साहित्य से बढ़कर मधुर और कुछ नहीं

साहित्य से मुझे हमेशा बहुत उत्साह होता है। साहित्य-देवता के लिये मेरे मन में बड़ी श्रद्धा है। एक पुरानी बात याद आ रही है। बचपन में करीब 10 साल तक मेरा जीवन एक छोटे से देहात में ही बीता। बाद के 10 साल तक बड़ौदा जैसे बड़े शहर में बीते। जब मैं कोंकण के देहात में था, तब पिता जी कुछ अध्ययन और काम के लिये बड़ौदा में रहते थे। दिवाली के दिनों में अक्सर घर पर आया करते थे। एक बार माँ ने कहा- “आज तेरे पिता जी आने वाले है, तेरे लिये मेवा-मिठाई लायेंगे।” पिताजी आए। फौरन मैं उनके पास पहुँचा और उन्होंने अपना मेवा मेरे हाथ में थमा दिया। मेवे को हम कुछ गोल-गोल लड्डू ही समझते थे। लेकिन यह मेवे का पैकेट गोल न होकर चिपटा-सा था। मुझे लगा कि कोई खास तरह की मिठाई होगी। खोलकर देखा, तो किताबें थीं। उन्हें लेकर मैं माँ के पास पहुँचा और उनके सामने धर दिया। माँ बोली-बेटा! तेरे पिताजी ने तुझे आज जो मिठाई दी है, उससे बढ़कर कोई मिठाई हो ही नहीं सकती।” वे किताबें रामायण और भागवत की कहानियों की थीं, यह मुझे याद है। आज तक वे किताबें मैंने कई बार पढ़ीं। माँ का यह वाक्य मैं कभी नहीं भूला कि-”इससे बढ़कर कोई मिठाई हो ही नहीं सकती।” इस वाक्य ने मुझे इतना पकड़ रखा है कि आज भी कोई मिठाई मुझे इतनी मीठी मालूम नहीं होती, जितनी कोई सुन्दर विचार की पुस्तक! वैसे तो भगवान् की अनन्त शक्तियाँ हैं, पर साहित्य में उन शक्तियों की केवल एक ही कला प्रकट हुई है। भगवान् की शक्ति की यह कला कवियों और साहित्यिकों को प्रेरित करती है। कवि और साहित्यिक ही उस शक्ति को जानते हैं, दूसरों को उसका दर्शन नहीं हो पाता।

-विनोबा भावे


चरित्र-निर्माण और सदाचार

विष्णोः कर्माणि पश्यत यतो व्रतानि पस्पशे।

॥ऋ. वे. 1। 22। 19

किसी धार्मिक ग्रन्थ या वेद वेद-मंत्रों को तोता की भाँति रटने से कुछ लाभ नहीं हो सकता। हमें उन नियमों को अपने जीवन में धारण करना चाहिए।

उदुत्तमं मुमुग्धि नो वि पाश मध्यमं चृत

अबाधमानि जीवसे॥

॥ऋ. वेद 1। 25। 21

श्रेष्ठ पुरुष परमात्मा की उपासना द्वारा अपने दुःख और भव बन्धनों को काटकर सुख प्राप्त करते हैं। हमें भी परोपकारी कर्मों के द्वारा सुख प्राप्त करने और बन्धनों से छुटकारा पाने का प्रयत्न करना चाहिए।

सुगः पन्था अनृक्षरः आदित्यास ऋतं यते।

नाभावखादो अति वः॥

॥ऋ. वेद 1। 41।4

सत्य का मार्ग ही कंटक रहित सरल और सुगम होता है अतएव सभी को सत्य का आचरण करना चाहिए।

मा वो ध्नन्तं शयन्तं प्रतिवोचे देवयन्तम्।

सुम्नैरिद्व आ विवासे॥

॥ऋ. वेद 1। 41। 8

जो लोग धर्मनिष्ठ सदाचारी पुरुषों की मित्रता करते हैं और उनकी रक्षा, सद्व्यवहार भोजन; वस्त्र आदि के द्वारा उनका सम्मान करते हैं उन्हें सदैव सुख प्राप्त होता है। दुष्ट दुर्जनों के प्रभाव से सदैव दूर रहना चाहिए। वे विद्वान् हैं जो धर्मात्माओं की मैत्री करते हैं।

मधुनक्त मुतोषसो मधुमत्पार्थिवं रजः।

मधु द्यौरस्तु नः पिता॥

॥ऋ. वेद 1। 90। 7

संसार में ऐसे कार्य करने चाहिएं जिससे सभी को सुख-शाँति और प्रसन्नता मिले।

ये पायवो मामतेय ते अग्ने पश्यन्तो

अंधं दुरितादरक्षने।

ररक्ष तान्त्सकृता विश्ववेदा दिप्सन्त

इन्द्रियवो नाह देभुः॥

॥ऋ. वेद 1। 147। 3

परोपकार और परमार्थ के कार्यों में निन्दा लाँछन, उपहास आदि का भय नहीं करना चाहिए। ऐसे मनुष्यों की रक्षा स्वयं परमात्मा करता है अतः निश्चिंत होकर लोक-कल्याण में लगे रहना चाहिए।

सुगो हि वो अर्यमन्मित्र पन्था

अनृक्षरो वरुण साधुरस्ति।

तेनादित्या अधि वोचता ना

यच्छता नो दुष्परिहन्तु शर्म॥

॥ऋ. वेद 2। 27। 6

जिस मार्ग पर धर्मात्मा व विद्वान् पुरुष चले हैं मनुष्यों को उसी वेदोक्त सत्य मार्ग पर चलना चाहिए। जिनसे सत्य की प्रतिष्ठा होती हो ऐसे ही कर्म मनुष्यों को करना चाहिए।

तुभ्यं दक्ष कविक्रतो यानीमादेव

मर्तासो अध्वरे अकर्म।

त्वं विश्वस्य सुरथस्य बोधि

सर्वं तदग्ने अमृत स्वदेह॥

॥ऋ. वेद 3। 14। 7

विद्वान लोग जो धर्माचरण नियुक्त करें मनुष्य उसका पालन करे अर्थात् महापुरुषों की शिक्षाओं का अनुसरण करना चाहिए। सभी लोगों के एक जैसे विचार हों और सभी लोग मिल कर विद्या और सुख की वृद्धि करें।


ईश्वर-भक्ति और जीवन-विकास

प्रत्येक मनुष्य चाहता है कि वह सुख पूर्वक जीवन जिये। सब का प्रेम और स्नेह प्राप्त करे। शक्ति और समृद्धि के पथ पर आगे बढ़ने की इच्छा किसकी नहीं होती। सर्वज्ञता की अभिलाषा भी ऐसे ही सब को होती है। यह दूसरी बात है कि यह सम्पूर्ण सौभाग्य किसी को मिले या न मिले । मिले भी तो न्यूनाधिक मात्रा में, जिससे किसी को सन्तोष हो किसी को न हो।

परमात्मा सम्पूर्ण ऐश्वर्य का अधिष्ठाता माना गया है। वह सर्वशक्तिमान् है। वेद उसे सर्वज्ञ, सर्वव्यापी बताते हैं। यह उसके गुण हैं अथवा शक्तियाँ। साँसारिक जीवन में उन्नति और विकास के लिये भी इन्हीं तत्वों की आवश्यकता होती है। बुद्धिमान, शक्तिमान् और ऐश्वर्यमान व्यक्ति बाजी मार ले जाते हैं। शेष अपने पिछड़ेपन, अभाव और दुर्दैव का रोना रोया करते हैं।

यह बड़े आश्चर्य की बात है कि इन तीन तत्वों का विकास मनुष्य ईश्वर भक्ति से बड़ी सरलता से प्राप्त कर लेता है। कबीर निरक्षर थे किन्तु ईश्वर उपासना के उनकी सूक्ष्म बुद्धि का विकास हुआ था। विचार और चिंतन के कारण इनमें वह शक्ति आविर्भूत हुई थी जो बड़े-बड़े विद्यालयों के छात्रों, शिक्षकों को भी नहीं नसीब होती। कबीर अक्षर लिखना नहीं जानते थे किन्तु वह पंडितों के भी पंडित हो गये।

ध्रुव वेद-ज्ञानी न थे प्रह्लाद ब्रह्मोपदेशक थे, नानक की बौद्धिक मंदता सर्व विदित है। सूर और तुलसी जब तक साधारण व्यक्ति के तरीकों से रहे तब तक उनमें कोई विशेषता नहीं रही किन्तु जैसे ही उनमें भक्ति रूपी ज्योति का अवतरण हुआ अविद्या रूपी आवरण का अपसरण हो गया और काव्य की, विचार की ऐसी अविरल धारा बही कि काव्याकाश में “सूर सूर और तुलसी चन्द्रमा हो गये।”

जिन लोगों में ऐसी विलक्षणतायें पाई जाती हैं वह सब ईश्वर-चिन्तन का ही प्रभाव होती हैं चाहे वह ज्ञान और भक्ति पूर्व जन्मों की हो अथवा इस वर्तमान जीवन की ।

उपासना से चित्त-शुचिता, मानसिक सन्तुलन भावनाओं में शक्ति और पंचकोषों में सौमनस्य प्राप्त होता है वह बौद्धिक क्षमताओं के प्रसार से अतिरिक्त है। यह सभी गुण बुद्धि और विवेक का परिमार्जन करते हैं। दूर-दर्शन की प्रतिभा का विकास करते हैं। प्रारम्भ में वह केवल किसी वातावरण में घटित होने वाली स्थूल परिस्थितियों का ही अनुमान कर पाते हैं किन्तु जब भक्ति प्रगाढ़ होने लगती है तो उनकी बुद्धि भी इतनी सूक्ष्म और जागृत हो जाती है कि घटनाओं के सूक्ष्म से सूक्ष्म अंग उन्हें ऐसे विदित हो जाते हैं जैसे कोई व्यक्ति कानों में सब कुछ चुपचाप बता गया हो ।

ईश्वर-भक्ति की प्रगाढ़ अवस्था भ्रमर और कीट जैसी होती है। भ्रमर कहीं से कीट को पकड़ लाता है फिर उसके सामने विचित्र गुँजार करता है। कीट उसमें मुग्ध होकर आकार परिवर्तन करने लगता है और स्वयं ही भ्रमर बन जाता है। ईश्वर उपासना में भी वह अचिन्त्य शक्ति है जो उपासक को उपास्य देवता से तदाकार करा देती है। गीता के 11 वें अध्याय श्लोक 54 में भगवान कृष्ण ने स्वयं इस बात की पुष्टि करते हुये लिखा है- “अनन्य भक्ति से ही मुझे लोग प्रत्यक्ष देखते हैं। भक्ति से ही मैं बुद्धि प्रवेश करने योग्य बनता हूँ।”

ईश्वर-मुखी आत्माओं में जहाँ सूक्ष्म बुद्धि का विकास होता है और वे साँसारिक परिस्थितियों को साफ-साफ देखने लगते हैं वहाँ उनमें सर्वात्म-भाव भी जागृत होता है। इन्द्रियों से प्रतिक्षण उठने वाले विषयों के आकर्षणों में आनन्द की क्षणिक अनुभूति निरर्थक साबित हो जाती है जिससे शारीरिक शक्तियों का अपव्यय रुक जाता है। रुकी हुई शक्ति को आत्म कल्याण के किसी भी प्रयोजन में लगाकर उससे मनोवाँछित सफलतायें पाई जा सकती हैं। जिन लोगों ने संसार में बड़ी सफलतायें पाई हैं विश्वास के रूप में परमात्मा ने ही उन्हें वह मार्ग दिखाया और सुझाया है। निष्काम कर्म में प्रत्येक कर्म परमात्मा को समर्पित करना बताया जाता है उसमें भी यही तथ्य काम करता है कि मनुष्य प्रतिक्षण प्रत्येक कार्य में परमात्मा का अनुग्रह और अनुकम्पा प्राप्त करे। ईश्वर निष्ठ व्यक्ति के अन्तःकरण में उसकी सफलता का विश्वास अपने आप पर बनता है और इस तरह वैभव-विकास की परिस्थितियाँ भी अपने आप बनती चली जाती हैं। भूल दर असल यह हुई कि कुछ लोगों ने साँसारिक कर्तव्य पालन को तिलाँजलि देकर आत्म-कल्याण के लिये पलायनवाद का एक नया रास्ता खड़ा कर दिया। इससे लोगों में मतिभ्रम हुआ अन्यथा परमात्मा स्वयं अनन्य ऐश्वर्य से सम्पन्न है वह भला अपने उपासक को क्यों उस से विमुख करने लगा? ईश्वर उपासना से बौद्धिक सूक्ष्मदर्शिता की तरह अनवरत क्रिया-शीलता का भी उदय होता है। परिश्रम की आदत पड़ती है। पुरुषार्थ जगता है। इन वीरोचित गुणों के रहते हुये अभाव का नाम भी नहीं रह सकता । परमात्मा अपने भक्त को क्रियाशील बनाकर उसे संसार के अनेक सुख ऐश्वर्य और भोग प्रदान करता है। मनुष्य स्वयं बेवकूफी न करे तो वह चिरकाल तक उनका सुखोपभोग करता हुआ भी आत्म-कल्याण का लक्ष्य पूरा कर सकता है।

प्राचीन काल में एक साधारण गृहस्थ से लेकर राजे-महाराजे सभी ईश्वरनिष्ठ हुआ करते थे। इतिहास साक्षी है कि उस समय इस देश में आर्थिक या भौतिक सम्पत्ति की संकीर्णता नाम मात्र को भी न थी। ईश्वर-भक्ति के साथ उन लोगों ने परमात्मा की क्रिया-शक्ति को भी धारण किया हुआ था फलस्वरूप अभाव का कहीं नामोनिशान नहीं था। एक राजा जितना सुखी और सन्तुष्ट हो सकता था प्रजा भी उतनी सुखी और सम्पन्न होती थी। आत्म-कल्याण के लिये उन लोगों ने एक अवधि आयु निर्धारित कर ली थी तभी उसके लिये प्रस्थान करते थे। इसके पूर्व तक साँसारिक सम्पदाओं, सुख और ऐश्वर्य का पूर्ण उपभोग भी किया करते थे। यह स्थिति रहने तक हमारे देश में किसी भी तरह की सम्पन्नता में कमी नहीं रही।

जीव या मनुष्य परमात्मा का ही दुर्बल और विकृत भाव है। दरअसल जीव कोई वस्तु नहीं परमात्मा ही अनेक रूपों में प्रतिभासित हो रहा है। जब तक हमारी कल्पना जीव भाव में रहती है तब तक अपनी शक्ति और सामर्थ्य भी वैसी ही तुच्छ और कमजोर दिखाई देती है। ईश्वर भक्ति से कीट के अंग परिवर्तन जैसा प्रारम्भिक कष्ट तो अवश्यम्भावी है किन्तु जीव का विकास सुनिश्चित है। प्रारम्भ में वह स्वार्थ, परमार्थ, माया, ब्रह्म, लोक और परलोक की मोह ममता में परेशान रहता है। कीट जिस तरह भ्रमर का गुँजन पसन्द तो करता है किन्तु वह अहंभाव छोड़ने के लिये तैयार नहीं होता, उसी प्रकार जीव का अहंभाव में बने रहना प्रारम्भिक स्थिति है, उसके लिये जिद करना मचलना साधना की प्रारम्भिक अवस्था है। उसे पार कर लेने पर जब वह नितान्त ब्राह्मी स्थिति अर्थात् तदाकार में बदल जाता है तो उसका अहंभाव एक विशाल शक्तिमान् रूप में परिणत हो जाता है । वह अपने को ही ब्रह्म के रूप में देखने लगता है। “मैं ही ब्रह्म हूं” यह स्थिति ऐसी है जिस में जीव की शक्तियाँ विस्तीर्ण होकर ईश्वरीय शक्तियों में बदल जाती हैं।

और संसार में सुख स्वामित्व और विकास के लिये तीसरी वस्तु जो आवश्यक है वह शक्ति भी उसे मिलती है। शक्ति बुद्धि और साधन पाकर जीव दिनों दिन उन्नति की ओर बढ़ता जाता है। यह सही है कि परमात्मा-भाव अपने निश्चित समय में पकता है इसलिये फल देखने के लिये मनुष्य को भी निर्धारित नियमों और समय की प्रतीक्षा करनी पड़े किन्तु यह निश्चित है कि मनोवाँछित सफलता और जीवन विकास का अधिष्ठाता परमात्मा ही है । उसकी भक्ति के बिना वह सब उपलब्ध नहीं हो सकता जिसकी हम इस जीवन में कामना करते हैं।


सवित-आत्मा हमारी बुद्धि धारण करे

साधना से उदात्त जीवन की जो प्रेरणा और प्रखरता अन्तःकरण में आनी चाहिए वह नहीं आती तो परमात्मा का उपासक निराश होता है और साधना की व्यर्थता अनुभव करने लगता है। इस सीढ़ी पर पाँव रख कर आत्म-कल्याण के इच्छुकों को जानना चाहिए-देव शक्तियों और परमात्मा के जो सनातन नियम हैं उनकी अवहेलना करने की शक्ति उनमें भी नहीं है।

क्रमिक विकास ही वह नियम है जिस से हम संसार के कर्मफल में बँधे हुए हैं। एक माह तक कार्यालय में काम करने के बाद वेतन मिलता है, निश्चित मात्रा तक वाष्प और उष्णता ग्रहण करने के बाद ही इंजिन चलता है, गर्मियों में सूर्य जब अपनी प्रचण्ड ताप शक्ति से तप लेता है तब कहीं बरसात आती है। मनुष्य का जन्म भी क्रमिक विकास के इस सिद्धाँत से परे नहीं जा सकता। नौ माह दस दिन तक माँ के गर्भ में पकने के बाद ही धरती में आने का सौभाग्य उसे मिल पाता है।

बीच के समय प्रयत्न और आवश्यक तैयारी के होते हैं। जो लोग इस तैयारी में जितनी अधिक बुद्धि खर्च करते हैं, लगन और तत्परता व्यक्त करते हैं फल भी उन्हें वैसा ही स्वस्थ और परिपुष्ट मिलता है। अधीर, उद्विग्न, समय से पूर्व फल चाहने वालों को फल की प्राप्ति दूर, कई बार जोखिम में भी पड़ते देखा गया है।

शास्त्रकार ने अपनी इसी बात को एक किसान का उदाहरण देते हुए कहा-

क्षेत्रे बिना प्रयत्नेन वन्यतृण समुद्भवः॥

भूयो भूयाः कृषे पक्षे महानर्थाय जायते॥

“किसान खेत में बीज बोता है। पौधे उगते हैं। बीच में जंगली घास-पात बिना प्रयत्न के ही उग आती है वह कृषि को हानि पहुँचाती है।”

आत्म-विकास की उपासना भी ऐसी ही है। मनोभूमि पर पड़े हुए पूर्व जन्मों के दुर्गुणों कुविचारों के बीज बिना प्रयत्न अपने आप उगा करते हैं। कई बार तो मन की स्थिति ऐसी असमंजस पूर्ण बन जाती है कि पता भी नहीं चलता कि जिस कुविचार की कल्पना एकाएक सूझ पड़ी वह तो कभी मेरे द्वारा हो नहीं सकती थी। किन्तु वह किसी अज्ञात जन्म, पूर्व योनि की क्रियाओं का संस्कार होती है जिसे हम प्रत्यक्ष नहीं जानते पर वह हमें विचलित करती है। ऐसे समय मनुष्य क्या करें सूक्ष्मदर्शी शास्त्रकार ने उसका उपाय भी बताया है-

कृषकस्य प्रयत्नेन सावधानस्य नित्याशः।

वारणं क्रियते तेषाँ कृषे रक्षा च जायते॥

“चतुर किसान जानते हैं कि यह बिना प्रयत्न उगा हुआ खर-पतवार कृषि के लिये हानिकारक है अतएव वह नित्य नियमपूर्वक उनकी निराई करता रहता है।”

एवं चित्ते स्वभावेन नाना दुर्वासनोदयः।

जायमानो मनुषस्य क्लेश सन्ततिकारणम्॥

केवलं तत्र यत्नेन भूयोभूयः कृतैन वै।

निरोधः शक्यते कर्तुं तासामुन्मूलनं तथा॥

मनुष्य के चित्त में भी उसी प्रकार दुर्वासनाओं के अनेक खर-पतवार उगते रहते हैं जिनके कारण दुःख और क्लेश अनुभव होता है। इस स्थिति का निरोध किसान की तरह केवल बार-बार किये गये प्रयत्नों से ही सम्भव है। इनका उन्मूलन तो सावधानी से प्रयत्नपूर्वक ही किया जा सकता है।

प्रयत्नों को शास्त्रकारों ने चतुरता की संज्ञा दी हैं। उन्होंने केवल यही नहीं कहा कि जो लोग मन में पैदा हुई दुर्वासनाओं को प्रयत्नपूर्वक हटाते रहते हैं वही लक्ष्य तक पहुँच सकते है वरन् उसका संबल भी बताया है-

धीरैरुत्साहसम्पन्नैः श्रद्धाविश्वास धारिभिः।

कर्तु तत्पार्यते नैव संशयाविष्ट मानसैः।

“श्रद्धा और विश्वास को धारण करने वाले उत्साही धीर वीरों द्वारा ही दुर्वासनाओं और अमंगल विचारों का निरोध और उन्मूलन किया जा सकता है जिसके मन में संशय है, फल के प्रति आशंका रहती है वे इस कार्य में पिछड़ जाते हैं बीच में ही प्रयत्न छोड़ देते हैं।

श्रद्धा और विश्वास की शिक्षा किसान से पाई जा सकती है। किसान जानता है कि फल डालने के बाद फसल उगना अवश्यम्भावी है। फल की इसी सुनिश्चितता का नाम है विश्वास और विश्वास के प्रति आशा उत्साह आदि का नाम श्रद्धा है। केवल विश्वास ही पर्याप्त नहीं श्रद्धा भी होनी चाहिए। आशा और उत्साह बना रहता है तो फल की परिपक्वता, विश्वास की पुष्टि तक का समय सरल और सुरुचि पूर्ण बन जाता है। प्रयत्नों में मन लगा रहता है। कदाचित आधी फसल उग आने पर किसान कहे-मालूम नहीं फसल आयेगी भी या नहीं और इस संशय के साथ ही वह अपना प्रयत्न परित्याग दे तो फल की आशा नष्ट होगी ही अब तक का प्रयत्न भी निरर्थक चला जायेगा। दुबारा सफलता के लिये फिर एक नये सिरे से श्रीगणेश करना पड़ेगा।

इसमें कोई संदेह नहीं कि वासनायें और कुविचार क्षणिक होते हैं। देर तक चित्त में बने रहने वाले, सुख और आह्लाद देने वाले शुभ संकल्प और स्वस्थ विचार ही होते हैं। इसलिये किसी विधि उठने वाली दुर्वासनाओं को सफलता का संकेत मानकर संतोष तो करना चाहिए किन्तु उनके उन्मूलन में चतुर किसान की तरह सजग और जागरुक रहने वाले जीवन-साधक अन्त में सफलता का सुख पाते हैं।

तस्य देवस्य सवितः प्रसवानाँ य ईशिता।

प्रकाश प्रेरणाँ लब्ध्वा वस्तुतो जीवन प्रदाम्॥

नष्टा ये दुष्ट संस्कारास्तेषाँ खाद्येन नित्यशः।

सद्विचाराः प्ररोहन्ति शुभ संकल्प वारिणा॥

अन्त में शास्त्रकार ने कहा-सविता स्वरूप तेजस्वी परमपिता परमात्मा उन्हें अपना प्रेरणापुँज प्रतिदान कर सुखी बनाता है जो उसकी उपासना करते हैं। पर उसके लिये प्रयत्न की आवश्यकता है। इसी का नाम साधना है। अर्थात् जो लोग अपने शुभ संकल्पों को बढ़ाते हैं और दुर्वासनाओं को उनकी खाद बनाकर डालते जाते हैं अन्त में उनके प्रयत्नों की कृषि सफल होती है और सविता-आत्मा उनकी बुद्धि को धारण करते हैं अर्थात् उनको अपने ही समान प्रखरता और तेजस्विता से भर देते हैं।


बासा मन ताजा करो

बासी मन ताजा करो-

श्रावस्ती का मृगारि श्रेष्ठि करोड़ों मुद्राओं का स्वामी था। वह मन में अपनी मुद्रायें ही गिनता रहता था। उसे धन से ही मोह था। मुद्रायें ही उसका जीवन थीं। उनमें ही उसके प्राण बसते थे। सोते-जागते मुद्राओं का सम्मोहन ही उसे भुलाये रहता था। संसार में और भी कोई सुख है यह उसने कभी अनुभव ही नहीं किया ।

एक दिन वह भोजन के लिये बैठा। पुत्रवधू ने प्रश्न किया-’तात भोजन तो ठीक है न? कोई त्रुटि तो नहीं रही? मृगारि हँसा और कहने लगा- आयुष्मती! आज यह कैसा प्रश्न पूछ रही हो? तुम जैसी सुयोग्य पुत्रवधू भी कहीं त्रुटि कर सकती है, तुमने तो मुझे सदैव ताजे और स्वादिष्ट व्यंजनों से तृप्त किया है।

विशाखा ने निःश्वास छोड़ी, दृष्टि नीची करके कहा- आर्य ! यही तो आपका भ्रम है। मैं आज तक सदैव आपको बासी भोजन खिलाती रही हूँ। मेरी बड़ी इच्छा होती है कि आपको ताजा भोजन कराऊँ पर ऐषणाओं के सम्मोहन ने आप पर पूर्णाधिकार कर लिया है। खिलाऊँ भी तो आपको उसका सुख न मिलेगा। आपका जीवन बासी हो गया है फिर मैं क्या करूं?

