बुद्ध ने उपनिषद् की शिक्षाओं को जीवन में कार्यान्वित करने की कला का अभ्यास करने के बाद अपना संदेश दिया था। वह संदेश था कि भूमि या आकाश में, दूर या पास में, दृश्य या अदृश्य में, जो कुछ भी है उसमें असीम प्रेम की भावना रखो, हृदय में द्वेष या हिंसा की कल्पना भी जाग्रत न होने दो। जीवन की ही चेष्टा में उठते-बैठो, सोते-जागते, प्रतिक्षण इसी प्रेमभावना में ओतप्रोत रहना ही ब्रह्म-विहार है, दूसरे शब्दों में जीवन की यही गतिविधि है जिससे ब्रह्म का आत्मा में विचार किया जाता है।
यह ब्रह्म की आत्मा क्या है? उपनिषद् के शब्दों में जो आकाश में तेजोमय और अमृतमय है और जो विश्वचेतना है वही ब्रह्म है और उपनिषद् का कहना है कि आकाश में ही नहीं बल्कि जो हमारे अन्तःकरणों में भी तेजोमय और अमृतमय पुरुष है और जो विश्वचेतना का स्रोत है वह ब्रह्म है। इस विराट विश्व के रिक्त स्थान में उस को चेतनता प्राप्त है और हमारी अंतर-आत्मा में भी उसी की चेतनता है।
इस लिये इस व्यापक चेतना की प्राप्ति के लिए हमें अपने अन्तर की चेतना से विश्व की असीम चेतनता का समभाव स्थापित करना है। वस्तुतः मानव के अभ्युदय का सच्चा अर्थ इसी चेतना के उदय और विस्तार में है। वही हमारे-सारे ज्ञान-विज्ञान का ध्येय रहा है।
-रवीन्द्रनाथ ठाकुर
वर्ष 28 सम्पादक - श्रीराम शर्मा आचार्य अंक 1
यह विचार निश्चय ही भ्राँतिपूर्ण है कि धन-वैभव, मान-सम्मान तथा पद-प्रतिष्ठा पा लेने पर जीवन सफल एवं सार्थक हो जाता है। यह उन उपलब्धियों की तुलना में तुच्छ एवं नगण्य है, जिन्हें आगे बढ़ कर और वर्तमान भूमिका से ऊपर उठकर अवश्य पाया जा सकता है।
विद्या-बुद्धि, पुत्र-कलत्र ऐश्वर्य एवं वैभव आदि समस्त साँसारिक उपलब्धियाँ अस्थिर तथा क्षणभंगुर हैं। हजारों लोगों को यह नित्य प्रति मिलती और मिटती रहती हैं। इनकी प्राप्ति होने से सुख हो जाता है और चले जाने से दुःख होता है। संसार की यह सारी अस्थिर उपलब्धियाँ मनुष्य को सुख-दुःख के दोलन में झुलाती रहती हैं जिससे चित्त क्षुब्ध एवं व्याकुल रहता है। इन उपलब्धियों के सुख में भी दुःख छिपा रहता है। मनुष्य अच्छी तरह जानता है कि यह सब विभूतियाँ नश्वर एवं गमनशील हैं। किसी समय भी नष्ट हो सकती हैं, छोड़ कर जा सकती है। इन्हें पाकर मनुष्य इनकी रक्षा, इन्हें अपने पास बनाये रहने के लिए दिन-रात व्यग्र एवं व्यस्त रहा करता है। ऐसी दशा में सुख संतोष अथवा निश्चिन्तता का होना सम्भव नहीं। इस प्रकार इन साँसारिक उपलब्धियों की प्राप्ति एवं अप्राप्ति दोनों ही दुःख का कारण हैं।
संसार में रह कर साँसारिक उपलब्धियाँ प्राप्त करने का प्रयत्न करना बुरा नहीं। बुरा है उनके लोभ में उस महान लाभ का त्याग कर देना जो स्थिर एवं शाश्वत सुख का हेतु है। ऐसा सुख जिसमें न तो विक्षेप होता है और न परिवर्तन। इन उपलब्धियों के बीच से गुजरते हुए मानव-जीवन के सारपूर्ण सर्वोपरि लाभ प्राप्त करने का प्रयत्न करना ही सच्चा पुरुषार्थ है मनुष्य को जिसे करना ही चाहिए।
मानव-जीवन का सर्वोपरि लाभ आध्यात्मिक लाभ ही है। साँसारिक लाभों के नितान्त अभाव की स्थिति में भी आध्यात्मिक लाभ मनुष्य को सर्वमुखी बनाने में सर्वदा समर्थ है जब कि आध्यात्मिक लाभ के अभाव में संसार की समग्र उपलब्धियाँ भी मनुष्य को सुखी एवं संतुष्ट नहीं बना सकतीं। बल्कि वे उल्टी जान के लिये जंजाल बनकर चिन्ता में वृद्धि किया करती हैं।
आध्यात्मिक लाभ के अतिरिक्त संसार की कोई भी उपलब्धि मनुष्य को क्षुद्रता से विराट की ओर और तुच्छता से उच्चता की ओर नहीं ले जा सकती। यह विशेषता केवल आध्यात्मिकता में ही है कि मनुष्य क्षुद्र से विराट और तुच्छ से उच्च हो जाता।
आध्यात्मिक जीवन आत्मिक सुख का निश्चित हेतु है। अध्यात्मवाद वह दिव्य आधार है जिस पर मनुष्य की आन्तरिक तथा बाह्य दोनों प्रकार की उन्नतियाँ एवं समृद्धियाँ अवलम्बित हैं। साँसारिक उपलब्धियाँ प्राप्त करने के लिये भी जिन परिश्रम, पुरुषार्थ, सहयोग, सहकारिता आदि गुणों की आवश्यकता होती है वे सब आध्यात्मिक जीवन के ही अंश है। मनुष्य का आन्तरिक विकास तो अध्यात्म के बिना हो ही नहीं सकता।
अध्यात्मवाद जीवन का सच्चा ज्ञान है। इसको जाने बिना संसार के सारे ज्ञान अपूर्ण हैं और इसको जान लेने के बाद कुछ भी जानने को शेष नहीं रह जाता। यह वह तत्वज्ञान एवं महा-विज्ञान है जिसकी जानकारी होते ही मानव-जीवन अमरता पूर्ण आनन्द से ओत-प्रोत हो जाता है। आध्यात्मिक ज्ञान से पाये हुए आनन्द की तुलना संसार के किसी आनन्द से नहीं की जा सकती क्योंकि इस आत्मानन्द के लिए किसी आधार की आवश्यकता नहीं होती। वस्तु-जन्य सुख नश्वर होता है, परिवर्तनशील तथा अन्त में दुःख देने वाला होता है। वस्तु-जन्य मिथ्या आनंद वस्तु के साथ ही समाप्त हो जाता है। जब कि आध्यात्मिकता से उत्पन्न आत्मिक सुख जीवन भर साथ तो रहता ही है अन्त में भी मनुष्य के साथ जाया करता है। वह अक्षय और अविनश्वर होता है, एक बार प्राप्त हो जाने पर फिर कभी नष्ट नहीं होता। शरीर की अवधि तक तो रहता ही है, शरीर छूटने पर भी अविनाशी आत्मा के साथ संयुक्त रहा करता है।
ऐसे अविनाशी आनन्द की उपेक्षा करके जीवन को क्षणिक एवं मिथ्या सुखदायी उपलब्धियों में लगा देना और उनमें संतोष अथवा सार्थकता अनुभव करना अनमोल मानव जीवन की सबसे बड़ी हानि है। जब आनन्द ही मानव जीवन का वर्तमानकालिक लक्ष्य है तब शाश्वत आनन्द के लिये ही प्रयत्न क्यों न किया जाये? क्यों क्षणभंगुर सुख की छाया-वीथियों में ही भटकते रहा जाये?
मनुष्य साँसारिक उपलब्धियों को प्राप्त करे किन्तु आध्यात्मिक उपलब्धि का बलिदान देकर नहीं। यदि वह ऐसी भूल करता है तो निश्चय ही अपने को प्रवंचित एवं प्रताड़ित करता है। जीवन को आध्यात्मिक मार्ग पर नियुक्त कर देने से साँसारिक लाभ तो होता ही है साथ ही मनुष्य अपने परम लक्ष्य अक्षय आनन्द की ओर भी अग्रसर होता जाता है। अध्यात्मवाद में दोनों लाभ अपनी क्षमता भर प्राप्त ही करना चाहिए। यही उसके लिये लिये प्रेय भी है और श्रेष्ठ भी।
आध्यात्मिक जीवन कोई अप्राकृतिक अथवा आरोपित जीवन नहीं है। आध्यात्मिक जीवन ही वास्तविक एवं स्वाभाविक जीवन है। इससे भिन्न जीवन ही अस्वाभाविक एवं आरोपित जीवन है। दुःख, क्लेश, चिन्ता एवं विक्षोभ के बीच से बहते हुए जीवन प्रवाह को स्वाभाविक नहीं कहा जा सकता है। जीवन का प्रसन्न प्रवाह ही वास्तव में स्वाभाविक जीवन है। अध्यात्मवाद का त्याग करके अपनाया हुआ जीवन प्रवाह किसी प्रकार भी निर्मल स्निग्ध धारा के रूप में नहीं बन सकता। एक मात्र साँसारिक जीवन में लोभ, मोह, काम-क्रोध आदि विकारों के आवर्त बनते ही रहेंगे जो कि मनुष्य को अशान्त एवं असंतुलित बनायेंगे ही। जब कि आध्यात्मिक जीवन सुख एवं शाँति के क्षणों में प्रसन्नता पूर्वक बहता हुआ मनुष्य को सुख शान्ति की शीतलता प्रदान करता रहेगा।
आध्यात्मिक जीवन अपनाने का अर्थ है असत् से सत् की ओर जाना। सत्य, प्रेम और न्याय का आदर करना, निकृष्ट जीवन से उत्कृष्ट जीवन की ओर बढ़ना। इस प्रकार का आध्यात्मिक जीवन अपनाये बिना मनुष्य वास्तविक सुख शान्ति नहीं पा सकता। धनवान, यशवान होकर भी यदि मनुष्य आत्मा की उच्च भूमिका में न पहुँचा सका तो क्या वह किसी प्रकार भी महान कहा जायेगा। सत्य की उपेक्षा और प्रेम की अवहेलना करके, छल-कपट और दम्भ के बल पर कोई कितना ही बड़ा क्यों न बन जाये, किन्तु उसका वह बड़प्पन एक विडंबना के अतिरिक्त और कुछ भी न होगा। महानता की वह अनुभूति जो आत्मा को पुलकित अथवा देवत्व की ओर प्रेरित करती है कदापि प्राप्त नहीं हो सकती। यह दिव्य अनुभूति केवल आध्यात्मिक जीवन अपनाने से ही प्राप्त हो सकती।
वासनापूर्ण निकृष्ट जीवन त्याग कर शुद्ध सात्विक जीवन यापन करने की प्रेरणा देने वाला अध्यात्मवाद ही है। वह मनुष्य को तम से ज्योति और मृत्यु से अमृत की ओर ले जाने वाला है। बाह्य वस्तुओं के सुख की भाँति अध्यात्मवाद का आन्तरिक सुख अस्थिर नहीं होता। वह चिरन्तन स्थिर एकरस होता है। संसार की अशुद्धताएँ, इन्द्रिय भोग की लिप्सा और वस्तुवाद की असारता अध्यात्मवादी को प्रभावित नहीं कर पातीं। वह अन्तर बाहर एक जैसा तृप्त सन्तुष्ट तथा महान रहा करता है।
आत्मा में अखण्ड विश्वास रख कर जीवन यापन करने वाला आध्यात्मिक ही कहा जायेगा। आत्मा है यह मान लेना ही आत्मा में विश्वास करना नहीं है। आत्मा में विश्वास करने का आशय है इस अनुभूति से प्रतिक्षण ओत-प्रोत रहना कि ‘संसार में व्याप्त परमात्मा के अंश आत्मा द्वारा हमारा निर्माण किया गया है। हम यह पच भौतिक शरीर ही नहीं हैं बल्कि आत्मरूप में वही कुछ हैं जो परमात्मा है’। ऐसी अनुभूति होने से ही हम अपने को ठीक से पहचान सकेंगे और सत्य, प्रेम, सहानुभूति, दया, क्षमा आदि ईश्वरीय गुणों का आदर कर सकेंगे। जिस समय हममें इन गुणों के ठीक-ठीक मूल्याँकन तथा इनको अपने अन्दर विकसित करने की चाह जाग उठेगी हम अध्यात्म पथ पर अग्रसर हो चलेंगे।
अध्यात्म सदाचरण और सदाचरण अध्यात्म के प्रेरक मित्र हैं। सदाचरण अध्यात्मवाद का सक्रिय रूप है और अध्यात्मवाद सदाचरण की घोषणा है। सदाचारी आध्यात्मिक तथा आध्यात्मिक व्यक्ति का सदाचारी होना अवश्यम्भावी है।
भौतिक लोभ लिप्सा को त्याग कर निर्विकार अध्यात्म पथ को अवलम्बन करने से मनुष्य स्वभावतः आन्तरिक संतोष, प्रेम, आनन्द एवं आत्मीयता की दैवी संप्रदाएं प्राप्त कर लिया करता है। अक्षय दैवी सम्पदा पा जाने पर मनुष्य पूर्ण काम हो जाता है और तब फिर उसे और कुछ चाहने की अभिलाषा नहीं रह जाती। अध्यात्म जन्य दैवी सम्पदाओं में संसार के सारे भौतिक तथा अभौतिक सुख निहित हैं।
आध्यात्मिक जीवन का सबसे बड़ा लाभ आत्मोद्धार माना गया है। अध्यात्मवादी का किसी भी दिशा में किया हुआ पुरुषार्थ परमार्थ का ही दूसरा रूप होता है। वह प्रत्येक कार्य को परमात्मा का कार्य और परिणाम को उसका प्रसाद मानता है। पुरुषार्थ द्वारा परमार्थ-लगन व्यक्ति के ईर्ष्या, द्वेष, माया, मोह, लोभ, स्वार्थ, तृष्णा, वासना आदि के संस्कार नष्ट हो जाते हैं और उनके स्थान पर त्याग, तपस्या, संतोष, परोपकार तथा सेवा आदि के शुभ संस्कार विकसित होने लगते हैं। अध्यात्म मार्ग के पुण्य पथिक के हृदय से तुच्छता दीनता, हीनता, दैन्य तथा दासता के अवगुण वैसे ही निकल जाते हैं जैसे शरद ऋतु में जलाशयों का जल मलातीत हो जाता है। स्वाधीनता, निर्भयता, सम्पन्नता, पवित्रता तथा प्रसन्नता आदिक प्रवृत्तियाँ आध्यात्मिक जीवन की सहज उपलब्धियाँ हैं, इन्हें पाकर मनुष्य को कुछ भी तो पाना शेष नहीं रह जाता। इस प्रकार की स्थायी प्रवृत्तियों को पाने से बढ़कर मनुष्य जीवन में कोई दूसरा लाभ हो नहीं सकता।
संसार का कोई संकट, कोई भी विपत्ति आध्यात्मिक व्यक्ति को विचलित नहीं कर सकती, उसके आत्मिक सुख को हिला नहीं सकती। जहाँ बड़ा से बड़ा भौतिक दृष्टिकोण वाला व्यक्ति तनिक सा संकट आ जाने पर बालकों की तरह रोने चिल्लाने और भयभीत होने लगता है, वहाँ आध्यात्मिक दृष्टिकोण वाला मनुष्य बड़ी से बड़ी आपत्ति में भी प्रसन्न एवं स्थिर रहा करता है। उसका दृष्टिकोण आध्यात्मिकता के प्रसाद से इतना व्यापक हो जाता है कि वह सम्पत्ति तथा विपत्ति दोनों को समान रूप से परमात्मा का प्रसाद मानता है और आत्मा को उसका अभोक्ता, जब कि भौतिकवादी अहंकार से दूषित दृष्टिकोण के कारण अपने को उनका भोक्ता मानता है। आध्यात्मिक व्यक्ति आत्म-जीवी और भौतिकवादी शरीर-जीवी होता है। इसी लिये उनकी अनुभूतियों में इस प्रकार का अन्तर रहा करता है।
सुख सम्पत्ति की प्राप्ति से लेकर संकट सहन करने की क्षमता तक संसार की जो भी दैवी उपलब्धियाँ हैं वे सब आध्यात्मिक जीवन यापन से ही सम्भव हो सकती हैं। मनुष्य जीवन का यह सर्वोपरि लाभ है इसकी उपेक्षा कर देना अथवा प्राप्त न करने से बढ़कर मानव-जीवन की कोई हानि नहीं है।
विचार स्वातंत्र्य का सम्मान-
एक बार एक अंग्रेज पादरी ने स्वामी श्रद्धानन्द जी को लिखा कि मैं भारत में ईसाई धर्म का प्रचार करने के लिये आया हूँ। किन्तु हिन्दी का ज्ञान न होने से मुझे अपने कर्त्तव्य में कठिनाई हो रही है। मैं आपके गुरुकुल काँगड़ी में रहकर हिन्दी सीखना चाहता हूँ। मैं वचन देता हूँ कि जब तक गुरुकुल में रहूँगा ईसाई धर्म का प्रचार विद्यार्थियों के बीच नहीं करूंगा।
हिन्दू धर्म के अखण्ड भक्त एवं विद्वान् स्वामी श्रद्धानन्द ने पादरी को उत्तर में लिख भेजा कि ‘आप अवश्य आकर गुरुकुल में रहें और हिन्दी पढ़ें किन्तु इस बात का वचन दें कि यहाँ आकर आप अपने धर्म का प्रचार पूरी तरह करेंगे। इससे मुझे प्रसन्नता होगी-क्योंकि इससे मेरे विद्यार्थी ईसामसीह तथा उनके प्रचारित धर्म के विषय में ज्ञान प्राप्त करेंगे।
पादरी स्वामी जी की यह धर्मनिष्ठा एवं उदारता देखकर इतना प्रभावित हुआ कि जीवन भर के लिये उनका मित्र बन गया।
प्रत्येक कार्य का कुछ-न-कुछ प्रयोजन होता है। बिना प्रयोजन संसार का कोई कार्य नहीं होता। पृथ्वी का परिभ्रमण, सूर्य का निकलना, रात का आना, वायु का चलना, तारों का टूटना, नदी का बहना, पहाड़ों का स्थिर रहना-आदि सब कार्यों में कुछ-न-कुछ प्रयोजन अथवा ध्येय छिपा रहता है।
जन्म, जीवन तथा मरण आदि सभी प्रति क्रियाओं का एक प्रयोजन रहा करता है। परमात्मा की इस सृष्टि में कोई काम निष्प्रयोजन अथवा निरुद्देश्य नहीं होता। कार्य के इस प्रयोजन को समझ लेना ही ज्ञान है। जिसमें संसार की प्रक्रियाओं को समझ सकने की सामर्थ्य आ जाती है, उसे तत्वज्ञानी कहा जाता है। जन्म, जीवन, जरा और मृत्यु का यही प्रयोजन समझने के कारण ही महात्मा लोग उनसे प्रभावित नहीं होते। उनको हर्ष और शोक की प्रतिक्रियायें विचलित नहीं कर पातीं। इन प्रक्रियाओं का ठीक-ठीक प्रयोजन न समझने के कारण ही साधारण जन जरा-जरा-सी हर्ष और शोक की घटनाओं से प्रभावित हुआ करते हैं।
प्रयोजन के सिद्धान्त के अनुसार मानव-जीवन का भी एक प्रयोजन, एक उद्देश्य होता है। किन्तु ऐसे कितने लोग होते हैं जो मानव-जीवन के सही प्रयोजन को समझने और उसे पूरा करने का प्रयत्न किया करते हैं? अधिकाँश लोग मानव-जीवन का प्रयोजन खाना, कमाना, जीना तथा मर जाना ही समझते हैं और रात-दिन इसी हाय-हाय में पड़े रहते हैं। इतने मात्र प्रयोजन के लिए ही परमात्मा ने इतना बहुमूल्य, दुर्लभ तथा सर्वशक्ति सम्पन्न मानव-जीवन नहीं दिया है। यदि केवल खाना, कमाना और मर जाना मात्र ही मानव-जीवन का लक्ष्य होता है तो उसमें और अन्य कीट-पतंगों में कोई अन्तर न रह जाता। कीट-पतंग तथा पशु-पक्षी भी तो यही करते हैं। जन्म लेते, निरुद्देश्य जीते, खाते-पीते और मर जाते हैं। मानव-जीवन का मात्र इतना ही उद्देश्य रहा होता तो न तो उसे बुद्धि दी जाती और न विवेक। वह प्रगति, उन्नति व विकास की भावना से शून्य होता। ज्ञान, गौरव व आत्म-अस्तित्व की जिज्ञासा उसे न मिली होती। विषय-भोगों को जीवन का प्रयोजन मानने वाले भ्रम में रहते हैं-ऐसा मानना होगा। खाने, कमाने और मर जाने जैसे तुच्छ प्रयोजन के लिए यह विलक्षण मनुष्य-देह नहीं मिली है। मानव-शरीर की विलक्षणता तथा उसके भीतर भरी हुई अद्भुत शक्तियाँ इस बात का प्रमाण हैं कि पशुओं की तरह खाने, पीने और मर जाने के लिए यह मानव-जीवन नहीं मिला है, अवश्य ही इसके अनुरूप इसका कोई महान प्रयोजन है। खाने-पीने और मर जाने को मानव-जीवन का प्रयोजन समझने वाले यह नहीं जानते कि यह प्रक्रियायें जीवन पाने और उसको बनाये रखने के साधन उपाय हैं, उसका मुख्य प्रयोजन नहीं है। किसी इंजन को कोयला, पानी, तेल, ग्रीस देने का उद्देश्य है उसे चलने योग्य बनाए रखना। पानी, कोयला, और तेल आदि खाते, जलाते रहना उसका उद्देश्य नहीं है। उसका वास्तविक तथा मुख्य उद्देश्य कुछ और ही होता है। किन्तु साधारण लोग इसी भ्रम-जंजाल में पड़े जीवन के मुख्य प्रयोजन को भूले रहते हैं और इसीलिए अधिकतर उनका जीवन असफल रहा करता है।
यह कम खेद का विषय नहीं है कि मनुष्य धन कमाना, घर बनवाना, नौकरी करना, खाना-पीना आदि के विषय में तो जानने की जिज्ञासा रखता है किन्तु मानव-जीवन और उसके प्रयोजन के सम्बन्ध में जानने के लिए जरा भी जिज्ञासु नहीं होता।
मानव-जीवन का वास्तविक प्रयोजन है उस पूर्णता को प्राप्त करना जिसको पाने के बाद कुछ पाना न तो शेष रह जाये और न इच्छा हो। एक बार यदि विचारपूर्वक देखा जाये तो पता चलेगा कि मनुष्य जिन बातों को लक्ष्य बनाकर चलता है उनमें भी तो पूर्णता प्राप्त नहीं कर पाता। एक ओर धन कमाता है, दूसरी ओर घाटा हो जाता है। एक ओर जीवन पाता है, दूसरी ओर मृत्यु की तैयारी शुरू हो जाती है। एक ओर मोद मनाता है दूसरी ओर खेद और शोक की परिस्थितियाँ खड़ी रहती हैं। एक ओर अभावों को दूर करने का प्रयत्न करता है तो दूसरी ओर अनेक प्रकार के अभाव दीखने लगते हैं। मनुष्य किसी बात के लिए कितना ही प्रयत्न क्यों न करता रहे किन्तु पूर्णता प्राप्त नहीं कर पाता।
इस अपूर्णता का कारण यही है कि वह जिन-जिन बातों को पूर्णता की स्थिति में पाकर सदा-सर्वदा के लिए सन्तुष्ट हो जाना चाहता है, वे सब नश्वर एवं असत्य हैं। अपूर्णता ही उनका स्वरूप है। कभी भी वे पूर्णता की दशा में नहीं आ सकतीं। पूर्ण केवल परमात्मा है। वह नित्य एवं अपरिवर्तनीय है। उसको पाकर उसका ज्ञान प्राप्त करके ही मनुष्य पूर्णता की उपलब्धि कर सकता है। उस शाश्वत को पा लेने पर मनुष्य हर प्रकार से पूर्ण एवं संतुष्ट हो जाता है। परमात्मा को पाकर न तो कुछ पाना शेष रह जाता है और न फिर आगे के लिए कोई जिज्ञासा होती है। मनुष्य स्वयं ही तद्रूप होकर परमपद में स्थित हो जाता है। मानव-जीवन का यही तो प्रयोजन है। किन्तु कितने ऐसे होते हैं जो इस प्रयोजन, इस उद्देश्य और इस ध्येय की ओर ध्यान देते अथवा पूरा करने का प्रयत्न करते हैं ? यही कारण है कि बहुत कुछ साधन-सामग्री के होते हुए भी वह असन्तुष्ट एवं अभावग्रस्त बना रहता है।
पूर्णता की प्राप्ति यों ही बैठे-ठाले नहीं हो सकती और गलत दिशा में प्रबल पुरुषार्थ करने की आवश्यकता है। पुरुषार्थ वही है जो वाँछित लक्ष्य की ओर बढ़ता चला जाये और सही दिशा वही है जिसमें इस उन्नति एवं प्रगति के लक्षण मिलते और दीखते चले जायें। इसी लक्ष्य, पुरुषार्थ तथा पथ को निर्देश करते हुए यजुर्वेद में कहा गया है-
‘देवस्य चेततो महीभ्य सवितुर्हवामहे।
सुमतिœ सत्यराधसम्॥’
अर्थ-हे मनुष्यों ! जिस परम देव ने अपनी चेतन-स्वरूप क्षमता से इस विशाल सृष्टि-कानन को उत्पन्न किया है, उसकी नित्य उपासना कर सुन्दर विनिश्वयात्मक बुद्धि धारण करो जिससे जीव सत्यरूपी ब्रह्म को सिद्ध और साक्षात कर मोक्ष की ओर अग्रसर होगा।
उपयुक्त श्रुति में उपासना करने का निर्देश दिया गया है। परमात्मा की उपासना क्या है उसकी पूजा का तात्पर्य क्या है ? इसको ठीक से समझे बिना काम नहीं चल सकता। उपासना का प्रयोजन है परमात्मा की प्रसन्नता प्राप्त करना, उसे अपने अनुकूल बनाना, क्योंकि उसकी अनुकूलता एवं अनुकम्पा के अभाव में किसी भी श्रेय में सफलता मिलना सम्भव नहीं। अधिकाँश लोग उपासना का अर्थ पूजा-पाठ करना ही मानते हैं। भजन, कीर्तन, नाम, जप, भोग, आरती अथवा कुछ कर्मकाँड की व्यवस्था कर देना ही उपासना मानते हैं और आशा करते हैं कि इससे परमात्मा की अनुकम्पा एवं अनुकूलता प्राप्त हो जायेगी, किन्तु यह उनका भ्रममात्र है। परमात्मा की अनुकम्पा तथा अनुकूलता प्राप्त करने के लिए उसके आदर्शों पर चलना और आदेशों का पालन करना होगा। कोई पुत्र अपने पिता की प्रशंसा तो करता रहे उसकी पद-पूजा और प्रशस्ति में तो लगा रहे किन्तु न तो उसकी आज्ञा माने और न उस पथ पर चले जिसका वह निर्देश दें तो क्या वह पुत्र पिता की अनुकम्पा एवं अनुकूलता प्राप्त कर सकता है? नहीं, वह इस प्रकार अपने ध्येय में सफल नहीं हो सकता। इसके विपरीत एक पुत्र पिता की पूजा-प्रशस्ति तो नहीं करता किन्तु उसकी आज्ञायों का पालन करता और निर्दिष्ट मार्ग पर चलता है- निश्चय ही वह पिता के अनुग्रह अधिकारी बनेगा।
