ईश्वर-उपासना से महान आध्यात्मिक लाभ

जल में प्रवेश करते ही उसकी उष्णता या शीतलता का तत्काल भान होता है। आग के पास बैठने वाले को उसकी गर्मी मिलना स्वाभाविक है। किसी भी वस्तु की समीपता मनुष्य के जीवन में अपना विशिष्ट प्रभाव अवश्य छोड़ती है। बुरी वस्तु का संग, बुराई पैदा करता है और भली का भलाई। संसार के सभी लोग इसीलिये भले आदमियों और भली वस्तुओं का सान्निध्य-सुख प्राप्त करना चाहते हैं।

ईश्वर-उपासना के सत्परिणाम भी मनुष्य को तुरन्त देखने को मिलते हैं। जो लोग उसके वैज्ञानिक अस्तित्व का ज्ञान नहीं रखते वे भी उस लाभ से वंचित नहीं रहते। दियासलाई जान में जलाई जाय या अनजान में, उससे आग अवश्य पैदा होगी। उपासना की वैज्ञानिक प्रक्रिया को न समझने वाले भी ईश्वर से प्राप्त होने वाले आध्यात्मिक लाभों द्वारा अपने लौकिक एवं पारलौकिक उद्देश्य प्राप्त कर लेते हैं इसमें जरा भी सन्देह नहीं है।

ईश्वर एक प्रकार का विज्ञान है और उपासना उसे प्राप्त करने की वैज्ञानिक पद्धति। ईश्वर-उपासना का अर्थ है, ईश्वर के समीप बैठना। जल, अग्नि अथवा वायु की समीपता से जिस तरह मनुष्य तुरन्त उनके गुणों का प्रभाव अनुभव करने लगता ही ठीक उसी तरह से परमात्मा का सान्निध्य प्राप्त होते ही जीव का आपा विस्तीर्ण होने लगता है, उसकी शक्तियाँ प्रकीर्ण होने लगती हैं। उस प्रकाश में मनुष्य न केवल अपना मार्ग दर्शन करता है अपितु अनेकों औरों को भी सन्मार्ग की प्रेरणा देता है। एक ईश साधक की शक्ति इसीलिये बहुत बड़ी और जाज्वल्यमान समझी जाती है क्योंकि वह सर्व शक्ति मान ज्योति में अन्तर्हित होकर स्वयं भी उनका उत्तराधिकार अनुभव करने लगता है। यजुर्वेद में इस सम्बन्ध में प्रकाश डालते हुये कहा गया है।—

सपर्य्यगाच्छुक मकायमब्रणमस्नाविरं शुद्धमपापविद्धम्। कविर्मनीषी परिभू-स्वयं भूर्याथातथ्यतोऽर्थान् - व्यदधाच्छाश्वतीभ्यः समाभ्यः॥

(यजु 40।1)

“जो परमात्मा देव तेजस्वी, निराकार, व्रण रहित, स्नायु जाल से अपरिच्छिन्न अलौकिक पाप-रहित, कवि, मनीषी, सर्वव्यापी, सर्व शक्तिमान है वह हमें भी इन शक्तियों से ओत-प्रोत करें।”

इस मंत्र में परमात्मा की उपासना से प्राप्त होने वाले महान् आध्यात्मिक लाभों को ईश्वरीय गुणों के रूप में दिखाया गया है। यह गुण अग्नि की उष्णता या जल की शीतलता के ही समान है और जो व्यक्ति उनकी जितनी अधिक समीपता में पहुँचता, इन गुणों का उसी अनुपात में उसके जीवन में आविर्भाव होता चला जाता है और में उसी में लीन होकर जीव-भाव से मुक्त हो जाता है।

परमात्मा को “शुक्रम्” अर्थात् प्रकाश स्वरूप कहा जाता है। प्रकाश-तेजस्विता, निर्दोषिता एवं ज्ञान का प्रतीक है। ईश्वर उपासना से जीवात्मा का उत्थान इसी कक्षा से प्रारम्भ होता है। जब तक मनुष्य अपने जीव भाव में था। तब तक वह अज्ञान-ग्रस्त था, उसे संसार की वस्तुस्थिति का कुछ भी ज्ञान न था। थोड़े से क्षणिक सुखों की पूर्ति को ही उसने अपने जीवन का उद्देश्य समझा था वह भोग में लिप्त था। इस कारण उसका जीवन दीन भी था। भोग शारीरिक रोग शोक पैदा करने वाले होते हैं उनसे इन्द्रियों की क्षमता नष्ट होती है और मनुष्य वृद्धावस्था तथा मृत्यु की ओर अग्रसर होता है। भोगों से जहाँ शारीरिक व्याधियाँ बढ़ती हैं वहाँ मानसिक चिन्तायें भी बढ़ती हैं। यह चिन्तायें मनुष्य को बन्धनों से बाँधनी और दुःखी करती हैं। पर जैसे ही परमात्मा के शुक्रम् अर्थात् प्रकाश तत्व ने उसके जीवन में प्रवेश किया कि वह साँसारिक भोगों की निःसारता अनुभव करने लगा। अब उसे क्षणिक सुख निरर्थक अनुभव होने लगते हैं और दैवी प्रकाश में अपना जीवन लक्ष्य निर्धारित करता है। वह देखता है कि जब मुझे केवल सुख और असीम सुख की चाह है, तो मैं इन क्षुद्र वासनाओं के पीछे क्यों भागता फिरूं। ऐसे भी प्रश्न उसके जीवन में उतरते हैं, संसार के गहन रहस्य और जीवन की पारलौकिकता और उसके विचार दौड़ने लगते हैं। यह ज्ञान ही परमात्मा का प्रकाश है। इसे ही उसकी कृपा मान सकते हैं। परमात्मा का यह प्रकाश पाये बिना मनुष्य जीवन का उद्धार भी सम्भव नहीं।

प्रकाश जीव के विकास की प्रारम्भिक अवस्था भी है और अन्तिम भी। प्रारम्भ इसलिये है कि जीवन की शक्तियों का विस्तार यहीं से प्रारम्भ होता है। इस ज्ञान के उदय के साथ ही मनुष्य के अन्तःकरण में आत्म-ज्ञान की तीव्र आकाँक्षा जागृत होती है और चूँकि अन्त में जीव उसी प्रकाश में ही समाधि ले लेता है, यह परम लक्ष्य की अन्तिम अवस्था भी है। इसलिये वेद-शास्त्रों में ज्ञान के महत्व को सर्वोपरि माना गया है और उसके बिना मनुष्य को पशुवत् बताया गया है।

परमात्मा का दूसरा गुण है— अकायम्। वह निराकार है, उसका शरीर मनुष्यों जैसा नहीं अर्थात् वह मनुष्यों जैसा कार्य नहीं करता। उपासक के अन्तःकरण में यह गुण शीघ्र ही चमकता है। अर्थात् परमात्मा का ज्ञान-तत्व प्राण-तत्व जब उसने धारण किया तो उसे सर्व प्रथम अनुभव हुआ कि वह अब तक जिस शरीर को ही संसार सुख और अहंकार की पूर्ति का प्रमुख साधन समझे हुये या यों कहें कि अब तक वह अपने शरीर को ही जीवन भर प्राण समझता था अब उससे उसे विरक्ति होने लगती है। विरक्ति का यह अर्थ नहीं कि वह शारीरिक क्रियायें छोड़ देता है वरन् अब वह इसे साधन या परमात्मा के मन्दिर के रूप में प्रतिष्ठित हुआ देखता है। जो इन्द्रिय लिप्सायें उसे अब तक परेशान किये हुये थीं अब उसने समझा कि इन शारीरिक विकृतियों से उसे परेशान नहीं होना चाहिये। यह शरीर नाशवान है, पंच भौतिक है, कभी भी नष्ट हो सकता है। अतः अब इस पर स्वामित्व कर इसका सदुपयोग किया जाना चाहिये।

इन भावनाओं के उदय के साथ ही उसे प्राण-तत्व या शरीर में प्रतिष्ठित चेतना का अनुभव हुआ और उसने विचार किया कि अपने अदृश्य शरीर— प्राण-शरीर को प्राप्त करना चाहिये। यह प्राण-शरीर निराकार है जो चिन्तन और विचार द्वारा ही अनुभव किया जा सकता है। सूक्ष्म इन्द्रियाँ ही उसे जान सकती हैं। अतः उसकी मनोवृत्तियाँ अंतर्मुख होने लगीं । वह कायिक हितों से परोन्मुख होकर अपने निराकार स्वरूप का चिन्तन और उसका रहस्य जानने की इच्छा करने लगा।

परमात्मा अव्रणम् है अर्थात् उसे किसी प्रकार के घाव नहीं लगते। घाव मनुष्य के शरीर में ही लग सकते हैं। शास्त्रकार ने बताया है— “ नैनं छिद्रन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।” अर्थात् आत्मा को शस्त्र छेदन नहीं कर सकते आग उसे जला नहीं सकती। जब तक मनुष्य में शरीर भाव था तब तक साँसारिक ताप और शारीरिक कष्ट उसे अप्रिय लगते थे और हर क्षण इनसे छुटकारा पाने का ही प्रयत्न करता था किन्तु अब उसने अनुभव किया कि शारीरिक लालसायें अभी भी ईश्वर प्राप्ति के मार्ग में उसकी बाधक है अतः इनका उच्छेदन करना चाहिए। यह तप के अर्थ में है। तप को शारीरिक तितीक्षा भी कहते हैं। अर्थात् जान बूझकर शरीर को कष्ट देते हैं जिससे आत्मभाव स्पष्ट होने लगे और जीव-भाव से मुक्ति मिलने लगे।

शरीर को कष्ट देने का तात्पर्य यह नहीं है कि उसे शस्त्रों से छेदा या आग से जलाया जाय वरन् उन तितिक्षाओं को जगाना है जिससे लौकिक सुखों की कामना मर जाय। नियमित जीवन, स्वच्छता, सफाई जप, प्राणायाम, उपवास, कृच्छ-चान्द्रायण, आदि तप कहे गये हैं इनका उद्देश्य आत्मा को तपाना है और उसे परमात्मा में मिलने के अनुरूप शुद्ध और तेजस्वी बनाना है।

किन्तु मनुष्य की युग-युगान्तरों की दमित वासनायें इतने शीघ्र नष्ट नहीं हो जाती। शरीर और मन की यह सफाई ठीक ऐसी ही है जैसी किसी गन्दी नाली में शुद्ध जल डालकर उसकी सफाई की जाती है। सफाई करते समय बहुत दिनों से सतह में जमी हुई गन्दगी की सड़ाँद इतनी तीव्रता से फैलती है कि वह आस-पास वालों का दिमाग बदबू से खराब कर देती है। आत्मोत्थान के विभिन्न साधनों द्वारा भी शरीर में वासनाओं ओर लौकिक कामनाओं की ऐसी सड़ाँद उत्पन्न होती है जो मन को झकझोर कर रख देती है। कुछ क्षण के लिये मन को काबू करना कठिन हो जाता है। इस हलचल की प्रक्रिया को ही अग्नि-दीक्षा या प्राण-दीक्षा के नाम से पुकारा जाता है और उस स्थिति को सम्हालने के लिये किसी योग्य तथा अनुभवी मार्गदर्शक की बड़ी आवश्यकता बताई गई है। परमात्मा का “अस्नाविरम्” गुण इस बात का बोध कराता है कि उपासक परमात्मा की प्राप्ति के लिये जब सन्धान करे तो वह शरीर की चंचलता को हर तरह से रोके । अथवा यह कह सकते हैं कि परमात्मा की ओर अचल भावना से प्रतिष्ठित हुई जीवात्मा शारीरिक चंचलता, इन्द्रियों की भड़कन या मनोविकारों से प्रभावित नहीं होती है।

परमात्मा नित्य शुद्ध है वह अपने उपासक में पाप कैसे देख सकता है। दूध में शुद्ध जल मिल सकता है, गन्दा जल तो उसके स्वरूप को ही बिगाड़ देता है। अग्नि में लोहा डाला जाता है तो वह भी अग्नि वर्ण हो जाता है। परमात्मा अपने भक्त के पापों का इसी प्रकार संहार कर उन्हें नष्ट करता है। यही बात उपासक की ओर से भी होती है। वह अनुभव करता है कि पाप पूर्ण जीवन बिता कर परमात्मा को पाना सम्भव नहीं, वैसे ही पुराने पापों का फल पाये बिना भी उसकी सिद्धि सम्भव नहीं। इन दोनों स्थितियों में सन्तुलन रखकर वह अपने पापों का धैर्य पूर्वक प्रच्छालन करता है और परमात्मा में मिल जाने की योग्यता प्राप्त करने में संलग्न रहता है।

विचारों से भावनाओं की शक्ति बड़ी मानी गई है। परमात्मा मनीषी भी है और कवि भी । कविता आत्मा की सर्वव्यापकता की अभिव्यक्ति है। आत्मा जब विकसित होती है तो सारे संसार के सुख दुःख में वह अपना सुख दुःख अनुभव करने लगती है। यह गुण ईश्वर उपासक में भी उसी रूप में जागृत होता है। उसमें भी दया, प्रेम, त्याग, उदारता, सद्व्यवहार, सहानुभूति और कष्ट सहिष्णुता जैसी कवि-भावनायें जागती हैं। अपने स्वार्थों का परित्याग कर उसे परमार्थ में विशेष आनन्द आने लगता है। संसार में जितने भी संत-भक्त हुये हैं उन्होंने मनुष्य की सेवा को ही परम धर्म बताया ही ऐसा तभी सम्भव हुआ जब परमात्मा की उपासना के फलस्वरूप उनका कवि-गुण- भावनायें जागृत हुई। इतिहास प्रसिद्ध घटना है कि बाल्मीकि, अजामिल और सदन जैसे कठोर और दुष्ट प्रकृति के व्यक्तियों ने जब ईश्वर की शरण ग्रहण की तो वे इतने सदय हृदय हुये कि मानवता की सेवा में ही अपना सर्वस्व अर्पण कर दिया।

विचार और भावनाओं की सर्वोच्चता में पहुँचने पर उपासक भगवान की “परि-भू” शक्ति का रसास्वादन करता है। ईश्वर सर्वव्यापी है, परिभू है। संसार के कण-कण में उसकी सत्ता समा रही है। पहाड़, नदियाँ, सागर, वृक्ष, वनस्पति, सूर्य, चन्द्र, नक्षत्र सब उसी के बनाये हुये हैं। सर्वत्र उसी का प्रकाश भर रहा है। कण-कण में, रज-रज में वही खेल खेल रहा है। जल, थल, नभ ऐसा कोई भी स्थान नहीं जो परमात्मा से रिक्त हो। यह विराट् जगत उसी का स्वरूप है। एक-एक जिनके पर उसकी दृष्टि है किसी का व्यवहार उससे छुपा हो यह सम्भव नहीं, उस आँख से कोई बचकर नहीं जा सकता, कोई भी व्यक्ति बुरी बात करे और वह उसे सुन ले ऐसा कभी सम्भव नहीं। उपासक परमात्मा की इस सर्व व्यापकता की अनुभूति प्राप्त कर आनन्द-विभोर हो जाता है। वह अपने आपको भी उसी अविनाशी तत्व में विलीन हुआ सर्वव्यापक सत्ता के रूप में देखता है, स्वयं भी सर्वव्यापक हो जाता है।

परमात्मा सर्व शक्तिमान भी है। उसकी व्यवस्था बड़ी विशाल बड़ी अनोखी है। संसार के सब कर्मों की वह देख-रेख करता है। कर्म का फल भी वही देता है। रक्षा, पालन और विनाश भी वही करता है। पर वह यह सब अलिप्त, निर्विकार भाव से किया करता है। संसार के कल्याण की दृष्टि से ही उसने अपनी शक्तियाँ विकसित की है और उनका लाभ भी वह सारे संसार को देता रहता है। ईश्वर का अंचल पकड़ने वाला भी अन्त में परमात्मा की यह महान् विभूति प्राप्त कर अलिप्त निर्विकार और जीवन मुक्त हो जाता है। मनुष्य शरीर में ही वह परमात्मा की सिद्धियों और शक्तियों का रसास्वादन करता हुआ अन्त में उसी सुख स्वरूप, तेजस्वी दुःख का नाश करने वाले परमात्मा के दिव्य प्रकाश में विलीन हो जाता है।


उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत

अनेक योनियों में रहकर,करोड़ों वर्ष तक कष्ट भोगने के बाद भटकते हुये जीव को मनुष्य शरीर प्राप्त करने का सौभाग्य प्राप्त होता है। प्रमादवश कोई इसे यों ही व्यर्थ गँवा दे, यह दूसरी बात है अन्यथा मनुष्य जीवन जैसी सुविधायें मिलना किसी भी योनि में सम्भव नहीं। मनुष्य ही एक ऐसा जीव है जो विचार कर सकता है, योजनायें बना सकता है, धर्म कर सकता है, साधना कर सकता है। यह विशेषतायें, यह श्रेष्ठ उपलब्धियाँ इस बात की ओर संकेत करती हैं कि मनुष्य-जीवन प्राप्त हो जाना कोई साधारण बात नहीं है।

अपनी योग्यताओं का उपयोग लोग साँसारिक सुखोपभोग के साधन प्राप्त करने में भी कर सकते हैं किन्तु धन, स्त्री, पुत्र, मिष्ठान, पद, राजनैतिक महत्व आदि भौतिक विभूतियाँ भी स्थायी कहाँ हैं? माना इनमें कुछ सुख और सन्तोष मिलता है पर क्या यह किसी से छुपा है कि भोग अन्त में रोग ओर शोक के रूप में ही परिवर्तित होते हैं। इन्द्रियाँ कभी तृप्त नहीं होतीं। भोग-भोग की इच्छा को और भी अतृप्त बनाना है। वासना, वासना को ही भड़काती है फलस्वरूप मनुष्य दिन-प्रति दिन वृद्धावस्था और मृत्यु की ओर ही अग्रसर होता रहता है। साँसारिक कामनाओं में प्रत्येक दृष्टि से सन्तुष्ट व्यक्ति भी भय से नहीं बच पाते। रोग और शोक तो उन्हें भी घेरे रहते हैं।

हमें सुख की अभिलाषा क्यों है और दुःख से निवृत्ति क्यों नहीं होती यह एक अत्यन्त महत्वपूर्ण प्रश्न है और इसे सुलझा लेना ही ज्ञान का अन्तिम ध्येय है। पर मनुष्य अज्ञान के कारण अपने सही जीवन-पथ का निर्धारण नहीं कर पाता । इससे यह भी कहा जा सकता है कि उसे जीवन के प्रति सच्चे दृष्टिकोण का ज्ञान नहीं मिल पाता। पक्षी जिस प्रकार अपने आपको पक्षी की शक्ति वाला, शेर अपने को शेर की शक्ति वाला, बन्दर-बन्दर की शक्ति वाला मानता है, मनुष्य भी ठीक उसी प्रकार अपने को मनुष्य की शक्ति वाला मानता है। मानवीय दृष्टिकोण से यह बात सही भी हो सकती थी। शारीरिक दृष्टि से विचार करने पर यह बात बुद्धि संगत भी हो सकती थी किन्तु घटनायें, हमें उस विचार धारा से असहमत होने के लिये बार-बार विवश करती हैं। जन्म, मृत्यु, रोग-शोक, धरती आकाश के विराट स्वरूप हमें यह सोचने को विवश करते हैं कि मनुष्य केवल मनुष्य जन्तु मात्र ही नहीं है— वह कोई और भी सूक्ष्म तत्व है। मनुष्य तो केवल इसलिये है कि उसका शरीर के साथ संयोग हो गया है, अन्यथा शरीर नष्ट होने के बाद उसका कोई स्वरूप ही भिन्न है। अपने प्रति दृष्टिकोण के सम्बन्ध में यही हमारा अज्ञान है। अर्थात् हम अपने मूल स्वरूप को नहीं समझ पाते, इसीलिये ऐसे कार्य हमसे होते हैं जो हमें बार-बार दुःख बन्धनों में बाँधते और विभिन्न योनियों में भ्रमण कराते रहते हैं।

अपने आपको जानना ही आत्म-ज्ञान प्राप्त करना है। अपने को शरीर मानना यह अविद्या है और आत्म-ज्ञान प्राप्त करना ही विद्या है। पहली मृत्यु है दूसरी अमरता, एक अन्धकार है दूसरा प्रकाश, एक जन्म-मृत्यु है दूसरा मोक्ष। एक बन्धन है दूसरा मुक्ति। नरक और स्वर्ग भी इन्हें ही कह सकते हैं। ये दोनों एक दूसरे से अत्यन्त विपरीत परिस्थितियाँ हैं, दोनों भिन्न-भिन्न दिशाओं को ले जाती हैं, इसलिये एक को ग्रहण करने के लिये दूसरे को त्यागना अनिवार्य हो जाता है।

ज्ञान और अज्ञान की समान परिस्थितियाँ इस विश्व में विद्यमान है। जिन्हें पदार्थों से प्रेम होता है वे प्रेयार्थी अज्ञानी कहे जाते हैं। भले ही उन्हें साँसारिक ज्ञान अधिक हो पर ब्रह्मवेत्ता पुरुष उन्हें कभी विद्वान नहीं मानते और न ही उन्हें महत्व दिया जा सकता है क्योंकि भोग की इच्छा करने वाले व्यक्ति अँधेरे में चलते और अन्धों की तरह ठोकर खाते हैं।

आत्म-ज्ञान प्राप्त करना वस्तुतः ईश्वर की सबसे सुन्दर सेवा और उपासना है। हमारे पूर्वज कहते हैं परमात्मा बड़ा मंगल कारक है उसकी सृष्टि भी बड़ी मंगलमय है। यहाँ कष्ट और दुःख की कोई बात ही नहीं है, पर लोग अज्ञान वश कष्ट भोगते और परमात्मा को दोषी ठहराते हैं। इसलिये इन मूढ़जनों से आत्मज्ञानी ही श्रेष्ठ है, जो परमात्मा की कलाकृति का अपने गुण कर्म और स्वभाव के द्वारा अनुमोदन करता है। आत्मज्ञानी ईश्वर के गुणानुवाद न गाये तो भी वह सच्चा ईश-भक्त ही माना जायेगा और परमात्मा भी उसे अपना प्यार दुलार अजस्र रूप से प्रदान करेगा। अपने आज्ञाकारी और कर्मनिष्ठ बेटे से प्यार कौन नहीं करता?

आत्म-तत्व का ज्ञान मनुष्य के लिये सभी दृष्टियों से उपयुक्त है। शास्त्रकार का कथन है कि— “ तेषाँ सुखं शाश्वतं नेतरेषाम”— अर्थात् आत्म-ज्ञान के सुख से बढ़कर ओर कोई सुख नहीं। कठोपनिषद् अध्याय दो की दूसरी बल्ली में तेरहवें मंत्र में आत्मा की विशदता और उससे प्राप्त होने वाले महान सुख का इस प्रकार वर्णन है—

नित्यो नित्यानाँ चेतनश्चेतनाना— मको बहूनाँ यो विदधति कामान्। तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरा— स्तेषाँ शान्तिः शाश्वती नेतरेषाम्॥

“जो समस्त जीवों का मूल, चेतन और सब प्रकार की कामनाओं को पूर्ण करता है उस शरीरस्थ आत्मा का जो ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं उन्हें ही नित्य और शाश्वत शान्ति उपलब्ध होती है।”

यद्यपि यह आत्मा जीव रूप से हृदय में ही अवस्थित है तो भी वह अति सूक्ष्म है और सहज ही ज्ञान में नहीं आता। किन्तु जब कोई साहसी पुरुष अध्यात्म योग के द्वारा उसे जानने का प्रयत्न करता है, कठिनाइयों में प्रविष्ट होकर उसे ढूँढ़ने का प्रयत्न करता है तो वह आत्मा की विशेषताओं से प्रभावित भी होता है और अन्त में उसे प्राप्त कर साँसारिक दुःख और कष्टों से छुटकारा पा जाता है। यह लाभ आज के लोगों की दृष्टि से सम्भव है कुछ छोटे लगें पर इनके आगे साँसारिक भोग बिलकुल फीके और नीरस लगते हैं। यद्यपि वह इनसे वंचित भी नहीं रहता है अर्थात् उसे साँसारिक सुख सम्पदाओं की भी किसी तरह की कमी नहीं होती। स्वर्ग और मुक्ति का लाभ प्राप्त कर लेने पर लौकिक सुख तो दास-दासियों की तरह मनुष्य को अनायास ही प्राप्त हो जाते हैं। यमाचार्य ने शिष्य नचिकेता को आत्म ज्ञान के द्वारा ब्रह्म विद्या का अधिकारी बना दिया था, वह नचिकेता राज-सुखों से भी वंचित नहीं रहा।

मूल प्रश्न श्रद्धा और विश्वास का है। मनुष्य के अन्तःकरण में जिज्ञासा पैदा होनी चाहिये। ज्ञान की , आत्मा के रहस्य जानने के तीव्र आकाँक्षा ही इसका मूल आधार है। भगवान् बुद्ध के अन्तःकरण में यह जिज्ञासा इतने प्रबल रूप में प्रकट हुई थी कि हर दृश्य, हर समस्या उनके लिये और अधिक चिन्तन का आधार होती थी। हर बात के साथ “ऐसा क्यों हुआ? का प्रश्न जुड़ा रहता था। अपने आपके सम्बन्ध में, जीवन, मृत्यु, ईश्वर और इस विराट जगत के रहस्य जानने के लिये उनके हृदय में तीव्र अकुलाहट रहती थी। यद्यपि उन्हें वैभव-विलास की कुछ भी कमी न थी, तो भी वे इस प्रश्न का औचित्य सब के लिये एक समान देखते थे। अपने लिये भी उन्होंने यही देखा कि वैभव विलास में बड़ा होने पर भी मूलभूत समस्यायें मेरे साथ भी वैसी ही हैं। यह धन, यह राजसिंहासन न तो मेरे शारीरिक सौंदर्य की रक्षा कर सकता है और न जरा-मृत्यु से बचा सकता है तो उसका महत्व ही क्या रहा? मैं अपने आपकी रक्षा नहीं कर सकता, तो फिर अपना शारीरिक महत्व भी क्या रहा? बस इसी उधेड़ बुन, आत्म-ज्ञान की तीव्र आकाँक्षा ने उन्हें तप के लिये आकर्षित किया। बुद्ध इस महान् आध्यात्मिक आवश्यकता की सर्वोपरिता को न अनुभव करता तो उन्हें वे विभूतियाँ प्राप्त न होतीं जिनके आधार पर वे सामान्य श्रेणी के व्यक्तियों से ऊँचे उठकर भगवान बन गये।

आत्म-तत्व निश्चय ही बहुत विशद् है। बुद्धिमान व्यक्ति इस परम गोपनीय तत्व को प्राप्त कर अपनी मुक्ति के भागी तो बनते ही हैं साथ ही वे हजारों औरों की आत्मकल्याण के मार्ग में अग्रसर करने में भी समर्थ होते हैं। किन्तु यह तत्व गोपनीय ही नहीं दुःसाध्य भी है। मनुष्य की जिज्ञासा ही उसे अधिकारी नहीं बना देती वरन् उस तत्व के अवगाहन की पात्रता भी होना आवश्यक है। अधिकारी व्यक्ति ही उसे प्राप्त कर सकते हैं जो भय और मोह की स्थिति में डग-मग न हो सकें और जिनमें इतनी दृढ़ता, गम्भीर और कठिनाइयों के सहन करने की क्षमता हो कि वे साधना काल की ऊँची-नीची, टेढ़ी-तिरछी परिस्थितियों में भी बढ़ते रह सकें वस्तुतः वही उसके पात्र होते हैं।


श्रद्धाहीन बुद्धिवान अभिशाप ही है।

आज का युग बुद्धि-युग कहा जाता है। मनुष्य पूरी तरह से बुद्धिवादी बन गया है। प्रत्येक व्यवहार को बुद्धि की कसौटी पर कस कर ही स्वीकार करना चाहता है। यह बुरा नहीं। बुद्धिमान होना मनुष्य की शोभा है। अन्य प्राणियों से बुद्धि में बढ़ा -चढ़ा होने से ही मनुष्य उन सबसे श्रेष्ठ माना गया है। किन्तु आज के बौद्धिक चमत्कारों के जो फल हमारे सामने आ रहे हैं, वे बड़े ही निराशाजनक तथा भयप्रद हैं।

बुद्धिमान होना अच्छा है किन्तु बुद्धिवादी होना उतना अच्छा नहीं है। आज हम अपने को विगत युगों के मानवों से अधिक बुद्धिमान तथा सभ्य मानते हैं। आज हम अपनी वैज्ञानिक उपलब्धियों पर गर्व करते हैं और कहते हैं कि हमने अपने पूर्वकालीन पूर्वजों से अधिक उन्नति और विकास किया है। यह ठीक है कि आज के मनुष्य ने उन्नति की है, किन्तु याँत्रिक क्षेत्र में। मानवता के क्षेत्र में नहीं। जब तक हम बुद्धि के बल पर मानव मूल्यों की प्रतिस्थापना नहीं करते, सही मानो में बुद्धिमान कहलाने के अधिकारी नहीं हो सकते।

किसी ओर भी दृष्टि डाल कर देख लीजिये, प्रश्नों, परेशानियों, समस्याओं तथा असमाधानों के ही दृश्य दिखाई देते हैं। न कोई प्रसन्न दीखता है और न निश्चिन्त। संशय, भय, आशंका मानव अस्तित्व को घेरे हुए दृष्टिगोचर होंगे। सुबह से शाम तक यन्त्र की तरह काम करता हुआ भी मनुष्य न तो आश्वस्त दीखता है और न अभाव मुक्त ।

लोग बड़े उत्साह से जीवन क्षेत्र में उतरते हैं, किन्तु कुछ ही समय में उन्हें अनुभव होने लगता है कि उनके उत्साह के लिये संसार में कोई मार्ग नहीं है और तब वह उतरे हुए ज्वार की तरह सिमट कर एक संकुचित सीमा में धीरे-धीरे, थका-थका, रेंगता हुआ चलने लगता है। मानो न वह जी रहा है और न जीना चाहता है। ज्यों-त्यों मिली हुई श्वाँसों का बोझ उतार रहा है। यह सब निराशा एवं अवसाद, बुद्धि का फल नहीं है, बल्कि बुद्धिवादिता की देन है। केवल बुद्धिवादी बने रहने से मनुष्य में एक नीरसता, शून्यता का आ जाना स्वाभाविक ही है।

