श्रम ही नहीं- अविराम श्रम चाहिये।

श्रम एवं समय मनुष्य की सबसे मूल्यवान सम्पत्ति है। जिसने अपनी इस पूँजी का सदुपयोग सीख लिया उसने मानो मनुष्य जीवन को सार्थक बनाने का रहस्य ही जान लिया।

संसार में जो कुछ शिव और सुन्दर दृष्टि-गोचर होता है, वह मनुष्य की श्रमशीलता का ही सुफल है। कलाकौशल की सारी उपलब्धि श्रम के आधार पर ही होती है। यदि मनुष्य ने श्रम को न अपनाया होता तो वह भी अन्य पशुओं की तरह पिछड़ी स्थिति में पड़ा रहता । मनुष्य को छोड़कर संसार के सारे प्राणी आज भी उसी आदि स्थिति में रह रहे हैं जिसमें वे सृष्टि के आरम्भ में थे। मनुष्य की प्रगति का कारण उसकी श्रमशीलता ही है।

मनुष्य ने श्रम करके अपने रहने के लिये मकान बनाये, पहनने के लिये कपड़ा तैयार किया और खाने के लिये खेती का धन्धा अपनाया। यही नहीं जीवन को और अधिक सुन्दर तथा सुखदायी बनाने के लिये अनेक प्रकार के कला कौशलों का विकास किया। वह जीवन की सुविधा के लिए कोई एक चीज बनाकर वहीं नहीं रुक गया बल्कि उसको अधिकाधिक विकसित तथा सुन्दर बनाने के लिये निरन्तर श्रम करता रहा। तभी वह एक साधारण झोंपड़ी से चल कर बड़े-बड़े प्रासादों तक आ सका है। साधारण बोने काटने से लेकर असाधारण उद्योग धन्धों तक पहुँच सका है। नग्नता ढकने से लेकर पट परिधानों तक का निर्माण कर सका है। इतनी प्रगति तथा उन्नति मनुष्य अपनी श्रमशीलता के बल पर ही कर सका है।

यदि रहन-सहन की साधारण सुविधाओं को निर्मित करके मनुष्य वहीं रुक जाता और अपनी श्रमशीलता का परित्याग कर देता तो, वह इतनी उन्नति किस प्रकार कर सकता था और अब भी जिस दिन मनुष्य अपनी श्रमशीलता को छोड़ देगा बना हुआ संसार बिगड़ने लगेगा। महल अट्टालिकायें खण्डहरों में बदलने लगेंगी। पट-परिधान पत्तों और छालों तक लौटने लगेंगे और सुन्दर खाद्य बनैली वस्तुओं तक सीमित होने लगेंगे। आशय यह कि श्रमशीलता त्यागते ही संसार आदिकालीन वन चरतां की ओर पुरोगामी होने लगेगा।

कोई भी उन्नति, प्रगति अथवा सुन्दरता सुरक्षित रहने के लिए मनुष्य की अनवरत श्रमशीलता की अपेक्षा रखती है। आज भी संसार में हजारों लाखों खण्डहर ऐसे पाये जाते हैं, जो मनुष्य की श्रमशीलता की गवाही देते हुये उसके आलस्य एवं उदासीनता पर आँसू से बहा रहे होते हैं।

एक बार एक बड़े परिश्रम के साथ मनुष्यों ने ऊँचे-ऊँचे शिल्प खड़े किये उन्हें कला कृतियों से सजाया और बहुत समय तक उनकी रक्षा की, किन्तु कालान्तर में जब उन्होंने उसको आवश्यक परिश्रम एवं अपेक्षता को अंश देना बन्द कर दिया, वे मिट्टी मात्र बनकर रह गये।

बड़े-बड़े साम्राज्य, बड़े-बड़े समाज, बड़ी-बड़ी सभ्यताएं और बड़ी-बड़ी संस्कृतियाँ मनुष्य की श्रम साधना से बनीं और फिर उसी की अनाश्रमिक प्रवृत्ति के कारण मिट गई। श्रम के बल पर बनाई गई कोई भी वस्तु बनी रहने के लिये निरन्तर श्रम की आवश्यकता रखती है। यदि आज यह सोच लिया जाये कि संसार में सुख-सुविधा के प्रचुर साधन इकट्ठे हो गये हैं, अब आगे उनके लिए श्रम करने की क्या आवश्यकता है, तो निश्चय ही कल से संसार में दरिद्रता का सूत्रपात हो जाय। श्रम से ही श्रेय प्राप्त होते हैं और श्रम से ही वे सुरक्षित रहते हैं।

बड़े से बड़े परिश्रम के साथ ऊँची से ऊँची शिक्षा एवं योग्यता प्राप्त कर लेने के बाद वकील-बैरिस्टर प्रोफेसर और डॉक्टर आदि यदि यह सोच लें कि पच्चीस-तीस साल के कठिन पुरुषार्थ के बाद उन्होंने पर्याप्त योग्यता प्राप्त कर ली है अब उसके लिये परिश्रम करने की क्या आवश्यकता है, तो क्या वे एक दिन भी अपनी योग्यता सुरक्षित रख सकते हैं? इसीलिए सारे समझदार वकील, बैरिस्टर, डॉक्टर प्रोफेसर आदि अपनी योग्यता को सुरक्षित बनाये रहने के लिये निरन्तर श्रम करते रहते हैं और जो ऐसा न करने की भूल किया करते हैं वे अपने क्षेत्र में दूसरों से पिछड़ जाते हैं। जो एक बार उपार्जित योग्यता के बल पर जीवन भर योग्य बने रहने की सोचते हैं, वे भूल करते हैं। परिश्रम, प्रयत्न और पुनरावृत्ति में स्थगन आ जाने से उपार्जित योग्यताएं भी पास से चली जाती हैं। वे तभी तक किसी के पास बनी रह सकती हैं, जब तक उनके लिये श्रम किया जाता रहता है।

कला-कौशल की बड़ी-बड़ी सिद्धियाँ श्रमहीनता एवं अभ्यास शून्यता से निकम्मी हो जाती हैं। एक शिल्पकार, चित्रकार अथवा कलाकार अपनी सिद्धि के सन्तोष में यदि अभ्यास का परित्याग करे दे तो क्या वह दक्ष बना रह सकता है? जिस श्रम की बदौलत वह एक से एक ऊँचे और बढ़िया निदर्शन तैयार करता रहता है, उसी के अभाव में आगे प्रगति करना तो दूर पीछे की विशेषताएं भी खो देगा। यही कारण है कि संसार में सैकड़ों उदीयमान कलाकार और शिल्पकार ऐसे हुए हैं, जो अपनी ऊँची सम्भावनाओं की एक झलक दिखा कर बुझ गये और संसार उनकी असफलता पर तरस खाता रह गया। उदीयमान प्रतिभाओं के पतन का एक ही कारण होता है— ‘प्रमाद’। जो प्रारम्भिक परिश्रम उन्हें लेकर उठता है, उसका त्याग कर दिये जाने से भविष्य की सम्भाव्य प्रगति रुक गई और उदीयमानता अस्मिता होकर अन्धकार के परदे में चली गई। इसलिए आवश्यकता है कि अपनी योग्यताओं एवं विशेषताओं को तरुण बनाये रखने के लिये अविराम परिश्रम में संलग्न लगा रहा जाये।

कला-कौशलों की भाँति अनवरत श्रमशीलता का नियम धनोपार्जन के क्षेत्र में भी लागू होता है। जो व्यापारी, व्यवसायी अथवा उद्योगी अपने कार्य में निरन्तर परिश्रम करते रहते हैं, वे न केवल अपने व्यवसाय को सुरक्षित ही बनाये रखते हैं, बल्कि बढ़ाया भी करते हैं। परिश्रम के बल पर कुछ समय में लाखों-करोड़ों की दौलत कमा लेने के बाद यदि कोई उद्योगी यह सोचकर प्रमादी बन जाये कि अब तो पर्याप्त धन मिल गया है, अब परिश्रम अथवा उद्योग करने की क्या आवश्यकता है, तो उसकी वह अपरिमित सम्पत्ति उससे भी कम समय में समाप्त हो जायेगी, जितने समय में उसने उसे कमाया है।

उपार्जन की ओर ध्यान लगा रहने से मनुष्य का मस्तिष्क अपव्यय की ओर से हटा रहता है। जब मन और मस्तिष्क की गति आय की दिशा में लगी हुई है तो उसकी विपरीत दिशा का अपव्यय की ओर न जाना स्वाभाविक ही है। किंतु ज्यों ही आय की ओर से उन्हें छुट्टी मिली नहीं कि वे व्यय की ओर चल पड़े। एक मात्र व्यय की ओर चले हुए मन-मस्तिष्क फिर केवल व्यय तक ही सीमित नहीं रह सकते, अपव्ययता से होते हुए अनिवार्य रूप से वे व्यर्थ व्यर्थता और व्यसन-व्ययता तक पहुँच जायेंगे।

व्यक्तिगत जीवन की तरह निरन्तर श्रमशीलता का नियम समाजों एवं राष्ट्रों के उत्थान-पतन में भी लागू होता है। जिस समाज अथवा राष्ट्र के नागरिक जितने अधिक श्रमिक होंगे, वह राष्ट्र व समाज उतनी ही अधिक उन्नति करता जायेगा। अमेरिका-रूस यद्यपि संसार के अनेक देशों से छोटे देश हैं, किन्तु निरन्तर श्रम की बदौलत आज वे संसार के सबसे समृद्ध एवं शक्तिशाली देश बने हुए हैं। यदि यह दोनों देश अपनी वर्तमान समृद्धि से सन्तुष्ट होकर अविराम श्रमिकता का परित्याग कर दें तो क्या कल वे इस स्थिति में रह सकेंगे? कदापि नहीं। और निश्चय ही जिस दिन ये श्रम को छोड़ कर प्रमाद के वशीभूत हो जायेंगे, उसी दिन से उनका पतन प्रारम्भ हो जायेगा।

इसलिए क्या व्यक्ति और क्या राष्ट्र जो भी अपनी उन्नति चाहता है और अपनी वर्तमान उपलब्धियों को भविष्य में सुरक्षित रखना चाहता है, वह अविरत परिश्रम का महामन्त्र अपना कर आलस्य एवं प्रमाद के अभिशाप से सदा दूर रहे।

कहना न होगा कि जिस प्रकार भारतवासियों ने अविरत संघर्ष के बल पर सदियों बाद जिस स्वाधीनता को उपलब्ध किया है उसे सुरक्षित रखने और समृद्धि का रूप देने के लिये उन्हें अखण्ड पुरुषार्थ करना ही होगा। अन्यथा न तो स्वतन्त्रता की रक्षा कर पायेंगे और न समृद्धि के शुभ-दर्शन कर पायेंगे।


आत्म-विश्वास ही अटूट शक्ति

अकर्मण्य, असहाय तथा अविश्वासपूर्ण जीवन बिताने वाले मनुष्यता के नाम पर एक कलंक के अतिरिक्त कुछ नहीं हैं। मनुष्य जीवन रिरियाने, रेंगने और रोने के लिये नहीं है। वह है, आगे बढ़कर भविष्य पर पैर रोपने और समय पर अधिकार करने के लिये। जीवन पराजय के लिये नहीं, विजय के लिये है।

किन्तु जीवन-संग्राम में विजय मिलती उसी को है, जो उत्साह से भरपूर और आत्म-विश्वास से ओत-प्रोत है। जिसके चरणों में अंगद की दृढ़ता है, वही समय की छाती पर अपना पदारोपण कर सकता है। आत्म-विश्वास सारी शक्तियों का उद्गम और समस्त श्रेयों की कुँजी है।

आत्म-विश्वास के जागते ही मनुष्य में वह दिव्य शक्ति प्रबुद्ध हो जाती है, जिसके बल पर ऊँचे से ऊँचे पर्वतों को लाँघा और गहरे से गहरे समुद्र को सन्तरण किया जा सकता है। आत्म-विश्वासी समस्त संसार के विश्वास का अधिकारी होता है।

—सुरेन्द्रनाथ बनर्जी

—सुरेन्द्रनाथ बनर्जी


“मामेकं शरणं व्रज”

रुलमैन मर्सविन के सम्बन्ध में कहा जाता है कि एक दिन जब उसके विचार पूर्ण रूप से थके हुये थे, किसी अव्यक्त चिन्ता में डूबा हुआ, सन्ध्या के समय वह अपने बाग में घूम रहा था, सहसा उसे एक दिव्य प्रकाश दिखाई दिया। इस दर्शन से उसका हृदय इतना गदगद हो गया कि उसने उसी क्षण संकल्प लिया “ हे प्रभु मेरी इच्छायें, मेरी सम्पत्ति और व्यक्तित्व सब कुछ तेरा है, यह तुझे ही समर्पण है।” मर्सविन की आध्यात्मिक शक्तियाँ जागृत हुई और वह आत्म-कल्याण करने में सफल हुआ। अनेकों दूसरी संत्रस्त आत्माओं को भी उसने प्रकाश और प्रेरणा दी। अपने आप को परमात्मा की भेंट कर देने के कारण मर्सविन का मनुष्य-जीवन धन्य हो गया।

हमारी दृष्टि में यह स्थिति संसार के प्रत्येक व्यक्ति के लिये एक जैसी ही है। अनेक तपस्वी महापुरुषों ने आत्म-समर्पण किया और जीवन-मुक्त बने। महर्षि रमण, स्वामी रामकृष्ण, ऋषि दयानन्द, स्वामी विवेकानन्द, स्वामी रामतीर्थ, सुकरात, सन्त हेरेसा, कैबेरिन आदि अनेक जीवनमुक्त-आत्माओं के जीवन-दर्शन स्पष्ट संकेत करते हैं कि मनुष्य की अन्तिम महानता पूर्ण शरणागति है। जब तक अहंकार का थोड़ा- सा भी अंश शेष रहता है तब तक जीवात्मा परमानन्द का रसास्वादन नहीं कर पाती। अनन्त एवं शाश्वत आत्मा का साक्षात्कार अपने आप को ईश्वरीय सत्ता में पूर्णतया घुला देने के बाद ही होता है। अपनी स्वतन्त्र इकाई बनाये रखना ही दुःख और बन्धन का कारण है। “डायनोसियस द एरोपागाइट” ने लिखा है— अपनी सम्पूर्ण वस्तुओं को सच्चे हृदय से परमात्मा को समर्पित कर देने से ही सिद्धि प्राप्त होती है।

कोई भी व्यक्ति क्यों न हो, यदि वह परिस्थितियों से टक्कर नहीं लेता और केवल सुखोपभोग को ही मनुष्य जीवन का लक्ष्य मानकर चलता रहता है तो उसके जीवन में कोई विशेषता भले ही न जान पड़े पर वह अपनी अज्ञान जनक स्थिति में ही सन्तुष्ट बना रहेगा। उसे जैसी भी अच्छी-बुरी परिस्थितियाँ मिल जायेंगी उन्हें ही अपना भाग्य समझ कर भोगता रहेगा। इस प्रकार के मनुष्य पूर्णतया माया या अज्ञानग्रस्त कहे जा सकते हैं। इस स्थिति का प्रत्येक अन्त,यदि उसका दृष्टिकोण नितान्त भोगवादी है तो दुःख से भरा ही होगा और यह कहा जायगा कि जीवात्मा अधोगति की ओर जा रही है।

एक सामान्य जीवन-क्रम भी हो सकता है जिसमें सुख-दुःख, शान्ति-अशान्ति, आशा-निराशा की उभयनिष्ठ परिस्थितियाँ आती हैं। मनुष्य न तो बहुत श्रेष्ठ सत्कर्म ही करता है और न कोई बड़े पाप ही करता है। यह स्थिति पहली से यदि कुछ भिन्न है तो भी उसमें विशेषता न होगी और यह कहा जायगा कि मनुष्य-जीवन के लक्ष्य से वह भी विमुख ही है। इन दोनों स्थितियों को तमोगुणी और रजोगुणी कहना अधिक उपयुक्त होगा।

तीसरी अवस्था आत्म-कल्याण की ओर अग्रसर होना है। यह मनुष्य जीवन को सार्थक बनाने वाली स्थिति है, पर जब मनुष्य इस ओर अग्रसर होता है तो प्रारम्भ में बड़े संघर्ष आते हैं। परिस्थितियों के उतार-चढ़ाव, प्रारम्भ में कर्मों के फल और वर्तमान क्रियाओं से प्रभावित मनुष्य का मन विभ्रमित होता रहता है। मनुष्य का मन कभी विश्व-वैचित्र्य को ध्यान में रखता हुआ दार्शनिक तथ्यों को सच मानता है और उन पर चिन्तन करता है तो कभी भौतिक आकर्षण उसे अपनी ओर खींचते हैं और उसे उन्हीं में पूर्णानन्द की उपलब्धि होती जान पड़ती है। ब्रह्म और माया के बीच की यह रस्साकशी प्रत्येक साधक के मस्तिष्क में प्रस्फुटित होती है। इस संघात से कई बार वह इतना विभ्रमित हो जाता है कि उसकी सारी विचारशक्ति जवाब दे जाती है और वह इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि जब इस माया या अज्ञानान्धकार का विच्छेदन करना अपनी सामर्थ्य से बाहर है तो फिर क्यों उसके पीछे पड़ा जाय और साँसारिक सुखों का भी तिलाँजलि दे दी जाय।

साधक का मार्गदर्शन कमजोर हो तो यह स्थिति मनुष्य को आत्म-कल्याण के मार्ग में देर तक टिकने नहीं देती। साधक की श्रद्धा कमजोर हो तो भी यही बात है।

किन्तु यदि विचार मन्थन द्वारा इस बात को पूरी तौर पर समझ लिया गया है कि संसार निःसंदेह एक बहुत बड़ा रहस्य है और उसमें अपनी स्थिति का ज्ञान प्राप्त किये बिना कल्याण नहीं हो सकता तो फिर साँसारिक बाधायें रास्ता नहीं रोक सकतीं।

विश्वास अटल हो तो अन्त में विचार करते-करते मनुष्य इसी स्थिति पर पहुँचेगा कि इस अखिल सृष्टि का संचालन करने वाली कोई अतीन्द्रिय, व्यापक और विशाल चेतन-सत्ता विद्यमान है। उस तक अपने विचार पहुँचाये जा सकते हैं और उसका आशीर्वाद प्राप्त किया जा सकता है। उसके समक्ष अपनी इच्छायें पहुँचाई जा सकती हैं और उनका जवाब पाया जा सकता है। ऐसे ईश्वर-परायण व्यक्ति को यह भी मालूम पड़ जाता है कि वह परम-पिता सर्वज्ञ ही नहीं सर्व नियामक और न्यायकर्ता भी है। उसके लिये सभी पुत्र समान रूप से प्यारे हैं। किसी को छोटा या बड़ा समझने की असावधानी उसके दरबार में नहीं होती। संसार उसकी एक नियमित व्यवस्था में चल रहा है।

विश्व-व्यापी सत्ता का विचार बोध हो जाने से ही पूर्णता की स्थिति बन जाती हो ऐसा नहीं सोचना चाहिये। यह एक प्रकार से विश्वास की परिपक्वता है जहाँ से साधक पीछे की ओर नहीं लौटता। क्योंकि तब तक उसका अन्तःकरण पूरी तरह से मथ चुका होता है और यह भली-भाँति समझ लेता है कि सुख भौतिक वस्तुओं न होकर ब्रह्म में, आत्मा में विद्यमान है, उसकी खोज हुये बिना पूर्ण आनन्द की प्राप्ति नहीं हो सकती। उससे उसे साँसारिक भोगों से तृप्ति नहीं होती वरन् वह जितना अधिक उनमें रस लेने का प्रयत्न करता है उतना अधिक उसके मन और मस्तिष्क में तीव्र आन्दोलन उठ खड़ा होता है।

अब मनुष्य के लिये एक ही रास्ता शेष रहता है—आत्म समर्पण। वह जितना अधिक तादात्म का अनुभव करता है उतना ही सुख पाता है। इसका अभ्यास करते हुये वह परमात्मा में जितना अधिक घुलता जाता है उतना ही अधिक उसकी आन्तरिक विशालता का परिष्कार होता जाता है और मनोवृत्तियाँ निर्मल होती चलती हैं। यही स्थिति एक दिन आत्म-सिद्धि या पूर्णता की स्थिति तक पहुँचा देती है। ईश्वर प्राप्ति की यह साधना यौगिक क्रियाओं की अपेक्षा कहीं अधिक सरल है।

आत्म-समर्पण की परिभाषा को समझ लेना यहाँ जरूरी है। अल्प-बुद्धि के व्यक्ति आत्म-समर्पण का अर्थ घर छोड़कर भाग खड़े होना लगाते हैं। उनका कहना होता है कि अब उन्हें कर्म करने से कोई प्रयोजन नहीं रहा। पर यह बात भ्रामक है। कर्म के बिना तो मनुष्य घर छोड़ देने के बाद भी नहीं रह सकता। खाने-पीने, चलने, उठने, बैठने की क्रियायें तो वह करेगा ही। मानसिक वृत्तियों का शमन न हुआ हो तो वह इच्छायें भी करेगा और तब यह संभव नहीं कि वह जो कुछ करे सही ही हो। इच्छायें पापपूर्ण भी तो हो सकती हैं, भोगवादी भी हो सकती हैं। जबकि यह ईश्वर-निष्ठा से विपरीत आचरण है उसे आत्म-समर्पण की कोटि में कैसे लाया जा सकता है। आत्म-समर्पण का अर्थ गृह-त्याग या कर्म से संन्यास ले लेना नहीं, उसका सम्बन्ध मनुष्य की आन्तरिक स्थिति से है।

मर्सविन ने कहा था—”हे प्रभु! मेरी इच्छायें, मेरी सम्पत्ति और व्यक्तित्व सब कुछ तेरा है।” इन तीन बातों में ही आत्म-समर्पण का सारा रहस्य समाया हुआ है। इन तीन बन्धनों को खोल कर ही मनुष्य परमात्मा का सान्निध्य सुख प्राप्त कर सकता है।

इच्छायें समर्पित कर देने से मनुष्य कामना रहित हो जाता है। जब तक कामनायें शेष रहती हैं, तब तक मनुष्य फल की आशा रखता है और यदि वह न मिले तो दुःखी होता है। कामनाओं की पूर्ति के लिये आवश्यक परिस्थितियाँ न हुई तो वह कैसे पूरी हो सकती हैं? अल्प विद्या वाला व्यक्ति कोई उच्च पद प्राप्त करना चाहे तो वह कहाँ सम्भव है? ऐसी स्थिति में असंतोष, निराशा, विक्षोभ का उत्पन्न होना स्वाभाविक ही है। फिर यदि कामनायें पूरी हो भी जाय तो उनका उपभोग शरीर तक ही तो सीमित है जब कि जीवात्मा शरीर नहीं प्रकाश है। अमर-तत्व परिवर्तित नहीं हो सकता तो उसकी मूलभूत आवश्यकतायें ही कैसे बदल जायेंगी। इसलिये कहो है कि ऐ मनुष्य! तू इच्छायें न कर। इच्छाओं से कभी तृप्ति नहीं होती। इन्हें परमात्मा को सौंप दे अर्थात् जैसी भी स्थिति हो उसी में सन्तोष अनुभव करना चाहिये।

सम्पत्ति-मनुष्य को स्थूल सुखों से बाँधने वाली दूसरी वस्तु है जबकि आत्म-देश तक पहुँचने वाली केवल भावनायें होती हैं, अतः ईश्वरनिष्ठ को धन का भी मोह नहीं होना चाहिये। धन का खेल खेलना चाहिये। आत्मा के उत्थान के लिये उसे एक साधन के रूप में देखना चाहिये। धन को परमात्मा की वस्तु समझकर सीमित और आवश्यक मात्रा में ही उपभोग करना चाहिये। निर्जीव वस्तु के लिए चेतन का सुख ठुकरा देना बुद्धिमानी नहीं हो सकती। आत्म-साक्षात्कार के लिए धन को भी परमात्मा को सौंप देते हैं अर्थात् उसका मोह त्याग देते हैं।

धन और कामनाओं का त्याग कर देने के बाद भी मनुष्य को व्यक्तित्व का मोह हो सकता है। मैं ब्राह्मण हूँ, मैं विद्वान हूँ ऐसी मिथ्या धारणायें ज्ञानी पुरुषों को भी हो जाया करती हैं। मन में किसी भी प्रकार का अहंकार लाना बन्धन का ही कारण हो सकता है। जीवात्मा का शरीर-गत विशेषताओं से उतना ही सम्बन्ध है जितना मनुष्य का उसके निवास स्थान से। आध्यात्मिक गुण ही व्यक्तित्व को सजा सकते हैं और उन्हीं से जीवात्मा को शाश्वत लाभ हो सकता है। शारीरिक विशेषताओं की ओर ध्यान रहते हुए सूक्ष्म आत्मिक गुणों का प्राप्त करना कठिन हो जाता है इसलिये अपने व्यक्तित्व की विशेषताओं को भी परमात्मा का सौंप देते हैं।

जब आत्मा का कोई भी विकार शेष नहीं रहता तब वह पूरी तरह से परमात्मा को आच्छादित कर लेती है। जीव ब्रह्ममय हो जाता है। उसकी आध्यात्मिक शक्ति जाग्रत हो जाती है।

मनुष्य अपने आप में पूर्ण नहीं है। साधन करते हुये भी वह गलतियाँ कर सकता है। मुक्ति का सीधा और सरल पथ आत्म-समर्पण है। अपने आपको पूर्ण रूप से परमात्मा को सौंप देने के बाद आत्म-कल्याण की सब कठिनाइयाँ दूर हो जाती हैं और भगवान् उसका कुशल-क्षेम स्वयं वहन करने लगते हैं। गीता में भगवान कृष्ण ने यही बात संक्षेप में इस तरह कही है—

सर्व धर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयामि मा शुचः॥

अर्थात्—हे मनुष्यों! तुम सब धर्मों का परित्याग कर केवल मेरी शरण में आ जाओ, मैं तुम्हें सारे पाप-बन्धनों से मुक्त कर दूँगा।

अर्थात्—हे मनुष्यों! तुम सब धर्मों का परित्याग कर केवल मेरी शरण में आ जाओ, मैं तुम्हें सारे पाप-बन्धनों से मुक्त कर दूँगा।


Quotation

आन्तरिक शृंगार और सौंदर्य

अन्दर से अच्छा बनना ही वास्तव में कुछ बनना है। अन्तर को घटाकर जीवन को बाहर से बनाना, सजाना ठीक उसी प्रकार की क्रिया है जैसे कोई विद्यार्थी किसी प्रश्न के मूल अन्तर को छोड़कर उसकी भूमिका के बल पर ही परीक्षा पास करना चाहता है।

मनुष्य जीवन की बाह्य बनावट उसे कब तक साथ देगी। जो कपड़े अथवा जो प्रसाधन जीवन में सुन्दर लगते हैं, यौवन ढलने पर वे ही उपहासास्पद दीखने लगते हैं। मनुष्य को जीवन का शृंगार ऐसे उपादानों से करना चाहिये जो आदि से अन्त तक सुन्दर बने रहें और मनुष्य को आकर्षक बनाये रहें।

मनुष्य जीवन का वह अक्षय शृंगार है, आन्तरिक विकास। हृदय की पवित्रता एक ऐसा प्रसाधन है जो मनुष्य को बाहर भीतर से एक ऐसी सुन्दरता से ओत-प्रोत कर देता है जिसका आकर्षण न केवल जीवन पर्यन्त अपितु जन्म-जन्मान्तरों तक सर्वदा एक सा बना रहता है।

—अश्विनीकुमार दत्त

—अश्विनीकुमार दत्त


आत्म-साक्षात्कार के लिए सच्चरित्रता अनिवार्य

कठोपनिषद् में वैवस्वत यम ने नचिकेता को आत्म-साधना पर प्रकार डालते हुए कहा—

नाविरतो दुश्चरितान्नाशान्तो नासमाहितः। नाशान्त मानसो वापि प्रज्ञानेनैन माप्नुयात्॥

1/2/24

“हे शिष्य! जिनने अपना चरित्र शुद्ध नहीं किया, जिसकी इन्द्रियाँ शान्त नहीं, जिसका चित्त स्थिर नहीं रहता और जिसका मन सदैव अशान्त रहता है, वह केवल बाह्य ज्ञान के आधार पर आत्मा को प्राप्त नहीं कर सकता।”

चरित्र या कर्म अपना फल किस प्रकार देते हैं? यह जानने की बात है। बीज के अनुरूप ही फल होता है। पाप से आत्मा की पराधीनता दृढ़ होती है और पुण्य आत्मा को मुक्त अवस्था की ओर अग्रसर करता है, यही पाप और पुण्य के फल का रहस्य है। बुरे कर्म आत्मा के लिये आवश्यक हैं या नहीं? यह बातें व्यवहार से स्पष्ट मालूम पड़ जाती हैं। मोटे तौर पर वासना पूर्ति से अशान्ति बढ़ती है, क्रोध से शरीर जलने लगता है और आत्मा को बेचैनी मालूम पड़ती है। लोभ आता है तो मनुष्य कितना उद्विग्न हो जाता है, मानो वह नरक की अग्नि में प्रत्यक्ष जल रहा हो। इसी प्रकार संसार में जितने भी बुरे कर्म हैं, वह आत्मा को कष्ट देने वाले और उसके शाश्वत गुणों के विपरीत ही होते हैं, फिर इनके रहते आत्मा अपने मुक्त रूप में प्रकट भी कैसे हो सकता है?

मन की मलीनतायें, पाप, क्रोध, काम और इच्छायें नहीं रहतीं तो आत्मा को तुरन्त शान्ति मिलती है, गुण बढ़ते हैं, ज्ञान बढ़ता है, आनन्द मिलता है, शक्ति अनुभव होती है, सन्तोष होता है। इस प्रकार आत्मा को सुख की अनुभूति होती है। इससे भी मालूम पड़ता है कि काम, क्रोध आदि विकार हैं और वे आत्मा की पवित्रता को कलंकित करने वाले ही होते हैं। अतः इनके रहते हुए आत्म-ज्ञान की इच्छा कैसे पूर्ण हो सकती है?

