आस्तिकता का अर्थ है ईश्वर को मानना, मानने का अर्थ है उसका अनुयायी होना और अनुयायी होने का तात्पर्य है उसके विचार, निर्देश एवं आदर्श के अनुसार चलना। जो अपने को आस्तिक मानता है उसे यह भी मानना होगा कि वह परम प्रभु परमात्मा का अनुयायी है, उसका प्रतिनिधि है, उसका ऐसा प्रतिबिम्ब है जिसको देखकर परमात्मा के स्वरूप तथा उसके गुण तथा विशेषताओं का आभास पाया जा सकता है। परमात्मा में विश्वास करते हुए भी अपनी रीति-नीति उसके अनुरूप नहीं बनाता, पवित्र एवं उन्नत आत्मा नहीं बनता वह धृष्ट, विद्रोही तथा प्रच्छन्न नास्तिक है।
आस्तिकता स्वयं में ही एक उदात भावना है जिसे हर मनुष्य को अपने में विकसित करना ही चाहिये। उस परमात्मा को मानना, उसमें विश्वास करना, मनुष्य का परम-पावन कर्तव्य है जिसने चिदानन्द का साधन यह समर्थ जीवन दिया है, एक से बढ़कर विशेषतायें एवं क्षमतायें दी हैं। साथ ही आस्तिकता एक बहुत बड़ा सम्बल भी है आस्तिक भावना एक ऐसी अक्षय एवं अमोघ शक्ति है जिसके सहारे मनुष्य भयानक से भयानक संकट सागर को सहज में ही पार कर जाता है। संसार में किसी समय भी कोई संकट आ सकता है और ऐसी भी स्थिति हो सकती है कि उस समय उससे बचने अथवा उभरने का कोई साधन न हो, संसार के सारे मित्रों, प्रेमियों, हितैषियों ने साथ छोड़ दिया हो, ऐसी भयानक स्थिति के अवसर पर उस निरुपाय एवं असहाय मनुष्य की आस्तिकता बहुत बड़ी सहायता बन जाती है। सब ओर से निराश होकर आस्तिक व्यक्ति ईश्वर का सहारा पकड़ लेता है उसे ही अपना सब से बड़ा सहायक एवं साथी समझ लेता है।
सर्वशक्तिमान परमात्मा का अंचल पकड़ते ही उसमें आत्मबल, आत्मविश्वास तथा उत्साहपूर्ण आशा का संचार होने लगता है। प्रकाश पाते ही अन्धकार दूर हो जाता है मनुष्य में संकट सहने अथवा उसको दूर कर सकने का साहस आ जाता है। ईश्वर में अखण्ड विश्वास रखने वाला सच्चा आस्तिक जीवन में कभी हार नहीं मानता। एक तो उसे यह विश्वास रहता है कि परमात्मा जो भी सुख-दुख अनुग्रह किया करता है उसमें मनुष्य का कल्याण ही निहित रहता है। इसलिए वह किसी हर्ष, उल्लास अथवा कष्ट-क्लेश से प्रभावित नहीं होता। दूसरे परमात्मा के प्रति आस्थावान होने से उसमें संकट सहने की शक्ति बनी रहती है। आस्तिक व्यक्ति परमात्मा का नाम लेकर संकट सहना क्या उसका नाम लेकर जहर पी जाते और शूली पर चढ़ जाते हैं। मीरा, प्रहलाद, ईसा और मंसूर ऐसे ही सच्चे आस्तिक थे।
नास्तिक व्यक्ति के पास परमात्मा जैसा कोई अन्तिम सम्बल अथवा शक्ति साहस का स्रोत नहीं होता। इसलिए वह निरुपाय अथवा निस्सहायता की दशा में संकट आ जाने पर वह अस्त-व्यस्त, अशान्त एवं हताश हो जाता है। मानसिक सन्तुलन बनाये रहने के लिए उसके पास आस्तिकता के भाव जैसा कोई मानसिक आधार नहीं होता। इस अभाव में या तो वह अपने जीवन से भटक जाता है, कुमार्गगामी, सिद्धान्त-हिंसक, आदर्शहीन होकर अपनी रक्षा करता अथवा हार मानकर मैदान से हट जाता है, अथवा निराश होकर आत्महत्या तक कर लेता है। संसार में मानसिक संकटों से घबराकर विक्षिप्त होने अथवा आत्महत्या करने वालों की यदि मनःपरीक्षा सम्भव हो सके और उनके विचारों तथा विश्वासों का पता लगाया जा सके तो निश्चय ही वे नास्तिक भावना वाले निकलेंगे।
आस्तिकता न केवल बाह्य संकटों में सहायक होने वाला सम्वल अथवा सहारा है, अपितु वह आन्तरिक शत्रुओं, काम, क्रोध, मद, लोभ आदि से भी रक्षा करती है। उसका आत्मिक विश्वास रहता है कि जिस प्रकार परमपिता परमात्मा का प्रिय पुत्र, अनुयायी अथवा प्रतिबिम्ब हूँ, उसी प्रकार प्रत्येक प्राणी भी है। इस विश्वास से पुलकित सच्चा आस्तिक प्रत्येक प्राणी को अपना भाई बहन ही मानता और तदनुरूप प्रेम व्यवहार करता है। संपर्क में आने वाला जब प्रत्येक व्यक्ति अपना भाई-बहन ही है तब सच्चा आस्तिक उनसे कठोर, क्रूर अथवा छल-कपटपूर्ण व्यवहार किस प्रकार कर सकता है? वह तो सब से प्रेमपूर्ण, निश्छल एवं युक्त व्यवहार ही करेगा। बंधु भाव से प्रेरित वह प्रत्येक की सहायता करने को हर समय तैयार रहेगा। वह किसी से स्वार्थ अथवा विश्वासघात पूर्ण व्यवहार कदापि नहीं करेगा। इस प्रकार सच्चा आस्तिक सहज ही में आत्म-कल्याणकारी यज्ञ भावना का अधिकारी बन जाता है। काम, क्रोध अथवा लोभ के शत्रु तभी आक्रमण करते हैं जब मनुष्य का मन मलीन अथवा आरक्षित रहता है। आस्तिक व्यक्ति का ईश्वरीय विश्वास एवं परमात्मा की अनुभूति उसके हृदय को प्रसन्न एवं उज्ज्वल बनाने में सहायक होते हैं। उसकी भावनाओं में हर समय परमात्मा का निवास रहता है जिससे उसके सुरक्षित हृदय पर आसुरी वृत्तियाँ आक्रमण नहीं कर पाती।
आस्तिक भावना से परमात्मा का सहारा पाकर मनुष्य नितान्त निर्भय एवं निश्चिंत हो जाता है। उसके अखण्ड विश्वास के रूप में उसका साथी, मित्र, पिता तथा रक्षक हर समय उसके साथ रहता है। परमात्मा रूपी पिता अथवा रक्षक के साथ रहने पर भय अथवा चिन्ता किस बात की? संसार में ऐसा शक्तिशाली दुष्ट कौन हो सकता है जो सर्वशक्तिमान परमात्मा से रक्षित किसी आस्तिक का बाल भी बाँका कर सके। अखण्ड विश्वास के साथ जब कोई आस्तिक भूत, भविष्य, वर्तमान के साथ अपना सम्पूर्ण जीवन परमात्मा अथवा उसके उद्देश्यों को सौंप देता है, तब उसे अपने जीवन के प्रति किसी प्रकार की चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं रहती। तब भी यदि वह चिन्ता करता है तो समझना चाहिए कि उसने अपना दायित्व पूरी तरह से सर्वशक्तिमान को सौंपा नहीं है अथवा उसकी ईमानदारी में विश्वास नहीं करता—कि धरोहर रूप में उसके पास सौंपें हुए जीवन की वह खोज खबर लेता ही रहेगा। जो अपना सर्वस्व पूर्णरूप से परमात्मा को सौंपकर उसके उद्देश्य में नियोजित हो जाता है, पूरी तरह से उसका बन जाता है, परमात्मा उसके जीवन का सारा दायित्व खुशी-खुशी अपने ऊपर ले लेता है और कभी भी विश्वासघात नहीं करता। आत्म-समर्पण में कमी अथवा दुरभिसंधि होने पर ही उसकी ओर से उपेक्षा बरती जा सकती है अन्यथा नहीं। आस्तिक अनुभूति से परमात्मा में समाहित हो जाने पर किसी प्रकार का भय अथवा चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं रहती। निश्चिंतता एवं निर्भयता में कितना अनिवर्चनीय सुख है इसको एक सच्चा आस्तिक ही अनुभव कर सकता है।
असंदिग्ध आस्तिकता ईश्वर के साथ भावनात्मक है। जब साधारण सज्जनों तथा सत्पुरुषों का संग मनुष्य को क्या बना देगा इसकी प्रसन्न कल्पना उसका संग करके ही अनुभूत की जा सकती है, कही नहीं जा सकती है।
मनोवैज्ञानिक तथ्य के अनुसार जो जिसके संसर्ग में रहता है वह उसी का अनुरूप एवं अनुभव हो जाता है। ऐसा तो तब हो जाता है जब मनुष्य बाह्य रूप में किसी के संपर्क में आता है। भावनाओं का समावेश होने पर तो यह अनुरूपता और भी अधिक गहरी होकर तदरुपता में बदल जाती है। जब साधारण लौकिक व्यक्तियों के संसर्ग का इस प्रकार प्रतिफल होता है तब उन सर्व एवं सम्पूर्ण श्रेय तथा श्रीमन्त सर्वशक्तिमान के संपर्क में आकर, सो भी भावना भूमि के स्तर पर आकर मनुष्य किस अनिर्वचनीय आत्म कल्प की दिशा में गतिमान हो उठेगा इसे उस सौभाग्यपूर्ण स्थिति में पहुँचे बिना किस प्रकार बताया जा सकता है। केवल इतना ही कहा जा सकता है कि भृंगी एवं कीट की तरह मनुष्य ईश्वर रूप ही हो जायेगा। इस कल्पनातीत एवं अन्तिम पदवी की प्रदायिनी आस्तिकता को कौन बुद्धिमान अपने अन्तर एवं अणु-अणु में ओत-प्रोत करने का प्रयत्न नहीं करेगा?
आस्तिकता सदाचार की जननी है। जो आस्तिक होगा, जो सब में और सब जगह भगवान की उपस्थिति देखेगा वह कोई दुराचार करने का साहस ही न करेगा। सदा-सर्वदा ऐसे ही कार्य करने और भावनाएँ रखने का प्रयत्न करेगा जो सच्चे आस्तिक-ईश्वर के अनुयायी के अनुरूप हों। ईश्वरीय निर्देश एवं आदर्श सत्यं, शिवं सुन्दरम् के अतिरिक्त कुछ हो ही नहीं सकता । प्रेम, सहानुभूति, सहयोग, सत्य तथा सेवाभाव आस्तिक के विशेष गुण हैं। चोरी, मक्कारी, छल, कपट, ईर्ष्या-द्वेष, लोभ, मोह, काम आदि की दूषित प्रवृत्तियों से आस्तिक व्यक्ति का कोई सम्बन्ध नहीं रहता। आस्तिकता द्वारा ईश्वर से भावनात्मक संपर्क रखने वाला तो उसके अनुरूप ही अपने जीवन को उन्नत एवं उत्कृष्ट बनाने का प्रयत्न करेगा। आज संसार जिस शान्ति, व्यवस्था तथा सहयोग भावना की आवश्यकता अनुभव कर रहा है वह आस्तिकता द्वारा सहज ही प्राप्त हो सकता है।
यदि संसार का प्रत्येक व्यक्ति पूर्णरूप से आस्तिक होकर ईश्वरीय आदर्श पर चलने लगे तो न तो कोई किसी को सताये और न प्रवंचित करने का प्रयत्न करे। हर कोई अपनी सीमाओं में सन्तुष्ट होकर शांतिपूर्ण जीवन यापन करे। आज संसार में फैला हुआ सारा अनाचार दूसरे की सुख-सुविधा अथवा अधिकार सीमा का ध्यान नहीं रखते। यदि आज आस्तिकता का व्यापक प्रचार हो जाये लोग ईश्वर को सच्ची भावना से जानने-मानने और उससे डरने लगें तो कल ही सारे अपराधों का अन्त हो जाये और चिर वाँछित रामराज्य साकार हो उठे।
जप-तप, पूजा-पाठ लेने अथवा किसी देव प्रतिमा के सम्मुख, सिर नवा देने मात्र से ही कोई आस्तिक नहीं हो जाता। आस्तिकता का अर्थ है अपनी भावनाओं एवं क्रियाओं को उत्कृष्ट बनाना। ईश्वर में विश्वास करता हुआ और अपने को आस्तिक घोषित करता हुआ भी जो व्यक्ति साँसारिक तृष्णा, वासना का दास बना हुआ है वह आस्तिक नहीं आडम्बरी है। किसी प्रकार भी आस्तिक मानकर उसका आदर नहीं किया जा सकता। आस्तिकता का अर्थ है प्राणीमात्र में परमात्मा की झाँकी देखना और तदनुसार ही प्रत्येक का आदर करना, उसके साथ उदारता, दया और प्रेम का व्यवहार करना ही आस्तिकजनों के श्रेष्ठ लक्षण हैं।
आस्तिक भावना भक्ति रूप में परिपक्व होकर मनुष्य को कृतार्थ कर देती है। अपने को आस्तिक कहते हुए भी जिसमें भगवद्भक्ति का अभाव है वह झूठा है उसकी आस्तिकता अविश्वसनीय है। आस्तिकता के माध्यम से जिसके हृदय में भक्ति भावना का उदय हो जाता है आनन्द मग्न होकर उसका जीवन सफल हो जाता है। भक्ति का उदय होते ही मनुष्य में सुख-शांति, सन्तोष आदि के ईश्वरीय गुण फूट पड़ते हैं भक्त के पास अपने प्रियतम परमात्मा के प्रति आन्तरिक दुख, क्षोभ, ईर्ष्या-द्वेष का कोई कारण नहीं रहता। भक्त का दृष्टिकोण उदार तथा व्यापक हो जाता है। उसे संसार में प्रत्येक प्राणी से प्रेम तथा बन्धुत्व अनुभव होता है। जन-जन उसका तथा वह जन-जन का होकर लघु से विराट बन जाता है। आठों याम उसका ध्यान प्रभु में ही लगा रहता है। संसार की कोई भी बाधा-व्याधा उसे सता नहीं पाती। वह इसी शरीर में जीवन मुक्त होकर चिदानन्द का अधिकारी बन जाता है। यह है आस्तिकता की परिपक्वता का परिणाम। तब भला कौन ऐसा होगा जो भगवान से सान्निध्य, संसर्ग तथा उसकी भक्ति पाकर कृतार्थ होने के लिए सच्चा आस्तिक बनकर अपना जीवन धन्य न करना चाहेगा।
आचार्य रामानुज मन्त्र पाठ करते हुए मन्दिर की प्रदक्षिणा कर रहे थे कि वहाँ एक चाण्डाल स्त्री उनकी परिक्रमा के बीच में आ गई। आचार्य रामानुज ठिठक कर रुक गये। उनका वेद खण्डित हो गया क्रोधपूर्वक बोले—अरी चाण्डालिन! मेरे रास्ते से हट जा मेरी प्रदक्षिणा अपवित्र न कर!
चाण्डाल स्त्री हाथ जोड़कर उनके सामने खड़ी हो गई और पूछने लगी भगवन् मेरे चारों और पवित्रता ही पवित्रता व्याप्त है! कृपया बतला दीजिये कि मैं अपनी पवित्रता लेकर किस ओर कहाँ चली जाऊँ? स्वामी रामानुज आचार्य को उसके कथन से मानो ज्ञान मिल गया—हाथ जोड़कर बोले—माँ। मुझे क्षमा करो तुम निश्चय ही पवित्रात्मा हो।
मनोविज्ञान का एक अटल नियम है कि जो व्यक्ति अपने मन में जिस प्रकार की भावना संजोता रहता है वह अन्ततः वैसा ही बन जाता है। एक पहलवान और एक श्रमिक अपने-अपने तरह से शारीरिक श्रम ही किया करते हैं। पसीना बहाते और शरीर में थकान लाया करते हैं। किन्तु उनमें से एक हृष्ट-पुष्ट हो जाता है और दूसरा क्षीण। यह अन्तर मात्र भावना रखता है कि वह जो शारीरिक श्रम कर रहा है, पसीना बहा रहा है, वह स्वास्थ्य लाभ के लिए कर रहा है और उसे दिन-दिन स्वास्थ्य लाभ हो रहा है। अपनी इसी भावना के अनुसार वह हृष्ट-पुष्ट तथा बलिष्ठ हो जाता है। श्रमिक की भावना श्रम करते समय ऐसी नहीं होती। वह सोचता है कि वह पेट के लिए औरों की मजदूरी कर रहा है। पैसे के लिए सेवा कर रहा है। जीविका की मजबूरी उससे परिश्रम करा रही है। अपनी इसी भावना के कारण वह पहलवान की तरह हृष्ट-पुष्ट नहीं हो पाता। विवशता एवं मजबूरी की भावना से उसका शरीर थक जाता है। उसकी शक्तियों का ह्रास होता जाता है।
भावना के प्रभाव का यह सत्य कभी भी किसी क्षेत्र में देखा जा सकता है। जो विद्यार्थी विद्या प्राप्त करके परीक्षा में सफल होने की भावना से अध्ययन किया करता है वह शीघ्र ही योग्यता प्राप्त कर लेता है। इसके विपरीत जो मजबूरी के साथ, अभिभावकों अथवा अध्यापकों के त्रास से पढ़ा करता है वह कोई लाभ नहीं उठा पाता उसका अधिकाँश श्रम बेकार चला जाता है।
स्वास्थ्य परीक्षा के अवसर पर दो व्यक्तियों को एक साथ यक्ष्मा का रोगी घोषित किया गया। यह घोषणा दोनों के लिए समान चिन्ता का विषय थी। डॉक्टर का घोषित कर देना उन्हें यक्ष्मा हो गई है और शीघ्र ही उनके जीवन के अन्त हो जाने की सम्भावना है, एक भयंकर आपत्ति ही है। किन्तु उन दोनों रोगी व्यक्तियों में से एक की भावना बड़ी दृढ़ थी। उसने डॉक्टर की घोषणा को सत्य स्वीकार करते हुए मृत्यु की सम्भावना को स्वीकार नहीं किया। उसने अपने इस अमृत विश्वास को नष्ट नहीं होने दिया कि मृत्यु की अपेक्षा जीवन में अधिक शक्ति है। जीवन की अपेक्षा यदि मृत्यु प्रबल होती तो संसार को श्मशान होना चाहिए था। यह जीवन की प्रबलता का ही प्रमाण है कि संसार में इतनी चहल-पहल दिखाई देती है यदि मनुष्य के हृदय से मृत्यु का भाव सर्वथा तिरोहित हो जाये—जीवन के प्रति अविश्वास का अत्यन्ताभाव हो जाये—तो निश्चय ही वह अमर हो सकता है। जिनके हृदय में जीवन के प्रति पूर्ण, दृढ़ विश्वास रहता है, वह आज भी दीर्घजीवी होते हैं।
जीवन के प्रति गहरी निष्ठा रखने वाले रोगी ने अपनी भावनाओं को दृढ़ किया। अपना आत्मविश्वास जगाया और प्रतिदिन सायंकाल एवं प्रातःकाल शांतचित्त होकर अपने उत्तरोत्तर स्वस्थ होने का चिन्तन करना प्रारम्भ किया। औषधि के साथ उसने अमृत भावना के घूँट भी पीना प्रारम्भ किया। इस प्रकार प्रतिक्षण अपने स्वस्थ होने की भावना करते-करते एक दिन ऐसा आया कि वह तपेदिक का रोगी पूर्ण स्वस्थ हो गया। उसके रोम-रोम में आरोग्य की पुलक होकर उत्साहपूर्वक अपना काम करने लगा।
दूसरे रोगी का मन निर्बल था। डॉक्टर की घोषणा सुनकर उसका हृदय बैठ गया। जीवन के प्रति उसका विश्वास जर्जर हो गया। प्रतिक्षण उसे मृत्यु की ही चिन्ता रहने लगी। रोज वह अपने स्वास्थ्य में पहले से क्षीणता अनुभव करने लगा। इस प्रकार की भावना करते रहने का परिणाम यह हुआ कि उसे न तो किसी औषधि ने लाभ किया और न कोई पथ्य ही काम आया। शीघ्र उसने चारपाई पकड़ ली और कुछ ही समय में इस सारपूर्ण संसार को अपने जैसों के लिए असार सिद्ध करके चलता बना। एक ही घातक रोग से पीड़ित दो व्यक्तियों की यह विपरीत दशा, उनकी अपनी भावना का ही परिणाम था।
जीवन के प्रति विश्वास रखने वाले आत्म धनी व्यक्ति अपने सिर पर मृत्यु की काली छाया कभी भी मँडराने नहीं देते। वे हर समय जीवन्त भावनाओं से ओत-प्रोत-संसार समर में डटा करते हैं। बड़ी से बड़ी विपरीत परिस्थिति आ जाने पर अपने मनोबल को गिरने नहीं देते। हजार बार गिरकर उठने और आगे बढ़ने का हौसला रक्खा करते हैं। उनके सोचने का ढंग सृजनात्मक होता है। जीवन की मनोरम पगडंडी पर चलते हुए वे कभी भी इस प्रकार सोचने की धृष्टता नहीं करते कि—”संसार नश्वर है, जीवन क्षणभंगुर है। इस भवसागर में मनुष्य का अस्तित्व एक जल के बुद्बुदे से अधिक कुछ भी नहीं। जब तक हवा का एक झोंका नहीं लगता बुलबुला पानी पर तैरता रहता है पर ज्योंही हवा की चपेट लगी कि इसका अस्तित्व विलीन हो जाता है।” वे जीवन के प्रति विश्वास रखने वाले आत्म वीरों की तरह यही सोचते रहते हैं—कि जीवन एक शाश्वत सत्य है। मृत्यु इसके बीच में एक आरोपित अवकाश है, मध्यान्तर है। मृत्यु की काली छाया जीवन-ज्योति को कदापि नष्ट नहीं कर सकती।”
कोई भी मन-मूर्छित व्यक्ति देखने में कितना ही स्वस्थ अथवा हृष्ट-पुष्ट क्यों न हो अधिक दिनों तक जीवित नहीं रह सकता। मृत्यु के प्रति भयभीत नश्वरता का चिन्तन करने वाले की निर्धारित आयुष्य भी कम हो जाती है जबकि जीवन का विश्वासी व्यक्ति कम होती आयु को आत्मबल से बढ़ा लेता है।
स्वास्थ्य के नियमों का उल्लंघन जहाँ रोगों को जन्म देता है मनुष्य का अनिष्ट वास्तव में किसी परिस्थिति, विपत्ति अथवा व्याधि से नहीं होता है। वह होता है उसकी उस अशिव भावना से जिसमें अनिष्ट का चिन्तन निवास किया करता है। अंग्रेजी के प्रसिद्ध कवि एलेक्जेण्डर पोप जो कि जन्मजात रोगी थे और जिनके बचने की कोई आशा नहीं की जाती थी, उन्होंने अपने स्वास्थ्य लाभ एवं दीर्घ आयु का रहस्य बतलाते हुए लिखा है—
“यह बात सही है कि मैं शैशवकाल से ही रोगी रहता आया था। धीरे-धीरे रोग इतना बढ़ गया कि मेरे बचने की आशा जाती रही। बहुत कुछ दवादारु करने पर भी आरोग्य के लक्षण दृष्टिगोचर न होते थे और धीरे-धीरे एक दिन ऐसा आया कि मेरे चिकित्सकों ने जवाब दे दिया। आरोग्य लाभ के विषय में हर ओर से निराश्रय होकर मैंने अपने भरोसे अपना नवीन कायाकल्प कर डालने का संकल्प कर लिया।”
महाकवि पोप आगे लिखते हैं कि उन्होंने—”आरोग्य नियमों से सम्मत अपनी एक छोटी-सी दिनचर्या बनाई जिसमें आहार-बिहार, रहन-सहन तथा आचार-विचार का भी समावेश था। अपनी दिनचर्या के अनुसार उन्होंने अनिवार्य एवं अतीव्र दवाओं के अतिरिक्त अन्य किसी प्रकार की दवा लेना बन्द कर दिया। वे नित्यप्रति प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में उठते और खुली हवा में सामर्थ्यानुसार घूमने जाने लगे। नियमित रूप से रात में समय पर सोते। रात्रि में सोने से पूर्व तथा प्रभात में जगने के बाद वे ईश्वर का चिन्तन करते और अपनी प्रार्थना में कहते—”प्रभु, मुझे स्वास्थ्य एवं आयु प्रदान कर जिसके कि मैं साहित्य द्वारा मानव समाज की सेवा कर सकूँ। मुझे स्वास्थ्य एवं आयु की कामना इसलिए नहीं है कि मै इस दुनिया के भोग भोगना चाहता हूँ। शुद्ध सात्विक आहार और कल्याणकारी विचारधारा ने उनके रोग को दूर करना प्रारम्भ कर दिया। पोप का कहना है कि उन्होंने अच्छी प्रकार से अनुभव कर लिया था कि उनके स्वास्थ्य को रोगों की अपेक्षा दुर्बल स्वास्थ्य के निरन्तर चिन्तन ने अधिक क्षीण बना दिया था। उनके अनिष्ट विचार ही उनकी हर विपत्ति का मुख्य कारण होते थे। चिन्ता, निराशा, अविश्वास अथवा मृत्यु की कल्पना उन्हें दिन-दिन गिराती चली गई। किन्तु जिस दिन से उन्होंने आत्म-भावना का सहारा लेकर अपने को निरोग तथा आयुष्मान मानना प्रारम्भ किया, उनके स्वास्थ के नियमों का पालन युक्त आहार-विहार तथा पुष्टकर भावना ने उन्हें शीघ्र ही स्वस्थ बना दिया। उनके आशापूर्ण विचारों तथा प्रसन्न चिन्तन ने शीघ्र ही वरदान सिद्ध होकर उन्हें स्वास्थ्य तथा दीर्घ आयु प्रदान की जिससे वे एक लम्बे समय तक काव्य द्वारा मानवता की सेवा करते रहे।
दुर्बल भावना एवं निर्बल विश्वास रखने वाले व्यक्तियों को इस उदाहरण से शिक्षा लेनी चाहिए और समझ लेना चाहिए कि हमारे अनिष्टकर विचार ही हमको बीमार, विवश, संतप्त एवं अल्पायु बनाया करते हैं। हमारे अनिष्ट में परिस्थितियों अथवा कुसंयोगों का हाथ बहुत कम रहा करता है। किसी भी रोग अथवा विपत्ति के आ पड़ने पर यदि मनुष्य अपनी आशा, उत्साह एवं आत्म-विश्वास को त्याग कर चिन्तित असंतुलित, निराश, भयभीत अथवा शंकाकुल न हो तो कोई कारण नहीं कि वह अपने शुभ संकल्पों के बल पर बड़े से बड़े संकट पर विजय प्राप्त न कर सकें।
मनुष्य की भावना ही मृत्यु है और वही अमृत। भावना की तेजस्विता मनुष्य में ओज, तेज तथा आयुष्य की वृद्धि करती है जबकि उनकी मलीनता जीवित रहने पर भी निर्जीव जैसा बना देती है।
शारीरिक दृष्टि से निर्बल हो जाने पर भी मनुष्य को मानसिक रूप से सबल बना रहना चाहिए। अपने मनोबल को बनाये रखने से शीघ्र ही ऐसा समझ में आ जायेगा। हमारे विचारों का प्रवाह जिस ओर होगा निश्चय ही हम उस ओर बढ़ेंगे। उद्वेग, शोक, दुःख, चिन्ता, निराशा अथवा जीवन के प्रति अविश्वास की भावना रखने वाले संसार में कदापि सफल अथवा सुखी नहीं रह सकते। आत्मविश्वास के साथ शक्ति भर प्रयास करने, आशापूर्ण दृष्टिकोण से देखने और साहस के साथ संघर्ष करने वाले कर्मवीर सारी कठिनाइयों को जीतकर जीवन के रंग-मंच पर प्रतिष्ठित होते हैं। जरा सी कठिनाई आ जाने पर रोने लगने वाले, घबराकर हाथ, पैर छोड़ देने वाले अथवा अपनी शक्तियों में अविश्वास करने वाले संसार के हर सुख से वंचित रहकर शोक-संताप से भरा जीवन काटने के ही अधिकारी बन सकते हैं।
अपने प्रति उच्च भावना रखिये, छोटे से छोटे काम को भी महान भावना से करिये बड़ी से बड़ी विपत्ति में भी निराश न होइये। आत्म-विश्वास एवं आशा का प्रकाश लेकर आगे बढ़िये, जीवन के प्रति अखण्ड निष्ठा रखिये और देखिये कि आप एक स्वस्थ सुन्दर, सफल एवं दीर्घजीवन के अधिकारी बनते हैं या नहीं?
