नींव अच्छी होनी चाहिए।

भवन जितना ही ऊँचा बनाना होता है, उतनी ही नीची नींव खोदनी पड़ती है। नींव की गहराई पर भवन की ऊँचाई निर्भर है। ध्येय की गति ऊर्ध्वगामिनी है। ऊँचे ध्येय को पाने के लिये अपने आधारित ज्ञान को गम्भीर से गम्भीर करना होता है। जिस प्रकार गहरी नींव पर, खड़े भवन पर, प्रभंजन का कोई प्रभाव नहीं रहता, एक बार भूकम्प आने पर भी उसके गिरने की विशेष चिन्ता नहीं होती, उसी प्रकार गहरी नींव पर आधारित ध्येय आलोचनाओं के समय नहीं डगमगाता।

नींव का कार्य सम्पन्न हो जाने पर जिस प्रकार भवन निर्माण की दिशा बदल जाती है, उसी प्रकार अपनी आधार भित्ति पर खड़े ध्येय की गति-विधि भी आवश्यक दिशाओं की ओर अग्रसर हो उठती है।

ध्येय का सूत्रपात होने पर एक बार जो जन क्षोभ उठता है वह उसकी नींव में समाहित हो जाता है और आगे चलकर लोग ध्येय को मान्यता देने और अपनाने लगते हैं।

—अब्राहिम लिंकन


परमात्मा की प्राप्ति का दिव्य साधन—प्रेम

आध्यात्मिक उन्नति की परम अवस्था तथा ईश्वर प्राप्ति की अन्तिम भक्ति-अवस्था प्रेम है। भक्ति का स्वरूप भी निस्वार्थ प्रेम ही कहा गया है। इस विषय में कोई विवाद नहीं है कि परमात्मा की प्राप्ति के अन्य सभी साधनों में प्रेम दिव्य एवं सुखद साधन है और उसका प्रत्येक साधन में समावेश होना चाहिए। वस्तु कितनी ही सुन्दर क्यों न हो यदि उसके प्रति आकर्षण का भाव नहीं होगा तो न तो उसकी प्राप्ति का प्रयत्न ही हो सकता है और न उस प्रयत्न में चिरस्थायी ही रहा जा सकता है। प्रेम का विकसित रूप ही आध्यात्मिक गुणों- श्रद्धा-भक्ति विश्वास आदि के रूप में प्रकट होता है पर ईश्वर उपासना में उसे किसी न किसी रूप में प्रकट होना आवश्यक है। इसके बिना उपासना अधूरी है, सच्ची भक्ति तो प्रेम ही है, प्रेम ही परमात्मा का प्रकट स्वरूप है।

प्रेम ईश्वर प्राप्ति की साधना की वह कसौटी है जिसमें तपकर जीव विशुद्ध बनता है और ब्रह्म में मिलन की स्थिति प्राप्त करता है। जीव और परमात्मा के बीच जो तादात्म्य है वह अपने शुद्ध रूप में प्रेम द्वारा ही प्रकट होता है। प्रेम न होता तो इस पृथ्वी पर लोगों को आध्यात्मिक तत्वों की अनुभूति भी न होती। यह स्थिति प्रारम्भ में आत्मस्वरूप की प्राप्ति के लिये विकलता, विरह के रूप में प्रकट होती है पर जिन्हें स्वाभाविक रूप में वह स्थिति प्राप्त न हो और वे ईश्वर को प्राप्त करना अपने जीवन का उद्देश्य मान गये हों तो उन्हें भी प्रेम का अभ्यास करना पड़ता है। तप, त्याग और सुख की इच्छाओं का दमन कर अन्तःकरण की प्रेम-प्रवृत्ति को जागृत करना पड़ता है।

प्रेम जो मनुष्य का मनुष्य के साथ सम्बन्ध स्थापित करता है उसे उसकी सत्ता के मूल स्रोत में पहुंचा देता है। जो वस्तु मनुष्य-समाज को धारण किये रखती है,उसके विकास और नैतिक उत्कर्ष में सहायक होती है वह प्रेम ही है। यदि मनुष्य-मनुष्य के बीच प्रेम का आदान-प्रदान न रहा होता और मानव जाति की प्रवृत्ति के मूल में प्रेम का प्रेरक भाव न होता तो नैतिक क्षेत्र में उसने कोई भी उन्नति न की होती।

मनुष्य विकास-क्रम में सृष्टि के अन्य जीवों की अपेक्षा बहुत पीछे है। संसार के अन्य प्राणियों में जो नैतिक मर्यादायें देखी जाती हैं वे ईश्वर प्रदत्त होती हैं। यदि उसके जीवन में प्रेम परिचालक न रहा होता तो उसकी सारी नैतिक मर्यादायें भंग हुई होती। स्वार्थ या छल-कपट की अधिकता वाले प्रदेशों में आज भी इस सिद्धान्त को स्पष्ट रूप में देखा जा सकता है।

प्रेम विश्व की सर्वाधिक शक्तिशाली सत्ता है, उसी के आधार पर मनुष्य-समाज जीवित है। यह न होता तो मनुष्य बड़ा दरिद्र एवं अविकसित रहा होता। उसे केवल अपना ही ध्यान रहा होता, अपने ही स्वार्थों की फिक्र रही होती, अपने ही सुख सुहाये होते। न तो उसे समाज-सेवा के लिये प्रोत्साहन मिला होता, न व्यक्तिगत जीवन में पराक्रम करने की प्रेरणा मिली होती। प्रेम की शक्ति का साम्राज्य आज सुव्यवस्थित और सुनियोजित विश्व के रूप में देखने को मिल रहा है।

प्रेम के बगैर मनुष्य मुर्दा है। जब मनुष्यों में प्रेम का अभाव होगा तो कोई आकर्षण न होगा तो क्रिया न होगी, क्रिया न होगी तो यह सारा संसार नीरव, उदासीन और जड़वत हो जायगा। इसीलिये प्रेम ही जीवन है।

ईश्वर उपासना में इस उद्दात्त भावना का दर्शन संसार के सभी धर्मों में पाया जाता है। भगवान को प्रेममय समझकर प्रेम मार्ग द्वारा उसकी साधना सभी देशों के भक्तों एवं साधकों में देखी जाती है। उपनिषद् में भगवान को “मधु ब्रह्म” कहा है यह उसका विशुद्ध प्रेममय स्वरूप ही है। परमात्मा प्रेम द्वारा ही मधुर होता है—’मधुक्षरन्तितद्ब्रह्म’ जिससे मधु अर्थात् प्रेम प्रकीर्ण होता है वही ब्रह्म है। अपने इसी रूप में वे भक्त के लिये, आराधक के लिये पुत्र, धन आत्मीय स्वजन—इन सबसे बढ़कर प्रियतम हो जाते हैं। महापुरुष ईसा का कथन है—’प्रेम परमेश्वर है’। संत इमर्सन की वाणी है—”परमात्मा का सार-तत्व प्रेम है”। सभी ईसाई सन्तों ने भगवान् की साधना आनन्दमय, मधुमय एवं प्रेममय रूप में ही की है।

सेंट टेरेसा नामक पाश्चात्य साधिका ने लिखा है—”परमात्मा के प्रति प्रेम होता है तभी सच्ची उपासना बन पड़ती है। आत्मा के उत्थान की यह प्रारम्भिक अवस्था है। अन्त में जीव और ब्रह्म का प्रणय-संस्कार होता है तो दोनों एक दूसरे में आत्मसात् हो जाते हैं। न जीव रहता है और न परमात्मा, केवल प्रेम ही शेष रह जाता है, जो ब्रह्म के समान सर्वज्ञ, सर्वव्यापक और सर्वशक्तिमान दिखाई देता है।”

मुसलमानों में सूफी संतों की प्रेममयी भक्ति-धारा प्रियतम (माशूक) के रूप में की है और जीवात्मा को प्रेमी (आशिक) के रूप में माना है। इस प्रेम भक्ति-धारा का सुन्दर प्रवाह जाय सीकृत “पद्मावत” में भली-भाँति देखने को मिलता है। जलालुद्दीन भक्त बड़े प्रेमी सन्त हुये हैं, उन्होंने लिखा है—”तुम्हारे हृदय में परमात्मा के लिये प्रेम होगा तो उसे भी तुम्हारी चिन्ता अवश्य होगी।

जिस प्रेम शक्ति का सन्तों, अध्यात्म-तत्ववेत्ताओं ने इतना समर्थन किया है वह मनुष्य जीवन में अवतरित होकर किस प्रकार उसे अनन्त ब्रह्म की ओर विकसित करती है यह जानने योग्य है। लोगों के अन्दर अनेक बुरी वृत्तियाँ हैं—काम, क्रोध, लोभ, मोह,भय, कुसंग, चोरी, व्यसन आदि। इन्हें जीतने और दूर करने का प्रयास जीवन भर करते रहते हैं तो भी वे दूर नहीं हो पाती। मन स्वभावतः कुमार्गगामी होता है और वह किसी भी नियम-बन्धन को मानने के लिये तैयार नहीं होता। ऐसी अवस्था में लोग यह मानकर निराश हो जाते हैं कि इन बुराइयों से बचने का कोई उपाय नहीं है। पर यदि मनुष्य के अन्तःकरण में प्रेम जागृत हो गया तो उसे इन्हें जीतने में कोई कठिनाई नहीं होती। प्रेमी के लिये कुछ उत्सर्ग करने में या अभावग्रस्त जीवन जीने में ही तो आनन्द है। मनुष्य का मन प्रेम का गुलाम है। प्रेम की शक्ति के सहारे उसे जिस मार्ग पर चलने के लिये प्रेरित किया जाए वह उसी में चलने के लिए तैयार हो जाता है। प्रेम से मानव जीवन के उत्थान का यही आध्यात्मिक रहस्य है।

असीम सुख की प्राप्ति के लिये प्रेमी अपने आपको घुलाता है और इसमें उसे एक अनिर्वचनीय तृप्ति मिलती है। प्रेम का वास्तविक स्वरूप अपने आपको प्रेमी के प्रति आत्मोत्सर्ग करना ही तो है। इसका उद्दात रूप बच्चे के प्रति माता के वात्सल्य में देख पड़ता है । प्रेमवश माता बच्चे के ध्यान में अपने आपको बिलकुल विस्मृत कर देती है। उसे अपने सुख, सुविधा, विश्राम, निद्रा और भूख-प्यास की कोई सुध नहीं रहती।

ईश-उपासना में ऐसा प्रेम जागृत करने के लिए इष्टदेव से मिलने के लिये तीव्र और अदम्य इच्छा जागृत करनी चाहिये। साधारण मनुष्य के प्रेम में जब लोग इतने विभोर हो जाते हैं तो ईश्वर के प्रेम में ऐसा क्यों न होना चाहिये। पर इसके लिये भी हमें त्याग और बलिदान के लिये उसी भावना से तैयार रहना चाहिये जिस प्रकार अपने प्रेमास्पद का सुख देखने को तरसते हैं और उसके सामने अपनी विद्या-बुद्धि, धन-सम्पति, पद-यश सबको तुच्छ मान लेते हैं।

हमारा प्रयत्न यह होना चाहिये कि परमात्मा से शुद्ध प्रेम के लिये अपने आपको, अपनी आत्मा को, अपने बच्चों, अपनी धर्मपत्नी, घर गाँव, समाज राष्ट्र और सम्पूर्ण मानव भाइयों के प्रति विकसित करना चाहिये। यथाशक्ति उनकी सेवा और त्याग भावना द्वारा निष्काम प्रेम, वासना और कामना रहित प्रेम बढ़ाना चाहिये। इस विकास के मार्ग पर जितना अपना अहंकार नष्ट होता जायगा हम उतना ही परमात्मा की सत्ता में समाते चले जायेंगे और इसी प्रेम-अभ्यास में परम-पिता परमात्मा की समीपता का सौभाग्य प्राप्त कर लेंगे क्योंकि परमात्मा का द्वार प्रेमी भक्तों के लिये सदैव ही खुला रहता है।


अधर्म की जननी—नास्तिकता


विचारों की उत्तमता ही उन्नति का मूलमन्त्र है।

यदि आप उन्नति नहीं कर पा रहे हैं, आपका उद्योग असफल होता जा रहा है तो अवश्य ही आप निराशापूर्ण प्रतिकूल विचारों के बीमार हैं। आप काम करते हैं किन्तु अविश्वास के साथ, सफलता के लिये उद्योग करते हैं तो असफलता की शंका के साथ, भविष्य की ओर देखते हैं तो निराश दृष्टिकोण से। अन्यथा कोई कारण नहीं कि मनुष्य प्रयत्न करें और सफल न हो। जीवन भर प्रयत्न करते रहिये, पुरुषार्थ एवं उद्योग में जिन्दगी लगा दीजिए किन्तु तब तक कदापि सफल न होंगे, जब तक अपने अनिष्ट चिन्तन के रोग से अपने को मुक्त करके उसके स्थान पर विश्वासपूर्ण विचारों की स्थापना नहीं करेंगे।

सर्वशक्तिमान का अंश होने से मनुष्य में उसकी वे सारी विशेषतायें उसी तरह रहती हैं जिस प्रकार बिन्दु में सिन्धु की विशेषताएं। मनुष्य की शक्ति अतुलनीय है। अपनी इस शक्ति का ठीक-ठीक सदुपयोग करके वह सब कुछ कर सकता है, जीवन में एक उल्लेखनीय सफलता पा सकना तो उसके लिये साधारण सी बात है। किन्तु खेद है कि अधिकतर लोग अपनी शक्ति का उपयुक्त उपयोग नहीं करते अथवा उसे क्षुद्र एवं तुच्छ बातों में नष्ट कर डालते हैं।

मनुष्य की यह शक्ति उसके विचारों में ही निहित रहती है। जिसके विचार सत्य-शिव सुन्दर रहते हैं, उसकी गति संसार का कोई भी अवरोध नहीं रोक सकता। वह अपने निर्धारित लक्ष्य तक अवश्य पहुँचेगा, यह ध्रुव सत्य है। इसके विपरीत विश्वास करने वालों को समझ लेना चाहिये कि वे विचार विपर्यय के रोगी हैं और इस बात की आवश्यकता है कि उनका मानसिक उपचार हो।

संसार की यह अद्भुत उन्नति सुविधा एवं साधनों का यह भंडार तथा सभ्यता, संस्कृति, साहित्य तथा कलाकौशल का विपुल विकास मानवीय शक्ति के ही तो परिचायक हैं। बड़े-बड़े कल कारखाने विलक्षण वाहन और वैज्ञानिक खोजें व आविष्कार मनुष्य शक्ति की महानता की ही तो घोषणा करते हैं। इन सब प्रमाणों को पाकर भी जो मनुष्य, मनुष्य की शक्तियों में विश्वास करने और यह मानने को तैयार नहीं कि पृथ्वी का यह प्राणी सब कुछ कर सकने में समर्थ है तो उसे बुद्धिमानों की कोटि में नहीं रखा जा सकता। इस प्रकार का अखण्ड विश्वास लेकर चलने वाले ही आज तक जीवन में सफलता पा सके हैं और इसी प्रकार के विचारवान व्यक्ति ही आगे सफलता प्राप्त भी कर सकेंगे। जिसे अपने में, मनुष्य की शक्तियों में विश्वास ही नहीं, उसकी शक्तियाँ उस जैसे अविश्वास व्यक्ति का साथ भी क्यों देने लगीं और तब ऐसी दशा में सफलता के लिये जिज्ञासु होना अनुचित एवं असंगत है।

विचारों की विकृति ही दुर्भाग्य एवं विचारों की सुकृति ही सौभाग्य है। विचारों के बाहर दुर्भाग्य अथवा सौभाग्य का कोई स्थान नहीं है। मनुष्य का भाग्य लिखने वाली विचारों के अतिरिक्त अन्य कोई शक्ति भी नहीं है। मनुष्य अपने विचारों के माध्यम से स्वयं अपना भाग्य लिखा करता है। जिस प्रकार के विचार होंगे, भाग्य की भाषा भी उसी प्रकार की होगी। जिसके विचार उन्नत, उज्ज्वल एवं उत्पादक होंगे, उसके भाग्य में सफलता, सम्पन्नता एवं श्रेय लिख जायेंगे, इसके विपरीत जिसके विचार क्षुद्र, तुच्छ, थोथे, मलीन अथवा निम्न कोटि के होंगे, उसकी भाग्य लिपि तीन अक्षरों के ‘नरक’ शब्द में ही पूरी हो जायेगी। सौभाग्य एवं श्रेय प्राप्त है तो विचारों को अनुरूप बनाना ही होगा। इसके अतिरिक्त जीवन में उन्नति करने का दूसरा कोई मार्ग नहीं है।

भाग्य यदि कोई निश्चित विधान होता और उसका रचने वाला भी कोई दूसरा होता, तो कंगाली एवं गरीबी की दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति में जन्म लेने वाला कोई भी मनुष्य आज तक उन्नति एवं विकास के पथ पर चलकर सौभाग्यवान न बना होता। उसे तो निश्चित भाग्य दोष से यथास्थिति में ही मर खपकर चला जाना चाहिये था। किन्तु सत्य इसके विपरीत देखने में आता है। बहुतायत ऐसे ही लोगों की है जो गरीबी से बढ़कर ऊँची स्थिति में पहुँचे हैं, कठिनाइयों को पार कर ही श्रेयवान बने हैं। महापुरुषों के उदाहरणों से इस बात में कोई शंका नहीं रह जाती कि भाग्य न तो कोई निश्चित विधान है और न उसका रचयिता ही कोई दूसरा है। विचारों की परिणति ही का दूसरा नाम भाग्य है जिसका कि विधायक मनुष्य स्वयं ही है। सद्विचारों का सृजन कीजिए, उन्नत विचारों का उत्पादन करिये, आप अवश्य भाग्यवान बनकर श्रेय प्राप्त करेंगे।

विचारों का प्रभाव मनुष्य के आचार पर अवश्य पड़ता है। बल्कि यों कहना चाहिये कि आचार विचारों का ही क्रियात्मक रूप है। क्रिया सम्पन्न करने वाले मनुष्य की कोई अपनी गति नहीं, इन्द्रियाँ विचारों की ही अनुगामिनी रहती हैं। जिस दिशा में मनुष्य के विचार चलते हैं, शरीर भी उसी दिशा में गतिशील हो उठता है। इसका कारण विचार वैचित्र्य ही है कि एक जैसा शरीर पाने वाले मनुष्यों में से कोई परमार्थ और कोई अनर्थ की ओर अग्रसर होता है। एक ही प्रकार की शक्ति तथा बुद्धि व विवेक-तत्व पाने वालों में से किसी का विज्ञान की ओर और किसी का व्यापार की ओर उन्मुख होना इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि मनुष्य अपनी विचारधारा के अनुसार ही जीवन का पथ प्रशस्त करता है। एक ही माता-पिता के दो पुत्रों में से एक का सदाचार और दूसरे का दुराचारी बन जाने का कारण उनकी अपनी-अपनी विचार-धारा ही होती है। इस सत्य में किसी प्रकार के सन्देह की गुंजाइश नहीं है कि आचार मनुष्य के विचारों का ही क्रियात्मक रूप है।

सफलता एवं श्रेय के महत्वाकाँक्षी व्यक्ति अपने पास प्रतिकूल विचारों को एक क्षण भी नहीं ठहरने देते। बड़ी आपत्ति आ जाने और संकट का सामना हो जाने से वे न तो कभी यह सोचते हैं कि उनका भाग्य खोटा है, आया हुआ संकट उन्हें नष्ट कर देगा, उनमें इतनी शक्ति नहीं कि वे इस आपत्ति से लोहा ले सकें। निषेधात्मक ढंग से सोचने के बजाय वे इस प्रकार निषेधात्मक ढंग से ही सोचा करते हैं कि आने वाला संकट उनकी शक्ति की तुलना में तुच्छ है, जो वे उसका सफलतापूर्वक सामना कर सकते हैं, उनमें इतनी बुद्धि, इतना विवेक अवश्य है कि वे अपनी समस्या को अवश्य सुलझा सकते हैं। श्रेय पथ पर उनकी गति को कोई भी नहीं रोक सकता है। वे संसार में श्रेय एवं सफलता प्राप्त करने के लिये ही भेजे गये हैं, परिस्थितियों से परास्त होने, उन्हें आत्म समर्पण करने के लिये नहीं। अपने इन विधायक विचारों के बल पर ही, कठिनाइयों एवं संकटों को पारकर संसार के प्रसिद्ध पुरुषों ने श्रेय एवं सफलता प्राप्त की है।

निषेधात्मक विचार रखने से मनुष्य की सारी शक्तियाँ नकारात्मक होकर कुँठित हो जाती हैं, उसका आत्म-विश्वास नष्ट हो जाता है। जिस प्रकार सृजनात्मक विचारों में संजीवनी का समावेश रहता है ठीक इसके विपरीत ध्वंसक विचारों में विष का प्रभाव रहता है जो मनुष्य की सारी क्षमताओं को जलाकर रख देता है। अपने भाग्य का आप निर्माता होते हुये भी मनुष्य अपनी वैचारिक त्रुटियों के कारण दुर्भाग्य का शिकार बन जाता है? अपने क्षुद्र विचारों के अनुसार ही वह अपने को तुच्छ एवं हेय बना लिया करता है। उसके विचार उसके व्यक्तित्व को घेरे हुये जन-जन को इस बात की सूचना देते रहते हैं कि यह व्यक्ति निराशावादी एवं मलीन मन्तव्यों का है। ऐसे कुविचारी व्यक्ति के पास वह ओज तेज नहीं रहने पाता जो दूसरों को प्रभावित करने में सहायक हुआ करता है? क्षुद्र विचारों का व्यक्ति समाज में क्षुद्र स्थिति ही पा सकता है।

हम अपने को जिस प्रकार का बनाना चाहते हैं अपने अन्दर उसी प्रकार के विचारों का सृजन करना होगा। उसके अनुरूप विचारों का ही मनन एवं चिन्तन हमको मनोवाँछित साँचे में ढाल सकता है। विचारों का प्रभाव आचरण पर पड़ता है और आचरण ही मनुष्य की मनोरूप सफलताओं का संवाहक होता है। यदि हम समाज में प्रतिष्ठा तथा संसार में प्रसिद्धि के इच्छुक हैं तो सबसे पहले अपने विचारों, भावनाओं तथा चिन्तन को स्वार्थ की संकुचित सीमा से बढ़ाकर विशालता तक विस्तारित करना होगा। यदि हम क्षुद्रताओं के जाल में ही पड़े रहे संकीर्णता के गढ्ढे से अपने विचारों का उद्धार न किया तो निश्चय जानिये हमारी महानता की इच्छा एक स्वप्न ही बनी रहेगी। क्षुद्र विचारों से प्रेरित होकर कोई क्षुद्र आचरण ही कर सकता है, तब ऐसी स्थिति में प्रतिष्ठा अथवा प्रसिद्धि का स्वप्न किस प्रकार पूरा हो सकता है।

निषेधात्मक अथवा निराशापूर्ण विचार वाले लोग प्रतिष्ठा एवं प्रसिद्धि पा सकना तो दूर अपने सामान्य जीवन में भी सुखी एवं सन्तुष्ट नहीं रह सकते। उनके हीन विचार उन्हें तो उन्नति नहीं ही करने देंगे, साथ ही दूसरों की उन्नति एवं विकास देख उनके मन में ईर्ष्या, द्वेष एवं अनिष्ट की भावना पैदा होगी, जिससे दूसरे का अनिष्ट चिन्तन करते-करते, वे स्वयं ही अनिष्ट के आखेट बन जाया करते हैं। जीवन में यदि उन्नति करना है, सफलता पाना है तो अपने विचारों को उन्नत एवं सृजनात्मक बनाना ही होगा, इसके अतिरिक्त कोई दूसरा मार्ग नहीं है और यही ईश्वर के अंश मनुष्य के लिए उचित एवं योग्य है।

अनेक लोग कोई अन्य कारण न होने पर भी अपने अप्रसन्न विचारों के कारण ही दुखी तथा व्यग्र रहा करते हैं। सामने कोई प्रतिकूलता न होने पर भी भविष्य के काल्पनिक संकटों का ही चिन्तन किया करते हैं अपनी विकृत विचारा धारा के कारण वे प्रसन्नतापूर्वक कारणों में भी अप्रसन्नता के कारण खोज निकालते हैं। प्रतिकूल विचारों से अपने मन का माधुर्य मस्तिष्क की शक्ति नष्ट करते रहना उचित नहीं। मानव जीवन एक दुर्लभ उपलब्धि है। इसे कुत्सित विचारों की आग में जलाने के स्थान पर उच्च विचारों, सद्भावनाओं तथा उनके अनुरूप सदाचरण द्वारा उच्च से उच्चतर स्थिति में पहुँचाना ही उचित है और यही मनुष्य का लक्ष्य है भी और होना भी चाहिये।

निराशापूर्ण अनिष्ट विचारों में फँस जाना कोई असम्भव बात नहीं है। कोई भी किसी परिस्थिति अथवा घटना के आघात से विचारों की इस दुरभिसंधि में फँस सकता है। किन्तु इनसे छुटकारा पा सकना भी कोई असम्भव बात नहीं है। यदि मनुष्य वास्तव में अपने अनिष्ट विचारों से मुक्ति चाहता है तो उसे दो उपायों को लेकर आगे बढ़ना चाहिये। एक तो यह कि वह ऊँचे तथा सृजनात्मक विचारों वाले व्यक्तियों तथा पुस्तकों के संपर्क में रहे, दूसरे उसे नियमित रूप से एकान्त में बैठकर अवकाश के समय अपने मन मस्तिष्क का सद् संकेत देना चाहिये। सद्विचारों के संपर्क में रहने से सद्-विचारों को प्रोत्साहन मिलेगा और मन मस्तिष्क को सद्संकेत देते रहने से उनका कुविचार व्यसन छूटने लगेगा।

एकान्त में बैठिये और अपने मन मस्तिष्क को समझाइये कि—”तुम ईश्वरीय शक्ति के केन्द्र हो, तुम ही वह शक्ति हो जो संसार में चमत्कारपूर्ण कार्य कर दिखाया करती है। अपने शिव संकल्पों का अवतरण करके अपने ईश्वरीय अंश को पहचानें। तुम महान हो, यह क्षुद्रता शोभा नहीं देती, इसे छोड़कर पुनः महान बनो और शरीर को महान कार्य करने की प्रेरणा देकर महत्व को प्राप्त करो।” इस प्रकार मन मस्तिष्क को उपदेश करता हुआ, मनुष्य अपने प्रति हीन भावना का भी परित्याग कर दे। वह अपने स्वरूप को पहचाने, अपनी शक्तियों में विश्वास करे और आत्म श्रद्धा के संवर्धन से व्यक्तित्व को विकसित करने का प्रयत्न करे। इस प्रकार कुछ ही दिनों में उसका विचार शोधन हो जायेगा, आचरण सुधर जायेगा और वह अपने मनोवाँछित लक्ष्य को अवश्य प्राप्त कर लेगा।

विचार ही आचार के प्रेरक हैं और आचार से ही मनुष्य कोई स्थिति प्राप्त करता है, इस मूलमन्त्र को ठीक से समझकर हृदयंगम करने वाले जीवन में कभी असफल नहीं होते यह निश्चय है।


Quotation

जब एक राष्ट्र में एक ऐसे मनुष्य का जन्म होता है जो एक महान विचार को उत्पन्न करने के योग्य होता है, तब उस जाति में एक दूसरा भी पैदा हो जाता है जो उक्त विचार को समझ सके और उसकी सराहना कर सके।

—जूवर्ट


अशान्ति के चार कारण और उनका निवारण

व्यक्ति हो अथवा राष्ट्र, तब तक उन्नत एवं समृद्ध नहीं हो सकता जब तक उसमें शाँति का अभाव रहेगा। उन्नति की सारी सम्भावनायें शाँतिपूर्ण वातावरण में ही निहित रहती हैं। संघर्ष, युद्ध एवं क्षोभ उन्नति के सबसे बड़े शत्रु हैं। इनसे अशाँति का जन्म होता है और अशाँति मानव की सृजन शक्ति को नष्ट कर डालती है। अशाँति से क्षुब्ध-चित्त मनुष्य का मन किसी काम में नहीं लगता और यदि वह हठपूर्वक लगाता भी है तो उसका काम ठीक से नहीं होता, जल्दी थक जाता है और काम को छोड़कर बैठ रहता है! अकर्मण्यता की स्थिति में उन्नति असम्भव है।

बड़े से बड़े व्यक्ति और उन्नत से उन्नत राष्ट्र को ले लीजिये। जब तक उनका वातावरण शाँतिपूर्ण बना रहता है वे उन्नति के मार्ग पर चलते हुये दिन-दिन आगे बढ़ते रहते हैं। किन्तु ज्योंही उनमें आन्तरिक क्षोभ अथवा कलह उत्पन्न होती है, उनकी उन्नति स्थिर नहीं रह पाती, उनका पतन हो जाता है, विनाश हो जाता है। संसार में न जाने कितने व्यक्ति एवं राष्ट्र इसी अशाँति के कारण मिटे हैं और मिटते रहते हैं। उन्नत होने और उसको स्थिर बनाये रखने के लिये शाँति की नितान्त आवश्यकता है।

अशाँति के अन्य अनेक कारण हो सकते हैं किन्तु चार मूलभूत कारण हैं। अभाव, अहं, असहयोग तथा अज्ञान, इन कारणों की उपस्थिति में कोई भी व्यक्ति अथवा राष्ट्र शाँतिपूर्ण स्थिति में नहीं रह सकता।

जहाँ अभाव है, आवश्यकताओं की आपूर्ति है वहाँ शाँति का हो सकना सम्भव नहीं। मनुष्य कितना भी संतोषी एवं सहनशील क्यों न हो यदि उसे रोटी, कपड़े, निवास स्थान, आवश्यक वस्तुओं की कमी रहेगी—शाँतिपूर्वक नहीं रह सकता। पेट की ज्वाला कब तक सहन की जा सकती है? शीत, घाम, वर्षा आदि के कष्टों की कब तक उपेक्षा की जा सकती है? फिर मनुष्य अकेला तो होता नहीं, उसका परिवार भी होता है, उसके बच्चे तथा आश्रित भी होते हैं। मनुष्य अपने पर कष्ट एक बार सहन भी कर सकता है, चुपचाप पड़े रह सकता है किन्तु इतना कठोर कदापि नहीं हो सकता कि अपने आश्रितों तथा बच्चों को अभाव का कष्ट सहते देखकर भी विचलित न हो। वह अवश्य विचलित होगा, उसे चिन्ता होगी जिसके परिणामस्वरूप उसकी शाँति सुरक्षित नहीं रह सकती! वह अशाँत, बेचैन तथा क्षुब्ध होगा ही।