आत्मा में केवल वही इच्छायें सुखद अनुभव होती हैं, जिन्हें हम पुण्य कहते हैं। सेवा, सर्द्धम, सद्भावना, प्रेम, स्नेह और त्याग-उदारता के क्षणों में आत्मा की शुद्ध इच्छा प्रकट होती है, जबकि साँसारिक भोग की इच्छायें पराधीनता और दूसरे पदार्थों का दास बनाती हैं। अतः रागद्वेष सभी अस्वाभाविक हैं। इनके रहते हुए आत्म-स्थिरता या आत्मा के सुखों में एकाग्रता नहीं हो पाती और आत्मस्थित हुए बिना उसका ज्ञान प्राप्त करना सम्भव नहीं। यह स्थिति ही ऐसी है, जिसे कामनाओं के पहाड़ पर चढ़कर नहीं देख सकते। आत्मा को देखने के लिए तो विशुद्ध आत्म-गुण वाला बनना पड़ता है या आत्मा में ही बस जाना होता है। अतः आत्मा को जागृत करने का पहला महामन्त्र आत्मा को शुद्ध बनाना है।

अध्यात्म योग की आधार शिला की व्याख्या करते हुए श्री शंकराचार्य ने भी इसी तथ्य का प्रतिपादन किया है। उन्होंने लिखा है—

विषयेभ्यः प्रतिसंहृत्य चेतस आत्मानि समाधान मध्यात्म योगः।

अर्थात्— चित्त को विषयों से हटा कर आत्मा में समावेश करना ही अध्यात्म-योग है।

उपरोक्त कथन से इस आन्तरिक प्रक्रिया पर पूरी तरह प्रकाश पड़ जाता है कि आत्मा की शुद्धि के बिना आत्म-ज्ञान सम्भव नहीं है।

जैन-धर्म में “तत्वाधिगम् सूत्र” में इस बात को और भी विवरण युक्त करते हुए लिखा है—

हिंसानृतास्तेयब्राह्मपरिग्रहेभ्यो विरतिर्व्रतम्।

(तत्वा. (7/2)

अर्थात्—प्राण हिंसा करना, झूठे बोलना, चोरी करना, व्यभिचार और परिग्रह इन पाँच पापों को छोड़ना ही व्रत है।

बौद्ध दर्शन में निवृत्ति मार्ग की चर्चा की जाती है। वह वस्तुतः आत्मोद्धार का ही पर्याय है। इसके लिए जिन साधनों का विस्तार किया गया है, वे भी उपनिषदों के आत्म-शोधन एवं जैन दर्शन के व्रतों के समान ही है। बौद्ध भिक्षु जब आत्म-कल्याण के लिये निवृत्ति पथ का अनुसरण करता है तो उसे भी इस तरह की पाँच प्रतिज्ञायें करनी पड़ती हैं—

पाणातिपाता वेरमणी सिक्खापदं समादियामि।

—मैं प्राणि-बध नहीं करूंगा।

अदिन्नादाना वेरमणी सिक्खापदं समादियामि।

—किसी की चोरी नहीं करूंगा।

कामे सुमिच्छासारा वेरमणी सिक्खापदं समादियामि।

— व्यभिचार नहीं करूंगा।

मुसावादा वेरमणी सिक्खापदं समादियामि।

—मैं कभी झूठ नहीं बोलूँगा।

सुरा-मेरेय-मज्ज पमाद ट्ठाना वेरमणी सिक्खापदं समादियामि।

—माँस मदिरा आदि अभक्ष्य पदार्थों का सेवन नहीं करूंगा।

हिन्दू धर्म में भी यह सम्पूर्ण दुराचरण तो विवर्जित हैं ही साथ ही मनोवैज्ञानिक विश्लेषण से जानी गई मन की सूक्ष्म विकारमय वृत्तियों से जिनके कारण बड़े दोष बन पड़ते हैं, निग्रह की आवश्यकता पर प्रकाश डाला गया है जो वास्तव में दूसरे धर्मों के सिद्धान्तों की अपेक्षा अधिक तथ्यपूर्ण एवं वैज्ञानिक हैं। उदाहरणार्थ काम-वासना बुरी वस्तु है और वह आत्म-ज्ञान से विमुख करने वाली है पर मनुष्य केवल मनोबल के आधार पर वासना से मुक्त नहीं हो सकता क्योंकि परिस्थितियों का प्रभाव भी तो अपना महत्व रखता है। मन की काम-वासना वस्तुतः वैज्ञानिक दृष्टि से अन्न दोष है अर्थात् यदि आहार अनियमित है तो मन की वासना पर कभी भी नियंत्रण नहीं किया जा सकता। इसलिए सच्चरित्रता के सिद्धान्तों को कुछ वाक्यों तक ही सीमित नहीं किया गया वरन् उनका बहुत अधिक विस्तृत विश्लेषण किया गया है। अर्थात् इन नियमों को प्रारम्भिक अवस्था, आहार-विहार, शिक्षा-दीक्षा, भाषा-व्यवहार, धर्म-कर्म आदि से ही बाँधने का प्रयास किया है। इस सर्वांगीण शुद्धि-प्रक्रिया को अपनाये बिना मनुष्य जीवन के दोषों से कदापि मुक्त नहीं हो सकता।

संसार में मनुष्य अपने क्षणिक सुख के लिए अनेक प्रकार के दुष्कर्म कर डालता है। उसे यह खबर नहीं होती कि इन दुष्कर्मों का फल हमें अन्त में किस प्रकार भुगतना पड़ेगा। मनुष्य को जो तरह-तरह के कष्ट उठाने पड़ते हैं, उनके लिए किसी अंश तक समाज और देशकाल की परिस्थितियाँ भी उत्तरदायी हो सकती हैं पर अधिकाँशतया वह अपने ही दुष्कर्मों के प्रतिफल भोगता है। किन्तु मनुष्य शरीर दुःख भोगने के लिए नहीं मिला। यह आत्म-कल्याण के लिए मुख्यतः कर्म-साधन है, इसलिए अपनी प्रवृत्ति भी आत्म-कल्याण या सुख प्राप्ति के उद्देश्य की पूर्ति होना चाहिए और इसके लिए बुरे कर्मों से बचना भी आवश्यक हो जाता है।

विकास का क्रम भी इसी तरह चलता है। साधनों को प्राप्त कर यदि आत्मा विवेक का सदुपयोग करता है और उसे अच्छे कर्मों में लगाता है तो आत्मा अपनी शक्तियों को बढ़ाता हुआ अनुकूल साधनों को भी बनाता रहता है और अन्त में प्रारब्ध से, स्वाधीन होकर अपनी पूर्ण उन्नति कर लेता है।

इन दोनों मार्गों में से एक का चुनाव करना आवश्यक हो जाता है। आत्म-ज्ञान की इच्छा रखने वाले एक साथ दोनों आचरण नहीं कर सकते। शास्त्रकार ने अपना निष्कर्ष स्पष्ट शब्दों में व्यक्त करते हुए लिखा है—

हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्। तत्वं पूषन्नपावृणु सत्य धर्माय दृष्टये॥

“सत्य का मुख ढ़का हुआ है ऐ सत्य शोधक! यदि तू उसे प्राप्त करना चाहता है तो उस ढक्कन को खोलना पड़ेगा जिससे सत्य ढ़क गया है। यदि तू उसे नहीं छोड़ सकता तो सत्य ही तुझे छोड़ जाएगा।” दोनों बातें एक साथ कदापि नहीं हो सकतीं। आत्म-ज्ञान को बुरे कर्मों ने भी इसी तरह ढ़क लिया है। उसे प्राप्त करने के लिए इस अशुद्ध अवस्था का परित्याग करना ही पड़ता है। साँसारिक विषय वासनाओं की इच्छाओं पर विजय करनी ही पड़ती है।


अपने जीवन में प्रकृति को प्रवेश होने दीजिये।

“मैं एक गरीब किसान हूँ। हमारी दुनिया हमारा गाँव, हमारे खेत है। मैंने अपनी सारी जिन्दगी खेतों में ही बिताई है। मुझे छत के नीचे नींद नहीं आती। बरसात में भी कभी-कभी ही मैं छप्पर के नीचे सोता हूँ। हजारों की कमायी मैंने कठोर श्रम द्वारा कमाई है। बचपन में पका भोजन नहीं नसीब हुआ सो कच्चा अन्न खाने की मेरी आदत पड़ गई है। आज भी सभी चीजें कच्ची ही खाता हूँ। जानवरों से मुझे प्रेम है। मैं माँस नहीं खाता। कुरान में शराब की मनाही है। मैंने भी कभी शराब नहीं पी। बकरी का दूध पीता हूँ। आठ घण्टे परिश्रम करता हूँ। पहाड़ियों पर चढ़ने,तैरने, कुएं खोदने में मुझे आनन्द आता है। 6 घंटे की नींद मुझे पर्याप्त है। दोनों समय नहाता हूँ। भगवान का भजन करता हूँ। मेरा जीवन पूर्ण सुखी है।”

उपरोक्त शब्द मिश्र के गाजियाना गाँव के व्यक्ति श्री “रजा बका” के हैं, जिनके स्वास्थ्य को इस युग में आश्चर्य की दृष्टि से देखा जाता है। स्वीडन से लेकर केलिफोर्निया तक के अनेक स्वास्थ्य विशेषज्ञ पिछले कई वर्षों से उनके स्वास्थ्य का गम्भीर अध्ययन करने में लगे हुये हैं। डा. लेसरनेस, फ्राँसीसी सरजन जनरल वेताँ रोशे तथा अनेक स्वीडिश आरोग्य शास्त्रियों ने बका के स्वास्थ्य की भूरि-भूरि प्रशंसा की है। रजा बका का वजन 123 पौण्ड, ऊँचाई 5 फुट 8 इंच,उम्र 107 वर्ष। शरीर में कहीं झुर्री नहीं, पूरे दाँत, सीधी कमर,तीव्र नेत्र दृष्टि। 107 वर्ष की आयु में वह पूरे नवयुवक से दिखाई देते हैं। स्वास्थ्य की दुर्बलता, रोग या बुढ़ापे का कोई चिह्न इस व्यक्ति के शरीर में नहीं है।

इस “स्वास्थ्य-वैचित्र्य” पर स्वास्थ्य विशेषज्ञ व आरोग्य शास्त्रियों ने अपने-अपने ढंग के अनेक मन्तव्य निकाले हैं पर प्रायः सबके सब इस बात पर एक मत हैं कि रजा बका के स्वास्थ्य को चिरस्थायी रखने वाली वस्तु है—प्राकृतिक जीवन पद्धति। बका के उपरोक्त कथन से भी यह बात प्रकट हो जाती है कि उन्होंने अपने जीवन के प्रत्येक अंग में प्रकृति को प्रवेश होने दिया है। सौ वर्ष तक पूर्ण स्वास्थ्य और बलिष्ठ बनाये रखने की क्षमता प्रकृति में है। प्रकृति के बीच रहने, प्राकृतिक आहार विहार रखने, प्राकृतिक जीवन जीने से मनुष्य अपनी पूर्ण-आयु प्राप्त कर सकता है। मृत्युपर्यन्त स्वास्थ्य और आरोग्य का सुखोपभोग कर सकता हैं। इसमें राई-रत्ती भर भी शंका की बात नहीं है।

विचारपूर्वक—देखा जाय तो प्रकृति हमारा पालन-पोषण ठीक ऐसे ही करती है जैसे कोई माता अपने बेटे का। आहार जुटाने से लेकर शारीरिक सफाई तक का प्रत्येक कार्य प्रकृति पूरी तत्परता के साथ निभाती है। वह इस कार्य में गुमराह बन जाय तो मनुष्य का जीना भी कठिन हो जाय। प्रकृति से अलग रहने, बनावटी जीवन जीने में मनुष्य का कल्याण नहीं है। स्वास्थ्य तथा आरोग्य का वरदान भी वह प्रकृति माता की गोद में रहकर ही प्राप्त कर सकता है। हम अपने अस्तित्व की रक्षा के लिये पेड़-पौधों वनस्पतियों,वायु जल, आकाश आदि प्राकृतिक साधनों पर निर्भर हैं। इनकी समीपता में रहने से स्वास्थ्य की मौलिकता बनाये रख सकते हैं। पर लापरवाही के साथ उनकी बर्बादी करने में अपने भविष्य या वंशजों का जरा भी खयाल नहीं करते। प्राकृतिक जीवन तथा प्राकृतिक नियमों का उल्लंघन करने के कारण रोग और शारीरिक दुर्बलता का शिकार होना पड़ता है। आश्चर्य होता है कि यह रोग आया कहाँ से? किसी न किसी वस्तु पर दोषारोपण कर या दैव को दोषी ठहराकर संतोष भले ही कर लिया जाय पर सच यही है कि नितान्त अप्राकृतिक जीवन पद्धति के कारण ही मनुष्य के स्वास्थ्य की यह विषम समस्या खड़ी हुई है। इसका उपचार भी एक ही है और वह यह है कि प्राकृतिक जीवन की ओर पुनः लौटा जाय, उसे जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में समाविष्ट होने दिया जाय।

पेड़-पौधे हमारे जीवन की रक्षा करते हैं। मनुष्य की पैदा की हुई गन्दी वायु कार्बन-डाई-आक्साइड आदि दूषित तत्व बेचारे वृक्ष ही खाते हैं और बदले में आक्सीजन तत्व जो जीवन रक्षा का प्रमुख साधन है हमारे लिये बराबर देते रहते हैं। फल, तरकारियाँ, फूल, औषधियाँ आदि भी प्रकृति से ही उपलब्ध हैं। वर्षा का कारण तथा वायु की तीव्रता आदि से बचाव भी यही करते हैं। प्रकृति हमारी जीवन-रक्षक है उसकी सान्निध्यता में रहकर हम यह जीवन स्वर्ग-तुल्य बना सकते हैं।

पर मनुष्य अब इस सिद्धान्त से दूर हटता जा रहा है। पेड़-पौधे, बाग आदि लगाने का शौक घट रहा है उलटे वनों का निर्ममता से सफाया किया जा रहा है। मकानों की दूषित वायु में शहरों की गन्दगी में ही रहने का जितना मनुष्य आदी होता जा रहा है उतना ही उसकी उम्र भी कम होती जा रही है। इसके विपरीत अभी भी ऐसे उदाहरण हैं जबकि लोग प्रकृति के संपर्क में रहने के कारण अधिक आयु, स्वास्थ्य शरीर तथा आरोग्य रक्षा के पूर्ण लाभ प्राप्त करते हैं। मनुष्य इस संसार में अन्योन्याश्रित जीवों के एक अंग के रूप में ही रह सकता है। भिन्न रूपधारी प्राणियों के साथ एक भाग में ही रहने में उसकी कुशल है। प्रकृति पर नियंत्रण करने, उसे नष्ट कर डालने से उसका जीवन खतरे में पड़ सकता है, इसके ठोस प्रमाण आज बढ़ती हुई बीमारियों के रूप में सर्वत्र दिखाई पड़ रहे हैं।

प्रकृति के अनुकूल चलने में मनुष्य सुखी, स्वस्थ एवं प्रसन्नचित्त रह सकता है। प्रतिकूल चलने में अनेक शारीरिक तथा मानसिक रोगों का प्रादुर्भाव होता है। जीवन की सरसता के लिये प्रकृति-प्रेम अत्यन्त उपयोगी है। इससे जीवन में सन्तोष, उत्साह, उमंग, शान्ति एवं तेजस्विता प्राप्त होती है। प्रातःकाल उन्मुक्त प्रकृति में परिभ्रमण से शारीरिक और मानसिक बल बढ़ता है, चैतन्यता आती है, स्फूर्ति बढ़ती है। प्रकृति मन को प्रफुल्लित रखने और शान्ति प्रदान करने में बड़ी सहायक है। ऋषियों का आवास इसी दृष्टि से सदैव घने जंगलों में रहा है। पक्षियों के कलरव, झरनों की कल कल, फूलों की महक से शरीर और मन को बड़ा सुख मिलता है। प्राण और जीवन तत्व बढ़ता है। सद्प्रवृत्तियों का अन्तःकरण में विकास होता है।

पं. जवाहरलाल जी ने लिखा है—”प्रकृति के इस सुनसान रूप में मुझे अजीब सन्तोष मिला है। एक ऐसा उत्साह और उमंग का तूफान दिल में आया जो पहले कभी नहीं आया था। प्रकृति में दिमागी बल देने की ताकत है।”

प्रकृति का सामीप्य उदासीनता, मानसिक परेशानी तथा नीरसता को दूर करता है। इससे मनुष्य के मस्तिष्क में सुव्यवस्थित जीवन जीने की सूझ पैदा होती है। घर के रहन-सहन में सफाई तथा सजावट की प्रेरणा प्रकृति प्रेम पर आधारित है। कला विकास व चारित्रिक दृढ़ता को प्रभावित करने की अलौकिक शक्ति प्रकृति में है।

रहन-सहन की तरह आहार भी प्राकृतिक रहना स्वस्थ जीवन का मूलमन्त्र है। कच्चे-फल, तरकारियाँ, गाजर, मूली, सकरकंद जैसे पदार्थों में शरीर सुरक्षा तथा अभिवृद्धि के सब तत्व मौजूद होते हैं। रोग बाहर से नहीं आते वरन् वे शरीर के भीतर अप्राकृतिक ढंग के आहार से उत्पन्न विजातीय द्रव्य के कारण ही पैदा होते हैं। प्राकृतिक पद्धति का बुनियादी सिद्धान्त यह है कि रोग अपने को निरोग करने का शरीर की ओर से किया हुआ प्रयत्न है। शरीर अपने को स्वस्थ रखने के लिए ही रोग प्रस्तुत करता है। विजातीय पदार्थ का बढ़ना कम हो तो रोग के आघात भी कम हों इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए प्राकृतिक आहार ही लाभदायक होता है। शरीर में मल की मात्रा बढ़ने का एक मात्र कारण अप्राकृतिक आहार है।

स्वास्थ्य और आनन्द का जीवन जीने का यह अचूक सिद्धान्त है कि हमारे जीवन की प्रत्येक गतिविधि में प्रकृति का समावेश हो। गाजियाना के रजाबका की घटना इस देश के लिए सामान्य बात रही है किन्तु वह तब थी जब प्रकृति हमारे जीवन का आधार थी। आज इसे भुला देने से स्वास्थ्य की समस्या ने इतना विकराल रूप बनाया है। हम पुनः प्रकृति का आश्रय ग्रहण करें तो कोई कारण नहीं कि हमारा भी जीवन सौ वर्ष से कम हो। प्रकृति हमारी जीवन रक्षा का आधार है हमें उसकी गोद में से हटना नहीं चाहिए। उसकी शरण में बने रहकर सुख, स्वास्थ्य और धन प्राप्त करने का प्रयत्न करना चाहिए।


सुख और दुःख दृष्टिकोण मात्र हैं।

सब कुछ साधन सम्पन्न और सूक्ष्म होने पर भी एक नहीं असंख्यों व्यक्ति संसार में चिन्तित और उद्विग्न दिखाई देते हैं। यदि और अधिक गहराई से देखा जाये तो जो जितना साधन सम्पन्न और सुविधाओं से भरा-पूरा है वह उतना ही व्यग्र चिन्तित और विकल दिखाई देगा। इसके विपरीत कम साधनों और अभाव वाले व्यक्ति मस्त और मनमौजी दिखाई देंगे।

जो साधन सम्पन्न है, सुविधाओं से भरा पूरा है उसके अधिक चिन्तित रहने का कारण यह रहता है कि वह व्यक्ति अपनी सम्पन्नता के अभिमान में संसार के सारे सुख अपने लिए चाहता रहता है। वह हर समय प्रसन्न रहने और हँसी खुशी पाने के लिए लालायित रहा करता है। बहुत कुछ सम्पन्नता के बावजूद भी जब वह अप्रिय परिस्थिति के बीच पहुँचता है तो उसका रोम-रोम दुखी हो उठता है। वह सोचने लगता है कि इतना सब कुछ सम्पन्न होने पर भी वह जो दुखी है, वह उसके भाग्य का ही दोष है। उसका सारा ध्यान पूर्व जन्म के पापों का काल्पनिक चिन्तन करने में लग जाता है। इससे उसका पूरा जीवन दुःखी की क्रीड़ास्थली बन जाता है।

दूसरा व्यक्ति अभावग्रस्त होने पर भी बहुत कुछ निश्चिन्त एवं प्रसन्न दीखता है। न उसे अभाव सताता है और न सम्पन्नता की कामना ही क्लेश दे पाती है! भोजन, वस्त्र और निवास की घोर समस्या होने पर भी उसके प्रसन्न रहने का एक कारण उसका सन्तोष है। इसके साथ अनेकों व्यक्ति अभाव और विपन्नता का रोना रोते देखे जाते हैं। उन्हें भोजन, वस्त्र और निवास आदि की समस्याएं घुलाया करती हैं।

एक-सी परिस्थिति के दो व्यक्तियों में से एक को दुखी और एक को प्रसन्न देखकर यही समझ में आता है कि परिस्थितियाँ मात्र ही दुःख-सुख का कारण नहीं हैं। यह मनुष्य का अपना दृष्टिकोण तथा मनोभूमि का स्तर है जो उन्हें दुखी किया करता है।

जिस व्यक्ति को किसी बात के अन्धेरे पक्ष को ही देखने का अभ्यास हो गया है, वह अच्छी से अच्छी बात में भी दुःख चिन्ता का कारण निकाल लेता है और उसी को लेकर सोच-सोच कर दुखी हुआ करता है। दृष्टि दोष के कारण ही किसी वस्तु में दुःख का दर्शन होता है। संयोग के समय जो चन्द्रमा मनोहर दीखता है, वही वियोग के समय कष्टदायक बन जाता है। यदि वास्तव में सुख या दुःख का जन्म चन्द्रमा से ही होता तो क्या संयोगिन और क्या विरहिणी वह दोनों को एक समान ही सुख या दुःख दायक न होता?

सम्पत्ति के लिए रोने और चिन्तित होने वाला व्यक्ति यदि यह सोच ले कि अधिक सम्पत्ति उपार्जन के लिए मनुष्य को उचित एवं अनुचित साधनों का प्रयोग करना पड़ता है जिससे उनकी बुद्धि कलुषित और आत्मा पतित होती है। साथ ही धन सम्पत्ति पा जाने पर उसकी रक्षा करने और बढ़ाने की इच्छा चिन्ता बनकर साथ लग जाती है। तब ऐसी दशा में सुख कहाँ? अभाव के प्रति यदि इस प्रकार सोच लिया जाये कि यह ईश्वर की एक कृपापूर्ण प्रसन्नता है, जिसके कारण वह सम्पत्ति एवं धन दौलत के कारण उत्पन्न होने वाले झंझटों से बच जाता है। संपत्ति को बढ़ाने उसकी रक्षा करने आदि की चिन्ता उसके पास नहीं फटकती। वह निश्चिन्त एवं निर्द्वन्द्व जीवन व्यतीत करता है। सम्पत्ति एवं सम्पन्नता जन्य दोषों से वह सहज ही बचा रहता है। जिससे उसका मन मस्तिष्क तथा शरीर अधिकतर स्वस्थ ही रहता है, और उसके पास दुखी अथवा व्यग्र होने का कोई कारण नहीं रह जाता! सम्पन्नता अथवा विपन्नता मनुष्य के सुख-दुःख का हेतु नहीं होती, हेतु है उसका दृष्टिकोण, सोचने का ढंग और मानसिक स्तर।

जीवन में निश्चिन्त एवं निर्द्वन्द्व रहने के लिए मनुष्य को सुख साधन जुटाने से पूर्व अपनी मनोभूमि को स्वच्छ एवं समुन्नत बनाना चाहिए। इसके बिना वह किसी भी परिस्थिति में सन्तुष्ट नहीं रह सकता। हर समय उसे दुखंद भावनाएं ही घेरे रहेंगी।

मनुष्य का यह हठ कि वह जिस प्रकार की अवस्थायें एवं परिस्थितियां अपने लिये चाहता है उसके विपरीत स्थिति उसके सामने न आवे—उसके दुःखों का एक विशेष कारण है। संसार का निर्माण किसी एक व्यक्ति के लिये तो हुआ नहीं, जिससे वह उसकी इच्छा के अनुसार ही गतिशील रहे। केवल वे ही परिस्थितियाँ सामने लावे जिन्हें वह चाहता है। संसार का निर्माण तो जीवमात्र के लिये हुआ है। सभी प्राणी समान रूप से सुख के अधिकारी हैं। आज की जो परिस्थिति हमारे लिये सुखदायक है, वह किसी अन्य के लिये दुःखदायक हो सकती है। ऐसी अवस्था में उसका बदलना अनिवार्य है। क्योंकि जब तक वह बदलेगी नहीं, दुःखी रहने वाला व्यक्ति सुखी न हो सकेगा। हो सकता है कि जिस परिस्थिति में हमें दुःख का अनुभव होता है वह किसी दूसरे के लिये सुख देने वाली हो। ऐसी दशा में उसका आना बहुत आवश्यक है। सुख-दुःख का क्रमिक आवागमन संसार का शाश्वत विधान है। ऐसी दशा में केवल अपने मनोनुकूल परिस्थितियों का आग्रह न केवल स्वार्थ अपितु ईश्वरीय विधान के प्रति अस्वीकृति है, जो एक प्रकार से नास्तिकता, ईश्वर द्रोह एवं भयंकर पाप है।

सुख-दुःख के प्रति यदि मनुष्य का दृष्टिकोण सम हो जाये तो उसके लिये चिन्ता, शोक, व्यग्रता तथा विकलता के सारे ही कारण समाप्त हो जायें। अपने प्रति सुखद परिस्थितियाँ पाकर जहाँ कोई प्रसन्न होता है, वहाँ प्रतिकूल परिस्थितियों में भी उसे और न कुछ इसी विचार से प्रसन्न होना चाहिए जो परिस्थितियाँ मेरे लिए दुःख का हेतु बनी हुई हैं उनमें कहीं न कहीं हमारा कोई दूसरा मानव-बन्धु सुख का अनुभव प्राप्त कर रहा है।

निःसन्देह वह मनुष्य बहुत ही दयनीय है जो सुख में तो प्रसन्न और अप्रिय परिस्थिति में आँसू बहाता है। वह प्रकृति के इस मोटे से विधान को नहीं समझ पाता कि जब उसे प्रसन्नता प्राप्त हुई है उससे पहले वह प्रतिकूल परिस्थितियों से परेशान था। दुःख के कारण दूर हुए और उसे सुख प्राप्त हुआ। आज जब वह दुखंद परिस्थितियों में है तो क्यों रोता है। दुःख के पीछे सुख और सुख के पीछे दुःख संसार का एक अविकल नियम है,न तो यह कभी बदला है और न बदला जा सकता है। तब फिर निरर्थक द्वन्द्वात्मक स्थिति को क्यों स्वीकार किया जाये। बड़ी से बड़ी आपत्ति और भयानक से भयानक दुःख आने पर मनुष्य उससे अभिभूत रहता हुआ भी किसी न किसी समय क्षण-भर को उसे भूल ही जाता है और एक शान्तिपूर्ण स्वाभाविक अवस्था में आ जाता है तब क्या कारण है कि शान्ति के उस क्षणिक समय को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता ।

वास्तविक बात तो यह है कि न तो दुःख हमें हर समय पकड़े रहता है और न उसमें ऐसी कोई शक्ति होती है कि हमारे अनचाहे वह हमें अप्रसन्न अथवा विषादग्रस्त बनाये रहें। यदि ऐसा होता तो एक बार आये हुये दुःख से मनुष्य कभी न छूट पाता। आठों याम जीवन-भर वह एक ही दुखंद स्थिति में तड़पता रहता। किन्तु ऐसा कभी होता नहीं। दुःखद परिस्थितियाँ आती हैं—मनुष्य परेशान होता है—और फिर एक दो दिन में वह स्थिति समाप्त हो जाती है। इसका ठीक-ठीक अर्थ यही है कि दुःख-सुख का अपना कोई अस्तित्व अथवा प्रभाव नहीं है। उसकी वेदना हमारे स्वीकृति, अस्वीकृति पर निर्भर करती है। जिन परिस्थितियों को हम दुःखद स्वीकृत कर लेते हैं वे हमें दुःख और जिन परिस्थितियों को हम सुखद स्वीकार कर लेते हैं वे हमें सुख देने लगती हैं।

मनुष्य की यह स्वीकृति, अस्वीकृति एक मात्र उसके दृष्टिकोण तथा मानसिक स्तक पर निर्भर करती है। यदि हमारा मानसिक स्तर गिरा हुआ है। हममें मनुष्योचित धीरता गम्भीरता और सहिष्णुता की कमी है तो अवश्य ही हम जरा-जरा-सी प्रतिकूलताओं में दुःखी होकर रोते कलपते रहेंगे। इसके विपरीत यदि हम अन्दर से गम्भीर आत्मा से ऊँचे हैं तो कोई भी परिस्थिति हमें प्रभावित नहीं कर सकती। हम सुख-दुःख मय इस नियति-नाटिका को उत्साहपूर्वक देखते हुए जीवन यापन करते रहेंगे। ऐसी स्थिति में तो हमें क्या दुःख और क्या सुख कोई भी विक्षुब्ध न बना पायेंगे।


निराशा से बचने का उपाय-कम कामनाएं

“मनुष्य कुछ भी नहीं है, वह एक चलता फिरता धूल-पिण्ड है, उसकी शक्तियाँ सीमित हैं। वह नियति के हाथ की कठपुतली है, भाग्य का खिलौना और हर समय काल का कवल है।”

इस प्रकार के निषेधात्मक एवं निराशापूर्ण विचार रखने वाले निःसन्देह धूल-पिंड भाग्य की कठपुतली और जीवित अवस्था में भी मृतक ही होते हैं। जो कायर और निराशावादी है वह अभागा ही है। जहाँ संसार में लोग कंधे से कंधा भिड़ाकर उन्नति और विकास के लिये निरंतर संघर्ष कर रहे हैं, वहाँ निराशावादी विषाद का रोग पाले हुए दुनिया के एक कोने में पड़े हुए मक्खियाँ मारा करते हैं। समाज की निरपेक्षता तथा संसार की नश्वरता को कोसा करते हैं। मनुष्य की इस दशा को दुर्भाग्य नहीं तो और क्या कहा जायेगा।

