ईश्वरी आदेश की उपेक्षा न करें।

अन्तःकरण मनुष्य का सब से सच्चा मित्र, निःस्वार्थ पथ-दर्शक और वात्सल्यपूर्ण अभिभावक है। वह न कभी धोखा देता है, न साथ छोड़ता है और न उपेक्षा करता है। पग-पग पर मनुष्य को सजग एवं सचेत बनाता हुआ सही मार्ग पर ही चलाने का प्रयत्न किया करता है। अपने अन्तःकरण पर विश्वास कर के चलने वाले व्यक्ति न कभी पथ-भ्रष्ट होते हैं और न किसी आपत्ति में पड़ते हैं। आपत्तियों का आगमन तब ही होता है जब मनुष्य अपने सच्चे शुभ-चिंतक अन्तःकरण पर अविश्वास करता है।

अन्तःकरण पर अविश्वास करने का मतलब है ईश्वर के आदेश पर अविश्वास करना। ईश्वर के आदेश पर अविश्वास करने वाला धृष्ट उसकी सृष्टि, इस संसार और अपर संसारों में यदि सुख की आशा करता है तो वह अपने समय का सब से बड़ा मूर्ख है। जब साधारण शासक के आदेश की अवहेलना करने वाला दण्ड का अधिकारी बने बिना नहीं रह सकता तब शासकों के भी शासक उस परमात्मा के आदेशों की अवहेलना किस प्रकार अदण्डनीय हो सकती है।

—स्वामी विवेकानन्द

—स्वामी विवेकानन्द


धर्म और ईश्वर निष्ठा की महान् आवश्यकता

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। सामाजिक होने का अर्थ इतना ही नहीं कि उसे समाज में रहने का अभ्यास है। सामाजिकता की परिभाषा इससे भी विशद है। सामान्य जीवन क्रम में उसे बहुतों के सहयोग की आवश्यकता होती है। कितनों का उत्तरदायित्व भी उसे निभाना पड़ता है। परिवार, कुटुम्ब, जाति, देश और सम्पूर्ण जीवन में जीवन-रस, ज्ञान और विविध साधन लेकर वह अनेक प्रकार के सुखोपभोग प्राप्त करता है। मनुष्य की सामाजिकता का अर्थ है कि उसे जिन-जिन से उपकार मिलता है वह उनके प्रति उपेक्षा या उदासीनता की वृत्ति न रखे। स्वार्थ के साथ परमार्थ का भी उसे पूरा ध्यान रहे।

अपने शरीर के सीमित दायरे में बहुत सारे सुखों को उपलब्ध कर लेना बड़ी आसान बात है। मनुष्य जैसे अपार क्षमता वाले प्राणी के लिये यह कोई बड़प्पन की बात नहीं है कि अपनी तृष्णा, अपनी वासना की पूर्ति में ही लगा रहे। नीचे आने का क्रम बड़ा आसान है, पानी को नीचे बहाना हो तो यह कोई कठिन कार्य नहीं, ऊँचे से नीचे उतरने के लिये कोई भी फिसल सकता है, पर यदि ऊँचे उठकर कुछ श्रेष्ठतर कार्य करने हों तो बड़े साहस और बड़ी कर्त्तव्यनिष्ठ की आवश्यकता होगी। मनुष्य की स्वार्थपरता इसके लिये पर्याप्त न होगी, उसे परमार्थ का भी उतना ही ध्यान रखना पड़ेगा। समाज की सुख-शान्ति और समुन्नति इन कर्त्तव्यों का समुचित पालन करने से ही हो सकती है। स्वार्थ और परमार्थ में समन्वय और सन्तुलन रखे बिना मनुष्य सामाजिक प्राणी होने की कसौटी पर खरा सिद्ध नहीं होता।

ऋषियों ने मनुष्य-जीवन के प्रत्येक क्षेत्र का बड़ी गहराई तक अध्ययन किया उससे सम्बन्धित अनेकों सात्विक, मनोवैज्ञानिक, सैद्धान्तिक तथा व्यावहारिक तथ्यों की खोज की। उन्होंने मनुष्य को दो रूपों में विभक्त किया। एक उसका साँसारिक रूप था और दूसरा आध्यात्मिक। यहीं से धर्म का प्रादुर्भाव हुआ। पूर्वज इस बात को समझते थे कि मनुष्य की आत्मा अनेक जन्मों के कुसंस्कारों का मलावरण और अज्ञान अपने आप में चढ़ाये हुये होती है और वह इस मनुष्य रूप में प्रकट होने पर साँसारिकता में बड़ी जल्दी ग्रास हो जाता है और चौरासी-लाख योनियों वाले जीवों की तरह के कार्यों में ही इसे काम लेने लग जाता है। भोगों की अतृप्त आकांक्षा उसे बार-बार उधर घसीटती है।

इन दिनों निजी स्वार्थ बहुत बढ़ गये हैं उनमें कोई किसी प्रकार की कमी नहीं करना चाहता। कहने को कुछ लोग जप-तप, दान-दक्षिणा, तीर्थ-व्रत आदि भी करते हैं किन्तु आज यह सब उन स्वार्थपूर्ण प्रवृत्तियों पर पर्दा डालने वाली प्रवंचना मात्र बनकर रह गई। उससे मानव जीवन में जो सत्कर्मों, दया, क्षमा, उदारता, सेवा सहिष्णुता का विकास होना था वह जरा भी नहीं हो पाता वरन् इससे सामाजिक स्थिति और भी खराब, भ्रमपूर्ण और कष्टदायक हो जाती है।

इन बुराइयों से मनुष्य को सावधान रखने और मनुष्य जीवन जैसी सर्वथा दुर्लभ वस्तु का सदुपयोग करने के लिये ऋषियों ने मनुष्य जीवन के आध्यात्मिक पहलू का बड़ी तत्परता के साथ पूर्ण वैज्ञानिक पद्धति से विकास किया। धर्म की मान्यतायें काल्पनिक नहीं हैं, उनके पीछे पूर्व जनों के कठिन परिश्रम, गहन शोधों के सत्परिणाम संयुक्त हैं। इसीलिये वे इतनी सुन्दर बन गई हैं कि उनसे एक व्यक्ति का भी भला होता है और सामाजिक वातावरण भी स्वर्गीय बनता है।

भारतवर्ष में किसी जमाने में आध्यात्मिकता का बहुत अधिक विकास हुआ था। इतिहास साक्षी है कि उस समय यहाँ के लोग कितने सुखी, सम्पन्न और समुन्नत थे। यहाँ किसी बात का अभाव न था। यहाँ का समाज देव-समाज कहलाता था। दुष्प्रवृत्तियों का कहीं नामों-निशान तक न था, यही कारण था कि यह देश स्वर्ग की सी गरिमाओं से विभूषित था और जीवनमुक्त आत्मायें भी यहाँ बार-बार लौट-लौट कर जीवन धारण करने के लिये आतुर रहा करती थीं।

धर्म मनुष्य समाज को सुव्यवस्थित, सुनियन्त्रित एवं सुविकसित रखने में सर्वप्रथम और शक्तिशाली सिद्ध हुआ है। पर खेद है कि आज उसे वह प्रतिष्ठा प्राप्त नहीं जो होनी चाहिये थी। समाज यद्यपि इसका दोषी नहीं है। कुछ अर्थों में तो वह इसके लिए प्रशंसा का पात्र ही समझा जाना चाहिये कि उसने अपने विवेक के द्वारा आज के तथाकथित मिथ्यावादी धर्म का भंडाफोड़ किया और उसमें उच्छृंखल तत्वों की दाल न गलने दी। किन्तु अपने सच्चे और स्वाभाविक रूप में धर्म और आध्यात्म ही ऐसा है जो मनुष्य समाज की प्रत्येक गुत्थी को सुधार सकता है। धर्म मनुष्य को सुसंस्कृत और सुसंस्कारित बनाने वाली सर्वांगपूर्ण प्रक्रिया का नाम है। उसे धारण करने से ही मनुष्य का व्यक्तिगत जीवन भी सार्थक होना संभव है।

स्मृतियों में धर्म के जो लक्षण बताये गये हैं उनमें त्याग, क्षमा, दया, समता, सेवा, परोपकार को ही सर्वश्रेष्ठ माना गया है। यह गुण जहाँ व्यक्तिगत जीवन में शान्ति और सन्तोष प्रदान करने वाले हैं वहाँ इनका आचरण भी समाज में ही हो सकता है फलस्वरूप सामाजिक जीवन में भी वैसे ही सद्परिणामों का दिखलाई देना स्वाभाविक है।

मनुष्य के भौतिकवादी दृष्टिकोण पर नियंत्रण रखने के लिये आध्यात्मिक तत्व बड़े आवश्यक हैं। शरीर को ही सर्वप्रमुख वस्तु समझने की भूल ने मनुष्य को बड़ा धोखा दिया है। अपने मूल कलेवर आत्मा का वेधन और ज्ञान किये बिना मनुष्य की स्वार्थ पूर्ण प्रवृत्तियाँ कम नहीं होतीं, पर जब उसे यह मालूम पड़ता है कि मनुष्य एक विज्ञान है और वह विश्वव्यापी प्राण तत्व परमात्मा से निर्गत हुआ अत्यन्त अल्प क्षमता वाला प्राणी है तो उसका सारा अहंभाव नष्ट हो जाता है। विराट जगत की कल्पना का ईश्वर के अस्तित्व को मान लेने के बाद दूसरों को सताने या छल-कपट, द्वेष, पाखण्ड, दम्भ और दुराचार का व्यवहार करने में प्रायः हर किसी को भय लगता है। यह भय ईश्वर का भय है। यही सामाजिक दुष्प्रवृत्तियों से हर लक्षण, हर घड़ी सजग रखता है। ऐसी व्यवस्था न तो कानून में है न किन्हीं स्थानीय प्रतिबन्धों में। जब तक मनुष्य कण-कण में विद्यमान आत्मतत्व के भाव को हृदयंगम न कर लेगा कानूनी व्यवस्थाएं चाहें कितनी ही कठोर क्यों न कर दी जाँय बुराइयाँ कभी कम नहीं हो सकतीं। ऐसे अवसर बराबर आते हैं जब मनुष्य कानून की पकड़ से बच सकता है या उसे धोखा दे सकता है। जब तक दंड से बच निकलने का विश्वास बना रहेगा तब तक कोई भी व्यक्ति पाप या दुराचरण से न डरेगा। उजागर न सही पर छिपे तौर पर तो बुराइयाँ वह करेगा ही। रिश्वत लेगा, मिलावट करेगा, कम तौ लेगा और भी तरह तरह के कपट-पूर्ण कार्य करेगा फलस्वरूप सामाजिक व्यवस्था में गड़ गड़ी भी अवश्य ही फैलेगी।

आस्तिकता मनुष्य के आत्मभाव को विकसित कर उसे सबकी कुशलता में अपनी कुशलता अनुभव करने की प्रेरणा देती है। स्पष्ट है कि ऐसी अवस्था में कोई भी व्यक्ति किसी के साथ प्रकट या अप्रकट कोई अभद्र व्यवहार न करेगा। यह बात सब के अन्दर आ जाय तो निस्सन्देह मनुष्य समाज का स्तर बहुत ऊँचा उठ जाय।

ईश्वर पर विश्वास करने और आत्मा की सर्वज्ञता अनुभव करने के अनेक आधार हैं अतः इसे व्यवस्था से सहायक केवल मनोवैज्ञानिक उपचार मात्र नहीं कहा जा सकता। यह संसार कर्त्ता और कर्म के अडिग सिद्धान्त पर टिका हुआ है। प्रत्येक वस्तु का कोई न कोई जन्मदाता भी अवश्य है। फिर इस विराट जगत का भी तो नियन्ता होना चाहिये अन्यथा इतने सूक्ष्म गणित के सिद्धान्त पर फैली हुई साँसारिक व्यवस्था न मालूम कब की अस्त-व्यस्त हो गई होती। जहाँ मनुष्य की बुद्धि नहीं पहुँच पाती, जहाँ उसकी कोई योजना कार्य नहीं कर सकती वहाँ भी प्रकाश है, वहाँ भी गतिविधियाँ जारी हैं यह सब किसी प्रकार नियंत्रित होनी चाहिये और यह भी स्पष्ट है कि इस कार्य को कोई भगवान् जितना शक्तिशाली तत्व ही पूरा करता होगा। हिन्दू धर्म ग्रन्थों में इस सम्बन्ध में जो व्यापक अनुसंधान हुआ है वह सम्पूर्ण विश्व के लिये कल्याण का साधन है।


जीवन को भव्य बनाने वाली- ब्रह्मविद्या

ईश्वर उपासना का प्रभाव मनुष्य के जीवन निर्माण में किस प्रकार होता है इसको समझने के लिये आत्मा के स्वरूप और उसका परमात्मा के साथ क्या सम्बन्ध है यह जानना बहुत जरूरी है। जब मनुष्य अपने आप को शरीर तथा इन्द्रियों से पृथक देखता है और आत्मिक दृष्टिकोण से समझने का प्रयत्न करता है तो उसकी बुद्धि में एक नये ज्ञान का प्रकाश उत्पन्न होता है। वह समझता है कि यह इन्द्रियाँ, यह शरीर आत्मोत्थान के महत्वपूर्ण साधन मात्र हैं अतः इनका सदुपयोग भी करना चाहिये। पर इनके विषयों में आसक्त न होना चाहिये। इस प्रकार धारणा जब तक पक नहीं जाती तब तक मनुष्य को विचार-विभ्रम होता रहता है, पर जैसे ही इस प्रकार की निश्चयात्मक बुद्धि बनी कि यह शरीर तो कोई नष्ट हो जाने वाली वस्तु है वहीं मृत्यु का भय छूट जाता है। भय और प्रलोभनों से मुक्त होना अथवा आत्मा के स्व वश होना ही जीवन-मुक्ति है। इसी का नाम ब्रह्म-विद्या है।

वेद और उपनिषदों में जो ज्ञान संग्रहित है उससे मालूम पड़ता है कि ऋषियों ने इसी विद्या के प्रकाश में अनन्त ऐश्वर्यशाली परमात्मा का साक्षात्कार किया। मनुष्य के साथ उस परमात्मा का क्या सम्बन्ध है इसे भी स्थान-स्थान पर प्रकट किया है। परम्परा, प्रतिपादन पद्धति तथा ज्ञातव्य आदि के भेद से इन वर्णनों में अनेक रुपता तो है, पर उनमें विरोधाभास नहीं है। कुछ अंश तो एक दूसरे के पूरक हैं, कुछ में केवल साधना पद्धति की भिन्नता है, तथापि ब्रह्मविद्या के इन अनेक रूपों के अन्तस्तल में स्वरूपगत एकता बनी हुई है। ब्रह्म की शक्ति और उसके जीवन को भव्य बनाने के संबंध में उनमें कहीं भी मतभेद नहीं है। परमात्मा की उपासना चरित्र निर्माण का अत्यन्त आवश्यक अंग है, यह बात यह सब स्वीकार करते हैं।

परमात्मा की दिव्य-शक्ति का अवतरण मनुष्य के जीवन में किस प्रकार होता है, इस सम्बन्ध में ऋषियों की सैद्धान्तिक मान्यता यह है—

य आत्मदा बलदा यस्य विश्व उपासतेप्रशिषं यस्य देवाः यस्यच्छाया अमृत यस्य मृत्युः कस्मै देवाय हविषा विधेम॥

- यजु 25। 13

यह परमेश्वर उपासनीय है क्योंकि उसके चिन्तन से मनुष्य को आत्मा के स्वरूप को समझने में सहायता मिलती है। आत्म-ज्ञान उसके अन्दर महान बल पैदा करता है सारे विश्व में उसका महत्व आच्छादित है पर उसे पाते वही हैं जो उसके प्रशासन में रहते हैं अर्थात् उसकी आज्ञायों का पालन करते हैं।

ब्रह्मविद्या का सम्पूर्ण गूढ़ तत्व इस मंत्र में निचोड़कर रख दिया है। यह सच बात है कि जब तक लोगों में ऐसा विश्वास या जिज्ञासा नहीं पैदा होती कि इस विश्व का अन्तिम निर्णायक कोई परमेश्वर है तब तक वे केवल साँसारिक कर्मों में, लौकिक और भौतिक सुखों की उपलब्धि में ही लगे रहते हैं। ईश्वर की बात और उसके अस्तित्व पर विश्वास होते ही भौतिक दृष्टिकोण का एकाएक विराम होता है और उसकी मानसिक चेष्टायें अन्तर्मुखी होने लगती हैं। मनुष्य के विचार और अनुभव का क्षेत्र जितना अधिक विकसित होता है उतना ही उसे इन्द्रियों और उसके विषयों की निस्सारता समझ में आने लगती है। जिन कार्यों में लोग प्रमादवश अपनी शक्ति और सामर्थ्य ही गंवाया करते हैं वह उन्हें रोक कर आत्म शोधन की साधना में लगाता है फलस्वरूप उसकी आत्मिक प्रगति होती है और वह अपने सूक्ष्म आध्यात्मिक स्वरूप को भी समझने लगता है।

आत्मा की मान्यता जितना ही दृढ़ होती जाती है मृत्यु का भय उतना ही दूर हो जाता है इससे उसके हृदय में बल का संचार होता है किन्तु इस समय मन की अधोगामी प्रवृत्तियाँ भी चुप नहीं रहतीं। संसार के दूषित तत्व भी उसे अपनी ओर आकर्षित करते हैं। इसलिये कहा है कि इस संघर्ष काल में जो जागृत पहरेदार की तरह सदैव सावधान रहते हैं और ईश्वरीय आदेशों का पालन करते रहते हैं, ईश्वर की पूर्ण कृपा उसे ही प्राप्त होती है। उसी का जीवन भव्य बनता है।

ईश्वर की आज्ञाएं क्या हैं हमारे लिये समझने के लिये यह सब से कठिन बात नहीं है। आमतौर पर हमारे जीवन की प्रत्येक गतिविधि का संचालन मन करता है और अपना अच्छा-बुरा जैसा भी कुछ मन है उसकी बातों को ही ईश्वर की आज्ञाएं मानकर पूरा किया करते हैं। किन्तु जब कभी मन कोई बुरा कर्म करता है तो उससे अन्तःकरण में दुःख प्रकट होता है। परमात्मा का आदेश समझने की सीधी कसौटी यही है जिन कार्यों से आत्म-हीनता, असंतोष और अशान्ति उत्पन्न होती हो उन्हें न करना और जिनसे दिव्य तत्वों की वृद्धि होती हो आत्म सुख, सन्तोष और शान्ति मिलती हो उनका विकास करना ही ईश्वर की आज्ञाओं का पालन करना है।

मन की प्रवृत्ति आमतौर पर अधोमुखी होती है इसलिये आत्मा को अपनी बुद्धि और सामर्थ्य का प्रयोग करना चाहिये। मन को बुरे कर्मों से बार-बार हटाने और उसे शुभ कर्मों में लगाये रखने से कुछ दिन में उसकी प्रवृत्ति भी सतोगुणी हो जाती है। पाप करने या बुद्धि का दुरुपयोग करने से ईश्वर की व्यवस्था के अनुसार उसको लज्जित होना पड़ेगा और उसका सिर झुका रहेगा। पर सत्कर्म लौकिक या आत्मिक सभी दृष्टियों से मनुष्य को सुख प्रदान करने वाले ही होते हैं और उनसे अपना आत्माभिमान भी विकसित होता है। शक्तियों और सामर्थ्यों का विकास भी उसी क्रम से होता है।

यह बात तो सभी चाहते हैं कि हमारे मन में बुरे विचार कभी न आवें। हम सदा शान्ति और आनन्दमय रहें, दुःख का भान न हो। इसके लिये लोग प्रयत्न भी करते हैं किन्तु संसार की गति भी कुछ ऐसी है कि मन को आघात पहुँचाने वाली घटनायें यहाँ घटती रहती हैं, उन घटनाओं को सहते हुये भी जो मन को वश में रखता है और उसे शुभ संकल्पों से रिक्त नहीं होने देता ईश्वर की आज्ञाओं का सच्चे मन से वही पालन कर सकता है। जो मन को चञ्चल, अस्थिर या विकारपूर्ण नहीं होने देते वह सच्चे साहसी, धीर, वीर और गंभीर होते हैं। इन दैवी सत्प्रवृत्तियों के आधार पर निरंतर उसे परमात्मा की कृपा प्राप्त होती रहती है और वह आत्म विकास की साधना से उत्तरोत्तर सफल होता हुआ आगे बढ़ता रहता है।

आत्मा के विकास और ईश्वर की प्राप्ति के लिये केवल दैवी गुण भी चिरकाल तक नहीं टिक सकते, ईश्वर-भक्ति, जप, उपासना आदि आवश्यक हैं किन्तु जहाँ भक्ति हो वहाँ श्रद्धा, प्रेम, विश्वास, दया, करुणा, उदारता, त्याग, सहयोग, सहानुभूति, क्षमा आदि दैवी गुण भी अवश्य होने चाहिये। कर्म चाहे जैसे करो, ईश्वर सब क्षमा करेगा—इस मान्यता ने व्यक्ति और समाज दोनों का बड़ा अहित किया है। ईश्वर को मानने का दावा करने वाले लोग दैवी गुणों की परवाह न करके इस भ्रम में पड़ गये हैं कि गुणों का विकास चाहे हो या न हो ईश्वर भक्ति से हमारा सब कुछ ठीक हो जायगा। इस संकीर्ण दृष्टिकोण ने ब्रह्म-विद्या के सच्चे स्वरूप की आस्थाओं को भी नष्ट कर दिया है और बुद्धि प्रधान लोग उसे संदेह की दृष्टि से देखने लगे हैं।

मनुष्य जीवन बड़े सौभाग्य की वस्तु है, उससे भी बड़ा सौभाग्य ईश्वर में विश्वास होना है। कदाचित् लोगों का मन जप-तप और उपासना में लग जाय तो उन्हें अपने ऊपर परमात्मा की कृपा समझनी चाहिये पर साथ ही अपने दुर्गुणों और दुष्प्रवृत्तियों के निवारण के लिये भी प्रयत्नशील होना आवश्यक है। अपने आस-पास सभी प्रकार का ऐसा वातावरण रखना चाहिये जिसमें गुणों को विकसित करने वाली सब चीजें हों। इसमें यदि किसी प्रकार की साँसारिक हानि होती हो तो उसे भी ईश्वर का आदेश मानकर पूरा करना चाहिये। सद्गुणों के विकास में किया हुआ कोई भी त्याग कभी भी व्यर्थ नहीं जाता।

भारतीय आर्यों ने ईश्वर उपासना को मनुष्य जीवन का अत्यन्त आवश्यक अंग बनाया है और प्रकारान्तर से उसकी अनेक सिद्धियों, सामर्थ्यों का वर्णन भी किया है। अनेक तरह के साधन और विधानों को भी इसी दृष्टि से निकाला गया है कि हर स्थिति हर अवस्था तथा देश, काल और परिस्थितियों में भी लोग ईश्वर-उपासना के महान लाभ प्राप्त कर सकें किन्तु कर्म के क्षेत्र में सबको एक स्थान पर बाँध दिया है। इस जगत में मनुष्य से लेकर छोटे से छोटे कीटाणु तक जितने भी प्राणी हैं उन सबसे हमारा सम्बन्ध है, उन सबका हमारे ऊपर ऋण है। उन सबके प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष सहयोग से ही हमारा कल्याण हो रहा है अतः उनके प्रति भी हमारा कुछ न कुछ कर्त्तव्य है। हम उन्हें भले ही न पहचान सकें पर परमात्मा तो सर्वज्ञ है वह तो यह सब कुछ देख ही रहा है। फिर यदि हम कोई ऐसा कार्य करेंगे जिससे दूसरों को नुकसान होता हो तो वह चाहे जैसा कर्म होगा परमात्मा हमारे ऊपर अप्रसन्न हो जायगा। ऐसी स्थिति में उस उपासना का भी क्या महत्व रहेगा जो ईश्वर को प्रसन्न करने के लिये की जाती है।

ब्रह्म-विद्या मनुष्य को ईश्वर उपासना तक ही सीमित नहीं रखती प्रत्युत उसे प्राणिमात्र के प्रति अपने कर्त्तव्यों का उचित रीति से पालन करना भी सिखाती है। अपनी व्यक्तिगत सामर्थ्यों को विकसित करने की शिक्षा देती है। (1)उपासना (1)आत्मशोधन और (3)परमार्थ इन तीन श्रेणियों में विभक्त होकर जो ईश्वर की आज्ञाओं का पालन करते हैं ब्रह्म-विद्या उनके जीवन को भव्य बना देती है। उन्हें स्वर्ग और मुक्ति का उत्तराधिकार प्रदान करती है।

ब्रह्म-विद्या मनुष्य को ईश्वर उपासना तक ही सीमित नहीं रखती प्रत्युत उसे प्राणिमात्र के प्रति अपने कर्त्तव्यों का उचित रीति से पालन करना भी सिखाती है। अपनी व्यक्तिगत सामर्थ्यों को विकसित करने की शिक्षा देती है। (1)उपासना (1)आत्मशोधन और (3)परमार्थ इन तीन श्रेणियों में विभक्त होकर जो ईश्वर की आज्ञाओं का पालन करते हैं ब्रह्म-विद्या उनके जीवन को भव्य बना देती है। उन्हें स्वर्ग और मुक्ति का उत्तराधिकार प्रदान करती है।

ब्रह्म-विद्या मनुष्य को ईश्वर उपासना तक ही सीमित नहीं रखती प्रत्युत उसे प्राणिमात्र के प्रति अपने कर्त्तव्यों का उचित रीति से पालन करना भी सिखाती है। अपनी व्यक्तिगत सामर्थ्यों को विकसित करने की शिक्षा देती है। (1)उपासना (1)आत्मशोधन और (3)परमार्थ इन तीन श्रेणियों में विभक्त होकर जो ईश्वर की आज्ञाओं का पालन करते हैं ब्रह्म-विद्या उनके जीवन को भव्य बना देती है। उन्हें स्वर्ग और मुक्ति का उत्तराधिकार प्रदान करती है।


सच्चा परोपकार

संसार में न जाने कितने ऐसे परोपकारी हो गये हैं, हो रहे हैं और आगे भी होते रहेंगे जिन्होंने किसी कीर्ति, ख्याति, लोभ अथवा लाभ के लिये नहीं बल्कि मनुष्यता की उदात्त भावना से प्रेरित होकर स्वान्तः सुखाय मानव कल्याण के लिये अपार कष्ट सहा, सह रहे हैं और सहते रहेंगे। इतिहास के खुले पन्नों में देखे हुये महान पुरुषों की अपेक्षा ऐसे बेनाम उपकारी अधिक महान हैं, इसमें संदेह नहीं। ऐसे ही अनेक गुमनाम धाम उपकारियों ने अपनी अमूल्य सेवाओं से पनामा नहर के बनते समय मानवता को उपकृत किया था।

एक द्वीप से दूसरे द्वीप तक एक देश से दूसरे देश का संपर्क स्थापित करने के लिये जल मार्ग पनामा नहर का निर्माण हो रहा था। उन दिनों अनेक भयंकर रोगों का प्रकोप था जिनमें से मलेरिया का रोग तो महामारी की तरह फैला हुआ था और इस रोग को साधारण रोग नहीं असाध्य रोग समझा जाता था। एक बार जिसको यह रोग पकड़ लेता था उसे या तो समाप्त करके छोड़ देता था अथवा इतना कमजोर कर देता था कि वह किसी काम के योग्य न रहता था।

मलेरिया का यह भयंकर रोग पनामा नहर पर काम करने वाले सैकड़ों हजारों मजदूरों में फैल गया जिससे जाने कितने मजदूर मर गये और कितने बुरी तरह बीमार पड़ गये। बड़ा हाहाकार मच गया। ऐसा लगने लगा कि इस रोग के कारण न केवल पनामा का निर्माण ही रुक जायेगा बल्कि अगणित मनुष्यों का संहार हो जायेगा।

उपचार करने वाले उपचार करने में लग गये और डॉक्टर मलेरिया का समूल नष्ट करने के उपायों में जुट गये। इस रोग के समूल विनाश के लिये डॉक्टरों को कठिन प्रयोग की आवश्यकता पड़ी। उन्होंने कहा कि यदि हमको कुछ ऐसे आदमी मिल जायें जिनके शरीर में मलेरिया के कीटाणुओं को प्रवेश कराकर उसकी प्रक्रिया एवं प्रतिक्रिया का अध्ययन किया जा सके तो सम्भव है कि हम लोग मलेरिया के समूल विनाश के उपाय खोज निकालें।

कठिन कार्य था, मलेरिया के कष्ट से लोग परिचित थे। तब भी क्या किसी कष्ट के भय से मानव कल्याण के इतने बड़े कार्य को अधूरा रहने दिया जाता। निदान अनेक ऐसे आदमी आगे आये जिन्होंने अपने स्वस्थ शरीर में मलेरिया के कीटाणु प्रवेश कराकर डॉक्टरों को उपचारक उपाय खोज निकालने में सहायता दी, किन्तु जिनका आज तक संसार को पता नहीं चल सका।


धरती के स्वर्ग को प्राप्त कीजिये।

संसार से अलग कहीं कोई स्वर्ग अथवा नरक है—इसकी खोज खबर करने से कहीं अच्छा है कि मनुष्य अपनी इस धरती पर विद्यमान स्वर्ग-नरक की खोज करके पहचाने और उसे पाने अथवा उससे बचने का प्रयत्न करे।

अभौतिक स्वर्ग एवं नरक अप्रत्यक्ष हैं। उन्हें आपने कब देखा, अथवा कब पाया, इसका दृष्टिगोचर प्रत्यक्ष प्रमाण इस समय हम साधारण मानवों के पास नहीं हाँ, धरती के स्वर्ग-नरक हमारे सामने हैं। उनको इस चर्म चक्षुओं से देखा जा सकता है और उनको पाया अथवा बचा जा सकता है।

स्वर्ग एवं नरक का स्थल अर्थ है सुख तथा दुःख जो व्यक्ति अन्दर तथा बाहर से सुखी एवं प्रसन्न है वह स्वर्ग में स्थित है और जो अन्दर बाहर से दुःखी अथवा अप्रसन्न है वह नरक में स्थित है। मनुष्य इस भौतिक स्वर्ग-नरक को अपने भौतिक शरीर से ही पा सकता है, उसे देख सकता है और अपनी इन्द्रियों द्वारा उसके रस अथवा विष को अनुभूत कर सकता है।

स्वर्ग एवं नरक की उभय स्थितियों में से कोई भी व्यक्ति स्वर्गीय-स्थिति की ही कामना करेगा। ऐसा कौन मूर्ख अभागा होगा जो नरक की यातना में जलना चाहेगा। मनुष्य से लेकर कीट पतंग तक जितने भी जीवधारी हैं, वे सब स्वर्ग अर्थात् सुख की स्थिति ही पाने की कोशिश किया करते हैं उनमें से बहुत से पाते हैं और अनेक असफल भी रहते हैं। स्वर्ग-नरक के प्रति प्राणियों की अनुभूति इतनी तीव्र है कि एक अबोध शिशु तक अपने हास रुदन से यह सूचित कर देता है कि वह उस समय स्वर्ग की स्थिति में है अथवा नरक की यातना में। अनुभूति की यह तीव्रता और ह्रास-रुदन के रूप में उसकी अभिव्यक्ति इस बात का प्रमाण है कि मनुष्य ही क्यों प्राणी मात्र स्वर्ग की ही स्थिति चाहता है, नरक की नहीं। यही उसका चरम लक्ष्य भी है और यही उसका चरम विकास।

