कर्त्तव्य पालन का अविरल आनन्द

समराँगण की लीला में तलवार आनन्द पाती है, तीर अपनी उड़ान और सनसनाहट में मजा लेता है। पृथ्वी इस आकाश में अपना अन्धाधुन्ध चक्कर लगाने के आनन्द में विभोर है, सूर्यनारायण अपने जगमगाते वैभव में तथा अपनी सनातन गति में सदा सम्राट्-सदृश आनन्द का भोग कर रहा है, तो फिर सचेतन यन्त्र, तू भी अपने नियत कर्म को करने का आनन्द उठा।

तलवार अपने बनाये जाने की माँग नहीं करती, न अपने उपयोगकर्ता के कार्य में बाधा ही डालती है, और टूट जाने पर विलाप भी नहीं करती। बनाए जाने में एक प्रकार का आनन्द है, प्रयुक्त किए जाने में भी एक आनन्द है। इसी के सम आनन्द की तू खोज कर।

क्योंकि तूने यन्त्र को कार्यकर्ता और स्वामी समझने की भूल की है और क्योंकि तू अपनी अज्ञानमयी इच्छा के कारण, अपनी निजी उपयोगिता का विचार करना पसंद करता है, तुझे दुःख और यातनाएँ झेलनी पड़ती हैं, बार-बार लाल दहकती हुई भट्टी के नरक में घुसना पड़ता है, और यह जब तक कि तू अपना मनुष्योचित पाठ पूरा नहीं कर लेगा।

-योगी अरविन्द


सच्चे हृदय से आत्मा का उद्बोधन करें।

आत्मा के उद्धार के लिए शास्त्रों और उपनिषदों में काफी साधन और ज्ञान पड़ा हुआ है। किन्तु साहित्य का स्वाध्याय कर लेना, उसका ज्ञान बढ़ाकर उपदेश कर लेने से किसी को आत्मसात् नहीं हो जाता। गीताकर का स्पष्ट निर्देश है-

नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यी

न मेधया न बहुना श्रुतेन।

यमैवैष्ज्ञ वृणुते तेन लभ्य-

रस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूँ स्वाम्।

अर्थात्-यह आत्मा बहुत उपदेश कर लेने से नहीं मिल जाता। बहुत ज्ञान और शास्त्रों के सुन लेने से भी वह प्राप्त नहीं होता। यह आत्मा, आत्मा को वरण करने से ही जाना जा सकता है।

आत्मा सत्य है, शाश्वत है और शक्ति का स्वरूप है। पर जब तक वह साँसारिक आत्म-कल्पनाओं से विमुक्त नहीं हो जाती, वह अपने वास्तविक रूप में प्रकट नहीं हो सकती । शास्त्रों का सत्साहित्य स्वाध्याय और ज्ञान-संवर्द्धन भी इस कार्य में सहायक है पर केवल ज्ञान की प्राप्ति ही पर्याप्त नहीं है। बुद्धिमान् लोग ज्ञान का दुरुपयोग करते हुए भी देखे जाते हैं। ज्ञान के द्वारा यदि आत्मलाभ सम्भव रहा होता तो अनेक पाश्चात्य दार्शनिक बहुत ज्ञानवान् हुए हैं-वे सब आत्मज्ञानी रहे होते और यदि इन देशों में थोड़े भी आत्मज्ञानी रहे होते तो आज उनकी दशा ही भिन्न होती। भौतिक दृष्टि से समृद्ध बनकर भी बुराइयों का जाल फैलाकर यह देश तब न दूसरों के लिए अभिशाप बनते वरन् स्वयं भी आध्यात्मिक सुखों का रसास्वादन कर रहे होते।

औरों को उपदेश करने की अपेक्षा अपना उपदेश आप कर लिया जाये, औरों को ज्ञान देने की अपेक्षा स्वयं के ज्ञान को परिपक्व कर लिया जाए, दूसरों को सुधारने की अपेक्षा अपने को ही सुधार लिया जाये तो अपना भी भला हो सकता है और दूसरे लोगों को भी कर्मजनित प्रेरणा देकर प्रभावित किया जा सकता है। लोग यह कम देखते हैं कि आप कहते क्या हैं? उपदेशक की वार्ता का नहीं, उसके व्यक्तिगत जीवन का प्रभाव अधिक होता है।

आत्मज्ञान की परिपक्वता और गुणों के विकास के लिए आत्म-सम्बोधन का महत्व है। सच्चे हृदय से आत्मा का उद्बोधन होता रहे तो मनुष्य अनेकों बुराइयों से बचा रह सकता है और आत्म-कल्याण के मार्ग में निष्ठापूर्वक आरुढ़ बना रह सकता है। ईश्वर-भक्ति भी दरअसल आत्म-उद्बोधन का विकसित रूप ही है जो विचार की अपेक्षा अधिक सरल है। किसी भी विषय को लेकर उसकी गहराई में तन्मय हो जाना और नये-नये तथ्यों की खोज कर लेना सामान्य व्यक्तियों के लिए बहुत कठिन है। कोई थोड़े ही ज्ञान-वान अर्चना निष्ठ व्यक्ति ऐसे होते हैं जो विचार-रत रहकर किन्हीं सिद्धांतों का प्रतिपादन कर पाते हैं। प्रारम्भिक अवस्था में विचार आत्म-निर्माण में भी बड़ा सहायक होता है पर जब किसी के लिए यह स्थिति सम्भव न हो तो उसे भावनाओं का आश्रय तो लेना चाहिए परमात्मा के गुणों का रूप, आकृति, दया करुणा, उदारता और रक्षा आदि के कार्यों का अपने आप मनन, भजन अथवा कीर्तन करना ही भावना का प्रतीक है। अपेक्षाकृत यह अधिक सरल प्रक्रिया है और इस मार्ग के द्वारा भी अपने आपको सत्य से उस समय तक जोड़े रखा जा सकता है, जब तक सत्य सिद्धि न हो जाये अथवा फिर कभी बुराइयों की ओर आकृष्ट हो जाने का भय शेष न रहे।

ईश्वर की प्राप्ति के लिए जो महत्व ईश्वर को उद्बोधन करने का है। आत्मज्ञान के मुमुक्षुओं के लिए आत्मा के उद्बोधन का भी वही महत्व है। जिस प्रकार भगवान् का भक्त यह कहता है-हे ईश्वर! तू सर्वशक्तिमान् है, सर्वव्यापक है, विश्व नियन्ता और सबको धारण करने वाला तू ही है, तूने ही इस सृष्टि की रचना की , आकाश बनाया, समुद्र, पर्वत, नदियाँ, वृक्ष, फल, फूल और तरह-तरह के जीवन बनाये हैं। तू परम दयालु है पर ममतारहित है, तेरे वश में सम्पूर्ण लोकपाल और दिक्पाल हैं फिर भी तू अहंकार रहित है। इस प्रकार की अर्चनायें भक्त की भावनाओं को जीवन प्रदान करती हैं, उसकी ईश्वर निष्ठा बढ़ती है और वह बुरे विचारों से बचता हुआ निरन्तर कल्याण की ओर अग्रसर होता रहता है।

यह उद्बोधन सच्चे हृदय से आत्मा के लिए किया जाये तो आत्मा की अपनी सम्पूर्ण विशिष्टतायें हम पर प्रकाशित करता है और इस प्रकार आत्म-भावना की पुष्टि भी होती रहती है। ऐसी भावनायें साधन-काल में, चलते फिरते, खाते-पीते, उठते-बैठते, काम करते हर समय की जा सकती हैं। आत्म-शोधन का यह अनुपम और पूर्ण मनोवैज्ञानिक तरीका है।

‘ऐ आत्मा। तू अपनी ओर देख, तेरी शक्तियों और सामर्थ्यों का क्या ठिकाना? तू अनन्त हैं, महान है, कण-कण में तू ही तो समाया हुआ है। जीव-जन्तुओं में कलरव करते हुए पक्षियों में लहलहाते हुए खेतों में, महकते हुए फूलों में, धरती-आकाश, जल-थल, सर्वत्र तू ही तू विराजमान् है, तेरी ही आत्मा फैल रही है। देख अपने इस विराट् स्वरूप को तो देख। इसे देखकर तू आनन्द से भर जायेगा।

‘ए जीव! तू शुद्ध और सौंदर्य युक्त है फिर भी धिक्कार है तुझे, जो इन तुच्छ विषय-भोगों की ओर आकर्षित हो रहा है। उनकी स्थिति क्या है, इस पर कभी विचार किया है? क्या तुझे यह मालूम नहीं कि यह तरह-तरह के भोज्य पदार्थ, जिनकी ओर तू ललचाई आँखों से देख रहा है, स्वास्थ्य को गिराने वाले हैं। इन विषय-भोगों के शक्तिक्षय करने वाले स्वरूप को क्या तू अभी तक नहीं पहचान सका, शरीर की नश्वरता का तूने जरा भी ध्यान नहीं किया-क्या यह तेरे लिए अशोभनीय बात नहीं है?

‘ऐ जीव!

विचार कर, कितने सौभाग्य से तुझे यह मानव देह उपलब्ध हुई। तुझे यह भी मालूम नहीं कि तू आया कहाँ से, कहाँ जा रहा है? कितना अच्छा होता, यदि तू अपने अपने आप को जानने का प्रयत्न करता और इस मनुष्य-जीवन का सदुपयोग करता। उदर-पूर्ति तो असहाय पशु-पक्षी भी कर लेते हैं, बच्चे तो ये जानवर भी पैदा कर लेते हैं। आलस्य और निद्रा में मस्त पड़े रहना व समय को व्यर्थ गँवाना तो पशु भी जानते हैं। तू भी इन्हीं साँसारिक क्रिया-कलापों में सीमाबद्ध रहा तो तेरी विशेषता भी क्या रही? सुख आखिर कब तक रहेंगे? शरीर कब तक साथ देगा? धन कब तक ठहरेगा? यह तो आने-जाने वाले पदार्थ हैं, इन्हें तो तू त्यागपूर्वक ही भोग, आसक्त न हो। आसक्त होने से लाभ भी क्या? तू नहीं तो यह पदार्थ ही एक दिन तुझे छोड़ जायेंगे। विचार कर-शरीर नहीं रहा तो धन किसके साथ गया। पद, सौंदर्य और साँसारिक सुखों को आज तक कौन अपने साथ ले पाया है? इन्हें किंतु यहीं तक सीमित रख और शाश्वत स्वरूप को जानने की इच्छा कर।

देख तू माया में, अज्ञान में, अविद्या में, रोग-ग्रस्त हो कर अपने स्वरूप से भ्रष्ट हुआ है। अब तुझे अपने आपको पहचानने की इच्छा हुई है तो इसे तू अपना महान् सौभाग्य ही मान। पर यह और जान ले कि यह कार्य इतना आसान नहीं है तुझे पग-पग पर कठिनाइयों से लड़ना पड़ेगा, बुराइयों को मारना पड़ेगा और मन की दुष्प्रवृत्तियों को मोड़कर सन्मार्ग की ओर चलना पड़ेगा। पथ दुर्गम है, संघर्ष से भरा है, इनसे लड़ने के लिए तू अपना गाँडीव धारण कर अपने पुरुषार्थ का आह्वान कर क्योंकि यह अनन्त शक्तिवाला आत्मा केवल साहसी व्यक्तियों को ही उपलब्ध हो पाता है। शूरवीर ही इस पथ का अनुसरण कर पाते हैं।

इस प्रकार के विचारों का उद्बोधन निरन्तर चलते रहना चाहिए। संसार में फैले हुए कलुषित विचारों का मन में प्रभाव न पड़े, ऐसा सम्भव नहीं। यह आत्मोपदेश बहुत सरल है और उसे हृदयंगम भी किया जा सकता है। प्राप्त ज्ञान का सदुपयोग भी इसी से सम्भव है। आत्मा के स्वरूप की प्रतिष्ठा करने से वैसे गुणों का विकास होने लगता है। जीवात्मा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह अपने आपको जिस स्थिति का अनुभव करने लगता है, उसकी मनोदशा का झुकाव जिस तरफ हो जाता है उधर ही उसकी उन्नति होने लगती है और अभ्यास होने पर उस स्थिति की पूर्णता को उपलब्ध कर लेता है।


आध्यात्मिक आदर्श के मूर्तिमान् देवता-भगवान् शिव

भारतीय संस्कृति में देवताओं की विचित्र कल्पनायें की गई हैं। उनकी मुखाकृति, वेष-विन्यास, रहन-सहन, वाहन आदि के ऐसे विचित्र कथानक जोड़कर तैयार किये गये हैं कि उन्हें पढ़कर यह अनुमान करना भी कठिन हो जाता है कि वस्तुतः कोई ऐसे देवता है भी अथवा नहीं।

चार मुख के ब्रह्मा जी, पश्चमुख महादेव, षट्मुख कार्तिकेय, हाथी की सूँड़ वाले श्री गणेशजी, पूँछ वाले हनुमानजी-यह सब विचित्र-सी कल्पनायें हैं, जिन पर मनुष्य की सीधी पहुँच नहीं हो पाती उसे या तो श्रद्धावश देवताओं को सिर झुकाकर चुप रह जाना पड़ता है या तर्कबुद्धि से ऐसी विचित्रताओं का खण्डन कर यही मान लेना पड़ता है कि ऐसे देवताओं का वस्तुतः कहीं कोई अस्तित्व नहीं है।

पौराणिक देवी-देवताओं के जो वर्णन मिलते हैं उन पर गम्भीरतापूर्वक विचार करें तो पता चलता है कि इन विचित्रताओं के पीछे बड़ा समुन्नत आध्यात्मिक रहस्य छिपा हुआ है। मानव-जीवन के किन्हीं उच्च आदर्शों और स्थितियों का इस तरह बड़ा ही कलापूर्ण दिग्दर्शन किया है, जिसका अवगाहन करने मात्र से मनुष्य दुस्तर साधनाओं का फल प्राप्त कर मनुष्य जीवन को सार्थक बना सकता है।

इस प्रकार के आदर्श आदिकाल से मनुष्य को आकर्षित करते रहे हैं। मनुष्य उनकी उपासना करता रहा है और जाने अनजाने भी इन आध्यात्मिक लाभों से लाभान्वित होता रहा है। इन्हें एक प्रकार से व्यावहारिक जीवन की मूर्तिमान उपलब्धियाँ कहना चाहिए। उस जीवन-क्रम में इतना सरल और सुबोधगम्य बना देने में भारतीय आचार्यों की सूक्ष्म बुद्धि का उपकार ही मानना चाहिए, जिन्होंने बहुत थोड़े में सत्य और जीवन-लक्ष्य की उन्मुक्त अवस्थाओं का ज्ञान उपलब्ध करा दिया है।

शैव और वैष्णव यह दो आदर्श भी उन्हीं में से हैं शिव और विष्णु दोनों आध्यात्मिक जीवन के किन्हीं उच्च आदर्शों के प्रतीक हैं। इन दोनों में मौलिक अन्तर इतना ही है कि शिव आध्यात्मिक जीवन को प्रमुख मानते हैं उनकी दृष्टि में लौकिक सम्पत्ति का मूल्य नहीं है, वैराग्य ही सब कुछ है जबकि विष्णु जीवन के लौकिक आनन्द का भी परित्याग नहीं करते हैं।

यहाँ हमारा उद्देश्य इन दोनों स्थितियों में तुलना या श्रेष्ठता के आधार ढूँढ़ना नहीं है। शिव के आध्यात्मिक रहस्यों का ज्ञान कराना अभीष्ट है ताकि लोग इस महत्व का भली भाँति अवगाहन कर अपना जीवन-लक्ष्य सरलता पूर्वक साध सकें।

शिव का आकार लिंग माना जाता है। उसका अर्थ यही है कि यह सृष्टि साकार होते हुए भी उसका आधार आत्मा है। ज्ञान की दृष्टि से उसके भौतिक सौंदर्य का कोई बड़ा महत्व नहीं है। मनुष्य को आत्मा की उपासना करनी चाहिए, उसी का ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। साँसारिक रूप-सौंदर्य और विविधता में घसीटकर उस मौलिक सौंदर्य को तिरोहित नहीं करना चाहिए।

शिव के स्वरूप, अलंकार और जीवन सम्बन्धी घटनाओं का और भी विशद् वर्णन मिलता है। ऐसे प्रत्येक प्रसंग में या तो किसी दार्शनिक तत्व का विवेचन सन्निहित है अथवा व्यावहारिक आचरण की शिक्षा दी गई है। आइये,इन पर एक-एक करके विचार किया जाये-

(1) शिव का स्वरूप-भगवान शंकर के स्वरूप में जो विचित्रतायें हैं वह किसी मनुष्य की देह में सम्भव नहीं इसलिए उसकी सत्यता संदिग्ध मानी जाती है पर हमें यह जानना चाहिए कि यह चित्रण सामान्य नहीं, अहंकार हैं जो मनुष्यों में योग-साधनाओं के आधार पर जागृत होते हैं।

(क) माथे पर चन्द्रमा-चन्द्रमा मन की मुदितावस्था का प्रतीक है अर्थात् योगी का मन सदैव चन्द्रमा की भाँति उत्फुल्ल, चन्द्रमा की भाँति खिला और निःशंक होता है। चन्द्रमा पूर्ण ज्ञान का प्रतीक भी है अर्थात् उसे जीवन की अनेक गहन परिस्थितियों में रहते हुए भी किसी प्रकार का विभ्रम अथवा ऊहापोह नहीं होता। वह प्रत्येक अवस्था में प्रमुदित रहता है, विषमताओं का उस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।

(ख) नीलकंठ-पुराणों में ऐसी कथा आती है कि देवों और दानवों को रक्तपात बचाने के लिए भगवान् शंकर ने विष पी लिया था और तब से इनका कंठ नीला है अर्थात् इन्होंने विष को कंठ में धारण किया हुआ है। इस कथानक का भी सीधा सम्बन्ध योग की सिद्धि से ही है। योगी पुरुष अपने सूक्ष्म शरीर पर अधिकार पा लेता है जिससे उसके स्थूल शरीर पर बड़े तीक्ष्ण विषों का भी प्रभाव नहीं होता। उन्हें भी वह सामान्य आहार की तरह पचा लेता है। यह बात इस तरह भी है कि संसार के मान अपमान, कटुता-क्लेश आदि दुःख -कष्टों का उस पर कोई प्रभाव नहीं होता। उन्हें भी वह साधारण घटनायें मानकर आत्मसात् कर लेता है और संसार का कल्याण करने की अपनी आत्मिक वृत्ति में निश्चल भाव से लगा रहता है। दूसरे व्यक्तियों की तरह लोकोपकार करते समय उसे स्वार्थ आदि का कोई ध्यान नहीं होता। वह निर्विकार भावना से संसार की भलाई में जुटा रहता है। खुद विष पीता है पर औरों के लिए अमृत लुटाता रहता है।

(ग) विभूति रमाना-शिव ने सारे शरीर पर भस्म रमा रखी है। योग की पूर्णता पर संयम-सिद्धि होती है। योगी अपने वीर्य को शरीर में रमा लेते हैं जिससे उसका सौंदर्य फूट पड़ता है। इस सौंदर्य को भस्म के द्वारा सौंदर्य बढ़ाने की आवश्यकता नहीं रहती। अक्षुण्ण संयम ही उसका अलंकार बन गया है, जिससे उसका स्वास्थ्य और शरीर सब काँतियुक्त हो गये हैं।

(घ) तृतीय नेत्र-योग की भाषा में इसे ‘नेत्रोन्मीलन’ या आज्ञा-चक्र का जागरण भी कहते हैं। उसका सम्बन्ध गहन आध्यात्मिक जीवन से है। घटना-प्रसंग जुड़ा हुआ है कि शिवजी ने एक बार तीसरा नेत्र खोलकर कामदेव को भी जला दिया था। योगी का यह तीसरा नेत्र यथार्थ ही बड़ा महत्व रखता है। सामान्य परिस्थितियों में यह विवेक के रूप में जागृत रहता है, पर वह अपने आप में इतना सशक्त और पूर्ण होता है कि कामवासना जैसे गहन प्रकोप भी उसका कुछ बिगाड़ नहीं पाते। उन्हें भी जला डालने की क्षमता उसके विवेक में बनी रहती है। इसे वैज्ञानिक बुद्धि का प्रतिनिधि भी कहा जा सकता है। पर सबका तात्पर्य यही है कि तृतीय नेत्र होना साधारण क्षमता से उठाकर विशिष्ट श्रेणी में पहुँचा देना है। भारतीय संस्कृति का यह वैज्ञानिक पहलू कहीं अधिक मूल्यवान भी है।

भगवान् शिव का वाहन वृषभ है। वृषभ सौम्यता और कर्मठता का प्रतीक माना जाता है। तात्पर्य यह कि शिव का साहचर्य उन्हें मिलता है, जो स्वभाव से सरल और सौम्य होते हैं, जिनमें छल-छिद्र आदि विकार नहीं होते। साथ ही जिनमें आलस्य न होकर निरन्तर कर्म करने की दृढ़ता होती है। श्मशान में उनका निवास है अर्थात् वे मृत्यु को कभी भूलते नहीं। भगवान् की शक्ति और नियमों को मृत्यु की तरह अकाट्य मानकर चलने में मनुष्य की आध्यात्मिक वृत्तियाँ जागृत रहती हैं जिससे वह लौकिक कर्त्तव्यों का पालन करते हुए भी अपने जीवन-लक्ष्य की ओर निष्काम भाव से चलता रह सकता है। मृत्यु को लोग भूले रहते हैं, इसलिए बुरे कर्म करते हैं। इस महातत्त्व की उपासना का अर्थ अपने आप को बुरे कर्मों से बचाये रखने के लिये प्रकाश बनाए रखना होता है। इस तरह की जीवन-व्यवस्था व्यक्ति को असाधारण बनाती है। वह शक्ति शिव में पाई जाती है, शिव के उपासकों में भी वह वृत्तियाँ धुली हुई होनी चाहिए।

यह प्रसंग भगवान् शिव की आध्यात्मिक शक्तियों पर प्रकाश डालते हैं। इनके साथ कथानक और घटनायें भी जुड़ी हुई हैं जो जीवन के आदर्शों की व्याख्या करती है इनमें से गंगावतरण की कथा मुख्य है। गंगाजी विष्णुलोक से आती हैं। यह अवतरण महान् आध्यात्मिक शक्ति के रूप में होता है। उसे संभालने का प्रश्न बड़ा विकट था। शिवजी को इसके उपयुक्त समझा गया और भगवती गंगा को उनकी जटाओं में आश्रय मिला। गंगा जी यहाँ ज्ञान की प्रचण्ड आध्यात्मिक शक्ति के रूप में अवतरित होती है। लोक-कल्याण के लिए उसे धरती पर प्रवाहित करने की बात है ताकि अज्ञान से मरे हुए लोगों को जीवन-दान मिल सके पर उस ज्ञान को धारण करना भी तो कठिन बात थी जिसे शिव जैसा संकल्प-शक्ति वाला महापुरुष ही धारण कर सकता है अर्थात् महान् बौद्धिक क्रान्तियों का सृजन भी कोई ऐसा व्यक्ति ही कर सकता है जिसके जीवन में भगवान शिव के आदर्श शिव के आदर्श समाये हुये हों वही ब्रह्म-ज्ञान को धारण कर उसे लोक हितार्थ प्रवाहित कर सकता है।

गृहस्थ होकर भी पूर्ण योगी होना शिवजी के जीवन की दूसरी महत्वपूर्ण घटना है। साँसारिक व्यवस्था को चलाकर भी वे योगी रहते हैं पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं। वे अपनी धर्मपत्नी को भी मातृशक्ति के रूप में देखते हैं। यह उनकी महानता का दूसरा आदर्श है। यहाँ उन्होंने सिद्ध कर दिया है कि गृहस्थ रहकर भी आत्म-कल्याण की साधना असम्भव नहीं। जीवन में पवित्रता रखकर उसे हँसते खेलते पूरा किया जा सकता है।

यह सभी आदर्श इस बात की शिक्षा देते हैं कि मनुष्य शिव की तरह संसार के पदार्थों और समाज में प्रचलित परम्पराओं का आध्यात्मिक मूल्याँकन करना सीख ले तो निस्सन्देह उसका शारीरिक और सामाजिक जीवन अधिकाधिक निरापद होता चला जायेगा। संक्षेप में कहा जा सकता है कि शिव मानव-जीवन की उन सभी आध्यात्मिक विशेषताओं के प्रतीक हैं जिसके बिना मनुष्य-जीवन पाने का अर्थ हल नहीं होता। मनुष्य का धर्म उसकी विवेक बुद्धि है जिसके सहारे वह ज्ञान-विज्ञान की ओर अग्रसर होता है और मनुष्य से देव बनने में समर्थ होता है। इस तरह की सामर्थ्य प्राप्त करके ही आत्म-कल्याण और लोक-हित की परम्परा जीवित रखी जा सकती है। यह सन्देश हमें आदिकाल से भगवान शिव देते चले आ रहे हैं। इन आध्यात्मिक रहस्यों की ओर से हमें उपेक्षा नहीं रखनी चाहिए।


शबरी की महत्ता

शबरी की महत्ता-

शबरी यद्यपि जाति की भीलनी थी किन्तु उसके हृदय में भगवान की सच्ची भक्ति भरी हुई थी। बाहर से वह जितनी गन्दी दीख पड़ती थी, अन्दर से उसका अन्तःकरण उतना ही पवित्र और स्वच्छ था। वह जो कुछ करती भगवान के नाम पर करती भगवान् के दर्शनों की उसे बड़ी लालसा थी और उसे विश्वास भी था कि एक दिन उसे भगवान् के दर्शन अवश्य होंगे। शबरी जहाँ रहती थी उस वन में अनेक ऋषियों के आश्रम थे। उसकी उन ऋषियों की सेवा करने और उनसे भगवान की कथा सुनने की बड़ी इच्छा रहती थी। अनेक ऋषियों ने उसे नीच जाति की होने के कारण कथा सुनाना स्वीकार नहीं किया और श्वान की भाँति दुत्कार दिया। किन्तु इससे उसके हृदय में न कोई क्षोभ उत्पन्न हुआ और न निराशा। उसने ऋषियों की सेवा करने की एक युक्ति निकाल ली।

वह प्रतिदिन ऋषियों के आश्रम से सरिता तक का पथ बुहारकर कुश-कंटकों से रहित कर देती और उनके उपयोग के लिये जंगल से लकड़ियाँ काटकर आश्रम के सामने रख देती। शबरी का यह क्रम महीनों चलता रहा किन्तु किसी ऋषि को यह पता न चला कि उनकी यह परोक्ष सेवा करने वाला है कौन? इस गोपनीयता का कारण यह था कि शबरी आधी रात रहे ही जाकर अपना काम पूरा कर आया करती थी। जब यह कार्यक्रम बहुत समय तक अविरल रूप से चलता रहा तो ऋषियों को अपने परोक्ष सेवक का पता लगाने की अतीव जिज्ञासा हो उठी । निदान उन्होंने एक रात जागकर पता लगा ही लिया कि यह वही भीलनी है जिसे अनेक  बार दुत्कार कर द्वार से भगाया जा चुका था।

तपस्वियों ने अन्त्यज महिजा की सेवा स्वीकार करने में परम्पराओं पर आघात होते देखा और उसे उनके धर्म-कर्मों में किसी प्रकार भाग न लेने के लिये धमकाने लगे। मातंग ऋषि से यह न देखा गया। वे शबरी को अपनी कुटी के समीप ठहराने के लिये ले गये। भगवान राम जब वनवास गये तो उन्होंने मातंग ऋषि को सर्वोपरि मानकर उन्हें सबसे पहले छाती से लगाया और शबरी के झूठे बेर प्रेमपूर्वक चख-चखकर खाये।


मानसिक सुख-शाँति के उपाय

मनोविश्लेषण आधुनिक समय का एक विशेष तथा नवीन विज्ञान माना जा रहा है। यह मनोविज्ञान पाश्चात्य देशों के लिये कोई नवीन अथवा विज्ञान हो सकता है। किन्तु भारत के लिये यह एक प्राचीन विषय है। दुःख सुख की अनुभूतियाँ, काम क्रोध, लोभ-मोह आदि की वृत्तियाँ, उनका कारण एक निवारण का उपाय इस देश का चिर परिचित तथा प्राचीन विषय है। अन्तर केवल यह है कि भारत के प्राचीन वेत्ताओं ने इस विषय को दर्शन का नाम दिया था और आज के पाश्चात्य विद्वानों ने इस मनो ज्ञान अथवा मानस-विज्ञान की संज्ञा दी है। ध्येय दोनों का मनःस्थिति द्वारा आन्तरिक सुख शाँति ही रहा है।

सुख-दुःख की अनुभूति मन में होती है। अस्तु, मन की स्थिति पर सुख दुःख का आना जाना स्वाभाविक है पाश्चात्य मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि मनुष्य साँसारिक प्राणी है। उसका संसार के विषयों की ओर झुकाव होना अनिवार्य है। संसार में जहाँ इच्छा, अभिलाषाओं तथा कामनाओं का बाहुल्य है वहाँ शोक संघर्षों की भी कमी नहीं है। संसार में निवास करने वाला मनुष्य इन अवस्थाओं से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता। कामनायें होंगी, अभाव खटकेगा, फलस्वरूप मन को अशाँति होगी। मन अशाँत रहने पर तरह-तरह की बाधाओं तथा व्यामोहों का जन्म होगा और चिन्ताओं की वृद्धि होगी, जिसका परिणाम दुःख के सिवाय और कुछ नहीं हो सकता।