किन्तु इस मानवीय क्षति की ओर किसी का भी ध्यान नहीं जाता। साक्षरता, शिक्षा, विद्या, विद्यालयों, विश्वविद्यालयों, प्रशिक्षण केन्द्रों तथा वैज्ञानिक संस्थानों को दिनों दिन बढ़ाया जा रहा है। किसलिए? जिससे कि मनुष्य अधिक से अधिक बुद्धिमान बने, अपने जीवन में विकास करे और समाज की उन्नति में सहायता दे। किन्तु इन प्रयत्नों के परिणामों पर कोई सोचने को तैयार नहीं दीखता। भौतिक उपलब्धियों के पीछे मनुष्य को इस सीमा तक डाल दिया गया है कि यह सोच सकना उसकी शक्ति के परे की बात हो गई है कि इन भौतिक उपलब्धियों का उद्देश्य केवल उपलब्धि ही नहीं है। इनका उद्देश्य है, इनके द्वारा मानवता का दुःख-दर्द दूर करना, उसके अभावों तथा समाधानों का निराकरण करना। किन्तु इस वाँछित बुद्धि को जगाने के बजाय जगा दी गई है— एक सर्वभक्षी होड़, एक आर्थिक प्रतिस्पर्धा, जिसका फल यह हो रहा है कि मनुष्य —मनुष्य को कुचल कर भौतिक उन्नति में आगे निकल जाना चाहता है। जीवन के मूल उद्देश्य मानव के प्रति मानव का स्नेह, अनुशासन, सेवा, सहयोग, सहायता तथा बन्धु-भाव का सर्वथा अभाव होता जा रहा है संसार में दीखने वाली व्यग्रता, व्यस्तता तथा आपाधापी इसी अभाव की विकृतियाँ हैं। विद्यार्थी पढ़ते हैं अपने लिये— मनुष्य परिश्रम करता है अपने लिये— व्यापारी व्यवसाय करता है तो अपने लिये। तात्पर्य यह है कि वह जो कुछ करता है सब अपने लिये — जो कुछ चाहता है सब अपने लिये। इस “अपने लिये” ने मनुष्य को इतना शुष्क तथा संकीर्ण बना दिया है कि उसकी सारी मन-बुद्धि अपने तक ही सीमित हो गई है, जिससे स्वार्थ संघर्षों के फलस्वरूप समाज में शोक सन्तापों की वृद्धि होती जा रही है। आज आपा बढ़ाना ही मनुष्य ने अपनी बुद्धि विकास का लक्ष्य बना रक्खा है। यह सब स्वार्थपूर्ण बुद्धिवाद का ही विकार है। जिस परमात्मा के सर्वोत्कृष्ट प्रसाद बुद्धि का उपयोग मानव-मूल्यों को बढ़ाने में किया जाना चाहिए था, उसका उपयोग निकृष्ट से निकृष्ट स्वार्थ साधनों में किया जाने लगा है। अनैतिकता पर परदे के रूप में, दूसरे के अधिकार अपहरण करने में, पटुता के रूप में अपने अनधिकृत स्वार्थ सिद्धि में, सकुशलता के रूप में, आय के अनुचित साधन बढ़ाने के लिये चतुराई के रूप में बुद्धि का उपयोग कर सकना ही बुद्धिमत्ता की परिभाषा बन गई है। ऐसा नहीं कि इस अमानवीय मान्यता के कुफल न भोगने पड़ते हों। खूब अच्छी तरह भोगने पड़ रहे हैं, किन्तु युग की विशेषता बुद्धिवादिता के कारण धारणा बदलने को तैयार नहीं। अपने ही कारण अपने पर आये दुःख कष्टों का हेतु दूसरे को मान लेना और उसका बदला तीसरे से लेने का प्रयत्न करना बुद्धिवादिता की विशेष प्रेरणा बन गई है।

आज एक ओर सौभाग्य से जहाँ मनुष्य की बुद्धि ने विस्मयकारक विकास किया है, वहाँ दूसरी ओर दुर्भाग्य से उनका नियन्त्रण तथा सदुपयोग का भाव शिथिल हो गया है। बुद्धि का तीव्र विकास जितना लाभकारी है उससे कहीं अधिक हानिकारक उसका अनियंत्रण तथा असंयम होता है। यही कारण है कि आज बुद्धि के चमत्कारी वैज्ञानिक अनुसन्धान मनुष्य के सिर मृत्यु की छाया की तरह मँडराते नजर आते हैं। यहीं पर यदि मनुष्य की विचारा धारा नियंत्रित भी हो सकी होती तो यह वैज्ञानिक उपलब्धियाँ सुख और संतोष के वरदान सिद्ध होतीं। पर बुद्धिवाद से अभिशापित मनुष्य का विश्वास मनुष्य पर से उठता जा रहा है।

पूर्वकालीन मानवों से अपने को अधिक बुद्धिमान मानने तथा सभ्य एवं विकासशील कहने वाले यह नहीं सोच पाते कि अपेक्षाकृत कम बुद्धिमान होने पर भी वे एक दूसरे की तरह आज की भाँति खतरा नहीं बने हुए थे। उनमें आपस में कितना सौहार्द्र, स्नेह तथा सहयोग रहा है? उनका समय आज के समय से कितना निश्चित तथा समाधान पूर्ण था? यही कारण है कि उस समय जिस प्रकार अध्यात्म पूर्ण मानवता का विकास हुआ है, उसका शताँश भी आज देखने को नहीं मिल रहा है। जो सभ्यता, संस्कृति कला-कौशल तथा परोपकार एवं पारस्परिकता की भावना पूर्व-कालीनों ने संसार को दी थी, हम बहुत कुछ उसी के आधार पर चलते हुए आज इतना बढ़ पाये हैं। जहाँ पूर्वकालीनों ने विचार करके सभ्यता के सन्देश सारे संसार को देकर प्रबुद्ध बना दिया था, वहाँ आज लगभग पूरा संसार सभ्य होकर मानवीय सभ्यता के विनाश पर तुल गया है। संसार के अधिक सभ्य एवं प्रबुद्ध होने से तो सुख−शांति की सम्भावनाओं की वृद्धि होनी चाहिए थी, वहाँ उल्टे भय, शोक और सन्ताप ही बढ़े हैं। यह सब नीरस एवं अनियंत्रित बुद्धिवाद का ही कुपरिणाम है।

अब प्रश्न यह है कि आज के इस बुद्धि-विकास के युग में इन विकृतियों का कारण क्या है और क्या है इनके समाधान का उपाय? अब वह समय आ गया है कि जब कि मनुष्य को रुक कर सोचना, विचार करना आवश्यक हो गया है, अन्यथा बुद्धिवाद से हाँका हुआ संसार शीघ्र ही अपना विनाश कर लेगा।

इसी आत्मिक अश्रद्धा के कारण उसके हृदय से आत्मीयता का भाव उठ गया है। उसे किसी दूसरे के प्रति न तो सहानुभूति रह गई है और न स्नेह, उसमें एक शुष्क स्वार्थ का बाहुल्य हो गया है। अधिक बुद्धि पाकर यदि वह अपने से कम बुद्धि वालों के प्रति अपना कर्तव्य समझ उनको अपने साथ ले चलने की नैतिकता के प्रति श्रद्धावान हो सकता तो निश्चय ही जहाँ संसार में आज संशय, भय, अविश्वास एवं असमाधान दीखता है, वहाँ आश्वासन, प्रसन्नता, विश्वास तथा सुख समाधान की ही परिस्थितियाँ दीखतीं।

अश्रद्धावान व्यक्ति में स्वभावतः ही स्वार्थ, असन्तोष तथा अतृप्ति का दोष उत्पन्न हो जाता है। श्रद्धा ही एक ऐसा प्रकाश है, जो मनुष्य को अनात्मिक-अन्धकार में खोने से बचाये रहता है। श्रद्धावान को जहाँ अपने प्रति स्नेह रहता है, वहाँ दूसरों के प्रति भी। आज के बुध्यातिरेकता के युग में इसी श्रद्धा नामक मानव मूल्य का अभाव हो गया है। जिस दिन मनुष्य में श्रद्धा के भाव की बहुलता हो जायेगी-बुद्धिवादिता का नियमन होगा, तब आज के ध्वंस-सूचक बौद्धिक चमत्कार सृजन सम्बन्धी वरदान बन जायेंगे।


जिन्दगी निरुद्देश्य नहीं—सोउद्देश्य जियी जाय।

जिन्दगी एक रास्ता है, जो हर आदमी को पूरा करना होता है। कोई इसे सफलतापूर्वक पूरा कर लेते हैं और कोई असफलता की वेदना लिये हुये इस के दूसरे छोर पर पहुँचते हैं। जिन्दगी की इस राह पर झाड़-झंखाड़ों से भरे जंगल भी हैं और फूलों भरी फुलवारी भी। कोई चलता-चलता झाड़-झंखाड़ों में उलझ जाता है तो कोई फूलवारी की मोहक गोद में पहुँचता है।

जिन्दगी का रास्ता चलते-चलते हम कहाँ पहुँचें। यह सोच समझ कर तय करना होगा और उसी के अनुसार अपनी डगर भी। कुछ लोग केवल चलते रहने में विश्वास रखते हैं। चलते चलो कहीं न कहीं तो पहुँच जायेंगे। ऐसे व्यक्ति अधिकतर उन्हीं स्थानों पर पहुँचते हैं जहाँ पर उन्हें पश्चाताप होता है और वे सोचा करते हैं कि गलती की। हमको रास्ता निश्चित करके ही चलना चाहिए था। किन्तु उस समय उनके पास न तो समय शेष रह जाता है और न शक्ति, जिससे कि वे लौटकर उस जगह से अपना रास्ता ठीक कर लें जहाँ से उन्हें अपने रास्ते का उचित चुनाव कर लेना चाहिये था।

इसके विपरीत जो लोग ठीक समय और ठीक स्थान पर आगे चलने का रास्ता सोच-विचार कर चुन लेते हैं वे प्रायः उसी स्थान पर पहुँचते हैं जहाँ उन्हें पहुँचना होता है और तब वे अपने को सफल मानते हैं। उन्हें पश्चाताप नहीं होता। एक सन्तोष होता है। यदि उनका जीवन यान किसी कारणवश फुलवारी में नहीं पहुँच पाता है तब भी कंटकित वनस्थली से तो बच ही जाता है। उन्हें यह सोचकर सन्तोष पाने का अवसर रहता है कि हम ठीक रास्ते पर ठीक से चले। अपने प्रयत्न में कोताही नहीं रक्खी अब अगर फूलों भरी फुलवारी में नहीं भी पहुँच पाये तो कोई बात नहीं। हम पर मूर्खता अथवा अकर्मण्यता का लाँछन तो नहीं आया।

ऐसा कोई बिरला ही होता है, जो होश सँभालते ही रास्ता चुन लेता है। नहीं तो प्रायः होता यही है कि बहुत कुछ चल लेने के बाद ही रास्ता ठीक करने का होश आता है। इस बात को होश जब आये यानी मन में यह विचार उठे कि अब हम सयाने हो गये लोग हमें उत्तरदायी समझने लगे हैं अब हमें एक निश्चित रास्ता तय कर लेना चाहिये और उसी पर चल कर हम जो कुछ बनना चाहते हैं, जहाँ पहुँचना चाहते हैं वह बन जायें और वहाँ पहुँच जायें । विचारों का यही स्थल वह चौराहा है जहाँ पर से जिन्दगी के अन्त तक चलने वाली राह चुननी होती है।

जिन्दगी के चौराहे पर सभी को देर-सबेर एक दिन पहुँचना होता है और जरूरी हो जाता है कि एक उचित रास्ता पकड़ा जाये। इस चौराहे पर एक रास्ता तो वह होता ही है जिस पर हम चले आ रहे होते हैं और जो सीधा-सपाट सामने चला जाता है। एक रास्ता दायें और एक बायें जाता है। अब यहीं से वह रास्ता चुनना है जो हमें ठीक-ठीक लक्ष्य तक पहुँचा दे। यदि इसके चुनाव में गलती हो गई तो हम अपने लक्ष्य से भटकर ऐसी जगह पहुँच जायेंगे जहाँ पर हमारे अस्तित्व को भय उत्पन्न हो सकता है। क्योंकि हम जो बनना चाहते थे वह न बन सकेंगे, तब ऐसी स्थिति में हम वैसे बन जायेंगे जिससे क्षोभ में अस्तित्व खो जायेगा।

यदि हम विचारपूर्वक सही रास्ता चुन सके तो लक्ष्य पर जा पहुँचेंगे जिसका परिणाम हर्ष, उल्लास, प्रसन्नता और सन्तोष के रूप में हमारे सामने आयेगा। हम अपने को सफल समझेंगे और अपनी आत्मा में सुख-समृद्धि और प्रतिष्ठा का अनुभव करेंगे। स्वयं अपनी दृष्टि में ऊँचे उठ जायेंगे।

इसी चौराहे पर आकर हम अपने भाग्य विधाता की स्थिति में होते हैं, और रास्ते के उचित चुनाव पर हमारी भावी सुख सफलता निर्भर रहती है। यही वह असमंजस की घड़ी होती है जब हम अपने मूल मन्तव्य के अनुसार प्रेरित होते हैं। यदि वास्तव में हमारी जिन्दगी का कोई मन्तव्य है और हम उसके प्रति ईमानदार हैं तो निश्चय ही उचित रास्ता चुनेंगे और दृढ़तापूर्वक उसमें आये अवरोधों को पार करते हुए लक्ष्य तक पहुँचने के लिए आजी वन चलते रहेंगे, और यदि हमारी जिन्दगी का कोई उद्देश्य नहीं यों ही उल्टी-सीधी जी डालना चाहते हैं तब या तो जिस रास्ते चले आते हैं उसी पर चलते चले जायेंगे या बिना सोचे समझे जिधर सींग समायेगें चल निकलेंगे।

संसार में आज तक जितने भी सफल और लक्ष्य गामी लोग हुये हैं, वे इस जिन्दगी के चौराहे पर अवश्य रुके हैं, ठीक से विचार कर लक्ष्य की ओर ले जाने वाले रास्ते का चुनाव किया है और दृढ़तापूर्वक उस पर चले हैं। किन्तु ऐसा कर वे ही लोग पाते हैं जिनका लक्ष्य पूर्व निर्धारित, निश्चित और स्पष्ट होता है।

जिन्होंने अपनी जिन्दगी का कोई उद्देश्य निश्चित नहीं किया है, लक्ष्य निर्धारित नहीं किया है उनके लिए कोई रास्ता निरापद नहीं हैं। वे जब किसी एक रास्ते पर चलकर उसके फल पायेंगे तो सोचेंगे कि वे यह तो नहीं चाहते थे। उनकी वाँछा तो यह है, और जब असन्तोष वश रास्ता बदल कर दूसरे रास्ते पर चलकर परिणामों के सामने आएंगे तब फिर ‘यह नहीं वह’ का असन्तोष होगा। इस प्रकार उनकी सारी जिन्दगी ‘इस और उस’ के अर्थ में लग जाती है और वे एक असफलता, एक असन्तोष लेकर दुनिया से रवाना हो जाते हैं। इसलिये जरूरी है कि कोई न कोई, स्थिति के अनुकूल, साधारण अथवा असाधारण उद्देश्य लेकर ठीक रास्ते से जिन्दगी चलानी चाहिये।

ऐसे लोग अधिक नहीं होते जो इस जिन्दगी के चौराहे पर पहुंचकर रास्ते का ठीक चुनाव कर पाते हैं। यही कारण है कि संसार में बहुतायत ऐसे लोगों की है जो एक निरुद्देश्य जिन्दगी की भँवर में फँसे हुये शोक-सन्तापों के शिकार बने रोते-झींकते नजर आते हैं। न तो वे अपनी जिन्दगी में खुद कोई रस पाते हैं और न किसी की रसानुभूति में सहायक हो पाते हैं।

मनुष्य की बुद्धिमानी इसी में है कि वह अपने को इन अहितकर श्रेणियों में से किसी को भी सदस्य न बनने दे, और यदि वह किसी कारण बन गया है तो उसका त्याग कर दे और ठीक-ठीक बुद्धिमान और हाथ- पाँव के वर्ग में आये। यदि अब तक वह किसी लक्ष्य को निर्धारित नहीं भी कर पाया है तो अब करले और उसी अनुसार अपना रास्ता चुन कर उस पर दृढ़तापूर्वक निकले। लक्ष्य का चुनाव अपनी शेष जिन्दगी, उसी शक्ति और साधनों के अनुसार करे। यदि महत्वाकाँक्षा बोझिल हो उठी हैं तो उन्हें त्याग दे। यदि बिना विचार निर्धारित किया हुआ लक्ष्य असह्य दीखता है तो उस कम दूरी वाला लक्ष्य, अपनी गति के अनुपात के अनुसार फासले वाला, उद्देश्य निश्चित करलें और उसकी ओर जाने वाले रास्ते पर चल पड़े।

जिन्दगी कितनी ही लम्बी और विश्वासपूर्ण क्यों न हो, हमेशा छोटी और अविश्वस्त ही है। इसका गया हुआ क्षण मूल्यवान है हर आने वाला क्षण कीमती है इसलिए एक-एक क्षण लक्ष्य की दिशा में उपयोग किया जाना विवेकशीलता है। जीवन में एक सामान एवं साधारण जिन्दगी जीने तक को भी जब लक्ष्य बना लिया जाता है तो उसमें विशिष्टता तथा महानता का समावेश हो जाता है। जरूरी नहीं कि बड़ी-बड़ी चीज पाने को ही लक्ष्य बनाया जाये। जो जिन्दगी आपको मिली है उसे व्यवस्थित रूप से एक रस बिता जाना भी एक ऊँचा लक्ष्य है और जब आप इस विश्वास के साथ अपनी शेष जिन्दगी को भी अन्त तक एक जैसा शान्त और सुव्यवस्थित रूप में पूरा कर लेंगे तो एक लक्ष्य ही पालेंगे और सुख-सन्तोष की वाँछित फुलवारी की गोद में पहुँच जायेंगे।

जिनके सामने एक लम्बी जिन्दगी पड़ी है। जिन्दगी की शुरुआत करनी है वे अपने जीवन का कोई न कोई उद्देश्य अवश्य बना लें और चलने से पूर्व उसके अनुरूप रास्ता चुन लें जिससे कि वे अपने लक्ष्य की ओर ही ठीक-ठीक अग्रसर हो सकें। फिर वह लक्ष्य एक साधारण-सी नौकरी और छोटा-सा परिवार ही क्यों न हो।


“मन के हारे-हार है, मन के जीते-जीत”

कहा गया है कि — “मन के हारे—हार है, मन के जीते-जीत” यह साधारण-सी लोकोक्ति एक असाधारण सत्य को प्रकट करती है और वह है मनुष्य के मनोबल की महिमा। जिसका मन हार जाता है, वह बहुत कुछ शक्तिशाली होने पर भी पराजित हो जाता है और शक्ति न होते हुए भी जो मन से हार नहीं मानता, उसको कोई शक्ति परास्त नहीं कर सकती ।

मनुष्य की वास्तविक शक्ति मनोबल ही है। मनोबल से हीन मनुष्य को निर्जीव ही समझना चाहिए। संसार के सारे कार्य शरीर द्वारा ही सम्पादित होते हैं, किन्तु उसका संचालक मन ही हुआ करता है। मन का सहयोग पाये बिना शरीर-यन्त्र उसी प्रकार निष्क्रिय रहा करता है, जैसे— बिजली के अभाव में सुविधा- उपकरण अथवा मशीनें आदि।

बहुत बार देखा जा सकता है कि साधन-शक्ति तथा आवश्यकता होने पर भी जब मन नहीं चाहता तो अनेक कार्य बिना किये पड़े रहते हैं। शरीर के अक्षत रहते हुए भी मानसिक सहयोग के बिना कोई काम नहीं बनता। और जब मन चाहता है तो एक बार रुग्ण शरीर भी कार्य में प्रवृत्त हो जाता है। जो काम मन से किया जाता है वह अच्छा भी होता है और जल्दी भी। बेमन किये हुए काम न केवल अकुशल ही होते हैं, बल्कि बुरी तरह शिथिल भी कर देते हैं। मनोयोग रहने से मनुष्य न जाने कितनी देर तक बिना थकान अनुभव किये कार्य में संलग्न रहा करता है, किन्तु मन के उचटते ही जरा देर भी काम करने में मुसीबत आ जाती है। इस प्रकार देखा जा सकता है कि मनुष्य का वास्तविक बल— मनोबल ही है।

मनोबल के इस उत्थान-पतन से घटित होने वाले न जाने कितने परिवर्तन इतिहास में भरे पड़े हैं? सिकंदर जीता और पोरस हार गया। यह मोटा-सा ऐतिहासिक सत्य है। किन्तु यदि गहराई से देखा जाये तो तथ्य इसके विपरीत है—विजयी होते हुए भी सिकन्दर हारा और विजित होते हुए भी पोरस जीता। पोरस बन्दी हुआ, उसकी सेनाओं ने तलवारें नीची करलीं — यह शारीरिक हार थी। पर पोरस मन से नहीं हारा— यह सच्ची जीत थी। सिकन्दर के पूछने पर पोरस का यह उत्तर कि “ एक राजा जो व्यवहार दूसरे राजा से करता है।”— उसकी मानसिक पराजय थी, जिसे सिकन्दर को मान्यता देनी पड़ी और इतिहास को स्वीकार करना पड़ा कि पोरस हार कर भी नहीं हारा और सिकन्दर जीत कर भी जीता।

यह महान् सेनानियों, सम्राटों, महापुरुषों तथा योद्धाओं की बात रही। इनको लोग विशेष व्यक्ति कहकर मनोबल की बात को हल्का कर सकते हैं। सामान्य जनता के मनोबल के चमत्कार देखने के लिये गत विश्वयुद्ध के दौरान होने वाली दो-एक घटनाओं का स्मरण किया जा सकता है।

हिटलर ने हाहाकार मचा रक्खा था। उसका लक्ष्य तो पूरा विश्व था, किंतु इंग्लैंड विशेष लक्ष्य बना हुआ था। उसके आक्रमण से ‘इंग्लैंड अब गया, तब गया’ की स्थिति आ गई थी। किन्तु वहाँ के राजनेता भले ही एक बार विचलित हो उठे हों, लेकिन जनता ने अपने मनोबल को नहीं खोया था। इसका प्रमाण यह है कि जिस समय डंकर्क के मोर्चे से ब्रिटेन की लगभग तीन साढ़े-तीन लाख सेना भागी थी, उस समय उसकी अधिकाँश युद्ध-सामग्री भी वहीं छट गई और इंग्लैंड की सेना शक्ति-साधन तथा शस्त्र विहीन हो गई। नौबत यहाँ तक आ पहुँची कि शत्रु को भ्रम में डालने के लिये खजूर के पेड़ कोलतार से रँग-रँग कर लन्दन के चारों ओर तोपों के स्थान पर लगाये गये थे।

अब प्रश्न यह था कि निःशस्त्नता की पोल खुलने से पहले ही सेनाओं को साधन एवं शस्त्र सम्पन्न कर दिया जावे। यह काम इंग्लैंड की नागरिक जनता का था। हार पर हार हो रही थी, सैन्य-सामग्री समाप्त हो गई थी, हिटलर के हमले पर हमले हो रहे थे।

ऐसी दशा में जनता के हाथ-पैर फूल जाना कोई बड़ी बात नहीं थी। किन्तु इंग्लैंड की मनोधनी जनता ने अपना मनोबल नहीं खोया। वह हर भय, आपत्ति तथा खतरों की ओर से निरपेक्ष होकर अपने काम में दिन और रात जुट गई। इस हद तक जुट गई कि एक बार प्रधान मन्त्री विंस्टन चर्चिल एक कारखाना देखने गये तो किसी ने उनका अभिवादन करने तक में समय खराब करना उचित न समझा। प्रधान मन्त्री कारखाना घूम कर बाहर आये और पत्रकारों को बताया कि जिस इंग्लैंड की जनता का मनोबल इतना ऊँचा है और जो अपने कर्तव्य को ठीक-ठीक समझ कर पूरा करने में इतनी ईमानदार है, उस ग्रेट-ब्रिटेन को एक हिटलर क्या हजार हिटलर भी परास्त नहीं कर सकते। और कुछ ही समय बाद इंग्लैंड जीता और हिटलर की हार हुई। यह विजय किसकी थी— सैनिकों की ? नहीं यह इंग्लैंड की जनता के मनोबल की विजय थी।

दूसरी घटना फ्राँस की है। जनरल पेताँ ने पेरिस में मोह में आकर मनोबल खो दिया और बिना हारे ही झण्डा झुका दिया। फ्राँस की स्वतन्त्रता-प्रिय स्वाभिमानिनी जनता ने अपने इस निकृष्ट कल्याण को अकल्याण माना। उसने जनरल पेताँ का बहिष्कार कर दिया और जनरल दिगाल को नेता बनाया। पेरिस का पतन हो चुका था, किन्तु वहाँ की जनता सुलभ साधनों को लेकर जंगलों तथा पर्वतों में फैल कर गुरिल्ला युद्ध करने लगी। उसने अपनी स्वतन्त्रता को सेना तथा सेना-नायकों पर निर्भर नहीं रहने दिया। भूखी-प्यासी फ्राँस की जनता इस मनोबल से लड़ी कि आखिर हिटलर को लेने के देने पड़ गये। फ्राँस स्वतन्त्र हुआ और पेरिस पर फिर राष्ट्र-ध्वज फहराने लगा। यह विजय किस की थी फ्राँस की उस जनता के मनोबल की, जिसके नेता विजय की आशा छोड़ बैठे थे।

एक घटना रूस की है। जहाँ की मनोधनी जनता ने मनोबल का रोमाँचकारी उदाहरण उपस्थित किया है। एक दिन रात के दो बजे हिटलर ने धोखे से रूस पर आक्रमण कर दिया और उसी फौजें रूस में दूर तक घुस कर मास्को तथा लेनिनग्राड तक पहुँच गई। लगभग पूरे योरोप के बर्बर विजेता हिटलर की फौजें असावधान रूस पर टूट ही नहीं पड़ी, प्रमुख राज-नगरों में पहुँच गई। संयोग की भयंकरता से रूसी जनता में भगदड़ मच जानी चाहिए थी, किन्तु नागरिकों ने हिम्मत न हारी। वह गली-गली, सड़क-सड़क, कूँचे-कूँचे, घर-द्वार, हाट-वाट दुश्मन से जूझ पड़ी। उसके शस्त्र— लाठी, डण्डा, भाला, बल्लप, मुँह-हाथ, प्याले-प्लेट, मेज-कुर्सी आदि बन गये। मास्को तथा लेनिनग्राड की गलियाँ खून और लाशों से भर गई लगभग डेढ़ करोड़ रूसी जनता काम आई, जिसमें से छः लाख वे बलिदानी नागरिक थे, जिन्होंने अपना पूरा राशन सेना को दे दिया था और खुद भूख से तड़प-तड़प कर प्राण दे दिये थे। इसका फल यह हुआ कि रूस के लेनिनग्राड तथा मास्को की भूमि से हिटलर की फौजें वापिस न आई और वहीं से हिटलर की पराजय प्रारम्भ होकर जर्मनी की बरबादी तक पहुँची। यह विजय किस की थी? रूसी फौजों, नेताओं की अथवा लाठी-डण्डों, प्याले प्लेट आदि अस्त्रों की? सर्वथा नहीं, यह विजय थी—रुस की जनता के महान् मानसिक बल की, जो कि उस अन्तक आपत्ति में भी यथावत बना ही नहीं रहा, बल्कि और अधिक बढ़ गया।

रूस, इंग्लैंड तथा फ्राँस की जनता ही नहीं, अभी के चीनी आक्रमण तथा पाकिस्तान के युद्ध में भारतीय जनता ने जिस मनोबल को परिचय दिया, उससे न केवल देश की रक्षा ही हुई, बल्कि संसार में भारत का मान ऊँचा हो गया।

इस प्रकार कहना होगा कि युद्ध से लेकर नित्यप्रति की सफलताओं में मनोबल ही काम किया करता है। मनोधनी व्यक्ति बड़ी से बड़ी आपत्तियों को जीत कर अपना मार्ग बना लेता है। कोई साधन न होने पर भी मानसिक बल के विश्वासी कभी किसी परिस्थिति से परास्त नहीं होते। इसलिये मनुष्य को चाहिये कि वह बड़ी से बड़ी और विकट से विकट परिस्थिति में भी अपना मनोबल न जाने दे और सदैव याद रक्खें—” मन के हारे हार है, मन के जीते जीत।”


प्रसन्न रहिए-प्रगतिशील बनिए।

प्रसन्नता संसार का सबसे बड़ा सुख है। जो प्रसन्न है वह सुखी है और जो सुखी है वह अवश्य प्रसन्न रहेगा। जिसके जीवन से प्रसन्नता चली गई, हर्ष उठ गया, वह जीने को जीता तो है ही किन्तु निर्जीव जैसा। जीवन में क्या आनन्द है उसमें कितनी सुख-शान्ति है यदि इसका अनुभव न किया जा सका तो जिन्दगी को एक शव की भाँति ढोना ही समझना चाहिये। जिन्दगी जीने के लिये मिली है भार ढोने के लिये नहीं।

जो बाहर से गरीब है, अभावग्रस्त है, यदि वह अन्दर से अनुद्विग्न है तो वह सुखी ही रहेगा। कोई भी असुविधा उसे दुःखी नहीं कर सकती। जीवन में कुछ भी न होने पर भी यदि किसी के पास मन की मौज और हृदय का हर्ष है तो वह संसार को सबसे सम्पन्न मनुष्य है।

आन्तरिक प्रसन्नता के लिए किन्हीं बाह्य साधनों की आवश्यकता नहीं। बाह्य साधन किसी की शारीरिक आवश्यकताएँ पूरी कर सकते हैं मन की मस्ती नहीं दे सकते। बड़े-बड़े राजे-महाराजे, सेठ-साहूकार, अफसर और ओहदेदार सुख-सुविधाओं के प्रचुर साधन होते हुये भी बुरी तरह से दुःखी और क्लान्त रहा करते हैं। इसके विपरीत गरीब और साधनहीन व्यक्ति बहुत कुछ सुखी और सन्तुष्ट देखे जाते हैं।

प्रसन्न मन व्यक्ति एक टूटी-फूटी झोपड़ी में भी सुखी रह सकता है और चिन्तित अथवा उद्विग्न चित्त मनुष्य राजमहल में भी दुःखी और असन्तुष्ट रहा करता है। जो मन से प्रसन्न है वही सुखी है, शान्त है और सम्पन्न है। जिसका हृदय प्रसन्न नहीं दुःखी है दरिद्री है और विपन्न है। जीवन के यथार्थ सुख के लिये मानसिक प्रसन्नता बहुत आवश्यक है। इसके अभाव का दूसरा नाम दुःख है सुखी होना है तो प्रसन्न रहिये, निश्चिन्त रहिये, मस्त रहिये।

प्रसन्न मन ही आत्मा को देख सकता है परमात्मा का साक्षात्कार कर सकता है और जीवन के समस्त श्रेयों को पा सकता है। अस्तु, जीवन को हर प्रकार से सफल बनाने के लिये प्रसन्न रहना बहुत आवश्यकता होता है। हर कीमत पर अपने हर्ष को बचाइए, प्रसन्नता की रक्षा कीजिए।