मृगारि को सारे जीवन की भूल पर बड़ा पश्चाताप हुआ। अब उसने भक्तिभावना स्वीकार की और धन का सम्मोहन त्याग कर धर्म कर्म में रुचि लेने लगा।


मनोनिग्रह के लिये विचार, विवेक और वैराग्य

जिस प्रकार ज्ञान का कोई स्वरूप नहीं है वह मन की ही एक शक्ति है उसी प्रकार मन का भी कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है। इच्छा और विचार करने की शक्ति का ही नाम मन है। इसलिए मनोनिग्रह के लिये, मन को वश में रखने का सर्वोत्तम उपाय यह है कि उसे निरन्तर विचार निमग्न रखा जाय। एक विचार की दूसरे विचार से काट-छाँट और स्थानापत्ति की जाती रहे।

मन में अधिकाँश वही इच्छायें उठती हैं जो तात्कालिक या अल्प काल में ही सुख दे सकती हैं। इन्द्रियों के सुख उनमें प्रधान हैं। मनुष्य का मन जब तक इन नन्हीं-नन्हीं इच्छाओं में फँसा रहता है तब तक न उसकी शक्ति प्रकट होती है न मनुष्य जीवन की उपयोगिता, इसलिये यह आवश्यक है कि हम आध्यात्मिक जीवन का भी चिन्तन किया करें। वैराग्य ऐसे ही चिन्तन का नाम है जिसमें हम लोकोत्तर जीवन की कल्पना और सत्य जानने का प्रयास करते हैं। मन बुद्धि, चित्त आदि शक्तियाँ मिलीं भी मनुष्य को इसलिये हैं कि मनुष्य अपना पारमार्थिक उद्देश्य हल कर सके।

भगवान् कृष्ण ने भी गीता में वैराग्य को मनोनिग्रह का उपाय बताया है। महर्षि पतंजलि ने योगशास्त्र में “अभ्यास वैराग्याभ्याँ तन्निरोधः” “वैराग्याभ्यास से मन का निरोध होता है” यह सूत्र लिखा है। अभ्यास से उद्धत मन वश में होता है वैराग्य से उसे निर्मल, कोमल और शान्त बनाया जा सकता है।

हुआ यह कि हमने अपने जीवन को बहिर्मुखी बना लिया है। उतना ही सोचते हैं जितना व्यक्त है, दिखाई देता है, पर बहुत कुछ ऐसा भी है जो दिखाई नहीं देता पर उसका स्वरूप है। वह शाश्वत सत्य भी है। अनेक वस्तुयें ऐसी हैं जिनसे इस जीवन में वैभव और इन्द्रिय भोग का सुख दिखाई देता है। पर जन्म-मरण का भय, प्रियजनों का विछोह, खाँसी, बुखार-बीमारी, कटुता-कलह, अत्याचार, भय विद्वेष प्राकृतिक प्रकोप यह सब मनुष्य के बहिर्मुखी जीवन का गतिरोध करते हैं, आवश्यक है कि इनसे मनुष्य क्षुब्ध हो और दुख अनुभव करे। इन सम्पूर्ण अभावों से परे जो सनातन आनन्द की स्थिति है वह कैसे प्राप्त हो? जन्म मृत्यु का बन्धन और भय कैसे मिटे? शरीर से परे यह जो आत्मा है जो चलता, हिलता, डुलता बोलता है उसकी उपलब्धि कैसे हो ? यह ऐसे प्रश्न हैं जिन पर विचार करके मनुष्य अपने मन को अंतर्मुखी बना सकता है। वैराग्य का यही स्वरूप भी है कि मनुष्य जितना लौकिक सुख साधनों का चिंतन करता है उससे अधिक अमरत्व का शाश्वत सुख और सनातन स्वरूप का भी चिन्तन करे।

आध्यात्मिक चिंतन आत्म-कल्याण के लिये उपयोगी ही नहीं आवश्यक भी है। किन्तु लौकिक वासनायें और इच्छायें भी तो इतनी जल्दी नहीं मिटतीं। ईश्वर का भजन करने बैठिये, हाथ चलेगा, माला घूमेगी, मन्त्र जाप भी होगा किन्तु मन जिसे ईश्वर के प्रकाश की ओर गमन करना चाहिये था वह तो बार-बार अपनी प्रिय वस्तुओं, ऐच्छिक इन्द्रियों के विषय भोगों की और लपटें लेगा। कठोर संयम और तितिक्षाओं से मन को दण्डित कर इस तरह भटकने से रोकने का भी विधान है किन्तु जिस प्रकार दंड से जानवर और भी क्रुद्ध और हिंसक बनते हैं, उसी प्रकार मन भी चोट खा कर विद्रोह करता है। मन वस्तुतः हमारा शत्रु नहीं है उसे यदि पुचकार कर मित्रतापूर्वक सलाह दी जाये अर्थात् प्रेमपूर्वक यह बताया जाये कि-”भाई-यह ऐन्द्रिक सुख तुम कब तक भोग सकोगे? कब तक क्रोध, मोह, लोक संग्रह, व्यभिचार और अनाचार में पड़े रहकर अपने लिये दुःख की फसल बोते रहोगे? भाई, कुछ ऐसा काम करो जिससे पद-पद पर होने वाली ईर्ष्या, अपमान, शोक-बीमारी, कलह की कुँठाओं से छुटकारा मिले। आखिर यह जीवन भी कितने दिन चलेगा ? यह युवावस्था कब तक रहेगी ? शरीर ढलेगा ही, मृत्यु होगी ही। क्यों न अमरत्व की प्राप्ति के लिये प्रयत्न करें क्यों न अपने को परमात्मा की प्राप्ति की दिशा में अग्रसर करें। “

यह विचार मन के समर्थन में न आयें ऐसा सम्भव नहीं। मन जैसा मित्र नहीं। आखिर वह भोग भी तो आत्मतृप्ति के लिये ही करता है। जितना ज्ञान, विवेक और विचारशक्ति होती है उतने क्षेत्र में वह आत्म-सुख ही तो ढूंढ़ता है। यदि अपना ज्ञान बढ़ाकर उसे बड़े सुख, उच्च आध्यात्मिक लक्ष्य का ज्ञान कराया जा सके तो वह उधर भी हँसी-खुशी-से चल देगा। स्वामी विवेकानन्द, रामतीर्थ, शंकराचार्य, दयानन्द आदि को भी उत्कृष्ट जीवन की ओर प्रेरित करने वाले उनके मन ही थे। मनोबल जगाया जा सके उसे मित्र बनाया जा सके तो जो काम कठिन तपश्चर्या से सम्भव नहीं हो पाता वह क्षण भर में मन के सहयोग से सफल हो सकता है।

अवगुणी मन को सद्गुणी बनाने के लिये विवेकशील होना आवश्यक है। विचार, विवेक और वैराग्य वस्तुतः एक ही क्रम की अनेक शृंखलायें हैं। विचार का अर्थ है मन को स्थिर न रहने देना आलसी न होने देना। जब वह स्थिर होता है तभी भोग की, काम की इच्छा जागती है। इसलिये एक पर एक विचार उठाना चाहिये। यह सम्भव नहीं कि अधिक अभ्यास से पूर्व ही मन में अच्छे विचार आने प्रारम्भ हो जायें। अब तक जैसा जीवन क्रम रहा है और पूर्व जन्मों में जो प्रवृत्तियाँ रही हैं वह भी दबाये नहीं दबतीं पर उन्हें काटा आसानी से जा सकता है। अच्छे विचारों का ग्रहण और बुरों का त्याग यही विवेक है। मुझे यहाँ से चल कर अमुक स्थान पर भोग भोगना चाहिये, यह एक विचार हुआ। यदि उसे स्वतन्त्र रखा जाता तो वह उसी दिशा में कल्पना करता-उस स्थान तक इतने समय में पहुँचना है, यह वस्तु वहाँ मिलेगी, यह आवश्यक होगी......तब यह भोग उपलब्ध होगा आदि। पर यदि मूल विचार के साथ ही रुख बदल दिया जाये तो मन का बुराई से बचना संभव हो जाय। वहाँ सोचना चाहिये- “उससे यह बीमारी सम्भव हो सकती है। स्वास्थ्य गिरेगा, धन व्यय होगा, तो दूसरे आवश्यक कार्यों में परेशानी आयेगी, उसकी अपेक्षा यह थोड़ा सा समय है इसे क्यों न किसी उत्पादक कार्य में लगायें? घर की, कपड़ों की सिलाई कर डालें, बागवानी करें, कोई उद्योग करें आदि। रचनात्मक दिशा में जब मन काम करने लगता है तो ऐसी अनोखी बातें सूझती हैं कि आश्चर्य होता है। दरअसल लोग मन की ताकत को पहचानते नहीं अन्यथा यदि उसे रचनात्मक दिशा दी जा सके तो आर्थिक औद्योगिक, शिक्षा रोजगार अथवा नेतृत्व की दिशा में वह अनोखी सफलतायें और चमत्कारी उपलब्धियाँ प्रस्तुत कर सकता है।

आपका मन सोया पड़ा है इसे सावधान कर दें, जगा दें। रचनात्मक विचारों की चिल्लाहट से इसे शान्त न होने दो यह आपके लिये वह भौतिक सफलतायें भी प्रस्तुत करेगा जिनकी आप इस जीवन में कामना करते हैं।

विचार और विवेक की इसी दिशा को जब आत्मा के रहस्य अनुभव करने की ओर संयोजित कर दिया जाता है तो वैराग्य का अभ्यास होने लगता है। अंतर्जगत में जो प्रक्रियायें चला करती हैं बाह्यजगत में उन्हीं को मन क्रियान्वित किया करता है। मनुष्य यदि यह जान ले कि बाह्य जगत के हमारे समस्त प्रयास मनोजगत की प्रेरणा से हमारे अहंकार को सक्रिय करने का ही परिणाम है, तो यह एक बहुत बड़ी बात होगी। इतना आभास होते ही मन और अहंकार एक तमाशे जैसे दिखाई देने लगते हैं, और एक तीसरी सत्ता की अनुभूति होने लगती है। मन का बिचौलियापन सिद्ध हो जाये तो फिर यह समझते देर न लगे कि हम आत्मा हैं और शरीर धारण का हमारा लक्ष्य भिन्न है। यह भिन्नता का भाव ही महत्व का है।

वह तत्व हमारे अन्दर बैठा है जिसके न रहने पर यही शरीर शव कहलाने लगता है। यह तत्व ही आत्मा है, चाहें तो इसे ही परमात्मा कह सकते है। विचार और विवेक द्वारा जब उसकी अनुभूति हो जाय तो साँसारिक तृष्णाओं, इच्छाओं और धारणाओं को हटाकर तत्व चिंतन की दिशा में अग्रसर करने का अभ्यास किया जा सकता है। जितना प्रखर यह अभ्यास होगा वैसा ही वैराग्य पारलौकिक जीवन के प्रति संवेदना का भाव भी जागृत होने लगेगा। जब यह सिद्ध हो जायेगा, मन यह स्वीकार कर लेगा कि परलोक ही सत्य है, आत्मा ही अमरत्व है तो फिर मन से झंझट करने की आवश्यकता ही न रहेगी, वह आपका मित्र बन जायगा।


सुखी जीवन की कुँजी-सुनियोजित जीवन

पड़ोस में दो व्यक्तियों के मकान हैं। एक साधन सम्पन्न व्यक्ति है। नाम है सम्पतलाल। दूसरा एक कचहरी में काम करने वाला क्लर्क जीवनदास। इनको वेतन के रूप में कुल 120) मिलते हैं। सम्पतलाल की बहुत बड़ी टाइप फाउंड्री है। कई हजार मासिक की आमदनी है।

अन्तर हर पड़ोसी-पड़ोसी में रहता है। कोई धनी कोई निर्धन, किसी के पास विद्या अधिक, कोई बुद्धिहीन, कोई अपने साधन पर निर्वाह करता है, किसी ने उधार खाने की आदत डाल ली है। किसी का स्वास्थ्य बहुत अच्छा है कोई खा-पीकर भी दुबला है। विविधता पूर्ण संसार है यहाँ व्यक्ति-व्यक्ति में अन्तर स्वाभाविक है।

जीवन विकास के लिये यह जरूरी है कि प्रत्येक व्यक्ति अपनी विशिष्टता को बढ़ाकर अपना ऐसा विकास करे कि वह अपना, आश्रित परिजनों का जीवन उत्कृष्ट श्रेणी का बनाता हुआ मानवीय उद्देश्य की प्राप्ति के लिये अग्रसर होता चले। इस जीवन की शान्ति ही पारलौकिक शान्ति है, इस जीवन का सन्तोष ही पारलौकिक संतोष है। इस जीवन का सुख ही पारलौकिक सुख है, इसलिये स्वर्ग पाना है तो इसी जीवन को स्वर्ग बना लो। अधःपतित स्थिति में तो आगे की बात कौन कहे यही जीवन नरक तुल्य होता है।

इन दोनों स्थितियों का तुलनात्मक अध्ययन करने के लिये सम्पतलाल और जीवनदास का उदाहरण प्रस्तुत करना पड़ा। सम्पतलाल की बड़ी हवेली है। बैंक में पैसा जमा है, और भी सब साधन मुहैया हैं, यदि कोई वस्तु उनके घर में नहीं है वह है सुख-शान्ति और संतोष।

जीवनदास के घर में भी लगभग उतने ही आदमी हैं। बैंक में पैसे नहीं जमा। घर भी बहुत साधारण श्रेणी का है। एक लड़का दो लड़कियाँ पढ़ती भी हैं। कभी पूछो- “जीवनदास कुशल-मंगल तो है?” तो एक ही उत्तर मिलता है-”खूब आनन्द से जिन्दगी कट रही है, बच्चे सुखी हैं, किसी का लेना नहीं देना नहीं।”

सौभाग्यजनक स्थिति में दुर्भाग्य और अभावग्रस्त स्थिति में आनन्द इन दोनों बातों का अन्तर काफी दिन बाद समझ में आया। सो भी जीवनदास के मुख से सारी बात मालूम हुई। एक दिन उसी से पूछ लिया-क्यों जी-जीवन बाबू तुम कहते हो हम बड़े सुखी हैं, तब जबकि आमदनी कम है और यह सम्पतलाल तो पूरे सम्पतलाल हैं, फिर इनके घर हाय-तोबा मचा रहता है यह क्यों?

जीवनदास हँस कर बोले-उनके यहाँ सब स्वतन्त्र हैं, परम स्वतन्त्र। वैसे ही उन सबकी इच्छायें और वृत्तियाँ स्वतन्त्र हैं। सब मनमाना पैसा पाते हैं और उसे जी चाहे जहाँ खर्च करते हैं। आर्थिक नियंत्रण न होने से बच्चे बिगड़ गये हैं, रोज एक टंटा मोल ले आते हैं, स्त्रियों में परस्पर अधिकार के लिये झगड़ा होता है। सम्पतलाल समझते हैं कि वह करोड़ों कमा कर अपना कर्तव्य पूरा कर रहे हैं पर उनका किसी पर कोई नियंत्रण नहीं। सच पूछो तो वे -घर के लोग कहाँ जा रहे, क्या कर रहे हैं, इसका भी कुछ पता नहीं रखते।

रही अपनी बात, सो जितनी आय उतना व्यय। बच्चों को 1) तब देते हैं जब पिछले एक रुपये का हिसाब मिल जाता है। बच्चे भी नई कापी तब खरीदते हैं जब पुरानी खतम हो जाती है। बाजार में खाने-पीने की आदत डाली नहीं, जो कुछ बनता है चौके में बनता है और सब लोग वहीं बैठ कर बराबर खा लेते हैं। सब एक दूसरे के हित और आवश्यकताओं का ध्यान रखते हैं। अब आप ही बताइये हमारे घर क्यों ऊधम होने लगा? सब अपने-अपने काम से लगे हैं।

दोनों व्यक्तियों के रहन-सहन और परिस्थितियों की तुलना करने के बाद हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि सुखी जीवन के लिये प्रत्येक वस्तु का योजना पूर्वक उपयोग आवश्यक है। नियन्त्रण और सुचारु रूप से बरती थोड़ी सी वस्तु, साधारण सी स्थिति भी यथेष्ट सुख और आनन्द दे सकती है जब कि अनियंत्रित, आयोजनाबद्ध बड़े लाभ बड़े काम उतने ही दुःखदायी होते हैं।

मनुष्य जीवन एक बौद्धिक कला है, जिसे सम्पन्न करने के लिये परमात्मा ने अनेक आवश्यक और उपयोगी शक्तियाँ दी हैं। शक्ति का योजना पूर्वक अपनी व दूसरों की भलाई में उपयोग करने की कला जिसे आ जाती है वह थोड़े से साधनों में भी आनन्द लाभ प्राप्त कर सकता है, जीवन को सफल और सार्थक बना सकता है।

जो लोग साधारण परिस्थितियों से उठकर बड़े व्यवसायी, सफल नेता अथवा महान् व्यक्ति बने हैं उनके जीवन में आत्म-शक्तियों के सुनियोजित व्यवहार ही ऊपर उठने के आधार रहे हैं। जिन लोगों ने सफलता के मद में आकर उन आधारों को छोड़ दिया है वे उच्च स्थिति से गिर कर बिल्कुल चकनाचूर भी हो गये हैं। जीवन का सनातन नियम है अपनी शक्तियों को सही दिशा में योजनापूर्वक उपयोग कर आगे बढ़ना। उसी का उल्टा रूप असन्तोष, अशान्ति, फूट-कलह, कटुता और नरक के रूप में प्रस्फुटित और परिलक्षित होता है।

जरूरत से अधिक पैदा करना, बुरा नहीं। अपनी स्थिति से औरों की स्पर्धा कर आगे बढ़ना भी बुरा नहीं। आज की अपेक्षा कल का जीवन अधिक सुखद सुरुचिपूर्ण रहे यह तो ठीक है पर यह ध्यान प्रतिक्षण रहे कि गतिविधियों का संचालन करने वाला स्टियरिंग-अपना सन्तुलन न बिगड़ने दें। निर्माण से अधिक खर्च और आवश्यकता से अधिक उपभोग की आदत ही मनुष्य को दुःखद स्थिति में पहुँचाती है। उसके लिये सम्पतलाल और जीवनदास दोनों एक जैसे हैं। जो उस नियम पर चलेगा सुखी रहेगा, इसके विपरीत चलने वाला कष्ट भोगेगा, कलह में पड़ा रहेगा।

हमारा एक उद्देश्य होना चाहिये-आत्मोन्नति। आत्मोन्नति बड़ा व्यापक शब्द है आत्मोन्नति का भाव अपने आप तक ही सीमित नहीं, वह सार्वभौमिक हित का बोध कराता है। हम अपना ध्येय अपना तथा औरों का हित करना बना लें और फिर यह सोचते रहें कि उस ध्येय की सिद्धि कैसे हो ? इसी विचार को यदि कार्य रूप में परिणत करते समय इतनी योग्यता और प्राप्त कर ली जाय कि उसका सुव्यवस्थित ढाँचा क्या हो तो फिर मार्ग और साधन अलग-अलग होते हुये भी सुखी जीवन जिया जा सकता है। जीवन दास के जीवन में यही विशेषता है जब कि सम्पतलाल के जीवन में शेष सब कुछ है, नियोजन नहीं है इसी से उनका जीवन असफल और दुःखी है।

जीवन विकास के लिये हमें जीवन दास की तरह सुनियोजित और सुव्यवस्थित जीवन जीना चाहिए। सुखी जीवन की यह व्यावहारिक कुँजी है।


Quotation

सेवा, दिखावटी न हो :-

बहुत से आदमी हर समय सेवा का अभिनय करते रहते हैं, वे अपना सब कुछ परोपकार में लगा देते हैं, किन्तु अपने मन को चुराये रहते हैं, तो क्या उनको सच्चा परोपकारी, परसेवी कहा जायेगा? विश्वस्त माना जायेगा? ऐसे व्यक्ति ठीक वैसे ही सेवक होते हैं; जैसे किसी नाटक में सेवा का पार्ट करने वाले। किसी काम में केवल अभिनय कर देने भर से ही प्रयोजन सिद्ध नहीं होता ।

मानो किसी राजा का एक हाथी रणभूमि में जाकर अपनी पूँछ, दाँत और पैरों से तो काम लेता है किंतु अपनी सूंड को मुँह में छिपाये रहता है तो क्या उसकी सेवा भावना विश्वस्त कही जायेगी? इसी प्रकार यदि कोई मन को छिपाकर अपने सर्वस्व से कितना किसी की सेवा करता हो किंतु सच्चा सेवक अथवा परोपकारी नहीं कहा जा सकता।

अन्य भाव से किया हुआ कोई भी पुण्य कार्य सिद्ध नहीं होता ।

-आनन्दमयी माता


कल्याण धर्माचरण से ही होगा।

मानव जीवन का लक्ष्य अक्षय सुख प्राप्त करना है। जीवन के सारे उपक्रम तथा कार्यक्रम इसी अक्षय सुख प्राप्त करने के प्रयास हैं। मनुष्य जो कुछ करता है वह किसी न किसी रूप में इसी सुख को पाने के लिये करता है । जान अथवा अनजान उसका कोई भी काम, मानसिक अथवा शारीरिक उद्देश्य के अंतर्गत होता है। यहाँ तक कि वह दुःख तक इसी सुख को पाने के मन्तव्य से उठाया करता है।

सुख-शान्ति की आवश्यकता मनुष्य की एक विशिष्ट वाँछा है जो उसके हृदय में स्वयंभू रूप में उत्पन्न होती है। यह आत्मा की सहज स्वाभाविक जिज्ञासा है। सुख-शाँति की स्थिति में ही आत्मा का विकास होता है। उसी स्थिति में वह अपने अंशी परमात्मा की ओर उन्मुख होती और उससे सायुज्य की क्षमता पाती है।

मानव जीवन में जब तक शाँति का अभाव रहता है, उसकी शक्तियाँ अस्त-व्यस्त रह कर क्षीण होती रहती हैं। वाँछित दिशा में उनका कोई उपयोग नहीं हो पाता। मनुष्य जीवन का यह अवसर जिसमें कि प्रभु की प्राप्ति की जा सकती हैं यों ही व्यर्थ नष्ट हो जाता है और वह संसार के बन्धनों, उसके दुःख-द्वन्द्वों तथा शोक-सन्तापों से मुक्त नहीं हो पाता ।

जीवन विकास अथवा आध्यात्मिक उन्नति के लिये मानसिक स्थिरता, मस्तिष्कीय सन्तुलन आत्म-प्रसन्नता की आवश्यकता होती है। वह अशाँति की स्थिति में पूरी नहीं की जा सकती । जो मानसिक संघर्ष में फँसा है, मोह-माया से संत्रस्त है, कामनाओं तथा वासनाओं के बन्धन से ग्रसित है वह पारलौकिक तो क्या लौकिक उन्नति भी नहीं कर सकता। किसी प्रकार की उन्नति के लिये शाँतिपूर्ण स्थिति अनिवार्य रूप से अपेक्षित है।

संसार में कितना ही क्यों न भटका जाये, कितनी ही विषय-वासनाओं का भोग क्यों न किया जाये और कितने ही तथाकथित सुख-साधन क्यों न इकट्ठे कर लिये जायें किन्तु मनुष्य उस अक्षय सुख-शाँति को प्राप्त नहीं कर सकता जो उसका वास्तविक लक्ष्य है । वह सुख और वह शाँति जो मनुष्य का वास्तविक लक्ष्य है और जिसे पाने के लिए वह सतत प्रयत्न करता रहता, पर पा नहीं रहा है, इन भौतिक साधनों अथवा उपकरणों में नहीं है। उसका निवास केवल उस एक परमात्मा में है जो कण-कण में व्याप्त, मनुष्य में आत्मा रूप से स्थित और सचराचर जगत को अपनी सत्ता से आलोकित करता है। जो स्पष्ट एवं ज्ञातव्य है, पर मनुष्य अपने अज्ञानवश न तो उसे देख पा रहा है और न अपने में अनुभव कर पा रहा है।

परमात्मा को पाना ही अक्षय सुख-शाँति को पा लेना है। परमात्मा के साथ एकात्मता प्राप्त कर लेने पर मनुष्य के वर्तमान तथा विगत के सारे शोक-सन्तापों, माया-मोह, वासना एवं कामनाओं का समूल विनाश हो जाता है। उसे किसी प्रकार का कोई दुःख नहीं रहता । दुःखों का विनाश हो जाने पर आत्मा में अपरिमित आनन्द और शिवत्व का समावेश हो जाता और एक अक्षय एवं अस्थायी सुख-शाँति के अतिरिक्त कुछ भी नहीं रहता। इस प्रकार की ब्राह्मी स्थिति में पहुँचा मनुष्य संसार में बर्तता हुआ भी न तो किसी कर्म का भोगी बनता है और न किसी दुःख का कोई कारण उसे प्रभावित कर पाता है। मंगलमय आनन्द से ओतप्रोत वह आजीवन सुख-शाँति पाने के लिए मनुष्य को उक्त ब्राह्मी स्थिति प्राप्त करने का प्रयत्न करना चाहिये।

अक्षय सुख-शाँति की प्रदायिनी, ब्राह्मी स्थिति को पा सकने का केवल एक ही मार्ग, एक ही उपाय है, और वह है ‘धर्माचरण’। शास्त्रोक्त धर्म का देश काल तथा अवस्था स्थिति के अनुसार आचरण करते रहने वाला एक दिन निश्चय ही इस ब्राह्मी स्थिति को प्राप्त कर लेता है, इसमें किसी प्रकार का सन्देह नहीं है।

धर्म को ब्रह्म का सक्रिय स्वरूप कहा गया है। जो धर्मविद् है वह ब्रह्मविद् है। धर्म को जान लेने पर ब्रह्म का ज्ञान आप से आप हो जाता है। “ब्रह्मविद् ब्रह्मैव भवति” अर्थात्-ब्रह्म का जानने वाला ब्रह्म ही हो जाता है। इसी भाव की अभिव्यक्ति गोस्वामी तुलसीदास की इस पंक्ति में है-”जानति तुम्हें तुम्हहि हुई जाई।” अक्षय सुख-शाँति, अपरिच्छिन्न आनन्द और दुःख रहित अवस्था को पाने के लिये ब्रह्म को जानना चाहिये, फिर चाहे उसे सर्व व्यापक परमात्मा के रूप में जाना जाये, अथवा अंतस्थ आत्मा के ज्ञान रूप में, तो उसका सरल सा उपाय यही है कि धर्म का सच्चा स्वरूप जान कर उसका यथोचित आचरण किया जाये ।

प्राचीन ऋषि-मुनियों ने इसी धर्म का धारण एवं आचरण कर शारीरिक अवस्था में ही ब्राह्मी पद को प्राप्त किया है। देह के अक्षत रहते मोक्ष का आनन्द अनुभव किया है। संसार में रहते और बर्तते हुए भी वे न तो कर्मगति से प्रभावित होते थे और न दुःखद स्थिति से । धर्माचरण करने से ही वे इस योग्य हो सके थे कि संसार बंधन से मुक्त होकर स्वयं तो तर ही जाते थे साथ ही दूसरों को भी तार सकते थे ।

धर्म का स्वरूप दुःसाध्य अथवा दुर्बोध नहीं है। जो उसे कठिन अथवा दुष्कर समझते हैं वे भ्रम में हैं। धर्म जीवन का सबसे सरल, सुखदायक तथा निरापद मार्ग है। इसको असाध्य कहने वाले अपने मन की दुर्बलता ही व्यक्त करते हैं अथवा यह प्रकट करते हैं कि उनमें धर्म के प्रति उतनी जिज्ञासा नहीं है जितनी कि विषय-वासनाओं के प्रति आसक्ति !