जीवन-ध्येय में सफलता पाने, उसके प्रयोजन को पूरा करने के लिए परमात्मा को जिस अनुकम्पा की आवश्यकता है उसकी प्राप्ति, उसकी आज्ञाओं का पालन करने और आदर्शों पर चलकर ही हो सकती है। पूजा-पाठ, भजन-कीर्तन आदि के कार्यक्रम तो इसलिए जरूरी हैं कि इनकी सहायता से मनुष्य में उस योग्यता की वृद्धि होती है जिसके बल पर वह परमात्मा द्वारा प्रशस्त पथ पर चल सकने और उसकी आज्ञाओं का पालन कर सकने की सामर्थ्य पाता रहता है। यह परमात्मा के प्रति अपनी अनुकूलता प्रकट करने का एक ढंग भी है। क्योंकि जिसकी अनुकूलता अपेक्षित होती है उसके प्रति स्वयं भी अनुकूल होना होगा, आत्म प्रतिकूलता की दशा में किसी की अनुकूलता प्राप्त नहीं की जा सकती।
पूजा-अर्चना और भजन-कीर्तन द्वारा पथ पर चलने की शक्ति तो प्राप्त की जाती है, किन्तु चला न जाये तो उस शक्ति का परमात्म-पथ पर चलने के लिए क्या उपयोग हुआ? कितनी ही सामर्थ्य क्यों न एकत्रित कर ली जाए, अपने को कितना ही सक्षम तथा योग्य क्यों न बना लिया जाए, जब तक क्रिया का आश्रय न लिखा जाएगा कोई काम बनने वाला नहीं। कर्म के अभाव में किसी लक्ष्य की पूर्ति नहीं की जा सकती।
मनुष्य के कर्म ही उसकी शुभाशुभ गति के हेतु होते हैं। कर्मों द्वारा ही मनुष्य सुख-दुःख पाता है, बन्धन तथा मुक्ति का अधिकारी बनता है। मनुष्य के दुष्कर्म उसे जन्म-जन्मान्तरों में अन्धकार के बीच भटकाते रहते हैं और उसके सत्कर्म ही उसे अन्धकार से निकालकर प्रकाश की ओर, और बन्धन से मुक्ति की ओर ले जाते हैं।
मन, वचन और शरीर से सत्कर्मों में रत रहने वाला ही परमात्मा की अनुकूलता एवं अनुकम्पा प्राप्त कर सकता है। सत्कर्म ही परमात्मा की वह उपासना है जिससे वह प्रसन्न होता है। अपने उपासक को अनायास ही मोक्षपद का अधिकारी बना देता है। मनुष्य को अन्य प्राणियों से भिन्न तथा बढ़कर बुद्धि, विवेक तथा शक्तियों का पुञ्ज देने, उसकी आत्मा में श्रद्धा तथा जिज्ञासा को भरने तथा आत्मशक्ति का ज्ञान कराने में इस बात का प्रमाण निहित है कि परमात्मा की निश्चित इच्छा है कि ‘मनुष्य ध्येय-पथ पर आगे बढ़े संसार में बिखरे पड़े अनन्त ऐश्वर्य का अधिकारी बने। अपने स्वरूप तथा मेरे रूप को पहचाने और प्राप्त करने में सफल हो। वह अपूर्णता से पूर्णता की ओर बढ़ कर सदा-सर्वदा के लिए सन्तुष्ट तथा सम्पन्न हो जाए।’ पर ईश्वर की यह इच्छा भी तभी पूर्ण होगी जब मनुष्य उसके बतलाये हुए परमार्थ-पथ पर उसकी आज्ञाओं एवं आदर्शों के अनुकूल चलेगा, अन्यथा मनुष्य के कर्मफलों में परमात्मा भी एक निश्चित विधान के अनुसार हस्तक्षेप करने में असमर्थ है। उसकी विशालता, महानता और न्यायप्रियता अनुचित हस्तक्षेप को कदापि स्वीकार न करेगी।
सत्कर्म ही मनुष्य को मोक्ष अथवा परमात्मा के साक्षात्कार की ओर अग्रसर करते हैं। मनुष्य को अवश्य ही परमार्थ-पथ का अवलम्बन लेकर पूर्णता की ओर बढ़ना चाहिए। यही प्रगति इस मानव-जीवन का मुख्य प्रयोजन तथा उद्देश्य है।
आपका सहायक-
युवक का उत्साह कठिनाइयों को धूल में मिला देता है। वही उत्साह बुढ़ापे तक बना रहे तो आश्चर्यजनक काम करके दिखाता है। विश्व-कवि रवीन्द्रनाथ अस्सी वर्ष के हो जाने पर भी वैसे ही उत्साहपूर्ण थे, जैसे कि वे जीवन के आरम्भ के दिनों में देखे गये थे। मृत्यु के कुछ घण्टे पूर्व तक वे बराबर कवितायें लिखते रहे थे और उनमें वही स्फूर्ति और वही उत्साह दिखाई देता था जैसा कि उनकी युवाकाल की रचनाओं में था। यही कारण है कि उनकी अन्तिम रचना में, जिसमें उन्होंने मृत्युरूपी मल्लाह से कहा है-”सामने अगाध समुद्र है। कर्णधार “नाव बढ़ाओ”, उत्साह की एक उद्दाम लहर दिखाई देती है जो मृत्यु की भीषणता का उपहास-सी करती जान पड़ती है।
महात्मा गाँधी के वे शब्द-”अभी तो मैं नवयुवक हूँ, मेरी अवस्था ही कितनी है-केवल 65 वर्ष की” उत्साह का सजीव चित्र उपस्थित करते हैं। हाथ में लिए कार्य को पूरा करने के लिए वे जिस उत्साह से अग्रसर होते थे, वह हमें सदैव नया पाठ पढ़ा सकता है। वे कभी पराजय स्वीकार नहीं करते थे। उत्साह उनका सहायक रहता था। जो उत्साही हैं, उनके मन में पराजय की भावना नहीं आ सकती। पराजय तो उत्साह-हीनता का लक्षण है और हतोत्साह का परिणाम है।
-स्माइल्स
संसार में उन्नति करने और सफलता पाने की असंख्यों दिशायें हैं। असंख्यों लोग उन में बढ़ते और सफल होने का प्रयत्न करते रहते हैं। किन्तु कुछ लोग देखते ही देखते मालामाल होकर सफल हो जाते हैं और कुछ चींटी की चाल से रेंगते और तिल-तिल बढ़ते हुए जीवन भर उतनी दूर तक नहीं जा पाते जितनी दूर अन्य बहुत से लोग दो-चार साल में पहुँच जाते हैं।
दो समान एवं सामान्य स्थिति के व्यक्ति व्यापार क्षेत्र में एक साथ उतरते हैं। एक घोड़े की चाल से दौड़ता हुआ शीघ्र ही बड़ा व्यापारी बन जाता है और दूसरा छोटा-सा दुकानदार ही रह जाता है। यदि इसे भाग्य-चक्र की गति कह दिया जाये तो कर्म, परिश्रम एवं उद्योग की मान्यता उठ जाती है, जिसे किसी अन्धविश्वासी, आलसी तथा अभाग्यवान भाग्यवादी के सिवाय कोई विवेकवान शक्ति स्वीकार करने को तैयार न होगा।
दोनों दुकानदार परिश्रमी तथा पुरुषार्थी रहे हैं। कभी कोई क्षण आलस्य अथवा प्रमाद में नहीं खोया। प्रत्येक क्षण अपनी उन्नति एवं विकास में लगाते रहे। तब भी एक छोटा-सा दुकानदार बना रहा और दूसरा आँधी तूफान की तरह बढ़ कर, एक बड़ा व्यवसायी, एक धनवान पूँजी-पति और लम्बे चौड़े कारोबार वाला बन गया। उसकी फर्म स्थापित हो गई, बैंकों में खाते खुल गये, टेलीफोन लग गया, और मुनीम रोकड़िये काम करने लगे। अभी एक बेचारा अपने छोटे-से मकान की नींव भी नहीं डाल पाया था कि दूसरे की कोठियों पर मंजिलें चढ़ने लगीं, दरवाजे पर कार खड़ी हो गई। निश्चय ही ऐसा लगता है कि उन दोनों में से एक सफल हो गया और दूसरा असफल रह गया।
स्वाभाविक है कि इस उन्नति एवं सफलता को देख सुन कर इच्छा हो कि उसकी उस गतिमान सफलता का रहस्य पता चल जाता जिसे अपना कर उन्नति की दिशा में अग्रसर होने का प्रयत्न किया जाये। धन सम्पत्ति और वैभव विभव के साथ जीवन को सफलता के ऊँचे शिखर पर कल्लोल करते देखा जाये। किन्तु विश्वास है कि इस घोड़े की चाल से आने वाली सफलता का रहस्य जान कर कोई भी स्वाभिमानी मनुष्य उसे दूर से ही हाथ जोड़कर उसके विपरीत असफलता को सहर्ष स्वीकार कर देगा।
आँधी तूफान की तरह आने वाली सफलता का रहस्य जानने के लिए सरकारी ठेकेदार का उदाहरण ले लीजिये। वह अपना कार्य किसी ठेकेदार के पास मजदूरों की कारगुजारी देखने और लिखने के काम से शुरू करता है। मालिक को दिखाने के लिये मेहनत करने का अभिनय तो करता है पर साथ ही मजदूरों से मिला रहता है। किसी को आराम देकर अथवा अधिक पैसा दिला कर कमीशन लेता है। इमारत के मसाले में गड़बड़ी करके मालिक के मुनाफे में सहायक होता है साथ ही मौका पाकर मालिक के सामान पर हाथ साफ करता है। मजदूरों की कारगुजारी और हाजिरी में हेर-फेर करके या तो उन्हें परेशान करके नाजायज लाभ उठाता है या सीधे-सीधे मजदूरी मार लेता है। सामान सप्लायरों से मिल कर कमीशन तय करता और घटिया माल की खपत कर देता है। अफसरों को खुश करने के लिए चाटुकारी तो करता ही है, साथ ही मालिक से रिश्वत दिलवा कर खुद भी फायदा उठाता है। इस प्रकार अपनी आर्थिक आय के अनेक स्रोत खोल कर उन्नति का मार्ग प्रशस्त करता है। इस बीच उसे हजारों बार मजदूरों के कोप तथा कोस का भाजन बनना पड़ता है। मालिक से डाट और अफसरों से अपमान प्राप्त होता है। नौकरी से अलग होने की नौबत आती है तो खुशामद करना, पैर पड़ना और गिड़गिड़ाना काम आता है।
धीरे-धीरे छोटे-मोटे ठेके लेकर काम आगे बढ़ाता है। रिश्वत, बेईमानी, असत्य और कपट की नीति से पैसा पैदा करके बड़ा ठेकेदार बन जाता है। फिर क्या राष्ट्र की सम्पत्ति हड़पता और सरकारी सड़कों भवनों आदि में खोटा माल लगा कर खरे पैसे लेता है। कमजोर और अनुपयुक्त निर्माणों को रिश्वत के बल पर पास कराता और मालामाल बन जाता है। यह है वह रहस्य जिसके आधार पर अनेक लोग घोड़े की चाल चल कर बड़े आदमी बन जाते हैं और कोठी, कार, रेडियो, बंगले की चमक-दमक में सफल दिखाई देते हैं। आत्मा से लेकर राष्ट्र तक और लोक से लेकर परलोक तक की हानि कर बढ़ने वाले व्यक्तियों को यदि सफल माना जा सकता है तो फिर संसार में असफल व्यक्ति किसे कहा जा सकता है-यह बात विचारणीय है। ऐसे आदर्श एवं आचरणहीन व्यक्तियों को वे लोग ही सफल मानकर प्रशंसा एवं स्पृहा कर कसते हैं जो या तो सफलता का अर्थ नहीं जानते या फिर उसी मनोवृत्ति के होते हैं। आर्थिक स्वार्थ के लिये आत्मा, स्वाभिमान, मनुष्यता, तथा राष्ट्र के हित को बलिदान कर देने के बाद भी जिसे संतोष और प्रसन्नता होती है उन्हें मनुष्य की श्रेणी में गिनने में संकोच ही होना चाहिए।
इसके विपरीत दूसरा व्यक्ति जिस काम में उतरता है, उसे ईमानदारी से करता है। न तो स्वयं अनुचित लाभ उठाता है और न दूसरे के लिये सहायक हो पाता है। नौकरी में मालिक के प्रति ईमानदार रहता है, हर प्रकार से उसके हित का ध्यान रखता है किन्तु अनुचित लाभों में सहायक नहीं हो पाता। निदान कोई उन्नति किये बिना यथास्थान पड़ा रहता है। धीरे-धीरे अपनी शुभ कमाई से से मितव्ययिता पूर्वक कुछ बचाता रहता है और जब थोड़ा-सा पैसा हो जाता है तब काम को आगे बढ़ाता है। वह घूस देकर किसी दूसरे का अहित नहीं करता और न एक के बदले चार पाने का लोभ करता है, आत्मा, स्वाभिमान, राष्ट्र तथा मानवता की रक्षा करता, लोक-परलोक के रास्ते में काँटे नहीं बोता और थोड़े में सन्तोष करता है। ऐसे ईमानदार तथा आदर्श एवं आचरणवान व्यक्ति की उन्नति की गति धीमी होना स्वाभाविक है। वह कहीं जिन्दगी भर की कमाई में रहने योग्य एक अच्छा मकान बनवा पाता है। बैंक बैलेन्स, ऊँचा फर्म लम्बा चौड़ा कारोबार उसकी कल्पना एवं कामना के बाहर की बातें रहती हैं और यदि इनकी उपलब्धि होती भी है तो एक लम्बे अरसे और कठिनतम परिश्रम के बाद, देखते ही देखते नहीं। लगभग जीवन की पूरी अवधि सामान्य स्थिति और साधारण कारोबार में ही व्यय हो जाती है। देखने वालों को असफल एवं अनुन्नत व्यक्ति ही दीखता है। किन्तु वास्तव में वह कितना सफल व्यक्ति होता है इसे विवेकशील व्यक्ति ही समझ पाते हैं।
आर्थिक प्रचुरता, व्यापारिक उन्नति एवं सामाजिक स्थिति को उसी दशा में सफलता की सूचक कहा जा सकता है जबकि यह उपलब्धियाँ निष्कलंक तथा स्थिर सुख संतोष की देने वाली हों, जिन्हें देखकर अपने पवित्र पुरुषार्थ, निर्विकार आचरण, सत्य व्यवहार और आन्तरिक ईमानदारी का आत्म-गौरव अनुभव हो। यदि यह उपलब्धियाँ अपने अन्याय, अनौचित्य, असत्य अथवा अनाचरण की याद दिलाकर आत्मग्लानि, हीन भावना, अपराधी-भाव का कारण बनती हैं और उनसे वाँछित एवं वास्तविक हर्ष की प्राप्ति नहीं होती है तो निश्चय ही वे ‘सफलता’ जैसे शब्द की अधिकारिणी नहीं बन सकती हैं। सफलता की कसौटी आदर्श रक्षा है- आर्थिक प्रचुरता नहीं।
ठेकेदार की तरह ही सफलता असफलता का सच्चा स्वरूप समझने के लिये किन्हीं दो दुकानदारों का उदाहरण लिया जा सकता है। एक दुकानदार खाद्य पदार्थों में मिलावट करता है। कम तोल कर देता है। अधिक पैसे लेता है। चोरबाजारी करता है। उचित दाम देने वाले को न देकर वस्तुयें अधिक दाम देने वाले के हाथ बेचता है। होते हुए चीज के लिए इनकारी कर अभाव पैदा करता है और महंगाई बढ़ाता है। भोले अनजान व्यक्तियों को ठगता है। इस प्रकार के जानें कितने अनुचित उपायों द्वारा पैसा कमा कर कोठी खड़ी करता है। बड़ी फर्म का मालिक बनता है। अपनी अनुचित कार्यवाहियों के लिए समाज में शंका, संदेह तथा अपवाद का विषय बनता है। पुलिस का डर, कानून और हुक्कामों का भय उसे रात-दिन चैन नहीं लेने देता। आय एवं बिक्रीकर की चोरी करने के लिए दोहरा कागज रखता और उन्हें कहाँ रक्खूँ, कहाँ छिपाऊँ के चक्कर में परेशान रहता है। रहस्यविद् मुनीमों तथा नौकरों से अपराधी की तरह डरता है। कभी-कभी जेल हवालात की हवा भी खानी पड़ती है। सरेआम शोषित व्यक्तियों द्वारा अपमानित होने की हर समय सम्भावना बनी रहती है और इस प्रकार जिन्दगी एक बवाल बन जाती है। इतनी चिन्ताओं, भयों तथा अवहेलनाओं के साथ पाया हुआ धन, जमा की हुई सम्पत्ति यदि सफलता की सूचक हो सकती है तो फिर असफलता को किन लक्षणों से जोड़ा जायेगा।
इसके विपरीत एक दुकानदार ईमानदार, स्पष्ट तथा औचित्यवान रहता है। कमाई कम होती है किन्तु बाजार में साख है। ग्राहक विश्वास करते हैं। आत्म संतोष के साथ शिर ऊँचा करके चलता है। कोई उँगली नहीं उठा पाता। बाहर भीतर से साफ सुथरा है। उचित दामों पर उचित चीज ही देता है। न तो समाज में निन्दा का भय और हाकिम हुक्कामों का डर। स्त्री-पुरुष, बच्चे-बूढ़े सब प्रशंसा करते और सद्भावना रखते हैं। पहले उसी की दुकान पर जाते तब कहीं मजबूरी से दूसरे के पास। बाजार के बड़े किन्तु बेईमान व्यापारियों के बीच हीरे की तरह दमकता रहता, लोक रंजन और लोक प्रियता के बीच व्यापार करता। थोड़ा किन्तु शुद्ध सामान रखता, न कभी किसी को कम देता और न बुरा सुनता। ऐसे स्वच्छ तथा निर्लिप्त दुकानदार को यदि सफल नहीं कहा जा सकता तो फिर आर्थिक क्षेत्र में सफल कहा जाने योग्य कोई भी नहीं माना जा सकता। सफलता का वास्तविक मापदण्ड अधिकता नहीं औचित्य ही है। अधिकता को औचित्य की तुलना में सफलता कहने वाले अपनी अविवेकशीलता को ही व्यक्त करते हैं।
दो विद्यार्थी परीक्षा देते हैं। उनमें से एक पास हो जाता है और दूसरा फेल। फेल होने वाला विद्यार्थी सालों भर पढ़ता रहा यथासाध्य अध्ययन में कमी नहीं की। किन्तु किन्हीं विशेष कारणों अथवा संयोगवश फेल हो जाता है। दूसरा पास होने वाला विद्यार्थी सालों भर खेलता-कूदता अथवा मटरगस्ती करता रहा। किताब को हाथ नहीं लगाता। किन्तु परीक्षा में नकल द्वारा अथवा अन्य अनुचित उपायों से पास हो जाता है। तो क्या यह सफल और वह असफल माना जायेगा? नहीं ! ऐसा माना जाना गलत होगा। नकल द्वारा अथवा अनुचित उपायों के आधार पर पास हो जाने पर वह असफल ही माना जायगा और पढ़ने तथा परिश्रम करने के बाद भी संयोगवश फेल हो जाने वाला उसकी तुलना में सफल ही माना जायेगा।
सफलता की कसौटी परिणाम नहीं बल्कि वह मार्ग, वह उपाय, वह साधन और वह आधार है उन्नति एवं विकास के लिये जिन्हें अपनाया और काम में लाया गया है। इस विवेचना के प्रकाश में, सफलता के आकाँक्षी की अपनी समझ है कि वह सरल एवं क्षिप्रागत की स्वीकृति देता है अथवा पुरुषार्थ पूर्ण धीरे-धीरे आने वाली सफलता को।
परावलम्बी पुरुष ही होनहार या दैव ऐसे शब्दों का सहारा अधिक लिया करते हैं। वे पुरुषार्थ तो करना नहीं चाहते, सारा काम भाग्य, होनहार या दैव के सहारे छोड़कर चलते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि पुरुषार्थी व्यक्ति को स्वावलम्बी अवश्य होना चाहिये या यों कहिए कि स्वावलम्बी वही हो सकता है जो पुरुषार्थ करता है। पुरुषार्थ में जिसका अद्भुत विश्वास है, पुरुषार्थ जिसके जीवन का एक प्रमुख अंग है, पुरुषार्थ से जो पीछे नहीं हटना जानता, वही स्वावलम्बी हो सकता है तथा वही सफल भी हो सकता है।
महात्मा गाँधी ने एक स्थान पर कहा कि देश के हर बालक को पहले स्वावलम्बी बनाने का पाठ पढ़ाना चाहिए। हमें यह गुण पाश्चात्य देशवासियों से सीखना चाहिये। व्यावहारिक जीवन में हम देखते हैं कि जिन परिवारों के बालक परावलम्बी हो जाते हैं, उनमें स्वावलम्बन बहुत कम मात्रा में पाया जाता है। इसके विपरीत पाश्चात्य देशों में धनी से धनी पुरुष अपने कार्य को अपने हाथ से करने से संतोष, गर्व व सुख का अनुभव करता है। वह उसे कर्तव्य समझकर करता है और इस कारण कठिन से कठिन परिस्थिति में वह दृढ़ रहता है।
मस्तिष्क को पक्षपात से दूर रखिए।
मस्तिष्क मनुष्य का मित्र माना गया है। वह जीवन पर अग्रसर होने में सहायक होता है। मस्तिष्क ही राह दिखलाया करता है और उस पर चलने की प्रेरणा भी दिया करता है। अच्छाई-बुराई की सूचना देना भी उसी का काम होता है। मनुष्य को अपना वास्तविक नेता अपने मस्तिष्क को ही समझना चाहिए।
मनुष्य के मस्तिष्क में उलझाव तब पैदा होता है जब वह अपने अन्दर किन्हीं बातों को स्थायी रूप से स्थापित कर लेता है और उनके विषय में सोचना-समझना छोड़ देता है। जो बात जिस प्रकार स्थापित हो गई है उसको उसी प्रकार माने रहने से मस्तिष्क की अपनी मौलिकता समाप्त हो जाती है। वह तब किसी बात पर सोचता भी है तो उसकी विचारधारा पूर्व स्थापित रेखाओं के बीच से ही बहती चलती है, जिससे वह सोचता तो है किन्तु उन्हीं के अनुरूप सोचने को मजबूर हो जाता है।
यद्यपि ऐसा वह जान बूझकर अवश्य नहीं करता तब भी उसकी विचारधारा रहती है एक ढ़ार पर, जिस प्रकार पटरी में फँसे हुए रेलगाड़ी के पहिए स्वयं चलते हुए अपनी गति में स्वतन्त्र नहीं रहते और जो दिशा पटरी की होती है वही दिशा पहिए भी ग्रहण कर लिया करते हैं, उसी भाँति पूर्व मान्यतायें बनी रहने से मस्तिष्क भी उन्हीं के अनुरूप सोचा करता है।
जिस प्रकार रेल के पहिए फँसे रहने से पटरी के अधीन होते हैं, उसी प्रकार पूर्व निर्धारित मान्यताओं में फँसे रहने से मस्तिष्क की गति उनकी गुलाम बनी रहती है। वह जो कुछ भी सोचता, कहता अथवा प्रतिपादित करता है उसमें मान्यताओं के प्रति पक्षपात का आग्रह रहा करता है।
इस प्रकार का एकांगीय अथवा पक्षपाती मस्तिष्क कभी भी अच्छा मित्र नहीं रहता। जिस प्रकार किसी मित्र के प्रभाव में रहने से कोई उसका परामर्श मानने का अभ्यस्त रहा करता है उसी प्रकार मस्तिष्क के प्रभाव में रहने से मनुष्य उसकी आज्ञा मानता ही है। ऐसी दशा में पक्षपाती मस्तिष्क परामर्श देने में सक्षम नहीं होता।
अपने इसी पक्षपात जन्य विश्वास के कारण वह कभी-कभी अपनी मान्यताओं को दूसरे पर थोपने की अनाधिकार चेष्टा भी किया करता है जिससे अनेक प्रकार के संघर्ष उत्पन्न हो जाते हैं। अपनी मान्यतायें मनाने का मनुष्य को बड़ा चाव रहता है। उनके प्रति प्यार होने के कारण उसकी इच्छा रहती है कि सारा संसार उन्हें प्यार करे, उनका आदर करे और उसी की तरह अपनाये भी। इस अनधिकार चेष्टा में उसको लोकप्रियता अथवा नेतृत्व का लोभ भी रहता है। यही नेतृत्व की लोकेषणा कभी-कभी वास्तविक मूल्य जानते हुए भी अपनी मान्यताओं के अधिक मूल्याँकन की दुर्बलता पैदा कर देती है।
