हम जड़ नहीं, प्रगतिशील बनें

परिवर्तन एक अनिवार्य प्रक्रिया है। संसार की हर वस्तु समयानुसार बदलती है। शैशव, यौवन, बुढ़ापा और मृत्यु की शृंखला ही इस संसार को गतिशील, स्वच्छ और सुन्दर बनाये हुए है। जड़ता तो केवल कुरूपता उत्पन्न करती है।

सामाजिक ढर्रे जब बहुत पुराने हो जाते हैं तब उनमें जीर्णता और कुरूपता उत्पन्न हो जाना स्वाभाविक है। इसे सुधारा और बदला जाना चाहिए। समय की प्रगति से जो पिछड़ जाते हैं उन्हें कुचलते हुए समय आगे बढ़ जाता है।

ऋतुओं के परिवर्तन के साथ-साथ आहार-विहार की रीति-नीति बदलनी पड़ती है। युग की माँग और स्थिति को देख कर हमें सोचना चाहिए कि वर्तमान की आवश्यकताएं हमें क्या सोचने और क्या करने के लिए विवश करती हैं। विचारशीलता की यही माँग है कि आज की समस्याओं को समझा जाय और सामयिक साधनों से उन्हें सुलझाने का प्रयत्न किया जाय।

जो पुराना सो ठीक-जो अभ्यास में है वह सही-यह आग्रह बौद्धिक जड़ता का चिन्ह है। जीवित मनुष्यों को जड़ नहीं होना चाहिए। चेतनता ही मनुष्य की शोभा है। चेतनता इस बात में है कि वर्तमान को समझें और मनुष्य में निर्माण का सुदृढ़ आधार निर्मित करें।

-डॉ. सनयात सेन


दो में से एक का चुनाव

युग परिवर्तन की घड़ियाँ निकट आती चली जा रही हैं। यह एक सुनिश्चित तथ्य और ध्रुव सत्य है कि जिस घुटन भरे युग में हमें आज दिन गुजारने पड़ रहे हैं वह अधिक समय टिका नहीं रह सकता, यदि टिका रहे तो संसार को- मानव-समाज को- आज जिन कष्ट-कठिनाइयों से भरे नर्क में समय काटना पड़ रहा है, उससे भी हजारों गुनी लोमहर्षक विभीषिकाएं उपस्थित होंगी और उस रौरवीय दावानल में मानव-जाति के हर सदस्य को तिल-तिल करके जल मरना होगा। भगवान अपनी परम प्रिय रचना इस भूलोक को और अपने परम प्रिय मनुष्य को इस सीमा तक दुर्दशाग्रस्त नहीं होने देना चाहते, वे इसका सर्वनाश नहीं देखना चाहते इसलिए वे समय रहते परिस्थितियाँ उत्पन्न करने जा रहे हैं जिससे यह सम्भावना भयावह सर्वग्राही रुप धारण करने से पूर्व ही सरल हो जाय।

जुलाई की ‘अखण्ड ज्योति’ में तत्वदर्शियों, समाज-शास्त्रियों और सूक्ष्म दृष्टाओं की महत्वपूर्ण अनुभूतियाँ प्रस्तुत की गई हैं। उन्हें किसी साधारण ज्योतिषी की अटकल या भविष्यवाणी नहीं समझा जाना चाहिए। वे अगले दिनों घटित होने वाली सुनिश्चित सम्भावनाएं हैं, जिन्हें हम एक-एक करके मूर्तिमान होते हुए यथा समय देखते चले जायेंगे। पिछले दिनों जिस कुमार्ग पर मनुष्य जाति चलती रही है उसके दुष्परिणाम क्रमशः अधिक परिपक्व होते चले आये हैं और अब वह स्थिति उत्पन्न हो गई है जिसे आगे भी देर तक चलने दिया जा सकना असम्भव हो गया है। इस स्थिति का आमूलचूल परिवर्तन हुए बिना और कोई रास्ता अब रहा नहीं। दो ही विकल्प हैं- एक

सर्वनाश दूसरा परिवर्तन। परिवर्तन के लिए यदि हम तत्पर नहीं होते तो फिर सर्वनाश के लिए ही तैयार होना पड़ेगा। सर्वनाश से बचना है तो परिवर्तन का स्वागत करना होगा। बीच का कोई रास्ता नहीं।

जुलाई अंक में प्रस्तुत भावी सम्भावनाओं का जो रेखाचित्र प्रस्तुत किया गया है उस पर बारीकी से दृष्टिपात करने के उपरान्त यही निष्कर्ष निकलता है कि अगले दिनों दुनिया दो भागों में बंट जायगी, जिनमें एक उदार होगा दूसरा अनुदार। एक विवेकवान वर्ग होगा दूसरा मूढ़ताग्रस्त। एक को देव कहा जायगा, दूसरे को दानव। मूढ़ताग्रस्त लोगों ने अपनी बुरी आदतों, दुष्प्रवृत्तियों और संकीर्णताओं से ग्रस्त होने के कारण सारे संसार को नरक तथा देवोपम मानव जाति को नर-पिशाचों के रूप में परिणत कर दिया है। उसमें वे कुछ भी बुराई अनुभव न करेंगे और न उसे बदलना चाहेंगे। पुराने ढर्रे पर चलते रहने का उनका आग्रह होगा। समय के अनुरूप बदलना उन्हें रुचेगा नहीं। इतना ही नहीं वे परिवर्तन का विरोध करेंगे और मरते समय पंख उगने वाले चींटे की तरह प्रतिरोध की उछल-कूद भी तीव्र कर देंगे। इस समुदाय को उसी वर्ग में गिना जा सकता है, जिसके बारे में गीता के 11 वे अध्याय में अर्जुन ने कहा था।

वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति

दष्ट्रा करालानि भयानकानि।

केचिद्वलग्ना दशानान्तरेषु

संदृश्यन्ते चूर्णितेरुत्माँगैः॥

“भगवान! आपके विकराल डाढ़ों वाले भयानक मुख में वे लोग प्रवेश करते हैं और कितने ही चूर्ण-विचूर्ण हुए सिरों सहित आपके दाँतों में उलझे हैं।”

यथा प्रदीप्त ज्वलनं पतंगा

विशन्ति नाशाय समृद्ध वेगाः।

तथैव नाशाय विशन्ति लोका

स्तवापि वक्त्राणि समृद्ध वेगाः॥

“जैसे मोह ग्रसित पतंगे नष्ट होने के लिये प्रज्ज्वलित अग्नि में वेगपूर्वक प्रवेश करते हैं, वैसे ही यह लोग भी अपने सर्वनाश के लिये आपके मुख में दौड़ते हुए चले जाते हैं।”

जिन्हें मूढ़ता इस सीमा तक घेरे रहती है, उनकी संख्या इस संसार में कम नहीं। मरने के दिन अति निकट आ जाने और परिवार द्वारा पग-पग पर तिरस्कृत किये जाने पर भी अधिकाँश वृद्धजन मोह-माया के दल-दल में अधिक गहरे फंसने के लिये कदम बढ़ाते रहते हैं। भविष्य को नहीं देखते, दुष्प्रवृत्तियों के परिणाम को नहीं सोचते वरन् आदतों से मजबूर पाप की गठरी ही सिर पर बोझिल बनाते चलते हैं। ऐसे लोग इस दुनिया में भरे पड़े हैं, उन पर न ज्ञान का असर होता है न विवेक का प्रकाश पड़ता है। मदोन्मत्तों की तरह वे अपनी बेढंगी चाल चलते रहते हैं। इनको सुधारना कठिन देखकर महाकाल उनको गतिरोध का रोड़ा बनने देने से रोकने के लिये अपनी लात से कुचलकर रख देने को विवश होते हैं। खेत जोतते समय जो कड़े ढेले रह जाते हैं, किसी प्रहार से उन्हें तोड़ने की किसान को व्यवस्था बनानी पड़ती है। युग-परिवर्तन के समय मूढ़ताग्रस्त वर्ग की अव्यवस्था के व्यवस्थित करने के लिये यही दैवी प्रकोप-चक्र गतिशील रहता है। अगले दिनों संसार में मानवीय और दैवी स्तर पर जो उत्पीड़न होने वाले हैं उनका आधार यही है। दुष्टता से निपटने का यही सनातन मार्ग है। जहाँ ज्ञान को, विवेक को, तर्क को, औचित्य को सफलता नहीं मिलती वहाँ दण्ड-प्रहार की करारी चोटें थोड़े ही समय में सब कुछ ठीक कर देती है। मनुष्य की चिर-संचित दुर्बुद्धि और हठवादिता बदली जानी आवश्यक है। इसी प्रयोजन के लिये ताण्डव नृत्य का सरंजाम जुटाना पड़ रहा है। दुष्टता के समर्थन में दुराग्रह करने वाले इन मोहान्ध लोगों की कुचेष्टा ही वह विभीषिका है जिसके लिये दैवी और मानवी विग्रह विभिन्न रूपों में उत्पन्न होकर इस पुण्य धरित्री को रक्त-रंजित करेंगे।

जुलाई के अंक का एक दूसरा निष्कर्ष यह है कि इस सन्धि वेला में मानव जाति का सद्भावना सम्पन्न वर्ग विशेष रूप से सजग होगा और महत्वपूर्ण अवसर पर अपने विशिष्ट उत्तरदायित्वों को तन्मयता के साथ वहन करेगा। आपत्तिकाल में विवेकवान् व्यक्ति आपत्ति धर्म का पालन करते हैं। सामान्य स्थिति की साधारण गतिविधियों को वे कुछ काल के लिये रोक देते हैं और इस आपत्ति धर्म की पूर्ति के लिये विशिष्ट पुरुषार्थ करते हैं। उनकी यह दूरदर्शिता न केवल उनके यश, गौरव, आत्मसन्तोष, पुण्य एवं श्रेय-साधन का निमित्त बनती है वरन् उनके सत्य प्रयत्नों से संसार की महती सेवा भी होती है। महाकाल को अपने पुण्य प्रयोजन में उपयुक्त सहायता भी इन्हीं पार्षदों से मिलती है।

