सामान्यतः संसार में उसी को बुद्धिमान मानने की प्रथा-सी पड़ी है जो अधिक-से-अधिक सम्पत्ति प्राप्त कर लेता है, फिर वह सम्पत्ति उसने अनुचित रीति और अवाँछनीय साधनों से ही क्यों न कमाई हो। यहाँ तक कि दूसरे का धन हड़प लेने तक को लोग कुशलता और चतुरता मान लेते हैं।
जब कि वास्तविक बुद्धिमत्ता है मानव-जीवन का समुचित सदुपयोग करना। जिसने बाह्य साधनों की तुलना में आन्तरिक सद्गुणों को अधिक महत्ता दी उसे ही वास्तविक बुद्धिमान मानना चाहिए।
इस सुर दुर्लभ मानव-जीवन को पाकर भी जो इसके उद्देश्य को नहीं समझता वह बुद्धिमान नहीं कहा जा सकता। जो इस अलभ्य अवसर का सदुपयोग करके अपनी आन्तरिक उन्नति में प्रयत्नशील है, वही सच्चे मानों में बुद्धिमान है। जो विचारवान है, भावनाशील और चरित्रवान् है उसे ही बुद्धिमान कहा जायेगा।
एकमात्र भौतिक उन्नति में अपने जीवन के अणु-क्षण लगा देने वाले को बुद्धिमान नहीं कहा जा सकता फिर चाहे वह कितना ही बड़ा आदमी क्यों न हो।
—महर्षि कर्वे
गत वर्ष इन्हीं दिनों पाकिस्तान का आक्रमण हुआ था, चीन आक्रमण के लिए उतारू हो गया था उस दुरभिसंधि का मुकाबला करने के लिए हमारी सेना ने, राजनीतिज्ञों ने तथा जनता ने साहस और त्याग बलिदान से भरे कदम उठाये। ऐसे अवसर पर इस बात की भी भारी आवश्यकता थी कि सूक्ष्म वातावरण में ऐसी अदृश्य आध्यात्मिक स्फूरणा, चेतना एवं भावना उत्पन्न की जाय जिससे देश की शक्ति एवं सामर्थ्य बढ़े और आक्रमणकारियों का कुचक्र छिन्न-भिन्न हो जाय।
उपरोक्त आवश्यकता की पूर्ति के लिए गायत्री परिवार के सदस्यों ने एक सामूहिक शक्ति पुरश्चरण आरम्भ किया, जिसमें शत्रु संहारिणी दुर्गा के ‘क्लीं’ बीज समेत प्रतिमास 24 करोड़ जप करने का संकल्प किया गया। बड़ी प्रसन्नता की बात है कि वह इस युग का अद्भुत पुरश्चरण एक वर्ष में इस आश्विन मास की विजय दशमी को पूर्ण सफलता के साथ पूर्ण हो गया। प्रयोजन पूरी तरह सफल रहा। आक्रमणकारी अपना-सा मुँह लेकर रह गये। भारतीय जनता विजयी हुई।
इस महापुरश्चरण की पूर्णाहुति देश भर में फैली हुई 3000 गायत्री परिवार की शाखाओं ने समारोह पूर्वक सम्पन्न की। जिन 10 हजार साधकों ने उस अभियान में एक वर्ष तक निष्ठापूर्वक भाग लिया उनके तप, त्याग की जितनी प्रशंसा की जाय कम है। राष्ट्र की रक्षा और प्रगति के लिए हम अध्यात्मवादियों को अपने उत्तरदायित्वों को पूरा करना ही चाहिए था, प्रसन्नता की बात है कि वह किया भी गया।
अब इस वर्ष गौ-रक्षा के लिए गायत्री परिवार द्वारा गत वर्ष जैसा ही एक दूसरा पुरश्चरण आरम्भ किया जा रहा है। इसके अंतर्गत 24 करोड़ गायत्री जप ‘ह्री’ बीज समेत होगा। ‘ह्री’ ज्ञान और विवेक की देवी सरस्वती का बीज मन्त्र है। इसके फलस्वरूप सूक्ष्म वातावरण में वह चेतना एवं स्फुरणा उत्पन्न होगी, जिसके आधार पर गौमाता की रक्षा और उन्नति के लिए जन-साधारण में भावना तीव्र हो, सरकार गौवध रोकने का कानून बनावे और वे परिस्थितियाँ उत्पन्न हों जिनमें गौ संवर्धन की विभिन्न योजनाएँ कार्यान्वित हो सकें।
‘ह्रीं’ बीज का उपयोग गत वर्ष की भाँति ही होगा। “ॐ भूर्भुवः स्वः ह्रीं, ह्रीं, तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि, धियो यो नः प्रचोदयात् ह्रीं, ह्रीं, ह्रीं” इस मन्त्र की एक माला प्रत्येक गायत्री उपासक को जपनी चाहिए। इस समय परिवार में इतने नैष्ठिक उपासक हैं, जिनके द्वारा एक-एक माला उपरोक्त मन्त्र की जपने पर हर महीने 24 करोड़ जप पूरा होता रहेगा। यह संकल्प एक वर्ष के लिये है, अगले वर्ष विजय दशमी को ही इसकी भी पूर्णाहुति होगी।
विश्वासपूर्वक यह आशा करनी चाहिये कि गत वर्ष के महापुरश्चरण की भाँति ही—यह आत्मशक्ति के माध्यम से विनिर्मित ब्रह्मास्त्र भी सफल होगा और ऐसी अनेक परिस्थितियाँ अप्रत्याशित रूप से बनेंगी, जिनके द्वारा कठिन प्रतीत होने वाली समस्या बहुत बड़ी सफलता के साथ हल हो सके। जिन्हें आत्मशक्ति पर विश्वास है वे जानते हैं कि विधिवत् की हुई साधनाएं, तपश्चर्याएँ कभी निष्फल नहीं जाती। हमारा यह प्रयोग भी निष्फल जाने वाला नहीं है।
प्रत्येक गायत्री उपासक से अनुरोध है कि यह पंक्तियाँ पढ़ने के बाद प्रतिदिन एक माला ‘ह्नीं’ बीज समेत गायत्री उपासना गौरक्षा के नियमित आरम्भ कर दें और उसके द्वारा होने वाले महान पुण्य एवं सत्परिणाम के भागी बनें। जो सज्जन इस पुरश्चरण में सम्मिलित हों वे इसकी सूचना युग-निर्माण योजना मथुरा के पते पर हमें देदें ताकि संख्या की सही गणना हो सके।
विज्ञान-विकास के प्रारम्भिक चरण के समय भौतिक उपलब्धियों से उन्मत्त अनेक लोग यह कहने का साहस करने लगे थे कि—संसार में र्इ्रश्वर नाम की कोई सत्ता नहीं है। यह तो लोगों के अपरिपक्व एवं जिज्ञासु मस्तिष्क की काल्पनिक उपज है। यह सारा संसार स्वयं उद्भूत, स्वयं संचालित तथा स्वयं स्थित है। न तो कोई इसका बनाने वाला है न चलाने वाला और न स्थिर रखने वाला है। इसके कर्त्ता के रूप में ईश्वर एक आरोपित नाम है, जिसका कहीं न तो कोई अस्तित्व है न इस विश्व-ब्रह्माण्ड से, इसकी गतिविधि से कोई सम्बन्ध।”
विज्ञान-विकास की नूतन चकाचौंध में कुछ दिन यह नास्तिक विचारधारा जोर पकड़े रही। वैज्ञानिकों ने अपनी खोज के आधार पर यह घोषणा की थी कि—’संसार के मूल तथा उसकी प्रत्येक क्रिया प्रक्रिया एवं प्रतिक्रिया में एक विद्युत, जो इलेक्ट्रोन प्रोटोन के रूप में पाई गई है काम कर रही है जो संचलन में स्वतः सक्षम एवं समर्थ है उनमें स्वयं ही अपनी चेतना उत्पन्न होती है। सक्रियता के लिए उन्हें किसी ऐसी अन्य चेतन शक्ति पर निर्भर नहीं रहना पड़ता जिसे धर्मवादी लोग ईश्वर कहते हैं।”
इस नास्तिक भाव का वास्तविक कारण विज्ञान का अपूर्ण ज्ञान ही था। पर ज्यों-ज्यों वैज्ञानिक ज्ञान पूर्णता की ओर बढ़ता गया सूक्ष्म से सूक्ष्मतर चेतन शक्ति का पता लगता गया और विज्ञानवादियों की विचारधारा उस ओर बढ़ती गई, जिसमें ईश्वर के अस्तित्व की शक्ति विद्यमान थी। एक दिन ऐसा आया कि संसार के सर्वश्रेष्ठ विज्ञान महारथी यह कहने पर सहमत हुए कि अणुओं के एक निश्चित नियम से अपनी गतिविधि बनाए रखने में स्वयं अणुओं की शक्ति नहीं है बल्कि यह काम किसी ऐसी चेतना शक्ति का है जो उनमें अगोचर रूप से ओत-प्रोत रहती है। विज्ञान महारथी आइन्सटीन की यह घोषणा ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार करने के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। यद्यपि पिछले दिनों विज्ञान आश्चर्यजनक प्रगति कर गया है तथापि अभी पूर्णता की सीमा में नहीं पहुँचा है। जिस दिन भौतिक विज्ञान पूर्णता को प्राप्त होगा, निश्चय ही यह तत्वज्ञान में बदल जायेगा और इसका सबसे ऊँचा एवं विश्वसनीय उद्घोष यही होगा—”यह संसार निश्चय ही उस चेतन तत्व की रचना है जिसे परम ब्रह्म परमात्मा कहते हैं। यह उसी से उत्पन्न हुआ है, उसी की सत्ता से स्थित है और उसी में लयमान होता जा रहा है। जड़ चेतन की सारी सक्रियता, सारा चमत्कार उसी परम प्रभु की चेष्टा है जिसमें सब लीन हैं और जो स्वयं सबमें ओत-प्रोत है। न तो कुछ परमात्मा से भिन्न है और न परमात्मा किसी से प्रथक है।” पूर्णता को पहुँचा हुआ वैज्ञानिक सबसे बड़ा अस्तिव, सबसे बड़ा भक्त होगा ऐसा विश्वास वैज्ञानिकों की बदलती हुई धारणाओं के आधार पर निर्भय होकर किया जा सकता है।
पवन, अग्नि, जल और मृत्तिका चार व्यक्त एवं अस्तित्ववान पदार्थों से मिल कर यह संसार बना है। यह चारों पदार्थ अपने में जड़ और निर्जीव हैं। किन्तु फिर भी इनमें एक जीवन, एक सक्रियता एवं एक प्राणमयता दीखती है। यह सजीवता क्या है? उसी परमात्मारूपी चेतन शक्ति की विद्यमानता है। हवा का चलना, जल का बहना, अग्नि का चमकना तथा जलना, मिट्टी का गुण सब ही तो उस सर्वशक्तिमान परमात्मा की सत्ता से ही सम्भव है। अन्यथा किसी जड़ अथवा निर्जीव पदार्थ में सक्रियता की सम्भावना कहाँ? गुण अथवा प्राण रूप से विद्यमान परमात्मा जब इनकी सक्रियता समापन करना चाहता तो उनमें से तिरोधान हो जाता है। ऐसी दशा में कोई भी पदार्थ अपनी सक्रियता का प्रमाण नहीं दे पाता। संसार के किसी भी पदार्थ में अपनी कोई क्षमता अथवा अपना कोई गुण नहीं है वह सब उसी चेतन रूप परमात्मा का ही चमत्कार है जो अणु-अणु में सक्रिय, सुखद, अथवा निश्चल मौनता के रूप में निरन्तर विद्यमान रहता है। ऐसे चेतन सर्वव्यापक, सर्व समर्थ एवं सर्व विदित विभु के अस्तित्व से इनकार करना अपनी धृष्टता एवं अज्ञानता का परिचय देना है।
लोहा जड़ एवं निर्जीव पदार्थ है किन्तु यन्त्रों एवं चक्रों के रूप में सक्रिय दिखाई देता है। पत्थर निर्जीव एवं जड़ वस्तु है किन्तु चक्की के रूप में चलता दिखाई देता है। काष्ठ निर्जीव तथा जड़ पदार्थ है किन्तु वृक्ष रूप में उठता हुआ और फूल-फल-पत्तों से भरता झरता दिखाई देता है। इन सब निर्जीव पदार्थों की सक्रियता का कारण चेतन शक्ति ही है। फिर चाहे उसका समावेश मनुष्य की सहायता से हुआ हो अथवा उक्त चेतना स्वयं ही उसमें गतिमती हो उठी हो। चेतन सत्ता के अभाव अथवा अव्यक्ति की स्थिति में सम्पूर्ण जग निर्जीव, निष्प्राण एवं निस्तब्ध स्थिरता मात्र है। इस प्रकार संसार के नियामक संचालन एवं प्राण रूप परमात्मा में विश्वास ही नहीं आस्था रहना हम जीवों का परम पावन कर्तव्य है। उसके अस्तित्व से विमुख होकर मनमानी घोषणायें करना विवेकशील मनुष्य को योग्य नहीं है। हम आप सब परमात्मा के अंश रूप में उसके प्रतिनिधि पुत्र हैं, अपने परम पिता से परांगमुख होना न तो हमारे लिए शोभनीय है और न कल्याणकारी!
बहती सरितायें, गिरते प्रपात खिलते फूल, हिलती हुई पत्तियाँ, उड़ती और गाती हुई चिड़ियाँ उदय अस्त होते हुए सूर्य चन्द्र, निकलते और चलते हुए तारे, भ्रमण करते हुए नक्षत्र, आते जाते दिन-रात और बदलती हुई ऋतुओं में उसी चेतन रूप परमात्मा की ही विद्यमानता है। अन्यथा मूल रूप में जड़ इन सबमें यह विशेषतायें स्वयं सम्भव कैसे हो सकती?
यह सर्वांग सुन्दर मनुष्य मूलतः क्या है? निर्जीव मिट्टी का एक नश्वर पुतला, जिसमें न कोई अपने गुण हैं और न अपनी कोई चेतना! किन्तु यह मात्र मिट्टी की प्रतिमा क्या-क्या काम और कैसे-कैसे चमत्कार कर दिखाती है? निरर्थकताओं को उपयोगी और जड़ों को चेतन बना कर चला देने वाला मनुष्य यदि अपनी विशेषताओं को अपना समझने का दम्भ करता है तो यह परमात्मा के प्रति कृतघ्नता ही है, जिसने उसमें चेतना रूप आत्मा होकर स्वयं प्रवेश किया और उसे ऐसा कर सकने योग्य बनाया!
परमात्मा के अंश आत्मा की उपस्थिति के कारण ही मनुष्य शरीर का मूल्य एवं महत्व है। मनुष्य शरीर में स्थित यही आत्मा प्राण रूप में मुखर एवं सक्रिय होता और जिसके प्रभाव से यह मृत्तिका मय मानव शरीर संक्रामक एवं सक्षम बनता है। जिस दिन यह परम तत्व—परमात्मा—अपने को स्थिर एवं स्तब्ध कर लेता है समग्र अवयवों के अक्षत रहने पर भी शरीर निचेष्ट होकर निरर्थक हो जाता है और अन्ततः यह मिट्टी होकर मिट्टी में मिल जाता है। संसार में सारे सम्बन्धी एवं स्नेही जन रहने पर भी प्राणहीन शरीर का कोई पूछने वाला नहीं रहता। मनुष्य शरीर में यह परमात्मा तत्व ही है जो उसका मूल्य महत्व बढ़ाता है और परिजन उसे चाहते अथवा प्रेम करते हैं। ऐसे सर्वकर्त्ता एवं सर्वभर्ता परमात्मा के अस्तित्व से किस प्रकार इनकार किया जा सकता है?
ऋषियों, मुनियों, मनीषियों एवं महात्माओं ने इस स्पष्ट एवं रहस्यमय परमात्मा को पहचान पाने का प्रयत्न किया, पाया और जन-जन पर उसे पाने की विधि का उद्घाटन किया। उस अपने तथा जगत के सर्वस्व प्राण एवं प्रेरक परमात्मा को धन्यवाद देने तथा अपनी कृतज्ञता प्रकट करने के लिए उपासना की पद्धति चलाई। जन मानस में अखण्ड आस्तिकता का प्रभाव बढ़ाने के लिए धर्म मार्ग की खोज की और उसका प्रचार किया। उपासना पद्धति से इसी धर्म मार्ग पर चल कर न जाने कितने जीव परम प्रभु को पाकर तद्रुप हो चुके हैं और आगे भी होते रहेंगे।
परम प्रभु की उपासना की अनेक विधियाँ हैं किन्तु इन सबका मूल मन्तव्य एक ही है—वह है अपने जीवन की रीति नीति ऐसी बनाना है जो परमात्मा के अंश मनुष्य के अनुरूप हो! परमात्मा से स्वीकृत, मन, वचन, कर्म से जीवन पद्धति अपनाने वाला सहज ही परमात्मा का कृपापात्र बन जाता है और तब उस पर इस परमपिता की कृपा की अजस्र धारा अनेक उन्नतियों के रूप में बरसती रहती है। परमात्मा आनन्द रूप में अपने युक्त उपासक को अपना मंगलमय सान्निध्य का अनुग्रह करता है। परमात्मा के सच्चे भक्तों को संसार में किसी भी प्रकार की सुख शाँति की कमी नहीं रहती।
यह बात असंदिग्ध रूप से सत्य है कि परमात्मा परम कृपालु एवं स्वभावतः करुणाकर है। किन्तु इसके साथ उसका एक रूप और भी है—वह है उसका न्यायी तथा दण्ड दाता होना। जहाँ उसकी प्रसन्नता अपने पुत्र मनुष्य पर अनिवर्चनीय उपहारों की झड़ी लगा देती है वहाँ उसकी अप्रसन्नता असहनीय दण्ड भी देती है! संसार में कदाचित् ही कोई ऐसा अभागा एवं दुर्बुद्धि व्यक्ति हो जो परमात्मा की न्याय परिधि में आकर दुख की, दंड की कामना करे। नहीं तो प्रत्येक जीव उसकी प्रसन्नता एवं पुरस्कार पाने का ही आकाँक्षी रहता है। उपासना परमात्मा की प्रसन्नता प्राप्त करने का ही एक उपाय है। किन्तु यह उपाय केवल पूजा-पाठ, भजन, कीर्तन अथवा स्मरण जाप से ही सफल नहीं हो सकता!
अनेक लोग परमात्मा को अकारण करुणाकर मान कर यह आशा करते हैं कि थोड़ा-सा पूजा पाठ कर देने से वह कृपालु प्रसन्न हो जायेगा और उनके सारे अपराध क्षमा कर अदण्डनीय मान लेगा। इसी भ्राँत विश्वास के आधार पर लोग उसके पुण्य पथ से विपथ होकर गुण कर्म एवं स्वभाव को अवाँछनीय रख कर भी पूजा-पाठ का क्रम चलाते और सोचते रहते हैं कि परमात्मा उनको क्षमा कर देगा! ऐसे अल्पबुद्धि लोग परमात्मा को भी अपनी ही तरह पक्षपाती तथा घूसखोर समझते हैं। वे यह नहीं सोच पाते कि परमात्मा अपनी न्याय विधि में वज्र की तरह कठोर तथा यम की तरह निर्दय है। वह बड़ी से बड़ी चाटुकारी तथा पूजा अर्चा से भी अपने न्याय से विचलित नहीं हो सकता।
परमात्मा की कृपा पाने और कृपा के फलस्वरूप सुव्यवस्थित शाँति, हर्ष उल्लास तथा आनन्द मंगल के शिव एवं शाश्वत उपहार पाने के लिए मनुष्य को उसके निर्देशित धर्म मार्ग पर चलकर ही उपासना करनी होगी। मनुष्य का कल्याण इसी में है कि वह परमात्मा के कृपालु रूप के साथ उसके ‘रुद्र’ रूप को भी याद रक्खे, उससे डरे और सत्पथ पर शुद्ध एवं सात्विक भावना से चलकर उसे अप्रसन्न होने का अवसर न दे। हम सबको परमात्मा का प्रकोप नहीं उसकी प्रसन्नता पाने का ही प्रयत्न करना चाहिए। यही मनुष्यरूप परमात्मा के अंश हम सबके लिए योग्य एवं शोभनीय है। पुरस्कार एवं दण्ड का भागी बनना न तो मनुष्यता के अनुरूप है और न विवेकसंगत!
मुफ्त का दान क्यों लें-
दानशील राजा भोज ने एक बार नगर की जनता को प्रसन्न करने और अपनी दानशीलता का प्रमाण देने के लिए सार्वजनिक भोज कर दिया। भोज में हजारों लाखों लोग आए और विविध प्रकार के स्वादिष्ट व्यंजनों को सराह-सराह कर खाया!
दावत के बाद राजा भोज सायंकाल भेष बदलकर उस उत्सव की प्रतिक्रिया का पता करने निकल पड़े। वे जिधर भी जाते लोग उनकी दानशीलता, उदारता और भोजन तथा व्यंजनों के स्वादों की सराहना करते सुनाई देते। राजा भोज अपनी प्रशंसा सुनकर प्रसन्नता से उन्मत्त हो उठे।
जिस समय वे घर वापस आ रहे थे उन्होंने देखा कि एक लकड़हारा सिर पर लकड़ी का गट्ठर रक्खे पसीने से लथपथ जंगल की ओर से आ रहा है और शहर में बेचने जा रहा है! भोज ने उसके पास जाकर पूछा—क्यों भाई तुम्हें आज भी इतना परिश्रम करने की क्या आवश्यकता थी। आज तो राजा भोज ने पूरे नगर की दावत की थी क्या तुम्हें पता नहीं?
लकड़हारे ने हँसते हुए उत्तर दिया, ‘मुझे पता था। पर भाई, जो आदमी अपने परिश्रम की खरी कमाई खा सकता है उसे राजा भोज की दावत से क्या सरोकार? जो आनन्द और स्वाद अपने पसीने और पुरुषार्थ से कमाई हुई सूखी रोटी में है वह स्वाद दूसरों की कृपा पर पाए पकवानों में कहाँ!’
लकड़हारे की बात सुन कर राजा भोज की उदारता और दानशीलता का मद उतर गया और वे रास्ते भर यही सोचते आए कि लकड़हारा ठीक कहता था!