स्वर्ग क्या है! सुख-शाँति, आनन्द मंगल कुशल प्रेम तथा पुण्य प्रकार की परिस्थिति ही स्वर्ग है! इस स्थिति में मनुष्य का मन प्रसन्न शरीर स्वस्थ तथा आत्मा सस्मित रहा करती है। वह दिन-दिन उन्नति करता हुआ, सफलताओं की वरमाला पहनता हुआ संसार में पुण्य प्रताप के बल पर कीर्तिमान होकर अमर हो जाता है। भौतिक शरीर में प्रसन्न परिस्थितियों के बीच निवास करना ही स्वर्गीय भोग है और अन्त में यहाँ—शरीर से निर्लिप्त होकर अमरत्व पा लेना स्वर्ग का अन्तिम एवं लक्ष्य फल है।

इस समुन्नत स्वर्गीय स्थिति तक पहुँचने के लिये सोपान-परम्परा को ‘सदाशयता’ का एक नाम दिया जा सकता है। सब कुछ सही एवं शुभ ही करना स्वर्ग की पावन परिस्थिति की ओर अग्रसर होना है।

मनुष्य एक जीवन है और जीवन का ठीक-ठीक अर्थ है सुस्वास्थ्य। स्वास्थ्य स्वर्ग का प्रथम एवं मूलभूत सोपान है। स्वस्थ शरीर, स्वस्थ मन और स्वस्थ आत्मा का त्रिविष्टिप ही सच्चा स्वर्ग है। इसे प्राप्त कर लेने पर स्वर्ग की अन्य सारी सहायक परिस्थितियाँ स्वयं प्राप्त हो जाती हैं।

शरीर हृष्ट-पुष्ट एवं बलिष्ठ है तो मनुष्य धरती को चीरकर सुख का श्रोत्र निकाल लेगा। आवश्यकतानुसार दिन रात परिश्रम कर सकता है। कलावती, अशाँति, अनिद्रा अथवा अजीर्ण निकट नहीं आ सकते। निराशा एवं चिन्ता की परिस्थिति उसे विचलित नहीं कर सकती। स्वस्थ श्रम से उद्दीप्त उसकी क्षुधा साधारण अन्न को पचा कर उसे परम तृप्ति प्रदान करने में समर्थ रहती है, जिससे उसे संतोष होगा। लिप्सा एवं लोलुपता से रक्षा होगी। स्वस्थ शरीर ऋतुओं का आनन्द, प्रकृति का सौंदर्य अनुभूत करा के स्वर्गीय सुख ही प्रदान करता है। जलवायु का परिवर्तन उस पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं डाल पाता। स्वस्थ मनुष्य सदैव प्रसन्न एवं प्रमुदित रहा करता है। व्यग्रता, विवशता उसके पास होकर नहीं गुजरती। मनुष्य की इस निरोग अवस्था को स्वर्गीय स्थिति के सिवाय और क्या कहा जा सकता है।

जो पुष्ट एवं बलिष्ठ है वह निर्द्वन्द्व ही रहा करता है। उसको न तो किसी शत्रु से भय और न किसी संघर्ष के प्रति चिन्ता ही रहा करती है। स्वस्थ मनुष्य का स्वभाव सहज रूप से मधुर एवं सौजन्यपूर्ण रहा करता है। अक्रोध के कारण वह बहुधा अजातशत्रु ही रहता है तथापि यदि कोई अकारण द्वेषी दुष्ट उससे बैर बाँधता भी है तो वह उससे हर प्रकार से निपट लेने की सामर्थ्य रखता है उसे शंका अथवा भय नहीं रहता अपने स्वस्थ एवं सशक्त शरीर के भरोसे वह सदा निर्भय रहा करता है। अभयता स्वर्ग की एक उत्कृष्ट अनुभूति है, स्वस्थ-व्यक्ति जिसका सहज अधिकारी होता है।

मन को ईर्ष्या, द्वेष, कलह क्लेश तथा कामनाओं के कलुष से बचाइए। सदाचार विचार से उसे उज्ज्वल एवं उन्नत बनाइये। प्रसन्न वातावरण के बीच प्रसन्नचेता व्यक्तियों के साथ रहिये। क्रोध से इसकी रक्षा कीजिये और संकीर्णता की सीमा में तोड़ कर स्वर्गीय क्षितिज में विस्तृत होने दीजिए। शुभ कल्पनाओं, सद्भावनाओं एवं शिव संकल्पों से इसे बनाइये आपका मानस आप के लिये प्रत्यक्ष स्वर्ग ही बन जायेगा। पुण्य प्रयत्नों से प्रसन्न किया हुआ कुँठा रहित मन स्वर्ग ही क्या बैकुँठ धाम की परिस्थिति उत्पन्न कर देता है।

सत्संग, स्वाध्याय, चिन्तन तथा चारु-चरित्र से आत्मा को प्रबुद्ध कीजिए। उन पर पड़े कुसंस्कारों के आवरण को पुण्य कर्मों से जला डालिये। परोपकार एवं परमार्थ में आस्था रखिये। आस्तिकता के बल पर आत्मा की उपस्थिति पहचानिए, उसे प्रत्यक्ष होने का अवसर दीजिये। आप की बुद्ध एवं प्रबुद्ध आत्मा अपने भीतर छिपे शत-शत स्वर्गों को आपके लिए प्रत्यक्ष एवं उपलक्ष्य बना देगी।

स्वास्थ्य के बाद स्वर्ग का दूसरा सोपान है परिवार। परिवार में प्रेम एवं प्यार का संचार कीजिए। श्रम एवं सहनशीलता के बल पर कलह क्लेश को पास मत आने दीजिए। अपने त्याग के उदाहरण से सदस्यों में त्याग भावना की प्रवृत्ति जगाइए, शिक्षा प्रसार करिये। अपने कर्तव्य एवं अधिकार का समुचित उपयोग करिये, संतोष एवं मितव्ययता का गुण सीखिये और सिखाइए। हर छोटे बड़े के बीच सहमति एवं सम्मति रखिये। पत्नीव्रत धर्म के साथ गृहस्थ का हर उचित कर्तव्य निबाहिये, हर मूल आवश्यकता की पूर्ति करिये और प्रत्येक कृत्रिम आवश्यकता को दूर भगाइये, परिवार की सुख सुविधा के लिये अगाध श्रम कीजिये, परिवार का पालन पवित्र कमाई से करिये। झूठ, प्रपंच तथा छल कपट की दूषित कमाई के अन्न से बच्चों के संस्कार न बिगाड़िये। इस प्रकार उत्पन्न किया हुआ पारिवारिक सुख पृथ्वी का जीता जागता स्वर्ग है।

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी भी है। समाज में रहता हुआ मनुष्य यदि उसकी उपेक्षा करके अपना स्वर्ग अलग से बसा लेना चाहे तो यह उसके लिये कठिन भी होगा और अनुचित भी। समाज के साथ सुख सुविधाओं को मिल-बाँट कर भोग करने में एक व्यापक स्वर्ग का आनंद है। हमारे पास सुख सुविधायें हों और हम उनका केवल अपने परिवार के सदस्यों के साथ ही उपभोग करते रहते हैं और अपने पड़ोस में बसे परिवार को आवश्यकता ग्रस्त देखते रहते हैं, तो हमारा वह स्वर्ग दूषित हो जायेगा। यथा-साध्य समाज के साथ ही मिल बाँट कर उपभोग करने पर साधन एवं सुविधायें स्वर्गीय आनन्द देती हैं। हम स्वयं तो हँसते विहँसते रहें और पास की आह-कराह पर ध्यान न दें अथवा ध्यान देकर उपेक्षा कर दें तो हमारा वैधानिक स्वर्ग बहुत दिन सुरक्षित नहीं रह सकता।

हम सब एक राष्ट्र भी हैं। हमारा एक राष्ट्रीय अस्तित्व भी है। हमारी एक मातृभूमि तथा देश भी है जिसके प्रति हमारे अनेक कर्तव्य निश्चित हैं। उन कर्तव्यों का पालन न करने का अर्थ है अपने शारीरिक, पारिवारिक तथा सामाजिक स्वर्ग-सुख को कलंकित करना, राष्ट्रीय कर्तव्यों में मातृभूमि की रक्षा में बलिदान, उसकी उन्नति के लिये त्याग तथा उसके गौरव के लिये सदाचार का पालन करना, स्वर्गीय सुख उपलब्ध करने का एक सात्विक उपाय है। राष्ट्र की सेवाओं, व्यवसायों तथा निर्माण कार्य कर्मों में ईमानदारी के साथ अपना अंश दान करना एक पवित्र साधन है जिसका फल एक स्वर्गीय संतोष ही होगा।

राष्ट्र के बाद सार्वभौतिकता की भावना भी स्वर्गीय सुख का एक अग्रिम सोपान है। मानवता को भूल कर केवल राष्ट्र तक सीमित हो जाना भी एक स्वार्थ-पूर्ण संकीर्णता ही है। मानवता का दुख दूर करने को अंशदान करना, यथासम्भव उसकी सेवा करना, उसके लिए कष्ट उठाने की प्रवृत्ति का विकास करना, अपने वाँछित एवं अक्षय स्वर्ग की ओर बढ़ना ही है। सम्पूर्ण मानवता में आत्मीयता की भावना रखना ही ईश्वर के प्रधान अंश मनुष्य के लिये शोभनीय है। व्यष्टि से समष्टि एवं समष्टि से बढ़कर सार्वभौमिक बनने वाले महापुरुष जीवन भर स्वर्गीय अनुभूति का आनंद लेकर युग-युग के लिये यशः शरीर से अमर हो जाते हैं।

शारीरिक स्वास्थ्य से लेकर मानसिक एवं आत्मिक स्वास्थ्य का विकास करते हुये, समाज, राष्ट्र तथा अन्तर्राष्ट्रीय कर्तव्य-पालन के सात सोपानों पर अधिकार कर लेने वाला सत्पुरुष निश्चय ही इस धरा धाम पर ही सच्चे तथा प्रत्यक्ष स्वर्ग का अधिकारी बनता है। धरती का स्वर्ग पाना किसी भी व्यक्ति के लिए कठिन नहीं है यदि वह वास्तव में दैवी जीवन के साथ स्वर्ग सुख का आकाँक्षी है। संयम, सदाचार तथा सद्भावना रखने वाला सदाशयी व्यक्ति निश्चय ही इस प्रत्यक्ष एवं अक्षय स्वर्ग को प्राप्त कर सकता है। प्रत्येक को ही इस सम्पूर्ण स्वर्ग को पाने का प्रयत्न करना चाहिये नहीं तो कम से कम उसके एक दो सोपानों पर तो चढ़ ही जाना चाहिये।

शारीरिक स्वास्थ्य से लेकर मानसिक एवं आत्मिक स्वास्थ्य का विकास करते हुये, समाज, राष्ट्र तथा अन्तर्राष्ट्रीय कर्तव्य-पालन के सात सोपानों पर अधिकार कर लेने वाला सत्पुरुष निश्चय ही इस धरा धाम पर ही सच्चे तथा प्रत्यक्ष स्वर्ग का अधिकारी बनता है। धरती का स्वर्ग पाना किसी भी व्यक्ति के लिए कठिन नहीं है यदि वह वास्तव में दैवी जीवन के साथ स्वर्ग सुख का आकाँक्षी है। संयम, सदाचार तथा सद्भावना रखने वाला सदाशयी व्यक्ति निश्चय ही इस प्रत्यक्ष एवं अक्षय स्वर्ग को प्राप्त कर सकता है। प्रत्येक को ही इस सम्पूर्ण स्वर्ग को पाने का प्रयत्न करना चाहिये नहीं तो कम से कम उसके एक दो सोपानों पर तो चढ़ ही जाना चाहिये।

शारीरिक स्वास्थ्य से लेकर मानसिक एवं आत्मिक स्वास्थ्य का विकास करते हुये, समाज, राष्ट्र तथा अन्तर्राष्ट्रीय कर्तव्य-पालन के सात सोपानों पर अधिकार कर लेने वाला सत्पुरुष निश्चय ही इस धरा धाम पर ही सच्चे तथा प्रत्यक्ष स्वर्ग का अधिकारी बनता है। धरती का स्वर्ग पाना किसी भी व्यक्ति के लिए कठिन नहीं है यदि वह वास्तव में दैवी जीवन के साथ स्वर्ग सुख का आकाँक्षी है। संयम, सदाचार तथा सद्भावना रखने वाला सदाशयी व्यक्ति निश्चय ही इस प्रत्यक्ष एवं अक्षय स्वर्ग को प्राप्त कर सकता है। प्रत्येक को ही इस सम्पूर्ण स्वर्ग को पाने का प्रयत्न करना चाहिये नहीं तो कम से कम उसके एक दो सोपानों पर तो चढ़ ही जाना चाहिये।


मानवता की यह दशा

समर्थ होते हुये भी किसी दुखी अथवा आवश्यकता पीड़ित व्यक्ति की सहायता न करने वालों को क्या कहा जायेगा और क्या कहना होगा उन उपकारी आत्माओं को जो अपने सारे साधन मनुष्य की मदद के लिये मुक्त कर देते हैं। अठारह वर्षीया छात्रा जेन-एडम्स ऐसी ही महान आत्माओं से थी जिसने दूसरों का दुःख दूर करने के लिये अपने घर के द्वार खोल दिये थे।

घटना 1883 की है। अमेरिका के शिकागो शहर की छात्रा जेन-एडम्स उस समय लन्दन के एक कॉलेज में अध्ययन कर रही थी। वह छात्रावास से बहुधा कॉलेज पैदल ही जाया करती थी। इसका करण यह नहीं था कि उसके पास सवारी के लिये पैसों की कमी थी। वास्तविक कारण यह था कि वह रास्ते में दुखी, असहाय एवं आवश्यकता पीड़ित व्यक्तियों को देखती और उनका दुःख दर्द पूछती हुई जाया करती थी। उसे अपने इस कार्य से बड़ी आत्मिक सांत्वना मिला करती थी। उसका हृदय बड़ा कोमल तथा करुणापूर्ण था। वह दीन-दुखियों की सहायिका बनकर अपने मानव जीवन को सार्थक बनाना चाहती थी। उसके नित्य का यह कार्यक्रम उस भविष्य की भूमिका थी, जिसमें वह जन सेवा करने का विचार किये हुये थी।

एक दिन उसने देखा कि एक बालक किताबों के अभाव में स्कूल न जा सकने के कारण बुरी तरह रो रहा है। उसने फुटपाथों पर पड़े असहाय रोगियों को रोते कराहते देखा। उसने देखा कि बेरहम मालिक-मकान भाड़ा न चुका सकने की विवशता के कारण वर्षा से भीगी घोर जाड़ों की रात में किरायेदार को धक्का देकर बाहर निकाल रहा है और सामान फेंक रहा है। उसने देखा कि शिक्षा के अभाव में उसके पड़ोस की स्त्रियाँ बुरी तरह लड़ती-झगड़ती और गाली-गलौज करती हैं। उसने ऐसे अपंग और अपाहिजों को भी देखा जो दो दानों के लिये मुँह बाँये दम तोड़ रहे हैं।

कुमारी जेन-एडम्स के हृदय से एक आह निकल पड़ी और उसकी आत्मा कह उठी “मानवता की यह दशा”। जेन! जिनको तेरी सहायता की आज और अभी आवश्यकता है उनको तू भविष्य के लिये टाल रही है। कल किसने देखा है। जो कुछ कर सकती है इनके लिये आज अभी कर। कुमारी जेन-एडम्स के इन छोटे-छोटे परोपकारी अन्तर महानता ने उसे एक विख्यात समाज सेविनी बना दिया।

कुमारी जेन-एडम्स के हृदय से एक आह निकल पड़ी और उसकी आत्मा कह उठी “मानवता की यह दशा”। जेन! जिनको तेरी सहायता की आज और अभी आवश्यकता है उनको तू भविष्य के लिये टाल रही है। कल किसने देखा है। जो कुछ कर सकती है इनके लिये आज अभी कर। कुमारी जेन-एडम्स के इन छोटे-छोटे परोपकारी अन्तर महानता ने उसे एक विख्यात समाज सेविनी बना दिया।


प्रसन्नता की उपलब्धि सद्-विचारों से

जीवन में बालक से लेकर बूढ़े तक सभी प्रसन्नता चाहते हैं और उसे पाने का प्रयत्न करते रहते हैं। ऐसा करना भी चाहिये क्योंकि एक स्थायी प्रसन्नता जीवन का चरम लक्ष्य भी है। यदि मनुष्य-जीवन में प्रसन्नता का नितान्त अभाव हो जाये तो उसका कुछ समय चल सकना भी असम्भव हो जाये।

यह बात सत्य है कि मानव जीवन में अनुपात दुख क्लेश का ही अधिक देखने में आता है। तब भी लोग शौक से जी रहे हैं। इसका कारण यही है कि बीच-बीच में उन्हें प्रसन्नता भी प्राप्त होती रहती है और उसके लिये उन्हें नित्य नई आशा भी बनी रहती है। प्रसन्नता जीवन के लिये संजीवनी तत्व है। मनुष्य को उसे प्राप्त करना ही चाहिये। प्रसन्नावस्था में ही मनुष्य अपना तथा समाज का कुछ भला कर सकता है, विषण्णावस्था में नहीं।

प्रसन्नता वाँछनीय भी है और लोग उसे पाने के लिये निरन्तर प्रयत्न भी करते रहते हैं; किन्तु फिर भी कोई उसे अपेक्षित अर्थ में पाता दिखाई नहीं देता। क्या धनवान, क्या बालक और क्या वृद्ध किसी से भी पूछ देखिये क्या आप जीवन में पूर्ण संतुष्ट और प्रसन्न हैं? उत्तर अधिकतर नकारात्मक ही मिलेगा। उसका पूरक दूसरा प्रश्न भी कर देखिये—तो क्या आप उसके लिये प्रयत्न नहीं करते? नब्बे प्रतिशत से अधिक उत्तर यही मिलेगा— “कि प्रयत्न तो बहुत कुछ करते हैं किन्तु प्रसन्नता मिल ही नहीं पाती”। निःसन्देह मनुष्य की यह असफलता आश्चर्य ही नहीं दुःख का विषय है।

कितने खेद का विषय है कि आदमी किसी एक विषय अथवा वस्तु के लिये प्रयत्न करे और उसको प्राप्त न कर सके। ऐसा भी नहीं कि कोई उसे प्राप्त करने में कम श्रम करता हो अथवा प्रयत्नों में कोताही रखता हो। मनुष्य संपूर्ण अणु-क्षण एकमात्र प्रसन्नता प्राप्त करने में ही तत्पर एवं व्यस्त रहता है। वह सोते, जागते, उठते, बैठते, चलते, फिरते जो कुछ भी अच्छा बुरा करता है सब प्रसन्नता प्राप्त करने के मन्तव्य से। किन्तु खेद है कि वह उसे उचित रूप से प्राप्त नहीं कर पाता।

इस स्थिति को देखते हुये तो यही समझ में आता है कि या तो मनुष्य प्रसन्नता के वास्तविक स्वरूप को नहीं पहचानता अथवा वह अपनी वाँछित वस्तु को पाने के लिये जिस दिशा में प्रयत्न करता है वह ही गलत है। इस समस्या पर गहराई से विचार करने की आवश्यकता है।

लोगों में अधिकतर एक सामान्य धारणा यह रहा करती है कि यदि उनके पास अधिक पैसा हो, साधन सुविधायें हों तो वे प्रसन्न रह सकते हैं। ऐसी धारणाओं वाले लोग पैसे और साधन सुविधाओं के लिये रोते रियायतें रहने के बजाय एक बार दृष्टि उठाकर उन लोगों की ओर क्यों नहीं देखते कि प्रचुरता से परिपूर्ण होने पर भी क्या वे सुखी हैं, प्रसन्न और संतुष्ट हैं? यदि धन दौलत तथा साधन सुविधायें ही प्रसन्नता की हेतु होती तो संसार का हर धनवान अधिक से अधिक सुखी और संतुष्ट होता किन्तु ऐसा कहाँ है। इससे स्पष्ट सिद्ध है कि वैभव और विभूति वास्तविक प्रसन्नता का कारण नहीं है। प्रसन्नता प्राप्ति का हेतु मानकर इन भौतिक विभूतियों के लिये रोते-मरते रहना बुद्धिमानी नहीं है।

बल, बुद्धि और विद्या को भी प्रसन्नता का हेतु मानने की एक सभ्य प्रथा है। किन्तु यह ऐश्वर्य भी वास्तविक प्रसन्नता का वाहक नहीं है। यदि ऐसा होता तो हर शिक्षित प्रसन्न दिखाई देता और हर अशिक्षित अप्रसन्न। ऐसा भी देखने में नहीं आता। जिस प्रकार अनेक धनवान अप्रसन्न और निर्धन प्रसन्न देखे जा सकते हैं उसी प्रकार अनेक विद्वान क्षुब्ध तथा वे पढ़े लिखे लोग प्रसन्न मिल सकते हैं। बड़े-बड़े बलवान आहें भरते और साधारण सामर्थ्य वाले व्यक्ति हँसी खुशी से जीवन बिताते मिल सकते हैं।

इस प्रकार विचार करने से पता चलता है कि वास्तविक प्रसन्नता कोई ऐसी वस्तु नहीं जिसको किसी शक्ति अथवा साधन के बल पर प्राप्त किया जा सके। साधनों की झोली फैलाकर प्रसन्नता की तलाश में दौड़ने वाले कभी भी प्रसन्नता प्राप्त नहीं कर सकते; और वास्तविक बात तो यह है कि जो जितना अधिक प्रसन्नता के पीछे दौड़ते हैं वे उतने ही अधिक निराश होते हैं। उनका यह निरर्थक श्रम उस अबोध हरिण की तरह ही शोचनीय होता है जो पानी के भ्रम में मरु मरीचिका के पीछे दौड़ते हैं अथवा उस बालक की तरह कौतुक पूर्ण है जो आगे पड़ी हुई अपनी छाया को पकड़ने के लिये दौड़ता है। प्रसन्नता कोई ऐसी वस्तु नहीं जिसका पीछा करने की जरूरत है। वह तो अवसर आने पर स्वयं ही आकर मनोमंदिर में हँसने लगती है। उसके आने का एक अवसर तो यही होता है जब हम उसके पाने के लिये कम से कम लालायित, व्यग्र और चिन्तित होते हैं।

प्रसन्नता प्राप्ति का मुख्य रहस्य यह है कि मनुष्य अपने लिए सुख की कामना छोड़कर अपना जीवन दूसरों की प्रसन्नता में योजित करें। दूसरों को प्रसन्न करने के प्रयत्न करने में जो कष्ट भी प्राप्त होता है वह भी प्रसन्नता ही देता है। छोटा मोटा कष्ट तो दूर, देश भक्त तथा अनेकों परोपकारियों ने अपने प्राण देने पर भी अनिवर्चनीय प्रसन्नता प्राप्त की है। इतिहास ऐसे बलिदानियों से भरा पड़ा है कि जिस समय उनको मृत्यु वेदी पर प्राण हरण के लिये लाया गया उस समय उनके मुख पर जो आह्लाद, जो तेज, जो मुस्कान और जो प्रसन्नता देखी गई, वह काल के अनन्त पृष्ठ पर स्वर्णाक्षरों में अंकित हो गई है।

एक साधारण से साधारण व्यक्ति भी अपने जीवन की किसी न किसी ऐसी घटना का स्मरण करके समझ सकता है कि जब उसने कोई परोपकार का काम किया था तब उसके हृदय में प्रसन्नता की कितनी गहरी अनुभूति हुई थी। जिस दिन यह सोचने के बजाय कि आज हम अपने लिये अधिक से अधिक प्रसन्नता संचय करेंगे, यदि यह सोचकर दिन का काम प्रारम्भ किया जाये कि आज हम दूसरों को अधिक से अधिक प्रसन्न करने का प्रयत्न करने का प्रयत्न करेंगे तो वह दिन आप के लिये बहुत अधिक प्रसन्नता का दिन होगा।

साधारण मनोरंजन, कार्यों तथा व्यवहारों में इस रहस्य को आये दिन देखा जा सकता है कि जो काम दूसरों को प्रसन्न करने वाले होते हैं अथवा जिन कामों से हम दूसरों को प्रसन्न कर पाते हैं वे ही काम हमें अधिक से अधिक प्रसन्न किया करते हैं। एक खिलाड़ी गेंद खेलता है और विपक्ष पर एक गोल कर देता है तो उसे अपनी सफलता पर प्रसन्नता होती है किन्तु तभी जब उसके साथी भी प्रसन्न होते हैं। यदि किसी कारण से उसकी यह सफलता दर्शकों अथवा साथियों को प्रसन्न न कर पाये तो उसे स्वयं भी प्रसन्नता न होगी। एक शिल्पी भवन अथवा मंदिर बनाता है। यद्यपि वह उसका नहीं होता तथापि वह इसलिये प्रसन्न होता है कि उसका वह काम दूसरों को प्रसन्न कर सकता है। इसी प्रकार कोई चित्रकार कलाकार अथवा कवि कोई रचना करता है तो उसे प्रसन्नता होती है, उसे अपनी कृति अच्छी लगती है। किन्तु उसकी प्रसन्नता में वास्तविकता तभी आती है जब दूसरे भी प्रसन्न होते हैं। संयोगवश यदि उसका सृजन अन्य किसी की प्रसन्नता का सम्पादन न कर सके तो अपनी होते हुये भी कला से कोई रुचि न रहेगी वह उसे बेकार समझेगा और उसकी प्रसन्नता जाती रहेगी।

साधारण मनोरंजन, कार्यों तथा व्यवहारों में इस रहस्य को आये दिन देखा जा सकता है कि जो काम दूसरों को प्रसन्न करने वाले होते हैं अथवा जिन कामों से हम दूसरों को प्रसन्न कर पाते हैं वे ही काम हमें अधिक से अधिक प्रसन्न किया करते हैं। एक खिलाड़ी गेंद खेलता है और विपक्ष पर एक गोल कर देता है तो उसे अपनी सफलता पर प्रसन्नता होती है किन्तु तभी जब उसके साथी भी प्रसन्न होते हैं। यदि किसी कारण से उसकी यह सफलता दर्शकों अथवा साथियों को प्रसन्न न कर पाये तो उसे स्वयं भी प्रसन्नता न होगी। एक शिल्पी भवन अथवा मंदिर बनाता है। यद्यपि वह उसका नहीं होता तथापि वह इसलिये प्रसन्न होता है कि उसका वह काम दूसरों को प्रसन्न कर सकता है। इसी प्रकार कोई चित्रकार कलाकार अथवा कवि कोई रचना करता है तो उसे प्रसन्नता होती है, उसे अपनी कृति अच्छी लगती है। किन्तु उसकी प्रसन्नता में वास्तविकता तभी आती है जब दूसरे भी प्रसन्न होते हैं। संयोगवश यदि उसका सृजन अन्य किसी की प्रसन्नता का सम्पादन न कर सके तो अपनी होते हुये भी कला से कोई रुचि न रहेगी वह उसे बेकार समझेगा और उसकी प्रसन्नता जाती रहेगी।


Quotation

=कोटेशन===========================

स्वस्थ मनुष्य के चित्त के लिए प्रसन्नता वैसी ही प्राकृतिक है जैसी उसके गालों पर लाली। जहाँ कहीं स्वाभाविक स्नानता होती है, वहाँ उसका कारण या दूषित वायु, अस्वास्थ्यकर भोजन, अनुचित रूप से कठिन परिश्रम होता है या भूल से भरी जीवनचर्या।

—रस्किन

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समस्त उन्नतियों का मूल सदाचरण ही है।

हर वह विचार एवं व्यवहार जो अपने अथवा किसी दूसरे के लिये किसी माने में भी अहितकर हो चरित्र-हीनता है। विपथ-गमन से लेकर किसी को कटु वचन कहना अथवा मन में दुर्भावना रखना तक चरित्र हीनता की परिभाषा में आता है। सरल, सुन्दर तथा सुखकर आचार विचार वाला व्यक्ति चरित्रवान ही कहा जायेगा। किसी भी समाज, वर्ग अथवा राष्ट्र में सच्चरित्रता एवं दुश्चरित्रता की परिभाषा अपनी मान्यताओं, मर्यादाओं तथा धारणाओं के आधार पर अलग-अलग हो सकती हैं। अपनी मान्य मर्यादाओं एवं मान्यताओं के अनुसार ही चलना किसी समाज के व्यक्ति के लिये सच्चरित्रता हो सकती है और उसके विपरीत चलना दुश्चरित्रता। दूसरे समाजों अथवा व्यक्तियों के समाजों की मान्यताओं का उदाहरण लिये बिना ही मनुष्य को अपनी लोक मर्यादाओं के अनुसार ही चलना चाहिए।

भिन्न-भिन्न मान्यतायें होने पर भी संसार में सच्चरित्रता की एक सार्वभौम परिभाषा है वह है सदाचार। सदाचार का अर्थ है अच्छे काम करना। ऐसे काम करना जिससे किसी दूसरों को कष्ट तो नहीं हो अपने तथा अन्यों के लिये हित सन्निहित हो। अपने नैतिक, सामाजिक तथा आध्यात्मिक अधिकार व कर्तव्य का विचार रखकर व्यवहार करने वाले को चरित्र-हीनता का कलंक नहीं लगने पाता।

चरित्र मानव जीवन की नींव है। यदि नींव ही जर्जर तथा कमजोर होगी तो जीवन का महालय विश्वासपूर्वक खड़ा न रह सकेगा। वैसे संसार में जीने के लिये बड़े-बड़े दुश्चरित्र लोग भी जीते हैं, किन्तु उनका जीना, जीना नहीं माना जा सकता है। जीवन उसी का है जिसके विषय में लोगों को बुरी धारणा न हो। जिसकी उपस्थिति से लोग दूर न भागना चाहें। जिस पर लोग विश्वास करें और जो स्वयं भी निर्भीक, निष्कलंक एवं सम्मानपूर्वक जीता हो। दुश्चरित्र व्यक्ति को ऐसा निर्द्वन्द्व जीवन प्राप्त नहीं हो सकता। जिसका चरित्र गिरा हुआ है, जो समाज में विश्वास के योग्य नहीं रहा है, उसे पग पग असहयोग, असफलता एवं असहानुभूति का ताप सहना ही पड़ेगा।

संसार में ऐसे न जाने कितने शक्तिशाली एवं धनी व्यक्ति होंगे जिनको कोई भी कमी नहीं और बहुत मानों में वे समाज की सहायता तथा सेवा भी करते होंगे किन्तु फिर भी किसी चारित्रिक दुर्बलता के कारण समाज की प्रतिष्ठा के पात्र नहीं बन पाते होंगे। वे समाज के लिये कितना कुछ क्यों न करें किन्तु समाज उनकी सदाशयता में विश्वास नहीं करता। मुँह पर भले ही लोग उनकी आलोचना न करें, किन्तु मन ही मन घृणा करते रहते हैं। यह एक लाँछित एवं कलंकित जीवन है। ऐसे गर्हित जीवन से प्रत्येक व्यक्ति को बचने का प्रयत्न करना चाहिये। इसके विपरित अनेकों सत्पुरुष ऐसे होते हैं, कि धन, दौलत, शक्ति एवं बल के नाम पर उनके पास कुछ भी नहीं होता, तब भी समाज उनका आदर करता है। अपने सर आँखों चढ़ा कर रखता है। उनके आचरण तथा कथन में विश्वास करता है। उन्हें जीवन का आदर्श मानता है। निर्धन एवं निःशुल्क होने पर भी सत्पुरुषों का सम्मान उनके चरित्र धन के कारण होता है। एक चरित्रहीन धनवान की अपेक्षा एक सच्चरित्र निर्धन का आदर होना सहज स्वाभाविक है। उसके प्रति लोगों की श्रद्धा आप से आप झुकी रहती है। चरित्र का तेज उसके मुख मंडल पर चमकता हुआ लोगों को आकर्षित एवं प्रभावित करता रहता है।