कैयट की सक्रिय साधना-
वैयाकरणी कैयट का स्वास्थ्य दिन-दिन खराब होता जा रहा था। उसका कारण था, दिन को तो वह आजीविका के लिए परिश्रम किया करते थे और रात में जाग-जाग कर महाभाष्य पर टीका लिखा करते थे। उनकी पत्नी उनके स्वास्थ्य के विषय में बहुत चिन्तित रहा करती थी! वे जब तब पति से इतना परिश्रम न करने की प्रार्थना किया करती थीं। एक बार पत्नी ने जब बहुत कहा तो उन्होंने जवाब दिया—’देवि! इतना परिश्रम मेरे लिये अनिवार्य हैं, इसके बिना मेरा जीवन शून्य हो जायेगा। तुम्हारे पोषण के लिये पति होने के नाते मुझे धनोपार्जन के लिये परिश्रम करना ही है और ब्राह्मण होने के नाते समाज के लिए ज्ञान का दान करना ही है। मैं अपने इन दोनों अनिवार्य कर्तव्यों में से किसी से एक से भी विरत नहीं हो सकता। पत्नी ने उत्तर दिया—”स्वामी समाज का महत्त्व मुझसे अधिक है और उसके लिए ज्ञानवृद्धि का जो महान कार्य आप कर रहें हैं वह आपको करना चाहिये, किन्तु जो परिश्रम आप मेरे लिये और घर चलाने के लिये कर रहे हैं उससे मुक्त हो जाइये।”
कैयट पत्नी की बात सुनकर बोले—”तो फिर यह किस प्रकार चलेगा?” यह उत्तरदायित्व आप मुझ पर छोड़ दीजिये” पत्नी ने कहा। “इसके लिए मेरे पास एक योजना है।”
पत्नी ने बतलाया कि आज से मैं अपने कुटीर के चारों ओर उगी हुई कुशा की रस्सियाँ बनाकर बेचा करूंगी और आप सर्वथा निश्चिंत होकर सम्पूर्ण एकाग्रता से ज्ञान साधना से लग जाइये।
कैयट की आँखों में हर्षपूर्ण कृतज्ञता के आँसू आ गये और वे बोले जिसकी जीवन संगिनी ज्ञान का महत्त्व समझ कर इतना सहयोग करने को तत्पर हो उसकी साधना भला क्यों न पूरी होगी?
अनेक मनुष्य सदैव ही कोई न कोई अभाव अनुभव करते हुए दुःखी होते हैं। वे अपने दुःख का कारण किसी न किसी अभाव को ही मानते रहते हैं और ऐसा सोचा करते हैं कि यदि उनका वह अभाव मिट जाये, अमुक आवश्यकता पूरी हो जाये तो वे सुखी हो जायें। पर ज्यों ही वह एक अभाव पूरा होता है कि दूसरा अभाव सताने लगता है। दूसरा पूरा होने पर तीसरा। इस प्रकार अभावों का एक क्रम लगा रहता है।
अभावों का सर्वथा अभाव हो जाना सम्भव नहीं। आज यदि पैसे का अभाव है तो कल विद्या का अभाव सता सकता है। यदि विद्या का अभाव नहीं है तो सामाजिक सम्मान का अभाव अनुभव हो सकता है। सामाजिक सम्मान है तो सन्तान का अभाव दुःखी कर सकता है। यदि सन्तान का अभाव नहीं है तो उनके सत्सन्तान होने का अभाव खटक सकता है और यदि एक बार सभी चीजें प्राप्त हो जायें तो उनकी न्यूनाधिक मात्रा अथवा उत्कृष्टता का अभाव सामने खड़ा हो सकता है। तात्पर्य यह है कि किसी न किसी रूप में अभाव मनुष्य को सताता ही रहता है। सही बात यह है कि अभाव का होना न होना वस्तुओं, परिस्थितियों की मात्रा अथवा स्तर पर निर्भर नहीं है। अभाव का अनुभव होना मनुष्य की अपनी मानसिक कमी पर ही निर्भर है। अभाव का वास्तविक अस्तित्व तो कदाचित ही होता है, यह मनुष्य की अपनी आदत है जो अभाव के रूप में उसे अनुभव हुआ करती है। इस आदत का जन्म असन्तोष से हुआ करता है।
जिसका स्वभाव असन्तोषी है, वह कुबेर का कोष और भूमण्डल का राज्य पाकर भी पूर्ति का, सम्पन्नता का अनुभव नहीं करेगा। उसको अपनी सारी विभूतियाँ सारी सम्पदाएँ कम ही मालूम होती रहेंगी । यदि ऐसा न रहा होता तो जहाँ एक वस्तु के अभाव में कोई दुःखी होता है तो उसी वस्तु के भाव में दूसरे को सुखी होना चाहिए। किन्तु ऐसा कभी भी देखने में नहीं आता। संसार में सारी मनोवांछाएं पूरी होना सम्भव नहीं इसका एक कारण तो यह है कि मनुष्य की वाँछाओं, इच्छाओं तथा कामनाओं का कोई अन्त नहीं। एक के बाद एक वाँछा उत्पन्न ही होती रहती है। एक दूसरा कारक यह भी है मनुष्य की इच्छाओं का एक स्वरूप स्थिर नहीं होता। उनका स्वरूप एवं प्रकार बदलता रहता है। जैसे कोई मनुष्य यदि सन्तान चाहता है, उसको सन्तान प्राप्त हो सकती है, होती भी है। पर इससे उसकी मनोवाँछा पूरी नहीं होगी। सन्तान पाकर भी वह यह सोचकर असन्तुष्ट रह सकता है कि उसको पुत्र नहीं पुत्री होना चाहिये थी अथवा उसकी कामना तो पुत्र की थी पुत्री की नहीं और यदि उसकी इच्छानुसार पुत्र या पुत्री भी हुई थी तो वह यह सोचकर सन्तोष से वंचित रह सकता है कि उसकी सन्तान तो इस रंग रूप की होनी चाहिये थी। इस प्रकार मनुष्य की एक वाँछा में न जाने कितनी वांछाएं जुड़ जाया करती हैं। ऐसी वाँछाओं की पूर्ति के लिये तो मनुष्य को ‘कल्पवृक्ष’ की सिद्धि होनी चाहिए जो कि सामान्यतः सम्भव नहीं। किन्तु अभाव का अनुभव तब भी दूर न होगा। इच्छा-सिद्धि होने पर भी मनुष्य की एक-मनोनुकूल वाँछा थोड़ी देर में उसके लिये पुरानी हो जायगी और वह एक नवीन वाँछा के लिये लालायित हो उठेगा। इस प्रकार यदि एक बार अणिमानक होने पर भी वह अपनी मनोवांछाओं की पूर्ति में दिन और रात लगा रहे तब भी सन्तुष्ट नहीं हो सकता। सन्तोष वस्तुओं अथवा परिस्थितियों में नहीं, मनुष्य की मनःस्थिति में है।
जिसका स्वभाव सन्तोषी है वह अभाव की परिस्थितियों में भी व्यग्र अथवा दुःखी नहीं होता। इस संसार में हजारों लाखों ऐसे व्यक्ति होंगे जिन्हें सामान्यतः आर्थिक कष्ट रहता है। मुश्किल से रूखी-सूखी रोटी मिल पाती है। तब भी वे सन्तुष्ट तथा प्रसन्न देखे जा सकते हैं। अपने आर्थिक कष्ट का रोना रोते अथवा अपने भाग्य को कोसते रहना उन्हें आता ही नहीं। इसके विपरीत असंख्यों लोग भी मिलेंगे जो दिन-रात अपने अभाव का रोना रोते और दुर्भाग्य को कोसते रहते हैं। वे कभी भी सुखी अथवा सन्तुष्ट रह ही नहीं पाते। इससे यह भी देखा जा सकता है कि जिनके पास अपेक्षाकृत अधिक साधन एवं सुविधायें हैं किन्तु वे उक्त अभावग्रस्त व्यक्ति से भी अधिक असन्तुष्ट एवं दुखी दीख रहे हैं। सुख का निवास सन्तोषी मनोवृत्ति में है प्राप्ति तथा उपलब्धियों में नहीं।
अपनी वर्तमान परिस्थितियों से असन्तुष्ट रहना कितने मनुष्यों का स्वभाव होता है। उनका वर्तमान कितना अनुकूल क्यों न हो किन्तु वे खिन्नता अथवा असन्तोष कोई कारण निकाल ही लिया करते हैं। उन्हें अपने भूतकाल से बड़ा लगाव होता है। उनकी अनुपस्थिति वे उसमें अपने सन्तोष का आरोप करके यही सोचा करते हैं कि वे अपने बीते दिनों में बहुत अधिक प्रसन्न एवं सुखी थे। जबकि वास्तव में ऐसा था बिल्कुल नहीं। उनका उक्त अतीत जब वर्तमान था तब भी वे आज की तरह असन्तुष्ट एवं अप्रसन्न थे। यदि उनका स्वभाव सन्तुष्ट रहने का होता तो वे कल भी सुखी होते हैं और आज भी प्रसन्न। वर्तमान से असन्तुष्ट व्यक्ति जहाँ अतीत को सुखपूर्ण अनुभव करता है वहाँ भविष्य से सुख-सन्तोष की कामना रखता है। जबकि उनका प्रत्येक आगामी कल वर्तमान का आज बनकर आता और असन्तुष्टि के साथ चला आता है।
असन्तोषी स्वभाव के व्यक्ति का यह विशेष लक्षण है वह अतीत तथा अनागत में ही सुख की कल्पना किया करता है और वर्तमान को कंटकाकीर्ण ही माना करता है जबकि उसका काम केवल वर्तमान से ही रहता है। अतीत से उनका कोई वास्ता नहीं रहता और अनागत ही वर्तमान बनता रहता है।
भविष्य वर्तमान से अच्छा हो सकता है। होना भी चाहिये। मनुष्य का कर्तव्य है कि वह इसके लिये प्रयत्न करे। किन्तु एक सुन्दर भविष्य के लिये प्रयत्न तो वर्तमान में ही करना होगा। जो व्यक्ति वर्तमान से असंग्रस्त है, उसे दुर्भाग्य एवं अभावग्रस्त समझता है, उससे सामंजस्य नहीं कर पा रहा है, साधन एवं सुविधाओं का रोना रोता हुआ व्यग्र रह रहा है वह एक उच्चतर भविष्य के लिये प्रयत्न किस प्रकार कर सकता है? उसे खिन्न होने और कमियों को देखते रहने से ही अवकाश नहीं मिलेगा, तब भला वह भविष्य के लिये सन्तुलित चित्तवृत्ति, स्थिर बुद्धि, प्रसन्न मनः स्थिति एवं उपलब्ध साधनों में विश्वास की आवश्यकता होती है वह खिन्नता अथवा असन्तोष की दशा में कदापि प्राप्त नहीं हो सकता।
सुखी एवं प्रसन्न रहने का एक ही उपाय है कि अपनी वर्तमान स्थिति से सामंजस्य रखते हुए सन्तुष्ट रहा जाए और उपलब्ध साधनों का सीमान्त सदुपयोग करते हुए उच्चतर भविष्य के लिये प्रयत्न, परिश्रम एवं पुरुषार्थ करते रहा जाये। जो अपनी वर्तमान स्थिति में प्रसन्न नहीं रह सकता वह निश्चय ही भविष्य में भी प्रसन्न न हो सकेगा फिर चाहे उसका भविष्य वर्तमान से कितना ही अच्छा बनकर क्यों न आए। प्रसन्नता, सामंजस्य एवं सन्तोष मनुष्य की अपनी चित्तवृत्ति पर निर्भर है, साधन अथवा सुविधाओं की उत्कृष्टता अथवा अधिकता पर नहीं।
थोड़ी बुद्धि विवेक से काम लेने पर मनुष्य का सन्तुष्ट हो सकना सम्भव है। यह कोई असम्भव बात नहीं है। मनुष्य ही सन्तुष्ट रहते हैं और मनुष्य ही असन्तुष्ट रहते हैं। दृष्टिकोण में की दिशा बदल देने भर से ही बड़े से बड़ा असन्तोषी व्यक्ति भी सन्तोषी बन सकता है। असन्तोष कब होता है जब हम अपने से अधिक साधन सुविधा वाले व्यक्ति से अपनी तुलना किया करते हैं। जब हम यह सोचते हैं कि हमारे पास केवल एक छोटा-सा मकान ही है और अन्यों के पास ऊँची-ऊँची कोठियाँ, जब हम यह विचार करते हैं कि अमुक के पास इतना पैसा है, मोटरकार है, नौकर-चाकर हैं, कारोबार है किन्तु हम केवल एक साइकिल पर अपनी सौ-दो-सौ की ही नौकरी पर जाते हैं तब हमारे हृदय में असन्तोष की चिनगारी दहकने लगती है और हम अपनी स्थिति को बड़ी ही हेय समझकर खिन्न तथा अप्रसन्न हो उठते हैं। हमारी सारी सुख-शान्ति चली जाती है।
यदि हम अपनी दृष्टि को उन लोगों की और मोड़ देते हैं, जो भी कठिन स्थिति में रह रहे हैं, जिनके पास उतना कुछ भी नहीं है जितना हमारे पास है, तो निश्चय ही हमें अपनी स्थिति पर सन्तोष होगा। हम ऐसे हजारों व्यक्तियों को अपने चारों ओर देख सकते हैं, जिनके पास एक छोटी-सी झोपड़ी भी नहीं है। सवारी के नाम पर वे दसियों मील पैदल चलकर जाते और जीविका के नाम पर बारह-बारह घण्टे पसीना बहाते हैं। हम ऐसे न जाने कितने व्यक्तियों को देख सकते हैं जो दिन में दोनों समय रोटी नहीं पाते। जाड़ों में भी नंगे बदन फुटपाथों पर सोते हैं। हम कितने ही ऐसे व्यक्तियों के दर्शन कर सकते हैं जिनको हमसे कहीं कम सुविधायें उपलब्ध हैं किन्तु वे हर समय सुखी, सन्तुष्ट तथा प्रसन्न रहा करते हैं। हमारी तरह न तो वे अभाव अनुभव करते हैं और न अपने को दुःखी अथवा दुर्भाग्यपूर्ण मानते हैं। वे ईमानदारी से परिश्रम करते, पाये हुए पर सन्तोष करते और प्रसन्नता पूर्वक जीवनयापन करते हैं। ऐसे लोगों को देख हमारे मन में अपनी अपेक्षाकृत अधिक सुविधाओं के प्रति सन्तोष उत्पन्न न हो इसका कोई कारण समझ में नहीं आता। और तब तो हमको अपनी स्थिति पर गर्व तक हो सकता है जब हम लूले, लंगड़े, अपाहिज अथवा नेत्रहीन व्यक्तियों की ओर सहानुभूतिपूर्वक देखें। ऐसे विवश तथा विकलांग व्यक्तियों को देखकर भी क्या हमें अपनी स्थिति के प्रति असन्तोष रह सकता है? क्या हमें यह विचार न आयेगा कि वास्तव में हम कितने भाग्यवान हैं—भगवान की हम पर कितनी महती कृपा है कि उसने हमें इस प्रकार शुभाँग बनाया। हमें हाथ-पाँव , नाक-कान, आँख आदि सारे अंग पूर्ण एवं सक्षम दिये हैं। ऐसी स्थिति में भी यदि हमको अपनी स्थिति पर सन्तोष नहीं होता तो समझना चाहिये कि हम पर दुर्भाग्य की फटकार है। हम ईमानदार आदमी तो नहीं है साथ ही उस परमपिता परमात्मा की कृपा प्रति कृतघ्न भी हैं। हम जानबूझकर असन्तुष्ट एवं अप्रसन्न रहना चाहते हैं और रह रहे हैं। हमारे इस अहैतुक असन्तोष का उपचार स्वयं ब्रह्मा भी नहीं कर सकते।
हम जब केवल अपने अभावों एवं कठिनाइयों के विषय में ही सोचते रहते हैं और अपने उपलब्ध साधनों की महत्ता तथा सामर्थ्य पर विचार नहीं करते तब भी असंतोष के शिकार बन जाते हैं। यदि हम विचार करें कि अपने लोग अपने वर्तमान साधनों का ही सदुपयोग करके केवल संतुष्ट जीवन ही बीतते हैं बल्कि उनके बल पर ऊँचे उठते चले जाते हैं, संसार के अधिकतर महापुरुष अभावों तथा कठिनाइयों के बीच रहकर ही ऊँचे उठे हैं। यह हमारी तरह अपने अभावों तथा साधनहीनता का रोना लिए ही बैठे रहते, यदि वे अपनी स्थिति के प्रति अन्तुष्ट अथवा खिन्न रहे होते तो निश्चय ही उस स्थिति में कीड़े-मकोड़ों की तरह तरस-तरस कर मर गये होते, इस प्रकार संसार में अमर न हो सकते । असंतुष्ट का कारण यदि साधनों की कमी रही होती तो अवश्य वे लोग भी दुःखी रहे होते और आज भी प्रत्येक साधनहीन व्यक्ति रोता-झींकता ही नजर आता । किसी के मुख पर प्रसन्नता तथा अधरों पर मुस्कान दिखाई न देती जबकि हमारे जैसे कतिपय असन्तोषियों को छोड़कर दुनिया में अधिकतर लोग हँसते-खेलते ही जीते रहे हैं।
सुख सन्तोष में ही है और सन्तोष मनुष्य के दृष्टिकोण पर निर्भर है यदि हमारा दृष्टिकोण परिमार्जित तथा समचीन है तो कोई कारण नहीं कि हम अपना वर्तमान स्थिति में सन्तुष्ट न रह सकें और हमें सुख प्राप्त न हो सके।
=कोटेशन============================
मनुष्य सुख-प्राप्ति के विचार से विषयों का उपभोग करते हैं। उनको समझ लेना चाहिये कि वास्तव में सुख का कारण मन ही है ।
एक महान उद्देश्य के लिये प्रयत्न में स्वतः ही आनंद है, सुख है और किसी अंश तक प्राप्ति की मात्रा भी है।
—जवाहरलाल नेहरू
—जवाहरलाल नेहरू
मृत्यु के विषय में निश्चिन्त सभी होते हैं किन्तु निश्चिंत कदाचित कोई-कोई ही होते हैं। वैसे मृत्यु की चिन्ता सभी होते को होती है।
मृत्यु की चिन्ता न करने वालों में वे ही बोध वान सत्पुरुष होते हैं जो उसके सम्मुख होने की तैयारी करते रहते हैं। इस अनायास आने वाली घटना का स्मरण रखने वाले व्यक्ति अपने जीवन का एक क्षण भी बरबाद नहीं करते। अपने जीवन के प्रत्येक कर्तव्य को तत्परता से पूरा करने में लगे हुए, इस बात का प्रयत्न किया करते हैं कि वे मृत्यु आने से पूर्व ही अपने सारे कर्तव्य का उत्तरदायित्व आपूर्ति की दशा में दबाव न डाल सके।
जिस प्रकार कर्तव्य परायण व्यक्ति जीवन में असत्कर्मों से बचा रहता है, उसी प्रकार कर्तव्यहीन व्यक्ति असत्कर्मों में ही लगा रहता है। असत्कर्मों द्वारा पाप का परिचय करते रहने वाले व्यक्ति का मृत्यु से भयभीत होना स्वाभाविक ही है। वह जानता है कि जिस समय मृत्यु कर उपस्थित होगी उस समय जीवन भर किये पापों के सर्वत्र सामने आ जायेंगे जिससे पश्चाताप की भयानक अग्नि में जलना होगा। एक असहनीय यंत्रणा के बीच शरीर का अन्त होगा। तब ऐसा कोई अवकाश शेष न रह जायेगा जिसमें उन असत्कर्मों का ताप सत्कर्मों से कम किया जा सके। यंत्रणा के बीच गर्हित अन्त होने से शरीरोपरान्त प्राप्त होने वाली गति भी गर्हित होगी, जिसे पता नहीं कितने युगों तक भोगना पड़े। इस भयानक सम्भावना से कर्तव्यवान का भयभीत होना स्वाभाविक ही है।
मनुष्य जीवन का एक-एक क्षण अमूल्य है। यह धर्म, अर्थ, काम-मोक्ष आदि पुरुषार्थों को प्राप्त कर लेने का सुअवसर है। केवल मनुष्य शरीर ही ऐसा साधन है जिससे भगवत् प्राप्ति का उपाय किया जा सकता है। अन्य सारी योनियाँ भोग योनियाँ है। उनमें भगवत्-प्राप्ति का उपाय नहीं किया जा सकता । इसको प्रमादवश नाना प्रकार के नरक दायक भोगों में नष्ट कर देना बहुत बड़ी हानि है।
जीवन-काल में जिन कार्यों, संस्कारों तथा वृत्तियों को अभ्यास द्वारा प्रमुख बनाया जाता है वही मृत्यु के समय चलचित्र की तरह मनुष्य के सम्मुख चक्कर लगाया करते हैं। उस समय मनुष्य उस स्मरण की भीड़भाड़ में अपने सत्कर्मों को ढूंढ़ने का प्रयत्न किया करता है। यदि उसने सुकृत किये रहे होते हैं तो वे उसके स्मृति-पटल पर आकर मित्र की तरह उसे सहारा दिया करते हैं। जिससे अनन्त पथ के यात्री को बड़ी सान्त्वना मिलती है और वह सुख शान्तिपूर्वक शरीर त्यागकर सदाचार के अनुसार सुन्दर लोक की प्राप्ति करता है।
इसके विपरीत जीवन के खाते में जिसने सत्कर्मों का संचय किया ही नहीं बड़े चाव से असत्कर्मों में ही लगा रहा है, खीजने पर उस असहाय काल में कोई सहारा किस प्रकार मिल सकता है? उसे अपने चारों ओर अपने असत्कर्म ही प्रेत-पिशाचों की तरह विकराल रूप रखकर नाचते और अट्टहास करते हुए दिखाई देंगे। उसे ऐसा लगेगा मानों उसके असत्कर्म उसे पर व्यंग करते हुए कह रहे हैं—”मूर्ख मनुष्य तूने हमको सुखदायी समझकर जो जीवन भर पाला है अपनी उस मूर्खता का परिणाम देख ले और युग-युगान्तरों के लिए जाकर नरक की यातना भोग।” निःसन्देह असत्कर्मों के लिए वह याम कितना भयानक रहा होता है। इसलिए सावधान पुरुष अपने जीवन के खाते में सत्कर्मों का ही संचय करने का प्रयास किया करते हैं जिससे अन्तिम काल में उन्हें भय-यातना से मुक्ति मिली रहे।
मृत्यु के भय से बचने का एक सीधा सरल-सा उपाय है, सत्कर्मों का संचय करना। शास्त्रोक्त एवं लोकोक्त अपने निर्धारित कर्तव्यों का पालन करना ही सुकृत्य माने गये हैं। इनका ज्ञान मनुष्य को सहज ही हो जाता है। किसी को दुःख न देकर यथा सम्भव सुख देना संसार के सभी सत्कर्मों का मूलाधार है। इसका अभ्यास करते रहने से जीवन के खाते में सत्कर्मों की पूँजी इकट्ठी होती रहती है जो कि कठिन काल में एक विशाल सम्बल बनकर मनुष्य को निस्तार किया करती है।
सामान्यतः सुख समझकर जो अबोध व्यक्ति भोग परायण बने रहते हैं वे बड़ी भूल करते हैं। मनुष्य जीवन की विशेषता है भगवद्चिन्तन परायण रहना। भोगों के चिन्तन अथवा प्राप्त करने के उपायों में लगा हुआ मनुष्य अपनी वृत्तियों को दूषित कर देता है, संस्कार बिगाड़ लेता है जिससे उसका चित्त सत्कर्म परायण न रहकर भोगों में ही निरत रहता है वह शरीर से मनुष्य होता हुआ भी गुण, कर्म, स्वभाव से पशु ही होता है। मनुष्य की भोगपरक पशु प्रवृत्तियाँ उसके पतन एवं विनाश का कारण बनती हैं। भोग प्रवृत्तियों के पोषण से मनुष्य मृत्यु के उपरान्त निकृष्ट योनियों में भ्रमण करता हुआ नारकीय यातना पाया करता है। जिस पुण्य पूंजी से वह मनुष्य शरीर का अधिकारी बना होता है वह नष्ट हो जाती है फलतः वह निकृष्ट गतियों में जा गिरता है। मनुष्येत्तर योनियों के जीव कर्म के अधिकारी नहीं होते। उन्हें हठात् उन योनियों का भोग करना पड़ता है। कर्म का अधिकारी न होने से उसे किसी प्रकार का कर्म दोष लगने का प्रश्न ही नहीं उठता । अस्तु वह स्वभावतः एक योनि से दूसरी योनि में जाता हुआ चौरासी लाख चक्करों को पार करता हुआ अन्त में मनुष्य योनि के उस अन्तिम अवसर में आ पाता है जिसमें वह कर्मों का अधिकारी होकर अपनी मुक्ति का प्रयास कर सकता है। इसी सुविधा के कारण वह अन्य पशु-पक्षियों की तरह कर्मफल से मुक्त नहीं होता। अब यह मनुष्य के अपने हाथ की बात है कि वह सुकर्मों द्वारा अपनी मुक्ति का प्रयत्न करे अथवा कुकर्मों में पड़कर पुनः चौरासी लाख के चक्कर में लौट जाये। इस प्रकार मानवेत्तर योनियों का भ्रमण जीव की प्रगति का सूचक है जिसकी कि पराकाष्ठा मानव-योनि की प्राप्ति है। जबकि मानव की मृत्यु उसकी मुक्ति अथवा अधर्म योनियों में पुनर्पतन का हेतु होती है तो मनुष्य योनि में आकर जीव या तो अपने सत्कर्मों द्वारा भगवान को प्राप्तकर मुक्त हो सकेगा अथवा असत् कर्मों द्वारा गिरकर फिर अधोगति में चला जायेगा। इस प्रकार मनुष्येत्तर प्राणियों की मृत्यु साधारण प्रगति मात्र होती है और मनुष्य की मृत्यु या तो उसके चरमोत्थान का हेतु बनेगी अथवा परम पतन की।
मृत्यु से डरना एक लज्जाजनक कायरता है। इस कायरता का समावेश होता उन्हीं में है जो इस दुर्लभ मानव-जीवन का सदुपयोग नहीं करते, इसे अकर्तव्य कर्मों तथा भोग लिप्सा में नष्ट किया करते हैं। जो बोधवान व्यक्ति मानव-जीवन की दुर्लभता तथा उसके मूल्य महत्व को समझते हुए सत्कर्मों में इसका सदुपयोग किया करते हैं उन्हें मृत्यु का स्मरण आनन्ददायक होता है। उन्हें अपने सत्कर्मों के बल पर यह विश्वास रहा करता है कि जिस पुण्य-पूँजी को उन्होंने संचित किया है वह भवसागर की उतराई के लिये पर्याप्त है। अपने पुण्यों के बल पर वे इस भव् सिन्धु को पार कर अपने अन्तिम लक्ष्य परमात्मा की प्राप्ति कर लेंगे और यदि इस पुण्य-पूँजी में कुछ कमी रह गई है तो पुराना वस्त्र छोड़कर नये वस्त्र धारण करने के समान पुनः नया जीवन नया शरीर धारण करेंगे और आज के अधिक उन्नति एवं परिष्कृत। अपने अगले शरीर के अवसर पर वे और अधिक साधना करके अपने लक्ष्य को अवश्य पा लेंगे। इस प्रकार पुण्यात्मा पुरुष को मृत्यु की कल्पना से भय तो क्या एक आनन्द पुलक की ही प्राप्ति होती है।
मृत्यु अवश्यम्भावी है। सत्कर्मों का सहारा लेकर ही इसके त्रास से बचा जा सकता है। यह क्षण भंगुर मानव-जीवन प्रतिपल मृत्यु के प्रवाह में बहता चला जा रहा है। मनुष्य जिस क्षण से जन्म लेता है उसी क्षण से मृत्यु की और बढ़ने लगता है। जीवन की बढ़ोतरी तथा आयु की वृद्धि मृत्यु की निकटता ही है। पता नहीं किस समय वह अवश्यम्भावी अन्तिम घड़ी आ जाये। इसलिये मनुष्य को प्रतिक्षण सावधान रहकर अपने जीवन का अनुक्षण सत्कर्मों में ही लगाते रहना चाहिये।
प्रथम तो मृत्यु का भय एक अनुचित त्रास है। तब भी यदि उसका भय सताता ही है तो बुद्धिमत्तापूर्वक उसका लाभ भी उठाया जा सकता है। जैसे अपने अधिकारी से डरने वाला व्यक्ति अपने को अधिक से अधिक अनुशासित, आज्ञापालक तथा कार्यदक्ष बनाने का प्रयत्न किया है, उसी प्रकार मृत्यु से भयभीत व्यक्ति यदि चाहे तो भय के कारण दुष्ट दुष्कर्मों को छोड़कर सत्कर्मों में संलग्न हो सकता है। लोग मृत्यु से डरते तो हैं लेकिन सच पूछा जाए तो वे सच्चाई के साथ उससे नहीं डरते। यदि उनके हृदय में मृत्यु के प्रति सच्चा भय रहे तो निश्चय ही पाप कर्मों की ओर से विमुख होकर पुण्य कर्मों की ओर अग्रसर हो उठें।
जिसे लोग प्रायः मृत्यु का भय कहते हैं वह वास्तव भोगों के छूट जाने की चिन्ता ही होती है, दुनिया छूट जाने का मोह ही होता है, लोग वास्तव में यह सोचकर दुखी होते हैं कि जब हम मर जायेंगे तो हमारी यह पत्नी-बच्चे और यह धन दौलत सब छूट जायेगी। और हम एकाकी न जाने कहाँ-कहाँ भटकते रहेंगे। यह सब हमारे प्रियजन तथा धन सम्पत्ति हमें फिर कहाँ मिलेगी? अच्छा होता मृत्यु न आती और हम सदा सर्वदा इनके संपर्क का सुख उठा सकते। इस प्रकार की मोह भावना ही विधा मृत्यु का भय बनकर सामने आया करती है। ऐसे व्यक्ति कम ही होते हैं जिन्हें मृत्यु का भय अपनी अज्ञात रक्षा की चिन्ता के कारण सताता हो।
निःसन्देह मृत्यु का मोहजन्य भय बड़ी ही निकृष्ट भावना है। यह अकारण ही आत्मा के बन्धन कड़े कर दिया करता है, संसार तो सभी को एक दिन छोड़ना पड़ता है। सम्पत्ति एवं प्रियजन सबके ही छूटते हैं। इस भवितव्यता में किसी प्रकार का व्यवधान नहीं पड़ सकता। इस अवश्यम्भाव्य के प्रति निरर्थक मोह करना सबसे बड़ी मूर्खता है।
जो व्यक्ति धर्म, अर्थ, काम आदि की प्राप्ति के लिये पुण्य पूर्वक प्रयत्न किया करता है उसको इनके प्रति निकृष्ट मोह भी नहीं होता है, वह इन सब की प्राप्ति भोग सुख के लिये नहीं केवल मानव कर्तव्य समझकर ही करता है। जिस प्रकार कर्तव्य पूरा हो जाने पर मनुष्य को कार्य के प्रति मोह न रहकर आत्म सन्तोष होता है उसी प्रकार कर्तव्य पूर्वक लौकिक उपलब्धियों का सुख ही रहता है उसके प्रति मोह नहीं। जिस प्रकार वह उन्हें पुण्य पुरुषार्थ द्वारा प्राप्त करता है उसी प्रकार साहसपूर्वक छोड़ भी देता है।
मोहजन्य अथवा अकृत जन्य मृत्यु का भय निरर्थक निकृष्ट एवं निम्न वाहक है। मनुष्य को इससे बचे रहने का लाभ उठाकर सत्कर्मों द्वारा मृत्यु से मोर्चा लेने की तैयारी कर लेनी चाहिए।
जिन्दगी और मौत क्षितिज की ओर में बैठी बातें कर रही थीं। बातों-बातों में एक दूसरे के महत्व पर बात चल पड़ी। जिन्दगी बोली—मैं तुम से बड़ी हूँ। संसार में मेरा ही महत्व है। तुम तो हर चीज को नष्ट करती रहती हो। तुम ध्वंस की दूती हो, निर्माण के देवता से तुम्हारा परिचय भी नहीं है। नष्ट करने वाले का संसार में महत्व हो ही कब सकता है?