जीव की शारीरिक स्थिति पर विचार करें तो प्रत्यक्षतः यह देखने में आता है कि दो शक्तियाँ अवस्थित हैं। प्रथम पञ्चधा प्रकृति—जिससे हाथ, पाँव, पेट, मुँह, आँख, कान, दाँत आदि शरीर का स्थूल कलेवर बनकर तैयार होता है। इस निर्जीव तत्व की शक्ति और अस्तित्व का भी अपना विशिष्ट विधान है जो भौतिक विज्ञान के रूप में आज सर्वत्र विद्यमान है। जड़ की परमाणविक शक्ति ने ही आज संसार में तहलका मचा रखा है जबकि उसके सर्गाणुओं, कर्षाणुओं, केन्द्रपिण्ड (न्यूक्लिअस) आदि की खोज अभी भी बाकी है। यह सम्पूर्ण शक्ति अपने आप में कितनी प्रबल होगी इसकी कल्पना करना भी कठिन है। द्वितीय—शरीर में सर्वथा स्वतन्त्र चेतन शक्ति , भी कार्य कर रही है जो प्राकृतिक तत्वों की अपेक्षा अधिक शक्तिमान मानी गई है। यह चेतन तत्व संचालक है, इच्छा कर सकता है, योजनायें बना सकता है, अनुसन्धान कर सकता है इसलिये उसका महत्व और भी बढ़-चढ़कर है। हिन्दू ग्रन्थों में इस सम्बन्ध में जो गहन शोधों के विवरण हैं वे चेतन शक्ति की आश्चर्यजनक शक्ति प्रकट करते हैं। इतना तो सभी देखते हैं कि संसार में जो व्यापक क्रियाशीलता फैली हुई है वह इस चेतना का ही खेल है। इसके न रहने पर बहुमूल्य, बहु शक्ति -सम्पन्न और सुन्दर शरीर भी किसी काम का नहीं रह जाता।
जीवधारियों के शरीर में व्याप्त इस चेतना का ही नाम आत्मा है। सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, ज्ञान तथा प्रयत्न उसके धर्म और गुण हैं। न्याय और वैशेषिक दर्शनों में आत्मा के रहस्यों पर विशद प्रकाश डाला गया है और उसे परमात्मा का अंश बताया गया है। यह आत्मा ही जब सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष आदि विकारों का त्याग कर देती है तो वह परमात्म-भाव में परिणित हो जाता है।
आज भौतिक विचारधारा के लोग इस बात को मानने के लिए तैयार नहीं होते। उनकी दृष्टि में शरीर और आत्मा में कोई भेद नहीं है। इतना तो कोई साधारण बुद्धि का व्यक्ति भी आसानी से सोच सकता है कि जब उसके हृदय में ऐसे प्रश्न उठते रहते हैं—’मैं कौन हूँ’, ‘मैं कहाँ से आया हूँ’, ‘मेरा स्वरूप क्या है’, ‘मेरे सही शरीर-धारण का उद्देश्य क्या है’ आदि। ‘मैं यह खाऊँगा’, ‘मुझे यह करना चाहिए, ‘मुझे धन मिले’—ऐसी अनेक इच्छायें प्रतिक्षण उठती रहती हैं। यदि आत्मा का प्रथम अस्तित्व न होता तो मृत्यु हो जाने के बाद भी वह ऐसी स्वानुभूतियाँ करता और उन्हें व्यक्त करता। मुख से किसी कारणवश बोल न पाता तो हाथ से इशारा करता, आँखें पलक मारती, भूख लगती, पेशाब होती। पर ऐसा कभी होता नहीं देखा गया। मृत्यु होने के बाद जीवित अवस्था की सी चेष्टायें आज तक किसी ने नहीं कीं, आत्मा और शरीर दो विलग वस्तुयें—दो विलग तत्व होने का यही सबसे बड़ा प्रमाण है।
छान्दोग्योपनिषद के सातवें अध्याय के 26वें खण्ड में बताया गया है—
‘आत्मा से प्राण, आत्मा से आशा, आत्मा से स्मृति, आत्मा से आकाश, आत्मा से तेज, आत्मा से जल, आत्मा से आविर्भाव और तिरोभाव, आत्मा से अन्न, आत्मा से बल, आत्मा से विज्ञान, आत्मा से ध्यान, आत्मा से चित्त; आत्मा से संकल्प, आत्मा से मन, आत्मा से वाक्, आत्मा से नाम, आत्मा से मन्त्र, आत्मा से कर्म और यह सम्पूर्ण चेतन जगत ही आत्मा से आच्छादित है। इस आत्म-तत्व का ज्ञान प्राप्त कर लेने वाले मनुष्य जीवन-मरण के बन्धनों से मुक्त हो जाते हैं।’
वृहदारण्यकोपनिषद् में राजा जनक ने आत्मा के सम्बन्ध में श्री याज्ञवल्क्य को उपदेश देते हुए कहा है—’यह आत्मा प्राणों में बुद्धि वृत्तियों के भीतर रहने वाला विज्ञानमय ज्योति स्वरूप पुरुष है। वह लोक परलोक दोनों में संचार करता है। स्वप्नास्थामें यह सूक्ष्मातिसूक्ष्म आत्मा ही विभिन्न लोकों में विचरण करता है।’
भौतिक विज्ञान दरअसल आत्मा के अस्तित्व का खण्डन नहीं करता अपितु वह उसे सिद्ध करने में ही सहायक हुआ है। विज्ञान की उच्च सतह पर न पहुँचने के कारण आज कुछ लोग ऐसी भ्रामक धारणायें फैलाए हुए हों, यह दूसरी बात है अन्यथा जिन वैज्ञानिकों ने गहन तत्वान्वेषण किये हैं उनमें से प्रायः सभी ने यह माना है कि पदार्थ जड़ है और आत्मा चेतनायुक्त ज्ञानमय द्रव्य है। इन दोनों के गुणों में असमानता है और आत्मा की शक्ति पदार्थ की शक्ति से बहुत बड़ी है।
जुलाई 1936 में कलकत्ता ने प्रकाशित ‘दी मार्डन रिव्यू’—में सर ए. एस. एडिंग्टन तथा प्रो. अलवर्ट आइन्स्टीन के आत्म-ज्ञान सम्बन्धी विचार उद्धृत हुए हैं जो इस प्रकार हैं—
‘संसार में कोई अज्ञात शक्ति काम कर रही है जिसे हम नहीं जानते कि वह क्या है? फिर भी इतना तो स्पष्ट है ही कि वह अधिक शक्तिशाली है। मैं चेतना को मुख्य मानता हूँ। इस आत्मा के विषय में मुझे अपने मत से कोई विचलित नहीं कर सकता।’
‘मैं विश्वासपूर्वक कह सकता हूँ कि सारी प्रकृति में एक असीम शक्तिशाली चेतन-शक्ति काम कर रही है।’
विश्वविख्यात वैज्ञानिक डा. गाल का मत है—’विश्व में केवल एक ही मुख्य तत्व है जो देखता है, अनुभव करता है, प्रेम करता है, विचार और स्मृति करता है।’
‘जैसे मनुष्य दो दिनों के बीच रात्रि को स्वप्न देखता है वैसे ही मनुष्य की आरम्भ ही मृत्यु तथा पुनर्जन्म के मध्य विभिन्न साँसारिक क्रियायें करती हैं—सर ओलीवर लाज ने इन शब्दों में आत्मा के अस्तित्व पर प्रकाश डाला है।
कुछ दिन पूर्व इस बात को लेकर वैज्ञानिकों में काफी लम्बी चर्चा चली थी और आत्मा के अस्तित्व सम्बन्धी उनके मत लिए गए थे जिन्हें सामूहिक रूप से ‘दो ग्रेट डिजाइन’ नामक पुस्तक में प्रकाशित किया गया है। पुस्तक में उपसंहार करते हुए लिखा गया है—
‘यह संसार कोई आकस्मिक घटना नहीं लगता है। इसके पीछे कोई सुनियोजित विधान चल रहा है। एक मस्तिष्क, एक चेतन-शक्ति काम कर रही है। अपनी-अपनी भाषा में उसका नाम चाहे कुछ रख लिया जाय पर वह मनुष्य की आत्मा ही है।’
इसके अतिरिक्त जे. एन. थामसन, जे. बी. एम. हेल्डन, पी. गोइडेस, आर्थर एच. काम्पटन, सर जेम्स जोन्स आदि वैज्ञानिकों ने भी आत्मा के अस्तित्व में सहमति प्रकट की है। उसके प्रत्यक्ष ज्ञान के साधनों का पाश्चात्य देशों में भले ही अभाव हो, पर विचार और बुद्धिशील मनुष्य के लिए यह अनुभव करना कठिन नहीं है कि यह जगत केवल वैज्ञानिक तथ्यों तक सीमित नहीं वरन् उन्हें नियन्त्रित करने वाली कोई चेतना भी अवश्य काम कर रही है और उसे जानना मनुष्य के लिए बहुत आवश्यक है।
शास्त्रीय कथानकों के माध्यम से आत्मा के अस्तित्व, गुणों और क्रियाओं के सम्बन्ध में बड़ी ही ज्ञानपूर्ण चर्चायें की गई हैं। ऐसे कथानकों में नारद, ध्रुव आदि के वार्तालाप के साथ राजा चित्रकेतु की कथा भी बड़ी शिक्षाप्रद और वास्तविक तथ्यों से ओत प्रोत है।
चित्रकेतु एक राजा था जिसे महर्षि अंगिरा की कृपा से एक सन्तान प्राप्त हुई थी। बच्चा अभी किशोर ही था कि उसकी मृत्यु हो गई। राजा पुत्र-वियोग से बड़ा व्याकुल हुआ। अन्त में ऋषिदेव उपस्थित हुए और उन्होंने दिवंगत आत्मा को बुलाकर शोकातुर राजा से वार्तालाप कराया। पिता ने पुत्र से लौटने के लिए कहा तो उसने जवाब दिया, ‘ए जीव! मैं न तेरा पुत्र हूँ और न तू मेरा पिता है। हम सब जीव कर्मानुसार भ्रमण कर रहे हैं। तू अपनी आत्मा को पहचान। हे राजन् ! इसी से तू साँसारिक संतापों से छुटकारा पा सकता है।’ अपने पुत्र के इस उपदेश से राजा आश्वस्त हुआ और शेष जीवन उसने आत्म-कल्याण की साधना में लगाया। राजा चित्रकेतु अन्त में आत्म-ज्ञान प्राप्त कर जीवन-मुक्त हो गया।
यह आत्मा अनेक योनियों में भ्रमण करती हुई मनुष्य जीवन में आती है। ऐसा संयोग उसे सदैव नहीं मिलता। शास्त्रीय अथवा विचार की भाषा में इतना तो निश्चय ही कहा जा सकता है कि जीवों की अपेक्षा मनुष्य को जो श्रेष्ठताएँ उपलब्ध है वे किसी विशेष प्रयोजन के लिए ही हैं जो आत्मज्ञान या अपने आपको जानना ही हो सकता है, आत्मज्ञान ही मनुष्य-जीवन का लक्ष्य है जिससे वह जीवभाव से मुक्त होकर ईश्वरीय भाव में लीन हो जाता है।
संसार की हर वस्तु नाशवान है—मनुष्य का शरीर भी। किन्तु इन नाश होने वाली वस्तुओं में मनुष्य-जीवन सबसे अधिक मूल्यवान् वस्तु है। संसार की हर वस्तु का अपना-अपना कुछ उपयोग है। उपयोगिता के आधार पर नगण्य वस्तु का भी मूल्य बढ़ जाता है। जो पेड़ जंगल में सूख जाता है। वह वर्षा के पानी में भीग-भीगकर एक दिन गलकर नष्ट हो जाता है। उसका कुछ भी मूल्याँकन नहीं हो पाता। किन्तु जब वही सूखा वृक्ष इधन बनकर उपयोगी हो जाता है तब उसका मूल्य बढ़ जाता है। लोग उसे जंगल से काटकर बाजार में बेचते हैं। जरूरत मन्द खरीद ले जाते और घरों में ठीक से रखते हैं। यदि उसी वृक्ष को और अधिक उपयोगिता का अवसर मिल जाता है तो उसका मूल्य,महत्व और भी बढ़ जाता है। अलमारी शहतीर, कपाट, मेज, कुर्सी अथवा इसी प्रकार की उपयोगिता में आकर उसी सूखे वृक्ष का मूल्य बहुत बढ़ जाता है।
जो वस्तु किसी प्रकार के सुविधा-साधन अथवा सौंदर्य-सुख बढ़ाने में जितनी सहायक होती है वह उतनी ही उपयोगी मानी जा सकती है और उसी उपयोगिता के आधार पर उसका मूल्य बढ़ जाता है।
मानव-शरीर संसार की बहुत महत्वपूर्ण तथा चरम उपयोगिता की वस्तु है। इसके आधार पर संसार में बड़े-बड़े विलक्षण कार्य किये जाते हैं। इसी के सदुपयोग से मनुष्य धन, मान, पद, प्रतिष्ठा, यश, ऐश्वर्य और यहाँ तक कि मुक्ति-मोक्ष का अमृत पद प्राप्त कर लेता है। संसार की सारी सुन्दरता, सभ्यता, संस्कृति, साहित्य एवं साधना इसी शरीर के आधार पर ही सम्भव होती तभी है। किन्तु यह सम्भव होती है जब मनुष्य सत्कर्मों द्वारा शरीर का सदुपयोग करता है।
मानव-शरीर के मूल्य एवं महत्व की अभिव्यक्ति इसकी सदुपयोगिता के पुण्य से ही होती है। वैसे यह पंचभौतिक शरीर भी मिट्टी है। एक दिन नष्ट होकर मिट्टी में मिल जायेगा। इसके परमाणु बिखर जायेंगे, पाँचों तत्व अपने विराट रूप में मिल जायेंगे। फिर यह चलती-फिरती हँसती-बोलती और काम-काज करने वाली तस्वीर कभी देखी न जा सकेगी। इसीलिए बुद्धिमान जीवन के अणु क्षण का सदुपयोग करके नश्वर शरीर के नष्ट हो जाने पर भी अविनश्वर होकर वर्तमान रहते हैं।
जीवन का पारमार्थिक यापन ही वह विधि है जो मनुष्य को सत्कर्मों की ओर प्रेरित करती है। निस्वार्थ भाव से दूसरों की सेवा, परोपकार तथा जीव-मात्र के प्रति प्रेम भाव रखना पारमार्थिक जीवन के लक्षण हैं। मनुष्य में इस प्रकार की सद्वृत्तियाँ केवल आध्यात्मिक मनोभूमि पर ही अंकुरित एवं पल्लवित हो सकती हैं। जीवन को आध्यात्मिक साँचे में ढाल लेने से पारमार्थिकता की सिद्धि सहज ही हो जाती है।
आध्यात्मिक जीवन ही शुद्ध, प्रबुद्ध एवं सफल जीवन है और इसी जीवन में मनुष्य को सुख-शाँति भी मिलती है। पारमार्थिक जीवन-यापन के रूप में किये जाने वाले परोपकार आदि सत्कर्म भी मनुष्य को वास्तविक सुख-शाँति नहीं दे पाते और वह कहने के लिये सत्कर्म करता हुआ भी अशाँत एवं असन्तुष्ट अन्त को प्राप्त होता है। लोग दान करते, दीन-दुखियों की सहायता करते, स्मारक तथा इमारतें बनवाते, भजन-पूजन तथा जप-जोग भी करते हैं, किन्तु फिर भी उनका जीवन सुख-शाँति की आशा में समाप्त हो जाता है।
वास्तविक सुख-शाँति केवल ऊपरी दान-पुण्य करते रहने से नहीं मिल सकती। उसके लिये आध्यात्मिक स्थिति का मूलाधार अन्तःकरण को निर्मल एवं शुद्ध करना होगा। ऊपर से दिखाई देने वाले सत्कर्म भी अन्तःकरण की शुद्धता के अभाव में निष्फल चले जाते हैं। दान देते समय यदि यह विचार रहता है कि मैं कोई एक विशेष कार्य कर रहा हूँ और इसके उपलक्ष में हमको सम्मान एवं प्रतिष्ठा मिलनी चाहिए तो निश्चय ही वह दान-पुण्य के फल से वंचित रह जायेगा। किसी की कुछ भलाई करते समय यदि यह विचार रहता है कि मैं किसी पर आभार कर रहा हूँ तो वह उपकार कार्य परमार्थ की परिधि में नहीं आ सकता। किसी परमार्थ कार्य में निरहंकारिता का समावेश तभी सम्भव हो सकता है जब कि मनुष्य का अन्तःकरण निर्मल एवं शुद्ध होगा। अशुद्ध अन्तःकरण की स्थिति में लोभ, मोह, स्वार्थ एवं अहंकार आदि विकारों का आना स्वाभाविक है।
वह मनुष्य निश्चय ही सौभाग्यवान है जिसने अपने अन्तःकरण को निर्मल बना लिया है और जिसका जीवन आध्यात्मिकता की ओर उन्मुख हो रहा है। अध्यात्म जीवन का वह तत्वज्ञान है, जिसके आधार पर मनुष्य विश्व ही नहीं अखण्ड ब्रह्माण्ड के सारे ऐश्वर्य को उपलब्ध कर सकता है। अध्यात्म ज्ञान के बिना सारा वैभव—सारा ऐश्वर्य और सारी उपलब्धियाँ व्यर्थ हैं। जो भाग्यवान अपने परिश्रम, पुरुषार्थ एवं परमार्थ से थोड़ा बहुत भी अध्यात्म लाभ कर लेता है वह एक शाश्वत सुख का अधिकारी बन जाता है। व्यवहार जगत में अनेक सीखने योग्य ज्ञानों की कमी नहीं है। लोग इन्हें सीखते हैं, उन्नति करते हैं, सुख−सुविधा के अनेक साधन जुटा लेते हैं। किन्तु इस पर भी जब तक वे अध्यात्म की ओर उन्मुख नहीं होते वास्तविक सुख-शाँति नहीं पा सकते।
संसार में पग-पग पर दुःख, क्षोभ और कलह, कलेश की परिस्थितियों में आना पड़ता है। इस प्रकार की प्रतिकूल परिस्थितियाँ, सुख-सुविधा के अनन्त साधन होने पर भी दुखी किए रहती हैं। मनुष्य के उपार्जित साधन उसकी कोई सहायता नहीं कर पाते। संसार में जिससे सामान्य प्रतिकूलताओं की यातना से तो सहज ही बचा जा सकता है, वह है आध्यात्मिक दृष्टिकोण एवं आचरण। आध्यात्मिकता के अभाव में सुख-शाँति सम्भव नहीं और उसके अभाव में दुःख अथवा अशाँति असम्भव है!
मनुष्य के अन्तःकरण का निर्माण चार वृत्तियों से मिल कर हुआ है। मन, बुद्धि, चित्त तथा अहंकार। मन संकल्प विकल्प करता है, बुद्धि निर्णय देती है, चित्त, स्मृति तथा संस्कारों को ग्रहण करता और बनाए रखता है, अहंकार मनुष्य को आत्मिक न बनने देकर शरीर भाव बनाए रहता है। इन वृत्तियों के अशुद्ध रहने पर अन्तःकरण अशुद्ध हो जाता है। इन वृत्तियों को सात्विक बनाना ही अन्तःकरण को शुद्ध करना माना जाएगा।
वृत्तियों को शुद्ध करने का प्रयत्न करने से पूर्व उनकी अशुद्धता के लक्षण जान लेना आवश्यक हैं—”अशुद्ध काम संकल्पम् — शुद्ध काम विवर्जितम्”—मन में जब तमोगुण पूर्ण स्वार्थ एवं काम पूर्ण संकल्प विकल्प होते रहें समझना चाहिए कि मनोवृत्ति अशुद्ध है। इसका मोटा-सा एक लक्षण यह भी है कि जब मन निराश, निरुत्साह अथवा क्षुब्ध रहे समझना चाहिये कि वह अशुद्ध है। मन की शुद्धता का प्रमुख लक्षण है निष्कामता एवं प्रसाद। कर्मों की सफलता असफलता पर मन का समान रूप से प्रसन्न बना रहना उसकी शुद्धता का प्रमुख लक्षण है। अधिक, असंगत अथवा असात्विक कामनायें करने से मन निर्बल एवं मलीन हो जाता है। संतोष न रहने से सदा क्षुब्ध, चंचल और दुखी रहता है। मन की प्रसन्नता अपनी स्थिति के अनुसार शुभ संकल्प एवं निष्काम भाव से कर्म करने से ही सुरक्षित रह सकती है।
बुद्धि जब किसी विषय में स्पष्ट निर्णय देने में असमर्थ रहे, कोई भी प्रसंग उपस्थित होने पर असमंजस अथवा ऊहापोह में पड़ जाए तब समझना चाहिए कि वह प्रबुद्ध अथवा शुद्ध नहीं है। करने अथवा न करने योग्य कर्मों का शीघ्र एवं समीचीन निर्णय दे सकने में समर्थ बुद्धि ही सात्विक अथवा शुद्ध कही जायेगी। देखने में भयप्रद लगने वाले ठीक कर्तव्य के प्रति स्वीकृति दे देने वाली साहस की बुद्धि शुद्ध ही हो सकती है। सन्देह अथवा संशयशील बुद्धि अशुद्ध है।
चित्त की शुद्धता का मुख्य लक्षण है उन स्मृतियों तथा संस्कारों का रहना जो शुभ एवं शिव हों। मलीन, दुःखद अथवा ग्लानिपूर्ण स्मृतियों तथा संस्कारों का प्रदर्शन करने वाला चित्त अशुद्ध ही माना जायेगा। स्मृतियों के सद और संस्कारों के शुद्ध होने से मनुष्य का चिन्तन एवं आचरण कल्याणकारी दिशा में ही चला करता है। जिसे शुभम् का ज्ञान ही नहीं, शिवत्व की पहचान नहीं वह न तो सत्कर्मों की ओर बढ़ सकता है और न चिन्तन में माँगलिक संस्थान ही चित्त की शुद्धता के लक्षण हैं।
शरीर तथा संसार के प्रति अहंकार अशुद्ध है और यही अहंकार तब शुद्ध ही कहा जाएगा जब यह आत्मा अथवा परमात्मा के प्रति हो। अपने को शरीर समझना और क्षणभंगुर साँसारिक भोगों का भोक्ता भर समझना अशुद्ध अहंकार है। अपने को शुद्ध-बुद्ध चेतना, आत्मा और परमात्मा का प्रतिनिधि मान कर साँसारिक भोगों के प्रति मोक्ष की भावना न रख कर कर्तव्यवान की भावना रखना अहंकार की शुद्धता की द्योतक है।
इस प्रकार इन वृत्तियों की शुद्धता अशुद्धता के लक्षण समझ कर निर्णय कर लेना चाहिए कि उसका अन्तःकरण किस सीमा तक शुद्ध अथवा अशुद्ध है और फिर उसी अनुपात से चिन्तन, मनन तथा सत्कर्मों के द्वारा उसे अधिकाधिक शुद्ध बनाने में लग जाना चाहिये। स्वार्थ रहित सात्विक आहार-विहार तथा आचार-विचार का अभ्यास अपना लेने से मनुष्य की चारों वृत्तियाँ आप से आप शुद्ध होने लगती हैं। मन को प्रसन्न रखिये, बुद्धि को विकृतियों से बचाइये, चित्त पर शिव संस्कारों की छाप डालिये और अहंकार को शरीर से आत्मा अथवा परमात्मा की ओर उन्मुख करिये, आपका अन्तःकरण शुद्ध हो जायेगा। इस प्रकार का सकर्मक अभ्यास ही आध्यात्मिक जीवन प्राप्त करने का प्रयास है, जिसे पाकर मनुष्य जीवन शाश्वत सुख का अधिकारी बन कर सफल एवं सार्थक हो जाता है। यह आध्यात्मिक उपलब्धि संसार की सारी उपलब्धियों का मूल तथा सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि है जिसे हर प्रयत्न पर प्राप्त कर मनुष्य को अपने नश्वर जीवन को अनश्वर बनाना ही चाहिए।
तब वसुधा पुलकित हो उठी-
प्रचण्ड अन्तर्दाह से एक विराट् पिंड खण्ड-खण्ड होकर आकाश से टूट पड़ा और क्षितिज में घूमने लगा। एक खण्ड विधाता के सम्मुख भी जा गिरा।
उन्होंने सोचा इससे क्रीड़ा की जाए। किन्तु ओह! यह तो अंगार की तरह गर्म था। विधाता ने उसे जल में विहार करने के लिए छोड़ दिया। जब निकाला तो पता चला कि उसमें स्पन्दन है।
विधाता ने पूछा क्या तुम में जीवन है? ‘हाँ’ का उत्तर पाकर विधाता ने फिर पूछा तुम्हारा नाम क्या है? अनामा पिण्ड ने उत्तर दिया—मेरा नाम कुछ भी नहीं है! विनोदी विधाता ने उसका नाम ‘वसुधा’ रखकर कहा लो तुम्हारा नाम रख दिया। अब प्रसन्न होकर हँसो खेलों और मंगल मनाओ।
वसुधा ने एक गर्म उच्छास छोड़ कर कहा—निर्माता! मेरे अन्तर में अनन्त दाह भरा है, मैं किस प्रकार हँस सकती हूँ।
विधाता ने उसे हरी-भरी वनस्पति से भर दिया और कहा अबतो हँसोगी? वसुधा ने फिर एक उच्छास छोड़ा वह भी गर्म था। अब विधाता ने उसे एक शिशु प्राणी प्रदान करके कहा—ले यह मानव शरीर तेरी प्रसन्नता का हेतु बनेगा।
मनुष्य वसुधा की गोद में बड़ा हुआ और उसने अपने परिश्रम से माँ वसुधा को सजा दिया। वसुधा का श्रंगार देख कर विधाता ने एक दिन फिर पूछा—वसुधे, अबतो तुम्हारी प्रसन्नता का वारापार न होगा। वसुधा ने पुनः उच्छास छोड़ा। वह भी गर्म था। विधाता ने झुँझला कर कहा—तू कभी सुखी नहीं हो सकती और वे नाराज होकर चले गये।
एक दिन एक मधुर संगीत से विधाता की नींद टूटी। उन्होंने उठकर देखा वसुन्धरा गा रही थी। विधाता ने उसकी प्रसन्नता हेतु पूछा। हँसते हुये वसुधा ने बतलाया—सृष्टा, जब हमारे पुत्र मनुष्य निःस्वार्थ भाव से एक दूसरे पर प्रेम करते हैं और मिलजुल कर मेरी सम्पत्ति का आनंद उठाते हैं तो पुत्रों के इस प्रेम-भाव से मेरा रोम-रोम पुलकित हो जाता है।
‘हमारा चित्त अशुद्ध है’—प्रायः लोगों को यह शिकायत रहा करती है। शिकायत ठीक है। यदि उनका चित्त अशुद्ध न हो, वह दोषः रहित हो तो उनको दुःख-द्वन्दों का सामना न करना पड़े। चिन्ता, क्षोभ तथा असंतोष का ताप जब किसी को संतप्त करने लगता है और वह उसका कारण बाह्य परिस्थितियों में नहीं खोज पाता, क्योंकि वह वहाँ होता ही नहीं, तो उसे यही मानना पड़ता है कि उसकी इस यातना का कारण उसका चित्त-दोष ही है। निर्दोष चित्त व्यक्ति की प्रसन्नता कभी भंग नहीं होती। चित्त की निर्दोषिता ही वह प्रसन्नता है जिसकी आकाँक्षा मनुष्य किया करता है और जो कि जीवन की सबसे सच्ची एवं सार्थक उपलब्धि है।
मनुष्य की इच्छा रहती है कि उसका चित्त उसके वश में रहे। वह जिस प्रकार चाहे उसका संचालन करे। चित्त गति के अनुसार ही मनुष्य कर्मों में नियुक्त होता है। सत्कर्मों को करने की इच्छा हर मनुष्य में होती है। वह सत्कर्म करना भी चाहता है किन्तु चित्त की उच्छृंखलता के कारण ऐसा नहीं कर पाता। चित्त-दोष के कारण न चाहता हुआ भी वह असत् कर्मों में प्रेरित हो जाता है और फलस्वरूप दुःख, क्षोभ अथवा पश्चाताप का भागी बनाता है।
जिस प्रकार चित्त की उच्छृंखलता दुःख का कारण है उसी प्रकार उसकी स्ववशता, सत्कर्मों अथवा शुभ संकल्पों के माध्यम से सुख का हेतु होती है। इसी कारण हर मनुष्य अपने चित्त को स्वाधीन रखना चाहता है। चित्त स्ववश तभी हो सकता है जब वह निर्दोष हो। सदोष अथवा अशुद्ध चित्त उपद्रवी होता है। विपरीत-गति-गामी होने से वह मनुष्य को भयावह अन्धकार की ओर ही लिये भागता रहता है। अन्धकार से मनुष्य को स्वाभाविक घृणा तथा भय से वितृष्णा ही होती है क्योंकि यह दोनों आनन्द के घोर शत्रु हैं।
स्वाधीन-चित्त केवल शाँति दाता ही नहीं, शक्ति-दाता भी होता है। शक्ति सुख की जननी है। उससे आत्मविश्वास और आत्मविश्वास से निर्भयता का आविर्भाव होता है। अनुशासित चित्त का शक्ति भण्डार मनुष्य को इतना कार्य सक्षम बना देता है कि वह बड़े-बड़े विस्मयकारक कार्य कर सकता है। जीवन की सार्थकता एवं सफलता इस एक बात पर ही निर्भर रहती है कि वह कुछ ऐसे सत्कर्म कर सके जिससे उसका तथा संसार का उपकार हो और उसकी आत्मा को एक शाश्वत सन्तोष मिले। उसे जीवन अथवा मृत्यु दोनों स्थितियों में हर्ष की उपलब्धि हो। मनुष्य का चित्त सच्ची शक्तियों का आगार है। इस शक्ति -कोष का उद्घाटन तब ही होता है जब चित्त अनुशासित तथा स्ववश होता है। चित्त की स्वाधीनता उसकी निर्दोषिता पर ही निर्भर है।
मनुष्य के लिये अब यह बात अनजान नहीं रह गई है कि उसे क्या करना है और क्या नहीं करना चाहिए क्या करने में उसका कल्याण है और क्या करने में अकल्याण है। अशुद्ध चित्त के कारण बहुधा यह होता रहता है कि मनुष्य कल्याणकारी कार्य करना चाहता है किन्तु नहीं कर पाता प्रत्युत उससे परवश ही ऐसे कार्य हो जाते हैं जो अमाँगलिक तथा अकल्याणकारी होते हैं। ऐसी दशा में पश्चाताप होना स्वाभाविक है। मनुष्य मन ही-मन रोता-खीजता और अपने को कोसता है। वह जानता है कि इस प्रकार के अवाँछनीय कार्य उसको प्रगति पथ पर, सुख-शाँति के महान् मार्ग पर न बढ़ने देंगे। जिससे उसका बहुमूल्य मानव-जीवन यों ही नष्ट होकर व्यर्थ चला जायेगा और तब उसे आत्मोन्नति, आत्मकल्याण करने का अवसर न जाने कभी मिलेगा या नहीं। मनुष्य की स्वाभाविक इच्छा होती है कि वह अति दुर्लभ मानव-जीवन का सदुपयोग करके आत्मकल्याण का अधिकारी बन जाये। किन्तु खेद है कि चित्त की अशुद्धता के कारण वह अपने इस महत् उद्देश्य में सफल नहीं हो पाता।
बहुधा लोग चित्त को चंचलता का ही वह दोष मान लेते हैं जिसके कारण हम उसे स्ववश नहीं कर पाये चित्त की चंचलता वस्तुतः उसका दोष नहीं है बल्कि यह असकी विकलता है, छटपटाहट है जो शुद्धि प्राप्त करने की लालसा एवं प्रयास से उत्पन्न होती है। नैसर्गिक नियम के अधीन चित्त स्वभावतः शुद्धि की ओर स्वयं गतिशील रहा करता है और जब तक उसे अभीष्ट शुद्धता नहीं मिल जाती है एक ओर से दूसरी और को भागता रहता है। ज्यों ही उसे अभीष्ट शुद्धता जो कि प्रसन्नता के रूप में होती है,मिल जाती है वह स्थिर, शाँत एवं सन्तुष्ट हो जाता है। फिर न वह व्यग्र होता है और न चंचल। अभीष्ट केन्द्र बिन्दु पर पहुँच कर वह एकरस शुभ संकल्पों तथा सत्कर्मों में लग कर मानव जीवन को सफल एवं सार्थक बना देता है। चित्त की चंचलता इस बात का प्रमाण है कि वह अपने अभीष्ट लक्ष्य को नहीं पा रहा है, जिसके लिए वह लालायित होकर भागा-भागा फिर रहा है। मनुष्य को चाहिए कि वह उसकी सहायता करे। एक बार ऐसे अपने केन्द्र बिन्दु पर पहुँच जाने में मदद करे, जिससे कि वह शुद्ध एवं प्रबुद्ध होकर मनुष्य को उसी प्रकार सहायक तथा सुखदाता बन सके जिस प्रकार पिता द्वारा पाला-पोषा पुत्र उसका अवलम्ब बन जाता है। चित्त द्वारा शुद्धि का प्रयत्न और कुछ नहीं मनुष्य को कल्याण पथ पर पहुँचाने की सामर्थ्य प्राप्त करने का प्रयास ही है चित्त में अस्वाभाविकता आ जाना ही उसकी अशुद्धि है जिसके कारण हम उसे अपने वश में नहीं रख पाते। वासनाओं की उत्पत्ति और उनकी पूर्ति को ही जीवन मान लेना वह अस्वाभाविकता है जो चित्त की अशुद्धि का कारण बनता है। जब कि स्वाभाविक जीवन वासनाओं से परे है। वासनाओं से परे जो एक सत्य, शिव और सुन्दर जीवन है वही वास्तविक जीवन है। उस जीवन की अनुभूति कर लेने पर मनुष्य का चित्त शान्त, सन्तुष्ट एवं स्थिर हो जाता है। वासनायें जीवन की अविराम विकृतियाँ है। एक बार जब इनका क्रम प्रारम्भ हो जाता तो फिर खत्म होने का नाम नहीं लेता। एक वासना की पूर्ति से दूसरी वासना का जन्म होता है। वासनाओं का जाल इतना सधन तथा सुदृढ़ हो जाता है कि एक बार फँस जाने पर उसमें से निकल जाना कठिन हो जाता है। मनुष्य मछली की तरह छटपटाता हुआ तड़प-तड़प कर जीवन खो देता है। वासनाओं की उत्पत्ति एवं पूर्ति स्वयं में कोई प्रक्रिया नहीं है। इनको जन्म और पूर्ति का सुख देने वाली एक चेतन सत्ता है उसी चेतना सत्ता के प्राप्त करने का प्रयास ही वह स्वाभाविक जीवन है जो चित्त की शुद्धि में सहायक होता है। आत्म प्रकाशक मूल सत्ता को जीवन न मान कर वासनाओं की उत्पत्ति एवं पूर्ति को जीवन मान लेना ही अस्वाभाविकता है, जिसको अपनों लेने से चित्त अशुद्ध एवं विकृत हो जाता है। वासना प्रधान चित्त सदैव ही किसी न किसी प्रकार का अभाव अनुभव करता है। वासनाओं एवं तृप्ति में स्वाभाविक विरोध है। जिस समय तक वासनाओं की उपस्थिति रहेगी, अभाव बना रहेगा। वासनाओं से निवृत्त चित्त में एक शाश्वत तृप्ति का समावेश हो जाता है और यही तृप्ति उसकी वह निर्विकारता है जिसकी मनुष्य को अपेक्षा है, आवश्यकता है।
वस्तुओं के प्रति अत्यधिक आकर्षण ही वासनाओं को जन्म देता है। इस आकर्षण का कारण है वस्तुओं को बहुत महत्व देना। जब मानव जीवन की सुख शाँति का हेतु वस्तुओं की प्राप्ति मान लिया जाता है तब उनका महत्व अनावश्यक रूप से बढ़ जाता है। मनुष्य अपनी भ्राँत मान्यता के वशीभूत होकर वस्तुओं के संग्रह में निरत हो जाता है। वह उन्हें पाने में कर्तव्य का भी बोध खो देता है। एक वस्तु पाने के बाद दूसरी पाने की लालसा में प्रयत्न करता हुआ स्वाभाविक जीवन से भटक कर अस्वाभाविक जीवन की ओर चला जाता है, जिससे संघर्ष अशांति तथा अतृप्ति की वृद्धि हो जाती है। ऐसी दशा में चित्त का शुद्ध रहना सम्भव नहीं हो सकता ।
जिनको पाने और इकट्ठा करने में मनुष्य अपना सारा जीवन ही यापन कर डालता है, यदि उन वस्तुओं में सुख एवं सन्तुष्टि होती तो कोई एक वस्तु की कामना न रहती । सुख में खण्ड नहीं होते वह अखण्ड एवं पूर्ण होता है। वह जिसमें रहता है पूर्ण एवं अखण्ड रूप में रहता है अन्यथा बिल्कुल नहीं रहता। एक वस्तु से तृप्त न होकर दूसरी के लिए लालायित रहना इस बात का प्रमाण है कि सच्चा सुख, सन्तुष्टि वस्तुओं में नहीं है। इस लिए उसके लिए उनका संग करना असंगत एवं अस्वाभाविक है जो कि चित्त की अशुद्धि का विशेष कारण बनती है।
चित्त की शुद्धि के लिये वस्तुओं से असंग रहना आवश्यक है। वह हर चीज इन अर्थों में वस्तु ही कही जायेगी जो नश्वर एवं परिवर्तनशील है। आवश्यकतानुसार निर्मोह के साथ संसार की वस्तुओं का उपयोग करते हुए अवनिश्वर आत्मा के प्रति आकर्षित रहना ही वस्तुओं का असंग कहा गया है। वस्तुओं के साथ असंग रहने की स्थिति में मनुष्य में माया, मोह, ममता, लोभ तथा अहंकार की वे विकृतियाँ उत्पन्न नहीं होने पाती जो कि चित्त की अशुद्धता अथवा मल कही गई है। इन विकृतियों के अभाव में चित्त शुद्ध, शान्त एवं स्थिर रहता है जिससे एक शाश्वत, सात्विक तथा अनिवर्चनीय प्रसन्नता प्राप्त होती है और यही प्रसन्नता मानव जीवन का लक्ष्य एवं उद्देश्य है।
निःसन्देह इस नश्वर संसार में रहते हुए और नश्वर वस्तुओं की आवश्यकता होने पर उनसे संग होना असम्भव नहीं, किन्तु आवश्यकता जन्य संग व्यवहारिक है, स्थायी अथवा सार्वजनिक नहीं है। मनुष्य का सार्वजनिक सम्बन्ध तो उसकी अपनी उस आत्मा से है जिसका कभी न तो नाश होता है और न जिसमें कभी कोई विकार ही उत्पन्न होता है। संग करते हुये भी वस्तुओं से असंग रहने की कला का अभ्यास कर लेने वाले अपने चित्त को शुद्ध करके शाश्वत सुख शान्ति एवं सन्तोष के अधिकारी बनते हैं।
विद्या से विनय-
महर्षि आरुणि के पुत्र श्वेतकेतु ने गुरुकुल में रहकर लगन के साथ विद्याध्ययन किया। साथ ही गुरु-सेवा से उनके कृपा पात्र भी बन गये। यद्यपि गुरु को अपने सभी शिष्य प्रिय थे तथापि अपने सेवा बल से श्वेतकेतु ने विशेषता प्राप्त करली थी। गुरु सेवा की कृपा से जहाँ उन्होंने शीघ्र ही चारों वेदों का अखण्ड ज्ञान प्राप्त कर लिया था। वहाँ गुरु की प्रशंसा और प्रियता के कारण उनमें कुछ अहंकार भी आ गया था। अपने पाण्डित्य के अभिमान में गुरु के सिवाय अन्य किसी का आदर करना ही भूल गये।
निदान श्वेतकेतु जब गुरु का आशीर्वाद और चारों वेदों का सम्पूर्ण ज्ञान लेकर घर आये तो अहंकारवश पिता को भी प्रणाम नहीं किया। उनके पिता महर्षि आरुणि को इसका बड़ा दुःख हुआ। दुःख इसलिये नहीं कि वे पुत्र के प्रणाम के भूखे थे और श्वेतुकेतु ने उन्हें प्रणाम नहीं किया। वरन् दुःख इसलिये हुआ कि पुत्र एक लम्बी अवधि के बाद जहाँ ज्ञानी वहाँ अभिमानी भी होकर आया है।
महर्षि आरुणि पुत्र की इस वृत्ति से चिन्तित हो उठे। क्योंकि वे जानते थे कि जिस विद्या के साथ विनय नहीं रहती वह न तो फलीभूत होती है और न आगे विकसित! उन्होंने पुत्र के हित में उसका यह विकार दूर करने के मन्तव्य से व्यंगपूर्वक कहा— “ऋषिवर ! आपने ऐसी कौन ज्ञान की गूढ़ पुस्तक पढ़ ली है जो गुरुजनों का आदर तक करना भूल गये। मानता हूँ आप बहुत बड़े विद्वान हो गये। चारों वेदों का ज्ञान आपने प्राप्त कर लिया है। किन्तु इसके साथ यह भी जानते होंगे कि विद्या का सच्चा स्वरूप विनय है। जब आप वही न सीख पाये विद्वान कैसे?