चरित्र मनुष्य का अनमोल धन है। हर उपाय से इसकी रक्षा करनी चाहिये। किसी की धन दौलत जमीन जायदाद, व्यवसाय, व्यापार चला जाये तो वह उद्योग करने से पुनः प्राप्त हो सकता है। किन्तु जिसने प्रमाद अथवा असावधानी वश एक बार भी अपना चरित्र खो दिया तो फिर वह जीवन भर के उद्योग से भी अपने उस धन को वापस नहीं पा सकता। आगे चलकर वह अपनी भूल सँभाल सकता है, अपना सुधार कर सकता है, अपनी सच्चरित्रता के लाख प्रमाण दे सकता है किन्तु फिर भी वह एक बार का लगा हुआ कलंक अपने जीवन पर से धो नहीं सकता। उसके लाख सँभल जाने, सुधर जाने पर भी समाज उसके उस पूर्व पतन को भूल नहीं सकता और इच्छा होते हुये भी उस पर असंदिग्ध विश्वास नहीं कर सकता। एक बार का चारित्रिक पतन मनुष्य को जीवन भर के लिये कलंकित कर देता है। भूत, भविष्यता एवं वर्तमान की निर्धन स्थिति बदल जाने पर भुलाई जा सकती है उससे विगत अथवा आगामी धनवंता की सुप्रसिद्ध पर कोई अवाँछनीय प्रभाव नहीं पड़ेगा। किन्तु किसी समय का भी चारित्रिक पतन मनुष्य के सत्कर्मों को भी प्रभावित कर डालता है। कल तक जो व्यक्ति जीवन में सत्कर्म ही करता रहा है यदि आज वह अपनी चरित्रहीनता का प्रमाण देता है तो उसका साग किया कराया मिट्टी में मिल जायेगा। लोग यही सोचेंगे कि यह ऐसा ही रहा होगा। इसकी चरित्रहीनता इसके तथाकथित सत्कर्मों में छिपी रही होगी। यह जो कुछ भी अच्छा करता रहा है वह सब अपने कुकर्मों पर परदा डालने के लिये ही करता रहा है। इसके साथ यदि वह भविष्य में भी अपनी भूल सुधार कर सत्कर्मों में प्रवृत्त होता है तब भी लोग उसे उसका आडम्बर, प्रपंच अथवा छल ही समझेंगे। एक समय की एक चरित्रहीनता मनुष्य के त्रय कालिक जीवन को कलंकित कर देती है। इसी लिए तो विद्वानों का कहना है कि मनुष्य का यदि धन चला गया तो कुछ नहीं गया, स्वास्थ्य चला गया तो कुछ गया और यदि चरित्र चला गया तो सब कुछ चला गया। इस लोकोक्ति का अर्थ यही है कि धन दौलत तथा स्वास्थ्य आदि को फिर पाया जा सकता है किन्तु गया हुआ चरित्र किसी भी मूल्य पर दुबारा नहीं पाया जा सकता। इसलिये मनुष्य का प्रमुख कर्त्तव्य है कि वह संसार में मनुष्यता पूर्ण जीवन जीने के लिये हर मूल्य पर, हर प्रकार से हर समय, अपनी चरित्र रक्षा के लिये सावधान रहे।

सच्चरित्रता मनुष्य की सफलता की गारंटी है। आचरण वान व्यक्ति निश्चित रूप से मन शरीर तथा आत्मा से पुष्ट हुआ करता है। वह हर परिश्रम एवं पुरुषार्थ के करने योग्य होता है। हो सकता है कि चरित्रवान व्यक्ति किसी रोग आदि की आकस्मिकता से एक बार शरीर से निर्बल हो जाये किन्तु वह मन तथा आत्मा से कभी कमजोर नहीं होता। जिसके मन व आत्मा कमजोर नहीं होते, उसे शारीरिक निर्बलता बाधा नहीं दे पाती। एक तो वह शीघ्र ही अपने सदाचरण से शारीरिक शक्ति प्राप्त कर लेगा और यदि किसी कारण शारीरिक शक्ति पाने में उसे विलम्ब लगता है तो अन्य बहुत से लोग श्रद्धावश उसकी शक्ति बन जाते हैं? उसके सहायक बन जाते हैं।

पास में एक पैसा न होने पर भी चरित्रवान व्यक्ति व्यवसाय में दूसरों के सहयोग से बढ़ सकता है। लोग प्रसन्नतापूर्वक उसे धन आदि व्यवसाय करने के लिये दे सकते हैं। उन्हें विश्वास रहता है कि यह व्यक्ति आचरणवान है। हमारे दिये हुये पैसे को नहीं खोयेगा, बहाएगा नहीं और समय आने पर, सुविधा अथवा अवसर होने पर शीघ्र ही हमारा पैसा-पैसा अदा कर देगा।

अच्छे लोग ही नहीं बुरे लोग तक समाज में चरित्रवान व्यक्ति को आगे बढ़ाने के लिये सहर्ष उद्यत रहा करते हैं। क्योंकि वे जानते हैं कि आचरणवान व्यक्तियों के आगे बढ़ने से समाज की न केवल प्रतिष्ठा ही बढ़ेगी, उसमें सुख-शाँति का वातावरण भी उत्पन्न होगा। छल, कपट, मलीनता, मक्कारी, संघर्ष एवं स्वार्थ का दोष कम होगा जिससे उन्हें व उनकी संतानों तथा अन्य अनेक लोगों को सुख और शाँति मिलेगी।

व्यसनी, अपव्ययी अथवा लिप्सालु न होने से चरित्रवान व्यक्ति का सारा समय तथा सारा उद्योग उन्नति की दिशा में ही लगता है, जो सफलता का एक बहुत बड़ा कारण है। आचरणवान व्यक्ति की बुद्धि बड़ी ही प्रखर एवं चारु-चिन्तका होती है। वह मनुष्य को निरन्तर आगे की ओर ही बढ़ाती है। मन, बुद्धि तथा आत्मा के सबल होने ने चरित्रवान व्यक्ति किसी भी विपरित परिस्थिति तथा विपत्ति के समय न तो निराश होता है और न हिम्मत ही हारता है। उसे अपने पर—अपनी आत्मा पर—तथा समाज की सदाशयता पर—पूर्ण विश्वास बना रहता है। इसी विश्वास के कारण उसके बढ़ते हुये चरण निरुत्साह से ठिठककर रुकने नहीं पाते। साहस तथा निर्भीकता चरित्रवान व्यक्ति की ही निधि है जो कि उन्नति एवं विकास में बहुत बड़ी सहायक होती है।

आचरण हीन व्यक्ति जीवन में कोई भी उन्नति नहीं कर सकता और यदि संयोगवश वह किन्हीं अनुकूल परिस्थितियों की कृपा से उन्नति कर भी लेता है तो उसकी रक्षा नहीं कर पाता। आलस्य, प्रमाद तथा दुश्चिंता, आचरणहीन व्यक्ति के स्वाभाविक दोष होते हैं। इन दोषों के रहते मनुष्य का उन्नति कर सकना एक असम्भाव्य बात है। चरित्रहीन व्यक्ति अपने दुराचरण पर कितने ही मोटे आवरण क्यों न डालता रहे किन्तु एक न एक दिन उसका परदा फाश ही होता है। उसकी मन-मलीनता स्वयं ही किसी न किसी रूप में उसके असली स्वरूप को प्रकट ही कर देगी। आचरणहीन व्यक्ति का जब तक परदा फटा भी नहीं होता तब तक भी वह निरपराध नहीं रहने पाता। यह बात सही है कि निरावृत्त होने तक समाज में उसकी साख बनी रहती है। लोग उसे अच्छा आदमी समझते रहते हैं। मान सम्मान भी देते रहते हैं किन्तु फिर भी उसके अन्दर बैठा हुआ उसका सर्व साक्षी आत्मा उसे एक क्षण भी विश्राम नहीं पाने देता। वह उसे दिन रात धिक्कारता रहता है और भर्त्सना करता हुआ सुनाता रहता है कि तुम आडम्बर कर रहे हो, समाज को धोखा दे रहे हो। जिस प्रतिष्ठा को तुम ले रहे हो वास्तव में उसके अधिकारी नहीं हो। परदाफाश न होने पर भी आचरणहीन व्यक्ति मन ही मन भयभीत होकर तथा अपने वास्तविक स्वरूप को खुद देखता हुआ दिन-रात संत्रस्त एवं अशाँत रहा करता है। वह सब कुछ मान प्रतिष्ठा पाकर भी एक क्षण को विश्वस्त अथवा आश्वस्त नहीं हो पाता। अतएव मनुष्य को चाहिये कि वह सामाजिक लाँछना, आत्म भर्त्सना और उसके फलस्वरूप अशाँत जीवन से बचने और एक उज्ज्वल एवं उन्नत जीवन पाने के लिये चरित्रवान बने और अपने चरित्र की रक्षा करे।

वास्तव में यह कम दुर्भाग्य की बात नहीं है कि मनुष्य संसार की सभी उपलब्धियों को पाने के लिये दिन रात उद्योग करता रहता है। विशेषतया धन-दौलत पाने के लिये तो वह न जाने क्या-क्या करणीय अथवा अकरणीय कर्म करता रहता है। किन्तु कभी स्वप्न में भी चरित्रवान बनने की नहीं सोचता। वह न जाने यह क्यों नहीं सोच पाता कि यदि एक बार वह अपने चरित्र अपने सदाचरण की छाप समाज पर छोड़ सके, उसे यह विश्वास दिला सके कि वास्तव में वह चरित्रवान है तो उसकी सारी वाँछित समृद्धियों के द्वारा स्वतः ही खुल जायें। मूल को देखने के बजाय पत्तों पर देखने वाला मनुष्य एक बड़ी भूल में रहता है। चरित्र एवं सदाचरण सारी समृद्धियों की जड़ है। जीवन में विभूति, वैभव तथा आदर सम्मान पाने के इच्छुक मनुष्य को सब से पहले अपने चरित्र को उज्ज्वल एवं उन्नत बनाने का प्रयत्न करना चाहिये। उसे समझ लेना चाहिये कि संसार की सारी विभूतियाँ सदाचरण की ही अनुगामिनी होती हैं। सदाचरण से शून्य व्यक्ति न तो संसार में आज तक कुछ कर पाया है और न आगे कर पायेगा। संसार में सच्ची समृद्धि एवं सम्मान पाने वाले सदाचारी सत्पुरुष ही हैं। सच्चा सुख, सच्ची शाँति तथा सच्चा जीवन सच्चरित्रता का ही फल है। मानव जीवन एक अनमोल अवसर है एक अनन्त सुविधा है, इसका सदुपयोग कर मनुष्य तो क्या परमात्मा के समकक्ष बनकर एक चिरन्तन सुख शाँति का अधिकारी बन सकता है। किन्तु यह सब कुछ सदाचरण एवं चारु-चरित्र के बल पर ही हो सकता। दुश्चरित्र या दुराचारी व्यक्ति एक गर्हित जीवन व्यतीत करने के सिवाय और कुछ भी श्रेयस्कर कार्य नहीं कर सकता।

वास्तव में यह कम दुर्भाग्य की बात नहीं है कि मनुष्य संसार की सभी उपलब्धियों को पाने के लिये दिन रात उद्योग करता रहता है। विशेषतया धन-दौलत पाने के लिये तो वह न जाने क्या-क्या करणीय अथवा अकरणीय कर्म करता रहता है। किन्तु कभी स्वप्न में भी चरित्रवान बनने की नहीं सोचता। वह न जाने यह क्यों नहीं सोच पाता कि यदि एक बार वह अपने चरित्र अपने सदाचरण की छाप समाज पर छोड़ सके, उसे यह विश्वास दिला सके कि वास्तव में वह चरित्रवान है तो उसकी सारी वाँछित समृद्धियों के द्वारा स्वतः ही खुल जायें। मूल को देखने के बजाय पत्तों पर देखने वाला मनुष्य एक बड़ी भूल में रहता है। चरित्र एवं सदाचरण सारी समृद्धियों की जड़ है। जीवन में विभूति, वैभव तथा आदर सम्मान पाने के इच्छुक मनुष्य को सब से पहले अपने चरित्र को उज्ज्वल एवं उन्नत बनाने का प्रयत्न करना चाहिये। उसे समझ लेना चाहिये कि संसार की सारी विभूतियाँ सदाचरण की ही अनुगामिनी होती हैं। सदाचरण से शून्य व्यक्ति न तो संसार में आज तक कुछ कर पाया है और न आगे कर पायेगा। संसार में सच्ची समृद्धि एवं सम्मान पाने वाले सदाचारी सत्पुरुष ही हैं। सच्चा सुख, सच्ची शाँति तथा सच्चा जीवन सच्चरित्रता का ही फल है। मानव जीवन एक अनमोल अवसर है एक अनन्त सुविधा है, इसका सदुपयोग कर मनुष्य तो क्या परमात्मा के समकक्ष बनकर एक चिरन्तन सुख शाँति का अधिकारी बन सकता है। किन्तु यह सब कुछ सदाचरण एवं चारु-चरित्र के बल पर ही हो सकता। दुश्चरित्र या दुराचारी व्यक्ति एक गर्हित जीवन व्यतीत करने के सिवाय और कुछ भी श्रेयस्कर कार्य नहीं कर सकता।


Quotation

संसार को आँसुओं से भरने की अपेक्षा उसे हँसकर उड़ा देना सचमुच अधिक अच्छा है। वास्तव में संसार-चक्र के चलने का यही एक मार्ग है।

—टैगोर

कुछ लोगों को यह संसार कंटकों से भरे हुए वन के समान जान पड़ता है और उन्हें उसमें अपने लिए एक मार्ग ढूँढ़ना पड़ता है। किसी को तो मार्ग मिल जाता है और किसी को नहीं मिलता।

—शरद बाबू

—शरद बाबू


महान राजनीतिज्ञ चाणक्य

चाणक्य शब्द कान में पड़ते ही मानस-मुकुट पर एक ऐसी मूर्ति प्रतिबिम्बित हो उठती है जिसका निर्माण मानो विद्या, वैदग्ध, दूरदर्शिता, राजनीति तथा दृढ़ निश्चय के पंच-तत्वों से हुआ था।

महर्षि चाणक्य एक व्यक्ति होने पर भी अपने में एक पूरे युग थे। उन्होंने अपनी बुद्धि एवं संकल्पशीलता के बल पर तात्कालिक मगध सम्राट् नन्द का नाश कर उसके स्थान पर एक साधारण बालक को स्वयं शिक्षित कर राज सिंहासन पर बिठाया।

चाणक्य न तो कोई धनवान थे और न उनका कोई सम्बन्ध किसी राजनीतिक सूत्रधार से था। वे केवल एक साधारण तम व्यक्ति—एक गरीब ब्राह्मण थे। बाल्यकाल में चाणक्य में कोई विशेषता न थी। विशेषता थी तो केवल इतनी कि वे अपनी माँ के भक्त, विद्या-व्यसनी तथा संतोषी व्यक्ति थे। वे जो कुछ खाने पहनने को पा जाते उसी में सन्तोष रखकर विद्याध्ययन करते हुये अपनी ममतामयी माता की सेवा किया करते थे।

उनकी मातृ भक्ति, विद्या व्यसन तथा दृढ़ संकल्प की अनेक कथायें प्रसिद्ध हैं। एक बार, जिस समय वे केवल किशोर ही थे, अपनी माँ को एक पुस्तक सुनाते-सुनाते हँस पड़े। माता ने उनकी मुँह की तरफ देखा और रो पड़ी।

चाणक्य को माँ के इस अहैतुक एवं असामयिक रुदन पर बड़ा आश्चर्य हुआ। उन्होंने पूछा—”माँ तू इस प्रकार मेरे मुँह की ओर देखकर रो क्यों पड़ी?

माँ ने उत्तर दिया कि “तू बड़ा होकर बड़ा भारी राजा बनेगा और तब अपनी गरीब माँ को भूल जायेगा।”

चाणक्य ने पुनः विस्मय से पूछा—”पर तुझे यह कैसे पता चला कि मैं राजा बनूँगा”।

“तेरे आगे के दो दाँतों में राजा होने के लक्षण हैं, उन्हें ही देखकर मैंने समझ लिया कि तू राजा बनेगा”। माँ ने चाणक्य को बतलाया।

चाणक्य ने माँ की बात सुनी और बाहर जाकर पत्थर से अपने वे दोनों दाँत तोड़ डाले फिर अन्दर आकर माँ से हँसते हुये बोले “ले अब तू निश्चिन्त हो जा, मैंने राज लक्षणों वाले दोनों दाँत तोड़कर फेंक दिया। अब न मैं राजा बनूँगा और न तुझे छोड़कर जाऊँगा।” यह था चाणक्य की ज्वलन्त मातृ भक्ति का प्रमाण।

चाणक्य का परिवार घोर निर्धन था। किन्तु विद्या प्राप्त करने की उन्हें बड़ी इच्छा थी। तक्षशिला उन दिनों देश में बहुत बड़ा विद्या केन्द्र था। माता के न रहने और घरेलू शिक्षा समाप्त करने के बाद चाणक्य पैदल ही तक्षशिला की ओर चल दिये। बिना किसी साधन के ज्ञान पिपासु चाणक्य सैकड़ों मील की पैदल यात्रा करके, मार्ग में मेहनत मजदूरी तथा कन्द, मूल और शाक–पात खाते हुये तक्षशिला जा पहुँचे।

चाणक्य तक्षशिला की विद्यापीठ में पहुँच तो गये किन्तु विद्यालय, भोजन, निवास, वस्त्र, पुस्तक आदि की व्यवस्था किस प्रकार हो? घर से सैकड़ों कोस दूर परदेश में कोई साधारण किशोर हताश होने के सिवाय क्या करता। किन्तु चाणक्य हताश नहीं विद्वान् होने के लिये गये थे, निदान सेवा का सहारा लेकर मार्ग निकाल ही तो लिया।

उन्होंने अनिमंत्रित आचार्यों, अध्यापकों एवं उपाध्यायों की सेवा करनी शुरू कर दी। वे गुरु माताओं के लिये जंगल से लकड़ी ला देते, कुयें से पानी भर देते, बाजार से सौदा ला देते।

आचार्यों के हाथ से पुस्तकें लेकर उसके पीछे-पीछे विद्यालयों तक पहुँचा आते। अध्यापकों को कक्षा में पानी पिला आते, थके हुये उपाध्यायों के शिर में मालिश कर देते।

इस प्रकार चाणक्य ने बिना कहे और बिना कोई परिचय दिये शिक्षकों को अपनी सेवा से इतनी सुविधा पहुँचाई कि उनका ध्यान आकर्षित हुये बिना न रह सका। कुछ समय तो गुरुजन तथा गुरु माताएं चाणक्य को विद्यालय की किसी शाखा का साधारण विद्यार्थी समझकर कोई विशेष ध्यान न देते रहे किन्तु जब उनकी सेवाओं का क्रम इतना बढ़ गया तो वे सोचने लगे कि यह विद्यार्थी जब हर समय सेवा ही में लगा रहता है तब अपना पाठ किस समय पढ़ता होगा? इसी उत्सुकता से प्रेरित एक दिन एक आचार्य ने पूछ ही लिया—”बटुक! तुम बिना समय तो हमारी सेवा में व्यतीत कर देते हो फिर अपना पाठ किस समय याद करते हो?”

चाणक्य ने सजल कंठ से उत्तर दिया कि “भगवन्! मैं विद्यालय का कोई छात्र नहीं हूँ। मगध से यहाँ विद्या प्राप्त करने की आशा से आया था। किन्तु कोई अन्य साधन न होने से गुरुजनों की सेवा को ही अपना साधन बना लिया है। पेट गुरु माताओं की कृपा से भर जाता है, किन्तु आत्मा की भूख तो आप गुरुजनों की कृपा से ही......।” चाणक्य आगे कुछ न कह सके उनका कंठ रुंध गया और नेत्र बहने लगे।

आचार्य का हृदय गदगद हो गया और उन्होंने उसे छाती से लगाकर कहा—”वत्स! तुम्हारी इच्छा की पूर्ति को विधाता भी नहीं रोक सकता। जिसके आचरण में इतना सच्चा सेवा भाव और लक्ष्य के प्रति इतनी गहरी निष्ठा हो उसके लिये संसार में कौन पराया है, कौन सा मार्ग अवरुद्ध है और कौन से साधन दुर्लभ हैं। आज से तू मेरा पुत्र है। घर रहेगा और विद्यालय में पढ़ेगा। इस प्रकार लगनशील चाणक्य ने सेवा के बल पर भाग्य के अवरुद्ध कपाटों को धक्का देकर खोल दिया।

लगभग चौदह वर्ष बाद वैदिक ज्ञान से लेकर राजनीति, अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र एवं अस्त्र-शास्त्र का प्रकाण्ड पाण्डित्य प्राप्त करने के बाद लगभग छब्बीस वर्ष के तरुण चाणक्य ने अपने महान विद्या मंदिर की पावन धूल माथे पर चढ़ाकर और गुरुजनों से आज्ञा लेकर तक्षशिला से विदा ली-इसलिये कि अब वे मगध जाकर अपनी जन्मभूमि में विद्या प्रचार करेंगे और महाराज नन्द के शासन में सुधार करवाने का प्रयत्न करेंगे जिसकी उसको उस समय नितान्त आवश्यकता थी।

तक्षशिला से आकर चाणक्य ने पाटलिपुत्र में एक साधारण विद्यालय की स्थापना की, जिसमें वे विद्यार्थियों को निःशुल्क शिक्षा देते थे। अपनी जीविका की व्यवस्था उन्होंने पिता की उस खेती से कर ली थी जिसे वे बटाई पर उठाया करते थे। चाणक्य की योग्यता ने शीघ्र ही उन्हें प्रकाश में लाकर लोक प्रिय बना दिया।

जनता में संपर्क स्थापित हो जाने पर वे उसके दुःख सुख में साझीदार होने लगे। चाणक्य ने अपने प्रवचनों एवं प्रचार से शीघ्र ही जनमानस में अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता ला दी जिससे स्थान स्थान पर घननन्द की आलोचना होने लगी और जनता का असंतोष एक आन्दोलन का रूप लेने लगा।

घननन्द को जब इन सब बातों का पता चला तो उसने जनता का विक्षोभ दूर करने और उसे अपने पक्ष में लाने के लिये अनेक दानशालायें खुलवा दीं जिनके द्वारा चाटुकार और राज समर्थक लोगों को रिश्वत की तरह अन्न, वस्त्र तथा धन का वितरण किया जाने लगा। घननन्द की इस नीति का भी कोई अच्छा प्रभाव जनता पर न पड़ा। पहले जहाँ लोग उसके शोषण से क्षुब्ध थे वहाँ अब धन के दुरुपयोग से अप्रसन्न रहने लगे।

चाणक्य नन्द की कपट नीति के विरुद्ध खुला प्रचार करने लगे। समाचार पाकर घननन्द ने चाणक्य को वश में करने के लिये दानशालाओं की प्रबन्धक समिति का अध्यक्ष नियुक्त कर दिया।

चाणक्य ने शासन सुधार की इच्छा से वह पद स्वीकार कर लिया और सारे धूर्त सदस्यों को समिति से निकाल बाहर किया। अनियंत्रित दान को नियंत्रित करके दान पात्रों की योग्यताएं तथा सीमाएं निर्धारित कर दीं।

चाणक्य के इन सुधारों से नन्द की मूर्खता से पलने वाले धूर्त उनके विरुद्ध हो गये उसको नीचा दिखलाने के लिए तरह-तरह के षड़यंत्र करते हुये नन्द के कान भरने लगे। निदान घननन्द ने चाणक्य को एक दिन दरबार में बुलाकर उनकी भर्त्सना की और उन्हें चोटी पकड़कर बाहर निकाल दिया।

चाणक्य को अपना वह अपमान असह्य हो गया और उनका क्रोध पराकाष्ठा पर पहुँच गया। उन्होंने अपनी खुली चोटी को फटकारते हुये प्रतिज्ञा की कि जब तक इस अन्यायी घननन्द को समूल नष्ट करके मगध के सिंहासन पर किसी कुलीन क्षत्रिय को न बिठा दूँगा तब तक अपनी चोटी नहीं बांधूंगा। चाणक्य चले गये और उनकी प्रतिज्ञा पर नन्द के साथ चाटुकार दरबारी हँसते रहे।

नन्द से अपमान पाकर चाणक्य की विचारधारा बदल गई। अभी तक वे शाँतिपूर्ण सुधारवादी थे किन्तु अब घोर क्राँति पूर्ण परिवर्तनवादी हो गये। अब उनके जीवन का एक ही लक्ष्य बन गया, नन्द के निरंकुश शासन का नाश और मगध के राज सिंहासन पर किसी सुयोग्य व्यक्ति की स्थापना।

सबसे पहले चाणक्य ने भारत का एक छत्र सम्राट बनने योग्य किसी उपयुक्त व्यक्ति की खोज शुरू की जिसके फलस्वरूप चक्रवर्ती के लक्षणों से युक्त उन्होंने एक दासी-पुत्र प्रतिभावान चन्द्रगुप्त मौर्य को खोज निकाला। चन्द्रगुप्त लगभग सत्तर वर्ष का एक सुयोग्य, प्रतिभावान, सूक्ष्म दृष्टि एवं दूरदर्शी किशोर था। उसका सुगठित शरीर एवं व्युत्पन्नमति मस्तिष्क शासन एवं शस्त्र संचालन के सर्वथा योग्य था।

चाणक्य ने तक्षशिला ले जाकर चन्द्रगुप्त का निर्माण प्रारम्भ कर दिया। उन्होंने लगभग दस वर्ष तक चन्द्रगुप्त को शास्त्र, शस्त्र तथा राजनीति की शिक्षा स्वयं दी। राजनीति के क्षेत्र में गुप्तचर से लेकर सम्राट और शस्त्र के क्षेत्र में सिपाही से लेकर सेनापति तक की दक्षताओं, क्षमताओं एवं योग्यताओं को विकसित कर चाणक्य चन्द्रगुप्त को लेकर पुनः देशाटन पर चल दिये।

चाणक्य ने अपने अनवरत प्रयत्न से भारत के पश्चिमी प्रान्तों के बहुत से राजाओं को संगठित करने के साथ चन्द्रगुप्त के लिये भी एक स्वतन्त्र सेना का निर्माण कर दिया। इस प्रकार चन्द्रगुप्त की शक्ति बढ़ाकर चाणक्य ने भारत की राजनीति में सक्रिय हस्तक्षेप करना प्रारम्भ किया। सबसे पहले उन्होंने पंजाब के संगठित राजाओं को सहयोगी बनाकर चन्द्रगुप्त को यूनानियों को भगाने का काम सौंपा। साहसी चन्द्रगुप्त ने यूनानियों को युद्ध में हराकर भारत के पराधीन भू भाग को स्वतन्त्र कर लिया।

चन्द्रगुप्त की इस महान विजय ने उसे भारत के राजाओं के बीच इतना लोकप्रिय बना दिया कि वे उसे अपना नेता और चाणक्य को राजनीतिक गुरु मानने लगे।

अनन्तर चाणक्य ने बहुत से राजाओं का आपसी मतभेद तथा विद्वेष अपनी कुशल बुद्धि तथा सूक्ष्म राजनीति के बल पर मिटा, उन्हें चन्द्रगुप्त के झन्डे के नीचे खड़ा कर दिया। इस प्रकार विदेशियों को भगाने के बाद चन्द्रगुप्त पंजाब तथा सीमान्त प्रदेशों के राजाओं की संगठित शक्ति का अगुआ बनकर चाणक्य की देखरेख में मगध की ओर चल पड़ा।

यूनानियों को देश से निकाल बाहर करने से चन्द्रगुप्त तथा गधर कौन सा मार्ग अवरुद्ध है,चाणक्य का यश पूरे भारत में फैल चुका था जिसके फलस्वरूप मगध तक पहुँचने में मार्ग में पड़े अधिकाँश राजाओं ने न केवल चन्द्रगुप्त का स्वागत ही किया बल्कि उसे भावी भारत सम्राट मानकर उसके झन्डे के नीचे आ गये।

मगध सम्राट घननन्द अपने विलास तथा अन्य दुर्गुणों के कारण अन्दर और बाहर से पूरी तरह जर्जर हो चुका था। जनता तो उससे पहले ही रुष्ट थी। अतएव बहुत कुछ प्रयत्न करने पर भी वह चन्द्रगुप्त को न रोक सका और अन्त में सवंश चन्द्रगुप्त के हाथों मारा जाकर सदा के लिए नष्ट हो गया।

चाणक्य ने विधिवत् अपने हाथ से चन्द्रगुप्त मौर्य को सम्राट पद पर अभिषिक्त करके सन्तोषपूर्वक अपनी चोटी बाँधते हुये कहा—

कोई साधन न होने पर भी मेरी प्रतिज्ञा पूरी हुई, राष्ट्र विदेशी प्रभाव से मुक्त हुआ और देश में एक छात्र साम्राज्य की स्थापना हुई। किस प्रकार? केवल एक श्रेष्ठ कर्तव्य-शीलता, आत्म-विश्वास, अविरत प्रयत्न तथा अन्य के पक्ष में रहने के बल पर। चन्द्रगुप्त! जब तक तुममें न्याय, सत्य, आत्मविश्वास, साहस एवं उद्योग के गुण सुरक्षित रहेंगे, तुम और तुम्हारी सन्तानें इस पद पर बनी रहेंगी और यदि तुम और तुम्हारी संतानें इन गुणों से विरत हुई तो पतन का उत्तरदायित्व देश, काल अथवा परिस्थितियों पर नहीं तुम पर और तुम्हारी सन्तानों पर होगा।


एक अकाल ग्रसित प्रतिभा—श्री रामानुजम्

कभी कभी समाज में ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न हो जाती हैं जब वह कुछ ऐसे राजनीतिक, आर्थिक अथवा नैतिक समस्याओं में उलझकर अनेक उन्नयन प्राप्त करती हुई प्रतिभाओं की ओर ध्यान नहीं दे पाता और वे उपेक्षा की आग में झुलस कर नष्ट हो जाती हैं।

होनहार प्रतिभाओं की उपेक्षा करने में किसी हद तक समाज दोषी हो सकता है, किन्तु इस सम्बन्ध में वे प्रतिभायें भी कम दोषी नहीं है जो स्वयं ही अपनी उपेक्षा किया करती हैं और समाज की कृपा की प्रतीक्षा करते हुये निकम्मी बैठी रहती हैं। अपनी प्रतिभा को प्रकाशित करने का स्वयं कोई प्रयत्न नहीं करतीं। सर्वथा समाज के सहारे बैठे रहने वाले, जीवन में कभी उन्नति नहीं कर सकते। अथवा यों भी कहा जा सकता है कि दूसरों के सहारे उन्नति की कामना करने वाले वास्तव में उन्नति करना ही नहीं चाहते। वास्तविक मन से जो अपनी उन्नति के आकाँक्षी होते हैं वे परमुखापेक्षी नहीं रहते, बल्कि अपनी निज की बुद्धि तथा परिश्रम से काम में जुट जाते हैं, और हठात् समाज को अपनी ओर आकर्षित करके, उसे यह सोचने पर विवश कर देते हैं कि यह एक होनहार प्रतिभा है इसकी उपेक्षा करने का अर्थ है अपनी हानि करना।