जब गांव के छप्परों में आग लग रही हो तो बुद्धिमान लोग अपनी सुरक्षा की दृष्टि से भी-और परमार्थ की दृष्टि से भी-उस आग को बुझाने के लिये अपने निजी सब काम छोड़कर जुट पड़ते हैं। पुराने युग के पलटने और नये युग के प्रवेश करने का मध्यान्तर एक ऐसी ही सन्धि वेला है जैसी कि रात्रि के विदा होने और प्रभात के आगमन के अवसर पर होती है। इन घड़ियों में लोग साधारण काम-काज करने की अपेक्षा दैवी सम्बन्ध स्थापित करने की- पूजा-उपासना की- व्यवस्था करते हैं। उपयुक्त अवसर पर उपयुक्त कार्य का विशेष महत्व होता है। बीज ठीक समय पर बोया जाय तो अच्छी फसल उगने की सम्भावना अधिक स्पष्ट रहती है। प्रबुद्ध आत्मायें इतनी अन्तः प्रेरणा अपने भीतर धारण किये रहती हैं-इतना प्रकाश उनके अन्दर बना रहता है कि उपयुक्त अवसर को पहचानें और विशेष प्रयोजन के लिये विशेष अवसर पर प्रस्तुत की गई ईश्वरीय पुकार को सुनें और उस दैवी निर्देश के अनुरूप अपनी गतिविधियाँ मोड़ दें।

ऐसी अन्तः प्रेरणा जिन्हें मिलती है वे अपने कर्त्तव्य और उत्तरदायित्व की उपेक्षा नहीं कर सकते। जीवन यापन के सामान्य क्रम में व्यावधान सहकर भी आपत्तिकालीन युगधर्म को निबाहने के लिये तत्पर होते हैं। देश की सीमा सुरक्षा के लिये समय पर अगणित बलिदानी वीर सैनिक मोरचों पर जा पहुँचते हैं। जिनके भीतर ईश्वरीय प्रकाश की किरणें विद्यमान हैं वे युग परिवर्तन जैसे महत्वपूर्ण अवसर पर संकीर्ण स्वार्थों में हानि पड़ने की बात सोचकर, अपना बचाव करने के लिये बहाने नहीं ढूंढ़ते। बिगुल बजने पर सैनिक कमर कसने के अतिरिक्त और कुछ सोचता ही नहीं। संकटकाल में अवकाश प्राप्त सैनिक भी ड्यूटी पर लौट आते हैं। ऐसे विशिष्ट अवसर जैसाकि ऐतिहासिक सन्ध्याकाल इन दिनों उपस्थित है, सजग व्यक्तियों के लिए अपनी महत्वपूर्ण भूमिका प्रस्तुत करने की चुनौती उपस्थित करते हैं और वे बिना अनुनय के सहर्ष स्वीकार कर लेते हैं।

मूढ़तावादी मोहग्रस्त असुर-वर्ग और लोकमंगल की भूमिका सम्पादित करने में संलग्न देव-वर्ग इन दोनों को ही अगले दिनों रीति-नीति की श्रेष्ठता-निकृष्टता प्रस्तुत करने का अवसर मिलेगा। दोनों गतिविधियों के सत्परिणाम और दुष्परिणाम उपस्थित होंगे और उनको देख-समझकर भावी पीढ़ी को यह निश्चय करने का अवसर मिलेगा कि उपरोक्त दोनों पद्धतियों में से कौन उपयुक्त और कौन अनुपयुक्त है। इनमें से किसे ग्रहण किया जाय और किसे त्यागा जाय ?

अगले दिनों हमें इनमें से किसी एक वर्ग में सम्मिलित होना होगा, बीच में नहीं रहा जा सकता। महाकाल के विधान में प्रतिरोध प्रस्तुत करने वाले मूढ़तावादी लोगों में सम्मिलित रहना हो तो खुशी-खुशी वैसा करें और कराल काल-दण्ड के प्रहार सहने को तैयार रहें। यदि यह अभीष्ट न हो तो ईश्वरीय प्रयोजन की पूर्ति में सहायक बनकर चलना ही उचित है। तब हमें अपनी गतिविधियाँ अभी से बदलनी होंगी और उस पुण्य प्रक्रिया को अपनाना होगा जिसमें आत्म-कल्याण और विश्व-कल्याण दोनों का ही समान रूप से समन्वय हो।

हम बदलें तो युग बदले

युग परिवर्तन का आरम्भ जन साधारण का दृष्टिकोण परिवर्तन होने के साथ-साथ होता है। लोगों के विचार करने की शैली, आकाँक्षा, अभिरुचि, प्रवृत्ति यदि निकृष्टता की ओर हों तो उसके फलस्वरूप व्यक्ति एवं समाज के सम्मुख अनेक प्रकार की कठिनाइयाँ, चिन्तायें तथा व्यथायें उत्पन्न होती हैं और सब ओर नारकीय वातावरण विनिर्मित होता है। इसके विपरीत यदि लोगों की रुचि उत्कृष्टता एवं आदर्शवादिता अपनाने में हो, प्रसन्नता का लक्ष्यबिन्दु परमार्थ हो तो संसार में स्वर्गीय परिस्थितियों का जन्म होता है और हर व्यक्ति प्रचुर सुख-शान्ति का अनुभव करता है। यही वह तथ्य है जिसके ऊपर विश्वशान्ति एवं सुख का सारा आधार निर्भर है।

युग-परिवर्तन की प्रक्रिया कहाँ से आरम्भ हुई, इसका पता लगाना हो तो उसकी एक ही कसौटी है कि कहाँ स्वार्थ की उपेक्षा करके उसके स्थान पर परमार्थ को प्रतिष्ठित किया गया ? कहाँ तृष्णा और वासना को तिलाँजलि देकर उत्कृष्टता एवं आदर्शवादिता को चरितार्थ करने का साहस किया गया? जहाँ इस प्रकार की सत्प्रवृत्तियाँ पनप रही हों समझना चाहिए कि यहीं से युग-निर्माण का शुभारम्भ हो रहा है। भावी परिवर्तित युग में जनसाधारण को शरीर-निर्वाह के लिये सादगी से काम चला सकने जितनी स्वल्प आजीविका पर पूरा-पूरा सन्तोष करना होगा। भविष्य के लिए संग्रह करने की पद्धति किसी में न होगी। लोग परिवार सेवा का उत्तरदायित्व पूरी तरह निभायेंगे, पर बेटे-पोतों के लिये सात पीढ़ी तक बैठे-बैठे खाने के लिये सारी कमाई छोड़ जाने की मोह-मूढ़ता एक अनैतिक एवं हेय प्रवृत्ति मानी जायगी।

इस दृष्टि से समाजवाद और अध्यात्मवाद एक हैं। व्यक्ति को अपनी प्रतिभा, योग्यता एवं विभूतियों का एक अनिवार्य अंश ही अपने तथा अपने परिवार के लिए खर्च करना चाहिए और यह चेष्टा होनी चाहिए कि उसकी उपलब्धियों का अधिकाधिक लाभ समाज को मिले। यही दृष्टिकोण सतयुग का आधार है। रामराज्य की स्थापना इन्हीं सत्प्रवृत्तियों पर होगी। व्यक्ति जब तक अपने संकीर्ण स्वार्थों की कीचड़ में कीड़ों की तरह कुलबुलाता रहेगा तब तक वह दिव्य वातावरण एवं स्थिर सुख शान्ति का दर्शन करने से वंचित ही बना रहेगा। युग-परिवर्तन की नींव परमार्थ प्रवृत्ति पर निर्भर है। अतएव हमें उसी के लिये सारा ध्यान एकत्रित करना होगा और उसी प्रकार की घटनाओं की अभिवृद्धि करने का अभियान गतिशील करना होगा।

अगला समय यह सुनिश्चित सम्भावना साथ लेकर आ रहा है कि सम्पत्ति पर व्यक्ति का नहीं समाज का स्वामित्व होगा। जिस प्रकार राजाओं के राज्य, जागीरदारों की जागीर, जमींदारों की जमींदारी देखते-देखते चली गई, उसी प्रकार अगले दिनों व्यक्तिगत सम्पत्तियों का भी राष्ट्रीयकरण होगा। व्यक्ति उसमें से उतना ही लाभ ले सकेगा जिससे उसको औसत दर्जे के भारतीय नागरिक के स्तर पर जीवित रहने की सुविधा मिल जाय। मनुष्य अपनी प्रतिभा के अनुरूप उपार्जन तो कर सकेंगे पर उसका लाभ उसी व्यक्ति के लिए सुरक्षित नहीं रहेगा वरन् समस्त मानव जाति अपने इस सदस्य की उपलब्धियों का लाभ उठाया करेगा। मनुष्य की प्रतिभाओं का विकास जिन परिस्थितियों पर निर्भर है वे समस्त मानव जाति की चिर संचित थाती हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य आदि के जिन साधनों के आधार पर कोई भी व्यक्ति आगे बढ़ सकता है, वे लाखों-करोड़ों के, लाखों-करोड़ों वर्ष के अनुदान से उत्पन्न हुए हैं। इसलिये समाज को पूरा-पूरा अधिकार है कि किसी व्यक्ति के पास यदि प्रतिभा, क्षमता एवं सम्पदा है तो उसका उपयोग और उपभोग करे।