पिता की बात सुन कर श्वेतकेतु ने अपनी भूल अनुभव की और लज्जित होकर पिता के चरणों में गिर गये। महर्षि आरुणि ने श्वेतकेतु को उठाकर छाती से लगा लिया और कहा—”अभिमान तुम्हें नहीं, अपने पुत्र की विद्वता पर अभिमान तो मुझे होना चाहिये था।”
अनादि काल से मनुष्य सुख शाँति की कामना करता और उसको प्राप्त करने का प्रयत्न एवं उपाय करता आ रहा है। मनुष्य का शारीरिक मानसिक तथा बौद्धिक प्रत्येक कर्म एकमात्र सुख और शाँति प्राप्त करने का ही प्रयत्न है। वह धन-दौलत कमाता है सुख-शाँति के लिये। मकान-महल बनाता है सुख-शाँति के लिए। स्त्री-बच्चों को करता है सुख-शाँति के लिये। दान-पुण्य,तप-योग जो कुछ करता है, सुख-शाँति के लिए।
जंगली युग से लेकर आज के उन्नत एवं वैज्ञानिक युग तक मनुष्य लगातार सुख-शाँति के साधनों को उन्नत करता, बढ़ाता तथा संचय करता आया है। सुख-शाँति की खोज में उसने आकाश-पाताल एक कर दिए हैं। किन्तु क्या उसे अब तक सुख-शाँति की प्राप्ति हो सकी है? यदि विचार पूर्वक देखा जाये तो विपरीत निष्कर्ष ही सामने आयेगा। पूर्व काल की अपेक्षा आज का मनुष्य कहीं अधिक उन्नत व समृद्ध है। उसने अपरिमित साधन एवं सुविधाएँ एकत्र कर ली है। किन्तु अपने साध्य सुख और शाँति को तब भी नहीं पा सका है। बल्कि सत्य यह है कि वह पूर्वकाल की अपेक्षा आज कहीं अधिक व्यस्त एवं उल्टा दुःख और अशाँति के अन्धकार में भटक गया है। सुख-शाँति की खोज करता-करता मनुष्य आखिर दुःख एवं अशाँति का ग्रास क्यों बनता जा रहा है, इस खेदपूर्ण आश्चर्य का स्पष्टीकरण बहुत आवश्यक है।
मनुष्य की इस विपरित गति का एक कारण तो यह है कि मनुष्य की सुख-लिप्सा बहुत बढ़ गई है। जिस वस्तु में बहुत स्पृहा अपनी सीमा को लाँघ जाती है तब वह दुःख का कारण बन जाती है। मनुष्य को सुख मिलते हैं तो वह और सुख चाहता है। जब वह और सुख पाता है तब और अधिक पाने के लिये लालायित हो उठता है। इस प्रकार उसकी स्पृहा उत्तरोत्तर बढ़ती हुई अतृप्ति अथवा असन्तोष का रूप धारण कर लेती है। असन्तुष्ट कामनाओं की पूर्ति असम्भव है। जहाँ असन्तोष है, अतृप्ति है, वहाँ सुख और शाँति कहाँ? असन्तोष में बदली हुई अपनी लिप्सा पूरी करने के लिए कामनाओं से प्रेरित किया हुआ मनुष्य उचित-अनुचित, युक्त -अयुक्त सभी प्रकार के काम करने में प्रवृत्त हो जाता है। अत्यधिक सुख का कामी पुरुष दूसरों की सुख-सुविधा का भी विचार नहीं करता जिससे दुःख तथा अशाँति के परिणाम वाले संघर्ष प्रारम्भ हो जाते हैं। जहाँ संघर्षों की चिनगारियाँ दहक रही हों वहाँ और अधिक सुख-शाँति तो दूर जो कुछ रही-बची शाँति होती है वह भी भस्म हो जाती है।
दुःख एवं अशाँति का एक कारण अत्याग अथवा संग्रह वृति भी है। मनुष्य ने कुछ इस प्रकार की गलत धारणा बना ली है कि वह जितने भी अधिक-से-अधिक पदार्थ एवं वस्तुयें अपने पास इकट्ठी कर सकेगा, उतनी ही अधिक सुख-शाँति उसे मिल सकेगी। इसी आधार पर लोग अपने पास वस्तुओं का भंडार इकट्ठा करने का प्रयत्न करते रहते हैं। इस प्रकार की संग्रह-वृत्ति लोभ को जन्म देती है। वह जो भी वस्तु किसी के पास देखता है उसे पाने के लिये ललचा उठता है। जिस चाही वस्तु को वह सरल मार्ग से प्राप्त कर सकता है उसे सरल मार्ग से पाने का प्रयत्न करता है अन्यथा उसके लिये छल-कपट तथा कुटिलता करने में भी नहीं चूकता। लोभ होती ही ऐसी बुरी बला है। यह जिसे लग जाती है उसे बुराई की ओर ही प्रेरित करती है। लोभ से ही ईर्ष्या-द्वेष का जन्म होता है। ईर्ष्या एवं द्वेष दो ऐसे विषधर हैं जिनका अशन मनुष्य के हृदय की सुख-शाँति ही हुआ करता है। जिनकी मन-बुद्धि और आत्मा इन विषधरों के विष से व्याकुल रहते हैं वे स्वप्न में भी सुख-शाँति की अनुभूति नहीं कर सकते।
सुख-शाँति की सम्भावना से मनुष्य पदार्थों का संग्रह किया करता है और एक दिन उसके यही संग्रहित उपादान दुःख और अशाँति के हेतु बन जाते हैं। वस्तुओं की अधिकता होने से उनकी साज-सम्भाल में व्यस्त रहना पड़ता है। यदि ऐसा न किया जाये तो वे विकृति एवं विकारों से अभिभूत होकर नष्ट होने लगेंगे और तब उनमें भ्रामक सुख का हेतु आकर्षण भी होने लगेगा जिससे न केवल दुःख ही होगा बल्कि वे चीजें एक बोझ बनकर सिर दर्द बन जायेगी। संग्रह को चोरी क भी भय बना रहता है। उसकी रक्षा की चिन्ता चिता की तरह जलाती हुई नींद तक हर लेती है। यदि इस प्रकार की सम्भावना न भी रहें तब भी संसार की प्रत्येक वस्तु नाशवान है। सारी चीजें धीरे-धीरे स्वयं ही नष्ट होने लगती हैं। ऐसी दशा में दुःख होना स्वाभाविक है। बहुधा जड़ पदार्थों की आयु मनुष्य की आयु से अधिक होती है। चीजें बनी रहती हैं किन्तु मनुष्य चल देता है। ऐसी कल्पना आते ही लोभी पुरुष को यह भाव सताने लगता है कि ‘हाय! जिन चीजों को मैंने यत्नपूर्वक इकट्ठा किया है उन्हें छोड़कर मुझे इस संसार से चला जाना पड़ेगा’। यह मोह मय चिन्तन मनुष्य को कितनी पीड़ा दे सकता है इसका अनुमान नहीं लगाया जा सकता।
तर्क अथवा अनुमान-प्रमाण के अतिरिक्त इस बात के अनेक प्रमाण पाये जा सकते हैं कि पदार्थों के संग्रह में सुख की कल्पना करना मरु-मरीचिका में जल की सम्भावना करना है। यदि वस्तुओं एवं पदार्थों के संग्रह में सुख-शाँति रही होती तो संसार में एक से एक बढ़कर धनकुबेर तथा साधन-सम्पन्न व्यक्ति विद्यमान हैं वे सब पराकाष्ठा तक सुखी तथा सन्तुष्ट होते। दुःख अथवा अशाँति उनके पास-पड़ोस में होकर भी नहीं गुजरते—किन्तु ऐसा देखने में नहीं आता। संसार के धन कुबेर, साधन-सम्पन्न तथा वस्तुओं के भंडारी एक साधारण व्यक्ति से भी अधिक व्यग्र, चिन्तित, दुःखी तथा अशाँत देखे जाते हैं। पदार्थों के अनावश्यक संग्रह में सुख-शाँति की सम्भावना देखना एक भारी भूल है।
इसके विपरीत सुख-शाँति के हेतु सन्तोष निस्पृहता एवं त्याग ही है। त्याग वृत्ति वाले व्यक्ति को लोभ तथा मोह जैसे शत्रु नहीं घेर पाते। उसका अबोझिल मन, कम से कम सन्तुष्ट रहकर सुख भोगा करता है। मनुष्य पुरुषार्थ करता है। उसकी इन्द्रियाँ पुरुषार्थ करती हैं। उसका पुरुषार्थ अनन्त धन तथा प्रचुर साधनों में फलीभूत हो सकता है। इस पर प्रतिबन्ध लगाना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता है। कि मनुष्य अपने परिश्रम एवं पुरुषार्थ से होने वाले अपरिमित लाभों को न उठाये। उसे अपने पुरुषार्थ के फल दोनों हाथों से लूटने चाहिए। किन्तु इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि मनुष्य लाभ लूटने के लिये ही पुरुषार्थ करे। उसे पुरुषार्थ, पुरुषार्थ के लिये ही करना चाहिए और तब भी यदि उसके पास प्रचुर मात्रा में विभूतियाँ इकट्ठी हो जायें तो उसे उन्हें आवश्यक रूप से अपने पास ही ढेर नहीं लगाते जाना चाहिए। उसे चाहिए कि अपनी आवश्यकताओं को तुष्ट करते हुए उसे अपनी उपलब्धियों का त्याग उनके लिये भी करना चाहिए जो कष्ट में है, आवश्यकता में है। अपने संग्रह का त्याग परोपकार तथा परमार्थ में करने से हृदय को सच्ची सुख-शाँति मिलती है। त्याग के लिये किया हुआ संग्रह ही सुख-शाँति का हेतु है नहीं तो वह लोभ, दम्भ तथा अहंकार का प्रतीक मात्र है जिससे वास्तविक सुख-शाँति की अपेक्षा नहीं की जा सकती।
मनुष्य की भोगेच्छा भी दुःख एवं अशाँति का बहुत बड़ा कारण है। मनुष्य इस भ्राँत विश्वास का भी शिकार बना हुआ है कि सुख का निवास साँसारिक भोगों में है। अपने इसी विकृत विश्वास के कारण मनुष्य भोगों में लिप्त रहकर अपनी सुख-शाँति की सम्भावना नष्ट किया करते हैं। यदि संसार के भोग-विलास में सुख-शाँति का निवास रहा होता तो संसार का प्रत्येक प्राणी सुखी होता क्योंकि संसार का कदाचित ही कोई प्राणी ऐसा हो जिसे थोड़ा बहुत भोग विलास का अवसर न मिलता हो। किन्तु देखा यह गया है कि अधिक भोग-विलास में लिप्त व्यक्ति दैविक, मानसिक तथा आध्यात्मिक तीनों तापों से त्रस्त रहा करते हैं। उनका शारीरिक स्वास्थ्य नष्ट हो जाता है मन मलीन हो जाता है, आत्मा का पतन हो जाता है जो इन त्रिविधि तापों का पात्र बना है यदि वह जीवन में सुख और शाँति की कामना करता है तो अनधिकार चेष्टा का अपराधी माना जायेगा।
भोगों की तृष्णा एक ऐसी अक्षय प्यास है जो कभी शाँत ही नहीं होती। लोग सुख के भ्रम में जवानी में भोगों के प्रति आकर्षित रहते हैं। उसके परिणाम पर विचार नहीं करते कि आज शक्ति होने पर जो वे अपनी वृत्तियों को भोगों का गुलाम बनाये दे रहे हैं इसका फल आगे चलकर बुढ़ापे में क्या होगा? उस अशक्त एवं जर्जर अवस्था में भोगों की प्यासी वृत्तियाँ क्या शत्रु की तरह त्रास न देंगी? भोग एक प्रज्वलित अग्नि के समान है, इनको जितना ही भोगा जाता है इनकी ज्वाला उतनी ही बढ़ती जाती है और धीरे-धीरे एक दिन मनुष्य की सारी सुख-शाँति की सम्भावनाओं को सदा के लिए भस्म कर देती हैं।
भोगों की भयंकरता समझने के लिये महाराज ययाति का उदाहरण पर्याप्त है—राजा ययाति भोगों में आनन्द की कल्पना कर बैठे। निदान आनन्द पाने के लिए वे पूरी तरह से भोगों में डूबे रहने लगे। इसका फल यह हुआ कि उन्हें शीघ्र ही जठरता ने घेर लिया। उनकी शक्ति समाप्त हो गई किन्तु भोगेच्छा और भी बढ़ गई। राजा ययाति अपनी विकृत वृत्तियों से दिन और रात दुःखी रहने लगे। उनका दिन का चैन और रात्रि की नींद गायब हो गई। उनकी अतृप्त वासनायें उन्हें पल-पल पर त्रास देने लगी। विषय-वासनाओं के बन्दी राजा ने कोई उपाय न देखकर अपने को याचक बनाया, सो भी अपने पुत्र से—और वह भी यौवन का। उन्होंने अपने छोटे पुत्र से एक हजार वर्ष तक के लिए जवानी की भीख इसलिये माँगी कि वे अपनी अतृप्त वासनाओं को पुनः भोग सकें। पुत्र को अपने पिता की दशा पर बड़ा तरस आया उसने अपना यौवन उन्हें दे दिया। ययाति की वासना-कलुषित बुद्धि यह न सोच सकी कि पुत्र पर कितना बड़ा अन्याय होगा। किन्तु भोगों का भूखा मनुष्य भेड़िये से कम निर्दयी नहीं होता।
पुत्र से यौवन लेकर राजा ययाति पुनः भोगों में डूब गये और पूरे एक सहस्र वर्षों तक डूबे रहे। उन्हें पूरी आशा थी कि वे विषय-वासना के माध्यम से सच्ची सुख-शाँति पा लेंगे। किन्तु एक सहस्र वर्ष बीतने पर जब पुत्र को यौवन वापिस करने का अवसर आया तो उन्होंने देखा कि उनकी भोग-लिप्सा और अधिक बढ़ गई है। विवशता वश उन्हें पुत्र का यौवन लौटाना पड़ा और एक अशाँत मृत्यु मरने के पश्चात शायद गिरगिट की योनि भोगनी पड़ी। भोगों तथा विषय-वासना में सुख-शाँति का स्वप्न देखने वालों की यही दशा होना सम्भाव्य है।
मनुष्य के साध्य—सुख और शाँति का निवास कामनाओं, उपादानों अथवा भोग-विलासों में नहीं है। वह कम से कम कामनाओं, अधिक से अधिक त्याग और विषय-वासनाओं के विष से बचने में ही पाया जा सकता है। जो निःस्वार्थी, निष्काम, पुरुषार्थी, परोपकारी, सन्तोषी तथा परमार्थी है, सच्ची सुख-शाँति का अधिकारी वही है। साँसारिक स्वार्थों एवं लिप्साओं के बन्दी मनुष्य को सुख शाँति की कामना नहीं करनी चाहिए।
मनुष्य जब एक बार पाप के नागपाश में फँसता है, तब वह उसी में और भी लिपटता जाता है, उसी के गाढ़ आलिंगन में सुखी होने लगता है। पापों की शृंखला बन जाती है। उसी के नये रूपों पर आसक्त होना पड़ता है। मानवों के समस्त पाप उनके स्वभाव जन्य या पूर्व संस्कारों के परिणामस्वरूप एक बीमारी की तरह होते हैं। ऐसे पापी क्रोध और दण्ड के बजाय दया के पात्र अधिक होते हैं। इसीलिये कहा गया है कि पाप में पड़ना मानव-स्वभाव है और उसमें जान-बूझकर डूबे रहना शैतान का स्वभाव है।
-विक्टर ह्यूगो
ऋग्वेद का ऋषि परमात्मा से प्रार्थना करता हैः—
“प्राता रत्नं प्रतारित्वा दधाति तं चिकित्वान्प्रति गृह्यानिधत्ते। तेन प्रजाँ वर्धयमान आयू रायस्पोषेण सचते सुवीरः॥
—जो निरालस्य पूर्वक धर्माचरण द्वारा धन उपार्जित करता है, तथा दूसरों के हित में भी उसी प्रकार लगाता है वह व्यक्ति इस संसार में सदा सुखी रहें।
ऐसे ईमानदार और सदाचारी व्यक्ति संसार में सुखी न रहें ऐसा सम्भव नहीं। निश्चय ही वे सुखी रहे हैं, आज भी होंगे और आगे भी सुखी रहेंगे। ऐसे सत्पुरुषों के लिये दुःख दारिद्रय अथवा कष्ट क्लेशों का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। दुःख दारिद्रय एवं कष्ट क्लेश तो कुमार्गगामियों एवं मिथ्या वादियों के दाय भाग हैं। वह तो उनका ही अधिकार है वह किसी अन्य को किस प्रकार प्राप्त हो सकता है?
जो किसी का अहित नहीं करता, किसी को प्रवंचित अथवा प्रताड़ित नहीं करता, अनुचित उपार्जन से दूर रहता है, धर्माचरण द्वारा धन कमा कर उसी में सन्तुष्ट रहता है, स्वार्थ की अपेक्षा परमार्थ को महत्व देता है, प्रसन्नता, सुख, शाँति, स्थिरता एवं संतुलन उसे ही प्राप्त होता है। ऐसा ईमानदार व्यक्ति आत्माह्लाद के अतिरिक्त दूसरे व्यक्तियों के सम्मान एवं प्रतिष्ठा का भी पात्र बन जाता है।
अपने सदाचरण से जिसने दूसरों के हृदय में अपने लिए सम्मान, सद्भाव एवं आदर उत्पन्न किया है तो दूसरों की वे भावनायें अदृश्य रूप में ऐसी सुशीतल, शाँतिदायक तथा आनन्दमयी विद्युत तरंगों को उत्पन्न करेंगी जो मानसिक स्वास्थ्य बनकर उस तक उसी प्रकार पहुँचती रहेंगी जिस प्रकार चन्दन-वन के निकट खड़े व्यक्ति के पास शीतल मंद सुगंध समीरण आता रहता है। उस स्वास्थ्यप्रद वातावरण में सदाचारी को जो सुख शाँति एवं आह्लाद प्राप्त होगा वह किसी स्वर्गीय आनन्द से कम न होगा। पृथ्वी का परमानन्द पाने के लिए मनुष्य को ईमानदार, सन्मार्गगामी तथा सदाचारी बनना ही चाहिये।
मनुष्य की शोभा तुच्छ, तिरस्कृत अथवा अपमानित होने में नहीं है। उसकी शोभा है उच्च, सदाशयी, प्रतिष्ठित एवं भावनापूर्ण बनने में। यदि आप मनुष्यता के गौरव की रक्षा करना चाहते हैं, मनुष्यों के योग्य आदर पाना चाहते हैं तो उसके लिए सर्वमान्य, सरल तथा समुचित उपाय है ईमानदार एवं सदाचारी बनना। समाज में सच्चा व्यवहार करिये, उचित लाभ उठाइये, वचन देकर भंग न करिए, जो कुछ मुँह से कहिए उसे पूरा करने का प्रयत्न कीजिए, विश्वास देकर घात न करिए। देखिए आप समाज की श्रद्धा एवं आदर के पात्र बनते हैं या नहीं, फिर भले ही आप धन से अभावग्रस्त ही क्यों न हों। धन का न्यूनाधिक्य किसी को आदर अनादर का पात्र नहीं बनाता, यह मनुष्य का सदासद् आचरण-व्यवहार है जो उसे उठाता गिराता है। चरित्र-धन की तुलना में अन्य सारे धन धूल के समान ही माने गए हैं। विद्वानों का कहना है कि—’जिसका धन चला गया, कुछ गया, किन्तु यदि चरित्र चला गया साख मिट गई तो मानो सर्वस्व चला गया।”
जीवन को सम्माननीय स्थिति में रखना सबसे अधिक सुखद अवस्था है। जिस प्रकार तिरस्कार अपयश अथवा अनादर को विष बतलाया गया है उसी प्रकार विज्ञों ने सच्चे सम्मान को अमृत वत् कहा। लाँछित व्यक्ति जीता हुआ भी मृतक के समान होता है। तेजहीन एवं तिरस्कृत जीवन भी कोई जीवन है? इस प्रकार की लाँछना एवं घृणा पूर्ण जिन्दगी किसी निकृष्ट पशु को ही सहन हो सकती है, किसी आत्म-सम्मान के धनी मनुष्य को नहीं।
जो व्यक्ति मन, वचन, कर्म से सच्चाई का व्यवहार करता है। नम्रता, उदारता, सज्जनता एवं सत्य जिसके स्वभाव की शोभा है वह व्यक्ति स्वयं भी अपनी दृष्टि में सम्मानित रहता है। जो अपनी दृष्टि में स्वयं सम्मानित है, उठा हुआ है उसका दूसरों की दृष्टि में उठा रहना स्वाभाविक है। यह एक मनोवैज्ञानिक सत्य है कि मनुष्य का जो मूल्याँकन अपनी खुद की दृष्टि में होता है, वही मूल्य उसका दूसरों की दृष्टि में भी हुआ करता है। अपनी दृष्टि में स्वयं सम्मानित व्यक्ति केवल वही हो सकता है जो कभी किसी को धोखा नहीं देता है। किसी के धन पर दृष्टि डालना पाप समझता है। जो लोभ लालच तथा स्वार्थ की भावना से पीड़ित नहीं है, उसे अपने प्रति यह विश्वास ही आत्म सम्मान का आधार होता है वह समाज में यथोचित सत्य एवं ईमानदारी का व्यवहार करता है।
आत्म सम्मान में एक अनिवर्चनीय सुख सन्तोष एवं गौरव ही रहता हो ऐसी बात नहीं। यह अमृत आत्मा के लिए एक आध्यात्मिक आहार है। जिसे पाकर आत्मा पुष्ट, सन्तुष्ट, प्रसन्न एवं स्फुरित होती है, जिससे मनुष्य कल्याण के मार्ग पर वेग से बढ़ता चला जाता है।
आत्म अनादर वह मारक विष है जिसका स्पर्श होते ही आत्मा मुरझा जाती है, मन मलीन हो जाता है और मनुष्य के बाह्य एवं आन्तरिक दोनों तेज प्रशमित हो जाते हैं। जिससे उसमें भय भीरुता, भ्रम एवं भ्राँतियों का न जाने कितना सघन अन्धकार घर कर लेता है। आत्मविश्वास के अभाव और निराशा के भय से उसका सारा जीवन ही लड़खड़ा जाता है। यह विषममयी यातना उसे अवश्य ही भोगनी पड़ती है, जो वंचक है, विश्वासघाती है और कुकर्मों से संकोच नहीं करता। इन नारकीय स्थिति से बचने और अमृत पद पाने के लिये मनुष्य को पराकाष्ठा तक ईमानदार एवं सत्याचारी रहना चाहिये। सत्य स्वयं एक प्रकाश है, ईश्वर की तेजोमयी अनुभूति है। जिससे मन वचन कर्म में सत्य का समावेश होगा उसके पास किसी प्रकार का अन्धकार नहीं आ सकता। एक अकेले सत्य के बल पर महात्मा गाँधी ने बिना किसी शस्त्र प्रयोग अथवा हिंसा किये बिना ही सर्व शक्ति मानवता माने जाने वाले अंग्रेजों से बात की बात में भारत खाली करा लिया। उस कीर्तिमान महापुरुष ने स्वयं का आचरण कर अपनी सहनशीलता से अंग्रेजों को बार-बार असत्य वादन एवं आचरण का अवसर देकर इतना जीर्ण कर दिया कि उसकी ‘भारत छोड़ो’ की एक दहाड़ को अंग्रेज सरकार सहन न कर पाई उसे भागते ही बना। यह सत्य सर्वशक्तिमान की ही अभिव्यक्ति है, जिसने इसका अंचल पकड़ लिया मानो उसने सर्वशक्तिमान परमात्मा का ही हाथ थाम लिया।
सत्य एवं असत्य का यह प्रभाव आज किसी से छिपा नहीं है। जहाँ सत्याचारी ईमानदार लोग सत्य का सुख एवं सम्मान प्राप्त करते और असत्याचारी गैर ईमानदार लोग देखते हैं। वहाँ असत्याचारी बेईमान लोग उसका दण्ड भोगते हैं और सत्याचारी ईमानदार लोग देखते हैं। इस प्रकार दानों ही प्रकार के व्यक्ति देखते और उसके परिणामों से अवगत होते हैं। किन्तु खेद है कि परिणाम एवं फलों को देखते हुये भी आज समाज में गैर ईमानदारों की संख्या ही अधिक देखने में आ रही है।
यह धन-पूजा का ही कुपरिणाम है कि आज अध्यात्मवादी भारतवासी लोग देश, राष्ट्र, समाज मनुष्यता एवं आत्मा तक को भूल कर धर्म के पीछे भाग रहा है। उसे मात्र यह विचार करने की फुरसत नहीं दीखती कि कुधन धान्य का संचय एवं प्रयोग करने वाले की आत्मा का पतन हो जाता है और उसके लोक परलोक दोनों बिगड़ जाते हैं। धन के नशे ने जिन्हें उन्मत बना दिया है वे भला इस आर्ष सिद्धान्त के महत्व को क्यों समझने लगे कि धन देकर परिवार और परिवार देकर आत्मा की रक्षा करनी चाहिए। आत्म संसार में सर्वोपरि तत्व है, जिसका यह तत्व नष्ट हो गया समझना चाहिये कि उसकी जीवित ही मृत्यु हो गई।
जिस भारत का सत्य, ईमानदारी और सदाचरण विश्वविख्यात था और जिसे देखने, समझने और सीखने के लिये संसार के कोने-कोने से लोग आते थे और प्रसाद पाकर कृतार्थ हो जाते थे। संसार ने जिन भारतवासियों से सभ्यता, संस्कृति एवं सुशीलता का पाठ सीखा, सत्य एवं सदाचार का स्वरूप समझा उन्हीं भारतवासियों की यह दशा हो गई है कि वे भ्रष्टाचार, मिथ्याचार, चोरबाजारी, काला बाजारी, तस्कर व्यापार, मिलावट तथा नकलीपन में आकण्ठ निमग्न हो गये हैं। संसार में उनके आचरण पर थू-थू हो रही है। राष्ट्रीय का आर्थिक, स्वास्तिक एवं आत्मिक पतन हो रहा है, राष्ट्र विनाश की ओर बढ़ रहा है किन्तु आज के अर्थ पिशाचों को पैसे के सिवाय और कुछ नहीं दीखता। ऐसे ही स्वार्थी एवं निकृष्ट व्यक्तियों के लिये ही ‘भारत-भारती’कार ने कहा है—’जिसको न निज गौरव तथा निज देश पर अभिमान है वह नर नहीं नर पशु निरा है और मृतक समान है।’ निस्संदेह जिसे अपने राष्ट्र के सम्मान, आत्मा की महानता तथा सभ्यता-संस्कृति का विचार नहीं वह अधम और मृतक ही है।
इस आर्थिक व्यभिचार को प्रोत्साहन देने में न केवल अर्थ-लिप्सुओं का ही हाथ है, उन अज्ञानियों का भी हाथ समझना चाहिए जो गुणों के स्थान पर धन को आदर देने की भूल करते हैं। आज जिसके पास अधिक धनसम्पत्ति है समाज के लोग उसको ही आदर-प्रतिष्ठा देने लगते हैं। वे यह देखना नहीं चाहते हैं कि इस धनवान ने जो प्रचुर मात्रा में धन-सम्पत्ति एकत्र की है वह किस मार्ग और उपायों से की है। बेईमानी पूर्वक धन कमा लेने पर जब अवमानता के स्थान पर सम्मान ही होता है तो कोई वैसा करने में संकोच ही क्यों करे? इस आर्थिक व्यभिचार को कम करने का एक उपाय यह भी है कि धन के स्थान पर गुणों का आदर किया जाये। ऐसे आदमियों का अभिनन्दन एवं सार्वजनिक सम्मान किया जाये जिन्होंने अपनी ईमानदारी तथा सदाचरण का प्रमाण दिया हो फिर चाहे वह धन के सम्बन्ध में दरिद्री ही क्यों न हो। उस धन कुबेर, जिसने कि भ्रष्टाचार से धन कमाया है, उसका वह दरबान अधिक सम्मान्य है जो अपनी छोटी-सी तनख्वाह में सन्तोषपूर्वक गुजर करता है और धन की लिप्सा में न तो किसी को धोखा देता है और न झूठ बोलता है। यदि धनधारियों के स्थान पर चरित्र धारियों की पूजा-प्रतिष्ठा होने लगे तो निश्चय ही धन का महत्व घट जाये और लोग प्रतिष्ठा के लिए धन के स्थान पर सदाचरण सिद्ध करने का ही प्रयत्न करने लगें। न जाने अध्यात्मवादी भारतीय समाज में कब इस प्रकार की बुद्धि आयेगी और यह ऋषियों की सन्तानें कब समझ पायेंगी कि अधोपाप से उपार्जित धन कुल को कलंकित तथा आत्मा को विनष्ट कर देता है। किन्तु यह सत्य है कि जिस क्षण से भारतवासियों में यह सद्बुद्धि आ जायेगी उसी क्षण से देश, राष्ट्र एवं समाज के शुभ दिन फिरने लगेंगे।
चर्चिल की कर्तव्य-निष्ठा
यद्यपि इंग्लैंड को भौतिकता प्रधान देश कहा जाता है, तो भी उसके प्रधानमन्त्री श्री चर्चिल की ईमानदारी और देश-प्रेम निम्न उदाहरण से स्पष्ट होती है। मि. डब्लू. एच. टामसन ने अपनी पुस्तक ‘मैं मि. चर्चिल का प्राइवेट सेक्रेट्री था’ में लिखा है—