मद्रास प्रान्त में जन्म लेने वाले श्री रामानुजम की परिस्थितियाँ बड़ी ही संकुचित थीं। उनके पिता की इतनी भी आय नहीं थी कि वे परिवार को दोनों समय पूरा भोजन दे सकते। किन्तु तब भी रामानुजम् ने अपने अध्यवसाय के बल पर अपना अभ्युदय करके समाज के समक्ष एक उदाहरण उपस्थित कर दिया।

यही नहीं कि समाज ने भी उनकी ओर कोई ध्यान नहीं दिया। ठीक है समाज ध्यान देता भी किस तरह? वह तो उन्हीं की ओर ध्यान देता है जिनके आगे कुछ शोर होता चलता है और जिनके पीछे लक्ष्मी की चमक रहती है। उसे इतना अवकाश कहाँ कि वह वैभव विभूति से जगमगाते हुये व्यक्तियों की ओर से अपनी दृष्टि हटाकर, उनकी ओर लगाये जो कठिन परिस्थितियों के बीच उन्नति एवं विकास के लिये संघर्ष करते होते हैं। किन्तु ऐसे श्रमवानों की संसार में कोई कमी नहीं है जो अपनी परिस्थितियों से मोर्चा लेते हुये और तिल-तिल आगे बढ़ते हुये समाज से सहायता की अपेक्षा नहीं करते जबकि वह जो कुछ करते होते हैं या करना चाहते हैं वह सब होना समाज के हित के लिए ही है। ऐसे ही अडिग तथा अविचल कर्मवीरों को निष्काम समाज सेवी कहा जाता है।

श्री रामानुजम् समाज की सेवा करना चाहते थे किन्तु विशेष रूप से कोई शारीरिक, संस्थापिका अथवा आर्थिक सेवा वे नहीं करना चाहते थे। उनका झुकाव तो एक ऐसी स्थायी सेवा करने का था जो केवल अपने समाज अथवा राष्ट्र के लिए ही उपयोगी न हो बल्कि सारा संसार उसका लाभ उठा सके और ऐसी सार्वभौमिक सेवा एकमात्र ज्ञानदान के अतिरिक्त कुछ हो ही नहीं सकती। उनका विचार गणित के कुछ ऐसे नये सिद्धान्तों का अन्वेषण करना था जिनसे गणित जैसा नीरस कहा जाने वाला विषय न केवल रुचिपूर्ण ही बने बल्कि सरल भी बन जाये। वे कुछ ऐसे सूत्रों का आविष्कार करना चाहते थे जिनकी सहायता से अनेक प्रकार के प्रश्न समान सरलता के साथ हल किये जा सकें।

देखने सुनने में तो यह बात बड़ी ही छोटी मालूम होती है कि क्या गणित के कुछ सिद्धान्त-इनसे संसार का क्या बनता बिगड़ता है? किन्तु गणित के सिद्धान्तों का महत्व उन ज्योतिषियों से पूछो जो इनकी सहायता से ग्रह-नक्षत्रों की गति का पता लगाते हैं, उन वैज्ञानिकों से पूछो जो इनके उपयोग से प्रकृति के तत्वों को खोज निकालते हैं, उन अर्थशास्त्रियों से पूछो जो इनकी मदद से संसार का अर्थ तन्त्र नियन्त्रण में रखते हैं।

फिर सबसे बड़ी बात तो यह है कि कोई भी उपयोगी बात उपयोगी ही है फिर चाहे वह छोटी हो अथवा बड़ी। जो जिस रूप में जितनी भी समाज की सेवा कर सकता है, संसार का हित कर सकता है, उसे करना चाहिये। संसार के विकास में अपना अंशदान करना प्रत्येक का पावन कर्तव्य है। मनुष्यों के छोटे-छोटे अंशदान मिलकर समाज का कितना बड़ा दान हो सकता है इसका अनुमान अपने मस्तिष्क से किसी समय भी दूर नहीं करना चाहिये। किसी तालाब को भरने के लिये किसी को एक बूँद जल का दान करने में भी न तो संकोच करना चाहिये और न लज्जित होना चाहिये। जिसके पास जो भी साधन हैं, जो भी क्षमता है उस भर संसार का हित करना मनुष्यता का सबसे बड़ा प्रमाण है।

श्री रामानुजम् में न तो कोई दिव्य प्रतिभा थी और न कोई विलक्षण बुद्धि। हाँ इतना अवश्य था कि अपने विद्यार्थी काल से ही उन्हें गणित में विशेष रुचि थी। अन्य विषयों की अपेक्षा उनको गणित के प्रश्नों की तरह-तरह से हल करने में बड़ा आनन्द आता था। धीरे-धीरे जब वे सयाने होने लगे तो अपनी इस विशेषता को पहचानने लगे। निदान उन्होंने अपनी अभिरुचि को लक्ष्य के रूप में बदलना शुरू कर दिया।

अपने इस गुण का महत्व तथा प्रामाणिकता को जानने के लिये रामानुजम् ने अध्यापकों के दिये प्रश्नों को नये-नये तरीकों से हल करके शिक्षकों के सम्मुख रखने शुरू कर दिये और उनसे प्रशंसा तथा सराहना पाते हुये उत्साहित होने लगे। अपनी प्रारम्भिक सफलता से प्रोत्साहित होकर उनका गणित के विषय में आत्म-विश्वास जाग उठा।

यद्यपि रामानुजम् की इस विशेष प्रतिभा से लोग परिचित होने लगे थे किन्तु वे अपनी सहज उपेक्षा वृत्ति के कारण कोई ध्यान न देते। यहाँ तक कि उनके माता पिता ने भी पुत्र के भविष्य का कोई विचार किये बिना ही उन्नीस वर्ष की अवस्था में उनका विवाह कर दिया।

इस नये उत्तरदायित्व के आने से श्री रामानुजम् की सारी साधना भंग हो गई और वे पत्नी के भरण पोषण की चिन्ता करने लगे। घर की परिस्थिति ऐसी न थी कि रामानुजम् के साथ उनकी पत्नी का भी भरण पोषण किया जा सकता। फिर रामानुजम् की गैरत ही यह कब गवारा करती कि वे अपनी पत्नी के भरण-पोषण का भार अपने कम आय वाले पिता के सिर पर डालकर अपने गणित-सिद्धान्तों की खोज में लगे रहते। अब जब उन्होंने गृहस्थ जीवन अपना ही लिया था तो उसके संवाहन-कर्तव्य से विमुख किस प्रकार हो सकते थे। निदान इन्टर से पढ़ाई छोड़कर वे उपार्जन की चिन्ता में घूमने लगे। कुछ ही प्रयत्न से उन्हें मद्रास में चालीस रुपये मासिक वेतन पर क्लर्की मिल गई।

यद्यपि इस प्रकार पिता के आर्थिक सहायक बनने के साथ-साथ श्री रामानुजम् एक सद्गृहस्थ भी बन गये तथापि उन्हें हार्दिक सन्तोष न हो सका। उनके मन में गणितज्ञता की जो लगन लग चुकी थी वह उनकी आत्मा को चैन न लेने देती थी। अन्दर से बार-बार यही आवाज आती थी कि क्या मैं इसी प्रकार कुछ पैसों के लिये दिन भर कलम रगड़ने के लिये पैदा हुआ हूँ? क्या मानव-जीवन का इतना ही उद्देश्य है कि वह कुछ कमाये और खाता-पीता हुआ इस संसार से चल बसे। इन्हीं भावनाओं से भरकर उनका हृदय भारी हो जाता और वे अपने गणित सिद्धान्तों की खोज के लिये तड़प उठते।

बहुत दिन मानसिक संघर्ष करने के बाद जब उनकी लगन ने उन्हें चैन न लेने दिया तो वे अपने कार्यालय के कार्य से जरा भी अवकाश मिलते ही अपनी खोज में लगने लगे। इस प्रकार कई महीने अधिकारियों की दृष्टि बचाकर काम करते रहने के बाद एक दिन उनके गणित सम्बन्धी कागज एक अंग्रेज अधिकारी के हाथ लग गये। वे महोदय स्वयं भी एक अच्छे गणितज्ञ थे। अतएव उन्होंने जब रामानुजम् के उन कागजों को पढ़ा तब वे यह देखकर दंग रह गये कि जिन प्रश्नों तथा हलों का अंकन उन कागजों में किया गया था वे गणित के क्षेत्र में एक नवीन खोज थी।

गुणग्राही उक्त अंग्रेज अधिकारी रामानुजम् से कुछ कहने के बजाय यह सोचने लगा कि कितने खेद का विषय है कि एक ऐसा व्यक्तित्ववान युवक अपने समाज की उपेक्षा का शिकार बना हुआ जीवन खराब कर रहा है जबकि इसकी प्रतिभा मानव-समाज के लिये बहुत ही उपयोगी बन सकती है।

उक्त अंग्रेज अधिकारी ने गम्भीरता से विचार कर तथा अच्छी प्रकार से समझबूझ कर रामानुजम् के वे सारे कागज इंग्लैंड के विश्व-विख्यात गणितज्ञ प्रो. जी. एच. हार्डी के पास भेज दिये। प्रो. हार्डी ने रामानुजम् के कागजों का अध्ययन मनन करके यही निष्कर्ष निकाला कि यदि यह युवक भारत में मरने-खपने के बजाय हम लोगों के बीच इंग्लैण्ड में आ जाये तो बहुत कुछ काम कर सकता है। निदान उन्होंने मद्रास पोर्ट ट्रस्ट अधिकारी को लिख दिया कि उस भारतीय युवक रामानुजम् को किसी प्रकार इंग्लैण्ड भेज दें।

रामानुजम् से होता हुआ उनके इंग्लैंड भेजे जाने का प्रस्ताव जब उनके माता-पिता तथा परिजनों के पास पहुँचा तब तो वे आपे से बाहर हो गये और विदेश जाना धर्म विरुद्ध बताकर घोर विरोध करने लगे। किन्तु रामानुजम् की दृढ़ इच्छा तथा अंग्रेज अधिकारियों के समझाने पर रूढ़िवादी परिजन इस शर्त पर रामानुजम् को इंग्लैंड जाने की अनुमति देने के लिये सहमत हो गये कि वहाँ जाकर भी शालिग्राम की पूजा करेगा, धोती, कुर्ता पहनेगा और अपने हाथ से ब्राह्मणोचित भोजन बनाकर खायेगा। अपनी गर्ज के लिये युवक रामानुजम् सभी शर्तें निभाने की प्रतिज्ञा करके सरकारी छात्रवृत्ति पर इंग्लैण्ड चले गये।

इंग्लैण्ड पहुँचकर रामानुजम् संसार को भूलकर प्रो. वाटसन, हार्डी तथा मोर्डल के संपर्क में रहकर गणित के नये नये सिद्धान्तों की खोज से संसार को लाभान्वित करने लगे। उनकी आश्चर्य जनक खोजों से प्रभावित होकर उक्त विद्वान् गणितज्ञों ने उनकी इंग्लैण्ड की रॉयल सोसाइटी के फिलोशिप के लिये सिफारिश की जिसके फलस्वरूप वे फेलो आँफ दी रॉयल सोसाइटी होकर एक स्पृहरणीय सम्मान के भागीदार बने। विद्या तथा योग्यता की पूजा क्या देश और क्या विदेश सभी जगह सम्मान रूप से होती है।

किन्तु खेद का विषय है कि लगभग तीन वर्ष रुढ़िवादियों की शर्त पूरी करने और इंग्लैण्ड की उस घोर सरदी में नंगे होकर अपने हाथ से भोजन बनाने, धोती, कुरता पहनने तथा ब्रह्ममुहूर्त में नहा धोकर बिना वस्त्र पहने घन्टों पूजा पर बैठने से उनका स्वास्थ्य चूर-चूर हो गया और तैंतीस वर्ष की अल्प आयु में ही वह चमत्कारी प्रतिभा सदा के लिये बुझ गई।

इस होनहार प्रतिभा का जन्म मद्रास प्रान्त में 1887 के आसपास तथा तिरोधान इंग्लैण्ड में ही 1920 के लगभग हुआ।


मैं तो बापू का चपरासी हूँ

मैं तो बापू का चपरासी हूँ

बिहार के चम्पारन जिले में महात्मा गाँधी का शिविर लगा था। किसानों पर होने वाले सरकारी अत्याचारों की जाँच चल रही थी। हजारों की तादाद में किसान आ-आ कर बापू से अपने दुःख निवेदन कर रहे थे। उस समय उस जाँच आन्दोलन में कृपलानी जी का बड़ा प्रमुख सहयोग था।

वे गाँधी जी के कैम्प सेक्रेटरी के रूप में काम कर रहे थे। इसलिये जिला अधिकारियों की आँख की कीर-किरी बने हुये थे।

इस जाँच पड़ताल के दौरान महात्मा जी को अनेक चिट्ठियाँ दिन में बहुत बार कलेक्टर के पास भेजनी पड़ती थीं। यह सब डाक ले जाने का काम कृपलानी जी ही करते थे।

कृपलानी जी को डाक लाते ले जाते देखकर एक बार कलेक्टर ने पूछा आप ही तो वह प्रो. कृपलानी हैं जो इस सब हलचल के मुखिया हैं। फिर आप यह डाक का काम क्यों करते हैं?

कृपलानी जी ने उत्तर दिया में तो एक साधारण कार्यकर्त्ता और बापू का चपरासी हूँ।

कृपलानी जी का उत्तर सुनकर कलेक्टर ने महात्मा गाँधी की महानता को समझा और आँदोलन की गरिमा का अंदाज लगा लिया।


सुख चाहिए किन्तु दुःख से डरिये मत

जीवन में दुःख, शोक और संघर्ष का आना स्वाभाविक है। इससे कोई भी जीवधारी नहीं बच सकता। सुख, दुःख मानव-जीवन के दो समान पहलू हैं। सुख के बाद दुःख और दुःख के बाद सुख आते ही रहते हैं। यदि कोई इतना साधन सम्पन्न भी हो कि उसके जीवन में किसी दुःख, किसी अभाव अथवा किसी संघर्ष की सम्भावना को अवसर ही न मिले और वह निरन्तर अनुकूल परिस्थितियों में मौज करता रहे, तब भी एक दिन उसका एकरस सुख ही दुःख का कारण बन जायेगा। वह अपनी एकरसता से ऊब उठेगा, थक जायेगा। उसे एक अप्रिय नीरसता घेर लेगी, जिससे उसका मन विषाद से भरकर कराह उठेगा, वह दुःखी रहने लगेगा। मानव-जीवन में दुःख-सुख के आगमन के अपने नियम को प्रकृति किसी भी अवस्था में अपवाद नहीं बना सकती। जो सुखी है उसे दुःख की कटुता अनुभव करनी ही होगी और इस समय जो दुःखी है उसे किसी न किसी कारण से सुख की शीतलता का अनुभव करने का अवसर मिलेगा ही।

दुःख-सुख है क्या? यह किसी भी मनुष्य के लिए परिस्थितियों का परिवर्तन मात्र ही है। और यदि ठीक दृष्टिकोण से देखा जाये तो परिस्थितियाँ भी दुःख-सुख का वास्तविक हेतु नहीं है। वास्तविक हेतु तो मनुष्य की मनः स्थिति ही है, जो किसी परिस्थिति विशेष में सुख-दुःख का आरोपण कर लिया करती है। बहुत बार देखा जा सकता है कि किसी समय कोई एक परिस्थिति मनुष्य को पुलकित कर देती है, हर्ष विभोर बना देती है, तो किसी समय वही अथवा उसी प्रकार की परिस्थिति पीड़ादायक बन जाती है। यदि सुख-दुःख का निवास किसी परिस्थिति विशेष में रहा होता तो तदनुकूल मनुष्य को हर बार सुखी या दुःखी ही होना चाहिए। एक जैसी परिस्थिति में यह सुख-दुःख की अनुभूति का परिवर्तन क्यों? वह इसीलिए कि सुख-दुःख वास्तव में परिस्थितिजन्य न होकर मनोजन्य ही होते हैं।

इस सत्य के अनुसार मनुष्य को सुखी अथवा दुःखी होने का कारण अपने अन्तःकरण में ही खोजना चाहिए, परिस्थितियों को श्रेय अथवा दोष नहीं देना चाहिए। जो मनुष्य अपने दुःख के लिये परिस्थितियों को कौसा अथवा सुख के लिये उन्हें धन्यवाद दिया करता है वह अपनी अल्पज्ञता का ही द्योतन करता है। यह सर्वदा सत्य है कि कोई भी मनुष्य दुःख की कामना तो करता ही नहीं, वह तो सदा सुख ही चाहा करता है। इसलिए उसे अपनी यह चाह पूरी करने के लिए परिस्थितियों से अधिक मन पर ध्यान देने का प्रयत्न करना चाहिए। उसे ईर्ष्या, द्वेष, चिन्ता, क्षोभ अथवा असन्तोष से अभिभूत न होने देना चाहिये। इस प्रकार का निराभि भूत मानस गोमुखी गंगाजल की तरह निर्मल एवं प्रसन्न होता है। मन प्रसन्न है तो संसार में सभी ओर प्रसन्नता ही प्रसन्नता दृष्टिगोचर होगी, सुख ही सुख अनुभव होगा। तब ऐसी सहज प्रसन्नता की दशा में परिस्थितियों के अनुकूल होने की अपेक्षा नहीं रहती। परिस्थितियाँ अनुकूल हैं— मनभावनी हैं—बहुत अच्छा। परिस्थितियाँ अनुकूल नहीं है तब भी कोई अन्तर नहीं पड़ता। प्रसन्न-मन मानव उन्हें अनुकूल करने के लिए प्रयत्न करेगा, संघर्ष करेगा, पसीना बहायेगा, मूल्य चुकायेगा, कष्ट उठायेगा किन्तु दुःखी नहीं होगा। वह, यह सब हँसते-हँसते प्रसन्न मनोमुद्रा में ही करता रहेगा। उसे परिश्रम में आनन्द आयेगा। संघर्ष में सुख मिलेगा। असफलता पर हँसी आयेगी और सफलता का स्वागत करेगा। जीवन की विविध परिस्थितियाँ तथा विविध उपलब्धियाँ उसकी प्रसन्नता को बढ़ा ही सकती हैं घटा नहीं सकती।

यह सही है कि संसार का कोई मनुष्य दुःख की कामना नहीं करता। यदि चाहता है तो केवल सुख ही चाहता है। किन्तु एकमात्र सुख की स्वार्थपूर्ण कामना का अर्थ यह है कि दुःख क्लेश आ जाने पर हाय-हाय करते हुए हाथ-पैर छोड़कर बैठ-रहना और दुर्भाग्य अथवा नियति को कोसते रहना। इस प्रकार की निरुत्साह वृत्ति ही सुख की स्वार्थपूर्ण कामना है जो कि किसी मानव को शोभा नहीं देती।

एकमात्र सुख की आकाँक्षा रखने वाले और दुःख क्लेशों से भयभीत होने वाले न केवल स्वार्थी ही होते हैं, अपितु कायर भी होते हैं। कायरता मनुष्य जीवन का कलंक है। जो संघर्षों, मुसीबतों तथा आपत्तियों से डरता है, उनके आने पर निराश अथवा निरुत्साहित हो जाता है वह और कोई बड़ा काम कर सकना तो दूर साधारण मनुष्यों की तरह साधारण जीवन भी यापन नहीं कर सकता है। संसार में न तो आज तक ऐसा कोई मनुष्य हुआ है और न आगे ही होगा जिसके जीवन में सदा प्रसन्नता की परिस्थितियाँ ही बनी रहें। उसे कभी दुःख क्लेश के तप्त झोंके न सहन करने पड़े हों। राजा से लेकर रंक तक और बलवान से लेकर निर्बल तक प्रत्येक प्राणी को अपनी-अपनी स्थिति में अपनी तरह के दुःख क्लेश उठाने ही पड़ते हैं। कभी शारीरिक कष्ट, कभी मानसिक क्लेश, कभी सामाजिक कठिनाई कभी आर्थिक अभाव तो कभी आध्यात्मिक अन्धकार मनुष्य को सताते ही रहते हैं। सदा सर्वदा कोई भी व्यक्ति कष्ट एवं कठिनाइयों से सर्वथा मुक्त नहीं रह सकता। तब ऐसी अनिवार्य अवस्था में किसी प्रकार की कठिनाई आ जाने पर निराश, चिन्तित अथवा क्षुब्ध हो उठना इस बात का प्रमाण है कि हम संसार के शाश्वत नियमों से सामंजस्य स्थापित नहीं करना चाहते, हम असामान्यता के प्रति हठी अथवा दुराग्रही बने रहना चाहते हैं।

सुख-सुविधा की कामना बेशक की जाये और उसके लिए अथक प्रयत्न भी, पर साथ ही कठिनाइयों का स्वागत करने के लिए भी प्रस्तुत रहना चाहिए। अनुकूलता पाकर हर्षोन्मत्त हो उठना और प्रतिकूलता देखते ही रो उठना मानसिक हीनता का लक्षण है। मनोहीन मनुष्य संसार में कुछ भी करने लायक नहीं होता। वह जीता जरूर है लेकिन मृतकों से भी बुरी जिन्दगी। जिसका हृदय विषाद से आक्रान्त है, चिन्ताओं से अभिभूत है उसका जीना जीने में नहीं गिना जा सकता। जिन्दगी वास्तव में वही है जिसमें जीने के साथ कुछ ऊँचा और अच्छा करते रहने का उत्साह सक्रिय होता रहे। यह उत्साहपूर्ण सक्रियता केवल उसी में सम्भव है जो हर समय कठिनाइयों से लड़ने का साहस रखता है, आपत्तियों से संघर्ष करने की हिम्मत वाला है। जो व्यग्र है त्रस्त है और निराश है वह न केवल संसार पर ही बल्कि अपने पर भी बोझ बना हुआ श्वासों का भार ढोया करता है। चिन्तित तथा निराश मनः स्थिति वाला व्यक्ति किसी पुरुषार्थ के योग्य नहीं रहता। जिसकी जड़ में दीमक लग चुकी है अथवा जिसका मूल किसी कीड़े ने काट डाला है उस लता से, उस वृक्ष से सुन्दर फल-फूलों की आशा नहीं की जा सकती।

सुख-सुविधा की कामना अवश्य करिए यह उपयुक्त है। किन्तु साथ ही कठिनाइयों से लोहा लेने के लिए भी सदैव तत्पर रहिये। कठिनाइयाँ स्वयं कष्ट लेकर नहीं आतीं। वे केवल आती हैं आप की मानसिक प्रसन्नता, आपकी आशा तथा आपके उत्साह पर आवरण डालने। यदि आपने उनको अपनी इन आत्म-किरणों पर परदा डाल लेने दिया तो आपके मनों-मन्दिर में अन्धकार हो जायगा और तब तमोजन्य निराश, क्षोभ, दुःख, भय तथा असन्तोष की अशिव भावनायें आपको तरह-तरह से त्रस्त करने लगेंगी और आप अकारण ही पीड़ित रहने लगेंगे।

आशा और उत्साह मनुष्य जीवन के दो बहुत बड़े सम्बल हैं। मनुष्य की प्रसन्नता के यह दोनों प्रमाणिक आधार हैं। जो बुद्धिमान किसी भी दशा में इनको मन्द नहीं होने देते अभाव, दुःख, कष्ट तथा प्रतिकूलताएं उस पर वैसे ही प्रभाव नहीं डाल पातीं जैसे कवच-सज्जित शरीर पर शत्रु के बाण! कष्ट आयेगा, कठिनाई खड़ी हो जायगी, आशा उनका सत्य स्वरूप समझने और उनके हल के लिये मार्ग दिखलायेगी, उत्साह आगे बढ़ायेगा और बढ़ते हुए व्यक्ति का मार्ग कोई भी अवरोध रोक नहीं सकता। दुःख-क्लेश होता उन्हीं को है जो किसी कारण से किंकर्तव्यविमूढ़ होकर एक जगह ठिठके रहते हैं। जो ठिठककर रुकना नहीं जानता वह कठिनाइयों को परास्त कर आगे निकल ही जाता है।

आशा और उत्साह की शक्ति अपरिमित है। उसका परिणाम लगाया ही नहीं जाता। प्राणान्तक संकट में पड़े हुये न जाने कितने वीर व्यक्तियों ने केवल आशा और उत्साह के बल पर इतिहास प्रसिद्ध विजयों का वरण किया है। आशा और उत्साह के अभाव में एक नगण्य से कारण से परास्त होकर न जाने कितने व्यक्ति आत्महत्या कर लिया करते हैं, जब कि उनका वह दुःख, वह क्लेश अथवा वह अभाव—प्राण तो दूर, एक रोम के बलिदान योग्य भी नहीं होता। आशा और उत्साह का अभाव तिनके जैसी कठिनाई को पहाड़ जैसी बना दिया करता है। निराशा अन्धकार है और निरुत्साह व्याधि। अन्धेरे में एक छोटी-सी आशंका प्राणलेवा बन जाया करती है और व्याधिग्रस्त व्यक्ति एक कदम आगे बढ़ने का साहस नहीं रखता।

दिनों, महीनों और वर्षों के संचित विषाद को आशा की एक छोटी-सी किरण क्षणभर में दूर करके जीवन में उल्लास तथा उत्साह का संचार कर देती है। मरण शय्या पर पड़ा रोगी औषधि की अपेक्षा आशा के सहारे रोग या मृत्यु पर अधिक विजय पाता है। जीवन से क्षुब्ध, परेशानियों से परेशान होकर आत्महत्या को उद्यत यदि किसी व्यक्ति को किसी संयोग से आशा की किरण मिल जाती है तो वह तुरन्त अशुभ विचार छोड़कर जीवन-पथ पर हँसता हुआ बढ़ चलता है। तिल-तिल भूमि पर बलिदान देता हुआ कोई भी योद्धा विजय की आशा से ही युद्ध-भूमि में बढ़ता चला जाता है।

अनेक बार अनुभव किया जा सकता है कि कभी-कभी जीवन में ऐसी परिस्थितियाँ आ जाती हैं जिनसे जीवन का हर क्षेत्र निराशा, कठिनाइयों तथा आपत्तियों से भरा दिखाई पड़ता है। हर समय वही अनुभव होता है कि अब जीवन में कोई सार नहीं रहा है, उसके अस्तित्व को हर प्रकार से खतरा पैदा हो गया है किन्तु किसी भी माध्यम से आशा का एक प्रकाश कण दीख जाने से परिस्थिति बिल्कुल बदल जाती है और वही निराश व्यक्ति एक बार फिर कमर कसकर जीवन संग्राम में योद्धा की तरह उतर पड़ता है, वह निश्चय ही विजय प्राप्त किया करता है। हानि के धक्के अथवा असफलता के क्षोभ से जब भी किसी व्यक्ति की मरने अथवा निराश, निकम्मे हो बैठने का समाचार सुनें तो समझलें कि उसने अपनी भौतिक हानि के साथ अपनी आशा की भी हानि करली है अपने उत्साह का पल्ला छोड़ दिया है।

आशा तथा उत्साह कहीं से लाने अथवा आने वाली वस्तु नहीं हैं। यह दोनों तेज आपके अन्तःकरण में सदैव ही विद्यमान रहते हैं। हाँ आवश्यकता के समय उनको जगाना तथा पुकारना अवश्य पड़ता है। जीवन की कठिनाइयों तथा आपत्तियों से घबराकर अपने इन अन्तरंग मित्रों को भूल जाना अथवा इनका साथ छोड़ देना बहुत बड़ी भूल है। ऐसा करने का अर्थ है कि आप अपने दुर्दिनों को स्थायी बनाते हैं, अपनी कठिनाइयों को पुष्ट तथा व्यापक बनाते हैं। किसी भी अन्धकार में किसी भी प्रतिकूलता अथवा कठिनाई में अपने आशा उत्साह के सम्बन्ध को कभी मत छोड़ियेगा, कठिनाइयाँ आपका कुछ भी नहीं कर सकेंगी।

आशा तथा उत्साह कहीं से लाने अथवा आने वाली वस्तु नहीं हैं। यह दोनों तेज आपके अन्तःकरण में सदैव ही विद्यमान रहते हैं। हाँ आवश्यकता के समय उनको जगाना तथा पुकारना अवश्य पड़ता है। जीवन की कठिनाइयों तथा आपत्तियों से घबराकर अपने इन अन्तरंग मित्रों को भूल जाना अथवा इनका साथ छोड़ देना बहुत बड़ी भूल है। ऐसा करने का अर्थ है कि आप अपने दुर्दिनों को स्थायी बनाते हैं, अपनी कठिनाइयों को पुष्ट तथा व्यापक बनाते हैं। किसी भी अन्धकार में किसी भी प्रतिकूलता अथवा कठिनाई में अपने आशा उत्साह के सम्बन्ध को कभी मत छोड़ियेगा, कठिनाइयाँ आपका कुछ भी नहीं कर सकेंगी।

आशा तथा उत्साह कहीं से लाने अथवा आने वाली वस्तु नहीं हैं। यह दोनों तेज आपके अन्तःकरण में सदैव ही विद्यमान रहते हैं। हाँ आवश्यकता के समय उनको जगाना तथा पुकारना अवश्य पड़ता है। जीवन की कठिनाइयों तथा आपत्तियों से घबराकर अपने इन अन्तरंग मित्रों को भूल जाना अथवा इनका साथ छोड़ देना बहुत बड़ी भूल है। ऐसा करने का अर्थ है कि आप अपने दुर्दिनों को स्थायी बनाते हैं, अपनी कठिनाइयों को पुष्ट तथा व्यापक बनाते हैं। किसी भी अन्धकार में किसी भी प्रतिकूलता अथवा कठिनाई में अपने आशा उत्साह के सम्बन्ध को कभी मत छोड़ियेगा, कठिनाइयाँ आपका कुछ भी नहीं कर सकेंगी।

आशा तथा उत्साह कहीं से लाने अथवा आने वाली वस्तु नहीं हैं। यह दोनों तेज आपके अन्तःकरण में सदैव ही विद्यमान रहते हैं। हाँ आवश्यकता के समय उनको जगाना तथा पुकारना अवश्य पड़ता है। जीवन की कठिनाइयों तथा आपत्तियों से घबराकर अपने इन अन्तरंग मित्रों को भूल जाना अथवा इनका साथ छोड़ देना बहुत बड़ी भूल है। ऐसा करने का अर्थ है कि आप अपने दुर्दिनों को स्थायी बनाते हैं, अपनी कठिनाइयों को पुष्ट तथा व्यापक बनाते हैं। किसी भी अन्धकार में किसी भी प्रतिकूलता अथवा कठिनाई में अपने आशा उत्साह के सम्बन्ध को कभी मत छोड़ियेगा, कठिनाइयाँ आपका कुछ भी नहीं कर सकेंगी।

आशा तथा उत्साह कहीं से लाने अथवा आने वाली वस्तु नहीं हैं। यह दोनों तेज आपके अन्तःकरण में सदैव ही विद्यमान रहते हैं। हाँ आवश्यकता के समय उनको जगाना तथा पुकारना अवश्य पड़ता है। जीवन की कठिनाइयों तथा आपत्तियों से घबराकर अपने इन अन्तरंग मित्रों को भूल जाना अथवा इनका साथ छोड़ देना बहुत बड़ी भूल है। ऐसा करने का अर्थ है कि आप अपने दुर्दिनों को स्थायी बनाते हैं, अपनी कठिनाइयों को पुष्ट तथा व्यापक बनाते हैं। किसी भी अन्धकार में किसी भी प्रतिकूलता अथवा कठिनाई में अपने आशा उत्साह के सम्बन्ध को कभी मत छोड़ियेगा, कठिनाइयाँ आपका कुछ भी नहीं कर सकेंगी।