पाश्चात्य मनोवैज्ञानिकों का यह कथन किसी प्रकार भी गलत नहीं कहा जा सकता। निःसन्देह बाधाओं का यही क्रम है जिससे मनुष्य को दुःख का अनुभव करने लिये विवश होना पड़ता है। किन्तु उनके इस कथन से जो यह ध्वनि निकलती है कि मनुष्य को दुःख होना ही स्थायी अनुभूति है अथवा साँसारिक स्थिति के अनुसार पीड़ा उसका प्रारब्ध भाग है-ठीक नहीं।

इस विषय में पाश्चात्य मनोवैज्ञानिकों से भारतीय दार्शनिकों का कहना है कि जीव अर्थात् मनुष्य की स्वाभाविक स्थिति सुखमय है। उसका सत्य रूप आनंदस्वरूप है। संसार की बाधायें माया जन्य हैं जो दुःख रूप में मानव मन पर आरोपित होती हैं। यदि जीव अपने सत्यस्वरूप का ज्ञान प्राप्त कर ले तो दुःख की सारी अनुभूतियों का अत्यंताभाव हो जाये, फिर वह न तो कभी दुःखी हो और न पीड़ित।

इन प्रश्न के उत्तर में कि जब संसार में शोक संघर्षों का अस्तित्व स्थायी है और मनुष्य साँसारिक प्राणी है तो उसे सुख प्राप्ति ही किस प्रकार हो सकती है। उसके भाग्य में मानो सदा सर्वदा के लिये दुःख शोक ही अंकित हो गये हैं। उत्तर में आधुनिक मानस-वेत्ताओं का उत्तर है कि मानव-मन की कुछ अभिलाषायें होती हैं, इच्छायें तथा कामनायें होती हैं। जिनकी पूर्ति के लिये वह लालायित रहता है। अपनी कामनाओं की आपूर्ति में ही मन को दुःख तथा अशाँति होती है। यदि उसकी लालसाओं, अभावों तथा आवश्यकताओं की पूर्ति होती रहे तो मन के दुःखी अथवा अशान्त होने का कोई कारण ही उपस्थित न हो। इसलिये मनुष्य को सुखी होने अथवा मन को सुखी करने के लिये उसी दिशा में बढ़ना होगा जिस दिशा में उसकी लालसाओं का पूर्ति-लाभ हो । मन जो कुछ चाहता है वह उसे मिल जाये तो निश्चय ही वह सुखी एवं सन्तुष्ट रहे।

सुनने में तो पाश्चात्यों का यह उत्तर बड़ा सीधा, सरल तथा समीचीन मालूम होता है पर भारतीय दार्शनिकों के मतानुसार वह वैसा है नहीं। उनका कहना है कि मनुष्य का मन-मानस हर समय तरंगित होता रहता है। उसकी हर तरंग की तृप्ति नहीं की जा सकती। मनुष्य के चंचल मन की वासनाओं, कामनाओं, इच्छाओं, अभिलाषाओं तथा लालसाओं का वारापार नहीं। एक की पूर्ति होते ही दूसरी उठ खड़ी होती है। साथ ही चंचल मन में असन्तोष का एक दोष रहता है। किसी विषय की कामना करने पर यदि वह उसे मिल भी जाये तो वह उससे तृप्त नहीं होता उसे ‘और-और’ का दौरा जैसा पड़ने लगता है। इस प्रकार वह विषय की पूर्ति में भी असन्तुष्ट एवं अशान्त रहने लगता है, और यदि एक बार उसकी और, और की तृष्णा भी बहुतायत से पूरी की जा सके तो उसे शीघ्र ही उस विषय से अरुचि होने लगती है और वह नवीन विषय के लिये उत्सुक हो उठता है।

इस सत्य का, यदि पाश्चात्य मनोवेत्ताओं के पास कोई उत्तर हो सकता है तो केवल यह है कि मन को प्रसन्न करने का इसके अतिरिक्त अन्य कोई उपाय नहीं कि उसकी लालसाओं की पूर्ति करने का यथासाध्य प्रयत्न किया जाये। जो जिस सीमा तक इस प्रयत्न में सफल होता रहेगा वह उस सीमा तक सुखी एवं सन्तुष्ट रहेगा। और जो जितनी सीमा तक असफल होगा वह उस सीमा तक दुःखी एवं अशाँत रहेगा। उसे सुखी एवं सन्तुष्ट कर सकने का अन्य कोई उपाय नहीं है।

क्या पाश्चात्य मानस-वेत्ताओं का यह उत्तर उपयुक्त माना जा सकता है? इसका तो ठीक-ठीक आशय यह है कि जो अधिक शक्तिशाली, साधन सम्पन्न तथा चतुर है वह वाँछाओं को किसी प्रकार भी पूरी कर सुखी एवं सन्तुष्ट रह सकता है और जो सामान्य जन जिनके पास शक्ति, साधन तथा चातुर्य की कमी है वे दुःख की दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति में ही पड़े-पड़े रोते-कलपते रहेंगे। सुखी होने का यह उपाय शाश्वत, सार्वभौम, सार्वजनिक तथा सभ्यता पूर्ण नहीं है। निःसन्देह इसी प्रकार के दृष्टिकोण ने संसार में स्वार्थ, संघर्ष, शोषण तथा साम्राज्यवाद को जन्म दिया और बढ़ाया है। संसार में फैले अन्याय, अत्याचार तथा अनैतिकता का उत्तरदायी भी यही दूषित दृष्टिकोण ही है।

इसके अतिरिक्त इस पाश्चात्य कथन में सत्य का अंश भी नहीं है। यदि धन, धाम, वैभव-विभूति, साधन-सुविधा, वस्तुयें एवं उपादान सञ्चय कर लेने से कोई सुख का अधिकारी बन सकता होता तो संसार का कोई भी साधन सम्पन्न व्यक्ति दुःखी अथवा असन्तुष्ट नहीं दिखाई देता। उसका जीवन शाँतिपूर्वक शरद-सरिता की तरह निर्विकार रूप से आनन्द कलरव के साथ कल्लोल करता हुआ बहता चला जाता। इसके विपरीत असाधनवानों का कभी मानसिक समाधान ही न होता। वे सदा सर्वदा क्षण-प्रतिक्षण अशान्ति एवं असुखं के अनुपात में जलते मरते रहते। जबकि ऐसा देखने में नहीं आता। एक से एक बढ़कर सम्पन्न व्यक्ति दुखी और एक से एक असम्पन्न व्यक्ति सुखी एवं सन्तुष्ट देखे जा सकते हैं।

भारतीय दार्शनिकों ने मानसिक सुख-शाँति का जो उपाय निर्देश किया है वह सत्य, शाश्वत, सार्वभौम, सार्वजनिक, सुलभ, सरल तथा सात्विकता पूर्ण है। उसका अवलंबन लेकर क्या धनी, क्या निर्धन क्या साधन सम्पन्न क्या असाधनवान्, क्या धनी, क्या निर्बल सभी समान रूप से सुखी एवं शाँत रह सकते हैं। भारतीय दार्शनिकों का कहना है कि सच्ची सुख शाँति मन की मनमानी करने में नहीं। मन की इच्छाओं एवं लालसाओं की पूर्ति करते रहने से सुख-शाँति की उपलब्धि कदापि नहीं हो सकती। सच्ची सुख-शाँति की प्राप्ति मन का रंजन करने से नहीं उसका दमन करने, कामनाओं एवं लालसाओं को कम करने से ही प्राप्त हो सकती है। लालसाओं की ज्यों-ज्यों पूर्ति की जाती है तृष्णा बढ़ती जाती है, जिसका परिणाम असन्तोष एवं अशाँति के सिवाय और कुछ नहीं होता। मन की लालसा अभिलाषा एक दो हों और वह उन पर स्थिर भी रहे तो सम्भव है कि उनकी पूर्ति की जा सके और मन शाँत एवं सन्तुष्ट रहे। किन्तु यह चंचल मन अनन्त एवं असीम अभिलाषाओं का अभियुक्त होता है, ऐसी दशा में उसे किसी प्रकार भी सुखी तथा सन्तुष्ट नहीं किया जा सकता। मानव मन की विवशता, विपरीतता तथा वितृष्णा स्पष्ट बतलाती है कि अपने सुख के लिये उसकी न तो कोई विशेष अभिलाषा होती है और न उसकी कोई एक ऐसी आकाँक्षा होती है जिसकी पूर्ति से वह वास्तव में सुखी एवं सन्तुष्ट हो सकता है। यही नहीं उसका किसी विषय विशेष में भी अभिन्न योग नहीं होता, जिसके प्रसंग से वह सदा सर्वदा को सन्तुष्ट एवं सुखी हो सकता हो। मन प्रयत्नशील होता है वह अबोध बालकों अथवा शेख चिल्लियों की तरह क्षणभर में ‘वह-यह’ किया करता है उसे डाँट-डपट कर इस ‘यह-वह’ से मुक्त कर देना ही उसे सुखी एवं सन्तुष्ट कर देना है। इस प्रकार कहना न होगा कि भारतीय दार्शनिक द्वारा बताया हुआ उपाय ‘मन का दमन’ ही उसे सुखी एवं सन्तुष्ट कर सकता है। निःसन्देह जिनका मन स्थिर एका काँक्षी अथवा एक लक्ष्यीय होता है वे अवश्य ही अपेक्षाकृत अधिक सुखी तथा सन्तुष्ट रहा करते हैं। मन की विविधता, बहुलता एवं चंचलता ही उसके दुःखी एवं अशाँत होने का मूलभूत कारण है।

मन के दमन के सम्बन्ध में पाश्चात्य मनोवेत्ताओं की शंका है कि - मन का दमन करने से भले ही उसकी कोई तात्कालिक प्रतिक्रिया न हो पर उसकी भावना मनुष्य के अवचेतन में दबे-दबे जीवित रहती है और अनुकूल अवसर की प्रतीक्षा करती रहती है। ज्यों ही उसे कोई अनुकूल परिस्थिति मिलती है वह सक्रिय होकर विविध प्रकार के उपद्रव उत्पन्न कर देती है। मनुष्य के मानसिक उपद्रवों के पीछे अधिकाँश में दमन किये गये मन की वह अतृप्ति ही रहती है जो मनुष्य के अंतर्मन में दबी पड़ी रहती है।

सम्भव है पाश्चात्यों की इस शंका में सत्य का कोई अंश हो। किन्तु इस प्रकार का उपद्रव तभी सम्भव है जब मन का दमन अवैज्ञानिक ढंग से किया जाता है। विषयों में अनुरक्ति रखते हुए मन की इच्छाओं का हनन अवैज्ञानिक है। इसका उचित मार्ग यही है कि विषय सेवन की हानियों पर विवेक द्वारा विचार किया जाये। ऐसा करने से विषयों से घृणा उत्पन्न होने लगेगी जिसका परिपाक वैराग्य में होगा। विषयों के प्रति वैराग्य होते ही मन उनसे स्वभावतः विमुख हो जायेगा। इस वैज्ञानिक विधि से वश में किए हुए मन की कोई ऐसी वासना न रहेगी जो अवचेतन में दबी पड़ी रहे और अवसर पाकर उपद्रव उपस्थित करे।

संसार में विषयों और उनके प्रति वाँछाओं की कमी नहीं। उनसे हटाया हुआ मन, सम्भव है चतुर्दिक् वातावरण से प्रभावित होकर कभी फिर विपथी हो उठे- इस शंका से बचने के लिये विषयों से विरक्त मन को भी भगवान् अथवा उनके क्रियात्मक रूप परोपकार एवं परमार्थ में नियुक्त करना चाहिये क्योंकि मन निराधार नहीं रह सकता उसको टिकने के लिये आधार चाहिये ही । परमात्मात्मक आधार से शुभ एवं निरापद, मन की एकाग्र स्थिति के लिये अन्य आधार नहीं हो सकता। वह परम है उसी से सब कुछ का उदय है और उसमें सब कुछ का समाधान है। और फिर परमात्म रूप में एकाग्र किये हुए मन में जिस सुख-शाँति एवं सन्तुष्टि का प्रस्फुरण होगा वह, सुख होगा जो शाश्वत, अक्षय एवं स्थायी होता है उससे बढ़ कर कोई भी सुख नहीं है। इस शाश्वत सुख को पाकर फिर कुछ पाना शेष न रह जायेगा। आज का विषयी एवं चंचल मन सदा सर्वदा के लिए सन्तुष्ट होकर स्थिर, एकाग्र तथा परिपूर्ण हो जायेगा। मन की यही दशा तो वह सुख शाँति है जिसे पाने के लिये मनुष्य रूप जीवन जन्म-जन्मांतर से भटकता चला आ रहा है किन्तु पा नहीं रहा है।


पात्रता की परीक्षा

पात्रता की परीक्षा-

एक महात्मा के पास तीन मित्र गुरु-दीक्षा लेने गये। तीनों ने बड़े नम्र भाव से प्रणाम करके अपनी जिज्ञासा प्रकट की। महात्मा ने उनको शिष्य बनाने से पूर्व पात्रता की परीक्षा कर लेने के मन्तव्य से पूछा-”बताओ कान और आँख में कितना अन्तर है?”

एक ने उत्तर दिया-केवल पाँच अंगुल का, भगवन् महात्मा ने उसे एक ओर खड़ा करके दूसरे से उत्तर के लिये कहा। दूसरे ने उत्तर दिया-महाराज आँख देखती है और कान सुनते हैं, इसलिये किसी बात की प्रामाणिकता के विषय में आँख का महत्व अधिक है। महात्मा ने उसको भी एक ओर खड़ा करके तीसरे से उत्तर देने के लिये कहा। तीसरे ने निवेदन किया -भगवन् कान का महत्व आँख से अधिक है। आँख केवल लौकिक एवं दृश्यमान जगत् को ही देख पाती है किन्तु कान को पारलौकिक एवं पारमार्थिक विषय का पान करने का सौभाग्य प्राप्त है। महात्मा ने तीसरे को अपने पास रोक लिया। पहले दोनों को कर्म एवं उपासना का उपदेश देकर अपनी विचारणा शक्ति बढ़ाने के लिये विदा कर दिया। क्योंकि उनके सोचने की सीमा बाह्यतत्व की परिधि में अभी प्रवेश कर सकने योग्य, सूक्ष्म बनी न थी।


व्यक्ति के मूल्याँकन का मापदण्ड बदलें।

आज समाज में चारों ओर अन्याय, अनीति तथा भ्रष्टाचार का जो ताँडव दिखाई दे रहा है और पिस-पिस कर जनता चकनाचूर हुई जा रही है, उसका बहुत कुछ उत्तरदायित्व उस गलत मापदण्ड पर भी है जिसके कि आधार पर मनुष्यों का मूल्याँकन किया जा रहा है।

लोगों ने देखा कि कितनी विशाल कोठी है। चाँदी की तरह चमक रही है। खिड़की, दरवाजे और रोशनदान रंगीन काँच से जड़े हुए हैं। रेशमी परदे झिलमिला रहे हैं। मून लाइट बल्ब जल रहे हैं, रेडियो से गायन-वादन के स्वर गूँज रहे हैं। आँखें चकाचौंध हो गई कान लालायित हो उठे। मन कह उठा साक्षात् स्वर्ग का निवास है। बड़ा भाग्यवान है इसका मालिक कितना बड़ा आदमी होगा? लाखों-करोड़ों होंगे इसके पास अनायास श्रद्धा जागी और उस अनजान धनवान् की ओर झुक गई। उसका बड़े आदमी के रूप में मूल्याँकन हो गया। वह चर्चा और प्रशंसा का पात्र बन गया और कोई अवसर आने पर पूजा-प्रतिष्ठा के रूप में उसका मूल्य व्यक्त कर दिया जाता है।

धन-प्रतिष्ठा का विषय रहता रहा है इसलिए कि यह परिश्रम एवं पुरुषार्थ का साक्षी होता था। प्राचीन समय में जब धन को प्रतिष्ठा के विषयों में स्थान दिया गया था। लोग यह कल्पना तक भी न कर सकते थे कि इसका उपार्जन अनीति के मार्ग से भी किया जा सकता है । अनुचित तथा अनीति के पैसे और पैसे वाले से लोग ऐसे डरते और घृणा किया करते थे जैसे विषैले सर्प से। कोई किसी का अन्न खाने, दान या सहायता लेने में हजार प्रकार से सोच-विचार किया करते थे। उसी की सेवा अथवा सहायता स्वीकार करते थे जिसकी कमाई के विषय में यह विश्वास रहता था कि प्रत्यक्ष तो क्या परोक्ष रूप में भी इसका पैसा अन्याय अथवा अनीति से दूषित नहीं हुआ है। यदि इस प्रकार का सन्देह भी हो जाता था तो समाज का बच्चा-बच्चा लक्षधि पति होने पर भी उस धनवान को नीची नजर से देखा करता था, जिससे धनाढ्यता ही उसके लिए काल-फाँस की तरह दुःखदायिनी हो जाती थी।

समाज द्वारा इस कठोर मूल्याँकन से अनुशासित तब के धनवान् अपने व्यापार एवं व्यवसाय में पराकाष्ठा तक पवित्र एवं सत्य परायण रहकर विशुद्ध परिश्रम एवं पुरुषार्थ से उस स्थिति तक पहुँचकर प्रतिष्ठा के पात्र बनते थे। साथ ही यह विशुद्धता भी तब तक मान्यता नहीं पाती थी जब तक उसका पवित्र धन पवित्र एवं पुनीत कामों में व्यय नहीं होता था। इस प्रकार आय-व्यय दोनों की समान पवित्रता से तुलकर ही कोई धनवान् धन के आधार पर उसी प्रकार समाज में मान्यता एवं श्रद्धा के भाजन बन पाते थे जैसे जन-सेवा के अन्य कार्य करके कोई सत्पुरुष।

पहले जहाँ धन की मात्रा का कोई मूल्य नहीं था। मूल्य था उसके आय-व्यय की रीति-नीति का। वहाँ आज आय-व्यय की रीति-नीति का तो कोई मूल्य रहा नहीं। धन की मात्रा को ही श्रेष्ठत्व का मापदण्ड मान लिया गया है। स्थिति बिलकुल विपरीत हो गई है, इसलिए उसका प्रभाव एवं परिणाम भी उल्टा हो गया है।

लोगों ने कोठी, कार, बिजली, पंखा, रेडियो, नौकर-चाकर, हास-विलास और मोद-प्रमोद की चहल-पहल देखी नहीं कि बड़ा आदमी मान लिया और मान-सम्मान देना शुरू कर दिया। मान-सम्मान जैसी बहुमूल्य चीज और श्रद्धा जैसी दुर्लभ वस्तु जोकि त्याग, तपस्या, साधना, सेवा श्रम और पुरुषार्थ के आधार पर इतनी सस्ती और आसानी से मिल सकती है तब किसी ने क्या भाँग खाई है कि वह प्रतिष्ठापूर्ण जीवन जीने के लिए संयम तथा साधना करता फिरे, सेवा और त्याग का प्रमाण देता घूमे, क्यों न किसी प्रकार से धन बटोरकर उसे प्राप्त किया जाये? जनता द्वारा धन के प्रभाव में आकर दी जाने वाली इस सस्ती सामाजिक प्रतिष्ठा ने लोकप्रियता के प्यासे लोगों को अन्ध आर्थिकता में खो दिया है।

यही नहीं कि लोग किसी का धन-वैभव देख कर ही प्रभावित हो जाते और उसे प्रतिष्ठापूर्ण दृष्टि से देखने लगते हों, फिर चाहे उसका वह धन उनके अथवा समाज के किसी हित में आता हो या न आता हो-प्रतिष्ठा का स्तर इतना गिर गया है, सम्मान इतना सस्ता हो गया है कि लोग धन के संचय को ही नहीं, अपव्यय तक को श्रद्धा की दृष्टि से देखते हैं। नाच-रंग में डूबा रहना, शराब-खोरी और फैशनपरस्ती में लगा रहना, ब्याह-शादियों में धूम-धड़ाका करते रहना, बड़ी-बड़ी दावतों और जश्न में पैसा पानी की तरह बहाना तक लोगों के लिए श्रद्धास्पद बन जाता है। लोग उसे उदार बड़ा आदमी, शाह खर्च कहकर सम्मान करते और रास्ता देते हैं। जनता की इस सस्ती श्रद्धा और अस्तरीय मापदण्ड ने भी लोगों की अन्ध आर्थिकता बढ़ाने में बहुत कुछ योग दिया है।

हर बुद्धिमान् व्यक्ति का नैतिक कर्त्तव्य है कि वह किसी के वैभव-विलास से प्रभावित होकर उसका मूल्याँकन करने से पूर्व यह अवश्य देख लें कि इस सम्पत्ति का आधार नीतिपूर्ण रहा है या नहीं? उसे उसके साधन, उपायों तथा युक्तियों की पवित्रता की खोज कर लेना आवश्यक है जिससे कि गलत कामों के मूल्याँकन का अपराध न हो जाये।

जब यह बात स्पष्ट दिखाई देती है कि अमुक व्यक्ति छल, कपट, छीना-झपटी, चोर-बाजारी, मुनाफा-खोरी और भ्रष्टाचार को आधार बनाकर कोठी पर कोठी बनाये जा रहा है, बैंक बैलेन्स और कारोबार बढ़ाता जा रहा है तब क्या उसे अधिकार है कि वह हमारी प्रशंसा अथवा सम्मान की भावना को पाये और क्या हमें ही अधिकार है कि हम उसे वह सब कुछ दें? यदि हम दोनों में से कोई भी ऐसा करता है तो अनधिकार चेष्टा करता है, समाज में अन्ध अर्थवाद को बढ़ावा देकर भ्रष्टाचार फैलाने में सहयोग करता है, जो कि रिश्वत रूप से सामाजिक अपराध और आध्यात्मिक पाप है। आज यदि लोग धनाढ्यता का मूल्याँकन करना छोड़कर साधनों और उसके उपायों पर ध्यान रखने लगें तो समाज में पैसे के लिए फैला हुआ भ्रष्टाचार बहुत कुछ कम हो सकता है। अनुचित साधनों के कारण यदि धनियों का मूल्याँकन कम हो जाए, उनका वह अन्याय-उपार्जित वैभव घृणा एवं तिरस्कार का प्रसंग बन जाये तो निश्चय ही लोग आवश्यकता से अधिक धनवान बनने की लिप्सा छोड़कर सम्मान-रक्षा के लिये कमाई के उचित एवं उपयुक्त उपाय अपनाने के लिए विवश हो जायें।

आर्थिक क्षेत्र की तरह धार्मिक अथवा आध्यात्मिक क्षेत्र में भी जनता के मूल्याँकन की कसौटी खोटी हो गई है। जिसे भी रंगे कपड़े पहने, जटा रखाये, चन्दन लगाये और भस्य रमाये देख लिया उसी को महात्मा, सन्त अथवा साधु समझ लिया और पूजा-प्रसाद चढ़ाने लगे । सेवा करने और वरदान की आशा लगाने लगे। जिसको भी धार्मिक शब्दावली में वाचालता करते सुन लिया। विद्वान, दार्शनिक तथा तत्व-ज्ञाता मान लिया जिसे भी हाथ उठाये, पैर गड़ाये, शरीर तपाते, पानी में खड़े या सूर्य से आँख मिलाये देख लिया उसे ही सिद्ध, चमत्कारी, मुक्त, वीतराग, गुणातीत आदि न जाने क्या-क्या समझकर पूजा प्रतिष्ठा करने लगे।

जनता की इस सस्ती श्रद्धा में आध्यात्मिक क्षेत्र में रंगे स्यारों की बाढ़ बुला दी है। जब ढोंग, आडम्बर तथा बहरूपियापन करके तपस्वियों तथा सिद्धों जैसी पूजा पाई जा सकती है, स्थान पर बैठे-बैठे पुजापा प्राप्त किया जा सकता है, तब क्या जरूरत है कि त्याग-तपस्या का असिधारा के समान तीखा मार्ग अपनाया जाये?

पता नहीं, श्रद्धा जैसी बहुमूल्य संपत्ति को लोग बिना परखे-पहचाने ढोंगियों तथा आडम्बरियों पर क्यों लुटाते, फेंकते फिरते हैं? वे यह क्यों सोचने-समझने की कोशिश नहीं करते कि आध्यात्म साधना और उसकी सिद्धियाँ यदि इतनी ही सरल और सस्ती होतीं तो प्राचीन ऋषि-मुनि आत्म-परिष्कार, चिन्तन-मनन तथा स्वाध्याय में अपना जीवन क्यों खपा देते? आध्यात्मिक सिद्धियों के धनी क्या इस प्रकार गली-गली पैसा और प्रतिष्ठा माँगते घूमते हैं? क्या यह शंका और सन्देह का विषय नहीं है कि जो दूसरों को धन, वैभव, संपत्ति, सन्तान का वरदान देने की क्षमता रखता है वह क्यों स्वयं दरिद्री, भिखारी तथा पैसे-पैसे के लिए जान दे रहा है? क्या दूसरों को लाखों का वरदान देकर दो पैसे माँग ले जाने वाला सिद्ध हो सकता है उसकी पूजा की जानी चाहिए ? इस मान्यता में कौन -सी तुक है-यह बात समझ में नहीं आती। अटपटे शब्दों का उच्चारण और विलक्षण क्रिया-प्रतिक्रिया के साथ भूत भगाने वाले, रोग और दोष दूर करने वाले यदि पूजा प्रतिष्ठा के अधिकारी हो सकते हैं तो क्या कारण है कि विचित्र एवं अनबूझ भाषा बोलने और असंगत काम करने वाले पागल पूजा के अधिकारी नहीं हैं, ऐसा किस प्रकार कहा जा सकता है?