‘मि. चर्चिल को प्रधानमन्त्री की हैसियत से जो सुविधायें उपलब्ध थीं उनका कभी निजी कामों में प्रयोग नहीं करते थे। अगर वह अपनी सरकारी कार को निजी काम के लिए प्रयोग करते थे तो चाहे वह बहुत ही मामूली दूरी तय करें, मुझे यह आदेश था कि मैं चलने से पहले गाड़ी के मीटर में जितने मील अंकित हैं लिख लूँ और फिर वापसी पर लिख लूँ। फिर उन मीलों को सरकारी गैरज के अफसर के पास भेज दिया जाता था और वह उनको मि. चर्चिल के निजी हिसाब में दर्ज करके उनकी कीमत वसूल कर लेता था। कौन-सा सरकारी है और कौन-सा गैर सरकारी—इसका निर्णय करने में मि. चर्चिल ने कभी सन्देह का लाभ नहीं उठाया.... मैंने तो यहाँ तक देखा है कि जब वह सरकारी कार पर सरकारी काम से जा रहे हों तो उन्होंने अपने रिश्तेदारों और अपने दोस्तों को भी बिठाने से इस कारण इन्कार कर दिया कि कार को जरा-सा भी चक्कर न लगाना पड़े।’
भारत की जनता स्वभावतः धर्मप्राण जनता है। धर्म के प्रति जितनी आस्था भारतवासियों में पाई जाती है उतनी कदाचित ही किसी अन्य देश की जनता में पाई जाती हो। भारत एक आध्यात्मिक देश है। यहाँ के अधिकाँश वासियों में आध्यात्मिक प्रवृत्तियाँ न्यूनाधिक मात्रा में विद्यमान पाई जाती हैं। उसका कारण यही है कि आदिकाल से ही भारत के ऋषियों, मुनियों एवं मनीषियों ने जनता में धर्म के बीज बोने के सतत प्रयत्न किये हैं। उन्होंने धर्म के तत्व, महत्व तथा जीवन पर उसके सत्प्रभाव का मूल्य समझा और यह भी जाना कि धर्म की पृष्ठभूमि पर विकसित किया हुआ जीवन ही वह जीवन हो सकता है जिसे यथार्थ रूप में जीवन कहा जा सकता है और जिसको उपलब्ध करना मनुष्य के लिए वाँछनीय हो कर उसका लक्ष्य भी होना चाहिए।
भारतवासियों में आध्यात्मिक जिज्ञासा संस्कार रूप में विद्यमान है। हर व्यक्ति किसी-न-किसी रूप में आध्यात्मिक प्रगति करने को उत्सुक रहा करता है और जिस उपलब्ध स्रोत अथवा सूत्र से वह जितना ज्ञान प्राप्त कर सकता है करने का प्रयत्न करता है। किन्तु खेद है कि जनसाधारण अपनी इस जिज्ञासा पूर्ति में सफल ही नहीं हो रहे हैं बल्कि पथभ्रष्ट होकर अज्ञान के अन्धकार में भटक रहे हैं।
अनेक लोगों ने जनसाधारण की इस लालसा को समझा और धर्म के प्रति उनकी अडिग आस्था का भी आभास पा लिया। फलस्वरूप अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिये जनता की भक्ति -भावना द्वारा प्रतिष्ठित होने के लिए उन्होंने आडम्बर धारण कर धर्म-गुरुओं का रूप बना लिया और धर्म अथवा अध्यात्म-ज्ञान के नाम पर जनता को भ्रमित करते हुए भटकाने और अपना उल्लू सीधा करने में लग गये। निदान ज्ञान के नाम पर समाज में ज्ञान का अन्धकार इतना घनीभूत हो उठा है कि धर्म का सच्चा स्वरूप समझ सकना दुरूह हो गया है। आज इस बात की नितान्त आवश्यकता आ पड़ी है कि समाज में इस प्रकार फैलाये गये अज्ञानान्धकार के विरुद्ध अभियान चलाये जायें सद् एवं सत्ज्ञान का प्रकाश प्रसारित करके अज्ञान रूपी अन्धकार को निर्मूल कर दिया जाये। यह एक बड़ा काम है। किसी एक, दो या दस-बीस अथवा सौ-पचास व्यक्तियों द्वारा पूरा नहीं किया जा सकता। इसके लिए तो प्रत्येक समझदार सत्पुरुष को अपना योगदान करना होगा। अज्ञान के कल्मष में फँसी जनता का उद्धार करना सर्वोपरि सत्कर्म है, जिसे पूरा करने के लिये अध्यात्मवादी धर्मनिष्ठों को आगे आना ही चाहिए।
ज्ञान ही आध्यात्मिक जीवन की आधारशिला है। ज्ञान के अभाव में आत्मिक उन्नति असम्भव है। ज्ञान रहित मनुष्य अन्य पशुओं की तरह ही मूल प्रवृत्तियों से प्रेरित होकर अपना जीवन यापन किया करता है और उन्हीं की तरह हांक जाकर किसी ओर भी चल सकता है। अज्ञानी व्यक्ति में अपनी सूझ-बूझ नहीं होती और न वह जीवन प्रगति की किसी भी दिशा में विचार ही कर पाता है। ज्ञान के आधार पर ही मनुष्य अपने भीतर छिपी ईश्वरीय शक्ति का परिचय पा सकता है और उसी के बल पर उन्हें प्रबुद्ध कर आत्म-कल्याण की दिशा में नियोजित कर पाता है। अज्ञानी व्यक्ति की सारी शक्तियाँ उसके भीतर निरुपयोगी बनी बन्द रहती है और शीघ्र ही कुँठित होकर नष्ट हो जाती है। जिन शक्तियों के बल पर मनुष्य संसार में एक-से-एक ऊंचा कार्य कर सकता है, बड़े-से-बड़े पुण्य-परमार्थ सम्पादित करके अपनी आत्मा को भव-बन्धन से मुक्त करके मुक्ति , मोक्ष जैसा परम पद प्राप्त कर सकता है, उन शक्तियों का इस प्रकार नष्ट हो जाना मानव-जीवन की सबसे बड़ी क्षति है। इस क्षति का दुर्भाग्य केवल इसलिए सहन करता है कि वह ज्ञानार्जन करने में प्रमाद करता है अथवा अज्ञान के कारण धूर्तों के बहकावे में आकर सत्य-धर्म के मार्ग से भटक जाता है। मानव-जीवन को सार्थक बनाने, उसका पूरा-पूरा लाभ उठाने और आध्यात्मक स्थिति पाने के लिये सद्ज्ञान के प्रति जिज्ञासु होना ही चाहिए और विधिपूर्वक जिस प्रकार भी हो सके उसकी प्राप्ति करनी चाहिए। जड़ता पूर्वक जीवन मृत्यु से भी बुरा है।
ज्ञान की जन्मदात्री, मनुष्य की विवेक बुद्धि को ही माना गया है और उसे ही सारी शक्तियों का स्रोत कहा गया है। जो मनुष्य अपनी बुद्धि का विकास अथवा परिष्कार नहीं करता अथवा अविवेक के वशीभूत होकर बुद्धि के विपरीत आचरण करता है वह आध्यात्मिकता के उच्च स्तर को पाना तो दूर साधारण मनुष्यता से भी गिर जाता है। उसकी प्रवृत्तियाँ अधोगामी एवं प्रतिगामिनी हो जाती हैं। वह एक जन्तु-जीवन जीता हुआ उन महान सुखों से वंचित रह जाता है जो मानवीय मूल्यों को समझने और आदर करने से मिला करते हैं। निकृष्ट एवं अधो-जीवन से उठकर उच्चस्तरीय आध्यात्मिक जीवन की ओर गतिमान होने के लिये मनुष्य को अपनी विवेक बुद्धि का विकास, पालन तथा सर्म्बधन करना चाहिए। अन्य जीव-जन्तुओं की तरह प्राकृतिक प्रेरणाओं से परिचालित होकर सारहीन जीवन बिताने रहना मानवता का अनादर है,उसी परमपिता परमात्मा का विरोध है जिसने मनुष्य को ऊर्ध्वगामी बनने के लिये आवश्यक क्षमता का अनुग्रह किया है।
आध्यात्मिक ज्ञान सिद्ध करने में बुद्धि ही आवश्यक तत्व है। इसके संशोधन, संवर्धन एवं परिमार्जन के लिए विचारों को ठीक दिशा में प्रचलित करना होगा। विचार प्रक्रिया से ही बुद्धि का प्रबोधन एवं शोभन होता है। जिसके विचार अधोगामी अथवा निम्न स्तरीय होते हैं उसका बौद्धिक पतन निश्चित ही है। विचारों का पतन होते ही मनुष्य का सम्पूर्ण जीवन दूषित हो जाता है। फिर वह न तो किसी माँगलिक दिशा में सोच पाता है और न उस ओर उन्मुख ही हो पाता है। अनायास ही वह गर्हित गर्त में गिरता हुआ अपने जीवन को अधिकाधिक नारकीय बनाता चला जाता है। पतित विचारों वाला व्यक्ति इतना अशक्त एवं असमर्थ हो जाता है कि अपने फिसलते पैरों को स्थिर कर सकना उसके वश की बात नहीं रहती।
ज्ञान भूत आध्यात्मिक जीवन प्राप्त करने का यथार्थ अर्थ विचारों का उपयुक्त दिशा में विकसित करना ही है। विचारों के अनुरुप ही मनुष्य का जीवन निर्मित होता है। यदि विचार उदात्त एवं ऊर्ध्वगामी है तो निश्चय ही मनुष्य निम्न परिधियों को पार करता हुआ ऊँचा उठता जायेगा और उस सुख-शाँति का अनुभावक बनेगा जो उस आत्मिक ऊँचाई पर स्वतः ही अभिसार किया करता है। स्वर्ग-नरक किसी अज्ञात क्षितिज पर बसी बस्तियाँ नहीं है। इनका निवास मनुष्य के विचारों में ही होता है। सद्विचार स्वर्ग और असद्विचार नरक का रूप धारण कर लिया करते हैं।
विचारों का विकास एवं उनकी निर्विकारता दो बातों पर निर्भर है—सत्संग एवं स्वाध्याय। विचार बड़े ही संक्रामक, संवेदनशील तथा प्रभावशाली होते हैं। जिस प्रकार के व्यक्तियों के संसर्ग में रहा जाता है मनुष्य के विचार भी उसी प्रकार के बन जाते हैं। व्यवसायी व्यक्तियों के बीच रहने, उठने-बैठने, उनका सत्संग करने से ही विचार व्यावसायिक, दुष्ट तथा दुराचारियों की संगत करने से कुटिल और कलुषित बन जाते हैं। उसी प्रकार चरित्रवान तथा सदात्माओं का सत्संग करने से मनुष्य के विचार महान एवं सदाशयतापूर्ण बनते हैं।
किन्तु आज के युग में सन्त पुरुषों का समागम दुर्लभ है। न जाने कितने धूर्त तथा मक्कार व्यक्ति वाणी एवं वेश से महात्मा बनकर ज्ञान के जिज्ञासु भोले और भले लोगों को प्रताड़ित करते घूमते हैं। किसी को आज वाणी अथवा वेश के आधार पर विद्वान अथवा विचारवान मान लेना निरापद नहीं है। आज मन-वचन-कर्म से सच्चे और असंदिग्ध ज्ञान वाले महात्माओं का मिलना यदि असम्भव नहीं तो कठिन अवश्य है। सत्संग के लिए तो ठीक दिशा दे सके और आत्मा में आध्यात्मिक प्रकाश एवं प्रेरणा भर सकें। वक्तृता के बल पर मन चाही दिशा में भ्रमित कर देने वाले वीरों से सत्संग का प्रयोजन सिद्ध न हो सकेगा।
ऐसे प्रामाणिक प्रेरणा-पुञ्ज व्यक्तित्व आज के युग में विरल हैं। जो हैं भी उनकी खोज तथा परख करने के लिये आज के व्यस्त समय में किसी के पास पर्याप्त समय तथा बुद्धि नहीं है। जो प्रेरणा एवं प्रकाश दायक प्रज्ञा पात्र विदित भी हैं उनका लाभ तो वे ही भाग्यवान उठा सकते हैं जो उनके सन्निकट रहते हैं। दूर-दूर के लोग उनके पास न तो आसानी से रह सकते हैं और न पूर्ण अवकाश पाने तक समय ही दे सकते हैं। इन सब कठिनाइयों तथा असुविधाओं के कारण विद्वानों का साक्षात सत्संग असम्भव-सा हो गया है। इसलिये ज्ञान के उत्सुक लोगों के लिये स्वाध्याय का ही एक ऐसा माध्यम रह गया है जिसके द्वारा वे सत्संग से अपेक्षित लाभ पुस्तकों से प्राप्त कर सकते हैं।
पुस्तकें क्या हैं? विद्वानों के ‘विचार-शरीर’ ही तो हैं। सत्संग का प्रयोजन भी तो विचारों का श्रवण, मनन तथा ग्रहण ही है। विद्वानों तथा महापुरुषों के जो विचार उनके मुख से सुने जा सकते हैं, वे उनकी लिखी पुस्तकों से आँखों द्वारा पढ़े जा सकते हैं, एक बार बौद्धिक सत्संग में विचार अस्त-व्यस्त भी हो सकते हैं। किन्तु पुस्तकों में संचित विचार व्यवस्थित तथा स्थिर होते हैं। ग्रन्थ कर्ता अपनी पुस्तक में ज्ञान की परिपक्वता से ओत-प्रोत विचार ही अंकित किया करता है। स्वाध्याय रूपी सत्संग द्वारा कोई भी व्यक्ति उन विद्वानों का विचार-संग किसी समय भी, किसी स्थान पर प्राप्त कर सकता है, जो आज संसार में नहीं है अथवा जो सुदूर देशान्तर में रह रहे हैं। परिचित भाषा ही नहीं अनुवादों द्वारा अपरिचित भाषाओं के विद्वानों के विचार-संग में आया जा सकता है। पुस्तकों के माध्यम से प्रामाणिक विद्वानों का सत्संग विचार विकास के लिये अधिक उपयोगी, सरल तथा निरापद है।
जहाँ यह आवश्यक है कि मनुष्य स्वयं स्वाध्यायी बने उसके लिये प्रेरणादायक पुस्तकें संचय करें और नित्यप्रति उनका पारायण करता रहकर अपनी बुद्धि, विवेक तथा ज्ञान को विकसित करता रहे, वहाँ यह भी आवश्यक है कि स्वाध्याय की प्रेरणा दूसरे लोगों में भी भरे। किसी समाज में रहते हुए मनुष्य का स्वयं अपने लिये सुखी, साधन-सम्पन्न अथवा ज्ञानवान बनना कोई अर्थ नहीं रखता, फिर भारतीय समाज में रहते हुए—जिसमें आज अज्ञान का भयानक अन्धकार फैला हुआ है। धर्म के नाम पर न जाने कितने ढोंग जनता को पथभ्रष्ट करने में जुटे हुए हैं।
आज हम में से प्रत्येक शिक्षित भारतीय का पुनीत कर्तव्य है कि वह स्वाध्याय द्वारा स्वयं तो ज्ञान का प्रकाश प्राप्त ही करे साथ ही यथासाध्य अपनी परिधि में निवास करने वाले लोगों को भी प्रकाश एवं प्रेरणा दे। आज के युग का यह सबसे बड़ा पुण्य-परमार्थ है। यों भी ज्ञान पाना और उस ज्ञान से अन्यों में ज्ञान-प्राप्ति की प्रेरणा भरना पुण्य कर्म ही कहा गया है। तब आज की भ्राँत स्थिति में तो यह सर्वोपरि पुण्य कर्म बताया गया है।
परिश्रम करना गौरव की बात!
अमेरिका के स्वाधीनता-संग्राम के समय एक नगर में किलेबन्दी हो रही थी। अनेक सैनिक एक दीवार पर लकड़ी का लट्ठा चढ़ाने का प्रयत्न कर रहे थे किन्तु वह चढ़ नहीं रहा था। उनका नायक दूर से ही उत्साहित कर रहा था और कभी डाट देता था। इतने में एक घुड़सवार उधर से निकाला। वह रुका और नायक से कहा—’जरा आप भी हाथ लगाइये न, लकड़ी आसानी से चढ़ जायेगी।’ नायक ने सवार की ओर आँख तरेर कर कहा—’जानते नहीं, मैं इस टुकड़ी का नायक हूँ भला ऐसा छोटा काम कैसे कर सकता हूँ।’ सवार ने उतरकर सैनिकों की मदद की और लट्ठा बात-की-बात में चढ़ा दिया। घोड़े पर सवार होते समय नायक ने उसे धन्यवाद दिया। सवार ने कहा—’धन्यवाद की जरूरत नहीं महाशय, जब भी ऐसे काम में सहायता की जरूरत हो अपने प्रधान सेनापति को संदेश भेज देना। वह परिश्रम का गौरव जानता है!’
‘आलस्य एक घोर पाप है’—ऐसा सुनकर कितने ही आश्चर्य में पड़कर सोच सकते हैं क्या अजीब-सी बात है! भला आलस्य किस प्रकार पाप हो सकता है? पाप तो चोरी, डकैती, लूट-खसोट, विश्वासघात, हत्या, व्यभिचार आदि कुकर्म ही होते हैं। इनसे मनुष्य का नैतिक पतन होता है और वह धर्म से गिर जाता है। आलस्य किस प्रकार पाप माना जा सकता है? आलसी व्यक्ति तो चुपचाप एक स्थान पर पड़ा-पड़ा जिन्दगी के दिन काटा करता है। वह न तो अधिक काम ही करता है और न समाज में घुलता-मिलता है, इसलिये उससे पाप हो सकने की सम्भावना नहीं के समान ही नगण्य रहती है।
पाप क्या है? वह हर आचार-व्यवहार एवं विचार पाप ही है जिससे किसी को अनुचित रीति से शारीरिक अथवा मानसिक कष्ट अथवा हानि हो। आत्म-हिंसा अथवा आत्म-हानि एक जघन्य-पाप कहा गया है। आलसी सबसे पहले इसी पाप का भागी होता है। मनुष्य को शरीररूपी धरोहर मिली हुई है। निष्क्रिय पड़ा रहकर आलसी इसे बरबाद किया करता है जबकि उसे ऐसा करने का कोई अधिकार नहीं है। यदि कोई समझदार व्यक्ति उससे इस अपराध का उपालम्भ करता है तो वह बड़े दम्भ से यही कहता है कि शरीर उसका अपना है। रखता है या बर्बाद करता है—इस बात से किसी दूसरे का क्या सम्बन्ध हो सकता है?
आलसी का यह अहंकार स्वयं एक पाप है। उसका यह कथन उसकी अनधिकारिक अहमन्यता को घोषित करता है। शरीर किसी की अपनी संपत्ति नहीं। वह ईश्वर-प्रदत्त एक साधन है जो भव बन्धन में बँधी आत्मा को इस शरीर रूपी साधन को उद्देश्य-दिशा में उपभोग करने क कर्तव्य भर ही मिला है। उसे अपना समझने अथवा बरबाद करने का अधिकार किसी को नहीं है। आलसी निरन्तर इस अनधिकार चेष्टा को करता हुआ पाप करता है।
शरीर की सुरक्षा श्रम द्वारा ही की जा सकती है। आलस्य में निष्क्रिय पड़े रहने से इसके सारे कल-पुर्जे ढीले तथा अशक्त हो जाते हैं, अनेक व्याधियाँ घेर लेती हैं। आरोग्य चला जाता है। अस्वस्थ शरीर आत्मा को भी अस्वस्थ कर डालता है। आत्मा चेतनास्वरूप परमात्मा का पावन अंश है, उसे इस प्रकार निस्तेज, निश्चेष्ट अथवा अपावन बनाने का अधिकार किसी जीव को नहीं है। और जो अबुद्धिमान ऐसा करता है वह नास्तिक जैसा ही माना जायेगा। आलसी निश्चय ही इस पाप का दोषी होता है।
परमात्मा ने शरीर दिया, शक्ति दी, चेतना दी और बोध दिया। इसलिये कि मनुष्य अपनी उन्नति करें और जीवन-पथ पर आगे बढ़े। स्वयं सुख पाये और उसके प्यारे अन्य प्राणियों को सुखी होने में सहयोग दे। मनुष्य का कर्तव्य है कि ईश्वर की इस अनुकम्पा को सार्थक करे और अपने उपकारी के प्रति भक्ति- भावना से कृतज्ञता प्रकट करे। पर क्या आलसी अपने इस कर्तव्य को पूरा करता है? निश्चय ही नहीं। वह दिन-रात प्रमाद में पड़ा ऊँघता रहता है। औरों को सुखी करना तो दूर, उल्टा उन्हें दुःख ही देता रहता है और स्वयं भी दीनता, दरिद्रता, रोग तथा निस्तेजता का दुःख भोगा करते हैं। क्या इस प्रकार की अकर्तव्य शालीनता पाप नहीं कही जायेगी? जो अभागा आलसी अपने साधारण जीवन-क्रम का निर्वाह प्रसन्नता, तत्परता तथा कुशलता से नहीं कर पाता वह स्वस्थ तन, प्रसन्न मन एवं उज्ज्वल आत्मा द्वारा कृतज्ञता प्रदर्शन रूप, पूजा-पाठ, जप-तप, सेवा-उपासना, भजन-कीर्तन का नियमित आयोजन कहाँ निभा सकता है? दोपहर तक सोते रहने, दिन में खाकर पड़े रहने और कष्टपूर्वक कोई आवश्यक कार्य कर सकने वाला प्रमाद उन्मादी भगवत्-भक्ति करता अथवा कर सकता है, ऐसा सम्भव नहीं। नियमित रूप से, भक्ति-भावना से भरी उपासना न करना उस अनुग्राहक ईश्वर के प्रति कृतघ्नता है। कृतघ्नता का पाप जघन्यता की कोटि का पाप है जिसका सबसे पहले अपराधी आलसी ही होता है। जिसके पास समय ही समय रहता हो वह परमात्मा की उपासना न करे उससे बढ़कर पापी और कौन हो सकता है जबकि व्यस्त जीवन में से भी समय निकाल कर प्रभु की याद न करने वाले आत्मधारी तक आलोचना एवं निन्दा के पात्र बनते हैं।
आलसी का हठ रहता है कि शरीर उसका अपना है। मान लो उसका है तब भी तो उसे नष्ट करने का अधिकार उसे नहीं हो सकता है। शरीर उसका है तो शरीर जन्य सन्तानें भी तो उसकी ही होती हैं और उनका भी उसके शरीर पर कुछ अधिकार होता है। शरीर नष्ट कर वह उनके शरीर का हनन तो नहीं कर सकता। शरीर से उपार्जन होता है और उपार्जन से बच्चों का पालन-पोषण। शिथिल एवं अशक्त शरीर आलसी उपार्जन से ऐसे घबराता है जैसे भेड़ भेड़िये से दूर भागती है। धन तो परिश्रम का मीठा फल है आलसी जिसे लाकर परिवार को नहीं दे पाता और रो-झींक कर, मर-खप कर विवश हो कर लाता भी है वह अपर्याप्त तो होता ही है साथ ही उसकी कुढ़न उसके साथ जुड़ी रहती है जो कि बच्चों के संस्कारों एवं शारीरिक तथा मानसिक स्वास्थ्य पर कुप्रभाव डालती है। इस प्रकार आलसी बच्चों का पालन करने के स्थान पर परोक्ष रूप से उनका भावनात्मक हनन ही किया करता है, जो एक अक्षम्य अपराध तथा पाप है। यदि बच्चों का सम्बन्ध न भी जोड़ा जाये तो भी अपने कर्मों से शरीर का सत्यानाश करना आत्महत्या के समान है जो उसी तरह पाप ही माना जायेगा।
आलस्य के कुठार द्वारा कल्पवृक्ष के समान उस शरीर की जड़ काटते रहना, उसकी शक्ति , क्षमताओं एवं योग्यताओं को नष्ट करते रहना पाप ही है जो मानव के महान से महान मनोरथों को चूर कर सकता है। शक्ति , सम्पन्नता, गौरव, ज्ञान, मान, प्रतिष्ठा, यश, कीर्ति आदि ऐसी कौन-सी समृद्धि अथवा ऐश्वर्य है जो शरीररूपी देवता को प्रसन्न करने पर नहीं मिल सकता। ऐसा कौन-सा पुण्य-परमार्थ है जो आत्मा की मुक्ति में सहायक हो और शरीर द्वारा सम्पन्न न किया जा सकता हो। मनुष्य श्रम-साधना द्वारा इस पंच-तात्विक देवता को प्रसन्न करने, समृद्धिय पाने, पुण्य-परमार्थ करके आत्मा को मुक्त करने के लिए है, वचन-बाध्य है। “मैं नहीं चाहता”—कहकर मनुष्य इस उद्देश्य से मुक्त नहीं हो सकता। उसका जन्म, उसकी नियुक्ति इस कर्तव्य के लिये ही की गई है और उसने जीवन-लाभ के लिए सर्व समर्थ को यह वचन दिया था कि वह उसके दिये जीवन को सुन्दर एवं समृद्ध बनाकर संसार की शोभा बढ़ायेगा और उसके आत्मा रूपी प्रकाश की किरणें आवरण से मुक्त कर उसमें ही मिला देने की लिए किसी परिश्रम, पुरुषार्थ तथा परमार्थ से विमुख न होगा। परमात्मा ने उसके इसी वचन पर विश्वास करके उसे सृष्टि की सर्वश्रेष्ठता प्रदान की। बल, बुद्धि एवं विवेक सब योग्य बना दिया। अब वचन से फिरकर कर्तव्य से विमुख हो जाना कहाँ तक उचित है? यह भयंकर पाप है, विश्वासघात के समान ही पाप है और आलसी इस पाप को जान-बूझकर किया करता है। मनुष्य संसार का सर्वश्रेष्ठ प्राणी और जीव-जगत का राजा है। संसार की व्यवस्था एवं सुन्दरता का भार उसके परिश्रम एवं पुरुषार्थ पर निर्भर है। किसी को कोई अधिकार नहीं कि वह उत्तरदायित्व से फिरकर आलस्य, प्रमाद अथवा निष्क्रियता द्वारा पृथ्वी का भार बने और उसे असुन्दर, अव्यवस्थित, अशाँत अथवा असुखकर बनाने की दुरभिसन्धि किया करे। आलसी एवं अकर्मण्य लोग निश्चय ही यह अपराध किया करते हैं जबकि उन्हें अपना सुधार कर ऐसा नहीं करना चाहिए। उनकी यह दुष्प्रवृत्ति अपरिमार्जन किसी प्रकार भी शोभनीय अथवा वाँछनीय नहीं है।
दरिद्रता भयानक अभिशाप है। इससे मनुष्य के शारीरिक, पारिवारिक, सामाजिक, मानसिक एवं आत्मिक स्तर का पतन हो जाता है। कहने को कोई कितना भी सन्तोषी, त्यागी एवं निस्पृह क्यों न बने किन्तु जब दरिद्रता जन्य अभावों के थपेड़े लगते हैं तब कदाचित् ही कोई ऐसा धीर-गम्भीर निकले जिसका अस्तित्व काँप न उठता हो। यह दरिद्रता की स्थिति का जन्म मनुष्य के शारीरिक एवं मानसिक आलस्य से ही होता है। गरीबी, दीनता, हीनता आदि कुफल आलस्यरूपी विषबेलि पर ही फला करते हैं।
आलसी व्यक्ति परावलम्बी एवं पर भाग भोगी ही होता है। इस धरती पर परिश्रम करके ही अन्न-वस्त्र की व्यवस्था हो सकती है। यदि परमात्मा को मनुष्य की परिश्रमशीलता वाँछनीय न होती तो वह मनुष्य का आहार रोटी वृक्षों पर उगाता। बने बनाए वस्त्रों को घास-फूस की तरह पैदा कर देता। मनुष्य को पेट भरने और शरीर ढकने के लिये भोजन-वस्त्र कड़ी मेहनत करके ही पैदा करना होता है। नियम है कि जब सब खाते-पहनते हैं तो सबको ही मेहनत तथा काम करना चाहिए। इसका कोई अर्थ नहीं कि एक कमाये और दूसरा बैठा-बैठा खाये। कोई काम किये बिना भोजन-वस्त्र का उपयोग करने वाला दूसरे के परिश्रम का चोर कहा गया है। अवश्य ही उसने हराम की तोड़कर संसार के किसी कोने में श्रम करते हुए किसी व्यक्ति का भाग हरण किया है। दूसरे का भाग चुराना नैतिक, सामाजिक तथा आत्मिक रूप से पाप है और अकर्मण्य आलसी इस पाप को निर्लज्ज होकर करते ही रहते हैं।
जो खाली ठाली रहकर निठल्ला बैठा रहता है उसका शारीरिक ही नहीं मानसिक तथा आध्यात्मिक पतन भी हो जाता है। “खाली आदमी शैतान का साथी” वाली कहावत आलसी पर पूरी तरह चरितार्थ होती है। जो निठल्ला बैठा रहता है उसे तरह-तराह की खुराफातें सूझती रहती हैं। यह विशेषता परिश्रमशीलता में ही है कि वह मनुष्य के मस्तिष्क में विकारपूर्ण विचार नहीं आने देती पुरुषार्थी व्यक्ति को इतना समय ही नहीं रहता कि वह काम से फुरसत पाकर बेकार के ऊहापोह में लगा रहेगा और अकर्मण्य आलसी के पास इसके सिवाय कोई काम नहीं रहता, निदान उसे अनेक प्रकार की ऐसी विकृतियाँ तथा दुर्गुण घेर लेते हैं जिससे उसके चरित्र का अधःपतन हो जाता है। लोग इस अभिशाप से दुराचारी तथा अपराधी बन जाया करते हैं। निठल्ले और निष्क्रिय बैठे रहने वाले व्यक्तियों का विचार-सन्तुलन बिगड़ जाता है जिससे उन्हें ऐसी-ऐसी अनेक सनकें सूझा करती हैं जो व्यवहार-जगत में पागलपन की संज्ञा पा सकती हैं। शेखचिल्ली की तरह वह न जानें किस प्रकार के मानस-महल बनाया और गिराया करता है। प्रमाद पूर्ण ऊहापोह ने संसार में जाने कितने उन्मादी पैदा कर दिये हैं। प्रमाद तथा आलस्य को उन्माद तथा पागलपन का प्रारम्भिक रूप समझकर उससे दूर ही रहना चाहिए। क्या आर्थिक क्या सामाजिक, क्या आत्मिक अथवा क्या आध्यात्मिक कोई भी उन्नति चाहने वाले को आलस्य के पाप का परित्याग कर श्रम एवं पुरुषार्थ का पुण्य करना चाहिए तभी वे अपनी वाँछित स्थिति पा सकेंगे, अपने उद्देश्य में सफल हो सकेंगे अन्य कोई नहीं।
परोपकारी को कहीं भी भय नहीं-