अहं भी अशाँति का बहुत बड़ा कारण है। मनुष्य के पास जर, जन, जमीन सब कुछ है, किसी प्रकार का अभाव नहीं है। रोटी, कपड़ा, घर मकान सबकी सुविधा है, हर वस्तु आवश्यकता भर ही नहीं अधिकता पूर्ण है तब भी वह अहंकार की दुर्बलता के कारण अशाँत रहेगा। अहं-प्रधान व्यक्ति अपनी मनोनुकूलता में जरा सा विघ्न पड़ते ही उत्तेजित हो उठता है। उसे क्रोध हो आता है जिससे उसका चित्त अशाँति से भर जाता है। अहं का दोष मनुष्य को ईर्ष्यालु भी बना देता है। अपनी उन्नति के सामने अहंकारी व्यक्ति दूसरे की उन्नति सहन नहीं कर पाता। वह यथासम्भव हर उचित अनुचित कोशिश करता है कि वह तो दिन-दिन उन्नति करता रहे किन्तु कोई दूसरा उन्नति न कर सके। समाज में सब उससे नीचे तथा निर्धन ही रहें। न कोई उसके बराबर हो सके और न आगे निकल सके। दूसरे की प्रगति में रोड़े अटकाना अहंकारी का विशेष दोष है। इस निम्न प्रवृत्ति के कारण ईर्ष्या, द्वेष, कलह एवं संघर्ष का जन्म होता है और तब उस आक्रान्त स्थिति में समाज अथवा व्यक्ति का शान्त रहना किस प्रकार सम्भव हो सकता है? अहंकारी व्यक्ति किसी को उन्नति करते देखेगा तो उसे डाह होगी, उसके चित्त की शाँति नष्ट हो जायेगी। किसी की प्रगति रोकने में असफल होने पर आत्मग्लानि होगी जिससे शाँति का रहना सम्भव नहीं। किसी के पथ में अवरोध बनने से अपवाद एवं लाँछन का लक्ष्य बनना पड़ेगा जिससे शाँति का भंग होना स्वाभाविक है। अहंकारी व्यक्ति अपने स्वभाव-दोष के कारण कभी भी शाँति नहीं पा सकता।

मनुष्य सामाजिक प्राणी है। समाज की व्यवस्था परस्पर सहयोग पर ही निर्भर रहा करती है। असहयोग की स्थिति में समाज की प्रगति अवरुद्ध हो जाया करती है। कोई भी सामाजिक प्राणी अकेले अपने बल पर जीवन गाड़ी को नहीं खींच सकता। मालिक को यदि मजदूर सहयोग न करे तो उसका कारबार नहीं चल सकता। मालिक का असहयोग मजदूरों के लिये रोटी रोजी का अभाव ला सकता है। स्त्री-पुरुष के असहयोग में परिवार की सुख-शाँति नष्ट हो सकती है। पिता पुत्र का असहयोग एक दूसरे के विनाश का कारण बन सकता है। व्यापारी तथा किसान के बीच असहयोग उन दोनों की ही नहीं समग्र समाज की हानि का हेतु होगा। जनता एवं सरकार का पारस्परिक असहयोग देश को गिरा देता है। असहयोग से उत्पन्न इन तथा इन जैसी असंख्यों हानियों के बीच व्यक्ति अथवा समाज की शाँति किस प्रकार अक्षुण्ण रह सकती है। मनुष्य आज किसी न किसी रूप में दूसरे मनुष्यों पर निर्भर है। एक अकेले वह अपना जीवन चला सकने में समर्थ नहीं है।

असहयोग स्वार्थ एवं संघर्ष को भी जन्म देता है। स्वार्थी व्यक्तियों तो स्वभाव से असहयोगी होता है अथवा असहयोग को प्रश्रय देने से अनुसार बन जाता है। सहयोग की स्थिति में जिस प्रेम, पारस्परिकता, सहानुभूति तथा सहकारिता की वृद्धि होती है वह रुद्ध हो जाती है। इन आवश्यक मानवीय गुणों के अभाव में समाज में शाँति का वातावरण सम्भव नहीं हो सकता। असहयोगी केवल स्वार्थी ही नहीं कुटिल एवं कपटी भी होता है। वह दूसरे के काम तो नहीं ही आता साथ ही किसी न किसी आडम्बर द्वारा दूसरे से लाभ उठा लिया करता है। वह अपने सहयोग को इस ढंग से सहयोग का रूप दे दिया करता है कि सामान्य जन उसके दोष को नहीं जान पाते। किन्तु जब उसका दोष समाज पर उद्घाटित हो जाता है तब उसे समाज का असहयोग इस सीमा तक सहन करना पड़ता है कि उसका पूरा जीवन ही अशाँत हो जाता है। समाज में असहयोग की प्रवृत्तियाँ अशाँति का बहुत बड़ा कारण हैं।

अज्ञान तो अशाँति का जीता-जागता रूप ही है। जिस प्रकार अंधकार में मनुष्य भटकता हुआ बेचैन रहा करता है, उसी प्रकार अज्ञान की दशा में भी मनुष्य अशाँत रहा करता है। अज्ञानी पग-पग पर ठगा जाता है। अज्ञता के कारण वह किसी काम को सफलतापूर्वक नहीं कर पाता। मूढ़ मनुष्य का कहीं भी आदर नहीं होता। अज्ञानी व्यक्ति जीवन व्यवस्था से शून्य रहकर अपने लिये कष्टों के बीज बोता रहता है। मूढ़ मनुष्य को सत्य असत्य, हित, अनहित का ज्ञान नहीं होता। विवेकहीनता की दशा में उसके हर व्यवहार में असत्य एवं मिथ्यात्व का समावेश हो जाता है। आडम्बर, प्रदर्शन एवं कृत्रिमता अज्ञान का ही अभिशाप है। अव्यावहारिक होने से अज्ञानी व्यक्ति समाज में यथायोग्य शिष्टाचार पालन करने में भी भूल करता रहता है जिससे उसे तिरस्कार का भाजन बनना पड़ता है जो उसमें मानसिक क्षोभ को जन्म देता है।

अज्ञान के कारण—जीवन का लक्ष्य न जानने के कारण—मनुष्य अधिकतर रास्ते से भटक कर कंटकाकीर्ण पगडंडियों में उलझ जाता है। जीवन की सारी हानियाँ, असफलतायें, निराशाएं अज्ञान के ही फल कहे गये हैं। अज्ञान के कारण ही मनुष्य असत्य में सत्य और सत्य में असत्य की भ्राँति पा जाता है। अनिश्चय के कारण अज्ञानी व्यक्ति भय, संदेह, अविश्वास एवं आशंका से पग-पग पर आक्रान्त एवं अशाँत रहा करता है। रूढ़िवाद, मूढ़वाद एवं अंधविश्वास अज्ञान की ही तो देन है। अज्ञान के कारण आत्म-अविश्वासी होकर मनुष्य पराधीन तथा परावलम्बी बना रहता है, जिससे उसे परानु ग्रहपूर्ण जीवन बिताने की यातना सहन करनी पड़ती है। पराधीनता की स्थिति में भी कोई शाँत चित्त रह सकता है यह बात सर्वथा असम्भव है। अज्ञानी व्यक्ति समाज में दुवृत्तियों तथा दुराचार को जन्म देता है जिसके कारण वह दूसरों की शाँति में बाधक बनकर अपनी शाँति भी नष्ट कर लिया करता है।

शाँतिपूर्ण स्थिति के लिये मनुष्य को पुरुषार्थी, सुशील, सहयोगी तथा विवेकवान बनना ही होगा। मनुष्य अपने सामाजिक व्यक्तित्व को पहचाने। समाज की उन्नति में ही अपनी उन्नति समझे। अपने सामाजिक स्वरूप को जान लेने पर मनुष्य कोई भी ऐसा काम करते संकोच करता है जो किसी प्रकार भी सार्वजनिक जीवन के लिये अहितकर हो सकता है। जब मनुष्य व्यक्ति को समष्टि में विलीन कर देता है उसकी स्वार्थ एवं संकीर्णता की दुखदाई वृत्तियाँ नष्ट हो जाती हैं। समाज का हित आगे रखकर सोचने और व्यवहार करने वालों को पूरे समाज का सहयोग अनायास ही मिलने लगता है जो उनकी उन्नति एवं विकास में सर्वथा सहायक होता है। समाज द्वारा हाथों हाथ लिये गये व्यक्ति का जीवन कितना सुख-शाँति पूर्ण हो सकता है यह किसी भी सच्चे समाज-सेवक के निकट संपर्क में आकर जाना जा सकता है।

सामाजिक सहयोग एवं सहकारिता सुख-शाँतिपूर्ण जीवन की गारंटी है। मनुष्यों का पारस्परिक सहयोग तथा सहकारिता समाज में अभाव को प्रवेश नहीं करने देती और वर्तमान अभाव को भगा देती है। सहयोग एवं सहकारिता की स्थिति में हर मनुष्य दो हाथ से हजार हाथ वाला हो जाता है। अपने परिश्रम एवं पुरुषार्थ को समाज की सेवा में समर्पित कर देने वाले निःस्वार्थी व्यक्तियों के लिये सम्पूर्ण समाज का परिश्रम एवं पुरुषार्थ उनका अपना हो जाता है। सुख-दुख को मिल बाँटकर भोग करने वालों के बीच अशाँति अथवा असंतोष का कोई अवसर ही नहीं रहता। प्रेम, सहानुभूति, संवेदना, एवं पारस्परिकता की मानवीय भावनाएँ सहयोग एवं सहकारिता से ही सम्भव होती हैं।

किन्तु मनुष्य को इन गुणों की उपलब्धि भी तब हो सकती है जब वह अज्ञान के निविड़ अंधकार से निकलकर जीवन के सच्चे प्रकाश में आये। अज्ञानी व्यक्ति प्रेम, सहानुभूति, सहयोग, तथा निःस्वार्थ भावना के मानवीय गुणों की महत्ता से सर्वथा अनभिज्ञ रहता है। दुराग्रह एवं दुर्व्यवहार अज्ञान के कष्टकारक दोष हैं। सत्य, असत्य एवं उचित अनुचित का निर्णय कर सकने वाला ज्ञान प्राप्त करने के लिये स्वाध्याय एवं सत्संग हर प्रकार से सहायक हो सकते हैं। जिन्हें संयोगवश स्वाध्याय की सुविधा प्राप्त नहीं है, उन्हें सत्संग तथा प्रामाणिक व्यक्तियों के कथनों, निर्देशों तथा उपदेशों में निश्चय करके अपने चरित्र का विकास करना चाहिये। सत्य के समर्थन में अपनी मान्यताओं, परम्पराओं, धारणाओं, रूढ़ियों, आग्रहों तथा अंधविश्वासों का त्याग कर सकने का साहस भी ज्ञान ही है। सत्य को यथावत स्वीकार कर लेने और उसको अपने व्यवहार में लाने वाले व्यक्ति ज्ञानी ही कहे जायेंगे फिर चाहे वे निरक्षर ही क्यों न हों।

सामाजिक चेतना से ओत प्रोत पुरुषार्थी व्यक्ति के जीवन में अभाव अथवा अशाँति की सम्भावना अधिक नहीं रहती। अशाँति, असंतोष एवं अभाव तो आलसी, स्वार्थी, असहयोगी तथा असामाजिक व्यक्ति का दया भाग है जो अपनी अज्ञानपूर्ण प्रवृत्तियों के कारण पायेगा और भोगेगा।

यदि आपके जीवन में अशाँति है, असंतोष है तो अपनी परीक्षा कीजिये, अपनी प्रवृत्तियों को परखिए और उन कारणों को खोज-खोज कर निकालते रहिये जो उसके आधार बने हुये हैं और तब देखिये कि आपकी जीवन धारा सुख एवं शाँति के सुन्दर कुलों के बीच बहती चलती है या नहीं?


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विषयों का सुख और आत्मा की शाँति—इन दोनों में से किसी एक को हमें चुनना है। अगर संसार में रहकर आत्मिक शाँति प्राप्त करनी है, अगर दिव्य जीवन तक पहुँचना है, अगर मृत्यु के इस संसार से मुक्त होना है—तो भौतिक जीवन के फलों को नहीं चखना चाहिए।

—एमर्सन


विशिष्ट एवं महत्वपूर्ण व्यक्ति इस तरह बनें

प्रत्येक मनुष्य जीवन में अवश्य कुछ ऐसा बनना चाहता है जिससे लोग उसे विशेष व्यक्ति समझें। वह समाज में कुछ ऊँचा, कुछ विशिष्ट होकर चमके। लोग उसकी ओर आकृष्ट हों, उसका सम्मान करें, उसे प्रतिष्ठा दें।

समाज में ऐसी विशिष्टता पाने के लिये वह प्रयत्न भी कुछ न कुछ करता ही है। शान-शौकत से रहना, ऊँची-ऊँची बातें करना, धन संचय करना, दान देना, संस्थायें चलाना, पद एवं नेतृत्व प्राप्त करना आदि सभी प्रयास मनुष्य, समाज में विशिष्टता प्राप्त करने के लिये ही किया करता है।

विशिष्ट व्यक्ति लोगों के आकर्षण का बिन्दु होता है। लोग उसकी प्रशंसा करते हैं, नमन करते हैं, मान देते और उससे अनेक प्रकार की आशायें बाँध लिया करते हैं। अपनी इस लोकप्रियता से उसके अहं को सन्तोष मिलता है, मन सुखी एवं प्रसन्न होता है। इसी अहं सुख के लोभ में अनेक व्यक्ति लोक लोलुप बनकर विविध प्रकार के आडम्बर रचने और लोगों को अपनी ओर आकर्षित करने का प्रयत्न किया करते हैं।

लोकेषणा निःसन्देह एक प्रचण्ड तृष्णा है जो मनुष्य को बहुधा मनुष्यता से गिराकर, ऐसे छल प्रपंच के काम करा डालती है जिनको कदाचित सामान्य स्थिति में विचार करने पर स्वयं करने वाला भी अच्छा नहीं बतलायेगा।

एक स्थिति के दो व्यक्ति समाज में आगे बढ़ने का प्रयत्न करते हैं। एक बढ़ने के लिये धन, लोक-प्रियता नाम, नेतृत्व आदि प्रदर्शन पूर्ण बातों को आधार बनाता है और दूसरों सेवा, सहानुभूति, सहायता सत्यता, त्याग और सादगी एवं सदाचार को उसका आधार बनाता है। दोनों अपने-अपने उद्देश्य पूर्ति में अपनी-अपनी तरह से लग जाते हैं। किन्तु जब देखा जाता है तब पता चलता है कि पहला व्यक्ति अपने उद्देश्य में असफल हो जाता है और दूसरा सफल। यद्यपि पहले ने धन, नाम, नेतृत्व आदि चीजों को प्रचुर मात्रा में इकट्ठी कर लिया और दूसरे के पास उतना भी नहीं रहा जितना कि उसके पास पहले था।

पर समाज में पहले व्यक्ति का धनाढ्य हो जाने और दूसरों से बहुत बढ़ जाने पर कोई आदर नहीं होता और दूसरे का पहले की अपेक्षा ज्यादा निर्धन हो जाने पर भी अधिक आदर सम्मान होता है। यह उल्टा परिणाम देखकर एक क्षण को आश्चर्य हो सकता है किन्तु वास्तव में इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है। यह यों ही होना चाहिये था। यदि इसके विपरीत होता तो अवश्य ही आश्चर्य का विषय होता।

विशिष्टता के इच्छुक उन दोनों व्यक्तियों में से एक ने सोचा कि यदि वह किसी प्रकार अधिक से अधिक धन कमा ले, ऊँची कोठी बना ले, कार रख ले, एक लम्बा चौड़ा कारोबार स्थापित कर ले और उसी धन की सहायता से लोगों को आभारी करके, दान देकर अथवा किसी अन्य प्रकार से विवश करके अपनी ओर आकृष्ट कर ले तो धन की बदौलत वह समाज में नेतृत्व प्राप्त कर लेगा, अपनी प्रतिष्ठा जमा लेगा और प्रभाववान बनकर एक विशिष्ट व्यक्ति बन जायेगा।

अपनी तरह से उसने किसी हद तक ठीक ही सोचा। क्योंकि समाज में ऐसे लोगों की भी तो कमी नहीं होती जो धन देकर आदर खरीदने वालों को औपचारिक आदर सम्मान देकर धन ले लिया करते हैं। अपना उल्लू सीधा करने के लिये धनवान को प्रतिष्ठा के दो फूल चढ़ा दिया करते हैं। वह समझते हैं कि यदि किसी को बड़ा कह देने में, मतलब के लिये सम्मान कर देने में, उनकी जेब से जाता भी क्या है। हमारे इस आडम्बर से उसके अहं को संतोष मिल जाता है और हमारा स्वार्थ सिद्ध हो जाता है। इस प्रकार के परस्पर सिद्ध-साधकों की समाज में कमी नहीं है। किन्तु इन दोनों में से किसी को सच्चा सन्तोष नहीं मिलता। समझने के लिये कोई भी, अपनी इस योजना पूर्ण प्रतिष्ठा को विशिष्टता समझ भले ले किन्तु यह होती दरअसल विशिष्टता का आडम्बर ही है जो हर भले आदमी के लिये उपहास स्पंद ही होता है।

दूसरा, सत्य, सेवा और परोपकार आदि गुणों को आधार बनाकर आगे बढ़ता है। वह सोचता है संसार में धन वैभव की अनस्थिर छाया हटते देर नहीं लगती। धन के लालच में मनुष्य बुरे से बुरे काम करने को तैयार हो जाता है। धन के अभिमान में वह मनुष्य को पूरी तरह मनुष्य समझने में कृपणता करता है। धनवान व्यक्ति धन के बल पर लोगों की विवशता दत्त प्रतिष्ठा एवं आदर प्राप्त करने का प्रयत्न किया करता है। धन के आधार पर हर काम करने और हर चीज पाने का दम रखने वाला गुणों की गरिमा भूल जाता है। वह दूसरों के गुणों का तो आदर ही नहीं करता है बल्कि अपने गुण भी खो देता है और अवगुणी बन जाता है। लोगों द्वारा स्वार्थवश दिये गये आदर को वे जीवन की उपलब्धि समझकर झूठा संतोष कर लिया करते हैं। धन के बल पर सब कुछ पाने वाले और कुछ क्यों न पा लें, किन्तु समाज के समझदार व्यक्तियों से सच्च आदर नहीं पा सकते। लाख लोगों द्वारा आदर सम्मान दिये जाने पर भी यदि उनकी विशिष्टता अथवा प्रतिष्ठा सज्जन व्यक्तियों द्वारा प्रमाणित नहीं की जाती तो वह झूठी है, छल है, आत्म प्रवंचना है। सज्जनों द्वारा दिये जाने वाला बड़प्पन का प्रमाणपत्र धन अथवा युक्तियों द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता। उसके लिये मनुष्य को गुणी बनकर समाज में प्रमाण देना व सिद्ध करना होगा कि उसके गुण सत्य हैं, स्वाभाविक हैं, असंदिग्ध एवं अहैतुक हैं। सज्जनों द्वारा दी हुई प्रतिष्ठा एवं विशिष्टता ही सच्ची है बाकी सब झूठ है और सज्जन गुणी को मान देते ही हैं फिर चाहे वह धनी हो अथवा निर्धन।

एक ने समाज में अपनी धारणा के अनुसार अर्थ लाभ का जाल फैलाया। खूब यत्नपूर्वक उसको छिपाया भी। ठगी, चोरी, मक्कारी, काला बाजारी, मुनाफा तथा घूसखोरी से मनमाना धन कमाया। कोठी बनाई, कार खरीदी, कारोबार फैलाया, दान दिया और लोगों की आदर भावना खरीदी। बड़ी दूर तक अपना रुबाव-दबाव फैला लिया। समाज में दूर से दीखने लगे, अनेक प्रकार से प्रतिष्ठित होने लगे और संतोष कर लिया कि वे एक विशिष्ट व्यक्ति बन गये। उन्होंने अपना लक्ष्य पा लिया और वे जीवन में सफल हो गये।

दूसरे ने अपनी धारणा के अनुसार सत्य का सम्मान किया। थोड़े में संतोष पाया, सादगी एवं सरलता को सुख समझा, अनुचित उपाय की अपेक्षा गरीबी का स्वागत किया। लोगों की सेवा की, यथासाध्य परोपकार किया। अपने सौजन्य एवं सज्जनता से लोगों की आँखों में नहीं हृदय में स्थान बनाया। कर्तव्यों का अधिक से अधिक पालन किया और अपने अधिकारों का दूसरों के हित में त्याग किया। वह धनवान न बन सका, न कोठी बन सकी, न कार रख सका और न लोगों को अपनी चाटुकारी करने के लिये विवश कर सका और न ध्वजा की तरह कलश पर दिखाई दे सका। तो भी उसने जो कुछ कमाया वह कुछ विशिष्ट था, ऐसा था जिसने उसे सच्चा सुख दिया, सच्ची शाँति दी।

इस प्रकार एक संग्रह के प्रयत्न में सम्पन्न बन गया और दूसरा विपन्न। किन्तु प्रतिष्ठा एवं विशिष्टता के सम्बन्ध में सम्पन्न, विपन्न और विपन्न सम्पन्न बन गया। इसका पता इस प्रकार चला कि लोग सम्पन्न को देखकर दूसरे से कहने लगे कि धन कितना भी कमा लिया हो और कितनी ही इज्जत क्यों न इकट्ठी कर ली हो किन्तु यह आदमी ठीक नहीं है। धन के लोभ में न तो इसे किसी पर दया आती है और न भ्रष्टाचार करते संकोच होता है। पाप से धन कमाया तो क्या कमाया, लूटकर कोठी खड़ी की तो क्या बड़ी बात कर ली, और पैसे के बल पर इज्जत खरीद ली तो क्या बड़ा आदमी हो गया? जनमत की इस प्रकार की अभिव्यक्ति हुई नहीं कि सारे धन वैभव की और मान सम्मान पर कालिख पुती नहीं, अपने कोई हठ से भले ही अपने को प्रतिष्ठित एवं विशिष्ट समझता रहे।

उपकारी को लोग देखते हैं। श्रद्धा एवं सहानुभूति से आँखें सजल हो जाती हैं। माथा आप से आप आदर से झुक जाता है। लोग आपस में कहते हैं—”क्या आदमी है किसी का दुःख देखा नहीं कि संवेदना-सहानुभूति का अमृत लेकर दौड़ा नहीं। अपना करने योग्य कोई काम करा लो तुरन्त करेगा और लेने के लिए एक कौड़ी नहीं लेगा। जिन्दगी भर से सादा रह रहा है, रूखा-सूखा खा रहा है। साधारण मकान में रह रहा है, सस्ता मोटा पहन रहा है लेकिन अवसर होने पर भी क्या मजाल कोई एक पैसा देने में सफल हो जाये। भ्रष्टाचार किसे कहते हैं यह जानता ही नहीं। क्या ईमानदारी है, कि इसे तो मनुष्य मानने की इच्छा ही नहीं होती। हर तरह से देवता ही है—देवता। संतोष इतना मानो त्रिलोक की सम्पदा इसी के पास हो। बिना किसी स्वार्थ के हर समय सेवा तथा सहायता के लिये प्रस्तुत। गरीब है लेकिन कोई अवसर आ जाने पर यथासाध्य हर त्याग करने को सदा तत्पर रहता है।”

ऐसे ही आदमी तो वास्तव में आदमी कहलाने योग्य होते हैं, वैसे होने को तो दुनिया आदमियों से भरी पड़ी है। लोकमत ने इस प्रकार की अभिव्यक्ति की नहीं कि गरीबी मणि–माणिक की तरह चमक उठी। प्रतिष्ठा एवं विशिष्टता मिल गई। जीवन सफल हुआ और लक्ष्य मिल गया।

यथार्थ में बात क्या है? बात वास्तव में यह है कि एक ने प्रतिष्ठा अथवा विशिष्टता पाने से पहले मनुष्य बनने की कोशिश की और दूसरे ने मनुष्य बनने से पूर्व और सब कुछ बनना चाहा। एक ने धन को सर्व शक्तिमान-कारक समझकर पूजा प्रतिष्ठा खरीदनी चाही और दूसरे ने अन्यों की सेवा करके, पूजा प्रतिष्ठा करके उसे अनायास ही पुरस्कार रूप में पा लिया।

हम जीवन में धनवान, बलवान, विद्यावान नेता, नायक, प्रशासक सब कुछ बन जाते हैं पर यदि ठीक-ठीक मनुष्य नहीं बन पाते तो हमारे जीवन पर यह सब भूषण असंगत दूषण जैसे ही लगेंगे। मनुष्यता के अभाव में शक्ति अथवा अधिकार सम्पन्नता दोष के रूप में ही अपनी अभिव्यक्ति करते हैं। दया, क्षमा, त्याग सेवा सहानुभूति आदि मानवीय गुणों रहित मनुष्य शक्ति पाकर बर्बर एवं अत्याचारी बन जाया करते हैं। इतिहास में मनुष्यता हीन न जाने ऐसे कितने शक्तिवान काले अक्षरों में लिखे हैं, जिनके नाम पर दुनिया आज तक थूकती आ रही है। उन्होंने बड़ी-बड़ी विजय प्राप्त कीं, लम्बे चौड़े साम्राज्य स्थापित किये, लाखों करोड़ों का नेतृत्व किया, न जाने कितनों से पूजा प्रतिष्ठा प्राप्त की, किन्तु तब भी वे अपने जीवन में पूरी तरह असफल ही रहे। जो मनुष्य होकर मनुष्य न बन सका, वह कुछ बन जाने पर भी असफल ही माना जायेगा।

सफलता-असफलता, पूजा एवं प्रतिष्ठा की सच्ची कसौटी यह है कि किसी को लोकमत किस भाव से याद करता है, किस दृष्टि से देखता है। तलवार अथवा शक्ति के बल पर लोगों का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट कर लेने पर आदर में मस्तक झुकवा लेने वाले हजारों विजयवानों की अपेक्षा वह निर्धन, सज्जन कहीं अधिक पूजित, प्रतिष्ठित एवं विशिष्ट है जिसकी याद आँसुओं से भीगकर आती हो और जिसे देखकर मनुष्यों की आत्मा अनायास ही आत्मीयता का अनुभव करने लगे और जिसके प्रति लोगों का अखण्ड विश्वास रहे कि यह हमारा सच्चा हितैषी है, हमारा कल्याण कामी है, फिर चाहे वह परिस्थितियों के कारण किसी का कुछ हित साधन भले ही न कर पाये। इस प्रकार के मानवता पूर्ण मनुष्य अकिंचन होने पर भी उन हजारों विजगीषुओं, धनवानों एवं बलवानों के बीच विशिष्ट ही माने जायेंगे। उन्हें अपने जीवन काल में तो सच्चा सम्मान मिलेगा ही मरने के बाद भी वे थोड़े से लोगों के द्वारा ही क्यों नहीं—आदर के साथ याद किये जायेंगे। मनुष्यों की आत्मा जिन्हें आकर बड़ा स्वीकार कर ले वही व्यक्ति इस धराधाम के विशिष्ट होते हैं और यह स्वीकृति एकमात्र मनुष्यता के गुणों से ही मिल सकती है, धन अथवा शक्ति आदि से नहीं।


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एक सदाचारी मनुष्य बिना जबान हिलाये सैकड़ों मनुष्यों का सुधार कर सकता है। पर जिसका आचरण ठीक नहीं है उसके लाखों उपदेशों का कुछ फल नहीं होता।

—मौलाना रुमी


मृत्यु हमारे जीवन का अनिवार्य अतिथि

संसार के सबसे बड़े आश्चर्य-सम्बन्धी प्रश्न का उत्तर देते हुये धर्मराज युधिष्ठिर ने कहा था—”संसार का सबसे बड़ा आश्चर्य यह है कि नित्य प्रति दूसरों को मरते देखकर भी मनुष्य अपनी मृत्यु में विश्वास करने को तैयार नहीं होता। वह समझता है कि और कोई भले ही मरे पर वह सदा सर्वदा धरती पर बना रहेगा।”

निःसन्देह यह एक बहुत बड़ा आश्चर्य है कि नित्य प्रति अनेकों को मृत्यु-मुख में जाते देखकर हम अपने सम्बन्ध में मृत्यु-मुख में जाते देखकर हम अपने सम्बन्ध में मृत्यु को अवश्यम्भावी मानने को तैयार नहीं होते। हर मनुष्य अपने पूर्व पुरुषों की एक लम्बी परम्परा में चला आ रहा है और यह जानता है कि उसके पूर्व पुरुष उसी की तरह इस पृथ्वी पर वर्तमान थे पर आज उनमें से कोई भी नहीं है। सब ही मृत्यु के मुख में समाकर इस धराधाम से नाता तोड़ गये। पूर्व पुरुषों की इतनी लम्बी शृंखला जब मिटती चली आई है तब हम में ही ऐसी कौन सी विशेषता है कि मृत्यु, पूर्व पुरुषों की तरह, एक दिन, हम को भी अपना मेहमान न बना लेगी। हर मनुष्य को एक दिन मृत्यु का मेहमान बनना ही होगा। परमात्मा का यह अटल नियम किसी के लिये भी अपवाद नहीं बन सकता।

सोचने की बात है कि यदि मनुष्य के लिये, परमात्मा ने मृत्यु का अनिवार्य प्रतिबन्ध न लगाया होता तो क्या आज तक पृथ्वी पर इतनी जनसंख्या न हो जाती कि इस धरती पर तिल रखने की भी जगह न रहती। तब कहाँ तो मनुष्य रहता, कहाँ खेती करता और कहाँ जीविका के अन्य साधन स्थापित करता? वह अनन्त तम जनसंख्या क्या खाती, क्या पीती और क्या पहनती? आज जब मृत्यु का अनिवार्य प्रतिबंध लगा हुआ है, हजारों लाखों मनुष्य नित्य संसार खाली करते जो रहे हैं तब तो जन संकुलता की वृद्धि ने मानव समाज के सामने भोजन, वस्त्र तथा निवास की समस्या विकट रूप में खड़ी कर दी है। यदि मृत्यु का प्रतिबन्ध न रहा तो इस संसार, इस मानव समाज की क्या दशा हो जाती इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती और यदि आज भी यह प्रतिबंध उठा लिया जाय तो कुछ ही समय में हम सब की क्या दुर्दशा हो जाये, क्या इसका अनुमान कोई कर सकता है?