आशा तथा उत्साह कहीं से लाने अथवा आने वाली वस्तु नहीं हैं। यह दोनों तेज आपके अन्तःकरण में सदैव ही विद्यमान रहते हैं। हाँ आवश्यकता के समय उनको जगाना तथा पुकारना अवश्य पड़ता है। जीवन की कठिनाइयों तथा आपत्तियों से घबराकर अपने इन अन्तरंग मित्रों को भूल जाना अथवा इनका साथ छोड़ देना बहुत बड़ी भूल है। ऐसा करने का अर्थ है कि आप अपने दुर्दिनों को स्थायी बनाते हैं, अपनी कठिनाइयों को पुष्ट तथा व्यापक बनाते हैं। किसी भी अन्धकार में किसी भी प्रतिकूलता अथवा कठिनाई में अपने आशा उत्साह के सम्बन्ध को कभी मत छोड़ियेगा, कठिनाइयाँ आपका कुछ भी नहीं कर सकेंगी।

आशा तथा उत्साह कहीं से लाने अथवा आने वाली वस्तु नहीं हैं। यह दोनों तेज आपके अन्तःकरण में सदैव ही विद्यमान रहते हैं। हाँ आवश्यकता के समय उनको जगाना तथा पुकारना अवश्य पड़ता है। जीवन की कठिनाइयों तथा आपत्तियों से घबराकर अपने इन अन्तरंग मित्रों को भूल जाना अथवा इनका साथ छोड़ देना बहुत बड़ी भूल है। ऐसा करने का अर्थ है कि आप अपने दुर्दिनों को स्थायी बनाते हैं, अपनी कठिनाइयों को पुष्ट तथा व्यापक बनाते हैं। किसी भी अन्धकार में किसी भी प्रतिकूलता अथवा कठिनाई में अपने आशा उत्साह के सम्बन्ध को कभी मत छोड़ियेगा, कठिनाइयाँ आपका कुछ भी नहीं कर सकेंगी।


शिष्ट एवं सभ्य व्यवहार ही मनुष्य की शोभा है।

शील एवं शिष्टता मनुष्य के मानसिक-विकास के परिचायक गुण हैं। जिस अनुपात से मनुष्य का मानसिक-विकास होता जाता है उसी अनुपात से वह पशुता से उठकर मनुष्यता की ओर बढ़ता जाता है। इस प्रकार, एक दिन, वह शनैः शनैः बढ़ता हुआ अपने आत्म-स्वरूप तक पहुँचकर चिरन्तन सुख शान्ति का अधिकारी बन जाता है।

आत्म-स्वरूप की उपलब्धि सहसा नहीं होती। यह धीरे-धीरे क्रमपूर्वक मानसिक विकास द्वारा ही संभव होती है। शील एवं शिष्टता मनुष्य के मानसिक विकास के लक्षण हैं। इन्हीं लक्षणों द्वारा मनुष्य यह जान सकता है कि उसने कितना मानसिक विकास कर लिया है। जब कोई प्रत्येक क्षण प्रत्येक व्यक्ति के साथ यथायोग्य शीलता एवं शिष्टता का व्यवहार करने लगे तो उसे समझ लेना चाहिये कि उसका मानसिक विकास होना प्रारम्भ हो गया है। जिस दिन यह व्यवहार औरों के साथ रहने के अतिरिक्त अपनी आत्मा और आत्मा से बढ़कर समस्त जड़ चेतन के साथ होने लगे तो समझ लेना चाहिये कि अब हम आत्म-स्वरूप की परिधि के पास पहुँचने लगे हैं।

मनोविकास का अर्थ है—मनोविकारों का दूर होना। काम, क्रोध, मद, लोभ आदि विकार जितनी मात्रा में कम होते जाते हैं, उतनी ही मात्रा में मनोविकास होता जाता है। दुःशीलता एवं अशिष्टता के कारण भी ये मनोविकार ही हैं। काम मनुष्य को शील-रहित बना देता है। एक बार उसकी कामजन्य दुःशीलता अन्य किसी पर प्रकट नहीं होती तो अपनी आत्मा पर तो प्रकट हो ही जाती है। वह अपनी आत्मा के प्रति तो अशिष्ट एवं असभ्य हो ही जाता है। कामनाओं के रूप में जो काम मनुष्य में तीव्रता एवं लिप्सा उत्पन्न कर देता है। इससे मनुष्य में छल-कपट, शोषण, अपहरण आदि के दोष उत्पन्न हो जाते हैं।

क्रोध तो मनुष्य को एक प्रकार से सामयिक पागल ही बना देता है। क्रोध होने पर मनुष्य शिष्टता तथा सभ्यता की सारी सीमायें तक भूल जाता है। वह न कहने योग्य बातें कहने और न करने योग्य काम कर बैठता है। क्रोध में लोग छोटों के साथ तो दुर्व्यवहार करते ही हैं बड़ों के साथ भी अशिष्टता का व्यवहार कर बैठते हैं। क्रोध में मनुष्य बड़ों का बड़प्पन और आदरणीयों की गुरुता का भी मान नहीं करता। लोग अपने बड़े भाइयों यहाँ, तक कि माता-पिता तक को भी बुरा भला कहने लगते हैं क्रोध, धृष्टता एवं अशिष्टता का बहुत बड़ा कारण है।

मद मनुष्य को संसार में किसी को भी शालीन व्यवहार के योग्य नहीं समझने देता। मद का नशा क्रोध के वेग से अधिक बुरा होता है। जिसे धन वैभव रूप यौवन शक्ति , बल अथवा अधिकारों का अहंकार रहता है वह सचराचर जगत को तृणवत् ही समझा करता है। किसी से सीधे मुँह बात करना तो वह जानता ही नहीं। अहंकार मद से मतवाले व्यक्ति बहुधा दया, क्षमा, सहानुभूति एवं संवेदना जैसे मानवी गुणों को तिलाँजलि दे देते हैं। जरा-सी प्रतिकूलता पाकर अहंकारी व्यक्ति आपे से बाहर हो जाता है और बड़े-बड़े अनर्थ कर डालने पर उतर आता है। अनाचार, अत्याचार तथा अनीति आदिक दोष प्रायः अहंकार से ही जन्म पाते हैं। अहंकार मनुष्य को आततायी भी बना देता है। वह अपने दम्भ की तुष्टि में दूसरों की सुख-सुविधा का भी ध्यान नहीं रखता। वह अपनी प्रसन्नता के स्वार्थ में यह तक विचार नहीं कर पाता कि मेरे अमुक व्यवहार से अमुक व्यक्ति को अमुक कष्ट, दुःख अथवा क्लेश हो सकता है। अहंकारी एक अपने को प्रसन्न करने के लिये हजारों पर अत्याचार करने, उनका अधिकार छीनने में संकोच नहीं करता। अहंकार जैसा भयानक रोग मनुष्य को किस सीमा तक शील एवं शिष्टता से दूर हटा सकता है इसका अनुमान नहीं लगाया जा सकता।

लोभ भी मनुष्य को स्वार्थी, संकीर्ण, निष्ठुर एवं क्रूर बना देता है। लोभी की तृष्णायें भयानक रूप से बढ़ जाती हैं। संसार की सारी दौलत पाकर भी लोभी की वित्तेषणा पूरी नहीं होती। बहुत कुछ पास होने पर भी लोभी की “और” नामक रट लगी ही रहती है। लोभी को जहाँ अपने लिये वस्तुओं की स्पृहा होती है वहाँ दूसरे की चीजों के प्रति बड़ी डाह होती है। वह यही चाहता है कि जो वस्तु मेरे पास है वह किसी दूसरे के पास न हो और यदि किसी के पास है तो मुझे मिल जानी चाहिये। संसार को विपन्न कर स्वयं सम्पन्न बनने की इच्छा लोभी की सहज स्वाभाविक मानसिक दुर्बलता होती है। अपने स्वार्थ-साधन अथवा लिप्सा की पूर्ति में लोभी कपटपूर्ण व्यवहार करने में भी नहीं चूकता। वह झूठ बोलकर आडम्बर बनाकर लोगों को ठगा ही करता है। अपने स्वार्थ के लिये वह किसी के साथ भी क्रूरता का व्यवहार कर सकता है। लोभी व्यक्ति धनी, निर्धन, सबल निर्बल, स्त्री, पुरुष, बालक, वृद्ध किसी का भी सम्मान करना नहीं जानता। दया, दाक्षिण्य, सहायता, सहयोग, सहानुभूति एवं संवेदना, सद्व्यवहार मानों उसके शब्द कोष में नहीं होते। लालची व्यक्ति पराकाष्ठा तक कृपण होता है। वह किसी क्षुधार्त को भूखा मरते आँखों देख सकता है, किन्तु उसका पाषाण हृदय उसे एक बार भोजन कराना स्वीकार नहीं करेगा। एक पैसे के लिये किसी का बड़े से बड़ा काम बिगड़ते देख सकता है किन्तु एक पैसा देना स्वीकार नहीं करेगा। लोभी व्यक्ति तो अशिष्टता एवं अभद्रता का जीता जागता नमूना ही होता है।

इस प्रकार के मानसिक विकारों के रहते हुये कोई किस प्रकार अपना मानसिक विकास कर सकता है, और मानसिक विकास के अभाव में उसका आत्म स्वरूप की ओर बढ़ सकना सम्भव न होगा। अतएव आवश्यक है कि मनुष्य अपने मानसिक विकारों को दूर करे उन पर विजय प्राप्त करे और चिर साध्य सच्ची सुख-शाँति का अधिकारी बने।

मनोविकारों पर विजय पाने का साधारण-सा उपाय है—अपने अन्दर सभ्यता, शिष्टता तथा नम्रता का भाव उत्पन्न करना है। शिष्टता में एक अनुपम मिठास रहती है। एक बार का शिष्ट व्यवहार अपनी मधुरता से अनेक बार शिष्टता का व्यवहार करने के लिए प्रेरित करता है। जो सुशील है, सभ्य एवं शिष्ट है वह न केवल औरों को ही सुखी एवं शीतल बनाता है बल्कि अपने को भी सुखी बनाता है। शील एवं शिष्टता दैवी गुण हैं। इनका अवतरण कर लेने से मनुष्य सहज ही मानसिक विकास की ओर बढ़ने लगता है। अपने मनोविकास के लिये एक सच्चे, शिष्ट तथा शालीन व्यक्ति को किसी तप साधना अथवा पूजा अर्चना की जरूरत नहीं पड़ती। शिष्ट व्यवहार स्वयं ही अपने में एक पूजा है, एक उपासना है। एक उपासक तो केवल एक ईश्वर की कल्पना करके उसकी पूजा किया करता है, उसे प्रसन्न करने का प्रयत्न किया करता है, किन्तु एक नम्र एवं शिष्ट व्यक्ति न जाने कितने मनुष्यों की आत्मा प्रसन्न किया करता है जो कि ईश्वर का ही अंश होती है। उपासक एक देव की पूजा करता है और शिष्ट व्यक्ति अपने शालीन व्यवहार से सार्वजनिक विराट भगवान की पूजा किया करता है शिष्ट व्यवहार को केवल व्यवहार नहीं पूजा के भाव से ही देखना चाहिये।

भगवान की बनाई हुई चराचरमय सारी सृष्टि अपने युक्त व्यवहार से ही सुरक्षित एवं शाश्वत बनी हुई है। सृष्टि में अयुक्तता आते ही प्रलय एवं विनाश की सम्भावना उपस्थित हो जाती है। मनुष्य में जब तक शिष्टता एवं सभ्यता का उदय नहीं हुआ वह भी पशुओं की कोटि में बना रहा और उन्हीं की तरह जंगली जीवन व्यतीत करता रहा। ज्यों-ज्यों उसमें सभ्यता एवं शिष्टता की वृद्धि होती गई, उसका मनोविकास होता गया तो वह आज की उन्नत स्थिति में पहुँच सका। अपने सभ्यता एवं शिष्टता के जिन गुणों के आधार पर मनुष्य पशुता से वास्तविक मनुष्यता में आ सका है उसका त्याग कर देने से स्वाभाविक है कि वह अपनी आदिम अवस्था में वापस जाने लगे। आज भी जो व्यक्ति अश्लील, अशिष्ट अथवा असभ्य व्यवहार किया करता है उसे लोग नर-पशु ही मानते हैं। यह शील एवं शिष्टता का ही चमत्कार है कि मनुष्य पारस्परिक सहयोग एवं सहायता से अपने जीवन में इतनी सुख-सुविधाओं का समावेश कर सका है। यदि जंगलियों की तरह वे एक दूसरे से अशिष्ट तथा अभद्र व्यवहार करते रहे होते तो कैसे वो मिल-जुल कर रहते? कैसे मिलकर खेती तथा व्यवसाय करते? और कैसे मिल जुलकर विचार विमर्श करते हुये सभ्यता एवं संस्कृति का विकास कर पाते?

आत्मिक उन्नति के साथ-साथ शील एवं शिष्टता भौतिक उन्नति का भी आधार है। जो अशिष्ट है, असभ्य अथवा शील रहित है वह जीव जीवन में किसी प्रकार की उन्नति नहीं कर सकता। नौकरी, व्यवसाय आदि किसी भी क्षेत्र में किसी धृष्ट की सफलता का कोई उदाहरण आज तक नहीं पाया है। धृष्ट अथवा अशिष्ट व्यक्ति को कोई भी पसन्द नहीं करता और न कोई उससे सहयोग ही करना चाहेगा। मनुष्य के बड़े से बड़े गुण, बड़ी से बड़ी क्षमतायें अशिष्टता के दोष से दूषित होकर नष्ट हो जाती हैं। बहुत कुछ उपयोगी होने पर भी दुष्ट अथवा दुर्मुख व्यक्ति के पास कोई जाना तक पसन्द नहीं करेगा। अशिष्ट व्यक्ति एक प्रकार से समाज से बहिष्कृत ही रहता है।

धृष्ट अथवा अशिष्ट विद्यार्थी बहुत कम सफल होते हैं। कर्कशा पत्नी कभी भी पति का प्यार नहीं पा सकती और कठोर पति कभी भी गृहस्थी की सुख-शाँति नसीब नहीं कर सकता। धृष्ट तथा अशिष्ट बच्चे और तो और स्वयं अपने माता-पिता के लिये भी घृणा के पात्र बन जाते हैं। असफलता एवं अशाँति अशिष्टता एवं असभ्यता का सुनिश्चित परिणाम है।

इसके विपरित विनम्रता, मधुरता, शिष्टता एवं सभ्यता पूर्ण व्यवहार मनुष्य को सफलता के उच्च शिखर पर पहुँचा देने में सक्षम होते हैं। निर्धन होने पर भी शिष्ट विद्यार्थी की शिक्षा रुकने नहीं पाती। किसी नौकरी में शिष्टता एक बार योग्यता की कमी को भी पूरा कर देती है। जो स्वयं सही मायनों में शिष्ट एवं सभ्य है उसे किसी काम के लिये किसी की सिफारिश की आवश्यकता नहीं पड़ती। विनम्रता एवं मधुरता क्रूर से क्रूर शत्रु को जीत लिया करते हैं। सहयोग, सहायता एवं सहानुभूति शिष्ट एवं शीलवान व्यक्ति की विरासत ही माननी चाहिये। घर बाहर, देश परदेश, कहीं भी क्यों न रहे विनम्रता एवं शिष्टता मनुष्य को मित्र की तरह हर जगह सहायता करती रहती है। विनम्र व्यवहार विरोधों के बीच भी अपना मार्ग बना लिया करता है।

जो शिष्ट एवं सभ्य होता है वह सहिष्णु भी होता है। शिष्ट दूसरे से तो दुखदायी व्यवहार नहीं करता है यदि उसके साथ भी दुःखद व्यवहार किया जाता है तब भी वह अधिक दुखी नहीं होता। न तो उस पर कोई अप्रिय प्रतिक्रिया होती है और न उसे क्रोध ही आता है। विपरित व्यवहार में भी उसकी मनः शाँति अक्षुण्ण बनी रहती है। बदले में बुरा व्यवहार न करके वह अपने धृष्ट विरोधी को भी लज्जित कर देता है। शिष्ट एवं सभ्य के सम्मुख संघर्ष की परिस्थितियाँ बहुत कम आती हैं और यदि आती भी हैं तो वे उलझकर अधिक भयानक नहीं बनने पातीं। वह बिना किसी हानि के उन्हें सुलझा लिया करता है। इस प्रकार कोई भी शिष्ट एवं सभ्य व्यक्ति सदा ही संघर्षहीन, निर्द्वन्द्व एवं सौहार्द्रता पूर्ण सुख शाँति का जीवन व्यतीत किया करता है। मनुष्य को चाहिये कि वह स्थायी सुख शाँति के लिये विकारों को दबाकर शिष्ट एवं सभ्य बने तथा शिष्ट एवं सभ्य व्यवहार के अभ्यास से विकारों पर विजय प्राप्त करें।


पंडित नेहरु का वजन

एक बाल सम्मेलन के अवसर पर पंडित नेहरू बालक बालिकाओं के बीच प्रश्नोत्तर का आनन्द ले रहे थे। तभी एक बालिका ने प्रश्न किया—

“क्या आपने कभी अपना वजन भी लिया है?” पंडित नेहरू ने तुरन्त उत्तर दिया—”अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखने के कारण मैंने अनेक बार अपना वजन लिया।”

बालिका ने फिर दूसरा प्रश्न किया—”अच्छा बताइये, आपका सबसे ज्यादा और सबसे कम वजन कब और कितना था?”

नेहरू ने बिना रुके कहा—”मेरा सबसे ज्यादा एक सौ बासठ पौण्ड उस समय था जब मैं अहमदनगर जेल में था और सबसे कम साढ़े सात पौण्ड वजन जब मैं पैदा हुआ तब था।”

बालिका ने ताज्जुब से पूछा— “जेल में तो वजन कम हो जाना चाहिये बढ़ कैसे गया?”

पंडित नेहरू ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुये कहा— “उस समय मेरा वजन इस खुशी में बढ़ गया कि मैं अपने देश की सेवा में जेल का कष्ट सहन कर रहा हूँ।”


जीवन को उलझन बनने से बचाइए।

जिस जीवन को एक उलझी हुई पहेली बताया जाता है वह वास्तव में बड़ा ही सरल तथा सीधा है। जीवन जीने में किसी प्रकार की उलझन तो होनी ही नहीं चाहिये। जीवन में उलझनों का सूत्रपात तभी होता है जब हम अपनी परिस्थितियों से बाहर का जीवन जीना चाहते हैं।

परिस्थिति तो हमारी एक छोटे से मकान में रहते हुये मोटा-झोटा खा-पीकर जीने की है किन्तु हम चाहते हैं महल में रहकर, विविध व्यंजनों का स्वाद लेते हुये जीना। ऐसी दशा में जीवन का उलझ जाना स्वाभाविक हैं। हमें अपनी स्थिति से तो असन्तोष हो जायेगा और मनोरथ की पूर्ति होगी नहीं। फलस्वरूप असन्तोष, असुखं तथा अभाव की समस्यायें आकर सताने लगेंगी।

जीवन में वर्तमान स्थिति से आगे बढ़ने की आकाँक्षा जीवन की प्रगति का लक्षण है जो कि हर प्रकार से प्रशंसनीय है। यदि मनुष्य अपनी आदि स्थिति में ही अन्न का आलिंगन कर लेता है तो मानों उसने जीवन में कुछ न करके जग में होते हुये भी जड़ जैसी जिन्दगी ही बिताई है। उसने अपनी सारी शक्तियों को मानों निरर्थक खो दिया है अथवा उनको अन्दर पड़े-पड़े ही नष्ट हो जाने दिया है। मनुष्य की शोभा आज की अपेक्षा कल उच्चतर स्थिति पाने के लिये प्रबल पुरुषार्थ करने में ही है। किन्तु इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि अपने मनोरथों अथवा अपने जीवन लक्ष्य को अपनी क्षमताओं अथवा सम्भावनाओं से दूर कर रक्खा जाये।

मनुष्य के जीवन में उलझनों का आविर्भाव तभी होता है जब वह ऐसी मनोवाँछाओं को अपना लक्ष्य बना लेता है जो उसकी परिस्थितियों के अनुरूप नहीं होतीं। हमें अपनी वाँछाओं को बढ़ाने से पूर्व यह देख लेना नितान्त आवश्यक है कि हम जीवन में जो कुछ पाने का स्वप्न देख रहे हैं उसका मूल्य चुकाने के लिये जिस पूँजी की आवश्यकता है वह हमारी गाँठ में है भी अथवा नहीं। वाँछाओं की पूर्ति मनोरथ मात्र से ही तो नहीं हो सकती। उनके लिये अनुरूप योग्यता, परिश्रम, पुरुषार्थ, परिस्थिति अवसर, सहयोग तथा साधन की आवश्यकता होगी। इन सब अनुरूप उपादानों के अभाव में मनुष्य की कोई भी मनोवाँछा पूरी नहीं हो सकती। यदि हमने अपने अन्दर किसी ऐसी इच्छा के लिये व्यग्रता जंगली है, जिसका मूल्य चुकाने योग्य पूँजी हमारे पास नहीं है तो समझ लेना चाहिये कि हमने अपने सरल एवं स्निग्ध जीवन में समस्याओं का सूत्रपात कर लिया है, जिसका परिणाम दुःख दर्द के अतिरिक्त और कुछ नहीं हो सकता।

बहुत बार सारे साधन होने पर भी संयोग अथवा प्रारब्धवश मनोवाँछा पूरी नहीं होती। तब ऐसी अनहोनी असफलता तो जीवन को एक भार जैसा ही बना सकती है। अस्तु अपेक्षित उपादानों के साथ मनुष्य में असफलता सहन करने और सफलता के लिये बारम्बार प्रयत्न करने का धैर्य भी होना चाहिये। अन्यथा साधन पूर्ण असफलता तो एक बहुत बड़ी समस्या बन जायेगी।

सबसे सरल एवं सुधरा हुआ जीवन तो वास्तव में स्वाभाविक जीवन ही होता है। अपनी परिस्थितियों के अनुसार जो कुछ प्राप्त हो जाये उसे उपलब्धि समझकर हर्ष एवं सन्तोषपूर्वक अंगीकार करना चाहिये। किन्तु ऐसा सरल जीवन सिद्ध होना कठिन है। मनुष्य एक प्रगतिशील प्राणी है। इच्छाओं का पुतला है। उसमें इच्छाओं का उदय होना सहज स्वाभाविक है। इसी इच्छा शीलता के कारण ही वह उन्नति करता करता आज यहाँ पहुँच सका है।

इच्छाओं का होना बुरा नहीं। बुरा है उनका नियंत्रित न होना। इच्छा उतनी ही करनी चाहिये जितनी अपनी सामर्थ्य हो। अपनी सामर्थ्य के बाहर की इच्छा करना अपने पर दुख-द्वन्द्वों को आमंत्रित करना है। किन्तु इतने विवेकशील व्यक्ति कितने होते हैं जो अपनी शक्ति तथा मनोरथों को समानान्तर रख सकें। लोग अपनी क्षमताओं का अनुमान लगाये बिना ही अपनी इच्छाओं की डोर ढीली कर देते हैं और उनकी पूर्ति के लिये लालायित होने लगते हैं। निदान उनकी कामनायें अधूरी रहकर उनके लिये एक दुःखद समस्या बन जाया करती हैं।

यदि एक बार ही कोई बहुत बड़ा लक्ष्य निर्धारित न करके हम छोटी-छोटी मंजिलों को पार करते हुये चलें तो एक दिन धीरे-धीरे बड़े लक्ष्य पर भी पहुँच सकते हैं। किन्तु इच्छावान् आदमी इतना आतुर अथवा उतावला होता है कि वह एक ही छलाँग में सात समुद्र पार कर जाना चाहता है। यदि कोई विद्यार्थी एम. ए. पास करने की कामना रखता है तो उसे कक्षा-अनुकक्षा को पार करते हुये चलना पड़ेगा। यदि वह प्रारम्भिक कक्षाओं की उपेक्षा करके एक साथ एम. ए. में पहुँचना चाहता है तो यह उसकी मूर्खता ही कही जायेगी। एम. ए. तक पहुँचने का जो क्रम निश्चित है वह उसको अपनाना ही पड़ेगा। पूर्व कक्षाओं में यदि वह केवल एम. ए. तक पहुँचने की उतावली से व्यग्र रहता है तब भी कोई काम न चलेगा। उसे अपने एम. ए. के महान लक्ष्य पर पहुँचने के लिये क्रमबद्ध कक्षाओं को लक्ष्य बनाना पड़ेगा। उसे अपने चरम लक्ष्य को अदृष्टिगोचर करके वर्तमान कक्षा को पास करना ही अपना लक्ष्य बनाना पड़ेगा और इतना धैर्य रखना पड़ेगा कि वह निम्न कक्षाओं को पास करने की अवधि में ही इतना उतावला अथवा अधीर न हो जाये कि एम. ए. तक पहुँचना उसे एक पहाड़ जैसा लगने लगे। अत्यधिक उतावली होने से वह बीच में ही ऊबकर थक जायेगा। एम. ए. तक पहुँच सकना उसे असम्भव जैसा लगने लगेगा और वह हिम्मत हारकर बीच में ही बैठ जायेगा।

जीवन में कोई बड़ा लक्ष्य निर्धारित किया जा सकता है। किन्तु उस तक पहुँचने के लिये मंजिलें बाँटनी होंगी। पड़ाव निश्चित करने होंगे—जिनको क्रम से पार करते हुये ही अपने विशाल लक्ष्य तक पहुँचा जा सकेगा। पहली मंजिल केवल उतनी ही लम्बी बनाइये जितनी शक्ति और सम्बल आपके पास हो और जिसे पूरा कर लेने का पूरा-पूरा विश्वास हो। अपनी पहली मंजिल में प्राप्त साधनों, शक्ति तथा सम्बल को इकट्ठा करके दूसरी मंजिल की ओर अग्रसर होइये और दूसरी से प्राप्त सम्बल के बल पर तीसरी मंजिल की ओर बढ़िये और इस प्रकार पड़ाव पर पड़ाव पार करते हुये अपने निर्धारित लक्ष्य तक जा पहुँचिये। किसी बड़े लक्ष्य का पाने का यही एक तरीका है।

इसके विपरीत जो अपने लक्ष्य पथ को पड़ावों में बाँटे बिना ही एक अभियान में ही लक्ष्य को पा लेना चाहते हैं निश्चय ही वे अपने मन्तव्य में सफल न हो सकेंगे। निदान उनके जीवन में कटुता का समावेश होगा और वह एक उलझन भरी समस्या बन जायेगा।

आपका लक्ष्य क्या है? वास्तव में आप चाहते क्या हैं, इसका स्पष्ट ज्ञान रहना भी बहुत जरूरी है। लक्ष्यहीन जीवन भी बहुत बड़ी उलझन है। जिनका लक्ष्य स्पष्ट नहीं है किन्तु हृदय में चाहना उठती रहती है वह वास्तव में चाहता कुछ भी नहीं है। उसे मात्र मनोरथ करते रहने का व्यसन हुआ करता है। इस प्रकार मनोरथी व्यक्ति आज यदि इस ओर बढ़ना चाहता है, तो कल दूसरी ओर। यदि आज वह व्यवसायी बनना चाहता है तो कल एक बड़ा अधिकारी। आज यदि साहित्यकार बनने की इच्छा है तो कल राजनीति में स्थान पाने की कामना करने लगता है। आज यदि यशवान बनने का मनोरथ करता है तो कल धनवान बनने का। ऐसे इच्छाशील व्यक्ति का कोई एक लक्ष्य नहीं होता। वह इसी प्रकार कटी पतंग की तरह हवा के रुख पर तैरता हुआ अपने बहुमूल्य जीवन को व्यर्थ में उलझाता-सुलझाता हुआ खो दिया करता है।

लक्ष्यवान व्यक्ति वास्तव में वही कहा जायेगा जिसका एक सुनिश्चित लक्ष्य हो और जिसकी सारी शक्ति एकाग्र होकर उसे पाने के लिए क्रमबद्ध अभियान में लगी हो। ऐसे लक्ष्यवान अथवा इच्छाशील व्यक्तियों की जिन्दगी उलझन बनकर नष्ट नहीं होती। अन्यथा जो नित्य नये स्वप्न देखने और उन्हें पाने के लिये लालायित भर होता रहता है वह कभी यह अनुभव ही नहीं कर सकता कि जिन्दगी एक साफ सुलझी हुई पहेली है,वह एक ऐसा सीधा सरल राजपथ है जिस पर आनन्दपूर्वक चलकर अपने इच्छित गन्तव्य पर पहुँचा जा सकता है। जो अपने लक्ष्य के प्रति अनजान, पथ के प्रति अपरिचित तथा गतिविधि से अनभिज्ञ है उसकी जिन्दगी उलझन भरी पहेली के सिवाय और क्या बन सकती है।

लक्ष्य, पथ, शक्ति, सम्बल, क्रम तथा गतिविधि सब अनुरूप होने पर भी यदि धैर्य एवं स्वयं की कमी है तब भी उसका जीवन समस्या बने बिना न रह सकेगा। मंजिल-मंजिल पार करते हुये चलने पर भी यह निश्चित नहीं कहा जा सकता कि आप के क्रमिक प्रयास सफल ही होते जायेंगे। हो सकता है कि आप को बीच की एक-एक मंजिल पर अनेक बार असफलताओं का सामना करना पड़े। आपका एक ही पड़ाव उतना समय ले ले जितना कि आपने अपने लक्ष्य के लिये निर्धारित कर रखा हो। ऐसी दशा में आप पर प्रतिगामिनी प्रतिक्रिया हो सकती है। आप निराश एवं हतोत्साहित हो सकते हैं। यदि आप बीच की असफलताओं से निराश अथवा हतोत्साहित हो गये तो आपका वाँछित लक्ष्य दूर हो जायेगा। आपको एक-एक कदम बढ़ना पहाड़ हो जायेगा। एक-एक मील पथ काले कोस में बदल जायेगा।

इस निराशापूर्ण स्थिति से बचने के लिये आपको गीता के निष्काम कर्मयोग का आदर्श लेकर चलना पड़ेगा। जिसके अनुसार आपको अपने कर्तव्य तथा प्रयत्न को ही अपना अधिकार समझना होगा। आपको विश्वास रखना होगा कि परिश्रम एवं पुरुषार्थ ही हमारे वश की बात है उसका फल हमारे अधिकार के बाहर की बात है। सफलता में अखंड विश्वास लेकर असफलता को सहर्ष स्वीकार करने का साहस लेकर चलने वाला धीर पुरुष ही अपने लक्ष्य को पा सकता है। केवल सफलता के लिये उतावले व्यक्ति बहुधा असफल होकर अपने जीवन में असन्तोष के बीज बोकर दुःखी होते हैं।

जीवन एक सुलझा हुआ सरल मार्ग है। इसे अखण्ड प्रसन्नता के साथ पूरा किया जा सकता है। किन्तु यह सम्भव होगा तभी जब मनुष्य अपनी स्थिति में पूर्ण संतुष्ट रहे, अपनी शक्ति सीमा के अनुरूप वांछाएं करे, उन्हें पाने के लिये सम्पूर्ण शक्ति का उपयोग करे और आकस्मिक असफलताओं को अंगीकार करने के लिये साहसपूर्वक तैयार रहे। अनियंत्रित मनोरथ, अस्थिर इच्छायें और केवल सफलताओं की उत्सुक कामना मनुष्य के सुलझे जीवन के निश्चय ही एक उलझी हुई पहेली बना देगा जिसको सुलझाते-सुलझाते उसकी सारी आयु निकल जायेगी और अंत में वह एक भयंकर असन्तोष लिये संसार से विदा हो जायेगा। मानव-जीवन एक अनमोल अवसर की तरह है इसे सफलतापूर्वक सुख-शाँति के साथ जी सकना स्वयं एक बड़ी सफलता है जिसे पाने के लिये प्रत्येक व्यक्ति को शक्ति भर प्रयत्न करना ही चाहिये।


Quotation

अपनी गति का सृजन करो

हर मनुष्य एक नदी के समान है जो अपनी ही गति में बहता चला जा रहा है। इन सब नदियों की गति में गति मिलाकर चल सकना असम्भव है और इनके विपरीत बहना भी।

तब क्या किया जाय? बहना तो है ही। हाँ बहना है और अवश्य बहना है। बिना बहे काम भी तो नहीं चल सकता। इसका एक आसान रास्ता यही है कि न तो किसी की गति में गति मिलाई जाये और न किसी की गति के विपरीत अपना बहाव चलाया जाय। सभी नदियों के प्रवाह से अपने अनुरूप गति लेकर एक नई, एक अलग गति का सृजन करना चाहिये, जिससे कोई भी नदी हमें गति का चोर न कह सके और न किसी से संघर्ष हो।

अपनी इसी स्व-निर्मित गति में बहे चलो, बहे चलो और पहुँच जाओगे अपने अभीष्ट स्थान पर!

