क्षमया वयया प्रेम्णा सूनृतेनार्जवेन च। वशीकुर्याज्जगर्त्सव विनयेन च सेवया॥
क्षमा, दया, प्रेम, मधुर वचन, सरल स्वभाव, सेवा और नम्रता से संसार में समस्त प्राणियों को वश में करना चाहिए।
अक्रोधेन जयेत्क्रोध मसाधुँ साधुनाजयेत्। जयेत्कदर्यं दानेन सत्येनालीक वादिनम्॥
क्षमा से क्रोध को जीते, भलाई से बुराई को जीते, कृपण को उदारता से अर्थात् अर्थेच्छु को धन देकर जीते और असत्यवादियों को सत्य से जीते।
क्रोधं जह्यात् विप्र जह्यात् मानम्। संयोजनं सर्वमति क्रमेत्॥ तं नामरुपयोरसज्य मानम्। अकिंचनं नानु पतन्ति दुःखानि॥
क्रोध का त्याग करें, अभिमान को छोड़ दें, समस्त वासनाओं के बन्धनों से मुक्त रहे और नाम तथा रूप की आसक्ति से बचकर कर्म करें, अपरिग्रही रहें—ऐसा मनुष्य दुःखों से पार हो जाता है।
यस्तु क्रोधं समुत्पन्नं प्रज्ञया प्रतिबाधते। तेजस्विनन्तं विद्वाँसो मन्यन्ते तत्त्वदर्शिनः॥
जो मनुष्य उत्पन्न हुए क्रोध को प्रज्ञा द्वारा शान्त कर देता है, उस तेजस्वी पुरुष को तत्वदर्शी लोग विद्वान् कहते हैं।
कथञ्चिदुपकारेण कृतेनैकेन मुह्यति। न स्मरत्यपकाराणाँ शतमप्यात्मवत्तया॥
भगवान श्री रामचन्द्रजी किसी के एक ही किये हुए उपकार को जन्मभर याद रखते थे और उसके सैकड़ों अपकारों को भी तुरन्त भूल जाते थे, क्योंकि वे सबमें आत्मभाव रखते थे।
इर्ष्या घृणी त्वसंतुष्टः क्रोधनो नित्यशंकितः। परभाग्योपजीवी च षडेते दुःखभागिनः॥
ईर्ष्या करने वाला, घिन करने वाला, असन्तोषी, क्रोधी, सदा सन्देह करने वाला और पराये आसरे जीने वाला—ये छह दुःख भोगते हैं।
यो वै उत्पतितं क्रोधं, रथं भ्रान्तमिव धारयेत्। तमहं सारथिं ब्रवीमि रश्मिग्राह इतरो जनः॥
जो उत्पन्न एवं प्रवृद्ध क्रोध को रथ की तरह रोक ले, वही सच्चा सारथी है, और तो केवल अश्वों की लगाम पकड़ने वाले ही होते हैं।
ये क्रोधं संनियच्छन्ति क्रुद्धान् संशमयन्ति च। न च कुप्यन्ति भृतानाँ दुर्गाण्यतितरन्ति ते॥
जो मनुष्य क्रोध को वश में रखते हैं, उस पर नियंत्रण रखते हैं तथा क्रुद्ध हुए लोगों को शान्त करते हैं और प्राणिमात्र पर कभी क्रोध नहीं करते, वे ही इस लोक के सम्पूर्ण दुस्सह दुःखों से तर जाते हैं।
क्षमा वशीकृतिर्लोके क्षमया किं न साध्यते?। छान्तिखड्गः करे यस्य किं करिष्यन्ति दुर्जनाः॥
क्षमा संसार को वश में कर लेती है। क्षमा से क्या सिद्ध नहीं होता? जिसके हाथ में शांति रूपी तलवार है, उसका दुष्ट पुरुष क्या कर सकेगा?
परश्चेदेनमतिव दवाणैभृशं विद्धयेच्छम एव कार्यः। संरोष्यमाणः प्रतिहृष्यति यः स आदत्ते सुकृतं वै परस्य॥
प्रतिपक्षी के कुवाक्य रूपी बाणों से बिद्ध होकर भी वीर-पुरुष शान्त ही रहा करते हैं। शत्रु के द्वारा क्रोध दिलाने पर भी जो पुरुष क्रोधित नहीं होते हैं वे धैर्यशाली पुरुष शत्रु के पुण्य का हरण कर लिया करते हैं।
नाक्रोशी स्यान्नावमानी परस्य मित्रद्रोहीनोत नीचोपसेवी। न चाभिमानी न च हीनवृतो रुक्षाँ वाचं रुषतीं वर्जयेत्॥
गाली न दें, न अन्य का तिरस्कार करें, मित्र से अनबन न करें, नीच की सेवा न करें, दुराचरण न करें तथा रूखे क्रोध युक्त वचनों का त्याग करें।
सृष्टि के कार्य इतने व्यवस्थित तथा नियमित ढंग से चल रहे हैं कि कोई भी विचारवान व्यक्ति यह मानने के लिये कभी तैयार न होगा कि यह सारे कार्य परमाणुओं के आकस्मिक संयोग के ही फल हैं। अपितु यह मानने के लिये विवश होना पड़ता है कि इस सम्पूर्ण विश्व-व्यवस्था को सुचारु रूप से चलाने वाली कोई चेतन-सत्ता अवश्य विद्यमान है। यह भी कि उसने संसार को एक निश्चित उद्देश्य रखकर बनाया है और प्रत्येक जीवधारी को उसकी पूर्ति के लिए किसी न किसी प्रकार सहायक नियुक्त किया है। हम यह भली-भाँति देखते हैं कि यहाँ जो भी विधान चल रहे हैं वे सब ऐसे हैं, जिन तक मानवीय बुद्धि का पहुँच पाना सहज बात नहीं है तो भी उसमें एक प्रकार का सामंजस्य जरूर है। ठीक गणित के सिद्धान्त की तरह। अंकों के गुणा-भाग जिस प्रकार से नियमित और व्यवस्थित उत्तर देते हैं, ठीक ऐसी ही विश्वव्यापी प्रक्रिया चल रही है, जो निश्चित उत्तर देती है। इसलिए हम यह मानने के लिये कदापि तैयार नहीं कि विश्व केवल जड़ परमाणुओं का चमत्कार मात्र हैं। इस सुन्दर विधि-व्यवस्था का कोई नियामक होना ही चाहिए।
माना कि जड़ पदार्थों की भी एक अनोखी प्रक्रिया है, अर्थात् ग्रह-नक्षत्र जहाँ एक निश्चित पथ, निश्चित कक्षा में रहते हैं, वहाँ वे आपस में टकराते भी हैं, मनुष्य जो इतना बुद्धिमान, ज्ञानवान, क्षमतावान है, वह भी एक दिन नष्ट हो जाता है। शास्त्रों में तो बड़े-बड़े लोकों और लोकपालों के विनाश और लय की चर्चा की गई है, पर यह सब गणित के सिद्धान्त से विमुक्त नहीं है और इसी का नाम व्यवस्था है। जहाँ इस प्रकार का एक नियम बना हुआ है वहाँ नियामक होना भी आवश्यक है। सूर्य-चन्द्रमा, ग्रह-नक्षत्र जब चाहें टकरा जाते। मनुष्य की आयु की एक निश्चित मर्यादा न होती। दिन 15 घण्टे और रात 9 घण्टे वर्षा के बाद गर्मी और गर्मी के बाद फिर गर्मी और इसके बाद फिर बरसात, तब जाड़ा—इस प्रकार की उल्टी-सीधी क्रियाएं हुई होतीं तो यह मानने में कदापि संकोच न होता कि इस संसार में कोई नियम नहीं है और न ही उस व्यवस्था को चलाने वाली कोई चेतन शक्ति है।
ईश्वर की मान्यता कोई निराधार कल्पना नहीं है। उस पर ऋषियों की गहन ज्ञानानु सन्धान की छाप लगी हुई है। मुनियों का विशद चिन्तन और उपनिषदों की साधना का निष्कर्ष मिला हुआ है।
इन शास्त्रों में ईश्वर को सत् अर्थात् सदैव, शाश्वत बताया गया है पर वहाँ यह भी स्पष्ट किया गया है कि उसे स्थूल नेत्रों के द्वारा नहीं देखा जा सकता। जीवित तथा विकसित होने वाले पदार्थों का रूप देखने में नहीं आ सकता केवल पार्थिव संयोग से बने निर्जीव पदार्थ ही देखने को मिल सकते हैं, इसलिए परमात्मा का कोई ऐसा लक्षण नहीं मिल सकता, जिसे साकार करके मनुष्य को दिखाया जा सके। यदि वह इस प्रकार परिवर्तन में आ सकने वाली वस्तु होती तो फिर वह चेतन अथवा शाश्वत न रही होती।
इसलिए ईश्वर का साक्षात्कार किसी बाह्य प्रक्रिया से सम्भव नहीं। किन्तु परमात्मा का अन्य बोध-गम्य स्वरूप भी है। इसे बाह्य चर्म-चक्षुओं से भले ही न देखा जा सकता हो, पर आन्तरिक ज्ञान-चक्षुओं से आत्म-निग्रह, आत्म-शुद्धि तथा आत्म-ज्ञान के द्वारा उसकी प्रत्यक्ष अनुभूति प्राप्त की जा सकती है।
प्रसिद्ध पाश्चात्य दार्शनिक कान्ट ने इस तथ्य की पुष्टि में कहा है— ‘समस्त भौतिक अभिव्यक्ति, कार्य कारण और भावना से बँधी हुई है, हम उसी के अन्दर रहते, चलते, फिरते तथा उत्पन्न होते हैं। किन्तु उस परमात्मा को बुद्धि के द्वारा जान नहीं सकते। बुद्धि की विशालता की अपेक्षा परमात्मा अधिक व्यापक और गहरा है, हम केवल उसका अनुभव कर सकते हैं, देख नहीं सकते।”
महान दार्शनिक ‘हेगेल’ का भी इस सिद्धान्त की ओर झुकाव था, क्योंकि उसका यह विश्वास था कि ईश्वर केवल भावनाओं द्वारा ही अनुभव किया जा सकता है। उसने लिखा है—”ईश्वर का अस्तित्व धर्म का विषय है और उसे अनुभव किया जा सकता है। परमात्मा की व्यापकता और उसकी अभिव्यक्ति का अवगाहन हम उतना ही स्पष्ट कर सकते हैं, जितना हमारा अनुभव गहन और व्यापक होगा।” प्रो. नाइट का मत है- “ईश्वर की भावना हमारे हृदय में इस प्रकार घर कर गई है कि उसे अन्तःकरण से बाहर लाना कठिन जान पड़ता है।”
आन्तरिक ज्ञान के द्वारा ही हम परमात्मा का अनुभव प्राप्त कर सकते हैं, उसका साक्षात्कार कर सकते हैं अथवा यों कहना चाहिए कि हम ईश्वर बनकर ही ईश्वर के दर्शन प्राप्त कर सकते हैं। इसमें भी आन्तरिक शक्तियों के विकास की ओर ही संकेत है। कल्पना और चिन्तन, विचार-भावना, स्वप्न आदि के माध्यम से तो उसकी एक झलक ही देख सकते हैं। विश्वास की पुष्टि के लिए यद्यपि यह बुद्धि तत्व भी आवश्यक है, तथापि उसके पूर्ण ज्ञान के लिए अपने अन्दर प्रविष्ट होना होगा, आत्मा की सूक्ष्म सत्ता में प्रवेश करना आवश्यक हो जाता है। वहाँ बुद्धि की पहुँच नहीं हो सकती। आत्मा का भेदन आत्मा ही करता है और आत्मा बनकर ही आत्मा का साक्षात्कार किया जा सकता है। इसी बात को ईश्वरीय ज्ञान के बारे में भी घटित किया जाता है। यह ऐसा ही है, जैसे कोई यह कहे कि एक बूँद समुद्र में मिलकर अपने आपको समुद्र अनुभव कर सकती है पर अपने बूँद रूप में समुद्र की गहराई का मापन नहीं कर सकती।
उपनिषदों में यह स्पष्ट किया गया है कि जब परिमित ज्ञान के द्वारा अपरिमित शक्ति का अनुमान न किया जा सका तो ऋषियों के पास एक ही उपाय शेष रहा। उन्होंने तर्क के आश्रय को तिलाँजलि देकर अभ्यांतरिक ज्ञान का द्वार खटखटाया और उसकी सहायता से सृष्टि के अन्दर ईश्वर की सत्ता को ढूँढ़ने में सफलता प्राप्त की। ईश्वर के अस्तित्व को जो नहीं मानते, उनमें यह बात भी होगी कि वे आन्तरिक ज्ञान की आवश्यकता को भी निर्मूल कह रहे होंगे, पर अब यह निर्विवाद सिद्ध हो चुका है और दर्शन ने भी इस सत्यता को सिर झुका लिया है कि ईश्वर की अनुभूति केवल आन्तरिक ज्ञान की सहायता से ही संभव है।
यह आन्तरिक ज्ञान सर्वसाधारण के लिए सुलभ नहीं है। यह केवल पुरुषार्थियों को ही उपलब्ध हो सकता है। क्योंकि जब तक दूषित वासनाएं और भौतिक विकार पूर्णतया शान्त नहीं हो जाते, आत्मानुभूति किसी प्रकार भी सम्भव नहीं है और यह प्रक्रिया निःसन्देह भौतिक दृष्टि से काफी कठिन जान पड़ती है। पर यह सिद्धान्त अकाट्य, अपरिवर्तनीय है। ईश्वर को प्राप्त करने के लिए आत्म-शोधन की आवश्यकता अनिवार्य है।
महापुरुष ईसामसीह की वाणी में— “वे पुरुष धन्य हैं, जिनके अन्तःकरण पवित्र हो गये हैं, क्योंकि शुद्ध आत्मा वाले व्यक्ति ही ईश्वर को प्राप्त कर सकते हैं।”
सत्य का ज्ञान तर्क के द्वारा सिद्ध नहीं हो सकता। वह तो तभी प्राप्त हो सकता है, जब कि खोज करने वाला उसी सत्ता में घुल-मिलकर एक हो जाय, उसी के रंग में पूरी तरह रँग जाय। ईरान के प्रसिद्ध योगी—शम्शतब्रेज ने इस अवस्था का वर्णन इस सेर में बड़ी सुन्दरता के साथ किया है—
दुई रा चूँ बदर करदम यकी दीदम दु आलम रा।
यकी बीनम, यकी जूयम, यकी खानम, यकी दानम्॥
अर्थात्—जब तक मैं अपने-पराये के प्रपंच में पड़ा था, तब तक मुझे ईश्वरीय सत्ता का ज्ञान नहीं हुआ, पर जब से मैंने अपने अहंभाव को नष्ट कर दिया है, तब से वही परमात्मा ही दिखाई देता है, उसे ही ढूँढ़ता हूँ, उसे ही पढ़ता और उसे ही जानता हूँ।
आध्यात्मिक विकास का यही मार्ग है। मनुष्य उसे जानता नहीं, पर आन्तरिक ज्ञान के द्वारा उस परम पिता के साथ संपर्क स्थापित करता है। वह उसके स्वरूप को न समझते हुए भी उससे एकता स्थापित करता है तो उसको एक दिव्य अनुभूति मिलती है और वह भी ईश्वरीय गुणों को धारण कर अपना जीवन पूर्णतया प्रेममय और त्यागमय बना लेता है।
यह संसार एक निश्चित विधान के अनुसार चल रहा है। जिसने हमें पैदा किया, पालन-पोषण तथा जो हमारी रक्षा करता है, उसके प्रति हमें कृतज्ञ होना चाहिए। अरस्तू के शब्दों में— ‘जो परमात्मा जगत का चरम एवं चेतन कारण और सारे विश्व का विधाता है। जो सृष्टि का संचालक है, किन्तु स्वयं अचल है, जिसने सृष्टि को स्वरूप और सौंदर्य प्रदान किया है, पर स्वयं निराकार है, हम उस परम-पिता को प्रणाम करते हैं।”
एक बार राजा पुष्यजित महर्षि अंगिरा के पास गये और उनसे अपने राज्य में फैल रही अशान्ति के निवारण का उपाय पूछा। राज्य की सही स्थिति समझने के बाद महर्षि ने पुष्यजित को बताया राजन्! तुम्हारे राज्य में ब्राह्मणों का अभाव है इसीलिए सर्वत्र अशान्ति है। जिस राज्य में ब्रह्मणो का आविर्भाव नहीं होता वह राष्ट्र पतित हो जाता है। तुम अपने यहाँ फिर से ब्राह्मणों की प्रतिष्ठा करोगे तो तुम्हारे राज्य में फिर से सुख-समृद्धि का अभिवर्द्धन होगा, वर्तमान कलह दूर होगा और सामाजिक जीवन में शान्ति की स्थापना हो सकेगी।
महर्षि अंगिरा की वह वाणी आज हमारे समाज के लिये भी अक्षरशः आवश्यक प्रतीत हो रही है। सामाजिक-सुव्यवस्था का सम्पूर्ण भार प्रशासन पर लाद कर उसके सबल होने की कभी भी कल्पना नहीं की जा सकती। उसके लिये तो सुयोग्य, तेजस्वी और ब्रह्मनिष्ठ लोकसेवी मार्गदर्शकों की ही आवश्यकता होगी। जो निष्काम सेवाभाव से राष्ट्र के स्वाभिमान को ऊँचा उठाये रख सकने के कठोर कर्त्तव्य का पालन कर सकते हों, समाज के प्रति न्याय और सुव्यवस्था की आशा उन्हीं से की जा सकती है। पदलोलुप, स्वार्थी, महत्त्वाकांक्षी व्यक्ति उन्हें चाहे कितने ही बड़े अधिकार क्यों न मिले हों वे सभी स्थायी शान्ति और सामाजिक व्यवस्था को मजबूत नहीं रख सकते।
प्राचीनकाल से ही इस देश में यह महत्वपूर्ण पद ब्राह्मणों और पुरोहितों को मिला हुआ है। हिन्दू ग्रन्थों में इस सम्बन्ध में महत्वपूर्ण सूक्त उपलब्ध हैं, जिनसे यह पता चलता है कि ब्राह्मणों ने उस समय की सामाजिक व्यवस्था को मजबूत बनाने का कितना कठोर व्रत धारण किया था। उन्हें कितनी सामाजिक प्रतिष्ठा प्राप्त थी और उसे स्थिर रखने के लिए उन्हें कितनी कठिन कर्त्तव्य-साधना करनी पड़ती थी। ऋग्वेद में कहा है- “आपव्रिता विसृजन्तो अधिक्षमि” अर्थात् वे प्रत्यक्ष देवता हैं, जो धर्म-प्रेरणा को सजीव रखने के लिये मर मिटते हैं।
“परातत सिच्यते राष्ट्रं ब्रह्मणे पत्र जीयते”—
जहाँ ब्राह्मण हारते हैं वह देश खोखला हो जाता है।
“न ब्राह्मणस्य गाँ जग्ध्वा राष्ट्रं जागार कश्चना।”
जहाँ ब्राह्मण का तिरस्कार होता है वहाँ से सुख शान्ति चली जाती है।
“अग्निऋषिः पावमानः पाञ्चजन्य पुरोहितः”—
पुरोहित की पवित्र जिम्मेदारी केवल वे लोग उठावें जिनमें आवश्यक गुण हों।
“तमेव ऋषिं तमु ब्रह्मणमाहुर्यज्ञन्य सामगा”—
जो अपने ज्ञान से दूसरों को सन्मार्ग पर लगाता है वही ऋषि, वही ब्राह्मण है।
“प्रियं अतिथिं गृणीर्षाण”
—हे आदरणीय ब्राह्मणों घूम-घूम कर धर्मोपदेश करो—और
“देव उन्नयथा पुनः”
—गिरे हुओं को फिर से ऊपर उठाओ।
इस प्रकार के अभिवचन शास्त्र में पग-पग पर उपलब्ध हैं, जिनमें ब्राह्मण के कर्त्तव्य, गौरव, महत्व एवं सम्मान का निर्देश दिया गया है। इनमें ब्राह्मण के गुण कर्म तथा स्वभाव का भी समुचित निर्देश किया गया है, इन गुणों के कारण ही उनको भूसुर कहलाने का गौरव मिला था और समाज शरीर का उन्हें शीर्ष सम्बोधित किया गया था।
ब्राह्मण का प्रमुख कर्त्तव्य यह है कि वह राष्ट्र के चरित्र और मनोबल को न गिरने दे। यह कार्य वह धर्मोपदेश द्वारा करता है पर समाज की विषैली परिस्थितियों में वह अपनी वाणी का प्रभाव तभी डाल सकता है जब उसने स्वयं भी ज्ञान, संयम, चरित्र की साधना की हो और सन्मार्ग पर चलने की उसकी अपनी भावना इतनी मजबूत हो जो कैसी भी विकट परिस्थिति आने पर भी झुक न सके। ब्राह्मण मर जाते हैं पर अपने आदर्शों से नहीं गिरते। जीवन भर कठिनाइयों से लड़ते रहते हैं पर समाज के प्रति सेवाओं का कोई लौकिक मूल्य माँगने वाला जल्द उनकी जबान पर नहीं आता।
ब्राह्मण ब्रह्मनिष्ठा का “पर्यायवाची” शब्द है। जिसने केवल परमात्मा का आश्रय ग्रहण कर लिया हो उसके लिए लौकिक सुखों की आवश्यकता भी क्या और क्यों वह इनके लिये औरों के आगे हाथ बढ़ायेगा। ब्राह्मण अध्यात्म शक्ति से ओत-प्रोत ज्ञानी और तेजस्वी ही नहीं होते वे त्यागी, तपस्वी और परमार्थी भी होते हैं इसीलिए वे भूसुर कहलाते हैं। इतने बड़े व्यक्तित्व को इससे छोटा पद और हो भी क्या सकता है।
धर्म और अध्यात्म, नीति और दर्शन—यह समाज को व्यवस्थित रखने वाले स्थायी अंग है। लोगों को पथ भ्रष्ट होने से बचाने का एकमात्र साधन “धर्म” ही है। राजनैतिक नेता केवल सामयिक समस्याओं तथा भौतिक असुविधाओं को ही हल कर सकते हैं। समाज के आन्तरिक जीवन में प्रवेश कर उसकी उत्कृष्टता को जागृत करने का उत्तरदायित्व कोई देव-शक्ति ही वहन कर सकती है। ब्राह्मण वही देव पुरुष हैं जो इस कार्य को भली प्रकार पूरा कर सकते हैं।
पहली समस्या यह है कि आज कल ऐसे सेवानिष्ठ ब्राह्मणों की भारी कमी है। जहाँ कुछ लोगों को अपने इस कर्तव्य धर्म में रुचि है भी उन्हें व्यावहारिक मार्गदर्शन नहीं मिलता। एक ओर ब्राह्मणों का अभाव दूसरी ओर उनका तिरस्कार इन दोनों ने परिस्थितियों को बिगाड़ा है।
अपने पद के अनुरूप ब्राह्मण का कर्त्तव्य कठिन और महान है। इस महानता को विकसित करने का पहला उत्तरदायित्व भी ब्राह्मणों पर ही आता है। वे अपने चरित्र और व्यक्तित्व को ऊँचा उठाने के लिए अपनी वासनाओं-तृष्णाओं को परास्त करने के लिए कटिबद्ध हो जायें तो सामाजिक जीवन में ब्राह्मणों की प्रतिष्ठा पुनः अपने पूर्वस्वरूप को ग्रहण कर सकती है। माना इस युग में आसुरी तत्वों की प्रबलता है तो भी भारत की आत्मा में धार्मिक संस्कारों के बीज अभी पूर्ण सुरक्षित हैं, भारतीय जनता इतनी कृतघ्न नहीं है जो अपने पुरोहितों का सम्मान न कर सके और उनके उपदेशों पर चलने के लिए राजी न हो। उसे जहाँ भी विश्वास मिलता है, वह सहर्ष अपनी मनोवृत्तियों को उधर इस आशा से मोड़ने के लिये तैयार हो जाती है कि इससे उसके पारलौकिक जीवन की सफलता सम्भव हो सके? जनता ठगी गई है इसलिए यदि वह अविश्वास रखती है तो उसका भी दोष नहीं अतः अब ब्राह्मणों को ही अपने आपको इस योग्य बनाना चाहिये कि समाज उन पर विश्वास कर सके। कठिन कसौटी पर भी वे खरे उतर सकें तो समाज उनकी अगवानी के लिये आज भी उसी भावना से तत्पर मिलेगा।
ब्राह्मणों को दोष यह रहा कि उन्होंने भाग्यवाद भविष्यवाद, चमत्कारवाद, टोना-टोटका भूत-प्रेत, झाड़-फूंक जैसी अविवेकपूर्ण भ्रान्तियों का समर्थन तथा प्रसार किया और जनता का कसूर यह रहा कि उसने इन्हें ही “बाबा वाक्य प्रमाणम्” मानकर स्वीकार कर लिया।
मानसिक दासता और संकीर्णता के बीज अवसर पाकर अन्य क्षेत्रों में पनपे और उनने हमारे राष्ट्रीय एवं सामाजिक जीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया। थोथी परम्परायें जनता में फूट के बीज बोने का कारण बनीं। समाज भी विभिन्न मत-मतान्तरों से भर गया। पूर्व-पश्चिम, उत्तरी-दक्षिणी, प्रान्तवाद, जातिवाद, धर्मवाद, मतवाद आदि के वाद-विवाद इस सीमा तक बढ़े कि हिन्दू जाति का सम्पूर्ण संगठन विश्रृंखलित हो गया और इसका लाभ उठाकर विदेशी शासकों ने हमें दास बना लिया।
सौभाग्य से हमें राजनैतिक पराधीनता से छुटकारा मिल गया है। राष्ट्र पुनः अँगड़ाई लेकर उठ खड़ा होने की चेष्टा कर रहा है पर यहीं पर हमें यह भी समझ लेना चाहिये कि राष्ट्र की सर्वांगीण प्रगति और अपनी महान आध्यात्मिक विरासत को जीवित रखने के लिये ब्रह्म परम्परा को नष्ट नहीं होने देना चाहिये। समाज-शरीर का शीर्ष ब्राह्मण ही विश्रृंखलित हो गया तो भौतिक उन्नति कर लेने पर हमारी दशा भी पाश्चात्य देशों जैसी अशान्तिमय बन जावेगी। भौतिक प्रगति और आध्यात्मिक तत्वों में पारस्परिक तालमेल रखकर ही हम अपने पूर्व गौरव को प्राप्त कर सकते हैं। इस कार्य का शुभारम्भ आज अपने समाज के शीर्ष भाग—ब्राह्मण को जगाकर ही करना चाहिये। उन्हें आगे बढ़कर अपने कर्त्तव्यों का पालन करना चाहिये ताकि हमारा देश पुनः ऊपर उठ सके। अपने जातीय अस्तित्व को बनाये रख सके।
मनुष्य को परमात्मा ने बुद्धि नामक एक अतुलनीय शक्ति प्रदान की है। इसी शक्ति के आधार पर मनुष्य लाखों-करोड़ों अन्य प्राणियों के बीच सृष्टि का अप्रतिम स्वामी बना है। इतना ही नहीं, मनुष्य ने बुद्धि बल पर संसार को सुन्दर से सुन्दरतर बनाया है। बिना किसी के बतलाये उसने सृष्टि के गोपनीय रहस्यों को बुद्धि के बल पर खोज निकाला है। जीवन में न जाने कितनी सुख-सुविधाओं का समावेश किया है।
मनुष्य ने अतीत का अध्ययन कर उसके व्यवहारों, मान्यताओं एवं धारणाओं के हानि-लाभ को समझ कर नित्य नये भविष्य के लिये पथ-प्रशस्त करते हुए महान से महान तर सभ्यताओं एवं संस्कृतियों का सृजन किया है। संसार में प्रत्यक्ष सुन्दर कला-कृतियाँ, ऊँचे-ऊँचे महल, दुर्ग, प्रासाद तथा अट्टालिकायें, यान, जलयान, वायुयान जो कुछ भी विस्मयकारक तथा लाभ कारक दिखाई दे रहा है, वह सब मनुष्य की बुद्धि-शक्ति का ही चमत्कार है।
बुद्धि ने मानव को केवल भौतिक विभूतियों तक ही ले जाकर नहीं छोड़ दिया, बल्कि उसने उसे आत्मा-परमात्मा, पुरुष और प्रकृति के रहस्यों तक भी पहुँचा दिया है। सामाजिक, राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय चेतनाएं, पारस्परिक व्यवहार, कर्तव्य एवं अधिकारों का ज्ञान बुद्धि ने ही कराया है।
बुद्धि की शक्ति का एक उज्ज्वल पक्ष तो यह रहा। इस शक्ति का एक अन्धेरा पक्ष भी है। आक्रमण, अत्याचार, अन्याय, उत्पीड़न, शोषण, लाभ-लोभ, छल-कपट, वंचना-प्रताड़ना, विजय, आतंक, अभियान, नोंच-खसोट, लूटमार, छीना-झपटी, चोरी-मक्कारी, ध्वंस अथवा विनाश की आसुरी वृत्तियाँ भी मनुष्य—बुद्धि बल पर ही सफल करता है।
मनुष्य शारीरिक बल से नहीं, बुद्धि-बल से ही अभियानों का संचालन और सेनाओं का नियन्त्रण करता है। बड़ी-बड़ी लड़ाइयों की हार-जीत—बुद्धि-बल पर ही निर्भर करती है। राष्ट्रों के नेतृत्व और राज्यों की शासन व्यवस्था के काम भी बुद्धि-शक्ति से ही चलते हैं। व्यापार, व्यवसाय, उद्योग, योजनाएं एवं उपाय सब बुद्धि के अधीन रहते हैं। तात्पर्य यह कि संसार में जो कुछ सृजनात्मक अथवा ध्वंसात्मक क्रिया-कलाप होता दिखाई देता है, वह सब बुद्धि-बल से ही संचालित एवं नियन्त्रित होता है। बुद्धि एक अनुपम एवं अतुलनीय सर्व-समर्थ शक्ति है।
आज के वैज्ञानिक युग में तो मानव बुद्धि चमत्कारिक क्षमता से सम्पन्न हो गई है। असम्भव जैसे कार्य आज सम्भव होते दिखाई दे रहे हैं। मनुष्य की बुद्धि आज जीवन-मृत्यु के रहस्यों को खोज निकालने पर तुली हुई है। संसार के कारणभूत पंच-तत्वों पर विजय प्राप्त कर उन्हें अपना आज्ञाकारी बना रही है। प्रकृति की पराधीनता से मुक्त होकर मानव आज बुद्धि बल पर स्व-निर्भर होने का प्रयत्न कर रहा है। प्रगति देखते हुए यह बात असम्भव नहीं दिखाई देती कि वह जब जिस ऋतु को चाहे उत्पन्न कर ले और जब जिस वातावरण का चाहे निर्माण कर ले। आज का युग मानवीय बुद्धि-शक्ति का प्रमाण सूचक साक्षी बना हुआ है।
ऐसी अमोघ है—मानव-बुद्धि की शक्ति! यदि यह चाहे तो संसार को दो दिन में ही नष्ट कर दे और चाहे तो इसे स्वर्ग बना दे! किन्तु आज की परिस्थितियाँ देखते हुए ऐसा नहीं लग रहा है कि मनुष्य की बुद्धि-शक्ति संसार को स्वर्ग रूप में परिणित करेगी। इसके अधिकाधिक नरक बनने की संभावनाएं अवश्य दृष्टिगोचर होने लगी हैं। आगे की बात तो छोड़ दीजिये, आज के दिन भी संसार एक नरक से क्या कम बन गया है? जिधर देखो, दुःख-पीड़ा, शोक-सन्ताप, आवश्यकता एवं अभाव का ही ताण्डव होता दृष्टिगोचर हो रहा है। मनुष्य, मनुष्य के लिये भूत-प्रेतों की तरह शंका का स्वरूप बना हुआ है! सुख-सुविधा के अगणित साधन संचय हो जाने पर मनुष्य को उनका कोई लाभ नहीं मिल रहा है। जिस एक आश्वस्तता एक निश्चिन्तता प्राप्त करने के लिए मनुष्य की बुद्धि तन-मन से लगी हुई है, उसके दर्शन भी संभव नहीं हो रहे हैं। निःसंदेह आज के युग के बुद्धि बलिष्ठ मनुष्य की यह दुर्दशा तरस का ही विषय है।
अब एक प्रश्न मन में उठे बिना नहीं रहता। क्या कारण है कि जो सर्व समर्थ बुद्धि आकाश-पाताल को मिला देने की क्षमता रखती है, उस बुद्धि का मानव-मस्तिष्क में आज चरम-विकास हो रहा है, किन्तु वह वंचित उन सुखों से भी होता जा रहा है, जो उसने कम बुद्धि के युग में उपयोग किये हैं। यह उल्टा परिणाम कुछ कम विस्मयकारक नहीं है। इस पर शान्त मस्तिष्क से विचार करने की नितान्त आवश्यकता है।
बात वास्तव में यह है कि मनुष्य ने आज बुद्धि को तो विकट रूप से बढ़ा लिया है, किन्तु उस पर नियन्त्रण करना नहीं सीखा है, उचित नियन्त्रण के अभाव में यह निरंकुश मातंगिनी अथवा अतट-तटिनी की भाँति चारों ओर ध्वंस के दृश्य उपस्थित करती दृष्टिगोचर हो रही है। बुद्धि-शक्ति में कोई अपना मर्यादा तो होती नहीं। स्वयं मनुष्य को ही अपनी इस शक्ति को नियंत्रित करना होता है।
बुद्धि का अनियन्त्रित विकास केवल दूसरों के लिये ही दुःखदायी नहीं होता, स्वयं अपने लिये भी हानिकारक होता है। अति बुद्धि मानव को अन्ततः असन्तोष की ज्वाला में ही जलना होता है। वह बहुत कुछ पाकर भी कुछ नहीं पाता। एक बुद्धिवादी कितना ही शास्त्रज्ञ, विशेषज्ञ, दार्शनिक, वैज्ञानिक, तत्व-वेत्ता आदि क्यों न हो, बुद्धि का अहंकार उसके हृदय में शाँति को न ठहरने देगा। वह दूसरों को ज्ञान देता हुआ भी आत्मिक शाँति के लिये तड़पता ही रहेगा। बुद्धि की तीव्रता पैनी छुरी की तरह किसी दूसरे अथवा स्वयं उसको दिन-रात काटती ही रहती है। मानव की अनियन्त्रित बुद्धि-शक्ति मनुष्य जाति की बहुत बड़ी शत्रु है। अतएव बुद्धि के विकास के साथ-साथ उसका नियन्त्रण भी आवश्यक है।
किसी शक्तिशाली का नियन्त्रण तो उससे अधिक शक्ति से ही हो सकता है। तब भला समग्र सृष्टि को अपनी मुट्ठी में कर लेने वाली शक्ति बुद्धि का नियन्त्रण करने के लिये कौन सी दूसरी शक्ति मनुष्य के पास हो सकती है? मनुष्य की वह दूसरी शक्ति है—श्रद्धा! जिससे बुद्धि जैसी उच्छृंखल शक्ति पर अंकुश लगाया जा सकता है, उसका नियन्त्रण किया जा सकता है। ध्वंस की ओर जाने से रोक कर सृजन के मार्ग पर अग्रसर किया जा सकता है। श्रद्धा के आधार के बिना बुद्धि एक बावले बवण्डर से अधिक कुछ भी नहीं है। श्रद्धा रहित बुद्धि जिधर भी चलेगी उधर दुःखद परिस्थितियाँ ही उत्पन्न करेगी।
विशुद्ध बुद्धिवादी के पास स्नेह, सौजन्य, सौहार्द्र, सहानुभूति, भ्रातृत्व-भाव जैसी कोमलताऐं नहीं होतीं। इन मानवीय गुणों की जननी श्रद्धा ही है। श्रद्धालु अन्तःकरण वाला मनुष्य सेवा-सहयोग, क्षमा-दया, परोपकार तथा परमार्थ में विश्वास करता है, न्याय और नियम उसकी विशेषताएं हुआ करती हैं।
मानवता के इतिहास में दो परस्पर विरोधी ख्याति के व्यक्तियों के नाम पाये जाते हैं। एक वर्ग तो वह है, जिसने संसार को नष्ट कर डालने, जातियों को मिटा डालने तथा मानवता को जला डालने का प्रयत्न किया है। दूसरा वर्ग वह है, जिसने मानवता का कष्ट दूर करने, संसार की रक्षा करने, देश और जातियों को बचाने के लिये तप किया है, संघर्ष किया है और प्राण दिया है। इतिहास के पन्नों पर जाने वाले यह दोनों वर्ग निश्चित रूप से बुद्धि-बल वाले रहे हैं। अन्तर केवल यह रहा है कि श्रद्धा के अभाव में एक की बुद्धि शक्ति अनियन्त्रित होकर बर्बरता का सम्पादन कर सकी है और दूसरे का बुद्धि-बल श्रद्धा से नियन्त्रित होने से सज्जनता का प्रतिपादन करता रहा है।
यदि आज की चमत्कारी बुद्धि का ठीक दिशा में उपयोग करना है, संसार से दुःख दर्दों को मार भगाना है, अपनी धरती माता को स्वर्ग बनाना है, मानव सभ्यता की रक्षा के साथ-साथ उसका विकास करना है तो अन्तःकरण में श्रद्धा की प्रतिस्थापना करनी होगी। बिना श्रद्धा के मनुष्य की बुद्धि-शक्ति उसकी शत्रु बनकर मानवता का विनाश किये बिना नहीं मानेगी। आज अवसर हैं, साधन हैं, मनुष्य चाहे तो सृजन का देवदूत बन सकता है और चाहे तो शैतान का अनुचर!