जब मरने का भय हर समय सिर पर सवार रहता है, साथ ही किस समय मृत्यु आ सकती है इसका भी पता नहीं तब तो मनुष्य अपने लिये न जाने कितना संग्रह करता रहता। वह सब उसे किसी समय भी छोड़ देना पड़ सकता है। दिन रात चोरी, मक्कारी ठगी, छीना झपटी, शोषण आदि कुकृत्यों द्वारा दूसरों को, दिन-रात रिक्त करने में जुटा रहता है। यदि उसे अमरता का आश्वासन मिल जाये तो लिप्सालु मनुष्य कितना प्रचंड पिशाच बन जाये यह कह सकना कठिन है।

मृत्यु की अनिवार्यता की स्थिति में तो मदोन्मत्त व्यक्ति नित्य नये ध्वंस रचता एक दूसरे को खा जाने की कोशिश करता रहता है सदा जीवी होने पर उसकी उद्धतता न जाने क्या कर डालती! संसार में हर ओर हर समय केवल रक्तपात ही होता दिखाई देता। न कहीं कोई मनुष्य शाँतिपूर्वक सृजन करता दिखाई देता और न भजन करता।

यदि मृत्यु न होती तो पुराने स्थान छोड़ते नहीं और नये उन्हें पाना चाहते—इस स्थिति में हर समय नये पुराने का संग्राम छिड़ा रहता। पिता-पुत्र को और पुत्र अपने पुत्र को अपना स्थान अथवा उत्तराधिकार देने को तैयार न होता। लोग अपने अनन्त जीवन यापन की आवश्यक वस्तुओं में से एक कण तक अपने आश्रितों अथवा सन्तानों को देने में झिझकते। आत्म यापन की चिन्ता एवं आवश्यकता के दबाव में लोग कितने स्वार्थी एवं कितने संग्राहक और कितने कृपण हो जाते क्या, किसी प्रकार इसका अनुमान लगाया जा सकता है? चिरस्थायी जीवन पाकर मनुष्यों में एक दूसरे के प्रति त्याग, सहानुभूति, सौहार्द्रय, सहयोग, सहायता, स्नेह, सौजन्य एवं आत्मीयता का कोई भाव रहता ऐसी आशा नहीं की जा सकती।

संसार में जो नव लता एवं नवीनता के दर्शन होते हैं, जिस सरसता एवं सुन्दरता की अनुभूति होती है वह सब पूर्वापूर्व के गमनागमन की प्रक्रिया के कारण ही दिखाई देती है। यदि इस पावन प्रक्रिया का प्रभाव न रहा होता तो पट परिवर्तन के अभाव में विश्व रंगमंच पर चलने वाला यह जीवन-नाटक एकरसता, एकरूपता एवं एक दृश्यता के कारण कितना नीरस, कितना अरुचिकर, कितना अप्रिय, कितना बोझिल और कितना असह्य हो जाता—इसका उत्तर, मनुष्य अपनी नव-रुचि एवं परिवर्तन-प्रिय वृत्ति से पूछ सकता है।

जीवन के किंचित समय में ही मनुष्य न जाने कितनी बार, कितनी तरह की अतिव्याधी ईति, भीति दुःख, दारिद्रय एवं शोक संतापों का शिकार बनता रहता है और कष्ट क्लेशों से घबराकर मृत्यु माँगने लगता है—यदि उसे समापन शून्य निर्विराम जीवन मिल जाये तब उसकी यातनायें कितनी दीर्घ जीवनी हो सकती हैं क्या मृत्यु से द्वेष मानने वाले मनुष्य कभी इस पर विचार करते हैं? संसार में हर मनुष्य अपनी बारी में जो कुछ सुख-शान्ति, साधन-सुविधा अथवा रसानुभूति पा रहे हैं, अथवा जो अपनी बारी में पा चुके हैं और जो आगे पायेंगे वह सब मृत्यु के अनिवार्य प्रतिबंध के कारण ही सम्भव हुआ है और होगा। यदि यह प्रतिबन्ध न रहा होता या आज उठ जाये तो हमारा यह संसार रौरव नरक से भी भयानक, बन जाये—इसमें किसी प्रकार का संदेह नहीं है। मृत्यु मनुष्य के लिये एक मैत्रीपूर्ण वरदान है। इसे परमात्मा की असीम अनुकम्पा समझकर उसे बार-बार धन्यवाद देकर कृतज्ञता प्रकट करनी चाहिए।

मृत्यु से भयभीत होने वाले लोगों में अधिकतर वे ही लोग होते हैं जो जीवन को उस प्रकार नहीं जीते जिस प्रकार एक मनुष्य को जीना चाहिये। अकरणीय एवं दण्डनीय कर्मों की गठरी तैयार कर लेने वाला स्वभावतः भयभीत होगा ही। क्योंकि वह अच्छी तरह जानता है कि उसने ऐसे-ऐसे कार्य किये हैं जो माफ नहीं किये जा सकते और इसके लिये उसे परलोक में सजा पानी है। जीवन रहने तक वे उस यातना से बचे रह सकते हैं—इसी लिये मृत्यु की कल्पना तक से काँप उठते हैं।

यद्यपि कुकर्मों का कुफल मनुष्य को विविध प्रकार के रोग, शोक और अयश अपवाद के रूप में जीवन काल में भी भोगना पड़ता है और कभी-कभी कानून के शिकंजे में फँसकर भी दण्ड भोगना पड़ता है, किन्तु मनुष्य के कुकृत्यों का भोग यहाँ ही पूरा नहीं हो जाता। उन सबको पूरी तरह से परलोक में ही भरना पड़ता है। बहुत से कुकृत्य इस प्रकार के होते हैं जो मनुष्य अपनी चतुराई से समाज अथवा कानून से छिपाये रहता है और बहुतों के दण्ड से परिस्थिति अथवा संयोगवश बच जाया करता है। किन्तु जीवन के पश्चात् परलोक में क्या प्रत्यक्ष और क्या अप्रत्यक्ष दोनों प्रकार के कर्मों का पूरा लेखा जोखा चुका लिया जाता है।

जिसने इस प्रकार का कुप्रबंध कर रखा है उसे तो मृत्यु से डर लगेगा ही। पर उसे मृत्यु से भला डर क्यों लगने लगा जिसने मन, वचन, कर्म से अपने जीवन को यथासाध्य ईमानदारी से पवित्र एवं निष्कलंक रखने का पूरा-पूरा प्रयत्न किया है। और यदि संयोग, प्रारब्ध, परवशता अथवा परिस्थितिवश जाने—अनजाने कोई अकृत्य कर भी गया है, तो उसके लिये उसके हृदय में खेद, पश्चाताप तथा आत्मग्लानि हुई है और आगे के लिये और भी सावधान हो गया है। ऐसे सावधान सुकृती को मृत्यु से कभी भय नहीं लगता। क्योंकि वह जानता है कि उसने ऐसा कोई काम नहीं किया जिसके लिये उसे परलोक में दण्ड पाना होगा।

मृत्यु से भयभीत होने वालों में कुछ ऐसे लोग भी होते हैं जो जीवन की लंबी अवधि को आलस्य, विलास अथवा प्रमाद में गँवा देते हैं—यहाँ तक कि अपने सामान्य कर्तव्यों तथा आवश्यक उत्तरदायित्व को भी ठीक से नहीं निभाते। जब ऐसे लोगों को मृत्यु की याद आती है तब वे शोक करते हुये सोचने लगते हैं कि मैंने अति दुर्लभ मानव जीवन को यों ही व्यर्थ में गँवा दिया है। यदि इसका ठीक ठीक मूल्याँकन किया होता तो न जाने कितना क्या कर सकता था। अब मृत्यु का झोंका आकर मुझे ले जायेगा और हाथ मलते हुए इस संसार से जाना होगा। इस प्रकार के आलसी एवं असावधान व्यक्ति पश्चाताप की आग में जलते हुये अमृत्यु मनाया करते हैं और चाहते हैं कि यदि उनको दीर्घ जीवन की गारन्टी मिल जाये तो वे अब भी कुछ कर डालें। किन्तु खेद है कि उनको इस प्रकार की कोई गारन्टी नहीं मिल सकती। पर इससे भी ज्यादा खेद एवं आश्चर्य की बात यह होती है कि वे पश्चाताप में जलते हुये मृत्यु-चिन्ता से भयभीत तो होते रहते हैं किन्तु शेष जीवन को पूरी तरह से करणीय कार्यों में नहीं डुबा देते, जिससे जो कुछ थोड़ा बहुत-लोक परलोक बन सके, वही सही। यदि आज भी वे जितनी चिन्ता मृत्यु की और जितनी कामना अधिक जीवन की किया करते हैं, यदि उतनी चिन्ता अपने कर्तव्यों के लिये करें और पूरक गति से काम में जुट जावें तो सम्भव है उनकी तन्मयता एवं तीव्रता विगत जीवन की क्षतिपूर्ति कर दे। किन्तु दुर्भाग्य है कि दिन-दिन आलस्य, विलास एवं प्रमाद का अभ्यासी मृत्यु की चिन्ता करने के अतिरिक्त कुछ करना नहीं चाहता।

धोखे से आना तो दूर यदि कहकर भी आये तब भी मृत्यु उन कर्मवीरों को भयभीत नहीं कर सकती जिनका अणु-क्षण अपने पावन कर्तव्यों में आत्मविभोर होकर निमग्न रहता है। उन्हें जब अपने काम के सम्मुख दीन-दुनिया की खबर ही नहीं रहती तब भला मृत्यु जैसे निरर्थक विषय पर विचार करने के लिये न तो उनके पास फालतू समय ही होता है और न मस्तिष्क ही। कर्तव्यवान व्यक्ति दिन−रात जिन्दगी के मुखर मार्गों में ही विचरण किया करता है मृत्यु की सुनसान दरीचियों की ओर उसका ध्यान ही नहीं जाता। अकर्मण्यता, निष्क्रियता एवं अकर्तव्य शीलता मृत्यु की सबसे बड़ी स्मारिकायें हैं। इनको समीप न आने देने वाला कर्मवीर मृत्यु से डरना तो दूर उसकी याद तक नहीं करता।

धर्मवीर तो मृत्यु के नाम से पुलकित हो उठता है। जिसने सत्कर्मों द्वारा सुकृत की पूँजी जमा कर रक्खी है, धर्म धन का सम्बल संचय कर लिया है उसके लिये मृत्यु तो परलोक का निमंत्रण होता है जहाँ उसके सत्कर्मों के पुरस्कार प्रतीक्षा किया करते हैं। जिसने अपने जीवन में परमार्थ पुण्य का पथ प्रशस्त किया है, अध्यात्म का चिन्तन एवं परमात्मा का स्मरण किया है उसकी आत्मा तो स्वयं ही शरीर बंधन से मुक्त होने के लिये व्यग्र रहती है। वह सोचती है कि कब उसकी शरीर यात्रा समाप्त हो और कब वह पिंजड़े से छूटे पक्षी की तरह मोक्ष की ओर उड़ान भरे।

अडिग, अनिवार्य एवं आवश्यक सत्य मृत्यु से डरना क्या। बल्कि उसकी कल्पना से तो मनुष्य को अधिकाधिक सक्रिय होकर अपने लोक-परलोक को बनाने के लिये तीव्रता से तत्पर हो जाना चाहिये। उसे अपने सुकृत कार्यों को यह सोचकर बढ़ा देना चाहिये कि न जाने अतिथि, अनाहूत एवं अपूर्वज्ञात मृत्यु कि किस समय आ जाये। उसके आने से पूर्व वह सब कुछ कर ही डालना चाहिये जो कि करना है और हमारे करने योग्य है।


Quotation

जीवन और मृत्यु-

यह जीवन समुद्र यात्रा की भाँति है जिसमें हम सभी एक ही संकुचित नौका में परस्पर मिलते हैं। मृत्यु, तट पर पहुँचने के समान है जहाँ हम सभी अपने-अपने लोक को चले जाते हैं।

मृत्यु जो कि शाश्वत सत्य है, क्रान्ति है और जन्म तथा जीवन धीरे-धीरे और स्थिर रूप से होने वाला विकास है। मनुष्य की उन्नति के लिए स्वयं जीवन जितना आवश्यक है, उतनी ही आवश्यक क्रान्ति है।

—रवीन्द्र


आत्मोन्नति के लिए परिपुष्ट शरीर की आवश्यकता

स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ आत्मा का निवास होता है यह कथन अक्षरशः सत्य है। जिसका शरीर स्वस्थ होगा उसकी आत्मा भी स्वस्थ एवं समुन्नत होगी। स्वस्थ आत्मा के लिए शरीर का स्वस्थ होना आवश्यक है।

स्वस्थ आत्मा के लक्षण हैं साहस, शौर्य, वीरता, धीरता, स्थिरता, शान्ति, सन्तोष, प्रसन्नता, प्रफुल्लता एवं असंकीर्णता आदि दैवी सात्त्विकी अथवा आध्यात्मिक गुणों का बाहुल्य। जिन व्यक्तियों में इन गुणों की अभिव्यक्ति पाई जायेगी, उनकी आत्मा को स्वस्थ ही कहना होगा। इसके विपरीत जो कायर है, अधैर्यवान्, भीरु, दीन-हीन एवं मलीन है वह स्वस्थ आत्मा वाला नहीं माना जा सकता। आत्मा को स्वस्थ बनाने अथवा स्वस्थ आत्मा पाने के लिये जिन गुणों की आवश्यकता है उनमें प्रथम स्थान स्वस्थ शरीर का ही है। शरीर के पूर्ण रूप से स्वस्थ होने से बाहर भीतर चारों और सामर्थ्य ही सामर्थ्य दृष्टिगोचर हुआ करती है।

संसार के प्रत्येक क्षेत्र में स्वस्थ शरीर की अनिवार्य आवश्यकता है। उपार्जन से लेकर भोजन तक और संघर्ष से लेकर मनोरञ्जन तक ऐसा कोई भी क्षेत्र नहीं है जिसमें अस्वस्थ शरीर व्यक्ति सफलता एवं सार्थकता पूर्वक बरत सकें। किसान से लेकर क्लर्क तक और उद्योगपति से लेकर श्रमिक तक-यदि वह शरीर से स्वस्थ एवं समर्थ नहीं होगा तो अपना उपार्जन क्रम नहीं चला सकता। यदि रो-झींक कर चलाता भी है तो उसका काम सुन्दर एवं सन्तोषजनक नहीं हो सकता। अस्वस्थ-शरीर व्यक्ति अधिक दिनों तक उपार्जन के क्षेत्र में नहीं डट सकता। शीघ्र ही वह या तो रोगी होकर चारपाई पकड़ लेगा अथवा पूर्ण रूप से क्षीण होकर क्षय हो जाएगा। बहुत से अस्वस्थ व्यक्ति खाते कमाते देखे जाते हैं। किन्तु उनके खाने कमाने में कोई रस अथवा कोई आनन्द नहीं होता। वे मुर्दों की तरह कमाते और उन्हीं की तरह ही जीते हैं।

यह भी सम्भव हो सकता है कि ऐसे अनेक अस्वस्थ व्यक्ति हों जिनके काम करने वाले नौकर चाकर हों, पुत्र व पौत्र हों और उनको उपार्जन के लिए किसी प्रकार की चिन्ता न करनी पड़ती हो, तब भी ऐसे परावलम्बी व्यक्ति जीवन का कोई सुख नहीं पा सकते। परावलम्बी, पराश्रित अथवा परमुखापेक्षी व्यक्ति की आत्मा दीनहीन तथा मलीन होकर मर तक जाती है। सन्तान वाला होकर भी अनाथ और धनवान होकर भी भिखारी जैसा बना रहता है। पर-निर्भर, सो भी शारीरिक निर्भरता वाला व्यक्ति ऊपर से कितना ही अभिमान, मान, गुमान अथवा स्वाभिमान क्यों न दिखलाये किन्तु वह सब उसका आडम्बर मात्र ही होता है। उसका मन, उसकी आत्मा अन्दर ही अन्दर रोया, सिसका करती है।

जीवन का आधार कहा जाने वाला भोजन अस्वस्थ शरीर व्यक्ति के लिए विष होता है। वह जो कुछ खाता है अजीर्ण बन जाता है, यों ही पेट के बाहर निकल जाता है अथवा अन्दर ही अन्दर रुककर सड़ा करता और कष्ट बढ़ाया करता है। बहुत कुछ खाने-पीने को होने पर भी जब असमर्थ शरीर व्यक्ति दो ग्रास रुचिकर भोजन करने के लिये तरसता है तब उसके आत्मा की क्या दशा होती है इसे तो भुक्त -भोगी ही जान सकते हैं।

अन्य सुख तो दूर की चीज है। असमर्थ व्यक्ति निद्रा सुख से भी वञ्चित रहता है। अस्वस्थ व्यक्ति को- अनेक चिन्तायें, पीड़ायें, तथा वेदनायें घेरे रहती हैं। इस कारण उसे रात में नींद नहीं आती। जब सारा संसार मौज से मीठी तथा गहरी नींद सोता है और असमर्थ व्यक्ति अनिद्रा का आखेट बना तारे गिनता रहता है तब उसकी आत्मा पर क्या बीतती है यह भी कोई भुक्त-भोगी ही जान सकता है। भोजन, नींद, श्रम एवं स्वावलंबन के सुख से वञ्चित असमर्थ शरीर वाला व्यक्ति आध्यात्मिक क्षेत्र में कौन से तारे तोड़ सकता है, कितनी उन्नति कर सकता है, कितना आगे बढ़ सकता है—इसका उत्तर केवल नकारात्मक ही हो सकता है।

आत्मोन्नति के इच्छुक अध्यात्मवादियों की सबसे प्रमुख एवं प्रथम साधना यह है कि वे अपने शरीर को पूर्ण रूप से स्वस्थ एवं पुष्ट बनायें। जो असमर्थ व्यक्ति साधारण तम दैनिक श्रम नहीं कर सकता—अपने जीवन संकट को ठीक से नहीं खींच सकता वह साधन समर में आवश्यक संयमों का निर्वाह कर सकेगा—काम, क्रोध, मोह, लोभ, ईर्ष्या, डाह आदि शत्रुओं से डटकर मुकाबला कर सकेगा ऐसी कल्पना भी नहीं की जा सकती। साधन समर के लिये स्वस्थ एवं पुष्ट शरीर की अनिवार्य आवश्यकता है जिसे पूरा किये बिना कोई भी व्यक्ति अध्यात्म पथ पर एक कदम भी नहीं बढ़ सकता। “स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ आत्मा रहती है” यह तथ्य किसी भी आध्यात्मिक जिज्ञासु को नहीं भूलना चाहिए।

निर्बल शरीर व्यक्ति बहुधा चरित्रहीन भी हुआ करते हैं। उनकी शारीरिक निर्बलता ही इस बात का विज्ञापन है कि यह व्यक्ति पूरी तरह सदाचारी नहीं है। बहुत बार लोग किसी रोग का शिकार होकर क्षीणकाय हो जाते हैं। किन्तु वह रोग भी उनको किसी अनियमित आहार-विहार के दण्ड स्वरूप ही मिलता होता है। आहार-विहार तथा आचार-विचार का असंयम स्वयं में ही एक असदाचार है एवं चरित्र-हीनता है। हीन-चरित्र अथवा आचरण रहित व्यक्ति यदि उस आध्यात्मिक दिशा में बढ़ना चाहता है, जिसमें अखण्ड आत्मबल एवं सदाचरण की आवश्यकता है तो वह दिन में स्वप्न देखता है, इस प्रकार के तेजस्वी चरित्र को क्षीण अथवा दीनहीन शारीरिक अवस्था वाला नहीं पा सकता।

आवेग, आवेश, आक्रोश एवं आतुरता आध्यात्मिक पथ पर लगने वाले बड़े क्रूर डाकू हैं। यह डाकू, कठिनता से कमाई हुई मानसिक शान्ति अथवा स्थिरता को क्षण भर में ही लूटकर साधक को निर्धन एवं निर्बल बना देते हैं। यह दस्यु किस समय किस पर आक्रमण कर सकते हैं इसका कोई ठिकाना नहीं। विश्वामित्र, ययाति, पाराशर तथा दुर्वासा आदि महान आध्यात्मिक साधक जब इनके शिकार बन सकते हैं तब साधारण-जन जो तिल-तिल कर उस पथ पर बढ़ पाते हैं इन क्रूर एवं असामयिक पथ-पिंडारियों से सुरक्षित रह सकते हैं, ऐसी आशा आत्मप्रवंचना ही मानी जायेगी।

असमर्थ एवं अस्वस्थ शरीर व्यक्ति स्वभाव से ही आवेश प्रधान होते हैं। निर्बल का क्रोधी होना चिर प्रसिद्ध है। जरा-सी बात पर उत्तेजित हो उठना, तनिक-सी प्रतिकूलता देखकर आवेश में आ जाना, अणुमात्र अप्रियता से क्रोधग्रस्त हो जाना और बिन्दु भर विषमता से बड़ी सीमा तक चिन्तित हो उठना निर्बल व्यक्तियों का विशेष अवगुण होता है। असमर्थ शरीर आलस्य, प्रमाद तथा काम विकार का स्थायी निवास होता है। अस्वास्थ्य के कारण भली प्रकार न पचने वाले भोजन का रस-रक्त कामुक प्रवृत्ति को उत्तेजित करने वाला ही होता है। इतने अधिक और विषैले कृमि कीटों के लगे रहने पर किसी की आध्यात्मिक कृषि फलीभूत हो सकती है ऐसा विश्वास किसी प्रकार भी नहीं किया जा सकता। आध्यात्मिक उन्नति करने के लिये जिस निर्मलता, निर्विकारता एवं निर्मयता की आवश्यकता है वह शरीर को संबल, स्वस्थ एवं समर्थ बनाकर ही पायी जा सकती है। दीन-हीन, क्षीण तथा निर्बल शरीरावस्था में नहीं।

“अभय” आध्यात्मिक उन्नति का महत्वपूर्ण आधार है। अथवा यों भी कहा जा सकता है कि ‘अभय स्थिति’ प्राप्त करना ही आध्यात्मिक साधना का लक्ष्य है। जिसे शत्रु-भय, अस्वास्थ्य भय, मृत्यु भय, अयश भय, हानि भय, विछोह भय आदि सताते रहते हैं वह एक प्रकार से जीते जी नरक में पड़ा रहता है। भय, चिन्ताओं को जन्म देने वाला विष बीज है। जिसके हृदय में चिन्ता की ज्वाला जल रही है जिसकी बुद्धि विविध प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष भयों से भ्रमित हो रही है, वह आध्यात्मिक पथ पर एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकता। इन्हीं भवभयों पर विजय पाना ही आध्यात्मिक साधना का लक्ष्य है। भयों से मुक्त हो जाने पर मनुष्य की आत्मा एक अनिवर्चनीय सुख शाँति की अनुभूति पाती है—एक ऐसी निःशंक सुख शाँति की अनुभूति जो ब्रह्मानन्द के समकक्ष ही होती है।

अभय का अभ्यास समर्थ शरीर द्वारा ही सम्भव है। शरीर में शक्ति एवं ओज-तेज रहने से मनुष्य का मनोबल भी बढ़ता है। उसे विश्वास रहता है कि वह किसी भी समय परिश्रम पुरुषार्थ एवं सहन शक्ति के बल पर किसी भी प्रतिकूलता का मुकाबला सफलतापूर्वक सकर सकता है। किसी दुष्ट के आ जाने पर उससे निपट सकता है। शत्रु के आने पर टक्कर ले सकता है, संकट के आने पर स्थिर रह सकता है और आपत्ति में फँस जाने पर अपना संतुलन बनाए रह सकता है। उसे कभी भी यह शंका नहीं रहती कि संसार की कोई भी विषम परिस्थिति उसको विचलित कर उसका बाल भी बाँका कर सकती है। सच्चा सामर्थ्य भरे पूरे शरीर वाले की हिम्मत, हौसला तथा साहस बहुत बढ़ा चढ़ा देता है। शारीरिक सामर्थ्य के अभाव में मनोबल तथा आत्मविश्वास की सम्भावना दूर की बात है। असमर्थ व्यक्ति जीवन में पल-पल पर त्रस्त, व्यग्र आतुर तथा शंकाकुल ही रहा करते हैं और यदि कभी वे किसी कारणवश कोई साहस भी कर बैठते हैं तो बहुधा उन्हें पराजय, अपमान, तिरस्कार अथवा असफलता का सामना करना पड़ता है जिससे उनकी आत्मा पर अन्धकारपूर्ण प्रतिक्रिया ही होती है। ऐसी स्थिति में आत्मा की उन्नति तो दूर उल्टा पतन ही होता है।

आध्यात्मिक उन्नति के लिए जिन साधनाओं एवं साधनों की आवश्यकता है उनमें शरीर रूपी साधन को सक्षम, समर्थ एवं सुयोग्य बनाने के लिए स्वास्थ्य-साधना की प्रमुख एवं प्रथम आवश्यकता है। शरीर को स्वस्थ, सबल एवं सक्षम बनाने सात्विक आहार, इन्द्रिय संयम मानसिक संतुलन, व्यवस्थित दिनचर्या के अतिरिक्त उचित मात्रा में शारीरिक श्रम करना भी है। इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए व्यायाम आवश्यक है। श्रम करने को तो यों सभी लोग कुछ न कुछ शारीरिक श्रम करते रहते हैं। किसान तथा मजदूर तो केवल शारीरिक श्रम के आधार पर ही अपनी जीविका कमाते हैं। एकमात्र शारीरिक श्रम को ही, स्वास्थ्य का आधार मान लेना गलत है। किसी रूप में केवल शारीरिक श्रम करते रहने से ही व्यायाम की पूर्ति नहीं हो सकती । कार्य श्रम तथा व्यायामिक श्रम में जो भेद है वह यह है कि साधारण क्रियाशीलता के श्रम में स्वास्थ्य सम्वर्धन की भावना नहीं रहती जबकि व्यायामिक श्रम में एक इसी भावना का समावेश रहता है। स्वास्थ्य सम्वर्धन की भावना से रहित श्रम से वाँछित स्वास्थ्य की उपलब्धि नहीं हो सकती। व्यायाम केवल शारीरिक श्रम नहीं—वरन् शारीरिक श्रम तथा मानसिक भावना के सम्मिश्रण का नाम है। शरीर तथा मन दोनों के संमिश्रण पर जो नियमित एवं विधिपूर्वक श्रम किया जाता है उसे ही व्यायाम की संज्ञा दी जाती है और वही परिश्रम मनुष्य को स्फूर्ति, प्रेरणा, शक्ति, सामर्थ्य, साहस, उत्साह, प्रसन्नता, मनोबल तथा आत्मविश्वास प्रदान कर सकता है जिसके आधार पर अध्यात्म मार्ग के सहायक गुण ‘अभय’ एवं उल्लास को प्राप्त किया जा सकता है।

अनेक लोग बढ़िया, पौष्टिक भोजन की प्रचुरता को स्वास्थ्य एवं शारीरिक बल का आधार मानते हैं। ऐसा विश्वास रखने वाले भी इस दिशा में अन्धेरे में ही भटकते कहे जायेंगे। दूध, धी, मक्खन, मलाई, मेवा और फूलों को अधिक से अधिक खाते रहने से ही कोई स्वस्थ एवं सबल नहीं हो सकता। स्वास्थ्य के लिये महत्वपूर्ण यह नहीं है के हम क्या और कितना खाते हैं? स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण यह है कि हम क्या खाते और कितना पचाते हैं? यह बात सही है कि गरिष्ठ, असात्विक तथा अवाँछनीय भोजन अस्वास्थ्यकर होता है किन्तु वह सात्विक भोजन भी तामसी अवगुण में बदल जाता है जो पूरी तरह से पचाया नहीं जाता।

भोजन को पूरी तरह पचाने और उसका शक्ति तत्व आत्मसात् करने के लिये व्यायाम के रूप में शारीरिक श्रम करना बहुत आवश्यक है। व्यायाम के अभाव में बढ़िया, पौष्टिक एवं स्वास्थ्य दायक भोजन भी अपच बनकर शरीर को हानि पहुँचाएगा, जबकि व्यायाम श्रम द्वारा पूरी तरह पचाया हुआ सस्ता तथा ज्वार जैसा साधारण अन्न तक उन सब आवश्यकताओं की पूर्ति कर देगा, शारीरिक स्वास्थ्य एवं सामर्थ्य के लिए जिनकी अपेक्षा है।

इससे उसकी शारीरिक शक्ति बढ़ेगी, भोजन तथा आत्म-विश्वास की उपलब्धि होगी आध्यात्मिक मार्ग के संयमों, नियमों तथा कठिनाइयों की सहन करने की क्षमता प्राप्त होगी, अभय की सिद्धि होगी जो कि भवभय से मुक्त करने में सहायक होगी।


परिवार को कुसंस्कारी न बनने दिया जाय।

अनेक लोगों का कहना है कि आज पारिवारिक जीवन में फैली फूट, बिखराव तथा गृहकलह का कारण आर्थिक अभाव है। घर-घर लोगों की आवश्यकताएँ बढ़ती चली जाती हैं किन्तु आमदनी बढ़ने का मार्ग दिखलाई नहीं देता। हर व्यक्ति अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये परेशान हो रहा है, इच्छाओं की आपूर्ति लोगों में क्रोध, असहिष्णुता तथा चिड़चिड़ापन बढ़ा रही है। असंतोष से प्रेरित लोगों का पारस्परिक प्रेम कम हो गया है। इसी लिए घर-घर में फूट तथा लड़ाई झगड़ा दिखाई देता है। यदि लोगों की आर्थिक कठिनाइयाँ दूर हो जायें, उनकी आवश्यकताओं एवं इच्छाओं की प्रकाम पूर्ति होती रहे तो मनों में माधुर्य तथा स्वभाव में सरलता बनी रहे। फिर उनमें न तो आपस में लड़ाई-झगड़ा हो, न टूट फूट और न किसी प्रकार का गृह कलह ही दिखाई दे। सब समान रूप से शान्त, सन्तुष्ट तथा सुखी जीवन बिताते हुए मिलजुल कर रहें।

लोगों की यह धारणा पूरी तरह सही नहीं है। आर्थिक कठिनाइयों में कुछ असन्तोष होता अवश्य है, किन्तु इस सीमा तक नहीं जिस सीमा तक घर-घर में दिखाई दे रहा है। यदि आर्थिक सम्पन्नता ही पारिवारिक सुख-शान्ति एवं सौहार्द्र का कारण रही होती तो सम्पन्न परिवारों में गृह-कलह एवं बिखराव दिखाई नहीं देता। संसार में जहाँ गरीब परिवार पड़े हैं वहाँ एक से एक बढ़कर सर्वसम्पन्न परिवार भी मौजूद हैं। गार्हस्थिक सुख-शान्ति यदि आर्थिक सम्पन्नता पर ही निर्भर होती तो हर धनवान परिवार को सुखी, सन्तुष्ट तथा संगठित रहना ही चाहिए। किन्तु वास्तविक इसके विपरीत है।

