ईश्वर को खोजते लोग मेरे पास आते हैं। मैं उनसे कहता हूँ कि ईश्वर तो प्रतिक्षण और प्रत्येक स्थान पर है। उसे खोजने कहीं भी जाने की आवश्यकता नहीं। जागो और देखो और जागकर जो भी देखा जाता है, वह सब परमात्मा ही है।
सूफी कवि हफीज अपने गुरु के आश्रम में था। और भी बहुत से शिष्य वहाँ थे। एक रात्रि गुरु ने सारे शिष्यों को शाँत ध्यानस्थ हो बैठने को कहा। आधी रात गए गुरु ने धीमे से बुलाया-’हफीज’! सुनते ही तत्क्षण हफीज उठ कर आया। गुरु ने जो उसे बताना था, बताया। फिर थोड़ी देर बाद उसने किसी और को बुलाया लेकिन आया हफीज ही। इस भाँति दस बार उसने बुलाया लेकिन बार-बार आया हफीज ही क्योंकि शेष सब तो सो रहे थे।
परमात्मा भी प्रतिक्षण प्रत्येक को बुला रहा है-सब दिशाओं से, सब मार्गों से उसकी आवाज आ रही है लेकिन हम तो सोए हुए हैं। जो जागता है, वह उसे सुनता और जागता है केवल वही उसे पाता है।
इसलिए मैं कहता हूँ कि ईश्वर की फिक्र मत करो। उसकी चिन्ता व्यर्थ है। चिन्ता करो स्वयं को लगाने की। निद्रा में जो हम जान रहे हैं वह ईश्वर का ही विकृत रूप है। यह विकृत अनुभव ही संसार है। जागते ही संसार नहीं पाया जाता है और जो पाता है वही सत्य है।
-आचार्य रजनीश
मनुष्य सुख चाहता और दुःख से बचाना चाहता है। उसकी एकमात्र इच्छा रहती है कि उसे सुख मिले-ऐसा सुख जिसमें दुःख का लवलेश भी न हो और जो सदा सर्वदा एक समान स्थित रहे। न उसमें कमी आवे और न किसी काल में उसका नाश हो। ऐसा शाश्वत सुख मोक्ष के सिवाय और क्या हो सकता है।
मनुष्य की शाश्वत सुख की कामना समर्थनीय है, यही उसका लक्ष्य है और यही उसका श्रेय। उसे यह कामना होनी ही चाहिए और इस लक्ष्य को पाने के लिए हर प्रयत्न एवं पुरुषार्थ को करने में तत्पर रहना चाहिए। मानव देह तथा मनुष्य जीवन की प्राप्ति हुई भी इसी कर्त्तव्य के लिए ही।
शाश्वत सुख की यह कामना मनुष्य में यों ही उद्भूत नहीं हो गई है। इसका वास्तविक स्वरूप ही आनन्द रूप है जिसे वह बहुत समय से भूल गया है। शाश्वत सुख की कामना उसी विस्मृत अथवा वियुक्त स्वरूप को पाने के लिए एक कसक है, जिससे प्रेरित होकर वह उसकी खोज में भटक रहा है किन्तु ठीक मार्ग का अनुसरण न कर सकने से कृतकृत्य नहीं हो पा रहा है, और जो भाग्यवान पुरुषार्थी सत्य मार्ग का अनुसरण कर लेते हैं वे अपने सत्यस्वरूप शाश्वत सुख अथवा मोक्ष पद को प्राप्त भी कर लेते हैं।
संसार के समस्त प्राणियों में केवल मनुष्य ही शाश्वत सुख अर्थात् मोक्ष का अधिकारी है, क्योंकि उसका कर्मों में अधिकार है। उसकी ही बुद्धि इस योग्य है, जिसके द्वारा वह ब्रह्म का साक्षात्कार कर सकता है, अन्य प्राणियों को यह योग्य बुद्धि प्राप्त नहीं हुई है और न उनको कर्म में अधिकार ही प्राप्त है। वे प्रकृत प्रेरणाओं से यों ही यंत्रवत जीवन जीते हुए, भोग भार को वहन करते हुए मरते और जन्म ग्रहण करते रहते हैं। केवल मानव जीवन ही ऐसा अवसर है जिसमें मोक्ष के ध्येय का श्रेय प्राप्त किया जा सकता है। जो प्रमोद वश इस दुर्लभ अवसर को चूक जाता है और लक्ष्य प्राप्ति के लिए पुरुषार्थ न कर केवल विषय-भोगों में लिप्त रह इस कर्म-काल को भोग-काल में हठपूर्वक बदल लेते हैं ये पुनः जीवनान्त में अधोयोनियों में गिर कर एक अविज्ञात काल के लिए दुःख-रूप जन्म-मरण चक्र में फंस जाते हैं। इसलिए सावधानीपूर्वक इस मानव जन्म का पूरा एवं परम लाभ उठा लेना ही बुद्धिमानी है।
मनुष्य आनन्द-रूप ही है, किन्तु वह अपने इस वास्तविक स्वरूप से विमुक्त हो गया है। उसका यह रूप उसके युग-युगीन संस्कारों की आड़ में पड़ गया है जिसके कारण वह न तो उसे देख ही पा रहा है और न प्राप्त ही कर पा रहा है। अनन्त जन्मों के कुसंस्कारों के फलस्वरूप मनुष्य के मन में अगणित पाप वृत्तियाँ निवास किए रहती हैं जो मनुष्य को बलपूर्वक श्रेय पथ से खींच कर विपरीत दिशा में लगाती रहती हैं जिससे मनुष्य अपने सच्चे-स्वरूप अर्थात् शाश्वत सुख से वंचित रह जाता है। यह पाप वृत्तियाँ नष्ट हों, कुसंस्कार मिटें, अज्ञान का आवरण हटे तब कहीं मनुष्य अपने आनन्द-स्वरूप का साक्षात्कार कर सके।
बार-बार अकरणीय कर्म करने से मनुष्य की उसमें प्रवृत्ति बढ़ती रहती है, जिससे आगे चल कर उनका अभ्यास दृढ़ होकर संस्कारों का रूप धारण कर लेता है। मनुष्य के यह स्वकृत संस्कार बड़े भयानक होते हैं। इनसे छूट सकना एक दुस्तर कार्य हो जाता है। इस परेशानी को व्यक्त करते हुए एक बार दुर्योधन ने कहा था-
‘जानामि धर्मं न च में प्रवृत्तिर्जानाम्यधर्मं न च में निवृत्तिः।
केनापि देवेन हृदि स्थितेन यथा नियुक्तोऽस्मि तथा करोमि॥’
-धर्म क्या है यह मैं जानता हूँ तथापि उसमें मेरी प्रवृत्ति नहीं होती। अधर्म क्या है यह भी मैं जानता हूँ किन्तु उससे निवृत्त नहीं हो रहा हूँ। ऐसा जान होता है जैसे कोई देव मेरे हृदय में बैठा है और वह मुझे जिस प्रकार प्रेरित करता है वैसा ही मैं करता हूँ।
दुर्योधन ने हृदय में जिस देव का भ्रम किया था वह और कुछ नहीं पाप कर्मों का वह अभ्यास मात्र था जो कुसंस्कार बन कर प्रवृत्तियों का प्रेरक बन बैठा था और जो धर्माधर्म का ज्ञान होने पर दुर्योधन को बलात् ही पाप कर्म में लगाए रहता था।
अनन्त काल से दृढ़ हुई पाप वृत्तियाँ शीघ्र ही नष्ट हो जातीं। इन पर धीरे-धीरे सावधानीपूर्वक पुण्याचरण द्वारा ही विजय प्राप्त की जा सकती है। शाश्वत सुख के शुभेच्छु शिव संकल्पों का अवलम्बन लेकर सदाचरण द्वारा हृदय में संचित पाप प्रवृत्तियों पर बार-बार आघात करता हुआ अन्ततः उन पर विजय ही प्राप्त कर लेता है।
पाप कर्मों का परिणाम अकल्याणकारी होता है और पुण्य कर्मों का परिणाम कल्याणकारी इस सत्य को सभी जानते हैं, तथापि पाप कर्म में प्रवृत्त हो जाते हैं इसका कारण मनुष्य का अज्ञान ही है! मनुष्य के सारे व्यवहार ज्ञानाधीन ही रहा करते हैं। जिस विषय में जिस प्रकार का ज्ञान होगा, स्वभावतः व्यवहार भी वैसा! यदि मनुष्य को पाप-पुण्य का यथार्थ ज्ञान हो जाए तो निश्चय ही मनुष्य पापाचरण को छोड़कर पुण्याचरण में प्रवृत्त होने लगे। जब तक बाल्मीक को अपने कर्मों का यथार्थ ज्ञान नहीं था तब तक वे एक दस्यु बने रहे। हत्या तथा लूटपाट के कुकर्म में लगे रहे और वैसा करने में कोई दोष भी न समझते थे। किन्तु जब देवर्षि नारद की कृपा से उनका ज्ञान बदला और पाप-पुण्य का भेद समझ में आया, उनके कर्मों की धारा मुड़ गई जिसके परिणामस्वरूप वे पुण्य श्लोक महर्षि बन गए।
मनुष्य सुख चाहता है। उसकी सारी प्रवृत्तियाँ तथा कर्म उसी की प्राप्ति में लगे भी रहते हैं तब भी वह अपने वाँछित लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर पा रहा है। इसका कारण यही माना जा सकता है कि या तो वह अपने लक्ष्य को ठीक नहीं पहचानता है अथवा उसकी गतिविधि अनुकूल दिशा में नहीं चलती। बहुधा लोग विष योग भोग में होने वाली सुखानुभूति को ही वह सुख मान लेते हैं जिसकी उसे खोज है। जबकि वह सुख मिथ्या तथा परिणाम में दुःख कारक होते हैं। सुखों की श्रेणी तथा उनका परिणाम फल बतलाते हुए भगवान कृष्ण ने गीता में स्पष्ट कहा है-
“सुखं त्विदानीं त्रिविधं श्रुणु में भरतर्षभ।
अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति॥
यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम्।
तत्सुखं सात्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम्॥
विषयेन्द्रिय संभोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम्।
परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम्।
यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः।
निद्रालस्य प्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम्॥
हे भरत-श्रेष्ठ अर्जुन! अब तुम मुझसे सुख के तीन प्रकारों को सुनो- जिस सुख में साधक ध्यान और सेवा आदि के अभ्यास से रमण करता है और सुखों के अन्त को प्राप्त करता है, जो सुख पहले साधनाभ्यास के समय में विष समान अप्रिय विदित होता है, किन्तु परिणाम में अमृत तुल्य प्रिय तथा हितकारी होता है वह भगवत्-विषयक बुद्धि के प्रसाद उत्पन्न हुआ सुख सात्विक सुख है। जो सुख विष और इन्द्रियों के संभोग से उत्पन्न होता है, और जो पहले भोग-काल में अमृत के समान प्रिय लगता है, किन्तु जो परिणाम में विष-फल के समान दुःखदाई होता है-वह सुख राजस सुख है! किन्तु जो सुख आदि अन्त अर्थात् भोग काल और परिणाम दोनों में आत्मा में मोह उत्पन्न करने वाला होता है, वह निद्रा, आलस्य एवं प्रमाद से उत्पन्न होने वाला सुख तामस सुख है।
स्पष्ट है कि मनुष्य को जिस सुख की खोज है वह सुख सात्विक सुख ही है जो अक्षय तथा स्थायी है। जैसा कि भगवान ने अपने उपर्युक्त कथन में कहा है कि-सात्विक सुख की प्राप्ति साधना सेवा आदि से ही संभव है, तब उसको विषय भोग में खोजना निश्चय ही विपरीत दिशा में दौड़ने के समान ही है। किन्तु खेद का विषय है कि मनुष्य जो चाहता है उसकी ओर तो ध्यान देता नहीं किन्तु जिस दुःख को वह नहीं चाहता उसके लिए तत्परता से प्रयत्न किया करता है। निम्नांकित श्लोक में शास्त्रकार ने मनुष्य की इसी विपरीत बुद्धि का चित्रण किया है-
‘पुण्यस्य फलमिच्छन्ति पुण्यं नेच्छन्ति मानवाः।
न पाप फलमिच्छन्ति पापं कुर्वन्ति यत्नतः॥’
-मनुष्य पुण्य के फल (सुख) की तो कामना करते हैं किन्तु पुण्य कर्म करने की इच्छा नहीं करते। जिस पाप के फल दुःख को चाहते नहीं पर पाप कर्म प्रयत्नपूर्वक किया करते हैं।
सुख-दुःख के विषय में निःसंदेह मनुष्यों की यही स्थिति है। सुख पुण्य कर्मों का फल है उसकी प्राप्ति सुकृत के बिना संभव नहीं। सुख, शाश्वत सुख, जो भगवत्-विषयक तथा अहैतुकं हो, पुण्य कर्म करने से ही प्राप्त हो सकता है। इसके अतिरिक्त ऐसा कोई उपाय नहीं जिसके द्वारा वाँछित सुख पाया जा सके।
वास्तविक सुख की वाँछा रखने वालों को पाप कर्मों से विमुख होकर पुण्य कर्मों में ही प्रवृत्त होना चाहिए। अनेक लोग भजन-पूजन आदि को ही पुण्य कर्म मान लेते हैं। उनका विचार होता है कि दिन में कुछ देर भगवान का नाम जप लेने अथवा पूजा-उपहार कर देने मात्र से ही पुण्य लाभ हो जायेगा जिसके फलस्वरूप वे स्वर्ग आदि अथवा वैभव-विभूति के रूप में अक्षय सुख के अधिकारी बन जायेंगे। किन्तु उनका यह विचार मिथ्या है, भ्रमपूर्ण है। जप-तप, पूजा-पाठ के साथ जब तक मनुष्य सत्कर्मों तथा सदाचरण में निरत नहीं होगा उसका भगवत् विषयक कोई भी उपक्रम पुण्य रूप में फलीभूत नहीं हो सकता। पूजा-उपचार के बल पर जो अपने पापाचार का भोग दुःख दूर कर लेना चाहते हैं, भगवान की पूजा कर देने मात्र से उनका वह कर्म व्यर्थ हो जायेगा, उन्हें किसी प्रकार भी विचारवान नहीं कहा जा सकता। कितना ही पूजा-पाठ क्यों न किया जाए। पापाचरण का फल क्षमा नहीं किया जा सकता। दुःख रूप में उसका भोग तो करना ही होगा।
सुख की कामना रखते हुए भी लोग पाप-कर्म करते हैं और दुष्परिणाम दुःख को पाते हुए भी उससे विपरीत नहीं होते। इस विपरीतता का कारण यही समझ में आता है कि मनुष्य तात्कालिक लाभ की ओर ही अपना ध्यान केन्द्रित रखता है। इस बात की ओर ध्यान नहीं देता कि तात्कालिक लाभ को देखता हुआ जो असदाचरण कर रहा है उसका परिणाम विष के समान घातक होगा। अनुचित करते समय यदि मनुष्य अपनी दीर्घ दृष्टि से उसके परिणामों पर विचार कर ले तो निश्चय ही वह वैसा करने से बचता रहे। इस प्रकार दुःख से बच जाने पर सुख तो अपने आप अनुभूत होने लगेगा।
अज्ञान दोष से आज विषय सुख को ही वास्तविक सुख मान लिया गया है और उसे प्राप्त करने में सहायक साधनों को उचित अनुचित रूप से संचय किया जा रहा है जबकि अनुचित रूप से एकत्र किए हुए लौकिक सुख-साधन भी दुःख का कारण होते हैं। जहाँ तक लौकिक साधनों से प्राप्त होने वाले सुख का प्रश्न है-यदि इन्हें समुचित उपायों द्वारा पापाचरण से दूर रह कर संचय किया जाए तो भी वह किसी सीमा तक संतोष दें सकते हैं। किन्तु खेद है कि लोग ऐसा करने तक का ध्यान नहीं देते। फलस्वरूप साधनों की सुविधा में दुःख का भोग करते रहते हैं। क्या लौकिक और क्या पारमार्थिक किसी भी सुख के लिए पापाचरण से बच कर भागवत् भाव से सत्कर्माचरण में ही प्रवृत्त होना होगा। इसी से कुसंस्कारों का अभ्यास नष्ट होगा, अपने वास्तविक आनन्द-स्वरूप का आभास होगा अक्षय सुख का लक्ष्य प्राप्त होगा और अन्त में मोक्ष पद का अधिकार मिलेगा।
छात्रों द्वारा बूट पालिश-
रतलाम (म.प्र.)। रचनात्मक कार्यों में श्रद्धा व लगन हो तो सफलता मिलना स्वाभाविक है। इस बात का एक अच्छा उदाहरण यहाँ की ‘विद्यार्थी मोर्चा’ नामक संस्था ने प्रस्तुत किया है।
विगत दिनों से यहाँ के महाविद्यालय में नवीन विषय में एम. ए. की कक्षा ¹लवाने के लिए उक्त संस्था प्रयत्नशील हुई। इसके लिए विद्यार्थियों ने प्रशासन से सहायता की माँग तो की पर उन्होंने शासन का ही मुँह ताकना उचित नहीं समझा। स्वावलम्बन की शक्ति पर भरोसा र¹ कर छात्रों ने ‘बूट पालिश’ अभियान चला कर विद्यालय की आर्थिक दशा सुधारने का संकल्प लिया है। इससे जल्दी ही एम.ए. की कक्षा ¹ल जाने की संभावना है।
‘विपर्यय’ संसार का स्वाभाविक नियम है। दो विपरीत भावों को लेकर इसकी रचना की गई है। रात-दिन, आलोक-अंधकार, धूप-छाँह, उदय-अस्त, जीवन-मरण, परिश्रम-विश्राम, निद्रा और जागरण एक अनादि, अविच्छिन्न क्रम का दूसरा नाम ही संसार है। जिस प्रकार संसार इस प्रतिभावात्मक क्रम के अंतर्गत गतिशील है, उसी प्रकार इसका परिणाम भी प्रतिभावात्मक ही है। सुख और दुःख संसार के केवल मात्र दो फल हैं। विविध रूपों और प्रकारों से प्रत्येक प्राणी इन फलों का स्वाद लेता हुआ जीवन यापन कर रहा है।
यद्यपि सुख और दुःख संसार के दो फल है तथापि देखने में यही आता है कि अधिकतर लोग दुःखपूर्ण जीवन ही व्यतीत कर रहे हैं। हजारों में कदाचित हो कोई एक व्यक्ति ऐसा मिले, जो वास्तविक रूप में सुखी कहा जा सके। संसार में सुख होते हुए भी मनुष्य जो उससे वंचित दीखता है, उसका प्रमुख कारण उसकी अपनी मानसिक कमजोरी है। बाह्य परिस्थितियाँ मनुष्य को उतना परेशान नहीं करती जितना कि वह अपनी आन्तरिक दुर्बलता से दुःखी और व्यग्र होता है।
सुख-दुःख का अपना कोई स्थायी अस्तित्व नहीं है। इनका उदय एक-दूसरे के अभाव में ही होता है और इन दोनों का उदय-स्थल मनुष्य का मन है। जिस समय मन प्रसन्न और प्रफुल्ल होता है, संसार में चारों ओर सुख-ही-सुख दिखाई देता है। इसके विपरीत जब मन विषाद और निराशा से घिरा होता है तो हर दिशा में दुःख के ही दर्शन होते हैं।
अस्तु, दुःख से बचने के लिये मन को सदा प्रसन्न, प्रफुल्ल, उत्साह और आशापूर्ण बनाये रखना आवश्यक है। प्रत्येक अनुभूति का मूल केन्द्र ‘मन’ जितना ही अधिक सबल सशक्त होगा मनुष्य उतना ही सुखी और सन्तुष्ट रहेगा।
यदि अनुपात लगाकर देखा जाये तो ज्ञात होगा कि सुख की अपेक्षा मनुष्य दुःख ही अधिक भोग रहा है। इसका कारण यह नहीं है कि संसार में सुख की अपेक्षा दुःख अधिक है, बल्कि इसका कारण यह है कि मनुष्य ने अपनी दशा को दुःख के अनुकूल बना लिया है।
साँसारिक क्रम के अनुसार मनुष्य पर परेशानियों, कठिनाइयों और मुसीबतों का आना कोई अचम्भे की बात नहीं है। परेशान करने वाली परिस्थितियाँ सबके सम्मुख आती हैं और सभी को उनसे निपटना पड़ता है। अब यह एक भिन्न बात है कि कोई आई हुई विपत्ति पर विजय पा लेता है और कोई उनसे दबकर कष्टपूर्ण जीवन व्यतीत करता रहता है।
आई हुई विपत्तियों को अपने पर हावी न होने देकर जो शाँत चित्त और स्थिर बुद्धि से उनके निराकरण का प्रयत्न करता है, वह शीघ्र ही उन्हें दूर भगा देता है। किन्तु जो व्यक्ति किसी विपत्ति की संभावना अथवा उसके आने पर घबराकर अशाँत और उद्विग्न हो उठता है तो उसका सारा जीवन ही कटुतापूर्ण हो जाता है।
अशाँत और उद्विग्न रहने वाले व्यक्ति के भाग्य से जीवन के सारे सुख उठ जाते हैं। उसके विकास और उन्नति की सारी संभावनायें नष्ट हो जाती हैं। निराशा और विषाद उसे रोग की तरह घेर लेते हैं। न उसे भोजन भाता है और न नींद आती है। जरा-जरा सी बात पर कुढ़ता, चिढ़ता और खीजता है। बड़ी-बड़ी अप्रिय एवं अस्वास्थ्यकर कुँठाओं से उसका हृदय भरा रहता है।
अनेक वैज्ञानिक प्रयोगों से यह सिद्ध हो चुका है कि मानसिक अशाँति मनुष्य के स्नायु संस्थान पर अनुचित बोझ डालकर उसे निर्बल बना देती है, जिससे विश्राम करने की अवस्था में भी उसे आराम नहीं मिलता। चिन्तित एवं उद्विग्नचित व्यक्ति गहरी नींद न आने के कारण जब सोकर उठता है, तो ताजगी और स्फूर्ति के स्थान पर भारी थकान अनुभव करता है। घण्टों तक उसका शरीर उसके कब्जे में ही नहीं आता। आलस्य, शैथिल्य एवं निर्बलता आदि उसको बुरी तरह से दबाये रहते हैं। इस प्रकार कष्टपूर्ण दिन बिताने के कारण उसका स्वास्थ्य नष्ट हो जाता है और आयु घट जाती है। मानसिक अशाँति को मानव-जीवन का जीता-जागता नरक ही कहना चाहिए।
जिस प्रकार शरीर में ताप की अधिकता हो जाने से ‘ज्वर’ नामक रोग हो जाता है उसी प्रकार अधिक चिंतित और उद्विग्न रहने वाले व्यक्ति को अशाँति और एवं चिन्ता का मानसिक रोग उत्पन्न हो जाता है। मानसिक अशाँति एक ऐसा आँतरिक आँदोलन है, जिसके उठने से मनुष्य के सारे विवेक, विचार एवं ज्ञान नष्ट हो जाते हैं। उसकी बुद्धि असन्तुलित हो जाती है, जिसके फलस्वरूप वह अशाँति के कारणों का निराकरण कर सकने में सर्वथा असमर्थ रहता है और यदि उद्विग्न अवस्था में कोई उल्टे-सीधे प्रयत्न करता भी है तो उसके परिणाम उल्टे ही निकलते हैं। एक आपत्ति से छूटकर दूसरी में पड़ जाना, विषाद से छूटकर निराश हो उठना, क्रोध से छूटकर शोक और शोक से छूटकर भय के वशीभूत हो जाने का एक क्रम-सा बन जाता है। मानसिक असन्तुलन एक प्रकार की विक्षिप्तता हो होती है, जिसमें फंसकर मनुष्य किसी योग्य नहीं रहता। हर समय दुःखी, चिन्तित और परेशान रहना उसके जीवन क्रम का एक विशिष्ट अंग बन जाता है।
कोई कठिनाई अथवा आपत्ति अपने में उतनी भयंकर नहीं होती जितना कि उसे उसकी मानसिक अशाँति जटिल और दुरूह बना देती है। आपत्तियों से छूटने का उपाय चिन्ता, भय, निराशा, आशंका आदि की प्रतिगामी भावना नहीं है बल्कि साहस, धैर्य और उत्साह की वृत्तियाँ ही होती है।
मानसिक अशाँति मनुष्य के शरीर में एक भयंकर उत्तेजना में रहने वाले व्यक्ति के रक्त में विषय का प्रभाव हो जाता है, जो रक्त के क्षार को नष्ट करके गठिया, यक्ष्मा आदि भयंकर रोगों में प्रकट होता है।
मानसिक अशाँति एक भयंकर आपत्ति है। मनुष्य को हर संभव उपाय से इससे बचते रहने का प्रयत्न करना चाहिए। विपत्तियों से घबराने, भयभीत होने, उनसे भागने अथवा उन्हें लेकर चिन्तित होने से आज तक कोई व्यक्ति छुटकारा न पा सका है। बहुधा देखा जाता है कि जो जितना अधिक चिन्तित और अशाँत रहता है, वह और अधिक विपत्ति में फंसता है। इसके विपरीत जो शाँतचित्त, सन्तुलित मन और स्थिर बुद्धि से उनका सामना करता है, परेशानी उसका कुछ भी बिगाड़ नहीं पाती। विपत्ति आने पर मनुष्य अपनी जितनी शक्ति को उद्विग्न और अशाँत रहकर नष्ट कर देता है, उसका एक अंश भी यदि वह शाँत चित्त रहकर कष्टों को दूर करने में व्यय करे तो शीघ्र ही मुक्त हो सकता है।
आपत्तियों के आने पर घबराना नहीं चाहिए बल्कि धैर्यपूर्वक उनको हटाने का उपाय करना चाहिए। अधिकतर लोग कठिनाइयों को पार करने का मार्ग निकालने के बजाय अपनी सारी क्षमताओं का व्यग्र और विकल होकर नष्ट कर देते हैं। किंकर्तव्यविमूढ़ बनकर ‘क्या करें’, ‘कहाँ जायें’, ‘कैसे बचें’ आदि विर्तकना करते हुए बैठे रहते हैं, जिससे आई हुई विपत्ति भी सौगुनी होकर उन्हें दबा लेती है।
जीवन में जो भी दुःख-सुख आए उसे धैर्यपूर्वक तटस्थ भाव से सहन करना चाहिए। क्या सुख और क्या दुःख दोनों को अपने ऊपर से ऐसे गुजर जाने देना चाहिए जैसे वे कोई राहगीर हैं, जिनसे अपना कोई संबंध नहीं।
मनुष्य की मानसिक शाँति और बौद्धिक सन्तुलन दो अमोघ शक्तियाँ है, जिनके बल पर विकट-से-विकट परिस्थिति का भी सामना किया जा सकता है। विपत्तियाँ आती हैं और चली जाती हैं, परिस्थितियाँ बदल जाती हैं। किन्तु जो व्यक्ति इनका प्रभाव ग्रहण कर लेता है वह मानसिक अशाँति के रूप में आजीवन बनाये रहता है और ऐसे मनुष्य के लिए प्रतिकूल परिस्थितियाँ भी प्रतिकूल फल ही उत्पन्न करती हैं। इस तरह न केवल दुःख अपितु सुख की अवस्था में भी वह दुःखी रहता है।
जीवन को सुखी और सन्तुष्ट बनाये रखने के लिए मनुष्य को चाहिए कि प्रत्येक अवस्था में अपनी मानसिक शाँति को भंग न होने दें, इसकी उपस्थिति में सुख और अभाव में दुःख की वृद्धि होती है।
विकास की पृष्ठ भूमिका-जिज्ञासा
पाश्चात्य देश पिछली शताब्दी से विज्ञान में तेजी से प्रगति करते जा रहे हैं। हजारों प्रकार के ऐसे उपकरणों का तत्वों का, उन्होंने अन्वेषण किया है जो आज लोगों को बड़े आश्चर्य के रूप में दिखाई दें रहे हैं। विज्ञान की उन्नति ने ही इन देशों को धन और साधन सम्पन्न बना दिया है। इसका श्रेय किसी देवी शक्ति को न देकर उन लोगों की सूझ-बूझ को देना ही उचित लगता है।
उन्होंने इतनी उन्नति कर ली और हम अभी निम्न श्रेणी में ही पड़े हैं यह एक प्रश्न है जो हमें बार-बार कारण की खोज करने को विवश करता है। हमारे देश में प्राकृतिक साधनों की कोई कमी नहीं, मनुष्यों का अभाव भी नहीं है। लोग चाहें तो अपनी वर्तमान स्थिति से ऊंचे उठ कर स्वयं भी उस वैज्ञानिक प्रगति और धन सम्पन्नता की श्रेणी में पहुँच सकते हैं जो पाश्चात्य देशों को उपलब्ध है। किन्तु कुछ कमी है जो हमारी प्रगति में बाधक है और हमें वर्तमान स्थिति से ऊंचे नहीं उठने देती है।