सदाचार धर्म का बाह्य स्वरूप है और सद्भाव उसका आन्तरिक स्वरूप है। सज्जनता, साधुता, सरलता, सादगी, सहानुभूति, संवेदना, सहिष्णुता, दया, क्षमा, करुणा आदि वे अनुभूतियाँ हैं जो धर्म का भावनात्मक अथवा आन्तरिक स्वरूप कहा जा सकता है। और सेवा, श्रम, परोपकार, परमार्थ आदि धर्म का क्रियात्मक अथवा बाह्य स्वरूप है। अपने, अपने में धर्म के यह दोनों स्वरूप अपूर्ण हैं। इन दोनों के समन्वय से ही धर्माचरण में पूर्णता आती है। किसी को दुःखी अथवा कष्ट में देख कर हृदय में वेदना होती है, उसके प्रति सहानुभूति तथा संवेदना का उद्वेग होता है, पर यदि कोई उस दुःखी जन की यथासम्भव अथवा यथासाध्य सहायता नहीं करता केवल अन्दर ही अन्दर दुःख पा सकता है तो वह धर्म का अपूर्ण आचरण करता है। किन्तु यदि वह संवेदना के साथ उसकी कुछ सहायता करता है, फिर चाहे वह आश्वासन अथवा ढाढ़स के रूप में ही क्यों न हो तो वह पूर्ण धर्म का आचरण करता है। इसी प्रकार यदि कोई असद्भावना, अहंकार अथवा प्रदर्शन के लिये किसी की सहायता तो करता है, कोई उपकार कार्य पूरा कर देता है पर हृदय में दुःखी जन के लिये सच्ची सहानुभूति नहीं है तो वह अपूर्ण धर्म का आचरण करता है । पूर्ण धर्म का आचरण भावना तथा क्रिया दोनों के समन्वय से ही हो सकता है।

धर्म में पूजा-पाठ तथा भगवत् भजन का सन्निवेश तो इस मन्तव्य से आवश्यक माना गया है कि इससे मनुष्य के हृदय में सद्भावनाओं का उदय होता है, उसकी आत्मा का विकास होता और उसकी प्रवृत्तियाँ परमार्थमुखी होती हैं। पूजा-पाठ साधन मात्र ही है साध्य नहीं। केवल पूजा-पाठ करते रह कर, कोई परोपकार अथवा परमार्थ का काम न किया जाय, समाज, राष्ट्र अथवा व्यक्ति की कोई सेवा-सहायता अथवा सहयोग न किया जाये तो इससे उस धर्माचरण का प्रतिपादन नहीं हो सकता, जिसकी, मनुष्य जीवन के लक्ष्य अक्षय सुख शाँति पाने के लिए आवश्यकता है ।

अक्षय सुख-शाँति अथवा ब्राह्मी स्थिति प्राप्त करने के लिए भगवत् भजन द्वारा अपनी प्रवृत्तियों को ऊर्ध्वमुखी बना कर, अपनी भावनाओं को परमात्मा में समाहित कर तदर्थ कर्म करते हुये इस प्रकार बरता जाना चाहिये जिससे बाहर से स्वार्थ जैसे दीखने वाले काम तक परमार्थ का स्वरूप बन जायें । नित्य प्रति अपनी सामर्थ्य एवं स्थिति के अनुरूप मन, वचन, कर्म , अथवा तन, मन, धन से कोई न कोई परोपकार अथवा पर-सेवा का काम किया जाये। अनासक्त भाव से अपनी सामान्य क्रियाओं को परमात्मा के प्रति पवित्र मन से करते रहने से निःसन्देह उस धर्माचरण की सिद्धि हो सकती है जो अक्षय सुख-शाँति के लिये आवश्यक है और जिसे किया ही जाना चाहिये।


हमारी आध्यात्मिक क्राँति और प्रबुद्ध व्यक्ति

स्वाधीनता प्राप्ति के बाद से ही भारतवर्ष में भी समाज-परिवर्तन की चर्चा तेजी से होने लगी है। बुद्धि-विनियोग से लेकर शिक्षा-पद्धति, रहन-सहन, आचार-विचार आज सभी अपभ्रंश दिखाई दे रहे हैं। कानूनी ढाँचा , आर्थिक स्तर, औद्योगिक उन्नति के सभी क्षेत्र विश्रृंखलित दिखाई दे रहे हैं, वैसे ही हमारी नैतिक प्रवृत्तियों में भी निरन्तर ह्रास हो रहा है। जहाँ व्यक्तिगत चरित्र दूषित हुये हैं वहाँ राष्ट्रीय आचरण भी पिछले बीस वर्षों में गिरा ही है ।

समाज की सभ्य और सुसंस्कृत रचना प्रबुद्धवर्ग के व्यक्तियों के हाथों ही सम्पन्न होती है , होनी है , पिछले लेख में यह स्पष्ट हो चुका है। ऐसी जन-क्राँतियाँ भारतवर्ष में पहले भी हो चुकी हैं। यह कोई अनहोनी बात नहीं होने जा रही। बुद्ध, राम, कृष्ण, स्वामी विवेकानन्द, स्वामी दयानन्द के काल में ऐसी क्राँतियाँ हुई और सामाजिक स्वरूप परिवर्तित हुआ। इतिहास उसकी पुनरावृत्ति करना चाहता है।

शिक्षित और विचारशील व्यक्तियों के संगठित प्रयत्नों के फलस्वरूप सोवियत-संघ, अमेरिका, क्यूबा, चीन, जापान में आर्थिक, औद्योगिक, वैज्ञानिक, शैक्षणिक, साँस्कृतिक क्राँति के मुख्य उद्देश्य पर काम करना सम्भव हो सका तो भारतवर्ष में भी वैसी क्राँति लाई जा सकती है। योजनाबद्ध क्रियाशीलता समाज के प्रबुद्ध व्यक्तियों के हाथ सौंप कर, उन्हें उद्देश्यपूर्णता का बल देकर समाज के रुग्ण रोग का उपचार किया जा सकता है, उसके लिए जन-मानस बन भी रहा है।

स्वाधीनता संग्राम भी इन्हीं परिस्थितियों में लड़ा गया था। काँग्रेस आज देश की सर्वोच्च शक्तिशाली पार्टी के रूप में देश भर में कार्य कर रही है, वह भी थोड़े से प्रबुद्ध व्यक्तियों के संगठन पर इतना विशाल आकार ग्रहण कर सकी। इतिहास प्रसिद्ध घटना है कि इटावा के कलक्टर सर ह्यूम ने जब काँग्रेस की नींव रखी थी तो उसके सदस्यों की जनसंख्या उँगलियों पर गिने जाने से भी कम थी, पर वह सभी विचारशील व्यक्ति थे, विचारों की आग फैलाकर ही इन थोड़े से लोगों ने एक विशाल संगठन पैदा कर लिया और राष्ट्र के राजनैतिक ढाँचे को बदल डाला।

अब जो परिस्थितियाँ अवशेष हैं उनमें आर्थिक और औद्योगिक युद्ध राजनैतिक स्तर पर लड़ा जा रहा है, प्रबुद्ध व्यक्तियों का एक बड़ा वर्ग उधर खिंच गया है। थोड़े से ऐसे कर्मठ व्यक्ति चाहिये जो राजनैतिक दिशा से मुख मोड़ कर अपनी नेतृत्व शक्ति का उपयोग जौन गार्डनर, बौव वुड, चार्ली हौर, कोन्सतान्तित-त्सियोल्कोव्स्को, इवान पावलोव, सनयात सेन और कागावा की तरह नैतिक, साँस्कृतिक और सामाजिक क्राँतियों में कर सकें। प्रभावशील जन नेतृत्व और प्रबुद्ध व्यक्तियों के संगठित प्रयास राष्ट्र के वर्तमान ढाँचे को बदल डालने के लिए काफी हैं।

किन्तु इस घोषणा से पूर्व हमें भारत की विशिष्ट परम्पराओं, संस्कारों एवं मनोवृत्तियों का विस्तृत अध्ययन करना आवश्यक है। काँग्रेस ने राष्ट्र की उन्नति के लिए महत्वपूर्ण प्रयास किये हैं किन्तु उसकी प्रतिष्ठा गिर रही है, इसका एक कारण है। वह यह कि- उसने देशवासियों के संस्कार और उनकी मनोवृत्ति को नहीं समझा या समझने की चेष्टा नहीं की। जो पार्टियाँ विजयी हो रही हैं उनमें जिनका भविष्य उज्ज्वल है वे ऐसी ही होंगी जिन्होंने यहाँ की आत्मा का गहन अध्ययन किया होगा।

धर्म और अध्यात्म भारत की आत्मा है, प्राण है, सर्वस्व है। स्वामी विवेकानन्द ने कहा था-”मैं तुम्हारी बात जानता हूँ, नास्तिकों जैसी बात कर के भी तुम धर्म को नहीं ठुकरा सकते क्योंकि वह तुम्हारे संस्कारों में बस गया है।”

राजनीति हो अथवा शिक्षा-नीति हमारी मनोवृत्ति दार्शनिक है। हम धर्म और अध्यात्म को जीवन का पूर्ण उद्देश्य मानते हैं अन्य किसी भी लक्ष्य के लिये उसे ठुकरा नहीं सकते। कोई भी सामाजिक क्राँति लाने के लिये इस मनोवृत्ति का ज्ञान होना परम आवश्यक है। राजनीतिक क्राँति भी महात्मा गाँधी के आध्यात्मिक मार्गदर्शन के साथ-साथ चल सकी थी। उसे हरगिज नहीं छोड़ा जा सकता क्योंकि हमारी हर साँस धर्म है, हम धर्म खाते हैं, धर्म कमाते हैं, सोने, उठने, बैठने, बोलने पढ़ने का सारा विकास क्रम धार्मिक मनोभूमि पर टिका है। तो फिर उसे छोड़ा नहीं जा सकता । हमारा अस्तित्व ही धर्म है यों मानना चाहिये ।

इसलिये भावी सामाजिक क्राँति में जिन लोगों को भाग लेना है भारतवर्ष में उनकी विशिष्टता प्रबुद्ध होना ही काफी नहीं आध्यात्मिक होना भी आवश्यक है। उनका ज्ञान सामान्य स्थिति से आत्म-दर्शन, जीवन-कला, जीव-विज्ञान और ब्रह्म-विद्या से जुड़ा हुआ हो तो समाज उनकी बात सुनने और मानने को तैयार होगा। प्रवर्त्तकों को इस विचारधारा के अनुरूप योजनायें और प्रशिक्षण देकर प्रबुद्ध व्यक्तियों को क्रान्तिकारी तैयार करना चाहिये। समाज के भावी निर्माण का कार्य केवल ऐसे ही व्यक्तियों द्वारा सम्भव होगा। भारतवर्ष की यह विशिष्टता उसके उज्ज्वल भविष्य के लिए बनी भी रहनी चाहिये । इसे भविष्यवाणी भी कह सकते हैं और देश पर परमात्मा की कृपा भी कह सकते हैं मूल बात एक ही है कि देह, मन और आत्माओं में बसे आध्यात्मिक संस्कारों को न तो राजनीति की ब्लीचिंग साफ कर सकती है और न अभारतीय शिक्षा और समाजवाद।

आज बड़े-बड़े कार्यकर्त्ताओं के सामने यह असमंजस उपस्थित है । तब यह सोचना आवश्यक है कि समाज के अभिनव निर्माण का स्वरूप किस तरह निर्मित किया जाय, उसे कौन सा विनियोग प्रदान किया जाये ।

अन्य राष्ट्रों के सामाजिक परिवर्तनों का संक्षिप्त इतिहास भी यों प्रस्तुत है और भारतीय परिस्थितियों का विश्लेषण भी। उसे देख कर यह भविष्य वाणी की जा सकती है कि हम परिवर्तन को ला सकते हैं यदि सूत्र संचालन के लिए थोड़े से प्रबुद्ध व्यक्ति उठ खड़े हों, जो आध्यात्मिक ज्ञान के साथ आध्यात्मिक उद्देश्य भी लिये हों। उनमें इतना गौरव रहना चाहिये कि वे देश के भावी निर्माण के लिए उच्चतम त्याग, अधिकतम परिश्रम, लगन और कर्मठता तथा आदर्श और सिद्धाँतों की शिला पर उद्देश्य प्राप्ति तक निष्ठापूर्वक सुदृढ़ बने रह सकते हैं।

सारा देश आज अपने आपको बदल डालने के लिये अकुला रहा है। वातावरण बदल रहा है, परिस्थितियां बदल रही हैं, दृष्टिकोण बदल रहे हैं। यह राष्ट्र के उज्ज्वल भविष्य का प्रतीक है पर यह भी नहीं भूलना चाहिये कि आदर्श, दिशा और विश्वासों से विभ्रमित समाज रास्ते से कुरास्ते में भी चल पड़ सकता है। वर्तमान झुकाव है उसी ओर। उसे रोकने के लिये आध्यात्मिक क्राँति ही अब विकल्प रह गया है।

भारतीय संस्कृति के आध्यात्म स्तम्भों वाला दुर्ग लगभग ढह चुका है। आस्तिकता और कर्तव्यपरायणता की नींव हिल चुकी है। नीति और सदाचरण की चौपाल फूट रही है। आदर्श और सिद्धान्तों के द्वार अस्त-व्यस्त हो चुके। स्वास्थ्य, मनोबल, सुदृढ़ गृहस्थ, जातीय संगठन का मसाला लगभग समाप्त-सा है। उस दुर्ग पर दखल देने के लिये बाह्य संस्कृतियाँ अवसर ढूँढ़ रही हैं। ऐसे समय प्रत्येक प्रबुद्ध व्यक्ति का यह कर्तव्य हो गया है कि वह देश की आध्यात्मिक क्राँति की भूमिका निभाने में हिस्सा ले। यह अन्तिम समय, अन्तिम चेतावनी है। अभी भी राष्ट्र सजग न हुआ तो भारतीय संस्कृति का सूर्य अस्त ही हुआ मानना चाहिये। उसके साथ-साथ हिन्दू जाति का अस्तित्व भी समाप्त हुआ समझना चाहिये।


धर्मपत्नी का सहयोग

धर्मपत्नी का सहयोग-

महाविद्वान कैयट एक ग्रन्थ लिख रहे थे। उस महत्त्वपूर्ण कार्य को पूरा करने के लिये समय बहुत कम था अतएव उन्होंने आजीविका का भी ध्यान भुला दिया और उसे लिखने में तल्लीन हो गये।

कैयट की धर्मपत्नी, जब तक वह ग्रन्थ पूर्ण न हो गया स्वयं छोटी-मोटी मेहनत-मजदूरी कर के परिवार को रूखा-सूखा खिलाने का साधन जुटाती रही । पर उसने पति के महत्वपूर्ण कार्य में किसी प्रकार की बाधा उत्पन्न न होने दी।


विपत्ति से बढ़कर हितैषी नहीं

किन्हीं सफल व्यक्तियों और महापुरुषों के जीवन वृत्त पर दृष्टि दौड़ायें तो एक बात सामान्य रूप से दिखाई देगी और वह यह कि उनमें से प्रायः प्रत्येक का जीवन संघर्षों ने पाला, कठिनाईयों, आपदाओं और विपत्तियों ने सँवारा । मुसीबतों ने ही उनकी आत्म-शक्ति को जगाया, उद्वेलित किया और वह पथ प्रशस्त किया जो साधारण व्यक्तियों के लिये अचरज प्रतीत होता है।

राम, कृष्ण, बुद्ध, महावीर, कबीर, नानक, ईसा, सुकरात, टॉलस्टाय, गान्धी, शिवाजी, महाराणा प्रताप, किसी व्यक्ति को उदाहरण बनाइये एक भी महापुरुष ऐसा न मिलेगा जिसने वैभव विलास के बीच महा पौरुष सार्थक किया हो। राकफेलर, हेनरी फोर्ड , मार्सेल बोजाक आदि प्रसिद्ध उद्योगपतियों ने भी असाधारण सफलतायें परिस्थितियों से लड़ते और टक्कर खाते हुये पाई हैं।

साधारण व्यक्ति कठिनाइयों और प्रतिकूल परिस्थितियों से बचना चाहते हैं इसलिये घिसावट और टकराव से जो प्रेरणादायी शक्ति उत्पन्न होनी चाहिये थी, हिम्मत, साहस और पुरुषार्थ जागृत होना चाहिये वह नहीं हो पाता। मनुष्य कठिनाइयों से बचता है वैसे ही बड़ी सफलतायें उससे बचती हैं।

मुसीबतें दर असल बोझ नहीं संकेत हैं जो आत्म-विकास का दिशा निर्देश करती हैं। इन संकेतों को समझना और उनसे लाभ उठाना ही मनुष्य को आ जाय तो कठिनाई से बड़ा देवता नहीं विपत्ति से बढ़कर हितैषी नहीं।

बीमारी और शरीर कष्ट को आप बुरा मानते हैं पर आप कहीं यह जान लें कि प्रकृति आप को असंयम से सावधान कर रही है और आपके शरीर में घुस गये बुरे तत्वों को निकाल रही है तो आपकी आधी घबराहट तत्काल दूर हो जाये।

यही तो वह अवसर होता है जब अपने आत्मीयजनों की पहचान होती है। जो अपना है, जिसके प्रति हमें अपने दायित्वों का परिपालन करना है, वे व्यक्ति ऐसे समय सिमट कर आपके समीप आ जाते हैं। आत्मीयता जाग उठती है और वर्षों का मनोमालिन्य दूर हो जाता है। दाम्पत्य जीवनों में अकसर वैमनस्य और गुबार भर जाते हैं अपने साथी की पीड़ा में बीमारी में वह कैसे दूर हो जाते हैं, यह हर गृहस्थ अनुभव करता है। आत्मीयता को सजग करने वाली, बिछुड़ों के हृदय जोड़ने वाली, शरीर का गर्द गुबार निकाल फेंकने वाली और भविष्य के लिये “स्वस्थ जीवन अपनाओ” शिक्षा देने वाली बीमारी को फिर क्या आप बुरा कहेंगे?

आप रह-रह कर बीमार होते हैं तो देखिये कहीं आपकी आदतें तो खराब नहीं हो रहीं। आपने आहार-विहार के असंयम को तो नहीं अपना रखा। तम्बाकू , सिगरेट, शराब आदि किसी दुर्व्यसन के आदी तो नहीं हो गये किसी मादक द्रव्य ने तो कहीं यह विकृति नहीं लादी। जरूर कोई इन्हीं में से कारण होगा। उसे मिटाने का संकेत ग्रहण कर सकें तो विश्वास कीजिये वह बीमारी आपके लिये वरदान ही होगी।

अपनी स्वास्थ्य संरक्षण की भावना जगाइये, संकल्प कीजिये आगे आप बलवान बनेंगे। स्वस्थ सुडौल शरीर बनायेंगे। दीर्घजीवन प्राप्त करेंगे बीमारी का इशारा इन्हीं की ओर था। यदि नहीं समझ पाये तो आपकी भूल थी । समझ गये तो अपनी जीवन दिशा बदल कर देखिये लाभ होता है या नहीं।

आप नहीं आपके घर का कोई सदस्य, आपकी धर्म-पत्नी, बच्चा, भाई, पिता बीमार है तो क्या आपको निराश होना चाहिये? नहीं, इससे अच्छा सेवा का, परिजनों का हृदय जीतने का और अच्छा अवसर न मिलेगा। आप उनकी एक बार हृदय से सेवा कर देखिये आपके जीवन में वही बीमारी वरदान लाती है या नहीं। दाम्पत्य जीवन में प्रगाढ़ मैत्री, बच्चों में आज्ञापालन की भावना, भाई का प्रेम, सहयोग और पिता का स्नेह दिलाती है या नहीं।

चलिये आपकी आर्थिक कठिनाईयों पर भी सोचें। धन की तंगी से, कर्ज से, आजीविका की समस्या से आप घबराये बैठे हैं, पर आपको पता नहीं वह विपत्ति आपका सौभाग्य द्वार खोलने आई है केवल आपके समझने की देर है।

आर्थिक तंगी के अवसर पर देखा गया है कि मानसिक क्रियाशीलता सजग हो उठती है। भले ही वह बेचैनी और घबराहट के रूप में व्यक्त होती हो पर इतना निश्चित है आदमी के दिमाग में हलचल पैदा होती है। चाहे तो इस सजगता को विधिवत विचार का रूप देकर सोचें कि ऐसे गाढ़े समय आप कोई अन्य नौकरी या धन्धा कर सकते हैं क्या? कहीं से पूँजी उपलब्ध कर कोई उद्योग चला सकते हैं क्या? अपने घर में जेवर पड़ा है, जमीन है, पुराना मकान पड़ा है इनमें से कोई ऐसी वस्तु है क्या जो आपको पूँजी देकर कर्ज से बचा सकती हो? केवल धन्धा अपने लिए निकाल सकें तो आप विश्वास कीजिये ऐसी परिस्थिति जन्य कठिनाईयों से ही बड़े-बड़े पूँजीपति पैदा हुये हैं।

ऋण का बोझ सवार है? मनः स्थिति सचमुच बहुत दुःखद होती है। नौकरी में पैसा बचता नहीं तो क्या यह संभव नहीं मोमबत्ती, रबड़ की मोहर, लिफाफा, सिलाई, साबुन, चर्खा आदि से आप कोई सहायक आजीविका की व्यवस्था कर लें और उस ऋण को धीरे पटा डालें। अच्छा तो यह हो कि जेवर-जकड़े का मोह त्याग कर आप उसे एक मुश्त चुका डालें। यह भी देखेंगे कि दुबारा कर्ज लेने से आप बचेंगे ही। फिजूल खर्ची से भी बचेंगे और बेकार के भोज, उत्सव, रंग-रेली मनाने की, जो आदतें पड़ गई थीं उनसे भी बचेंगे। भविष्य में बजट बना कर चलेंगे। सावधानी से खर्च करेंगे। इतनी सारी सूझ समझ और योग्यता कब आई? जब ऋण या आर्थिक घाटे की विपत्ति आई!

कई बार परिस्थितियाँ अपनी नहीं औरों की बनाई हुई भी होती हैं। संसार में फूहड़ और राह चलते रोड़ा अटकाने वाले भी कम नहीं। मान लीजिये कोई ऐसा व्यक्ति आपको परेशान कर रहा है तो बड़ा अच्छा अवसर है अपना शौर्य, साहस जगाने का। शक्ति और संगठन बनाने का इससे सुन्दर अवसर कब आता? धन्यवाद दीजिये इस विपत्ति को जिसने आप में यह वीरोचित गुण जगा दिये।

बच्चा कहना नहीं मानता-धर्मपत्नी सहयोग नहीं करती, भाई खिन्न रहते हैं तो आप कुछ अपने आप पर भी विचार कर डालिये। आप को मालूम न होगा महात्मा गाँधी जी की पूर्व में कस्तूरबा से नहीं पटती थी, पर आत्मचिंतन के द्वारा बापू ने अपने आपको सुधारा तो कस्तूरबा स्वयमेव उनकी सच्ची सहचरी बन गई। दाम्पत्य जीवन में वह आनन्द आया कि मृत्युपर्यन्त कोई मनोमालिन्य न आया। सुकरात को दार्शनिक बना देने में उनकी धर्मपत्नी की कर्कशता ही थी। ऐसे अवसर मनुष्य को जीवन-दर्शन की गहराइयों तक पहुँचा सकते हैं, साथ ही पारिवारिक प्रेम, ईमानदारी, सद्व्यवहार, स्नेह, प्रेम, आत्मीयता, प्रसन्नता, प्रफुल्लता की आवश्यकता और उपयोगिता का पाठ सिखा सकते हैं। मनुष्य जीवन की गहराइयों का ज्ञान उपलब्ध करा सकते हैं।

परीक्षा में असफल वोपदेव आचार्य वोपदेव बने। स्वयं पाँडित्य उनके पैरों गिरा क्योंकि उन्होंने घबराकर अपनी सारी बौद्धिक लगन उधर लगा दी। यह पाठ आप के लिये भी वैसा ही। हारे हुये मनुष्यों के अनेक जीवन चरित्र आप पढ़ सकते हैं जिनको कठिनाईयों में ही पाथेय मिला है।

यदि आप मानसिक संतुलन न खोयें, विचारशक्ति को जगाकर सूझ बूझ से काम लें तो इसमें किंचित संदेह नहीं कि विपत्तियाँ मनुष्य को परिश्रमी, उद्योगी, संतोषी, सहिष्णु और शक्तिशाली बनाती हैं। उनसे लाभ उठाने का दृष्टिकोण समझ में आ जाय तो मुसीबत मनुष्य जीवन के लिये वरदान ही होती है।


सुसंस्कारों से स्वास्थ्य एवं सौंदर्य की वृद्धि

संसार में सभी सुन्दर दीखना चाहते हैं, कोई भी यह नहीं चाहता कि वह असुन्दर तथा कुरूप दिखाई दे। अपनी सुन्दरता को बढ़ाने, बनाये रखने, अथवा पैदा करने के लिये लोग खर्च और प्रयत्न भी किया करते हैं। आजकल सौंदर्य-प्रसाधनों पर लोग प्रति वर्ष लाखों करोड़ों रुपया खर्च करते हैं। प्रसाधन सामग्री की बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियां दिन-रात काम करती है। लोग तरह-तरह के वेश-विन्यास तथा फैशनों को सुन्दर तथा आकर्षक दीखने के लिये अपनाते हैं। किन्तु खेद का विषय है कि वे प्रसाधन के बावजूद भी असुन्दर और कुरूप ही दीखते हैं। सुन्दरता बढ़ने के बजाय घटती जा रही है। सौ, दो-सौ, चार-सौ में एक आध आदमी, औरत भी वास्तविक रूप से सुन्दर नहीं दिखलाई देते।

सौंदर्य प्रसाधनों का प्रचार ही इस बात का प्रमाण है कि संसार से प्राकृतिक, स्वाभाविक अथवा वास्तविक सुन्दरता का ह्रास होता जा रहा है। यदि इस अप्रिय प्रसंग में गहराई से पैठा जाये और उसके कारणों की खोज की जाये तो पता चलेगा कि लोग सुन्दरता का वास्तविक अर्थ भूलते जा रहे हैं। उन्हें यह स्मरण नहीं रह गया है कि सुन्दरता का निवास मनुष्य के अन्दर है, इन बाजार में बिकने वाले शृंगार साधनों में नहीं। शृंगार और सज्जा भी सुन्दरता नहीं है, यह एक सलीका है जो सभ्यता के साथ मनुष्य की सुरुचि का परिचय देता है। किन्तु इस सलीके में से भी सुघड़ता एवं स्वाभाविकता इस सीमा तक दूर कर दी गई है कि वह भी एक भोंड़ा प्रदर्शन भर रह गया है।

सुन्दरता का निवास यदि प्रसाधनों, शृंगारों, अथवा बाह्याडम्बरों में होता तो हर वह मनुष्य सुन्दर दीखना चाहिये, जो इनका प्रयोग करता है और हर वह स्त्री-पुरुष कुरूप दीखनी चाहिये जिसे यह साधन या तो उपलब्ध नहीं है अथवा वह इनका उपयोग नहीं करती। परन्तु ऐसा नहीं है। गाँवों के प्रसन्न एवं स्वच्छ वातावरण में पलने वाली सुन्दरियाँ प्रसाधन से पुती नागरिकाओं से अनेक गुना सुन्दर होती हैं। कृत्रिमता से हटकर जितना ही स्वाभाविकता की ओर जाइये आपको अधिकाधिक सुन्दरता देखने को मिलती जायेगी। मनुष्यों से हटकर पशु-पक्षियों में आ जाइये। उनके पास न तो कोई प्रसाधन होता है और न शृंगार सामग्री और न वे किसी प्रकार की सजा सज्जा ही करते हैं, तब भी कितने सुन्दर, आकर्षक तथा भोले लगते हैं। इसका अर्थ यही है कि सुन्दरता का रहस्य प्रसाधन अथवा शृंगार नहीं कुछ और ही है।