एकबार गरीब परिवारों में तो शान्ति एवं संगठन देखा जा सकता है किन्तु अमीर परिवारों में आयें दिन झगड़े और बटवारे होते रहते हैं। लड़के सयाने होते ही अपना हिस्सा अलग माँगते हैं। भाई-भाई से बटवारा करने के लिए न्यायालय की ओर दौड़ रहा है। कार रोजगारों के खण्ड होते, घरों में हिस्सें होते और सयाने सदस्यों को अलग बसते आये दिन देखा जा सकता है। गृह-कलह का जितना बड़ा कारण निर्धनता नहीं है उससे हजार लाख गुना बड़ा कारण सम्पन्नता है। धन के कारण-घरों में न केवल कही−सुनी ही होती रहती है बल्कि खून खराबी तक की नौबत आ जाती है। बड़े घरों की महिलायें गहने-कपड़ों की कमी ज्यादती को लेकर जूझा करती हैं और पुरुष आय व्यय को लेकर द्वन्द्व मचाये रहते हैं। ऊपर से लक-दक और मुस्कान से मीठी दिखाई देने वाली अमीर लोगों की जिन्दगी अन्दर से प्रायः कटु एवं क्लेश पूर्ण ही होती है। कदाचित ही कोई ऐसा भाग्यवान गृहपति हो जो धनवान हो और भाई बन्दों, पुत्र-पुत्रियों के बीच सुख-शान्ति की जिन्दगी बिता रहा हो। गृह कलह का कारण निर्धनता और सुख-शान्ति का आधार धन को मानने वाले भारी भ्रम में हैं, उन्हें अपनी धारणा में सुधार कर ही लेना चाहिये।

गृह-कलह का सारभूत कारण न तो निर्धनता है और न तो धनता। इसका आधारभूत कारण है परिवारों का असंस्कृत होना। जिस परिवार के सदस्य सुशील, सुसंस्कृत, सभ्य एवं उदात्त स्वभाव के होंगे उस परिवार में गृह-कलह कदाचित ही हो फिर चाहें वे निर्धन हों अथवा धनवान! परिवारों से गृह-कलह को अमोल नष्ट करने और उनमें संगठन,सुदृढ़ता,सुख और शान्ति बनाये रखने के लिये उनको सुसंस्कृत बनाना होगा।

संस्कार के अभाव में सुशिक्षित होने पर भी परिवारों के सयाने लड़के दुर्व्यसनी एवं दुर्गुणी बन जाते हैं। वे चारित्रिक महत्व और उसकी परिभाषा न जानने से उच्छृंखल, निरंकुश तथा अनुशासनहीन हो जाते हैं। घरों के बड़े-बूढ़े अधिकार एवं कर्तव्य में संतुलन न रख सकने के कारण क्लेश के कारण बन जाते हैं। स्त्रियाँ घर की सुख समृद्धि में शान्ति, सन्तोष, स्नेह सौहार्द्र एवं हँसी-खुशी के योगदान की महत्ता न जानने से गाल फुलाये, मुँह लटकाये, रूठी ऐंठी और चख-चख करती हुई वातावरण को असहनीय बनाये रहती हैं। संस्कारों के अभाव में उनका स्वभाव असहनशील एवं व्यंगचारी बन जाता है। घर की बड़ी बुढ़िया अधिकार लिप्सा से पीड़ित परिजनों का उठना बैठना तक दूभर कर देती हैं। इन सब विकारों, विकृतियों एवं त्रुटियों का कारण क्या है? परिवारों का असंस्कृत होना।

यदि परिवारों के सदस्य सुसंस्कृत हों तो वे अपने अधिकारों की सीमा और कर्तव्यों की प्रसार परिधि को पूरी तरह से समझ सकते हैं। फलस्वरूप उनमें संतुलन बनाए रखकर घर में गृह कलह होने का अवसर ही न आने दें। स्वार्थों के टकराने, कर्तव्य एवं अधिकारों में असंतुलन आने और हृदयों से त्याग भावना का तिरोधान हो जाने पर ही गृह-कलह का जन्म होता है। यदि प्रयत्नपूर्वक इन न्यूनताओं को दूर कर दिया जाये तो आज के जलते नरक कुण्ड के समान कलह-कुपित घर सुख-शान्ति के स्वर्ग बन जायें और तब परिवारों के उस मंगलमय वातावरण में क्या लौकिक और क्या पारलौकिक ऐसी कौन-सी समृद्धि हो सकती है, जो उपलब्ध नहीं की जा सकती।

परिवार को सुसंस्कृत बनाने का अर्थ है, उसके सदस्यों के गुण, कर्म, स्वभाव में सुन्दर विकास करना। दूसरों को दुःखदायी उनकी क्रियाओं, कुमार्ग पर ले जाने वाले उनके दुर्गुणों और क्रोध, द्वेष, दुर्भाव, ईर्ष्या, स्वार्थ, अनुदारता, असहिष्णुता आदि दोषों का परिमार्जन कर उनके स्थान पर सदाचार, सुशीलता प्रेम, परस्परता, उदारता, मधुरता और प्रसन्नता के बीजारोपण करना ही उनका संस्कार करना है। परिजनों में सुशील संस्कार विकसित करने का दायित्व गृहपति को ही अपने ऊपर लेना चाहिये। क्योंकि परिवार का मुख्य सदस्य एवं संचालक होने से उसका प्रभाव सबसे अधिक होता है। प्रायः गृहपति की बात कदाचित ही कोई सदस्य नीचे डालेगा। हाँ ऐसी परिस्थिति तब आ सकती है जब गृहपति स्वयं ही सुसंस्कृत न हो, स्वयं ही गुणों का अनुसरण न करता हो अथवा सुधार में सीख के स्थान पर अधिकार का प्रयोग करे और दण्ड अथवा डर के आधार पर वाँछित संस्कारों को आरोपित करने का प्रयत्न करे। ऐसी भूल से पहले से ही असंस्कृत परिवार में गृह कलह का एक और कारण बन जायेगा और पुण्य प्रयत्न अभिशाप के रूप में फलीभूत होने लगेगा।

परिवार को गुणी, सदाचारी तथा सुशील बनाने के लिए सबसे पहले गृहपति को वैसा बनना होगा। यदि उसमें बीड़ी, सिगरेट, पान, तम्बाकू, शराब आदि का कोई दुर्व्यसन हो तो उसे तुरन्त त्याग देना चाहिये। अपनी आवश्यकताओं को यथासम्भव संक्षेप कर देना चाहिये। अपना जीवन क्रम एक निश्चित दिनचर्या में नियमित कर देना चाहिए। क्रोध, कटुता तथा उत्तेजना से स्वभाव को मुक्त कर प्रसन्नता, स्थिरता तथा मधुरता सिद्ध करनी चाहिये। अधिकारों की परिधि संकुचित कर कर्तव्यों का दायरा बढ़ा देना चाहिए। गुरुता गौरव नहीं गर्व छोड़कर विनम्रता की विशेषता विकसित करनी चाहिए। आत्म-संयम एवं आत्म-अनुशासन से अपने को सजाकर एक आदर्श मुखिया के समान अपने जीवन को एक अनुकरणीय उदाहरण के रूप में सबके सामने रखना चाहिए। गृहपति का इस प्रकार से सुसंस्कृत किया हुआ जीवन साकार शिक्षा के रूप में परिवार के प्रत्येक सदस्य को अन्तराल तक प्रभावित करेगा और वे धीरे-धीरे स्वभावतः स्वयं ही सुसंस्कृत एवं सुशील बनने लगेंगे।

इसके अतिरिक्त अनेक ऐसे उपयोगी उपाय हैं जिनको शिक्षा एवं प्रशिक्षण के रूप में काम में लाकर सदस्यों को संस्कार की दिशा में और अधिक अग्रसर किया जा सकता है।

परिवार के प्रत्येक सदस्य को हर सम्भव उपाय से शिक्षित एवं साक्षर बनाना ही चाहिये। उनमें से विकासोन्मुख सदस्यों को शिक्षा और विकसित एवं प्रौढ़ निरक्षर सदस्यों के लिये साक्षरता की व्यवस्था करनी चाहिये। बिना शिक्षा एवं साक्षरता के संस्कार शोधन में कठिनाई होगी। शिक्षा जीवन-निर्माण की आधारशिला है ऐसा मानकर विद्यालय के योग्य सदस्यों को विद्यालय में जाना चाहिए और अन्यों को घर पर ही पढ़ने का प्रबन्ध करना चाहिए। घर-घर लगने वाली चटसार में छोटों को बड़ों से पढ़ने और बड़ों को छोटों से पढ़ने में किंचित मात्र भी संकोच न करना चाहिए। जिस परिवार के सारे सदस्य शिक्षा में रुचि वान बना लिये गये मानों उसके सुसंस्कृत होने की सम्भावनायें सुनिश्चित बना दी गई।

आस्तिकता शुभ संस्कारों की जननी है। घर के हर सदस्य को आस्तिक बनाने के लिये परिवार का वातावरण धार्मिक बनाये रक्खा जाये। इसके लिए नित्य ही प्रातः अथवा सायंकाल सामूहिक प्रार्थना का कार्यक्रम चलाया जाये। चटसार के समय ही नित्य प्रति, गीता, रामायण, भागवत अथवा किसी अन्य धर्मग्रन्थ का वाचन श्रवण होना चाहिये और पर्वोत्सवों के अतिरिक्त साप्ताहिक अथवा पाक्षिक भजन, कीर्तन की व्यवस्था की जानी चाहिये। इस प्रकार घर का वातावरण धार्मिक बनाये रहने से सदस्यों के चरित्र में दुर्गुणों के समावेश की सम्भावनाएँ बड़ी सीमा तक निकल ही जायेंगी।

इस प्रकार मानसिक सुधार के साथ-साथ सुसंस्कार जागृत करने के लिये शारीरिक सुधार की भी आवश्यकता है। शारीरिक सुधार में स्वास्थ्य का प्रमुख स्थान है। स्वास्थ्य सुधार के लिये शारीरिक व्यायाम की बहुत आवश्यकता है। इसके लिये वृद्ध व्यक्ति प्रातःभ्रमण का कार्यक्रम बना सकते हैं। तरुण सदस्य परिश्रम पूर्ण व्यायाम कर सकते हैं, किशोर अपने साथियों के साथ हॉकी, फुटबाल, बालीबाल आदि खेल खेलने जा सकते हैं। स्त्रियाँ अपने स्वास्थ्य के लिए अनाज पीस कूट सकती हैं। घरों में बागवानी, घर की सफाई कपड़ों का धोना और पानी भरना भी उनके लिए व्यायाम का लाभ दे सकता है।

भोजन के विषय में परिवार के सारे सदस्यों की रुचि एक जैसी बनाने का प्रयत्न किया जाना चाहिये। यह प्रयत्न सात्विक भोजन का अभ्यास कराने से सहज ही में सफल हो सकता है। तामसी अथवा राजसी भोजन करने से ही मनुष्य की रुचि तथा जिह्वा बिगड़ जाती है। सात्विक आहार मनुष्य की रुचि को सरल, साधारण तथा स्थिर बना देता है। सात्विक वृत्ति वाले व्यक्ति को साधारण तथा सादे से सादे भोजन में स्वाद आता है। अस्तु घर की रसोई को पराकाष्ठा तक सरल, सात्विक तथा साधारण रखना चाहिये। भोजन का स्तर इतना माध्यमिक होना चाहिये जो तीसों दिन समान रूप से चलता रहे। यह नहीं होना चाहिये कि दो दिन तो पूरी पकवान, मेवा-मिष्ठान अथवा खीर, हलुवा बन गया और बाकी दिन शाक-दाल में भी कमी होती रहे। साधारण एवं समान भोजन जहाँ स्वास्थ्य में असन्तुलन नहीं लाता वहाँ अल्पव्ययी भी होता है। शाक, सब्जी तथा ऋतु फलों की अधिकता दूध, दही, मक्खन, मलाई आदि पौष्टिक पदार्थों से किसी भी दशा में कम लाभकर नहीं होती।

परिवार के सारे सदस्यों के वस्त्र एक ही स्तर के आवश्यकतानुसार मोटे एवं मजबूत होने चाहिए। वस्त्रों की विषमता सदस्यों में स्पर्धा जगा देती है। फैशन, प्रदर्शन तथा अलंकरणों को तो पूरे परिवार से पूरी तरह बहिष्कृत कर देना चाहिये। वस्त्र अधिक से अधिक स्वच्छ तथा कम से कम विचित्रता पूर्ण रक्खे जायें। सादी वेशभूषा सदस्यों में सात्विक स्वभाव को विकसित करेगी।

घर के आय-व्यय का ज्ञान हर समझदार सदस्य को रहना ही चाहिए। इसके लिये उनको सम्मिलित करके घर का बजट बनाना बहुत ही उपयोगी रहेगा। घर के अव्यय का ज्ञान रहने से कोई भी सदस्य अपनी आवश्यकताओं को आर्थिक परिधि से बाहर ले जाने से बचेगा। इस प्रकार उसमें सन्तोष तथा मितव्ययता का विकास होगा।

इन उपायों को काम में लाने के अतिरिक्त गृहपति का कर्तव्य है कि वह घर की व्यवस्था पर पूरा ध्यान दे। सदस्यों का आपसी मनोमालिन्य दूर करने के लिये दैनिक गोष्ठी करे जिसमें वह सब को गुणों की महिमा तथा पारस्परिक प्रेम का महत्व समझाए। उन्हें ऐसी कहानियाँ तथा समाचार सुनाये जो चरित्र-निर्माण तथा सौहार्द्र की दिशा में प्रेरक हों।

कहना न होगा कि इस प्रकार अपने उदाहरण के साथ यदि गृहपति संस्कार शोधन के इन कतिपय उपायों को अविकल रूप से काम में लाये तो कोई कारण नहीं कि उसका परिवार सुसंस्कृत न हो जाये और गृह कलह दूर होकर उसके स्थान पर सुख-शान्ति का वातावरण न रहने लगे।


जीवन का उत्तरार्ध लोक-सेवा में लगावें

जिन्होंने अपने जीवन का पूर्वार्ध उपभोग कर लिया है, उनका नैतिक एवं धार्मिक कर्त्तव्य है कि वे अपने जीवन का उत्तरार्ध परमार्थपरक समाज-सेवाओं में लगायें, इससे उनकी आत्मा का कल्याण और समाज, राष्ट्र व संसार का हित होगा।

सौ वर्ष की आयु का अनुमान कर मानव-जीवन की सुविधा एवं सार्थकता की दृष्टि से इस आयुष्य-अवधि को दो भागों में विभक्त कर दिया गया है। एक पूर्वार्ध दूसरा उत्तरार्ध। मानव-जीवन का यह विभाजन किन्हीं लौकिक पुरुषों द्वारा नहीं बल्कि शास्त्रों एवं दूरदर्शी ऋषियों द्वारा ही निर्धारित किया गया है।

ऋषियों के आदेशानुसार मनुष्य को चाहिए कि वह जीवन का पूर्वार्ध अर्थात् पचास वर्ष तक की आयु तो समाज में रहकर, समाज के सहयोग से अपनी शक्तियों को विकसित करके संसार को सुखोपभोग करने में व्यतीत करे, पूर्वार्ध में ही गृहस्थी बसाये, बाल-बच्चों तथा घर-बार का पालन करे। धन, मान, बड़ाई तथा अन्य प्रकार की विभूतियों का उपार्जन एवं उपभोग करे। अनन्तर इक्यावन वर्ष से लेकर आयु पर्यन्त का शेष जीवन समाज-सेवा में लगाये और उन उपकारों का ऋण चुकाये जो गृहस्थ-काल में उसने समाज से पाये हैं।

गृहस्थ-जीवन अर्थात् आयु के पूर्वार्ध में मनुष्य की न जाने कितनी आवश्यकतायें होती हैं जिनकी पूर्ति वह समाज की सहायता एवं सहयोग के बल पर ही कर पाता है। अकेला एक मनुष्य अपनी आवश्यकतायें पूरी नहीं कर सकता। सुख-सुविधा के जो भी साधन और जीवन-विकास के जितने उपकरणों की आवश्यकता होती है, उनके प्रस्तुत करने में अगणित लोगों की श्रम-साधना लगा करती है। एक-एक वस्तु तैयार होने और उपयोग की दशा में लाने तक प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से लाखों-करोड़ों लोगों का सहयोग रहा करता है।

यदि दूर-दृष्टि से देखा और गहराई से विचार किया जाये जो पता चलेगा कि मनुष्य पग-पग पर दूसरों से उपकृत होता है। संसार में जिसने जीवन धारण किया है और एक सभ्य मनुष्य की तरह जीवन जिया है वह समाज के अन्य लोगों के उपकार से रहित नहीं हो सकता उसने जीवन में जो और जितना सुख पाया होता है वह एक प्रकार से दूसरों का ही दिया होता है। यद्यपि मनुष्य स्वयं भी इसके लिये परिश्रम एवं प्रयत्न किया करता है तथापि वह अन्य लोगों द्वारा उपकृत हुए बिना नहीं बच सकता। जब तक अन्य लोगों का स्नेह, सद्भाव अथवा साहाय्य प्राप्त नहीं होता परिश्रम एवं प्रयत्न भी कोई फल उत्पन्न नहीं कर पाते। इस प्रकार हर दशा में मनुष्य पर किसी-न-किसी रूप में अन्य असंख्यों लोगों का उपकार चढ़ता रहता है।

इसीलिये ऋषियों ने यह व्यवस्था की कि प्रत्येक मनुष्य अपने जीवन के पूर्वार्ध में तो समाज की सहायता-सहयोग से अपने जीवन को उन्नत एवं सफल बनाकर साँसारिक सुखों का उपभोग करे और उत्तरार्ध में समाज एवं संसार का उपकार, ऋण चुकाने के लिए संलग्न हो जाये। जीवन के इसी विभाजन की क्रम से गृहस्थ एवं वानप्रस्थ स्थिति कहा गया है। यों तो ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ तथा संन्यास —चार आश्रमों अथवा जीवन-विभागों का वर्णन है किन्तु आज की परिवर्तित स्थिति में इन चारों आश्रमों को अलग-अलग चला सकना सम्भव नहीं। आज पूर्वकाल जैसे आश्रम एवं गुरुकुल नहीं हैं जहाँ घर से दूर जाकर वटुक रह सकें और ब्रह्मचर्य की साधना के साथ विद्या-लाभ कर सकें और न पूर्वकाल जैसे वनस्थली ही रह गये हैं जहाँ सन्यासावस्था में सुरक्षा पूर्वक रहा जा सके और आत्म-कल्याण की साधना की जा सके। इसीलिये ब्रह्मचर्य-आश्रम को गृहस्थ आश्रम एवं संन्यास आश्रम को वानप्रस्थ आश्रम में ही जोड़कर वास्तविक प्रयोजन को चरितार्थ किया जाये यही उचित है। जिस प्रकार आज बालक घर रहकर ही माता-पिता के अवधान में विद्याध्ययन करता है, वहीं रहकर अपनी शक्तियों एवं योग्यताओं का विकास करता है उसी प्रकार संन्यास स्थिति का पालन समाज-सेवा द्वारा, वानप्रस्थ में ही किया जाये।

यह बात सही है कि सज्जन लोग गृहस्थ-जीवन में भी स्वार्थ के साथ कुछ-न-कुछ परमार्थ करते रहते हैं फिर भी गृहस्थ की परिस्थितियाँ ही कुछ ऐसी होती हैं कि वह लेता अधिक है और देता कम है। जिस अनुपात से सामाजिक सहयोग का ऋण उस पर चढ़ता जाता है उस अनुपात से उसका प्रतिकार नहीं कर पाता और गृहस्थ-जीवन की पूर्ति तक वह इतना अधिक हो जाता है कि उसे चुकाने के लिये उतनी ही अवधि की आवश्यकता होती है। इसीलिये जीवन का पूरा उत्तरार्ध समाज का प्रत्युपकार करने के लिये निश्चित किया गया है।

समाज की सहायता एवं सहयोग के आधार पर संसार का भौतिक सुख लेने और प्रेमपूर्ण पारिवारिक जीवन-यापन करने के लिये पचास वर्ष की अवधि कुछ कम नहीं है। इन पचास वर्षों में मनुष्य गृहस्थ-सुखों को पूरी तरह भोग चुकता है और जब तक बच्चे भी सयाने होकर स्थैर्य प्राप्त कर चुके होते हैं। मनुष्य का पारिवारिक उत्तरदायित्व भी परि मुक्त हो चुका होता है। तथापि यदि कोई उसके आगे भी उसी परिधि में रहकर उसी प्रकार की तृष्णा, वासना एवं एषणा में पड़ा रहना चाहता है तो यह उसका घोरतम स्वार्थ ही होगा। इसका ठीक-ठीक यही अर्थ होगा कि वह आजीवन समाज से कुछ लेता ही रहना चाहता है और उसके उपकार का कोई बदला नहीं चुकाना चाहता है। ऐसे स्वार्थी संसार से उऋण होकर नहीं जाना चाहते। जिसका फल यह होता है कि वे अगले जन्म में गधा, घोड़ा, ऊँट, बैल आदि होकर मनुष्यों का भार ढोकर सेवा-रूप में ऋण चुकाते और नाना प्रकार के कष्ट उठाते हैं।

परमात्मा की इस न्यायपूर्ण सृष्टि में ऋण-भार रोकने की कोई व्यवस्था नहीं है। मनुष्य को संसार का ऋण यदि इस जीवन में नहीं तो अगले जीवन में किसी-न-किसी रूप में दण्ड के साथ ही चुकाना होगा। गधा, घोड़ा, बैल, ऊँट आदि जिन जानवरों को मनुष्यों की सेवा में मरते-खपते देखा जाता है, उन्हें उस जन्म के वे ही व्यक्ति समझना चाहिये जो समाज का ऋण चुकाए बिना संसार से चले गये थे। इसलिये बुद्धिमानी इसी में है कि जिस ऋण को चुकाये बिना निस्तार नहीं, उसे क्यों न इसी जीवन में हँसी-खुशी के साथ चुका दिया जाये।

फिर मानव-जीवन का मात्र उद्देश्य इतना ही तो नहीं है कि खाने-कमाने और मौज-मजा लेने में ही उसे समाप्त कर दिया जाये। जहाँ उस पर पारिवारिक, सामाजिक तथा राष्ट्रीय उत्तरदायित्वों का भार होता है वहाँ अपनी आत्मा का उद्धार करने का सबसे बड़ा कर्तव्य भी उसके कन्धों पर है। यह मानव-जीवन ही एक ऐसा अवसर है जिसका सदुपयोग कर मनुष्य अपने आत्मोद्धार के महान् एवं पुनीत कर्तव्य को पूरा कर सकता है। यदि वह इस स्वर्ण अवसर को वासना-तृष्णा की विभीषिका में पड़कर चूक जाता है तो चौरासी लाख का चक्र उसे न जाने कब तक पूरा करना पड़े और कब उसे दुबारा यह अवसर मिले। इसके विषय में कुछ नहीं कहा जा सकता। जो मनुष्य तनिक भी विवेकशील होगा वह इस मानव-जीवन के महत्व और इसको गँवा देने की हानि समझकर अपने कर्तव्य पूर्ण करने में तत्काल तत्पर हो उठेगा।

अपना साँसारिक तथा आत्मिक उभय प्रकार का दायित्व सुचारु एवं सुविधापूर्वक निभाने का सबसे सरल एवं समीचीन उपाय यही है कि मनुष्य अपने जीवन का पूर्वार्ध साँसारिक कर्तव्यों में लगाये और उत्तरार्ध संसार की सेवा करने में लगाये। इससे उसका लोक भी बनेगा और परलोक भी। ऋण से उऋण होकर बन्धन से छूट जायेगा।

अधिकतर लोग जीवन के उत्तरार्ध अर्थात् वानप्रस्थ अवस्था में आकर भजन-पूजन तथा जप-तप को ही आत्मोद्धार का साधन मान लेते हैं और इसी पूजा-पाठ को ही वानप्रस्थ का प्रयोजन भी समझते हैं। वानप्रस्थ के लिये जप-तप, पूजा-पाठ, आत्मसंयम एवं मानसिक सन्तुलन के लिये आवश्यक है किन्तु यह उस आश्रम का एकमात्र ध्येय अथवा प्रयोजन नहीं है। वानप्रस्थ का मुख्य धर्म सेवा-धर्म ही है।

जीवन के उत्तरार्ध में वानप्रस्थ लेकर समाज से अलग-अलग होकर केवल पूजा-पाठ अथवा जप-तप करते रहने से सम्भव है कोई आत्मोद्धार की दिशा में थोड़ा-बहुत बढ़ जाये, किन्तु सेवा-कार्यों के बिना पूर्णरूपेण कृत-कृत्य हो सकना सम्भाव्य नहीं समझ पड़ता। व्यक्तिगत पूजा-पाठ करते रहने से संसार अथवा समाज के उस ऋण से उऋण होने की सम्भावना नहीं सहती जो जीवन के पूर्वार्ध में सिर पर चढ़ जाता है वह ऋण तो समाज सेवा द्वारा ही शोधन किया जा सकता है।

जहाँ व्यक्तिगत पूजा-पाठ में समाज-सेवा का समावेश नहीं रहता वहाँ समाज-सेवा में जनता-जनार्दन की परिचर्या करने, विश्व-विराट की संराधना करने में भजन-पूजन का भाव सन्निहित रहता है। भजन शब्द ‘भज्’ धातु से बना है, जिसका अर्थ सेवा ही होता है। जिस विधान में सेवा सम्मिलित नहीं, वह न तो पूजा है और न आराधना। वानप्रस्थ आश्रम का मूल प्रयोजन भी समाज सेवा ही है। विषय-वासनाओं एवं पारिवारिक उत्तरदायित्व से मुक्त होकर ही कोई मनुष्य निःस्वार्थ भाव से समाज-संराधना के कार्यक्रमों में योगदान कर सकता है। यदि समाज की रखवाली करने वाले उसे ठीक दिशा दिखलाने और दुष्प्रवृत्तियों से सावधान करने वाले अनुभवी व्यक्ति आगे न बढ़ते रहें तो निश्चय ही मानव-समाज कुछ ही समय में भयानक रूप से पतित हो जाये और ऐसी अवस्था में मनुष्य की क्या दशा हो जाये, कुछ नहीं कहा जा सकता। निस्पृह, निस्वार्थ, निष्काम, अनुभवी एवं परितृप्त व्यक्ति ही समाज की रखवाली ठीक तरह से कर सकते हैं और ऐसे साधु पुरुष वे वानप्रस्थी ही हो सकते हैं जो पारिवारिक उत्तरदायित्व मुक्त होकर उस अवस्था में आ गये हैं जिसमें वितृष्णाओं की कमी हो जाती है और वे किसी रूप में शोभा नहीं देतीं।

अस्तु, मनुष्यों का पावन कर्तव्य है कि वह पचास वर्ष की आयु होने पर वानप्रस्थ धर्म में दीक्षित होकर सामाजिक ऋण से उऋण होवें। समाज का प्रहरी बनने और आत्मा की मुक्ति के लिए निस्पृह भाव से निरन्तर लोक-सेवा के कामों में निरत होकर मानव-जीवन को सार्थक बनाएँ।


परोपकार कभी निष्फल नहीं जाता

उन दिनों रोम में दासों पर बड़े अत्याचार किये जाते थे। एण्ड्री नामक एक दास भी जो अपने मालिक द्वारा बुरी तरह सताया जाता था, एक दिन अवसर पाकर रात में भाग निकला। भागते-भागते वे एक जंगल में पहुँच गया। किन्तु संयोगवश वह जिस वृक्ष के नीचे बैठकर अपने जीवन पर सोचने लगा उसी के निकट एक झाड़ी में एक सिंह बैठा था। एण्ड्री ने सोचा कि वह निर्दयी मालिक से तो ज्यों-त्यों बच गया किन्तु इस शेर से कदापि नहीं बच सकता। पर एण्ड्री को यह देखकर आश्चर्य हुआ कि सिंह धीरे से उसके पास आया और उसके हाथ पर अपना पंजा रख दिया। एण्ड्री ने देखा कि उसके पंजे में काँटा लगा हुआ था। एण्ड्री ने अपना चाकू निकाला और शेर के पंजे का काँटा निकाल दिया।

अदालत लगी और राज-नियम के अनुसार भागने के अपराधी एण्ड्री को प्राणदंड सुना दिया गया और यह तय हुआ कि उसे भूखे शेर के सम्मुख डालकर मरवाया जाये। इसके लिये एक शेर भी पकड़कर आ गया और कई दिन तक भूखा भी रक्खा गया। नियत दिन और समय पर रोम के अमीर, आबाल-वृद्ध, स्त्री पुरुष उस मृत्यु-दृश्य का खेल देखने के लिये आये। एण्ड्री भूखे शेर के पिंजरे में ढकेल दिया गया। शेर भयानक रूप से गरजकर एण्ड्री के पास आया और मुँह फैलाकर उसे दबोचने ही वाला था कि दर्शकों ने आश्चर्य से देखा कि शेर उसे खाने के बजाय सिर झुकाये मृत्यु की प्रतीक्षा करते हुए एण्ड्री के पास दुम हिलाकर गुर-गुर करने लगा। एण्ड्री ने सिर उठाया और देखा कि वह उसका वही मित्र सिंह था जिसका उसने काँटा निकाला था। अप्रत्याशित दृश्य देखकर न्यायाधीश ने कहा कि एण्ड्री भाग्यवान है उसे सदा के लिए मुक्त कर दिया जाय। निश्चय ही परोपकार कभी निष्फल नहीं जाता।


श्रेष्ठता धन से नहीं धन्य कार्यों से प्राप्त होती है।

पैसे की अधिकता के कारण ही कोई मनुष्य श्रेष्ठ नहीं माना जा सकता। श्रेष्ठ कार्य ही मनुष्य को श्रेष्ठ बना सकते हैं। यदि पैसे ने आज तक किसी को श्रेष्ठ बनाया होता तो संसार के धनवान लोग किसी निर्धन को प्रतिष्ठा पाने ही न देते। वे एक के दस खर्च करके समाज की सारी प्रतिष्ठा अपने लिये खरीद लेते।