मनुष्य-योनि में आकर जिसने जीवन में कोई विशेष कार्य नहीं किया, किसी के कुछ काम नहीं आया, उसने मनुष्य शरीर देने वाले उस परमात्मा को लज्जित कर दिया। अपने में अनन्त शक्ति होने पर भी दीनतापूर्ण जीवन बिताना, दयनीयता को अंगीकार करना अपने साथ घोर अन्याय करना है। मनुष्य जीवन रोने कलपने के लिए नहीं, हँसते मुस्कराते हुए अपना तथा दूसरों का उत्कर्ष करने के लिए है।

मनुष्य जीवन के लिए निराशा अस्वाभाविक है। यह एक प्रकार का मानसिक रोग है जो मनुष्य को हीन विचारों, जीवन में आई कठिनाइयों और असफलता के कारण लग जाता है। इच्छाओं की पूर्ति न होने, मनचाही परिस्थितियाँ न पाने से मनुष्य में संसार के प्रति, अपने प्रति तथा समाज के प्रति घृणा हो जाती है। बार-बार असफलता पाने से मनुष्य का साहस टूट जाता है और वह निराश होकर बैठ जाता है। जीवन के प्रति उसका कोई अनुराग नहीं रह जाता।

निराशाग्रस्त मनुष्य दिन-रात अपनी इच्छाओं कामनाओं और वाँछाओं की आपूर्ति पर आँसू बहाता हुआ उनका काल्पनिक चिन्तन करता हुआ तड़पा करता है। एक कुढ़न, एक त्रस्तता एक वेदना हर समय उसके मनों-मन्दिर को जलाया करती है। बार-बार असफलता पाने से मनुष्य का अपने प्रति एक क्षुद्र भाव बन जाता है । उसे यह विश्वास हो जाता है कि वह किसी काम के योग्य नहीं है। उसमें कोई ऐसी क्षमता नहीं है, जिसके बल पर वह अपने स्वप्नों को पूरा कर सके, सुख और शान्ति पा सके।

साहस रहित मनुष्य का वैराग्य, असफलता जन्य विरक्ति और निराशा से उपजी हुई आत्म-ग्लानि बड़ी भयंकर होती है। इससे मनुष्य की अन्तरात्मा कुचल जाती है।

ऐसे असात्विक वैराग्य का मुख्य करण मनुष्य की मनोवाँछाओं की असफलता ही है जिसके कारण अपने से तथा संसार से घृणा हो जाती है। प्रतिक्रिया स्वरूप संसार भी उससे नफरत करने लगता है। ऐसी स्थिति में मनुष्य की मनोदशा उस भयानक बिन्दु के पास तक पहुँच जाती है जहाँ पर वह त्रास से त्राण पाने के लिए आत्म-हत्या जैसे जघन्य पाप की ओर तक प्रवृत्त होने लगता है।

जो भी अधिक इच्छाएं रखेगा बहुत प्रकार की कामनाएँ करेगा उसका ऐसी स्थिति में पहुँच जाना स्वाभाविक ही है। किसी मनुष्य की सभी मनोकामनाएं सदा पूरी नहीं होती। वह हो भी नहीं सकतीं। मनुष्य की वांछाएं इतनी अधिक होती हैं कि यदि संसार के समस्त साधन लगा दिये जायें, तब भी वे पूरी न होंगी।

ऐसा नहीं है कि मनुष्यों की इच्छायें पूर्ण नहीं होती हों, किन्तु इच्छायें उसी मनुष्य की पूर्ण होती हैं जो उनको सीमित एवं नियंत्रित रखता है। जिसकी आकाँक्षायें अनियंत्रित हैं जिनका कोई ओर-छोर ही नहीं है उसकी कोई भी महत्वाकाँक्षा पूर्ण होने में सन्देह रहता है। बहुधा अनन्त आकाँक्षाओं वाले व्यक्ति को घोरतम निराशा का ही सामना करना पड़ता है।

इच्छाओं के ऐसे दुष्परिणाम देखकर ही भारतीय मनीषियों ने इच्छाओं को त्याज्य बतलाया है। उन्होंने अच्छी प्रकार इस सत्य को अनुभव कर लिया था कि जो इच्छाओं के प्रति त्याग भावना नहीं रखता उसकी इच्छायें धीरे-धीरे एक से दो और दो से चार होती हुई शीघ्र ही बढ़ती चली जाती हैं और फिर वे न तो नियंत्रण में आ पाती हैं न पूरी हो पाती हैं। फलस्वरूप मनुष्य को घोर निराशा की स्थिति में पहुँचा देती हैं। अतएव ऋषि मुनियों ने हृदय को पूर्ण रूप से निष्काम रखने का ही आदेश दिया है।

इस इच्छा त्याग का गलत अर्थ लगाकर लोग यह कह उठते हैं कि जिसमें कोई इच्छा नहीं होगी, वह कोई काम ही न करेगा और यदि एक दिन संसार का हर मनुष्य इच्छा रहित निष्काम हो जाये तो सृष्टि की सारी गति-विधि ही नष्ट हो जाये और यह चौपट हो जाये।

इच्छाओं के त्याग का अर्थ यह कदापि नहीं कि मनुष्य प्रगति, विकास, उत्थान और उन्नति की सारी कामनाएँ छोड़कर निष्क्रिय होकर बैठ जाये। इच्छाओं के त्याग का अर्थ उन इच्छाओं को छोड़ देना है जो मनुष्य के वास्तविक विकास में काम नहीं आतीं, बल्कि उलटे उसे पतन की ओर ही ले जाती हैं। जो वस्तुऐं आत्मोन्नति में उपयोगी नहीं, जो परिस्थितियाँ मनुष्य को भुलाकर अपने तक सीमित कर लेती हैं मनुष्य को उनकी कामना नहीं करनी चाहिये। साथ ही वाँछनीय कामनाओं को इतना महत्व न दिया जाये कि उनकी अपूर्णता शोक बनकर सारे जीवन को ही आक्रान्त कर ले।

मनुष्य का लगाव इच्छाओं से नहीं बल्कि उनकी पूर्ति के लिये किये जाने वाले कर्म से ही होना चाहिए। इससे कर्म की गति में तीव्रता आयेगी और मनुष्य की क्षमताओं में वृद्धि होगी जिससे मनोवाँछित फल पाने में कोई सन्देह नहीं रह जायेगा। इसके साथ ही केवल कर्म से लगाव होने पर यदि कोई प्रयत्न में लग जायेगा। असफलता उसे प्रभावित नहीं कर पायेगी। इच्छा के प्रति लगाव रहने से प्रयत्न की असफलता पर मनोवाँछा पूरी न होने से उसका जी रो उठेगा। वह अपनी कामना के लिए तड़पने और कलपने लगेगा। अपेक्षित फल न पाने से उसे कर्म के प्रति विरक्ति होने लगेगी, प्रयत्नों से घृणा हो जायेगी और तब कर्म का अभाव उसको निष्क्रिय बनाकर घोर निराशा की स्थिति में भेज देगा। अस्तु, मनुष्य को मनोवांछाएं प्राप्त करने और निराशा के भयानक अभिशाप से बचने के लिये अपना लगाव इच्छाओं के प्रति नहीं बल्कि उनके लिये आवश्यक प्रयत्नों के प्रति ही रखना चाहिये।

मनुष्य की वे ही वासनायें उपयुक्त कही जा सकती हैं जो उसके विकास में सहायक हों। सम्पत्ति की कामना तभी उपयुक्त है जब वह कोई महान कार्य सम्पादित करने में काम आये। सम्पत्ति की कामना इसलिये करना ठीक नहीं-कि लोग हमें धनवान समझें समाज में प्रभाव बढ़े, संसार की हर चीज प्राप्त की जाये, भोगों के अधिक साधन संग्रह किये जायें। लोग सन्तान की वासना करते हैं, ठीक है सन्तान की कामना स्वाभाविक है, किन्तु सन्तान को केवल इसलिए चाहना कि मैं पुत्रवान समझा जाऊँ सम्पत्ति का कोई उत्तराधिकारी हो जाये, बहुत उपयुक्त नहीं। देश को अपने प्रतिनिधि के रूप में एक अच्छा नागरिक देने के लिये सन्तान की कामना महान एवं उपयुक्त है। लोग जीवन में कीर्ति चाहते हैं, अपनी ख्याति चाहते हैं और उसके लिये न जाने कौन-कौन से उपाय प्रयोग किया करते हैं। ख्याति इसीलिए चाहना ठीक नहीं-कि समाज में प्रभाव बढ़ेगा उससे हजार प्रकार के काम निकलेंगे, लोग आदर करेंगे, चाटुकारी करेंगे, प्रतिष्ठा बढ़ेगी। मनुष्य को कीर्ति कामी होना चाहिए, किन्तु यह तभी ठीक होगा कि वह कीर्ति का उपार्जन अपने सत्कर्मों से करे, अन्याय और धूर्तता से नहीं।

इस प्रकार की उपयुक्त कामनाएं रखने वाला व्यक्ति कभी भी उनकी असफलताओं से दुःखी नहीं होता और न कभी निराशा की स्थिति में पहुँचता है। अपने व्यक्तिगत सुखभोग के लिए विषयों की कामना परिणाम में ही नहीं प्रारम्भ में भी दुःखदायी होती है। आत्म विकास और समाज कल्याण के लिये की हुई कामनायें आदि एवं अंत दोनों में ही सुखदायी एवं कल्याणकारी रहती है। जीवन में निराशा से बचने के लिये मनुष्य को कम से कम कामनाएँ रखना ही ठीक है। कामनाओं की अधिकता ही निराशा और पतन का कारण होती है।


परंपराएं बदली भी जा सकती हैं।

जो बातें आज के समाज के लिये प्रथायें अथवा परम्परायें बनी हुई हैं वे वास्तव में कभी के समाज के लिये ऐसे नियम रही होंगी जिनको अपनाये बिना समाज की व्यवस्था न बन रही होगी।

यह अनिवार्य नहीं कि आज की बदलती हुई परिस्थितियों में कल की वे बातें यथावत हितकारक हों। कल जो नियम हमारे पूर्व पुरुषों ने बनाये थे, वे उस समय की परिस्थितियों के अनुसार ही बनाये थे। ऐसा करते समय उन्होंने कोई ऐसी व्यवस्था अथवा आदेश नहीं दिया था कि यदि यह नियम आगे चलकर हितकर सिद्ध न भी हों तब भी इन्हें अपनाये रहना चाहिये। इसी प्रकार आज की परिस्थितियों के अनुसार जो नियम हम बनायेंगे वे आगे आने वाली पीढ़ियों के लिए आज की तरह ही हितकारी होंगे, यह आवश्यक नहीं? परिवर्तन जहाँ अनिवार्य है वहाँ वाँछनीय भी है।

यह सही है कि बन्धन बन गई परम्पराओं को अवश्य त्याग देना चाहिये। प्राचीनता किसी बात को अपनाए रहने के लिये शपथ नहीं है, किन्तु यह भी सत्य नहीं है कि कोई बात पुरानी होने से त्याज्य ही है।

संग्रह अथवा त्याग की कसौटी नवीनता अथवा प्राचीनता नहीं है, बल्कि इन दोनों में रहने वाला हितकारक तत्व ही है। आज अनेकों ऐसी पुरानी बातें, परम्परायें, प्रथायें, विश्वास एवं विचार धारायें हैं जिनको त्याग देने से अतुलनीय हानि हो सकती है। यहाँ तक कि मानव मनुष्यता से योजनों दूर जा सकता है। साथ ही अनेकों ऐसी नवीनताएं हैं जिनको अपनाये बिना मनुष्य का एक कदम बढ़ सकना असम्भव हो जायेगा। नवीनता एवं प्राचीनता के संग्रह त्याग में कोई दुराग्रह नहीं करना चाहिये, बल्कि किसी बात को विवेक एवं अनुभव के आधार पर अपनाना अथवा छोड़ना चाहिये।

जिस बात को अन्तरात्मा स्वीकार न करती हो, विवेक जिसे मानने से इनकार कर दे उसे अवश्य ही त्याग देना चाहिए, फिर वह कितनी ही पुरानी क्यों न हो।

समाज की सुव्यवस्था, सुविधा और हित के लिये जो नियम बहुत समय पहले बनाये गये हैं वह आज के भी परिवर्तित समाज के लिये यथावत हितकारक हों, यह आवश्यक नहीं। किसी भी नियम की हितकारिता की एक साधारण कसौटी है—वह यह कि देखो पूर्व नियम जिस प्रकार समाज के विकास और उसकी उन्नति में सहायक होता था आज भी हो रहा है या नहीं। यदि वह पहले की अपेक्षा आज अपनी उपयोगिता खो चुका है, तो वह आवश्यकता एवं समयानुसार परिवर्तनीय अथवा त्याज्य है। उसे त्याग कर नये हितकारी नियम अपनाना चाहिये। इसमें संकोच करने का अर्थ है स्वयं अपनी प्रगति में रोड़े अटकाना।

अनुपयोगी परम्पराओं से चिपटा रहना इस बात का प्रमाण है कि अमुक व्यक्ति अथवा समाज में नव-जीवन का अभाव हो गया है। जागरूक तथा जीवित समाज का यह एक निश्चित लक्षण है, कि वह अवाँछनीय अथवा असामयिक प्राचीनता को त्याग कर उसके स्थान पर एक नवीन प्रगतिशीलता को स्थान देता है।

कोई भी विचारशील व्यक्ति किसी अविवेकपूर्ण प्रथा को इसलिये अपनाए नहीं रह सकता कि वह बहुत जमाने से चली आ रही है, किसी बात की प्राचीनता ही उसकी उत्तमता की कसौटी नहीं है।

प्रथायें और परम्परायें कोई ईश्वरीय आदेश नहीं होतीं। ये सुख, सुविधा तथा सुव्यवस्था के लिये मानव-समाज द्वारा ही बनाई जाती हैं। जब इनका उक्त उद्देश्य नष्ट हो जाये तो इन्हें भी किसी प्राचीन तथा निर्जीव वस्तु की भाँति त्याग देना चाहिये।

यदि हम सड़ी-गली पुरानी रूढ़ियों को हानि उठाकर भी प्राचीनता के लोभ में अपनाये रहेंगे तो अवश्य शीघ्र ही ऐसा समय आ सकता है कि हम जमाने से इतने पीछे रह जायें कि जो हमसे छोटे हैं बाद के हैं वे हम से आगे निकल जायें और हमसे जेष्ठ और श्रेष्ठ बनने लगें।

किसी प्रगति अथवा उन्नति से ईर्ष्या न करते हुये हमें स्वयं अपनी उन्नति का पथ प्रशस्त करना है और यह होता तभी है जब हम अपनी विवेक बुद्धि का समुचित उपयोग करेंगे। जब तक हम आँख मूँदकर रूढ़ियों के पीछे चलते रहेंगे और विवेक की पुकार की अपेक्षा करेंगे तब तक बढ़ते हुए समय के साथ न चल सकेंगे।

कोई एक नियम किसी एक समय में प्रगति में सहायक हो सकता है, वही कालान्तर में बन्धन का रूप धारण कर सकता है। बन्धन बनते हुए नियम का त्याग ही हितकर है।

अनेक परम्पराओं के भक्त होते हैं और अनेक उसके विरोधी। एक पक्ष परम्पराओं को यथावत बनाये रखना चाहता है फिर चाहे वे मानव-विकास के बन्धन ही क्यों न बन गई हों और दूसरा पक्ष उन्हें जड़ मूल से नष्ट कर देना चाहता है फिर चाहे वे कितनी ही उपयोगी क्यों न हों। यह दोनों बातें ठीक नहीं। इनमें से जहाँ एक में जड़ता है वहाँ दूसरे में अविवेक है।

परम्परा अतीत की देन होती है और परिवर्तन भविष्य का प्रतीक। मनुष्य का जितना मतलब वर्तमान से होता है उतना भूत अथवा भविष्यत् से नहीं। मनुष्य को वर्तमान में रहना होता है। अतीत का वैभव उसका कोई कार्य सम्पादित नहीं कर पाता और भविष्य के स्वप्न भी कुछ काम नहीं आते। मनुष्य को अपने वर्तमान का ही निर्माण करना चाहिये। किन्तु इस निर्माण के लिये आवश्यक सामग्री वर्तमान में नहीं होती उसके लिये उसे अतीत अनुभवों और भविष्य की कल्पनाओं का भी उपयोग करना होगा। वर्तमान का भवन भूत भविष्यत् की ही आधारशिलाओं पर बनाया जा सकता है।

परिवर्तन संसार का एक अपरिवर्तनीय नियम है। जो कल था वह आज बदल गया है और जो आज है, वह कल बदल जायेगा। संसार के विकास में परिवर्तन का बहुत हाथ रहता है। यदि परिवर्तन न हो, संसार में एक जैसी परिस्थितियाँ सदैव बनी रहें तो यह संसार नीरस और निःसार होकर रह जाये।

एक नैसर्गिक नियम होते हुये भी परिवर्तन स्वतः घटित नहीं होता। यह भी मनुष्य द्वारा ही लाया जाता है। बुद्धिमान और विवेकी पुरुष अपनी आत्मा में आवश्यक परिवर्तन की स्फुरणा का अनुभव करके उसे संसार में प्रचारित करते हैं। तदनुसार गतिविधि अपनाने के लिए मानव-समाज को निर्देश देते हैं और उसी प्रकार जन साधारण अपने जीवन की गतिविधि बदल लेता है।

परिवर्तन कोई बुरी बात नहीं। इसका स्वागत हर व्यक्ति को करना चाहिये—बशर्ते कि वह परिवर्तन नवीन उपयोगी, उन्नति और विकास मूलक हो।

परिवर्तन कोई बुरी बात नहीं। इसका स्वागत हर व्यक्ति को करना चाहिये—बशर्ते कि वह परिवर्तन नवीन उपयोगी, उन्नति और विकास मूलक हो।


Quotation

जीवन का स्वरूप और अर्थ—जीवन का अर्थ है आशा, उत्साह और गति। आशा, उत्साह और गति का समन्वय ही जीवन है। जिसमें जीवन का अभाव है उसमें इन तीनों गुणों का होना निश्चित है। साथ ही जिसमें यह गुण परिलक्षित न हों समझ लेना चाहिये कि उसमें जीवन का तत्व नष्ट हो चुका है।

केवल श्वास-प्रश्वास का आवागमन अथवा शरीर में कुछ हरकत होते रहना ही जीवन नहीं कहा जा सकता। जीवन की अभिव्यक्ति ऐसे सत्कर्मों में होती है, जिनसे अपने तथा दूसरों के सुख में वृद्धि हो?

अपनी वर्तमान परिस्थिति से आगे बढ़ना, आज से बढ़कर कल पर अधिकार करना, अच्छाई को शिर पर और बुराई को पैरों तले दबाकर चलने का नाम जीवन है! कुकर्म करने तथा बुराई को प्रश्रय देने वाला मनुष्य जीवित दिखता हुआ भी मृत ही है! क्योंकि कुकर्म और कुविचार मृत्यु के प्रतिनिधि हैं इनको आश्रय देने वाला मृतक के सिवाय और कौन हो सकता है।

—सुब्रह्मण्य भारती

—सुब्रह्मण्य भारती


जन-जागरण के अमर साधक-गुरु रामदास

भारतवर्ष का जहाँ यह दुर्भाग्य रहा है कि इसे संसार में सबसे अधिक आक्रमणों एवं अत्याचारों को सहन करना पड़ा है, वहाँ यह सौभाग्य भी रहा है कि आवश्यकतानुसार इसमें समय-समय पर ऐसे महापुरुषों का जन्म भी होता रहा है, जिन्होंने साधन एवं परिस्थितियों के अनुसार अन्धकार में डूबे भारत को प्रकाश की ओर बढ़ाया है। ऐसे ही युग-पुरुषों में गुरु रामदास का प्रमुख स्थान है।

उस समय भारत पर यवनों को राज्य था। मुगल सम्राट औरंगजेब धर्मान्धता के वशीभूत होकर मन्दिरों तथा मूर्तियों को तुड़वा रहा था। असहाय हिन्दुओं के शिखा सूत्र काटे और सिर उतारे जाते थे। सैकड़ों साल निरन्तर लड़ते रहने से राजपूत राजा निरस्त हो चुके थे। धर्मोद्धार का कोई मार्ग दिखाई न दे रहा था। बड़ी भयंकर परिस्थिति चल रही थी।

समर्थ गुरु रामदास ने जिनका घर का नाम नारायण था, यवनों के इस असह्य अत्याचार की पीड़ा अनुभव कर ली थी। बालक नारायण उस समय उसके प्रतिकार के विषय में तो कुछ अधिक न समझ पा रहा था केवल भारतीय संस्कारों के कारण इतना अवश्य जानता था कि तपस्या एवं सच्चे मन से भगवद्भक्ति करने से सारे संकट दूर हो जाते हैं। इसके साथ उसे यह भी विश्वास था कि यदि समाज के सब लोग मिलकर उद्धार के लिए भगवान् से प्रार्थना करें तो अवश्य कल्याण हो जाये। तपस्वीजन यदि अपने तप का भाग समाज कल्याण के लिये प्रदान करे दें तो कोई कारण नहीं कि यवनों के इस अत्याचार की समाप्ति न हो जाये।

इस प्रकार की विचारधारा ने उस अल्प आयु में ही नारायण के मन में विराग-भावना उत्पन्न कर दी, यह स्वाभाविक भी था। मनुष्य की आत्मा में जब परोपकार की भावना समाहित हो जाती है, तब उसको संसार के भोग विलास से विरक्ति हो ही जाती है। इसका स्पष्ट कारण है कि विषय वासना का केन्द्र स्थान मन होता है और वही मन जब किसी उच्चादर्श में नियोजित हो जाता है तब उसमें विषय वासनाओं के लिये कोई स्थान ही नहीं रहता।

नारायण के बड़े भाई श्रेष्ठ बड़े ही विद्वान् एवं सन्त प्रकृति के व्यक्ति थे। नारायण ने उनसे दीक्षा देने का अनुरोध किया। श्रेष्ठ ने उनकी इस जिज्ञासा को केवल बाल बुद्धि ही नहीं समझा। उन्होंने इसके पीछे एक आग, एक लगन भी देखी। उन्होंने पाँच वर्ष के बालक नारायण की इस असामयिक जिज्ञासा का न तो मखौल उड़ाया और न उसकी इतनी उपेक्षा की कि वह हतोत्साह हो जाता। उन्होंने उसकी आयु कम बतलाकर कुछ समय बाद दीक्षा देने का आश्वासन दे दिया।

भाई के मात्र आश्वासन से नारायण को सन्तोष न हुआ। उसे तो अपने तप द्वारा देश का उद्धार करने की लगन लगी हुई थी। उसने स्वयं ही भगवान की शरण जाकर तप करने का विचार किया। कहना न होगा कि किसी कर्तव्य के प्रति आत्मा की सच्चाई किसी मार्ग विरोध की कोई चिन्ता नहीं करती । वह काँटों के बीच भी अपना मार्ग बना लेती है, पहाड़ों पर भी अपना पथ प्रशस्त कर लेती है। नारायण गोदावरी के किनारे एक मन्दिर में जाने और वहाँ एकान्त में ध्यान लगाने का अभ्यास करने लगे।

ज्यों-ज्यों नारायण का हृदय निर्मल होता गया, त्यों-त्यों उसे अपने अन्तर में एक आवाज सुनाई देने लगी—”नारायण! पृथ्वी पर अधर्मियों का अत्याचार फैला है। विदेशी लोग भारत भूमि को आक्रान्त किये हुए हैं। तू अपने तप और ज्ञान से देश का उद्धार कर।” भोले भक्त ने इसे भगवदादेश समझा और उसी के अनुसार कर्तव्य करने का निश्चय कर लिया।

बेटा वैरागी हुआ जाता था, माता को बड़ी चिन्ता थी। उसके पास एक ही अस्त्र था उसे रोकने का ‘विवाह’। निदान उसने नारायण के विवाह की चर्चा चलानी शुरू कर दी। कर्तव्य व्रती नारायण ने जब अपने बन्धन की बात सुनी तो वह विचलित हो उठा और घर से भाग जाने लगा।

माता के अत्यधिक आग्रह पर विवाह का आयोजन हुआ। पुरोहित ने विवाह की कार्यवाही आरम्भ करने के लिये नियमानुसार “सावधान” शब्द का उच्चारण किया। नारायण सतर्क हो गये। उन्होंने सोचा कि सावधान होने का ठीक यही समय है। वे मण्डप छोड़ कर भाग खड़े हुये। लोग बहुत कुछ पीछे दौड़े, खोजा, तलाश किया, किन्तु लगनशील बालक अपनी धुन के पंखों पर उड़ कर गायब ही हो गया।

घर से भागने के बाद नारायण कुछ समय तो अपने इलाके में ही इधर-उधर छिपते फिरे, फिर नासिक को चले गये। अपने कर्तव्य-निष्ठा के प्रकाश से जिसका हृदय भरा हुआ है, जिसने अपने कर्तव्य को पहचान लिया है, अपना जीवन ध्येय देख लिया है उसे भला संसार का कौन-सा बन्धन रोक कर रख सकता है। विवाह तो एक बहुत ही साधारण बात है।

समर्थ श्रीराम के दास होने से नारायण ने स्वयं अपना नामकरण रामदास कर लिया और बाद में उनके भक्तों तथा शिष्यों ने उनकी शक्ति देखकर रामदास के साथ समर्थ शब्द का समावेश कर दिया इस प्रकार से नारायण से समर्थ गुरु रामदास हो गये। अनिवर्चनीय आलोक से परिप्लावित ज्ञान प्राप्त कर समर्थ गुरु रामदास ने अपना वास्तविक कार्य प्रारम्भ किया।

उन्होंने देशाटन का कार्यक्रम बनाया। भारतवर्ष की इस लम्बी तीर्थ-यात्रा में वे एक दिन से अधिक कहीं भी नहीं रुके। उनकी इस यात्रा में जो भी ग्राम, जनपद अथवा नगर पड़ता था उसमें धर्मोपदेश करते, देश की दशा बतलाते, परमात्मा पर विश्वास उत्पन्न कराते और आत्म कल्याण के साथ भारत का उद्धार करने की प्रेरणा करते। समर्थ गुरु रामदास की अखण्ड विद्वत्ता, तेजोमय, व्यक्तित्व तथा ओजपूर्ण वाणी का इतना प्रभाव पड़ता है कि नगर-नगर ग्राम-ग्राम उनके शिष्य बनते चले जाते। इस प्रकार कुछ ही समय में उनकी कीर्ति सारे भारत में फैल गई।

समर्थ गुरु रामदास के शिष्यों में अनेक महाराज शिवाजी के सैनिक तथा अधिकारी थे। उनके द्वारा शिवाजी को भी उनकी कीर्ति सुनने को मिली। महाराज शिवाजी उनसे मिलने को अत्यन्त आतुर रहने लगे। यह समाचार समर्थ को मिला तो उन्होंने शिवाजी के नाम एक लम्बा पत्र लिखा जिसमें उन्होंने शिवाजी को राज-धर्म का उपदेश किया। देश तथा धर्म की दशा का दिग्दर्शन कराया तथा उन्हें धर्मोंद्धार के लिये समर्थ बतलाते हुये उत्साहवर्धन किया।

उन्होंने लिखा- “हो सकता है कि तुम अपने राज्य की सीमित भूमि और गिने-चुने साधनों को देखकर यह समझो कि इतने अल्प उपादानों एवं सीमित शक्ति के द्वारा यवनों के इतने व्यापक अत्याचार को किस प्रकार रोक सकता हूँ और किस प्रकार धर्म की रक्षा करते हुये देश में हिन्दू पद पातशाही की स्थापना कर सकता हूँ। तुम्हारा यह सोचना उचित न होगा। क्योंकि मनुष्य की शक्ति साधनों में नहीं उसकी आत्मा में होती है। जिसे अपनी आत्मा में विश्वास है, मन में देशोद्धार की सच्ची लगन है उसके कर्तव्य पथ पर पद रखते ही साधन स्वयं एकत्र होने लगते हैं। भगवान राम ने अपने विश्वास-बल, इच्छा-शक्ति तथा अविरत उद्योग से वन में अकेले ही वानरों तथा भालुओं की सेना बनाकर सर्व-शक्ति सम्पन्न रावण को न केवल हराया ही बल्कि पूर्णतया नष्ट कर दिया। पाण्डवों ने भिखारी बनकर भी उद्योग बल पर अपना वैभव प्राप्त कर लिया और योगीराज श्रीकृष्ण ने केवल एक अकेले ही महाभारत का नेतृत्व कर भारत से दुरात्माओं को नष्ट करा दिया। अपनी आत्मा का जागरण करो, मन को बलवान बनाओ और उद्धार कार्य में एकनिष्ठ होकर लग जाओ। तुमको अवश्य सफलता प्राप्त होगी।”

“अत्याचारी की शक्ति क्षणिक होती है। उसे देखकर कभी भी भयभीत न होना चाहिये। अत्याचारी प्रत्यक्ष रूप में निरपराधों पर तलवार चलाता हुआ परोक्ष में अपनी ही जड़ें काटा करता है। अत्याचार से अल्पायु एवं अत्याचारी से बढ़कर कोई भी कायर संसार में नहीं होता। निष्काम बुद्धि से अपना कर्तव्य करो। भगवान तुम्हारी सहायता करेंगे।”

पत्र पढ़कर महाराज शिवाजी का हृदय उत्साह से पूरी तरह भर गया। उन्होंने स्वल्प साधनों से ही देशोद्धार कार्य करने का निश्चय कर लिया। दृढ़ निश्चयी का कोई भी कार्य संसार में नहीं रुकता।

