“मुझे भय है कि जो लोग इस संसार की वर्तमान घटनाओं पर दुःखी हो रहे हैं, उनको मैं कोई विशेष सान्त्वना की बात नहीं कह सकता। इस समय की परिस्थिति निस्सन्देह बुरी है, निरन्तर अधिक बुरी होती जाती है और सम्भव है कि किसी भी समय वह अधिक से अधिक बुरी बन जाय। अब वर्तमान अशान्तिपूर्ण जगत में कोई द्म॥द्म;स्रद्म;ह्यस्रद्म;स्रद्मस्रद्मभी बात, चाहे वह कितनी भी विपरीत और कठिन क्यों न जान पड़ती हो, हो सकनी असम्भव नहीं है। इस परिस्थिति में सबसे अच्छा यही है कि हम यह विश्वास रखें कि संसार में एक नया और श्रेष्ठ युग आना है तो इसके लिये उन बुराइयों को प्रकट होकर निकल जाना ही चाहिये। यह परिस्थिति वैसी ही है जैसी कि योग साधन में होती है, जबकि अपने भीतर की हीन भावनाओं को प्रकाश में लाकर, उनके साथ संघर्ष करके उन्हें दूर कर दिया जाता है। शुद्धि करने का यही एक तरीका है। इसके सिवाय लोगों को यह कहावत भी याद रखना चाहिए कि प्रभात होने के पहले रात्रि का अन्धकार सबसे अधिक घनीभूत हो जाता है।
नये संसार का निर्माण वर्तमान की अपेक्षा किसी भिन्न प्रकार के साधनों और तत्वों से ही होगा। इस समय बाहरी चीजों का ही ज्यादा महत्व है, जबकि नये युग में आन्तरिक शक्तियों की ही प्रधानता होगी। इसलिये इस समय बाहरी वस्तुओं की दुर्दशा हो रही है- उनमें दोष उत्पन्न होकर वे नष्ट होती जाती हैं, उस पर अधिक ध्यान देने या उनके लिये दुखी होने की आवश्यकता नहीं। इसके बजाय हमको अपनी आत्मिक शक्तियों के विकास का उपयोग करते रहना चाहिये जिससे नये युग में उसके अनुकूल रूप में प्रस्तुत हो सकें- उसके उपयुक्त बन सकें।”
-महायोगी अरविन्द
परिवर्तन प्रकृति का अटल नियम है। आज हम संसार का जो नक्शा अपनी आँखों से देख रहे हैं वह न मालूम कितनी हलचल और उलट फेर के बाद इस रूप में उपस्थित हुआ है। यद्यपि सूक्ष्मदर्शी तत्वज्ञानियों के कथनानुसार हमारी दुनिया में प्रत्येक क्षण नये नये परिवर्तन होते रहते हैं पर कोई जमाना ऐसा आता है कि जब परिवर्तन की गति ऐसी हो जाती है कि सामान्य बुद्धि के व्यक्ति भी उसे स्पष्ट रूप से अनुभव करने लगते हैं। सौभाग्य से या दुर्भाग्य से आजकल हम ऐसे ही समय में निवास कर रहे हैं। राज्य-क्रान्ति युद्ध, नये देशों का निर्माण, राष्ट्रों की सीमाओं का बदलते रहना, आर्थिक और सामाजिक क्षेत्रों में अभूतपूर्व परिवर्तन आदि ऐसी-ऐसी घटनायें अब प्रति दिन देखने में आ रही हैं जो पहले असाधारण मानी जाती थीं और दस बीस या सौ पचास वर्षों में ही कभी-कभी दिखलाई पड़ा करती थीं।
अब से दो सौ वर्ष पहले तक दुनिया में बादशाहों और राजाओं का बोलबाला था। जनता का बड़े से बड़ा व्यक्ति उनको झुक कर सलाम करने के लिए बाध्य था। हमारे धर्म में तो राजा को ईश्वर का अंश बतला ही दिया गया था और बादशाहों के लिये भी ‘दिल्लीश्वरो वा जगदीश्वरो वा’ की उक्ति प्रसिद्ध हो गई थी। पर हम लोगों के देखते देखते समय ने पलटा खाया। जो सिंहासन सैंकड़ों हजारों वर्षों से जमे हुए थे और जिन पर बैठने वालों ने अपने को ‘अजर-अमर’ समझ लिया था, वे धूल में मिलते और नष्ट-भ्रष्ट होते नजर आये और आज सभ्य जगत में शायद ही कोई वास्तविक सत्ताधारी राजा-बादशाह शेष रहा हो।
इसी तरह इन सौ वर्षों में हमने व्यवसायी-वर्ग (पूँजी-पतियों) को उठते देखा। जो लोग ‘बनिया’ के अनादृत नाम से पुकारे जाते थे, जिनको एक मामूली राजा या सरदार बेगार देने के लिए बाध्य कर सकता था, वे कुछ ही समय में समस्त साधन-सामग्री के कर्ता-धर्ता बन बैठे। वे क्रमशः व्यवसायी, उद्योगपति, पूँजीपति कहला कर समाज के कर्णधार बन गये। आज सीमित राजतन्त्र, अधिनायक-तंत्र, समाजतन्त्र कैसा भी शासन क्यों न हो राज-काज की वास्तविक बागडोर पूँजीपति-वर्ग के हाथ में ही रहती है। कम्युनिस्ट प्रणाली के शासन उनसे अपना पीछा पूर्णतः छुड़ाना चाहते हैं पर वे घुमा-फिरा कर वहाँ भी अपना प्रभाव किसी रूप में जमाते ही रहते हैं।
अब पूँजीवाद का समय भी पूरा हो चला है और पिछले तीस-चालीस वर्षों से हम एक के बाद दूसरे देश में साम्यवादी शासन की स्थापना होते देख रहे हैं, जिनका उद्देश्य पूँजीपतियों को हटा समस्त शासन सत्ता श्रमजीवियों के हाथों में रखना है। इसके फलस्वरूप इन दिनों समस्त संसार में अशाँति फैली हुई है। दूसरे महायुद्ध में जो सन् 1939 से 1945 तक लड़ा गया साम्यवादी रूस का पूरा हाथ रहा और एक दृष्टि से उसी के सहयोग से जर्मनी का पराभव सम्भव हो सका। इस समय संसार में जो अशाँति और विग्रह का वातावरण छाया हुआ है उसका मूल कारण पूँजीवाद और साम्यवाद का संघर्ष ही है। यद्यपि विकास सिद्धाँत के अनुसार पूँजीवाद अपना काम पूरा कर चुका, पर जैसे मरता हुआ व्यक्ति भी प्राण बचाने के लिए हाथ-पाँव मारता रहता है और तिनके का सहारा पाकर भी आशान्वित हो उठता है, उसी प्रकार इस समय पूँजीवाद भी अपनी रक्षा करने में संलग्न है।
इस परिवर्तन का प्रभाव सामाजिक और धार्मिक क्षेत्रों पर भी पड़ता है। जिन रूढ़ियों और परम्पराओं से लोग सदा से लिपटे हुये थे वे टुकड़े-टुकड़े हो रही हैं। हमारे हिन्दू समाज में विदेश यात्रा, स्त्रियों को शिक्षा न देना और उन्हें पर्दे में कैद रखना, छोटे बच्चे-बच्चियों का विवाह कर देना, विधवाओं को घोर कष्ट देना आदि बातें देखते-देखते मिट गई और अब उनकी तरफ कोई विशेष ध्यान नहीं देता। अब रूढ़ियों के सबसे बड़े गढ़ जात-पाँत, विवाह-शादी, छुआछूत का नम्बर आया है और उनके विरुद्ध लोकमत दिन पर दिन जागृत और संगठित होता जाता है। अब क्रियात्मक रूप से भी इन पर आक्रमण किया जाने लगा है और अन्तर्जातीय, अन्तर्प्रान्तीय, सामूहिक विवाह आदि की चर्चा प्रायः सुनाई पड़ती रहती है। अब पुराने ढर्रे के नेता लोग भी इनका प्रभावशाली ढंग से कोई विरोध नहीं कर पाते।
धर्म सम्बन्धी मान्यतायें भी बदल रही हैं। अब से कुछ समय पहले धर्म का रूप बहुत कुछ कट्टरता और दूसरे धर्मों की निन्दा कर के अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करना ही रह गया था। हिन्दू और मुसलमानों में तो सदा से ही 36 का सम्बंध रहा है, पर स्वयं हिन्दुओं के विविध सम्प्रदायों में धर्म के नाम पर घोर संघर्ष हो चुके हैं। शिव और विष्णु दोनों ही हिन्दु मात्र के पूजनीय हैं, पर शैव और वैष्णव आचार्यों ने अपने-अपने अनुयायियों को भड़का कर काफी खून खराबा कराया है। अभी हाल में ही आर्यसमाजी और सनातन धर्मियों में काफी संघर्ष हो चुका है। पर इन कुछ वर्षों में लोगों का दृष्टि कोण बहुत कुछ बदला है और उनमें अन्य मजहबों और संप्रदायों के प्रति सहिष्णुता और उदारता का भाव आने लगा है। यह नये युग का ही लक्षण है।
विदेशों में भी धर्म के नाम पर ऐसा ही अर्थ का अनर्थ किया गया है। अब से दो हजार वर्ष पहले यहूदियों ने एक नये धर्म का उपदेश देने के कारण ईसामसीह को सूली पर चढ़ा कर मार डाला और सैंकड़ों वर्ष तक ईसाइयों पर अमानवीय अत्याचार किये गये। उसके पश्चात जब इस्लाम धर्म का प्रचार बढ़ा तो उनमें और ईसाइयों में दो सौ वर्ष तक युद्ध होते रहे जिनमें अनगिनत व्यक्ति मारे गये। स्वयं ईसाइयों में रोमन कैथोलिक और प्रोटेस्टैण्ट सम्प्रदायों के मतभेद के कारण स्पेन, इटली, जर्मनी आदि में निर्दोष व्यक्तियों को ऐसी यम-यातनायें दी गई कि उनका हाल पढ़ कर आज भी पाठकों को रोमाँच हो जाता है। पर अब युग के प्रभाव से वहाँ की दशा भी बदल गई है और ईसाई धर्म के दोनों सम्प्रदाय संसार-भर में दया, क्षमा और सेवा-धर्म का प्रचार करते हुये ईसा के सिद्धाँतों का प्रचार कर रहे हैं। जो काम तलवार से न हो सका वह प्रेम से कर दिखाया जा रहा है और आज संसार भर में ईसाई धर्मानुयायियों की संख्या ही सर्वोपरि है।
इन परिवर्तन का प्रभाव जन मानस पर भी कम नहीं पड़ा है। संसार के सब मजहबों और देशों में किसी धार्मिक महापुरुष या अवतार के जन्म लेने का विचार बहुत समय से फैल रहा है। अब से 25 वर्ष पूर्व भारत में कल्कि अवतार के प्रकट होने के आँदोलन ने ऐसा जोर पकड़ा कि सैंकड़ों व्यक्ति अपने को ‘अवतार’ कहने लगे, जिनमें से दस-पाँच अब भी शेष हैं। गीता के उपदेश से अधिकाँश हिन्दू धर्मानुयायियों का यह विश्वास है कि ‘जब-जब पृथ्वी पर अन्याय, अत्याचार बहुत अधिक बढ़ जाते हैं, तब-तब भगवान किसी रूप में प्रकट होकर उस अव्यवस्था का सुधार करते हैं। इसमें सन्देह नहीं कि इस समय संसार ऐसी ही अवस्था में होकर गुजर रहा और है और इससे लोगों के हृदय में जगत का उद्धार करने वाले किसी महापुरुष का आविर्भाव होने की भावना बढ़ती जाती है। और यह भी एक प्राकृतिक नियम है कि जब अधिकाँश जनता कष्ट सहती हुई मन में ऐसी भावना करती है तो वह भावना अवश्य ही साकार रूप में प्रकट होती है। हमारी पौराणिक कथाओं में अवतारों के प्रकट होने का यही कारण बतलाया गया है कि जब कभी पृथ्वी अधिक भाराक्राँत हो जाती है और व्यथित होकर प्रभु की शरण में जाती है तो कोई दैवी शक्ति इस कार्य को पूरा करने के लिये विश्व रंगमंच पर आ जाती है। ‘रामायण’ में गोस्वामी तुलसीदास जी ने इस बात को बड़े सरल और सुन्दर ढंग से कह दिया है :-
जब जब होइ धरम की हानी।
बाढ़ें असुर महा अभिमानी॥
तब तब प्रभु मनुज शरीरा।
हरहिं कृपानिधि सज्जन पीरा॥
आज जो लोग एटम और हाइड्रोजन बम तथा प्रक्षेपणास्त्र बना कर कुछ ही घण्टों के भीतर सारी दुनिया को भस्म कर देने का भय पैदा कर रहे हैं, उनकी तुलना ‘देवताओं’ को नष्ट करने वाले ‘दैत्यों’ से ही की जा सकती है। अगर इस आतंक से विश्व की रक्षा हो सकती है तो उसके लिये किसी बहुत बड़ी दैवी विभूति का प्रकट होना अवश्यम्भावी है।
ईसाई धर्म वालों में ईसामसीह के पुनरागमन का विचार बहुत समय से फैल रहा है और इसको मानने वालों ने अपना एक नया संगठन “सैकिण्ड एडवेंटिस्ट चर्च” (द्वितीय आगमन वालों का गिर्जाघर) के नाम से स्थापित किया है। इसके मानने वाले बाइबिल की भविष्यवाणियों के आधार पर यह प्रकाशित करते रहते हैं कि अब दुनिया में स्वार्थ और असमानता के कारण लोगों के कष्ट जो बहुत बढ़ गये हैं, उसके निराकरण के लिए ‘ईसा मसीह’ फिर से प्रकट होकर धर्म की स्थापना करेंगे। इस सम्बन्ध में श्री जे. एच. कोनीवियर नामक सज्जन ने बाइबिल के ‘लूक’ नामक विभाग की निम्नलिखित भविष्यवाणी का हवाला देते हुये लिखा था-
“उस समय सूर्य, चन्द्रमा तथा तारों में चिन्ह प्रकट होंगे, संसार के देशों में कष्ट व हलचल बहुत बढ़ जायगी, समुद्र और उसकी लहरें भी गर्जने लगेंगी। मनुष्य संसार में होने वाली घटनाओं को देख सकने का भी साहस न कर सकेंगे, क्योंकि उस समय आकाश की शक्तियाँ विचलित हो जायेंगी। उसके बाद ‘मनुष्य-पुत्र’ शक्ति तथा शोभा के साथ बादलों से प्रकट होकर संसार का उद्धार करेगा।”
“ईश-पुत्र ईसा ने जो बात दो हजार वर्ष पूर्व कही थी, अब उसमें बतलाये हुये चिन्ह दृष्टिगोचर होने लग गये हैं। ज्योतिष विज्ञान के ज्ञाता सूर्य, चन्द्रमा में होने वाले परिवर्तनों को प्रत्यक्ष देख रहे हैं। एटम और हाइड्रोजन बमों के परीक्षणों के कारण समुद्र के पानी में भी हलचल पैदा हो रही है और करोड़ों जल-जन्तु नष्ट हो जाते हैं। समस्त देशों में इतने अधिक आँदोलन और क्राँतियाँ हो रही हैं कि आकाशी-शक्तियाँ भी विचलित हो रही है और समस्त संसार पर आने वाला भयंकर परिणाम की सूचना दे रही हैं। इस घटना के बाद “मनुष्य का पुत्र” पृथ्वी पर अवतरित होगा। पहले युग में धर्मग्रन्थ में ईसा को ‘ईशा-पुत्र’ कहा गया था, पर वर्तमान विकास और विधान के युग में वह ‘मानव-पुत्र’ के रूप में ही प्रकट होगा।”
मुसलमानी धर्मग्रन्थों और उसके साधना करने वाले आत्मज्ञानी पुरुषों ने भावी घटनाओं पर विचार करते हुए एक बात विशेष रूप से कही है कि वर्तमान युग का अन्त ‘चौदहवीं सदी’ में हो जायगा और तभी इस्लाम खत्म होकर कोई अन्य मजहब संसार में फैल जायगा। इस सिद्धाँत का स्पष्टीकरण करते हुये ‘कुरान’ में कहा गया है-
“हम जिसे आयु देते हैं उसे अखीर में अन्धा कर देते हैं। यह लोग बुद्धि से काम क्यों नहीं लेते? अगर वे विचार करें तो फौरन समझ में आ जाय कि एक आदमी की तरह एक उम्मत (सम्प्रदाय या मजहब) की भी आयु निश्चित रहती है। बचपन, जवानी और बुढ़ापे की सीढ़ियाँ तय कर के जब उम्मत मर जाती है, तब खुदा नई उम्मत को पैदा करता है।”
(सूरत यासीन)
इसी प्रकार ‘हदीस दारकुतनी’ में यह बतलाया है कि वह नवयुग आगमन का समय कब तक आयेगा-
इननाले मेंहदीएना आयतैने लमत कुना।
मुँजौखल्क समाँ वातेबल अर्ज इयन्नकसे॥
फुलक्रमो ले अव्वले लैलतीम् मीर रमजाना।
वत नकसे पुशशम्सो फिनस्फीम् मिन हो॥
अर्थात्- “हमारे मेंहदी के आने के कई निशान हैं। जब से जमीन और आसमान बने यह निशान किसी और “मामूर” अथवा ‘रसूल’ के वक्त जाहिर नहीं हुए। इसमें से एक यह है कि मेंहदी मामूर का जमाना जब आने वाला होगा तो उससे कुछ पहले रमजान के ही महीने में चाँद का ग्रहण 13 वीं तारीख को होगा और सूर्य ग्रहण 28 तारीख को होगा। तब वह चौदहवीं सदी होगी।”
इस तरह के दो ग्रहण मुसलमानी सन् 1312 में पड़ चुके हैं और तभी से अनेक मुसलमान मेंहदी के आगमन की घोषणा करने लगे हैं। उनका कहना है कि अब धर्मग्रन्थों के अनुसार ‘जमाना शैतानी’ (कलियुग) खत्म होकर ‘जमाना रहमानी’ (सतयुग) शुरू होने का समय आ चुका है।
इस प्रकार समय की गति, दुनिया की हलचल और प्राचीन ग्रन्थों के कथनों के आधार पर सर्वसाधारण में पुराना युग समाप्त होकर नया युग प्रारम्भ होने की धारणा पिछले तीस-चालीस वर्ष से जोर पकड़ती जा रही है और वर्तमान घटनाओं को देख कर तो हम कह सकते हैं कि अब वह समय ठीक सिर पर आ पहुँचा है।
इस समय संसार में प्रतिद्वन्द्विता, ईर्ष्या, द्वेष, कलह, भय, निराशा के भाव चारों तरफ फैले दिखाई पड़ते हैं। यद्यपि पूर्व काल की अपेक्षा आजकल संपत्ति और सुख-साधनों की बहुत अधिक वृद्धि हो चुकी है। विज्ञान ने मनुष्य के हाथ में ऐसी अपूर्व शक्तियाँ दे दी हैं, जिससे वह अनेकाँश में प्रकृति का स्वामी ही बन बैठा है, तो भी अपनी अनैतिकतापूर्ण मनोवृत्ति के कारण वह सुख और शाँति से प्रायः वंचित ही रहता है। क्या यह कम आश्चर्य की बात है कि एक तरफ तो मनुष्य चन्द्रलोक तक पहुँच गया है और आकाशीय पिण्डों को अणु-शक्ति द्वारा नष्ट कर सकने का दावा कर रहा है, नवीन सृष्टि रचना करने में भी अपने को सक्षम मानता है और दूसरी ओर मानव-मात्र को जीवन के सामान्य अधिकार देकर शाँति स्थापन में अकृतकार्य हो रहा है? इसका आशय यही है कि उसने ज्ञान विज्ञान में जो प्रगति की है उसमें उसका लक्ष्य स्वार्थ-प्रधान है। परिणाम यह होता है कि प्रकट में संसार की चमक दमक और वैभव-सामग्री बढ़ने पर भी सुख-शाँति दूर भाग जाती है और ब्रह्माण्ड का ज्ञान प्राप्त हो जाने पर भी पारस्परिक विभिन्नता और पार्थक्य की भावना ही बढ़ती जाती है। इसलिए हमारे देश के विद्वानों ने प्राचीन भारतीय दृष्टिकोण को उपस्थित करते हुये आधुनिक ज्ञान-विज्ञान की छः त्रुटियाँ बतलाई हैं-
(1) वह भौतिक है (2) तर्क मात्र है (3) शिल्पवत् है (4) अवास्तविक है (5) केवल प्रवृत्ति प्राण है (6) यश और जीविका का साधन है। इस तथ्य को योग वसिष्ठ में इस प्रकार प्रतिपादित किया गया है-
आत्मज्ञानं विदुर्ज्ञानं ज्ञानान्यन्यानि यानितु।
तानि ज्ञानवभासानि सारस्यानय बोधनत् ॥
अज्ञातारं वरं मन्ये न पुनर्ज्ञान बन्धुताम्।
व्याचष्टे या पठति च शास्त्रभोगाय शिल्पिवत् ॥
“आत्मज्ञान ही सच्चा ज्ञान है अन्य ज्ञान तो ज्ञानाभास है। उस प्रकार के ज्ञान से सम्पन्न व्यक्ति तो ज्ञान-बन्धु या ज्ञान-शिल्पी ही माने जा सकते हैं, अर्थात् उनका ज्ञान खाने कमाने अथवा यश कीर्ति के लिए ही होता है।”
आजकल जो व्यक्ति थोड़ा भी पढ़-लिख जाते हैं उनकी दृष्टि में संसार में सबसे बड़ा पुरुषार्थ -जीवन की सफलता बँगला और मोटर आदि ही हैं। अध्यात्म तो उनके निकट हँसी की बात या दुनिया को ठगने का एक ढोंग है। सच्ची बात तो यह कि वे बेचारे आध्यात्म का केवल नाम ही सुन लेते हैं, पर उसका क-ख-ग भी नहीं जानते। उनको नहीं मालूम कि जिस भौतिकता के आधार को वे ग्रहण कर रहे हैं वह एक प्रकार की मृगमरीचिका है, जो यद्यपि दूर से बड़ी लुभावनी, सुहावनी जान पड़ती है, पर जिसका परिणाम सिवाय कष्ट के और कुछ नहीं होता। इसके मुकाबले में अध्यात्म एक गूढ़, गम्भीर और शाँत प्रकृति वाला होता है पर उससे जो सुख प्राप्त होता है वह स्थायी और प्रत्येक दृष्टि से कल्याणकारी होता है।
हम यह बलपूर्वक कह सकते हैं कि आज दुनिया की जो दुर्दशा हो रही है, खासकर जगह जगह जो युद्ध और खून-खराबे का दावानल दहक रहा है उसका मुख्य कारण अध्यात्म का अभाव ही है। अध्यात्म के अभाव से मानव ज्ञान विज्ञान को प्राप्त करके भी दानव बन जाता है और अपनी स्वार्थ पूर्ति के लिये किसी के सुख दुःख की कुछ परवाह नहीं करता। दूसरा दोष यह पैदा हो जाता है कि उसकी तृष्णा, कामनायें कभी शान्त नहीं होतीं। स्वार्थपरता उसमें प्रतिस्पर्धा का भाव भी उत्पन्न कर देती है और वह यही चाहता है कि मैं दूसरे लोगों के मुकाबले का या उनसे बढ़-चढ़कर रहूँ, घटकर नहीं। इसलिये वह चाहे कितना ही बढ़ जाय, पर उसके चैन नहीं पड़ता। वह अनेक व्यक्तियों को अपने से बढ़ा हुआ देखता है तो उसके हृदय में उनसे भी आगे निकल जाने की दुर्दमनीय प्रवृत्ति उत्पन्न होती है, जिसके फलस्वरूप न तो वह स्वयं शान्ति से रह सकता है और न दूसरों को रहने देता है। इसका परिणाम समाज के देश के संसार के लिए अशाँति और कष्टों का वातावरण पैदा करना ही होता है।
यही प्रवृत्ति संसार में पिछले सैंकड़ों, हजारों वर्षों से छोटे-बड़े संघर्ष, गृह-कलह और युद्धों की प्रेरिका रही है। स्वार्थी प्रवृत्ति के मनुष्य अपने छोटे से आर्थिक लाभ अथवा नामवरी के लिए ऐसे-ऐसे झगड़े पैदा कर देते हैं जिनका अन्तिम परिणाम विनाशकारी युद्ध ही होता है। अब तक संसार में जितनी भयंकर लड़ाइयाँ हुई हैं, उनमें से अधिकाँश आर्थिक लाभ और नाम कमाने के लिए ही हुई हैं। आप सिकन्दर और सीजर से लेकर नैपोलियन और जर्मनी के कैसर तक के युद्धों के कारणों पर विचार कीजिये तो यही मालूम होगा कि उनमें एक या दो-चार व्यक्तियों की महत्वाकाँक्षा ही मुख्य रूप से प्रेरक थी। जब साधारण जनता अपने नेता अथवा कर्णधारों को इस नीति पर चलता देखती है तो वह भी उसी का अनुसरण करती है और इससे संसार में स्वार्थपूर्ण संघर्ष तथा चालबाजी का जोर बढ़ता है और धर्म तथा नीति का ह्रास होने लगता है। अधिकाँश मनुष्य अपना मतलब सिद्ध करने के लिये न्याय-अन्याय, सच-झूठ, हिंसा-अहिंसा का ध्यान छोड़ देते हैं और एक की देखा-देखी दूसरा और तीसरा उसी मार्ग पर दौड़ने लगते हैं। इस प्रकार भ्रष्टाचार बढ़ने लगता है, लोगों की निगाह में धर्म और नीति का मूल्य घटने लगता है और मानवता का स्तर दिन पर दिन दूषित बनने लगता है।
जब मनुष्य धर्म को भूल कर अधर्म और अनीति के मार्ग को अपना लेते हैं और उनका स्वभाव अपना हित और दूसरों को अनहित करना बन जाता है तो अपने पड़ोसियों तथा समाज के अन्य सदस्यों के कष्ट, हानि अथवा बर्बादी का उनको कुछ ख्याल नहीं होता। वे अपने छोटे से तुच्छ स्वार्थ के लिये समाज या देश का बड़े से बड़ा अनहित करने में नहीं हिचकिचाते। ऐसी ही मनोवृत्ति के लिए ‘रेबड़ी के लिए मस्जिद को ढहाना’ की कहावत प्रसिद्ध हो गई है। यह प्रत्यक्ष ही है कि इस दशा में कभी शाँति, सुख, उन्नति, प्रगति की आशा नहीं की जा सकती। यद्यपि ये स्वार्थान्ध व्यक्ति जो कुछ करते हैं उसका उद्देश्य स्वयं सुख प्राप्त करना ही होता है, पर ‘बबूल का पेड़ बोकर आम किस प्रकार खाया जा सकता है।’ फलतः जहाँ वे संसार के लिए शूल (काँटे) बोते हैं वहाँ उनके लिए भी त्रिशूल तैयार मिलते हैं।
भारत के प्राचीन ऋषि मुनि इस तथ्य को खूब अच्छी तरह समझते थे और उन्होंने स्पष्ट शब्दों में बार बार यह समझाया है कि मनुष्यों को साँसारिक व्यवहारों का निर्वाह करते हुए लौकिक जीवन को सुखी बनाने का प्रयत्न अवश्य करना चाहिये,पर साथ ही आत्म-कल्याण का ध्यान भी कभी नहीं भुलाना चाहिये। हमको सदैव यह स्मरण रखना आवश्यक है कि लौकिक-सुख सदैव अस्थाई और किसी भी क्षण नाशवान रहेगा, जबकि आत्म कल्याण स्थायी ही नहीं शाश्वत सिद्ध होगा। इसलिये जो लोग आत्म-हित के उच्च मार्ग को त्याग कर सर्वथा लौकिक कामनाओं की पूर्ति में ही संलग्न हो जायेंगे वे कभी सुख नहीं पा सकते, सदा अवनति के गर्त में ही पड़े रहेंगे। ‘भगवद् गीता’ में ऐसे नीच प्रवृत्ति वालों के अभिशप्त जीवन का वर्णन करते हुये कहा है-
काममाश्रित्य दुष्पूरं दम्भमानमदान्विता।
मोहाद्गृहीत्वासद्ग्राहान्प्रवर्तन्ततेऽशुचिव्रताः॥
चिन्तामपरिमेयाँ च प्रलयान्तामुपाश्रिताः।
कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिताः॥
इदमद्य मया लब्धमिमं प्राप्स्ये मनोरथम्।
इसमस्तीदमपि में भविष्यति पुनर्धनम्॥
असौ मया हतः शत्रुर्हनिष्ये चापरानपि।
ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान्सुखी॥
(अध्याय 16)
“ऐसे दम्भ, मान और मद से युक्त मनुष्य किसी भी प्रकार पूर्ण न होने वाली कामनाओं का आश्रय लेकर तथा अज्ञान से मिथ्या सिद्धाँतों को ग्रहण करके भ्रष्ट आचरणों से युक्त संसार में व्यवहार करते हैं। वे मरण काल तक रहने वाली अनन्त चिन्ताओं को आश्रय किये हुये और विषय भोगों के भोगने में तत्पर हुये और ‘यही एकमात्र आनन्द है’ ऐसा मानने वाले होते हैं। उनके विचार इस प्रकार के होते हैं कि-”मैंने आज यह प्राप्त कर लिया, कल उसे पा जाऊँगा-अभी मेरे पास इतना धन है, आगे इसमें इतनी वृद्धि और हो जायेगी। आज मेरे द्वारा वह शत्रु मारा गया फिर दूसरे शत्रुओं को भी मारूंगा। मैं ईश्वर के तुल्य ऐश्वर्य का उपभोग करने वाला हूँ, सब सिद्धियों से युक्त, बलवान् और सुखी हूँ।”
पर इसका परिणाम उनके और दूसरों के लिये भी सदैव अनिष्टकारी ही निकलता है। इसमें तो सन्देह नहीं कि ऐसे महत्वाकाँक्षी व्यक्ति प्रायः कर्मठ और दुस्साहसी होते हैं, इसलिये वे एक बार प्राणपण से यत्न और परिश्रम करके अपने उद्देश्य में थोड़ी बहुत सफलता प्राप्त कर ही लेते है। पर चूँकि उनकी भावनायें दूषित और लोक विरोधी होती हैं इसलिये अन्त में उनको असफलता का ही मुख देखना पड़ता है। इसीलिये गीताकार ने स्वार्थान्ध व्यक्तियों के उपरोक्त लक्षण बतलाने के साथ यह भी कहा है-
एताँ दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मनोऽल्प बुद्धयः।
प्रववन्त्युग्र कर्माणः क्षयाय जगतोऽहिताः॥
(16-9)
“इस तरह जो लोग झूठ-मूठ की कामनाओं को बढ़ाकर अपने स्वभाव को नष्ट और बुद्धि को भ्रष्ट कर लेते हैं, वे अपकार करने वाले क्रूर कर्मी केवल जगत का नाश करने के लिए ही उत्पन्न होते हैं।”
पर जब वे स्वार्थ बुद्धि से जगत का अपकार करते हैं तो सम्भव नहीं कि वे प्रकृति और ईश्वर के दण्ड से बच सकें। ‘गीता’ में ऐसे व्यक्तियों के दुर्भाग्य का वर्णन करते हुये कहा है-
अनेक चित्त विभ्रान्ता मोहजालसमावृताः।
प्रसक्ताः काम भोगेषु पतन्तो नरकेऽशुचो॥
“इसलिये वे अनेक प्रकार से भ्रमित चित्त वाले मूढ़-जन जाल में फँसे हुये एवं विषय भोगों में अत्यन्त आसक्त हुये महान अपवित्र नरक में गिरते हैं अर्थात् अत्यन्त कष्टों से पीड़ित होते हैं।”
अन्य ग्रन्थों में भी यही कहा गया है कि जब स्वभाववश, परिस्थितियों के कारण मनुष्यों में अनैतिकता, चरित्रहीनता, स्वार्थान्धता की प्रवृत्तियाँ बहुत अधिक बढ़ जाती हैं, या जब लोग समाज के हित अनहित का ख्याल छोड़ कर मनमाना आचरण करने लगते हैं, तो व्यक्तियों को ही नहीं समस्त समाज को भी उसके भीषण परिणाम सहन करने पड़ते हैं। महर्षि वसिष्ठ ने एक स्थान पर यह सम्मति दी है कि-”जब किसी देश पर जनसंख्या का भार अत्यधिक बढ़ जाता है तो वहाँ महामारी, अकाल, युद्ध और भूकम्प आदि के द्वारा प्रकृति मनुष्यों का संहार करती है।” वेदान्त सूत्र में दो प्रकार की सृष्टि बतलाई गई है-एक क्रमोन्नति वाली और दूसरी क्रमावनति वाली। पहली योरोप की है जो क्रम से उन्नति करती हुई शिखर पर पहुँच चुकी है और अब अवनति की तरफ झुकने वाली है। दूसरी क्रमावनति वाली भारतवर्ष की है जो सतयुग से कलियुग तक पहुँच कर अब फिर उन्नति की तरफ अग्रसर होने वाली है।
इसका तात्पर्य यही है कि हिन्दू धर्म में अवतार का जो सिद्धाँत माना गया है उसका सम्बन्ध मानव समाज में होने वाली विशेष हलचल और महान परिवर्तनों से है। जब कभी समाज का एक बड़ा भाग सही रास्ते को त्याग कर गलत मार्ग को अपना लेता है, सहयोग सहायता, उदारता, परोपकार के धार्मिक आदेशों की अवहेलना करने लगता है तो वह मानव नाम का अधिकारी नहीं रहता, वरन् दानव दैत्य या असुर बन जाता है। भगवान को यह अभिप्रेत नहीं कि पृथ्वी पर ऐसे लोगों की संख्या इतनी बढ़ जाय कि जिससे सज्जन पुरुषों के अस्तित्व को खतरा पैदा हो जाय। अतः जब कभी संसार में धर्म और नीति का उच्छेद होने लगता है तभी दैवी रूप से कोई ऐसी परिस्थिति पैदा हो जाती है जिससे दुष्टता का विनाश होकर सत्कर्मों की रक्षा हो सके।
जिस तरह हिन्दू शास्त्रों में मनुष्यों के दुष्कर्मों और अनीति के फल से व्यक्ति और समाज के नष्ट-भ्रष्ट होने की चेतावनी दी गई है उसी प्रकार ईसाइयों के धर्मग्रन्थ बाइबिल में मनुष्य जाति के पापों के फलस्वरूप लोगों की घोर दुर्दशा का वर्णन किया है। दोनों में इतना अन्तर अवश्य है कि जहाँ हिन्दू शास्त्रकारों ने इस सम्बन्ध में शाश्वत सिद्धाँतों को ही उपस्थित किया है ‘बाइबिल’ के लेखकों ने अधिकाँश में सामयिक घटनाओं का उल्लेख किया है। वास्तव में यह एक विशेष महत्व की बात है कि ईसाई योगियों ने दो हजार वर्ष पूर्व संसार के भावी इतिहास की जिन घटनाओं का वर्णन किया है उनमें से अनेक इस समय प्रत्यक्ष सिद्ध होती दिखाई पड़ती हैं। यद्यपि ‘बाइबिल’ में इनके घटित होने का समय संकेत रूप से लिखा है, पर उनके व्याख्याकारों ने आज से सौ वर्ष पूर्व प्रमाणों के साथ यह घोषित किया था कि ये भविष्यवाणियाँ बीसवीं शताब्दी में चरितार्थ होती नजर आयेंगी।
ऐसी एक पुस्तक ‘चालीस भविष्यत् आश्चर्य’ (स्नशह्ह्लब् स्नह्वह्ह्वह्द्ग ख्शठ्ठस्रद्गह्ह्य) है जिसे इंग्लैंड के विद्वान पादरी मि. बैक्सटर ने सन् 1866 में प्रकाशित कराया था। इसमें उन्होंने ‘बाइबिल’ के उद्धरण देकर और उनकी व्याख्या करके यह बतलाया है कि बीसवीं शताब्दी में दस-पाँच वर्ष बीत जाने पर ही समस्त योरोप में घोर राजनीतिक हलचल, राज्यक्राँतियाँ, युद्ध आदि फैल जायेंगे जिनके फल से कुछ वर्षों में वहाँ राष्ट्रों की कायापलट हो जायगी और शासन पद्धति में क्राँतिकारी परिवर्तन हो जायेंगे। अन्त में ऐसा समय आयेगा कि मनुष्यों के दुष्कर्मों के फलस्वरूप उनके ऊपर दैवी प्रकोप फट पड़ेंगे जिससे असंख्यों व्यक्ति नष्ट होंगे और उनके पापों का प्रायश्चित्त हो जाएगा।
इस सम्बन्ध में एक प्रभावशाली उद्धरण इस प्रकार है-
च्च्ंखड्डह्ह्य ड्डठ्ठस्र ह्ह्वद्वशह्वह्ह्य शद्ध ख्ड्डह्ह्य द्धशह् ठ्ठड्डह्लद्बशठ्ठ ह्यद्धड्डद्यद्य ह्द्बह्यद्ग ड्डद्दड्डद्बठ्ठह्यह्ल ठ्ठड्डह्लद्बशठ्ठ, ड्डठ्ठस्र द्मद्बठ्ठद्दस्रशद्व ड्डद्दड्डद्बठ्ठह्यह्ल द्मद्बठ्ठद्दस्रशद्व, ड्डठ्ठस्र ह्लद्धद्गह्द्ग ह्यद्धड्डद्यद्य ड्ढद्ग द्धड्डद्वद्बठ्ठद्गह्य ड्डठ्ठस्र श्चद्गह्यह्लद्बद्यद्गठ्ठष्द्गह्य ड्डठ्ठस्र द्गड्डह्ह्लद्धह्नह्वड्डद्मद्ग द्बठ्ठ स्रद्बक्द्गह्ह्यद्ग श्चद्यड्डष्द्गह्य. ञ्जद्धद्गह्यद्ग ड्डह्द्ग ह्लद्धद्ग ड्ढद्गद्दद्बठ्ठठ्ठद्बठ्ठद्द शद्ध ह्लद्धद्ग ह्यशह्ह्शख्, ड्ढह्वह्ल ह्लद्धद्ग द्गठ्ठस्र द्बह्य ठ्ठशह्ल ब्द्गह्ल.ज्ज्
(द्वड्डह्लह्लद्धद्गख् गंगढ्ढंक)
“उस काल में हर जगह युद्ध होने लगेंगे और युद्धों की अफवाहें सुनाई देने लगेंगी। एक जाति दूसरी जाति के मुकाबले में और एक राज्य दूसरे राज्य के विरुद्ध खड़ा हो जायगा। जगह-जगह अकाल पड़ेंगे, भयंकर बीमारियाँ फैलेंगी और भूकम्प आयेंगे। इस प्रकार की घटनाओं से इस शोकपूर्ण युग का आरम्भ होगा और आगे चल कर इससे भी कहीं भयंकर आपत्तियों का सामना करना पड़ेगा।
(मैथ्यू अध्याय 24)
‘बाइबिल’ का यह भविष्य कथन ‘योगवसिष्ठ’ के उपरोक्त सिद्धाँत के अनुकूल ही है कि जब पृथ्वी पर मनुष्यों और उनके पाप कर्मों का भार बढ़ जाता है तब दैवी कोप के रूप में उनको युद्ध, अकाल, महामारी और भूकम्प आदि की भीषण आपत्तियाँ सहन करनी पड़ती हैं। बाइबिल में इन चारों दण्डों का जो वर्णन आलंकारिक भाषा में किया है वह बड़ा रोमाँचकारी है। ईश्वरीय नियमों का उल्लंघन करके, धर्म को त्याग कर अधर्म मार्ग पर चलने वालों की कैसी दुर्दशा होती है, इसका जो ज्वलन्त चित्र ईसा के शिष्य महात्मा जन ने खींचा है वह अपने ढंग का अपूर्व ही है-
्नठ्ठस्र ख्द्धद्गठ्ठ द्धद्ग द्धड्डस्र शश्चद्गठ्ठद्गस्र ह्लद्धद्ग ह्यद्गष्शठ्ठस्र ह्यद्गड्डद्य ढ्ढ द्धद्गड्डह्स्र ह्लद्धद्ग ह्यद्गष्शठ्ठस्र ड्ढद्गड्डह्यह्ल ह्यड्डब्, ष्शद्वद्ग ड्डठ्ठस्र ह्यद्गद्ग. ्नठ्ठस्र ह्लद्धड्डह्ल ह्लद्धद्गह्द्ग ख्द्गठ्ठह्ल शह्वह्ल ड्डठ्ठशह्लद्धद्गह् द्धशह्ह्यद्ग ह्लद्धड्डह्ल ख्ड्डह्य ह्द्गस्र ड्डठ्ठस्र श्चशख्द्गह् ख्ड्डह्य द्दद्बक्द्गठ्ठ ह्लश द्धद्बद्व ह्लद्धड्डह्ल ह्यड्डह्ल ह्लद्धद्गह्द्गशठ्ठ ह्लश ह्लड्डद्मद्ग श्चद्गड्डष्द्ग द्धह्शद्व ह्लद्धद्ग द्गड्डह्ह्लद्ध ड्डठ्ठस्र ह्लद्धड्डह्ल ह्लद्धद्गब् ह्यद्धशह्वद्यस्र द्मद्बद्यद्य शठ्ठद्ग ड्डठ्ठशह्लद्धद्गह् ड्डठ्ठस्र ह्लद्धद्गह्द्ग ख्ड्डह्य द्दद्बक्द्गठ्ठ ह्वठ्ठह्लश द्धद्बद्व ड्ड द्दह्द्गड्डह्ल ह्यख्शह्स्र. (क्रद्गक्.6)
“जब उसने दूसरी मुहर को तोड़ा तो उसमें से दूसरा जानवर निकला। यह लाल रंग का घोड़ा था। जो उस पर बैठा था उसको इस बात की शक्ति दी गई थी कि संसार की शाँति को भंग कर दे और युद्ध आरम्भ करा दे। उस सवार के हाथ में एक बहुत बड़ी तलवार दी गई थी।”
(रिवेलेशन अ. 6)
लाल रंग का आशय युद्धों से तो होता ही है, पर इन दिनों जो कम्यूनिस्ट दल संसार में उथल-पुथल कर रहा है वह विशेष रूप से लाल (रेड) कहा जाता है। इस समय हम चीन के लाल-रक्षकों की जो करतूतें सुनते रहते हैं उससे स्पष्ट प्रकट होता है कि उनका मुख्य उद्देश्य संसार-भर में युद्ध भड़का कर वर्तमान समाज-संगठन को नष्ट करना ही है। रूस का बोलशेविक दल भी ‘रेड’ ही कहलाता था और उसकी लाल-सेना संसार भर में प्रसिद्ध है।
्नठ्ठस्र ख्द्धद्गठ्ठ द्धद्ग शश्चद्गठ्ठद्गस्र ह्लद्धद्ग ह्लद्धद्बह्स्र ह्यद्गड्डद्य, ढ्ढ द्धद्गड्डह्स्र ह्लद्धद्ग ह्लद्धद्बह्स्र ड्ढद्गड्डह्यह्ल ह्यड्डब्, ष्शद्वद्ग ड्डठ्ठस्र ह्यद्गद्ग. ्नठ्ठस्र ढ्ढ ड्ढद्गद्धद्गद्यस्र ड्डठ्ठस्र द्यश, ड्ड ड्ढद्यड्डष्द्म द्धशह्ह्यद्ग, ड्डठ्ठस्र द्धद्ग ह्लद्धड्डह्ल ह्यड्डह्ल शठ्ठ द्धद्बद्व द्धड्डस्र ड्ड श्चड्डद्बह् शद्ध ड्ढड्डद्यड्डठ्ठष्द्गह्य द्बठ्ठ द्धद्बह्य द्धड्डठ्ठस्र. ्नठ्ठस्र ढ्ढ द्धद्गड्डह्स्र ड्ड क्शद्बष्द्ग द्बठ्ठ ह्लद्धद्ग द्वद्बस्रह्यह्ल शद्ध द्धशह्वह् ड्ढद्गड्डह्यह्ल ह्यड्डब्, ड्ड द्वद्गड्डह्यह्वह्द्ग शद्ध ख्द्धद्गड्डह्ल द्धशह् ड्ड श्चद्गठ्ठठ्ठब् ड्डठ्ठस्र ह्लद्धह्द्गद्ग द्वद्गड्डह्यह्वह्द्गह्य शद्ध ड्ढड्डह्द्यद्गब् द्धशह् ड्ड श्चद्गठ्ठठ्ठब्.