मौत ने जिन्दगी की बात का बुरा नहीं माना। वह हँसती हुई बोली-”मैं जो कुछ भी करती हूँ; सब तुम्हारे हित के लिए। एक मेरे ही कारण संसार में तुम्हारी महत्ता है। यदि मैं न होऊँ तो तुम्हारी कद्र कौड़ी मोल हो जाय।” मौत की बात सुनकर के जिन्दगी को क्रोध आया और उसकी अवमानना करने लगी मौत खिन्न हुई और रूठकर चली गई।
दुनिया के लोगों को जब पता चला कि जिन्दगी का मौत से सम्बन्ध टूट गया है, तब मौत जिन्दगी को प्यार करने लगे। जिन्दगी अपनी जड़ गति से घबराकर दौड़ी-दौड़ी मौत के पास गई और उसे यह कह कर मना लाई चलो हम तुम दोनों ही एक दूसरे के सहायक एवं पूरक हैं।
यह मनुष्य के अपने हाथ में है कि वह उत्कृष्ट कोटि का जीवन जीता है अथवा निकृष्ट कोटि का। कदाचित ही कोई ऐसा व्यक्ति इस संसार में हो जो उत्कृष्ट जीवन जीने की चाह न रखता हो। सभी समान रूप से यही चाहेंगे कि वे अच्छे से अच्छा और उच्च से उच्च जीन जिएँ किन्तु प्रायः देखा इसके प्रतिकूल जाता है। बहुत ही कम ऐसे व्यक्ति संसार में मिलेंगे जो उच्चकोटि का जीवन जी रहे हों। नहीं तो अधिकतर लोग उच्च स्थिति में भी निकृष्ट जीवन जीते दिखाई देते हैं।
इस प्रतिकूलता का कारण यही समझ में आता है कि ‘उत्कृष्ट कोटि’ का जीवन किसे कहते हैं इसको बहुत कम लोग जानते हैं। अधिकतर लोग ऊँचे दर्जे के रहन-सहन, आमोद-प्रमोद, हास-विलास और भोजन-भोग आदि की बहुतायत के साथ जीने को उत्कृष्ट कोटि का जीवन मानते हैं। जबकि ऐसा है नहीं। इस प्रकार की बहुतायत मिथ्यात्व से भरा बाहरी आडम्बर है। यह वास्तविक जीवन भी नहीं है तब उत्कृष्ट होने की तो बात ही नहीं रह जाती। वास्तविक जीवन बाह्य नहीं आन्तरिक होता है। जिसका अन्तर जितना ही स्वच्छ, पवित्र, परोपकारी, प्रेमपूर्ण तथा प्रसन्न है उसका जीवन उतना ही उत्कृष्ट माना जायेगा। इसके विपरीत जिसका हृदय मलीन, स्वार्थी, छली तथा असंतुष्ट है उसका जीवन उतना ही निकृष्ट कहा जायेगा फिर उसके पास क्यों न कुबेर का कोष हो और क्यों न वह इन्द्र जैसा भोग-विलास से पूर्ण विभ्रामक जीवन जी रहा हो। जीवन की उत्कृष्टता का मूल्याँकन बाह्य से नहीं अन्तर से ही किया जायेगा।
कर्म की प्रधानता और कामनाओं की नगण्यता पर निर्मित जीवन निश्चय ही उत्कृष्ट कोटि का होता है। जिस जीवन में कर्म की प्रधानता है निश्चय ही उसमें परिश्रम एवं पुरुषार्थ का पुण्य निवास करेगा। क्योंकि इन गुणों के अभाव में जीवन का कर्म-प्रधान हो सकना सम्भव नहीं। कर्म की प्रधानता के साथ जब कामनाओं की उपेक्षा भी की जाती है, उन्हें नगण्य ही रक्खा जाता है तब वह निष्काम कर्म, अलोलुप, पुरुषार्थ-परमार्थ—की श्रेणी में चला जाता है, जिसका परिणाम एक आन्तरिक एवं स्थायी सुख-शान्ति से भिन्न हो ही नहीं सकता। अहैतुक सुख-शान्तिपूर्ण जीवन ही उत्कृष्ट कोटि का जीवन है, मलीन, अशान्त तथा दुःखपूर्ण जीवन निश्चय ही निम्नकोटि का है और उच्चकोटि का जीवन कहा उसे भी नहीं जायेगा जिसका सुख संसार की नश्वर वस्तुओं पर निर्भर रहता हो अथवा पदार्थों के भावाभाव में आता जाता रहता हो। वस्तुओं पर निर्भर सुख की अनुभूति वास्तव में सुख नहीं होता वह वास्तव में ममता होती है जो वस्तुओं के अति संग से उत्पन्न दासता के कारण उत्पन्न होती है। ममत्व का सुख, सुख नहीं सुख की भ्रान्ति मात्र होती है जिसका आभास अज्ञान के कारण ही होता है।
कर्म के स्थान पर कामना प्रधान जीवन निकृष्ट कोटि का होता है। कामना प्रधान व्यक्ति जो कुछ करता है वह किसी कामना की पूर्ति के लिए ही करता है। उसकी रुचि-कर्म में नहीं बल्कि कामना की पूर्ति में ही रहती है। यही कारण है कि कर्म के माध्यम से जब उसकी कामना पूर्ति में कमी रह जाती है तब वह बहुत अधिक दुःखी तथा निराश होने लगता है। कामनायें जिनको कि लोग अज्ञानवश जीवन में प्रधानता दे देते हैं दुःख का मूलभूत कारण है। यह किसी भी सीमा में जाकर पूर्ण नहीं होतीं। इनका अस्तित्व अतृप्ति से अभिशप्त रहा करता है।
धन की कामना, पुत्र और कलत्र की कामना, पूजा एवं प्रतिष्ठा की कामना, कोठी, कार और लम्बे-चौड़े कार-रोजगार की कामना वास्तव में वे काँटे हैं जो मनुष्य को अपने में उलझाकर आगे बढ़ने ही नहीं देते। उस उच्च भूमिका उस आत्मिक स्तर पर पहुँचने ही नहीं देते जो मानव जीवन का वास्तविक श्रेय है। ऐसी बात नहीं कि मनुष्य जीवन में इनका कोई स्थान नहीं हैं? इनका स्थान है, किन्तु अपनी सीमा एवं उपयोगिता तक ही। जब यही और इन जैसी अन्य साँसारिक कामनायें जीवन का लक्ष्य बन जाती हैं तब निश्चय ही यह जंजाल प्राप्त कर मनुष्य का जीवन निम्न कोटि का बना देती हैं। कामनाओं से प्रेरित होकर कर्म करने में वह उच्चता, वह उदात्तता, वह राजत्व और वह शहंशाहियत नहीं रहती जो निष्काम कर्म करने में रहती है। सकाम कर्म तो कामनाओं की गुलामी करना है। गुलामी का जीवन कभी उत्कृष्ट नहीं हो सकता वह निम्न एवं निकृष्ट ही माना जायेगा! संसार का लघु-गुरु कोई भी कर्म-कर्तव्य समझ कर, ईश्वर की आज्ञा पालन मानकर करना चाहिए और उसका फल भी उसी को समर्पित कर देना चाहिये। ऐसे उदार कर्म के परिणाम स्वरूप आने वाली सफलता-असफलता दोनों ही मनुष्य को समान हर्ष उल्लास एवं सन्तोष देती है। वह उसकी प्रतिक्रिया से प्रभावित होकर संतुलन नहीं होता और धीर गम्भीर व्यक्ति की गरिमा से गौरवान्वित रहा करता है! ऐसा गौरवपूर्ण जीवन ही वास्तव में उच्चकोटि का जीवन है न कि पल-पल पर सफलता-असफलता से आन्दोलित होने वाला असंतुलित जीवन!
मनुष्य को उद्दात्त एवं उत्कृष्ट जीवन की प्राप्ति आध्यात्मिक दृष्टिकोण से ही हो सकती है। आध्यात्मिक दृष्टिकोण मनुष्य को भौतिक के निम्न स्तर से उठा कर आत्मा की उन्नत भूमिका में पहुँचा देता है। आध्यात्मिक दृष्ट कोण में साँसारिक वासनाओं, कामनाओं, तृष्णाओं एवं स्वार्थों का उतना भी मूल्य नहीं होता जितना कूड़ा-करकट का। मनुष्य की इन वितृष्णाओं से मोह, लोभ, क्रोध, ईर्ष्या, द्वेष, छल, कपट तथा वाद-विवाद आदि विकारों का जन्म होता है जो कि मनुष्य के जीवन को लीन, दीन, हीन, क्षुद्र तथा पापपूर्ण बना देते हैं। अविकार एवं विशाल आध्यात्मिक दृष्टि में इन निकृष्टताओं के स्थान कहाँ। जहाँ निकृष्टता नहीं, वहाँ हीनता और विनता भी नहीं। वहाँ उच्चता एवं उदात्तता के अतिरिक्त और क्या हो सकता है!
महानता का निवास वस्तुओं की बहुलता अथवा बहुमूल्यता में नहीं। उसका निवास मनुष्य की भावनाओं, विचारों तथा कर्मों में ही होता है! भावनाओं एवं विचारों की उन्नति आत्मा की उन्नति पर निर्भर है और आत्मा की उन्नति आध्यात्मिक दृष्टिकोण पर ही अवलम्बित रहा करती है। संसार की प्रत्येक वस्तु नश्वर एवं सारहीन है। जो नश्वर है, सारहीन है, उसमें उत्कृष्टता की कल्पना करना अज्ञान के अतिरिक्त और कुछ नहीं कहा जा सकता है! वस्तुओं का अपना एक उपयोग है। उनका महत्व उनकी उपयोगिता तक ही सीमित रखना बुद्धिमानी है। उन्हें जीवन का सर्वस्व मान लेना अथवा जीवन को उनके अधीन कर देना निष्कृष्ट का साथ कर स्वयं को निकृष्ट बना लेने की भाँति हेय है! जीवन वस्तुओं के लिए नहीं, बल्कि वस्तुयें ही जीवन सेविकाएं हैं। इन्हें सेविकाओं के स्थान तक ही सीमित रखना ठीक है। जीवन को इन पर अवलम्बित कर देना और जीवन में इन्हें सर्वोपरि स्थान दे देना अपने को सेविका के अधीन बना देना है, जो कि स्वयं में ही एक निकृष्टतम परिस्थिति है! आध्यात्मिक दृष्टिकोण वाला व्यक्ति नश्वर वस्तुओं का मूल्य ठीक-ठीक जानता-मानता और तदनुसार ही उनका सेवन भी करता है!
मानव जीवन में यदि कोई तत्त्व सारपूर्ण एवं शाश्वत है तो वह है आत्मा। अध्यात्मवादी व्यक्ति का विशाल दृष्टिकोण पंच भौतिक शरीर को भी अधिक महत्व नहीं देता। वह उसे आत्मा का वाहन अथवा उसका निवास कक्ष जानकर उसका उतना और वैसा ही पालन पोषण करता है; जितना कि आवश्यक एवं समीचीन होता है। वह उसके स्वामी आत्मा की उपेक्षा करके उसके वाहन की सेवा में ही बहुमूल्य जीवन को नहीं लगा देता! आध्यात्मिक दृष्टिकोण वाला व्यक्ति अपना जीवन सम्बन्ध आत्मा से स्थापित करता है इस नश्वर शरीर से नहीं। संसार की सर्वोच्च सत्ता से सम्बन्ध स्थापित करने वाला स्वतः ही उच्च एवं उत्कृष्ट होता जायेगा। विराट, अमर, एवं अक्ष्यशील आत्मा का सम्बन्ध मनुष्य को निश्चय ही संसार की तुच्छताओं से निकाल कर विराट् एवं अविनाशी बना देगा। आत्मा का संग ही वह शुभ एवं सौभाग्यपूर्ण सत्संग है जो मनुष्य जीवन को अक्षय एवं अहैतुक सुख-शान्ति से भर देता है! आध्यात्मिक दृष्टिकोण वाला व्यक्ति इस रहस्य को भली-भाँति जानता है और अपने ज्ञान का पूरा-पूरा लाभ उठा कर एक उद्दात्त एवं उत्कृष्ट जीवन प्राप्त करता है!