भाषण सुनकर भक्त हो जाने और शब्द सुनकर ही विश्वास कर लेने की सार्वजनीन दुर्बलता समाज में नित्य नये वाक्-वञ्चकों को जन्म देती और आगे बढ़ाती रहती है। शब्द सुनकर ही किसी के प्रभाव में आ जाना वह प्रोत्साहन एवं प्रेरणा है जिससे लोग व्यक्तिगत आचरण की उपेक्षा कर वाक्पटुता का अभ्यास करके सभी क्षेत्रों में प्रतिष्ठा पा लेते हैं। जनता पर यदि महत्व का मापदंड होता तो निश्चय ही वाक् पञ्चकों की बुद्धि पर अंकुश लग जाता और समाज परिगत-प्रवृत्ति के धर्म-ध्वजियों तथा अन्ध को से होने वाली हानियों से बच जाता और धार्मिक तथा आध्यात्मिक क्षेत्र में बढ़ रहे भ्रष्टाचार की बाढ़ पर रोक हो जाती। किन्तु खेद है कि जानता की अन्ध श्रद्धा-अन्धविश्वास और मूल्याँकन की खोटी कसौटी ही हित अनहित का निदर्शन नहीं करने देती।

यह बात बड़ी सीमा तक सत्य मानी जा सकती है कि यदि जनता आज बुद्धिमानी से काम ले और मूल्याँकन के विषय में अपनी श्रद्धा एवं प्रतिष्ठा का मापदण्ड ऊँचा करे, तथा सही कसौटी को काम में लाये तो उक्त महान् एवं व्यापक क्षेत्रों में से भ्रष्टाचार बहुत अंशों तक दूर हो जाये। अर्थ तथा धर्म के क्षेत्र में देखने, परखने और मूल्याँकन करने का सही मापदण्ड साधन और सच्ची कसौटी व्यक्ति के कथन तथा आचरण की एकरूपता ही है। जिस दिन जनता इस सत्य को हृदयंगम कर तटस्थ आचरण करने लगेगी। उसी दिन से सुधार का शुभारम्भ प्रारम्भ हो जायेगा।


Quotation

नदी बनाम जोहड़-

एक जल-पूरित नदी कल-कल करती हुई आनन्द और उल्लास के साथ बही जा रही थी । उसके किनारे बड़े-बड़े सुन्दर नगर और उपनगर बसे हुए थे। इन सभी नगरों के निवासी विविध प्रकार से उसके जल का उपयोग करके अपने दैनिक जीवन को सफल बनाते रहते थे।

पर्वतों से टकराकर नदी का पानी जहाँ ऊपर से नीचे गिरता था वहाँ एक विशाल विद्युत-केन्द्र बनाया गया था जहाँ बिजली का उत्पादन होकर उससे अनेक प्रकार के यान्त्रिक और औद्योगिक कार्यों का संचालन किया जा रहा था।

आगे चलकर इसी नदी से कुछ नहरें निकाली गई थीं। कहीं नावों से इसमें व्यापार करके अपनी आजीविका चला रहे थे।

ऐसा था इस नदी का जीवन । आदि से अन्त तक अपने अंग-प्रत्यंग से औरों का भला करती हुई जब इस प्रकार वेग से समुद्राभिमुख बही चली जा रही थी तब एक ठहरी हुई जोहड़ ने, जिसका पानी प्रवाहहीन होने के कारण दुर्गन्धयुक्त हो गया था इस नदी से कहा-

“बहन, बताओ अपने इस दिन-रात के बहते हुए जीवन में आखिर तुम्हें किस बात का अनुभव होता है, जो तुम निरन्तर कल-कल करती हुई किलोलें में किया करती हो? मुझे क्यों नहीं देखती, जो एक जगह ठहरकर अपने जीवन को प्रगति और प्रवाह से दूर करके स्थिर होकर यहाँ पड़ी-पड़ी आराम के साथ अपने दिन गुजार रही हूँ।”

नदी ने जोहड़ से कहा-प्रगति और प्रवाह का पन्थ अपनाने से ही मेरा आभ्यन्तर स्वच्छ और निर्मल बना हुआ है और इसीलिए मेरी हर बूँद का सदुपयोग किया जाता है। प्रगति और प्रवाहहीन होने के कारण ही तुम गंदगी का आगार बनी हुई हो। औरों के उपयोग में न आने वाले तुम्हारे जीवन का इस दुनिया में अधिक अस्तित्व नहीं है।


प्रतिकूलताओं की चुनौती स्वीकार कीजिये।

संसार में ऐसे व्यक्तियों की भी कमी नहीं है जो अपनी हीनावस्था का कारण अपने दुर्भाग्य को बतलाया करते हैं। उनसे बात कीजिये और पूछिये कि भाई, आप जो इस प्रकार विपन्नता में जीवन काट रहे हैं, इसमें आपको संतोष किस प्रकार हो रहा है और इस दशा को बदलने के बजाय हाथ पर हाथ धरे क्यों बैठे हुए हैं।

इस सहानुभूति के उत्तर में उनका कथन होगा कि-क्या करें हमारा भाग्य ही खराब है, परमात्मा ने हमारे भाग्य में दुःख दर्द ही लिखे हैं सो भोग रहे हैं। यदि हमारे भाग्य में सुख-सुविधा होती तो क्या अन्य लोगों की तरह हमारा जन्म भी अमीर अथवा साधन सम्पन्न घर में नहीं होता? हम जानते हैं कि हमारा भाग्य खराब है इसलिये कोई उद्योग करना भी बेकार है।”

लोगों का ऐसा निराशापूर्ण उत्तर सुन कर तरस आए बिना नहीं रहता। यह भाग्य एवं भविष्य के “जानपाडे” उपाय एवं उद्योग की अपेक्षा विपन्नतावस्था में अधिक विश्वास करते हैं। उनका गरीब होना वास्तव में उतना दुर्भाग्यपूर्ण नहीं है जितना कि उनका यह निराशापूर्ण अन्धविश्वास।

कितने आश्चर्य की बात है कि भाग्य के अन्धविश्वासी अपनी दशा बदलने का उपाय किये बिना ही बड़ी आसानी से यह मान लेते हैं कि गरीबी तो उनका प्रारब्ध भोग है। वह किसी उपाय अथवा उद्योग से नहीं बदली जा सकती। इसलिये इसके विरोध में डट कर मोर्चा लेना बेकार है। इस प्रकार के भाग्य -ज्ञाताओं को जरा सोचना चाहिये कि जब तक उन्होंने परिचय एवं पुरुषार्थ नहीं किया तब तक उन्हें यह किस प्रकार पता चल गया कि कोई भी उद्योग सफल न होगा।

हो यह भी सकता है कि उन्होंने उद्योग किया हो ओर वे असफल रहे हों। किन्तु एकबार की असफलता से घबरा कर बैठ रहना और यह मान लेना कि उनका भाग्य ही खोटा है, सफलता उन्हें नहीं मिल सकती कोई अर्थ नहीं रखता। उद्योग का अर्थ है बार-बार उपाय करना , निरन्तर एवं नितान्त परिश्रम करना अपने काम में तब तक जुटे रहना जब तक उद्देश्य पूरा न हो जाये। मैदान में उतरे और जरा-सी कठिनाई देखते ही भाग खड़े हुए और मान लिया कि सफलता उनके भाग्य में ही नहीं है। परिश्रम एवं पुरुषार्थ करना निरर्थक है, मनुष्यता नहीं कही जा सकती। उपाय एवं उद्योग एकबार में ही सफल नहीं होता उसके लिए बार-बार प्रयत्न करना होता है।

यदि निराश व्यक्ति बार-बार प्रयत्न करने की बात कहता है तो या तो उसका कथन विश्वास के योग्य नहीं है अथवा उसके प्रयत्न के समानान्तर यह अपविश्वास अवश्य चलता रहा होगा कि ‘उसका भाग्य खोटा है उसका प्रयत्न सफल नहीं होता।’ निश्चय ही उसकी बार-बार की असफलता में उसकी यह भावना हेतु रही है। अन्यथा कोई कारण नहीं कि जो व्यक्ति अपने पूरे तन, मन एवं साहस के साथ निरन्तर प्रयत्न करे वह सफल न हो । ऐसा कभी नहीं हो सकता।

अविश्वास के साथ किया हुआ कोई भी कार्य सफल नहीं होता। अपने प्रयत्नों में विश्वास न रखने वाले व्यक्ति की शक्तियाँ अपमानित जैसा अनुभव करती रहती हैं और कभी भी पूरी तरह से काम नहीं करतीं। अपने प्रयत्न को दुर्भाग्य का अभिशाप देने वाले नासमझ लोग शुभ संकल्पों का महत्व नहीं जानते, इसीलिए आत्म अभिशापि उनके प्रयत्न निष्फल चले जाते हैं। अपने को किसी दूसरे का शाप लगे या न लगे किन्तु अपना शाप अवश्य लग जाता है।

अपनी समुन्नति में प्रतिकूल सम्भोगों अथवा भाग्यहीनता को हेतु मानना अपने को भ्रम में रखना और आत्मविश्वास को धोखा देना है। अपने साथ इस प्रकार का विश्वासघात करने वाले निश्चय ही जीवन में सफलता का सौभाग्य नहीं ले पाते। अपने से विश्वासघात करने की निकृष्ट भावना को छोड़कर उन्हें आँख फैला कर चारों ओर देखना चाहिये और समझने की कोशिश करनी चाहिए कि आज जो उनके सामने ही उन्नति के शिखर पर चढ़ गये हैं और दिन-दिन अग्रसर होते जा रहे हैं वे सब क्या जन्म-जात सुविधाओं के अधिकारी रहे हैं? इतिहास साक्षी है कि संसार के प्रसिद्धिवादी व्यक्तियों में से अधिकाँश ऐसी कठिन परिस्थितियाँ में जन्मे, ऐसी वज्र-विवशताओं में पले और ऐसे प्रतिकूलताओं की छाया-मात्र भी उन जैसे निराशावादियों पर पड़ जाती तो कदाचित् उन्होंने रो-रो कर जान ही दे दी होती।

हिम्मत हार कर बैठे व्यक्तियों को सोचना चाहिए कि उनके आस पास उन्हीं जैसी परिस्थितियों में जो लोग रह रहे हैं उनमें से आगे चलकर न जाने कितने लोग धनवान् विद्वान, कलाकार तथा जन-नेता आदि बन कर जीवन को सफल बनायेंगे, तब क्या कारण है कि वे वैसा नहीं बन सकते? कारण केवल यही है कि ये उद्योगशील आशावादी उन जैसे दुर्भाग्यवादी नहीं हैं। वे बलपूर्वक बदलने में विश्वास रखते हैं। यदि जन्म-जात सुविधायें ही उन्नति एवं महानता का कारण होतीं तो निश्चय ही संसार के सारे साधन सम्पन्न व्यक्तियों को चाँद-सूरज की तरह चमकना चाहिये था । किन्तु ऐसा देखा कहीं नहीं जाता। कठिन परिस्थितियाँ अथवा प्रतिकूल संयोग ही किसी की उन्नति एवं विकास में विजयी रहे होते तो न तो आज तक कोई गरीब से अमीर बन पाया होता और न निम्न से महान्। और न आगे ही कोई ऐसा परिवर्तन प्राप्त कर सकने की सम्भावना ही रख सकता है। लोग प्रतिकूलताओं को जीत कर आगे बढ़े हैं, बढ़ रहे हैं और भविष्य में भी बढ़ते जायेंगे। किन्तु आत्मविश्वास एवं पुरुषार्थ के बल पर।

अपनी दयनीयता का दोष परमात्मा को देने से कहीं अच्छा है कि अपने अपरिश्रमी स्वभाव को दिया जाए। वह समदर्शी परम पिता परमात्मा कभी किसी के साथ अन्याय नहीं करता। उसके पास देने के लिये जो न्याय का कोष है उसका भाग वह सबको पात्रता के अनुसार न्यायपूर्वक ही देता है। जगत् में आकर जो पुरुषार्थी एवं आत्मविश्वासी व्यक्ति अपनी पात्रता की वृद्धि कर लेते हैं निश्चय ही वे उसकी कृपा का अधिक अंश पा लेते हैं। परमात्मा मनुष्य के प्रयत्न पात्र को अपनी कृपा से लबालब भरे रहता है। अब जो अपने प्रयत्न को छोटा कर लेता है कृपा का अंश उसमें से कम हो जाता है और जो उसको जितना विशाल बना लेता है उसकी कृपा का उतना ही अंश उसमें बढ़ जाता है। अपनी प्रयत्न हीनता को दोष ने देकर परमात्मा को दोष देना उसकी न्यायशीलता में एक अक्षम्य अशिष्टता तथा धृष्टता है। यह उनकी इस दुष्ट भावना का भी फल होता है कि आशा की ओर से अन्धे होकर निराशा का हाथ पकड़े हुए जीवन का मार्ग टटोल कर ठोकरें खाते फिरते हैं। यह उनकी इस धृष्टता का ही परिणाम है कि उनका विश्वास सौभाग्य के प्रति होने के स्थान पर दुर्भाग्य के प्रति दृढ़ रहता है। अपना कल्याण चाहने वाले प्रत्येक व्यक्ति का पावन कर्तव्य है कि वह परमात्मा को दोष देने के बजाय, उसकी कृपा में न्यूनता खोजने के बजाय अपने निष्क्रिय स्वभाव, उपयोगी प्रवृत्ति एवं निराशापूर्ण विश्वासों को दोष दे और अपनी कमियों त्रुटियों एवं न्यूनताओं की खोज करे और उन्हें दूर करने का प्रयत्न करे। मनुष्य जब तक भी अपनी विवशताओं की खोज अपने में न करके उनका दोष दूसरों को देता रहेगा यों ही दयनीय एवं दुर्भाग्यपूर्ण जीवन बिताता रहेगा।

लोग गरीबी को दोष देते-देते सारी जिन्दगी गुजार देते हैं और कभी कुछ नहीं कर पाते। जिसकी बुद्धि जिसका मन और जिसकी शक्तियाँ गरीबी के अपरिवर्तनीय विश्वास चंगुल में फँसी हुई उसी को कोसने में लगी रहती है उसके पास कुछ और करने के लिये अवकाश कहाँ रह जाता है। अकर्मण्यता एक छोटा सा बहाना पाकर ही सामने पथ-रोधक पहाड़ खड़े कर देती है तब गरीबी तो नर-नरों के एक चुनौती जैसी होती है। जिस गरीबी को लोग जीवन को डसने वाली नागिन बतला कर कोसा करते हैं उसे ही अनुभवी विद्वान लोग कुछ कर दिखाने का एक अवसर बताया करते हैं। उनका कहना है कि गरीबी का अनुभव यद्यपि कटु होता है तब भी वह मनुष्य के लिए बड़ी हितकर सिद्ध होती है। वह औषधि की तरह मनुष्य के स्वभावगत न जाने कितने दोष-दुर्गुणों को दूर कर देती है। आविष्कार की जननी आवश्यकता के अनुसार गरीबी भी मनुष्य में ऐसे अनेक महत्वपूर्ण गुणों को उत्पन्न कर देती है जो सम्पन्नता की दिशा में सहज सम्भाव्य नहीं होते। गरीबी को चुनौती मानकर उसका मुकाबला करने के लिये कटिबद्ध होने वाले साहसियों में दूरदर्शिता सहन-शीलता, कर्मठता, संलग्नता एवं व्युत्पन्न बुद्धि की हितकारी विशेषताएँ आ जाया करती हैं। मनुष्य का बिगड़ा हुआ जीवन सुधर जाया करता है।

निःसन्देह विद्वानों का यह कथन केवल विश्वसनीय ही नहीं श्रद्धेय भी है! उनके इस कथन में आस्था रख कर चलने वाले व्यक्तियों के लिये गरीबी एक स्वर्णावसर, एक हितकारी परिस्थिति एवं एक वरदान सिद्ध होती है। किन्तु कब, जब कोई अपनी इस आस्था के साथ प्रयत्न एवं उद्योग की कारिकायें जोड़ देता है। अन्यथा अकर्मण्यता के लिये गरीबी निश्चय ही एक विषैली नागिन है जो उसे डस कर नष्ट ही कर देगी।

गरीबी के साथ यदि एक बार इस प्रकार की उच्च भावनायें अथवा आस्थायें तभी जोड़ी जाएं और उसे एक विरोधी परिस्थिति ही मान लिया जाये तो क्या विरोधी के हाथ नष्ट हो जाना किसी प्रकार शोभा देता है? अपने जीवन को केवल इसलिए रो-रो कर नष्ट कर देना कि परमात्मा ने उसे सुख-सम्पत्ति के बीच जन्म न देकर प्रतिकूल परिस्थितियों में पैदा किया है कहाँ तक उचित है? गरीबी के प्रति असन्तोषपूर्ण किसी का रोना इस बात की गवाही है कि वह उससे अच्छी परिस्थितियों को पाने के लिए व्यग्र एवं लालायित है। किन्तु क्या यह लालसा केवल लालायित होने और व्यग्र बने रहने-मात्र से पूरी हो सकती है? केवल कामना करते रहने से न तो कोई आज तक पूर्ण काम हुआ और न आगे ही होगा इसके लिये प्रयत्न एवं पुरुषार्थ, सो भी अवधि एवं अदिशान्त पुरुषार्थ करने के सिवाय कोई विकल्प नहीं है।

गरीबी को कोसते, कठिनाइयों पर बड़बड़ाते और प्रतिकूलताओं के प्रति क्रोध दिखलाते रहने से कोई काम न चलेगा। यदि वास्तव में आप सच्चे मन से अपनी परिस्थिति बदलना चाहते हैं और जीवन में सफलता का श्रेय लेना चाहते हैं तो आपको कमर कस कर इस संकल्प के साथ उठना ही होगा कि मैं मनोवाँछित श्रेय पाने के लिए अपने जीवन की सारी शक्तियों को मैदान में उतारूंगा और हजार असफलताओं के बाद भी सफलता प्राप्त कर के रहूँगा। ऐसा संकल्प कर के उठते ही आपकी सारी शक्तियाँ, सारी क्षमताएँ एवं सारी विशेषताएँ दूने उत्साह के साथ आपका सहयोग करेंगी और आप अवश्य ही अपने मन्तव्य में सफल होंगे।


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झुकने की पात्रता-

एक दिन पानी से भरे कलश पर रक्खी हुई कटोरी ने घड़े से कहा -कलश। तुम बड़े उदार हो तुम्हारे पास जो भी बर्तन आता है उसे तुम पानी से भर देते हो किसी को खाली नहीं जाने देते।

कलश ने उत्तर दिया-हाँ मैं अपने पास आने वाले प्रत्येक पात्र को भर देता हूँ। मेरे अन्तर का सारा सार दूसरों के लिये है। कटोरी बोली- लेकिन तुम मुझे कभी नहीं भरते जबकि मैं हर समय तुम्हारे सिर पर ही मौजूद रहती हूँ।

घट ने उत्तर दिया- इसमें मेरा कोई दोष नहीं। दोष तुम्हारे अभिमान का है। तुम अभिमान पूर्ण मेरे सिर पर चढ़ी रहती हो जबकि अन्य पात्र मेरे पास आकर झुकते हैं और अपनी पात्रता सिद्ध करते हैं। तुम भी अभिमान छोड़ कर मेरे सिर से उतर कर विनम्र बनो मैं तुम्हें भी भर दूँगा। पूर्णता की प्राप्ति पात्रता एवं नम्रता से होती है अभिमान एवं अहंकार से नहीं।


ईर्ष्या-एक अहितकर विकृति

ईर्ष्या हल्की मनोभूमि के लोगों को बड़ी जल्दी अपना शिकार बना लेती है। संसार की सारी विकृतियों का निवास क्षुद्र मानसों में ही रहता है इसका कारण है-क्षुद्र मानस अथवा हल्की मनोभूमि के व्यक्ति में शक्ति-सामर्थ्यों की कमी रहती है। इस कमी के कारण उनमें पुरुषार्थ की मात्रा की भी कमी रहती है-जिसके फलस्वरूप वे अपने जीवन में सन्तोषजनक कोई काम नहीं कर पाते। वे निरन्तर अपने अन्दर एक खालीपन अनुभव किया करते हैं। जो जीवन में कुछ सन्तोषजनक काम नहीं कर सका, वह दूसरों की सफलता देखकर जलेगा ही। असन्तोष ही वास्तव में ईर्ष्या का जन्मदाता है। मनुष्य या तो कोई सन्तोषजनक कार्य कर सके अथवा अपनी स्थिति में सन्तुष्ट रहे तो वह अवश्य ही ईर्ष्या को आग से बचा रह सकता है। सब लोग तो ऊँचे कार्य कर नहीं सकते, क्योंकि हर एक की अपनी एक सीमा, एक शक्ति तथा एक परिस्थिति हुआ करती है। चाहते हुए भी अनेक लोग संयोग अथवा सीमाओं के कारण कोई सफलता नहीं पाते। इसलिए ईर्ष्या की आग से बचने का एक ही सार्वजनीन उपाय है कि अपनी स्थिति में सन्तुष्ट रहा जाये। यह उपाय ऊँचे काम कर सकने वाले और न कर सकने वाले दोनों के लिए व्यवहार्य हो सकता है।

सन्तोष सिद्ध कर लेना स्वयं ही एक महान् एवं श्रेयस्कर कार्य है। सन्तोषी व्यक्ति सफलता एवं असफलता दोनों दशाओं में समान रूप से प्रसन्न रहता है। यही अविकल प्रसन्नता मानव-जीवन का चरम लक्ष्य है-इसको पा लेना एक बड़ा काम है, एक प्रशंसनीय उपलब्धि है। सन्तोष असफलताओं को भी सफलता का दर्जा दिला देता है।

यदि आप में ईर्ष्या की एक भी चिनगारी हो तो उसे तुरन्त होशियार होकर बुझाने का प्रयत्न करना चाहिए। ईर्ष्या की आग किसी दूसरे का तो कदाचित् यदा-कदा ही अहित कर सकती है किन्तु ईर्ष्यालु को तो हर समय ही जलाया करती है। अँगीठी में आग जलती है। जब कोई व्यक्ति अथवा वस्तु उसके संयोग में आती है तभी जल पाती है, किन्तु अँगीठी हर समय तपती रहती है। इसका परिणाम यह होता है कि लोहे की अँगीठी कुछ ही समय में जल-जलकर झड़ जाती है और जल्दी ही बेकार हो जाती है। यही दशा एक ईर्ष्यालु की होती है। वह यदि किसी का अहित करना भी चाहे तो उसके लिए अवसर आने पर भी वह किसी का अहित कर पायेगा, इसका कोई निश्चय नहीं। क्योंकि अन्य लोगों के पास भी बुद्धि और बल रहा करता है। जब-तक कोई अवसर आता है तब तक ईर्ष्यालु अपनी आग में आप जलता हुआ ढेर हो लेता है। उसके मन, मस्तिष्क तथा आत्मा शनैः शनैः दुर्बल होते रहते हैं और शीघ्र ही उसका अधःपतन हो जाता है। आज तक कोई भी ईर्ष्यालु व्यक्ति जीवन में कोई उन्नति करता नहीं देखा गया है। उसका मन-मस्तिष्क तो कलुषित होकर द्वेष की उपासना में लगा रहता है। उसका शरीर डाह से झुलसकर निःशक्त हो जाता है, तब भला इस प्रकार नष्ट एवं मृत प्रायः हो जाने वाला व्यक्ति उन्नति एवं विकास के लिए पुरुषार्थ कर भी क्या सकता है?

उन्नत स्थिति वाले ऐसे अनेक व्यक्ति भी मिल सकते हैं जिनमें ईर्ष्या, द्वेष की दुर्बलता हो-किन्तु यह निश्चित है कि या तो उनकी वह स्थिति संयोग का फल है अथवा परप्रदत्त। उसमें उसका अपना कोई पुरुषार्थ नहीं होगा और यदि वह स्थिति उनकी आत्म-अर्जित है तो अवश्य ही वे जिस समय उन्नति-मार्ग पर चलने के लिए बढ़े होंगे उस समय उनमें ईर्ष्या का विष नहीं ही रहा होगा। यह विकृति उनमें बाद में ही आई होगी जो शीघ्र ही उनके पतन का कारण बनेगी। यों तो वैसे भी उनका पतन ही समझना चाहिए। उच्च स्थिति पर पहुँचकर जिसकी उच्चाशयता एवं उन्नत भावनाओं का पतन हो गया, वह सिंहासन पर बैठा हुआ भी वास्तव में भूलुँठित ही है। स्थूल उन्नति तो जड़ता मात्र है, वास्तविक उन्नति तो मन एवं आत्मा की उच्चता ही है।

जिस आग में हमें स्वयं ही जलना पड़े अथवा किसी अन्य को जलाकर पाप कमाना पड़े, उसे बुझा देने में ही कल्याण है। ईर्ष्यालु व्यक्ति मानसिक रोगी तो होता ही है, उसका शरीर भी रुग्ण हो जाता है। ईर्ष्या, द्वेष, चिन्ता आदि विकारों में विष जैसा प्रभाव रहा करता है जो मनुष्य के रक्त को दूषित कर देता है। दूषित रक्त से शरीर के अवयवों का कहाँ तक पोषण हो सकता है, इसका अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है। ईर्ष्यालु व्यक्ति में अपच का भयंकर रोग हो जाता है। उसकी भूख नष्ट हो जाती है नींद चली जाती है। उसका शरीर विविध व्याधियों का आगार बन जाता है। ईर्ष्यालु व्यक्ति देखने में कितना ही मोटा-ताजा क्यों न हो, अन्दर से बड़ा ही जर्जर होता है। ईर्ष्यालु व्यक्ति कभी भी तेजस्वी नहीं हो सकता। उसके मुख पर सदैव ही अपराधी की सी कालिमा छाई रहती है। उसके जीवन का सारा सौंदर्य, सारी शाँति सारा सुख और सारा सन्तोष नष्ट हो जाता है। उसके अधःपतन की स्थिति इतनी भयंकर हो जाती है कि वह जीवन से ऊबकर उसे त्याग देने तक की इच्छा करने लगता है।

समाज में फैले झगड़े-फसादों की जड़ में मनुष्यों की प्रधान रूप से ईर्ष्या ही सक्रिय रहा करती है। ईर्ष्यालु व्यक्ति का एक स्वभाव होता है कि वह स्वयं तो उन्नति करने के लिए बढ़ नहीं पाता, दूसरे उन्नति करते हुए व्यक्तियों के मार्ग में रोड़े अटकाया करता है, जिसका परिणाम समाजिक संघर्ष के रूप में सामने आता है। आज परिवारों, समाजों तथा राष्ट्रों में जितना भी तनाव तथा संघर्ष दृष्टिगोचर हो रहा है इसका मुख्य हेतु मनुष्य की मनुष्य के प्रति ईर्ष्या-भावना ही है। अनुदारता, द्वेष , घृणा एवं संकीर्णता ईर्ष्या की ही विषबेलि के कटु फल हैं। जिस समाज, परिवार अथवा राष्ट्र में ईर्ष्या की विषबेलि फली होगी, उसे यह कडुए फल चखने होंगे। जहाँ ईर्ष्या रूपी विषधर का वास होगा, वहाँ सुख-शाँति का रह सकना असम्भव है। ईर्ष्यालुओं के भाग्य में जलन तथा अशाँति के अतिरिक्त और कुछ नहीं होता।

जिस व्यक्ति को आप दूसरों की बुराई करते, उसके छल-छिद्र खोजते मार्ग में रोड़े अटकाते अथवा किसी प्रकार हानि पहुँचाने का प्रयत्न करते अथवा सोचते देखें तो समझ लें कि ईर्ष्या के विष से इस व्यक्ति की बुद्धि मूर्छित हो गई है, इसकी मनुष्यता मर गई है। ईर्ष्यालु व्यक्ति की सबसे बड़ी पहचान यह है कि वह किसी की सुख-शाँति नहीं देख सकता उन्नति सहन नहीं कर सकता। वह अकारण ही उन्नतिशील व्यक्तियों की आलोचना करता, उन पर झूठे दोषारोपण करता और उनके कृत्यों का अवमूल्यन करता दिखाई देगा।

ईर्ष्यावश कोई किसी के रस में विष घोलता और उन्नति में बाधा डालने का प्रयत्न भले ही करें, किन्तु वह उसमें कहाँ तक सफल हो सकता है, यह निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता क्योंकि किसी की प्रगति अथवा प्रसन्नता किसी की अच्छी-बुरी भावना पर निर्भर नहीं होती, वह उसकी अपनी सदाशयता पर निर्भर रहा करती है। ईर्ष्यालु व्यक्ति बाधक बनकर अथवा डाह दिखलाकर अपना कलुषित स्वरूप प्रकट करने पर ईर्ष्यालु दूसरे से अधिक घाटे में रहता है। लोग उससे घृणा करने लगते हैं। उसे अपने हर्ष, उल्लास तथा उत्सवों में सम्मिलित करने से बचते हैं। लोगों का विश्वास ईर्ष्यालु व्यक्ति पर से उठ जाता है। कोई उससे बात तक करना पसन्द नहीं करता। इस प्रकार की बहिष्कृत स्थिति किसी के लिए भी जलते नरक कुँड की यातना से कम नहीं होती।

ईर्ष्या का जन्म स्वयं अपनी उन कमजोरियों से होता है जो उन्नति-पथ में बाधक होती हैं। जब मनुष्य अपनी कमियों से असफलता का शिकार बनता है तब उसमें पराजय की भावना आ जाती है। किन्तु अपने अहंकार के कारण वह उनका हेतु अपने अन्दर ने देखकर दूसरों पर दोषारोपण किया करता है। नौकरी के लिए बुलाये गये बहुत-से प्रत्याशियों में से जो असफल हो जाते हैं वे यह तो सोचते नहीं कि उनके अन्दर भी ऐसी कोई कमी रही होगी जिसके कारण उन्हें दूसरों की अपेक्षा कम महत्व दिया गया, बल्कि सोचने लगते हैं कि हमारी असफलता का कारण अमुक व्यक्ति ही रहा है। यदि यह न आया होता तो कोई कारण नहीं कि वे नौकरी के लिये न चुने गये होते। कितना गलत तरीका है सोचने का । दूसरे लोग चुनाव के लिए क्यों न आते और न अपनी अधिक विशेषता के कारण नौकरी पाने में सफल होते? किन्तु क्या हो? ईर्ष्यालु व्यक्ति के भाग्य में ठीक विचार कर सकना होता ही नहीं। उसे तो किसी न किसी बहाने अन्दर ही अन्दर जलने का अभिशाप पूरा करना होता है।

ईर्ष्या से बचने का अमोघ उपाय यह है कि आप अपनी असफलता का कारण किसी दूसरे को कल्पित मत कीजिए। कभी मत सोचिए कि आप किसी अन्य के कारण असफल हुए हैं। विश्वास रखिए कि आप अपनी ही कमियों, कमजोरियों तथा अयोग्यताओं के कारण ही असफल हुए हैं। दूसरों की प्रसन्नता देखकर प्रसन्न होइये। आगे बढ़ते हुए व्यक्तियों को अपना योगदान करिये। दूसरों की सफलता में प्रसन्न होने वाला किसी-न-किसी रूप में उसकी सफलता में भागीदार बन जाता है। लोग उसे अपना हितैषी समझ कर विश्वास करने लगते हैं, जिससे सौहार्द्र का जन्म होता है।

दूसरों की सफलता को अपनी, अपने परिवार, अपने समाज तथा अपने राष्ट्र की सफलता समझने वाला व्यक्ति हर प्रकार से लाभ में ही रहता है। लोग खुशी-खुशी उसे अपने साथ लेकर चलने के लिए उद्यत रहते हैं। सद्भावना रखने के कारण दूसरे उसे अपना सहायक समझने लगते हैं जिसके प्रत्युत्तर में स्वयं भी उसकी सहायता किया करते हैं। दूसरे की उन्नति को अपने मित्र की ही उन्नति समझने वाले व्यक्ति मन से तो ऊंचे हो ही जाते हैं साथ ही सद्भावना के कारण उन्नतिशील व्यक्तियों के पास ही आसन पाते हैं। सक्रिय सहायता करने वालों की अपेक्षा लोग सद्भावना रखने वाले को कम महत्व नहीं देते।

यह मनुष्य के निश्चय ही अपने हाथ में है कि वह किसी के लिए अपने मन में ईर्ष्या रखता है अथवा सद्भावना। किसी की सफलता अथवा उन्नति में प्रसन्न होने से आपकी गाँठ से कुछ भी तो नहीं जाता उल्टे दूसरों का स्नेह अथवा श्रद्धा-पात्र बनकर आपको लाभ ही लाभ होगा।

हम सामाजिक प्राणी हैं। समाज से अलग हमारा कोई अस्तित्व नहीं । समाज उन्नत होगा तो हमारी भी उन्नति होगी, समाज का पतन होगा तो हमारा भी पतन होगा। हम समाज के उत्थान-पतन अथवा सफलता-असफलता से कदापि अछूते नहीं रह सकते। इस प्रकार समाज के एक अभिन्न अंग होकर यदि हम ईर्ष्यावश किसी का अहित करने की सोचते हैं तो सबसे पहले अपना अहित करने का उपक्रम करते हैं। समाज में एक दूसरे की सहायता-सहयोग से ही लोग आगे बढ़ते हैं। जब हम दूसरों के प्रति सद्भावना रखेंगे, उनको आगे बढ़ने में सहायता करेंगे तभी कोई हमारी भी सहायता करेगा। यह सोचना कि समाज में केवल मेरी ही उन्नति हो और मैं सफलता पाऊं अन्य सारे लोग गिरे ही पड़े रहें- तो यह एक संकीर्णता, एक स्वार्थपरता होगी जो किसी भी दशा में वाँछनीय कदापि नहीं कही जा सकती। समाज में सबकी उन्नति होने पर ही हमारी उन्नति होगी और तभी सबके साथ हमारी उन्नति की शोभा भी है। हम उन्नत तथा सम्पन्न बने रहें और सब पतितावस्था में ही पड़े रहें तो हमारी उन्नति हम पर एक बोझ जैसी लगेगी।

मानवता का यही तकाजा है कि हम किसी से ईर्ष्या न करते हुए स्वयं अपना विकास करने का प्रयत्न करें और यथासाध्य दूसरों की उन्नति में सहायक बनकर अपने लिए भी सहायता, सहयोग तथा सहानुभूति सुरक्षित कर लें। इस प्रकार ही हम ईर्ष्या की आग से बचकर सबके साथ सुख एवं शाँति का जीवन बिता सकेंगे।


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ईर्ष्या वह काली नागिन है जो समस्त पृथ्वी मंडल में जहरीली फुफकारें छोड़ रही है। यह गलतफहमियों की एक गर्म हवा है जो शरीर के अन्दर ‘लू’ की तरह चलती है और मानसिक शक्तियों को झुलसा कर राख बना देती है।

-अज्ञात


प्रगति पथ के तीन प्रमुख अवरोध

जीवन पथ पर आगे बढ़ने के महत्वाकाँक्षियों को प्रगति के तीन शत्रु- (1) आवेश, (2) असहनशीलता और (3) अदूरदर्शिता से सदा सावधान रहना चाहिए। जो श्रेयपंथी इन तीन शत्रुओं को साथ लेकर चलते हैं अथवा समय असमय साथ हो लेने देते हैं वे कदाचित ही अपने लक्ष्य पर पहुँच पाते हैं।

उन्नति और विकास के लिए मनुष्य को योजनाबद्ध कार्यक्रम बनाना पड़ता है। योजनाबद्ध कार्यक्रम को बनाये बिना जो यों ही अस्त-व्यस्त गति से चल पड़ते हैं उनकी यात्रा निरापद अथवा पूरी होगी इसमें सन्देह किया जा सकता है। हमें क्या पाना है अथवा कहाँ पहुँचना है-इस बात को जाने बिना गति की दिशा निर्धारित नहीं की जा सकती और जिस गति की दिशा ही अज्ञात है उसका कोई गन्तव्य हो ही नहीं सकता ।

गन्तव्य और उसके अनुरूप दिशा का निर्णय हो जाने पर साधन, सम्बल तथा शक्ति का संचय करना पड़ेगा और यह समझना होगा कि अपने उपलब्ध साधनों का किस प्रकार प्रयोग किया जाये जिससे कि वे लक्ष्य की दिशा में अधिक से अधिक उपयोगी हो सकें। साधन तथा सम्बल संचय हो जाने पर दृढ़तापूर्वक कदम-कदम निर्धारित पथ पर धैर्यपूर्वक चलना होगा तब कहीं अपने गन्तव्य और लक्ष्य पर पहुँचा जा सकता है। जिसके लिए इस प्रकार की सुनियोजित योजना, क्रमबद्धता तथा सन्तुलन की आवश्यकता है उस लक्ष्य की सिद्धि भला यों ही सोचे-समझे बिना ग्रस्त-व्यस्त गति से चल पड़ने से किस प्रकार हो सकती है?