(क्रद्गक्.6)
“जब उसने तीसरी मुहर को तोड़ा तो उसमें से तीसरा जानवर निकला। वह एक काले रंग का घोड़ा था और उसके ऊपर जो बैठा उसके हाथ में एक तराजू थी। मैंने एक आवाज सुनी कि एक पैमाना गेहूँ एक सिक्के को मिलेगा और तीन पैमाने जौ का दाम एक सिक्का होगा।”
(रिवेलेशन अध्याय)
यद्यपि इस समय खाद्य पदार्थों का भाव बहुत बढ़ गया है और भारतवर्ष में अन्न की कमी भी अनुभव की जा रही है, पर यह अकाल जब पूर्ण रूप में आयेगा तब की हालत कल्पनातीत होगी। ‘बाइबिल’ की ‘लैमेनटेशन’ नामक पुस्तक में इसका वर्णन करते हुये लिखा है-
“लोगों के चेहरे कोयले की तरह काले हो जायेंगे। वे गलियों में मारे-मारे फिरेंगे। उनकी खाल हड्डियों से अलग होकर लटक पड़ेगी और शरीर सूख कर लकड़ी की तरह हो जायगा। जो लोग तलवार से मारे जाते हैं वे उन भूख से मरने वालों की अपेक्षा सुख में रहेंगे।”
बाइबिल की ‘इरास’ नामक पुस्तक में इस युग-परिवर्तन की घटना का वर्णन करते हुये कहा गया है -
“संसार के और संसार में रहने वाले मनुष्यों के नाश का समय आ गया। एक ऐसी आग लगाई गई है जो उस समय तक शाँत न होगी, जब तक वह पृथ्वी की जड़ तक न पहुँच जाय। संसार के पापी मनुष्यों को दण्ड देने के लिये ईश्वर अकाल, प्लेग, युद्ध और भयंकर बीमारियाँ भेजेगा। पर लोग फिर भी पापों से मुख न मोड़ेंगे। एक मनुष्य दूसरे को मारने की तैयारी करेगा। तमाम संसार में विद्रोह फैल जायगा और लोग एक दूसरे पर हमला करने लगेंगे। बादशाहों और राजाओं की कोई इज्जत न करेगा और उनके अधिकार छीन लिये जायेंगे। गाँवों के निवासी भाग कर शहरों में जाना चाहेंगे पर खुद शहर ही बड़ी मुसीबत और झगड़ों के घर बने होंगे। तमाम मानव नष्ट हो जायेंगे और लोग भयभीत होंगे। मनुष्य अपने पड़ोसियों की सहायता करना और प्रेम रखना छोड़ देंगे और एक दूसरे का घर लूटने लगेंगे। क्योंकि उस समय चारों ओर घोर अकाल होगा और मनुष्य हर तरह से पेट भरने की कोशिश करेंगे।”
इस समय संसार में जनसंख्या जितनी अधिक बढ़ गई है और तरह-तरह के व्यसनों वाले पदार्थों के कारण अन्न की पैदावार में कमी पड़ती जाती है, उससे अन्न-संकट दिन पर दिन बढ़ता जाता है और अमरीका तथा योरोप के अर्थ-शास्त्री ही नहीं भारत के खाद्य विशेषज्ञ भी निश्चित रूप से यह कह रहे हैं कि संसार एक बहुत बड़े अकाल के द्वार पर खड़ा है। विशेषज्ञों ने इस अकाल की भयंकरता का समय 1970 से 1980 तक बतलाया है।
(3) “जब उसने चौथी मुहर को तोड़ा तो उसमें से चौथा जानवर निकला। वह एक पीले रंग का घोड़ा था। उस पर मृत्यु का देवता बैठा था। इस देवता को इस बात की ताकत दी गई थी कि वह पृथ्वी के एक चौथाई भाग में तलवार, प्लेग, अकाल और जंगली जानवरों आदि के द्वारा मनुष्यों का नाश करे।”
(रिवेलेशन अ. 6)
(4) “जब उसने छठी मुहर को तोड़ा तो मैंने एक महाभयंकर भूकम्प देखा। उस समय सूर्य काले कपड़े की तरह प्रकाश रहित हो गया और चन्द्रमा खून की तरह लाल। आसमान के तारे (उल्का) इस तरह टूटने लगे जिस प्रकार किसी पेड़ को हिलाने से पके फल गिरने लगते हैं। हर एक पहाड़ और टापू हटने लगा। राजा बादशाह से लेकर गरीब आदमी तक ईश्वर के इस भयंकर कोप से घबड़ा कर पहाड़ों की गुफाओं और चट्टानों में जा छुपे।”
यह भूकम्प प्राकृतिक और राजनीतिक दोनों तरह का हो सकता है। क्योंकि जब कोई छोटा या बड़ा राज्य नष्ट होता है तो उस घटना से उत्पन्न होने वाली भयंकर गड़बड़ी और विश्रृंखलता किसी भूकम्प से कम नहीं होती। उस समय न किसी के मरने-जीने का पता रहता है न किसी पदार्थ या संस्था की रक्षा का। पर यदि यह प्राकृतिक भूकम्प हो तो भी कोई आश्चर्य नहीं। हम जापान के 1923 के भूकम्प का वर्णन पढ़ कर सहज में अनुमान लगा सकते है कि यह कहाँ तक भयंकर हो सकता है।
जैसा हम लिखे चुके हैं ‘बाइबिल’ का भविष्य-वर्णन प्राचीन धर्म ग्रंथों की तरह रूपक और अलंकार युक्त भाषा में लिखा गया। इसलिए उसकी बातें अनेक व्यक्तियों को चमत्कार और असम्भव-सी जान पड़ेगी। पर जब कभी संसार में युद्ध, विद्रोह और क्रान्ति होकर युग परिवर्तन होगा तो उसका रूप बहुत कुछ ऐसा ही होगा। एक तो ऐसे समय जनसंख्या की अधिकता से खाद्य सामग्री की पहले ही कमी होती है। फिर युद्ध द्वारा उत्पन्न अव्यवस्था के कारण पैदावार और भी घट जाती है। ऐसी अवस्था में अकाल का भीषण रूप धारण कर लेना स्वाभाविक ही है।
इस समय संसार एक महा भयंकर विश्व-युद्ध की तरफ अग्रसर हो रहा है। वास्तविकता तो यह है कि मनोमय जगत में युद्ध प्रारम्भ हो चुका है और वियतनाम, कश्मीर, इसराइल जैसे स्थानों में उसकी चिनगारियाँ भी प्रकट होती रहती हैं, पर प्रमुख राष्ट्र अभी उपयुक्त अवसर की प्रतीक्षा में आगा-पीछा कर रहे हैं। यही कारण है कि दिव्य-दृष्टि वाले संत-पुरुषों के भविष्य कथन में भी अन्तर पड़ जाता है। हमने सन् 1940 में एक भविष्य-वाणी प्रकाशित की थी जिसमें 1964 तक विश्व-युद्ध होकर नवयुग आगमन की बात थी। सामान्य जनों की दृष्टि में तो यह भविष्य-कथन ठीक नहीं उतरा, पर हम जानते हैं कि सन 1960 में क्यूबा की समस्या पर रूस और अमरीका में युद्ध की पूरी तैयारी हो गई थी। रूस ने अमरीका की छाती पर स्थिति क्यूबा द्वीप पर दूरमारक अड्डे बना लिए थे। इस पर अमरीका के सैनिक अधिकारी लड़ाई आरम्भ करने के लिये पूरी तरह तैयार हो गये। पर प्रेसीडेन्ट कैनेडी की नीतिज्ञता और पं. नेहरू की मध्यस्थता से यह संघर्ष होते-होते रुक गया और रूस ने अपने अड्डे क्यूबा से हटा लिये। सृष्टि-चक्र और मानव जाति के विकास के ज्ञाता पुराकालीन दिव्यदर्शी सन्त पुरुष इस तथ्य को समझते थे और इसलिए वे युद्ध, अकाल आदि जैसी घटनाओं की कोई खास तारीख नहीं कहते थे वरन् संभावित काल का ही निर्देश कर देते थे। घटना की ठीक तारीख में तो सामयिक नेताओं और शासन-सूत्रधारों की मनोवृत्ति, सूझबूझ अथवा प्रवृत्ति के अनुसार कुछ शीघ्रता अथवा देर भी हो सकती है।
इसी तथ्य के आधार पर भारतीय भविष्यकर्ताओं ने संसार में होने वाली घटनाओं के लिये शताब्दियों का हिसाब ही बतलाया है। किस युग में मानव-समुदाय की प्रवृत्तियाँ मुख्य रूप से किस प्रकार की होंगी और उनका परिणाम दैवी रूप में किस प्रकार का होगा इसका संकेत उन्होंने कर दिया है और घटनाओं के ठीक समय के निर्माण का कार्य तत्कालीन विद्वानों के लिये छोड़ दिया है। इस दृष्टि से भारतीय शास्त्रकारों की निम्न भविष्य-वाणी, विशेष महत्व की है-
ततस्तुमुल संघाते वर्तमाने युग क्षये।
यदा चन्द्रश्च सूर्यश्च तथा तिष्य बृहस्पति॥
एक राशौ समेष्यन्ति प्रयत्स्यति तदा कृतम्।
कालवर्षी च पर्जन्यो नक्षत्राणि शुभानि च॥
क्षेमं सुभिक्षमारोग्यं भविष्यति निरामयम्॥
(महाभारत, वन पर्व 1। 90)
इसमें कहा गया है कि- “जब चन्द्रमा, पुष्प, नक्षत्र और बृहस्पति एक राशि पर समान अंश में हो जायेंगे, तब पुनः कलि की अंतर्दशा समाप्त होकर सतयुग की अंतर्दशा आरम्भ होने का समय आ जायगा। उस अवसर पर सर्वत्र बड़ी संघर्ष और हलचल की स्थिति होगी। इसके पश्चात् फिर यथासमय वर्षा होकर सब पदार्थों की बहुतायत और सुभिक्ष होगा और सब लोग स्वस्थ तथा सुखी होंगे।”
ज्योतिर्विज्ञान के ज्ञाताओं के मतानुसार ऐसा योग सन् 1943 में आ चुका है और तभी से हम संसार में एक नया परिवर्तन तथा भारत, इण्डोनेशिया, मिस्र और अनेक अन्य देशों को दासत्व से छूट कर स्वतन्त्रता के मार्ग पर चलता देख चुके हैं। पर इसका यह आशय समझना गलत है कि उक्त ग्रह-योग के आने पर एक दिन में पुराना युग समाप्त होकर नया युग पूरे लक्षणों सहित आरम्भ हो जायगा। जो लोग युग परिवर्तन के विषय को इस प्रकार कोई चमत्कार या जादू का खेल समझते हैं वे काल-चक्र की गति को समझने में अयोग्य हैं। महाभारत के उक्त वर्णन में जहाँ युग बदलने की बात कही गई है, वहाँ यह भी लिखा है-
द्विजातिपूर्वको लोकः क्रमेण प्रभविष्यति।
दैव कालान्तरेऽन्यस्मिन्पुनर्लोक विवृद्धये॥
इसमें स्पष्ट कहा गया है कि- “जब युग-परिवर्तन होगा तब ‘क्रम’ से सुसंस्कार सम्पन्न लोगों का अभ्युत्थान होगा और समाज की वृद्धि तथा उन्नति होने लगेगी।” इसी तथ्य को दृष्टिगोचर रख कर समस्त शास्त्रों में युगों का हिसाब बतलाते हुये कह दिया है कि जिस युग की अंतर्दशा जितने हजार वर्ष की होती है उतने ही सौ वर्ष की उसकी संध्या और संध्याँश भी होती है। अर्थात् जिस प्रकार सतयुग की अंतर्दशा 4000 वर्ष की है तो उसके आगे-पीछे 400-400 वर्ष का समय ऐसा व्यतीत होगा जिसमें उस युग की क्रमशः उन्नति अथवा अवनति होगी। इसी प्रकार सन् 1943 में जो कलि की अंतर्दशा समाप्त हुई है उसका संध्याँश 100 वर्ष तक चलेगा अर्थात् उसके समाप्त होने का संघर्ष और हलचल सौ वर्ष तक चलते रहेंगे और उनमें होकर क्रमशः नये युग का आविर्भाव होगा। उसके पश्चात् भी सतयुग की अंतर्दशा एकदम न आ जायगी, वरन् उसकी 400 वर्ष तक की संध्या आरम्भ होगी जिसमें क्रमशः होते हुये सन् 2500 में सतयुग की वास्तविक अवस्था दिखाई पड़ने लगेगी। जो लोग विकास के इस नियम को नहीं समझ सकते और “चट्ट मँगनी पट्ट ब्याह” वाली मनोवृत्ति का ही परिचय देते हैं, वे युग-परिवर्तन के विषय में अपना सर न खपाये यही अच्छा है।
महाभारत के ‘हरिवंश पर्व’ में इससे भी अधिक स्पष्ट शब्दों में युग-परिवर्तन के वे लक्षण बतलाये गये हैं जो इस समय हमको अपने सम्मुख दिखलाई पड़ रहे हैं-
परस्पर हृतश्वाश्च निराकंद्य सदुःखिता।
एवं कष्ट मनुप्राप्तः कलि सन्ध्याँशके तदा॥
प्रजाक्षय प्रयस्येति साध्यं कलियुगे न ह॥
क्षीणो कलियुगे तस्मिन्ततः कृतयुगं पुनः॥
प्रयत्स्येत यथान्यायं स्वभावादेवनान्यथा।
एते चान्ये च बहवो दिव्या देवगुणैर्युतः॥
प्रादुर्भावा पुराणेषु गीयन्ते ब्रह्मवादिभिः।
विश्वत्व श्रृणु में विष्णोर्हरित्वं च कृतेयुगे॥
अर्थात्- “कलि समाप्त होने पर उसके संध्याँश के समय प्रचण्ड व्याधियाँ उठ खड़ी होती हैं। प्रजा में असन्तोष बढ़ता है और घोर युद्ध भी होते हैं जिनमें जनता का अत्यन्त नाश होता है। सतयुग आरम्भ होने के पहले एक बार पाप और अशाँति की पराकाष्ठा हो जाती है। ऐसा होने पर ही समझना चाहिये कि कलियुग क्षीण हुआ। फिर सुधरी हुई परिस्थिति कृतयुग के रूप में प्रकट होती है। और मनुष्यों में दिव्य गुणों का आविर्भाव होता है। उस समय शास्त्रों के आदेशानुसार लोग अध्यात्मवादी और ब्रह्मपरायण होने लगते हैं।”
यह भविष्य कथन उन्हीं के लिये उपयोगी और कल्याणकारी है जो गम्भीरतापूर्वक उसके तथ्य को समझने की चेष्टा करते हैं और धैर्यपूर्वक उसकी पूर्ति की घटनाओं को देखते और समझते रहते हैं। ऐसे व्यक्ति ही अपनी बुद्धि के अनुसार परिवर्तन की प्रक्रिया और उसके विभागों को समझने में समर्थ हो सकते हैं और समय पर उचित सावधानी बर्तते हुये लाभ उठा सकते हैं। पर जो लोग इसमें ज्योतिषियों से किये जाने भाग्य सम्बन्धी प्रश्नों की तरह व्यवहार करते हैं, वे सदैव निराश होते हैं और उल्टी-सीधी आलोचना, आक्षेप आदि करते रहने के अतिरिक्त इसका कोई अन्य उपयोग नहीं कर पाते।
भविष्य के सम्बन्ध में प्राचीन शास्त्रों का सिद्धाँत तो हमने ऊपर बतला दिया, यहाँ हम पिछले दो-चार सौ वर्षों के भीतर होने वाले दिव्यदर्शी सन्तों के कुछ वचन लिखते हैं जिससे इस समय युग-परिवर्तन का आभास मिलता है। इस सम्बन्ध में एक भजन महात्मा सूरदास जी के नाम से बहुत प्रसिद्ध है जो नीचे दिया जाता है-
अरे मन धीरज क्यों न धरे।
मेघनाद रावण का बेटा सो पुनि जन्म धरे।
पूरब पश्चिम उत्तर दक्खिन चहुँ दिशि राज करे॥
अकाल मृत्यु जगमाहीं ब्यापै परजा बहुत मरे।
दुष्ट-दुष्ट को ऐसा काटे जैसे कीट जरे।
एक सहस्र नौ सौ के ऊपर ऐसा योग परे।
सहस्र वर्ष लों सतयुग बीते धर्म की बेल बढ़े॥
स्वर्ण फूल पृथ्वी पर फूले, पुनि जग दशा फिरे।
स्रदास यह हरि की लीला टारे नाहिं टरे॥
इस पद में संवत् 1900 लिखा है। यों तो संसार में विशेष परिवर्तन का आरम्भ संवत् 1900 के पश्चात् ही हुआ है और इस दृष्टि से यह कथन ठीक ही है। यह भी हो सकता है कि इसके रचयिता का आशय शक संवत् से हो, जो भारत के एक बड़े भाग में प्रचलित है और जिसे अब सरकार ने भी राष्ट्रीय संवत् मान लिया है। वह इस समय 1989 है और 11 वर्ष में 1900 आ जायगा। जो लोग युग-संधि के सिद्धाँत को जानते हैं कि किसी भी युग के बदलने में सौ-दो सौ वर्ष का समय लगा ही करता है, वे शताब्दियों की दृष्टि से ही बातें करते हैं, क्योंकि सामयिक कारणों से किसी भी घटना में दस-बीस वर्ष का अन्तर पड़ जाना स्वाभाविक ही है। बुन्देलखण्ड केसरी महाराज छत्रसाल के गुरु योगी प्राणनाथ ने भी ऐसा ही लिखा है। उन्होंने भगवान की शक्तियों के द्वारा युग-परिवर्तन की चर्चा करते हुये इसका समय संवत् 2000 के आसपास बताया है-
विजयाभिनन्दन बुद्धजी, और निष्कलंक. इत आय।
मुक्ति देसी सबन को, मेट सबै असुराय॥
एक सृष्टि धनी भजन एकै, एक ज्ञान, एक आहार।
छोड बैर मिलै सब प्यार सों, भया जगत में जैजैकार॥
कहा जमाना आबसी झूठा और नुकसान।
यार असहाब होसी कतल, तलवार उठसी सब जहान॥
अक्षर के दो चश्मे, नहासी नूसर नजर।
बीस सौ बरसें कायम होसी बैराट सचराचर॥
प्राणनाथ जी का यह भी कहा है कि बीसवीं शताब्दी में जब यह युग-परिवर्तन का कार्य पूर्ण हो जायगा और एक विराट (विश्वव्यापी) दैवी विधान समस्त देशों में व्याप्त हो जायगा। तब विभिन्न मतमतान्तरों की द्विविधा मिट कर सब लोग एक ही पर-ब्रह्म को स्वीकार करेंगे, एक ही उपासना पद्धति पर चलेंगे, एक सी मान्यतायें होंगी और रहन-सहन, खान-पान में ही एकता पैदा हो जायगी। उस समय आपस की फूट, बैर का अन्त हो जायगा, सब सद्भावपूर्वक रहते हुये दैवी-जीवन व्यतीत करने लगेंगे। यही आदर्श आजकल संसार के समस्त अध्यात्मवादी विद्वान स्वीकार कर रहे हैं और इसी का प्रचार किया जा रहा है।
पंजाब में एक प्राचीन कहावत गुरु नानक के नाम से प्रसिद्ध है कि- “जब आवे संवत बीसा, तो मुस्लिम रहे न ईसा।” इसका आशय यही है कि बीसवीं सदी में मुसलमान और ईसाइयों में ऐसा भयंकर युद्ध होगा कि दोनों की अत्यन्त बर्बादी हो जायगी।
राधास्वामी सम्प्रदाय के प्रधान गुरु स्वामी ब्रह्मशंकर (हजूर महाराज) ने कहा है कि- “निकट भविष्य में ही दैवी क्षेत्र में से आध्यात्मिक लहरें हमारी पृथ्वी पर आधिपत्य जमाने वाली हैं। इस समय हम जितनी आपत्तियों को अनुभव कर रहे हैं वे सब गायब हो जायेंगी और सतयुग से भी बढ़ कर प्रेम, आनन्द और कल्याण की दशा, सर्वत्र व्याप्त हो जायगी। जो आत्मिक शक्तियाँ इस समय छिपी पड़ी हैं तब वे बहुत कुछ प्रकट हो जायेंगी।”
श्री एन.के. बोस का कथन है कि- “मैंने रावण के ज्योतिष सूत्रों का विशेष रूप से अध्ययन करके यह निष्कर्ष निकाला है कि 1962 के आरम्भ में ही अष्टग्रही योग भावी विपत्ति के बीज बो देगा जिसके फल से अवस्था लगातार गम्भीर होती चली जायगी। सन् 1964 में जब शनि और गुरु वृश्चिक राशि में आयेंगे तो इसका प्रत्यक्ष फल दृष्टिगोचर होने लगेगा और आगामी आठ वर्षों (1972 तक) में जो घटनायें होंगी उनसे नये युग की स्थापना हो जायगी।”
महाप्रभु जगतबन्धु ने कहा था- “कलियुग की अवधि पूरी हो चुकी, अब नवयुग का प्रकाश होगा और एक हजार वर्ष तक मेरी लीला चलेगी। इस बार सभी भगवान के नाम का अमृत चखेंगे। इस महाव्रत का उद्यापन इसी बीसवीं शताब्दी के भीतर पूर्ण रूप से हो जायगा।”
और भी अनेक महात्माओं ने यही विचार प्रकट किया है कि- इस समय जो पापकर्म, भ्रष्टाचार, अनैतिकता की वृद्धि हो रही है उसका कारण कलियुग समाप्त होकर एक श्रेष्ठ युग का आगमन होना ही है। जिस प्रकार दीपक बुझने के पहले एक बार जोर से भभक उठता है उसी प्रकार पाप-युग की समाप्ति होने से पहले एक बार वह अपना समस्त बल लगा कर विजय प्राप्त करने का प्रयत्न करता है, जिससे बाह्य दृष्टि वालों को परिस्थिति और भी बिगड़ी जान पड़ती है। पर जिनको अंतर्दृष्टि प्राप्त है वे ऐसे समय में और भी आशान्वित हो जाते हैं कि यह पाप-समूह अब जल्दी ही क्षीण हो रहा है और इसके पश्चात् धर्म-युग का प्रकाश बिखरेगा। यह भी आशा की जा रही है कि चूँकि इस समय संसार के अधिकाँश देश भौतिकवाद के पीछे भाग रहे हैं, केवल भारत में ही प्राचीन काल के अध्यात्म-ज्ञान के कुछ अवशेष बाकी हैं, इसलिये आधुनिक युग का दैवी संगीत यहीं से प्रारम्भ होगा।
ईसाई धर्म वालों का विश्वास-
जिस समय ईसामसीह अपना प्रचार कार्य कर रहे थे उस समय कहा गया था कि - कुछ समय बाद वे फिर आकर ईश्वरीय-कार्य की पूर्ति करेंगे। उनके वक्तव्य के आधार पर अनेक ईसाई सैंकड़ों वर्षों से उनके आगमन की राह देख रहे हैं। ‘बाइबिल’ के कथनानुसार इस अवसर पर प्रकट होकर ईसामसीह पृथ्वी पर धर्मराज्य की स्थापना करेंगे और सब प्रकार के दोष दुर्गुणों को संसार से दूर कर देंगे। ‘बाइबिल’ का कथन इस प्रकार है-
“मैंने एक फरिश्ते को आसमान से आते देखा जिसके हाथ में एक बड़ी जंजीर थी। उसने शैतान को जंजीर से बाँध कर अथाह गड्ढे में फेंक दिया और उसे बन्द कर दिया। इसके बाद पृथ्वी पर एक हजार वर्ष तक ईसामसीह राज्य करेंगे।”
इसकी व्याख्या करते हुये पादरी बैक्सटर साहब ने लिखा है कि- “इन घटनाओं के फल से पृथ्वी की जनसंख्या बहुत कम हो जायगी और दुनिया सुनसान-सी जान पड़ने लगेगी, पर इसके बाद जब पृथ्वी का शासन ईसामसीह तथा सन्त-पुरुष करने लगेंगे तो लोग धर्म मार्ग के अनुयायी बन जायेंगे और उनके सब कष्ट और दुःख दूर हो जायेंगे। उस समय संसार में जल और स्थल सेनाओं का नाम भी न रहेगा। लोग तलवारों को तोड़ कर हल का फार बना लेंगे। एक देश के निवासी दूसरे देश के निवासियों से लड़ाई-झगड़ा न करेंगे, युद्ध सदा के लिए बन्द हो जायेंगे। सब लोग मेहनत और खेती आदि द्वारा उपार्जन करके अपना निर्वाह करेंगे। जमीन की पैदावार बहुत बढ़ जायगी और ऊसर जमीन में भी फल−फूल उत्पन्न होने लगेंगे। इस युग में शासन-कार्य केवल उन्हीं लोगों के हाथ में रहेगा जिनका चरित्र शुद्ध और पवित्र होगा और जो नम्र, विनयशील और गरीबी को पसन्द करने वाले होंगे।”
धर्म प्रेमी संगठित हों-
इस समय भी ईसाई धर्म के अनुयायी ईसा के आगमन का प्रचार करके लोगों को नवयुग का सन्देश सुना रहे हैं। इस सम्बन्ध में मिस एडिल बेयर नामक आध्यात्मिक शक्ति सम्पन्न महिला ने धर्मप्रेमी सज्जनों के नाम एक खुला पत्र भेजा है, जिसमें संसार पर आने वाली कठिनाइयों को चेतावनी देते हुये कहा है-
‘अपने गुरु और स्वामी ईसामसीह की अनुमति से मैं अपने समस्त मित्रों और परिचितों को कुछ बहुत महत्वपूर्ण बातें बतलाना चाहती हूँ। यद्यपि मैं वर्तमान समय में संसार के ऊपर मंडराने वाली घटनाओं का रूप या कार्यक्रम तो प्रकट नहीं कर सकती, पर कुछ ऐसी बातें कह सकती हूँ जिनकी इस समय आवश्यकता है। सम्भव है इन बातों को आपने अन्य स्थानों से भी सुन रखा हो। इनमें सबसे प्रधान बात यही है कि अब पूर्ण रूप से मिल कर सहयोगपूर्वक काम करने का समय आ गया है। अब ऐसा जमाना आ रहा है कि आपको आपस के सब भेदभाव और विचार तथा कार्यों की भिन्नता दूर करके एकता की भावना पर ही जोर देना चाहिए।”
“अब जो नवयुग आने वाला है उसमें ऐसे लोगों का अस्तित्व रहना कठिन होगा जिनमें आत्मिक शक्ति की कमी या अभाव पाया जायगा। यद्यपि वे टिके रहने की चेष्टा करेंगे, पर ज्यादा दिन न ठहर सकेंगे। आकाश से आने वाली विश्व-किरणें (कॉस्मिक रेज) उनके लिये ‘तीव्र औषधि’ का काम करेंगी। ऐसे लोगों को, जब वे आत्मिक मार्ग में आवश्यक प्रगति कर लेंगे तब नवीन जगत में फिर से जन्म लेने का मौका दिया जायगा। इस समय तो हमारा कर्तव्य यही है भगवान पर पूर्ण विश्वास करके अपने को उस पर ऐसे ही छोड़ दें, जैसे बालक माता के भरोसे सर्वथा निश्चिंत हो जाता है। भगवान ऐसे ही श्रद्धा रखने वालों को नवीन आकाश और नई पृथ्वी पर स्थान देगा।”