समर्थ गुरु रामदास का प्रेरक पत्र पढ़कर जहाँ एक ओर शिवाजी में उत्साह की वृद्धि हुई वहाँ उनसे मिलने कि उत्सुकता अपनी सीमा पार कर गई। वे सोचने लगे, कि जिन महात्मा के वचनों में इतना प्रभाव है उनका व्यक्तित्व कितना महान होगा? निदान एक लम्बी खोज के बाद वे उनसे जा ही मिले।

समर्थ गुरु के दर्शन करके शिवाजी कृतार्थ हो गये। उन्होंने उनसे दीक्षा माँगी और संन्यास लेने की इच्छा प्रकट की। समर्थ गुरु रामदास ने उन्हें वैशाख शुक्ल नववीं सम्वत् 1581 शाके को गुरु मन्त्र दिया और प्रसाद के रूप में एक नारियल, मुट्ठी भर मिट्टी, दो मुट्ठी लीद और चार मुट्ठी पत्थर दिये जो क्रमशः दृढ़ता, पार्थिवता, ऐश्वर्य एवं दुर्ग-विजय के प्रतीक थे। महाराज शिवाजी ने गुरु का वह प्रसाद शिरोधार्य किया और पुनः साधु जीवन अपनाने की अनुमति माँगी।

समर्थ गुरु ने उन्हें समझाया। पीड़ितों की रक्षा तथा धर्म का उद्धार करना तुम्हारा कर्तव्य है? संन्यास का अर्थ संसार के कर्तव्य त्याग देना नहीं है। सच्चे संन्यास का अर्थ है अपनी तृष्णा वासना संकीर्णता और स्वार्थपरता का परित्याग और निःस्वार्थ भाव से देश धर्म की रक्षा करना। तुम संन्यस्त भाव से अपने राज-धर्म का पालन करो, देश का उद्धार करो और धर्म मर्यादा की रक्षा के किये संघर्ष करो।

एक ओर शिवाजी अपनी सैन्य शक्ति से देशोद्धार के लिये प्रयत्न कर रहे थे दूसरी ओर उनके गुरु देश-देश घूम कर धर्म भावना जागृत करते थे। उन्होंने शिवाजी की सैन्य-शिक्षा के लिये हजारों महावीर मठों की स्थापना की, जनता को उनका सहयोग देने के लिये प्रेरित किया। झोली डाल कर गाँव-गाँव घूमे और आवश्यक धनराशि एकत्र की।

गुरु की कृपा और अपने उद्योग से महाराज शिवाजी का दिन-दिन अभ्युदय होता गया और शीघ्र ही वे छत्रपति महाराज शिवाजी के नाम से हिन्दू-पद पातशाही के प्रवर्तक मान लिये गये। गुरु शिष्य के सम्मिलित प्रयत्नों से हिन्दुओं में आत्म-विश्वास जगा, धर्म के प्रति आस्था एवं श्रद्धा की वृद्धि हुई। जिसके फलस्वरूप मुगल साम्राज्य की जड़ें खोखली हो गई और आगे चलकर वह कुछ ही समय में गिर कर ढेर हो गया।

इन सब बातों के साथ ही समर्थ गुरु अपने शिष्य शिवाजी का चरित्र उज्ज्वल रखने के लिये समय-समय पर उनकी परीक्षा लेते और उपदेश देते रहते थे। एक बार वे यह देखने के लिये कि अपने राज्य-विस्तार तथा अभ्युदय से कहीं शिवाजी में माया, मोह अथवा अहंकार की दुर्बलता तो नहीं आ गई, उनके द्वार पर गये और भिक्षा के लिये आवाज लगाई। शिवाजी ने उनकी आवाज पहचानी और एक परचे पर अपना सारा साम्राज्य लिख कर उनके कमण्डल में डाल दिया।

गुरु समर्थ रामदास ने उन्हें राज्य लौटाते हुये केवल अन्न माँगा। शिवाजी दुबारा दिया हुआ राज्य वापस लेने को जब किसी प्रकार तैयार न हुए तब उन्होंने उन्हें अपनी ओर से एक प्रतिनिधि के रूप में राज्य करने का आदेश देकर प्रस्थान किया।

गुरु-भक्त शिवाजी ने सिंहासन पर उनके खड़ाऊँ प्रतिष्ठित कर दिये और राज्य का ध्वज भगवा रंग में रंगवा दिया। इस प्रकार वे सारे राज्य को गुरु का समझ कर एक प्रतिनिधि के रूप में राज-काज करते रहे।

सम्वत् 1903 में शिवाजी के स्वर्गारोहण के बाद समर्थ गुरु रामदास ने भी माघ कृष्णा 9 1903 को यह कहते हुये समाधि ली कि मेरा कार्य पूरा हो चुका अब आने वाली पीढ़ी अपना कर्तव्य करेगी।

समर्थ गुरु रामदास का जन्म चैत्र शुक्ल नवीं रविवार सम्वत् 1530 में हुआ। इनके पिता का नाम सूर्या जी पन्त और माता का नाम राणुवाई था। उनका लिखा हुआ ग्रन्थ ‘दास बोध’ मानव-जीवन की सभी समस्याओं पर प्रकाश डालने वाला एक मात्र अद्वितीय ग्रन्थ माना जाता है।


भारतीय मस्तिष्क के गौरव सर जगदीशचन्द्र वसु

सर जगदीशचन्द्र वसु संसार की उन वैज्ञानिक विभूतियों में से हैं, जिन्हें लोकष्णु विदेशी वैज्ञानिकों ने अनेक छल-प्रपंचों द्वारा बुझा देना चाहा, किन्तु भारत माता के उस अमृत पुत्र ने एक अविचल प्रकाश स्तंभ की तरह अपनी प्रतिभा के बल पर पराधीन भारत का मुख उज्ज्वल कर ही दिया। श्री वसु एक अग्रिणी भारतीय वैज्ञानिक थे। उन्होंने भारत के वेदान्त दर्शन का गहनतम अध्ययन एवं मनन किया था। उन्हें विश्वास था कि संसार की सारी जड़-चेतन प्रकृति में एक चैतन्य सत्ता का निवास है जो कि ‘ब्रह्म’ नाम से भारत के विज्ञान-दर्शन में विख्यात है। श्री वसु ने इसी सत्य को भौतिक यन्त्रों द्वारा खोज निकालने में अपना जीवन लगा दिया और जीवितों की भाँति जड़ों पर भी भौतिक परिवर्तनों तथा प्रतिक्रियाओं को सिद्ध कर दिखाया। इससे भारतीय दर्शन सिद्धान्तों की गरिमा में अभिवृद्धि हुई।

भारत के इस विलक्षण वैज्ञानिक का जन्म 30 नवम्बर 1858 ई. को बंगाल के ढ़ाका जिले के राढ़ीखाल नामक ग्राम में हुआ। इनके पिता का नाम भगवान चन्द्र वसु था और वे उस समय के अंग्रेजी राज्य में फरीदपुर जिले के डिप्टी-कलेक्टर थे।

साधन सम्पन्न होने पर भी भगवान चन्द्र वसु ने अपने बेटे जगदीशचन्द्र वसु की प्रारम्भिक शिक्षा फरीदपुर की एक ग्रामीण पाठशाला में ही कराई। ऐसा करने में उनका एक महान् उद्देश्य छिपा हुआ था। भगवान चन्द्र वसु नहीं चाहते थे कि उनका पुत्र प्रारम्भ से अंग्रेजी स्कूल में पढ़ कर अंग्रेजियत का गुलाम बन जाये और विदेशी नौकर-शाही का सहायक बने।

भगवान चन्द्र वसु न केवल पुत्र के लिये ही राष्ट्रीय भावना रखते थे, अपितु अपनी मर्यादाओं के अनुसार स्वयं भी देशोद्धार के कार्य किया करते थे। डिप्टी-कलेक्टर होने के कारण अवश्य ही वे सक्रिय जन-सेवा के कार्य तो न कर पाते थे, किन्तु फिर भी अपनी सेवा के फलस्वरूप वेतन के रूप में जो कुछ सरकार से प्राप्त करते थे, वहाँ से थोड़ा-सा भाग परिवार संचालन के लिए निकाल के बाकी सब पद-दलित जनता की सेवा में लगा देते थे उन्हें मिटते हुए देशी उद्योग-धन्धों से बहुत सहानुभूति थी और वे जीवन भर उनके पुनरुद्धार के लिये अपनी गाढ़ी कमाई का पैसा व्यय करते रहे।

शुभ-संस्कृत जगदीशचन्द्र वसु ने कलकत्ते के सेंट जेवरों कॉलेज से ही बी. ए. की उपाधि प्राप्त की और इच्छा प्रकट की कि उन्हें आई.सी.एस. की परीक्षा के लिए इंग्लैंड भेजा जाये, जिससे वे पिता की ही तरह डिप्टी-कलेक्टर बनें और उनकी उदारतापूर्ण उस परम्परा को आगे बढ़ा सकें, जो देशी उद्योग-धन्धों से सम्बन्धित थी। किन्तु भगवान चन्द्र वसु पुत्र की इस इच्छा से सहमत न हुए। वे बाहर से प्रतिष्ठापूर्ण एवं अधिकार सम्पन्न दीखने वाली आई.सी. एस. सेवा का आन्तरिक खोखलापन देख चुके थे। वे नहीं चाहते थे कि उनकी तरह ही उनका पुत्र भी अंग्रेज नौकरशाही का विवश यन्त्र बनकर अपनी प्रतिभा का बेच दे।

दूरदर्शी पिता ने उन्हें डॉक्टरी पढ़ने का परामर्श दिया और स्नेहमयी माता ने अपने सारे आभूषण बेच कर विदेश यात्रा का व्यय जुटाया। जगदीशचन्द्र वसु ने पिता के परामर्श को पिता का मात्र आदेश समझ कर ही नहीं माना, बल्कि पिता के अनुभवपूर्ण परामर्श को अपने विचारों की कसौटी पर परखा भी। ऐसा करने से वे जिस निष्कर्ष पर पहुँचे, उससे अपने पिता के प्रति कृतज्ञ हुए बिना न रह सके। उन्होंने मन ही मन पिता को धन्यवाद दिया और इस विश्वास को दोहराया कि अनुभवी गुरुजनों के किसी भी सद्-परामर्श में बहुत बड़ा हित निहित रहता है।

किन्तु इंग्लैंड में मेडिकल कॉलेज में भरती हो सकने से पूर्व उन्हें मलेरिया ने घेर लिया। रोग की लम्बी अवधि के कारण उनकी डॉक्टरी पढ़ाई में विलम्ब हो गया और उन्हें विवश होकर डॉक्टरी के बजाय भौतिक विज्ञान अध्ययन में प्रवेश करना पड़ा, जिसे उन्होंने सहर्ष स्वीकार किया और यथा समय लंदन-विश्व विद्यालय से बी. एस. सी. उपाधि प्राप्त की।

जगदीशचन्द्र वसु जिस समय भारत लौटे तो उनके पास बी. एस. सी. का एक उपाधि-पत्र ही नहीं था, बल्कि बहुत से बहुमूल्य विचार रत्न भी थे, जो उन्होंने अपने समय काल में विज्ञान क्षेत्र के उर्वर मस्तिष्कों के सतत् संपर्क में रहकर संचय किये थे।

अपने परिश्रम पूर्ण अध्यवसाय से उपार्जित जगदीशचन्द्र वसु ने अपनी जिस योग्यता की छाप विश्व-विद्यालय में छोड़ी थी, वह अखबारों में छप कर भारत आई, जिसे देखकर दूरदर्शी लार्ड रिपन ने उनको शासन के अनुकूल अपनाने और स्वतन्त्र विकास न करने देने के लिये कलकत्ता में प्रेजीडेन्सी कॉलेज की प्रोफेसरी का स्वर्ण जाल बिछा दिया। जगदीशचन्द्र वसु उसमें फँसे नहीं, बल्कि स्वयं स्वीकार किया। इसलिये कि वे अपनी प्रखर प्रतिभा के बल से कॉलेज के उस वैतनिक भेद-भाव की परम्परा को मिटा सके, जो अंग्रेज तथा हिन्दुस्तानी प्रोफेसरों के बीच चली आ रही थी।

कॉलेज के स्थायी, हिन्दुस्तानी प्रोफेसरों को अंग्रेजों के वेतन का केवल दो तिहाई ही दिया जाता था और स्थानापन्न प्रोफेसरों को तो उसका भी आधा। प्रखर प्रतिभा को ऊँचे पद के लोभ में फाँस कर नीचे वेतन से हतप्रभ करने की लार्ड रिपन की नीति को जगदीशचन्द्र ने समझा और अवैतनिक सेवा की घोषणा करके कूटज्ञ पक्ष-पातियों का न केवल अस्त्र ही खुट्टल कर दिया, बल्कि भारतीय त्याग के तेज से उनके मुँह भी मैले कर दिये।

इसी बीच जगदीशचन्द्र का विवाह हो गया था, जिससे यह अर्थाभाव और भी कंटकित हो उठा था, किन्तु संकल्पशील भारतीय आचार्य तिल−भर भी विचलित न हुआ और विचलित होता भी कैसे? जब उनकी नव- विवाहिता ने उनके इस त्याग में पूर्णाञ्जलि सहयोग किया और उस नाव को नदी के आर-पार स्वयं, खेकर ले जाती रही, जिस पर जगदीशचन्द्र वसु बैठ कर अपने उस मकान से आया करते थे, जो किराये की तंगी के कारण उन्हें कलकत्ते के बजाय नदी पार चन्द्र नगर में लेना पड़ा था। उनकी पत्नी अबला वसु ने अपना यह नाविक व्रत दो साल निभाया।

सब कुछ आर्थिक कठिनाइयों के होते हुए भी जगदीशचन्द्र ने अपनी आनुसान्धानिक गतिविधियों को प्रारम्भ ही कर दिया। कार्य-व्रती आत्मायें जब कर्तव्य पथ पर पहाड़ जैसे अवरोधों की आन नहीं मानती तब एक आर्थिक अवरोध भला वसु को अपने उद्देश्य से किस प्रकार रोक पाता। उन्होंने अपने हाथ से एक छोटी-सी प्रयोगशाला अपने अध्ययन कक्ष में ही बना ली और फोटोग्राफी के लेट तथा संगीत के रिकार्ड बनाने की विधि निकाल डाली।

जगदीशचन्द्र वसु को अपने इन अनुसन्धानों से सन्तोष न हुआ और उन्होंने विद्युत की चुम्बकीय तरंगों के गंभीर अनुसंधान का कार्य अपने हाथ में लिया, जिन पर अनेक जर्मन वैज्ञानिक बहुत समय से प्रयोग करते हुए सफलता के लिये लालायित हो रहे थे। अपने इस अनुसंधान में उन्होंने अनेक महत्वपूर्ण सिद्धान्तों की खोज कर ली, जिनकी मदद से बेतार के तार (रेडियो विधि) का यन्त्र निर्माण किया। उनके इस आविष्कार से विज्ञान जगत में एक हलचल मच गई। उन्होंने अपने इस विलक्षण यंत्र का प्रदर्शन इंग्लैंड में किया, तब विदेशी वैज्ञानिक आश्चर्य चकित रह गये।

इसी बीच विद्युत तरंगों के चुम्बकीय प्रभाव की प्रतिक्रिया अन्य भौतिक पदार्थों पर देखकर श्री वसु इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि प्रकृति के प्रत्येक पदार्थ में चेतन की भाँति ही किसी भी अनुभूति को अनुभव करने का संवेदनशील तत्व मौजूद है। अपनी इस खोज से वे स्वयं ही इतने प्रभावित हो उठे कि बेतार के तार का अन्वेषण अधूरा छोड़कर इस नये अनुभव के अनुसंधान में लग गये। उनकी इस उत्सुकता का अनुचित लाभ उठा कर विदेशी वैज्ञानिकों में से मार्कोनी नामक एक वैज्ञानिक ने वसु के सिद्धान्तों पर ही उनके पूर्ण प्रायः बेतार के तार के यन्त्र को पूर्ण कर रेडियो आविष्कर्ता का श्रेय प्राप्त कर लिया। निःसन्देह रेडियो के जिस आविष्कार का श्रेय भारतीय वैज्ञानिक श्री जगदीशचन्द्र वसु को मिलना चाहिये था, वह उनकी उत्सुकता तथा विदेशियों के पक्षपात के कारण मार्कोनी को मिल गया। हाथ के किसी कार्य को अपूर्ण छोड़ने की जो हानि हुआ करती है, वह जगदीशचन्द्र वसु को भी हुई।

किन्तु उन्हें इसका जरा भी खेद न हुआ और वह जड़ में चेतन सत्ता की खोज में इसलिये पूरी तरह जुट गये, जिससे कि भारतीय मनीषियों के इन वेदान्त वाक्यों को भौतिक विज्ञान की कसौटी पर सत्य सिद्ध कर सकें कि “संसार के सारे जड़-चेतन पदार्थों में एक ही चैतन्य शक्ति विद्यमान है” — “सर्व खल्विदंब्रह्म नेह नान्यस्ति किंचन।”

भारत के तत्वदर्शी वैज्ञानिक की तपस्या सफल हुई और उसने एक ऐसा यन्त्र बना लिया, जिसकी सहायता से उसने न केवल स्वयं ही देख लिया, बल्कि सारे संसार को दिखला दिया कि संसार की यह वनस्पतियाँ जिन्हें कि जड़ माना जाता है, मनुष्य की तरह हर प्रतिक्रिया को अनुभव करती हैं। मनुष्य की तरह ही पेड़ पौधे भी हँसते हैं, रोते हैं, उदास और प्रसन्न होते हैं। वे भी जीवों की तरह ही भूख और प्यास के कष्ट को अनुभव करते हैं।

जगदीशचन्द्र वसु का यह अद्भुत आविष्कार जहाँ भौतिक विज्ञान में एक चमत्कार है वहाँ तत्व-दर्शन में एक शाश्वत सत्य की ऐसी खोज है जो भारतीय दर्शन की प्रमाणिकता सिद्ध करती है, चेतन विज्ञान में विश्वास का सन्देश देती है।

जिस समय श्री वसु ने इंग्लैंड की राँयल सोसाइटी के सम्मुख अपनी क्राँतिकारी खोज का प्रदर्शन किया। भारतीय दर्शन शास्त्र के प्रकाश में उसकी व्याख्या करते हुए भाषण दिया तो वहाँ उनके प्रतिपादन की जाँच हुई और जगदीशचन्द्र वसु की मौलिकता स्वीकार की गई। संसार ने उनकी महत्ता को स्वीकार किया और वे सर्वश्रेष्ठ वैज्ञानिक घोषित किये गये।

इसके अनन्तर उन्होंने देश-विदेश की यात्रा की और भारतीय मस्तिष्क की धाक सारे संसार में जमा दी। प्रेजीडेन्सी कॉलेज ने अपनी परम्परा में सुधार किया उन्हें सारे समय का पूरा वेतन दिया और संसार की बड़ी-बड़ी संस्थाओं ने उन्हें सम्मानित एवं पुरस्कृत किया। अनेक विश्व विद्यालयों ने डॉक्टर की उपाधि देकर अपने को धन्य माना और भारत सरकार ने उन्हें क्रमशः सी. आई. ई, सी. एस. आई. और “ सर” की उपाधियों से विभूषित किया।

अन्त में उन्होंने अपने जीवन भर की कमाई लगाकर, जिसको कि इसी उद्देश्य से बचाते चले आ रहे थे, “ वसु रिसर्च इन्स्टीटय़ूट” नामक एक विशाल वैज्ञानिक संस्था की स्थापना करके 23 नवम्बर 1936 को परमधाम प्राप्त किया।

सर जगदीशचन्द्र वसु आज संसार में नहीं हैं किन्तु उनके दिये हुए आलोक में संसार का विज्ञान-स्पन्दन दिनों-दिनों प्रगति-पथ पर बढ़ता जायेगा।

सर जगदीशचन्द्र वसु आज संसार में नहीं हैं किन्तु उनके दिये हुए आलोक में संसार का विज्ञान-स्पन्दन दिनों-दिनों प्रगति-पथ पर बढ़ता जायेगा।


Quotation

सत्य और असत्य का अन्तर

जो सत्य को केवल बुद्धि से समझना चाहता है, वह अनेक बार असत्यों के इन्द्रजाल में फँस जाता है। सत्य सुन्दर है, किन्तु असत्य जब सत्य का रूप रखकर सम्मुख आता है तो और भी आकर्षक दीखता है । जो स्वभावतः सुन्दर होता है, वह सामान्यतः सुन्दर लगता है किन्तु जब किसी को रिझाने के लिये सजगता पूर्वक सोलह शृंगार किये जाते हैं, तब उसकी प्रतिक्रिया का तीव्र होना स्वाभाविक है। लोग उस सोद्देश्य रूप जाल में फँस ही जाते हैं। यही दशा सत्य और असत्य की भी है। सत्य मनुष्य के सम्मुख साधारण रूप में ही उपस्थित होता है, किन्तु असत्य छलने के मन्तव्य से अपने स्वरूप को नख से शिखा तक सजा कर ही आता है।

केवल बुद्धि के बल पर सत्यासत्य की परख करने में प्रवंचना की शँका रहती है। सत्य बुद्धि से परखने की नहीं, जीवन में अनुभव करने की वस्तु है। जीवन में अनुभूत किया हुआ सत्य ही वास्तविक सत्य है, शेष असत्य भी हो सकते हैं।

—जे. कृष्णमूर्ति

—जे. कृष्णमूर्ति


भोजन भगवान को समर्पित कर लिया करें।

ईशा वास्यमिद्ं सर्वं यत्किञ्च जगत्याँ जगत्। तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्य स्विद्धनम्॥

ईशावास्योपनिषत्।1

अर्थात्— अखिल विश्व में जड़ चेतन स्वरूप जो कुछ भी है वह सर्वव्याप्त ईश्वर से परिपूर्ण है। इस संसार में जो कुछ भोग है, उसे समर्पित कर भोगो। लालच न करो, यह धन तुम्हारा नहीं है।

मनुष्य में एक बहुत बड़ी कमजोरी यह है कि उसे प्राप्त का अभिमान हो जाता है। यह घर मैंने बनाया है। यह खेत मेरे हैं। इतना धन मैंने कमाया है। मैं इस सम्पत्ति का स्वामी हूँ, जो चाहे करूं, जैसा चाहूँ बरतूँ। इसे अहंकार कहते हैं। कहते हैं अहंकार करने वाले का विवेक नहीं रहता और वह बुद्धि-भ्रष्ट होकर नष्ट हो जाती है। अभिमानी व्यक्ति की भावनायें बड़ी संकीर्ण होती हैं। दूर तक सोचने की उसमें क्षमता न होने से वह अज्ञानियों के काम करता और दुःख भोगता है। इसलिये उसके लिये यह मंगलमय विश्व भी दुःखरूप हो जाता है। वह क्लेश में जीता और क्लेश में मर जाता है।

आप प्रतिदिन भोजन करने बैठते हैं। उस समय स्वाद की जल्दी में आप यह नहीं सोचा करते कि यह आहार किसने प्रदान किया है। कदाचित् आप से कोई यह प्रश्न पूछे तो आप कहेंगे—यह अन्न मैंने पैदा किया, मेरी धर्मपत्नी ने बनाया। बस यह सब मेरा है इसमें किसी का राई-रत्ती अधिकार नहीं, जैसे चाहूँगा वैसे भोगूँगा।

आपका इस प्रकार सोचना मिथ्या है। माना आपने श्रम किया, तो उसके बदले आप ही तो भोगने जा रहे हैं। आपकी धर्मपत्नी ने बनाया है, इसीलिए तो आपकी इच्छानुसार बना है। पर आप थोड़ा ऊँचे उठकर विचार कीजिये कि आपके इस अन्न में सृष्टि के नियामक परमात्मा का अधिकार भी है। उसने धरती न बनाई होती तो आप अन्न कहाँ उगाते? बीज न बनाया होता तो क्या पैदा कर लेते? फिर कहीं आपका ही अस्तित्व न होता, यह मनुष्य शरीर न मिला होता तो इसे भोगने की सामर्थ्य आप में कहाँ से आती? आपको भोग के साधन प्रदान किये गये हैं तो उस दाता के प्रति आपको कृतज्ञ भी तो होना चाहिये।

भोजन करने से पूर्व आप उसे परमात्मा को समर्पित कर दिया करें, तो इसमें आपका घटेगा कुछ नहीं वरन् अन्न की शक्ति के साथ भावना बल भी बढ़ेगा। आपको शक्ति और ओज प्रदान करने में इस प्रकार की भावना की महत्ता अद्वितीय है।

जो भोजन आप ग्रहण करते हैं उसी के द्वारा आपका पोषण और नव निर्माण नहीं होता, प्रत्युत भोजन करते समय आपकी जैसी मनः स्थिति होती है, मन जैसा सूक्ष्म प्रभाव फेंकता है और जैसी भावनायें लेकर भोजन करते हैं उनका भी आपके जीवन निर्माण से महत्वपूर्ण सम्बन्ध होता है। उन भावनाओं का विकास शरीर के रक्त, माँस, वीर्य और प्राण के द्वारा प्रस्फुटित होकर सारे जीवन में बिखर जाता है। परमात्मा को भोजन समर्पित करने से जो सात्विक और पवित्र विचार-प्रवाह उमड़ता है वह अपने शरीर और जीवन में घुल जाता है। शरीर पुष्ट और बलिष्ठ बनता है। साथ में संकल्प मजबूत होते हैं और उस निश्चयात्मक बुद्धि से बनने वाला जीवन-क्रम भी अधिक सुव्यवस्थित बन पड़ता है।

प्रातःकाल से लेकर दोपहर तक काम करने में आपके सामने अनेक प्रकार की परिस्थितियाँ आती हैं। कभी क्रोध उत्पन्न होता है, कभी खिन्नता आती है। कभी भय पैदा होता है, कभी निराशा उत्पन्न होती है। अनेक तरह के बुरे विचार भी प्रभावित करते रहते हैं। काम की कठोरता में उत्तेजना, उद्विग्नता, ईर्ष्या, द्वेष पैदा होना स्वाभाविक-सा है। कई बार दूसरे लोग अपने काम में बाधायें डालते हैं उसके कारण प्रतिशोध की भावनायें भी भड़क उठती हैं। दोपहर को घर लौटते हैं तो अशुभ विचारों को पूरा बोझ साथ लेते आते हैं। यह कुत्सित विचार भोजन करते समय भी बने रहें तो वे स्थायित्व ग्रहण करने लगेंगे। परमात्मा के प्रति समर्पण को विचार करते ही आपकी अन्तरात्मा विशाल होती है। उसमें सारे कलुष काषाय धुल जाते हैं। आगे के लिये एक स्वस्थ चैतन्यता अनुभव करने लगते हैं।

आहार ग्रहण करने के समय भावनाओं के सम्मिश्रण का फल अलौकिक है इससे आत्मा में स्वर्गीय शान्ति का अवतरण होता है। बच्चे अपनी माँ का दूध पीते हैं तो कितनी अठखेली करते हैं। कभी मुँह नोचते हैं तो कभी चूम-चटकार करते हैं। तरह-तरह के आमोद-प्रमोद करता है बालक। माँ के प्रति उसकी कृतज्ञता पूर्ण प्रकट होती है। माँ भी यह देखकर अपनी ममत्व उड़ेलती है। दूध के साथ भावनायें पिलाती है। बच्चे के स्वास्थ्य और सुडौलता में दूध उतना महत्वपूर्ण नहीं होता जितना माँ-बेटे के द्वारा विनिर्मित उल्लास और ममता भरा वातावरण। वह दूध बच्चे के लिये शहद से भी अधिक मीठा, शक्ति वर्द्धक और अमृत के समान होता है।

मनुष्य का पिता परमात्मा है। पिता की शक्ति और सामर्थ्य माता से बढ़कर होती है। अपने पुत्र की भावनाओं को देखकर उसका जी भर आता है, तब वह अपने शिशु को अपनी भावनाओं का रस उसी तरह पिलाता है जैसे माता अपने बेटे को दूध पिलाती है। निर्लेप, भव्य और उत्तम मनःस्थिति सुन्दर स्वास्थ्य के लिए प्रथम आवश्यक तत्व है। भयपूर्ण, क्लान्त या उद्विग्न मनः स्थिति में भोजन करना आलस्य और रोग-शोक को निमन्त्रण देना है।

“जो कुछ भोजन आप लेते हैं वह पाचन के उपरान्त शरीर का एक भाग बन जाता है, उस भोजन के साथ जो कुछ सूक्ष्म विचार थे वे भी शरीर में बस जाते हैं। लोग समझते हैं खाद्य पदार्थ में शक्ति है इसलिये आहार की बाहरी सफाई पर तो ध्यान देते हैं किन्तु आन्तरिक स्वच्छता को उपेक्षित करते हैं इससे उत्तम स्वास्थ्य और निरोग शरीर की आकाँक्षा नहीं सफल होती।” यह शब्द थियोसोफिकल सोसायटी के विद्वान सन्त लेडबीटर ने “वस्तु की आन्तरिक दशा” नामक पुस्तक में लिखे हैं।

परमात्मा पूर्ण पवित्रता का प्रतीक है। जब वह भोजन में हमारे साथ बैठ जाता है तो सात्विकता की लहर दौड़ने लगती है। परमात्मा का प्रसाद पुष्टिदायक, मधुर स्वादिष्ट और थोड़ा होता है। प्रसाद-भावना से लिया हुआ आहार भी वैसा ही होना चाहिये। मीठा, स्वल्प, सात्विक और स्वादिष्ट। इसी में स्वास्थ्य की तृप्ति की संभावनायें भी टिकी हैं। जब भगवान साथ नहीं होता तभी लोग अखाद्य पदार्थ भक्षण करते हैं। असात्विक भोजन लेते हैं। माँस, मिर्च मसालेदार गरिष्ठ पदार्थ, प्याज और इसी तरह के अन्य दूषित पदार्थों का सेवन वही लोग करते हैं जो परमात्मा को अपने अन्दर धारण नहीं करना चाहते। इसी के फलस्वरूप उन्हें स्वास्थ्य का सुख नहीं मिलता, भावनाओं का सुख नहीं मिलता।