प्रसन्न रहने के लिये किसी बहुत बड़े सरंजाम की आवश्यकता नहीं। बहुत अधिक साधन इकट्ठे करने का अर्थ है दुःख को निमन्त्रित करना। जो प्रसन्नता और सुख-शान्ति के लिए छल-कपट और छीना-झपटी करके जमीन, जायदाद और धन-दौलत इकट्ठा करते हैं वह भूल करते हैं। बाह्य साधन आज तक न किसी को सुख-शान्ति दे सके हैं और न कभी दे सकेंगे।

मानसिक प्रसन्नता के लिये मनुष्य को अधिक से अधिक मुक्त रहना चाहिये। उसे अपने चारों ओर जटिलताओं का जाल नहीं रच लेना चाहिये। लोभ, मोह आदि को अधिक बढ़ा लेना ही अपने चारों ओर जटिलता का जाल बिछा लेना है। जिसका जीवन लोभ से प्रभावित है वह संसार की हर वस्तु को अपने लिये चाहा करता है। उसकी इच्छाओं का कोई ओर-छोर नहीं रहता। आज वह एक झोपड़ी चाहता है तो कल पक्के मकान की इच्छा करने लगता है। मकान मिलने पर कोठी की कामना धर दबाती है। लोभी व्यक्ति की इच्छाएँ इतनी बढ़ जाती हैं कि उसका पूरा जीवन उनकी पूर्ति करने में ही लग जाता है। हर प्रकार के अच्छे-बुरे साधनों का उपयोग करता हुआ वह अपनी इच्छाओं को तुष्ट करने में ही अपनी सारी सुख-शान्ति खो देता है। हजार तरह की चिन्ताएँ अनेक तरह के विक्षेप उसे घेरे रहते हैं। इच्छायें ज्यों-ज्यों पूरी होती जाती हैं वे बढ़ती ही जाती हैं और ज्यों-ज्यों बढ़ती जाती हैं त्यों-त्यों उनकी पूर्ति के लिये चिन्तित और व्यग्र होना पड़ता है।

इसके विपरीत जब इच्छाओं की पूर्ति नहीं होती तब भी दुःख होता है लोभी स्वभाव का व्यक्ति हर समय हर वस्तु के लिये तरसता रहता है जिससे उसके जीवन का सारा रस सूख जाता है वह नीरस तथा दरिद्री बन जाता है। न वह खुलकर हँस पाता है और न उल्लास प्रकट कर पाता है। दरिद्रता पूर्ण मनोवृत्ति का व्यक्ति बड़ा ही ईर्ष्यालु और क्रोधी होता है। वह किसी की उन्नति, किसी की सम्पत्ति फूटी आँखों नहीं देख पाता। बात-बात में झल्लाता, खिसियाता और कलह किया करता है। वह हर साधन सम्पन्न व्यक्ति को अपना शत्रु मानने लगता है। अपनी दशा का दोष दूसरों को देकर क्षुब्ध रहा करता है।

मोह प्रधान व्यक्ति का हृदय अत्यधिक दुर्बल होता है। उसे संसार की हर वस्तु से एक हार्दिक लगाव रहता है। अनिष्ट की सूचना पाने, कोई अप्रिय दृश्य देखने मात्र से ही व्यग्र और दुःखी हो उठता है। आँसू उसकी आँखों के कगारों पर ही रक्खे रहते हैं।

हर व्यक्ति से लगाव मानने के कारण मोह प्रधान व्यक्ति प्रत्येक को अपना मानने लगता है और उससे बड़ी-बड़ी अपेक्षाएं करने लगता है। जिस प्रकार वह सबके प्रति आकर्षित रहता है उसी प्रकार चाहता है कि दूसरा व्यक्ति भी उसे अपना समझें और उसकी ओर आकर्षित रहे। किन्तु संसार में ऐसा हो नहीं पाता। हर व्यक्ति किसी को अपना नहीं मान सकता और न हर प्रकार से हर तरह की सहायता कर पाता है।

मोह प्रधान व्यक्ति ही अपनी दुर्बलता के कारण सबसे अधिक धोखा खाते और ठगे जाते हैं। परावलम्बन कर स्वभाव होने से उसे कदम-कदम पर ठोकर खाना और निराश होना पड़ता है। मोह की अधिकता के कारण वह किसी बात को ठीक नहीं समझ पाता और न सुख-दुःख पूर्ण परिस्थितियों के प्रति निरपेक्ष रह पाता है इतनी निरर्थकताओं से भरे हुए व्यक्ति का जीवन भला किसी प्रकार से सुखी रह सकता है? कदम-कदम पर उलझते सुलझते चलने वाले चंचल मना मनुष्य की प्रसन्नता कभी भी अक्षुण्ण नहीं रह सकती ।

स्थायी प्रसन्नता के लिए मनुष्य में तटस्थ स्वभाव और निरपेक्ष दृष्टिकोण का विकास बहुत आवश्यक है। जो लोभी है, मोहि है वह कभी प्रसन्न नहीं रह सकते। प्रसन्नता के लिए मन का मुक्त रहना बहुत आवश्यक है। मन मुक्त तभी रह सकता है जब मनुष्य अपने में समदृष्टिकोण का विकास कर ले। संसार में सबसे प्रेम रखते हुये किसी से लगाव न रक्खा जाये। किसी वस्तु विषय अथवा व्यक्ति में इतना अनुरक्त न हुआ जाये कि उसकी ओर से तनिक सी प्रतिकूलता अथवा अप्रियता होने पर हृदय असहनीय पीड़ा से भर जाये।

किसी से बहुत अधिक अपेक्षा रखना अपने लिये दुःखों के बीज बोना है। सफलता के लक्ष्य से काम करते हुये असफलता के लिए सदैव तैयार रहना चाहिए। अधिक इच्छायें प्रसन्नता की सबसे बड़ी शत्रु हैं। कम से कम इच्छायें रखना और अधिक से अधिक सन्तुष्ट रहना प्रसन्नता में अभिवृद्धि करता है।

जिसका मन विकृत है, जो दूसरों के लिए दुर्भावनाएँ रखता है वह कभी भी प्रसन्न नहीं रह सकता। ईर्ष्या, द्वेष, दम्भ, छल, कपट के वशीभूत रहने वाला व्यक्ति जीवन में कभी प्रसन्नता नहीं प्राप्त कर सकता। निष्कामता, निर्लिप्तता एवं निर्विकारता प्रसन्नता का अमोघ उपाय है। सेवा, साधना, आस्तिकता, अतर्कता,विश्वास और श्रद्धा की भावना से भरे हृदय में सदैव प्रसन्नता का निवास रहता है।

जो जीवन में प्रसन्न रहना चाहता है सुख और शान्ति प्राप्त करना चाहता है उसे कर्तव्य-निष्ठा, परोपकारी और आत्म-परायण होना आवश्यक है। जो कर्तव्यनिष्ठ हैं, परोपकारी हैं, आत्म-निष्ठा है उसका हृदय निर्विकार और सन्तुष्ट रहता है। जो जीवन को दूसरों के लिए समझता है उसमें लोभ, मोह, काम, क्रोध आदि विकारों का अभाव रहता है। दूसरों के लिये जीने वाले का संसार में अपना कोई विशेष स्वार्थ नहीं रहता, जिससे वह निरर्थक मानसिक विक्षेपों से मुक्त रहने के कारण सदैव प्रसन्न और सुखी रहता है।


Quotation

स्वस्थ मनुष्य के चित्त के लिए प्रसन्नता वैसी ही प्राकृतिक है जैसा उसके गालों पर लाली, और जहाँ कहीं स्वाभाविक म्लानता होती है, वहाँ या तो दूषित वायु, अस्वास्थ्यकर भोजन, अनुचित रूप से कठिन परिश्रम होता है या भूल से भरी जीवन चर्चा।

—रस्किन


पराधीनता के बन्धन तोड़ फैंकिए।

पराधीनता प्राणी-मात्र के लिये सबसे कष्टकर स्थिति है। पराधीन व्यक्ति की अपनी कोई सत्ता नहीं होती। उसकी समस्त इच्छायें, आकाँक्षायें खाना-पीना रहना-सहना सब दूसरे की इच्छा पर निर्भर हो जाता है। पराधीन व्यक्ति अपनी इच्छा से उठ-बैठ तक नहीं सकता। उसे अपने हर कार्य और चेष्टा में यह भय बना रहता है कि कहीं मेरी अमुक बात मेरे अधिकारी को बुरी तो नहीं लगेगी। साराँश यह कि पराधीन व्यक्ति का समग्र अस्तित्व दूसरे का संकेत-पालक बन जाता है। उसका अपना व्यक्तित्व दूसरे में समाहित हो जाता है और वह अपने लिये-शून्य मात्र रह जाता है।

यह जितना भी चराचरमय जगत दृष्टिगोचर होता है वह सब मनुष्य के लिये है। संसार की प्रत्येक वस्तु पर मनुष्य की अखण्ड सत्ता है। मनुष्य जिस वस्तु को जिस प्रकार से चाहता है उपयोग में लाता है, उसे कोई रोकने, टोकने वाला नहीं है। वह जहाँ चाहता जमीन को जोतता, जहाँ चाहता मकान बनाता, जहाँ चाहता बाग लगाता और जहाँ चाहता खोदकर कुआं, तालाब और नहरें आदि बना लेता है। नदियों को बाँध लेता, समुद्रों में जहाज चलाता, पहाड़ों को काटता और जंगलों को उजाड़ डालता, पशुओं को पकड़ता, पालता और उनसे अपना काम लेता है। यह सब कुछ और इससे भी बड़े-बड़े साधिकार कार्य करने पर भी मनुष्य को कभी कोई रोकता, टोकता नहीं। इससे पूर्णतया प्रकट है कि यह सम्पूर्ण सृष्टि मानव मात्र के उपयोग के लिए ही है। वह जिस प्रकार से चाहे इसके साधनों द्वारा अपनी सुख सुविधा की व्यवस्था कर सकता है।

यह भी सत्य ही है कि मनुष्य जो कुछ भी करता है वह एक स्थिर सुख प्राप्त करने के लिए ही करता है। खाने से लेकर सोने तक और उपार्जन से लेकर व्यय तक वह जो कुछ क्रिया-कलाप किया करता है वह केवल सुख—एक अक्षय सुख पाने के लिए ही करता है। यहाँ तक कि मैत्री से लेकर युद्ध तक की सारी क्रिया प्रतिक्रियाओं की पृष्ठभूमि में सुख का ही उद्देश्य सन्निहित है।

किन्तु यह कम खेद और आश्चर्य का विषय नहीं है कि इतनी बड़ी और परिपूर्ण सृष्टि का अधिकारी और इतनी क्रियाओं का कर्त्ता होने पर भी मनुष्य अपनी वाँछित वस्तु ‘सुख’ को नहीं पा रहा है। आदि काल से लेकर आज तक के अपरिमित समय के सारे प्रयत्न व्यर्थ चले गए और चले जा रहे हैं। मनुष्य की इस कल्पनातीत असफलता से बड़ी खेदजनक बात और क्या हो सकती है?

क्या कारण है कि प्रचुर साधनों, सम्मिलित उपायों और वैयक्तिक प्रयासों के बावजूद भी मनुष्य सुख नहीं पा रहा है? ज्यों-ज्यों वह सुख प्राप्ति के प्रयत्न करता और उपकरण इकट्ठे कर रहा है त्यों-त्यों वह अधिकाधिक दरिद्री, दुःखी और दयनीय होता जा रहा है? प्रयासों के इस विपरीत परिणाम का एक प्रमुख कारण है मनुष्य की पराधीनता! संसार के समस्त पदार्थों का स्वामी होते हुए भी मनुष्य अपना स्वयं का स्वामी नहीं है। सब कुछ उसके वश में है, किन्तु वह स्वयं अपने वश में नहीं है। अपनी मानसिक दुर्बलता के कारण अपने को दुःख-दर्द, रोग-शोक, विषय-वासना, काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि कष्टदायक अनुभूतियों के वश में किए रहता है। वह इनको अपने अधीन रखने के बजाय स्वयं ही इनका गुलाम बन जाता है। इनमें से जब जो विकार चाहता है मनुष्य पर हावी हो बैठता है और अपने अनुकूल उसे हाँकता रहता है।

यह अनुचित अधिकार प्राप्त विकार एक क्षण को भी मनुष्य को चैन नहीं लेने देते। कभी शोक तो कभी क्षोभ, कभी काम तो कभी क्रोध, कभी मद तो कभी मत्सरता, कभी मोह तो कभी ईर्ष्या द्वेष आदि उसे दबाए हुए त्रास देते ही रहते हैं। दुःख के इतने अधिक हेतुओं को अपने अंदर पाल लेने पर भूला मनुष्य किस प्रकार सुखी हो सकता है? सुख तो स्वतन्त्र और स्वाधीन रहने में है।

यही नहीं जो मनुष्य सुख साधनों का भी गुलाम बन जाता है वह भी दुःखी ही होता है। मनुष्य धन दौलत, जमीन जायदाद, कुटुम्ब परिवार, बन्धु बाँधव जिनका भी संचय किया करता है, वह सब सुख के लिए ही करता है।

जब तक मनुष्य इनको अपने अधीन रखता है इनको साधन मानकर निरपेक्ष व्यवहार करता है तब तक तो किसी हद तक झूँठा सच्चा सुख चैन पाता है, किन्तु ज्यों ही वह इन पर निर्भर होकर अपने को इनके वश में कर देता है, इन्हें जीवन का साध्य एवं श्रेय मान लेता है त्यों ही वह दुःखी होने लगता है। सुख बाह्य साधनों की गुलामी में नहीं अपने को स्वाधीन रखने में है। जिस दिन मनुष्य के मस्तिष्क में स्ववश रहने का महत्व अपना समुचित स्थान पा लेगा, उसी दिन दुःखों से निस्तार पाकर सुखी हो जायेगा।

वासनाओं, वस्तुओं और विकारों की अधीनता भी मनुष्य की अपनी कमजोरी है। इनमें स्वतः मनुष्य को गुलाम बना लेने की सामर्थ्य नहीं है। मनुष्य ने भ्रमवश इनको अपने से अधिक शक्तिशाली समझ लिया है। इनको अपने से अधिक शक्तिशाली समझ लेने से स्वाभाविक है कि मनुष्य अपने को निर्बल और निरुपाय समझे। मन में निर्बलता का भाव आते ही कायरता की उत्पत्ति होती है। जिससे मनुष्य की सारी शक्तियाँ शिथिल हो जाती हैं। अपनी इसी दुर्बलता के कारण वह किसी भी विकार के प्रति तत्काल आत्म-समर्पण कर देता है। अभ्यासवश वह इस दुर्बलता के इतना वशीभूत हो गया है कि परिणाम जानते और भोगते हुये भी विकारों का विरोध करते डरता है। वह समझ बैठा है कि वासनाओं और विकारों के अनुकूल परिचालित न होने से यह सब विद्रोह का भूकम्प लाकर एक क्षण को उसे सुख चैन से न बैठने देंगे। अपने इस काल्पनिक भय से ही मनुष्य उन्हें परितृप्त कर देने ही में अपना कल्याण समझता है।

क्रोध होने पर गुस्सा कर लेना आवेग आने पर उसे देना, मोह होने पर रो लेना, ईर्ष्या द्वेष होने पर जल लेना और लोभ पर स्वार्थ साधन कर लेना ही मनुष्य ने सुख का एक सीधा और सरल मार्ग मान लिया है।

विकार वेग वास्तव में उस पागल कुत्ते की तरह है जो अपने पालने वाले को ही काट लेते हैं। इन पागल कुत्तों को न पालना ही मनुष्य की सबसे बड़ी बुद्धिमानी है। जो जितना अधिक विकारों को पालता और परिपुष्ट करता है वह उतना ही अधिक अपने जीवन में विष बीज बोता है। सुर-दुर्लभ मनुष्य जीवन को कौड़ी मोल खोता है।

मनुष्य जीवन का यह बहुमूल्य उपहार इसलिये नहीं मिला है कि इसे विषय-विकारों के कीटाणुओं का भोजन बनाया जाये। इसे तिल-तिल जलाकर नष्ट कर दिया जाये। दुःख और दरिद्रता का भंडार बना लिया जाये! यह बहुत मूल्य उपहार इसलिये मिला है कि इसको हर अनिष्टकारी आक्रमण से सुरक्षित रक्खा जाये और इसका सदुपयोग करके अपने सुन्दरतम सुख-मूल एवं सत्य-स्वरूप का साक्षात्कार किया जाये। अनन्त एवं आविष्कार आनन्द की उपलब्धि की जाये।

इस आनन्दपूर्ण आत्म-स्थिति को पाने का केवल एक ही उपाय है और वह है अपने को स्वाधीन करना? संसार के विषयों को एक उच्चमना स्वामी के समान भोग करना! जो बुद्धिमान व्यक्ति संसार के उपभोगों को स्ववश स्वामी की भाँति भोगता हुआ उनके वश में नहीं रहता, वह अवश्य सच्चे सुख का अधिकारी बनता है। विषया वेगों के वशीभूत होकर उनकी गुलामी करने वाले व्यक्ति को अपने भाग्य में दुःख-दर्द और शोक सन्तापों के अतिरिक्त अन्य किसी वस्तु की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए।

जिसका अपने पर अधिकार नहीं है जो गुलाम है पराधीन है, निर्बल और पराभूत है उसके लिए, उस सुख की आकाँक्षा करने का क्या अधिकार हो सकता है। सच्चा सुख, आत्म अधिकारियों, समर्थ स्वामियों और वासना के बैरियों की वाँछा है। कायर और कमजोरों को उसकी कामना नहीं करनी चाहिए।


Quotation

बिना चेष्टा के, बिना साधना के, स्वतन्त्रता, पेड़ के फल की भाँति नहीं टपक सकती और बिना स्वतन्त्रता के जीना वृथा है।

—देशबन्धु चित्त रंजन दास


परिष्कृत संस्कृत के महान् प्रणेता—महर्षि पाणिनि

मनुष्य क्या और कितना कुछ कर सकता है, इसका कोई अनुमान नहीं लगाया जा सकता है। इसके सम्बन्ध में केवल यही कहा जा सकता है कि वह सब कुछ कर सकने में पूर्ण समर्थ है, यदि वह वास्तव में कुछ करना चाहता है। बात ऐसी भी नहीं है कि कुछ कर सकने की क्षमता कुछेक गिने चुने लोगों में ही है हर व्यक्ति बहुत कुछ कर सकने में समान रूप से समक्ष है।

अब यहाँ पर मनुष्यों के कर्त्तव्यों में असमानता इसलिये हो जाती है कि कुछ, कुछ कर दिखाने की चिन्ता करते हैं और हौसला रखते हैं बाकी अपने जीवन की सारी क्षमतायें छीना-झपटी, खाने-पीने और हा-हा, ही-ही में गवाँ देते हैं। मोटे तौर पर अपनी सामान्य क्रिया-शीलता को उपयोग में लाकर स्थूल रूप से चला-चली वाली जिन्दगी बिता जाते हैं। वे अपने अन्दर सुरक्षित उन विशेष शक्तियों का लाभ नहीं उठाते जिनको काम में लाने पर मनुष्य अनिवार्य रूप से ध्यानाकर्षण कार्य कर सकता है। जो अपने अंदर ठहरी इस विशेष कुमुक को काम में लाते हैं वे संसार के जीवन समर में सफल होकर अपने स्थायी स्मारक अवश्य ही छोड़ जाते हैं।

आचार्य पाणिनि उन्हीं बुद्धिमान व्यक्तियों में से थे जिनका ध्येय जीवन बिताना नहीं उसे पराकाष्ठा तक काम में लाना होता है, और जो अपनी बूँद-बूँद क्षमता का सदुपयोग करने में जरा भी मुरब्बत नहीं करते। इस, आलस्य, प्रमाद और अकर्मण्यता के प्रबल शत्रु ने मानव शक्तियों के प्रमाण में जो प्रस्थापना लगभग ढ़ाई हजार वर्ष पूर्व की वह “पाणिन अष्टाध्यायी” के नाम से आज भी अमर है और आगे भी रहेगी।

“पाणिन अष्टाध्यायी” वह व्याकरण शास्त्र है जिसने युगों से अदलती-बदलती आ रही भारतीय भाषा का संस्कार कर उसे एकरु पता के साथ स्थायित्व प्रदान किया। पाणिनि ने अपने इस महान कार्य से न केवल एक सर्वांगपूर्ण भाषा को ही जन्म नहीं दिया अपितु राष्ट्र की सभ्यता एवं संस्कृति को सदा सर्वदा के लिए अक्षुण्ण बना दिया। युग-युग की विचार-विभूति को पीढ़ी-दर-पीढ़ी के लिये सुरक्षित रख सकने के लिये एक परम पात्र की रचना कर दी।

साधारण आचार-व्यवहार से लेकर दर्शन तक और लोक कथाओं से लेकर इतिहास तक किसी राष्ट्र की जो भी सम्पदा होती है वह सब भाषा में ही संकलित रहती है और आगामी पीढ़ियाँ उसे माध्यम से प्राप्त कर लाभ उठाती हैं जिससे राष्ट्र की सभ्यता एवं साँस्कृतिक परम्परा चिरंजीवनी बनती है।

आज तक संसार में असंख्यों भाषाओं का उदय-अस्त हुआ। अनेक तो अपने बदले हुए रूप में चलती रही हैं, कुछ के स्थान पर कोई नवीन भाषा आ गई और कोई भाषा अपने में किसी को मिलाकर अथवा स्वयं किसी में मिलकर एक नवीन भाषा बन गई और बहुतों का अस्तित्व ही संसार से मिट गया। केवल एक ही भाषा संस्कृत ही ऐसी है जो हजारों वर्षों से आज तक अपने एक रूप में चली आ रही है। इसी संस्कृत भाषा का सर्वांगपूर्ण व्याकरण रचकर महर्षि पाणिनी ने उसे नियमबद्ध किया।

संस्कृत से पूर्व देश में कोई एक ऐसी सार्वदेशिक भाषा नहीं थी जिसके माध्यम से एक प्रदेश के लोग दूसरे प्रदेश के लोगों से विचार-विनिमय कर सकते, और यह कमी राष्ट्र की एकता के लिये बहुत घातक थी। भारत का बहुमूल्य वांग्मय न जाने कितनी भाषाओं में बिखरा पड़ा था, जिसका अध्ययन कोई भी देश की लगभग सभी भाषाओं को पढ़े बिना नहीं कर सकता था और यह साधारणतः एक कठिनतम बात थी।

महर्षि पाणिनी ने इस देश की विशाल कमी को अनुभव किया और देश के सारे शब्द-भण्डार को एक व्यवस्थित रूप में रखकर, उनकी व्याख्या और अर्थ निश्चित करके एक नियमबद्ध भाषा का निर्माण करने का निश्चय कर लिया। यह काम साधारणतः कठिन ही नहीं बल्कि बहुत ही विराट् तथा असाधारण था। इस एक काम को पूरा करने के लिए कितनी शक्ति, कितने परिश्रम, कितनी लगन और कितने अध्ययन अनुभव एवं अविरतता की आवश्यकता थी, पाणिनी इससे अनभिज्ञ नहीं थे। किन्तु उन्होंने इसकी रंच मात्र भी चिन्ता न की। जहाँ उन्हें कार्य की कठिनता तथा विराटता का ज्ञान था वहाँ मानव की अनन्त क्षमताओं का भी पता था।

अपने नियम पूर्ण निर्माण और संयमशील आत्मा, प्रबुद्ध बुद्धि, अविचल मन और अखण्ड के बल पर पाणिनी को पूर्ण विश्वास था कि वे राष्ट्र की इस बड़ी कमी को अवश्य पूरा कर लेंगे। वे जानते थे कि उन्होंने अब तक के अपने श्रम से जो कर्मठता उपार्जित की है उसकी तेजस्विता के सम्मुख आलस्य, प्रमाद, विलम्ब अथवा दीर्घसूत्रता के पतंगे आ ही नहीं सकते। जब वे शरीर के साथ अपने मन मस्तिष्क को सम्पूर्ण रूप से नियोजित करके काम करना शुरू करेंगे तब उनकी क्रियाशीलता एक अविचल लगन के रूप में बढ़ती जायेगी और फिर ऐसी दशा में काम के अपूर्ण रह जाने का प्रश्न ही नहीं उठता। निदान उन्होंने संसार के सारे सुख भोगों का विचार त्याग कर अपने जीवन का अणु क्षण उद्देश्य के प्रति समर्पित कर दिया। अपने स्वार्थ, वैयक्तिक सुख और व्यक्तित्व के साथ अस्तित्व को जन उपयोगी कार्य के लिए दान कर दिया।

अपने विद्वान गुरुवर्य से विद्या प्राप्त कर पाणिनी घर आने के बजाय देशाटन पर चल पड़े। उनके देशाटन कार्यक्रम में उनके दो साथी ब्याडि और पर रुचि भी सम्मिलित हो लिए।

अपनी यात्रा क्रम में पाणिनि सबसे पहले हिमालय पहुँचे जहाँ उनकी भेंट ईश्वर देव नाम के एक प्रकाँड विद्वान से हुई। पाणिनी ने उनका ध्यान देश की भाषाई कमी की ओर आकर्षित किया और उसे दूर करने की अपनी योजना बताई—उन्होंने बताया कि सम्पूर्ण देश में जितनी भी बोलियाँ, भाषायें तथा लोक भाषायें तथा भाषायें प्रचलित हैं उन सबका शब्द कोष इकट्ठा करके समानार्थक शब्दों को वर्ग बद्ध कर लिया जाये अनन्तर प्रत्येक शब्द का इस प्रकार परिष्कार किया जाए कि वे एक जातीय जैसे हो जायें। फिर उनके स्वरूप, प्रयोग अर्थ तथा आकार निश्चित कर दिया जाय और इस प्रकार भारत की तमाम भाषाओं की सहायता एक ऐसी राष्ट्र-भाषा का निर्माण कर दिया जाये जो देश की समग्र जनता को समान रूप से ग्राह्य हो श्री ईश्वर देव ने पाणिनि की इस योजना को उपयोगी ही नहीं आवश्यक बतलाते हुए उनकी प्रतिभा, दूरदर्शिता तथा सूझ-बूझ की बहुत प्रशंसा की और स्वयं भी हर प्रकार का सहयोग तथा सहायता देने का वचन दिया।

जिस राष्ट्र में उसका हित सोचने वाले सर्वत्यागी तपस्वी होते रहे उसका अनादि से अनन्त तक जीवित रहना कोई आश्चर्य का विषय नहीं है! भारत की अज्ञात प्राचीनता का यही एक रहस्य है कि यह भूमि पाणिनि जैसे तपस्वियों से कभी खाली नहीं रही और जब तक इस प्रकार के महापुरुषों की परम्परा बनी रहेगी, भारत अपने गौरव के शिखर पर आसीन रहेगा ही। पाणिनि ने अपने उद्देश्य के अंतर्गत सम्पूर्ण भारत का भ्रमण किया। वे अपनी इस यात्रा में केवल नगरों में ही नहीं जनपदों, कस्बों तथा छोटे-से-छोटे गाँव तक में गये, वहाँ रहे और अध्ययन के साथ अर्थ भाव तथा उच्चारण सहित अपार शब्द राशि संकलित की। शब्द राशि के अतिरिक्त पाणिनि ने प्रान्त-प्रान्त, नगर-नगर तथा ग्राम-ग्राम के रीति रिवाज आहार-विहार तथा आचार-विचार का भी अध्ययन किया! लोगों से मिलकर, बात कर और गहरी से गहरी खोज में उतर कर एक-एक शब्द की व्युत्पत्ति तथा उसके इतिहास का पता लगाया।

इतना बड़ा और व्यापक कार्य करने में पाणिनि को कितना श्रम करना पड़ा होगा इसका सहज ही अनुमान लगाया जा सकता। पाणिनि अपनी खोज के लिए जहाँ भी गए होंगे वहाँ की भाषा सीखी होगी, निवासियों से अपनत्व प्राप्त करने के लिए आचार व्यवहार का अभ्यास किया होगा। वृद्धों एवं विद्वानों का सहयोग सहानुभूति पाने के लिए अपनी पात्रता सिद्ध की होगी, क्योंकि इसके बिना वे अपने कार्य में कृत कृत्य न हो सकते थे! निःसन्देह पाणिनि ने इस शब्द संकलन तथा स्थान-स्थान की भाषायें सीखने और उनके रीति-रिवाजों का अध्ययन एवं अभ्यास करने में आयु का बहुत बड़ा भाग लगा दिया होगा।

अपने इस यात्रा काल में वे भाँति-भाँति के अच्छे बुरे क्रूर-करुण, मूर्ख-विद्वान, स्त्री-पुरुषों के संपर्क में आये होंगे और निःसन्देह यह सारी यात्रा पैदल ही पूरी की होगी। किन्तु उनके जीवनवृत्त, कार्य-कुशलता तथा उद्देश्य की महानता से स्पष्ट है कि अपने लक्ष्य पथ के अतिरिक्त किसी अन्य मार्ग पर एक पद भी न चले होंगे। इतनी विराट् यात्रा में उनके सम्मुख हजारों बार भय, मोह अथवा स्वार्थ-प्रलोभनों के अनेक अवसर आये होंगे किन्तु उनकी सफलता इस बात की गवाही देती है कि वे इन मानवीय दुर्बलताओं से एक क्षण को भी प्रभावित न हुये होंगे! भूख प्यास, शीत-धाम तथा वर्षा के कष्टों को उठाते हुये पाणिनि निरन्तर अपने लक्ष्य की ओर ही बढ़ते रहे होंगे। अन्यथा संसार की फिजूल बातों में अपने को उलझाकर वे इतना बड़ा काम न कर सके होते। जिनको जीवन में कुछ करने की लगन लगी होती है उनको सारी व्यक्तिगत आवश्यकताओं का अभाव हो जाता है। इस प्रकार अपने को निःस्वार्थ, निस्पृह एवं निर्विकार बनाये बिना इतना बड़ा काम सम्पादित कर सकना असम्भव ही होता है।

देश का अपार शब्द भण्डार इकट्ठा करके पाणिनि हिमालय के एक एकान्त स्थान में जा बैठे और अपना काम शुरू कर दिया। अब तक का सारा पुरुषार्थ उनके असली काम की तैयारी मात्र ही था। एक कुशल शिल्पी की भाँति अब पाणिनि ने अपने उपकरण जमा कर लेने के बाद महाग्रन्थ की रचना शुरू कर दी।

सर्वप्रथम उन्होंने उस विशाल शब्द संकलन को क्रम से वर्गों में बाँटा, उनका परिष्कार किया , अर्थ एवं आकार निश्चित किया, प्रयोग के नियम बनाये और इस प्रकार एक व्यापक व्याकरण की रचना करके संस्कृत नाम की भाषा को जन्म दिया, जो उसी समय से भारत की राष्ट्र-भाषा और सार्वदेशिक आचार-विचार का माध्यम मान ली गई।