संसार में इस समय जो विषम परिस्थिति उत्पन्न हो गई है उसका मूल कारण पारस्परिक वैमनस्य और दूसरों को दबाने की प्रवृत्ति ही है। मनुष्य में स्वार्थभाव और अहंकार के बढ़ जाने से वह दूसरों के अधिकारों और हितों की चिन्ता नहीं करता और यही चाहता है कि चाहे सब मरें, कष्ट सहन करें, पर मेरा लाभ अवश्य हो। खासकर व्यापार-व्यवसाय के क्षेत्र में मनुष्य ईमानदारी और सच्चाई के व्यवहार को बहुत हद तक त्याग चुका है। ऐसे लोगों की भी कमी नहीं जो व्यापार में चालाकी, धूर्तता करना उसका एक अंग मानते हैं और इसमें किसी तरह की लज्जा अनुभव नहीं करते। उदाहरण के लिये आजकल खाद्य पदार्थों में मिलावट करना मामूली बात हो गई है। लोग आटे में सेलखड़ी, लकड़ी का बुरादा, धनिये में जानवरों की लीद, हल्दी में रामरज नाम की पीली मिट्टी, लाल मिर्चों में गेरू, काली मिर्चों में पपीते के बीज, नमक में पत्थर आदि मिला देना मामूली बात समझने लग गये हैं। यद्यपि ये सब अत्यन्त जघन्यता के कार्य हैं और ऐसे व्यक्तियों को समाज का शत्रु मान कर बहिष्कार का दण्ड देना चाहिये, पर आजकल चूँकि इस प्रकार के भ्रष्टाचारियों की संख्या बहुत बढ़ गई है और अधिकाँश अपने-अपने पेशे में ऐसे अनैतिक कार्य करते ही हैं, इसलिये कोई किसी से कुछ नहीं कहता। भेद खुलने पर चाहे ऐसे व्यक्ति सरकार से दण्डित हो जायें, पर समाज में उनकी साख और प्रतिष्ठा में अन्तर नहीं पड़ता। इस कारण वे थोड़ा जुर्माना देकर या कुछ दिन की सजा भोग कर फिर वैसा ही कुकर्म करने लग जाते हैं।
आवश्यकता इस बात की है कि सज्जन लोग अपने संगठन बनायें और समाज-विरोधी कार्यों को रोकने और वैसा करने वालों को सामाजिक दण्ड दिये जाने की व्यवस्था करें। आज लोग छोटे-मोटे राजनीतिक आँदोलनों में तो मारधाड़, आगजनी, तोड़-फोड़ की कार्यवाही करने लग जाते हैं, स्कूल और कालेजों के विद्यार्थी मामूली बातों पर हंगामा मचा देते हैं, पर समाज में रह कर तरह-तरह के भ्रष्टाचार करने वालों के विरुद्ध कोई उँगली भी नहीं उठाता। चाहे जीवन-निर्वाह के लिये आवश्यक पदार्थों का ‘ब्लैक’ करने वालों के खिलाफ लोग जबानी शिकायत किया करें, उन्हें गालियाँ देते रहें, पर संगठित होकर कोई ऐसे सक्रिय कदम उठाना जिससे वे अपने अनैतिक कर्म के लिये लज्जित हों अथवा हानि होने का भय अनुभव करने लगें, ऐसा कोई यत्न नहीं किया जाता। जैसा मिस एडिल वेयर ने कहा है-यदि संसार के सब सज्जन पुरुष अपने-अपने क्षेत्र में संगठित होकर पाप-कर्मों के निरोध और पुण्यकर्मों के प्रचलन में हार्दिक सहयोग दें तो धर्म-नीति का उल्लंघन करने वालों का जोर बहुत कुछ घट सकता है।
उद्धारकर्ता प्रकट होने वाला है-
किसी ऐसे महापुरुष के आविर्भाव की भावना, जो संसार-भर पर प्रभाव डाल कर पाप-युग का अन्त करा सके, सर्वसाधारण में काफी समय से व्याप्त हो रही हैं। हमारे देश में कुछ समय पहले ‘कल्कि’ अवतार के प्रकट होने की बड़ी धूम मची थी और दिल्ली तथा बिहार आदि में कितनी ही संस्थायें भी इस तरह का प्रचार करने लग गई थीं। अनेक व्यक्तियों को ‘अवतार’ घोषित भी कर दिया गया था। इससे मालूम पड़ता है कि मनुष्य में इस प्रकार किसी उद्धारकर्त्ता के प्रकट होने की आकाँक्षा स्वाभाविक है। जब वह अपनी शक्ति से अपने ऊपर आई विपत्तियों का निराकरण नहीं कर सकता तो यह इच्छा करता है कि कोई दैवी शक्ति आकर उसकी सहायता करे। जब तक ऐसी इच्छा उथली रहती है तब तक तो उसका कोई परिणाम नहीं होता, पर जब वह अन्तरात्मा तक पहुँच जाती है और जन-मानस समष्टि रूप से ऐसी भावना से परिपूर्ण हो जाता है तब किसी रूप में दैवी शक्ति का आविर्भाव होता है। हम यहाँ तक कह सकते हैं कि जिस प्रकार दैत्यों से उत्पीड़ित होकर देवताओं ने अपनी-अपनी शक्ति को एकत्रित कर ‘दुर्गा’ के आविर्भाव में सहायता की थी, उसी प्रकार आन्तरिक भावनायें भी जब सम्मिलित हो जाती हैं तब उनका कोई साकार रूप सामने आता ही है।
इस वक्तव्य पर यह विवाद उठाना निरर्थक है कि दैवी-शक्ति किस देश, किस जाति या किस मजहब में प्रकट होगी। प्राचीन युगों में संसार में आवागमन के साधनों का विकास न होने से प्रत्येक देश अपनी सीमाओं में ही आबद्ध रहता था और इस कारण कोई दैवी शक्ति सम्पन्न व्यक्ति प्रकट होता था तो उसका कार्य-क्षेत्र वही देश रहता था। आस-पास के दो-चार देशों में भी उसका समाचार और प्रभाव बहुत कम पहुँचता था।
पर अब परिस्थिति बदल गई है और आवागमन के साधन इतने अधिक पूर्ण हो गये हैं कि संसार के किसी भी दूर से दूर के भाग में 24 घंटे के भीतर ही पहुँचा जा सकता है। इस समय सारा संसार एक छोटे देश की तरह बन गया है और यही वर्तमान विश्व युद्धों का मूल कारण है। इसका एक नमूना पिछले एक-दो सप्ताह में ही दिखलाई पड़ गया है। अरब देशों और इसराइल के यहूदियों में संग्राम आरम्भ हुआ। इन दोनों में से किसी के साथ भारत का कोई विशेष सम्बन्ध नहीं और वे हमसे कई हजार मील के फासले पर हैं, फिर भी यहाँ की खाद्य समस्या पर तुरन्त उसका प्रभाव पड़ गया और कहा गया कि इस युद्ध के कारण विदेशों से अन्न के जहाजों के आने में बाधा पड़ गई है, इसलिए यहाँ अन्न के भाव में कुछ वृद्धि हो जायगी। इतना ही नहीं अन्न का भाव 4-6 रुपया क्विण्टल बढ़ भी गया।
इसलिए अब जो ‘अवतार’ होगा वह चाहे जहाँ और चाहे जिस जाति और वंश में पैदा हो उसका प्रभाव समस्त संसार पर पड़ेगा और मनुष्य-मात्र उसे सम्मान की दृष्टि से देखेंगे। वह सबके हित की दृष्टि से कार्य करेगा, इसलिए सभी उसको अपना ही समझेंगे। वह सब मतमतान्तरों के मतभेदों को दूर करके एक मानव-धर्म का उपदेश करेगा, इसलिए उसे किसी एक मजहब का बतलाना निरर्थक होगा। वह लोगों को समझायेगा कि-मनुष्य का पहला धर्म समाज की प्रगति में सहयोग देना और व्यक्तियों की सब प्रकार की आवश्यकताओं में यथासम्भव सहायता पहुँचाना है। उसके पश्चात् अगर वह चाहे तो किसी पद्धति या विधि से विश्व-संचालक शक्ति-परमात्मा का ध्यान, उपासना, पूजा भी कर सकता है। पर उस अवस्था में वह सामान्य धर्म-कृत्य किसी प्रकार के पारम्परिक संघर्ष या मतभेद का जन्मदाता न होकर मानव-जाति की एकता और कल्याण की वृद्धि करने वाला ही होगा। आने वाले धर्म-युग की यह भावना केवल हिन्दुओं और ईसाइयों में ही नहीं पाई जाती वरन् संसार में अनेक धर्मों के बहुसंख्यक विद्वान किसी बहुत बड़े महापुरुष के आगमन और नवयुग की स्थापना की बात कह रहे हैं। कुछ वर्ष पहले तिब्बत के एक लामा ने योरोप के जगत प्रसिद्ध विद्वान और चित्रकार रोरीश को बताया था कि-दुनिया की पार्थिव शक्ति के ऊपर धर्म की शक्ति की विजय चंबाला युग (सतयुग) में होगी जो जल्दी ही शुरू होने वाला है। यहूदी लोगों का भी ख्याल है कि उनके धर्मग्रन्थों में बतलाया ‘मुएर गजर’ नामक युग जल्दी ही शुरू होगा। ईरान में अली के अनुयायियों (शिया सम्प्रदाय) वालों का भी ऐसा ही विश्वास है कि उनके ‘मेंहदी’ जल्दी ही प्रकट होकर न्याय का राज्य स्थापित करेंगे। जापानी लोगों का विश्वास है कि उनका ‘अवातेरी’ युग (सतयुग) कुछ समय बाद प्रारम्भ हो जायगा।
यद्यपि युद्ध की प्रवृत्ति मनुष्य की आदिमकालीन बर्बरता का चिन्ह है, पर यह अन्तिम युद्ध मानवता के विकासक्रम की एक महत्वपूर्ण सीढ़ी की तरह सिद्ध होगा, इस दृष्टि से उसका एक विशिष्ट स्थान है। वास्तव में मनुष्य अब तक ज्ञान, विज्ञान तथा अध्यात्म के क्षेत्र में जितनी प्रगति कर चुका है उसे देखते हुये युद्ध उसके लिए एक लज्जा-निन्दा की वृत्ति ही समझी जायगी। इस समय तक मनुष्य को जितने वैज्ञानिक साधन मिल चुके हैं उनका यदि बुद्धिमानी के साथ उपयोग किया जाय तो समस्त संसार इस समय भी वर्तमान स्थिति से कहीं उन्नत और सुखी जीवन बिता सकता है।
अब भी यदि मनुष्य जंगली पशुओं की तरह एक दूसरे को मारने-काटने, पीड़ित करने लिये उद्यत होता है तो उसका कारण उसकी स्वार्थमयी अनुचित प्रवृत्तियाँ ही हैं। भावी महायुद्ध इसी दूषित अवस्था का अन्त करने के लिये उपस्थित होने वाला है। अभूतपूर्व वैज्ञानिक अस्त्र-शस्त्रों के कारण वह जितना अधिक नाशकारी हो जाय उतना ही कम है। पर इससे मनुष्य की पाशविकता मर कर मानवता जागृत हो जायगी यही इसका सबसे बड़ा लाभ है। उसके बाद मनुष्य अपने को एक ही परमात्मा का अंश समझ कर भ्रातृभाव से रहना सीख जायगा जो संसार की उच्चतम स्थिति है। जब संसार में ऐसी अवस्था आ जायगी तो वही सतयुग होगा, वही कल्कि का धर्मराज्य होगा और वही ईसा का स्वर्गीय शासन होगा।
पिछले पृष्ठों में हमने जिस युग-परिवर्तन की चर्चा की है उसके सम्बन्ध में विद्वान लोग बहुत समय से चेतावनी देते आये हैं और हम भी गत चालीस वर्ष से समय-समय पर उसके विषय में विभिन्न रूपों में पाठकों को सूचनायें देते ही रहते हैं। पर मनुष्य का स्वभाव है कि वह दूरवर्ती संकट की उपेक्षा ही करता रहता है और जब आफत सर पर आ जाती है तो हाय-तोबा मचाने लगता है तथा अपने भाग्य, देवताओं तथा परमात्मा तक को दोष देने लगता है।
एक शंका यह भी की जा सकती है कि क्या भविष्य को जान सकना सम्भव है? हमारे यहाँ यह कार्य ज्योतिषियों के भरोसे है, जो असंख्यों योजन दूर ग्रह नक्षत्रों की गति से या हाथ की रेखाओं से व्यक्तियों का भविष्य फल बतलाया करते हैं। उनकी बातें कुछ अंशों में ठीक और कभी गलत भी होती रहती हैं। इससे सीधे-साधे व्यक्ति तो उन पर विश्वास कर लेते हैं और बुद्धिमान उन्हें अटकल–पच्चू बतलाया करते हैं। कुछ भी हो हमारे यहाँ जो ज्योतिष का धन्धा करने वाले व्यक्ति मिलते हैं। उनमें से अधिकाँश बहुत सामान्य ज्ञान वाले और गोलमोल उत्तर देकर लोगों को बहकाने वाले ही दिखाई पड़ते हैं। यह दोष हमारे यहाँ ही नहीं विदेशों में भी है-इंग्लैंड, फ्राँस, जर्मनी आदि जैसे देशों में भी बहुत से व्यक्ति भविष्य बतलाने का पेशा करते हैं और अनेक मूर्ख व्यक्ति तथा विशेष रूप से स्त्रियाँ उनके चक्कर में फँस ही जाती हैं।
वास्तव में बात यह है कि ग्रहों अथवा हस्तरेखाओं के द्वारा किसी व्यक्ति की भावी क्रिया-प्रतिक्रियाओं का ठीक हाल जान सकने का दावा सदैव शंकास्पद विषय ही रहेगा। एक सुशिक्षित व्यक्ति ने कहा था कि-किसी व्यक्ति का भविष्य बतला सकना वैसा ही है जैसा यह कह सकना कि यह सामने बैठी हुई बिल्ली अबकी बार किस तरफ कूदेगी? मनुष्य को अपने दैनिक जीवन में निरन्तर जिन बाह्य बाधाओं और विघ्नों का सामना करना पड़ता है उनके कारण उसकी कार्यपद्धति में तरह-तरह के आकस्मिक परिवर्तन और वैसे ही परिणाम होना स्वाभाविक ही है।
पर किसी राष्ट्र या देश का भविष्य एक हद तक जान सकना सम्भव है क्योंकि उनका विकास प्रकृति के नियमानुसार होता है। अगर वे प्रकृति के नियमों को किसी दिशा में भंग करेंगे तो उनको तदनुसार हानि भी उठानी पड़ेगी और उतना पतन भी होगा। इस तथ्य का विश्लेषण करते हुये अंग्रेजी के एक बहुत प्रसिद्ध विद्वान श्री एच॰ जी0 वेल्स ने लन्दन के ‘रायल इन्स्टीट्यूट’ के सामने ष्ठद्बह्यष्शक्द्गह्ब् शद्ध ह्लद्धद्ग द्धह्वह्लह्वह्द्ग (भविष्य की खोज) शीर्षक निबन्ध पढ़ा था, जिसमें उन्होंने साबित किया था कि भविष्य को जानना ज्योतिषियों या जादू-टोना वालों का काम नहीं है, वरन् यह एक वैज्ञानिक विषय है।
आगे चल कर उन्होंने कहा- “दुनिया में प्रायः दो तरह के मनुष्य पाये जाते हैं। अधिकाँश मनुष्य तो उस श्रेणी के होते हैं, जो भविष्य के सम्बन्ध में कुछ भी विचार नहीं कर सकते। उनके लिये भविष्य एक कोरे कागज की तरह है जिस पर वर्तमान काल की घटनायें लिखती जायेंगी। दूसरी श्रेणी वाले बराबर भविष्य की बात सोचते रहते हैं और वर्तमान घटनाओं पर भविष्य की निगाह से विचार करते हैं। पहली श्रेणी वाले अपने समस्त जीवन को पूर्वकर्मों का फल भोगना समझते हैं और दूसरी श्रेणी वाले अपने वर्तमान जीवन को भविष्य-जीवन की तैयारी करना मानते हैं।”
“अब इस विज्ञान युग में यह बात अच्छी तरह साबित हो गई है कि चाहे साधारण आदमी भविष्य के सम्बन्ध में कुछ न समझते हों पर वैज्ञानिकों को सन् 3000 की घटनायें उसी प्रकार साफ दिखलाई पड़ती हैं जैसी कि सन् 1000 की। मैं इस बात को बलपूर्वक कह सकता हूँ कि जिस प्रकार हमने वैज्ञानिक खोज करके भूतकाल के इतिहास का पता लगा लिया है उसी प्रकार हम वर्तमान घटनाओं का ध्यानपूर्वक निरीक्षण और मनन करके आगामी समय में होने वाली घटनाओं का पता भी निश्चित रूप से लगा सकते है। वह समय अब पास आता जाता है जब वैज्ञानिक लोग भविष्य की खोज का काम नियमपूर्वक करने लगेंगे। इस समय तक हम लोगों को भविष्य का ज्ञान जो बहुत कम है उसका कारण यही है कि अब तक इस सम्बन्ध में कुछ भी कोशिश नहीं की गई और न किसी जगत प्रसिद्ध विद्वान ने अपना दिमाग इस तरफ लड़ाया है। विज्ञान द्वारा जो भविष्य का ज्ञान प्राप्त किया जायगा उसका मुकाबला आजकल के ज्योतिषियों और हाथ देखने वालों के भविष्य-कथन से नहीं करना चाहिये। इन लोगों की बातों पर सिवाय मूर्खों के और कोई विश्वास नहीं कर सकता। विज्ञान से भविष्य का जो हाल मालूम होगा वह सार्वजनिक होगा न कि व्यक्ति सम्बन्धी। व्यक्ति सम्बन्धी ज्ञान वैसे भी हानिकारक है, क्योंकि उससे मनुष्य की उन्नति में बाधा पड़ती है और उसकी कर्मठता नष्ट हो जाती है।”
फिर भी हम अपने पाठकों को एक स्पष्ट सम्मति देना चाहते हैं कि वे भविष्य-वाणियों को पत्थर की लकीर मानने की प्रवृत्ति छोड़ दें। आजकल समाचार पत्रों में वर्ष के आरम्भ में और बाद में भी अनेक भविष्य-वाणियाँ प्रकाशित होती रहती हैं वे प्रायः निरर्थक और लोगों को भ्रम में पतित करने वाली ही सिद्ध होती हैं। प्राचीन भविष्यवाणियाँ प्रायः आलंकारिक भाषा में लिखी रहती हैं उनको भी ज्यों का त्यों सही मान लेने से मनुष्य गलती में पड़ जाता है। इसलिये प्रत्येक भविष्य-वाणी का ठीक अर्थ समझने के लिये अपनी बुद्धि से भी काम लेना आवश्यक होता है। जब हम उनकी बातों को मनन करके और दूसरों से मिला कर सही समझ लें तभी उन पर विश्वास करना चाहिये।
प्राचीन काल की जिन भविष्यवाणियों को हम अगले पृष्ठों में दे रहे हैं उनके कहने वाले वे योगी थे जो अध्यात्म विज्ञान की शक्ति से भावी घटनाओं को देख सकते हैं। इन लोगों को संसार त्याग किये कई-कई सौ वर्ष हो गये पर विद्वान लोग आज भी उनके भविष्य-कथन का मनन करके भावी घटनाओं की जानकारी प्राप्त करने में समर्थ होते हैं।
बाइबिल का भविष्य-कथन-
‘बाइबिल’ की भविष्य-वाणियों का कुछ जिक्र हम पिछले लेख में कर चुके हैं। उनमें पृथ्वी पर होने वाले जैसे नाशकारी युद्ध, अकाल महामारी आदि का वर्णन किया गया है उनके चिन्ह इस समय स्पष्ट दिखाई पड़ रहे हैं। इससे अनेक विद्वानों ने यही निष्कर्ष निकाला है कि वे अब शीघ्र ही पूर्ण होने वाली हैं। खासकर तुर्की की खिलाफत का अन्त हो जाने और यहूदियों को फिर से पैलेस्टाइन (फिलिस्तीन) में बसा दिये जाने की घटनाओं से उनकी प्रामाणिकता विशेष रूप से सिद्ध हो गई है। पहली घटना के सम्बन्ध में लिखा है-
च्च््नठ्ठस्र ह्लद्धद्ग ह्यद्बफ्ह्लद्ध ड्डठ्ठद्दद्गद्य श्चशह्वह्द्गस्र शह्वह्ल द्धद्बह्य क्द्बड्डद्य शठ्ठ ह्लद्धद्ग द्दह्द्गड्डह्ल ह्द्बक्द्गह् श्वह्वश्चद्धह्ड्डह्लद्बद्गह्य ड्डठ्ठस्र ह्लद्धद्ग ख्ड्डह्लद्गह् ह्लद्धद्गह्द्ग शद्ध स्रह्द्बद्गस्र ह्वश्च.ज्ज्
(क्रद्गक्द्गद्यड्डह्लद्बशठ्ठ 16)
“छठे फरिश्ते ने अपना ‘वायल’ यूफ्रेटीज नदी पर डाला और उसका पानी सूख गया।”
ईसाई धर्म के सैंकड़ों विद्वान पुराने समय से यह लिखते आये हैं कि इस भविष्य-वाणी में यूफ्रेटीज नदी के सूखने का जो वर्णन है उसका मतलब टर्की की सल्तनत के टुकड़े-टुकड़े होकर खत्म हो जाने से है। इस विषय में ‘तेलनघास्ट’ नाम के लेखक ने सन् 1655 में लिखा था-
‘यूफ्रेटीज नदी से हमको तुर्की साम्राज्य का अर्थ समझना चाहिये। साधारण बोलचाल में भी इस साम्राज्य को ‘बड़ी नदी’ के नाम से पुकारा जाता है, क्योंकि उसमें भिन्न-भिन्न जातियों की कितनी ही प्रजायें शामिल हैं। इसलिये यह निश्चित है कि जब ईश्वरीय कोप का समय आयेगा यह साम्राज्य अवश्य छिन्न-भिन्न हो जायगा।”
‘तेलनघास्ट’ की यह भविष्य-वाणी सचमुच आश्चर्यजनक है, क्योंकि सन् 1955 में चारों ओर तुर्की सुलतान का बोलबाला था और वह आधे योरोप तथा मिस्र आदि अनेक देशों का मालिक बना हुआ था। पर देखते-देखते 1820 में टर्की का पतन आरम्भ हुआ और सन् 1918 में उस साम्राज्य का पूर्ण रूप से अन्त हो गया।
यहूदियों के रहने की पुरानी जगह (फिलिस्तीन) पैलेस्टाइन था। वहीं पर उनका एकमात्र और सबसे पवित्र धार्मिक नगर जरुशलम है। जिस प्रकार संसार-भर के मुसलमान मक्का को प्रधान तीर्थस्थान मानते हैं और हजारों कोस से उसकी ‘यात्रा’ करने जाते हैं, उसी प्रकार यहूदी भी सब तरह की तकलीफें सह कर योरोप और अमरीका के दूरवर्ती देशों से जरुशलम की यात्रा करने जाते थे। यह मुल्क कितने ही समय से टर्की के कब्जे में था और वहाँ अरब लोग रहते थे। पिछले महायुद्ध में टर्की के हार जाने पर वह अंग्रेजों के अधिकार में आ गया और मित्र राष्ट्रों की सलाह से वहाँ यहूदियों को बसाने का निश्चय किया गया। सन् 1949 में इसराइल को एक स्वतंत्र राष्ट्र बना दिया गया और तब से 20-25 लाख यहूदी वहाँ बस चुके हैं। ‘बाइबिल’ की भविष्यवाणी में यह भी कहा गया है कि- “इस प्रदेश का शासक (नया नैपोलियन) पहले तो यहूदियों को बसने और अपना जरुशलम का मन्दिर बनवाने की अनुमति दे देगा, पर बाद में अप्रसन्न होकर उन पर हमला कर देगा और उनको निकालने की कोशिश करेगा।” इसी के ऊपर संसार की सबसे बड़ी लड़ाई छिड़ जायगी अन्त में नये नैपोलियन का अन्त हो जायगा।
भविष्य-कथन के अनुसार जब यह नवयुग आरम्भ होने का समय आयेगा तो उसके पहले एक विश्व-युद्ध होगा, साथ में और भी अनेक प्रकार की आपत्तियाँ मानव जाति पर आयेंगी। उनमें से युद्ध, अकाल और महामारी का वर्णन हम पिछले लेख में कर चुके हैं, पर उसके सिवाय और भी कई महत्वपूर्ण और चमत्कारी घटनायें उस में बताई गई हैं। उनमें से कुछ खास बातों को यहाँ उद्धृत किया जाता है-
ञ्जद्धद्ग द्धद्बह्ह्यह्ल ड्डठ्ठद्दद्गद्य ह्यशह्वठ्ठस्रद्गस्र, ड्डठ्ठस्र ह्लद्धद्गह्द्ग द्धशद्यद्यशख्द्गस्र द्धड्डद्बद्य ड्डठ्ठस्र द्धद्बह्द्ग द्वद्बठ्ठद्दद्यद्गस्र ख्द्बह्लद्ध ड्ढद्यशशस्र, ड्डठ्ठस्र ह्लद्धद्गब् ख्द्गह्द्ग ष्ड्डह्यह्ल ह्वश्चशठ्ठ ह्लद्धद्ग द्गड्डह्ह्लद्ध, ड्डठ्ठस्र ह्लद्धद्ग ह्लद्धद्बह्स्र श्चड्डह्ह्ल शद्ध ह्लद्धद्ग ह्लह्द्गद्गह्य ख्ड्डह्य ड्ढह्वह्ठ्ठह्ल ह्वश्च, ड्डठ्ठस्र ड्डद्यद्य द्दह्द्गद्गठ्ठ द्दह्ड्डह्यह्य ख्ड्डह्य ड्ढह्वह्ठ्ठह्ल ह्वश्च.
्नठ्ठस्र ह्यद्गष्शठ्ठस्र ड्डठ्ठद्दद्गद्य ह्यशह्वठ्ठस्रद्गस्र ड्डठ्ठस्र ह्लद्धद्गह्द्ग ख्द्गह्द्ग ड्ड द्दह्द्गड्डह्ल द्वशह्वठ्ठह्लड्डद्बठ्ठ ड्ढह्वह्ठ्ठद्बठ्ठद्द ख्द्बह्लद्ध द्धद्बह्द्ग ख्ड्डह्य ष्ड्डह्यह्ल द्बठ्ठह्लश ह्लद्धद्ग ह्यद्गड्ड. ्नठ्ठस्र ह्लद्धद्ग ह्लद्धद्बह्स्र श्चड्डह्ह्ल शद्ध ह्लद्धद्ग ह्यद्गड्ड ड्ढद्गष्ड्डद्वद्ग ड्ढद्यशशस्र. ्नठ्ठस्र ह्लद्धद्ग ह्लद्धद्बह्स्र श्चड्डह्ह्ल शद्ध ह्लद्धद्ग ष्ह्द्गड्डह्लह्वह्द्गह्य ख्द्धद्बष्द्ध ख्द्गह्द्ग द्बठ्ठ ह्लद्धद्ग ह्यद्गड्ड ड्डठ्ठस्र द्धड्डस्र द्यद्बद्धद्ग, स्रद्गड्डस्र, ड्डठ्ठस्र ह्लद्धद्ग ह्लद्धद्बह्स्र श्चड्डह्ह्ल शद्ध ह्लद्धद्ग ह्यद्धद्बश्चह्य ख्द्गह्द्ग स्रद्गह्यह्लह्शब्द्गस्र.