आहार का उद्देश्य मन को, स्वादेन्द्रिय को तृप्त करना मात्र नहीं, वरन् उसका जीवन की गतिविधियों से गहरा सम्बन्ध है। जिस व्यक्ति का जैसा भोजन होगा उसका आचरण भी तदनुकूल होगा। आहार शुद्धि की आवश्यकता पर प्रकाश डालते हुये छान्दोग्य उप. में लिखा है—

“आहार शुद्धौ सत्व शुद्धिः सत्व शुद्धौ ध्रुवा स्मृतिः, स्मृतिलाभे सर्वग्रन्थीनाँ विप्रमोक्षः।

अर्थात्— आहार की शुद्धि से सत्व की शुद्धि होती है। सत्व की शुद्धि से बुद्धि निर्मल और निश्चयी बनती है। पवित्र और निश्चय बुद्धि के द्वारा ही मनुष्य मोक्ष प्राप्त करते हैं।

जिसके जीवन में अनेक बुराइयाँ धँसी हैं, अनेक मनोविकारों से जो ग्रस्त है उसे अपना जीवन सीधी राह पर लाने का प्रारम्भिक एक साधन आहार शुद्धि और परमात्मा को समर्पित कर भोजन लेना है। आहार में ईश्वरीय दिव्यता का समावेश होता है तो काम, क्रोध, उत्तेजना, चंचलता, निराशा, उद्वेग आदि बुराइयाँ दूर होती हैं। स्वास्थ्य, शक्ति और सौंदर्य बढ़ता है। यह मनुष्य का कर्त्तव्य भी है। जिस परमात्मा ने हमें यह अलौकिक भोग इस धरती में दिया है उसके प्रति समर्पण का भाव न रखें तो यह मनुष्य की धृष्टता होगी। उसे जो मिलता है, मिला है, वह परमात्मा की कृपा वश मिलता है। उनकी इस कृपा के प्रति कृतज्ञ होना हमारा प्रमुख कर्त्तव्य होना चाहिये।


नारी का सुयोग्य होना आवश्यक है।

नारी पुरुष की ही अर्धांगिनी नहीं, समाज का भी अर्धांग है। जिस प्रकार पुरुष के पारिवारिक जीवन में वह सुख-दुःख की सहयोगिनी है, उसी प्रकार समाज के उत्थान पतन में भी उसका हाथ रहता है।

किसी समाज का केवल पुरुष वर्ग ही शिक्षित, सभ्य और चेतना सम्पन्न हो जाये और नारी वर्ग अशिक्षित, असंस्कृत एवं मूढ़ बना रहे तो क्या उस समाज को उन्नत समाज कहा जा सकेगा? ठीक-ठीक उन्नत समाज वही कहा जा सकता है, जिसके स्त्री पुरुष दोनों वर्ग समान रूप से शिक्षित, सुसंस्कृत एवं चेतना सम्पन्न हों।

केवल पुरुषों के सुयोग्य बन जाने से कोई भी काम नहीं चल सकता । उसका अपना पारिवारिक जीवन तक सुरुचिपूर्ण नहीं रह सकता, तब सामाजिक जीवन की सुचारुता की सम्भावना कैसे की जा सकती? पुरुष अपनी योग्यता से जो कुछ सुख-शान्ति की परिस्थितियाँ पैदा करेगा, उसे घर की गंवार नारी बिगाड़ देगी। किसी गाड़ी की समगति के लिये जिस प्रकार उसके दोनों पहियों का समान होना आवश्यक है, उसी प्रकार क्या पारिवारिक और क्या सामाजिक दोनों जीवनों के लिए नारी-पुरुष का समान रूप से सुयोग्य होना आवश्यक है।

किसी भी समाज, देश अथवा राष्ट्र की उन्नति तभी सम्भव है,जब उसमें शिक्षा, उद्योग,परिश्रम,पुरुषार्थ जैसे गुणों का विकास हो। इन गुणों के अभाव में कोई भी देश अथवा समाज उन्नति नहीं कर सकता। यदि इन गुणों को केवल पुरुष वर्ग में ही विकसित करके नारी को अज्ञानावस्था में ही छोड़ दिया जायेगा तो केवल पुरुष का गुणी होना किसी राष्ट्र अथवा समाज की उन्नति का हेतु नहीं बन सकता। पुरुष प्रगतिशील हो और नारी प्रति गामिनी, पुरुष बुद्धिमान हो और नारी मूर्ख, तो भला किसी समाज राष्ट्र अथवा परिवार का काम सुचारु रूप से किस प्रकार चल सकता है? और जिन समाजों में ऐसा होता है वे समस्त संसार में पिछड़े हुए ही रह जाते हैं। जिन परिवारों में पुरुष बुद्धिमान, विचारशील और विद्वान् रहे हैं और नारी अशिक्षिता और गँवार रही है, उन परिवारों की सुख-शान्ति कभी भी सुरक्षित नहीं रह सकी है। अकेले पुरुष की गुणज्ञता कभी भी सुख-शान्ति को स्थायी नहीं बना सकती। स्त्री-पुरुष के सम्मिलन से बने परिवार एवं समाज की उन्नति एवं सुख-शाँति तभी सुरक्षित रह सकती है, जब उसके दोनों घटक समान रूप से सुशिक्षित एवं कर्तव्य विज्ञ हों। ऐसे कलहपूर्ण परिवारों की समाज में आज भी कमी नहीं है, जिनके पुरुषवर्ग बड़े ही विद्वान एवं कर्तव्य-परायण हैं। टालस्टाय, गोर्की, अब्राहम लिंकन, सुकरात आदि न जाने संसार के कितने विद्वान् महापुरुषों के पारिवारिक-जीवन केवल अशिक्षित एवं कर्तव्य-ज्ञान से शून्य नारियों के कारण ही नरक बने रहे।

बड़े-बड़े सम्पन्न और उन्नत परिवार केवल घर की मूर्ख नारियों के कारण बर्बाद हुए हैं और होते रहते हैं। पारिवारिक एवं सामाजिक जीवन में नारी का एक महत्वपूर्ण एवं अडिग, अक्षय तथा अनिवार्य स्थान है। उसे जीवन से हटा कर संसार का काम चलाया ही नहीं जा सकता। ऐसी दशा में जब अशिक्षित, मूर्ख एवं कर्तव्यहीन नारियों की बहुतायत होगी तो उनको ही उनके आवश्यक स्थान पर लाना पड़ेगा। ऐसी दशा में क्लेश-कलह का जो सुनिश्चित परिणाम होता है, वह होगा ही। इसके विपरीत जब योग्य नारियाँ समाज में अपना स्थान ग्रहण करेंगी, तब क्लेश-कलह का प्रश्न ही नहीं उठता।

समाज में नारी का बहुत महत्वपूर्ण कर्तव्य एवं स्थान है। सन्तान-रचना से लेकर पुरुष का आश्रय स्थान, घर की सुख-शाँति बहुत कुछ नारी पर ही निर्भर करती है और पारिवारिक सुख-शान्ति पर पुरुष का विकास निर्भर रहता है। इसलिए इस प्रकार के महत्वपूर्ण स्थान की पूर्ति सुयोग्य नारी द्वारा ही होना आवश्यक है।

सम्पन्नता की परिस्थिति में जब अयोग्य नारी जीवन को कंटकाकीर्ण बना देती है, तब विपत्ति और विपन्नता के समय वह पुरुष का क्या हाथ बँटा सकती है? बल्कि उस समय तो वह और भी एक भारी विपत्ति बन जाती है। मध्यकाल में विदेशी आक्रमणों के समय यही तो हुआ। उस समय नारियाँ अन्तःपुर की शोभा मात्र बनी हुई घर में बन्द रहा करती थीं। वे समय की गतिविधि से एकदम अपरिचित यहाँ तक कि द्वार पर आई हुई विपत्ति के समय भी वे उससे अनभिज्ञ रहा करती थीं। आपत्ति के समय होना तो यह चाहिये कि बढ़कर उससे मोर्चा लिया जाय। साहस और बुद्धिमत्तापूर्वक उसका मुकाबला किया जाय, किन्तु होता यह था कि किसी आक्रमण अथवा विपत्ति का अवसर आने पर वे आत्मघात करके अपनी इज्जत बचाती थीं।

इसके विपरीत यदि शिक्षा एवं सामाजिकता के साथ नारी का ठीक-ठीक विकास किया जाता रहा होता तो वह भी हर आपत्ति की सम्भावना से परिचित रहती, उससे बचने और उसका प्रतिकार करने के योग्य होती तब पुरुष को शत्रु से लड़ने और नारी की रक्षा करने का दोहरा दायित्व न निभाना पड़ता। उनकी शक्ति दो भागों में न बँट कर केवल शत्रु से लोहा लेने में ही लगती और तब ऐसी दशा में दुश्मन की दाल इतनी आसानी से नहीं गल पाती। बुद्धिमती एवं वीर नारियाँ न केवल अपनी ही रक्षा में समर्थ रहतीं, बल्कि पुरुष का भी साहस बढ़ाती और हाथ बंटाती।

इतिहास साक्षी है कि जिन-जिन स्थानों की नारियों ने उस समय आपत्ति काल में साहस दिखाया और प्रतिगामिनी के स्थान पर प्रगतिशीलता एवं बुद्धिमत्ता का परिचय दिया, उन-उन स्थानों पर आक्रान्ताओं को अधिकतर पराजित ही होना पड़ा, किन्तु यह रहा अपवाद के रूप में ही। यदि समाज का सारा नारी वर्ग सुशिक्षित एवं जागरूक होता और वह आई हुई अथवा आने वाली विपत्तियों का ज्ञान रख रहा होता तो कोई कारण नहीं कि समाज शत्रुओं का प्रतिरोध पूरी तरह कर सकने में सफल न होता।

मध्य-युग के राजपूत काल में एक से एक वीर योद्धा और बलिदानी हुए हैं, जिनकी तलवार के जौहर और साहस के कार्य आज तक इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखे हुए हैं। इसका एक मात्र कारण यही था कि उस समय माताएं अपने पुत्रों को पालने में ही वीरता एवं बलिदान का पाठ पढ़ाया करती थीं। यही कारण था कि माता के पाये संस्कारों के बल पर एक-एक राजपूत योद्धा सैकड़ों शत्रुओं से जूझ जाया करता था। किंतु उस समय माता का यह पाठ परम्परा की तरह ही था। सन्तान को मरने और जूझने की शिक्षा देने की एक प्रथा-सी बनी हुई थी। माताएं केवल यही एक मंत्र जानती थीं। इस परम्परागत पाठ के स्थान पर यदि वे ठीक-ठीक शिक्षित, सावधान और समय व समाज की गतिविधि परख सकने योग्य रही होतीं तो वे अपनी संतान को देश काल के अनुसार वीरता और उत्कृष्टता दोनों गुणों की शिक्षा दे सकतीं। जहाँ वे शत्रु से जूझने का मंत्र सन्तानों के संस्कारों में फूंकती, वहाँ आपस में संगठित रहने, सहिष्णु बनने और मिल-जुलकर करने, सुरा सुन्दरी से बचे रहने, क्रूर और नृशंस न बनने का भी पाठ पढ़ाती, किन्तु ऐसा न हो सका। माताओं के पास विद्या की कमी होने से उनमें प्रत्युत्पन्न बुद्धि की सदैव कमी रही, इससे प्रथा के अनुसार वे सन्तान को वीर तो अवश्य बना सकीं, किंतु मानवीय उत्कृष्टता, महापुरुषों जैसी प्रतिभा उत्पन्न न कर सकीं। देश काल तथा समाज की, राष्ट्र की परिस्थितियों एवं आवश्यकताओं का ज्ञान तो उनको तभी हो सकता था, जब उनका ठीक-ठीक मानसिक एवं बौद्धिक विकास होता और यह तभी सम्भव था, जब उनकी शिक्षा एवं सामाजिकता के अधिकार देकर इस योग्य बनाया गया होता।

आज का संसार पहले से भी भयानक हो गया है। हर समाज एवं राष्ट्र अपनी सुरक्षा एवं स्वतन्त्रता के लिये जी-जान से जुटा हुआ है। ऐसी दशा में यदि भारतीय समाज ने अपने नारी-वर्ग को समयानुकूल विकसित एवं जागरूक न किया तो किसी समय राष्ट्रीय आपत्ति काल में उनसे सहायता सहयोग मिलना तो दूर उनकी चेतना-शून्यता एक दूसरी विपत्ति बन जायेगी। यदि राष्ट्रीय उत्थान कार्य में योग्य बना कर नारी को भी संलग्न किया जाये तो राष्ट्र की प्रगति तो दोहरी हो ही जायेगी, साथ ही वर्तमान एवं भविष्य दोनों सुरक्षित एवं निरापद बन जायेंगे।


धन को सम्मानित न किया जाय।


आदर्शवादिता की प्रतिमूर्ति-श्री लाल बहादुर शास्त्री

चार-पाँच वर्ष पूर्व जब पण्डित नेहरू के उत्तराधिकारी का प्रश्न उठना शुरू हुआ था, तब लोग इस विषय में अनेक प्रकार की अटकलें लगाने लगे थे। कोई किसी के विषय में सोचता था, तो कोई किसी के विषय में कहता था। बहुतों के मुँह से बहुतों के नाम सुने जाते रहे। किन्तु समय आने पर जब पं. नेहरू के उत्तराधिकारी का चुनाव हुआ,तब एक ऐसा आदमी भारत का प्रधान मन्त्री बना, जिसकी किसी को आशा न थी।

पं. नेहरू के सहयोगियों में होने के कारण उनके बाद प्रधान मन्त्री पद के लिये जिन नामों का अनुमानित उल्लेख किया जाता रहा है। उस सूची में श्री लालबहादुर शास्त्री का स्थान सदा ही पाँचवें-छठे नम्बर पर ही रहा है, सो भी यों ही गौण रूप से। भारत जैसे विशाल लोकतंत्र का नायकत्व, सो भी पं. नेहरू जैसे प्रतिभा एवं प्रभाव सम्पन्न व्यक्ति के उत्तराधिकारी के रूप में कभी लालबहादुर शास्त्री जैसा साधारण, सादा और अविशेष प्रतिभा का व्यक्ति प्राप्त कर सकेगा? यह बात लोगों की कल्पना से परे थी। किन्तु यह असम्भाव्य जैसी लगने वाली बात सम्भव हुई और पं. नेहरू के निधन के बाद श्री लालबहादुर शास्त्री ने उनका आसन ग्रहण कर संसार को आश्चर्य में डाल दिया। उनकी इस अप्रत्याशित उपलब्धि का रहस्य विचारशील लोगों की खोज का विषय बन गया।

असाधारण राजनीतिक प्रेक्षकों, नीति विशारदों और राजनीतिक भविष्य सूचकों एवं निकटवर्ती सूत्रों को अपने अनुमान की असफलता और शास्त्री जी की सफलता पर इतना अधिक आश्चर्य हुआ कि वे इसको वर्तमान युग की कसौटियों के लिये एक चुनौती मानने लगे। बड़े-बड़े अनुमान आदेशक विस्मय के साथ विचार करने लगे कि यह प्रदर्शन हीन साधारण तम कोटि का व्यक्तित्व रहित व्यक्ति भारत मन्त्री पद के लिये किस प्रकार निर्वाचित हो सका? जबकि अन्य आकाँक्षी प्रति योगियों की तुलना में वह उन सभी विशेषताओं एवं विशिष्टताओं से वंचित हैं, जो उनमें उससे अधिक हैं। शास्त्री की पृष्ठभूमि में न कोई पारिवारिक प्रतिष्ठा है और न मित्रों अथवा परिचितों का प्रयत्न।

आज के अनादर्शवादी युग में सफलता प्राप्त करने के लिये जिन साधनों को आधुनिक ही नहीं, बल्कि आवश्यक एवं अनिवार्य माना जाता है, श्री लालबहादुर शास्त्री के पास उनका सर्वथा अभाव था। कुटिलता, दलबन्दी, छल-छद्म महान् कुल, सम्पन्न परिवार, असाधारण प्रतिभा, प्रभावपूर्ण व्यक्तित्व, ऊँची शिक्षा एवं विघटन-कुशलता आदिक बातों से उनका दूर का भी सम्बन्ध नहीं था। इसके विपरीत वे पूर्ण आदर्शवादी, ईमानदार, सत्य-निष्ठा एवं सरल-साधारण प्रतिभा के व्यक्ति थे।

वे सीधे-सादे ग्रामीण-जन थे, नवीं-दसवीं कक्षा तक पढ़े थे और घर के बहुत ही गरीब आदमी थे। उन्होंने न तो कभी विदेश-यात्रा की और न राजनीति के क्षेत्र में खुल कर खेले ही थे। लम्बी-चौड़ी प्रपंच पूर्ण बातें करना और अन्य लोगों पर अपनी छाप छोड़ने की कला से वे सर्वथा अनभिज्ञ ही थे। उनके पिता साधारण अध्यापक थे, जो उन्हें शैशव-काल में ही अठारह माह का छोड़कर स्वर्ग सिधार गये थे। उनका लालन-पालन विधवा माता ने घोर अभाव-ग्रस्त परिस्थितियों में अपने पिता के सहारे किया था। उन्होंने अपना विद्यार्थी जीवन ढाई रुपये माह के खर्च में खाने में खाने कपड़े से लेकर स्कूल की फीस तक देकर चलाया था। उनका कोई सम्बन्धी इस योग्य न था, जो उनकी शिक्षा अथवा जीवन-विकास में सहायता दे पाता। वे पढ़ने के लिये सात-आठ मील पैदल चलकर जाया करते थे।

ऐसे निचले धरातल से उठकर भारत के सर्वोच्च राजनीतिक पद पर पहुँच जाने में शास्त्री जी के अपने आन्तरिक गुण तथा आदर्शवादी विचारधारा ही सहायक हुई है। शास्त्री जी ने अपनी महान उपलब्धि से सिद्ध कर दिखाया कि संसार में उन्नति करने के लिये जो अनीति एवं अनादर्श को आवश्यक बतलाते हैं, वे भूल में हैं। यह मनुष्य की परिश्रमशीलता, सत्य-निष्ठा, ईमानदारी, सदाचार एवं सद्व्यवहार ही है, जो उसे उच्चतम पद पर पहुंचा देते हैं। यदि किसी के तिकड़म सफल होकर यदि उच्च पद तक पहुंचा सकते हैं,और दूसरे का आदर्श चरित्र भी ऐसा कर सकने में समर्थ हो, तब क्या आवश्यक है कि मनुष्य निम्न आचरण का सहारा लेकर अपनी उन्नति का प्रयत्न करें? क्यों न वह उदात्त आचरण को ही अपनाये, जिससे कि उसे उन्नति, यश, लोक-प्रियता, पुण्य एवं आत्म-सन्तोष की स्थायी सफलतायें प्राप्त हों।

श्री लालबहादुर शास्त्री ने अपने आदर्श जीवन एवं महान चारित्रिक बल पर ही इतनी सफलता पाई है। जानकर लोगों में उनके आदर्शवादी व्यक्तित्व के विषय में दो मत नहीं हो सकते। उन्होंने बिना किसी के सहारे स्वावलम्बन एवं परिश्रम के बल पर ही अपना रास्ता आप बनाया है, अपनी उपलब्धियाँ स्वयं उपार्जित की हैं, वे ईमानदारी से बिना किसी महत्वाकाँक्षा के ठोस काम करते हुए कदम व कदम आगे बढ़े हैं। उन्होंने सदैव ही अपने साथियों एवं सहयोगियों की गणना में अपने को पश्चात् पंक्ति में ही रखा है और काम के समय सबसे आगे रक्खा है। उनके मस्तिष्क में नेतृत्व की कमजोरी कभी नहीं रही, उन्होंने आजीवन अपने को एक स्वयं-सेवक ही माना है और उसी भावना से किसी पर अपने बड़प्पन की छाप छोड़ना वे जानते ही न थे। नाम से बचते हुए काम करना ही उनके जीवन का मूलमन्त्र था।

घर से गरीब होने और कठिनतम परिस्थितियों में रहते हुए भी उन्होंने जीवन के लिये सुख-सुविधा की अवस्थाओं को उपार्जित करने के प्रयत्न को देश की स्वतन्त्रता पर न्यौछावर कर दिया। गाँधी जी के असहयोग आन्दोलन का आह्वान सुनकर अपने बाल्य-काल में ही श्री शास्त्री जी दीन दुनिया को भूल और पढ़ाई को तिलाँजलि देकर एक साधारण स्वयंसेवक के रूप में कर्म-क्षेत्र में उतर पड़े। उन्होंने कठोर मानसिक एवं शारीरिक अनुशासन के साथ असहयोग आन्दोलन का प्रचार किया, जिसके लिये उन्हें कठोर कारावास का दण्ड भोगना पड़ा। उन्होंने तत्कालीन स्वयंसेवक शिविरों में इतनी लगन एवं परिश्रमशीलता से काम किया कि लाला लाजपतरात राय और राजर्षि पुरुषोत्तमदास टण्डन जैसे महान नेताओं का ध्यान उनकी ओर आकर्षित हुए बिना न रह सका, जिसके फलस्वरूप उन्होंने उन्हें स्वयं स्थापित “सर्वेण्ट आफ पीपुल्स सोसाइटी” की सदस्यता देकर ही सन्तोष किया।

इस प्रारम्भिक सफलता एवं सम्मान से प्रभावित होकर शास्त्री जी में कोई अभिमान नहीं आया, बल्कि वे और भी अधिक लगन एवं अनुशासन से काम करने लगे, अपने साथ काम करने वालों से आगे बढ़ जाने पर भी उन्होंने कभी नायकत्व की भावना का प्रदर्शन नहीं किया।

शास्त्री जी के सह-जेल-यात्री श्री सादिक अली ने अपने व्यक्तिगत अध्ययन एवं अनुभव के आधार पर लिखा है कि “वे एक गम्भीर एवं निष्ठावान व्यक्ति थे। उन्होंने अपने द्वारा जीवन के क्षण-अनुक्षण का अपना मानसिक बौद्धिक एवं आध्यात्मिक विकास करने में उपयोग किया। उनकी बौद्धिक रुचियों का क्षेत्र बहुत विस्तृत था। हम लोग तब अन्य प्रकार से अपना सारा जीवन-यापन करने में लगे रहते थे, तब शास्त्री जी निरन्तर अध्ययन में ही व्यस्त रहा करते थे। उन्होंने अपनी दिनचर्या बड़ी सावधानी से बना रक्खी थी और पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार ही अपना काम किया थे। वे अपने विचार एवं कार्यों में कभी उलझन पैदा न होने देते थे। उनके मस्तिष्क में यह बात हमेशा साफ रहती थी कि हमें अपने कारा-जीवन के कठिन दिनों का अधिक से अधिक उपयोग किस प्रकार करना चाहिए?”

श्री शास्त्री जी नैतिक शुद्धि का बहुत विचार रखते थे और गाँधी जी के निर्देशानुसार आत्मा के विकास के प्रयत्न और उसकी कमियों एवं खामियों को दूर करने के लिये न केवल जागरूक ही रखते थे, बल्कि प्रयत्न किया करते थे।”

धर्म-प्राण व्यक्ति होने पर भी शास्त्री जी में पुरातन पन्थियों की कट्टरता न थी। वे धर्म के मूल तत्वों पर अडिग निष्ठा रखते हुए सामयिक समन्वय में समर्थ थे स्वयं आचार-विचार, नियम-संयम से रहते हुए भी दूसरों की उस जीवन-पद्धति में जरा भी दखल न देते थे, जोकि उनकी पद्धति में बाधक न बनती थी।

अपने इन्हीं विशाल गुणों के कारण शास्त्री जी न पंडित जवाहरलाल जैसे शक्तिशाली व्यक्ति को प्रभावित किया और उन्होंने उन्हें गम्भीर से गम्भीर तर जिम्मेवारियाँ सौंपते हुये उनकी उन क्षमताओं की परीक्षा ली जो उनकी आत्मा में निवास करती थीं, उनके कार्यों में झलक मारती थीं किन्तु कभी मुखरता न पाती थीं।

उत्तर प्रदेश के पार्लियामेण्टरी सेक्रेटरी के लघु पद पर प्रशासनिक योग्यता दिखलाकर वे अखिल भारतीय काँग्रेस कामेटी के जनरल सेक्रेटरी बने और सार्वजनिक चुनावों में काँग्रेस दल के चुनाव नेता के दायित्वपूर्ण कार्य में कुशलता पूर्ण सफलता का परिचय देकर रेल मंत्री तथा गृहमन्त्री का पद प्रतिष्ठित किया। अपने इन दायित्वपूर्ण पदों पर उन्होंने जो मौन महानता पूर्ण अपनी योग्यता का परिचय दिया उसने देश के सर्वोच्च लोकप्रिय एवं प्रभावशाली नेता, शासक एवं राजनीतिज्ञ को इस गहराई तक प्रभावित किया कि उन्हें श्री शास्त्री जी की ठोस क्षमताओं को मान्यता देनी पड़ी।

इन्हीं अपने गुणों एवं अग्निपरीक्षाओं में सफलता के कारण श्री शास्त्री जी नेहरू जी के निधन के बाद अप्रत्याशित रूप से उनके उत्तराधिकारी चुने गये और अठारह माह की अवधि में ही उन्होंने सिद्ध कर दिखाया कि किसी की सादगी, सरलता, अथवा बाह्याकार से किसी की क्षमताओं का गलत अन्दाज लगाना अदूरदर्शिता है।

कहना न होगा कि शास्त्री जी की सफलतायें वास्तव में भारतीय आदर्शों की सफलता है। उन्होंने सिद्ध कर दिखाया यदि आलीशान इमारतें, कुलीनतायें, सम्पन्नतायें, उपाधियाँ अथवा प्रचण्ड व्यक्तित्व किसी को सफल एवं महान बना सकते हैं तो सच्ची सरलता, सादगी, साधुता और सामान्यता भी किसी को सफल बना सकने में सर्वथा समर्थ है। शास्त्री जी की सफलता एवं उन्नति का उदाहरण निःसन्देह उन हजारों लाखों व्यक्तियों के लिये एक प्रेरक प्रसाद है जो जीवन में उन्नति करना चाहते हैं किन्तु अपनी साधनहीन एवं कठिन परिस्थितियों को देखकर हिम्मत हार कर यथा स्थान बैठे रहते हैं।

कहना न होगा कि शास्त्री जी की सफलतायें वास्तव में भारतीय आदर्शों की सफलता है। उन्होंने सिद्ध कर दिखाया यदि आलीशान इमारतें, कुलीनतायें, सम्पन्नतायें, उपाधियाँ अथवा प्रचण्ड व्यक्तित्व किसी को सफल एवं महान बना सकते हैं तो सच्ची सरलता, सादगी, साधुता और सामान्यता भी किसी को सफल बना सकने में सर्वथा समर्थ है। शास्त्री जी की सफलता एवं उन्नति का उदाहरण निःसन्देह उन हजारों लाखों व्यक्तियों के लिये एक प्रेरक प्रसाद है जो जीवन में उन्नति करना चाहते हैं किन्तु अपनी साधनहीन एवं कठिन परिस्थितियों को देखकर हिम्मत हार कर यथा स्थान बैठे रहते हैं।

कहना न होगा कि शास्त्री जी की सफलतायें वास्तव में भारतीय आदर्शों की सफलता है। उन्होंने सिद्ध कर दिखाया यदि आलीशान इमारतें, कुलीनतायें, सम्पन्नतायें, उपाधियाँ अथवा प्रचण्ड व्यक्तित्व किसी को सफल एवं महान बना सकते हैं तो सच्ची सरलता, सादगी, साधुता और सामान्यता भी किसी को सफल बना सकने में सर्वथा समर्थ है। शास्त्री जी की सफलता एवं उन्नति का उदाहरण निःसन्देह उन हजारों लाखों व्यक्तियों के लिये एक प्रेरक प्रसाद है जो जीवन में उन्नति करना चाहते हैं किन्तु अपनी साधनहीन एवं कठिन परिस्थितियों को देखकर हिम्मत हार कर यथा स्थान बैठे रहते हैं।


विवेकानन्द

किशोरावस्था में ही विवेकानन्द एक ऐसे गुरु की खोज में थे जिसने स्वयं ईश्वर को देखा हो और उन्हें भी दिखा सके। वह जिस साधु सन्त को देखते उसी से प्रश्न करते-क्या आपने भगवान को देखा है?

एक बार उन्हें राम कृष्ण परमहंस के दर्शन हुए। उनके व्यक्तित्व और प्रवचनों से विवेकानन्द जी बहुत प्रभावित हुये। स्वामी रामकृष्ण परमहंस ने दक्षिणेश्वर के काली मन्दिर में उन्हें मिलने के लिये बुलाया।

विवेकानन्द उनसे मिलने गये तो देखा कि एक से एक बड़े आदमी उनकी सेवा में तत्पर हैं और वे उन्हें ईश्वर संबंधी उपदेश कर रहे हैं। बालक विवेकानन्द उस प्रभावपूर्ण वातावरण में जरा भी नहीं झिझकें और श्री रामकृष्ण परमहंस से प्रश्न कर दिया—”क्या आपने भगवान को देखा है?”

बालक का यह दुःसाहस देखकर श्री रामकृष्ण के भक्तों ने बुरा माना और कहा—बालक! तुम्हें भगवान से ऐसा प्रश्न नहीं करना चाहिये, स्वामी जी तो स्वयं भगवान स्वरूप हैं।

बालक विवेकानन्द ने दृढ़तापूर्वक उत्तर दिया—’मैं बिना ठीक से समझे किसी बात पर अन्धविश्वास नहीं करता।’ श्री रामकृष्ण उनकी इस स्पष्टवादिता से बहुत प्रसन्न हुये!


ममता और करुणा की मूर्ति-कुमारी डायना बालेमी?