पाणिनि का व्याकरण शास्त्र आठ अध्यायों में विभक्त है अतएव उसको अष्टाध्यायी कहा जाता है जिसमें वृत्ति तथा तद्वित एवं कृदंत सिद्धान्तों को भाषा के क्षेत्र में एक बड़ी क्राँति माना जाता है। उन्होंने शब्द निर्माण, अर्थ संकोच अथवा विस्तार तथा रुपार्थ के परिवर्तन के उन सिद्धान्तों की प्रतिष्ठा की कि जिनके आधार भाषा विज्ञान का जन्म हुआ।

अपने इस विशाल कार्य को पूरा करने के बाद पाणिनि पाटलिपुत्र में महाराज नन्द के दरबार में पहुँचे। उन दिनों नन्द का दरबार देश भर के बड़े-बड़े विद्वानों से भरा रहता था और वही विद्वानमंडली उन दिनों नये पंडितों द्वारा किये गये कार्यों को जाँच कर मान्यता प्रदान किया करती थी और किसी बहुत बड़ी नई खोज पर पंडित को ‘सन्नयन’ की उपाधि दिया करते थे।

उस विद्वानमंडली ने पाणिनि की अष्टाध्यायी की जाँच की और उनको ‘सन्नयन’ की उपाधि देकर यह भी घोषणा की कि पाणिनि के इस व्याकरण शास्त्र को जो अच्छी तरह समझ लेगा उसे भी एक हजार मुद्रायें पुरस्कार में दी जाया करेंगी।

भाषा शास्त्र में इस प्रकार एक क्राँति उपस्थित करने वाले महर्षि पाणिनि का जन्म गान्धार में सिन्धु तथा काबुल नदियों के संगम से चार मील ऊपर हट कर लहुर नामक ग्राम में हुआ था। किन्तु उनका पालन पोषण उनके ननिहाल के ग्राम शलातुर में हुआ था जहाँ उनके पिता जाकर बस गये थे। इनके पिता का नाम समान पाणिनि तथा बाबा का नाम विष्णु शर्मन पाणिनि था। केवल पाणिनि के नाम से प्रसिद्ध इनका नाम आहिक पाणिनि था। इनके वंशज बाल्हीक के रहने वाले थे, इनका जन्म ईसा पूर्व 480-410 माना जाता है और मृत्यु के विषय में प्रसिद्ध है कि अपनी खोज में तल्लीन पाणिनि को एक व्याघ्र ने भक्षण कर लिया था।


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प्रजानाँ रक्षणं दानमिज्याऽध्ययनमेव च। विषयेष्वप्रसक्तिश्च क्षत्रियस्य समावतः ॥

प्रजा की रक्षा करना, दान करना, यज्ञ करना, पढ़ना, और विषयों में न फंसना उनसे विरक्त होना यह सब कर्म संक्षेप से क्षत्रिय के लिये बतलाये हैं। यह कर्म क्षत्रिय वर्ण के करने योग्य हैं।


अमर हुतात्मा-श्री गणेशशंकर विद्यार्थी

देश की स्वाधीनता में बाधक बने साम्प्रदायिक विष को पीकर बलिदान हो जाने वाले श्री गणेशशंकर विद्यार्थी का जन्म आश्विन शुक्ल 14 सम्वत् 1947 (सन् 1890) को प्रयाग के अतरसुइया मौहल्ले में हुआ। उनका परिवार मध्यवर्गीय परिवारों में भी एक साधारण परिवार था। उनके पिता मुन्शी जयनारायण ग्वालियर रियासत में मुँगावली कस्बे के एक मिडिल स्कूल में सहायक अध्यापक थे।

विद्यार्थी जी के पिता की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी, किन्तु वे बड़े ही मितव्ययी, सदाचारी और सादे स्वभाव के थे। सन्तोष को उन्होंने जीवन की सुख-शान्ति का मूलमन्त्र बनाया हुआ था। अपने इन्हीं गुणों के कारण वे अपनी सन्तानों पर इतने पवित्र संस्कार डाल सके कि आगे चलकर उनके आदर्श पुत्र गणेशशंकर केवल कुटुम्ब का ही नहीं, प्रत्युत देश का मस्तक ऊँचा करके गाँधी जी जैसे महान् मनस्वी की प्रशंसा एवं प्रेम के पात्र बन कर दिखला सके।

मुँशी जयनारायण जी अपनी कठिन आर्थिक परिस्थितियों के कारण अपने होनहार पुत्र गणेशशंकर को कुछ अधिक शिक्षा न दिला सके। वे उसे केवल अंग्रेजी मिडिल तक की शिक्षा दिलाने के बाद यह आशा करने लगे कि गणेशशंकर नौकरी करके परिवार का बोझ बटाये। गणेशशंकर ने पिता की विवशता अनुभव की और कानपुर में अपने बड़े भाई के पास नौकरी करने के लिये चले गये।

चलते समय उनके पिता ने कहा कि “गणेश! यह मैं अच्छी प्रकार जानता हूँ कि पढ़ने-लिखने में तुम्हारी रुचि है और तुम आगे पढ़ने-लिखने में तुम्हारी रुचि है और तुम आगे पढ़ने की इच्छा रखते हो, किन्तु परिवार की स्थिति से तुम अनभिज्ञ नहीं हो। मैं हर प्रकार से विवश होकर ही तुम्हें नौकरी करने की अनुमति दे रहा हूँ। यदि तुममें शिक्षा की सच्ची लगन होगी तो तुम नौकरी करते हुए भी आगे पढ़ सकने के लिये मार्ग निकाल लोगे। मनुष्य यदि अपने ध्येय का धनी है तो वह पर्वत के बीच भी अपना रास्ता बना लेता है।”

पिता के प्रेरणापूर्ण शब्दों ने गशेश शंकर पर बड़ा गहरा प्रभाव डाला और वे मन ही मन यह संकल्प लेकर कानपुर के लिये विदा हो गये कि हजार बाधाओं के रहते हुए भी मैं जीवन की उन्नति और जन-सेवा का मार्ग निकाल लूँगा।

गणेशशंकर कानपुर में जब अपने बड़े भाई के पास पहुँचे और अपना मन्तव्य बतलाया तो उनके दूरदर्शी भाई ने उन्हें आगे पढ़ने के लिये प्रेरित किया। उनकी हार्दिक इच्छा थी कि उनका उद्योगी एवं परिश्रमी भाई अधिक से अधिक शिक्षा पाये और जीवन में विकास करे। निदान उन्होंने अपने सीमित साधनों में से भी खर्च निकाल कर गणेशशंकर को इन्ट्रेन्स के पाठ्यक्रम की पुस्तकें खरीद दीं और कुछ खर्च देकर पिता के पास पुनः इस प्रार्थना के साथ भेज दिया कि वे उन्हें स्कूल में भरती कराकर आगे पढ़ने का अवसर दे दें। पिता की इच्छा में फूल खिल उठे और उन्होंने पुत्र को खुशी-खुशी इन्ट्रेन्स में भरती कराकर भगवान को धन्यवाद दिया।

गणेशशंकर ने खूब मन लगाकर पढ़ा और बहुत ही अच्छे नम्बरों के साथ इन्ट्रेन्स की परीक्षा द्वितीय श्रेणी में पास की। आगे पढ़ने के लिये उन्होंने इलाहाबाद में कायस्थ कॉलेज में प्रवेश लिया, किन्तु किसी प्रकार भी आगे का खर्च न चल सकने के कारण सात-आठ माह बाद उन्हें कॉलेज छोड़ देना पड़ा।

किन्तु इससे उन्होंने अपने उत्साह को मन्द नहीं होने दिया और कानपुर में करेन्सी कार्यालय में नौकरी कर ली। किन्तु स्वतन्त्र विचार के उद्योगी युवक गणेशशंकर को सरकारी गुलामी पसन्द न आई और उन्होंने करेन्सी की नौकरी छोड़कर कानपुर के पृथ्वी नाथ हाईस्कूल में अध्यापन का कार्य कर लिया। अपने अध्यापन काल में विद्यार्थी जी न केवल छात्रों को पढ़ाते ही थे, बल्कि उनके हृदय में देशभक्ति का संचार करते और पत्र-पत्रिकाओं में लेख भी लिखा करते थे। इसी समय दिल्ली दरबार के अवसर पर महाराजा बड़ौदा ने अपने स्वाभिमान की रक्षा में कोई ऐसा आचरण व्यक्त कर दिया, जो दरबार की प्रथा के अनुरूप न था। देश के सरकारी पिट्ठू अखबारों ने महाराजा बड़ौदा की बड़ी आलोचना की। गणेशशंकर से यह अन्याय सहन न हुआ और उन्होंने भारतीय स्वाभिमान की रक्षा करने वाले महाराजा बड़ौदा के आचरण को उचित ठहराते हुए बड़े ही तेजस्वी शब्दों में ‘कर्मयोगी’ आदि पत्रों में लेख लिखे।

गणेशजी का यह स्वतन्त्र साहस उनकी जिन्दगी में एक महत्वपूर्ण मोड़ सिद्ध हुआ। जनता ने उनकी प्रतिभा पहचानी और उन्होंने जनता की आवश्यकता समझी। स्कूल के अधिकारियों ने गणेशशंकर के तेजपूर्ण विचारों को अहितकर बतलाया और उन्होंने स्कूल की नौकरी से त्याग-पत्र दे दिया।

उसी समय ‘सरस्वती’ के सम्पादक आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी को एक योग्य सहायक की आवश्यकता थी। वे गणेशजी के विचारों की तेजस्विता और लेखनी की विशेषता से परिचित हो चुके थे। उन्होंने उनको अनुरोधपूर्वक ‘सरस्वती’ में बुला लिया और तीस रुपये मासिक पारिश्रमिक का प्रस्ताव करते हुए कहा—विद्यार्थी जी! सरस्वती के पास साहित्य-सेवा के अवसर के अतिरिक्त और कोई लाभ नहीं है। गणेशशंकर ने विनम्रतापूर्वक निवेदन करते हुए केवल पच्चीस रुपये ही इसलिए स्वीकार किये कि उनका अपना कोई विशेष खर्च नहीं है। पच्चीस रुपया पारिश्रमिक ही उनके लिये पर्याप्त होगा। उन्होंने अपना जीवन पैसे के लिये नहीं, किसी भी माध्यम से देश-सेवा के लिये समर्पित कर देने का निश्चय कर लिया है और ‘सरस्वती’ ने उन्हें इसका अवसर देकर कृतार्थ कर दिया है।

प्रस्तावित वेतन से पाँच रुपये कम लेकर श्रीगणेशशंकर ने सरस्वती में इतनी ऊँची लगन और गहरे परिश्रम से सेवा की कि आचार्य द्विवेदी ने एक स्थान पर व्यक्त किया—”विद्यार्थी जी जब तक मेरे साथ रहे, उन्होंने बड़ी मुस्तैदी और परिश्रम से सारा काम किया। वे रोज दो मील पैदल चलकर प्रातःकाल जुही जाते थे और सन्ध्या के बाद वापिस आते थे। उनकी शालीनता, सृजनता और परिश्रमशीलता ने मुझे मुग्ध कर लिया। विद्यार्थी जी में ज्ञानार्जन की इतनी लगन थी कि वे बहुधा रास्ते में चलते हुए भी कोई न कोई अखबार अथवा पुस्तक का अध्ययन किया करते थे।

सरस्वती की निष्काम सेवा ने उन्हें भारत के पत्रकार जगत में विख्यात कर दिया। जिसके फलस्वरूप उन्हें इलाहाबाद के ‘अभ्युदय’ साप्ताहिक ने द्विवेदी जी से माँग लिया। द्विवेदी जी ने उन्हें राजनीतिक विचारधारा विकसित करने का परामर्श देकर आशीर्वाद पूर्वक अभ्युदय का सम्पादन भार सँभाल लेने के लिए अनुमति दे दी।

देश की चिर वाँछित स्वाधीनता के लिए सेवा करने के इच्छुक गणेशजी को अब उपयुक्त क्षेत्र मिल गया था और उन्होंने निर्द्वन्द्व होकर कलम उठाई और अपने तेजस्वी विचारों से राजनीतिक वातावरण में एक हलचल भर दी। किन्तु कुछ समय बाद बीमार हो जाने के कारण उन्हें ‘अभ्युदय’ से हटना पड़ा।

स्वस्थ हो जाने के बाद वे फिर मैदान में आये। किन्तु अभ्युदय के माध्यम से नहीं, बल्कि ‘प्रताप’ नामक एक नये साप्ताहिक की योजना लेकर। अपनी बीमारी के समय उन्होंने ‘अभ्युदय’ के सम्पादक का पद जिन मित्र को समर्पित कर दिया था, उनसे वापिस लेना उचित न समझा। साथ ही देश में अच्छी पत्र-पत्रिकाओं की कमी की पूर्ति में योगदान करने के इरादे से उन्हें अपने नये पत्र का प्रकाशन करने की योजना उचित ही लगी।

‘प्रताप’ की योजना का प्रस्ताव करते समय उन्होंने अपने सहयोगी मित्र पं. शिवनारायण मिश्र के निराशापूर्ण प्रश्न का जो उत्तर दिया, वह वास्तव में कुछ करने की आकाँक्षा रखने वालों के लिए एक प्रेरणाप्रद शिक्षा से कम नहीं है। उन्होंने कहा—”रुपये-पैसे व प्रेस आदि अन्य साधनों की कमी को हम लोग अपने अनवरत परिश्रम एवं लगनशीलता से पूरी कर लेंगे। हम निःस्वार्थ भाव से जनता की सेवा का व्रत लेकर कार्य करेंगे और जनता हमारा सहयोग करेगी। मिश्र जी आप निराश न हों, आत्म-विश्वास के साथ पुरुषार्थ का सहारा लेकर मैदान में आइए तो हम लोग लेखन से लेकर चपरासी तक का सब काम जब स्वयं करेंगे तो कोई कारण नहीं कि हमारी जनोपयोगी योजना सफल न हो।”

श्रीगणेशशंकर विद्यार्थी ने ऐसा ही किया और साधनों की नीति किसान, मजदूर तथा देशी राज्यों की पीड़ित एवं घोषित जनता का हित-समर्थन बनाई। उन्होंने रायबरेली के किसानों, कानपुर के मिल-मजदूरों का समर्थन करते हुए चम्पारन में निहले गोरों के अत्याचार की कड़ी आलोचना शुरू करके जन-स्वाधीनता का संघर्ष छेड़ दिया। इस राष्ट्रीय सेवा के पुरस्कार स्वरूप उन्हें पाँच बार जेल-यात्रा करनी और यातना सहनी पड़ी।

श्री गणेशशंकर की इन जीवन्त सेवाओं ने उन्हें गाँधीजी के निकटस्थ कर उनका कृपा-पात्र बना दिया और तब तो उन्होंने होम रूल आन्दोलन, कानपुर के सूती मिल-मजदूरों की हड़ताल, रायबरेली कृषक-संघर्ष स्वदेशी बहिष्कार आन्दोलन और नमक सत्याग्रहों में सक्रिय भाग लेकर वह महत्वपूर्ण कार्य कर दिखाया, जिसके लिये वे प्राँतीय राजनीतिक सम्मेलन के अध्यक्ष बनाये गये और जनता द्वारा 1925 में कानपुर के एक धन-कुबेर के मुकाबले चुनाव में जिताकर प्रान्तीय कौंसिल में भेजे गये। किन्तु उन्हें धारा सभा का निष्क्रिय जीवन पसन्द न आया। वे तो मैदान में सिपाही बनकर देश की स्वाधीनता के लिये सक्रिय सेवा करना चाहते थे। निदान उन्होंने 1929 में धारा सभा का त्याग कर दिया।

उसी समय जब वे कराची के अखिल भारतीय कांग्रेस सभा में भाग लेने के लिये जाने की तैयारी कर रहे थे, तभी कानपुर में अंग्रेज सरकार ने हिन्दू-मुस्लिम दंगा करा दिया। श्री गणेशशंकर जी कराची जाना स्थगित करके उक्त साम्प्रदायिक विष पीने में लग गये। वे हिन्दू मुहल्लों से मुसलमानों और मुसलमानी मुहल्लों से हिंदुओं को निकालने और उन्हें समझाने में जुट गये इसी सेवा अवसर पर एक उत्तेजित मुस्लिम भीड़ को समझाते हुए वे एक धर्मान्ध मुसलमान की कुल्हाड़ी के शिकार हो गये।

बलिदान के दिन 29 मार्च सन् 1931 को श्री गणेशशंकर विद्यार्थी के यह अन्तिम वाक्य युग-युग तक इतिहास में अंकित रहकर आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा एवं शिक्षा देते रहेंगे।

“भाई! आप मुझे घसीटते क्यों हैं? मैं मृत्यु के भय से भागने वाला नहीं। एक दिन मरना ही है, तो फिर ऐसी महत्वपूर्ण मृत्यु से डरना ही क्या? यदि मेरे रक्त से आपकी प्यास बुझ सकती है, तो मैं सहर्ष बलिदान होने को तैयार हूँ। आप अपनी इच्छा पूरी करें, मैं अपने कर्तव्य पालन के लिये प्रस्तुत हूँ।”

इतना कहकर उन्होंने अपना सिर झुका दिया और आततायी की कुल्हाड़ी उनकी गर्दन के पार हो गई श्री गणेशशंकर का यह आदर्श बलिदान सदा सर्वदा के लिए अमर हो गया।


ईमानदारी का महत्व

उस समय महात्मा भगवानदीन की आयु लगभग आठ वर्ष की थी। वे गाँव के जिस दुकानदार से पास जाया करते थे, उसे चाचा कहा करते थे। वह पारसी था और बहुत समय से उनके गाँव में दुकान किये हुए था।

एक दिन भगवानदीन की माँ ने उन्हें चार पैसे के बादाम लेने के लिये भेजा। बालक भगवानदीन चाचा की दुकान पर पहुँचा और चार पैसे के बादाम माँगे उस समय उसकी दुकान पर बहुत भीड़ थी। चाचा ने बहुत से बादाम भगवानदीन को दे दिये।

बालक भगवानदीन ने घर आकर जब बादाम माँ को दिये तो वे बहुत नाराज होने लगीं और चार पैसे के इतने बादाम आते हैं? इतना सयाना हो गया है और जरा भी असर न आया। जा फेर कर आ!

बालक भगवानदीन ने बादाम लेकर चाचा को दिये और माँ की बात कही। चाचा ने वे बादाम लेकर एक थैले में अलग रख लिये और चार पैसे के बादाम देते हुए कहा—बेटे, तुमने मुझे चिन्ता में डाल दिया, कहीं ऐसा हुआ हो कि चार आने वाले को मैं चार पैसे बादाम दे गया होऊँ?

बालक भगवानदीन पर चाचा की इस बात का बहुत प्रभाव पड़ा और उसी दिन से वह ईमानदारी का महत्व समझ गया।


उतावली के दोष से बचिये।

उतावलापन मनुष्य स्वभाव का एक दोष है। इसीलिये एक कहावत प्रचलित है—”उतावला सो वावला।” उतावले की समता वावले से करने का सही आशय है कि जिस समय मनुष्य उतावली में होता है उस समय उसमें कमोवेश वे सारी कमियाँ और विकृतियाँ आई रहती हैं जो किसी वावले व्यक्ति में पाई जाती हैं।

आवेग, उद्वेग, व्यग्रता, अस्त-व्यस्तता, अस्थिरता, अधैर्य अथवा असंतुलन आदि दोष वावले व्यक्ति के लक्षण हैं। जिस प्रकार वावला व्यक्ति किसी काम को करते समय विचारों का संतुलन खोये रहता है, वह करता हुआ भी यह नहीं जानता कि जो कुछ वह कर रहा है उसकी अस्त-व्यस्तता के कारण ठीक नहीं हो रहा है। उसे वह इस प्रकार नहीं करना चाहिये जिस प्रकार वह कर रहा है। कोई भी काम करने का एक तरीका होता है, एक व्यवस्था होती है। उसे उसकी निरर्थक क्रियाशीलता ही समझा जाता है। यही अवस्था किसी उतावले व्यक्ति अथवा विश्वस्त नहीं होता। इसीलिये “जल्दी का काम शैतान का” कहा जाता है।

प्रायः होता यह है कि किसी काम को जल्दी से निपटाने के लिये लोग उतावली बर्तते हैं। किन्तु उसका परिणाम उल्टा ही होता है। उतावली के साथ किये हुये काम बहुधा जल्दी होने के बजाय देर में ही हो पाते हैं—सो भी अव्यवस्थित, अस्त-व्यस्त एवं त्रुटिपूर्ण। किसी काम को करने के लिये एक अपेक्षित गति तथा समय की आवश्यकता होती है। जब मनुष्य किसी काम के लिये आवश्यक गति में बढ़ोत्तरी और समय में कटौती करेगा—दो घंटे के काम को एक आध घंटे में पूरा करने की हड़बड़ी में अंधाधुँध लग जायेगा, तो उसका बिगड़ जाना स्वाभाविक है। अब क्षण-क्षण पर भूलें होंगी, गलतियों और कमियों को अवसर मिलेगा। तब उनको सँभालने देखने और दूर करने में दोहरा परिश्रम करना पड़ेगा जिसमें अधिक समय लगेगा ही! इस प्रकार समय की बचत तो नहीं ही होती, काम भी गलत-सलत होता है सो अलग। जल्दी में गलतियों करते हुये उन्हें बार-बार सँभालने की अपेक्षा, कहीं अच्छा है कि किसी काम को धैर्यपूर्वक सावधानी के साथ किसी जाय।

जब कोई काम उतावली के साथ किया जाता है तब मन में एक उद्वेग आन्दोलित होता चलता है, जिससे चित्त चंचल रहता है, बुद्धि में व्याकुलता तथा व्यग्रता का समावेश होता है, जिससे न तो एकाग्रता प्राप्त होती है और न काम की व्यवस्था बन पाती है। उतावली के साथ काम करने वाले का ध्यान काम में नियोजित रहने के बजाय उसकी ज्यों-त्यों समाप्ति में लगा रहता है। वह काम प्रारंभ करने से पूर्व ही उसकी समाप्ति के लिये उत्सुक होने लगता है, जिससे काम करने में बीच में लगने वाला समय उसके लिये एक भार बन जाता है और वह ज्यों-ज्यों बेगार की तरह काटने के लिये व्यग्र होने लगता है। उतावले व्यक्ति की काम में रुचि नहीं होती। वह उसे ज्यों-त्यों निबटा कर अपना पीछा छुड़ाने का प्रयत्न किया करता है। काम करने का यह तरीका बिल्कुल गलत है। इससे न केवल काम ही बिगड़ता है बल्कि समय खराब होने के साथ-साथ काम करने की शक्तियों का ह्रास होता है, अदक्षता एवं असावधानी का दोष उत्पन्न होता है। इस प्रकार उतावली करने वाला अपनी न जाने कितनी हानि किया करता है।

जल्दबाज आदमी हर काम में उतावली किया करता है। ऐसा करते समय उसे यह भी ध्यान नहीं रहता कि उसके ऐसा करने में क्या हानि होगी। भोजन करते समय जल्दी-जल्दी ग्रास मुँह में डालेगा, जल्दी हाथ चलायेगा, झटपट चबायेगा और अधकचरा ही निगल लेगा। कभी दाल के पहले शाक और शाक से पहले दाल खायेगा। कभी कुछ भूल जायेगा तो कभी कुछ। मतलब यह कि उसका भोजन-कार्यक्रम नासमझ बच्चों की तरह अस्त-व्यस्त क्रीड़ा कौतुक जैसा बन जायेगा। जिससे वह न केवल पात्रों तथा स्थान को ही गन्दा करेगा बल्कि कपड़े भी खराब कर लेगा। साथ ही स्वाद से प्रवंचित होकर स्वास्थ्य का भी अहित करेगा। जल्दी-जल्दी ज्यों-त्यों चबाकर निगल लेने से मुख में भोजन का स्वाद तो नहीं ही मिलेगा, अधकचरे ग्रास पेट में जाकर दाँतों का दायित्व आँतों को सौंपेंगे जिससे अजीर्ण, पीड़ा, अपच तथा मंदाग्नि का विकार पैदा होगा और अस्वस्थता का शिकार होना पड़ेगा! भोजन को क्रम के साथ अपेक्षित गति, धैर्य और स्वाद के साथ आदर पूर्वक करना चाहिये। इस प्रकार सुचारुता से किया हुआ साधारण भोजन भी स्वास्थ्य को असाधारण लाभ करता है।

बहुत से लोग यात्रा के समय तो उतावली करने में कमाल कर देते हैं। यह रख, वह हटा, यह बाँध वह खोल, यह पहन वह उतार, ताँगा छोड़ रिक्शा पकड़ आदि की ऐसी हड़बड़ी मचा देते हैं मानो हाला-चाला आ गया हो और उनकी समझ में ही नहीं आता कि क्या करें और क्या न करें। जिसका फल यह होता है कि बहुधा यात्रा के लिये आवश्यक चीजें छूट जाती हैं और अनावश्यक चीजें साथ लग लेती हैं, जिनका परिणाम बीच रास्ते अथवा गन्तव्य स्थान पर पहुँच कर व्यग्रता, परेशानी तथा पश्चाताप के रूप में सामने आता है। कभी-कभी तो इस उतावली में यात्रा का मुख्य उद्देश्य ही नष्ट हो जाता है। टिकट लेने, रेलगाड़ी पर चढ़ने आदि में ऐसी हड़बड़ी करते हैं कि अपने आप तो परेशान होते ही हैं दूसरों के लिये भी असुविधा एवं अप्रसन्नता का कारण बनते हैं। जल्दी में टिकट के पैसे ज्यादा दे सकते हैं और कुली चुकाते समय चवन्नी की बजाय अठन्नी जेब से निकल सकती है। छोटे पैसे उँगलियों के बीच से गिर सकते हैं। मनी बैग को की जेब में जाने के बजाय स्वीटर में फँस कर गिर सकता है। अथवा जल्दी में ठीक से न रखा जाकर निकला रह सकता जिससे किसी गठकटे के पौबारह हो सकते हैं। इतना ही नहीं उतावली के कारण और न जाने कितनी तरह की अस्त-व्यस्तताएं हो सकती हैं जो क्षति करने के साथ उपहासास्पद बना सकती हैं। यात्रा करने से पूर्व ठीक से उसकी तैयारी करिये, सोच-समझकर सारा सामान रखिये हटाइये विश्वासपूर्वक टिकट लीजिये, आश्वस्त होकर गाड़ी में चढ़िये, ठीक से सामान रखिये और कुली को पूरे पैसे दीजिये। यात्रा को यात्रा तक सीमित रखिये, उतावली में उसे संकट अथवा समस्या न बनाइये!

किसी से बात करते समय उतावली बड़े बड़े अनर्थों तथा आपदाओं का कारण बन जाती है। जल्दी में क्या से क्या कह जाना, किसी के कथन का क्या-से-क्या अर्थ लगा लेना तो एक साधारण भूल है। बिना विचार किये और शब्दों के उच्चारण प्रकार और प्रभाव को समझे बिना कह निकलना न जाने कितनी गलत फहमिया पैदा कर सकता है। अर्थ का अनर्थ अथवा अत्यर्थं उपस्थित कर सकता है। इससे कितनी हानि और सम्मान क्षति हो सकती है, इसका अनुमान कर सकना कठिन है। उतावली में देश,काल कथन और परिस्थिति का ज्ञान न रहने से संकटोत्पन्न स्थिति की सम्भावना रह सकती है। बात करते समय तो धैर्य और सावधानी की बहुत बड़ी आवश्यकता है। अच्छी तरह से सोच समझकर ही बात अथवा बर्ताव करना ठीक होता है।

किन्तु उतावली न करने का अर्थ यह भी नहीं है कि हर काम को अनावश्यक विलम्ब से किया जाये! इतने धीरे-धीरे किया जाये कि वह अपेक्षित समय में पूरा न होकर सर पर बोझ बना रहे। हर काम को अभ्यास के अनुरूप इस प्रकार किया जाना चाहिये जिससे कि न तो वह बिगड़े और न अनावश्यक विलम्ब हो। काम का जल्दी अथवा देर में कर सकना अपने-अपने अभ्यास पर निर्भर होता है। यदि आप कोई काम दक्षतापूर्वक जल्दी करना चाहते हैं तो उचित रूप से धीरे-धीरे उसका अभ्यास बढ़ाइये। अभ्यास बढ़ जाने से काम स्वयं ही अपेक्षित समय में ठीक से होने लगेंगे।

उतावली न करने का मतलब यही है कि कोई काम करते समय चित्त हड़बड़ी से उद्वेलित न रहे। आपको उसे ज्यों-त्यों निबटाने की हैवत न हो। काम को पूरी तरह चित्त लगाकर निरन्तरता के साथ करिये, न तो जल्दी में पड़िये। उतावली वास्तव में शीघ्रता नहीं बल्कि कमजोर मन की विक्षिप्तता होती है जो आवेग से भर कर उतावला बना देती है। अपनी इस मानसिक दुर्बलता से बचना चाहिये और काम को उतावली के साथ करने के बजाय जमे हुए ढंग से करना चाहिये। उतावली से काम बनता नहीं बिगड़ता ही है।


असुर और राक्षस कौन?