वैज्ञानिक प्रगति पाश्चात्य देशों की विरासत नहीं है। भारतवर्ष किसी समय उसकी पराकाष्ठा तक पहुँचा था, इससे यह स्पष्ट है कि कोई भी देश इस क्षेत्र में ऊंचे न उठ पाने के लिए प्रतिबंधित नहीं है। ज्ञान हो तो एक से एक बढ़कर आविष्कार और अन्वेषण यहाँ भी किए जा सकते हैं और हर तरह की भौतिक समृद्धि को प्राप्त किया जा सकता है। ऐसी चेष्टा करना धर्म की दृष्टि से भी कुछ बुरा नहीं है। भौतिक समुन्नति भी अध्यात्म का ही एक अंग है। हमारा आर्ष इतिहास यह बताता है कि जिन दिनों यहाँ धर्म-तत्व का जागरण पूर्णता की स्थिति में था उन दिनों भौतिक दृष्टि से भी यह देश आज के अमेरिका, ब्रिटेन आदि से भी बढ़-चढ़ कर था। परिष्कृत अध्यात्म का लक्षण है भौतिक समृद्धि। धर्म और उसके बिना अधूरा है। साधनों के अभाव में अध्यात्म फल-फूल भी तो नहीं सकता।
जब कोई देश नया आविष्कार करता है तो उस पर हमें भी कम कौतूहल नहीं होता। रेडियो, टेलीविजन, परमाणु शक्ति, ऊर्जा-शक्ति, चन्द्रमा की ओर प्रयाण आदि अनेकों बातें जब हमारे सामने आती हैं तो बड़ा आश्चर्य होता है, कौतुहल पैदा होता है। किन्तु हमारा कौतूहल बाह्य मात्र है। हम केवल कहने-सुनने तक सीमित है। किसी वस्तु के प्रति आश्चर्य प्रकट कर देने मात्र से वैज्ञानिक प्रगति की आवश्यकता पूरी नहीं होती, हमारा कौतुहल दरअसल आन्तरिक होना चाहिए तभी सच्चे ज्ञान, आविष्कार और भौतिक समृद्धि की दिशा में अग्रसर हुआ जा सकता है। कोरी शाब्दिक अभ्यर्थना किसी काम की नहीं होती। किसी वस्तु का ज्ञान प्राप्त करने के लिए आन्तरिक कौतुहल आवश्यक है। उस वस्तु की तह तक पहुँच कर सारी जानकारी प्राप्त कर लेना अधिक महत्वपूर्ण होता है।
वैज्ञानिक विकास का पूर्व इतिहास यह है कि लोगों के मन में यथार्थ के प्रति जिज्ञासा पैदा हुई। इससे वस्तुविश्लेषण की प्रक्रिया चल पड़ी। इस प्रकार का एनालिसिस जितना बढ़ा उतना ही यथार्थ की शक्ति और दक्षता का ज्ञान होता गया और उस बढ़े हुए ज्ञान के कारण तरह-तरह के आविष्कार हुए। आविष्कार परिणाम है, जिज्ञासा या आन्तरिक कौतूहल इसका जन्मदाता। वस्तु के प्रति आश्चर्य का भाव पैदा न होता तो परमाणु शक्ति का पता भी नहीं चला होता और आज के बढ़ते हुए वैज्ञानिक आविष्कारों का कहीं नाम-निशान भी न होता।
ताप, चुम्बक, विद्युत, शब्द और पदार्थ के अनेक सूक्ष्मतम रहस्यों का ज्ञान और उन सिद्धान्तों के आधार पर वैज्ञानिक यंत्रों का निर्माण तभी संभव हुआ जब लोगों ने वस्तु के रहस्य को जानने का प्रयत्न किया और तभी वे इतनी उन्नति कर सके।
पाश्चात्य देशों के लिए यह कोई नई बात नहीं है। ऋषियों का जीवन इन ¹ोजों में इतना रत्त रहता है कि उन्हें सुखी और सुविधाओं में भी कटौती कर समय निकालना पड़ता था। ¹ने की चिन्ता से मुक्ति होने के लिए ऋषि पीपल के फलों पर, ¹तों पर गिरे हुए अन्न के दानों पर ही अवलम्बित रह जाते थे और तत्परतापूर्वक ज्ञान की शोध में लगे रहते थे। ‘वेद’ का प्रादुर्भाव कोई सामान्य घटना नहीं है। उनमें विश्व का गूढ़तम दर्शन और विज्ञान भरा रहता है उन्हें कोई व्यक्ति एक अंश में भी जान जाए तो अतुलित शक्ति, शौर्य और साधनों का स्वामी बन जाए। इतनी बड़ी ¹ोज यों ही नहीं हो गई। ऋषियों ने जीवन दर्शन और प्रकृति को बहुत बड़े आश्चर्य के रूप में दें इसी से प्रेरित होकर वे ‘वेद’ की शोध कर सके।
मानव-जीवन चूँकि बहुत अधिक मात्रा में इस पृथ्वी पर बिखरा पड़ा है इसलिए उसके प्रति लोगों में आश्चर्य का भाव नहीं है। शारीरिक तृष्णायें, लालसायें, ऐषणायें भी इस मार्ग में बाधक हैं। मानव जीवन की विपुलता और इच्छाओं, लालसाओं में व्यस्त रहने के कारण मनुष्य आत्म-रहस्य जानने को भी तत्पर नहीं होता इसलिए वह अपने आप में भी एक पहेली बना हुआ है। उसके प्रत्येक क्रिया-कलाप में भ्रम है, भूल है, अनात्मिकता है। यह सब इसीलिए ही है कि लोगों में अपने वास्तविक स्वरूप के प्रति कौतूहल का भाव नहीं है। भौतिक पदार्थों के प्रति कौतूहल से जो विज्ञान बना उससे भौतिक समृद्धि हुई। जो आत्म-ज्ञान से शक्तियों का प्रकाश होता है उसे आध्यात्मिक बल समुत्पन्न होता है। इस स्थिति में पहुँच कर ही मानव जीवन का लक्ष्य पूरा होना बताया जाता है। पर इन दोनों ही स्थितियों के लिए जन-मानस में जिज्ञासा का प्रवेश होना आवश्यक है। मनुष्य की भावनाओं में ज्ञान और विकास की भूख मिटती है तो वह बिलकुल आलसी, आशक्त, दीन-हीन एवं क्लेशपूर्ण परिस्थिति में गिर जाता है। उन्नति के द्वार बन्द हो जाते हैं और वह मनुष्य जीवन के उद्देश्य से च्युत हो जाता है। उनकी प्रवृत्तियाँ अधोगामी हो जाती हैं और वे सब प्रकार के विकास से वंचित रह जाते हैं।
आज इस देश की स्थिति ठीक ऐसी ही है। भौतिक पदार्थों के प्रति उनकी जिज्ञासा का प्रभाव यह है कि हमारी भौतिक समृद्धि अवरुद्ध है और स्थूल देह में परामष्ट प्राण के प्रति कौतूहल नहीं है इसलिए अध्यात्म ज्ञान का एक महत्वपूर्ण अध्याय अन्धकार में पड़ा है। लोग जिस स्थिति में हैं उससे तनिक भी आगे बढ़ने की इच्छा नहीं करते। ज्ञान के क्षेत्र में जो कठिनाइयाँ उठानी पड़ती हैं, शोध के लिए जो साँसारिक वासनाओं को मारना पड़ता है उससे लोग डरते से रहते हैं। इसलिए हमारी विकास की प्रक्रिया अधमुँदी पड़ी। राष्ट्र का आविष्कृत ज्ञान भी इसीलिए प्रभावशील होते हुए भी निष्क्रिय-सा अनुपयोगी-सा पड़ा हुआ है।
अब जब हम विकास के लिए अग्रसर हो रहे हैं तो आध्यात्मिक तथा भौतिक दोनों क्षेत्रों में हमारी जिज्ञासायें समान रूप से जागृत होनी चाहिए। जब तक किसी वस्तु के प्रति सच्चे हृदय से आकर्षित नहीं होते तब तक उसका संपूर्ण ज्ञान प्राप्त करना संभव नहीं हो पाता पर जिस वस्तु में रुचि होती है उसके उन पहलुओं पर हमारा मन, हमारी कल्पनायें दौड़ती हैं और उससे संबंधित सारी जानकारी हमें उपलब्ध करा देती हैं। बढ़े हुए ज्ञान का उपयोग किसी भी दिशा में किया जा सकता है। आत्मिक ज्ञान की अधिकता से सद्गुणों का और आन्तरिक सुख का अभाव दूर होता है उसी तरह भौतिक ज्ञान की अधिकता से साधनों का लाभ प्राप्त होता है और साँसारिक सुविधायें उपलब्ध होती हैं। यह निश्चित है कि ज्ञान ही मनुष्य के विकास का मूल तत्व है और जागरण के लिए जिज्ञासा आवश्यक है।
यह बात हमें पाश्चात्य वैज्ञानिकों और अपने ऋषियों के दर्शन-समन्वय से पूर्णतया स्पष्ट हो जाती है कि किसी भी क्षेत्र में समुन्नति के लिए उसका सम्यक्-ज्ञान होना आवश्यक है।
हम उस भौतिक और अध्यात्मिक समृद्धि की ओर अग्रसर होने की इच्छा रखते हों तो हमें भी प्रत्येक वस्तु को पूर्ण मनोभावना के साथ देखना और विवेचन करना होगा। उसके लिए जो तल्लीनता और तत्परता अपेक्षित है वह जुटानी पड़ेगी तभी हम उस स्थिति को प्राप्त कर सकते हैं जिसके कारण भारतवर्ष ने सर्वांगीण उन्नति की थी।
शक्ति ही सारी समृद्धियों का आधार है। भूमि से अन्न उपजाने से लेकर वैज्ञानिक अन्वेषणों तक की सारी सफलता शक्ति पर ही निर्भर है। किसी भी सफलता का अर्जन करने के लिए शक्ति की आवश्यकता है। फिर वह चाहे शारीरिक शक्ति हो अथवा मानसिक, बौद्धिक, आध्यात्मिक।
शक्ति का अभाव एक प्रकार की निर्जीवता है। निर्बल व्यक्ति जीवन में कोई सफलता पा सकना तो दूर, सामान्य जीवन भी शाँति एवं सन्तोषपूर्वक यापन नहीं कर सकता है। निर्बल व्यक्ति भले ही उसे किसी की ओर से कोई खतरा न हो, अपनी स्वयं की न्यूनता के कारण सबसे डरा-डरा रहता है। दैत्य एवं दरिद्रता निर्बलता के निश्चित फल हैं। इस दयनीय स्थिति में कोई सुख-शाँतिपूर्वक रह सकता है- ऐसा नहीं माना जा सकता। परिश्रम एवं पुरुषार्थ के आधार पर मिलने वाले मीठे फलों का अधिकारी वही है, जो शक्तिमान है।
जहाँ एक ओर शक्तिमान व्यक्ति एक के बाद दूसरा कदम बढ़ाता जाता है, एक लक्ष्य के बाद दूसरा लक्ष्य प्राप्त करता जाता है, वहाँ निर्बल व्यक्ति दिन-प्रतिदिन अपनी स्थिति से नीचे गिरता जाता है। शक्तिमान व्यक्ति जिन-जिन समृद्धियों तथा परिणामों को अपने बल पर अर्जित कर विश्व में श्रेय एवं श्रेष्ठता के भागी बनते हैं, उनको पाना तो दूर निर्बल व्यक्ति उनकी कल्पना तक भी नहीं कर सकता। आपत्तियों का आगमन जहाँ शक्तिशाली व्यक्ति के लिए चेतना एवं प्रयत्न की एक चुनौती होती है व हर्ष, उल्लास एवं विजयश्री का एक अवसर होता है, वहाँ वहीं परिस्थिति निर्बल व्यक्ति के लिए भय, पलायन, पराजय, आँसू और कराह का कारण होती है। निर्बलता जहाँ मनुष्यता को अभिशाप की तरह अधोगति की ओर ले जाती है- शक्ति वरदान की भाँति उसे ऊर्ध्वगामी बनाती है।
समृद्धि एवं सुख-संतोष का आधार होने से शक्ति मनुष्य से लेकर कीट-पतंग तक प्रत्येक प्राणी को स्पृहणीय है। शक्ति के प्रति अनुराग कोई आरोपित भावना नहीं है। वह स्वाभाविक है, जन्मजात है। किसी में शक्तिमान बनने की इच्छा जगानी नहीं पड़ती। चेतना पाते ही प्राणी शक्ति का सुख और निर्बलता के कष्टों को आप-से-आप अनुभव करने लगता है। मनुष्य ज्यों-ज्यों विकास की ओर अग्रसर होता है, शक्ति के प्रति उसका अनुराग बढ़ता जाता है। वह आज जितना शक्तिशाली है, कल उससे अधिक बनना चाहता है, जिस प्रकार शक्ति के प्रति मनुष्य के अनुराग की इति नहीं है, उसी प्रकार शक्ति की भी सीमा नहीं है। दो हाथ, दो पैरों वाला यह छोटा सा मानव कितना शक्तिशाली हो सकता है? इसके साक्षी उसके कर्त्तव्य हैं, जिनको देख-सुनकर चकित रह जाना पड़ता है। जिस प्रकार शक्ति अपार है, उसी प्रकार मनुष्य की पात्रता भी। किन्तु यह पात्रता यों ही प्राप्त नहीं हो जाती उसके लिए प्रयत्न एवं पुरुषार्थ करना पड़ता है, साधना एवं तपस्या करनी पड़ती है। कोई भी मनुष्य जो कि अपने त्याग, तपस्या तथा प्रयत्न द्वारा शक्ति का जिस मात्रा में मूल्य चुका सकता है, कितना ही निर्बल होने पर भी वह उसी अनुपात से शक्तिशाली बन सकता है।
शक्ति स्पृहणीय है। अपनी, अपनी बुद्धि एवं परिस्थिति के अनुसार उसे संग्रह करने का प्रयत्न भी करते हैं। कोई एक बड़ी सीमा तक हृष्ट-पुष्ट होकर शारीरिक शक्ति जमा करना चाहते हैं। कोई अथक अनुभव तथा चिन्तन-मनन द्वारा बौद्धिक शक्ति का संचय करना चाहते हैं। किन्हीं लोगों का प्रयत्न रहता है कि वे अधिक धन जमा करके अपनी शक्ति का सिक्का जमा सकें। कुछ लोग पद और कुछ लोकप्रियता के द्वारा शक्तिमान बनने के लिए अभ्यास किया करते हैं। अनेक विवेकशील व्यक्ति ऐसे भी होते हैं, जो इन सब शक्तियों की शिरमौर चारित्रिक, नैतिक अथवा आध्यात्मिक शक्ति का संग्रह करने के लिये प्रयत्न किया करते हैं। तात्पर्य यह है कि सभी व्यक्ति किसी-न-किसी रूप में शक्ति पाना और शक्तिशाली बनना चाहते हैं।
जिस प्रकार शक्ति सारी समृद्धियों का आधार है, उसी प्रकार शक्ति का मूल स्रोत ज्ञान है। ज्ञान के अभाव में शक्ति एवं अशक्तता में कोई अन्तर नहीं रह जाता। जो अशक्त है और शक्ति चाहता है- उसे शक्ति की प्राप्ति केवल चाह के आधार पर ही तो नहीं हो सकती। उसके लिए प्रयत्न करना होगा। प्रयत्न के लिये उसकी दिशा, उसका प्रकार और शक्ति का स्वरूप जानना बहुत आवश्यक है। जब तक मनुष्य को यह ज्ञान न होगा कि वह निर्बल है, उसकी निर्बलता का कारण क्या है, उनके निराकरण के क्या उपाय हैं? उनकी साधना की क्या दिशा है, उसे किस प्रकार की शक्ति श्रेयस्कर है और उसकी पात्रता तथा परिस्थितियाँ शक्ति के किस रूप के योग्य, अनुकूल अथवा अनुरूप हैं, तब तक वह किस प्रकार की शक्ति को लक्ष्य बनाकर उसे प्राप्त करने के लिए उद्योगवान हो सकता है? इस प्रकार अपनी निर्बलता को दूर करने और शक्तिसंचय करने के लिये ज्ञान की नितान्त आवश्यकता है।
शक्ति, निश्चय ही सुख-शाँति का कारण है, समृद्धि का हेतु है। किन्तु कब? जब उसका सदुपयोग हो। निरुपयोगी शक्ति किसी प्रकार की समृद्धि का सम्पादन नहीं कर सकती। ठीक उसी प्रकार, जिस प्रकार निष्कृषित धरती की उर्वरा शक्ति कोई उपज प्रदान नहीं कर सकती। सदुपयोग के अभाव में मनुष्य की सारी शक्तियाँ मूर्छित पड़ी रहती हैं। उसके आधार पर सुख-सम्पत्ति पाने के लिए उनका उपयुक्त होना निताँत आवश्यक है। शक्ति का उपयोग करने के लिए ज्ञान की आवश्यकता है। ज्ञान के अभाव में शक्ति का उपयोग किसी प्रकार भी नहीं किया जा सकता। शरीर में शक्ति भरी है, सामने क्षेत्र और साधन उपस्थित हैं, किन्तु जब तक उनके प्रयोग का ज्ञान न होगा शक्ति का उपयोग किस प्रकार किया जा सकता है? इस प्रकार की वह शक्ति अशक्ति ही मानी जायेगी। उपयोग अथवा प्रयोग के अभाव में शक्ति का होना, न होना एक बराबर है।
शक्ति के समुचित प्रयोग का ज्ञान न रखने वाले बड़े-बड़े शक्तिशाली बात-की-बात में असफल एवं अपदस्थ होते देखे जाते हैं। बड़े-बड़े अतिकाय पहलवान जिनके शरीर में प्रचुर शक्ति होती है, प्रयोग ज्ञान के अभाव में अपेक्षाकृत दक्ष प्रतियोगी द्वारा बात-की-बात में चित्त कर दिये जाते हैं। बड़े-बड़े प्रतिभाशाली और प्रभाववान व्यक्ति साधारणजनों से पीछे पड़ जाते हैं। प्रचण्ड शक्ति के स्वामी होने पर अदक्ष सेनापति छोटे-छोटे मोर्चों पर मात खा जाते हैं। असफलता एवं पराजय निर्बलता की द्योतक है। शक्ति होते हुए भी उसके उपयोग के ज्ञान के रहित होने के कारण शक्तिवानों को अशक्तता का कलंक ओढ़ना पड़ता है।
शेर, चीते, हाथी, घोड़े, बैल, भालू आदि मनुष्य की अपेक्षा कहीं अधिक बलवान होते हैं किन्तु मूढ़ता के कारण उनकी शक्ति मनुष्य के सम्मुख निष्क्रिय हो जाती है। अपेक्षाकृत कम शक्तिशाली होने पर भी मनुष्य उन्हें अपने वश में कर लेता है और अपने ज्ञान के बल पर उनकी शक्ति का उपयोग कर बड़े-बड़े काम बना लेता है जबकि अज्ञान के कारण वे जानवर अपनी शक्ति का कोई लाभ नहीं उठा पाते। ज्ञान न होने से एक छोटी-सी आपत्ति अथवा आशंका आ जाने से यह प्राणी व्यग्र एवं भयभीत होकर धीरज खो देते और भागने की कोशिश करते हैं। आग, पानी, आँधी, तूफान के अवसर पर इन्हें चीखने और चिल्लाने के सिवाय कुछ नहीं सूझता। उनकी शक्ति, ज्ञान के अभाव में उनके किसी काम नहीं आती। ज्ञान के अभाव में शक्ति का कोई अस्तित्व नहीं। हवा, पानी आग आदि तत्व विशुद्ध शक्तिरूप ही हैं किन्तु जड़ होने से उनकी अपनी कोई महत्ता नहीं है। उनकी महत्ता तभी स्थापित होती है जबकि उनके साथ मनुष्य के ज्ञान का संयोग होता हो।
ज्ञान शक्ति का सारथी ही नहीं, स्वयं ही शक्ति है। प्रागैतिहासिक काल में मनुष्य का ज्ञान नगण्य था, जिससे वह प्रकृति की छोटी-मोटी शक्तियों तथा पदार्थों से भय खाता था। उसकी किसी भी अबूझ प्रक्रिया को अलौकिक घटना समझकर उसके प्रति अवनत होकर पूजा करने लगता है। अंधकार, बातूल, आँधी, पेड़-पौधे, पत्थर, पहाड़, धूप-छाँह, गर्त, गह्वर, नदी, नालों आदि न जाने कितनी चीजों के प्रति वह उनकी उपयोगिता अथवा अपनी आध्यात्मिकता के कारण भयजन्य श्रद्धा समर्पित कर पूजा एवं प्रतिष्ठा प्रदान किया करता था। पशु-पक्षियों से ही नहीं अपने जैसे मानवों से भीत रहकर भागा करता था। अज्ञान के कारण सब प्रकार शक्तिमान तथा स्वाधीन होने पर भी उपयोग न कर पाता था और हर प्रकार से अशक्त बना हुआ भयभीत बना रहता था।
पर ज्यों-ज्यों उसने अज्ञान से ज्ञान की ओर प्रगति की, उसका भय दूर होता चला गया और उसमें आत्मशक्ति, आत्म-विश्वास एवं आत्माधार की भावना दृढ़ होती चली गई। पहले जिस प्रकृति की साधारण प्रक्रियाओं से उसे भय लगता था, आज उसी प्रकृति पर विजय स्थापित करता चला जा रहा है। ज्ञान-शक्ति के बल पर उसने न केवल प्रकृति के रहस्यों को जाना बल्कि उसकी शक्तियों पर अधिकार स्थापित कर लिया है। जो मनुष्य पहले जल की एक लहर के प्रति भय से अवनत हो जाता था, वह आज ईति भीति जैसी आपत्तियों को ज्ञान-बल के बंधन लगाने में समर्थ हो गया। स्थल, जल तथा वायु पर अधिकार करने के बाद अब वह बाह्य अन्तरिक्ष में अपनी विजय-पताका फहराने का प्रयत्न कर रहा है। जरा-जरा सी बातों से भयभीत होने वाला वही दो हाथ-पैरों वाला मानव अपनी उन्हीं शक्तियों के आधार पर, जो सदा ही उसमें निहित रही हैं, आज जो चमत्कार कर रहा है वह किसी से छिपा नहीं है। ज्ञान का उदय होते ही उसकी सारी निर्बलता, दीनता, दयनीयता तथा निरुपायता बन्द हो गई है और वह इस सृष्टि का सर्व शक्ति-सम्पन्न प्राणी बन गया है।
कला, विज्ञान, सभ्यता, संस्कृति, भाषा, साहित्य आदि क्षेत्रों में ही उसने प्रगति नहीं की बल्कि मानव-मस्तिष्क से लेकर आत्मा तक की खोज कर उस दिशा में आश्चर्यजनक प्रगति की है। उसकी इस चमत्कारी शक्ति का आधार ज्ञान के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। मनुष्य को जीवन के विकास, सुख, समृद्धि तथा आत्मोन्नति के लिए शक्ति और शक्ति के लिए ज्ञान का सम्पादन करना चाहिए।
किन्तु सच्चा ज्ञान और वास्तविक शक्ति वही है जो मानव-कल्याण की सम्पादिका हो। ध्वंस की परिस्थितियाँ पैदा करने वाली शक्ति एक पैशाचिक प्रवृत्ति है, उसी प्रकार अकल्याण अथवा आतंक की रचना करने वाला ज्ञान आसुरी है। जिस प्रकार संसार में हर वस्तु के दो पहलू होते हैं, उसी प्रकार ज्ञान अथवा शक्ति अपने उपयोग के अनुसार लाभ-हानि से समन्वित है। जिन ज्ञान-शक्ति को सृजन की दिशा में प्रयुक्त किया जा सकता है, उसे ही विनाश का हेतु बनाया जा सकता है। शक्ति का सम्पादन करते समय यह ध्यान रहने की आवश्यकता है कि उसका उत्पादन दैवी हो, आसुरी नहीं क्योंकि किसी विद्वान ने ठीक ही लि¹ है-’ज्ञान से होने वाले ¹तरों की तुलना अविद्या से होने वाले ¹तरों से नहीं की जा सकती।’
निरहंकारी ही सच्चा संत-
निरहंकारी व्यक्ति में एक स्वर्गीय विनम्रता आ जाती है, जिसका सौंदर्य, जिसकी शोभा न केवल उसके मुख-मण्डल पर ही परिलक्षित होती है बल्कि वह उसके प्रत्येक कर्म में भी प्रतिभासित हुआ करती है।
अहंकार रहित व्यक्ति का हृदय उस बालक की तरह सौहार्दपूर्ण रहता है, जो परिचित, अपरिचित किसी को भी देखकर उसकी गोद में जाने को अपनी बांहें फैला देता है।
निरभिमानी को सब अपने दीखते हैं। उसको सबसे प्रेम होता है। उसे दूसरों का दुःख अपना दुःख और दूसरों का सुख अपना सुख दिखाई देता है।
निरहंकारी व्यक्ति जब किसी से मिलता है, तब न केवल स्वयं ही स्नेह-विह्वल होता है वरन् दूसरे को भी आत्म-विभोर बना देता है। निरभिमानी को देखकर पाषाण हृदय में भी एक करुण विनम्रता की स्रोतस्विनी बह उठती है।
-समर्थ गुरु रामदास
जीवन की सफलता, असफलता, उत्थान-पतन, उत्कर्ष-अपकर्ष मनुष्य के विचारों पर ही निर्भर है। जिसके विचार जिस मात्रा में साफ-सुथरे, स्वतंत्र और सुलझे हुए होंगे वह उसी मात्रा में प्रगति पथ पर आगे बढ़ सकेगा। इसके विपरीत जिसके विचार भ्राँतिपूर्ण, जड़ और उलझे हुए होंगे वह जीवन-रथ को जहाँ का तहाँ रोके हुए खड़ा रहेगा।
नव-सृजन, नव-निर्माण, नव-चेतना तथा नूतन उपलब्धियाँ प्रगति के लक्षण हैं। इस प्रकार की सृजनात्मक नवीनताओं का अधिकारी वही मनुष्य बन सकता है जिसके विचारों में नवीनता का अवसर हो, जिसका मस्तिष्क नवचेतना को ग्रहण कर सके। वही मस्तिष्क नव-चेतना को स्वीकार कर सकने में सफल हो सकता है जो स्वतंत्र एवं साफ-सुथरा हो। जिसका मस्तिष्क पहले से ही रूढ़ि मान्यताओं, अंध-विश्वासों, भ्राँति धारणाओं तथा अस्त-व्यस्त विचारों से भरा होगा, वह मनुष्य नवीनताओं को अपना सकने में सक्षम नहीं नहीं पाता। मान्यताओं, पूर्ण धारणाओं एवं विश्वासों का बंदी मस्तिष्क अपनी स्वतंत्र सत्ता खोकर प्रगतिशीलता से वंचित हो जाता है। उसे तो अपनी पूर्वता में ही पड़े रहने में उसी प्रकार सुख-सन्तोष तथा सुरक्षा विदित होती है जिस प्रकार एक लंबे समय तक पराधीनता में पड़े रहने वाले दास मालिक की गुलामी और उसके अनुसार उसकी आज्ञा पालन करते रहने से उसकी स्वतंत्र चेतना, स्वतंत्र विचार शक्ति नष्ट हो जाती है, जिससे वह इस डर से स्वाधीन होने की बात नहीं सोच पाता कि यहाँ से छूट कर वह कहाँ जाएगा, क्या करेगा, उसके लिए जीवन एवं जीविका का क्या मार्ग रह जाएगा? वह पथ भूल सकता है, किसी अनजान आपत्ति में फंस सकता है और अनजाने भविष्य में चल कर अन्धकार में खो सकता है-तब उसकी यह अच्छी बुरी परिस्थिति जिससे कि वह परिचित है, यह अच्छा-बुरा संतोष जिसे वह पाए हुए है और वह मीठा-कडुआ आश्रय जो उसे मिला हुआ है, सभी चला जायेगा जिससे वह न जाने कितनी असहाय स्थिति में पड़ कर दिग्भ्रान्त हो जायेगा। दास की यह पराधीन विचार-धारा ही उसे स्वाधीन होने और उन्नति की ओर जाने वाले स्वतंत्र पथ पर पग रखने का साहस नहीं करने देती जिससे वह अपने परिचित अंधकार में पड़ा-पड़ा जीवन नष्ट कर देता है।