एक गीदड़ एक दिन गढ़े में गिर गया। बहुत उछल-कूद की किन्तु बाहर न निकल सका। अन्त में हताश होकर सोचने लगा कि अब इसी गढ़े में मेरा अन्त हो जाना है। तभी एक बकरी को मिमियाते सुना। तत्काल ही गीदड़ की कुटिलता जाग उठी। वह बकरी से बोला—’बहिन बकरी! यहाँ अन्दर खूब हरी-हरी घास और मीठा-मीठा पानी है। आओ, जी भरकर खाओ और पानी पियो।’ बकरी उसकी लुभावनी बातों में आकर गढ़े में कूद गई।
चालाक गीदड़ बकरी की पीठ पर चढ़कर गढ़े से बाहर कूद गया और हँसकर बोला—’तुम बड़ी बेवकूफ हो, मेरी जगह खुद मरने गढ़े में आ गई हो।’ बकरी बड़े सरल भाव से बोली—”गीदड़ भाई, मैं परोपकार में प्राण दे देना पुण्य समझती हूँ। मेरी उपयोगिता वश कोई-न-कोई मुझे निकाल ही लेगा किन्तु तुम निरुपयोगी को कोई न निकालता। परोपकारी को कहीं भी भय नहीं होता है।”
एक समय था जब भारत संसार का शिरमौर माना जाता था। भारत से ही निकल-निकल कर सभ्यता, संस्कृति एवं मनुष्यता के सन्देश देश-देशान्तर में फैले। हमारे पूर्वजों ने न जाने कितनी बार विश्व-विजय कर संसार में धर्म की स्थापना की। जीवन-दर्शन से परिप्लावित ज्ञान देने के कारण ही भारत को ‘जगत्-गुरु’ की पदवी प्राप्त हुई थी।
उस स्वर्णिम समय की याद अभी संसार को बनी हुई है जब हमारा भारत देश उन्नति एवं प्रगति के शिखर पर विराजमान था और संसार उससे कौशल, शिल्प तथा ज्ञान-विज्ञान सीखने के लिये अपने प्रतिनिधि भेजा करता था। बल, बुद्धि, विद्या एवं धनधान्य की प्रचुरता होने के कारण ही भारतवासियों को देवता करके माना गया था और इस धरती को ‘स्वर्गादपि गरीयसी’ कहा गया था।
भारत की इस उन्नति पूर्ण स्थिति का कारण यहाँ का जीवन-दर्शन ही रहा है जिसके आधार पर भारतवासी निस्वार्थ, परिश्रम, कर्मठता, न्याय, औचित्य एवं विवेक में अति अखण्ड निष्ठा रखकर उसी के अनुसार आचरण किया करते थे।
आज भारत संसार में पिछड़े हुए देशों में गिना जाता है उसकी धन-सम्पत्ति नष्ट हो गई और उसे एक अभावग्रस्त गरीब देश माना जा रहा है। कायरता, आलस्य एवं अकर्मण्यता भारतवासियों के स्वभाव के अंग बन गये हैं। जिससे उनकी दशा दिन-दिन गिरती चली जा रही है अविवेक एवं अन्धविश्वासों का तो कोई वारापार ही नहीं रहा।
भारतवासियों का यह पतन कोई आजकल की बात नहीं है। उसमें प्रमाद एवं अविवेक का दोष बहुत प्राचीन समय से चला आ रहा है। जिसके कारण उन्हें गत सात सौ साल तक विदेशी आक्रमणों एवं दासता की ताड़ना भोगनी पड़ी है। शोषण, संहार एवं अपहरण की असंतोषजनक स्थिति यद्यपि आज नहीं है, विदेशी शासन एवं प्रभाव नष्ट हो चुका है, देश आजाद है। उस पर किसी का बाहरी दबाव भी नहीं रहा है, तथापि इसकी दशा दयनीय बनी हुई है। इसका अविवेक एवं अन्ध विश्वास यथावत् अक्षुण्ण रहने से प्रगति की कोई सम्भावना दृष्टिगोचर नहीं हो रही है।
भारतवासियों के इस पतन के कारणों में मुख्य कारण ‘भाग्यवाद’ का पाप हो रहा है। ‘भाग्यवाद’ ‘पुरुषार्थवाद’ अथवा ‘कर्मवाद’ का विरोधी है। जहाँ ‘भाग्यवाद’ जड़ जमाये हुए होगा वहाँ पुरुषार्थ की महत्ता नहीं रह सकती और जहाँ पुरुषार्थ के प्रति निष्ठा होगी वहाँ भाग्यवाद प्रवेश नहीं कर सकता। एक लम्बे समय से भारतीयों के जीवन में भाग्यवाद ने जड़ जमा ली है। फलतः उनका पुरुषार्थ एवं कर्तव्यवादी जीवन-दर्शन आलस्य प्रमाद, पलायन एवं प्रतिगामिता आदि के अवनति कारक पाप से दूषित हो गया है और नंगे-भूखे, दीन-दलिद्र होकर भी भारतवासी यथावत् स्थिति पर अज्ञानजन्य सन्तोष किये हुए जिये जा रहे हैं। उनके मस्तिष्क में परिस्थितियों को बदलने, उनका कारण खोजने का विचार जन्म लेकर सक्रिय नहीं हो पा रहा है।
‘भाग्यवाद’ में विश्वास करने वाले, फिर चाहे वे व्यक्ति हों, अथवा राष्ट्र बहुत अधिक हानि उठाया करते हैं। जहाँ ‘कर्मवाद’ मनुष्य को उत्साही, परिश्रमी साहसी आत्म-विश्वासी तथा स्वावलम्बी बनाता है वहाँ ‘भाग्यवाद’ में अन्धविश्वास रखने वालों में निष्क्रियता, निराशा, निरुत्साह, परावलम्बन आदि की हीन वृत्तियाँ आ जाती हैं जिनका परिणाम अवनति के अतिरिक्त और कुछ हो ही नहीं सकता।
भाग्यवाद का बन्दी मनुष्य अपनी असफलता अथवा दीन दशा का दोष भाग्य को देकर बैठ जाता है और सोच लेता है कि सफलता उसके भाग्य में ही नहीं है। जब अच्छे दिन आयेंगे भाग्य साथ देगा उसकी उन्नति होते देर न लगेगी। किसी बात के लिये हाथ-पैर मारना, सर खपाना व्यर्थ है, यदि वह चीज भाग्य में होगी तो किसी न किसी बहाने मिल ही जायेगी। ऐसे अकर्मण्य निष्क्रियतावादी व्यक्ति आत्म-निरीक्षण, आत्म-शोधन, आत्म-सुधार एवं आत्म-विकास का प्रयत्न नहीं करते। सब कुछ भाग्य के भरोसे छोड़कर सफलता अथवा प्राप्ति की राह देखा करते हैं।
भाग्यवाद पर विश्वास रखने वाले की विचार-शक्ति कुँठित हो जाती है। वह अपने दुःख-दर्द, आपत्तियों, कठिनाइयों तथा हानि—असफलता के कारणों की खोज-बीन करने का उत्साह नहीं रखता उसका अन्धविश्वास उसको ऐसा करने से रोकता है। अभावों एवं कठिनाइयों का वास्तविक कारण तभी समझा जा सकता है जब विवेक को अपना काम करने का अवसर दिया जाये। जिसका विवेक बन्दी है, विचार-शक्ति कुँठित हो गई है, तार्किक दृष्टिकोण पर प्रतिबन्ध लगा हुआ है वह आपत्ति अथवा अभाव का कारण खोज सकने में सर्वथा असमर्थ ही रहेगा। वास्तविक कारण को खोजने के स्थान पर जब भाग्य को दोष देकर छुट्टी पा ली जायेगी तो निश्चय है कि ऐसी अवस्था से उनको दूर किये जाने का प्रश्न ही नहीं रहता। यही कारण है कि अधिकतर भाग्यवादी आलसी, अकर्मण्य होकर दीन-हीन जिन्दगी ही भोगा करते हैं।
‘कर्म प्रधान विश्व रचि राखा’—संसार में कर्म की प्रधानता है। कर्म किए बिना यहाँ किसी प्रकार की उपलब्धि सम्भव नहीं। भाग्य के भरोसे हाथ-पर-हाथ रखे बैठे रहने वाले, अपनी दयनीय परिस्थितियों में ही पड़े-पड़े मरा करते हैं। भारतवासियों में भाग्यवाद की उल्टी विचारधारा जब से चल पड़ी है तभी से इसका पतन आरम्भ हो गया। जब तक वह अपने यथार्थ जीवन-दर्शन कर्मवाद पर विश्वास करता और उसका आचरण करता रहा संसार में सर्वश्रेष्ठ स्थान का अधिकारी बना रहा। भारत का सारा आध्यात्मिक दर्शन ही कर्म पर आधारित है। धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष उपलब्धियों को पुरुषार्थ के बल पर प्राप्त करने का निर्देश किया गया है। मनुष्य के लिये यदि भाग्य की कोई सत्ता रही होती तो निश्चय ही तत्व एवं त्रिकालदर्शी ऋषि उपने अनुयायियों को कर्म का उपदेश न करते। रूस, अमेरिका, जापान, जर्मनी, इंग्लैंड आदि देशों को उन्नति किये हुए बहुत दिन नहीं बीते। कतिपय दशाब्दियों में ही वे उन्नति के शिखर पर जा पहुँचे। जिन दिनों वे अवनति के अन्ध गर्त में पड़े हुये थे, आज के भारत के समान ही वे भी भाग्य, दैव डडडड अदृष्टवादी थे। न जाने कितने अकर्मण्यता जनक अन्धविश्वास उन्हें घेरे हुए थे। किन्तु जब उन्होंने आँख खोलकर अपनी दुर्दशा पर विचार किया और भाग्यवाद का परित्याग कर कर्मवादी को अपनाया, उन्नति करते देर न लगी।
भारत में भाग्यवाद की विचारधारा चल पड़ने के कारणों की खोज करने पर दो कारण समझ में आते हैं— एक तो अज्ञान और दूसरा विदेशी आक्रमणकारियों का षडयन्त्र। अज्ञान एक प्रकार का अन्धकार है। जिस भाँति अन्धकार में वस्तुस्थिति का वास्तविक ज्ञान नहीं हो पाता अज्ञान भी किसी बात को ठीक से समझने और उसकी तह तक जाने नहीं देता। अज्ञानान्धकार से ग्रस्त व्यक्ति की विचार एवं कार्य-पद्धति सर्वथा विपरीत विचारधारा को ही कहा जाना चाहिए। अविद्या जन्य अज्ञान के कारण भारतवासियों में बहुत समय से विचार-निर्णय मिट गया है और वे वास्तविकता को छोड़कर अवास्तविकता पर विश्वास करने लगे हैं।
अज्ञान को आर्य पुरुषों ने पाप बतलाया है और इसीलिये ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ का उद्घोष किया है। अज्ञान एक भय है, नरक की परिस्थितियों को ले जाने वाला है, इसलिये—’मनुष्य को अन्धकार अर्थात् अज्ञान से विरत्त होकर प्रकाश अर्थात् ज्ञान की ओर चलना चाहिए।’ ऋषियों ने अज्ञान से निकलने और ज्ञान को प्राप्त करने को सबसे बड़ा पुरुषार्थ माना है। पुरुषार्थ ही वह उपाय है जिसके बल पर भौतिक ही नहीं अपवर्ग सुखों तक को प्राप्त किया जा सकता है। लोक से लेकर परलोक तक की किसी भी उपलब्धि को पुरुषार्थ के बिना नहीं पाया जा सकता है। अर्थ विकास से लेकर आत्म-विकास तक की सारी सम्भावनाएँ पुरुषार्थ पर ही निर्भर हैं।
कर्मवादी भारतवासियों में भाग्यवाद की विचारधारा को जन्म देने में विदेशी शासकों का बहुत हाथ रहा है उन्होंने देखा कि भारतीयों का ज्वलन्त जीवन-दर्शन जिसमें कि पुरुषार्थ, उत्कर्ष, परमार्थ एवं कर्तव्य की प्रबल निष्ठा सन्निहित है, राजनीतिक दासता की अवस्था में भी उनको आदर्शोर्त्कष की ओर प्रेरित करता जाता है, उनका आत्म-गौरव इतना बढ़ा-चढ़ा है कि वे अपने विदेशी उपासकों को तृण तुल्य भी नहीं समझते। किसी दिन भी उठ कर खड़े हो सकते हैं और बात की बात में हमारी सत्ता को धूल में मिला सकते हैं। इसलिये आवश्यक है कि इन प्रबल पुरुषार्थियों को कोई ऐसी विचारधारा दी जाये जो इनकी चेतना पर अफीम का काम करे। निदान उन्होंने देशद्रोही धर्माधिकारियों को मिलाकर विचार-विमर्श किया और भाग्यवाद की अफीम खोज निकाली।
विदेशी शासकों ने तथाकथित धर्म नेताओं, पंडों, पुजारियों तथा पुरोहितों को, जो कि जन-जीवन में गहराई तक धँसे हुए थे, अधिकाधिक पुरस्कार एवं पारिश्रमिक दे-देकर समाज में भाग्यवाद का विष फैलवाना प्रारम्भ किया। जिसका फल यह हुआ कि कुछ ही समय में भारतवासियों के मस्तिष्क में कर्मवाद के प्रति अविश्वास तथा भाग्यवाद के प्रति आस्था उत्पन्न होने लगी। प्रचार के अनुसार लोग यह समझने लगे कि संसार में जो कुछ होता है वह सब पूर्व निर्दिष्ट ही है। मनुष्य का सुख दुःख, भाव-अभाव, विपत्ति-सम्पत्ति आदि हर परिस्थिति का कारण भाग्य ही है जो कि विधाता द्वारा पहले से ही निश्चित किया हुआ है। इतना ही नहीं जनता शासकों के अत्याचार, अनाचार, शोषण तथा अपहरण को भी अपने भाग्य का दोष समझने और सन्तोषपूर्वक सहने लगी। जिससे शासकों को विद्रोह विप्लव अथवा प्रतिरोध का भय जाता रहा और वह देशवासियों को मनमाने ढंग से सताने तथा लूटने में निःसंकोच रहने लगे। “दिल्लीश्वरो वा जगदीश्वरो वा” ही जब शास्त्रसम्मत उद्घोष बन गया तब जनता उस अत्याचारी जगदीश्वर के विरुद्ध उठकर खड़ी भी क्योंकर होती? जब गुलामी तथा शोषण उसके भाग्य के पूर्व निर्धारित फल थे, जिनको कि बदला नहीं जा सकता था तब उसके लिए प्रयत्न करना ही बेकार था। इस आरोपित भाग्यवाद का फल यह हुआ कि भारतवासी आलसी और अकर्मण्य, कायर और कुँठित होकर अज्ञानपूर्ण जिन्दगी बिताते और हर प्रकार का अपमान एवं अत्याचार सिर झुकाकर सहते रहे। एक लम्बे समय के बाद कुछ चेतना आई। जनता ने संघर्ष करके अपने को राजनीतिक गुलामी से तो मुक्त किया किन्तु दुर्भाग्यवश वह अपनी मानसिक गुलामी तथा अन्धविश्वासों की दासता से अब भी अपने को मुक्त न कर सकी है।
भारतवासियों को अत्याचारियों द्वारा दिये और अज्ञान द्वारा पोषित इस भाग्यवाद का त्यागकर अपने सच्चे आदर्श—कर्मवाद को अपनाना होगा तभी उनकी आर्थिक से लेकर आत्मिक उन्नति सम्भव हो सकेगी अन्यथा नहीं।
करील वृक्ष में यदि पत्ते नहीं हैं तो वसन्त का क्या दोष? उल्लू यदि दिन में नहीं देख पाता तो सूर्य का क्या दोष? वर्षा का जल यदि पपीहा के मुख में नहीं पड़ता तो मेघ का क्या दोष? विधाता ने जो पहले ही भाग्य में लिख दिया है उसे कौन मिटा सकता है? जिनके घर में गृहिणी अन्नपूर्णा हैं जो कि अन्नदान से तीनों लोकों की रक्षा करती है, वे शंकरजी भी हाथ में कपाल लेकर भिक्षा माँगते फिरते हैं! यों तो भाग्य में लिखा हुआ नहीं मिटता पर भाग्य के भरोसे बैठे रहने पर भाग्य सोया रहता है और हिम्मत बाँध कर खड़े होने पर भाग्य भी उठ खड़ा होता है। आलसियों का भाग्य असफल बना रहता है तथा कर्मवीरों का भाग्य उन्हें निरन्तर सफलता का पुरस्कार प्रदान किया करता है।
—अज्ञात
परमात्मा ने मनुष्य को जो भी बल, बुद्धि एवं विवेक दिया है, उसके हृदय में दया, करुणा, सहृदयता, सहानुभूति अथवा संवेदना की भावनायें भरी हैं, वे इसलिये नहीं कि वह उन्हें अपने अन्दर ही बन्द रखकर व्यर्थ चला जाने दे। उसने जो भी गुण और विशेषता मनुष्यों को दी हैं वह इसीलिए कि वह उनका उपयोग संसार की सेवा करने, उसे लाभ पहुंचाने में करे। जो मनुष्य ऐसा नहीं करता वह ईश्वर के मन्तव्य के विरुद्ध आचरण करता और उन गुणों के लिये अपने को अयोग्य सिद्ध करता है। करुणा, दया, क्षमा आदि के अपने गुण ईश्वर मनुष्यों के माध्यम से ही प्रकट करता है।
अन्याय एवं अत्याचार करना अथवा उसे सहना तो पाप है ही, दूसरे निर्दोष प्राणियों पर अत्याचार होते देख कर उसका प्रतिकार न करना, चुपचाप उसे देखते रहना अथवा उसकी उपेक्षा कर देना भी एक पाप है। मनुष्य का कर्तव्य है कि वह अपने सामने अथवा अपनी जान में किसी निर्दोष प्राणी पर अत्याचार देख-सुनकर, सामर्थ्य भर उसका विरोध एवं प्रतिकार अवश्य करे। अन्याय अथवा अत्याचार को देख-सुनकर चुपचाप रह जाना, उसका प्रतिकार अथवा विरोध न करने वाला अत्याचारी की तरह ही पाप का भागी बनता है। क्योंकि निर्बल अथवा निर्दोष पर होने वाले अत्याचार को देखकर उसकी उपेक्षा कर देना, मौन रह जाने का अर्थ है उस कुकृत्य का समर्थन करना। मौनता स्वीकृति का लक्षण माना गया है। अन्याय अथवा अत्याचार का सामर्थ्य भर विरोध करना प्रत्येक विवेक एवं धर्मवान व्यक्ति का अनिवार्य कर्तव्य है।
आज दिन-दिन संसार में अन्याय एवं अत्याचार की वृद्धि होती जा रही है। इसका कारण यही है कि लोग प्रमादवश उसका विरोध नहीं करते, जिससे कि वह सभी दिशाओं में अबोध गति से बढ़ता चला जा रहा है। किन्तु निरीह, निर्बल एवं निर्दोषी पशुओं पर भी मनुष्यों का अत्याचार अपनी पराकाष्ठा को पार कर गया है। आज संसार में प्रतिदिन हजारों-लाखों निर्दोष पशु-पक्षियों का संहार किया जाता है। कहीं भोजन के लिए, कहीं उनके अस्थि-पिंजर का उपयोग करने के लिये तो कहीं देवी-देवताओं के नाम पर बलि के रूप में। इतना ही नहीं, मनोरंजन, शिकार खेलने तथा निशाना साधने के लिये भी न जाने कितने पशु-पक्षियों की अकारण हत्या की जा रही है। आज के बुद्धिमानी युग में जबकि मनुष्य अपनी वन्यावस्था से बहुत आगे आ गया है इस प्रकार पशु-पक्षियों का हत्याकाँड बड़ी लज्जा की बात है।
एक ओर जहाँ मनुष्य ईश्वर, जीव, प्रकृति, पुरुष, जड़-चेतना, आत्मा, धर्म, ज्ञान-विज्ञान की बात करता है वहाँ दूसरी ओर निर्बल, निरीह एवं निर्दोष प्राणियों की गर्दन काट रहा है। एक ओर जहाँ मनुष्य अपने को परमात्मा का अंश मानता है और अपने को दयालु, क्षमा-शील, करुणा एवं पर दुःख कातर होने का दावा कर रहा है, अपने को धर्म ज्ञाता, अहिंसक तथा सहानुभूति-सम्पन्न बतला रहा है वहाँ दूसरी ओर पशुओं को मारकर खा रहा है, उनकी खाल खींच रहा है और देवताओं के नाम पर उनके प्राण ले रहा है। क्या मनुष्य का यह कुत्सित कर्म उसे इस दावे से नीचे नहीं गिरा देता कि वह सृष्टि का सबसे श्रेष्ठ एवं धर्मशील प्राणी है। निश्चय ही उसके द्वारा पशु-पक्षियों पर होने वाले अत्याचार को देख कर यही कहना पड़ता है कि मनुष्य का यह दावा झूठा, मिथ्या तथा आत्म-प्रवर्चना पूर्ण है।
यों तो संसार के सभी धर्मों में प्राणियों पर दया करने को पुण्य और उनको मारना, सताना अथवा अत्याचार करना पाप बतलाया गया है किन्तु हिन्दू धर्म तो पूर्णरूप से दया, करुणा, सहानुभूति एवं संवेदना के आधार पर ही खड़ा है। पशु-हिंसा को तो हिन्दू धर्म में सबसे बड़ा पाप बतलाया गया है और अहिंसा को परम धर्म। जो हिंसक, क्रूर अथवा निर्दयी है वह लाख पूजा-पाठ, जप तप और दान-पुण्य क्यों न करे, उसको अधर्मी ही कहा जायेगा।
क्रूरता संसार में सबसे बड़ा पाप है। किसी प्राणी के प्रति क्रूरता का व्यवहार करने वाला एक प्रकार से अपनी ही आत्मा के प्रति क्रूरता का व्यवहार करता है। संसार के समस्त प्राणियों में एक ही आत्मा का निवास रहता है। जो आत्मा हममें है वही आत्मा अन्य पशु-पक्षियों में भी है। जब हम किसी पशु-पक्षी की आत्मा को दुःख पहुँचाते हैं तो स्वयं अपनी आत्मा को दुःख पहुंचाते है। यह बात दूसरी है कि हम अभ्यासवश उस दुःख को बिल्कुल उसी प्रकार अनुभव न कर सकें जिस प्रकार सताया जाने वाला प्राणी अनुभव कर रहा होता है। जिनका हृदय हिंसा से कठोर नहीं हो गया होता है, सहृदयता एवं सहानुभूति—संवेदना का जिनका मानवीय गुण नष्ट नहीं हो गया होता है वे सज्जन पुरुष परपीड़ा को उसी प्रकार अपने में अनुभव कर लेते हैं जिस प्रकार कि पीड़ित प्राणी। यही कारण है कि सहृदय व्यक्ति दूसरे को दुःखी देखकर तत्काल करुणा तथा दयार्द्र होकर रोने तक लगते हैं। यथासम्भव उसी तरह उसका दुःख दूर करने का प्रयत्न किया करते हैं जिस प्रकार अपना निजी दुःख और जब उसका कष्ट दूर हो जाता है तब वैसे ही प्रसन्न होते हैं। पर दुःख कातरता मनुष्यता का असंदिग्ध लक्षण है जिसमें इसका सर्वथा अभाव पाया जायेगा, उसको मनुष्य कह सकना कठिन ही होगा।
किसी बड़े प्रयोजन के लिए यदि अनिवार्य ही हो तो किसी प्राणी के लिए उचित ताड़ना अथवा दण्ड की व्यवस्था किसी हद तक उचित मानी जा सकती है, किन्तु किसी को स्वार्थवश अथवा यों ही मनोरंजनार्थ सताना अमानवता पूर्ण अपराध है जो किसी प्रकार भी क्षम्य नहीं कहा जा सकता।
यद्यपि मनुष्य की पाशविक अथवा आदिकालीन क्रूर प्रवृत्तियों में बहुत कुछ परिवर्तन आ गया है, वह किसी दूसरे को कष्ट देने का परिणाम तथा उसकी पीड़ा का भी अनुमान करने लगा है। वह यह भी भली प्रकार जानता है कि पशुओं के प्रति उसका व्यवहार वैसा नहीं है जैसा मनुष्य जैसे विवेकशील प्राणी को अन्य अनबोल प्राणियों के साथ करना चाहिए। किन्तु स्वार्थ रूपी पिशाच से ग्रसित अनेक मनुष्य अपनी अन्तरात्मा को भर्त्सना की उपेक्षा करके पशु-पक्षियों के साथ अन्याय एवं अत्याचार करने में संकोच नहीं करते। इस प्रकार जान-बूझकर स्वार्थ के लिये किया हुआ पाप उन्हें किस घोर नरक की ओर ले जायेगा, इसका अनुमान कर सकना कठिन नहीं हैं।
आज अपने को ईश्वर का पुत्र कहने वाला मनुष्य ईश्वर के अन्य पुत्र,प्राणियों पर कितना निर्दय अत्याचार कर रहा है यह देख-सुनकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। जिह्वा के अनार्य स्वार्थ के लिये पशु-पक्षियों को मारना तो एक साधारण-सी बात रही है। माँस भोजन की जंगली प्रवृत्ति अभी तक कुछ मनुष्यों में बनी हुई है, जिसकी प्रेरणा से वे अपनी इस आदिम प्रवृत्ति को नहीं छोड़ पा रहे हैं। यह आदिम प्रवृत्ति परम्परागत होकर अनेक परिवारों एवं समाजों में संस्कार बनकर चली आ रही है। यदि मनुष्य थोड़ा-सा प्रयत्न करे, हिंसा की अधार्मिकता तथा माँस-भोजन की हानियों को समझ ले तो कोई कारण नहीं कि उसे माँस खाने से घृणा न हो जाये। जिस प्रकार उसने आदिम काल की अनेक अवाँछित प्रवृत्तियों का त्याग कर दिया है उसी प्रकार वह माँसाहार का भी त्याग कर सकता है। माँस भोजन के लोभ से जो प्राणियों को मारते हैं वे तो अपराधी हैं ही, किन्तु जो यों ही मनोरंजन अथवा बन्दूक का निशाना साधने के लिए निर्दोष एवं निरपराध पशु-पक्षियों के प्राण लेते हैं, उन्हें क्या कहा जायेगा। वास्तव में यह कितना क्रूर कर्म है? अकारण ही दिल खुश करने के लिये, डाल पर असावधान बैठे हुए पक्षी अथवा जंगल में निश्चिन्त चरते हुए किसी पशु पर गोली चलाकर मिट्टी के ढेले की तरह नष्ट कर देने वालों का हृदय कितना अकरुणा तथा क्रूर होता है, इसका अनुमान तो वही सहृदय व्यक्ति कर सकता है जो अपनी पीड़ा की तरह दूसरे की पीड़ा और अपने प्राणों की तरह दूसरे के प्राणों को जानता है। संसार में एक क्या हजारों तरह के मनोरंजन हो सकते हैं, तब किसी निर्दोष जीव के प्राणों से खिलवाड़ करने का पाप करने की क्या आवश्यकता है— इस बात पर बन्दूक बाजों को विचार करना ही चाहिए।
जहाँ एक ओर अनेक क्रूर व्यक्ति पशु-पक्षियों को मारकर मनोरंजन करते हैं वहाँ बहुत-से सहृदय व्यक्ति उन्हें पालने-पोसने और खिलाने-पिलाने में मनोरंजन मानते हैं। वास्तव में इस प्रकार के दयावान व्यक्ति अपने परमपिता परमात्मा के कितने प्यारे पुत्र होंगे। जहाँ वह उन दारुण पुत्रों को देखकर खेद करता होगा वह इन करुण कुमारों को देखकर शीतलता का अनुभव करता होगा। इस वैभिन्नय से सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि उसका कौन-सा पुत्र उसके स्वर्ग-राज्य का अधिकारी बनेगा और कौन-सा उसके कारागार नरक की यातना भोगेगा।
मनोरंजन के लिए पशु-पक्षियों के साथ एक प्रकार का क्रूर एवं करुण व्यवहार करने वालों में से एक उन्हें मारते हैं और एक उन्हें पालते-पोसते हैं। किन्तु कुछ व्यक्तियों का मनोरंजन और भी शालीन होता है। उनका मनोरंजन न पालने में होता है और न मारने में। यथा-स्थान पशु-पक्षियों को स्वच्छन्दतापूर्वक खेलते-खाते, उड़ते-गाते देखकर ही उनका हृदय उतना ही प्रफुल्लित हो जाता है जितना कि उन खेलते, खाते और उड़ते हुए प्राणियों का होता है। ऐसे प्रेमी पुरुष परमात्मा के सत्पुरुष ही नहीं उनके प्रतिनिधि ही माने जायेंगे। यदि किसी पुण्यात्मा को स्वर्ग प्राप्त हो सकता है तो ऐसे सर्व संवेदनशील सत्पुरुषों को परमपिता का साक्षात् सान्निध्य ही प्राप्त होगा जो पशु-पक्षियों को मारना अथवा अपने पास रखने के बजाय स्वच्छन्दतापूर्वक खेलते-खाते देखकर ही ऐसे प्रसन्न होते हैं जैसे उनके छोटे भाई-बहन ही खेल-कूद रहे हों। ऐसी संवेदना, सहानुभूति, सहृदयता एवं आत्मशीलता रखने वालों का यह मानव-जीवन धन्य हो जाता है।
विचार करने का विषय है कि जब हम मानव किसी मेले-ठेले में जाते हैं तो मिट्टी अथवा कागज कपड़े के बने पशु-पक्षियों को हाट में देखकर खुश हो जाते हैं। उन्हें पैसे देकर खरीद लाते हैं। घरों में अलंकरण की तरह सजा कर रखते हैं, रक्षा करते हैं, उन्हें तोड़ने अथवा खराब करने के लिये बच्चों तक पर नाराज होते हैं और यदि धोखे से टूट जाते हैं तो दुःख करते हैं। तब साकार, सजीव और नाचते-गाते हुए पशु-पक्षियों को मारना, सताना अथवा उन्हें अन्य प्रकार से नष्ट करना कहाँ तक शोभनीय है?