संसार में फैले हुए संघर्षों के मूल में बैठकर यदि विचार किया जाए तो पता चलेगा कि वर्तमान अशाँति का मुख्य कारण अपनी-अपनी मान्यताओं के प्रति मनुष्य का पक्षपात ही है। कोई साम्राज्यवाद में संसार का कल्याण देखता है तो कोई समाजवाद में। कोई स्थायी सुख-शाँति को मानता है तो कोई सहअस्तित्व को। कोई हिंसा में विश्वास करता है तो कोई अहिंसा में। कोई आस्तिकता की दुहाई देता है तो कोई नास्तिकता को जरूरी समझता है। किसी की उपासना-पद्धति निराकार की ओर जाती है तो किसी की साकार की ओर। कोई ईश्वर, प्रकृति, जीव, जीवन, परलोक, धर्म, सृष्टि आदि के प्रति एक प्रकार की मान्यता रखता है तो दूसरा अन्य प्रकार की। कहने का तात्पर्य यह है कि संसार में मान्यताओं का कोई बारम्बार नहीं और उनके बीच मित्रता एवं विचित्रता की भी कमी नहीं है। साथ ही सबको उनके प्रति मोह और पक्षपात की दुर्बलता भी रहती है। तब भला कोई किसी की मान्यता को अपनी मान्यता से श्रेष्ठ मानने अथवा अपनी मान्यता के स्थान पर अन्य के विश्वास को किस प्रकार स्वीकार करने को तैयार हो सकता है? और ऐसी दशा में जब कोई अपनी मान्यताओं की श्रेष्ठता का अनुचित दुराग्रह करेगा तो कलह-क्लेश और लड़ाई-झगड़े की परिस्थितियाँ आयेंगी ही।
यह सत्य है कि किसी एक विषय में संसार की सारी मान्यतायें समान रूप से सही नहीं हो सकतीं। सब में ही सत्य और असत्य का कुछ-न-कुछ अंश होगा ही। किसी एक की मान्यता की सचाई के विषय में पूछा जाए तो वह उसको इस प्रकार से एकाँगी प्रतिपादन करेगा कि सुनने वाले को उसके सत्य होने का विश्वास हो सकता है। अपनी मान्यताओं के पक्ष में मानव-मस्तिष्क ऐसे-ऐसे तर्क, ऐसी-ऐसी दलीलें प्रस्तुत करता है कि जिनको सुनकर मान लेने को जी करता है।
इस प्रकार एक को सुनने के बाद जब दूसरे पक्ष को सुना जाए तो ऐसा लगेगा कि पहले व्यक्ति ने जो कहा है वह बिल्कुल गलत है। ठीक तो यह है जो कि यह व्यक्ति कह रहा है। इस प्रकार किसी एक को अलग सुनकर सही निर्णय पर नहीं पहुँचा जा सकता। सही निर्णय पर पहुँचने के लिए आवश्यक है कि उभय पक्ष को तटस्थ होकर सुना जाए और उनके कथन पर स्वतन्त्र मस्तिष्क से सोचा जाए, तभी किसी सही निर्णय पर पहुँच सकने की सम्भावना हो सकती है।
किन्तु कठिनाई तो यह है कि संसार का हर आदमी अपनी कुछ मान्यतायें रखता है और उनके प्रति आग्रह भी। ऐसी दशा में सत्य-शोधियों का सर्वथा अभाव ही है। सत्य की शोध करने के लिए आवश्यक है कि मनुष्य अपनी पूर्व निर्धारित मान्यताओं का पक्षपात छोड़कर अपने मस्तिष्क को मुक्त करे और तब आपस में बैठकर उपयोगी एवं हितकारी तत्व की खोज का दृष्टिकोण लेकर एक, दूसरे को सुने और समझे। ऐसी दशा में आग्रहरहित विचार-विनिमय से ही किसी सत्य की आशा की जा सकती है, अन्यथा मान्यताओं की भिन्नता के आधार पर संसार में यह संघर्ष होता ही रहेगा और क्लेश, कलह बढ़ते ही रहेंगे।
पारस्परिक विचार-विनिमयता का यह गुण मस्तिष्क में तभी आ सकेगा जब उसको पूर्व निर्धारित मान्यताओं के पक्षपात से मुक्त किया जाए। उसकी विचारधारा को लीकों और लकीरों के बन्धन से अलग किया जाये। सत्य की खोज में दुराग्रह को बाधक मानकर उसका त्याग कर दिया जाये।
धैर्यपूर्वक समक्ष पक्ष को जब तक तटस्थ होकर नहीं सुना जायेगा और अपनी कमियों को जानकर उनको दूर नहीं किया जायेगा तब तक अविश्वास-संघर्ष की सम्भावना कम नहीं हो सकती। इतना ही नहीं, अपने व्यक्तिगत जीवन में भी सुख और शाँति लाने के लिए भी यही आवश्यक है कि हर बात को करते समय उसकी विधि तथा त्रयकालिक प्रभाव एवं परिणाम के प्रति प्रकाशित रहा जाए तभी किसी ठीक तथा वाँछित सन्तोष की प्राप्ति हो सकना सम्भव हो सकेगा। पूर्व निर्धारित मान्यताओं के प्रति पक्षपात से उत्पन्न अन्धकार से मनुष्य भूले और भटकेगा ही और तब उसका परिणाम शोक-सन्ताप के रूप में ही सामने आयेगा।
मन को भाव से ही माना जाता है, वचन या कर्म से नहीं। पत्नी और पुत्री के आलिंगन में भाव की ही भिन्नता है। जब तक मन नहीं जीता जाता, राग-द्वेष शाँत नहीं होते, तब तक मनुष्य इन्द्रियों का गुलाम बना रहता है। मन ही अपने जीवन का रास्ता बनाता है और मृत्यु का रास्ता भी मन में ही तैयार होता है, विचार उस रास्ते की सीमा निश्चित कर देते हैं। -अज्ञात
अपने मित्र एवं पथ-प्रदर्शक नेता मस्तिष्क को यथासम्भव मुक्त एवं निर्विकार रखिए। हर बात पर निष्पक्ष होकर विचार करिये और आवश्यक रीति-नीति को अपनाइये। आपके जीवन से शोक-संतप्त तापों के बहुत से कारण दूर हो जायेंगे।
संसार के 80 प्रतिशत दुःख का कारण केवल यह है कि मनुष्य जो कुछ करता है उस पर या तो विचार नहीं करता या विचार द्वारा किसी ठोस निष्कर्ष तक पहुँचने के पूर्व ही कार्य आरम्भ कर देता है। नासमझी से किये जाने वाले कार्यों के परिणाम भी भोंड़े, अधूरे और दुःखदाई ही होते हैं। सन्त बिनोवा का यह कथन नितान्त सत्य ही है कि “विचार का चिराग बुझ जाने से आचार अन्धा हो जाता है।” इसमें कुछ भी सन्देह नहीं है, कि यदि कार्य के परिणाम पर कुछ सोचने से पूर्व ही यदि मनमाने ढंग से या उतावली में कुछ करने लगें तो उससे विपरीत परिणाम ही उत्पन्न होते हैं। कई बार तो मनुष्य ऐसी उलझन में पड़ जाता है कि उसे यह भी सूझ नहीं पड़ता कि अब बचाव के लिये क्या किया जाए? इस दुःख से दुःखी होकर अधिकाँश व्यक्ति अपनी शारीरिक एवं मानसिक शक्तियों का अपव्यय किया करते हैं। किसी कार्य का आरम्भ करने के पूर्व यदि उसके व्यावहारिक पहलुओं पर विचार कर लिया जाए तो अनेक कठिनाइयों से बचा जा सकता है, शारीरिक तथा मानसिक शक्तियों का अपव्यय रोका जा सकता है।
किसान इस बात को जानता है कि किसी खेत को कितनी बार पानी दें? उस की जुताई कैसे और कितनी बार की जाए? उसकी घास, पात और निराई कब हो? कौन-सा बीज किस ऋतु में बोने से फसल पैदा होगी? इन सभी संभावनाओं पर उसकी दृष्टि खुली हुई होती है तभी वह अच्छी पैदावार उगा पाता है। कार्तिक की फसल अषाढ़ में, अषाढ़ की कार्तिक में, सुखे-अनसूखे कैसे ही खेत में उल्टा-सीधा कोई भी बीज डाल देने से फसल हो जाना मुश्किल है। यदि किसी तरह हो भी जाए तो वह अच्छी भी न होगी और ठीक ढंग से उपजाई गई फसल से बहुत ही घटिया किस्म की होगी।
मनुष्य भी एक तरह का किसान है जो संसार में कर्म की खेती करते हैं। विचार कर्म का बीज है, यदि उसे उपयुक्त समय, उपयुक्त वातावरण न मिले तो लाभ होने की अपेक्षा हानि होने की ही संभावना अधिक रहेगी। इन दिनों ऐसे कर्मों की बाढ़ सी आ गई है जिन्हें लोग बिना विचार किये हुए करते हैं और जब उनके दुष्परिणाम भुगतने पड़ते हैं तो ईश्वर, भाग्य, समाज तथा सरकार पर तरह-तरह के आरोप लगाते रहते हैं। इतने पर भी उनका दुःख नष्ट नहीं होता, एक बार का उपजा कर्मफल चाहे वह दुःख दें या सुख उसे तो भुगतना ही पड़ता है।
सोचते भी हैं तो अपनी शक्ति और सामर्थ्य से बहुत चढ़ा बढ़ाकर। पर परिस्थितियों में एकाएक परिवर्तन तो हो नहीं जाता। कर्ज लिये हुये धन को चुकाने के लिये भी तो कमाई ही करनी पड़ेगी। फिर उस समय जब सारी कमाई ब्याज समेत उघाई में ही चली जायेगी तब अपना तथा बच्चों का क्या होगा? इन नासमझ लोगों का जीवन ही एक तरह से उधार हो जाता है। वे दूसरों का ही मुँह ताकते रहते हैं। अपनी शक्तियों का उपयोग कर कुछ अच्छी परिस्थिति प्राप्त करने की शक्ति व सामर्थ्य का उनमें अभाव होता है।
औंधे सीधे कार्य जिनका कोई पूर्वाकार नहीं होता वे मनुष्य को कठिन दुःख देते हैं। चोरी, भ्रष्टाचार, नशेबाजी आदि बुरी आदतें भी ऐसी ही होती हैं जिनके परिणाम जाने बिना या जानकर भी घृष्टता पूर्वक लोग उन्हें व्यवहार में लाते हैं, इनके परिणाम बड़े कष्टकर होते हैं। सबसे हानिकारक वस्तु अविचारिता ही है जिससे लोग गलत परिणाम भुगतते हैं।
इसलिये कोई भी कार्य करने के पूर्व उसे अच्छे बुरे दोनों दृष्टिकोण से परखें। सोना खरीदा जाता है तो उस की कीमत और असलियत दोनों पर विचार किया जाता है। इसी तरह कोई भी कार्य क्यों न हो उससे लाभ क्या होगा इतना सोचने के बाद यदि वे लाभदायक हों और उनसे अनिष्ट की संभावनायें न दीख पड़ती हों तो ही उन्हें क्रिया रूप देना चाहिए। नशा करना है तो यह भी सोचिये कि उससे शरीर पर कितना बुरा प्रभाव पड़ता है और सामाजिक स्थिति पर उसकी कैसी प्रतिक्रिया उत्पन्न होती है। कुल मिलाकर यदि उसमें लाभ दिखाई देता हो तब तो कोई भी उसे बुरा न कहता पर सभी देखते हैं नशा मनुष्य के धन को बरबाद करता है, तन फूँकता है और सामाजिक शाँति व व्यवस्था को भंग करता है। इन परिणामों का एक काल्पनिक रूप जो बना लेगा उसके लिए अपमान, अपव्यय तथा उत्तेजनाओं से बच सकना असंभव हो जायेगा। यह बात एक नशे में ही लागू नहीं होती। संसार का कोई भी कार्य हो उसकी अच्छी-बुरी परिस्थितियों पर विचार करने के उपरान्त ही उसे मूर्तरूप देना समझदारी की बात होगी। जो इस समझदारी को जितना अधिक व्यवहार में उतारेगा वह उतना ही सफल व्यक्ति बनेगा यह निश्चित है।
यह भी ध्यान रहे कि अपने स्वार्थ या सुख प्राप्ति को ही प्रमुख मानकर आप विचार न करने लग जायें अन्यथा उसकी बुराइयों की ओर आपका ध्यान भी नहीं जायेगा। विचार उभय पक्षीय तथा निष्पक्ष होना चाहिये। अपने सुखों के लिये प्रायः लोग ऐसा ही करते हैं कि वे उसके हानिकारक पहलू पर दृष्टिपात नहीं करते। जुआरी आदमी यही सोचता है कि वही सारा धन जीत लेगा, पर ऐसी मान्यता तो उनमें से प्रत्येक की होती है, यह कोई नहीं सोचता कि जीत तो एक की ही होगी, शेष तो सब हारने वाले ही हैं। “हारने वालों में मैं भी हो सकता हूँ” ऐसा जो सोच सकता है वह जरूर बुराइयों से और उनके बुरे परिणाम से बच सकता है। कोई भी विचार एकाँगी होता है तभी बुराइयों को स्थान मिलता है, इसलिये हमारी विचार शक्ति निष्पक्ष व सर्वांगीण होनी चाहिए।
किसी कार्य को केवल विचार पर भी न छोड़ देना चाहिए। कार्य रूप में परिणित हुए बिना योजनायें चाहे वे कितनी ही अच्छी क्यों न हों लाभ नहीं दें सकतीं। उन्हें क्रिया-रूप भी मिलना चाहिये। विचार की आवश्यकता वैसी ही है जैसी रेलगाड़ी को स्टेशन पार करने के लिए सिगनल की आवश्यकता होती है। सिगनल का उद्देश्य केवल यह है कि ड्राइवर यह समझले कि रास्ता साफ है, अथवा आगे कुछ खतरा है? विचारों के द्वारा भी ऐसे ही संकेत मिलते हैं कि वह कार्य उचित और उपयुक्त है या अनुचित और अनुपयुक्त? यह समझ जाने पर उस विचार को क्रिया-रूप दें देना चाहिए। बुरे परिणाम की जहाँ आशंका हो उन कार्यों को छोड़कर शेष विचार आचरण में प्रयुक्त होने चाहिएं तभी कोई काम बन सकता है। महात्मा गाँधी का कथन है-”आचरण रहित विचार कितने ही अच्छे क्यों न हों उन्हें खोटे सिक्के की तरह समझना चाहिए।”
इससे यह सिद्ध होता है कि कोरा आचरण अपने आप में पूर्ण नहीं। उसी प्रकार केवल विचार से भी कोई काम नहीं बनता। आत्म सफलता के लिये दोनों की आवश्यकता समान रूप से है। कबीरदास की यह सम्मति किसी विचारक की शिक्षा से कम महत्वपूर्ण नहीं कि-
आचरण सब जग मिला, मिला विचारी न कोय।
कोटि अचारी वारिये एक विचारी जो होय॥
अर्थात्- इस संसार में आचरण करने वाले बहुत हैं पर उन पर विचार करने वाले बहुत कम हैं। जो मनुष्य विचारपूर्वक कार्य करता है वह केवल आचरण करने वाले हजार पुरुषों से अच्छा है।”
अभ्यास की दृष्टि रही तो साधन काम आते हैं। अभ्यास की दृष्टि न रही तो उत्तम साधन भी निकम्मे हो जाते हैं।
उत्तम साध्य के लिए उत्तम साधन भी होना चाहिए। सुगन्ध की प्राप्ति चन्दनादि सुगन्धित द्रव्यों से ही सम्भव है। घटिया तेल जलाकर हवन की सुगन्ध नहीं पैदा की जा सकती।
-वृन्द
यह उद्बोधन साँसारिक सफलता, सामाजिक व्यवस्था तथा नैतिक सदाचरण सभी दृष्टियों से महत्वपूर्ण है कि मनुष्य कुछ करने के पूर्व उस पर विचार कर लिया करे। भली प्रकार विचार किये हुये कर्म सब फलकारी होते हैं उनसे ठोस लाभ मनुष्य जाति को मिलते हैं। बिना विचार किये हुये जो काम करते हैं उन्हें बाद में पश्चाताप ही भुगतना पड़ता है।
महाराज जनक के द्वार पर एक विचित्र-सा व्यक्ति आकर ठहरा और द्वारपाल से कहा कि महाराज को सूचित कर दो कि एक पर्यटक आपका साक्षात्कार करना चाहता है।
द्वारपाल उस विचित्र व्यक्ति को देखकर दूसरे साथियों के साथ जोर से हँस पड़ा। टेढ़ा, कुबड़ा, काला, कुरूप, नाटा और नंगा-भला देखकर कोई क्यों न हँस पड़ता।
द्वारपाल ने तिरस्कार करते हुए कहा-’जा-जा, महाराज से साक्षात्कार करेगा! जरा अपनी सूरत तो देख जाकर कहीं।’
आगन्तुक द्वारपाल की बौद्धिक योग्यता तथा तदनुकूल शिष्टाचार एवं सभ्यता का अनुमान रखता ही था। उसकी बात का बुरा न माना और फिर कहा-’आप जरा जाकर खबर तो कर दें। आगे महाराज की इच्छा, मिलने की अनुमति दें या न दें। सूचना करना आपका कर्तव्य है, उसे पूरा करिए।
एक दूसरे सेवक ने कहा-’जाकर कह भी दो। महाराज का भी मनोरंजन हो जाएगा। दरबार से निकाले जाने पर इसे शिक्षा हो जायेगी। आगे भविष्य में किसी राजदरबार में जाने का साहस नहीं करेगा।’ सेवकों ने आगन्तुक का अपने मापदण्डों से मूल्याँकन किया और पूरे विवरण के साथ महाराज जनक को सूचना दे दी। विवरण की विलक्षणता ने ही दरबार में आगन्तुक के प्रति जिज्ञासा उत्पन्न कर दी। द्वारस्थ आगन्तुक दरबार में बुला लिया गया।
दरबार में आगन्तुक द्वारा पदार्पण करते ही इधर से उधर तक उपहासपूर्ण हँसी की एक लहर दौड़ गई। उसे अनायास फूटी हुई हँसी की लहर को राजसभा की मर्यादा भी न रोक सकी। आठ स्थानों से टेढ़ा-मेढ़ा काला-कुरूप, एक लंगोटी की अतिरिक्त नंग-धड़ंग आगन्तुक कुछ कम हास्यास्पद था भी नहीं। स्थिति के अनुसार महाराज जनक ने दरबारियों की अशिष्टता सहन कर ली। गम्भीर होकर आगन्तुक ने परिचय प्रकट किया-
‘मेरा नाम अष्टावक्र है। आपकी तथा आपके दरबारियों की विद्वता सुनकर सत्संग-लाभ के लोभ से आया था, किन्तु देखता हूँ कि आपके दरबार में चर्मदर्शी चमारों की ही बहुतायत है।’
महर्षि अष्टावक्र की बात सुनकर दरबार में सन्नाटा छा गया। हँसने वालों पर घड़ों पानी पड़ गया और सभी सिर झुकाकर मन-ही-मन पश्चाताप करते हुए सोचने लगे कि इसकी बाह्य-दशा के आधार पर मूल्याँकन में जल्दी कर हमने भूल की है।
महाराज जनक ने महर्षि का अभिनन्दन कर उचित आसन दिया और दरबारियों की ओर से उनकी इस अयोग्यतापूर्ण अशिष्टता के लिए क्षमा माँगी।
यह घटना मनुष्य के मूल्याँकन सम्बन्धी मापदण्ड पर प्रकाश डालती है। द्वारपाल से लेकर सभासदों तक सबने महर्षि अष्टावक्र के मूल्याँकन का मापदण्ड उनका बाह्याकार ही रक्खा। उन्होंने यह विचारने की बुद्धिमानी नहीं की कि हो सकता है इस टेढ़े-तिरछे शरीर में कोई गहन विद्या, महान् तेज और उज्ज्वल आत्मा निवास कर रही हो और इस प्रकार दृश्य आधार पर किया हुआ इसका अवमूल्यन उक्त गुणों का अपमान सिद्ध हो। क्योंकि मूल्य आकार का नहीं, आचार-विचार का ही होता है। निस्सन्देह दरबारियों से भूल हुई जिसका फल उनके अवमूल्यन के रूप में उनके सामने आया। राज-सभासद होकर भी चर्मपारखी चमार कहलाना पड़ा।
महाराज जनक धीर, गम्भीर, अंतर्दर्शी तथा मनुष्य के मूल्याँकन करने में कुशल विद्वान थे। वे मनुष्य की बाहरी अवस्था देखकर ही किसी को कुछ भी अनुमान न कर लेते थे। अन्य दरबारियों की तरह उन्होंने भी वह अष्टावक्र आकार देखा किन्तु हँसे नहीं, सोचने लगे। यदि इस व्यक्ति में साहस, आत्म-विश्वास, विद्या, बुद्धि, अनुभव आदि गुणों का अभाव होता तो मेरे दरबार में आकर साक्षात्कार करने की कल्पना भी न करता। यदि वह पीड़ित अथवा याचक होता तो द्वारपाल से वैसी सूचना भिजवाता। वंचक अथवा मूर्खों की इस दरबार में गम्य कहाँ? और यदि संयोगवश ऐसा हो भी तो दो शब्दों में ही प्रकट हो जायेगा। किसी के प्रति बिना परखे हीन या ओछे भाव बना लेने की अमानवीय मूर्खता क्यों की जाये? महाराज जनक का अनुमान ठीक निकला और वे मनुष्य के ऊँचे पारखी सिद्ध हुए। वे महर्षि अष्टावक्र का वंचित मूल्याँकन कर न केवल प्रशंसा के ही पात्र बने बल्कि दूसरों की दृष्टि में अपना महत्व बढ़ा गये।
आकार-प्रकार का नहीं मनुष्य का वास्तविक मूल्य उसके गुणों एवं आचार-विचार का होता है। बाहर के आधार पर मूल्याँकन करने वाले धोखा तो प्रायः खाया ही करते हैं, कभी-कभी मूर्ख भी सिद्ध होते हैं और तब उन्हें आत्म-ग्लानि, पश्चाताप तथा अपवाद का भी पात्र बनना पड़ता है। बाहर से स्वच्छ, शिष्ट तथा बहुमूल्य वेशभूषा देखकर बहुधा लोग प्रभावित होकर वञ्चकों तथा धूर्तों के चक्कर में फँस जाते हैं और बहुत बार बुरी तरह से ठगे जाते हैं। कई बार सन्तवेश से प्रभावित होकर कुटिल करनी वाले आडम्बरधारियों की पद-पूजा करने लगते हैं और बाद में विदित होने पर आत्म-ग्लानि की वेदना भी सहते हैं।
इसके विपरीत कभी-कभी निष्प्रभाव आकार-प्रकार अथवा वेश-भूषा देखकर लोग अनेक सन्तों, सत्पुरुषों तथा महापुरुषों का अपमान एवं अवमानना करके मूर्ख बनते और पश्चाताप की ज्वाला में जलते हैं। जैसा कि पण्डित ईश्वरचन्द्र विद्यासागर और महादेव गोविन्द रानाडे जैसे व्यक्तित्वों के साथ हुआ है। अस्तु, किसी का आकार-प्रकार देखकर ही उसका मूल्याँकन करना बुद्धिमानी नहीं है। महात्माओं के वेश में अपराधी और साधारण वेशभूषा में असाधारण पुरुष पाये जा सकते हैं। इस उलझन का हल यही है कि जब तक आवश्यकता अथवा प्रेरणा न हो, यों ही किसी के मूल्याँकन करने के लिये उत्सुक नहीं होना चाहिए। मनुष्य का मूल्याँकन एक अर्थ रखता है, केवल बौद्धिक कौतुक अथवा कुतूहल मात्र नहीं। आवश्यकता के अवसर पर ही मूल्याँकन करने का प्रयत्न कीजिए और यथासाध्य सही तथा ठीक रहने की कोशिश कीजिए।
किसी की बाह्य कृति कैसी भी हो, उसे मूल्याँकन का माप-दण्ड न बनाइए वेशभूषा एवं आकार-प्रकार से अप्रभावित रहकर निरपेक्ष भाव से उसके आचार-विचार का अध्ययन कीजिए। यदि उसके गुण मनुष्यता की कसौटी पर खरे सिद्ध होते हैं, वह अन्दर से महामना एवं आदर्श पुरुष सिद्ध होता है तो अवश्य ही आपके आदर का अधिकारी है। उसे आदर दिया ही जाना चाहिए। और यदि वह उस कसौटी पर खोटा उतरता है तो निश्चय ही उपेक्षा का पात्र है। सभ्यता के नाते निन्दा तो न करिये किन्तु तटस्थ अवश्य रहिए, फिर वह कितनी ही आकर्षक वेशभूषा का अथवा रूपवान क्यों न हो। इसे मनुष्य के मूल्याँकन की सही विधि कहा जा सकता है।
किसी के मूल्याँकन में उतावली करना मनुष्य की आन्तरिक क्षुद्रता का द्योतक में। किसी की बहुमूल्य वेशभूषा अथवा आकर्षक आकार-प्रकार देखते ही प्रभावित हो उठना अथवा वाह-वाह करते हुए प्रशंसा करने लगना इस बात का ज्वलन्त प्रमाण है कि उक्त व्यक्ति की गति इसके आगे कुछ नहीं है। यह अन्दर से हीन अथवा दरिद्री है और अवश्य ही इसके लिए यह वस्तुयें जीवन की आकाँक्षा हैं। या तो वह इनके लिए लालायित है अथवा यह स्वयं ही इस प्रदर्शनपरक मनोवृत्ति का रोगी है। इसकी दृष्टि में वस्तुओं अथवा वेश-विन्यास का मूल्य मनुष्य की अपेक्षा अधिक है। ऐसी हीन तथा ओछी मनोवृत्ति वाले ही अनाकर्षक वेशभूषा के आधार पर गुणी व्यक्तियों तक पर दाँत बिचकाने और मुँह बनाने लगते हैं और इस सिद्धान्त को चरितार्थ करते हैं कि “गुणी का मूल्य गुणी ही समझता है, मूर्ख नहीं।”
किसी का मूल्याँकन करने से अपना-स्वयं का भी मूल्याँकन हो जाता है। जो जैसा होता है वह उसी प्रकार के व्यक्तियों से प्रभावित, प्रसन्न तथा उन्हीं का प्रशंसक हुआ करता है। एक अपव्ययी व्यक्ति किसी मितव्ययी का सही मूल्याँकन नहीं कर सकता। प्रदर्शनकारी के लिए यह सम्भव नहीं कि वह सरलता, सादगी तथा सामान्यता की प्रशंसा कर सके। बेईमान व्यापारी ईमानदार व्यवसायी को मूर्ख अथवा असहयोगी ही कहेगा। उच्छृंखल छात्र शिष्ट तथा अनुशासित छात्रों को बुद्धू समझ उनकी खिल्ली उड़ाया करते हैं। परोपकार एवं परमार्थ में संलग्न सत्पुरुष किसी भी स्वार्थी तथा अपकारी व्यक्ति से सही मूल्याँकन नहीं पा सकता। इस प्रकार जो व्यक्ति स्वयं जिस प्रकार का होता है, उसी प्रकार के गुणी-दुर्गुणी व्यक्तियों से प्रभावित होकर उनका अपेक्षाकृत बहुमूल्यन किया करता है। अतः आवश्यक है कि किसी का गलत मूल्याँकन करते ही हमारी असली तस्वीर सामने आ जायेगी। साथ ही वह एक सामाजिक एवं नैतिक अपराध होगा।