‘जिन्दगी जीना एक कला है’—ऐसा सुनकर अनेक लोगों को अजीब सा लग सकता है। किन्तु है यह वास्तविकता कि जीवन एक कला है। जो लोग जीवन जीने की कला नहीं जानते अथवा उसे कलात्मक कर्तव्य नहीं मानते, वे जीते हुए भी ठीक से नहीं जी पाते।
बहुत लोग जिन्दगी को विविध उपकरणों से सजाये सँवारे रहने को ही कला समझते हैं। किन्तु बाह्य प्रसाधनों द्वारा जीवन का साज शृंगार किये रहना कला नहीं है। यह मनुष्य की लिप्सा है, जिसे पूरा करने में उसे एक झूठे सन्तोष का आभास होता है। फलतः यह मान बैठता है कि वह जिन्दगी को ठीक से जी रहा है। कला तो वास्तव में वह मानसिक वृत्ति है जिसके आधार पर साधनों की कमी में भी जिन्दगी को खूबसूरती के साथ जिया जा सकता है।
जिन्दगी को हर समय हँसी-खुशी के साथ अग्रसर करते रहना ही कला है, और उसे रो-झींक कर काटना ही कलाहीनता है। जहाँ तक जिन्दगी को कलापूर्ण बनाने में साधनों की सहायता का प्रश्न है—उसके विषय में बहुत बार देखा जा सकता है कि एक ओर जहाँ प्रचुर साधन-सम्पन्न अनेक लोग रो-रो कर जिन्दगी काट रहे हैं उनसे बात करने पर ऐसा लगता है मानो उनका जीवन-तत्व समाप्त हो गया है और वे ऊबे हुए शेष श्वाँसों की लकीर पीट रहे हैं, जीवन से उन्हें कोई अभिरुचि नहीं रह गई है। इस प्रकार की जिन्दगी को आकुल अथवा अकला पूर्ण कहा जायेगा।
दूसरी ओर अनेक लोग अपने सीमित साधनों में भी उत्साह एवं उल्लासपूर्वक जीते दिखाई देते हैं। जिन्दगी उनके लिये कटु अनुभव नहीं मधुर आस्वादन जैसी होती है। उन्हें न तो उससे अरुचि होती है और न शिकायत। उनके जीवन में आँसुओं की अपेक्षा मुस्कानें अधिक होती हैं। इस प्रकार की जिन्दगी कला-कुशल मानी जायेगी।
ऐसा नहीं कि कलापूर्ण जिन्दगी जीने के लिये जीवन के आँसुओं का सर्वथा निष्कासन अथवा बहिष्कार कर दिया जाये और उनके स्थान पर जैसे भी हो मुस्कानों का सञ्चय किया जाये। जिन्दगी में हँसने तथा रोने दोनों का अपना-अपना स्थान है। हास-रुदन की क्रमिक कड़ियों के गुम्फन से ही जीवन शृंखला का निर्माण होता है। यह सहज सम्भाव्य नहीं कि किसी के जीवन में हास के फूल ही खिलते रहें और रुदन के ओंस की एक बूँद भी न गिरे। अथवा किसी के आँसू कभी मुस्कान में ही न बदलें। हर्ष और विषाद जीवन नाटिका के दो अनिवार्य दृश्य हैं, जिन्हें सबको ही यथा-अवसर देखना ही पड़ता है। किन्तु जो इन दोनों प्रति-परिवर्तनों को समभाव से उपभोग कर लेता है वह ही कुशल और कला जीवी कहा जायेगा।
संसार में ऐसे बहुत से लोग हो सकते हैं जो करुणा अथवा शोक के संयोग पर भी यों ही टुकुर-टुकुर देखा करते है। उनकी आँखें अनावृष्टि की मारी धरती की तहर ही शुष्क बनी रहती हैं। यह सही है कि शोक प्रसंगों के अवसर पर धाड़ें मार-मार कर नदी नाले बहाना जीवन में आवश्यक आँसुओं की पूर्ति करना नहीं है। फिर भी करुणा के अवसरों पर ठूँठ की तरह ठूँठ रह जाना कोई आकर्षक अभिव्यक्ति नहीं है। यह जड़ता है, कठोरता है और दारुणता है।
करुणा अथवा शोक के अवसर पर द्रवित हो उठना मनुष्यता का मोहक लक्षण है किन्तु पराभूत होकर अतिरेकता की अभिव्यक्ति करना मूर्खता है। शोक संपर्क के समय ‘लोचन जल रहु लोचन कोना’—के प्रकार से रोने वाले जीवन में अपेक्षित आँसुओं की कलात्मक अभिव्यक्ति करते हैं। बहुत से गहन गम्भीर व्यक्ति शोक से समाकुल होकर भी उसे वाणी अथवा आँखों द्वारा व्यक्त नहीं होने देते। आँसुओं अथवा उच्छासों के आवागमन पर ऐसे धीर गम्भीर व्यक्ति पर जड़ता अथवा प्रस्तरता का आरोप नहीं किया जा सकता। ऐसी ही स्थिति की परिभाषा करते हुये किसी उर्दू शायर ने कहा—
‘शक न कर तू मेरी खुश्क आँखों पर —
यों भी आँसू बहाये जाते हैं।’
इस प्रकार जैसे जीवन में आँसुओं को स्थान न देना अकलात्मकता है उसी प्रकार धैर्य का बाँध तोड़कर अनर्गल रूप से बह उठना भी कुरूपता है। शोक से अभिभूत होने पर भी पराभूत हुए बिना जो कतिपय मानस-मोतियों के देय भाग को सच्चाई के साथ समर्पित कर देना ही पर्याप्त कोई आँच नहीं आती।
हास निःसन्देह जीवन का सौंदर्य पूर्ण कला पक्ष है। जिस अनुपात से जिसके जीवन में हँसी-खुशी की अवतरण होगी वह उसी अनुपात से कलापूर्ण समझा जायेगा। किन्तु यह हँसी-खुशी मनुष्य की अपनी ही होनी चाहिये। दूसरों की छीनी हुई अथवा हरे हुए सुख-सन्तोष से प्राप्त प्रसन्नता कला पक्ष में नहीं मानी जा सकती। मनुष्य की वह ही हँसी-खुशी जीवन की कलात्मकता मानी जायेगी जो उसके अपने सन्तोष, आशा, उत्साह, धैर्य अथवा शौर्य से उत्पन्न हुई हो!
हँसी का अर्थ केवल हँसते रहना ही नहीं है। जीवन में सन्तोष, सहिष्णुता, आशा, उत्साह, रुचि तथा रोचकता आदि गुण भी हास और उल्लास के समान ही हैं। इनके अभाव में मनुष्य का अशान्त एवं रुचिर रहना स्वाभाविक है। अशान्ति, असन्तुष्टि अथवा आलम्भ पूर्ण जीवन असुन्दर तथा अकलापूर्ण है। उपकरणों तथा अलंकारों से सजा रहने पर भी इस प्रकार का जीवन अकलात्मक ही है।
हँसी-खुशी जीवन का विशिष्ट कला-पक्ष होने पर भी जब यह अनियंत्रित अथवा अमर्यादित हो जाती है तब कला के स्थान पर कुरूपता ही उत्पन्न करती है। हर समय, हर स्थान अथवा परिस्थिति में हँसते रहना, निश्चिन्तता दिखाना, अलमस्त बने रहना वास्तविक हँसी-खुशी नहीं है। अपने छोटे-बड़े हर कर्तव्य का उत्तरदायित्व से निर्वाह करते जीवन के संघर्ष में सफलता असफलता से अप्रभावित हुए देश-काल के साथ परिस्थिति तथा पर-भावनाओं का ध्यान रखते हुये प्रसन्न रहना ही वास्तविक हँसी-खुशी है। जिसको अपने जीवन से स्वयं कोई शिकायत नहीं है और दूसरों को शिकायत का अवसर नहीं देता उसके जीवन को ही ठीक-ठीक कलात्मक कहा जा सकता है।
इस प्रकार का निरुपालम्भ जीवन प्राप्त करने के लिए सन्तोष, संघर्ष तथा साहस की वृत्तियों को परिश्रय देना होगा! आलस्य अथवा अकर्मण्यता जन्य साधनहीनता अथवा अभाव की स्थिति में जबरदस्ती जीवन में हँसी-खुशी का आरोप किये रहना कला नहीं है। यह स्थिति उसी दशा में कलापूर्ण कही जा सकती है जब मनुष्य असाधनता अथवा अभाव को दूर करने के लिए पूरा प्रयत्न एवं पुरुषार्थ करता रहे और परिस्थिति, सम्भोग अथवा अन्य किन्हीं कारणों से सफलता न पाने पर भी असन्तुष्ट, हताश अथवा निरुत्साह न हो। अकारण अभावों अथवा आवश्यकताओं की मार खाते हुए निर्लिप्त अथवा निश्चन्त बना रहना कला नहीं कुरूपता है। अपनी क्षमताओं के अन्तिम छोर तक उद्योग करने पर भी यदि कृतकृत्यता नहीं मिलती तब भी दुःखी होकर आशा एवं उत्साह का परित्याग न करके उपाय पूर्वक परिस्थितियों से टक्कर लेने और विपन्नता को बदल देने का हौंसला बनाये रखना ही कला है।
सरलता तथा सादगी, सद्व्ययता एवं संकलन जीवन में कला पक्ष का सम्पादन करते जरूर हैं किन्तु जब यह गुण ग्राम्यता अथवा कृपणता के स्तर पर पहुँच जाते हैं तब दुर्गुण बनकर कुरूपता के कारण बन जाते हैं। कलापूर्ण जीवन के लिये उचित एवं उपयुक्त, उदारता भी परिश्रम एवं पुरुषार्थ ठीक तरह की अपेक्षित हैं, सन्तोष एवं शान्ति की तरह ही आवश्यक हैं।
साधन अथवा असाधन, सम्पन्नता अथवा विपन्नता किन्हीं भी स्थितियों में अनुरूप अथवा आवश्यक पुरुषार्थ के साथ सहजता, सरलता, सन्तोष, आशा-उत्साह तथा अव्यग्रता पूर्ण हर्ष विषाद का यथायोग्य निर्वाह करते हुये जीना ही कलापूर्ण जीवन है जिसे प्राप्त करना का न केवल श्रेयस्कर ही है बल्कि सार्थक एवं सुखकर भी है।
हमारे जीवन का एक प्रधान उद्देश्य होना चाहिये और सारे अन्य सहायक उद्देश्य हमारे मुख्य लक्ष्य की पूर्ति ही के लिए होने चाहिये।
—नार्मन प्रिचड
संसार का स्वरूप इच्छाओं का ही मूर्त रूप है। संसार का प्रकृत स्वरूप ईश्वर की और उसका परिष्कृत, परिवर्तित एवं परिमार्जित रुप मनुष्य की इच्छाओं का फल है। यह सारा जगत भी एकमात्र ईश्वर की इच्छा का ही स्फुरण है। मनुष्य भी जो कुछ करता-धरता है, उसके मूल में इच्छा का ही प्राधान्य रहता है।
ईश्वर ने अपनी इच्छा शक्ति से मनुष्य सहित सम्पूर्ण चराचर जगत की सृष्टि कर दी और मनुष्य को विविध शक्तियों से सम्पन्न कर उसके कर्तृत्व का खेल देखने के लिये अवस्थित हो गया। मनुष्य को क्रियाशील बनाने के लिए इच्छाओं के साथ सुख-दुःख का द्वन्द्व देकर संचालित कर दिया।
मनुष्य ने जब होश सँभाला होगा, अपनी वास्तविक चेतना में आया होगा तो उसने अपने चारों ओर प्रकृति के प्रचुर साधन बिखरे देखे होंगे और उनको अपनी सुख-सुविधा के लिये प्रयोग में लाने की इच्छा करने लगा होगा। यही से उसकी इच्छा का विकास और आवश्यकता का अनुभव प्रारम्भ हो गया होगा। आज संसार का जो परिष्कृत रूप दिखाई देता है, बड़े-बड़े निर्माण और सृजन दृष्टिगोचर हो रहे हैं, वे मनुष्य की प्रारम्भिक इच्छा का क्रमानु गत परिणाम हैं।
मनुष्य में इच्छा का उदय होना कोई अस्वाभाविक प्रक्रिया नहीं है। मनुष्य स्वयं ही उस विराट एवं पुराण पुरुष की इच्छा का परिणाम है, तब उसका इच्छुक होना सहज स्वाभाविक है। जहाँ इच्छा नहीं वहाँ सृजन नहीं, विकास नहीं, उन्नति और प्रगति नहीं। जिसकी इच्छाएं मर चुकी हैं—वह जड़ है, निर्जीव है, श्वास वायु के आवागमन का एक यन्त्र मात्र ही है। जो इच्छुक नहीं—वह निष्क्रिय है, निकम्मा है और निरर्थक है। इसके साथ ही यह भी कहा जा सकता है—जो चेतन है, प्राणी है वह इच्छा से रहित नहीं हो सकता। खाने-पीने, चलने-फिरने आदि ओर यदि और कुछ नहीं तो जीने की इच्छा तो करेगा ही। और किन्हीं कारणों से जिसे जीने की भी इच्छा नहीं है तो मरने की इच्छा तो रखता ही होगा। आशय यह कि क्या मनुष्य, क्या जीव-जन्तु, क्या कीट-पतंगा और क्या स्वार्थी-परमार्थी, मोहि, मुमुक्षु, पंडित, विद्वान, मूर्ख, स्त्री, पुरुष, बालक और वृद्ध सभी में अपनी-अपनी तरह की कुछ न कुछ इच्छा अवश्य रहती है। इच्छा जीवन का एक ज्वलन्त सत्य है। इससे इन्कार नहीं किया जा सकता। यदि जीवों में अपनी मौलिक इच्छायें न भी जन्म लें तो भी भोजन, जल, निद्रा तथा मैथुन आदि की नैसर्गिक इच्छायें तो उसमें वर्तमान ही हैं।
मनुष्य में यदि इच्छा का उदय न हो तो संसार का विकास ही रुक जाये। इच्छा ने ही मनुष्य की विवेक बुद्धि और सृजन-शक्ति को उत्तेजित किया है, जिसके बल पर उसने ऊँचे-ऊँचे महल, लम्बे-लम्बे राजमार्ग, बड़े-बड़े उद्योगों की स्थापना की, विविध कला कौशलों के साथ अच्छी से अच्छी सभ्यता, संस्कृतियों का विकास किया।
इच्छा करना कोई पाप नहीं, पाप है—इच्छा का निकृष्ट होना—इच्छा करके उसकी पूर्ति का प्रयत्न न करना अथवा पूर्ति के लिये अनुचित उपायों और साधनों को प्रयोग में लाना।
इच्छा की निकृष्टता उसके सीमित अथवा साधारण होने में नहीं है, निकृष्टता उसके उद्देश्य की तुच्छता में है। जैसे यदि कोई यह इच्छा करता है कि यदि वह किसी प्रकार से मिडिल पास हो जाता तो पंचायती-मंत्री बनकर अनपढ़ ग्रामीणों से खूब लाभ उठाता! मिडिल पास करने और पंचायत मंत्री बनने की इच्छा अपने में कोई बड़ी इच्छा न होते हुए भी निकृष्ट नहीं मानी जा सकती, किन्तु इसको निकृष्ट बना देता है, इसके साथ निरक्षर ग्रामीणों से लाभ उठाने का जुड़ा हुआ उद्देश्य! यदि यह इच्छा मिडिल पास करने और पंचायत मंत्री के रूप में अपनी शिक्षा का उपयोग करने तक सीमित रहती तो बहुत निःस्वार्थ एवं उच्च न होने पर भी निकृष्ट नहीं कही जा सकती थी। यह केवल निकृष्ट हुई है, अपने उद्देश्य की तुच्छता के कारण। और यदि इसी साधारण इच्छा के साथ पंचायत मन्त्री बनकर निरक्षर ग्रामीणों को साक्षर बनाने और गाँवों का यथा सम्भव विकास करने में योग देने का उद्देश्य जुड़ जाता तो यही साधारण इच्छा उच्च कोटि की परिधि में पहुँच जाती। यद्यपि उद्देश्य के उच्च होने पर भी उक्त इच्छा में व्यक्ति का जीविका सम्बन्धी स्वार्थ निहित था और उद्देश्य में भी कोई अतिरिक्त विशेषता नहीं, मात्र मन्त्री के कर्तव्य का सच्चा पालन भर ही है, तथापि इस इच्छा को निकृष्ट अथवा सामान्यतम नहीं कहा जा सकता, क्योंकि जीविका सम्बन्धी उत्तरदायित्व को पूर्ण कर्तव्यनिष्ठा तथा ईमानदारी के साथ निर्वाह करने की मनोवृत्ति भी ऊँची ही मानी जायगी।
निकृष्टता न केवल स्वयं में एक व्यावहारिक अथवा सामाजिक पाप है, वरन् यह एक आध्यात्मिक पाप भी है। निकृष्ट इच्छा की प्रतिक्रिया आत्मा पर अहितकर होती है। निकृष्टता से आत्मा का दिव्य आलोक मन्द होता है, आत्मा संकुचित होती है, जिससे ईर्ष्या, द्वेष, क्रोध आदि मनोविकार घेर लेते हैं और मनुष्य मानव से पशु बन जाता है। जहाँ ऊँची इच्छायें संसार में सुन्दरता, शाँति एवं सुख की वृद्धि करती हैं, वहाँ निकृष्ट इच्छायें संसार में अशाँति और संघर्ष को जन्म देती हैं। संसार में अशाँति के कारणों को जन्म देने वाला ईश्वरीय इच्छा का विरोध है, जिससे बड़ी से बड़ी इच्छा की पूर्ति हो जाने पर निकृष्ट उद्देश्य व्यक्ति एक क्षण को भी सुख-शाँति नहीं पाता और वैभव के बीच भी तड़प-तड़प कर ही मरता है। उसकी आत्मा का पतन हो जाता है और लोक व परलोक दोनों बिगड़ जाते हैं।
इच्छा का उदय होने पर उसकी पूर्ति का प्रयत्न न करना भी पाप है। मनुष्य की सत् इच्छा उसके हृदय में उतरना एक ईश्वरा देश ही होता है। इच्छा के रूप में ईश्वर उसे कहता है कि “तू ऐसा बन अथवा ऐसा कर।” ऐसी दशा में इच्छा की उपेक्षा कर देना, उसकी ओर ध्यान न देना—ईश्वर के आदेश की अवहेलना है। ईश्वरीय आदेशों की अवहेलना करने वाला व्यक्ति कभी भी सुख-शाँति नहीं पा सकता। इच्छा के रूप में ईश्वरीय आदेश की अवहेलना करने वाले को इच्छाओं के माध्यम से ही दण्ड दिया जाता है। एक इच्छा के बाद दूसरी इच्छा और दूसरी के बाद तीसरी, इस प्रकार उक्त व्यक्ति के हृदय में इच्छाओं की एक भीड़ जमा हो जाती है और अपूर्ण रहने की पीड़ा से चीखती-चिल्लाती हुई जीना हराम कर देती हैं। जिसका हृदय अपूर्ण इच्छाओं का क्रीड़ा-स्थल बन जाता है उसके लिये किसी अन्य नरक की आवश्यकता नहीं रहती, उसकी इच्छाएं ही उसे नारकीय पीड़ा देने के लिये पर्याप्त हैं। अतएव जीवन की सुख-शाँति के लिए सदा शिव इच्छाओं को ईश्वरीय आदेश समझकर पूर्ण करने के लिए भरसक प्रयत्न करना चाहिए। एक इच्छा को लेकर कर्तव्य-रत हो जाने पर जब तक उसकी पूर्ति नहीं हो जाती, किसी दूसरी इच्छा को आने का अवसर नहीं मिलता और इस प्रकार मनुष्य अपूर्ण इच्छाओं के क्राँति पूर्ण आन्दोलन की पीड़ा से बचा रहता है।
इच्छा की पूर्ति में क्रियाशील रहने से मनुष्य के शक्तिकोशों का उद्घाटन होता है, जिससे दिन-दिन वह विकास और उन्नति की ओर बढ़ता हुआ अपने को परम पद के योग्य बना लेता है।
अनुचित साधन अथवा उपाय अपनाने वाले व्यक्ति की आत्मा पर भी पाप की छाया पड़ती है, जिससे परमात्मा का एक अंश आत्मा का अपमान होता है, जो कदाचित किसी भी दशा में किसी को वाँछनीय न होगा। शुभ साधनों के प्रयोग से इच्छा की पूर्ति में विलम्ब हो सकता है, अधिक परिश्रम करना पड़ सकता है, किन्तु कठिन परिश्रम के बाद जो पुरुषार्थ का फल मिलेगा, वह स्वर्ग से कम सुखदायक नहीं हो सकता।
अनुचित साधनों से आई हुई सफलता—विष फल से भी भयानक होती है। विष-फल केवल मनुष्य के प्राण ही लेता है, किन्तु अनौचित्य-जन्य फल मनुष्य का ओज-तेज, पुण्य-प्रभाव सबको नष्ट कर देता है और मनुष्य को जीवित दशा में ही घृणित शव बना देता है।
इच्छाओं का उदय और उनकी पूर्ति का प्रयत्न पाप नहीं। पाप है—उनका निकृष्ट एवं अनुचित सिद्ध होना।
हर व्यक्ति अपने-अपने क्षेत्र में एक ऊँचा विचारक है। वह चाहे विद्यार्थी हो, अध्यापक हो, लेखक हो, कलाकार, मजदूर, व्यवसाय, उद्योगपति अथवा राजनेता कोई क्यों न हो, अपनी एक विचारधारा रखता है। अधिकतर यह विचारधारा तरक्की करने और जीवन में एक अच्छी सफलता प्राप्त करने से ही सम्बन्धित होती है।
मजदूर एक कुशल मजदूर बनकर मेटगीरी चाहता है, विद्यार्थी ऊँची से ऊँची कक्षा अच्छी से अच्छी श्रेणी में उत्तीर्ण करने का विचार रखता है, अध्यापक-प्राध्यापक और प्राध्यापक-प्रिंसिपल होने के लिये उत्सुक रहता है। कलाकार ख्याति, व्यवसायी उद्योगपति और उद्योगपति की इच्छा रहती है कि वह संसार का सबसे बड़ा धनवान बन जाये। सारे संसार में उसके कारखानों की बनी चीजों के खपत हो। और राजनेता सारी सत्ता अपने हाथ में लाने की कामना करता है। इस प्रकार संसार का प्रत्येक मनुष्य अपनी वर्तमान स्थिति से आगे बढ़ना चाहता है।
आदि काल से आज तक संसार की जो कुछ भी उन्नति हुई है वह सब मनुष्य के विचारों का ही फल है। जो भी अद्भुत और आश्चर्य में डालने वाले आविष्कार हुए हैं और हो रहे हैं वह सब मनुष्य की विचार शक्ति का ही चमत्कार है। जितनी प्रकार की कलाओं, कौशलों और दक्षताओं के दर्शन आज संसार में हो रहे हैं वह और कुछ नहीं मनुष्य की विचार शक्ति के ही मूर्तरूप हैं। संसार में विभिन्न सभ्यताएं, संस्कृतियाँ, ज्ञान, विज्ञान आदि जो भी विशेषतायें एवं सुंदरताएं दिखाई देती हैं, वह सब मनुष्य की विचारशीलता का ही परिणाम है।
यह अद्भुत विचार शक्ति संसार में सब मनुष्यों को मिली है और वह अपने अनुरूप दिशाओं एवं क्षेत्रों में गति मती भी होती है तथापि सभी मनुष्य समान रूप से कुछ श्रेयस्कर फल सामने नहीं ला पाते! इसका कारण विचारों की स्पष्टता, परिपुष्टता अथवा तीव्रता को भी माना जा सकता है। किन्तु मनुष्य की इस स्थिति भिन्नता का प्रमुख कारण विचारों की विशेषता नहीं है। क्योंकि आये दिन ऐसे हजारों उदाहरण पाये जाते हैं कि बड़े-बड़े तीव्र एवं प्रमाणित विचारधारा रखने वाले यथा स्थान पड़े दीखते हैं और सामान्य एवं सौम्य विचार वाले लोग उन्नति कर जाते हैं। वास्तव में इसका मुख्य कारण है मनुष्य के अकर्मक एवं सकर्मक विचार!