ऐसा नहीं कि धन प्रतिष्ठा में बाधक है अथवा कोई धनवान प्रतिष्ठा पा ही नहीं सकता। धनवान प्रतिष्ठा पा सकते हैं और पाते हैं किंतु वे ही जिनके धनोपार्जन के साधन पवित्र एवं उपयुक्त होते हैं और जिनका धन समाज सेवा के किन्हीं श्रेष्ठ कामों पर भी खर्च होता है।

धन को धनवान होने के लिये कमाना और रखते जाना अथवा केवल अपने पर ही खर्च करना कोई अर्थ नहीं रखता। जो समाज के बीच धन कमाता और जोड़ता रहता है, जिसका पैसा आवश्यकता पर पीड़ितों अथवा समाज सेवा के काम में नहीं आता वह वास्तव में धनवान नहीं धन का चोर है। धन किसी के अधिकार में क्यों न हो वह समाज का ही है क्योंकि उसकी प्राप्ति समाज से—समाज की सहायता से—ही हुई है। उस धनवान को श्रेष्ठ ही कहा जायेगा जो समाज के धन को अपनी सुरक्षा में रखकर बढ़ाता और समयानुकूल उसका उपयुक्त भाग समाज सेवा के कार्यों में खर्च करता है। ऐसे धनवान श्रेष्ठियों को समाज का खजांची ही माना जायेगा और वे अपने पद एवं कार्य के अनुरूप प्रतिष्ठा के अधिकारी होंगे।

तन, मन, धन, तीन उपकरणों में से जो व्यक्ति कोई भी उपकरण समाज के श्रेष्ठ कामों में नियोजित करता है उसे एक श्रेष्ठ मनुष्य ही कहा जायेगा। केवल धनवान बलवान अथवा महामना मात्र होने से कोई श्रेष्ठता का अधिकारी नहीं हो सकता। जिसका धन, बल और महामानवता समाज के किसी काम नहीं आती वह अपने काम में कितना ही श्रेष्ठ एवं महान बनता रहे वस्तुतः समाज उसे श्रेष्ठ मानने और प्रतिष्ठा में कृपणता ही बरतेगा।

संसार में आज ऐसे लोगों की बहुतायत होती जा रही है जो पैसे को परमात्मा मानकर पूजते हैं और आशा करते हैं कि पैसे के कारण उन्हें भी पूजा जाये। किन्तु उनकी यह इच्छा कभी पूरी नहीं हो सकती। इस आर्थिक युग में भी समाज केवल पैसे के कारण किसी को तब तक प्रतिष्ठा नहीं दे सकता जब तक वह अथवा उसका पैसा समाज में श्रेष्ठ कार्यों का सम्पादन नहीं करते।

अनेक लोग तो पैसे के इतने भक्त होते हैं कि उनका पैसा समाज सेवा के कार्यों में खर्च होना तो दूर उनके स्वयं के जीवन विकास में भी खर्च नहीं हो पाता। धन को कमाना और केवल जमा करना ही उनका ध्येय होता है। यदि वे अपने पैसे को अपने विकास, अपने परिवार की उन्नति और बच्चों को विकसित बनाने में ही खर्च करते रहें तब भी धन का कुछ अंश किसी न किसी बहाने समाज में आता रहे और एक दिन ऐसा आ सकता है कि वे और उनके बच्चे विकसित होकर धन कमाने के ध्येय और उसका सदुपयोग कर सकने की बुद्धि पा जायें।

जो केवल धन कमाता और आगामी पीढ़ियों के लिये ही जमा करता रहता है वह अपने उस धन की बदौलत धनवान किस प्रकार माना जा सकता है? वह धन उनका होता ही कहाँ है वह तो वास्तव में उनके उन उत्तराधिकारियों का होता है, जिनके लिये वे उसे जमा करते रहते हैं। वास्तव में हमारा धन तो वही है जिसका हम ठीक-ठीक सदुपयोग कर सकते हैं। जो धन हमारे अथवा समाज के किसी काम नहीं आता वह निरर्थक ही कहा जायेगा। ऐसे निरर्थक धन के बल पर यदि कोई समाज में श्रेष्ठता पाने की इच्छा करता है तो उसकी यह इच्छा कभी पूरी नहीं हो सकती।

श्रेष्ठता धन के बल पर नहीं बल्कि श्रेष्ठ कामों के फलस्वरूप मिला करती है। रोमन साम्राज्य का स्तम्भ ‘सिसरो’! एक सामान्य स्थिति का व्यक्ति था। किन्तु वह अपने पुरुषार्थ एवं विद्या बुद्धि के बल पर रोमन साम्राज्य का नीति निर्धारक बनकर बड़ी प्रतिष्ठा पा सका। उसकी प्रतिष्ठा से डाह करने वाले एक कुलीन वंशी ने एक दिन कहा—’सिसरो, तुम एक सामान्य कुल के हो जब कि मैं कुलीन राजवंश का अंश हूँ।’ सिसरो ने बड़े सामान्य भाव से उत्तर दिया—’महाशय! मैं एक सामान्य वंश का हूँ किन्तु मेरे काम के कारण मेरे वंश की गणना कुलीनों में होने लगेगी जबकि आपके कार्य आपके वंश की कुलीनता समाप्त कर देने वाले सिद्ध हो सकते हैं।” सिसरो की श्रेष्ठता उसके श्रेष्ठ कार्यों पर आधारित थी जो कि सही और सच्ची श्रेष्ठता थी।

केवल धन देखकर किसी को श्रेष्ठ मान लेना अपनी मानसिक हीनता का परिचय देना है। ऐसे ही मानसिक दरिद्रों की दी हुई प्रतिष्ठा से प्रोत्साहित होकर अनेक लोग श्रेष्ठता पाने के लिये श्रेष्ठ कामों की ओर ध्यान न देकर हर प्रकार से धन बटोरने में जुट जाते हैं। वे जानते हैं कि श्रेष्ठ कामों के अभाव में केवल धन होने के कारण बुद्धिमान व्यक्ति उन्हें श्रेष्ठ जरूर नहीं मानेंगे किन्तु समाज में ऐसे दरिद्रों की भी कमी नहीं है जो उन्हें उनके धन के कारण ही देवता मानकर पूजने लगेंगे। मेरे पास धन होना ही उनके लिये एक बड़ी बात होगी फिर चाहे मेरे धन का एक पैसा भी उनके किसी काम न आये।

कहना न होगा कि श्रेष्ठ कार्यों में धन का सदुपयोग न करने वाले धनी उतने दया के पात्र नहीं हैं जितने कि वे मानसिक निर्धन जो धन देखकर ही किसी को श्रेष्ठ मान लेते हैं और उनकी सम्मान लिप्सा की पूर्ति में सहायक होते हैं। मनुष्य की श्रद्धा तथा उसकी आदर भावना एक बहूमूल्य वस्तु है। इसको यों ही लुटा देना, उचित नहीं। मनुष्य की श्रद्धा एवं आदर भाव का ठीक-ठीक अधिकारी वही है जो स्वयं श्रेष्ठ हो और समाज के लिये कोई श्रेष्ठ कार्य करने में लगा हो, फिर चाहे वह धनी हो या निर्धन।

एडिनवरा वह कंगाल लड़का हजार धनवानों से श्रेष्ठ माना जायगा जिसने मरण शय्या पर पड़े होने पर भी अपने भाई के हाथ एक सज्जन व्यक्ति के पास चार आने पैसे भेजे थे। यह गरीब लड़का एक जाड़े की रात में दियासलाई का बण्डल ले जाकर एक सज्जन से खरीदने के लिए इसलिये प्रार्थना करने लगा कि उसे कुछ पैसे मिल जायें जिससे कि वह और उसका छोटा भाई दो दिन से जल रही भूख की ज्वाला शान्त कर सकें। लड़के की दशा पर दया खाकर उन सज्जन ने एक आने की एक दियासलाई खरीद ली और बारह आने का एक सिक्का लड़के को देकर बाकी लौटाने को कहा।

लड़के के पास बाकी के पैसे नहीं थे। वह ग्राहक को रोककर बाजार में उसे तुड़ाने चला गया। किन्तु जब वह बहुत देर तक वापस न आया तो ग्राहक निराश होकर चला गया। उसने सोचा गरीब लड़का उसका शिलिंग लेकर भाग गया है।

शाम को एक दूसरा लड़का उन सज्जन का पता लगाते-लगाते उनके घर गया और चार आने के सिक्के को उन्हें देता हुआ बोला—महाशय मेरे बड़े भाई ने, जिससे आपने सवेरे एक दियासलाई खरीदी थी, यह चार आने पैसे आपके पास भेजे हैं और शेष सात आने न भेजे सकने के लिये माफी माँगी है। मेरा भाई जिस समय आपका शिलिंग भुनाकर आ रहा था उस समय रास्ते में सड़क पर एक घोड़े की चपेट में आकर घायल हो गया। उसकी दोनों टाँगें टूट गई हैं। उसके बाकी पैसे और दियासलाइयाँ उसी दुर्घटना में खो गई हैं। वह घर पर चारपाई पर पड़ा है, इसीलिये खुद न आ सका और आपके पास भेजा है। एडिनवरा की किसी गली में रहने वाला यह निर्धन लड़का अपनी इस चारित्रिक श्रेष्ठता के कारण किसी भी श्रेष्ठ जन के पार्श्व में बैठने के सर्वथा योग्य माना जायेगा। उसके पास न तो धन था और न अन्य किसी प्रकार का बड़प्पन। किन्तु उसके एक ईमानदारी एवं सज्जनता के काम ने उसे इतना श्रेष्ठ बना दिया कि वह उदाहरण के रूप में लोगों के सामने रक्खा जाता है। उस निर्धन श्रेष्ठ के समय में न जाने कितने लक्षाधिपति एडिनवरा की ऊँची-ऊँची कोठियों में रह रहे होंगे किन्तु उनमें से आज तक किसी एक की भी चर्चा नहीं की जाती है। निःसन्देह जेष्ठता धन से नहीं श्रेष्ठ कार्यों से ही मिलती है। कार्य कितना ही छोटा क्यों न हो यदि उसके पीछे चरित्र की श्रेष्ठता झाँक रही है तो वह किसी भी बड़े काम से छोटा नहीं माना जा सकता। इस प्रकार के चरित्र अथवा गुणबोधक न जाने कितने छोटे-छोटे काम किसी सामान्य से सामान्य व्यक्ति को भी श्रेष्ठजनों की सूची में अंकित कर सकने में समर्थ होते हैं।

किसी को श्रेष्ठता का सौभाग्य उसके धन वैभव के आधार पर न तो मिल सकता है और न दिया जा सकता है। ऐसे हजारों उदाहरण संसार में पाये जा सकते हैं कि एक नौकर अपने उस मालिक से श्रेष्ठ हो, जिसने कि उचित अनुचित साधनों से प्रचुर धन कमाकर इकट्ठा कर लिया है, किन्तु उसका पैसा किसी के श्रेष्ठ काम में खर्च नहीं होता, जब कि नौकर अपनी अल्प कमाई में से भी कुछ अंश अपाहिजों की सहायता अथवा एक−आध भूखे को भोजन करा देने में खर्च करता हो।

श्रेष्ठ व्यक्ति उसी को कहा जायेगा जो अपने मानवीय गुणों को किसी न किसी रूप में इस प्रकार प्रकट करे जिससे समाज अथवा किसी व्यक्ति का हित हो।

क्या वह निर्धन युवक उस धनी पुरस्कार दाता से श्रेष्ठ नहीं कहा जायेगा— जिसने नदी की बाढ़ से टूटते हुए एक पुल पर बनी कोठरी में रहने वाले पहरेदार के परिवार को अपनी जान की बाजी लगाकर पानी के प्रकोप से बचाया था और पुरस्कार के रूप में दिये जाने वाले सौ रुपये की धनराशि को लेने से इनकारते हुये दाता से कहा था कि उसने पैसे के लिये अपनी जान की बाजी नहीं लगाई थी। यह उसका मानवीय कर्तव्य था जो उसने बिना किसी लोभ लालच के पूरा किया है। यह पैसा इस पीड़ित परिवार को दे दिया जाये क्योंकि उसकी इसकी मुझसे अधिक आवश्यकता है?

ऐसे-ऐसे उदाहरणों के होते हुए भी जो व्यक्ति धन के बल पर श्रेष्ठता खरीदने का प्रयत्न करते हैं वे नादान ही कहे जायेंगे। अरबों कमा लेने और करोड़ों खर्च करने पर भी श्रेष्ठता तब तक नहीं मिल सकती जब तक कोई व्यक्ति अपने सत्कर्मों से अपनी पात्रता सिद्ध नहीं कर सकता। उसी पुरस्कार दाता धनी ने यदि धन के लालच पर किसी दूसरे को, उक्त संकटग्रस्त परिवार को बचाने के लिये प्रोत्साहित करने के बजाय स्वयं ही यथासाध्य प्रयत्न किया होता तो निश्चय ही वह एक श्रेष्ठ कार्य करता और तब उसका धन उसकी श्रेष्ठता में चार चाँद लगा देता । उसने धन द्वारा परोक्ष रूप से किसी पीड़ित को सहायता करने की कोशिश जरूर की किंतु ऐसा कोई लक्षण व्यक्त नहीं किया जिससे वह आर्थिक सहायता धनाभिमान से मुक्त मानी जाती ।

श्रेष्ठता पाने के भ्रम में धन की लिप्सा में लिप्त कोई भी व्यक्ति श्रेष्ठ नहीं हो सकता। जो व्यक्ति अपनी स्थिति के अनुसार समाज अथवा व्यक्ति की सेवा करता अथवा अपने किसी काम से उस आन्तरिक महानता का परिचय देता है जो उसकी आत्मा में सोई रहती है और जिसे मनुष्यता की उपाधि से पुकारा जाता है वही व्यक्ति वास्तविक श्रेष्ठता का अधिकारी है। ऐसा गुणी तथा चरित्रवान व्यक्ति स्वयं भी श्रेष्ठ होता है और दूसरे लोग भी उसे श्रेष्ठ मानते और प्रतिष्ठा करते हैं।


घिस-घिसकर परिमार्जित होने का परिणाम

पेड़ की ऊँची डाली पर लटके नारियल ने नीचे नदी में पड़े पत्थर को देखकर घृणा पूर्वक कहा—”घिस-घिसकर मर जाओगे लेकिन नदी के पैर नहीं छोड़ेंगे, अपमान की भी कोई हद होती है। मुझे देखो स्वाभिमानपूर्वक कैसी उन्नत स्थिति में मौज कर रहा हूँ। पत्थर ने चुपचाप नारियल की बात सुन ली, कोई उत्तर न दिया। कुछ समय बाद पूजा की थाली में रक्खे उसी नारियल ने देखा कि नदी का वही पत्थर शालिग्राम के रूप में पूजा-पाठ पर प्रतिष्ठित है जिसकी पूजा के लिए उसे नैवेद्य के रूप में लाया गया है, नारियल मन-ही-मन क्रोधित हो उठा। पत्थर ने नारियल का भाव समझा और कहा—नारिकेलि! देखा घिस-घिसकर परिमार्जित होने का परिणाम क्या होता है? और अभिमान के मद में मतवाले रहने वालों की गति क्या क्या हुआ करती है?


पशु-पक्षियों को इतना न सताया जाय।

आज संसार में पशुओं का उत्पीड़न जिस बुरी तरह से किया जा रहा है उसे देखकर किसी भी भावनाशील व्यक्ति का हृदय दया से भरकर कराह उठता है। पशुओं पर होने वाला अत्याचार मनुष्यता पर एक कलंक है। समस्त प्राणी-जगत में सर्वश्रेष्ठ एवं जेष्ठ कहे जाने वाले मनुष्य को पशुओं के साथ क्रूरता का व्यवहार करना कहाँ तक शोभा देता है?

साधारण-सी बात है कि संसार में रहने वाले सारे प्राणियों को उस एक ही परमपिता परमात्मा ने पैदा किया है। जब मनुष्यों सहित सारे जीव एक ही पिता के पैदा किये हुए हैं तब इस नाते वे सब आपस में भाई-बहन ही हैं। बुद्धि, विवेक तथा अधिकारों की दृष्टि से मनुष्य उन सबमें बड़ा है और अन्य समस्त प्राणी उसके छोटे भाई-बहन ही हैं। बड़े तथा बुद्धिमान होने से मनुष्य का धर्म हो जाता है कि वह अपने छोटे जीव-बन्धुओं पर दया करे, उन्हें कष्ट से बचाए, पाले और रक्षा करे। किन्तु खेद है कि बड़े भाई का कर्तव्य निभाने के बजाय मनुष्य उनसे क्रूर व्यवहार करता है।

यदि भाई-बहन की भावना तक न भी पहुँचा जाये तो भी मानवता के नाते उनके साथ निर्दयता का व्यवहार नहीं करना चाहिए। हम मनुष्यों की तरह ही पशुओं को भी अपने प्राण प्यारे होते हैं, वे भी पीड़ा तथा सुख दुःख की इसी प्रकार अनुभूति करते हैं। मनुष्यों की तरह उनकी भी इच्छा रहती है कि उन्हें भी कोई मारे-सताये नहीं। पर मनुष्य इस साधारण सभ्यता, जो मनुष्यता का पहला लक्षण है, का भी निर्वाह नहीं करते और पशुओं पर अकथनीय अत्याचार किया करते हैं। जब तक जो मनुष्य अपनी ही तरह पशु-पक्षियों की पीड़ा अनुभव करना नहीं सीखता सच्चे मानों में उसे मनुष्य नहीं कहा जा सकता। उसे तो निर्दयी एवं न्याय हीन न जाने क्या कहा जायेगा। ठीक-ठीक मनुष्य तो उसे कहा जायेगा जो अपने छोटे भाई-बहनों की तरह ही अन्य पशु-पक्षियों एवं प्राणियों के साथ दया, करुणा तथा प्रेम का व्यवहार करे।

समता, दया एवं करुणा के आधार पर ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का महान् सिद्धान्त हिन्दू धर्म की आधारशिला है। अपनी इसी उदारता के कारण ही यह धर्म संसार में सभी धर्मों का सिरमौर बना है। यदि हिन्दू धर्म से दया तथा करुणा का तत्व निकाल दिया जाये तो वह एक महान् धर्म न रहकर न जाने कौन-सा रूप धारण कर ले। धर्म की महत्ता उसके अनुयायियों का आचरण देखकर ही निर्धारित की जा सकती है। एक हिन्दू धर्म ही नहीं, संसार के सारे धर्मों में जीव-जन्तुओं पर दया करने का निर्देश किया गया है। ईसाई, यहूदी तथा मुसलमान आदि अनेक जातियाँ भौगोलिक एवं अन्नाभाव की परिस्थितियों की विवशता से माँस-मछली आदि खाते और पशुओं का वध करते हैं तथापि उनके धर्मग्रन्थों में जीव पर दया करने का ही निर्देश किया गया है कि ‘परमात्मा का आदेश है कि तुम सब जीवों पर दया करो।’ तीर्थ-यात्रा एक धर्म-कृत्य माना गया है। मुसलमानों को उनके पैगम्बर का आदेश है कि ‘मक्का की यात्रा पर जब जाओ और वहाँ से वापस आओ तब रोज़ा रक्खो, किसी जीव की हत्या न करो और न माँस ही खाओ।’

मुसलमानों के मूल पैगम्बर हजरत मोहम्मद साहब किसी पशु-पक्षी का माँस नहीं खाते थे। इसी प्रकार मुसलमानों के धार्मिक नेता हजरत अली ने कहा है, ‘तू अपने पेट को पशु-पक्षियों की कब्र मत बना।’ ईसामसीह का मुख्य उपदेश दया और अहिंसा ही है। उन्होंने एक स्थान पर कहा है, “तुझे संसार की सारी जड़-चेतन प्रकृति का ज्ञान क्यों न हो पर तेरे हृदय में यदि दया नहीं है तो तेरा वह ज्ञान परमात्मा के सम्मुख किसी काम न आवेगा।” यहूदी धर्म में कहा गया है कि ‘बकरों तथा बछड़ों के रक्त से नहीं , अपने ही परिश्रम, पुरुषार्थ एवं परमार्थ द्वारा ही स्वर्ग अथवा मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है।’

इस प्रकार के निर्देश तो उन धर्मों में हैं जो अभारतीय हैं और जहाँ अन्न तथा फल-फूलों का अभाव रहता है। भारत तो धन-धान्य पूर्ण देश है। यहाँ वनस्पतियों एवं अन्नों की प्रचुरता रही है, तब भला यहाँ के धर्म में जीवों पर निर्दयता का समर्थन किस प्रकार किया जा सकता था। ‘दया धर्म का मूल है’ और हिन्दू धर्म इसी मूल पर स्थित है।

आत्मा अमर, व्यापक तथा समानरूपा है। वह एक समान ही सभी प्राणियों में विद्यमान है। आत्म-तत्व की दृष्टि से संसार के सारे प्राणी समान ही हैं। सबमें ईश्वर का अंश वर्तमान है। चींटी से लेकर हाथी तक में एक उसी आत्म-तत्व का प्रकाश हो रहा है। इस प्रकार एकात्मा का सम्बन्ध होने पर पशुओं का उत्पीड़न किया जाये तो इससे बढ़कर और कौन-सा अधर्म हो सकता है? किसी प्राणी को अकारण कष्ट देने वाले की आत्मा निर्बल हो जाती है। क्रूरता करने से मनुष्य के अंतरमन पर जो अशुभ संस्कार पड़ते हैं वे आजीवन साथ तो रहते ही हैं, अन्तकाल में भी स्मरण आते हैं जिससे मनुष्य की जीवात्मा अधोगति की ओर ही जाती है। पशु-पक्षियों के साथ निर्दय व्यवहार करने वाला मनुष्य कितना ही साहसी, लापरवाह और उपेक्षाशील क्यों न हो, उसका तर्क-कुतर्क उसकी आत्मा को उस पाप से बचा नहीं सकता और अन्त में उसे इस लोक में दण्ड न भी मिले तो परलोक अथवा पुनर्जन्म में उसका भोग करना ही होगा।

स्वार्थ, सुविधा, लाभ अथवा मनोरंजन किसी की प्रेरणा से भी क्यों न किया जाये, पशु-पक्षियों के साथ किया हुआ उसका अत्याचार उसकी आत्मा का पतन अवश्य कर देगा। जीवों के साथ क्रूरता का व्यवहार करने वाले व्यक्ति का हृदय भावनाशून्य होकर कठोर हो जाता है। ऐसा हृदयहीन व्यक्ति न तो आत्मिक उन्नति कर सकता है और न समाज में अपने आचरण को शालीन रख सकता है।

आज के उन्नति एवं विकास के युग में भी जो विनाश की सम्भावनाएँ संसार के सिर पर मँडराती दिखाई देती हैं, उसका मूलभूत कारण मनुष्य की हृदयहीनता ही है, जिसको उसने पशु-पक्षियों पर अत्याचार करने के फलस्वरूप पाया है। जब तक मनुष्य अपने में जीव दया, समस्त प्राणियों के प्रति सहानुभूति की वृत्तियों का विकास नहीं करेगा, बहुत कुछ भौतिक उन्नति कर लेने पर भी वह वास्तविक सुख-शाँति की प्राप्ति नहीं कर सकता। उसका आत्मिक, आध्यात्मिक,धार्मिक तथा सामाजिक जीवन यों ही हिंसा की आग में जल-जलकर नष्ट होता रहेगा। धर्म का मूल दया है और सच्ची सुख-शाँति का निवास प्रेम, सहानुभूति, सहृदयता में है, क्रूरता अत्याचार अथवा निर्दयता में नहीं।

जो व्यक्ति अन्य पशु-पक्षियों के प्रति सहानुभूति एवं दया का भाव नहीं रख सकता वह संसार में किसी के प्रति सद्भाव रखने में असमर्थ ही रहेगा। जहाँ सुमति एवं सद्भावनाएँ हैं, सुख-सम्पत्ति का निवास एवं विकास वहीं सम्भव है। जहाँ अन्याय, अत्याचार, निर्दयता एवं स्वार्थपरता है वहाँ विनाश का ही बोलबाला रहेगा यह एक सत्य एवं शाश्वत सिद्धान्त है।

मनुष्य पशु-पक्षियों पर कितना और किस-किस प्रकार अत्याचार करता है, किस बुरी तरह से उनका उत्पीड़न कर रहा है इसको आये दिन सामान्य जीवन में देखा जा सकता है। तिस पर यह और भी दुःख एवं खेद की बात है कि मनुष्य का यह अत्याचार उन्हीं पशु-पक्षियों पर चल रहा है जो उसके लिये उपयोगी, उसके मित्र, सेवक तथा सुख-दुःख के साथी तथा बच्चों की तरह ही भोले, निरीह और आज्ञाकारी हैं।

गाय, बैल, भैंस, भैंसा, घोड़ा, गधा, बकरी आदि मनुष्य के युग-युग के साथी और बहुत ही उपयोगी साधन हैं। किन्तु मनुष्य उन पर कितना अत्याचार करता है, यह किसी से छिपा नहीं है। गाय पालते हैं, उससे दूध प्राप्त करते हैं पर साथ ही उसे घटिया तरह का चारा देते और बूढ़ी अथवा दूध न देने की स्थिति में हो जाने पर या तो मारकर घर से निकाल देते हैं अथवा कसाई के हाथ कटने को बेच देते हैं। इतना ही नहीं, उसके जरा भी गलती करने पर अथवा कोई अप्रिय अभिव्यक्ति करने पर उस पर यह सोचे बिना डण्डे बरसाने लगते हैं कि आखिर यह है तो एक पशु ही, गलती कर सकती है। ग्वाले, चरवाहे अथवा वरधिये जब गायों का झुण्ड लेकर चलते हैं तब वे यों ही स्वभावतः किसी-न-किसी गाय अथवा बछड़े पर मार लगाते ही चलते हैं। उनको आसानी से हाँक कर अथवा घेरकर ठीक रास्ते पर रक्खा जा सकता है। किन्तु फिर भी जरा भी इधर-उधर होने पर गाय-बछड़ों पर लट्ठ तोड़ देते हैं। अपने खेत पर आ जाने पर तो लोग दूसरों के जानवरों को इस बुरी तरह मारते हैं कि बेचारे कभी-कभी तो चीखकर गिर तक पड़ते हैं।

बैल-भैंसों पर तो मनुष्य का अत्याचार देखकर यही भान होता है कि यह बेचारे पशु अपने पूर्व-पापों का दण्ड पा रहे हैं और इनका वाहक मनुष्य न होकर मनुष्य रूप में यमराज है जो कि इन्हें असहनीय यन्त्रणा दे रहा है। जेठ की दोपहरी में गाड़ी-ठेले पर तीस-तीस मन बोझ ढोने अथवा हल में चलने वाले अधिकाँश बैल-भैंसों के कन्धे घायल रहते हैं, वे जुआ अथवा हल की रगड़ से कट जाते हैं किन्तु उनका क्रूर स्वामी उसकी कोई परवाह न कर उन्हीं घायल कन्धों पर जुआ रख देते हैं, जिससे उस पीड़ित पशु के कन्धों में स्थायी घाव हो जाता है जो फिर आजीवन अच्छा नहीं होता। मक्खियाँ, कौवे तथा अन्य चिड़ियाँ उसके उस निर्जीव एवं घायल कन्धों को नोच-नोच कर खाती रहती हैं किन्तु क्रूर मनुष्य उसकी कोई चिन्ता नहीं करते।

इक्के-ताँगों में जुतने वाले घोड़ों की दशा देखकर रोना आता है। एक तो उनका मालिक उन्हें भरपेट खाना नहीं देता, जिससे वे यों ही बड़े रोगी तथा निर्बल रहते हैं। तिस पर मजदूरी के लोभ से आठ-आठ, दस-दस सवारियाँ भरते हैं और जब बेचारा जानवर ठीक से नहीं चल पाता तो उसे चाबुक अथवा डण्डों से बुरी तरह मारते हैं। न जाने कितने भूखे, प्यासे, कमजोर और बोझ से दबे घोड़े नित्यप्रति सड़कों पर गिरकर या तो मर जाते हैं या अंग-भंग हो जाते हैं। जो घोड़े इस प्रकार की मनुष्य-सम्भावित दुर्घटना के शिकार होकर मर जाते हैं वे एक प्रकार से भाग्यवान् ही होते हैं। किन्तु जो लंगड़े-लूले अथवा घायल होकर बच जाते हैं, उनकी यातना सौ गुनी बढ़ जाती है। निर्दयी इक्के-ताँगे वाले उन्हीं घायल घोड़ों को फिर जोड़ देते हैं और डण्डे के जोर से चलने को विवश करते हैं।

बेचारी घोड़यों की दशा तो और भी बुरी होती है। उन्हें वे सब अत्याचार तो सहन ही करने पड़ते हैं, जो घोड़ों को सहने होते हैं, इसके अतिरिक्त सद्यजातिका अथवा आसन्न प्रसवा होने पर भी उन्हें इक्के-ताँगों में भरी बेहिसाब सवारियों को ढोना पड़ता है। एक तो प्रसव अथवा गर्भ की पीड़ा से यों ही पीड़ित, तिस पर सवारियों का बोझ और उस पर डण्डों की मार। भला उस बेचारी की क्या दशा होती होगी, उसे तो वही जान सकती है अथवा सहृदय मनुष्य अपनी संवेदना के अनुपात से कुछ अनुभव कर सकता है। अनेक बार तो सवारियों को खींचते-खींचते गर्भवती घोड़ियों का प्रसव सड़कों पर ही हो जाता है अथवा यन्त्रणा से उनका गर्भपात हो जाता है। इसी प्रकार की यन्त्रणा बकरी, भैंस, भेड़ आदि हर उपयोगी पशु को सहन करनी पड़ती है।

पक्षियों का उत्पीड़न भी पशुओं से कम नहीं होता है। उन्हें पिंजड़े में बन्दी बनाकर रखना, बाँधकर अड्डों पर पालना, नशा पिलाकर लड़ाना और यहाँ तक लड़ाना कि जब तक वे मर न जायें, पक्षियों का उत्पीड़न ही तो है। मुर्गा, तीतर, बटेर तथा बुलबुल की लड़ाइयों को तो एक मनोरंजन बना लिया गया है।

इस प्रकार जिधर भी दृष्टि जाती है पशु-पक्षियों तथा कीट-पतंगों का उत्पीड़न दृष्टिगोचर होता है। जानवर-जानवर का या कीट-कीट का ऐसा उत्पीड़न नहीं करते जितना कि प्राणियों का उत्पीड़न संसार का सिरमौर कहा जाने वाला मनुष्य किया करता है। पशुओं का उत्पीड़न करना पाशविक ही नहीं, पैशाचिक वृत्ति है जिसका सुधार मनुष्य को करना ही चाहिए।