हमें मूल्याँकन के अपने मानदण्ड के आधार पर यह समझने का प्रयत्न करना चाहिए कि कहीं हममें किसी का अनुचित मूल्याँकन करने की कमी अथवा दुर्बलता तो नहीं है? हमारा मानदण्ड अथवा कसौटी गलत तो नहीं है? यदि ऐसा है तो तुरन्त सुधार कर लेना चाहिए अन्यथा खोटी कसौटी के आधार पर समाज में हमारा स्वयं का मूल्य घट जायेगा जिसका परिणाम क्षोभ, ग्लानि, आत्महीनता अथवा अशाँति और असन्तोष के रूप में सामने आयेगा। सज्जनों के प्रति द्वेष और गुणियों के प्रति ईर्ष्या की अकल्याणकारी भावना का शिकार बनना पड़ेगा।
बहुत से व्यक्ति किसी का सुन्दर व्यक्तित्व देखकर पानी-पानी हो जाते हैं। उसे कोई प्रतिभाशाली व्यक्ति मान लेते हैं और असुन्दर व्यक्तियों को बुद्धू तथा अतेजस्वी अनुमान कर लेते हैं। वे यह नहीं समझ पाते कि ढाक का सुन्दर फूल निर्गन्ध हो सकता है और चम्पा का असुन्दर फूल पूरी वाटिका को सुरभित कर देता है। हर चमकने वाली वस्तु सोना और हर मैली धातु लोहा ही हो, ऐसा सम्भव नहीं। इसका ठीक-ठीक पता तो परख के बाद ही लगाया जा सकता है। अस्तु, दर्शनमात्र से ही किसी का बहुमूल्यन अथवा किसी का अवमूल्यन करना अविवेकपूर्ण व अन्यायपूर्ण अभ्यास है। यदि हम इस प्रकार के अयोग्य अभ्यास के दोषी हैं तो शीघ्र ही अपना सुधार अपेक्षित है, जिसे कर ही लेना चाहिए।
इसी प्रकार धन-वैभव से प्रभावित होते लोगों को देर नहीं लगी। धनी को देखते ही उसके बहुमूल्यन में मन-ही-मन श्रद्धा के फूल चढ़ाने लगते हैं। ऐसे लोग यह नहीं देख पाते कि उसने जो यह प्रचुर सम्पत्ति संचय की है, इसमें इसने किस रीति-नीति का आधार लिया है। निश्चय ही अपार सम्पत्ति का संचय सन्मार्ग से नहीं हो सकता। ऐसी दशा में किसी धनी का धन मात्र देखकर बड़प्पन अथवा प्रतिष्ठा की भावना से मूल्याँकन करना कहाँ तक उचित है, जब वह आय-व्यय के अनुचित मार्गों के कारण मिट्टी के भी मोल का नहीं। वस्तुओं अथवा आकार-प्रकार के आधार पर व्यक्ति का मूल्याँकन करना उसके साथ अन्याय करना है, क्योंकि ऊपरी मूल्याँकन उस वस्तु अथवा आकार-प्रकार का ही होता है, व्यक्ति का नहीं। व्यक्ति एवं वास्तविक व्यक्तित्व, पदार्थ तथा आकार-प्रकार से परे है। मूल्याँकन यदि करना ही है तो उसी का करना चाहिए, उसकी साधन-सामग्री अथवा आकार-प्रकार का नहीं।
व्यक्तित्व की महिमा समझिए-
समाज में एक सुखपूर्ण सम्मानित स्थिति प्राप्त करने की कामना सभी में रहती है और इसकी तैयारी के लिए लोग धन, बल, विद्या और सहयोगियों का संग्रह भी करते हैं। किन्तु इस संग्रह के लिए लोग किस-किस प्रकार के साधन उपयोग में लाते हैं इसका विचार नहीं करते, जिसका परिणाम यह होता है कि उनका वास्तविक व्यक्तित्व विकृत हो जाता है, जिससे यदि वे वाँछित स्थिति प्राप्त भी कर लेते हैं तो भी एक प्रकार से हास्यप्रद ही बने रहते हैं।
किसी उन्नत दशा को प्राप्त करने के लिए व्यक्तित्व का विकास सबसे समीचीन साधन है। यदि मनुष्य अपने गुण-कर्म-स्वभाव में उदात्तता का समावेश कर अपने व्यक्तित्व को विकसित कर ले तो समुन्नत स्थिति पाने के लिये किन्हीं अन्य साधनों की आवश्यकता ही न रहे। संसार के सारे साधन व्यक्तित्व के अधीन रहते हैं, पर व्यक्ति बाह्य साधनों के अधीन नहीं रहता। व्यक्तित्वरहित प्राणी कोई उन्नत दशा प्राप्त करने पर भी वह अपेक्षित सुख-शाँति नहीं पाता जो उसे प्राप्त होनी चाहिए।-रोम्या रोलाँ
आज हर ओर से ‘अभाव! अभाव!’ की ध्वनि आ रही है। मनुष्य दिन-रात मशीन की तरह काम में जुटा रहता है। तब भी उसके खर्च पूरे नहीं होते। हर समय कोई-न-कोई कमी उसे सताती ही रहती है। अभाव को पूरा करने के लिए लोगों ने आय के अनुचित साधन भी अपना लिए हैं, किन्तु अभाव से फिर भी पीछा नहीं छूटता है। गरीब तो गरीब है! उसे कोई भी अभाव रह सकता है, किन्तु जब आज बड़े-बड़े धनवानों को अभाव की शिकायत करते सुना जाता है, तो यह सोचने पर मजबूर होना पड़ता है कि अभाव का कारण धन की कमी नहीं है बल्कि इसका कोई दूसरा ही कारण है जो अमीर तथा गरीब दोनों को समान रूप से जकड़े हुए है। अभावों का मुख्य कारण है-आवश्यकता की बढ़ोतरी। आवश्यकतायें जिस तेजी तथा अनुपात से बढ़ती हैं, आय का उसी अनुपात से बढ़ सकना असम्भव है। फलतः मनुष्य के सम्मुख कोई-न-कोई अभाव बना ही रहता है।
यदि ध्यानपूर्वक देखा जाए और विचारपूर्वक सोचा जाये तो पता चलेगा कि जीवन में वास्तविक अभाव बहुत कम होते हैं। वास्तविक अभाव की अवस्था में मनुष्य का जीना कठिन है। अधिकतर कृत्रिम अभावों की वेदना से व्यग्र रहते तथा मरते हैं। अन्न-वस्त्र आदि जीवन की निताँत आवश्यकता की आपूर्ति को ही वास्तविक अभाव कहा जा सकता है। समाज में मनुष्य की इन अनिवार्य आवश्यकताओं की किसी-न-किसी प्रकार पूर्ति होती ही रहती है। यह बात भिन्न है कि किसी की यह आवश्यकतायें सघन रूप में अतिपूर्ति पाती हों और किसी की केवल सीमाबद्ध।
आज संसार में जो कुछ भी दुःख, क्षोभ, अशाँति, असन्तोष अथवा व्यग्रता दृष्टिगोचर हो रही है, उसका मूल कारण मनुष्य की बढ़ी हुई कृत्रिम आवश्यकतायें ही हैं। मूल आवश्यकताओं को कोशिश करके भी बढ़ाया जा सकता है, किन्तु कृत्रिम आवश्यकताओं की वृद्धि का कोई अन्त नहीं। मनुष्य प्रयत्न करके भी पेट से अधिक भोजन नहीं कर सकता और तन से अधिक कपड़ा नहीं पहन सकता। यदि वह ऐसा करेगा तो रोगी तथा असभ्य बनेगा। जब इन्हीं मूल आवश्यकताओं के साथ कृत्रिमता अथवा अनावश्यकता जोड़ दी जाती हैं तब यह सीमित जरूरतें भी ईरान से तूरान तक बढ़ जाती हैं। पेट के लिए भोजन चाहिए। ठीक है। किन्तु भोजन के लिए मिर्च-मसाले, मक्खन-मलाई, कचौड़ी-पकौड़ी, अण्डा, मुर्गी, माँस-मज्जा और थाली भरे जंजाल आदि विभिन्न व्यंजन हों-ठीक नहीं है। भोजन की आवश्यकता मौलिक है किन्तु उसमें स्वाद अथवा प्रकारों का आरोप कृत्रिमता है। कृत्रिमता से कलुषित भोजन की जरूरत सामान्य रूप से पूरी नहीं की जा सकती है। सामान्य, सरल तथा साधारण भोजन-जो कि मनुष्य के स्वास्थ्य एवं जीवन के लिए जरूरी हैं, आठ-दस आने में पूरा हो सकता है। वहीं कृत्रिमता और स्वादों से सजाया हुआ भोजन आठ-दस रुपयों में भी पूरा नहीं हो सकता है। अस्तु, अभाव का कारण मूल आवश्यकता की पूर्ति नहीं, भोजन के साथ जुड़ी हुई कृत्रिमता ही है।
वस्त्र एवं निवास के साथ भी यही बात है। शरीर ढ़कने के लिए कपड़ा चाहिए जिससे कि शरीर की भी रक्षा हो सके और सभ्यता की भी। यह काम साधारण मोटे कपड़ों की दो-तीन जोड़ी से आसानी से हो सकता है। इसके लिए मनुष्य को अधिक व्यग्रता अथवा व्यय की जरूरत नहीं पड़ती। बुद्धिमानी तथा सावधानी से थोड़े पैसों में ही काम चलाया जा सकता है। किन्तु जब कपड़े की यही सामान्य जरूरत मूल्यवान वस्त्रों, प्रकारों, फैशनों तथा अनेकताओं की कृत्रिमताओं से बोझिल कर दी जाती है तब उसका खर्च उठाना मुश्किल हो जाता है। पचास रुपये साल का खर्च बढ़कर पाँच सौ रुपये साल हो जाता है। ऐसी कृत्रिम जरूरत से मनुष्य का पैसा बरबाद होगा ही, फलस्वरूप वह अभाव की आग में जलेगा भी।
प्रकाश तथा वायु की सुविधा वाला एक स्वच्छ व साधारण-सा मकान साधारण रूप से थोड़े पैसों में बनवाया अथवा किराये पर पाया जा सकता है। किन्तु जब निवास की इस जरूरत के साथ आलीशान सजी हुई कोठी की कल्पना अथवा कृत्रिमता जोड़ दी जाती है तब वह साधारण जरूरत असाधारण बन जाती है। अपनी पूर्ति में या तो मनुष्य का पैसा व्यय करा देगी अथवा अभाव की पीड़ा से परेशान करेगी।
सामान्यतः मनुष्य की जरूरतों की तीन कड़ियाँ हैं। मूल जरूरतें, कृत्रिम अथवा विलास जन्य जरूरतें और व्यसन-रूप जरूरतें। जीवन-रक्षा से सम्बन्धित भोजन, वस्त्र और निवास की साधारण जरूरतें मूल जरूरतें हैं। इन्हीं जरूरतों का अनावश्यक स्तर बढ़ा देने से यही मूल जरूरतें कृत्रिम तथा विलास-विषयक हो जाती हैं। नशीली, प्रदर्शन परक तथा वासना बोधित जरूरतें व्यसन रूप जरूरतें हैं। यह तीसरे स्तर की आवश्यकतायें मनुष्य-जीवन के लिए जरूरी तो नहीं ही हैं वरन् हानिकारक भी हैं। यह न केवल कमाई को ही नष्ट कर देती हैं वरन् स्वास्थ्य एवं शक्ति को भी स्वाहा कर देती है। व्यसन-विषयक जरूरत तो मानव-जीवन की भयानक शत्रु है। इन्हें जरूरतों की कोटि में न रखकर दुर्भाग्य की कोटि में रखना ही उचित होगा।
जरूरतों के न्यूनाधिक्य के अनुपात से ही दुःख-सुख की वृद्धि होती है, जिसकी जरूरतें जितनी कम हैं वह उतना ही अधिक सन्तुष्ट एवं सुखी रहेगा। उसे अभाव की पीड़ा नहीं भोगनी होगी। जिसकी जरूरतें जितनी ही अधिक होंगी वह उतना ही असन्तुष्ट एवं दुःखी होगा और उसके सम्मुख हर समय अभाव का भूत खड़ा रहेगा। मनुष्य जरूरतों को तो बिना किसी कठिनाई के आसानी से बढ़ाया जा सकता है किन्तु उनकी पूर्ति के लिए अपनी आय को आसानी से नहीं बढ़ा सकता। जरूरतों की पूर्ति न होने की पीड़ा, आय बढ़ने की प्रतीक्षा तो करती नहीं, वह तो तत्काल सताने लगती है और तब तक सताती रहती है जब तक कि उसकी पूर्ति नहीं हो जाती। किन्तु इसके साथ एक मुसीबत यह है कि एक जरूरत की पूर्ति हुई नहीं कि दूसरी तैयार। जरूरतों की वृद्धि रक्तबीज की तरह होती रहती है। यदि कोई किसी प्रकार दस जरूरतों की पूर्ति कर पाता है तो उसके साथ उतनी ही और खड़ी हो जाती हैं। जरूरतों की वृत्ति का यह तार-तम्य किसी भी प्रकार रुकता नहीं। फिर एक जरूरत एक बार-पूरी होने के बाद दूसरी बार के लिए फिर तकाजा करने लगती हैं। जरूरतों की पूर्ति से उनकी वृद्धि नहीं रोकी जा सकती।
मूल जरूरतें, आवश्यकतानुसार आगे भी बढ़ सकती हैं। मनुष्य के सामाजिक अथवा स्थानीय स्तर के साथ इनका स्तर भी बढ़ाया जा सकता है, किन्तु केवल तब ही जब उसका बढ़ाया जाना अनिवार्य न हो जाये बल्कि उपयोगी भी हो जाये। समाज में प्रतिष्ठा बढ़ जाने अथवा स्थान के ऊँचा हो जाने पर किसी को अपने रहन-सहन का स्तर ऊँचा करना पड़ सकता है। कार्य-कुशलता अथवा बौद्धिकता के कारण भोजन का सामान्य तथा साधारण खर्च बढ़ाया जा सकता है। किन्तु यह बढ़ाया तब ही जाए जब उसकी नितान्त आवश्यकता हो जाए और उसके अनुरूप या तो उनकी आय में बढ़ोतरी हो गई हो अथवा बढ़ने की सम्भावना हो। प्रदर्शन अथवा अहं-प्रसन्नता के लिए ही साधारण स्तर को असाधारण रूप में बढ़ाना विलास एवं अपव्ययता होगी।
इसके साथ यह जरूरी ही नहीं है कि स्तर तथा स्थान बढ़ जाने पर भी जरूरतों का स्तर बढ़ाया ही जाये। रहन-सहन अथवा आहार-विहार का स्तर तो वास्तव में उसकी स्वच्छता, सादगी तथा व्यवस्था ही मानी जानी चाहिए, न कि बहुमूल्यता अथवा बहुतायतता। भारत में तो ऐसे महापुरुषों की परम्परा ही चलती रही है कि समाज में सर्वोपरि प्रतिष्ठा पा लेने पर भी उनके रहन-सहन तथा आहार-विहार का स्तर पूर्ववत् ही साधारण बना रहा, उसे उन्हें उठाने की न कोई आवश्यकता अनुभव हुई और न उनकी बढ़ी हुई सामाजिक प्रतिष्ठा ने ही इसके लिए दबाव डाला। फिर भी स्तर, स्थान तथा आय के अनुसार रहन-सहन को उठाने की छूट मानी जा सकती है, किन्तु यह हो जरूरत और उपयोगिता के अनुसार ही, प्रदर्शन या प्रसन्नता के लिए नहीं।
कृत्रिम एवं व्यसनमूलक जरूरतों की अनियन्त्रित वृद्धि ने समाज में शोषण का चक्र चला रखा है। यह सही है कि मनुष्य अपनी अनावश्यक तथा अनुचित जरूरतों की पूर्ति के लिए दूसरों का शोषण करने लगा है। किन्तु यह भी किसी प्रकार झूँठ नहीं है कि मनुष्य दूसरे की अपेक्षा स्वयं अपना शोषक अधिक है। कोई दूसरा तो उसका शोषण चार-छः अथवा दस-बीस प्रतिशत कर पाता होगा किन्तु आदमी अपनी पाली हुई निरर्थक जरूरतों को अपनी पूरी अथवा अधिकाँश कमाई चुगा देता है। अपनी अनावश्यक जरूरतों को बढ़ाकर फिर उनकी मजबूरन पूर्ति करने के लिए कमाई का अपव्यय करना अपनी आय का शोषण करना ही तो है। फिर व्यसन पालकर तो वह अपना आर्थिक शोषण ही नहीं करता, जीवनी-शक्ति एवं स्वास्थ्य का भी शोषण किया करता है। शोषण की शिकायत दूसरे से करने से पहले मनुष्य को जरूरतें घटाकर स्वयं अपना शोषण बन्द करना चाहिए। दूसरों के शोषण से त्रस्त मनुष्य यदि एक बार स्वयं अपना शोषण बन्द कर दें तो भी बहुत राहत पा सकता है।
यदि आप अभावों से दुखी रहते हैं, दिन-रात परिश्रम करते हैं फिर भी पूर्ति का सन्तोष नहीं पाते तो अपने जीवन पर नजर डालिए। अपनी आय की कमी की शिकायत करने के बजाय अपने व्यय की विवेचना कीजिए। अवश्य आप पायेंगे कि आपकी आय उतनी कम नहीं है जितनी कि आपकी जरूरतें बढ़ी हुई हैं। यदि आप बिना किसी विशेष उद्योग अथवा आय-वृद्धि के सुखी एवं संतुष्ट होना चाहते हैं और अभावों के चंगुल से छूटना चाहते हैं तो आज ही अपनी जरूरतें कम करना प्रारम्भ कर दीजिए। सर्वप्रथम व्यसन-मूलक जरूरतें तो ऐसे छोड़ दीजिये जैसे धोखे से हाथ में आ जाने पर आग को छोड़ देते हैं। इसके बाद देखिए कि ऐसी भी कोई जरूरत तो नहीं जो अनावश्यक सुख-सुविधा की द्योतक हो। इन स्तरीय जरूरतों को केवल वहीं तक रखिए जो आपके स्थान अथवा स्तर के अनुरूप हों और जीवनोपयोगी भी हों। प्रदर्शन या अहंप्रसन्नता के लिए जीवन-स्तर पर व्यय करना अपने परिश्रम के साथ अन्याय करना है। यह संचय कुछ समय में ही पुराने होकर आकर्षणहीन और निरर्थक हो जाते हैं।
आप अपनी केवल उन्हीं जरूरतों को रखिए और उन्हीं पर खर्च करिए जो मूल और जीवन के लिए नितान्त आवश्यक हों। जरूरतों को वश में कर लेने पर आपके जीवन में सुख-सन्तोष और सम्पन्नता निश्चित हो जायेगी। सुखी होने का यह उपाय सदा ही आपकी शक्ति में है। इसे कीजिए और सन्तोषपूर्ण अभावहीन जीवन-यापन करते हुए अपना आत्मिक विकास कीजिए।
मनुष्य-जीवन का अनुपम अवसर-
अवसर का यथोचित उपयोग ही मनुष्य-जीवन की सफलता का रहस्य है। कोई भी ‘अवसर’ अपनी अञ्जलि में मनुष्य के लिए बहुमूल्य उपहार लेकर ही उपस्थित होता है। अब उनको प्राप्त करना, न करना मनुष्य के अपने हाथ की बात है।
किसी एक ‘अवसर’ के अनेक प्रत्याशी हो सकते हैं, जिनमें प्रतिद्वन्द्विता भी हो सकती है। किन्तु जीतता वही है, जिसके पक्ष में ‘अवसर’ लड़ता है और ‘अवसर’ उसी पक्ष में लड़ता है जो सद्गुणी और सत्पात्र होता है।
हर मनुष्य के जीवन में ‘अवसर’ आता है। किन्तु एक बार निराश होने पर दुबारा नहीं आता है। किसी भी ‘अवसर’ से यह आशा करना मृग-मरीचिका के तुल्य है कि वह आपका द्वार दुबारा खटखटायेगा। बुद्धिमान लोग ‘अवसर’ को आगे से आलिंगन करते हैं, घेरते हैं और पकड़ते हैं क्योंकि इसके दुम नहीं होती जो आगे बढ़ जाने पर पकड़ी जा सके।
मनुष्य-जीवन से बढ़कर कोई ‘अवसर’ नहीं। इसके सदुपयोग न करने से बढ़कर कोई दुर्भाग्य नहीं हो सकता।
-डिजरायली
आश्रम धर्म और सन्तान सीमाबन्ध
परिवार नियोजन अथवा संतति निरोध आज का एक आवश्यक प्रश्न ही नहीं महती आवश्यकता है। इस प्रश्न को हल करने और आवश्यकता को पूरी करने के लिए उपाय, प्रयास तथा उपचार चल रहे हैं। किन्तु समस्या हल होती नहीं दीखती और जनसंख्या वृद्धि से सम्भावित खतरा निश्चित होता चला जा रहा है।
इस समस्या तथा आवश्यकता पर विश्व के विद्वानों का आज ही ध्यान गया हो अथवा यह खतरे की नई जानकारी हो ऐसा नहीं। आज तो जब जनवृद्धि की भयंकरता सामने आ गई और लोग उसका कष्ट पूरी तरह अनुभव करने लगे हैं तब चौंके, आँखें खोलीं और विचार, प्रचार व प्रयास शुरू हुआ।
भारतीय दार्शनिकों, विचारकों, समाज-वेत्ताओं और विद्वानों ने अपनी दूरदृष्टि से इस विभीषिका को अनेक सहस्राब्दियों पूर्व देख लिया था और संसार को बचाने के लिये उपाय कर दिया था। ऐसा उपाय जो न तो अवैज्ञानिक था, न अप्राकृतिक, न अनिश्चित, न हानिकर और न दुष्कर, बल्कि जो हर प्रकार से युक्त, उचित साध्य और जीवन की हर दिशा में अतिरिक्त कल्याणकारी था। ऐसा विधान ऐसा उपाय, जिस का अवलम्बन कर लेने से एक साथ संतति निरोध, आत्मोद्धार, समाज विकास तथा लोक-परलोक की समस्यायें हल सकती थीं।
रेतस ही प्रजनन का मूल आधार है। यदि उसका उस दिशा में प्रयोग न हो तो सन्तानोत्पत्ति का प्रश्न ही नहीं उठता। यदि वीर्य अन्तर्मुखी रखा जाये और उसका उपयोग न किया जाये तो गर्भ निरोध के कृत्रिम उपकरणों के प्रयोग की आवश्यकता ही न रहे। आज इस माँगलिक एवं मूल उपाय पर तो ध्यान दिया नहीं जा रहा है बल्कि अवरोध, निरोध, शल्य, पात एवं औषधियों का सहारा लेकर स्त्री-पुरुषों की दुर्दशा का उपाय अपनाया जा रहा है। ब्रह्मचर्य धारण करने के स्थान पर उसे अथवा उसके प्राकृतिक प्रभाव को व्यर्थ करने की ओर ध्यान दिया जा रहा है। वीर्य जैसा तत्व जो कि मनुष्य का जीवन तत्व और प्राण है, और कृपणता के साथ जिसका व्यय केवल सन्तान प्राप्ति के उद्देश्य के लिये किया जाता था, आज विजातीय तत्व की तरह बाहर फेंका और इसलिये व्यर्थ किया जा रहा है कि सन्तान न हो। जब पौध नहीं चाहिये तो बीज वपन क्यों किया जाए, इस सीधी-सी बात को कोई नहीं समझ पा रहा है। बीज बो कर उसे नष्ट करने में कौन सी बुद्धिमानी है? किन्तु क्या कहा जाये इस विषयी वृत्ति और घातक मनोरंजन को जो क्षणिक ही नहीं अकल्याणकारी भी है जिसकी लिप्सा में इस सत्य को नहीं समझा जा रहा है कि जिस तत्व के क्षय में इतना सुख है उसके संचय में कितना आनन्द होगा, जबकि क्षय का सुख मिथ्या और संचय का आनन्द चिरन्तन एवं स्थायी है।
भारतीय विचारकों की दी हुई जीवन व्यवस्था आश्रम धर्म पर आधारित थी। ब्रह्मचर्य-आश्रम, गृहस्थाश्रम, वानप्रस्थ-आश्रम, संन्यास-आश्रम। मनुष्य की औसत आयु सौ वर्ष की मान कर इन चारों आश्रमों की अवधि पच्चीस-पच्चीस वर्ष रखी गई थी। परिवार नियोजन का उद्देश्य सामने रख कर यदि इस आश्रम धर्म व्यवस्था की विवेचना की जाए और आलोक में देखा जाए तो स्पष्ट पता चल जायेगा कि ऋषियों ने इस जीवन-विधान में निश्चय ही परिवार नियोजन तथा संतति निरोध का दृष्टिकोण इस उद्देश्य से अवश्य रखा है कि देश की जनसंख्या सीमित रहे, सन्तान स्वस्थ एवं सुयोग्य बने, गृहस्थों का स्वास्थ्य सुरक्षित रहे जिससे कि समाज एवं राष्ट्र, स्वस्थ, सुखी और सशक्त स्थिति में बना रह कर अजेय रहे।
ब्रह्मचर्याश्रम में रह कर पच्चीस वर्ष से पहले विवाह करने का कोई प्रश्न ही नहीं था। जहाँ सोलह साल से पूर्व ही विवाह हो जाते हैं और सत्तरह अठारह साल की आयु से बच्चे होने लगते हैं, वहाँ तब पच्चीस वर्ष के बाद विवाह करने पर छब्बीस, सत्ताईस वर्ष की अवस्था से पूर्व सन्तान होने का प्रश्न ही नहीं था। अनुमान लगाया जा सकता है कि इन दस वर्षों के अन्तर में पूरे देश में जनसंख्या वृद्धि में कितना अन्तर हो सकता है। यदि दो वर्ष में एक सन्तान का अनुपात लगा लिया जाए तब भी प्रति व्यक्ति पाँच बच्चे कम हो जाते हैं इस प्रकार पूरे राष्ट्र में प्रति वर्ष लाखों करोड़ों का अन्तर पड़ जाता है।