यश और अपयश विचार एवं भावनाओं को किसी वाहन की आवश्यकता नहीं पड़ती। इनके अपने स्वयं के पंख होते हैं जिनके सहारे ये वायु में तैरते हुये वन, पर्वत, समुद्र एवं मरुस्थलों को पार करते हुये देश देशान्तर में भ्रमण किया करते हैं और अपने अनुरूप हृदयों में उतरकर अपना नीड़ बना लेते हैं।

किसी एक देश के निवासी किसी दूसरे देश की दशा एवं परिस्थिति का समाचार पाकर अपनी वृत्तियों के अनुरूप अर्थपूर्ण योजनायें बनाते और कल्पना किया करते हैं। आसुरी प्रवृत्ति के प्राणी किसी दूसरे विपन्न अथवा सम्पन्न मानवों से अपना स्वार्थ सिद्ध करने के विविध ढंग निकाल लेते हैं। विपन्नों से विषय में वे समझते हैं कि गरीब तथा परेशान व्यक्ति का मानसिक सन्तुलन ठीक नहीं होता, उनकी बुद्धि भ्रमित एवं आत्मा कमजोर होती है। उनको हर प्रकार से डराकर, धमका कर अथवा धोखा देकर अपना स्वार्थ सिद्ध किया जा सकता है, उनका शोषण किया जा सकता है। और इस प्रकार विपन्नता के अभिशाप से अकुशल एवं अचतुर प्राणियों को आसुरी प्रवृत्ति के भोगवादी व्यक्ति ठग-ठग कर अपना स्वार्थ सिद्ध किया करते हैं, उनकी मनबूरी का बेजा फायदा उठाते हैं।

दैवी प्रवृत्तियों से अलंकृत प्राणियों के सोचने का ढंग दूसरा ही होता है। उनकी कल्पना का देवरथ करुणा, ममता, सहानुभूति, सेवा और सौहार्द की सम्पत्ति लिये हुये उधर ही जाता है जहाँ से विपन्न मानवता के कराहने की आवाज आती होती है। दैवी सम्पदा के सरदारों के हाथ में मक्कारी, ठगी, वंचकता अथवा अत्याचारिता के शस्त्र नहीं होते। वे तो मनुष्यता के स्वरों में आलाप भरते हुये प्रेम की बाँसुरी लिये हुये ही तन, मन, धन से पीड़ित मनुष्यों की सेवा का अवसर खोजा करते हैं। शोषण की घात नहीं लगाते।

इस लम्बे चौड़े संसार के एक कोने से दूसरे कोने तक आसुरी तथा दैवी प्रवृत्तियों का प्रसार फैला हुआ है। क्या देश,क्या विदेश और क्या उपनिवेश कोई भी इन प्रतिद्वन्द्वी प्रवृत्तियों का ठेकेदार नहीं है। सबमें समान रूप से उभय वृत्तियाँ काम कर रही हैं। अपनी रचना इस सृष्टि में विधाता ने गुण, कर्म और स्वभाव के अनुसार किसी विभाग जन प्राचीर का निर्माण नहीं किया है। सभी देशों में आसुरी और सभी देशों में दैवी प्रवृत्ति के प्राणी जन्म लेते और अपने कर्मों द्वारा अपना स्वरूप प्रकट करते हुये सुख दुःख भोगा करते हैं। महानता एवं मानवता का गुण न तो किसी के लिये सुरक्षित है न किसी के लिये प्रतिबन्धित है। जो चाहे अपने शुभेच्छाओं से उन्हें प्राप्त कर सकता है।

हजारों योजनों दूर समुद्रों के पार कहाँ न्यूजीलैण्ड और कहाँ भारत। किन्तु यहाँ के विपन्नता पूर्ण समाचारों ने हजारों काफी हादसों में से कसी एक में बैठी हुई कुमारी डायना बालेमी को प्रभावित कर दिया। विदेशों में लाखों करोड़ों लोग नित्य ही समाचार पढ़ते रहते हैं किन्तु सभी तटस्थ तथा उदासीन ही रहते हैं। न कोई प्रभावित होता है और न ध्यान देता है। किसी को किसी की दीनता, दरिद्रता अथवा दयनीयता से क्या मतलब? मानवता के इन त्रासों से सम्बन्ध होता है उन मानवीय देवताओं को जिनकी मनोभूमि दया दाक्षिण्य के सुमनों से सुशोभित एवं सुगन्धित रहती है।

दैवी वृत्तियों के व्यक्ति के कान में संसार के किसी कोने की भी पुकार गूँजते ही उनका हृदय द्रवित हो उठता है और वे देश-विदेश की विभाजन रेखा को पार करके किसी दैवी प्रेरणा से परिचालित, उसी ओर सेवा एवं सौहार्द का सम्बल लेकर चल पड़ते हैं। उन्हें न उनका देश रोक पाता है और न स्वार्थ। देव एवं असुर मानवों की केवल यही एक पहचान है कि मानवता की चीत्कार सुनकर कौन बैठा रहता है और कौन उठ खड़ा होता है।

देवी डायना बालेमी अपने अवकाश के दिनों में यूरोप भ्रमण पर जाया करती थीं। उन्हें सैर-सपाटे में बड़ी रुचि थी। अपने धन का बहुत बड़ा भाग वे इसी पर्यटन मनोरंजन पर खर्च किया करती थीं। एक बार इसी तारतम्य में उन्हें भारत में फैली हुई घोर दरिद्रता की गाथा समाचार-पत्रों में पढ़ने के लिये मिली। भारत की विपन्नता का चित्र उनके हृदय में उतर गया। उस भारत का चित्र जो संसार की मानवीय सभ्यता संस्कृति का आदि स्रोत रहा है, इसके ऋषियों,मुनियों और महा-मनीषियों ने जीवन की स्वाभाविक सुख-सुविधाओं को मानवता के कल्याण के लिये तिलाँजलि देकर अरण्यालय में रहकर घोर तपश्चर्या की और ‘सर्वे भवन्तु सुखिना’ ‘सर्वे सन्तु निरामयः’ के आशीर्वादों के साथ ‘वसुधैव कुटुम्बकम्” का सन्देश संसार को दिया। उस भारत का चित्र जिसमें कभी दूध, दही और मक्खन के सरोवर रहते थे। जिसके खेतों में अन्न ऐसे उपजता था जैसे ऊपर से बरसा हो। उस भारत का चित्र जिसमें द्वार पर आये अतिथि देवता के चरण रजत-झारी से धुलाये जाते थे और जिसको स्वर्ण-पात्रों में पय-पूर्ण भोजन कराया जाता था। क्रूर काल के इसी पट-परिवर्तन को देखने और संसार के प्रति भारत की भव्य भावनाओं से साभार कुमारी डायना ने भारत आकर उसकी सेवा का विचार बनाया।

सेवा की भावना आते ही उनके हृदय में विशालता का समावेश हो गया जिससे उन्हें पर्यटन का अपना मनोरंजन बड़ा ही तुच्छ दीखने लगा। उन्होंने स्वयं ही कहा है कि भारत की गरीबी की गाथा पढ़कर उनका मन सैर-सपाटे से स्वयं हट गया और उन्हें ऐसा लगा मानो जिस डायना की सेवाओं एवं धन की आवश्यकता दुःखी मानवता को थी उसने परिभ्रमण में उसे व्यय करके भारी भूल की है।

निदान वे न्यूजीलैण्ड से चलकर बम्बई पहुंची और वहाँ की चकाचौंध के बीच भी उन्होंने दुःख दारिद्रय एवं दयनीयता से बिलखती हुई मनुष्यता को पहचान लिया। यद्यपि बम्बई में कम आकर्षण न था और वह अपने परिसीमित विभव विभ्रम में दरिद्रता के वास्तविक रूप को छिपाने का प्रयत्न कर रही थी तथापि कुमारी डायना ने सहानुभूति तथा सम्वेदना से प्राप्त दिव्य दृष्टि से उन स्थलों को देख ही लिया जहाँ उनकी सेवाओं की आवश्यकता तथा सार्थकता थी। विराट् भारत की उस वर्तमान दुरावस्था को देखकर उनके हृदय पर एक गहरा आघात लगा।

कुमारी डायना बम्बई में ही रुक गई और वहीं एक विज्ञापन एजेन्सी की प्रतिनिधि बन गई। वे अपने अतिरिक्त एवं अवकाश के समय में अनाथालयों में जातीं और तन, मन, धन से अनाथ बच्चों की सेवा करतीं। सेवा भावना की अतिरेकता से उनके कुमार हृदय में मातृ-ममता का ऐसा स्रोत फूटा कि उन्होंने एक-एक करके ग्यारह बच्चों को गोद ले लिया। अब वे ग्यारह बच्चों की मानस माता थीं। अपनी इन अंगीकृत सन्तानों के पालन-पोषण के लिये उन्हें पर्याप्त समय एवं स्थान की आवश्यकता थी। निदान उन्होंने नौकरी छोड़ दी और अनाथालय के नाम से एक घर बसाने का विचार बनाया।

बम्बई जैसे विशाल एवं संकुलित नगर में मकान कहाँ? किन्तु देवी डायना की प्रबल इच्छाशक्ति सद्भावना एवं सदाशयता ने सहायता की और उन्हें पाँच कमरों का एक सुन्दर-सा मकान मिल गया। शीघ्र ही कु. डायना की सुशीलता की सुगन्ध चारों ओर फैलने लगी जिसके प्रभाव से परमार्थ प्रेमी भ्रमर प्रबुद्ध और मनुष्य के हृदयों में प्रसुप्त सद्-भावना के पक्षी जाग उठे। एक के हृदय से मनान्तरित हुये विचार अन्य मन के सजातीय विचारों को बुला-बुलाकर मूल केन्द्र बिन्दु के चारों ओर एकत्र कर देते हैं। कुमारी डायना को सहायता एवं सहयोग की कमी न रही।

कुमारी डायना के ग्यारह मनोनीत बच्चों के लिये विभिन्न संस्थाओं से, अन्न, धन, दूध, घृत तथा तेल आदि अनेक वस्तुएँ आने लगीं और अनेक डॉक्टरों द्वारा स्वास्थ्य सम्बन्धी परामर्श तथा निःशुल्क दवायें मिलने लगीं। इसके अतिरिक्त वे अपनी उस परिवार रूपी संस्था का बहुत -सा खर्च अपने काफी हाउस से पूरा करती थीं। उनका यथार्थ कार्य सुचारु रूप से चलने लगा। अपनी सफलता से प्रोत्साहित होकर कुमारी डायना ने इस सेवा कार्य को स्थायी एवं विकसित रूप देने के लिये “डोर आफ होप सोसाइटी” नामक एक ट्रस्ट की स्थापना की है, जिसका प्रबन्ध व्यवस्था छः भारतीयों एवं एक ओर पक्ष बन्धु के हाथ में है।

कुमारी डायना जैसी आध्यात्मिक आत्माओं का अपना कोई देश, धर्म व जाति वर्ण नहीं होता है। सारा संसार उनका घर, मानवता उनकी जाति और सेवा उनका धर्म होता है जिसके पुण्य प्रताप से एक साधारण व्यक्तित्व भी असाधारण बनकर विश्व की महान विभूतियों में अपना स्थान निर्धारित कर लेता है।

कुमारी डायना जैसी आध्यात्मिक आत्माओं का अपना कोई देश, धर्म व जाति वर्ण नहीं होता है। सारा संसार उनका घर, मानवता उनकी जाति और सेवा उनका धर्म होता है जिसके पुण्य प्रताप से एक साधारण व्यक्तित्व भी असाधारण बनकर विश्व की महान विभूतियों में अपना स्थान निर्धारित कर लेता है।


Quotation

येन द्यौरुग्रा पृथिवी च दृढा येन स्वः स्तभितं येननाकः। यो अन्तरिक्षे रजसो विमानः कस्मै देवाय हविषा विधेम॥ (ऋ ग. 10। 121। 5)

जिस दैवी शक्ति ने विशाल द्युलोक को, पृथिवी को, स्वर्लोक और नाक-लोक को अपने-अपने स्वरूप में स्थिर कर रखा है और जो अन्तरिक्ष-लोक भी व्याप्त हो रही है, उसको छोड़कर हम किस देव की स्तुति और उपासना कर सकते हैं? अर्थात् हमको उसी महाशक्ति-रुपणी देवता की पूजा करनी चाहिये।

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आकस्मिक लाभ का वरदान

धरती कुछ और कहती पर इसका अवसर दिये बिना ही लक्ष्मी जी ने अपना रथ बढ़ा दिया। वे जिधर से भी निकलीं उधर से ही वरदान बरसा देखते-देखते लोगों के घर सोने, चाँदी से भर गये। अपने सौभाग्य की सराहना करते हुए लोग उल्लास भरे उत्सव मनाने लगे। विपुल धन पाकर उन्होंने आमोद-प्रमोद के अनेक साधन जमा कर लिए। श्रम की ओर अब कौन ध्यान देता? वर्षा आई, कोई खेतों को जोतने न गया। आमोद-प्रमोद से फुरसत ही किसे थी। न बीज बोया गया और न उन्न उपजा। खेतों में खर-पतवार जम गये और घरों में भरे अन्न भंडार की इतिश्री हो गई। भूख से व्याकुल लोग सोना-चाँदी लिए इधर-उधर फिरने लगे। श्रम का अभ्यास छूट चुका था दुर्भिक्ष ने विकराल रूप धारण किया। छाती से सोने की इट बाँधे क्षुधार्त लोग जहाँ-तहाँ तड़प-तड़प कर प्राण त्यागने लगे।

धरती की आँखों में आँसू आ गये। उसने बचे-खुचे पुत्रों से कहा—आकस्मिक लाभ का वरदान वस्तुतः अभिशाप जैसा दुर्भाग्य जनक ही होता है।


बच्चों को भीरु नहीं वीर बनाइये

बच्चा जन्म से कायर नहीं होता। उसकी नैसर्गिक प्रकृति इतनी निर्भीक होती है कि वह साँप, चूहे, बिल्ली, बन्दर जो भी पास आये पकड़ने को दौड़ता है। उसे प्रत्येक वस्तु खेल की, विनोद की वस्तु लगती है और संभवतः वह इसीलिये बिना हिचक के, प्रत्येक वस्तु की ओर दौड़ पड़ता है। बच्चे के मस्तिष्क में पूर्वारम्भ में भय की भावना न जगायी जाय तो हमारा विश्वास है कि वह कभी कायर नहीं हो सकता। घर का वातावरण और माता-पिता का त्रुटिपूर्ण संरक्षण ही उन्हें भीरु बनाता है। भारतवर्ष की अतीत कालीन परम्पराओं की दृष्टि से यह अभिशाप-सा लगता है कि हमारे बच्चे डरपोक बनें। वीर-प्रसविनी वसुन्धरा के लाड़लों को तो वीर और बाँकुरा ही होना चाहिए।

इस निर्माण में आप बहुत अधिक सहयोग दे सकते हैं। निर्भीक प्रकृति के बालकों में भय की भावना पैदा कर देने का बहुत कुछ उत्तरदायित्व अभिभावकों का है। व्यक्तिगत सावधानी और समीप वर्ती वातावरण को शुद्ध रखकर आप अपने बच्चों को निर्भय प्रकृति का बना सकते हैं।

माता-पिता की अविश्वासी प्रकृति हमारी दृष्टि में मुख्य विकार है। उन्हें अपने बालकों पर विश्वास नहीं होता और वे छोटी-छोटी आशंकाओं को लेकर बालकों की क्रीड़ाओं में हस्तक्षेप करते रहते हैं। इसमें केवल परावलम्बी हो जाने का ही दोष नहीं है वरन् बच्चों में भी अपनी शक्तियों के प्रति विश्वास उठने लगता है। वह अपने को दीन-दयनीय स्थिति वाला समझने लगता है। कायरता की मुख्य जड़ यही है। बच्चे की कुशलता की देख-रेख तो रखिये पर इतना नहीं कि उसकी अपनी क्रिया-शक्ति परावलम्बी हो जाय। इसमें इतना ही संभव है कि बच्चा कहीं फिसल कर गिर पड़े और मामूली चोट आ जाय या उँगली में थोड़ा जल जाय। घर में और किसी बड़े खतरे की आशंका नहीं होती, यदि हो भी तो कारण को दूर कर देना चाहिये पर बच्चे के कार्यों में जितना कम सम्भव हो, हस्तक्षेप करना चाहिए। स्वानुभूतियाँ बालक का नैसर्गिक विकास करती हैं, प्रबुद्ध और निर्भय बनाती हैं।

अज्ञान और असत्य मूलक विश्वास से बच्चों को परिचित करा देना बहुत बड़ी भूल है। मनुष्य का जैसा विश्वास होता है वैसा ही उसके कार्यों का फल भी उसे मिलता है। यदि विश्वास सत्य, ज्ञान और प्रेम मूलक होगा तो उससे विकास होगा, इसके विपरीत यदि विश्वास असत्य और अज्ञान परक हुआ तो वह घृणा और पतन की ओर ले जायगा। बहुधा माताएं बच्चों को चुप करने के लिए या सुलाने के लिए बाबाजी, सिपाही, हौवा, भूत, बुढ़िया डायन, जूजू आदि का भय दिखाती हैं। बेचारा बच्चा डरकर दुबक जाता है। माताएँ अपनी इस सफलता पर बहुत प्रसन्न होती हैं पर उसका बुरा असर बच्चों के जीवन पर पड़ता है। वह सदा के लिए भीरु बन जाता है। उसमें अन्धविश्वास की प्रवृत्ति जोर पकड़ने लगती है। बालकों को कमजोर बनाने में इसका मुख्य हाथ है।

बच्चों के आगे डरावने दृश्यों का वर्णन या भयोत्पादक कहानियाँ नहीं सुनाना चाहिये। भूत-मसानी के किस्से और रोमाँचकारी घटनाओं के चित्रण करना बड़ी भूल होगी। इस प्रकार की बातों से उसके प्रसुप्त मन में भयोत्पादक ग्रन्थियाँ जम जाती हैं जो बाद में स्वयं अपना कार्य प्रारम्भ कर बच्चे को डरपोक बना देती हैं।

कहीं से आपके बच्चे के मस्तिष्क में इस प्रकार का भय छा गया हो तो उसका हर सम्भव तरीके से निवारण करना चाहिए। इस प्रकार भ्रान्त-धारणा को पूर्व में ही निर्मूल कर दिया जाय तो बच्चे का न केवल भय ही दूर हो जाता है वरन् भय की निरर्थकता भी मालूम पड़ जाती है।

स्वामी विवेकानन्द जी जब बालक थे तो एक बार उनकी बहनों ने उन्हें पास के पेड़ में भूत होने की बात सुनाकर डरा दिया। एक रोज बालक विवेकानन्द उसी पेड़ पर जा बैठे और बड़ी देर तक भूत के आने की प्रतीक्षा करते रहे। काफी देर हो जाने पर घर में तलाश हुई। उनकी माता जी उसी पेड़ की ओर गई तो वे पेड़ पर बैठे मिले। माँ ने वहाँ बैठने का कारण पूछा तो बालक ने बताया कि वह भूत देखने आये थे। माँ ने समझाया बेटा भूत कुछ नहीं होता, न माने तो और परीक्षा कर ले। बालक के मन से भूत की कल्पना दूर हो गई और उसका भय मिट गया।

प्रत्येक माता-पिता का यह कर्त्तव्य है कि यदि उन्हें ऐसा मालूम पड़े कि किसी बात को लेकर बच्चे के मस्तिष्क में भय पैदा हो रहा है तो उसे तुरन्त दूर कर दिया जाय ताकि वैसी भावना मस्तिष्क में जड़ न जमा ले।

भय केवल डराने, मनगढ़न्त भयोत्पादक कहानियाँ सुनाने से ही नहीं पैदा होता। कई बार लड़ाई-झगड़ों के कारण वातावरण में एक प्रकार का भयोत्पादक कम्पन छा जाता है इससे बच्चों के कोमल मस्तिष्क में आघात होता है और वे बहुत जल्दी डर जाते हैं। जोर-जोर से चिल्ला कर लड़ने, गालियाँ बकने, चीखने मारपीट करने से जो डरावना वातावरण बनता है उससे बच्चों को सदैव दूर रखना चाहिए।

यह सब इसलिए आवश्यक है कि बच्चे के मन में भय न पैदा हो और वह कायर एवं कमजोर न बने। इनसे अधिक बच्चे के रचनात्मक विकास में सहयोग देने का महत्व है। बच्चों को प्रारम्भिक अवस्था से ही वीर-बाँकुरा बनाना चाहिए।

शकुन्तला का भरत सिंहों के बच्चों के साथ खेला करता था। अब वैसा संकल्प और आत्म-बल न हो तो भी साहसपूर्ण कहानियाँ, बाल-निर्माण के रोचक संस्मरण तो उन्हें सुनाये ही जा सकते हैं। छोटे-छोटे बच्चों के वीरतापूर्ण कार्यों की चर्चा करनी चाहिए। ऐसी कहानियाँ काल्पनिक भी हो सकती हैं, ऐतिहासिक भी। जिनसे बच्चे पर अनुकूल प्रभाव पड़े ऐसी कथायें रात को लेटते समय या दिन के किसी भी अवकाश के समय बच्चों को सुनाना चाहिए।

कहानियों की तरह ही काव्य भी बच्चों को प्रिय होता है। उन्हें गाना सुनने, सुनाने का शौक होता है पर लोगों की भूल यह होती है कि वे दोषपूर्ण गीतों के द्वारा बच्चों के मस्तिष्क में विकार उत्पन्न कर देते हैं। यों नहीं, बच्चों को ऐसी रचनायें सुनानी और याद करानी चाहिए जिनसे उनकी भावनाओं में दृढ़ता, वीरता और आदर जागृत होता हो। बुद्धिमान स्त्रियाँ बच्चों को लोरियाँ गाकर सुलाती हैं। उन लोरियों में भय नहीं, प्रेम, श्रद्धा और वीरता की बातें होती हैं। भूत आदि की अन्धविश्वास की बातों से बालक का मन कमजोर नहीं करतीं। इसलिए ऐसे लोग वीर होते हैं। बालक के मन को भय और विकार जन्य संस्कारों से बचाना नितान्त आवश्यक है।

बच्चों को स्वस्थ रखने की सामान्य जानकारी प्रत्येक अभिभावक को होनी चाहिये। आहार-विहार, खेलकूद नियमोपनियम तथा सुव्यवस्था की जानकारी खुद न हो तो अपने मित्रों और पड़ोसियों से सीख लेनी चाहिये।

यदि किसी बच्चे का वजन प्रतिमास बढ़ता रहता है श्वास-प्रश्वास नियमपूर्वक चलते हैं, सोते समय उसे किसी प्रकार का कष्ट नहीं होता और खूब गहरी नींद आती है। दिन में उसे टट्टी एक या दो बार साफ आती है, तो समझना चाहिये बच्चा स्वस्थ है। और उसे कोई शारीरिक बीमारी नहीं है। अस्वस्थ होने पर बच्चे मुरझाये रहते हैं खेलते नहीं और उनका वजन भी नहीं बढ़ता। ऐसा कोई कारण जान पड़े तो उसका तुरन्त उपचार करना चाहिए।

घर की बैठक के कमरे में शिवाजी, राणाप्रताप, गुरुगोविन्दसिंह, रणजीतसिंह, सुभाषचन्द्र बोस आदि वीर पुरुषों के चित्र रहने चाहिये। अवकाश होने पर बच्चों को उनसे संबंधित ऐतिहासिक वर्णन भी सुनाते रहना चाहिए।

माताएं और कुछ न करें तो भी केवल अपने संकल्प से बच्चों में वीरतापूर्ण, शौर्य और साहसपूर्ण भावनाओं का जागरण कर सकती हैं। बच्चे को दूध पिलाते समय ऐसी भावना की जाती रहे कि मेरे स्तनों से यह जो मधुर दुग्ध बच्चे के शरीर में पहुँच रहा है उससे उसका शरीर, और आत्मा सभी बलिष्ठ हो रहे हैं, मेरा बच्चा कर्ण, अर्जुन, अभिमन्यु, राम, भरत, गोरा, बादल, फतेहसिंह, जोराबर सिंह, आदि की तरह ही वीर-बाँकुरा और बलशाली बनेगा वह धर्मनिष्ठ होगा पर दुष्टता एवं अनैतिक जूझने में भी पीठ न दिखायेगा। हमारे बच्चे वीर बाँकुरे बनें यह हमारे उत्तरदायित्व है।


विवाह संस्कार को कौतुक न बनाया जाय।

आज के हिन्दू समाज को जो कुप्रथाएं सबसे अधिक त्रस्त किये हुये हैं वह विवाह के नाम पर होने वाले आडम्बर हैं। इस एक स्वाभाविक एवं सामान्य सामाजिक कृत्य को इतनी अधिक अर्थहीन रीति-रिवाजों से भरकर इतना जटिल बना दिया गया है कि यह सामान्य-सा सामाजिक कृत्य एक मुसीबत बन गया है।

जिस दिन से विवाह संबंध पक्का होता है तब से लेकर उसके अन्तिम दिन तक इतने अधिक रीति-रिवाजों का निर्वाह किया जाता है कि वर-वधू के साथ उन दोनों के अभिभावकों को कई-कई दिन तक भूखा, प्यासा रह कर रात्रि जागरण करना पड़ता है।

विवाह की दो तीन दिन की अनावश्यक व्यस्तता और निरर्थक कार्य भार से इतना दबाव पड़ जाता है कि संबंधित व्यक्तियों का स्वास्थ्य तक खराब हो जाता है। विवाह के दौरान चार पाँच दिन इतना हाहाकार रहता है मानो वह कोई सामान्य विवाह संस्कार के दिन न होकर किसी आपत्ति के दिन हों, जिसे सँभालने और जिसका सामना करने में वर-वधू के अभिभावक आधे पागल हो जाते हैं।

इसके साथ यदि रीति-रिवाजों की बहुतायत के कारण यदि कोई अलन-चलन किया जाने से रह जाता है तो वर-वधू के प्रति एक भयानक अनिष्ट की आशंका सताने लगती है। इस निरर्थक आशंका से त्रस्त अभिभावकों को मानसिक हानि के रूप में तो कष्ट उठाना ही पड़ता है साथ ही अशुभ शंका की भावना का परोक्ष प्रभाव वर-वधू पर भी पड़ता है। और कहीं यदि कोई अप्रियता हो जाय, जैसा कि उस भीड़-भाड़ और अस्त-व्यस्त वातावरण में सदा सामान्य है, तब अशुभ आशंका एक स्थायी विश्वास बन जाता है, जो वर-वधू के सम्बन्ध में अभिभावकों का पीछा आजीवन नहीं छोड़ता।

इन रीति-रिवाजों और अनावश्यक व्यवहारों के अंतर्गत वर-वधू को न जाने कितने देवी-देवताओं और अन्य व्यक्तियों के पैरों डाला जाता है। न जाने कितने वृक्षों, थानों और दुराहों, तिराहों और चौराहों की पूजा कराई जाती है। और यदि कोई समझदार वर-वधू यह सब करने में ऐतराज करते हैं तो उन्हें केवल कोप भाजन ही बनना पड़ता है।

इन बहुत से अनावश्यक रीति-रिवाजों तथा प्रथा परम्पराओं के कारण रुढ़िज्ञों की खूब चढ़ बनती है। वे अशुभ आशंका के भय पर वर-वधू के अभिभावकों को अपनी कठपुतली बना लेते हैं। डट-डट कर अपना आदेश चलाते और निर्देश पूरे कराते हैं। विवाह की भूमिका से लेकर उपसंहार तक वर-वधू तथा उनके अभिभावकों पर जी भर नेतृत्व झाड़ते हैं और अर्थ का शोषण करते हैं।

कभी-कभी इन रीति-रिवाजों अलन-चलन अथवा नेगा-जोगा के प्रकारों, पूरा करने की विधियों के समय अथवा क्रमिकता के विषय में दो मूढ़ रुढ़िज्ञों में विवाद हो जाता है। तब घंटों का समय उसका निर्णय करने में खराब चला जाता है और बेचारे वर-वधू अथवा उनके अभिभावक उसके जाने की प्रतीक्षा में हाथ बाँधे, बंधे अथवा झोली फैलाये बैठे, या खड़े रहते हैं। कभी-कभी रूढ़िवादियों का यह विवाद प्रतिष्ठा का प्रश्न बनकर हठ का रूप ले लेता है तब तो यह गाली-गलौज के स्तर तक पहुँच जाता है, जिससे विवाह जैसे शुभ कृत्य का वातावरण निहायत अशुभ तथा अवाँछनीय हो आता है। अब चूँकि इन रीति-रिवाजों एवं अलन-चलन का कोई निश्चित विधान तो होता नहीं कि जिसके आधार पर सर्वमान्य निर्णय कर लिया जाये। निदान वर-वधू अथवा उनके अभिभावकों को किसी एक पक्ष की बात मान कर रिवाज पूरा करना पड़ता है और तब ऐसी दशा में उनको उपेक्षित पक्ष के क्रोध, मनमुटाव और यहाँ तक कि अशुभ शब्दों का भाजन बनना पड़ता है। और यदि दोनों पक्षों का मान रखने के लिये एक रस्म को दो तरह से पूरा किया जाता है तो बेकायदगी के कारण किसी को भी उसकी शुभता में विश्वास नहीं रहता। ऐसी अवाँछनीय स्थिति में कितने समय, पैसे तथा भावनात्मक संपत्ति की कितनी हानि होती है जिसका अन्दाजा लगा सकना रूढ़ि-रोगियों की ताकत के बाहर होता है।

साथ ही यह निरर्थक कृत्य एक सिलसिले में इतनी देर तक चलते हैं कि बेचारे अभिभावक अथवा वर-वधू के प्राणों पर पड़ जाती है। उस लम्बे समय में यदि उन्हें प्यास लग जाये अथवा लघु शंका की हाजत होने लगे तब तो उनकी पीड़ा का अन्दाजा ही नहीं लगाया जा सकता।

इस प्रकार के निरर्थक, आशय हीन और हानिकारक न जाने कितने रीति-रिवाज, चलन, त्यौहार और पूजापाठ के मूर्खतापूर्ण कृत्य ब्याह की भूमिका से लेकर उपसंहार तक दिन और रात होते रहते हैं। यदि इन सब का अर्थ उन करने और कराने वालों से पूछा जाये तो वे—”ऐसा होता है अथवा ऐसा होता चला आया है”—इसके सिवाय कोई भी बुद्धिसंगत उत्तर न दे सकेंगे। इसी प्रकार के चले आ रहे बुद्धिहीन रीति-रिवाजों को ही रूढ़ियां कहते हैं, हिन्दू समाज में जिनकी संख्या अपरिमित हो गई है।