किसी भी दार्शनिक, धार्मिक, वैज्ञानिक, शिल्पी कारीगर, कलाकार आदि को क्यों न ले लिया जाये तब तक वह अपने विचारों को कार्य रूप में नहीं बदलता तब तक उनकी उपयोगी अभिव्यक्ति नहीं हो पाती! केवल मन ही मन सोचने, योजनायें रचने और नक्शे बनाने मात्र से कोई काम नहीं चलता। मस्तिष्क का काम है रूप-रेखा बनाना और शरीर का काम है, उसे मूर्त रूप देना! जब तक मनुष्य का मस्तिष्क तथा उसका शरीर एक मत होकर किसी योजना को क्रियान्वित नहीं करते तब तक उच्च से उच्च विचार दिवास्वप्न की भाँति बनते-बिगड़ते रहते हैं। न तो कोई देख सुन पाता है और न वे किसी के काम आते हैं। इस प्रकार के निष्क्रम एवं अकर्मक विचार किसी दूसरे के काम आना तो दूर स्वयं अपने भी किसी काम नहीं आते! विचारों की शक्ति का उपयोग करने के लिए क्रिया का समन्वय बहुत आवश्यक है।
निरर्थक एवं निष्क्रिय विचार वास्तव में मस्तिष्क के विकार मात्र ही कहे जाने चाहियें। उनसे कोई लाभ होने के स्थान पर हानि ही हुआ करती है। निरर्थक विचारों से होने वाली हानि को देखते हुए तो कहना पड़ेगा कि ऐसी विचारशीलता की अपेक्षा तो विचार शून्यता ही अच्छी है।
मानिये एक व्यक्ति बहुत विचारशील है, वह मन ही मन अनेक योजनायें बनाया करता है, इरादों के घोड़े दौड़ाया करता है, किन्तु उनको सफल करने के लिए करता कुछ नहीं है, तो वह विचारक नहीं विचार-व्यसनी ही कहा जायेगा! निरर्थक विचार न केवल समय ही खराब करते हैं, अपितु मनुष्य की शक्ति का ह्रास किया करते हैं। विचार एक वेगवती नदी की तरह उमड़ा करते हैं, यदि उनको क्रिया रूप में मार्ग न दिया जाये तो वे मन और मस्तिष्क को मथते हुए उसे थका डालते हैं जिससे आलस्य प्रमाद विश्रान्ति शिथिलता आदि के विकार उत्पन्न हो जाते हैं जो किसी प्रकार भी मनुष्य को स्वस्थ नहीं रहने देते।
व्यर्थ विचारक एक स्थान पर बैठा-बैठा मानसिक महल बनाता और बिगाड़ता रहता है। अपनी कल्पना की दुनिया में वह इस सीमा तक रम जाता है कि उसे समय एवं सामान्यता का भी ध्यान नहीं रहता। कल्पना करने, विचारों के घोड़े दौड़ाने और मन के महल बनाने में कुछ प्रगति तो है नहीं, उन्हें किसी भी सीमा तक सुन्दर से सुन्दर बनाया जा सकता है। निरन्तर ऐसा करते रहने से एक दिन इस कल्पना और थोथे विचारों के साथ मनुष्य की भावुकता जुड़ जाती है; जिससे वह अपने मनोवाँछित काल्पनिक लोकों को पाने के लिये लालायित हो उठता है। किन्तु कल्पना लोक से उतर कर जब यथार्थ के कठोर एवं विषम धरातल पर चरण रखता है तो उसे एक गहरा धक्का लगता है और वह घबराकर फिर अपने काल्पनिक स्वर्ग में भाग जाता है। इस प्रकार की निरर्थक दौड़-धूप से उसकी न केवल शक्तियों का क्षय होता है, वरन् वह ऐसा भीरु और सुकुमार हो जाता है कि यथार्थ के धरातल पर पाँव रखते कंपा करता है। उसे अपने चारों ओर वास्तविकतायें कँटीली झाड़ियों की तरह तकलीफ देने लगती हैं। कल्पना की तरह स्निग्ध एवं निर्विरोधी परिस्थितियाँ वास्तविकता के विषम धरातल पर कहाँ? संसार की यथार्थता तो प्रतिरोधों और प्रति कलाओं से मिलकर बनी है।
विचारों और क्रियाओं का सन्तुलन जब बिगड़ जाता है तब मनुष्य का मानसिक सन्तुलन भी सुरक्षित नहीं रह पाता! इससे होता यह है कि जब वह भूमि पर अपनी वैचारिक परिस्थितियों को नहीं पाता सब उसका दोष समाज के मत्थे मढ़कर मन ही मन एक द्वेष उत्पन्न कर लेता है। किन्तु समाज का कोई दोष तो होता नहीं। अस्तु उसको खुलकर कुछ न कह पाने के कारण मन ही मन जलता-भुनता और कुढ़ता रहता है। इस प्रकार की कुण्ठापूर्ण जिन्दगी उसके लिए एक दुखंद समस्या बन जाती है। अपनी प्यारी कल्पनाओं को पा नहीं सकता यथार्थता से लड़ने की ताकत नहीं रहती और समाज का कुछ बिगाड़ नहीं पाता—ऐसी दशा में एक अभिशाप पूर्ण जीवन का बोझा ढोने के अतिरिक्त उसके पास कोई चारा ही नहीं रहता!
इसके विपरीत जिन बुद्धिमानों की विचारधारा संतुलित है, उसके साथ कर्म का समन्वय है, वे जीवन को सार्थक बनाकर सराहनीय श्रेय प्राप्त करते हैं। जीवन में कर्म को प्रधानता देने वाले व्यक्ति योजनायें कम बनाते हैं और काम अधिक किया करते हैं। इन्हें व्यर्थ-विचारधारा को विस्तृत करने को अवकाश ही नहीं होता। एक विचार के परिपुष्ट होते ही वे उसे एक लक्ष्य की तरह स्थापित करके क्रियाशील हो उठते हैं, और जब तक उसकी प्राप्ति नहीं कर लेते किसी दूसरे विचार को स्थान नहीं देते। इस बीच उनका मस्तिष्क उपस्थित विचार लक्ष्य को प्राप्त करने में कर्मों का साथ दिया करते हैं। कर्मण्यता प्रिय व्यक्ति के चरण सदैव ही यथार्थ की कर्म भूमि पर चलते हैं, कल्पना के आकाश लोक में नहीं!
एक ही विचार-लक्ष्य पर अपनी सारी शक्तियों को केन्द्रित कर देने से कोई कारण नहीं कि उसकी उपलब्धि न हो सके। जीवन के चरम लक्ष्य को प्राप्त करने का सबसे सही और सरल उपाय यही है कि मनुष्य अपने मस्तिष्क को नियन्त्रित रक्खे कि वह एक विचार के मूर्तता पा लेने के बाद ही किसी दूसरे विचार को जन्म दे। विचारों को क्रम-क्रम से बढ़ाते और उनको क्रिया में उतारते चलने वाला व्यक्ति ही जीवन में सफलता प्राप्त कर पाता है। अन्यथा अनुपयुक्त एवं अयुक्त विचारों की भीड़ में पूर्ण रूप से खोकर कोई श्रेयस्कर लक्ष्य तो दूर मनुष्य स्वयं अपने को ही नहीं पा पाता।
अंग्रेजी में किसी विद्वान का कथन है— “मैन इज ए लाफिंग एनीमल” अर्थात्— “मनुष्य एक हँसने वाला प्राणी है।” मनुष्य और अन्य पशुओं के बीच भिन्नता सूचित करने वाले—बुद्धि, विवेक तथा सामाजिकता आदि जहाँ अनेक लक्षण हैं, वहाँ एक हास्य भी है। पशुओं को कभी हँसते नहीं देखा गया है। यह सौभाग्य, यह नैसर्गिक अधिकार एकमात्र मनुष्य को ही प्राप्त हुआ है। जिस मनुष्य में हँसने का स्वभाव नहीं, उसमें पशुओं का एक बड़ा लक्षण मौजूद है, ऐसा मानना होगा!
संसार में असंख्यों प्रकार के मनुष्य हैं। उनके रहन-सहन, आहार-विहार, विश्वास-आस्था, आचार-विचार, प्रथा-परम्परा, भाषा-भाव एवं स्वभावगत विशेषताओं में भिन्नता पाई जा सकती है। किन्तु एक विशेषता में संसार के सारे मनुष्य एक हैं। वह विशेषता है— ‘हास्य’। काले-गोरे, लाल-पीले, पढ़े-बेपढ़े, नाटे-लम्बे, सुन्दर-असुन्दर का भेद होने पर भी उनकी भिन्नता के बीच हँसी की वृत्ति सब में सम-भाव से विद्यमान है!
प्रसिद्ध विद्वान् मैल्कम मगरीज ने एक स्थान पर दुःख प्रकट करते हुए कहा है— “संसार में आज हँसी की सबसे अधिक आवश्यकता है, किन्तु दुःख है कि दुनिया में उसका अभाव होता जा रहा है।” कहना न होगा कि श्री मगरीज का यह कथन बहुत महत्व रखता है और उनका हँसी के अभाव पर दुःखी होना उचित ही है! देखने को तो देखा जाता है कि आज भी लोग हँसते हैं। किन्तु यह उनकी व्यक्तिगत हँसी होती है। किन्तु सामाजिक तथा सामूहिक हँसी दुनिया से उठती चली जा रही है। उसके स्थान पर एक अनावश्यक, एक कृत्रिम गम्भीरता लोगों में बढ़ती जा रही है।
ऐसा करने में उनका विचार होता है कि लोग उनको गहन-गम्भीर और उत्तरदायी व्यक्ति समझ कर आदर करेंगे, समाज में उनका वजन बढ़ेगा। यह बात सही है कि गम्भीरता जीवन में वाँछित गुण है। किन्तु यह ठीक तभी है, जब आवश्यकतानुसार हो और यथार्थ हो। नकली गम्भीरता से आदर होना दूर लोग मातमी सूरत देखकर उल्टा उपहास ही करते हैं। गम्भीरता के नाम पर हर समय मुँह लटकाये, गाल फुलाये, माथे में बल और आँखों में भारीपन भरे रहने वाले व्यक्तियों की समाज में बहुत कम पसन्द किया जाता है। वे एक बन्द पुस्तक की भाँति लोगों के लिये सन्देह तथा संदिग्धता के विषय बने रहते हैं।
आज लोग अपनी गम्भीरता तथा उदासी का कारण उत्तरदायित्व एवं चिन्ता बतलाते हैं। कहते है—” ढेरों की ढेर चिन्तायें सिर पर सवार हैं, जिम्मेदारियाँ पीसे डाल रही हैं, कैसे हंसे और कैसे खुश रहें?” किन्तु वे यह नहीं सोचते कि उदास और विषष्ण रहने से चिन्तायें और प्रबल उत्तरदायित्व और बोझिल हो जाता है। जब कि हँसने और प्रसन्न रहने से उनका बोझ हल्का मालूम होता है, उन्हें वहन कर सकने की शक्ति में वृद्धि होती है। एक बार एक विदेशी ने महात्मा गाँधी की विनोद-प्रियता के विषय में प्रश्न किया तो बापू ने बताया कि “यदि मुझमें विनोद-प्रियता की वृत्ति न होती तो मैं चिन्ताओं के भार से दब कर कभी का मर गया होता। यह मेरी विनोद-प्रियता ही है, जो मुझे चिन्ताओं में घुलने से बचाये रखती है!” इस प्रकार पता चलता है कि जिन्दगी का उत्तरदायित्व वहन करने में हास-विनोद बहुत सहायक होता है। जो लोग विनोदी वृत्ति का बहिष्कार कर देते हैं, उनकी जिन्दगी नीरस होकर निर्जीव हो जाती है। वे श्वाँसों के बन्दी बने हुए ज्यों-त्यों दिन पूरे किया करते हैं।
जिसको हास-विनोद में रुचि नहीं, हर समय रोनी सूरत बनाये रहता है, उसका साथ देना लोग कम पसन्द करते हैं। एक विचारक ने बताया है कि “अगर तुम हँसोगे तो सारी दुनिया तुम्हारे साथ हँसेगी और अगर तुम रोओगे तो कोई तुम्हारा साथ न देगा और इस प्रकार अकेले पड़ जाओगे!” जीवन को सामाजिक बनाने के लिये हास-विनोद की बड़ी आवश्यकता है। हास जीवन की कँटीली राह में सुन्दर सुमनों की तरह है, जो काँटों एवं कटुता का प्रशमन कर देता है।
द्वेष की दावानल शमन करने के लिये हास एक अमोघ उपाय है। दो पुराने दुश्मन भी जब एक साथ किसी प्रसंग पर हँस पड़ते हैं तो उनके हृदय से द्वेष का विष बहुत कुछ कम हो जाता है। असफलताओं को हँस कर अंगीकार करने से उनका दुःख, क्षोभ कम हो जाता है। मनुष्य आगे के लिए हतोत्साहित नहीं होता। विद्वानों का मत है कि यदि लोग जी खोल कर हँसा करें, अपने सामाजिक एवं दैनिक व्यवहार में इसको अधिक स्थान दें तो समाज में फैली कटुता तथा असहयोग की भावना बहुत कुछ कम हो जाये। कड़ी से कड़ी बात को हँस कर टाल देने से बड़े-बड़े अनर्थों से बचाव हो जाता है। इसके विपरीत जब एक छोटी सी अप्रिय बात को गम्भीरतापूर्वक लिया जाता है और उस पर आक्रोश भाव से सोचा जाता है, तब वह बात इतनी गम्भीर अनुभव होती है जितनी कि वह होती नहीं है। हास जहाँ कटु प्रसंगों को भी मधुर बना देता है, वहाँ अनावश्यक गम्भीरता अथवा विषाद मीठी बात को भी कड़वी बना देते हैं। सुख-दुःख, द्वेष-प्रेम आदि सारी बातों को मुस्कान एवं प्रसन्नता के वातावरण में रखकर ही स्वीकार करना चाहिए।
हास्य से प्राप्त होने वाली जीवनी-शक्ति का लाभ उठाने के लिए बड़े-बड़े चिकित्सालयों में रोगियों को हँसाने तथा प्रसन्न करने के लिए हास्य-विनोद की व्यवस्था रक्खी जाती है। मनोरंजन के माध्यम से अपराधियों के आचरण-सुधार के प्रयोगों के परिणामों को आशाजनक बतलाया जा रहा है, मनोरंजक तथा विनोद-प्रियता के साथ पढ़ाने वाले अध्यापक गम्भीर तथा गुरुता से बोझिल अध्यापकों की अपेक्षा अधिक सफल पाये जाते हैं। इसीलिये बच्चों को पढ़ाने की आधुनिक पद्धति मनोरंजक एवं विनोदपूर्ण व्यवस्था के आधार पर विकसित की जाती है। जो एक बात गम्भीरता अथवा गुरुता के साथ किसी के मस्तिष्क में हजार बार कहकर नहीं बिठाई जा सकती, वह मुसकराते हुए मधुर ढंग से एक बार में बिठाई जा सकती है।
हास; मुस्कान और विनोद में कितना सुख है, कितना आनन्द है? इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि बड़े बड़े लोग यहाँ तक कि राजा-महाराजा स्वाँग और नाटकों के रूप में अपने प्रति व्यंग विनोद देख-सुनकर प्रसन्न ही नहीं होते हैं, बल्कि सफल अभिनेता को पुरस्कार तक दिया करते थे! आज समाचार पत्रों में छपने वाले व्यंग चित्र संसार के किस बड़े से बड़े आदमी का मजाक नहीं बनाते, छींटा-कशी नहीं करते? किन्तु उनको देखकर सब हँस ही पड़ते है, रोष कोई भी नहीं करता।
आध्यात्मिक क्षेत्र में तो हास्य एवं प्रसन्नता का महत्व अपरिमित है! योग में मन को स्थिर करने के उपायों में प्रसन्नता का प्रमुख स्थान है। हर समय प्रसन्न रहने से मन के मल तथा विक्षेप आदि विकार स्वयं दूर हो जाते हैं। आध्यात्मिक लाभ एक चिर-स्थायी प्रसन्नता के रूप में ही प्राप्त होता है। जो लोग अध्यात्म क्षेत्र में गम्भीर चिंतन, विचार एवं विवेचना को ही प्रधानता देते हैं, वे भूल करते हैं। आध्यात्मिक क्षेत्र में हास्य एवं प्रसन्नता की ही प्राथमिकता है।
एक बार एक तरुण, एक महात्मा के पास बड़ी गंभीर मुद्रा के साथ पहुँचा और उनसे अध्यात्म ज्ञान देने की प्रार्थना करने लगा! उसका विचार था कि इस क्षेत्र में अधिक से अधिक गम्भीरता अपेक्षित है। बुद्धिमान सन्त ने उसे देखा और कहा—वत्स! बाजार से कोई विनोद प्रधान अच्छी-सी पुस्तक खरीद लाओ और उसे पढ़ा करो। तुम्हारे अध्यात्म का यही मार्ग उचित होगा!
इस प्रकार देखा जा सकता है कि जीवन के हर क्षेत्र में हास्य का कितना महत्व है? निःसन्देह संसार के सभी व्यक्ति समान रूप से विनोद-प्रिय बन जायें और जीवन में मुक्त एवं निश्छल हास्य की प्रतिस्थापना कर सकें तो दुनिया से रोग-दोष, दुःख-दारिद्र तथा ईर्ष्या-द्वेष को भागते देर न लगे।
जैन-धर्म के चौबीसवें तीर्थंकर भगवान महावीर का पहला नाम ‘वर्धमान’ था। इनके पिता ‘लिच्छविराज सिद्धार्थ’ और माता का नाम ‘त्रिशला’ था। इनका जन्म-स्थान वैशाली का कुण्ड ग्राम और जन्म-तिथि चैत्र सुदी त्रयोदशी थी।
जिन महापुरुषों की जन्म-तिथि संसार के लिये पर्व और जिनका जन्म-स्थान तीर्थ के समान पवित्र माना जाता है, निःसन्देह उनके निर्विकार आचरण में कुछ महान गुण होते भी हैं। उन गुणों में लोकमंगल का उनका गुण सबसे अधिक महान होता है। यों तो संसार में महात्माओं और योगियों की कमी कभी नहीं रही किंतु संसार उन सभी को कभी याद नहीं करता। संसार उन्हीं को याद किया करता और नाम लिया करता है, जो उसके हित के लिए कुछ कर जाते हैं।
श्री महावीर महात्मा थे, परमार्थी थे और ‘जिन’ थे। किन्तु उनका यह सब कुछ था, संसार के कल्याण के लिये ही। यदि वे चाहते तो अन्य योगियों की तरह किसी गुफा कन्दरा में चले जाते और आत्म लाभ प्राप्त करके ऋद्धि-सिद्धि अथवा निर्वाण प्राप्त कर सकते थे। किन्तु वे हजार कष्ट सहकर भी संसार में ही रहे और उसी के लिए ही कल्याण कार्य करते रहे।
जन-कल्याण की भावना से जन्मी हुई महावीर की सेवा भावना दिन-दिन बढ़ती गई और वे अपनी संकुचित सीमा से निकल कर संसार की विस्तृत परिधि में प्रवेश करने लगे। ज्यों-ज्यों उनका यह विकास बढ़ता गया, वे व्यक्तिगत महत्वाकाँक्षाओं से विरक्त ही नहीं, प्राणी मात्र के लिये व्याकुल होते गये और आखिर शीघ्र ही वह घड़ी आ गई, जब उनकी सकरुण आत्मा ने लोकमंगल के लिए संन्यास लेने की ठान ली!
महाराज सिद्धार्थ को मन्त्रियों ने न केवल सूचना ही दी, बल्कि परामर्श भी दिया गया कि वे कुमार वर्धमान को साधु होने से रोकें। माता-पिता ने राजकुमार को डाँट-फटकार से बदलता न देखा तो उन्होंने उसकी विरक्ति भावना नष्ट कर देने के लिये विवाह कर दिया।
अब, पुत्र कर्तव्य के वशीभूत, माता-पिता की आज्ञा पालन स्वरूप जब उन्होंने विवाह कर के एक उत्तरदायित्व ले ही लिया, तब उसे खींच-तान के साथ निभाना कहाँ की बुद्धिमानी होती? अपनी इच्छा के विरुद्ध विवाह को यदि वे एक बोझ की तरह ढोते तो यह उस पत्नी के प्रति एक घोर अत्याचार होता, जो विभोरता के साथ पति को सुखी करके स्वयं सुखी होने आई थीं।
राजकुमार वर्धमान ने अपने दाम्पत्य जीवन को एक आदर्श जीवन की तरह चलाया। राजन्य होने के बावजूद भी वे एक साधारण व्यक्ति की तरह गृहस्थी के हर छोटे-बड़े काम में रुचि लेते। सेवकों के होते हुए भी सारे काम अपने हाथ से करते। पत्नी को आत्मा की गहराई से इस सीमा तक प्यार किया कि उसका मानवीय अनुराग श्रद्धा में बदल गया और उसका महत्वपूर्ण सारा मोह वर्धमान की महानता में डूब गया।
उनकी पत्नी राजकुमारी यशोदा ने स्पष्ट अनुभव कर लिया, उसका पति परमात्मा का पूर्ण प्रतिबिम्ब है। वे केवल उसकी ही सम्पत्ति नहीं, बल्कि सारे संसार की विभूति हैं, जिसका कि लाभ दुनिया की दुःखी मानवता को मिलना ही चाहिए। कुछ ही समय में एक पुत्री रत्न के रूप में पति का प्रसाद पाकर यशोदा संतुष्ट हो गई और उसने पति की इच्छानुसार उन्हें संसार को सौंप देने की तैयारी कर ली!
इसमें सन्देह नहीं कि किसी कच्ची लगन वाले के लिये वैराग्य-मार्ग में ‘विवाह’ एक विशेष बन्धन है। किन्तु जो अन्तरात्मा से मोह विरक्त हो चुका हो, उसे संसार का कौन-सा प्रलोभन ध्येय मार्ग से विचलित कर सकता है? वर्धमान ने गृहस्थी को अनासक्त भाव से भोगा और पत्नी को इतना अधिक प्रेम किया कि कोई दूसरा सारे जीवन में भी नहीं कर पाता। वर्धमान ने अपने सरल स्वभाव तथा सादे जीवन से जन-साधारण के सम्मुख सामान्य जीवन का एक आदर्श उपस्थित कर दिया।
अपने बुद्धिमत्तापूर्ण व्यवहार से वर्धमान ने पत्नी को तो परोपकार के लिये हर त्याग करने के लिये तैयार कर लिया था, किन्तु माता-पिता का मोह कम कर सकने का कोई उपाय नहीं था। पत्नी पर तो उनका अपना अधिकार था और उसका कर्तव्य था कि वह पति की महान भावनाओं के अनुरूप अपने को ढाले और उसने वैसा ही किया भी, किन्तु माता-पिता तो उस परिधि में आते न थे। माता-पिता का अधिकार स्वयं वर्धमान पर था। वह नहीं चाहते थे कि उनको शोक-समाहित कर संन्यास ले लिया जाये। कारुणिक हृदय होने के कारण वे माता-पिता के ममत्व का मूल्य समझते थे।
समय आया और जो माता-पिता अपने को छोड़कर वर्धमान को परमार्थ पथ पर नहीं जाने देना चाहते थे, वही एक दिन स्वयं उसे छोड़कर चले गये। माता-पिता के दिवंगत होने के समय वर्धमान की आयु अठारह वर्ष की थी, किन्तु फिर भी वे संन्यास लेकर घर से चल देने को तैयार हो गये। माता-पिता की आकस्मिक मृत्यु ने उनमें यह विचार प्रबल कर दिया कि किसी भी शुभ कार्य में देर न करनी चाहिए, क्योंकि इस क्षणभंगुर शरीर का कोई ठीक नहीं कि किस समय धोखा दे जाये?
वर्धमान को घर से जाते देखकर उनके बड़े भाई नन्दिवर्धन ने उन्हें रोक कर कहा— “वर्धमान अभी तो माता-पिता के बिछुड़ने की घड़ी पुरानी भी नहीं पड़ी, उसका घाव बिल्कुल ताजा है और अब तुम भी मुझे छोड़ कर जा रहे हो—क्या मेरा दुर्भाग्य इतना क्रूर और कठोर है? परिवार को अपने बिछोह का आघात सहन कर लेने के योग्य हो लेने दो, तब जाना और इसके लिए मैं तुमसे दो वर्ष की अवधि माँगता हूँ।”
वर्धमान के चलते हुए कदम रुक गये। माता पिता की भाँति ही आदरणीय अपने बड़े भाई का हृदय तोड़ना भी उन्होंने उचित न समझा। वर्धमान ने इस दो वर्ष की अवधि को भी अपने आगामी जीवन के अभ्यास में ही लगाया। वे घर पर रुक तो अवश्य गये, किन्तु पूर्ण साधु की भाँति ही।
इधर नन्दिवर्धन ने उनके भाग की जो लाखों रुपयों की सम्पत्ति दी थी, वह भी उन्होंने स्नेहियों, सेवकों तथा दीन-दुखियों को बाँट दी। नन्दिवर्धन की जरा भी इच्छा न थी कि वह संन्यास लेते हुए अपने छोटे भाई का दाय भाग दबा लें। वास्तव में वे कितने अभागे होते होंगे, जो अवसर का लाभ उठाकर अपने भाइयों का अधिकार छीन लेते होंगे। यदि नन्दिवर्धन—वर्धमान को उनका भाग न भी देते तो भी उनको कोई शिकायत न होती। जो सारा घरबार छोड़कर संन्यास ले रहा हो, उसको सम्पत्ति से क्या काम? फिर भी नन्दिवर्धन ने आग्रहपूर्वक उनका भाग उन्हें दे ही दिया और उसको वितरण करते देखकर उन्हें हर्ष एवं सन्तोष ही हुआ।
दो वर्ष बीते और वर्धमान ने ‘महावीर’ होकर अपना रास्ता लिया। उन्होंने अपने केश तथा श्मश्रु अपने हाथ से उखाड़ फेंके। एक कोपीन के अतिरिक्त सारे वस्त्र त्याग दिये। कुछ समय इधर-उधर घूमने के बाद वर्धमान ने निश्चय किया कि अब वे किसी उपयुक्त एकाँत स्थान पर ठहर कर समाधि का अभ्यास करेंगे, मौन धारण करेंगे और भिक्षा का अन्न हाथ पर ही रखकर खायेंगे! निदान वे इसी उद्देश्य से आस्थिक नामक ग्राम में पहुँचे। किन्तु वहाँ पहुँच कर उन्होंने देखा कि वहाँ जनता अन्ध-विश्वासों में फँसी हुई भूतों-प्रेतों और देव-दानवों में बहुत विश्वास करती है और धूर्त लोग इस आधार पर उसे मूर्ख बनाकर खूब ठगते हैं।
आस्थिक की जनता की दुर्दशा और धूर्तों की दुरभिसन्धियों को देखकर उनकी आत्मा तड़प उठी। वे समाधि लगाना और मौन धारण करना तो भूल गये और जनता का अन्ध-विश्वास दूर करने लगे तथा धूर्तों से उसकी रक्षा करनी प्रारम्भ कर दी! इस काम के लिये वे वहाँ पर चार माह तक ठहरे और तब ही वहाँ से चले, जब जनता के अन्ध-विश्वासों का मूलोच्छेदन कर दिया।
आस्थिक से चलकर महावीर मौराक पहुँचे तो उन्हें पता चला कि वहाँ की जनता बुरी तरह से अनाचार के कुचक्र में फँसी हुई है। महावीर का समाधि-साधना का कार्यक्रम पुनः रुक गया। तन्त्र-मन्त्र का पाखण्ड दूर करने के लिये उनको वहाँ भी चार माह तक रुकना पड़ा।
अनन्तर वे स्वेताम्बी और सुरभि पुर होते हुए नालन्दा पहुँचे, जहाँ उनका परिचय मोखिल पुत्र गोसाल से हुआ! गोसाल उस समय के बहुत बड़े विद्वान एवं धर्म प्रवर्तकों में से था, किन्तु वर्धमान की त्याग, तपस्या और मानव-कल्याण की भावना से वह इतना प्रभावित हुआ कि उन्हें अपना गुरु मान लिया!
महावीर का यह प्रभाव न उनकी किसी बड़ी तपस्या का था और न विद्या-विभूति का, अपितु उनका यह प्रभाव उनकी उस उज्ज्वल आत्मा का था, जो हर समय विश्व-कल्याण की कामना से विह्वल रहती थी। मनुष्य कोई साधना न करे, किसी तप में अपने को न जलाये, तब भी एक अकेली परिव्याप्त विश्व भावना से उसकी वाणी तथा व्यक्तित्व में इतना तेज आ जाता है कि संपर्क में आया हुआ कोई भी बड़े से बड़ा व्यक्ति प्रभावित हुए बिना नहीं रहता!