आगे, जब ब्रह्मचारी गृहस्थ धर्म में आता था तब वह यों ही नहीं आ जाता था, अपने पूर्व आश्रम में गृहस्थ धर्म की शिक्षा लेकर और संस्कार बना कर आता था, जिससे वह कामुक विषयी बनकर इस आश्रम का उपयोग नहीं करता था बल्कि धर्मपूर्वक गृहस्थ का कर्त्तव्य पालन करता था। दाम्पत्य एवं संतानोत्पादन संबंधी नियमों का पालन करता था। उसकी शिक्षा-दीक्षा और संस्कार उसे इसमें पूरी मदद करते थे। साथ ही वह अपने ब्रह्मचर्य के विषय में बड़ा कृपण एवं ममतावान रहता था। इसलिये कि अपने पूर्वाश्रम में ब्रह्मचर्य का सुख देख चुका होता था, आवश्यकता समझ चुका होता था और आत्मोद्धार के अगले दो चरणों में उसकी अनिवार्यता जान चुका होता था। पूर्वकालिक ब्रह्मचर्य का अभ्यास उसे गृहस्थाश्रम में पूरी मदद करता था। क्योंकि ब्रह्मचर्य पालन से ब्रह्मचर्य में और विषय से विषय में ही प्रवृत्ति बढ़ती है-ऐसा नैसर्गिक नियम है।
इस प्रकार आश्रम धर्म का अनुयायी गृहस्थ जीवन भी अधिकाधिक ब्रह्मचारी ही रहा करता था जिससे परिवार नियोजन का उद्देश्य आप-से-आप पूरा होता रहता था। इसके लिए हठात् प्रयत्न करने की आवश्यकता नहीं होती थी। फिर गृहस्थाश्रम की सफलता, पवित्रता, सम्पन्नता तथा सुख शाँति के लिये वर्ष में न जाने कितने यज्ञ-याग, पूजा-अनुष्ठान, व्रत-उपवास, पर्व-उत्सव, पाठ-पारायणध आदि का विधान रहता था जिनमें संयम एवं पवित्रता का नियम अनिवार्य था। अनेक बार तिथि, मास और समय का समागम के संबंध में निषेध था। सन्तान के लिये दाम्पत्य धर्म का एक शास्त्रीय विधान था जिसका पालन करना प्रत्येक गृहस्थ का पावन कर्त्तव्य था। इस प्रकार पूरी आयु के चौथाई भाग में भी अधिकाँश भाग ऐसा रहता था जिसमें समय एवं ब्रह्मचर्य की रक्षा रहती थी। शेष बचे हुये समय में कुछ ही संतानों की संभावना हो सकती थी।
इसके अतिरिक्त गृहस्थों पर सन्तान के संबंध में एक सामाजिक उत्तरदायित्व भी था-कि सन्तान धर्मात्मा, निरोग, सशक्त, संयमी, सुयोग्य तथा सुशील होने के साथ-साथ दीर्घजीवी भी हो। इसके लिये धर्माचरण का निर्वाह तो किया ही जाता था आयुर्वेद तथा कामशास्त्र के नियमों का भी पालन करना पड़ता था जिसके लिये यथायोग्य सन्तान पाने के लिये एक सन्तान के बाद दूसरी सन्तान के लिये बीच में गर्भ, प्रजनन सौर, दूध, पालन तथा अन्य संस्कारों के लिये कम से कम चार पाँच साल का अन्तर रहना जरूरी था। अन्यथा संतान का निर्बल एवं कुसंस्कारी होना स्वाभाविक था। यह स्थिति समाज में हेयता तथा अपवाद का कारण बनती थी। साथ ही पूर्वकालीन धर्मनिष्ठ, नैतिक तथा शीलवान व्यक्ति पहली संतान के समझदार होते ही प्रजनन इसलिये भी बन्द कर देते थे कि बच्चे पर अवाँछित प्रभाव पड़ सकता है, पारिवारिक मर्यादा तथा शील संकोच के नैतिक गुणों की हानि हो सकती थी।
नैतिक और शुभ कमाई से पाली गई सन्तान ही सु-संस्कारी हो सकती है इस शाश्वत सत्य को प्रत्येक गृहस्थ अच्छी तरह जानता था और उसका पालन करता था। शुभ तथा ईमानदारी की कमाई इतनी कदापि नहीं हो सकती जिससे कि चार-चार छः-छः संतानों का समुचित पालन, पूरी शिक्षा-दीक्षा आदि का प्रबंध किया जा सके। एक या दो सन्तानों को ही सुसंस्कृत-सुनिश्चित बनाया जा सकता है। इसलिये गृहस्थ अपने तथा समाज के हित में भी प्रयत्नपूर्वक कम से कम संतान की कामना करते थे। इन सब प्रतिबंधों, नियमों एवं निबंधों के साथ गृहस्थ जीवन में लोगों के प्रायः एक या दो सन्तानें ही होती थीं, जो कि पूर्ण स्वस्थ, सुयोग्य एवं सामर्थ्यवान होती थीं। तभी किसी समाज में राम, कृष्ण, भीम, द्रोण, अर्जुन, प्रताप व शिवा जैसे शूरवीर और गौतम कणाद तुलसी एवं विवेकानन्द जैसे विद्वान होते हैं जिनसे राष्ट्र अभेद्य, अजेय, उन्नत तथा जगद्गुरु बनते हैं।
अब भी कुछ अधिक नहीं बिगड़ा है। यदि संसार कृत्रिम, अप्राकृतिक, नैतिक, अनिश्चित एवं वीभत्स उपायों को छोड़कर भारतीय आश्रम धर्म को अपने जीवन में स्थान दें सके तो न केवल आपसे आप परिवार नियोजन ही हो जाये बल्कि लोक परलोक दोनों के लिए सफलता एवं सुख का पथ प्रशस्त हो जाये।
आज के समय में सांस्कृतिक कार्यक्रमों का बहुत बोल-बाला है। किसी भी उत्सव समारोह, स्वागत, पर्व अथवा विशेष अवसर पर कुछ रुचिकर कार्यक्रमों की योजना कार्यान्वित की जाती है और उसी को साँस्कृतिक कार्यक्रम मान लिया जाता है। नाच, गाना, नाटक, एकाँकी, गोष्ठी, कवि सम्मेलन आदि को विशेष रूप से साँस्कृतिक कार्यक्रम कहा जाता है। किन्तु यह विचार का विषय है कि क्या इस प्रकार के मनोरंजन साँस्कृतिक कार्यक्रम का उद्देश्य पूरा करते हैं? इस बात को समझने और हृदयंगम करने के लिये सबसे पहले ‘संस्कृति’ का आशय अथवा अर्थ समझना होगा। शब्द का अर्थ समझे बिना उसका तात्पर्य अथवा प्रयोजन समझ में नहीं आ सकता।
‘साँस्कृतिक’ शब्द ‘संस्कृति’ से और ‘संस्कृति’ शब्द संस्कार से बना है। संस्कार का अर्थ है परिष्कार, परिमार्जन, शोधन, सुधार अथवा संराधन! संस्कार किसी बुराई, गंदगी अथवा कुरूपता का ही किया जाता है। इस प्रकार जो कार्यक्रम अथवा आयोजन अपरूपता से सुरूपता, मलीनता से स्वच्छता, बुराई से अच्छाई, दुर्गुणों से गुणों और अशुद्धि से शुद्धि की ओर प्रेरित करें, उन्हें ही साँस्कृतिक कार्यक्रम कहना उचित होगा। केवल मनोरंजन अथवा हास-विलास के आयोजनों को साँस्कृतिक कार्यक्रम नहीं कहा जा सकता है।
आज ‘साँस्कृतिक’ शब्द का प्रयोग जिस अर्थ में किया जाता है प्राचीन साहित्य में उस अर्थ में नहीं पाया जाता। आज का ‘संस्कृति’ शब्द अंग्रेजी के ‘कलचर’ शब्द के भाषान्तर अथवा समानार्थक अर्थ में प्रयुक्त किया जाता है, और व्यापक रूप में लिया माना और समझा जाता है। आज किसी राष्ट्र, देश अथवा जाति के आचार-विचार को घेर कर चलने वाली जीवन पद्धति को प्रायः साँस्कृतिक-कार्यक्रमों का आयोजन उसी को व्यक्त करने का उपक्रम है। आज के साँस्कृतिक कार्यक्रम अधिकाँश में नाच-गानों, खेलकूद तथा अन्य मनोरंजनों तक सीमित होकर इतने ओछे, हीन तथा तुच्छ हो गये हैं कि वे देश की सभ्यता का निदर्शन नहीं कर पाते। बहुत बार तो इन कार्यक्रमों में इतनी वैदेशिकता, विजातीयता तथा परत्व का भाव सम्मिलित हो जाता है कि उससे किसी देश विशेष की ‘संस्कृति’ ठीक तथा स्पष्ट रूप से समझ सकने में कठिनाई होती है।
‘संस्कृति’ शब्द आधुनिक है। प्राचीन साहित्य में यह शब्द इस रूप अथवा अर्थ में प्रयुक्त नहीं पाया जाता। इस विषय में विचार करते-करते विद्वान इस निष्कर्ष पर पहुँचे है कि आज का ‘संस्कृति’ शब्द जितना व्यापक है और आचार-विचार सहित जिस जीवन पद्धति को घेर कर प्रवाहित हो रहा है, पूर्व काल में व्यापक तात्पर्य को व्यक्त करने वाला शब्द ‘धर्म’ ही माना जाता था।
भारतीय साहित्य में धर्म शब्द का प्रयोग केवल उपासना अथवा पूजा-पाठ करने के आयोजन के लिये ही प्रयुक्त नहीं हुआ है। वह भारतीय आचार-विचार, आहार-विहार रहन-सहन के साथ जीवन पद्धति के लिये भी प्रयुक्त हुआ है। इससे प्रकट होता है कि हमारा धर्म ही हमारी ‘संस्कृति’ है और उसी से प्रभावित कार्यक्रम ही ‘साँस्कृतिक-कार्यक्रम’ कहे जाने चाहिये। भारतीय धर्म में जिन षोडश संस्कारों का निर्देश है वे सब एक प्रकार से साँस्कृतिक कार्यक्रम ही हैं।
जैसा कि ऊपर विचार किया जा चुका है कि संस्कृति शब्द का निर्माण संस्कार शब्द से हुआ है और संस्कार शब्द का अर्थ है शुद्धि अथवा शोधन। इसलिए साँस्कृतिक कार्यक्रम उसी आयोजन को कहना होगा जिससे जीवन का परिमार्जन, शोधन अथवा शुद्धि हो। इस शुद्धि अथवा शोधन का आशय यथार्थ में चित्त शोधन से ही है। मनुष्य के मन में जो दोष, दुर्गुण घर किये बैठे रहते हैं उन्हीं को दूर करने के विधान को संस्कार कहा गया है। मानसिक स्थिति का मनुष्य के जीवन पर बहुत प्रभाव पड़ता है, मन की शुभ अथवा अशुभ अवस्था पर जीवन का उत्थान-पतन निर्भर है। उन्नति करना ही मानव जीवन का उद्देश्य है। उन्नति करता हुआ ही वह एक दिन परमोन्नति मोक्ष तक पहुँच जाता है, जहाँ पर जाकर फिर न तो आगे कोई उन्नति की सीढ़ी शेष रह जाती है और न पतन का भय। मनुष्य आत्मा रूप में अपने अंशी परमात्मा से मिल कर सर्वदा के लिये स्थित होकर हर प्रकार से निवृत्त तथा मुक्त हो जाता है।
परिष्कार अथवा परिमार्जन के अर्थ में जहाँ ‘संस्कार’ क्रियापद है वहाँ क्रिया प्रेरक स्वभाव के अर्थ में वह संज्ञापद भी है। अभ्यास द्वारा ढलती-ढलती जब कोई प्रवृत्ति, स्थायी स्वभाव का रूप धारण कर लेती है तब उसे संस्कार भी कहा जाता है। संस्कारों का संचय आधुनिक जीवन से ही प्रारंभ नहीं होता। उनका संचय जन्म जन्मान्तरों से होता रहता है, जिन्हें पूर्व संस्कार अथवा पूर्वजन्म के संस्कार भी कहा जाता है। यही कारण है कि अनेक मनुष्य स्वभाव अथवा जन्म से ही सज्जन तथा सत्प्रवृत्ति के होते हैं और अनेक इसके विपरीत। अनेक लोग शुद्ध और सुन्दर वातावरण में रहते हुए भी तदनुकूल नहीं हो पाते जबकि बहुत से लोग असुन्दरता के बीच भी सुन्दरतापूर्वक रह लेते हैं। बहुत बार देखा जा सकता है कि अनेक लोग बहुत जल्दी ही किसी बात को ग्रहण कर लेते हैं और अनेक लोग जीवन भर किसी बात को ग्रहण नहीं कर पाते। इस विपर्यय अथवा विषमता का कारण पूर्व संस्कार ही होते हैं। मनोभूमि में जिस प्रकार के पूर्व बीजों को लेकर मनुष्य आता है वे बीज अपने अनुकूल परिस्थिति पाते ही उसी दिशा में फलीभूत होने लगते हैं। मनुष्य जीवन के साथ संस्कारों के आवागमन की एक परम्परा लगी हुई है। जिस प्रकार मनुष्य पूर्व जन्म से संस्कार लेकर आता है, उसी प्रकार वर्तमान जीवन के संस्कार लेकर अगले जीवन में जाता है।
संस्कारों का संबंध केवल व्यक्ति तक ही नहीं होता, उसका प्रभाव परिवार, कुटुम्ब, कुल तथा संपर्क प्राप्त व्यक्तियों पर भी पड़ता है। दो प्रतिकूल संस्कारों वाले व्यक्तियों के परस्पर मिलते रहने से उनके संस्कारों का प्रभाव एक दूसरे पर पड़ता रहता है। उनमें से जिस व्यक्ति के संस्कार जितने शक्तिशाली होंगे वे उतना ही दूसरे को प्रभावित कर लेंगे। अच्छे संस्कार वाला व्यक्ति अपनी संस्कार शक्ति के आधार पर दूसरे की बुराई दूर कर देता है जबकि निर्बल संस्कार वाला अपनी अच्छाई छोड़कर बुराई ग्रहण कर लेता है। संस्कारों का प्रभाव बच्चों में परम्परागत चलता हुआ एक जैसी प्रवृत्ति की पीढ़ी तक तैयार कर देता है। अस्तु संस्कारों का परिष्कार ही वह विधि है जिससे मनुष्य का जीवन शुद्ध, सुख-शाँतिमय तथा उन्नतिशील बन सकता है।
चित्त की शुद्धि अभ्यास द्वारा ही होती है। यह अभ्यास भी एकाँगी नहीं सर्वांगीण अर्थात् मन, वचन, कर्म , द्वारा ही करना होगा। एकाँगी अभ्यास से चित्त की अत्यन्त शुद्धि नहीं हो सकती। एक मनुष्य शरीर से तो धर्म, कर्म, पुण्य परमार्थ करता रहे और मन में उन कार्यों के प्रति कोई श्रद्धा आस्था न रखे तो उसका वह कार्य मात्रिक ही होगा। उसका कोई भी वाँछित फल निकलना निश्चित नहीं। इसी प्रकार कोई मन से तो सत्कर्मों का चिन्तन करता रहे और तदनुसार कार्य सम्पादित न करे तो उसकी वह क्रिया मनोरथ अथवा कल्पना तक ही सीमित रह जायेगी और उसका भी कोई वाँछित फल प्राप्त नहीं होगा। साथ ही मन तथा क्रिया दोनों का संयोजन कर लेने पर भी यदि कोई सत्कर्मी, वचनों से अश्लील, असद्, अवाँछनीय अथवा विपरीत भाषण करता और सुनता रहे तब भी इसका प्रभाव उसके मानसिक तथा शारीरिक सत्कर्मों के पुण्य फल पर पड़ेगा और चित्त का परिमार्जनपूर्ण प्रेरणा से न हो सकेगा। आवश्यक है कि चित्त शोधन के लिये मन, वचन, कर्म तीनों साधनों का समान नियोजन किया जाये।
शुद्धि अथवा परिष्कार किसी अशुद्धि अथवा मलीनता का ही होता है। चित्त के परिष्कार का अर्थ है उसकी मलीनता अथवा दोष दूर करना, ईर्ष्या, द्वेष, स्वार्थ, काम, कुत्सा, कुँठा आदि मन की मलीनता और क्रोध, लोभ, तृष्णा अहंकार, चंचलता, लोलुपता आदि उसके दुर्गुण हैं। इनको दूर करना ही चित्त का संस्कार करना है। जो चित्त अखण्ड एवं अबोध प्रसन्नता तथा प्रफुल्लता से रहित है, मानना होगा कि वह मलिन तथा दोषपूर्ण है। इसके विपरीत जिस चित्त में प्रसन्नता, प्रफुल्लता, आशा, उत्साह स्फूर्ति, प्रेम, दया, करुणा तथा सेवा भाव का निवास रहता है उस चित्त को शुद्ध तथा दोष रहित ही कहा जायेगा।
चित्त में वाँछित अवस्था उत्पन्न करने का जो उपाय है वह अभ्यास कहा जाता है। यह अभ्यास चिन्तन, मनन, क्रिया-कर्म, पठन, श्रवण तथा दृश्य द्वारा ही होता है। मन की स्वाभाविक गति पतनोन्मुख ही है।
मन को पतन की ओर ले जाने में किसी प्रकार का प्रयत्न नहीं करना पड़ता है, उसको शुभ एवं कल्याणकारी दिशा में चलाने के लिये। इसका उपाय यही है कि कुप्रवृत्तियों के स्थान पर बलपूर्वक सत्प्रवृत्तियों को स्थापित किया जाये। जो विचार अवनतिदायक अथवा जो काम अधोगति वाले हैं उनको प्रतिक्षण त्यागने का ही प्रयत्न करते रहना चाहिए। सत्साहित्य पढ़ना, सद्विचारों का चिन्तन मनन करना, कल्याणकारी दृश्य देखना और शुभ वाणी बोलना तथा सुनना ऐसा अभ्यास है जो धीरे-धीरे मन की दूषित प्रवृत्तियों को नष्ट कर सत्प्रवृत्तियों को समाविष्ट कर देता है। जब तक बुराई को अच्छाई और दुर्गुण को गुण से स्थानापन्न न किया जायेगा तब तक चित्त शुद्धि हो सकना संभव नहीं। केवल शुभ में आस्था रखना मात्र ही वह अभ्यास अथवा प्रयास नहीं है जिससे चित्त-शुद्धि की आशा की जा सके।
मन को वाँछित मोड़ देने के लिये ही विविध संस्कारों का विभाजन किया गया है। पर्वों, त्यौहारों तथा उत्सवों के पीछे भी यही मन्तव्य और साहित्य तथा कलाओं के पीछे भी यही उद्देश्य रहा करता है। इनका प्रतिपादन जितना कल्याणपूर्ण होगा मनुष्य जाति अथवा राष्ट्र उसी अनुपात से दोषरहित होगा। जिस पूर्व काल में धर्म ही संस्कृति का द्योतक था सारे संस्कार उसी के प्रकाश में किये जाते थे लोगों के चित्त अधिकाधिक शुद्ध तथा निर्दोष रहते थे। आज धर्म का अर्थ पतन अथवा संकोचन हो गया है और वह आज के ‘संस्कृति’ शब्द का व्यापक अर्थ नहीं दे पा रहा है। उसे पूजा पाठ, साधना, उपासना तक ही सीमित माना जाने लगा है। अस्तु आज के साँस्कृतिक कार्यक्रम धर्म की सीमा छोड़कर अन्य परिवेश में आ गये हैं। किन्तु उनका मूल उद्देश्य तो बदल ही नहीं सकता। साँस्कृतिक कार्यक्रमों का निश्चय ही ऐसा आयोजन है जिससे मनुष्य के मन का संस्कार हो।
क्या आज जिन नाच-गानों के रूप में साँस्कृतिक कार्यक्रमों की परम्परा चल पड़ी है वे मूल मन्तव्य का सम्पादन कर रहे हैं, अथवा कर सकते हैं? कदापि नहीं। माध्यम चाहे नृत्य, संगीत नाटक अथवा अन्य कार्यक्रम ही क्यों न हो किन्तु जब तक उनमें आदर्श, उदारता, शालीनता, सौम्यता, शुद्धता तथा पवित्रता का समावेश नहीं किया जायेगा, जब तक उनके द्वारा मानवीय मूल्यों की प्रतिस्थापना, उनका महत्व सम्पादित नहीं किया जायेगा, उद्देश्य की पूर्ति न होगी। आज जैसे ओछे, तुच्छ, अभद्र मनोरंजन मात्र से मानव मन के संस्कृत करने का महान मन्तव्य पूरा करना तो दूर वह अधिकाधिक तुच्छ एवं मलीन बनता रहेगा।
उल्टी चाल सुधारी जाए-
मनुष्य सुख चाहता है और दुःख से दूर भागता है। किन्तु चाहने भर से न तो कोई वस्तु मिलती है और न भागने से कोई भय दूर हो सकता है।
सुख पाने और दुख दूर करने के लिये उसकी परिस्थितियों और कारणों को समझना होगा। मनुष्य न तो सुख की परिस्थितियों को समझना चाहता है और न दुःख के कारणों को जानना चाहता है। यदि मनुष्य इस द्वन्द्व का मूल समझ कर उसके अनुसार उपाय करे तो कोई कारण नहीं कि वह अपने ध्येय को न पा ले।
मनुष्य उन विकारों को दूर करने का तो प्रयत्न करता नहीं जिनके कारण वह दुःखी है। चेष्टा यह जानने की करेगा कि सुख का भंडार स्वर्ग कहाँ है? उसका स्वरूप क्या है? उसमें कौन-कौन से सुख साधन प्राप्त हो सकेंगे? क्या उसकी समस्त उचित और अनुचित कामनायें वहाँ पूर्ण हो जायेंगी? वह आनन्द के लिये ईश्वर की खोज करेगा किन्तु पाँव के नीचे चुभने वाले काँटों को हटाने का प्रयत्न नहीं करेगा। सुख के लिये साध्य को छोड़कर असाध्य की उपासना करेगा। इसी उल्टी चाल को हमें सुधारना है।
‘अति सर्वत्र वर्जयेत्’ अर्थात् अति का हर क्षेत्र में निषेध है। बुरी बात तो बुरी बात ही होती है, उसमें अति या अनति का प्रश्न ही क्या? अच्छी बात भी जब अपनी वाँछित मर्यादा का उल्लंघन कर जाती है, तो वही बुराई की कोटि में पहुंच जाती है।
धार्मिक सहिष्णुता एक महान गुण है। किसी दूसरे के धार्मिक विचारों तथा कार्यों में हस्तक्षेप न करना स्वयं ही एक धार्मिकता है। हिन्दुओं ने इस गुण का जितना व्यापक परिचय दिया है, उसका हजारवाँ भाग भी संसार की कोई अन्य जाति न दें सकी। बल्कि यह कहने में भी कोई अतिशयोक्ति नहीं है कि वेद-धर्म के अनुयायियों को छोड़कर संसार की अधिकाँश जातियों ने असहिष्णुता का ही परिचय दिया है।
किन्तु बहुत समय से हिन्दुओं की धार्मिक सहिष्णुता अति की सीमा में पहुँच गई है, जिसके फलस्वरूप गुण, अवगुण बन गया है। अतिशयता हो जाने से हिन्दुओं की सहिष्णुता धार्मिक उपेक्षा के दोष से दूषित हो गई है। होते-होते वे इतने धर्म-निरपेक्ष बन गये कि अपने धर्म पर किये जाने वाले आघात भी इस प्रकार सहन करने लगे हैं, मानो यह अन्य धर्मावलम्बियों का धार्मिक अधिकार हो, जिसमें हस्तक्षेप न करना उनका कर्त्तव्य है।
हिन्दुओं की इस सहिष्णुता से प्रोत्साहित होकर अन्य धर्मावलम्बियों ने क्या-क्या किया और इससे हिन्दू राष्ट्र को कितनी क्षति हुई है? यह बात किसी से छिपी नहीं है। विगत हानियों तथा अत्याचारों की चर्चा करना बेकार है। किन्तु वर्तमान में हिन्दू-जाति पर ईसाइयों का जो आक्रमण हो रहा है, उसकी ओर से आँखें बंद नहीं की जा सकती है।
भारत एक धर्म-निरपेक्ष देश है और भारत-सरकार धर्मनिरपेक्षिता की संरक्षिका। विधान की इस धारा के अनुसार भारत में सभी धर्मों को फलने फूलने और फैलने और विकसित होने का अधिकार है। किन्तु इसका यह आशय कदापि नहीं कि कोई धर्म दूसरे किसी धर्म को मिटाकर फूल-फल सकता है। ईसाई पादरी भारतीय विधान की इस धारा का दुरुपयोग करके हिन्दू धर्म को मिटाकर अपने ईसाई धर्म का विस्तार करने में बुरी तरह जुटे हुए हैं।
भारत में पादरियों का धर्म-प्रचार हिन्दू धर्म को मिटाने का एक खुला षडयंत्र है जो कि एक लम्बे अरसे से चला आ रहा है, अब उपेक्षावश और भी तीव्र तथा प्रबल हो गया है। ईसाई पादरियों के इस धर्म-प्रचार का क्या उद्देश्य है? यह समय-समय पर किए उनके कथनों, लेखों तथा वक्तव्यों से सहज ही पता लग जाता है।
‘लाइट आफ लाइफ’ कैथोलिक पत्रिका के 1964 के जुलाई अंक में ईसाई नवयुवकों को परामर्श देते हुए निर्देश किया गया-’ईसाई छात्रों तथा स्नातकों का यह कर्त्तव्य है कि वे ईसाई धर्म का प्रचार करने के लिए पत्र-पत्रिकाओं में लेख लिखा करें और इस विषय में वे धर्म-निरपेक्ष नीति वाली पत्र-पत्रिकाओं का लाभ उठा सकते हैं। किन्तु यह आवश्यक नहीं है कि वे शुरू-शुरू में ही अपने लेखों में ईसाईयत का प्रचार करने लगें। अच्छा तो यह होगा कि पहले वे सामान्य लेख लिखकर आगे चलकर के पत्रों में खुलकर ईसाई विचारधारा का प्रचार करें।’
यह क्या है? ईसाई नवयुवकों को धर्मनिरपेक्ष पत्र-पत्रिकाओं में घुसने और उनके माध्यम से भारत में ईसाईयत फैलाने के लिए खुला प्रोत्साहन तथा आह्वान है। इसे धर्मनिरपेक्षता का अनुचित लाभ उठाने के लिए एक षड़यंत्र के सिवाय और क्या कहा जायेगा? जहाँ धर्मनिरपेक्षता की नीति भारत के हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई सभी को एक समान तथा सामान्य राष्ट्रीय विचारधारा में लाने का प्रयत्न कर रही है, वहाँ विदेशी मिशनरी ईसाई नवयुवकों की धार्मिक भावनाओं को भड़काकर उन्हें अपने षड़यंत्र का सहायक अस्त्र बनाने का प्रयत्न कर रहे हैं। क्या भारत के राष्ट्रीय हित में यह सहन करने योग्य बात है?