मनुष्य जिस समाज, सम्प्रदाय अथवा वर्ग जाति में जन्म लेता है, बढ़ता और रहता है उसकी परम्परागत मान्यताओं एवं धारणाओं को अपना लेता है। उन्हीं मान्यताओं के बीच एक लंबे समय तक रहने सहने के कारण वह उनका अभ्यस्त बन जाता है। वह अभ्यास जब धीरे-धीरे बढ़ कर उसके संस्कारों के साथ समन्वित हो जाता है तब वह उसके प्रति न केवल पक्षपाती ही बल्कि दुराग्रही तक हो जाता है। पक्षपाती मस्तिष्क में एक बड़ा दोष यह होता है कि जिस बात के प्रति उसका आग्रह रहता है फिर उसकी भलाई, बुराई, हानि, लाभ के विषय में विचार नहीं करना चाहता। अपनी इस सहज दुर्बलता के कारण उसे गलत होने पर भी अपना पक्ष सत्य ही प्रतीत होता है। उसके प्रतिकूल अथवा भिन्न बात को वह सर्वथा असत्य, अयुक्त एवं अग्राह्य समझने लगता है। अपनी मान्यता के विरुद्ध किसी भी तर्क, दलील अथवा संशोधन को स्वीकार कर सकना उसके वश की बात नहीं रहती। ऐसे पक्षपाती मस्तिष्क वाला व्यक्ति किसी नवीन विचार, नवीन पद्धति अथवा नूतन मान्यता को अंगीकार करने का साहस नहीं कर पाता। जिससे प्रगति की ओर बढ़ सकना संभव नहीं रहता। प्रगतिशीलता के अभाव में उन्नति अथवा उत्थान का प्रश्न ही नहीं उठता। अप्रगतिशीलता, जड़ता का चिन्ह है और जड़ का जीवन यथास्थिति में ही पड़ा-पड़ा समाप्त हो जाता है। जो उन्नति स्थान अथवा उत्कर्ष की आकाँक्षा रखता है उसे इस बौद्धिक गुलामी से मुक्त होना ही होगा। उसे आविर्भूत हुए नूतन प्रकाश, नव-चेतना एवं नव-विचारणा को अपनाना होगा। पराधीनता फिर चाहे वह मानसिक, शारीरिक अथवा बौद्धिक किसी प्रकार की भी क्यों न हो प्रगति के लिए एक बड़ा अवरोध है।
सामान्य व्यक्ति और असाधारण व्यक्तित्व में जो एक बड़ा अन्तर होता है वह उनकी बौद्धिक दासता एवं स्वतंत्रता का ही होता है। सामान्य व्यक्ति अपने आस-पास के वातावरण में प्रचलित मान्यताओं, धारणाओं एवं विश्वासों को जाने-अनजाने ज्यों का त्यों अपना लेता है। वह उनके विषय में सत्य असत्य तथ्य अथवा अतथ्य का तर्क लेकर न तो विचार करता है और न उनकी उपयोगिता अनुपयोगिता की ओर दृष्टिपात करता है। जबकि स्वाधीनता विचार-धारा वाला किसी भी मान्यता अथवा विश्वास को तभी स्वीकार करता है जब उसको विचारपूर्वक उपयुक्तता की कसौटी पर परख लेता है। वह किसी बात को केवल इसलिए ही सत्य नहीं मान लेता कि वह पूर्वकाल से परम्परागत चली आती है। ऐसे ही स्वतंत्र एवं प्रगतिशील विचार वाले लोग सड़ी-गली मान्यताओं, अबुद्धि सम्मत विश्वासों एवं आधारहीन धारणाओं से अलग होकर समयानुकूल, युक्त एवं उपयोगी विचार-धारा समाज अथवा राष्ट्र को देकर असामान्यता के लक्षण प्रकट करते और मानव-समाज के पथ-प्रदर्शक बना करते हैं। यह क्षमता पराधीन अथवा पक्षपाती मस्तिष्क में नहीं होती कि वह समय की माँग, समाज की आवश्यकता को ठीक से देख, समझ और परख सके और तदनुसार पथ एवं प्रकाश दें सके।
पथ और प्रकाश लेकर असामान्य स्थिति पा सकना तो दूर पराधीन विचार तथा पक्षपाती मस्तिष्क वाला व्यक्ति मान्यताओं के प्रति दुराग्रह में अपनी हानि देखता हुआ भी उन्हें छोड़ नहीं पाता। मान्यताओं एवं विश्वासों के प्रति पूर्वाग्रह के कारण अनेक लोग प्रस्तुत परिस्थितियों से हार कर हानि तक कर लेते हैं। जैसे किसी की मान्यता है कि किसी दूसरी जाति के व्यक्ति के हाथ का पानी नहीं पीना चाहिए किन्तु वह एक ऐसी परिस्थिति में फंस जाता है कि उसके पास न तो अपना लोटा-डोर है और न उस समय कोई परिचित व्यक्ति है तो उस पूर्वाग्रही के सामने प्यासे मरने के अतिरिक्त अन्य कोई मार्ग नहीं रह जाता। ऐसे अनेक दुराग्रही व्यक्तियों के प्यास से मरने के समाचार सुनने में आए और आते रहते हैं। कभी किसी परिस्थिति विशेष में हो सकता है इस मान्यता की कोई आवश्यकता रही हो अथवा हो सके किन्तु सामान्य जीवन व्यवहार में ने तो इसकी कोई आवश्यकता है और न महत्व। ऐसी मूढ़ मान्यताओं के व्यक्ति स्टेशनों तक पर नलों अथवा सप्लाई का पानी नहीं पीते और न बच्चों को पीने देते जिससे वे अनेक घंटों प्यास से खुद परेशान रहते और बच्चों को भी रखते हैं। खान-पान का संयम एवं शुद्धता ठीक है किन्तु जब वह विवेक सम्मत बात मूढ़ मान्यता बन कर किसी को पराधीन बना लेती है तब उससे हानि होने के सिवाय कोई लाभ नहीं होता।
मूढ़ मान्यताओं का पक्षपाती मस्तिष्क उनसे स्पष्ट होने वाले अनर्थों को देख कर भी उन्हें छोड़ना तो दूर उल्टे दृढ़ पूर्वक पकड़े रहना चाहता है। उसके दोष बतलाने अथवा संशोधन करने के लिए कहने वालों से लड़ने-झगड़ने तक पर तूल जाता है और जब तक उसका वश चलता है हितोपदेशक का विरोध ही करता रहता है। सती होना भारत की बहुत समय तक एक मान्यता रही है। सती का अर्थ है-सत्यनिष्ठ। जो स्त्रियाँ विधवा होने पर लोक मंगल के लिए सत्यनिष्ठा को बढ़ाने के लिए अपना जीवन अपर्णा करती थीं वे सती साध्वी कहलाती थीं। साधुता का आचरण ही सती होने का प्रमाण माना जाता था। ऐसी सतियाँ यहाँ घर-घर होती थीं। किन्तु दुर्भाग्यवश समाज के स्वाधीन संचालकों ने इसे एक अनिवार्य जातीय प्रथा का रूप बना दिया जो जन-साधारण के लिए एक मान्यता बन गई। फलस्वरूप विधवाओं को उनकी इच्छा से विरुद्ध त्राहि-त्राहि करने पर भी जबरदस्ती जलाया जाने लगा। परम्परावश इस मूढ़ मान्यता के प्रति अनेक जातियों में इतना पक्षपात उत्पन्न हो गया कि जब राजा राममोहनराय जैसे शुभचिन्तकों ने असहाय विधवाओं के इस हठ दाह को बन्द कराने का प्रयत्न किया तो न केवल लोगों ने उसका विरोध ही किया बल्कि उनको जाति-बाहर भी कर दिया। अनेक दुराग्रहियों ने तो उनके प्राणों के लिए संकट उत्पन्न कर दिया जिससे उन्हें देश छोड़ कर विदेश तक जाना पड़ा। कुछ समय बाद जब पक्षपातियों का तिरोधान हुआ अथवा प्रबल प्रयत्न द्वारा उक्त दाहकर्म के प्रति लोगों का पक्षपात कम हुआ तो लोगों की समझ में आया कि जिसको वे धर्म का एक अंग समझते थे वह सती-दाह एक मूढ़-मान्यता मात्र ही थी। आज समाज में सती-दाह के प्रति किसी में पूर्वाग्रह न होने से उसकी चर्चा आने पर तत्कालीन लोगों की उस भ्रष्ट मान्यता पर खेद प्रकट करने लगते हैं।
मूढ़ मान्यता के कारण ही पृथ्वीराज ने ‘शरणागत’ गौरी को सत्रह बार क्षमा कर देश को गुलाम बनाया। मूढ़ मान्यता के कारण ही मुसलमान द्वारा कुएं में डूबे जाने का भ्रम हो जाने से गाँव के गाँव मुसलमान हो गए। मूढ़ मान्यता के कारण ही शत्रु पर रात में आक्रमण न करने से हजारों हिन्दू राजे-महाराजे मुसलमानों तथा अंग्रेजों से हारे। मूढ़ मान्यता के कारण ही करोड़ों हिन्दू अस्पृश्य बने हुए समाज द्वारा त्यक्त पड़े हैं जिन्हें बहकाकर ईसाई अपनी संख्या बढ़ाते चले जा रहे हैं।
इस प्रकार की सामाजिक ही नहीं न जाने कितनी व्यक्तिगत मूढ़ मान्यतायें अन्धविश्वासों के रूप में लोगों में भरी पड़ी है जिससे ओझे, स्याने, ज्योतिषी तथा वंचक लोग लाभ उठाते हैं। अनेक मूढ़ मान्यताओं के कारण न जाने कितनी स्त्रियाँ अपना धन और शील ठगती हैं और अनेक पुरुष प्रवंचकों के चक्कर में आकर प्राण तक गंवा बैठते हैं किन्तु फिर भी उन्हें त्यागने में अभिरुचि नहीं रखते। इसका कारण यही है कि परम्परावश उनके मस्तिष्क उनके प्रति पक्षपाती हो गये हैं जिससे उन्हें छोड़ने का साहस नहीं कर पाते।
पक्षपाती मस्तिष्क में केवल यही दोष नहीं होता कि वह अपनी मान्यताओं एवं विश्वासी के प्रति दुराग्रही होता है बल्कि वह अन्य लोगों की मान्यताओं एवं विश्वासों के प्रति असहिष्णु भी होता है जिसके कारण योरोप एशिया में न जाने कितने बार रक्तपात हुआ है और भारत तो इन साम्प्रदायिक विवादों के कारण जर्जर ही हो गया है। अविवेक पोषित मान्यताओं के प्रति पक्षपात एक भयानक दोष है जो व्यक्ति समाज अथवा राष्ट्र को हानि पहुँचाए बिना नहीं रहता।
इस प्रकार का दोष मनुष्य में आता तभी है जब वह किसी बात में निहित सत्यासत्य का निर्णय किये बिना उसे स्वीकार कर लेता है। यह आवश्यक नहीं कि जो मान्यता कभी प्राचीन काल में हितकारी अथवा आवश्यक रही हो वह आज भी उसी प्रकार उपयोगी हो और न यही आवश्यक है कि जो मान्यता, विश्वास अथवा धारणा कुल वंश अथवा समाज में परम्परागत चली आ रही है उसे यथावत अपना ही लिया जाये। नवीन अथवा प्राचीन कोई भी बात क्यों न हो उसे अपनाने से पूर्व किसी भी मनुष्य को अपनी स्वतंत्र विवेक बुद्धि से उसके सत्यासत्य एवं उपयोगिता अनुपयोगिता का निर्णय कर लेना चाहिये। परमात्मा ने मनुष्य को बुद्धि तत्व इसीलिये ही दिया है। किन्तु यह संभव होगा तभी जब अपने मस्तिष्क को पहले से ही किसी मान्यता अथवा विश्वास का दास न बना दिया गया हो और पक्षपात के दोष से उसे सर्वथा मुक्त रखा गया हो। उचित को अपनाना और अनुचित के प्रति दुराग्रह करना ही लक्षण है जिसे मनुष्यता कहा जा सकता है।
देह दण्ड का नाम तप नहीं-
अध्यात्म मार्ग में अनावश्यक देह-दण्ड से कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होता। अनावश्यक देह दण्ड से साधक का ध्यान पीड़ा की ओर लगा रहेगा, ध्येय की ओर नहीं। इस प्रकार तो दण्ड अथवा पीड़ा की उपासना ही होगी, जिससे पीड़ा और उद्विग्नता की ही वृद्धि होगी, शाँति की नहीं। जबकि अध्यात्म का लक्ष्य शाँति ही है।
अनावश्यक कष्ट और क्लेश उठाने से धर्म नहीं होता। वास्तविक तपस्या तो मन की है मन को पवित्र और निर्मल करना ही तप है। तन को दुखाना और मन को उद्विग्न करना तप नहीं।
मन को वश में करने के लिए तन को ऐसी तपस्या में नहीं लगाना चाहिये जिससे मन उस पर दया कर के उसका पक्षपात करने लगे। मानस शाँति और उसकी प्रसन्नता के प्रकाश में ही आत्मा के दर्शन किये जा सकते हैं। मनुष्य को सामान्य एवं साधारण तपस्या द्वारा तन, मन को मैत्री पूर्वक वश में करना चाहिए न कि निर्दयी शत्रु की तरह।
-जै. सत्यमूर्ति
मनुष्य की आँतरिक शक्तियों में इच्छा-शक्ति का बड़ा महत्व है। यही वह शक्ति है जो मनुष्य में नव-जीवन और नवीन स्फूर्ति का संचार करती है। जीवन की समग्र क्रियात्मकता इसी शक्ति पर निर्भर है। इच्छा-शक्ति की प्रेरणा से ही मनुष्य अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए कार्य में जुटा रहता है। इच्छा का लगाव जिस विषय से हो जाता है, मनुष्य की सारी शक्तियाँ उसी ओर को झुक जाती हैं। इच्छा की तीव्रता विपरीतता में भी अपना मार्ग निकाल लेती है।
जिस समय मनुष्य की इच्छायें मर चुकी हैं, समझना चाहिए कि वह मनुष्य मर चुका है। श्वाँस लेते हुए एक शव के समान ही वह सारे कार्य किया करता है। नष्ट मनुष्य की जिन्दगी में कोई आकर्षण शेष नहीं रहता, कोई रुचि नहीं रहती। अरुचिपूर्ण जीवन का अभिशाप नरक से भी अधिक कष्टदायक होता है। इच्छायें ही जीवन को गति देती हैं, संघर्ष की शक्ति और परिश्रम की प्रेरणा प्रदान करती हैं।
किसी वस्तु की प्राप्ति की लालसा को इच्छा कहते हैं। इस लालसा की तीव्रता को इच्छा-शक्ति कहते हैं। किसी वस्तु के अभाव में जो एक वेदनापूर्ण अनुभूति होती है वही इच्छा की तीव्रता है, जिसकी न्यूनाधिकता के अनुपात से ही इच्छा में शक्ति का सम्पादन होता है।
मनुष्यों की इच्छा अनेकों प्रकार की हो सकती हैं। वे अच्छी और बुरी दोनों प्रकार की हो सकती हैं। मनुष्य की इच्छायें उसकी आँतरिक अवस्था की द्योतक हैं। जिस मनुष्य की इच्छायें स्वार्थपूर्ण हैं, वह अच्छा आदमी नहीं। उसकी इच्छाओं में सात्विक शक्ति नहीं होती, जिसके बल पर बड़ी-से-बड़ी उपलब्धि प्राप्त की जा सकती है।
अन्याय एवं अनीतिपूर्ण इच्छायें रखने वाला भले ही किसी संयोग, युक्ति अथवा परिस्थितियों का लाभ उठाकर अपना स्वार्थ सिद्ध कर ले, तब भी यह न मानना चाहिए कि इसने इच्छा-शक्ति के बल पर अपनी वाँछा को पूर्ण कर लिया है या यों कहना चाहिए कि यह उसकी इच्छा शक्ति की तीव्रता है, जिससे यह अपने लक्ष्य में सफल हो सका है। सफल होने के लिए अनीतिपूर्ण योजनाएं भी सफल होती रहती हैं। इतिहास में ऐसे अनेकों अत्याचारियों, अन्यायियों एवं बर्बरों के उदाहरण पाये जाते हैं, जिन्होंने अपनी अन्यायपूर्ण इच्छाओं को पूरा कर लिया है, साम्राज्य स्थापित किये हैं, विजय प्राप्त की हैं।
कहा जा सकता है कि यह उन अत्याचारियों की इच्छा-शक्ति का परिणाम है कि वे ऐसी-ऐसी विकट विजयों को प्राप्त कर सके हैं। किन्तु यदि वास्तव में तात्विक दृष्टि से देखा जाये तो पता चलेगा कि वे विजयें अत्याचारियों की तीव्र शक्ति का फल नहीं था, बल्कि विजितों की निर्बल इच्छा-शक्ति का परिणाम था। जब किसी एक वर्ग की विजयेच्छा नष्ट हो जाती है तभी आक्रामक की, अनीतिपूर्ण होने पर भी विजय-वाँछा पूर्ण हो जाती है।
अन्यायी की इच्छाओं में स्वयं अपनी कोई इच्छा नहीं होती, वे वास्तव में अहंकार द्वारा ही प्रेरित है। यदि अन्यायी के अहंकार का हरण कर लिया जाये, उसे ध्वस्त कर दिया जाये तो वह विश्व का सबसे निर्बल और निरीह प्राणी हो जाता है। यही कारण है कि अहंकार का उन्माद उतरते ही उसकी सारी शक्तियाँ ठीक उसी प्रकार समाप्त हो जाती हैं, जिस प्रकार नशे की उत्तेजना उतरते ही कोई मद्यप मुर्दे की तरह निर्जीव हो जाता है। उसका सारा जोश-खरोश, वेग-आवेग आदि आन्दोलनपूर्ण क्रियायें खत्म हो जाती हैं और वह एक साधारण-से-साधारण व्यक्ति के हाथ कुत्ते की मौत मारा जाता है।
अनीतिपूर्ण इच्छाओं में कोई स्थायित्व नहीं होता। वे बरसाती नदी की भाँति उफनती हैं और शीघ्र ही ठण्डी पड़ जाती हैं। अन्यायी इच्छाओं से अभिभूत होता है। उनसे उत्तेजित होता है, उसे पूरी करने के लिए व्याकुल रहता है और उनके वेग में एक शक्ति भी अनुभव करता है। किन्तु फिर भी अहंकार का लाख आवरण डालने पर भी वह इस विचार से मुक्त नहीं हो पाता कि उसकी इच्छायें अनुचित हैं। वह स्वयं अपनी दृष्टि में अपराधी बना रहता है और बाहर अन्यों से भी भयभीत रहता है। यही कारण है कि उसकी इच्छाओं में न तो कोई शक्ति रहती और न वे जीवन-लक्ष्य बनकर स्थायित्व प्राप्त कर पाती हैं। प्रतिकूल परिस्थिति आने पर वह इच्छाओं को छोड़ देता है, उनमें परिवर्तन कर लेता है और कभी-कभी तो उनकी भयंकरता से वह जीवन के रणक्षेत्र से ही भाग खड़ा होता है। अत्याचारी अथवा अन्यायी की सफलता वस्तुतः उसकी इच्छाओं की पूर्ति नहीं होती बल्कि उसके उस अहंकार की ही परितुष्टि होती है, जिसके आवेग से वह त्रस्त, दुःखी एवं विकल रहता है।
सदिच्छुक का कर्त्तव्य बुद्धि के तर्क विवेक की भर्त्सना अथवा आत्मा के धिक्कार से प्रभावित नहीं होता बल्कि उनका सहयोग पाकर उसकी इच्छायें और भी अधिक बलवती एवं सुनिश्चित हो जाती हैं। इसके अतिरिक्त आत्म-कल्याण और परोपकार की भावना के कारण वह दिनोंदिन सदाचारी, सच्चरित्र एवं सत्य मूर्ति बनकर दूसरों की सद्भावना, सहयोग तथा सहायता प्राप्त करता हुआ अधिकाधिक शक्ति-सम्पन्न होता जाता है। सदिच्छायें स्वयं शक्तिमती होने के साथ-साथ दूसरों से भी शक्ति संचय करती रहती है।
विरोध करना लोगों का आज स्वभाव बन गया है। यहाँ पर क्या अच्छे कार्य और क्या बुरे, विरोध सबका ही किया जाता है, बल्कि वास्तव में यदि देखा जाये तो पता चलेगा कि बुराई से अधिक भलाई को विरोध का सामना करना पड़ता है। इसका कारण यह नहीं है कि भलाई भी बुराई की तरह ही विरोध की पात्र है,बल्कि समाज की दुष्प्रवृत्तियाँ अपने अस्तित्व के प्रति खतरा देखकर भड़क उठती हैं और विरोध के रूप में सामने आ जाती हैं। चूँकि सत्प्रवृत्तियाँ विरोध-भाव से शून्य होती हैं इसलिए वे बुराई का विरोध करने से पूर्व सुधार का प्रयत्न करती हैं। ध्वंसात्मक न होने के कारण वे बुराई के विरोध को भयंकरता के रूप में उपस्थित नहीं करती, जिससे ऐसा नहीं दीखता कि बुराई का विरोध हो रहा है। दुष्प्रवृत्तियों के उफान को, किसी ध्वंसात्मक संघर्ष को बचाने के लिए सुप्रवृत्तियां किसी सीमा तक उनकी उपेक्षा करती हुई यह प्रतीक्षा किया करती है, कदाचित यह स्वयं सुधर जाये। किन्तु जब ऐसा नहीं होता तो सत्प्रवृत्तियाँ अपने ढंग से आगे बढ़ती हैं और बुराई को दूर करने का प्रयत्न करती हैं। ध्वंसात्मक होने के कारण दुष्प्रवृत्तियाँ, सत्प्रवृत्तियों के विरोध में एक संघर्ष खड़ा कर देती हैं, जिससे सत्प्रवृत्तियों को अधिक विरोध दृष्टिगोचर होता है। इसके विपरीत सत्प्रवृत्तियों द्वारा संघर्ष के स्थान पर सुधार का प्रयत्न करने के कारण बुराई का विरोध होते नहीं दीखता, जबकि सत्प्रवृत्तियों का विरोध अधिक फलदायक तथा स्थायी होता है।
जहाँ तक इच्छाओं का संबंध है, सदिच्छायें ही इच्छाओं की सीमा में आती हैं, इसके विपरीत जो असद् इच्छायें हैं वे वास्तव में इच्छायें न होकर दुष्प्रवृत्तियों का आवेग ही हैं। सद्इच्छाओं की शक्ति अपरिमित है। कोई अच्छा कार्य करने अथवा उदात्त लक्ष्य प्राप्त करने की कामना रखने वाला लाख विरोधों एवं असुविधाओं के होने पर भी अपने ध्येय पर पहुँच ही जाता है।
सदाशयी में एक स्थायी लगन होती है, जिससे वह अपने ध्येय के प्रति निष्ठावान होकर अपनी समग्र शक्तियों को लगाकर प्रयत्न में लगा रहता है। इच्छा एवं प्रयत्न की एकता उसमें एक अलौकिक सहायता-स्रोत का उद्घाटन कर देती है, जिससे उसके प्रयत्नों में निरन्तरता, तीव्रता और अमोघता बढ़ती जाती है और वह क्षण-क्षण ध्येय की और उत्तरोत्तर अग्रसर होता जाता है।
सदिच्छावान् व्यक्ति में आशा, उत्साह, साहस और सक्रियता की कमी नहीं रहती और जिसमें इन सफलता वाहक गुणों का समावेश होगा, असफलता उसके पास आ ही नहीं सकती। असद् इच्छायें जहाँ अपने विषैले प्रभाव से मनुष्य की शक्ति का नाश करती हैं, वहाँ सद् इच्छायें उनमें नवीन स्फूर्ति, नया उत्साह और अभिनव आशा का संचार किया करती हैं।
एक इच्छा, एक निष्ठा और शक्तियों की एकता मनुष्य को उसके अभीष्ट लक्ष्य तक अवश्य पहुँचा देती हैं। इसमें किसी प्रकार के सन्देह की गुँजाइश नहीं।
अन्त भला सो भला
भलाई के कार्यों में यदि कुछ कमी है तो उतनी ही कि उसके फल के परिपाक में कुछ समय लगता है। शुभ कर्म का फल समय के गर्भ में जब तक पक नहीं जाता तब तक उसकी धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा करनी पड़ती है। कम स्वादिष्ट, कम उपयोगी फलों के वृक्ष एक वर्ष में ही काफी बड़े हो जाते हैं किन्तु स्वादिष्ट आम धीरे-धीरे बढ़ता है, काफी समय के बाद फूलता और फल देता है। शुभ कर्मों के फल भी विलम्ब से प्राप्त होते हैं किन्तु उनसे प्राप्त होने वाले आनन्द में आम के फल की तरह कोई संदेह नहीं होता।
भलाई की गति सदैव मन्द, स्थिर एवं शाँत होती है कि किन्तु बुराई का एक छोटा-सा अंकुर भी बड़ी तेजी और बड़े विस्तार के साथ फैलता है। भलाई उतनी तेजी से विकसित नहीं होती। बुराई में जल्दी प्रसारित होने के अवगुण के फलस्वरूप ही वह उत्तेजनापूर्ण होती है और वह बारा-बार, लौट-लौट कर मनुष्य को दुःख देती है। बुराई का फल कभी अच्छा नहीं होता। एक बार का दुष्कर्म अनेक तरह से साँसारिक परिस्थितियों से टकरा-टकरा कर वापस आता है और करने वाले को क्षुब्ध, दुःखी और असन्तुष्ट बनाता रहता है।
बुराई का परिणाम अन्ततः बुरा ही होता है यह किसी से छिपा हुआ नहीं है। जीवन साधकों, समाज सुधारकों एवं विचारकों ने इस गंभीर सत्य का प्रतिपादन सदैव किया है। मनुष्य की जीवनचर्या में भी इस सत्य को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। बबूल के वृक्ष में काँटे ही लगते हैं, आम नहीं। बुराई का परिणाम शुभ हो और भलाई का अशुभ यह कभी नहीं हो सकता।
व्यभिचारी व्यक्ति संभव है तत्काल कुछ लाभ उठा लें पर उसे उनका सुख नहीं मानना चाहिए। यह निश्चित है कि वह सुख नहीं भोग रहा वरन् अपना स्वास्थ्य, यश और धन बरबाद कर रहा है। किसी दिन पकड़ा जायेगा तो समाज उसकी भर्त्सना करेगा, दण्ड देगा। ऐसी अवस्था में उसका जीवित रहना भी कठिन हो जायेगा। यह तो रहे दूसरों से मिलने वाले दण्ड। व्यभिचारी की इन्द्रिय-उच्छृंखलता उसे और भी दुःख देती हैं। स्वेच्छाचारी इन्द्रियों से मनुष्य पहले पाप बढ़ाता है बाद में वह इन्द्रियाँ ही उसे खाने लगती हैं। तब उसे घोर दुःख, अपार कष्ट और तीव्र मानसिक बेचैनी होती है।
बुराई का एक छोटा-सा अंकुर भी उपज कर जब बड़ा होता है तो उसमें जो फल लगते हैं वह सब बुराइयों के ही होते हैं। व्यभिचार के परिणाम-स्वास्थ्य की खराबी, अकाल मृत्यु, बीमारी, भय, आशंका, निन्दा, तिरस्कार और सामाजिक दण्ड। गाली देने के परिणाम लड़ाई-झगड़ा, जीवन भर का वैमनस्य, मुकदमेबाजी, क्रोध, उत्तेजना, प्रतिद्वन्दी को नीचा दिखाने की कोशिश में अपनी उन्नति का द्वार अवरुद्ध कर लेना।
चोरी करेगा वह जेल अवश्य जायेगा। पुलिस डण्डे लगायेगी और निगरानी में रखेगी। घर वाले परेशान होंगे हो वे भी अच्छी दृष्टि से नहीं देखेंगे। सार्वजनिक स्थानों में कोई सम्मान नहीं रहेगा। चोर से संबंध रख कर कोई भी प्रसन्न नहीं रहता।
यह नहीं देखना चाहिए कि बुराई से वैभव बढ़ता है। यदि ऐसा हुआ भी तो वह क्षणिक ही होगा। बुराई जल्दबाज होती है। जितनी जल्दी बढ़ती है उतनी ही जल्दी नष्ट हो जाती है साथ ही कर्त्ता को भी नष्ट कर डालती है। आकाश तक फैलती है और अन्त में सिकुड़ कर स्वयं बुराई करने वाले के ही सिर आकर पड़ती है। जिस प्रकार आपके द्वारा उच्चारा हुआ शब्द आगे भी दीवार से टकरा कर पुनः आपके कानों से टकराता है, बुराई बार-बार मनुष्य से टकराती और अन्ततः उसे हैरान करके, या नष्ट करके छोड़ती है। जो वैभव उत्पन्न हुआ था वह तो बिजली की सी कौंध थी, चमक थी और नष्ट हो गई। चोरी में या भ्रष्टाचार में धन मिला और नशेबाजी वेश्यावृत्ति में नष्ट हो गया। जैसे आया वैसे गया। कर्त्ता की सुख शाँति और बरबाद करता गया।
वसिष्ठ के पुत्र प्रचेता की कथा प्रसिद्ध है। एक बार यात्रा करते उन्हें किसी ऐसे व्यक्ति से भेंट हो गई जो उनसे विपरीत दिशा में जा रहा था। दोनों के रथ आमने-सामने आ गए। कोई भी अपने रथ को घुमाना नहीं चाहता था। इसमें कहा-सुनी हो गई। प्रचेता बड़े क्रोधी थे। गुस्से में आकर उस व्यक्ति को शाप दें दिया- ‘तू राक्षस हो जा।’ ऋषि-पुत्र के वशीभूत वह राक्षस हो गया और तरह-तरह से प्रजा का उत्पीड़न करने लगा। एक बार उसकी भेंट प्रचेता से हुई। उसे पुराना बैर याद आया। उसने प्रचेता को ही धर-पटका और मार कर ¹ गया।