अपने संन्यस्त जीवन में बारह वर्ष तक देश-देश घूमते और कष्ट सहते-सहते वे पूर्ण परमहंस पदवी के योगी हो गये।
वे नंगे घूमते, बच्चे उन पर इटें मारते, लोग ताली बजाते और पागल-पागल कहते हुए शोर मचाते, किन्तु वीतराग वर्धमान मौन, मानस में डुबकी लगाये, न सुनने के समान सहते और सत्य की खोज में लगे रहते।
अब उन्होंने पानी, साधारण शाक-भाजी तक का त्याग कर दिया था। यदि कभी पानी पीते भी थे तो गर्म पानी का ही प्रयोग किया करते थे। उन्होंने शरीर की सारी वासनाएं मिटा डालने के लिए सुख की नींद सोना, जाड़ा, गर्मी और बरसात से बचना छोड़ दिया। वे जाड़ों में खुले मैदानों और गर्मियों में लुहारों आदि की दुकानों पर पड़े रहते थे। बारह वर्ष तक निद्रा का त्याग करके वे पूर्ण जिन हो गये और संसार के सारे दुख-सुखों से परे हो गये।
शरीर साधना में सिद्ध होकर महावीर राजगिरि, मुँगेर, बसाढ़, बनारस, अयोध्या आदि प्रदेशों का भ्रमण करते हुए राढ़ पहुँचे, जहाँ उन्हें सबसे अधिक कष्ट उठाने पड़े।
इस प्रकार अपनी अद्भुत एवं असहनीय तपस्या में बारह साल तपने के बाद उन्हें वैशाख सुदी दशमी को ऋजु बालिका नदी के तट पर जंमिया नामक ग्राम में ‘केवल दर्शन’ अर्थात् बोध प्राप्त हुआ।
प्रकाश पाते ही उन्होंने सुख के साथ मार्ग की खोज कर ली और तब उन्होंने अपने मौन व्रत को उपदेशों के रूप में तोड़ दिया। उन्होंने सैकड़ों शास्त्रार्थों तथा असंख्यों सभाओं द्वारा पाखण्डियों तथा वंचकों को परास्त कर जनता को धार्मिक अत्याचारों से मुक्त कराया लाखों शिष्य एवं प्रचारक बनाये। उनके शिष्यों में केवल जनसाधारण ही नहीं, बल्कि बड़े-बड़े राजा-राजकुमार तथा राजकुमारियाँ भी थीं। ज्ञान तथा सत्य-पथ की प्यासी जनता की भीड़ की भीड़ उनके पास जाने, उपदेश सुनने तथा दीक्षा ग्रहण करने लगी, जिससे सम्पूर्ण देश में उनका यश फैल गया।
अंग, काशी, श्रावस्ती तथा राजगृह आदि में राजाओं तथा राजवंशियों को दीक्षा देते और उपदेश करते हुए अपनी जन्म-भूमि ‘वैशाली’ में गये, जहाँ पर उन्होंने अपनी पत्नी, पुत्री तथा दामाद ‘जामालि’ को भी धर्म दीक्षा दी। इस प्रकार जब वे देश का धार्मिक कायाकल्प करके पावापुरी आये, तब कठोर तपस्या तथा व्यस्त कार्यक्रमों में उनका स्वास्थ्य समाप्त हो चुका था। वहाँ उन्होंने निरन्तर उपदेश देते और उपवास करते हुए दीपावली की रात को निर्वाण प्राप्त किया।
भगवान महावीर ने सुख के जिस सत्य मार्ग का उपदेश दिया था, उसमें अहिंसा, सत्य, आस्तेय, अपरिग्रह तथा ब्रह्मचर्य का विशेष स्थान था।
कहना न होगा कि यह भारत के वैदिक धर्म का ही सार था, किन्तु चूँकि महावीर ने इसे एक विशेष रूप में जैन-धर्म के अंतर्गत प्रतिपादित किया, इसलिये यह एक भिन्न धर्म जैसा माना जाने लगा। अन्यथा भारत के सारे बौद्ध, जैन तथा सनातन आदि सारे धर्म वैदिक धर्म की शाखायें ही हैं।
देश से विदेश जा कर जिन विद्वानों ने भारतीय धर्म, सभ्यता एवं संस्कृति का प्रचार ही नहीं किया बल्कि स्थापना की, उनमें कुमारजीव का नाम सबसे आगे है।
भारत के सम्बन्ध चीन से बहुत प्राचीन काल से चले आ रहे थे। यों तो लंका, बर्मा, जापान, सिंहापुर हिन्देशिया, मलाया आदि अनेक देशों में बौद्ध धर्म का प्रचार किया गया किन्तु चीन एक ऐसा देश रहा है जिसमें केवल अनुयायी के रूप में ही बौद्ध धर्म ग्रहण नहीं किया गया बल्कि उन दिनों वह एक प्रकार से बौद्ध धर्म का प्रामाणिक केन्द्र बन गया था।
इस प्रकार चीन में बौद्ध धर्म के जागरण पूर्ण आन्दोलन का प्रमुख श्रेय भारतीय विद्वानों को ही है और उनमें भी कुमारजीव का स्थान सर्वोपरि है।
कुमारजीव का जन्म ईसा की चौथी शताब्दी में हुआ था। इनके पिता का नाम कुमारायण और माता का नाम देवी था। कुमारायण एक रियासत के दीवान पद पर कार्य करते थे। दीवान पद पर कार्य करते हुये उन्होंने शीघ्र ही धन के साथ यश भी प्राप्त कर लिया। सब कुछ होने पर भी कुमारायण को अपने जीवन क्रम से सन्तोष न था। दीवान के पद पर वे अपनी योग्यता एवं विद्वता का समुचित उपयोग न कर पाते थे। वे अपने वैयक्तिक सुख की अपेक्षा दूसरों को सुखी बनाने में अधिक प्रसन्नता एवं सन्तोष अनुभव करते थे। पर दीवान के एक प्रतिबन्धित तथा उत्तरदायित्वपूर्ण पद पर रहते हुये वे जन सेवा का कोई काम न कर पाते थे। उन्हें अपने स्वामी राजा की इच्छानुसार जनता से व्यवहार करना पड़ता था जो कि प्रायः शोषण मूलक ही होता था।
कुमारजीव के विद्वान् पिता कुमारायण की आत्मा अधिक समय तक यह स्वीकार न कर सकी वे इसी प्रकार करते हुए दुर्लभ मानव जीवन को समाप्त कर दें। अतएव उन्होंने जन साधारण में ज्ञान का प्रकाश फैलाने के लिए अन्तःप्रेरणा से दीवानी का पद छोड़ दिया।
नौकरी छोड़कर कुमारायण यात्रा साधनों के अभाव का कष्ट सहते हुए भी अनेक पर्वत तथा वनों को पार करते हुए मध्य-एशिया में तारिम नदी के तट पर बसे, कूची नगर चले गये।
फैलाने को तो ज्ञान को आलोक अपने देश के भी अनेक विस्तृत कोनों में भी फैलाया जा सकता था किन्तु कुमारायण ने विदेश में ही अपना ज्ञान फैलाना इसलिए ठीक समझा कि उस समय भारत में विद्वानों की कमी नहीं थी। अनेक लोग देश की सेवा करने में लगे हुये थे। कुमारायण ने विदेश में भारत के सन्देश ले जाकर देश की अन्तर्राष्ट्रीय कीर्ति बढ़ाना अधिक श्रेयस्कर समझा।
कूची में कुमारायण एक बौद्ध बिहार में रह कर प्रचार करने लगे। धीरे-धीरे उनकी कीर्ति इतनी फैल गई कि कूची के राजा ने उन्हें अनुरोधपूर्वक अपना राजगुरु बना लिया। कुछ समय बाद कूची राजवंश की ‘देवी’ नामक एक कन्या से उनका विवाह हो गया, जिसके गर्भ से उनके विश्व विख्यात पुत्र कुमारजीव का जन्म हुआ।
कुमारजीव के जन्म के कुछ समय बाद ही उनके पिता की मृत्यु हो गई और पति का प्रचार कार्य पूरा करने के लिये कुमारजीव की माता बौद्ध भिक्षुणी बन गई।
परमात्मा जिसे जीवन में कोई विशेष अभ्युदय अनुग्रह कराना चाहता है, उसकी बहुत-सी सुविधाओं को समाप्त कर दिया करता है। इस प्रकार जीवन में कठिनाइयों के आने से मनुष्य में कर्मठता का गुण जाग उठता है, वह आलस्य एवं प्रमाद से दूर रह कर परिश्रम करता और भगवद् भय से अधिक से अधिक ईमानदार तथा सत्य परायण रहने का प्रयत्न करता है। असुविधाओं तथा कठिनाइयों में पड़ जाने से मनुष्य का सारा जीवन परिश्रम एवं पुरुषार्थ पर निर्भर हो जाता है, क्योंकि यदि वह ऐसा न करे तो जीवित नहीं रह सकता। अधिकाधिक परिश्रम का स्वभाव बन जाने से उसमें कर्मवीरता का वह गुण आ जाता है, उन्नति और सफलतायें जिसकी अनुगामिनी छाया में ही होती हैं।
इसके विपरीत जो अधिक सुविधा एवं सम्पन्नता की परिस्थिति में रहता है वह स्वभावतः सुकुमार तथा विलासी बन जाता है, प्रमाद और आलस्य उसके मानसिक मित्र बन जाते हैं, जिससे निकम्मा हो कर सामान्य कामों के योग्य भी नहीं रहता फिर ऊँचे और बड़े कामों की बात ही क्या?
इसके साथ ही जो व्यक्ति असुविधा एवं कठिनाई के स्वर्ण अवसर को भाग्य का अभिशाप मानकर रोते झींकते हुये निराशा अथवा निरुत्साह के वशीभूत हो जाते हैं उनका जीवन तो निकम्मे आलसियों से भी गया गुजरा हो जाता है और वह न केवल अपने पर ही बल्कि समाज पर एक भयानक भार बन कर जीवन काटते हैं। मनुष्यों को चाहिये कि वह कठिनाइयों को भगवान की कृपा और अभ्युदय का सन्देश समझ कर अपनाए और उनसे प्रेरणा लेकर जीवन को उन्नत एवं उदात्त बनाये।
बौद्ध भिक्षुणी हो जाने पर भी कुमारजीव को बुद्धिमती माता यह न भूली कि उनके सम्मुख कुमारजीव है, जिसे उनको हर प्रकार से योग्य बनाकर समाज एवं संसार की सेवा के लिए समर्पित कर देना है। निदान पुत्र की शिक्षा के लिये कुमारजीव की माता उन्हें कश्मीर ले गई। कश्मीर उस समय विद्या का बहुत बड़ा केन्द्र माना जाता था।
कश्मीर पहुँच कर ‘देवी’ ने अपने पुत्र कुमारजीव को बन्धुदत्त नामक एक बहुत बड़े कश्मीरी विद्वान की संरक्षता में विद्याध्ययन के लिये छोड़ दिया। बन्धुदत्त जितने बड़े विद्वान् थे, उतने ही शिष्य बनाने में कृपण थे। उन्होंने अपने जीवन में बहुत ही कम शिष्य बनाये और जिनको बनाया उनको फिर पराकाष्ठा का पण्डित ही बना दिया। इसलिये वे शिष्य बनने के इच्छुक व्यक्तियों की कड़ी परीक्षा लेकर पहले परख लिया करते थे कि इसमें बोये हुये विद्या के बीज अंकुरित भी होंगे अथवा नहीं! निरर्थक एवं लंठ शिष्यों के साथ सिर मारने के लिये फिजूल समय उनके पास न था।
निदान अपने नियमानुसार उन्होंने बालक कुमारजीव को भी नहीं छोड़ा और उसके चरित्र, गुण, कर्म, स्वभाव में जमे बीजाँकुरों को कड़ाई से जाँचा। जब बालक गुरु की कसौटी पर खरा उतरा तो उसकी शिक्षा दीक्षा में पूरी तत्परता दिखाने में कोई कसर न रखी।
कठोर गुरु जब सुयोग्यताओं से प्रसन्न होता है तब शिष्य को पढ़ाता क्या, वास्तव में ज्ञान लोक के रूप में स्वयं उसकी आत्मा में बैठ जाता है। पितृहीन बालक कुमारजीव के भाग्य खुल गये। कुछ ही समय में बन्धुदत्त ने उसको संस्कृत भाषा तथा बौद्ध दर्शन का प्रकाण्ड पण्डित बना किया।
कश्मीर से वापस जाकर कुमारजीव कश्मीर पहुँचे और बुद्धियश नामक एक विद्वान् के साथ मिलकर बौद्ध दर्शन को पुनः दोहराया और ज्ञान को पूर्ण रूपेण असंदिग्ध बनाकर अपने जन्म स्थान कूची चले आये! यद्यपि कश्मीर में ही कुमारजीव के पाँडित्य की ख्याति इतनी फैल गई थी कि तुर्किस्तान से आ आकर बहुत से लोग उनके शिष्य बनकर बौद्ध धर्म की दीक्षा लेने लगे थे। किन्तु वहाँ से चले आने में उनके दो उद्देश्य थे। एक तो यह कि कश्मीर में गुरु के सम्मुख अपनी प्रतिष्ठा नहीं कराना चाहते थे और दूसरे वे अनेक स्थानों पर भ्रमण करते हुए कूची जा कर अपने पिता का ध्येय पूरा करना चाहते थे।
किन्तु कूची में वे अपना उद्देश्य प्रारम्भ भी न कर पाये थे कि कूची नरेश और चीन सम्राट में लड़ाई हो गई जिसमें कूची का पतन हो गया। फलस्वरूप कूची का राज्य चीन साम्राज्य में मिला लिया गया। चीनी जिन बहुत से लोगों को बन्दी बना कर ले गये उनमें कुमारजीव भी थे। किन्तु उनके प्रकाँड पाँडित्य तथा चीन में फैली हुई उनकी कीर्ति ने उन्हें प्राण दण्ड से बचा लिया! किन्तु फिर भी उन्हें ‘लिहाँग चो’ प्रदेश में गवर्नर की देख रेख में अठारह वर्ष के लिए नजरबन्द कर दिया गया।
कुछ समय बाद जब उनकी लोकप्रियता के दबाव से उन पर प्रतिबन्ध उठा लिया गया तब उन्होंने अपना प्रचार कार्य प्रारम्भ कर दिया। कुमारजीव की नई व्याख्याओं और नए दृष्टिकोण से बौद्धधर्म में एक नवीनता आ गई। अभी तक बौद्धधर्म के जिन ग्रन्थों का अनुवाद चीनी भाषा में हुआ था वह न तो सरल था, न सुन्दर और समीचीन! निदान कुमारजीव ने अपने हाथ में बौद्ध ग्रन्थों का ठीक-ठीक अनुवाद करने का काम अपने हाथ में लिया! इसे पूरा करने के लिये उन्होंने चीनी भाषा का अध्ययन प्रारम्भ किया और शीघ्र ही उस पर अधिकार प्राप्त कर लिया।
उन्होंने महायान की उपशाखा “सर्वास्त्वाद” के लगभग सौ ग्रन्थ चीनी भाषा में अनुवादित किये, जिनमें से ‘विनय-पिटक’, ‘योगाचार भूमि शास्त्र’, ‘ब्रह्म जाल सूत्र’, ‘महाप्रज्ञा-पारिमिता-सूत्र’, ‘देश भूमि’, विभाषा शास्त्र’, ‘सूत्रालंकार शास्त्र’ विशेष महत्व के हैं। इसमें से ‘महाप्रज्ञा, पारिमिता’ सूत्र का अनुवाद तो उन्होंने तीन वर्ष के अविरत परिश्रम के साथ किया था। इसके अतिरिक्त उन्होंने चीन में प्रचलित धर्म ‘ताओ’ की बुद्ध दर्शन के आलोक में व्याख्या की।
इतना अनुवाद कार्य करने के साथ ही उन्होंने भाषणों, प्रवचनों तथा विचार विनिमय के द्वारा बौद्ध धर्म के महायान सम्प्रदाय का धुआँधार प्रचार किया। उनके भाषण इतने ज्ञानपूर्ण एवं प्रभावशाली होते थे कि अच्छे-अच्छे विद्वान् उन्हें नत-मस्तक हो जाया करते थे। कुमारजीव के अनेक शिष्य सहयोगी तथा सहायक विद्वानों में से विमलाक्ष तथा पुण्यत्रात के नाम बहुत प्रसिद्ध हैं। इन दोनों ने अनुवाद कार्य में कुमारजीव को बहुत सहयोग दिया था।
कुमारजीव ने चीन में भारतीय बौद्ध धर्म की शाखा महायान के सिद्धान्तों को प्रचार करने में अपना पूरा जीवन लगा दिया। जीवन में एक दिन के लिये भी बैठ कर उन्होंने अपनी व्यक्तिगत सुख सुविधाओं के विषय में नहीं सोचा। कूची की पराजय के समय गिरफ्तार होने पर उन्होंने न किसी प्रकार का भय माना और न शंका की। उन्हें अपनी उस विद्या पर अखण्ड विश्वास था जिसे कि उन्होंने जीवन के सारे सुख छोड़कर प्राप्त किया था। वे मानते थे कि उनकी विशाल विद्या, किसी भी दशा में मित्र की तरह उनकी सहायता करेगी और हुआ भी वही। बंदी की दशा में भी उनका ज्ञान-प्रकाश छिटक-छिटक कर बाहर फैलने लगा जिसने चीन के निवासियों को उस सीमा तक आकर्षित किया कि सरकार को उन पर लगे प्रतिबन्धों को ढीला करना पड़ा।
यदि कुमारजीव के पूरे जीवन पर दृष्टिपात किया जाये तो पता चलेगा कि उनका सम्पूर्ण जीवन काम का दूसरा नाम था। उनका कर्तव्य था तो अपना काम, उनका सुख था तो अपना कर्तव्य, उनका मनोरंजन था तो काम करते रहना और उनका धर्म था तो अपना कर्तव्य कर्म। वे यह भी न जानते थे कि बिना किसी काम के बेकार कैसे बैठा जाता है, यदि कुमारजीव जैसे कर्तव्यवानों के नाम के साथ क्रिया हीनता, आलस्य, प्रमाद, गपशप, हास-विलास, घूमना, फिरना और टल्लेनबीसी आदि शब्द एक पंक्ति में रक्खे जायें तो यह शब्द इतने विजातीय विदित होंगे कि बिना हटाये मन को चैन नहीं मिल सकता। यह निर्जीव शब्द उनके नामों के साथ स्वयं झेंपते से दीखेंगे। आज तक भी समय एवं जीवनी शक्ति को निरर्थक के कार्यों में ध्यय करने वाला कोई भी व्यक्ति संसार में कोई ध्यानाकर्षक काम नहीं कर सका।
जिन्होंने कर्तव्य का आनन्द परख लिया है परिश्रम का स्वाद चख लिया उन्हें काम के सिवाय न तो किसी में आनन्द आ सकता है और न आराम मिल सकता है।
बौद्ध धर्म के माध्यम से विदेश में भारतीयता का गौरव बढ़ाने वाले कुमारजीव का जीवन बहुत ही सादा तथा सरल था। उनके उपदेशों में एक यह वाक्य भावनात्मक रूप से अवश्य रमा रहता था कि “मेरे काम को अपनाओ लेकिन मेरे जीवन को यथावत् आदर्श बनाकर अनुकरण मत करो, कमल कीच में पैदा होता है। कमल को प्यार करो कीच को नहीं।”
निस्पृह कुमारजीव ने संसार को बहुत कुछ दिया किन्तु उन्होंने अपने बारे में कहीं कुछ भी नहीं लिखा। उनका बहुत कुछ परिचय किसी ग्रन्थ में नहीं मिलता। क्योंकि अपने विषय में बहुत कुछ कहने को वे अहंकार का एक स्वरूप मानते थे। उनका कहना था कि अच्छे कार्यों द्वारा संसार की सेवा करना तो मनुष्य का सामान्य कर्तव्य है फिर उसके लिये परिचय अथवा प्रशस्ति की क्या आवश्यकता? संसार को लाभ तो हमारे विचारों से होगा न कि हमारे व्यक्तिगत परिचय से। अपने नाम का लोभ लेकर जो काम किया करते हैं वे वास्तव में स्वार्थी होते हैं परमार्थी नहीं।
मृत्यु मनुष्य जीवन की एक अवश्यम्भावी घटना है। संसार में कुछ और सत्य अथवा अटल हो या न हो, किन्तु मृत्यु एक अटल एवं अतर्क्य सत्य है। मनुष्य जीवन का उदय और अस्त प्रकृति का एक अनिवार्य नियम है। जो संसार में उत्पन्न हुआ है उसे एक दिन जाना अवश्य है। मृत्यु के सम्बन्ध में इस अखण्ड अनिवार्यता को जानते हुये भी लोग न जाने मृत्यु से डरते क्यों हैं?
मृत्यु का विचार आते ही लोग अजीब तरह से हताश तथा उदास हो जाते हैं। मृत्यु का नाम हृदय पर एक ऐसा धक्का मारता है, जिससे, जब तक उसका प्रभाव दूर नहीं हो जाता, हृदय एक भयपूर्ण विरक्ति से भरा रहता है। मृत्यु का भय उन्हें यहाँ तक कायर तथा मिथ्या पूर्ण बना देता है कि नित्यप्रति अनेक लोगों को मरते देखकर भी अपने मरने की कल्पना में संदिग्धता का समावेश कर लिया करते हैं। भय के कारण वे अपने हृदय में इस सत्य को पूरी तरह स्थान नहीं दे पाते कि एक दिन उन्हें इस संसार को छोड़ ही देना है।
इसमें सन्देह नहीं कि जो मनीषी व्यक्ति मृत्यु के अनिवार्य सत्य को साहस के साथ हृदयंगम कर लेते हैं वे न केवल उसके भय से ही मुक्त रहते हैं, प्रत्युत जीवन का पूरा-पूरा लाभ भी उठाते हैं। जिन्हें यह विश्वास रहता है कि न जाने मृत्यु किस समय अपनी गोद में उठा ले, वे जीवन के प्रत्येक क्षण का सदुपयोग कर लेने में बड़ी तत्परता तथा सतर्कता से लगे रहते हैं। वे बहुत कुछ, मृत्यु की बेला से पूर्व कर डालने के लिये प्रयत्नों में कमी नहीं रखते। मृत्यु का वास्तविक विश्वास उन्हें अधिकाधिक सक्रिय बना देता है।
इसके विपरीत जो मिथ्या विश्वासी मृत्यु से डर-डर कर जीवन में रेंगते हैं वे बेचारे कुछ दूर भी ठीक से नहीं चल पाते और मृत्यु आकर उन्हें पकड़ ले जाती है। मृत्यु जब अटल है अनिवार्य है, तब उससे डरना क्या? मृत्यु से न डरने वाले ही उसे वरण करके चिरंजीवी बनते हैं।
मृत्यु से अभय रहने वाला व्यक्ति उसे एक चुनौती मानकर साहस तथा उत्साहपूर्वक जीता हुआ यह कोशिश करता है कि वह जीवन के राजकुमार की तरह मृत्यु का मेहमान बने। जीवन की तरह मृत्यु भी उसे पाकर कृतार्थ हो जाये।
मनुष्य की स्वाभाविक वृत्तियों में भय की गणना भी की गई है। किन्तु वह भय कायरता का नहीं सतर्कता का लक्षण है। यों तो कोई भी मरना नहीं चाहता। मृत्यु से बचने का हर सम्भव उपाय किया करता है। सड़क पर चलते मोटर से बचना, नदी में नहाते डूबने से सावधान रहना, मृत्यु भय नहीं है। हिंस्र जन्तुओं, रोगों तथा शत्रुओं से जीवन रक्षा करने में यथासम्भव उपायों का करना स्वाभाविक है। निरर्थक एवं निरुद्देश्य मर जाना कोई वीरता नहीं मूर्खता है। ‘हाय मैं मर जाऊँगा’ की भावना ही मृत्यु का वह भय है जो कायरता की कोटि में आता है। मनुष्य को “हाय मर जाऊँगा” की हीन भावना के वशीभूत होकर कायरता का परिचय नहीं देना चाहिये।
‘हाय मर जाऊँगा’ की भावना में रो तड़प कर मृत्यु से बचा तो जा ही नहीं सकता। उल्टे यह भावना जीवन को बोझिल एवं भयावह बना देती है, मृत्यु से निरपेक्ष रह कर जीवन रक्षा का हर सम्भव उपाय करते हुये, मृत्यु आ जाने पर साहसपूर्वक उसका सहर्ष आलिंगन करने में ही पुरुषार्थ की शोभा है। महान मृत्यु के अवसर पर जीवन का मोह एक अश्रेयस्कर दुर्बलता है।
मृत्यु का भय उत्पन्न करने में परलोक की चिन्ता का बहुत बड़ा हाथ है। लोगों का यह सोचते रहना कि मर जाने के बाद न जाने हमारा क्या होगा, हम कहाँ किस लोक अथवा योनि में भ्रमण करेंगे, न जाने हमारी सद्गति होगी अथवा अगति, मृत्यु भय को एक बड़ी सीमा तक बढ़ा देता है? परलोक की चिन्ता ठीक है। वह करनी भी चाहिये। किन्तु इस शुभ चिन्ता से मृत्यु के अशुभ भय का पैदा होना बड़ी ही असंगत तथा अस्वाभाविक बात है। फिर भी परलोक की चिन्ता से लोगों में मृत्यु का भय उत्पन्न होता है। इसका एक मात्र कारण लोक को बिगाड़ कर चलना है। परलोक का कोई स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं है। परलोक इस लोक की ही परिणति है। जिस प्रकार का हमारा लोक होगा हमारे लिये उसी प्रकार के परलोक की रचना होगी। यदि हमने अपने आलस्य, अकर्म, अकर्त्तव्य अथवा अनीति अत्याचार से अपने लोक को दग्ध कर लिया है और ईर्ष्या, द्वेष, छल, कपट, काम क्रोध, मोह आदि विकारों तथा वासनाओं से विषैला बना लिया है तो निश्चय ही उसी के अनुसार हमें जलते हुये लोकों को साकार करने पर विवश होना ही होगा। यदि हम जानते हुए भी अपने कर्मों से पतित परलोकों की रचना के लिये लोक में नींव रख रहे हैं तो मृत्यु का भय हमें सतायेगा ही। क्योंकि हम जानते हैं कि जो कुछ हम कर रहे हैं मृत्यु के उपरान्त उसका दण्ड भोगना ही है और इसीलिये मृत्यु की कल्पना आते ही भय से सिहर उठते हैं।
इसके विपरीत यदि हम लोक को परलोक का आधार मान कर उसे सजाने, सँवारने और सुन्दर बनाने के शुभ प्रयत्नों को ईमानदारी से करते रहें तो मृत्यु की कल्पना हमें विभोर करती रहे। क्योंकि हम जानते हैं हम जो कुछ शिव तथा सुन्दर कर रहे हैं वह हमारे लिये मंगलमय परलोक की रचना कर रहा है जिनको हम मृत्यु के उपरान्त पुरस्कार के रूप में पायेंगे।
मनुष्य का विचार सानिध्य भी मृत्यु के विषय में भय अभय का कारण होता है। जिसकी चिन्तन-धारा जितनी अधिक जीवन के समीप रहेगी वह उतना ही कम मृत्यु से डरेगा और जिसके विचार जितना अधिक मृत्यु का चिन्तन करेंगे वह उतना ही उससे भयभीत रहेगा। मृत्यु का चिंतन क्या करना। वह अपने समय पर आयेगी, आती रहेगी। उसका विचार छोड़कर मनुष्य को जीवन की आराधना में लगा रहना चाहिये। चिन्तन का विषय जीवन है मृत्यु नहीं। मृत्यु का चिन्तन करने से जीवनी-शक्ति का ह्रास होता है जिससे मृत्यु का भय स्थायी रूप से सूक्ष्म में बस जाया करता है। ऐसी भय पूर्ण स्थिति में कर्त्तव्यों का पालन यथाविधि नहीं हो पाता जो स्वयं एक बड़ा दुःख प्रसंग होता है। मनुष्य जब ठीक प्रकार से अपने कर्त्तव्यों में लगा रहता है मृत्यु का भय उसके पास नहीं फटकने पाता।
कर्त्तव्यों की आपूर्ति इस विचार के साथ मृत्यु का भय लाती है कि यह नहीं कर पाया वह करने को रह गया है। सारा जीवन बेकार जा रहा है। यों ही दिन गुजर जायेंगे और एक दिन मृत्यु के मुख में चला जाना होगा। मनुष्य अपनी स्थिति के अनुसार अपने कर्तव्यों का पालन तत्परता से करता रहे तो भी मृत्यु का भय उसे नहीं सताने पावे। फिर वह कर्तव्य छोटे हों अथवा बड़े, साधारण हों अथवा असाधारण, कर्तव्यहीन, अकर्मण्यता तो साक्षात् मृत्यु ही कही गई है।
बहुत से लोग अपने बाद की स्थिति पर विचार करते-करते मृत्यु से भयभीत होने लगते हैं। मेरे बाद न जाने क्या होगा मेरे मर जाने पर बीवी बच्चे क्या करेंगे? कहाँ किसका आश्रय लेंगे। पता नहीं उन्हें क्या-क्या कष्ट उठाने पड़ेंगे। इस प्रकार की कल्पनायें निरर्थक जल्पनाएं ही हैं। ऐसे लोग अपने को ही बीबी बच्चों का विधाता समझते हैं। वे समझते हैं कि जब तक वे जिन्दा हैं बीबी बच्चों के लिये स्वर्ग संचय कर रहे हैं उनके न रहने के बाद वे सब यातना पूर्ण नरक में गिर जायेंगे। मानो उन सब की जीवन गाड़ी उनकी जिन्दगी से ही चल रही है जिसके खत्म होते ही सब का खेल खत्म हो जायेगा। दूसरों के लिये अपने को सब कुछ समझना दम्भ है जब हम नहीं थे संसार का सारा काम चल रहा था और जब नहीं रहेंगे तब भी सब काम चलता रहेगा। संसार का कोई काम किसी के न रहने से रुकता नहीं। यह बात सही है कि हमारा जीवन आश्रितों के लिये आवश्यक है। किन्तु इस आवश्यकता का यह अर्थ कदापि नहीं है कि हम अपने न रहने की कल्पना के साथ उनका जीवन जोड़कर कायरों की तरह मृत्यु भय से रोते कलपते रहें। अपने बाद की कल्पना के भयावह चित्र बनाने के बदले हमारी बुद्धिमानी इसी में है कि हम मरने से पूर्व ईमानदारी के साथ अपने आश्रितों की बहवूदी के लिये जो कुछ कर सकें करें। ऐसा करने से ही अपने बाद की चिन्ता की सार्थकता है, केवल कल्पना करते रहना मूर्खता ही होगी। मृत्यु को भय का कारण बनाने की अपेक्षा उसे अपने कर्मों का सजग प्रहरी बनाकर चलने वाले सदाशयी व्यक्ति यशस्वी जीवन के अधिकारी बनते हैं।