ज्ञान का विकास एवं प्रसार एक महान पुण्य कार्य है।

उन्नति एवं प्रगति की आधारशिला मनुष्य के अपने विचार ही हैं। विचारों के अनुरूप ही उसका जीवन बनता-बिगड़ता है। विचारहीन मनुष्य प्रकृति-प्रेरणाओं के आधार पर अन्य मानवेत्तर जीवों की तरह ही अनुन्नत जीवन यापन किया करता है। वह उन सद्प्रवृत्तियों के सुख से सदैव वंचित रहा करता है, जो उच्च विचारों की प्रेरणा से किसी सुसंस्कृत मनुष्य में विकसित होती रहती हैं।

विचार-साँचे की तरह मनुष्य-जीवन को अपने अनुरूप ढाल लिया करते हैं। मनुष्य का जो भी रूप उसके सामने आता है, वह विचारों का ही प्रतिबिम्ब हुआ करता है। सुख-दुःख, सफलता-असफलता, उन्नति-अवनति, प्रसन्नता-खिन्नता अथवा तुच्छता-महानता की जो भी स्थिति प्राप्त होती है वह विचारों का ही प्रतिफल होता है। भूत, भविष्यत्, वर्तमान में मनुष्य जिस प्रकार भी रहा है, रहेगा अथवा रह रहा है उनका मूलभूत कारण विचार ही हैं। मनुष्य के विचार ही उसका स्वर्ग और विचार ही जीता-जागता नरक बना करते हैं।

मनुष्य जिस दिशा में बढ़ना अथवा प्रगति करना चाहता है, उसी के अनुरूप उसे अपने विचारों का निर्माण करना होता है। जिसके विचार अधोगामी हैं, उसका जीवन ऊर्ध्वगामी नहीं हो सकता और जिसके विचार ऊर्ध्वगामी हैं, उसका जीवन उन्नत दिशाओं में ही आगे बढ़ेगा। धार्मिक अथवा आध्यात्मिक जीवन प्राप्त करने का एकमात्र उपाय है—तदनुसार अपने विचारों को बनाना।

विचारों में अपार शक्ति सन्नहित रहा करती है, वे मनुष्य की क्रियाशीलता को उत्तेजित एवं प्रेरित करते हैं। आशावादी, उन्नत, उदार तथा धार्मिक विचार मनुष्य को आत्म-विकास की ओर बढ़ाते हैं, जबकि निम्न एवं निकृष्ट विचार उसे पतन के अपावन गर्त में गिरा देते हैं।

अपने आन्तरिक एवं बाह्य-जीवन को तेजस्वी, प्रखर, पूर्ण तथा पुरोगामी बनाने के लिये अपनी विचार-शक्ति को विकसित एवं परिमार्जित करना होगा। यह कार्य उन्नत विचारों के संपर्क में आने से ही पूरा हो सकता है। धार्मिक एवं आध्यात्मिक जीवन-पद्धति सिद्ध करने के लिए ऐसे महान् पुरुषों एवं चरित्रवान व्यक्तियों के संपर्क में आना, उनका सत्संग का लाभ उठाकर उनके सद्विचारों एवं सदाचरण से अपने आचार-विचार को प्रभावित करना होगा। जिस प्रकार व्यवसायी की संगत से मनुष्य व्यावसायिक, व्यभिचारी के कुसंग से व्यसनी एवं दुराचारी बन जाता है, उसी प्रकार धर्म-निष्ठा सत्पुरुषों का सत्संग उसे एवं आत्म-कल्याण के लिये आवश्यक है कि मनुष्य महामना सदाचारियों का सत्संग करे और असद् व्यक्तियों से बचता रहे।

किसी को महान् व्यक्ति समझकर विचार-लाभ के लिये उसके संपर्क में आने और उसके विचारों में विश्वास करने से पूर्व आज इस बात की छान-बीन कर लेना आवश्यक है कि अमुक व्यक्ति वाणी से ही नहीं, आचरण से भी महान् है। आज-कल सत्संगों के नाम पर जगह-जगह ढोंगियों के ढोल बजते सुनाई देते हैं। अपनी वाचालता के बल पर जिधर देखो उधर ही रंगे स्यार लोगों में प्रवचन एवं प्रचार करते दीख पड़ते हैं। तत्व-ज्ञान के नाम पर न जाने कितनी बकवास रात-दिन होती रहती है। अनेक लोगों के उपदेशों में शास्त्र-सम्मत कुछ सार भी होता है, तो उनका आचरण तद्रूप नहीं होता। इस आडम्बरपूर्ण कोलाहल में मन-वचन-कर्म से शुद्ध सत्पुरुषों को खोज निकालना बहुत कठिन हो गया है। ऐसे सत्संग-योग्य सत्पुरुषों की संख्या बहुत विरल हो गई है, जो अपनी वाणी एवं कर्म की एकरूपता से हमारे बाह्य एवं आन्तरिक दोनों जीवनों को प्रेरणा देकर प्रकाशपूर्ण दिशा में अग्रसर कर सकें।

यदि एक-दो ऐसे प्रकाश-स्रोत कहीं पर हों भी, तो दूरवर्ती लोगों के लिये उनके पास पहुँच सकना और सत्संग का लाभ उठा सकना सरल नहीं है। इस व्यस्त और महंगे समय में लोगों के पास अतिरिक्त पैसे तथा अवकाश का नितान्त अभाव है। फिर महापुरुषों के पास भी इतना समय कहाँ, जो दूर देशों से आये जिज्ञासुओं पर्याप्त समय दे सकें और यदि किसी प्रकार वे समय निकालकर घण्टा-दो घण्टा दे भी दें, तो वर्षानु वर्ष के निरन्तर सत्संग से समझ में आने वाली जीवन-दर्शन जैसी गूढ़ समस्या उतने अल्प समय में हल भी नहीं हो सकती। अस्तु, जीवन एवं विचार विकास के लिये साक्षात सत्संग की सम्भावनाएँ नहीं के बराबर ही रह गई हैं।

अब सद्ज्ञान के जिज्ञासुओं के लिये केवल एक ही विकल्प शेष रह गया है और वह है—स्वाध्याय। लोग सत्पुरुषों की लिखी पुस्तकों का अध्ययन करें और उन्नति की ओर प्रेरित करने वाले विचारों को ग्रहण करें और उनके अनुसार अपने जीवन की रीति-नीति निर्धारित करते चलें।

महापुरुषों से सत्संग का आशय उनके विचारों के संपर्क में आने से ही है, न कि उनके शरीर से साक्षात्कार प्राप्त करने से। जो लाभ सन्त-महात्माओं के पास जाकर उठाया जा सकता है, वही लाभ उनकी पुस्तकें पढ़कर भी प्राप्त किया जा सकता है। वैचारिक लाभ के लिए आवश्यक नहीं कि उनके व्यक्तिगत संपर्क में आया ही जाये।

पुस्तकों के माध्यम से संसार के किसी भी सद् विचारक का किसी भी समय और किसी भी तरह संग प्राप्त किया जा सकता है। जिस विद्वान् की पुस्तक आपके पास है, वह विचाररूप में हर समय आपके पास उपस्थित है। पुस्तकों द्वारा आप ऐसे दिवंगत महात्माओं से संपर्क स्थापित कर सकते हैं, जिनको संसार से गये सदियाँ बीत चुकी हैं। यदि आप स्वाध्यायशील हैं और आपको पुस्तक रखने का चाव है, तो आपकी रुचि अथवा लक्ष्य का विचारक किसी समय आपसे दूर नहीं है। यदि आप उनसे आधी-रात को भी मिलना और उनके विचार जानना चाहें, तो अपने संकलन से उनकी पुस्तक निकाल लीजिये। पृष्ठ उलटिये और वे आपसे बातें करने, अपने विचार प्रकट करने लगेंगे। पुस्तकों द्वारा महापुरुषों का सत्संग स्वाध्यायशीलता के बल पर, आज सरलतापूर्वक पाया जा सकता है।

पुस्तकों का अध्ययन न केवल विचार-विकास द्वारा जीवन को समुन्नत करने का एक उपाय मात्र ही है, बल्कि एक पुण्य-कर्म भी है।

देवताओं की पूजा किसलिए की जाती है? इसलिये कि उनकी कृपा—आशा, उत्साह,चरित्र एवं पवित्रता के रूप में हमें प्राप्त हों, जिसके आधार पर हम अपने जीवन को सफल, समृद्ध एवं उन्नत बना सकें। सद्ग्रन्थ भी अपने जीते-जागते देवता ही होते हैं। उनकी कृपा से मनुष्य को ज्ञान का प्रकाश मिलता है। सत्प्रेरणा तथा मार्ग-दर्शन का लाभ होता है। प्रेरणादायक पुस्तकें निराशा का अन्धकार दूरकर, हृदय में आशा और उत्साह का संचार करती है। उनके पढ़ने से हृदय को हर्ष, आत्मा को प्रसन्नता मिलती है। परमात्मा भी ज्ञान-रूप ही है। योगी और साधक उसे अपने अन्तःकरण में ही अनुभव करते हैं। ज्ञान, मुक्ति का साधन है जो कि हमको अच्छी पुस्तकों की उपासना करने, उन्हें पढ़ने से सहजरूप में ही प्राप्त हो सकता है।

महापुरुषों, महात्माओं एवं पुण्य प्राण विद्वानों का आदर-सम्मान करना, उनकी शिक्षा मानना, उपदेश सुनना, हृदयंगम करके उन्हीं के अनुसार जीवन-क्रम का निर्माण करना निश्चय ही पुण्य-कर्म है जो कि मनुष्य को उच्च से उच्चतर आध्यात्मिक कक्षा में पहुँचा देता है। पुस्तकों में विद्वानों एवं महात्माओं की आत्मा निवास करती है, जिसकी उपासना करने से लाभ होता है और मनुष्य उन जैसे आदर्शों का अनुयायी बन जाता है।

आत्मोत्थान के लिये किये जाने वाले धर्म-कर्मों तथा साधन-साधनाओं में स्वाध्याय के लिये महत्वपूर्ण सद्ग्रन्थ पढ़ने से हृदय में निर्मलता और मन में एकाग्रता की वृद्धि होती है। विवेक उज्ज्वल और बुद्धि प्रखर होती है। मन को संयमित एवं सुशील बनाने में पुस्तकों का अध्ययन बड़ी सीमा तक सहायक होता है। निरन्तर प्रेरणाप्रद, जीवनोंपवागी पुस्तकें पढ़कर तन्मयता का गुण सहज रूप से बढ़ाया जा सकता है। सदाचार, सद्विचार तथा सद्वृत्तियाँ बढ़ाने में तो पुस्तकों का योगदान सबसे अधिक रहता है। पुस्तकों का अध्ययन अक्षर-ब्रह्म की उपासना ही है, जिसका पुण्य मनुष्य को आध्यात्मिक भावों से ओत−प्रोत कर दिया करता है।

पुस्तकें देवता हैं तो उनका निवास-स्थान पुस्तकालय देव मन्दिर होने ही चाहिये। इनकी स्थापना करना, इनको सहायता सहयोग देना भी एक महान् धर्म-कृत्य है। देव-मन्दिरों के समान ही ज्ञान-मन्दिरों की स्थापना भी सार्वजनिक आत्मोद्धारा का पुण्य कार्य है। मन्दिरों में जाकर जिस प्रकार लोगों की प्रवृत्तियों में पवित्रता का समावेश हो जाता है, उसी प्रकार पुस्तकालयों में प्रवेश करने पर भी लोगों के विचार अनायास ही ऊर्ध्वगामी होने लगते हैं। इस प्रकार का भावनात्मक प्रभाव जीवन-विकास में बड़ा ही उपयोगी सिद्ध होता है।

आत्म-कल्याण चाहने वाले ‘लोगों में धर्म-कर्म की इच्छा रहती है। वे मोक्ष, स्वर्ग अथवा मुक्ति पाने की इच्छा से अनेक परोपकार के कार्य किया करते हैं। देव मन्दिरों की स्थापना, मूर्तियों की प्रतिष्ठा, धर्मशाला, कुआँ, तालाब आदि का निर्माण करना ऐसे ही जनोपयोगी धर्मकृत्य हैं, जिससे पुण्य प्राप्त होने की आशा रहती है। किसी का कष्ट-निवारण करना, सेवा-सहायता करना भी वे परोपकारी कार्य हैं, जिनकी गणना परमार्थ में ही की जाती है।

ज्ञान रुपी परमात्मा के मन्दिर पुस्तकालयों की स्थापना करके अथवा उनकी स्थापना में सहयोग-सहायता देकर भी उसी प्रकार का पुण्य-लाभ किया जा सकता है। अँधेरे मार्गों में प्रकाश का प्रबन्ध करा देने के ही समान अज्ञानान्धकार में भटकती जनता के लिये पुस्तकालय जैसे प्रकाश-गृह की स्थापना करा देने से बढ़कर और कौन-सा पुण्य हो सकता है? संसार में हजारों-लाखों प्रकार के दुःख तथा कष्ट हैं, किन्तु अज्ञान का दुःख सबसे बड़ा माना गया है। अज्ञान से ग्रस्त मनुष्य की आत्मा का त्रास अकथनीय है। अज्ञानी मनुष्य का न कहीं आदर होता है और न उसका कोई प्रयास ही सफल होता है। अज्ञान ही वह मूल-बीज है, जिसमें नाना प्रकार के दुःख, क्लेशों का जन्म होता है। निराशा, अवसाद, विषाद, निरुत्साह, काम, क्रोध, लोभ, मोह, आदि विकारों का असहनीय दुःख अज्ञान के कारण ही उत्पन्न होता है। जीवन की सारी समस्याओं, प्रतिकूल परिस्थितियों, द्वेष-द्रोह एवं संघर्ष की घटनाओं के मूल में अज्ञान की ही प्रेरणा रहती है। अज्ञान का अन्धकार अजगर की तरह मनुष्य के सम्पूर्ण जीवन को घेरकर मूर्छित कर देता है, जिससे आत्मोद्धार के पावन लक्ष्य की ओर अग्रसर होना तो दूर, मनुष्य सामान्य जीवन-क्रम को भी ठीक से नहीं चला पाता है। अज्ञान से बड़ा दुःख इस संसार में कोई नहीं है। अज्ञान का पाप मनुष्य के लोक-परलोक दोनों को बिगाड़ देता है। इतने बड़े दुःख से मनुष्य की आत्मा का उद्धार करने में सहायक होने से बड़ा कौन-सा परोपकार,परमार्थ अथवा पुण्यकार्य हो सकता है।

सद्ग्रन्थों की उपासना और पुस्तकालयों की स्थापना आज के युग में दो बड़े पुण्य-कार्य हैं। परमार्थ द्वारा आत्म-कल्याण की कामना रखने वाले लोगों को इन दोनों कार्यों को अपने जीवन-क्रम का एक भाग बना लेना चाहिये। घरों में व्यक्तिगत रूप से छोटे-छोटे पुस्तकालय ज्ञानमन्दिर के नाम से स्थापित किये जा सकते हैं। ग्राम-क्षेत्र अथवा नगर के अनेक लोग पारस्परिक सहयोग-सहायता एवं अनुदान देकर सामूहिक रूप से सार्वजनिक ज्ञान-मन्दिर की स्थापना करके पुण्य-लाभ के भागी बन सकते हैं। धन, भूमि, उपकरण, सुविधाएँ, सामग्री तथा पुस्तकें देने के साथ-साथ लोग अपनी स्थिति के अनुसार श्रम एवं समय-दान देकर भी पुण्य के भागी बन सकते हैं।

किन्तु इन ज्ञान-मन्दिरों की स्थापना की सार्थकता तभी है, जब इनमें केवल जीवनोपयोगी सत्साहित्य ही रखा जाये और लोगों में उसे पढ़ने की प्रेरणा भरी जाये।

कन्धे पर पुस्तकों का झोला लटकाये जब वे जनता में ज्ञानार्जन को जाग्रत करने के लिए पुस्तकें बाँटते और वापस लेते घूमेंगे, तो निस्संदेह उनका यह साधारण-सा प्रयास भी शंकराचार्य की भाँति ही होगा, जो उन्होंने गली-गली घूमकर वितंडावाद से प्रताड़ित सत्य-धर्म का उद्धार करने के लिये किया था। अतः स्वयं से लेकर सार्वजनिक ज्ञान-वर्धन का पुण्य अर्जन कर आत्मोद्धार का मार्ग प्रशस्त ही करना चाहिए।


सत्पुरुषों के प्रेरणाप्रद संस्मरण

जगद्गुरु शंकराचार्य की धर्म-निष्ठा

जगद्गुरु शंकराचार्य ने व्यवस्था और वंश-परम्परा के विपरीत अल्पायु में ही संन्यास ले लिया, इससे उनकी जाति के लोग बड़े रुष्ट हुए। उन्होंने शंकराचार्य का सामाजिक बहिष्कार करने का निश्चय किया। इसके लिये वे अवसर की प्रतीक्षा करने लगे।

जगद्गुरु उत्तर भारत का परिव्राजन कर रहे थे, तभी उनकी माँ बीमार पड़ीं। कोई भी कुटुम्बी उनकी सेवा-सुश्रुषा के लिये पास न गया। शंकराचार्य को समाचार मिला, वे घर आये। उनको देखकर तृप्त हुई माताजी सन्तोषपूर्वक स्वर्ग सिधार गई। इधर दाह संस्कार के लिए कोई भी नहीं आया। कुटुम्बियों का ख्याल था कि शंकराचार्य अपनी भूल पर पश्चाताप करेंगे और उसकी क्षमा माँगेंगे, पर वह कल्पना निरर्थक सिद्ध हुई । जगद्गुरु अपने मार्ग से विचलित न हुए।

शव को अकेले उठाकर ले जाना कठिन था, इसलिए उन्होंने उसके तीन टुकड़े किये और एक-एक टुकड़े को श्मशान घाट तक ले गये और दाह-क्रिया सम्पन्न की, पर किसी से क्षमा-याचना नहीं की। उन्होंने कहा—’धर्म कायरों के लिये नहीं है, मैंने संन्यास-समाज के लिये ग्रहण किया है अतएव किसी से क्षमा नहीं माँग सकता।” इस निष्ठा से अन्त में कुटुम्बी पराजित हुए। उसी का प्रभाव है कि मद्रास के नम्बूद्रीपाद ब्राह्मण अभी तक अपने शवों पर खंड परिचायक तीन लकीरें खींचते आ रहे हैं। परिस्थितियों से विचलित न होने वाला व्यक्ति ही सच्चा धर्म निष्ठा होता है।

अपना-अपना कर्तव्य

“माँ! मुझे बड़े भाई ने मारा है।” रोते हुए गान्धी जी ने अपनी माता से शिकायत की। तब उनका बचपन था। माँ ने प्यार से बापू के सिर पर हाथ फेरा और कहने लगीं—” मैं क्या करूं बेटा! तूभी उसे मार।” गान्धी जी बिगड़कर बोले—स्वयं तो मारने वाले को रोकती नहीं और मुझे भी मारने की शिक्षा देती है । तू ही बता, क्या मुझे बड़े भाई पर हाथ उठाना चाहिए। माताजी बड़ी लज्जित हुई, उन्होंने गाँधीजी के कथन की यथार्थता को अनुभव किया।

पेट है, कब्रिस्तान नहीं

जार्ज बर्नाड शा एक प्रीतिभोज में सम्मिलित हुए। भोजन परोसा जाने लगा। जब माँस उनकी थाली में डाला गया, तो वे उठ खड़े हुए और चलने की तैयारी करने लगे। लोगों में खलबली मच गई। मेजबान ने पूछा—हमसे कोई गलती हुई हो तो कहें? उन्होंने माँस की ओर इशारा करते हुए कहा—”महाशय! मेरा पेट कोई कब्रिस्तान नहीं है जो यह मुर्दा परोसा गया है।” यह कहकर वे घर चले आये।

पुत्र और परमेश्वर

विनोबा के पिता सहृदय व्यक्ति थे। वे प्रायः असहाय बच्चों को ले आया करते थे। उन बच्चों की घर में वैसी ही खातिरदारी की जाती थी जैसे घर के सगे बच्चों के साथ। एक बार ऐसा ही एक लड़का घर में रह रहा था। सेवा-सत्कार का सारा भार विनोबाजी की माताजी पर था। कभी-कभी दोपहर की रोटी बच जाती, तो वह विनोबा को दी जाती, उस बच्चे को नहीं। विनोबा ने एक दिन अपनी माता से कहा—”अभी तो तेरा भेदभाव मिटा नहीं, मुझे बासी रोटी देती है और उस लड़के को ताजी।” विनोबा की माताजी ने बड़ा मार्मिक जवाब दिया। कहने लगीं—”वह मुझे परमेश्वर स्वरूप दीखता है, तू पुत्र स्वरूप दीखता है। तुझमें मेरी आसक्ति है, इसलिए पक्षपात तो होगा ही। जब तू भी परमेश्वर हो जायेगा तो यह भेदभाव अपने आप बन्द हो जायेगा।”

गायत्री की उच्चस्तरीय साधना-


गायत्री महाशक्ति का स्वरूप और रहस्य

(यह लेख-माला अगले पाँच वर्ष तक नियमित रूप से चलती रहेगी। गायत्री महाशक्ति के रहस्यों पर इन लेखों में महत्वपूर्ण प्रकाश पड़ेगा। अगले अंकों को सुरक्षित रखा जा सके, तो पाठकों को आध्यात्मिक विद्या का एक सर्वांग सुन्दर ग्रन्थ मिल जायेगा।)

गायत्री महामन्त्र भारतीय तत्वज्ञान एवं अध्यात्म-विद्या का मूलभूत आधार है। चारों वेदों में उन्हीं 24 अक्षरों की व्याख्या हुई है। वट-वृक्ष की समस्त विशालता उसके नन्हे-से बीज में जिस प्रकार सन्निहित रहती है, उसी प्रकार वेदों में जिस अविच्छिन्न ज्ञान-विज्ञान का विशद् वर्णन है, उसे बीज-रूप से गायत्री मन्त्र में पाया जा सकता है।

भारतीय धर्म में प्रचलित उपासना-पद्धतियों में सर्वोत्तम गायत्री ही है। उसे अनादि माना गया है। देवता, ऋषि, मनीषी उसका अवलम्बन लेकर आत्मिक प्रगति के पथ पर आगे बढ़े हैं और इसी आधार पर उन्होंने समृद्धियाँ, सिद्धियाँ एवं विभूतियाँ उपलब्ध की हैं। हमारा प्राचीन इतिहास बड़ा गौरवपूर्ण है। इस गौरव-गरिमा का श्रेय हमारे पूर्व पुरुषों द्वारा उपार्जित आत्म-शक्ति को ही है। कहना न होगा कि इस दिव्य उपार्जन में गायत्री महामन्त्र का ही सर्वोत्तम स्थान है।

स्थूल प्रकृति की शक्तियों का वैज्ञानिकों ने बहुत कुछ पता लगा लिया है, यद्यपि जो खोज शेष है वह प्राप्त उपलब्धियों की तुलना में कहीं अधिक है, फिर भी निस्सन्देह इस दिशा में बहुत प्रयत्न हुआ है। जो सफलता मिली है, वह सराहनीय है। प्राचीनकाल के तत्वदर्शी विज्ञानवेत्ता भौतिक विज्ञान की शक्ति और उसके उपार्जन की कष्ट साध्य प्रणाली से भली-भाँति परिचित थे, इसलिये वे उसे बाल क्रीड़ा जैसी उपहासास्पद एवं उपेक्षणीय मानते थे। उनकी दृष्टि में सूक्ष्त जगत और उसमें सन्निहित अद्भुत, अनुपम एवं दिव्य शक्तियों की महत्ता थी, इसलिए उन्होंने अपना सारा ध्यान उसी ओर लगाया था, श्रम भी उसी दिशा में किया था। फलस्वरूप पाया भी इतना अधिक था कि धरती पर स्वर्ग अवतरित करना, मनुष्य में देवत्व का दर्शन करना, सम्भव हो सका था।

आज के वैज्ञानिक जिस प्रकार भौतिक शक्ति यों का पता लगाकर उनका उपयोग यन्त्रों द्वारा कर रहे हैं, और अपनी सफलता से मानव-जाति को लाभान्वित कर रहे हैं, उसी प्रकार प्राचीन काल के तत्वदर्शी वैज्ञानिकों ने—ऋषियों ने चेतन-जगत में समाविष्ट एक-से-एक महत्तर शक्तियों की जानकारी प्राप्त की थी और उनके उपयोग का लाभ मानव-जाति को दिया था। इस प्रकार की उनकी अगणित उपलब्धियों में गायत्री-शक्ति का मानव-उपयोग के लिए अवतरण हो सकना, एक बहुत बड़ा वरदान है।

जड़ जगत् में काम करने वाली विद्युत, गुरुत्वाकर्षण, अणु-विकिरण, ब्रह्माँड व्यापी ईथर, उद्भव और विलय आदि अगणित शक्तियों का पता लगाया गया है। उसी प्रकार चेतन जगत में व्याप्त शक्ति-पुँजों में से जितना कुछ ढूँढ़ा जा सका है उसका महत्व, उपयोग एवं परिणाम इतना अधिक है कि यदि उसमें से कोई थोड़ा-सा भी उपयोग कर सके तो अपने व्यक्तित्व को सुनिश्चित करते हुए महामानव, अतिमानव, नरदेव एवं नर-नारायण बन सकता है।

अणु-समूह की गतिशीलता से उस भौतिक जगत का सारा क्रिया−कलाप चलता है। उसी प्रकार सूक्ष्म जगत के महदाकाश में चेतना की एक अविच्छिन्न धारा बहती है उसी के फलस्वरूप जीवन के जितने भी स्वरूप विकसित एवं अविकसित जीवों में पाये जाते हैं वे उस दिव्य चेतना की गतिशीलता ही प्रदर्शन करते हैं। इस अचिन्त्य, अगोचर, अनुपम, विश्व ब्रह्माण्ड में लहराती हुई चेतना का नाम ‘ब्रह्म’ है। ब्रह्म इस समस्त विश्व ब्रह्माण्ड में व्याप्त है। कोई कण उसकी उपस्थित से रहित नहीं। भौतिक जगत की गतिविधियों की प्रेरणा इस ब्रह्म से ही मिलती है। आइन्स्टीन प्रकृति चोटी के गण्यमान्य वैज्ञानिकों ने निस्संकोच भाव से यह स्वीकार किया है कि प्रकृति को सक्रिय रखने वाली अणु गति शीलता वस्तुतः किसी अज्ञात चेतनशक्ति के नियन्त्रण में काम करती है और उसी की शक्ति का अनुदान लेकर यह निर्जीव संसार सजीव जैसी चेष्टा कर रहा है। आज के वैज्ञानिक भले ही उस ब्रह्म-चेतना का स्वरूप ठीक तरह समझने में समर्थ न हो पा रहे हों, पर वह दिन दूर नहीं, जब उसका अस्तित्व भावना क्षेत्र तक सीमित न रहकर स्थूल जगत में भी प्रत्यक्ष अनुभव किया जाने लगेगा। भारतीय तत्वदर्शियों ने इस ब्रह्म-चेतना की सत्ता चिर अतीत में ही जान ली थी और उस शक्ति के मानव जीवन में उपयोग करने की प्रक्रिया का एक व्यवस्थित विधान बनाकर मानव प्राणी के नगण्य अस्तित्व को इतनी महत्तम स्थिति में परिणित किया था, जिससे स्वयं तक ब्रह्मभूतं हो सकें। इस विज्ञान का नाम ‘अध्यात्म’ रखा गया।

नगण्य दृष्टिगोचर होने वाली अणु आत्मा जिस प्रक्रिया का अवलम्बन करने से विभु बन सके, नर से नारायण के रूप में विकसित हो सके—परम आत्मा— परमात्मा बन सके, उस विद्या का नाम अध्यात्म अथवा ब्रह्म विद्या रखा गया। ब्रह्म अपने आप में दृष्टा मात्र है। वह ऐसा है तो सही पर अपनी महत्ता एवं गरिमा के अनुरूप उत्पादन एवं व्यवस्था की प्रक्रिया का भी निर्धारण करता है। उसकी सक्रियता शक्ति-यद्यपि उसी का अंग है तो भी उसकी क्रिया प्रणाली की भिन्नता देखते हुए उसे ब्रह्म की पूरक—सामर्थ्य भी कहा जा सकता है।

पुराणों में गायत्री महाशक्ति का निरूपण ब्रह्मा जी को पत्नी के रूप में हुआ। ब्रह्म अर्थात् ब्रह्म—पत्नी, अर्धांगिनी, अर्थात् क्षमता। पौराणिक उपाख्यान के अनुसार अलंकार यह है कि ब्रह्माजी की दो पत्नी थीं, एक गायत्री दूसरी सावित्री। गायत्री अर्थात् चेतन जगत में काम करने वाली शक्ति । भौतिक विज्ञान सावित्री उपासना का विधान प्रस्तुत करता है। विभिन्न प्रकार के वैज्ञानिक आविष्कार एवं उपकरण सावित्री शक्ति की अनुकम्पा के ही प्रतीक हैं। गायत्री वह शक्ति है जो प्राणियों के भीतर विभिन्न प्रकार की प्रतिभाओं, विशेषताओं और महत्ताओं के रूप में परिलक्षित होती है। जो इस शक्ति के उपयोग का विधान—विज्ञान ठीक तरह जानता है वह उससे वैसा ही लाभ भी उठाता है जैसा कि भौतिक जगत के वैज्ञानिक अपनी प्रयोगशालाओं, मशीनों तथा कारखानों के माध्यम से उपार्जित करते हैं।

सामान्य स्थिति का नरपशु व्यक्तित्व की दृष्टि से विकसित होकर मानव, महा-मानव, अति-मानव बनता है तो उसे अनन्त चैतन्य सागर में कल्लोल करने वाली इस ब्राह्मी शक्ति का ही आश्रय लेना पड़ेगा। आकाशवाणी के विभिन्न स्टेशनों से विभिन्न स्तरों पर, विभिन्न अभिभाषण प्रसारित होते रहते हैं। हमारा रेडियो यंत्र यदि निष्क्रिय पड़ा हो तो उसमें कोई ध्वनि सुनाई न देगी, पर यदि उसमें बिजली चालू कर दी जाय और सुई निर्धारित मीटर पर लगादी जाय तो जिस भी स्टेशन का प्रसारण मन्द या तीव्र ध्वनि में सुनना हो सुना जा सकेगा। ठीक इसी प्रकार ब्राह्मी महाशक्ति—गायत्री-सर्वव्यापक होते हुए भी असम्बद्ध लोगों का कोई विशेष हित साधन नहीं कर पाती, पर जो उसके साथ अन्तः चेतना को जोड़ देते हैं वे उस धारा का अवतरण अपने में होता हुआ देखते हैं और उसका लाभ उठाते हैं। गायत्री उपासना की शास्त्रोक पद्धति एक ऐसी ही वैज्ञानिक प्रणाली है जो जीव को ब्राह्मी सत्ता के साथ जोड़कर वैसा ही लाभ उठाने का अवसर प्रस्तुत करती है जैसा कि खाली तालाब भरे तालाब के साथ नाली द्वारा जोड़ दिया जाय तो कुछ ही देर में जल से भर जाने का लाभ ले लेता है।