मनुष्य का आवेश इस योजनाबद्ध कार्यक्रम में बाधक होता है। आवेश एक प्रकार का उन्माद है, जिसका दौरा किसी समय भी पड़ सकता है। जिसका मस्तिष्क आवेश के दोष से घिरा रहता है वह क्षण-क्षण पर उत्तेजित हो उठता है। उसमें इतना हल्कापन आ जाता है कि किसी बात पर कुछ देर भी स्थिर रह कर सोच नहीं सकता। किसी लक्ष्य के लिए सुनियोजित कार्यक्रम बनाने के लिए बौद्धिक परिश्रम की आवश्यकता होती है। आवेश प्रधान मस्तिष्क में उसका हो सकना कठिन होता है। आवेश के दोष वाला व्यक्ति जरा-सा सोचने पर थक जाता है। उसे एक उलझन, विषण्णता तथा अरुचि अनुभव होने लगती है जिससे वह या तो यह सोचना ही छोड़ देता है अथवा अपूर्ण विचारों के बीच ही निर्णय कर डालता है। जिसका फल असफलता के सिवाय और क्या हो सकता है।

आवेश प्रधान व्यक्ति का हर काम उतावली से भरा होता है। वह अपने कामों को आवश्यक धैर्य तथा सन्तुलन का दाया भाग नहीं दे पाता। समय से पूर्व ही फल की आकाँक्षा करने पर जब वह पूरी नहीं होती तब उत्तेजित होकर खीझ उठता है। तब वह या तो अपने कर्त्तव्य कर्म से चिढ़ने लगता है अथवा समाज को दोषी मान कर द्वेष करने लगता है और बदले में अपने विरोधी पैदा कर लेता है।

आवेश प्रधान व्यक्ति की बेल कभी सिरे नहीं चढ़ती। उसकी अस्त-व्यस्त गति उसके पैरों को उलझाती रहती है। उसके काम बिगड़ते अथवा कुरूप होते रहते हैं, जिससे उसे एक दिन स्वयं अपने से अरुचि हो सकती है और तब किसी ऊँचे लक्ष्य को पाना तो क्या सामान्य जीवन भी खिन्नता से भर जाता है।

आवेश निश्चय ही एक मानसिक रोग है। जिसका उपचार धैर्य सन्तुलन तथा स्थिरता ही है। यदि आप में आवेश की दुर्बलता है तो पहले अभ्यास एवं प्रयत्नपूर्वक उसे धैर्य, सन्तुलन तथा सौंदर्य से स्थानापन्न कर लीजिये। तब शाँतिपूर्वक अपना लक्ष्य निर्धारित करिये, दिशा का निर्णय करिये और सोचे हुए सुनियोजित कार्यक्रम के अनुसार गन्तव्य की ओर कदम-कदम बढ़िये अवश्य ही आप अपने उद्योग में कृतकृत्य हो जायेंगे।

असहनशील व्यक्ति मार्ग की उन बाधाओं तथा विरोधों से उस प्रकार नहीं निपट सकता जिस प्रकार प्रगति के महत्वाकाँक्षी के लिए योग्य है। विरोधों का विरोध करना होता है। अवरोधों को धकेलना होता है। किन्तु उनका विरोध करने और धकेलने का तरीका ऐसा होना चाहिये जिससे कि उल्टा विरोध और न बढ़ने लगे। क्या ऐसा शाँत एवं बुद्धिमत्तापूर्ण तरीका असहनशील व्यक्ति से सम्भव हो सकता है? असहनशीलता क्रोध को जन्म देती है और क्रोध विरोध को घटाता नहीं बल्कि बढ़ाता है। जिसमें सहनशीलता का अभाव है यह अपनी आलोचना, निन्दा अथवा अप्रिय इंगित को एक क्षण भी सहन नहीं कर सकता। वह तत्काल उत्तेजित होकर कटु से कटु प्रत्यालोचना करने पर उतर आयेगा एक की सौ सुनायेगा और वही काम करने लगेगा जो समाज के निर्लक्ष्य, निरर्थक और निकम्मे व्यक्ति किया करते हैं । क्या इस प्रकार की रीति-नीति प्रगति पथ पर आगे बढ़ने में सहायक हो सकती है? आलोचना सुनते अथवा किसी के विरोध में खड़े होते ही असहनशील व्यक्ति तत्काल मुकाबले पर उत्तर आता है। वह यह सोचने का कष्ट नहीं करता कि आखिर यह लोग क्यों तो उसकी आलोचना करते हैं और क्यों विरोध में खड़े हो रहे हैं। सम्भव है हमारी गतिविधि में कोई ऐसा तत्व समाहित हो रहा हो जो इन लोगों की प्रगति में बाधक हो अथवा इनको कष्ट पहुँचा रहा हो। कोई भी आदमी अपने में पूर्ण नहीं होता। उससे गलती भी हो सकती है। सहनशील व्यक्ति शाँत मस्तिष्क से आलोचना तथा विरोध की विवेचना करके यह समझने का प्रयास करता है कि क्या इन लोगों के विरोध का कारण मेरी कोई अवाँछित गतिविधि तो नहीं है? और यदि ऐसा होता है तो वह तत्काल सुधार को स्थान देता है क्योंकि सहनशील व्यक्ति हठी अथवा दुराग्रही नहीं होता। असहनशील व्यक्ति से इस सदाशयता की आशा नहीं की जा सकती जिसका परिणाम अधिकाधिक विरोध के अतिरिक्त और क्या हो सकता है?

उन्नति अथवा प्रगति के पथ पर बाधाओं की भाँति असफलताओं का आना भी सहज सम्भाव्य है। यह किसी प्रकार भी संभव नहीं कि पहले कदम से लेकर अन्तिम कदम तक सफलता ही सफलता मिलती रहे। असफलतायें आती हैं और जरूर आती हैं। असहनशील व्यक्ति जब बाधा और विरोध से उत्पन्न होने वाली असफलता की सम्भावना से ही विचलित होकर अपना मानसिक सन्तुलन खोकर उत्तेजना के वशीभूत हो जाता है तब यह आशा करना व्यर्थ है कि वह साक्षात् असफलता को स्वीकार कर सकेगा। असफलता का स्वागत करने के लिए उद्यत न रहने वाला व्यक्ति जीवन में कभी सफलता का स्वागत करने का अवसर पा सकेगा यह असम्भव नहीं तो अस्वाभाविक अवश्य है। सफलता की ओर जाने वाला मार्ग असफलताओं के बीच होकर ही जाता है।

असफलता की अप्रियता न सह सकने के कारण असहनशील व्यक्ति को निराश एवं हताश होते देर न लगेगी। यह दोनों दुर्बलतायें ऐसी शृंखला हैं जो मनुष्य की गति को अवरुद्ध कर जहाँ का तहाँ रोक दिया करती हैं। बाधा, विरोध, कठिनाई तथा असफलता प्रगति पथ पर चलने वाले के लिए काँटों का उपहार है जिसको स्वीकार करना उसका कर्त्तव्य है- ऐसा समझ सकना असहनशीलता के वश की बात नहीं होती। असहनशील व्यक्ति की वृत्ति इस विषय में कुछ विपरीत-सी होती है। वह असफलता अथवा कठिनाई को स्वीकार करने में तो आनाकानी करता है किन्तु हार मान कर हताश जरूर होता है।

सहनशीलता का गुण मनुष्य को हर कठिनाई कटुता तथा अप्रियता को सहने योग्य बनाये रखता है। असफलता के आने पर उसके सोचने का ढंग असहनशील से भिन्न होता है। वह सोचता है कि आज यदि असफलता का मुख देखने को मिला है तो कल अवश्य ही सफलता के दर्शन होंगे। उसके पास निराशा अथवा निरुत्साह के भाव फटकने भी नहीं पाते। वह कठिनाइयों से शक्ति विरोध से साहस और असफलता से शिक्षा लेकर दूने वेग से आगे बढ़ा करता है। असहनशील व्यक्ति की तरह खिन्न होकर हानि पर बैठा-बैठा शोक नहीं मनाया करता है। ऐसे ही साहसी व्यक्ति हजार कठिनाइयों और कटु से कटु असफलता को सहन कर अपने गन्तव्य पर पहुँच कर ही दम लेते हैं। श्रेय पथ पर चलने से पूर्व मनुष्य को चाहिए कि वह असहनशीलता का मानसिक हलकापन दूर कर अपने अन्दर गम्भीरता, दृढ़ता तथा सहनशीलता का विकास करके- तब चले-और तब उसे अपने लक्ष्य तक पहुँचने से संसार की कोई भी शक्ति नहीं रोक सकती!

अदूरदर्शी व्यक्ति कितना ही धैर्यवान साहसी तथा पुरुषार्थी क्यों न हो अपने लक्ष्य पर नहीं पहुँच सकता है उसकी संकुचित तथा सीमित दृष्टि पैर तले को देख सकने के सिवाय दो कदम आगे का भी नहीं देख सकती जबकि महत्वाकाँक्षाओं को मूर्तिमान् करने के लिए दूर, वर्षों दूर भविष्य के गर्भ तक में झाँकना और अनागत का स्वरूप अनुमान करना पड़ता है। जो नाक के आगे देखने की क्षमता ही नहीं रखता वह आज से लेकर आने वाली परिस्थितियों तथा वासनाओं का दिग्दर्शन किस प्रकार कर सकता है। किसी ऊँचे लक्ष्य को पाने के लिये वर्तमान परिस्थितियों का उपयोग किस प्रकार करना पड़ता है जिससे कि भविष्य द्वारा सम्वाहित परिस्थितियों पर अनुकूल प्रभाव पड़े जिससे कि यदि उनमें कोई प्रतिकूलता लिपटी चली आ रही हो तो वह दूर कर अलग गिर जाये और वह अनागत आकर मनोनुकूल वर्तमान में बदलता रहे। इस प्रकार की दूर, व्यापक तथा सूक्ष्मदर्शिता का काम संकीर्ण बुद्धि वाले से हो सकना सम्भव नहीं। दूरदर्शी ही तो यह देख सकता है कि उसका लक्ष्य किस दिशा में कितनी दूर और किन-किन भिन्न तथा अभिन्न परिस्थितियों से घिरा हुआ वर्तमान है और उस तक किस गति से कितने समय में पहुँच जा सकता है। जो आज के वर्तमान में बर्तता हुआ अनागत भविष्य के बर्ताव की रूपरेखा नहीं समझ सकता उस अदूरदर्शी को महत्वाकाँक्षियों के चमत्कार से आकर्षित न होना चाहिए क्योंकि उसे इस विषय में असफलता तथा ग्लानि के अतिरिक्त कुछ भी हाथ न लगेगा।

अदूरदर्शी व्यक्ति तात्कालिक लाभ तथा सफलता पर ही ध्यान केन्द्रित रखता है। वह उस लाभ या परिणाम समझने में असमर्थ रहता है। यह अनुमान लगा सकना उसके वश के बाहर की बात होती है कि आज का यह लाभ जिसे पकड़ कर वह हर्षित अथवा सन्तुष्ट हो रहा है भविष्य के किसी बड़े लाभ पर बुरा प्रभाव डालेगा। उसे इस बात का स्पष्ट ज्ञान नहीं रहता कि आज के इस लाभ का त्याग कल ऊँचे सफलता में फलीभूत हो सकता है। दूरदर्शिता की कमी किसी भी महत्वाकाँक्षी के लिये सबसे बड़ी और हानिकारक भी है। इसको दूर कर ही श्रेय पथ पर पैर रखना बुद्धिमानी माना जायेगा।

यदि आप महत्वाकाँक्षी हैं। जीवन में उन्नति एवं विकास का कोई ऊँचा लक्ष्य पाना चाहते हैं तो प्रगति पथ के इन तीन शत्रुओं-आवेश, असहनशीलता तथा अदूरदर्शिता यदि आप में हों तो निकाल डालिये और प्रतिक्षण सावधान रह कर श्रेय पथ पर आगे बढ़िये आपकी आकाँक्षायें सफल होंगी। आपका उद्योग, उद्यम तथा परिश्रम और पुरुषार्थ फल लायेगा।


क्षणिक अस्तित्व पर इतना अभिमान

क्षणिक अस्तित्व पर इतना अभिमान-

अमावस की रात में दीप ने देखा-न चाँद और न कोई ग्रह नक्षत्र न कोई तारा-केवल वह एक अकेला संसार को प्रकाश दे रहा है। अपने इस महत्व को देख कर उसे अभिमान हो गया।

संसार को सम्बोधित करता हुआ अहंकारपूर्वक बोला-मेरी महिमा देखो, मेरी ज्योति-किरणों की पूजा करो, मेरी दया-दयालुता का गुणगान करो मैं तुम सबको राह दिखाता हूँ, प्रकाश देता हूँ इस प्रगाढ़ अन्धकार में तुम सब मेरी कृपा से ही देख पर रहे हो। मुझे मस्तक नवाओ, प्रणाम करो।

दीप के इस अहंकारोक्ति का उत्तर और किसी ने तो दिया नहीं, पर जुगनू से न रहा गया बोला-ऐ दीप! क्षणिक अधिकार पाकर इतना अभिमान, एक रात के अस्तित्व पर यह अहंकार केवल इस रात ठहरे रहो। प्रभात में तुमसे मिलूँगा तब तुम अपनी वास्तविकता से अवगत हो चुके होगे!


साधु लोक-मंगल की मुहीम संभालें

समय था जब संसार में भारतीय धर्म का बोलबाला था, उसकी सभ्यता एवं संस्कृति उच्चतम शिखर पर विराजमान थी। यह उच्चता उसे यों ही प्राप्त नहीं हो गई थी। इसके लिए भारतवासियों को त्याग और तपस्या करनी पड़ी थी। भारतीय समाज में दो वर्ग तो ऐसे थे जिनका एकमात्र जीवन ध्येय, देश, धर्म तथा सभ्यता संस्कृति का विकास एवं प्रचार करना ही था। वे दिन-रात देश धर्म की सेवा में लगे रहते थे और समाज उन्हें इस उपकार के बदले में साधन तथा सम्मान दिया करता था यह दोनों वर्ग ब्राह्मण एवं साधु नाम से प्रसिद्ध थे और आज भी प्रसिद्ध हैं और कमोबेश उसी तरह माने भी जाते हैं और यह अपेक्षा भी की जाती है कि वे देश धर्म की सेवा उसी प्रकार करेंगे जिस प्रकार पूर्वकालीन लोग करते रहे थे। किन्तु खेद है कि इन दोनों वर्गों ने अपने कर्तव्यों को तिलाँजलि तो दे दी है, किन्तु अपने मान-सम्मान की पिपासा को नहीं त्यागा है। इस समय देश धर्म बड़ी विषम स्थिति से गुजर रहा है साधु ब्राह्मणों को अपना दायित्व समझना तथा कर्तव्य करने के लिए पुनः परिकर बाँध कर मैदान में उतरना होगा। अन्यथा नहीं कहा जा सकता कि काल की करा लता और विकृतियों की विषमता समाज, राष्ट्र तथा उन्हें किस स्थिति में ले जाकर पटक दे।

पूर्वकालीन ब्राह्मणों तथा सन्त महात्माओं में कोई विशेष अन्तर नहीं था। उनके दायित्व एवं कर्तव्य समान ही थे साथ ही अविकारों में भी कोई विषमता नहीं थी। वह दोनों शब्द एक ही व्यक्तित्व के दो नाम थे। अन्तर ही था तो केवल स्थिति का साधु, सन्त अधिकतर गृहत्यागी होते थे और उनका रहन-सहन उस स्थिति के अनुरूप रहता था। परिवार अथवा घर-गृहस्थी की परिधि से परे हो जाने से साधुओं का कार्य-क्षेत्र सारा देश रहा करता था। वे आजीवन परिभ्रमण करते हुए देश के कोने-कोने में घूमते रहते थे और जहाँ ही विकृति अथवा अवाँछनीयता देखते थे वहीं रुक कर, संस्कार तथा शोधन का अपना कर्तव्य पालन किया करते थे।

ब्राह्मणों पर गृह त्याग का प्रतिबन्ध न था। वे इच्छानुसार परिवार बसा कर रह सकते थे, आजीविका के लिए अध्यापन तथा धर्म शिक्षण का कार्य कर सकते थे। फिर भी समाज के प्रति उनका कर्तव्य वही था जो साधु अथवा संन्यासी का! परिवार में रहने से ब्राह्मणों को कार्य-क्षेत्र सारा देश ने होकर उनका एक सीमित क्षेत्र ही रहा करता था। जहाँ वे घर-घर जाकर लोगों के धार्मिक स्वाध्याय की देख-भाल किया करते थे। कथा, प्रवचन तथा पूजा-पाठ द्वारा लोगों की धर्म निष्ठा को सम एवं समुचित बनाए रहते थे।

आज समय कुछ बदल गया है। परिस्थितियाँ उन दिनों जैसी नहीं रह गई हैं। अधिकतर ब्राह्मणों को परिवार पोषण के लिए अनेक काम करने पड़ गये हैं। आज उनके पास समाज सेवा के लिए उतना समय तथा साधन नहीं रह गया है जितना कि पहले था। किन्तु साधु-सन्तों तथा संन्यासियों की स्थिति यथावत् बनी हुई है। आज भी वे उसी प्रकार आग्रही, परिव्राजक तथा समाज द्वारा सम्मानित एवं पोषित हैं। उन्हें अपनी आजीविका अथवा जीवन रक्षा के लिए कोई उद्योग नहीं करना पड़ रहा है समाज उनका सारा भार वैसे ही वहन कर रहा है जैसा कि पहले किया करता था। अस्तु, समाज-सेवा समाज-सुधार तथा धर्म-प्रचार का सारा दायित्व एवं कर्तव्य इन साधु, संन्यासियों तथा सन्त, महात्माओं पर आ गया है। जिसे उन्हें पूरा करना ही चाहिये।

किन्तु, क्या आज के साधु-संन्यासी अपने दायित्व को समझ और कर्तव्य को पूरा कर रहे हैं? इसका उत्तर ‘न’ में होने के सिवाय और क्या हो सकता है। आज के साधुजन वेश रचना के सिवाय शायद यह भी नहीं जानते है कि साधुता का क्या अर्थ होता है। क्या आज के छप्पन-साठ लाख साधुओं में से कोई यह स्वीकार कर सकता है कि वेश-विन्यास से साधुता का कोई भी सम्बन्ध नहीं। साधु सज्जन शब्द का पर्याय है। जिसमें निष्कलंक सज्जनता है वही साधु कहलाने योग्य हो सकता है। जिसका समय, श्रम, ज्ञान तथा मनोभावनाएँ व्यक्तिगत स्वार्थों में ही लगे रह कर समस्त मानव समाज की सेवा में लगी हों वही साधु है। साधु उस व्यक्ति को ही माना जा सकता है जो अपने सर्वस्व को सार्वजनिक सम्पत्ति समझता हो और जन-सेवा के कार्यों में उपयोग करता हो। जिसके मन-मन्दिर में वसुधैव कुटुम्बकम् की महान् ज्योति जल रही हो और जिसका आचरण उसी से प्रकाश एवं प्रेरणा लेकर सक्रिय हो रहा हो, वही-साधु है । उसी को साधु माना जाना चाहिए। पूर्वकालीन ऋषि-मुनियों अथवा साधु-संन्यासियों जैसा वेश बना लेना ही साधुता नहीं है।

साधुता तथा साधु-संन्यासियों के कर्तव्य समझना तो दूर, आज के साधु जन शायद उस वेश-विन्यास का तात्पर्य भी नहीं जानते होगे जिसे बनाये फिरते हैं और जिसके कारण वे जनता में आदर की दृष्टि से देखे जाते हैं। जो वेश-विन्यास आज का साधु समुदाय बनाए घूमता है वह पूर्वकालीन ऋषि-मुनियों का ही अनुकरण है। इस प्रकार का वेश विन्यास ऋषियों के लिए ऋचाओं की तरह ईश्वर प्रेरित नहीं था। बल्कि ऋषियों ने इसे सामयिक परिस्थिति एवं अपनी स्थिति के अनुसार ही चुना था।

साधु का प्रथम धर्म है अपरिग्रहण। अपनी जीवन-चर्या में वे कम से कम खर्च करना अपना पावन कर्तव्य समझते थे। कमण्डलु नामक लौकी के खोखले से पात्र का काम चलाते थे। जंगल की साधारण लकड़ी के खड़ाऊ पहनते थे। उस समय आज जैसी कपड़ों की बहुतायत न थी। जो कुछ कपड़ा होता भी था, समाज की सुविधा तथा आवश्यकता का ध्यान रखने वाले साधुजन स्वयं उसका प्रयोग न करते थे। जब तक सरदी-गर्मी सहन होती थी एक कोपीन के सिवाय कुछ न पहनते थे। हवा तथा धूप से बचने के लिए भस्म मल लेते थे,या पेड़ों की छाल छील कर वल्कल-वस्त्र बना लेते थे। भोजन के नाम पर अधिकतर जंगलों में पैदा होने वाले फल-फूलों एवं कन्द-मूलों का ही सेवन करते थे। ऋषियों द्वारा जटा-जूट रखाये जाने का कारण यही रहा है कि जंगलों की ओर रहने के कारण वहाँ हजामत बनाने की सुविधा न थी। और इसके लिए वे हर तीसरे दिन नगरों की ओर दौड़ते रहते तो उनके द्वारा समाज के लिए किये जाने वाले चिन्तन एवं शोध कार्यों में विघ्न पड़ता। वे जटा-जूट रखा सकते थे किन्तु समाज-सेवा में लगे हुए जीवन का एक क्षण भी खराब करना स्वीकार न कर सकते थे। इस प्रकार ऋषि-मुनियों के वेश-विन्यास एवं रहन-सहन में उनकी परिस्थिति तथा स्थिति की अनुरूपता के सिवाय और कुछ न था । किन्तु आज के साधु समाज ने केवल वेश-भूषा को ही धारण करना साधुता की चरमावधि मान लिया है।

आज का जो साधु-समुदाय वेश-विन्यास बना लेने को ही साधुता प्राप्त कर लेना समझता है यह नहीं समझ पाता कि यदि वेश की अनुरूपता अथवा अनुकरण किसी व्यक्ति को वैसा करना बना सकता तो नाटकों एवं स्वाँगों के नट-विदूषक सब राजा, साधु-संत अथवा महात्मा बन जाते जो उन जैसा विन्यास बनाते और अभिनय करते हैं। साधु के गुणों एवं कर्मों से रहित रह कर जो अपना बाह्य कलेवर उन जैसा बना कर गली-गली घूमते-फिरते हैं उन्हें कोई मूढ़-मति व्यक्ति भले ही साधु मान ले किन्तु जिसके पास जरा-भी बुद्धि होगी, साधुता का तनिक भी अर्थ समझता होगा-वह उनको प्रबन्धक अथवा उस विदूषक के समान उपहासास्पद ही मानेंगे, जो लोगों को तरह-तरह के वेश बना कर हँसाता और पैसा माँगता फिरता है। साधु के रूप में रह कर उन जैसा कर्तव्य न करना घोर विडम्बना है। आज ऐसे ही विन्यासी साधुओं की तरह समाज में साधु शब्द को हेय दृष्टि से देखा जाने लगा है। साधु शब्द सुनते ही किसी आडम्बरी, प्रवंचक अथवा भिक्षुक की तस्वीर सामने आ जाती है।

आज देश में छप्पन लाख साधु बतलाए जाते हैं। यदि उनमें से अपाहिज, अपंग, अशिक्षित एवं उचक्कों को निकाल दिया जाए तब भी 10-20 लाख ऐसे साधु निकलेंगे जो शिक्षित तथा समझदार होंगे। किन्तु खेद है कि साधुओं के बीच जो पूजने और पुजापा खाने की हवा चल रही है वे भी उसी में बहते चले जा रहे हैं। उन्हें अपने समुदाय तथा वर्ग के वच्चकों का अनुकरण न कर के साधुजनों के सच्चे कर्तव्य को पूरा करना चाहिये। उन्हें अपने उस समाज की वर्तमान दयनीय दशा के प्रति दयार्द्र एवं संवेदनशील होना चाहिये जो उन्हें हार्दिक आदर, सम्मान तथा सब प्रकार के साधन देता रहा है साधु होकर उपकार के बदले प्रत्युपकार न करने के समान कोई पाप नहीं । यह कृतघ्नता है जिसे शास्त्रों में महापातक कहा गया है। सज्जन एवं सच्चे साधुओं को वर्गवाद के दलदल से निकल कर समाज-सेवा के कार्य में लग ही जाना चाहिए। उन्हें स्थानस्थ होकर पूजा लेने के स्थान पर परिव्रजन का कार्यक्रम बना लेना चाहिये और गाँव-गाँव, नगर-नगर, द्वार-द्वार धर्मोद्धार एवं समाज-सुधार का शंक फूँक देना चाहिये। आज के कठिनतम आर्थिक युग में अभाव के समय में जनता की सहज श्रद्धा के शोषण रूप बन कर समाज का बोझ बढ़ाना अनुचित ही कहा जायेगा। साधुजनों को अपना यह कलंक धो डालने के लिये पूर्वकालीन साधु-परम्परा को सच्चे मानों में जाग्रत कर यह दिखला ही देना चाहिए ऋषि-मुनियों के इस देश की वह साधुता अभी मर नहीं गई है जिसके बल पर भारत का धर्म, उसकी सभ्यता, संस्कृति एवं समाज संसार का सिरताज बना रहा है। साधु समुदाय के पास ऐसा कोई पारिवारिक उत्तरदायित्व नहीं जो उन्हें उनके समय अथवा श्रम का कोई अंश छीन रहा हो। संयोग भाग्य अथवा संस्कारों वश साधुओं के लिए वे पूर्वकालीन सारी परिस्थितियाँ आज भी विद्यमान हैं उनका समुचित उपयोग कर वे लोक-परलोक दोनों का संसाधन कर सकते हैं। उन्हें करना भी चाहिए। अन्यथा संसार में बुद्धिवाद बहुत तेजी से बढ़ रहा है, श्रद्धा का अस्तित्व धुँधला पड़ता जा रहा है। भगवान् न करे, यदि निषेधात्मक युग आ जाए तो इस साधु-समाज की क्या स्थिति हो सकती है यह साधुओं के लिये विचारणीय एवं करणीय है।