“हम शरीर हैं, शरीर की आवश्यकतायें पूरी करना
समाज में फैली हुई अन्धता, मूढ़ता तथा कुरीतियों का कारण अज्ञान है। अज्ञान में अन्धकार जैसा ही दोष होता है। अन्धकार में भ्रम होना स्वाभाविक ही है। जिस प्रकार अँधेरे में वस्तु स्थिति का ठीक-ठीक ज्ञान नहीं हो पाता, आस-पास रखी हुई चीज का स्वरूप यथावत दिखाई नहीं देता, उसी प्रकार अज्ञान के दोष से स्थिति, विषय का ठीक आभास नहीं होता। वस्तु स्थिति के ठीक न होने के अभाव में कुछ-का-कुछ सूझने और होने लगता है विचार और उनसे प्रेरित कार्य के गलत हो जाने पर विपत्ति, संकट अथवा भ्रम में पड़कर अपनी जान जोखिम कर लेना स्वाभाविक ही है।
अन्धकार के समान अज्ञान में भी अनजान भय लगा रहता है। रात के अन्धकार में रास्ता चलने वालों को डाकू, भूत-प्रेत आदि से दिखाई देने लगते हैं। अन्धकार में भी जो चीज दिखाई देगी वह शंका जनक ही होगी, उत्साहजनक नहीं। घर में रात के समय पेशाब शौच आदि के लिये आने-जाने वाले अपने मात-पिता बेटे-बेटियाँ तक अन्धकाराच्छन्न होने के कारण चोर, भूत, चुड़ैल जैसे भान होने लगते हैं ओर कई बार तो लोग उनको पहचान न सकने के कारण टोक उठते हैं तो भय से चीख मार बैठते हैं। यद्यपि उनके वे स्वजन आगे चलने पर न भूत-चुड़ैल अथवा चोर-डाकू निकले और पहचान से पूर्व ही थे किन्तु अन्धकार के दोष से वे भय एवं शंका के विषय बनें। भय का निवास वास्तव में न तो अन्धकार में होता है और न वस्तु में, उसका डडडड होता है उस अज्ञान में जो अंधेरे के कारण वस्तु-स्थिति का ज्ञान नहीं होने देता।
ज्ञान के अभाव में जन-साधारण भ्राँतिपूर्ण एवं निराधार बातों को उसी प्रकार समझ लेता है जिस प्रकार हिरन मरु-मरीचिका में जल विश्वास कर लेता है और निरर्थक ही उसके पीछे दौड़-दौड़कर जान तक गंवा देता है। अज्ञान का परिणाम बड़ा ही अनर्थकारी होता है। अज्ञान के कारण ही समाज में अनेकों अन्धविश्वास फैल जाते हैं। स्वार्थी लोग किसी अन्ध-परम्परा को चलाकर जनता में यह भय उत्पन्न कर देते हैं कि यदि वे उक्त परम्परा अथवा प्रथा को नहीं मानेंगे तो उन्हें पाप लगेगा जिसके फलस्वरूप उन्हें लोक में अनर्थ और परलोक में दुर्गति का भागी बनना पड़ेगा। अज्ञानी लोग ‘भय से प्रीति’ होने के सिद्धान्तानुसार उक्त प्रथा-परम्परा में विश्वास एवं आस्था करने लगते हैं और तब उसकी हानि देखते हुए भी अज्ञान एवं आशंका के कारण उसे छोड़ने को तैयार नहीं होते। मनुष्य आँखों देखी हानि अथवा संकट से उतना नहीं डरते जितना कि अनागत आशंका से। अज्ञानजन्य भ्रम जंजाल में फंसे हुए मनुष्य का दीन-दुःखी रहना स्वाभाविक ही है।
यही कारण है कि ऋषियों ने “तमसो मा ज्योति र्गमय” का सन्देश देते हुए मनुष्यों को अज्ञान की यातना से निकलने के लिये ज्ञान-प्राप्ति का पुरुषार्थ करने के लिये कहा है। भारत का अध्यात्म-दर्शन ज्ञान-प्राप्ति के उपायों का प्रतिपादक है। अज्ञानी व्यक्ति को शास्त्रकारों ने अंधे की उपमा दी है। जिस प्रकार बाह्य-नेत्रों के नष्ट हो जाने से मनुष्य भौतिक जगत का स्वरूप जानने में असमर्थ रहता है उसी प्रकार ज्ञान के अभाव में बौद्धिक अथवा विचार-जगत की निर्भरता की जानकारी नहीं हो पाती। बाह्य-जगत के समान मनुष्य का एक आत्मिक जगत भी है, जो कि ज्ञान के अभाव में वैसे ही अँधेरा रहता है जैसे आँखों के अभाव में यह संसार।
अन्धकार से प्रकाश और अज्ञान से ज्ञान की ओर जाने में मनुष्य का प्रमुख पुरुषार्थ माना गया है। जिस प्रकार आलस्यवश दीपक न जलाकर अन्धकार में पड़े रहने वाले व्यक्ति को मूर्ख कहा जायेगा उसी प्रकार प्रमादवश अज्ञान दूर कर ज्ञान न पाने के लिये प्रयत्न न करने वाले को भी मूर्ख ही कहा जायेगा। भारतवर्ष की महिमामयी संस्कृति अपने अनुयायियों को विवेकशील बनने का सन्देश देती है मूढ़ अथवा अन्धविश्वासी नहीं।
ज्ञानवान् अथवा विवेकशील बनने के लिए मनुष्य को अपने मन-मस्तिष्क को साफ-सुथरा बनाना होगा, उनका परिष्कार करना होगा। जिस खेत में कंकड़, पत्थर तथा खर-पतवार भरा होगा उसमें अन्न के दाने कभी भी खेत से झाड़-झंखाड़ और कूड़ा-करकट साफ करके दाने बोये जायेंगे। उसी प्रकार मनुष्य में ज्ञान के बीज तब तक जड़ नहीं पकड़ सकते जब तक कि मानसिक एवं नैतिक धरातल उपयुक्त न बना लिया जायेगा।
हमारे मन-मस्तिष्कों में इसी जन्म की ही नहीं, जन्म-जन्मान्तरों की विकृतियाँ भरी रहती हैं। न जाने कितने कुविचार, कुवृत्तियाँ एवं मूढ़ मान्यतायें हमारे मन-मस्तिष्क को घेरे रहती हैं। ज्ञान पाने अथवा विवेक जाग्रत करने के लिये आवश्यक है कि पहले हम अपने विचारों एवं संस्कारों को परिष्कृत करें। विचार एवं संस्कार परिष्करण के अभाव में ज्ञान के लिये की हुई साधना निष्फल ही चली जायेगी।
विचार-परिष्कार का अमोघ उपाय अध्ययन एवं सत्संग को ही बतलाया गया है। विचारों में संक्रमण एवं ग्रहणशीलता रहती है। जब मनुष्य अध्ययन में निरन्तर संलग्न रहता है तब उसको अपने विचारों द्वारा विद्वानों के विचारों के बीच से बार-बार गुजरना पड़ता है। पुस्तक में लिखें विचार अविचल एवं स्थिर होते हैं। उनके प्रभावित होने अथवा बदलने का प्रश्न ही नहीं उठता। स्वाभाविक है कि अध्ययन कर्त्ता के ही विचार, प्रभाव ग्रहण करते हैं। जिस प्रकार के विचारों की पुस्तक पढ़ी जायेगी अध्येता के विचार उसी प्रकार ढलने लगेंगे। इसलिये अध्ययन के साथ यह प्रतिबन्ध भी लगा दिया गया है कि अध्येता उन्हीं ग्रन्थों का अध्ययन करें जो प्रामाणिक एवं सुलझे हुए विचारों वाले हों। विचार-परिष्कार अथवा ज्ञान प्राप्त करने के उद्देश्य से पढ़ने वालों को एकमात्र जीवन एवं निर्माण सम्बन्धी साहित्य का ही अध्ययन करना चाहिये। उन्हें निठल्ले एवं निकम्मे लोगों की तरह निम्न मनोरथ वाले उपन्यास, कहानी, नाटक तथा कविता आदि नहीं पढ़ना चाहिए। अश्लील, अनैतिक, वासनापूर्ण अथवा जासूसी आदि से भरे उपन्यास पढ़ने से लाभ तो कुछ नहीं ही होना है उल्टे बहुत अधिक हानि ही होगी। अयुक्त साहित्य पढ़ने से विचारों की वह थोड़ी-बहुत उदात्तता भी चली जायेगी, जो उनमें रही होगी। अध्ययन का तात्पर्य सत्यं, शिवं एवं सुन्दरं साहित्य पढ़ने से है। सद्विचारों तथा सदुद्देश्य से पूर्ण साहित्य ही पढ़ने योग्य होता है। वेद, शास्त्र, गीता, उपनिषद् आध्यात्मिक एवं धार्मिक साहित्य ही ऐसा साहित्य हो सकता है जो अध्ययन के प्रयोजन को पूरा कर सकता है। इसके विपरीत अनुपयुक्त एवं अवाँछनीय साहित्य का पठन-पाठन विचारों को इस सीमा तक दूषित कर देगा कि फिर उनका पूर्ण परिष्कार एक समस्या बन जायेगा। आत्मोद्धारक ज्ञान प्राप्त करने के जिज्ञासु व्यक्तियों को तो सत्साहित्य के सिवाय अवाँछनीय साहित्य को हाथ भी न लगाना चाहिए। सच्ची बात तो यह है कि अमुक अवाँछनीय एवं निम्न मनोरंजनार्थ किये गये ‘लिपि-लेखन’ को साहित्य कहा ही नहीं जाना चाहिये। यह तो साहित्य के नाम पर लिखा गया कूड़ा-करकट होता है, जिसे समाज के हित-अहित से मतलब न रखने वाले कुछ स्वार्थी लेखक उसी प्रकार लिखकर पैसा कमाते हैं जिस प्रकार कोई भ्रष्टाचारी खाने-पीने की चीजों में अवाँछनीय चीजें मिलाकर लाभ कमाते हैं। व्यावसायिक भ्रष्टाचारी जहाँ राष्ट्र का शारीरिक स्वास्थ्य नष्ट करते हैं वहाँ अशिव लेखक राष्ट्र का मानसिक, बौद्धिक तथा आत्मिक स्वास्थ्य नष्ट करते हैं। मनुष्य की चारित्रिक अथवा आध्यात्मिक क्षति शारीरिक क्षति की अपेक्षा कहीं अधिक भयंकर एवं असहनीय होती है।
सत्संग से भी उसी उद्देश्य की पूर्ति होती है जो अध्ययन से। विद्वान् एवं सन्तजनों से प्रत्यक्ष संपर्क में आने से उनको सुनने तथा समझने एवं अनुकरण करने का अवसर मिलता है जिससे विचार-परिष्कार की प्रक्रिया और शीघ्र प्रारम्भ हो जाती है। किन्तु आज के समय में प्रामाणिक एवं श्रेष्ठ सन्त-पुरुषों का अभाव ही दीखता है। ऐसे महामानव मिलना सहज नहीं, जिनके विचार तेजस्वी एवं सार्थक हों, जिनका व्यक्तित्व निष्कलंक और आचरण आदर्शपूर्ण हो। हाँ, बकने-झकने और प्रवचन करने वाले विद्वान् जगह-जगह मिल जायेंगे जिनके कथन में न तो कोई सत्य सार होगा और जो बिना सिर-पैर के उपदेशों से जनता को पथ-भ्रान्त करके अपना स्वार्थ सिद्ध करते हैं। ऐसे तथाकथित सन्तों के समागम से तो लाभ के स्थान पर हानि ही अधिक हो सकती है।
कहीं किन्हीं दूर प्रदेशों में कोई सच्चे सन्तजन रहते भी हों जो सद्ज्ञान एवं जीवन-निर्माण की सही शिक्षा दे सकते हों—तो सबका जल्दी-जल्दी उनके पास पहुँच सकना सम्भव नहीं। आज के व्यस्त एवं विपन्न जीवन में इतना धन एवं समय किसके पास हो सकता है जो दूरस्थ महापुरुषों के पास जाकर काफी समय तक रह सकें और सत्संग का लाभ उठा सके। साथ ही सच्चे सत्पुरुषों के पास स्वयं भी तो इतना समय नहीं होता कि वे आत्मकल्याण की साधना को सर्वथा त्यागकर आगन्तुकों को पूरा समय दे सकें। इस प्रकार साक्षात सत्संग की सम्भावनायें एवं अवसर आज नहीं के बराबर ही रह गये हैं।
मनुष्य के लिये विचार-परिष्कार एवं ज्ञानोपार्जन के लिए यदि कोई मार्ग रह जाता है तो वह अध्ययन ही है। पुस्तकों के माध्यम से किसी भी सत्पुरुष, विद्वान् अथवा महापुरुष के विचारों के संपर्क में आया और लाभ उठाया जा सकता है। सत्संग का तात्पर्य वस्तुतः विचार-संपर्क है जो उसकी पुस्तकों से सहज ही प्राप्त किया जा सकता है।
जीवन का अन्धकार दूर करना और प्रकाशपूर्ण स्थिति पाकर निर्द्वन्द्व एवं निर्भर रहना यदि वाँछित है तो समयानुसार अध्ययन में निमग्न रहना भी नितान्त आवश्यक है। अध्ययन के बिना विचार-परिष्कार नहीं, विचार-परिष्कार के बिना विवेक और विवेक के बिना ज्ञान नहीं। जहाँ ज्ञान नहीं वहाँ अन्धकार होना स्वाभाविक ही है और अँधेरा जीवन शारीरिक, मानसिक तथा आध्यात्मिक तीनों प्रकार के भयों को उत्पन्न करने वाला है जिससे अज्ञानी न केवल इस जन्म में ही बल्कि जन्म-जन्मान्तरों तक, जब तक कि वह ज्ञान का आलोक नहीं पा लेता त्रिविधि तापों की यातना सहता रहेगा। जीवनोद्धार के उपायों में अध्ययन का उपाय सबसे श्रेष्ठ, सरल, सुगम एवं सुलभ है। आत्मवान् व्यक्ति को इसे ग्रहण कर भौतिक अज्ञान-यातना से मुक्त होना ही चाहिये।
नकली स्वर्ण छोड़कर वास्तविक सम्पदा प्राप्त करें-
अवंती देश के कुररधर नगर में भिक्षु कोटि कर्ण का अमृत-उपदेश चल रहा था। भिक्षु कोटि कर्ण अनन्त धन-वैभव का त्यागकर परिव्राजक बने थे। वे इतने धनवान थे कि कानों में एक करोड़ रु. मूल्य के कुण्डल पहना करते थे। जनता उन त्याग मूर्ति भिक्षु का उपदेश बड़ी तल्लीनता से सुन रही थी। श्रोताओं में श्राविका कार्तियानी भी बैठी थी। संध्या हो चली थी। उसने दासी को घर में दीप बाती कर आने के लिये भेजा। दासी ने घर जाकर देखा कि चोरों ने सेंध लगा दी है और वे सारा स्वर्ण निकाल-निकाल कर बाँध रहे हैं। दासी डरकर स्वामिनी के पास भागी। चोरों का सरदार उसे मारने के लिए पीछे से दौड़ा।
दासी श्राविका कार्तियानी के पास पहुँच गई और उसे घटना बताई, किन्तु वह उपदेशामृत में इतनी मग्न थी कि दासी की बात न सुन सकी। दासी ने उसका कन्धा हिलाकर फिर कहा—’स्वामिनी, चोरों ने घर में सेंध काट दी है और वे सब स्वर्ण लूटे लिये जा रहे हैं।’ श्राविका ने दुःखी होकर कहा—’तू मुझे क्यों व्यर्थ में दुःख दे रही है। चोरों को स्वर्ण भूषण ले जाने दे, वह स्वर्ण नकली है। देखती नहीं कि मैं दोनों हाथों वास्तविक स्वर्ण-वैभव बटोर रही हूँ, वह जिसे कोटि कर्ण महाराज ने असंख्यों का वैभव त्यागकर पाया है।’
यह सुनकर चोरों के सरदार के ज्ञान-चक्षु खुल गये। वापिस आकर साथियों से कहा कि यह नकली स्वर्ण यहीं पड़ा रहने दो। चलो, भिक्षु कोटि कर्ण द्वारा बाँटी जा रही धर्म की वास्तविक सम्पदा प्राप्त करें जिसके लिए श्राविका ने इस स्वर्ण की उपेक्षा कर दी है। सब चोर कुटी पर पहुँचकर और भिक्षु कोटि कर्ण का उपेशा मृत सुनकर कृतार्थ हो गये।
आध्यात्मिक प्रगति के लिये आन्तरिक स्वच्छता की अनिवार्य आवश्यकता है। जिसका मन मलीन है, जिसकी बुद्धि निर्विकार नहीं है, जिसका विवेक निर्मल नहीं है, वह व्यक्ति लाख पूजा-पाठ तथा जप-तप सब करने पर भी आध्यात्मिक लाभ नहीं पा सकता। आध्यात्मिक अभ्यास के लिए जिन नियम-संयमों का निर्देश किया गया है, उनके पालन का उद्देश्य अपनी आन्तरिक स्वच्छता करना ही है। जिसका अन्तर दर्पण की तरह निर्मल नहीं है उसके हृदय में ईश्वरीय प्रकाश का प्रतिबिम्ब अवतीर्ण नहीं हो सकता। व्रत, उपवास, पूजा-पाठ, योग, ध्यान, धारणा आदि सारे पुनीत कृत्य मनुष्य को आन्तरिक स्वच्छता की ओर ही ले जाते हैं। आध्यात्मिक लाभ प्राप्त करने के लिये मनुष्य को पराकाष्ठा तक स्वच्छ एवं पवित्र रहना होगा। स्वच्छता परमात्मा का सान्निध्य है अथवा निर्मलता आत्मा का प्रकाश है आदि आध्यात्मिक सूक्तियाँ मनुष्य की स्वच्छता पवित्रता एवं निर्मलता की ओर संकेत करती हैं।
आन्तरिक स्वच्छता का आधार शारीरिक स्वच्छता ही है। जिस मनुष्य का शरीर पूर्ण रूप से पवित्र एवं स्वच्छ न होगा उसका मन पवित्र होगा ऐसी आशा नहीं की जा सकती। अपना आन्तरिक जीवन स्वच्छ एवं पवित्र बनाने के लिये आवश्यक है कि सबसे पहले अपने बाह्य जीवन को शुचि तथा निर्मल बनाया जाये। बाह्य-वातावरण अथवा रहन-सहन मनुष्य के आन्तरिक जीवन को प्रभावित किया करता है। मनुष्य अपने अन्तर को जिस प्रकार का बनाना चाहता है, पहले उसे ठीक उसी प्रकार अपने बाह्य जीवन को ढालना होगा। आन्तरिक शुचिता एवं स्वच्छता का अभ्यास बाह्य पवित्रता तथा स्वच्छता द्वारा ही सिद्ध किया जा सकता है। अपना बाह्य जीवन शुद्ध किये बिना यदि कोई धार्मिक कृत्यों द्वारा अपने आन्तरिक जीवन को पवित्र बना लेना चाहता है तो उसका सारा प्रयास निष्फल चला जायेगा।
जो बाह्य स्वच्छता के सुकर संयम का निर्वाह नहीं कर सकता वह निर्बल व्यक्ति काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, द्वेष आदि विकट विकारों एवं जड़ जमाये निकृष्ट संस्कारों को दूर करने के दुष्कर नियमों का निर्वाह किस प्रकार कर सकता है? लोग धर्म-कर्मों के आधार पर अपने आन्तरिक जीवन को निर्मल एवं उन्नत बना लेना चाहते हैं किन्तु यह नहीं सोच पाते कि धर्म के लक्षणों में शौच का प्रमुख स्थान है और स्वच्छता पवित्रता की पहली शर्त है। मनुष्य का शरीर, उसके वस्त्र अथवा उसका निवास स्थान भले ही तथाकथित अपवित्रताओं से मुक्त हों, उसमें अशुचिता का कोई कारण उपस्थित न किया गया हो, तब भी वह पवित्र नहीं माना जायेगा।
यदि उसका उपासनास्थल झाड़ा-बुहारा, लीपा-पोता या धोया हुआ नहीं है, नीराजना के उपकरण साफ-सुथरे नहीं है। दीपक में चीकट है, बत्ती गन्दगी से भरी है, आसन पर धूल जमी है, प्रतिमा मलीन है, निर्माल्य अथवा बासी फूलों का अंश पड़ा हुआ है तो निश्चय ही देव-प्रतिमा सहित उसका पूजा-स्थल अपवित्र है। ऐसी मलीन स्थिति में किया हुआ कोई भी धर्म-कर्म आध्यात्मिक विकास में सहायक नहीं हो सकता। आध्यात्मिक उन्नति के लिये स्वच्छता एवं शुचिता नितान्त आवश्यक हैं।
जिस प्रकार बुरे एवं दुष्ट लोगों का संसर्ग किसी भी व्यक्ति के विचारों तथा आचरण का पतन कर देता है। ठीक उसी प्रकार अशुचि एवं अस्वच्छ वातावरण भी आचार-विचारों को अपवित्र एवं मलीन बना देता है। जब मनुष्य किसी गन्दी जगह पहुँच जाता है तो उसके मन में स्वाभाविक रूप से मलिनता का उद्रेक होने लगता है। उसके हृदय पर घृणा, ग्लानि, अरुचि तथा अप्रसन्नता की प्रतिक्रिया होती है। उतनी देर के लिये उसके सद्विचार, सद्भावनाएँ एवं सदाशयता गन्दगी से दब जाया करते हैं। इसके विपरीत जब वह किसी स्वच्छ, पवित्र अथवा मनोरम स्थान पर जाता है तब उसका मन मस्तिष्क प्रसन्न हो उठता है। वह अपने अन्दर एक उच्चता, स्वच्छता एवं पवित्रता अनुभव करता है। उसकी आत्मा में रोचकता एवं रम्यता का आविर्भाव होता है और जब तक वह उस पवित्र वातावरण में रहता है तब तक एक अनिवर्चनीय सुख-शान्ति का अनुभव करता है। मनुष्य की आत्मा पर यह पवित्र एवं अपवित्र प्रतिक्रिया आध्यात्मिक गति में बहुत बड़ा अर्थ रखती है। मनुष्य जितना स्वच्छ एवं पवित्र रहेगा उतना ही अध्यात्म-पथ पर आगे बढ़ेगा। इसके विपरित जितना मलीन, गन्दा तथा अपवित्र रहेगा उतना ही पीछे हटेगा। अस्तु, आवश्यक है कि आध्यात्मिक प्रगति चाहने वाले अधिक-से-अधिक स्वच्छ एवं पवित्र रहें।
बाह्य स्वच्छता आन्तरिक स्वच्छता का हेतु है। यदि हमारा शरीर मलीन एवं दुर्गन्धपूर्ण है, हमारे कपड़े मैले तथा कुवासित हैं, हमारा भोजन गन्दा, स्थान मलीन और रहन-सहन अनुपयुक्त है तो हम यह आशा कदापि नहीं कर सकते कि हमारा मन, मस्तिष्क तथा आत्मा स्वच्छ रहेगी। हमारे विचार, हमारी भावनाएँ आध्यात्मिक पथ का अनुसरण कर सकेंगी। आन्तरिक ज्योति की पात्रता बाह्य स्थिति से ही समझी जा सकती है। ईश्वर परम पवित्र, शुचि तथा सुन्दर है। उसकी अनुभूति मलीन स्थिति में नहीं की जा सकती है। परमात्म-प्रकाश को पाने के लिये तो मनुष्य को गंगाजल की भाँति प्रसन्न एवं पवित्र बनना होगा।
जिसने अपने शरीर, भोजन, वस्त्र, घर-द्वार, परिवार, परिजनों तथा पड़ोस को स्वच्छ एवं पवित्र रखना सीख लिया है मानों उसने आध्यात्मिक प्रगति की बड़ी मञ्जिल पार कर ली है, आत्म-लाभ का मूल मन्त्र जान लिया है और परमात्म-प्रकाश के आगमन के लिये जीवन के आलोकायन खोल दिये हैं। अध्यात्म-अभ्यास द्वारा मनुष्य जिस उच्चस्तरीय दैवी जीवन को प्राप्त करना चाहता है, स्वच्छता एवं पवित्रता स्वयं में ही वह एक दिव्य जीवन है। सुख, शाँति, सन्तोष, समृद्धि, निर्मलता, विमलता आदि मधुरताओं की सिद्धि को ही दैवी-जीवन कहा जाता है। देवताओं के निवास-स्थान—जिस स्वर्ग की कल्पना की गई है उसमें इन्हीं सब समृद्धियों तथा स्वच्छता, शुचिता, सौंदर्य एवं निर्मलता आदि रम्यताओं की उपस्थिति विशेष रूप से मानी गई है। यदि मनुष्य अपनी तथा अपने पास-पड़ोस की गन्दगी दूर करके उसके स्थान पर स्वच्छता एवं पवित्रता को पूरी तरह से स्थापित कर ले तो उसको दिव्य जीवी कहने में किस को संकोच हो सकता है। काल्पनिक स्वर्ग के स्थान पर यदि हम स्वच्छता, पवित्रता एवं प्रयत्न करें तो अधिक उपयुक्त तथा समीचीन होगा।
कहना न होगा कि गन्दगी पशुता का लक्षण है। पशु अपने शरीर की स्वच्छता का ध्यान नहीं रखते, वे जहाँ रहते, उठते-बैठते या चलते-फिरते हैं वहीं मल-मूत्र त्याग कर देते हैं। उन्हें अपनी इन मलीन क्रियाओं एवं स्थान की संगति का जरा भी विचार नहीं रहता। विवेक रहित होने से उन्हें उनकी इन अवाँछनीय क्रियाओं के लिए किसी हद तक क्षमा किया जा सकता है किन्तु मनुष्य तो विवेकशील प्राणी है उसे इस दोष के लिये किसी प्रकार भी क्षमा नहीं किया जा सकता। उसका गन्दा रहना किसी प्रकार भी शोभनीय नहीं है। जो गन्दा रहता अथवा गन्दगी को सहता है निश्चय ही वह अपने पाशविक संस्कारों को दूर नहीं कर पाया है। आध्यात्मिक प्रयास करके देवता बनने से पूर्व अच्छा है कि पहले हम पूर्ण मनुष्य बनने का प्रयत्न करें। आध्यात्मिक उपलब्धि का यथार्थ क्रम भी यही है कि पहले मनुष्य अपने कुसंस्कारों से मुक्त होकर ठीक-ठीक मनुष्य बने। मनुष्यों की तरह ही साफ-सुथरा तथा पवित्र बने। इस प्रकार मनुष्यता प्राप्त करने के बाद ही यदि वह देवत्व की ओर बढ़ने की आकाँक्षा करे तो उसकी इच्छा उपयुक्त ही कही जायेगी। जो पशुता से देवत्व तक पहुँचने में बीच में मनुष्यता को छोड़ कर सीधे ऊँची छलाँग मारना चाहता है उसका साहस बाल-विनोद से अधिक कुछ नहीं समझा जा सकता है। मनुष्यता की परि वक्ता ही देवत्व का द्वार है। जिसने पशुता का परित्याग कर अपने को पूर्ण एवं सच्चा मनुष्य बना लिया है उसने मानों देवत्व प्राप्त करने का पथ-निर्माण कर लिया है। मनुष्य-शरीर से देवताओं की श्रेणी में पहुँचने वाले सारे महापुरुषों ने पहले मनुष्यता की ही सिद्धि की है। मनुष्यता की चरम उपलब्धि ही देवत्व है, इसमें कोई सन्देह नहीं। अस्तु, मनुष्य को चाहिये कि वह अपने आध्यात्मिक प्रयास को मनुष्यता के रूप में सार्थक एवं चरितार्थ करे। स्वच्छता एवं पवित्रता की पराकाष्ठा ही वह मनुष्यता है जिसकी परिणिति देवत्व में होना असंदिग्ध है।
किसी को कष्ट पहुँचाना, दुःख देना अथवा प्रसन्नता हरना अध्यात्म-पथ में बहुत बड़ा अवरोध—पाप है। गन्दा आदमी दूसरों को कितना कष्ट पहुँचाता है, इसका अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है। जब शरीर, वस्त्र तथा आकार-प्रकार से गन्दा आदमी किसी के संपर्क में आता है तब उस आदमी की आत्मा पर बड़ी ही प्रतिकूल प्रतिक्रिया होती है। उसे घृणा अथवा ग्लानि का दुःख सहन करना पड़ता है। गन्दे पैरों अथवा थूक खासकर किसी का स्थान गन्दा करना —किसी को कितना दुःख पहुँचाना है? यह एक साधारण आदमी भी समझ सकता है। गन्दगी एक अस्वास्थ्यकर स्वभाव है। जो स्वयं गन्दा रहता है अथवा मलीन वातावरण में निवास करता है वह अवश्य ही किसी प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रोग का शिकार होता है। ऐसी स्थिति में किसी के संपर्क में आना अन्य को रोगी बनाने का उपक्रम करना है। जो स्वयं गन्दे रहते हैं, अपने वस्त्रों को गन्दा रखते हैं, घर-द्वार अथवा पास-पड़ौस को किसी प्रकार गन्दा रखते हैं, किन्हीं सार्वजनिक स्थानों को गन्दा बनाने में संकोच नहीं करते वे निश्चित रूप में राष्ट्र एवं समाज को कलंकित करने के साथ अस्वस्थ बनाने, सामूहिक रूप में लोगों को कष्ट देने का प्रयत्न करते हैं। ऐसा गन्दा, निकृष्ट तथा अधो वृत्ति वाला सामाजिक दोषी व्यक्ति कोई आध्यात्मिक उन्नति कर सकता है— ऐसा कहना अपनी अल्प बुद्धिता का परिचय देना है।
अध्यात्म-जिज्ञासुओं को शपथपूर्वक अपनी सारी गन्दगी को धोना ही होगा। जितना समय जप-तप एवं पूजा-पाठ में दिया जायें यदि उतना समय अपनी, अपने तथा पास-पड़ौस की गन्दगी दूर करने में लगाया जाये तो मनुष्य दोहरी आध्यात्मिक प्रगति कर सकता है।
स्वच्छता ईश्वर का स्वाभाविक सान्निध्य है। इसे प्राप्त करके मनुष्य सहज ही ईश्वर की प्राप्ति कर सकता है। शरीर, वस्त्र, घर-द्वार, पास-पड़ौस, आचार-विचार एवं आहार-विहार की स्वच्छता एवं पवित्रता, सुख-शाँति, सन्तोष, प्रसन्नता एवं परमार्थ के पावन द्वार है। स्वच्छता एवं समृद्धि का निकट सम्बन्ध है—कहते हैं कि जो मनुष्य गन्दा रहता है उसे लक्ष्मी अवश्य ही त्याग देती है फिर चाहे वह साक्षात् विष्णु ही क्यों न हों। सदा स्वच्छ एवं पवित्र रहिए साथ ही कहीं पर गन्दगी न करिये और दूसरों को स्वच्छता के लिए प्रेरित करिये तो यह एक परम पवित्र परमार्थ पुण्य होगा जो आपकी अध्यात्कि उन्नति में सहायक होगा। जहाँ स्वच्छता ईश्वर के प्रति प्रेम की द्योतक है, वहाँ गन्दगी उसके प्रति विद्रोह है। गन्दे रहकर परम पवित्र एवं सुन्दर के प्रति विद्रोह न करिये बल्कि स्वच्छ, स्वस्थ, सुन्दर तथा पवित्र बनकर उसका सान्निध्य प्राप्त करिये।