—जापान के गाँधी, कागावा।


सेवा से ही सच्ची सुख शाँति सम्भव है।

ऐसे मनुष्यों का सर्वथा अभाव नहीं है कि जिन्होंने अपनी पहुँच, पुरुषार्थ, प्रयत्न एवं प्रारब्ध तक साँसारिक सुख जैसे स्वास्थ्य सुख; सन्तान-सुख; सामाजिक एवं पारिवारिक सुख, न प्राप्त कर लिया हो। अनेकों ऐसे व्यक्ति मिलेंगे जिन्हें कोई विशेष दुःख न हो और किसी हद तक उन्हें सुखी ही कहा जा सकता है।

किन्तु ऐसे सुखियों से भी यदि सच्चाई के साथ बतलाने का अनुरोध किया जाये तो निश्चय ही वे यही कहेंगे कि उन्हें कोई दुःख तो अवश्य नहीं है, फिर भी इस सुख में एक अभाव, एक अतृप्ति खटकती रहती है। कुछ ऐसा अनुभव होता रहता है जैसे हमें वह सुख, वह तृप्ति नहीं मिल रही है जो मिलनी चाहिये और मिल भी सकती है। इस अभाव, इस खटक और इस अतृप्ति का कारण खोजने में पर भी नहीं मिलता है।

निःसन्देह इस प्रकार की अतृप्ति बड़े से बड़े सुखी व्यक्ति में रहा करती है। यह अभाव, यह अतृप्ति उसकी आत्मा की माँग होती है जो पूरी नहीं की जाती है। संसार के सारे सुख इन्द्रिय-जन्य शारीरिक ही होते हैं। शरीर का अंश न होने से आत्मा की तृप्ति उस से नहीं होती। आत्मा की यही अतृप्ति सुखी व्यक्ति को भी अभाव बनकर खटकती रहती है।

जहाँ शरीर का सुख अर्थ है वहाँ आत्मा का सुख परमार्थ है। जब तक परमार्थ द्वारा आत्मा को संतुष्ट न किया जायेगा, उसकी माँग पूरी न की जायेगी तब तक सर्व सुखों के बीच भी मनुष्य को एक अभाव एक अतृप्ति व्यग्र करती ही रहेगी। शरीर अथवा मन को, संतुष्ट कर लेना भर ही वास्तव में सुख नहीं है। वास्तविक सुख है—आत्मा का संतुष्ट करना, उसे प्रसन्न करना।

साँसारिक भोग भोगने और मनभाई परिस्थितियाँ पा लेने से शारीरिक सुख मिलता है, किन्तु आत्मा सुखी होती है—परोपकार एवं पर सेवा रूपी परमार्थ कार्यों से। अतएव विवेकशील व्यक्ति सच्चा सुख पाने के लिये स्वार्थ सुख की अपेक्षा परमार्थ सुख को अधिक महत्व देते हैं। वे परमार्थ सुख के लिये स्वार्थ सुख का भी त्याग कर देते हैं क्योंकि वे जानते हैं कि शारीरिक सुख छाया है और आत्मिक सुख सत्य है, यथार्थ है। जिसके प्रति हमारी इतनी जिज्ञासा है, इतना आकर्षण है उसके बिम्ब को क्यों प्राप्त किया जाये, क्यों न चन्द्रमा की ही उपलब्धि की जाये।

परोपकार अथवा पर-सेवा ही परमार्थ का सच्चा एवं सक्रिय स्वरूप है। योग, ध्यान, साधना अथवा आराधना की अपेक्षा आत्मिक सुख के मार्ग परमार्थ की ओर बढ़ने के लिये—’सेवा’ सबसे सरल साधन एवं उपाय है।

सेवा संसार में सबसे बड़ा परमार्थ है। इसमें मानव जीवन की महती मान्यताओं का मूल्याँकन रहता है। सेवा द्वारा किसी दूसरे को सुखी बनाने में जो आत्मतोष होता है, उसकी तुलना में शारीरिक सुख तुच्छ एवं नगण्य है। दूरदर्शी व्यक्ति जानते हैं कि परोपकार से मनुष्य का न केवल लोक ही सुधरता है अपितु परलोक भी बनता है। संसार यात्रा के समय जो जिस मात्रा में अपनी आत्मा को प्रसन्न एवं उन्नत बना लेगा, महाभियान के समय वह उतने ही उच्च लोकों का अधिकारी बनेगा। इस प्रकार की अहैतुक प्रसन्नता आत्मा को यदि मिल सकती है तो केवल परोपकार रूपी परमार्थ से। जो परोपकार अथवा परसेवा का कोई व्यावहारिक सत्कर्म न करके आत्मतोष के लिये तप अथवा योग साधन मात्र करते रहते हैं, वे भी एक प्रकार के स्वार्थी ही होते हैं। भले ही उनका वह स्वार्थ तुच्छ, हेय अथवा निकृष्ट न कहा जाये। हाँ, यह आध्यात्मिक स्वार्थ तब अवश्य ही परमार्थ बन सकता है जब यह पर-सेवा अथवा परोपकार के लिये ही किया जाये। यदि तप द्वारा प्राप्त होने वाले आत्म संयम, आत्मशक्ति अथवा आत्मरोध का उद्देश्य यह हो कि हम इस प्रकार एक सच्चे सेवक की पवित्रता प्राप्त करके जन-सेवा, लोक सेवा अथवा परोपकार कार्य में ही संलग्न होंगे तब तो वह तप श्लाघ्य होगा अन्यथा वह भी जायेगा स्वार्थ की परिधि में ही।

आध्यात्मिक उद्योग अथवा परमार्थ साधना का प्रतिफल क्या है —आत्म-बोध। आत्म-बोध, आत्मतोष, आत्म प्रसाद अथवा आत्म सुख। सेवा के सत्कर्म करने पर इस सुफल की प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती। आज ही कोई छोटा-सा सेवा कार्य की याद कर देखिये—आप पायेंगे कि उक्त छोटे सेवा कार्य में जितनी आत्म प्रसन्नता, आत्म संतोष प्राप्त हुआ है उतना सप्ताह भर की पूजा उपासना अथवा तपश्चर्या में भी नहीं प्राप्त हुआ। यह यथार्थ तथा व्यक्तिगत अनुभव कोई भी बड़ा-छोटा व्यक्ति स्वयं ही करके निर्णय कर सकता है कि परोपकार तथा सेवा सत्कार्य सद्य फल-दाता होते हैं। तब ऐसे सद्य-फल-दाता सेवा तप को छोड़कर मनः-मार्गीय उस तपश्चर्या में समय क्यों दिया जाये, जिसका कि प्रतिफल निश्चित नहीं होता।

स्थैर्य तप के नियम नितान्त वैज्ञानिक एवं विलक्षण हैं। यह तलवार की धार से भी अधिक तीक्ष्ण तथा मृणाल-तन्तु से भी अधिक कोमल होते हैं। एक तो इनका सम्पूर्ण निर्वाह ही कठिन है दूसरे यदि इनका निर्वाह भी किये जाने का प्रयत्न किया जाये तो यह तनिक सी मानसिक छलन से टूट जाते हैं। एक लम्बे समय की साधना क्षण मात्र में भंग हो जाती है। वर्षों के साधे हुये संकल्प चारित्रिक विकल्प से नष्ट हो जाते हैं और तब बहुधा साधक को पुनः ‘अ’ ‘आ’ से यात्रा प्रारम्भ करनी पड़ती है। इस प्रकार के संकल्प-विकल्पों का क्रम न जाने कब तक चलता रहता है। यह मनः मार्गीय अध्यात्म साधना जन्म जन्मान्तरों तक की अवधि ले सकती है। सेवा मार्ग से जिस मनःशाँति के लिये मनुष्य को एक जीवन ही काफी है उसके लिये हठ पूर्वक जन्म जन्मान्तरों का मूल्य चुकाना महंगा ही कहा जायेगा। वैसे जो सामर्थ्यवान हैं वे चुकाते भी हैं और एक लम्बी यात्रा का श्रम करके अपना लक्ष्य प्राप्त भी कर लेते हैं। किन्तु जनसामान्य के लिये यह व्यवहार-सम्मत कहा जाना उपयुक्त नहीं जान पड़ता। मन बड़ा दुराग्रही, चंचल तथा बलवान है। यह बिना रज्जु-संयोजन अथवा योजना के यों ही शून्य में पकड़ने से वश में नहीं आता। इसको वश में लाने, अनुद्धत राहगीर बनाने के लिये परोपकार पथ पर जोतना ही होगा—इसे सत्कर्मों में नियोजित करना ही होगा—इसे सेवा की कठोर लगाम देनी ही होगी। सेवा के सत्कर्म में नियोजित मन को इधर उधर भागने का अवकाश ही नहीं मिलता। सेवा कार्य के साथ सम्बंधित दया, करुणा, सहानुभूति तथा आत्मीयता आदि इतने शीतल गुण होते हैं कि इनके स्पर्श सुख से मन स्वयं ही एकाग्र होने लगता है और इस प्रकार धीरे-धीरे शिव संकल्पी स्वाधीन मन स्वतः ही निर्मल होकर आत्मा को एक स्थायी सुख, एक अक्षय प्रसन्नता प्रदान करता है। यही है परमार्थ और यही है मनुष्य का साध्य, जो कि परोपकार तथा सेवा भाव से सहज ही पाया जा सकता है।

इसके अतिरिक्त स्वयं भी ठीक-ठीक नैतिक नागरिक तथा आचरणवान बनना, अपनी विकृतियों, विकार तथा असभ्यता को दूर करके सभ्य, शिष्ट तथा अनुशासित बनना भी एक परोपकार ही है। क्योंकि ऐसा बनने से आप समाज में एक सभ्य नागरिक बनेंगे, अपने संतुलित व्यवहार से दूसरों को शीतल एवं प्रसन्न करेंगे और अपने उदाहरण से दूसरों को सभ्य, शिष्ट तथा सदाचारी बनने की प्रेरणा देंगे। अपने अधिकार तथा कर्तव्यों को ठीक-ठीक समझना और उनका सुधारना सामाजिक ही नहीं सार्वदेशिक सत्कर्म है। इस प्रकार के अन्य न जाने कितने छोटे-छोटे सेवा कार्य हो सकते हैं जिनको सामान्य से सामान्यजन भी प्रतिपादित करके परमार्थ लाभ कर सकता है। दिन भर की व्यस्त जिन्दगी में किया हुआ एक छोटा-सा सेवा कार्य उस दिन को स्वर्गीय सुख-संतोष से भर देगा। उस दिन की कोई भी निराशा, असफलता अथवा विषाद जैसी तीव्र स्थिति आपको व्यग्र अथवा त्रस्त नहीं रख सकती। इस प्रकार आप बिना किसी विशेष श्रम के प्रतिदिन एक छोटा-सा सेवा कार्य करके अपनी पूरी जिन्दगी को हर्ष, उल्लास, सुख और संतोष को आगार बना सकते हैं जो कि आपको एक स्थायी आत्मिक सुख देने में सर्वथा समर्थ होगी। जब साधारण से साधारण जन इस प्रकार निःस्वार्थ सेवा से परमार्थ लाभ कर सकता है, तब धनी मानी तथा साधन सम्पन्न व्यक्ति तो न जाने क्या क्या कर सकते हैं। और यदि प्रत्येक व्यक्ति अपने प्रत्येक कार्य को राष्ट्र, समाज, संसार अथवा ईश्वर का सेवा कार्य समझकर करने लगे तब तो यह संसार ही स्वर्ग बन जाये। न शारीरिक सुख का अभाव रहे और न आत्मिक सुख का अभाव खटके। मनुष्य सम्पूर्ण रूप से सुखी तथा संतुष्ट हो जाये।

सेवा कार्यों में एक बात का विशेष ध्यान रखने की आवश्यकता यह है कि जो भी सेवा की जाये वह सत्पात्र की ही की जाये। अपात्र की सेवा पुण्य के स्थान पर पाप वाहिका ही सिद्ध होगी। न जाने कितने वंचक, अपंग, अन्ध आवश्यकता ग्रस्त समाज में भोले, भले और परोपकारी व्यक्तियों की दया, करुणा तथा सहानुभूति ठगने के साथ अपना आर्थिक उल्लू भी सीधा करते घूमते हैं। ऐसे वंचकों की सेवा अथवा सहायता करने से एक तो बेचारे अधिकारी पात्र वंचित रह जायेंगे दूसरे यह ठग और वंचक समाज में बिना श्रम के जीते हुये विकृतियाँ उत्पन्न करेंगे। सस्ती अथवा अनियंत्रित सहायता सहानुभूति समाज में वंचकों को बढ़ा देती है और उनकी संख्या में वृद्धि करती है। इसलिए इस बात का भी विशेष ध्यान रखना है कि हमारी व्यावहारिक, भावनात्मक, मौन अथवा मुखर सेवा का दुरुपयोग न हो।

इस प्रकार का विवेक विचार रखते हुये आज से ही सेवा कार्य में लगकर लगे रहिये, आपका आत्मिक अभाव दूर होगा, आपको सच्ची तथा स्थायी सुख-शाँति प्राप्त होगी।


मीरजाफर द्वारा विश्वासघात

सन् 1757 की बात है—अंग्रेज बंगाल पर अपना कब्जा करने का प्रयत्न कर रहे थे। किन्तु नवाब सिराजुद्दौला की नीतिमयी वीरता से उनकी दाल न गलती थी। बार-बार मुँह की खाने पर अंग्रेजों ने कूटनीति से काम लिया। उन्होंने सिराजुद्दौला के सेनापति मीरजाफर पर डोरे डालने शुरू किये। उन्हें पता लग गया कि मीरजाफर एक कुशल सेनापति होते हुये भी बड़ा लालची और कमजर्फ आदमी है। अंग्रेजों ने उसका लाभ उठाया और उसे बंगाल का नवाब बना देने का लालच देकर अपनी ओर मिला लिया। मीरजाफर नवाबी का स्वप्न देखता हुआ बड़ा खुश रहने लगा।

इधर अंग्रेजों ने नई तैयारी करके बंगाल पर फिर आक्रमण किया। सिराजुद्दौला ने सेनापति मीरजाफर को मोर्चे पर भेजा। नवाब के मन बढ़े सिपाही बड़ी वीरता से लड़े किन्तु गद्दार मीरजाफर ने उन्हें हतोत्साहित करके अस्त-व्यस्त कर दिया। अंग्रेजों की जीत हो गई जिसके फलस्वरूप बंगाल पर उनका अधिकार हो गया।

मीरजाफर ने जब अपना वचन पूरा करने को कहा—तो अंग्रेज सेनापति ने घृणा से यह कहकर उसे तलवार के घाट उतार दिया—”कि ऐ विश्वास घाती कुत्ते! तू बंगाल का सुलतान होने का स्वप्न देख रहा है। तेरे जैसे गद्दार को दुनिया में जीवित रहने का कोई अधिकार नहीं है। जब तू अपने मालिक और मुल्क का न हुआ, तो हमारा ही क्या होगा?”


श्रमिक जीवन को अतिशय प्यार करने वाला विद्वान-ऐरिक हौफर

ओजस्वी वक्ता, तेजस्वी लेखक और मौलिक विचारक श्री ऐरिक हौफर ने समाजवादी विचारधारा पर अनेक प्रामाणिक पुस्तकें लिखी हैं। उनकी प्रसिद्ध एवं प्रकाशित पुस्तकों में ‘दि टू बिलीवर’, ‘दि पैशनेट स्टेट आफ माइन्ड’ और ‘दि और्डियल आफ चेन्ज’ अपना विशिष्ट स्थान रखती हैं।

उनके आलोचकों का कथन है कि ऐरिक हौफर मुहावरेदार भाषा के प्रयोक्ता, नैतिकतावादी और मानव-समाज की स्थिति के दृष्टा हैं। उनके सिद्धान्त व्यावहारिक और परिभाषायें सुबोध हैं। श्री ऐरिक की रचनाओं ने अमेरिका के श्रमिक वर्ग तथा समाज को एक परिवर्तनकारी विचार-धारा देकर मालिक और मजदूरों को परस्पर समन्वय स्थापित करने के उपायों पर सोचने को विवश किया जिसका फल अमेरिका में मालिक मजदूरों के बीच एक समझदारी आयी जो राष्ट्रीय अर्थ-तन्त्र को सुदृढ़ बना सकने में काफी हद तक सहायक सिद्ध हुई है।

श्री ऐरिक एक यथार्थवादी समाज-चिन्तक हैं। मजदूरों और मालिकों की प्रवृत्तियों को उन जैसे समझने वाले चिन्तक विरले ही हुये हैं। इसका विशेष कारण यह है कि वे स्वयं भी एक मजदूर हैं। सो भी कलम के मजदूर नहीं, ठीक-ठीक शारीरिक श्रमिक और इस समय भी वे प्रशान्त तट पर जहाजी घाट मजदूर की हैसियत से काम करते हैं।

श्री ऐरिक हौफर एक प्रसिद्ध एवं प्रामाणिक लेखक तथा प्रवक्ता हैं। यदि वे चाहें तो अपनी रचनाओं एवं वक्तृताओं के बल पर शाही जीवन व्यतीत कर सकते हैं। प्रकाशक उनके पीछे उनके लिपिबद्ध विचार लेने के लिये पैसों की थैली लिये लगे रहते हैं। नित्यप्रति कालेजों से समाजवाद पर लेक्चर देने के लिये उनके पास निमन्त्रण आते रहते हैं सो भी अच्छे खासे पारिश्रमिक के साथ। किन्तु त्याग की मूर्ति और परिश्रम की प्रतिमा हौफर उसका कोई लाभ उठाने को तैयार नहीं होते। वे पुस्तकें लिखते हैं पर पैसे के लिये नहीं, कालेजों में वक्तव्य देते हैं पर पारिश्रमिक लिये नहीं और जो कुछ उन्हें लेने के लिये विवश भी होना पड़ता है उनको वे मजदूरों के हित में ही खर्च कर देते हैं। अमेरिका में श्री ऐरिक हौफर ही एक ऐसे लोकप्रिय लेखक हैं जिनके पास न सूट हैं और न टाई और न वे कभी किसी होटल रेस्टोरेन्ट में ऊँची-ऊँची बातें करते पाये जाते हैं। श्री हौफर के मित्रों का कहना है कि यदि वे एक दो वर्ष के लिए अपनी त्यागवृत्ति का परित्याग करदें तो उनके पास इतना पैसा हो सकता है कि वे एक आलीशान कोठी में आरामदेह जिन्दगी बिता सकते हैं।

किन्तु हौफर का कहना है—कि मैं नहीं समझ पा रहा हूँ कि ज्यादा धन पा जाने से मेरी वर्तमान दशा बदल जायेगी और मैं मेहनत-मजदूरी से विरत होकर आराम की जिन्दगी बिताने लगूँ या एक राजा की तरह जिन्दगी अपना कर अपने साथी मजदूरों के बीच आना जाना, उठना-बैठना और रहना-सहना छोड़ सकूँ। मुझे तो विश्वास नहीं कि मैं धनवान बनकर अपनी परिश्रम एवं सन्तोषपूर्ण निर्धनता को छोड़ सकने में सफल हो जाऊँगा। जिस निर्धनता ने मुझे परिश्रमी बनाया, मेहनत मजदूरी करने वालों के लिये दिल में एक दर्द पैदा किया और एक विचारक बनाकर उनकी समस्याओं पर सोचने व लिखने की प्रवृत्ति दी है और जिसकी कृतज्ञता से मेरा रोम-रोम ऋणी है, धन मुझे इस निर्धनता से विमुख कर सकेगा ऐसा सोच सकना मेरे वश की बात नहीं है। मुझे सदैव यह बात आवश्यक प्रतीत होती रहती है कि मैं उतने से अधिक कुछ भी न जटाओं जिसकी गठरी अपनी पीठ पर न ढो सकूँ और एक दिन थककर परिश्रम से ही हाथ धो बैठूँ।

इस समय वे सन-फ्रान्सिस्को की खाड़ी के सामने एक मकान के छोटे से हिस्से में अपने छोटे से परिवार के साथ रह रहे हैं। वह परिवार भी उनके अपने बाल-बच्चे नहीं हैं बल्कि एक तरुण तथा होनहार मजदूर को अपना पुत्र मानकर और उसके आठ वर्षीय पुत्र के दादा बनकर पोते का निर्माण कर रहे हैं। उनका आठ वर्षीय मजदूर पोता हर मंगलवार को स्कूल की पढ़ाई खत्म करके दादा के साथ समुद्र तट, उद्यान, पुस्तकालय अथवा संग्रहालय में जाता है जहाँ वे दोनों बहुत कुछ सीखते और एक दूसरे को बहुत कुछ सिखाते हैं। श्री हौफर अपने इस परिवार के साथ काफी सुखी तथा संतुष्ट हैं।

अमेरिका के इस मजदूर विचारक का पूर्व जीवन उसके आज के जीवन से भी कठिन एवं असुविधापूर्ण रहा है। उसके पिता अलमारी बनाने का काम करने वाले एक जर्मन प्रवासी थे। घर की हालत कुछ अच्छी न थी। अतएव ऐरिक हौफर को स्कूल जाने का अवसर न मिल सका। उसने घर पर ही जैसे तैसे अंग्रेजी व जर्मन भाषा सीखना प्रारम्भ किया। किन्तु निर्मम नियति को बालक का यह उद्योग सहन न हुआ और सात वर्ष की आयु में उसकी आँखों की रोशनी छीन ली।

किन्तु बालक हौफर इससे रंचमात्र भी विचलित न हुआ। अब वह पढ़े-लिखे लोगों के पास किताबें लेकर जाने और उनसे पढ़वाकर सुनने लगा। उसकी विद्या विषयक यह लगन देखकर अनेक भद्र पुरुषों ने उसकी आँखों का इलाज करवाने का प्रबन्ध कर दिया जिससे उसे कुछ-कुछ दृष्टि लाभ हुआ। फिर भी पन्द्रह वर्ष की आयु तक वह ठीक से न देख पाता था।

इसी बीच उसके पिता की मृत्यु हो गई और वह गली-गली घूमने वाला एक अनाथ बालक बन गया। अनेक लोगों ने उस पर दया करके कुछ देना चाहा किन्तु उसके स्वाभिमान ने किसी का दिया स्वीकार करने से स्पष्ट इनकार कर दिया। वह दया दिखलाने वाले से यही कहा करता था कि आप मुझे कुछ देने के बजाय कोई काम दें यही अच्छा होगा। बालक हौफर इसी प्रकार दस साल तक मेहनत-मजदूरी करता और पेट पालता घूमता रहा।

इस अनाथावस्था के भ्रमण में उसे न जाने कितनी रातों भूखों सोना पड़ा और न जाने कितनी सर्दियां ठिठुर कर काटनी पड़ीं। नियति द्वारा भिक्षुक की स्थिति में पहुँचाये गये ऐरिक हौफर ने न तो कभी भीख माँगी, न किसी का दान स्वीकार किया और न हिम्मत हारी। यदि वह कभी किसी से कुछ माँगता था तो केवल पुस्तकें, जिन्हें वह किसी दुकान अथवा सड़क की रोशनी में बैठकर धीरे-धीरे पढ़ता था। अध्ययन की तन्मयता में उसने न जाने कितने दिन-रात बिना खाये-पिये बिता दिये।

इस प्रकार बहुत कुछ कष्ट उठाने और काम खोजने के बाद उसे एक सोने की खान में मजदूरी मिल गई जहाँ उसने पराकाष्ठा तक मेहनत और ईमानदारी से काम किया। अनेक वर्षों तक सोने की खान में काम करने के बाद वह प्रशाँत तट पर जहाजी घाट मजदूरों में काम करने लगे और तब से अब तक वहीं काम करते हैं।

श्री ऐरिक हौफर आज भी अपने साथियों को अपने संकट काल के अनुभव सुनाते और इस पर सन्तोष प्रकट करते हैं कि नियति ने उन्हें भिखारी बना देने में कोई कसर उठा न रखी, किन्तु उनके स्वाभिमान और परिश्रमशीलता ने उन्हें कभी भी पस्त हिम्मत न होने दिया। उन्होंने भविष्य का आशा-प्रदीप एक क्षण के लिये भी कभी बुझने न दिया।

उन्होंने बताया “जिस समय 1920 में मेरे पिता की मृत्यु हुई उस समय मेरी आयु ठीक अठारह वर्ष की थी। पिता की मृत्यु के बाद जब मैं संसार में अकेला रह गया तो इस कोलाहल से भरी दुनिया को देखकर जी काँप उठा। किन्तु तुरन्त ही मैंने अपने को धिक्कारा कि “इस प्रकार हिम्मत हारने का क्या काम? भगवान ने हाथ-पैर दिये हैं और संसार में काम की कमी नहीं तब डरने की क्या जरूरत? सामान लादकर घर से निकल पड़ा। हर छोटा बड़ा काम करने के लिये तैयार हो जा। तुझे काम मिलेगा, रोटी मिलेगी और आश्रय मिलेगा।”

अपनी आत्मा की प्रेरक आवाज सुनकर मैं घर से टोकरी में अपनी सम्पत्ति पुस्तकों को भरकर निकल पड़ा और कैलीफोर्निया पहुँचा। कैलीफोर्निया में मेरे सामने काम से अधिक निवास की समस्या थी। निवास की समस्या इसलिये नहीं थी कि मैं कोई अच्छा मकान चाहता था। समस्या यह थी कि मेरा मकान किसी ऐसी जगह हो जहाँ पर समीप ही एक अच्छा पुस्तकालय भी हो। क्योंकि घर से एक अच्छे शहर में आकर केवल रोटी ही कमाना नहीं चाहता था ज्ञानार्जन भी करना चाहता था। मैं कई दिन तक एक ऐसे कमरे की तलाश में भटकता रहा और अन्त में अपने प्रयत्न में सफल भी हो गया। किन्तु अब एक दूसरी समस्या फिर खड़ी हो गई। पास की नगण्य पूँजी खत्म हो चुकी थी आज मेरे पास एक वक्त के भोजन के पैसे भी नहीं बचे थे।

भूख से व्याकुल होकर मैं एक होटल के सामने जाकर खड़ा हो गया। होटल के मालिक ने समझा कि मैं कुछ पाने की आशा में खड़ा हूँ। उसने पूछा—’क्या भूखा है? रोटी खाना चाहता है?’ मैंने बड़ी शिष्टता से उत्तर दिया—”हाँ, श्रीमान जी भूखा भी हूँ और रोटी भी खाना चाहता हूँ, किन्तु यों ही नहीं, कुछ काम करके। मेरे पास पैसे नहीं हैं। आप मुझसे कुछ काम करा लीजिये और उसके बदले में रोटी खिला दीजिये” होटल का मालिक एक भद्र व्यक्ति था। उसने मेरी दीन दशा में छिपे हुये स्वाभिमान को समझ लिया और उसकी रक्षा भी की।

उस समय उसके पास तश्तरियाँ धोने का ही काम था। मैंने सहर्ष स्वीकार किया और काम करना स्वीकार कर दिया। मैंने इतना मन लगाकर तश्तरियाँ धोने का काम किया कि होटल का मालिक खुश हो गया और मुझे स्थायी नौकर रख लिया। कुछ समय बाद हम दो नौकरों में से एक को निकालने की आवश्यकता आ पड़ी। मालिक मुझसे खुश था। इसलिये उसने मेरे दूसरे साथी को नोटिस दे दिया। वह मुझसे पुराना भी था और निर्दोष भी। मैं उसका अधिकार छीनने को राजी न हुआ और खुद काम छोड़ दिया। मेरा साथी मेरे इस न्यायपूर्ण त्याग से बहुत खुश हुआ और काम खोजने में बड़ी मदद की। अपने उस होटल के साथी की मदद से ही मैं यहाँ आप लोगों के बीच जहाजी घाट पर आज भी काम करता हुआ प्रसन्न एवं संतुष्ट हूँ।”

इन कठिन परिस्थितियों से गुजर कर अपनी योग्यता, स्वाभिमान एवं जीवन की रक्षा करने वाले श्री ऐरिक हौफर इस समय अमेरिका के लब्ध प्रतिष्ठित लेखकों तथा मजदूर नेताओं में हैं। उनके लिये आज कॉलेज से लेकर सरकार तक में स्थान मिलने की सम्भावनायें बनी हुई हैं किन्तु वे अपने मजदूर जीवन में ही प्रसन्न रहकर मजदूरों की समस्याओं पर लिखते, उनका सुधार करते और आवश्यकता पड़ने पर पथ प्रदर्शन करते हैं।

उन्हें इस बात पर गर्व है कि वे एक मजदूर हैं। “मेरी दृष्टि में श्रम, सच्चरित्रता और मानवीय योग्यता का प्रतीक है। मेरी इच्छा है कि अन्तिम दिन तक मैं जहाजी घाट का मजदूर बना रहूँ और शायद मेरी यह इच्छा पूरी भी होगी।”


Quotation

अपनी सीमा के भीतर रहो

सत्य का कोई एक निश्चित रूप नहीं। देश काल के अनुसार सत्य की मान्यता बदलती रहती है। किन्तु सत्य में निहित जो एक कल्याणकारी तत्व है वह चिरन्तन है, एक है, अपरिवर्तनशील है। जिस बात में भी यह शिव-तत्व निहित होता है वह बात सदा सत्य है। वैसे सत्य का कोई मौलिक रूप नहीं है।

इसी तराजू से यदि तोलकर देखा जाये तो आज बहुत से सत्यों का थोथापन सामने आ जायेगा। फिर किसी एक सत्य पर किसी एक देश का आधिपत्य नहीं है। न कोई जाति विशेष ही किसी सत्य पर अपना इजारा जाहिर कर सकती है।

कोई एक बात एक देश के लिये सत्य और कल्याणकारी हो सकती है और दूसरे के लिये नहीं। पर यह सबके लिये समान रूप से सत्य है कि विश्व शाँति तभी सम्भव है जब प्रत्येक व्यक्ति एवं देश अपनी सीमाओं और अपने साधनों में संतुष्ट रहे।