हिन्दू-समाज में विवाह शादियों के अवसर पर होने वाले रीति-रिवाज न केवल संख्या में ही बढ़ गये हैं। बल्कि मूढ़ता की शक्ति पाकर इतने प्रबल हो गये हैं कि अपने सामने शास्त्रीय विधि-विधान को भी नहीं ठहरने देते। हर ब्याह शादी में देखा जा सकता है कि वास्तविक वैदिक कृत्य किये जाने से पूर्व बुढ़िया-विधान को मान्यता दी जाती है। इसीलिये हर समझदार पंडित अथवा पुरोहित अपना शास्त्रीय कृत्य प्रारम्भ करने से पूर्व स्वयं कह देता है पहले सब लोग अपनी-अपनी रस्म पूरी कर लो तब मैं अपना काम शुरू करूं। क्योंकि वह जानता है कि यदि इन रूढ़ि-रोगियों को उनकी इच्छानुसार अवसर न दिया गया तो यह मंत्रोच्चारण को भी बीच में रोक कर अपनी-अपनी कहने और करने लगेंगे। इस प्रकार यदि गम्भीरतापूर्वक देखा जाये तो स्पष्ट पता चलेगा कि हिन्दुओं की वर्तमान विवाह पद्धति पर शुरू से लेकर आखिर तक और ऊपर से लेकर नीचे तक केवल रूढ़ियों तथा मूढ़ता पूर्ण प्रथाओं का ही प्रभाव है। शास्त्रीय विधि-विधान का कोई महत्व नहीं है।

कहना न होगा कि हिन्दुओं के विवाह संस्कार को शुरू से आखिर तक कोई अनाभ्यस्त व्यक्ति देखे तो वह इसी निष्कर्ष पर पहुँचेगा कि हिन्दू-समाज वास्तव में अविवेकी, असंस्कृत और अज्ञानी है। उसका विवाह जैसा संस्कार एक शुद्ध सामाजिक संस्कार न होकर किसी पागल की उठवा धरी जैसा एक उपहासास्पद कौतुक ही है।

अस्तु, आज के सभ्य युग में विवाह जैसे महत्वपूर्ण एवं सामान्य सामाजिक कृत्य को बच्चों के खेल अथवा पागलों की अनबूझ क्रियाओं जैसा न बनाकर सभ्य एवं समझदार व्यक्तियों के काम जैसा बनाया जाये। जिससे वर-वधू उसका आशय समझ सकें, दूसरे लोग शिक्षा ले सकें, अनजान लोग प्रभावित हो सकें साथ ही होने वाली आर्थिक, मानसिक, शारीरिक, सामाजिक तथा धार्मिक हानि बच सके।

राजा के यहाँ एक साधु अतिथि होकर आया। राजा उसकी योग्यता और व्यवहार से प्रसन्न होकर उसे अपना भण्डार दिखाने ले गये। वहाँ साधु ने एक जगह बहुत से हीरे, मोती, नीलम आदि रत्न रखे देखे। साधु ने पूछा—”महाराज! इन पत्थरों से आपको कितनी आय हो जाती है?” राजा ने कहा—”महात्मा जी, इनसे तो कुछ आय नहीं होती, उल्टा इनकी रक्षा के लिये बहुत-सा धन खर्च करना पड़ता है।” साधु ने कहा तब चलिये मैं आपको इन से बड़ा और बहुमूल्य पत्थर दिखलाऊं । वह राजा को एक गरीब बुढ़िया की झोंपड़ी में ले गया। वहाँ उसकी चक्की को दिखा कर उसने कहा—”महाराज, यह पत्थर आपके अनुपयोगी पत्थरों से अधिक बहुमूल्य है, क्योंकि इसके द्वारा यह निराश्रित विधवा जीवन निर्वाह कर लेती है। वस्तु का महत्व उसके रंग रूप से नहीं वरन् उसकी उपयोगिता से समझना चाहिये।”

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गन्दगी एक सामाजिक अपराध

मनुष्य की अनेक विशेषताओं में एक विशेषता यह भी कि उसे मलीनता से घृणा और स्वच्छता से प्रेम है। जहाँ साफ सुथरा दिखाई देता है, साफ-स्वच्छ वस्तुयें दिखाई देती हैं वहाँ स्वभावतः सभी आकर्षित होते हैं, पर यदि आँखों के आगे कोई गन्दी वस्तु आ जाय तो तुरन्त उस तरफ से मुँह फेर लेते हैं। कोई दुर्गन्ध आये तो तुरन्त वहाँ से हट कर दूर भाग जाने का प्रयत्न करते हैं। शरीर की हो या कपड़ों की, घर की हो या मुहल्ले की, गन्दगी किसी को भी पसन्द नहीं, सब उससे दूर भागने का ही प्रयत्न करते हैं।

इस बात से यह मालूम होता है कि स्वच्छता और सौंदर्य आत्मा का गुण है। इससे उसे विशेष आत्म-सन्तोष मिलता है। आत्म-विकास के लिये जिन सद्गुणों की आवश्यकता बताई जाती है स्वच्छता उन सब का मूल-मंत्र है। यही कारण है कि यहाँ प्रत्येक कार्य, प्रत्येक धर्मानुष्ठान में स्वच्छता को प्रमुख माना गया है, इसके बिना अपेक्षित पवित्रता का वातावरण बन नहीं पाता। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुये हमें इस ईश्वर-प्रदत्त गुण का अधिकाधिक विकास और सदुपयोग करना चाहिये।

स्वास्थ्य—आरोग्य को नष्ट करने वाले जितने भी कारण हैं गन्दगी उनमें सर्वप्रमुख है। शरीर की सफाई का समुचित ध्यान नहीं दिया जाता और इन्द्रिय छिद्रों की पूरी तरह सफाई नहीं की जाती तो शरीर में दाद, खाज, फोड़े, फुँसी, बिवाई आदि बीमारियाँ बनी रहती हैं। वस्त्र साफ नहीं होते और उनमें मिट्टी, तेल, पसीने आदि की दुर्गन्ध उड़ती रहती है तो इस दोषयुक्त वायु से खून की सफाई भी ठीक तरह नहीं हो पाती और भीतरी स्वास्थ्य संस्थान में मल-विक्षेप जमा होने लगता है। इसी प्रकार जिन घरों के आस-पास गन्दी नालियाँ, पेशाब दान, नाव दान, कूड़ा कचरा तथा गन्दगी का ढेर सड़ता रहता है उनके निवासी भी प्रायः किसी न किसी बीमारी में ग्रस्त ही बने रहते हैं।

गन्दगी चाहे शरीर की हो चाहे निवास स्थान की उसका स्वास्थ्य पर सदैव ही बुरा असर पड़ता है। इससे भी अधिक दुष्प्रभाव मनुष्य की मानसिक स्थिति पर भी पड़ता है। गन्दा व्यक्ति कभी बुद्धिमान नहीं हो सकता, उसके कार्य भी गन्दे और फूहड़पन से भरे हुये होंगे। गन्दे व्यक्तियों में ही अक्सर आलस्य का दुर्गुण पाया जाता है। ऐसे व्यक्तियों के प्रति स्वच्छ मस्तिष्क के व्यक्तियों में भी घृणा और अविश्वास की भावना पैदा होती है। किसी भी समाज के लिये यह बहुत अशोभनीय बात है कि वहाँ के नागरिक इस प्रकार गन्दगी के कारण स्वयं भी कष्ट पा रहे हों और दूसरों के लिये भी परेशानी का कारण बन रहे हों।

दुर्भाग्य से भारतीय समाज जितना अन्धविश्वासी, रूढ़िवादी तथा हानिकारक सामाजिक कुरीतियों से ग्रसित है वहाँ एक बात यह भी है कि उसका स्वच्छता और सफाई का स्तर भी बहुत गिरा हुआ है। कुछ दिन पूर्व यहाँ एक विदेशी पर्यटक आया था। स्वदेश लौटने से बाद भारतीय संस्कृति और सभ्यता पर उसने जो कुछ लिखा वह सन्तोषजनक था पर पर्यटक की कलम से निकले हुये कुछ शब्द ऐसे थे जिनसे भारतीय समाज का एक अत्यन्त भोंड़ा रूप प्रकट होता है। उसने लिखा है कि—”भारतवर्ष में रात में भी लोग भटक नहीं सकते। कदाचित किसी के सामने ऐसी स्थिति आ जाय कि उसे गाँव पहुँचने का रास्ता न मिल रहा हो और अन्धकार के कारण मार्ग भी साफ न सूझ रहा हो तो उसे किसी ऊँचे स्थान पर खड़े होकर चारों ओर की गन्ध लेनी चाहिये। जिस तरफ से उसे दुर्गन्ध आती जान पड़ रही हो उधर ही चल पड़े तो निश्चय है कि वह जल्दी ही किसी आबादी वाले गाँव में पहुँच जायगा।”

वस्तुतः भारतीय समाज की स्थिति ठीक ऐसी ही है। महात्मा गान्धी गन्दगी को “भारतीय समाज का क्षय रोग“ कहा करते थे और इसके उन्मूलन के लिये उन्होंने विधिवत् सफाई आन्दोलन चलाने का विचार किया था। बापू जी इस देश में भंगी-मुक्त समाज की रचना करना चाहते थे किन्तु यह दोष इतना बढ़ चुका है कि उन्हें सार्वजनिक स्थानों की सफाई की व्यवस्था से ही छुटकारा न मिला।

अभी कुछ दिन पूर्व ही सर्वोदयी कार्यकर्त्ता बाबू जयप्रकाश नारायण ने कहा था—”दुनिया के सभी देशों में हिन्दुस्तान ही सबसे अधिक गंदा देश है।” इस बात को अस्वीकार करने के कारण भी नहीं हैं। घने बसे, सीलन और सड़न भरे, धुआँ, शोर और तनाव से ग्रसित शहरों का तो कहना ही क्या है—गाँवों में जहाँ लोग अधिक चौड़े में रहते हैं—मल, मूत्र, घूरे, घर आदि सफाई रहित और गंदगी से ग्रसित रहते हैं। इसका कुप्रभाव भी उनके जीवन में देखने को मिल जाता है। आर्थिक साधनों की पर्याप्त व्यवस्था होते हुये भी उनका जीवन स्तर बहुत गिरा हुआ होता है और इसका कारण अधिकाँश यही है कि वे गन्दे रहते हैं और इसके कारण आये दिन बीमारियों से पीड़ित बने रहते हैं। स्वास्थ्य की खराबी के कारण एक ओर आर्थिक अपव्यय होता है, तो दूसरी और उनकी कार्य क्षमता भी घटती है फलस्वरूप जीवन स्तर में सुधार की कोई समस्या हल नहीं होती।

शहरों में, जहाँ कि अधिकाँश जनता शिक्षित होती है वहाँ भी गन्दगी का बोलबाला कम नहीं है। टट्टी और पाखानों की व्यवस्था होते हुये भी लोग गली की नलियाँ के किनारे बच्चों को टट्टी और पखाने के लिये बैठा देते हैं। सार्वजनिक स्थानों की दुर्दशा का तो कहना ही क्या? लोग धुँधलके में टट्टियों की बदबू से बचने के लिये पार्कों के किनारे पाखाना फिर आते हैं और उन स्थानों को भी गन्दा कर देते हैं।

रास्ते चलते खाते जाना और मूँगफली, केले अथवा सिंगाड़ों के छिलके सड़क पर बिखेरते जाने में यहाँ के लोग कोई विशेष हानि अनुभव नहीं करते। किसी भी स्थान में थूक देने या नाक साफ कर देने के दुष्परिणामों पर लोगों ने विचार किया होता तो आज जो शहरों में स्थान-स्थान पर कूड़ा करकट बिखरा दिखाई देता है वह न रहा होता और उनकी सफाई के लिये जितनी व्यवस्था नगरपालिकाएं बनाती हैं उतने से ही काम चल गया होता। पर कठिनाई यह है कि लोग अपने सामाजिक उत्तरदायित्व के प्रति उदासीन बने रहते हैं फलस्वरूप गन्दगी को बढ़ते रहने का पूरा अवसर मिलता रहता है।

शरीर, वस्त्र, घर, सामान, सार्वजनिक स्थान इन सभी क्षेत्रों में जो मलीनता पाई जाती है उसका कारण कोई भौतिक कठिनाई नहीं है, मनुष्य का घटिया व्यक्तित्व ही एक मात्र कारण होता है। फुरसत न मिलना नौकर न होना, घर के अन्य लोगों का ध्यान न देना आदि बहाने हो सकते हैं पर वस्तुस्थिति ऐसी नहीं। अपने उन कार्यों को पूरा करने के बाद, जो अपनी आजीविका या व्यवसाय से सम्बन्धित होते हैं, लोगों को इतना समय मिल जाता है जितने से वे अपनी ऐसी आवश्यकता बड़े आराम से पूरा कर सकते हैं। स्नान के लिये सभी लोग कुछ न कुछ समय निकालते हैं, पर इसे जो लोग केवल दो लोटे पानी से शरीर को गीला कर लेना मानते हैं वह उनकी बड़ी भूल है थोड़ा-सा और ध्यान दे लें और शरीर को रगड़ कर साफ कर लें तो सामान्य समय की अपेक्षा अधिक से अधिक पाँच मिनट का ही समय और ज्यादा लगेगा। इतना समय न तो किसी के लिये आपत्तिजनक हो सकता है और न ही इसके लिये किसी प्रकार का बहाना किया जा सकता है।

आँख के आगे कूड़ा-करकट का ढेर लगा रहता है पर वह खटकता नहीं। सामने की नाली में मल और मूत्र सड़ता रहता है पर वह अखरता नहीं। कपड़े गन्दे हो जाते हैं पर उसमें कोई बुराई नहीं जान पड़ती। सामान अस्त-व्यस्त और बिखरा हुआ पड़ा रहता है पर उसे ठीक-ठीक तरह से सजाकर रखने की बात नहीं सूझ पड़ती लोगों का जैसा ढर्रा चलता रहता है उसमें किसी प्रकार का परिवर्तन करना उन्हें अच्छा नहीं लगता। इस प्रकार घटिया मानसिक स्तर ही गन्दगी का कारण है। यदि अपना उद्देश्य स्वच्छता और सफाई को विकसित करना हो तो यह कोई बड़ी कठिन बात नहीं कि वह पूरा न हो सके। सुरुचि जागृत हो जाय तो सब वस्तुयें स्वच्छ सुव्यवस्थित और साफ रखी जा सकती हैं और उससे मानसिक तथा शारीरिक स्वास्थ्य की रक्षा भी आसानी से की जा सकती है।


जीवन का काया-कल्प करने वाला एक वर्षीय प्रशिक्षण

इस शिक्षा को ग्रहण करने के लिए हर घर से एक शिक्षार्थी आए।

हमारा प्राचीन गौरवमय इतिहास नर-रत्नों की उज्ज्वल यश-गाथाओं से भरा पड़ा है। इसका मूल कारण उस समय की शिक्षा पद्धति थी। नई पीढ़ी का उत्पादन तो घर-गृहस्थी में होता था, पर उनका निर्माण तत्ववेत्ता ऋषि करते थे। छात्र उनके सान्निध्य में रहकर अक्षर ज्ञान एवं भौतिक जानकारी ही प्राप्त नहीं करते थे, वरन् सुसंस्कारों से सम्पन्न भी बनते थे। गुण, कर्म, स्वभाव का ढाँचा वहीं ढाला जाता था, हाड़-माँस के बने छात्रों में प्राण प्रतिष्ठा उस प्रशिक्षण के द्वारा ही की जाती थी। हमारे गौरवमय अतीत में जो नर-रत्नों और महापुरुषों का बाहुल्य दीखता है, उसका बहुत कुछ श्रेय उस समय की शिक्षा-पद्धति को ही है।

नव-निर्माण के महान कार्य को सम्पन्न करने के लिए देश में प्राचीन काल जैसी शिक्षा-व्यवस्था का भी प्रचलन करना होगा। छात्रों के लिए गणित, इतिहास, भूगोल, भाषा आदि का जानना ही पर्याप्त नहीं, वरन् उन्हें व्यक्ति एवं समाज का समग्र स्वरूप समझने और उनकी समस्याओं को सुलझाने की जानकारी भी होनी चाहिए। उनके व्यक्तित्व को सुसंस्कारित भी होना चाहिए। यह आवश्यकता जब तक पूरी नहीं की जायगी, सामूहिक और वैयक्तिक सुसम्पन्नता का उद्देश्य पूरा नहीं हो सकेगा।

इस प्रकार की शिक्षा व्यवस्था का प्रबन्ध करना आज की एक महत्वपूर्ण आवश्यकता है। कुछ दिन पूर्व हमने एक छोटा गुरुकुल तपोभूमि में चलाने की सूचना भी छापी थी। हम चाहते थे कि 14 से 18 वर्ष तक के अपने परिवार के बच्चों को हम अपने पास रखें, चार वर्ष तक उन्हें इस तरह पढ़ावें कि वे भौतिक जीवन के हर क्षेत्र में सफल हो सकें और अपने व्यक्तित्व को सुविकसित, सुसंस्कृत बनाते हुए अपने सम्बन्धित लोगों में, समीपवर्त्ती क्षेत्र में स्नेह, सौहार्द और सद्भाव की गंगा बहा सकें।

खेद है कि इस सूचना के प्रति परिजनों ने कोई उत्साह नहीं दिखाया। जिन अभिभावकों के पत्र आये, वे यही चाहते थे कि उनके बच्चों को सरकारी डिग्री भी मिले। आज नौकरी में सरकारी प्रमाण-पत्र ही काम आते हैं, उन्हें ही जैसे-तैसे प्राप्त करने के लिए पढ़ाया जाता है। वह न मिले तो फिर कोई अपने बच्चों को कहीं पढ़ने क्यों भेजे? हमारी कठिनाई यह है कि जो कुछ हम पढ़ाना चाहते हैं, वह इतना अधिक है कि छात्रों का पूरा समय उसी में लग जायगा। आजकल सरकारी परीक्षाओं की तैयारी में पूरा समय लगाने पर भी जब 60-70 प्रतिशत लड़के फेल होते हैं, तब दूनी पढ़ाई का भार लेकर चलने पर तो शत-प्रतिशत ही फेल होंगे। न सरकारी पढ़ाई हो सकेगी, न हमारी। इन परिस्थितियों में न तो यह बन पड़ा कि हम अभिभावकों की इच्छानुकूल अपनी और सरकारी पढ़ाई का समन्वय कर सकें और न यह सम्भव हुआ कि लोग जीवन-निर्माण की शिक्षा का महत्व समझ कर सनदों का मोह छोड़ें। अतएव वह पूर्व प्रकाशित सूचना फलवती न हो सकी। स्वप्न अभी भी हमारे मस्तिष्क में है, अवसर आया तो फिर कभी कार्यान्वित करेंगे।

इस समय हम एक विशिष्ट शिक्षा व्यवस्था का आयोजन कर रहे हैं। इसका शिक्षण-काल केवल एक वर्ष है, पर इसमें जन-साधारण की महत्वाकाँक्षाओं के समन्वय की पूरी-पूरी व्यवस्था है। लोग इसलिए पढ़ना चाहते हैं कि उनकी आर्थिक उन्नति हो उन्हें पद गौरव मिले और अपना व्यक्तित्व प्रखर हो। इस वर्ष शिक्षा व्यवस्था में लोगों की यह तीनों ही भौतिक आकाँक्षाएँ पूरी होंगी, साथ ही हमारा व्यक्ति निर्माण का उद्देश्य भी एक सीमा तक पूरा होगा।

हमारा विश्वास है कि इस प्रशिक्षण को प्राप्त करने वाले प्रत्येक शिक्षार्थी को भौतिक एवं आन्तरिक प्रगति की दिशा में तेजी से बढ़ चलने का एक नया मोड़, नया प्रकाश नया बल एवं नया स्फुरण मिलेगा।


एक वर्षीय प्रशिक्षण योजना

प्रस्तुत योजना में तीन प्रकार की शिक्षा व्यवस्था रहेगी। (1) संजीवनी विद्या, (2) लोक नेतृत्व, (3) आजीविका उपार्जन। तीनों शिक्षाएं प्रति दिन साथ-साथ तीन पाठ्य क्रमों की तरह चलेंगी।

संजीवनी विद्या- इस प्रशिक्षण में व्यक्ति और समाज की सभी समस्याओं का स्वरूप और समाधान बताया जायगा। हम बीमार क्यों पड़ते हैं और उससे छुटकारा कैसे पा सकते हैं? रोगियों को रोग मुक्त करने के लिए क्या किया जाना चाहिये? कमजोर शरीर बलवान कैसे बने? लम्बी उमर तक जी सकना सम्भव कैसे हो? दाम्पत्ति जीवन में प्रेम और सहयोग कैसे उत्पन्न किया जाय? बच्चे स्वस्थ, सुन्दर और सुसंस्कृत कैसे बनें? परिवार में शान्ति सहयोग और सद्भाव किस प्रकार बना रहें? माता-पिता आदि को सुखी संतुष्ट कैसे रखा जाय। अधिकाधिक ब्रह्मचर्य कैसे सुलभ बने? विद्याध्ययन की आजीवन क्रम व्यवस्था बनी रहनी कैसे सम्भव हो? दुर्व्यसनों से छुटकारा कैसे मिले? व्यापार, कृषि, उद्योग आदि से अधिक आमदनी कैसे बढ़े। नौकरी में जल्द तरक्की का अवसर कैसे मिले? प्रस्तुत आमदनी का किस प्रकार सदुपयोग किया जाय कि उतने से भी सारा परिवार सुखी, संतुष्ट और सुविकसित बन सके। समय और धन के खर्च करने की महत्वपूर्ण बुद्धिमत्ता कैसे विकसित हो? बीमारी में मधुरता उत्पन्न करने के रहस्य। मुख पर प्रसन्नता कैसे झलकती रहे? क्रोध, आवेश, और उत्तेजना, चिढ़-चिढ़ापन जैसी बुरी आदतें कैसे छूटे? निराशा, आलस्य, ईर्ष्या जैसी दुष्प्रवृत्तियों से छुटकारा कैसे मिले? सरलता, सादगी, स्वच्छता और सात्विकता का स्वभाव में समावेश कैसे हो? परिश्रम कैसे विकसित हो? शिष्टाचार एवं सज्जनता अपने स्वभाव का अंग कैसे बने?

शत्रुता घटाने एवं मित्रता बढ़ाने के लिये क्या उपाय करें। समाज में सम्मान कैसे मिले? विवाह शादियों के बारे में क्या दृष्टिकोण अपनायें? सामाजिक, कुरीतियों और रूढ़ियों से कैसे निपटे? समाज का ऋण चुकाने के लिए कुछ करना आवश्यक है? धर्म और सदाचार युक्त सुसंपन्नता जीवन की उपलब्धि। ईश्वर को अपना और अपने को ईश्वर का बनाने का सरल किन्तु सफल साधन दुष्टता और अनीति से कैसे जूझें? महापुरुष बनने का राज मार्ग। आपत्तियों और कठिनाइयों को कैसे परास्त करें? सम्बन्धित व्यक्तियों को अधिक सुखी एवं समृद्ध बनावें?

इस प्रकार मानव जीवन की अगणित समस्याओं का स्वरूप, विवेचन इतिहास कारण एवं निवारण समझाने के लिए प्रौढ़ विचार छात्रों को दिये जायेंगे। इन तथ्यों को व्यवहार में लाने के लिये नित्य अभ्यास कराये जायेंगे तब आशा की जायेगी कि एक वर्ष बाद छात्र जब अपने घर जायगा तब उसका मानसिक कायाकल्प ही हो चुका होगा शकल सूरत पहली ही रहने पर भी घर के लोग उसे बदला हुआ पावेंगे। यह परिवर्तन घर में हर सदस्य को आनन्ददायक, उल्लास वर्धक एवं सन्तोषजनक होगा।

जन नेतृत्व- संसार में जितने भी श्रेष्ठ पुण्य परमार्थ हैं उन सबका उत्कृष्ट किसी की जीवन दिशा को सन्मार्ग की ओर मोड़ देना ही हो सकता है। उच्च विचारों से बढ़कर इस विद्या में और कोई विभूति नहीं। सुविधा साधनों के आधार पर नहीं, उच्च विचारों के आधार पर मनुष्य लौकिक एवं पारलौकिक सुख-शान्ति प्राप्त कर सकता हैं। अतएव पुण्य परमार्थ के जितने भी प्रकार हैं, उन सब में ज्ञान-दान का महत्व सर्वोपरि माना गया है। ब्राह्मण की श्रेष्ठता इसीलिए मानी गई है कि उसका जीवन ‘ज्ञान यज्ञ’ रहता है। इससे बड़ी संसार की सेवा और कुछ हो भी नहीं सकती।

राजतंत्र बनाम धर्मतंत्र- आज संसार में जो अशान्ति फैली हुई है और विविध विधि विपत्तियाँ उत्पन्न हो रही हैं, उसका एक मात्र कारण मनुष्य का विचार क्षेत्र दुष्प्रवृत्तियों से भर जाना ही है। विश्व-शान्ति का लक्ष्य केवल एक ही प्रकार पूरा हो सकता है और वह है हर प्रकार से जन-साधारण में से दुर्बुद्धि का निष्कासन और उसके स्थान पर सद्बुद्धि का स्थापन। अखण्ड ज्योति परिवार के प्रत्येक सदस्य को युग की इस सर्वोपरि आवश्यकता को पूर्ण करने के लिए कटिबद्ध होना चाहिए।

इन दिनों राजतन्त्र की महत्ता और शक्ति सर्वोपरि बन गई है। राजनीति और शासन में सारी मानव प्रवृत्तियाँ केन्द्रित हो गई हैं। लोग राजनीति द्वारा मानव जाति की समस्याओं का हल करने की बात सोचते हैं। पर यह प्रयोग असफल हो रहे हैं। राजनीति की प्रमुखता ने विश्व को कलह और शोक-सन्ताप से भरापूरा नरक बना दिया है। घातक अस्त्र-शस्त्रों से, अणु बमों से मानव जाति एवं संस्कृति का अस्तित्व तक खतरे में पड़ गया है। यह स्थिति देर तक नहीं रहने दी जा सकती। अगले दिनों मानव जाति की आशा और अभिरुचि का विषय धर्मतन्त्र बनेगा। उसी से विश्वव्यापी सुख-शान्ति का सृजन होगा। जन नेतृत्व अगले दिनों धर्मतन्त्र के हाथ में होगा। इसके लिए धर्म के नाम पर प्रचलित विडम्बनाओं का परिशोधन और तर्क एवं विवेक के आधार पर धर्म की सत्ता, महत्ता एवं उपयोगिता के प्रति जनमानस में श्रद्धा का संस्थापन आवश्यक होगा। जो लोग यह कार्य कर सकेंगे, अगले दिनों में ही मानव जाति के भाग्य का निर्माण कर सकने का श्रेय एवं गौरव प्राप्त करेंगे।

नेतृत्व की योग्यता- आज एक ऐसा वर्ग तैयार करना है, जो राजनीति के हाथ से शक्ति छीन कर धर्म-नीति के हाथों में उसका परिवर्तन कर सके। अगले दिनों ऐसी ही एक अनुपम क्रान्ति अवतरित होने वाली है। उस गंगावतरण को सुव्यवस्थित बनाने वाले जटाधारी शंकर की एक मुहीम भी अभीष्ट है। युग-नेतृत्व कर सकने की क्षमता से परिपूर्ण लौह-पुरुषों का एक दल उत्पन्न करना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। इस आवश्यकता की पूर्ति अखण्ड-ज्योति परिवार की सुसंस्कृत आत्माएं यदि अपना स्वरूप समझें तो बड़ी आसानी से कर सकती हैं।

प्रस्तुत एक वर्षीय पाठ्यक्रम में एक तिहाई प्रशिक्षण जन-नेतृत्व कर सकने की क्षमता एवं योग्यता उत्पन्न करने का भी होगा।

1- अपने व्यक्तित्व में मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, शरीर, मान, इच्छा, अभिरुचि, आदर्श आदि का एक बहुत बड़ा शक्तिशाली परिवार है। यदि इसका नेतृत्व ठीक तरह किया जा सके तो अपना आप आज की दुर्दशाग्रस्त स्थिति में न पड़ा रहे, वरन् अगले ही दिनों उसका प्रखर-प्रबल एवं प्रचण्ड स्वरूप सामने आ जाय। नेतृत्व की दिशा में पहला प्रशिक्षण इसी तथ्य का होगा।

2- दूसरा प्रशिक्षण अपने दैनिक जीवन के साथ जुड़े हुए व्यक्तियों का नेतृत्व करना होगा। स्त्री, पुरुष, भाई, बहिन, माता, पिता, मित्र, शत्रु, स्वजन-सम्बन्धी-सेवक, स्वामी, ग्राहक, सहचर आदि कितनों से ही अपना वास्ता नित्य पड़ता है। उनकी प्रतिकूलता को अनुकूलता में परिणत कर सकने की कला का यदि अभ्यस्त रहा जाय तो यह परिवार अपने लिए बड़ा आनन्दवर्धक एवं मंगलमय हो सकता है। इस अनभ्यस्तता से जहाँ अपना लाभ है, वहाँ उन सबका भी उतना ही हित साधन है। इस प्रकार यह प्रशिक्षण हर शिक्षार्थी के जीवन एवं वातावरण में एक नया उल्लास एवं प्रकाश उत्पन्न करेगा।