्नठ्ठस्र ह्लद्धद्ग ह्लद्धद्बह्स्र ड्डठ्ठद्दद्गद्य ह्यशह्वठ्ठस्रद्गस्र ड्डठ्ठस्र ह्लद्धद्गह्द्ग द्धद्गद्यद्य ड्ड द्दह्द्गड्डह्ल ह्यह्लड्डह् द्धह्शद्व द्धद्गड्डक्द्गठ्ठ, ड्ढह्वह्ठ्ठद्बठ्ठद्द ड्डह्य द्बह्ल ख्द्गह्द्ग ड्ड द्यड्डद्वश्च, ड्डठ्ठस्र द्बह्ल द्धद्गद्यद्य ह्वश्चशठ्ठ ह्लद्धद्ग ह्लद्धद्बह्स्र श्चड्डह्ह्ल शद्ध ह्लद्धद्ग ह्द्बक्द्गह्ह्य ड्डठ्ठस्र ह्वश्चशठ्ठ ह्लद्धद्ग द्धशह्वठ्ठह्लड्डद्बठ्ठह्य शद्ध ख्ड्डह्लद्गह्ह्य. ्नठ्ठस्र ह्लद्धद्ग ठ्ठड्डद्वद्ग शद्ध ह्लद्धद्ग ह्यह्लड्डह् ष्ड्डद्यद्यद्गस्र ख्शह्द्वख्शशस्र, ड्डठ्ठस्र ह्लद्धद्ग ह्लद्धद्बह्स्र श्चड्डह्ह्ल शद्ध ह्लद्धद्ग ख्ड्डह्लद्गह्ह्य ड्ढद्गष्ड्डद्वद्ग ख्शह्द्वख्शशस्र, ड्डठ्ठस्र द्वड्डठ्ठब् द्वड्डठ्ठ स्रद्बद्गस्र शद्ध ह्लद्धद्ग ख्ड्डह्लद्गह्ह्य, ड्ढद्गष्ड्डह्वह्यद्ग ह्लद्धद्गब् ख्द्गह्द्ग द्वड्डस्रद्ग ड्ढद्बह्लह्लद्गह्
(क्रद्गक्द्ग. 16)
अर्थात्- “पहले फरिश्ते ने अपना ट्रम्पेट (बिगुल) बजाया और पृथ्वी पर आग और खून का तूफान आया। इससे पेड़ों का एक तिहाई भाग जल गया और तमाम हरी घास जल गई।”
“दूसरे फरिश्ते ने ‘ट्रम्पेट’ बजाया और एक बहुत बड़ा जलता हुआ पहाड़ समुद्र में गिरा और उससे समुद्र का एक तिहाई हिस्सा खून हो गया। समुद्र में रहने वाले जीवित प्राणियों में से एक तिहाई मर गए और एक तिहाई जहाज नष्ट हो गये।”
“तीसरे फरिश्ते ने ‘ट्रम्पेट’ बजाया और एक बहुत बड़ा तारा गिरा, जो दीपक की तरह प्रकाशित था। यह नदियों और पानी के स्रोतों के एक तिहाई भाग पर पड़ा। इस तारे का नाम वार्मवुड है। इससे जल स्रोतों का एक तिहाई भाग ‘वार्मवुड’ हो गया। यह पानी जहरीला था जिसके पीने से असंख्य मनुष्य मर गये।”
इसी तरह अगले ‘ट्रम्पेट्स’ के बजने से दूसरी आपत्तियाँ दुनिया में रहने वाले लोगों को सहनी पड़ेंगी। चौथे ‘ट्रम्पेट’ से सूर्य-चन्द्रमा का प्रकाश घट जायगा। पाँचवें से मनुष्यों को नष्ट करने वाले टिड्डियों के आकार के प्राणी पृथ्वी के भीतर से निकलेंगे और छठे से ऐसे सवार उत्पन्न होंगे जो आग और धुँआ से मनुष्यों को मारेंगे। जैसा हम कह चुके हैं ये भविष्य-वाणियाँ आलंकारिक भाषा में लिखी गई हैं और उनका आशय उन वैज्ञानिक अस्त्र-शस्त्रों से ही है जो आगामी युद्ध के व्यवहार में लाये जायेंगे। इस बात की आशंका आजकल सब कोई कर रहे हैं कि यदि युद्ध में एटम-अस्त्रों का प्रयोग खुल कर किया गया तो उससे पेड़-पौधे, खेती, समुद्र तथा उसमें रहने वाले प्राणी सभी नष्ट होंगे। टिड्डी के आकार के जो प्राणी कहे गये हैं वे हवाई जहाज हो सकते हैं जो आजकल युद्ध के मुख्य साधन हैं। इसी प्रकार आग और धुँये से मारने वाले सवारों का अर्थ आधुनिक तोपों से समझा जा सकता है। हो सकता है कि जिस समय अंतर्दर्शी योगियों ने इन घटनाओं को ध्यानावस्था में देखा था उस समय उनके पास इन नवीन आविष्कारों का वर्णन करने के लिये आजकल के शब्द न थे, इससे उन्होंने सर्वसाधारण के जाने हुए शब्दों में-जैसे पहाड़ का गिरना, तारे का टूटना, टिड्डियों का निकलना, आग-धुँआ उगलने वाले सवारों का प्रकट होना-उन घटनाओं को प्रकट किया। आगामी युद्ध के लिये जो हजारों एटम और हाइड्रोजन बम तैयार किये गये हैं और जिनमें से हर एक एकाध करोड़ व्यक्तियों को मारने तथा दो सौ वर्गमील जमीन को जला कर नष्ट करने की शक्ति रखता है, जब उनका प्रयोग किया जायगा, तो संसार में जगह-जगह वैसे ही दृश्य देखने को मिलेंगे जिनका बाइबिल में वर्णन किया गया है।
मुसलमानी धर्म-ग्रन्थों में युग-परिवर्तन की सूचना-
यद्यपि मुसलमानी धर्म में अपने अनुयायियों के बाह्य संगठन पर तथा अन्य देशों को जीत कर वहाँ अपना मजहब फैलाने पर विशेष जोर दिया है, तो भी जो थोड़े से आत्मज्ञानी सन्त हुये हैं उन्होंने भविष्य में होने वाले परिवर्तनों की सूचना अपने धर्म-भ्राताओं को दी है, जिससे वे ऐसे अवसर पर भ्रम में न पड़ें और अपने उचित कर्तव्य का पालन करें। चूँकि आरम्भ में मुसलमानों में कट्टरता का भाव अधिक भरा गया था और वे अपने सिवाय संसार के अन्य समस्त मजहब वालों को ‘काफिर’ कहते थे, इसलिये सन्तों ने उन्हें बताया कि कोई भी मजहब संसार में सदैव कायम नहीं रह सकता। जब हमारे मजहब की उम्र पूरी हो जायेगी तो उसका अन्त हो जायगा और उसकी जगह जो कोई नवीन धर्म-प्रचारक आये, उसकी बातों को आदरपूर्वक सुनने और उसके कार्य में सहायक बनना तुम्हारा कर्तव्य है।
कुरान में कुछ ऐसे निशान भी दिये गये हैं जिनसे प्रकट होता है कि उन भविष्य-वक्ताओं की दृष्टि में वर्तमान समय ही युग-परिवर्तन का जमाना था। कहा गया है-
“व एजल एसारो उत्तेलत्”
अर्थात्- “उस समय ऊँटनियों की सवारी नहीं रहेगी।”
यह एक प्रसिद्ध बात है कि अरब के रेगिस्तानी इलाकों में आवागमन और जीवन निर्वाह का प्रधान साधन ऊँट ही है। पर अब युग-परिवर्तन का प्रभाव अरब जैसे बीहड़ प्रदेश पर भी पड़ रहा है और वहाँ भी लम्बे फासले की यात्रा मोटरों द्वारा किये जाने की व्यवस्था हो गई है। इसलिये अब ऊँट की सवारी का प्रचार दिन पर दिन कम होता जाता है और कोई आश्चर्य नहीं कि शीघ्र ही वह नाम मात्र को ही शेष रह जाय। हमारे देश में भी अब बैलों द्वारा खींचे जाने वाले रथों की सवारी केवल एक नुमाइशी चीज रह गई है।
एक स्थान पर छपी हुई पुस्तकों का जिक्र किया गया है-
“व एजल सोहीफो नै शेरत्।”
अर्थात्- “छपी हुई वस्तुएँ फैलाई जायेंगी।”
पुराने जमाने में विद्या प्रचार का एकमात्र साधन मुख्यतः हस्तलिखित ग्रन्थ ही होते थे जो बड़े परिश्रम से और बहुत समय में तैयार होते थे और इसलिये जिनका प्राप्त होना एक समस्या ही थी। पर अब छपाई की मशीनों के कारण छोटी-बड़ी पुस्तकों, ट्रैक्टों, हर तरह के सामयिक पत्रों की बाढ़ आ गई है और दुनिया का कोई कोना ऐसा नहीं जहाँ छपा कागज दिखाई न दे। संभवतः भविष्य-दर्शन में इसी दृश्य को देख कर उपयुक्त संकेत किया गया है कि छपी हुई चीजों का विश्वव्यापी व्यवहार भी नये युग का एक चिन्ह होगा।
वास्तव में युग-परिवर्तन का सिद्धाँत एक विश्वव्यापी मानव-प्रकृति का अंश है। प्रत्येक प्रगतिशील मनोवृत्ति का व्यक्ति भविष्य के लिये किसी उच्च आदर्श की कल्पना और आकाँक्षा करता रहता है। इसके अतिरिक्त दूरदर्शी महापुरुष यह भी अच्छी तरह जानते हैं कि निरन्तर परिवर्तन संसार का नियम है और यही परिवर्तन बढ़ते-बढ़ते एक दिन नवीन युग का रूप धारण कर लेता है। पर जिस समय इस प्रकार पुरानी दुनिया अथवा एक ‘युग’ की समाप्ति होकर नई दुनिया या दूसरे युग का सूत्रपात होता है तब सर्वत्र बहुत बड़ी हलचल, संघर्ष, अशाँति फैल जाती है। पुरानी प्रथाओं और संस्थाओं के निरर्थक, समय-विरुद्ध और हानिकारक हो जाने पर भी बहुसंख्यक लोग उनको पकड़े रहना चाहते हैं और इसी प्रयत्न में परिवर्तन विरोधी और परिवर्तन-पक्षपाती दलों में कलह होने लग जाती है जिससे सर्वत्र विध्वंस और नाश की लीला दृष्टिगोचर होने लगती है। यद्यपि अपनी प्रिय वस्तुओं का इस प्रकार नष्ट होना लोगों को खेदजनक-शोकोत्पादक जान पड़ता है, पर वास्तव में यह अनिवार्य होता है। अगर प्राचीन का नाश न हो तो नवीन का निर्माण कैसे सम्भव होगा? इस लिये सभी धर्मों के तत्वज्ञानी महात्माओं ने अपने अनुयायियों को इन भावी परिवर्तनों की सूचना दे रखी है, जिससे वे ऐसे अवसर पर अपने मासिक सन्तुलन को कायम रख सकें और ईश्वरीय निर्देशों का श्रद्धाभाव से पालन करते रहें।
बुखारा के सन्त का भविष्य-कथन-
इन दिनों जो भविष्य-वाणियाँ हमारे देखने में आई हैं उनमें बुखारा के सन्त शाह नियामत उल्ला वल्ली साहब की भविष्य वाणी, जो फारसी भाषा में कविता (कसीदा) में लिखी गई है, विशेष महत्वपूर्ण है। उसमें उन्होंने 850 वर्ष पहले संसार की राजनीतिक दशा में होने वाले जिन परिवर्तनों की सूचना दी थी वे बराबर सत्य सिद्ध हो रहे हैं। यह हस्तलिखित प्राचीन पुस्तक इस समय पटना की प्रसिद्ध ‘खुदाबख्श ओरियण्टल लाइब्रेरी’ में सुरक्षित है। वहीं से उसकी खास-खास बातों को संग्रह करके एक सज्जन ने प्रकाशित कराया है जो इस प्रकार है-
“भारत के विषय में प्रकाश डालते हुये उन्होंने लिखा है कि-मुसलमानों के राज्य के बाद यह देश विदेशियों के हाथ में चला जावेगा। इसके बाद जापान और रूस में युद्ध होगा जिसमें जापान विजयी होगा (यह युद्ध 1904 में हुआ था)। तत्पश्चात् जापान में भयंकर भूकम्प आवेगा (ऐसी घटना 1923 में हुई थी)। प्रथम महायुद्ध के विषय में उन्होंने इस प्रकार लिखा है कि-संसार में एक बड़ी लड़ाई होगी जिसमें ‘अलफ’ (अंग्रेज), ‘जीम’ (जर्मनी) पर विजयी होंगे और इसमें एक करोड़ इकत्तीस लाख व्यक्ति मारे जावेंगे। (आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि ब्रिटिश कमीशन की रिपोर्ट के अनुसार एक करोड़ तीस लाख व्यक्ति हताहत हुए थे)। द्वितीय विश्व युद्ध के सम्बन्ध में भी उन्होंने स्पष्ट लिखा था कि-दोनों पक्षों में शाँति-सन्धि हो जावेगी किन्तु दोनों पक्ष गुप्त रूप से युद्ध की तैयारी करते रहेंगे और पहले युद्ध के 21 वर्ष बाद द्वितीय महायुद्ध प्रारम्भ हो जावेगा। (प्रथम महायुद्ध 11-11-1918 को समाप्त हुआ था और दूसरा 3-9-39 को शुरू हो गया था)। भारत इस युद्ध में अंग्रेजों की सहायता करेगा जो भारत के वास्ते घातक सिद्ध होंगी इस युद्ध में प्रयोग किये गये वैज्ञानिक बम आदि का उल्लेख भी किया गया है। इस दूसरे युद्ध में जो देश भाग लेंगे उनके नाम के प्रथम अक्षर भी बताये गये हैं। दो अलफ (अंग्रेज और अमरीका) तथा रूस और चीन आपस में मिल कर अलफ (इटली), जीम (जर्मनी) तथा द्वितीय जीम (जापान) पर अस्त्र-शस्त्र चलायेंगे। अमरीका के पक्ष वाले विजयी होंगे और युद्ध छः वर्ष तक चलेगा।
“पाकिस्तान और भारत के विभाजन के विषय में भी संकेत लिखा गया है। अंग्रेज भारत को मुक्त करके चले जायेंगे किन्तु अपने पीछे बुराई का बीज बो जायेंगे। भारत का विभाजन हो जावेगा किन्तु विभाजित भाग आपस में सदैव लड़ते रहेंगे और अशाँति बनी रहेगी। इसके बाद वर्तमान युग की प्रगति का वर्णन किया है कि स्त्री जाति अधिक स्वतन्त्र हो जावेगी, पर्दे की रस्म प्रायः समाप्त हो जावेगी, आदि आदि। तृतीय विश्वयुद्ध के विषय में शाह साहब ने लिखा है कि-अमरीका इस युद्ध का एक प्रधान दल होगा। परास्त जर्मनी तथा रूस एक होकर संसार को क्षणभर में नष्ट करने वाले हथियारों को लेकर युद्ध में उतर आवेंगे। अंग्रेजों को भारी हानि उठानी पड़ेगी और अंग्रेज अपनी सभ्यता सहित तीसरे महायुद्ध के बाद संसार से नष्ट हो जावेंगे और पुनः उनकी सभ्यता कभी भी संसार के रंगमंच पर नहीं आ पावेगी।”
फ्राँस का प्रसिद्ध भविष्य-वक्ता-
आज से कई सौ वर्ष पहले फ्राँस में ‘नोस्टरडम ‘ नाम का एक भविष्य-वक्ता हुआ है जिसके ग्रन्थ के सम्बन्ध में आज तक विद्वानों में विवाद होता रहता है। उसने अपना ग्रन्थ कविता में लिखा है और वह भी ऐसी गूढ़ कि जिसे समझने में मनुष्यों को काफी ध्यान देना पड़ता है। इस कारण लोग उसके कई तरह के अर्थ निकाल लेते हैं। पर उसमें कितनी ही बातें इतनी स्पष्ट हैं कि उनकी सचाई से कोई इनकार नहीं कर सकता। उसमें फ्राँस की राज्यक्राँति का वर्णन बहुत विस्तार से लिखा है जो ऐतिहासिक घटनाओं से ठीक मिलता-जुलता है। स्वेज की नहर खोदे जाने, संसार में विज्ञान का प्रचार बढ़ने और विश्व युद्धों का उनका लिखा वर्णन भी सत्य सिद्ध हुआ है। तीसरे महायुद्ध के विषय में ‘नोस्टरडम’ ने जो लिखा है वह भी बड़ा महत्वपूर्ण है। यद्यपि उनकी भविष्य-वाणियों का बहुत ही सूक्ष्म भाग हमको प्राप्त हो सका है पर तीसरे युद्ध के विषय में उसके ये शब्द आश्चर्यजनक हैं-
“तीसरा महायुद्ध वैज्ञानिकों की प्रयोगशालाओं में से फट पड़ेगा और उसमें दो मुख्य पक्ष रूस और अमरीका होंगे।” (नोस्टरडम ने लिखा है कि यह गरुड़ (ईगील) और रीछ के बीच होगा)। आज राजनीतिक और साहित्यिक लेखों में ‘ईगिल’ को अमरीका और रीछ को रूस का प्रतीक माना गया है। अखबारों में प्रकाशित होने वाले कार्टूनों में भी उनका प्रतीक गरुड़ और रीछ ही चित्रित किया जाता है।
वर्तमान समय में ज्योतिष शास्त्र व हस्तरेखा शास्त्र का सबसे प्रसिद्ध ज्ञाता ‘कीरो’ या ‘शेरो’ नाम का व्यक्ति हुआ है। उसने भी संसार के भविष्य को बड़े विस्तार से लिखा है। उसकी भविष्य-वाणियों को हम आगे चल कर पृथक लेख के रूप में दे रहे हैं।
अमरीका की सन्त महिला जीन डिक्सन-
आजकल योरोप अमरीका में कैथोलिक धर्मावलम्बी संत महिला जीन डिक्सन की बड़ी प्रसिद्धि है। उसमें भविष्यदर्शन की शक्ति बहुत कुछ स्वाभाविक है। आठ वर्ष की आयु में ही उसकी असाधारण आत्मिक प्रतिभा को देख कर एक जिप्सी जाति की साधुनी ने उसे कुछ साधन बताये और उपकरण दिये जिनकी सहायता से उसने अपनी दिव्य दर्शन की शक्ति को बहुत अधिक बढ़ा लिया। अब उसकी भविष्य-वाणियाँ प्रायः सत्य ही सिद्ध होती हैं और इसलिये योरोप अमरीका के अनेकों प्रधान व्यक्ति, राजनीतिक नेता उससे सलाह लेते रहते हैं। जीन डिक्सन ने पिछले 25 वर्षों में जितनी भविष्य वाणियाँ की हैं वे प्रायः पूर्ण रूप से सच्ची साबित हुई हैं।
उन्होंने अमेरिका के राष्ट्रपति श्री फ्रेंकलिन रुजवेल्ट को उनकी मृत्यु के बारे में पहले ही बता दिया था और उनका कथन अक्षरशः सच निकला। राष्ट्रपति से जब उनकी भेंट हुई तो उन्होंने उनकी उँगलियों के पोरुवे छूकर कहा आपकी मृत्यु छः महीने के भीतर हो जायगी। स्वस्थ राष्ट्रपति को इसकी तनिक भी संभावना न थी, इस पर उन्होंने विश्वास भी नहीं किया पर जब वह भविष्यवाणी सच निकली तो लोग आश्चर्यचकित रह गये।
महात्मा गाँधी का उनके बारे में एक वर्ष पूर्व ही कथन यह था कि-वे सन् 48 में एक ऐसे व्यक्ति के हाथों मारे जायेंगे जिसकी बाबत अभी कोई कल्पना तक नहीं कर सकता। वस्तुतः वैसा हुआ भी।
इस महिला की ख्याति इतनी बढ़ी-चढ़ी है कि संसार के प्रमुख राजनेता भी उनसे अपन-अपने संबंधित विषयों पर पूछताछ करते रहते हैं। इंग्लैंड के तत्कालीन प्रधान मन्त्री चर्चित ने अपने बारे में पूछा तो उन्होंने कहा था कि-आप अगले चुनाव में हार जायेंगे। उस समय चर्चित का सितारा इतना चमक रहा था कि इस बात की कोई कल्पना तक न कर सकता था, फिर भी वह अनहोनी दिखने वाली बात सच हो गई, चर्चिल चुनाव में हार गये। अमेरिका के प्रेसीडेंट ट्रूमेन चुनाव में खड़े भी न हुये थे कि उसने घोषणा की कि ट्रूमेन खड़े होंगे और जीत जायेंगे। इस विजय को भी एक अचम्भा माना गया।
जिस दिन राष्ट्रपति कनैडी मारे गये उस दिन यह महिला एक होटल में खाना खाते हुए लोगों से कह रही थी कि-आज कनैडी मारे जा सकते हैं। लोगों ने उसकी बात को बेहूदी बकवास कहा, पर जब उस दिन यह समाचार सच हो गया तो लोग हैरत में रह गये।
सन् 44 में अन्तर्राष्ट्रीय घटनाचक्र के बारे में अमेरिका के प्रेसीडेंट श्री रुजवेल्ट ने इस महिला से पूछा था कि क्या रूस के साथ हमारी दोस्ती आगे भी बनी रहेगी जैसी कि हिटलर के विरुद्ध इस समय है? तो उसने उत्तर दिया कि रूस के साथ अमेरिका के सम्बन्ध बिगड़ जायेंगे। लेकिन बहुत समय बाद ऐसा समय आवेगा जब दोनों मिलकर लाल चीन के विरुद्ध लड़ेंगे।
इस महिला द्वारा बताई भविष्यवाणियों में से कुछ ऐसी हैं जिनका सत्य या असत्य होना भविष्य के गर्भ में है।
आगामी विश्व युद्ध और नया ‘अवतार’-
जीन डिक्सन ने कहा है- कुछ समय बाद चीन रूस पर आक्रमण करेगा। प्रारम्भ में यह युद्ध सीमा संघर्ष जैसा रहेगा। तुरन्त ही वह विश्व युद्ध के रूप में नहीं बदलेगा। पर आगे चलकर यही समस्या बढ़ते बढ़ते विश्व-युद्ध का रूप धारण कर लेगी और अन्त में रूस तथा अमरीका मिल कर चीन के विरुद्ध लड़ेंगे।
विश्व युद्ध में एक डेढ़ फुट लम्बी ऐसी छोटी-सी मिसाइल का विकास होगा जो आकार में हलकी होते हुए भी प्रधान शस्त्र का काम करेगी। उन दिनों अमेरिका की जीवन रेखा ‘डेविस स्टेट’ रहेगी। कनाडा और ग्रीनलैण्ड के बीच का यह छोटा सा प्रदेश अमरीका के लिए ढाल का काम करेगा।
विश्व युद्ध सन् 1980 तक हो जायेगा। इसकी आग में सारी दुनिया के लोगों को झुलसना पड़ेगा। यह युद्ध इतना भयानक होगा कि वर्तमानकालीन साधन सामग्रियों को ही नहीं, मानव जाति के विचारों, मान्यताओं, आदर्शों एवं गतिविधियों को भी बदल कर रख देगा। तब नई सभ्यता और उत्कृष्ट आध्यात्मिकता का विकास होगा और ऐसे नये युग की आधार शिला रखी जायगी जिसमें विश्व शाँति अक्षुण्ण रहेगी।
उपरोक्त महिला का कथन है कि- 5 फरवरी 1965 को एक ऐसे बालक का जन्म हो चुका है कि जो संसार का नया कायाकल्प करेगा। संप्रदायों की संकीर्णता वह मिटा देगा और एक सार्वभौम विश्व-धर्म की स्थापना करेगा। 1980 में होने वाले विश्व-युद्ध के बाद वह बालक इतना शक्तिशाली हो जायगा कि संसार भर की सद्भावना उसे प्राप्त होगी और सब लोग उसके निर्देशों का पालन करेंगे। सन् 1999 में इस बालक की प्रतिभा पूर्ण रूप से निखरेगी और उसके हाथों नये युग की आधार शिला रखी जायेगी।
यहूदी भविष्य-वेत्ता ने क्या कहा?
प्रो. हरार इसराइल के रहने वाले एक अन्तर्राष्ट्रीय ख्यात प्राप्त भविष्यवक्ता हैं। वे भी जीन डिक्सन की तरह आत्मिक शक्ति सम्पन्न व्यक्ति हैं और उनको जानने वाले व्यक्ति कहते हैं कि ईश्वर ने पूर्व जन्मों के सत्कर्मों के फलस्वरूप उनको भविष्य दर्शन की शक्ति दी है। वे हिटलर की मृत्यु का ठीक समय तथा कई भूकम्पों की सही भविष्य वाणी कर चुके हैं। आगामी चार वर्षों के लिए उन्होंने जो कुछ कहा है उसका साराँश इस प्रकार है-
(1) जॉनसन अमरीका के 1968 के चुनाव में पराजित होंगे।
(2) वियतनाम का युद्ध 1969 तक समाप्त हो जायगा, जिसमें अमरीका सफल होगा।
(3)सन् 1968 में राष्ट्रपति नासिर की हत्या कर दी जायगी। (एक अन्य भविष्यवाणी के आधार पर यह भी कहा जा सकता है कि अत्यन्त घातक चोट लगने पर भी वह अन्त में बच जायेंगे।)
(4)सन् 1970 तक रूस और चीन के बीच मंगोलिया और साइबेरिया के प्रश्न पर युद्ध होगा जिसमें अणु-अस्त्रों का भी प्रयोग किया जायगा और उसका प्रभाव समस्त एशिया पर पड़ेगा।
प्रो. हरार ने इसराइल और अरब देशों के बीच भयंकर युद्ध का शुरू होना सन् 1969 में लिखा है। यद्यपि अब भी इन दोनों पक्षों में युद्ध हो चुका है, पर वह छः दिन में ही समाप्त हो गया। हो सकता है अब उनमें जो जीते हुये प्रदेश को लौटाने का विवाद छिड़े वह एक डेढ़ वर्ष में फिर भयंकर रूप धारण कर ले जो होते-होते विश्व युद्ध के रूप में परिणत हो जाय।
जैसा हम पहले लिख चुके हैं जिन भविष्य-वेत्ताओं ने सैंकड़ों वर्ष पहले नवयुग आगमन की घटनाओं का वर्णन किया है उन्होंने उनके होने का संकेत मोटे रूप में ही किया है। अब वर्तमान समय के दूरदर्शी विद्वान सामयिक घटनाओं को देखते हुये उनके ठीक समय का निर्णय कर रहे हैं।
योगियों और सन्तों के कथनानुसार बीसवीं शताब्दी (सन् 2000 तक ) मानवजाति के परस्पर विरोधी समुदायों में महा भयंकर घमासान युद्ध होकर नवयुग की स्थापना हो जाना एक निश्चित तथ्य है। इन कथनों में एक महत्व की बात यह भी है कि ये प्रायः विभिन्न समयों में और देशों में कहे गये हैं जैसे- पैलेस्टाइन, बुखारा (रूस), फ्राँस, भारत आदि, तो भी सबमें इनके घटित होने का समय बीसवीं शताब्दी ही बतलाया गया है। वैसे तो इस शताब्दी के आरम्भ से ही युग-परिवर्तनकारी घटनाओं का सिलसिला लग गया है और जैसे-जैसे समय बीतता जाता है उनकी तीव्रता बढ़ती जाती है। अब इस शताब्दी का चतुर्थ चरण समीप आ चला है, तो हमारा विश्वास है कि अन्तिम संघर्ष होकर नवयुग का कार्य प्रत्यक्ष रूप से आरम्भ हो आयेगा। इस दृष्टि से ‘अखण्ड ज्योति’ का युग निर्माण आन्दोलन भी विशेष महत्व रखता है। यह भारतीय जनता को नवयुग आगमन तथा उसके उपयुक्त बनने की प्रेरणा दे रहा है। क्योंकि अगर नवयुग आ गया और हम पुराने दोषों, समय के विपरीत मान्यताओं में ही ग्रस्त रहे तो उससे कुछ भी लाभ उठा सकेंगे। इतना ही नहीं वरन् जैसा एक महिला सन्त ने कहा है-’उस अवसर पर ऐसे लोगों का अस्तित्व कायम रह सकना कठिन होगा जिनमें आध्यात्मिक शक्ति की कमी या अभाव होगा। इसलिये युग परिवर्तन के इस संदेश को जान लेने के पश्चात हमारा सबसे बड़ा कर्तव्य यही है कि हम अपनी कर्तृत्व-शक्ति को बढ़ायें, उसे सुमार्ग पर लगायें और स्वार्थ-भाव को सीमित करके सेवा और सहयोग की वृत्तियों को जागृत करें।
जिस प्रकार अध्यात्मवादियों के कथनों से वर्तमान समय में विश्वव्यापी संघर्ष के अंतिम शिखर तक पहुँचने की बात प्रकट होती है वहीं राजनीतिज्ञों के वक्तव्यों से भी स्पष्ट मालूम पड़ता है कि अब निर्माण की घड़ी निकट ही आ पहुंची है। यद्यपि अनेक लोग अब भी तीसरे विश्वयुद्ध में सन्देह प्रकट करते रहते हैं, पर इस विषय का गम्भीरतापूर्वक मनन करने वाले विद्वान 30-40 वर्ष पहले ही इस युग की समाप्ति होकर नया युग आने की घोषणा कर चुके थे। इस सम्बन्ध में एक वक्तव्य जो अब से लगभग 25 वर्ष पूर्व पं॰ जवाहरलाल ने दिया था, जब कि वे भारत के प्रधान मन्त्री नहीं वरन् एक आन्दोलनकारी ही थे, उनके दृष्टिकोण को बड़े स्पष्ट रूप में उपस्थित करता है-
“इस समय दुनिया में बड़े जोरदार परिवर्तन हो रहे हैं तो भी दिन पर दिन यही दिखलाई पड़ता है कि वे आने वाली घटाओं के लक्षण मात्र हैं। हम इस समय एक ऐसे महान क्राँतिकारी युग में जीवित हैं जिसकी तुलना का युग शायद ही अब तक के इतिहास में मिल सके। यह क्राँति अपना नियत कार्यक्रम पूरा करके ही रहेगी। जब तक इसका कार्यक्रम पूरा नहीं होता तब तक हमारी पृथ्वी पर शान्ति या समझौते की कोई आशा नहीं है। हमें समझ रखना चाहिए कि पुरानी दुनिया अवश्य मरेगी, चाहे यह बात हमको पसन्द हो या नापसन्द। जो लोग इस पुरानी दुनिया के सबसे बड़े प्रतिनिधि थे, वे नष्ट होकर भूतकाल की चीजें बन चुके हैं।
“हमको यह समझ लेना चाहिए कि एक युग समाप्त हो चुका है और इस खून-खराबे (द्वितीय विश्वयुद्ध में) होकर हम नये युग में प्रवेश कर रहे हैं। मैं यह तो नहीं कह सकता कि यह नया युग अवश्य ही बहुत अच्छा होगा, पर मैं इतना जानता हूँ कि वह बिल्कुल भिन्न प्रकार का होगा।”
जो लोग ऐसे परिवर्तन के लिये किसी अवतार की ही राह देखते रहते हैं उनसे नेहरू जी ने कहा - “मनुष्य समाज के उद्धार के लिए समय-समय पर इस देश में और अन्य देशों में भी महापुरुष पैदा होते रहते हैं। पर ऐसे किसी महापुरुष की अपेक्षा वह भावना कहीं बड़ी है, जिसको वह अपने जीवन-व्यवहार में पूरी कर बताता है। ऐसे महापुरुषों को लोग अवतार कहते हैं। इस युग का अवतार वह भावनायें ही हैं, जो कि मनुष्य समाज के सुधार के लिए प्रकट हो रही हैं। आज की वह भावना जिसको अवतार कहा जा सकता है, सामाजिक समानता है। आइये, इस अवतार रूपी भावना के संदेश को हम सुनें और उसके द्वारा पैदा होने वाली सामाजिक क्राँति के हम उपयुक्त साधक बनें। इससे मनुष्य का जीवन बदल जायगा और यह संसार मनुष्यों के निवास के लिए अधिक उपयुक्त बन जायगा।
दो सौ वर्ष बाद की दुनिया कैसी होगी-
श्री एच. जी. वेल्स इंग्लैंड के बहुत बड़े लेखक थे। वे संसार और मनुष्य जाति के भविष्य पर सदैव अपने विचार प्रकट किया करते थे। World set free (संसार कैसे बन्धन से मुक्त हुआ?) Sleeper awakes (सोने वाला जाग गया) Time machine (समय यन्त्र, आदि पुस्तकों में उन्होंने भावी संसार का चित्र खींचा है। The first man in the moon (चन्द्रमा में पहला मनुष्य )भी उनकी एक अद्भुत पुस्तक है जिसमें आज से 50-60 वर्ष पहले चन्द्रमा तक यात्रा करने की कल्पना की गई थी, जो अब पूरी होने के समीप आ गई है। अपने विशाल ज्ञान और आन्तरिक अनुभव के कारण उनको भविष्य में होने वाले परिवर्तन ऐसे ही प्रत्यक्ष दिखाई पड़ते थे जैसे कोई वैज्ञानिक बड़ी भारी दूरबीन से आकाश के गूढ़ रहस्यों को देख लेता है अथवा कोई योगी समाधि-अवस्था में विश्व के अज्ञात प्रदेशों का दर्शन करता रहता है। अब से 35 वर्ष पूर्व 'The shape of things to come' (आगामी घटनाओं का स्वरूप) नामक पुस्तक लिखी थी जिसमें सन् 1939 के महायुद्ध की स्पष्ट शब्दों में सूचना देते हुए आगामी सौ डेढ़ सौ वर्षों के भीतर होने वाली संसार की कायापलट का वर्णन किया था।
इस 5-6 सौ पृष्ठों के ग्रन्थ में श्री वेल्स ने वर्तमान जगत की दुर्दशा के कारणों का विवेचना करते हुए नये संसार की नई मानव-जाति का चित्र बड़े विस्तार और स्पष्टता से खींचा है। उन्होंने कहा कि अभी पच्चीस-तीस साल संसार में भयंकर नाश, बर्बादी और सामाजिक क्राँति होकर सन् 2000 से कुछ पहले ही नये संसार का पुनर्गठन होने लगेगा। इसके फल से वर्तमान समय में दिखलाई पड़ने वाली राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक, नैतिक आदि सब प्रकार की प्रथाओं में पूर्ण रूप से परिवर्तन हो जायगा और समस्त संसार का शासन एक ही स्थान से समता और न्याय के सिद्धाँतानुसार किया जायगा। आरम्भ में उन लोगों को नियंत्रण में रखने के लिए, जो पुराने विचारों के कारण नये सामाजिक विधान का विरोध करेंगे, शासन-परिषद् जल और वायु शक्ति को अपने अधिकार में रखेगी और जो पुराना शासक विद्रोह करने की चेष्टा करेगा उसे सामान्य वायुयानों द्वारा फैंके गये बेहोश करने वाले बमों से वश में कर लिया जायगा। इस प्रकार उस युग में वर्तमान समय में दिखाई पड़ने वाले अनावश्यक और निकम्मे भेदभावों का पूर्णतः अन्त कर दिया जायगा। प्रत्येक बालक को आदर्श शिक्षा दी जायगी। उसे अपनी शक्तियों को विकसित करने का हर तरह का अवसर दिया जायगा, अपनी रुचि और मनोवृत्ति के अनुसार सब प्रकार के साधन प्राप्त होंगे, जिससे कुछ ही समय में ऐसी मानव जाति का आविर्भाव होगा जो शारीरिक, मानसिक, आत्मिक दृष्टि से आज कल के मनुष्यों की तुलना में देवता ही प्रतीत होंगे। उदाहरण के लिये उस समय के वस्त्रों का वर्णन करते हुए श्री वेल्स ने जो कुछ लिखा है उसका साराँश इस प्रकार है-