बुराई कितनी ही छोटी क्यों न हो उसके परिणाम इसी तरह औंधे-सीधे होते हैं। उससे न व्यक्ति का भला होता है न समाज का। बुराई से बुराई ही बढ़ती है और समाज को अधोगामी बनाती है।
लोग अपनी कठिनाइयों का, असफलता का, दुःख, कष्ट और परेशानी का कारण औरों में ढूँढ़ते हैं। दूसरों के मत्थे अपराध मढ़ते हैं। कभी अपनी हार के लिए अपने मित्र को दोष देते हैं या परमात्मा को कोसते हैं पर सच यह है कि मनुष्य का प्रत्येक दुःख, उसकी प्रत्येक पीड़ा असफलता या यातना उसकी अपनी ही बुराई का फल होता है। अपने स्वास्थ्य की खराबी के लिए अपने घर वालों को दोष न दीजिए। असंयम किया है उसका परिणाम भुगत रहे हैं। नशेबाजी की है इसी से शरीर टूटा है, रोज-रोज सिनेमा न देखते तो आंखें यों खराब न होती। आप ढूँढ़िए, आपको अपने कष्ट का कारण आपमें ही मिल जायेगा।
बुराई मनुष्य के बुरे कर्मों की नहीं वरन् बुरे विचारों की देन होती है इसलिए वह एक बार में ही समाप्त नहीं हो जाती वरन् स्वभाव और संस्कार का अंग बन जाती है। इस स्थिति में बुराई ही भलाई जान पड़ने लगती है। इसलिए बुरे कामों से बचने के लिए सर्व प्रथम बुरे विचारों से बचना चाहिए। दुष्कर्म का फल तुरन्त भोग कर उसे शाँत किया जा सकता है पर संस्कार हुत काल तक नष्ट नहीं होते। यह जन्म-जन्मान्तरों तक साथ-साथ चलते और कष्ट देते हैं।
बुराई और उसके दुष्परिणामों का बहुत देर तक चिन्तन करना और उनसे बचना बहुत आवश्यक है। जीवन में यह क्रिया आवश्यक है। जिस तरह शरीर, वस्त्र, घर आदि की नित्य सफाई होती रहती है उसी तरह बुरे विचारों का भी परिमार्जन होता रहना चाहिए।
अच्छा तरीका है आप भलाई का स्वभाव बना डालें। भलाई अपने जीवन में घुला लें। भलाई ही आपके जीवन का उद्देश्य बन जाए। भलाई इतनी भली होती है कि वह अपने कर्त्ता को तुरन्त आत्म-संतोष प्रदान करती है। भलाई का आशीर्वाद मनुष्य जीवन में फलीभूत और अपार सुख सम्पदा से ओत-प्रोत कर देता है।
वह एक द्वारा से प्रस्फुटित होती है और अपने अनुदान समेट कर सैंकड़ों दरवाजों से अपने स्वामी की ओर गमन करती है। आप औरों से मीठा बोलिए सारा संसार आपको मित्र सरीखा लगेगा। सब आपकी सहायता को तत्पर रहेंगे। सब आपके पास बैठना चाहेंगे। आप तकलीफ में होंगे तो किसी को बुलाने की आवश्यकता नहीं, यदि आपके पास भलाई की शक्ति है तो वह अपने आप औरों को आपकी सहायता के लिए बुला लेगी। भलाई का अन्त-फल सदैव भला ही होता है।
बुराई व्यग्र करती हुई आम-असन्तोष के रूप में निरन्तर बेचैन रखती है। करने में भी बुरा और अन्त में भी बुरे का बुरा, शराब पीने में भी कड़ुवी और प्रभाव में भी बुरी। चोरी करने में भी भय और घबराहट और करने के बाद भी बेचैनी, परेशानी भय और तिरस्कार। बुरे का फल सदैव बुरा ही होता है ऐसा निश्चयपूर्वक जान लेना चाहिए।
मनुष्य शरीर में जीवात्मा अपने गुणों का रसास्वादन करने धरती पर आती है। वह बुराइयों में भटक जाती है उससे सुख समूल नष्ट हो जाते हैं। भलाई गुणों को सींचने वाला अमृत है। उससे आत्मा को तृप्ति मिलती है ऐसा विश्वासपूर्वक जान कर अच्छे कर्म ही करना चाहिए। बुराई तो सर्वथा त्याज्य है, उसे दूर से ही नमस्कार करना चाहिए।
गृहस्थ-जीवन की वासनात्मक मर्यादा
मनुष्य-जीवन का अर्थ केवल मात्र शरीर और श्वाँस का समागम ही तो नहीं है। यदि जीवन का यही अर्थ रहा होता तो बिना सिर-पैर के जमीन पर रेंगने वाले कीड़ों-मकोड़ों और मनुष्य में कोई अन्तर ही न रहता। जिस प्रकार वे जो कुछ मिलता खाते, पीते, प्रजनन करते और मर जाते। मनुष्य सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ प्राणी है। उसे शक्ति, विवेक और सदाचार का अधिकार मिला है। कीटोपम जीवन मनुष्य के लिए न तो योग्य है और न श्रेयस्कर।
मनुष्य-जीवन का अर्थ है शक्तिमान्, व्रतवान् और कर्तृत्ववान बनकर दिनों-दिन उन्नति करना और सत्यं, शिवं, सुंदरम् के रूप में सम्पूर्ण आयु का उपभोग एवं उपयोग करना। जो व्यक्तिगत, सामाजिक अथवा राष्ट्रीय दिशा में समुन्नत जीवन का प्रयत्न नहीं करता और यों ही बिना जाने जिये चला जा रहा है, वह न पृथ्वी पर भारस्वरूप है, वह न केवल स्वयं ही अपने लिये कष्टकर होता है बल्कि दूसरों के लिए भी अनेक प्रकार से कष्टदायक बनता है। मानव-जीवन का स्वरूप बतलाते हुए वेद भगवान ने कहा है-
समास्त्वाग्न ऋतवो वर्धयन्तु संवत्सरा ऋषियों यानि सत्याः।
सं दिव्येन दीदिहि रोचनेन विश्वा आवाहि प्रदशश्चतसु॥
-अथर्ववेद
-मनुष्यों को चाहिए कि श्रेष्ठ जनों से उत्तम शिक्षा प्राप्त कर संकल्पवान्, सत्यवान् और सत्कर्मशील बनें। इस प्रकार संसार में उन्नति और कीर्ति प्राप्त करते हुए सदैव प्रसन्नचित्त रहें।
‘सूर रसि वर्चोधा असि तन्पा नोऽसि।
आप्नुहि श्रेयाँसमति समं काम॥’
-अथर्ववेद
-मानव जीवन को सार्थक बनाने के लिए हे मनुष्यों! ज्ञान प्राप्त करो, तेजस्वी बनो और शारीरिक दृष्टि से बलवान बनो। अपनी वर्तमान स्थिति में ही न पड़े रहकर आगे बढ़ने का प्रयास करते रहो।
मनुष्य को इस उन्नत अवस्था में पहुँचने के लिए साधन, सुविधा तथा अवसर की आवश्यकता होती है। क्योंकि बिना साधनों के आगे बढ़ सकना संभव नहीं और इन साधनों को भी उसे अपने आप अपनी बुद्धि एवं बल के आधार पर उपलब्ध करने होंगे। इस कर्म प्रधान सृष्टि में ऐसा कोई प्रबंध नहीं, ऐसा कोई कल्पवृक्ष नहीं है, जिसकी सहायता से साधनों को यों ही बना बनाया पा लिया जाये। उसके लिए तो उसे स्वयं ही प्रयत्न करना होगा।
उन्नति एवं प्रगति करने का तथा श्रेयस्कर जीवन पाने के लिए जिन साधनों की अनिवार्य अपेक्षा है उनमें भोजन, वस्त्र, व्यवस्था, शाँति एवं संयम प्राथमिक है। इनके अभाव में किसी प्रकार की उन्नति कर सकना तो दूर, साधारण जीवन भी ठीक से नहीं जिया जा सकता। जिस व्यक्ति, राष्ट्र अथवा समाज के पास भोजन वस्त्र की कमी होगी- क्या उससे यह आशा की जा सकती है कि वह बलवान एवं उन्नतिशील बनेगा। अव्यवस्था ऐसी प्रतिकूल परिस्थिति होती है जो ऊपर उठने में ही बाधक नहीं होती बल्कि ऊपर से नीचे गिरा देती है। चिन्तन-मनन करने के लिये जिस बौद्धिक विकास और मानसिक सन्तुलन की आवश्यकता होती है, वह अशाँति की स्थिति में संभव नहीं। संयम का निर्वाह तभी हो सकता है, जब मनुष्य के विचार निर्विकार, वातावरण अनुकूल और व्यवहार-क्षेत्र के लोग सदाचारी एवं सद्भावी हों, नहीं तो अनुकरण वृत्ति, स्वाभाविक वातावरण और संसर्ग-दोष उसके रहन-सहन में बाधक बनेंगे एवं वाँछित पथ पर आगे बढ़ने से रोकेंगे।
जीवन को सुविकसित व्यवस्थित और सुख-शाँतिमय बनाने के लिए मनुष्य परिवार बसाता है, विवाह करता है और प्रजा-प्रणयन करता है। उसे आशा रहती है कि पत्नी उसकी सेवा-सहायता करेगी, बच्चे अपनी किलकारियों से दुःख-दर्द भुला देंगे और वह निश्चित रूप से कर्त्तव्य करता हुआ, जीवन को धीरे-धीरे विकसित करता हुआ मानव-ध्येय की ओर बढ़ता जायेगा। बच्चे बड़े होंगे, बुढ़ापे में सहायक होंगे जिससे उस अन्तिम चरण में और अधिक निश्चिन्तता और शाँति मिलेगी। इस प्रकार परलोक के लिए साधना करने के लिये पूरा-पूरा अवसर मिलेगा।
आज कितने ऐसे गृहस्थ देखने को मिल सकते हैं जो पारिवारिक जीवन का प्रयोजन पाते हुए शक्तिमान, व्रतवान् और कर्तृत्ववान् बनते हों?
इसका अर्थ यह नहीं कि आत्म-विकास के लिये मनुष्य को घर-बार नहीं बसाना चाहिए और एकाकी ही जीवन नौका को खेते हुए ध्येय तट की ओर ले जाना चाहिए। यदि सभी व्यक्ति यही सोच लें और करने लगें, तो संसार में उतनी व्यवस्था और अवसर भी न दिखाई दें जो आज थोड़ी बहुत, उल्टी-सीधी दिखाई दे रही है। एकाकी जीवन इस पारिवारिक जीवन से भी बुरा और असहनीय सिद्ध हो। मनुष्य एकाकी जीवन से त्रस्त होकर ही घर-बार के जीवन में आया है और जब तक वह परिवार के पावन प्रयोजन को समझता और पूरा करता रहा, उसका आशातीत विकास होता रहा। वह शाँतिपूर्ण वातावरण में व्रतमय जीवन के साथ शक्तिमान् और कर्तृत्ववान् बनता रहा। समाज, संसार और मानवता की सेवा करता हुआ खुद भी उठता रहा और उसको भी उठाता रहा। इस सर्वांगीण सुविधा के कारण ही गृहस्थाश्रम को परम पुनीत आश्रम और सद्गृहस्थ को योगी, यती और तपस्वी कहा जाता रहा। किन्तु खेद है कि आज ही असफल गृहस्थियाँ नरक बनती जा रही हैं और गृह हर दशा में दीन-हीन, निर्बल और दयनीय। मानव जीवन की वर्तमान दुर्दशा में गृहस्थाश्रम का दोष नहीं है। दोष है उन गृहस्थों का जो वैवाहिक जीवन तथा परिवार-व्यवस्था का प्रयोजन भटक कर भूल गये हैं। क्या आज हम सब गृहस्थ जीवन में इस उद्देश्य का पालन करते हैं-
‘इषे राये रमस्व सहसे द्मुम्नऊर्जे अपत्याय।
सम्राऽसि स्वराऽपि सारस्वतौ त्वौ त्सौ प्रावताम्॥’
-यजुर्वेद
-विवाह के बाद पति-पत्नी प्रीतिपूर्वक रहें। विद्यावान् बनें। श्रेष्ठ गुणों को धारण कर एक दूसरे की मंगल कामना करें। धर्मानुसार सुसंतति को जन्म दें। इस प्रकार वे सुखमय जीवन जीते रहें।
आज दुर्भाग्यवश विवाह संबंध को काम-क्रीड़ा का साधन मान लिया गया है। इस अनियमित काम-सेवन का जो दुष्परिणाम होना चाहिए, वह सबके सामने है। ब्रह्मचर्य का अनुचित अपव्यय मनुष्य के शारीरिक स्वास्थ्य पर प्रत्यक्ष प्रभाव डालता है। कुछ ही समय में शरीर जर्जर होकर खोखला हो जाता है। आलस्य, निर्बलता तथा अकर्मण्यता घेर लेती है। परिश्रम व काम से जी घबराता है। ऐसी दशा में मजबूरन काम करना पड़ता है तो हर समय खिन्नता, विपन्नता तथा विषण्णता घेरे रहती है, जिससे चिन्ता, भय, निराशा आदि की मानसिक व्याधियाँ घेर लेती हैं। आरोग्य चला जाता है और मनुष्य या तो शीघ्र मर जाता है या फिर मुर्दों जैसी जिन्दगी ढोया करता है। कमाई का अधिकाँश भाग दवा-दारु और डॉक्टर हकीमों के अर्थ लगाता रहता है।
अनियंत्रित काम-सेवन से पुरुष का ही नहीं नारी का भी स्वास्थ्य चौपट हो जाता है, शीघ्र ही सुन्दरता बुझ जाती है, शरीर ढल जाता है और वह अकाल ही में वृद्धा होकर बीमार रहने लगती है। स्वभाव चिड़चिड़ा हो जाता है। घर का काम अस्त-व्यस्त हो जाता है जिससे भोजन-व्यवस्था की जो एक सुविधा रहती है वह भी जाती रहती है। जो कुछ मजबूरन रो धोकर अनुत्साहपूर्वक करती भी है, वह भावना के अभाव में स्वाद एवं स्वास्थ्यहीन हो जाता है। प्रेम, स्नेह और रस रीति के स्थान पर कलह-क्लेश, लड़ाई-झगड़ा, कुढ़न और आवेश की वृद्धि हो जाती है। गृहस्थ-जीवन का पुनीत प्रयोजन भूलकर उसे काम-क्रीड़ा का आधार मानकर एक ब्रह्मचर्य के असंयम से गृहस्थों को यह दुष्परिणाम भोगने पड़ रहे हैं। तब ऐसी दशा में किस अकार आशा की जा सकती है कि व्यक्ति शक्तिमान्, व्रतवान् और कर्तृत्ववान् बनकर ऊंचे उठेंगे और समाज व राष्ट्र को उठायेंगे।
अनियमित काम-सेवन का दूसरा दुष्परिणाम, जो इससे भी भयंकर है, वह है बहुसन्तानोत्पत्ति। मनुष्य का एक अपना ही विकास कर सकना कठिन होता है तब पैदा किए हुए दर्जनों बच्चों का विकास किस प्रकार कर सकता है? उस स्थूल सत्य को एक साधारण व्यक्ति भी समझ सकता है। ब्रह्मचर्य के असंयम से उत्पन्न दुर्बलता तथा अस्वास्थ्य के कारण परिश्रम होता नहीं, काम में जी नहीं लगता, कमाई का अभाव रहता है जिस पर चार-छः बच्चों के पालन-पोषण, शिक्षा-दीक्षा, कार रोजगार का भार बेचारे अभिभावक को चकनाचूर करके रख देता है।
सन्तानों की कमी नहीं और उनको योग्य बनाने के लिए आवश्यक साधनों का दूर-दूर तक पता नहीं, तब भला उन पुत्रों को कुपुत्र बनने से कौन बचा सकता है? उन्हें आवारा होने और अशिक्षित रहने से कौन रोक सकता है? सुयोग्य सन्तान जितनी सुखदायक होती है, उससे सौगुनी दुःखदायी अयोग्य सन्तान होती है। नालायक बच्चों के पिता को कितना कष्ट, लाँछना और उलाहना व अपवाद सहना पड़ता है, यह किसी भी ऐसे व्यक्ति से पूछकर मालूम किया जा सकता है, जिसका एक भी पुत्र आवारा निकल गया हो। शास्त्रकारों ने ‘पुत्रःशत्रुःकुपडितः’ गलत नहीं कहा है। आवारा बच्चों के अभिभावक उसके लिए मौत ही माँगा करते हैं और जो वात्सल्य अथवा भद्रता के कारण उसकी नहीं तो अपनी मौत माँगते सुने जाते हैं।
बच्चों का भार यहीं तक तो सीमित नहीं रहता। आगे उनकी शादी भी करनी होती है। उसकी चिन्ता साँपिन की तरह घेरे रहती है। दिन में भूख नहीं लगती और रात में नींद नहीं आती और यदि कन्याओं की अधिकता हुई, जो कि अति काम-सेवन से सदा सम्भाव्य है, तब तो कष्ट, क्लेश, चिन्ता, विषण्णता का कहना ही क्या? और देशों की तो नहीं कहीं जा सकती, भारत में मनुष्यों की यह दशा होश संभालते ही होने लगती है। असमय आँखें खराब होने लग जाती हैं, दाँत गिर जाते हैं, शरीर सूखकर जर्जर हो जाता है केवल धुँआ-ही-धुँआ शेष रह जाता है। 40-45 तक पहुँचते-पहुँचते जरठ होकर लकड़ी टेकने योग्य हो जाती है। होश संभालने से प्रौढ़ता तक पहुँचते-पहुँचते जब यह दशा हो जाती है तब शक्तिमान्, बलवान् और कर्तृत्ववान् बनकर मानव-जीवन का उच्च ध्येय प्राप्त कर सकने की आशा करना उपहासास्पद ही मानी जायेगी। आज घर-घर में यही हाल है और यही कारण है कि समाज व राष्ट्र की यह दशा हो रही है।
अपने पारिवारिक जीवन में जो इस प्रकार की भूल कर चुके हैं, वे तो सावधानी एवं समयपूर्वक नौका पार लगायें ही, किन्तु अपने बच्चों को यथासंभव ऐसी शिक्षा दें जिससे कि वे ऐसी गलती कर भयानक भ्रम-जंजाल में न पढ़ें।
विवाह किया जाये और अवश्य किया जाये, घर परिवार बसाया जाये। यह मनुष्य का परम धर्म है, किन्तु इस धर्म के अनुसार ही जीवन-यापन किया जाये। दाम्पत्य जीवन के मूल प्रयोजन को समझा जाये। सन्तान उत्पन्न की जाये यह हर दृष्टि से आवश्यक है, किन्तु एक या दो जिससे उनका सर्वांगीण पालन किया जा सके, उन्हें शिक्षित बनाया जा सके जिससे कि शक्तिमान्, व्रतवान्, तथा कर्तृत्ववान् बनकर समाज को सुशोभित कर सके, सुख-सुविधा दे सकें और आत्म-कल्याण का मानवीय लक्ष्य प्राप्त कर सकें।
आत्मा की ज्योति जगावें-
सतर्कता, जागरुकता एवं चैतन्यता आत्मा की त्रिमुखी ज्योति है, जिसके प्रकाश में मानव-जीवन का लक्ष्य स्पष्ट दृष्टिगोचर रहता है। आत्मा की त्रिमूर्तिमयी ज्योति को जाग्रत रखने वाला अनायास ही परमात्मा का साक्षात्कार कर लेता है।
इसके विपरीत संशय, अविश्वास एवं अन्धविश्वास मानव-मन की त्रिधा गंदगी है, जिसकी उपस्थिति में ठीक मार्ग पर चलने वाला व्यक्ति भी पथ-भ्राँत होकर अपने लक्ष्य से दूर जा पड़ता है। मनुष्य को हर मूल्य पर इस गन्दगी को निकाल डालना चाहिए।
-योगी अरविन्द
प्रशंसा एवं निन्दा दो ऐसी क्रियायें है जिससे किसी बात का बोधन अथवा निरोधन होता है। प्रशंसा एवं सराहना पाकर हारता हुआ खिलाड़ी बाजी जीतने लगता है। निन्दा का संकेत पाते ही जीत की ओर बढ़ता कदम रुक जाता है।
मनुष्य की अच्छी-बुरी प्रवृत्तियों, वृद्धि अथवा न्यूनता में प्रशंसा एवं निन्दा का बहुत कुछ योग रहता है। कोई लड़का बुराई की ओर बढ़ता है, तभी कोई सज्जन व्यक्ति अथवा उसके अभिभावक उसकी निन्दा कर देते हैं। फल यह होता है कि उसका गिरता हुआ आचरण रुक जाता है। व्यसनों को अपनाने से पूर्व हर मनुष्य उससे डरता है और उसकी प्रवृत्ति उससे विमुख ही रहती है। किन्तु जब उसके साथी तथा आस-पास संपर्क में रहने वाले व्यक्ति किसी व्यसन की प्रशंसा करते और बार-बार प्रोत्साहित करते हैं तो वह व्यसन को अपना लेता है। बार-बार कहने से मनुष्य की प्रवृत्ति तदनुकूल हो उठती है। यह मानव मन की एक सहज दुर्बलता है।
प्रशंसा द्वारा प्रोत्साहन पाकर लोग हंसते-हंसते मृत्यु के गले लग जाते हैं। सराहना की प्रेरणा से लोग सर्वस्व त्याग कर देने को तैयार हो जाते हैं निरन्तर निन्दा से बड़े-बड़े सज्जन एवं सत्पुरुषों का लोकमत बिगड़ जाता है और प्रशंसा पाकर अनुपयुक्त, अयोग्य तथा अकर्मण्य व्यक्ति प्रतिष्ठा पा जाते हैं। निर्वाचन के समय में अधिकतर लोग प्रशंसा एवं निन्दा के आधार पर जीतते-हारते रहते हैं। दोनों बातों में किसी एक का अधिकाधिक प्रचार किसी को जनमत का अधिकारी अनधिकारी बना देता है, निन्दा एवं प्रशंसा में विनाश तथा सृजन की शक्ति होती है। अच्छाई बुराई को बढ़ाने गिराने की क्षमता होती है। सत्य तथा असत्य की स्थापना कर सकने की सामर्थ्य होती है। इसलिए किसी बात की प्रशंसा, निन्दा करने में बहुत सावधान रहना चाहिए। कहीं ऐसा न हो कि अन्याय हो जाये और उसके लिए पाप का भागी बनना पड़े।
एक बार की घटना है कि एक नौजवान को हत्या के अपराध में मृत्यु दण्ड दिया गया। फाँसी पर लटकाये जाने से पूर्व उससे पूछा गया कि क्या वह किसी से मिलन चाहता है? अभियुक्त ने अपनी माँ से मिलने की इच्छा प्रकट की। निदान माँ बुलाई गई और वह रोती-बिलखती बेटे के सामने आई।
लोगों का यह समझना कि यह दोनों मिलते हुये माँ बेटे सदा-सर्वदा के लिये अलग होने के शोक से विह्वल होकर बड़ा ही कारुणिक दृश्य उत्पन्न करेंगे। इस भावना से ही वहाँ उपस्थित लोगों के हृदय करुणा से भर कर आर्द्र हो उठे। लेकिन तभी यह देख कर लोगों के आश्चर्य का ठिकाना न रहा कि वह नवयुवक रोती बिलखती अपनी माँ की ओर देख कर अट्टहास कर उठा और व्यंग्य करता हुआ बोला-’आज जब मैं मौत के मुख में बैठा हूँ तब तू आँसू बहा रही है। यह तेरी ही कृपा है कि मैं हत्या का कलंक लेकर मृत्यु-दण्ड के माध्यम से इस संसार से जा रहा हूँ! यदि तूने पहले ही दिन, जिस दिन मैं पड़ोस के लड़के को पीट कर आया था मेरी भर्त्सना की होती, मेरे उस अनुचित कार्य की निन्दा की होती, बुरा बताया और दण्डित किया होता तो निश्चय ही मेरे कदम इस अपराध की दिशा में नहीं बढ़ते! तूने निन्दा करने के बदले मेरी प्रशंसा की थी! मेरे कर्म को उचित ठहराया था और मेरी पीठ ठोकर दुष्परिणामों के प्रति अभय किया था। यह तेरी उस गलत नीति, अनुचित प्रशंसा तथा अन्यायपूर्ण सराहना का ही नतीजा है कि मैं धीरे-धीरे अपराधी बनता हुआ इस सीमा पर पहुँच गया कि आज हत्या के अपराध में प्राणदण्ड पाकर संसार से जा रहा हूँ! मेरे लिये आँसू बहाने की अपेक्षा कहीं अच्छा है कि तू अपने किए पर पश्चाताप के आँसू बहा। मेरे बिछोह के रूप में तुझे अपनी करनी की पूरी सजा मिल गई इसका मुझे सुख एवं सन्तोष है! ऐसा कह कर नवयुवक ने माँ की ओर से घृणापूर्वक मुँह फेर कर उसे चले जाने को कह दिया!
न जाने कितने अभिभावक वात्सलिक दुर्बलता के कारण बच्चे का मन छोटा न हो जाये-वह कहीं दब्बू और डरपोक न बन जाए इस ख्याल से उसकी गलत बातों की प्रशंसा कर दिया करते हैं। वे नहीं समझ पाते कि उन्होंने बच्चे का मन रख कर जो तात्कालिक आश्वासन अथवा अभय दिया है उसका विषैला प्रभाव बच्चे के दूर भविष्य और निर्माण हो रहे आचरण कर पड़ेगा जिससे उसका बड़े से बड़ा अहित हो सकता है।
अनेक अबोध मित्र घनिष्ठता प्रदर्शित करने के लिए मित्रों की उन बातों की भी प्रशंसा करने लगते हैं जिनकी भरपूर निन्दा की जानी चाहिए। वे नहीं समझते कि वे जो अपने मित्रों की बुराइयों की, उसका मन रखने के लिए, मिथ्या प्रशंसा कर रहे हैं, वह उसे किसी समय भी सर्प बन कर डस सकती है। समाज में अपराधों की वृद्धि होती ही प्रशंसा, सराहना, समर्थन अथवा प्रोत्साहन के कारण यदि हर ओर से बुराई की निन्दा, भर्त्सना तथा आलोचना होती रहे तो कोई कारण नहीं कि उठती अथवा बढ़ती हुई बुराई जहाँ की तहाँ दबकर दफन हो जाये। समाज में कुछ इस प्रकार का उपेक्षा एवं निरक्षेता का भाव बढ़ गया है कि यदि कोई एक सत्पुरुष किसी बुराई की भर्त्सना करने का अपना कर्त्तव्य पूरा करता है तो उसके विपरीत सौ आवाजें उठ कर एक आवाज को दबा देती हैं।
अनेक लोग स्वार्थ एवं द्वेष के वशीभूत होकर लोगों की झूठी प्रशंसा व निन्दा किया करते हैं। ऐसा करते समय में यह नहीं सोच पाते हैं कि वे जो दोष को प्रोत्साहित और गुण को दबाने का प्रयत्न कर रहे हैं यह एक सामाजिक अपराध ही नहीं बल्कि नैतिक अपराध भी है जिसका अशिव प्रभाव उनकी निज की आत्मा पर पड़ेगा, जिसके प्रति फलन में वह बुराई बढ़ कर उन्हें भी आक्रान्त कर सकती है।
एक बार एक समाचार छपा था कि एक लड़की छज्जे से रात के समय धोती लटका कर नीचे उतरती हुई पकड़ी हुई। उससे जब उसकी इस अवाँछनीय तथा आशंकापूर्ण क्रिया का कारण पूछा गया तो उसने बताया कि वह बम्बई जाकर फिल्म ऐक्ट्रेस बनने की लालसा में घर से भाग जाने का प्रयत्न कर रही थी।
उस अबोध लड़की को फिल्म ऐक्ट्रेस बनने के प्रयत्न में आने वाली नैतिक बाधाओं का पता न था और न उसे उन ख्यातिनामा अभिनेत्रियों के गर्हित जीवन के विषय में ही कोई जानकारी थी, जिनको उसने चित्रपट पर देखा, जिनके चित्र बाजार में बिकते और घरों, दुकानों पर टंगे देखे और जन-जन से सुनी थी जिनकी प्रशंसा। अभिनय संसार का जीवन कितना नीरस, कटु, कलुषित, कृत्रिम, प्रदर्शन एवं पीड़ापूर्ण हो सकता है-इसकी उस बालिका को कोई जानकारी नहीं थी। उसके सामने तो अभिनेत्रियों का यह ही रंगीन तथा प्रशंसापूर्ण चित्र था जिसको वह देखा सुना करती थी।
निश्चय ही उसके इस ज्ञान अज्ञान का कारण लोगों द्वारा सिनेमातारिकाओं की भूरि-भूरि प्रशंसा ही रहा है, जिसने कि उनके नकली चित्र का तो ज्ञान करा कर आकर्षित कराया किन्तु उनकी असली तस्वीर से वंचित रखा। सिनेमातारिकाओं का, चित्रपट पर अभिनीत औपन्यासिक अथवा आदर्श जीवन ही वास्तविक जीवन नहीं है, लोगों की प्रशंसा ने उसे इसका ज्ञान नहीं होने दिया! निदान वह प्रशंसा से प्रभावित होकर सिनेमातारिका बनने के आकर्षण से पागल होकर अनपेक्षित काम करने को उद्यत हो उठी। एक यही लड़की नहीं, न जाने ऐसी कितनी लड़कियाँ और लड़के प्रशंसा से प्रेरित होकर सिनेमातारक-तारिकायें बनने की लालसा से भागते और पथ-भ्राँत होते रहते हैं!