यों साधारण उपासना क्रम में गायत्री को एक देवी के रूप में चित्रित, अंकित किया गया है। त्रिकाल संध्या में ब्राह्मी, वैष्णवी, शाँभावी आकार-प्रकार में उसका ध्यान भजन किया जाता है। माता के रूप में उसकी भावना करते हैं और नारी आकृति की प्रतिमा में उसका पूजन, वन्दन सम्पन्न करते हैं। पर यह तो ध्यान की एकाग्रता और भक्ति भावना के जागरण का एक तरीका मात्र है। उपासना के लिये मानवीय मनोभूमि की रचना के अनुरूप शब्द रूप एवं भावों का निर्धारण करना पड़ता है। विद्युत महाशक्ति के विश्वव्यापी सूक्ष्म रूप को वैज्ञानिक जानते हैं। साधारण लोग उसे बत्ती—पंखा, आदि के रूप में कार्य करते हुए ही देखते हैं। उनकी दृष्टि में ये उपकरण ही विद्युत महाशक्ति के प्रत्यक्ष रूप हैं। ठीक इसी प्रकार उपासना प्रकरण में गायत्री की माता के रूप में पूजा अर्चा की जाती है और उसके साथ वैसा ही सम्बन्ध जोड़ा जाता है जैसा कि साँसारिक माँ-बेटे का होता है। यह प्रक्रिया आवश्यक है। क्योंकि निराकार तत्व के साथ पंचभौतिक मन अपना सम्बन्ध जोड़ ही नहीं सकता। निराकार का ध्यान सम्भव नहीं, और न उसके साथ किसी प्रकार आत्मीयता की भावना उठ सकती है। इसलिये ब्राह्मी शक्ति के निराकार होते हुए भी उपासना के लिये उसे साकार रूप में ही प्रतिष्ठापित करना पड़ता है। यदि ऐसा न किया जाय तो ध्यान जैसी उपासना की प्रमुख प्रक्रिया का द्वार ही बन्द हो जायगा। इसलिये गायत्री माता के साकार स्वरूप की उपयोगिता आवश्यकता मानते हुये भी हमें यह जानना होगा कि ब्राह्मी महाशक्ति वस्तुतः एक विश्वव्यापी चेतन तत्व है जो प्राणियों के प्राण के रूप में देखा जा सकता है। गायत्री उपासना द्वारा हम अपने सामान्य प्राण को महाप्राण में परिणित-विकसित करते हैं।

साधारणतया मानव शरीर में रहने वाला अकिञ्चन-सा प्राण स्फुल्लिंग इतना ही प्रयोजन सिद्ध करता है कि प्राणी अपनी शारीरिक एवं मस्तिष्क की गतिविधियाँ जारी रख सके जो जीवन धारण किये रहने के लिये आवश्यक हैं। प्राण के अन्तराल में से शक्ति कम्पन क्षण क्षण पर उद्भूत होते हैं वे कोई अन्य उपयोग न होने के कारण यों ही शून्य में जाते और समाप्त होते रहते हैं। इसका कोई विशेष लाभ प्राणधारी को मिल नहीं पाता पर यदि कोई ऐसा उपाय निकल आवे जिससे इस प्राण-तत्व के शक्ति कम्पनों को सुरक्षित रखा जा सके तो यह कोष एक वृहद् भाण्डागार के रूप में संचय होकर प्राणी को सच्चे अर्थों में शक्तिवान् बना सकता है।

गायत्री शब्द का नामकरण उसके क्रिया−कलाप एवं स्वभाव को ध्यान में रखकर ही किया गया है। इस महाशक्ति के साथ सम्बन्ध होने की प्रथम प्रतिक्रिया यह होती है कि साधक का प्राण प्रवाह शून्य में बिखरना रुक जाता है और उसका ऐसा संरक्षण होता है जिससे कोई महत्वपूर्ण प्रयोजन सिद्ध किया जा सके। वर्षा का जल नदी-नालों में बहता हुआ यों ही अस्त−व्यस्त हो जाता है पर यदि उसे बाँध लगाकर रोका जा सके तो सिंचाई, विद्युत उत्पादन आदि कई कार्य सिद्ध हो सकते हैं। गायत्री उपासना प्राणशक्ति के क्षरण को रोकती है उसकी रक्षा करती है और इस संरक्षण से लाभान्वित उपासक दिन-दिन प्रगति पथ पर अग्रसर होता है, इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए उस महती शक्ति का नाम—गुण के अनुरूप —तत्वदर्शी मनीषियों ने ‘गायत्री’ रखा। शास्त्रों में ऐसा ही उल्लेख मिलता है—

सा हैषा गायत्री गयाँस्तत्रे। प्राथाः वै गयाँस्तत् प्राणाँस्तत्रे तद् यद् गायाँ स्तत्रे तस्माद् गायत्री नाम।

—शतपथ

“प्राणों का त्राण करने वाली गायत्री है। उपासना करने वाले के प्राण को निर्मल एवं समर्थ बनाती है, इसलिये गायत्री कहते हैं।”

गयाः प्राणा उच्यन्ते, गयान् प्राणात् त्रायते सा गायत्री। गायतं त्रायते इति वा गायत्री प्रोच्यते तस्मात् गायन्तं त्रायते यतः।

—गायत्री सन्ध्या

“जो प्राणों की रक्षा करती है, जिसकी उपासना से जीवन प्राणवान बनता है। जो उपासक का परित्राण करती है, त्रिविधि तापों से बचाती है, वह गायत्री है।”

प्राणियों में जितनी तेजस्विता दृष्टिगोचर हो, समझना चाहिये कि उसमें उतना ही प्राणाँश अधिक है। निर्जीव, निस्तेज और निष्क्रिय लोगों में इस तत्व की न्यूनता होती है और तेजस्वी मनस्वियों में—पुरुषार्थी साहसियों में अधिकता। फिर भी यह तत्व न्यूनाधिक मात्रा में रहता सभी के अन्दर है। परमात्मा की इस पवित्र शक्ति का दर्शन हम प्रत्येक प्राणी में कर सकते हैं। इसलिये गायत्री को जगत्मय और जगत् को गायत्रीमय कहा गया है।

परमात्मास्तु या लोके ब्रह्म शक्तिर्विराजते। सूक्ष्मा च सात्विका चैव गायत्रीत्वाभिधीयते।

—स्कन्द

“सब लोकों में विद्यमान, जो सर्वव्यापक परमात्म शक्ति है, वह अत्यन्त सूक्ष्म सत्प्रकृति ही चेतन शक्ति गायत्री है।”

अपना परिचय देते हुए इस महाशक्ति ने शास्त्रों के विभिन्न कथा-प्रसंगों में इस रहस्य का रहस्योद्घाटन किया है कि मनुष्य के अन्दर जो सचेतन विशेषता होगी उसके मूल में ब्राह्मी-शक्ति का ही वैभव रहा होगा। धन-सम्पत्ति तो लोग उचित-अनुचित कई तरीकों से कमा लेते है, समृद्ध और श्रीमान तो भाग्यवश मूर्ख भी बन जाते हैं। पर यदि किसी का व्यक्तित्व विकसित हो रहा होगा, तो उसके अन्तराल में यही ब्राह्मी-चेतना—गायत्री—काम कर रही होगी। जिस सामर्थ्य के बल पर लोग विभिन्न प्रकार की सफलताएँ उपलब्ध करते हैं, उस शक्ति को भौतिक नहीं, आत्मिक ही समझना चाहिये। आत्म-बल के अभाव में समृद्धि का उपार्जन तो दूर, व्यक्ति उसकी रखवाली भी नहीं कर सकता। इस रहस्य का उद्घाटन उसी शक्ति के श्रीमुख से इस प्रकार हुआ है—

अहं बुद्धि रहं श्रीश्च धृतिः कीर्तिः स्मृतिस्तथा। श्रद्धा मेधा दया लज्जा क्षुधा तृष्णा तथा क्षमा। कान्तिः शान्तिः पिपासा च निद्रातंद्रा जराजरा। विद्याऽविद्या स्पृहावाञ्छा शक्तिश्चाशक्ति देव च। बसा मज्जा च त्वज चाह दृष्टि र्वागनृत ऋता। परमध्या च पश्यन्ती नाड्योऽहं विविधा श्चयाः। किं नाहं पश्य संसारे मद्वियुक्तं क्रियस्ति हि। सर्वनेवाहमित्येवं निश्चयं विद्धि पद्मज॥

—देवी भागवत

“मैं क्या नहीं हूँ? इस संसार में ये मेरे सिवाय और कुछ नहीं है। बुद्धि, धृति, कीर्ति, स्मृति, श्रद्धा, मेधा, लज्जा, क्षुधा, तृष्णा, क्षमा, कान्ति, शान्ति, पिपासा, निद्रा, तन्द्रा, जरा, अजरा, विद्या, अविद्या, स्पृहा, वाञ्छा, शक्ति , अशक्ति , वसा, मज्जा, त्वजा, दृष्टि, असत् और सत्, वाणी, परा, मध्यमा, पश्यन्ती, नाड़ी-संस्थान आदि सब कुछ मैं ही हूँ।”

मयासो अन्नमत्ति यो विपस्यति यः प्राणिति य ई शृणोत्युक्तम्। ऊमन्त वो माँ त उपक्षियन्ति श्रुधि श्रुत श्रद्धि वै ते वदामि।

—महार्णव.

“यह विश्व मुझसे ही जीवित है। मेरे द्वारा ही उसे अन्न मिलता है। मेरी शक्ति से ही वह बोलता और सुनता है। जो मेरी उपेक्षा करता है, वह नष्ट हो जाता है। हे श्रद्धावान्! सुनो, यह रहस्य मैं तुम्हारे कल्याणार्थ ही कहती हूँ।”

प्रकृति ने जड़ पदार्थ बनाये, पदार्थों की रचना उसने की पर उन पदार्थों को व्यवस्थित करने और उपयोग में लाने की क्षमता चेतना में ही रहती है। चेतन की अनुपस्थिति अथवा न्यूनता में सुख-साधनों के प्रचुर परिमाण में उपस्थित रहने पर भी उनका कोई उपयोग नहीं। सोना जमीन में गढ़ा है पर किसी सजीव प्राणी को उसकी जानकारी न हो अथवा निकालने की क्रिया करने वाला कोई न हो, तो वह सोना जहाँ-का-तहाँ पड़ा रहेगा, उससे किसी का कुछ भी लाभ न होगा। उसी प्रकार शरीर जैसा बहुमूल्य यन्त्र जो मस्तिष्क बहुत कुछ सोचता, हाथ-पैरों से बहुत कुछ करता एवं इन्द्रियों से बहुत कुछ रसास्वाद करता है, चेतन-तत्व निकल जाने पर निकम्मा बन जाता है। इसलिये साँसारिक सुख-साधनों की उपयोगिता होने पर भी महत्ता चेतन-तत्व की ही है। समस्त सुख-साधनों का वास्तविक आधार और मूल स्रोत वही है।

इस चेतन के आरम्भिक स्तर से लेकर ऊँचे-ऊँचे अनेक स्तर हैं। सामान्य समझदारी में जितनी चेतना है, संसार की स्वाभाविक व्यवस्था के अनुसार जीवधारियों को मिलती रहती है, पर ऊँचे स्तरों की क्षमता प्राप्त करने के लिए उसे कुछ विशेष प्रयत्न करने होते हैं। उन विशेष प्रयत्नों का नाम ही साधना एवं उपासना है। इस पुण्य प्रक्रिया द्वारा पुरुषार्थी साधक अपनी आन्तरिक स्थिति इतनी विकसित कर लेते हैं कि इस निखिल महदाकाश में संव्याप्त उस ब्राह्मी-महाशक्ति—गायत्री—से अपना संबन्ध स्थापित कर सकें। यह सम्बन्ध जितना स्पष्ट और जितना प्रौढ़ होता है, उतनी ही उच्चस्तरीय विभूतियाँ मनन-क्षेत्र में अवतरित होती है। यह अवतरण ही मनुष्य को महापुरुष, सिद्ध-पुरुष एवं अतिमानव के रूप में विकसित करता है।

लौकिक प्रयत्नों से मस्तिष्कीय मनोबल को बढ़ाया जा सकता है। साँसारिक साधनों की सहायता से अध्ययन, अभ्यास, प्रशिक्षण एवं परिश्रम से इतना ही हो सकता है कि गुण-कर्म-स्वभाव की सुव्यवस्था बन जाय। इतने क्षेत्र में थोड़ी-सी उन्नति हो जाय। यह उन्नति आत्मिक दृष्टि से नगण्य ही मानी जाती है। कितने ही चतुर, सुशिक्षित, शिष्ट और व्यवस्थित व्यक्ति संसार में पाये जाते हैं। उन्हें सज्जनोचित आदर, सहयोग और सन्तोष तो मिलता है, पर इससे आगे की विभूतियाँ उपलब्ध नहीं होतीं। जिन दिव्य शक्तियों के बलबूते मनुष्य महान् आध्यात्मिक लक्ष्यों को प्राप्त कर सकता है, वे उसे तभी मिलते हैं जब उच्चस्तरीय महदाकाश में संव्याप्त व दिव्य चेतना ब्राह्मी-शक्ति—गायत्री—के साथ अपना सम्बन्ध जोड़े।

जितने हार्स पॉवर की मोटर होती है, बिजलीघर में उत्पन्न होने वाले लाखों किलोवाट विद्युत भंडार में से उस मोटर को उतनी ही शक्ति मिलती है। मोटर की पात्रता पर ही उसमें विद्युत-धारा कितनी प्रवेश करे, यह निर्भर रहता है। साधक ने साधना द्वारा अपना आन्तरिक स्तर कितना परिष्कृत किया है, इसी आधार पर वह ब्राह्मी-शक्ति अवतरित होती है। मनोभूमि में अधिकाधिक पात्रता उत्पन्न करने के प्रयोजन से ही उपासना की जाती है महाशक्ति ने अपनी जिन विभूतियों का वर्णन उपरोक्त श्लोकों में आत्म-परिचय देते हुए किया है, वे सभी उसमें प्रचुर परिमाण में विद्यमान हैं। आवश्यकता केवल उतनी भर रह जाती है कि व्यक्ति अपने में पात्रता उत्पन्न करे और उन लाभों से लाभान्वित हो, उन विभूतियों को धारण करके दैवी-जीवन जी सकने की स्थिति तक पहुँचे।

जिस साधक पर उसकी पात्रता के अनुरूप उस महाशक्ति का अनुग्रह अवतरित होता है वह सर्वतोभावेन धन्य हो जाता है। माता गायत्री का प्यार अनुग्रह जिसे मिला, उसे इस संसार की कोई वस्तु अप्राप्त नहीं रह जाती। उसके भीतर से ही दिव्य प्रेरणाएँ उठनी आरम्भ हो जाती हैं और उनके प्रकाश में, जो सर्वसाधारण के लिये अप्रकट एवं अज्ञात है, वह उसके लिये हस्तामलकवत् स्पष्ट हो जाता है। जो दूसरों के लिये लालसा एवं कामना का क्षेत्र है वह उसकी मुट्ठी में होता है। उसे वह ऋतम्भरा प्रज्ञा मिलती है जिसके प्रकाश में अदृश्य को देख सकना उसकी सामर्थ्य के अंतर्गत होता है। ऐसा व्यक्ति ऋषि बन जाता है। उसे ब्रह्म-शक्ति-गायत्री का सर्वोपरि उपहार-ब्रह्म-पद-प्राप्त होता है। ब्रह्म विशेषताओं और विभूतियों से विभूषित वह ब्रह्म परायण मानव-प्राणी कहलाते हुए भी वस्तुतः देवत्व की भूमिका में ही विचरण करता है

शक्ति-तन्त्र में उस महाशक्ति ने अपनी इसी विशेषता की चर्चा की है। वह जिसका पथ-प्रदर्शन करती है, जिसे प्यार करती है उसे अपना सर्वोत्तम उपहार प्रदान करने में संकोच नहीं करती—

अहमेक स्वयमिदं वदामि जुष्टं देवेभिरुत मानुषेभियं कामये तं तमुग्रं कृणोमि तं ब्रह्माणं तमर्षि तं सुमेधा।

—शक्तितन्त्र

“तत्वज्ञान की उपदेशक मैं ही हूँ। मैं जिसे प्यार करती हूँ उसे समुन्नत करती हूँ, उसे सुबुद्धि देती हूँ, ऋषि बनाती हूँ और ब्रह्मपद प्रदान करती हूँ।” दैवी शक्तियों का स्वरूप और क्रिया-कलाप शास्त्रों में विस्तारपूर्वक वर्णित हुआ है। उन शक्तियों को धारण करने वाले दृश्यमान मनुष्य भी हो सकते हैं और अदृश्य-मान शक्ति-केन्द्र भी। सूक्ष्म-जगत में ऐसे शक्ति-केन्द्र विद्यमान हैं, जो विशेष-विशेष प्रकार की सामर्थ्य अपने अन्दर धारण किये हुए हैं। उन केन्द्रों में जो जिस स्तर का सम्बन्ध बना लेता है, वह उतना ही शक्तिमान बन जाता है। देववाद और देवस्वरूप, देवशक्ति और देवाराधन का एक स्वरूप यह है।

दूसरे सर्वगुण सम्पन्न मानव भी देवता कहलाते हैं। इन दोनों प्रकार के देवताओं के नाम अलग-अलग प्रकार के हैं। सूक्ष्म शक्ति-केन्द्रों को रुद्र, आदित्य, बसु, विश्वदेवा, त्वष्टा, पूषा, इन्द्र, मारुत, अर्यमा, अग्नि कहा जाता है और दृष्टमान देव-मानवों को ऋषि, मनीषी, दृष्टा, जीवन मुक्त अर्हंत-अवतार आदि नामों से पुकारते हैं। दोनों ही वर्ग के इन देवताओं की महत्ता का आधार वह ब्रह्मशक्ति —गायत्री—ही है। उसका जितना अंश जिसे मिला, वह उतना ही शक्तिशाली हो गया। ऋग्वेद में इ तथ्य को इस प्रकार प्रकट किया गया है—

अहं रुद्रेभिर्वसुभिश्चराम्यहमादित्यै रुत विश्व देवैः। अहं मित्रा वरुणोभा विभर्म्य हविद्राग्नी अहिमश्विनोभा।

—ऋग्वेद

“मैं ही रुद्र, वसु, आदित्य और विश्वे देवताओं में विचरण करती हूँ। मैं ही मित्र, वरुण, अग्नि और अश्विनीकुमारों का रूप धारण करती हूँ।”

इसी गायत्री तत्व का उपनिषदों में अदिति के नाम से उल्लेख हुआ है। सम्पूर्ण प्राणी इस अदिति के प्रभाव से ही अपनी हलचल जारी रखे रहने में समर्थ होते हैं। इतना ही नहीं वे देव, गंधर्व, पितर आदि का दिव्य स्तर प्राप्त करते हैं। सच्चा मनुष्य भी इसी शक्ति की सहायता से बनता है और दानवी क्षमता भी—उसी का दुरुपयोग करने वालों को मिलती है—

आदित्य देवा गन्धर्वा मनुष्याः पितरो सुराः तेषाँ सर्वभूतानाँ माता मेदिनी माता मही सावित्री गायत्री जगत्युर्वी पृथ्वी बहुला विद्या भूता ।

—नारायणोपनिषद

“देव, गंधर्व, मनुष्य, पितर, असुर इनका मूल कारण अदिति अविनाशी तत्व है। वह अदिति सब मूलों की माता मेदिनी और मातामहि है। उसी विशाल गायत्री के गर्भ में विश्व के सम्पूर्ण प्राणी निवास करते हैं।

ब्रह्मा, विष्णु और महेश देव-जगत के तीन प्रधान आधार हैं। उत्पत्ति, पालन और संहार इन तीनों के द्वारा ही होता है। तदनुसार यह सृष्टि-क्रम अपनी निर्धारित धुरी पर घूमता रहता है। इन त्रिदेवों में भी जो शक्ति काम कर रही है, वह तत्वतः गायत्री ही है। कहा गया है—

गायत्र्यैव परोविष्णु, गायत्र्यैव परः शिवः। गायत्र्यैव परोब्रह्मा, गायत्र्यैव त्रयी ततः॥

—गरुण पुराण

“गायत्री में ब्रह्मा-विष्णु-महेश की तीनों शक्तियाँ समाई हुई हैं। गायत्री में तीनों वेद सन्निहित हैं।”

जिस प्रकार चन्द्रमा का प्रकाश सूर्य की किरणें उस पर पड़ने से होता है, उसी प्रकार इन तीनों देवताओं की क्षमता एवं क्रियाशीलता गायत्री महाशक्ति के द्वारा ही सुसंचालित होती है। वे अपने इसी शक्ति-केन्द्र से अपना कर्तव्य-पालन करने योग्य सामर्थ्य ग्रहण करते हैं—

सर्ववेदसार भूता गायत्र्यास्तु समर्चना। ब्रह्मादयोऽपि संध्यायाँ ताँ ध्यायन्ति जपन्ति च।

—देवी भागवत 16।16।15

“गायत्री-अर्चना वेदों का सारतत्व है। ब्रह्मा-विष्णु-महेश सभी प्रातः-सायं गायत्री का जाप करते हैं।”

ब्रह्माजी द्वारा चारों वेद बनाये गये। उनमें ज्ञान-विज्ञान के समस्त सूत्र-संकेत किये गये। इस महान् रचना की प्रेरणा उन्होंने गायत्री से ही ली। सृष्टि के आदि में आकाशवाणी के निर्देशानुसार कमल-पुष्प पर बैठकर उन्होंने शत वर्ष पर्यन्त गायत्री-उपासना की और उसी के फलस्वरूप वे वेद-ज्ञान निष्णान्त बने। वेद की रचना का मूल आधार गायत्री है और वही विधाता की कृतियों का उद्गम प्रेरक भी है। गायत्री से बढ़कर इस संसार में और कुछ है भी तो नहीं।

वेदों में ज्ञान और विज्ञान का असीम भाण्डागार भरा पड़ा है। उन मन्त्रों के आधार पर जीवन को सुख-शाँतिमय समर्थ और समृद्ध बनाने की शिक्षा प्राप्त की जा सकती है और भौतिक-जगत में मिल सकने वाली समस्त सिद्धियों, सफलताओं को उपलब्ध किया जा सकता है। वेद-ज्ञान के माध्यम से ही ऋषियों ने अपना और इस महान् देश का वर्चस्व बढ़ाया था। कहना न होगा कि वह वेद-ज्ञान और कुछ नहीं, गायत्री-महामंत्र के 24 अक्षरों की व्याख्या मात्र ही है। जिसने गायत्री को समझ लिया और जिसे गायत्री प्राप्त हो गई, उसके लिये और कुछ प्राप्त करना शेष नहीं रहा।

अपनों से अपनी बात—


हमारी भावी कार्य-पद्धति और उसका स्पष्टीकरण

अध्यात्म महाशक्ति का मानव-शरीर में ठीक तरह अवतरण हो, इसके लिए उसकी कुछ पात्रता चाहिए। स्वर्ग से गंगा जब पृथ्वी पर उतरी थी, तब उसने भागीरथ से यही पूछा था कि जब मैं नीचे उतरुँगी तब उस वेग को धारण कौन करेगा? ऐसा वेग धारण न किया जा सका, तो धरती में छेद हो जायगा और धारा पाताल को चली जायगी। भागीरथ ने वस्तुस्थिति को समझा और वे गंगा धारण करने वाले सत्पात्र की तलाश में निकले। यह कार्य भगवान शंकर ने पूरा किया। गंगा उनकी जटाओं में उतरी। यदि धारण करने वाला सत्पात्र न मिला होता, तो संभवतः गंगावतरण ही न हो पाता।

समर्थ गुरु रामदास के पास बड़ी आध्यात्मिक शक्ति थी। वे उसे किसी को देना चाहते थे, पर सत्पात्र न मिलने पर दें किसे? उन्होंने बालक शिवाजी की परीक्षा ली। आँखों में दर्द का बहाना किया और उसके उपचार में सिंहनी के दूध की आवश्यकता बताई। यदि शिवाजी स्वार्थी शिष्यों की तरह इस झंझट में पड़ने से कतरा गया होता, तो उसे न तो समर्थ गुरु का अनुग्रह मिला होता और न भवानी की दी हुई अपराजिता तलवार उपलब्ध होती।

गुरु गोविन्दसिंह हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए अवतरित हुए थे। उन्हें अपने कुछ साथी-सहचरों की आवश्यकता थी। खोटे सिक्कों की तरह ओछे व्यक्तित्व के लोग किसी महत्वपूर्ण कार्य में नहीं आ सकते। उन्हें सत्पात्र साथियों की जरूरत थी। शिष्यों की भरी सभा में उन्होंने ऐसे सच्चे लोगों का आह्वान किया, जो अपनी बलि देने को तैयार हों। चतुर भाग खड़े हुए, केवल पाँच व्यक्ति शेष रह गये। उनने बलिदान की इच्छा प्रकट की। यह लोग छोटी जातियों के थे। गुरुदेव ने उनकी परीक्षा ली और अपने महान मिशन का कार्य उन्हीं पाँचों के ऊपर छोड़ दिया। वे ही ‘पंच प्यारे’ सिख-धर्म के प्रमुख संचालक कहलाये। इतना ही नहीं गुरु गोविन्दसिंह के प्राण-प्यारे पुत्र भी अपने को जीवित दीवार में चिनवा कर धर्म-निष्ठा की परीक्षा में पंच प्यारों से भी एक कदम आगे बढ़कर और भी खरे उतरे।

अरुणि, धौम्य, शुकदेव, नचिकेता आदि की गुरुओं द्वारा कठोर परीक्षा लिये जाने की कथाएँ प्रसिद्ध हैं। प्राचीन काल में जिन्हें भी तत्वदर्शी लोग ब्रह्म-विद्या का अनुदान देते थे, उनकी यह परीक्षा अवश्य कर लेते थे कि यह इस विभूति के धारण करने का पात्र भी है या नहीं? कुपात्रों को कुछ बड़ी चीज नहीं दी जा सकती— क्योंकि वह बेचारा न तो उसे धारण कर सकेगा और न उसकी रखवाली ही उससे बन पड़ेगी। ताँत्रिक उपासना का प्रथम सोपान यही है कि साधक के साहस और धैर्य की परीक्षा कर ली जाय। डरपोक प्रकृति के व्यक्ति तन्त्र-शक्ति को धारण नहीं कर सकते। इसलिए उस साधना-क्रम में प्रवेश करने वाले को आरम्भ में ही भय और प्रलोभन-भरी कितनी ही विभीषिकाओं का सामना करना पड़ता है। जो उनमें असफल हुआ उसे तन्त्र-शक्ति के अवतरण से वंचित रहना पड़ा।

हरिश्चन्द्र को अविनाशी यश पाने से पूर्व कड़ी परीक्षा की आग से गुजरना पड़ा। प्रहलाद की भक्ति झूठी है या सच्ची—यह उसने एक-से-एक भयावह संकटों को शिरोधार्य करके सिद्ध किया। निपुत्री दलीप गुरु वशिष्ठ से सन्तान का वरदान माँगने गये तो उनकी श्रद्धा गौ चराने और उसकी रक्षा का अड़चन-भरा कार्य सोंपकर, परखी गई। सिंह से गुरु की गौ बचाने के लिए जब वह अपना प्राण देने तक को तैयार हो गया, तभी यह जाना गया कि दलीप श्रद्धावान है। श्रद्धावान को ही आध्यात्मिक अनुदान मिलते रहे हैं।

यदि अध्यात्म-मार्ग की वास्तविक प्रगति के लिए थोड़ा-सा पूजा-पाठ ही पर्याप्त होता तो शिवि, दधीचि, हरिश्चन्द्र, मोरध्वज, ध्रुव, प्रहलाद, भर्तृहरि, बुद्ध, महावीर, सुदामा, शंकराचार्य, ज्ञानेश्वर, मीरा, सूर,तुलसी, अरविन्द, वन्दा वैरागी, गान्धी जैसे सभी धर्म-प्रेमियों को कष्टसाध्य जीवन अपनाने और त्याग-बलिदान के पथ पर अग्रसर होने की क्यों आवश्यकता पड़ती?