मनुष्य की परेशानियों के कारणों में एक प्रमुख कारण अर्थाभाव भी है। जितने लोग पैसे की कमी के कारण उद्विग्न एवं व्यग्र देखे जाते हैं उतने और किसी कारण से नहीं। मनुष्यों की समझ में दुनिया की सारी परेशानियाँ एक मात्र पैसे की कमी के कारण ही होती हैं। यदि उनके पास पैसे की इफरात हो जाये तो वे परेशान ही न हों, और यदि परेशानी आ भी जाये तो वह पैसे के बल पर शीघ्र दूर की जा सकती है।
लोग सोचते हैं कि बीमार होने पर पैसा होने से अच्छे से अच्छे डॉक्टर को दिखा सकते हैं, अच्छी से अच्छी दवा ला सकते हैं। पैसा होने पर लड़कों को ऊँची शिक्षा दिला सकते हैं। बेटी का ब्याह ऊँची जगह कर सकते हैं। पैसा होने पर वे घरबार में सुख-सुविधा के साधन इकट्ठा कर सकते हैं। पैसे के बल पर पुण्य दान कर सकते हैं, समाज में आदर-सम्मान पा सकते हैं।
बात किसी हद तक सही है कि पैसे की ताकत पर मनुष्य अनेक परेशानियाँ दूर कर सकता है। पैसे का अभाव बहुत कुछ आड़े आया करता है। किन्तु यह बात इससे भी अधिक सही है कि संसार में शायद ही दो-चार प्रतिशत व्यक्ति ऐसे हों जिनको सर्वथा पैसे का अभाव रहता हो। हर आदमी अपनी योग्यता एवं क्षमता के अनुसार कमाता ही रहता है। पैसा सबके पास आता ही रहता है। तब भी बहुत से लोग ऐसे होते हैं जो सदैव यही अनुभव किया करते हैं कि उनके पास पैसा आता ही नहीं, वे सदैव ही खाली हाथ रहा करते हैं।
ऐसे आदमियों में अधिकतर वे ही लोग होते हैं जिन्हें फिजूलखर्ची की आदत हुआ करती है। इधर पैसा हाथ में आया कि उधर खर्च हो गया। एक दो दिन तो क्या घंटे दो घंटे भी पैसा अपनी मूल संख्या में उनके पास नहीं रहने पाता। हर समय कुछ न कुछ खर्च करते रहने से उनका हाथ जल्दी ही खाली हो जाता है जिससे वे अपने को रिक्त हस्त ही अनुभव करते रहते हैं।
कमाई कठिनता से और खर्च आसानी से किया जा सकता है। बुद्धिमानी तो वास्तव में यह है कि जितनी कठिनाई से पैसा पैदा होता है उससे अधिक कठिनाई से खर्च किया जाये। किन्तु लोग करते इसके विपरीत हैं। जितने पैसे के लिये लोग महीने-भर ऐड़ी-चोटी का पसीना एक किया करते हैं, मिलने पर उतना पैसा दो सप्ताह से कम की अवधि में खर्च कर देते हैं। ऐसे विद्युत-व्ययी को पैसे की तंगी बनी रहना स्वाभाविक ही है। जो पैसे के दुश्मन बने रहते हैं अथवा पैसा जिनकी जेब से बाहर निकलने के लिए उछलता रहता है उनको खाली ही रहना पड़ेगा।
पैसा खर्च करने के लिये ही होता है। यह बात ठीक है। किन्तु यह बात बिल्कुल गलत है कि उसे चाहे जैसे भी खर्च किया जाये। चाहे जैसे खर्च करने वाले कितनी ही आमदनी होने पर भी पैसे के मामले में दरिद्री बने रहते हैं। जो चीज सामने आई खरीद ली, जो चाहा खाया या जो कुछ भाया पैसा फेंका, वाली नीति खर्च करने के तरीके में नहीं मानी जा सकती। खर्च करने का तरीका वही ठीक माना जा सकता है, जिसमें किसी भी खरीददारी की आवश्यकता सच्चे रूप में निहित हो। बेजरूरत की चीजें खरीदना अथवा जरूरत से पहले खरीदकर डाल देना खरीददारी की गलत नीति है। आवश्यकता के अनिवार्य दबाव पर ही किसी चीज को खरीदना ही ठीक होता है। साथ ही उस आवश्यकता को भी ठीक से ठोक-बजाकर परख लेना चाहिए कि वह वास्तविक है अथवा मिथ्या, जिसके दबाव से आप कोई चीज खरीदने जा रहे हैं।
मनुष्य की बहुत-सी आवश्यकतायें बनावटी होती हैं। जीवन में उनकी कोई भी वास्तविक उपयोगिता नहीं होती। तब भी वे पूरा किये जाने के लिये दबाव डालती अनुभव होती हैं। ऐसी गैर जरूरी ‘आवश्यकताओं’ में अधिकतर वे जरूरतें होती हैं जिनका सम्बन्ध फैशन, दिखावा अथवा साज शृंगार से हुआ करता है। इसके अतिरिक्त मनुष्य के व्यसन तो शत-प्रतिशत कृत्रिम आवश्यकतायें ही हुआ करती हैं।
कपड़ों बालों तथा शरीर के ऊपरी बनाव शृंगार की आवश्यकतायें शुद्ध रूप से कृत्रिम आवश्यकतायें हैं। तरह-तरह के काट-छाँट वाले कपड़े पहनने, भाँति-भाँति से बालों को बाँका बनाने, सुगन्धित तेल फुलेल, स्नो, क्रीम, पाउडर के प्रयोग का शौक मनुष्य की वास्तविक आवश्यकता नहीं है। बिना उपयोग के घड़ी, फाउन्टेन पेन आदि रखना, चैन, जंजीर, अँगूठी आदि अलंकार पहनना अथवा अन्य प्रकार के साज शृंगार बनाने वाली चीजों का इस्तेमाल एक दिखावा-भर है इससे मनुष्य की वास्तविक आवश्यकता का कोई सम्बन्ध नहीं है।
चाय, काफी, सोड़ा, लैमन, बर्फ, चाट, मिठाई, पाक, पकवान, अचार, मुरब्बे, लाइमजूस, चाकलेट, बिस्कुट आदि खाने-पीने की चीजें मनुष्य की वास्तविक आवश्यकताओं के दायरे में नहीं आतीं। यह सब चीजें मनुष्य की स्वाद, लिप्सा की पैदा की हुई जरूरतें हैं।
पान, तम्बाकू, सिगरेट, बीड़ी, शराब, भाँग, अफीम, गाँजा आदि नशे की वस्तुयें तो स्पष्ट रूप से दुर्व्यसन ही हैं, मनुष्य की वास्तविक आवश्यकता से इनका दूर का भी सम्बन्ध नहीं है।
इसी प्रकार खेल-तमाशे, नाच-गाने, नाटक-सिनेमा आदि के मनोरंजन भी मनुष्य की चंचल वृत्ति के सेवक हैं, वास्तविक आवश्यकतायें इनसे बहुत दूर की चीज हैं। गपशप, मटरगश्ती, प्रीतिभोज, होटल, रेस्टोरेन्ट, आदि सामाजिकतायें मनुष्य की वास्तविक आवश्यकतायें नहीं मानी जा सकतीं।
मनुष्य की वास्तविक आवश्यकतायें वही हैं जो उसके सामान्य जीवन के लिए अनिवार्य हों। जिसको पूरा किये बिना काम ही न चल सके। इन अनिवार्य आवश्यकताओं में भोजन, वस्त्र, तथा निवास की आवश्यकतायें ही प्रमुख हैं। यदि मनुष्य भोजन न करे तो उनका जीवन चलना कठिन हो जायेगा। बिन वस्त्र पहने न तो उसका गुजारा हो सकता है और न वह समाज में नंगा ही रह सकता है। तन ढकने और जलवायु के प्रभाव से उसकी रक्षा करने के लिए मनुष्य के लिये वस्त्रों की अनिवार्य आवश्यकता है। बिना घर के अथवा निवास स्थान के कोई किस प्रकार रह सकता है। यदि घर न हो तो कहाँ तो मनुष्य अपने बीबी-बच्चों को रक्खे, कहाँ खाना बने, कहाँ गृहस्थी का सामान रक्खा जाये और कहाँ रात में सोया जाये? बिना घर-मकान अथवा आश्रय स्थान के कैसे वह जल, वायु, धूप, जाड़े आदि से अपनी तथा अपने परिवार की रक्षा कर सकता है? इस प्रकार मनुष्य की अनिवार्य आवश्यकताओं में इन तीन चीजों का मुख्यतम स्थान है।
इन अनिवार्य आवश्यकताओं की पूरक कुछ अन्य आवश्यकतायें भी ऐसी हैं जिनको अनिवार्य आवश्यकताओं की श्रेणी में ही रखना होगा। जैसे शिक्षा-दीक्षा, दक्षता, शिल्प, स्वास्थ्य, स्वच्छता, सफाई आदि। इन पूरक आवश्यकताओं को यदि पूरा न किया जायेगा तो मनुष्य का जीवन मनुष्य के अनुरूप न होगा। जीवन की मूल तीन आवश्यकताओं भोजन, वस्त्र, एवं निवास, तक ही सीमित रहने से मनुष्य जीवन भी पशुओं जैसा बन जायेगा। पशुओं की तरह भोजन कर लेना और किसी विवर में पड़े रहने भर से मनुष्य का काम नहीं चल सकता उसे मनुष्य के अनुरूप जीवन जीने के लिए उक्त पूरक आवश्यकताओं को भी अनिवार्य आवश्यकताओं की तरह ही बरतना होगा।
इनके अतिरिक्त मनुष्य की कुछ आकस्मिक आवश्यकतायें भी होती हैं। दवा-दारु, अतिथि-सत्कार, जन्म-मरण, ब्याह-शादी आदि आवश्यकतायें ऐसी ही अनिवार्य आवश्यकतायें हैं अपने-अपने अवसर पर जिनको अनिवार्य ही माना जायेगा और जिनको पूरा किये बिना मनुष्य का काम नहीं चल सकता।
फैशन, प्रदर्शन तथा स्वादवाद की कृत्रिम आवश्यकतायें ही मनुष्य की मूल आवश्यकताओं को महँगा बना देती हैं तिस पर दुर्व्यसन तो दैत्य की तरह, क्या मूल, क्या अवास्तविक, क्या पूरक और क्या आकस्मिक सभी आवश्यकताओं का भाग हड़प कर जाता है।
वही मितव्ययी है वही अर्थज्ञानी और वही बुद्धिमान है जो अपनी कमाई को अधिकारिणी आवश्यकताओं के बीच निष्पक्ष रूप से बाँटकर जीवनयापन करता है। ऐसे विज्ञानी पुरुष को न तो कभी कोई कमी सताती है और न उसे कभी असंतोष होता है। वह आजीवन एक संतुलित स्थिति में वास करता हुआ, सम्पन्न, प्रसन्न तथा संतुष्ट रहा करता है।
श्रीमती वेल्दी फिशर की आयु इस समय लगभग चौरासी वर्ष की है। यह एक अमेरिकन महिला हैं। इनका जन्म अमेरिका में न्यूयार्क राज्य के अंतर्गत रोम नामक कस्बे में सन् अठारह सौ अस्सी में हुआ।
इस आयु में भी वे आज कितना काम करती हैं, इस का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि एक प्रहर रात रहे ही उनके कमरे में टाइप राइटर खटकने लगता है, और उसकी आवाज से जागकर जब इनके साथ के लोग जागते हैं तब तक वे बहुत-सा काम कर चुकी होती हैं।
श्रीमती फिशर का सारा दिन अपने काम को आगे बढ़ाने की योजना बनाने, आगन्तुक परिचितों, अपरिचितों से बातें करते हुये अपनी भविष्य की कार्य-पद्धति पर प्रकाश डालने और अपने चल रहे कार्यक्रम को दिखाने में ही बीतता है।
उनकी व्यस्तता देखकर अनेक बार उनके हितैषियों ने पूछा कि आप इस आयु में इतना अधिक परिश्रम करती हुई कभी क्लाँति अनुभव नहीं करतीं? उत्तर में उनका यह कथन निःसन्देह उनकी परिश्रमशीलता का रहस्य खोल देता है, मैं रात में बहुत अधिक थकी हुई सोने जाती हूँ, जिससे सघन निद्रा का सुख पाकर मैं प्रातःकाल नई आशा और नूतन विचार लेकर उठती हूँ। मेरे यही आशापूर्ण नित नूतन विचार ही मुझे दिन भर क्रियाशील बनाये रहते हैं। जिससे मैं न केवल अनवरत कार्य ही करती रहती हूँ, बल्कि काम करने में मुझे एक आनन्द की अनुभूति होती रहती है।
श्रीमती वेल्दी फिशर जिस काम को अपने हाथों में लिये हुये हैं वह जन-सेवा का एक बहुत ही महत्वपूर्ण कार्य है। इस समय वे भारत में साक्षरता प्रसार का व्रत लिये हुये गाँव-गाँव घूम रही हैं। भारत के अशिक्षित समाज में शिक्षा का पुण्य प्रदीप जलाना उन्होंने अपना जीवन ध्येय बना लिया है। जिसको पूरा करने में वे दशाब्दियों से लगी हुई हैं। लखनऊ का “साक्षरता-निकेतन” उनकी इस परिश्रम पूर्ण लगन का एक जीता जागता साक्षी बना हुआ सैकड़ों हजारों निरक्षरों को अक्षर ज्ञान करा रहा है।
श्रीमती वेल्दी फिशर के पूर्व जीवन पर दृष्टि डालने से पता चलता है कि उनका वर्तमान जीवन एक गहरा मोड़ लेकर आया है। अपने सुन्दर सुरीले कंठ की आकर्षक स्वर लहरी और संगीत के प्रति प्रेम ने उनमें एक कुशल आँपेरा-गायिका बनकर ख्याति प्राप्त करने की जिज्ञासा जगा दी थी। किन्तु उनकी इस जिज्ञासा को उनकी माँ की ओर से कोई प्रोत्साहन नहीं मिला। उनकी माँ का कहना था कि यदि तुम ख्याति ही प्राप्त करना चाहती हो तो पढ़ लिखकर जन-सेवा का कोई ऐसा कार्य करो जिससे तुम्हारी ख्याति के साथ लोगों की आदर भावना भी जुड़ जाये। रंगमंच की कुशल गायिका होकर सम्भव है तुम्हें कुछ ख्याति मिल जाये किन्तु उस ख्याति के साथ लोगों की वे पवित्र भावनायें नहीं मिल सकेंगी जो एक जन-सेवक को मिला करती हैं।
माँ की प्रेरणा से वे कॉलेज गई जरूर लेकिन उनकी जिज्ञासा ने उनका मन पढ़ने-लिखने में लगने नहीं दिया और इक्कीस वर्ष की आयु में वे न्यूयार्क के रंगमंच पर आँपेरा-गायिका के रूप में उतर ही गई किन्तु शीघ्र ही उन्होंने अनुभव कर लिया कि वास्तव में यह क्षेत्र उनके योग्य नहीं है। जिस आत्मिक शाँति की आशा से वे उस ओर गई वह एक मृगतृष्णा ही सिद्ध हुई।
रंगमंच के कृत्रिम जीवन ने उनमें एक ऐसी आत्मग्लानि जगाई कि उनका झुकाव धर्म की ओर हो गया जिसको पिता की दुःखद मृत्यु ने और भी बढ़ा दिया। निदान जन-सेवा का संकल्प लेकर वे चीन चली गई। वहाँ उन्होंने नान-चाँग में वाल्डियन-मिशन स्कूल में प्रधान-अध्यापिका का पद ग्रहण कर लिया। अनेक वर्षों तक स्कूल की सेवा करते हुये उन्होंने संस्था के लिये अनेक सराहनीय विकास कार्य किये। किन्तु उन्हें अपना यह सेवा क्षेत्र बहुत ही संकुचित एवं संकीर्ण लगा। निदान उन्नीस-सौ अठारह में उन्होंने संस्था का दायित्व एक सहयोगिनी को सौंप दिया और अमेरिका लौट गई जहाँ से अपना दृष्टिकोण विशाल बनाने के लिये विश्व-भ्रमण पर चल पड़ीं और जापान, कोरिया, सिंगापुर मलय और बर्मा होते हुये भारत आ गई।
भारत में वे महात्मा गाँधी के संपर्क में आई और दिल्ली में उनकी प्रार्थना सभाओं में सम्मिलित होती रहीं। गाँधी जी के संपर्क में उन्होंने जन सेवा का सच्चा स्वरूप और सर्व धर्म समन्वय की महत्ता समझी। कुछ समय भारत में रहकर जब वे अमेरिका लौटते समय गाँधी जी से मिलीं तो उनके एक वाक्य ने श्रीमती फिशर पर इतना प्रभाव डाला कि कुछ दिनों बाद उन्होंने अमेरिका से वापस आकर भारत को ही अपनी मातृभूमि बना लिया और तब से अब तक वे जन-सेवा के कामों में संलग्न हैं।
विदा होती हुई श्रीमती फिशर से महात्मा गाँधी ने कहा था यदि तुम्हें भारत की कुछ सेवा करने की इच्छा है तो अब की जब भारत आना तो गाँवों में जाकर जनता में शिक्षा प्रसार का कार्य करना। ज्ञान प्रसार से बड़ी कोई दूसरी सेवा इस संसार में नहीं है।
अमेरिका से वापस जाकर श्रीमती फिशर अपने पति डा. फ्रेड फिशर के साथ अनेक वर्षों तक धर्मप्रचार एवं जन-सेवा के कार्य करती रहीं। किन्तु उन्नीस सौ अड़तालीस में एक मोटर दुर्घटना में उनके पति की मृत्यु हो जाने से उनके मन में बड़ी अशाँति पैदा हो गई किन्तु महात्माजी के वे शब्द जो उन्होंने श्रीमती फिशर से अमेरिका लौटते समय कहे थे उनके जीवन के एक बहुत बड़े सम्बल बन गये। उन्होंने भारत जाकर जनता में शिक्षाप्रसार का संकल्प सुदृढ़ किया और विश्व की शिक्षा प्रणालियों का अध्ययन करने के लिये पुनः विश्व भ्रमण पर चल पड़ीं। पन्द्रह साल अध्ययन एवं भ्रमण करने के बाद वे बहत्तर वर्ष की आयु में पुनः भारत आ गई।
भारत आकर उन्होंने शिक्षा प्रसार की जो योजना बनाई उसमें प्रौढ़-साक्षरता को प्राथमिकता दी। उनका विचार था कि जीवन की उन्नति एवं विकास का द्वार शिक्षा ही है और साक्षरता उसकी द्वार-शिला है, जिस पर पैर रखकर ही शिक्षा के द्वार में प्रवेश किया जा सकता है। श्रीमती फिशर ने अपनी योजना को कार्यान्वित करने के स्थान की खोज में भारत के अनेक नगरों, कस्बों तथा देहातों का दौरा किया और पाया कि यहाँ पर किसी हद तक बालक, बालिकाओं की शिक्षा का तो प्रबन्ध है किन्तु प्रौढ़ शिक्षा का सर्वथा अभाव है। उन्होंने भारत में प्रौढ़ शिक्षा की आवश्यकता को बड़ी गहराई से अनुभव किया।
उन्होंने देखा कि यहाँ के अधिकाँश लोग निरक्षर होने के कारण अपनी एक छोटी-सी चिट्ठी पढ़वाने के लिये बड़ी दूर-दूर तक जाकर पढ़ने के लिये लोगों की खुशामद किया करते हैं। लोग यह भी नहीं जान पाते उस छोटी-सी रसीद अथवा कागज पर क्या लिखा है जिस पर अँगूठा लगा कर वे किसी शर्त में बँध रहे हैं। उनके इस अज्ञान का लाभ उठाकर थोड़ा बहुत पढ़े-लिखे लोग अपना मतलब बनाया करते हैं। श्रीमती फिशर को भारतीय जनता की इस अज्ञानावस्था पर बड़ी दया आईं। और वे सोचने लगीं कि इस देश का पढ़ा-लिखा वर्ग कैसा है कि जो अपने देश के भाइयों की इस मूढ़ता को दूर करने का प्रयत्न नहीं करता। इस प्रकार सोचते-सोचते उनका हृदय भर आया और वे मन ही मन कह उठीं—मैं विदेशिनी होने पर भी इस देश में शिक्षा प्रसार की अग्रदूती बनकर लोगों में शिक्षा सेवा की भावना जाग्रत करूंगी और उनमें यह प्रेरणा पैदा करूंगी कि जब एक अन्य देश की महिला हमारे देश में शिक्षाप्रसार के लिये इतनी प्रयत्नशील है तो इस ओर से हमारा उदासीन रहना कहाँ तक उचित है? मुझे पूरी आशा है कि मेरी इस सेवापूर्ण प्रेरणा से यहाँ का शिक्षित वर्ग अपने कर्तव्य को समझेगा और मुझे देश जाति, धर्म तथा वर्ण आदि से ऊपर उठकर मानवता की सेवा करने का संतोष प्राप्त होगा और मेरे इस सत्प्रयत्न से “वसुधैव कुटुम्बकम्” के सार्वभौम सिद्धान्त को बल मिलेगा।
श्रीमती फिशर की भावना से परिचित होकर इलाहाबाद के ऐग्रीकल्चरल इन्स्टीटय़ूट के अध्यक्ष ने उन्हें अक्षर-प्रचार के आन्दोलन में सहयोग करने के लिये आमंत्रित किया। उन्होंने अध्यक्ष का निमन्त्रण स्वीकार किया और इलाहाबाद में तेरह फरवरी उन्नीस सौ त्रेपन को अपनी योजना के अनुसार साक्षरता-निकेतन का सूत्रपात किया।
उन्होंने कम से कम पाँच सौ गाँव से निरक्षरता-निर्मूलन का लक्ष्य बनाकर एक छोटे से मकान में कक्षा लगाना प्रारम्भ कर दिया। श्रीमती फिशर ने इस प्रारम्भिक स्कूल में इतने परिश्रम से काम किया कि जिसे देखकर न केवल फोर्ड फाउन्डेशन ने आर्थिक सहायता ही दी बल्कि उत्तर-प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल के. रामा मुँशी ने उनसे अनुरोध किया कि वे अपने प्रचार का केन्द्र प्रदेश की राजधानी लखनऊ को बनायें।
निदान वे उन्नीस सौ अट्ठावन में अपना साक्षरता-निकेतन लखनऊ उठा लाई। लखनऊ में राज्यपाल महोदय ने उनके लिये बीस एकड़ भूमि एवं अनेक आर्थिक सहायताओं का प्रबन्ध कर दिया।
श्रीमती फिशर के शिक्षा निकेतन का मुख्य कार्यक्रम है देश के करोड़ों निरक्षरों को साक्षर बनाने के लिये ऐसे उत्साही शिक्षक तैयार करना जो गाँव-गाँव जाकर शिक्षा-प्रचार करें। उनकी इस संस्था में समाज के सभी वर्गों तथा सभी क्षेत्रों से शिक्षार्थी आते और शिक्षा व प्रशिक्षण पाकर अपने कर्तव्य मार्ग पर चल पड़ते हैं।
प्रशिक्षण पाने वालों में अधिकतर अध्यापक, समाज सेवक, निवृत सरकारी कर्मचारी तथा सहकारी व ग्राम पंचायतों आदि से सम्बंधित ऐसे लोगों की प्रमुखता है जो प्रशिक्षित होकर जाने के बाद अपने-अपने क्षेत्रों में रात्रि पाठशालायें तथा प्रौढ़ पाठशालायें लगाकर लोगों को साक्षर बनाने में अवैतनिक सेवा करते हैं। श्रीमती फिशर की इस संस्था से अब तक लगभग सात सौ व्यक्ति प्रशिक्षण पाकर अपने काम में लग चुके हैं जिन्होंने लगभग दो-लाख निरक्षरों को अक्षर ज्ञान करा दिया है।
इसके अतिरिक्त श्रीमती फिशर का कार्यक्रम अब शिक्षा प्रचार से आगे बढ़कर कृषि, रहन-सहन, सफाई, सहयोग, सहकारिता, एवं घरेलू उद्योग धन्धों की शिक्षा तक पहुँच गया है।
संस्थाओं एवं पाठशालाओं के साथ-साथ उन्होंने एक सचल शिक्षा संस्था आन्दोलन भी चलाया है। जिसके अंतर्गत वे उत्साही स्वयं-सेवकों को एक शिक्षा-झोला देती हैं जिसमें पच्चीस शिक्षार्थियों के पढ़ाने योग्य पुस्तकें, चार्ट, बोर्ड तथा लैम्प आदि आवश्यक वस्तुयें हैं। झोला वाहक शिक्षक गाँव-गाँव घूमते हैं और जहाँ कहीं भी अवसर तथा अवकाश पाते हैं वहीं अपनी पाठशाला लगा कर लोगों को पढ़ाने लगते हैं। श्रीमती फिशर के इस झोला आन्दोलन में अब तक लगभग डेढ़ हजार स्वयं-सेवक सम्मिलित होकर काम करने लगे हैं।
अपने प्रयत्नों की सफलता से प्रोत्साहित होकर श्रीमती फिशर ने विकास कार्य के नये-नये प्रयोग भी प्रारम्भ कर दिये हैं। उन्होंने लखनऊ तथा उसके पार्श्ववर्ती जिलों में प्रौढ़ प्रशिक्षण केन्द्र खोले हैं जिनमें प्रशिक्षित हुये लगभग पौने तीन सौ व्यक्ति पैंतीस औद्योगिक स्कूल चला रहे हैं। उन्होंने ग्राम पंचायतों के कार्यकर्ताओं के प्रशिक्षण के साथ स्त्रियों के लिये द्वय वर्षीय साधन-शिक्षण कार्यक्रम भी चलाया है। जिससे निकली हुई महिलायें आर्थिक दृष्टिकोण में बहुत कुछ आत्म-निर्भर हो सकेंगी।
अपने कार्यक्रमों की सफलता एवं साक्षरता-प्रसार के लिये पाठ्य पुस्तकों के सम्बन्ध में सामान्य लेखकों पर निर्भर होना ठीक न समझ वे वर्ष के अनेक महीनों में अपने साक्षरता-निकेतन पर देश के लेखकों का शिविर लगाती हैं और वयस्कों के लिये उपयोगी पुस्तकें लिखने के लिये आवश्यक प्रशिक्षण भी देती हैं। जिसके फलस्वरूप स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि, घर बार, परिवार-नियोजन आदि उपयोगी विषय पर लगभग साठ पुस्तकें लिखी एवं प्रकाशित हो चुकी हैं जिनकी पाँच लाख से अधिक प्रतियाँ बिक चुकी हैं। पुस्तक प्रकाशन के साथ श्रीमती फिशर की संस्था ‘उजाला’ नाम का एक हिन्दी पाक्षिक भी निकालती है।
अपने इन सराहनीय कार्यों के लिये देश, विदेश की अनेक संस्थाओं ने श्रीमती फिशर को अनेक पुरस्कार भी दिये हैं और उनकी संस्था को नियमित सहायता भी दे रही हैं। इस समय श्रीमती फिशर संसार की महान् शिक्षा विदों तथा जन-सेवियों में मानी जाती हैं जिससे चौरासी वर्ष की आयु में भी वे अपने आत्म-संतोष की प्रसन्नता से पूर्ण स्वस्थ एवं कार्यक्षम बनी हुई एक महान एवं मान पूर्ण जीवन-यापन कर रही हैं।
जापान के आदर्श शिक्षक मियासावा केन्जी आज संसार की विभूति बन गये हैं। उनके लिखे हुए बाल साहित्य का संसार की लगभग सभी भाषाओं में अनुवाद किया जा रहा है। उनका बाल-साहित्य विश्व बाल-साहित्य के रूप में स्वीकार कर लिया गया है।
केन्जी की इस सार्वभौमिकता का मुख्य कारण उनकी वे विशेषतायें रही हैं जो एक आदर्श मनुष्य में होनी चाहियें। वे मानव-जीवन की सफलता एवं सार्थकता के लिये सत्यं, शिवं, सुन्दरम् तीनों की प्रतिस्थापना को आवश्यक मानते थे। मानव-जीवन के इन श्रेयों की व्यवस्था करते हुये वे कहा करते थे कि सत्यं, शिवं, सुन्दरम् कोई पारलौकिक सिद्धियाँ नहीं हैं बल्कि यह विशुद्ध रूप से मानव-जीवन की अनिवार्य आवश्यकताएँ हैं। इनसे दूर रहकर कोई भी मनुष्य पूर्ण मनुष्य नहीं बन सकता।
श्री केन्जी ने अपना सम्पूर्ण जीवन अपनी इन्हीं व्याख्याओं के अनुसार सफलताओं एवं उपयोगिताओं के साथ बिताया और इन्हीं को अपने अन्तिम लक्ष्य मोक्ष के लिए सोपान बनाया।
श्री मियासावा केन्जी का जन्म जापान के जिला युवाते के अंतर्गत हानायाकी शहर में एक अगस्त अठारह सौ छियानवे में हुआ था। इनकी माता का नाम इची और पिता का नाम मासा जीरो था।
अठारह वर्ष की आयु में पहुँचते-पहुँचते श्री केन्जी में धार्मिक जिज्ञासा जाग्रत हो गई, जिसकी संतुष्टि के लिए वे बौद्ध सम्प्रदाय के एक मन्दिर में जाकर धार्मिक ग्रन्थों का अध्ययन करने और ध्यान लगाने लगे। उनकी यह असामयिक विरक्ति देखकर उनके पिता को बड़ी चिन्ता हुई और वे उन्हें उक्त कार्यक्रम छोड़कर घर-गृहस्थी में रहने के लिए समझाने लगे। श्री केन्जी ने पिता को आश्वासन देते हुये विश्वास दिलाया कि वे साधु होकर संसार से विमुख न होंगे। बल्कि अपनी साधना से सच्चा ज्ञान प्राप्त कर संसार की सेवा ही करेंगे।
श्री केन्जी ने अपने धार्मिक अध्ययन के साथ विद्यालय जाना भी आरम्भ कर दिया। उन्होंने सोचा कि यदि केवल धर्म-संदेशों के आधार से वे संसार की सेवा करना चाहेंगे तो उनकी सेवा में मानव-समाज के लिए कुछ अधिक उपयोगी न होगी। यह उनकी मात्र बौद्धिक सेवा ही होगी कोई सक्रिय सेवा न हो सकेगी। निदान उन्होंने विद्यालय में कृषि एवं कला को अपना अध्ययन का विषय बनाया। इसके साथ ही उन्होंने संगीत एवं काव्य कला का भी विकास किया। इन विषयों को चुनने में उनका उद्देश्य यही था कि कृषि की शिक्षा से वे समाज में सुख-सुविधाओं की वृद्धि का प्रयत्न कर सकेंगे और काव्य एवं संगीत के माध्यम से मानव आत्मा का कलात्मक उत्थान करने का प्रयास करेंगे, और उनका धार्मिक अध्ययन इन विषयों में धार्मिक भाव भरने में सहायक होगा।
श्री केन्जी ने अपने अध्ययन में तन, मन और समय का सम्पूर्ण उपयोग करके तेईस वर्ष की आयु में ही कृषि-विषयक अध्ययन को पूरा कर लिया। उनकी इस परिश्रमशीलता एवं प्रखर प्रतिभा को देखकर उनके विद्यालय ने ही उनको कृषि विभाग में सहायक शिक्षक के पद पर नियुक्त कर लिया जिससे वे अपने शिक्षक के तत्वावधान में कृषि अनुसंधान का कार्य करने लगे।
चार साल तक अध्यापन करने के बाद केन्जी टोकियो चले आये और वहाँ लेख-शोधन कार्य में लग गये। अध्यापन कार्य का त्याग करते समय उन्होंने अपने सहयोगी तथा शिक्षक जिनके तत्वावधान में वे कार्य करते थे, उनको बताया कि अब वे कुछ नवीन शोध कार्य करेंगे जिससे कि जनता का वास्तविक हित साधन कर सकें।