दुर्गुण जब स्वभाव की गहराई तक प्रवेश कर जाता है, तब उसे व्यवहार करने में न तो लाज आती है न आत्म-ग्लानि होती है। दूसरे की दृष्टि और लोक-भलाई की दृष्टि से वह बात अत्यधिक घृणित होती है, पर करने वाला उसे अपनी विशेषता, अपना गुण समझता है, इसलिये उसे चिन्ता भी नहीं होती कि कोई उसे निन्दित करेगा या दण्ड देगा। यदि ऐसे अनेक दुर्गुण का सामूहिक प्रसार हो जाय तो स्थिति बिल्कुल ही विपरीत हो जाती है। दुर्गुण-सद्गुण और सुखद जान पड़ने लगते हैं और सद्गुणों तथा सत्कर्मों का कोई महत्व नहीं रह जाता। बुरा-भला बन जाता है और भला-बुरा। आज की स्थिति ठीक ऐसी है, जिसमें से देवत्व और असुरत्व को अलग-अलग ढूँढ़ लेना कोई साधारण बात नहीं रही।

हर वर्ग, हर जाति, हर क्षेत्र में बुराइयाँ भर गई हैं, पर वे इतनी स्वाभाविक हो गई हैं कि लोग उनको करते हुए भी यह मान रहे हैं कि वे शुद्ध और निष्कलंक हैं। कहीं-कहीं तो देवताओं के गुणों से तुलना करके उसे मानवजाति का विशेषाधिकार ही माना जाने लगा है। छल, कपट, व्यभिचार, निन्दा, चोरी, पर द्रोह, स्वार्थ, माँसाहार, जुआ, नशाखोरी आदि बुराइयाँ आज के जमाने में सभ्य और शिक्षित व्यक्तियों में, असभ्य और अशिक्षितों की अपेक्षा अधिक मात्रा में बढ़ गई हैं, तो भी उन्हें समाज में किसी प्रकार की निन्दा या अपमान का सामना नहीं करना पड़ता और न ही इससे उनके सम्मान में किंचित कमी आती है। यह स्थिति निस्सन्देह अवाँछनीय और खेदजनक है।

प्रति वर्ष रावण, मेघनाथ, कुम्भकर्ण, सुबाहु, कंस आदि के पुतले जलाये जाते हैं और असुर, राक्षस आदि कहकर उनकी निन्दा की जाती है, उन्हें अपमानित किया जाता है। पर यदि बारीकी से देखा जाय और रावण-कुम्भकर्ण के स्वभाव का विश्लेषण किया जाय तो मालूम पड़ेगा कि वे भी आज के मनुष्यों के समान उच्च-कुलों से उत्पन्न हुए थे, पर दुर्गुणी होने के कारण उन्हें निशाचर कहा गया। आज के समाज में यदि दुर्गुणों का अत्यधिक प्रसार हो रहा हो तो लोगों को क्या कहा जा सकता है? यह अब प्रत्येक व्यक्ति को एकान्त में विचार करना चाहिए।

रामचरितमानस में एक बार निशाचरों की आकृति को लेकर सती-पार्वती को भी शंका हुई तो उन्होंने भगवान शंकर से समाधान कराया। शिवजी बोले—

शुभ आचरन कतहुँ नहि होई। देव विप्र गुरु मान न कोई॥

उहिं हरि भगति जग्य तप ग्याना। सपनेहुँ सुनिअ न वेद पुराना॥

बाढ़े खल बहु चोर जुआरा। जे लम्पट परधन परदारा॥

मानहिं मातु पिता नहिं देवा। साधुन्ह सन करवावहिं सेवा॥

जिन्हके यह आचरन भवानी। ते जानेहु निसिचर सब प्रानी॥

हे पार्वती जी! जो लोग अच्छा आचरण नहीं रखते, देव, ब्राह्मण और गुरुजनों का सम्मान नहीं करते, ईश्वरभक्ति, यज्ञ, तप और ज्ञान से विमुख, स्वाध्याय में जिनकी अभिरुचि नहीं, चोर, जुआरी, लम्पट, व्यभिचारी तथा माता-पिता का अपमान करने वाले, सन्त-पुरुषों को कष्ट देने वाले—सब व्यक्ति जिनके ऐसे आचरण हों, निशाचर कहे जाते हैं।

बाल काण्ड में ही तुलसीदास जी ने इस व्याख्या को और भी विस्तृत करते हुए लिखा है—

सुनहु असन्तन्ह केर सुभाऊ। भूलेहु संगति करिअ न काऊ॥

दुष्ट व्यक्तियों के स्वभाव इस तरह होते हैं, उनकी संगति भूल कर भी नहीं करनी चाहिए—

खलन्ह हृदय अति ताप विसेषी। जरहिं सदा पर सम्पति देखी॥

जहँ कहुँ निन्दा सुनहिं पराई। हरषहिं मनहुँ परी निधि पाई॥

काम क्रोधमद लोभ परायन। निर्दय कपटी कुटिल मलायन॥

बैर अकारन सब काहू सों। जो कर हित अनहित ताहू सों॥

झूठइ लेना झूठइ देना। झूठइ भोजन झूठ चबेना॥

बोलहिं मधुर वचन जिमि मोरा। खाइ महा अहि हृदय कठोरा॥

परद्रोही परदार रत, परधन पर अपवाद। ते नर पाँवर पापमय, देह धरे मनुजाद॥

दुष्ट व्यक्तियों के हृदय में जलन रहती है, ईर्ष्यालु होते हैं, दूसरे की निन्दा से बड़े प्रसन्न होते हैं। काम, क्रोध, मद एवं लोभ में आकर डूबे हुए, निर्दयी, कपटी, कुटिल, मलिन वृत्ति के लोग सभी से अकारण ही बैर करते हैं। जो हित करता है, ये उसका भी अनहित करने से नहीं चूकते। आहार से लेकर रहन-सहन और प्रत्येक व्यवहार में केवल झूठ को ही आश्रय देने वाले, वाणी से मधुर, पर हृदय से कठोर, द्रोही, व्यभिचारी—यह सब मनुष्य शरीर होते हुए भी नीच निशाचर ही हैं।

लोभइ ओढ़न लोभइ डासन। सिस्नोदर पर जमपुर वासन॥

काहू की जौं सुनहिं बड़ाई। श्वाँस लेहिं जनु जूड़ी आई॥

जब काहू कै देखहिं विपती। सुखी भये मानहु जग नृपती॥

स्वारथ रत परिवार विरोधी। लम्पट काम लोभ अति क्रोधी॥

मातु पिता गुरु विप्र न मानहिं। आपु गये अरु घालहिं आनहिं॥

करहिं मोह बस द्रोह परावा। सन्त-संग हरि-कथा न भावा॥

अवगुन सिन्धु मन्दगति कामी। वेद विदूषक परधन स्वामी॥

अत्यन्त लोभी, शिश्नोदर परायण, दूसरे की प्रशंसा सुनकर दुःखी होने वाले, दूसरों के कष्ट सुनकर हार्दिक प्रसन्नता अनुभव करने वाले, परिवार विरोधी, कामी, क्रोधी, सत्संग और ईश्वर उपासना से विमुख, अवगुणी, अबुद्धि कामी तथा वेद का उपहास करने वाले व्यक्ति ही निंदनीय हैं। इसके कार्यों की सदैव निंदा की जानी चाहिए।

वर्ग विशेष के कर्तव्यों का बोध कराते हुए अयोध्या काण्ड में मानसकार ने बड़ा सुन्दर प्रसंग प्रस्तुत किया है। युवराज भरत अपने पिता सम्राट दशरथ की मृत्यु पर शोक करते हैं। गुरु वशिष्ठ ने शोकातुर भरत को अपने पास बुलाकर कहा—’भरत! इस संसार में जीवात्मा पुण्यार्जन के लिए विविध रूपों में प्रकट होती है। जो अपने जीवन लक्ष्य को पूरा करते हुए इस संसार से विदा होते हैं, उनके मृत्यु पर शोक नहीं करना चाहिए। शोचनीय तो वे लोग होते हैं, जिन्होंने अपने धर्म का, अपने कर्तव्यों का पालन नहीं किया होता। इसी प्रसंग में महर्षि वशिष्ठ समझाते हैं-

शोचिय विप्र जो वेद विहीना। तजि निज धरम विषय लवलीना॥

सोचिय नृपति जो नीति न जाना। जेहिं न प्रजा प्रिय प्रान समाना॥

सोचिअ बयसु कृपन धनवानू। जो न अतिथि शिव भगति सृजानू॥

सोचिये पुनि पति वंचक नारी। कुटिल कलह-प्रिय इच्छा चारी॥

देवताओं और असुरों की आकृति में नहीं, प्रकृति में अन्तर होता है। जिनकी प्रकृति में दुष्टता, दुराचार, स्वार्थ-परता, संकीर्णता आदि दुर्गुणों का बाहुल्य है, वे असुर हैं असुरता की जितनी निंदा और भर्त्सना की जाय, उतनी ही कम है। इसी दृष्टि से रामायण आदि ग्रन्थों में असुरों के प्रति घृणा भावों की अभिव्यक्ति हुई है। रामलीला में प्रतिवर्ष रावण, मेघनाद, कंस आदि के रूप में यह असुरता ही सार्वजनिक रूप से जलाई जाती है।

आत्म-निरीक्षण करके हमें अपने भीतर की छिपी असुरता को ढूँढ़ निकालना चाहिए और उसका उसी तरह दमन करना चाहिए, जैसा कि भगवान राम ने किया था। इसी रीति-नीति को अपनाकर हम मनुष्यता को सार्थक कर सकेंगे और देवत्व की ओर बढ़ते हुए परम लक्ष्य तक पहुँच सकेंगे।


रामायण में यज्ञ की महत्ता

सृष्टि के प्रादुर्भाव काल में जब पहले-पहल मनुष्य इस धरती पर अवतीर्ण हुआ तो यहाँ उसे बड़े अभाव, अशक्ति और कष्ट दिखाई दिये। मनुष्य अपने पितामह ब्रह्माजी के पास गये और अपनी सारी व्यथा कह सुनाई। ब्रह्माजी कुछ देर तक विचार करते रहे, इसके बाद उन्होंने मनुष्य से कहा—”जाओ यज्ञ करो, आहुतियों से सन्तुष्ट हुए देवता तुम्हारी कामनायें पूर्ण करेंगे, शक्ति प्रदान करेंगे जिससे तुम्हारा जीवन सब प्रकार सुखी होगा।”

इसके बाद ब्रह्माजी ने ‘यजुर्वेद’ का निर्माण किया। जिस प्रकार ऋग्वेद के मन्त्रों में विश्व-दर्शन, सूक्ष्मातिसूक्ष्म ज्ञान, तथा तात्विक मीमाँसायें भरी हुई हैं उसी प्रकार यजुर्वेद में यज्ञों से कामनाओं की पूर्ति होने का विशद विज्ञान भरा पड़ा है। इस यज्ञ-विद्या का पंडित होने के कारण ही भारतवर्ष किसी समय धन-धान्य से परिपूर्ण, सर्वसुखी एवं सर्व समुन्नत रहा है। यज्ञ की महत्ता का प्रतिपादन करते हुए शास्त्रकार ने उसे भारतीय संस्कृति का पिता कहा है और उसके द्वारा मनुष्य की सम्पूर्ण कामनाओं की पूर्ति होने की बात को प्रमाणित किया है।

यही कारण था कि किसी जमाने में घर-घर अग्नि-होत्र हुआ करता था। यज्ञ किये बिना लोग आहार नहीं ग्रहण करते थे, यज्ञ के बिना कोई मंगल कार्य नहीं पूरा होता था। दुष्ट प्रवृत्ति के लोग भी यज्ञ के तान्त्रिक विधानों से अपने मनोरथ सफल किया करते थे। इससे पता चलता है कि उस जमाने में यज्ञ-विद्या की कितनी गहन शोध हुई थी।

हमारा ऐसा कोई ग्रन्थ नहीं जिसमें यज्ञ के महत्व पर प्रकाश न डाला गया हो। वेदों के अतिरिक्त भी उपनिषद्, दर्शन, पुराण, स्मृति, ब्राह्मण-ग्रन्थ, गीता आदि सभी ग्रन्थों में यज्ञ को संसार की सुख-शान्ति का प्रमुख उपाय बताया गया है। अनेक स्थलों पर बड़े-बड़े यज्ञों के विधान और वर्णन मिलते हैं। भारतीय-संस्कृति में एक नये अध्याय के प्रणेता महाकवि तुलसीदास जी की दृष्टि से भी वह महत्व छुप नहीं सका। रामायण में अनेक प्रसंग ऐसे हैं जिनसे यज्ञ की महान महत्ता पर प्रकाश डाला गया है।

भगवान राम स्वयं यज्ञ किया करते थे। राज-सिंहासन पर बैठने के बाद तो उन्होंने अनेकों बड़े-बड़े यज्ञ कराये। उत्तर-काण्ड में राम-राज्य के धर्म, सुख सम्पदा के प्रसार पर प्रकाश डालते हुये तुलसीदास जी ने लिखा है—

कोटिन्ह बाजि मेघ प्रभु कीन्हें। दान अनेक द्विजन्ह कहँ दीन्हें॥

भगवान राम ने हजारों अश्व-मेध यज्ञ किये और अनेक ब्राह्मणों को दान दिया।

भगवान राम का जन्म भी यज्ञ के फलस्वरूप ही हुआ था। बालकाण्ड का बड़ा रुचिकर प्रसंग है—एक बार दशरथ जी को बड़ा दुःख हुआ कि उनके तीन रानियाँ होते हुये भी कोई सन्तान नहीं हुई। इस दुःख से दुःखी होकर सम्राट दशरथ गुरु वशिष्ठ के पास गये और उनसे अपनी अन्तर्व्यथा कही। महर्षि वशिष्ठ को मालूम था कि यदि शृंगी ऋषि द्वारा काम यज्ञ कराया जाय तो दशरथ को सन्तान हो सकती है। इस निश्चय के अनुसार—

शृंगी ऋषिहिं वशिष्ठ बोलावा। पुत्रकाम सुभ जग्य करावा॥

भगति सहित मुनि आहुति दीन्हें। प्रगटे अग्नि चरु कर लीन्हैं॥

वशिष्ठ का आमन्त्रण पाकर श्रृंगी ऋषि अयोध्या आये और उन्होंने पुत्र की कामना से यज्ञ कराया। जब यज्ञ समाप्त हुआ तो अग्नि देव प्रकट हुये और उन्होंने वशिष्ठजी से कहा—

जो वशिष्ठ कछु हृदय विचारा। सकल काजु भा सिद्ध तुम्हारा॥

यह हवि बाँटि देहु नृप जाई। जथा जोग जेहि भाग बनाई॥

हे वशिष्ठ! आपने जिस इच्छा से हमें आहुतियाँ दीं उनसे मैं प्रसन्न हुआ। तुम्हारा कार्य सिद्ध हो गया। लो! इस हविषान्न को यथा-योग्य अपनी रानियों को बाँट दो।

वशिष्ठ जी ने वह खीर दशरथ जी को समर्पित कर दी। इसके बाद उसे बाँटने और रानियों के गर्भवती होने का वर्णन इस प्रकार किया है—

तबहिं राय प्रिय नारि बोलाई। कौसल्यादि तहाँ चलि आइ॥

एहि विधि गर्भ सहित सब नारी। भइ हृदय हरषित सुख भारी॥

राजा ने सभी रानियों को बुलाकर वह खीर वितरित की जिसे सबने प्रसन्नतापूर्वक खा लिया। इस प्रकार सभी रानियाँ गर्भवती हुई और उन्हें अपार सुख मिला।

यज्ञों से देव-शक्तियों का आवाहन होता है। वह देव-शक्तियाँ बड़े वैज्ञानिक ढंग से लोगों की कामनायें पूर्ण करती हैं—इस बात का बालकाण्ड में अन्यत्र भी संकेत किया गया है—

करिहहिं विप्र होम-मख सेवा। तेहि प्रसंग सहजेहिं बस देवा॥

हे राजन्! जब ब्राह्मण लोग यज्ञ-मख आदि से देवताओं की सेवा करेंगे तो वे सहज ही में तुम्हारे वश में हो जायेंगे अर्थात् देवतागण तुम्हारी अभीष्ट कामनायें भी पूरी करेंगे।

देवताओं को प्रसन्न करने और देश में सुख-शान्ति तथा सुव्यवस्था बनाये रखने के लिए ऋषिगण आश्रमों में यज्ञ किया करते थे पर आसुरी शक्तियाँ तो तब भी थीं। देवों असुरों का संग्राम सदैव से होता आया है। असुर लोग नहीं चाहते थे कि समाज में सत्प्रवृत्तियाँ बढ़ें और सदाचारी व्यक्तियों का बाहुल्य हो इसलिए वे उस जमाने में विघ्न उपस्थित किया करते थे। यज्ञ के महत्व से असुर भी अपरिचित न थे वे जानते थे कि यज्ञों से देव-शक्तियों का विकास होता है इसलिए जहाँ एक ओर ऋषि-मुनि यज्ञों का आयोजन किया करते थे वहाँ आसुरी प्रवृत्ति के लोग उनमें विघ्न डालने के कार्यक्रम बनाया करते थे। रामायण में इसका स्पष्ट दिग्दर्शन कराया है) यथा—

विश्वामित्र महामुनि ग्यानी। बसहिं बिपिन सुभ आश्रम जानी॥

जहँ जप जग्य जोग मुनि करहीं। अति मारीच सुबाहुहिं डरहीं॥

देखत जग्य निसाचार धावहिं। करहिं उपद्रव मुनि दुःख पावहिं॥

विश्वामित्र अपने आश्रम में ऋषि, मुनियों समेत जप तप और यज्ञ किया करते थे पर उन्हें मारीच तथा सुबाहु आदि शक्तिशाली राक्षसों का डर बना रहता था। जहाँ भी लोगों को यज्ञ करते देखते वहाँ पहुँचकर उपद्रव खड़ा कर देते जिससे मुनियों को बड़ा दुःख होता था।

इन असुरों की कोई अलग जाति नहीं थी। आजकल जिस प्रकार अपने ही समाज में से कुछ लोग इस प्रकार के सत्कर्मों का विरोध करने लग जाते हैं और उनका सहयोग देना तो दूर उल्टे अनेक प्रकार के विघ्न बाधाएं खड़ी कर देते हैं मारीच और सुबाहु भी ऐसे ही थे। यह मारीच और सुबाहु आज भी जगह-जगह फैले हैं। ये अच्छे कार्य और दूसरों का सुख कभी नहीं देख सकते अपनी महत्वाकाँक्षा के लिये दूसरों के कार्यों में विघ्न पैदा करना ही उनका जीवन उद्देश्य होता है। इसी में वे अपनी शान समझते हैं।

शक्ति का उच्छेदन शक्ति से होता है, बुराई के विरोध में वैसी ही शक्तिशाली भलाई को खड़ा कर दिया जाय तो बुराई परास्त हो जाती है। इस तथ्य को महर्षि विश्वामित्र ने अनुभव किया, और इसी निश्चय के अनुसार वे महाराज दशरथ के पास गये और उनसे कहा—

असुर समूह सतावहिं मोहीं। मैं जाचन आयऊँ नृप तोहीं॥

अनुज समेत देहु रघुनाथा। निसिचर बध मैं होव सनाथा॥

परन्तु दशरथ जी इसके लिए राजी न हुये। उन्हें पुत्रों का मोह सताने लगा। उस समय महर्षि वशिष्ठ भी वहाँ उपस्थित थे उन्होंने विचार किया कि यदि शुभ कर्मों में ही सहायता न दी जाय तो शक्ति और वैभव का महत्व ही क्या रहा? भलाई की शक्ति तो इसी से अजेय रह सकती है कि उसे सत्कर्मों में प्रोत्साहन भी मिले। इस विचार के साथ उन्होंने दशरथ को समझाया और यज्ञ की रक्षार्थ पुत्रों को सौंपने के लिए राजी कर लिया। राम और लक्ष्मण इससे बड़े हर्षित हुए, शुभ कर्म में सहयोग करने पर किसे हर्ष नहीं होता? वे तुरन्त विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा के लिए चल पड़े।

भगवान राम का जीवन ही यज्ञमय था फिर वे यज्ञ की रक्षा क्यों न करते? विश्वामित्र के आश्रम में पहुँच कर उन्होंने जिस प्रकार कठिन परिस्थितियों में यज्ञ की रक्षा की, रामायण में उसकी सुन्दर झाँकी देखने को मिलती है—

प्रात कहा मुनि सन रघुराई। निर्भय यज्ञ करहु तुम जाई॥

होम करन लागे मुनि झारी। आपु रहे मख की रखवारी॥

सुनि मारीच निसाचर कोही। लै सहाय धावा मुनि द्रोही॥

बिनु फर बान राम तहि मारा। सत योजन गा सागर पारा॥

पावक सर सुबाहु पुनि मारा। अनुज निसाचर कटकु संघारा॥

इस प्रकार राम और लक्ष्मण ने असुरों को मार कर यज्ञ की रक्षा की।

भगवान राम ने जिन यज्ञों की रक्षा की थी, वे संसार की भलाई के लिए किये जाने वाले यज्ञ थे। निर्जन एकाँत में रहने वाले वैरागी मुनियों को न तो किसी प्रकार के लाभ की इच्छा थी, न उन्हें कोई अन्य महत्वाकाँक्षा थी। लोक-कल्याण की कामना से वे आहुतियाँ दिया करते थे। समस्त पृथ्वी मण्डल पर विचरण करता हुआ यज्ञ धूम लोगों के स्वास्थ्य और आरोग्य की रक्षा करता था। प्रकृति शुद्ध रहती थी, सात्विक वातावरण में लोगों के मन और चित्त-वृत्तियाँ भी सात्विक हुआ करती थीं। भगवान राम ने लोक-कल्याण की कामना से ही राक्षसी वृत्तियों का संहार किया और यज्ञों की रक्षा की।

ताँत्रिक यज्ञों में शत्रु-संहार की भी शक्ति है। रावण अपनी विजय के लिए एक ऐसा ही वाममार्गी यज्ञ कर रहा था। इससे राम-दल में चिन्ता उत्पन्न हुई और उस प्रयोग को असफल करने का प्रबन्ध किया गया।

लंका काण्ड में इसका वर्णन इस प्रकार है—

नाथ करई रावन एक जागा। सिद्ध भए नहिं मरिहिं अभागा॥

पठवहु नाथ बेगि भट बन्दर। करहिं विध्वंस आव दसकन्धर॥

जाइ कपिन्ह सो देखा वैसा। आहुति देत रुधिर अरु भैंसा॥

जग्य विध्वंस कुशल कपि, आये रघुपति पास चलेउ निसाचर क्रुद्ध होइ, त्यागि जिवन की आस॥

इस प्रकार के यज्ञ वाम-मार्गी कहलाते हैं, जो असुरों द्वारा ही सम्पन्न होते थे, इसी से कभी-कभी दूसरे धर्म के लोग हमारे यज्ञों पर आक्षेप भी करते हैं, किन्तु शास्त्रों में ऐसे यज्ञों का स्पष्ट निषेध है और ऐसा करने वालों को दण्ड देने की आज्ञा की गई है। भगवान राम ने भी रावण का ऐसा ही वाम-मार्गी यज्ञ नष्ट किया था।

शत्रु-विजय के लिए सात्विक प्रकृति के शक्ति-यज्ञ करने का विधान है, उसमें वनौषधियाँ ही प्रयुक्त होती हैं, पर उनका अपना एक स्वतन्त्र विधान है। चूँकि यह विद्या कठिन और दोषी हो जाने पर हानिकारक भी हो जाती है, इसलिए उसे गोपनीय रखा गया है। यह ऐसा ही है कि यदि बन्दूक चलाने वाले को उसकी प्रतिक्रिया का ज्ञान न हो तो वह दुश्मन को मारने की जगह अपना ही अहित कर सकता है।

रामायण के यह प्रसंग जहाँ यज्ञों की महत्ता पर प्रकाश डालते हैं, वहाँ वे हमें इस बात के लिए भी प्रेरित करते हैं कि यज्ञ भारतीय संस्कृति का मूलाधार है, उसे हमारे सब महापुरुषों ने स्वीकार किया है तो हमें भी यज्ञ करना चाहिए, जहाँ यज्ञ हो रहे हों, तो वहाँ सहयोग देना चाहिए। यज्ञ से मनुष्य की भावनाएं शुद्ध और आवश्यकताएं पूर्ण होती हैं। यज्ञों से संसार में सुख-शान्ति का वातावरण पैदा होता है।


धन-कुबेर राकफेलर—जिन्हें अपनी दिशा बदलनी पड़ी।

मनुष्य कई तरह के आत्मिक, बौद्धिक, शारीरिक एवं सामाजिक शक्तियों का विकास करता है, तब कहीं स्वस्थ व्यक्तित्व का निर्माण कर पाता है। एकांगी विकास से मनुष्य जीवन का वास्तविक अर्थ सिद्ध नहीं होता। कई बार तो वह मनुष्य के पतन का कारण भी बन जाता है। अकेले स्वास्थ्य के निर्माण में तन्मय रहकर मनुष्य आजीविका, शिक्षा एवं पारिवारिक आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं कर सकता, तो केवल बौद्धिक प्रगति में लगे रहने से स्वास्थ्य आदि का क्षेत्र अधूरा रह जाता है। प्रकृति अद्भुत रीति से विभक्त होकर सृष्टि की संचालन व्यवस्था को बनाये रखती है। मनुष्य का जीवन भी उसी प्रकार अनेक क्षेत्रों में विभक्त है। उनमें से सभी क्षेत्र आवश्यक, सभी महत्वपूर्ण हैं। सभी क्षेत्रों में प्रगति करने वाला मनुष्य ही पूर्ण अध्यात्मवादी कहा जा सकता है, एकांगी विकास तो साँसारिक सुख प्रदान करते रहने में भी पूर्ण समर्थ नहीं है।

धन-कुबेर राकफेलर का जीवन-क्रम इस वस्तु स्थिति को पूरी तरह सिद्ध कर देता है। उन्होंने 53 वर्ष की अवस्था तक विशुद्ध रूप से केवल अर्थ-उपासना की। धन, बहुत धन, अथाह और अपार धन की लिप्सा ने उन्हें इस तरह जकड़ा कि बेचारे आधी उम्र भी न गुजार पाये थे कि उनका शरीर हड्डियों का ढाँचा मात्र रह गया था।

प्रति सप्ताह बीस लाख डालर की कमाई करने वाले राकफेलर को दूध और रोटी के टुकड़े पचा लेना भी दुस्तर हो गया था।

धन से उन्हें इतना मोह हो गया था कि जरा-सा नुकसान भी उन्हें सहन न होता था, ऐसा कोई समाचार उन्हें सुनने को मिल जाता तो बेचारों का बुरा हाल हो जाता था, बुखार आ जाता, बीमार पड़ जाते। रात में नींद न आना तो स्वाभाविक बात हो गई थी। आरम्भ में राकफेलर बड़े स्वस्थ थे। 23 वर्ष की उम्र में जब तक कि ‘स्टैर्ण्डड वेकुअम आइल कम्पनी’ के मालिक न बने थे, ऐसे झूमते हुए चलते थे कि हाथी भी उनकी मस्ती के आगे शरमा जाय। खूब हँसी-खुशी का, मस्ती का जीवन था, पर जैसे-जैसे उनका धन का स्वामित्व बढ़ता गया, भोग, रोग और दुश्चिंताओं ने उनके सारे शरीर को खोखला करना शुरू कर दिया। स्थिति यहाँ तक पहुँची कि केवल सिगरेट और काफी के अतिरिक्त और कुछ पचा लेना उनके लिये हराम हो गया। जीवित रहने के लिये कैप्सूल और इन्जेक्शन ही मात्र सहारे रह गये थे।

अथाह धन होते हुए भी ऐसा क्यों हो गया? यह एक प्रश्न है। इसका एक ही उत्तर है कि उन्होंने जीवन के अन्य क्षेत्रों की और बढ़ने की कभी इच्छा नहीं की, प्रारम्भ में धन की अधिकता ने उन्हें भोगवादी बना दिया। आहार-विहार की अनियमितता के कारण उनके शरीर का जीवन-तत्व निचुड़ता गया, पर इन्होंने कभी अपने स्वास्थ्य की ओर ध्यान नहीं दिया।

चिन्ता के मानसिक बोझ ने उनकी रही-सही शक्तियों को भी बर्बाद कर दिया। एक बार की घटना है—इन्होंने लगभग 50 हजार डालर के अनाज से भरा हुआ एक जहाज भेजा, जिसे ग्रेजलेक्स से होकर जाना था। इनका दूसरा साझीदार ज्योर्ज गार्डनर था। उसने सलाह दी जहाज का बीमा करा लेना चाहिए, पर इसमें 150 डालर का बीमा खर्च देना पड़ता था। राकफेलर उसके लिए तैयार न हुए। रात को लेक्स में भारी तूफान आ जाने से जहाज संकट में फँस गया। यह खबर राकफेलर को मिली तो वे बुरी तरह डर गये, चिन्ता से मुँह पीला पड़ गया। सारी रात पलक नहीं मूँदी। प्रातःकाल गार्डनर को किसी तरह अब भी बीमा करवाने के लिये दौड़ाया। बीमा हो गया, बीमे की रसीद कट कर आ गई। इधर यह भी खबर आ गई कि जहाज सकुशल यथा-स्थान पहुँच गया, बस राकफेलर महोदय को डेढ़ सौ डालर का इतना दुःख हुआ कि चारपाई पकड़ ली। हफ्तों इन्जेक्शन दिये गए, तब कहीं दुबारा काम करने योग्य हो पाये।

अनियन्त्रित आकाँक्षा एक व्यक्ति को ही नहीं, सारे समाज को दुःख देती है। “पुअर मैन्स एडवोकेट” के लेखक का यह कथन—”हजार गरीबों से एक-एक टुकड़ा छीनकर एक बड़ा धनवान् बनता है”—राकफेलर के जीवन में अक्षरशः सत्य साबित हुआ। धन की वासना इतनी बढ़ी कि उसने अपने मजदूरों का शोषण करना शुरू किया। उचित-अनुचित सभी तरह के निन्दित कार्य करने में भी उन्हें जरा भी आत्म-ग्लानि न हुई। उनके पुतले जलाये गये। पेनसिलेविया के तेल क्षेत्रों में मजदूरों ने उन्हें मार डालने तक की धमकी दी, पर उन्हें तो धन चाहिये था। लोगों की धमकियों, गालियों और धमकियों से भरे पत्रों ने एक बार फिर से उन्हें बिस्तर से जा चिपकाया। इस बार भी वे मरणासन्न स्थिति से ही किसी प्रकार वापिस लौटे।

आमोद-प्रमोद, खेल-कूद, इष्ट-मित्र आदि भी संसार में होते हैं—राकफेलर ने यह कभी नहीं जाना। उनके एक मित्र ने कई हजार डॉलर से एक सुन्दर नाव बनवाई, एक दिन राकफेलर को सैर करने के लिए निमन्त्रण भेजा, पर उत्तर में “नाही” कर दी गई। बेचारा दूसरे दिन स्वयं आया और सैर करने के लिये आग्रह करने लगा। राकफेलर ने उसे बुरी तरह आड़े हाथों लिया—”तुम्हारे पास खेल-कूद ही है या और कुछ, जाओ हमारे पास बेकार के कामों के लिये समय नहीं।”

तिजोरियाँ भर गई, पर मित्रों की संख्या समाप्त हो गई। चिन्ताओं का बोझ बढ़ गया, इधर सहयोगियों, स्वामी भक्तों, शुभ-चिन्तकों का बिल्कुल अभाव हो गया। इस बार वह बीमार पड़े तो जीवित बचने की कोई अभिलाषा न रही। डॉक्टरों ने अथक परिश्रम किया, करोड़ों रुपये खर्च हुए, तब कहीं जाकर हालत सुधरी, पर इस बार डॉक्टरों ने स्पष्ट बता दिया कि यदि उन्होंने अपना जीवन-क्रम नहीं बदला तो अब उनका दुबारा जीवित बच सकना बिल्कुल असम्भव होगा।