अश्लीलता, अनुशासनहीनता, कृत्रिमता, प्रदर्शन, फैशन एवं अमर्यादा के जो दृश्य आज समाज में विचारवानों के दिल-दिमाग जला रहे हैं उनका बहुत कुछ दायित्व अविद्या एवं अज्ञान पर है किन्तु बहके और भटके बहुमत द्वारा गलत नीति की प्रशंसा पर कुछ कम नहीं है। आज हम सब और हमारे बच्चे अपने चारों ओर सिनेमा संसार की प्रशंसा की ध्वनि सुन रहे हैं और देख रहे हैं कि उनकी नकल करने वाले एक सराहना तथा स्पर्धा की दृष्टि से देखे जाते हैं। स्वाभाविक है यह सब हमारे अपरिपक्व अथवा अनादर्श मन मस्तिष्क पर प्रभाव डालें और हमारी तथा हमारे बच्चों की प्रवृत्तियाँ उस ओर उन्मुख एवं प्रेरित हों। बुराई को अच्छाई सुनते-सुनते हम सब भी उसे अच्छा ही कहने लगे।
कुछ ऐसी हवा ही चल पड़ी है कि आज का जनसमुदाय जहाँ गलत बातों की प्रशंसा करने लगा है वहाँ उचित एवं उदात्त रीति-नीति की निन्दा करने लगा है। इसी विपरीत प्रवाह के प्रभाव में आकर लोगों ने धर्म-कर्म, संयम-नियम, पूजा-उपासना, आत्मा-परमात्मा, सरलता, सादगी, आदि उदात्त गुणों की निन्दा करनी शुरू कर दी है। उन्हें व्यर्थ की अलाभकारी बातें कह कर खिल्ली उड़ाना मानसिक तथा बौद्धिक मनोरंजन बना लिया है। जिसका फल यह हुआ है कि अबोध तथा अस्तित्व रहित जन-साधारण की आस्था इन कल्याण कर्मों पर उसे उठने लगी, जिसका परिणाम, दुराचार, भ्रष्टाचार तथा अनीति अन्याय के रूप में उनके सामने है जिससे वे पिसे तो जा रहे हैं किन्तु समझने तथा सुधार करने का प्रयत्न नहीं कर रहे हैं।
पैसे और पद की प्रशंसा करना तो लोगों ने अपना धर्म बना लिया है। इसी प्रशंसा से प्रेरित होकर लोग किसी भी उचित अनुचित उपायों द्वारा धन तथा पद पाने का प्रयत्न करने लगे, निदान व्यावसायिक तथा राजनीति के क्षेत्र में अवाँछनीय तत्वों की बाढ़ आ गई। शासन से लेकर अनुशासन तक में रिश्वत तथा घूँसखोरी का बोलबाला हो गया। पैसे एवं पद के प्रशंसक धन तथा पदधारियों की उस अनुचित रीति-नीति तथा गतिविधि की निन्दा नहीं करते जिसको वे लक्ष्य सिद्धि के लिए अपनाते चले जा रहे हैं। इस गलत प्रशंसा की प्रवृत्ति ने समाज के सारे नैतिक अस्तित्व को नष्ट-भ्रष्ट कर के रख दिया है। यह निश्चित है कि जब तक हम सब स्वस्थ प्रवृत्तियों की प्रशंसा तथा अनैतिक एवं अवाँछनीय तत्वों की निन्दा करने में न्याय नहीं करते वे समाज को पतन के गर्त से उठाने में सहायक न हो सकेंगे।
हम सबको चाहिए कि हम अपनी प्रशंसा तथा निन्दा का प्रयोग सही दिशा में करें और जिस प्रकार प्रशंसा एवं निन्दा से किसी को अनुचित रूप से प्रभावित करने से अपने को रोकें उसी प्रकार स्वयं भी प्रभावित होने से बचें। हमारी प्रशंसा तथा निन्दा में बहुत बड़ी प्रेरक शक्ति है उसके उपयोग में त्याग एवं सावधानी बरनता हम सबका नैतिक कर्त्तव्य है, जिसका ध्यान रखना आवश्यक एवं कल्याणकारी होगा।
रवीन्द्रनाथ की गुरु परीक्षा-
विश्व-कवि रवीन्द्रनाथ टैगोर बचपन में जिस समय कलकत्ता के नार्मल स्कूल में पढ़ते थे उस समय वे एक वार्षिक परीक्षा में प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुए।
शिक्षक को सन्देह हुआ कि परीक्षक ने रवींद्रनाथ के साथ पक्षपात किया है। उनके सन्देह का मुख्य कारण यह था कि रवीन्द्रनाथ पढ़ने-लिखने में कभी भी इतने तेज नहीं रहे जिससे कि उनके प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होने की आशा ही नहीं की जा सकती थी।
निदान उन्होंने अपना सन्देह मिटाने के लिए रवीन्द्रनाथ को बुलाया और कहा-बच्चे यह बात ठीक है कि परीक्षा फल के अनुसार तुम प्रथम उत्तीर्ण हुए हो। तथापि मुझे सन्देह है कि परीक्षक ने तुम्हारे साथ पक्षपात किया है। मैं स्वयं तुम्हारी परीक्षा लेकर अपना सन्देह मिटाना चाहता हूँ।
रवीन्द्रनाथ ने तुरन्त उत्तर दिया-बहुत अच्छा श्रीमान जी। मैं स्वयं पक्षपात के आधार पर प्राथमिकता का श्रेय नहीं लेना चाहता। आप अवश्य मेरी परीक्षा ले सकते हैं।
निदान शिक्षक ने स्वयं परीक्षा ली और फिर भी रविन्द्रनाथ को प्रथम पाकर यह विश्वास कर लिया कि फिसड्डी रवीन्द्र ने अब जी लगा कर पढ़ना शुरू कर दिया है।
आवेश एक प्रकार का क्षणिक उन्माद है। पागल व्यक्ति जिस प्रकार कोई काम करते समय उसका परिणाम नहीं सोच पाता, उत्तेजना ग्रस्त मनुष्य का विवेक उसी प्रकार नष्ट हो जाता है। आवेगावस्था में किया हुआ काम कभी ठीक नहीं होता। गलती, भूल और उत्तेजना अथवा क्रोध करने वाला अपने कल्याण की आशा नहीं कर सकता।
लड़ाई-झगड़े, मार-पीट, तोड़-फोड़, तथा सत्य-आत्महत्या आदि जितने भी दुष्ट कार्य हैं सब उत्तेजना के ही प्रतिफल हैं। उत्तेजना का आवेग एक क्षण में ही जीवन भर के प्रेम, मित्रता तथा सदभाव को नष्ट कर देता है। जीवन-भर एक दूसरे को प्राणों से अधिक प्रेम करने वाले पति-पत्नी उत्तेजना के वशीभूत होकर एक-दूसरे से घृणा करने लगते हैं। मित्र एक दूसरे के शत्रु बन जाते हैं उत्तेजना के वशीभूत होकर मनुष्य प्रिय जनों की हत्या कर डालता है और उसी के आवेग से संचालित होकर अपनी वस्तुओं को नष्ट कर डालता है, सम्पत्ति फूँक देता है और आत्महत्या तक कर डालता है।
उस उत्तेजना को पागलपन के सिवाय और क्या कहा जायेगा, जो जीवन-भर के स्नेह तथा सम्पत्ति को नष्ट कर डालती है। जो माता-पिता संतान को इतने लाड़-प्यार से चलाते हैं वे ही कभी उत्तेजना के वशीभूत होकर उसकी हत्या तक कर डालते हैं। क्षणिक उत्तेजना में आकर मनुष्य ऐसे अकरणीय कार्य कर डालते हैं जिसके कारण उन्हें जीवन-भर पछताना पड़ता है। एक क्षण की उत्तेजना मनुष्य को आजीवन दरिद्री बना देती है,जेल भिजवा देती है। आजीवन जेल में सड़ने और फाँसी के तख्ते पर लटकने वाले किसी न किसी आवेग अथवा उत्तेजना के वशीभूत हुये होते हैं। उत्तेजना का वेग समाप्त होने पर स्वयं ही मनुष्य को अपनी गलती अनुभव होने लगती है किन्तु तब उसके पास पश्चाताप के अतिरिक्त और कुछ नहीं रह जाता। एक क्षण की उत्तेजना मनुष्य को आजीवन जलन, आत्मग्लानि अथवा पश्चात्ताप के हवाले कर देती है। जीवन के इस भयानक दुर्भाग्य, उत्तेजना से मनुष्य को सदा सावधान रहना चाहिये।
मन की शाँत अथवा एक संतुलित अवस्था में मनुष्य बहुत-सी अग्रिम बातों को भी अदृष्टिगोचर कर देता है किन्तु उत्तेजनाजन्य असन्तुलन की दशा में वह भ्रम तथा सन्देह मात्र में ही अनर्थ कर डालता है। उत्तेजनाग्रस्त मनुष्य की विवेक बुद्धि नष्ट हो जाती है। उन क्षणों में वह एक पागल की तरह परिणाम सोचे बिना ही काम कर डालता है।
शाँति एवं सन्तुलन ही मनुष्य का सहज गुण है। अपने इसी गुण के कारण वह इतना सृजन सम्पादित कर सका है। उत्तेजना अथवा आवेग उसका प्रकृत स्वभाव रहा होता तो संसार सृजन के स्थान पर खण्डहरों से भरा होता। उत्तेजना मनुष्य का आरोपित विकार है जो किन्हीं ऐसे कारणों से उत्पन्न हो जाता है जिन पर शाँत मन से विचार नहीं किया गया होता है। आज संसार में जहाँ भी विनाश एवं ध्वंस के चिन्ह दिखाई देते हैं वे सब मनुष्य के क्षणिक आवेश अथवा उत्तेजना के ही प्रमाण हैं। हिंसा, द्वोष तथा युद्ध आदि ध्वंसक दोष एकमात्र उत्तेजना के ही परिणाम है। संसार के राष्ट्रनायक एवं शासक जब तक शाँत एवं संतुलित मस्तिष्क से समस्याओं पर विचार करते और उनका समाधान सोचते रहते हैं तब तक शाँति बनी रहती है। किन्तु ज्यों ही वे असन्तुलन अथवा उत्तेजना के वशीभूत होते हैं संसार में विनाश तथा नरसंहार का संवाहक युद्ध का ताण्डव होने लगता है क्षणिक उत्तेजना के फलस्वरूप होने वाले विनाशक युद्ध के बाद जब मनुष्य का उन्माद उतरता है तब वह अपने को भयानक भुखमरी, बेकारी तथा व्याधियों के बीच पाता है। अपनी क्षणिक उत्तेजना का ध्वंसात्मक परिणाम देख कर तब उसके पास पछताने के सिवाय और कुछ नहीं रह जाता। सदियों की संचित, उसकी सारी सम्पदायें नष्ट हो चुकी होती हैं।
किसी द्वन्द्व के समय जो व्यक्ति जितना अधिक शाँत एवं सन्तुलित रहता है, वह उतना ही लाभान्वित होता है। उत्तेजनाग्रस्त व्यक्ति आपे से बाहर होकर अपनी हानि कर लेता है। उसकी उत्तेजना उचित-अनुचित का विचार नहीं करने देती। वह छोटी-सी बात लेकर बड़े-बड़े अनुचित व्यवहार कर डालता है। किसी झगड़े में शाँत एवं अनुत्तेजित रहने वाला ही जीतता है। जन-समुदाय उसके पक्ष में हो जाता है। उत्तेजनापूर्ण व्यवहार करने वाला जनमत को अपने विरुद्ध कर लेता है, अपने बनते हुए काम को बिगाड़ लेता है। उसका जोर-जोर से बोलना, गाली-गलौज करना अथवा आवेश में आकर मारपीट पर उतारू हो जाना उसे सहज ही अपराधी बना देता है और वह बहुधा न्याय का अधिकार खो देता है।
अदालत में उत्तेजित हो जाने वाला वकील अपने मुवक्किल की हानि करता है। आवेशग्रस्त व्यवसायी अपने व्यापार को मन्द कर देता है। असहनशील नौकर अपने मालिक को नाराज करके उन्नति की संभावनायें खो देता है। आवेश वान विद्यार्थी गुरु का आशीर्वाद और गुरु शिष्य की श्रद्धा से वंचित हो जाया करता है। उत्तेजनाग्रस्त मनुष्य हर प्रकार से, हर क्षेत्र में हानि उठाया करते हैं।
उत्तेजनाग्रस्त मनुष्य अपने गौरव, गरिमा तथा गम्भीरता को खो देता है। बात-बात में बिगड़ उठने, झुंझला पड़ने और आपे से बाहर हो जाने वाला व्यक्ति अपने से छोटों का भी आलोचनापात्र बन जाता है। हर आदमी उससे बात करने से बचता है। उत्तेजना हल्के मानसिक धरातल की द्योतक है। हल्की मनोभूमि वाला कटु बात तो दूर बहुधा साधारण से विनोद तक में लड़ने-झगड़ने को तैयार हो जाता है।
उत्तेजना का यह विकार प्रायः अहंकार अथवा निराशा से उत्पन्न हो जाता है। अहंकारी व्यक्ति अपने को अनावश्यक महत्व दिया करता है। वह किसी से बात करते समय इस बात पर ध्यान रखता है कि कोई बात उसकी शान के खिलाफ तो नहीं कहीं जाती है। प्रतिक्षण ऐसा ध्यान रहने से उसे थोड़ी ही देर में कोई-न-कोई ऐसी बात मिल जाती है, जो उसके मनोनुकूल न हो। ऐसी स्थिति में उसे भभकते देर नहीं लगती और वह तत्काल प्रतिवादी से उलझने को तैयार हो जाता है। यद्यपि उत्तेजना प्रधान स्वभाव से व्यक्ति से लोग सावधान होकर ही बातचीत करते हैं और यथासंभव इस बात का प्रयत्न करते हैं कि कोई ऐसी बात न निकल जाये, जिससे अमुक व्यक्ति उत्तेजित हो जाये, तथापि अहंकार के दोष से आवेशी व्यक्ति कोई-न-कोई ऐसा कारण निकाल ही लेता है जिससे उसे अपने अहं को व्यक्त करने का अवसर मिल जाये। अहंकार के कारण उत्तेजित हो उठने वाले को लोग आधा पागल समझते हैं।
निराशा को पश्रय देने वाले व्यक्ति के मस्तिष्क में कटुता आ जाती है जिसके कारण उसे हितकर अच्छी बात भी कभी-कभी बुरी लगती है। अपने विषय में दिए गए उपदेश, व्यक्त की गई सद्भावना तथा प्रस्तुत किया गया परामर्श विष जैसा ही लगता है। अपने हित की बात सुनकर भी आवेशी व्यक्ति उत्तेजित हो उठता है। निराशा से पीड़ित व्यक्ति का मानसिक सन्तुलन बिगड़ जाता है, जिसके कारण उसके हृदय पर अनुकूल बात की प्रतिक्रिया भी प्रतिकूल होती है।
उत्तेजना एक बहुत बड़ी मानसिक कमजोरी है। इसका जन्म क्रोध, आवेग, ईर्ष्या अथवा प्रतिशोध भावना से होता है। आवेशी व्यक्ति का विवेक शिथिल हो जाता है। उसमें उचित-अनुचित का निर्णय करने की क्षमता नहीं रहती। जरा-सी अप्रियता होते ही वह पराकाष्ठा तक उत्तेजित हो उठता है और कभी ऐसी भयानक बात कर डालता है, जिससे उसका सारा जीवन ही असफल हो जाता है। उत्तेजना एक भयानक मानसिक रोग है। इससे बचे रहने में ही मनुष्य का हित है। आवेश जीव-विकास के मार्ग का भयानक रोड़ा है, जिसको मनुष्य स्वयं ही अपने हाथ अटकाया करता है।
आवेश का रोग मनुष्य की जीवन-शक्ति का ह्रास किया करता है। मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि यदि मनुष्य चार-पाँच घण्टे निरन्तर क्रोध में रहे तो उसके शरीर का लगभग 8 औंस रक्त जल जायेगा। उसके शरीर में इतना विष पैदा हो जायेगा, जितना कि दो तोला कुचला खाने से। आवेश प्रधान मनुष्य तो प्रायः दिन भर ही क्रोध से भरा रहता है। ऐसी दशा में उसका कितना रक्त जल जाता होगा इसका अनुमान कर सकना कठिन है। आवेशी व्यक्ति के मस्तिष्क में हर समय एक तनाव तथा एक गुबार भरा रहता है, जो अवसर पाकर दूसरे के साथ प्रकट होता है और यदि उसे ऐसा अवसर नहीं मिलता तो वह स्वयं अपने पर ही खीझा एवं झुँझलाया करता है, उसे स्वयं अपने कामों में ही गलतियाँ दिखाई देती हैं और अपने पर ही खीझ उठता है। मनुष्य की यह मनःस्थिति उसके शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक तथा आत्मिक चारों स्वास्थ्यों के लिए हानिकारक होती है।
संसार में अच्छी-बुरी, प्रिय-अप्रिय कड़ुवी तथा मीठी सभी प्रकार की परिस्थिति आती रहती है। इनको समभाव से सहन करने का अभ्यास उत्तेजना का एक अच्छा उपाय है। किसी से बात अथवा व्यवहार करते हुए अपने अहं भाव को कभी भी ऊपर मत आने दीजिए। अहंकार, आक्रोश तथा आवेग का बहुत बड़ा कारण है। निराशा, चिन्ता, द्वेष, ईर्ष्या तथा प्रतिरोध को प्रश्रय देने से मनुष्य का मानसिक धरातल बड़ा हल्का हो जाता है, जिससे वह साधारण-सी बात पर भी गर्म हो उठता है। उक्त मनोविकारों को अपने आस एक क्षण भी न ठहरने दिया जाये। उत्तेजना से मनुष्य को विषैले सर्प की तरह सावधान रहना चाहिये। एक क्षण की उत्तेजना आजीवन अनर्थ का कारण बन जाती है। मानसिक कष्ट एक कठिनाई को सौ बार सहन करके भी सहिष्णुता का अभ्यास करते रहना, व्यक्ति को शीघ्र ही मनस्वी बना देता है। उसका मन एवं मस्तिष्क सन्तुलित हो जाता है। कुछ ही समय में वह एक अनिवर्चनीय शाँति अनुभव करने लगता है।
जिस प्रकार सहिष्णुता का अभ्यास उत्तेजना का उपचार है, उसी प्रकार आहार संयम भी इस दिशा में बड़ा सहायक होता है। कटु, तिक्त, गरिष्ठ अथवा तामसी भोजन करने से मन-मस्तिष्क में ऊष्मा की वृद्धि हो जाती है, जो जरा-सा कारण पाते ही उत्तेजना के रूप में प्रकट होने लगती है। भोजन का प्रभाव मनुष्य स्वभाव पर अनिवार्य रूप से पड़ा करता है। शाँत, सात्विक तथा साधारण भोजन करने वाले व्यक्ति कम-से-कम उत्तेजित हुआ करते हैं।
अपना हित चाहने वाले व्यक्ति को उत्तेजना उत्पन्न करने वाले वातावरण से सदा दूर ही रहना चाहिए। क्रोधी, आवेशी, ईर्ष्यालु तथा द्वेषी व्यक्तियों का संपर्क भी इस मानसिक विकार का बड़ा कारण है। जिस प्रकार के व्यक्तियों का संग किया जायेगा अथवा जिस प्रकार के वातावरण में रहा जायेगा, स्वभाव स्वभावतः उसी ढाँचे में ढल जायेगा। सदाचारी, शाँत तथा सहिष्णु व्यक्तियों का संपर्क उत्तेजना का प्रतिभाशाली उपचार है।
उद्वेग अथवा उत्तेजना मनुष्य की बहुत बड़ी शत्रु है। यह हर क्षेत्र में नुकसान ही किया करती है। बुद्धिमान व्यक्ति हर उपाय तथा मूल्य पर इसका परित्याग कर दिया करते हैं। उत्तेजना के कारणों को छोड़कर शाँत, सन्तुलित एवं सहनशील बनिए, आप एक मधुर शीतलता के अधिकारी बनेंगे जिससे आपकी आयु, बल तथा सामाजिक प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी, आपकी उन्नति तथा सफलता के तार स्वयं ही अनावृत्त हो जायेंगे और आप एक सुखी जीवन जीने की स्थिति पा लेंगे।
श्रद्धा और सन्तुलन-
श्रद्धा जब सीमा को पार कर जाती है तब वह बाह्य आडम्बर का रूप धारण कर लेती है, सतर्कता जब सीमा का अतिक्रमण कर जाती है तब वह भी भीरुता बन जाती है, शक्ति जब सीमा को पार कर जाती है तब औद्धत्य बन जाती है और निश्छलता जब सीमा से बढ़ जाती है तब वह रूढ़ता का नामाँतर बन जाती है। इस प्रकार किसी भी विषय में मनुष्य मात्रा या सन्तुलन का ज्ञान खो बैठता है तब उसका जीवन सामञ्जस्य-हीन बन जाता है। इसलिए सब प्रकार की अतिशयता का बर्जन करके मनुष्य को मध्यम मार्ग का अनुसरण करना चाहिए।
-कनफ्पूशियस
कहा गया है ‘तन्दुरुस्ती हजार नियामत’, कहा ही नहीं गया बल्कि संसार का प्रत्येक प्राणी ऐसा विश्वास रहता है और चाहता है कि वह अधिक-से-अधिक स्वस्थ रहे। सब कुछ होने पर भी यदि मनुष्य के पास स्वास्थ्य नहीं है, तो समझो उसके पास कुछ है ही नहीं, वह धनवान् होने पर भी गरीब है, सम्पन्न होने पर भी दरिद्र है। जिसके पास स्वास्थ्य है, वह कुछ न होने पर भी भाग्यवान् है।
संसार में ऐसा कौन होगा जो हर प्रकार से स्वस्थ रहने की आकाँक्षा न करता हो। हर व्यक्ति की सर्वोपरि कामना रहती है कि वह स्वास्थ्यपूर्ण दीर्घ जीवन का अधिकारी बने। तब क्या बात है कि लोग अपनी सर्वोपरि इच्छा एवं आवश्यकता के विपरीत विविध प्रकार के रोगों-शोकों से त्रस्त अनारोग्य के दुर्भागी बनते हैं। दीर्घायु की कामना करते-करते अकाल ही में मृत्यु-मुख में चले जाते हैं। प्रकृति ने मनुष्य को एक स्वस्थ जीवन जीने की सारी सुविधायें दी हुई हैं। किन्तु वह इन सुविधाओं का यथा योग्य उपयोग करने में असफल और निराश ही दीखता है। सृष्टि के मनुष्येत्तर प्राणी पशु-पक्षी तक स्वस्थ एवं पूर्ण आयु का उपभोग करते और आनन्द मनाते दृष्टिगोचर होते हैं। पर मनुष्य आह-कराह, रोग-दोष और शोक-सन्तापों से ग्रस्त जीवन में ही मृत्यु की पीड़ा पा रहे हैं। जबकि प्रकृति ने उसे अन्य प्राणियों की अपेक्षा अधिक सुविधायें और बुद्धि दी है। निस्सन्देह मनुष्य का यह दयनीय जीवन कुछ कम खेद का विषय नहीं है।
संसार में बहुत से आदमी हृष्ट-पुष्ट और मोटे-ताजे देखे जा सकते हैं। खाते-पीते, काम करते और हंसते-बोलते ऐसा आभास देते हैं, मानों वे बड़े ही स्वस्थ तथा निरोग हों। किन्तु क्या वे वास्तविक रूप से स्वस्थ होते हैं? उनके पास जाकर पूछिये अथवा उनका परीक्षण करिये तो पता चलेगा कि वे वास्तव में वैसे स्वस्थ नहीं है, जैसा कि होना चाहिए। यदि कोई शरीर से स्वस्थ है तो मन से रोगी है। शरीर रोगों से बचा हुआ है तो ईर्ष्या, द्वेष, काम-क्रोध और कपट के न जाने कितने कीट उसके मन-सुमन को जर्जर कर रहे हैं और यदि संयोग से उसमें यह विकार नहीं है वह शरीर से गया-गुजरा होगा। शारीरिक और मानसिक दोनों से ठीक प्रकार स्वस्थ हों, ऐसे व्यक्ति विश्व में कम ही मिलेंगे। जबकि प्रकृति के अनुसार मानव मात्र को तन और मन दोनों से पूर्ण स्वस्थ होना चाहिए, यही उसकी शोभा है।
इस तन-मन के स्वास्थ्य का प्रश्न एक समस्या बना हुआ है। किन्तु यदि इस पर गहराई से विचार किया जाये तो पता चलेगा कि प्रकृति की ओर से स्वास्थ्य के लिए सारी साधन-सुविधायें मिली होने पर भी अस्वस्थ रहने में मनुष्य का अपना ही दोष है। वह अपने आलस्य, प्रमाद, अज्ञान, अनियमितता, लोलुपता तथा कलुषित प्रवृत्तियों के कारण ही प्रकृति प्रदत्त सुविधाओं का लाभ उठाना तो दूर, उल्टे उससे दण्ड पा रहा है। जहाँ उसे प्रकृति से पुरस्कार पाना चाहिए, वहाँ वह उसके दण्ड का भागी बन रहा है। हमारे लिये पुरस्कार का प्रबंध करने वाले को यदि हमारी हठ जन्य धृष्टता अथवा लिप्सा जन्य अपात्रता के कारण दण्ड देने के लिए विवश होना पड़े तो इससे अधिक लज्जा की बात हमारे लिए और क्या हो सकती है? हम सब मनुष्य हैं, विवेक के अधिकारी हैं, हमें अपनी इस पदवी के अनुरूप ही प्रकृति माता का पुरस्कार पात्र ही बनना चाहिए। जब हम एक स्वस्थ, सुखी तथा दीर्घ जीवन भोगने के लिए संसार में भेजे गये हैं, तब रोगों, दोषों तथा शोक-संतापों द्वारा मार-मारकर अकाल में ही संसार से खदेड़ दिया जाना शोभा नहीं देता। हमें समझना चाहिए कि हम इस सृष्टि में अच्छा जीवन बिताने और कुछ अच्छे काम करने के लिए आये हैं, न कि जीते-जी नरक भोगने के लिए।
यदि वास्तव में हमको इस दयनीय दशा पर क्षोभ है और प्रकृति द्वारा निर्धारित पूर्ण आयु तथा स्वस्थ जीवन अपेक्षित है तो निरुपाय बैठे रहने अथवा जैसे चल रहे हैं, वैसे ही चलते रहने से काम न चलेगा। अपना उद्देश्य पूरा करने और लक्ष्य पाने के लिए उपाय एवं प्रयत्न करना ही होगा।
स्वस्थ जीवन का उद्देश्य प्राप्त करने के लिए हमको कोई कठिन अथवा विशेष उपाय नहीं करना है। केवल अपने भ्रमों तथा भूलों को सुधारना भर ही है और जिनको सुधारना बड़ा ही सुकर है। आहार-विहार तथा आचार-विचार में आवश्यक परिवर्तन भर कर देने से हमारी स्वास्थ्य संबंधी समस्या हल हो जायेगी। अपने रहन-सहन को प्रकृति को अधिकाधिक अनुकूल बना लेना ही वह परिवर्तन है जिसे हमें अपने जीवन-क्रम में लाना है।
आज की सभ्यता तथा आज की मान्यतायें हमें अधिक-से-अधिक खाने-पीने और मौज-मजा लेने की शिक्षा देती हैं। जैसे भी हो अधिक-से-अधिक पैसा कमाओ और जो इच्छा हो खाओ-पिओ। मानव जीवन को सुखी बनाने के लिए नियम, संयम अथवा आचार, विचार की कोई आवश्यकता नहीं है। हमारी इस प्रकार की निरंकुश एवं अनियंत्रित मान्यताओं ने ही इस दयनीय दशा को पहुँचाया हुआ है।
मनुष्य प्रकृति-जन्य प्राणी है, इसलिए उसे अधिक-से-अधिक प्रकृति के निकट रहना चाहिए। इसके विपरीत वह अधिक-से-अधिक बन्द घरों में रहता और तरह-तरह के चुस्त कपड़ों में अपने को छिपाये रहता है। हवा, धूप, शीत, ऊष्मा और आकाश से मानों मनुष्य ने शत्रुता ठान ली है। प्रातःकाल में जब उसे उठकर ऊषा के दर्शन करने चाहिए, तब वह शाल लपेटे हुए बंद कमरे में खर्राटे लिया करता है। जिस समय प्रातःकाल उठकर उसे वायु सेवन तथा उषापान करना चाहिए, उस समय वह चारपाई पर ही चाय, काफी तथा धूम्र आदि का पान किया करता है। जिस समय मनुष्य को रात्रि में चन्द्रमा तथा नक्षत्रों को देखते हुए और आकाश की व्यापकता का चिन्तन करते हुए सोना चाहिए, वह उनसे दूर बंद कमरों में जाकर सोता है।
प्रकृति ने मनुष्य के लिए विभिन्न फलों, वनस्पतियों तथा औषधियों को भोजन के लिए बनाया है। इसके विपरीत वह खाता है- पशुओं का माँस और विविध प्रकार के तत्त्वहीन पकवान। कब खाना चाहिए, कितना और क्या खाना चाहिए, इसका ज्ञान रहते हुए भी अपनी स्वाद-लिप्सा के कारण वह न जाने कितने अखाद्य, असमय एवं अमात्रा में खाता-पीता रहता है। यह सब लक्षण मनुष्य के प्राकृतिक विद्रोह तथा निरंकुशता के लक्षण हैं। इसीलिए वह रोगों का दण्ड पाता है।
जो आहार-विहार सरल तथा सहज है वही वास्तव में प्राकृतिक है और जिस रहन-सहन में हवा, धूप, शीत तथा ऊष्मा का उचित स्थान है वही रहन-सहन प्राकृतिक तथा उपयुक्त है। मनुष्य ऐसे उपयुक्त एवं प्राकृतिक रहन-सहन को अपनाकर शुद्ध आचार-विचार से नियमित खान-पान एवं दिनचर्या के साथ रहे तो कोई कारण नहीं कि वह प्रकृति द्वारा निर्धारित पूरी आयु और स्वास्थ्य का सुख न पा रहे।
शरीर से अधिक विचारों को शुद्ध रखने की आवश्यकता है। सारे नियम निबाहते तथा संयमपूर्वक रहने पर भी जिस मनुष्य के विचार शुद्ध नहीं है वह स्वास्थ्य के अपेक्षित उद्देश्य को कदापि प्राप्त नहीं कर सकता। शारीरिक तथा मानसिक दोनों प्रकार के स्वास्थ्यों पर आचार-विचार का गहरा प्रभाव पड़ता है। जिसके विचार स्वस्थ होगे वह हर प्रकार से स्वस्थ रहेगा।
यूनान के इब्नेर्सिना नामक एक प्राचीन आरोग्य शास्त्री तथा दार्शनिक महात्मा के स्वास्थ्य संबंधी निम्नलिखित पाँच नियम मानव स्वास्थ्य तथा दीर्ष जीवन में लिए मूल मंत्र की तरह ही है। इनका निर्वाह करने वाला व्यक्ति अवश्य ही आरोग्यपूर्ण दीर्घ जीवन प्राप्त कर सकता है-
शरीर से अधिक प्राण-बल की रक्षा करो।
शरीर से पूर्व वातावरण शुद्ध करो।
रोगी को दवा की अपेक्षा निरोग रहने की शिक्षा दो।
खाओ कम और पीओ ज्यादा।
सुविचारों से बड़ी कोई औषधि नहीं।
जिन गुणों के कारण किसी व्यक्ति, समाज अथवा राष्ट्र का वास्तविक सम्मान एवं उत्कर्ष होता है उनमें ईमानदारी का विशेष स्थान है। अंग्रेजी की एक कहावत है- ‘आनिस्टी इज द बेस्ट पालिसी’- (ईमानदारी सर्वश्रेष्ठ नीति है)। इस कहावत से स्पष्टतः ध्वनि आती है कि जो व्यक्ति सत्य, न्याय तथा ईमानदारी का व्यवहार करता है, किसी काम अथवा क्षेत्र में कठिनाई नहीं होनी चाहिए। जो नीतिमान है और जिसकी नीति उत्तम होगी, असफलता उसके भाग में कम-से-कम ही आती है।
मनुष्य की सफलता एवं प्रगति अधिकाँश में समाज की सहायता, सहयोग पर ही निर्भर रहती है। कोई कितना ही गुणवान, बुद्धिमान, विद्वान एवं कार्यकुशल क्यों न हो यदि समाज सहयोग करना छोड़ दें, तो उसके गुण किसी काम न आयेंगे। असहयोग के कारण जब समाज उसके गुणों का मूल्याँकन ही न करेगा तब उसकी उन्नति होना किस प्रकार संभव है?