“उस युग में वस्त्रों को धोने का रिवाज न रहेगा। सार्वजनिक स्टोरों में सब नाप के तैयार वस्त्र सदैव प्रस्तुत रहेंगे, जहाँ से लोग अपनी इच्छानुसार उनको ले सकेंगे और दस-पाँच दिन पहनने के बाद जब मैला होता देखेंगे तो उनको त्याग कर फिर नये वस्त्र ले लेंगे। पर वास्तव में उस समय लोगों की शारीरिक शक्ति तथा स्वास्थ्य में ऐसी आश्चर्यजनक उन्नति हो जायगी कि सर्दी-गर्मी से बचने के लिए वस्त्रों की आवश्यकता ही प्रतीत न होगी और वे सभ्यता की रक्षा की दृष्टि से शरीर ढकने के लिये कम से कम वस्त्रों का उपयोग करने लगेंगे।
“ऐसा ही अद्भुत परिवर्तन खान-पान, पठन-पाठन, गृहस्थ जीवन, निजी सम्पत्ति, मैत्री सम्बन्ध आदि के विषय में हो जायेंगे। उस समय संसार में रुपया, जायदाद या संग्रह करने का नाम भी न रह जायगा, क्योंकि प्रत्येक मनुष्य को, वह चाहे जहाँ चला जाय, सब प्रकार की वस्तुएँ अनायास मिल जायेंगी। उस परिस्थिति में पहुँच कर ‘भोजन और घर’ की समस्या से ऊपर जाकर मनुष्य दैवी और आत्मिक क्षेत्र में पदार्पण करेगा।”
ये बातें आज कल ‘रोटी और रुपया’ के लिए मरने वाले छोटे दिमाग के मनुष्यों को ‘ख्याली पुलाव’ जान पड़ेंगी पर इसका कारण यही है कि उनको पुराने और नवीन ‘विस्तृत विश्व’ का ज्ञान नहीं है। दुनिया में पहले भी कभी-कभी ऐसे परीक्षण हो चुके हैं खास कर भारतीय धर्म ग्रन्थों में सतयुग का जो चित्र खींचा गया है कि उस समय कामना करने से ही सब आवश्यक पदार्थ वृक्षों से मिल जाते थे, वह ऐसी अवस्था के सिवाय और कुछ नहीं हो सकता। विदेशी लेखक भी सैंकड़ों हजारों वर्षों से ऐसे कल्पना-राज्यों का वर्णन कर रहे हैं। प्लेटो की क्रद्गश्चह्वड्ढद्यद्बष् (प्रजातन्त्र ) मोरिस विलियम का हृद्गख्ह्य द्धह्शद्व ठ्ठशख्द्धद्गह्द्ग (अज्ञात प्रदेश के समाचार ) टामस मूर का ह्लशश्चद्बड्ड (यूटोपिया ) ऐसी ही पुस्तकें हैं जिनमें समस्त समाज की एक परिवार के रूप में कल्पना की है और खरीदने-बेचने की प्रथा के स्थान पर बिना मूल्य वाले सार्वजनिक स्टोरों का ही वर्णन किया है। भारतीय संस्कृति के लिये तो यह कोई अनोखी बात हो ही नहीं सकती, जबकि यहाँ के सर्व प्रथम धार्मिक ग्रन्थ वेद में कह दिया गया है-
ईशावास्यमिदं सर्व यत्किंच जगत्याँ जगत्।
तेन त्यक्तेन भुँजीथा मा गृधः कस्यस्विद् धनम्॥
(यजुर्वेद 40-1)
“यह सम्पूर्ण जगत ईश्वर तत्व से ही परिपूर्ण है। इस बात को ध्यान में रखते हुए साँसारिक पदार्थों का त्यागपूर्वक उपभोग करो, क्योंकि यह धन (सामग्री) किसी की नहीं है अर्थात् इस पर सब का समान अधिकार है।”
पर अभी तक इस सिद्धान्त को बहुत थोड़े लोगों ने हृदयंगम किया है और उनमें से भी व्यवहार में लाने वालों की संख्या और भी थोड़ी है। पर इसमें सन्देह नहीं कि यह एक प्राकृतिक शाश्वत सिद्धान्त है और जब तक इस पर आचरण न किया जायगा मनुष्य अपने नाम को चरितार्थ नहीं कर सकता और न सच्ची सुख-शान्ति पा सकता है। पर जब बार-बार ठोकरें खाकर उसकी आँखें खुलेंगी और खास कर इसी कारण से तीसरे महायुद्ध में मानव-जाति का विध्वंस हो जायगा, उसके आधे या उससे भी ज्यादा व्यक्ति काल के गाल में समा जायेंगे, तब उसे होश आयेगा और श्री वेल्स की भविष्यवाणी चरितार्थ होती दिखाई देगी।
अमरीकन प्रेसीडेण्ट की स्वीकारोक्ति-
गत 12 मई को अमरीका के ‘वाशिंगटन पोस्ट’ नामक समाचार पत्र में अमरीका के वर्तमान प्रेसीडेण्ट जॉनसन और उनकी पुत्री लूसी का एक संवाद प्रकाशित हुआ था जिसमें जॉनसन ने कहा था कि-”हो सकता है कि इतिहास में तुम्हारे पापा (जॉनसन) को ही तीसरा महायुद्ध आरम्भ करने वाला माना जाय। कारण कि मैं किसी को यह बतलाना चाहता हूँ कि हम कोई भी बड़े से बड़े खतरा उठाने के लिये तैयार हैं।” वियतनाम में तेल की टंकियों पर आक्रमण किये जाने के अवसर पर भी उन्होंने लूसी से कहा था-”हो सकता है तुम्हें कल सुबह देखना नसीब न हो।”
इस प्रकार के उद्गारों का स्पष्ट आशय यह है कि प्रेसीडेंट किसी भी समय विश्वयुद्ध आरम्भ होने की सम्भावना को पूरी तरह अनुभव करते हैं और एटम बम के प्रयोग द्वारा महानाश होने की आशंका भी करते हैं।
राष्ट्रपति जॉनसन के इस कथन पर टीका करते हुए रूस के सरकारी पत्र ‘प्रावदा’ ने लिखा है कि-”इस कथन को मनोवैज्ञानिक युद्ध की दिशा में एक कदम समझना चाहिए। यह वियतनाम की जनता को भयभीत करने का एक प्रयास है, जो कभी सफल नहीं हो सकता। पर अब इसराइल के युद्ध में हम देख रहे हैं कि अमरीका वास्तव में युद्ध के लिए तैयार हो गया है, और इसमें राष्ट्रपति जॉनसन का उपर्युक्त दृष्टिकोण ही काम कर रहा है। अगर अमरीका का पूरा भरोसा न होता और उसका शक्तिशाली छठा बेड़ा पास में ही सहायतार्थ न खड़ा होता तो इसराइल केवल छः दिन में इतने बड़े युद्ध को न जीत लेता। अब जबकि अमरीका तैयार हो गया तो रूस को भी उसके मुकाबले में तैयार होना ही पड़ेगा। पर इस समय उसके मार्ग में चीन की बाधा है जो उसका साथी होते हुए भी विरुद्ध चाल चल रहा है और उसे नीचा दिखाने के लिए हर रोज कोई न कोई झूठी सच्ची बात फैलाता रहता है। इसी कारण अभी विश्वयुद्ध रुक गया है। पर कोई आश्चर्य नहीं कि कुछ समय में ही वियतनाम के युद्ध में कोई ऐसी परिस्थिति पैदा हो जाय जिससे चीन को खुलकर मैदान में आना पड़े और तब संघर्ष भयंकर रूप धारण कर ले। वैसे इस समय भी इसराइल का युद्ध एक प्रकार से स्थगित हुआ है। अभी उसमें बड़ी-बड़ी विकट समस्यायें उत्पन्न होंगी जिनके कारण बार-बार शान्ति भंग होने की आशंका जान पड़ेगी।
‘माओ’ की भविष्यवाणी-
चीन की कम्यूनिस्ट सरकार के अध्यक्ष माओत्से तुँग ने एक-डेढ़ वर्ष पूर्व अन्य देशों के कुछ नेताओं से बातचीत करते हुए कहा था कि “चीन अब भी अपने इस विश्वास पर अटल है कि आगामी 10-15 वर्षों में विश्वयुद्ध होना अवश्यम्भावी है।
इस समय युद्ध का सबसे बड़ा हामी चीन ही बन रहा है। वह संसार में जहाँ कहीं संभव होता है युद्ध करने वालों को प्रोत्साहन देता है और हर तरह से उनकी मदद का वायदा करता है। इसका एक मुख्य कारण यह है कि चीन की आबादी इतनी अधिक बढ़ गई है कि वह उसको सँभाल नहीं सकता और उसके घर के भीतर ही निरन्तर कलह चलती रहती है। इसलिए उसको सदैव यही सूझती है कि किसी तरह युद्ध आरम्भ हो जाय और उसमें संसार के अधिकाँश व्यक्ति समाप्त हो जायें। चीन को आशा है कि उसकी आबादी सर्वाधिक होने से अन्त में उसकी जनसंख्या ही सबसे अधिक रहेगी और उसका प्रभाव सबसे अधिक माना जायगा।
फिलीपाइन के प्रेसीडेंट-
फिलीपाइन के प्रेसीडेंट फर्डिनेण्ड मार्कास ने इसी वर्ष 8 मई को एशियाई देशों के विशेष प्रतिनिधियों के सम्मुख कहा कि-”कम्यूनिस्ट चीन दस साल के भीतर फिलीपाइन तथा सभी पड़ोसी देशों को सैनिक ताकत के बल पर हथियाने की कोशिश करेगा। इसी भय के कारण हमको अपनी रक्षा के लिए अमरीका पर निर्भर रहना पड़ता है।”
ऐसा विदित होता है कि इस बार विश्व युद्ध आरम्भ करने का बीड़ा चीन ने ही उठाया है जैसा कि द्वितीय महासमर में हिटलर ने किया था। यही कारण है कि वह कोरिया, वियतनाम, पाकिस्तान, अरब गणराज्य जहाँ कहीं भी वैमनस्य की कुछ संभावना देखता है उसे सुलगाने, बढ़ाने का प्रयत्न बड़ी लगन के साथ करता है। उसने भारत से, जो आरम्भ से उसका बहुत बड़ा सहायक रहा है, बिना कारण लड़ाई मोल ले रखी है और बार-बार भड़काने की चेष्टा ही करता रहता है। इसी तरह रूस से भी वह छेड़खानी करता रहता है, यद्यपि उसका निर्माण और वृद्धि मुख्यतः उसकी सहायता से ही हुई है। पर ऐसी मनोवृत्ति और लड़ाई को निमन्त्रण देने का क्या परिणाम होता है उसका अनुमान हम जर्मनी की हालत से ही कर सकते हैं।
डाक्टरों द्वारा लाइलाज बीमारी की भविष्यवाणी-
जैसे पिछले लेखों में बताया गया है संसार में इन 10-15 वर्षों के भीतर जो महाकाल का ताण्डव होने वाला है उसमें केवल युद्ध द्वारा ही मनुष्यों का विध्वंस नहीं होगा वरन् महामारी और अकाल भी अपना ‘पार्ट’ अदा करेंगे। कुछ लोगों का तो यह कहना कि युद्ध में अधिक मनुष्य नहीं मारे जा सकते, असली संहार तो महामारी से ही होता है। अंक शास्त्रियों की गणना के अनुसार प्रथम महायुद्ध में 1 करोड़ 31 लाख व्यक्ति मारे गये थे और दूसरे में 2.5-3 करोड़। इस तरह तीसरे में भी 5-10 करोड़ तक मारे जा सकते हैं क्योंकि संसार के प्रमुख राष्ट्रों की सेनाओं की संख्या इससे अधिक नहीं है। पर विश्व की पौने तीन अरब की आबादी को देखते हुए यह संख्या नगण्य ही है। तब जैसा भविष्यवाणियों में प्रकट किया गया है कि संसार की आधी या तिहाई आबादी समाप्त हो जायगी, वह कैसे होगा? वह काम महामारी और अकाल के प्रकोप से पूरा होगा। अब से कुछ समय पूर्व समाचार पत्रों में लन्दन का एक समाचार छपा था जिसमें कहा गया था-
यहाँ के डॉक्टर और रोग विशेषज्ञों का मत है कि आजकल जिस वेग से संसार में आबादी बढ़ रही है, उससे किसी भयंकर महामारी के फैलने की बहुत बड़ी आशंका है। निकट भविष्य में जिस महामारी के फैलने की शंका डॉक्टर और विशेषज्ञ कर रहे हैं उसका नाम “एशियाई फ्ल्यू” बतलाया जा रहा है। डाक्टरों की यह आशंका केवल कल्पना के आधार पर नहीं है। उन्होंने चूहों को खोज का माध्यम बनाकर अपना यह निष्कर्ष निकाला है।
डाक्टरों ने एक स्थान पर छः-छः, सात-सात चूहे रख कर खोज की तो पता चला कि घनी आबादी वाले चूहों में अकेले रहने वाले चूहों की अपेक्षा रोग के कीटाणुओं से संघर्ष करने की शक्ति कम थी। इकट्ठे रक्खे जाने वाले सब चूहे बीमार हो गये और अकेले रहने वाले निरोग रहे। विशेषज्ञों का कथन है कि आबादी जिस तेजी में बढ़ रही है और घरों में तथा कारखानों में जिस घिच-पिच तरीके से थोड़े स्थान में अधिक लोगों को रहना पड़ रहा है उसमें इस प्रकार के असाध्य रोगों की सम्भावना स्वाभाविक है। भविष्य में बढ़ती हुई जनसंख्या ऐसे असाध्य रोग उत्पन्न करके अपने लिए स्वतः ही संकट बन जायगी।
श्री एच. जी. वेल्स ने भी अपने भविष्य कथन में कहा है कि विश्वयुद्ध के बन्द हो जाने के पश्चात् ऐसी बीमारी फैलेंगी जिससे ज्वर होने के साथ ही मनुष्य के मस्तिष्क पर ऐसा प्रभाव पड़ेगा जिससे वह चलना आरम्भ कर देगा और लगातार चलते-चलते ही मर जायगा। यह बीमारी भयंकर छूत वाली होगी, लोग इसलिये बीमार का इलाज करना तो दूर उसे अपने पास भी न आने देंगे। जब ऐसे बीमार चलते-चलते रास्ते में किसी व्यक्ति के पास जाने की चेष्टा करेंगे तो वह उनसे दूर भागेगा और अनेक अवसरों पर ऐसे बीमारों को लोग गोली से मार देंगे। पर यह बीमारी ऐसी छूत की होगी कि उसका असर दूसरों पर बड़ी जल्दी होगा और जिस-जिस देश में वह फैलेगी वहाँ की अधिकाँश आबादी खत्म हो जायेगी।
इसका कारण भी स्पष्ट ही है। वर्तमान समय में खाद्य संकट भयंकर रूप धारण कर रहा है और भारत ही नहीं संसार के बहुसंख्यक देशों की यही हालत है। फिर जब युद्ध के कारण यह स्थिति गम्भीर होगी, एक ओर तो युद्ध के विस्फोटक पदार्थों से तरह-तरह के विषाक्त तत्व चारों ओर फैलेंगे और दूसरी तरफ अव्यवस्था और अकाल के कारण न मालूम कैसे कैसे अखाद्य पदार्थ खाकर पेट की आग बुझाने की चेष्टा की जायगी तो स्वास्थ्य का नष्ट हो जाना और शरीर के दूषित तत्वों का बढ़ जाना स्वाभाविक ही है। उस समय शरीर की रोगनिवारिणी शक्ति प्रायः नष्ट हो जायगी और इस कारण जिस किसी रोग का आक्रमण होगा वही एक महामारी का रूप धारण कर लेगा।
महाभयंकर अकाल का खतरा-
जन-संख्या की लगातार वृद्धि के कारण हमारे देश में कितने ही वर्षों से अन्नाभाव अनुभव किया जा रहा है। जिस देश को इस बात का गुमान था कि हमारे अनाज से ही इंग्लैंड और अन्य योरोपीय देशों का पेट भरता है वह पिछले 25 वर्षों से लगातार अमेरिका, कनाडा, आस्ट्रेलिया आदि द्वारा भेजे गये अन्न से अपनी भूख को बुझा रहा है। संसार के अन्य कितने ही देशों की भी यही हालत है। पर अब यह दशा और भी भयंकर रूप धारण करती जाती है और विशेषज्ञों के मतानुसार एक विश्वव्यापी अकाल का खतरा पैदा होता जाता है। इस संबन्ध में न्यूयार्क (अमेरिका) राज्य विश्वविद्यालय के अनुसंधान विभाग के संचालक श्री रेमण्ड ईवैल ने संसार की जनसंख्या वृद्धि विषयक अध्ययन के ठोस आधार पर भविष्य वाणी की है कि एशिया, अफ्रीका तथा लेटिन अमरीका के अविकसित देश इतिहास में एक अभूतपूर्व भयंकर अकाल के दरवाजे पर खड़े हुए हैं। अगर इस स्थिति का सामना करने के लिये तुरंत व्यापक प्रयत्न नहीं किये गये तो सन् 1970 के आरम्भ में ही भारत, पाकिस्तान और चीन में भयंकर अकाल पड़ने का खतरा उपस्थित है। 1980 तक तो एशिया, अफ्रीका तथा लेटिन अमरीका के कई दूसरे देश भी इस व्यापक अकाल के कौर बन सकते हैं।
श्री ईवैल ने कहा है कि एशिया, अफ्रीका और लेटिन अमरीका में प्रति वर्ष 2.3, 2.4 तथा 3 प्रतिशत के हिसाब से आबादी बढ़ रही है। दूसरी तरफ इन देशों में पिछले तीन-चार सालों से अन्नोत्पादन में कोई वृद्धि नहीं हो रही है। यदि इन देशों में कुछ साल तक यही प्रवृत्ति जारी रही तो स्वभावतः इसका परिणाम अकाल होगा। ऐसा भयंकर और व्यापक अकाल जैसा दुनिया के इतिहास में कभी भी नहीं हुआ है।
इस प्रकार संसार के प्रमुख राजनीतिज्ञों, वैज्ञानिकों तथा विद्वानों के मतानुसार अब तक के इतिहास में यह दस-पन्द्रह वर्ष का समय सबसे कठिन और संकट पूर्ण सिद्ध होगा। इसमें मानव जाति तथा सम्पत्ति का जितना भी नाश हो जाय वह कम ही है। पर अध्यात्मवादी इन बातों से चिन्तित नहीं होते और न इसमें किसी प्रकार के अनिष्ट की कल्पना करते हैं। वे इन कष्टों की तुलना एक स्त्री की उस प्रसव वेदना से करते हैं जो देखने में तो बड़ी वीभत्स जान पड़ती है पर जिसका परिणाम एक नवीन, निष्कलंक, निर्मल जीवात्मा का आविर्भाव होता है। इसी प्रकार यद्यपि इस संक्रमण काल में मानव-जाति को बहुत सहन करना पड़ेगा, सम्भव है देश के देश और कितनी जातियाँ लोप हो जायँ पर इसका परिणाम यही होगा कि मानवता दोष दुर्गुणों से मुक्त होकर नवीन युग के उपयुक्त बन जायगी जिसे अनेक विद्वानों ने ‘देव-युग’ बतलाया है। इस समय मानव-स्वभाव में जो कमजोरियाँ सम्मिलित हो गई हैं उनके रहते हुए वह किसी दिव्य-युग का अधिकारी नहीं बन सकता। अतएव युद्ध, अकाल महामारी आदि के रूप में उसकी शुद्धि आवश्यक ही है।
जनसंख्या की समस्या सबसे भयंकर-
इस समय जनसंख्या के नियंत्रण का प्रश्न संसार भर के विचारकों के सम्मुख बड़े उग्र रूप में उपस्थित हो रहा है। विभिन्न देशों की सरकारें और प्रगतिशील संगठन जितनी वृद्धि की-उन्नति की योजनायें करती हैं, यह जनसंख्या की वृद्धि उन सब पर पानी फेर देती है और अभाव का अभाव ही बना रहता है। सच पूछा जाय तो युद्ध का एक मुख्य कारण जनसंख्या की अनियंत्रित वृद्धि भी है। इस पर विचार करते हुए अमरीका के नोबुल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिक डॉ. अल्बर्ट ग्योरग्यी ने भीषण भविष्य की कल्पना करते हुए कहा है-”अगर संसार की आबादी बढ़ने से न रुकी तो एक वक्त ऐसा भी आ सकता है जब खाद्यान्न के अभाव में आदमी ही आदमी को खाने लगे। जनसंख्या की वृद्धि से मानवता को बहुत बड़ा खतरा पैदा हो गया है। कुछ समय बाद ऐसी भी स्थिति आ सकती है कि इस धराधाम पर प्रत्येक व्यक्ति के हिस्से में रहने के लिये एक वर्ग गज जमीन ही आये।”
अन्तर्राष्ट्रीय परिवार नियोजन संघ के अध्यक्ष डॉ. एलन एफ. गुट्टामाचेर ने कुछ समय पूर्व आइलैंड (कनाडा) के राष्ट्रीय महिला चिकित्सालय की एक बैठक में भाषण करते हुए कहा कि “इन वर्षों में दुनिया की आबादी दुगनी हो जायगी। दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि इस शताब्दी के अन्त तक इस पृथ्वी पर 7 अरब के करीब मनुष्य रहने लगेंगे।”
भारतवर्ष की आबादी 1891 में 23 करोड़ 60 लाख थी। 30 वर्ष बाद इसमें 1.5 करोड़ की वृद्धि हुई। अब इस वृद्धि की गति बहुत अधिक बढ़ गई है। राष्ट्र संघीय जनसंख्या सर्वेक्षण के अनुसार इस शताब्दी के अन्त तक भारत की आबादी 90 करोड़ हो जायगी।
नई दिल्ली में एकत्रित परिवार नियोजन के विशेषज्ञों के मतानुसार “भारत में प्रति घंटे 1100 से अधिक बच्चे जन्म लेते हैं। इस हिसाब से जनसंख्या की वृद्धि प्रति वर्ष एक करोड़ तक पहुँच जाती है। इस वृद्धि से यहाँ का रहन सहन का स्तर कम हो रहा है।
यह आश्चर्य का विषय है कि जन संख्या वृद्धि के खतरे को इतने स्पष्ट रूप में समझते और स्वीकार करते हुए भी विभिन्न देशों के शासन उसे रोकने का कोई कारगर उपाय नहीं कर पाये हैं। हमारे देश के जन साधारण तो इस विषय को मनुष्य की शक्ति से बाहर और ‘भगवान’ की इच्छा मानते आये हैं और उनकी निगाह में 5-6 बच्चे हो जाने में कोई बुराई की बात नहीं है। ऐसे लोग अगर खाद्य-संकट में ग्रस्त हों और अवसर आने पर युद्ध, अकाल, महामारी आदि के शिकार बनकर अकाल में ही परलोक के पथिक बनें तो अस्वाभाविक क्या है? अन्धाधुन्ध संतान उत्पन्न करने वालों और समझाने पर न मानने वालों को अपने कृत्य का दंड सहन करना ही पड़ेगा।
‘कीरो’ विलायत के सबसे बड़े ज्योतिषी और सामुद्रिक शास्त्र के आचार्य थे। उनमें कोई ऐसी गुप्त शक्ति थी कि वे जिस आदमी का हाथ देखते थे उसके जीवन की तमाम भूत और भविष्यत् घटनाएँ उनको सिनेमा के चित्रों की भाँति दिखलाई पड़ने लगती थीं। इसीलिए दुनिया के बड़े-बड़े बादशाह, राज्य-संचालक, संसार के नामी-गिरामी व्यक्ति उनको अपना हाथ दिखलाया करते थे उनकी कुछ बातें तो ऐसी मशहूर हैं कि जिनका हाल अंग्रेजी जानने वाले सभी ज्योतिष-प्रेमियों ने सुन रखा है। कीरो साहब ने दक्षिण अफ्रीका की लड़ाई, रानी विक्टोरिया की मृत्यु, बादशाह एडवर्ड सप्तम की मृत्यु का ठीक महीना और दिन, इटली के बादशाह हम्बर्ट की हत्या, रूस के जार का पतन और उसके परिवार के प्रत्येक व्यक्ति का कत्ल किया जाना, जर्मनी की पहली लड़ाई का ठीक समय आदि वर्षों पहले बतला दिया था। उनकी सबसे आश्चर्यजनक भविष्यवाणी लार्ड किचनर के सम्बन्ध में है, जिनको उन्होंने सन् 1887 में, जबकि वे सेना में एक साधारण कर्नल थे, बतला दिया था कि आपको सन् 1914 में एक बहुत बड़े महासमर की भारी जिम्मेदारी उठानी पड़ेगी और उस अवसर पर आपकी मृत्यु एक सिपाही की तरह मैदान में न होकर समुद्री दुर्घटना में 66 वर्ष की आयु में होगी। उनकी यह भविष्यवाणी अक्षरशः सत्य सिद्ध हुई और लार्ड किचनर युद्ध संबंधी सलाह के लिए अमरीका जाते हुए जर्मनी की गोताखोर नाव द्वारा समुद्र में डुबा दिये गये।
अपने जीवन के अन्तिम वर्षों में कीरो ने ज्योतिष-शास्त्र संबंधी कई पुस्तकें लिखी थीं जो लोगों को बहुत पसंद आई थीं। उन्होंने च्च्ंखशह्द्यस्र श्चह्द्गस्रद्बष्ह्लद्बशठ्ठह्यज्ज् (संसार की भविष्य-वाणियाँ) नाम की पुस्तक सन् 1925 के अक्टूबर महीने में प्रकाशित होने को भेजी थी, जो सन् 1927 में छपकर तैयार हुई। इससे पहले उन्होंने इस पुस्तक को लेख के रूप में समाचार पत्रों में प्रकाशनार्थ भेजा था, पर उन सबने यह कह कर लौटा दिया कि इसकी बातें अत्यन्त ‘सनसनीपूर्ण’ हैं और जब तक इसमें बहुत अधिक उलटफेर न किया जायगा तब तक वे इसको नहीं छाप सकते।
पुस्तक रूप में प्रकाशित होने पर यह बड़ी लोकप्रिय सिद्ध हुई और कुछ ही वर्षों में इसके बहुत संस्करण हो गये और नियत कीमत से भी अधिक मूल्य पर बेची जाने लगी। अब उसकी एक भी प्रति बहुत कठिनाई से मिलती है। लोग उसके विषय में बहुत सी अन्ट-सन्ट बातें किया करते हैं और उसकी बातों का उलटा ही अर्थ निकाला करते हैं। इसलिए हम उसकी मुख्य-मुख्य बातों का साराँश, खासकर तीसरे महायुद्ध के संबंध में उसकी सम्मति यहाँ उद्धृत करना चाहते हैं।
कीरो के भविष्य-कथन का मुख्य आधार यह सिद्धाँत है कि-पृथ्वी की कक्षा अथवा धुरी अपनी जगह से बराबर हटती जाती है और इस कारण हमको सूर्य अपना स्थान बदलता जान पड़ता है। पृथ्वी क यह हटना इस प्रकार होता है कि सूर्य एक-एक करके बारहों राशियों में होकर गुजर जाता है। एक राशि से दूसरी राशि में जाने में उसे 2150 वर्ष का समय लगता है और बारह राशियों का भ्रमण 25800 वर्ष में पूरा होता है। ईसा के जमाने में सूर्य मीन राशि में था और सन् 1762 से कुँभ राशि में प्रविष्ट हुआ है।
पृथ्वी की कक्षा में होने वाले इस बदलाव का असर दुनिया की आबोहवा पर बहुत ज्यादा पड़ता है। ध्रुवों का स्थान बदल जाने से बड़े-बड़े भूकम्प आते हैं, समुद्रों की गहराई में अन्तर पड़ जाता है और दुनिया के नक्शे में बड़े-बड़े परिवर्तन दिखलाई देने लगते हैं। पृथ्वी की कक्षा में अन्तर पड़ने के सिद्धांत को वैज्ञानिक भी मानते हैं और संसार के सबसे प्राचीन ग्रंथ वेदों से भी यह सिद्ध होता है। लोकमान्य तिलक ने अपने वेद संबंधी ग्रन्थ में इस विषय पर काफी प्रकाश डाला है। उन्होंने बतलाया है कि किसी समय आर्य लोग उस भूमि में रहते थे जो इस समय ध्रुव प्रदेश (Artictic) नाम के से पुकारी जाती है। इससे सिद्ध होता है कि किसी समय यह भू-प्रदेश निवास योग्य होगा और बर्फ के कारण अगम्य प्रदेश उससे कुछ हट कर होगा।
मि. कीरो के मतानुसार अगले 50 या कुछ न्यूनाधिक वर्षों में अटलाँटिक महासागर के तल में कुछ ऐसा अन्तर पड़ जायगा कि गल्फस्ट्रीम का मार्ग बदल जायगा जिसके कारण न्यूयार्क और अमरीका का बहुत-सा पूर्वी हिस्सा, आयरलैंड, इंग्लैंड, स्वीडन, नार्वे डेनमार्क, रूस, जर्मनी, फ्राँस के उत्तरी भाग इतने ठण्डे हो जायेंगे कि वहाँ मनुष्यों का रहना कठिन हो जायगा। इसके बदले में भारत, अफ्रीका, मिस्र आदि जैसे देश जो अभी खास तौर पर गर्म समझे जाते हैं मातदिल आबोहवा वाले बन जायेंगे। इससे इन देशों में सभ्यता की बहुत उन्नति होगी और संसार में इनका महत्व अन्य देशों से बढ़ जायगा। अटलाँटिक महासागर में जमीन के ऊँचा उठने से एक नया टापू पैदा हो जायगा और उसके परिणामस्वरूप द. अफ्रीका का सहारा रेगिस्तान फिर से समुद्र बन जायगा, जिससे उस प्रदेश की कायापलट हो जायगी। इस भविष्य के अनुसार जब तक सूर्य कुम्भ राशि में रहेगा (अर्थात् सन् 3912 तक) संसार की सामाजिक अवस्था बहुत बदली हुई रहेगी। इस युग में स्त्रियों और मजदूरों की प्रधानता रहेगी। इस दृष्टि से यह युग वर्तमान समय से बहुत भिन्न होगा और उसमें वर्तमान समय में प्रचलित उन अधिकाँश प्रथाओं और रूढ़ियों का अन्त हो जायगा जिनको आज हम धर्म या समाज का आधार स्तम्भ मानते हैं। कुम्भ युग (Aquarian age) के इन महान परिवर्तनों का जिक्र करते हुये कीरो ने स्पष्ट लिखा है-
च्च्ञ्जद्धद्बह्य ह्यद्बद्दठ्ठ शद्ध भ्शस्रद्बड्डष्, द्वशह्द्ग द्बद्वद्वद्गस्रद्बड्डह्लद्गद्यब् द्बठ्ठद्धद्यह्वद्गठ्ठष्द्गस्र ड्डह्य द्बह्ल द्बह्य ड्ढब् ह्लद्धद्ग श्चद्यड्डठ्ठद्गह्लह्य ह्ड्डठ्ठह्वह्य ड्डठ्ठस्र स्ड्डह्लह्वह्ठ्ठ , द्धड्डह्य, द्बठ्ठ द्वद्बठ्ठस्रह्य शद्ध ड्डठ्ठष्द्बद्गठ्ठह्ल ह्यह्लह्वस्रद्गठ्ठह्लह्य शद्ध शष्ष्ह्वद्यह्लद्बह्यद्व द्धह्शद्व ह्लद्बद्वद्ग द्बद्वद्वद्गद्वशह्द्बड्डद्य, ड्ढद्गद्गठ्ठ ड्डह्यह्यशष्द्बड्डह्लद्गस्र ख्द्बह्लद्ध ह्लद्धद्ग द्बस्रद्गड्ड शद्ध ड्ड च्च्ठ्ठद्गख् ्नद्दद्गज्ज् ड्डठ्ठस्र ष्शद्वश्चद्यद्गह्लद्ग ष्द्धड्डठ्ठद्दद्ग द्बठ्ठ ह्लद्धद्ग द्यड्डख्ह्य ष्शठ्ठह्लह्शद्यद्यद्बठ्ठद्द ष्द्बक्द्बद्यह्यड्डद्यड्डह्लद्बशठ्ठ. ढ्ढह्ल ख्ड्डह्य ड्ढद्गद्यद्बद्गक्द्गस्र ड्डठ्ठस्र ह्वठ्ठस्रद्गह्ह्यह्लशशस्र ह्लद्धड्डह्ल ह्लद्धद्ग श्चद्गष्ह्वद्यद्बड्डह् क्द्बड्ढह्ड्डह्लद्बशठ्ठह्य ष्ड्डह्वह्यद्गस्र ड्ढब् ड्डष्ह्लद्बशठ्ठ शद्ध ह्लद्धद्ग ह्यह्वठ्ठ ह्द्गह्लह्शद्दह्ड्डस्रद्बठ्ठद्द ह्लद्धह्शह्वद्दद्ध ह्लद्धद्बह्य श्चड्डह्ह्ल शद्ध भ्शस्रद्बड्डष् ख्शह्वद्यस्र ह्यश द्गद्धद्धद्गष्ह्ल ह्लद्धद्ग द्वद्बठ्ठस्रह्य शद्ध द्धह्वद्वड्डठ्ठद्बह्लब् ह्लद्धड्डह्ल ह्लद्धद्ग द्वशह्यह्ल ड्डह्यह्लशह्वठ्ठस्रद्बठ्ठद्द ष्द्धड्डठ्ठद्दद्गह्य , ह्वश्चद्धद्गड्डक्ड्डद्यह्य ड्डठ्ठस्र ह्द्गक्शद्यह्वह्लद्बशठ्ठह्य ख्शह्वद्यस्र द्धशद्यद्यशख् द्बठ्ठ द्बह्लह्य ह्लह्ड्डद्बठ्ठ . ह्लद्धद्ग च्च््नह्नह्वड्डह्द्बड्डठ्ठज्ज् शह् च्च्हृद्गख् ्नद्दद्गज्ज् द्धड्डह्य ड्डद्यह्यश ड्ढद्गद्गठ्ठ ह्यद्गह्ल स्रशख्ठ्ठ ड्डह्य ह्लद्धद्ग श्चद्गह्द्बशस्र ख्द्धद्गठ्ठ ख्शद्वड्डठ्ठ द्बठ्ठ ह्लद्धद्ग शह्स्रद्गह् शद्ध ह्वश्चद्धद्गड्डक्ड्डद्य, ह्द्गक्शद्यह्वह्लद्बशठ्ठ ड्डठ्ठस्र ष्द्धड्डठ्ठद्दद्ग ख्शह्वद्यस्र ड्डश्चश्चद्गड्डह् शठ्ठ ह्लद्धद्ग ख्शह्द्यस्रज्ह्य ह्यह्लड्डद्दद्ग द्बठ्ठ ष्शद्वश्चद्यद्गह्लद्गद्यब् ठ्ठद्गख् ह्शद्यद्गज्ज्.