मनुष्य कितना ही क्षुद्र और अधोगामी हो, उसका दृष्टिकोण बदल जाय तो वह कुछ से कुछ बन सकता है। डाकू बाल्मीकि का दृष्टिकोण बदला तो वे महर्षि वाल्मीकि बन गये, सदन कसाई परम-भक्त, गणिका-ब्रह्मवादिनी तथा अंगुलिमाल जैसा क्रूर दस्यु प्रतापी बौद्ध भिक्षु हुआ। एक बार जीवन का ध्येय बदल जाने से वह राकफेलर, जिसे 53 वर्ष की आयु में जीने की कोई सम्भावना न शेष रही थी, जो रोटी का एक टुकड़ा भी न पचा सकता था, वह 98 वर्ष की अवस्था तक जिया, कष्ट और तकलीफ से नहीं, प्रसन्न, प्रफुल्ल और सन्तुष्ट रहकर। खूब खाना खाने लगा। राकफेलर को गहरी नींद आने लगी, चारों तरफ सुख ही सुख बिखर गया।

यह सब तब सम्भव हुआ, जब उसके मस्तिष्क में यह बात आई कि धन ही सब कुछ नहीं है। स्वार्थों में ही जीवन को नष्ट कर दिया जाय तो मनुष्य-जीवन की विशेषता क्या रही? जिस मायावी धन ने स्वयं को सुखी न रहने दिया था, उसकी आसक्ति के कटु परिणामों का एक बार बोध हो गया तो राकफेलर ने अपने जीवन की दिशा ही बदल दी। विनाश की ओर बढ़ते हुए कदम विकास की ओर मुड़ गये। पतन के गर्त की ओर जाने की अपेक्षा अब उसने निर्माण को अपना जीवन-लक्ष्य चुन लिया था।

राकफेलर वही था, पर अब उसके विचार बदल गये थे, पहले जैसा व्यवहार न था उसका। प्रातःकाल वह कारखाने में जाता तो हर मजदूर से उनके कष्ट और दुःख पूछता और उनकी मदद करता। अमेरिका में कोई भी नेक कार्य राकफेलर के रहते आर्थिक अभाव के कारण रुकने न पाया। “राकफेलर-फाउण्डेशन” नाम का कोष जो अन्तर्राष्ट्रीय हित के लिए स्थापित किया गया था, पेन्सिलीन आदि बहुमूल्य औषधियाँ जो आज हजारों व्यक्तियों को जीवन दान देती हैं, उसी संस्था के नेक कार्यों में से है। यह सब राकफेलर की उदारता और परोपकार वृत्ति के कारण ही सम्भव हुआ।

अब वह प्रतिदिन सायंकाल मैदान की ओर निकल जाता। गोल्फ खेलता, मित्रों से मिलता, सबके सुख-दुःख में सच्चे हितैषी की तरह शामिल होता। धन की चिन्ता छोड़ दी। व्यायाम करने से शरीर की शक्तियाँ पुनः लौट आई। त्याग वृत्ति से मानसिक दुश्चिन्ताओं का बोझ भी हल्का पड़ गया, फलस्वरूप उसे पूरी तरह नींद आने लगी और जीवन सुखपूर्वक बीतने लगे।

पिछले जीवन में जो गलतियाँ हो गई थीं, वह अब भी सामने आती थीं, पर निर्द्वन्द्व राकफेलर को उनसे कोई घबराहट नहीं होती थी। कठिन से भी कठिन परिस्थितियों में वह अपना धैर्य नहीं छोड़ता था। अनुचित कर्म की सजा भोगने से उसे दुःख नहीं हुआ, वरन् उससे उसे आत्म सन्तोष ही हुआ।

एक घटना उस समय की है, जब ‘स्टैर्ण्डड आयल कम्पनी’ पर अमरीकी सरकार ने एकाधिकार कायम कर लेने पर मुकदमा चला दिया। राकफेलर ने उसमें बड़े-बड़े बैरिस्टरों को पैरवी में नियुक्त किया। एक से एक कानूनी विशेषज्ञों की सलाह ली गई, पर अन्तिम नतीजा कुछ ठीक न निकला। राकफेलर मुकदमा हार गये और उन पर भारी जुर्माना कर दिया गया। यह बात अभी केवल वकीलों को ही मालूम थी। राकफेलर तो निश्चिन्त होकर अपने बँगले की सैर कर रहे थे। वकीलों को सूझ नहीं रहा था, आखिर राकफेलर को इस परिणाम से कैसे अवगत कराया जाए? सबके मन में एक बात पक्की तौर पर बैठ गई थी कि यह समाचार सुनकर उसकी हृदय-गति अवश्य ही रुक जायगी और जैसा कि वह अपने पूर्व के जीवन में धनासक्त था, वैसा ही अब भी रहा होता तो वकीलों का यह अनुमान गलत भी न होता।

वकील ने डरते-डरते सुनाया— आप मुकदमे में हार गये हैं, कहीं ऐसा न हो, आप अपनी मानसिक शान्ति खो बैठें। राकफेलर ने जबाब दिया— “आप घबड़ाइये नहीं, इस समाचार से मुझे जरा भी दुःख नहीं हुआ, मेरा मानसिक सन्तुलन ठीक है, मुझे रात में पूरी नींद आ जायेगी।” वकील राकफेलर के इस तरह के उत्तर से अवाक् रह गये। उन्हें स्वप्न में भी ऐसी आशा न थी, वे अब भी उसे वही राकफेलर समझते थे जो 150 डॉलर के लिए चारपाई पकड़ लिया करता था।

जब तक धन का लोभ रहा, राकफेलर को चिन्ता, स्वार्थ, निंदा और सामाजिक अपमान ने बहुत सताया। करोड़पति होकर भी उसे सुख-शान्ति पल भर को भी उपलब्ध न हुई। पर जब उसने अपनी प्रतिभा को बहुमुखी बनाया, धन के साथ धर्म, त्याग, परमार्थ और परोपकार आदि आध्यात्मिक वृत्तियों का आश्रय ग्रहण कर लिया, वही राकफेलर सुखी, सन्तुष्ट स्वस्थ और सम्मानित व्यक्ति बन गया।

राकफेलर अपने अन्तिम जीवन में मानवता की भलाई के लिए जो कार्य कर गये, उससे अनेकों सन्तप्त हृदय व्यक्तियों को राहत मिल रही हैं, बहुतों के लिए वे प्रेरणास्रोत बने तो उनकी आत्मा भी जहाँ होंगी, सुख और सन्तोष का ही अनुभव कर रही होगी।

हर मनुष्य अपना दृष्टिकोण बदल और सुधार सकता है। विपन्नताओं की विभीषिकाओं को तोड़ता हुआ, हर स्थिति में सुख-शान्ति की ओर बढ़ सकता है। हम और आप भी ऐसा ही कर सकते हैं।


शास्त्री जी की सद्भावना

शास्त्री जी की सद्भावना-

घटना उस समय की है, जब श्री लालबहादुर शास्त्री अपने अनेक साथियों के साथ जेल में थे।

राजनीतिक बन्दियों से लिए धोबी का प्रबन्ध होते हुए भी शास्त्री जी अपने कपड़े स्वयं ही धोते थे और अपने भोजन में से सारी अच्छी चीजें अधिकाँश में दूसरे कै दियों को बाँट देते थे।

साथियों ने जब उनके इस विचित्र स्वभाव का कारण पूछा, तो उन्होंने कहा— ‘मैं धोबी की सुविधा होने के कारण अपने जीवन का नियम तोड़ कर परावलम्बी नहीं बनना चाहता। जब मैं बाहर अपने ही हाथ से कपड़े धोता रहा हूँ, तो यहाँ ही धोबी से क्यों धुलवाऊँ?

‘और कैदियों को अच्छी चीजें इसलिये बाँट देता हूँ कि एक तो मैं अपने स्वाद-संयम को बिगाड़ना नहीं चाहता। दूसरे इन गरीबों को ऐसी चीजें नहीं मिलती। हमारे इस अच्छे व्यवहार से इन पर शुभ-संस्कार पड़ेंगे, जिससे इनका नैतिक-स्तर सुधरेगा। मैं इसे भी देश-सेवा ही समझता हूँ।’

साथी, शास्त्रीजी का उत्तर सुनकर न केवल प्रसन्न ही हुए, बल्कि उनका दृष्टिकोण समझकर उन पर श्रद्धा करने लगे।


प्रातःभ्रमण—एक उत्तम व्यायाम

स्वस्थ रहने के लिये व्यायाम बहुत आवश्यक है। व्यायाम से सारे शरीर-संस्थान में एक हलचल होने लगती है, जिससे अवयव विशेष रूप से सक्रिय हो उठते हैं। उनमें एक गर्मी पैदा हो जाती है, जिससे वे सक्षम, तेजस्वी और सुडौल बने रहते हैं। शरीर की संतुलित स्थिति ही स्वास्थ्य का लक्षण है।

मनुष्य जब व्यायाम करता है, तब उसके शरीर के विकार तथा विजातीय तत्व पसीने के साथ शरीर के बाहर बह जाते हैं, जिससे शरीर में एक ताजगी, चेतना तथा स्फूर्ति की अभिवृद्धि होती है। मन प्रसन्न रहता है और काम करने में खूब जी लगता है।

व्यायाम के समय अवयवों का आन्दोलन तथा ऊष्मा शरीर के अन्दर स्थान-स्थान पर रुके हुए अवाँछित तत्वों को द्रवित करके बाहर खदेड़ देती है। इस प्रकार रोज व्यायाम करते रहने से हमारी पाचक क्रिया ठीक रहती है, जो कुछ खाया जाता है, वह ठीक तरह से पच जाता है। ठीक समय पर पूरे शौच की आसानी रहती है। खुलकर सच्ची भूख लगती है, जो अगले भोजन के लिये रुचि तथा जीर्णता के लिये सहायक होती है। इस प्रकार ठीक भूख लगने और सुपच रहने से शरीर में अवाँछित तत्वों तथा विकारों के पैदा होने और रुकने की सम्भावना नहीं रहती और यदि किसी कारणवश वह पैदा हो जाते अथवा रुकते हैं तो व्यायाम की क्रिया उन्हें रोज बाहर कर देती है। इस प्रकार जब शरीर की नित्य ही सफाई होती रहेगी तो किसी रोग का भय नहीं रहता और आरोग्य ही वास्तविक स्वास्थ्य है। इसलिये स्वस्थ एवं समर्थ बने रहने के लिये मनुष्य को नियमित रूप से व्यायाम करते रहना चाहिए।

व्यायाम का अर्थ एक व्यवस्थित शारीरिक श्रम ही है। जो लोग दिन में आठ-दस घण्टा शारीरिक श्रम करते हैं, उनके लिये कहा जा सकता है कि व्यायाम की आवश्यकता नहीं है। जहाँ तक शारीरिक श्रम तक व्यायाम की परिभाषा है, वहाँ तक तो ठीक है कि शरीर-श्रमिक को व्यायाम करने की आवश्यकता नहीं है। किन्तु जहाँ तक व्यायाम की भावनात्मक परिधि है, वहाँ तक व्यायाम क्या शरीर श्रम करने वाले और क्या न करने वाले के लिये आवश्यक है?

जो दिनभर मेहनत-मजदूरी करके जीविका कमाते रहते हैं उनका शरीर हलचल का लाभ जरूर उठाता है, किन्तु व्यायाम से सम्बन्धित जो स्वास्थ्य लाभ का भावनात्मक विश्वास है, उसका लाभ उन्हें नहीं हो पाता। स्वास्थ्य लाभ के लिये यह भावनात्मक विश्वास बहुत आवश्यक है। यह जरूर है कि शारीरिक श्रम करने वाले बौद्धिक श्रम करने वालों की अपेक्षा कम अस्वस्थ रहते हैं, तब भी स्वास्थ्य सम्बन्धी भावनात्मक विश्वास न रहने से वे पूर्ण रूप से स्वस्थ नहीं रह पाते। कभी थकान अनुभव तो कभी अधिकता की शिकायत करते हैं। इस प्रकार श्रम में भावनात्मक विश्वास की कमी रहने से मानसिक रूप से तो वे स्वस्थ नहीं रहने पाते। व्यायाम से प्राप्त स्वास्थ्य और स्वास्थ्य से प्राप्त प्रसन्नता से वे बहुधा वंचित ही रहते हैं। इसीलिये प्रायः श्रमिकों में उस मानसिक माधुर्य का दर्शन नहीं होता, जो एक स्वस्थ व्यक्ति में होना चाहिये। स्वास्थ्य के भावनात्मक विश्वास के लिये बौद्धिक ही नहीं, शारीरिक श्रम करने वालों को भी कुछ न कुछ व्यायाम करते ही रहना चाहिए।

व्यायाम के अनेक प्रकार हो सकते हैं। दण्ड-बैठक लगाना, खेलना कूदना, दौड़ना भागना, कुश्ती लड़ना डम्बल, लेजम, लाठी आदि उठाना, घुमाना। किन्तु इस प्रकार के व्यायाम अधिकतर उन्हीं लोगों के लिये उपयुक्त रहते हैं, जिनको दिन में कुछ अधिक काम न करना हो। यह व्यायाम—भारी व्यायाम हैं। इनसे शरीर पर अधिक दबाव पड़ता है और अधिक थकान आती है। जिसे पूरा करने के लिये अधिक विश्राम तथा अधिक पौष्टिक भोजन की आवश्यकता पड़ती है। यदि ऐसा न किया जायेगा तो शरीर में थकान भरी रहेगी, शिथिलता बनी रहेगी, जिससे स्फूर्ति के बजाय जड़ता की वृद्धि होगी, जो कि स्वास्थ्य के लिये यह अहितकर लक्षण होगा।

यह सत्य है कि टहलना एक उत्तम तथा हर प्रकार से स्वास्थ्य दायक व्यायाम है। व्यायाम की भावना के साथ जब भ्रमण किया जाता है, तब शरीर तो निरन्तर सक्रिय रहता है, भावना भी काम करती रहती है, जिससे अपना ही आत्म-विश्वास स्वास्थ्य बन बनकर मन तथा शरीर में संचय होता रहता है।

केवल किसी भी समय कुछ दूर पैदल चल लेने की जगमाता ही वह व्यायाम क्रिया नहीं है, टहलने के रूप में जो स्वास्थ्य के लिये आवश्यक कही जा सकती है। टहलने की भी एक सीमा, समय, स्थान तथा विधि है। इन नियमों के निर्वाह के साथ ही वास्तविक अपेक्षित लाभदायक हो सकता है, अन्यथा यों ही खाली घूमते-फिरते रहने से कोरी थकान ही अधिक हाथ आयेगी, व्यायाम का वास्तविक लाभ कम से भी कम।

टहलने अथवा भ्रमण करने के लिये सबसे उपयुक्त समय है, प्रभात का—उषा काल। यह प्रत्यूष काल वैदिक काल से लेकर आज के भौतिक-काल तक अमृत-बेला कहा जाता है। जिस समय सूर्य की शिशु-किरणें अन्तरिक्ष में पूरा जन्म न पा सकी हों, केवल पूर्व में लालिमा के रूप में उनका आभास भर ही भासित हो रहा हो, वही उषाकाल कहा जाता है और यही वह अमृत-बेला होती है, जिसमें टहलने का विधान दिया गया है। जन्मोन्मुख प्रातःकाल की सूर्य-किरणों में वे वैज्ञानिक तत्व रहा करते हैं, जिनमें रोग-नाशक तथा जीवन दायिका शक्ति होती है। साथ ही प्रातःकाल का वायु अपने साथ निर्विकार औषधि-तत्व लेकर संसार में फैलने के लिये चला करता है। रात्रि के शान्त वातावरण में प्रकृति जिस स्वास्थ्य दायक सम्पत्ति को संचय करती है, उसका कोष प्रातःकाल प्राणि-मात्र के लिये खोल देती है, ऐसे समय में जो निरालसी व्यक्ति उसके संपर्क में जाते हैं, वे सबसे अधिक अंश पाते हैं। अन्यथा दिन निकल आने पर कुछ तो सूर्य की किरणें प्रकृति के ऐश्वर्य का शोषण कर लेती हैं, कुछ निकल पड़ने वाली भीड़भाड़ में थोड़ा-थोड़ा बँट जाता है और कुछ यातायात आदि के धूल-धक्कड़ से विकृत हो जाता है। इसलिये प्रकृति-माता का विशुद्ध तथा अधिक से अधिक प्रसाद पाने के लिये उषा की अमृत-बेला के समय ही टहलने जाना चाहिए।

टहलने की एक सीमा भी रखना आवश्यक है। यह नहीं होना चाहिए कि कभी तो मौज में आकर दूर-दूर तक भ्रमण कर आये और कभी थोड़ी दूर ही जाकर वापिस आ गये। अपनी शारीरिक क्षमताओं, समय तथा सुविधा के अनुसार टहलने के लिये उतनी ही दूरी रखनी चाहिये जिसका नियमित निर्वाह हो सके और जिससे शरीर से आवश्यक शिथिलन तथा हलचल पैदा हो सके। कभी ज्यादा और कभी कम टहलने से सन्तुलित व्यायाम की कमी रहेगी, जिससे अपेक्षित स्वास्थ्य लाभ की आशा कम रहती है।

टहलने के विधि-विधान में तीन बातें बहुत आवश्यक हैं। अपेक्षाकृत तेज चलना इस प्रकार कि सारे शरीर की गर्मी दौड़ती रहे, यथा सम्भव नंगे पैर और शरीर पर अनावश्यक कपड़े न पहने हुए। तीसरी मुख्य बात यह कि टहलते समय सारी चिन्तायें तथा विकृत भावों को त्याग कर प्रकृति के साथ एकाग्र रहना चाहिए।

तेज चलने से जहाँ शरीर में हलचल होगी, गहरी श्वाँसों के साथ वायु का आक्सन तत्व अधिक से अधिक प्राप्त होगा। शरीर में चपलता तथा स्फूर्ति का समावेश होगा। गर्मी तथा पसीने के साथ शरीर के विकार बाहर निकलेंगे। नंगे पैर तथा कम कपड़े पहनकर टहलने से पृथ्वी का विद्युत-तत्व तलवों के जरिये पूरे शरीर में प्रवेश करेगा। कम कपड़ों से उषा का अमृत तथा वायु का गुण शरीर में अधिक से अधिक प्रवेश करेगा, जिससे शरीर निर्विकार तथा पुष्ट होगा।

प्रकृति के साथ तन्मय होकर निश्चिंत तथा निर्विकाम होकर घूमना सबसे अधिक लाभदायक है, इससे विचार शुद्ध होगा, आत्मा उन्नत होगी, मन प्रसन्न रहेगा और पवित्रता आयेगी। विचारों की पवित्रता स्वयं एक स्वास्थ्य दायक रसायन है।

इस प्रकार शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक तथा आत्मिक स्वास्थ्य के लिये आबाल, वृद्ध, नर नारी को प्रातःकाल विधि-विधान के साथ अवश्य ही भ्रमण-व्यायाम करना चाहिए, इससे केवल स्वास्थ्य-लाभ ही नहीं होता, आयु भी बढ़ती है।


आप वृद्धावस्था से सदा बचे रह सकते हैं।

जिसे हम सब सामान्यतः वृद्धावस्था कहते हैं, वह वस्तुतः जीवन-विकास की चरम-विधि होती है। आयु की बढ़ोतरी को ही बुढ़ापा नहीं कहा जा सकता। यदि बुढ़ापा आयु-वृद्धि पर ही निर्भर होता तो निश्चय ही संसार का कोई भी व्यक्ति एक निश्चित आयु के बाद बेकार हो जाता और एक निश्चित आयु तक पूर्ण रूप से कार्यक्षम बना रहता। किन्तु सामान्यतः ऐसा देखने में नहीं आता।

संसार में सैकड़ों-हजारों ऐसे व्यक्ति मिलेंगे, जो तीस चालीस वर्ष की तरुण आयु में ही थक जाते हैं और आगे की आयु को टूटे पहिये वाली गाड़ी की तरह ढकेलते नजर जाते हैं, जबकि सैकड़ों-हजारों व्यक्ति ऐसे देखे जा सकते हैं, जो साठ और सत्तर वर्ष की पक्की आयु में भी क्षिप्रता से भरे रहते हैं और उनका काम देखकर अनुमान लगाया जा सकता है कि यह लोग आगे भी इसी प्रकार जीवन पूर्ण जिन्दगी चलाते रह सकते हैं। इस प्रकार के उदाहरणों को देखकर इस विश्वास में शंका की कोई गुंजाइश नहीं रह जाती कि बुढ़ापे का आयु की बढ़ोतरी से कोई सम्बन्ध नहीं है। आयु-वृद्धि मनुष्य जीवन की एक स्वाभाविक प्रक्रिया है, कोई परिणाम नहीं। आयु तो जन्म के दिन से लेकर मृत्यु तक निरन्तर क्षण-प्रति-क्षण बढ़ती ही रहती है। आयु की अग्रता तथा वृद्धता दोनों एक बात नहीं है, आयु का बढ़ना एक बात है और बुढ़ापा दूसरी बात है। इसी बात को यों भी कहा जा सकता है कि आयु का बढ़ना एक गति है और वृद्धता एक स्थिति है। वैज्ञानिकों का मत है कि यदि मनुष्य मानव-जीवन की साधारण शर्तों को पूरा करता हुआ उस प्रकार जीवन-यापन करता चले, जिस प्रकार उसे करना चाहिए तो न केवल तरुणता ही बनी रहे, बल्कि जीवन की अवधि भी लम्बी हो जाये। प्रकृति के जीवन-विधान के अनुसार शरीर को यथाविधि उपयोग में लाने वाला व्यक्ति बुढ़ापे का शिकार नहीं बन सकता, फिर चाहे वह सौ साल से अधिक क्यों न जिये। आज भी संसार में न जाने शतायु और अधिकायु वाले कितने व्यक्ति मौजूद हैं, जिनमें बुढ़ापे का कोई चिन्ह नहीं पाया जाता। पूर्व काल में तो यह एक सामान्य बात रही है। आयु-वृद्धि ही वास्तविक बुढ़ापे का कारण नहीं होती, बुढ़ापे का कारण जीवन की वे भूलें ही होती हैं, जिन्हें मनुष्य असावधानी, उपेक्षा, स्वभाव, अज्ञान अथवा संस्कारों वश जाने-अनजाने किया करता है। बुढ़ापा आयु की नहीं, जीवन के लिये असंगत भूलों की परिणति होती है। जीवन को ठीक-ठीक जीवन की तरह जीने वाले बुढ़ापे की सम्भावना से बहुत कुछ मुक्त रहते हैं।

बुढ़ापे के सम्बन्ध में मनुष्य की एक नहीं, दो आयु होती हैं। एक दैहिक तथा एक मनोवैज्ञानिक। यद्यपि यह दोनों आयु सापेक्ष हैं, तब भी इनका एक स्वतन्त्र अस्तित्व भी है। दैहिक आयु तो एक अवधि के बाद ही समाप्त होती है, किन्तु मानसिक आयु में परिवर्तन आता रहता है। अनेक लोग जीवन में अनेक बार मानसिक रूप से मरते-जीते रहते हैं। यही नहीं, मनःस्थिति के अनुसार, देह से अलग भी बूढ़े, जवान होते रहते हैं। संसार में ऐसे न जाने कितने लोग पाये जा सकते हैं, जिनके शरीर में बुढ़ापे का कोई लक्षण न होने पर भी मन से बूढ़े हो चुके होते हैं। वृद्धों की तरह ही वे निराशा, हतोत्साह तथा निष्क्रियता के शिकार बने रहते हैं। उन्हें जीवन से उस प्रकार की कोई रुचि नहीं रहती, जो एक तरुण में होती हैं, जो आयु से, बालों से तथा अन्य इन्द्रियों से वृद्धता की सूचना देते हुए भी मन से बालकों की तरह प्रफुल्ल और नौजवानों की तरह रुचिपूर्ण बने रहते हैं। किन्तु मनुष्य का वास्तविक जीवन तथा वाँछनीय जीवन्तता इन दोनों संस्थाओं के समान रूप से स्वस्थ एवं सम्मिलित रहने से ही पूर्ण होती हैं। शरीर तथा मन दोनों से तरुण बने रहने से ही मनुष्य आयु की बढ़ोतरी पर विजय पाकर चिर-तरुण तथा सक्षम बना रह सकता है और उभय-उपलब्धि तभी सम्भव है, जब मनुष्य जीवन के विधि-विधान का पूरा पालन करे।

बुढ़ापे के कारणों तथा उसके प्रतिरोध के उपाय खोजने में व्यस्त वैज्ञानिकों का मत है कि यद्यपि आयु के बढ़ने पर मानव शरीर की नियामक प्रणालियों की क्रिया-प्रक्रिया एवं प्रतिक्रिया में कुछ परिवर्तन अवश्य आ जाता है, किन्तु उनकी शक्ति नष्ट नहीं होती। जैसे बढ़ी आयु में हृदय, रक्त-वाहिकाओं तथा अवयवों एवं ग्रन्थियों की सामान्य सम्वेदना शीलता कम हो जाती है, किन्तु साथ ही उनमें रासायिनिकता के प्रति संवेदनशीलता बढ़ जाया करती है, जिससे जहाँ उनका काम कम हो जाता है, वहाँ उनकी आवश्यकता भी कम हो जाती है, वे जीवन की सामान्य सक्रियता के लिये कम आयु की अपेक्षा कम से कम तत्व में सन्तुष्ट होने लगती हैं। इसका ठीक-ठीक अर्थ यही है एक अवधि के बाद प्रकृति कुछ अवयवों तथा इन्द्रियों को अपना काम कर देने का संकेत देती है और उसी के अनुसार वह उनको कम भोजन में जीवित तथा प्राणपूर्ण बना रहने की क्षमता भी दे देती है। अब जो व्यक्ति प्रकृति के इस विधान की उपेक्षा करके निवृत्त अवयवों को जबरदस्ती काम में लगाये और अधिक तत्वों के बल पर उन्हें तेजस्वी बनाये रहने को प्रयत्न करते हैं, वह दोहरी गलती करते हैं। एक तो वे विश्राँत अंगों से अतिरिक्त परिश्रम लेते हैं, दूसरे उन्हें अनधिकृत तत्व-मात्रा को ग्रहण करने पर मजबूर करते हैं। यह नियति-नियमों का स्पष्ट उल्लंघन है जिसका परिणाम जीवनहीन बुढ़ापे के रूप में शीघ्र ही सामने आ जाता है।

शारीरिक-श्रम अथवा उसके स्थान पर समुचित व्यायाम के साथ-साथ शरीर को सदा तेजस्वी बनाये रहने के लिये समुचित आहार व्यवस्था भी बहुत आवश्यक है। शारीरिक-श्रम अथवा व्यायाम से उसकी पूर्ति करते रहने पर भी यदि आहार को अनुकूल तथा उचित न बनाया गया तो लाभ के स्थान पर हानि की ही आशंका अधिक रहेगी। श्रम का कार्य तो शरीर के अंगों, उपाँगों को सक्षम तथा तेजस्वी बनाये रखना ही होता है, किन्तु उनको पोषण-तत्व तो आहार से ही प्राप्त हो सकेगा। अस्तु-श्रम के साथ समुचित आहार को शामिल कर लेना भी जरूरी है।

आहार का निर्धारण करते समय केवल दो-तीन मोटी-मोटी बातों को ध्यान में रखने से भी बहुत कुछ काम चल सकता है। पहली बात तो यह कि आहार अधिक से अधिक प्रकृति सम्मत, स्वास्थ्य तत्वों तथा खनिज लवण से युक्त होना चाहिये। उसका चुनाव, आयु, श्रम तथा स्वभाव के अनुकूल ही किया जाना चाहिये। आहार की मात्रा संतुलित तथा समय नियमित होना चाहिए। एक बार बहुत-सा खाने की अपेक्षा अनेक बार थोड़ा-थोड़ा खाना स्वास्थ्य के लिए अत्यधिक हितकर है। युवकों की अपेक्षा वयोवृद्धों को आहार की मात्रा कम ही रखना चाहिए। बुढ़ापे के कारणों में आहार का असन्तुलित तथा अयुक्त होना भी एक विशेष कारण है। हरे शाक, ताजी सब्जियाँ तथा ऋतु-फल स्वास्थ्य के लिए सबसे उपयुक्त आहार माने गये हैं। मासिक तथा साप्ताहिक उपवास आहार के ही अंग हैं, जिनका निर्वाह भी आवश्यक है। जिस प्रकार आवश्यकता से कम खाना अकाल वृद्धता के हेतु है, उसी प्रकार आवश्यकता से अधिक भोजन भी शरीर को थका कर असमय में ही बूढ़ा बना देता है।

इस प्रकार की विवेचना से पता चलता है बुढ़ापा मनुष्य की कोई आवश्यक स्थिति नहीं है और न आयु की बढ़ोतरी से ही उसका कोई सम्बन्ध है। शरीर का सक्षम तथा तेजस्वी बना रहना ही यौवन है और उसका शिथिल हो जाना ही बुढ़ापा है फिर मनुष्य की आयु चाहे तीस साल की हो अथवा नब्बे साल की। शरीर का सक्षम तथा तेजस्वी बना रहना, श्रम, संयम तथा आहार-विहार के साथ विचारों तथा भावनाओं की युक्तता के अधीन है। प्रकृति के शरीर तथा जीवन सम्बन्धी विधान का निष्ठा के साथ पालन करते चलिये और यौवन पूर्ण लम्बी आयु का आनन्द लीजिये।


अपव्ययी मत बनिये।

अपव्ययता एक बहुत ही गर्हित दोष है। अपव्ययी वहाँ स्वयं दुःखी और अशान्त रहता वहाँ इस दोष के कारण उधार माँगकर और कर्ज लेकर दूसरों को भी परेशान करता रहता है। अपव्ययी का परिवार तो उसके इस दोष के कारण दुःखी रहता ही है उसके मित्र, परिचित तथा सम्बन्धी भी दुःखी होते हैं। एक तो उससे सहज सहानुभूति के कारण व्यग्र होते हैं, दूसरे वह उन पर पैसा आदि देने के लिये भी दूसरे की स्थिति का विचार किये बिना दबाव डाला करता है, मजबूर किया करता है।

अपव्ययता का दोष मनुष्य की अनेक मानसिक दुर्बलताओं के कारण पैदा होता है। इन कमजोरियों में एक कमजोरी अन्दर का थोथापन भी है। जो आदमी अन्दर से जितना हल्का और दरिद्री होता है वह ऊपर से उतना ही बनाव शृंगार किया करता है। ऐसा करने में उसका उद्देश्य यही रहता है कि लोगों की दृष्टि उसके बाह्याडम्बर पर ही अटकी रहे, उसकी अंदरूनी न्यूनता को न देख पाये! अधिक वाचालता जिस प्रकार अज्ञान की द्योतक होती है, उसी प्रकार ऊपरी बनाव भीतरी कृत्रिमता का विज्ञापन किया करता है। सदाचार, शिक्षा, विद्या, बुद्धि की कमी ही ऊपरी ठाठ-बाट में उभरा करती है। जो विद्यावान होता है, ज्ञानी और विचारक होता है, उसे बाह्याडंबर से घृणा हुआ करती है। कोई कितना ही पढ़ा लिखा क्यों न हो, यदि वह तड़क-भड़क और शान-शौकत के साथ रहता है, बनाव शृंगार में अधिक दिलचस्पी रखता है तो समझ लेना चाहिये कि या तो इसने शिक्षा का अर्थ नहीं समझा है अथवा शिक्षा इसके लिये ज्ञान के रूप में फलीभूत नहीं हुई हैं। शिक्षा की वास्तविकता तो ‘सादा जीवन उच्च विचार’ के सार में निहित है। सादगी और शालीनता के अभाव में बड़ी-बड़ी उपाधियाँ किसी के लिये उसी प्रकार निस्सार है जैसे वादी से बढ़ा हुआ किसी का मोटा ताजा शरीर। जिस प्रकार जो वास्तव में स्वस्थ एवं शक्तिवान होगा, वह बाहर से अस्वाभाविक रूप से मोटा तुदा नहीं होगा, उसी प्रकार जो अन्दर से ठीक-ठीक सम्पन्न तथा भरा पूरा होगा वह बाहरी बनाव शृंगार से सदा दूर रहेगा।