अनेक लोगों का कथन है कि सुन्दरता ईश्वर प्रदत्त विशेषता है, जिसे मिल जाती है वह सुन्दर दीखता ही है। ऐसे लोग गोरी चमड़ी और अच्छे नाक नक्शे को सुन्दरता मान लेते हैं। जबकि रंग तथा नाक नक्शे से भी सुन्दरता का संबन्ध नहीं है। यदि ऐसा होता तो हर काले व्यक्ति को कुरूप दीखना चाहिये। जब कि एक-से-एक बढ़कर काले लोग सुन्दर देखने में आते हैं। और तो और भगवान् राम और कृष्ण काले थे, किन्तु इसके बावजूद भी वे इतने सुन्दर थे कि उनकी सुन्दरता का गुण-गान आज तक गाया जा रहा है। सुन्दरता का निवास यदि गौरवर्णता में ही होता तो महापुरुष सुन्दर न होते और इनके गुणों तथा कार्यों का भले ही बखान किया जाता किन्तु सुन्दरता का नहीं।

अनेक बार देखा और अनुभव किया जा सकता है कि अनेक लोग गोरे-चिट्टे तथा अच्छे नाक नक्शे वाले होते हैं। फिर भी मन उनकी और आकर्षित नहीं होता। बहुत बार तो रंग तथा नाक नक्शे वाले अनेक लोगों को देखकर अनाकर्षण ही नहीं विकर्षण, अरुचि तथा घृणा तक होने लगती है। इसका यही अर्थ है कि सुन्दरता का निवास वर्ण अथवा बनावट में नहीं, बल्कि किसी और बात में है।

सभी के जीवन में कोई न कोई ऐसा सन्त, महात्मा, साधारण व्यक्ति आया होगा जो रंग, रोगन, बनाव शृंगार तथा नाक नक्शे से सर्वथा रहित रहता होगा, पर उनमें इतना आकर्षण रहा होगा कि पास से हटने की इच्छा न होती होगी। अष्टावक्र ऋषि आठ जगह से कुबड़े थे और इतने कुरूप थे कि उनका नाम ही आठ जगह से टेढ़ा पड़ गया। चाणक्य की कुरूपता प्रसिद्ध है। कार्लमार्क्स, टॉलस्टाय, अब्राहम लिंकन तथा महात्मा गाँधी, प्रभृति व्यक्ति संसार के कुरूप व्यक्तियों में माने जाते हैं। यूनान के सुकरात तो कुरूप ही नहीं काले और मोटे थे, पर इनका व्यक्तित्व इतना आकर्षण और स्वयं में यह इतने सुन्दर थे कि इनकी एक झलक देखकर ही लोग मुग्ध हो जाते थे। जो इनके समीप गया सदा−सर्वदा के लिये इनका हो गया। हजारों लाखों इनकी मोहकता से मुग्ध होकर दूर से झाँकी लेने के लिये आया करते थे। यदि सुन्दरता का मानदण्ड रंग और नाक नक्शा ही होता तो इस माने में इन व्यक्तियों को कुरूप एवं निराकर्षक होना चाहिये था। इससे पता चलता है कि सुन्दरता न तो कोई ईश्वर प्रदत्त प्रसाद है और न इसका निवास रंग अथवा नाक नक्शे में होता है। इसका कुछ और ही रहस्य है, जिसे लोग समझने तथा अपनाने का प्रयत्न न करके भ्रान्तियों में बहे चले जा रहे हैं।

सुन्दरता का रहस्य वास्तव में मनुष्य के शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य पर निर्भर है। स्वस्थ शरीर निर्विकार मन और मधुर स्वभाव का समन्वय सुन्दरता बनकर मुख पर चमका करता है। मनुष्य का रंग काला ही क्यों न हो, उसका नाक नक्शा भले ही आकर्षक न हो, यदि वह निरोग है, उसका मन स्फूर्तिपूर्ण है वह काम को लाघवता के साथ कर सकता है, फूल की तरह प्रसन्न तथा खिला हुआ रहता है तो उसके मुख पर एक ऐसी छवि बनी रहती है जो सुन्दरता के रूप में अनायास ही दूसरों को अपनी ओर आकर्षित कर लेती है। मनुष्य को ही क्यों साधारण पशु-पक्षियों को देख लिया जाये, जब वे खुशी के साथ खेलकूद कर, फुदक और चहककर अपने हृदय का हर्ष प्रकट करते हैं तो दर्शकों का मन दो क्षण को ठहरा ही लेते हैं। इसके विपरीत जब यही पशु-पक्षी लड़ते-झगड़ते अथवा आलस से ऊंघते झींकते बैठे रहते हैं तो किसी का भी ध्यान इनकी ओर नहीं जाता। एक खिला और डाल पर झूमता हुआ फूल जितना मन-भावन लगता है, उतना मुरझाया अथवा माला में डाला हुआ फूल सुन्दर नहीं दिखाई देता। रंग, रस तथा सुगन्ध रहने पर भी मलिन होता हुआ फूल अपनी सुन्दरता खो देता है। सुन्दरता का निवास उत्तम संस्कार निर्विकार जीवन और प्रसन्न मन से ही रहता है। इसको प्रसाधनों में मानना अथवा साज-सज्जा से पा लेने का प्रयत्न करना एक भ्रम तथा भूल ही है।

व्यक्ति के मुख पर, आन्तरिक अवस्था का प्रभाव आकर्षण अथवा विकर्षण बन कर दिखाई देता है। बहुत बार दुराचारी, दुष्ट तथा अत्याचारी व्यक्ति भी नाक-नक्शे तथा रंग रूप से अच्छे लगने वाले होते हैं। किन्तु उनका व्यक्तित्व किसी में आकर्षण अथवा प्रियता उत्पन्न नहीं कर पाता। प्रत्युत जो भी उसे देखता है उसको घृणा मिश्रित विकर्षण की ही प्रतिक्रिया होती है। सुन्दरता के सामान्य मानदण्ड पर योग्य उतरने पर भी दर्शकों में उसके प्रति प्रतिकूल, प्रतिक्रिया क्यों होती है? इसका कारण यही है कि उसका हृदय क्रूर एवं कलुषित होता है। उसके हृदय के दुष्ट भाव उसके मुख मण्डल की सुन्दरता को दबाकर मलिन कर देते हैं। एक व्यक्ति सुन्दरता के बाह्य मानदंड पर तो नहीं उतरता किन्तु उसका हृदय सरल, सौम्य, निश्छल तथा निर्विकार है तो कोई कारण नहीं कि उसकी अंतर्दशा का प्रकाश उसके मुख मंडल पर न उभरे और वह सुन्दरता के रूप में लोगों में प्रियता अथवा आकर्षण उत्पन्न न करे। सहज सुन्दरता पाने और आकर्षक दिखाई देने के लिये आन्तरिक सुदशा की अपेक्षा है। इसके अभाव में कोई कितना ही क्रीम पाउडर क्यों न मले, कितना ही शृंगार एवं साज सज्जा क्यों न करे, सुन्दर एवं सौम्य नहीं दिखाई दे सकता। सुन्दरता का रहस्य बाहरी चमड़ी में नहीं, आन्तरिक सुदशा में निहित है।

मानसिक भावों एवं विचारों की तरह गुण-अवगुण भी सुन्दरता के कारण होते हैं। जो मनुष्य परोपकार, परमार्थ तथा परसेवा में लगे रहते हैं, किसी की भी सहायता सहयोग करने में मुख नहीं मोड़ते, सान्त्वना, साहस, प्रोत्साहन तथा आश्वासन देना जिनका स्वभाव होता है वे बाहर से कितने ही कुरूप तथा भोंड़े क्यों न हों। पर वास्तविक सुन्दरता, वह सुन्दरता जो दूसरों को मुग्ध कर लेती है, उनके बाह्य व्यक्तित्व में भी चमत्कार उत्पन्न कर ही देगी।

यदि हम सुन्दर बनना और सुन्दरता को स्थिर रखना चाहते हैं तो हमें प्रसाधन, प्रदर्शन, आडम्बर अथवा शृंगार सामग्री के स्थान पर आन्तरिक दशा को सुधारने एवं शुभ बनाने का प्रयत्न करना होगा। यदि हमारा स्वभाव क्रोधी है, हम ईर्ष्या, द्वेष से जलते-भुनते रहते हैं, लोभ, स्वार्थ अथवा पर-धन प्राप्ति की विषैली भावना को पालते रहते हैं तो दुनिया भर के प्रसाधनों का प्रयोग करते रहने पर भी हमारा व्यक्तित्व मोहक अथवा मन-भावन नहीं बन सकता।

गोरे चिट्टे तथा नाक-नक्शे से ठीक होने पर भी हम दूसरों के लिये विकर्षण के कारण ही बनेंगे। एक स्त्री जो देखने में सुन्दर भी है, उसका नाक-नक्शा भी बुरा नहीं है, शृंगार तथा साज भी करती है, सलीके से रहना भी जानती है किन्तु उसमें कलह करने, डाह से जलने, बात-बात पर उलझ पड़ने और बड़बड़ाते रहने की आदत है तो उसके सारे सौंदर्य चिन्हों पर पानी फिर जायेगा। जो भी उसके संपर्क में आयेगा अप्रसन्न ही होगा। गरीब, कुरूप तथा शृंगार रहित स्त्रियाँ भी अनेक बार अपने मधुर स्वभाव, सौम्य व्यवहार, मृदुता एवं स्नेहता के कारण परिवार तथा गुरुजनों की प्यारी बन जाती हैं। उन्हें देखकर एक अहेतुकी प्रसन्नता का अनुभव होता है। न्यूनाधिक सुन्दरता वाली बहुओं में अनेक बार अधिक सुन्दर बहू की अपेक्षा कम सुन्दर बहू परिवार तथा सास ससुर पर मोहिनी कर देती है। इसका कारण उन दोनों की मानसिक दशा तथा उनका गुण अवगुणपूर्ण स्वभाव ही होता है। सुन्दर गुणों के कारण असुन्दर पत्नियाँ पतियों की प्यारी रहती हैं जबकि दुर्गुणों के कारण सुन्दर से सुन्दर नारियाँ अपने पति का स्नेह पाने से वंचित रह जाती हैं।

असुन्दरता अथवा अरूपता एक दोष है और सुन्दरता अथवा मनभावनता एक गुण अथवा विशेषता है। यह मान्यता नितान्त भ्रम है। मनुष्य को अधिक से अधिक सुन्दर बनने का प्रयत्न करना चाहिये, किन्तु वास्तविक सुन्दरता क्या होती है इस ज्ञान के साथ। केवल साज-सज्जा अथवा लीपापोती से सुन्दरता प्राप्त करने का प्रयत्न करना भूल है और इस भूल से हरएक को बचते रहना चाहिये। सुन्दर बनना है तो गुणवान्, सद्भावी, स्वस्थ तथा स्वच्छ बनना होगा। शरीर को लीपने-पोतने के बजाय उसे स्वच्छ बनाना होगा। बाह्य प्रसाधन अथवा नाक-नक्शे पर निर्भर न रहकर हृदय का संस्कार करना होगा।

स्वास्थ्य प्राप्त करने का एकमात्र उपाय समय, श्रम तथा नियमित जीवनयापन ही है। मानसिक सुधार, प्रसन्नता, प्रेम, अक्रोध आदि का प्रश्रय लेने से होता है। अधिक से अधिक यहाँ तक कि विपत्ति में भी प्रसन्न रहिये, कटु परिस्थिति में भी क्रोध न करिये, दूसरों के लिये सद्भावना, सेवा तथा सहायता के भाव रखिये, यथासम्भव परमार्थ एवं परोपकार करिये-आपका मानसिक संस्कार हुए बिना न रहेगा। इस प्रकार जो भी व्यक्ति प्रयत्नपूर्वक शारीरिक तथा मानसिक स्वास्थ्य का विकास कर लेगा वह निश्चित रूप से सुन्दर तथा आकर्षक बन जायेगा इसमें किसी प्रकार के सन्देह की गुँजाइश नहीं है।

मानसिक स्थिति का सुन्दरता से क्या संबन्ध है, इसको बतलाते हुए एक विद्वान ने लिखा है-अच्छे और बुरे विचारों की धारा मानसिक केन्द्र से चारों ओर फैलकर रक्त प्रवाह के साथ त्वचा-तल तक विद्युत धारा की तरह आती और अपना प्रभाव छोड़ जाती है। यदि यह विचार धारा निरन्तर आती जाती रहती है तो उसका प्रभाव स्थायी बन कर सुन्दरता असुन्दरता के रूप में प्रतिबिम्ब होने लगता है। अस्तु आवश्यक है कि वास्तविक तथा स्थायी सुन्दरता पाने के लिये स्वस्थ तथा संस्कारवान् बना जाये। अपने मन तथा मस्तिष्क को बुरे विचारों, दूषित भावनाओं से मुक्त रखकर उनके स्थान पर दैवी भावों का समावेश किया जाये।


ज्ञान के सदृश और कुछ पवित्र नहीं

न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्र मिह विद्यते।

तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति॥

-गीता 4।38

गीताकार का कथन है कि ज्ञान के समान इस संसार में पवित्र वस्तु और कोई नहीं। ज्ञान योग की उपासना करने वाले को समयानुसार योग सिद्धि स्वयं मिल जाती है।

ज्ञान की उपासना ईश्वर की श्रेष्ठतम उपासना है। अज्ञान को माया और बन्धन कहा गया है, उसी को नरक की उपमा दी गई है। ज्ञान की आराधना करके हम वह प्रकाश प्राप्त कर सकते हैं जिससे इन बन्धनों से छुटकारा मिल सके। “ज्ञानान्मुक्ति” सूत्र में ज्ञानयोग को ही मुक्ति का सोपान बताया गया है।

ज्ञान के माध्यम से ही भौतिक सुख और आत्मिक शान्ति प्राप्त होती है। संसार में जो श्रेष्ठतायें विद्यमान हैं और लोगों ने जो प्रतिष्ठा प्राप्त की है वे किस कारण से हैं, तो ज्ञान की ही महत्ता प्रकट होती है। वैयक्तिक साधारण काम-काज से लेकर सामाजिक, प्रशासनिक एवं राष्ट्रीय जिम्मेदारियों जैसे स्थूल कार्य भी ज्ञान के बिना भली प्रकार सम्पन्न नहीं हो पाते। इसलिये इन कर्तव्यों का उत्तरदायित्व भी पढ़े-लिखों को ही सौंपा जाता है। जो जितना अधिक बुद्धिमान, विद्यावान् है उसे उतना ही उच्च पद दिया जाता है, यह अत्यन्त सरलतापूर्वक समझ लेने की बात है।

यही कारण है कि लोग अपने बच्चों को जन्म देने के बाद सर्वप्रथम जब उनके विकास और उन्नति के सवाल पर पहुँचते हैं तो यह मानते हैं कि सर्व प्रथम बच्चों का बौद्धिक विकास आवश्यक है। शिक्षा की व्यवस्था उस विचार और योजना के फलस्वरूप ही होती है। बालक को पहले पढ़ाया लिखाया जाता है तब आगे की किसी दूसरी बात पर विचार किया जाता है। ऐसा कहीं नहीं होता कि बच्चे की पहले शादी कर दी जाय, फिर उसे नौकरी से लगा दिया जाय और इस प्रकार जब 50 वर्ष की आयु बीत जाये तो उसे पढ़ने भेजा जाय। मनुष्य की प्रगति के लिये शिक्षा को प्राथमिकता दी गई है। इससे भी ज्ञान की सर्वश्रेष्ठता ही सिद्ध होती है।

गई-गुजरी स्थिति में जन्मे लोग भी ज्ञान-सम्पत्ति पाकर आगे सफलता से बढ़े हैं और उन्होंने साधन-सम्पन्न किन्तु ज्ञानरहित व्यक्तियों को पछाड़ कर रख दिया है।

इस दृष्टि से शिक्षा बड़ी आवश्यक है। वह मनुष्य को साँसारिक परिस्थितियों का ज्ञान कराती है। अच्छे-बुरे की पहचान की क्षमता-विवेक जागृत करती है। उत्तरदायित्व निभाने की कुशलता पैदा करती है। इसलिये पढ़ना हर व्यक्ति के लिये उपयोगी है। छोटे-छोटे बच्चे ही नहीं, जो अनपढ़ प्रौढ़ हैं उन्हें भी पढ़ना चाहिये। जो कम पढ़े हैं उन्हें अधिक पढ़ना चाहिये, जो अधिक पढ़े हैं उन्हें अधिक से भी अधिक ज्ञान की अभिलाषा करनी चाहिये। ज्ञान की कोई सीमा नहीं। ज्ञान की पूर्णता ही मनुष्य जीवन का उद्देश्य है, लक्ष्य है। ज्ञान की तृप्ति हो जाने पर मनुष्य जीवन सार्थक हो जाता है। इसलिये ज्ञान-प्राप्ति के लिये निकाला गया समय, खर्चा गया धन, कभी बेकार नहीं जाता। सैंकड़ों गुने अधिक सुख-सुविधाओं के रूप में आराधक के पास पुनः-पुनः लौट-लौट आता है।

कुछ बालक जन्म से ही बहुत बुद्धिमान, सूझ-बूझ वाले और परिस्थितियों को शीघ्रता से हृदयंगम कर लेने वाले होते हैं। यह भी पूर्व जन्मों की बौद्धिक-प्रौढ़ता का ही परिणाम होता है। ज्ञान मनुष्य के संस्कारों में परिवर्तित हो कर जन्म-जन्मान्तरों तक साथ रहता है। इसलिये उसे प्राप्त करने में आयु और अवस्था का भी प्रश्न नहीं। ज्ञान अक्षय है, उसकी प्राप्ति मृत्यु शय्या तक बन पड़े तो भी उस अवसर को हाथ से न जाने देना चाहिये।

ज्ञान का क्षेत्र दो भागों में विभक्त है-(1) शिक्षा, (2) विद्या। अक्षर अभ्यास और उसके सहारे विश्व की खुली परिस्थितियों का ज्ञान, इसे शिक्षा कहते हैं। इतिहास, भूगोल, गणित, भौतिकशास्त्र, जन्तु-शास्त्र, रसायनशास्त्र, स्वास्थ्य-विज्ञान, व्याकरण, भाषा, समाजशास्त्र, नागरिक-शास्त्र, अर्थशास्त्र यह सब शिक्षा के विषय हैं। इनकी उपयोगिता और आवश्यकता भी सर्व विदित है।

ज्ञान का महत्तर स्वरूप उसका विद्या रूप है। संसार के प्रत्येक प्राणी के साथ एक अहं-समस्या, आध्यात्मिक सवाल हर घड़ी चलता रहता है। “मैं क्या हूँ, कौन हूँ” “मेरा प्रादुर्भाव क्यों हुआ है?” “विश्व का आध्यात्मिक स्वरूप क्या है? योनियाँ क्या हैं? उनमें जीवात्मा का अवतरण कैसे और क्यों होता है?” यह प्रश्न ऐसे हैं जो भौतिक शिक्षा साधन और सम्पत्ति के होते हुए भी मनुष्य को आन्तरिक सुख-संतोष नहीं दे पाते। अपनी शाश्वत और सनातन सत्ता का बोध हुए बिना मनुष्य जिस आनन्द की प्राप्ति के लिये बार-बार शरीर धारण करता है, उसकी पूर्ति नहीं हो पाती। मनुष्य बार-बार जन्म लेता है, फिर भटकता है, फिर भूलता है और मृत्यु के मुख्य में चला जाता है-क्यों? ऐसा किस विधान से होता है इसे जाने बिना मुक्ति नहीं मिलती। क्लेशों का अनावरण नहीं होता। ज्ञान का अर्थ है-भावनात्मक स्तर को इस प्रकार उपयुक्त बनाना कि मनुष्य साँसारिक सफलताओं को भी प्राप्त करे और आध्यात्मिक, आन्तरिक शक्तियों की सुख और शान्ति भी उपलब्ध कर ले।

शिक्षा और विद्या, लोक वृत्त की जानकारी और अंतःलोक वृत्त की भी जानकारी इन दोनों का ही सम्मिलित स्वरूप ज्ञान है।

दोनों महत्वपूर्ण हैं, दोनों आवश्यक हैं। शिक्षा से ही वह योग्यता बढ़ती है जिससे मनुष्य सूक्ष्म से सूक्ष्म और विशद् से विशद् बातों को हृदयंगम कर लेता है। उसी से मनुष्य का बौद्धिक विकास होता है। बिना पढ़ा-लिखा आदमी जब छोटे-छोटे कर्तव्य भी सरलता से पूरे नहीं कर सकता तो आत्मा और परमात्मा जैसे विषय सम्पन्न करना बेचारे के वश में कहाँ होगा? उसी प्रकार बहुत पढ़ा-लिखा तो हो, किन्तु उसने आत्मिक शक्तियों को न जगाया हो, न समझा हो तो वह भी दुःख और कष्ट में ही पड़ा रहता है।

आत्म-विद्या के विकास के साथ-साथ प्रेम, स्नेह, सौजन्य, सौहार्द्र, सरलता, आत्मीयता, दया, करुणा, परोपकार, श्रद्धा, भक्ति, आत्मविश्वास, आत्मबल की अभिवृद्धि होती है। विचारपूर्वक देखा जाये तो जिन व्यक्तियों में यह आध्यात्मिक गुण होते हैं, वे पढ़े-लिखे न होने पर भी अपने आप में इतने सुखी, इतने संतुष्ट होते हैं मानों वे किसी इन्द्र के राज्य का सुखोपभोग कर रहे हों। इन गुणों से शून्य अन्तःकरण वाले बहुत पढ़े-लिखे होने पर भी कटुता, कलह, रोग, शोक, मद, मोह, माया, दम्भ, द्वेष, पाखण्ड के मायाजाल में पड़े कष्ट भुगता करते हैं।

जहाँ शिक्षा और विद्या दोनों का समावेश हो जाता है वहीं स्वर्ग उत्पन्न हो उठता है। शिक्षा से साँसारिक सफलतायें अवश्यम्भावी हैं और विद्याभ्यास से आन्तरिक गुणों का यथा-प्रेम, दया, करुणा आदि का विकास असंदिग्ध रूप से होता है। जहाँ यह दोनों बातें मिल जाती हैं, वहीं आनन्द के फौबारे छूटने लगते हैं, स्वर्ग बन जाता है।

इसलिये शिक्षाभ्यास के साथ-साथ विद्याभ्यास की आवश्यकता भी सर्वोपरि है। साधना, उपासना, आध्यात्मिक ज्ञान से ओत-प्रोत साहित्य के निरन्तर स्वाध्याय, मनन, चिन्तन, व्रत, उपवास आदि की आवश्यकता शिक्षा से भी अधिक है। प्राचीन काल के गुरुकुलों में शिक्षा संबन्धी विषय गौण माने जाते थे, आत्म-विद्या के विषय अनिवार्य होते थे। मनुष्य के दार्शनिक स्वरूप को यथार्थ, शाश्वत और पूर्णानन्द की प्राप्ति का पाथेय माना जाता था। इसलिये उस पढ़ाई पर ज्यादा जोर दिया जाता था जो व्यक्ति के आत्म गुणों का परिवर्द्धन करती थी। उसकी आवश्यकता आज भी उतनी ही नहीं बल्कि वर्तमान विकृत परिस्थितियों में तो उससे भी अधिक है।

स्वाध्याय, आत्म-चिन्तन, सत्संग, तीर्थाटन, व्रत, उपवास, उपासना, साधना के ग्राह्य और सुधरे हुए स्वरूप को समझने और प्रयत्नपूर्वक उन्हें अपने आत्म-विकास में नियोजित करने की बुद्धि जिन लोगों में आ जाती है उन्हें अपने आपको सौभाग्यशाली समझना चाहिये। आत्म-जिज्ञासा आत्म-कल्याण का मुख्य द्वार है। जो उसे पा लेता है वह अपनी जीवन-यात्रा की मंजिल भी आसानी से प्राप्त कर लेता है। गीता अध्याय 1 के 10वें लोक में भगवान् कृष्ण ने भी कहा है-

तेषाँ सतत युक्तानाँ भजताँ प्रीतिपूर्वकम्।

ददामि बुद्धियोग तं येन मामुपयान्ति ते॥

अर्थात् निरन्तर श्रद्धा और प्रयत्नपूर्वक मुझ ईश्वर को भजने वाले लोगों को मैं बुद्धियोग की प्रेरणा देता हूँ। वे इसी के सहारे मुझे प्राप्त कर लेते हैं।

परमेश्वर की कृपा जिस पर होती है वह इस प्रकार अपनी बौद्धिक शक्तियों के विकास का प्रयत्न करता है। इसी से मनुष्य अपने भूले-भटके हुए लक्ष्यों को फिर से सुधार लेते हैं। परमात्मा को पा लेते हैं। साँसारिक पदार्थों को मिलना न मिलना उनके लिये कोई महत्व की बात नहीं रह जाती। यह तो उसे ऐसे ही मिल जाते हैं जैसे अन्न की कामना करने वाले किसान भूसा आदि ब्याज में ही पा लेते हैं।

आज शिक्षा की अभिवृद्धि तो हो रही है पर विद्या की उपेक्षा हो रही है। इसीलिये संसार में दुःख, शोक, सन्तापों की भी वृद्धि हो रही है। ज्ञान-यज्ञ की नई दिशा का विस्तार कर अब व्यक्तियों को विद्या-आत्मज्ञान की आवश्यकता भी अनुभव करनी होगी। उसके लिये प्रयत्न और पुरुषार्थ भी करना होगा। जब यह प्रयत्न चलने लगेंगे तो न केवल व्यक्ति अपने सनातन लक्ष्यों की प्राप्ति करेंगे वरन् लौकिक जीवन भी भव्य बनेगा।

इसी तथ्य को इस श्लोक में प्रगट करते हुए गीताकार ने बताया है-

‘निस्सन्देह इस संसार में ज्ञान के सदृश पवित्र अन्य कुछ भी नहीं है। प्रयत्न में संलग्न व्यक्ति समयानुसार उसे सहज ही में पा लेता है।’


दानों में बड़ा दान-ज्ञान दान

दानों में बड़ा दान-ज्ञान दान-

उत्तराखण्ड के एक प्राचीन नगर में सुबोध नाम के राजा राज्य करते थे। महाराज का नियम था-राजकीय कार्य प्रारम्भ होने से पूर्व वे आये हुए याचकों को दान दिया करते थे। इस नियम में उन्होंने कभी भूल नहीं की।