सच्ची शंतिं कैसे प्राप्त हो

सच्ची शंतिं कैसे प्राप्त हो-

मिथिला नगरी के महानन्द परिव्राजक ने जीवन के तीन दिन कठिन तपश्चर्या में बिताये। जप, तप, आसन, प्राणायाम, स्वाध्याय, यज्ञ, कीर्तन, मार्जन, तर्पण करते करते असंख्य सिद्धियाँ करतल गत कर लीं। असाधारण क्षमता वाले मुनि महानन्द की ख्याति चन्द्रमा के प्रकाश की तरह विकसित होने लगी सैंकड़ों व्यक्ति उनकी सिद्धियों का लाभ पाने लगे। सैंकड़ों व्यक्ति प्रतिदिन आश्रम पहुँचते और श्री चरणों में सिर रख कर महासुख अनुभव करते।

किन्तु मुनि का अन्तःकरण स्थिर न था सिद्धियों ने उनकी तृष्णा तो बढ़ा दी पर वह शाँति वह स्थिरता न मिली जिसके लिये मुनि ने घर, परिवार और स्नेहियों सम्बन्धियों का साथ छोड़ा था।

एक दिन महानन्द इसी दुःख से भरे अपने कुटिया से निकले। एक गाँव की ओर चल पड़े। शुरू चौखट में पहुँचे थे कि किसी के कराहने का स्वर सुनाई दिया। कोई बीमार था, देखने वाला कोई न था बड़ी पीड़ा बढ़ गई थी। व्यक्ति की दर्दभरी कराह मुनि के हृदय में उतर गई । उन्होंने बीमार की रात-भर सेवा की। दवा दी, पाँव दाबे, बिस्तर बदले, टट्टी ओर पेशाब धोया। चौथे पहर जब उसे नींद आई मुनि आश्रम लौटे। आज न उन्होंने संध्या की न प्राणायाम और निदिध्यासन भी नहीं किया किन्तु तो भी उसके अन्तःकरण में अपूर्ण शाँति, स्थिर उत्फुल्लता, अबोध सुख निर्झर की भाँति झर रहा था । मुनि अनायास कह उठे-हाय रे! मैं कितना अभागा रहा जो चार पन यों ही बिता दिये। मुझे मालूम होता कि परमात्मा दीन-दुखियों की सेवा और परमार्थ का प्यासा है तो क्यों इतना समय व्यर्थ जाता।


नारी का प्रगति-पथ अवरुद्ध न रहे

भारत का प्राचीन इतिहास गौरवपूर्ण रहा है। इसका श्रेय यहाँ के जीवन-दर्शन, सामाजिक एवं पारिवारिक पद्धति को ही है, जिसने ऐसी मान्यतायें, भावनायें एवं प्रेरणायें दीं जिनके आधार पर इस देश का बच्चा-बच्चा नर-रत्न एवं महापुरुष बन सका। यहाँ के निवासियों का चरित्र, व्यक्तित्व, आदर्श, लक्ष्य एवं कर्तव्य-कर्म इतना उत्कृष्ट रहा करता था कि वह अनायास ही अन्यों का अनुकरणीय बन जाता था! जन-जीवन में इन गुणों का समागम उन संस्कारों के माध्यम से हुआ करता था, जो उन्हें बाल्यकाल में ही अपने माता-पिता से बीज रूप में मिल जाया करते थे।

जननी और जनक सन्तानों को न केवल जन्म देने वाले ही होते हैं अपितु उनके निर्माता भी हुआ करते हैं। सन्तान का भला-बुरा होना बहुत कुछ उनके माता-पिता के स्तर पर निर्भर है सन्तान प्रायः उन्हीं गुणों-अवगुणों को ग्रहण कर लिया करती है जो उनके माता-पिता के जीवन में पाये जाते हैं। इनमें भी माता के संस्कार सन्तान पर पिता की अपेक्षा अधिक, गहरे और पहले पड़ते हैं। इसका कारण यह है कि गर्भ से लेकर उस सुकुमार आयु तक सन्तान एकमात्र माता के संपर्क में रहती है जिस आयु में उसका मानसिक धरातल संस्कारों को जल्दी और गहराई तक ग्रहण कर लेने के सर्वथा उपयुक्त होता है। जिस समय सन्तान माँ से संस्कार ग्रहण करना प्रारम्भ करती है उस समय उसका मन मस्तिष्क कोरे कागज की तरह अंकित होता है और जब वह औरों के संपर्क में आने और संस्कार ग्रहण करने योग्य होता है तब तक वह अंकित हो चुका होता है बच्चे माँ के बाद अन्यों के संपर्क में भी आते और संस्कार ग्रहण करते रहते हैं किन्तु आजीवन प्रधानता उन्हीं संस्कारों की रहती है जो वे अनजाने में ही माता से ग्रहण किये होते हैं और जो एक प्रकार से उनके स्वभाव एवं व्यक्तित्व के अंग बन कर स्थिर हो जाया करते हैं। इसलिए संतति निर्माता में माता की ही प्रधानता मानी जाती है।

माँ के स्तर की अनुरूपता ही बच्चों के चरित्र में प्रतिबिम्बित होती है-ऐसा कहने में कोई अत्युक्ति नहीं है। माँ का अन्तरंग एवं अंक दोनों मनुष्यों के दोनों बाह्य एवं आँतरिक आकार-प्रकार के साँचे हैं। साँचा जितना सुन्दर और एवं सुघड़ होगा खिलौना उतना ही सुन्दर बनेगा यही कारण है कि जब-जब देश-समाज की मातायें जितनी सुशिक्षिता, सुशील, सौम्य एवं गुणवती रही हैं उस देश के निवासी भी उसी अनुपात में विद्वान एवं सद्गुणी होते रहे हैं। माता के इस महत्व को प्रकट करते हुए ऋग्वेद में कहा गया है-

“सूयवसाद्भगवती हि भूया अथो वयं भगवन्तः स्याम। अद्धितृणमध्न्ये विश्वदानीं पिब शुद्धमुदकमाचरन्ती ॥”

-सन्तान विद्यावान हो इसलिए मातायें ज्ञानवती बनें। जो स्त्रियाँ सदाचारी पुरुषों से विवाह कर सन्तान उत्पत्र करती हैं और उन्हें संस्कारयुक्त बनाती हैं, उनसे समाज का गौरव बढ़ता है। उनका अनुदान गायों के समान पवित्र होता है।

“नूनं साते प्रतिवरंजरित्रे दुहीयदिन्द्र दक्षिणा मघोनी। शिक्षा स्तोतृभ्यो माति धग्भगो नो बृहद्वदेम विदथे सुवीराः॥”

-हे विद्वानों! धर्मात्मा विदुषी स्त्रियाँ अध्यापन करें। उनसे कन्यायें उत्तम शिक्षा प्राप्त करें जिससे पुनीत परम्परा का विनाश न हो।

जब तक भारत में माता के इस महत्व को समझा और उसका मूल्याँकन होता रहा तब तक इस देश में एक से एक बढ़ कर विद्वान एवं शूर-वीर पैदा होते रहे जो शास्त्र एवं शस्त्र बल से तम तथा तमस का दमन करते संसार की सुख-शाँति को बढ़ाते और राष्ट्रीय गौरव को ऊँचा चढ़ाते रहे हैं। जहाँ वैदिक काल में भारत के मातृ-वर्ग ने भारद्वाज, गौतम, कपिल, कणाद, व्यास, वशिष्ठ, विश्वामित्र, आदि जैसे ऋषि, मध्य काल में राणा साँगा, प्रताप, पृथ्वीराज, गोरा बादल जैसे शूर-वीर, वहाँ आधुनिक काल में भी शंकराचार्य, दयानन्द, विवेकानन्द, गाँधी जैसे संत एवं त्यागी पुरुष भी दिये हैं। इन सबके जीवनों को गहराई से देखने पर पता चलता है कि इनके इस उत्थान उत्कर्ष पूर्ण चरित्र विकास में माताओं का काफी हाथ रहा है। माता द्वारा आदि संस्कार पाये बिना कदाचित् ही कोई जीवन पथ पर आगे बढ़ सकता है। व्यक्ति ही नहीं , परिवार की सुख-शाँति एवं समृद्धि भी बहुत अंशों में नारियों पर निर्भर है जहाँ शिक्षित, उन्नतिशील एवं कर्तव्य परायण स्त्रियाँ घर को स्वर्ग बना देती हैं वहाँ अशिक्षित जड़ तथा मूढ़ स्त्रियाँ उसे नरक में बदल देती हैं। इसलिए शास्त्रों में नारी को घर और परिवार का मूलाधार कहा गया है। गृहस्थों को सुख-शाँति का हेतु बतलाते हुए कहा गया है-

“यूयं देवी ऋतयुग्भिरश्वैः

परि प्रयाथ धुवनानि सद्यः।

प्रवोधयन्ती रुषसः ससन्तं,

द्विपाच्चतुष्पाच्च रथाय जीवम्॥”

ऋ. वे.

-उत्तम गुणों से युक्त विदुषी और सुशील स्त्री प्राप्त करने वाले सदैव सुखी रहते हैं।

“अहं केतु रहं मूर्धाहिमुग्रा विवाचनी।

ममेदनु क्रतुँ पतिः सेहानाया उपाचरेत॥”

-गृहिणी ज्ञानवती हो, क्योंकि वह घर का आधार है। पति को उसके अनुकूल आचरण करना चाहिये। इस प्रकार जब तक नारी की महत्ता बनाई रक्खी गई भारत, भारत बना रहा। किन्तु जबसे उसकी महत्ता की उपेक्षा की जाने लगी देश का पतन प्रारम्भ हो गया। नारी की उपेक्षा का यह क्रम लगभग हजार-बारह सौ साल से चला आ रहा है जिसमें अब तक कोई भी उल्लेखनीय अथवा आशाजनक सुधार नहीं किया गया। नारी के इस पतन अथवा उपेक्षा का कारण चाहे देश का अज्ञान रहा हो चाहे विदेशी आक्रमण, इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता। वास्तविकता यह है कि नारी की उपेक्षा हुई है जिसके फल स्वरूप समाज का पतन हुआ है।

एक समय था जब भारत की नारियाँ विद्या-बुद्धि में पुरुषों के समकक्ष थीं। वे आध्यात्मिक चिन्तन शास्त्रार्थ एवं पुरुषों के साथ धर्मानुष्ठान में बराबर भाग लिया करती थीं जिसके फलस्वरूप उनके प्रभाव से उनकी गोद में पली हुई सन्तानें भी संसार में अपनी विद्या-बुद्धि तथा शूर-वीरता का प्रभाव दे सकीं। किन्तु एक ऐसा अन्धकार युग भी आया जब कि राष्ट्र की निर्मात्री नारी को उसके अधिकारों से वंचित कर विविध बन्धनों से जकड़ दिया गया। उनके पढ़ने, समाज में आने-जाने और स्वतन्त्र रूप से अपना विकास करने पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। उसे केवल चूल्हा चक्की तक घर में सीमित कर सन्तानोत्पत्ति की मशीन-भर माना जाने लगा। जिसके फलस्वरूप उनमें मूढ़ता तथा अन्धविश्वासों का बाहुल्य हो गया और अपने समान ही वे मूढ़ तथा अयोग्य संतानों को जन्म देने लगीं। आज समाज में विकृतियों की जो बहुतायत दिखाई दे रही है इस सबका हेतु बहुत अंशों में नारी की अयोग्यता ही है जो उस पर बहुत पहले थोप दी गई थी किन्तु दुर्भाग्य है कि नारी की अधोगति का परिणाम देखते हुए और जगत्गुरु की पदवी से अर्ध सभ्य कहे जाने पर भी भारतीय समाज नारी को उसकी गिरी दशा से उठाने के लिए पूर्ण रूप से उद्यत नहीं हो रहा है वह उसे ज्यों का त्यों अशिक्षित अनुभव शून्य तथा पुरुष की भोग सामग्री भर ही बना रहने देना चाहता है। उन्हें परदे के बाहर निकालने, मानसिक एवं आत्मिक विकास करने का अवसर देने में कृपणता एवं हठ का व्यवहार कर रहा है।

यद्यपि समाज में नारी शिक्षा को प्रोत्साहन दिया जा रहा है बुद्धिमान लोग उसका समर्थन भी करने लगे हैं तथापि बहुमत अभी ऐसे लोगों का ही है जो स्त्रियों का कार्य क्षेत्र घर की चहार दीवारी तक ही मानते हैं। उन्हें बौद्धिक, शारीरिक, तथा मानसिक दृष्टि से विकसित करना अनावश्यक ही नहीं हानिकर भी मानते हैं। ऐसे मूढ़मति लोगों की कमी समाज में अभी भी नहीं है जिनकी धारणा है कि पढ़-लिख कर पुरुषों के समकक्ष हो जाने पर और सामाजिक क्षेत्र में निकल कर कार्य निकल कर कार्य करने से नारियाँ बिगड़ सकती हैं। ऐसी भ्राँत धारणा वाले लोग ऐसी नारियों को ओछी दृष्टि से ही देखने का पाप करते हैं जो अपने अध्यवसाय, परिश्रम एवं लगन के बल पर पढ़-लिख कर स्वावलम्बिनी अथवा समाज-सेविका बन कर कुछ करने के लिए आगे बढ़ती हैं। निःसन्देह इस प्रकार का तुच्छ दृष्टिकोण रखना नारीत्व का तिरस्कार है जो किसी भी समाज, राष्ट्र तथा परिवार का हित चाहने वाले को शोभा नहीं देता। नारियों के प्रति इस प्रकार का संकीर्ण दृष्टिकोण, राष्ट्रीय, असामाजिक तथा अमानवीय है। इसकी जितनी भी भर्त्सना एवं विरोध किया जाये उतना ही उचित है। नारी पर लगे प्रतिबन्ध निश्चय ही अपनी सामाजिक एवं राष्ट्रीय प्रगति में बाधक हैं, इन्हें हटाना ही होगा। अन्यथा राष्ट्र जिस पतन के गर्त में गिरा हुआ है उसी में यों ही गिरा रहेगा और तब भारतीय संस्कृति के अनुरूप राष्ट्र का पूर्वकालीन गौरव प्राप्त कर सकना सम्भव न होगा।

आज भारतीय समाज में नारी की जो दशा चल रही है वह किसी से छिपी नहीं है। कन्याओं के मूल्य महत्व का आदर न करने के कारण छोटी आयु में उनका विवाह कर जीवन नष्ट कर दिया जाता है। नारी को इतना सस्ता बना लिया गया है कि एक पत्नी के रहते हुए भी पति दूसरी और तीसरी पत्नी तक कर लेते हैं और मूढ़ अभिभावक ऐसों को अपनी कन्यायें दे भी देते हैं। दहेज की दानवी प्रथा ने तो नारियों का जीवन और भी बरबाद कर रक्खा है। दहेज की रकम का प्रबन्ध कर सकने में असमर्थ न जाने कितने अभिभावकों को अपनी सुन्दर एवं सुकुमार कन्याएं वृद्ध-विधुरों के साथ बाँध देनी पड़ती हैं शिक्षा के अभाव में तो नारी इतनी दीन तथा परावलम्बिनी हो गई है कि वह निष्ठुर पति की पैर की जूती बन कर और नाना प्रकार के त्रास सहकर भी मुँह से आह तक करने का साहस नहीं कर सकती। अविद्या ने उन्हें न जाने कितने प्रकार के अन्धविश्वासों, मान्यताओं एवं भयों का आगार बना दिया है जिससे समाज की सैंकड़ों भद्र नारियाँ तक वंचकों एवं प्रपंचकों के जाल में फँस कर अपना धन ही नहीं शील तक गँवा बैठती हैं। अज्ञान एवं गुलामी के कारण भारतीय नारी इतनी निर्बल एवं साहस हीन हो गई है कि आपत्ति, संकट अथवा आक्रमण के समय अथवा कोई अवाँछनीय संयोग आ पड़ने पर आत्म-रक्षा में किंकर्तव्यविमूढ़ होकर लुट जाती है। परदा प्रथा ने उसे न केवल सामाजिक अनुभव से ही शून्य बना दिया है बल्कि उसका स्वास्थ्य भी समाप्त कर दिया है। आज घरों में बन्द अधिकाँश नारियाँ न जाने कितने प्रकार के प्रकट गुप्त रोगों की शिकार बनी यातनापूर्ण जीवन काट रही हैं। विधवाओं की दशा देख सुन कर तो किसी सहृदय की आँखें आँसुओं से आर्द्र हुए बिना नहीं रहतीं। जिस समाज में सधवाओं की ऐसी दशा हो उसमें विधवाओं की क्या दशा होगी इसका अनुमान कर लेना कठिन नहीं है। उन बेचारियों की दशा पशुओं से भी बुरी रहा करती है। उन्हें अभागिनी कुलक्षणी तथा कलमुँही कह कर दिन-रात लजाया, सताया ही नहीं जाता बल्कि उनके हँसने, बोलने, खाने पहनने तथा उठने-बैठने तक के अधिकार छीन लिए जाते हैं। जहाँ राष्ट्र की जननी, सन्तान की निर्मात्री तथा पुरुष की अर्धांगिनी नारी की यह दशा हो वह समाज और वह राष्ट्र यदि अपनी उन्नति में प्रगति अथवा सुख-शाँति की कामना करे तो यह उसकी अनाधिकार चेष्टा ही कही जायेगी।

यदि राष्ट्र को उठाना, समाज को उन्नत बनाना और भारत को उसके पूर्ण गौरव पर प्रतिष्ठित करना है, परिवार और कुटुम्ब में सुख-शाँति लानी तथा, स्वस्थ, सुन्दर सुशील सन्तान पानी है तो उसके लिए नारी शिक्षित करना और उसके मानसिक, बौद्धिक तथा शारीरिक विकास की समुचित अवस्था करनी होगी। उसे परदे से निकाल कर सामाजिक अधिकार देने और भोग-भावना से निकाल कर पुरुष की तरह अर्धांगिनी, राष्ट्र की जननी और समाज की सहयोगिनी के सर्वथा योग्य पद पर प्रतिष्ठित करना ही होगा। वेद भगवान् की आज्ञा है-

“मम पुत्राः शत्रुहरणोऽथो में दुहिता विराट्।

उदाहमस्मि सेजया पत्यौ में श्लोक उत्तमः॥”

मातायें आत्माभिमानिनी हों। उनके पुत्र वीर और कन्यायें तेजस्विनी हों।


Quotation

मनुष्य होकर जो दूसरों का उपकार करना नहीं जानता उसके जीवन को धिक्कार है। उससे धन्य तो पशु ही हैं जिनका चमड़ा तक (मरने पर) दूसरों के काम आता है। -अज्ञात


आर्थिक चिन्ताओं से छुटकारा पाने के कुछ उपाय

इस व्यस्त संसार में व्यग्रताओं का होना कोई आश्चर्यजनक बात नहीं है। व्यग्रतायें आती हैं, चिंताएं घेरती हैं-यह उतना हानिकारक नहीं है जितना कि उनको लेकर बैठ जाना और मस्तिष्क को मथने का अवसर देना।

विद्वानों का कहना है कि जिस प्रकार इंधन देने से आग बढ़ती है और इंधन देना बन्द कर देने से वह बुझ बुझ कर नष्ट हो जाती है, उसी प्रकार मनन करते रहने से चिन्तायें बढ़ती हैं और उन पर अधिक विचार न करने से नष्ट हो जाती हैं।

मानव-मस्तिष्क में प्रायः अनेक प्रकार की चिन्ताएँ अपना डेरा डाल लिया करती हैं जिनमें से निर्धनता की चिन्ता सबसे प्रमुख एवं असुखकर होती है।

निर्धनता के भय से चिन्तित व्यक्ति सदा अपनी आय की अल्पता का रोना रोया करता है। उसे हर समय यही चिन्ता सताया करती है कि उसकी आमदनी कम है। उसके बच्चे बढ़िया खाना और बढ़िया कपड़े नहीं पाते। उसकी पत्नी के पास कीमती साड़ियां नहीं हैं, उसके अंग आभूषणों से रिक्त हैं। उसका मकान छोटा है। उसके पास रेडियो, बिजली, पंखा अथवा सोफा सेट नहीं है। उसे साधारण चारपाइयों पर सामान्य बिस्तर के साथ सोना पड़ता है। उसके पास इतना पैसा नहीं हो पाता हो वह अपने मित्रों को अच्छी दावत देकर अपना सम्मान बढ़ा सके, उन्हें सिनेमा दिखाकर अपनी उदारता का परिचय दें सके। उसके पास इतना पैसा नहीं बचता, जिससे वह बेटी की शादी किसी बड़े घर में कर सके। उसकी आय कम है और वह एक निर्धन आदमी है।

इस प्रकार न जाने कितने लोग अपनी ही रीति से अपनी निर्धनता एवं अल्प आय की चिन्ता में व्यग्र से रहा करते हैं और उसकी आग में अपनी मानसिक शाँति के साथ स्वास्थ एवं शक्तियों को जलाया करते हैं। उन्हें न जाने यह समझ क्यों नहीं आती कि इस प्रकार अपनी निर्धनता की कल्पना करते रहने से क्या उनकी आय बढ़ जायेगी, निर्धनता दूर हो जायेगी?

उन्हें समझना चाहिए कि वे ज्यों-ज्यों अपनी निर्धनता की चिन्ता करते हैं त्यों-त्यों वह बढ़ती हुई उन्हें और अधिक व्यग्र बनाती जायेगी। वे अधिकाधिक निराश होते जा रहे हैं, जिससे कि उनका उज्ज्वल भविष्य अन्धकार में डूबता जा रहा है जब उनके मस्तिष्क में अपनी निर्धनता की चिन्ता शुरू हुई थी तब वे इतने हताश, निराश अथवा व्यग्र नहीं थे, जितने कि आज हो रहे हैं। उनकी चिन्ता ने आज जितना उग्र रूप धारण कर रखा है, प्रारम्भ में उसका रूप इतना भयानक नहीं था। चिन्ता की इस विकट वृद्धि का यही कारण रहा है कि उसको मनन का इंधन दें देकर स्वतः बढ़ाया गया है । यदि वे प्रारम्भ में ही इस निकम्पी चिन्ता को अपने मस्तिष्क में प्रवेश न करने देते अथवा आ जाने पर उसे इंधन न देते बल्कि उसे एक प्रेरणा समझकर आय बढ़ाने के उपायों में लग जाते तो निश्चय ही उनकी यह चिन्ता ग्रन्थि बनकर उनके स्वभाव का अंग न बन पाती ।

अब भी कुछ विशेष बिगाड़ नहीं है, यदि आपको इस प्रकार की चिन्ता सता रही है तो इसके पूर्व ही कि वह आपके स्वास्थ्य को सदा-सर्वदा के लिए चौपट कर दें और आपके रहे-सहे भविष्य को जलाकर फैंक दें, आप स्वयं ही उसे अपने मस्तिष्क से निकाल फेंकिये। चिन्ता का अचिन्तन चिन्ता दूर करने का सबसे सरल एवं सफल उपाय है।

यह बात सही है कि उत्तरदायी व्यक्ति के पास अनेक चिन्तायें आ सकती हैं किन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि आपके पास आई हुई चिन्ता इस बात की हकदार है कि आप उसे अपने चिन्तन, समय तथा शाँति का कुछ अंश अवश्य ही दें। मनुष्य के वास्तविक चिन्तायें बहुत कम आती हैं और यदि वे आती हैं तो हर उत्तरदायी व्यक्ति उनका मनन करने के बजाय चिन्ता का कारण दूर करने का प्रयत्न किया करता है। वह अपने मस्तिष्क को चिन्ता की शाखा-प्रशाखाएँ छोड़कर बेकार में न तो उलझाया करता है और न उसकी शक्ति क्षीण किया करता है। वह सीधे-सीधे उसका हल निकालने में अपनी सारी शक्तियों को नियोजित किया करता है और ठीक तरह से , ठीक दिशा में शाँत मस्तिष्क से सोचने पर उसका हल निकाल भी लेता है। बहुत करके तो निरर्थक एवं काल्पनिक चिन्तायें ही अधिकतर मनुष्य को घेर लिया करती हैं।

यदि आप अल्प आय के कारण निर्धनता के भय से व्यग्र हैं तो सबसे पहले इस बात की परीक्षा कीजिए कि कहीं आपकी यह चिन्ता आरोपित तो नहीं है। कहीं किसी पड़ौसी अथवा मित्र की स्थिति, उसका रहन-सहन एवं जीवन-स्तर देखकर स्पर्धावश यह चिन्ता आपके मस्तिष्क में तो नहीं आई है। हो सकता है कि दूसरे के बीवी बच्चों, मकान तथा साधन-सुविधाओं को देखकर आपके मस्तिष्क के किसी कोने में ईर्ष्या ने जन्म ले लिया हो और निर्धनता की यह चिन्ता उसी नागिन का विष हो। यदि ऐसा है तो निश्चय ही यह शर्म की बात है। यह सभ्यता एवं सज्जनता के विरुद्ध व्यवहार है । ऐसी स्थिति में आपकी निर्धनता की चिन्ता-चिन्ता का विषय नहीं है जितनी कि आपकी वह ईर्ष्या-भावना जो किसी का रहन-सहन देखकर उत्पन्न हुई है। जितनी जल्दी आप अपने मस्तिष्क से, यदि ऐसा है तो, इस ईर्ष्या को निकाल फेंकिये अन्यथा आप द्वेष, क्रोध, लोभ, मोह के ऐसे बवंडर में फँस जायेंगे कि सारा लोक-परलोक ही तबाह हो जायेगा।

यदि आप में ईर्ष्या रूपी विष का प्रभाव नहीं हुआ है तो निश्चय ही आप साधारण जीवन एवं सामान्य रहन सहन की सुन्दरता एवं सुख-शाँति को भूल गये हैं और विलासिता, प्रदर्शन तथा निरर्थक आवश्यकताओं की ओर झुक गये हैं जिससे आपको अपनी आय तो पहले कम नहीं मालूम होती थी, अब कम मालूम होने लगी है। यदि आपमें सादगी के प्रति अरुचि होने लगी है और आप विलासिता की ओर उन्मुख होने लगे हैं तो अपने सहज सन्तोष को अपने हाथों बरबाद करके ऐसी सम्भावनाओं का बीजारोपण कर रहे हैं जिसका फल आपको इतना निर्धन बना देगा, जितने निर्धन न आप पहले थे, न अब हैं और न आगे होने की शंका है। निश्चय जानिए कि आपको यह अंकुरित विलास-वृत्ति आपको व्यसनी तक बना सकती है। इसलिए बुद्धिमानी इसी में है और कल्याण भी कि आप अपने सहज सुखदाता सन्तोष की रक्षा करें और अपने साधारण जीवन-स्तर में सज्जनोचित दृष्टिकोण से सुन्दरता देखिये।

ईमानदारी से निरीक्षण कर लेने के बाद यदि आप अपने में इन दुर्बलताओं में से किसी को भी न पायें तो देखिये कि आप परिश्रम कम तो नहीं करते हैं, आप अपनी योग्यताओं अथवा क्षमताओं से अधिक तो नहीं चाहते? ईमानदारी से निर्णय कीजिए -यदि आपकी आप आपके परिश्रम तथा योग्यताओं के अनुरूप है तो आप अधिक की कामना करके अपने तथा समाज दोनों के साथ अन्याय करते हैं। चोरी न करने पर भी चोरी का इरादा रखना भी जिस प्रकार चोरी है उसी प्रकार योग्यता से अधिक चाहना भी एक नैतिक अपराध है। आपकी आय यदि आपके उद्योग एवं योग्यता के समानान्तर है तो यह चिन्ता का विषय नहीं है। आपको उस पर सन्तोष करना ही चाहिये। उसके लिये चिन्तित होना किसी भी दशा में ठीक नहीं।

अपने खर्च के एक-एक बिन्दु पर बारीकी से नजर डालो। जहाँ अपव्यय की तनिक भी गन्ध आती हो वहाँ तुरन्त कसौटी-किफायता आरंभ कर दीजिए। अनावश्यक खर्चों को घटा देना, आमदनी बढ़ाने का सबसे सरल तथा तात्कालिक उपाय है।

आय-अल्पता की चिन्ता का एक कारण, अपने दायरे से आगे निकलकर सोचना भी है। यह उचित है कि लोग अपनी संतान को बहुत ऊँची शिक्षा दिलाना चाहते हैं। वे चाहते हैं कि उनकी संतान अधिक से अधिक उन्नत एवं योग्य बने। समाज में प्रतिष्ठा एवं सम्मान प्राप्त करे। किन्तु अल्प आय के कारण वे ऐसा कर सकने में अपने को विवश पाने से चिन्तित होने लगते हैं। यदि आपने अपने दायरे से बाहर निकलकर बच्चों के लिये इस प्रकार की सद्भावनाओं को भावुकता से जोड़ दिया तो निश्चय ही ये सद्भावनाएँ आपका सर-दर्द बन जाएँगी। अपनी सीमाओं तक उन्हें ॐ चा उठाने और पढ़ाने-लिखाने में पूरे ईमानदार रहिये किन्तु भावुकता में आकर उसे चिन्ता का विषय न बनाइए । इससे बनना तो कुछ नहीं, सन्तोषपूर्ण जिन्दगी में काँटे ही उग आयेंगे।