आज यह बातें अटपटी लगती हैं। क्योंकि चिरकाल से हमारी विचार पद्धति एवं रीति-नीति संकीर्ण स्वार्थपरता से प्रभावित होती चली आ रही है। पर अब इसे बदलना ही होगा। साम्यवादी शासन के अंतर्गत आज लगभग आधी मनुष्य जाति ने इसी रीति-नीति को स्वीकार कर लिया है और यह देख लिया है कि व्यक्ति और समाज का स्वस्थ विकास इसी पद्धति पर निर्भर है। यही मान्यता अध्यात्मवाद की भी है। प्राचीन काल में दान का भारी महत्व था। व्यक्ति के पास जैसे ही कुछ पूँजी जमा हुई की उसने लोक मंगल के लिए उसका उर्त्सग करने की बात सोची। इसी में व्यक्ति को सन्तोष होता था और सम्मान मिलता था। स्वार्थी, संग्रहशील, कंजूस, अपनी कमाई आप ही खाते रहने वाले संकीर्ण व्यक्ति यहाँ सदा से चोर, पापी, तस्कर, हत्यारे आदि नामों से तिरस्कृत किये जाते रहे हैं। भारतीय इतिहास का पन्ना-पन्ना इसी तथ्य का साक्षी है। सम्पत्ति का उपार्जन तो व्यक्ति करते थे पर उसका अधिकाधिक अंश लोक मंगल में ही खर्च होता था। लोग अपने बच्चों के सुसंस्कारों को बनाते थे पर उनके लिये दौलत छोड़ने जैसी दुश्मनी करने की बात नहीं सोचते थे। अध्यात्मवाद का यही सुनिश्चित दृष्टिकोण है। जहाँ भी यह दृष्टिकोण कार्यान्वित होगा वहाँ पाप, शोषण, अनीति, दुष्टता के लिये कोई गुंजाइश न रहेगी। लोभ और मोह ही सामाजिक अव्यवस्था, अपराध और असन्तोष उत्पन्न करते हैं। इन दोनों को जहाँ नियन्त्रण में ले लिया गया कि सुख-शान्ति की समस्या के हल होने में फिर कोई कठिनाई शेष न रह जायगी।

युग-परिवर्तन मूलतः मनुष्य में भावनात्मक परिवर्तन ही है। आज हमारे व्यक्तिगत जीवन को वासना और तृष्णा ने बुरी तरह आच्छादित कर लिया है। मनुष्य की अधिकाँश क्षमता इन्हीं दो दुष्प्रवृत्तियों की बलिवेदी पर चढ़ती रही है। शरीर को सजाने, रंगने, मौजमजा का आस्वादन कराने के सरंजाम एकत्र करने में अपने बहुमूल्य जीवन का बहुत बड़ा भाग खर्च किया जा रहा है। इन लिप्सा-लालसाओं की पूर्ति एक छोटी सीमा तक सम्भव करने में भी जितना श्रम-समय लगता है उसका लेखा-जोखा यदि लिया जाय तो वह एक बहुत बड़ी राशि दिखाई देगी। यदि उतने समय को अपनी ज्ञान-सम्पत्ति एवं सद्गुणों की अभिवृद्धि में लगाया गया होता-परमार्थ प्रयोजनों में, लोक मंगल के लिये खर्च किया गया होता तो स्थिति कुछ दूसरी ही होती। संसार के महान पुरुषों की पंक्ति में हम अपने को बैठा देखते।

महामानवों के जीवनों पर गम्भीर दृष्टिपात करने से हम एक ही निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि उन्होंने व्यक्तिगत महत्वकाँक्षाओं को-वासनाओं को और लालसाओं को तिलांजलि दी। सादगी से जीने का व्रत लिया। जो आसानी से मिल गया उतने- रूखे-सूखे- में ही सन्तोष करके शरीर-यात्रा का ढर्रा चलते रहना पर्याप्त माना। यह रीति-नीति अपनाते ही मस्तिष्क में जो असंख्य कामनाओं की आग मरघट की चिताओं जैसी जलती रहती थी वह शान्त हो गई, उद्विग्नता मिट गई। स्वर्गीय जीवन का यही चिन्ह है। जिसके अन्तःकरण में भौतिक कामनायें कुहराम नहीं मचातीं वस्तुतः वही योगी, यती और ज्ञानी है। शरीर-यात्रा के जैसे-तैसे साधन जुट जाने पर जिसे तृप्ति हो गई, समझना चाहिए कि उसने अध्यात्मवाद का सारा तत्व ज्ञान सार रूप से हृदयंगम कर लिया, भले ही उसने बड़े-बड़े ग्रन्थ न पढ़े हों।

भौतिक कामनायें शान्त हो जाने पर ओछे लोगों के सामने एक खतरा यह आता रहता है कि वे पलायनवादी, निराश, उदासीन, निष्क्रिय हो जाते हैं। साधु बाबाओं के वर्ग में ऐसे ही ‘जीवित मृत’ व्यक्तियों की भरमार है। यह त्याग नहीं, सन्तोष नहीं, यह तो दरिद्रता और मुमूर्षा जैसी आत्मिक अवसाद की चिन्ताजनक व्याधि है। इससे हर विवेकवान और आत्मिक प्रकाश सम्पन्न व्यक्ति बड़ी आसानी से बचा रह सकता है। गीता के 18 अध्यायों ओर 700 श्लोकों में जिस कर्मयोग का प्रतिपादन है उसमें भौतिक वासनायें, निकृष्ट लालसायें छोड़ने की बात तो है पर साथ ही यह भी प्रतिपादित किया गया है कि ऐसा व्यक्ति अपनी इस श्रम, समय तथा चिन्तन की विभूतियों को बचाकर हजार गुनी तन्मयता और तत्परता के साथ परमार्थ प्रयोजन के लिये नियोजित कर देता है।

तृष्णा के सम्बन्ध में भी वही बात है। व्यक्तिगत संग्रह न करने का- अपरिग्रह का- व्रत लेने का अर्थ यह नहीं कि ऐसे लोग उपार्जन के लिये पुरुषार्थ करना बन्द कर देते हैं जो उपार्जन का पुरुषार्थ बन्द करेगा वह समाज का भार बनेगा और संसार में दरिद्रता की वृद्धि करेगा। विवेकवान अध्यात्मवादी ऐसा नहीं कर सकता। वह धन, ज्ञान, स्वास्थ्य, सद्गुण बहुत कुछ कमाता है। निरन्तर कमाता है पर इसका लाभ अपने लिये नहीं अपने आराध्य देव-विश्व-मानव के लिये-लोक मंगल के लिये समर्पित करता है। धीरे-धीरे उसके यह छोटे-छोटे अनुदान मिलकर लोक मंगल का एक यशस्वी मापदण्ड बना देते हैं और उसकी कृतियों को परखने वाले उसे असीम श्रद्धा के साथ ‘नर नारायण’ घोषित करते हैं। तृष्णा को-नारकीय अग्नि को यदि लोकमंगल की भट्टी में डाल दिया जाय तो उस पर एक-से-एक बढ़िया व्यंजन पक सकते हैं।

कुँए में पानी के छोटे-छोटे सोत इधर-उधर से आकर गिरते हैं और उन्हीं नगण्य-सी इकाइयों के अनुदान से बना यशस्वी कुंआ असंख्य मनुष्यों, प्राणियों, वनस्पतियों की प्यास चिरकाल तक बुझाते रहने में समर्थ होता है। कुंए का सारा यश उन जल-धमनियों के आत्मदान का प्रतिफल है। यदि वे संकीर्ण होतीं, अपना बचाव सोचतीं, अपनी सम्पत्ति को मुफ्त में देने से कतरातीं तो इस संसार में एक भी कुंआ न बन सका होता और यहाँ सब कोई कभी के प्यास से तड़प कर अपना अस्तित्व गंवा चुके होते।

संसार की सुख, शान्ति, समृद्धि और सुन्दरता एक यशस्वी कुंए की तरह है जिसे सजीव रखने के लिये कुछ जल धमनियों का- उत्कृष्ट आत्माओं का- निरन्तर अनुदान मिलते रहना आवश्यक है। इन दिनों भारी दुष्काल इसी सत्प्रवृत्ति का पड़ गया है। लोग अपनी व्यक्तिगत तृष्णाओं की पूर्ति में पाँव से सिर तक डूबे पड़े हैं। दान-पुण्य एवं पूजा-पाठ के नाम पर राई-रत्ती जैसे उपकरण इस आशा में खर्च करते हैं कि अगले ही दिनों वह लाख-करोड़ गुना होकर उन्हें मिल जायगा। अविवेकी नर-पशु इस स्तर के हों तो एक बात समझ में भी आती है पर भक्ति, ज्ञान, अध्यात्म, वेदान्त, ब्रह्मज्ञान, तत्वदर्शन जैसे विषयों पर भारी माथापच्ची कर सकने में समर्थ लोग भी जब इस कसौटी पर कसे जाते हैं कि उनका अनुदान समाज के लिए क्या है? तो उत्तर निराशाजनक ही मिलता है। ऐसा सूखा ब्रह्मज्ञान भला किसी का क्या हित साधन करेगा जिसने मनुष्य के हृदय में इतनी करुणा एवं श्रद्धा उत्पन्न न की कि विश्व मानव को उसके अनुदान की महती आवश्यकता है और वह उसे देना ही चाहिए।

लोक मंगल की सर्व कल्याणकारी सत्प्रवृत्तियों से ही किसी व्यक्ति, देश, धर्म, समाज तथा संस्कृति की उत्कृष्टता नापी जा सकती है। खरे-खोटे की पहिचान इसी आधार होती है। हमारे देश में लोगों ने यश और वर्चस्व लूटने के लिए लोक मंगल के तमाशे जहाँ-तहाँ खड़े कर रखे हैं। पर यदि यह देखा जाय कि इसमें कितने व्यक्ति अपनी उपलब्धियों का कितना बड़ा अनुपात समर्पित कर रहे हैं, तो सब कुछ खोखला ही खोखला प्रतीत होता है। लोक मंगल के नाम पर खड़े किये गये यह डेरे-तम्बू आये दिन गढ़ते-उखड़ते रहते हैं। इनसे हम मनोरंजन अथवा आत्म प्रवंचना भले ही करते रहें, कोई ठोस काम न हो सकेगा। लोक मंगल की कोई प्रकाशित किरण कहीं उदय हो रही है, यह तलाश करना हो तो संस्थाओं में ऐसे लोग ढूँढ़ने पड़ेंगे जिन्होंने अपनी व्यक्तिगत उपलब्धियों का बड़े से बड़ा अनुपात जनता जनार्दन के चरणों में अर्पित कर दिया हो। गरीब के पास पसीना, शिक्षित के पास मस्तिष्क और धनी के पास धन की जो बचत होती है, आत्मा का- परमात्मा का- एक ही तकाजा है कि वह उसे संकीर्णता के बन्धन तोड़कर परमार्थ प्रयोजन के लिये उत्सर्ग करें।