3- तीसरा प्रशिक्षण जन- साधारण का, समाज का नेतृत्व कर सकने का होगा। इसका आधार धर्मतन्त्र रहेगा। रामायण और गीता आज के जन-ग्रन्थ हैं। वेद-शास्त्रों का बहुत कुछ साराँश उनमें आ भी गया है। इन दोनों धर्म ग्रन्थों को आधार मानकर भाषण एवं प्रवचन कर सकने और उनके द्वारा आज की लोक समस्याओं का समाधान प्रस्तुत कर सकने की योग्यता शिक्षार्थियों में उत्पन्न की जायगी। हमें रामायण एवं गीता के ऐसे प्रवक्ता व्याख्याता तैयार करने हैं, जो प्रसुप्त एवं दिग्भ्रान्त जन-मानस में एक नये प्रकाश, उत्साह एवं गतिशीलता का संचार कर सकें। यह दो ग्रन्थ हमारी आगामी युग-क्रान्ति के प्रमुख आधार होंगे। इसलिए इन शस्त्रों को किस अवसर पर किस प्रकार चलाया जाय? इसकी मार्मिक शिक्षा गम्भीरतापूर्वक दी जायगी।

षोडश संस्कार- व्यक्ति और परिवार का उचित बौद्धिक पथ-प्रदर्शन करने के लिए षोडश संस्कारों का प्रचलन नितान्त आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य भी है। धर्मानुष्ठान के मानो वैज्ञानिक वातावरण में वेद-मंत्रों, यज्ञ एवं देवताओं के सान्निध्य में जो शिक्षा दी जाती है, उसका प्रभाव आशातीत होता है। घर-घर पहुँचकर जन-जन से संपर्क स्थापित करने और उसे उपयुक्त वातावरण में उचित शिक्षा देने का तरीका संस्कार, आयोजनों से बढ़कर और कोई हो ही नहीं सकता। प्राचीन काल में ब्राह्मण इसी अवलम्बन से व्यापक जन-संपर्क बनाये रहते थे और हर व्यक्ति को, हर परिवार को सुसंस्कृत बनाये रहने में सफल होते थे। इस मृतप्राय, अस्त-व्यस्त पद्धति का हमें पुनर्जागरण करना होगा। प्रस्तुत प्रशिक्षण में यह सिखाया जायगा कि अपने परिवार, पड़ौस और समाज में किस प्रकार षोडश संस्कारों के माध्यम से जीवन-निर्माण एवं चरित्र निर्माण का कार्य गतिशील किया जाय। संस्कार कराने का विधि-विधान ही नहीं इन अवसरों पर उपस्थित लोगों को उद्बोधन कराने का अभ्यास इस प्रशिक्षण का प्रमुख अंग होगा।

पर्व एवं त्यौहार- जिस प्रकार व्यक्ति एवं परिवार के लिए संस्कारों का महत्व है, उसी प्रकार सामूहिक जन समाज को आदर्श वादिता, उत्कृष्टता,एवं सुव्यवस्था की ओर उन्मुख करने के लिए पर्व त्यौहारों का महत्व है। आज तो त्यौहार केवल पकवान, मिष्ठान्न खाने और एक दो परम्परागत लकीर पीट लेने तक ही सीमित हैं, पर आगे यह करना होगा कि यह पर्व सामूहिक रूप से मनाया जाँय। अधिकाधिक लोग एक स्थान पर एकत्रित हों, इन पर्वों में जो प्रेरणा, चेतना भरी है, उसे हृदयंगम करें और एक जीवित जाति की तरह शक्ति साधना के लिए उत्साहपूर्वक उठ खड़े हों। पर्वों की प्रेरणाप्रद पद्धति को यदि ठीक तरह अपनाया जा सके तो इससे बढ़कर जन-जागरण एवं युग निर्माण का दूसरा कोई आधार नहीं हो सकता। विचार व्यक्त करने के लिए जन-समूह का उचित मनोभूमि के साथ एकत्रित होना आवश्यक है। धर्म-मंच का यह वह महत्वपूर्ण प्रयोजन पर्व आयोजनों के समय सहज ही पूरा हो सकता है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए पर्वों को मनाने एवं उस माध्यम से लोक नेतृत्व करने की क्षमता प्रस्तुत प्रशिक्षण के सभी शिक्षार्थियों में उत्पन्न की जायेगी।

यज्ञ आयोजन- बड़े-बड़े विशाल जन-सम्मेलन प्राचीन काल में यज्ञ के माध्यम से होते थे। राजनैतिक समस्याओं पर विचार करने के लिए राजसूय यज्ञ, सामाजिक समस्याओं के समाधान के लिए बाजपेय यज्ञ, आर्थिक गुत्थियाँ सुलझाने के लिए विष्णु यज्ञ, सुरक्षा एवं शत्रु विजय के लिए यज्ञ, स्वास्थ्य संबंध के लिए रुद्र यज्ञ एवं भावनात्मक परिष्कार के लिए गायत्री यज्ञ होते थे। भावनात्मक परिष्कार आज के युग की सबसे बड़ी आवश्यकता है इसलिए विशाल जन-सम्मेलन बुलाने और उपस्थित व्यक्तियों की मनःस्थिति अनुकूल स्थिति में रखने के लिए अब ऐसे गायत्री यज्ञों का विशाल परिमाण में आयोजन करना होगा, जिनमें खर्च तो कम से कम पड़े पर जन-अधिकाधिक एकत्रित हों। इन आयोजनों में उपस्थित जन समूह को एक सुनिश्चित दिशा देने वाले प्रेरणाप्रद प्रवचन की व्यवस्था रहेगी और यह प्रयत्न किया जायगा कि समारोह में उपस्थित लोग कुछ ऐसे संकल्प लेकर जाँय, जिनसे नव-निर्माण के महान् लक्ष्य को सफल बनाने में सहायता मिलती हो। गायत्री यज्ञों के माध्यम से एकत्रित भावनात्मक स्थिति लेकर उपस्थित हुई जनता जन क्रम की दिशा में आश्चर्यजनक रीति से आगे बढ़ती है। यह तथ्य पिछले 15 वर्षों में भली प्रकार अनुभव किया चुका है। प्रस्तुत प्रशिक्षण में इस प्रकार के आयोजनों, पृष्ठ- भूमि, विधि व्यवस्था, संचालन एवं प्रवचन का सारा ढांचा शिक्षार्थियों के अभ्यास में ला दिया जायगा। उनसे यह आशा की जायगी कि वे विशाल जन-समाज में इस माध्यम से अभिनव चेतना उत्पन्न कर सकने में सफल होंगे।

संगीत गायन- इसी संदर्भ में संगीत एवं भजन गायन का प्रशिक्षण भी साथ-साथ चलेगा। भारत की ग्राम-वासिनी, अशिक्षित जनता को भावोद्वेलित करेन में संगीत-भजन का माध्यम एक महत्वपूर्ण आवश्यकता है। सूखे प्रवचनों की अपेक्षा संगीत-गायन के माध्यम से किये हुये भाषण स्त्री, बच्चे, शिक्षित-अशिक्षित सभी की समझ में भली प्रकार आ जाते हैं। अपना और दूसरों का मनोरंजन भी होता है। संगीत अपने-आप में एक महान कला है, जो हर व्यक्ति को आकर्षक एवं लोक प्रिय बनाती है। इसलिए इस शिक्षा पद्धति में संगीत एवं प्रेरणाप्रद भजनों के गायन का भी समावेश रखा गया है। जिनका कंठ एवं रुझान इसके उपयुक्त होगा, वे एक वर्ष में संगीत भी काम चलाऊ सीख लेंगे और अपने क्षेत्र में एक भजनोपदेशक की आवश्यकता पूर्ण कर सकेंगे।

सर्वोपयोगी प्रशिक्षण- यह सभी प्रशिक्षण ऐसे हैं, जो जहाँ किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व को सम्मानित करते हैं वहाँ आवश्यकतानुसार आजीविका के भी माध्यम बन सकते हैं। जब कि धर्म-क्षेत्र में 56 लाख निरर्थक और अयोग्य अनुपयोगी व्यक्ति गुलछर्रे उड़ा रहे हैं, तो कोई कारण नहीं कि कोई व्यक्ति इन योग्यताओं से सुसम्पन्न हो तो उसके गुजारे का प्रश्न हल न हो सके। यदि किसी के पास निजी व्यवसाय है, तो वह बिना कुछ लिए यह धर्म सेवा करे, पर यदि कोई आजीविका का प्रश्न हल करने की भी आशा रखे तो निश्चित रूप से, बिना माँगे ही उसे इस क्षेत्र में गुजारे के लिए समुचित साधन मिल सकते हैं। लोक-सेवा एवं प्रचुर यश, सम्मान का द्वार तो स्पष्टतः खुलता ही है, पुण्य और आत्म-सन्तोष भी इस क्षेत्र में प्रवेश करने वाले को कम नहीं मिलता।

युग-निर्माण के शाखा संगठनों में तो एक-दो व्यक्ति ऐसे होने ही चाहिए जो इस प्रशिक्षण को प्राप्त कर स्थानीय शाखा को सक्रिय रख सकें। ऐसे प्रशिक्षित व्यक्ति ही शाखाओं के स्थानीय धर्म पुरोहित का काम कर सकते हैं। उस माध्यम से वे अपनी जीविका चलावें या न चलावें, यह उनकी इच्छा एवं आवश्यकता का प्रश्न है, पर उपयोगिता उनकी हर हालत में होगी ही।

जन-नेतृत्व का उपरोक्त प्रशिक्षण प्राप्त करके कोई भी शिक्षार्थी अपने व्यक्तिगत जीवन में अधिकाधिक सफल हो सकता है। उसे जो जन-सम्मान मिलेगा, उससे किसी न किसी प्रकार उसकी आर्थिक, सामाजिक एवं आध्यात्मिक स्थिति को अधिक अच्छी बनाने में निश्चित रूप से सहायता ही मिलेगी।

प्रेस व्यवस्था- भाषण की तरह ही लेखन भी जन-जागरण का एक माध्यम है और लेखन का विस्तार प्रेस द्वारा होता है। दैनिक, साप्ताहिक, मासिक-पत्र उन्हीं से छपते-निकलते हैं। पुस्तकें भी प्रेसों में ही छपती, पर्चे-पोस्टर भी उन्हीं में तैयार होते हैं। जन-जागरण की कार्य पद्धति में प्रेस की आवश्यकता अनिवार्य रूप से रहती है। इसलिए इस कला को यदि जान लिया जाय तो उससे कोई भी व्यक्ति युग निर्माण के महत्वपूर्ण कार्य में आशाजनक योगदान कर सकता है।

जैसे-जैसे शिक्षा बढ़ती जाती है, वैसे-वैसे ही साहित्य के छपे कागजों की उपयोगिता भी तेजी से बढ़ रही है। अभी जो प्रेस हैं, वे छपाई की सामयिक आवश्यकता को पूरा नहीं कर पा रहे हैं। अनुमान है कि अगले दस वर्षों में अब की अपेक्षा चार गुने प्रेस बढ़ जायेंगे। अन्य व्यवसाय भले ही घटती पर हों, पर प्रेस व्यवसाय अगले दिनों—दिन तेजी से बढ़ेगा। उसका भविष्य हर दृष्टि से उज्ज्वल है। इस व्यवसाय में लगे हुए व्यक्ति जितनी आसानी से अपनी आजीविका चला सकते हैं, उतनी अन्य व्यवसायों वाले नहीं चला सकते। दूसरे धंधों में किसी कारणवश घाटा भी हो सकता है, मन्दी-तेजी का असर भी पड़ सकता है, पर यह तो शुद्ध कुटीर उद्योग जैसी मजूरी है। लागत बढ़ी तो रेट भी बढ़ेंगे, इसलिए यदि व्यवसाय करना आता हो तो पैसे में घाटा नहीं पड़ता।

सम्मानित आजीविका- शिक्षित लोग ऐसा धन्धा ढूँढ़ते हैं, जिसमें सम्मान और आजीविका दोनों मिलें। इस दृष्टि से उन्हें नौकरी ठीक मालूम पड़ती है। सो ही वे ढूँढ़ते हैं। पर शिक्षितों की संख्या अधिक और नौकरी के स्थान कम रहने से हर किसी को वह मिलती नहीं और लाखों की संख्या में वे बेकार फिरते हैं। ऐसे लोग यदि छोटा-सा भी प्रेस लगा बैठें तो अपना गुजारा इस सम्मानित धन्धे के साथ आसानी से कर सकते हैं। नौकरी में जो पराधीनता और आत्मग्लानि रहती है, उसकी तुलना में प्रेस का धन्धा हर दृष्टि से उत्तम है। साधारण नौकरी करने वालों की अपेक्षा तो छोटे प्रेस में भी अधिक आजीविका हो जाती है। न्यूनतम 4-5 हजार की पूँजी से एक छोटा प्रेस खुल सकता है। इतने से एक छोटी गृहस्थी पल सकती है। यदि पूँजी अधिक लगाने को हो तो अधिक बड़ा प्रेस भी बन सकता है और आजीविका भी अधिक सन्तोषजनक परिमाण में हो सकती है।

प्रस्तुत एक वर्षीय प्रशिक्षण में प्रेस व्यवसाय की सर्वांगपूर्ण शिक्षा देने का एक तिहाई पाठ्य-क्रम रखा गया है। ताकि इस शिक्षा को प्राप्त करने के उपरान्त यदि कोई व्यक्ति आजीविका की समस्या से चिन्तित हो तो उसे भी आसानी से हल कर सके। अपने पास थोड़ी पूँजी हो या स्वजन सम्बन्धी उधार दे सकें तो यह व्यवसाय आरम्भ किया जा सकता है। थोड़ी-थोड़ी पूँजी कई व्यक्ति लगाकर सहयोग समिति के रूप में एक सामूहिक प्रेस खोल सकते हैं और उसमें उस प्रशिक्षित व्यक्ति को नौकरी मिल सकती है। नौकरी तो हमेशा, हर नगर में मिल सकती है। प्रेस कर्मचारियों की माँग तेजी से बढ़ रही है, जिसने यह सीखा है उसे आसानी से नौकरी मिल सकती है और वह बाबूगिरी में मिलने वाले पैसे से किसी भी प्रकार कम नहीं होते।

साँगोपाँग शिक्षा- अक्षर जोड़ना, (कम्पोजिंग), मशीन चला कर छपाई मशीन की मरम्मत, प्रूफ उठाना, प्रूफ पढ़ना, नम्बरिंग, परफोरेटिंग, बाइंडिंग, कटिंग जैसे प्रेस व्यवसाय से सम्बन्ध रखने वाले सभी काम इस एक वर्ष में सिखा दिये जायेंगे। यह विभिन्न कार्य ऐसे हैं कि इनमें से एक-दो को भी ठीक तरह जान लिया जाय तो उतने से भी गुजर बसर हो सकता है। बाइंडिंग, नम्बरिंग जैसे कार्यों को तो अशिक्षित स्त्रियाँ भी घर के भीतर करती रह सकती हैं और कुछ आजीविका वे भी कमा सकती हैं। फिर जो व्यक्ति इन सभी कार्यों को जानता हो वह तो हर दृष्टि से और भी अधिक उपयुक्त रहेगा। स्वयं कर सकेगा और दूसरों को सिखा सकेगा, साथ में काम करने वाले कर्मचारियों से काम ले सकेगा, नये कारीगर पैदा कर सकेगा, किसी के प्रेस का मैनेजर बन सकेगा। प्रेस सम्बन्धी हर काम पूरी तरह जानते हों ऐसे आदमी आज ढूँढ़े नहीं मिलते। कहीं इस प्रकार के प्रशिक्षण की व्यवस्था भी नहीं है फिर समग्र शिक्षा प्राप्त प्रेस व्यवसाय के ज्ञाता मिल भी तो कहाँ से? छुट-पुट करके कोई कुछ सीख पाते हैं, उसी से काम चलाते हैं। सच तो यह है कि इन सब बातों को व्यापारिक गुप्त रहस्य समझ कर एक दूसरे को इस भय से सिखाते भी नहीं कि नया सीखा व्यक्ति प्रतिस्पर्धा करके कहीं उसी को हानि न पहुँचावे।

एक वर्षीय प्रशिक्षण में इसका समावेश करके शिक्षार्थी की आजीविका सम्बन्धी समस्या का हल भी जोड़ा गया है। प्रेस व्यवसाय के साथ जुड़ा हुआ सहायक धन्धा रबड़ मुहर बनाने का भी है। अच्छी से अच्छी रबड़ की मुहर बनाने में लागत चार-छः आने से अधिक नहीं आती, पर उसका मूल्य डेढ़-दो रुपया आसानी से मिल जाता है। रबड़ की मुहरों का काम थोड़ा-थोड़ा भी मिलता है तो उससे भी अतिरिक्त आमदनी हो सकती है। यह शिक्षा भी इस एक वर्ष की शिक्षा में सम्मिलित रखी गई है।

उज्ज्वल भविष्य की आशा- एक वर्षीय प्रशिक्षण के तीनों अंग (1) जीवन जीने की कला। (2) जन-नेतृत्व। (3) प्रेस व्यवस्था। तीनों ही एक से एक बढ़कर महत्वपूर्ण हैं। इनमें से एक भी यदि उपलब्ध हो तो किसी का भी भविष्य उज्ज्वल हो सकता है फिर तीनों के सम्मिलित लाभ का तो कहना ही क्या है। इन्हें सीखने में जो एक वर्ष का समय लगाया गया है, उसे कभी कोई व्यक्ति यह नहीं कह सकता कि वह समय हमने निरर्थक गँवाया था।

हमारी आन्तरिक इच्छा इस प्रकार की शिक्षा व्यवस्था के प्रचलन की है, जिससे जन-साधारण के व्यक्तित्व घटिया स्तर के न रहें, उत्कृष्ट बनें। यह तभी सम्भव है, जब छात्र अध्यापक के साथ रहें। भौतिक लाभ उपार्जित करने वाली शिक्षा तो आज सर्वत्र है और तेजी से बढ़ रही है, पर व्यक्तित्वों को प्रखर और अन्तःकरण को प्रबुद्ध बनाने के लिये कहीं कोई योजना नहीं है। इस अभाव की पूर्ति होनी ही चाहिए। बहुत सोच-विचार के बाद अभी एक वर्षीय शिक्षा का प्रचलन आरम्भ कर रहे हैं। इच्छा यह है कि यहाँ से शिक्षा प्राप्त छात्र अपने-अपने क्षेत्र में ऐसे ही शिक्षा संस्थान चलायें। जीवन जीने की कला उनमें मुख्य विषय है। जन-नेतृत्व और प्रेस व्यवसाय के स्थान पर स्थानीय सुविधा एवं आवश्यकता के अनुरूप दूसरे विषय रखे जा सकते हैं, पर जीवन जीने की कला व्यक्तित्वों को उत्कृष्ट बनाने की शिक्षा तो व्यापक रूप से फैलनी ही चाहिए। हम यही आशा कर रहे हैं कि मथुरा में एक वर्ष रहकर और शिक्षा प्राप्त करने के उपरान्त न केवल अपना जीवन दूसरों की तुलना में अधिक सुविकसित, सुसंस्कृत बनावेंगे, वरन् दूसरे अनेकों को भी इसी प्रकार का प्रकाश देने में सफल होंगे।

आह्वान और आमंत्रण- जिन्हें अवकाश है, इस दिशा में रुचि है, उन्हें यह एक वर्षीय प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए हम आमंत्रित करते हैं। एक वर्ष कोई बड़ा समय नहीं है। कितने ही छात्र एक वर्ष फेल हो जाते हैं। यह मान लिया जाय कि हमें एक वर्ष फेल होने के दाँव पर यह त्रिविध प्रशिक्षण प्राप्त करना है तो भी परिणाम आशाजनक ही रहेगा। हमारे द्वारा एक वर्ष में सुसंस्कृत बनाया हुआ छात्र आगे चलकर यदि स्कूल-कॉलेज में पढ़े तो भी उसका भविष्य तब की अपेक्षा अधिक उज्ज्वल ही बनेगा, जबकि वह हर साल पास ही होता चला जाता। 16 वर्ष से अधिक आयु के छात्र एक वर्ष का फेल होने जैसा दाँव लगा कर भी यह शिक्षा प्राप्त करें तो वे किसी भी प्रकार घाटे में रहने वाले नहीं हैं।

इच्छा यही है कि वयस्क (बड़ी आयु के व्यक्ति) इस प्रशिक्षण में भाग लें। जिन घरों में कई भाई हैं, कई कमाने वाले हैं, उनमें से एक सदस्य एक वर्ष के लिये इस शिक्षा के निमित्त आसानी से भेजा जा सकता है। घर वालों का यह त्याग, उनके परिवार में एक नई चेतना एवं मंगलमय धारा का ही सृजन करेगा। इस लाभ की तुलना में घर के एक सदस्य के एक वर्ष तक उपार्जन न करने की हानि आरम्भ में भले ही कुछ अखरे, पर अन्ततः उन्हें यह अपनी बुद्धिमानी ही प्रतीत होगी।

जिन्हें साधारण रीति से जिन्दगी के दिन पूरे नहीं करने हैं, कुछ अधिक उत्कर्ष का आनन्द उपलब्ध करना है वे अपने गुण, कर्म, स्वभाव को परिष्कृत करके नररत्न बनने की सम्भावना उत्पन्न करें, उनके लिये हर हालत में यह शिक्षा उपयोगी होगी। जेष्ठ के शिविर के बाद तुरन्त यह पढ़ाई आरम्भ हो जायगी। शिक्षार्थियों को इस 20 दिवसीय (25 मई से 13 जून तक के) शिविर में भी सम्मिलित रहना चाहिए। इसलिए उन्हें भी अन्य शिविर शिक्षार्थियों की तरह 24 मई को ही मथुरा पहुँचना होगा और पूरे एक वर्ष तक यहाँ रहने के लिए आना होगा।

यह ध्यान रखें- हर छात्र अपना भोजन वस्त्र आदि का खर्च स्वयं करेगा। शिक्षा एवं निवास की व्यवस्था ही निःशुल्क होगी। छात्र अनुशासन-प्रिय, स्वस्थ एवं कम से कम 8 वीं कक्षा तक शिक्षित होने चाहिए। आयु 16 वर्ष से कम न हो। अपना अब तक का जीवन परिचय, कुटुम्ब परिचय विस्तृत विवरण समेत आवेदन-पत्र यथा संभव जल्दी ही भेज देने चाहिये और अनेक की स्वीकृति पाये बिना किसी भी छात्र को आने का कष्ट नहीं करना चाहिए।

जो गृह कार्यों से निवृत्त, रिटायर हो चुके हैं, पेन्शन आदि पाते हैं, उन्हें तो लोक सेवा के लिए यह शिक्षा अवश्य ही प्राप्त करनी चाहिये। इस माध्यम से वे देश, धर्म, समाज एवं संस्कृति की बहुत ही महत्वपूर्ण सेवा करते हुये अपने जीवन को सच्चे अर्थों में सफल बना सकेंगे। उन्हें ऐसे केन्द्र अपने क्षेत्रों में स्थापित करने चाहिए।

अभी एक वर्षीय शिक्षण क्रम ही चलाया जा रहा है। यदि लोग सरकारी सनदों का स्नेह छोड़कर अपने बच्चों को महान व्यक्तित्व सम्पन्न बनाने का महत्व समझ सके और अपने बच्चों को चार वर्षीय शिक्षा के लिये भेजने को तैयार हो सकें तो उस पाठ्यक्रम को भी आरम्भ करेंगे यदि यह किसी प्रकार पूरी हो सकी तो निश्चय ही युग निर्माण का स्वप्न साकार मूर्ति धारण कर हमारी आँखों के सामने उपस्थित होगा।


इन अनुरोधों की उपेक्षा न की जाय।

“अखण्ड-ज्योति” के गत अंक में परिजनों के सम्मुख चार सामयिक कार्यक्रम प्रस्तुत किये गए थे।

(1) एक से दस आन्दोलन को तीव्र किया जाय। अपने परिवार, रिश्ते तथा संपर्क के प्रत्येक भावनाशील व्यक्ति को नवनिर्माण की विचारधारा से परिचित सम्बन्धित रखने के लिए उसे अखण्ड-ज्योति एवं जनजागरण का अन्य साहित्य नियमित रूप से पढ़ने सुनाने के लिए तैयार किया जाय। लोगों में विचार शक्ति का सन्देश पढ़ने सुनने की अभिरुचि उत्पन्न करना हमारा आरम्भिक एवं आवश्यक कार्य है। इसलिए हम में से ही एक को कम से कम दस व्यक्तियों तक युगनिर्माण की विचारधारा का सन्देश पहुँचाते रहने का व्रत लेना चाहिये।

(2) क्लीं बीज युक्त गायत्री महामंत्र का जो शक्ति पुरश्चरण अपने परिवार द्वारा चल रहा है। उसमें प्रत्येक परिजन को भागीदार बनना चाहिए। भले ही वह दस मिनट में हो सकने वाली एक माला 108 मन्त्रों जितना ही कम क्यों न हो। राष्ट्र को सर्वांगीण सशस्त्रता के लिए प्रस्तुत पुरश्चरण, जिसके अंतर्गत प्रति मास 24 करोड़ जप हो रहा है एक अमोघ अध्यात्मिक उपचार है। राष्ट्रीय सुरक्षा एवं समर्थता के भौतिक उपचारों के साथ-साथ यह आध्यात्मिक अनुष्ठान भी एक महत्वपूर्ण प्रयास है। इसका लाभ आगे चलकर और भी अधिक होता है। इसमें अखण्ड-ज्योति का प्रत्येक सदस्य भागीदार बने। जिसने अभी यह उपासना आरम्भ न की हो वे अब से शुरू कर दें।

(3) जेष्ठ में 25 मई से आरम्भ होकर 13 जून तक चलने वाले 20 दिन के शिविर में परिजनों को मथुरा आने की तैयारी करनी चाहिए। शिक्षा तो साहित्य के माध्यम से भी दी जा सकती है पर प्रेरणा के लिये व्यक्तिगत संपर्क-सान्निध्य आवश्यक है। परिजन साल में 20 दिन हमारे साथ रहें तो यह हमारे लिए आनन्द का और परिजनों के लिए नया प्रकाश एवं मार्ग दर्शन प्राप्त करने का सुअवसर होगा। जो आ रहे हों, वे पूर्व स्वीकृति ले लें।

(4) संस्कार एवं पर्वों को प्रेरणाप्रद ढंग से मनाने का आन्दोलन अब हमें सर्वत्र एक सुव्यवस्थित प्रक्रिया के रूप से चलाना चाहिये। उसमें धार्मिक आधार पर व्यक्ति परिवार एवं समाज के नवनिर्माण का उद्देश्य बड़ी सरलता एवं सफलतापूर्वक पूर्ण होगा। इनका विधि विधान पूरा करने का ढंग तथा इन अवसरों पर किये जाने वाले उद्बोधन प्रवचन का ढंग, हर शाखा को सीखना चाहिये जो पुराने पण्डित पुरोहित हैं, उन्हें भी इसे अपनाना चाहिए।

इस क्रिया पद्धति को सीखने के लिए शाखाओं में चार दिवसीय प्रशिक्षण शिविरों का आयोजन होना चाहिये इनके लिये शिक्षण कर्ता मथुरा से भेजे जायेंगे। जहाँ आवश्यकता समझी जाय और सुविधा हो वहाँ इन शिविरों की माँग की जाय। माँगों के आधार पर एक क्रम से प्रशिक्षण कर्ता आगे बढ़ते जायेंगे, तदनुरूप तारीखें निश्चित कर दी जायेंगी। शिविर जुलाई में आरम्भ होंगे पर उनकी तिथियाँ अभी से निश्चित होनी हैं, अतएव उस सम्बन्ध में भी आवश्यक पत्र व्यवहार अवश्य किया जाना चाहिये।

गत अंक में प्रस्तुत यह चारों ही कार्यक्रम महत्वपूर्ण हैं। इनकी ओर परिजनों को समुचित ध्यान देना चाहिये, अपनी प्रतिक्रिया हमें सूचित करनी चाहिये। नवनिर्माण के लिये हमें अखंड-ज्योति का पाठक मात्र ही नहीं बने रहना है, वरन् सक्रिय रूप से कुछ करने के लिए भी तत्पर होना चाहिये।

पांचवां कार्यक्रम इस अंक में प्रस्तुत है। एक वर्ष के लिये प्रशिक्षण की जो योजना है, वह हर उज्ज्वल महत्व का स्वप्न देखने वाले व जीवन को सार्थकता की ओर अग्रसर करने के महत्वाकाँक्षी को अपने लिए सर्वथा उपयुक्त प्रतीत होगी। यह एक वर्षीय प्रशिक्षण किसी की जीवन दिशा को प्रगति की ओर मोड़ सकता है। जिन्हें अवसर होवे इसका लाभ अवश्य उठावें।


युग निर्माताओं से-


युग निर्माताओं से (Kavita)

तपोभूमि से जली डडडडव-मशाल, तुम आओ! ओ नवयुग के निर्माताओं, सब मिल कदम बढ़ाओ!!

जग होगा प्रथम स्वर्ण-सा अपना मूल्य बढ़ाने। मिटना होगा, किरण जागरण की वसुधा पर लाने॥ चलना होगा, सदा सजग हो खुद ही अलख जगाने। आज दीप बने, तिल-तिल जलकर-तम हर, पंथ दिखाने॥

सदियों से सोये जन-जन को, जगकर स्वयं-जगाओ! ओ नवयुग के निर्माताओं, सब मिल कदम बढ़ाओ!!

युग के नये यज्ञ के होता बोलो कैसे होंगे? स्वयं न जब तक तुम हँसकर के अपनी आहुति दोगे॥ आजादी मिल गई, सृजन है अब तक किन्तु अधूरा। बलिदानों के बिना, कहो कब लक्ष्य हुआ है पूरा??

नव-चेतनता और एकता का नव-पाठ पढ़ाओ! ओ नवयुग के निर्माताओं, सब मिल कदम बढ़ाओ!!

जीवन एक धरोहर पावन, इसे न व्यर्थ गँवाओ। कर सेवा मानवता की तुम, सच्चा पुण्य कमाओ॥ सारे भेद-भाव विस्मृत कर, सबको गले लगाओ। जाति, धर्म से कर्म बड़ा है-बस, इसको अपनाओ॥

कर सतयुग-निर्माण, सभी को शाश्वत सुखी बनाओ! ओ नवयुग के निर्माताओं, सब मिल कदम बढ़ाओ!!

-रामस्वरूप खरे, बी. ए., साहित्य रत्न

-रामस्वरूप खरे, बी. ए., साहित्य रत्न

*समाप्त*