“राशि चक्र का यह चिह्न बहुत जल्दी अपना प्रभाव डालता है, क्योंकि उसके ग्रह यूरेनस और शनि हैं, जिनको गूढ़ विद्याओं के प्राचीन ज्ञाता स्मरणातीत काल से एक नये युग से सम्बन्धित मानते आये हैं। इस प्रभाव से सभ्यता का नियंत्रण करने वाले नियमों-कानूनों में भी पूरा परिवर्तन हो जाता है। लोगों का यह विश्वास है कि जब सूर्य राशिचक्र के इस विभाग में संक्रमण करने लगता है तो उसके प्रभाव से बड़े चकित करने वाले परिवर्तन, हलचल और क्रान्ति उत्पन्न होने लगते हैं। यह ‘कुम्भ युग’ अथवा ‘नवयुग’ इस बात का भी चिन्ह समझा जाता है कि इस युग के परिवर्तन, हलचल और क्राँतियों में स्त्रियाँ संसार के रंगमंच पर एक बिल्कुल नये रूप में उपस्थित होंगी।”
कीरो ने यह भी लिखा है कि - “यूरेनस एक ऐसा ग्रह है जो स्थूल पदार्थों के बजाय मनुष्यों के विचारों पर अधिक प्रभाव डालता है। इस सिद्धाँत को मान कर जब हम गत शताब्दी की घटनाओं पर एक सरसरी निगाह डालते हैं तो हमको स्पष्ट विदित होता है कि इस बीच में मनुष्यों के विचारों और विशेषतया स्त्रियों की स्थिति के संबंध में निस्संदेह बहुत बड़े परिवर्तन हो चुके हैं। हजारों वर्षों से स्त्रियाँ सभी देशों में पशु अथवा दासों की सी अवस्था में थीं और उनको अपने से सम्बन्ध रखने वाले कानूनों के निर्माण में भी बोलने का अधिकार न था। पर जब से यह ‘कुम्भ युग’ आरम्भ हुआ है (सन् 1762 से) तब से संसार के सभी देशों में स्त्रियों की स्थिति में जबर्दस्त परिवर्तन हो रहे हैं। चीन और जापान जैसे घोर रूढ़िवादी देशों में भी स्त्रियों के पुराने बन्धन टूट चुके हैं। टर्की में स्त्रियों के लिये ‘हरम’ के दरवाजे खोल दिये गये हैं और स्त्रियाँ पर्दा हटा कर सार्वजनिक स्थानों पर जाती हैं। फ्राँसीसी क्राँति में स्त्रियाँ मोरचों के पीछे पुरुषों के कन्धे से कन्धा मिलाकर लड़ी थीं। रूस की क्राँति में स्त्रियों ने बाकायदा अपनी एक पल्टन बना कर युद्ध में भाग लिया था। वर्तमान समय में महिला वैज्ञानिक, महिला डॉक्टर, महिला वकील और महिला ड्राइवर पर्याप्त संख्या में दिखलाई पड़ती हैं और वे अब मिट नहीं सकतीं। महिलाओं ने फ्राँस और इंग्लैंड के बीच के समुद्र को तैर कर पार किया, वे हवाई जहाज चलाती हैं और पुरुषों द्वारा किये जाने वाले समस्त पेशों में प्रवेश कर रही हैं।”
इन बातों का आशय यह नहीं कि लेखक इस प्रकार के परिवर्तन को पूर्णतः वाँछनीय या शुभ मानते हैं। उनका कहना है-”नवीन युग के प्रभाव से सार्वजनिक जीवन के समस्त विभागों में स्त्रियाँ सामने आयेंगी और पुरुषों का कोई भी समुदाय स्त्रियों के इस बढ़ाव को रोक नहीं सकेगा फिर चाहे इस प्रकार स्त्रियों के हाथ में शक्ति का जाना अच्छा साबित हो या बुरा!”
फिर भी कीरो का विश्वास है- “चूँकि कुम्भ राशि का चिन्ह ‘पानी ले जाने वाला’ है। इसलिये अन्त में इसके द्वारा पृथ्वी की सुख-समृद्धि की वृद्धि होगी, यह भली प्रकार फूले फलेगी और मानव जाति के समस्त विभागों में एक दूसरे के लिए विशेष प्रेम का भाव देखने में आयेगा।”
विश्व-युद्ध का होना अनिवार्य है-
‘कीरो’ के कथानुसार आगामी तीसरे महायुद्ध का कारण यहूदियों के राज्य की स्थापना होगा। उसका कथन है कि भगवान के आदेश को अमान्य करने के कारण यहूदी जाति ढाई-तीन हजार वर्ष से कष्ट भोगती रही है, फिर भी वह अभी कायम है और वर्तमान जगत में उसको एक प्रभावशाली स्थान प्राप्त है। यहूदियों को अर्थ व्यवस्था (फायनेंस) में विशेषज्ञ माना जाता है और वे युद्धों के संचालन के लिए सरकारों को करोड़ों रु. कर्ज देते रहते हैं। इसके साथ ही इस जाति वालो नें साहित्य, कला, विज्ञान के क्षेत्र में भी नाम कमाया है। वर्तमान समय के सर्वश्रेष्ठ वैज्ञानिक माने जाने वाले ‘ईन्सटीन’ यहूदी थे और जिन वैज्ञानिकों ने उनसे प्रेरणा लेकर एटम बम तैयार किया उनमें से भी कई यहूदी थे। ये वैज्ञानिक खास तौर से हिटलर के अत्याचारों के कारण जर्मनी से भाग कर अफ्रीका चले गये थे।
कीरो ने लिखा है कि- “यहूदी स्वभाव से नवीन आविष्कारों को करने की बजाय उनको सुसम्बद्ध रूप में प्रयोग में लाने में अधिक योग्य होते हैं। जिस प्रकार आज वे व्यापार, व्यवसायों को सुनियोजित रूप देते हैं, उसी प्रकार वे किसी दिन विभिन्न राष्ट्र और जातियों को एक सूत्र में संगठित करने में अपनी योग्यता को प्रदर्शित करेंगे, पर ऐसा होने के पहले यहूदियों की सम्पूर्ण जाति को संसार के सबसे बड़े महायुद्ध में फँसना पड़ेगा।”
आज कीरो की यह भविष्य-वाणी प्रत्येक व्यक्ति को सच्ची सिद्ध होती दिखाई पड़ रही है। कदाचित लोगों को हमारे कथन पर शीघ्र विश्वास न हो इसलिए हम ‘वर्ल्ड प्रीडिक्शन’ के शब्दों को यहाँ ज्यों का त्यों दे रहे हैं-
च्च््नह्य द्धद्ग (ढ्ढह्यह्ड्डद्गद्यद्बह्लद्गह्य) द्बह्य ह्लशस्रड्डब् ड्ड द्वड्डठ्ठ शद्ध श्चद्गड्डष्द्ग ह्ड्डह्लद्धद्गह् ह्लद्धड्डठ्ठ शद्ध ख्ड्डह्-द्धद्बह्य द्बठ्ठद्धद्यह्वद्गठ्ठष्द्ग द्बठ्ठ ह्लद्धद्ग द्गठ्ठस्र ख्द्बद्यद्य ड्ढद्ग ह्लश श्चह्द्गक्द्गठ्ठह्ल ख्ड्डह्. क्चद्गद्धशह्द्ग, द्धशख्द्गक्द्गह्, ह्लद्धद्बह्य ष्ड्डठ्ठ ह्लड्डद्मद्ग श्चद्यड्डष्द्ग, ह्लद्धद्ग ढ्ढह्यह्ड्डद्गद्यद्बह्लद्गह्य ड्डह्य ड्ड ह्ड्डष्द्ग ख्द्बद्यद्य ड्ढद्ग द्बठ्ठक्शद्यक्द्गस्र द्बठ्ठ ह्लद्धद्ग द्दह्द्गड्डह्लद्गह्यह्ल ष्शठ्ठद्धद्यद्बष्ह्ल ह्लद्धड्डह्ल द्धड्डह्य ब्द्गह्ल ड्ढद्गद्गठ्ठ द्मठ्ठशख्ठ्ठ ह्लद्धद्ग ह्द्गह्लह्वह्ठ्ठ ह्लश क्कड्डद्यद्गह्यह्लद्बठ्ठद्ग द्बह्य ख्द्धड्डह्ल ख्द्बद्यद्य ड्ढह्द्बठ्ठद्द ह्लद्धद्बह्य ड्डड्ढशह्वह्ल.ज्ज्
(क्कड्डद्दद्ग 156)
“चूँकि वर्तमान समय में इसराइल (यहूदी) युद्ध के बजाय शाँति के कर्त्ता बन गये हैं इसलिए अन्त में वे अपने प्रभाव का उपयोग युद्ध का अन्त करने के लिए करेंगे। पर ऐसा समय आने से पूर्व यहूदी जाति को एक ऐसे महासंग्राम में फँसना पड़ेगा जैसा आज तक कभी नहीं हुआ। इस युद्ध का कारण यहूदी जाति का पैलेस्टाइन में फिर से आकर बसना ही होगा।”
यहूदियों को इस बात का गर्व है कि उनके धर्मग्रन्थ में भावी घटनाओं की जो भविष्य वाणियाँ की गई हैं वे अभी तक पूर्णतः सत्य सिद्ध हुई हैं। इसलिये यह अन्तिम युद्ध की भविष्य वाणी भी अवश्य सिद्ध होगी, ऐसा उनका अटल विश्वास है। अब से एक हजार वर्ष पहले योरोपियन देशों के ईसाइयों की बड़ी-बड़ी सेनाओं ने जरुशलम को मुसलमानों के अधिकार से मुक्त कराने के लिए, पचासों वर्षों तक युद्ध किया था, जिसमें लाखों व्यक्ति धर्म के नाम पर मारे गये थे, पर उस समय जरुशलम का उद्धार न हो सका। कीरो के कथनानुसार इसका कारण यही था कि उस समय तक दैवी भविष्यवाणी के पूरा होने का समय पूरा नहीं हुआ था। पर अब जब वह समय आ पहुँचा तो जरुशलम विजय का लक्ष्य न होने पर भी सन् 1917 में वह इंग्लैंड के अधिकार में आ गया और उसके कुछ ही समय बाद यह घोषित कर दिया गया कि यहूदियों को वहाँ बसने का अधिकार और सुविधायें दी जायें। इसके अनुसार कार्यारम्भ होने पर सन् 1925 तक, जब ‘वर्ल्ड प्रीडिक्शन’ लिखी गई थी, डेढ़ लाख से अधिक यहूदी वहाँ जाकर बस चुके थे। सन् 1949 में वहाँ इसराइल राष्ट्र की स्थापना कर दी गई और अब वहाँ यहूदियों की संख्या 26 लाख हो गई है। अब वह राष्ट्र इतना मजबूत हो चुका है कि दो बार बड़े-बड़े अरब देशों को हरा चुका है।
कीरो की भविष्यवाणियों का महत्व हमको इस दृष्टि से अवश्य स्वीकार करना पड़ेगा कि उन्होंने सन् 1925 में जब कि यहूदियों की शक्ति नाम मात्र को ही थी, पैलेस्टाइन में उनके शासन की जड़ जम जाने और उसके एक शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में परिणत हो जाने के तथ्य को बड़े स्पष्ट और जोरदार शब्दों में प्रकट कर दिया था। फिर उन्होंने यह भी कह दिया कि तीसरा महायुद्ध यहूदी राष्ट्र की उन्नति के कारण ही आरम्भ होगा। यहाँ हम उनके शब्दों को ज्यों का त्यों दे रहे हैं :-
च्च्ढ्ढ ख्द्बद्यद्य ठ्ठशख् ह्यद्गह्ल शह्वह्ल ड्डह्य ड्ढह्द्बद्गद्धद्यब् ड्डह्य श्चशह्यह्यद्बड्ढद्यद्ग द्वब् ह्द्गड्डह्यशठ्ठह्य द्धशह् ह्यह्लड्डह्लद्बठ्ठद्द ह्लद्धड्डह्ल ह्लद्धद्ग ्नह्द्वड्डद्दद्गस्रस्रशठ्ठ ब्द्गह्ल ह्लश ष्शद्वद्ग ख्द्बद्यद्य ड्ढद्ग ड्ढह्शह्वद्दद्धह्ल ड्डड्ढशह्वह्ल ड्ढब् ह्लद्धद्ग ह्द्गह्लह्वह्ठ्ठ शद्ध छ्वह्वस्रड्डद्ध ड्डठ्ठस्र ढ्ढह्यह्ड्डद्गद्य ह्लश ह्लद्धद्गद्बह् ष्शह्वठ्ठह्लह्ब्.
ढ्ढठ्ठ ह्लद्धद्ग द्धद्बह्ह्यह्ल श्चद्यड्डष्द्ग क्कड्डद्यद्गह्यह्लद्बठ्ठद्ग ड्डठ्ठस्र ह्लद्धद्ग ह्यह्वह्ह्शह्वठ्ठस्रद्बठ्ठद्द ष्शह्वठ्ठह्लह्द्बद्गह्य ख्द्बद्यद्य ड्ढद्गष्शद्वद्ग ह्लद्धद्ग द्वशह्यह्ल द्धद्गह्ह्लद्बद्यद्ग ड्डठ्ठस्र शठ्ठद्ग शद्ध ह्लद्धद्ग ह्द्बष्द्धद्गह्यह्ल श्चह्शक्द्बठ्ठष्द्ग द्बठ्ठ ह्लद्धद्ग ख्शह्द्यस्र. रुद्बठ्ठद्गह्ड्डद्यह्य ड्डठ्ठस्र ह्ड्डह्द्ग द्वद्गह्लड्डद्यह्य ख्द्बद्यद्य ड्ढद्ग द्धशह्वठ्ठस्र ह्लद्धद्गह्द्ग द्बठ्ठ ड्डड्ढशह्वठ्ठस्रद्गठ्ठष्द्ग ड्डठ्ठस्र द्यड्डह्द्दद्ग स्रद्गश्चशह्यद्बह्लह्य शद्ध ष्शड्डद्य ड्डठ्ठस्र शद्बद्य ख्द्बद्यद्य ड्ढद्ग स्रद्बह्यष्शक्द्गह्द्गस्र द्बठ्ठ ह्लद्धद्बह्य श्चड्डह्ह्ल शद्ध ह्लद्धद्ग द्गड्डह्ह्लद्ध द्बठ्ठ द्बठ्ठद्गफ्द्धड्डह्वह्यह्लद्बड्ढद्यद्ग ह्नह्वड्डठ्ठह्लद्बह्लद्बद्गह्य.
्नह्य ह्लद्धद्ग ड्डठ्ठष्द्बद्गठ्ठह्ल ड्ढशह्वठ्ठस्रड्डह्द्बद्गह्य शद्ध क्कड्डद्यद्गह्यह्लद्बठ्ठद्ग शह्द्बद्दद्बठ्ठड्डद्यद्यब् द्गफ्ह्लद्गठ्ठस्रद्गस्र ह्लश च्च्ह्लद्धद्ग ह्द्बक्द्गह् शद्ध श्वद्दब्श्चह्लज्ज् ह्यश ख्द्बद्यद्य ढ्ढह्यह्ड्डद्गद्यद्बह्लद्गह्य ख्द्बह्लद्ध ह्लद्धद्गद्बह् ष्श-ख्शह्द्मद्गह्ह्य द्बठ्ठ क्कड्डद्यद्गह्यह्लद्बठ्ठद्ग शश्चद्गठ्ठ ह्वश्च श्वद्दब्श्चह्ल ख्द्धद्बष्द्ध द्धड्डह्य ड्ढद्गद्गठ्ठ ह्यश ष्द्यशह्यद्गद्यब् ड्डह्यह्यशष्द्बड्डह्लद्गस्र ख्द्बह्लद्ध ह्लद्धद्गद्बह् द्धद्बह्यह्लशह्ब् ह्यद्बठ्ठष्द्ग द्यशठ्ठद्द श्चड्डह्यह्ल ड्डद्दद्गह्य. ञ्जद्धद्बह्य स्रद्गक्द्गद्यशश्चद्वद्गठ्ठह्ल ख्द्बद्यद्य ड्डह्शह्वह्यद्ग ड्डठ्ठह्लड्डद्दशठ्ठद्बह्यद्व द्धह्शद्व ह्लद्धद्ग द्धशद्यद्यशख्द्गह्ह्य शद्ध ढ्ढह्यद्यड्डद्व ड्डठ्ठस्र ञ्जह्वह्द्मद्गब्, ड्ढड्डष्द्मद्गस्र ड्ढब् क्रह्वह्यह्यद्बड्ड ख्द्बद्यद्य द्गठ्ठस्रद्गड्डक्शह्वह् ह्लश ह्द्गष्ड्डश्चह्लह्वह्द्ग क्कड्डद्यद्गह्यह्लद्बठ्ठद्ग. ष्टद्धह्द्बह्यह्लद्बड्डठ्ठह्य ड्डठ्ठस्र ढ्ढह्यह्ड्डद्गद्यद्बह्लद्गह्य ख्द्बद्यद्य द्धद्बद्दद्धह्ल ह्यद्बस्रद्ग ड्ढब् ह्यद्बस्रद्ग द्बठ्ठ ह्लद्धद्बह्य ष्शठ्ठद्धद्यद्बष्ह्ल ख्द्धद्बष्द्ध ख्द्बद्यद्य स्रद्गक्द्गद्यशश्च द्बठ्ठह्लश ह्लद्धद्ग ख्ड्डह् शद्ध ख्ड्डह्ह्य.ज्ज्
“अब मैं जहाँ तक सम्भव है बिल्कुल संक्षेप में उन कारणों को उपस्थित करना चाहता हूँ जिनके आधार पर कि आरमागड्डन का युद्ध, जो अभी लड़ा जाने वाला है, यहूदियों के अपने देश में वापिस आने के कारण ही पैदा होगा।”
“सबसे पहली बात तो यह है कि पैलेस्टाइन और उसके आस पास के प्रदेश संसार के सबसे अधिक उपजाऊ और धन संपन्न भू-भाग बन जायेंगे। खनिज पदार्थ और बहुमूल्य धातुएँ बहुत बड़े परिमाण में वहाँ प्राप्त होने लगेंगी, कोयले और तेल के बड़े भंडार भी जो बहुत समय तक समाप्त न हो सकें, वहाँ पर मिल जायेंगे।”
“चूँकि पैलेस्टाइन की प्राचीन सीमाएं ‘मिस्र की नदी’ तक फैली हुई थीं इसलिये इसराइल अपने सहयोगियों की मदद से मिस्र में प्रवेश करने की चेष्टा करेगा, जो उनके इतिहास से प्राचीन समय से बहुत अधिक सम्बद्ध रहा है। यह घटना मुसलमानों में विरोध की भावना को भड़कायेगी और रूस की सहायता के बल पर टर्की पैलेस्टाइन पर फिर से अधिकार करने की कोशिश करेगा। इस युद्ध में जो ‘युद्धों का युद्ध’ होगा ईसाई और यहूदी कंधे से कंधा मिला कर लड़ेगा।”
इस उद्धरण में कीरो ने यहूदियों की पुनर्स्थापना तथा इसराइल राज्य की वृद्धि के विषय में जो कुछ कहा था वह पूरी तरह ठीक साबित हो रहा है। पैलेस्टाइन के एक भाग का शासनाधिकार यहूदियों को मिल गया और उन्होंने कुछ वर्षों में उसे प्रयत्न और साधनों से इतना विकसित बना दिया कि आस पास के मुसलमान देश सचमुच उससे द्वेष भाव रखने लगे और अन्त में उन्होंने मिलकर उसके खिलाफ युद्ध की घोषणा कर ही दी। आज यह तथ्य इतना स्पष्ट है कि अरब गणराज्य और इसराइल का संघर्ष होने पर समाचार पत्रों के लेखों में उसका कारण अरबों की यही द्वेष भावना बतलाई गई। 22 मई 1967 के ‘वीर अर्जुन’ में ‘मध्य पूर्व में क्या हो रहा है?’ शीर्षक लेख में कहा गया है :-
“यह तो है वर्तमान स्थिति, परन्तु इसे समझाने के लिये यह नितान्त आवश्यक है कि इसकी गहरी भूमिका में जाया जाए। असल में इस बात से कौन इन्कार कर सकता है कि अरबों को इसराइल की विद्यमानता फूटी आँखों नहीं भाती। वे उसका विनाश चाहते हैं। इसके लिये वे एक समय से दाव पेंच खेलते आ रहे हैं और यदि अब तक सफलता नहीं मिली तो इसलिये कि इसराइल कोई अशक्त, अकर्मण्य या भीरु देश नहीं है। वह हर दृष्टि से सशक्त है। उसकी जनता समृद्ध एवं सम्पन्न है। आर्थिक, सैन्य और वैज्ञानिक सभी क्षेत्रों में वह बड़े राष्ट्रों से टक्कर ले रहा है। वास्तव में उसने अपने जीवन के कुछेक वर्षों में ही ऐसे-ऐसे चमत्कार कर दिखाये हैं जिससे आश्चर्य होता है। उसकी जनता में जहाँ अपने धर्म के प्रति अगाध श्रद्धा और आस्था है वहाँ अपने देश और राष्ट्र के लिए जीवनोत्सर्ग करने की भावना भी बड़ी प्रबल है। यह बात अरब देशों के बारे में नहीं कही जा सकती। अरब स्वतः एक दूसरे से कटे हुये हैं और फिर वहाँ की जनता की दुर्दशा किसी से छिपी नहीं। आर्थिक दृष्टि से तो वे पिछड़े हैं ही, विज्ञान तथा अन्य क्षेत्रों में भी उनकी उन्नति इसराइल की तुलना में नगण्य है। इससे उनमें इसराइल के प्रति जलन होना स्वाभाविक है। अतः वे इसे नष्ट करना चाहते है। और इसके लिये प्रारंभ से ही तैयारियाँ करते आ रहे हैं।”
जब हम इस बात पर विचार करते हैं कि यह संघर्ष कब तक निर्णायक स्वरूप ग्रहण कर लेगा तो कीरो की भविष्य वाणियों के अनुसार उसका समय निश्चित रूप से आगामी दस पाँच वर्षों में ही जान पड़ता है। यहूदियों के धर्म ग्रंथों उनके मुख्य परिवर्तनों (छ्वह्वड्ढद्बद्यद्गद्ग ष्टब्ष्द्यद्ग) का युग ‘सात बार सत्तर’ अथवा 490 वर्ष का बतलाया गया है। कीरो ने बाइबिल के ‘डैनियल’ अध्याय के आधार पर प्रति 490 वर्षों के बाद यहूदी इतिहास की एक-एक महान घटना का वर्णन करते हुये बतलाया कि सन् 1980 में यहूदी जाति बहुत उन्नत, शक्तिशाली और प्रमुख पद ग्रहण कर लेगी। इस सम्बन्ध में ‘वर्ल्ड प्रीडिक्शन’ में लिखा है :-
च्च्ढ्ढठ्ठ 1980, ह्लद्धद्ग द्भद्गख्ह्य, शह् ड्डह्य ह्लद्धद्गब् ख्द्बद्यद्य ड्डद्दड्डद्बठ्ठ ड्ढद्ग ष्ड्डद्यद्यद्गस्र ढ्ढह्यह्ड्डद्गद्यद्बह्लद्गह्य ख्द्बद्यद्य द्धड्डक्द्ग द्वड्डस्रद्ग द्गठ्ठशह्द्वशह्वह्य ह्यह्लह्द्बस्रद्गह्य द्बठ्ठ ख्द्गड्डद्यह्लद्ध, ख्शह्द्यस्र श्चशह्यद्बह्लद्बशठ्ठ ड्डठ्ठस्र श्चशख्द्गह्. ...क्चद्गद्धशह्द्ग ह्लद्धद्बह्य स्रद्गह्यद्बह्द्गस्र ह्लद्बद्वद्ग ष्ड्डठ्ठ स्रड्डख्ठ्ठ ह्लद्धद्ग द्दह्द्गड्डह्ल ्नह्द्वड्डद्दद्गस्रस्रशद्व द्वह्वह्यह्ल ड्ढद्ग द्धशह्वद्दद्धह्ल.ज्ज्
“सन् 1980 में यहूदी अथवा उस समय वे जिस नाम से वह प्रसिद्ध होंगे, ‘इसराइल’ जाति के लोग सम्पत्ति, सांसारिक दर्जा और शक्ति में बहुत तरक्की कर चुके होंगे, पर इस इच्छित अवसर के आने से पहले ‘आरमागड्डन’ का महान युद्ध अवश्य लड़ा जायगा।”
एक नया धर्मः-
कीरो ने विश्व युद्ध की भविष्यवाणी की है कि आगामी युग में मजदूरों की प्रधानता होगी और ‘कम्यूनिज्म’ का सिद्धान्त ही उस युग का ‘धर्म’ बन जायगा। यह सिद्धान्त वर्तमान मजहबों से बहुत अधिक भिन्न है और इसका उद्देश्य यह है कि संसार में से गरीब-अमीर का भेद मिट जाय, कोई व्यक्ति बहुत अधिक धनवान या जायदाद, कारखानों, जमींदारी आदि का मालिक न रहे और राजा, बादशाह, सरदार, रईस आदि का नाम ही मिट जाय। इसका वर्णन करते हुए लिखा हैं-
च्च्ष्ठह्वह्द्बठ्ठद्द ह्लद्धद्ग ष्शद्वद्बठ्ठद्द ब्द्गड्डह्ह्य ह्लद्धद्ग द्बठ्ठद्धद्यह्वद्गठ्ठष्द्ग शद्ध ष्टशद्वद्वह्वठ्ठद्बह्यद्व ख्द्बद्यद्य ह्यश्चह्द्गड्डस्र द्यद्बद्मद्ग ड्डठ्ठ द्बठ्ठद्धद्गष्ह्लद्बक्द्ग द्धद्गक्द्गह् ह्लद्धह्शह्वद्दद्ध ड्डद्यद्य ष्शह्वठ्ठह्लह्द्बद्गह्य, ह्लद्धद्ग द्वशह्यह्ल द्धड्डठ्ठह्लड्डह्यह्लद्बष् स्रशष्ह्लह्द्बठ्ठद्गह्य ख्द्बद्यद्य ड्ढद्ग शश्चद्गठ्ठद्यब् श्चह्द्गड्डष्द्धद्गस्र ड्डठ्ठस्र ड्डड्ढह्यशह्ड्ढद्गस्र ड्ढब् ड्डद्यद्य ष्द्यड्डह्यह्यद्गह्य. क्रद्बष्द्ध द्वड्डठ्ठ ख्द्बद्यद्य द्दद्बक्द्ग ड्डख्ड्डब् ह्लद्धष्द्बह् ख्द्गड्डद्यह्लद्ध ड्डठ्ठस्र ख्शह्द्मद्गह्ह्य ख्द्बद्यद्य स्रद्बष्ह्लड्डह्लद्ग ह्लश द्मद्बठ्ठद्दह्य. स्शठ्ठह्य ड्डठ्ठस्र स्रड्डह्वद्दद्धह्लद्गह्ह्य शद्ध द्धद्बद्दद्धद्गह्यह्ल ख्द्बद्यद्य ड्ढद्गष्शद्वद्ग ह्यशष्द्बड्डद्यद्बह्यह्लह्य ड्डठ्ठस्र ह्लद्धद्ग द्यड्डठ्ठस्र ह्लद्धद्गब् द्बठ्ठद्धद्गह्द्बह्ल ह्लद्धद्गब् ख्द्बद्यद्य द्दद्बक्द्ग ह्लश ह्लद्धद्ग श्चद्गशश्चद्यद्ग. श्वक्द्गठ्ठ ह्लद्धद्ग ष्द्धह्वह्ष्द्ध ख्द्बद्यद्य द्धड्डक्द्ग ह्द्गक्शद्यह्वह्लद्बशठ्ठ ख्द्बद्यद्य द्बह्लह्यद्गद्यद्ध द्धह्शद्व ड्डद्यद्य श्चह्वद्यश्चद्बह्लह्य.ज्ज्
“अगले वर्षों में कम्यूनिज्म (साम्यवाद ) का प्रभाव समस्त देशों में एक संक्रामक ज्वर की तरह फैल जायगा। दुनिया में बड़े-बड़े विचित्र सिद्धान्तों का प्रचार खुले तौर पर किया जायगा और सब श्रेणियों के व्यक्ति उनको मान लेंगे। अमीर लोग खुशी से अपनी धन-सम्पत्ति को त्याग देंगे और गरीब बन जाएंगे। बादशाह मजदूरों के साथ बैठ कर रोटी खायेंगे और मजदूर बादशाहों पर हुक्म चलायेंगे। बड़े-बड़े लोगों के पुत्र और पुत्रियाँ साम्यवादी बन जाएंगे, अपने बाप-दादों से प्राप्त जमीन जायदाद को जनता में बाँट देंगे। ईसाई धर्म में भी बड़ी क्राँति हो जायगी और धर्म मंच से बड़े अजीब सिद्धान्तों का प्रचार किया जाने लगेगा।”
आज संसार भर में और हमारे देश में भी मजदूर आन्दोलन जिस गति से फैलता जाता है और शक्तिशाली बन रहा है उसे देखकर ‘कीरो’ के कथन की सत्यता में कोई सन्देह नहीं कर सकता। उसने जिस समय कम्यूनिज्म की सफलता की यह भविष्यवाणी लिखी थी उस समय यद्यपि रूस की बोलशेविक क्राँति हो चुकी थी और कम्यूनिस्ट शासन की नींव पड़ चुकी थी, तो भी उसकी नैया भँवरों में पड़ी हुई थी और किसी भी समय अतल जल में डूब सकती थी। पर कीरो ने अनुभव किया कि यह परिवर्तन युग के अनुकूल है, कुम्भ-युग का लक्षण दबे हुओं को उभारना है, वह अवश्य ही रत्नजटित मुकुटों और स्वर्ण सिंहासनों को मिटा कर सबको समानता के फर्श पर ला बिठायेगा। इसलिये उसने निःसंकोच भाव से संसार में समाजवादी शासन के आगमन की घोषणा कर दी। इसका अर्थ यह नहीं कि वह कम्यूनिज्म या समाज वाद का अनुयायी था। इसके विपरित जहाँ तक हमको उसके लेखों से पता चलता है वह स्वयं भी वर्तमान समय की ‘उच्चश्रेणी’ वालों से संबंधित था, उनके समान ही वैभवयुक्त जीवन व्यतीत करता था, पर उसे अपने ज्योतिष ज्ञान द्वारा जो प्रतीत हुआ उसे प्रकट कर देना उसने अपना कर्तव्य समझा। फिर भी उसने यह आशा प्रकट की है कि यह पूँजीवाद और साम्यवाद की कलह थोड़े दिनों की है। जब एक बार पूरी तरह संघर्ष होकर शाँति हो जायगी तो स्वभावतः ऐसी सामाजिक प्रणाली का प्रचार होगा, जो किसी के विरुद्ध न होकर सबके विकास और प्रगति में सहायक सिद्ध होगी।
यह कहने की आवश्यकता नहीं कि ‘कीरो’ ने अब से 42 वर्ष जो भविष्यवाणी की थी वह आज अक्षरशः ठीक साबित हो, यह सम्भव नहीं। यह बात केवल कीरो के विषय में ही नहीं प्रत्येक भविष्यवक्ता के सम्बन्ध में कहनी पड़ती है। इसका कारण यही है कि कोई भविष्य वक्ता इतने समय पहले दिव्य-दर्शन के रूप में जो कुछ देखता है, बीच में उस पर किन्हीं नवीन विशेष शक्तियों का प्रभाव पड़ जाता है और उनमें कुछ परिवर्तन होता जान पड़ता है। उदाहरण के लिए कीरो ने इसराइल का विरोध करने वालों का मुखिया टर्की को लिखा पर अब वह कार्य मिस्र के द्वारा पूरा हो रहा है। पहले तो मिस्र एक प्रकार से टर्की के एक प्रदेश की तरह ही था और अब से 40-50 वर्ष पहले भी वह टर्की के नेतृत्व के नीचे ही था। पर इधर नासर का उदय होने से मिस्र का दर्जा बढ़ गया और वही नेता के रूप में सामने आया। पर इससे यहूदियों के सम्बन्ध में बाइबिल की प्राचीन भविष्यवाणी में कोई अन्तर नहीं पड़ता।
यही बात भारत सम्बन्धी भविष्यवाणी की है। कीरो ने लिखा है अन्तिम विश्वयुद्ध के अवसर पर अंग्रेज भारत को स्वतंत्र कर देंगे, वह मुसलमानों और हिन्दुओं के बीच दो भागों में बँट जायगा। पर जो कार्य 1965 से 1975 के बीच होने को था, वह महात्मा गाँधी की आत्म शक्ति और द्वितीय महासमर में अंग्रेजों के निर्बल हो जाने से 25 वर्ष पूर्व ही हो गया। इस प्रकार समय में अन्तर पड़ जाने पर भी कीरो ने भारत के बँटवारे की जो बात 22 वर्ष पूर्व लिख दी उसका महत्व स्वीकार करना ही चाहिए।
कीरो की मुख्य भविष्यवाणी तो यही है कि सन् 1980 से पहले यहूदियों के अस्तित्व के आधार पर एक महाभयंकर विश्वयुद्ध हो जायगा और उसके बाद एक नवयुग प्रारम्भ होगा, जिसमें सबके साथ सहानुभूति और मानवता का व्यवहार किया जायगा।
रोमा रोलाँ यद्यपि फ्राँस के निवासी थे, पर उनमें विश्व बन्धुत्व की भावना की इतनी वृद्धि हो चुकी थी कि उनको मानव मात्र अपने भाई की तरह प्रतीत होते थे। वे रंग, जाति, मजहब और राष्ट्रीयता को उतना महत्व नहीं देते थे जितना कि मानवता को। यही कारण है कि भारतवर्ष को अपने न्यायपूर्ण अधिकारों- स्वाधीनता के लिये संघर्ष करते देख कर उनको यहाँ वालों से सहानुभूति हो गई। यद्यपि भारतवासियों की गिनती काली जातियों में की जाती थी और उनके स्वामी गोरे थे, पर रोमा रोलाँ ने इस बात पर ध्यान न देकर सदैव भारत का पक्ष समर्थन किया और अंग्रेजों को उनके अन्यायों, दमन नीति और स्वार्थपरता के लिए फटकारा। वे एक सच्चे दार्शनिक थे और आत्मा की सत्ता में विश्वास रखते हुए सुख-दुख को समान मानते थे और निर्माण तथा नाश को प्रकृति की लीला समझ कर कभी क्षुब्ध नहीं होते थे। इन गुणों के कारण उनको ऋषियों जैसी दूर-दृष्टि भी प्राप्त हो गई थी जिससे वर्तमान घटनाओं के आधार पर आगामी संभावनाओं का ठीक अनुमान लगा सकते थे। इसी शक्ति से उन्होंने अबसे पचास-साठ वर्ष पहले योरोपियन सभ्यता के रुख को देख कर जो भविष्यवाणी की थी वह हमको आज ज्यों की त्यों यथार्थ होती जान पड़ती है। उन्होंने लिखा था-
ढ्ढ ड्ढद्गद्यद्बद्गक्द्ग ह्लद्धड्डह्ल ख्द्ग ड्डह्द्ग ड्ढह्वह्ल ड्डह्ल ह्लद्धद्ग ड्ढद्गद्दद्बठ्ठठ्ठद्बठ्ठद्द शद्ध ड्ड द्दह्द्गड्डह्ल ष्ड्डह्लड्डह्यह्लह्शश्चद्धद्बष् द्गह्ड्ड द्बठ्ठ ख्द्धद्बष्द्ध ह्यद्धड्डद्यद्य स्रद्बह्यड्डश्चश्चद्गड्डह् ड्ड द्दह्द्गड्डह्ल श्चड्डह्ह्ल शद्ध शह्वह् शद्यस्र ख्द्धद्बह्लद्ग ष्द्बक्द्बद्यद्बभ्ड्डह्लद्बशठ्ठ ख्द्बह्लद्ध द्बह्लह्य क्द्बह्ह्लह्वद्गह्य, द्बह्लह्य ड्ढद्गड्डह्वह्लब्, द्बह्लह्य ह्वद्दद्यद्बठ्ठद्गह्यह्य, ड्डठ्ठशह्लद्धद्गह् ड्डद्दड्डद्बठ्ठ ह्यद्धड्डद्यद्य द्धद्यशह्वह्द्बह्यश्च, ड्ड ठ्ठद्गख् शह्स्रद्गह् ह्यद्धड्डद्यद्य ह्लड्डद्मद्ग ड्ढद्बह्ह्लद्ध. ढ्ढ ड्डद्व ठ्ठशह्ल ड्डठ्ठफ्द्बशह्वह्य द्धशह् ह्लद्धद्ग स्रद्गह्यह्लद्बठ्ठद्बद्गह्य शद्ध द्यद्बद्धद्ग. ञ्जद्धद्गब् ड्डह्द्ग द्बठ्ठद्धद्बठ्ठद्बह्लद्ग. क्चह्वह्ल ह्लद्धशह्यद्ग शद्ध शह्वह् श्वह्वह्शश्चद्ग ड्डह्द्ग ठ्ठशह्ल ह्यश. ्नठ्ठस्र ह्लद्धशह्यद्ग ह्लद्धड्डह्ल ड्डह्द्ग ह्लड्डद्मद्बठ्ठद्द ड्ढद्बह्ह्लद्ध ड्डह्ल श्चह्द्गह्यद्गठ्ठह्ल ह्यद्धड्डद्यद्य द्धड्डक्द्ग ह्लश द्धड्डष्द्ग द्धद्बद्गह्ष्द्ग ड्डह्यह्यड्डह्वद्यह्लह्य.