सचाई और ईमानदारी का आचरण करने वाला विश्वसनीय व्यक्ति होता है। सारा समाज उस पर न केवल विश्वास ही करता है, बल्कि किसी-न-किसी अंश तक श्रद्धा भी करता है। ईमानदार दुकानदार के पास ग्राहक खुद दौड़-दौड़कर जाते हैं। ईमानदार कम्पनियों का माल लोग ढूंढ़-खोजकर खरीदते हैं। ईमानदार मालिक को किसी समय भी मजदूरों की कमी नहीं रहती। ईमानदार मजदूरों को घर पर बुलाकर काम पर लगाया जाता है। ईमानदार नौकर घर का अभिभावक बन जाता है और ईमानदार विद्यार्थी कक्षा की शोभा कहा जाता है। ईमानदारी का आदर होना सहज स्वाभाविक है। यह इतना आकर्षक गुण है कि लोगों को अनायास ही अपनी ओर खींच लेता है। ईमानदारी से सच बोलकर अपना दोष बतला और स्वीकार कर लेने पर अपराधी को क्षमा तक कर दिया जाता है। पिता पुत्र पर कितना ही रुष्ट क्यों न हो, गुरु शिष्य पर कितना ही कुपित क्यों न हो और मालिक नौकर को दण्ड देने के लिये तैयार क्यों न बैठा हो किन्तु यदि वह खेदपूर्वक सच बोलकर अपना अपराध स्वीकार कर लेता है तो कुपित पक्ष तत्काल शाँत हो जाता है और रुष्टता प्रसन्नता में बदल जाती है। सत्याचरण अथवा सत्यवादन पर भी यदि कोई क्रोध अथवा किसी अन्य कारणवश दण्ड दें भी बैठता है तो उसकी अन्तरात्मा दुःखी होती है और कहती है कि दण्ड देकर इस सच बोलने वाले के साथ अन्याय किया है। यह होता है सत्य का प्रभाव एवं आदर। ऐसे दिव्य गुण को त्याग कर जो असत्य अथवा बेईमानी का दोष अपनाता है तो वह एक प्रकार से अभाग्यवान ही कहा जायेगा।
समाज में मिथ्याचारी तथा बेईमान व्यक्ति भी सफल एवं समृद्ध होते देखे जाते हैं। किन्तु उनकी समृद्धि का आधार वह बेईमानी नहीं होती जो उनके हृदय में सर्प की तरह बैठी रहती है, किन्तु वह सचाई और ईमानदारी का आडम्बर होता है, जो वे अपने ऊपर डाले रहते हैं। कपट भी ऊपर से सत्य का आवरण ओढ़कर ही सफल होता है। संसार में कोई ऐसा साहसी बेईमान नहीं है और न हुआ ही है, जो सत्य का आवरण ओढ़े बिना अपने को बेईमान घोषित करके सफलता प्राप्त कर रहा हो। यदि कुछ भावुक अथवा भोले लोग घोषित बेईमान के प्रति सहानुभूति रखेंगे तो केवल उसकी इस ईमानदारी के कारण कि उसने अपने सत्य स्वरूप को सचाई के साथ प्रकट कर दिया है।
सत्य सम्मानित होता है और वह असत्य भी जो ईमानदारी का आवरण धारण किये रहता है। किन्तु अन्तर यह है कि सत्य शाश्वत है और सदा सम्मानित रहता है, असत्य अचिरजीवी है। आवरण हटते ही, जिसे कि शीघ्र हटना ही होता है, अपनी अधम स्थिति में पहुँच जाता है और फिर ‘उघरे अन्त न होइ निवाहू’। कालनेमि जिमि रावण राहू॥’ का सिद्धान्त चरितार्थ होता है। छल-कपट का भेद खलने पर समाज के तिरस्कार, अपवाद, अवहेलना, लाँछना, अपमान, घृणा तथा असहयोग आदि का इतनी दूर तक लक्ष्य बनता है कि आखिर नष्ट होकर ही रहता है। नियमों की परिधि में आ जाने पर तो उसे कारागार तक ही यातना सहनी पड़ती है। इस प्रकार मिथ्याचारी को ऐसी कौन सी दुर्गति है, जो उठानी न पड़ती हो।
बेईमान व्यक्ति की समाज से साख उठ जाती है। उसे पग-पग पर सहयोग के लाले पड़ जाते हैं। जहाँ किसी ईमानदार की हानि पर लोग सहानुभूति से आर्द्र हो उठते हैं और अयाचित ही सहायता-सहयोग का हाथ बढ़ाने लगते हैं वहाँ किसी बेईमान के पतन पर लोग हंसते और मनोरंजन करते हैं। सहायता, सहानुभूति अथवा सहयोग के नाम पर दो लातें लगाना चाहते हैं। निस्संदेह बेईमान इसी व्यवहार के ही योग्य होता है, उसे ऐसा व्यवहार मिलना ही चाहिए।
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। उसकी उन्नति एवं प्रगति परस्पर सहयोग पर ही निर्भर है। इस सहयोग की प्रवृत्ति को चिरस्थायी एवं सक्रिय बनाये रहने के लिये ही धर्म, अध्यात्म, संस्कृति, शासन तथा कानून की व्यवस्था की गई है। अब जो आदमी इनके प्रति ईमानदार रहता है, वह समाज को सुदृढ़ बनाने और उसमें सुख, शाँति एवं सुविधा की परिस्थितियाँ उत्पन्न करने का प्रयत्न करता है। इसके विपरीत जो इनके प्रति बेईमानी बर्तता है, निश्चय ही वह समाज को अव्यवस्थित करने और उसके प्रसन्न प्रवाह में कलह-क्लेश एवं कष्ट-कुत्सा का विष घोलने का अपराध करता है। बेईमान व्यक्ति अपनी दुष्प्रवृत्ति से समाज में अविश्वास का वातावरण उत्पन्न करता है। एक की देखा-देखी दूसरा भी बेईमानी करने पर उतारू होने की सोचता है। कोई एक से धोखा पाकर दूसरे पर अविश्वास करने लगता है। इस प्रकार यह अविश्वास एवं विश्वासघात का विष शीघ्र ही सारे समाज में फैल जाता है और समाज का अधःपतन हो जाता है। विश्वास के अभाव में सहयोग, सहायता एवं सहानुभूति का प्रश्न ही नहीं उठता। तब ऐसी विषम स्थिति में क्या व्यक्तिगत और क्या सामूहिक, किसी प्रकार की उन्नति एवं प्रगति नहीं होती है। प्रगति के अवरुद्ध होते ही समाज में उसी प्रकार की असंख्यों विकृतियाँ जन्म लेने लगती हैं, जिस प्रकार की विकृतियाँ रुके हुए पानी में पैदा होने लगती हैं। आज का भारतीय समाज अप्रगतिशीलता से उत्पन्न न जाने कितनी विकृतियों एवं विकारों का रोगी बना मरणान्तक पीड़ा से तड़प रहा है।
एक समय था जब भारतवर्ष की सचाई और ईमानदारी सारे संसार में विख्यात थी। यह कोई प्राग्ऐतिहासिक काल की बात नहीं है, सम्राट् चन्द्रगुप्त के समय की ही बात है कि लोग अपने घरों में ताले नहीं लगाते थे। लेन-देन में किसी प्रकार की लिख-पढ़ी नहीं की जाती थी। रास्तों में चोर-डाकुओं के भय से चौकी-पहरे की आवश्यकता न होती थी। यह वर्णन इतिहास का सत्य है सो भी उस इतिहास का जो भारतीयों ने स्वयं नहीं लि¹ बल्कि ‘फाहियान’ और ह्वेनसाँग‘ जैसे विदेशी यात्रियों ने अपनी आंख से देखकर लिखी है, जो कि उस काल में भारत का भ्रमण और यहाँ के दर्शन, धर्म और सभ्यता संस्कृ़ति का अध्ययन करने के लिये आये थे। न केवल जनता ही बल्कि शासक सम्राट तक हराम का पैसा ¹ने से घृ़णा किया करते थे। अश्वपति, जनक आदि पौराणिक तथा समुद्रगुप्त विक्रमादित्य, भोज और यहाँ तक कि औरंगजेब व बहादुरशाह जैसे सम्राट परिश्रम पूर्वक पुस्तकें लि¹कर, पं¹ और चटाइयाँ बुनकर तथा टोपी आदि सीकर जन-सामान्य की तरह जो उपार्जित करते थे, उसी से अपने राज परिवार के साथ गुजर-बसर किया करते थे। अनेक राजा तो किसान की तरह अपने हाथ से ¹ती करके जीविका कमाते थे। अपने या अपनों पर जन-कोष की एक पाई ¹र्च करने को वे बेईमानी मानते थे। धरोहर के धन को लोग धर्म की तरह पवित्र मानते थे और अमानत में ¹यानत करना जघन्यतम पाप समझते थे।
भारतवर्ष की सचाई और ईमानदारी इस सीमा तक पहुँची हुई थी। अभी कुछ समय तक ही उत्तराखण्ड के पहाड़ी क्षेत्रों की ईमानदारी, आदर्श का विषय बनी रही। उन क्षेत्रों में मूल्यवान् से मूल्यवान् वस्तु छूट जाने पर महीनों उसी स्थान पर पड़ी रहती थी उठाना तो दूर, कोई उसे देखता तक न था और यदि कोई ऐसा करता था तो न केवल राजदण्ड ही पाता था बल्कि सामाजिक तिरस्कार का भी भाजन बनता था। अपने सत्य और ईमान के कारण तिब्बत को त्रिविष्टिप (स्वर्ग) का महत्व प्राप्त रहा है। किन्तु अभागे बेईमानों ने वहाँ जा-जाकर अपने पापों का अभिशाप फैला दिया है।
जब तक भारत की सचाई और ईमानदारी सुरक्षित रही राजा-प्रजा दोनों उसका आचरण करते रहे, देश में सुख-समृद्धि की वर्षा होती रही। अकाल, भुखमरी और गरीबी देखने में न आती थी। सभी सुखी और सन्तुष्ट रहा करते थे और यही वह स्थिति थी जिसमें विद्वानों, महात्माओं, शूर-वीरों और आदर्श-पुरुषों का आविर्भाव संभव था, जिन्होंने भारत को जगद्गुरु की पदवी से विभूषित कराया।
किन्तु आज खेद है कि आज वही जगद्गुरु की पदवी से विभूषित भारत भिखारी बन गया है। अन्न एवं आश्रय के लिये परावलंबी होकर संदिग्ध जीवन व्यतीत कर रहा है। यह सब इसी असत्य, आडम्बर, बेईमानी का विषफल है, जो भारतीयों के आचरण में जन-सामान्य से लेकर शासन तक और व्यवसायी से लेकर मजदूर तक में प्रवेश हो गई है।
स्वराज्य-प्राप्ति से पूर्व समझा जाता था कि भारतीयों में यह दुर्गुण विदेशी पराधीनता के कारण उत्पन्न हो गया है। स्वतंत्र होते ही वे पुनः अपने पूर्वकालीन सत्याचरण पर आ जायेंगे। किंतु सत्य यह है कि आज स्वाधीनता की स्थिति में यह दोष पराधीनता काल की तुलना में सैकड़ों गुना बढ़ गया है। आज स्थिति यहाँ तक सोचनीय हो गई है कि चोर बाजारी, भ्रष्टाचार, रिश्वत, मिलावट, घट तोल, मुनाफाखोरी, मक्कारी, प्रवश्चना, ठगी आदि को दोष नहीं व्यावसायिक चतुरता एवं कुशलता समझा जाने लगा है। भारतीयों के अल्प पतन ने तो उन्हें हजारों साल गुलाम रखा है, तब यह व्यापक, भयानक एवं सर्वक्षेत्रीय पतन उन्हें किस दुर्दशा में पहुँचा देगा इसकी कल्पना नहीं की जा सकती। यह प्रश्न किसी भी देशभक्त एवं विचारशील व्यक्ति की नींद हरे बिना नहीं रहता। आज व्यावसायिक, धार्मिक, सामाजिक, आध्यात्मिक, शासकीय, प्रशंसनीय जिधर भी दृष्टि जाती है भ्रष्टाचार एवं बेईमानी दिखाई देती है। कुछ समझ में नहीं आता कि इस पतन के लिये उत्तरदायी किसे बनाया जाये?
आज हम सबको अपने अन्दर टटोलकर देखना चाहिए कि हम स्वयं अपने आचार-विचार में कहाँ तक ईमानदार हैं। हमें अपने अन्दर की सारी बुराई स्वयं ही निकालनी होगी और तब ही हम सब सामूहिक रूप से इस पापपूर्ण अभिशाप से मुक्त होकर सुख-शाँतिपूर्ण वह जीवन बिता सकने के योग्य होंगे, जिसको मानवीय जीवन कहा जा सकता है अन्यथा आज का अमानवीय जीवन किसी भी दिन पैशाचिक जीवन में बदलकर हम सबको आदमी से बदलकर न जाने क्या बना देगा?
प्रेम और वासना का अन्तर-
प्रेम और वासना का प्रमुख अन्तर यह है कि प्रेम एक निष्काम, निर्विकार एवं अविकार अनुभूति है, जिसकी पुलक हृदय से आत्मा पर्यन्त व्याप्त रहती है। वह एक-रस और एक-स्थिति मय रहता। किन्तु वासना शरीराकाँक्षिणी होती है। यह परिवर्तनशील तथा सुख-दुःखमय और क्षणिक होती है।
प्रेम एक आकर्षण है और वासना एक पिपासा। प्रेम अपने आलम्बन को अधिक सुन्दर, अधिक चिरजीवी और पवित्र बनाता है। किन्तु वासना उसको असुन्दर, अल्पजीवी और अपवित्र बनाती है, प्रेम पोषक और वासना-शोषक तत्व है। प्रेम अपने पात्र को अमर बना कर जहाँ स्वयं भी अमरत्व प्रदान करता है, वहाँ वासना उसको मृत्यु का अभिशाप दें कर स्वयं भी मृत्यु का आलिंगन कर लेती है। प्रेमपूर्ण ईश्वरीय तत्व और वासना अनाध्यात्मिक कलुष।
-स्वामी विवेकानन्द
क्या तीसरा विश्व-युद्ध निकट ही है?
इस समय मनुष्य जाति बड़े संकट और भय की अवस्था में होकर गुजर रही है। हम पिछले-2 महायुद्ध देख चुके हैं, जिनमें करोड़ों लोग मारे गये और हजारों अरब की सम्पत्ति का नाश किया गया। अब युद्धशील राष्ट्रों की मारक और नाशक शक्ति पहले की अपेक्षा बहुत बढ़ गई है। उस समय जो काम एक वर्ष में हो सकता था, वह अब एक महीने में ही हो सकता है। अणु शक्ति के अस्त्र और दूरगामी राकेटों ने ऐसी स्थिति उत्पन्न कर दी है कि यदि कोई युद्धोन्मादी राष्ट्र चाहे तो दो दिन में चौथाई दुनिया को तहस-नहस कर सकता है। इस महाविनाशकारी शक्ति का ख्याल रखते हुए जब हम तीसरे महायुद्ध की निकटवर्ती संभावना का समाचार पढ़ते हैं तो हृदय में अकस्मात् एक अभूतपूर्व आतंक का संचार हो जाता है।
संसार की राजनैतिक समस्यायें भी आजकल इतनी अधिक उलझनपूर्ण बन गई हैं कि कौन देश किसका मित्र और किसका शत्रु है, यह कह सकना बड़े-बड़े जानकारों के लिए भी कठिन है। अभी तक संसार के दो विरोधी शिविरों के नेता-अमरीका और रूस माने जाते हैं और इन्हीं दोनों के पास सबसे अधिक अणु-अस्त्र है। अमरीका के सैन्य विशेषज्ञ कई बार कह चुके हैं कि हमारे पास इतनी सामग्री है कि पूरी दुनिया को दो-चार दिन में ही नष्ट कर सकते हैं। लगभग ऐसा ही दावा रूस भी दूसरे शब्दों में करता रहा है, और इसमें संदेह नहीं कि यदि अणु-अस्त्रों का खुलकर मनमाना उपयोग किया गया, तो दुनिया के आधे आदमी दो-चार दिन में और शेष दो-चार महीने में समाप्त हो जायेंगे। इसके बाद जो व्यक्ति किन्हीं छोटे टापुओं या ध्रुव प्रदेश में बच जायें तो उनकी संख्या कुछ हजार या लाख से अधिक नहीं हो सकती।
पिछले कुछ वर्षों में कई बार ऐसे अवसर आ चुके हैं जबकि विश्वयुद्ध की स्थिति बिलकुल निकट आ गई थी। वियतनाम की छोटी-सी लड़ाई के कारण ही अमरीका अपने अणुबमों को एक-दो बार हवाई जहाजों में रखकर प्रयोग करने को तैयार हो चुका है। पर जैसा हम बतला चुके हैं कि इन शस्त्रों का प्रभाव ऐसा सर्वनाशक और भीषण है कि उसका अन्तिम परिणाम सोचते हुए सबका कलेजा काँपता है। इसलिए बार-बार मौका आने पर भी वह किसी-न-किसी तरह टल जाता है।
पर कहावत कि ‘बकरे की माँ कब तक ¹खेर मनायेगी’ ये युद्ध की धमकियाँ और आशंकायें कब तक टलती रहेंगी। जब तक झगड़े के झूठे या सच्चे कारण मौजूद हैं और दिलों के भीतर जहर भरा हुआ है, तब तक किसी भी दिन इस मनुष्य निर्मित ज्वालामुखी फूटने का दृश्य दिखाई पड़ सकता है। यद्यपि विश्वव्यापी घटना के लिए कुछ भी कर सकना एक सामान्य मनुष्य की सीमा से बाहर की बात है और इसलिए उससे चिन्तित होना भी निरर्थक है, तो भी ऐसा समय कब तक आ सकता है इसे जानने की- इस संबंध में कुछ अनुमान करने की उत्सुकता होना अस्वाभाविक नहीं।
इन विचारों के उठने का कारण इसराईल राष्ट्र के एक आत्मदर्शी विद्वान् प्रो.- हरार की भविष्यवाणी है, जो आजकल ही समाचार-पत्रों में छपी है। यों तो ‘भविष्य वक्ताओं’ की हमारे और दूसरे देशों में कमी नहीं है। हमारे यहाँ तो ला¹ो पेशेवर भविष्य बतलाने वाले (ज्योतिषी) मौजूद हैं, फिर भी प्रो. हरार इस श्रेणी से ऊंचे हैं। वे उन लोगों में से हैं जिसके लिए कहा जाता है कि ईश्वर ने उन्हें पूर्वजन्मों के सत्कर्म के फलस्वरूप भविष्यों को देख सकने और उससे कुछ निश्चित निष्कर्ष निकालने की शक्ति प्रदान की है। उनकी अनेक महत्वपूर्ण भविष्यवाणियाँ अभी तक सत्य सिद्ध हो चुकी हैं। प्रो. हरार ने हिटलर की मृत्यु का दिन पहले ही बतला दिया था और दो भूकम्पों तथा एक विनाशकारी समुद्री तूफान की सूचनायें भी पहले से ही दें दी थीं। अब आगामी 4 वर्षों के लिए उन्होंने जो कुछ कहा है, उसका साराँश संक्षेप में यह है-
1. राष्ट्रपति जान्सन अमरीका के 1968 के चुनाव में पराजित होंगे।
2. वियतनाम का युद्ध 1969 में समाप्त हो जायेगा जिसमें अमरीका सफल होगा।
3. सन् 1968 में मिश्र के राष्ट्रपति नासिर की हत्या कर दी जायेगी।
4. 1969 में अरबों तथा इसराईल के बीच युद्ध छिड़ेगा जिसमें दोनों को काफी हानि हो जाने के पश्चात् संधि हो जायेगी।
5. सन 1970 में रूस और चीन के बीच मंगोलिया और साइबेरिया के प्रश्न पर युद्ध होगा जिसमें अणु-अस्त्रों प्रयोग किया जायेगा और जिसका प्रभाव समस्त एशिया पर पड़ेगा।
6. 1970 में ही एक भीषण तूफान आयेगा जिससे सीरिया, लेबनान, जोर्डन और अधिकाँश इसराइल नष्ट हो जायेगा।
प्रो. हरार ने इन भविष्यवाणियों को अनेक साक्षियों के सामने किया है और इनका टेप रिकार्ड भी भर लिया गया है।
प्रो. हरार ने केवल रूस और चीन के युद्ध का जिक्र ही किया है जो सम्भवतः उनके सीमा संबंधी विवाद से संबंधित होगा। यह झगड़ा इस समय भी चल रहा है और एकाध बार मामूली लड़ाई भी हो चुकी है। यह असंभव नहीं कि सन् 1970 तक यह अधिक उग्र रूप धारण कर ले। पर वर्तमान परिस्थिति का विश्लेषण करने से हमको प्रतीत होता है कि यदि यह लड़ाई सन् 1970 में आरंभ भी हो गई, तो भी इसकी वृद्धि और विस्तार धीरे-धीरे ही होगा और 5-7 वर्ष में विश्वव्यापी रूप धारण करके निर्णायक स्थिति में पहुँचेगी। इस संबंध में अमरीका की प्रसिद्ध संत महिला जीन डिक्सन का भविष्य कथन भी जो डेढ़-दो वर्ष पहले प्रकाशित हुआ था, काफी महत्वपूर्ण है। यह महिला भारतवर्ष के बटवारे, महात्मा गाँधी के मारे जाने, कैनेडी की हत्या आदि प्रमुख घटनाओं की ठीक भविष्यवाणी करके लोगों को चकित कर चुकी है। आगामी संकट के विषय में उसकी सम्मति इस प्रकार हैं-
‘कुछ समय बाद चीन रूस पर आक्रमण करेगा। आरंभ में यह युद्ध सीमा-संघर्ष जैसा रहेगा, तुरन्त ही विश्वयुद्ध के रूप में नहीं बदलेगा, पर आगे चलकर यही समस्या बढ़ते-बढ़ते विश्वयुद्ध का रूप धारण कर लेगी, जिसमें रूस और अमरीका मिलकर चीन के विरुद्ध लड़ेंगे। यह विश्वयुद्ध 1980 तक होगा। इसकी आग में सारी दुनिया के लोगों को झुलसना पड़ेगा। यह ऐसा भयंकर होगा कि वर्तमानकालीन साधन-सामग्रियों को ही नष्ट नहीं कर देगा वरन् मनुष्यों के विचारों, मान्यताओं, आदर्शों एवं रहन-सहन को भी बदलकर रख देगा। तब तक नवीन उत्कृष्ट, आध्यात्मिकता पर आधारित सभ्यता का विकास होगा जिसमें विश्वशाँति अक्षुण्ण रहेगी।’
मैक्सिको के एक ज्योतिषी-’अमाया अरथ’ ने भी 1971 तक विश्व का सूत्रपात होने की भविष्यवाणी की है। उसका कहना है कि यह समय इस शताब्दी में सबसे अधिक विनाशकारी होगा। 1971 के प्रथम रविवार को मैक्सिको नगर पूर्णतः नष्ट हो जायेगा।
आज राजनीति का तो दिवाला निकल चुका है। बड़े-बड़े, अधार्मिक लोगों के हाथ में जाकर निस्तेज हो गये हैं। अब तो सिर्फ एक हृदय-धर्म ही बचा है, जो हमें माता की गोद में मिलता है। बाकी सम्पत्ति-शास्त्र अर्थशास्त्र का नाम धारण कर अनर्थ कर रहा है। इस हृदय-धर्म को ग्रहण करें, तभी दुनिया का उद्धार है।
-काका कालेलकर
भविष्यदर्शी ही नहीं संसार के प्रमुख राजनीतिज्ञ भी भावी संकट की सूचना बराबर देते रहते हैं। स्वर्गीय पं. जवाहर लाल नेहरू कई बार विश्वयुद्ध की संभावना को प्रकट कर चुके थे और इसी आधार पर वह विश्व-शाँति को यथासंभव कायम रखने के लिए तरह-तरह से चेष्टा करते रहते थे। चीन के कर्ता-धर्ता माओत्से तुँग ने दो वर्ष पहले रूस के नेताओं से बातचीत के दौरान में कहा था कि ‘चीन अब भी अपने इस विश्वास पर अटल है कि आगामी दस-पन्द्रह वर्षों में विश्वयुद्ध होना अनिवार्य है’। अब जब कि स्वयं चीन ही इस महा अभियान का होता बनने को कमर कस रहा है, तो उसके टल सकने की आशा की जा सकती है।
गायत्री की उच्चस्तरीय साधना-
गायत्री महामन्त्र की सामान्य स्तरीय साधना स्नान, पूजन, जप आदि क्रिया-कलापों से आरंभ होती है। जिनने आध्यात्म मार्ग में प्रारंभिक कदम उठाये हैं, उनके लिये कर्मकाँड का अवलम्बन आवश्यक है। इस स्तर के साधक जब सामने आते हैं, तब उनकी मनोभूमि के अनुरूप यही बताया जाता है कि-’वे शरीर और वस्त्रों को शुद्ध कर, पवित्र आसन बिछाये, जल और अग्नि का सान्निध्य लेकर बैठे। जल-पात्र पास में रख लें और अगरबत्ती या अग्नि जला लें। गायत्री माता की प्रतिमा, साकार होने पर चित्र के रूप में और निराकार होने पर दीपक के रूप में स्थापित कर लें जिससे माता का सान्निध्य प्राप्त होता रहे। इस स्थापना की पुष्प, गंध, अक्षत, नैवेद्य जल आदि से पूजा-अर्चा करें। पवित्रीकरण, आचमन, शिखाबंधन, प्राणायाम, न्यास, पृथ्वी पूजन इन षट्-कर्मों से शरीर, मन और स्थान पवित्र करके माला की सहायता से जप आरंभ करें। ओष्ठ, कण्ड, जीभ चलते रहें, पर ध्वनि इतनी मन्द हो कि पास बैठा हुआ व्यक्ति उसे ठीक तरह सुन-समझ न सके। माला घुमाने में तर्जनी अंगुली काम में नहीं आती। जब जप पूरा हो जाये तो स्थापित जल-पात्र से सूर्य भगवान को अर्ध प्रदान करे।’ सामान्य साधना का इतना ही विधान है। इसे करने के लिए साधना-मार्ग पर चलने वाले आरंभिक साधकों को निर्देश दिया जाता है।
क्रिया-कृत्य में-कर्मकाण्ड में जब मन लगने लगे और यह विधि-विधान अभ्यास में आ जाए, उपासना में श्रद्धा स्थिर हो जाये और मन रुचि लेने लगे तब समझना चाहिए कि आरंभिक बाल-कक्षा पूरी हो गई और अब उच्चस्तरीय प्रौढ़ साधना की कक्षा में प्रवेश करने का समय आ गया।
प्रौढ़ साधना में भावना स्तर का विकास करना होता है। प्रथम साधना में व्यथा का अभ्यास-नियमितता का स्वभाव बनाना होता है। नियत समय-नियत संख्या-नियत विधि-व्यवस्था-यह तीन आधार प्राथमिक साधन के हैं। उनका अभ्यास में ढाल लेना भी कोई कम महत्व की बात नहीं। देखा जाता है कि उपासना करने वाले का समय व्यवस्थित नहीं होता। आलस और गपशप में, व्यर्थ की बातों में समय गंवाते रहते हैं और उपासना के समय में घंटों का हेरफेर कर देते हैं। औषधि सेवन का और व्यायाम का एक नियत समय होता है। नियत मात्रा, संख्या का भी ध्यान रखना होता है। कभी व्यायाम सवेरे, कभी दोपहर को, कभी रात को किया जाये- कभी 5 बैठक कभी 60 बैठक और कभी-कभी 200 लगाई जायें तो वह व्यायाम उपयोगी न हो सकेगा। इसी प्रकार औषधि-सेवन भी कभी रात में, कभी दिन में, कभी दो-पहर-कभी रत्ती भर, कभी तोला भर, कभी छटांक भर मात्रा खाई जाये तो उससे रोग निवृत्ति में कोई सहायता न मिलेगी।
प्रारंभिक साधकों को जप की चाल नियमित करने के लिए माला का आश्रय लेना पड़ता है। साधारणतया 1 घंटे में 10 माला की उच्चारण गति होनी चाहिए। इसमें थोड़ा अन्तर हो सकता है, पर बहुत अन्तर नहीं होना चाहिए। घड़ी और माला का तारतम्य मिलाकर जप की चाल को व्यवस्थित करना होता है। चाल तेज हो तो धीमी की जाये, धीमी हो तो उसमें तेजी लाई जाये। इस नियंत्रण में उच्चारण क्रम व्यवस्थित हो जाता है। सन्ध्याकाल जप के लिए नियत है। सूर्योदय एवं सूर्यास्त का काल एक नियमित समय है। इसमें थोड़ा आगे-पीछे किया जा सकता है, पर बहुत अन्तर नहीं होना चाहिए। बात ऐसी नहीं कि अन्य काल में करने से कोई नरक को जायेगा या माता नाराज हो जायेगी। बात इतनी भर है कि समय नियत-नियमित होना चाहिए। नियमितता में बड़ी शक्ति है। जिस प्रकार चाय सिगरेट की अपने समय पर ‘भड़क’ उठती है, वैसी ही भड़क नियत समय पर उपासना के लिए उठने लगे तो समझना चाहिए कि उस क्रम व्यवस्था ने स्वभाव में स्थान प्राप्त कर लिया। नियत विधि व्यवस्था, नियत स्थान, नियत क्रम, नियत सरंजाम जुटाने के लिये जब हाथ नेत्र अभ्यस्त हो जायं तो समझना चाहिये कि प्रारंभिक कक्षा का साधना क्रम पूर्ण हो गया। जब तक ऐसी स्थिति न आये तब तक पूर्वाभ्यास ही जारी रखना होता है। अनुभवी मार्ग-दर्शन, साधकों को तब तक इस प्राथमिक उपासना में ही लगाये रहते हैं जब तक वे समय, संख्या और व्यवस्था इन तीनों क्षेत्रों में नियमित नहीं हो जाते-कर्मकाण्ड-विधि विधान-साधना क्षेत्र का प्रथम सोपान है।
उच्चस्तरीय साधना का प्रमुख प्रयोजन है, भावनात्मक विकास, विचारणा एवं चेतना का परिष्कार। इसके लिए आवश्यक कर्मकाण्ड विधि विधान जारी तो रहते हैं पर सारा जोर इस बात पर दिया जाता है कि तन्मयता एवं एकाग्रता बढ़े। आमतौर से साधकों का मन जहाँ-तहाँ भागता फिरता है, चित्त स्थिर नहीं रहता, उपासना के समय न जाने कहाँ-कहाँ के विचार आते हैं। यह स्थिति आत्मिक विकास में प्रथम बाधा है। पातञ्जलि योग दर्शन में चित्त वृत्ति के निरोध को ही योग कहा गया है। चित्तवृत्तियाँ चेतन रहें, मन जहाँ-तहाँ दौड़े तो योग कैसे सधे? आन्तरिक विकास कैसे हो?