एक दिन जब सब लोग दान पा चुके तो एक विचित्र स्थिति आ खड़ी हुई। एक व्यक्ति ऐसा आया जो दान के लिये हाथ तो फैलाये था पर मुँह से कुछ न कहता था। सब हैरान हुए इसे क्या दिया जाये? एतदर्थ बुद्धिमान व्यक्तियों का सलाहकारी बोर्ड बैठाया गया। किसी ने कहा वस्त्र देना चाहिये, किसी ने अन्न की सिफारिश की। कोई स्वर्ण देने को कहता कोई आभूषण। पर समस्या का यथार्थ हल न निकला। सुबोध की कन्या उपवर्गा भी वहाँ उपस्थित थी। उसने कहा-राजन् जो व्यक्ति न बोल सकता है न व्यक्त कर सकता है उसके लिये द्रव्याभूषण सब व्यर्थ हैं। ऐसे लोगों के लिये सर्वश्रेष्ठ दान तो ज्ञान-दान ही है। ज्ञान से मनुष्य अपनी सम्पूर्ण इच्छायें, आकाँक्षायें आप पूर्ण कर सकता है और दूसरों को सहारा भी दे सकता है। इसलिये इन्हें ज्ञान-दान दीजिये।

उपवर्गा की बात सब ने पसन्द की। उस व्यक्ति के लिये शिक्षा की व्यवस्था की गई। राजा ने उस दिन अपने दान की सार्थकता समझी। यही व्यक्ति आगे चल कर उसी नगरी का विद्वान-मंत्री नियुक्त हुआ।


किसी संगति में बैठने से पहले यह ध्यान में रखें

यह संसार गुण दोषमय बनाया गया है। इसमें जहाँ अच्छे और भले लोगों का निवास है वहाँ बुरे और गन्दे लोग भी रहते हैं। जहाँ सुख-शान्ति और स्वास्थ्य के साधन हैं वहाँ रोग दोष और कलह क्लेश की परिस्थितियाँ भी पाई जाती हैं। इसीलिये संसार में पग-पग पर सावधान रहकर चलने का निर्देश किया गया है। जो मनुष्य इस गुण दोषमय संसार में सावधान रहकर बुद्धिमत्तापूर्वक चला करते हैं वे संसार के दोष दुर्गुणों से प्रभावित नहीं होते और शान्ति तथा सुखकर जीवन के अधिकारी भी बनते हैं।

जीवन-यापन में सावधानी बरतने का यही अर्थ है कि हम दोष दुर्गुणों तथा ऐसी प्रवृत्तियों से सदा बचते रहें जो जीवन विकास में बाधक बनकर पतन अथवा निरर्थकता की ओर उन्मुख करने वाली हों।

हम सब जिस समाज में रहते हैं उसमें भिन्न-भिन्न प्रवृत्तियों, स्वभावों, रुचियों, आदर्शों, उद्देश्यों तथा मानसिक स्तर के लोग रहते हैं। वे अपनी-अपनी बुद्धि तथा मानसिक स्तर के अनुसार संसार के गुण-दोषों से प्रभावित भी रहते हैं और उसी प्रकार अच्छे-बुरे होकर समाज में व्यवहार किया करते हैं।

समाज के नाते हमें हर प्रकार के मनुष्यों के संपर्क एवं संसर्ग में आने के लिये विवश होना पड़ता है। यदि कोई यह चाहे कि उसके जीवन में सदा सर्वदा गुणी और सत्पुरुष ही आयें और बुरे तथा दुष्ट व्यक्तियों का समागम न हो तो यह संभव नहीं। समाज में दोनों प्रकार के व्यक्ति रहते हैं इसलिये बुरे लोगों का संपर्क में आना अस्वाभाविक नहीं है। वे आयेंगे, परिस्थितियाँ उन्हें ला सकती हैं, आवश्यकता विवश कर सकती है। ऐसी स्थिति में हमारा यही कर्तव्य रहता है कि हम संपर्क में आये व्यक्ति के दोषों से बचे रहें। अपने में इतनी दृढ़ता बनाये रहें कि उनके दोष हमें प्रभावित न कर सकें। बुराई के कारण, परिस्थिति वश आये किसी बुरे व्यक्ति तक से दुर्व्यवहार करना अथवा उससे तिरस्कार अथवा बहिष्कारपूर्ण ढंग से भागना या घृणा का प्रकट करना अपने आप में स्वयं ही एक दोषपूर्ण क्रिया अथवा प्रतिक्रिया है। ऐसा करने से यदि आवश्यकता अथवा उपयोगिता की होने वाली हानि को यदि छोड़ भी दिया जाये तब भी बुरे आदमी से बुराई और द्वेष का डर रहता है। इसीलिये कहा गया है कि ‘बुराई से घृणा करो बुरे आदमी से नहीं।’

यदि हमें सद्गुणों में विश्वास है, हमने अपने अन्दर गुणों की प्रस्थापना कर ली है और अपनी मनोभूमि का विकास इस प्रकार कर लिया है कि उसमें बुराइयों की छाप पड़े ही नहीं, तो फिर किसी बुरे आदमी के संपर्क में आ जाने से कोई भय नहीं रहता। इसके अतिरिक्त यदि किसी ने अपने गुणों को तद्नुकूल कर्मों में ढालकर उन्हें जीवन में मूर्तिमान कर लिया है तब तो किसी के दुर्गुणों से प्रभावित हो सकने का प्रश्न ही नहीं उठता, साथ ही मन वचन और कर्म से परिपालित गुण अपने तेज से अपपुरुष को भी अलौकिक कर देंगे जिससे उसका कम उपकार नहीं होगा। दुर्गुणों से बचने और उन्हें संसार से दूर करने के लिये हर मनुष्य का कर्तव्य है कि वह अपने में हर सम्भव उपाय से सद्गुणों का परिपाक करे।

यह बात अवश्य श्रेयस्कर है कि मनुष्य अपनी मनोभूमि को गुण-ग्राहिका तथा अवगुण अग्राहिका बनाये और अपनी प्रवृत्तियों को इस प्रकार ऊर्धस्थ रक्खे कि संसार के दुर्गुण अथवा दुर्व्यसन उन्हें छू ही न सके। ऐसे उदात्त मन और उच्च प्रवृत्ति वाले व्यक्ति को अवगुणों से कोई डर नहीं रहता तथापि अपने को गुण सिद्ध मानकर चलने का अहंकार भी एक अवगुण है। मनुष्य कितना ही उच्च गुणों तथा अडिग-चरित्र वाला क्यों न हो और क्यों न उसे अपने और अपनी गति पर विश्वास हो तब भी उसे ऐसी स्थितियों, परिस्थितियों तथा व्यक्तियों से हर संभव उपाय के बचे रहने का प्रयत्न करना ही चाहिये जो दोष दुर्गुणों से दूषित एवं कलुषित हों। अनावश्यक रूप से अपनी दृढ़ता को परीक्षा में डालना बुद्धिमानी नहीं कही जा सकती।

किन व्यक्तियों से दूर रहना चाहिये इसकी मोटी-सी पहचान यह है कि जिन व्यक्तियों के संसर्ग से जीवन-विकास के लिये किसी प्रकार की प्रेरणा, प्रोत्साहन अथवा प्रकाश न मिलता हो उनका संपर्क निरर्थक समय नष्ट करने के सिवाय किसी प्रकार की उपयोगिता का लाभ नहीं दे सकता। ऐसे निरुपयोगी व्यक्तियों का साथ करना उचित नहीं और ऐसे व्यक्तियों का संपर्क तो शतप्रतिशत अनुचित एवं अकल्याणकर है जिनका साथ करने से किसी प्रकार की कुरुचि, कुत्सा अथवा कुपरिणाम की संभावना हो। दुर्गुणी व्यक्तियों का संपर्क तो जीवन के लिये साक्षात् विष ही है, उससे तो अपने को इस प्रकार बचाये रहना चाहिये जैसे माँ बच्चे को सतर्कतापूर्वक आग से बचाये रहती है।

ऐसे व्यक्तियों में जिनसे दूर रहने में ही कल्याण है, निन्दक का विशेष स्थान है। निन्दक कभी-भी किसी व्यक्ति के गुण नहीं देखता। परदोष दर्शन तथा छिद्रान्वेषण उसका स्वभाव होता है। वह जहाँ बैठता है दूसरों के दोषों का बखान करता है, कमियों और कमजोरियों की तस्वीरें खींचता है। किसी के प्रति किसी के हृदय में शत्रुता उत्पन्न करने और द्वेष जगाने में पर निन्दक अपनी पूरी चतुरता लगा देता है। किसी निन्दक के संपर्क में हर समय दूसरे के दोष अवगुण तथा बुराइयों को सुनते-सुनते अपने में भी परदोष दर्शन का दोष आ सकता है।

चाटुकार व्यक्ति को भी इसी श्रेणी में रखना चाहिए। चाटुकार का परनिन्दक होना स्वाभाविक ही है। जब तक वह हमारी प्रशंसा के साथ दूसरे की निन्दा नहीं करेगा, चाटुकारी का प्रभाव कम रहेगा। दूसरे की तुलना में अपनी प्रशंसा सुनते-सुनते किसी का भी स्वभाव दूषित हो सकता है जिसका कुप्रभाव जीवन पर पड़े बिना नहीं रह सकता।

अज्ञानी तथा मूढ़ अथवा दुराग्रही व्यक्ति का संग करने का अर्थ है अपने में जड़ता का समावेश करना। अज्ञानी का संपर्क करने से अदूरदर्शिता के साथ संकीर्णता तथा स्वार्थ भावना की वृद्धि होती है जिससे मनुष्य की प्रवृत्तियाँ अधोगामिनी हो जाया करती हैं।

कटु तथा मिथ्यावादी दुर्मुख का संग वाणी का दोष उत्पन्न कर देता है। जिसकी वाणी दूषित हो जाती है वह साधारण सभ्यता के भी नीचे गिर जाता है। बुरा सुनकर मन पर मलीन प्रभाव पड़ता है जिससे दूषित हुए विचार वाणी द्वारा व्यक्त होकर निरादर अथवा अयश का भागी बनाते हैं।

आततायी अथवा अत्याचारी का साथ तो तब भी नहीं करना चाहिये जब कि वह आपके लिये कल्पलता के समान ही लाभकारी क्यों न हो। मिथ्यावादी की तरह आततायी अथवा अन्यायी पलटकर किसी समय आप से भी विश्वासघात कर सकता है। अन्यायी के संपर्क से दूसरों को सताने, दुखाने तथा उनका स्वत्व-हरण करने की प्रवृत्ति होती है जिससे न केवल साँसारिक बल्कि आध्यात्मिक पतन तक हो जाता है।

इनके अतिरिक्त उन व्यक्तियों से तो सर्प तथा बिच्छू की तरह दूर रहना चाहिये जो समाज अथवा राष्ट्र के हित का ध्यान नहीं रखते। ऐसे व्यक्ति गुणी, उदार, विशेषतापूर्ण अथवा महत्वपूर्ण क्यों न हों और क्यों न अपने लिये कितने ही उपयोगी हों तब भी उनसे एक क्षण भी संबन्ध न रखना चाहिये और यदि हो सके तो उनकी इस विकृति का विरोध कर उन्हें सुधारने का प्रयत्न करना चाहिये।

इस प्रकार इन अथवा इन जैसे ही वृत्तियों तथा व्यसनों के रोगी व्यक्तियों को हर प्रकार से अपनी जीवन परिधि से दूर रखना चाहिये और सज्जन सद्गुणी तथा प्रेरणादायक व्यक्तियों का संपर्क करने में तत्पर रहने से जीवन में सफलता तथा सुख-शान्ति की संभावनायें सुनिश्चित होती हैं।

किस का साथ करना और किसका न करना चाहिये यह जान लेना कुछ कठिन नहीं। यदि मन उचित संसर्ग के महत्व को समझे, संपर्क में आने वालों को परखता रहे और जीवन को सावधानीपूर्वक यापित करने में विश्वास करे तो कोई कारण नहीं कि वह वाँछनीय एवं अवाँछनीय व्यक्ति को न परख सके।


गुरु प्रदत्त शिक्षा-पद्धति की विशेषता

“मैं पृथ्वी का पुत्र हूँ, भूमि मेरी माता है। मेरा जीवन मातृभूमि की सेवा में अर्पण रहेगा। लोक कल्याण की सेवा के लिये समर्पित रहेगा। मैं सम्पूर्ण विश्व को ज्ञान और शक्ति से उद्दीप्त रखूँगा। गुरुदेव द्वारा प्रदत्त शक्ति से मैं अपने राष्ट्र को जीवित और जागृत रखूँगा। मेरे जीवित रहने तक मेरे धर्म और संस्कृति को आँच नहीं आने पायेगी।”

तब के 25 वर्षीय स्नातक की, जो गुरुकुल से विदा होने पर उपरोक्त प्रकार की प्रतिज्ञा लेता था, बौद्धिक प्रतिभा, उद्दात्त भावना और उच्चतम आध्यात्मिक संस्कारों का पता इस एक ही वाक्य से चल जाता है। यह विशेषता स्नातकों की अपनी नहीं होती थी वरन् उन्हें गुरुकुल विद्यालयों के वातावरण में इस प्रकार ढाला जाता था। श्रेय प्राचीन गुरुकुलों और आचार्यों को है जिनकी शिक्षा-पद्धति ऐसी थी जो मनुष्य को न केवल आध्यात्मिक लक्ष्य की प्राप्ति के दार्शनिक और तात्विक ज्ञान से ओत-प्रोत बनाती थी वरन् उनमें ऐसी शक्ति और प्रतिभा का भी विकास करती थी जो अपने को ही नहीं सारे समाज को ऊर्ध्वगामी बनाये रखने में समर्थ होती थी।

आज की टूटी-फूटी लकीर में चल रहे ऐसे विद्यालयों में छात्रों के सादे जीवन, सरल वेष-भूषा को देखकर यह अनुमान लगाया जाता है कि गुरुकुलीय शिक्षा विद्यार्थियों को कमजोर बनाती है किन्तु यह निरी विडम्बना मात्र है। गुरुकुल के छात्रों में वह गंभीर शक्ति होती थी जिसे सम्भवतः आज का निर्बल छात्र वहन करने में भी समर्थ न हो। जिन्हें इस प्रकार के शिक्षण की एक किरण का भी अनुमान है वे उसकी तेजस्विता और प्रखरता से भी अनभिज्ञ नहीं हो सकते।

पाणिनि की तरह व्याकरण, पातंजलि की तरह योग, चरक और सुश्रुत की तरह औषधि-शास्त्र, मनु, याज्ञवलक्य आदि के संविधानों में अत्यन्त सूक्ष्म तत्वज्ञान और बौद्धिक शक्तियों का अवतरण हुआ है। गुरुकुलों में आरण्यक और उपनिषदों की रचना हुई। उपपुराण और पुराण लिखे गये। गुरुकुलों में आविष्कृत ज्ञान का सहारा लेकर आज पाश्चात्य देश छोटे-छोटे खिलौने उड़ा रहे हैं।

हमारा बौद्धिक ज्ञान उससे भी विलक्षण और परिपूर्ण रहा है। बिन्दु में सिन्धु, राई में पर्वत, अणु में विभु का साक्षात्कार यदि किसी की समझ में न चढ़े, सत्यता में संदेह हो तो भी स्वामी विवेकानन्द के शब्दों में- “इतनी उच्च कल्पना भी संसार में कोई नहीं कर सका।” हमने परमानन्द को स्वर्ग से उतार कर अपनी जन्मभूमि में रख दिया। हम बड़े गर्व से कहते हैं ईश्वर मेरा है, मेरे भारतवर्ष का है। यह कोई विक्षिप्तता नहीं, तादात्म्य की सही रूपरेखा है। इस देश के संकल्प बल के आगे देवता तो क्या परमात्मा को भी नत-मस्तक होना पड़ा है।”

फिर कौन कह सकता है कि हमारी संस्कृति और शिक्षा-पद्धति कमजोर थी। यह तो हमारे आध्यात्मिक अभ्युत्थान, ज्ञान गरिमा का संक्षिप्त चित्रण है जिस के द्वारा यहाँ का जन-जीवन अविद्या रूपी आवरण का अपसरण कर जीवन मुक्ति का आनन्द लिया करता था। शारीरिक और सामाजिक शक्ति समृद्धता में भी हम किसी से पीछे नहीं रहे।

विज्ञान इतना आगे बढ़ चुका है पर अभी महाभारत काल जैसे भी इच्छा-चालित शस्त्र और आग्नेयास्त्र नहीं बन पाये। शारीरिक शक्तियों की प्रौढ़ता के बारे में तो कहना ही क्या? शान्त तपोभूमियों के वातावरण में रहने वाले परिश्रमी बालकों के मुख जिस तेज से दमदमाया करते थे आज उसकी कल्पना भी किसी चेहरे पर नहीं झाँकती। पीले और निचोड़े विद्यार्थी ही इधर-उधर डोलते दिखाई देते हैं। 100 वर्ष तक 100 बसन्तों का आनन्द लेने की शारीरिक क्षमता का निर्माण भी गुरुकुलों में ही होता था।

जहाँ स्वार्थ नहीं परमार्थ को पूजा जाता था, अनात्म नहीं आत्मवत् सर्व भूतेषु की प्रतिष्ठा थी वहाँ-”जिमि सुख सम्पत्ति बिनहिं बुलाये। धर्मशील पहँ जाहिं सुहाये” वाली कहावत चरितार्थ होती थी। इस तरह का सर्वांग पूर्ण व्यक्तित्व और वातावरण बनाने में नींव का काम गुरुकुलों में होता था। समाज की सम्पूर्ण समृद्धि और सुव्यवस्था का कारण वह शिक्षा पद्धति ही थी जो आचार्यों के संरक्षण में रखकर किशोरों को दिलाई जाती थी।

विद्यार्थियों को इनमें राष्ट्र-सेवा और जन सेवा की, संयम और नियमपूर्वक त्याग एवं तप पूर्ण जीवन जीने की, आचार्य, अतिथि, माता-पिता और भाई के प्रति आदर और श्रद्धा की उच्च भावना रखने की शिक्षा दी जाती थी। सादा जीवन और उच्च चिन्तन यद्यपि उनका आदर्श रहता था, पर ज्ञान और शक्ति के जगमगाते सूर्य ही हुआ करते थे तब के विद्यार्थी। साँचे में ढाले हुए यही बालक-जब गृहस्थ धर्म को संभालते थे तो वहाँ भी सुख और सौभाग्य का स्वर्ग उपस्थित कर देते थे।

शिक्षा का जीवन से पूर्ण संबन्ध था। व्यक्ति के अज्ञान किंवा अविद्या के नाश के अतिरिक्त उसके गुण, कर्म, स्वभाव, आचार-विचार, दृष्टिकोण, बल, विवेक, चातुर्य तथा शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य का विकास अर्थात् सर्वशक्ति सम्पन्न व्यक्तित्व का विकास हमारे गुरुकुलों में दी जाने वाली शिक्षा का उद्देश्य होता था। उस शिक्षा पद्धति की उपयोगिता और व्यावहारिकता का तो कहना ही क्या?

आज का विद्यार्थी अस्त-व्यस्त है। न उसकी शारीरिक शक्तियाँ मुखर हैं न बौद्धिक। स्कूल से निकलते वह अनुशासनहीनता, चारित्रिक पतन, मनोविकारों का बोझ और कन्धे पर डाल लेता है। फिर जब वह गृहस्थ में प्रवेश करता है तो वहाँ भी कलह, क्रूरता, स्वेच्छाचारिता, आलस्य, अकर्मण्यता के अतिरिक्त कोई नया जीवन नहीं जगा पाता। हो भी कैसे सकता है, कमजोर नींव पर खड़ा मकान आखिर कमजोर ही हो सकता है।

जो शिक्षा शिक्षार्थी को अपना ही ज्ञान नहीं करा सकती, जीवन की समस्याओं का सम्यक् बोध नहीं करा सकती उसमें चाहे इतिहास पढ़ाया जाय अथवा नागरिक शास्त्र, अर्थशास्त्र, शरीर या जीव विज्ञान, वह कभी उपयोगी नहीं हो सकती। मनुष्य अपने आप में आध्यात्मिक तथ्य और सत्य है जब तक उसकी शिक्षा पद्धति में आध्यात्मिकता की नींव नहीं पड़ती तब तक वह शिक्षार्थी को उसके वास्तविक लक्ष्य तक नहीं पहुँचा सकती। उलटे गड़बड़ी ही पैदा कर सकती है। बन्दर के हाथ तलवार दे देने जैसी परिस्थिति आज सर्वत्र बन रही है। बुराइयों के साथ बढ़ी हुई बौद्धिक शक्ति से विनाशकारी परिस्थितियों का ही निर्माण हो सकता है? सो वही आज हो भी रहा है।

यह स्थिति आज सबके सामने है। तब यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है- “क्या हमारी शिक्षा पद्धति उपयुक्त है?” कोई भी विचारशील व्यक्ति यह मानने को तैयार नहीं होगा। तब फिर वही पीछे लौटने की बात याद आती है। वही शिक्षा हमारे काम आ सकती है जो हमारे शरीर मन और बौद्धिक संस्थान को ज्ञान और शक्ति से प्रखर बना सके और इस प्रकार के उच्च संस्कार, उच्च भावना जगा सके और जिसमें विद्यार्थी अपनी ही नहीं अपने समाज के उत्थान की बात सोच सके। वह गर्व से कह सके-’माता भूमि पुत्रोऽहं’ “मैं पृथिवी का पुत्र हूँ भूमि मेरी माता है।” यह केवल प्राचीन शिक्षा-पद्धति के संस्कारों से ही संभव है। समय आ गया है जब हमें उसे पुनः जगाना पड़ेगा। अपने गुरुकुलों को पुनः प्रतिष्ठित और प्रसारित करना होगा।


Quotation

जिस प्रकार पानी की वह धारा जिसमें कोई बाँध नहीं है, गाँव के गाँव डुबा देती है और फसलों को नष्ट कर देती है, उसी प्रकार बिना रोक-टोक की लेखनी भी केवल विनाश ही करती है। यदि रोक बाहर से लगाई गई है, तो वह रोक के अभाव से भी अधिक जहरीली है।

-गाँधी जी


बुढ़ापे से टक्कर लेने के उपाय

मनुष्य जीवन के दो बड़े तथा अपरिहार्य, भय, बुढ़ापा तथा मृत्यु कम व्यग्र नहीं करते। किसी-किसी को तो यह भय इतना सताया करता है कि वह अकाल में ही इनके हवाले हो जाता है। मृत्यु का मुकाबला तो अवश्य नहीं किया जा सकता पर यदि तैयारी कर ली जाये तो बुढ़ापे से जरूर टक्कर जी जा सकती है। किन्तु यह तैयारी बुढ़ापे के आक्रमण से पूर्व ही कर लेनी चाहिये, नहीं तो उसी प्रकार हार हो सकती है जिस प्रकार असावधान तथा असन्नद्ध राष्ट्र आकस्मिक आक्रमण से परास्त हो जाता है।

किसी आकस्मिक आक्रमण अथवा अनजान आपत्ति में अदूरदर्शिता की भूल हो सकती है, असावधानी की गलती हो सकती है, किंतु बुढ़ापे का आक्रमण तो निश्चित है। यह एक न एक दिन होगा ही। तब उसका मुकाबला करने की तैयारी में असावधानी रखना अदूरदर्शिता नहीं मूर्खता होगी। इसलिये किसी भी गफलत अथवा भ्रम में रहे बिना बुढ़ापे से टक्कर ले सकने की तैयारी अवश्य कर लेनी चाहिये।

लोग बुढ़ापे का मुकाबला करने का सबसे बड़ा सम्बल सन्तान को ही मानते हैं। ऐसा मानना कुछ गलत भी नहीं है। बात दरअसल यही है कि सन्तान पिता का नवीन संस्करण होती है। माता-पिता को अधिकार है कि उसके नये प्रतिरूप, अपने बच्चे से बुढ़ापे में उनकी सेवा प्राप्त करें। क्योंकि माता-पिता का सर्वस्व धीर-धीरे बच्चों में ही समाहित हो जाता है और आगे चल कर वे बेचारे खोखले होकर आश्रय के पात्र बन जाते हैं।

अन्य संस्कृतियों के विषय में तो ठीक से नहीं कहा जा सकता किन्तु भारतीय संस्कृति में माता-पिता की सेवा करना पुत्र का परम धर्म रहा है और पूर्वकाल की तो शत-प्रतिशत सन्तानों ने अपने इस धर्म का निष्ठा के साथ पालन किया है और आज भी ऐसे न जाने कितने भाग्यवान सुपुत्र होंगे, जिनके माता-पिता मौजूद होंगे और वे उनकी सेवा का पुण्य लाभ कर रहे होंगे। लेकिन आम तौर पर आज की सामाजिक दशा, समय का परिवर्तन, परिस्थितियों के प्रभाव को देखने से यही पता चलता है कि भारतीय संस्कृति की वह मान्यता अब बहुत कुछ नष्ट होती जा रही है और उसका पालन अपवाद-भर बनता जा रहा है। अब इसको, मानस परिवर्तन, पर-प्रभाव, अभाव अथवा समय का फेर कुछ भी क्यों न कह लिया जाये, इससे कुछ बनता नहीं-मूल बात यह है कि आज प्रायः घर-घर बूढ़ों की दशा बड़ी ही दयनीय है। वे बेचारे बेकार की चीज माने जाकर उपेक्षा के शिकार बनते जा रहे हैं। आज के बदले युग में, बुढ़ापे के कष्टों से बचने का उपाय सोचना ही होगा-क्योंकि इससे शायद वर्तमान बूढ़ों को कुछ राहत मिले और आगामी वृद्धों को पथ-प्रकाश। इसका उपाय सोचने में जड़ की बात यही है कि बुढ़ापे के कष्टों से कम दुःखी होने के लिये जो तैयारी करनी होगी वह सब करनी खुद ही होगी। इसमें किसी दूसरे की सहायता की अपेक्षा रखना फिर वही गलती होगी जिसके कारण बुढ़ापा एक प्राणलेवा शत्रु बन जाता है।

तैयारी की बातों पर विचार करते हुए सबसे पहले यह बात समझ में आती है कि पति-पत्नी को दूध-शकर की तरह घुल-मिल कर एकरूप हो जाना चाहिये और दोनों को एकमत रह कर बुढ़ापे से मुकाबला करने की तैयारी करते रहना चाहिये। एक जगह जब दो मिल कर, वह भी कौन से दो जो एक दूसरे के पूरक हैं और एक नाव के सवार हैं-तैयारी करेंगे तो तैयारी ठीक होगी। एकरूप पति-पत्नी जब निराश्रित होकर यदि संयोगवश बुढ़ापे के बीहड़ में पहुँच भी गये तो एक दूसरे के सहारे काफी साहस और सान्त्वना पा सकेंगे।

एक मत रहने से पति-पत्नी बच्चों का समान रूप से लाड़-दुलार करेंगे, समान रूप से अनुशासन करेंगे, जिसके परिणामस्वरूप उनके समान श्रद्धाभाजन बनेंगे। ऐसी दशा में माता-पिता का मतैक्य तथा अपने प्रति समान व्यवहार देख कर बच्चे न तो अधिक ढीठ हो पायेंगे और न किसी के पक्षपाती। बच्चों की यह मनःस्थिति उन्हें बहुत कुछ बुढ़ापे का सम्बल बनाने में सहायक हो सकती है।

बच्चों को पढ़ाइये-लिखाइये, पहनाइये-उढ़ाइये, प्यार-दुलार सब कुछ करिये, फिर भी बुढ़ापे में उनसे सहयोग की आशा बिल्कुल भी न रखिये। इसके लिये आप अपने हाथ पैर मजबूत रखिये और बुढ़ापे से अकेले टक्कर रखने के लिये अपनी गाँठ को भी पोढ़ी रखिये। मतलब यह कि बच्चों पर बहुत कुछ खर्च करते हुए भी कुछ बचाते रहना चाहिये। आज के युग में आपकी गाँठ का पैसा गोद के बच्चे से कहीं ज्यादा सच्चा सहायक सिद्ध होगा।

अधिक सन्तान करना भी बुढ़ापे के लिये एक परेशानी पैदा करना है। एक तो ज्यादा बच्चे होने पर घर में हर समय परेशानी रहती है। उनका ठीक-ठीक पालन पोषण नहीं हो पाता तब ऊँची शिक्षा दीक्षा की बात सोच सकना भी मुश्किल होगा। जब शिक्षित बच्चे आज के जमाने में ज्यादा सहायक सिद्ध नहीं होते तब कम पढ़े या न पढ़े लिखे बच्चे क्या पार लगा सकते हैं? कम योग्यता के कारण जब वे खुद कम कमायेंगे तब यदि वे चाहें भी तो अपने बेकार बड़े-बूढ़ों के लिये कुछ न कर सकेंगे। साथ ही अधिक बच्चे होने से बचत तो असम्भव हो ही जायेगी, पत्नी के स्वभाव की मधुरता और स्वास्थ्य समाप्त हो जायेगा, साथ ही बुढ़ापे तक कोई न कोई नाबालिग बच्चा एक बड़ी मुसीबत की तरह साथ लगा रहेगा, जिससे बुढ़ापे में आवश्यक निश्चिन्तता के अभाव में जो दुर्दशा होनी चाहिये वह होगी ही!