(क्रशद्वड्डद्बठ्ठ क्रशद्यद्यड्डठ्ठस्र)
“मेरा विश्वास है कि एक महा-भयंकर युग का आरम्भ हो रहा है जिसमें हमारी प्राचीन ‘श्वेत सभ्यता’ का एक बड़ा भाग उसके गुणों और अवगुणों सहित नष्ट हो जायगा। फिर एक नई सभ्यता का उदय होगा, एक नये समाज की रचना होगी। मुझे जीवन के बनने और बिगड़ने की चिन्ता नहीं है, क्योंकि वह अविनाशी है। पर हमारे अन्य योरोपियन भाई इस प्रकार का विचार नहीं रखते। इसलिए जो लोग इस समय जन्म ले रहे हैं उनको भीषण विपत्तियों का सामना करना पड़ेगा।”
जिस समय ये शब्द लिखे गये थे उस समय योरोप समस्त संसार का स्वामी बना हुआ था। अंग्रेजों का साम्राज्य पृथ्वी भर में फैला हुआ था। फ्राँस, जर्मनी, हालैंड आदि ने भी अन्य महाद्वीपों में अपने देशों से कई-कई गुने बड़े उपनिवेशों पर अधिकार जमा रखा था। समस्त उद्योग-धन्धे योरोपियनों के अधिकार में ही थे और इसलिये संसार-भर की दौलत उनके यहाँ खिंची जा रही थी। वे ही विद्या, ज्ञान-विज्ञान में अग्रगामी माने जाते थे और इस आधार पर एशिया, अफ्रीका के निवासियों को ‘सभ्य’ बनाने, उनका मार्गदर्शन करने का दावा करते थे। उन्होंने नये-नये आविष्कारों द्वारा अपने सैनिक शक्ति बहुत बढ़ा रखी थी और उनके बल पर वे दूरवर्ती देशों और जातियों को अपने अंकुश में रख सकने में समर्थ थे। पर अपने ही दोषों के कारण स्थिति बदल गई और योरोप का पतन होने लग गया।
ज्ञानी लोगों का कथन है कि किसी का समय एक सा नहीं रह सकता। संसार परिवर्तनशील है और जो व्यक्ति या समाज कालचक्र के अनुकूल व्यवहार करने को तैयार रहता है वही पर्याप्त समय तक उच्च पद पर टिक सकता है। पर जो कोई शक्ति, सम्पत्ति, सम्मान को पाकर अहंकार या स्वार्थ के वशीभूत हो जाता है वह शीघ्र ही नीचे गिरता दिखाई पड़ता है। यही बात योरोप के साथ हुई। उसने श्वेत जातियों के अतिरिक्त काली, पीली, भूरी लाल सभी जातियों को अपने से नीचा और अपना शिकार समझा और उनकी भलाई, सुख-दुःख का ख्याल न करके अपने स्वार्थ को ही प्रधान रखा। नतीजा यह हुआ कि जैसे-जैसे उन जातियों में जागृति आती गई, वे संगठित और शक्तिसम्पन्न बनती गई, वैसे-वैसे ही योरोपियनों के विरुद्ध उनका विरोध भाव प्रकट होने लगा। दूसरी बात यह कि- जिन लोगों में स्वार्थ की भावना बढ़ जाती है और जो दूसरों को लूटमार कर पेट भरने को अपना उद्देश्य बना लेते हैं उनमें आपस में कलह उत्पन्न हो जाती है और वे परस्पर में ही टकराने लगते हैं। इस प्रकार एक तरफ तो योरोप के विभिन्न देश आपस में लड़-झगड़ कर अपनी शक्ति नष्ट करने लगे और दूसरी तरफ उनके अधीन देशों की प्रजा विरोधी बन कर उनसे संघर्ष करने लगी। परिणाम यह हुआ कि उनका विस्तार और अधिकार दिन पर दिन कम होने लगा और अधिकाँश अधीनस्थ देश और उपनिवेश स्वाधीन हो गये। इस बात की भी चेतावनी विद्वान उसी समय देने लग गये थे। एक प्रसिद्ध दार्शनिक पाल रिचार्ड ने एशिया की समस्या पर विचार करते हुये सन् 1915 के लगभग लिखा था-
ञ्जद्धद्गह्द्ग द्बह्य ठ्ठश द्यशठ्ठद्दद्गह् ड्डठ्ठब् स्रशह्वड्ढह्ल ह्लद्धड्डह्ल ्नह्यद्बड्ड ख्द्बद्यद्य ह्यशशठ्ठ द्धह्द्गद्ग द्धद्गह्ह्यद्गद्यद्ध द्धह्शद्व ह्लद्धद्ग ख्द्गड्डद्मठ्ठद्बठ्ठद्द ष्द्यड्डख्ह्य शद्ध श्वह्वह्शश्चद्ग. ञ्जद्धद्ग शठ्ठद्यब् ह्नह्वद्गह्यह्लद्बशठ्ठ द्बह्य, ख्द्धड्डह्ल द्मद्बठ्ठस्र शद्ध द्धह्द्गद्गस्रशद्व ख्द्बद्यद्य ह्यद्धद्ग द्दद्गह्ल-ह्लद्धद्ग द्धह्द्गद्गस्रशद्व ख्द्धद्बष्द्ध ह्लद्धद्ग ह्लद्बस्रद्ग ड्ढह्द्बठ्ठद्द ड्डठ्ठस्र ह्लड्डद्मद्गह्य ड्डख्ड्डब्, शह् ह्लद्धद्ग ह्यद्गष्ह्वह्द्ग, श्चद्गह्द्वड्डठ्ठद्गठ्ठह्ल शठ्ठद्ग ख्द्धद्बष्द्ध ष्शद्वद्गह्य द्धह्शद्व ह्लद्धद्ग ह्यशह्वद्य, द्धह्शद्व ह्लद्धद्ग ह्यद्गद्यद्ध स्रद्गह्लद्गह्द्वद्बठ्ठड्डह्लद्बशठ्ठ, ह्लद्धद्ग ह्द्गड्डद्य द्धह्द्गद्गस्रशद्व शद्ध द्दह्द्गड्डह्लठ्ठद्गह्यह्य.
(क्कड्डह्वद्य क्रद्बष्द्धड्डह्स्र)
“अब इस बात में कुछ भी सन्देह नहीं कि एशिया शीघ्र ही योरोप के दिन पर दिन कमजोर होते जाने वाले पंजों से अपने को छुड़ा लेगा। प्रश्न केवल यही है कि वह किस तरह की स्वाधीनता प्राप्त करेगा? क्या वह स्वाधीनता ऐसी होगी जो ज्वार के साथ आती है और उसी के साथ पीछे लौट जाती है। अथवा ऐसी स्थायी और मजबूत स्वाधीनता होगी जो कि आत्मा से, अपने आँतरिक दृढ़ निश्चय से प्राप्त होती है और वास्तविक स्वतन्त्रता और महानता के नाम से पुकारी जाती है।”
भारतवर्ष के स्वाधीनता संघर्ष को देख कर भी उन्होंने ऐसा ही सांत्वना पूर्ण सन्देश दिया था। भारतवर्ष को संबोधित करके उन्होंने कहा था-
॥शख् ख्द्बद्यद्य ह्लद्धब् द्धद्गह्लह्लद्गह्ह्य ड्ढद्ग ड्ढह्शद्मद्गठ्ठ? ञ्जद्धद्गब् ख्द्बद्यद्य द्धड्डद्यद्य शद्ध ह्लद्धद्गद्वह्यद्गद्यक्द्गह्य ख्द्धद्गठ्ठ ह्लद्धद्ग द्धड्डठ्ठस्रह्य शद्ध ह्लद्धब् द्वड्डह्यह्लद्गह्ह्य ख्द्धश द्वड्डस्रद्ग ह्लद्धद्गद्व ह्यश द्धद्गड्डक्ब्, ड्ढद्गष्शद्वद्ग ह्लशश ख्द्गड्डद्म ह्लश ह्द्गह्लड्डद्बठ्ठ ह्लद्धद्गद्व.
“तेरे बन्धन किस प्रकार टूटेंगे? जब कि तेरे मालिकों के हाथ, जिन्होंने उन्हें इतना भारी बनाया है, बहुत कमजोर हो जायेंगे और उनको सँभाल न सकेंगे तो अपने आप टूट कर गिर जायेंगे।”
जैसा इन उद्धरणों से प्रकट होता है- योरोप के कमजोर पड़ने और उच्च पद से पतित होने का मुख्य कारण स्वार्थपरता की दूषित भावना ही है। भगवान ने उसे जो उच्च पदवी प्रदान की थी यदि उसका सदुपयोग करता और पिछड़े हुये अथवा किसी कारणवश निर्बल देशों को प्रगतिशील बना कर संसार में साम्यावस्था लाने की कोशिश करता तो वह और भी उत्कर्ष को प्राप्त हो सकता था। पर उसने विज्ञान के प्रकाश से आलोकित इस युग में भी वही नीति अपनाई जो मिस्र, चैल्डिया, बैबिलोनिया, यूनान, रोम, टर्की आदि के साम्राज्यवादियों ने प्राचीन काल में अपनायी थी। ये सब देश समय-समय पर संसार के प्रधान पद पर विराजमान हुये और कुछ समय पश्चात किसी विशेष शक्तिशाली के आक्रमण से पराभूत होकर नीचे गिर पड़े। उनके पतन का कारण भी यही था कि उन्होंने अपने उत्थान काल में दूसरों को लूटने-खसोटने, दास बनाने, अपनी शान शौकत बढ़ाने में ही अपनी शक्ति खर्च की। सबको अपने समान ही मनुष्य समझ कर उनके कल्याण की चेष्टा कभी नहीं की। यही नीति इस समय के साम्राज्यवादियों ने अपनायी है। उन्होंने कभी इस ढंग से काम नहीं किया जिससे उनके अधीनस्थ लोग उन्हें अपना सच्चा हितैषी समझें और उनके साथ हृदय से सहयोग करें। यही कारण है कि जब उन पर किसी प्रकार की आपत्ति आई, किसी बलवान शत्रु ने आक्रमण किया तो बजाय इसके कि उनका अपने अधीनस्थ देशों से सहायता मिलती उल्टा उसके विरोध का खटका बना रहा और बहुत सी शक्ति उसमें भी फँसी रही।
इन सब बातों का यही परिणाम हुआ कि आज हम रोमा रोलाँ की इतने वर्ष पहले की गई भविष्यवाणी को कार्यरूप में परिणत होता देख रहे हैं। इस बीच में दो बार महायुद्ध में करोड़ों यूरोपवासी अकाल में ही मारे गये और दस-बीस करोड़ ने घायल होकर अथवा सर्वस्व नष्ट हो जाने से तरह तरह के कष्ट सहे। ऐसे ही आचरणों के फलस्वरूप हिटलर जैसे दानवी स्वभाव वाले का प्रादुर्भाव हुआ जिसने समस्त महाद्वीप में उथल-पुथल मचा दी और स्वयं नष्ट होकर भी बड़े-बड़े साम्राज्यों की कब्र खोद दी।
अब योरोप और अमरीका ने एटम और हाइड्रोजन बम के रूप में ऐसा हथियार खोज निकाला है जो उनके ही नाश करने के लिये मुँह फाड़े खड़ा है। जिस समय यह अस्त्र निकाला गया था और इसका प्रयोग करके दो दिन में ही जापान को पदावनत कर लिया था, उस दिन तो गोरे लोग बड़े प्रसन्न थे कि अब तो हमने समस्त संसार को अपनी मुट्ठी में कर लिया और इशारे पर नचाने का उपाय प्राप्त कर लिया। पर आज सब राष्ट्र उसके भय से काँप रहे हैं। एटम शक्ति का सदुपयोग कर के अपरिमित लाभ भी उठाया जा सकता है और दुरुपयोग द्वारा अपना गाल खुद ही काटा जा सकता है। इसी तथ्य को समझ कर इंग्लैंड के प्रसिद्ध साम्यवादी नेता श्री बरट्रैण्ड रसल ने एक विशाल जन समुदाय के सामने कहा था -
ढ्ढ ड्डश्चश्चद्गड्डद्य ड्डह्य ड्ड द्धह्वद्वड्डठ्ठ ड्ढद्गद्बठ्ठद्द ह्लश द्धह्वद्वड्डठ्ठ ड्ढद्गद्बठ्ठद्दह्य: ह्द्गद्वद्गद्वड्ढद्गह् ब्शह्वह् द्धह्वद्वड्डठ्ठद्बह्लब् ड्डठ्ठस्र द्धशह्द्दद्गह्ल ह्लद्धद्ग ह्द्गह्यह्ल. ढ्ढद्ध ब्शह्व ष्ड्डठ्ठ स्रश ह्यश, ह्लद्धद्ग ख्ड्डब् द्बह्य शश्चद्गठ्ठ ह्लश ड्ड ठ्ठद्गख् श्चड्डह्ड्डस्रद्बह्यद्ग, द्बद्ध ब्शह्व ष्ड्डठ्ठ ठ्ठशह्ल , ठ्ठशह्लद्धद्बठ्ठद्द द्यद्बद्गह्य ड्ढद्गद्धशह्द्ग ब्शह्व ड्ढह्वह्ल ह्वठ्ठद्बक्द्गह्ह्यड्डद्य स्रद्गड्डह्लद्ध.
“मैं एक मानव की हैसियत से अन्य मानवों से वह कहना चाहता हूँ कि अपने मनुष्यत्व को याद रखो और सब कुछ भूल जाओ। अगर तुम ऐसा कर सके तो तुम्हें एक नये स्वर्ग का मार्ग मिल जायेगा, अगर तुम ऐसा न कर सके तो तुम्हारे सामने विश्वव्यापी मृत्यु-प्रलय के सिवाय और कुछ नहीं है।
यह बरट्रैण्ड रसल की प्रथम चेतावनी नहीं है। वह गत 50 वर्ष से निरन्तर योरोपियन सरकारों को इस प्रकार के सर्वनाश की चेतावनी देते आये हैं और इसके लिये तरह तरह के कष्ट, जुर्माना, जेल की सजा आदि सहन कर चुके हैं। 10 जुलाई सन 1923 को उन्होंने अमरीका के ‘नेशन’ नामक पत्र में प्रकाशित कराया था-
“जब से संसार में सभ्यता का उदय हुआ है, तब से कला कौशल और साहित्य की जितनी उन्नति हुई है उसका मुख्य उत्पत्ति स्थान मैडीटेरेनियन (भूमध्य सागर ) के आस पास का प्रदेश (यूनान, इटली मिस्र आदि )रहा है। पर मालूम पड़ता है कि योरोप ने इस दशा को बदलने का निश्चय कर लिया है और वह चाहता है कि सभ्यता का यह प्राचीन घर असभ्य और जंगली लोगों का निवास स्थान बन जाय। इस इरादे के साथ योरोप बराबर अपने सर्वनाश की ओर बढ़ रहा है। उसके भाग्य में ऐसा ही लिखा हुआ है और किसी की शक्ति नहीं जो उसे इस रास्ते से लौटा कर नष्ट होने से बचा सके।”
इस समय योरोप के ऊपर जो संकट के बादल घहरा रहे हैं और उसकी समस्त महानता के नष्ट-भ्रष्ट होने के लक्षण प्रकट हो रहे हैं। उसका कारण उसके भीतर उत्पन्न हो गये अहंकार, फूट, स्वार्थपरता के दोष ही हैं। उन्होंने अपनी सामयिक सफलता से घमण्ड में आकर के अन्य देशों को तुच्छ समझ लिया, इससे आज स्वयं उनको तुच्छ बनना पड़ रहा है। इसी अहंकार के कारण वे आपस में भी अपने को दूसरे से बड़ा मानने लगे, जिससे उनमें कलह होने लगी और जो शक्ति निर्माणकारी कार्यों में खर्च होती वह आपस की बर्बादी में लगने लगी। इसी प्रकार यदि वह एशियाई और अफ्रीकी देशों के साथ इतनी अधिक स्वार्थपरता का व्यवहार न करता तो अभी सौ-पचास वर्ष और अपने प्रधान पद पर कायम रह सकता। उन्होंने विज्ञान की उन्नति को भी संसार की सच्ची प्रगति में लगाने के बजाय धन कमाने और नाश के उपाय ढूँढ़ने में लगा दिया। इस प्रकार एक नहीं अनेक कारण इस समय योरोप को निगल जाने के लिये तैयार बैठे हैं और जैसा बरट्रैण्ड रसल ने कहा है उसके नाश होने को कोई रोक नहीं सकता।
“यहूदी लोग जगत्कर्त्ता की योजना को प्रकट करने के लिये एक विशिष्ट जाति की तरह हैं, यह बात इस जाति के इतिहास पर निष्पक्ष भाव से विचार करने वाले किसी व्यक्ति को विदित हो सकती हैं। ऐसा क्यों है? इसका उत्तर यही दिया जा सकता है कि भगवान की दैवी योजना का मुख्य उद्देश्य मानव जाति का विकास है और इसके लिये उसने यहूदियों को ही चुना है। जिस प्रकार सौर परिवार के नवग्रहों में से केवल पृथ्वी को ही जीव विकास के विशेष उद्देश्य की पूर्ति के लिये चुन लिया गया है, इसी प्रकार इस बात का भी कोई कारण नहीं बतलाया जा सकता है कि भगवान ने अपने अगम्य अभिप्राय की पूर्ति के लिये इसी एक जाति को क्यों चुना? ‘बाइबिल’ में कहा गया है कि भगवान ने तुमको पृथ्वी तल पर निवास करने वाले समस्त मनुष्यों में से एक विशेष जाति के रूप में चुना है। इसका कारण यह नहीं है कि तुम अन्य जाति वालों की अपेक्षा अधिक संख्या में हो वरन् इसका कारण यह है कि भगवान तुमको प्यार करते हैं और उस वचन को पूरा करना चाहते हैं जो उन्होंने तुम्हारे पूर्वजों को दिया था। ‘बाइबिल’ के अतिरिक्त हम अन्य जातियों के इतिहास लेखकों की रचनाओं से भी जान सकते हैं कि यहूदी जाति अति प्राचीन काल से है, उनके पूर्वज इब्राहीम चैल्डिया देश के ‘उर’ नामक स्थान के निवासी थे। मिस्र वालों ने आक्रमण करके उनको दास बना लिया और चार सौ वर्ष उनको उसी स्थिति में काटने पड़े। अन्त में छुटकारा पाकर उन्होंने पैलेस्टाइन का अधिकार प्राप्त किया और वहाँ जरुशलम का नगर बसाया। उस काल में ऐसे बादशाह (शाह सलैमान आदि) हुए जिनके नाम और कर्मों का वर्णन उस युग की अन्य जातियों के कीर्तिस्तम्भों पर खुदा हुआ मिलता है।”
एक यहूदी लेखक की पुस्तक का उपर्युक्त उद्धरण बतलाता है कि किस प्रकार यहूदी लोग अपने को संसार की अन्य जातियों से उच्च और श्रेष्ठ मानते है और दूसरों के साथ व्यवहार में उस भाव को प्रकट करने में भी संकोच नहीं करते। वे बात का प्रमाण देते हैं कि उनकी जाति का मुख्य पुरुष जोसफ मिस्र का शासक बन गया था, फिर हजरत मूसा के नेतृत्व में उनको वहाँ से बहिष्कृत होना पड़ा। इसके पश्चात सुलैमान ने जरुशलम में प्रथम मन्दिर बनाया और शेवा की रानी तथा अन्य प्रमुख व्यक्तियों ने उसकी महानता को स्वीकार किया।
यह भी कहा गया है कि परमात्मा ने जरुशलम के मन्दिर का नक्शा अनेक वर्ष पहले आकाश में दिखला दिया था और बाद में सुलैमान ने उसी के अनुसार उसका निर्माण कराया। दैवी आदेश के अनुसार यहूदी जाति के व्यक्तियों को बारह राशियों के आधार पर बारह फिर्कों में बाँट दिया गया था। जरुशलम के मन्दिर में बारह फिर्कों के लिये बारह विभाग थे। बीच के मुख्य ‘हाल’ में ‘सर्वोच्च पुजारी’ बैठता था जिसकी छाती पर बारहों राशियों के प्रतीक के रत्नों से जड़ा एक तमगा लटकता रहता था।
बाइबिल के प्राचीन भाग (ओल्ड टेस्टामेंट ) में यहूदी जाति के सम्बन्ध में अनेक भविष्यवाणियाँ दी गई हैं जिनमें यह संकेत दिया गया कि इस जाति ने परमात्मा के एक आदेश को अमान्य किया जिसके फलस्वरूप उनका पैलेस्टाइन का राज्य नष्ट हो गया और उन्हें अपनी जीवन-रक्षा और निर्वाह के लिये संसार के अन्य देशों पर निर्भर रहना पड़ा। यहूदी लेखकों का मत है कि यह प्रक्रिया यद्यपि यहूदियों के लिये महा कष्ट कारक थी, पर इसमें परमात्मा का उद्देश्य यह भी था कि विभिन्न देशों में जाकर यहूदी लोग सभ्यता तथा संस्कृति का प्रचार करें और अपने उद्योग से उन देशों के विकास में सहयोग करें। यद्यपि अंग्रेजी के महान साहित्यकार शेक्सपीयर के एक नाटक के कारण यहूदी योरोप भर में कंजूस और शोषण कर्ता प्रसिद्ध हो गये हैं, पर उनके व्यापार कुशल तथा उपयोगी होने से इनकार नहीं किया जा सकता। भारतवर्ष के औद्योगिक विकास में जो स्थान मारवाड़ी जाति का है और जिस प्रकार निजी रहन सहन में कंजूस मशहूर होने पर भी वे भारतवर्ष के व्यावसायिक और औद्योगिक विकास के मुख्य आधार बने हुए हैं, उसी प्रकार यहूदियों ने योरोप अमरीका के विभिन्न स्थानों में पहुँच कर तरह-तरह के व्यवसायों और उद्योग धन्धों की स्थापना तथा वृद्धि की इसे मानने से इनकार नहीं किया जा सकता।
इस प्रकार अपने मूल निवास स्थान के छिन जाने से यहूदी एक अन्तर्राष्ट्रीय जाति बन गये। वे रुपये के लेन−देन और बैंक व्यवसाय में स्वभावतः ही निपुण थे, इसलिये वे जहाँ गये उन्होंने वहाँ की अर्थ व्यवस्था को अधिकाँश में अपनी मुट्ठी में कर लिया। पर चूँकि उन्होंने अपनी पुरानी जातीयता को नहीं त्यागा और वे विभिन्न देशों में रहने पर भी अपने को वहाँ के पक्के निवासी न बना सके, इसलिये रुपया पा जाने पर भी कहीं उनको उच्च नागरिक सम्मान प्राप्त न हो सका।
जर्मनी के डिक्टेटर हिटलर ने यहूदियों के साथ जो अमानुषिक व्यवहार किया और उनके ऊपर जोर-जुल्म का पहाड़ ढाह दिया, उसके लिये वह संसार भर में बदनाम है। पर इसका मूल कारण क्या था यह बहुत कम लोगों को मालूम है। जर्मनी में यहूदियों की संख्या बहुत अधिक थी और बड़े-बड़े कारबार तथा बैंक आदि उनके अधिकार में थे। सन् 1914 के प्रथम विश्व युद्ध में उन लोगों ने राष्ट्र का साथ बहुत कम दिया। युद्ध समाप्त होने पर उन पर यह आरोप लगाया गया कि युद्धकाल में भी वे गुप्त रूप से शत्रु देशों से व्यापार करके धन कमाने में ही लगे रहे और युद्ध संचालन के लिये धन की कमी हो जाने पर भी वे चालाकी से अपने धन को छिपा कर बचाये रहे। पर उस समय जर्मनी हार गया था और उस पर विदेशियों का दबाव था इसलिये यहूदियों से कुछ कहा नहीं जा सका। जब हिटलर दूसरे महायुद्ध की तैयारी करने लगा तो उसने अनुभव किया कि पहले इन घर के भेदी और राष्ट्र विरोधी तत्वों का सफाया कर दिया जाय, जिससे युद्ध संचालन में कोई बाधा न खड़ी हो। उसने ऐसा ही किया और लाखों यहूदियों को या तो मार दिया या आतंकित करके भगा दिया।
जैसा ऊपर कहा जा चुका है पैलेस्टाइन यहूदियों का मुख्य निवास स्थान था, पर सन् 700 के लगभग जब अरब में मुसलमानी धर्म का आविर्भाव हुआ और वे लोग नये उत्साह से प्रेरित और संगठित होकर विजय अभियान के लिये अग्रसर हुए तो उन्होंने सबसे पहले अपने निकटवर्ती पड़ोसी यहूदियों पर ही आक्रमण किया और उनकी राजधानी जरुशलम को नष्ट-भ्रष्ट करके उनको मार भगाया। तब से दो-तीन सौ वर्ष तक यहूदी जाति को घोर कष्ट सहने पड़े और वे कहीं स्थायी ठिकाना न मिलने के कारण जगह जगह मारे-मारे फिरते रहे। फिर जब सन् 1000 के आसपास मुसलमानों की ताकत घटने लगी तब वे लोग अपने निर्वाह की कुछ व्यवस्था बना सके। इसके कुछ समय पश्चात योरोप में उद्योग धन्धों की तरक्की होने लगी और सन् 1400 से लगभग अमरीका की खोज हो जाने से योरोप की फालतू आबादी को बाहर निकल कर प्रगति करने का अवसर मिल गया। यहूदियों ने इस अवसर का अच्छा लाभ उठाया। कष्ट सहते हुए और विपत्तियों से संघर्ष करते हुए उनकी कार्य क्षमता का बहुत कुछ विकास हो चुका था और अपना कार्य बड़ी मितव्ययिता से चला सकने का भी उनको अभ्यास था, इससे स्वतंत्र वातावरण में वे बहुत जल्दी वृद्धि करने लगे और संसार के आर्थिक क्षेत्र में अपना वर्चस्व स्थापित कर लिया। आज आर्थिक दृष्टि से संसार की बागडोर अमेरिका के हाथ में है, और अमेरिका के सबसे बड़े बैंकर अधिकाँश में यहूदी ही हैं।
द्वितीय महायुद्ध के पश्चात जब जर्मनी से निष्कासित यहूदियों की समस्या सामने आई तो इंग्लैंड और अमेरिका ने उन्हें पैलेस्टाइन में बसाने की योजना की, जो उस समय इंग्लैंड के अधिकार में था। यद्यपि अरबों ने इसका बड़ा विरोध किया पर उनकी शक्ति विश्रृंखलित होने कारण वे कुछ अधिक न कर सके। यहूदियों को अपने संसार भर के धनी जाति भाइयों का सहयोग प्राप्त था, इससे उन्होंने पैलेस्टाइन में जगह पाते ही उस उजाड़ मुल्क को सरसब्ज बनाना शुरू कर दिया। अपने रुपये के जोर से उन्होंने धीरे-धीरे अरबों की अधिकाँश जमीनें खरीद लीं और वे बेघरबार के होकर इधर उधर मारे मारे फिरने लगे। तब प्रतिशोध की भावना में उनमें कितने ही लोगों ने अपने छापामार दल बना लिये और वे यहूदियों के प्रदेश ‘इसराइल’ में घुस कर तोड़-फोड़ और लूटमार करने लगे। इससे इन दोनों जातियों में कटुता का भाव बढ़ने लगा और वही आज नाशकारी युद्ध के रूप में प्रकट हो रहा है।
इस शीर्षक को पढ़ कर शायद अनेक पाठकों को कुछ कौतुहल हो कि हमने ‘अध्यात्म’ को संसार का नवीन धर्म क्यों कहा? कारण यह कि अध्यात्म ही दुनिया की प्रगति का आधार है। इसी के आधार पर मनुष्य पशु श्रेणी से निकल कर मानव-श्रेणी में आया है और देव श्रेणी में पहुँचने का प्रयास करता रहता है।
निस्सन्देह अध्यात्म ही सच्चा और अनादि धर्म है। भौतिक धर्म सदैव अस्थायी, परिवर्तनशील और दृढ़ आधार बन सकने के अयोग्य होता है जबकि अध्यात्म मनुष्य को स्थायी सफलता और शाश्वत सुख प्रदान करने की सामर्थ्य रखता है। पर इधर बहुत समय से मनुष्य अध्यात्म को भूल कर भौतिकता के पीछे दौड़ने में प्रवृत्त हो रहे हैं, जिससे होते-होते आजकल प्रायः सभी सुशिक्षित और बुद्धिमान कहे जाने वाले व्यक्ति अध्यात्म को एक असंभव या काल्पनिक आदर्श समझने लगे हैं और भौतिकवाद को लाभ का एकमात्र द्वार मान कर उसी तरफ निरन्तर बढ़ते जाते हैं। फिर नये सिरे से उसकी शिक्षा देने, उसकी आवश्यकता समझाने का प्रयत्न करना पड़ता है। इस समय लोगों को यह बतलाने की आवश्यकता है कि यह प्रत्यक्ष फल की दुनिया ही एकमात्र दुनिया नहीं है। इसके अतिरिक्त एक अध्यात्म की दुनिया भी है, जिसमें फल का बीज अथवा कारण रहता है। इस अध्यात्म-जगत की विशेषताओं का विवेचन करते हुये एक विद्वान ने कहा है-
“बड़े-बड़े परिवर्तन जो व्यक्तियों और देशों के जीवन पर प्रभाव डालते हैं इस अदृश्य आध्यात्मिक जगत में ही जन्म लेते हैं। ये दैवी बुद्धि से उत्पन्न होते हैं और बाद में इस पृथ्वी तक पहुँच जाते हैं। इस समय समग्र कारण-जगत तेजी से गतिशील हो रहा है और उसी की प्रतिक्रिया पृथ्वी के पदार्थों पर भी दिखलाई पड़ रही है। इसका प्रभाव मनुष्यों के हृदय, मस्तिष्क, विचार और कार्यों पर भी पड़ रहा है।”
“जब साधारण बातचीत में हम कहते हैं-’अमुक व्यक्ति गलती कर रहा है’ तो इसका वास्तविक आशय यह नहीं समझना चाहिये कि मनुष्य दैवी-विधान के विरुद्ध चलने की सामर्थ्य रखता है। उसमें ऐसी शक्ति नहीं है। इसका अर्थ यही समझना चाहिये कि मनुष्य में अहंभाव उत्पन्न किया गया है और उसे कार्य करने की थोड़ी-सी स्वाधीनता दी गई है। इससे वह कुछ हद तक इच्छानुसार कार्य कर सकता है और बाद में अपनी गलती का सुधार हो जाने पर वापस लौट आता है। वास्तव में गलती करना और उसका सुधार होना दोनों दैवी विधान के अंग हैं।”
इस दृष्टि से जब वर्तमान समय में लड़े जाने वाले युद्धों और आगामी विश्वयुद्ध पर विचार करते हैं तो हमको यही निर्णय करना पड़ता है कि यह कार्य गलत होते हुये भी ठीक है। सामान्य दृष्टि से युद्ध एक बुरा कार्य है क्योंकि उसके फलस्वरूप धन-जन का घोर नाश होता है और जनता को असहनीय कष्ट उठाने पड़ते हैं। पर दूसरी दृष्टि से यह ठीक भी है क्योंकि इसी के द्वारा पुराना युग खत्म होकर नया युग जल्दी पास आता है। युद्ध मनुष्य के अहंकार को दबा कर उसे ईश्वर के सामने आत्म-समर्पण की प्रेरणा देता है और विकास के आगामी दर्जे के लिये नवीन अनुभव भी प्रदान करता है।
हमारे देश में ऐसे लोगों की कमी नहीं जो अध्यात्म का अर्थ घरबार त्याग कर, लँगोटी लगा कर जंगल या गुफाओं में रहना और कन्द मूल आदि खाकर जीवन निर्वाह करना मानते हैं। ऐसे भी अन्य लोग मौजूद हैं जो दाढ़ी और जटा बढ़ा लेने, शरीर पर भस्म पोत लेने अथवा गर्मियों में धूनी तपने, जाड़ों में नदी के जल में दो-बार घण्टा खड़े रह कर जप करने आदि काया-कष्ट को अध्यात्म समझे बैठे हैं। पर हम बतलाना चाहते हैं कि ये सब भ्रमयुक्त विचार हैं इस संबंध में एक विचारक ने कुछ समय पहले एक लेख में कहा था-
“हमारा विश्वास है कि निकट भविष्य में जिस नये युग का आविर्भाव हो रहा है-उसमें सबसे मुख्य परिवर्तन मनुष्यों की चित्तवृत्तियों में होगा और वे सच्चे अर्थ में धार्मिक बनने की चेष्टा करेंगे। यह कोई जरूरी बात नहीं कि इसके लिये जंगल में जाकर ही तपस्या की जाय या कुर्ता, धोती, कोट, पाजामा आदि छोड़ कर कोपीन धारण की जाय, छाल तथा पत्तों के वस्त्र धारण किये जायें। ये सब तो ऊपरी बातें हैं जो देशकाल के अनुसार अपने आप बदलती रहती हैं। कोई जमाना था जब देश का अधिकाँश भाग जंगल था और कातने-बुनने की कला का प्रचार बहुत कम हुआ था, तब लोग मरे हुये या मारे गये हिरन, शेर आदि की खाल से ओढ़ने, बिछाने, पहनने का काम निकाल लेते थे, पर इससे वे सभी आध्यात्मिक बन जाते थे यह कोई नहीं मान सकता। अब भी तिब्बत आदि में ऐसे मनुष्य पाये जाते हैं जो ठण्ड के कारण गुफाओं में रहते हैं, दाढ़ी, जटा आदि बढ़ाये रहते हैं और देखने वाले को वनवासी साधू या ऋषि की तरह ही जान पड़ते हैं, पर जो वास्तव में डाकू का पेशा करते हैं या मनुष्यों को मार कर खा जाने वाले नर-राक्षस हैं। यही हाल अफ्रीका के कई हब्शी फिर्के वालों का है, जो पत्तों की लंगोटी लगाकर पूर्णतः प्राकृतिक जीवन बिताते हैं, पर जिनको मनुष्य का माँस मिल जाय तो उसे सबसे अच्छा भोजन मान कर बड़े आग्रह के साथ खाते हैं।”