ईसाई पादरियों तथा मिशनरियों का ऐसा ज्वलन्त अभियान और भयानक विचार न केवल भारत के हिन्दुओं वरन् सारी, गैर-ईसाई जनसंख्या की आँखें खोल देने को एक खुली चुनौती है। अपने धर्म की रक्षा तथा भारतीय राष्ट्र की एकता के लिए क्या यह आवश्यक प्रतीत नहीं होता कि भारत की गैर-ईसाई जनता विदेशी मिशनरियों के अनुचित इरादों को असंभव बना देने के लिए आवाज उठाये। यदि भारत की ईसाई जनसंख्या यों ही विदेशी मिशनरियों की गतिविधियों को उपेक्षा की दृष्टि से देखकर प्रमाद में ही पड़ी रही तो यह असंभव बात न होगी कि ईसाई ‘ईसाई भारत’ के अपने ध्येय के बहुत कुछ समीप जा पहुँचे और तब क्या हिन्दू, क्या मुसलमान और क्या सिक्ख सभी धर्मों के मिट जाने का खतरा पैदा हो सकता है।
यह बात सही है कि ईसाई मिशनरियों को हिन्दुओं की अपेक्षा अन्य धर्म वालों पर अपना प्रपंच चलाना आसान नहीं पड़ता। वे मुख्यतः हिन्दुओं को ईसाई बनाने में जुटे हुए हैं, इसके दो कारण हैं-पहला, अति धर्म-सहिष्णुता- वे धर्म बन्धुओं के बीच इसी अति के दोष से ईसाइयत का प्रचार सहन करते जा रहे हैं। दूसरा यह कि गैर-ईसाई अहिन्दुओं की धार्मिक रूढ़िवादिता के कारण ईसाई मिशनरियों को उनके बीच जाल बिछाने का अधिक अवसर नहीं मिलता। अहिन्दू, गैर-ईसाइयों की रूढ़िवादिता उन्हें अपने बीच धंसने का साहस नहीं करने देती। किन्तु इसका यह अर्थ लगाना गलत होगा कि अहिन्दू गैरईसाई ईसाइयों के धार्मिक षड़यंत्र से सुरक्षित हैं और यदि वे ऐसा सोचते हैं तो गहरी भूल करते हैं। अहिन्दू गैर-ईसाइयों को भी इस षड़यन्त्र की, जो ईसाइयों ने हिन्दुओं के बीच प्रचार-प्रपंच चला रखा है, उपेक्षा नहीं करनी चाहिए और समझ लेना चाहिए कि हिन्दुओं पर किया जा रहा आघात परोक्ष रूप में उन पर भी एक आघात है।
कैथोलिक ईसाई पत्रों के कथनों से यह तो स्पष्ट हो ही जाता है कि भारत के गैर-ईसाई समुदाय से ईसाई मिशनरियों को ईर्ष्या है और वे उनकी विशाल जनसंख्या को फूटी आँखों भी नहीं देख पा रहे हैं। वे सम्पूर्ण भारत के गैर-ईसाइयों को ईसाई बनाकर ‘ईसाई-भारत’ का स्वप्न देखते हैं और उसके लिए हर उचित-अनुचित उपाय करते जा रहे हैं।
ईसाइयों से अपने को सुरक्षित समझने वाले बौद्ध, सिक्ख, पारसी, मुसलमान और यहूदी आदि को पर इस बात पर गहराई से विचार करना चाहिए कि भारत की धर्म-निरपेक्षता तथा हिन्दुओं की उपेक्षापूर्ण धार्मिक सहिष्णुता का अनुचित लाभ उठाते हुए यदि ईसाई मिशनरी इसी तेजी से हिन्दुओं को अपने जाल में फंसाने में सफल होते रहे तो शीघ्र ही उनकी जनसंख्या भारत में बहुत अधिक हो जायेगी और तब ऐसी स्थिति में भारत के सारे गैर-ईसाई उनकी तुलना में अल्पसंख्यक हो जायेंगे। क्या ईसाइयों का यह बहुमत तब शक्ति पाकर सम्पूर्ण भारत को ईसाई देखने के लिए व्यग्र पोप, पादरियों तथा प्रचारकों को अल्पसंख्यक गैर ईसाइयों को अपने में आत्मसात करने के प्रपंचों के लिए साहस, अवसर तथा प्रोत्साहन नहीं देगा? इसलिए भारत की धर्म-निरपेक्ष नीति, धार्मिक सहिष्णुता तथा राष्ट्रीय स्वरूप को सुरक्षित रखने और लोकतंत्र की गरिमा बनाये रखने के लिए आवश्यक है कि भारत के सारे गैर ईसाई जन-समुदाय एक साथ होकर ईसाइयों के इस बढ़ते हुए धार्मिक साम्राज्य को रोकने का प्रयत्न करें।
हिन्दुओं का तो यह धार्मिक कर्त्तव्य है कि वे ईसाइयों के षड़यंत्र से आत्मरक्षा में अपना तन-मन-धन लगा दें और गैर ईसाई मिशनरियों की अंतर्राष्ट्रीय गतिविधियों को रोकने में अपना नैतिक समर्थन देकर हिन्दुओं की हिमायत को आगे बढ़ें और आज जो हिन्दुओं को लपेटती हुई ईसाइयत की लपट परोक्ष रूप से उनकी ओर बढ़ रही है, उसे यहीं पर बुझा दें। ऐसा करने से ही भारत में धर्मनिरपेक्षता, धार्मिक बन्धुत्व तथा सच्चे लोकतंत्र की रक्षा हो सकेगी, अन्यथा पुनः आजादी को खतरा की संभावना हो सकती है।
यह स्पष्ट है कि पाश्चात्य देशों की ईसाई-सरकारें तथा संस्थायें भारत में मिशनरियों को एजेंट-रूप में भेजकर ईसाइयत को बढ़ावा दें रही हैं और एक प्रकार से वे धर्म का आधार लेकर उन देशों का साम्राज्य ही भारत में स्थापित करने का प्रयत्न कर रहे हैं। विदेशों के इस धर्मधारी साम्राज्यवाद से बचाव हेतु सम्पूर्ण गैर ईसाइयों को एक मंच पर आकर ईसाइयों के मलीन मन्तव्यों को असफल होने से रोकने के लिए भरसक प्रयत्न करना ही चाहिए।
किन्हीं व्यक्तियों, समाजों तथा राष्ट्रों का उत्थान पतन का हेतु उतना बाह्य वातावरण नहीं होता, जितना कि उनका आन्तरिक वातावरण अथवा उनकी अपनी प्रवृत्तियाँ। यह बात सही है कि व्यक्ति पर समाज की अच्छाई बुराई का प्रभाव पड़ता है, किन्तु पड़ता उन पर ही है जो अन्दर से निर्बल होते हैं। जिसकी प्रकृति उत्तम है, स्वभाव उत्कृष्ट है और प्रवृत्तियाँ ऊर्ध्वगामिनी हैं, उस पर समाज की विकृतियों का निकृष्ट प्रभाव नहीं पड़ सकता। वह कीचड़ में कमल के समान और कमल पर पानी की बूँद के समान ही निर्लिप्त रहा करता है। इसी सिद्धान्त को कविवर रहीम ने एक दोहे में कहा है- “जो रहीम उत्तम प्रकृति का करि सकत कुसंग। चंदन विष व्याप्त नहीं लपटें रहत भुजंग।”
सामाजिक विकृतियों का प्रभाव उन दुर्बलमना व्यक्तियों पर ही पड़ता है जिनके पास अपनी विवेक बुद्धि, विचार शक्ति नहीं होती है। जैसा दूसरों को करते देखते हैं, अपना भला बुरा सोचे बिना खुद भी वैसा करने लगते हैं। यह वृत्ति भेड़-वृत्ति है। एक अगली भेड़ के कूयें में गिर जाने पर पीछे की सारी भेड़ें उसका अनुकरण कर कुएं में गिर जाया करती हैं। आत्मावान पुरुष-सिंहों को यह भेड़-वृत्ति शोभा नहीं देती। रोग उन्हीं पर आक्रमण करता है जिनका स्वास्थ्य कमजोर होता है। स्वस्थ व्यक्ति पर रोग के कीटाणु हावी नहीं हो पाते। रोगों के कीटाणुओं में अपनी शक्ति से अधिक व्यक्ति के निर्बल स्वास्थ्य का बल रहा करता है। यदि उनमें अपना निज का ही अमोघ बल रहा करता, तब किसी बीमारी के फैलने पर कोई भी निरोग न रहता, सभी रोगी हो जाते। पर ऐसा होता नहीं है। रोग से सामान्यतः प्रभावित होने वाले के लिए यह सोचा जा सकता है कि यह व्यक्ति स्वयं ही स्वस्थ नहीं था इसीलिये इस पर रोग की संक्रामकता का प्रभाव पड़ा है। पूर्ण स्वस्थ मनुष्य शीघ्र संक्रमित नहीं होता।
ठीक यही बात विकृतियों के संबंध में भी है। विकृतियाँ भी रोगों की तरह ही संक्रामक होती हैं। समाज में एक से दूसरे के बीच फैलती हैं। किन्तु उनके चुगल में फंस जाने वाले को इसे सहज, स्वाभाविक अथवा अनिवार्य प्रक्रिया नहीं मान लेना चाहिए। उसे समझ लेना चाहिए कि अवश्य ही उसका मन, उसकी वृत्तियाँ और उसका चरित्र निर्बल है तभी दूसरे की विकृति उसे प्रभावित कर सकी है। उसे अपने चारों तरफ देखने पर पता चलेगा कि उसी समाज एवं उसी वातावरण में अनेकों ऐसे सज्जन हैं जिन पर इन विकृतियों के संक्रमण का कोई प्रभाव नहीं पड़ा और वे यथावत शुद्ध-बुद्ध और सुशील बने हुए हैं। किसी को अपने पतन का दोष बाह्य परिस्थितियों अथवा किसी अन्य को न देकर साहसपूर्वक उसका दायित्व अपने निर्बल अन्तःकरण को ही देना चाहिए। यही सोचने का सही ढंग है यही वह मार्ग है जिसके द्वारा को ही अपने कोई उत्तरदायी समझ कर आत्म सुधार में प्रवृत्त हो सकता है। दूसरों पर दोष थोपते रहने से आत्म सुधार की जिज्ञासा संभाव्य नहीं होती।
किन्तु खेद है कि आज समाज में निर्बल मनोभूमि वाले लोगों की ही बहुतायत है जिससे एक दूसरे के बाद अनेक विकृतियाँ समाज को घेरे ही चली जा रही हैं। ऐसी दशा में व्यक्तियों को स्वयं तो आत्म सुधार का प्रयत्न करना ही चाहिए, साथ ही सबल मनोभूमि के सत्पुरुषों को भी सामूहिक सुधार के लिए अपनी सेवायें समर्पित करनी चाहिए। सुधार-सुधार करने से ही होगा। रोग का निदान उपचार ही है, यों ही अपने आप उपाय किये बिना न कोई रोग दूर होता है और न विकृति।
भगवान तिलक ने एक स्थान पर कहा है-
‘व्यक्ति यद्यपि अपने आप में शक्तिवान एवं समर्थ है, किन्तु कोई विरले ही अपनी उस महता को समझने और कार्यान्वित कर सकने में समर्थ होते हैं। साधारणतया लोग गर्मी, सर्दी से मुरझाने, हरियाने वाले पौधों की तरह समाज के भले बुरे वातावरण से प्रभावित होते रहते हैं। यदि सामाजिक परम्परायें एवं मान्यतायें अच्छी होंगी निश्चय ही समाज के लोग सुसंस्कृति तथा सुविकि सित बनेंगे। इसके विपरीत यदि समाज में दुष्प्रवृत्तियों का बाहुल्य होगा तो लोगों का चरित्र एवं जीवन क्रम अस्त-व्यस्त होगा और वे दुःख-दारिद्रय, कष्ट क्लेशों के चुगल में फंसते चले जायेंगे। अतएव विज्ञ, विज्ञान, बुद्धिमान एवं सज्जनों का कर्त्तव्य है कि वे अपने समाज की स्थिति की बारीकी के साथ समीक्षा करें और जहाँ भी जिस प्रकार की विकृति देखें, उसे प्रयत्नपूर्वक सुधारने में तत्पर हो जायें।
जन-साधारण अपनी भेड़चाल के लिए बदनाम है। उनके पास अपनी स्वयं की वह बुद्धि विकसित नहीं होती, वह विवेक जागरुक नहीं होता जिसके आधार पर अपना पथ स्वयं प्रशस्त कर सकें अथवा भलाई-बुराई की समीक्षा कर उसका संग्रह त्याग कर सकें। उनके सामने बुरे लोग आ जाते हैं उनका अनुकरण करने लगते हैं, सत्पुरुष अथवा भले लोग आ जाते हैं तो उनसे प्रभावित होने लगते हैं। आज समाज की व्यापक विकृति का मुख्य कारण यह है कि बुरे लोग ही अधिक जन-साधारण के सम्मुख आये हुए हैं, मैदान में उतरे हुये हैं। जन-साधारण उनसे प्रभावित होकर विकारों, विकृतियों तथा अवाँछित प्रवृत्तियों को अपनाते हुये अपना सर्वनाश करते चले जा रहे हैं। स्वाभाविक है कि जो सामने आयेगा, मैदान हाथ में लेगा-वह प्रभाव डालेगा ही।
एक तो दैव दुर्विपाक अथवा सामाजिक दुर्भाग्य से सत्पुरुषों की संख्या ही बहुत अधिक नहीं है और कुछ सत्पुरुष हैं भी वे या तो समाज से दूर एकान्त में आत्म कल्याण की साधना में विश्वास किये बैठे हैं अथवा एक दर्शक की तरह तटस्थ भाव से अलग खड़े लीला देखते रहते हैं। बहुत से सत्पुरुष ऐसे भीरु स्वभाव के भी होते हैं जो समाज की विकृतियों से इस डर से संघर्ष में नहीं आते कि कोई विकृतियां उन्हें भी न पकड़ लें। और ऐसे विरागी व्यक्तियों की तो कमी नहीं है-जो हर उत्थान, हानि-लाभ, अच्छाई-बुराई को भगवान की इच्छा अथवा लोगों का कर्मभोग समझते हैं और उसमें दखल देने के लिए न तो अपने को अधिकारी समझते हैं और न हस्तक्षेप करना उचित ही। जैसा जो कुछ चल रहा है, चलने दिया जाये। ठीक होने को होगा ठीक हो जायेगा नहीं तो हरि इच्छा।
ऐसे साधु, सज्जन तथा सत्पुरुषों से क्या कहा जाये? उनकी क्या आलोचना की जाये? केवल इतना ही कहा जा सकता है कि एकान्त में आत्म-कल्याण की साधना में विश्वास रखने वाले उस स्वार्थी गृहस्थ की तरह, भौतिक न सही आध्यात्मिक स्वार्थी हैं जो घर में आग लगी होने पर असहाय स्त्री बच्चों की चिन्ता न करके सबसे पहले अपने बचाव का उपक्रम करता है। अलग से खड़े लीला देखने वाले तटस्थों को एक क्षण भी यह न भूलना चाहिए पड़ोस की आग से उपराम रहने वाले अपना घर भी जला लिया करते हैं। जिन विकृतियों को आज वे समाज को ग्रास करते देख रहे हैं, उनके प्रति उपेक्षा मान लिये बैठे हैं, वे विकृतियाँ उनकी उपेक्षा न कर सकेंगी और देर सबेर उन पर भी आक्रमण कर अशाँत एवं असन्तुष्ट बना देंगी। दुरित जब दुर्दमनीय हो जाते हैं तब समान भाव से अच्छे-बुरे, साधु-असाधु सबको धर लिया करते हैं। दिग्व्यापी अंधड़ चलने पर सभी प्रभावित होते हैं क्या वटवृक्ष क्या पौधे, सभी में कम्पन आता है और सभी समान रूप से धूल धूसरित हो जाते हैं।
स्वयं आक्राँत होने के डर से जो विकृतियों से लोहा लेने से दुबकते हैं उन सज्जनों को समझ लेना चाहिये कि अभी उनकी मनोभूमि कमजोर है, आत्म विश्वास की कमी है नहीं तो क्या आज तक अंधकार को प्रकाश पर हावी होते कहीं देखा सुना गया है। डॉक्टर यदि इस शंका से रोगियों के उपचार से विरत रहे कि कहीं कोई रोग उन्हें भी न लग जाये तो बेचारे रोगियों को मृत्यु के अतिरिक्त और कौन-सी गति शेष रह जायेगी। निर्विकार आत्मायें ही विकार ग्रस्तों की शोधक और सुधरे हुये ही बिगड़े हुओं के सुधारक होते हैं। सत्पुरुष ही समाज के त्राता हैं, उन्हें किसी भय, भ्रम अथवा आशंका से अपने इस नैतिक कर्त्तव्य से विमुख नहीं होना चाहिये। यह उनकी सावधानी नहीं भीरुता अथवा पलायन ही कहा जायेगा।
समाज की हर अच्छाई-बुराई, उत्थान पतन को भगवान की इच्छा अथवा लीला समझ कर उसमें हस्तक्षेप को अनुचित मानने वालों को या तो इस ज्ञान का अभाव रहा करता है कि परमात्मा की इच्छा में विकृति नहीं होती। वह सदा शुद्ध एवं प्रबुद्ध है, अस्तु उसकी इच्छायें भी शुद्ध एवं प्रबुद्ध ही होती हैं। निर्विकार परमात्मा की इच्छा में विकार का क्या प्रयोजन? अथवा वे वाक्-चतुर ऐसे व्यक्ति होते हैं जो अपनी अकर्मण्यता अथवा उदासीनता को आलोचना का विषय बनने से बचाने के लिए अत्यान्तिक आस्तिकता का अनुचित सहारा लिया करते हैं।
अस्तु, कुछ भी सही आज समय की आवश्यकता है कि सज्जन एवं सत्पुरुष आगे आयें, मैदान में उतरें और पतनोन्मुख धावमान मनुष्यता की रक्षा विकृतियों, दुष्प्रवृत्तियों एवं दुष्टताओं से करें। आज अच्छाई बुराई का देवासुर संग्राम छिड़ ही जाना चाहिये, देवपुरुष सज्जनों को अपने-अपने क्षेत्रों में अपने योग्य मोर्चा संभाल लेना चाहिये। अपने सत्कार्यों सदाचरण एवं सद्वृत्तियों की मशालें लेकर निकलें और जहाँ-जहाँ अंधकार देखें उसे दूर करें। समाज की विकृतियाँ अब उस सीमा तक पहुँच चुकी हैं, जहाँ पर यदि उन्हें आगे बढ़ने से न रोका गया तो निश्चय ही भारत न रह जायेगा।
मनुष्यता बहुत अधिक मूल्यवान वस्तु है उसकी रक्षा करना प्रत्येक जागरुक व्यक्ति का परम कर्त्तव्य है। परमात्मा ने मनुष्य का निर्माण सज्जनता के ही उपकरणों से इसलिये किया है कि वह स्वयं तो दिव्य एवं अदीन जीवन जिये ही साथ ही अन्य प्राणियों को भी सुख शाँतिपूर्ण जीवन जीने में सहायता करे। उस निर्माता ने प्रत्येक मनुष्य से यह आशा की थी कि वह सृष्टि में सज्जनता, सद्भावना, सहयोग तथा साहाय्य का वातावरण उपस्थित कर उसे स्वर्ग बना देगा। किन्तु काल विक्षेप अथवा मानवता के दुर्भाग्य से आज मानव समाज ईश्वरीय आशा के विरुद्ध आचरण करने लगा है। जिन सौभाग्यवानों को अज्ञान, अंधकार अथवा अनाचरण से नहीं घेर पाया वे ईश्वरीय आशा को चरितार्थ करें। मानव समाज के सुधार में तत्पर होकर श्रेय के भागी बनें। जिनका पतन हो गया है या हो रहा है उनसे तो किसी बात की आशा की नहीं जा सकती, आशा केवल उनसे ही की जा सकती है, जो प्रभु कृपा से पतन से बचे हैं, जिन्हें अपने चरित्र एवं सद्वृत्तियों पर विश्वास है और जो यह समझते हैं कि अपेक्षाकृत उन पर दूसरों से अधिक ईश्वरीय अनुकम्पा है, जिससे उनके हृदयों में सद्भावनाओं शेषाँश विद्यमान है वे ही देवपुरुष पतनोन्मुख समाज का उद्धार कर सकते हैं। उन्हें मनुष्यता की इस आशा को पूरा करना ही चाहिये।
विकृतियों में अपनी न तो कोई शक्ति होती है और न धैर्य। उनका अस्तित्व ठीक उसी प्रकार अस्वाभाविक है जैसे प्रकाश के अभाव में अंधकार का। जिस समय समाज के सामने सत्-प्रवृत्तियाँ आने लगेंगी विकृतियाँ स्वयं ही भागने लगेंगी, विकृतियों का अस्तित्व निश्चय ही सत्-प्रवृत्तियों के गोपन के कारण हे। अच्छाई को सामने आने दिया जाये, भलमनसाहत को आगे बढ़ाया जाये, देखते ही देखते समाज का सुधार प्रारंभ हो जायेगा। जनसाधारण तभी तक बुराई को अपनाये हुए हैं जब तक बुराई उनके सामने है और अच्छाई के दर्शन नहीं होते। अच्छाई का दर्शन तो साधु संत तथा सज्जन पुरुष ही करा सकते हैं। वे किसी जगह किसी साधना में क्यों न लगे हों, समाज कल्याण के कर्त्तव्य का ध्यान रखें और अपने सुझावों, कार्यक्रमों एवं आदर्श चरित्रों से जनसाधारण को प्रकाश दें, राह दिखलायें। भारतीय समाज का नेतृत्व सदैव से धार्मिक पुरुषों ने किया है। जिस दिन से वे अपने इस अधिकार से उदासीन हो गये समाज का विकास एवं सुधार बंद हो गया। वे सावधान होकर अपने अधिकार को कर्त्तव्य समझ कर संभालें, बस समाज का कल्याण हो गया।
श्रेष्ठ पुरुष दूसरे पापाचारी प्राणियों के पाप को नहीं ग्रहण करता, उन्हें अपराधी मान कर उनसे बदलना लेना नहीं चाहता। इस उत्तम सदाचार की रक्षा करनी चाहिए; क्योंकि सदाचार ही सत्पुरुषों का भूषण है।
विवाह को प्रत्येक मानव-समाज में एक धार्मिक कृत्य ही माना गया है। लगभग सभी देशों एवं जातियों में इसे धार्मिक कृत्य के रूप में ही सम्पन्न किया जाता है। हिन्दुओं में तो यह विशेष रूप से धार्मिक कृत्य है ही। मुसलमान, ईसाई, पारसी, यहूदी आदि सभी जातियों में इसे अपने-अपने प्रकार से धर्म-कृत्य मानकर ही किया जाता है।
विवाह से बढ़कर दूसरा कोई धार्मिक कृत्य हो भी क्या सकता है? इस अवसर पर दो आत्मायें अपना स्वतंत्र अस्तित्व खोकर एक दूसरे में मिल जाती है। दो नवीन घटक एक नये परिवार की रचना का महान उत्तरदायित्व संभालने का व्रत लेते हैं। दो मानव प्राणी उस गृहस्थाश्रम में प्रवेश करते हैं जिसके द्वारा अन्य सारे आश्रमों का पालन होता है। पति-पत्नि के रूप में कन्या और कुमार एक सूत्र में आबद्ध होकर, दो जीवनों की अपूर्णता को पूर्णता में परिणत करते हुए समाज, राष्ट्र एवं संसार के लिये सुन्दर नागरिक देने के लिए व्रत-बद्ध होते हैं।