संसार के प्राणियों पर अत्याचार करने वालों को, उन्हें सताने और मारने वालों को अपनी वृत्तियों का आप विवेचन करना चाहिए और देखना चाहिए कि ऐसी कौन-सी वृत्तियाँ हैं जिन्हें स्वार्थरूपी पिशाच ने विकृत कर रखा है, ऐसी कौन-सी वृत्तियाँ हैं जो अज्ञान द्वारा उत्तेजित की जाती हैं और वे वृत्तियाँ कौन-सी हैं जो असभ्य कालीन हैं? पता चलने पर मनुष्य को उन सारी दूषित वृत्तियों को निकाल फेंकना चाहिए जो हमें हिंसा-पाप के प्रति प्रेरित करती हैं क्योंकि इस प्रकार की पाप-परायण प्रवृत्तियाँ मनुष्य को देवत्व की ओर तो नहीं ही बढ़ने देती, आत्मा को कलुषित कर मनुष्यता से भी पतित कर देती हैं।
पापी हो या पुण्यात्मा अथवा वध के योग्य अपराध करने वाले ही क्यों न हों उन सबके ऊपर श्रेष्ठ पुरुषों को दया करनी चाहिए, क्योंकि ऐसा कोई नहीं है जो सर्वथा अपराध न करता हो। हम सभी ईश्वर से दया की प्रार्थना करते हैं और वही प्रार्थना हमें दूसरों पर दया करना सिखाती है। दया सब वस्तुओं में सबसे अधिक सस्ती है, उसके प्रयोग में हमें सबसे कम कष्ट सहन करना और आत्म-त्याग करना होता है
—बाल्मीकि
शास्त्रों में तो गाय को मोक्ष और भगवद्प्राप्ति का दाता कहा गया है। गाय का घृत सर्वोत्तम हवि है, इससे यज्ञ सम्पन्न होता है। यज्ञ से बादल बनते और वृष्टि होती है जिससे तृणादिक अन्न पैदा होता है और मानव-जीवन की सुख-सुविधायें बढ़ती हैं। यज्ञ परमार्थ का पर्यायवाची है, तात्पर्य यह है कि उससे पुण्य बढ़ता है, धन और भोग उपलब्ध होते हैं। इस तरह मनुष्य लौकिक एवं पारलौकिक व प्रेय और श्रेय दोनों साधनाओं को सम्पन्न कर मुक्ति का अधिकारी बनता है। यदि इन बातों को अगम्य बुद्धि मानें तो भी इतना तो है ही कि गाय की उपयोगिता सर्वोच्च है कृषि का सम्पूर्ण भार उसी की पीठ पर है। एक ओर बछड़े देकर और दूसरी ओर स्वास्थ्य का साधन प्रस्तुत कर वह किसान का और इस तरह समाज और राष्ट्र का बड़ा कल्याण करती है।
गाय के दूध की शक्ति , उष्णता, सात्विकता और तेजस्विता के सम्बन्ध में भारतीय तत्ववेत्ता महापुरुष, वैज्ञानिक और संसार के तमाम धर्म एकमत हैं। कहीं कोई विवाद या प्रतिवाद नहीं। सभी ने गाय के दूध को अमृत-तुल्य और परम पोषक पदार्थ माना है। यथा—
यूयं गावो मेदयथा कृशं चिद्श्रींर चित् कृणुथा सुप्रतीकम। भद्रं गृहं कृणुथ भद्रवाचो वृहद्वो वय उच्यते सभासु।
(अथर्व. 4। 21। 6)
अर्थ—हे गौ माता! तुम्हारा अमृततुल्य दूध दुर्बल व्यक्तियों को बलवान बनाता है, कुरूप को सुन्दर और सुडौल बनाता है। तुम हमारे घरों को मंगलमय रखती हो। हम विद्वानों की सभा में तुम्हारा यशगान करते हैं।
गोक्षीर मनभिष्यन्दि स्निग्धं गुरु रसायनम्। रक्त पित्त हरं शीतं मधुरं रसपाकयोः। जीवनयं तथा वातपित्तघ्नं परमं स्मृतम्॥
—सुश्रुत
अर्थात् गाय का दूध शौच साफ करने वाला, चिकना व शक्तिवर्द्धक और रसायन है। गाय का दूध रक्त तथा पित्त का शमन करता है। शीतल, स्वादिष्ट, आयुबर्द्धक और वात-पित्तहारी सर्व गुणकारी तथा मधुर फल देने वाला है।
“वनस्पति की पोषण-शक्ति का प्रयोग करने पर सिद्ध हुआ है कि गाय के दूध का घी अन्य सब चिकनाइयों व तेलों से— जिनमें वनस्पति भी शामिल है, निश्चित रूप से उत्तम है।”
(कृषि गवेषणा परिषद् का वार्षिक प्रतिवेदन 1950-51)
“पोषण की दृष्टि से भारतवर्ष को सबसे बड़ी आवश्यकता इस समय गाय के दूध की है।”
—सर राबर्ट मैक्कैरिसन
इन सब लाभों को देखकर ही गाँधीजी ने नारा दिया था—”मेरे नजदीक गौवध और मनुष्य-वध एक जैसे हैं, मेरा सारा प्रयत्न गौवध रोकने के लिये है। जो गाय को बचाने के लिए प्राण होम देने के लिए तैयार नहीं वह हिंदू नहीं”। लोकमान्य तिलक का बड़ा भारी स्वप्न था—”स्वराज्य मिलते ही कलम की एक नोंक से एक मिनट में ही गौ-हत्या बन्द हो जायेगी।” रफी अहमद किदवई का कथन है—”गौ-वध निषेध का प्रश्न दीर्घकाल तक स्थगित नहीं रखा जा सकता।” इसके बाद भारतीय संविधान की 48 वीं धारा में भी गौवध निषेध का स्पष्ट उल्लेख है। पर यह दुःख और लज्जा की बात है कि स्वतन्त्र भारत में महात्मा गाँधी की वाणी, लोकमान्य के स्वप्न को पूरी तरह ठुकराया गया। थोड़ी-सी विदेशी पूँजी के लालच के कारण शासन सत्ता द्वारा इस भयानक कुकृत्य को रोका न गया।
भारतवर्ष में केवल खाल और माँस के लिये ही गायें नहीं काटी जाती अब उसका वध गौसल्ले के लिए अधिक किया जाता है। यह गोसल्ला क्या है? इसका थोड़ा इतिहास जान लीजिए। हाथ में रखने वाले कीमती बेग, चमाचम जूते, बेल्ट और सूटकेस आपके पास होंगे पर यह नहीं सोचा होगा कि यह चमड़ा कहाँ से आता है? 1939-40 में पंजाब सरकार की ‘दी बोर्ड आफ इकोनोमिक कमेटी’ ने चमड़े की जाँच करवा कर ‘टैनिंग इण्डस्ट्री इन दी पंजाब’ नाम की पुस्तक प्रकाशित की। उसमें इस गोसल्ले का इस तरह वर्णन है— गर्भिणी भेड़-बकरियों को कत्ल करके या गर्भ गिराकर तथा गर्भिणी गायों को कत्ल करके गर्भस्थ बच्चों की खालें तैयार की जाती हैं। दिल्ली इनकी प्रसिद्ध मंडी है। गाय के बच्चे की खाल को गोसल्ला कहते हैं तथा श्री रोशनलाल जी एम. ए. जिन्होंने यह जाँच की, ने एक व्यापारी के यहाँ 800 गोसल्ले देखे। गोसल्ले का मूल्य गाय की खाल से बीस फीसदी अधिक होता है। मार्च सन् 1937 में देहली में प्रतिदिन इन खालों का औसत 15000 था और 16 कोठियाँ इस व्यापार में लगी थीं।” आज यह व्यापार मद्रास, बम्बई, कलकत्ता आदि बड़े नगरों में भी फैल गया है। यह नृशंस हत्याकाँड हमारे सामने हो रहा है। लार्ड मैकाले का यह कथन—” अंग्रेजी शिक्षा के द्वारा भारत में एक ऐसा वर्ग तैयार हो जायगा जिसका रंग हिन्दुस्तानी होगा पर दिल अँग्रेजी” के अनुसार आज लाखों पढ़े-लिखे हिन्दू लोग भी गौवध समर्थक नीति के वकील बन गये हैं। लगभग सारा देख आज गाय के महत्व को भूल चुका है। “ए प्लान एट एकोनोमिक डेवलपमेंट फार इण्डिया” के अनुसार युद्ध से पूर्व कुल राष्ट्रीय आय 22 अरब रुपये थी। प्रसिद्ध विशेषज्ञ डा. राइट की सम्मति से 1935 में 12 करोड़ रुपये की आय केवल पशुओं द्वारा प्राप्त हुई। प्राचीन भारत को एक प्रकार से गौवंश पर तरह आश्रित था पर इन दिनों गायों के महत्व को लोग भूलते जा रहे हैं फलस्वरूप कृषि और उपज का अनुपात निरन्तर घटता चला जा रहा है। पिछले दिनों की तुलना में दूध का ही अनुपात एक चौथाई से भी कम रह गया है।
गाय के दूध में सात्विकता और तेजस्विता की मात्रा अधिक होने से उसका महत्व बहुत अधिक है। अपनी “भोजन” नामक पुस्तक में डाक्टर मकेरिसन ने लिखा है— “भोजन शुद्ध और शक्तिशाली तभी होता है जब उसमें तमाम खनिज पदार्थ हों, गाय के दूध के सिवाय ऐसा कोई भोजन नहीं जिसमें सभी पोषक तत्व ठीक अनुपात में हों।” ‘मिरेकिल्स आफ मिल्क’ में बरनर मैकफेडन ने लिखा है—”यदि तुम हलके और दुर्बल हो तो गाय का दूध तुम्हारी मदद करेगा। यदि कमजोर हो और स्वास्थ्य गिर रहा है तो दूध तुम्हें बल देगा।”
“क्षीरात्परं नास्ति च जीवनम्” दूध से अच्छा और कोई जीवन बढ़ाने वाला पदार्थ नहीं। पर दूध मिलना तभी सम्भव है जब अधिक से-अधिक मात्रा में गायें पाली जाँय, उनके लिये चरागाहों का प्रबन्ध रखा जाये और गायों को वध से बचाया जाय। यह कार्य सरकार को तो करना ही चाहिए मुख्य उत्तरदायित्व तो जनता का है। यदि लोग अन्तःकरण से गाय की उपयोगिता को स्वीकार कर लें और संवर्धन, संरक्षण पर स्वतः ध्यान देने लगें तो न तो सरकारी सहयोग की आवश्यकता रहे न कसाई-खाने चलें। कटने के लिए गायें भी तो जनता ही बेचती है। इसलिए मुख्य रूप से हमारा हृदय परिवर्तन होना चाहिए।
गौवध का प्रश्न आर्थिक ही नहीं नैतिक भी है। कुत्ता पालने वाला वृद्धावस्था में उसे गोली नहीं मार देता। आर्थिक दृष्टि से हमारे वृद्ध माता पिता अनुपयोगी और अनुत्पादक होते हैं फिर भी हम उनका भार प्रेमपूर्वक सहन कर लेते हैं। तो जो गाय जीवनभर हमें सैकड़ों मन दूध देती है, बछड़े देती है और उर्वरा शक्ति बढ़ाने वाली गोबर की खाद समुपलब्ध कराती है उसे मार देना, छोड़ देना या कसाइयों को बेच डालना कृतघ्नता है, अनैतिक है। हमारी सभ्यता और संस्कृति कृतघ्नता तथा नैतिकता प्रधान रही है। गाय उसका प्रमाण रही। हम गान्धी जी के कथन को आज भी नहीं भूलते—”गोरक्षा हिन्दू धर्म की दी हुई दुनिया के लिए बख्शीश है और हिन्दू धर्म भी तब तक रहेगा जब तक गाय की रक्षा करने वाले हिन्दू हैं।”
परिवार परम्परा को प्रोत्साहन करने में ऋषियों का मन्तव्य केवल इतना ही नहीं रहा कि व्यक्ति एक से बहुत होकर रहे। दुःख-तकलीफ पड़ने पर उसका हाथ बटाने वाला उसके साथ हो। व्यक्ति व्यवस्थित रूप में स्थाई होकर रहे और परिजनों के साथ अधिक उल्लासपूर्ण जीवन-यापन करे। इस साधारण मन्तव्य के साथ उनका एक इससे कहीं ऊँचा मन्तव्य भी रहा है, वह यह—कि परिवार के माध्यम से मनुष्य आत्म-कल्याण की ओर भी अग्रसर हो। उसमें सामाजिकता, नागरिकता और सबसे बड़ी—विश्व-मानवता का कल्याणकारी भाव जागे। वह अपने जैसे अन्य मनुष्यों के लिये त्याग, सहानुभूति, सौहार्द्रय एवं आत्मीयता का अभ्यस्त हो सके।
मनुष्य की संकीर्णता दूर होकर उसकी आत्मा का व्यापक विकास हो यही आत्म-कल्याण का राजमार्ग है। मनुष्य दूसरे का दुःख दर्द समझकर उसके साथ सहानुभूति रख सके, उसकी सेवा-सुश्रूषा तथा सहायता करने को तत्पर रहे यही आत्म रहे यही आत्म-उन्नति के लक्षण हैं। पारिवारिक जीवन में इन आध्यात्मिक गुणों के विकास का पूरा-पूरा अवसर रहता है।
एक पिता जब वह बालक रहा होगा तब निश्चय ही आज की तुलना में अधिक संकीर्ण, अधिक स्वार्थी तथा अपने तक अधिक केन्द्रित रहा होगा। वह यही चाहता रहा होगा कि उसे सबसे अधिक और अच्छा खाने-पहनने को मिले, सबसे अधिक खर्च करने को मिले और सबसे अधिक सुख-सुविधा के साथ स्नेह-दुलार भी उसे ही मिले। अपनी इस स्वार्थ-भावना के वशीभूत वह दूसरों के हितों का ध्यान रखे बिना ही अपना हठ पूरा कराने का प्रयत्न करता रहा होगा। दूसरों के प्रति अनुदारता एवं कृपणता उसके स्वभाव के अंग रहे होंगे।
किन्तु अनन्तर जब उसने विवाह किया होगा और उसकी एकान्तिक स्वार्थपरता एवं संकीर्णता में दरार पड़ गई होगी तो वह केवल अपने स्वार्थ के प्रति आग्रही न रहकर पत्नी की सुख-सुविधा, उसकी इच्छाओं एवं हँसी-खुशी के विषय में सोचने लगा होगा। एक चीज यदि अपने लिये लाता होगा तो एक पत्नी के लिये भी और इस प्रकार उसकी आत्मीयता की परिधि बढ़ गई होगी। उसका प्रेम, स्नेह एवं सहानुभूति अपने से बढ़कर दूसरे तक जा पहुँची होगी और वह अपने अतिरिक्त अपनी पत्नी का भी आत्मीय बन गया होगा।
आज जब वह अनेक बच्चों का पिता बन गया है तो उसका सारा जीवन ही उसके परिवार का हो गया है। उसका अपना कुछ नहीं रहा है। कहने के लिये उसका जो कुछ है वह सब उसके बच्चों का है। आज न वह पूर्ववत् स्वार्थी है, न संकीर्ण और न अनुदार। उसमें त्याग, सन्तोष सहानुभूति, संवेदना तथा आत्मीयता के गुण आप-से-आप विकसित हो गये हैं। उसकी संकुचित आत्मा अनेकों तक निस्वार्थ भाव से विस्तृत हो गई है। यह आत्मिक विकास कैसे हुआ—पारिवारिक जीवन अपनाने से। यदि उसने पारिवारिक जीवन न अपनाया होता और उत्तरदायित्व न समझा होता तो न तो उसकी आत्मा का विस्तार पत्नी तक होता और न बच्चों तक फैलता। वह यथावत स्वार्थी एवं संकीर्ण बना हुआ पशुओं की तरह जड़ एवं अविकासशील जीवन बिता रहा होता। त्याग, सहानुभूति, संवेदना, स्नेह तथा अन्यों से आत्मीयता का क्या सुख होता है इस अनुभव से सदा सर्वथा अनभिज्ञ रहता। यह पवित्र पारिवारिक जीवन का ही प्रभाव है कि उसकी आत्मा के संकीर्ण बन्धन शिथिल हुए और विस्तार हो सका। इसी प्रकार पत्नी से परिवार से परिजनों, परिजनों से पार्श्वजनों और पार्श्वजनों से पुरजनों में फैलती हुई उसकी आत्मीयता विश्व तक जा पहुँचे तो सहज ही कड़ी-कड़ी करके उसकी आत्मा के बन्धन निःशेष हो जायें और वह मानव-जीवन का अन्तिम लक्ष्य मुक्ति अथवा मोक्ष की उपलब्धि कर ले। पारिवारिक जीवन एवं गृहस्थ आश्रम की व्यवस्था देने में ऋषियों का मुख्य उद्देश्य यही था— साँसारिक सुख-सुविधा तो स्वाभाविक एवं गौण थी।
किन्तु खेद है कि पारिवारिक जीवन के द्वारा महत्वपूर्ण एवं कल्याणकारी अनुपम उद्देश्य की ओर किसी का ध्यान ही नहीं जाता। यही नहीं पारिवारिक व्यवस्था के सामान्य एवं स्वाभाविक सुख-शाँति के उद्देश्य से भी हाथ धो डाले गये हैं। आज का गृहस्थ-जीवन तो निरुद्देश्य की खींच-तान एवं तनातनी भर रह गया है। जिस व्यवस्था से इतने बड़े श्रेयपूर्ण आत्मोद्धार के उद्देश्य की पूर्ति की जा सकती है वह आज पाप जैसे अभिशाप से भरा हुआ वर्तमान में तो नारकीय यातना दे ही रहा है, भविष्य के लिये भी नरक के द्वार खोल रहा है। यह कुछ कम दुर्भाग्य की बात नहीं है।
यदि परिवार-व्यवस्था का उद्देश्य ठीक-ठीक समझा जाये और इसे आत्मोन्नति की प्रयोगशाला मानकर बरता जाये तो साँसारिक सुख-शाँति तो स्थिर ही हो जाये साथ ही मनुष्य आत्मोद्धार की दिशा में भी सफलता प्राप्त कर सकता है।
अनेक लोग परिवार को आत्मोन्नति के मार्ग में बाधक मानते हैं। उनका कहना होता है कि परिवार-पालन के दायित्व के कारण मनुष्य को दिन-रात साँसारिक उलझनों में फँसा रहना पड़ता है। उसे बाल-बच्चों की चिन्ता से ही अवकाश नहीं मिलता, फिर भला वह आत्मोद्धार के लिये किस प्रकार प्रयत्न कर सकता है। इस प्रकार सोचने वाले गलत रूप में सोचते हैं। उलझनों का कारण परिवार नहीं बल्कि वह गलत व्यवस्था है जिसकी ओर लोग प्रमादवश ध्यान नहीं देते और परिवार की गाड़ी उल्टी-सीधी खींचते चले जा रहे हैं। किसी भी वस्तु का गलत प्रयोग ही उसे हानिकारक बना देता है। भोजन मनुष्य-जीवन के लिए निताँत उपयोगी वस्तु है। इसके अभाव में जीवन असम्भव हो जायेगा। इसी से मनुष्य को स्वास्थ्य एवं शक्ति मिलती है। इसी उपयोगी एवं जीवनप्रद भोजन को जब अनुचित रूप से उपयोग किया जाता है तब यही अनेक रोगों का कारण बन जाता है और मनुष्य को अशक्त बना देता है। उसी स्थान पर विधिपूर्वक उपवास के रूप में भूखा रहना अनेक अवसरों पर आरोग्य एवं जीवनदाता बन जाता है। दूध, घी, मक्खन, मधु आदि सर्वविदित पौष्टिक पदार्थ हैं। इनका विधिपूर्वक उपयोग करने से मनुष्य-जीवन के लिए अमृत का काम करते हैं किन्तु यही अमृततुल्य पदार्थ अविधिपूर्वक सेवन करने से विष बन जाते हैं। सखियां और पारा आदि प्राणघातक विष है। सब जानते हैं और इनसे डरते हैं किन्तु जब यही विष शोधन करके औषध बना लिये जाते हैं तो निर्भय होकर इनका सेवन करते हैं और अनेक रोगों से मुक्ति पाते हैं। यही बात गृहस्थ जीवन के साथ में भी है।
जो परिवार त्याग, उदारता, सहयोग एवं स्नेह के आधार पर मतैक्य की डोरी से मजबूती के साथ बँधे रहते हैं और जिनमें अनुशासन, शिष्टाचार, सदाचार, नियम एवं मर्यादाओं का यथोचित पालन किया जाता है उनमें सभी सदस्य लौकिक सुख-शाँति के साथ आत्म विकास अथवा आत्मोद्धार का आध्यात्मिक उद्देश्य भी पूरा कर सकने का अवसर पा सकते हैं। जिन परिवारों में दिन-रात कलह-क्लेश और स्वार्थपूर्ण हाय-तोबा मची रहती है, जिनको अविधिपूर्वक बरता जायेगा वे स्वभावतः आत्म-पतन एवं आत्म-बन्धन के हेतु बनेंगे ही। जैसा कि बताया जा चुका है कि कौटुम्बिक जीवन आत्म-विकास का एक सुअवसर है किन्तु तब,जब इसका उपयोग उस दिशा में किया जाये। अपनी पत्नी, पुत्र, प्रिय एवं परिजनों के बीच आत्मीयता का विस्तार करते हुए सार्वभौमिक आत्मीयता की अनुभूति प्राप्त की जाये। किन्तु होता यह है कि लोग अपने प्रिय एवं परिजनों तक ही आत्मा का विस्तार करके रुक जाया करते हैं। परिवार तक ही सौहार्द्रय एवं आत्मीयता की परिधि को परिमित कर लेते हैं। उनके त्याग, उदारता, दया, दान, करुणा, संवेदना, सहानुभूति, सेवा, सहयोग एवं सहायता तक ही बढ़कर रह जाते हैं। उन्हें अपने परिवार, सो भी निकटतम परिवार को छोड़कर किसी दूसरे के परिजनों से किसी प्रकार का स्नेह अथवा सौहार्द्रय पूर्ण सरोकार नहीं रहता और कभी-कभी तो लोग अपने परिवार को मोहवश अधिक सुख-सुविधा देने के लिए दूसरे लोगों की सुख-सुविधा अथवा हित-अनहित का ध्यान नहीं रखते। यहीं तक नहीं अनेक लोग अपने परिवार की तुलना में दूसरे परिवारों को हेय अथवा हीन तक समझने लगते हैं अथवा अपने परिवार की अपेक्षा अन्यों की सुख-समृद्धि में विकास देखकर आह तक करने लगते हैं। अपने बच्चों की ममता में दूसरे बच्चों को डांटने-फटकारने और दुत्कारने तक में संकोच नहीं करते। यह घोरतम संकीर्णता है, जिससे परिवार के आगे आत्म-विस्तार का तो प्रश्न ही नहीं उठता उन्हें आत्म-संकोचन ही होता है जिससे पतनपूर्ण पाश में पड़ना असंदिग्ध एवं अनिवार्य है।
परिजनों तक फैला हुआ आत्म-विस्तार भी किसी हद तक आध्यात्मिक दिशा में सहायक हो सकता है यदि उनको अन्य जीवों की तरह विश्व-विराट का अंग समझकर पालन-पोषण, सेवा-सहायता की जाये। किन्तु कठिनाई तो यह है कि लोग परिजनों के प्रति भी तो इस प्रकार का उदार एवं व्यापक दृष्टिकोण विकसित नहीं कर पाते। उनके प्रति भी जो कुछ त्याग एवं उदारता बरती जाती है, जो भी सेवा-सहायता की जाती है, जितना भी स्नेह, सहानुभूति एवं सौहार्द्रय दिया जाता है सब ममता के वशीभूत होकर दिया जाता है। परिवार के प्रति उनकी सारी आत्मीयता के पीछे ‘यह सब मेरे हैं’ का भाव ही सक्रिय रहा करता है। इसीलिए उनके प्रति किया हुआ उनका सारा उपकार आध्यात्मिक दिशा में निष्फल चला जाता है। ममत्व के भाव से किया हुआ शुभ कार्य भी परमार्थ की सूची में अंकित नहीं हो सकता फिर चाहे वह निस्वार्थ अथवा निर्लोभ ही क्यों न हो। ‘मेरे अपने’ के भाव से किसी के प्रति भी किया हुआ कोई भी उपकार घूम-घूमकर अपने लिए ही किया हुआ माना जायेगा। अपने लिये अथवा अपने आत्म-सन्तोष के लिए किया हुआ बड़े-से- बड़ा परमार्थ भी स्वार्थ ही है। ममत्व भाव से बढ़ी हुई आत्मीयता का विस्तार विश्व-विराट के प्रति निर्बन्ध आत्मीयता की अनुभूति नहीं कर सकता। इसके लिये परिजनों तथा प्रियजनों को भी विश्व विराट का एक अंग समझना होगा। उन्हें समस्त संसार के जीव-समुदाय में मिलाकर व्यापक दृष्टिकोण से देखना होगा। इस प्रकार जब आपका अपनत्व अपने तथा अपने परिवार की परिधि पारकर जीवभाव के लिए समान रूप से सक्रिय होने लगेगा तो वह विशद एवं व्यापक ममत्व भी आध्यात्मिक प्रेम में परिपक्व होकर आत्मोद्धार की सीमा तक सहायक बन जायेगा।
पारिवारिक जीवन को आत्मोद्धार में सहायक बनाने के लिये मनुष्य को आध्यात्मिक दृष्टिकोण से ही परिवार बसाना चाहिए। बहुधा परिवार बसाने में लोगों का दृष्टिकोण महत्वपूर्ण ही होता है। उनके मस्तिष्क में एक यही बात रहती है कि समाज में वे एक घर-बार वाले व्यक्ति समझे जायेंगे। उनका बोझ-वजन बढ़ेगा, लोग उन पर विश्वास करेंगे और वे समाज में एक उत्तरदायी व्यक्ति समझे जायेंगे। वे एक नारी के पति अथवा अनेक बच्चों के पिता होने का गौरव पायेंगे। पत्नी में उनके प्रणय और बच्चों में स्नेह को आश्रय मिलेगा; जीवन बड़ा ही सरस एवं सुमधुर बन जायेगा। वे एक से अनेक होकर सुख शाँति पूर्ण, भरा-पूरा तथा हरा-भरा जीवन बिता पायेंगे। ऐसा या इससे मिलता जुलता दृष्टिकोण लोग परिवार बसाने में रखते हैं। उनकी दृष्टि परिवार की सहायता से, सर्वथा भौतिक सुख पाने की ओर ही रहती है। उसमें किसी प्रकार के आध्यात्मिक दृष्टिकोण का समावेश नहीं रहता। अहंकार एवं स्वामित्व की ही बहुतायत रहा करती है। निदान वे उसी दृष्टिकोण से परिवार का उपयोग किया करते हैं। मिथ्या साँसारिक सुख भी पाते हैं और उनके परिणामस्वरूप अनन्त दुःख भी। यह परिणाम केवल इस भौतिक सुख-शाँति के दृष्टिकोण का होता है जो बहुधा लोग परिवार बसाने के मन्तव्य में रखते हैं। ममता, मोह, अहंकार, स्वामित्व व स्वार्थ सुख की भूमि पर बोये बीज कंटक रहित सुगन्धित फूलों के रूप में ही फले, यह सर्वथा सम्भव नहीं।
परिवार बसाने में आधार भौतिक न रहकर आध्यात्मिक रहे तो ऐसी परिस्थितियाँ न दिखाई दें जो घर-घर में आज देखी जा रही हैं। आध्यात्मिकता से त्याग, सेवा, प्रेम आदि गुणों का विकास होगा जो आत्म-विकास के आधार है। जब प्रत्येक परिवारीजन के साथ उच्चाशयता सहित यथोचित व्यवहार किया जायेगा तो स्वतः ही सब परिवार सात्विक भावों में ढलकर साँसारिक सुख-समृद्धि को प्राप्त कर लेंगे। परिवार बसाने में आध्यात्मिक दृष्टिकोण लौकिक समृद्धि तथा आत्मोद्धार दोनों उद्देश्यों का एक साथ संवाहक है। इसी दृष्टिकोण को विकसित करना पारिवारिक जीवन के हित में ही है।
आज समाज ही नहीं संसार की दशा किसी से छिपी नहीं है। क्या अमीर, क्या गरीब, क्या शिक्षित और क्या अशिक्षित, इस यथार्थ के विषय में सभी एक मत हैं कि आज का समाज बुरी तरह विकृत हो चुका है और संसार ऐसे विषम-बिन्दु पर पहुँच गया है कि यदि उसकी इस गति को यहीं पर रोक कर ठीक दिशा में न बढ़ाया गया तो युग-युग की संचित मानवीय सभ्यता का विनाश अवश्यम्भवी है।
वर्तमान दशा और परिवर्तन की पुकार किसी की आँख-कान से परे नहीं है। आज के असहनीय कष्ट सभी देखते, सुनते, और अनुभव कर रहे हैं किन्तु इस परिवर्तन की माँग को पूरा करने के लिए कौन आगे बढ़े, यह प्रश्न सामने खड़ा होकर स्तब्धता की स्थिति उपस्थित कर देता है। निःसन्देह इस संक्रामक काल में परिवर्तन पूर्ण करने के लिए, सम्पूर्ण समाज का कर्तव्य है कि वह योगदान करे। किन्तु यह सर्वथा सम्भव नहीं। इस परिवर्तन को प्रस्तुत करने के लिए समाज के एक विशिष्ट वर्ग को ही आगे बढ़ना होगा।
समाज में तीन प्रकार के व्यक्ति पाये जाते हैं। एक तो सर्वसामान्य जिन्हें रोटी कमाने और पेट भर लेने के अतिरिक्त दीन-दुनिया की खबर नहीं रहती। संसार में रोटी ही उनका एकमात्र उद्देश्य होता है। समाज किधर जा रहा है उसमें किन-किन सुधारों की आवश्यकता है इस चिन्ता से उनका कोई सरोकार नहीं होता। आराम से भोजन वस्त्र मिल गया प्रसन्न हो गए, उसमें घाटा आ गया दुखी हो गए। बस यही उनका जीवन और यही उनका ध्येय होता है। ऐसे आदमियों को जड़ एवं अभावुक कहा जा सकता है। अन्य पशु-पक्षियों और उनके जीवन में कोई विशेष अन्तर नहीं होता। संसार में ऐसे लोगों की ही बहुतायत हुआ करती है। इनमें भोजन एवं प्रजनन क्रिया की प्राकृतिक प्रेरणा के अतिरिक्त कोई विशप चेतना नहीं होती। बहुत अधिक हुआ तो अपने बाल-बच्चों की खोज-खबर की चिन्ता कर ली। समाज क्या है, राष्ट्र क्या होता है, सभ्यता एवं संस्कृति किसे कहते हैं, संसार में इन सबका क्या मूल्य महत्व है, ऐसे उच्चाशयता पूर्ण विचारों से वे न तो जरा भी परिचित होते हैं और न उनकी चिन्ता कर पाते हैं।
इतना ही नहीं समाज में फैलने वाली विकृतियाँ इसी जड़ वर्ग में जन्म लेती और पनपती हैं। यही वह जन साधारण है जो अपनी जड़ता के कारण रोग, शोक, गरीबी, बेकारी, शोषण एवं सन्तापों से ग्रस्त रहता है। और जिसके दुःख से अन्य चेतनावान व्यक्तियों को दुःखी एवं चिन्तित होना पड़ता है।
इसके अतिरिक्त समाज में एक दूसरा वर्ग भी होता है जो उपर्युक्त वर्ग की तरह जड़ अथवा पाशविक तो नहीं होता, अपेक्षाकृत अधिक सजग एवं सक्रिय होता है। किन्तु होता है यह वर्ग बड़ा ही भयंकर! इस वर्ग में वे लोग होते हैं जिनकी विद्या, बल और बुद्धि तथा साधन सुविधायें हैं। इस वर्ग का उद्देश्य यही रहता है कि संसार की सारी सम्पत्तियाँ, भोग तथा सुविधायें अधिक से अधिक उसी के पास रहें। वह और उनका परिवार सबसे अधिक सुखी एवं सम्पन्न रहें। ऐसे स्वार्थी लोग अपनी अनुचित आकाँक्षाओं को पूरा करने के लिये उचित-अनुचित सभी प्रकार के काम किया करते हैं। अपने तुच्छ स्वार्थ के लिये किसी का बड़े से बड़ा अहित कर देने में जरा भी संकोच नहीं करते। अपने मजा, मौज और सुख स्वार्थ के लिए दूसरों का हिस्सा एवं अधिकार अपहरण कर लेना वे अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझते हैं। ऐसे ही स्वार्थी पशु समाज में चोरी, डकैती तथा अन्य प्रकार के भ्रष्टाचारों को करते और बढ़ाते हैं। इन्हीं के कारण समाज के अन्य लोग दुःखी एवं संत्रस्त रहा करते हैं। शाँति एवं सुरक्षा के वातावरण को सबसे अधिक क्षति इसी वर्ग से पहुँचती है। भोले, भले, दीन, दुःखी और निर्बलों को सताना इनके लिये एक साधारण बात होती है। समाज से सब कुछ लेकर उसके बदले में उसे शोक-सन्ताप एवं कष्ट-क्लेश देना ही इनका धर्म बन जाता है। ऐसे लोग बड़े ही क्रूर, कपटी, अकरुण एवं कृपण होते हैं। अपने और अपने प्रियजनों के अतिरिक्त किसी का हित चाहना इनकी विचार परिधि से परे होता है। ऐसे लोगों को दुराचारी अथवा दुष्ट कहा जा सकता है। ऐसे लोगों की संख्या जड़ वर्ग से कम अवश्य होती है किन्तु समाज को संत्रस्त करने के लिए काफी होती है।
इस प्रकार के जड़ एवं दुष्ट जनसमूह की ही समाज में बहुतायत होती है। यह दोनों प्रकार के मनुष्य सामाजिकता पूर्ण नागरिक भावना से शून्य होते हैं। इनसे किसी सुधार, उपकार अथवा आदर्श कार्य की अपेक्षा नहीं की जा सकती। जो स्वयं बुरा है, व्यर्थ है, वह किसी को क्या तो सुधार सकता है और क्या उपयोगी हो सकता है। यथार्थ बात यह है कि यही दोनों वर्ग समाज में विकृतियों के कारण होते हैं और समाज सुधार के लिये इन्हें ही सुधारने ठीक रास्ते पर लाने के लिये प्रकाश एवं प्रयत्न की आवश्यकता होती है।
इन दो के अतिरिक्त समाज में एक वर्ग और होता है, जिसे ‘प्रबुद्धवर्ग’ कह सकते हैं। यद्यपि वह वर्ग उन दो वर्गों से संख्या में बहुत कम होता है किन्तु, यदि काम में लाये, तो इसकी शक्ति उनसे कहीं अधिक होती है। इस वर्ग की विचारधारा संकीर्ण स्वार्थों एवं पाशविक वृत्तियों से उठी हुई होती है। देश, धर्म, समाज एवं राष्ट्र के प्रति इस वर्ग की भावनायें अधिक तीव्र एवं चिन्ता पूर्ण होती हैं। जिन-जिन देशों में सुधारात्मक क्राँतियाँ हुई हैं उनमें किसी ऐसे ही वर्ग की चेतना काम करती रही है।
प्रबुद्ध वर्ग को किसी भी समाज की जीवनीशक्ति कहा गया है। जिस समाज का यह वर्ग प्रमाद में पड़कर चिन्ता एवं प्रयत्न करना छोड़ देता है वह समाज अधिक समय तक जीवित नहीं रह पाता। इसके विपरीत जिस देश अथवा समाज का यह वर्ग सतेज, सक्रिय एवं सजग रहता है उस समाज में पहले तो विकृतियाँ आती ही नहीं और यदि आ भी जाती हैं तो यह वर्ग उन्हें झाड़-बुहार कर साफ कर देता है। जनता को आदर्श का प्रकाश देना और उसे ठीक राह पर लाने वाला यह प्रबुद्ध वर्ग ही होता है।
जिस प्रकार से भारतीय समाज में सदा से प्रबुद्ध वर्ग रहा है आज भी है। किन्तु फिर भी सामाजिक सुधार का कार्य नहीं हो रहा है। इसका कारण यही है कि आज भारतीय समाज का प्रबुद्ध वर्ग स्वार्थी तो नहीं हुआ किन्तु प्रमादी अवश्य हो गया है। वह समाज की चिन्ता तो करता है किन्तु सक्रिय कार्यक्रमों को चलाने के लिये आगे नहीं बढ़ रहा है। जहाँ-तहाँ लोग समाज की दशा और उसके सुधार की आवश्यकता पर बात करते तो देखे सुने जाते हैं किन्तु एक होकर सुधार कार्य में रुचिवान होते नहीं दीखते।