जो इस तथ्य को हृदयंगम कर लेते हैं और इसी आधार पर अपनी रीति-नीति का निर्धारण करते हैं वस्तुतः वे ही इस धरती के देवता हैं। देवताओं के द्वारा ही युग-परिवर्तन जैसे महान कार्यों की भूमिका सम्पादित होती है। मुद्दतों से देव-परम्परायें अवरुद्ध हुई पड़ी है। अब हमें अपना सारा साहस समेटकर तृष्णा और वासना की कीचड़ से बाहर निकलना होगा और वाचालता एवं विडम्बना से नहीं अपनी कृतियों से अपनी उत्कृष्टता का प्रमाण देना होगा। हमारा उदाहरण ही दूसरे अनेक लोगों को अनुकरण का साहस प्रदान करेगा। वाणी और लेखनी के माध्यम से लोगों को किसी बात की अध्यात्मवाद की भी जानकारी कराई जा सकती है। इससे अधिक भाषणों का कोई उपयोग नहीं। दूसरों को यदि कुछ सिखाना हो तो उसका एकमात्र तरीका अपना उदाहरण प्रस्तुत करना है। यही ठोस, वास्तविक और प्रभावशाली पद्धति है। दूसरों को बदलना हो तो सबसे पहले हमें अपने को बदलना चाहिए। दूसरों को स्वार्थपरता से विरत होकर परमार्थ पथ पर चलने की चिरस्थाई प्रेरणा देनी हो तो उसका शुभारम्भ अपनी रीति-नीति को तृष्णा और वासना के जंजाल से ऊँची उठी हुई बना कर ही करना चाहिए।

युग-परिवर्तन, व्यक्ति-परिवर्तन से आरम्भ होता है। ‘अखण्ड ज्योति’ के प्रबुद्ध परिजनों में से प्रत्येक को हर दिन, हर घड़ी यह प्रश्न करना चाहिये कि क्या इस प्रकार का प्रकाश और उत्साह अपने भीतर उत्पन्न होने लगा है। यदि हाँ तो समझना चाहिए कि अपनी गणना महाकाल के देव पार्षदों में होने की पूरी-पूरी सम्भावना है। तब हम अपना ही नहीं इस विश्व वसुन्धरा की सुरक्षा और सुन्दरता बढ़ाने का शाश्वत श्रेय प्राप्त करेंगे।

भावी देवासुर संग्राम और उसकी भूमिका

प्राकृत रूप से मनुष्य एक दुर्बल किस्म का पशु है। जिस प्रकार अन्य पशु पेट पालते, प्रजनन करते और परिस्थितियों का भला-बुरा प्रभाव भोगते हुए जीवन यापन करते हैं वैसे ही मनुष्य भी अपनी जिन्दगी के दिन गुजारता पैदा होता, बढ़ता और मरता है। इस स्तर के हर व्यक्ति को नर पशु कहा जा सकता है। न उसके सामने कुछ लक्ष्य, न आदर्श, न उद्देश्य, न कर्त्तव्य, जैसे बने वैसे दिन गुजारने भर की बात वह सोचता है और परिस्थितियों के जुए में जुता हुआ अन्य असंख्य मरणधर्मा प्राणियों की तरह मौत के मुख में चला जाता है। जनसंख्या में लगभग आधे इसी स्तर के पाये जाते हैं।

नर पशुओं के जीवन में जो थोड़ा बहुत आकर्षण है वह उनके निजी स्वार्थ का है। वे अपनी व्यक्तिगत आवश्यकताओं की पूर्ति, आकाँक्षाओं की तुष्टि सब अभावों की निवृत्ति के लिये यत्किंचित् पुरुषार्थ करते हैं। जिनके सामने यह आकर्षण भी नहीं होता वे भूख, अभाव, दंड, असहयोग, तिरस्कार आदि प्रताड़ना का भय मानकर ही थोड़ा बहुत पुरुषार्थ करते हैं। अन्यथा यदि इस प्रकार की बाधायें न हों तो उन्हें जड़ जीवन बिताने में तनिक भी संकोच न हो। जिसने इस स्तर का जीवन बिताया उन्होंने अपने प्रति एक भारी अत्याचार किया यही मानना होगा।

यह स्वार्थपरता जब उद्धत, उच्छृंखल, दुष्ट एवं आक्रमणकारी हो जाती है और मनुष्य किसी को भी, किसी भी प्रकार सताकर अपना लाभ उठाने एवं अहंकार पूरा करने के लिये निर्लज्जतापूर्वक कटिबद्ध हो जाता है तब उसे नर-पिशाच कहते हैं। यों मोटे तौर से हत्यारे, डाकू, कसाई, आततायी, झगड़ालू, गुण्डे, निर्दय, क्रूरकर्मा आदि लोगों के लिये नर-पिशाच शब्द का प्रयोग किया जाता है पर अब इसका परिष्कृत संस्करण तैयार हो गया है। उसमें ऐसी प्रत्यक्ष दुष्टता करने, कानून की पकड़ में आने और निन्दा का पात्र बनने की जरूरत नहीं पड़ती। लोग बाहर से सज्जनता का लबादा ओढ़े रहते हैं और भीतर ही भीतर ऐसी छुरी चलाते रहते हैं जिससे असंख्यों का सर्वनाश होता है। उदाहरण के लिये मादक द्रव्यों के उत्पादन, प्रसार एवं व्यवसाय में लगे मनुष्य बाहर से सीधे-साधे से लगते हैं पर उनका मस्तिष्क, धन तथा पुरुषार्थ कितने लोगों का, किस बुरी तरह आर्थिक, नैतिक, शारीरिक नाश करता है, इसका कोई लेखा-जोखा तैयार किया जाय तो प्रतीत होगा कि उन्होंने लाखों मनुष्यों के जीवन में दुष्प्रवृत्तियों का बीज बोकर पतन के लिये जो व्यापक पथ प्रशस्त किया उस हानि का विवरण कितना रोमाँच कारी है। ऐसे-ऐसे उदाहरण संगठित एवं व्यक्तिगत प्रयासों के भरे पड़े हैं जिनसे प्रतीत होता है कि स्वार्थपरता यदि अनियन्त्रित हो तो वह कितनी भयंकर हो सकती है। चोरी, जेबकटी के पुराने, फूहड़, गन्दे तरीके अब गंवारों के हिस्से में चले गये हैं। शिक्षित लोगों ने ऐसी तरकीबें ढूँढ़ निकाली हैं जिससे होता वही सब कुछ है पर पता किसी को नहीं चलता। रिश्वतें अब एक दस्तूर बन गई हैं। असली में नकली की मिलावट अब हेय नहीं मानी जाती वरन् उसे ‘व्यापार चातुर्य’ कहा जाता है। व्यक्तिगत जीवन में लोग कितने नीरस, कितने स्वार्थी, कितने विश्वासघाती और कितने निर्लज्ज हैं इसका परिचय बाहर से तो नहीं मिलता पर उनके दाम्पत्य-जीवन की, पारिवारिक सौहार्द्र की अथवा सम्बन्धित व्यक्तियों की अनुभूतियों का पता लगाया जाय तो इन तथाकथित सफेदपोशों की काली कालिमा सामने आती है। इन्हें नरपिशाच नहीं तो और क्या कहा जा सकता है ?

जन-साधारण में असुर और देव के बारे में बड़ी भ्राँत धारणायें जड़ जमाये बैठी हैं। असुरों के बारे माना जाता है कि उनका मुँह काला होता है, दाँत, बड़े होते हैं, पशुओं की तरह सींग उगे होते हैं। देवताओं के बारे में मान्यता है कि वे गौरवर्ण, आनन्दधाम, स्वर्ग के निवासी, भक्तों की सहायता के लिये दौड़ आने वाले होते हैं। यह वर्णन अलंकारिक है। किसी अन्तरिक्ष लोक में इस प्रकार के प्राणी पाये जाने की सम्भावना नहीं। न इस पृथ्वी पर ही ऐसे जीवों का अस्तित्व देखा जाता है, न प्राचीन काल में था। मनुष्य की आन्तरिक अवस्थाओं के आधार पर ही यह देव-दानव चित्रण अलंकारिक रूप से किया गया है। मुँह काला अर्थात् कलंक कालिमा, अपयश, निन्दा से आच्छादित घृणित जीवन। बड़े दाँत अर्थात् अधिक खाने, अधिक समेटने, अधिक भोगने की दुष्प्रवृत्ति। सींग अर्थात् दूसरे के साथ दुष्टता का बरताव करने की- सताने, टोंचने, मर्माहत करने की- आदत। यह दुर्गुण जिस भी मनुष्य हों, उसे असुर कहना चाहिए भले ही वह रंग का गौरवर्ण, रूपवान् ही क्यों न हो। इसी प्रकार जिनमें उदारता, संयम, परमार्थ, सेवा जैसी सत्प्रवृत्ति बढ़ी-चढ़ी हों उन्हें देव कहना चाहिये। देव सदा पूजे जाते हैं उनका यश गाया जाता है, उनके सेवापूर्ण कर्तृत्व से असंख्य प्राणियों के शोक-सन्ताप में कमी होती है। यह विभाजन आज भी आत्म-निरीक्षण करने वाले को यह बता सकता है कि वह असुर है या देव। उनका समय, श्रम, धन, चिन्तन कितना स्वार्थ संजोने में लगता है, कितना परमार्थ प्रयोजन में? इसका लेखा-जोखा हम स्वयं ही तैयार कर सकते हैं, क्योंकि बाहर वालों को असलियत मालूम नहीं होती। हमारी अन्तरंग स्थिति ही हमें देव अथवा असुर वर्ग की पंक्ति में बैठा सकती है और इस निष्कर्ष पर पहुँचा जा सकता है कि परिवर्तन की भावी घड़ियों में हमें महाकाल की एड़ी से कुचले जाने का दण्ड भोगना है अथवा ईश्वरीय प्रयोजन की पूर्ति में संलग्न पार्षदों की पंक्ति में खड़े होकर विजय का वरण करना होगा।

नर-पशुओं और नर-पिशाचों का बाहुल्य जब कभी भी संसार में होगा तो विपत्तियाँ आयेंगी और अगणित प्रकार की विभीषिकायें उत्पन्न होंगी। यह अभिवृद्धि जब चिन्ताजनक स्तर तक पहुँच जाती है तब ईश्वर की इस परमप्रिय सृष्टि के लिये सर्वनाश का खतरा उत्पन्न हो जाता है। इसी को बचाने के लिये उन्हें हस्तक्षेप करना पड़ता है- अवतार लेना पड़ता है। गीता में इसी तथ्य का भगवान् ने स्पष्टीकरण किया है- “जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की अभिवृद्धि होती है तब साधुता का संरक्षण और दुष्टता का उन्मूलन करने के लिये मैं आत्मा का सृजन करता हूँ।”