एक नये परिवार की रचना का उत्तरदायित्व ग्रहण करना और सफलतापूर्वक उसके प्रयोजन का सम्पादन करने के लिए वचन-बद्ध होना कम महत्वपूर्ण नहीं है। ऐसे दो व्रतधारियों को साहस, सम्बल, श्रद्धा तथा शिक्षा देने के लिए ही धर्मपूर्ण विवाहोत्सवों का आयोजन किया जाता है। अनेक लोग बारातियों एवं जनातियों के रूप में इस परिणय-सूत्र को समाज सम्मानपूर्वक मान्यता देता है और उनके इस व्रत की सफलता के लिये आशीर्वाद एवं सद्भावनायें प्रदान करता है। विवाह के अवसर पर बारातियों, जनातियों, मित्रों, परिचितों तथा बंधु-बाँधवों के एकत्र होने का मुख्य प्रयोजन यही है अन्यथा बिना किसी उत्सव-समारोह के वर-वधू को केवल गुरुजन ही आबद्ध कर नर-नारी के मिलनार्थक विवाह-कार्य को पूरा कर सकते हैं।
विवाह के अवसर पर इस सामाजिक समारोह से कहीं अधिक धार्मिक आयोजन का मूल्य एवं महत्व है। अतिथि, आमंत्रित एवं आगन्तुक तो शुभाशीष एवं सद्भावनायें देकर चले जाते हैं। विवाह-समारोह से उनका संबंध तो एक दो दिन का, सो भी औपचारिक रूप से सामाजिकता के नाते रहता है। पर वास्तविक संबंध तो पति-पत्नी के बीच ही होता है जो कि उन्हें संसार की हर अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थिति में समान रूप से सुख-शाँतिपूर्वक ही निभाना होता है। पति-पत्नी रूप में स्त्री-पुरुष का यह संबंध प्रत्येक स्थिति में तभी चिरस्थायी रह सकता है जब उसे व्रतपूर्वक धार्मिक व्रत के रूप में ग्रहण किया जाता है- आत्मावान मनुष्य उसे लौकिक एवं परलौकिक सुख-शाँति एवं सफलता के लिये प्राण-पण से निभाने की कोशिश करता है। धार्मिक आधार पर धारण किये हुए कर्त्तव्य का विश्वासघात कर सकना मनुष्य के लिए कठिन होता है। क्योंकि वह जानता है कि ऐसा करने से उसको पाप लगेगा और जन्म-जन्माँतरों तक उसकी आत्मा को नरक की यातना भोगनी पड़ेगी।
स्त्री-पुरुष का सहज-मिलन विवाह-संस्कार के रूप में धर्म-कर्त्तव्य बनकर पुण्य युक्त संबंध में बदल जायेगा। उनकी प्रत्येक दाम्पत्य क्रिया धार्मिक परिधि में प्रतिष्ठित हो जाती है। मानव-जीवन का इन सहजताओं का पवित्रीकरण हो सकना तभी संभव हो सका है जब विवाहित जीवन को धार्मिक उत्तरदायित्व माना जाये अन्यथा विषम-योनियों का मिलन तो पशु-पक्षियों में भी होता रहता है। किन्तु उसका न कोई मूल्य है और न महत्व। वह एक साधारण-सी जैविक प्रक्रिया है जो प्रकृति रूप से सृष्टि का प्रयोजन सिद्ध करती रहती है। न कोई धर्म होता है और न ही आदर्श। यह सौभाग्य केवल मानव को ही मिला है कि वह उस जैविक प्रक्रिया को धार्मिक रूप देकर आध्यात्मिक लाभ तक प्राप्त कर सकता है।
विवाह निश्चित रूप से एक यज्ञ है। इस अवसर पर दो आत्मायें देवताओं को साक्षी एवं यज्ञाग्नि को मध्यस्थ बनाकर एक-दूसरे का ग्रहण एवं वरण किया करती हैं और पंच-परमेश्वर की उपस्थिति में आजीवन एक-दूसरे का साथ निभाने के लिए शपथ लेते हैं। वर-वधू एक-दूसरे के प्रति अपने कर्त्तव्य को निवाहने लिए परस्पर प्रतिज्ञाबद्ध होते हैं। परमात्मारूप पुरोहित उन दो अनुभवहीन आत्माओं और दाम्पत्य-जीवन की सफलता के लिए शिक्षा एवं आशीर्वादों का संबल देता है, उन्हें पारिवारिक एवं गृहस्थ-जीवन के अधिकार व कर्त्तव्यों का ज्ञान कराता है। उपस्थित जन अपनी सद्भावनाओं एवं मंगल कामनाओं के फूल बरसाते हैं। इस प्रकार सभी और से कुछ ऐसी पवित्र एवं पुण्य क्रियायें-प्रक्रियायें होती हैं जिससे वर-वधू के मन-मस्तिष्क पर एक प्रबोधक प्रतिक्रिया होती है जो उनके संस्कारों को उन्नत, उदात्त एवं उत्तरदायित्व को बढ़ाने में सहायक होती है। उन्हें ऐसा अनुभव होता है कि वे एक महान कर्त्तव्यों को अपने कंधों पर धारण कर रहे हैं जिसका सही रूप में पालन करना उनका परम धर्म है। हमने जिसको अपनाया है, अपना बनाया है और इस दैवी वातावरण में जिन यज्ञीय प्रतिज्ञाओं को लिया है उनका उचित निर्वाह ही उनके जीवन का लक्ष्य है, जिसे पाने के लिये वे हर कठिनाई को उठाने के लिए तत्पर रहेंगे। उस धर्मपूर्ण विवाहोत्सव के अवसर पर जो छाप वर-वधू के मन-मस्तिष्क पर पड़ जाती है वह फिर आजीवन दूर नहीं होती और उसी के अनुसार उनका अधिकतर जीवन-क्रम चलता रहता है। यदि तात्कालिक वातावरण ने उनके मन-मस्तिष्क को कर्त्तव्यपूर्ण छाप से छापा है तो दंपत्ति आजीवन कर्त्तव्य के प्रति निष्ठावान बने रहेंगे और एक सफल गृहस्थ-जीवन के अधिकारी बनेंगे अन्यथा प्रकट की छाप उनके दाम्पत्य प्रवाह को किस ओर मोड़ देगी कहा नहीं जा सकता। अतएव वर-वधू की मंगलकामना से विवाहोत्सव का वातावरण पूर्ण धार्मिक एवं अधिक-से-अधिक पवित्र बनाये रखना चाहिये। यही उस विवाहोत्सव का उद्देश्य भी है और शास्त्रों की आज्ञा भी।
किन्तु आज दुर्भाग्य अथवा अज्ञानवश अपने समाज में विवाहोत्सवों को धार्मिक अनुष्ठान की स्थिति से हटाकर एक खिलवाड़, एक कौतुक, एक मनोरंजन अथवा प्रहसन जैसा बना दिया गया है। विवाह-संस्कारों में आने वाला यह परिवर्तन बड़ा ही अवाँछनीय एवं आक्रमणकारी सिद्ध हो रहा है। विवाहोत्सव में अवाँछनीयताओं ने प्रवेश पाकर दाम्पत्य जीवन में असफलताओं के बीजारोपण करने शुरू कर दिये हैं, जिसके फलस्वरूप घर-घर कलह-क्लेश होता देखा जाता है।
जिस विवाह-संस्कार के अवसर पर अधिकाधिक धार्मिक वातावरण रखा जाना चाहिए जिससे नव-दम्पत्ति का हृदय पवित्रता एवं सात्विकता से ओत-प्रोत हो उठें, उस अवसर पर स्त्रियाँ अश्लील, असभ्य एवं विकारोत्पादक गीत गाती हैं। विवाहों के अवसर पर गीतों की आवश्यकता भी है। गीत उस समय के हर्ष एवं उल्लास की अभिव्यक्ति करते हैं। गाये जाने वाले गीत पवित्र एवं सामयिक भावों के अनुकूल ही होने चाहिएं। विवाहों के अवसर पर गाये जाने वाले गीत ‘मंगल गान’ कहे जाते हैं। उन गीतों को ‘मंगल-गान’ किस प्रकार कहा जा सकता है, जिनमें अश्लीलता, अभद्रता एवं अशिष्टता का समावेश हो। स्त्रियों द्वारा गाये गये उत्तेजक गीतों को सुनकर क्या वर-वधू और क्या उपस्थित व्यक्तियों, किसी की भी तो मनोवृत्ति बिना कुप्रभाव पड़े यथावत् नहीं रहती। यदि उनका कोई स्थायी प्रभाव न पड़े तो भी उस समय की वह गीतमयी अभद्रता असह्य होती है। गंदे गीतों को सुनकर हर भले आदमी को परेशानी होती है।
एक तो गंदे गीत यों ही अवाँछनीय हैं तिस पर उनको घर की बहू-बेटियाँ वहाँ उपस्थित पुरुष-समाज को सुनाकर गायें-यह एक घोर अनर्थ ही है। जब गंदे गीतों का प्रभाव सुनने वालों पर ही अवाँछनीय रूप से पड़ता है तब उनके गाने वाली महिलाओं पर कितना कुत्सित प्रभाव पड़ता होगा इसका अनुमान करने से हृदय क्षोभ से भर जाता है। उस पवित्र अवसर पर नारियों को गंदे गीत नहीं ही गाने चाहिये। यह असभ्यता, अशिष्टता का प्रदर्शन है जो किसी भी भारतीय महिला के लिए अशोभनीय ही है।
विवाह के अवसरों पर लेन-देन के झगड़ों, रीति-रिवाजों का झंझट कभी-कभी यहाँ तक बढ़ जाता है कि वह वाद-विवाद तथा कहा-सुनी की स्थिति उपस्थित कर देता है जिससे वह प्रसन्न एवं पवित्र संस्कार हाहाकार में बदल जाता है। विवाहरूपी यज्ञ का पुण्य ध्वंस हो जाता है। अशाँत, विक्षुब्ध तथा हाय-हाय से भरा वातावरण उन वर-वधू पर बड़ी ही अप्रिय छाप डालता है और विवाह अनुष्ठान से उन्हें जो उदात्तता प्राप्त करनी चाहिए, उसे वे प्राप्त नहीं कर पाते। उन्हें वह सत्कार एवं गरिमापूर्ण धर्मकृत्य के स्थान पर एक झंझट-सा विदित होने लगता है। विक्षुब्ध वातावरण की पड़ी हुई ओछी छाप उन्हें दाम्पत्य-कर्त्तव्यों में संकीर्ण एवं तुच्छ बना देती है। वर तथा कन्या पक्षों के लड़ने-झड़ने से वर-वधू पर भी अपने-अपने रक्त के अनुसार विपरीत प्रभाव पड़ता है, जिससे उन दोनों में भी अनजान में मनोमालिन्य के बीज वपन हो जाते हैं, जो भावी जीवन में गृह-कलह के रूप में फलीभूत भी होते रहते हैं।
इसी प्रकार कभी-कभी माँस-मदिरा का सेवन कर उस धर्म-कृत्य को आसुरी आचरण में बदल देते हैं। बारातियों द्वारा नशा करके बकने-झकने और पागलों जैसे काम करने पर विवाह का वातावरण किस प्रकार पवित्र एवं सद्भावना युक्त रह सकता है? उस उल्लास एवं प्रसन्नतापूर्ण उत्सव के अवसर पर माँस के लिए जीवों की हत्या करना नव-दंपत्ति के भावी जीवन पर कौन-सा अभिशाप अवतरित न करेगा, नहीं कहा जा सकता। जिस अनुष्ठान में यज्ञ हो, वेदों की ऋचायें पढ़ी जायें और शास्त्रों के मंत्र उच्चारण किये जा रहे हों, उसमें नशा करके और माँस खाकर शामिल होने वाले बाराती अथवा जानती क्या उसे अपवित्र एवं आसुरी न बना देंगे? ऐसे भ्रष्ट यज्ञ द्वारा यदि कोई देवताओं को प्रसन्न कर वर-वधू के भावी जीवन की कामना करता है तो वह भूल करता है। इन अवांछनीय क्रियाओं से तो देवता प्रसन्न होने के स्थान पर रुष्ट ही हो जायेंगे। अस्तु आवश्यक है कि विवाह-यज्ञ की सफलता तथा वर-वधू के भावी जीवन के मंगल के लिए विवाहों में माँस-मदिरा का प्रयोग कदापि न किया जाये।
इन अवाँछित कुरीतियों के अतिरिक्त वेश्याओं के नाच, स्वाँग, नौटंकी आदि की मनोरंजन-व्यवस्था भी विवाह-अनुष्ठान पर कुत्सित प्रभाव डालती है? इस निम्न स्तर के मनोरंजन के कारण न जाने कितनी बार लड़ाई-झगड़ा तथा खून-खराबी तक हो जाती है। भला विवाह जैसे प्रसन्न तथा पवित्र संस्कार के अवसर पर इस प्रकार की अशिव घटनायें कहाँ तक उचित एवं सराहनीय कहीं जा सकती हैं?
इसी प्रकार व्यंग्य-विनोद, हंसी-मजाक, रंग-रोगन के व्यवहारों द्वारा विवाहोत्सव को न जाने कितना गंदा, अश्लील और असहनीय बना दिया है। कुछ लोगों के कपड़े खराब हो जाते हैं, चोटें लग जाती हैं और कभी-कभी लड़ाई-झगड़ा तक भी हो जाता है। विवाह जैसे विशुद्ध धार्मिक कृत्य के अवसर पर इस प्रकार की असभ्यतायें तथा अशिष्टतायें किसी प्रकार भी शोभा नहीं देतीं। इनको हर प्रकार से बंद करने और इनके स्थान सभ्य, श्लील तथा शालीन रीतियों का समावेश किया जाना ही उचित है। विवाह के अवसर पर किसी प्रकार की भी अभद्रता अथवा अधार्मिकता न तो क्षम्य ही है और न शोभनीय ही।
अपने को प्रभु में विलीन करें-
ईश्वर के व्यक्त रूप इस संसार-सागर में हम मानव उसके जल पर तैरते फेन और तट पर बिखरे सिकताओं के समान हैं। समय रूपी ज्वार और प्रलय रूपी वायु आती है और उड़ा ले जाती है। किन्तु यह सिकता और फेन-रूपी मानव कहाँ जाते हैं? सिकता समुद्र की अटलता में डूबकर विलीन हो जाती है और फेन जल में घुल-मिलकर तदाकार हो जाता है।
मनुष्य के इन दोनों रूपों की गति एक है। किन्तु अन्तर इतना है कि सिकता समुद्र में डूबकर भी समुद्र रूप नहीं पाती, किन्तु फेन डूबकर समुद्र रूप हो जाता है।
ईश्वर में लवलीन होकर भी जो अपने अहंकार को बनाए रखता है, अपने विभिन्न अस्तित्व की भावना बनाये रखता है वह सिकता-रूप है और जो अहंकार को तिरोहित करके अपने भिन्न अस्तित्व का मोह नहीं रखता वह फेन-रूप है और देहावसान पाने पर समुद्र-रूप होकर आनन्द-रूप हो जाता है।
-खलील जिब्रान
आखिर उन लोगों का इरादा क्या है जो सन्तान पर सन्तान उत्पन्न किये जा रहे हैं। छः सात बच्चे हो चुके हैं किन्तु प्रजनन अभी बंद नहीं है। प्रौढ़ावस्था पार कर चुके हैं किन्तु बच्चों का बोझ बढ़ाये चले जा रहे हैं। कभी यह विचार नहीं करते कि आखिर इसका परिणाम क्या होगा? होगा यह कि या तो वे अपनी विधवा पर, क्योंकि इस प्रयास में उन्हें जीना तो ज्यादा दिन है ही नहीं, अनेक अबोध बच्चों का भार छोड़ जावेंगे, जो बेचारी जीवन पर रो-रोकर, मर खप कर ढोयेगी या उस बड़े लड़के की जिन्दगी में आग लगा जायेंगे जो उनके शिथिल अथवा महायात्री होने तक किसी प्रकार छोटे-मोटे काम पर लग गया होगा और ज्यों-त्यों विवाह हो गया होगा। जरा सोचने की बात है कि वह विकासोन्मुख तरुण अपना और अपनी पत्नी का ही भरण-पोषण कठिनता से कर पायेगा, वह इतने भाई-बहिनों को कैसे तो पाल पायेगा और कैसे पढ़ा-लिखा कर योग्य बनायेगा। इसका तो धर्म यही होगा कि वह पिता से भी जल्दी अपनी जवानी चिन्ताओं की भेंट चढ़ा देगा। पिता का पाप पुत्र भोगे यह तो बात कुछ समझ में नहीं आती हैं।
यह बात सही है कि भले भाई जिस प्रकार भी होगा अपने छोटे भाई-बहिनों को पालें पोसेंगे ही, इसके लिये उन्हें क्यों न कोई भी कष्ट सहना पड़े, त्याग करना पड़े, पर पिता को तो समझदारी से काम लेकर संयम बरतना ही चाहिये। ऐसे परिवारों की भी कमी नहीं है जहाँ एक साथ पिता और पुत्र के सन्तान होती है। पिता के लिये यह प्रतियोगिता कितनी शोभनीय है यह बात सोचनीय है। किन्तु क्या कहा जाये पिता के उस उत्साह एवं नैतिक साहस को कि पुत्र और पौत्र का जन्मोत्सव एक साथ मनाकर भी समाज में शान से चलते हैं। कहना होगा कि इस प्रकार प्रजनन शील प्रौढ़ों को न तो परिवार और न समाज तथा राष्ट्र की कोई चिन्ता होती है। वे यह बात नहीं देख पा रहे हैं कि कुछ ही समय में यदि जनसंख्या की वृद्धि नियंत्रित न हुई तो संसार में प्रलय के लक्षण दृष्टिगोचर होने लगेंगे। जिस संसार में हम रहते हैं, जिस देश के हम नागरिक हैं, जिस राष्ट्र का अन्नपानी खाते-पीते और जिस समाज की सहायता से जीते हैं, उसका हितचिन्तन करना हमारा पुण्य पवित्र कर्त्तव्य है और आज जनवृद्धि को नियंत्रित करना सबसे बड़ा देशहित साधन है। किन्तु क्या इस प्रकार के लोग इस ओर ध्यान दें पाते हैं?
कुछ लोग एक पुत्र को पाने के लिए लड़कियों से घर भर लिया करते हैं। दो लड़कियाँ हो गई। यही जिम्मेदारी काफी थी। लेकिन संतोष नहीं। एक लड़का भी हो जाता तो अच्छा था। लेकिन फिर कन्या आई। दुःख तो हुआ पर आशा एषणा का त्याग नहीं किया। पुनः लड़की, पुनः लड़की। फिर भी पुत्रेषणा नहीं जाती। देख रहे हैं कि लड़कियाँ ही हो रही हैं। उस अंधे सौदे का कोई विश्वास नहीं। ऐसा कोई साधन नहीं कि ठीक-ठीक लड़का-लड़की के बाबत जाना जाये। केवल आशा और ‘शायद’ के भरोसे प्रजनन नहीं रोकते आखिर नतीजा यह होता है कि जहाँ एक लड़की के विवाह में छक्के छूटते हैं वहाँ छः-छः, सात-सात लड़कियों से घर भर जाता है। इसका नतीजा सिवाय इसके और क्या हो सकता है कि किन्हीं एक-दो लड़कियों की शिक्षा-दीक्षा और ब्याह-शादी ठीक से हो जाये और बाकी सब यों ही अधेड़ों, विधुरों, दूल्हा, तीजहा को उचित अनुचित स्थानों पर फेंका जाये। समाज की अभागी प्रथायें और कुरीतियाँ दो-एक लड़कियों के विवाह में ही कंगाल बना देती हैं तब भला छः-छः, सात-सात लड़कियों का ब्याह-शादी किस प्रकार ठीक से किया सकता है।
जब दो लड़कियाँ हो गई तभी संतान की प्यास बुझ जानी चाहिए थी और समझ लेना चाहिए था कि जिन्दगी के लिये काफी जिम्मेदारी और काम आ गया है। इन दो कन्याओं को ही सुयोग्य बनाने और अच्छे घर वर को सौंपने में ही इतना रुपया चाहिए जितना कठिनता से ही जमा हो सकेगा। अब अगर लड़का हो भी गया तो उसकी शिक्षा-दीक्षा और ब्याह-शादी के लिये रुपये के लाले पड़ जायेंगे। किन्तु मनुष्य की इस निरर्थक इच्छा को क्या कहा जाये जिसे पूरा करने की आशा में जिन्दगी पर बोझ पर बोझ रखता चला जाता है।
बहुत बार लोग अनेक बच्चे होने पर भी यदि विधुर हो जाते हैं तब भी दूसरी शादी कर लाते हैं और बच्चों की संख्या ड्यौढ़ी दोगुनी बना लेते हैं। यदि उन्हें कोई सुधारवादी, समाजसेवी अथवा हितचिन्तक इसका विरोध करता हुआ समझाने का प्रयत्न करता है तो उनका नपा-तुला उत्तर मौजूद होता है- ‘क्या करें भाई शादी तो दूसरी नहीं करने को था किन्तु इन बच्चों की देख-भाल के लिए तो प्रबंध करना ही है। क्योंकि बच्चों की परेशानी मुझसे देखी नहीं जायेगी।’ बड़ा सुन्दर बहाना है।भला ऐसा कौन-सा कठोर होगा जो यह सम्मति दें कि आप शादी न करें भले ही बच्चे परेशान होते रहें। किन्तु इस प्रकार के बहानेबाज़ इस बात का उत्तर देने में या तो रोष प्रकट करेंगे या फिर दाँत निकालेंगे कि विधाता भले ही बच्चों को तब तक ठीक से रखें जब तक उसके अपने बच्चे न हो। उसके अपने बच्चे होने पर इन दिवंगता जननी के लाड़िलों का क्या हाल होगा? जब दूसरा बच्चा होने पर सगी माँ का पहले बच्चे से सिमट कर प्रेम दूसरे बच्चे पर चला जाता है, तब वहाँ तो कुक्षि की विषमता भी है।
स्पष्ट है यदि विशुद्ध रूप से बच्चों की परेशानी का ही विचार हो तो किसी वृद्ध विधवा, रिश्ते नाते की दादी, बुआ, बहिन, भौजाई ऐसी किसी स्त्री को भी लाया जा सकता है जो बेचारी गरीब और निराश्रिता हो। इससे उपकार का पुण्य भी हो और बच्चों की देख-भाल भी। और यदि ऐसा नहीं बन पड़े और दूसरा विवाह करते ही बने तो आगे के लिए परिवार-नियोजन का प्रबंध किया जा सकता है। किन्तु सत्य बात तो यह है कि बच्चों की देखभाल तो बहाना मात्र है, प्रेरणा होती है उस विकार की जिसे उन्हें पहली पत्नी से ही एक दो बच्चे हो जाने पर दृढ़ता पूर्वक नियंत्रित कर लेना था। इससे जो पत्नियाँ अधिक प्रजनन के कारण खोखली होकर अकाल में मर जाती हैं वह परिस्थिति न आती और यदि आ भी जाती तो एक-दो बच्चों का जो कि सयाने ही हो चुके होते स्वयं भी प्रबंध किया जा सकता था। मुसीबत आती है क्रम से उत्पन्न हुए अनेक छोटे बच्चों के कारण।
अनेक रईस और शौकीन तबीयत लोग दो-दो तीन-तीन शादियाँ करते या शायद कानून के भय से एक को तलाक देकर दूसरी से शादी कर लेते हैं और बिना सोचे समझे जनसंख्या बढ़ाते चले जाते हैं। वे यह नहीं सोच पाते कि जब हम एक अकेले ने पाँच सात संतानें बढ़ाकर आबादी वृद्धि की है तब यदि इन चार-चार, पाँच-पाँच के भी इतनी-इतनी संतानें होंगी तो केवल एक पीढ़ी अथवा बीस साल में आबादी कितने गुना बढ़ जायेगी?