सन्तान को ऊँची शिक्षा दिला सकना अथवा किसी बड़े पद पर पहुँचा सकना यदि आपके हाथ में नहीं है तो उन्हें अधिक से अधिक सच्चरित्र एवं सदाचारी बना सकना तो आपके हाथ में है ही। इस विकास के लिये तो किसी पूँजी की जरूरत होती नहीं। उन्हें उपदेश, व्यवहार तथा अपने जीवन-उदाहरण से अधिक से अधिक नैतिक एवं आचरणवान बनाने का प्रयत्न कीजिए। यदि आप बुद्धिमत्तापूर्वक उन्हें एक उन्नतमना मनुष्य बना सके तो निश्चय ही आपने उन्हें एक बड़ा आदमी तो बना ही दिया साथ ही उनके लिये जीवन का ऐसा उत्तम पथ प्रशस्त कर दिया जो उन्नति की ओर ही जाता है। अल्पशिक्षित तथा सामान्य स्थिति में रहने वाले व्यक्ति में यदि चारु-चरित्र की विशेषता विकसित हो गई तो वह अपनी स्थिति से ऊपर बढ़ेगा यह ध्रुव सत्य है। वह स्वयं बढ़ेगा और समाज न केवल उसे बढ़ने का अवसर ही देगा बल्कि सहायता भी करेगा नहीं तो सबसे ऊपर -चारुचरित्रता अपने में स्वयं एक बड़ी बात है जो साधारण स्थिति में भी सम्मान एवं प्रतिष्ठा का पात्र बना देती है।

पत्नी के लिये भूषण-वसन की चिन्ता करने के बजाय उसे प्रेम, आदर तथा एकात्मकता से प्रसन्न एवं परितुष्ट करिए। पति का सच्चा स्नेह पाई हुई पत्नियों को भूषण-वसन की विशेषता की ओर कोई जिज्ञासा नहीं होती और पति का पूर्ण प्रेम तथा अखण्ड विश्वास पाकर वे साधारण वेष-भूषा में भी दामिनी की तरह दमकती रहती हैं। निश्छल, प्रेमी-एवं सच्चरित्र पति पाकर पावन पत्नियाँ आत्म-सन्तुष्ट होकर पूर्णकाम हो जाती हैं। फिर वे संसार के अन्य वैभव-विभव के लिये लालायित नहीं होती।

अपने साधारण घर में मानसिक उच्चता एवं स्वच्छता से रहिए। घर का वातावरण प्रसन्न एवं पावन रखिए और देखिए आपको अपनी उस सामान्यता में ही सम्पन्नता के दर्शन होंगे। यह सब आपके अपने हाथ में है। इस सुख-शाँति के आप जन्मसिद्ध अधिकारी हैं। अपने अधिकार का उपयोग कीजिए, आपकी निर्धन भावना को दूर होते देर नहीं लगेगी और आपका सामान्य घर सम्पन्न स्वर्ग का एक कोना बन जायेगा।


श्री तारा कान्त राय की उदारता

श्री तारा कान्त राय की उदारता-

श्री ताराकाँत राय बंगाल के कृष्ण नगर राज्य के सचिव थे। वे जितने उदार विद्वान् थे, उतने ही नेक, ईमानदार, उदार और सदाचारी भी थे। गुणों से प्रभावित होकर ही कृष्ण नगर के नरेश ने उन्हें यह उत्तरदायित्वपूर्ण पद सौंपा था और उन्हें मित्र की तरह मानते व प्रतिष्ठा देते थे।

एक दिन राजा साहब बड़े सबेरे कोई समाचार देने स्वयं ही राय साहब के घर पहुँचे तो देखा कि उनका नौकर तो पलंग पर सोया है और स्वयं ताराकाँतजी जमीन में चटाई पर सो रहे हैं। नरेश ने उनको जगाया और नौकर को उसकी धृष्टता के लिये डाँटना चाहा, पर राय साहब ने मना करते हुए कहा-यह बेचारा काम करते-करते बहुत थक गया था इससे थोड़ी देर आराम करने की गरज से बैठते ही सो गया होगा। मैं रात्रि को देर से आया, सोते हुए आदमी को जगाना ठीक न समझा इसलिए एक रात्रि जमीन पर ही सो लिया तो इसमें क्या हो गया?

राजा साहब श्री राय की उदारता से बड़े प्रभावित हुए।


विवाहों में अनावश्यक अपव्यय क्यों करें

सामान्य स्थिति में किसी भी गृहस्थ के पास जाकर पूछिए-कि क्या वह बच्चों की ब्याह-शादी में होने वाले अपव्यय को पसन्द करता है? तो सौ में पिचानबे व्यक्तियों का यही उत्तर होगा कि इस अपव्ययता के कारण बच्चों के शादी-ब्याह जान के लिए जंजाल बने हुए हैं। बच्चे के ब्याह योग्य अवस्था में आने से पहले ही उनके ब्याह के लिए पैसा जुटाने की चिन्ता से दिन की भूख और रात की नींद चली जाती है-तब भी लोग न जाने क्यों ब्याह-शादियों को सादे सरल डंग से क्यों नहीं करते?

यद्यपि ब्याह-शादियों में इस प्रकार की अपव्ययता का कोई धार्मिक विधान नहीं है और न ऐसा कोई सामाजिक बन्धन ही है जिसका निर्वाह न करने से किसी को बहिष्कृत ही कर दिया जाये। बन्धन है तो लोगों की रूढ़िवादी मनोवृत्ति का। चूँकि ब्याह-शादियों में प्रदर्शन एवं धूमधाम की प्रथा एक लम्बे समय से चली आ रही है इसलिए वह एक रूढ़ि परम्परा बन कर बन्धन बन गई है और लोग अभ्यास-वश वैसा करते और करने के लिए मजबूर होते चले जा रहे हैं।

इच्छा न होते हुए भी लोग ब्याह-शादियों में पैसे की बरबादी करते रहते हैं। इसके पीछे अनेक कारण काम कर रहे होते हैं। पहला कारण तो संस्कारों की प्रेरणा है। शादी-ब्याह के अवसर आते हैं लोगों में अपव्ययता का एक जुनून-एक उन्माद-सा जाग उठता है, तब उन्हें याद ही नहीं रहता कि वे क्या कर रहे हैं। ब्याह-शादियों के अवसर को वे खर्च करने का त्यौहार मान लेते हैं। मन और मुट्ठी खोल कर खर्च करते हैं। पास नहीं होता तो वे कर्ज लेते हैं। घर-मकान बेचते व रहन करते हैं मनुष्य कुल परिवार एवं सामाजिक वातावरण से संस्कार ग्रहण किया करता है यह प्रक्रिया इतनी सहज स्वाभाविक है कि प्रयत्न किये अथवा सीखे जाने बिना ही वह उन संस्कारों में दीक्षित हो जाता है जो कि फिर उसके लिए बन्धन जैसे बन जाया करते हैं। प्रथा परम्पराओं की मान्यता भी ऐसे संस्कार ही होते हैं जिनसे प्रेरित लोग न चाहते हुए भी वैसा करने को विवश होते हैं।

किन्तु विवेकशीलता इसी में है कि मनुष्य कोई भी प्रथा परम्परा अपनाने से पूर्व उसके औचित्य एवं अनौचित्य पर विचार कर ले और जो कुछ उपयुक्त हो उसे ग्रहण कर बाकी को कूड़ा-कर्कट की तरह छोड़ दे। इतनी निर्बलता मनुष्य के लिए कदापि शोभनीय नहीं है कि उसका मन-मस्तिष्क महीन कपड़े की तरह परम्परागत रीति-रिवाजों में बिना सोचे-समझे रँग जाए। ब्याह-शादियों के अपव्ययता पूर्ण रीति-रिवाज परम्परागत रूढ़ियां हैं, इनमें न कोई औचित्य ही है और न उपयोगिता। उल्टी हानि ही हानि है स्वतन्त्र चिन्तन के बिना मनुष्य एक ऐसा यन्त्र बन जाता है जिसे कोई भी अच्छी बुरी बात, उल्टा सीधा वातावरण अपने अनुरूप सञ्चालित कर सकता है। यह जड़ता है जो विवेकवान् मनुष्य के लिए लज्जा की बात है।

ब्याह-शादियों में अपव्ययता का कारण लोक-लज्जा का भय भी बतलाया जाता है। अनेक समझदार लोग यह कहते सुने जाते हैं कि “शादियों में पैसे की बरबादी बुरी बात है, किन्तु क्या किया जाये-लोकापवाद के भय से इच्छा न रहते हुए भी वैसा करना होता है। यदि न करें तो लोग अँगुली उठाते हैं, आलोचना तथा मीन-मेख निकालते हैं। कंजूस, खसीस, असामाजिक, न्यारिया आदि न जाने क्या-क्या कहते हैं। इन्हीं कटुताओं से बचने के लिए भले आदमियों को ब्याह-शादियों के खर्चीले रीति-रिवाज पूरे करने होते हैं।

गलती को सुधारने और नेक बात अपनाने में लोक भय से विचलित हो जाना कायरता है। उचित अनुचित के संग्रह त्याग में लोग भय की बाधा उन्हीं को लगती है जो आँतरिक रूप से निर्बल होते हैं। लोक भय का बहाना लेने वाले अधिकतर ऐसे लोग ही होते हैं, जिनकी आदर्शों के प्रति पूर्ण निष्ठा नहीं होती। हवा की चाल पर उड़ने वाले तिनकों की तरह जिधर अधिक लोग चल रहे होते हैं चल पड़ते हैं। इस प्रकार की अस्तित्व हीनता मनुष्यता के लिए कलंक की बात है। सत्य एवं उपयुक्त को स्वीकार करना और असत्य एवं अनुपयुक्त को त्याग देना ही विवेक का लक्षण है। बहुत लोग जिस गलत बात को कर रहे हैं इसलिए हमको भी करना चाहिये- इस प्रकार की विचार धारा उन्हीं लोगों की होती है, जिनके पास अपनी बुद्धि का संबल नहीं होता। पूरी दुनिया के एक ओर हो जाने पर भी असत्य एवं अहितकर के आगे सिर न झुकाना ही मनुष्यता का गौरव है। लोग बुरा न कहें, अँगुली न उठायें इसलिए हमें गलत बात को भी कर डालना चाहिये, यह कोई तर्क नहीं है। विवेक का तकाजा यही है कि उचित को स्वीकार करने के सिवाय और सब कुछ अस्वीकार कर दें। दुनिया के लोगों की भेड़-चाल प्रसिद्ध है। वह स्वयं तो जिस खाई खन्दक की ओर चलती है सो तो चलती ही रहती है, साथ में यह भी चाहती है कि दूसरे विवेकशील लोग भी उसका अनुगमन करें, और यदि वे वैसा नहीं करते तो उनकी आलोचना करते हैं।

लोकापवाद से डरने वाले लोगों से पूछा जाये कि यदि एक बार बहुत से लोग उनसे यह कहें कि वे अपने घर में आग लगा लें- तो क्या वे अपवाद के भय से अपने घर में आग लगा लेंगे । निश्चय ही कोई ऐसा करने को तैयार न होगा। तब पता नहीं कि लोग ब्याह-शादियों के अपव्यय हो असह्य एवं अनुचित मानते हुए वैसा करने से विरत क्यों नहीं होते। कहा जा सकता है कि लोक द्वारा घर में आग लगा लेने की माँग करना अनुचित होगा। इसलिए उसका मान जाना आवश्यक नहीं। यदि घर में आग लगाना उचित नहीं तो फिर पैसे की निरर्थक बर्बादी ही कहाँ तक उचित है? घर की सारी धन-सम्पत्ति बेकार के हो-हल्ला में उड़ा देना घर में आग लगाने के समान ही है। तब लोकापवाद की इस अनुचित माँग को क्यों पूरा किया जाता है? क्यों नहीं उसे, घर फेंक देने की माँग के समान ही अनुचित कह कर अस्वीकार कर दिया जाता है।

वास्तविक बात यह है कि ब्याह-शादियों में अपव्यय की अस्वीकृति में लोक-भय उतना सक्रिय नहीं होता जितना कि मनुष्य की , बड़प्पन दिखलाने की लालसा! अनेक निर्बल-मना व्यक्ति प्रदर्शन द्वारा समाज में अपने को बड़ा सिद्ध करने का प्रयत्न किया करते हैं। यों तो प्रदर्शन करने का कोई अवसर मिलता नहीं। ब्याह-शादियों में वे अपनी इस हविश को अवश्य पूरा करने का प्रयत्न करते हैं किन्तु इस प्रकार के लोग होते बड़ी ही हल्की मनोभूमि के व्यक्ति! ऐसे लोग सामन्तशाही के युग में रह रहे होते हैं और यह नहीं समझ पाते कि अब वह समय नहीं रहा जब पैसे का अपव्यय करने वाला बड़ा आदमी समझा जाता था। अब लोगों की चेतना आगे बढ़ गई है और मान्यताएँ बदल गई हैं। आज बड़प्पन का मानदण्ड सरलता, सादगी और सत्कर्म बन गये हैं। निःसन्देह यही मानदण्ड बड़प्पन का सही और उपयुक्त मानदण्ड है। अपव्यय में बड़प्पन अथवा इज्जत की कल्पना करना मरु-मरीचिका में जल देखने के समान है। आज के कठिन आर्थिक समय में बेकार के स्वाँग-तमाशों में पैसा बरबाद करना बड़प्पन नहीं ओछेपन का लक्ष्य है। जिसके पास पाप तथा हराम की कमाई बेकार पड़ी होगी। ब्याह-शादियों के प्रदर्शन में अन्धाधुन्ध खर्च कर सकता है। मेहनत मजदूरी से खून पसीना एक कर के पैसा कमाने वाले यदि इसको इस प्रकार बर्बाद करते हैं तो उन्हें बड़ा आदमी तो क्या भूखा मनुष्य ही माना जायेगा। आज कठिनता के युग में जो निरर्थक कामों में पैसे की होली जलाते हैं, लोग उसकी आय में भ्रष्टाचार का माध्यम मान लेते हैं उसकी नेक कमाई में सन्देह करने लगते हैं। यह कोई बड़प्पन की बात नहीं। पैसे का पैसा बरबाद हो और समाज में भ्रष्टाचार का सन्देह किया जाये-ऐसे काम करना किसी भी दशा में बुद्धिमानी न कहा जायेगा। आज इज्जत पैसा बरबाद करने में नहीं। मितव्ययिता द्वारा खर्च कर के बचाने और उसे राष्ट्र, धर्म, समाज, सभ्यता , संस्कृति एवं अपने आप परिवार की उन्नति के साधनों में सदुपयोग करने में है। सम्मान, प्रतिष्ठा अथवा बड़प्पन का अधिकारी वही हो सकता है जो समाज की कुछ सेवा करता है, दीन दुखियों की सहायता कर परोपकार एवं परमार्थ का उत्पादन करता है। व्यर्थ विषयों में पैसा नष्ट करने वालों का प्रतिष्ठा पाने का स्वप्न कभी पूरा नहीं हो सकता। जो लोक भय के पीछे छिपे अपने इस अहंकार को नहीं देखते वे अपने विवेक और अपनी आत्मा को धोखा देते हैं।

अनेक लोग ब्याह-शादियों में होने वाले अन्धाधुन्ध अपव्यय को प्रसन्नता की अभिव्यक्ति बतलाते हैं। उनका कहना होता है कि बच्चों के प्रति प्रेम के कारण, जब उनका विवाह होता है अभिभावकों को अतिशय प्रसन्नता होती है । यही कारण है कि वे उस अवसर पर खूब धूमधाम किया करते हैं। इस प्रकार का तर्क भी अपव्ययता के समर्थन में कोई सारपूर्ण तथ्य को प्रकट नहीं करता । बच्चों के शादी-ब्याह में प्रसन्नता होना स्वाभाविक ही है। किन्तु उस प्रसन्नता को उचित नहीं कहा जा सकता जिसके प्रवाह में मनुष्य अपना विवेक बहा दे और निरर्थक के कार्य करने लगे। यदि पैसा खर्च करने से ही हर्ष की अभिव्यक्ति होती है तो उसके लिए अनेक ऐसे तरीके मौजूद हैं, जिन्हें अपनाने से हर्ष भी प्रकट हो जाये, पैसे का सदुपयोग भी हो, प्रतिष्ठा प्राप्त हो। ढोल-ताशे, गाजे-बाजे, धूम-धड़ाका, नाच-माना, स्वाँग-तमाशे बिजली-बत्ती, आतिशबाजी, नेगन्यौछावर, दावत-ज्यौनार के बड़े-बड़े प्रबन्ध एवं आयोजन करने में पैसा खर्च करने के बजाय अन्धे, लूले, लँगड़े अपाहिज तथा असमर्थ व्यक्तियों का दुःख दूर करने, राष्ट्र समाज, धर्म की उन्नति में सहयोग देने, अविद्या, गरीबी ओर बेकारी की समस्या का हल निकालने में उस पैसे का सदुपयोग किया जा सकता है। खुशी प्रकट करने का यह तरीका न केवल सभ्यतापूर्ण ही बल्कि परमार्थ एवं पुण्य रूप होगा जिससे आत्म-कल्याण के साथ वर-वधू के मंगल भविष्य की सम्भावना बढ़ेगी। बच्चों के शादी-ब्याह में होने वाले हर्ष की अभिव्यक्ति करने के यह सुशील तरीके छोड़ कर नट, भाँडों अथवा स्वाँगियों, बहरूपियों को लुटाना अथवा आतिशबाजी, बिजली और अन्य प्रकार के हुड़दंगों में गँवाना आज की बहुत बड़ी अबुद्धिमत्ता मानी जायेगी।

बहुत बार आदर्श विचार वालों को घर के बड़े-बूढ़ों की जिद के सम्मुख झुकना पड़ता है। बाबा-दादी, नाना-नानी आदि गुरुजन अनुरोध करते हैं कि उनके नाती, पौत्र की शादी खूब धूम-धाम से की जाये। अपने अन्तिम दिनों में वे उस सुख, समारोह को आँख भर कर देख लें। यदि उन्हें पैसे की बचत के लाभ समझाये जाते हैं तो उनका उत्तर यही रहता है कि पैसा बच्चों से ज्यादा प्यारा नहीं है। वह तो फिर भी मिल जायेगा लेकिन ऐसी खुशी के अवसर बार-बार नहीं आते। यदि बड़े-बूढ़ों की बात नहीं मानी जाती है तो वे नाराज होकर दुःख मानते हैं। उनकी अनुरोध रक्षा में सिद्धान्तवादियों को भी कभी-कभी झुक जाना पड़ता है। यदि ऐसा न किया जाये तो अवज्ञा होने अथवा माँ-बाप को बच्चों पर इजारा दिखाने का उपालम्भ देते हैं।

ऐसे समय पर अभिभावकों को किसी प्रकार समझा बुझा कर ठीक मार्ग पर ले जाना चाहिये। और यदि तरह-तरह से समझने पर भी वे अपनी जिद नहीं छोड़ते तो वृद्ध-हठ, बाल-हठ के सिद्धाँत के अनुसार अपने आदर्श की रक्षा करनी चाहिए। गुरुजनों की जहाँ हर उचित आज्ञा शिरोधार्य है वहाँ अनुचित अनुरोध अपेक्षणीय भी है । कोई जरूरी नहीं कि वृद्धों के बाल हठ की रक्षा करने के लिए आर्थिक संकट लाकर परिवार का भविष्य धुँधला किया जाये। उनकी नाराजगी को भावुक दृष्टि से न देख कर उचित अनुचित की दृष्टि से देखना चाहिये और कर्तव्य की कठोरता के नाते सहन कर लेनी चाहिये। आगे विवाह का वातावरण सिमट जाने पर सभी यथा-स्थिति में आकर प्रसन्न रहने लगेंगे।

इस प्रकार विवाहों के अपव्यय के कारणों में लोकापवाद, बड़प्पन, प्रसन्नता अथवा बड़े-बूढ़ों की नाराजगी अथवा हठ आदि को जोड़ लेना उचित नहीं। यह सब कारण तथ्यहीन हैं। इनके पीछे कोई भी औचित्य नहीं है। इसका विशेष कारण है अभिभावकों का स्वयं कमजोर तथा रूढ़ि प्रेरित होना। देश, समाज, बच्चों तथा अपना हित देखते हुए विवाहों में व्यर्थ अथवा अपव्यय की विकृति का त्याग कर देना ही उचित एवं बुद्धिमत्तापूर्ण है।


Quotation

यदि धन अपने पास इकट्ठा हो जाय तो वह पाले हुए शत्रु के समान है। उसका छोड़ना भी कठिन हो जाता है।

कोई व्यक्ति दो आदमियों की एक साथ सेवा नहीं कर सकता । चाहे ईश्वर की उपासना कर लो, चाहे कुबेर की। -बाइबिल


चित्रों का महत्व समझिये और उनके चुनाव में सावधानी बरतिये।

चित्र गृह-सज्जा के सुन्दर उपकरण हैं। चित्र के प्रति प्रत्येक व्यक्ति में न्यूनाधिक रुचि रहा करती है। शिक्षित व्यक्ति जहाँ चित्र की कला का भी आनन्द लेते हैं वहाँ अशिक्षित एवं अनपढ़ लोग उनके रंगों तथा आकृतियों के प्रति ही आकर्षित हो लेते हैं। इस प्रकार क्या शिक्षित और क्या अशिक्षित दोनों श्रेणियों के व्यक्ति चित्रों के प्रति कोई न कोई रुचि रखते अवश्य हैं और अपने घरों में प्रसन्नतापूर्वक लगाते और टाँगते हैं। चित्र सबको अच्छे लगते हैं किन्तु ऐसे कितने लोग होते हैं जो अच्छे लगने के सिवाय अथवा गृह-शोभा के अतिरिक्त उनका कोई विशेष उपयोग भी जानते हों। चित्र न केवल अच्छे ही लगते हैं बल्कि वे अपने अनुरूप मनुष्य के मन तथा आचरण पर प्रभाव भी डालते हैं। जिस स्थान पर चित्र लगे होते हैं, उस स्थान पर वे अपना एक वातावरण भी बना लेते हैं। जिस कमरे में धार्मिक चित्र लगे होंगे उसमें धार्मिक भावना की एक अविज्ञात अनुभूति अनुभव होगी। जिस कमरे में शृंगारिक चित्र टँगे होंगे निश्चय ही उस कमरे के वायुमण्डल में वासना का भाव तिरता रहेगा। चित्र अपना विशेष प्रभाव डालते हैं इसलिए उनके चुनाव में विशेष सावधानी बरतने की आवश्यकता है।

यह एक स्वाभाविक सत्य है कि मनुष्य जो वस्तु अपनी आँखों से देखता है उसका थोड़ा-बहुत प्रभाव वस्तु के अनुसार अच्छा या बुरा उसके व्यक्त मन पर अवश्य पड़ता है। यदि उसी एक चीज को प्रतिदिन बार-बार देखा जाये अथवा इस पर नजर पड़ती रहे तो उसका सूक्ष्म प्रभाव अनजान में ही गुप्त मन में धीरे-धीरे संचित होता रहता है और इस प्रकार मन्थर गति से स्वभाव संस्कार के रूप में मनुष्य के आचरण में उतरता रहता है कि पता नहीं चलता और मनुष्य का आचरण उसके अनुरूप ढल जाया करता है। यह प्रक्रिया इतनी चोरी-चोरी और मन्द गति से होती है कि मनुष्य सजग या सावधान नहीं हो पाता। इससे यह आसानी से समझा जा सकता है कि दृष्टि संपर्क किसी में किस सीमा और किस गहराई तक लाभात्मक प्रभाव डाल सकता है।

कमरे में लगे चित्रों पर दिन में अनेक बार दृष्टि पड़ना स्वाभाविक बात है, तो यह भी स्वाभाविक है कि उनकी भूमिका में निवास करने वाली भावनाओं, प्रेरणाओं, सन्देशों तथा विचारों का प्रभाव अंतर्मन पर पड़ेगा ही। यदि वे चित्र महात्माओं, महापुरुषों, देवी-देवताओं अथवा अवतारों के हैं तो बार-बार दृष्टि-संपर्क होने से हमारा गुप्त मन कुछ न कुछ धार्मिक अथवा आध्यात्मिक प्रभाव ग्रहण करता रहेगा जिसका लाभ होना ही है, फिर चाहे वह थोड़ा हो या अधिक। यदि कमरे में लगे चित्र नायिकाओं, नर्तकियों अथवा शृंगार मैथुनों के होंगे तो कहना न होगा कि उनका अवाँछित प्रभाव पड़ेगा जिसके अनुसार भावनात्मक, वैचारिक अथवा चारित्रिक हानि होगी ही।

चित्रों के प्रसंग तथा मुद्राओं एवं भाव-भंगिमाओं का भी कम प्रभाव नहीं पड़ता। उदाहरण के लिए भगवान श्री कृष्ण का चित्र ले लीजिए। यदि उनका चित्र सामान्य त्रिभंगी मुद्रा में वंशी बजाता हुआ है तो वह हृदय में भक्ति -भावना का जागरण करेगा और यदि उनका चित्र अपने सुदर्शन चक्र को लिए रण मुद्रा में है तो हृदय में एक अलौकिक वीर रस का स्फुरण होगा। चित्र की भाव-मुद्रा प्रसन्न, सौम्य तथा शालीन है-हृदय देखकर प्रसन्न हो उठेगा। यदि उसका प्रसंग कारुणिक तथा वेदनापूर्ण है तो निश्चय ही देखने वाला यदि एक बार प्रसन्न भी होगा तो उस चित्र को देखकर उदास तथा विषण्ण हो जायेगा। जहाँ प्रफुल्ल-प्रकृति के अंकित दृश्य प्रफुल्लता उत्पन्न करते हैं वहाँ उजाड़ वीरान तथा उदास संध्या के दृश्य हृदय में एक निराश निर्वेद की प्रतिक्रिया उत्पन्न करेंगे। इस प्रकार चित्र न केवल गृह-सज्जा के उपकरण ही हैं, बल्कि मानव-जीवन में उनका एक विशेष उपयोग है।

चित्र जहाँ मनुष्य के मन पर प्रभाव डालते हैं, वहाँ प्रायः उसकी अभिरुचि तथा वृत्तियों को भी अभिव्यक्ति करते हैं। विभिन्न प्रकार के चित्रों में से जो व्यक्ति आदर्श महापुरुषों देवी-देवताओं तथा महात्माओं के चित्र चुनता है-समझ लेना चाहिए कि इसकी वृत्तियाँ अपेक्षाकृत आदर्शोन्मुखी हैं और इनके विपरीत शृंगारिक प्रसंगों, प्रेम-प्रदर्शनों अथवा उद्दीपक भाव-भंगिमाओं के चित्रों में आकर्षण पाता है। यदि वह व्यक्ति कोई निर्विकार कला पारखी नहीं है तो माना जा सकता है कि इसकी वृत्तियाँ शृंगारिक तथा वासनामय हैं। इस प्रकार यदि कोई अपनी अंतःवृत्तियों को जिनको वह ठीक से समझ नहीं पा रहा है चित्रों के माध्यम से समझ सकता है और उसके अनुसार सावधानीपूर्वक उनमें, यदि कोई आवश्यकता है तो, सुधार-संशोधन कर सकता है। चित्रों का यह उपयोग मनुष्य के लिए कुछ कम महत्व की बात नहीं।

मनुष्य पर चित्रों मूर्तियों अथवा आकृतियों का कितना तीव्र तथा व्यापक प्रभाव पड़ता है उसको जानने-मानने के लिए निम्नलिखित दो उदाहरण पर्याप्त हैं, जिन्हें स्वयं भुक्त भोगी स्तरीय व्यक्तियों ने लिखा है । इनमें से एक श्री रोनाल्ड निक्सन हैं दूसरे श्री डेलकार्नेगी।

प्रथम जर्मन युद्ध में श्री रोनाल्ड निक्सन ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। वे उस युद्ध में हवाई बेड़े में एक ऊँचे अफसर थे। युद्ध का उन्माद उतर जाने पर उनके हृदय में भयंकर विभीषिका अपनी आँखों देखी थी। हत्या, मारकाट, मृत्यु का ताँडव रक्तपात, हाहाकार और चीत्कार ने उनकी शाँति हरण कर ली। उन्होंने लिखा कि मानव विकास के उस वीभत्स दृश्य ने उनके हृदय में भयंकर उथल-पुथल मचा दी। बहुत प्रयत्न करने पर भी उनकी मनःस्थिति शाँत नहीं हो रही थी। मानसिक व्यग्रता ने उन्हें विक्षिप्त सा बना दिया था।