=कोटेशन===========================
प्रयत्न की प्रतिक्रिया-
चाहे हम बच्चों को गला घोटकर मार डालें, परन्तु अपने कर्मों को नहीं मेट सकते। चाहे हमको मालूम पड़े, या न पड़े परन्तु हमारे कर्म सदैव अमर रहते हैं।
—जार्ज इलियट
इस संसार में मनुष्य का कोई कर्म ऐसा नहीं जिसके साथ परिणामों का एक लम्बा क्रम न बँध जाता हो, और कोई मनुष्य इतना दूरदर्शी नहीं है कि वह इस क्रम को अन्त तक देख सके।
—टामस
—टामस
आवश्यकताओं की अधिकता निश्चय ही अभावजन्य दुःख का कारण है। जिसकी आवश्यकताएँ जितनी सीमित एवं स्वल्प होती हैं, वह उतना ही अधिक सन्तुष्ट एवं सुखी रहता है। न जाने कितने द्वन्द्वों एवं संघर्षों में अपव्यय होने वाली अपनी सृजनात्मक शक्ति की रक्षा कर लेता है।
अपनी बढ़ी हुई आवश्यकताओं के बढ़े हुए वास से प्रत्येक व्यक्ति किसी-न-किसी रूप में पीड़ित रहता है। कुछ समय तो लोग बिना आगा-पीछा देखे, वेग से अपनी आवश्यकतायें बढ़ाते चले जाते हैं, कुछ उनको सन्तुष्ट करने का भी प्रयत्न करते हैं किन्तु शीघ्र ही उनका निश्चित परिणाम—अभाव एवं असन्तोष— उनके सामने आ जाता है और तब असह्य आवश्यकताओं से चाहते हुए भी पीछा नहीं छुड़ा पाते।
जीवन में सुख-शाँति के लिये बढ़ी हुई अथवा कृत्रिम अथवा निरर्थक आवश्यकताओं से पीछा छुड़ाना बहुत आवश्यक है। मनुष्य यदि ईमानदारी से इस उद्देश्य में सफल होना चाहता है तो इन उपायों को अपना कर कृतकृत्य हो सकता है, आवश्यकताओं को कम कर सकता है, उनसे मुक्त हो सकता है तथा वास्तविक एवं मितव्ययी सुख-शाँति का अधिकारी बन सकता है।
हमारी अनुकरण-वृत्ति भी अनेक निरर्थक आवश्यकताएँ बढ़ाने में बहुत सहायक होती है। हमें स्वभावतः जीवन में अनेक वस्तुओं की आवश्यकता नहीं रहती, किन्तु हम दूसरों की देखा-देखी उन्हें अपने जीवन में स्थान दे देते हैं। जैसे एक साधारण से मकान में सामान्य साधनों द्वारा गुजर हो सकने पर भी बहुत से लोग अपने मित्रों, पास-पड़ौसियों तथा सम्बन्धियों की देखा-देखी स्थिति से बाहर तक का मकान ले लेते हैं और उसे रेडियो, सोफा सैटों तथा बिजली आदि से सजाने के लिये पैसा खर्च किया करते हैं। यदि वास्तव में जिसके लिये इन वस्तुओं तथा साधनों को कोई उपयोगिता नहीं है, तो यह सब चीजें उसके लिये कृत्रिम तथा निरर्थक आवश्यकतायें हैं। देखा-देखी नकल करने की आदत पर नियन्त्रण कर लेने से इन निरर्थक आवश्यकताओं से बचा जा सकता है। आदमी सोच सकता है, जब हमें इन चीजों की वास्तविक आवश्यकता नहीं है तो इन पर बेकार में पैसा क्यों फेंका जाये। क्यों न वह पैसा बचाकर किसी उपयोगी काम में लगाया अथवा आगे के लिये बचाया जाये। निरर्थक बातों पर पैसा गँवाना अक्लमन्दी नहीं है और सो भी किसी की देखादेखी। मनुष्य की यह हिर्स भावना बहुत कुछ आर्थिक ह्रास किया करती है।
रहन-सहन के साथ लोग खाने-पीने, पहनने-ओढ़ने में भी देखा-देखी करके अपनी निरर्थक ही नहीं, हानिकारक आवश्यकताएँ तक बढ़ा लेते हैं। पान, बीड़ी, सिगरेट, शराब, गाँजा, अफीम आदि की आदत इसी अनुकरण वृत्ति की देन होती है। खाने-पीने में चाय काफी, सोड़ा, लेमन आदि निरर्थक चीजों के शामिल हो जाने का कारण ‘देखा-देखी’ ही होती है। वह यह चीज खाता है तो मैं भी खाऊँगा, वह ऐसा पहनता है तो मैं भी क्यों न पहनूँ, वह इतने बार चाय पी सकता है क्या मैं नहीं पी सकता, आदि के विचार अनुकरण वृत्ति की ही प्रति ध्वनि होते हैं। अनुकरण वृत्ति के कारण लोग अनेक सवारियाँ तथा प्रसाधन-सामग्री की आवश्यकता बढ़ा लेते हैं। तेल, फुलेल, इत्र, स्नो, पाउडर, क्रीम तथा अन्य न जाने कितनी प्रसाधन सामग्री अनुकरण के कारण ही आवश्यकता बन जाती हैं। अनुकरण की ओछी वृत्ति छोड़ देने से मनुष्य बहुत सी नकली जरूरतों से बचा रह सकता है।
प्रदर्शन-वृत्ति तो आवश्यकताओं की बीजिका ही है। यह न जाने कितनी नित्य नई एवं निरर्थक आवश्यकताओं को जन्म देती रहती है। संसार के सारे फैशन और दिखावा व साज-बाज इसी वृत्ति की विकृति है। घरों में सामानों के अम्बार, आवश्यकताओं से अधिक चीजों की संख्या, तड़क-भड़क, चमक-दमक, शान-शौकत, बहुतायत तथा बहुमूल्यता इसी प्रदर्शन-वृत्ति की देन है। एक बार जो प्रदर्शन वश अपना रहन-सहन अनावश्यक रूप से समाज में अपने को बड़ा आदमी दिखाने के लिए उठा देता है तो फिर लाज-लिहाज, उपहास अथवा अपवाद के डर से वह उसकी आवश्यकता बन जाती है, जिसके पूरा करने में लोगों को कर्जदार तक बन जाना पड़ता है।
दिखावा एक ओछी वृत्ति है, बचकाना स्वभाव है। हम जो नहीं हैं वह दिखाने की कोशिश करना मिथ्या दम्भ है। इस दम्भ से बचकर चलने वालों के जीवन में कृत्रिम-आवश्यकताओं का अभिशाप बढ़ने नहीं पाता। अपने को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाना कोई अच्छा स्वभाव नहीं है। इससे समाज में प्रतिष्ठा बढ़ने का स्वप्न देखने वाले बड़े भ्रम में रहते हैं। मिथ्या प्रदर्शन करना वास्तव में अपनी आर्थिक नींव पर फावड़ा चलाना है। प्रदर्शनवाद का रोग लगाकर अपनी कृत्रिम आवश्यकताओं को बढ़ा लेने वालों को गम्भीरता से विचार करके इस बात का लेखा-जोखा लेना चाहिये कि वे दिखावे पर जो इतना खर्च कर रहे हैं उससे क्या समाज में उनकी प्रतिष्ठा बढ़ गई है? ध्यानपूर्वक विचार करने से उन्हें पता चल जायेगा कि प्रतिष्ठा के लोभ में उन्होंने जो प्रदर्शनवाद को अपने जीवन में स्थान दे दिया है वह उनकी भूल थी, जिसके कारण उन्होंने अब तक बहुत हानि उठाई है। सादी जिन्दगी की सहायता से वे अपनी इस हानि को बचाकर समाज में कोई ऐसा काम कर सकते थे जिससे उनका मान-सम्मान अवश्य बढ़ जाता और यदि वे ऐसा न भी कर पाते तो साधारण, सरल एक सादी जिन्दगी यापन करना स्वयं एक प्रतिष्ठापूर्ण कार्य है। ऐसा करने से उनके पीछे ऐसी कृत्रिम आवश्यकतायें नहीं लगतीं जिनके कारण उन्हें चिन्तित एवं व्यग्र रहना पड़ रहा है।
मनुष्य को बिना कुछ सोचे अपनी प्रदर्शन- वृत्ति को अविलम्ब समाप्त कर देना चाहिये। ‘अब यदि ऐसा नहीं करता, यदि सादा रहन-सहन अपनाता हूँ तो समाज में लोग मुझ पर हंसेंगे, मेरी पोल खुल जायेगी और मुझे लज्जित होना पड़ेगा’—इस प्रकार के भाव मानसिक दुर्बलता के द्योतक हैं। आगे-पीछे अपनी भूल सुधार कर लेने पर कभी कोई भी भला आदमी उपहास नहीं कर सकता और यदि ओछे, उथले अथवा अविचारवान व्यक्ति हँसते अथवा इंगित करते हैं तो उनके उस उपहास का कोई मूल्य नहीं है। लोगों की हँसी की परवाह किये बिना अपनी भूल सुधारिये। प्रदर्शन से पैदा होने वाली दर्शक आवश्यकताओं को काटकर फेंक दीजिए। समझ लीजिए कि आपके इस परिवर्तन पर होने वाली हँसी उस गलती का खामियाजा है जो आप दिखावे के रूप में करते रहे हैं। समझदार लोगों को समाज के निरर्थक एवं बाल-बुद्धि वाले लोगों की हँसी की ओर ध्यान देने से पहले अपने अच्छे-बुरे तथा हानि-लाभ की ओर ध्यान देना चाहिए।
अपनी स्थिति से अधिक ऊँची तथा सम्पन्न व्यक्तियों के साथ अनावश्यक रूप से घुलने-मिलने अथवा उनका सान्निध्य पाने के लोभी व्यक्ति की बहुत सी ऐसी आवश्यकताएँ बढ़ जाती हैं जिनके बिना उनका काम बखूबी चल सकता है। बड़े लोगों के साथ उठने-बैठने और घूमने-फिरने में बड़प्पन की बेड़ी पहनने वालों को बड़ा कष्ट उठाना पड़ता है। यदि बड़े आदमियों का संग करना ही हो तो ‘सादा जीवन उच्च विचार’ वाले बड़े लोगों का साथ करना चाहिये। ‘कृत्रिम जीवन तुच्छ विचार’ वाले बड़े लोगों का संग कृत्रिम आवश्यकताओं के रूप में बड़ा महंगा पड़ता है। उनकी साथ-शोभा के लिये स्वयं को भी उसी प्रकार का बनाना पड़ेगा। बेजरूरत की न जाने कितनी चीजें खरीदनी और रखनी होंगी। बड़प्पनवादी मित्रों की आव-भगत के लिये न जाने ऐसी कितनी चीजों का प्रबन्ध करना पड़ेगा जिनके बिना सब काम आसानी से चल सकता है।
कृत्रिम आवश्यकता बढ़ाने वाले निरुपयोगी सम्पर्कों को तत्काल त्याग देना चाहिए। समाज में समान एवं सादे व्यक्तियों से ही संपर्क रखिये। बड़े आदमियों के साथ से बड़प्पन की तृष्णा बुझाने वाले, अपनी हीन भावना का परिचय देते हैं। बड़प्पन बड़े आदमियों के संपर्क से नहीं, अपने गुण-कर्म-स्वभाव की निर्मलता से मिला करता है।
चटोरी आदत वाले व्यक्तियों की भी आवश्यकतायें बहुत बड़ी रहती हैं। अपने चटोरेपन के कारण वे जो भी खाने-पीने की चीजें देखते हैं उसी के लिये राल बहाने लगते हैं। स्वादों की दासता में रहने वालों के लिये खटाई, मिठाई, मिर्च-मसाले, चाट- पकौड़ी, पूड़ी, पकवान आदि ना जाने कितनी चीजें जरूरत बन जाया करती हैं। जब तक वे इस प्रकार की चीजें खा-पी नहीं लेते तब तक न तो उनका पेट भरता है और न तृप्ति होती है। भोजन के बाद भी अनेक चटोरे लोगों की चाट मिठाई आदि खाना एक आवश्यकताएँ हैं जो स्वाद-वृत्ति के कारण बढ़ जाती हैं वैसे जीवन के लिये इन निरर्थक चीजों को भोजन में कोई स्थान नहीं है। यह इन्द्रिय लोलुपता है जो मनुष्य के हल्केपन का प्रमाण है। कृत्रिम आवश्यकताओं के संकट से छूटने के इच्छुक व्यक्तियों को स्वाद जन्य लोलुपता त्याग कर देनी चाहिये। उन्हें अपने अनुभव, अध्ययन एवं बुद्धिमानों के कथनों के आधार पर कृत्रिम भोजन की हानियाँ तथा सरल, साधारण एवं सामान्य भोजन के लाभों पर विश्वास करना चाहिये। स्वाद-रंजन के लिये विविध व्यंजनों को जीवन की आवश्यकता बना लेना भारी भूल है। इसका ठीक-ठीक अर्थ है—पैसा खर्च करके अस्वास्थ्य को खरीदना। कृत्रिम स्वादों की अपेक्षा आरोग्य का महत्व अधिक है।
बहुत से लोग आराम के विचार से तमाम अच्चाशियों की आवश्यकता पैदा कर लेते हैं। वे अधिक-से-अधिक आराम पाने के लिये नित्य नई चीजें खरीदते रहते हैं। शरीर को बहुत अधिक सुविधाओं के बीच रखने से कर्मठता कम होती है, आलस्य एवं विलासिता की वृद्धि होती है। जमकर काम करने के लिये मिले हुए शरीर को पलंग-पालने का अभ्यस्त बना देने वाले अकर्मण्य हो जाते हैं। शीघ्र ही उनकी शक्तियाँ कुण्ठित हो जाती हैं और वृत्तियाँ परावलम्बिनी बन जाती हैं जिससे सेवकों, सहायकों तथा अधिकाधिक सुविधा-साधनों की आवश्यकतायें बढ़ जाती है। शरीर को केवल उतना ही आराम देना चाहिये जो उसकी क्लान्ति दूर कर नवस्फूर्ति तो दे किन्तु आलसी और विलासी न बना दे। विलासपूर्ण सुविधा-साधनों की कृत्रिम आवश्यकताओं से होने वाली हानियों को समझकर उनका त्याग कर देने में ही बुद्धिमानी है।
अधिक आवश्यकताओं के अभिशाप से बचने के लिये मनुष्य को सन्तों, महात्माओं एवं महापुरुषों के सरल, सादे एवं संक्षिप्त साधनों के बीच उनके सन्तोष सुख एवं सानुकूलता से प्रेरणा लेनी चाहिये। अपनी इन्द्रियों के साथ मन की चंचलता पर नियन्त्रण करने का अभ्यास करना चाहिए। सच्चे सुख, सन्तोष, शान्ति एवं सम्पन्नता का मूल मन्त्र आवश्यकताओं की संक्षिप्तता ही है। आवश्यकताओं की बहुतायत जीवन को जटिलताओं से पूर्ण बना देती है।
विनम्रता की शक्ति -
नदी तट पर खड़े हुए शमी-वृक्ष ने बड़े जोर से अट्टहास किया और पास ही पानी में खड़े वेत से कहा—’क्या छोटी-छोटी लहरों के थपेड़े लगते ही झुक जाता है। मुझे देख, किस शान से सिर ऊँचा किये हुए खड़ा हूँ।’ इसी प्रकार वह वृक्ष जब-तब वेत का उपहास उड़ाया करता था। वेत बेचारा केवल इतना ही कह देता था—’वृक्षराज, मैं तो विनम्रता में विश्वास करता हूँ, अभिमान में नहीं।’ शमी वृक्ष उसकी बात सुनकर बड़ी देर तक हँसता रहता।
एक दिन नदी में भीषण बाढ़ आई। लोगों ने देखा कि शमी का अभिमानी वृक्ष जड़ से उखड़कर तूफान में बह गया, किन्तु जो वेत प्रवाह से बच कर जमीन में मिल गया था, वह बाढ़ उतर जाने पर फिर सीधा खड़ा हो गया।
वेत, वृक्ष अन्त देखकर हँसा नहीं बल्कि ईश्वर को धन्यवाद दिया कि उसने उसे ऐंठ में अकड़ा हुआ अभिमानी न बनाकर नतमस्तक विनम्र बनाया।
आध्यात्मिक साधना का मुख्य उद्देश्य मानवता का उच्चतम स्तर प्राप्त करना ही है। मानवता की चरमावधि पर पहुँचकर मनुष्य दैवत्व की परिधि में प्रवेश करता है और वहाँ से शनैः-शनैः उठता हुआ ईश्वरीय परिधि की ओर बढ़ता जाता है। इस प्रकार ईश्वर प्राप्ति की सोपान परम्परा में मनुष्य का विकास आदि सोपान है। आध्यात्मिक लक्ष्य प्राप्त करने के लिये जिज्ञासु व्यक्ति को सर्वप्रथम अपनी मनुष्यता का ही विकास करने का प्रयत्न चाहिये। जो साधक मनुष्यता का विकास न कर सीधे-सीधे ईश्वर प्राप्ति की कामना से साधना रत रहते हैं, उनको अपने उद्देश्य में सफलता मिल सकना असम्भव ही समझना चाहिये।
मनुष्यता के विकास का क्रम शरीर से चलता हुआ आत्मा तक पहुँचता है और तब आत्म-विकास से आध्यात्मिक विकास की ओर मार्ग जाता है। शारीरिक विकास का तात्पर्य उसके लम्बे-चौड़े, मोटे-ताजे होने से नहीं है। इसका मन्तव्य मात्र उसके पूर्ण आरोग्य से है।
शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक अथवा आत्मिक विकास यों ही आप-से-आप नहीं हो जाता, उसके लिये कुछ निश्चित नियम एवं कर्तव्य हैं, जिनका सावधानी पूर्वक पालन करना होता है। इन नियमों एवं कर्तव्यों के क्रम को धर्म कहा जाता है। इस प्रकार धर्म का आचरण करना ही वह उपाय है, जिसके आधार पर मनुष्य आत्म-विकास की ओर बढ़ता है।
जप-तप, पूजा-पाठ, दान, यज्ञ आदि धार्मिक कर्तव्यों में अन्न-संयम का विशेष महत्व है। मनुष्य प्राणधारी है और अन्न अर्थात् भोजन को प्राणों का आधार कहा गया है। मनुष्य भोजन न करेगा, तो किसी प्रकार जीवित न रह सकेगा। जीवन के रहते ही कोई साधना की जा सकती है, उसकी उपस्थिति में ही शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक तथा आत्मिक विकास का प्रयत्न किया जा सकता है। यदि जीवन नहीं, तो कुछ भी नहीं। जीवन का अर्थ केवल श्वाँसों का आवागमन मात्र ही नहीं है। जीवन का अर्थ है, प्राणों के साथ मनुष्य में स्वाभिमान, स्वास्थ्य, निर्भयता, आत्म-सम्मान, आशा, उत्साह, अखेद एवं अग्लानि आदि गुणों का होना। यदि मनुष्य की श्वाँस चलती है किन्तु उसमें इस प्रकार के गुण नहीं है, तो वह सच्चे अर्थों में जीवन जीना नहीं है, वैसे तो गति रूपी जीवन कीट-पतंगों में भी रहता है।
मनुष्य तथा अन्य प्राणियों के बीच जो बुद्धी, विवेक आदि भिन्नता बोधक विशेषतायें हैं, उनमें स्वाभिमान भी एक विशेष गुण है। स्वाभिमान मनुष्यता का प्रधान लक्षण है, जो अन्य जीवों में नहीं पाया जाता। तिरस्कार, अपमान, उपेक्षा, अवहेलना आदि के आत्म-हन्ता मनुष्येत्तर प्राणियों के निकट कोई मूल्य नहीं होता। आत्म-गौरव, आत्म-सम्मान एवं आत्माभिमान आदि का उदात्त भाव आत्मा की प्रधान वाँछा है, उसकी नैसर्गिक भूख है। इन अनुरंजनाओं के अभाव में आत्मा निर्बल एवं निस्तेज हो जाती है। यों तो आत्मा पशुओं में भी होती है किन्तु विवेकपूर्ण स्वाभिमान की अनुपस्थिति के कारण वह प्रबोध शून्यता की स्थिति में पड़ी सोती रहती है। आत्मा महान है, उससे अधिक महान इस संसार में और कुछ भी नहीं है। उसकी श्रेष्ठता की कोई सीमा नहीं। अस्तु, उसके लिये तदनुरूप श्रेष्ठ एवं उत्कृष्ट परिस्थितियाँ ही अनिवार्य एवं वाँछनीय हैं। तिरस्कार, तुच्छता, अपमान अथवा अवहेलना के वातावरण में उसका विकसित होना तो दूर, सजीव रह सकना भी कठिन है।
मनुष्य-जीवन पर भोजन का प्रभाव बहुत गहराई तक पड़ता है। जितना सात्विक, शुद्ध एवं उपयुक्त भोजन किया जायेगा, मनुष्य का तन-मन भी उतना ही शुद्ध एवं सात्विक बनेगा। निम्न कोटि एवं निम्न भावनाओं से प्राप्त अन्न मनुष्य के शरीर को अस्वस्थ एवं मलीन बना देता है। ‘जैसा खाये अन्न, वैसा बने मन’ वाली कहावत से सभी परिचित हैं। अन्न उत्पादन से ग्रहण तक उसकी शुद्धता एवं स्वच्छता पर ध्यान रखने का निर्देश शास्त्रों में किया है, जिससे कि उससे प्राप्त होने वाले तत्व एवं सूक्ष्म और विकृत होकर मनुष्य के तन-मन एवं आत्मा पर प्रभाव न डालने पावें, उसकी प्रवृत्तियाँ पूर्ण पवित्र एवं स्वच्छ बनी रहें, जिससे कि वह मनुष्यता के उन्नत शिखर पर क्रम से बढ़ता चला जाये।
परावलम्बन, पराधीनता अथवा अनाचरण से प्राप्त किया हुआ अन्न तो दूषित होता ही है, किन्तु भिक्षा से एकत्र किया हुआ अन्न सबसे अधिक दूषित होता है, वह चाहे पैसा माँगकर खरीदा गया हो अथवा भोजन के रूप में किया गया हो। भिक्षा का अन्न मनुष्य के मन, बुद्धि व आत्मा के लिये विष ही है। भिखारी जब किसी से कुछ माँगता है, तब उसकी आत्मा में एक दीनता, दासता एवं ग्लानि होती है। वह स्वयं जानता है, कि वह स्वाभिमान खोकर माँग रहा है। भिखारी यदि एक बार भूखा होने पर माँगता है, तो अनेक बार झूँठ बोलकर माँग लाता है। यह एक प्रकार की ठगी है, जिसके कारण न तो उसका मन प्रसन्न होता है और न बुद्धि। उसकी आत्मा इस निकृष्ट कार्य के लिये धिक्कारती रहती है। ऐसे धिक्कार पूर्ण अन्न से स्वस्थ तत्वों का मिल सकना सम्भव नहीं। साथ ही अनेक बार तो लोग भिखारी के हठ के कारण से खीझकर ही उसे भीख दे देते हैं। देने वाले एवं लेने वाले दोनों की भावनाओं के प्रभाव से अन्न के सूक्ष्म संस्कार दूषित होते हैं जो झोली पर दयनीयता के रूप में प्रतिफलित होता है। यही कारण है कि ग्लानि पूर्ण अन्न खाने से भिखारी दीन-हीन और मलीन दीखते रहते हैं। उनका शरीर रोगी तथा मुख निस्तेज ही बना रहता है। भिक्षा-वृत्ति करने वाला, चाहे वह कितना ही पौष्टिक भोजन खा पाये, किसी प्रकार से स्वस्थ नहीं रह सकता।
भारतीय धर्म में दान देने और लेने दोनों का विधान है। दान का पुण्य तो यज्ञादिक धर्म-कर्मों के समकक्ष ही पाया गया है। गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है—
यज्ञ दान तपः कर्म न त्याज्यं कार्यमे तत्। यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषणाम्॥
अर्थात् यज्ञ, दान, तप-रूप जो कर्म हैं, वह त्यागने योग्य नहीं है। यह कर्म निश्चित रूप से बुद्धिमान लोगों को पवित्र करने वाले हैं।
इतना ही नहीं, दान को मानवता का लक्षण बतलाया गया है और कहा गया है कि यज्ञ के रूप में अन्य व्यक्तियों तथा समाज का दान द्वारा उपकार करने के उपरान्त शेषाँश को अपने पर व्यय करने, उतने से ही निर्वाह करने वाला पुण्य पथ-गामी होता है। जो अपनी कमाई का एक भाग दान के रूप में नहीं देता और सबका उपयोग स्वयं ही करता है वह चोर के समान है।
गीता के अतिरिक्त अन्य धर्म-शास्त्रों में दान की महिमा का बखान किया गया है। मनु भगवान का कथन है—
‘तपः परं कृतयुगे त्रेतायाँ ज्ञान मुच्यते। द्वापरे यज्ञ मेवादुयनिमेक कलौ युगे॥’
अर्थात्, सतयुग में तप, त्रेता में ज्ञान, द्वापर में यज्ञ और कलियुग में दान ही धर्म के विशेष लक्षण हैं।
इस प्रकार सभी धर्म-ग्रन्थों में दान की भूरि-भूरि महिमा गाई गई है। दान करने से जहाँ मनुष्यों में उदारता की अभिवृद्धि होती है, वहाँ उसके द्वारा व्यक्तियों एवं समाज का भी उपकार होता है। किन्तु जहाँ दान की महिमा का वर्णन पाया जाता है, वहाँ इस बात का भी निर्देश है कि दान ऐसे व्यक्ति को ही देना चाहिए, जो उसका वास्तविक पात्र हो। अपात्र को दिया दान निष्फल चला जाता है और कुपात्र को दिया दान तो पाप का ही आवाहक होता है। दान द्वारा पुण्य-लाभ के लिये दानी को पात्रा-पात्र का विचार कर लेना बहुत आवश्यक है।
दान पाने और स्वीकार करने के अधिकारी केवल दो प्रकार के ही व्यक्ति ही होते हैं। एक तो वे जो सर्वथा अपाहिज, असमर्थ, अन्धे, कोढ़ी तथा अशक्त हों। जिनका शरीर अथवा परिस्थिति कमा सकने के सर्वथा अयोग्य हो। आकस्मिक आपत्ति में पड़कर अपना सर्वस्व गँवा देने वाले भी परिस्थिति तक सहायता के रूप में किसी हद तक दान पाने और लेने के अधिकारी हैं। दूसरे प्रकार के, दान पाने और लेने के अधिकारी वहाँ व्यक्ति माने जा सकते हैं, जिनके जीवन का अणु-क्षण सार्वजनिक सेवा-कार्यों में लगा रहता है और जो दान में पाये हुए धन अथवा अन्य वस्तुओं का उपयोग अपने लिये उतना ही करते हैं, जिससे सेवा करने के लिये उनका शरीर बना रहे और शेष सारी दान पाई वस्तुएँ अथवा धन को सार्वजनिक सेवा में ही लगा देते हैं।
प्राचीन काल में ऐसे ही उज्ज्वल व्यक्ति त्व एवं आदर्श चरित्र वाले सुधारक, सन्त, साधु तथा ब्राह्मण ही दान पाने और लेने के अधिकारी माने जाते थे और उन्हीं को दान स्वीकार करने के लिये कहा जाता था। समाजोत्थान के लिये अपना सारा समय देने वाले लोगों की सहायतार्थ, सहयोगार्थ एवं साधनार्थ दी जाने वाली दान की परम्परा आज भी चली आती है किन्तु इस पर से विवेक का अंकुश हटा लेने से यह दान की पुण्य परम्परा तुच्छ भिक्षावृत्ति में विकृत हो गई है, जो व्यक्ति से लेकर राष्ट्र तक, किसी के लिये भी, किसी प्रकार भी कल्याणकारी नहीं हैं। आज इसमें सुधार किये जाने की बहुत बड़ी आवश्यकता आ पड़ी है।
आज देश में भिखारियों की संख्या साठ-पैंसठ लाख के लगभग अनुमान की जाती है, जिसमें से अधिकतर ऐसे लोग ही हैं जो हट्टे-कट्टे तथा सब प्रकार से काम करने योग्य हैं, किन्तु उन लोगों ने आत्म-सम्मान, स्वाभिमान तथा समाज व्यवस्था को तिलाँजलि देकर भिक्षा को व्यवसाय बना लिया है। वे भिक्षा का तिरस्कृत अन्न स्वयं खाने और अपने परिवार को खिलाने में जरा भी संकोच नहीं करते। वे इस बात से न तो कोई सरोकार रखते हैं और न महत्व ही समझते हैं कि सदोष अथवा निर्दोष अन्न का मानव आत्मा पर एक स्थायी प्रभाव पड़ता है, जो अन्न के अनुसार दूषित अथवा पवित्र होता है। भिक्षा-व्यवसाय से पाई जीविका पर जीने वाले निश्चय ही आत्महन्ता होते हैं। उनका तथा उनकी आत्मा का पूर्ण पतन हो जाता है जिससे वे इस लोक में तो नरक जैसा निकृष्ट जीवन जीते ही हैं और अन्त में नरकगामी होते हैं।
आत्म-गौरव को सबसे अधिक ठेस पहुँचाने और आत्मा को तत्काल तिरस्कृत करने वाली यदि कोई वृत्ति है तो वह है, भिक्षावृत्ति। भिखारी को तृण के समान तुच्छ माना जाता है। न तो कोई कभी उसका सम्मान करता है और न उसके मानव होने का मूल्याँकन करता है। सभी उसे ओछा, दीन-हीन, क्षुद्र तथा बोझ के समान ही मानता है। कोई भी व्यक्ति किसी भिखारी को अच्छी दृष्टि से नहीं देखता। वह जहाँ जाता है घृणा एवं तिरस्कार का ही लक्ष्य बनता है।