समाज सुधार के लिए, प्रबुद्ध वर्ग में जो उदासीनता दिखाई देती है उसके दो ही कारण समझ में आते हैं। एक तो आजीविका और दूसरा समाज की अति पतित अवस्था। आजीविका के विषय में आज के समय को बहुत कठिन समय कहा जा सकता है। ईमानदार आदमी को दिन भर काम करने के बाद परिवार के गुजारे के योग्य मुश्किल से मिल पाता है। वह सोचता है कि यदि वह अपना समय समाज सुधार के कार्यक्रमों में देने लगा तो उसे आजीविका की पूर्ति करने में कठिनाई पड़ने लगेगी। साथ ही समाज का सर्वांगीण पतन देख कर कार्य क्षेत्र में उतरते उसका साहस नहीं होता। उसे शंका रहती है कि यदि आज के बुरे युग में वह अच्छाई का सन्देश लेकर जाता है तो कोई भी उसकी न सुनेगा और असफल होकर हताश अथवा उपहासास्पद होना होगा।
किन्तु लोगों की यह दोनों धारणायें निराधार हैं। जहाँ तक भोजन का प्रश्न है, अधिकतर लोग आजीविका के लिये आठ-दस घण्टे काम किया करते हैं। दस घण्टे काम करने के लिये रख लिए जायें और दस घण्टे सोने आदि के लिए मान लिए जायें तब भी हर किसी के पास चार घण्टे का ऐसा समय बच सकता है जिनमें समाज सेवा का बहुत सा काम किया जा सकता है। समाज सेवा के लिए समय न होने का बहाना मात्र है वस्तुतः इसमें कोई तथ्य नहीं है।
जहाँ तक समाज की भयावह स्थिति का प्रश्न है, उसके लिये साहस करना ही शोभनीय है। बाढ़, आग आदि की आपत्ति आ जाने पर यदि उसकी भयंकरता से डर कर हाथ पाँव छोड़ कर एक तरफ हो जाया जाए तो इसका परिणाम सर्वनाश के सिवाय और क्या हो सकता है? उस महा भयंकर आपत्तिकाल में लोग हिम्मत बाँधते और प्रयत्न करते ही हैं। उन्हें इसका फल आपत्ति निवारण के रूप में मिलता ही है। किसी सत्कार्य को करने के लिये उसके फल की चिन्ता नहीं करना चाहिये। ईमानदारी और लगन से अपना कर्तव्य करें और फल भगवान के ऊपर छोड़ दें—यही गीता के कर्म योग का सन्देश है जिसे हर श्रेष्ठ व्यक्ति को हृदयंगम रखना चाहिये।
आज तो केवल सामाजिक विकृतियों से लड़ना है—कुछ समय पूर्व जब महात्मा गाँधी देशोद्धार के क्षेत्र में उतरे थे तो सामाजिक विकृतियाँ तो इस प्रकार थी ही साथ ही समाज के पैरों में अंग्रेजी दासता की शृंखला भी पड़ी हुई थी। महात्मा गाँधी ने तो आज से भी अधिक भयावह परिस्थिति में बिना किसी साधन के स्वाधीनता संग्राम छेड़ा था और अपने साहस, लगन एवं अध्यवसाय के बल पर सफल होकर संसार के सामने एक उदाहरण उपस्थित कर दिया। विकृतियाँ देखने में ही भयावह मालूम होती हैं, वस्तुतः उनमें कोई शक्ति नहीं होती। सत्प्रवृत्तियों का प्रकाश होते ही उनका अन्धकार तो आप से आप दूर होने लगता है। प्रबुद्ध वर्ग को हर प्रकार की शंकायें एवं भयों को त्याग कर समाज सुधार के कार्य में लग ही जाना चाहिये।
वह हर भाग्यवान व्यक्ति अपने को प्रबुद्ध वर्ग का नैसर्गिक सदस्य समझे जिसकी अन्तरात्मा में परमात्मा ने देश धर्म के प्रति जागरूकता और मन मस्तिष्क में समाज की दयनीय दशा की पीड़ा पैदा की है। जो बुद्धिमान अपने अन्दर आदर्शवादिता, धार्मिकता, आध्यात्मिकता, सामाजिकता एवं मानवता का कोई अंश समझता है और देश तथा समाज की वर्तमान दशा से क्षुब्ध होता है जिसके हृदय में कुछ न कुछ उपाय करने की जिज्ञासा होती है, वह हर व्यक्ति अपने को प्रबुद्ध वर्ग का समझे और तदनुसार अपने कर्तव्य में यह समझ कर लग जाये कि यदि परमात्मा हम से इस पावन कर्तव्य की अपेक्षा न करता तो हमारी आत्मा में इस प्रकार की मंगलमयी जागरूकता न भरता।
हर प्रबुद्ध व्यक्ति नव-निर्माण के अलावा कार्यक्रमों में से अपने योग्य कोई भी एक अथवा अनेक कार्यक्रम चुन सकता है और उसे धार्मिक भावना के साथ अपने तथा समाज के कल्याण के लिए प्रसारित कर सकता है । आज समय की माँग है कि समाज के प्रबुद्ध व्यक्ति एक या अनेक होकर समाज सुधार के किसी न किसी काम को लेकर आगे बढ़ें और दूसरों को इस ओर बढ़ने की प्रेरणा दें। संसार की सारी क्राँतियाँ तथा परिवर्तन प्रबुद्ध वर्ग द्वारा ही लाये गये हैं। आज भी समाज सुधार का महान कार्य प्रब़द्ध वर्ग ही कर सकता है और उसे करना भी चाहिये।
अपरोपकारी का सार निष्फल ही चला जाता है-
प्यासा मनुष्य अथाह समुद्र की ओर यह सोच कर दौड़ा कि महासागर से जी भर अपनी प्यास बुझाऊंगा! वह किनारे पहुँचा और अंजलि भर कर जल मुँह में डाला किन्तु तत्काल ही बाहर निकाल दिया।
प्यासा असमंजस में पड़ कर सोचने लगा कि सरिता सागर से छोटी है किन्तु उसका पानी मीठा है। सागर सरिता से बहुत बड़ा है पर उसका पानी खारा है।
कुछ देर बाद उसे समुद्र पार से आती एक आवाज सुनाई दी कि— सरिता जो पाती है उसका अधिकाँश बाँटती रहती है किन्तु सागर सब कुछ अपने में ही भरे रखता है। दूसरों के काम न आने वाले स्वार्थी का सार योंही निःसार होकर निष्फल चला जाता है। आदमी समुद्र के तट से प्यासा लौटने के साथ एक बहुमूल्य ज्ञान भी लेता गया जिसने उसकी आत्मा तक को तृप्त कर दिया।
गायत्री-उपासना सर्वश्रेष्ठ, सर्वोपरि और अनादि उपासना है। उसका प्रभाव और परिणाम असंदिग्ध एवं संतुलित है। अन्य उपासना-पद्धतियाँ अपने लक्ष्य को प्राप्त करा सकने में असमर्थ हो सकती हैं पर गायत्री-उपासना में ऐसी अड़चन नहीं आती।
उपासना-संसार में यह सबसे अधिक लाभदायक प्रक्रिया है। साँसारिक सुख-सुविधाओं के उपार्जन की दृष्टि से स्वास्थ्य, शिक्षा, कुशलता, सम्पत्ति, मित्रता आदि की उपयोगितायें लोगों ने समझ ली हैं और उनके उपार्जन का प्रयत्न भी करते हैं, पर ऐसे कम ही लोग हैं जिन्होंने आत्मबल द्वारा प्राप्त हो सकने वाली विभूतियों का मूल्याँकन किया हो और उनको उपार्जन करने के लिए उपासना की पद्धति को व्यवस्थित एवं क्रमबद्ध रूप से अपनाया हो।
भारतीय धर्म-शास्त्रों का मर्म, ऋषियों का अनुभव महापुरुषों के कार्यक्रम को जब उपासना-अन्वेषण की से देखा जाता है तो उसमें गायत्री-उपासना ही सर्वोत्तम ठहरती है। सन्ध्या-वन्दन की कोई भी प्रणाली क्यों न हो, गायत्री-उपासना का उसमें अनिवार्य स्थान है। वेद भारतीय धर्म के मूल आधार हैं और उनका बीज मन्त्र एकमात्र गायत्री है। गायत्री के चार चरणों की व्याख्या स्वरूप चार वेद बने हैं। गुरुमन्त्र के रूप में प्रत्येक भारतीय धर्मानुयायी का एक ही अवलम्बन है— गायत्री मन्त्र। इस सुनिश्चित तथ्य को ध्यान में रखते हुए कोई वेद-धर्म अनुयायी और कोई मार्ग अपना भी नहीं सकता। खोज और अनुभूतियों के आधार पर हमने जो एकमात्र मार्ग पाया उस पर क्रमबद्ध रूप से चलते रहे। यही कारण है कि उस मार्ग पर चलते हुए इतना कुछ पाया है जिसके आधार पर सन्तोष, आनन्द, एवं उल्लास अनुभव किया जा सके।
उपासना मानव जीवन का सर्वोत्कृष्ट व्यवसाय है। अन्य व्यवसायों में जितना मनोयोग, जितना श्रम, जितना समय और जितना साधन लगाया जाता है, उतना ही यदि उपासना में लगाया जाता तो अपेक्षाकृत असंख्य गुना लाभ उठाया जा सकता है।
अध्यात्म भी भौतिक विज्ञान की तरह ही एक सर्वांगपूर्ण शास्त्र है और उसका लाभ तभी उठाया जा सकता है जब व्यवस्थित जानकारी तथा क्रिया प्रणाली अपनायी जाय।
संसार में अन्य समस्त क्रिया-कलापों की तरह उपासना भी (1) सिद्धाँत और (2) व्यवहार इन दो भागों में विभक्त है । यह दोनों ही पहलू एक दूसरे से अन्योन्याश्रय सम्बद्ध हैं। एक के बिना दूसरा पहलू अधूरा है। डॉक्टर आपरेशन करने की कला सीखता है—फोड़ा कहाँ से, कैसे, किस औजार से, कितना चीरा जाना चाहिए और उसके बाद उस पर क्या लगाना चाहिए—यह समझता है। पर इतने मात्र से ही वह अपने व्यवसाय में कुशल नहीं हो जाता। उसे फोड़ा उत्पन्न होने का कारण, उसकी किस्में तथा पकने-फूटने की सैद्धान्तिक जानकारी भी होनी ही चाहिए। जो सिद्धान्तों से उपेक्षित है, केवल व्यवहार जानते हैं, वह अनाड़ी डॉक्टर अपने व्यवसाय में सफल नहीं हो सकता। व्यापारी, किसान, शिल्पी आदि सभी वर्गों के लोग हाथ-पैर से क्या-क्या करना होगा, यह जानते हैं पर उतने से ही उनका काम नहीं चल जाता। व्यापारी को व्यावसायिक सिद्धाँत, किसान को पौधों की क्रियाप्रणाली, शिल्पी को अपने विषय की आवश्यक जानकारी प्राप्त करनी होती है, यदि वह ऐसा न करे तो मशीन मात्र रह जाएगा।
एक इंजीनियर और एक साधारण कुली में इस जानकारी का ही अन्तर होता है। कुली भी बताने पर हाथ-पैर से वही कार्य कर सकता है जो इंजीनियर के हाथ पैर करते हैं। कई बार तो कुली अपेक्षाकृत अधिक मेहनत भी कर सकता है पर इंजीनियर जितना ज्ञान न होने के कारण उसे वह श्रेय नहीं मिलता जो इंजीनियर को। अनपढ़ किसान की अपेक्षा एक कृषि-स्नातक खेती में अधिक लाभ ले सकता है। सैद्धान्तिक शिक्षा के अभाव में व्यवहार मात्र से जो लाभ मिलेगा वह नगण्य ही होगा। उपासना क्षेत्र में भी ऐसा ही विधान है। उपासक को पूजापाठ के नियम जानकर ही सन्तुष्ट नहीं हो जाना चाहिए वरन् उसके सिद्धान्त, आदर्श, तथ्य एवं स्वरूप को भी समझना चाहिए। जो आवश्यकता को अनुभव करते हैं और उसे पूरा करने में संलग्न रहते हैं उनकी साधना असंदिग्ध रूप से सफल होती है। किन्तु जो केवल कर्मकाँड सीखकर ही सन्तुष्ट हो बैठते हैं उनके हाथ यदि कुछ पड़े भी तो वह बहुत ही स्वल्प होता है।
वेद ज्ञान और विज्ञान के भाँडागार हैं। संसार का समस्त प्रकट और अप्रकट ज्ञान वेदों में भरा पड़ा है। इन वेदों का बीज गायत्री महामन्त्र है। जिस प्रकार विशाल वट वृक्ष एक छोटे से बीज की ही प्रतिकृति होती है उसी प्रकार वेदों में सन्निहित सारी शिक्षायें तथा सारी विद्यायें बीज रूप से गायत्री महामन्त्र में विद्यमान हैं।
इन 24 अर्थों में सूत्र रूप से समाविष्ट प्रेरणाओं और शिक्षाओं पर गम्भीरतापूर्वक विचार और मनन-चिन्तन किया जाये तो लगता है कि विश्व के समस्त धर्म ग्रन्थों एवं नीति शास्त्रों का निचोड़ इन थोड़े से अक्षरों में—गागर में सागर की तरह भर दिया गया है। व्यक्ति एवं समाज की सर्वतोमुखी—सर्वकालीन—समस्त समस्याओं का हल—समस्त उलझनों का समाधान इस महामन्त्र की मूल शिक्षाओं से मिल सकता है। यह चौबीस शब्द इतने सारगर्भित हैं कि ऋषियों को उनकी विवेचना, व्याख्या करने के लिए चार वेदों का अवतरण प्रस्तुत करना पड़ा।
प्राचीन काल में ऋषियों ने गायत्री के तत्व ज्ञान की गम्भीरतापूर्वक शोध की थी और इस गहन समुद्र में गहराई तक प्रवेश करके ज्ञान-विज्ञान की अतुलित रत्न राशि का लाभ लिया था। विश्वामित्र तो उसी के विशेष ऋषि कहलाये। उन्होंने स्वयं और अपने सहचरों सहित इस महाविद्या के रहस्यों को जानने के लिए समस्त जीवन खपाया। और उनने जो पाया उसका लाभ समस्त आध्यात्मिक जगत ने उठाया।
वेदों में ज्ञान भी है और विज्ञान भी। हृदय अक्षरों में से प्रस्फुटित होने वाली शिक्षा मनुष्य-समाज की भौतिक एवं आध्यात्मिक जिज्ञासाओं का समाधान करती है, सुख-शाँतिमय जीवन बिताने का प्रभावपूर्ण मार्गदर्शन करती है। यदि कोई उस प्रकाश का अवलम्बन लेकर अपने कदम उठाता चले तो आनन्द और उल्लास भरा वैसा ही स्वर्गीय जीवन जी सकता है, जैसा कि जीने के लिए यह मानव प्राणी इस वसुधा पर अवतीर्ण हुआ है।
गायत्री में सन्निहित विज्ञान तो इतना महान है कि वर्तमान भौतिक विज्ञान के समस्त चमत्कार उसकी तुलना में तुच्छ ठहराये जा सकते हैं। बेशक, पिछली दो सदियों में भौतिक विज्ञान ने बहुत उन्नति की है। एक-से-एक बढ़कर सिद्धान्तों, यन्त्रों और सुविधा-साधनों का आविष्कार करके एक चमत्कार उत्पन्न किया है। भविष्य में उसकी और भी अधिक उन्नति संभावित है पर साथ ही यह भी निश्चित है कि अध्यात्म विज्ञान की महत्ता एवं उपयोगिता भौतिक विज्ञान की तुलना में असंख्य गुनी अधिक है।
भारत पूर्वकाल में विज्ञान के उच्च शिखर पर जा पहुँचा था। उसके गौरव को विश्व में सर्वोपरि बनाने में इस विज्ञान को ही श्रेय था। दिव्य अस्त्र-शस्त्र, शरीरों में अकूत बल, धन-समृद्धि का इतना बाहुल्य कि स्वर्ण-कलश हर घर पर रखे हों, अभूत आत्म-बल और आन्तरिक शक्तियों के बल पर अभीष्ट परिस्थितियाँ तथा साधन सामग्री उत्पन्न कर सकने की क्षमता हमारे पूर्वजों की विशेषतायें थीं। जहाँ वेद, ब्रह्मविद्या एवं अध्यात्म तत्वज्ञान के आधार पर, भावनात्मक स्तर पर देवताओं जैसे पवित्र बनकर इस धरती पर स्वर्ग अवतरण कराने में सफल हुए थे, वहीं उनने विज्ञान के आधार पर प्रत्येक प्रकार की समृद्धियाँ भी अर्जित की थीं। यही कारण है। कि इस धरती के समस्त निवासियों ने उन्हें भूसुर, धरती के देवता कह कर सम्मानित किया था, जगद्गुरु एवं चक्रवर्ती शासन के महान उत्तरदायित्वों को सौंपा था और जीवन की प्रत्येक दिशा में उनका नेतृत्व स्वीकार किया था। यह उनके विज्ञान की ही महिमा थी।
वह विज्ञान आज जैसा न था जो महंगी तथा आये दिन टूटती-फूटती रहने वाली और निकम्मी हो जाने वाली मशीनों के आधार पर चलता है। तेल, कोयला, पेट्रोल, बिजली आदि ईंधन इस दुनिया में बहुत कम हैं। जिस गति से वैज्ञानिक प्रयोजनों में—कल कारखानों तथा विभिन्न मशीनों में खर्च हो रहा है, उसे देखते हुये यह सब सामग्री सौ डेढ़-सौ वर्षों में समाप्त हो सकती है और तब आज का यह यन्त्रवादी विज्ञान बेमौत मर सकता है। भारतीय तत्वदर्शी वैज्ञानिकों ने—ऋषियों ने—जिस विज्ञान का आविष्कार किया था वह यन्त्रों पर नहीं मन्त्रों पर आधारित था। मानव शरीर हाड़-माँस का पुतला ही नहीं है वरन् उसमें एक से एक बढ़कर चमत्कारी शक्ति केन्द्र प्रसुप्त अवस्था में पड़े हैं। षट्चक्र, 24 उपचक्र, 52 उपत्यिकायें, 108 ग्रन्थियाँ और ब्रह्मरंध्र की सहस्र का केशिक स्फुरणायें उतनी शक्ति तत्वों से ओत-प्रोत है कि यदि उनमें से थोड़ी सी जागृत की जा सके तो इतनी बड़ी उपलब्धियाँ हाथ में आ सकती हैं जिनकी तुलना में वर्तमान विज्ञान की भौतिक उपलब्धियाँ नगण्य एवं तुच्छ ही सिद्ध होंगी। प्राचीन काल में ऋषि, महर्षि अपने शरीरों की प्रयोगशाला में ऐसे ही परीक्षण किया करते थे, योगाभ्यास के द्वारा जो ऋषियाँ और सिद्धियाँ उपलब्ध करते थे, उनके चमत्कारों का आधार कोई जादू नहीं वरन् यह आत्म विज्ञान ही होता था। वेदों में इस प्रकार के आत्म विज्ञान का विस्तारपूर्वक वर्णन हुआ है।
वेदों में वर्णित विज्ञान की क्षमता का पता लगाने के लिये जर्मन सरकार ने कुछ समय पूर्व महत्वपूर्ण प्रयत्न किया। जर्मन प्रोफेसर मैक्समूलर भारत आये थे और यहाँ के वेद-विद्वानों की सहायता से उन्होंने ऋग्वेद का जर्मन भाषा में अनुवाद किया था। इस शोध कार्य के लिये जर्मन सरकार ने लाखों रुपया खर्च किया था। इसके बाद ही जर्मनी ने इतनी बड़ी वैज्ञानिक उन्नति की कि वह थोड़े ही समय में समस्त विश्व में चक्रवर्ती शासन स्थापित करने के सपने देखने लगा। पिछले दो महायुद्ध उसी ने आरम्भ किए। अपनी शक्ति का ठीक अन्दाज ना लगा सकने के कारण वह परास्त तो अवश्य हुआ, पर अपनी उपलब्धियों के कारण वह संसार भर के लिये आज भी एक आश्चर्य एवं रहस्य बना हुआ है। अणु विज्ञान का आविष्कार सबसे प्रथम उसी ने किया था और देशों ने तो पीछे उसी के आविष्कार का लाभ उठाया है।
वेदों की ऋचाओं में सूत्र रूप से समाविष्ट आत्म विज्ञान की महत्ता का क्षेत्र इतना बड़ा है कि उसकी जितनी भी शोध एवं साधना की जा सके उतना ही कम है। प्राचीन काल में इस दिशा में बहुत बड़ी प्रगति की थी, पर यह न समझना चाहिये कि उसमें आगे बढ़ने की गुंजाइश न थी। आगे और भी बहुत कुछ हो सकता था और मनुष्य देवताओं की तरह अजर-अमर बन कर इस धरती को स्वर्ग बना सकता था। यदि उसके हाथ में वेदों से सन्निहित समस्त विज्ञान हाथ लग जाता तो। पर संसार चक्र परिवर्तनशील है। हम उत्थान से विमुख होकर पतन के गर्त में गिरे और उन पूर्व उपलब्धियों को गँवा बैठे। यदि उस विज्ञान से हम वंचित न हो गये होते तो इस दयनीय दुर्दशा में असहायों की तरह पड़े संत्रस्त न हो रहे होते।
ऊपर की पंक्तियों में जिस आत्म विज्ञान की चर्चा की जा रही है वह वेद के दो अंगों में से—ज्ञान-विज्ञान में से—एक प्रमुख तत्व है। यह प्रथम ही कहा जा चुका है कि गायत्री वेदों का बीज मन्त्र है। किसी पेड़ में जो विशेषतायें और सम्भावनायें होती हैं वे सब छोटे से बीज में सूक्ष्म रूप से विद्यमान रहती हैं। मनुष्य की उतनी विशेषताओं वाला शरीर एवं मन अत्यन्त सूक्ष्म रूप से वीर्य कण के एक छोटे से बीज पिंड में मौजूद रहता है। ठीक इसी प्रकार वेदों में वर्णित विविध वैज्ञानिक उपलब्धियाँ गायत्री महामन्त्र के थोड़े से बीज रूप में भरी पड़ी है। इस महाशक्ति की जो ठीक तरह साधना कर सकता है वह अनुपम स्तर का शक्तिवान् बन सकता है। इतिहास पुराणों में ऐसे असंख्यों प्रसंगों का उल्लेख है जिनसे सिद्ध होता है कि गायत्री उपासना का लाभ अद्भुत, आश्चर्यजनक एवं अलौकिक कहे जाने जितना ही होता है।
शास्त्रकारों ने गायत्री की सर्वोपरि शक्ति, स्थिति और उपयोगिता को एक स्वर में स्वीकार किया है। इस संदर्भ में पाये जाने वाले अगणित प्रमाणों में से कुछ नीचे प्रस्तुत हैं—
सर्वेषाँ जप सूक्तानाँ ऋचाश्च यजुषाँ तथा। साम्नाँ चैकाक्षरादीनाँ गायत्री परमो जपः।
—बृहत् पाराशर स्मृति
अर्थ—समस्त जप सूत्रों मे—समस्त वेद मन्त्रों में—एकाक्षर बीज मन्त्रों में—गायत्री ही सर्वश्रेष्ठ है।
इति वेद पवित्राण्य भिहतानि एभ्य सावित्री विशिष्यते।
—शंख स्मृति
अर्थ—यों सभी वेद मन्त्र पवित्र हैं पर इन सब में गायत्री मन्त्र सर्वश्रेष्ठ है।
सप्त कोटि महामन्त्रा, गायत्री नायिका स्मृता। आदि देवा ह्य पासन्ते गायत्री वेद मातरम्॥
—कूर्म पुराण
अर्थ—गायत्री सर्वोपरि—सेनानायक के समान है। देवता इसी की उपासना करते हैं। यही चारों वेदों की माता है।
तदित्यृचा समोनास्ति मन्त्रो वेद चतुष्टये। सर्ववेदश्च यज्ञाश्च दानानि च तपाँसि च। समानि कलया प्राहुर्मुनयो न तदित्यृचः।
—याज्ञवल्क्य
अर्थ—गायत्री के समान चारों वेदों में कोई मन्त्र नहीं है। समस्त वेद, यज्ञ, दान, तप मिलकर भी गायत्री की एक कला के बराबर भी नहीं हो सकते, ऐसा ऋषियों ने कहा है।
दुर्लभा सर्व मन्त्रेषु गायत्री प्रणवान्विता। न गायत्र्याधिकं किंचित् वधीषुपरिगीयते।
—हारीत
अर्थ—इस संसार में गायत्री के समान परम समर्थ और दुर्लभ मन्त्र कोई नहीं है। वेदों में गायत्री से श्रेष्ठ और कुछ नहीं है।
नास्ति गंगा समं तीर्थ न देवः केशवात्परः। गायत्र्यास्तु परं जाप्यं न् भूतं न भविष्यति।
—अत्रि
अर्थ—गंगा के समान कोई तीर्थ नहीं, केशव के समान कोई देवता नहीं। गायत्री से श्रेष्ठ कोई जप न कभी हुआ है और न आगे होगा।
गायत्री सर्व मन्त्राणाँ शिरोमणिस्तथा स्थिता। विधानामपि तेनैताँ साधनेर्त्सव सिद्धये॥ त्रिव्याहृति युताँ देवीमोंकार युगसम्पुटाम्। उपास्यचतुरो वर्गान्साधयेद्योन सोऽन्धधीः॥ देव्या द्विजत्व मासाद्य श्रेयसेन्यरतास्तु ये। ते रत्नाभिववाँछन्ति हित्वा चिंतामणि करात्॥
—महा वार्तिक
अर्थ—गायत्री सब मन्त्रों तथा सब विद्याओं में शिरोमणि है। उससे सब इन्द्रियों की साधना होती है। जो व्यक्ति इस उपासना के द्वारा धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष इन चारों पदार्थों को प्राप्त करने से चूकते हैं वे मन्दबुद्धि हैं। जो द्विज गायत्री मन्त्र के होते हुए भी अन्य मन्त्रों की साधना करते हैं वे ऐसे ही हतभागी हैं जैसे कि चिन्तामणि को फेंककर छोटे-छोटे चमकीले पत्थर ढूँढ़ते फिरने वाले।
यथा कथं च जप्तैषा त्रिपदा परम पावनी। सर्वकामप्रदा प्रोक्ता विधिनाकिं पुनतृय।
—विष्णु धर्मोत्तर
अर्थ—हे राजन! जैसे-तैसे उपासना करने वाले की भी गायत्री माता कामना पूर्ण करती है, फिर विधिवत साधना करने के सत्परिणामों का तो कहना ही क्या है।
पुण्यं सूते दुष्कृतं य हिनास्ति। शुद्धाँ शान्ताँ मातरं मंगलानाँ धेनुँ धीराँ गायत्री मन्त्र माहुः॥
—वशिष्ठ
अर्थ—गायत्री कामधेनु के समान मनोकामनाओं को पूर्ण करती है, दुर्भाग्य, दरिद्रता आदि कष्टों को दूर करती है, पुण्य को बढ़ाती है, पाप का नाश करती है। ऐसी परम शुद्ध—शाँतिदायिनी, कल्याणकारिणी महाशक्ति को ऋषि लोग गायत्री कहते हैं। वस्तुस्थिति से अपरिचित रहने के कारण लोग कम महत्व के कामों में उलझे रहते हैं और अधिक महत्व के—अधिक उपयोगी एवं अधिक लाभदायक कार्यों की उपेक्षा करते रहते हैं। चमकीले काँच के बदले में धुँधले दिखाई पड़ने वाले हीरे को दे बैठने वाले बालक की तरह हम भी यही करते हैं। चन्दन के पेड़ के कोयले बनाकर बेचने वाले अज्ञानी लकड़हारे की तरह हम भी यही करते हैं कि इन्द्रियों की खुजली मिटाने वाली तुच्छ विलास सामग्री प्राप्त करने और धन-संचय की तृष्णा-लिप्सा शाँत करने के बहाने उसे दूने-चौगुने वेग से भड़काने की विडंबना में लगे रहते हैं। सुख की आकाँक्षा से की गई और सारी बाल-क्रीड़ायें आँख खुलने पर उपहासास्पद मूर्खता सी प्रतीत होती हैं। इन तुच्छ कार्यों में हम इतने तन्मय हो जाते हैं कि आत्म-निर्माण एवं आत्म-विकास जैसे महत्वपूर्ण कार्य का ध्यान ही नहीं रहता। बुद्धिमान कहे जाने वाले मानव प्राणी की इस मूर्खता की भर्त्सना जितनी भी की जाय कम है।
दूरदर्शिता इस बात में है कि लाभदायक, अधिक श्रेयस्कर एवं अधिक उपयोगी प्रक्रिया को प्राथमिकता दी जाये। भौतिक सुख-सुविधाओं को शरीर मात्र की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर घटाया जाना चाहिए। उनके लिये उतना ही समय देना चाहिए, उतना ही श्रम करना चाहिए जितना कि नितान्त आवश्यक है। शेष बची हुई क्षमता का उपयोग आत्म-बल बढ़ाने की प्रक्रिया में करना चाहिए। आत्मबल सबसे बड़ा बल है। उसके आधार पर जो विभूतियाँ उपलब्ध की जा सकती हैं वे भी इतनी महान हैं कि भौतिक जगत की समस्त सुविधायें मिलकर भी उनकी तुलना में हेठी पड़ती हैं।
गायत्री-उपासना से मानव के शरीर में सन्निहित अगणित संस्थानों में से कितने ही जागृत एवं प्रखर हो चलते हैं। इस जागृति का प्रभाव मनुष्य के व्यक्तित्व को समान रूप से विकसित होने में सहायक सिद्ध होता है।
व्यायाम से शरीर पुष्ट होता है, अध्ययन से विद्या आती है, श्रम करने से धन कमाया जाता है, सत्कर्मों से यश मिलता है, सद्गुणों से मित्र बढ़ते हैं। इसी प्रकार उपासना द्वारा अन्तरंग जीवन में प्रसुप्त पड़ी हुई अत्यन्त ही महत्वपूर्ण शक्तियाँ सजग हो उठती हैं और उस जागृति का प्रकाश मानव-जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में एक विशिष्टता का रूप धारण करके प्रकट करती हुआ प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर होता है। गायत्री-उपासक में तेजस्विता की अभिवृद्धि स्वाभाविक है। तेजस्वी एवं मनस्वी व्यक्ति स्वभावतः हर दिशा में सहज सफलता प्राप्त करता चलता है।
मानवीय मस्तिष्क में जो शक्ति-केन्द्र भरे पड़े हैं उनका पूरी तरह उपयोग कर सकना तो दूर, अभी मनुष्य को उनका परिचय भी पूरी तरह नहीं मिला है। मनोवैज्ञानिकों को अंतर्मन की जितनी जानकारी अभी तक विशाल अनुसन्धानों के बाद मिल सकी है उसे वे दो प्रतिशत के लगभग ही मानते हैं। प्रसुप्त मन की 98 प्रतिशत जानकारी प्राप्त करना अभी शेष है। इसी प्रकार शरीर शास्त्री डॉक्टरों ने बाहरी मस्तिष्क का केवल 8 प्रतिशत ज्ञान प्राप्त किया है शेष के बारे में वे भी अभी अनजान हैं मस्तिष्क सचमुच एक जादू का पिटारा है। इसमें सोचने-समझने की क्षमता तो है ही, साथ ही उसमें ऐसे चुम्बक तत्व भी हैं जो अनन्त आकाश में भ्रमण करने वाली अद्भुत सिद्धियों एवं सफलताओं को अपनी ओर खींचकर आकर्षित कर सकते हैं, सूक्ष्म जगत में अपने अनुकूल वातावरण बना सकते हैं। जिन व्यक्तियों के साथ अपनी कामना-आकाँक्षा का सम्बन्ध है उन पर ऐसा प्रभाव डाला जा सकता है कि उसे हमारे अनुकूल गतिविधि ही अपनानी पड़े। गायत्री उपासना के द्वारा उपासक में ऐसे ही मानसिक चुम्बक तत्व सक्रिय हो उठते हैं। मनोबल बढ़ने से ऐसी विद्युत धारा अंतर्मन के प्रसुप्त क्षेत्रों में गतिशील हो जाती है कि अब तक अपने प्रयोजन में आया हुआ मस्तिष्कीय चुम्बक सक्रिय हो उठता है और वे उपलब्धियाँ सामने लाकर खड़ी कर देता है जिन्हें आमतौर से सिद्धियाँ, विभूतियों का वरदान एवं दैवी सहायता कहा जा सके।
अजगर की इच्छा शक्ति उसकी आँखों में होकर बाहर देखती है तो उड़ते हुए पक्षी रुक जाते हैं और खिंचते हुए उसके शिकार बनकर नीचे खिंचकर चले आते हैं। शेर या भेड़िये के शरीर से निकलने वाला प्रभाव उनके शिकार को अनायास ही हक्का-बक्का कर देता है और समीप पहुँचने पर तो बेचारे छोटे जानवर बोलना-चालना तक भूल जाते हैं। मनुष्य का मनोबल अजगर और सिंह से असंख्य गुना है। गायत्री-अनुष्ठान के लिये विधि-विधान द्वारा बढ़ाने वाले मनोबल द्वारा यदि वह सक्रिय हो उठे तो अभीष्ट सफलतायें प्राप्त कर सकने की परिस्थितियाँ निर्मित या उपलब्ध कर सकना उसके लिये अधिक कठिन नहीं रहता।
उपासना में बरती गई तपश्चर्या से द्रवित होकर गायत्री माता ने अमुक सिद्धि या सफलता प्रदान की—यह भावुक भक्त का दृष्टिकोण है। इसी तथ्य का वैज्ञानिक दृष्टिकोण यह है कि कठोर नियम, प्रतिबन्धों का पालन करने में जो प्रतिरोधात्मक क्षमता बढ़ी, उसने मनोबल का विकास किया। उसने अंतर्मन के प्रसुप्त शक्ति-केन्द्रों का चुम्बकत्व जगाया और उसी जागरण ने अभीष्ट सफलतायें खींचकर सामने ला खड़ी कर दीं। मनुष्य अपने आप में एक देवता है। उसके भीतर वे समस्त दैवी शक्तियाँ बीज रूप विद्यमान रहती हैं जो इस विश्व में अन्यत्र कहीं भी हो सकती हैं। अन्यत्र रहने वाले देवता अपनी निर्धारित जिम्मेदारियाँ पूरी करने में लगे रहते हैं। वे हमारे व्यक्तिगत कामों में इतनी अधिक दिलचस्पी नहीं ले सकते कि अगणित उपासकों या भक्तों की अगणित प्रकार की समस्याओं के सुलझाने में संलग्न हो सकें। हमारी समस्याओं को हल करने की क्षमता हमारे अपने भीतर रहने वाले देवता में ही होती है और उसी को किसी अनुष्ठान द्वारा सशक्त एवं गतिशील बना करके साधक को अपना प्रयोजन वस्तुतः आप ही पूरा करना पड़ता है।
गायत्री-उपासना मनुष्य-जीवन को बहिरंग एवं अन्तरंग दोनों ही दृष्टियों में समृद्ध और समुन्नत बनाने का राजमार्ग है। बाह्य उपचार से बाह्य जीवन की प्रगति होती है, पर अन्तरंग विकास के बिना उसमें पूर्णता नहीं आ पाती। बाहरी जीवन की विशेषताएँ छोटा-सा शोक, सन्ताप, रोग, कष्ट, अवरोध एवं दुर्दिन सामने आते ही अस्त-व्यस्त हो जाती हैं, पर जिस व्यक्ति के पास आन्तरिक दृढ़ता, समृद्धि एवं क्षमता है वह बाहर के जीवन में बड़े से बड़ा अवरोध आने पर भी सुस्थिर बना रहता है और भयानक भँवरों को चीरता हुआ अपनी नाव पार ले जाता है। भौतिक समृद्धि और आत्मिक शाँति के लिए उपासना की वैज्ञानिक प्रक्रिया अचूक साधना है और कहना न होगा कि उपासनाओं में सर्वश्रेष्ठ एवं सर्वोपरि एकमात्र गायत्री महामन्त्र की उपासना ही है।
सकाम उपासना से प्रभु प्राप्ति-
लोग पूजा करते हैं, प्रार्थना करते हैं, उसे प्रसन्न करने का प्रयत्न करते हैं। किन्तु कैसी बच्चों जैसी बात हैं, कितने आश्चर्य का विषय है कि उसके प्रसन्न होने के पूर्व ही अपनी इच्छाओं को सामने रखने लगते हैं, मनोरथों की माँगने लगते हैं, सो भी मनोरथ कौन से? साँसारिक भोग जो संसार में चारों ओर बिखरे पड़े हैं और जिनका न कोई मूल्य है और न ही महत्व। बल्कि सब-के-सब हेय और त्याज्य माने गये हैं।
ऐसे मूर्ख और दरिद्रमना व्यक्ति से कोई साधारण व्यक्ति भी प्रसन्न नहीं होगा फिर परमात्मा के प्रसन्न होने की बात क्या हो सकती है?