इस समस्या का समाधान करने के लिए उच्चस्तरीय साधना में प्रथम प्रयत्न यह करना पड़ता है कि मन की एकाग्रता हो और हृदयगत तन्मयता बढ़े। यह प्रयोजन पूरा हो जाने पर तीन चौथाई मंजिल पूरी हुई समझनी चाहिए। उच्चस्तरीय साधना की पूर्णांध इसी पर आधारित है। उत्तरार्ध में वे विशिष्ट साधनायें करनी पड़ती हैं जो 1. प्राण शक्ति की प्रखरता, 2. शारीरिक तपश्चरण, 3. मानसिक एकाग्रता, 4. भावनात्मक तन्मयता एवं 5. उग्र मनोबल के आधार पर विशिष्ट विधि-विधानों के साथ पूरी की जाती हैं। षट् चक्रों के वेधन, ब्रह्म ग्रंथि, विष्णु गं्रथि, रुद्र ग्रन्थि का नियोजन, कुण्डलिनी जागरण, सहस्रार कमल का प्रस्फुरण, देव तत्वों का आमरण जैसी महत्वपूर्ण साधनायें केवल वे लोग कर सकते हैं जो मन क्षेत्र में एकाग्रता तथा तन्मयता की मंजिल पार कर चुके हैं। दूर दर्शन, दूर श्रवण, दिव्य दृष्टि, शरीर का हलका या भारी बनाना परकाया प्रवेश, प्राण प्रत्यावर्तन, कायाकल्प, अनुपस्थित वस्तुओं की उपलब्धि, व्यक्तित्वों का परिवर्तन, परिस्थितियों का मोड़-तोड़, शाप वरदान आदि अगणित प्रकार की ऋद्धि-सिद्धियाँ जिस स्तर पर प्राप्त होती हैं उसे प्राप्त करने के लिए वैसी उच्चस्तरीय भूमिका आवश्यक है, जैसी कि उपासना का उच्चस्तरीय उत्तरार्ध पूरा करने वालों को उपलब्ध होती है। ऐसे लोगों में कई प्रत्यक्ष विशेषतायें देखी जाती हैं, उनका शरीर चन्दन, गुलाब जैसी सुगंधियों से गंधमान रहता है और उनकी देह स्पर्श करने से बिजली के करेंट से लगने वाले झटके जैसा स्पन्दन अनुभव होता है। गाय और सिंह एक घाट पानी पीने वाले दृश्य ऐसे ही लोगों के समीपवर्ती वातावरण में देखे जाते हैं। अंगुलिमाल और बाल्मीक जैसे दस्यु, अम्बपाली जैसी वारवनिता जैसे निम्नस्तरीय व्यक्तित्व ऐसे ही लोगों के सान्निध्य में उच्चस्तरीय बनते हैं।
ऊपर वाली ऊंची भूमिकाएं अनायास ही नहीं आ जाती, उन्हें छलाँग मार कर प्राप्त नहीं किया जा सकता। छुटपुट कामयाबी की पूर्ति के लिए साधारण, सकाम अनुष्ठान काम चलाऊ परिणाम उपस्थित कर देते हैं। यह एक प्रकार के सामाजिक उपचार हैं। दर्द बंद करने के लिये कोई नशीली औषधि तत्काल चमत्कारी लाभ दिखा सकती है। पर जिस दर्द को उसके कारणों समेत समूल नष्ट करना हो उसे स्वास्थ्य सुधार की सारी प्रक्रिया आहार बिहार के संशोधन सहित आरंभ करनी होगी, और दीर्घ काल तक उस मंजिल पर सावधानी के साथ चलते रहना होगा। ठीक यही बात उपासना के संबंध में है। तात्कालिक संकट निवृत्ति के लिए कोई बीज मंत्र अनुष्ठान, यज्ञ या क्रिया कृत्य काम दें सकता है पर जिस आधार पर मानव जीवन को समग्र रूप में कृतकृत्य बनाया जा सके, ऐसी साधना जो मंजिल दर मंजिल चलने की ही हो सकती है। दूरदर्शी साधक धैर्यपूर्वक उसी आधार का श्रद्धापूर्वक अवलम्बन करते हैं।
इन पृष्ठों में उसी प्रकार का प्रशिक्षण किया जा रहा है। अखंड-ज्योति परिजनों में से अधिकाँश ऐसे हैं जिन्हें उपासना मार्ग पर चलते हुए कुछ समय हो गया। भले ही उनका क्रम व्यवस्थित न रहा हो, पर इस दिशा में उनके कुछ कदम जरूर उठे हैं। ऐसे लोग भावनात्मक, इस उच्चस्तरीय प्रशिक्षण के उपयुक्त होंगे। जिन्होंने एक कदम भी इस ओर नहीं उठाया है, उन्हें कुछ समय कम से कम तीन महीने अपनी उपासना प्रकृति व्यवस्थित करने में लगाने चाहिएं। इस संदेश में पिछले पृष्ठों पर आवश्यक चर्चा की जा चुकी है। बिलकुल नए साधकों के लिये प्रारंभिक कदम उसी आधार पर उठाने चाहिये और जब ‘नियमितता’ की बात कभी उत्तीर्ण हो जाए तब फिर भावनात्मक उत्कर्ष के उच्चस्तरीय साधना क्रम में सम्मिलित हो जाना चाहिये। देर से जो लोग उपासना करते चले आ रहे हैं पर जो अभी तक नियमित नहीं हो गये उन्हें भी गिनती भूलजाने पर नये सिरे से गिनने का क्रम आरंभ करना चाहिए। यदि लगन सच्ची है और इस मार्ग पर चलने का दृढ़ संकल्प किया गया हो तो ‘नियमितता’ का प्रारंभिक अभ्यास तीन महीनों में भी पूरा हो सकता है।
हमें पाँच वर्ष तक अपने वर्तमान कार्यक्रम चलाने हैं। इसके लिए जन-मानस का भावनात्मक नव निर्माण करने के लिये गत गीता जयन्ती (23 दिसम्बर 66) से ज्ञान यज्ञ का विधिवत शुभारंभ किया है। अब उसका दूसरा चरण-साधना सत्र इस बसंत पंचमी (14 फरवरी 67) से आरंभ कर रहे हैं। हमारे निर्देश, प्रोत्साहन, मार्ग दर्शन एवं सहयोग से जो भी व्यक्ति गायत्री उपासना करते रहे हों या नये सिरे से करने के इच्छुक हों उन्हें इस शुभ मुहूर्त से अपनी साधन व्यवस्था सुव्यवस्थित कर लेनी चाहिये। इसे आरंभ को यह मान कर करना चाहिए कि इसे पाँच वर्ष तक जारी रखेंगे। हर वस्तु समय पर अपना फल देती है। यों शुभ कार्य का प्रारंभ भी तत्काल आनंद उल्लास की एक किरण प्रदान करता है और सन्मार्ग पर चलने की प्रत्यक्ष अनुभूति नकद धर्म की तरह अविलम्ब होती है, फिर भी किसी तथ्य के समुचित विकास में कुछ समय तो लगता ही है। आम के पेड़ पाँच वर्ष में फल देते हैं। उच्चस्तरीय साधना के परिपाक में इतना समय तो चाहिए ही। हम पाँच वर्ष बाद जब अपनी स्थूल प्रवृत्तियों को पूर्णाहुति करेंगे तब तक बसंत पंचमी से साधना क्रम आरंभ करने वालों की वह स्थिति बन जानी चाहिए जिससे हमें भी सन्तोष मिले, और साधना पथ के पथिक को भी अपना निर्धारित लक्ष प्राप्त होने की स्थिति बिल्कुल समीप दृष्टिगोचर हो सके।
शुभारंभ के लिए इस बसंत पंचमी को प्रत्येक गायत्री उपासक एक दिन का उपवास करे, दूध फल लेकर रहे। पूजा के पुराने उपकरणों को बदल कर नए सिरे से नवीन वस्तुएं सुसज्जित करें। जिनके घर में पूजास्थली न हो वे एक चौकी पर गायत्री माता का चित्र तथा पूजा के अन्य उपकरण सजा लें। स्थान ऐसा चुनें जहाँ कम से कम खटपट रहती हो और जिसे बार-बार बदलना न पड़े। बन पड़े तो उस दिन घी का अथवा तिल के तेल का अखण्ड दीपक एक दिन के लिये जलाया जाए। 14 को प्रातः जला कर 15 को प्रातः उसे बुझ जाने दिया जाए। पुष्पों से पूजा स्थली सजाई जाए।
उस दिन सूर्योदय से पूर्व उठ कर नित्य कर्म से निवृत्त होकर पूजास्थली पर शाँत चित्त से बैठें और मन ही मन इस प्रतिज्ञा को दैव प्रतिमा के सम्मु¹ दुहराएं कि- ‘मैं नियमित और व्यवस्थित उपासना करूंगा। लकीर नहीं पीटूँगा वरन् साधना से भावनाओं का समावेश कर के उसे सर्वांगपूर्ण बनाऊंगा। मेरी उपासना आत्मिक प्रगति में सार्थक रूप से सहायक हो ऐसा सच्चे मन से प्रयत्न करूंगा। माता मेरी इस प्रतिज्ञा को सफल बनाने में सहायता करे।’ आधा घंटा इस संकल्प को ही मनन-चिन्तन किया जाए। अन्त में 108 गायत्री मंत्र माला की सहायता से अथवा उंगलियों पर गिन कर पूरे किए जाएं। अन्त में 24 आहुतियों का हवन किया जाए। यदि हवन का विधान न मालूम हो और संकल्प सामग्री न हो तो 24 घी की आहुतियाँ गायत्री मंत्र से दी जा सकती हैं। अन्त में आरती उतार ली जय और सूर्य भगवान को जल का अर्ध दिया जाए। यह विशेष विधि इस बसंत पंचमी को करने की है। साधारण नित्य-कर्म जिस प्रकार चलता हो उसे तो उसी प्रकार चलने देना चाहिए। इस प्रकार जो साधक उच्चस्तरीय साधना का नये सिरे से शुभारंभ करें, वे अपने संकल्प की सूचना हमें दें दें ताकि उनके साधना क्रम को सफल बनाने के लिए विशेष रूप से सहयोग देते रहने का एक नियमित क्रम यहाँ से भी चलाया जाता रहे।
प्रस्तुत साधना क्रम को अवलम्बन तो रखा जायेगा पर आधार ध्यान को बनाया जायेगा। इस प्रक्रिया में ध्यान प्रधान हो जायेगा और जप गौण। प्रारंभिक बाल कक्षा में अक्षर लिखना प्रधान कार्य रहता है और पुस्तक पढ़ना गौण माना जाता है उसी प्रकार नियमितता के प्रारंभिक अभ्यास की प्राथमिकता साधना में जप संख्या को प्रधानता दी जाती है। ध्यान के लिए थोड़ा-सा आधार इतना ही रहता है कि गायत्री माता का स्वरूप चित्र या प्रतिमा के रूप में सामने रखकर इसका दर्शन अधखुले नेत्रों से करते रहा जाये ताकि वह स्वरूप ध्यान का आधार बन सके। उच्चस्तरीय साधना में यह क्रम बदल जाता है। ऊंची कक्षाओं के छात्रों में पढ़ना अधिक होता है और लिखना कम। इसी प्रकार उच्चस्तरीय साधना में ध्यान को प्रमुखता देनी पड़ती है। जप को नित्य-कर्म की संज्ञा में रखकर उसे चालू तो रखा जाता है। समय भी उसी पर अधिक लगाया जाता है। इस स्तर की साधना में जप संख्या न्यूनतम एक माला (108 मंत्र) और अधिकतम 5 माला (540 मंत्र) पर्याप्त है। शेष जितना भी समय बचता हो ध्यान में लगाया जाना चाहिए।
इस वर्ष गौरक्षा के लिए एक माला ही बीज समेत जो सज्जन कर रहे हैं उसे वे एक सामयिक कर्त्तव्य समझ कर दैनिक जप के अतिरिक्त ही किया करें। उसे नियमित उपासना में न गिनें।
ध्यान के लिए जितना समय निर्धारित किया जाये, उसका 1. एक तिहाई वातावरण का 2. एक तिहाई भाग उपासक का अपना और एक तिहाई भाग उपास्य का-गायत्री का ध्यान करने में लगाया जाए। साधारणतया आधा घंटा इसके लिए रह जाना चाहिए। इसमें से 10-10 मिनट प्रस्तुत तीनों ध्यान करने में लगायें।
प्रलय के समय बची हुई अनन्त जलराशि में कमल के पत्ते पर तैरते हुए बाल भगवान का चित्र बाजार में बिकता है। यह चित्र खरीद लेना चाहिए और उसी के अनुरूप अपनी स्थिति अनुभव करनी चाहिए। इस संसार के ऊपर नील आकाश और नीचे नील जल के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं। जो कुछ भी दृश्य पदार्थ इस संसार में थे वे इस प्रलय काल में ब्रह्म के भीतर तिरोहित हो गई। अब केवल अनन्त शून्य बना है जिनमें नीचे जल और ऊपर आकाश के अतिरिक्त और कोई वस्तु शेष नहीं। यह उपासना भूमिका के वातावरण का स्वरूप है। पहले इसी पर ध्यान एकाग्र किया जाये।
दूसरा ध्यान जो एक तिहाई समय में किया जाता है, यह है कि मैं कमल पत्र पर पड़े हुए एक वर्षीय बालक की स्थिति में निश्चिन्त भाव से पड़ा क्रीड़ा-कल्लोल कर रहा हूँ। न किसी बात की चिन्ता है, न आकाँक्षा और न आवश्यकता। पूर्णतया निश्चिन्त, निर्भय, निर्द्वन्द्व, निष्काम जिस प्रकार छोटे बालक की मनोभूमि हुआ करती है, ठीक वैसी ही अपनी है। विचारणा का सीमित क्षेत्र एकाकीपन के उल्लास में ही सीमित है। चारों और उल्लास एवं आनन्द का वातावरण संव्याप्त है। मैं उसी की अनुभूति करता हुआ परिपूर्ण तृप्ति एवं सन्तुष्टि का आनन्द ले रहा हूँ।
तीसरा ध्यान सविता ब्रह्म के गायत्री स्वरूप का दर्शन करने का है। प्रातःकाल जिस प्रकार संसार में अरुणिमा युक्त स्वर्णिमा आभा के साथ भगवान सविता अपने समस्त वरेण्य, दिव्य भर्ग ऐश्वर्य के साथ उदय होते हैं उसी प्रकार उस अनन्त आकाश की पूर्व दिशा में से ब्रह्म की महान शक्ति गायत्री का उदय होता है। उसके बीच अनुपम सौंदर्य से युक्त अलौकिक सौंदर्य की प्रतिमा जगद्धातृ गायत्री माता प्रकट होती है। वे हंसती-मुस्कराती अपनी ओर बढ़ती आ रही हैं। हम बालसुलभ किलकारियाँ लेते हुए उनकी ओर बढ़ते चले जाते हैं। दोनों माता-पुत्र आलिंगन आनन्द से आबद्ध होते हैं और अपनी ओर से असीम वात्सल्य की गंगा-यमुना प्रवाहित हो उठती है दोनों का संगम परम पावन तीर्थराज बन जाता है।
माता और पुत्र के बीच क्रीड़ा कल्लोल भरा स्नेह-वात्सल्य का आदान प्रदान होता है। उसका पूरी तरह ध्यान ही नहीं भावना भूमिका से भी उतारना चाहिये। बच्चा माँ के बाल, नाक, कान आदि पकड़ने की चेष्टा करता है, मुँह नाक में अंगुली देता है, गोदी में ऊपर चढ़ने की चेष्टा करता है, हंसता मुस्कराता और अपने आनन्द की अनुभूति उछल-उछल कर प्रकट करता है वैसी ही स्थिति अपनी अनुभव करनी चाहिये। माता अपने बालक को पुचकारती है, उसके सिर पीठ पर हाथ फिराती है, गोदी में उठाती-छाती से लगाती दुलराती है, उछालती है वैसी ही चेष्टायें माता की ओर से प्रेम उल्लास के साथ हंसी मुसकान के साथ की जा रही है ऐसा ध्यान करना चाहिए।
स्मरण रहे केवल उपर्युक्त दृश्यों की कल्पना करने से ही काम न चलेगा वरन् प्रयत्न करना होगा कि वे भावनायें भी मन में उठें, जो ऐसे अवसर पर स्वाभाविक माता पुत्र के बीच उठती उठाती रहती हैं। दृश्य की कल्पना सरल है पर भाव की अनुभूति कठिन है। अपने स्तर को वयस्क व्यक्ति के रूप में अनुभव किया गया तो कठिनाई पड़ेगी किन्तु यदि सचमुच अपने को एक वर्ष के बालक की स्थिति में अनुभव किया गया, जिसके माता के स्नेह के अतिरिक्त और यदि कोई प्रिय वस्तु होती ही नहीं, तो फिर विभिन्न दिशाओं में बिखरी हुई अपनी भावनायें एकत्रित होकर उस असीम उल्लास भरी अनुभूति के रूप में उदय होंगी जो स्वभावतः हर माता और हर बालक के बीच में निश्चित रूप से उदय होती हैं। प्रौढ़ता भुला कर शैशव का शरीर और भावना स्तर स्मरण कर सकना यदि संभव हो सका तो समझना चाहिये कि साधक ने एक बहुत बड़ी मंजिल पार कर ली।
मन प्रेम का गुलाम है। मन भागता है पर उसके भागने की दिशा अप्रिय से प्रिय भी होती है। जहाँ प्रिय वस्तु मिल जाती है वहाँ वह ठहर जाता है। प्रेम ही सर्वोपरि प्रिय है। जिससे भी अपना प्रेम हो जाए वह भले ही कुरूप या निरूप भी हो पर लगती परम प्रिय है। मन का स्वभाव प्रिय वस्तु के आस-पास मंडराते रहने का है। उपर्युक्त ध्यान साधना में गायत्री माता के प्रति प्रेम भावना का विकास करना पड़ता है फिर उसका सर्वांग सुन्दर स्वरूप भी प्रस्तुत है। सर्वांग सुन्दर प्रेम की अधिष्ठात्री गायत्री माता का चिन्तन करने से मन उसी परिधि में घूमता रहता है। उसी क्षेत्र में क्रीड़ा कल्लोल करता रहता है। अतएव मन को रोकने, वश में करने की एक बहुत बड़ी आध्यात्मिक आवश्यकता भी इस साधना के माध्यम से पूरी हो जाती है।
इस ध्यान धारणा में गायत्री माता को केवल एक नारी-मात्र नहीं माना जाता है। वरन् उसे सत् चित् आनन्द स्वरूप-समस्त सद्गुणों, सद्भावनाओं, सत्यप्रवृत्तियों का प्रतीक, ज्ञान-विज्ञान का प्रतिनिधि और शक्ति सामर्थ्य का स्रोत मानता है। प्रतिमा नारी की भले ही हो पर वस्तुतः वह ब्रह्म-चेतना क्रम दिव्य ज्योति बन कर ही-अनुभूति में उतरे।
जब माता के स्तन पान का ध्यान किया जाए तो यह भावना उठनी चाहिये कि यह दूध एक दिव्य प्राण है जो माता के वक्षःस्थल से निकल कर मेरे मुख द्वारा उदर में जा रहा है और वहाँ एक धवल विद्युत धारा बन कर शरीर के अंग प्रत्यंग, रोम-रोम में ही नहीं वरन् मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, हृदय, अन्तःकरण, चेतना एवं आत्मा में समाविष्ट हो रहा है। स्थूल, सूक्ष्म, कारण शरीरों में अन्नमय कोश, मनोमय कोश, प्राणमय कोश, विज्ञानमय कोश, आनन्दमय कोशों में समाये हुए अनेक रोग शाकों कषाय कल्मषों का निराकरण कर रहा। इस पय पान का प्रभाव एक कायाकल्प कर सकने वाली संजीवनी रसायन जैसा हो रहा है। मैं नर से नारायण, पुरुष से पुरुषोत्तम, अणु से विभु, क्षुद्र से महान और आत्मा से परमात्मा के रूप में विकसित हो रहा हूँ। ईश्वर के समस्त सद्गुण धीरे-धीरे व्यक्तित्व का अंग बन रहे हैं। मैं दु्रतगति से उत्कृष्टता की ओर अग्रसर हो रहा हूँ। मेरा आत्म-बल असाधारण रूप में प्रखर हो रहा है।
उपर्युक्त ध्यान करने के बाद उपासना समाप्त करनी चाहिये। आरती और सूर्य आदि के पश्चात यह साधना समाप्त हो जाती है। उत्तम तो यह है कि यह उपासना स्नान कर के, धुले वस्त्र पहन कर की जाए। इससे शरीर और मन हल्का रहने से मन ठीक तरह लगता है। फिर भी यदि कोई व्यक्ति अपनी शारीरिक दुर्बलता अथवा साधनों की असुविधा के कारण स्नान करने में असमर्थ हो तो इस कठिनाई के कारण उपासना भी छोड़ बैठना ठीक नहीं। हाथ पैर मुँह धोकर-यथा संभव वस्त्र आदि बदलकर भी साधना की जा सकती है। उपासना का प्रधान उपकरण शरीर नहीं मन है। फिर ध्यान साधना में तो उसी को प्रमुखता है। बाहर से स्नान कर लेने पर भी भीतर तो इस देह में फिर भी गंदगी भरी रहती है। इसलिये शारीरिक शुद्धि की अधिकाधिक व्यवस्था तो की जाए पर उसे इतना अनिवार्य न बनाया जावे कि स्नान न हो सका तो साधना भी छोड़ दी जाए। रोगी, अपाहिज, जरा जीर्ण और असमर्थ व्यक्ति भी जिस साधना को कर सके वस्तुतः वही साधन है। मैले कुचैले गंदे शरीर समेत उत्पन्न हुये नवजात बछड़े की गाय अपनी जीभ से चाट कर उसे शुद्ध कर देती है तो क्या हमारी साध्य माता-स्नान न कर सकने जैसी आपत्तिकालीन असुविधा को क्षमा न कर सकेगी?