इस भिक्षा-वृत्ति का कुप्रभाव न केवल भिखारी के आत्म-सम्मान पर पड़ता है बल्कि इससे राष्ट्रीय गौरव को भी हानि पहुँचती है। एक तो भिखारियों की वृहत संख्या के कारण हर गाँव, शहर, गली-कूँचों तथा ग्राम सड़कों पर भिक्षुक-ही-भिक्षुक दृष्टिगोचर होते हैं, जिससे ऐसा लगता है मानो भारत सामान्य, सज्जन अथवा परिश्रमी व्यक्तियों का देश न होकर, भिखारियों का देश हो। विदेशी पर्यटक जब यहाँ लाखों की तादाद में—अपाहिज-शरीर नहीं, तरुण-तन लोगों को भीख माँगते देखते हैं तो उनका विचार इस महान राष्ट्र के प्रति बड़े ही तुच्छ एवं निकृष्ट ही बनते हैं और वे अपने-अपने देशों में संस्मरण के आधार पर भारत का बड़ा ही दीन-हीन चित्र अंकित करते हैं, जिससे संसार में इस देश का बड़ा अपयश होता है और उसका गौरव गिरता है।
भिक्षा को व्यवसाय बनाकर जीविका कमाने वालों को तो मानवता के आत्म-गौरव की ओर ध्यान देना ही चाहिये साथ ही दाताओं को भी अपनी अवैधानिक दान वृत्ति में सुधार करना चाहिए। वे दान दें, किन्तु सत्पात्र को ही। अपात्र अथवा कुपात्र या अनाधिकारी को दान अथवा भिक्षा देने का अर्थ है—व्यक्ति के साथ, राष्ट्र के आत्म-गौरव को पतनगामी बनाने में सहायक होना। किसी की आत्मा को पतन की ओर प्रेरित या प्रोत्साहित करना एक पाप है, जिससे स्वयं प्रेरक की आत्मा भी प्रतिफल से प्रभावित होकर पतित हो जाती है। दाता अथवा याचक जो भी भिक्षावृत्ति को प्रोत्साहित करता है, निश्चय रूप से राष्ट्रीय अपराध के साथ-साथ आत्मिक पाप करता है, जिससे अब बचने और बचे रहने में ही द्विविधि कल्याण है।
मन्दिरों की स्थापना का मुख्य उद्देश्य जन-मानस में आस्तिक भावना एवं धर्म-निष्ठा को जाग्रत रखना ही रहा है। यह बात सही है कि मंदिरों ने जनता की भक्ति-भावना में वाँछित वृद्धि की है और आज भारतीय जनजीवन में जो भी धार्मिकता ओत-प्रोत दिखाई दे रही है उसमें मन्दिरों का बहुत बड़ा योगदान रहा है। चौबीसों घन्टों के व्यस्त जीवन, जंजालों तथा समस्याओं में भूले जनसाधारण की आस्तिकता मन्दिर देखते ही जाग उठती है। उसे याद आ जाता है कि संसार में भगवान की सत्ता है, हम उसके जन हैं, संसार में पड़कर उसे भुला देना ठीक नहीं और फलस्वरूप उसका मस्तक श्रद्धावनत हो जाता है। उसकी आत्मा को क्षणिक सिहरन, शक्ति और आध्यात्मिक अनुभूति प्राप्त हो जाती है। नित्यप्रति आते-जाते ऐसा होते रहने से उसकी आस्तिकता अक्षुण्ण रहती है जो व्यक्ति एवं समाज दोनों के लिये कल्याणकारी है। यदि मन्दिरों के रूप में यह धार्मिक प्रतीक न रहे होते तो सम्भव था संसार भार से दबा हुआ जनसामान्य भगवान को भूल जाता और जब कभी कोई उसकी याद दिलाता तब तक उसकी आस्था काफी हद तक हिल चुकी होती। मनुष्य की यह क्षति बहुत बड़ी होती।
यह सब कुछ आवश्यक है किन्तु पर्याप्त नहीं कि जिसके लिए हजारों-लाखों रुपये लगाकर मन्दिर खड़े किये जायें और जनता से करोड़ों की सम्पत्ति संचय की जाये। मन्दिर एक वृहद् संस्था है और उनके लिए करोड़ों का धन और लाखों की जनशक्ति व्यय की जाती है। मन्दिर समग्र समाज के आध्यात्मिक विकास के आशा केन्द्र हैं। यदि उनका लाभ मात्र उतना ही है तो कहना पड़ेगा कि बहुत बड़े व्यय पर बहुत कम पाया जा रहा है।
मन्दिरों का उद्देश्य आस्तिकता की रक्षा करना है। किन्तु आस्तिकता का अर्थ केवल इतना ही नहीं है कि मन्दिर अथवा मूर्ति को सिर झुका दिया जाये, कुछ फूल-पत्री अथवा दान-दक्षिणा चढ़ा दी जाये, प्रतिमाओं के सामने कुछ देर बैठकर जप कर लिया जाये अथवा उनको नहला-धुलाकर कुछ सेवा कर ली जाये। आस्तिकता का अर्थ ईश्वर में अखण्ड विश्वास और उसके दिये हुए धर्म का ठीक-ठीक पालन करना है। ऊपरी पूजा, पाठ, जप, ध्यान आदि की क्रियायें धार्मिकता की स्थूल अभिव्यक्ति हो सकती हैं किन्तु वास्तविक धर्म का पालन करने का अर्थ है अपनी आध्यात्मिक उन्नति करना। यदि मनुष्य की आत्मा उज्ज्वल नहीं होती, उसके गुण-कर्म, स्वभाव में ऊँचाई नहीं आती उसकी चेतना ऊर्ध्वगमन नहीं करती तो भजन-पूजन, जप, तप आदि का सारा धार्मिक क्रिया-कलाप निरर्थक ही कहा जायगा।
मनुष्य की आध्यात्मिक उन्नति देवदर्शन अथवा प्रतिमा पूजन मात्र से नहीं हो सकती। इसके लिए मनुष्य को अपने भीतर भरे हुए कुविचारों, दुर्भावों एवं दुष्प्रवृत्तियों को दूर करना होगा। दुष्कर्मों को छोड़कर सुकर्मों को अपनाना होगा। मनुष्य ज्यों-ज्यों इस आन्तरिक उत्कृष्टता में उन्नति करता जायेगा त्यों-त्यों आध्यात्मिक उन्नति की ओर बढ़ता जायेगा। धर्म-धारण का तात्पर्य यही तो है कि मनुष्य इस तपश्चर्या में अपने को लगाये।
मन्दिरों की स्थापना का मूल उद्देश्य यही रहा है कि वे मनुष्य को वास्तविक धर्म की ओर उन्मुख होने के लिए प्रेरित करें। इसीलिए पूर्वकाल में उनमें आरती वन्दन के साथ कथा, कीर्तन, उपदेश, प्रवचन आदि के कार्यक्रम चलते थे। स्थानीय पुजारी तो नित्यप्रति कोई न कोई प्रसंग चलाया और लोगों को सत्संग का लाभ दिया ही करते थे साथ ही लोक-मंगल एवं मानवीय चरित्र में सत्प्रवृत्तियों का अभिवर्धन करने के मन्तव्य से प्रवचन करने वाले लोकसेवी साधु, सन्त भी आते ही रहते थे। उनकी भोजन व्यवस्था करने के लिए ही भगवान के नाम पर जनता से कुछ दान-दक्षिणा इकट्ठी करने का भी प्रचलन था। धर्म-प्रचारक, साधु, ब्राह्मण किसी संस्था अथवा व्यक्ति के वेतनभोगी कर्मचारी न होते थे। ये वे ही व्यक्ति होते थे जो धर्म-प्रचार को अपना जीवनोद्देश्य समझकर निःस्वार्थ भाव से लोकसेवा के लिए अपने को समर्पित कर दिया करते थे।
भारतीय संस्कृति का विकास जिस धरातल पर हुआ है उसे अक्षुण्य और स्थिर रखने वाले प्रमुख आधार स्तम्भों में गौ का मुख्य स्थान है। गौ भारत की आत्मा है। शरीर में जितना आत्मा का महत्व है वही महत्व गौ का भारत के जीवन में अनादि काल से है। हमारे कौटुम्बिक, सामाजिक, साँस्कृतिक, स्वास्थ्य और आर्थिक जीवन में गौ का मुख्य भाग होने से उसे माँ कहकर पुकारा है। गौ रक्षा करती है, पालन करती है, सम्पत्ति देती है, शक्ति और शौर्य आदि गुणों की वृद्धि में वह एक विदुषी माँ की भूमिका प्रस्तुत करती है।
राष्ट्र के मान चिह्नों में गाय का स्थान सर्वोपरि नहीं तो अद्वितीय अवश्य है। राष्ट्रीय जीवन में उसके व्यापक महत्व पर प्रकाश डालते हुए स्वयं वेद ने कहा—
यज्ञ पदीराक्षीरा स्वधाप्राणा महीलुका। वशा पर्जन्यत्नी देवान् अप्येति ब्रह्मणा ॥
—अथर्ववेद 10।10।6
अर्थात् यज्ञशाला जैसे पवित्र स्थान में रखने योग्य है। इराक्षीरा अर्थात् सात्विक और तेज प्रदान करने वाला दुग्ध रूप भोजन देती है। स्वधा प्राणा है—प्रत्येक प्राणी को अपना अस्तित्व धारण किये रहने के लिये यथेष्ट सहायता देने वाली है। गौ महीलु अर्थात् पृथ्वी को उर्वरा बनाये रखने वाली है। पर्जन्य पत्नी के रूप में तृण आदि खाकर हृष्ट पुष्ट होती है किसी के लिये भार नहीं बनती। अपने इस प्रभाव से वह प्रजा को अल्प प्रयास में ही देवलोक का अधिकारी बनाती है।
गौ के महत्व और उपादेयता के लिए भारतीय संस्कृति अपवाद नहीं संसार के विभिन्न धर्म, मतावलम्बियों और महापुरुषों ने भी उसे माना है। विचार और विवेचन की दृष्टि से जहाँ हिन्दू धर्म के अनेक अंग बौद्ध, जैन, बल्लभ, सिख, शैव, वैष्णव आदि सम्प्रदाओं में मित्रता है वहाँ गाय के महत्व को सबने एकमत होकर स्वीकार किया है।
महात्मा गान्धी का कथन है—”मेरे विचार में गाय भारतीय संस्कृति का मेरुदण्ड है उसे निकाल दो तो फिर संस्कृति का अस्तित्व ही कुछ नहीं बचता।” “मुझे ले लो मेरे प्राण ले लो पर गाय को छोड़ दो, इस जैसा पवित्र पशु नहीं।” यह शब्द महामना पं॰ मदनमोहन मालवीय के हैं। लाला लाजपतराय कहा करते थे—”दूध घी पर ही भारत का जीवन निर्भर है गायें नहीं रहेंगी तो हमारे बच्चे कैसे जियेंगे।” गुरु गोविन्द सिंह ने अपने शिष्यों को आदेश दिया था—
यही आश पूर्ण करो तुम हमारी। मिटें कष्ट गवन छूटे खेद भारी॥
मोहम्मद साहब की धर्मपत्नी आयशा हजरत की पवित्र वाणी है—फरमाया रसूल अल्लाह ने कि गाय का दूध शिफा है और घी दवा उसका माँस नितान्त मर्ज है।” मुल्ला मोहम्मद बाकर हुसेनी ने गाय की तुलना फलदार वृक्ष से की। हकीम अजमलखाँ —”न तो कुरान और न अरब की प्रथा ही गौ की कुर्बानी का समर्थन करती है।” बुद्ध धर्म की लोकनीति में कहा गया है—”सब गृहस्थों की भोग देने वाले और पालने वाले गौ-बैल ही हैं इसलिए माता-पिता के समान उन्हें पूज्य मानें और सत्कार करें।” (लोकनीति।6)। ईजियन द्वीप समूह में प्राचीनकाल में गाय की जो प्रतिष्ठा थी उसका दिग्दर्शन वहाँ के सोने के सिक्कों में देखा जा सकता है। ग्रीक, रोमन और नार्डिक में गौ-पालन भारत के समान ही परम धार्मिक कार्य माना गया। यही स्थान गौ को सुमेरियन और हिराइट संस्कृति में भी मिला है। जरथुश्तीय गाथाओं, इजिपिशयन शिला लेखों और प्राचीन मिश्र की कहानियों में गौ-पूजन के स्पष्ट वर्णन मिलते हैं। गाय को सार्वभौमिक महत्व देने का एक ही कारण था, उसकी उपयोगिता, जो परिस्थितियाँ बदल जाने पर भी कम नहीं हुई वरन् आज तो उसकी आवश्यकता और भी अधिक है।
गोवंश की हानि भारत में अंग्रेजी शासनकाल से प्रारम्भ हुई। अंग्रेज लोग गायों का माँस खाते थे इसलिए यहाँ व्यापक रूप से गायें काटी जाने लगीं। आज भी भारतवर्ष से दुनिया के सब देशों से अधिक गो माँस ब्रिटेन को जाता है पर अँग्रेजों की दृष्टि में भी गाय की उपयोगिता कम नहीं। कितना बड़ा धोखा है कि इंग्लैंड हमारी गायों के माँस का सबसे बड़ा ग्राहक है जबकि स्वयं इंग्लैंड में गौ के काटने में प्रतिबंध है। सर जान उडरफ ने इस सम्बन्ध में बड़े महत्वपूर्ण विचार व्यक्त किये हैं। गौ हत्या से सम्बन्धित कलकत्ता के एक सम्मेलन में उन्होंने कहा—”गौ माँसाहारियों के स्वार्थ के लिए गाय और बैलों पर आक्रमण किया जाता है। उनके स्वार्थ के लिए दूसरों का स्वार्थ क्यों नष्ट किया जाय, थोड़े से माँसाहारियों के लिए हत्या जारी रहे और जिसका दूध स्वार्थ है। वे थोड़ी चिल्लाहट मचाकर ही चुप हैं यह आश्चर्य है।”
भारतवर्ष कृषि प्रधान देश है। यहाँ अधिकाँश किसान हैं इसलिए यह बताने की आवश्यकता नहीं कि गौ-वंश भारत वर्ष के लिये कितना उपयोगी है। महात्मा गाँधी ने एक ही शब्द में उस पर प्रकाश डाल दिया है वे लिखते हैं “भारत की सुख-समृद्धि गौ और उसकी संतान के साथ जुड़ी हुई है।”
हिन्दुस्तान का जूता विदेशों में मशहूर है अच्छी किस्म का चमड़ा मरे हुए जानवर की अपेक्षा वध किये जानवर का होता है अतः यहाँ गायें असंख्य मात्रा में कटती हैं। ‘क्रोमलेदर’ नामक चमड़ा जिसके बहुत कीमती जूते बनते हैं वह गर्भिणी गाय को मारकर, उसके बच्चे की जीवित खाल उधेड़ कर बनाया जाता है। सरकारी रिपोर्टों के आधार पर सन् 1952—53 में छियालीस लाख दस हजार गायों की खालें बाहर भेजी गई, जिनका मूल्य सात करोड़ छप्पन लाख दस हजार रुपये होता है। बछड़ों की खालें इससे अलग हैं। उनकी संख्या भी उत्तरोत्तर बढ़ती जा रही है सन् 1945-46 में 1,72000 बछड़ों की खालें विदेश गईं। जबकि 1952—53 में यही संख्या बढ़कर 2007960 हो गई। यह केवल 10 प्रतिशत भाग था शेष 90 प्रतिशत की खपत देश में ही हो जाती है। तात्पर्य यह है कि इस संख्या से दस गुने से भी अधिक गायों का वध यहाँ होता है। इसके लिए बम्बई, मद्रास आदि बड़े शहरों में विशाल स्लाटर हाउस (वध-केन्द्र) बने हुए हैं और वहाँ प्रतिदिन हजारों की संख्या में गायें काटी जाती हैं।
विदेशों को माल निर्यात करने वाले 22 में से केवल तीन बन्दरगाहों से गो माँस के निर्यात के आँकड़े इस तरह हैं—बम्बई से 3169950 रुपये, कलकत्ता से—2169350 रुपये और मद्रास से 299139 रुपये का। यह 1952—53 के आँकड़े हैं जबकि इन दिनों यह औसत काफी अधिक बढ़ गया है। जहाँ एक ओर संविधान में गौ-संरक्षण की बात कही गई है वहाँ सरकार द्वारा गो-वध को प्रोत्साहन दिया जाना इस देश के लिए बड़े दुर्भाग्य की बात है।
सन् 1942 में 5370000 गायें काटी गई थी। दर भंग गौशाला सोसायटी के संचालक श्री धर्मलाल सिंह का हिसाब है कि कुल मिलाकर एक करोड़ बाईस लाख गायें वर्ष भर में काटी जाती हैं। इसका मतलब यह हुआ कि भारतवर्ष में प्रतिदिन लगभग 34000 और प्रतिमिनट 25 गायों के गले पर छुरी फेर दी जाती है। यह कितना भीषण हत्याकाण्ड है। इसके अतिरिक्त कसाइयों के हाथ से खींची गई खालों का वर्णन तो और भी आतंकित करने वाला है। कहते हैं किसी पत्थर से कूट−कूट कर जिन्दा गायों की खाल काढ़ ली जाती है जिससे सर्वोत्तम किस्म के जूते, चमड़े के बैग और अटैचिया, बेल्ट आदि बनते हैं। अहिंसावादी देश भारत के लिये यह नृशंस हिंसा एक प्रकार का अशोभनीय कलंक है।
ऐसा लगता है आज गौ माता की चीत्कार भारतीय जनता को उद्वेलित कर रही है। हम जिस श्रद्धा को खो बैठे हैं उसका स्मरण होना पुण्योदय ही है। इस संघर्ष की बेला में एक व्रत हमारा भी है कि हम सच्चे अर्थों में गौ भक्त बनकर उसका अनुग्रह प्राप्त करें पर अभी तो यही एक बहुत बड़ा कार्य हमारे सामने है। गौवंश की रक्षा और उसमें अपना सहयोग होना नितान्त आवश्यक है। हमें इस आधार स्तम्भ को भी खड़ा रखना है, ताकि हमारी संस्कृति का धरातल गिरने न पाये, हमारी अध्यात्मिक हानि न होने पाये।
गायत्री की उच्चस्तरीय साधना—
विद्याह वै ब्राह्मण माजगाम गोपाय माँ शेवधिष्ठेऽहम।
—वशिष्ठ स्मृति
“ब्रह्मविद्या-गायत्री-ब्राह्मण के पास पहुँची और बोली मैं ही तेरा खजाना हूँ।”
ब्राह्मण को भौतिक जीवन में भले ही निर्धन या भाव ग्रस्त रहना पड़ता हो पर उसके पास आत्मिक सम्पन्ता इतनी प्रचुर मात्रा में होती है कि वह अपना ही नहीं सारे असंख्यों का भी कल्याण कर सकता है। अपने ही नहीं दूसरों के जीवनों को भी आनन्द एवं उल्लास से परिपूर्ण कर सकता है। स्वयं तो रोग-शोक रहित होता ही है दूसरों को भी निरामय, निःशंक, निर्भय एवं निर्मल बना सकता है। जिसके निज के पास विभूतियों का भांडागार पड़ा हो उसके लिए दूसरों की छुट-पुट सहायता कर पाना कुछ विशेष कठिन नहीं होता।
तपकल्प तत्वदर्शी ऋषियों के संपर्क एवं आशीर्वाद से अनेक का भला होते नित्य ही देखा जाता है। यह अजस्र अनुदान वितरण करने की क्षमता उस ब्राह्मण को कहाँ से मिलती है उसका रहस्योद्घाटन उपरोक्त कण्डिका में किया जाता है। ब्रह्मविद्या—गायत्री—ब्राह्मण के पास पहुँची और उसे उद्बोधन करते हुए कहा—”मैं ही तेरा खजाना हूँ।” यह खजाना जिसमें प्रत्येक स्तर की श्री समृद्धि और सफलता प्रचुर परिमाण में भरी पड़ी है। ऐसा खजाने का पता जिसे लग जाय अथवा जो उसके उपयोग का अधिकारी बन जाय उसे भला कमी रहेगी भी किस बात की। उसकी शक्ति एवं सामर्थ्य की सीमा भी क्या रहेगी? ब्राह्मण द्वारा सहना और दूसरों का असीम उपकार इसी आधार पर होता है। परा और अपरा महाशक्तियों का बीज रहस्य इसके हाथ लग गया हो उसे इस संसार की कौन सी प्रतिभूति उपलब्ध होने से बच सकती है।
महाशक्ति का यह महान भाण्डागार सब के लिए खुला नहीं है। खजाने की ताली विश्वस्त खजानची के हाथ में ही रहती है, हर कोई उसे अपने पास रखने का अधिकारी नहीं होता। उसी प्रकार गायत्री का वास्तविक एवं परिपूर्ण लाभ प्राप्त करने के लिए साधक को अपना ब्राह्मणत्व परिपक्व एवं परिपुष्ट करना होता है। उस महती अनुकम्पा को करतलगत करने से पूर्व इस बात की परीक्षा देनी होती है कि वह ब्राह्मण है या नहीं? जो इस कसौटी पर खरा उतरता है उसे गायत्री महाशक्ति का साक्षात्कार होता है और वह सब कुछ मिल जाता है जो भगवती के पास है।
गायत्री उपासना का छुट-पुट लाभ कोई भी उठा सकता है। सकाम उपासनाएं, बीज मन्त्रों का प्रभाव, अनुष्ठान एवं पुरश्चरणों की शृंखला अपने ढंग के लाभ प्रदान करती रहती है, उनके द्वारा साधक के छुट-पुट कष्ट दूर होने एवं अभीष्ट सफलताऐं प्राप्त होने का क्रम चलता रहता है। ऐसे लाभ और चमत्कार आये दिन देखने को मिलते रहते हैं, पर यह सब हैं छोटे स्तर की वस्तुऐं। अमुक कष्ट को दूर कर लेना या अमुक सफलता को प्राप्त कर लेना कोई बहुत बड़ी बात नहीं है। ऐसा लाभ तो भौतिक प्रयत्नों से भी प्राप्त किया जा सकता है। उपासना का लाभ तो अन्तरात्मा को अनन्त सामर्थ्य से भर देता और चन्दन वृक्ष की तरह स्वयं ही सुगन्धित होने के साथ-साथ समीपवर्त्ती झाड़-झंखाड़ों को भी अपने ही समान सुरभित कर देता है। ऐसा उच्चस्तरीय लाभ प्राप्त करने के लिए मनुष्य को ब्राह्मणत्व के अनुरूप गुण-कर्म, स्वभाव अपने में उत्पन्न करने पड़ते हैं। तभी वह खजाना मिलता है, जिसके लिए ब्रह्मविद्या ने ब्राह्मण का उद्बोधन करते हुए उसे उस महान भांडागार को हस्तगत कर लेने की प्रेरणा की है। गायत्री महामंत्र में जिन देवशक्तियों का समावेश है वे सत्पात्र पर ही अवतरित होती हैं। स्वर्ग से उतर कर गंगा पृथ्वी पर उतरने का वरदान तो दिया था पर साथ ही यह भी कह दिया था कि यदि मेरी धारा को संभालने वाली भूमिका न बनी तो धारा पृथ्वी में छेद करती हुई पाताल को चली जायगी, उसका लाभ भूलोक वासियों को न मिल सकेगा। इस आवश्यकता की पूर्ति जब शंकर भगवान ने कर दी तभी गंगा अवतरण सम्भव हो सका। गायत्री महाशक्ति की भी ठीक यही स्थिति है उसे धारण करने के लिए समर्थ पृष्ठ-भूमि की अनिवार्य रूप से आवश्यक है। और इस आवश्यकता की पूर्ति ब्राह्मणत्व के गुण-कर्म, स्वभाव से सम्पन्न साधक ही कर सकता है। ऐसा ब्रह्मण मन्त्र की महाशक्ति को अपने में धारण कर सकता है और उससे व्यक्ति एवं समाज का महान उपकार साध सकता है। कहा भी है—
दैवाधीनं जगर्त्सवं मन्त्राधीनाश्च देवता। ते मन्त्रा ब्राह्मणाधीनास्तत्याद् विप्राहि देवता॥
—मत्स्य पुराण
“देवताओं के अधीन सब संसार है। वे देवता मन्त्रों के आधीन हैं। वे मन्त्र ब्राह्मण द्वारा प्रयुक्त होते हैं, इसलिए ब्राह्मण भी देवता हैं।”
महर्षि वशिष्ठ इसी प्रकार के सुर—पृथ्वी के देवता थे। उनके पास नन्दिनी कामधेनु—अर्थात् गायत्री की महाशक्ति थी। राजा विश्वामित्र के साथ जब वशिष्ठ का युद्ध हुआ और राजा की विशाल सेना परास्त हो गई तो विश्वामित्र के मुख से यही निकला—”धिग् बलं क्षत्रिय बल—ब्रह्म तेजो बलम्-बलम्” अर्थात् भौतिक बल धिक्कारने योग्य तुच्छ एवं नगण्य है। वास्तविक बल तो ब्रह्मबल ही है। वही मन्त्र बल है वही सच्चा बल है। यह कहते हुए विश्वामित्र ने राजपाट का परित्याग कर दिया और ब्रह्मबल प्राप्त करने के लिए तप करने लगे।
यहाँ किसी बिरादरी की चर्चा नहीं की जा रही है। हर बिरादरी में हर स्तर के लोग पाये जाते हैं। यहाँ गुण-कर्म स्वभाव से ब्राह्मणत्व अपने भीतर विकसित कर सकें उन्हीं साधकों की चर्चा की जा रही है और उन्हीं के लिए ब्राह्मण शब्द प्रयुक्त किया जा रहा है। वे ही मन्त्र-शक्ति के अधिकारी हो सकते हैं। शास्त्रकार ने कहा है—
यै शान्त दान्ताः श्रुतपूर्ण कर्णाः जितेन्द्रियाः प्राणिव्यथान्निवृत्ताः। प्रतिग्रहे संकुचिताग्रहस्ता— स्ते ब्राह्मणस्तरायितुँ समर्थाः।
—ब्रह्म वैवर्तन
“जो ब्राह्मण शान्त, दान्त, वेदज्ञ, जितेन्द्रिय, दयालु दान न लेने वाले हैं वे ही दूसरों का उद्धार कर सकते हैं।”
ब्राह्मणः समदृक् शान्ते दीनानाँ समुपेक्षकः। स्रवते ब्रह्म तस्यापि भिन्न भाण्डात् पयोयथा।
—कात्यायन
“जो ब्राह्मण समदर्शी, शान्तिवादी आदि का बहाना लेकर दीन दुखियों की उपेक्षा करता है—सेवा से जी चुराता है—उसका ब्रह्मज्ञान वैसे ही नष्ट हो जाता है जैसे फूटे बर्तन में से पानी टपक जाता है।
अतपास्त्वनधीयाना प्रतिग्रहरुचिर्द्विजः। अम्भस्यश्मप्लेनेव सह ते नैव मज्जति॥
(मनुस्मृति)
“ज्ञान और सेवाभाव से शून्य ब्राह्मण यदि दान लेता है तो वह उस दान देने वाले के साथ ही इस प्रकार डूब जाता है (नरकगामी होता है) जैसे पत्थर की नाव में बैठा मनुष्य नौका समेत डूब जाता है।”
तपो विद्या च विप्रस्य निःश्रेयसकरं परम्। तपसा किल्विषं हंति विद्ययाऽमृतमश्नुते॥
(मनुस्मृति)
“ब्राह्मण के लिए तप और विद्या दोनों अत्यन्त श्रेयस्कर हैं। तप से पापों का नाश होता है और विद्या से अमर जीवन की प्राप्ति होती है।”
ब्राह्मण की मान्यता, भावना एवं आकाँक्षा किस स्तर की होती है इसका दिग् दर्शन-परिचय नीचे के दो श्लोकों में देखें।
याचे न कञ्चन न कञ्चन बंचयामि, पेवे न कञ्चन निरस्तसमस्तदैन्यः।
गायत्री उपासना अनादिकाल से है, ऐसा वेदों में कहा गया है। इसके बिना ब्राह्मण की दुर्गति होती है।
इत्येवं संविचार्याथ गायत्रीं प्रजपेत्सुधीः आदि देवीं च त्रिपदाँ ब्राह्मणत्वादिदायजाम्।
—शिव कैवल्य
इन बातों पर विचार करके ब्राह्मण को चाहिए कि ब्राह्मणत्व प्रदान करने वाली गायत्री का जप नित्य किया करे।
बहुनाकिमि होक्तेन यथा साधु साधिता द्विजन्मनामियं विद्या सिद्धि कामदुघामता।
—शारदा तिलक
अधिक कहने की क्या आवश्यकता। भली प्रकार साधना की हुई यह गायत्री विद्या द्विजों के लिए कामधेनु के समान सब सिद्धियों को देने वाली है।
स्वयं शुद्धो हि पूतात्मा नरोन संत्रन्नतुमर्हति। गायत्रीजपशुद्ध ह शुद्धो ब्राह्मण उच्यते।
गायत्री जप से शुद्ध हुआ ब्राह्मण ही शुद्ध कहा जा सकता है। जो स्वयं शुद्ध हो चुका है वही दूसरों को भी शुद्ध कर सकता है।
उपर्युक्त प्रमाणों में किसी जाति विशेष की महत्ता का प्रतिपादन नहीं है, और न किसी जाति को उपासना के अधिकार से वंचित किया गया है। ईश्वरीय ज्ञान, वेद—और उसकी उपासना के अधिकार से किसी भी मनुष्य को वंचित नहीं किया जा सकता। इन शास्त्र वचनों से तो इस तथ्य का प्रकटीकरण किया गया है कि जो अपने मानसिक बौद्धिक एवं भावनात्मक स्तर को निर्मल बनाकर जितना ब्रह्मवर्चस प्राप्त कर लेगा उसे उतनी ही अधिक उतनी ही शीघ्र, उतनी ही उच्चस्तर की सिद्ध सफलता मिलेगी। गायत्री उपासना का अवलम्बन ग्रहण करने वाले को जप-अनुष्ठानों के भाँति ही अपनी मनोभूमि को परिष्कृत करने की साधना में संलग्न होना चाहिए।
ब्रह्मणोतर वर्ण भी गायत्री उपासना का लाभ उठा सकते हैं उसकी चर्चा शास्त्रों में जगह-जगह उपलब्ध होती है। यथा—
सोमदित्यान्वयाः सर्वे राघवाः कुरवस्तथाः पठन्ति शुचयो नित्यं सावित्रीं परमाँ गतिम्।
—महाभारत
हे युधिष्ठिर, सम्पूर्ण चन्द्रवंशी, रघुवंशी तथा कुरुवंशी नित्य ही पवित्र होकर परमगति दायक गायत्री मन्त्र का जप करते हैं।
तस्यर्षेः परमोरं वचः श्रुत्वा नरोत्तमौ। स्नात्वा कृतादिको वीरौ जपेतुः परमंजपम्।
—बाल्मीक रामायण
परम उदार ऋषि के वचन सुनकर राम-लक्ष्मण दोनों भाई स्नान-आचमन करके गायत्री का परम जप करने लगे।
प्रभावेणैव गायत्र्याः क्षत्रियः कौशिकी वशी। राजर्षित्व परित्यज्य ब्रह्मर्षि पदमीयिवान्। सामर्थ्यं प्रापचात्युच्चै रन्यद् युवन र्स्रजन। किं किं न दयात् गायत्री सम्यगेवमुपासिता।
—स्कन्द पुरण
क्षत्रिय विश्वामित्र ने राजर्षि पद से उन्नति करते हुए ब्रह्मर्षि पद गायत्री मन्त्र की उपासना से ही प्राप्त कर लिया तथा दूसरी सृष्टि रच डालने की भी शक्ति प्राप्त की थी। भली प्रकार साधना की हुई गायत्री भला कौन सा ऐसा अभीष्ट लाभ है जिसे प्राप्त नहीं करा सकती?