अनैतिकता की दुरभिसन्धि का उन्मूलन करने के लिए एक व्यक्ति नहीं वरन् एक वर्ग ही समर्थ हो सकता है। इसलिये इन विषम परिस्थितियों में सदा ही एक ऐसे वर्ग को सतेज होना पड़ता है जिसे अध्यात्म भाषा में देव अथवा नर-नारायण और बोलचाल की भाषा में परमार्थ परायण सज्जन- महापुरुष- नर-रत्न आदि कहते हैं। यों इस वर्ग का अस्तित्व सदा बना रहता है। पृथ्वी धर्मात्माओं, सज्जनों, परमार्थियों और ईश्वर-भक्तों से कभी रहित नहीं होती। पर देखा यह जाता है कि असुरता की बाढ़ में यह देवत्व शिथिल पड़ जाता है। ग्रीष्म के आतप से जैसे दूब घास जल जाती है उसी प्रकार प्रोत्साहन न मिलने के कारण देवत्व की प्रवृत्ति भी सूख जाती है किन्तु जब भी सन्तुलन को स्थापित करने के लिये महाकाल का अभियान आरम्भ होता है तो यह विश्रृंखलित, मूर्छित एवं उपेक्षित देव-श्रद्धा वर्षा के जल से हरी हुई दूब की तरह पुनः सजीव होकर अपना अस्तित्व सिद्ध करने लगती है।

असुरता के अभिवर्धन को नियन्त्रित करने के लिये समय-समय पर देवत्व को सक्रिय एवं संघर्षरत होना पड़ा है। पौराणिक उपाख्यानों में इस तथ्य का पन्ने-पन्ने पर प्रतिपादन है। 18 पुराणों और 18 उपपुराणों में देवासुर संग्राम की सहस्रों कथायें विद्यमान हैं। छल−बल में असुर तगड़े पड़ते हैं, फिर भी ईश्वरीय सहायता देव-वर्ग को मिलती है और अन्ततः वही जीतता है। असुरता को हर इतिहास में पराजय का ही मुँह देखना पड़ा है। दुष्टता के पास छल−बल से एकत्रित साधन बहुत होते हैं, इसलिये कुछ उसका आतंक ऐसा छाया रहता है कि सर्वसाधारण को प्रतिरोध का साहस नहीं होता। किन्तु यह स्थिति देर तक नहीं रहती, सृष्टि का सन्तुलन न बिगड़ने देने में सतर्क भगवान् यथा समय देव-वर्ग को सजग करते हैं-उसमें प्राण फूँकते हैं और देखते-देखते सामान्य प्रतीत होने वाले मनुष्य असामान्य उत्कृष्टता की भूमिका


सूक्ष्म शरीर का उत्कर्ष-ज्ञान योग से

सूक्ष्म शरीर विचार प्रधान है। मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार का अन्तःकरण चतुष्टय इस आवरण का आधार है। विविध कामनाएं, वासनाएं, आकाँक्षाएं, लालसाएं इसी में उठती हैं। अभिरुचि और प्रकृति का केन्द्र यही है। शरीर विज्ञान के अनुसार मस्तिष्क में यह संवेदनाएं समाविष्ट हैं, अतएव मस्तिष्क को सूक्ष्म शरीर का निवास स्थल माना गया है। यों यह चेतना समस्त शरीर में भी व्याप्त है। मस्तिष्क के दो भाग हैं एक सचेतन, दूसरा अचेतन। माथे वाले अग्रभाग में सोचने, विचारने, समझने, बूझने, निर्णय और प्रयत्न करने वाला सचेतन मन रहता है और मेरुदण्ड से मिले हुये पिछले भाग में अचेतन मस्तिष्क का स्थान हैं। यह अनेकों आदतें, संस्कार, मान्यताएं, अभिमान, प्रवृत्तियाँ, मजबूती से अपने अन्दर धारण किये रहता है। शरीर के अविज्ञात क्रिया कलापों का संचालन यहीं से होता है।

गुण विभाजन के अनुसार स्थूल शरीर तमोगुण (पंच तत्वों) से, सूक्ष्म शरीर रजोगुण (विचारणा) से और कारण शरीर सतोगुण (भावना) से विनिर्मित है। स्थूल शरीर को प्रवृत्ति प्रधान, सूक्ष्म शरीर को जीव प्रधान और कारण शरीर को आत्मा (परमात्मा) प्रधान माना गया है। अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, आनन्दमय, विज्ञानमय कोष भी इन तीन शरीरों से अंतर्गत ही हैं, जिनका वर्णन गायत्री महाविज्ञान (तृतीय खंड) में किया जा चुका है।

इन शरीरों के विस्तृत वर्णन का अवसर यहाँ नहीं। अभी तो इतना जानना ही पर्याप्त है कि सूक्ष्म शरीर में देवत्व का अभिवर्धन करने के लिए ज्ञानयोग की आवश्यकता होती है। ज्ञानयोग का अर्थ उन जानकारियों को हृदयंगम करना है जो हमारे आदर्श, सिद्धान्त, मनोभाव और क्रिया कलापों का निर्माण एवं संचालन करती हैं।

स्थूल ज्ञान वह है जो साँसारिक जानकारियाँ बढ़ा कर हमारे मस्तिष्क को अधिक उर्वर, सक्षम एवं समर्थ बनाता है। यश, धन, व्यक्तित्व, शिल्प, कौशल आदि इसी आधार पर उपार्जित किये जाते हैं। इसी को शिक्षा कहते हैं। विविध विषयों की अगणित शिक्षा संस्थाएं इसी प्रशिक्षण के लिये खुली हुई हैं जिनमें पढ़ कर छात्र अपनी रुचि एवं आवश्यकतानुसार जानकारी अर्जित करते हैं। पुस्तकों, पत्र-पत्रिकाओं, रेडियो, टेलीविजन, फिल्म, परस्पर संभाषण, भ्रमण आदि साधनों से भी मस्तिष्क को समुन्नत करने वाली जानकारी मिलती है। यह सब शिक्षा के ही भेद है।

शिक्षा साँसारिक जानकारी देती है, उसकी पहुँच मस्तिष्क तक है। विद्या अन्तःकरण तक पहुँचती है और उसके द्वारा व्यक्तित्व का निर्माण, निर्धारण होता है। विद्या को ही ज्ञान कहते हैं। ज्ञान का आधार अध्यात्म है। केवल शब्दों के श्रवण मनन से शिक्षा पूरी हो सकती है पर विद्या का उद्देश्य तभी पूरा होगा जब उसकी पहुँच अन्तरात्मा तक हो, उसका आधार अध्यात्म, तत्व-ज्ञान रहे और उसका प्रशिक्षण ऐसे व्यक्ति द्वारा किया गया हो जो अपना आदर्श उपस्थित कर उन भावनाओं को हृदयंगम करा सकने में समर्थ हो। यह आधार प्राप्त न हो तो विद्या एक तरह की भौतिक शिक्षा मात्र ही बन कर रह जाती है और उससे अभिष्ट प्रयोजन पूर्ण नहीं होता। आज कल अध्यात्म के नाम पर ज्ञानयोग के नाम पर वाचालता बहुत बढ़ गई है। कथा-प्रवचनों के अम्बार खड़े होते चले जाते हैं पर सुनने वालों का कौतूहल समाधान होने के अतिरिक्त लाभ कुछ नहीं होता। उनके अन्दर प्रभाव, प्रकाश एवं परिवर्तन तनिक भी दिखाई नहीं देता। इसका कारण यही है कि विद्या को भी शब्द शक्ति तक ही सीमित किया जा रहा है जबकि उसका प्रवेश और प्रकाश सीधा आत्मा तक पहुँचना चाहिये।

ज्ञान-योग का उद्देश्य आत्मा तक सद्ज्ञान का तत्व ज्ञान का प्रकाश है। इसका शुभारम्भ आत्म-ज्ञान से होता है। लोग साँसारिक जानकारियों के बारे में बहुत चतुर निपुण और निष्णात होते हैं, अपनी इस प्रतिभा के बल पर धन, यश, सुख और पद प्राप्त करते हैं। किन्तु खेद है कि अपने अस्तित्व, स्वरूप उद्देश्य और कर्तव्य के बारे में तात्विक दृष्टि से अनजान ही बने रहने हैं। यों इन विषयों पर भी वे एक लम्बी स्पीच झाड़ सकते हैं, पर यह केवल उनका मस्तिष्कीय चमत्कार भर होता है, यदि आत्म ज्ञान का थोड़ा भी तात्विक प्रकाश मनुष्य के अन्तःकरण में पहुँच जाय तो उसकी जीवन दिशा में उत्कृष्टता का समावेश हुये बिना नहीं रह सकता। उसकी विचारणा, निष्ठा तथा गतिविधि सामान्य लोगों जैसी नहीं असामान्य पाई जायगी। सच्चा आत्म-ज्ञान केवल जानकारी भर बन कर नहीं रह सकता। उसकी पहुँच अन्तःकरण के गहन स्तर तक होती है और उस स्थान तक पहुँचा हुआ प्रकाश-जीवन क्रम में प्रकाशित हुए बिना नहीं रह सकता।

अध्यात्मवाद का प्रथम प्रशिक्षण आत्म-ज्ञान की उपलब्धि के साथ ही दिया जाता है। उपनिषद्कार ने पुकार-पुकार कर कहा है-

“आत्मा व अरे दृष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यो।”