बच्चों की शादी तब करिये जब वे पूरी तरह खाने कमाने और घर संभालने लायक हो जायें। नहीं तो पुत्रवधू से घर आँगन की शोभा बढ़ाने की जल्दी में पुत्र के साथ पुत्रवधू के खर्च की भी जिम्मेदारी आप पर आ जायेगी और तब तो आप इस गैरत के मारे और भी न बचा पायेंगे कि पराये घर की लड़की को ऐसा कोई कष्ट न हो कि संबन्धी लोगों को कोई उलाहना देने का अवसर मिले। यह होगा सो तो होगा ही लड़के निकम्मे हो जायेंगे। कमाने से पहले शादी उन्हें कामचोर, आलसी और विलासी बना देगी। इससे बेटा माँ-बाप के लिये तो समस्या बनेगा ही खुद अपने लिये भी मुसीबत बन जायेगा और तब वह आपके बुढ़ापे के लिये सम्बल बन सकेगा ऐसी आशा करना मरुमरीचिका से कम सिद्ध न होगी!

यह तो रही बाल-बच्चों के और उनके जीवन के नियंत्रण की बात। अब अपनी बात पर आइये। आप दोनों अर्थात् पति-पत्नी ने यौवन की हवा में जीवन को बहार का स्थान दिया नहीं कि आप बहने लगेंगे और जवानी के उस अन्धे बहाव में वह सब कुछ बहा देंगे जिसकी बुढ़ापे में निहायत जरूरत होगी। जवानी की बहार मनाने में पैसा, स्वास्थ्य तथा स्वभाव सब कुछ चला जायेगा। खाने-पीने और मौज करने में लगे रहने से आप वृद्धता के आक्रमण का मुकाबला करने की तैयारी न कर पायेंगे। यह बात सही है कि जवानी में बुढ़ापा न आ सकने वाली दूरी पर जरूर दीखता है लेकिन सही यह भी है कि जवानी के दिन बहुत तेजी से गुजरते हैं और तब तो उनमें बड़े-बड़े पंख लग जाते हैं जब जवानी को जल्दी-जल्दी सुखों का उपभोग करने में लगा दिया जाता है। जीवन बहार नहीं है वह एक कर्तव्य है जिसे सोच समझकर और आगा पीछा देखभाल कर निभाया जाता है। जिन्दगी की बहार इसी में है कि वह एकसार चलती हुई कहीं पर हार न माने। चार दिन की जवानी की बहार यदि एक लम्बे बुढ़ापे का पतझर बन कर तपती, तरसती और तड़फती हुई संसार से विदा हुई तो क्या मजा रहा। इसलिये आवश्यक है कि जवानी की समर्थ आयु में ही अपने स्वास्थ्य, स्वभाव तथा स्वाद के यथेष्ट संयम का अभ्यास कर लिया जाये जिससे यह संचित सम्पत्ति आपके बुढ़ापे का सच्चा सामर्थ्य तथा स्थायी सम्बल बन सके।

कम से कम आवश्यकतायें, न्यूनतम इच्छायें, तृष्णायें, आशायें और चिन्तायें लेकर जो बुद्धिमान तन मन और धन के साथ बुढ़ापे के मोर्चे पर पहुँचता है उसे कोई सहायता दे या न दे वह अवश्य जीतता है, निश्चित रूप से विजयी होता है!


व्यायाम हर व्यक्ति के लिये आवश्यक

वैसे तो सभी प्रकार के व्यायाम कम या ज्यादा परिमाण में करने से सब अवस्थाओं के व्यक्तियों को थोड़ा बहुत लाभ अवश्य पहुँचा सकते हैं, पर जिन लोगों की अवस्था साठ से ऊपर हो चुकी है अथवा जो लम्बी बीमारी के कारण स्थायी निर्बलता के शिकार हो गये हैं, उनके लिए खड़े होकर किये जाने वाली कसरतें सहज नहीं हो सकतीं। इसी प्रकार यदि उन्होंने आरम्भ से ही अभ्यास नहीं किया है तो आसन-व्यायाम के लिये उनके शरीर का मुड़ना भी कठिन होता है। ऐसे लोगों के लिये एक अमरीका निवासी श्री सैनफोर्ड बैनेट ने लेटे हुये किये जाने वाले व्यायामों की विधि बतलाई हैं।

ये व्यायाम सैनफोर्ड के स्वानुभूत हैं। एक अस्वस्थ पिता की सन्तान होने तथा आरम्भ से ही अमीरों की तरह बिना शारीरिक परिश्रम का जीवन बिताने से वे थोड़ी आयु में ही निर्बल हो गये थे। पचास वर्ष की आयु में वे बिल्कुल बूढ़े जान पड़ने लगे। वे सदा डाक्टरी दवाइयों से काम चलाते रहते थे, पर किसी दवा ने उनके स्वास्थ्य का सुधार न किया और न स्थाई रूप से निर्बलता को दूर किया। वे सब काम-चलाऊ ही सिद्ध हुई। अन्त में जब उनकी हालत बहुत शोचनीय हो गई और ऐसा जान पड़ने लगा कि अब दो-चार वर्ष में शरीरान्त हो जाना निश्चित है तो उन्होंने डाक्टरों और दवाओं का सहारा त्याग कर सामान्य व्यायाम और प्राकृतिक जीवन व्यतीत करने की ओर ध्यान दिया। इसके प्रभाव से उनकी दशा सुधरने लगी और 70 वर्ष की आयु में उन्होंने एक प्रकार से नव-जीवन प्राप्त कर लिया। अपने इस अपूर्व कायाकल्प के विषय में उन्होंने अपनी आत्म-कथा में लिखा है- “यद्यपि आज औषधि-विज्ञान चरम सीमा पर पहुँच गया है और गाँव-गाँव, गली-गली में डाक्टरों की दुकानें व अस्पताल खुल रहे हैं फिर भी हमें इस निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि दवायें, चीरफाड़ और इन्जेक्शन का इलाज अत्यन्त हानिकारक और अनावश्यक है। इससे मानव जाति का बड़ा नाश हुआ है। मैं पचास वर्ष की आयु में सब तरह से बूढ़ा हो गया और फिर स्वयं ही उद्योग कर के 72 वर्ष की अवस्था में पुनः जवान बन गया तो इसका एकमात्र कारण यही हुआ कि मैंने औषधि सेवन बिल्कुल त्याग कर प्राकृतिक जीवन और स्वाभाविक व्यायाम का आश्रय लिया। अपने अनुभव से मैं इस निश्चय पर पहुँचा हूँ कि दवाओं के जरिये आरोग्य प्राप्त कर सकना असम्भव है और किसी औषधि से आयु बढ़ाने की आशा मूर्खता है।”

आगे चल कर सैनफोर्ड कहते हैं कि :- ”मैं जन्म से ही कमजोर पैदा हुआ और अपने पिता के उत्तराधिकार स्वरूप तरह-तरह की बीमारियाँ भी छोटी अवस्था से ही लग गई थीं। मेरे पिता को क्षय-रोग हो गया था और उन्हीं के संस्कारों से मुझे आरम्भ से ही खाँसी और निमोनिया के आक्रमण सहने पड़े। साथ ही मैं मन्दाग्नि का भी मरीज था। तीस वर्ष तक हर तरह की डाक्टरी दवाओं का प्रयोग कर के भी मैं कभी सच्ची भूख और भोजन के स्वादिष्ट लगने का आनन्द प्राप्त न कर सका। मैं बड़े व्यवसाइयों की तरह या तो अपने व्यवसाय संबन्धी कार्यों में लगा रहता था या नर्म गद्दों पर पड़ा रह कर आराम करता था। किसी प्रकार के व्यायाम की शिक्षा मुझे कभी किसी डॉक्टर ने नहीं दी। इसका नतीजा यह हुआ कि अधेड़ अवस्था में ही मेरा शरीर सब तरह से जीर्ण-शीर्ण हो गया, सब इन्द्रियाँ निर्बल पड़ गयीं और मेरी गिनती बूढ़ों में की जाने लगी।”

जब डाक्टरों के वायदे सब तरह से खोखले सिद्ध हो गये तो सैनफोर्ड ने अपना इलाज स्वयं करने का निश्चय किया और दवाओं को तिलाँजलि देकर प्राकृतिक उपायों का आश्रय लिया। उन्होंने समझ लिया कि स्वास्थ्य का वास्तविक आधार शुद्ध वायु, सूर्य का प्रकाश, सादा-सुपाच्य भोजन, व्यायाम, स्वच्छता और शरीर तथा मन की पवित्रता ही है। इन साधनों को अवलम्बन कर के प्रत्येक व्यक्ति अपनी दशा में आशातीत सुधार कर सकता है।

सैनफोर्ड ने जो 26 प्रकार की अंग-संचालन की क्रियाएं बतलाई हैं उनको एक बहुत ही सौम्य व्यायाम कहा जा सकता है। उनसे धीरे-धीरे पुनः माँसपेशियों का विकास होने लगता है और कुछ वर्षों में बुढ़ापे के बहुत से चिन्ह मिट जाते हैं या बहुत कम पड़ जाते हैं। ये व्यायाम देखने-सुनने में बहुत ही सामान्य जान पड़ते हैं, पर उनको प्रत्येक दिन प्रातःकाल जगने पर तीस-तीस मिनट तक चारपाई पर पड़े-पड़े कर लेने से स्वास्थ्य में आश्चर्यजनक परिवर्तन हो जाता है।

इनमें सबसे पहले पेट का व्यायाम करना चाहिए। इसके लिये प्रत्येक पैर के घुटने को एक-एक बार मोड़ कर पेट की तरफ लाना होता है जिससे पेट पर दबाव पड़े और उसके स्नायु सशक्त बनें। इसके बाद कमर के स्नायुओं का व्यायाम करना चाहिये जिसके लिये दोनों हाथों के भुजदण्डों को एक-दूसरे हाथ से पकड़ कर कमर को एक बार बायीं और दूसरी तरफ दायीं तरफ घुमाना चाहिये। इसी प्रकार क्रम से पेट के स्नायुओं का, कन्धों का, हाथों का, गर्दन का, गर्दन और पीठ की पेशियों का, गले के स्नायुओं का, हाथों की पेशियों का, भुजदण्डों की पेशियों का, यकृत (लीवर) का, ठोड़ी का, गर्दन की बगल की पेशियों का, शरीर की अन्य छोटी-बड़ी पेशियों, हाथों की पेशियों का, कन्धों की पेशियों का, कूल्हे व कमर का, कलाई का, भुजदण्डों और हाथों के पंजों का, पीठ की पेशियों का, हाथ की संधियों का, पैर की पेशियों का, पैर की पिण्डली और कन्धों की पेशियों का व्यायाम करना चाहिये। इन सब अंगों को दबा कर या मोड़ कर थोड़ा-थोड़ा जोर लगाना पड़ता है। इनको लगातार करते रहने से 50-60 वर्ष के ऊपर भी लोगों में जीवन शक्ति स्थिर रहती है। वृद्धावस्था में विशेष परिश्रम वाले व्यायाम केवल वही कर सकते हैं जिन्होंने आरम्भ से ही इस अभ्यास को जारी रखा है। पर जो लोग आरम्भिक जीवन में स्वास्थ्य रक्षा की तरफ से असावधान रहे हैं, या किसी अन्य परिस्थितिवश अधिक निर्बल हो गये हैं उनको एक-एक अंग के हलके और क्रमशः बढ़ाये गये व्यायाम भी लाभदायक होते हैं। विशेष रूप से जब इस प्रकार के व्यायाम भावनापूर्वक किये जाते हैं, अर्थात् अंग-संचालन करते समय विचार-शक्ति को प्रेरित कर के यह कल्पना की जाती है कि हमारे इन अंगों में नवीन शक्ति का संचार हो रहा है तो उसका सत्परिणाम बहुत शीघ्र और उत्तम प्राप्त होता है।

सबके लिये आवश्यक-

स्वास्थ्य रक्षा के लिये छोटे-बड़े, स्त्री-पुरुष, बालक-वृद्ध सबको किसी प्रकार का व्यायाम करना आवश्यक है और प्राचीन समय में इसके लिये हमारे देश में उचित व्यवस्था भी की गई थी। उस समय हर ग्राम में और हर नगर में एक या अधिक अखाड़े पाये जाते थे जिनमें आठ-दस वर्ष की आयु से ही बालक व्यायाम करने लगते थे। इससे उनके स्वास्थ्य की नींव मजबूत हो जाती थी और अन्तिम समय तक वे निरोग और शक्तिशाली देह का सुखोपभोग करते थे। पर पिछले सौ वर्षों में विदेशी शिक्षा के प्रभाव से इस प्रथा का बहुत कुछ ह्रास हो गया है और अपने को शिक्षित तथा सभ्य समझने वाले व्यक्ति मिट्टी के अखाड़ों में जाना अपनी शासन के विरुद्ध समझते हैं। यह ठीक है कि इन दिनों प्रत्येक आयु और पेशे के व्यक्ति अखाड़ों में नहीं जा सकते और उनकी अवस्था में कुछ त्रुटियाँ भी आ गई हैं, तो भी समयानुकूल परिवर्तित रूप में उनका फिर से प्रचलन किया जा सकता है, और उसके द्वारा हम अपने गिरते स्वास्थ्य को संभाल कर बहुत कुछ लाभ उठा सकते हैं।

वर्तमान समय में भी हमको अपने देश, जाति, राष्ट्र का नव-निर्माण करना है और उसके साथ ही संसार-भर में फैली नाशकारी प्रतिद्वन्द्विता, शत्रुता के निवारण में भी यथाशक्ति सहयोग देना है। इस उद्देश्य की पूर्ति तभी संभव है जब हममें उसके लायक योग्यता और शक्ति हो। जो लोग केवल मन में बड़ी-बड़ी बातों की कल्पना करते रहते हैं उनके विचार कागजी महल के सिवा और कुछ सिद्ध नहीं होते। हमारे धर्म-ग्रन्थों के अनुसार संसार में सबसे बड़ी शक्ति ‘आत्म-शक्ति’ है जिससे एक बार पूरी दुनिया को भी हिलाया जा सकता है। हमें सार्वजनिक स्वास्थ्य की अभिवृद्धि एवं सुरक्षा के लिये पूरा प्रयत्न करना चाहिये। इस संदर्भ में व्यायाम एवं शारीरिक श्रम का प्रचलन करना अनिवार्य रूप से आवश्यक है।

गायत्री की उच्चस्तरीय साधना-


गायत्री महाशक्ति का तत्वज्ञान और विवेचन

गायत्री उपासना का बड़ा महत्व एवं माहात्म्य है। उसे आत्म-कल्याण और बाह्य जीवन में अपरिमित विभूतियाँ प्राप्त करने का आधार बताया गया है। आत्म-शक्ति पढ़ने से मनुष्य की भौतिक प्रतिभा का बढ़ना स्वाभाविक है। आत्म-शक्ति बढ़ाने के लिये उच्चतम चरित्र और व्यवस्थित जीवन क्रम की तो आवश्यकता है ही, साथ ही गायत्री उपासना जैसी तपश्चर्याओं को भी इस संदर्भ में अविच्छिन्न रूप से जुड़ा हुआ समझना चाहिये। आत्म-बल अभिवर्धन के लिये जिन उपासनाओं का प्रतिपादन किया गया है उनमें गायत्री सर्वश्रेष्ठ है।

उपासना से पूर्ण गायत्री का तात्विक स्वरूप जानना आवश्यक है। वस्तुस्थिति को जाने बिना कार्य करने लगना एक प्रवंचना मात्र है, उससे अभीष्ट प्रयोजन सिद्ध, नहीं होता। इसलिये साधना मार्ग पर चलने वाले प्रत्येक व्यक्ति को अपने मार्ग की दिशा एवं तात्त्विकता को भी समझना चाहिये। अनजान रहने पर न तो पूरा विश्वास होता है और न पक्की श्रद्धा जमती है। अज्ञान एक अन्धकार है जिसमें पग−पग पर आशंका एवं अश्रद्धा की संभावना बनी रहती है। ऐसी मनःस्थिति में आध्यात्मिक सफलता का पथ कंटकाकीर्ण ही बना रहता है।

रामायण में कहा गया है-

जाने बिनु न होई परतीती।

बिन प्रतीति होई किमि प्रीति॥

बिन प्रीति किमि भक्ति दृढ़ाई।

जिमि खगेश जल की चिकनाई॥

आवश्यक जानकारी के बिना प्रतीति अर्थात् विश्वास में दृढ़ता नहीं आती। जब प्रतीति (विश्वास) ही परिपक्व नहीं तो प्रेम, लगन, निष्ठा, तत्परता कैसे उत्पन्न हों! जब सच्ची प्रीति ही नहीं तो भक्ति किस बात की! पानी में थोड़ी सी चिकनाई (तेल) डालने पर वे परस्पर मिलते नहीं। तेल ऊपर ही तैरता रहता है उसी प्रकार वस्तुस्थिति का सम्यक् ज्ञान हुए बिना उपासना क्रम का अन्तःकरण में गहरा प्रवेश नहीं हो पाता। अस्थिर मति और भक्ति रहित अन्तःस्थिति से किया हुआ पूजा-पाठ कोई विशेष फलप्रद नहीं होता, इसलिये मनीषियों ने साधन के लिये जितना बल दिया है उतना ही उसका तत्वज्ञान जानने के लिये भी कहा गया है। ज्ञान की उपेक्षा कर केवल कर्मकाण्ड करते रहने से अभीष्ट प्रयोजन पूरा नहीं होता।

इस तथ्य को स्पष्ट करने के लिये ‘शतपथ ब्राह्मण’ में एक मार्मिक उपाख्यान का उल्लेख मिलता है। राजा जनक तो गायत्री उपासना से पूर्णता को प्राप्त कर सके पर उनका पुरोहित, जो उनसे भी अधिक पूजा-पाठ में संलग्न रहता था उसे कुछ भी फल प्राप्त न हुआ वरन् पशु की योनि में चला गया।

काण्डिका इस प्रकार है-

एतद्धवै तज्जनको द्यैदेही वुडिल माश्वतं राश्वि मुवाच यन्तु हो तद गायत्री विदब्रूथाऽअथ कथ œ हस्ती भूतोव्वह सीमि मुखंह्यस्या सम्राशन विवाँच करेति हो वाच। तस्याऽग्निरेव मुखं यदि हयाऽअपि वन्हि वाग्नावभ्यादधति सर्वमेव तत्सन्द हत्येब व œ है वैव विद्यद्यपि वन्हिव पापंकरोति सर्वमेव सत्संरसा शुद्धः पूतोऽजरोऽमृतः संभवति।

-शतपथ

अर्थात्-राजा जनक के पूर्व जन्म के पुरोहित ‘वुडिल’ मरने के उपरान्त अनुचित दान लेने के पाप में हाथी बन गये। किन्तु राजा जनक ने विज्ञान तप किया और उसके फल से वे पुनः राजा हुए। राजा ने हाथी को उसके पूर्व जन्म का स्मरण दिलाते हुए कहा-आप तो पूर्व जन्म में कहा करते थे कि-मैं गायत्री का ज्ञाता हूँ? फिर अब हाथी बनकर बोझ क्यों ढोते हैं?

हाथी ने कहा-मैं पूर्व जन्म में गायत्री का मुख नहीं समझ पाया था। इसलिये मेरे पाप नष्ट न हो सके।

गायत्री का प्रधान अंग-मुख-अग्नि है। उसमें जो ईंधन डाले जाते हैं, उन्हें अग्नि भस्म कर देती है। वैसे ही गायत्री का मुख जानने वाला-आत्मा-अग्निमुख होकर पापों से छुटकारा प्राप्त कर अजर अमर हो जाता है।

मुख से तात्पर्य तत्संबंधी प्रशिक्षण में आवश्यक जानकारी से है। ज्ञान को मुख से कहा जाता है। गायत्री को ‘गुरु मंत्र’ कहते हैं। गुरु मंत्र से उस मंत्र का प्रयोजन है जो विस्तार पूर्वक विशद विवेचना के साथ शिष्य के मस्तिष्क एवं अन्तःकरण में उतारा जाय। स्पष्ट है कि इस महाविद्या की उपासना करना ही पर्याप्त नहीं वरन् उसका आवश्यक विवेचन, विश्लेषण भी हृदयंगम करना आवश्यक है।

गायत्री क्या है? इस संबन्ध में शास्त्रकारों ने बहुत कुछ कहा है। विश्व ब्रह्माण्ड के निर्माता, संचालक एवं नियामक परब्रह्म परमात्मा की चेतना एवं क्रियाशक्ति का नाम ‘गायत्री’ है। उसके साथ जिस वैज्ञानिक विधि के साथ संपर्क स्थापित किया जा सकता है उसका नाम ‘उपासना’ है। गायत्री उपासना-अर्थात् वह क्रिया जिसके द्वारा मनुष्य अपनी अन्तःचेतना को पराशक्ति के साथ जोड़ कर ब्रह्म वर्चस् के अनुपम लाभ का अधिकारी बनता है।

गायत्री क्या है? कैसे उत्पन्न हुई? उसका प्रयोजन तथा स्वरूप क्या है? इन प्रश्नों का उत्तर इस प्रकार मिलता है-

सर्वे वै देवा देवी मयतस्थु कासि त्वं महादेवी। सा ब्रवीदहं ब्रह्म रूपिणी, मनः प्रकृति पुरुषात्मकं जगदत्पन्नम्।

-श्रुति

“सब देवगण भगवती महाशक्ति के पास गये और उन्होंने पूछा- ‘हे भगवती आप कौन हैं?’ इस पर भगवती ने कहा- “मैं ब्रह्म रूपिणी हूँ। मुझसे ही यह प्रकृति पुरुषात्मक संसार हुआ है।”

स वै नैव रेमे। तस्मादेकाकी न रमते, स द्वितीय-मैच्छत। सहैतावानास यथा स्त्रीपुमासौ संपरिष्वक्तौ स इममेवात्मानं द्वेधापातयत्ततः पतिश्च पत्नी चाभवताम्।

(महोपनिषद्)

“वह रमण नहीं कर सका क्योंकि अकेला कोई भी रमण नहीं कर सकता। उसने दूसरे की इच्छा की। वह ऐसा था जैसे स्त्री-पुरुष मिले हुए होते हैं। उसने अपने इस रूप के दो भाग किये, जो पति और पत्नी हो गये।”

न हि क्षमस्तथात्मा त्र सृष्टि सृष्ट तया बिना।

(देवी भा. 9/2/9)

“बिना तुम्हारी शक्ति के आत्मदेव सृष्टि की रचना नहीं कर सकते।”

देवीह्येकाऽयम् आसीत्। सैव जगदण्ड मसृजत्......... तस्या एव ब्रह्मा अजी अनत्। विष्णु रजी जनत्........... सर्वमजी जनन्.....................सैवा पराशक्तिः।

-वृहवृचोपनिषद

“सृष्टि के आरम्भ में वह एक ही दैवी शक्ति थी। उसी ने ब्रह्माण्ड बनाया, उसी से ब्रह्मा उपजे। उसी ने विष्णु रुद्र उत्पन्न किये। सब कुछ उसी से उत्पन्न हुआ। ऐसी है वह पराशक्ति।”

कारणत्वेन चिच्छक्त्या रजस्सत्वतमोगुणैः।

यथैव वटबीजस्थः प्राकृतोऽयं महाद्रुमः॥

“वटबीज में जिस प्रकार महावृक्ष सूक्ष्मरूप से विद्यमान् रहता है और उत्पन्न होकर एक महावृक्ष के रूप में परिणत हो जाता है, वैसे ही प्राकृत ब्रह्माण्ड चित्-शक्ति से उत्पन्न होता है।”

आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत् नान्यत् किंचन मिषत् प्रज्ञा प्रतिष्ठा।

(ऐतरेयोपनिषद्)

“सृष्टि से पहले आत्म-शक्ति के अतिरिक्त अन्य कुछ न था।”

आसीदेवेदमग्र आसीत् तत्समभवत्।

(छान्दोग्य)

“सृष्टि से पहले चिति-शक्ति ही सूक्ष्म सत्ता से विराजमान रहती है।”

निर्दोषो निरविष्ठेयो निरवद्यः सनातनः।

सर्वकार्य करी साहं विष्णोरव्यय रुपिणः॥

-लक्ष्मी तन्त्र

वह ब्रह्म तो निर्विकार, निरविष्ठ, निरवद्य, सनातन एवं अव्यय है। उनकी सर्व कार्यकारिणी शक्ति तो मैं ही हूँ।

परमास्तु या लोके ब्रह्म शक्ति विराजते।

सूक्ष्मा च सात्विकी चैव गायत्रीत्यभिधीयते॥

-गायत्री संहिता

सब लोकों में विद्यमान जो सर्वव्यापक परमात्मा की शक्ति है, वह अत्यन्त सूक्ष्म एवं सतोगुणी प्रकृति में निवास करती है। वह चेतन शक्ति गायत्री है।

निर्दोषो निरधिष्ठेयो निरवद्यस्सनातनः।

विष्णुर्नारायणःश्रीमान् परमात्मा सनातनः॥

षाड्गुण्यविग्रहों नित्यं परं ब्रह्माक्षरं परम्।

तस्य माँ परमाँ शक्ति नित्यं तर्द्धमधर्मिणीम्॥

सर्व भावानुगाँ विद्धि निर्दोषामनपायिनीम्।

सर्व कार्य करी साहं विष्णोरव्ययरुपिणः॥

व्यापारस्तस्य साहमास्मि न संशयः।

मयाकृतं हि यर्त्कम तेन तत्कृतमुच्यते॥

“मैं नित्य, निर्दोष, निरवयव, परब्रह्म परमात्मा श्रीमन्नारायण की शक्ति हूँ। उनके सब कार्य मैं ही करती हूँ। इस सृष्टि का संचालन करने वाला जो ब्रह्म कहा जाता है उसकी परम शक्ति मैं ही हूँ और मैं ही सदैव उन कार्यों की पूर्ति किया करती हूँ। मैं उनकी व्यापार रूप हूँ। अतएव मैं जो कार्य करती हूँ वही उन्हीं का किया हुआ कहा जाता है।”

उपरोक्त प्रमाणों से यही प्रकट होता है कि अचिन्त्य निर्विकार परब्रह्म को जब विश्व-रचना की क्रीड़ा करना अभीष्ट हुआ तो उनकी वह आकाँक्षा शक्ति के रूप में परिणत हो गई। वह शक्ति जड़ और चेतन दो भागों में विभक्त होकर परा-अपरा प्रकृति कहलाई। उसी का नाम गायत्री-सावित्री पड़ा। यह महाशक्ति ही सृष्टि निर्माण के लिये सभी आवश्यक उपकरण जुटाती है और उनका निर्माण, विकास एवं विनाश प्रस्तुत करती है। इस दृश्य जगत् में जो कुछ विद्यमान है वह उसी महाशक्ति का स्वरूप है। उसमें जो परिवर्तन हो रहे हैं-उपक्रम चल रहे हैं। उनके पीछे उसी महान् शक्ति की सामर्थ्य सक्रिय है। ब्रह्म तो साक्षी दृष्टा है। उसका समस्त क्रिया-कलाप इस गायत्री महाशक्ति द्वारा ही परिचालित हो रहा है। प्रमाण देखिये-

स्पन्दशक्तिस्तथेच्छेदं दृश्याभासं तनोति सा।

साकारस्य नरस्येक्षा यथा वै कल्पनापुरम्॥

(योग व. 6/2/84/6)

“भगवान् की स्पन्द-शक्ति रूपी इच्छा उसी प्रकार इस दृश्य जगत का प्रसार करती है जैसे कि मनुष्य की इच्छा कल्पना नगरी का निर्माण कर लेती है।”

तत्सद् ब्रह्मस्वरूपा त्वं किंचित्सद्सदात्मिका।

परात्परेशी गायत्री नमस्ते मातरम्बिके॥

-स्कन्द.