—महामना मदनमोहन मालवीय


तीन सौ भाषाओं के जानकार—डा. हेराल्ड सुज

जर्मनी के महाविद्वान डा. हेराल्ड सुज संसार के आश्चर्यजनक विद्वानों में से हैं। वे आश्चर्यजनक इन मानों में नहीं हैं कि उन्होंने कोई आश्चर्य चकित कर देने वाला चमत्कार दिखाया हो। न तो वे कोई चमत्कारी व्यक्ति हैं और न कोई सिद्ध योगी। हाँ, एक अबोध अध्यवसायी एवं अध्ययनशील व्यक्ति अवश्य हैं और अपनी परिश्रम पूर्ण अध्यवसायता से जो काम कर दिखाया है वह निःसन्देह एक चमत्कार जैसा ही है। वे बर्लिन के फ्राँकफर्ट मुहल्ले की एक गली में बने अपने मकान में किसी समय भी मिल सकते हैं, किन्तु अपनी पंद्रह हजार विविध भाषाओं की पुस्तकों की लायब्रेरी के बीच पढ़ते अथवा लिखते हुये।

डा. सुज ने संसार की लगभग तीन सौ भाषाओं का ज्ञान प्राप्त किया है और अभी भी लगभग दो सौ भाषाओं का परिचय प्राप्त करने का प्रयत्न कर रहे हैं। इस समय उनकी आयु लगभग सत्तर वर्ष की है। वे शरीर से पूर्ण स्वस्थ हैं तथा काम में पूरी तरह तत्पर रहते हैं।

उन्होंने इतनी बड़ी संख्या में विभिन्न भाषायें सीखने का रहस्य बतलाते हुये विश्वासपूर्वक कहा कि मनुष्य में शक्ति का अनन्त भंडार भरा हुआ है और यदि किसी की किसी कार्य में सच्ची लगन है और वह उसे करने के लिये सच्चे मन और श्रम से काम करता है तो कोई कारण नहीं कि वह उसमें पूर्ण रूपेण कृतकृत्य न हो सके।

मैंने सदैव ही मानव की अमोघ शक्तियों और उनका उपयोग करने में विश्वास रक्खा है। यह मेरे उसी विश्वास का पुरस्कार है कि मैं संसार की विभिन्न तीन सौ भाषाओं का ज्ञान प्राप्त कर सकता हूँ।

डा. सुज ने अपने जीवन में तीन मूल सिद्धान्त बनाये, जिन्हें उन्होंने अध्ययनशाला में लिखकर टाँग रक्खा है और शुरू से अब तक उन्हीं सिद्धान्तों के अनुसार काम करते आये हैं। उनके वे तीन सिद्धान्त हैं—(1)अध्ययन, (2) ज्ञान की नित नूतन जिज्ञासा (3) अनवरत लगन तथा श्रम। डा. सुज अपने इन्हीं सिद्धान्तों का ईमानदारी से पालन करते हुये आज इस विचार सफलता के स्वर्ण शिखर पर पहुँच सके हैं।

डा. सुज के पूर्वजों में से अनेक, अनेक भाषाओं के ज्ञाता रहे हैं। वह भाषा विज्ञ अपने की मूल प्रवृत्ति उन्होंने अपने पूर्वजों से ही पाई थी। अन्तर केवल इतना रहा है कि उनके पूर्वज केवल व्यक्तिगत लाभ एवं मनोरंजन के लिये अनेक भाषायें सीखते रहे हैं जबकि डा. सुज ने इस उपलब्धि में मानव समाज का हित सन्निहित कर रक्खा है।

डा. सुज ने कोई भाषा व्यवसाय अथवा कीर्ति उपार्जन के लिये नहीं सीखी। बल्कि उनको निःस्वार्थ भाव से मानव-ज्ञान गरिमा को बढ़ाने के लिये ही सीखा है। डा. सुज ने अपने अध्ययन काल में ही लैटिन, ग्रीक, हिब्रू आदि अनेक प्राचीन भाषायें सीख ली थीं। इसके साथ फ्रेंच तथा अंग्रेजी भाषा उन्होंने खेल कूद में अपने विदेशी साथियों से ग्रहण की।

इन पाँच सात विभिन्न भाषाओं के साथ विश्व-विद्यालय की शिक्षा समाप्त करने के बाद उन्होंने अनेक वर्षों तक गणित, दर्शन एवं प्रकृत-विज्ञान के विषयों में अध्यापन कार्य किया। गणित, दर्शन तथा प्रकृत-विज्ञान जैसे जटिल विषयों का अध्ययन-अध्यापन करते हुये भी डा. सुज ने विभिन्न भाषाओं का ज्ञान प्राप्त करने की अपनी लगन को शिथिल न होने दिया। वे अध्यापन के व्यस्त कार्यक्रम में से थोड़ा बहुत समय निकालकर भाषाओं पर व्यय करते रहे। इसका परिणाम यह हुआ कि एक लम्बी अवधि के बाद पेंशन पाने तक उनका यह भाषा-प्रेम अक्षुण्ण बना रहा।

सेवा से निवृत्त होने के बाद उनके अनेक मित्र उनके पास यह मालूम करने आये कि डा. सुज अपना शेष जीवन किस प्रकार व्यतीत करेंगे? उनके एक मित्र ने उनकी श्रमशीलता की प्रशंसा करते हुये कहा कि आपने अपने सेवा काल में जी तोड़ परिश्रम किया है, अब तो शायद आप अपने शेष जीवन में जी भर विश्राम ही करेंगे ? डा. सुज ने हँसते हुये उत्तर दिया-”मेरे भले मित्र! परिश्रम करने का समय तो अब आया था। अध्यापन काल का श्रम तो पैसे की सेवा थी जो कि मजबूरन मुझे करनी पड़ी है। अब मैं अपने पारिवारिक उत्तरदायित्व से मुक्त हो चुका हूँ। वास्तविक सेवा तो अब कर सकूँगा। अपने इस अवकाश काल में मैं जो कुछ कर सकूँगा उसे ही वास्तविक करना समझूँगा और उसे ही अपने जीवन की सच्ची सम्पत्ति मानकर संसार से विदा होते समय संतोष कर सकूँगा।”

डा. सुज अपने उद्देश्य में जुट ही नहीं गये बल्कि डूबकर खो गये हैं जिसके फलस्वरूप अब तक उन्होंने चीनी, अरबी, जापानी, संस्कृत, इटैलियन, तमिल तेलगू, कन्नड़, फारसी आदि प्रगतिशील भाषाओं के अतिरिक्त उत्तर, मध्य एवं दक्षिण अमेरिका के आदिम वासियों, पूर्वीय देशों की विभिन्न प्राचीन भाषाओं, नीग्रो एवं एस्कीमों जाति के लोगों की भाषाओं का ज्ञान प्राप्त कर लिया है। रशियन, तुर्की, बर्मी, जापानी, डच, फिनिश, हिब्रू, अरबी, अंग्रेजी, फ्रेंच, हंगेरियन, असीरियन, संस्कृत, हिन्दी, तमिल, बंगला, मराठी तथा भारत की पर्वतीय एवं दक्षिणी भाषाओं पर तो उन्होंने पूर्ण अधिकार प्राप्त कर लिया है। इस प्रकार इस समय वे संसार की लगभग तीन सौ पुरानी-नई भाषाओं के ज्ञाता हो चुके हैं।

डा. सुज ने केवल भाषाओं का ज्ञान ही प्राप्त नहीं किया बल्कि उनमें साहित्य भी लिखा है। अंग्रेजी, फ्रेन्च, इटालियन एवं स्पेनिश भाषा में अनेक पुस्तकें लिखने के साथ उन्होंने चीनी भाषा का बहुत सा साहित्य विभिन्न भाषाओं में अनूदित किया है। स्पेनिश भाषा में लिखी हुई उनकी कवितायें संसार के काव्य साहित्य में अपना विशेष स्थान रखती हैं। अरबी भाषा में जिन कविताओं का सृजन डा. सुज ने किया है उसके कारण वे अरबी भाषी लोगों में काफी लोकप्रिय हो चुके हैं। चीनी जैसी कठिन भाषा की कवितायें तो चीन में बड़े चाव से पढ़ी जाती हैं। इसके अतिरिक्त वे पचास भाषाओं के प्रेम गीतों का एक संग्रह विभिन्न भाषाओं में अनुवाद करके प्रकाशित कर चुके हैं।

इस सब साहित्य सृजन के अतिरिक्त उनका जो सबसे बड़ा और उपयोगी कार्य है वह है संसार भर की भाषाओं का सूची पत्र जिसे उन्होंने अकारान्त विधि से तैयार किया है। उसमें संसार की तीन सौ भाषाओं के केवल नाम ही नहीं हैं बल्कि डा. सुज ने उनका संक्षिप्त इतिहास भी लिखा है। डा. सुज का भाषा सम्बंधी अनुसंधान कार्य अभी चल रहा है और उन्होंने विश्वास प्रकट किया है कि वे अपने अन्तिम समय तक इस भाषा सूची में कम से कम दो सौ भाषायें और जोड़ सकेंगे।

डा. सुज से जब भी कोई मिलने गया उसने यही देखा कि या तो वे किसी फ्राँसीसी उपन्यास का अनुवाद कर रहे हैं अथवा किसी विदेशी भाषा की पुस्तक का अध्ययन कर रहे हैं। अभी यदि किसी ताम्रपत्र को पढ़ कर रक्खा है, तो ताड़ पत्र उठा लिया है। आशय यह कि उनके जीवन की प्रत्येक श्वास अपने उद्देश्य की पूर्ति में पूरी तरह से लगी रहती है। यद्यपि डा. सुज ने किसी से मिलने का निषेध नहीं रक्खा है तथापि लोग उनका काम और व्यस्तता देखते हुये उनका बहुत ही कम समय खराब करते हैं।

कहना न होगा यदि यह मानव अपने उद्देश्य में सफल हो गया और उसकी एक मानव-सभ्यता के लिये रक्खी हुई नींव पर आगे जाने वाली पीढ़ियों ने पत्थर चढ़ाये तो एक दिन अवश्य ही संसार से द्वेष तथा वैमनस्य का विष दूर हो जायेगा और संसार की पूरी मानव जाति एक मानव समाज में बदल जायेगी, जिसकी एक सभ्यता, एक संस्कृति तथा एक भाषा हो सकती है। अभी तो यह बात दूर का स्वप्न दिखाई देती है पर पुरुषार्थ से कुछ भी असम्भव नहीं। कौन कह सकता है कि जिस दिन डा. सुज का उद्देश्य साकार होगा मनुष्यों की यह धरती स्वर्ग नहीं बन जायेगी। हम सब को ऐसे सदाशयी व्यक्ति की दीर्घ आयु के लिये मंगल कामना करनी चाहिये।


पर-दोष दर्शन की कुत्सा त्यागिए

यह सारा संसार गुण-दोषमय है। संसार की कोई भी वस्तु अथवा प्राणी सर्वथा गुणसम्पन्न अथवा दोषमुक्त नहीं है। सभी में कुछ न कुछ गुण और कुछ न कुछ दोष मिलेगा। परमात्मा ही अकेले पूर्ण एवं दोषरहित हैं। अन्य सब कुछ गुण-दोषमय एवं अपूर्ण है।

सामान्यतः मनुष्यों में दोष-दर्शन का भाव रहा करता है। इसी दोष के कारण वे अच्छी से अच्छी वस्तु में यहाँ तक कि परमात्मा तक में भी दोष निकाल लेते हैं। दोष-दर्शन करते रहने वाला व्यक्ति संसार में किसी प्रकार की उन्नति नहीं कर सकता। उसकी सारी शक्ति और सारा समय दूसरों के दोष देखने तथा उनकी खोज करने में लगे रहते हैं। दूसरों की आलोचना करना, उनके कार्यों तथा व्यक्तित्व पर टीका टिप्पणी करना, उनके दोषों की गणना करना उनका एक व्यसन बन जाता है। दोषदर्शी व्यक्ति निःसन्देह बड़े घाटे में रहता है।

छिद्रान्वेषक व्यक्ति को संसार में कुरूपता के सिवाय और कुछ दीखता ही नहीं। किसी बात में सौंदर्य देख सकना उसके भाग्य में होता ही नहीं। उसे अच्छी से अच्छी पुस्तक पढ़ने को दीजिये और उसके बारे में पूछिये तो वह बड़े अनमने मन से यही कहेगा कि—हाँ पुस्तक को अच्छा कह लीजिये किन्तु वास्तव में वह श्रेष्ठ पुस्तकों की सूची में रखने योग्य नहीं है। विचार अच्छे हैं तो भाषा शिथिल है। भाषा तथा विचार दोनों अच्छे हैं तो विषय योग्य नहीं है और यदि यह तीनों बातें अच्छी हैं तो पुस्तक बड़ी है, उसका मेकअप गेटअप अच्छा नहीं है। छपाई साफ सुथरी तथा सुन्दर नहीं है। यदि और कुछ दोष नहीं तो उसका मूल्य उचित नहीं है। इस प्रकार दोषदर्शी अच्छी से अच्छी पुस्तक में कोई न कोई दोष निकाल ही लेगा।

दोषदर्शी की दृष्टि में संसार की हर वस्तु तथा बात दोषपूर्ण होती है। उसे किसी महापुरुष, समाज सेवी अथवा लोकनायक के दर्शन कराइये और उनकी विशेषताओं, योग्यताओं तथा सेवाओं की चर्चा कीजिए तो वह बड़े अधैर्य से सुनेगा और मौका पाते ही दोष वर्णन करना शुरू कर देगा—”हाँ! यह गुणी हो सकते हैं किन्तु इनमें अहंकार की मात्रा बहुत है। यह कहते ज्यादा और करते कम हैं, ये सभी इस आड़ से अपना स्वार्थ सिद्ध करते हैं। यह तो अवसर की बात है कि इनको इस प्रकार की प्रतिष्ठा मिल गई है। आदर-सम्मान पाकर तो सभी वक्ता एवं उपदेशक बन जाते हैं। इस विषय में इनको श्रेय देने का क्या लाभ?” दोषदर्शी व्यक्ति इस प्रकार के न जाने कितने दोष निःस्वार्थ एवं निस्पृह महापुरुषों में निकाल कर रख देगा।

दोषदर्शी का वास्तव में यह बड़ा भारी दुर्भाग्य है कि वह किसी व्यक्ति अथवा वस्तु में गुण देख ही नहीं पाता। यह उसके स्वभाव की एक बड़ी कमी होती है। उसका हृदय इतना कलुषित एवं ईर्ष्यापूर्ण होता है कि वह किसी के वास्तविक गुणों को भी स्वीकार नहीं कर पाता। यदि वह ऐसा करता है तो उसका क्षुद्र हृदय डाह की आग से जलने लगता है। उसे संतोष तो दूसरों की आलोचना, निन्दा तथा टीका टिप्पणी करने में ही आता है। यही उसका सुख और यही उसकी शाँति होती है।

दूसरों के दोष देखते रहने वाले व्यक्ति स्वभावतः दोषग्राही भी होते हैं। दृष्टि-दोष के कारण जब उन्हें संसार में गुण दिखाई ही नहीं देते तब वह उनके प्रति आकर्षित भी किस प्रकार हो सकते हैं? दोष देखते-देखते उनका दुर्भाग्य यहाँ तक बढ़ जाता है कि वे उन्नति एवं विकास का कारण दोषों को मानने लगते हैं। जब वे उन्नति वान व्यक्तियों में छल-कपट, ढोंग, प्रदर्शन एवं आडम्बर के दोषों का आरोप कर विचार करते हैं तो यही विश्वास कर बैठते हैं कि उनकी उन्नति का विशेष कारण यह आडम्बर ही है। दोषदर्शी की दृष्टि महान व्यक्तियों के परिश्रम, पुरुषार्थ, त्याग बलिदान, निःस्वार्थ एवं सच्चे सेवा भाव की ओर जाती ही नहीं जो कि उन्नति के वास्तविक हेतु होते हैं। अपने वंचक विश्वास के कारण दोषदर्शी व्यक्ति बहुधा इन्हीं हीनताओं को आधार बनाकर उन्नति का प्रयत्न करने लगते हैं और जब दुर्गुणों के निश्चित परिणाम के रूप में वे लाँछना, अपवादों तथा कलंकों के आखेट बनकर धूल में मिल जाते हैं तब भी अपने को दोष नहीं दे पाते। वे अपनी इस दुर्दशा का दोष भी दूसरों को ही दिया करते हैं।

यह सारी सृष्टि गुण-दोषमय है। सभी में कुछ न कुछ दोष और गुण रहा करते हैं। दुष्ट व्यक्ति ही दूसरों के दोष देखा करते हैं, जब कि साधु पुरुष दूसरों की गुणों पर ही दृष्टि डाला करते हैं। उन्हें अपनी निष्कलंक भावना और गुण पूर्ण दृष्टि के कारण दूसरों के दोष दिखाई ही नहीं देते। साधु पुरुष दुष्ट में भी गुणों की खोजकर लिया करते हैं। यह मनुष्य के अपने ही गुण-दोषों का प्रतिबिम्ब हुआ करता है जो दूसरों में दिखाई देता है। जिस व्यक्ति में जिस प्रकार के गुण−दोष छिपे रहते हैं वह दूसरों के उन्हीं गुण−दोषों को आगे रखकर सोचता है, उन्हीं को महत्व देता है। दोषदर्शी व्यक्ति जब भी किसी के विषय में चर्चा करेगा तो उसकी चर्चा का विषय उसके दोष ही होंगे। इसके विपरित जब कोई गुणी व्यक्ति किसी के विषय में बात करेगा तो वह उसके गुणों को ही चर्चा का विषय बनायेगा। दूसरों के विषय में वार्तालाप के आधार पर कोई भी व्यक्ति अपने विषय में आसानी से जान सकता है कि वह दोषदर्शी है अथवा गुणदर्शी। जो व्यक्ति इस कसौटी पर अपने को परदोषदर्शी पाये, उसे चाहिए कि वह अपनी इस दुर्बलता को दूर करके अपना दृष्टिकोण गुणदर्शी बनाये। क्योंकि दोष-दर्शन की दुर्बलता एक ऐसा अभिशाप है जो मनुष्य का लौकिक एवं पारलौकिक दोनों प्रकार का पतन कर देता है।

दोष-दर्शन से मनुष्य में दूसरों के ऐसे अनेक दोष भी घर कर जाते हैं जो उसमें पहले से नहीं थे। जिस विषय में रुचि रखकर उसकी चर्चा एवं चिन्तन किया जायेगा वह मनुष्य के स्वभाव का चित्र बन जाता है और धीरे-धीरे चेतना पर छा जाया करता है।

दोषदर्शी व्यक्ति दूसरों की निन्दा करने के सिवाय और कुछ नहीं कर सकता। निन्दा की वृत्ति समाज में घृणा तथा वैमनस्य को जन्म देती है। निन्दा करने वाले व्यक्ति को बदले में स्वयं भी निन्दा का लक्ष्य बनना पड़ता है। निन्दक एवं निन्दित दोनों ही घृणा के पात्र होते हैं। उनसे न तो कोई सहयोग करता है और न किसी प्रकार की सहानुभूति रखता है। वे समाज में अकेले पड़कर जीवन में प्राणान्तक असफलता के भागी बनते हैं।

परदोषदर्शी निन्दक अपने मित्रों की संख्या कम कर लेता है और शत्रुओं की संख्या बढ़ा लेता है। जो दिन-रात दूसरों के दोष देखता, उनकी आलोचना, टीका-टिप्पणी और निन्दा करता रहेगा, वह किस प्रकार आशा कर सकता है, दूसरे उससे स्नेह अथवा मित्रभाव रख सकेंगे? परदोष दर्शन एवं निन्दा जीवन के विकास, उन्नति तथा सफलता के प्रामाणिक शत्रु हैं। संसार में कदाचित ही कोई ऐसा प्रमाण अथवा उदाहरण मिले कि किसी व्यक्ति ने दूषित दृष्टिकोण तथा परनिन्दा की वृत्ति रखकर भी जीवन में कोई विशेषता अथवा सफलता प्राप्त की हो। संसार का इतिहास इस बात के उदाहरणों से अवश्य भरा पड़ा है कि घोरतम निन्दा, आलोचना एवं विरोध होने पर भी जिन सत्पुरुषों ने किसी की निन्दा नहीं की, दोष नहीं दिया और अपनी गुण ग्राहिका वृत्ति में विश्वास बनाये रहे उनकी संसार में पूजा हुई है और दोषदर्शी निन्दक जहाँ के तहाँ कीचड़ में पड़े रहकर कीड़ों-मकोड़ों की मौत मरे हैं। जो दूसरे के दोष देखने, उनकी खिल्ली उड़ाने तथा आलोचना करने में ही अपने समय एवं शक्तियों का दुरुपयोग करते रहेंगे, उन्हें अपनी उन्नति के विषय में विचार करने का अवकाश अथवा अवसर ही कब मिलेगा? समय तो उतना ही है और शक्तियाँ भी वही, उन्हें चाहे पर दोषदर्शन और निन्दा में लगा लीजिए अथवा अपने गुणों के विकास में लगाकर उन्नति कर लीजिए। बुद्धिमान व्यक्ति समय एवं शक्तियों की सदुपयोगिता एवं दुरुपयोगिता का मूल्य, महत्व तथा परिणाम अच्छी प्रकार से जानते और उसमें विश्वास करते हैं इसलिये वे इन दोनों सम्पदाओं का अपव्यय किसी परिस्थिति में परदोष दर्शन अथवा निन्दा के पापपूर्ण कर्म में नहीं करते। उन्हें जीवन में उन्नति करने की आकाँक्षा होती है, आत्मा का उद्धार और लोक परलोक की चारु चिन्ता उनका अपना प्यारा तथा पुण्य पूर्ण विषय होता है। वे संसार में सम्मान एवं परलोक में स्थान पाने के अपने मानवीय लक्ष्य को परदोष-दर्शन अथवा निन्दा की कुत्सित वृत्ति पर बलिदान नहीं करते। वे सबमें गुण देखते, उन्हें ग्रहण करके अपने गुणों की संख्या वृद्धि और शक्ति को द्विगुणित करते और अपने महान लक्ष्यों को पा लिया करते हैं। धन्य हैं, ऐसे पर गुण दर्शी एवं ग्राहक सत्पुरुष। संसार उन्हें क्यों न नतमस्तक होगा। ऐसे ही साधु पुरुष मानवता के मान एवं पुरुषत्व के प्रहरी हुआ करते हैं।

दूसरों की दोष-गणना, छिद्रान्वेषण एवं निन्दा करने का कुप्रभाव अपने पर ही पड़ता है। हर समझदार व्यक्ति अपनी निन्दा सुनकर, छिद्रान्वेषण देखकर अपनी कमी दूर करने का प्रयत्न किया करता है। धीरे-धीरे दोष उसे छोड़कर चले जाते हैं। किन्तु वे जाते कहाँ हैं? वे सीधे निन्दक के ही हृदय में प्रवेश कर अपना स्थान बना लिया करते हैं। इसीलिये ही तो अनेक अनुभवी एवं बुद्धिमान व्यक्तियों ने ‘निन्दक नियरे राखिये’ का उपदेश किया है। क्योंकि वे जानते थे कि ऐसा करने से अपना तो सुधार होगा। संक्रामक रोगों की तरह निन्दक ही दोषों का शिकार हो जायेगा जिससे आगे चलकर उसकी आँखें खुलेंगी और वह अपनी भूल समझकर स्वभाव में सुधार करने का प्रयत्न करेगा। इस प्रकार अपना एवं उसका, दोनों का हित होगा।

परदोष-दर्शन की दुर्बलता त्यागकर आत्म दोष दर्शन का साहस विकसित कीजिए। जब दृष्टि देखने में समर्थ है तो वह गुण भी देखेगी और दोष भी। गुण औरों के और दोष अपने देखिये। जीवन में गुणों का विकास करने का यही तरीका है। जब आप स्वयं ही अपने दोष देखने लग जायेंगे तो दूसरों द्वारा इंगित करने पर आपमें कोई अप्रिय अथवा प्रतिकूल प्रतिक्रिया न होगी। ऐसा होने से आप ईर्ष्या-द्वेष, वाद-विवाद, लड़ाई-झगड़ा, कुँठा एवं कुढ़न के विकारों से बच जायेंगे। अपनी बुराई सुनकर आपको क्रोध न होगा बल्कि आप उसे सचाई समझकर ग्रहण करने का हितकर साहस दिखा सकेंगे। क्रोध अथवा प्रत्यालोचना न करने से आपकी दोष वृत्ति दबेगी, गुणों का विकास होगा और धीरे-धीरे आपके निन्दक भी प्रशंसक बन जायेंगे। अस्तु लोक एवं परलोक के कल्याण के लिये पर गुण एवं आत्मदोष-दर्शी बनिए। दूसरों के दोष देखना, छिद्र खोजना, निन्दा तथा आलोचना करने में अपने अमूल्य समय एवं अनमोल शक्ति का अपव्यय न करके उन्हें सत्कर्मों में लगाइये और संसार में सम्मान एवं सफलतापूर्वक जीकर परलोक के पावन पथ को प्रशस्त कर लीजिए।


Quotation

दुनिया का दुर्भाग्य भी सौभाग्य बन जाता है

मृत्यु का संकट संपन्न होते देखकर परेशान होने वाले शिष्यों से महात्मा ईसा ने कहा—”तुम लोग परेशान क्यों हो रहे हो? आज जब तुम मुझ पर मृत्यु की घटा देखकर इतना परेशान हो रहे हो तो यदि सत्य की प्रतिष्ठा में तुम्हारे प्राणों पर संकट आ पड़ा तो उसे किस प्रकार सहन करोगे?”

वह समय आता है जब लोग धर्म के नाम पर देवदूतों को मार डालते हैं और समझते हैं कि उन्होंने पुण्य किया, परमात्मा की सेवा की। किन्तु दुनिया का यह दुर्भाग्य अन्त में सौभाग्य बन जाता है। क्योंकि वे पिता के संदेशवाहक देवदूत को मारकर ही उसका और उसके वचनों का महत्व समझ पाते हैं।”


अखण्ड-ज्योति परिजनों के लिए कुछ विशेष— - हमारे और आपके संबंध आगे क्या हों?

-इसका अन्तिम निर्णय इसी मास हो जाना चाहिये-

‘अखण्ड-ज्योति’ परिजनों के साथ हमारे सीधे संबंध की अवधि अब धीरे-धीरे घटती चली जा रही है। अज्ञातवास से लौटने के पश्चात् हमें 10 वर्ष काम करने के लिए मिले थे। जिनमें से 5 वर्ष इस गुरु पूर्णिमा को पूरे हो चले, अब 5 वर्ष की अवधि और शेष है जिसमें हम अपने प्रिय परिजनों के साथ उस तरह का संबंध और रख सकेंगे जैसा कि अब तक रखते रहे हैं।

हमारी जीवन प्रक्रिया एक विशेष महती शक्ति की प्रेरणा एवं पथ प्रदर्शन में चलती रही है। जब से होश सँभाला है, उसी प्रकाश एवं मार्ग-दर्शन में हमारे पैर निर्बाध गति से चलते रहे हैं। हमने इस प्रेरणा को ही सर्वोपरि माना है। वही हमारे लिए ईश्वरीय सन्देश और ब्रह्म-वाक्य है। आत्म-समर्पण करने के बाद दूसरा कोई मार्ग हो भी नहीं सकता। अर्जुन ने “शिष्यस्तेऽहं साधिमाँत्वाँ प्रपन्नं” के रूप में अपना आत्म समर्पण किया था और “करिष्ये वचनं तव” की प्रतिज्ञा की थी, तभी उसका शिष्यत्व सार्थक हो सका। सारा जीवन क्रम इसी प्रक्रिया के आधार पर बिता देने के उपरान्त अब शेष थोड़े से समय में कोई भिन्न रीति नीति अपनाई भी नहीं जा सकती।

जब से होश सँभालने की स्थिति हुई तभी से मार्गदर्शक सत्ता ने हमारे जीवन की बागडोर सँभाल ली। (1) चौबीस वर्ष के चौबीस महापुरश्चरण, (2) गायत्री विद्या का विश्वव्यापी प्रचार, (3) वेद, उपनिषद्, दर्शन, स्मृतियाँ, पुराण आदि प्राय सभी धर्मग्रन्थों का भाष्य एवं प्रसार, (4) धर्म तंत्र का पुनर्जागरण एवं संगठन, (5)युग निर्माण योजना—की विचार क्रान्ति का जन मानस में बीजारोपण यह सभी कार्य एक से एक बढ़कर महत्व के हैं। हमारी व्यक्तिगत क्षमता एवं योग्यता इतनी नगण्य है कि अपने बलबूते पर इनमें से एक की भी सफलता संभव नहीं थी। शंख में अपनी निज की सामर्थ्य बजने की नहीं, उसे कोई दूसरा बजाता है तभी ध्वनि होती है। हमारी स्थिति भी शंख जैसी रही है। अपने को पोला खाली जरूर रखा है ताकि प्रेरक सत्ता को उचित रीति से काम करने को अवसर मिल सके। बस, इतनी भर हमारी विशेषता है। यदि इतना भी न होता, अपनी व्यक्तिगत कामनाओं, तृष्णाओं एवं महत्वाकाँक्षाओं को मन में भरे रखा होता तो संभवतः उस प्रेरक सत्ता के लिए भी यह कठिन होता कि हमारे शरीर से कुछ काम करा सके। सच्चे शिष्य अपने को खाली ही रखते हैं और अपने प्रकाशबिन्दु के सामने आत्म समर्पण करने का साहस तो कर ही लेते हैं। हमें एक अध्यात्म-मार्ग के पथिक के रूप में यही करना था, यही किया भी है। शिष्यत्व की पात्रता न होती तो बेचारे गुरुदेव भी आखिर क्या कर पाते?