अधिक सन्तानों को सुयोग्य बनाया जाना संभव नहीं। निश्चय ही उनमें से अनेक आवारा, अनैतिक, अपराधी तथा अनुशासनहीन हो जायेंगे। इस प्रकार की विकृत संतानें अभिभावकों के लिए तो जान का बवाल बन ही जाती हैं समाज के लिए भी अभिशाप सिद्ध होती हैं। इसी सत्य को ध्यान में रखते हुए आज से ढाई हजार वर्ष पूर्व जब कि जनसंख्या आज की अपेक्षा बहुत कम थी और भोजन वस्त्र तथा जीवन की अन्य आवश्यक वस्तुओं की प्रचुरता थी, दूरदर्शी यूनानी दार्शनिक व विचारक अरस्तू ने अपने देश वासियों को सावधान करते हुए चेतावनी दें दी थी-
‘जनसंख्या की अतिरिक्त वृद्धि हो जाने पर समाज का आर्थिक, नैतिक और आध्यात्मिक पतन हो जाता है। सामाजिक व पारिवारिक व्यवस्था बिगड़ जाती है। निरर्थक मनुष्य राष्ट्र का भोजन खा-खा कर नष्ट कर डालते हैं। धर्माचार का त्याग कर निरंकुश, स्वेच्छाचारी हो जाने से लोग अनैतिक मार्गों पर चलने लगते हैं। उद्दण्ड घोड़ों की तरह किसी कायदे कानून को नहीं मानते और समाज में अपराधों तथा आतंक का वातावरण उत्पन्न करते हैं जिससे प्रगति में बाधा पड़ती है। अधिकाँश नागरिक अविकसित, अशिक्षित और मूर्ख रह कर पशुओं जैसा जीवन व्यतीत करते और मक्खी की तरह मरते रहते हैं। मानसिक तथा सामाजिक बुराइयों का प्रधान कारण आबादी की अनियंत्रित वृद्धि ही है।’
अरस्तू ही क्यों भारतीय ऋषि मुनियों ने तो इससे भी पहले जन-वृद्धि के दुष्परिणामों से सावधान कर दिया था। राम को उपदेश देते हुए मुनि वशिष्ठ ने अपने ग्रंथ ‘योग वाशिष्ठ’ में कहा है- ‘जब किसी देश की जनसंख्या बहुत बढ़ जाती है तो अकाल, महामारी, युद्ध या भूकम्प आदि दैवी अथवा मानवीय आपत्तियाँ उठ खड़ी होती हैं जिससे कीड़े-मकोड़े की तरह मानव-जाति का विनाश हो जाता है।’
पहले जब किसी एक स्थान की जनसंख्या बढ़ जाती थी तो बहुत से लोग दूसरे स्थान पर चले जाते थे। किन्तु आज संसार का कौना-कौना मनुष्यों से खचाखच भरा हुआ है किसी को कहीं आने-जाने की सुविधा ही नहीं है। ऐसी दशा में सिवाय इसके कि देश भर की ईति-भीति में बरबादी हो अथवा सबल अपने अस्तित्व के लिए दूसरे निर्बलों को मार-काट कर अपने लिये स्थान बनायें इसके सिवाय और क्या हो सकता है? युद्ध का एक बहुत बड़ा कारण संसार में जनसंख्या की वृद्धि भी है।
भारत की बेतहाशा बढ़ती हुई जनसंख्या की चिन्ता संसार भर को है किन्तु स्वयं भारत वासियों को नहीं है। वे बराबर पीढ़ी-दर-पीढ़ी करोड़ों की आबादी प्रतिवर्ष बढ़ाते जा रहे हैं। जनसंख्या की यदि यही रफ्तार रही तो भारतवासियों को शीघ्र ही प्रलय के दृश्य देखने के लिये तैयार रहना चाहिए और अपनी बहुमूल्य सभ्यता एवं संस्कृति का मोह अभी से छोड़ने का अभ्यास करना चाहिए।
जो लोग वैज्ञानिक बल पर जनसंख्या और खाद्य सामग्री में अनुपात बने रहने की आशा करते हैं उन्हें सावधान करने के लिए विद्वान माल्थस के आधुनिक विज्ञान से सम्मत तथा तर्क व प्रमाणों से पुष्ट यह विचार कुछ कम सत्यपूर्ण नहीं है।
‘विज्ञान चाहे कितनी उन्नति क्यों न करता जाये जमीन की उपज और उससे मिलने वाले अनाज की पैदावार एक नियत सीमा के भीतर ही बढ़ सकती है। प्रत्येक पौधे की जड़ और पत्तियों को फैलने के लिए जितना स्थान, समय, वायु, धूप व जल इत्यादि की आवश्यकता है उसे जनसंख्या के अनुपात से खींचतान कर नहीं घटाया-बढ़ाया जा सकता। साथ ही यह भी अनुभव सिद्ध है कि जमीन की पैदावार को जब बहुत अधिक बढ़ाने की चेष्टा की जाती है तो शीघ्र ही ऐसा अवसर आता है कि परिश्रम के अनुपात से पैदावार घटने लगती है क्योंकि अप्राकृतिक ढंग से भूमि के साथ बलात्कार करने से उसकी उर्वराशक्ति नष्ट हो जाती है।
इन परिस्थितियों एवं तथ्यों के होते और जानते हुए भी जो लोग सन्तान वृद्धि का संयम नहीं करते उनके लिए तो यही कहना पड़ेगा कि ऐसे लोग जीवन में सुख-शंतिं, सत्सन्तान और सशक्त समाज का मूल्य, महत्व नहीं जानते और चाहते हैं कि जहाँ कल नष्ट होने को ही संसार आज नष्ट हो जाये।
प्रेम और पराक्रम
साहसी व्यक्तियों को अपने दोनों गुणों पर भरोसा होता है। एक गुण प्रेम जिससे हृदय जीते-जाते हैं और आत्मा की एकता अनुभव की जाती है। मानवता के इस पुण्य पथ का अनुसरण देव पुरुष ही कर सकते हैं क्योंकि प्रेम परमात्मा की प्रत्यक्ष अनुभूति है। पर संसार में ऐसे भी व्यक्ति है जिनकी दृष्टि में प्रेम और मानवता का कोई मूल्य नहीं होता। आतताईपन दिखाने में ही वे अपनी शान समझते हैं। ऐसे व्यक्तियों के लिए साहसी के पास दूसरा गुण-आत्मबल होता है। वह अनाचारी को शक्ति के द्वारा झुकने के लिये विवश कर देता है। यह भी मनुष्य का व्यावहारिक धर्म ही है और उससे भी मानवता का विकास ही होता है। अत्याचार का सामना न करना और उससे डर जाना कार्यरता है। जब भी समय आये हमें अत्याचार के विरुद्ध खड़े होने के लिये भी कटिबद्ध रहना चाहिये ताकि न तो हम साहस-विहीन माने जायें और न अपने प्रेम-गुण के लिये ही हमें लज्जित होना पड़े।
-हरिभाऊ उपाध्याय
अपनों से अपनी बात-
अखण्ड-ज्योति परिवार के अब इस अंक से बहुत कम सदस्य रह गये हैं। जो किसी दबाव संकोच के चंदा तो दे देते थे पर पत्रिका को पढ़ते नहीं थे, ऐसे सभी पाठकों को हटा दिया गया है। 40 हजार में से 4 हजार अब वे बचे हैं जो हमारे शरीर के प्रति नहीं, विचारों के प्रति श्रद्धा रखते हैं। जिन्हें हमारे आशीर्वाद पर नहीं, प्रेरणाओं की प्रखर सामर्थ्य पर विश्वास है। ऐसे थोड़े किन्तु सच्चे साथियों के साथ ही अब संपर्क रह गया है, इसका हमें बड़ा संतोष है और विश्वास है कि इन काम के साथियों द्वारा अधिक व्यवस्थापूर्वक वह कार्य सफलतापूर्वक कर सकेंगे-उस दिशा में अधिक तेजी के साथ चल सकेंगे, जो हमारे जीवन का लक्ष्य है।
वर्तमान अखण्ड-ज्योति परिजनों से यह आशा की गई है कि वे जिस विचारधारा को पत्रिका के पृष्ठों में पढ़ते हैं, उसे क्रियान्वित करने का भी प्रयत्न करें। विचार जब तक कार्यरूप में परिणित नहीं होते, तब तक वे संस्कार का रूप धारण नहीं करते। संस्कार स्वभाव का अंग बनकर व्यक्ति को दिशा देते और आगे बढ़ाते हैं। इसलिये सद्विचारों से लाभ उठाने की इच्छा रखने वाले के लिए यह नितान्त आवश्यक है कि वे इन्हें कार्यरूप में परिणत करें।
आत्म-निर्माण और पुण्य परमार्थ का कार्य ‘सेवा-साधना’ बिना चल ही नहीं सकता। सेवा से रहित व्यक्ति पाषाण की तरह है। जिस प्रकार पुष्प पकता है तो उसकी पंखुरियाँ फैलती और सुगंध उड़ती है उसी प्रकार आध्यात्मिक उत्कृष्टता जिस किसी के भीतर भी विकसित होगी उसके स्वभाव में उदारता एवं सेवा की भावना झरने की तरह फूटेगी। यही सच्ची आध्यात्मिकता की एकमात्र कसौटी है। जो स्नान, ध्यान, भजन, दर्शन, पाठ की विद्या में तो प्रवीण है पर सेवा की हूक अन्तःकरण में नहीं उठती तो समझना चाहिये कि इनका धर्म और अध्यात्म अभी विडम्बना की कक्षा में ही भ्रमण कर रहा है। अन्तरात्मा तक अध्यात्म का प्रकाश नहीं पहुँचा। यदि पहुँचता तो लोक-मंगल के लिये कुछ-न-कुछ त्याग बलिदान करने की वैसी ही इच्छा उत्पन्न होती, जैसी कि उत्कृष्टता का, ईश्वर और धर्म का अवलम्बन करने वाले हर एक सच्चे साधक के मन में सृष्टि के आदि से लेकर अब तक सेवा-भावना उत्पन्न होती रहती है। इतिहास में एक भी ऐसे सच्चे आस्तिक का उल्लेख नहीं मिलता जो सेवा-रहित होकर जिया हो।
अस्तु, अखण्ड-ज्योति के परिजनों को सच्चे अध्यात्मवादी अपने साथी सहयोगी के रूप में देखने की आकाँक्षा के साथ यह इच्छा रहना भी स्वाभाविक है कि परिजनों के क्रिया-कलाप में सेवा-साधना का पुट अवश्य रहें। कहना न होगा कि अन्न, वस्त्र, जल, निवास आदि के दान तो बहुत ही स्थूल स्तर के शरीरों को थोड़ी देर के लिये लाभ पहुँचा सकने मात्र की सुविधा देते हैं। वास्तविक दान तो किसी की मनोदशा विचारधारा को सन्मार्ग की ओर मोड़ देने में ही है। अपनी सेवा भी इसी में है और दूसरों की सच्ची सेवा-सहायता भी इसी प्रकार हो सकती है। इसी दृष्टि से ज्ञान-दान को सबसे बड़ा दान और ज्ञान-यज्ञ को सबसे बड़ा यज्ञ माना गया है। ज्ञान ही इस विश्व ब्रह्माँड का सबसे बड़ा देवता है। इसी से विवेक की देवी-गायत्री को विश्वमाता, वेदमाता कहा गया है। गायत्री की साधना वस्तुतः सद्ज्ञान की ही साधना है।
गत गीता जयंती (23 दिसम्बर 1966) से अपने 4 हजार साथियों, अखण्ड-ज्योति के वर्तमान सदस्यों को साथ लेकर ज्ञान-सत्र-ज्ञान-यज्ञ का विधिवत् समारंभ किया है, यह आगामी 5 वर्ष तक चलता रहेगा। इसकी पूर्णाहुति करके हम योगी अरविंद एवं महर्षि रमण के स्तर की युगाँतर प्रस्तुत करने वाली साधना के लिए हिमालय चले जायेंगे। अपने वर्तमान निष्ठावान परिजनों से हम यह आशा करेंगे कि वे उपेक्षा, लापरवाही, ढील-पोल की आदत छोड़ दें और जो कुछ करना है उसे पूरे मन से ठीक तरह करने का स्वभाव बनायें। जो करना सो करना, न करना तो न करना। सत्पुरुषों की यही रीति-नीति रहती है। वर्तमान साथियों की गतिविधि यही रहनी चाहिए।
वर्तमान साथी-सहचरों से अकिंचन-सी आकाँक्षा की गई है, नगण्य-सा वजन उन पर डाला गया है। जिनमें निष्ठा न हो उनकी बात दूसरी है, पर जिनमें उत्कृष्टता की दिशा में थोड़ी भी सच्चाई होगी, वे सहज ही सोच लेंगे कि हर अध्यात्मवादी को परमार्थ के लिए, लोक-मंगल के लिये थोड़ा-बहुत योगदान अनिवार्य रूप से करना पड़ता है। चौबीस घंटे स्वार्थ में ही डूबे रहा जाये, कानी कौड़ी भी लोक-मंगल में खर्च न की जाये तो आत्मा की सोई हुई महानता फिर आखिर जगेगी कैसे? इसलिए कुछ श्रम, कुछ समय, कुछ धन तो इस मार्ग के यात्री को लगाते ही रहना पड़ता है। इस रीति-नीति की उपेक्षा करके सस्ते, ‘शॉर्ट कट’ ढूँढ़ना बेकार है। अपने को भ्रम में रखने से कुछ लाभ नहीं है। आध्यात्मिकता और पारमार्थिकता एक-दूसरे से अविच्छिन्न रूप से जुड़ी हुई हैं। अतएव एक छोटा पारमार्थिक कार्यक्रम तो प्रत्येक वस्तुतः आत्मिक उन्नति चाहने वाले के सामने होना ही चाहिए। इस प्रयोजन की पूर्ति के लिए वर्तमान चार हजार साथियों के सामने एक सुव्यवस्थित योजना प्रस्तुत की गई है।
उपासना का एक व्यवस्थित कार्यक्रम हमने बना दिया है, जिसे अपनाकर पाँच वर्ष में वर्तमान साथी आशातीत प्रगति करेंगे। अगले अंक में उसे प्रस्तुत करेंगे। बसंत पंचमी से उसका आरंभ करना चाहिए और पाँच साल तक उसे चलाना चाहिए। प्रतिवर्ष इसी बसंत पंचमी को एक निरीक्षण दृष्टि डाली जाया करेगी कि किसने कितनी प्रगति की? यदि अभीष्ट प्रगति नहीं हुई तो उस कमी को पूरा किया जाये। यह उपासना क्रम सर्वसाधारण के लिए सर्वांगपूर्ण स्तर का है।
पञ्चकोशी उपासना का आधा पाठ्यक्रम हम पूरा कर चुके हैं। जो पूरा किया गया है, उसका अभ्यास भी आगामी पाँच वर्ष तक जारी रखें। जो शेष है, उसे कोई व्यक्ति अपने बलबूते पूरा नहीं कर सकता। उसमें मार्गदर्शक की शिक्षा ही काफी नहीं वस्तु शक्ति भी सम्मिलित होनी चाहिए। उन उच्चस्तरीय अध्यापकों को हम अपनी शक्ति-सामर्थ्य पर्याप्त मात्रा में देने की स्थिति में आज नहीं हैं, पाँच वर्ष बाद होंगे तब जो शेष साधना रही है उसे बहुत शीघ्र पूरा करा देंगे। अभी तो उन्हें सीखी हुई साधना का पाँच साल तक अभ्यास करते रहना है। धैर्यवान उसे जारी रखेंगे, उतावली वाले छोड़ बैठेंगे तो समझ लिया जायेगा कि इनका स्तर इतना विकसित नहीं हुआ कि पूर्णता तक पहुँचने की पात्रता सिद्ध कर सकें। पञ्च कोशी साधना के निष्ठावान साधकों के धैर्य की परीक्षा को यह पाँच साल का समय रखा गया है।
सामान्य उपासना का कार्यक्रम अगले अंक में प्रस्तुत होगा। वह सर्व-साधारण के लिए यहाँ तक कि व्यस्त व्यवसायी से लेकर छोटे बच्चों तक के योग्य, किन्तु अत्यन्त प्रभावपूर्ण होगा। उसे बसंत पंचमी से आरंभ करने की तैयारी की जाए। इसके अतिरिक्त सेवा साधना का जो कार्यक्रम परिजनों के लिये आवश्यक है उसे चालू कर देना चाहिए।
दि. अंक में ‘अपनों में अपनी बात’ स्तंभों के अंतर्गत जिस ब्रह्म विद्यालय के शुभारंभ की चर्चा की गई है, उसकी व्यवस्थित विधि व्यवस्था हर जगह-हर सदस्य द्वारा चालू हो जानी चाहिए। प्राप्त सूचनाओं के अनुसार तीन चौथाई सदस्यों ने इस गीता जयन्ती से अपना ज्ञान-यज्ञ आरंभ कर दिया है। उनका ब्रह्म विद्यालय विधिवत् चलने लगा है। जो किसी कारणवश अभी उसे आरंभ नहीं कर सके, उन्हें आगामी बसन्त पंचमी की अवधि तक आरंभ कर ही लेना चाहिए। गीता जयंती (23 दिसम्बर 66) से लेकर बसंत पंचमी (14 फरवरी 67) तक का 40 दिन का समय संधिकाल है। उस अवधि में हमारे सभी सहचरों को गतिशील हो जाना चाहिए।
ज्ञान सत्र एवं ज्ञान-यज्ञ का जो छोटा-सा शुभारंभ अभी किया गया है वह अत्यंत सरल है। आध्यात्मिक निष्ठा का यह छोटा-सा अंकुर भी जिनके भीतर उदय हो गया होगा उन्हें वह हंसी-खेल जैसा लगेगा। बात इतनी भर है कि- ‘अपने परिवार के तथा प्रभाव क्षेत्र के सभी व्यक्तियों के नाम एक उसी प्रयोजन के लिए बनाई गई विशेष कापी में नोट कर लिए जायें। उन्हें ही अपनी अखण्ड-ज्योति या युग-निर्माण पत्रिकायें पढ़ने के लिए दी जाएं और ऐसी चतुरता पूर्ण रीति-नीति बरती जाए कि वे रुचिपूर्वक उन्हें पढ़ने को तैयार हो जायें।’
इस कार्य में प्रमुख कार्यवाही यह है कि लोगों में आमतौर से पढ़ने की रुचि नहीं होती, फिर नव-निर्माण जैसे रूखे विषय में तो मन जरा भी नहीं लगता। सत्-साहित्य के स्वाध्याय में लगन उत्पन्न कर देना एक जादूगर जैसी सफलता है। प्रयत्न से लोगों को कसैली चाय, मितली उत्पन्न करने वाली तम्बाकू और कड़ुई अफीम, शराब आदि का अभ्यस्त बना दिया गया तो कोई कारण नहीं कि चतुरता भरी तरकीबें काम में लाकर भावनात्मक नव-निर्माण का साहित्य पढ़ने के लिए लोगों को तैयार न किया जा सके। कुनैन की कड़ुई गोली खाने और कान छिदाने जैसे कष्टसाध्य कार्य के लिए छोटे बच्चों को फुसलाया जा सकता है, तो कोई कारण नहीं कि समझदारी से प्रयत्न करने पर बड़ी आयु के पढ़े-लिखे लोगों को जीवन-कला की समग्र शिक्षा देने वाला कल्पवृक्ष, अमृत और स्वर्ण की तुलना में अधिक वजनदार, अधिक श्रेयस्कर साहित्य पढ़ने के लिए रजामन्द न किया जा सके। बिना हिम्मत हारे-बिना धैर्य छोड़े-जो प्रयत्न करते रहेंगे वे इस प्रयत्न में अवश्य सफल होंगे कि अपने परिवार के हर शिक्षित बाल-वृद्ध एवं नर-नारियों को अपने प्रभाव क्षेत्र के परिजनों एवं स्वजन संबंधियों को दोनों पत्रिकायें पढ़ने को सहमत किया जा सके।
हर परिजन का यह लक्ष्य होना चाहिए कि उसकी दोनों पत्रिकायें कम से कम दस व्यक्ति तो पढ़ेंगे ही, ज्यादा हों तो और भी अच्छा, नहीं तो न्यूनतम लक्ष्य 10 का तो रहना चाहिए। निर्धारित कापी में उनके नाम नोट रहें और कब उन्हें क्या पढ़ने को दिया और कब वापिस लिया इसका ब्यौरा होना चाहिए। यह कापी व्यवस्थित रीति से इस ज्ञान सत्र को चलाने में बड़ी सहायक सिद्ध होती है। इसलिए उसे रखना आवश्यक ही माना जाए।
जो पढ़े नहीं हैं, उन्हें सुनाने के लिए थोड़ा समय निकाला जा सकता है। ऐसा भी हो सकता है कि छात्रों से या स्त्रियों से एक-एक लेख पढ़कर सुनाने के लिए कहा जाए और लोग सुना करें। इस प्रकार घर के अन्य लोगों को सुनाने की शैली भी आयेगी और जो पढ़ेगा उसमें समझने की प्रवृत्ति भी बढ़ेगी। पत्नी से एक लेख रात को सोते समय सुनाने की एक सेवा यों भी ली जा सकती है। सोते समय पतियों के पैर दबाने का नियम जिस प्रकार वह पत्नियाँ चलाती हैं, उसी प्रकार शिक्षित परिवारों में यह अन्तःकरण को दबाने की पति भक्ति किसी प्रकार भी कम महत्व की नहीं। बच्चे अपने बूढ़े पिता, ताऊ बाबा किसी की सेवा किया करें तो उन्हें आँख से कम दीखने के कारण जिस श्रेयस्कर सद्ज्ञान से वंचित रहना पड़ता है उसकी पूर्ति होने लगे।
पूजा की देवस्थली हर आस्तिक घर में होनी चाहिए। एक चौकी पर पूजा-सामग्री, देव-प्रतिमा, रहना और वहाँ नित्य उपासना क्रम चलना एक आवश्यक धर्म-कर्त्तव्य है। इसी प्रकार हर घर में एक अलमारी या सन्दूक ऐसा होना चाहिए जिसमें जीवन निर्माण की केवल जीवन-निर्माण की प्रेरणा भरी पुस्तकें सुसज्जित रूप से रखी जाया करें। यह ज्ञान-स्थली भी देव-स्थली की भाँति ही जरूरी है। जिन घरों में यह दोनों स्थापित नहीं, उन्हें अध्यात्मवादियों का घर नहीं कहा जा सकता। अतएव हर अखण्ड-ज्योति के परिजन को अपने घर में यह दोनों स्थापनायें कर ही लेनी चाहिए।
पूजा की चौकी सजी न हो तो अब सजा लेनी चाहिए और उसके समीप बैठकर नियमित उपासना आरंभ कर देनी चाहिए। इसी प्रकार यदि ज्ञान स्थली न हो तो उसकी स्थापना कर लेनी चाहिए। कूड़ा-करकट जैसी पुस्तकें उसमें नहीं भरनी चाहिए। चाहे थोड़ी ही हों, पर हों ऐसी जो जीवन की दिशा का नव-निर्माण करने में प्रभावपूर्ण मार्गदर्शन करती हों। धर्म के नाम पर बहुत जंजाल भरी पुस्तकें छपी हैं। केवल उनकी नाम-प्रसिद्धि के आधार पर यह स्थापना नहीं की जानी चाहिये वरन् इस कसौटी पर कसा जाना चाहिए कि व्यक्ति की और आज के समाज की समस्याओं का व्यावहारिक हल उनमें है या नहीं। यदि है तो ही वे ज्ञान स्थली में स्थान प्राप्त करने योग्य मानी जाए, अन्यथा कोई पुस्तक पुराने जमाने की लिखी हुई है इसी आधार पर उस बेकार कूड़े से जगह न घेरी जाए। काम की पुस्तकें थोड़ी भी हों तो बहुत है। बेकार का कबाड़ा ढेर जितना होने पर भी व्यर्थ है। चुना हुआ साहित्य ही ज्ञान सत्र की पूर्ति कर सकता है। हवन में उत्कृष्ट पदार्थ ही आहुतियों का प्रयोजन पूरा करते हैं। गंदी चीजें होने से तो हवन भी गंदा हो जाता है। पुस्तकालयों में ज्ञान मन्दिरों में केवल चुनी हुई चीजें ही सोद्देश्य साहित्य ही-स्थान पा सके। इसका पूरा-पूरा ध्यान रखना चाहिए।
देवस्थली का दैनिक खर्च थोड़ा-सा है, दीपक, पुष्प, अगरबत्ती, चावल, नैवेद्य आदि वस्तुओं के उपकरण घर में मिल जाते हैं। पर ज्ञानस्थली की सभी सामग्री बाहर से ही मंगानी पड़ती है। दोनों पत्रिकाएं तथा युगान्तर प्रस्तुत करने वाले व्यक्ति परिवार तथा समाज को परिष्कृत बनाने की प्रेरणा से भरे-ट्रैक्ट, यह सब साहित्य को बाहर से ही खरीदना पड़ता है। इतने महान प्रयोजन के लिए 10 पैसा प्रतिदिन बचाने ही चाहिए। भले ही इसके लिए डेढ़ छटाँक आटा अपने भोजन में कम करना पड़े। रोटी में कटौती करके आत्मा का पोषण करना है। महंगा सौदा नहीं। वस्तुतः तो यही वास्तविक बुद्धिमानी और दूरदर्शिता है।
अगले अंक में उच्चस्तरीय साधना की प्रथम साधन प्रक्रिया प्रस्तुत करेंगे। उसे दो बार ध्यानपूर्वक पढ़ा जाए, ताकि जो विधि व्यवस्था समझाई गई है वह ठीक तरह समझ में आ जाए। उसका आरंभ बसंत पंचमी से किया जाना है। गायत्री तत्व ज्ञान का महत्वपूर्ण रहस्योद्घाटन करने वाले लेख तो अगले पाँच वर्ष तक छपे रहेंगे, कितनी ही साधनायें बताई जाती रहेंगी पर उनका उपयोग अधिकारी पात्र अनुभवी मार्ग दर्शकों के सहयोग से ही कर सकते हैं। सामान्य प्रशिक्षण जिसका मार्ग-दर्शन अखण्ड-ज्योति में होगा, हर साधक को एक अनुपम प्रकाश एवं आह्लाद प्रदान करेगा। उसकी तैयारी हमें करनी चाहिए। एक महीने का समय इसलिए दिया गया है कि जिनके घर में पूजा स्थली नहीं है वे उसकी व्यवस्था कर लें और जिनसे उपासना क्रम छोड़ रखा है या जिसने अभी आरंभ ही नहीं किया वे उसका आरंभिक उपचार तो चालू कर सकें।
ज्ञान-यज्ञ का संकल्प गीता-जयंती से किया जा रहा है। उस दिन अधिकाँश परिजन नव-निर्माण की विचारधारा का अपने क्षेत्र में प्रसार करने का संकल्प लेंगे। उस संकल्प को 40 दिन के भीतर कार्यान्वित कर लेना चाहिए। जिनमें थोड़ी भी विचार-शीलता का अंकुर हो ऐसे लोगों के नाम इस अवधि में ढूँढ़ लेने चाहिए और उन्हें पिछले अखण्ड-ज्योति तथा युग-निर्माण के अंक, ट्रैक्ट पढ़ाने आरंभ कर देने चाहिए।
मिथ्या, झिझक, झूठा संकोच इस मार्ग की प्रथम बाधा हैं। इन 40 दिनों में इस पर धीरे-धीरे विजय प्राप्त कर लेनी चाहिए। एक-एक, दो-दो करके लोगों से मिलना चाहिए और धीरे-धीरे अपना प्रयोजन उन पर प्रकट करके पहले धीमी पीछे तीव्र गति से प्रशिक्षण का कार्य आरंभ कर देना चाहिए। बसंत पंचमी के पुण्य पर्व पर उन 10 व्यक्तियों की नामावली हर परिजन को पूरी तरह तैयार कर लेनी चाहिए जिन्हें नियमित रूप से यह साहित्य पढ़ाना सुनाना प्रचलित रहेगा। आगे तो यह संख्या दस तक सीमित न रह कर और भी बढ़नी चाहिए, बढ़ेगी भी।
इस विधि-व्यवस्था के जमाने में जो समय खर्च हो, जो मनोयोग लगता हो, जो पैसा लगता हो उसे विशुद्ध ज्ञान-यज्ञ समझ लेना चाहिए। हमारे हर साथी को परिजन-को इस ज्ञान का होता होना चाहिए। हम इस ज्ञान यज्ञ के पुरोहित हैं तो 4 हजार सहचर हमारे यजमान। इस ब्रह्म विद्यालय के हम कुलपति हैं, तो 4 हजार सहचर सहायक अध्यापक। विश्व के नव-निर्माण के लिए देश, धर्म, समाज और संस्कृति का पुनरुत्थान करने के लिए जो यह उभयपक्षीय महा अभियान आरंभ किया गया है, अपने हर साथी को उसमें सम्मिलित देखकर ही हमें संतोष हो सकता है। हर स्वजन यही सोच कर अपने कर्त्तव्य और कार्यक्रम निर्धारित करें।
सच्ची आध्यात्मिकता की सरल साधना-
आत्मबल की अभिवृद्धि सत्कर्म करने में इतने साहस के रूप में सामने आती है कि दुनिया की भेड़चाल का कोई प्रभाव न पड़े। दुनियादार लोगों की अज्ञानग्रस्त बुद्धि प्रायः औंधी होती हैं, वे औंधा सोचते और औंधा करते हैं। इसलिए जो सीधा सोचता है वह उन्हें उल्टा एवं उपहासास्पद दिखाई देता है। परमार्थ मार्ग पर चलने वालों की आम तौर से दुनियादार लोग हंसी उड़ाते हैं। किन्तु जो कुमार्ग पर चल रहे हैं, उन्हें सहन करते रहते हैं। ऐसे अविवेकी लोगों के उपहास अथवा समर्थन का कोई मूल्य नहीं। मूल्य विवेक और सत्य का है। अध्यात्मवादी को केवल विवेक और सत्य का समर्थन करने का इतना साहस होना चाहिए कि औंधी बुद्धि के अविवेकी दुनिया वालों की परवाह न करता हुआ, अपनी मंजिल पर साहसपूर्ण कदम बढ़ाता रह सके।
अखण्ड-ज्योति के पाठकों के सामने सबसे प्रथम आध्यात्मिक साधना का ऐसा ही विधान रखा गया है जो आत्मबल की, साहस की अपेक्षा रखता है। अपने परिवार एवं परिजनों में नव-निर्माण की विचार-धारा फैलने में एकमात्र कठिनाई अपनी झिझक एवं संकोच-शीलता ही है। किसी से हुई बात कैसे कहें? कोई क्या समझेगा? इसमें अपनी हेटी होती है, हम क्यों किसी के पास जाएं? कोई कुछ पूछ बैठा तो क्या उत्तर देंगे? आदि-आदि न जाने कितने प्रश्न मन में उठते हैं, और एक झिझक एवं संकोच भरा वातावरण उपद्रव के रूप में खड़ा कर देते हैं। कदम उठाए उठता नहीं एकाध जगह गए, किसी से कुछ कहा और उपेक्षा जैसा उत्तर मिला, कोई हंस दिया, किसी ने व्यंग्य किया, तब तो पक्का बहाना ही मिल गया। दुनिया ऐसी है, वैसी है, लोग सुनना ही नहीं चाहते, आदि बातें सोच कर चुप बैठ जाते हैं और मिथ्या आत्म-प्रवंचना कर लेते हैं।
इस बाधा को दूर करने के लिए वैसे साहस की आवश्यकता है जैसी कि इन दिनों चल रहे चुनावों में उम्मीदवार लोग निधड़क होकर उनसे भी अनुरोध करते हैं जिनसे वोट मिलने की आशा नहीं है। अपनी बात कहने में आखिर हर्ज ही क्या? दस स्थानों पर असफलता की उपेक्षा कर हमें एक स्थान पर मिली सफलता को ही स्मरण रखना चाहिए और सत्प्रवृत्तियों के आत्मदर्शन में दुनिया वालों की उपेक्षा कर सकने का ‘आत्मबल’ साहस-परिपक्व करना चाहिए।
नव-निमार्ण के लिए आरंभ किया ज्ञान-यज्ञ वस्तुतः पाठकों के आत्मबल और आदर्शवाद को परिपुष्ट करने को एक छोटी किन्तु महत्वपूर्ण साधना है। इसमें मनोबल एवं साहस उपेक्षित है। सन्मार्ग पर चलने में जो आलस, प्रमाद एवं संकोच आदि आता है, उसे भी परास्त करने की बात है। परिजन सारा साहस बटोर कर इस दिशा में कदम बढ़ावें। अपने घर वालों में शिक्षितों को नव-निर्माण का साहित्य-पढ़ाने और सुनाने का कार्यक्रम आरंभ करें। आरंभिक उपेक्षा अशिक्षा, उपहास, व्यंग्य, प्रतिक्रियाओं से डरें, घबरायें नहीं। वरन् सहते-सहते, धीरे-धीरे प्रयत्न जारी रखें और उनमें आवश्यक अभिरुचि उत्पन्न करें। यही नीति मित्र, संयमी और परिजन के बारे में रखें। सद्विचार में अभिरुचि उत्पन्न करना मानव प्राणी की सर्वोपरि सेवा है, इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए-झिझक, संकोच की ओर नहीं देखना चाहिए और ज्ञान-यज्ञ की लहरें प्रज्ज्वलित करनी चाहिए।
दस व्यक्तियों को अपना नव-निर्माण साहित्य नियमित रूप से पढ़ाते रहने की साधना आरंभ करने वाले अपने साहस और आत्मबल में महत्वपूर्ण अभिवृद्धि हुई देखेंगे और इससे दूसरों की ही नहीं अपनी भी भावनात्मक प्रगति होगी। यह प्रगति व्यक्ति और समाज के नव-निर्माण की आधार शिला होगी।
*समाप्त*