इस संसार में जो कुछ सत्-असत् है, वह सब हे ब्रह्मस्वरूपा गायत्री! तुम्हीं हो, परा और अपरा शक्ति गायत्री माता आपको प्रणाम है।

गायत्री वा इदं सर्व भूतं यदिदं किंच।

(छान्दोग्य. 3/12/1)

“जो कुछ था और जो कुछ है अर्थात् यह समस्त विश्व गायत्री रूप है।”

उपरोक्त वाक्य की व्याख्या करते हुए भगवान शंकराचार्य ने लिखा है-

“गायत्रीद्वारेण चोच्यते ब्रह्म, ब्रह्मणः सर्वविशेषपरहितस्य नेतिनेतीत्यादि विशेषप्रतिषेधगम्यस्य दुर्बोधत्वात्।”

“जाति गुण आदि समस्त विशेषों से रहित अर्थात् निर्विशेष होने के कारण ब्रह्म केवल निषेधमुख से ही सम्यग् रूपेण जाना जाता है, अतः वह दुर्विज्ञेय है। उसी को सर्व साधारण के लिये सुलभ करने को भगवती श्रीगायत्री द्वारा सविशेष ब्रह्म का उपदेश करती है।”

अपरा विद्या-

अपरा ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्ववेदः शिक्षा कल्पोव्याकरणं निरुक्तं छन्दो ज्योतिषमिति।

(मुण्डकोप. 1/1/5)

“अपरा विद्या का आशय है-ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद और उनके अंग शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष।”

अपराविद्यागोचरं संसारं व्याकृतविषयं साध्यसाधन लक्षणं अनित्यम्।

(शंकराचार्य कृत प्रश्नोपनिषद् भाष्य)

“अपरा विद्या प्रत्यक्ष विषयों से और विनाशशील पदार्थों से संबन्धित, साध्य विषयों का समाधान करने वाली और अनित्य होती है।”

पराविद्यागम्यम् असाध्य साधन लक्षणम् अप्राणमनो-गोचरम् अतीन्द्रियाविषयं शिवं शान्तम् अविकृतमक्षरं सत्यं पुरुषाख्यम्।

(शंकराचार्य कृत प्रश्नोपनिषद् की व्याख्या)

“पराविद्या से असाध्य विषय भी साध्य हो जाता है, अन्तरंग का ज्ञान कराती है, अतीन्द्रिय विषयों को प्रत्यक्ष कर देती है, अविनाशी, अक्षर सत्य और भगवत् स्वरूप है।”

परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते।

स्वाभाविकी ज्ञान बल क्रिया च॥

(श्वेता. 6/8)

“उस परमेश्वर की पराशक्ति ज्ञान, बल, क्रिया युक्त विभिन्न प्रकार की सुनी गई है।”

सदैकत्वं न भेदोऽस्ति सर्वदैवममास्य च।

योऽसो साहमहं योऽसौ भेदोऽस्ति मतिविभ्रमात्॥

(देवी भागवत)

“मेरा और ब्रह्म का सदा एकत्व है, किसी प्रकार का कभी भेद नहीं रहता। जो वे हैं वही मैं हूँ और जो मैं हूँ वही वे हैं। केवल बुद्धिभ्रम से इसमें भेद प्रतीत होता है।”

एकैव माया परमेश्वरस्य,

स्वकार्यभेदाद्भवति चतुर्धा।

भोगे भवानी समरे च दुर्गा,

क्रोधे च काली पुरुषे च विष्णुः॥

“यह महामाया परमेश्वर की एकमात्र शक्ति है जो कार्यभेद से चार प्रकार की हो जाती है। भोग की दृष्टि से वह भवानी है, समर के लिये दुर्गा है, क्रोध के समय काली बन जाती है और पुरुष रूप में विष्णु हो जाती है।”

आराध्या परमाशक्तिः सर्वैरपि सुरासुरै।

नातः परतरं किंचिधिकं भुवनत्रये॥

(शुकदेव)

“वह पराशक्ति सब की आराध्या है, सुर और असुर सब उनकी उपासना करते हैं। तीनों लोकों में कोई उनके समान नहीं है, उनसे बढ़ कर होने का तो प्रश्न ही नहीं है।”

कारणावस्थयापन्ना सदाहं धातृरुपिणी।

नाकार्य में हि यत् किंचित सदाहं ह्यक्षरा परा॥

कार्यभाव समापन्ना सदा प्रकृतिरुपिणी।

तदा ब्रह्मादया सर्वे सर्वेऽप्याविर्भवन्ति हि॥

“कारणावस्था को प्राप्त होकर मैं सदा ब्रह्मरूपिणी रहती हूँ। जो कुछ दिखाई दे रहा है वह सब मेरा ही कार्य है। मैं सदा से अक्षर रूपिणी और पराशक्ति हूँ। कार्यावस्थापन्न होकर मैं प्रकृति रूपिणी हो जाती हूँ, उसी समय ब्रह्मादि देव और अन्य सभी मुझसे प्रकट होते हैं।”

यस्यादृष्टो नैव भूमण्डलाँशो,

यस्यादासो विद्यते न क्षितीशः।

यस्याज्ञातं नैव शास्त्रं किमन्यैः,

यस्याकारः सा पराशक्तिरेव॥

(योगी उमानन्द)

“पराशक्ति वह है जिसके लिये संसार का कोई भी भाग अदृष्ट नहीं है। कोई ऐसा राजा नहीं जो उसका दास न हो, कोई ऐसा शास्त्र नहीं जिसे वह न जानती हो।”

तं विलोक्य महेशानि सृष्ट्युत्पादन कारणात्।

आदिनाथं मानसिकं स्वभर्तारं प्रकल्पयेत्॥

(शक्ति संगम तन्त्र)

“हे महेशानि! अपना रूप देख कर उस पराशक्ति ने अपने पति आदिनाथ को जगत् की सृष्टि के लिये अपने मन से उत्पन्न किया।”

भगवान् की सामर्थ्य भगवान् का अंग होते हुए भी उससे पृथक् अस्तित्व में दृष्टिगोचर होती है। सूर्य की किरणें यद्यपि निकलती उसी से हैं पर वे गर्मी और रोशनी के रूप में अपने अस्तित्व का अलग परिचय भी देती हैं। उसी प्रकार ब्रह्म की सामर्थ्य, चेतना एवं सक्रियता उसी के कारण है पर उसका पृथक अस्तित्व भी अनुभव किया जा सकता है। हमारा सीधा सम्बन्ध उस सामर्थ्य से ही है। संसार में जो असीम विद्युत भाण्डागार संव्याप्त है वह मूलतः विश्वव्यापी अग्नि तत्व की सत्ता के कारण ही है। तथापि हमें जो काम चलाऊ बिजली मिलती है उसका केन्द्र स्थानीय बिजली घर ही है। गायत्री हमारे सीधे संपर्क में आने वाली शक्ति है। प्राणियों का तथा संसार की हलचलों का केन्द्र-बिन्दु उसे ही कहा जा सकता है। यदि यह शक्ति इस जगत् को प्रेरित प्रभावित न करे तो फिर यहाँ सब कुछ निर्जीव, निष्क्रिय ही बन जाय।

शक्ति के बिना ‘शिव’ भी ‘शव’ बन जाता है। वर्णाक्षरों में “ि“ मात्रा को शक्ति का प्रतीक माना गया है। जीव और ब्रह्म के बीच संचार, संपर्क व्यवस्था इस शक्ति मात्रा के ऊपर ही निर्भर है। ईश्वर अपना अस्तित्व इसी आधार पर प्रकट करता है। इसलिये उसे ब्रह्म का प्राण भी कहते हैं। गायत्री विश्व का-जीवों का प्राण ही नहीं, ब्रह्म का भी प्राण है। कहा गया है-

शक्ति बिना महेशानि सदाऽहं शवरुपकः।

शक्तियुक्तो महादेवि शिवोऽहं सर्वकामदः॥

ब्रह्म का कथन है-”शक्ति के बिना मैं सदा ही शव के समान अर्थात् प्राणरहित हूँ। जब शक्तियुक्त होता हूँ तभी मैं सब इच्छाओं को पूर्ण करने वाला मंगल रूप हूँ।”

वर्तते सर्वभूतेषु शक्ति सर्वात्मना नृप।

शववच्छक्ति हीनस्तु प्राणी भवति सर्वदा॥

(देवी भागवत)

“हे राजन्! सम्पूर्ण भूतों में सर्वरूप से शक्ति वर्तमान है। शक्तिहीन प्राणी तो सदा शव की भाँति हो जाता है।”

न हि तया बिना परमेश्वरस्य सृष्टत्वं सिद्धति। शक्तिरहितस्य तस्य प्रवृत्त्यनुपपत्तेः।

(व्र.सू.शाँ.भा. 1/4/3)

“उसके बिना परमेश्वर स्रष्टा नहीं हो सकते, क्योंकि वे शक्ति के बिना क्रियाशील नहीं हो सकते।”

ब्रह्मादयोऽपि यदपाँगतरंगभंगय,

सृष्टि स्थिति प्रलय कारणताँ ब्रजन्ति

लावण्य वारिनिधि वीचि परिप्लुतायै।

तस्मै नमोस्तु सततं हरवल्लभायै॥

“जिनकी कृपादृष्टि मात्र से ब्रह्मा में सृष्टि रचना करने की, विष्णु में पालन की, शिव में संहार की शक्ति आ जाती है, सौंदर्य सागर की तरंगों से व्याप्त उस जगदम्बा के लिये मेरा सतत प्रणाम हो।”

प्रकाशरुपा प्रथमे प्रमाणे अमृतरुपिणी इति, अतः सा एवं सर्वाराध्या स्वतन्त्रा विश्वसिद्धि हेतु रिति।

(श्रुति)

“वह स्वयं ही प्रकाशमयी और अमृत रूपिणी है। वह सब की आराध्या है, स्वतन्त्र है और विश्व की निर्माणकर्त्री है।”

रुद्रहीनं विष्णुहीनं न वदन्ति जनः किल।

शक्तिहीनं यथा सर्वे प्रवदन्ति नराधमम्॥

“यदि किसी का तिरस्कार करना हो तो उसे ‘रुद्रहीन’ या ‘विष्णुहीन’ नहीं कहा जाता वरन् उसे ‘शक्तिहीन’ ‘अशक्त’ या निकम्मा कह कर ही तिरस्कृत किया जाता है।”

सर्वशक्तिपरं ब्रह्म नित्यमापूर्णमव्ययम्।

न तदस्ति न तस्मिन्यद्विद्यते विततात्मनि॥

(योग वसिष्ठ 3/100/5)

“नित्य, सर्वथा पूर्ण, अव्यय, परम ब्रह्म सर्वशक्तिमय है। ऐसा कोई पदार्थ नहीं जो उस विस्तृत रूप में न हो।”

ज्ञानशक्तिः क्रियाशक्तिः कतृताऽकतृताऽपि च।

इत्यादिकानाँ शक्तीनामन्तो नास्ति शिवात्मनः॥

(योग व. 6(1)37/16)

“ज्ञानशक्ति, क्रियाशक्ति, कर्तृत्व, अकर्तृत्व आदि शक्तियों का उस शिवात्मा में कोई अन्त नहीं है।”

चिच्छक्तिर्ब्रह्मणो राम शरीरेष्वभिदृश्यते।

स्पन्दनशक्तिश्च वातेषु जड़शक्तिस्तथोपले॥

(यो.व. 3-100)

“चेतना शरीरों में उस ब्रह्म की चित्शक्ति, वायु में स्पन्दन-शक्ति, पत्थर में जड़-शक्ति दिखाई देती है।”

सर्वधारा च प्रकृतिः सर्वत्माहं जगत्सु च।

अहमात्मा मनोब्रह्मा ज्ञानरुपी महेश्वरः।

पश्च प्राणाः स्वयं विष्णुबुद्धिः प्रकृतिरीश्वरी॥

“इस समस्त जगत् की आधारभूता प्रकृति शक्ति ही है, श्री नारायण आत्मा है। ब्रह्माजी मन और सदाशिव महेश्वर ज्ञानरूप हैं। पंच प्राण स्वयं विष्णु हैं और प्रकृति ईश्वरी ही बुद्धि है।”

विभिन्न स्तर की, विभिन्न रूपों में, विभिन्न प्रयोजन के लिये जो भी सक्रियता एवं सामर्थ्य दृष्टि गोचर होती है वह गायत्री का ही स्वरूप है। जो कुछ भी सिद्धियाँ, विभूतियाँ, समृद्धियाँ, इस संसार में दृष्टिगोचर हो रही हैं वे सामर्थ्य का ही प्रतिफल हैं। यह समर्थता चेतन प्राणियों में तो है ही, जड़ कहे जाने वाले परमाणुओं में भी उतनी ही सक्रिय है। इलेक्ट्रोन, प्रोटोन, नाइट्रोन आदि अणु घटक अपनी धुरी तथा कक्षा में भ्रमण करते हैं। ग्रह नक्षत्र अपने यात्रा पथ पर भ्रमण करते हैं तथा पंच तत्वों से विनिर्मित विभिन्न पदार्थ अपनी परम्परा के अनुरूप विधि व्यवस्था में-क्रमबद्ध मर्यादाओं में-बंधकर सृष्टि का निर्धारित क्रम चलाते रहते हैं। यह खेल उसी महत-तत्व का है जिसे ब्रह्म की स्फुरणा अथवा गायत्री के नाम से अध्यात्मवादी शब्दावली में स्थान दिया गया है।

इस महाशक्ति से हम जितने ही असम्बद्ध रहते हैं उतने ही दुर्बल होते जाते हैं। जितने-जितने उसके समीप पहुँचते हैं, सान्निध्य लाभ लेते हैं, उपासना करते हैं, उतना ही अपना लाभ होता है। अग्नि के जो जितने समीप पहुँचता है उसे उतनी ही अधिक गर्मी मिलती है, जो जितना दूर रहता है उसे उतना ही उस लाभ से वंचित रहना पड़ता है। इसलिये उस महाशक्ति का सान्निध्य लेकर अधिक बल प्राप्त करें यही उचित है।

पूछा गया-कि हे देवि, महाशक्ति, आप कौन हैं? क्या करती हैं, इस ब्रह्माण्ड में आपकी क्या स्थिति है? ब्रह्म और आपके बीच क्या संबन्ध है? तो उसने तथ्य का स्पष्टीकरण करते हुए वस्तुस्थिति का दिग्दर्शन इस प्रकार कराया है-

सर्वे वै देवा देवीमुपतस्थुः कासि त्वं महादेवि। साब्रवीदहं ब्रह्म स्वरूपिणी। अजाहमनजाहं अधश्चोर्ध्वंच तिर्यक्चाहम्॥

(देवी उपनिषद्)

“जब ब्रह्मादि समस्त देवों ने देवी के समीप जाकर प्रश्न किया कि-हे देवि! तुम्हारा स्वरूप क्या है? तब देवी ने बताया कि मैं परब्रह्मस्वरूपिणी हूँ। परमार्थतः अजन्मा होते हुए भी व्यवहारतः नाना देव-देवी रूप में जन्म लेती हूँ। मैं ही ऊपर, नीचे, बगल में सर्वत्र पूर्ण हूँ तथा देश-काल वस्तु से अपरिच्छिन्न हूँ।”

तस्य या परमा शक्तिर्ज्योत्स्नेव हिमदीधितेः।

सर्वावस्थाँ गता देवी स्वात्मभूतानपायिनी।

अहन्ता ब्रह्मणस्तस्य साहमस्मि सनातनी॥

(लक्ष्मी तंत्र 2/11-12)

महाशक्ति इन्द्र के प्रति कहती हैं- “उस परब्रह्म की जो चन्द्रमा की चाँदनी की भाँति समस्त अवस्थाओं में साथ देने वाली, स्वात्मभूता अनपायिनी अहंता नाम की परम शक्ति है, वह सनातनी शक्ति मैं ही हूँ।”

अहं सुवे पितरस्थमूर्धन मम योनिरप्स्वन्तः समुद्रे ततो वितिष्ठे भुवनानु विश्वोतामूँ ह्याँ वर्ष्मणो स्पृशामि।

‘मैं जगत पिता ‘हिरण्य-गर्भ’ को प्रसव करती हूँ। इसके ऊपर आनन्दमय-कोष मध्यस्थ विज्ञानमय-कोष में ये कारण-शरीर अवस्थित है। मैं समग्र भुवन में अनुप्रविष्ट होकर अवस्थित हूँ। वह सामने स्वर्ग लोक है, उसे मैं अपने शरीर द्वारा स्पर्श कर रही हूँ।”

अहमेव वात ईव प्रवाम्यारभमाणा भुवनानि विश्वापरो दिवा पर राना पृथिव्यैतावती महिमा सम्बभूव।

“जब मैं वायु के सदृश्य प्रवाहित होती हूँ तभी समग्र भुवन की सृष्टि का आरम्भ होता है। इन स्वर्ग तथा मर्त्य लोक के पेट में भी मैं विद्यमान हूँ। यही महिमा है।”

अहं राष्ट्री संगमनी वसूनाँ चिकितुषी प्रथयज्ञियानाम्। ताँ मा देवा व्यदधुः पुरुत्रा भूरिस्थ भूर्यावेशयन्तीम्॥3॥

(देवी-सूक्त)

“मैं सृष्टि-स्थिति-प्रलय कारिणी जगदीश्वरी हूँ धन को देने वाली हूँ। मैं उस ज्ञान को देने वाली हूँ जिससे जीव आत्म-भाव को प्राप्त हो सके। यही ज्ञान सब उपासनाओं का आदि है। मैं बहुभावों में अवस्थित हूँ। देवगण मेरे अनेक रूपों की उपासना किया करते हैं।

मया सो अन्नमत्ति यो विपश्यति यः प्राणिति शणोत्युक्तम्। अमन्तवो माँ त उपक्षियन्ति श्रुधि श्राद्धिवं ते वदामि।

“जीव जो कुछ अन्नादि खाता है, जो कुछ देखता है, जिस श्वास-प्रश्वास क्रियादि द्वारा जीवित रहता है और जो कुछ सुनता है-वे सब क्रियायें मेरे ही द्वारा निष्पन्न होती हैं। मुझे जो नहीं जानते, वे संसार में क्षीणता को प्राप्त होते हैं। हे सौम्य! मैं जो कुछ कहती हूँ उसे श्रद्धा से सुनो।”

सृष्टि का संचालन, व्यवस्था, प्रगति, समृद्धि और सुन्दरता का मूल आधार वह महाशक्ति ही है। जिस प्रकार बिजली, भाप, तेल की शक्ति से विविध प्रकार के यंत्र चलते हैं उसी प्रकार उस महाशक्ति की सत्ता से ही इस जगत का सारा क्रिया कलाप चल रहा है।

देव शक्तियाँ इस सृष्टि के विभिन्न प्रयोजनों को पूरा करती हैं। जैसे पाचन क्रिया से संलग्न जीवनी शक्ति को जठराग्नि, मस्तिष्क में काम करने वाली को मेधा, प्रजनन संस्थान में काम करने वाली को कामोत्तेजना, चेहरे पर चमकने वाली को ओजस्विता कहते हैं, पर वस्तुतः वह एक ही शक्ति है, जो विभिन्न प्रयोजनों में प्रयुक्त होने के कारण अलग-अलग नामों से पुकारी जाती है। देव शक्तियों के अलग-अलग नाम रूप भी इसी प्रकार रखे गये हैं। ब्रह्मा, विष्णु, महेश, इन्द्र, वरुण, अग्नि, पूषा, अर्यमा, आदि के कार्य, प्रयोजन और स्वरूप अलग-अलग वर्णन किये गये हैं, पर वस्तुतः वे एक ही महाशक्ति द्वारा विभिन्न प्रयोजनों के लिये प्रयुक्त किये जाने वाले उपकरण मात्र हैं। इनका वही निर्माण करती है, प्रयोजन में लाती है और कार्य कर सकने की क्षमता प्रदान करती है, इसलिये उसे देव जननी अथवा देवाधिष्ठात्रि भी कहा गया है। अन्यान्य देवताओं की उपासना से जो कुछ प्रयोजन सिद्ध हो सकता वह सारे का सारा देव आत्मा सान्निध्य से भी प्राप्त हो सकता है।

महाशक्ति ने देवताओं से साथ अपने सम्बन्ध की चर्चा करते हुए कहा है-

अहं रुद्रेभिर्वसुभिश्चरामि। अहमादित्यैरुत विश्वदेवैः।

अहं मित्रावरुणावुभौ विभार्मि। अहमिन्द्राग्नी अहमश्विनाबुभौ।

“मैं रुद्रों और वसुओं के रूप में संचार करती हूँ। मैं आदित्यों और विश्वेदेवों के रूप में फिरा करती हूँ। मैं दोनों मित्रावरुण का, इन्द्राग्नि का और दोनों अश्विनीकुमारों का पोषण करती हूँ।”

न विष्णुर्न हरः शक्तो न ब्रह्मा न च पावकः।

न सूर्यो वरुणः शक्तः स्वे स्वे कार्ये कथंचन।

तथा युक्ता हि कुर्वन्ति स्वानि कार्याणि ते सुराः।

(दे.भा.1-8-39)

“विष्णु, शिव, ब्रह्मा, अग्नि, सूर्य, वरुण आदि स्वयं कुछ भी नहीं कर सकते। (मैं महाशक्ति) ही इन सब को कार्य करने में समर्थ बनाती हूँ।”

नूनं सर्वेषु देवेषु नाना नाम धरा ह्यहम्।

भवामि शक्ति रुपेण करोमि च पराक्रमम्॥

गौरी ब्राह्मी तथा रौद्री वाराही वैष्णवी शिवा।

वारुणी चाथ कौवेरी नारसिंही च वैष्णवी॥

(देवी भागवत्)

समस्त देशों में मैं ही तरह-तरह के नाम रखकर उनकी शक्ति बनती हूँ और पराक्रम करती हूँ। गौरी, ब्राह्मी, रुद्राणी, वाराही, वैष्णवी, शिवा, वारुणी, कौवेरी, नारसिंही आदि सब मेरे ही नामान्तर हैं।”

मानव प्राणियों में जो विभिन्न प्रकार की प्रतिभायें, विशेषतायें और महानतायें दृष्टि-गोचर होती हैं वे उस महाशक्ति की उपस्थिति का परिचय देती हैं। जड़ शरीर में जितनी चेतना, चमक, स्फूर्ति एवं सुन्दरता है उसे उसी सत्ता का चमत्कार कहना चाहिये। जिसने अपने पुरुषार्थ से उसे अपने भीतर जितनी मात्रा में धारण कर लिया है, वह उतना ही बड़ा महा-मानव दिखाई देता है। यह शक्ति जब घटने लगती है तो शरीर निर्बल, निस्तेज एवं निष्क्रिय हो जाता है। मन में जब यह शक्ति कम पड़ने लगती है तो उसे मन्द-बुद्धि, मूर्ख, अविवेकी, आदि लाँछनाओं से तिरस्कृत किया जाता है। इसी शक्ति की अत्यधिक न्यूनता होने से मनुष्य की मृत्यु हो जाती है। साराँश यह है कि संसार में जितनी महानता, विशेषता, चमत्कार देखने में आता है वह उस आदि शक्ति की क्रीड़ा ही है। चाहे साँसारिक और चाहे आध्यात्मिक कोई भी क्षेत्र हो इस शक्ति के बिना सफलता असम्भव है।

अपनों से अपनी बात-


‘ज्ञान-यज्ञ’ इस युग का सबसे बड़ा परमार्थ

युग परिवर्तन की इस सन्धि वेला में हम प्रबुद्ध आत्माओं का कुछ विशेष कर्तव्य है। आपत्ति काल में ‘आपद धर्म’ निभाना पड़ता है। मुहल्ले में आग लगी हो तो साधारण नित्य कर्मों को छोड़ कर पहले उसे बुझाने के लिये जाना पड़ता है। आज संसार में सब ओर आग लगी हुई है, उसे बुझाने के लिये समर्थ और सक्षम व्यक्तियों को आवश्यक प्रयत्न करना ही चाहिये। इस संदर्भ में बरती गई उपेक्षा तथा बहानेबाजी एक महान् भूल होगी जो चिरकाल तक पश्चाताप एवं आत्म-ताड़ना की आग में हमें जलाती रहेगी।