कुम्हार की इच्छानुसार घूमने वाले चाक की तरह हमारी गतिविधियाँ घूमती चली आ रही हैं, आगे भी वही रीति-नीति बनी रहने वाली हैं। इसलिए हमें अपना स्थूल कार्यक्रम, लोक संपर्क निर्धारित अवधि में पूरा करना ही होगा। इसमें ननुनच का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। परिजनों को वियोग जन्य व्यथा हो सकती है। हम भी मनुष्य हैं। हमारी मनोभूमि में स्नेह, वात्सल्य, ममता एवं आत्मीयता की कमी नहीं। जिन परिजनों को निज के कुटुम्बियों से अधिक स्नेह दिया और सद्भाव पाया है उनसे पृथक होना कष्टदायक न हो, ऐसी बात नहीं, पर कितने ही प्रसंग ऐसे होते हैं जिनमें मनुष्य विवश होता है। इस विछोह में हमारी भी विवशता ही है।

इस बचे हुए समय में हम परिजनों के घरों में अपनी एक स्मृति छोड़ जाना चाहते हैं। शरीर से पृथक हो जाने पर भी भावना रूप से अपने आत्मीयजनों के घरों में देर तक बैठे रहने की हमारी आन्तरिक अभिलाषा है। शेष बचे हुए समय का उपयोग हम इसी प्रकार करेंगे।

दूसरों की तरह हमारे भी दो शरीर हैं, एक हाड़मांस का, दूसरा विचारणा एवं भावना का। हाड़मांस से परिचय रखने वाले करोड़ों हैं। लाखों ऐसे भी हैं जिन्हें किसी प्रयोजन के लिए हमारे साथ कभी संपर्क करना पड़ा है। अपनी उपार्जित तपश्चर्या को हम निरन्तर एक सहृदय व्यक्ति की तरह बाँटते रहते हैं। विभिन्न प्रकार की कठिनाइयों एवं उलझनों में उलझे हुए व्यक्ति किसी दल-दल में से निकलने के लिए हमारी सहायता प्राप्त करने आते रहते हैं। अपनी सामर्थ्य के अनुसार उनका भार हलका करने में कोई कंजूसी नहीं करते। उस संदर्भ में अनेक व्यक्ति हमारे साथ संपर्क बनाते और प्रयोजन पूरा होने पर उसे समाप्त कर देते हैं। कितने ही व्यक्ति साहित्य से प्रभावित होकर पूछताछ एवं शंका समाधान करने के लिए, कितने ही आध्यात्मिक साधनाओं के गूढ़ रहस्य जानने के लिए,कई अन्यान्य प्रयोजनों से आते हैं। इनकी सामयिक सेवा कर देने से हमारा कर्तव्य पूरा हो जाता है। उनके बारे में न हम अधिक सोचते हैं और न उनकी कोई शिकायत या चिन्ता करते हैं।

हमारे मन में भावनाएं उनके लिए उफनती हैं जिनकी पहुँच हमारे अन्तःकरण एवं भावना स्तर तक है। भावना शरीर ही वास्तविक शरीर होता है। हम शरीर से जो कुछ है, भावना की दृष्टि से कहीं अधिक हैं। हम शरीर से किसी की जो भलाई कर सकते हैं उसकी अपेक्षा अपनी भावनाओं विचारणाओं का अनुदान देकर कहीं अधिक लाभ पहुँचाते हैं। पर अनुदान ग्रहण वे ही कर पाते हैं जो भावनात्मक दृष्टि से हमारे समीप हैं। जिन्हें हमारे विचारों से प्रेम हैं, जिन्हें हमारी विचारणा, भावना एवं अन्तःप्रेरणा का स्पर्श करने में अभिरुचि है उन्हीं के बारे में वह कहना चाहिए कि वे तत्वतः हमारे निकटवर्ती एवं स्वजन संबंधी हैं। उन्हीं के बारे में हमें कुछ विशेष सोचना है, उन्हीं के लिए हमें कुछ विशेष करना है।

अपने परिवार में कितने ही व्यक्ति ऐसे हैं जिनका प्रेम, अनुग्रह एवं आत्मभाव हर दृष्टि से सच्चा है। व्यक्तिगत रूप से भी वे हमें अपने प्रिय से प्रिय स्वजन सम्बन्धियों की तरह ही प्यार करते हैं। आदान की प्रतिक्रिया प्रदान और ध्वनि की प्रतिक्रिया प्रतिध्वनि होती है। जिनकी आत्मीयता जन्म जन्मान्तरों से हमारे साथ बँधी चली आ रही है और जो दूर रहते हुए भी निकटवर्ती लोगों से भी कहीं अधिक निकट हैं, उनके प्रति हमारा मन भी इस विछोह कल्पना से सजल हो उठता है। इन दिनों जो हमारे अत्यन्त निकट हैं, अगले दिनों परिस्थितियाँ न जाने उन्हें कहाँ और हमें कहाँ पटक देंगी। कष्ट इस संसार में एक से एक बड़े हैं पर प्रिय विछोह उन सबमें अधिक कष्टकर है। इस कष्ट की कल्पना हमें भी विचलित करती है क्योंकि आखिर भावनाओं के सहारे अपना कलेवर खड़े किये हुए एक दुर्बल मानव प्राणी ही हम भी हैं।

पिछले 26 वर्षों से जिन लोकोत्तर भावना सम्पन्न सहृदय स्वजनों की अनवरत आत्मीयता एवं श्रद्धा हमें प्राप्त होती रहती है उनके प्रति हमारे मन में कितनी अधिक ममता एवं कृतज्ञता है इसको लिखकर या कहकर नहीं बताया जा सकता। जो हमें गहराई तक जानते और समझ सके हैं उन्हें पता है कि पुरुष शरीर में होते हुए भी ममता, करुणा, स्नेह, वात्सल्य एवं आत्मीयता की दृष्टि से हमें नारी—माता कहा जाय तो कुछ अत्युक्ति न होगी। हमें प्यार का व्यापारी कहा जाय तो कुछ अत्युक्ति न होगी। हमने अपरिमित प्यार अपने परिजनों को दिया है और बदले में उसे असीम मात्रा में पाया भी है। अब जबकि हमारे क्रिया कलाप का अध्याय बन्द होने जा रहा है तब हमारे मन में एक ही कसक निरन्तर उठती रहती है और वह यह कि हम किस प्रकार उस ऋण से उऋण हो सकें जो स्वजनों ने असीम श्रद्धा के साथ हमारे ऊपर प्रेम एवं विश्वास उड़ेलते हुए चढ़ाया है।

पिछले कई महीनों यह एक ही विचार हमारे मन में निरन्तर घूमता रहता है कि जिस परिवार ने हमारे संकेतों के अनुसार बड़े से बड़े त्याग करने में कभी संकोच नहीं किया है, जिधर मोड़ा उधर मुड़ते रहे हैं, जो कहा सो मानते रहे हैं, जिधर चलाया उधर चलते रहे हैं और उस पर भी लोकोत्तर सद्भाव परम निःस्वार्थ भाव से प्रदान करते रहे हैं उनसे उऋण हो सकना संभव न हो तो कम से कम समुचित प्रतिदान किस प्रकार दिया जाय?

इन लोगों के नाम और रूप हमारी आँखों के आगे चलते-फिरते गुजरते रहते हैं। आत्मिक एवं भौतिक दृष्टि से उनकी ‘सुसम्पन्नता एवं समृद्धि बढ़ी-चढ़ी देखने की अपनी इच्छा भी रहती है, पर अनेक दिशाओं में हमारी शक्ति बिखरी रहने से उतनी साधना तपस्या बन नहीं पड़ती, जिससे अभीष्ट सहायता पहुँचाई जा सके। पाँच वर्ष बाद हमें इस दृष्टि से अधिक अवसर मिलेगा, तदनुरूप समर्थता भी बढ़ेगी। हमें न स्वयं की कामना है न मुक्ति की। इस जन्म में जो हमारा आध्यात्मिक उपार्जन हो उसे इस ऋण को चुकाने में ही लगा देंगे जो भावनाशील परिजनों द्वारा आत्मीयता एवं श्रद्धा के रूप में हमें उपलब्ध हुआ है। जिसने हमें जितना दिया है उसे ब्याज समेत लौटा देने की हमारी कामना आज रह-रह कर उठ रही है। विश्वास है कि उतनी शक्ति मिलेगी जिससे इस प्रकार उऋण होकर हम अपने मन का भार हलका कर सकें।

अगले दस वर्षों में हमें क्या करना है, उसकी रूप रेखा अज्ञातवास काल में ही हमें बनाकर दे दी गई थी। पाँच वर्ष ठीक उसी पटरी पर चलते हुए हो गये। पाँच वर्ष और भी उसी क्रम से आगे चलना होगा। इसके बाद हमारा, हमारे कार्यक्रम का क्या स्वरूप होगा, इसकी चर्चा अभी से करना अप्रासंगिक है। समयानुसार हर बात सामने आने वाली ही है।

इन पाँच वर्षों में भी हमें अनेक दिशाओं में अनेक कार्य करने हैं। उन सबका उल्लेख आज ही कर दिया जाय यह आवश्यक नहीं। इन पंक्तियों में तो उतनी ही चर्चा करनी उचित है जिसका ‘अखण्ड-ज्योति’ के पाठकों से सीधा सम्बन्ध हो।

हमें अपनी अन्तःप्रेरणा, भावना, अभिव्यक्ति, आकाँक्षा और शिक्षा अपने प्रेमी पाठकों के घरों में इस तरह छोड़ जानी है कि हमारा शरीर न रहने पर भी वह एक ज्योतिर्मय दीपक की तरह प्रकाशवान बनी रहे। वे, उनकी सन्तानें और सन्तानों की पीढ़ियाँ उससे प्रकाश एवं प्रेरणा ग्रहण करती रह सकें। हमारा भावना शरीर हर प्रेमी परिजन के समीप एक मूर्तिमान कलेवर की तरह विद्यमान रह सकना संभव हो सके तो जिस प्रकार हम आज वर्तमान शरीर द्वारा प्रेमी पाठकों का भावनात्मक निर्माण कर सकने में सफल हो रहे हैं उसी प्रकार आगे भी 100 वर्ष तक उनके परिवार की, प्रियजनों की सेवा करते रहने का अवसर हमें मिलता रहेगा। इस प्रकार भी हमारे ऊपर चढ़ा हुआ परिजनों का ऋण एक सीमा तक उतरेगा।

हमारे इस विचार रूपी शरीर-साहित्य से कुछ लोग भी लाभ उठाते रहें और हर साल इन लाभ उठाने वालों की न्यूनतम संख्या हर महीना एक के हिसाब से बारह भी मान ली जाय तो सौ वर्षों में बारह-सौ हो जायगी। एक घर में स्थापित हमारे विचारों का ज्योति-दीप यदि इतनी आत्माओं को प्रकाश दे सका तो हमें अपने श्रम की सार्थकता पर सन्तोष भी होगा और जिनसे हमने प्यार किया उनके स्वजन सम्बन्धी भी यह अनुभव करेंगे कि हमारे परिवार को जीवन विकास की प्रेरणा देने वाला कोई शिक्षक इस घर में विचार शरीर से अभी भी सजीव की तरह निवास करता है, भले ही उसका स्थूल शरीर समाप्त हो गया हो।

लागत मूल्य के, न लाभ न नुकसान की नीति पर आधारित अत्यन्त सस्ते और आकर्षक ट्रैक्ट 20-20 नया पैसा लागत के पिछले दिनों छपते रहे हैं। इनकी लोकप्रियता और उपयोगिता अधिक सिद्ध हुई है। कम पैसे की चीज कोई भी आसानी से खरीद सकता है। जिन्हें अवकाश नहीं मिलता वे भी काम की चीज थोड़े ही समय में पढ़ लेते हैं। बड़ी पुस्तक देखकर जो पढ़ने से चकराते हैं वे भी थोड़ा-सा पढ़ लेने की अभिरुचि न होते हुए भी तैयार हो जाते हैं। प्रचार का यह अच्छा साधन है। ईसाई मिशनरियों ने अपने धर्म का विस्तार करने के लिए इसी माध्यम का सहारा लिया है। कम पढ़े, गरीब और अपने से भिन्न मत रखने वालों तक उन्होंने अपनी बातें इन ट्रैक्टों के द्वारा सारे संसार में फैली दीं। हमारा विचार भी इसी सस्ते माध्यम से व्यक्ति एवं समाज का नव निर्माण करने वाले विचार जन मानस के अन्तराल तक व्यापक क्षेत्र में प्रविष्ट करा देने का है, इसलिए आगे इसी दशा में अधिक श्रम करेंगे। अगले पाँच वर्षों में हमारा जन-जागरण का अधिकाँश साहित्य लघु पुस्तिकाओं, ट्रैक्टों के रूप में ही प्रस्तुत किया जायगा। निबन्ध, कथा, जीवन-चरित्र और सभी माध्यमों को अपनाकर सर्वसाधारण के उपयुक्त स्तर का जीवन-साहित्य इन पाँच वर्षों में इतना तैयार कर दिया जायगा कि प्रत्येक परिवार के लिए नव निर्माण की बहुत कुछ सामग्री उसमें मिल सके।

दोनों पत्रिकाएं और हर महीने लगभग 12-15 ट्रैक्ट इस प्रकार कुल लगभग तीन रुपया मासिक की पुस्तकें अपने प्रिय परिजनों के घरों में नियमित रूप से पहुँचाने का हमारा मन है। यह सब सामग्री इतनी होगी कि एक परिवार में एक घन्टे प्रतिदिन स्वाध्याय एवं सत्संग की उत्कृष्ट पाठ्य सामग्री बड़ी आसानी से मिल सकती है। इतना अनुदान अपने आत्मीय जनों को नियमित रूप से दे सकें तो हमें यह सन्तोष ही रहेगा कि उनके भावना स्तर को परिष्कृत करने के लिए कुछ उत्तम प्रयत्न किया जा सका।

एक घंटा प्रतिदिन का समय दान हमने अपने प्रिय परिजनों से नव-निर्माण कार्य के लिए माँगा था। कितने ही व्यक्ति जन-संपर्क में इस बहुमूल्य अनुदान को लगा रहे हैं और उससे लोक मानस निर्माण का कार्य बहुत ही उपयुक्त ढंग से हो भी रहा है। मिशन के द्वारा जो महत्वपूर्ण कार्य अब तक हुआ है वह इस एक घंटा अनुदान का ही चमत्कार है। इतने पर भी कितने ही व्यक्ति अभी ऐसे बचे हैं जो संकोच, झिझक, आलस्य, व्यस्तता आदि कारणों से समय दान की माँग इच्छा रखते हुए भी ठीक तरह पूरी नहीं कर पाते। ऐसे सभी लोगों के लिए यह एक बहुत ही सरल तरीका होगा कि अपने परिवार के हर शिक्षित को यह साहित्य पढ़ने के लिए प्रेरणा करने में और हर अशिक्षित को पढ़कर सुनाने के लिए वह एक घन्टे का समय दिया करें। परिवार निर्माण भी समाज निर्माण है। इस बहाने स्वयं ध्यानपूर्वक इन विचारों को पढ़ने समझने का अवसर मिलेगा। परिवार को सुसंस्कृत बनाने के लिए जिस महत्वपूर्ण कर्तव्य का पालन अब तक नहीं बन पड़ा था वह अब बन पड़ेगा। अपने को और अपने परिवार को भी यदि भावनात्मक उत्कृष्टता की ओर मोड़ने का नियमित प्रयत्न किया जा सके तो यह एक बहुत बड़ी बात है। इसे देखने में तुच्छ किन्तु वस्तुतः समाज की महती सेवा माना जा सकेगा। यह ऐसा सरल साथ ही अपने को प्रत्यक्ष लाभ देने वाला कार्य है कि इस दिशा में दिया गया समय समाज के लिए, संसार के लिए ही नहीं, अपने और अपने परिवार के लिए भी श्रेयस्कर सिद्ध होगा।

गृह सदस्यों की रोटी, कपड़ा, मनोरंजन, दवादारु या पढ़ाई की व्यवस्था मात्र कर देने पर ही परिवार के प्रति अपने कर्तव्य एवं उत्तरदायित्व की इति-श्री नहीं हो जाती। हर विवेकशील और दूरदर्शी गृह संचालक का यह भी कर्तव्य है कि वह अपने स्त्री-बच्चे, माता-पिता, भाई-बहिन, भतीजे आदि कुटुम्बियों के लिये गुण, कर्म, स्वभाव को परिष्कृत बनाने वाला वातावरण प्रस्तुत करे। इसके अभाव में परिवार वाले भले ही शरीर की दृष्टि से मोटे, पढ़ाई की दृष्टि से सुशिक्षित और पैसे की दृष्टि से सुसम्पन्न हो जावें, पर वे भावनात्मक दृष्टि से पिछड़े रह जायेंगे और अपनी असज्जनता के कारण स्वयं दुखी रहेंगे और अपने साथियों को दुख देंगे। जिनका भावनात्मक परिष्कार नहीं हुआ वे न तो स्वयं जीवन का आनंद ले सकते हैं और न अपने साथियों को चैन से रहने दे सकते हैं। हो सकता है कि संस्कार रहित अपने बालक बड़े होने पर अपने साथ ही दुष्टता का व्यवहार करें और जो आशा उनसे रखी गई थी उसे धूलि में मिला दें। ऐसा होता भी है। दुर्भावनायुक्त परिवारों में साक्षात नरक का वातावरण दिखाई पड़ता है। इस संभावना को समय रहते उन्मूलन करना प्रत्येक उस व्यक्ति का कर्तव्य है जो अपने परिवार में कोई उत्तरदायित्व पूर्ण स्थान ग्रहण किये हुए हैं।

स्कूलों में शिक्षा मिल सकती है, संस्कृति नहीं। संस्कृति घर के वातावरण से उपलब्ध होती है। अध्यापक कुछ भी पढ़ाते रहें, बाहर के लिए कुछ भी उपदेश देते रहें पर घर का वातावरण जैसा होगा, परिवार के सदस्य उसी ढाँचे में ढलेंगे। इसलिए यह कार्य दूसरों के कन्धों पर नहीं छोड़ा जा सकता कि हमारे परिवार के छोटे या बड़े सदस्यों को सन्मार्ग पर चलाने की जिम्मेदारी कोई बाहरी व्यक्ति उठावे या सँभाले। यह कार्य-स्वयं ही करने का है और आवश्यक कार्यों से भी अधिक आवश्यक है। जो उसे कर सकेगा, वही परिवार का भावनात्मक सृजन कर सकने में सफलता प्राप्त करेगा। फलते-फूलते, हँसते-खेलते कुटुम्बियों के साथ स्वयं प्रसन्न रहेगा और उनके लिए स्वर्गीय जीवन जी सकने का पथ प्रशस्त करेगा।

एक घंटा रोज का समय इस संदर्भ में खर्च करते रहा जाय तो यह परमार्थ भी होगा और स्वार्थ भी सधेगा। घर में किस से क्या कहना है, यह अपनी समझ में न आता हो तो उस कठिनाई का हल करेंगे। जो कहना, बताना, सुनाना, सिखाना है, वह सब कुछ हम तैयार करेंगे। रसोई हम पकायेंगे, खाना और खिलाना आपका काम है। हम उस क्रमबद्ध विचारधारा का सृजन करेंगे जो सामान्य जीवनों में असामान्य भावना एवं प्रेरणा ओत-प्रोत कर सके। उस विनिर्मित सामग्री को अपने और आपके परिजनों के गले उतारने का श्रम आप करें, तो यह उभय पक्षीय प्रयत्न एक चमत्कारी परिणाम उत्पन्न कर सकता है।

अगले पाँच वर्षों में हम अपने प्रिय परिजनों के परिवारों में एक परिवार शिक्षक की भूमिका अदा करना चाहते हैं। क्या ही अच्छा होता, काश, उन सबके साथ सशरीर रह सकना हमारे लिए संभव हो गया होता। अभी-अभी गायत्री तपोभूमि में शिक्षण शिविर हुआ था, करीब 200 स्वजन एकत्रित थे। साथ-साथ हँसते-खेलते इतने दिन परिजनों के साथ इतनी अच्छी तरह बीते कि उस आनन्द में व्यवधान पड़ने का समय आते ही हमारी तथा सब शिक्षार्थियों की भावनाएं उमड़ने लगीं, आँखें छलकने लगीं। यदि परिजनों के साथ हँसने-खेलने, सीखने-सिखाने, जीवन बिताने का वैसा अवसर सदा मिलता रहे तो आनन्द का वारापार न रहे। पर यह तो आकाँक्षा मात्र है। संभव कहाँ हो सकता है? दूर-दूर बसे हुए लोग प्रारब्धवश दूर रहने के लिए ही विवश हैं। अभी तो इतना ही सम्भव है कि कागजों के माध्यम से भावनाओं का आदान-प्रदान होता रहे। इस प्रकार के प्रशिक्षण का एक क्रम पूरा नहीं सही, अधूरा सही, किसी रूप में चलता ही रह सकता है। प्रस्तुत योजना इसी उद्देश्य को लेकर बनाई गई है।

बच्चों को पढ़ाने वाले शिक्षकों को कुछ फीस देनी पड़ती है, घर की साज संभाल रखने वाले बुड्ढों पर भी आखिर कुछ खर्च पड़ता ही है। हमारे प्रशिक्षण की फीस दस नया पैसा प्रतिदिन पाँच वर्षों में इतने मात्र खर्च से 1000 के लगभग पुस्तकों का एवं 60+60=120 अंकों का (जो वस्तुतः एक बढ़िया पुस्तक ही होती है)एक सुसज्जित पुस्तकालय उस घर में बनाकर रख देंगे। बाजारू स्तर पर वस्तु की दृष्टि से यह एक अत्यन्त सस्ती किन्तु आवश्यक वस्तु ही खरीदी गई हैं। जो अनुपयोगी प्रतीत हो तो किसी को उतने ही मूल्य में बेची भी जा सकती हैं। अपने उत्तराधिकार में लोग मकान, जायदाद, सोना, चाँदी, नकदी आदि छोड़ते हैं। उसी में यदि यह अत्यन्त स्वल्प मूल्य में संग्रहित भावनात्मक रत्न-राशि भी संग्रह करके घर वालों के लिए छोड़ दी जाय तो कोई बहुत बड़ी बात न होगी।

घरों में अक्सर लोग देव प्रतिमाएं स्थापित करते हैं। उनकी पूजा, आरती, धूप, दीप, नैवेद्य, धूपबत्ती, फूल, भोग, प्रसाद, वस्त्र, शृंगार आदि में कम से कम दस नया पैसा तो खर्च करते ही हैं। ज्ञान देवता का प्राणवान मंदिर घरेलू नव-निर्माण पुस्तकालय भी पूजा-कक्ष की तरह पवित्र, प्रेरणाप्रद एवं प्रकाश प्रदान करने वाला ही सिद्ध होगा। इससे भी आध्यात्मिक आवश्यकता पूर्ण होगी और वे सब संभावनाएं बढ़ेंगी जो सकाम उपासना करने वाले अक्सर चाहते रहते हैं। पूजा-कक्ष और ज्ञान-मंदिर दोनों का समन्वय एक दूसरे के पूरक ही सिद्ध होंगे।

जिन्हें हमारे विचारों की प्रेरक शक्ति पर आस्था हो, जो उसकी उपयोगिता आवश्यकता समझते हों उन्हें अगले पाँच वर्ष तक हमारे सृजनात्मक साहित्य योजना का सदस्य बने रहना चाहिए। जो अधूरे मन से केवल शारीरिक परिचय या प्रयोजन पर आधारित संबंध रखते हैं उन्हें इस झंझट में नहीं पड़ना चाहिए। क्योंकि हम एक दिशा से अपना मस्तिष्क साफ कर लेना चाहते हैं कि हमें जो लिखना, छापना है वह किनके लिए, कितनों के लिए होगा। कभी सदस्य रहे, कभी न रहे, तकाजे पहुँचे तब याद आई, तो भी चन्दा भेजा, न भेजा, ऐसी अरुचि या उपेक्षा जिन्हें हैं, उनके लिए यही उचित है कि अपना नाम सदस्यता से कटा लें। इसमें हमें बहुत सुविधा रहेगी। अनिश्चित संख्या में व्यवस्था बनाने में बड़ी गड़बड़ी और परेशानी रहती है। जिन्हें हमारा साहित्य यदा कदा मनचले शौकिया ही पढ़ना चाहें वे किसी पड़ौसी से माँग कर पढ़ लिया करें।

अब हमें ऐसे सुनिश्चित मति वाले उन आस्थावान परिजनों की संख्या जाननी हैं, जिन पर हमारा ध्यान केन्द्रित रह सके। अनिश्चित संपर्क केवल उलझन पैदा करते और परेशानी बढ़ाते हैं। अगले पाँच वर्ष हम अनिश्चित नहीं सुनिश्चित लोगों के साथ संपर्क रखने में ही बिताना चाहते हैं। अगली सदस्यता दस नया पैसा रोज खर्च की होगी। क्योंकि इतने पैसे में ही हमारा सारा भावी प्रकाशन उपलब्ध किया जा सकेगा। जो इतना खर्च कर सकते हों, वे अपना नाम अगले महीने नोट करा दें। शेष लोग दूसरों से पढ़कर काम चला लिया करें।

प्रश्न आर्थिक तंगी का नहीं है। निर्धन से निर्धन व्यक्ति के लिए भी यह कठिन नहीं हो सकता कि वह लगभग डेढ़ दो छटाँक आटे की कीमत दस नया पैसा, इतने महत्वपूर्ण, इतने आवश्यक कार्य के लिए खर्च न कर सके। अत्यधिक आर्थिक तंगी हो तो स्वयं डेढ़ रोटी कम खाकर शरीर को थोड़ा दुर्बल करलें और उसके बदले में आत्मा को बलवान बना लें। यह तनिक भी महंगा सौदा नहीं है। यह भी हो सकता है कि यदि अकेले इतना खर्च करने की सुविधा न हो तो दो परिजन मिलकर सम्मिलित व्यवस्था बना लें। फुरसत न मिलने और आर्थिक तंगी की बात करने वालों का बहाना बेबुनियाद है। सही बात उपेक्षा और अरुचि है जिसके कारण उतना नगण्य खर्च और उतना नगण्य समय भार मालूम पड़ता है। ध्यान से देखा जाय तो हम लोग उससे कहीं अधिक पैसा और कहीं अधिक समय उन कार्यों में खर्च करते रहते हैं जो व्यर्थ तथा हानिकारक होते हुए भी हमारी अभिरुचि का स्थान ग्रहण किये हुए हैं। जिन कार्यों को लोग आवश्यक समझते हैं उनके लिए ढेरों समय और ढेरों पैसे खर्च करते हैं। अरुचि का प्रसंग ही भार मालूम पड़ता है। उसी के लिए तंगी और फुरसत की आड़ लेनी पड़ती है। सारा जीवन हमें मनुष्य का अंतरंग एवं बहिरंग स्वरूप समझने में बीता है। वस्तुस्थिति समझने में हमें तनिक भी भ्रम नहीं रहता। इसीलिए यह प्रस्ताव कर रहे हैं कि अगले पाँच वर्ष हमें जिन लोगों के लिये विशेष सोचना और करना है वे इस स्तर के नहीं होने चाहिए जिन्हें इतनी नगण्य व्यवस्था बनाने में कष्ट, कठिनाई, आशंका और असुविधा होती हो।

इन दिनों ‘अखण्ड-ज्योति’ के ग्राहक बहुत हैं उनमें से हर साल कितने ही नये बनते और कितने ही पुराने टूटते हैं। यह धमाचौकड़ी अब बन्द होनी चाहिए। हजार-दो हजार भी ग्राहक रहें तो हमें पूरा-पूरा सन्तोष रहेगा। भीड़ को समझाने वाली अवधि पूरी हो गई, अब जो आस्थावान हैं उनके लिए कुछ अधिक महत्वपूर्ण सोचने करने का प्रश्न है। ऐसी दशा में वर्तमान संख्या घटाने में हमें तनिक भी आपत्ति नहीं, वरन् सुविधा ही होगी।

साहित्य-सृजन की चर्चा तो इसलिए विशेष रूप से इन पृष्ठों में की गई है क्योंकि ‘अखण्ड-ज्योति’ तथा उसके पाठकों का स्थूल रूप से यही प्रमुख माध्यम रहा है। इसलिए यह प्रसंग साफ करना आवश्यक था। इसी महीने यह बात इसलिए विशेष रूप से स्पष्ट करनी पड़ी कि 1 जुलाई से ‘युग निर्माण योजना’ पाक्षिक का नया वर्ष आरम्भ होता है। उसके अधिकाँश ग्राहकों का चन्दा इसी महीने समाप्त हो जायगा। आगे से उसे मासिक कर दिया गया है। वह 15 तारीख को छपा करेगी। ‘अखण्ड-ज्योति’ जितने ही पृष्ठ रहेंगे और उतना ही 4) वार्षिक मूल्य रहेगा। ‘अखण्ड-ज्योति’ में जो बातें सैद्धान्तिक रूप से प्रतिपादित की जाती हैं वे कार्य रूप में किस तरह लाई जा सकती हैं या लाई जा रही हैं, इसका व्यावहारिक मार्ग-दर्शन उसमें रहा करेगा। एक प्रकार से ‘युग निर्माण’ को ‘अखण्ड-ज्योति’ का पूरक ही कहना चाहिए। अब तक उसे कोई पढ़ते थे कोई नहीं पढ़ते थे। अब यह उचित रहेगा कि जो ‘अखण्ड-ज्योति’ पढ़ते हैं वे ‘युग निर्माण योजना’ भी पढ़ें और जो ‘युग निर्माण योजना’ पढ़ते हैं वे ‘अखण्ड-ज्योति’ भी मंगावें। इसलिए अगले मास ‘युग निर्माण योजना’ भी उतनी ही छापने का विचार है जितने पाँच वर्ष तक साथ देने वाले स्थायी सदस्य होंगे। जो कभी ग्राहक रहते, कभी टूटते हैं, उन्हें ‘युग निर्माण योजना’ मँगाना भी अनावश्यक है। इस प्रकार उसके ग्राहक भी घट जायँ तो हर्ज नहीं। ‘अखण्ड-ज्योति’ तो दिसम्बर तक इतनी ही छपेगी, उसे जनवरी से उतनी ही छापेंगे, जितने स्थायी सदस्य होंगे।

प्रचार कार्य बहुत हो चुका, अब जो काम के आदमी हाथ लगें उतनों को ही पक्का करने का काम शेष है। इसलिए इस ग्राहक घटाने वाली योजना से पाठकों को न दुःख होना चाहिए न आश्चर्य। अस्थिर मति लोगों की भारी भीड़ से घिरे रहने की अपेक्षा हमें मुट्ठी भर आस्थावान लोगों के साथ रहने में अधिक सन्तोष एवं आनंद प्राप्त होगा। इसलिए जिन्हें स्थायी सदस्य रहना हो वे ‘युग निर्माण योजना’ अपने नाम चालू कराने के लिये और शेष उसे बन्द कर देने की सूचना हमें दे देंगे तो भविष्य के अंक उतनी ही संख्या में तैयार कराने में सुविधा रहेगी।

साधना क्रम का सामान्य प्रशिक्षण हो चुका। अब जिनने उसे सीख लिया है वे दूसरों को सिखावें। हमें आस्थावान लोगों की उपासना को इतना परिपक्व एवं प्रखर बनाने में अपना ध्यान केन्द्रित करना है, जिससे वे स्वयं एक अनुकरणीय उदाहरण बनकर दूसरों को साधना मार्ग पर आकर्षित एवं प्रोत्साहित कर सकें। साधारण कठिनाइयों को हल करने में हम अब तक सामने आये। व्यक्ति के लिए कुछ न कुछ सहयोग करते रहे हैं, आगे थोड़े लोगों पर ध्यान केन्द्रित करेंगे ताकि वे स्थायी रूप से अपनी समस्याओं का समाधान करके इस स्थिति में पहुँच सकें कि दूसरों की समस्याऐं हल करने में उसी प्रकार सहयोग दे सकने की क्षमता प्राप्त कर लें, जैसी कि अब तक हमारी गतिविधि रही है। अपना काम समाप्त करते हुए आखिर कुछ लोग तो पीछे छोड़ने ही हैं जो इस महान परम्परा को आगे भी गर्व और गौरव के साथ जारी रख सकें। इनका निर्माण अब भी न किया गया तो आखिर फिर वह समय आवेगा भी कब?

अगले पाँच वर्षों में हमें जो अत्यन्त महत्वपूर्ण कार्य करने हैं, उनमें से एक यह भी है कि निरर्थक भीड़-भाड़ में से कुछ काम के साथी सहचर चुन लें और उनके साथ अधिक मनोयोग पूर्वक संपर्क स्थापित करें। इसे कोई चाहे तो परिवार का परिष्कार, परिमार्जन या शुद्धिकरण भी कह सकता है। शब्द कुछ भी कहे जायँ वस्तुतः आगे किया यही जाना है।

इसी अंक में एक प्रश्न-पत्र अलग से संलग्न है। इसे भरकर पाठक इसी महीने भेज देने की कृपा अवश्य करें। इसमें हमें अपनी भावी विधि व्यवस्था जमाने में बड़ी सुविधा होगी। जिन्हें सदस्य रहना हैं वे स्वीकृति वाला लाल स्याही में आग भर दें। जिन्हें सदस्यता बन्द करनी हो वे पीठ पर दूसरी स्याही में छपा भाग भरकर भेज दें। जिनकी बन्द होने की सूचना होगी उनकी पत्रिकाएं चन्दा समाप्त होते ही बन्द कर दी जायेंगी। पत्रक भरकर न आने पर पुनः स्मरण दिलाने की कठिनाई से हमें बचाने के लिए हर पाठक से इतने उदार सहयोग की आशा तो रखी ही जायगी कि वे यथासंभव जल्दी ही इस फार्म को भरकर भेज देंगे।

*समाप्त*