टोकियो आकर श्री केन्जी ने अपना कार्यक्रम और भी अधिक व्यस्त बना लिया। वे दिन का अधिकाँश भाग प्राचीन लेख शोधन में लगाते और रात में बौद्ध मन्दिर में जाकर प्रचार कार्य करते। इतना ही नहीं छुट्टी के दिन जाकर पुस्तकालय में पूरे समय अध्ययन किया करते थे।
अपनी इस व्यस्तता के साथ उन्होंने भोजन के प्रकार एवं मात्रा में एक बड़ा परिवर्तन कर दिया। वे दिन में एक बार थोड़े से आलू ही खाया करते थे और फिर सारे दिन पानी ही उनका भोजन बना रहता था। श्री केन्जी की यह कठिन तपस्या देखकर अनेक परिचितों ने कहा श्री केन्जी आपने तो सम्पूर्ण जीवन ही काम के लिये उत्सर्ग कर दिया है। ऐसा पता चलता है कि आपको अपने जीवन से जरा भी मोह नहीं है।
श्री केन्जी ने उत्तर दिया ‘निःसन्देह मैंने ऐसा ही किया है।’ मैं जीवन को अपना नहीं समझता। इसको परमात्मा की धरोहर मानता हूँ, जो कि मुझे जनहित का कार्य करने के लिए दिया गया है। साथ ही अब मैंने आजीवन ब्रह्मचर्यपूर्वक रहने को निश्चय कर लिया है। अपने इस व्रत का पालन करने के लिए केवल काम ही ऐसा साधन है जो सबसे अधिक सहायक हो सकता है। ब्रह्मचर्य पालन के लिए जो व्यक्ति सक्रियता छोड़कर अन्य साधनों का सहारा लिया करते हैं मेरे मत से वे ठीक नहीं करते। केवल ब्रह्मचर्य बनाये रखने के लिए ही जो इस व्रत को लेते हैं उनका सारा समय सजगता पूर्वक उसकी रक्षा करने में ही लग जाता है वे अपने इस व्रत का कोई लाभ समाज को नहीं दे पाते हैं। ब्रह्मचर्य का पालन शारीरिक, मानसिक तथा आध्यात्मिक शक्ति संचय करने के लिए किया जाता है सो भी समाज अथवा राष्ट्र की कोई सेवा करने के लिए। जिसने ब्रह्मचर्य से उपार्जित शक्तियों का कोई उपयोग संसार के लिए नहीं किया उसने मानो अपने गृहस्थ जीवन को निरर्थक ही तिलाँजलि दे दी है।
राजधानी टोकियो में कुछ समय काम करने के बाद वे पुनः अपने घर युवाते चले आये। उनकी वापसी का कारण उनकी बहन की रुग्णता थी। उनकी छोटी बहन इतनी बीमार हो गई कि बचने की कोई आशा न रही। उसने मृत्यु शैय्या पर अपने बड़े भाई केन्जी को देखने की इच्छा प्रकट की। केन्जी अपनी बहन की अन्तिम इच्छा पूरी करने के लिए टोकियो से वापस चले आये। घर आकर उन्होंने अपने हाथ से बहन की सेवा-सुश्रुषा की जिससे कि कुछ ही समय में वह अच्छी हो गई। परिवार के लोगों का विश्वास था कि यदि केन्जी घर न आये तो सम्भव है कि उनकी बहन न बचे। इसलिए बहन के जीवन के लिए केन्जी को अनुरोधपूर्वक बुलाया गया था। केन्जी ने टोकियो से चलते समय विदाई समारोह में कहा कि मैं बहन के मोह से घर नहीं जा रहा हूँ बल्कि एक जाते हुए मानव-जीवन को साँत्वना देने के लिए जा रहा हूँ।
बहन के स्वस्थ हो जाने के बाद श्री केन्जी हायाना के कृषि विद्यालय में अध्यापन करने लगे। इसी समय उन्होंने सैकड़ों कवितायें तथा अनेकों नाटक लिखे जो कि उन्हीं की देख-रेख में अभिनीत भी किये गये। श्री केन्जी की अध्यात्म भावों से भरी हुई कवितायें आज भी जापान में घर-घर गाई जाती हैं।
लगभग पाँच छः वर्ष अध्यापन करने के बाद श्री केन्जी कृषि विद्यालय से निकले हुए तरुणों को कृषि का सक्रिय प्रशिक्षण देने के लिए अध्यापन छोड़कर कृषि करने लगे। उन्होंने नगर से दूर जंगल में स्वयं अपने हाथ से झाड़ियाँ काटकर एक छोटा-सा फार्म बनाया और उसी के किनारे एक कुटी बनाकर रहने लगे। वे अपने हाथ से खेती करते, छात्रों को निःशुल्क प्रशिक्षण देते और अवकाश के समय धर्म प्रचार करते।
इस प्रकार श्री केन्जी ने अन्य सभी ओर से अपने को पूर्ण रूप से जनहित में लगा दिया। उन्होंने एक “आदर्श धरती मानव संघ” की स्थापना का सूत्रपात किया और किसान संस्कृति के विकास के लिए प्रचार करना प्रारम्भ कर दिया। धरती-मानव संघ की स्थापना का उद्देश्य बतलाते हुए श्री केन्जी ने बतलाया कि वे चाहते हैं कि कृषि विद्यालय से निकले हुए छात्र केवल मौखिक शिक्षक ही न बनें बल्कि वे अपने हाथों से खेती करें जिससे कि परिश्रम एवं बौद्धिकता का समन्वय हो सके। मेरा विश्वास है कि कृषि-फार्म में शिक्षा पाये हुये छात्र यदि किसान बन जाने लगें तो देश शीघ्र ही धन-धान्य पूर्ण हो जाये, और किसान संस्कृति से मेरा मतलब है कि एक ऐसी श्रमिक-संस्कृति का विकास किया जाये जिससे कि संसार के श्रमिक वर्ग का संगठन हो सके और संसार श्रम की महत्ता समझने लगे और उसका आदर करने लगे। ऐसा होने से संसार में फैला हुआ संघर्ष बहुत कुछ दूर हो सकता है।
श्री केन्जी ने अपने उद्देश्य के प्रचार के लिए अथक परिश्रम किया। वे गाँव-गाँव घूमते, किसानों को इकट्ठा करते और उन्हें श्रम का महत्व बतलाते हुए कृषि की वैज्ञानिक विधि सिखाते। उन्होंने अपने फार्म पर एक कृषि-प्रशिक्षण केन्द्र खोलने के साथ-साथ गाँवों में भी अनेक ऐसे छोटे-छोटे केन्द्र खोले जहाँ किसानों को आवश्यक प्रशिक्षण दिया जाता था। उनके चलाये हुए अनेक प्रारम्भिक पाठशालाओं में बच्चों को शुरू से ही कृषि कार्य में रुचि पैदा की जाती थी।
श्री केन्जी अपने फार्म पर जो प्रशिक्षण दिया करते थे, उसका कोई पारिश्रमिक न लिया करते थे बल्कि शिक्षणार्थियों को यथा सम्भव अपने हाथ से पैदा किया हुआ अन्न, सब्जी तथा फल खिलाया करते थे। श्री केन्जी के इस अथक प्रयत्न का फल यह हुआ कि जापान की जनता ने श्रम तथा कृषि की महत्ता समझी और शीघ्र ही वह पिछड़े हुए देशों की पंक्ति से विकसित देशों की पंक्ति में आ गया।
दिन-रात के इस राष्ट्रीय कार्य में निरन्तर संलग्न रहने से श्री केन्जी का स्वास्थ्य खराब हो गया और वे बीमार पड़ गये। अपनी बीमारी की हालत में श्री केन्जी ने किसी से सेवा नहीं ली और न अधिक दवाओं पर ही निर्भर रहे। उन्होंने अपने भोजन के समय तथा आत्म-विश्वास के बल पर तीन साल के लम्बे क्षय रोग पर विजय पाली। बीमारी की हालत में उनके डॉक्टर मित्रों ने उन्हें अंडा तथा मछली का शोरबा खाने के लिए परामर्श दिया किन्तु वे इसके लिए तैयार न हुए। उन्होंने स्पष्ट कह दिया कि मैं जीवन-भर शाकाहारी रहा हूँ और अब जिन्दगी के मोह में पड़कर अपने शाकाहार का नियम नहीं तोड़ सकता। जिन्दगी मेरी अपनी नहीं है। वह परमात्मा की धरोहर है फिर भी मैं अधिक समय जनता की सेवा करने के लिए उसे बचाने का प्रयत्न करूंगा तथापि अपने आहार सम्बन्धी नियम को कदापि न त्यागूँगा।
इस दशा में श्री केन्जी ने शारीरिक श्रम करना कम कर दिया और उसके स्थान पर बौद्धिक कार्य में अधिक समय देने लगे। इसी अन्तिम समय में उन्होंने इतने सुन्दर बाल साहित्य का सृजन किया कि आगे चलकर वह सारे संसार में बच्चों के पाठ्यक्रम में स्वीकृत कर लिया गया। बाल-साहित्य लिखने के साथ श्री केन्जी ने जो कवितायें इस अवधि में लिखीं उन्होंने उन्हें कवि के रूप में भी अमर कर दिया। श्री केन्जी का गद्य साहित्य जहाँ समाज-सुधार की दिशा में प्रेरणाप्रद रहा करता था वहाँ उनका पद्य साहित्य मनुष्यता के विकास की प्रेरणा देने वाला रहा है।
अपने अन्तिम काल में श्री केन्जी ने जो कवितायें लिखीं वे उनकी सर्वोत्तम रचनायें हैं। उनके काव्य साहित्य का महान उद्देश्य उनकी एक अन्तिम रचना से समझा जा सकता है। जिसका भावार्थ इस प्रकार है—
“मेरी इच्छा है कि मैं एक ऐसा मानव बनूँ”—
मैं सशक्त शरीर धारण कर सकूँ। ऐसा शरीर जिसका आधार संयम हो और जिस पर प्रकृति के प्रकोपों का कोई प्रभाव न पड़ सके और जो दिन-रात काम करके भी न थके—मैं एक ऐसा मानव बन सकूँ —जिसकी आत्मा राग द्वेष के वशीभूत न हो, जिनका मन स्वार्थ देखने की योग्यता ही न रक्खे और जिसकी बुद्धि परमार्थ एवं परोपकार की पोषिका हो।”
“मैं एक ऐसा मानव बन सकूँ जिसकी कोई आवश्यकता न हो और जो अपने लिए कुछ भी न करके औरों के लिए सब कुछ कर सके।”
“मैं एक ऐसा मानव बन सकूँ—जिसकी सहानुभूति चारों दिशाओं में फैली रहे। पूर्व दिशा में यदि किसी बच्चे की बीमार देखूँ तो दौड़कर उसकी सेवा करने लगूँ, पश्चिम दिशा में यदि किसी थकी हुई माँ को देखूँ तो उसका बोझ उठाकर सहायता कर सकूँ, उत्तर दिशा में यदि विवाद होता देखूँ तो प्रार्थना पूर्वक लोगों को न लड़ने के लिए कह सकूँ और दक्षिण दिशा में यदि किसी को मृत्यु शय्या पर देखूँ तो उसको ढांढस बांधकर धर्म का सन्देश दे सकूँ।”
इस प्रकार साहित्य, श्रम तथा धर्म से संसार एवं समाज की सेवा करते हुए श्री मियासावा केन्जी ने सन् 1929 में अपना शरीर त्याग दिया।
आज के अर्थ-संकट के समय में निरुपयोगी व्यक्ति क्या परिवार, क्या राष्ट्र और क्या समाज सभी के लिये भार स्वरूप ही सिद्ध हो सकते हैं। ऐसे निरुपयोगी व्यक्तियों में अपाहित तथा अपंग तो हो ही सकते हैं, वृद्ध भी इसी गणना में आ सकते हैं। कौन से वृद्ध—जिनकी उपयोगिता शारीरिक तथा बौद्धिक दोनों रूपों में खत्म हो चुकी हो और वे समाज परिवार, अथवा राष्ट्र किसी के काम के न रहे हों। भारत जैसे अपूर्ण परिस्थितियों वाले देश में जहाँ अक्षत शरीर नौजवान तक समाज व राष्ट्र के लिये अधिक उपयोगी सिद्ध नहीं हो पा रहे हैं वहाँ वृद्धों से उपयोगिता की अपेक्षा कहाँ तक की जा सकती है? निःसन्देह वृद्ध भारत के लिये एक समस्या जैसे बन सकते हैं। इस समस्या के और भी गहन हो जाने की सम्भावना है-क्योंकि सर्वेक्षण के आधार पर डॉक्टरों का मत है कि पिछले पचास साठ साल में मनुष्य जीवन में लगभग अठारह बीस साल की वृद्धि हो गई है!
वृद्धों की समस्या केवल उनकी निरर्थकता ही नहीं है, प्रश्न केवल यह नहीं है कि वृद्धावस्था में लोग बहुधा कमा नहीं पाते, एक बड़ी समस्या है उनका अशक्त होकर प्रायः रुग्ण रहना, जिससे परिवार को उनकी देखभाल, दवा दारु तथा पौष्टिक आहार का प्रबंध करने में श्रम, समय, खर्च करने के अतिरिक्त परिचर्या तथा साज संभाल भी करनी पड़ती है। मोटे तौर से यह सारा खर्च एक तरह से जाता बेकार ही है, क्योंकि इससे किसी प्रकार की प्राप्ति की आशा तो होती नहीं। बिना किसी मुजायके के कहा जा सकता है कि यदि वृद्धों पर होने वाला व्यय बच्चों पर लगाया जाता तो वे अधिक स्वस्थ तथा सुयोग्य बन सकते हैं, और यदि बचत की जाये तो आगे परिवार का सम्बल बन सकता है।
इतना ही नहीं वृद्ध तब और भी समस्या बन जाते हैं जब वे अपने साथ विविध प्रकार के व्यसन साथ लाकर बुढ़ापे में प्रवेश करते हैं और अनेक प्रकार की विकृतियों से अपने स्वभाव में चिड़चिड़ाहट और अशक्यता में ईर्ष्या, द्वेष, वासना, तृष्णा, लिप्सा आदि निर्बलताओं को लपेट लाते हैं। सही बात तो यह है कि इस प्रकार के विकृत बूढ़े ही वास्तविक समस्या बन जाते हैं। नहीं तो वैसे वृद्ध जन परिवार समाज व राष्ट्र के गुरुजन होते हैं। उनके अनुभव बड़ी-बड़ी समस्यायें सुलझाने में काम आते हैं। उनका शान्त रक्त और संतुलित मस्तिष्क संसार की नौजवान गर्मी की बहुत कुछ समझाये बुझाये रहता है। उनके अनुत्तेजित नियंत्रण में संसार के जवान बहुत कुछ सधे रहते हैं। नहीं तो आगा–पीछा न सोचने वाली नौजवानी की आग संसार को जल्दी जला डाले! इस प्रकार वृद्ध जन समाज के रक्षक भी हैं। उनके रहने से परिवार, समाज राष्ट्र का वजन बढ़ता है और उनका होना आवश्यक भी है।
संसार के अन्य सारे देशों से अधिक वृद्धों का आदर भारत में होता रहा है, इस समय भी वही मान्यता है और शायद भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति के आधार पर यह मान्यता आगे भी बनी रहेगी, किन्तु जबकि वृद्ध जन अपनी ओर से इस महान् मान्यता को हिलने न दें।
गुरु-आदर की मान्यता बनाये रहने के लिये वृद्धों का कर्तव्य है कि वे किसी न किसी प्रकार से अपनी उपयोगिता बनाये रहें और जहाँ तक सम्भव हो परिवार पर बोझ न बनें। वे वृद्धावस्था में भी कोई न कोई ऐसा काम करते रह सकते हैं जो उनके करने योग्य हो। उन्हें इस भावना से निष्क्रिय नहीं रहना चाहिये चूँकि वे परिवार के गुरुजन हैं। उन्होंने लड़कों को पाला पोसा है, पढ़ाया लिखाया और किसी योग्य बनाया है इसलिये बेटे पोतों से बैठे-बैठे सेवा लेना उनका अधिकार है! यह ठीक है कि हमारे गुरुजन उस अधिकारी के सर्वथा अधिकारी हैं। उन की यथासाध्य सेवा होनी ही चाहिये। फिर भी यदि वे अपने इस अधिकार को यथा सम्भव अनुपयुक्त ही रहने दे तो उनको गुरु की गरिमा कई गुना बढ़ जाये और वे सेवा ही नहीं अधिकाधिक श्रद्धा व पूजा के पात्र बन कर न जाने कितना सम्मानित जीवन-यापन करें। उनकी प्रजा उन्हें हाथों हाथ लिये रहे और सेवा सुश्रुषा के साथ रहकर कुछ न करने और आराम से बैठने के लिये प्रार्थना करती रहे! कदाचित अपने नैतिक अधिकार के उपयोग की अपेक्षा उनका सक्रिय रहना उन्हें अधिक सुखी बना सकता है। इसलिये ही मनीषी व्यक्तियों ने अधिकार से अधिक त्याग करने की भावना को महत्व दिया है!
फिर निष्क्रिय रहने से शरीर में शिथिलता, बुद्धि में विकार और आत्मा में आलस्य आता है जिससे मनुष्य-परिवार पर क्या स्वयं अपने पर भार स्वरूप बन जाता है! सन्तानों के बहुत कुछ समर्थ एवं सम्पन्न होने पर भी यथासम्भव यदि उनके आभार से बचा रहा जा सके तो शायद जीवन का वह अन्तिम चरण जवानी की कर्मठता से भी अधिक महनीय एवं माननीय हो! जो वृद्ध जन इस गौरव को ले सकें वे अवश्य लें। उन्हें बेटे पोतों की कमाई खाने और सेवा लेने की सौभाग्यपूर्ण भावुकता से बचने का ही प्रयत्न करना चाहिये।
अब यदि किन्हीं वृद्ध जनों की स्थिति सक्रिय जीवनयापन करने की न भी हो तो वे कम से कम अपनी आवश्यकताओं को वैसे ही काट कर गिरा दें जिस प्रकार माली पौधों की बेकार बढ़ी हुई शाखाओं को काट देता है! जवानी के व्यसनों और विकारों को तो शपथपूर्वक त्याग ही देना चाहिये। वासना, तृष्णा, लिप्सा और लोलुपता को तिलाँजलि देकर अपने को अधिक से अधिक लघु तथा सरल बना लेना चाहिये। ऐसा करने से उनका चित्त स्वयं ही शान्त, प्रसन्न तथा बंधन रहित रहेगा। बुद्धि निर्विकार होगी और आत्मा में बल का संचार होगा जो परलोक चिन्तन की दिशा में बड़ा ही उपयोगी सिद्ध होगा! जवानी की विकृतियों को वृद्धता में बनाये रहने वाले वृद्धों को बड़े कष्ट का सामना करना पड़ता है। संतान से एक बार भोजन-वस्त्र का तकाजा किया जा सकता है किन्तु अनावश्यक व्यसन वासनाओं का नहीं। व्यसनीय व्यक्ति को भोजन वस्त्र का अभाव उतना नहीं सताता जितना कि व्यसनों की आपूर्ति। व्यसनी वृद्ध जनों का जीवन बड़ा ही दयनीय तथा अनादर पूर्ण बन जाता है! व्यसनों को साथ लगाये रहने से उनसे उत्पन्न होने वाले रोगों से भी पीछा नहीं छूटता ऐसी दशा में पर-निर्भरता के साथ व्यसनों की मार से त्रस्त बुढ़ापे की अशक्यता का क्या हाल होगा इसका अनुमान सहज ही में लगाया जा सकता है!
बुढ़ापे का शेष जीवन शाँतिपूर्ण आत्मचिन्तन तथा भगवान के भजन करने के लिये होता है, धक्के खाने के लिये नहीं। यही वह मूल्यवान समय होता है जब मनुष्य अपने परलोक-प्रसाद की नींव रखता है। किन्तु यह सम्भव तभी हो सकता है। जब मनुष्य पहले से ही इसकी तैयारी करके अन्तिम चरण में प्रवेश करे जवानी में अथक परिश्रम करके अपने कर्तव्यों को पूरी तरह से पूरा करे। संतानों को इस योग्य बनाये कि वे उसका दायित्व ठीक से सँभाल सकें। अपने लिए भी स्थायी परिस्थितियों का निर्माण करे जो आगे चल कर उसकी सच्ची सहयोगी बन सकें संयम नियम तथा कठोर व्रत पालन द्वारा इतनी शक्ति, इतना तप तेज संचय करें जो अन्तिम क्षण तक उसे अशान्त न होने दे बुढ़ापा जीवन की अनिवार्य शर्त है, एक दिन सबको ही बूढ़ा होना होता है। जीवन का वह समय ऐसा होता है, जिसमें संचय का अवसर नहीं होता केवल व्यय ही करना होता है। इस व्यय के लिये आवश्यक संचय जवानी में ही किया जा सकता है। जवानी को अस्त-व्यस्त बिता डालने वालों को वृद्धावस्था में बड़ी कठिनाई का सामना करना पड़ता है, जवानी के ज्वार में बुढ़ापे का भाटा न देखने वाले अदूरदर्शी ही होते हैं जीन को अहने कस दृष्टि-दोष का फल बुढ़ापे में भोगना पड़ता है जवानी के जीवंत दिन जिन कष्टों को सहन कर सकते हैं बुढ़ापा नहीं कर सकता इसलिये मनुष्य को चाहिये कि वह जवानी में अपने को इतना अवश्य कस ले कि आगे चलकर बुढ़ापे का बोझ आसानी से उठा सके।
ऋषि परम्परा से आश्रम जीवन जीने वाले बहुत कम धोखा खाते हैं। ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ तथा संन्यास विभाग के अनुसार जीवन क्रम कदाचित ही असफल होता है! वह आजीवन अपनी संचित शक्ति के आधार पर परिवार समाज तथा राष्ट्र को किसी न किसी प्रकार उपयोगी बना ही रहेगा। जिन्हें अपना बुढ़ापा समस्या न बनाना हो और ठीक-ठीक गुरु का आदर-वाँछित हो वह जवानी में ही बुढ़ापे की तैयारी करता हुआ बुढ़ापे में पहुँचे।
आज की तरुण पीढ़ी अपराध एवं अनुशासन-हीनता की ओर वेग से बढ़ती जा रही है। यह दुष्प्रवृत्ति न केवल वर्तमान के लिये ही भयप्रद है बल्कि भविष्य के लिये भी भयानक है। जो आज बिगड़ गया है वह कल आने वाले के लिये बुराई का उदाहरण बन जायेगा। वर्तमान को देख कर आने वाला भविष्य भी अनुकरण करता हुआ वैसा बन जायेगा। इस प्रकार समाज में बुरी प्रवृत्तियों की एक परम्परा लग जायेगी। इस प्रकार बढ़ती हुई अपराध, अनुशासनहीनता, अशिष्टता एवं अश्लीलता की दूषित प्रवृत्तियाँ ठीक नहीं। इन्हें रोकने का यथासम्भव प्रयत्न किया ही जाना चाहिए।
हर नागरिक किसी न किसी की सन्तान हुआ करता है। यदि अभिभावक प्रारम्भ से ही अपने बच्चों में शुभ-संस्कारों के बीज बो दें तो आगे चल कर वे अच्छे नागरिक ही बनें! अच्छे नागरिक अपने बच्चों को अच्छा बनायेंगे ही। इस प्रकार एक-दो पीढ़ी बाद समाज से बुरी प्रवृत्तियों का उन्मूलन हो जायेगा। इस दिशा में अभिभावक अपना कर्तव्य समझें और उसे पूरा करने का भरसक प्रयत्न करें। किशोर की बुद्धि परिपक्व नहीं होती। इसलिये वह अपना भला बुरा स्वयं ठीक से नहीं समझ पाता! इस समय किशोर को यदि पूरी तरह उसी पर छोड़ दिया जाता है तो उसके बहक कर विपथ गामी हो जाने का ही डर रहता है। और फिर आज तो चारों ओर का वातावरण विपथ गमन को ही प्रोत्साहित करने वाला हो गया है! इस अवस्था में एक बार बहक जाने पर किशोर अपने स्वास्थ्य एवं चरित्र को चौपट किये बिना नहीं मानेगा! वह कुछ ही दिनों में दुर्गुणों एवं दोषों का भंडार बन कर अपना होनहार जीवन अभिशाप बना लेगा और आगे चल कर अपने पाप से समाज में विकृतियों की वृद्धि करेगा! उसका आचरण तथा व्यवहार परिवार और समाज दोनों के लिये ही अहितकर बन जायेगा।
ऐसी स्थिति होने पर भी किशोरों को उनकी अपनी जिम्मेदारी पर पूरी तरह छोड़ा नहीं जा सकता। अभिभावकों को उनके, परिवार के, समाज के तथा राष्ट्र के हित में उन पर नजर रखनी होगी। उनके निर्माण में हाथ देना ही होगा! ऐसा करने में उनका मार्ग डाँट-डपट अथवा मारपीट का न होकर प्रेम, परामर्श तथा व्यवहार-संस्कार का हो सकता है।
अभिभावकों को चाहिये कि वे किशोरावस्था प्रारम्भ होने से पूर्व ही अपने बच्चों पर शुभ-संस्कार डालने प्रारम्भ कर दें, जिससे कि निरंकुशता प्रिय किशोरावस्था में उन्हें अभिभावकों का परामर्श एवं व्यवहार अस्वाभाविक न अनुभव हो। बाल्यकाल से बने हुये मार्ग पर वे बिना किसी द्वन्द्व के आसानी से चलते चले जायेंगे। बाल्यकाल से ही उनके मन बुद्धि को जो दिशा दे दी जायेगी किशोरावस्था में भी उनकी गति उसी दिशा में बनी रहेगी। मनुष्य के मन और बुद्धि गहराई से पाये हुये मार्ग से सामान्यतया विचलित नहीं हो पाते। इसलिये बालकों पर उच्च संस्कारों का सृजन बाल्यकाल से करना अभिभावकों के लिये सरल भी होगा और उपयुक्त भी।
किशोरों में शुभ संस्कार सृजन के लिये घर का वातावरण अनुकूल होना बहुत आवश्यक है। उपयुक्त वातावरण के अभाव में उपदेश, शिक्षा तथा परामर्श का कोई भी वाँछित प्रभाव उन पर नहीं पड़ेगा। वाणी की अपेक्षा वातावरण का प्रभाव मनुष्य के मन मस्तिष्क पर अधिक गहराई से पड़ता है! उपयुक्त वातावरण के बीच शुभाचार विचार की शिक्षा किशोरों के मानसों में द्विगुण रूप से फलवती होती है। घर का वातावरण उत्तम होने से किशोर का मन-मस्तिष्क तथा शारीरिक स्वास्थ्य भी उत्तम होगा। उसका चित्त शुद्ध एवं प्रसन्न रहेगा ऐसी दशा में साधारण भोजन भी पौष्टिक पदार्थों की तरह ही गुणकारी होगा। शरीर में शुद्ध रक्त का निर्माण होगा जिससे बल वीर्य की वृद्धि के फलस्वरूप उसकी स्मृति बलवती होकर शीघ्र ही शुभ संस्कारों को ग्रहण कर स्वभाव में परिवर्तित कर देगी।
जिन घरों में दिन रात हाय-हाय और किच-किच बनी रहती है उन घरों के बच्चे बहुत कम स्वस्थ, सुशील तथा सभ्य बन पाते हैं। कितना ही बचाव क्यों न किया जाय वे वातावरण के अशुभ संस्कार ग्रहण किये बिना न मानेंगे। लड़ाई, झगड़े, द्वेष डाह के अनुपयुक्त वातावरण में बालक, स्वस्थ, सुन्दर,सुशील एवं दीर्घजीवी न बन सकेंगे जबकि उन्हें वास्तव में बनना ऐसा ही चाहिये। उनके अंगों का विकास रुक जायेगा। प्रसन्नता के अभाव में उनकी पाचन क्रिया बिगड़ जायेगी। पुष्टि कारक धातुओं का निर्माण रुक जायेगा। उनकी कार्यक्षमता का ह्रास होगा। वृत्तियाँ कठोर एवं कर्कश हो जायेंगी, जिससे कि वे दया, उदारता, सहानुभूति, सहायता सहयोग तथा संवेदना के मानवीय गुणों से वंचित रहकर अनुपयुक्त नागरिक ही बनेंगे। बच्चों के निर्माण में घर के वातावरण का बहुत महत्व है। अभिभावकों को चाहिए कि वे बच्चों के हित में घर का वातावरण हर मूल्य एवं प्रयत्न से उपयुक्त बनाए रक्खें।
किशोरों के निर्माण में शिक्षा दीक्षा का अपरिहार्य महत्व है! सभ्य और सुशील होने पर भी बालक मृगछौने जैसे भोले होने पर भी अबोध पशु ही रह जायेंगे। अशिक्षित विनम्र भी पूरी तरह सभ्य नहीं कहा जा सकता! शिक्षा सभ्यता तथा नागरिकता की आधारशिला है। इसलिए बच्चों का पढ़ाया जाना भी बहुत आवश्यक है। विद्याध्ययन के विषय में किशोरावस्था में विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। इस अवस्था में यदि उन्हें विद्या के प्रति उदासीनता से पारित कर शिक्षा की ओर विशेष तौर पर उन्मुख कर दिया जाता है तो वे स्कूली शिक्षा समाप्त करने के बाद भी अध्ययनशील बने रहते हैं। बाल्यकाल से लेकर किशोरावस्था ही शिक्षा के संस्कार डालने के लिये सबसे उपयुक्त आयु है। इस समय बालकों की बुद्धि बड़ी ही कोमल तथा ग्रहणशील होती है। इस समय के थोड़े से ही अभ्यास से वे बहुत कुछ ग्रहण कर लेते हैं। आगे चल कर उनकी बुद्धि विकसित होने के साथ-साथ प्रौढ़ भी हो जाती है जिससे जल्दी पाठ ग्रहण नहीं कर पाती! सयाने हो जाने पर उन्हें पढ़ने में कुछ शर्म भी आती है और उन का उद्दण्ड मन पढ़ने में लगता भी नहीं! इसलिये बाल्यकाल से लेकर किशोरावस्था तक बच्चों की शिक्षा की ओर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिये।