इसी मानसिक उद्विग्नता की स्थिति में वे एक दिन कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय जा पहुँचे। वहाँ उनकी दृष्टि भगवान् बुद्ध की शाँत, सौम्य, सुस्मित तथा प्रेरणादायक प्रतिमा पर पड़ गई। वे रुक गये और ध्यानपूर्वक उस मनोज्ञ मूर्ति को देखने लगे। देखते-देखते उन्हें ऐसा लगा मानो उस शाँतिदायक मूर्ति से निकल-निकल कर शाँत शीतलता की फुहारें संतृप्त हृदय को विश्राम दे रही हैं और आकृति से सन्देश आ रहा है-हे पुत्रों तुम्हारा जीवन शाँति और तृप्ति के लिए है, आनन्दित और प्रफुल्ल रहने के लिये है-अशाँत और उद्विग्न रहने के लिये नहीं। चिंता को त्यागकर सदा प्रसन्न रहो।

भगवान् बुद्ध की मूर्ति को देखते-देखते उनके हृदय की सारी अशाँति दूर हो गई। उनका हृदय निर्मल जल की तरह शीतल हो गया। निराशा और निरुत्साह के विषैले भावों का तिरोधान हो गया और तब से वे सदा प्रसन्न रहने लगे।

अमेरिका के प्रसिद्ध लेखक श्री डेल कार्नेगी ने अपना अनुभव लिखा है कि जब-जब साँसारिक चिन्तायें तथा कठिनाइयाँ मुझे घेर लेती हैं और मैं परेशान हो उठता हूँ, तब-तब वाशिंगटन के राजप्रसाद में अवस्थित प्रेसीडेन्ट लिंकन के शाँत चित्त पर अपना ध्यान केन्द्रित कर देता हूँ। लिंकन के उस चित्र का दर्शन करते -करते मुझमें नया उत्साह, नई प्रेरणाएं, आशा और साहस जाग उठता है और मैं फिर सन्तुलित होकर अपने कर्त्तव्य पथ पर अग्रसर हो उठता हूँ।

यह है चित्रों का प्रभाव तथा उपयोग। घर की सज्जा मात्र के लिए ही चित्र लगाने में उनका प्रयोजन पूरा नहीं हो जाता। उनका प्रयोजन तभी पूरा होगा जब उन चित्रों को ध्यान से देखा जाये और उनसे उपयोगी प्रेरणायें तथा स्फूर्ति प्राप्त की जाए। कहना न होगा कि जिनके घरों में निकृष्ट एवं निम्न कोटि के चित्र लगे होंगे, वे उनसे जीवनोत्थान की प्रेरणायें किस प्रकार प्राप्त कर सकेंगे? यदि वे कोई प्रेरणा अथवा स्फूर्ति उनसे प्राप्त करेंगे तो वह चित्र के अनुसार ही निम्न एवं निम्न कोटि का होगा।

बच्चों पर चित्रों का बड़ा गहरा तथा दूरगामी प्रभाव पड़ता है। उनका सुकुमार, जिज्ञासु तथा असावधान मस्तिष्क चित्रों के अनुरूप प्रेरणायें गुप्त मन में संचित करता रहता है जो आगे चलकर संस्कार रूप में प्रकट होते हैं। बच्चे बहुधा उत्सुक तथा जिज्ञासु भी होते हैं वे जब-तब चित्रों के विषय में जानने के लिए प्रश्न भी कर उठते हैं। अब यदि कमरे के चित्र आदर्श श्रेणी के हैं तो निस्संकोच भाव से उन्हें उनके विषय में बताया जा सकता है और यदि चित्र निम्न कोटि के अथवा अभद्र या अश्लील हैं तो उनके विषय में बच्चों को कुछ भी नहीं बताया जा सकता है। इसके लिये उन्हें टालना अथवा निरुत्साह करना होगा। यह व्यवहार बच्चों के विकासशील मस्तिष्क पर हानिकारक प्रभाव ही डालेगा। साथ ही उनका जिज्ञासु मन कोई रहस्य समझकर चित्रों के विषय में जानने के लिए और अधिक जिज्ञासु हो उठेगा और सम्भव है तब ये उसके विषय में किसी दूसरे से जानकारी पाने का प्रयत्न करें। और नहीं तो इतना तो होगा ही कि उन निषेध प्रतिमाओं की ओर उनकी जिज्ञासा अधिक बलवती हो जायेगी और वे उसे अधिक बार, अधिक ध्यान से देखेंगे। फलस्वरूप उनका अवाँछनीय प्रभाव उनके अवचेतन में अधिक मात्रा तथा गहराई से संचित होता रहेगा।

चित्र बच्चों तथा नाजानकारों के लिये शिक्षा के बड़े अच्छे माध्यम हैं। कमरे में बैठे-बैठे बच्चे को आदर्श पुरुषों, महात्माओं, योद्धाओं, बलिदानियों तथा देश, धर्म तथा समाज-सेवियों, त्यागियों तथा कर्त्तव्य-निष्ठों के चरित्र, कथन तथा विचारों से अवगत कराया जा सकता है। इस प्रकार रुचि तथा मनोरंजन के साथ बताई हुई बातें बच्चे अपेक्षाकृत जल्दी तथा स्थायी रूप से ग्रहण कर लिया करते हैं। यही कारण है कि पाठशालाओं तथा विद्यालयों में बच्चों को पाठ पढ़ाने के साथ-साथ नक्शों, खाकों, प्रतिमाओं तथा चित्रों को दिखाने और समझने की प्रणाली प्रयुक्त की जाती है। पाठ्य-पुस्तकों में पाठ के नायक, घटनाओं तथा दृश्यों के चित्र देने के पीछे यही मन्तव्य रहा करता है। उनका मात्र प्रयोजन पुस्तकों को सजावट ही नहीं होता। चित्रों का दर्शन शब्दों की तरह ही चरित्र पर प्रभाव डालता हैं।

बुद्धिमान गृहस्थ बच्चों को सत्सन्तान बनाने के मन्तव्य से घरों का वातावरण अनुकूल तथा प्रेरणाप्रद बनाते रहने के लिए जहाँ अन्य आवश्यक निधियों का अवलम्बन लेते हैं वहाँ चित्रों, मूर्तियों तथा दृश्यों के चुनाव में सावधानी से काम नहीं लेते। जहाँ भारतीय संस्कृति, धर्म तथा इतिहास में ऐसे अनेकों नायक तथा देवी-देवता हैं कि जिनके चित्र सजाने से घर का वातावरण शुद्ध, स्वच्छ, सभ्य, प्रेरणादायक तथा देवोपम हो सकता है वहाँ वे घरों में नारियों के अर्धनग्न, अश्लील, अभद्र अथवा निरुपयोगी चित्रों को लगाकर घर का वातावरण अवाँछनीय बना देते हैं और यह विचार नहीं करते कि इनका प्रभाव बच्चों, स्त्रियों तथा स्वयं उन पर क्या पड़ेगा? आजकल जिधर देखो हाट, घर, दुकानों तथा दीवारों पर इसी प्रकार के अवाँछनीय चित्र टँगे तथा बने दिखाई देते हैं। समाज में फैली आज की इस अश्लीलता, अभद्रता, अमर्यादा, अनुशासनहीनता, तथा फैशनपरस्ती की विकृतियों के पीछे बहुत कुछ चित्रों के चुनाव में लोगों की असावधानी तथा कुरुचि काम कर रही है। अपने, अपने बच्चों, समाज तथा राष्ट्र के वैचारिक, भावनात्मक तथा चारित्रिक कल्याण के लिए जरूरी है कि आदर्श, नैतिक तथा प्रेरणाप्रद चित्रों का चुनाव तथा प्रदर्शन ही किया जाये, अवाँछनीय अथवा अयोग्य चित्रों का नहीं।


जीवन से प्रियतरराष्ट्र

जीवन से प्रियतर राष्ट्र

जीवन से बढ़कर सौंदर्य नहीं पर, वह किसी को स्थायी सम्पत्ति के रूप में नहीं मिला। वह तो इस प्रयोग के लिये है कि उससे कौन कितना आनन्द पाता है। मैंने अनेक मनुष्यों के जीवन-संस्मरण सुने हैं पर मुझे सबसे प्यारे वे लगे, जिन्होंने अपने आप को देश के हित के लिए पतिंगों की तरह जला दिया। राष्ट्र-प्रेम भी कितनी ऊँची वस्तु है, कितना बड़ा त्याग होता है वह जब मनुष्य केवल जातीय आदर्शों की रक्षा के लिये जीवन जैसी सुन्दर वस्तु को यों लुटा देता है मानो राष्ट्र-प्रेम के समक्ष वह कोई नगण्य वस्तु रही हो। जो इस सम्पत्ति का उपयोग राष्ट्र-हित में कर सकें वे धन्य हैं, उन्हें मेरे शत शत प्रणाम। -लुक्रीक्स


गायत्री महामन्त्र के शक्तिशाली 24 अक्षर

गायत्री महामन्त्र के 24 अक्षर केवल इसीलिए नहीं हैं कि कविता की दृष्टि से आठ-आठ अक्षरों के तीन चरण वाला छन्द गायत्री माना जाता है और यह महामन्त्र गायत्री छन्द भी कहा गया है। इसलिए उसमें 24 अक्षर होने ही चाहिएं। कविता के लिए आवश्यक अक्षरों की पूर्ति के लिए 24 अक्षर नियोजित नहीं किये गये हैं वरन् सच यह है कि प्रस्तुत गायत्री मन्त्र के 24 अक्षरों के बारे में भी विवाद चला आता है। ‘णयं’ शब्द पर गाड़ी अटक जाती है, किसी ऋषि ने उसे एक और किसी ने दो अक्षर गिना है। जो एक गिनते हैं उनके हिसाब से इस मन्त्र में 23 ही अक्षर ठहरते हैं। इस कमी के लिए णयं के उच्चारण-क्रम को थोड़ी लम्बी ध्वनि में बोलकर 24 अक्षरों की पूर्ति की जाती है। चारों वेदों में अनेक गायत्री मन्त्र हैं उनमें ऐसा विवाद नहीं है। उनके अक्षर सीधे-सादे और पूरे हैं। हमारे उपास्य महामन्त्र में जिस प्रकार का विवाद है, उस तरह का देखने में नहीं आता। इसलिए कविता की दृष्टि से 24 अक्षरों का होना जैसी सामान्य बात यहाँ नहीं है। कविता की दृष्टि से विवादास्पद कारण के रहते हुए भी, अक्षर वे ही रखे गये हैं, जो साधना के वैज्ञानिक प्रयोजन की पूर्ति करते हैं। कविता थोड़ी दोषयुक्त भी हो तो हर्ज नहीं, उनमें शब्द-ब्रह्म का उसी तरह, उसी क्रम में प्रयोग हुआ है जिससे कि आत्म-बल एवं ब्रह्म-वर्चस्व के उद्भव का वास्तविक प्रयोजन ठीक तरह पूरा हो सके।

पिण्ड और ब्रह्माँड में कुल मिलकर 24 प्रमुख शक्तियाँ हैं। ब्रह्माँड में व्यापक शक्तियाँ पिण्ड-मानव-शरीर-के साथ जुड़ी हैं। चेतना के जो प्रमुख संस्थान इस शरीर में हैं, वे इसलिये नहीं हैं कि शरीर का दैनिक कार्य ठीक तरह चलाते रहें, वरन् इसलिए भी हैं कि निखिल ब्रह्माँड में संव्याप्त महान् शक्ति-स्रोतों के साथ अपना सूक्ष्म सम्बन्ध जोड़े रह सकें। इन्द्रियों के द्वारा यों मोटे तौर से वे विभिन्न वासनाओं की पूर्ति का सुख जुटाते प्रतीत होते हैं, पर उनकी वास्तविक महत्ता पराप्रकृति के विभिन्न विभागों के साथ-साथ जुड़े रहने और दिव्य आदान-प्रदान द्वारा दुर्बल मानव प्राणी को देवताओं की श्रेणी में लाकर बैठा देने में है।

कामेन्द्रियाँ यों एक क्षणिक वासना-सुख की पूर्ति का माध्यम प्रतीत होती हैं पर वास्तविकता यह कि ब्रह्मांडव्यापी प्रजनन क्षमता-ब्रह्मणि-के साथ वह अविच्छिन्न रूप से जुड़ी हुई है। आकाश में भ्रमण करती हुई आत्मायें अपने प्रारब्ध कर्म भोगने को जहाँ जिस व्यक्ति शरीर में, जिस घर में जन्म लेने वाली हैं, उनकी आवश्यकता पूर्ण करने में कामेन्द्रिय एक निमित्त मात्र बनती है। अन्तरिक्ष में विचरण करने वाले जीव जहाँ जन्म लेने वाले हैं वहाँ निर्धारित व्यक्ति के शरीर में शुक्र बनकर प्रवेश करते हैं और कामेन्द्रिय उनकी भ्रूण-स्थापना की विधि-व्यवस्था बनाती है। कितना अद्भुत सृष्टिक्रम कामेन्द्रिय के द्वारा पूरा होता है। इस मर्म को तात्विक दृष्टि रखने वाले ही समझ सकते हैं। स्थूल दृष्टि वाला तो उस दिव्य अंग को केवल एक घृणित घर्षण क्रिया से उत्पन्न क्षणिक गुदगुदी का निमित्त मात्र ही समझता है।

यह बात अन्य इन्द्रियों के सम्बन्धों में भी है। यों जिह्वा, कान, नाक, आँख आदि से मोटे तौर पर हमें विभिन्न विषय-सुख मिलते हैं, पर उनका वास्तविक प्रयोजन ब्रह्माँडव्यापी, शब्द, रूप, रस, गन्ध, स्पर्श के पंचतत्वों में उत्पन्न तन्मात्राओं से सम्बन्ध मिलाना है। हर तत्व की एक तन्मात्रा है। शरीर भी पंच-तत्वों का बना है। पर पिण्ड और ब्रह्माण्ड में जो कुछ सूक्ष्म-सचेतन-शक्तिप्रवाह है उसका आदान-प्रदान इन तन्मात्राओं के माध्यम से ही होता है। आकाश तत्व की तन्मात्रा शब्द है, अग्नि तत्व की तन्मात्रा रूप, जल की रस, पृथ्वी की गन्ध और वायु की स्पर्श है। इनकी स्थूल एवं सूक्ष्म अनुभूतियाँ कान, नाक, आँख, जिह्वा एवं त्वचा के माध्यम से होती हैं। इन इन्द्रियों से जो चेतना संवेदना है वही मनुष्य का संबंध ब्रह्माँडव्यापी तात्विक चेतना के साथ जोड़ती है।

उपरोक्त पंक्तियों में इन्द्रिय संवेदन एवं ब्रह्माँडव्यापी तन्मात्राओं का संदर्भ प्रस्तुत किया गया है, केवल इन्द्रियाँ ही नहीं, अनेक शक्ति संस्थान ऐसे हैं जो पिण्ड एवं ब्रह्माँड की चेतनाओं -शक्तियों-क्षमताओं एवं संवेदनाओं को आपस में जोड़ते और प्रत्यावर्तन करते हैं। ऐसे स्रोत 24 हैं। इनमें से एक-एक स्रोत का प्रतिनिधित्व गायत्री का एक-एक अक्षर करता है। इन 24 अक्षरों को 24 विश्वव्यापी स्रोतों की कुञ्जियाँ कहा जाय तो कुछ अत्युक्ति न होगी।

‘योगी याज्ञवल्क्य’ ने इस तभ्य का स्पष्टीकरण इस प्रकार किया है-

कर्मेन्द्रियाणि पंचैव पच्चः बुद्धीन्द्रियाणि च।

पंच पंचेन्द्रियाणार्थश्च भूतानाँ चैव पंचकम्॥

मनाबुिद्ध स्तथात्माच अव्यक्तं च यदुत्तमम्॥ चतुर्विंशत्यथैतानिः गायत्र्या अक्षराणि तु॥

-योगी याज्ञवल्क्य

पाँच कर्मेन्द्रिय, पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच तत्व, पाँच तन्मात्राएँ, मन, बुद्धि, आत्मा तथा परमात्मा इस प्रकार 24 शक्तियाँ गायत्री के 24 अक्षरों में समाई हुई हैं।

भौतिक विज्ञान के वर्तमान वैज्ञानिकों ने इनकी शोध अपने ढंग से की है। वे इस शक्ति को एनर्जी आफ फोर्स के नाम से पुकारते हैं। हीट पावर (ताप) इलेक्ट्रिकल एनर्जी (ताकत) एनर्जी आफ ऐलैस्टिसिटी (स्थिति) एनर्जी आफ ग्रेवीटेशन (मध्याकर्षण) कास्मिक इलेक्ट्रिसिटी (विश्व विद्युत) इन्टैलिजेन्स (ज्ञान) सुपर फोर्स (उच्च शक्ति) आदि अनेक भेदों में इस शक्ति की विभक्त किया गया है और उसके गुण कर्मों को जान कर आविष्कारों का तारतम्य मिलाया है।

यह भौतिक शक्ति गायत्री के 24 अक्षरों के अनुसार 24 प्रकार की है। हमारे प्राचीन वैज्ञानिकों-ऋषियों की भाषा में इन्हें 24 मातृकाएँ कहा गया है। इनके नाम इस प्रकार है (1) चन्द्रकेश्वरी (2) अजित वला (3) दुरितारि (4) कालिका (5) महाकाली (6) श्यामा (7) शात्ता (8) ज्वाला (9) तारिका (10) अशोका (11) श्रीवत्सा (12) चण्डी (13) विजया (14) अंकुश (15) पन्नगा (16) निर्वाण (17) वला (18) धारिणी (19) वरण प्रिया (20) नरदत्ता (21) गान्धारी (22) अम्बिका (23) पद्मावती (24) सिद्धायिका ।

शरीर में काम करने वाली विद्युत शक्तियों का भी आधुनिक वैज्ञानिकों ने पता लगाया है। औडीलिक फोर्स (ओजस) परसनल मेगनिट (शारीरिक चुम्बकत्व) आदि नामों से इन भेदों का अन्वेषण किया है।

योग-शास्त्रों में शरीर के अन्तः प्रदेश में काम करने वाले सहस्रों तत्वों का पता लाखों वर्ष पूर्व लगा लिया था। आधुनिक विज्ञान ने भी इस मार्ग पर कदम उठाने शुरू कर किये हैं। और पिछले दिनों जो शोधें हुई हैं उनके अनुसार-ऐथेरिक वाडी (प्राण भंडार) माइस्टिक प्लेसिस (अनाहत चक्र) थिराइड ग्लाण्ड (कंठ ग्रन्थि) पाइनियल ग्लाण्ड (आज्ञाचक्र) पाइट्यूटरी वाडी (शक्ति ग्रन्थि) आदि का पता चलाया है और यह माना है कि इन विलक्षण संस्थानों द्वारा मनुष्य की प्रसुप्त प्रतिभाओं और विशेषताओं के भाव अभाव-मन्दता और तीव्रता से-भारी सम्बन्ध हैं। फिर भी वे यह नहीं जान सके कि औषधि, सर्जरी आदि की सीमा से बाहर के इन सूक्ष्म संस्थानों का विकास किस प्रकार सम्भव है। इसका उत्तर एवं मार्ग-दर्शन तो योग-शास्त्र की कर सकता है और करता रहा है। गायत्री उपासना एक ऐसी सर्वांगपूर्ण योग-साधना है जिसके द्वारा इन सभी शक्ति संस्थानों को अति सरलतापूर्वक सक्रिय बनाया जा सकता है।

इन सूक्ष्म संस्थानों के जागरण के लिए साधना विज्ञान के अनुसार बन्ध और मुद्राओं का विधान मौजूद है । गायत्री के 24 अक्षरों से सम्बन्धित इस प्रकार की 24 साधनाएँ प्रसिद्ध हैं। उनमें से प्रसिद्ध मुद्राओं और बंधो के नाम नीचे दिए जाते हैं-(1)महामुद्रा (2) नभोमुद्रा (3) उड्डियान (4) जालंधर बन्ध (5) मूल बन्ध (6) महाबन्ध (7) खेचरी मुद्रा (8) विपरीत करणी (9) योनि मुद्रा (10) वज्रोली (11) शक्ति चालनी (12) तडागी (13) माण्डवी (14) शाँभवी (15) अश्विनी (16) पाशिनी (17) काकी (18) मातंगी (19) भुजंगिनी (20) पार्थिवी (21) आपम्भरी (22) वैश्वानरी (23) कथठी (24) आकाशी।

महामुद्राओं की तरह प्राणायामों की साधना में भी 24 प्रत्यावर्तन मुख्य हैं। यों संख्या की दृष्टि से वे 84 हैं, पर प्रमुख उनमें से 24 ही हैं। इन 24 प्राणायामों, 24 मुद्राओं, 24 बंधो की साधना करके आत्म-विज्ञान के वैज्ञानिक अपने शरीर एवं मन को इतना सामर्थ्यवान् बना लेते हैं कि वे अपनी आत्मिक एवं भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए किसी दूसरे पर निर्भर न रहें। सृष्टि का विधान जिस विधि-व्यवस्था पर चलता है उसके संचालन तक की क्षमता जिनमें विकसित हो गई, उन्हें देवाधीन अथवा प्रारब्धाधीन भी नहीं रहना पड़ता। वे अपने लिये अपनी स्वतन्त्र परिस्थितियाँ एवं संभावनाएँ विनिर्मित कर सकते हैं।

सरकारी शासन तन्त्र, कायदे-कानून और कर्मचारी अधिकारियों से बनी व्यवस्था पर चलता है। पर इस यन्त्र का संचालक राजा, प्रधान मन्त्री, राष्ट्रपति आदि जो भी हो, वह अपने विशेषाधिकार एवं अध्यादेश से प्रचलित व्यवस्था के व्यतिक्रम की भी कोई आवश्यक व्यवस्था कर सकता है। इसी प्रकार तपस्वी साधकों ने अपने अन्तरंग मर्म स्थलों में छिपी हुई प्रसुप्त शक्तियों का जागरण कर लिया, वे ईश्वरीय चेतना के स्तर तक जा पहुँचते हैं। जीवन मुक्ति में आत्मा को सायुज्य, सालोक्य, सारूप्य, सामीप्य स्तर की स्थिति प्राप्त होती है। ऐसी परिस्थितियों तक पहुँचे हुए आत्मा का पद एवं अधिकार भी ईश्वर जैसा हो जाता है और यदि वह चाहे तो सृष्टि संचालन की चल रही विधि-व्यवस्था में समयानुसार आवश्यक हेरफेर भी कर सकता है।

गायत्री वेद वाङ्मय में प्रयुक्त होने वाला एक छन्दगीत है। जिसमें 8-8 अक्षरों के तीन चरण हों और जो निर्धारित स्वर-लहरी में गाया जा सके, उस कविता को वेद, विद्या के ज्ञाता गायत्री छन्द कहते हैं। यों गायत्री शब्द का अर्थ प्राणों का संरक्षण एवं संवर्धन करने वाली सत्ता भी होता है, पर मोटे तौर पर यह शब्द एक छन्द गीत का ही बोध कराता है। हर गीत की अपनी विशेषता होती है। वह अपने गर्भ में भरे हुए भावों को तो कोमल अभिव्यंजनाओं के साथ व्यक्त करता ही है, भावुकता को जगाता और सरसता को लहराता ही है, साथ ही एक वैज्ञानिक वातावरण भी पैदा करता है। शब्द को ब्रह्म कहा गया है। गीत को ब्रह्म की तरल स्थिति माना गया है। भक्तगण गीत के माध्यम से अपने इष्टदेव के साथ तन्मय होने की लय साधना करते हैं। मीरा, सूर, तुलसी कबीर, चैतन्य, नारद आदि ने अपनी गीत साधनाओं से ही अपने उपास्य देवों का सामीप्य पाया था, ऋषि सामगान करके ब्रह्म का साक्षात्कार करते थे। दीपक राग से बुझे दीपकों का जलना और मेघ मल्हार की स्वर लहरी से वर्षा होने लगना प्रसिद्ध है। गीत-शास्त्र के ज्ञाता जानते हैं कि किस ऋतु में, अथवा दिन के किस भाग में कौन से राग-रागिनी का गायन किया जाय तो सुनने वालों पर उसका क्या सूक्ष्म प्रभाव पड़ेगा? गीत का अपना एक वैज्ञानिक स्वरूप भी है, जिसकी शोध कर के आधुनिक पदार्थ विज्ञानवेत्ता अमुक स्वर लहरियों को ध्वनि विस्तारक यन्त्रों द्वारा प्रसारण कर के पशुओं से अधिक दूध लेना, पेड़-पौधों को अधिक फलदायक बनाना, रोगियों को कष्ट मुक्त करना आदि अनेक प्रकार के लाभ उठाने लगे हैं फौज में जब बिगुल बजता है, मार्च की ध्वनि बजती है तक कायर सैनिकों में भी वीरता के भाव लहराने लगते हैं। इसी प्रकार की अपनी विशेषताएँ अन्य गीतों की भी हैं। वेद-गीत तो इस दृष्टि से अत्यधिक प्रभावपूर्ण हैं। उनके अर्थ की महत्ता तो है ही, साथ ही उनका उच्चारण भी अपने आप में इतना प्रभावशाली है कि वेद-पाठ सामगान आदि के स्वर आयोजन मात्र से अद्भुत प्रतिफल उपस्थित होते हैं।

गायत्री की स्वर-लहरी अपने क्षेत्र में जादू का काम करती है। गायत्री छन्द के विधिवत् उच्चारण से आकाश में जो विद्युत कम्पन होते हैं उनका प्रभाव जिन समीपवर्ती ओर दूरवर्ती लोगों पर पड़ता है वे अनेक भौतिक एवं आध्यात्मिक लाभों से लाभान्वित होते हैं। अथर्व वेद में गायत्री उपासना से प्राप्त होने वाले सात लाभों का वर्णन करते हुए कहा गया है:-

स्तुता मया वरदा वेद माता प्रचोदयन्ताँ पावमानी द्विजानाम्। आयु प्राणं प्रजाँ पशु कीर्ति द्रविणं ब्रह्मवर्चसं। मह्माँदत्वा व्रजत ब्रह्म लोकम्।

-अथर्व 19।71।11

“वेदमाता गायत्री, उपासना करने वालों को पवित्र करती है प्रेरणा देती है, आयु, प्राण, प्रजा, पशु कीर्ति धन और ब्रह्म-वर्चस प्रदान कर के ब्रह्मलोक तक पहुँचाती है।”

अथर्व वेद की भाँति ही अन्य शास्त्रों तथा ऋषियों ने भी इस महामन्त्र का जो गुणगान किया है उससे सिद्ध होता है कि गायत्री उपासना, साधक को अनेक कठिनाइयों से छुड़ाने और सुख-शाँति का अधिकारी बनाने में महत्वपूर्ण योगदान करती है।

ऐहिकायुष्मिकं सर्वं गायत्री जपतो भवेत् ।

-आदि पुराण।

गायत्री जप से सभी साँसारिक कामनाएं पूर्ण होती हैं।

शत्रुतो न भयं तस्य दस्युतो क्वान राजतः।

न शस्त्रानल तोयौधात्कदाचित्संभविष्यति।

-कात्यायान

न उसे शत्रुओं का भय रहता है, न दस्युओं का, न हथियारों का, न अग्नि का वह सब प्रकार के भयों से निर्भय हो जाता है।

शास्त्रकार ने गायत्री को सर्वोपरि महत्व का साधन उपादान बताया है। वस्तुतः यदि कोई सच्चे मन से और सच्चे क्रम से इस महत्तत्व के साथ अपने को जोड़ सके तो उसे भी अपनी अनुभूतियों के आधार पर शास्त्र की उक्ति को स्वयं भी दुहराना पड़ेगा।

शास्त्र कहता है-

गायत्र्येव तपो योगः साधनं ध्यानच्यते।

सिद्धीनाँ सा मता माता नातः किंचिद् वृहत्तरम्।

गायत्री साधना लोके न कस्यापि कदापि हि॥

याति निष्फलता मेतत् ध्रुवं सत्यं हि भूतले।

योगिकानाँ समस्तानाँ साधनानाँ वरानने॥

- शिव कैवल्य

“गायत्री ही तप है, योग है, साधन है, ध्यान है। वही सिद्धियों की माता मानी गई है। इससे बढ़ कर श्रेष्ठ तत्व इस संसार में और कोई नहीं है। कभी किसी की गायत्री साधना निष्फल नहीं जाती। समस्त योग साधनाओं का आधार गायत्री ही है।

गायत्री एक वैदिक छन्द तो है ही, उस छन्द के सम्यक् उच्चारण से-जो सामान्यतः मिलना चाहिए वह तो मिलता ही है। पर विशेषता एक और भी है कि इन 24 अक्षरों में प्रत्येक अक्षर एक छन्द है। प्रत्येक अक्षर अपने-अपने में एक परिपूर्ण कविता हैं। इसे 24 काव्यों का एक समन्वय गुच्छक भी कहा जा सकता है। 24 प्रभावशाली औषधियों से मिला कर बनाई हुई औषधि रसायन की तरह-24 तारों की किसी उत्कृष्ट वीणा की तरह गायत्री के 24 अक्षर अपनी विशिष्ट प्रतिक्रिया उत्पन्न करते हैं गायत्री का हर अक्षर अपने आपमें परिपूर्ण गीत-परिपूर्ण शक्ति प्रवाह है इसका स्पष्टीकरण गायत्री तन्त्र में किया गया है। भगवान शंकर नारद जी से कहते हैं-

इत्येते ऋषयः प्रोक्ता वर्णानाँ क्रमशो मुने। गायत्र्युष्णिनानुष्टुप् च बृहती पंक्ति रेव च॥