असुरता के साम्राज्य को निरस्त्र करने के लिये-संस्कृति की सीता को वापिस लाने के लिये-समुद्र का सेतु बाँधने जैसी विषम आवश्यकता को तत्कालीन शूरवीरों ने साहसपूर्वक पूरा किया था। रावण का आतंक बड़ा था, उसे परास्त करने का कार्य असम्भव जैसा लगता था, रीछ-वानरों की अपनी क्षमता नगण्य थी, समुद्र बहुत गहरा और चौड़ा था, उसका पुल बाँधना दुरूह प्रतीत होता था। इन विषमताओं के होते हुए भी युग-मानव की पुकार सुन सकने वाली आत्मायें आगे आई थीं और उनने अपनी व्यक्तिगत पारिवारिक कठिनाइयों के बहानों को तिलाँजलि देकर ऐतिहासिक कर्तव्यों का पालन किया था। रीछ-वानर ही नहीं, गिद्ध

और गिलहरी जैसे तुच्छ जीव भी उस महान अभियान में योगदान करने के लिये उत्साहपूर्वक आगे आये थे। अब फिर उसी पुण्य प्रक्रिया की पुनरावृत्ति अपेक्षित हो रही है।

जिन परिस्थितियों में हमें आज जीवन यापन करना पड़ रहा है उन्हें बदलना नितान्त आवश्यक है। जीवनोपयोगी साधनों का अभाव सभी को कष्ट दे रहा है। यों धरती माँ का भण्डार खाली नहीं हो गया, उसके पास अपनी प्रत्येक सन्तान का समुचित निर्वाह कर सकने लायक धन-धान्य प्रचुर मात्रा में विद्यमान है। पर उसके उत्पादन, वितरण एवं संग्रह की वर्तमान प्रणाली इतनी दूषित है कि चन्द श्रीमन्तों को छोड़ कर शेष सभी को अत्यधिक कष्ट के साथ गुजर करने के लिये बाध्य होना पड़ रहा है। सामाजिक न्याय के अभाव में मनुष्य, मनुष्य के खून का प्यासा बना हुआ है। अमुक वंश, जाति में पैदा होने के कारण लोग ऊँच या नीच माने जाते हैं और उन्हें अहंकार करने एवं तिरस्कृत होने का अवसर मिलता है। स्त्रियाँ पुरुषों की खरीदी हुई जड़-सम्पत्ति की तरह दिन गुजार रही हैं। सामाजिक कुरीतियों का ऐसा बोलबाला है कि विवाह-शादी जैसे मामूली से आयोजन को आकाश-पाताल जैसा तूल मिल गया है और उस कुचक्र में जन-समाज की आर्थिक एवं पारिवारिक सुव्यवस्था चकनाचूर हुई जा रही है। इन परिस्थितियों में हमें जिस घुटन के साथ जिन्दा रहना पड़ रहा है वह दिन-दिन असह्य होती जाती है। युग की आत्मा पुकारती है कि इन विषमताओं को बदला ही जाना चाहिये।

अपना जन-जीवन दर्शन आज कितना क्षुद्र एवं घृणित है इसे देख कर विवेक की आत्मा सिहर उठती है। हर आदमी के सामने धन का बिना उचित-अनुचित का ध्यान किए प्रचुर मात्रा में उपार्जन एवं संग्रह करना ही एकमात्र लक्ष्य बना हुआ है। उस उपार्जन एवं संग्रह का उपयोग वह केवल अपने व्यक्तिगत विलास, स्वार्थ एवं अहंकार की पूर्ति तक ही सीमित रखे हुए है। इस हर दृष्टि से पिछड़े हुए समाज को उठाने और बढ़ाने के लिये आर्थिक साधनों की अत्यधिक आवश्यकता है। पर लोग अपनी सम्पन्नता बढ़ाने और विलासिता उभारने के अतिरिक्त उस दिशा में सोच तक नहीं पाते। कुछ अनुदान दे सकना तो दूर की बात है। जो देते भी हैं उनके पीछे कोई उदारता या विवंक नहीं होता, केवल अपनी कीर्ति के मूल्य पर ही कुछ कौड़ियाँ फेंकी जाती है। आज का यही अर्थशास्त्र है। इसने अपराधों की बाढ़ खड़ी कर दी है। हर क्षेत्र में अर्थ लोलुपता ने एक प्रकार का चरित्र संकट खड़ा कर दिया है। जहाँ देखिये प्रकट-अप्रकट भ्रष्टाचार का ही बोलबाला है। फलतः शोषण, उत्पीड़न, छल, विश्वासघात, लूट, हत्या, गुण्डागर्दी, बेईमानी की घटनायें पग-पग पर देखने को मिल रही हैं। उनकी प्रतिक्रिया से दशों दिशायें क्षोभ, रोष, असन्तोष एवं प्रतिशोध की भावना से भरी हुई उद्विग्न हो रही हैं। क्या इन परिस्थितियों के, इन आकाँक्षाओं एवं आदर्शों के रहते कभी सामाजिक शान्ति स्थापित हो सकती है? यदि हमें चैन से रहने और रहने देने की स्थिति प्राप्त करनी है तो इन परिस्थितियों को बदलने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं।

अज्ञान की कैसी विषम घटायें चारों ओर घुमड़ रही हैं उन्हें देख कर डर लगता है। नशेबाजी जैसे व्यसनों में लोग अपने धन, स्वरूप, मन, मस्तिष्क की होली जलाते छोटे बच्चों जैसी आतिशबाजी का खेल खेल रहे हैं। कितना समय और कितना धन लोग इन विडम्बनाओं पर खर्च करते हैं। तम्बाकू, शराब, भाँग, गाँजा आदि का प्रचलन जिस तेजी से बढ़ रहा है उसे देखते हुए शक होता है कि जमाना कहीं पागल होने तो नहीं जा रहा है। जिन कुरीतियों और अन्धविश्वासों को लोग छाती से लगाये बैठे हैं उनसे आडम्बरी धूर्तों की पाँचों घी में हैं और बेचारे निरीह लोगों का कचूमर निकला जा रहा है। भूत, पलीत, दई, देवता, टोना, टोटका के कुचक्र में अभी भी बेचारे अनपढ़ देहाती ही नहीं तथाकथित सुशिक्षित भी सिर पटकते देखे जाते हैं। रीति-रिवाजों का जंजाल पक्षियों को पकड़ने वाले जाल की तरह लोगों को बेतरह उलझाये हुए है और वे उसी गोरखधन्धे में न जाने कितनी बर्बादी भरी विडम्बना का बोझ ढोते हुए मरते-खपते रहते हैं। आज के अज्ञानग्रस्त मस्तिष्कों का यह तथाकथित शिक्षा भी कुछ सुधार नहीं कर पा रही है यह देख कर हैरत होती है। यह विडम्बना यदि बदली न जा सकी तो उलझा मनुष्य और भी अधिक जंजाली उलझनों में फंसता चला जायेगा।

मानव-जीवन एक दिव्य विभूति है। अनुपम अवसर और सुरदुर्लभ सौभाग्य है। इसे उन आदर्शों और उत्कृष्ट क्रिया-पद्धति के लिये ही प्रयुक्त किया जाना चाहिये। पर आज लोग जिस हैवानी और शैतानी रीति-नीति को अपना कर मौत के दिन पूरे कर रहे हैं उसे देखते हुए यही कहना होगा कि मनुष्य को न तो अपनी उत्कृष्टता का ध्यान रहा न महानता का। न उसे अपने जीवन का उद्देश्य एवं स्वरूप विदित है और न सदुपयोग की दिशा मालूम है। इन्सान का शरीर ओढ़े शैतान का स्वच्छंद विचरण इस युग की सबसे बड़ी विभीषिका है। यह स्थिति विषम से विषमतर होती चली जा रही है और हम सर्वग्राही, सत्यानाशी, रौरव नर्क में गिरने के लिये द्रुतगति से बढ़ रहे हैं। क्या इस विभीषिका की उपेक्षा करते रहना ही उचित है? क्या इस सामूहिक आत्महत्या को रोकने के लिये हम प्रबुद्ध व्यक्तियों का कुछ भी कर्तव्य नहीं है?

आज के विश्व का कण-कण परिवर्तन की माँग करता है। आज का विश्व मानव इन विडम्बनाओं से छुटकारा पाने के लिये आकुल है। परिवर्तन आज की एक अनिवार्य, अपरिहार्य आवश्यकता है। इसे पूरा करने के अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं।

‘यदा यदाहि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्’-की प्रतिज्ञा के अनुसार इन विषम परिस्थितियों को बदलने के लिये अब भगवान पुनः अवतरित हो रहे हैं। व्यक्ति के रूप में नहीं, एक प्रचण्ड आन्दोलन के रूप में। व्यक्ति में दोष भी रहते हैं इसलिये अवतारी महापुरुष में भी कोई कलंक रह जाता है। आन्दोलन के आदर्श यदि उत्कृष्ट हों तो वह निष्कलंक ही रहता है। भले ही कुछ अनुपयुक्त व्यक्ति उसे गंगाजी में पड़े हुए कछुओं की तरह मलीन करने की चेष्टा करते रहें। इस युग के परिवर्तन पर “निष्कलंक अवतार” होने की भविष्यवाणी शास्त्रों में है। कलंक से बचने के लिये वह निष्कलंक अवतार अब नव-निर्माण के लिये समुद्यत युग-परिवर्तन आन्दोलन के रूप में सामने आया है। प्रत्येक बुद्ध व्यक्ति को लंका-विजय में संलग्न रीछ, वानर, गिद्ध और गिलहरियों की तरह- गोवर्धन उठाते समय लाठी वाले ग्वाल-बालों तरह- शिव विवाह की बरात में भूत-गणों की तरह-स्वतन्त्रता आन्दोलन में साहस और त्याग दिखाने वाले वीर सत्याग्रहियों की तरह आना होगा और महाकाल की युग-निर्माण प्रत्यावर्तन प्रक्रिया को सफल बनाने में बड़-चढ़ कर योगदान देना होगा।

शत सूत्री युग-निर्माण योजना के अंतर्गत आज की प्रत्येक विषम परिस्थिति को बदलने के लिये प्रत्येक मोर्चे पर सुधारात्मक संघर्ष आरम्भ किया जाना है। अगले दिनों एक सर्वतोमुखी अभियान सक्रिय होगा और वह आँधी तूफान की तरह सड़ी-गली विकृतियों को हटा कर उसके स्थान पर स्वर्गीय सम्भावनायें विनिर्मित होने की सम्भावना करेगा। आज हमें उसी की पूर्व भूमिका तैयार करनी कितनी ही तेजस्वी आत्माएं प्रसुप्त एवं मूर्छित अवस्था में पड़ी हैं। वे जाग पड़ें और इस ईश्वरीय आकाँक्षा की में अपना आवश्यक योगदान देने लगें तो जिसकी है उसके साकार होने में देर न लगे।

युग-परिवर्तन की पृष्ठभूमि है- जन-जागरण। वस्तुस्थिति का आवश्यक अनुभव तथा विषमताओं को हटाने का उपयुक्त मार्गदर्शन मिलने पर विचारशील व्यक्ति सदा लोक-मंगल के लिये बड़े-बड़े कठिन कार्य करने में तत्पर होते रहे हैं। बुद्ध, महावीर, नानक, ईसा, गाँधी आदि के आन्दोलन अपने-अपने समय पर करोड़ों लोगों को आन्दोलन करने में सफल हुए। कार्लमार्क्स का साम्यवादी अभियान आज लगभग आधी दुनिया को अपने क्षेत्र में ले सकने में सफल हो गया है। आध्यात्मिक आदर्शों के अनुरूप जन-मानस को ढालने और स्वर्गीय सत- परिस्थितियाँ उत्पन्न करने का युग-निर्माण आन्दोलन सर्वांगपूर्ण सम्भावनाओं से ओत प्रोत है कि यदि उसका प्रकाश जन-जन के मन-मन तक पहुँचाया जा सके तो परिवर्तन की प्रक्रिया इतनी तीव्र एवं सफल हो सकती जिसकी साधारण बुद्धि तो कल्पना भी नहीं कर सकती।

युग-निर्माण की पृष्ठभूमि निस्सन्देह हमें जन-जागरण पुण्य-प्रक्रिया से ही आरम्भ करनी होगी। आज उसी का शुभारम्भ श्रीगणेश किया जा रहा है। अपनी प्रथम पंचवर्षीय योजना के पाँच कार्यक्रमों में ‘ज्ञान यज्ञ’ का स्थान सर्वोपरि है।

जन्मेजय में अपने पिता को काट खाने वाले सर्पों का निराकरण करने के लिये नाग-यज्ञ रचा था। अपने राष्ट्र-पिता भारतवर्ष की उज्ज्वल संस्कृति को- आत्मा की पतित बना देने वाले इन कुविचार, कुसंस्कार सर्पों का निराकरण करने के लिये ज्ञान-यज्ञ का आयोजन करना पड़ रहा है। इसमें होता अध्वर्यु, यजमान, पुरोहित, ब्रह्मा और आचार्य चाहिये ऐसे जो जन जागृति के लिये समय दे सकें। उपेक्षा दिखाने वाले और अरुचि प्रकट करने वालों को भी उत्कृष्ट विचारधारा के पढ़ने, सुनने तथा समझने के लिये विवश कर सकें। सच्ची लगन हो तो यह कार्य कुछ कठिन नहीं। चुनाव के दिलों में लोग वोटरों को जिस तरह फुसलाते हैं वही हथकण्डे यदि सदुद्देश्य के लिये हम प्रयोग करने लगे तो एक भी व्यक्ति ऐसा न बचे जो नव-निर्माण की विचारधारा सुनने-समझने के लिए तैयार न किया जा सके। आवश्यकता केवल कार्यकर्ता की लगन की है। लगनशील व्यक्ति क्या नहीं कर सकते? युग के अनुरूप विवेकशीलता को समझने की रुचि पैदा कर लेना इतना कठिन काम नहीं है जो सच्ची लगन वाले प्रबुद्ध कार्यकर्ताओं के लिए भी असम्भव या कष्ट सम्पन्न बना रहे।

युग-निर्माण योजना के अंतर्गत इन दिनों आग उगलने वाला, जन-मानस को उलट-पुलट कर रख देने वाला अत्यंत सस्ता और अत्यन्त उत्कृष्ट स्तर का साहित्य सृजन किया जा रहा है। पर इसका वास्तविक लाभ तभी हो सकता है जब उसे जनसाधारण के अन्तःकरण तक पहुँचने का अवसर मिले। आज लोगों में उत्कृष्ट स्तर की विचारधारा को पढ़ने, सुनने, समझने, हृदयंगम करने की तनिक भी क्षमता नहीं रही। लोगों की इस ओर जरा भी रुचि नहीं है। यह रुचि पैदा करना अपना काम है। चाय और बीड़ी के प्रचारकों के अपने प्रबल प्रयत्नों ने इन गन्दी चीजों को जन-जीवन का अंग बना दिया तो क्या हम ‘अखण्ड ज्योति’ के प्रबुद्ध परिजन ऐसी जन-रुचि उत्पन्न नहीं कर सकते जिसे आधार पर सर्वसाधारण के मस्तिष्क एवं अन्तःकरण उलट-पुलट कर रखे जा सकें? यह संभव है और सर्वथा सरल है। युग की माँग यही है। आवश्यकता केवल हमारे थोड़े से त्याग और थोड़े से साहस की है। इन पंक्तियों द्वारा उसी का आह्वान किया जा रहा है।

‘झोला पुस्तकालय’ ज्ञान-यज्ञ का मूर्तिमान प्रतीक है। आज की परिस्थितियों में इससे बड़ा परमार्थ और कोई नहीं हो सकता। दस पैसा रोज की नगण्य धनराशि थोड़ी सी भी उदारता मन में हो तो निर्धन से निर्धन व्यक्ति को भी बड़ी आसानी से इस महान परमार्थ के लिये सुलभ ही है। दधीचि, शिवि, कर्ण, हरिश्चन्द्र, मोरध्वज, भामाशाह जैसे परमार्थ परायण महापुरुषों की सन्तान इतनी कंजूस एवं अनुदार नहीं हो सकती जो इतने नगण्य से पैसे खर्च करने में आगा-पीछा सोचे। युग-निर्माण आन्दोलन की दोनों पत्रिकायें और छोटी-छोटी पुस्तिकायें एक थैले में साथ रखी जाएं। दफ्तर, बाजार, शादी, दोस्ती आदि में जहाँ भी जाय वहाँ सुरुचि वाले व्यक्ति ढूंढ़े जायें और अवसर देख कर उनसे नव-निर्माण विचारधारा के इस पहलू पर चर्चा की जाय जिससे कि उनका संबन्ध हो। इस प्रकार थोड़ी रुचि जान कर अपना साहित्य उन्हें पढ़ने को दिया जाय और पढ़ने पर वापिस लिया जाय। यह कार्य कुछ भी कठिन नहीं है। आरम्भ में थोड़ी सी झिझक जरूर लगती है पर अभ्यास होने पर दस-पाँच दिनों में ही यह कार्य बड़ा सरल एवं सरस प्रतीत होने लगता है। अपने घर, परिवार, पड़ोस, रिश्तेदारी तथा संबन्ध, परिचय के लोगों में ऐसे 50 व्यक्ति आसानी से मिल सकते हैं जिनकी मनोभूमि इस योग्य हो कि प्रयत्न करने पर प्रेरक विचारों वाला साहित्य पढ़ने की अभिरुचि उत्पन्न की जा सके। यदि इतना भी किया जा सका तो परिणाम आश्चर्यजनक होगा। आज युग-निर्माण योजना के 1 लाख सदस्य हैं वे 50 लाख व्यक्तियों को नव-निर्माण का प्रकाश कल से ही पहुँचा सकते है। उन 50 लाखों का 50-50 लाख तक पहुँचने का प्रयत्न कुछ ही दिनों में 2 करोड़ और इसके बाद तीसरे चक्रवृद्धि प्रयत्न में वह संख्या 1 अरब से ऊपर जा पहुँचेगी। इनमें से सौ पीछे एक व्यक्ति भी काम का निकल पड़ा तो शत सूत्री योजना के अंतर्गत सारे कार्यक्रम देखते-देखते मूर्तिमान हो जायेंगे और सतयुग के अवतरण की जो योजना आज स्वप्न जैसी दीखती है कल मूर्तिमान सामने अपनी सफलता का विजय घोष कर रही होगी।

हम अभिनव विचारों का सृजन करें, परिजन उन्हें जन-मानस में प्रवेश कराने का प्रबल प्रयत्न करें। पढ़े को पढ़ाया जाय, बेपढ़ों को सुनाया जाय तो वह विचार क्रान्ति प्रत्येक व्यक्ति के अन्तःकरण में एक चिनगारी बन कर जल सकती है और देखते-देखते प्रचण्ड ज्वाला के रूप में परिलक्षित हो सकती है। इन्जेक्शन कैसा ही उपयोगी क्यों न हो डॉक्टर की उंगलियाँ ही उसे रोगी के शरीर में प्रवेश करा सकती हैं। बन्दूक, कारतूस कितने ही कीमती क्यों न हों चलायेगा तो उन्हें सैनिक ही। हम कितना ही प्रेरक साहित्य विनिर्मित करें, परिजनों के प्रबल प्रयास बिना वह जन मानस में व्यापक रूप में प्रवेश न कर सकेगा। इस समस्या को हल करने के लिये परिजनों का जो भी योगदान हो वह “ज्ञान-यज्ञ” महानतम पुण्य-परमार्थ ही माना जायेगा।

यह कार्य हमें अपने-अपने घरों से आरम्भ करना होगा। परिवार का एक भी शिक्षित व्यक्ति ऐसा न हो जो इन विचारों के संपर्क में न हो। स्कूल जाने वाले घर के बच्चों के शिक्षा कार्यक्रम में आधा घन्टा नव-निर्माण साहित्य पढ़ने की बात भी अनिवार्य रूप से जुड़ी रहे। रात को विचार गोष्ठी हुआ करे जिसमें बारी से घर के शिक्षित व्यक्ति आधा या एक घंटा इस साहित्य को पढ़ कर सुनाया करें जिससे वो जो बिना पढ़े हैं उन्हें भी इन विचारों का लाभ मिलता रहे। घर में देव मन्दिर की तरह अपने पुस्तकालय ज्ञान-मन्दिर को सुसज्जित रखा जाय और उसके प्रति घर के हर सदस्य के मन में असाधारण श्रद्धा एवं आदर भाव हो। शास्त्रों, ऋषियों, मनीषियों और तत्वदर्शियों के विचारों का दोहन एक उत्कृष्ट स्तर का इत्र है, जिससे सारा घर, परिवार सच्चे अर्थों में महक सकता है। “पुस्तकालय ही सच्चे देवालय” ट्रैक्ट को यदि ध्यानपूर्वक पढ़ा जाय तो यह बात भली प्रकार समझ में आ जायेगी कि सत्साहित्य और स्वाध्याय का मानव-जीवन में कितना महान महत्व है। वह तथ्य यदि अपने परिवार के हर सदस्य के मन में ठीक तरह जमाया जा सका और इस दिशा में उनकी अभिरुचि को जागृत किया जा सका तो समझना चाहिए कि परिवार के प्रति अपने नैतिक कर्तव्य की बहुत हद तक पूर्ति हो गई।

घर, परिवार, रिश्तेदार, साथी, मित्र परिचित एक भी ऐसा न बचे जिस तक इस प्रेरणा के प्रकाश को पहुँचाने की हम चेष्टा न करें। जन-मानस के नव-निर्माण से ही इन प्रवृत्तियों का उद्भव सृजन एवं अभिवर्धन होगा जिसके आधार पर सृजनात्मक एवं संघर्षात्मक कार्यक्रमों के फलने फूलने की परिस्थितियाँ बनें। युग बदलने के लिये हमें कितने ही महत्वपूर्ण कार्य करने पड़ेंगे पर वे होंगे तभी जब करने वालों में इस तरह की निष्ठा, प्रेरणा प्रवृत्ति एवं लगन उत्पन्न हो। यह कार्य ज्ञान-यज्ञ के व्यापक बनाये बिना और किसी तरह संभव नहीं हो सकता। इस युग के इस महानतम कार्य के लिये- उच्चतर पुण्य परमार्थ के लिये- ज्ञान-यज्ञ के लिये यदि हमारा थोड़ा-सा समय, थोड़ा-सा भी पैसा न लग सके, तो समझना चाहिये कि हमारा सारा बातूनी- हवाई अध्यात्म परख की कसौटी पर बिलकुल थोथा सिद्ध हो रहा है। हमें बाल कल्पनाओं जैसी आध्यात्मिक उड़ानें उड़ते रहने की अपेक्षा अब कर्मठता के क्षेत्र में उतरना पड़ेगा और अपनी कंजूसी, संकोच शीलता तथा संकीर्णता की परिधि से बाहर निकल कर वह करना पड़ेगा जो इतिहास में हर प्रबुद्ध और विवेकशील को सक्रिय रूप से करना पड़ा है।

ज्ञान-यज्ञ, वाणी और साहित्य दोनों की ही अपेक्षा रखता है। इस पुण्य प्रयोजन के निमित्त विनिर्मित हुए साहित्य की जगह-जगह चर्चा के लिये जब तक मुँह न खोला जायेगा- बिना पढ़ों को उसे पढ़ कर न सुनाया जायेगा- तब तक उसकी सार्थकता और सफलता संदिग्ध ही बनी रहेगी। इसलिये हमको इस ओर से उपेक्षा तथा झिझक को छोड़ कर थोड़ा समय और धन देते रहने के लिये कटिबद्ध ही होना चाहिए। इतने महान प्रयोजन के लिये- अपने परिवार के प्रबुद्ध परिजन क्या इतना छोटा-सा त्याग एवं पुरुषार्थ भी न कर सकेंगे? ज्ञान-यज्ञ की पुण्य वेदी हम सबसे यही पूछती है- अब समुचित उत्तर देने की बारी है।


आवश्यकता है

आवश्यकता है

युग-निर्माण योजना के लिये अपने को खपा देने की उत्कट भावना वाले निम्नलिखित तीन कार्यकर्ताओं की आवश्यकता है।

(1) युग-निर्माण-विद्यालय के छात्रों को हिन्दी, संस्कृत अच्छी तरह पढ़ा सकें।

(2) जिसे मशीनरी और बिजली संबन्धी ज्ञान हो। लघु-उद्योगों की मशीनों पर काम कर सकने के योग्य जिनमें बुद्धि-कौशल हो।

(3) जिनकी लिपि सुन्दर हो और शुद्ध भाषा में भली प्रकार पत्र-व्यवहार कर सकें।

इन कार्यकर्ताओं के निर्वाह के लिये लोकसेवियों के स्तर की उचित आर्थिक व्यवस्था कर दी जायगी। गायत्री तपोभूमि में ही निवास तथा रोशनी की व्यवस्था है। रिटायर्ड लोग या ऐसे व्यक्ति ही पत्र-व्यवहार करें जिनके ऊपर बड़े परिवार का निर्वाह भार न हो। अतएव उपयुक्त व्यक्ति ही लिखा-पढ़ी करें और अपनी परिस्थिति स्पष्ट कर दें।

पता-युग-निर्माण योजना (अखण्ड ज्योति संस्थान)

मथुरा।


व्यर्थ का उलाहना


व्यर्थ का उलाहना (Kavita)

(1)

पखेरू का रोना है यही कि बिखरे तिनके चुन-चुन कर।

बनाया था जो मैंने नीड़ परिश्रम से सर धुन-धुन कर॥

उसी ने मेरे उड़ते समय एक भी बार न साथ दिया।

जिसे समझा था अपना सगा, उसी ने मुझ से दगा किया॥

(2)

नीड़ का यही उलाहना है कि वृक्ष मैंने सम्पन्न किया।

जहाँ सब गूँगे फल थे वहाँ चहकता फल उत्पन्न किया॥

मगर जब किसी क्रूर ने हाथ मार तिनकों को बिखराया।

उस समय प्रतिशोधन तो दूर वृक्ष प्रतिरोध न कर पाया॥

(3)

वृक्ष की यही शिकायत है कि छत्रवत मैंने छाया की।

अँगारे अपने सर पर झेल धरा की शीतल काया की॥

किन्तु आँधी के भीषण वेग जब कि लाये दुस्सह बाधा।

उस समय पैर उखड़ते देख धरा ने मुझे नहीं साधा॥

(4)

सभी के उपालम्भ यों उतर रहे हैं धरती के घर में।

मगर वह बेचारी क्या करे? पड़ी खुद दुहरे चक्कर में॥

-शिशुपाल सिंह “शिशु”

*समाप्त*