कई व्यक्ति निराकार उपासना को बहुत महत्व देते हैं और सांप्रदायिक आग्रह के कारण साकार उपासना से नाक भों सकोड़ते हैं। ऐसे लोगों को यह जान लेना चाहिए साकार और निराकार उपासना एक दूसरे का प्रतिकूल नहीं वरन् पूरक हैं। आरंभिक कक्षाओं में पट्टी, कलम, खड़िया का उपयोग करना पड़ता है। ऊंची कक्षाओं में फाउण्टेन पेन और कापी प्रयुक्त होती है। इन दोनों भिन्नताओं में परस्पर कोई झगड़ा झंझट नहीं वरन् स्थिति का विकास मात्र है। भावनात्मक विकास की साधना से भगवान को अपना कोई साँसारिक संबंधी माता-पिता भाई बहिन, सखा आदि कल्पित करना पड़ता है ताकि प्रेम भावना का, भक्ति रस का विकास हो सके। भक्ति भावना-प्रेम धारणा-का विकास उपासना का प्राण है। और यह प्रेम किसी व्यक्तित्व के माध्यम से ही विकसित होता है इसलिये उपासना क्षेत्र में इष्ट देव की कोई रूप कल्पना कर के चलना ही समीचीन माना गया है। इतने पर भी किसी को निराकार का ही आग्रह हो तो अन्य तीन प्रकार के ध्यान किए जा सकते हैं।
1. मैं पतंगों की तरह हूँ, इष्टदेव दीपक की तरह। अनन्य प्रेम के कारण द्वैत को समाप्त कर अद्वैत की उपलब्धि के लिये प्रियतम के साथ संकल्प भाव ग्रहण कर रहा हूँ। जिस प्रकार पतंगा दीपक पर आत्म समर्पण करता है, अपनी सत्ता को मिटा कर प्रकाश पुँज में लीन होता है उसी प्रकार मैं अपना अस्तित्व अहंकार मिटा कर ब्रह्म में-गायत्री तत्व में-लीन हो रहा हूँ।
2. मैं आत्मा पतिव्रता स्त्री के समान, अपने पति-परमात्मा के साथ ब्रह्म लोक में लाने के लिये एक चिता पर सती होने का उपक्रम कर रहा है। अग्नि भूत होकर अपने पति प्राण में लीन होकर-दो से एक बन रहा हूँ।
3. मैं अग्निहोत्र का शाकल्य हूँ। इष्टदेव प्रखर यज्ञ ज्वाला है। अपना अस्तित्व इस यज्ञाग्नि में होम कर स्वयं परम् पवित्र तेज पुञ्जवान् हो रहा हूँ।
यद्यपि इन ध्यानों को भी पूर्णतया निराकार नहीं कहा जा सकता। क्योंकि उनमें भी अनेक वस्तुओं का ध्यान करना पड़ता है। जब वस्तुएं आ गई तो वह साकार ही बन गया। ध्यान तो वस्तुतः आकार के बिना हो ही नहीं सकता। उग्र निराकार वादी बहुधा प्रकाश ज्योति का ध्यान करते हैं। वह प्रकाश भी वस्तुतः पंचभूतों के अंतर्गत ही आता है और रूपात्मक है। ऐसी दशा में शुद्ध निराकार तो वह भी नहीं रहा। फिर भी प्रतिमा विरोध का आग्रह किसी प्रकार इन ध्यानों में पूरा हो जाता है। जिन्हें ऐसा आग्रह हो वे उपर्युक्त तीन ध्यान में से कोई एक अपना कर अपनी उपासना क्रम चला सकते हैं।
ध्यान के समय जप बंद रखना पड़ता है, ताकि ध्यान की तन्मयता में बाधा न पड़े। नियत जप ध्यान में पूर्व ही समाप्त कर लेना चाहिये। जप के समय प्रतिमा का हलका ध्यान हो सकता है पर भावनायें तो परिपूर्ण जुदा तभी संभव हैं जब पूर्ण एकाग्रता और तन्मयता हो इसलिये समग्र ध्यान के लिये शारीरिक सभी क्रियायें बंद करनी पड़ती है, जिनमें जप भी आ जाता है क्योंकि उसमें भी माला, फेरना, शब्दोच्चारण, गणना, शब्दों का क्रम आदि कई बातें जुड़ी हुई हैं जो समान ध्यान में बाधा उत्पन्न करती हैं।
मनुष्य शरीर के तीन आवरण हैं। स्थूल, सूक्ष्म और कारण। स्थूल शरीर-क्षेत्र में जो स्थूल उपासनायें की जाती हैं उनमें व्रत, उपवास, देव-दर्शन, तीर्थयात्रा, स्नान, कथा, पाठ, हवन जप आदि हैं। कर्मकाण्डी की प्रधानता रहती है, हठयोग इसी स्तर पर है। सूक्ष्म शरीर से जो उपासना की जाती है-उनमें ध्यान धारण प्रमुख है। लय योग, ऋजु योग, प्राण योग, राज योग, भक्ति योग आदि 84 साधना इसी स्तर की हैं। कारण शरीर की साधना, समाधि, तन्मयता, एकान्त स्थिति, परम क्षेम गति, ब्रह्म निर्वाण, जीवन मुक्ति, आत्म-साक्षात्कार प्रभु-दर्शन आदि उपलब्धियाँ इस भूमिका में मिलती है। तीनों की कक्षायें क्रमशः अग्रगामी होती हैं। प्रथम कक्षा की स्थूल शरीर के द्वारा हो सकने वाली साधना पद्धति गायत्री महाविज्ञान के प्रथम व द्वितीय भागों में बताई जा चुकी है। समय-समय पर साधकों को उसका प्रशिक्षण भी करते रहे हैं। अब जिनकी प्राथमिक शिक्षा पूर्ण हो चुकी, उन्हें दूसरी कक्षा में अग्रसर किया जा रहा है। उन्हें उच्चस्तरीय सूक्ष्म शरीर द्वारा संभव हो सकने वाली इस साधना पद्धति को अपनाना चाहिए। इस कक्षा में पाँच वर्ष लगेंगे इस सन् 67 की बसंत पञ्चमी से यह ध्यान साधना शुरू की जाये तो सन् 72 की बसंत पञ्चमी को उसकी पूर्णाहुति करा देंगे। यही दिन हमारी सम्पूर्ण दृश्य गतिविधियाँ समाप्त करने का है। इसके पश्चात दूर रहकर इन साधकों को तथा उन्हें जिनकी पंचकोशी साधना पाँच वर्ष अभ्यास पक्का करने के लिए रुकवा दी है, दोनों ही वर्गों को कारण शरीर की साधना सम्पन्न करा देंगे। उसी प्रकार जिस प्रकार हमारे गुरुदेव हमसे अति दूर रहते हुए भी निरन्तर प्रकाश एवं सहयोग देकर हमें आगे बढ़ाते रहे हैं। जिनकी निष्ठा परिपक्व है, उनकी आध्यात्मिक पूर्णता प्राप्त होकर रहती है।
इम बसंत पञ्चमी 14 फरवरी 67 से श्रद्धावश साधक अनुभवी गायत्री उपासना उपर्युक्त पद्धति से आरंभ करें। हर बसंत पञ्चमी को उन्हें अगले वर्ष के लिए प्रगति के अनुरूप आवश्यक हेरफेर के लिए मार्ग-दर्शन मिलता रहेगा।
पाँच वर्ष तक गायत्री तत्वज्ञान का स्वरूप समझाने वाले लेख अखण्ड-ज्योति में नियमित रूप से छपते रहेंगे। उनमें षट्-चक्र बंधन, कुण्डलिनी जागरण, सहस्रार कमल प्रस्फुरक आदि अनेक सिद्धि साधनाओं का स्वरूप एवं विवेचन प्रस्तुत किया जाता रहेगा ताकि अधिकारी व्यक्ति आवश्यकतानुसार उनसे लाभ ले सकें। अखण्ड-ज्योति परिजन उन्हें समझने को तो पूरी तरह चेष्टा करते रहें पर साधना उसी क्रम से करें जो उनके स्तर के अनुरूप हो। अभी तो इस लेख में प्रस्तुत साधना ही अधिकाँश परिजनों के लिए उपर्युक्त रहेगा।
मनुष्य सेवा कराने नहीं, करने आया है-
तुम सब बड़े बनना चाहते हो, उत्तम होना चाहते हो, किन्तु मुझे ही उत्तम गुरु कहकर तुम न तो बड़े बन सकते हो और न उत्तम। उत्तम तो तुम तब बनोगे, जब उन बातों को अपनाओ जिनके कारण मुझे उत्तम मानते हो और कहते हो।
मैं तुमसे सच कहता हूँ-उत्तम संसार में और कोई नहीं, एक वह परमेश्वर ही उत्तम है, जिसने हम सबको बनाया और जिसे प्रसन्न करना ही हमारा ध्येय है।
इसलिये मैं फिर कहता हूँ- तुममें से जो बड़ा बनना चाहता है वह तुम सबका सेवक बने, जो प्रधान होना चाहे वह तुमको प्रधान माने और सेवा करे। क्योंकि मनुष्य के पुत्र ने इसलिये जन्म नहीं लिया कि वह दूसरों से सेवा कराये, बल्कि इसलिये आया है कि वह दूसरों की सेवा-टहल करे, उन्हें सुख दें और बंधन से छुड़ाने का प्रयत्न करे। जो दूसरों को बंधन से छुड़ाने की कोशिश करता है, उसके बंधन खुद खुल जाते हैं।
-बनार्ड शा
अपनों से अपनी बातें-
विगत गीता जयन्ती से अखण्ड ज्योति परिजनों में जिस ब्रह्म विद्यालय का शुभारंभ हुआ है, युग-परिवर्तन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, भले ही वह आज छोटा क्यों न दृष्टिगोचर हो। बीज छोटा होता है पर जब वह अंकुरित होकर पल्लवित, पुष्पित और फलित होता है तब उसको समृद्धि का वास्तविक परिचय मिलता है। आज 4 हजार साथी सहचरों को सहायक अध्यापक बना कर प्रत्येक के द्वारा दस-दस व्यक्तियों तक नव-निमार्ण विचारधारा का प्रकाश पहुँचाने का प्रयत्न आरंभ किया गया है। वह आज एक छोटी योजना मात्र भले ही दीखे पर इस पुण्य श्रृंखला का जब क्रमबद्ध रूप से विकास होगा तब वह बहुत बड़ी चीज होगी। आज के हमारे 4 हजार साथी परखे हुए और कसौटी पर कसे हुए सच्चे अध्यात्मवादी है। गीता जयंती से वे ब्रह्म विद्यालय योजना के अंतर्गत दस-दस को प्रशिक्षित करने के लिए कटिबद्ध हुए हैं। आज 40 हजार तक यह महाप्रकाश नियमित रूप से पहुँचने लगा है तो यह आशा करनी चाहिए कि यह संख्या व्यवस्थित रूप से बढ़ेगी। 4 हजार का स्थान जब 40 हजार अध्यापक ग्रहण करेंगे और वे 40 हजार 4 लाख का, फिर इसी क्रम से स्थान ग्रहण करने की प्रक्रिया चलेगी तो भारत ही नहीं विश्व में फैली हुई समस्त मानव जाति तक आदर्शवादिता की-उत्कृष्टता प्रवृत्ति सुविकसित होगी और युग परिवर्तन का स्वप्न साकार होगा।
अखण्ड-ज्योति परिजनों को ब्रह्म विद्यालय का पुण्य परमार्थ तत्परता-संकल्प और दृढ़ता के साथ पूरा करते रहने के लिए कहा गया था। प्रसन्नता की बात है कि उसका उत्साहवर्धक प्रत्युत्तर मिला है। गीता जयंती की जैसी सूचनायें प्राप्त हुई हैं, उनसे प्रतीत होता है कि अधिकाँश सदस्य उस संकल्प की पूर्ति में जुट गये हैं। जो उस दिन शुभारंभ नहीं कर सके वे बसंत पञ्चमी तक उसे कार्यान्वित अवश्य कर लेंगे। हमें विश्वास है कि एक भी सदस्य ऐसा न बचेगा जिसकी पत्रिकायें 10-10 व्यक्ति पढ़ते और प्रकाश प्राप्त न करते हों।
हमारा अनुरोध सभी से यह था कि वे अपनी उपासना को इस बसंत पञ्चमी से नियमित और व्यवस्थित रूप से आरंभ कर दें। गायत्री उपासना एक सरल किन्तु अत्यन्त प्रभावपूर्ण विधान इसी अंग में दिया गया है। जिन्हें गायत्री-उपासना पर निष्ठा हो वे उसे आरंभ कर दें। जिन्हें गायत्री उपासना न रुचे, वे अपनी पद्धति में इन्हीं सिद्धान्तों का समावेश कर सकते हैं। हममें से प्रत्येक को पक्का आस्तिक होना चाहिए और उसका व्यावहारिक अभ्यास करने के लिए दैनिक नित्य-कर्म में उपासना का समावेश कर लेना चाहिए, भले ही वह कितना ही स्वल्प क्यों न हो।
तीसरा कार्य इस वर्ष और भी परिजनों को आरंभ करना होगा। वह है-सदस्यों के जन्मोत्सवों का शुभारंभ। एक-दो महीने बाद परिजनों को यह करना ही होगा कि स्थानीय अखण्ड-ज्योति परिजनों का एक संगठन बना लें। एक संचालक नियुक्त कर लें। सदस्यों के जन्म दिन नोट करके उस तिथि पर सब सदस्यों को इकट्ठे करके उत्सव मनाने की व्यवस्था करें। इस प्रकार संगठन मजबूत होगा। एक दूसरे में प्रेम-भाव बढ़ेगा। इन अवसरों पर इकट्ठे हुए लोगों को नव-निर्माण की विचारधारा का प्रकाश मिलेगा। जिसका जन्मदिन है उसे अपने शेष जीवन के श्रेष्ठतम सदुपयोग की प्रेरणा मिलेगी। इस छोटे शुभारंभ से इस शाखा को संस्कारों एवं पर्वों का नुचलन करने में सरलता होगी तथा उन अन्यान्य अनेक कार्यों के लिए पथ प्रशस्त होगा जो युग परिवर्तन के लिए रचनात्मक कार्यक्रमों के रूप में कार्यान्वित किये जाने हैं।
जिसने अपनी जन्म तिथियाँ हमें सूचित कर दीं, उनकी नोट हैं। जिनकी सूचना अभी नहीं मिली है वे अगले दिनों लिखकर भेज देंगे। उनका जन्म दिन हम स्वयं करेंगे और उनके उज्ज्वल भविष्य की प्रकाश किरणें एवं परिस्थितियाँ उत्पन्न करने के लिए शक्ति भर प्रयत्न किया करेंगे।
हमारा कार्यकाल अब से पाँच वर्ष बाद सन 72 की बसंत पञ्चमी को पूर्ण हो जायेगा। तब हमारी स्थूल गतिविधियाँ समाप्त होकर सूक्ष्म सक्रियता आरंभ होगी। इस पाँच वर्ष की अवधि में जो कार्य हमें तथा सहचरों को करने हैं, उनकी यह सुनिश्चित रूपरेखा बना ली गई है। इसे हमारी प्रथम पंचवर्षीय योजना चाहिए। इस योजना के प्रथम वर्ष में परिजनों के जिनमें तीन काम सौंपे गये हैं 1. अपना नव-निर्माण साहित्य 10 व्यक्तियों को नियमित रूप से पढ़ाने का ब्रह्म विद्यालय एवं ज्ञान-यज्ञ 2. नियंत्रित दैनिक उपासना 3. युग-निर्माण परिवार के सदस्यों का जन्म दिन मनाने की सामूहिक पुण्य प्रक्रिया। ये तीनों ही कार्य हर सदस्य को उस वर्ष आरंभ में ही देने चाहिए। अगले वर्ष का कार्यक्रम अगले वर्ष इन्हीं दिनों प्रस्तुत करेंगे।
प्रस्तुत पाँच वर्षीय योजना में मथुरा केन्द्र से भी तीन प्रक्रियाओं का शुभारंभ अगली गायत्री जयंती के जून 67 से शुरू किया जा रहा है। परिजनों का कर्त्तव्य है कि उन्हें सफल बनाने में सहयोग प्रदान करे।
1. जो सज्जन पारिवारिक उत्तरदायित्वों से निवृत्त हो चुके हैं वे 4 वर्ष के लिए मथुरा आकर प्रशिक्षण प्राप्त करें। इस अवधि में उन्हें वेद, उपनिषद्, दर्शन, गीता रामायण एवं धर्मशास्त्रों का निर्धारित पाठ्यक्रम के अनुसार ऐसा अध्ययन करायेंगे, जिससे उनका ज्ञान इतना उच्चस्तरीय हो जायेगा कि स्वयं अन्तःतृप्ति प्राप्त करेंगे और दूसरों को धर्म एवं संस्कृति का वास्तविक प्रकाश देकर कल्याण पथ पर अग्रसर कर सकेंगे। प्रवचन, लोकसेवा आदि के कितने ही व्यावहारिक पहलू उन्हें यहाँ सीखने को मिलेंगे।
इस 4 वर्ष की अवधि में एक 24 लक्ष का महा-पुरश्चरण गायत्री तपोभूमिका सिद्ध पीठ में हमारे सान्निध्य एवं मार्गदर्शन में करने का अवसर मिलेगा। इसका प्रतिफल हर दृष्टि से आशाजनक होगा।
डॉक्टर, इंजीनियर आदि को इन दिनों 4 वर्ष का ही ‘थ्योरी सहित प्रेक्टिस’ सहित कोर्स पूरा करना पड़ता है। आत्मिक प्रगति का यह भी एक समृद्धिपूर्ण पाठ्यक्रम होगा जिससे जीवनोद्देश्य की पूर्ति में भारी सहायता मिलेगी। जो जीवन का बहुत-सा भाग ऐसे ही गंवा चुके, ढलती उम्र वालों आदि के लिए यह प्रशिक्षण का अनुपम अवसर है। जो थोड़ा समय बचा है उसके सदुपयोग का इससे बढ़कर दूसरा सुयोग शायद ही कभी आये। इसलिए जिनकी स्थिति 4 साल तक मथुरा रहकर आत्म-कल्याण की साधना करने की है उन्हें विशेष अनुरोधपूर्वक आमंत्रित किया जा रहा है। उनका एक साधना सत्र इसी वर्ष आरंभ होने जा रहा है।
2. नवयुवकों के लिये 4 वर्षीय प्रशिक्षण भी इसी अगली गायत्री जयंती से आरंभ होने जा रहा है। उससे 15 से अधिक आयु के छात्र विश्वविद्यालय स्तर की शिक्षा करने का प्रयत्न करेंगे कि जिन्हें नौकरी प्राप्त करने के लिए सरकारी सनद प्राप्त करने की आवश्यकता न हो, जिनके घर में अपनी कृषि, तिजारत आदि गुजारे का प्रबंध हो-जिनके माँ-बाप अपने बच्चों को पराई गुलामी कराते हुए जगह-जगह के चूल्हे काले कराते रहने को नापसंद करते हों-ऐसे छात्रों का एक 4 वर्षीय पाठ्यक्रम चलाने का हमारा मन है। गृह-निवृत्तवान् गृहस्थियों की तरह ब्रह्मचारी किशोरों का भी एक बैंच हम अपने प्रशिक्षण में ही निकालना चाहते हैं। जो समुन्नत, सुसंस्कृत एवं सफल सद्गृहस्थ बनाकर जनसाधारण के सामने यह उदाहरण प्रस्तुत कर सके कि जीवन जीने की कला से परिपूर्ण शिक्षा ही वास्तविक शिक्षा कहलाने की अधिकारिणी है।
इस 4 वर्षीय पाठ्यक्रम को इन गायत्री जयंती में ही आरंभ करेंगे। शरीर, मन, कुशलता, परिवार, समाज, व्यवसाय, धर्म, संस्कृति हर क्षेत्र में वह छात्र सर्वतोमुखी प्रतिभा रख सके और हर क्षेत्र में प्रकाश उत्पन्न कर सके ऐसा पाठ्यक्रम बनाया गया है। माँग की गई है कि ऐसे छात्र मिलें। आजकल हर व्यक्ति अपने बालकों को नौकरी में काम आने वाली सरकारी डिग्रियाँ दिलाना चाहता है, लड़के भी इसी तरह की बात सोचते हैं, इसलिये वर्तमान परिस्थितियों में ऐसे छात्र मिलना कठिन दीखता है, फिर भी प्रयत्न करेंगे और जितने छात्र मिल सकें उनसे यह पाठ्यक्रम आरंभ करेंगे। इससे भाषा, गणित, इतिहास, भूगोल, संस्कृत, अंग्रेजी, शरीर विज्ञान, मनोविज्ञान, समाज शास्त्र, नीति शास्त्र, राजनीति, कानून, व्यवसाय, धर्म शास्त्र आदि सभी विषयों की ऐसी शिक्षा का समावेश रहेगा, जिसे प्राप्त करके यहाँ से निकला हुआ छात्र किसी भी क्षेत्र में अपनी सफल प्रतिभा का परिचय दें सकेगा। जिसकी योग्यता बी.ए. पास छात्रों की तुलना में हर दृष्टि से कई गुनी अधिक होगी।
3. एक वर्षीय प्रशिक्षण 50 युवा पुरुषों के लिये रखा गया है। उससे जीवन के हर पहलू को समझने और उसमें उत्पन्न होते रहने वाली विविध समस्याओं का हल सिखाया जायेगा। शरीर, मन, परिवार, समजा, व्यवसाय और प्रत्येक क्षेत्र में किस विचारधारा एवं प्रक्रिया का अवलम्बन करने से श्री, समृद्धि एवं प्रगति का पथ प्रशस्त हो सकता है, यह सभी कुछ इस वर्ष तक में सिखाने का प्रयत्न किया जायेगा।
चूँकि आजकल पढ़ाई का अर्थ नौकरी मान लिया गया है। इसलिये इस संबंध में भी ऐसी व्यवस्था कर ली जायेगी, जिसे सीख कर यहाँ से निकलने वाले छात्र आजीविका भी प्राप्त कर सकें। प्रेस व्यवसाय हम स्वयं जानते हैं। उसका पूरा-पूरा शिक्षण जिसे मिल जाए वह 4-5 हजार रुपये की एक छोटी पूँजी लगा कर प्रेस खोल सकता है और 200 रुपये मासिक के करीब आसानी से कमा सकता है। जिसके पास ऐसी व्यवस्था न हो वह किसी प्रेस में कम्पोज या छपाई की नौकरी कर के सौ डेढ़ सौ रुपया आसानी से कमा सकता है। एक व्यवसाय प्रेस का हमारी जानकारी में है। उसके सारे साधन भी यहाँ हैं। इसके अतिरिक्त हमारे एक निकट संबंधी साबुन की फैक्टरी चलाते हैं। पिछले वर्षों में उन्होंने अच्छा पैसा भी कमाया है। उनके द्वारा साबुन बनाना ही नहीं-उसके व्यावसायिक रहस्य व जिनसे मारकीट की प्रतियोगिता में ठहरा जा सके-भली प्रकार सिखा समझा देने की व्यवस्था की गई है। यह व्यवसाय कम पूँजी में भी चल सकता है और अच्छी आजीविका का भी है।
एक वर्ष में वह दो व्यवसाय एक वर्षीय शिक्षण क्रम प्राप्त करने वाले प्रत्येक छात्र को सिखा दिये जायेंगे। इस प्रकार व्वसायात्मक उद्देश्य की भी एक तरह से पूर्ति हो सकेगी। जो छात्र स्कूली शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं, वे अपनी पढ़ाई एक वर्ष रोक कर-एक वर्ष फेल हुआ मानकर यह शिक्षा प्राप्त कर जायें तो भी यह उनके लिये एक बहुत बड़े कार्य की बात रह सकती है।
यह तीनों शिक्षण क्रम गायत्री जयंती 17 जून 67 से आँरभ करेंगे। इन्हीं दिनों दो सप्ताह का शिक्षण शिविर भी गायत्री तपोभूमि होगा। 9 जून से 13 जून तक परिवार के सदस्य व्यावहारिक अध्यात्म की शिक्षा प्राप्त करने के लिये मथुरा पधारेंगे। व्रज की तीर्थ यात्रा की सामूहिक व्यवस्था, जीवन-कला, अध्यात्म, उपासना, आदि सभी आवश्यक विषयों पर प्रशिक्षण के अतिरिक्त शिक्षणर्थियों की व्यक्तिगत समस्याओं को सुलझाने के लिये महत्पवूर्ण परामर्श दिये जाते हैं। अब तक के शिविरों का परिणाम यही रहा है कि जो उनमें सम्मिलित हुआ वह एक नई स्फूर्ति, नई चेतना, नई प्रेरणा एवं नई दिशा लेकर गया। अस्त-व्यस्त जटिल व्यवस्थित बना और चिन्ता के स्थान पर मुसकान का अवसर आया। हम चाहते हैं कि प्रेमी परिजन इस शिविर के अवसर पर हमसे वर्ष में एक बार मिल लिया करें और इतनी स्फूर्ति पा लिया करें जो उनके लिये एक वर्ष तक आवश्यक मनोबल जुटा दिया करें। इस शिविर में आने के लिये भी प्रेमी परिजनों को आमंत्रित किया जा रहा है।
उपर्युक्त तीन शिविरों का तथा शिविर में सम्मिलित होने का जिनका मन हो वे इसके लिये आवश्यक पत्र व्यवहार करके स्वीकृति प्राप्त कर लें। तपोभूमि में स्थान थोड़ा है उसके अनुसार ही सीमित संख्या में स्वीकृतियाँ दी जाती हैं। संख्या पूरी होने पर मना करने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं रहता अतएव उचित यही है कि जिन्हें इन प्रशिक्षणों में सम्मिलित होना हो वे समय से रहते पूर्व ही अपना नाम नोट करा दें और स्वीकृति प्राप्त कर लें। इन सभी शिक्षणों के बारे में नियम एक ही है। हर शिक्षार्थी अपने भोजन आदि का खर्च स्वयं उठाएगा। निवास, रोशनी, फर्नीचर आदि की व्यवस्था निशुःल्क रहेगी और शिक्षा की कोई फीस नहीं है। भोजन, वस्त्र आदि का खर्च सब अपना उठायेंगे। मिलजुल कर तीन-तीन चार शिक्षार्थियों के ग्रुप अपनी रुचि का भोजन आप बना लेते हैं तो वह काफी सस्ता भी पड़ता है। इस महंगाई के जमाने में भी 30 रु- मासिक से काम चल जाता है। थोड़ा बहुत हाथ खर्च, कपड़े आदि का इसके अतिरिक्त कुछ और भी हो सकता है। इसका प्रबंध आप ही कर के लाना चाहिए।
उपर्युक्त प्रशिक्षणों के अतिरिक्त युग-निर्माण योजना का प्रेरणाप्रद साहित्य अगले वर्ष बनाने का निश्चय किया गया है। पिछले दिनों 70 ट्रैक्ट छपे हैं। शाखा संचालकों को नव-निर्माण के लिये किस प्रकार क्या करना चाहिए? किस विचार-धारा का किस प्रकार प्रशिक्षण कराना इस उद्देश्य से उन्हें लिखा गया था। व्यक्ति, परिवार तथा समाज को अनेक समस्याओं के समाधान पर अभी काफी ट्रैक्ट लिखे जाने शेष हैं। अगले दिनों उन्हें लिखा और छापा जायेगा। प्रयत्न यह किया जायेगा कि व्यक्ति एवं समाज की एक भी समस्या ऐसी न हो, जिसका नवयुग के अनुपम प्रखर समाधान प्रस्तुत न किया गया हो। पिछले टै्रक्ट बहुत कर के शाखा संचालकों का मार्गदर्शन करते थे, अगले टै्रक्ट हर व्यक्ति की व्यक्तिगत समस्याओं को सुलझाने में सहायक होंगे तो वे सर्व साधारण के लिए अधिक उपयोगी एवं प्रेरक होंगे।
यह टै्रक्ट साहित्य भारत में बोले जाने वाली समस्त भाषाओं में अनुवाद कराने एवं छापने की भी योजना है। गुजराती, मराठी, बंगाली, उड़िया, आसामी, तमिल, तेलगु, अंग्रेजी अभी इन आठ भाषाओं का कार्य हाथ में लेना है। अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्यों में जो इन भाषाओं को अच्छी तरह जानते हों और उनको अखंण्डता हुआ नहीं, साहित्यिक प्रवाहपूर्ण अनुवाद कर सकते हों, वे सेवा-भाव से थोड़ा समय इस कार्य के लिए देना शुरु कर सकते हैं। अनुवाद तैयार होते रहेंगे और साधनों के अनुरुप उनका प्रकाशन चलता रहेगा।
इन सब कार्यों में अखण्ड-ज्योति परिजनों का आवश्यक सहयोग मिलेगा ऐसी आशा है।
गोरक्षा का महान उद्देश्य पूर्ण करने के लिए गत शरद पूर्णिमा से ‘ह्रीं’ बीज समेत अपना देशव्यापी गायत्री महा पुरश्चरण बड़ी सफलतापूर्वक चल रहा है, प्रति मास 24 करोड़ जप ठीक तरह पूरा हो जाता है। इससे देश में अभीष्ट वातावरण उत्पन्न होने में भारी सहायता मिली है। गोरक्षा अभियान समिति के झगड़े के नीचे अपने परिवार के एक हजार से ऊपर व्यक्ति सत्याग्रह में सम्मिलित हुए हैं तथा अन्य प्रकार से योगदान कर रहे हैं। इस संदर्भ में आन्दोलनात्मक कार्य एक ही झण्डे के नीचे होना उचित था इसलिए जो कार्य अपने परिवार द्वारा हुआ है उसकी अलग से विज्ञप्ति नहीं की गई है। प्रसन्नता की बात है कि तीन महीनों के आन्दोलन से सरकार को थोड़ा झुकने को विवश होना पड़ा। अभी इस संदर्भ में बहुत काम होना बाकी है। गौ-हत्या पर रोक लगाने के लिए अभी और भी प्रगति होना शेष है। 1. चमड़े का त्याग 2. गौ-दुग्ध का सेवन, 3. गो-संवर्धन, 4. गौ-रस का व्यवसाय, 5. वृद्ध एवं अपंग गौ-वंश का पालन जैसे रचनात्मक कार्य किये बिना वास्तविक गौ रक्षा न हो सकेगी। इसके उपर्युक्त वातावरण बनाने में अपना प्रस्तुत महा पुरश्चरण बहुत ही सहायक सिद्ध होगा। इसके अतिरिक्त हमें उपर्युक्त पाँच-सूची रचनात्मक कार्यों को भी हाथ में ले लेना होगा ताकि गौ संरक्षण एवं संवर्धन की ठोस आधार शिला र¹ी जा सके। इन कार्यों में परिवार के सभी धर्म प्रेमियों को उत्वाहपूर्वक भाग लेना चाहिए।
चुनाव में वोट किसे दें?
जन-प्रतिनिधि का व्यक्तिगत चरित्र एवं दृष्टिकोण उत्कृष्ट स्तर का होना चाहिए। ऐसे लोग ही किसी पार्टी को आदर्श उपस्थित कर सकने के लिए स्थिर रख सकते हैं। चरित्र की दृष्टि से गिरे हुए और विचारों की दृष्टि से अव्यवस्थित लोग जिस पार्टी में भी रहेंगे उसे कलंकित करेंगे। इसलिए हम वर्तमान चुनावों में किसे वोट दें, इसका निर्णय करते समय प्रत्याशी के चरित्र, निष्ठा एवं विचारशीलता पर अत्यधिक ध्यान देना चाहिए। पतित स्तर के व्यक्ति चाहे जिस प्रार्टी का लेबिल लगाकर आवें, वोट प्राप्त कर सकने के अधिकारी नहीं हो सकते। इस कसौटी पर खरे उतरने वाले उम्मेदारों को ही हमें वोट देना चाहिए।
*समाप्त*