त्रिष्टुभं जगती चैव तथाऽति जगती मता। शर्क्वयतिशक्वरी च धृतिश्वातिधृतिस्तथा॥

विराट प्रस्तारपंक्तिश्च कृति प्रकृतिराकृति।

विकृतिः संस्कृतिश्चैवाक्षर पंक्ति स्तथैव च॥ भूर्भुवास्वरितिच्छन्दस्तथा ज्योतिष्मती स्मृतम्।

इत्येतानि न छन्दाँसि कीर्तितानि महामुने॥

“हे नारद! गायत्री मन्त्र में अक्षरों से सन्निहित अब उसके 24 छन्दों को सुनिये-गायत्री, उष्णिक्, अनुष्टप, बृहती, पंक्ति, त्रिष्टुप, जगती, अतिजगती, शक्वरी, अतिशक्वरी, धृति, अति धृति, विराट् प्रस्तार-पंक्ति , कृति, प्रकृति, आकृति, संस्कृति, अक्षर-पंक्ति , भूः, भुवः स्वः ओर ज्योतिष्मती से 24 छन्द क्रम से प्रत्येक अक्षर के साथ जुड़े हुए हैं।”

अपनों से अपनी बातें-


हमारी शिक्षा योजना हर कसौटी पर खरी सिद्ध होगी।

आगामी गायत्री जयन्ती से गायत्री तपोभूमि में जिस त्रिविध प्रशिक्षण की व्यवस्था की जा रही है उसके पीछे नव-युग की पृष्ठभूमि तैयार कर सकने वाले- उत्कृष्ट व्यक्तियों का निर्माण करना हमारा प्रमुख उद्देश्य है। कोई बड़ा काम वे ही व्यक्ति सम्पन्न कर सकते हैं जो गुण,कर्म, स्वभाव की दृष्टि से- दूरदर्शिता एवं प्रबुद्धता की दृष्टि से सुसम्पन्न हों। ऐसे व्यक्ति बड़े परिश्रमपूर्वक बनाने और ढालने पड़ते हैं। गाँधी जी ने स्वाधीनता आँदोलन का नेतृत्व कर सकने वाले व्यक्ति ढाले थे। युग-निर्माण की सर्वतोमुखी पृष्ठभूमि विनिर्मित करने के लिए जिन सजीव शस्त्रों की-उत्कृष्ट व्यक्तित्वों की आवश्यकता है, वे अनायास ही नहीं मिल जाएंगे वरन् प्रयत्नपूर्वक ढालने पड़ेंगे। त्रिविध प्रशिक्षण के रूप में यही कार्य प्रारम्भ किया जा रहा है।

देश के कोने-कोने में इसी स्तर के विद्यालय स्थापित करने पड़ेंगे जैसे कि मथुरा में इस समय किए जा रहे हैं इनका संचालन ज्ञान और तप की पूँजी से सम्पन्न वानप्रस्थ लोग करेंगे। डाक्टरों की, इंजीनियरों की पढ़ाई चार वर्ष की होती है। इससे कम में नव-निर्माण का प्रयोजन पूरा कर सकने वाले विद्यालय के प्रिंसीपल भी प्रशिक्षित नहीं किए जा सकते। देश में अनेक प्रकार के रचनात्मक कार्यक्रमों का प्रसारण करना है, विवाहोन्माद, नशेबाजी, उच्छृंखलता, स्वार्थलिप्सा, भ्रष्टाचार जैसी अनेक दुष्प्रवृत्तियों के विरुद्ध संघर्षात्मक मोर्चा खड़ा करना है। जनमानस को नारकीय निकृष्ट स्तर से ऊपर उठा कर स्वर्गीय उत्कृष्टता के उच्च सोपान तक पहुँचाना है इस प्रयोजन की पूर्ति के लिए विचार क्राँति का दावानल प्रदीप्त करना है। यह सब कार्य निस्पृह आत्मबल एवं तत्व दृष्टि से सम्पन्न गृह-निवृत्त वानप्रस्थ ही करेंगे। उनकी ढलाई और शिक्षा चार वर्षीय तप एवं ज्ञान साधना के बिना सम्पन्न न हो सकेगी। कोई संस्थान एवं अभियान कैसे चलाया जा सकता है, इसका व्यावहारिक मार्ग दर्शन वे लोग चार वर्ष मथुरा रह कर प्राप्त कर लेंगे और युग-निर्माण की एक बड़ी आवश्यकता को पूरा करेंगे।

गृह कार्यों की जिम्मेदारी के कारण जो लोग अधिक व्यस्त हैं। आयु अधिक हो जाने के कारण देर तक पढ़ नहीं सकते, जल्दी ही उपार्जन में जिन्हें लगना है ऐसे लोगों के लिए एक वर्ष की शिक्षा है वे इस अवधि में जीवन रथ के संचालन की सर्वतोमुखी शिक्षा प्राप्त कर लेंगे। रेल, मोटर आदि चलाने वाले ड्राइवर, उस मशीन का ठीक उपयोग करने की विधि तथा कल-पुर्जों की बनावट, खराबी, मरम्मत आदि की आवश्यक जानकारी रखते हैं। पर खेद है कि हम मानव शरीर और मन जैसे बहुमूल्य यान वाहन का उपयोग तो करते हैं पर उसको सही तरीके से इस्तेमाल करना नहीं जानते। यही कारण है कि हम पग-पग पर दुर्घटनाओं के शिकार होते हैं। हमारा शरीर और मन इसी प्रकार की दुर्घटनाओं से क्षतिग्रस्त होकर अस्त-व्यस्त पड़ा रहता है। मानव जीवन प्राप्त कर के जिन महान सफलताओं को आसानी से प्राप्त किया जा सकता था, अपने और दूसरों के लिए स्वर्गीय वातावरण विनिर्मित किया जा सकता था, गैर जानकारी के कारण हम उससे वंचित ही बने रहते हैं। अन्यायों, असफलताओं एवं शोक सन्तापों का रोना रोते हुए उनका दोषारोपण किन्हीं दूसरों पर करते हुए मौत के दिन पूरे किया करते हैं। आवश्यकता ऐसे प्रशिक्षण की है जो शरीर और मन और व्यवहार के सम्बन्ध में उपयुक्त शिक्षा देकर व्यक्ति को सर्वतोमुखी प्रगति का अधिकारी बना दे। प्रौढ़ों को एक वर्षीय शिक्षा का जो पाठ्यक्रम रखा गया है उससे इसी आवश्यकता की पूर्ति होगी। आशा करनी चाहिए कि इस प्रशिक्षण को प्राप्त कर निकले हुए शिक्षार्थी अपने लिए-अपने परिवार एवं समाज के लिए एक वरदान बन कर निकलेंगे।

तीसरी शिक्षा किशोरों की है। जूनियर हाई स्कूल तक पढ़े 4 वर्ष में और हाई स्कूल तक पढ़े तीन वर्ष में इसे पूरा करेंगे। यह ग्रेजुएट स्तर की पढ़ाई है। अंग्रेजी, संस्कृत, हिन्दी, गणित, कानून, समाज-शास्त्र, मनोविज्ञान शरीर शास्त्र, विश्व परिचय, व्यवसाय, लोक-व्यवहार आदि जीवनोपयोगी हर विषय इसमें पढ़ाया जाएगा। सरकारी कालेजों से निकले हुए -छात्रों की तुलना में इस शिक्षा को प्राप्त करने वाले छात्र हर दृष्टि से बहुत अधिक अनुभवी, अग्रगामी एवं प्रतिभाशाली सिद्ध होंगे। यह शिक्षार्थी अपनी अपने परिवार की आर्थिक तथा अन्यान्य समस्याओं का सुलझाने में तो समर्थ होंगे ही, साथ ही विश्व कल्याण की-नव निर्माण की-भूमिका सम्पादित करने में भी महत्वपूर्ण योगदान करेंगे।

शिशु-कक्षाओं से लेकर जूनियर हाई स्कूल तक के लिए भी ऐसे ही विद्यालयों की आवश्यकता है। हम स्वयं तो इस प्रकार की व्यवस्था नहीं बना सके पर आशा है कि दूसरे लोग उसे भी बनाएंगे और प्रेरणाप्रद प्रखर प्रशिक्षण के माध्यम से जन-मानस के नव-निर्माण का पुण्य प्रयोजन समग्र रूप से पूरा हो सकेगा। मथुरा में उसका शुभारम्भ है। अगले दिन इस उद्यान के पेड़-पौधे फलेंगे फूलेंगे और उनसे उत्पन्न बीजों द्वारा इस समस्त विश्व को फिर हरा भरा बनाया जा सकेगा। आज का हमारा छोटा शुभारम्भ अगले दिनों एक ऐसे विशालकाय नव-निर्माण का साकार स्वरूप प्रस्तुत करेगा जिसे देखकर असम्भव को सम्भव होने जैसा आश्चर्य किया जा सके।

हमारा व्यक्तिगत कार्यक्रम पाँच वर्ष तपश्चर्या प्रधान होगा। गायत्री तपोभूमि की इमारत में युग-निर्माण का उत्तरदायित्व वहन करने वाले प्रखर व्यक्तित्वों का निर्माण करना होगा इसलिए यह प्रशिक्षण व्यवस्था आरम्भ की गई है। इसका संचालन एवं अध्ययन-अपने अन्य साथी सहचरों के साथ पाँच वर्ष तक हम स्वयं करेंगे। एक व्यवस्थित ढर्रा चल पड़ने पर हमारे उत्तराधिकारी उसे आसानी से गतिशील बनाये रह सकेंगे। यह एक बड़ा काम है। इसे स्थानीय छोटी-सी शिक्षण व्यवस्था नहीं समझा जाना चाहिए कि यह एक छोटी चिनगारी जलाई जा रही है जो आगे चलकर विशाल दावाग्नि का काम करेगी। नव-निर्माण की महान् हलचल को गतिशील बनाने के लिए प्रखर व्यक्तित्वों एवं कर्मठ कार्यकर्त्ताओं की जरूरत पड़ेगी। प्रस्तुत प्रशिक्षण योजना उसी की पूर्ति के लिए है।

इस महान शुभारम्भ को सफल बनाने के लिए प्रत्येक परिजन की सहानुभूति एवं सहायता आवश्यक है। सबसे पहली आवश्यकता उपयुक्त छात्रों की है। कूड़ा-करकट यहाँ जमा होगा तो उसे सुधारने में ही सारी शक्ति लग जायगी। बिगड़े छात्र सुधारने की स्थिति में पहुँचने तक ही हमारी सारी शक्ति खा जायेंगे। आवश्यकता सुसंस्कृत छात्रों की है जिन्हें डाल कर विद्यालय का यश और मिशन का प्रयोजन पूरा किया जा सके। अतएव प्रत्येक परिजन को अपने आप-पास के क्षेत्र में से तीनों प्रशिक्षणों के लिए सुयोग्य शिक्षार्थी तलाश करने चाहिए और उन्हें प्रेरणा प्रोत्साहन देकर मथुरा भिजवाना चाहिए। जिनका अधिक जन संपर्क है ऐसे लोग-बड़ी आसानी से इस प्रकार का सहयोग देकर इस महान अभियान की सफलता का पथ प्रशस्त कर सकते हैं।

उपर्युक्त पंक्तियों में विद्यालय के मूल प्रयोजन की चर्चा की गई है। साथ ही आजीविका उपार्जन सम्बन्धी-शिल्प शिक्षा भी इसमें सम्मिलित है। उसे हमारी दृष्टि से दूसरा स्थान प्राप्त है। पर लोग दूसरी तरह ही सोचते हैं। आज शिक्षा का प्रयोजन आजीविका उपार्जन है। कमाई के लिए पढ़ाई यही सबकी मान्यता है। यह प्रयोजन एक सीमा तक सरकारी डिग्रियों से पूरा होता है इसलिए वर्तमान शिक्षा-प्रणाली से घोर असन्तोष होते हुए भी लोग अपने बच्चों को उसी में धकेलने के लिए मजबूर होते हैं और ऐसे प्रशिक्षणों में-जैसा कि हम आरम्भ कर रहे हैं-अपने बच्चे भेजने को रजामन्द नहीं होते। लोगों की इस प्रवृत्ति को हम समझते हैं इसलिए उन उद्योगों का समावेश अपनी शिक्षा प्रणाली में कर रहे हैं जिससे नौकरी की अपेक्षा स्वावलंबी जीवन यापन करते हुए अपेक्षाकृत अधिक धन भी कमाया जा सके। इस कसौटी पर भी अपनी शिक्षा अधिक ही सफल रहेगी। सामान्य शिक्षा प्राप्त विद्यार्थी डेढ़-दो सौ की नौकरी मुश्किल से पाते हैं पर प्रस्तुत योजना से सिखाये गए शिल्पों में से एक भी ऐसा नहीं है जो ठीक तरह चलाये जाने पर दस-बीस रुपया रोज की आमदनी न दिला सके।

अभी शिक्षा 20 फीसदी है। अगले दस वर्ष में वह 80 फीसदी हो जायगी। तब आज की तुलना में प्रेस व्यवसाय भी कम से कम चार गुना बढ़ जायगा। छोटे कस्बों में भी कई-कई प्रेस चलेंगे। यह व्यवसाय भी 4-5 हजार की पूँजी से ही छोटे रूप में आसानी से चल सकता है और उसमें निस्सन्देह दस रुपया प्रति दिन का काम मिल सकता है। इतना ही नहीं उस कार्य में घर के कई व्यक्ति सिखा कर इस लायक बनाए जा सकते हैं जो घर रह कर सौ-डेढ़ सौ रुपये मासिक की मजदूरी कर लिया करें। इस प्रकार एक पूरे परिवार का वह आजीविका स्रोत बन सकता है। अपने पास पूँजी न हो तो इस विषय का सर्वांगपूर्ण ज्ञान रखने वाला व्यक्ति किसी की साझेदारी में काम आरम्भ कर सकता है। इतना भी न बन पड़े तो प्रेस मैनेजर, प्रूफ रीडर, कम्पोजीटर, मशीनमैन, बाइन्डर जैसे कामों के लिए किसी प्रेस में अच्छे वेतन की नौकरी कर सकता है।

रबड़ की मुहरें बनाना, एक सहायक काम प्रेस व्यवसाय के साथ जुड़ा रह सकता है। इसमें लागत की तुलना से प्रायः तीन गुना लाभ रहता है। 10) प्रति दिन की मुहरें बनाने को मिल जाय तो आसानी से 6) बच सकते हैं। जो लोग लेटर पेपर आदि नहीं छपा सकते वे मुहरों से काम चलाते हैं, हर संस्था में, हर छोटे-बड़े दफ्तर में कई-कई मुहरों की जरूरत पड़ती है। वे घिसती खराब होती भी रहती हैं। इस प्रकार थोड़े से सरकारी दफ्तरों, संस्थाओं, व्यवहारी, व्यापारियों से संपर्क बना लिया जाय तो यह काम भी थोड़ा-बहुत मिलता ही रहेगा ओर प्रेस के अतिरिक्त कुछ और आमदनी भी होती रहेगी।

इसी प्रकार पुस्तक प्रकाशन, पत्र-पत्रिकाओं का निकालना यह व्यवसाय भी प्रेस खोलने के साथ जोड़ा जा सकता है। जो कागज प्रेस में छपें उन्हें तथा विवाह-शादियों के कार्ड, लिफाफे आदि विक्रयार्थ रखे जाय तो वे अपने आपसे एक छोटा व्यवसाय बन सकते हैं। घर के लोगों को सीना, मोड़ना, काटना सिखा लिया जाये तो उस प्रेस में छपने वाली पुस्तकों, रसीद बहियों, पैडों आदि की बाइंडिंग, परफोरेटिंग घर में ही हो सकती है और यह परिवार के लिए एक सहायक गृह-उद्योग मिल सकता है। प्रेस अपने मालिक को ही नहीं उसके परिवार को भी सम्मानित आजीविका दे सकता है। उसकी शाखा, प्रशाखा फूटने की तो बहुत बड़ी गुंजाइश है। कम पूँजी में आवश्यक अर्थ उपार्जन की व्यवस्था कर सकने वाला प्रेस व्यवसाय है उसका आदि से अन्त तक सर्वांगपूर्ण शिक्षण प्राप्त व्यक्ति न तो बेकार रह सकता है और न भूखा रह सकता है सच तो यह है कि यदि भाग्य साथ दे तो उसमें आगे बढ़ने और फलने-फूलने की काफी गुंजाइश है।

साबुन हमारा दूसरा औद्योगिक प्रशिक्षण है। यह घरेलू आवश्यकता की चीज है। हर जगह इसकी खपत है। ज्यों-ज्यों शिक्षा और खुशहाली बढ़ेगी, साबुन की आवश्यकता भी बढ़ेगी। दूसरे देशों की तुलना में अभी चार-पाँच गुना साबुन उद्योग के विकास की इस देश में गुंजाइश है। छोटे देहातों तक में इसकी खपत बढ़ रही है। इस व्यवसाय का आदि से अन्त तक व्यापारिक एवं रासायनिक ज्ञान किसी को हो तो वह बाजार से बढ़िया साथ ही सस्ती चीज दे सकता है और अपने गुजारे की अच्छी व्यवस्था कर सकता है।

मोमबत्ती उद्योग इसी से जुड़ा हुआ है। यह साबुन उद्योग का सहायक धन्धा है। दिवाली पर, त्यौहारों पर तथा तत्काल प्रकाश सुविधा के रूप में इसकी अच्छी खपत है। लाभ का धन्धा है। साबुन के साथ-साथ आसानी से इसे चलाया जा सकता है।

निवाड़ बुनना एक छोटे से पावर लूम से बड़ी सुविधापूर्वक चल सकता है। लोगों के पास के पुराने लिहाफ की रुई बेकार बचती है। उसका कोई ठीक उपयोग नहीं होता। उस पुरानी रुई के बदले में, कताई-बुनाई की मजदूरी लेकर यदि लोगों को हाथों-हाथ निवाड़ दे दी जाए तो वे मूँज की रस्सी से बार-बार चारपाई बुनवाने, बार-बार उसके टूटने के झंझट से बच कर घर में सुन्दर एवं चिरस्थायी छोटे पलँग बना सकते हैं। इसके लिए हर घर में काम मिल सकता है। इधर इस पुरानी रुई को कातने, ऐंठने के लिए अनेकों महिलाएँ गृह उद्योग प्राप्त कर सकती हैं। बुनने वाला अपनी मजूरी तथा लाभ के रूप में दस रुपया रोज कमा सकता है। यह ऐसा काम है जिसमें काम न मिलने, बिक्री न होने जैसी शिकायत उत्पन्न नहीं हो सकती है।

सूती, ऊनी, रेशमी कपड़े तुरन्त धो देने, रँगने और रफू करने का धन्धा अब इस सभ्यता के जमाने में बड़ा विस्तार करता चला जा रहा है। छोटे-बड़े शहरों में ड्राइक्लीनिंग की दुकानें धड़ाधड़ खुलती चली जा रही हैं। धोबी देर में कपड़े धोकर देते हैं, तेजाब लगा कर कपड़े गला देते हैं, पीट कर उन्हें कमजोर कर देते हैं। कम कपड़े होने पर जर्क-वर्क सफाई चाहने वालों को सूखी धुलाई का सहारा लेना पड़ता है। मशीनों के सहारे, पेट्रोल तथा दूसरी रासायनिक वस्तुओं के सहारे एक घण्टे में सर्दी, वर्षा, रात-दिन की कठिनाई के बिना कपड़ा धोकर दे दिया जाता है। इसके लिए लोग खुशी-खुशी कुछ अधिक पैसा दे देते हैं। रंग फीका हो जाने पर उसे फिर रँग देना, फट जाने पर उसे रफ कर देना यह धुलाई का सहायक धन्धा है। आवश्यक मशीनों में कुछ पैसा लग जाता है पर आमदनी उतनी हो जाती है जितनी सरकारी नौकरी में डिप्टी-कलक्टरों या मामूली वकीलों की भी नहीं होती।

रेडियो, ट्राँजिस्टर एवं घड़ियाँ दैनिक जरूरत की चीजें बनती चली जा रही हैं। धीरे-धीरे हर घर में प्रवेश करती जाती हैं। कहना न होगा कि यह खराब भी जल्दी-जल्दी होती हैं और मरम्मत भी बार-बार चाहती रहती हैं। इन दोनों यन्त्रों को सुधारने की कला जिन्हें आती हो वे बिना कोई बड़ी पूँजी लगाए अपने बुद्धि, कौशल तथा हलके से हलके परिश्रम से ही काफी कमा सकते हैं। उपयुक्त दोनों चीजें नई बेचने का भी धन्धा साथ-साथ चलता रह सकता है। अलग-अलग पुर्जे खरीद कर एक नया रेडियो बना देना यह अपने आपसे एक अलग से धन्धा है। जो रेडियो बाजार में -दो सौ-तीन सौ रुपये में बिकते हैं वे घर बनाने पर सौ रुपये में बन सकते हैं। जिन्हें नये रेडियो तक बना कर खड़े कर देने की जानकारी है उन्हें नौकरी के लिए मारा-मारा न फिरना पड़ेगा। कोई व्यक्ति इस कार्य को आरम्भ करे तो वह विवाह-शादियों, उत्सवों, सभाओं तथा ऐलानों के लिये किराए पर देने को लाउडस्पीकर भी रख सकता है। लाउड-स्पीकरों की मरम्मत एवं चलाने की विधि भी सहायक धन्धे के रूप में इसी प्रशिक्षण में सम्मिलित है। टेप रिकॉर्डर यन्त्र का उपयोग एवं सुधार भी इस शिक्षा के अंतर्गत आ जाता है । बिजली के छोटे-मोटे फिटिंग, पंखे आदि की मरम्मत यह शिक्षा प्राप्त करने वाले शिक्षार्थी आसानी से कर सकते हैं।

उपर्युक्त चार उद्योग ऐसे हैं जो बाकायदा दुकान लगा कर आरम्भ किये जा सकते हैं। कुछ उद्योग ऐसे हैं जो घरों में स्त्री-बच्चों की सहायता से एक सहायक गृह उद्योग के रूप में चल सकते हैं। इनके लिए कोई कारखाना लगाने की जरूरत नहीं है। जितना काम मिल जाय उतना धन्धा प्रशिक्षित स्त्री-बच्चे कर सकते हैं और उससे एक अतिरिक्त आमदनी हो सकती है। जापान में घर-घर ऐसे गृह उद्योग चलते हैं इससे वहाँ हर घर में खुशहाली दिखाई पड़ती है। इस प्रकार के कुटीर-उद्योगों में से कुछ को सिखाने की व्यवस्था अपने विद्यालय में भी की गई है। जिनमें से प्रमुख यह हैं-

(1) सुधरे नये किस्म के अम्बर चरखे से सूत कातना (2) मधु-मक्खी पालन, उनके विशेष प्रकार के बने लकड़ी के छत्तों द्वारा बिना छत्ता तोड़े शहद निकालना (3) विभिन्न प्रकार के धातुओं तथा ऐवरी आदि के छोटे-बड़े बटन बनाना (4) प्लास्टिक, पैरिस प्लास्टर, टीन, चीनी तथा विभिन्न रासायनिक पदार्थों से मनमोहक सुन्दर खिलौने बनाना (5) बिजली की सहायता से पीतल, ताँबे आदि के बने जेवरों पर असली सोने का असली चाँदी का असली पर्त चढ़ा कर थोड़े से पैसों में कीमती जेवर पहनने की हविस पूरा देना (6) कई किस्म की पेन्सिलें बनाना (7) अगरबत्ती, धूपबत्ती एवं तरह-तरह की स्याहियाँ बनाना (8) स्वेटर, बनियान, मोजे, फीते, बार्डर आदि बनाना। (यह गृह उद्योग बड़े पैमाने पर भी किया जा सकता है।)

ऊपर चार बड़े और आठ छोटे उद्योगों का जिक्र है। जहाँ सुविधा हो वहाँ इन छोटे उद्योगों को भी बड़े कारखाने का रूप दिया जा सकता है। इसके अतिरिक्त और भी ऐसे ही उद्योगों की खोज-बीन जारी है जो सरल भी हों और जिनकी खपत भी आसानी से हो सके।

इस प्रकार प्रयत्न यह किया जा रहा है कि अपनी शिक्षा-पद्धति, जिसका मूल उद्देश्य उत्कृष्ट व्यक्तित्वों का निर्माण करना है, आजीविका उपलब्ध करने की कसौटी पर खरी सिद्ध हो सके। नौकरी से विरत कर नई पीढ़ी को स्वावलम्बी बनाने की प्रेरणा तो देनी ही होगी। परिस्थितियों की माँग भी यही है। आखिर हर वर्ष लाखों की संख्या में स्कूल, कालेजों से निकलने वाले युवकों को नौकरी मिलेगी भी कहाँ से? उन्हें नौकर रखेगा भी कौन? अस्तु सरकारी डिग्रियों का मोह छोड़ कर जिन्हें इस प्रशिक्षण के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है उन्हें आर्थिक दृष्टि से भी कोई घाटा रहने वाला नहीं है। भार-स्वरूप वर्तमान शिक्षा पद्धति से जिन बच्चों का मन हट जाता है उन पर मानसिक बलात्कार घातक मनोवैज्ञानिक असर डालता है। उसकी तुलना में अपनी शिक्षा पद्धति ऐसी है जिसमें इतना परिश्रम न करने पर भी छात्रों को हर घड़ी एक मनोरंजक खेल खेलने जैसी प्रसन्नता होती रहेगी। मन ऊबने को उसमें कोई गुंजाइश नहीं है। लाठी, तीर, बंदूक आदि चलाने तथा विभिन्न खेल-कूदो एवं फौजी कवायदों के आधार पर वे जिस व्यायाम द्वारा स्वास्थ्य सुधारेंगे वह भी भार रूप न होकर एक मनोरंजन ही होगा। फिर पढ़ाई का सारा क्रम भी तो ऐसा है जो किस्से, कहानी सुनने जैसा अपने आपमें एक अनोखी दिलचस्पी से भरा-पूरा है। इससे कम समझ विद्यार्थी भी आवश्यक दिलचस्पी लेंगे और वे अपना आश्चर्यजनक बौद्धिक विकास करेंगे।

वानप्रस्थों का प्रशिक्षण उनके आत्म-कल्याण तथा लोक-शिक्षण की आवश्यकता को पूरा करने के लिए है। आर्थिक दृष्टि से देखा जाय तो उनके भावी जीवन के आवश्यक गुजारे की भरपूर गारण्टी उसमें मौजूद है। रामायण, गीता के धुरन्धर प्रवचनकर्ता, यज्ञों तथा संस्कारों की प्रेरणाप्रद योग्यता से सम्पन्न, विद्यालयों के संचालक, रचनात्मक प्रवृत्तियों के संचालक लोक-सेवी बिना माँगे भी इतनी सुविधा प्राप्त कर लेंगे जिसमें वे सपत्नीक अपना निर्वाह बड़ी सुविधा शाँति और सम्मान के साथ कर सकें।

बेशक शिक्षण काल में किसी उपार्जन की गुंजाइश नहीं है। शिक्षा की अवधि में तो खाने, पहनने का प्रबन्ध स्वयं ही करना पड़ेगा। शिक्षा, निवास, बिजली, फर्नीचर, पुस्तकालय आदि की सुविधा ही निःशुल्क कर सकना हमारे लिए सम्भव हो सका है। किन्तु इतना निश्चित है कि प्रौढ़ों किशोरों तथा वानप्रस्थों की तीनों ही शिक्षा ऐसी हैं जो न केवल उनका व्यक्तित्व ही सुविकसित करेंगी वरन् उनकी आर्थिक सुविधा की व्यवस्था भी करेंगी।


VigyapanSuchana

एक विशेष अनुरोध

इस वर्ष छटनी कार्यक्रम के कारण अखण्ड-ज्योति की सदस्य संख्या बहुत घट गई है। बेकार लोगों का हट जाना तो ठीक हुआ पर उनकी स्थान -पूर्ति अच्छे लोगों से होनी चाहिए अन्यथा उसका प्रभाव अपने महान् मिशन पर पड़ेगा। एक नया सदस्य बढ़ाने की चेष्टा प्रत्येक परिजन को करनी चाहिये। इस मास इसके लिए विशेष रूप से प्रयत्न किया जाये।


जीवन-दीप


जीवन-दीप (Kavita)

जीवन-दीप जले अभिराम, पाकर त्याग स्नेह निष्काम।

हो पथ तम जिससे दूर,

सदा प्रकाश रहे भरपूर,

जल जल व्यथा करे जो दूर,

शीलता दे ज्यों कर्पूर,

छाये दुःख की चाहे शाम, जीवन दीप जले अभिराम।

जलें एक से दीप अनेक,

मिले प्रेरणा ऐसी नेक,

होवें पथ प्रशस्त अनेक,

रहे सदा केवल यह टेक,

उगे न जब तक सूर्य ललाम, जीवन-दीप जले अभिराम।

भटक न जाये तिमिर अजान,

कुश कंटक पथ में पाषाण,

दुख के मुख पर मधु मुस्कान

मुखर न हो जब तक द्युतिमान,

लक्ष्य पूर्व कैसा विश्राम, जीवन-दीप जले अभिराम।

करो आज तुम नव-अभिमान,

रहे न दुख का नाम निशान,

उगे ज्ञान का नव दिनमान,

हो जिससे जग का कल्याण,

मंगलमय हो भव अभिराम, जीवन-दीप जले अभिराम।

रामस्वरूप खरे एम. ए.

*समाप्त*