वंदेताँ परमाँ देवीं गायत्रीं वरदाँ शुभाम्। यत्कृपालेशतो यान्ति द्विजा वै परमाँगतिम्।
उस वरदात्री परम देवी गायत्री को नमस्कार है, जिसकी लेश मात्र कृपा से द्विज, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य परमगति को प्राप्त करते हैं।
उपर्युक्त अभिवचनों में ब्राह्मणेतर जातियों द्वारा गायत्री उपासना करने और उसके आधार पर परम सिद्धियाँ प्राप्त करने का वर्णन है। इससे स्पष्ट है कि जातिगत बंधन लगाने का शास्त्रों में कोई उल्लेख नहीं है। केवल इतना ही कहा गया है कि जो इस महाशक्ति का वास्तविक लाभ उठाना चाहें वे अपने आन्तरिक एवं व्यावहारिक जीवन में ब्राह्मणत्व की विशेषताऐं उत्पन्न करें जो इस दिशा में प्रयत्नशील रहे हैं उन्होंने इतना कुछ पाया है कि स्वयं धन्य हुए हैं और दूसरों को धन्य बनाया है। जिन्होंने जप-ध्यान तक ही अपने को सीमित रखा वे लौकिक जीवन की छुट-पुट समृद्धियाँ प्राप्त कर सकने के स्वल्प लाभों से आगे बढ़कर कोई अधिक महत्वपूर्ण सफलता प्राप्त न कर सके। कारण स्पष्ट है। शारीरिक और मानसिक अनाचार बरतने से आत्मशक्ति का इतना क्षारण जाता है कि फिर साधक मटियाल सर्प की तरह निस्तेज ही रहता है। किसी मन्त्र के सहारे भी अपना आन्तरिक वर्चस्व बढ़ाने का अवसर नहीं मिलता। आज के अग्रदूत पूजा-भजन में संलग्न व्यक्ति इसी प्रकार तेज रहित जीवन बिता रहे हैं। उनने उपासना को सरल जानकर उसे तो अपनाया पर जीवन शोधन की कठिन प्रक्रिया से कतराते-कतराते रहे। ऐसे लोगों को आत्म-बल और उसके आधार पर मिलने वाली महान उपलब्धियाँ भला मिलें भी तो कैसे? और वे अपने आशीर्वाद से किसी का भला कर सकें तो कैसे?
अनभ्यासेन वेदानामाचारस्य च वर्जनात्। आलस्यात् अन्न दोषाँच्च मृत्युर्विप्रान् जिघाँसति।
—मनु. 5-4
वेदों का अभ्यास न करने से, आचार छोड़ देने से, आलस्य से, कुधान्य खाने से ब्राह्मण की मृत्यु हो सकती है।
जिह्वा दग्धा परान्नेन करौ दग्धौ प्रतिग्रहात्। मनो दग्धं परस्त्रीभिः कथं सिद्धिर्वरानने॥
पराया अन्न खाने से जिह्वा की शक्ति नष्ट हो गई, दान, दक्षिणा लेते रहने से हाथों की शक्ति चली गई, नर-नारी की ओर मन डुलाने से मन नष्ट हो गया। हे पार्वती! इन ब्राह्मणों को सिद्धि कैसे मिले?
वादार्थं पठयते विद्या परार्थं क्रियते जपः। ख्यार्त्यधं दीयते दानं कथं सिद्धिर्वरानने॥
वाद-विवाद के लिये विद्या पढ़ी, दूसरों से दक्षिणा पाकर जप किया, कीर्ति के लिए दान दिया। ऐसे लोगों को पार्वती, सिद्धि कैसे मिले?
अनध्यापन शीलं च सदाचार विलंघनम्। सालसं च दुरन्नादं ब्राह्मणं वाधते यमः॥
स्वाध्याय न करने से, आलस्य से और कुधान्य खाने से ब्राह्मण का पतन हो जाता है।
देखा जाता है कि अभी भी कितने व्यक्ति गायत्री-उपासना करते हैं और उसके फलस्वरूप ज्ञान एवं विज्ञान की उपलब्धि चाहते हैं किन्तु कुछ कहने लायक सफलता नहीं मिलती। इसका कारण उनके उपासना-क्रम का अधूरापन ही है। साधारण साधना का विधि-विधान शास्त्रों में सार-रूप में लिखा हुआ है, उसमें कोई बड़ी पेचीदगी नहीं है। विधि-विधानों की मामूली जानकारी किन्हीं प्रामाणिक ग्रन्थों के आधार पर की जा सकती है। उन्हें कर सकना भी कुछ विशेष कठिन नहीं है। लोग करते भी हैं, कर भी रहे हैं, पर साधारण कठिनाइयों या मामूली-सी कामनाओं की पूर्ति के अतिरिक्त वस्तुतः कोई इतना बड़ा प्रभाव उन्हें नहीं दीखता, जिससे यह अनुमान लगाया जा सके कि गायत्री महामन्त्र के माध्यम से वेदों में वर्णित आत्म-विद्या के असंख्य चमत्कारी लाभों में से—ऋूद्धि-सिद्धियों में से—कुछ की उपलब्धि वे कर सकेंगे।
इस असफलता से निराश होने की आवश्यकता नहीं, वरन् यह देखना है कि यह अवरोध उत्पन्न क्यों होता है। इसका एकमात्र कारण साधक का शरीर और मन उस उच्च स्तर का न होना ही है, जिसमें कि आध्यात्मिक साधनाएँ फलित हुआ करती हैं। गन्ने की, गुलाब की या दूसरी कीमती फसलें पैदा करने के लिए वाटिका को जमीन की आवश्यकता पड़ती है। उसमें खाद-पानी का समुचित प्रबंध करना होता है। यदि ऐसा न हो सके, ऊसर, बंजर में बिना जोते-बोए बीज बो दिया जाए, वहाँ खाद-पानी तथा सुरक्षा का प्रबन्ध न हो तो अच्छी फसल की आशा किस प्रकार की जा सकेगी? आध्यात्मिक साधनाएँ—जिनमें गायत्री उपासना प्रमुख है, एक प्रकार की वैज्ञानिक कृषि है। उसके लिये उपयुक्त साधन आवश्यक हैं। इस संदर्भ में सबसे अधिक आवश्यकता साधक के उत्कृष्ट व्यक्तित्व की है। उसकी मनोभूमि बढ़िया किस्म की होनी चाहिए। यह बढ़ियापन जितना बढ़ा-चढ़ा होगा, उतनी ही साधना की सफलता सुनिश्चित रहेगी।
बढ़िया बन्दूक में रखकर चलाये जाने पर कारतूस जैसा ठीक काम करता है, वैसा घटिया, नकली बन्दूक में रखकर चलाने पर काम नहीं कर सकता है। कारतूस वही है पर बन्दूक के घटिया-बढ़िया होने पर वह अपना काम भी वैसा ही करता है। मन्त्र एक प्रकार का कारतूस है। व्यक्तित्व को बन्दूक कहना चाहिए। यदि साधक का चरित्र, स्वभाव, आचार, व्यवहार, दृष्टिकोण निकृष्ट स्तर का है तो गायत्री जैसे महान शक्ति सम्पन्न मन्त्र की उपासना का प्रतिफल भी सन्तोषजनक न होगा। यदि कोई चरित्रवान, इन्द्रिय संयमी, तपस्वी, उदारमना एवं देव-स्वभाव का मनुष्य उसी मन्त्र को जपेगा, उसी उपासना को करेगा तो निकृष्ट स्तर के व्यक्ति की तुलना में इसका परिणाम सैकड़ों गुना अधिक होगा। मन्त्र वही, विधान वही, फिर भी सफलता में इतना अन्तर? इस विषय में किसी को शंकाशील नहीं होना चाहिए। गायत्री जादू नहीं, एक सर्वांगपूर्ण विधान है। घटिया रेडियो खड़खड़ करती हुई जरा सी आवाज में बोलते हैं, जबकि बढ़िया, कीमती रेडियो बहुत साफ और बुलन्द आवाज में बोलता है। दिल्ली से एक ही तरह की आवाज बोली जाती है, आकांशा में भी कम्पन एक से हैं पर पास-पास रखे हुए दो रेडियो जिनकी सुई उसी स्टेशन पर है, यदि आवाज की दृष्टि से बहुत बड़ा अन्तर प्रकट करते हैं, तो उसमें दोष किसी का नहीं। उन सस्ते और कीमती यन्त्रों का ही है। मीरा, सूर, तुलसी, कबीर आदि ने जो हरि-नाम लिया था, उसी को हम रोज लेते हैं पर उनके उत्कृष्ट व्यक्तित्वों से मन्त्र सफल हुए, भगवान ने दर्शन दिये, पर हमारे लिए वही हरि-नाम कुछ भी प्रतिफल उत्पन्न नहीं करता तो उसका दोष बाहर किसी को न देकर अपनी आन्तरिक दुर्बलताओं को ही देना चाहिए।
गायत्री और उसकी पृष्ठ-भूमि
दशरथ जी को जब सन्तान-कामना की पूर्ति के लिए ‘पुत्रेष्टि यज्ञ’ कराने की आवश्यकता हुई तो उसका विधि-विधान भली प्रकार जानते हुए भी महर्षि वशिष्ठ ने उसे पूरा करा सकने में अपनी असर्थता प्रकट की। इस पर दशरथ जी ने आश्चर्य के साथ इसका कारण पूछा। वशिष्ठ जी ने कहा—’पुत्रेष्टि यज्ञ का विधान तो मैं जानता हूँ पर व्यक्तित्व की दृष्टि से पूर्ण ब्रह्मचारी न होने के कारण उस विधान को सफलतापूर्वक कार्यान्वित करने की सामर्थ्य से सम्पन्न नहीं। वर्तमान ऋषियों में यह कार्य शृंगी ऋषि ही ठीक तरह पूरा करा सकते हैं, क्योंकि वयस्क हो जाने पर भी वनवास में रहने के कारण उन्होंने रमणी को न तो देखा है और न उसकी कल्पना की है। ऐसे ब्रह्मचारी की आत्मा ही इतनी बलिष्ठ हो सकती है कि उसके द्वारा सफल पुत्रेष्टि यज्ञ कराया जा सके।’ अन्ततः शृंगी ऋषि को ही बुलाया गया और उन्हीं के पौरोहित्य में दशरथ का वह पुत्रेष्टि यज्ञ सफल हुआ जिसके प्रभाव से राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न जैसी आत्माओं को अवतरित होना पड़ा। यदि शृंगी ऋषि जैसे तपस्वी का पौरोहित्य न मिला होता तो विधि-विधान के पूर्ण ज्ञाता आचार्य द्वारा कराये जाने पर भी पुत्रेष्टि यज्ञ सफल न होता।
मन्त्र वही है, विधि-विधान भी वही है, उनकी जानकारी वही है, उनकी जानकारी ग्रन्थों से तथा दूसरे विद्वानों से प्राप्त की जा सकती है। इतने पर भी उनकी वैसी महिमा जैसी कि बताई गई है, अक्सर दृष्टिगोचर नहीं होती। इसका कारण उस विद्या का मिथ्या होना या विधि-विधान में कोई फर्क रह जाना नहीं होता, वरन् यह होता है कि उसे करने वाले का व्यक्तित्व एवं चरित्र उस स्तर का उत्कृष्ट नहीं होता जैसा कि आत्म-विद्या के सच्चे पथिक का होना चाहिये। साधक के लिये मन्त्र विद्या का विधि-विधान जान लेना ही पर्याप्त नहीं वरन् यह भी आवश्यक है कि वह अपने चरित्र एवं मानसिक स्तर को पवित्र एवं उत्कृष्ट बनाने में संलग्न रहे।
गायत्री उपासना के छुटपुट लाभ साधारण रीति से जप, अनुष्ठान करने वालों को भी मिल सकते हैं। गमलों में छोटे से फूल-पौधे उगाये जा सकते हैं, पर यदि कोई विशाल वृक्ष लगाना हो तो यह आवश्यक है कि उसके लिये ऐसी जमीन ढूँढ़ी जाय जिसमें होकर जड़ें नीचे गहराई तक प्रवेश कर सकें। बरगद और पीपल के वृक्ष गमलों में उग तो सकते हैं पर फलने-फूलने की स्थिति तक नहीं पहुँच सकते। गायत्री जैसा महामन्त्र जिसकी सामर्थ्य की कोई तुलना नहीं, पूरी तरह अपना प्रभाव तभी प्रकट कर सकता है जब साधक की मनोभूमि काफी परिष्कृत एवं सुसंस्कृत बनाई गई हो। उपासना का विधि-विधान दक्षिण मार्गी, वाममार्गी साधना विधान अपना-अपना विशिष्ट प्रतिफल उत्पन्न करते हैं पर इसके लिए उनकी समुचित जानकारी इस महाविद्या के प्रयोगकर्ताओं को ठीक तरह अनुभव और अभ्यास में लानी चाहिए। इसके लिए अनुभवी मार्गदर्शक और ऋषि परम्परा की शास्त्रीय पद्धति का अवलम्बन ग्रहण करना चाहिए। साथ ही यह भी स्मरण रखना चाहिए कि आध्यात्मिक उपासनाओं के पथ पर गतिशील होने के आकाँक्षी साधक को अपने व्यक्तित्व की उत्कृष्टता बढ़ाना तथा स्थिर रखना नितान्त आवश्यक है। आत्मिक प्रगति की यह एक अनिवार्य शर्त है।
बढ़िया किस्म का बाण भले ही हो पर उसे ठीक निशाने तक पहुँचाने के लिए बढ़िया मजबूत धनुष भी तो चाहिए। सड़ी, घुनी लकड़ी के धनुष का तीर के लिए निशाने तक फेंक सकना तो कठिन ही है—इस खींच-तान में अपनी भी दुर्गति करा लेगा। ओछे आदमी—घृणित और निकृष्ट दृष्टिकोण अपनाकर जीवन यात्रा कर रहे हैं। ऐसे कुसंस्कारी व्यक्ति भले ही जप-तप का बाह्य आवरण पूरा करते रहें, वह कर्मकाण्ड उनकी आन्तरिक प्रगति में कुछ विशेष सहायता न कर सकेगा।
प्राचीन काल में ऐसे अनेक साधक हुए हैं जिनका साधना-विधान कोई बड़ी शास्त्रीय परम्परा पर आधारित न था फिर भी उन्हें अपने उद्देश्य की पूर्ति में आशाजनक सफलता मिली। कबीर की शिक्षा स्वल्प थी, उन्हें मार्गदर्शक भी अनुभवी नहीं मिला। सन्त रामानन्द उनके ऐसे ही गुरु थे जैसे एकलव्य के द्रोणाचार्य। वे प्रत्यक्ष में कबीर के गुरु होने की बात से इनकार करते रहे। रैदास की वंश परम्परा ने उन्हें शास्त्रीय साधना पद्धति का लाभ लेने से वंचित रखा। मीरा केवल भजन, कीर्तन, नृत्य एवं भावोन्माद तक अपना साधन विधान सीमित रख सकी। शबरी किस प्रकार की उपासना पद्धति अपनाये रही कुछ पता नहीं चलता। बाल्मीकि तो सीधा राम नाम भी न ले सके उन्हें ‘मरा’ ‘मरा’ का उलटा नाम जप कर ही आगे बढ़ना पड़ा। ऐसे उदाहरण साधन इतिहास के पन्ने-पन्ने पर भरे पड़े हैं। और आज भी ऐसे अनेक साधक मिलते हैं जिनकी शिक्षा एवं साधना पद्धति उपहासास्पद है। फिर भी उनने काफी ऊँचाई तक आत्मिक प्रगति कर ली। इसका एकमात्र कारण उनके व्यक्तित्व की उत्कृष्टता ही थी। मानवीय सद्भावों का बाहुल्य ही उनकी यह विशेषता थी, जिसने उच्चस्तरीय सफलता का अधिकारी उन्हें बना दिया।
दूसरी ओर ऐसे भी उदाहरण मिलते हैं जिनमें उपासना का शास्त्रीय एवं वैज्ञानिक प्रकरण भली प्रकार जानते हुए भी साधक कुछ आशाजनक लाभ प्राप्त न कर सके। रावण, कुम्भकरण, मेघनाद, मारीच, भस्मासुर, वृकासुर, हिरण्यकश्यपु, मधुकैटभ आदि अगरिफ्त व्यक्ति उच्च कुलों में उत्पन्न हुए थे, उनके गुरु भी शुक्राचार्य जैसे पारंगत थे। उन्होंने कठिन तपश्चर्यायें भी कीं और वरदान भी पाए, फिर भी इन सुविधाओं का कोई विशेष लाभ उन्हें नहीं मिला। उनकी आत्मिक प्रगति नगण्य रही। जो साधना तपश्चरण उनने की वह उनकी आत्मा का, उनके परिवार का सारे समाज का कुछ भी हित साधन न कर सकी। अतएव हमें इसी निष्कर्ष पर पहुँचना होगा कि जिन्हें वस्तुतः अध्यात्मिकता का लाभ लेना हो, इस मार्ग पर चिरस्थायी और आशाजनक प्रगति करनी हो, उन्हें सबसे पूर्व—सबसे अधिक—ध्यान इस बात पर देना चाहिए कि उनका व्यक्तित्व, उत्कृष्ट स्तर का बने। यही ब्राह्मणत्व है। ब्रह्मवर्चस है। ब्रह्मवर्चस की सारी शक्ति, चेतना एवं क्षमता इसी आधार पर उपलब्ध होती और बढ़ती है।
प्राचीन काल के ब्राह्मण भूसुर कहलाते थे—भु-सुर अर्थात् पृथ्वी के देवता। देवताओं में जो शक्ति होती है वह सच्चे ब्राह्मण में देखी और पाई जाती है। यह उपलब्धि उसे मन्त्र बल से ही नहीं मिल जाती वरन् उत्कृष्ट स्तर के व्यक्तित्व का निर्माण करने की भी शर्त पूरी करने पर मिलती है। हममें से हर गायत्री उपासक को यह तथ्य भली प्रकार हृदयंगम करना चाहिए और अपना ब्रह्मणत्व बढ़ाना चाहिए। स्मरण रहे ब्राह्मणत्व का अभिवर्धन करने में किसी जाति-बिरादरी में जन्म लेना न तो सहायक है और न बाधक।
बढ़े हुए परिवार को घटाने की हमारी ‘छटनी योजना’ का एक उद्देश्य जहाँ उत्कृष्ट का चुनाव करके महत्वपूर्ण आयोजन के उपयुक्त व्यक्तियों का चुनाव करना है वहाँ दूसरा कारण यह भी है कि हम अपनी अयोग्यता को स्वीकार कर उतने ही दायरे में सीमित हो जायें जितने के कि हम वस्तुतः अधिकारी हैं।
परिवार बनाने और बढ़ाने की प्रक्रिया उत्तरदायित्वों से भरी हुई है। कोई व्यक्ति अपना कुटुम्ब बढ़ाता जाय पर उसे सुयोग्य, सुशिक्षित, सुसंस्कृत न बना सके तो उसका यह निर्माण कार्य अनुचित माना जायगा। इसी दृष्टि से आज परिवार नियोजन आन्दोलन चल रहा है। अब यह अनुमान किया जा रहा है कि सन्तान उतनी ही बढ़ाई जाये जिनकी सुव्यवस्था कर सकने के अपने साधन हों। संख्या बढ़ाने की अपेक्षा उत्कृष्टता का स्तर बढ़ाने की बात दूरदर्शितापूर्ण भी है और विवेकसंगत भी।
व्यक्तिगत रूप से हम एक विशुद्ध साधक हैं। जीवन साधना के द्वारा अपना ही नहीं दूसरों का भी कल्याण किया जा सकता है इस तथ्य पर हमारा अटूट विश्वास है। जीवन का अधिकाँश भाग हमने इसी प्रयोग परीक्षण में लगाया भी है। इस अपनी स्वाभाविक प्रक्रिया से भिन्न प्रकार का कार्य—परिवार का निर्माण—हमें हमारे मार्ग दर्शक ने इस उद्देश्य से सौंपा था कि जिन व्यक्तियों से संपर्क बने उनका आन्तरिक स्तर इतना उठाने का प्रयत्न किया जाय कि वे अपने निज के जीवन में सफल समृद्ध और सामाजिक जीवन में नव निर्माण के प्रकाश स्तम्भ सिद्ध हो सकें। अपनी तुच्छ सामर्थ्य और योग्यता के अनुसार वह कार्य हमने आरम्भ किया और गत 16 वर्षों में उसने असाधारण रूप से विस्तार भी पाया। 24 लाख सदस्यों वाला गायत्री परिवार अपने आप में एक बहुत बड़ी बात थी। इतना बड़ा संगठन एक व्यक्ति ने किया हो इसकी मिसाल इतिहास में नहीं मिलती । इतने व्यक्तियों को गायत्री उपासना में लगाया गया उनमें से सभी 1 माला प्रतिदिन और अनेक अधिक संख्या में जप करने लगे। मथुरा में सम्पन्न हुए सहस्र कुण्डी गायत्री महायज्ञ के अतिरिक्त 23 हजार कुण्डों के गायत्री यज्ञ देश भर में कराए गए थे। उसमें बहुत जन-शक्ति और धन-शक्ति लगनी थी। वह भी इन सदस्यों ने जुटायी। दस हजार शाखाओं में वह संगठन संगठित भी हो गया और साप्ताहिक हवन सत्संग आदि के छोटे-छोटे कार्य उन्हें सौंपे गए थे वे भी होने लगे। यह बहिरंग प्रक्रिया सम्पन्न हुई। इसके पीछे अतिरिक्त उद्देश्य यह छुपा हुआ था कि सदस्यगण हमारी नव निर्माण की युग परिवर्तन की विचार धारा के संपर्क में आवें, उसे समझें और कार्यान्वित करें ताकि इस संगठन के मूल में सन्निहित उद्देश्य पूरा होने की व्यवस्था बने। पर वैसा हो न सका। गायत्री परिवार के सदस्य कुछ मालायें घुमाने के बाद बड़ी-बड़ी सिद्ध सिद्धियाँ पाने की बात सोचने लगे और हमारे विचारों का महत्व समझने के स्थान पर आशीर्वाद पाने के लिये चक्कर काटने लगे।
आपत्तिग्रस्त व्यक्तियों की सहायता करना भी धर्म है। फिर जिसने कोई कुटुम्ब बनाया हो उस कुलपति का उत्तरदायित्व तो और भी अधिक है। गायत्री परिवार के परिजनों की भौतिक एवं आत्मिक कठिनाइयों के समाधान में हम अपनी तुच्छ सामर्थ्य का पुरा-पुरा उपयोग करते रहे। कहने वालों का कहना है कि इससे लाखों व्यक्तियों को असाधारण लाभ पहुँचा होगा।—पर हमें उससे कुछ अधिक सन्तोष नहीं हुआ। हम चाहते थे कि वह माला जपने वाले लोग—हमारे शरीर से नहीं विचारों से प्रेम करें। स्वाध्यायशील बनें, मनन-चिन्तन करें, अपने भावनात्मक स्तर को ऊँचा उठावें और उत्कृष्ट मानव निर्माण करके भारतीय समाज को देव समाज के रूप में परिणत करने के हमारे उद्देश्य को पूरा करें। पर वैसा न हो सका। अधिकाँश लोग चमत्कारवादी निकले। वे न तो आत्मनिर्माण पर विश्वास कर सके और न लोकनिर्माण में। आध्यात्मिक व्यक्तियों का जो उत्तरदायित्व होता है उसे अनुभव न कर सके। हम हर परिजन से बार-बार, हर बार अपना प्रयोजन कहते रहे, पर उसे बहुत कम लोगों ने सुना समझा। मन्त्र का जादू देखने के लिये वे लालायित रहे, हम उनमें से काम के आदमी देखते रहे। इस खींचतान को बहुत दिन देख लिया तो हमें निराशा भी उपजी और झल्लाहट भी हुई। मनोकामना पूर्ण करने का जंजाल अपने या गायत्री माता के गले बाँधना हमारा उद्देश्य कदापि न था। उपासना की वैज्ञानिक विधि व्यवस्था अपनाकर आत्मोन्नति के पथ पर क्रमबद्ध रूप से आगे बढ़ते चला जाना यही हमें अपने स्वजन परिजनों से आशा थी, पर वे उस कठिन दीखने वाले काम को झंझट समझ कर कतराते रहे। ऐसे लोगों से हमारा क्या प्रयोजन पूरा होता?