कामनाओं को साथ लेकर परमात्मा की पूजा-प्रार्थना करने वाला वास्तव में परमात्मा की नहीं, अपनी कामनाओं की ही उपासना किया करता है। उसमें जो कुछ लगन, तीव्रता और तन्मयता होती है उसका हेतु कामनाओं की लिप्सा ही हुआ करती है, प्रभु-प्रेम नहीं! तब भला ऐसा वंचक उस परम विज्ञानमय प्रभू को किस प्रकार प्रसन्न कर सकता है?
—संत तुकाराम
अपनों से अपनी बात—
सन् 66 में अखण्ड-ज्योति अपने परिवार की संख्या घटा रही है पर उसका स्तर अपेक्षाकृत बहुत ही उत्कृष्ट बन जायगा। इन उत्कृष्ट व्यक्तियों की सहायता से हमें नव निर्माण मिशन में अपेक्षाकृत अधिक सहायता मिलेगी। क्योंकि एक सीमित संख्या के साथी रह जाने पर उनकी ओर अधिक ध्यान दे सकना—उनके साथ अधिक परिश्रम कर सकना हमारे लिए अधिक सम्भव होगा। सेना थोड़ी है पर बहादुरों की है—अनुशासित, सुशिक्षित और सुसंगठित है तो उससे अधिक सफलता मिलती है। अनाड़ी, डरपोक, अव्यवस्थित भीड़ से सेना का काम लिया जाय तो वह गड़बड़ी ही अधिक उत्पन्न करेगी। स्वयं भी कुछ काम न करेगी और जो अच्छे योद्धा साथ में होंगे, उनको भी काम कर सकना कठिन बना देगी। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुये कुशल सेनापति फौजी ट्रेनिंग तो बहुतों को देते हैं पर महत्वपूर्ण मोर्चे पर लड़ने को उन्हें ही भेजते हैं, जिनकी वीरता और कुशलता पर उन्हें पूर्ण विश्वास होता है। अखण्ड-ज्योति के सदस्यों की वर्तमान छटनी इसी दृष्टि से हो रही है।
कई व्यक्तियों ने आशंका प्रकट की है कि इस प्रकार छटनी करने से तो अपना कार्यक्षेत्र बहुत थोड़ा रह जायगा, हमें भारत ही नहीं समस्त विश्व में युग परिवर्तन की भूमिका प्रस्तुत करनी है, इसके लिये अधिकाधिक व्यक्ति अपने संगठन में होने चाहियें थे। सदस्यों की संख्या बढ़नी चाहिये थी, पर जब वह संख्या घटाई जायगी तो काम कैसे बढ़ेंगे? थोड़े से व्यक्ति उस बड़े संकल्प को कैसे पूरा कर सकेंगे, जो हम लोगों ने विश्व-मानव के सम्मुख घोषित किया है।
उपरोक्त आशंका ऊपर से ही सारगर्भित लगती है, पर उसमें तथ्य कम है। संख्या बल-प्रदर्शन की दृष्टि से उपयोगी होती है पर काम थोड़े से काम के व्यक्ति ही चलाया करते हैं। भीड़ का उत्साह क्षणिक होता है, जिनमें दृढ़ता और निष्ठा नहीं वे आवेश में कुछ तूफान तो कर सकते हैं पर देर तक किसी आदर्श पर ठहर नहीं सकते। ऐसे लोग नारे लगाने और प्रदर्शन करने के लिये काम चलाऊ प्रयोजन पूरा कर सकते हैं पर किसी दीर्घकालीन पारमार्थिक प्रयोजन के लिये वे कुछ अधिक काम के सिद्ध नहीं हो सकते। कोई ठोस काम हमेशा निष्ठावान आदर्श व्यक्तियों के बल-बूते पर ही चलता है।
गान्धी जी के स्वराज्य आन्दोलन में जुलूस और प्रदर्शनों में लाखों की भीड़ जमा होती थी, पर उस अभियान की संचालन भूमिका प्रस्तुत करने वाले थोड़े से ही व्यक्ति थे। गुरु गोविन्दसिंह के पीछे शिष्यों की भारी भीड़ थी, पर उनने देखा कि इससे तो उल्टी गड़बड़ी पड़ेगी। काम के थोड़े से मजबूत व्यक्ति ही छाँटे जायँ, उन्होंने सिर कटाने वाले 5 शिष्यों की माँग की। कमजोर शिष्य भाग खड़े हुये पर जो मजबूत 5 शिष्य रह गये, उनकी परीक्षा की और उन्हीं के बल-बूते पर उन्होंने सिख धर्म की ऐतिहासिक परम्परा सम्पन्न की। ईसा मसीह को सारे जीवन के प्रयत्न करने पर लाखों की संख्या में उपदेश सुनने वालों में से केवल 12 सच्चे शिष्य मिले थे। पर थे वे इतने मजबूत कि उनके प्रयासों के बलबूते पर आज लगभग आधी दुनिया ईसाई धर्म में दीक्षित दिखाई पड़ रही है। बुद्ध-विहारों में लाखों भिक्षु, भिक्षुणी निवास करते थे पर उनके मिशन का संचालन कर सकने योग्य केवल 84 व्यक्ति ही मिल सके। कीमत संख्या की नहीं—मजबूती की है—और यह मजबूती बिना परीक्षा के प्रकट ही नहीं होती।
जिन दिनों हमने सहस्र कुण्डी गायत्री महायज्ञ किया था उन दिनों 24 लाख सदस्य गायत्री परिवार के थे। उनमें से करीब 4 लाख मथुरा आए थे। एक माला गायत्री जप करना उन दिनों सदस्यता की शर्त थी। यदि उसी स्तर के लोग—उसी क्रम से बढ़ाये जाते रहते तो अब तक उनकी संख्या करोड़ों हो गई होती। सभा, सम्मेलन, जुलूस, प्रदर्शनों का जुगाड़ उस भीड़ में खूब बनता रहता। कई व्यक्ति उसे सफलता का चिन्ह मानते। पर हमारा दृष्टिकोण भिन्न है। मजबूती के अभाव में वह भीड़ बरसाती मक्खी, मच्छरों का ही उदाहरण बनती, संख्या बल से कुछ काम न बनता। इसलिये सोचा गया कि ऐसी ही भीड़ बढ़ाते जाने से प्रदर्शन तो बढ़ेगा पर मिशन की परिपक्वता में सहायता न मिलेगी अतएव काम के आदमी बढ़ाये जाएं। विचारों की शक्ति और उपयोगिता समझ सकने वाले लोग इनमें से तलाश किए जायें क्योंकि विचार शक्ति का, युग परिवर्तन का प्रयोजन वे लोग न कर पायेंगे जिन्हें मानव जीवन के विकास में प्रौढ़ विचारधारा की उपयोगिता ही विदित नहीं। जो स्वयं प्रकाश पूर्ण बौद्धिक प्रखरता को सुनने-समझने के लिए तैयार नहीं, वे भला और किसी को क्या कुछ कह सुन सकेंगे और क्या अपने जीवन में प्रखरता ला सकेंगे। अखण्ड-ज्योति हमारी भावनाओं और विचारधाराओं का दर्पण है। जिन्हें उसे पढ़ने से रुचि, आकाँक्षा न जग सकी तो वे शरीर से हमारे समीप भले हों, भावनात्मक दृष्टि से हजारों कोस दूर हैं। जिन्हें हम विचार भी न दे सकेंगे उनके जीवनों में परिवर्तन तथा उस परिवर्तन से युग को प्रभावित करने का प्रयोजन कैसे पूरा करेंगे? अतएव सोचा कि भीड़ को लाखों से करोड़ों में ले जाने की अपेक्षा- भावनात्मक दृष्टि से परिष्कृत व्यक्तियों का चयन किया जाय। उस तलाश में 40 हजार व्यक्ति हाथ लग गए।
लोगों ने कहा “आपने 24 लाख से घटा कर मिशन 40 हजार कर लिया,—आवश्यकता बढ़ाने की थी, आपने घटाया। यह उचित नहीं हुआ।” पर यह आशंका निरर्थक निकली। 24 लाख व्यक्ति जो करते थे जो कर सकते थे उसकी तुलना में 40 हजार ने 10 गुना अधिक काम किया। अखण्ड ज्योति के विचारों को जो निरन्तर पढ़ेगा उसके जीवन में कोई आदर्शवादी परिवर्तन न हो यह सम्भव नहीं। यदि हमारी भावनायें सच्ची हैं, सजीव हैं, सशक्त हैं तो कोई कारण नहीं कि वे जहाँ पहुँचें अपना रचनात्मक काम न करें। पाठकों के जीवनों में आश्चर्यजनक परिवर्तन हुये—उन परिवर्तनों ने लाखों-करोड़ों को प्रभावित किया। जो कुछ हुआ है वह अविज्ञात है। यदि इसका लेखा-जोखा तैयार किया जाय और उसे प्रकाश में लाया जाय तो लोग आश्चर्य से दाँतों तले उंगली दबाते हुये कहेंगे कि नैतिक और साँस्कृतिक पुनरुत्थान की दिशा में इतनी अधिक प्रगति इस छोटे से संगठन द्वारा हो सकना सचमुच ही अनुपम है।
अपने तक सीमित रहने वाले अखण्ड ज्योति के सदस्य, अपने से स्वाभाविक संबद्ध लोगों को ही प्रभावित कर सके। अब हमारी आवश्यकता उन कार्यकर्ताओं की है जो जनता में प्रवेश कर कुछ अधिक व्यापक क्षेत्र में नव-निर्माण के मिशन को प्रतिष्ठित कर सकने में समर्थ हों। 24 लाख में से जब 40 हजार निकले तो 40 हजार में से 4 हजार से अधिक की आशा कैसे की जाय? एक घंटा समय और दस पैसे नित्य की शर्त यद्यपि भौतिक दृष्टि से किसी भी व्यस्त और नितान्त निर्धन व्यक्ति के लिये भी कठिन नहीं है। पर जिनमें भावनात्मक दृढ़ता का अभाव है उनके लिये यह शर्तें पहाड़ की तरह दुर्गम और समुद्र की तरह दुस्तर है। वे बेचारे अनेक बहाने बता कर इस झंझट से छुटकारा पर रहे हैं। हमें न इसका दुःख है और न क्षोभ। सरकारी स्कूल-कॉलेजों का परीक्षा फल 30-40 प्रतिशत रहता है। कानून की परीक्षा का रिजल्ट तो कभी-कभी 10-15 प्रतिशत ही रह जाता है। हमारी छटनी परीक्षा में 10 प्रतिशत परिजन ही उत्तीर्ण हों तो उसमें आश्चर्य की क्या बात है। आदर्शवाद को स्वीकार ही नहीं व्यवहार में लाने के लिये भी तत्पर व्यक्ति इतने प्रतिशत मिल जायँ तो यह कहना चाहिये कि अभी निराशा की कोई बात नहीं। उज्ज्वल भविष्य की पूरी-पूरी सम्भावना है। 4 हजार व्यक्ति यदि अपने सच्चे साथी हो सकें तो हमें पूरा और पक्का विश्वास हो जायगा कि जिस नव निर्माण के लिये युग परिवर्तन के लिये हम प्रयत्नशील हैं इसका भौतिक कार्यक्रम ठीक तरह चलता रहेगा और वह समयानुसार पूर्ण सफल होगा। इस महान अभियान की सफलता के लिये—युग परिवर्तन के लिये—सूक्ष्म वातावरण की आवश्यकता है उसकी पूर्ति पाँच वर्ष बाद कठोर तपश्चरण द्वारा पूरी करेंगे। महर्षि अरविन्द और महर्षि रमण का भारतीय स्वाधीनता की उपलब्धि में क्या योग रहा, इस रहस्य से बहुत कम लोग परिचित हैं। इसी प्रकार युग निर्माण आन्दोलन अगले दिनों जिस प्रचण्ड रूप में मूर्तिमान होगा उसकी रहस्यमय भूमिका कम ही लोगों को विदित होगी, पर यह निश्चित है कि वह आन्दोलन बहुत ही प्रखर और प्रचण्ड रूप से उठेगा और पूर्ण सफल होगा। सफलता का श्रेय किन व्यक्तियों के लिये, किन संस्थाओं को मिलेगा इससे कुछ बनता-बिगड़ता नहीं। पर होना यह निश्चित रूप से है। इस उज्ज्वल भविष्य की कृषि को बोने, उगाने, सींचने के लिये जिन कर्मठ भुजाओं की आवश्यकता है, उनकी आज जरूरत पड़ रही है। फसल काटने के समय बहुत होंगे पर जोतने बोने का समय तो आज है। आज 4 हजार जिन श्रमिकों की अपेक्षा है, उन्हें ही अखण्ड ज्योति परिवार में से छाँटा गया है। दो शर्तों ने गड़बड़ी फैलाकर 40 हजार को घटा कर 4 हजार कर दिया यह बात देखने में दुखंद सी लगती है, पर मजबूरी हमारी भी है। जो खुद ही कुछ त्याग बलिदान करने की बात कह किस मुँह से सकेंगे? अब गाल बजाने वालों का जमाना चला गया। बढ़-बढ़कर बोलने और लिखने से जनता का मनोरंजन मात्र ही हो सकता है। प्रभाव उनका पड़ता है जो कुछ स्वयं करते हैं। जन मानस को त्याग, बलिदान की प्रेरणा दे सकने की आवश्यकता केवल वे ही लोग पूरी कर सकेंगे जो पहले अपने जीवन में वैसा कुछ कर सकने की अपनी प्रामाणिकता सिद्ध कर चुके होंगे। छटनी के लिए जो शर्तें जोड़ दी गई हैं, वे वस्तुतः व्यक्ति के भावनात्मक स्तर एवं आदर्शवादिता के प्रति निष्ठा की ही जाँच पड़ताल है। उस पर व्यस्त और निर्धन व्यक्ति भी खरे उतर सकते हैं और धनी तथा निठल्ले ही खोटे सिद्ध हो सकते हैं। प्रश्न सुविधा-असुविधा का रत्ती भर भी नहीं। प्रश्न स्तर का है। थोड़े ऊँचे स्तर के लोग ही इस कार्य को कर सकेंगे जिसके लिए इन दिनों हमारी अन्तरात्मा निरन्तर उत्तेजित रहती है। इसलिए संख्या का घटना अन्य स्वजनों की तरह हमें भी भले ही अच्छा न लगे, पर विवशता ने इसके अतिरिक्त कोई मार्ग भी तो नहीं छोड़ा है। काम के आदमियों के बिना बड़ा प्रयोजन कैसे सिद्ध हो? और काम के आदमी बिना परीक्षा के परखे किस प्रकार जायँ? परीक्षा ऐसी कैसे हो जिसमें तनिक भी असुविधा का प्रसंग न आने पाये?
यह आशंका किसी प्रेमी परिजन को नहीं करनी चाहिए कि इस छटनी से अपना मिशन एवं कार्य क्षेत्र घट जायगा। सच बात तो यह है कि वह अगले दिनों तेजी से बढ़ेगा और अब की अपेक्षा अगले ही वर्षों में दूना-चौगुना हो जायगा। जिन चार हजार व्यक्तियों ने पाँच वर्ष तक हमारे विचार अभियान में कन्धे से कन्धा मिलाकर साथ देने की प्रतिज्ञा की है वे झूठे, धोखेबाज, अकर्मण्य और अनुत्तरदायी नहीं है। जिनने प्रतिज्ञा पत्र भरे हैं उनने यह समझा है कि अगले दिनों हमें क्या करना होगा। छपे कागज पर कौतुकवश हस्ताक्षर कर भेजने वाला बचकाना—सदस्य शायद ही इनमें से कोई हो। हमें इन सुदृढ़ सहचरों की श्रद्धा और कर्मठता पर पूरा भरोसा है और विश्वास है कि वे ईमानदारी और तत्परतापूर्वक दोनों प्रतिज्ञायें पालन करते रहेंगे।
अब तक बहुत सी जगह अखण्ड ज्योति कोने में पड़ी सिसकती रहती थी। दूसरों के दबाव में लोग चन्दा तो दे देते थे पर उसे पूरी दिलचस्पी से पढ़ते नहीं थे। ऐसे अश्रद्धालुओं को अब हटा दिया गया है। केवल उतने ही सदस्य रह जायेंगे जो समझते हैं कि यह पन्ने नहीं—आचार्य जी के अन्तःकरण के मूर्तिमान सजीव चित्र हैं। वे उन्हें भावनापूर्वक पढ़ेंगे और श्रद्धापूर्वक हृदयंगम करेंगे। इतना ही नहीं अब उन्हें इस विचारधारा को निजी अपने घर परिवार में अनिवार्य रूप से और पास-पड़ोस में सुविधानुसार प्रसारित करना होगा। हर परिवार में औसतन 5 व्यक्ति तो होते ही हैं। हम आशा करेंगे कि 4 हजार सदस्य हमारे विचारों को अपने घर के हर पढ़े सदस्य को पढ़ाने और बिना पढ़े को सुनाने की जिम्मेदारी पूरी करेंगे। इसी प्रकार यह भी स्वाभाविक है कि घर से बाहर कम-से-कम 5 व्यक्ति मित्र या प्रभावी परिचित हों। नव निर्माण का साहित्य उन्हें पढ़ने देने और वापिस लेने में—उनके साथ प्रस्तुत विचारों पर चर्चा करने में थोड़ा समय खर्च करते रहना किसी के लिए कुछ भी कठिन न होगा। 5 घर में और 5 बाहर कुल मिलाकर 10 से भी क्या कम किसी व्यक्ति का प्रभाव क्षेत्र होगा? इस क्षेत्र में हर स्थायी सदस्य हमारे विचारों का विस्तार करेगा तो वर्तमान 4 हजार सदस्यों द्वारा 40 हजार नयों को यह विचार दिये जाते रहेंगे। इस प्रकार 40 हजार नये और 4 हजार वे स्वयं कुल मिलाकर 44 हजार पाठकों द्वारा अखण्ड ज्योति, युग निर्माण योजना और ट्रैक्ट साहित्य पढ़ा, सुना, समझा और समझाया जाता रहेगा तो हमारा मिशन अगले वर्ष घटेगा नहीं, बढ़ेगा।
फिर जिन्हें स्थायी सदस्यों ने प्रयत्न करके नव निर्माण साहित्य पढ़ाया, सुनाया या समझाया है कि वे क्या यों ही मिट्टी के पुतले बने रहेंगे। निश्चित रूप से उनमें नव चेतना, प्रकाशपूर्ण स्फुरण उत्पन्न होगी और उनमें से ही कितने ही दोनों शर्तें पूरा करने वाले नये सदस्य बनेंगे। उनके प्रभाव से दूसरे बढ़ेंगे। इस प्रकार जलते हुए दीपक अपनी नई पौद तैयार करते हुए अमावस के दिन दिवाली जगमगाने का प्रयोजन पूरा कर सकेंगे। जो स्वयं बुझे पड़ें हैं उनसे दूसरों को जलाने की आशा नहीं की जा सकती, पर जो प्रज्वलित है वह अपने क्षेत्र में प्रकाश क्यों न करेगा? 4 हजार जलते दीपक कितना प्रकाश उत्पन्न करेंगे, कितने नये दीपक जलायेंगे? और फिर वह परम्परा एक से दूसरे में—दूसरे से तीसरे में—तीसरे से चौथे में फैलती हुई कितनी व्यापक, विस्तृत होगी? इसकी, सम्भावना का चित्र सामने आते ही हमारा मन उज्ज्वल भविष्य की आशा से उल्लसित हो उठता है। सच्चे साथियों की सहायता से क्या नहीं किया जा सकता? 40 हजार की भीड़ जिसे नहीं कर सकती थी उसे 4 हजार प्रबुद्ध परिजन कर दिखायेंगे, इसका हमें पूरा भरोसा है। इस प्रकार संख्या घट जाने पर भी हमारा मिशन अगले दिनों घटने वाला नहीं है, वस्तुतः वह कई गुना बढ़ने वाला है—आँधी और तूफान की तरह गतिशील होता हुआ विश्व-व्यापी एक महान अभियान का रूप धारण करने वाला है।
एक घण्टा समय देने की प्रतिज्ञा को इस रूप में निबाहना हर सक्रिय सदस्य के लिए सम्भव होगा ही कि वह अपने निज के परिवार में हर सदस्य को और घर से बाहर के मित्र, परिचितों, स्वजन, सम्बन्धियों को इस विचारधारा के संपर्क में लगाने, उन्हें पढ़ाने-सुनाने के लिये प्रयत्न करे। यह काम सरल होते हुए भी महत्वपूर्ण है। आज बीजारोपण होगा, उसका प्रतिफल अगले दिनों हरी-भरी फसल के रूप में सामने आयेगा।
दस नये पैसे का खर्च जिनने स्वीकार कर लिया है उनके घर में दोनों पत्रिकाओं और आग उगलने वाले ट्रैक्टों का एक सशक्त पुस्तकालय बनाना ही है। विचार क्राँति के लिए यह नव निर्माण पुस्तकालय एक प्रखर शस्त्रागार का काम करेगा। चार हजार घरों में दीप्तिवान यह ज्ञान-यज्ञ अगले ही दिनों कितना ठोस—कितना महत्वपूर्ण—कितना महान—कार्य सम्पन्न करेगा, इसे लोग आश्चर्यचकित होकर देखेंगे। सदस्यों की संख्या घट जाने पर भी स्तर की उत्कृष्टता बढ़ेगी। अतएव हमारा मिशन घटने वाला नहीं, बढ़ने ही वाला है। इस सम्बन्ध में किन्हीं शुभ चिन्तकों को न तो शंका करनी चाहिए और न आशंका। समर्थ परमेश्वर का यह पुण्य प्रयोजन अगले दिनों व्यापक, सार्थक और सफल होने वाला है।
पञ्चकोशी गायत्री साधना
पंचकोशों की उच्चस्तरीय साधना का जो प्रशिक्षण गत वर्षों में चला है, अब उस मार्ग के साधक कुछ दिन उसी को पक्का करें। उसी अभ्यास-क्रम को जारी रखें। इस लेख-माला के अंतर्गत उन्हें आगे की शेष साधना भी मिल जायेगी पर उसकी पूर्णता और सफलता के लिए अतिरिक्त सहायता की आवश्यकता पड़ेगी, उसकी पूर्ति आज से 5 वर्ष बाद ही सम्भव है। इसलिए अभी जो सीखा है उसे परिपक्व करना, आगे की आवश्यक जानकारी प्राप्त करना तथा मनोभूमि तैयार करना ही पर्याप्त है।
*समाप्त*