अपव्ययता का दोष उत्पन्न करने में झूँठी-शान शौकत और अमीरी को दिखाने की भावना का भी बहुत हाथ रहा करता है, अपने को औरों के सामने अधिक से अधिक सम्भ्रान्त एवं सम्पन्न सिद्ध करने के लिये लोग न जाने कितना पैसा बेकार में फूंक डालते हैं। इस प्रकार का मिथ्याचार करने में लोगों का यह भाव रहता है कि उनकी तड़क-भड़क और शान-शौकत देखकर दूसरे लोग उन्हें बड़ा आदमी समझेंगे, उनका रौब मानेंगे। मित्र लोग प्रशंसा करेंगे और उनके प्रति अधिक आकर्षित होने लगेंगे। समाज में उनकी प्रतिष्ठा बढ़ेगी आदर होगा।

समाज में प्रतिष्ठा और प्रशंसा पाने का लोभ एक मानसिक न्यूनता है और यह मानसिक न्यूनता तब मूर्खता की श्रेणी में पहुँच जाती है जब इस लोभ को पूरा करने के लिये शान-शौकत तथा दिखावे का सहारा लिया जाता है। सब जानते हैं कि समाज में वास्तविक प्रशंसा एवं प्रतिष्ठा मनुष्य के सदाचार और सत्कर्मों से मिलती है। संसार में जिन्होंने भी आज तक आदर सम्मान पाया है, वह विद्या बुद्धि तथा चारित्रिक पवित्रता के बल पर ही पाया है। यदि वास्तविक प्रतिष्ठा कपड़ों लत्तों, साजवाज अथवा शान-शौकत के प्रदर्शन भर से मिल जाया करती तो संसार में इससे सस्ती कोई चीज ही न होती। तब लोगों को तप, त्याग, परोपकार, परिश्रम अथवा पुरुषार्थ की आवश्यकता ही न पड़ती। सदाचार, सदाचरण तथा चारु-चरित्र की कोई महिमा ही न रह जाती। लोग बिना समाज-सेवा, परोपकार अथवा परमार्थ के काम किये, जैसे बनता अपने को नाटक के पात्रों की तरह रंग रोगन, वेष-भूषा से सजा-सँवार कर समाज के सम्मुख प्रस्तुत कर देते और ढेरों प्रतिष्ठा एवं मान सम्मान लूट लेते। यदि मान सम्मान और पूजा प्रतिष्ठा वेष-भूषा, शान-शौकत तथा ‘पोज’ प्रदर्शन के ही अधीन होती तो महात्मा गाँधी, महर्षि अष्टावक्र, मनीषी सुकरात, जैसे कुरूपों को संसार का सबसे अधिक अप्रतिष्ठित व्यक्ति और रंग-बिरंगे, छैल-छबीले और फैशनेबुल छोकरों को, रूपवती वेश्याओं को मान सम्मान का सबसे अधिक अधिकारी पात्र होना चाहिये। सच्ची मान प्रतिष्ठा शान-शौकत के नहीं परमार्थ एवं परोपकार के अधीन रहा करती है। इसके लिये मनुष्य को बाहर से नहीं भीतर से सजना संवरना पड़ता है।

किन्तु निःसन्देह खेद का विषय है कि लोग अपनी इस कमजोरी को समझना नहीं चाहते । न जाने कितने इस झूँठी शान-शौकत और मिथ्या पूजा प्रशंसा के लोभ में नित्य ही अपनी आर्थिक-हत्या करते ही रहते हैं। यदि कोई किसी की शान-शौकत अथवा वेष-भूषा को देखकर प्रशंसा अथवा प्रतिष्ठा करता है, तो समझ लेना चाहिये कि या तो यह प्रशंसक स्वयं भी उसी तरह का मानसिक दरिद्री है अथवा किसी स्वार्थ साधन की भूमिका के रूप में वैसा कर रहा है और यदि ऐसा नहीं है तो निश्चय ही वह उसका मजाक उड़ा रहा है, मखौल कर रहा है, मूर्ख बना रहा है। इसलिये लोगों को शान-शौकत अथवा प्रदर्शन के आधार पर वास्तविक प्रशंसा प्रतिष्ठा पाने के धोखे में न रहना चाहिये।

अपव्ययता के दोष में मनुष्य का चटोरपन, दुर्व्यसन तथा नकली जरूरतों का भी बहुत योगदान रहता है। जिसका स्वभाव चटोरा होता है, जिसकी जीभ बिगड़ी हुई होती है, मिठाई, खटाई, चाट, आदि अनेक चीजों के लिये उसकी लार हरदम टपकती रहती है, ऐसे चटोरे व्यक्तियों को घर के सामान्य भोजन से सन्तोष ही नहीं होता है। घर पर ज्यों-ज्यों भोजन का भार उतारने के बाद बाजार में खोंचों वालों के पास अथवा किसी होटल रेस्टोरेन्ट की शरण जाकर अपनी चाटुता की तृप्ति किया करते हैं। यदि वहाँ न गये और परिवार में बाल बच्चों पर मेहरबानी कर दी जो घर पर ही, विविध प्रकार की भाजियां, मुगौड़े, पकौड़ी, पूरी पकवान का तारतम्य लगाकर होटल खुला देते हैं। कभी यह चीज, तो कभी वह चीज, बनवाते और खाते ही रहते हैं। ऐसी चटोरी आदत के कारण वे सामान्य भोजन की अपेक्षा इस प्रकार के स्वाद सिद्ध भोजन में कई-कई गुना खर्च करते हैं जिससे आर्थिक दृष्टि से शीघ्र टूट-फूट जाते हैं और जब अपना होटली कार्यक्रम नहीं चला पाते तो माथे पर हाथ रखकर अपनी गरीबी को रोया करते हैं अथवा समाज की आर्थिक विषमता को कोसा करते हैं।

अनुत्तर दायित्व की दुर्बलता तो अपव्ययता की जननी ही समझनी चाहिये। जो मनुष्य गम्भीर स्वभाव का होगा, जिसमें उत्तर-दायित्व की भावना होगी वह हर काम सोच विचार कर ही करेगा। वह पहनने, ओढ़ने में सादगी एवं शालीनता का ध्यान रखेगा। स्वयं वैसा ही खाने पीने में रुचि रखेगा, जिस तरह का भोजन वस्त्र वह अपने पूरे परिवार को दे सके और सदा देता सके। कभी भी समाज में झूँठी शान-शौकत दिखलाने का प्रयत्न नहीं करेगा—क्योंकि वह जानता होगा कि सच्चे संभ्रान्त लोग ढोल के भीतर पोल के दोष से घृणा किया करते हैं। उत्तरदायी व्यक्ति को अपने बनाव शृंगार, देखा-देखी और शान-शेखी की अपेक्षा अपने बच्चों एवं परिवार की उन्नति तथा वहबूदी का अधिक ध्यान रहता है। उत्तरदायी व्यक्ति अपना कर्तव्य ठीक से निभा सकने में पैसे की सहायता का महत्व अच्छी तरह समझता है। वह यह भी जानता है कि अपव्ययता के दोष से मनुष्य को जब तब ऋणी होना पड़ता है जिससे समाज में अकारण ही अप्रतिष्ठा उठानी पड़ती है। इस प्रकार कोई भी उत्तरदायी व्यक्ति कभी कोई काम ऐसा न करेगा, जिससे वह अपना कर्तव्य ठीक से न निभा सके अथवा प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से उसे कोई जिल्लत उठानी पड़े या कोई उसकी भलमनसाहत पर उँगली उठाये या दाँत निकाले। दुर्व्यसन, दुराचार जैसे दोष तो दूर, उत्तरदायी व्यक्ति कृत्रिमता को भी पास नहीं फटकने देता।

इस प्रकार अपव्ययता के कारणों से बचकर जो व्यक्ति उत्तरदायित्व की भावना लेकर चलते हैं उनका हाथ सदा सधा रहता है, न उनको कभी आर्थिक कष्ट होता है और न दूसरों के सामने हाथ फैलाना पड़ता है। वे एक भले मानुष की जिन्दगी जीते हुए हँसी खुशी के साथ दिन बिताते हैं।


किशोर बच्चों से कैसा व्यवहार करें?

मनुष्य-जीवन में किशोर अवस्था बड़ी ही निर्णायक अवधि होती है। यही वह समय है, जब लड़के-लड़कियाँ जीवन भर के लिये बनते बिगड़ते हैं। किशोर अवस्था में जिन बालक-बालिकाओं के विकास को सही दिशा मिल जाती है, उनका जीवन सफल और जिनकी दिशा गलत हो जाती है, उनका जीवन एक उलझी हुई समस्या की तरह हो जाता है।

किशोर अवस्था मनुष्य की वयःसंधि का समय होता है। इस समय बचपन विदा लेता होता है और यौवन आता हुआ होता है। बचपन के विदा होने का अर्थ यह होता है कि उसकी मचलने, रोने, रूठने अथवा लापरवाही की प्रवृत्तियाँ तिरोहित होने लगती हैं और उनके स्थान पर गम्भीरता, धीरता और उत्तरदायित्व की प्रवृत्तियाँ विकसित होने लगती हैं। बचपन के भोलेपन का स्थान समझदारी लेने लगती है। संकोचशीलता एवं असमंजस की वृद्धि होने लगती है।

इस संधिकाल में जहाँ तेजी से शरीर का विकास शुरू हो जाता है, वहाँ मनोवेगों में भी तीव्रता एवं दीर्घता आने लगती हैं। बचपन में जिस बात को बच्चा आसानी से भूला है, किशोरावस्था में नहीं भूल पाता। बचपन में किसी बात की प्रतिक्रिया कुछ देर के बाद शिथिल पड़ जाती है, किशोरावस्था में वह बहुत समय तक रहा करती है। बचपन में यदि किसी को अकारण, भ्रमवश अथवा निर्दोष होने पर भी डाँट-फटकार दिया जाता है तो बच्चा कुछ देर दुःखी होकर उसे भूल जाता है। किन्तु यदि किशोरावस्था में किसी को अपराध पर भी डाँट-फटकार दिया जाता है तो उसकी प्रतिक्रिया उसके हृदय पर बड़ी गहरी चोट किया करती है। यही कारण है, घर से नाराज होकर भागने वालों में किशोरों को ही संख्या अधिक होती है।

इसी संधि समय में किशोर-किशोर जिन गुणों अथवा दुर्गुणों को ग्रहण कर लेते फिर वे उन्हें आजीवन कदाचित् ही छोड़ते हैं। किशोर अवस्था में बालक-बालिकाओं की जिज्ञासा बढ़ जाती है, जिससे वे शीघ्र ही अच्छी व बुरी बात की ओर आकर्षित हो उठते हैं। ऐसे समय में जिन किशोरों का ठीक-ठीक मार्ग-दर्शन कर दिया जाता है, वे आगे चलकर बड़े ही सुशील और सुव्यवस्थित व्यक्ति बनते हैं। इसके विपरीत जिनकी मनोदशा का विचार किये बिना उन्हें कोई दिशा दी जाती है अथवा नहीं दी जाती है तो युवावस्था में उनका अनुशासनहीन, अव्यवस्थित एवं अस्त-व्यस्त हो जाने का डर रहता है।

जिस प्रकार दो युगों के आवागमन संधि समय में एक क्राँति की स्थिति उत्पन्न हो जाती है, उसी प्रकार वयःसंधि काल में किशोरों के मन व शरीर में एक क्राँति उत्पन्न होने लगती है। उस समय उसमें न तो बच्चों जैसा अल्हड़पन रहता है और न प्रौढ़ों जैसी गम्भीरता आने पाती है। इसलिये इस असमंजस अथवा क्राँति के समय में अभिभावकों को अपने बच्चों के साथ समझ-बूझ कर व्यवहार करना चाहिए।

इस अवस्था में भी बच्चों को जो अभिभावक निरा बच्चा समझ कर उसी प्रकार व्यवहार करते रहते हैं, जिस प्रकार कि बचपन में, तो किशोर इसे अपना अपमान समझकर खीझ उठता है और यदि उसके साथ प्रौढ़ों जैसा व्यवहार किया जाता है, तब भी वह उसे एक व्यंग जैसा समझ कर प्रसन्न नहीं रहता। इसके अतिरिक्त जो अभिभावक कभी उसे बच्चा समझकर और कभी प्रौढ़ समझकर व्यवहार किया करते हैं, वे भी उसे अपनी स्थिति ठीक-ठीक नहीं समझा पाते।

वास्तव में किशोरावस्था में बच्चों से संतुलित व्यवहार कर सकने की कला हर अभिभावक के वश की बात नहीं है। फिर भी व्यवहार करने में अभिभावकों को इतना तो ध्यान रखना ही चाहिये कि उनके किसी व्यवहार से उनका किशोर अपने को अपमानित न समझे। जैसे यदि किसी समय वह बचकानी मौज में आ जाये और किसी बात के लिये जिद करता अथवा लाड़-दुलार चाहता है तो उससे यह न कहना चाहिए कि इतना सयाना हो गया है, ऐसा बचपन करते शर्म नहीं आती? उन्हें उस समय उसकी बचकानी मौज को रास्ता देना चाहिए। तिरस्कार न करना चाहिए। इसके विपरीत यदि वह कभी प्रौढ़ता के प्रवाह में बहकर कोई गम्भीर बात कहता, किसी गम्भीर विषय में दिलचस्पी लेता है अथवा बड़े-बूढ़ों की बातों में शामिल होता है तो उसे यह कहकर तुरन्त तिरस्कृत नहीं करना चाहिए कि “कल का छोकरा बूढ़ों जैसी बात करता है।” अभिभावकों को चाहिए वे किशोरों की इन दोनों तरंगों का समुचित मूल्याँकन करें और किसी उचित अवसर पर उनको उनकी स्थिति बतलायें। क्योंकि किशोरों में दोनों अवस्थाओं की प्रवृत्तियाँ हुआ करती हैं। न तो बचपन पूरी तरह जाने पाता है और न यौवन आने पाता है। किसी समय भी दोनों में से कोई प्रवृत्ति उभर कर ऊपर आ सकती है।

वैसे होता अधिकतर यह है कि इस आयु में किशोर अपने को अधिक बड़ा, अधिकारी और उत्तरदायी समझने लगते हैं, जब कि वे वास्तव में होते वैसे नहीं हैं। इस आयु में वे अवश्य यह चाहने लगते हैं, उन्हें पहले से अधिक आदर दिया जाये, अधिक अधिकार दिया जाय और अधिक स्वतन्त्रता दी जाये। उन पर से बचपन का कठोर नियन्त्रण उठा लिया जाये। इसका कारण यह कि इस समय उनकी अपनी रुचि, अपना दृष्टिकोण और अपनी जिज्ञासा विकसित होने लगती है। वे हर अच्छी-बुरी बात को अपने दृष्टिकोण से देखना ओर अपनी रुचि के अनुसार करना अथवा न करना पसन्द करने लगते हैं। ऐसी दशा में जब उनका विरोध किया जाता है तो उनमें एक विद्रोह की भावना जाग उठती है।

इस समस्या को हल करने के लिये अभिभावकों को बड़ी ही सहनशीलता एवं संतुलित मस्तिष्क से काम लेना होगा। किसी अवाँछनीय दिशा में किशोरों का मनोवेग रोकने के लिये डाँट-डपट अथवा लानत मलामत से काम लेना ठीक न होगा, बल्कि उन्हें एक मित्र की तरह प्रेम, गम्भीरता तथा उत्तरदायित्वपूर्ण ढंग से समझाना होगा। साथ ही किसी अच्छी बात के लिये प्रेरित करने के लिये आदेश, उपदेश अथवा निर्देश मात्र से काम न चलेगा। उन्हें उदाहरणों, प्रमाणों तथा अनुभवों के आधार पर मित्र की तरह ही शिक्षा देनी होगी। किन्तु इन दोनों बातों में भाषा एवं भावों का स्तर ऐसा रहना चाहिए, जिससे वह अपने को हीन न समझे अथवा अयोग्य न अनुभव करने लगे। यदि अभिभावक के समझाने में उसे इस प्रकार की अनुभूति हुई तो उसको मानसिक एवं बौद्धिक विकास में हानि होगी।

किशोरों का एक सहज स्वभाव यह भी होता है कि वे हर समय कुछ न कुछ करते रहना चाहते हैं। खाली बैठ सकना उनके लिये मुश्किल होता है। इसका एक मात्र कारण यही है कि इस आयु में उनके अन्दर नई शक्ति की अभिवृद्धि हुआ करती है, जो हर समय उनके अंग-प्रत्यंगों में लहर मारती रहती है, कुछ करने का हौंसला लगाती रहती है। ऐसी दशा में जब उन्हें कुछ और काम नहीं होता तो शरारत ही किया करते हैं। यदि उनकी इस नवोदित शक्ति को किसी अच्छे काम में नियोजित कर दिया जाय तो शरारत नहीं करें।

चूँकि लोग किशोरों को किसी काम के योग्य नहीं समझते, इसलिये उन्हें ठाली ही रक्खा करते हैं, कोई काम नहीं सौंपते। इसीलिये आजकल किशोर-अपराधियों की संख्या बढ़ती जा रही है। बेकार रहने से ही किशोर बिगड़ते जा रहे हैं। अनेक देशों ने अपने यहाँ किशोर-अपराध रोकने के लिये बहुत से क्लब खोल दिये ओर उनमें—संगीत, नृत्य, वाद्य, चित्रकारी, नाटक अध्ययन, शिल्प तथा कला-कौशल की विभिन्न व्यवस्थाएं कर रक्खी हैं, जिनमें किशोर एवं किशोरियाँ जाकर अपनी अभिरुचि के काम सीखते, करते और खुश होते हैं।

किशोरों को अपराधों तथा विकारों से बचाने के लिये अभिभावकों को उनके साथ मित्रवत् व्यवहार करते हुए उनकी रुचि एवं योग्यता के ऐसे काम देना चाहिए, जिससे उनकी शक्ति का ही उपयोग न हो, बल्कि उनका मनोरंजन हो, उनके मनोवेगों को उचित आश्रय मिले और आगामी समय में उपयोगी हों। यह किशोर वय लड़कों में 14 से 18 और लड़कियों में 13 से 17 वर्ष तक रहती है। इन चार वर्षों में जो अभिभावक अपने बच्चों को उचित व्यवहार से नियन्त्रण में रख लेते हैं, उनके बच्चे अवश्य ही अच्छे नागरिक बन कर जीवन में सफलता पाते हैं।

भव्य समाज की नव्य रचना


वयोवृद्धों के लिए एक अनुपम अवसर

जो इससे चूकेंगे, वे सदा पछताते रहेंगे!

युवावस्था को सुख-शाँतिमय और समृद्ध बनाने के लिए उसकी तैयारी बालकपन में करनी पड़ती है। बचपन में विद्याध्ययन, स्वास्थ संवर्धन एवं संस्कार अनुशासन का अभ्यास न किया जायगा। तो यौवन युवावस्था दीन-हीन होकर बितानी पड़ेगी। यौवन लौकिक-जीवन की सुविकसित अवस्था है। उसमें मनुष्य को सारे इह-लौकिक आनन्द प्राप्त करने का अवसर मिलता है। स्वास्थ्य, सौंदर्य, प्रतिभा, सत्ता, धन, मान, मनोरंजन, यश, पारिवारिक-उल्लास आदि आनन्द के बहुत से अनुभव इसी अवस्था में होते हैं। पर यह लाभ मिलते उन्हें ही हैं, जो बचपन में इसके लिए कठोर तप कर लेते हैं। जिन्होंने शैशव अस्त-व्यस्त बिताया, उनका यौवन निराशाओं और असफलताओं से भरा हुआ ही रहेगा।

भविष्य-निर्माण की तैयारी -

लौकिक जीवन में एक ही बार यौवन आता है। वृद्धावस्था तो लूटे हुए दिवालिये की तरह है। न शरीर काम देता है, न मस्तिष्क, न शक्ति रहती है, न प्रतिभा। बूढ़े को किसी प्रकार जिन्दगी के दिन पूरे करने पड़ते हैं। इसके उपरान्त मरणोत्तर जीवन की प्रौढ़ता एक बार फिर आती है। शरीर त्यागने के बाद परलोक का स्वर्गीय आनन्द और इसके बाद उच्च स्तरीय साधन सम्पन्न परिस्थितियों में नया जन्म। इन दोनों को मिलाकर एक यौवन आनन्द का अवसर फिर मिलता है।

यों समझना चाहिए कि एक जीवन-चक्र में दो बार यौवन आता है और दो बार उसकी तैयारी करनी पड़ती है। पच्चीस से पचास वर्ष की आयु के बीच रहने वाला लौकिक, शारीरिक-यौवन उसी के लिए आनन्ददायक बनेगा, जो पच्चीस वर्ष तक उसके लिए आवश्यक तपश्चर्या की तैयारी, शक्ति-संचय करता रहा होगा। जिसने वह अवधि—आलस्य और प्रमाद में, उच्छृंखलता और स्वच्छंदता में बिगाड़ दी, उसे युवावस्था में पग-पग पर नीचा देखना पड़ेगा। तिरस्कृत और असफल की तरह ही वह समृद्ध साथियों के बीच संकोच एवं पश्चात्ताप की व्यथा सहता रहेगा। अभावग्रस्त तो रहेगा ही।

दूसरा यौवन मानसिक आता है। यह मरणोत्तर जीवन है। इसमें परलोक में स्वर्ग एवं मुक्ति का देवोपम सुख सम्मिलित है और ऊँचे साधन सम्पन्न माध्यम लेकर—जन्म, जाति, प्रतिभा के साथ जन्मना भी उसी यौवन के अंतर्गत आता है। यह अदृश्य एवं अप्रत्यक्ष है, पर है इतना महत्वपूर्ण कि शारीरिक यौवन की समृद्धि एवं सफलता उसकी तुलना में नगण्य एवं अकिंचन ही ठहराई जायगी। स्वर्ग में मिलने वाले अपार सुखों की तुलना? मुक्ति का आनंद संसार की किसी भी सुविधा से असंख्य गुना अधिक है। सारे जीवन भर प्रयत्न करने पर भी साधारण मनुष्य इतनी प्रतिभा एकत्रित नहीं कर सकता, जितनी कि कोई-कोई तेजस्वी संस्कारी व्यक्ति जन्म से ही अपने साथ लेकर लेकर आते हैं। अद्भुत कुशाग्र बुद्धि, मनोरम सौंदर्य, मधुर कंठ, उत्कृष्ट संस्कार, अद्भुत मनोबल, साधन-सम्पन्न घरों में जन्म आदि कितनी ही विशेषताएं ऐसी हैं, जो अनेक व्यक्तियों को जन्म से ही इतनी प्रचुर मात्रा में मिलती हैं कि उनके भाग्य को सराहना पड़ता है। यह अदृश्य यौवन जो मरण से लेकर नये जन्म की अवधि के बीच में आता है, निःसंदेह शारीरिक यौवन की अपेक्षा हजारों-लाखों गुना अधिक उत्कृष्ट एवं महत्वपूर्ण है। इसका आनन्द वे लोग उठाते हैं, जो वृद्धावस्था में उसके लिए आवश्यक तपश्चर्या कर लेते हैं। जिन्होंने बुढ़ापा यों ही अस्त-व्यस्त ढंग से बिता दिया, उनके लिए यह अदृश्य यौवन अभाव और कष्टों से ही भरा रहता है। उन्हें नारकीय व्यथाएं सहनी पड़ती हैं।

बालकपन को सुव्यवस्थित एवं सुविकसित बनाने के लिए चारों ओर बड़ी प्रबल चेष्टाएं की जा रही हैं। स्कूल-कालेजों की स्थापना और शिक्षा-व्यवस्था के लिए बहुत कुछ किया जा रहा है, खेल-कूद के साधन प्रचुर परिमाण में जुटाये जा रहे हैं, मानसिक विकास के लिए अनेक साँस्कृतिक कार्यक्रम चल रहे हैं। यह बड़ी प्रसन्नता की बात है कि बच्चों का अगला समय, यौवन अधिक उज्ज्वल बनाने के लिए आवश्यक ध्यान दिया जा रहा है। किन्तु खेद इसी बात का है कि वयोवृद्धों के भविष्य-निर्माण की दृष्टि से कहीं कुछ भी नहीं हो रहा। जबकि उनकी संख्या भी लगभग बालकों के जितनी ही है। उनका भविष्य, उनका मरणोत्तर, यौवन—सच पूछा जाय तो बालकों से भी अधिक महत्वपूर्ण है।

गृह-निवृत्त व्यक्तियों सोचें, यों करें-

लगभग पचास-पचपन वर्ष की आयु में यह स्थिति आ जाती है कि बड़े लड़के अपनी शिक्षा पूरी करके आजीविका कमाने लगें। बड़े बच्चों पर यह नैतिक जिम्मेदारी है कि वे अपने छोटे भाई-बहिनों का पुत्रवत् लालन-पालन शिक्षा और विवाह आदि का उत्तरदायित्व अपने कन्धों पर उठावें। यदि वे यह भार नहीं उठाते तो समझना चाहिए कि वे माता-पिता के ऋण से उऋण नहीं होते। अपनी कमाई आप ही खाने और भाई-बहिनों की उपेक्षा करने का अर्थ यह है कि उनके बच्चे भी ऐसा ही करें और उनके बुढ़ापे को सार्थक बनाने में कुछ भी सहायता न करें।

सच्ची तीर्थ-यात्रा का पुण्य-फल -

प्राचीन-काल में तीर्थ इसी प्रयोजन के लिये थे। बुढ़ापे में लोग तीर्थ-यात्रा करने जाते थे। वहाँ वयोवृद्धों के लिए शिक्षा एवं साधना की आवश्यक व्यवस्था रहती थी, इसी के लिए वहाँ जाते थे और देर तक वहाँ ठहरते थे। तीर्थों का सृजन ही वानप्रस्थों से लिये, गुरुकुलों एवं साधना संस्थानों की दृष्टि से किया गया था। आज तो सब कुछ उल्टा हो रहा है, तो तीर्थ का स्वरूप भी उल्टा क्यों न होगा?