“अपने को सुनो, अपने बारे में जानो, अपने को देखो और अपने बारे में बार-बार मनन चिंतन करो।” वस्तुतः हम अपने को शरीर मान कर जीवन की उन गतिविधियों का निर्धारण करते हैं जिनसे केवल शरीर का ही यत्किंचित् स्वार्थ सिद्ध होता है। आत्मा के हित और कल्पना के लिए हमारे जीवन क्रम में प्रायः नहीं के बराबर स्थान रहता है। यदि हम अपने को आत्मा और शरीर को उसका एक वाहन औजार मात्र समझे तो सारा दृष्टिकोण ही बदल जाय। समस्त गतिविधियाँ ही उलट जायें तब हम आत्मा के हित, लाभ और कल्याण को ध्यान में रख कर अपनी रीति-नीति निर्धारित करें। ऐसी दशा में हमारा स्वरूप न नर-पशु जैसा रह सकता है और न नर-पिशाच जैसा। तब हम विशुद्ध नर नारायण के रूप में परिलक्षित होंगे, देवत्व हमारे रोम-रोम से फूटा पड़ रहा होगा।

जन्म-दिन मनाने की प्रक्रिया के साथ युग-निर्माण योजना के अंतर्गत आत्म-ज्ञान का व्यापक उद्बोधन-व्यापक अभियान- चलाया जा रहा है। अखण्ड-ज्योति के प्रत्येक परिजन को बहुत जोर देकर कहा जा रहा है कि वह अपना जन्म दिन समारोहपूर्वक मनाया करे। उस दिन अपने में भावनात्मक उल्लास उत्पन्न किया करे। जीवन के स्वरूप, उद्देश्य एवं उपयोग के महान् तत्वज्ञान पर एकान्त में विचार किया करे और अपने आपसे यह प्रश्न पूछा करे कि अपने अस्तित्व का मूल स्वरूप क्या है? इस सुर दुर्लभ मानव जीवन का उद्देश्य क्या? और इन बहुमूल्य क्षणों का सर्वोत्तम सदुपयोग किस प्रकार किया जा सकता है? इन प्रश्नों का यदि सही उत्तर भीतर से मिले और इतना साहस उत्पन्न हो जाय कि जो श्रेयस्कर है उसी को अपना लिया जाय तो हमारे जीवन में एक आध्यात्मिक क्रान्ति उपस्थित हो सकती है। हम सामान्य से असामान्य- नर से नारायण- पुरुष से पुरुषोत्तम तुच्छ महान- और आत्मा से बढ़ कर परमात्मा- बन सकते हैं।

जन्म दिन के अवसर पर वर्षों के हिसाब से घृत-दीप जलाना, पंच तत्व पूजन, महा मृत्युँजय मंत्र का सामूहिक पाठ, गायत्री यज्ञ, पुष्पोपहार, अभिवन्दन, आशीर्वाद जैसे धर्म कृत्य एक भावनात्मक उल्लासपूर्ण वातावरण उत्पन्न करते हैं। मित्रों, परिजनों का सम्मिलित, सस्ता पेय जल पान, उस हंसी, खुशी को और बढ़ा देता है। उपस्थित लोगों में भी उस तरह का आयोजन करने और जन्म-दिन मनाने की इच्छा उत्पन्न होती है और इस पुण्य-परम्परा के प्रसारण की सम्भावना बढ़ती है। मनुष्य का निज का जन्म-दिन उसके लिए निजी दृष्टि से सबसे बड़ा त्योहार होता है। कृष्ण जी की जन्माष्टमी, राम जी की रामनवमी अपने स्थान पर महत्वपूर्ण है पर एक सामान्य व्यक्ति के जीवन में उसका जन्म-दिन भी कम महत्व का नहीं। अपनापन हर किसी को पसन्द है। अपनी शकल शीशे या फोटो में देखकर, अपना नाम कहीं छपा देख कर, अपनी चर्चा कहीं सुन कर हर किसी को गर्व गौरव- सन्तोष आनन्द का- अनुभव होता है। आन्तरिक उल्लास का अभिवर्धन एक अध्यात्मिक साधन है। इस प्रकार हर दृष्टि से जन्म दिन आयोजनों का मनाया जाना, श्रेयस्कर ही है। इस प्रथा परम्परा को जितने अधिक उत्साह के साथ प्रचलित किया जायगा उतना ही राष्ट्र के आध्यात्मिक उत्कर्ष का उद्देश्य पूरा होगा। यों संसार के सभ्य समाज में सर्वत्र जन्म दिन का उत्सव मनाने का रिवाज है। इसे अच्छा भी माना जाता है। पर अपना उद्देश्य तो इससे भी ऊंचा है। सामाजिक, पारिवारिक एवं मनोवैज्ञानिक उत्सव मात्र ही इसे नहीं रहने देना है वरन् इस महान् परम्परा को आध्यात्मिक जागरण का आधार भी बनाना है, जिससे युग निर्माण का देवत्व के परिपोषण का महान् प्रयोजन पूर्ण हो सके।

जन्म दिन के अवसर पर अपने आपसे तीन प्रश्न पूछने चाहिये-

(1) भगवान् को सभी प्राणी समान रूप से प्रिय पात्र हैं। फिर मनुष्य को ही बोलने, सोचने, लिखने एवं असंख्य सुख सुविधाएं प्राप्त करने का विशेष अनुदान क्यों मिला? मनुष्य को हर दृष्टि से उत्कृष्ट स्तर का प्राणी बनाने में इतना असाधारण श्रम क्यों किया?

उत्तर एक ही हो सकता है- “अपने उद्यान, इस संसार को अधिक सुन्दर और सुव्यवस्थित बनाने के लिये परमेश्वर को साथी सहचरों की जरूरत पड़ी और अपनी क्षमताओं से सुसज्जित एक सर्वांगपूर्ण प्राणी-मनुष्य इस प्रयोजन की पूर्ति के लिये बनाया। विशेष साधन सुविधाएं इसलिये दी कि उनके द्वारा वह ईश्वरीय प्रयोजनों की पूर्ति ठीक तरह कर सके।”

(2) दूसरा प्रश्न अपने आपसे पूछना चाहिये कि जो सुविधायें, विभूतियाँ सम्पदायें हमें उपलब्ध हैं- “उनका लाभ यदि हम अकेले ही उठाते हैं तो इसमें क्या कोई हर्ज है ?”

उत्तर एक ही मिलेगा- “अन्य प्राणियों के अतिरिक्त जितनी भी बौद्धिक, आर्थिक, प्रतिभा कारक एवं अन्य किसी प्रकार की विशेषतायें हैं, वे विश्व मानव की ही पवित्र अमानत है ओर इनका उपयोग लोक-मंगल के लिये ही किया जाना चाहिये। शरीर रक्षा भर के आवश्यक उपकरण के अतिरिक्त इन साधनों का विश्व-कल्याण के लिये ही उपयोग किया जाय।”

(3) तीसरा प्रश्न अपने आपसे करना चाहिये कि “क्या इस सुरदुर्लभ मानव शरीर का सही सदुपयोग हो रहा है?”

उत्तर यही मिलेगा- “हम सदाचारी, संयमी, परिश्रमी, उदार, सज्जन, हंसमुख, सेवा भावी बने बिना मानव जीवन को सार्थक नहीं बना सकते। इसलिये इन सद्गुणों का अभ्यास बढ़ाने के लिये जीवन यापन की रीति-नीति में उत्कृष्टता और आदर्शवादिता का, सभ्यता और सज्जनता का पुरुषार्थ और साहस का समुचित समावेश करना चाहिये।”

इन्हीं प्रश्नोत्तरों में अध्यात्म तत्वज्ञान का सार सन्निहित है। यदि यह प्रश्न जीवन की महान् समस्या के रूप में सामने आयें और उन्हें सुलझाने के लिये हम अपने पूरे विवेक का उपयोग करें तो भावी जीवनयापन के लिये एक व्यवस्थित दर्शन और कार्यक्रम सामने आ खड़ा होगा। यदि साहसी शूरवीरों की तरह इस ईश्वरीय सन्देश को चुनौती के रूप में स्वीकार किया जा सका तो दूसरे ही दिन आकाँक्षाओं और कामनाओं का स्वरूप बदला हुआ होगा। रीति-नीति और कार्य पद्धति में वैसा परिवर्तन परिलक्षित होगा जैसे आत्मज्ञान सम्पन्न मनुष्य में प्रत्यक्षतः दृष्टिगोचर होना चाहिये।

जन्म दिन मनाने और उससे प्रेरणा ग्रहण करने की साधना विधि अपनाने के लिये परिजनों से इसीलिये अनुरोध किया जाता है कि वे अपने सूक्ष्म शरीर में- मानसिक चेतना में- ज्ञानयोग का समावेश कर देवत्व का जागरण करने की दिशा में आशाजनक प्रगति कर सकें।

ज्ञान-योग से जन-मानस का परिष्कार

ज्ञान-योग द्वारा सूक्ष्म शरीर में देवत्व की दैनिक प्रक्रिया है स्वाध्याय। जन्मदिन वर्ष में एक बार आता है झकझोर कर चला जाता है। उसे आत्म-ज्ञान का शुभारम्भ, श्रीगणेश एवं प्रेरक पर्व कह सकते हैं, इस उपलब्धि को नित्य सींचना आवश्यक है और यह कार्य दैनिक स्वाध्याय से ही सम्भव हो सकता है।

वातावरण का मनुष्य पर प्रभाव पड़ता है। आज के वातावरण में स्वार्थपरता, वासना, विलासिता, तृष्णा, उच्छृंखलता की मनोवृत्तियाँ बुरी तरह संव्याप्त हैं। इन्हीं से प्रेरित होकर लोगों की विभिन्न गतिविधियाँ संचालित होती हैं। लोग बाहर से आदर्शवादिता की बातें करते हैं पर उनके क्रिया कलाप में उपरोक्त तत्व ही घुले रहते हैं। बेईमानी और धूर्तता का सहारा लेकर साँसारिक वैभव उपार्जन करने वाले लोगों के उदाहरण चारों ओर भरे पड़े हैं। यह सारे का सारा वातावरण मौन रूप से मनुष्य को यही उपदेश करता है कि शीघ्र उन्नति करनी है- मौज-मजा के अधिक साधन उपलब्ध करने हों तो उचित अनुचित का अन्तर करने के झंझट में न पड़ कर जैसे बने वैसे अपना स्वार्थ सिद्ध करना चाहिये। आज के वातावरण की मौन रूप से यही शिक्षा है और यह शिक्षा हर दुर्बल मन के व्यक्ति को प्रभावित भी करती है। फलस्वरूप जनसाधारण की रुचि अकर्म करने की ओर बढ़ती चली जाती है। असुरता को दिन-दिन बढ़ते और देवत्व को दिन-दिन क्षीण होते हम भली प्रकार देख सकते हैं।