प्रचुर सम्पत्ति का स्वामी होने पर भी शिक्षा शून्य मनुष्य समाज में अधिक आदर नहीं पाता, उसका क्षेत्र अपने जैसे अशिक्षित व्यक्तियों तक ही सीमित हो जाता है। वह समाज के बुद्धिमानी लोगों के बीच घुल-मिल नहीं सकता। उसका परिचय संसार की गतिविधियों से नहीं हो पाता। वह अपने व्यापार व्यवसाय तक ही कूपमंडूक बना रहता है। कूप मंडूकता से स्वार्थ एवं संकीर्णता का प्रादुर्भाव होता है। तब ऐसी दशा में किसी से अच्छे नागरिक बनने की आशा करना उचित नहीं कहा जा सकता। अशिक्षित धनवान अपने धन का उचित उपयोग नहीं कर पाता। या तो वह बहुधा कृपण हो जाता है अथवा अपव्ययी। यह दोनों अवस्थायें किसी अच्छे नागरिक के उपयुक्त नहीं कही जा सकतीं! अच्छा नागरिक बनकर अपने अधिकार तथा कर्तव्यों को ठीक से समझने तथा उपयोग करने के लिये शिक्षा की बहुत बड़ी आवश्यकता है। किसी भी अभिभावक को अपने बालकों को अशिक्षित नहीं रखना चाहिये। उन्हें हर अवस्था हर दशा तथा हर परिस्थिति में शिक्षा दिलानी ही चाहिए।
धार्मिक शिक्षा के अंतर्गत बालकों को शिष्टता, उदारता, श्रमशीलता, सदयता, स्वच्छता आदि के नियमों का अभ्यास करा देना तथा सत्य, शिष्ट, विनय, मधुर एवं प्रसन्न व्यवहार का अभ्यस्त बना देना ही आवश्यक होगा! प्रातः जागरण, भ्रमण, व्यायाम, शुद्ध सात्विक भोजन, स्नान, संयम, निवास, वास तथा वसनों की सादगी स्वच्छता तथा मनोयोग से अध्ययन की प्रवृत्ति पैदा कर देना बच्चों को धार्मिक शिक्षा दिया जाना है। प्रवृत्ति से प्रेम और ईश्वर पर आस्था उनके लिये ब्रह्मविद्या की तरह ही लाभकारी होगा। माता पिता भाई बहनों, गुरुजनों, साथियों संपर्कों तथा अन्य सर्व साधारण से उन्हें किस प्रकार का व्यवहार करना चाहिये इसका ज्ञान करा देने का अर्थ होगा कि आपने उन्हें मानो योग साधना की शिक्षा दे दी।
किशोरों के लिये घर का वातावरण, शिक्षा तथा धार्मिक शिक्षा की व्यवस्था करने वाले अभिभावक अवश्य ही समाज को सभ्य एवं सुशील नागरिक प्रदान करके श्रेष्ठ सौभाग्य के भागी बनेंगे।
मानव शरीर को स्वस्थ और कार्यक्षम रखने के लिये पोषण और श्रम दोनों की समान रूप से आवश्यकता है। ये दोनों एक दूसरे से बहुत अधिक सम्बन्ध रखते हैं। बिना पोषण के श्रम कर सकने की शक्ति उत्पन्न नहीं हो सकती और बिना श्रम किये पोषण के रूप में ग्रहण किया गया पदार्थ पच कर, रस, रक्त बनकर शरीर को पुष्ट नहीं कर सकता। इस प्रकार शरीर के विकास के लिये पोषण और श्रम प्रकृति के अटल नियम हैं। श्रम के द्वारा हमारे शारीरिक अंग घिसते हैं और पोषक आहार के द्वारा उस घिसाई की पूर्ति होती है। जब तक यह क्रम स्वाभाविक रूप से चलता रहता है, पोषण और श्रम में संतुलन बना रहता है तब तक स्वास्थ्य ठीक तरह स्थिर रहता है और कार्य करने की शक्ति बनी रहती है। पर जब इन दोनों में असंतुलन हो जाता है, पोषण अधिक होकर श्रम में कमी पड़ जाती है या श्रम ज्यादा करने पर भी पर्याप्त पोषण नहीं मिलता तो उसका हानिकारक प्रभाव शरीर पर पड़ने लगता है और स्वास्थ्य में किसी न किसी प्रकार का दोष उत्पन्न हो जाता है।
शरीर की बनावट, आहार की पाचनक्रिया और उसे स्वस्थ दशा में रखने के नियमों की जानकारी न रखने वाले व्यक्ति सोचा करते हैं कि यदि उन्हें अच्छे-अच्छे पदार्थ खूब खाने को मिलें तो वे भली प्रकार सशक्त और तन्दुरुस्त रह सकते हैं। पर यह विचार एकांगी है। पोषण के पदार्थ चाहे जैसे उत्तम हों वे तभी कुछ लाभ पहुँचा सकते हैं जब वे शरीर में अच्छी तरह मिल जायें। यदि वे मुँह से खाये जायें और बिना ठीक ढंग से परिपाक हुये मल के रूप में बाहर निकल जायें तो उनसे लाभ के स्थान में उल्टी हानि होने की संभावना ही रहेगी। आधा पचा या कच्चा भोजन जब मलाशय में पहुँचता है तो वह सड़ने लगता है और तरह-तरह के दूषित तत्व उत्पन्न करके स्वास्थ्य को खराब करता है। पोषण के पदार्थ तभी शरीर को पुष्ट करने वाले सिद्ध होते हैं जब पर्याप्त श्रम से पाचन-यंत्र अपना कार्य ठीक ढंग से करता रहता है और खाये हुये भोजन से शुद्ध रस और रक्त बनकर विभिन्न अंगों में पहुँच कर उनकी घिसाई की पूर्ति करते रहते हैं।
इस दृष्टि से विचार करने पर शारीरिक श्रम हमारे जीवन-विकास के लिये एक अनिवार्य नियम सिद्ध होता है। जो लोग गाँवों अथवा जंगलों के स्वाभाविक वातावरण में रहते हैं और जिनको अपने जीवन-निर्वाह की सामग्री को प्राप्त करने में पर्याप्त परिश्रम करना पड़ता है उनके लिये किसी प्रकार के अतिरिक्त व्यायाम द्वारा स्वास्थ्य रक्षा की समस्या कभी उपस्थित नहीं होती। खेतों की जमीन को खोदना, गोड़ना, पेड़ों पर चढ़कर लकड़ी काटना, भारी बोझा उठाकर एक स्थान से दूसरे स्थान को ले जाना, जानवरों को भगाने या पकड़ने के लिये दौड़-धूप करना आदि कार्य ही ऐसे स्वाभाविक व्यायाम हो जाते हैं जिससे उनके समस्त अंगों का पर्याप्त संचालन—हिलना डुलना हो जाता है और उनकी पाचन-शक्ति तीव्र बनी रहती है। पर जो लोग शहरों में रहकर ऐसे धन्धों या रोजगारों में संलग्न रहते हैं जिनमें शारीरिक श्रम के बजाय मानसिक और बौद्धिक श्रम की प्रधानता रहती है, उनकी परिस्थिति इससे विपरीत होती है। वे अधिक वेतन या मुनाफा प्राप्त करके पोषक पदार्थ तो अधिक मात्रा में पा जाते हैं, पर उनको शारीरिक श्रम तथा अंग-संचालन का अवसर बहुत कम मिलता है। इससे उनकी पाचन-शक्ति दुर्बल बनी रहती है और अधिक घी, दूध से बने पदार्थों अथवा मेवा, मिष्ठान्न को अच्छी तरह नहीं पचा सकती। ऐसे व्यक्तियों के लिये इस बात की आवश्यकता पड़ती है कि अपने अर्थोपार्जन के धंधे के अतिरिक्त स्वास्थ्य रक्षा के निमित्त प्रतिदिन खुले वातावरण में किसी प्रकार का व्यायाम, शारीरिक श्रम भी करते रहें, जिससे शरीर के भीतरी-बाहरी अंगों को संचालन करने का उद्देश्य पूरा होता रहे और उनमें स्फूर्ति तथा दृढ़ता की वृद्धि हो।
व्यायाम और भावना-
वैसे सभी प्रकार के शारीरिक श्रम स्वस्थ-जीवन की दृष्टि से हितकारी होते हैं, पर जब हम एक विशेष भावना के साथ हलका या भारी व्यायाम करते हैं तो उसका प्रभाव अपेक्षाकृत अल्प समय में ही दिखाई देने लगता है। इसका कारण शरीर और मन का वह सम्बन्ध है जिससे वे सदैव एक दूसरे को प्रभावित करते रहते हैं। मन की शक्ति यद्यपि सूक्ष्म है, पर इसमें कुछ भी सन्देह नहीं कि जिन व्यक्तियों का मन अशान्त तथा अस्त-व्यस्त दशा में रहेगा वे शरीर और स्वास्थ्य की दृष्टि से भी कभी सुखी नहीं रह सकते। श्रम के साथ-साथ मनोयोग लगा देने से दुहरा लाभ होता है। व्यायाम का प्रयोजन यही है। मन को स्वास्थ्य संवर्धन पर एकाग्र कर देने से शारीरिक विकास में भारी सहायता मिलती है।
भारतीय मल्ल-विद्या के ज्ञाता और संसार भर में भारतीय व्यायाम पद्धति का डंका बजाने वाले प्रो. राममूर्ति ने भी कहा था कि “भारतीय व्यायाम पद्धति में केवल अंगों का संचालन ही नहीं किया जाता, वरन् उसमें प्राणायाम तथा ध्यान का भी संयोग रहता है। जब मेरी छाती पर से मोटर निकाली जाती है या भारी पत्थर तोड़ा जाता है तो मैं अपना समस्त मानसिक बल छाती के ऊपर ही लगा देता हूँ। जैसे किसी साधक ने समाधि चढ़ाई हो उसी प्रकार मैं उस समय प्रत्येक ख्याल और विचार को भूल जाता हूँ। इसी का परिणाम है कि मैं बिना किसी खतरे के ऐसे कठिन प्रयोगों को सहज ही सफलतापूर्वक करके दिखाने में समर्थ हो सकता हूँ।”
यों तो व्यायाम प्रत्येक मनुष्य के लिये हितकारी है, क्योंकि संसार में शक्ति की आवश्यकता सदैव पड़ती रहती है और निर्बलता अनेक कार्यों में बाधक सिद्ध होती है। फिर भी जो लोग परिस्थितिवश ऐसे वातावरण में रहते हैं जिसमें बाहर चलने-फिरने और परिश्रम करने का अवसर नहीं मिलता अथवा जो किसी रोग के कारण निर्बल हो गये हैं या वे स्त्रियाँ जिन्हें अधिकाँश में घर के भीतर ही रहना पड़ता है, इन सब को किसी न किसी प्रकार का व्यायाम अवश्य करना चाहिये। यह अच्छी तरह समझ लेना चाहिये कि पहलवानों द्वारा की जाने वाली भारी कसरतों से इस प्रकार का स्वास्थ्य-रक्षक व्यायाम सर्वथा भिन्न होता है। पहलवानी कसरत में जहाँ उनके अंग लोहे जैसे कठोर और प्रायः बेडौल हो जाते हैं सामान्य व्यायाम से हमारे अंग कोमल, लचीले और सुडौल ही बनते हैं।
शक्ति प्राप्त करने के कृत्रिम साधन-
स्वास्थ्य-सम्बन्धी उपर्युक्त दूषित अवस्था की तरफ यदि लोगों का ध्यान जगता भी है तो वे उसके सुधार के लिये स्वाभाविक और प्राकृतिक साधनों से काम न लेकर कृत्रिम उपचारों की तरफ दौड़ने लगते हैं। कुछ समय से बहुसंख्यक लोगों की यह धारणा हो गई है कि इस प्रकार की स्वास्थ्य सम्बन्धी न्यूनता का प्रतिकार दवाओं अथवा विशेष भोजनों के द्वारा किया जा सकता है। इसके लिये वे वैद्यों के पाक अथवा आसव, हकीमों की माजूम या कुश्ते और डॉक्टरों की ‘टानिकों’ पर भरोसा करते हैं और समझते हैं ये ताकत की गोलियाँ या शीशिया कोई जादू का करिश्मा करके घर बैठे हमको तन्दुरुस्त और ताकतवर बना देंगी। कभी-कभी उनकी यह आशा थोड़े समय के लिये पूरी भी होती है और औषधियों में मिश्रित मादक तत्वों के प्रभाव से वे झूठी शक्ति का अनुभव करने लगते हैं। पर जिस प्रकार थका हुआ घोड़ा चाबुक की मार खाकर कुछ दूर तेज दौड़ भी लेता है पर उसके बाद एक साथ गिर जाता है वही हालत इन भ्रम में पड़े लोगों की भी होती है और वे कुछ महीनों या एक-दो वर्ष बाद ही पहले से भी कहीं अधिक कमजोरी और बीमारी के शिकार होते हैं और उन्हें अकाल में ही अपनी जीवन-लीला समाप्त करनी पड़ती है।
वास्तव में स्वास्थ्य रक्षा की कुँजी प्राकृतिक आहार-विहार है। शारीरिक परिश्रम जीवन के प्रवाह को निर्मल और अबोध रखने का प्रथम मूल मंत्र है। कोई भी व्यक्ति चाहे वह कैसा भी विद्वान या चतुर क्यों न हो यदि इस नियम की उपेक्षा करेगा और जान-बूझकर या परिस्थितियों से विवश होकर सदा बैठे-बैठे काम करने का स्वभाव बना लेगा तो उसे निर्बलता क्षीणता, रोग के रूप में प्रकृति का दण्ड अवश्य भोगना पड़ेगा।
नारी का क्या महत्व है? इस प्रश्न का उत्तर एक इस शब्द में ही निहित है-कि वह “जननी” है। यदि जननी न हो तो कहाँ से सृष्टि का सम्पादन हो और किस प्रकार समाज का सृजन? जननी का अभाव सृष्टि की शून्यता और उसका संभव ही संकलन है। इस प्रकार नारी सृष्टि का मूलाधार है। जो सृष्टि का मूल है उद्गम है-संसार में उसका क्या महत्व है? इसके उत्तर में वितर्क करना हीनता का द्योतक होगा!
नारी केवल सन्तान सम्पादिका ही नहीं, पालिका तथा संचालिका भी है। संसार का प्रत्येक प्राणी माँ के गर्भ से जन्म लेता है, उसकी गोद में पलता और उसका ही स्वभाव संस्कार लेकर बढ़ता है। समाज का प्रत्येक सदस्य माँ के दिये मूल संस्कारों को विकसित करता हुआ व्यवहार किया करता है और माँ अपने वही संस्कार तो सन्तान को दे सकती है जो उसके पास होंगे। शुभ संस्कारों वाली माँ शुभ और अशुभ संस्कारों वाली माँ अशुभ संस्कार ही तो दे सकेगी। यह बात उसके वश की नहीं कि स्वयं असंस्कृत हो और अपनी संतानों को सुसंस्कृत बना सके।
जननी के रूप में नारी के इस महत्व के साथ पत्नी के रूप में भी उसका बहुत महत्व है। नारी पुरुष की अर्धांगिनी कही गई है। जिस प्रकार पुरुष के बिना नारी अपूर्ण है उसी प्रकार नारी के बिना पुरुष भी अपूर्ण है। नारी और पुरुष मिलकर ही ‘एक मानव जीवन’ की पूर्ति करते हैं। इस दार्शनिक तथा भावनात्मक आधार पर ही नहीं भौतिकता के ठोस धरातल तथा वास्तविकता की यथार्थ भूमि पर भी नारी पुरुष की अर्धांगिनी है। वह संसार की कठिनाइयों और परिवार बसाने और वंश परम्परा का प्रतिपादन करने में नारी पुरुष की अनिवार्य भार्या और समान सहचरी है। उसके अभाव में यह दोनों स्थितियाँ असम्भाव्य हैं।
पुरुष एक उद्योगी तथा उच्छृंखल इकाई है। परिवार बसा कर रहना उसका सहज स्वभाव नहीं है। यह नारी की ही कोमल कुशलता है जो उसे पारिवारिक बना कर प्रसन्नता की परिधि में परिभ्रमण करने के लिये लालायित बनाये रखती है। नारी ही पुरुष की उद्योग उपलब्धियों को व्यवस्था एवं उपयोगिता प्रदान करती है। पुरुष नारी के कारण ही पुत्रवान है, परिवाहिक है और प्रसन्नचेता है। पत्नी के रूप में नारी का महत्व असीम है, अनुपम है।
पारिवारिकता ही नहीं, सामाजिकता में भी नारी का महत्व महान है। समाज केवल पुरुष वर्ग से ही नहीं बना वह स्त्री पुरुष दोनों से ही बनता है। आज समाज से यदि नारी अपने आपको दूर कर ले अथवा अपने को निकाल ले तो क्या समाज का रथ केवल पुरुष रूपी एक पहिये पर एक दिन भी चल सकता है! नारी समाज की आधी जनसंख्या है। समाज के बहुत से ऐसे काम हैं जो नारी द्वारा ही किये जाते हैं और किये जा सकते हैं। सदस्य, जिनसे मिलकर समाज बनता है नारी ही जनती है और वही उनका लालन पालन करती है। नारी समाज की आधी शक्ति है। एकोहं बहुस्यामि के सिद्धान्त पर समाज की जनसंख्या का सृजन नारी ही करती है! नारी ही अपनी योग्यता, दक्षता एवं कुशलता के अनुसार समाज को अच्छे बुरे सदस्य और राष्ट्र को नागरिक देती है। अपने गुण एवं स्वभाव के अनुसार अपनी सन्तानों को ढाल-ढाल कर देश व राष्ट्र को देना नारी का काम है। देश के निवासी शूर-वीर, त्यागी बलिदानी अथवा कायर, कुटिल और आचरण हीन बनते हैं यह जननी की ही गौरव-गरिमा पर निर्भर है। साराँश यह कि जिस प्रकार की राष्ट्र की जननी नारी होगी राष्ट्र भी उसी प्रकार का बनेगा। सामाजिकता अथवा राष्ट्रीयता के रूप में नारी का यह महत्व सर्वमान्य ही मानना पड़ेगा!
धार्मिक क्षेत्र में भी नारी का महत्व अप्रतिम है। विद्या, वैभव और वीरता की अधिष्ठात्री देवियाँ शारदा, श्री और शक्ति नारी की प्रतीक हैं। सृष्टि कर्ता परमात्मा की स्फुरण-शक्ति, माया भी नारी मानी गई है। इसके अतिरिक्त यज्ञादिक जितने भी धार्मिक अनुष्ठान पुरुष द्वारा सम्पन्न किये जाते हैं वे नारी को साथ लेकर पूर्ण किये जाते हैं। यह बात सही है कि आज यद्यपि उनमें रुढ़िता, अन्धविश्वास तथा अज्ञान का दोष अवश्य आ गया है तथापि नारियाँ पुरुषों की अपेक्षा धर्म को अधिक दृढ़ता के साथ पकड़े हुये हैं। यही नहीं अनेक बार अंधकार युगों में जब कि आक्राँत अथवा सक्रान्त समय में पुरुषवर्ग धर्म अथवा आस्तिकता से विचलित होने लगे हैं नारियों ने धर्म भावना की रक्षा की है और घरों में चोरी छिपे, सही गलत, उल्टे सीधे धार्मिक कृत्य, व्रत, उपवास और पूजा के रूप में करती रही हैं। समय-समय पर उन्होंने धर्म रक्षा में अपने प्राण तक दिये हैं और आज के इस विकृत काल में भी नारियाँ धर्म-धारण में पुरुषों से आगे ही हैं। पुरुष के नास्तिक हो जाने अथवा धर्म के प्रति अविश्वासी हो जाने पर भी नारियाँ बहुधा घरों में आस्तिकता तथा श्रद्धा-विश्वास का वातावरण बनाये रखती हैं। आज भी कुप्रगति शीलता की लहर से अप्रभावित रह कर करोड़ों नारियाँ एक प्रकार से बहुत अंशों तक भारतीय धर्म तथा सभ्यता एवं संस्कृत की संरक्षिका बनी हुई हैं। धार्मिक क्षेत्र में यह कुछ कम महत्व की बात नहीं है।
इस प्रकार सभी क्षेत्र में नारी का इतना महत्व होते हुये भी आज हमारे समाज ने उसे इस दयनीय दुर्दशा में पहुँचा दिया कि देख-सुन और सोच समझ कर न केवल दुःख ही होता है बल्कि शर्म से गर्दन झुक जाती है। विचार आता है कि क्या वास्तव में हम इतने आततायी हैं कि राष्ट्र की जननी और पुरुष की सहयोगिनी, सहचरी और अनुवर्ती को पैर की जूती और पशुओं से भी बदतर बना दिया है! स्वार्थी पुरुष वर्ग ने उसके शैक्षणिक, एवं सामाजिक अधिकार, तथा शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक तथा आत्मिक विकास के सारे अवसर एवं संभावनायें अजगर की तरह निगल ली हैं।
आज हमारे समाज में अशिक्षा का अभिशाप नारी वर्ग को सर्प की तरह डसे हुये हैं। शिक्षा के भाव में अभारतीय नारी असभ्य, अदक्ष, अयोग्य एवं अप्रगति शील बनी हुयी चेतन होते हुये भी जड़ की तरह जीवन बिता रही है। समाज एवं राष्ट्र के लिये उसकी सारी उपादेयता नष्ट होती जा रही है। आज वह आत्मबोध से वंचित आजीवन बंदिनी की तरह घर में बंद रहती हुई चूल्हे चौके और और पौर तक सीमित पुरुषों की संकीर्णता का दण्ड भोगती हुई मिटती चली जा रही है। उसे समाज एवं राष्ट्र की गतिविधि में हाथ बटाना तो दूर उसके ज्ञान का भी अवसर नहीं मिलता।
अशिक्षा तथा अज्ञान ने उन्हें कायर और कलहनी बना दिया है। घर में अकेले रहते अथवा मार्ग में चलते हुये इस प्रकार दबी-दबी और भय त्रस्त चला करती हैं मानो उन पर अभी ही कोई आपत्ति आने वाली है, जिससे वे अपनी रक्षा न कर पायेंगी और वास्तव में जब कोई आपत्ति अथवा आशंका आ जाती है तब प्रतिकार करने के स्थान पर किंकर्तव्यविमूढ़ होकर काँपने रोने और अपना अहित होता सहने के अतिरिक्त उनके पास कोई उपाय ही नहीं होता। अप्रियताओं, प्रतिकूलताओं अथवा आपदाओं का प्रतिकार करने का न तो उनमें साहस ही होता है और न बुद्धि।
गृहणी होते हुये भी अशिक्षा के कारण नारी ठीक मानों में गृहणी सिद्ध नहीं हो पा रही! बच्चों के लालन-पालन से लेकर घर की साज सँभाल तक किसी काम में भी कुशल न होने से उस सुख सुविधा को जन्म नहीं दे पाती, घर में जिसकी अपेक्षा की जाती है! घर को सजा-सँवार कर रखना तो दूर उसकी अदक्षता उसे और भी अस्त-व्यस्त बनाये रहती है! शिक्षा के अभाव में कोमल-वृत्ति नारी कर्कशा एवं कलहनी होती जा रही है। हर समय कोप करना, बात-बात पर बच्चों को मारना पीटना, अकारण में कारण निकाल कर लड़ना-झगड़ना और खटपाट ले लेना, उनके स्वभाव का अंग बन गया है। वह परावलम्बिनी और परमुखापेक्षिणी बनी हुई विकास से वंचित, शिक्षा से रहित गूढ़ मूढ़ और मूक जीवन बिताती हुई अनागरिक पशु की भाँति परिवार ढ़ोडा जा रही हैं। पुरुष उसे स्वतंत्रता दे और समाज सुविधायें, फिर देखो आज की यह फूहड़ नारी कुशल शिल्पी की भाँति सन्तान, घर और समाज को रच देती है या नहीं?
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भव्य समाज की नव्य रचना
ब्रह्म-विद्या की उपलब्धि एवं प्रकाशपूर्ण तपश्चर्या का स्वर्ण संयोग
गत अंक में अखण्ड-ज्योति परिवार के उन वयोवृद्धों से जो परिवार के उपार्जन, उत्तरदायित्व से निवृत्त हो चुके हैं- यह अनुरोध किया गया था कि वे अपनी ढलती आयु का श्रेष्ठतम सदुपयोग करने के लिए अपनी भावना तथा प्रवृत्ति को मोड़ें। यह उनके ज्ञान, अनुभव और दूरदर्शिता की कसौटी है। बुद्धिमान उसे कहते हैं जो भविष्य की तैयारी में संलग्न है। जिसे भविष्य की चिन्ता नहीं, जो अगले दिनों की उज्ज्वल संभावना का निर्माण करने में आवश्यक अभिरुचि नहीं दिखाता उसे बालक ही कहना चाहिए भले ही उसके बाल सफेद हो गये हों।
दाँत तो छोटे बच्चों के भी उखड़ जाते हैं। बाल तो गधे के भी सफेद होते हैं। जिसके बाल सफेद हो गये या दाँत उखड़ गये वह वयोवृद्ध नहीं, यदि उसमें दूरदर्शिता नहीं, भविष्य चिन्तन की क्षमता नहीं तो उसे ‘ढलती उम्र का बालक’ ही कहना चाहिए। छोटे बच्चे तो इसलिए क्षम्य माने जाते हैं कि वे भविष्य को दूर तक देख सकने योग्य बौद्धिक विकास से वंचित रहते हैं। अस्त-व्यस्त तरीके से अपना बचपन गँवाकर जवानी को अन्धकारमय बना लेते हैं तो कम-से-कम इतना कहकर चित्त हलका किया जाता है कि लड़कपन में इतनी अकल न थी जो आगे की बात सोचकर उस समय का ठीक तरह सदुपयोग कर पाते। पर बूढ़ों को तो यह कहने का भी अवसर नहीं कि—”हम में इतनी समझ न थी कि भविष्य का स्वरूप समझ पाते या उसे उज्ज्वल बनाने के लिए कुछ कर पाते।” उनने जो सुना समझा, सीखा और जाना है उसके आधार पर इतना तो विवेक होना ही चाहिए कि अब हमारे जीवन अध्याय के अन्तिम पृष्ठ पूरे होने जा रहे हैं। बाल-क्रीड़ा को छोड़ें और वह करें जिससे इस सुरदुर्लभ मानव शरीर की सार्थकता का लाभ मिले और मरणोत्तर जीवन की उज्ज्वल संभावनाएं विकसित हों।
हमारे गत अंक में व्यक्त किये अनुरोध के पीछे एक ही पुकार एवं प्रेरणा थी कि वृद्धावस्था अस्त-व्यस्त तरीके से नहीं जीनी चाहिए। कम-से-कम अपने परिवार के उन लोगों को तो-जिन्होंने देर से अखण्ड-ज्योति पढ़ी है-कुछ अधिक साहस का परिचय--कुछ अधिक विवेक का परिचय देना ही चाहिए। ज्ञान की वास्तविकता कार्य की कसौटी पर परखी जाती है। जो पढ़ते, सुनते, सोचते समझते तो बहुत हैं पर उसे करने की हिम्मत नहीं दिखा पाते उनका नपुँसक ज्ञान एक प्रकार से भार रूप ही कहा जायगा। यदि कोई सच्चा ज्ञानवान है तो उसे आदर्शवादिता के अनुरूप कुछ करने के लिए क्रियावान भी होना चाहिए। अपने परिवार के ढलती आयु वालों को अपनी बुद्धिमत्ता एवं दूरदर्शिता का परिचय उत्कृष्टतावादी क्रियाशीलता अपनाकर ही देना चाहिए।
साँसारिक दृष्टि से व्यक्तिगत जीवन उनका सफल होता है जो अपने बचपन का ठीक उपयोग कर लेते हैं। जिन्होंने वह समय आवारागर्दी में गुजारा—कुसंस्कार, दुर्गुण, व्यसन अपना लिए, गुण कर्म स्वभाव को कुमार्गगामिता के ढाँचे में ढाल लिया, न विद्या पढ़ी, न स्वास्थ्य बनाया, न सुसंस्कृत बने, उन्हें लौकिक जीवन निकृष्ट स्तर का ही जीना पड़ेगा। बचपन यों ही खोखला बना दिया गया तो शरीर आजीवन रुग्णता और दुर्बलता का शिकार रहेगा। शिक्षा से वंचित रहने के कारण न तो सभ्य समाज में आदर मिलेगा और न वह आजीविका ही मिलेगी जो उच्च शिक्षा प्राप्त व्यक्तियों को मिला करती है। यश, सम्मान, धन, वैभव आदि संसार की जो भी विभूतियाँ हैं उनसे उन्हें वंचित ही रहना पड़ता है। बचपन लौकिक जीवन की आधार शिला है। नींव ही धसक गई तो उस पर खड़ा मकान किस योग्य रहेगा?
किसी राष्ट्र का सामाजिक जीवन—उसके वयोवृद्धों की विचारधारा एवं क्रिया पद्धति पर निर्भर रहता है। समाज का स्तर ऊँचा उठाने की—लोक नेतृत्व करने की—जन मानस को प्रबुद्ध एवं समृद्ध बनाये रहने की जिम्मेदारी सदा से वयोवृद्धों के कंधों पर रही है। आयु की अधिकता किसी व्यक्ति की प्रामाणिकता, अनुभवशीलता, एवं विश्वसनीयता प्रकट करती है। छोटी आयु वालों की अपेक्षा बड़ी आयु वालों का जन-मानस पर निश्चित रूप से अधिक प्रभाव पड़ता है। वे जो सोचते और कहते हैं उसमें अधिक मजबूती भी रहती है। लोभ और स्वार्थ भी जवानी ढलने के साथ ढल गया होगा ऐसी आशा की जाती है। इसलिए वे समाज का हित अधिक ईमानदारी से कर सकते हैं यह भी माना जाता है। फिर उनके पास पारिवारिक उत्तरदायित्व हलके हो जाने के कारण समय भी रहता है। जिसका वे अवैतनिक रूप से लोक मंगल में उपयोग करें तो बिना किसी अर्थ प्रबन्ध के, वेतन आदि की व्यवस्था के, भी बहुत कुछ काम सहज ही हो सकता है। इन्हीं तथ्यों को ध्यान में रखते हुए मनीषियों ने ढलती आयु के लोगों को वानप्रस्थ लेकर आत्म-कल्याण की—लोक मंगल की- साधना में संलग्न होने का निर्देश किया है। हिन्दू धर्म—वर्णाश्रम धर्म के नाम से प्रसिद्ध है। इसमें चार आश्रमों की जो अत्यन्त महत्वपूर्ण व्यवस्था थी उसी के कारण हमारा देश, हमारा समाज चिरकाल तक उन्नति के उच्च शिखर पर खड़ा रहा। अब जब कि आश्रम धर्म की मर्यादाएं टूट गई तो राष्ट्र की महानता का महल भी ध्वस्त होकर चूर-चूर हो गया। लड़कों ने शरीर, मस्तिष्क और आत्मा को विकसित करने वाली ब्रह्मचर्य साधना को छोड़ा तो व्यक्तिगत प्रगति के नाम पर अन्धकार ही अन्धकार दीख रहा है। लोग भले ही अमीर या डिग्री धारी बने पड़े हों पर उनमें महापुरुषों जैसे एक भी चिन्ह दृष्टिगोचर नहीं होते। रईसों के कुत्ते भी मोटरों में बैठकर घूमते दूध, जलेबी खाते और रेशमी झूल ओढ़ते हैं। इन सुविधाओं से क्या वे कुत्ते कोई सम्माननीय महापुरुष बन जायेंगे? बचपन में महानता के बीज नहीं बोये गये तो शेष जीवन में महानता के अंकुर फूटेंगे कैसे? उस स्तर के फल-फूल लगेंगे कैसे?