हमें एक महत्वपूर्ण कार्य, उन वयोवृद्धों के लिए ऐसे सजीव तीर्थों का सृजन करना है, जहाँ रहकर वे ब्रह्म-विद्या का प्रशिक्षण प्राप्त करते हुए एक अवधि तक साधना संलग्न रह सकें। इस तीर्थ-यात्रा के बिना उनके संस्कार परिपक्व न होंगे। जो इच्छा उत्कण्ठा परमार्थ के लिए किसी अवसर पर उठी होगी, वह फिर पानी के बबूले की तरह बैठ जायगी। भावनाओं की परिपक्वता के लिये कुछ ठोस प्रयत्न करना होता है। यह प्रयत्न कुछ समय घर से बाहर रहकर करना होगा, जहाँ जीवन के नये मोड़ में कार्य आने वाली क्षमता उत्पन्न की जा सके। लुप्त प्राय तीर्थ-परिक्रमा को हमें पुनः साकार रूप देना होगा।

इस अभाव की पूर्ति की जाय -

अखण्ड-ज्योति पवार के विवेकवान् वयोवृद्धों के लिये ऐसी सुविधा उत्पन्न करना हमारा कर्त्तव्य है। परिजनों में से प्रत्येक को यह प्रयत्न करना चाहिए कि इस लेख को उन सभी व्यक्तियों को पढ़ाने-सुनाने का प्रयत्न करें, जो पचास वर्ष की आयु पार कर चुके। उन्हें ढलती आयु के धर्म-कर्तव्यों का पालन करना ही चाहिए। पारमार्थिक जीवन में साहसपूर्वक प्रवेश करना ही चाहिए। यह प्रेरणा जितने आधिक वयोवृद्धों को दी जा सके उतना ही उत्तम है।

हम मथुरा में ऐसा प्रबन्ध कर रहे हैं, जिसके अनुसार ऐसे वयोवृद्धों की, वानप्रस्थों की तीर्थ-यात्रा एवं साधना-शिक्षा का प्रयोजन पूरा हो सके। कहना न होगा कि मथुरा तीर्थ का अपना अनुपम स्थान है। ‘तीन लोक से मथुरा न्यारी’ की उक्ति निरर्थक नहीं, सार-गर्भित है। यहाँ की कुछ विशेषताएं हैं, जो इस भूमि में अनादि-काल से घुली चली आती हैं। यहाँ के निवास का अपना लाभ है। फिर गायत्री-तपोभूमि को संस्कारवान् सिद्ध-पीठ बनाने के लिए तो पिछले 15 वर्षों से इतना कुछ किया गया है कि यदि कोई नई जगह होती तो भी वह तीर्थ बन जाती। अखण्ड-अग्नि, नित्य-यज्ञ, 2400 तीर्थों का जल, 123 अरब मन्त्रों की स्थापना, अब तक हुई साधना, तपश्चर्या, यज्ञाहुति आदि का प्रभाव ऐसा है, जिससे यहाँ निवास करने मात्र से बहुत कुछ कल्याण हो सकता है। यमुना तट पर बसी हुई यह तपोभूमि— साधना एवं तपश्चर्या के लिए, शिक्षा और दीक्षा के लिए कितनी उपयुक्त है, यह कहने की आवश्यकता नहीं।

एक वर्षीय तपश्चर्या -

व्यवस्था यह की गई है कि यहाँ निवास करने वाले वयोवृद्धों के लिए साधना एवं शिक्षा का एक वर्षीय कार्यक्रम चला करे। एक वर्ष में सहस्रांशु गायत्री महापुरश्चरण पूरा हो जाता है। यह एक बहुत बड़ी तपश्चर्या है। एक वर्ष तक इस तीर्थ भूमि में रहकर यह पुरश्चरण किया जाय तो घर रहकर किये जाने वाले दस पुरश्चरणों से अधिक इसका प्रभाव होगा। इसी एक वर्ष की अवधि में एक चान्द्रायण व्रत कर लिया जायगा। चन्द्रमा के हिसाब से भोजन घटाने-बढ़ाने का यह चान्द्रायण महाव्रत इस जीवन में बन पड़े तो यह पाप कर्मों का उचित प्रायश्चित है। इस प्रायश्चित से आत्मा में प्रत्यक्ष पवित्रता एवं सात्विकता का प्रकाश बढ़ते हुए परिलक्षित होना सुनिश्चित है। आत्मा की निर्मलता, साधना की सफलता को अधिक सम्भव एवं अधिक सरल बना देती है। एक वर्ष तक नित्य हवन करने का लाभ भी कुछ कम नहीं, उससे शरीर और मन पर चढ़े हुए रोग-शोक एवं कषाय-कल्मषों का शमन होगा ही। साधना में मार्ग-दर्शक का सान्निध्य आवश्यक होता है। गायत्री उपासना में मार्ग पर बढ़ते हुए जिन कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, उनका समाधान जितनी अच्छी तरह यहाँ रहने वाले का हो सकता है, उतना और कहीं नहीं। किस साधक के लिए किस प्रकार की साधना उपयुक्त है? इसका निश्चय यहाँ रहने पर बहुत ही उत्तमता से हो सकता है। जिन्हें गायत्री साधना का कुछ वास्तविक लाभ देखना हो, उन्हें एक वर्ष उधर रहकर अपनी तपश्चर्या पूर्ण करने की बात सोचनी चाहिए।

साथ में ब्रह्म-विद्या की शिक्षा भी -

साधना के साथ-साथ ब्रह्म-विद्या का प्रशिक्षण भी अनिवार्य रूप से हम आवश्यक है। ज्ञान और कर्म का जोड़ा है। स्वाध्याय और साधना की अन्योन्याश्रय संगति है। ब्रह्म-विद्या का ज्ञान प्राप्त करना ही सच्चा सत्संग है। सच्चे सत्संग की आवश्यकता ऊट-पटाँग बकवास से नहीं, वरन् क्रमबद्ध शास्त्र अध्ययन से ही पूरी हो सकती है। इस एक वर्षीय वानप्रस्थ साधना में ब्रह्म-विद्या की शिक्षा को भी आधारभूत अंग बना दिया गया है।

ज्ञान का स्रोत वेद है। वेद समस्त प्रकार के ज्ञान-विज्ञान का महानतम भण्डागार है। जो इसमें है, वही संसार में है। जो इसमें नहीं, वह कहीं भी नहीं है। ऋषियों ने वेद-ज्ञान के आधार पर ही भारत को, विश्व का मुकुट-मणि बनाया था। खेद है कि वह वेद-ज्ञान आज प्रायः लुप्त होता चला जा रहा है। इस सूर्य के अस्त हो जाने पर नाना प्रकार के पंथ-पाखण्ड उल्लू और चमगादड़ों की तरह कुहराम मचा रहे हैं। ज्ञान के नाम पर अज्ञात फैला रहा है। सच्चा ज्ञान प्राप्त करना हो तो वेद का ही आश्रय लेना पड़ेगा। वानप्रस्थों के लिये-ज्ञान के उद्गम वेद को ही पढ़ना सीखना चाहिए। एक वर्ष के इस साधना-काल में वेद का तत्वज्ञान और उसका रहस्योद्घाटन उपनिषदों के द्वारा पढ़ाया जायगा। चारों वेदों और 108 उपनिषदों का भाष्य करने के उपरान्त अब हमारे लिए यही उचित भी था कि ब्रह्म-विद्या के इस तत्वज्ञान को व्यवहारिक रूप से सिखाने पढ़ाने का भी कार्य करें। सो यह प्रशिक्षण प्रक्रिया द्वारा होगा।

संस्कृत जानने वाले वेद को साहित्यिक ढंग से पढ़ सकते हैं। पर जो संस्कृत नहीं पढ़े हैं उन्हें हिन्दी के माध्यम से भी भली-भाँति पढ़ाया जा सकेगा। किसी को यह आशंका न करनी चाहिए कि हमें संस्कृत नहीं आती इसलिए वेद कैसे पढ़ सकेंगे? जो संस्कृत सीख सकते हैं, उन्हें संस्कृत भी पढ़ावेंगे। अन्यथा हिन्दी में माध्यम से भी उसी प्रकार वेद का रहस्य सीखा समझा जा सकता है, जैसे कि संस्कृत के माध्यम से। जितना एक वर्ष में संभव है उतना पढ़ा दिया जायगा। जो अधिक दिन रहना चाहेंगे वे अधिक पढ़ सकेंगे।

प्रातः नित्यकर्म जप, हवन जलपान से निवृत्त होने पर वेद कथाएं प्रातःकाल चला करेंगी। दोपहर को शिक्षार्थी अपना-अपना अथवा कई मिलजुल कर भोजन बनायेंगे खायेंगे और फिर विश्राम स्वाध्याय करेंगे। तीसरे पहर गीता रामायण की कथा चला करेंगी। यों गीता रामायण का पाठ तो कई लोग करते हैं पर धर्म शास्त्रों के निचोड़ इन महाग्रन्थों का रहस्य कोई विरले ही जानते हैं। एक वर्ष में इन दोनों महाग्रन्थों का इस प्रकार शिक्षण किया जायगा कि शिक्षार्थी भारतीय धर्म और संस्कृति के समूचे स्वरूप को इन दोनों ग्रन्थों के ही आधार पर पूरी तरह समझ लें। इस शिक्षण क्रम में विशेषताएं ही विशेषताएं भरी रहेंगी। सामान्य गीता, रामायण पाठ से यह प्रशिक्षण कहीं अधिक महत्वपूर्ण होगा। आसन, प्राणायाम, सूर्य, नमस्कार, योग की अन्य क्रियाएं, प्राकृतिक चिकित्सा आदि छुट-पुट शिक्षण क्रम साथ-साथ चलते रहेंगे।

वानप्रस्थों के लिए धर्म तंत्र से भावी जीवन में समाज सेवा भी करनी है इसलिए उन्हें प्रवचन की कला, पर्व संस्कार, यज्ञ, कथा, सामूहिक धर्मानुष्ठान आदि कर्मकाण्डों की भी अच्छी जानकारी इसी अवधि में करा दी जायगी। व्यक्तिगत परामर्श एवं शंका समाधान के लिए समुचित स्थान रहेगा।

विधि व्यवस्था एवं रूपरेखा -

साधारण यह सोचा गया है कि वयोवृद्ध शिक्षार्थी एक वर्ष की शिक्षा और साधना पूरी करके अपने घरों को वापिस लौट जायेंगे और अपने परिवार की देख-भाल करते हुए अपनी उपासना तथा लोक सेवा की साधना में निरत रहकर अपना तथा दूसरों का कल्याण करेंगे। इस मार्ग पर चलते हुए वे अपना भावी यौवन—मरणोत्तर जीवन तो आनन्दमय बनायेंगे ही, इस लोक में भी यश तथा पुण्य से सम्मिश्रित आत्म संतोष प्राप्त करेंगे।

जो आगे अधिक दिन या सदैव यहाँ रहना चाहेंगे, वे प्रसन्नतापूर्वक रह सकेंगे। स्थान इतना यहाँ है। भोजन आदि का व्यय स्वयं होगा। अपनी स्थिति और सुविधा के अनुरूप जब अपना-अपना सस्ता-महँगा प्रबंध करेंगे। जो अपनी धर्मपत्नी समेत रहना चाहेंगे वे भी रह सकेंगे। जिन्हें भोजन बनाना न आता होगा, उन्हें इस प्रकार दो-चार दिन में ही सिखा दिया जायगा कि यह कार्य उन्हें एक खेल की तरह बहुत ही आसान प्रतीत होने लगे। जो अपनी शरीर यात्रा स्वयं चला सकने में असमर्थ हैं, बीमार हैं, खाँसी या किसी छूत के रोग से ग्रसित हैं उनका प्रवेश न हो सकेगा। शरीर से स्वस्थ और मन से श्रद्धालु होना आवश्यक है। उजड्ड, कटुभाषी, गन्दे, संकीर्ण, स्वार्थी, आलसी, प्रमादी प्रकृति के व्यक्तियों को भी नहीं लिया जायगा। ऐसे व्यक्ति व्यवस्था और परम्परा बिगाड़ेंगे तो सारी योजना ही गड़बड़ हो जायगी। सौम्य, सज्जन और सेवा-भावी ही स्थान पा सकेंगे।

25 मई से 13 जून तक चलने वाला शिविर समाप्त होते ही यह एक वर्षीय वानप्रस्थों के लिए आरंभ किया गया शिक्षा-क्रम चल पड़ेगा। जिन्हें आना हो शिविर में सम्मिलित रहकर दुहरा लाभ उठा सकते हैं। अन्यथा शिविर के बाद आ सकते हैं। जिन्हें आना हो अपना पूर्ण परिचय लिखते हुए आवेदन करना चाहिए और स्वीकृति प्राप्त होने पर आने की तैयारी करनी चाहिए।

परिवार के हर वयोवृद्ध को इन पंक्तियों के द्वारा इस एक वर्षीय प्रशिक्षण-क्रम में सम्मिलित होने के लिए आमन्त्रित करते हैं। जो आवेंगे वे इस एक वर्ष को जीवन का सर्वोत्कृष्ट एवं सार्थक कर्म अनुभव करेंगे। जिनकी परिस्थितियाँ ऐसी हों, वे इसमें सम्मिलित होने का शक्ति भर प्रयास करें। सच्ची तीर्थ-यात्रा का पुण्य-फल इससे अधिक और कहाँ मिल सकता है? जो लोग तीर्थ-यात्रा की बात सोचते हों, उन्हें वह धन अपने निर्वाह खर्च में कम कर इस एक वर्षीय साधना क्रम में सम्मिलित होना चाहिए।

सामान्य पाठक जो स्वयं नहीं आ सकते, इस स्थिति के व्यक्तियों तक यह सूचना पहुँचावें और उन्हें इसके लिए प्रोत्साहित करें। इस प्रकार भारत की एक महान परम्परा को पुनर्जीवित करने का हम लोग सचमुच ही कूद ठोस काम कर सकेंगे।


अपनों से, अपनी-पर नितान्त आवश्यक बात

पिछले दिनों में हमने अपने विशाल परिवार में से कुछ ऐसे प्रबुद्ध साथी ढूँढ़ने का प्रयत्न किया है, वो युग-निर्माण की पुण्य-परम्परा को हमारे पीछे भी प्रगतिशील रख सकें। इस दृष्टि से गत वर्ष परिजनों से पूछा था कि आप लोगों में से ऐसे कौन-कौन हैं, जो हमारे कन्धों पर आये हुए उत्तरदायित्वों के भार को अपना कन्धा लगाकर हल्का कर सकें? इसका उत्तर सन्तोषजनक मिला था। बेशक परिवार में ऐसे लोग भी हैं, जो हमारी विचारधारा में रस लेते हैं, उसे पसन्द करते हैं और अखण्ड-ज्योति अथवा अन्य साहित्य को पढ़कर अपना संतोष कर लेते हैं। परिवार में कुछ ऐसे लोग भी हैं, जो पूजा, उपासना के माध्यम से, अपनी कतिपय कठिनाइयों के समाधान की आशा करते हैं, उनका मूल प्रयोजन उतना मात्र ही है। इस दृष्टि से वे संपर्क में आते हैं, संपर्क में आने पर किसी प्रकार संकोचवश ही सही, अखण्ड-ज्योति या अन्य पुस्तकें भी पढ़ने लगते हैं। वैसे उनकी इस सम्बन्ध में कोई निजी दिलचस्पी नहीं है।

उपरोक्त दो प्रकार के लोगों से हम कुछ विशेष आशा नहीं करते। उनके बारे में उतना ही सोचते हैं कि अपनी साहित्यिक अभिरुचि को तृप्त करने अथवा उपासनात्मक मार्ग-दर्शन से मिल सकने वाले प्रलोभन के कारण वे किसी प्रकार आज हमारे साथ हैं। कल उन्हें उपयोगिता कम दिखाई पड़ी, अपना प्रयोजन कम सधता दीखा तो वे साथ छोड़ देंगे। परिवार की सदस्यता त्यागते उन्हें देर न लगेगी। इस श्रेणी के लोगों को सहचर मात्र कहा जा सकता है। रास्ता चलते कितने ही लोगों का साथ हो जाता है। बोलते बात करते मंजिल कट जाती है फिर जिसका जिधर अभिप्राय था, उधर रुक जाता है या चला जाता है। समय के साथ एक दूसरे को भूल भी जाते हैं। लाखों व्यक्ति हमारे जीवन संपर्क में ऐसे भी जाते हैं। लाखों व्यक्ति हमारे जीवन संपर्क में ऐसे भी जाते हैं। जो कभी बड़े घनिष्ठ थे, पर अब एक दूसरे को लगभग भूल चुके हैं। इसी प्रकार जो आज अपने सहचर हैं, उनमें से भी अनेकों ऐसे होंगे जो अगले दिनों अपना साथ छोड़ देंगे।

इस भीड़-भाड़ में से हम ऐसे लोगों को तलाश करने में कुछ दिन से लगे हुए हैं, जो हमारे सच्चे आत्मीय साथी एवं कुटुम्बी के रूप में अपनी निष्ठा का परिचय दे सकें। बात यह है कि हमारा कार्यकाल समाप्त होने जा रहा है। हमें अपनी वर्तमान गतिविधियाँ देर तक चलाते रहने का अवसर नहीं मिलेगा। किसी महान शक्ति के मार्ग दर्शन एवं संकेत पर हमारा अब तक का जीवन-यापन हुआ है। आगे भी इस शरीर का एक-एक क्षण उसी की प्रेरणा से बीतेगा। वह शक्ति हमें वर्तमान कार्यक्रमों से विरत कर दूसरी दिशा में नियोजित कर देगी, ऐसा आभास मिल गया है। अतएव हमारा यह सोचना उचित ही है कि जो महान् उत्तरदायित्व हमारे कंधों पर है, उसका भार-वहन करने की जिम्मेदारी किनके कंधों पर डालें? जो मशाल हमारे हाथ में थमाई गई है, उसे किन हाथों में सौंप दें? उस दृष्टि से हमें अपने उत्तराधिकारियों की तलाश करनी पड़ रही रहे।

गत वर्ष हमने परिजनों से यह पूछताछ की थी कि आप लोगों में से कौन ऐसे हैं, जो हमारे उत्तराधिकारी के रूप में आगे आ सकते हैं? कोई भौतिक धन-दौलत पास में होती तो अखण्ड-ज्योति परिवार का हर सदस्य अपने को हमारा सच्चा अनुयायी एवं शिष्य बताता और जो उसे मिलता, उस पर खुशी मनाता। पर जो चीज मिलने वाली है वह आध्यात्मिक है, प्रत्यक्ष दिखाई नहीं पड़ती, फिर उसके बदले में तृष्णा और वासना की पूर्ति नहीं होती, इतने पर भी वह पात्रता की कसौटी पर खरा उतरने के पश्चात् ही मिल सकती है, उत्तराधिकार में मिलने वाली इसी वस्तु को लेकर कोई करेगा भी क्या? अधिकाँश ने ऐसा ही सोचा है और जिन लोगों के उत्तराधिकार की इच्छा प्रकट करने वालों के नाम आये हैं, वे कम ही हैं। उन्हें सन्तोषजनक संख्या में नहीं कहा जा सकता।

हमें जिस महान् परम्परा का उत्तराधिकार मिला है, वह ऐसा ही है, जिसमें तृष्णा-वासना की पूर्ति जैसा कुछ नहीं है। श्रम और झंझट बहुत है, फिर भी गम्भीरतापूर्वक देखने से यह प्रतीत होता है कि जो लोग सारी जिन्दगी धन तथा भोग के लिए पिसते-पिलते रहने के पश्चात जो पाते हैं, उससे हमारी उपलब्धियाँ किसी प्रकार कम नहीं। ठीक है, अमीरों जैसे ठाठ नहीं बन सके, पर जो कुछ मिल सका है, वह उतना बड़ा है कि उस पर पहाड़ों जैसी अमीरी न्यौछावर की जा सकती है। सामान्य बुद्धि इस उपलब्धि का मूल्याँकन नहीं कर पाती, पर जो थोड़ी गम्भीरता से समझ और देख सकता है, वह यह विश्वास करेगा ही कि अमीरी की तुलना में यह आध्यात्मिक उपलब्धियाँ भी कम महत्व की, कम मूल्य की नहीं हैं।

हमने जो पाया है, वही हम अपने उत्तराधिकारियों के लिए छोड़ जाना चाहते हैं। हमें भी इसी परम्परा के अनुसार कुछ मिला है। हर पुत्र को पिता की सम्पत्ति में हिस्सा मिलता है। जो हमारे निकटतम आत्मीय होंगे, उन्हें हमारी संयमित पूँजी का भी लाभ मिलना चाहिए, मिलेगा भी। गाँधी की संग्रहित पूँजी का बिनोवा, नेहरू, पटेल, राजेन्द्र प्रसाद आदि अनेकों ने भरपूर लाभ उठाया। यदि वे लोग गाँधी जी के संपर्क से दूर रहते और अपने दूसरे चतुर लोगों की तरह भौतिक कमाई में जुटे रहते तो वह सब कहाँ से पाते, जो उन लोगों ने पाया। हम गाँधी तो नहीं, पर इतने निरर्थक, दरिद्र एवं खाली हाथ भी नहीं हैं कि जिनके निकट संपर्क में आने वाले को कुछ न मिले। यह खुला रहस्य है कि लाखों व्यक्ति साधारण संपर्क का लाभ उठाकर अपनी स्थिति में जादुई मोड़ दे सकने में सफल हुए हैं और इस संपर्क की सराहना करते हैं। भविष्य में जिन पर हमें अपना उत्तराधिकार सौंपना है, उन्हें वर्तमान स्थिति में ही पड़ा रहना पड़े, ऐसा नहीं हो सकता। वे सहज ही ऐसा कुछ पा सकेंगे, जिसके लिए चिर-काल तक प्रसन्नता एवं सन्तोष अनुभव करते रह सकें।

आध्यात्मिक महानता की, सत्पात्रता की कसौटी के सम्बन्ध में हम इस तथ्य को अनेकों बार प्रस्तुत कर चुके हैं कि व्यक्ति के गुण, कर्म, स्वभाव का उत्कृष्ट होना ही उसकी आन्तरिक महानता का परिचायक है। इसी आधार पर संसार में, इसी आधार पर परलोक में और इसी आधार ईश्वर के समक्ष किसी का वजन एवं मूल्य बढ़ता है। अपने दैनिक-जीवन में हम कितने संयमी, सदाचारी, शाँत, मधुर, व्यवस्थित, परिश्रमी, पवित्र, संतुलित, शिष्ट कृतज्ञ एवं उदार हैं, इन सद्गुणों का दैनिक-जीवन में कितना अधिक प्रयोग करते हैं, यह देख, समझकर ही किसी को, उसकी आन्तरिक वस्तु-स्थिति को जाना जा सकता है। जिसका दैनिक-जीवन फूहड़पनों से भरा हुआ है वह कितना ही जप, ध्यान, पाठ, स्नान करता हो, आध्यात्मिक स्तर की कसौटी पर ठूँठ या छूँछ ही समझा जायगा।

महानता की एक स्पष्ट परख यह है कि व्यक्ति अपने शरीर या परिवार के क्षेत्र से बाहर भी अपनी आत्मीयता को विस्तृत कर सका या नहीं? जो उसी दायरे में सोचता और करता है उसे संकीर्ण, अनुदार एवं तुच्छ कहा जायगा। महान आत्मा—महात्मा वह है जो विराट ब्रह्म की, विश्व मानव की सेवा में अपनी क्षमता एवं प्रतिभा की श्रद्धाँजलि अर्पित करते हुए नत मस्तक होता है। अक्षत चंदन, पुष्प, धूप दीप तो पूजा के प्रतीक मात्र हैं, असली पूजा तो लोक मंगल के लिए किये उदार सत्प्रयत्नों से ही आँकी जाती है। जो कृपण-परमार्थ का महत्व न समझ सका, लोक मंगल के लिए जिसने कुछ भी त्याग कर सकने की हिम्मत न की ऐसा अभागा व्यक्ति भावना की दृष्टि से पक्का नास्तिक है, फिर चाहे उसके तिलक और केश कितने ही लम्बे क्यों न हों। ईश्वर भक्त आस्तिक को लोकसेवी होना ही चाहिए। जिसके हृदय में अध्यात्म की करुणा जगेगी वह सेवा धर्म अपनाये बिना रह ही न सकेगा। कार्य कुछ कठिन है, पर ध्यान रखना चाहिए, बड़ी चीजों की कीमत बड़ी होती है। आध्यात्मिक लाभ जीवन साधना का महँगा मूल्य चुका कर ही प्राप्त किये जा सकते हैं। सस्ते दाम में ही वे नहीं खरीदे जा सकते। माला घुमाने की कीमत पर न तो ईश्वर मिल सकता है, न आत्मा। उपासना का तो कर्मकाण्ड-कलेवर है उसका प्राण तो भावनात्मक उत्कर्ष के साथ अविच्छिन्न रूप से जुड़ा हुआ है।

उत्तराधिकारियों की पात्रता उसी कसौटी पर कसी गई है। दो छोटे कार्यक्रम इस परख के लिए स्वजनों के सामने प्रस्तुत किये गये थे और देखा गया था कि किसमें कितनी वास्तविकता है। दो अत्यन्त छोटे कार्यक्रम थे (1) एक घंटा प्रतिदिन जन-जागरण के लिए देते रहना, (2) एक आना प्रतिदिन इसी ज्ञान यज्ञ के लिए समर्पित करना। यह दोनों इतने सरल हैं कि जिनमें रत्तीभर भी सद्भावना जग पड़ी होगी उन्हें इसमें तनिक भी कठिनाई अनुभव न होगी। जिनकी रुचि इस ओर नहीं उनके लिए हजार बहाने गढ़ लेना बाँये हाथ का खेल है। उत्तराधिकारियों की रुचि आत्म-निर्माण की धर्म साधना की दिशा में जगी या नहीं, हमारे अनुरोध का कुछ मूल्य समझा या नहीं—इसकी पहचान इस तरह सहज ही हो सकती है कि उपरोक्त दो छोटे से प्रयोग आरम्भ कर दिये या नहीं।

एक घंटा समय का क्या उपयोग करें, इस प्रश्न का उत्तर अपनी परिस्थिति के अनुसार कर लेना चाहिए। प्रतिदिन समय न मिलता हो तो छुट्टी के दिन अथवा जब अवसर मिले तब कई घंटे जन-जागरण के लिए खर्च किये जा सकते है। महीने में कुल मिलाकर 30 घंटे तो खर्च हो ही जाने चाहिए। (1) अपने कुटुम्बी , पड़ौसी, मित्र परिजनों में विचार क्रान्ति की प्रेरणा देने वाला साहित्य पढ़ाने या सुनाने के लिए उनके पास जाना, संपर्क बनाना, (2) किसी स्थान विशेष पर बैठकर वहाँ पुस्तकालय, वाचनालय जैसी प्रवृत्ति चलाना। स्थानीय संगठन का कार्यालय चलाना, (3) प्रबुद्ध परिजनों के जन्म दिन मनाने की व्यवस्था करना, उनमें सम्मिलित होना तथा उन आयोजनों में एकत्रित लोगों को प्रेरणा देना, (4) संगठनात्मक प्रक्रिया चल पड़ने पर शतसूत्री युग-निर्माण योजना, के कार्यक्रमों में से जो रचनात्मक एवं आन्दोलनात्मक कार्य अपने लिए विशेष उपयुक्त हो उसे चलाना। यों दैनिक जीवन में विभिन्न प्रयोजनों के लिए संपर्क में आने वाले व्यक्तियों को ऐसी सत्प्रेरणाएं देते रहना ही चाहिए पर कम से कम एक घंटा- (महीने में 30 घंटे) अलग से सुरक्षित रखे जायें। इतना भर करते रहने से एक व्यक्ति ही अपने क्षेत्र में संगठनात्मक एवं रचनात्मक कार्यक्रम को आशाजनक सीमा तक बड़ी सरलता और सफलतापूर्वक आगे बढ़ा ले जा सकता है।

एक आना प्रतिदिन—महीने में दो रुपया-प्रतिदिन या एकबार भी जमा करते चलना चाहिए। इसका उपयोग केवल मात्र सद्ज्ञान प्रसार के लिए, आवश्यक उपकरण, सत्साहित्य, खरीदने के लिए ही खर्च करना चाहिए। अन्य किसी काम में इस पैसे का उपयोग नहीं होना चाहिए। घर में पूजा, कथा की तरह ज्ञान मन्दिर का स्थापित होना भी आवश्यक है। विचार क्रान्ति का—साँस्कृतिक एवं नैतिक पुनरुत्थान का प्रयोजन पूरा कर सकने वाला सुबोध साहित्य हर घर में रहना चाहिए। हर उत्तराधिकारी के घर में इस प्रकार का पुस्तकालय, चले। अखण्ड-ज्योति और युग-निर्माण पत्रिकाएं इसी पैसे से मंगाई जाँय। जिन सर्वांग सुन्दर 5 ट्रैक्टों का प्रकाशन हर महीने हो रहा है उन्हें नियमित रूप से मँगाकर उस पुस्तकालय का कलेवर बराबर बढ़ाते रहा जाय। गत वर्ष 10 ट्रैक्ट विवाहोन्माद सम्बन्धी छपे थे। इस वर्ष हर महीने 5 के हिसाब से 12 महीनों में 60 और नये ट्रैक्ट छप चुके इस प्रकार कुल मिलाकर 70 हो गये। 20 नये पैसा प्रति ट्रैक्ट के भाव से अब तक वे 14) के छप चुके। आगे भी यह प्रकाशन नियमित रूप से होता रहेगा। अपने घरेलू ज्ञान मन्दिर पुस्तकालय में इनका रखा जाना आवश्यक है।

एक आना प्रतिदिन सद्ज्ञान प्रसार के उपकरण-सत्साहित्य खरीदने में और एक घंटा का समय जन-संपर्क में लगाना, यद्यपि बहुत ही छोटा और सरल कार्य है पर इस प्रारंभिक प्रयोजन को नियमित रूप से करते रहने पर सेवा साधना का क्रमबद्ध अभियान चल पड़ता है। दूसरे से कुछ कहने वाले को लोक-लाज वश अपने को भी अपेक्षाकृत अधिक सुधरा हुआ बनाना पड़ता है। सेवा धर्म अपनाने वाले के गुण कर्म स्वभाव स्वयमेव उत्कृष्टता की दिशा में विकसित होने लगते हैं। और उसकी पात्रता का कोष बढ़ता चला जाता है जो आध्यात्मिक प्रगति के लिए अनिवार्य रूप से आवश्यक हे।

अखण्ड-ज्योति परिवार के परिजनों में से प्रत्येक को अब पुनः अपने उत्तराधिकार के लिए आमंत्रित करते हैं। जिनने गतवर्ष अपनी प्रतिज्ञा की सूचना दी थी, उन्हें उसे नियमित रूप से चालू रखने का स्मरण दिलाते हैं। कहकर मुकर जाना बुरी बात है। प्रतिज्ञा तो पालन करने के लिए ही की जाती है। उसे मखौल नहीं बनाया जाना चाहिए। जिन्होंने यह दोनों बातें अभी आरंभ नहीं की हैं उनसे इस बार पुनः अनुरोध करते हैं कि वे आत्म-निर्माण एवं समाज-निर्माण के लिए अत्यन्त उपयोगी एवं आवश्यक इन छोटे-छोटे दो कार्यों को तत्काल आरंभ कर दें। ‘कथनी’ के क्षेत्र से आगे बढ़कर ‘करनी’ में यदि इस प्रकार दो कदम आगे बढ़ाये जा सकें तो यह आशा बँध जायगी कि महापुरुषों के मार्ग पर हम आगे भी चल सकेंगे और उन उपलब्धियों को प्राप्त कर सकेंगे जो सच्चे अध्यात्म-मार्ग पर चलने वालों को निश्चित रूप से मिलती हैं।

उपासनात्मक जीवन बिताने के कारण उस क्षेत्र में हमारी जो अनुभूतियाँ और उपलब्धियाँ हैं उन्हें हस्तान्तरित करने की अब हमें उतावली हो रही है। पर दिया उन्हें ही जा सकता है जो सत्पात्र हैं। सत्पात्र उत्तराधिकारियों के हाथ में हम बहुत कुछ सौंपना चाहते हैं। उन्हीं सौंपी जाने वाली वस्तुओं में से एक युग-निर्माण योजना की जाज्वल्यमान मशाल भी है। जीवन को धन्य बनाने के महत्वाकाँक्षियों को हम सादर आमंत्रित करते हैं, हमारा महान् उत्तराधिकार संभालने के लिए। जिनकी भावनाएँ जीवित हों वे आगे आयें और वह प्राप्त करें, जिसे प्राप्त करने वाले को मानव-जीवन की सार्थकता का लाभ मिलता है।


प्रोत्साहन


प्रोत्साहन (Kavita)

कंटकमय जीवन के पथ पर, पथिक न हिम्मत हारना!

रोषपूर्ण बातों से मन की, सदा भड़कती आग है, विनय शीलता के बचनों से, बढ़ता नव अनुराग है, श्रेष्ठ वस्तु मानव जीवन में, समझो उसका त्याग है, शक्ति, बुद्धि, कर्मठता जिसमें, वह तो पुण्य प्रयाग है,

ऐसे मानव की संगति में, तन, मन सदा सुधारना! जीवन के कंटकमय पथ पर, पथिक न हिम्मत हारना!!

दुःख सुख का तो इस जगती में, होता जब तब मेल है, घटनाओं पर बढ़ती रुकती, मानव जीवन रेल है, आलस उष्मा सदा सुखाती, सुख आशा की बेल है, उन्नति शील व्यक्ति करता नित, संघर्षों से खेल है,

सतत प्रयासों का संबल ले, बिगड़े कार्य संवारना! जीवन के कंटकमय पथ पर, पथिक न हिम्मत हारना!!

छल छल कर सरिता कहती है, सीखों मेरी चाल से, सुन्दर फल हमको सुख देते, ऊँचे तरु की डाल से, नभ पर शशि चंचल किरणें रखतीं पाँव उछाल के, ये रख देतीं है मनुष्य हित, काली रात उछाल के,

पंच तत्व के प्यारे पुतले पर-हित तुम न बिसराना! जीवन के कंटकमय पथ पर, पथिक न हिम्मत हारना!!

सुख की आशा जीवित रक्खो, दुख-पलनों में पाल के, सुन्दर सपना टूट न जाये, बोलो बात सम्हाल के, नयनों का खारा जल पोंछो, साहस के रुमाल से, मानव जग में डरना छोड़ो, भीषण दुख के व्याल से,

तुम प्रधान हो इस दुनिया में, जब तब यही विचारना! जीवन के कंटकमय पथ पर, पथिक न हिम्मत हारना!!

—भगवती प्रसाद सोनी ‘गुँजन’

*समाप्त*