ईसा मसीह अपने शिष्यों से कहा करते थे कि जो सच्चा ईश्वर-भक्त है, वह अपना क्रूसा (मौत) अपने कन्धे पर रखकर मेरे पीछे-पीछे आये। संसार के प्रायः सभी ईश्वर-भक्तों, धम-परायणों, महा-मानवों और सत्पुरुषों को अपनी मनोभूमि को वास्तविकता की अग्निपरीक्षा देनी पड़ी है। जो ईंट भट्टो में पकने से पहले इनकार कर दे वह पानी की बूँद पड़ते ही गल जाने वाली निकम्मी चीज बनी रहेगी। मजबूती प्राप्त करने के लिए तो आग को अपनाना ही होगा। कच्चा लोहा भट्टियों में ही तो फौलाद बनता है। ऊबड़-खाबड़, ओछे और घिनौने, स्वार्थी और तृष्णा-वासना ग्रसित मनुष्य को आत्म-कल्याण के पथ पर अग्रसर होने के लिए त्याग और बलिदान का मार्ग सदा ही अपनाना पड़ा है। इसका और कोई विकल्प न तो था और न ही आगे हो सकता है।

‘अखण्ड-ज्योति’ अखबार की तरह न तो निकाली गई थी और न वैसी है। लोगों को कोरे मनोरंजन की सामग्री बेचने का व्यवसाय हमारे लिये असम्भव है। संस्कारवान जागृत आत्माओं को इस आकर्षण से एकत्र करने और उन्हें आत्म-कल्याण के मार्ग पर लगाने के उद्देश्य से यह आयोजन आरम्भ किया गया था और इसी प्रयोजन के लिये वह जीवित भी है। प्रारम्भिक कदम के रूप में पाठकों के सामने दो कार्यक्रम रखे गये थे (1)युग के अनुरूप अध्यात्म का व्यावहारिक स्वरूप जानने के लिए प्रस्तुत विचार-धारा को पढ़ना-सुनना, चिन्तन और हृदयंगम करना (2) गायत्री-उपासना जैसी आस्तिकता की प्रथम शर्त को पूरी करना। प्रसन्नता की बात है कि पाठक इन प्राथमिक कक्षा के दो पाठों को ठीक तरह पढ़ते चले आ रहे हैं।

पर स्मरण रखना चाहिए कि यह आदि था, अन्त नहीं। ऐसे-ऐसे अभी कई कदम आगे बढ़ाने हैं। अब प्रशिक्षण का दूसरा अध्याय आरम्भ हो गया। इसमें दो नये पाठ पढ़ाये जा रहे हैं—(1) एक घंटा समय, (2)दस पैसे रोज नित्य परमार्थ-प्रयोजन के लिए खर्च करना। इस कसौटी पर कसे जाने से परिवार छोटा हो जाना स्वाभाविक है। आज से 14 वर्ष पूर्व जब हमने गायत्री-प्रचार आरम्भ किया था, तो पाँच मिनट नित्य समय देकर एक माला गायत्री-जप करने वाले 24 लाख व्यक्ति हमारे गायत्री-परिवार में शामिल हो गये थे। जब सहस्र-कुण्डी यज्ञ हुआ था, तो लगभग इतने ही हमारे साथी थे। पीछे जब यह शर्त रखी गई कि पाँच मिनट का जप ही पर्याप्त नहीं, हमारे विचारों को—युग के अनुरूप प्राचीन अध्यात्म परम्परा के व्यावहारिक स्वरूप को भी समझना चाहिए, अखण्ड-ज्योति भी पढ़नी चाहिए, तो लोगों को अखरा। रोज इस स्वाध्याय का झंझट क्यों उठायें? साल में 4) खर्च क्यों करें? यह कसौटी सामने आते ही उस भीड़ में से अधिकाँश लोग हट गये। केवल 40 हजार सदस्य ही अखण्ड-ज्योति परिवार के रूप में रह गये।

अब तीसरी छाँट का समय आ पहुँचा। व्यक्ति, परिवार और परिवार-निमार्ण के लिए एक घण्टा समय और दस पैसे रोज देने की शर्त सामने आई तो अधिकाँश लोग अचकचा रहे हैं। उन्हें यह सब बहुत झंझट एवं असुविधा का काम लग रहा है। व्यस्त-जीवन में से एक घंटा भला कैसे निकलेगा! दस पैसे खर्च कर देने से तो उनकी आर्थिक स्थिति ही डाँवाडोल हो जायगी! इस प्रकार की सुविधाएँ असमर्थताएँ व्यक्त की जा रही हैं। हम जानते हैं कि बहुत-से लोगों के लिये यह दोनों कार्य इतने भारी पड़ेंगे कि वे अपना साथ छोड़ देंगे। युग-निमार्ण-परिवार की तीसरी रचना में 40 हजार से घटकर 4 हजार भी हमारे साथी रह जायँ तो बहुत बड़ी बात समझनी चाहिये। यह बात आश्चर्य की मानी जायगी कि जहाँ सभी संस्थाएं, सभी नेता अपने सदस्यों और साथियों की संख्या अधिकाधिक बढ़ाने के लिये जी जोड़ प्रयत्न कर रहे हैं, तब हम अपने परिवार को घटाते क्यों चले जा रहे हैं? 24 लाख सदस्यों का गायत्री-परिवार घटकर 40 हजार के अखण्ड ज्योति परिवार में सीमित हुआ और अब युग-निर्माण परिवार में केवल 4 हजार का लक्ष्य रखा गया, यह कैसी उलटी बात हो रही है? कितने ही पत्र इस सम्बन्ध में आते रहते हैं।

थोड़ा विचार करने पर इसका स्पष्टीकरण सहज ही हो जाता है। प्राइमरी कक्षा में हजार बालक पढ़ते हैं पर कॉलेज में इनमें से थोड़े ही पहुँचते हैं। इससे शिक्षा-संचालकों को मूर्ख नहीं बताया जा सकता। शिशु-सदनों की बाल-कक्षाओं में बालकों को जलपान भी दिया जाता है ताकि बच्चे उस प्रलोभन से भी उधर आना सीखें। कालेजों में काफी कड़ाई कर दी जाती है और लम्बी फीस ली जाती है। क्योंकि इस शिक्षा का महत्व और मूल्य अधिक है। प्राइमरी उत्तीर्ण छात्र और एम.ए. की सनद प्राप्त करने वाले छात्र की तुलना नहीं हो सकती है।

अपने प्रिय परिजनों को आत्मिक प्रगति के पथ पर क्रमशः अग्रसर करना हमारा लक्ष्य रहा है। प्रगति की मंजिलें जैसे-जैसे आगे बढ़ेंगी, ऊँची उठेंगी वैसे-वैसे ही शर्तें कड़ी होती चली जाएंगी। इसमें हमारा दोष नहीं है, यह अनादि परम्परा है। यदि एक-दो माला जपने, हनुमान चालीसा पढ़ने, दस-पाँच आहुतियाँ दे लेने और थोड़ी-सी पूजा-पाठ का कर्मकाण्ड निपटा लेने से आत्मिक-प्रगति का लक्ष्य प्राप्त हो सकना संभव रहा होता तो हम अपने प्रियजनों को कदापि अधिकाधिक कष्टसाध्य वजन उठाने के लिए अनुरोध न करते। सस्ते में अधिक मूल्य की चीज मिल सकी होती तो हमसे अधिक और कोई प्रसन्न न हुआ होता। छुटपुट कर्मकाण्डों से ही आत्मा की प्राप्ति हो जाया करे तो कष्टसाध्य तपस्वी-जीवन में प्रवेश करने की आवश्यकता ही क्या रह जाय? हमें पूरे विश्वास के साथ यह मान लेना चाहिये कि कीमती चीजें उचित मूल्य चुकाने पर ही मिलती है। स्वास्थ्य, शिक्षा, यश, धन आदि साँसारिक विभूतियाँ उपार्जित करने में लोगों को कितना घोर प्रयत्न कितना साहस करना पड़ता है, फिर मानव-जीवन की सर्वोपरि सार्थकता-सबसे बढ़ा-चढ़ा लाभ-प्राप्त करने के लिए तनिक भी कठिनाई का सामना न करना पड़े, ऐसा किसी भी प्रकार संभव नहीं। जो सस्ते कर्मकाण्डों के सहारे स्वर्ग, मुक्ति, एवं आत्मिक प्रगति की आशा लगाये बैठे रहते हैं, उन्हें वज्र मूर्खों के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं समझना चाहिये।

उन सट्टेबाजों, लाटरी खोरों और शेखचिल्लियों से हमें कुछ नहीं कहना जो अत्यन्त स्वल्प मूल्य में बड़ी-से-बड़ी ऋद्धि-सिद्धियाँ पाने और ईश्वरीय अनुकम्पा हड़पने के सपने देखा करते हैं। जिनके मन में यह वहम जम गया है कि “थोड़ा सा उपासनात्मक कर्मकाँड उन्हें जीवन-लक्ष्य प्रदान कर सकता है तो जीवन-निर्माण के लिये कष्ट-साध्य एवं त्याग-बलिदान भरी प्रक्रियाएं अपनाने की क्या आवश्यकता?” ऐसे लोगों को हम कृषक, श्रमिक, विद्वान्, धनी एवं अन्य सफल मनोरथ व्यक्तियों के उदाहरण प्रस्तुत करते हुए इतना ही कह सकते हैं कि वे उनके दैनिक-जीवन की कठिन श्रम-व्यवस्था को ध्यानपूर्वक देखें और समझें कि इस संसार में हर चीज का उचित मूल्य चुकाने के अतिरिक्त और कोई मार्ग है ही नहीं । ईश्वर-भक्त, धर्मनिष्ठ एवं श्रेय-साधक बनने के लिए व्यावहारिक जीवन में तनिक भी कष्टसाध्य हेर-फेर न करना पड़े, थोड़ी सी पूजा-पत्री उस प्रयोजन में सिद्ध कर दे, ऐसा कभी भी.... कभी भी.... कभी भी.... नहीं हो सकता। ईश्वर की विधि-व्यवस्था में हर कार्य वैज्ञानिक नियमों के आधार पर चल रहा है। आत्म-कल्याण के पथ का पथिक तृष्णा और वासना के कीचड़ में ही फँसता रहे, जीवन-शोध और परमार्थ की कष्टसाध्य प्रक्रिया से अछूता बना रहे, यह न तो भूतकाल में कभी हुआ है, न आगे हो सकता है। हम भ्रम में पड़े हैं, पड़े रहें, पर सृष्टि का नियम, ईश्वर का विधान तो अपनी जगह पर ही कायम रहेगा।

प्रिय परिजनों को हर आत्मिक प्रगति की मंजिल पर अपेक्षाकृत अधिक त्याग-बलिदान के लिए तैयार रहना होगा। अन्त में जब पूर्णता का लक्ष्य प्राप्त करने का अवसर आवेगा तो साँसारिक पदार्थों का ही नहीं अपनी अंहता का भी विसर्जन ईश्वर के चरणों में करना पड़ेगा।

अभी तो उसका थोड़ा-थोड़ा अभ्यास कराया जा रहा है। 24 घन्टे स्वार्थपरता के कोल्हू में जुता रहने वाला 1 घंटा तो परमार्थ-प्रयोजन के लिये समय निकाले। अपनी सारी कमाई भौतिक प्रयोजनों के लिये खर्च करने वाला 10 नया पैसा जैसी डेढ़ छटाँक आटे की कीमत तो भावनात्मक उपलब्धियों को अधिग्रहण करने के लिए खर्च करे । यह अत्यन्त सरल,छोटे, नगण्य जैसे त्याग-बलिदान हैं। जो इतना भी नहीं कर सकते उनकी परिस्थितियाँ नहीं मात्र मानसिक दुर्बलता कारण मानी जायगी। इतने डरपोक व्यक्ति नर से नारायण बनने के महान् अभियान में अधिक दूर तक नहीं चल सकेंगे।

हमें स्वयं हमारे मार्ग-दर्शक ने इसी मार्ग पर चलाया है। उपासना हमने की है पर उसमें भी अधिक कष्ट-साध्य आत्मशोधन और त्याग-बलिदान के लिये अपने को जीवन के हर कदम पर प्रस्तुत किया है। यही कारण है कि कुछ कहने लायक उपलब्धियाँ प्राप्त कर सकने का अवसर आया। अगले पंच वर्ष जिन, साधारण लोगों को सुनने मात्र से विचलित करने वाली कष्टसाध्य तपश्चर्या का क्रम निर्धारित है, उसके पीछे भी स्वर्ग, मुक्ति का वैयक्तिक स्वार्थ नहीं वरन् विशुद्ध लोक-हित कर्म ही लक्ष्य है। यह एक प्रकट रहस्य है कि अरविन्द, रमण जैसे तपस्वियों ने भारत के राजनैतिक क्षेत्रों में जो चेतना उत्पन्न की थी उसमें गान्धी, नेहरू, पटेल, सुभाष, मालवीय आदि को शक्ति एवं सफलता मिली । आज वह बिजलीघर ठंडे हो गये तो एक-से -एक अधिक योग्यता वाले नेताओं के रहते हुए भी हमारे राजनैतिक, सामाजिक, धार्मिक आर्थिक, वैज्ञानिक क्षेत्रों में सन्नाटा पड़ा हुआ है। ऊँचे शक्तिशाली व्यक्तित्वों के अभाव में प्रगति हो भी कैसे? हमारी भावी तपश्चर्या के पीछे एकमात्र प्रयोजन उस ठण्डे पड़े बिजलीघर को पुनः चैतन्य करना है जिसके द्वारा अनेकों यन्त्र साथ में काम करने लगें और युग-परिवर्तन के उपयुक्त व्यक्तियों तथा परिस्थितियों का अभाव दूर हो सके। हमारे गुरुदेव ने हमारी भौतिक सुविधाओं को एक-एक करके घटाया है और त्याग-बलिदान की आग में अधिकाधिक तपाया है। हमारा अगला कदम आगे और भी अधिक कठोरता पूर्ण है। हमें अपने इस सौभाग्य पर अत्यधिक हर्ष और सन्तोष है क्योंकि हमें आत्मिक प्रगति की सुनिश्चित क्रम व्यवस्था का पता है। अनादि काल से प्रत्येक आत्मिक स्तर पर ऊँचा उठने वाले को यही रीति-नीति अपनानी पड़ती है। हमारे लिये भी और कोई नया मार्ग कैसे हो सकता था?

प्रिय परिजनों के लिये या उनकी आत्मिक प्रगति के लिये इसी राजमार्ग पर चलने के अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं। गान्धी जिन्हें प्यार करते थे उन्हें जेल भिजवाते थे। बुद्ध जिन्हें प्यार करते थे उन्हें प्रव्रज्या देते थे। हम भी परिजनों को असुविधाएं ही दे सकते हैं। ऊँचा उठने के लिये और कोई सरल मार्ग यदि हमारे हाथ में रहा होता तो उसे बताते हुए प्रसन्नता ही अनुभव करते पर सस्ते मूल्य पर ऊँची उपलब्धियाँ पाने का जब कोई विधान ईश्वर ने रखा ही नहीं तो हमें विवशता ही व्यक्त करनी पड़ती है। कुछ भी त्याग न करने पर भी आत्म-लाभ हो सकने का झूँठा आश्वासन दे सकना भी तो हमसे बन नहीं पड़ता ।

युग-निर्माण परिवार की दोनों शर्तें जिन्हें कठिन मालूम पड़ती हों, वे प्रसन्नतापूर्वक साथ छोड़े दें। वर्तमान 40 हजार सदस्यों में से 4 हजार ही रह जायें तो पर्याप्त है। पात्रता होने पर ही तो किसी को कुछ मिलना या दिया जाना सम्भव हो सकता है। इसलिए यह कसौटी कड़ी जरूर है, पर प्रगति का पर्वत बना ही कुछ ऐसा है कि उस पर चढ़ने के लिए त्याग, साहस और दूरदर्शिता का परिचय देना ही पड़ता है।

हमें अपनी क्रिया-पद्धति अगले दिनों समाप्त करनी है अपने उत्तरदायित्व मजबूत कन्धों पर सोपने हैं। हमारी समस्त गतिविधियों का केन्द्र उत्कृष्ट व्यक्ति और उत्कृष्ट समाज की रचना है। इस प्रयोजन में जो लोग हमारा साथ दे सकते हों, वस्तुतः वे ही हमारे सच्चे आत्मीय ही सकते हैं। जुलाई अंक में संलग्न फार्म जिन्होंने अभी भरकर न भेजा हो वे साथ छोड़ने की सूचना भी निस्संकोच भेज सकते हैं, पर सूचना देनी अवश्य चाहिये। 36 हजार का साथ छूटने का तो अनुमान हमें पहले से ही है, फिर बुरा मानने या संकोच अनुभव करने की किसी को काई आवश्यकता भी क्यों होनी चाहिए?


स्थायी सदस्यों के लिए 20 आवश्यक सूचनायें

(1) जिन पाठकों ने जुलाई अंक में संलग्न सूचना फार्म अभी भर कर न भेजा हो, उनसे अनुरोध है कि अब यथासम्भव जल्दी ही भर कर भेज दें।

(2) जिन्होंने पाँच साल तक हमारे सहचर रहने और एक घण्टा समय तथा दस पैसे नित्य देने का व्रत लिया है, उन्हें अपनी प्रतिज्ञा की गरिमा को ठीक तरह अनुभव करना चाहिए और उसका पालन बिना आलस्य-प्रमाद के आरम्भ कर देना चाहिए।

(3) स्थायी सदस्यों को ‘अखण्ड ज्योति’ की भाँति ही ‘युग निर्माण योजना’ मँगाना भी आवश्यक है। जिनने युग निर्माण का चन्दा अभी न भेजा हो उन्हें अब उसे भेज देना चाहिए।

(4) एक घंटा समय देने की प्रतिज्ञा करने वालों को उसे निम्न चार कार्यों में व्यय करना चाहिये।

(अ) परिवार के लोगों को इकट्ठे कर उन्हें अपनी विचारधारा सुनाने में ।

(ब) अपने मित्र, सम्बन्धी, परिचित लोगों को नव-निर्माण साहित्य पढ़ने देने और वापिस लेने में।

(स) सदस्यों के घरों में संस्कारों के अतिरिक्त तथा सामूहिक रूप से किन्हीं उत्सवों का प्रचलन करने में।

(द) शाखा कार्यालय की स्थापना और वहाँ पुस्तकालय, पाठशाला, सत्संग आदि ज्ञानवर्धक आयोजन चलाने में।

(5) स्थायी सदस्यों को सबसे आधिक ध्यान इस बात पर देना चाहिये कि अपने घर का एक भी व्यस्क व्यक्ति ऐसा न हो जो दोनों पत्रिकाएँ नियमित रूप से पढ़ता या सुनता न हो। घर में जो थोड़ा भी पढ़े-लिखे हों उन्हें आग्रहपूर्वक इस साहित्य को पढ़ने की प्रेरणा दी जाय । जो बिना पढ़े हो उन्हें एक नियत समय पर पढ़े व्यक्ति पढ़कर सुनायें। सदस्यों का पूरा परिवार अपनी विचारधारा से भली प्रकार परिचित एवं प्रभावित हो इसके लिए पूरा-पूरा प्रयत्न किया जाय।

(6) रात्रि को परिवार गोष्ठी के लिए समय निर्धारित हो जिसमें कथा-कहानी प्रेरक समाचार तथा दोनों पत्रिकाओं एवं ट्रैक्टों के कुछ अंश सुनाकर परिवार का मनोरंजन एवं ज्ञान संवर्धन किया जाता रहे। यह कार्य आरम्भ स्वयं करें, पीछे इस व्यवस्था को घर के किन्हीं दूसरे प्रबुद्ध सदस्यों को सौंपा जा सकता है।

(7) प्रतिदिन एक घटा का तात्पर्य है महीने में 30 घंटे। उपरोक्त चार कामों में यह समय अपनी सुविधानुसार खर्च किया जा सकता है। नित्य समय न मिलता हो तो छुट्टी के दिन अथवा अन्य काम-धंधे करने के साथ-साथ इस ज्ञान संवर्धन के लिए नियत समय का उपयोग किया जा सकता है।

(8) स्थायी सदस्यों को एक डायरी रखनी चाहिये। जिसमें 30 घन्टे मासिक समय का उपयोग किस तरह किया इसका ब्यौरा रखा जा सके। एक घंटा तो न्यूनतम समय है। प्रयत्न यह करना चाहिये कि इससे अधिक समय लगा करे।

(9) दस नया पैसा कोष का उपयोग अपने घर में ज्ञान मंदिर घरेलू पुस्तकालय स्थापित करने, बढ़ाने और चलाने में खर्च किया जायगा और किसी कार्य में यह पैसा खर्च नहीं किया जाना चाहिये।

(10) इस समय 70 नए ट्रैक्ट तैयार हैं। यह बहुत ही उपयोगी हैं। 20 नये पैसा प्रति के हिसाब से इनका मूल्य 14) होता है। 15 प्रतिशत कमीशन के 2) 10 काट 11) 90 हुए। डाक खर्च 2) 85 जोड़कर कुल 14) 75 के पास बैठेगा। घर में ज्ञानमंदिर पुस्तकालय आरम्भ करने के लिए इस सैट को मंगा लेना चाहिये।

(11) हर महीने 3) मथुरा भेजने की आवश्यकता नहीं । यह पैसे अपने पास जमा रखे जायँ । समय वाली डायरी में ही इनका भी हिसाब रखा जाय। (1) अखण्ड ज्योति (2) युग निर्माण योजना (3) ट्रैक्ट-इन तीन प्रकार के साहित्य में यह पैसा खर्च किया जाता रहे।

(12) ट्रैक्ट हर महीने छपेंगे पर 6-6 महीने (जनवरी,और जून) में दो बार में ही यह ट्रैक्ट भेजे जाया करेंगे। जिनका मूल्य हर बार लगभग 10-10 रुपया हुआ करेगा।

(13) यों 3) मासिक भी इस ज्ञान मंदिर पुस्तकालय के लिए जमा करते रहा जा सकता है पर भावनात्मक नित्य नवीनीकरण होते रहने की दृष्टि से प्रतिदिन एक गुल्लक में दस पैसे जमा करना ही अधिक उपयुक्त है। इससे यह स्मरण होता रहेगा कि हमारे आवश्यक नित्य-कर्मों में एक कार्य ज्ञान-यज्ञ के लिए नित्य नियमित रूप से कुछ कर्तव्य करना भी जुड़ा हुआ है।

(14) स्थायी सदस्य अपने आस-पास के उन लोगों से संपर्क बनाये रहें जो केवल अखण्ड-ज्योति या युगनिर्माण-योजना के सदस्य रहना चाहते हैं। उनका चन्दा वसूल करलें और अपने नाम उनके अंक भी मँगवाकर उनके पास पहुँचा दिया करें। इस प्रकार ऐसे ग्राहकों को निराश भी न रहना पड़ेगा और हमें भी हर साल बनने-टूटने वाले ग्राहकों के रजिस्टर बनाने का झंझट न उठाना पड़ेगा।

(15) जो सज्जन समय एवं पैसा नित्य खर्च नहीं करना चाहते, ट्रैक्ट नहीं लेना चाहते, वे भी साधारण ग्राहक तो बन सकते हैं, पर उनसे भी अनुरोध यही है कि वे एकाध वर्ष का मनीआर्डर मथुरा न भेजकर स्थायी सदस्यों की मार्फत अपना अंक मँगाने का प्रयत्न करें। यदि कोई स्थायी सदस्य वहाँ न हो तब ही सीधा मनी-आर्डर भेजें । हर साल बनने-टूटने वाले अस्थिर मति ग्राहक बनाने में अब हमें कोई रुचि नहीं है। यों जिनके मनीआर्डर सीधे आ जायेंगे, पत्रिका भेजेंगे तो उन्हें भी।

(16) जो केवल अखण्ड-ज्योति के ग्राहक रहना चाहते है, उनसे अनुरोध है कि हो सके तो युग-निर्माण-योजना भी साथ-साथ मँगाने का साहस और भी कर लें। अब दोनों पत्रिकाएँ एक-दूसरे की पूरक बन गईं हैं। अपने मिशन की विचारधारा अखण्ड-ज्योति में है और कार्य-पद्धति युग-निर्माण योजना में रहती है। दोनों के मिलने से ही एक पूरी बात बनती है। एक ही पत्रिका को दो अंकों में विभाजित करके 15-15 दिन के अन्तर से भेजते हैं, यह मानना चाहिये। अखण्ड-ज्योति को हो पाक्षिक हो गई समझना चाहिए। इसलिए प्रयत्न यह किया जाय कि दोनों पत्रिकाएँ साथ-साथ मँगाई जायँ, दोनों का चन्दा इकट्ठा भेजा जाय।

(17) जहाँ अधिक किफायत की बात हो, वहाँ ऐसा किया जा सकता है कि दो सदस्य मिलकर एक ही पते पर दोनों पत्रिकाएँ मँगाना आरम्भ कर दें। इससे हमारे रजिस्टर हलके रहेंगे। हिसाब एक के ही नाम चलेगा, पर पत्रिकाओं का चन्दा दो या अधिक सदस्य मिलकर इकट्ठा कर लिया करेंगे। इसी प्रकार ट्रैक्टों के स्थायी सदस्य बनने के लिये भी कई सदस्य मिलकर इकट्ठे हो सकते हैं।

(18) जुलाई में संलग्न फार्म में स्थायी सदस्यों की जन्म-तिथियाँ पूछी गईं हैं। जिनने उन फार्मों में न लिखी हों, वे अलग से हमें सूचित कर दें। इस जानकारी की हमें विशेष रूप से आवश्यकता पड़ेगी।

(19) इस वर्ष नवम्बर दिसम्बर में ही ‘अखण्ड-ज्योति’ का चन्दा जमा कराया जायगा, ताकि जनवरी का अंक नियत संख्या में ही छापा जाय। पाठकों से अनुरोध है कि वे सन् 67 के लिये तकाजा आने की प्रतीक्षा किये बिना ही नवम्बर या दिसम्बर में अपना चन्दा भेज दें।

(20) स्थायी सदस्य यह प्रयत्न करें कि उनके नाम एक-एक ही अंक न पहुँचे, वरन् दोनों पत्रिकाओं के कई-कई अंक पहुँचते रहें । इसके लिए उन्हें समीपवर्त्ती अस्थायी ग्राहकों से संपर्क बनाकर तथा अपने नये प्रयत्न का अनुमान कर अपने जिम्मे कुछ अधिक ग्राहकों की पत्रिकाएँ ले लेनी चाहिये। हम आशा करेंगे कि स्थायी सदस्य कम-से-कम तीन-तीन अखण्ड-ज्योति और दो-दो युग-निर्माण-योजना के छुटपुट सदस्य अपने द्वारा बनाये रखने का उत्तरदायित्व तो संभाले ही रहेंगे।


नव-निर्माण के अत्यन्त सस्ते ट्रैक्ट

नव-निर्माण के शतसूत्री कार्यक्रमों को व्यापक बनाने के लिए लागत मात्र मूल्य के अत्यन्त सस्ते, सुन्दर, आकर्षक और प्रेरणाप्रद ट्रैक्ट छापे गये हैं। इन्हें स्वयं पढ़ना और दूसरों को पढ़ाना या सुनाना जन-मानस को सुसंस्कृत एवं परिष्कृत करने के लिए आवश्यक है। अब तक 70 ट्रैक्ट छप चुके हैं। मूल्य प्रत्येक का 20 नया पैसा है। इस सीरीज में हर महीने नये ट्रैक्ट छप रहें है। अगले 5 वर्षों में इनकी संख्या 1000 तक पहुँचाने की योजना है।

अब तक छप चुके ट्रैक्टों के नामः-

1-विवाह के आदर्श और सिद्धान्त। 2-तीन दिन का सत्यानाशी विवाहोन्माद। 3-विवाहोन्माद के लिए बुद्धि क्यों बेच दी जाय? 4-विवाह -शादियों का असह्य अप-व्यय। 5-इस हृदय-द्रावक स्थिति को कब तक सहा जायगा? 6-यह कुरीतियाँ मिट रही हैं और मिटेंगी। 7-विवाह का वातावरण धर्मानुष्ठान जैसा रहे। 8-आदर्श विवाहों की रूपरेखा। 9-आदर्श विवाहों का प्रचलन कैसे हो? 10-प्रगतिशील जातीय संगठनों की आवश्यकता । 11-हम भाग्यवादी नहीं कर्मवादी बनें। 12-अन्धविश्वासी नहीं विवेकशील बनिये । 13-अन्ध-विश्वास से लाभ कुछ नहीं हानि अपार है। 14-भिक्षा व्यवसाय देश और समाज का कलंक। 15-मन्दिर जनजागरण के केन्द्र बनें! 16-उनसे जो पचास के हो चले। 17-साधु की महान् परम्परा और जिम्मेदारी । 18-ब्राह्मण अपना उत्तरदायित्व सँभालें। 19-स्वच्छता मनुष्यता का प्रथम गुरुमन्त्र । 20-दर्शन तो करें- पर इस तरह । 21-आलस छोड़िए परिश्रमी बनिये! 22-पश्चाताप त्यागें औचित्य अपनावें! 23-माँसाहार मानवता के विरुद्ध है। 24-तमाखू- एक भयानक दुर्व्यसन । 25-प्राणियों के प्रति निर्दयता न करें! 26-अवव्यय का ओछापन । 27-मृतक-भोज की क्या आवश्यकता? 28-नारी को तिरस्कृत न किया जाय? 29-अशिष्टता न कीजिये! 30-संतान की संख्या न बढ़ाइये। 31-खाद्य समस्या और उसका हल। 32-आहार में असंयम बरतें। 33-संतान की संख्या न बढ़ाइये। 34-गन्दगी की घृणित असभ्यता। 35-शाकाहारी व्यंजन। 36-व्यायाम-हमारी एक अनिवार्य आवश्यकता। 37-वृक्षारोपण- एक परम पुनीत पुण्य । 38-शाक उगायें-अन्न बचायें। 39-पुस्तकालय-सच्चे देवालय। 40-निरक्षरता का कलंक धो दिया जाय। 41-परिवार को सुसंस्कृत कैसे बनायें? 42-विधवा विवाह शास्त्र विरुद्ध नहीं। 43-हम सच्चे अर्थों में आस्तिक बनें। 44-संस्कारों की पुण्य परम्परा। 45-पर्व और त्यौहारों से प्रेरणा ग्रहण करें । 46-लोक निर्माण के लिए जन-गायन। 47-विवाह दिवसोत्स कैसे मनावें? 48-जन्म-दिवसोत्सव इस तरह मनावें। 49-गायत्री यज्ञों की विधि व्यवस्था। 50-गायत्री यज्ञों की विधि व्याख्या। 51-प्रबुद्ध व्यक्ति धर्मतन्त्र सँभालें। 52-सत्कार्यों का अभिनन्दन किया जाय। 53-पुँसवन संस्कार विवेचन। 54-नामकरण संस्कार विवेचन । 55-अन्नप्राशन संस्कार विवेचन। 56-चूड़ाकर्म संस्कार विवेचन। 57-विद्यारंभ संस्कार विवेचन। 58-यज्ञोपवीत संस्कार विवेचन। 59-विवाह संस्कार विवेचन । 60- वान्प्रस्थ संस्कार विवेचन। 61-अंत्येष्टि संस्कार विवेचन । 62-मरणोत्तर संस्कार विवेचन। 63-बाल विवाह की भयंकरता से समाज को बचाया जाय। 64-बच्चों को सद्गुणी कैसे बनायें? 65-छात्रों का निर्माण अध्यापक करें। 66-हरिजन उत्कर्ष के लिए बड़े कदम उठें। 67-नारी उत्थान के लिए महिलायें आगे आवें। 68-पशुबलि हिन्दूधर्म का कलंक। 69-नव-निर्माण के लिए जन-सम्मेलन। 70-मनुष्य क्या पशुओं से भी गिरा रहेगा?

अब तक 20 नया पैसा सीरीज के 70 ट्रैक्ट छप चुके हैं। इनका मूल्य 14) होता है। 15 प्रतिशत कमीशन घटाकर और पोस्टेज जोड़कर यह वी.पी. 14) 75 की बैठेगी। प्रथम सत्र आरम्भ करने के लिए सैट मँगाने का आर्डर भेज देना चाहिए। जिनके पास जो ट्रैक्ट हों, वे उनके नाम लिख दें तो शेष वी. पी. कर दिये जायेंगे।

*समाप्त*