बहुत दिन विचार करने के बाद यह सोचा कि जो अपने मूल मन्तव्य को सुनने-समझने तक के लिए तैयार नहीं हैं, केवल मन्त्र शक्ति का चमत्कार बिना उसका उचित मुख्य चुकाये देखने को आतुर हैं, इन पर शक्ति का अपव्यय न करके इस विशाल संसार में से उन लोगों को ढूँढ़ा जाय जो विचार, भावना, आदर्श और उद्देश्य का मूल्य महत्व समझते हों, अखण्ड ज्योति में व्यक्त हमारे विचारों के प्रति अभिरुचि एवं आस्था रखते हों। इस कसौटी पर 40 हजार व्यक्ति खरे उतरे। उन्होंने शरीर के प्रति आदर अभिवादन व्यक्त करने की अपेक्षा हमारे विचारों की शक्ति, उपयोगिता एवं आवश्यकता को समझा। 24 लाख की तुलना में 40 हजार की संख्या बहुत छोटी है। फिर भी यह सन्तोष किया गया कि जो आज हमारे विचारों के प्रति आस्था रखता है, आगे चलकर वह हमारी बताई हुई कार्य पद्धति को अपना लेगा। बहुत करके ऐसा हुआ भी है। अखण्ड-ज्योति की प्रखर प्रेरणा ने करोड़ों नहीं तो लाखों मनुष्यों की जीवन दिशा में आशाजनक मोड़ दिया है, इससे इन्कार नहीं किया जा सकता।
किन्तु इस प्रकार का कुछ-कुछ सुधार अपने व्यक्तिगत जीवन में कर लेने से हमारा वह प्रयोजन पूरा न हो पा रहा था जो हमारी मार्गदर्शक सत्ता ने हमको सौंपा है। युग परिवर्तन के लिए—देश, धर्म, समाज और संस्कृति का पुनरुत्थान करने के लिए लोगों की सक्रियता, सेवा भावना और परमार्थ वृत्ति की नितान्त आवश्यकता है। यह तत्त्व जिनके अन्दर विकसित न हो सके वे अपने व्यक्तिगत जीवन में भौतिक एवं आध्यात्मिक सुख-सुविधा ‘अखण्ड ज्योति’ की विचारधारा के प्रभाव में भले ही उपलब्ध कर लें, वह लक्ष्य तो पूरा करने में सहायक नहीं हो सकेंगे, जिसके लिए हम जीवित और कार्य संलग्न हैं। यदि भावनात्मक नव निर्माण का प्रयोजन हमारे सामने न होता—हमारे कंधों पर वह उत्तरदायित्व न आया होता— तो आज हमें इस प्रकार की न तो चिन्ता करनी पड़ती और न उखाड़-पछाड़। अपनी स्वाभाविक और सहज प्रवृत्ति के अनुरूप हम कहीं ब्राह्मणोचित तपश्चरण कर रहे होते और उससे उत्पन्न आत्मिक शक्ति से भी समाज को लाभान्वित कर रहे होते। पर किया क्या जाय, विवशता हमारे सामने भी है। लोकमान्य तिलक एक अच्छे कीर्तनकार बनना चाहते थे पर किसी अज्ञात शक्ति ने उन्हें राजनीति में ला पटका। हमारे साथ भी ऐसा ही हुआ है। मूल प्रवृत्ति से भिन्न प्रकार के—संगठन और निर्माण कार्य में—किसी शक्ति ने हमें जोत दिया तो अब भगोड़े सैनिक की तरह अपने कर्तव्य से इन्कार भी नहीं कर सकते।
हमारी जन संपर्क कार्य पद्धति का अन्त अति निकट है। केवल पाँच वर्ष ही संगठनात्मक और रचनात्मक क्रिया अपनाते रहने का अवसर है। यह समय बहुत ही स्वल्प है। पाँच वर्ष एक-एक करके बात की बात में समाप्त हो जाते हैं। इस थोड़ी-सी अवधि में कुछ अधिक ऊँचे स्तर के साथी ढूँढ़ने हैं जिनके हाथों में उस मशाल को सौंपा जा सके जो आज हमारे हाथ में है। इसके लिए अधिक मजबूत, अधिक साहसी और अधिक सच्चे आदमी चाहिये। अखण्ड ज्योति परिवार पर जब नजर डालते हैं तो उनमें से अधिक ‘पढ़ाकू’ लोग दीखते हैं। पढ़ना भी एक व्यसन है। अच्छी वस्तुयें पढ़ने को अच्छा व्यसन कहा जा सकता है। ऐसे विद्या व्यसनी लोग अभी हमारा साहित्य रुचि से पढ़ते हैं, पीछे अपनी रुचि की चीजें कहीं अन्यत्र से प्राप्त कर लेंगे। उनकी गाड़ी तो चलती रहेगी पर हमारी गाड़ी रुक जायगी। जो उच्च विचारों को पढ़ते तो हैं पर उन्हें गले से नीचे नहीं उतारते, उन्हें व्यवहारिक जीवन में स्थान नहीं देना चाहते, ऐसे लोगों से कोई बड़ी आशा किस प्रकार की जाय? हमें कर्मठ और प्रबुद्ध साथी चाहिए ऐसे जो युग निर्माण की भूमिका प्रस्तुत करने के लिए, अपने तुच्छ स्वार्थों की उपेक्षा, अवहेलना कर सकें, जो निजी समस्याओं में उलझे रहकर ही जिन्दगी व्यतीत कर डालने की व्यर्थता और भारतीय आदर्शों के लिए कुछ त्याग और बलिदान की साध अपने भीतर सँजो सकें।
वर्तमान ‘छटनी कार्यक्रम’ इसी प्रयोजन के लिये है। गायत्री परिवार के 24 लाख सदस्यों से जब यह कहा गया था कि हमारे विचारों को भी पढ़े-समझें तो उनमें से केवल 40 हजार रह गए ओर शेष भाग खड़े हुए। अब 40 हजार से यह कहा जा रहा है कि वे अपने निजी आवश्यकताओं में से युग निर्माण को भी एक छोटे कार्यक्रम के रूप में सम्मिलित कर लें और उसके लिए भी कुछ समय-पैसे खर्च करते रहें। बात बहुत छोटी और नगण्य सी है। उतनी ही सरल जितनी गायत्री परिवार के लोगों के लिये यह सरल था कि वे अखण्ड-ज्योति पढ़ा करें। पर अपना मन ही तो है—मन में जो बात न जमे उसके लिए हजार बहाने बन जाते हैं। किसी की आर्थिक स्थिति खराब हो गई तो किसी को फुरसत न मिली, यह झूँठे और बेबुनियाद बहाने हैं। इस महंगाई के जमाने में जो व्यक्ति रोटी खाता और कपड़े पहनता है तो उसी में से कोई बचत कर अखण्ड-ज्योति मंगाई जा सकती है और दस-बीस मिनट रोज पढ़ा जाय तो एक महीने में उसके सब लेख पढ़े जा सकते हैं। भला ऐसा भी कोई अभावग्रस्त हो सकता है जो इतना न कर पाये। बात तुच्छ सी थी पर जिन्हें भागना था—भाग खड़े हुए। और 24 लाख में 40 हजार रह गए। अब कुछ और 36 हजार का भाग खड़े होना सम्भव है। नव निर्माण की विचार-धारा को अपने निजी परिवार तथा मित्र सम्बन्धियों को पढ़ने-सुनाने की धारणा देने में एक घण्टा समय लगा देना क्या कोई बड़ी बात है? उनका स्वभाव बदले तो क्या अपने लिए कुछ कम लाभ होगा? फिर भी ऐसे लोग हो सकते हैं जो ऐसे उपयोगी एवं आवश्यक कार्य के लिए फुरसत न मिलने का बहाना करें। इसी प्रकार डेड़ छटाँक अन्न प्रतिदिन खर्च करके अपने घर में एक उत्कृष्ट स्तर का ज्ञान मन्दिर—नव निर्माण पुस्तकालय—स्थापित करके भावी पीढ़ियों तक के लिए अमूल्य निधि छोड़ जाने वाली बात क्या इतनी अशक्य है जिसे निर्धन से निर्धन व्यक्ति भी वहन न कर सके। बात राई रत्ती जैसी है, पर जिनकी आस्था दुर्बल है, उनके लिए तिल भर बोझ भी पर्वत जैसा भारी पड़ेगा। ऐसे लोगों से किस प्रकार आशा करें कि वे हमारे प्रयोजन में दो-चार कदम चलने का साथ देंगे जो हमारे जीवन का एकमात्र लक्ष्य है। व्यक्ति और समाज की उत्कृष्टता—साँस्कृतिक एवं भौतिक पुनरुत्थान-भावनात्मक नव निर्माण आज के युग की महानतम माँग है। प्रबुद्ध व्यक्तियों के लिए इन उत्तरदायित्वों से विमुख होना या इनकार कर सकना अशक्य है। हमें स्वयं इसी दिशा में जिस सत्ता ने बलपूर्वक लगाया है, वह अन्यान्य भावनाशील लोगों के अन्तःकरण में भी वैसी ही प्रेरणा कर रही है और वे सच्चे आध्यात्मिक व्यक्तियों की तरह इसके लिए कटिबद्ध हो रहे हैं। पर जिन्हें यह सब कुछ व्यर्थ दीखता है, जिन्हें इतने महत्वपूर्ण कार्य में कोई आकर्षण, कोई उत्साह, कोई साहस उत्पन्न नहीं हो रहा है, उनके सम्बन्ध में हमें निराशा हो सकती है।
अपनी तपश्चरण और ईमानदारी में कहीं कोई कमी ही होगी जिसके कारण जिन व्यक्तियों के साथ पिछले ढेरों वर्षों से सम्बन्ध बनाया, उनमें कोई आध्यात्मिक साहस उत्पन्न न हो सका। वह भजन किस काम का, जिसके फलस्वरूप आत्मनिर्माण एवं परमार्थ के लिए उत्साह उत्पन्न न हो । किन्हीं को हमने भजन में लगा भी दिया है पर उनमें भजन का प्रभाव बताने वाले उपरोक्त दो लक्षण उत्पन्न न हुए हों तो हम कैसे माने कि उन्हें सार्थक भजन करने की प्रक्रिया समझाई जा सकी? हमारा परिवार संगठन तभी सफल कहा जा सकता था जब उसमें ये सम्मिलित व्यक्ति उत्कृष्टता और आदर्शवादिता की कसौटी पर खरे सिद्ध होते चलते। अन्यथा संख्या वृद्धि की विडम्बना से झूँठा मन बहलाव करने से क्या कुछ बनेगा?
समय और धन खर्च करने की एक बहुत ही छोटी—नगण्य सी शर्त—अभी हमने अखण्ड-ज्योति परिजनों के सामने रखी है—दस नया पैसा और एक घण्टा समय का अनुदान—सो भी अपने निजी संबंधियों के लिए, किसी को क्यों भार लगना चाहिये, खास तौर से तब जबकि उसका पूरा-पूरा लाभ अपने परिवार और मित्रों के लिए ही मिलने वाला है। यह शर्तें किसी भावनाशील व्यक्ति को भारी नहीं हो सकतीं यह सोच कर युग निर्माण परिवार में ऐसे ही लोग लिए जा रहे हैं जो अपनी निष्ठा का कम से कम इतना तो परिचय दे सकें।
एक बार हमने अपने को असफल तब माना था जब 24 लाख में से 40 हजार रह गए थे और अब भी लगभग वैसी हो मनोदशा जाग्रत चल रही है जबकि 40 हजार में से केवल 4 हजार की आशा रह गई है। इसमें दोष किन्हीं दूसरों का नहीं, यह हमारी तपश्चरण की कमी का ही परिणाम है। जो अन्त तक साथ बने रहेंगे उन 4 हजार के बारे में यही समझना चाहिये कि उनकी संचित मनोभूमि की उत्कृष्टता इसका कारण थी, अथवा कुछ प्रेरक मित्रों ने अपना कुछ विशेष आग्रह व्यक्त करने के लिए उनके अन्तः करण में भी ऐसी प्रेरणा भर दी कि वे भी हमारी ही तरह ईश्वरीय प्रयोजन की पूर्ति में त्रेता के रीछ-वानरों की तरह और द्वापर के गोप-ग्वालों की तरह सार्थक जीवन की एक महत्वपूर्ण भूमिका प्रस्तुत कर सकें।
छटनी योजना में अपने परिवार को छोटा होते देख कर हमें दुःख है, पर वह किसी दूसरे पर दोषारोपण करते हुए नहीं, केवल अपनी दुर्बलता पर ही क्षोभ है जिसके कारण जीवन के 27 वर्ष संगठनात्मक कार्य में लगाने के उपरान्त लाखों से संपर्क बनाने और करोड़ों का द्वार खटखटाने के उपराँत केवल 4000 ऐसे व्यक्ति हाथ लगे, जिन पर हमारी और इस पिछड़े युग की अन्तरात्मा आशाभरी दृष्टि से देखते हुए, संतोष की एक हलकी सी साँस ले सकती है।
शक्ति पुरश्चरण की पूर्णाहुति
गत वर्ष शक्ति महापुरश्चरण पाकिस्तान और चीन हमले को निरस्त करने के संदर्भ में आश्विन नवरात्रि से प्रारम्भ किया गया था। शरद पूर्णिमा से उसकी विधिवत घोषणा की गई थी, पर आरम्भ नवरात्रियों में ही हो गया था। इसमें 10 हजार साधकों ने भाग लिया। ‘क्लीं बीज’ शत्रु संहारिणी दुर्गा शक्ति का मंत्र है। गायत्री महाशक्ति के साथ उसका संयोग करके प्रति मास 24 करोड़ जप का आयोजन था। प्रसन्नता की बात है कि वह क्रम पूर्ण शास्त्रोक्त् विधि-विधान के साथ एक वर्ष तक सुव्यवस्थित रीति से निर्विघ्न चलता रहा और आज आश्विन नवरात्रि में पूर्ण होने जा रहा है।
इस महापुरश्चरण को पूर्ण सफल कहा जा सकता है। गत वर्ष इन दिनों पाकिस्तान का प्रत्यक्ष और चीन का परोक्ष आक्रमण भयानक सम्भावनाओं के साथ चल रहा था। युद्ध की विभीषिका विश्व युद्ध में परिणित हो जाने की सम्भावना थी। उस अवसर पर भारत की बहादुर सेनाओं ने, राजनेताओं ने तथा अनेक देशभक्तों ने अपने-अपने ढंग से जिस त्याग, बलिदान, देशभक्ति एवं सूझ-बूझ का परिचय दिया उस पर देश का मस्तक सदा गर्वोन्नत रहेगा। इस अवसर पर अध्यात्म क्षेत्र भी अकर्मण्य नहीं रह सकता था। गायत्री परिवार ने उपरोक्त पुरश्चरण आरम्भ किया । उसका जो प्रभाव अभीष्ट था वही हुआ भी। इसमें एक महत्वपूर्ण भूमिका अपने इस शक्तिशाली पुरश्चरण की भी है।
इस पुरश्च्रण की पूर्णाहुति आश्विन नवरात्रि के अन्तिम दिन विजया दशमी को कर दी जानी चाहिए। क्लीं बीज समेत गायत्री मंत्र का हवन उस दिन हर शाखा में सामूहिक रूप से किया जाय। अन्त में कन्या भोजन तथा सत्साहित्य का प्रसाद वितरण भी किया जाय। जिन लोगों ने पुरश्चरण में भाग लिया है वे तथा अन्य लोग मिलकर जितनी आहुतियाँ दें उसकी सूचना मथुरा अवश्य भेज दें ताकि आहुतियों में कुछ कमी रह जाय तो उसकी पूर्ति यहाँ पर कर दी जाय। पुरश्चरण के भागीदारों के साहस, त्याग , परमार्थ, प्रेम एवं देशभक्ति का सादर अभिनन्दन!
नव-निर्माण के शतसूत्री कार्यक्रमों को व्यापक बनाने के लिए लागत मात्र मूल्य के अत्यन्त सस्ते, आकर्षक और प्रेरणाप्रद ट्रैक्ट छापे गये हैं। इन्हें स्वयं पढ़ना और दूसरों को पढ़ाना या सुनाना जनमानस को सुसंस्कृत एवं परिष्कृत करने के लिए आवश्यक है। अब तक 70 ट्रैक्ट छप चुके हैं। मूल्य का 20 नया पैसा है। इस सीरीज में हर महीने नये ट्रैक्ट छप रहे हैं। अगले 5 वर्षों में इनकी 1000 तक पहुँचाने की योजना है।
अब तक छप चुके ट्रैक्टों के नाम-
1- विवाह के आदर्श और सिद्धांत। 2-तीन दिन का सत्यानाशी-विवाहोन्माद। 3-विवाहोन्माद के लिए बुद्धि क्यों बेच दी जाय? 4-विवाह-शादियों का असह्य अप-व्यय। 5 इस हृदय-द्रवक स्थिति को कब तक सहा जायगा? 6-यह कुरीतियाँ मिट रही हैं और मिटेंगी। 7-विवाह का वातावरण धमनुष्ठान जैसा रहे। 8-आदर्श विवाहों की रूपरेखा। 9-आदर्श विवाहों का प्रचलन कैसे हो? 10-प्रगतिशील जातीय संगठनों की आवश्यकता। 11-हम भाग्यवादी नहीं कर्मवादी ।12-अन्धविश्वासी नहीं विवेकशील बनिये। 13-अन्ध-विश्वास से लाभ कुछ नहीं हानि अपार है। 14-भिक्षा-व्यवसाय देश और समाज का कलंक। 15-मन्दिर जनजागरण के केन्द्र बने! 16-उनसे जो पचास के हो चले। 17- साधु की महान परम्परा और जिम्मेदारी। 18-ब्राह्मण अपना उत्तरदायित्व संभालें। 19- स्वच्छता मनुष्यता का प्रथम गुरुमन्त्र। 20-दर्शन तो करें-पर इस तरह। 21-आलस छोड़िए परिश्रमी बनिये! 22-पक्षपात त्यागें औचित्य अपनावें! 23-माँसाहार मानवता के विरुद्ध है। 24-तमाखू-का भयानक दुर्व्यसन। 25-प्राणियों के प्रति निर्दयता न करें! 26-अपव्यय का ओछापन। 27-मृतक-भोज की क्या आवश्यकता? 28-नारी को तिरस्कृत न किया जाय? 29-अशिष्टता न कीजिये! 30-ईमानदारी का परित्याग न करें। 31-खाद्य समस्या और उसका हल। 32-आहार में असंयम न बरतें। 33-संतान की संख्या न बढ़ाइये। 34-गन्दगी की घृणित असभ्यता। 35-शाकाहारी व्यंजन। 36-व्यायाम-हमारी एक अनिवार्य आवश्यकता। 37- वृक्षारोपण-एक परम पुनीत पुण्य। 38- शाक उगायें-अन्न बचायें। 39-पुस्तकालय-सच्चे देवालय। 40- निरक्षरता का कलंक धो दिया जाय। 41-परिवार को सुसंस्कृत कैसे बनायें?-विधवा विवाह शास्त्र विरुद्ध नहीं। 43-हम सच्चे अर्थों में आस्तिक बनें। 44-संस्कारों की पुण्य परम्परा। 45-पर्व और त्यौहारों से प्रेरणा ग्रहण करें। 46-लोक निर्माण के लिए जन-गायन। 47-विवाहोत्सव कैसे मनावें? 48-जन्म-दिवसोत्सव इस तरह मनावें। 49-गायत्री यज्ञों की विधि व्यवस्था। 50-गायत्री यज्ञों की विधि व्याख्या। 51-प्रबुद्ध व्यक्ति धर्म तन्त्र सँभालें। 52-सत्कार्यों का अभिनन्दन किया जाए। 53-पुँसवन संस्कार विवेचन। 54-नामकरण संस्कार विवेचन। 55-अन्नप्राशन संस्कार विवेचन। 56-चूड़ाकर्म संस्कार विवेचन। 57-विद्यारंभ संस्कार विवेचन। 58-यज्ञोपवीत संस्कार विवेचन। 59-विवाह संस्कार विवेचन। 60-वानप्रस्थ संस्कार विवेचन। 61-अंत्येष्टि संस्कार विवेचन। 62-मरणोत्तर-संस्कार विवेचन। 63-बाल-विवाह की भयंकरता से समाज को बचाया जाय। 64-बच्चों को सद्गुणी बनायें? 65-छात्रों का निर्माण अध्यापक करें। 66-हरिजन उत्कर्ष के लिए बड़े कदम उठें। 67-नारी जागरण के लिए महिलायें आगे आवें। 68-पशुबलि हिन्दूधर्म का कलंक। 69-नव-निर्माण के लिए जन-आँदोलन। 70-मनुष्य क्या पशुओं से भी गिरा रहेगा?
अबतक 20 नया पैसा सीरीज के 70 ट्रैक्ट छप चुके हैं। इनका मूल्य 14) होता है। 15 प्रतिशत कमीशन घटाकर और पोस्टेज जोड़कर यह वी. पी. 14) 75 की बैठेगी। प्रथम सत्र आरम्भ करने के लिए सैट का आर्डर भेज देना चाहिए। जिनके पास जो ट्रैक्ट हों, वे उनके नाम लिख दें तो शेष वी. पी. से भेज दिये जायेंगे।
धरती की शपथ, अगर तुमको मैं नभ के गीत सुनाऊँ तो!
बादल की प्यास बुझाने वाला तो मेरा यह सागर है, ब्रह्माण्डों को उर में रखने वाला मेरा नटनागर है,
रवि-शशि-नक्षत्र सभी मेरे ही तप-बल से जगमगा रहे; मेरे ही समाधिस्थ शंकर दनुनों का जग डगमगा रहे! विश्वास-विष्णु से है मेरा अन्तराकाश यह आलोकित- श्रम-सृजन-ब्रह्म की शपथ, नई दुनिया यदि नहीं बसाऊँ तो!
धरती की शपथ, अगर तुमको मैं नभ के गीत सुनाऊँ तो!!
मेरी दशरथ-गति देख, मृत्यु की गति के रथ भी रुक जाते, मिट्टी के मानव-चरणों पर, देवों के मस्तक झुक जाते!
मत इठलाओ तुम स्वर्ग, कल्पनाओं के भ्रम को फैलाकर, मानव तुम पर कैसे ललचाएगा भू की अवहेला कर?
हर फूल यहाँ का नन्दन की सुषमा समेट कर हँसता है— इनके सौरभ की शपथ, अगर तुम पर मोहित हो जाऊँ तो!
धरती की शपथ, अगर तुमको मैं नभ के गीत सुनाऊँ तो!! मुझ में ही व्याप्त हुआ है आदर्श का विस्तृत महाकाश, इस शून्य गगन की ओर देखकर, क्यों होऊँ फिर मैं निराश?
आशाओं की फुलवारी में मेरे रखवाले राम खड़े, मेरे ही आँगन में भविष्य के दीपक ये घनश्याम खड़े!
मावस के मातम पर हँसने वाले नक्षत्रों सुन लेना— मुझको मिट्टी की शपथ, अगर मैं तुमको नहीं लजाऊँ तो!
धरती की शपथ, अगर तुमको मैं नभ के गीत सुनाऊँ तो!
—देवव्रत जोशी ‘देव’
*समाप्त*