आम लोग इस पतन प्रवाह में ही बहने लगते हैं। सामाजिक मूढ़ताएं, रूढ़ियां, अन्ध परम्परायें अधिकाँश लोगों को अपने चंगुल में जकड़े रहती हैं। उनकी देखा-देखी दुर्बल मन व्यक्ति भी अनुकरण करते हैं। विवेक उनकी उपयोगिता पर सन्देह तो उत्पन्न करता है पर समर्थन न मिलने से चुप ही बैठना पड़ता है और जो ढर्रा चल रहा है उसी के साथ लुढ़कना पड़ता है। इस प्रकार अवाँछनीय सामाजिक कुरीतियाँ, मूढ़ताएं और अन्ध परम्परायें घटने की बजाय बढ़ती ही रहती हैं। अनैतिकता का अभिवर्धन व्यक्तिगत चरित्र का और सामाजिक मूढ़ताओं का विस्तार सामूहिक जीवन को जर्जर बनाते चले जा रहे हैं। पतन का पहिया तेजी से घूमता है और दुर्दशा की दिशा में हम भयावह रूप से बढ़ते चले जा रहे हैं।

इस कुचक्र को कैसे रोका जाय? इस प्रश्न पर गम्भीरतापूर्वक विचार करने से एक ही निष्कर्ष निकलता है कि सर्व साधारण के मस्तिष्क को पतन की ओर आकर्षित करने वाले प्रशिक्षण की तुलना में ठीक उतना ही प्रबल प्रतिरोधी वातावरण ऐसा तैयार किया जाय जो जन मानस की असुरता की विभीषिकाओं और देवत्व की शुभ सम्भावनाओं का प्रभाव उत्पन्न कर सके। अच्छा तो यह था कि जिस प्रकार दुष्टता अपना कर सफलता उपलब्ध करने वालों के अगणित उदाहरण सामने उपस्थित है वैसे ही सज्जनता का अवलम्बन लेकर प्रगति के उच्च शिखर पर पहुँचने वालों के उदाहरण देखने को मिलते और उनका प्रभाव ग्रहण कर अनेकों को उस सन्मार्ग का अनुकरण करने की प्रेरणा मिलती है। पर यदि वैसी व्यवस्था तत्काल नहीं हो सकती तो दूसरा उपाय यह है कि जन साधारण के मस्तिष्क को प्रभावित कर सकने योग्य उत्कृष्ट समर्थ विचार इतनी अधिक मात्रा में उपलब्ध हों कि सामयिक कुशिक्षा और दूषित प्रभाव का निराकरण किया जा सके।

यह कार्य स्वाध्याय की व्यापक सर्वांगपूर्ण व्यवस्था करके सम्पन्न किया जा सकता है। वर्तमान का काम इतिहास से चलाया जा सकता है और कुशिक्षा देने वाले वर्तमान व्यक्तित्वों के मुकाबले दूरस्थ अथवा दिवंगत महापुरुषों की विचार पद्धति सामने खड़ी की जा सकती है। स्वाध्याय इसी प्रक्रिया का नाम है। संसार में ऐसे उत्कृष्ट व्यक्तित्व हैं अथवा हो चुके हैं जिनकी ओजस्वी विचार-धारा बड़ी समर्थ और सारगर्भित है, उसे सुनने का अवसर मिलता रहे तो वर्तमान दुर्बुद्धिपूर्ण शिक्षा की काट हो सकती है। इसी प्रकार दूरस्थ अथवा दिवंगत सन्मार्ग-गामी सज्जनों के महान चरित्र आँखों के सामने प्रस्तुत होते रहें तो भी वर्तमान दुरात्माओं के भ्रष्ट अनुकरण से बचने की हिम्मत जाग सकती है। प्रत्यक्ष न सही, परोक्ष रूप से मस्तिष्कों के सम्मुख प्रेरक प्रशिक्षण एवं घटनात्मक विवरण प्रस्तुत किया जा सके तो भी पतन के प्रवाह को रोकने में बहुत सहायता मिल सकती है। स्वाध्याय इसी महती आवश्यकता को पूर्ण करता है। स्वाध्याय ज्ञान-योग का अविच्छिन्न अंग हैं।

‘सत्य वद धर्म चर’ के बाद शास्त्र का मानव प्राणी के लिये महत्वपूर्ण निर्देश ‘स्वाध्यायान्या प्रवतव्य’ ही है। स्वाध्याय में प्रमाद करने की कठोरता पूर्वक मनाही की गई है। भोजन, शयन, स्नान जैसे नित्य कर्मों में ही स्वाध्याय की भी गणना है। जिस प्रकार आहार की आवश्यकता है, उसी प्रकार मन शरीर के लिये स्वाध्याय चाहिये। इसके बिना क्षुधा की निवृत्ति नहीं हो सकती। जिस मनोभूमि को स्वाध्याय नहीं मिलता वह ऊसर, नीरस, दुर्बल ओर विकृत होती चली जाती है। बर्तनों को नित्य माँजना पड़ता है, दाँत रोज साफ करने पड़ते हैं, स्नान नित्य किया जाता है, कमरे में झाड़ू रोज लगती है, इसी प्रकार मन पर वातावरण से निरन्तर पड़ने वाले बुरे प्रभाव का-मलीनता का-निराकरण करने के लिये नित्य ही स्वाध्याय की आवश्यकता पड़ती है। अन्यथा मनोभूमि मलीनता से इतनी आच्छादित हो जाती है कि उसमें सड़न और दुर्गन्ध के अतिरिक्त और कुछ दिखाई ही नहीं पड़ता। ऐसा मन असुरता का ही निवास-स्थल हो सकता है।

पिछले दिनों कोई-कोई पौराणिक कथा ग्रन्थ थोड़ा-थोड़ा कर बाँच लेना अथवा किसी प्राचीन धार्मिक पुस्तक के थोड़े-से पन्ने उलट लेना स्वाध्याय की लकीर पीटने के लिये काफी माना जाता रहा है। यह सर्वथा अपर्याप्त है। जीवन- की परिवार की- समाज की बाह्य तथा अंतरंग समस्याओं पर जो साहित्य वर्तमान परिस्थितियों के संदर्भ का ध्यान रख कर व्यावहारिक एवं बुद्धि संगत हल उपस्थित कर सके वहीं स्वाध्याय का उपयुक्त माध्यम माना जा सकता है। उसी से किसी उपयुक्त मार्ग दर्शन की- समस्याओं के समाधान की- आशा की जा सकती है।

खेद की बात है कि इस प्रकार का स्वाध्यायोपयोगी साहित्य ढूँढ़े नहीं मिलता। बुकसेलरों और प्रकाशकों के गोदामों में केवल कूड़ा कचरा ही भरा दिखाई पड़ता है। और मानव जाति का- देश धर्म और समाज संस्कृति का दुर्भाग्य ही कहना चाहिये कि व्यक्ति तथा समाज का नव-निर्माण कर सकने की क्षमता सम्पन्न साहित्य का आज खटकने वाला अभाव दृष्टिगोचर होता है। इस अभाव की पूर्ति के लिये भी प्रयत्न आरम्भ हो गया है। युग निर्माण योजना’ के अंतर्गत ऐसा सर्व सुलभ साहित्य छोटे ट्रैक्टों के रूप में छापा जा रहा है जो जन मानस की विकृतियों का समाधान कर उसे आवश्यक प्रकाश एवं मार्गदर्शन प्रस्तुत कर सके। जीवन के हर पहलू और समाज की हर समस्या पर इस प्रकाशन के अंतर्गत एक क्रमबद्ध प्रेरणा प्रस्तुत की जा रही है। इस एक बड़े अभाव की पूर्ति एक सीमा तक इस माध्यम से पूरी हो सकेगी ऐसी आशा करना उचित ही माना जा सकता है।

‘अखण्ड-ज्योति’ के प्रिय परिजनों को ज्ञान-योग की साधना के लिये स्वाध्याय को अनिवार्य आवश्यकता को समझने के लिये आग्रह किया गया है। देवत्व के अभिवर्धन का- सूक्ष्म शरीर के परिष्करण का यह एक असाधारण उपाय है। हमें नित्य ही अनिवार्य रूप से इस ‘युग निर्माण साहित्य’ का अध्ययन करना चाहिये। कुछ समय इसके लिये पूजा उपासना, आहार, स्नान आदि की तरह ही निर्धारित कर लेना चाहिये और कितने ही आवश्यक कार्यों की उपेक्षा कर इस आत्मिक आहार के लिये समय निकालना चाहिये। यह प्रेरक विचारधारा जिन अन्तःकरणों से निकलती है वह इतने समर्थ हैं कि पाठक में अपनी ज्योति एवं प्रेरणा उत्पन्न कर सकें। यों सद्गुणों का महत्व कई अन्य पुस्तकों एवं व्यक्तियों द्वारा समय-समय पर सुना समझा गया होगा पर यह साहित्य उन सबसे भिन्न- अपने ढंग का अनोखा है। वह पाठक के मस्तिष्क तक सीमित न रह कर अन्तःकरण के गहन स्तरों तक प्रवेश और वही हलचल उत्पन्न कर सकने की सामर्थ्य से सम्पन्न है। इसका नियमित अध्ययन किसी भी व्यक्ति को देवत्व के सत्य पर चलने की प्रबल प्रेरणा दिये बिना नहीं रह सकता। इसका वाचन निरर्थक नहीं जा सकता, उससे किसी भी व्यक्तित्व के उत्कर्ष में आशा जनक सहायता मिल सकती है।