ठीक यही बात सामाजिक जीवन के बारे में लागू होती है। जिस समाज के बूढ़े मोह ग्रसित, आलसी, स्वार्थी और संकीर्णतावादी होंगे। इन्द्रियों की गुलामी और तृष्णा लोलुपता मरते दम तक न छोड़ेंगे उस राष्ट्र या समाज का स्तर कभी भी उज्ज्वल न बन सकेगा। अवैतनिक, अनुभवी, ईमानदार, प्रभावशाली लोकसेवी यदि उत्पन्न ही न होंगे तो कोई देश या समाज आवश्यक प्रकाश ही कहाँ से प्राप्त करेगा? निर्माणात्मक सत्प्रवृत्तियों का अभिवर्धन ही वहाँ कहाँ से होगा? स्वार्थी, संकीर्ण और आलसी बूढ़े, समाज के अभिशाप हैं। किसी देश के अधःपतन का उत्तरदायित्व यदि इस वर्ग के शिर रखा जाय तो इसमें तनिक भी अनुचित बात या अत्युक्ति न होगी।
वानप्रस्थ की साधना, व्यक्ति और राष्ट्र दोनों के कल्याण की अत्यन्त महत्वपूर्ण एवं आवश्यक परिपाटी है। जो स्थान व्यक्तिगत जीवन में बालक को सुसंस्कृत रुप से बिताकर भौतिक प्रगति प्राप्त करने का है, ठीक वही सामाजिक एवं आध्यात्मिक जीवन में ढलती आयु के सदुपयोग का है। हमारा व्यापक प्रयत्न यह होना चाहिए कि ढलती आयु के लोग वासना और तृष्णा की कीचड़ में से निकल कर शानदार जिन्दगी जियें। वानप्रस्थ की परम्परा को अपनायें। आत्म-निर्माण और समाज निर्माण की उभयपक्षीय गतिविधियाँ अपनाकर मनुष्य जीवन की अपने विवेक की सार्थकता सिद्ध करें। मरणोत्तर जीवन, पुनर्जन्म का भविष्य तो इस प्रकार वे उज्ज्वल करेंगे ही साथ ही अपनी गतिविधियों के कारण वर्तमान में अपार आत्म-संतोष अनुभव करते हुए समाज के पुनरुत्थान का श्रेय भी प्राप्त करेंगे। अतएव हर ढलती आयु के व्यक्ति का कर्तव्य है कि यदि वह उपार्जन की जिम्मेदारी से निवृत्त हो चुका है तो पूरा समय और यदि निवृत्त नहीं हुआ हो तो जितना अधिक हो सके उतना समय उस परमार्थ प्रयोजनों में लगाने का व्रत लेकर अपनी वृद्धावस्था का सदुपयोग करना चाहिए। 50 वर्ष से अधिक आयु के हर व्यक्ति को इस सम्बन्ध में हजार बार अपने आप से प्रश्न पूछना चाहिए और यदि उत्कृष्टता की गतिविधियाँ अपनाने के लिए भीतर से कोई उत्साह उत्पन्न न हो रहा हो तो अपने आपको उसे हजार बार धिक्कारना चाहिए।
‘अखण्ड-ज्योति’ परिवार के हर ढलती आयु के परिजन को हमने गत अंक में पुकारा, ललकारा और धिक्कारा है। हम चाहते हैं कि उनके भीतर जो धर्म भावना के अंकुर विद्यमान हैं वे अब अंकुरित होकर बढ़ें और पत्र पल्लवों से लदे हुए, फल-फूलों से सजे हुए दिखाई पड़ें। इसके लिए आवश्यक मार्ग दर्शन—प्रकाश एवं प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए आवश्यक प्रबन्ध गायत्री-तपोभूमि में किया गया है। उसकी सूचना प्रस्तुत की जा चुकी है। ढलती आयु के व्यक्तियों को एक वर्ष तक शिक्षा प्राप्त करने के लिए —तपश्चर्या करने के लिए मथुरा आने का निमन्त्रण भेजा गया है। प्रातःकाल वेद और उपनिषद्—सायंकाल गीता और रामायण क्रमबद्ध रूप से पढ़ाने का पाठ्यक्रम बनाया गया है। संस्कृत न जानने वाले—साधारण हिन्दी का ज्ञान रखने वाले भी ब्रह्म-विद्या का यह अमृत भली प्रकार पान कर सकेंगे ऐसा हमें विश्वास है। छोटे बालक के मुँह में माता सभी आवश्यक पौष्टिक तत्वों से भरा-पूरा दूध निचोड़ देती है और उसके शारीरिक विकास का प्रबन्ध कर देती है उसी तरह हम स्वयं यह ब्रह्म-विद्या का प्रशिक्षण देने चले हैं तो आशा यही की जानी चाहिए कि हर शिक्षार्थी ब्रह्म-विद्या का अमृत पान ठीक तरह कर सकेगा, भले ही वह संस्कृत भाषा न भी जानता हो।
एक वर्ष में सहस्राँशु गायत्री महापुरश्चरण की तपश्चर्या, इसी वर्ष में एक चान्द्रायण व्रत का महाप्रायश्चित्य साधन भी कराया जायगा। गायत्री तपोभूमि जैसे चैतन्य तीर्थ में रहकर ऐसी साधना करने का अवसर जिन्हें मिलेगा वे अपना आत्मिक बल आशातीत मात्रा में बढ़ा सकेंगे यह निश्चय है। धर्म-मंच के माध्यम से वे लोक-मंगल का—जन-जागरण का—नैतिक और साँस्कृतिक पुनरुत्थान का महान परमार्थ किस प्रकार कर सकेंगे इसका प्रशिक्षण भी इसी वर्ष में हो जायगा। प्राकृतिक चिकित्सा का सामान्य ज्ञान, आसन, प्राणायाम, सूर्य-नमस्कार एवं योग-साधन की वे शिक्षाएं भी मिल जायेंगी जो इन दिनों के अस्त-व्यस्त शरीरों द्वारा आसानी से पूरी की जा सकती हैं। ऐसे आयोजन का लाभ हर ढलती आयु के व्यक्ति को उठाना ही चाहिए। बहुत दिन से ऐसी शिक्षा व्यवस्था करने की बात हम सोच रहे थे। पर अब उसके लिए आवश्यक स्थान आदि का प्रबन्ध हो सका है तो लोगों को विधिवत् आमंत्रित किया जा रहा है। जो चाहें वे अकेले या धर्मपत्नी समेत यह प्रशिक्षण एवं तप सम्पन्न कर सकते हैं। जिन्हें आगे भी यहाँ रहना हो वे रह सकते हैं, जो जाना चाहें वे एक वर्ष बाद जा सकते हैं। और जो सीखा है उसे अपने घर रहकर जारी रख सकते हैं। यह सब अपनी सुविधा पर निर्भर है। निवास रोशनी, सफाई, उद्यान, पुस्तकालय, चिकित्सा, प्रशिक्षण आदि के सभी साधन यहाँ मौजूद हैं, पर भोजन व्यय सभी को स्वयं वहन करना पड़ेगा। भिक्षा का कुधान्य उनकी साधना में बाधक ही बनेगा, इसलिए हर वानप्रस्थ को एक वर्ष के लिए भोजन वस्त्र का प्रबन्ध घर से ही करके लाना चाहिए। दो-दो, तीन-तीन व्यक्ति मिलकर भोजन बना लिया करेंगे तो इसमें समय और पैसे की और भी अधिक किफायत रहेगी, जिनको भोजन बनाना नहीं आता है, उनमें एक बड़ी कमी है। जो खाना जानता है उसे बनाना भी जानना चाहिए। जिन्हें न आता होगा उन्हें हम ब्रह्म-विद्या की तरह यह भी सिखा देंगे। जो पूरी तरह घर से निवृत्त नहीं हुए हैं पर एक वर्ष का समय किसी प्रकार निकाल सकते हैं, वे भी इस शिक्षा साधना का लाभ प्रसन्नतापूर्वक उठा सकते हैं।
वयोवृद्धों से उपरोक्त अनुरोध गत अंक में किया गया था। इस अंक में तो उसका पुनः स्मरण कराया गया है ताकि जो लोग पिछले अंक की बात ध्यानपूर्वक न पढ़ सके हों वे पुनः उसे समझें और उस दिशा में आवश्यक प्रयत्न करें। इस अंक में हमें विशेष अनुरोध उन लोगों से करना है जिनके घर में इस तरह के वयोवृद्ध व्यक्ति हैं पर वे किसी विवशता से इस अवसर का लाभ उठा सकने से वंचित हैं, विवशता से वे अपनी इच्छा को पूरी नहीं कर पाते, हमारी इच्छा है कि घर के लोग ऐसों वयोवृद्धों को आवश्यक साधना सुविधा उपलब्ध कराने में सहायता करें।
खाते पहनते तो वे घर पर भी हैं लगभग उतना ही खर्च मथुरा रहने में भी पड़ता है। थोड़ा ज्यादा भी हो तो उसे वहन करना चाहिए। उसी प्रकार वे यदि घर के काम-काज में कुछ सहायता करते हों तो उतना श्रम स्वयं अधिक कर लें और उन्हें छुट्टी दे दें। बालकपन में जिन अभिभावकों की सहायता एवं उदारता का लाभ बच्चों को मिलता है, उस ऋण से उऋण होने के लिए वैसी ही सुविधा बड़े होने पर अपने वयोवृद्धों को देनी चाहिए। उससे पितृ ऋण चुकता है। सच्च् श्राद्ध और तर्पण यही है। मरने के बाद जो मृतक-भोज करना हो वह धन उनके आत्म-कल्याण के साधन जुटाने में खर्च कर देना चाहिए। जो गृहस्थ पारिवारिक व्यस्तताओं के कारण स्वयं कुछ अधिक समाज की, धर्म की सेवा नहीं कर सकते वे अपने वयोवृद्धों को वैसी सुविधा देकर उस कमी की पूर्ति कर सकते हैं।
बड़े बूढ़ों को तीर्थ-यात्रा का पुण्य लाभ लेने की इच्छा अक्सर रहती है। प्राचीन काल में तीर्थों का वही वातावरण था वही प्रशिक्षण था जैसा कि हम अब गायत्री-तपोभूमि का बना रहे हैं। इसलिए वहाँ जो प्रकाश प्राप्त होता था, उससे आत्म-कल्याण का पुण्य भी मिलता था। पर आज तो परिस्थितियाँ बिलकुल विपरीत हैं। किन्हीं प्रतिमाओं का दर्शन, नदी तालाबों का स्नान, भीड़भाड़ की धक्का-मुक्की, कुपात्रों द्वारा दान के नाम पर धन का अपहरण—बस इतना प्रपंच ही तीर्थ-यात्रा का स्वरूप रह गया है। प्राण निकल गये, कलेवर खड़े हैं। ऐसी तीर्थ-यात्रा किसी को कोई पुण्य फल देगी यह संदिग्ध है। पर मथुरा जैसे पवित्र तीर्थ में रहकर तपश्चर्या एवं ब्रह्मज्ञान की साधना करने से तीर्थयात्रा का सच्चा पुण्य मिल जाना असंदिग्ध है। जो स्वयं तीर्थ करने के इच्छुक हैं या जिनके बच्चे अपने बड़े-बूढ़ों को तीर्थ-यात्रा के साधन उपलब्ध कराना चाहते हैं। अच्छा हो वे इस एक वर्षीय तीर्थ साधना का लाभ उठावें।
कई घरों में आर्थिक कठिनाई या काम धाम की जिम्मेदारी तो नहीं होती, पर बूढ़े होते ही ऐसे स्वार्थी, मोहग्रस्त तथा आलसी हैं जो नाली की कीचड़ में सड़ते हुए ही मरना चाहते हैं। स्वयं भी परेशान रहते हैं और घर वालों को परेशान करते हैं। मरने और घर से निकलने की धमकी तो कभी-कभी दिखाते हैं, जब-तब रूठते, मटकते और असंतुष्ट रहकर तकदीर भी ठोकते हैं, पर जीवन की सार्थकता का अवसर सामने आने पर भी उस ओर अभिमुख नहीं होते। ऐसे बूढ़ों को ठीक वैसा ही बालक समझना चाहिए जो पढ़ने जाने से कतराया और बहाने बनाया करते हैं। जैसे—इस तरह के घर घुस’ लड़कों को स्कूल पढ़ने के लिए घर के सभी लोग उनके साथ सख्ती से पेश आते हैं, अनुचित न होगा कि इन मोहग्रस्त बूढ़ों को भी उन्हीं के कल्याण के लिए शिष्टाचारपूर्वक कहा-सुनी की जाय, समझाया-बुझाया जाय, धकेला जाय और उन्हें अपना भविष्य उज्ज्वल बनाने के लाभ से लाभान्वित होने दिया जाय।
25 मई से 13 जून तक का 20 दिवसीय शिविर समाप्त होते ही यह प्रशिक्षण आरंभ हो जायगा पर, इसका विधिवत् उद्घाटन ‘गुरुपूर्णिमा (ता. 2 जुलाई) को होगा। इसलिये जिन्हें आना हो वे इस संबंध में आवश्यक पत्र-व्यवहार करके उपरोक्त अवधि से पूर्व ही स्वीकृति प्राप्त कर लें। स्वीकृति पाये बिना किसी को भी नहीं आना चाहिए।
हमारी धर्म-निष्ठा, कर्त्तव्य-निष्ठा की ओर बढ़ चलें।
अखण्ड-ज्योति अपने परिजनों को विगत 27 वर्षों से अध्यात्म ज्ञान और धर्म का प्रकाश उपलब्ध कराती रही है। उसका प्रयास कहाँ तक सफल हुआ इसकी परख एक ही कसौटी पर कसी जा सकती है कि जिनने इन विचारों को पढ़ा उनने उन्हें जीवन में अपनाया, उतारा या नहीं? ज्ञान की सार्थकता तभी है जब वह कार्य रूप में परिणत हो। अन्यथा बकरे के गले में लटकते हुए थनों की तरह उसे निरर्थक ही मानना चाहिए।
लोगों ने भले ही हनुमान-चालीसा पढ़ने का नाम, अभ्यास और तिलक लगाने का नाम धर्म समझा हो पर मनीषियों ने सदा से एक ही बात कही है कि धर्म और अध्यात्म उस प्रवृत्ति का नाम है जिसमें व्यक्ति अपने पर संयम का नियन्त्रण कठोर करता चला जाता है और दूसरों के प्रति उदार बनता जाता है। सेवा, धर्म का अविच्छिन्न अंग है। जो किसी की सेवा नहीं कर सकता वह अधार्मिक है। जिसे अपने ही लाभ की बात सूझती है, जिसे दूसरों के दुख-दर्द से कोई वास्ता नहीं वह नास्तिक है। भले ही वह बाहरी दृष्टि से कितना ही बड़ा धर्माडम्बर ओढ़े बैठा हो।
‘अखण्ड-ज्योति’ ने मानव-जीवन को सफल एवं सार्थक बनाने वाली विचारधारा का सृजन एवं प्रसार किया है। लोक-मानस तक उस प्रकाश को पहुँचाने का अविरत प्रयत्न किया है। साथ ही यह भी आवश्यक माना है कि जो लोग इन विचारों को पढ़ें वे मानसिक विलासिता ही इस पठन को न बना लें वरन् उसे कार्यान्वित करने के लिए भी साहसपूर्ण कदम उठायें। हमने गायत्री उपासना तथा दूसरी पूजा पद्धतियाँ भी लोगों को सिखाई हैं और साथ ही यह भी कहा है कि इनका पूरा लाभ उन्हीं को मिलेगा जो अपने व्यक्तित्व को पवित्र एवं उत्कृष्ट बनाने की साधना भी साथ ही करेंगे। मंत्र चाहे कितना ही प्रभावशाली क्यों न हो उसका फल केवल परिष्कृत व्यक्तित्व वालों को ही मिलता है। औषधि सेवन के साथ-साथ आहार-विहार का पथ्य भी ठीक रखें तभी रोगी अच्छा होगा। दवा कीमती खायें किन्तु परहेज बिगाड़े तो बीमारी कैसे जायगी? कारतूस बढ़िया हों पर बन्दूक बाँस की बनी हुई नकली हो तो उससे निशाना कहाँ सधेगा? अच्छा कारतूस तभी अच्छा निशाना लगावेगा जब बन्दूक भी बढ़िया हो। मनुष्य का चरित्र जितना सुधरेगा उतना ही भजन भी फलदायक होगा। अन्यथा गन्दे नाले में आधी छटाँक गंगा जल डालने की तरह वह भी निरर्थक हो जायगा।
अध्यात्म के लाभ अपार हैं। ईश्वर उपासना से जो लाभ मिलते हैं वे संसार के अन्य किसी भी पुरुषार्थ से संभव नहीं। पर यह मिलते उन्हीं को हैं जो अपना अन्तःकरण अधिक पवित्र एवं उत्कृष्ट बनाने के लिए प्रयत्नशील रहते हैं। कहना न होगा कि व्यक्तिगत जीवन में महानता उत्पन्न करने के लिए सेवा धर्म अपनाया जाना अनिवार्य रूप से आवश्यक है। गुण कर्म स्वभाव में उत्कृष्टता बढ़ाने का अभ्यास परमार्थ, परोपकार की प्रक्रिया अपनाने से ही संभव है। इसलिए प्रत्येक आंतरिक सफल अध्यात्मवादी ने ईश्वर उपासना के साथ-साथ ही जीवन साधना को भी गाड़ी के दो पहियों की तरह अन्योन्याश्रित माना है। कोई भी धर्मात्मा व्यक्ति ऐसा नहीं हुआ-कोई भी ईश्वर भक्त ऐसा नहीं रहा-जिसने मानव सेवा का व्रत न लिया हो। जिसने इस ओर उपेक्षा बरती वह भले ही कितनी ही माला घुमाता रहा हो, कितना ही व्रत उपवास करता रहा हो, आध्यात्मिक लक्ष्य प्राप्ति में सर्वथा असफल ही रहेगा।
इस सुनिश्चित तथ्य को ध्यान में रखते हुए ‘अखण्ड-ज्योति’ ने अपने प्रिय परिजनों को ज्ञान की शिक्षा, उपासना की प्रेरणा देते हुए साथ ही सेवाधर्म अपनाने का भी पूरे जोर से प्रतिपादन किया है, युग-निर्माण योजना ऐसी ही एक सेवा साधना है। जिसका उद्देश्य समाज का नवनिर्माण ही नहीं उस कार्यक्रम में संलग्न व्यक्तियों का अध्यात्म लक्ष्य पूरा करना भी है। हमने स्वयं भी यही रीति-नीति अपनाई है, और अपने प्रत्येक सहचर को शास्त्रों एवं ऋषियों का यही संदेश सुनाया है कि वे भी विश्व मानव की सेवा को भी अपने जीवन का वैसा ही अंग बनावें जैसा कि धन उपार्जन तथा शरीर यात्रा के नित्य कर्म करने में प्रयत्नशील रहते हैं।
प्रसन्नता की बात है कि जो तथ्य और सत्य को समझने का प्रयत्न करते हैं, अध्यात्म को बहुमूल्य तत्व मानकर उसकी समुचित कीमत चुकाने के लिए तैयार हैं, वे अपनी गतिविधियाँ इसी आधार पर विनिर्मित कर रहे हैं। सेवा धर्म को चरितार्थ करने के लिए सामयिक परिस्थितियों के अनुरूप युग-निर्माण योजना का जो कार्यक्रम प्रस्तुत किया है—उसे विश्व-मानव की—विराट ब्रह्म की- प्रत्यक्ष सेवा मानते हुए उस दिशा में सलग्न हैं। इन्हीं कर्मवीर सच्चे धर्म-प्रेमियों की निष्ठा और तत्परता देखते हुए हम देश, धर्म, समाज और संस्कृति के उज्ज्वल भविष्य को सामने देखते हैं और उन सपनों को मूर्तिमान होते देखकर एक सबसे बड़ा कदम उठाने का भी साहस करते रहते हैं।
कहना उनसे है जिन्होंने इस ओर ध्यान नहीं दिया, जिन्होंने पत्रिका को एक पठन मनोविनोद मात्र माना है, जिन्होंने एक दो माला फेरने को ही ऋद्धि-सिद्धि और स्वर्ग मुक्ति प्राप्त करने की कुँजी माना है, जो सेवा का प्रपंच मानते हैं, जिन्हें आदर्शवादी विचार तो अच्छे लगते हैं, पर उन्हें कार्यान्वित करने का साहस नहीं होता। आलस, संकोच, झिझक, निराशा आदि की आड़ में निष्क्रिय बने बैठे रहते हैं। ऐसे लोगों की संख्या भी अपने परिवार में कम नहीं यह पंक्तियाँ उन्हीं के लिए विशेष रूप से लिखी जा रही हैं।
आदर्शवादिता पर आस्था रखने वाले हर अध्यात्मवादी विचारशील व्यक्ति के लिए यह आवश्यक है कि उत्कृष्ट विचारधारा का वास्तविक लाभ एवं आनन्द लेने के लिए, उसे कार्यान्वित करने के लिए भी तत्परता प्रकट करे। हम अपने स्वजनों में से प्रत्येक से यही आशा करते हैं कि यदि उन्हें ‘अखण्ड-ज्योति’ के विचार पसंद आते हों तो वे उन्हें कार्य रूप में परिणत करके अपनी आन्तरिक ईमानदारी का परिचय दें। हम लोग इन दिनों जिस समाज में रह रहे हैं, उसमें भ्रान्तियों और विकृतियों की भरमार है। अतएव वैयक्तिक और सामाजिक दोनों ही स्तर पर व्यक्ति अनेक समस्याओं में घिरा उलझा पड़ा है। इस स्थिति को बदला जाना चाहिये और ऐसी परिस्थितियाँ पैदा की जानी चाहिए, जिनमें प्रेम, न्याय, सज्जनता, खुशहाली एवं हँसी-खुशी के साथ हर किसी को जीवन यापन कर सकना सम्भव हो सके। हमें ऐसा ही भावनात्मक नव-निर्माण करना चाहिये। संकीर्णता और स्वार्थपरता की जो दुष्प्रवृत्ति जन मानस में भर गई है, उसके विरुद्ध विचार क्रान्ति को बगावत खड़ी करनी है और उसके स्थान पर विवेकशीलता न्यायनिष्ठा एवं सज्जनता की प्रतिस्थापना कर धरती पर स्वर्ग अवतरित करने का स्वप्न साकार करना है। युग-निर्माण योजना के आधार पर इसी दिशा में एक व्यवस्थित अभियान चलाया गया है। इस पवित्र धर्म युद्ध में हम में से हर एक को सम्मिलित होना चाहिए। यह अनुरोध प्रत्येक भावनाशील विचारशील व्यक्ति से है पर ‘अखण्ड-ज्योति’ परिवार के सदस्यों से तो इस संदर्भ में विशेष आग्रह ही है। उन्हें इस दिशा में कुछ न कुछ करना ही चाहिए।
तात्कालिक कार्यक्रम यह है कि हम में से प्रत्येक अपने-अपने संपर्क क्षेत्र में विचारक्रान्ति का क्षेत्र बढ़ाना आरम्भ कर दें। जो प्रकाश उसे मिल रहा है उसे अपने से सम्बन्धित अधिकाधिक लोगों तक पहुँचाने का प्रयत्न करें। एक घण्टा समय और एक आना नित्य देने की युग-याचना को पूरा करने के लिए अब किसी को भी कृपणता नहीं दिखानी चाहिये। चौबीस घण्टे का समय स्वार्थ में ही बीतता है, इसमें से एक घण्टा समय लोक मंगल के लिए भी निकालना चाहिए। जो कमाते हैं वह प्रायः सारा का सारा ही अपने लिए खर्च होता है। उसका एक नगण्य अंश एक आना—नव-निर्माण के लिए भी खर्च किया जाना चाहिए। यदि किसी पर इस विचारधारा का—आध्यात्मिक आस्था का—रत्तीभर भी प्रभाव पड़ा होगा तो उसे इतने से दो तुच्छ त्याग कर सकता तनिक भी कठिन प्रतीत न होगा। इस सम्बन्ध में आलस किसी को भी नहीं बरतना चाहिए। छोटे ट्रैक्टों की सीरीज तेजी से छपती चली जा रही है। लागत से भी कम मूल्य के अत्यन्त सस्ती, अत्यन्त सुन्दर, साथ ही विचार क्रान्ति की आग में लबालब भी हुई इन छोटी-छोटी पुस्तिकाओं को—एक आना प्रतिदिन निकाले जाने वाले अनुदान के बदले खरीदा जा सकता है। पैसा बाहर के किसी व्यक्ति को दान नहीं देना है वरन् अपने ही घर में उसके बदले का भावनात्मक-क्रान्ति के लिए उपयुक्त अस्त्र-शस्त्र-सत्साहित्य—खरीदने में खर्च किया जाना है। इस पैसे के बदले में हर सदस्य के पास एक अत्यन्त ही महत्वपूर्ण, अत्यन्त ही प्रभावशाली पुस्तकालय बनता चला जायगा। यह पुस्तकालय अलमारी का कूड़ा बना कर नहीं पड़ा रहना चाहिए वरन् हर सदस्य को उसे पढ़ने के लिए सुनाने के लिए—अपने हर परिजन के—स्वजन एवं सम्बन्धी के पास जाना चाहिए। अपने घर का एक भी शिक्षित अशिक्षित-बाल वृद्ध ऐसा न बचे जिन्हें यह साहित्य पढ़ने या सुनने को नियमित रूप से न मिलता हो। इसी प्रकार पड़ौसियों, मित्रों, स्वजनों सम्बन्धियों, साथियों सहयोगियों को भी यह चीजें पढ़ने या सुनने के लिए विवश किया जाना चाहिए। बेशक आज आदर्शवादी विचारों को सुनने समझने की अभिरुचि लोगों में नहीं है। वे इस प्रयत्न को उपेक्षा की दृष्टि से देखते हैं और उसे पढ़ने -सुनने से बचना चाहते हैं तो भी हमारा पुरुषार्थ कुछ रंग लावेगा ही। हम सच्चे मन से प्रयत्न करें तो अरुचि एवं उपेक्षा को गहरी दिलचस्पी में परिणत कर सकते हैं। यदि इतना कर लिया तो समझना चाहिए कि बहुत बड़ी सफलता मिल गई। विचार क्राँति को सुनने समझने में निरन्तर अभिरुचि लेने वाले यदि दस व्यक्ति भी हम घर या बाहर बना सकें और इन तक निरन्तर इस प्रेरक प्रकाश की धारा को पहुँचाते रहने में संलग्न हो सकें तो समझना चाहिए कि ‘अखण्ड-ज्योति’ की उनको सदस्यता सार्थक हो गई और हमने जो आशा अपने प्रिय परिजनों से कर ली है, उसको पूरा करके दिखा दिया गया है। हम तीस हजार से तीन लाख, और तीन लाख से तीस लाख बने तो ही नव-निर्माण का उद्देश्य पूरा होगा।
इस युग की सबसे बड़ी शक्ति संघबद्धता है। दस-बीस चोर डाकुओं के संगठित गिरोह अपने क्षेत्र में आतंक मचा देते हैं। तब हम दस-बीस लोक सेवी धर्म पुरुष अपने क्षेत्र को दिव्य प्रकाश से प्रकाशित क्यों न कर सकेंगे? असुरता से देवत्व की शक्ति अधिक है। फिर हमारे संगठित प्रयत्नों का आशाजनक परिणाम क्यों उत्पन्न न होगा?
जहाँ भी ‘अखण्ड-ज्योति’ पहुँचती है वहाँ के सदस्यों का प्रयत्न यह होना चाहिये कि वे मिलजुल कर नये लोगों के पास जायें और कम से कम दस सदस्य तो अपने यहाँ बना ही लें। ताकि वहाँ एक छोटा संगठित युग-निर्माण केन्द्र-विधिवत् स्थापन हो सके। इन सदस्यों को परस्पर मिल-जुलकर बैठना सीखना चाहिए और एक विधिवत् संगठन बना लेना चाहिये। एक ऐसे कार्यालय की स्थापना जिसमें पुस्तकालय भी जुड़ा रहे हर शाखा द्वारा होना नितान्त आवश्यक है। ऐसी स्थापना अभी तक जहाँ नहीं हुई है, वहाँ विलम्ब न होना चाहिये। शाखा की गतिविधियों के संचालन का कोई व्यवस्थित क्रम तो होना चाहिये इन संगठनों का प्रथम कार्य यह हो कि सदस्यों के जन्म दिन मनाने आरम्भ कर दें।
(1) जन्म दिन मनाने की पद्धति, (2) जन्म दिन इस तरह मनायें, यह दो पुस्तकें 40+20=60 मूल्य और 20 पैसा पोस्टेज कुल 80 पैसे के टिकट भेज कर मंगाई जा सकती हैं और इनके आधार पर आरम्भ किये छोटे-छोटे आयोजनों द्वारा युग-निर्माण योजना का सन्देश घर-घर पहुँचाने का क्रम चलाया जा सकता है। इतना कार्य हर जगह चल पड़े तो हमें यह विश्वास हो जाय कि आगे अपने इस संगठन द्वारा नव-निर्माण के लिए जो बड़े कदम उठाये जाते हैं वे भी सफल होकर रहेंगे।
गत अंक में भी स्वजनों से यह अनुरोध किया था और अब बहुत जोर देकर अपने प्रत्येक परिजन से आग्रह कर रहे हैं कि वह एक घण्टा समय, एक आना नित्य नव-निर्माण के लिये देते रहने के लिये पूर्ण सतर्कता और नियमिता बरते। (2)विचार क्रान्ति के लिये नव निर्मित साहित्य का घरेलू पुस्तकालय चलायें और पढ़ने सुनने की अभिरुचि उत्पन्न करने के लिए जन संपर्क बनायें।
(3) अपने यहाँ कम से कम दस ‘अखण्ड-ज्योति’ के सदस्य पूरे करने और उन्हें संगठित करके कार्यालय की स्थापना तथा संचालक की नियुक्ति का काम पूरा कर लें। (4) जहाँ भी ऐसे संगठन बनें वहीं हर जगह सदस्यों के जन्म दिन मनाने की प्रक्रिया आरम्भ हो जाय ताकि रचनात्मक कार्यों के लिए आवश्यक उत्साह बढ़ाने की प्रक्रिया चल पड़े।
इन पंक्तियों को हर सदस्य अपने लिये निजी अनुरोध मानें और जहाँ उपरोक्त चारों बातें चल रही हैं, वहाँ उनमें अधिक तेजी लाई जाय। जहाँ इतना तक नहीं बन पड़ा वहाँ यह क्रम अविलम्ब आरम्भ कर लिया जाय। जहाँ यह क्रम चल रहे होंगे वहाँ की संगठित शाखायें सजीव मानी जायेंगी। हमारा विचार इस वर्ष-जुलाई के बाद—मथुरा से अपने प्रतिनिधि हर जीवित शाखा में भेजने का है ताकि वे आलस्य और अवसाद की, निराशा और ढील-पोल की स्थिति को दूर कर चेतना, प्रेरणा और प्रकाश का और भी अधिक संचार कर सकें। जेष्ठ के शिविर में ऐसे कार्यक्रम भी बन जायेंगे कि कहाँ किस शाखा में हमारे प्रतिनिधि कब पहुँचेंगे, वे सदस्यों की विचार गोष्ठी दो दिन तक करेंगे।
आशा है ‘अखण्ड-ज्योति’ के पाठक इन पंक्तियों को भावनापूर्वक पढ़ेंगे और आलस्य छोड़कर निर्धारित लक्ष्य की ओर तत्परतापूर्वक कदम उठाने के लिये कटिबद्ध होंगे। हमारी ऐसी ही अभिलाषा एवं आकाँक्षा है।
*समाप्त*