हममें से प्रत्येक को ईश्वर की भावनात्मक उपासना करने के लिये स्वाध्याय को एक आवश्यक धर्म कर्तव्य बना लेना चाहिये। ईश्वर की प्राथमिक पूजा, मूर्ति, चित्र आदि के ध्यान और अक्षत, पुष्प, नैवेद्य, धूप, दीप आदि उपकरणों के साथ होती है। पर आगे चल कर माध्यमिक उपासना उच्च विचारधारा रूपी प्रतिमा को मन मन्दिर में उपस्थित करके ही अग्रगामी बनाई जाती है। संयम, साहस, विवेक, सेवा, दया, करुणा, मैत्री, उदारता, सौजन्य, पवित्रता आदि सद्गुण विशुद्ध रूप से ईश्वर की भावनात्मक प्रतिमा ही है। स्वाध्याय सत्संग और चिंतन मनन द्वारा जितनी देर मन मन्दिर में इन सद्गुणों का प्रकाश बना रहे और उनमें अपनी श्रद्धा जमी रहे तो समझना चाहिये कि उतनी देर उच्च-स्तरीय ईश्वर पूजन होता रहा। प्रतिमायें ईश्वर की प्रतीक हैं पर उच्च-भावनायें तो प्रभु की प्रतिनिधि ही मानी गई हैं। इसलिये स्वाध्याय हमारी उपासनात्मकता को पूर्ण करने का एक महत्वपूर्ण माध्यम भी हैं।

जो हमें आज की स्थिति के अनुरूप उच्च-स्तरीय मार्ग दर्शन एवं परामर्श दे सकें ऐसे मनीषी महापुरुषों का सत्संग सान्निध्य हर घड़ी- चाहे जहाँ उपलब्ध नहीं हो सकता। पर सद्ग्रन्थों के माध्यम से हम जिस भी महापुरुष को- जिस भी समय जिस भी विषय पर परामर्श देने के लिये बुलाना चाहें वह बिना किसी कठिनाई के सामने उपस्थित होगा। इतना सरल और इतना महत्वपूर्ण आत्म-कल्याण का दूसरा कोई साधन नहीं हो सकता, जितना कि स्वाध्याय। अस्तु हमें मानसिक परिष्कार के इस अमोघ माध्यम को अपने दैनिक जीवन में दृढ़ता-स्थिरता और श्रद्धा पूर्वक स्थान देना चाहिये। स्वाध्याय में प्रमाद न करने की शास्त्राज्ञा को एक धर्मनिष्ठ व्यक्ति की तरह हमें निश्चित रूप से शिरोधार्य ही करना चाहिये।

जो शुभ है, श्रेयस्कर है, मंगलमय है, उसे स्वयं तो ग्रहण करना ही चाहिये, अपने परिवार को भी उसका पूरा-पूरा लाभ देना चाहिये। हमारी भौतिक उपलब्धियों का लाभ परिवार के लोगों को मिलता है, उन्हें इस भावनात्मक प्रकाश का लाभ उठाने के लिये भी अवसर देना चाहिये। घर में जितने भी शिक्षित व्यक्ति हैं उन सबको उनके स्तर का स्वाध्याय साधन उपलब्ध करना चाहिये और यदि उनमें अध्ययन की रुचि न हो तो प्रयत्न पूर्वक उसे जागृत करना चाहिये। इस रुचि का न होना मानव जीवन के विकास में एक भारी विघ्न है। इस गतिरोध को हटाने-मिटाने के लिये हर सम्भव प्रयत्न करना चाहिये और तभी चैन लेना चाहिये जब अपने प्रिय परिवार के हर शिक्षित सदस्य में स्वाध्याय की अभिरुचि उत्पन्न हो जाय और वह श्रेयस्कर साहित्य उपलब्ध करने के लिये उसकी तलाश के लिये स्वयं उत्सुक रहने लगे। इस मानसिक स्थिति तक अपने परिवार के सदस्यों को पहुँचा देना हर विवेकवान गृहपति का एक परम पवित्र धर्म कर्तव्य है। घर में जो पढ़े न हों उन्हें जीवन साहित्य सुनने का शौक लगाया जाय। पढ़े सदस्य यह सेवा स्वीकार करें और बिना पढ़ों को नित्य प्रेरक विचार धारा का कुछ न कुछ लाभ एवं प्रकाश उपलब्ध कराया करें। जिन घरों में यह परम्परा चलने लगे, समझना चाहिये, देवत्व की दिशा में अग्रसर होने के लिये इस परिवार ने एक महत्वपूर्ण अवलम्बन ग्रहण कर लिया।

समाज की एक महती सेवा के लिये- अखण्ड ज्योति परिजनों को- ‘झोला पुस्तकालय’ चलाने के लिये अनुरोध किया गया है। इस युग का यह सबसे बड़ा परमार्थ है। विचारों में उत्कृष्टता उत्पन्न करना मानव प्राणी की सबसे बड़ी सेवा है। उसी माध्यम से वह अपने बाह्य जीवन का- अन्तरंग जीवन का, परिवार का तथा समस्त समाज का हित साधन कर सकता है। बुरे विचार ही मनुष्य को नरक की आग में जलाते हैं और सद्विचारों के सहारे स्वर्गीय देव-जीवन जी सकना सम्भव होता है। अतएव सद्विचारों का दान- ब्रह्म दान- सदा से इस धरती का श्रेष्ठतम पुण्य माना जाता रहा है। साधु ब्राह्मण इसी परमार्थ के लिये अपना सम्पूर्ण जीवन उत्सर्ग करते हैं। शोक संतप्त और पाप-ताप से संत्रस्त मानव जाति को वर्तमान दुर्दशा से विमुक्त करने के लिये सद्-ज्ञान की संजीवनी बूटी ही एक मात्र उपाय है। इस आवश्यकता की पूर्ति का उत्तरदायित्व हममें से हर प्रबुद्ध व्यक्ति को वहन करना चाहिये।

एक छोटे झोले में बीस-तीस ‘युग निर्माण ट्रैक्ट’ लेकर ही हम घर से निकलें। दफ्तर में, दुकान में जहाँ भी हमारा कार्यक्षेत्र हो इस झोले को साथ रखें। जो भी विचारशील व्यक्ति दिन भर संपर्क में आवें, उनकी रुचि और आवश्यकता को समझ कर समाधान करके किसी ट्रैक्ट की चर्चा करनी चाहिये और बताना चाहिये कि उसे पढ़ने पर एक नया प्रकाश प्राप्त किया जा सकेगा। पहले दिन केवल पुस्तक का महत्व बता कर उसकी रुचि जागृत की जाय। ओर यदि उत्सुकता उत्पन्न हो जाय तो दूसरे दिन शीघ्र पढ़ कर वापिस करने का अनुरोध करते हुये वह पुस्तक देनी चाहिये। पढ़ लेने पर वापिस माँगनी चाहिये और उसमें प्रस्तुत विषयों पर अनुकूल चर्चा करनी चाहिये। इस प्रकार जिनसे भी संपर्क बने उन्हें उनकी रुचि, स्थिति और आवश्यकता के अनुरूप साहित्य देने वापिस लेने का क्रम चलाना चाहिये। समय पर आवश्यक साहित्य मिल सके उसके लिये ‘झोला पुस्तकालय’ साथ रखना चाहिये।

बड़े पुस्तकालय एवं विद्यालय खोल देने की अपेक्षा एक ‘झोला पुस्तकालय’ चलाना अधिक सत्परिणाम उपस्थित कर सकता है। पुस्तकालयों में हजारों रुपया मूल्य की पुस्तकें सड़ती रहती हैं। उत्कृष्टता की ओर रुचि न होने से श्रेयस्कर पुस्तकें कोई छूता तक नहीं। गन्दी और बेहूदी पुस्तकें ही अक्सर पढ़ी जाती हैं। इस प्रकार पुस्तकालय भी उतने उपयोगी सिद्ध नहीं हो रहे हैं। लोगों की सत्साहित्य में रुचि जगाना खास बात है और वह व्यक्तिगत प्रभाव तथा दबाव डाल कर ही उत्पन्न करनी पड़ेगी। ‘झोला पुस्तकालय’ चलाने वाले को यही सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता पूरी करनी पड़ती है। वह अपना सारा बुद्धि-कौशल और प्रभाव बाजी पर लगा कर ही अपने क्षेत्र में इस प्रकार की अभिरुचि उत्पन्न करता है। अतएव श्रेष्ठ साहित्य निर्माण करने वाले से भी अधिक बढ़ा-चढ़ा उसका सत्प्रयत्न माना जा सकता है। ‘झोला पुस्तकालय’ चलाने वाले का पुण्य परमार्थ किसी दार्शनिक मनीषी विद्वान् एवं लोकसेवी से किसी भी प्रकार कम नहीं वरन् कुछ बढ़ कर ही है। दस नया पैसा प्रतिदिन नियमित रूप से निकालते रहने पर एक झोला पुस्तकालय चलाते रहने के लायक साहित्य मिल सकता है। जो इतना समय और श्रम देने को तत्पर हो जायगा उसे इतनी छोटी धनराशि किसी भी प्रकार भार रूप में प्रतीत न होगी। आधे कप चाय की कीमत, एक पान की कीमत, एक छटाँक आटे की कीमत, आज कल दस पैसा है। मन में भावना हो तो इतना भार, इतने बड़े परमार्थ का लाभ देखते हुए कोई भी विचारशील व्यक्ति बड़ी आसानी से उठा सकता है। भावना न हो तो फुरसत न होने और आर्थिक तंगी रहने का घिसा-पिटा बहाना मौजूद ही है। उसे मन समझने के लिये कोई भी- कभी भी दुहरा सकता है। दो-चार दिन थोड़ी झिझक संकोच यदि छुड़ा ली जाय, लोगों से मिलने-जुलने और अपनी बात कहने में जो झिझक, भय, अनुभव होती है उस आत्महीनता को हटा दिया जाय तो फिर यह कार्य इतना अधिक आनन्द दायक प्रतीत होता है कि छोड़े नहीं छूटता।

ज्ञान योग को जन मानस में प्रतिष्ठापित कर देवत्व के जागरण का व्यापक अभियान गतिशील किया जा सकता है। जन्म दिन का प्रचलन और झोला पुस्तकालयों का हर प्रबुद्ध व्यक्ति द्वारा संचालन यह दो कार्य छोटे भले ही दीखें पर परिणाम में इतने महान् हैं कि युग निर्माण जैसी समय की पुकार को इन्हीं के माध्यम से चमत्कारिक रीति से पूर्ण किया जा सकता है।


हम मनस्वी और आत्म-बल सम्पन्न बनें