अध्यात्म का अर्थ है-संसार में एक ही आत्म-तत्व व्याप्त होने की अनुभूति और तदनुसार प्रत्येक मनुष्य को-प्राणी को अपने ही समान समझना, उसके सुख-दुःख का भी अपने सुख-दुःख की तरह ख्याल रखना। भविष्य के मनुष्य इसी धर्म के मानने वाले होंगे। चाहे वे घन्टों तक मन्दिर में बैठ कर मूर्तियों की पूजा आरती न करें और मजहब के नाम पर दूसरे सम्प्रदायों की निन्दा करने, मरने-मारने को उद्यत न हों, पर वे सबको अपने समान एक ही विराट आत्मा का अंश मान कर सबके साथ प्रेम, सहानुभूति, उदारता का व्यवहार करेंगे। आजकल अलग-अलग मजहब वाले ईश्वर और धर्म के नाम पर जो झगड़े करते रहते हैं और अन्य धर्म वालों की हत्या करने को भी पुण्य कार्य समझते हैं, वैसी मूढ़ता भविष्य में दिखाई न देगी। वरन् उस समय ईश्वरोपासना का सबसे श्रेष्ठ रूप यही होगा कि अन्य सभी मनुष्यों की सहायता और सेवा की जाय और घृणा तथा कलह का नाम-निशान भी न रहे।
उस समय राजनीति का स्वरूप भी बदल जायगा और लोग राष्ट्रीयता तथा जातीयता के नाम पर एक-दूसरे का नाश करने के बजाय समस्त संसार में एक सम्मिलित शासन स्थापित करके मनुष्य मात्र को सुखी बनाने की कोशिश करेंगे। आज जो अरबों खरबों रुपया युद्ध की तैयारी और घातक अस्त्र-शस्त्र बनाने में खर्च हो जाता है उसका उपयोग जरूरतमंदों को भोजन, वस्त्र, घर तथा अन्य आवश्यक वस्तुएँ पहुँचाने में किया जायगा। इससे सबको लाभ होगा और दुष्टता, दुर्जनता के भाव मिट कर सज्जनता का व्यवहार किया जाने लगेगा।
यद्यपि आज भी राष्ट्र-संघ (यूनाइटेड नेशन्स) कायम है और वह युद्धों को रोकने का भी कुछ प्रयत्न कर रहा है पर लोगों के मनों में मैल होने से उसे बहुत ही कम सफलता मिल पाती है। राष्ट्र-संघ के भीतर भी गुटबन्दी मौजूद है और वहाँ अपने-अपने हित के पक्ष का समर्थन और दूसरों का विरोध किया जाता है, इस बात का ख्याल कोई नहीं करता कि सच्चाई किस तरफ है। आज संसार के सब राष्ट्र युद्ध की तैयारी में संलग्न हैं और अपनी शक्ति को बढ़ाने के लिये भले-बुरे सब प्रकार के उपायों का सहारा ले रहे हैं। इस समय ध्यान देकर देखा जाय तो भौतिकता और स्वार्थपरता चरम सीमा पर पहुँच रही है। लोग इसे घोर कलियुग बतलाते हैं पर हम मानते हैं कि यह अध्यात्म-युग अथवा धर्म-युग तक पहुँचने की एक सीढ़ी है। मनुष्य बहुत-सी बाधाओं और विघ्नों को पार कर चुका है, अब यह राष्ट्रीयता अथवा जातीयता की कृत्रिम बाधा और शेष रह गई है, जिसके पार होते ही मानवता का सूर्योदय होगा और सब मनुष्य प्रथम बार सच्ची सुख और शाँति का अनुभव करने लगेंगे।
जो लोग कहते हैं कि शाँति-स्थापना के लिए संसार में से युद्ध को मिटाया जाय, निशस्त्रीकरण किया जाय, वे इस समस्या का पूर्ण समाधान नहीं कर सकते। केवल युद्ध का विरोध करने या उसे रोकने की चेष्टा करने से काम नहीं चल सकता वरन् हमें उन मूल कारणों को ही दूर करना चाहिये जिनके सबब से पारस्परिक कलह और द्वेष की उत्पत्ति होती है। आज स्थिति यह है कि जब अस्त्र-शस्त्रों द्वारा युद्ध और मारकाट नहीं भी होती तब भी ‘शीत-युद्ध’ चलता रहता है, अर्थात् विभिन्न राष्ट्र अपने प्रतिद्वन्द्वियों को डराने-धमकाने के लिए अपनी शक्ति का अप्रत्यक्ष रूप से प्रदर्शन करते रहते हैं जिससे अशाँति का वातावरण पैदा होता है और वही बढ़ते-बढ़ते अन्त में युद्ध के रूप में फूट पड़ता है। इतना ही नहीं पाकिस्तान और चीन जैसे उच्छृंखल देश तो शाँति के समय में भी छुपे तोर पर सशस्त्र घुसपैठ करते रहते हैं जिसमें दस-बीस व्यक्तियों का मरना मामूली बात होती है, पर उसे युद्ध का कार्य नहीं समझा जाता और विरोध-पत्र भेज कर ही मामला खत्म कर दिया जाता है। इसलिए अगर संसार को वास्तव में युद्ध की विभीषिका से मुक्त कराना है तो उसका उपाय यही है कि जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में जो द्वेष और कलह की भावनायें फैली हुई हैं उनको मिटाया जाय।
इस प्रकार की भावनायें प्रायः अहंमन्यता और स्वार्थपरता की अधिकता से वृद्धि को प्राप्त होती हैं। जब तक मनुष्य भौतिकता की दृष्टि से काम करता है और अपने स्वार्थ को दूसरों के स्वार्थ से भिन्न अथवा विरोधी समझता है तब तक उसमें शत्रुता के भाव बढ़ते जाते हैं और दूसरों को हानि पहुँचा कर अपना मतलब पूरा करने को वह एक प्रशंसनीय काम मानता रहता है। जिस समाज, देश या राष्ट्र में ऐसी भावना वाले व्यक्तियों की अधिकता होती है वहाँ मारकाट और अशाँति का भी दौर-दौरा रहता है। पर जब मनुष्य अपने भीतर रहने वाली चैतन्य सत्ता को समझ जाता है और यह भी अनुभव करने लगता है कि सभी मनुष्यों में वही एक सत्ता काम कर रही है तो उसकी भेद-भाव की दृष्टि मिटने लगती है और वह अध्यात्म पथ का पथिक बन कर सहयोग और मेल-जोल का जीवन व्यतीत करने लगता है। इस दृष्टि से आध्यात्मिकता का प्रचार संसार में से युद्ध को मिटा कर शाँति स्थापन का प्रधान साधन है।
जो लोग दुनिया में फैली हुई अशाँति का कारण रोटी का प्रश्न बतलाते हैं, वे भी किसी हद तक भ्रम में पड़े हैं। केवल ‘रोटी’ को मनुष्य का लक्ष्य समझना उसे ‘पश-श्रेणी’ में रखना है। पशु का जीवन उद्देश्य केवल आहार प्राप्त करना होता है। वह इससे ऊँची किसी बात को समझता ही नहीं। पर मनुष्य की विशेषता उसका ज्ञान और विवेक है। इसी के द्वारा वह अनेक मार्गों में से सर्वश्रेष्ठ मार्ग को चुन सकता है। जीवन धारण के लिए रोटी अनिवार्य तो है, पर जीवन में अनेक वस्तुएँ उससे भी बड़ी हैं। उदाहरण के लिये उच्च मनोवृत्ति के व्यक्ति स्वाभिमान तथा धर्मरक्षा के लिए अवसर पड़ने पर ‘रोटी’ के प्रश्न की उपेक्षा कर देते हैं और अनेक बार उनको इस कार्य में अपने प्राण भी गँवा देने पड़ते हैं।
हम मानते हैं कि उपर्युक्त उदाहरण किसी विशेष परिस्थिति और विशेष व्यक्तियों के लिए ही है। साधारण व्यक्ति भूखा रह कर अथवा कोई हानि सहन करके आध्यात्मिकता का अनुयायी नहीं बन सकता तो भी अन्य लोगों से सत्य, न्याय और सहानुभूति का व्यवहार करना, किसी के साथ वैसा व्यवहार न करना जैसा कि हम अपने लिये नहीं चाहते, अध्यात्म के ऐसे नियम हैं जिनको सही मानने में किसी को आपत्ति नहीं हो सकती। व्यक्ति का हित, समाज का हित, संसार का हित इसी पर निर्भर है। यह कोई जरूरी बात नहीं कि सब लोग अपना धर्म, जातीयता, भाषा, पहनाव छोड़ कर एक से बन जाएं, पर अपनी संस्कृति, धर्म की रक्षा करते हुये हमें दूसरे की संस्कृति और धर्म का भी आदर करना चाहिये। कलह या संघर्ष की वृद्धि तब होती है जब मनुष्य दुराग्रह या पक्षपात के कारण उचित को छोड़ अनुचित का समर्थन करता है। इसलिये यदि हम संसारव्यापी शाँति, सुख, प्रगति के पक्षपाती हैं और चाहते हैं कि हम स्वयं तथा अन्य लोग सुखी जीवन व्यतीत करें तो उसके लिए आध्यात्मिक मार्ग पर चलना ही हमारा कर्तव्य है। इसके लिए हमारा प्रथम कर्तव्य यही है कि अपने सुख-दुःख को भी समझें। हमारे धर्म की दृष्टि से प्राणीमात्र को और विशेषतः सभी मनुष्यों को आत्मीयता के दृष्टिकोण से देखना ही बुराई को मिटा कर भलाई को लाने का प्रमुख उपाय है।
“वाशिंगटन, 18 जून। बीसवीं सदी में हुई लड़ाइयों में मरने वाले व्यक्तियों में मरने वाले व्यक्तियों की संख्या उससे पूर्व की सदियों में लड़ी गयी लड़ाइयों में मरने वालों की संख्या से कहीं अधिक है। 1967 वर्ष के शुरू होने से पूर्व ही यह अनुमान था कि सन् 1900 से लेकर अब तक हुई लड़ाइयों में दस करोड़ से भी अधिक व्यक्ति मारे गये हैं। इस संख्या में दो विश्व युद्धों में मरने वाले व्यक्तियों की भी संख्या शामिल है।”
(नव भारत टाइम्स, 19 जून 67)
इस समाचार से एक बहुत बड़ी बात जो प्रकट होती है वह यह है कि मनुष्य ने अपनी संहारक शक्ति को पिछले सौ वर्षों में इतना अधिक बढ़ा लिया है कि उसका हिसाब लगा सकना भी कठिन है। गत अठारह शताब्दियों में रोम साम्राज्य का प्रसार, इस्लाम द्वारा एशिया तथा अफ्रीका के एक बड़े भाग की विजय, ‘क्रुसेडों’ का सौ वर्ष व्यापी युद्ध, नैपोलियन के योरोपीय संग्राम, अमरीका का स्वाधीनता संग्राम, भारतवर्ष का गदर आदि अनेकों इतिहास प्रसिद्ध संग्राम हुये और छोटी-बड़ी स्थानीय तथा प्रादेशिक लड़ाइयाँ तो कई सहस्र की संख्या में लड़ी गयीं, पर उन सब में मिल कर इतने मनुष्य नहीं मारे गये जितने बीसवीं सदी के इन 66 वर्षों में।
इस समाचार पर अविश्वास करने या इसका कारण ढूँढ़ने के लिये अधिक दूर जाने की आवश्यकता नहीं। 18 वीं शताब्दी तक युद्ध का सबसे बड़ा हथियार बन्दूक था और वह भी ऐसी कि एक मिनट में एक गोली चला देना भी बड़ा काम समझा जाता था। फिर यह बन्दूक भी पिछले दो डेढ़ सौ वर्षों से ही किसी काम लायक बन पाई थी। उसके पहले के मुख्य हथियार थे तलवार, भाला और तीर-कमान। इन सबकी मार बहुत सीमित है। तलवार केवल सामने खड़े व्यक्ति को ही मार सकती है, भाले से दस-पाँच गज की दूरी पर वार किया जा सकता है और तीर-कमान सामान्यतः सौ-दो सौ गज तक काम कर सकती है।
पर 19 वीं शताब्दी में जब विज्ञान का नियमबद्ध अध्ययन तथा खोज का कार्य आरम्भ हो गया और उससे प्राप्त ज्ञान को भौतिक लाभ के पदार्थ बनाने में खर्च किया जाने लगा तो स्थिति बदल गई। स्वार्थी और लालची लोगों ने विज्ञान का गठबन्धन व्यापार (कमर्शलिज्म) के साथ कर दिया। इससे वे विज्ञान की उसी शाखा को प्रोत्साहन और बढ़ावा देने लगे जिसका व्यापारिक उपयोग करके रुपया कमाया जा सकता था। चूँकि हथियार और युद्ध-सामग्री बना कर बेचना भी एक बहुत बड़ा व्यापार या पेशा था इसलिये लोग वैज्ञानिक प्रयोगों की सहायता से उस क्षेत्र में भी तरक्की करने में जुट गये। साधारण बंदूकों से ऑटोमेटिक रायफलें, मशीनगनें, हथगोला आदि तैयार किये जाने लगे जो एक से बढ़ एक शक्तिशाली थे। फिर जब हवाई जहाज का आविष्कार हो गया और लोगों ने देखा कि इससे चाहे जहाँ अचानक आक्रमण किया जा सकता है तो उसमें प्रयोग करने के लिये बड़े-बड़े बम बनाए जाने लगे जो दस-बीस मन से बढ़ते-बढ़ते सौ-पचास मन तक पहुँच गये।
प्रथम महायुद्ध (सन् 1914) में तो हवाई जहाजों का विकास बहुत कम हो सका था और इसलिये उनके द्वारा युद्ध में काम भी थोड़ा ही लिया गया, पर दूसरे महायुद्ध (1939) को तो मुख्यतः हवाई जहाजों द्वारा ही लड़ा गया। हिटलर ने दो-दो हजार हवाई जहाज एक साथ लगा कर इंग्लैंड पर लगातार चौबीस घण्टे बम वर्षा कराई जिससे वह घबरा कर हार मान ले। उसने पैराशूट द्वारा सैनिक उतार कर विभिन्न देशों के कई स्थानों पर अधिकार भी कर लिया। पचासों नगरों को कल कारखानों सहित मटियामेट कर दिया। पर लोगों का मन इतने नाशकारी हथियारों से भी नहीं भरा और वे ऐसा हथियार ढूंढ़ने के लिए विज्ञान का सहारा लेने लगे जिससे किसी देश का नाश करने का उद्देश्य हफ्तों और महीनों के बजाय घन्टों और दिनों में ही पूरा हो जाय। विज्ञान भी औघड़ दानी महादेव से कम नहीं है। उसने भक्तों की यह आकाँक्षा भी पूर्ण की, पर इस बार ऐसा भयंकर अस्त्र दिया कि जिससे दूर के साथ अपना भी नाश हो जाय। जब वैज्ञानिकों ने सन 1945 में अणु-बम बना कर तैयार किया तो उसका परीक्षण बड़े डरते-डरते किया कि कहीं उससे अपना देश ही खत्म न हो जाय। फिर जब उसका प्रयोग किया गया तो हिरोशिमा और नागासाकी ऐसे स्थान चुने गये जिनका प्रभाव यथासम्भव वहीं पर सीमित रह जाय, वहाँ से बाहर उसका प्रभाव कम से कम पड़े।
पर जब युद्धोन्मादियों के हाथ में अणु-शक्ति की कुँजी आ गई तो वे उसका अधिकाधिक विकास करने लगे और उन्होंने कुछ ही समय में ‘एटम बम’ से बढ़ कर ‘हाइड्रोजन’ बम का आविष्कार कर डाला। अब मनुष्य के हाथ में ऐसी शक्ति आ गई कि वह चाहे तो दस-पाँच करोड़ के देश को कुछ घण्टों में ही पूरी तरह नष्ट कर दे, पर साथ ही यह भी खतरा पैदा हो गया कि वह स्वयं भी उसके प्रभाव से नहीं बच सकता। अगर वह किसी देश को दस-बीस घण्टे में नष्ट करेगा तो दस-बीस दिन बाद उसका देश भी बम के घातक प्रभाव को अनुभव करने लगेगा।
जब लोगों को अणु-शक्ति के इस नाशकारी प्रभाव का पता चल गया तो अन्य देश भी उसकी तैयारी में लग गये और कम से कम पाँच देश इस क्षेत्र में काफी आगे बढ़ चुके हैं। अब इस बात का पूरा निश्चय हो चुका है कि यदि दो देशों में अणु-युद्ध हुआ तो उनका सर्वनाश तो तत्काल ही हो जायगा पर अन्य देश भी उससे नहीं बचेंगे। बमों से उड़ने वाली रेडियोधर्मी धूल आकाश मार्ग से समस्त संसार में फैल जायगी और उतने ही अधिक परिमाण में बिना लड़ाई-भिड़ाई के लोगों का मरना आरम्भ हो जायगा। अणुबम का यह प्रभाव दस-पाँच दिन या चार-छः महीने ही नहीं रहेगा वरन् वह बीसियों वर्ष तक इसी प्रकार अपना संहार-कार्य करता रहेगा और लोगों को ऐसे-ऐसे कष्ट देकर तथा विकृतियाँ पैदा करके मारेगा कि उस समय पृथ्वी पर साक्षात् नर्क का दृश्य ही दिखलाई पड़ने लगेगा।
जैसा इस लेख के आरम्भ में उद्धृत किये गये समाचार में कहा गया है कि इस शताब्दी के 66 वर्षों में जितने व्यक्ति युद्धों में मारे गये हैं उतने पिछली 19 शताब्दियों में सब मिला कर भी नहीं मारे गये थे। उसी प्रकार हम भी यह कह सकते हैं कि जितने मनुष्य इन 66 वर्षों में मारे गये हैं उससे दस गुने मनुष्य अगले दस-पन्द्रह वर्षों में (1980 तक) मारे जायेंगे।
स्त्रियों और मजदूरों का उत्कर्ष-
दूसरी बड़ी उल्लेखनीय विशेषता इस शताब्दी की यह होगी कि अभी तक मानव-समाज के दो बड़े भाग-स्त्रियों और मजदूर-तरह-तरह के बन्धनों और हीनावस्था में रखे गये हैं, वे अब ऊपर उठेंगे और जो पूँजीपति, जमीन जायदाद वाले आदि अभी तक ‘मालिक’ बन कर शान दिखलाते रहे हैं वे नीचे गिरते चले जायेंगे। सच पूछा जाय तो वर्तमान समय में जो क्राँति मची है, संसार में एक अभूतपूर्व हलचल व्याप्त है उसका मूल कारण इन दो दबे वर्गों का बन्धनमुक्त होकर उच्चस्थिति की तरफ अग्रसर होना ही है। कुम्भ-युग अथवा ‘ऐक्वेरियन एज’ का मुख्य लक्षण ऐसे पददलित समुदायों को उठा कर स्वामित्व प्रदान करना ही है। इसमें आश्चर्य की कोई बात ही नहीं कि जब कभी कोई ऐसी घटना होगी, अर्थात् समाज का शासन-सूत्र एक समुदाय या वर्ग के हाथ से निकल कर दूसरे वर्ग के अधिकार में जायगा, तो अवश्य ही ऐसा संघर्ष छिड़ेगा जिससे मानव-समाज की जड़ तक हिल जायगी। जिस व्यक्ति या समुदाय के हाथ में एक बार शासन सत्ता अथवा संचालन का अधिकार आ जाता है वह उसे राजी से कदाचित् ही छोड़ता है।
आज यह स्पष्ट दिखाई पड़ रहा है कि बड़े-बड़े पूँजीपतियों, कल-कारखानों के स्वामियों, बैंकरों, जमीन जायदाद के मालिकों, व्यापार-व्यवसाय पर एकाधिकार रखने वालों का जमाना समाप्त हो चुका। समाज की वर्तमान स्थिति में उनकी आवश्यकता नहीं है। यदि वे बने रहेंगे तो उनके कार्य समय तथा परिस्थिति के प्रतिकूल सिद्ध होंगे और उनसे समाज का अहित ही होगा। फिर भी मोह−माया वश वे अपने पद से हटने को तैयार नहीं और जो उनसे ऐसी बात कहता है उसे दुश्मन समझ कर लड़ने को तैयार होते हैं। यद्यपि उनके निष्कासन की प्रक्रिया आरंभ हो गई है और कितने ही देशों में उनके हाथों से सत्ता छीनी जा चुकी है, पर अब भी आंखें नहीं खुलतीं। वे इसे एक प्राकृतिक नियम तथा विकास का सिद्धाँत समझने के बजाय अन्य दल वालों का षडयन्त्र, अनुचित हस्तक्षेप मानते हैं और पुराने कानूनों अथवा किसी गुजरे जमाने और भिन्न परिस्थितियों में लिखे गये ‘धर्मग्रन्थों’ का सहारा लेकर ‘आत्म-रक्षा’ के लिये हाथ-पैर मारते हैं।
यद्यपि इन सिद्धाँतों का प्रचार योरोप में दो-तीन सौ वर्ष से हो रहा है और गिल्ड सोशलिज्म, सिण्डीकैलिज्म, स्टेट सोशलिज्म, एनारकिज्म, कम्यूनिज्म के नाम से भिन्न-भिन्न देशों में इस उद्देश्य की पूर्ति के प्रयत्न किये जाते रहे है, पर बीसवीं शताब्दी से पहले कार्य रूप में उनको अधिक सफलता नहीं मिल सकी। बहुत से मजदूर कभी-कभी हड़ताल कर देते थे, पर तब तक उनकी शक्ति अपर्याप्त होने से उन्हें बहुत थोड़ी सफलता मिल पाती थी। पर बीसवीं शताब्दी के आरम्भ से मजदूरों ने अपनी अनेक हड़तालों के असफल होने से अनुभव प्राप्त करके अपना संगठन मजबूत करने का निश्चय किया जो ‘ट्रेड यूनियन’ आँदोलन के रूप में कुछ समय में संसार के सब देशों में फैल गया। धीरे-धीरे इन संगठनों ने अपने प्रतिनिधि शासन सभाओं में भेजने और वहाँ अपने हितों की रक्षा करने वाले कानून बनवाने की तरफ ध्यान दिया। जब सन् 1917 में रूस के मजदूरों ने शासन-सत्ता अपने हाथ में ले ली और वहाँ श्रमजीवियों का मजबूत राज्य कायम कर दिया तो संसार के अन्य देशों के मजदूरों का ध्यान भी इस ओर आकर्षित हुआ और धीर-धीरे कई देशों में साम्यवादी शासन स्थापित हो गये।
यही स्थिति स्त्रियों के दर्जा के विषय में भी दिखलाई पड़ रही है। 19 वीं सदी में भारतवर्ष ही नहीं योरोप तक में स्त्रियों को किसी प्रकार के राजनीतिक अधिकार प्राप्त नहीं थे। वहाँ यद्यपि पर्दा प्रथा नहीं थी और शिक्षा के संबंध में भी कोई प्रत्यक्ष प्रतिबन्ध नहीं था, तो भी स्त्रियों का कार्यक्षेत्र बहुत सीमित था और वे सार्वजनिक आँदोलनों में खुल कर कदाचित् ही कहीं भाग लेती थीं। सन् 1900 के बाद भी इंग्लैण्ड और योरोप के अन्य देशों में स्त्रियों को शासन सभा के लिये ‘वोट’ देने का अधिकार नहीं था। जब सन् 1910 के आस-पास मिसेज पैंखर्स्ट ने इसके लिये आँदोलन उठाया और सैंकड़ों स्त्रियों ने जेल और जुर्माने की सजा सही तथा एक-दो मर भी गई तब जाकर 1920-21 में उन्हें कुछ अधिकार मिले। पर अब भी अनेक देशों में उन्हें वोट का अधिकार नहीं मिला है। सदस्य होने और शासनाधिकार की तो बात ही दूर रही।
पर अब हवा का रख बदला है। भारत जैसे सबसे अधिक रूढ़िवादी देश में, जहाँ के प्राचीन मनीषी स्पष्ट कह गये थे कि- “न स्त्रिया स्वतन्त्र मर्हति” इस समय कई साल से एक स्त्री ही देश की सबसे मुख्य शासनाधिकारी है और अन्य सैकड़ों स्त्रियाँ केन्द्रीय और प्राँतीय शासन-सभाओं की सदस्या हैं। स्त्री-गवर्नर, स्त्री-मैजिस्ट्रेट, स्त्री-वकील, स्त्री-प्रोफेसर, स्त्री-राजदूत आदि का भी अभाव नहीं है। लड़कों की तरह लड़कियों का भी ‘गर्ल्स गाइड’ बनाया गया है, जिसमें भाग लेने वाली लड़कियों की संख्या कई लाख तक पहुँच चुकी है। विदेशों की स्त्रियाँ तो विद्या, कार्य कुशलता में बहुत आगे बढ़ चुकी हैं। वे पुरुषों के समझे जाने वाले कितने ही कामों को बड़ी योग्यता से कर रही हैं और अनेक क्षेत्रों में पुरुषों से आगे भी निकल जाती हैं।
आज हम कभी-कभी यह बात सुना करते हैं कि- “संसार के शासन-संचालन में पुरुष असफल सिद्ध हुये हैं, इसलिये अब यह कार्य स्त्रियों को दे दिया जाय।” हम अच्छी तरह समझते हैं कि जो ऐसी बात कहते हैं, उनमें से थोड़े ही ऐसे होते हैं जो इस पर हृदय से विश्वास करते हों, अन्यथा अधिकाँश मनोविनोद के भाव से ही ऐसा कहते हैं। सुनने वाले भी इस पर प्रायः विरक्ति अथवा व्यंग विद्रूप के स्वर में अपनी सम्मति प्रकट करते हैं। ये लोग इस बात को सम्भव नहीं समझते हैं कि स्त्रियाँ समाज-संचालन का कार्य ठीक तरह सम्पन्न कर सकती हैं। हम भी इस बात को स्वीकार करते हैं कि वर्तमान समय में स्त्रियाँ जिस वातावरण में रह रही हैं और हजारों वर्षों से उनको जिस प्रकार बन्धनों में ‘अबला’ बना कर रखा गया है उससे उनके स्वभाव में अनेक त्रुटियाँ उत्पन्न हो जाना स्वाभाविक है। जब स्त्रियों को प्रायः घर की चहार-दीवारी के भीतर ही रखा जायगा और जब वे बाहर निकलेंगी तो उनकी इस प्रकार देख-भाल और चौकीदारी की जायगी मानो वे एक जीवधारी, स्वावलम्बी प्राणी के बजाय एक बहुमूल्य जायदाद हों, तो ऐसी दशा में उनके विचारों और मस्तिष्क का विकास हो सकना कैसे संभव हो सकता है? जो व्यक्ति पीढ़ियों से ऐसा ही जीवन बिता रहा हो और जिसे जन्म-काल से ही पराधीनता को शिरोधार्य करने की शिक्षा दी गई हो, उससे किसी बड़े काम की आशा कैसे की जा सकती है?
पर यह ख्याल करना कि यह दशा बदल नहीं सकती और स्त्रियाँ समाज-संचालन के अयोग्य हैं, एक प्रकार की विचारहीनता है। स्त्रियों में भी पुरुष के समान विवेक, बुद्धि, भावुकता, प्रेम, क्रोध आदि सब बातें मौजूद हैं। उनको जिस वातावरण में रहना पड़ेगा वैसा ही उनका शारीरिक और मानसिक गठन हो जायगा। यह ख्याल रखना कि स्त्रियाँ कोमल हृदय, प्रेमी, भावुक, चंचल स्वभाव की होती है इसलिये वे दृढ़ता के साथ देश तथा समाज का शासन नहीं कर सकतीं, एक भूल है। समय पड़ने पर अब भी स्त्रियाँ पुरुषों की तरह वीरता के कार्य कर दिखाती हैं और भिन्न प्रकार के वातावरण में रह कर तो उनकी बिल्कुल कायापलट हो जाती है। उदाहरण के लिये स्त्रियों के लिये यह ख्याल किया जाता है कि वे बड़ी ममतामयी और दयालु चित्त वाली होती हैं, इसलिये शासन कार्य में कठोरता का व्यवहार करना, दुष्टों का दमन करना, शत्रुओं का संहार करना आदि कार्य उनसे ठीक ढंग से नहीं हो सकते। पर लगभग दो-तीन हजार वर्ष पहले पश्चिमी एशिया के एक प्रदेश में ‘अमेजन’ नाम की स्त्रियों का राज्य था जो किसी पुरुष को अपने यहाँ नहीं आने देती थीं। वे बड़ी लड़ाका थीं और युद्ध में अच्छी तरह बाण चला सकें इसके लिये अपने दाहिनी तरफ के स्तन को आरम्भ से ही काट डालती थीं। प्रति वर्ष आसपास के अन्य राज्यों पर आक्रमण करके वहाँ से कुछ पुरुषों को पकड़ लाती थीं और उनसे समागम कर के संतानोत्पत्ति करती थीं। बच्चों में जितनी लड़कियाँ होतीं उनको पाल लिया जाता और लड़कों को मार देती थीं। उन पुरुषों को भी गर्भ धारण के बाद मार दिया जाता था। यूनानी इतिहासकारों ने इस ‘अमेजन’ जाति की स्त्रियों का वर्णन अपने ग्रंथों में किया है। वर्तमान समय में भी हम देखते हैं कि पहाड़ी और जंगली इलाकों में खेती का काम करने वाली ग्रामीण स्त्रियाँ अवसर आने पर बघेर, तेंदुआ आदि भयंकर जंगली जानवरों को दरातों से मार देती हैं जब कि शहरों के अच्छे ताकतवर व्यक्ति भी उनका नाम सुन कर घबड़ाते हैं। गत वर्षों में कितने ही स्थानों में युवती स्त्रियों और लड़कियों ने समय पड़ जाने पर डाकुओं का सामना किया है और उनको मार दिया है। इसलिये यह विचार करना कि स्त्रियाँ सदा आज के समान भीरु और चंचल स्वभाव ही बनी रहेंगी और शासन के योग्य नहीं बन सकतीं, वास्तविकता से अनजान होना है। जहाँ स्त्रियों को पूरी आर्थिक स्वतन्त्रता प्राप्त हुई और समाज संचालन का भार उनके कन्धों पर पड़ा कि सौ पचास वर्ष में वे बहुत कुछ बदल जायेंगी और दो-चार सौ वर्ष बाद तो उनकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। इस तथ्य को ज्योतिर्विज्ञान के महान ज्ञाता ‘कीरो’ ने निम्नलिखित जोरदार शब्दों में प्रकट किया है-
“संसार के समस्त देशों की स्त्रियों ने इन दिनों बड़ी प्रगति की है और घोर प्रतिगामी व्यक्तियों और संस्थाओं के विरोध का मुकाबला करते हुए ऊँचा दर्जा प्राप्त कर लिया है। इन बातों को ध्यान में रखते हुये और साथ ही यह जानते हुये कि ‘नव युग’ जिसमें हम लोग प्रवेश कर रहे हैं, दैवी-विधान के अनुसार एक ऐसा समय है जिसमें स्त्रियाँ सार्वजनिक जीवन के प्रत्येक विभाग में अग्रगामी होंगी, मुझे यह कहने में कुछ भी संकोच नहीं है कि कोई भी मानवीय संस्था अधिक समय तक स्त्रियों को शक्ति प्राप्त करने से नहीं रोक सकती, फिर चाहे इनका परिणाम अच्छा निकले या बुरा।”
इस प्रकार यह निस्सन्देह कहा जा सकता है कि बीसवीं सदी निश्चय रूप से युग-परिवर्तन के लिये निर्णायक सिद्ध होगी और इसके अन्त तक एक नये समाज की रचना होकर मानव-जाति एक नवीन युग में प्रवेश करेगी।
“युग कोई ऐसी वस्तु नहीं जो एक नियत समय पर ही आवेगी और फिर चिरकाल के लिये दृष्टि पथ से ओझल हो जायगी। हम अपना सतयुग और कलियुग अपनी प्रेरणा से आप बना सकते हैं। जब मनुष्य इस जागृत-जीवन के अधिकार को भूल कर सूक्ष्म स्थान पर पहुँच जाता है, वासना, कामना, संस्कार आदि से नाता तोड़ लेता है, उसी समय सतयुग का पुनः उदय हो जाता है। इस समय पृथ्वी तल पर रहने वाली मानव-जाति बुद्धि, मन और शरीर को ही सर्व प्रधान मानती है, इन्हीं के चक्कर में पड़कर वह नाना प्रकार की लीलायें किया करती है। वह स्वर्ग लोक की खोज खबर लेना बिल्कुल भूल गई है। इसलिये आज हमें नये सिरे से अनुष्ठान करना होगा। शक्ति को पुनः जगाना होगा। अहंकार का सिर हमें नीचा करके रखना होगा। हम दिव्य-लोक के अधिकारी हैं इस बात का हमें फिर से ज्ञान प्राप्त करना होगा। इसी से नवयुग की-सतयुग की स्थापना होगी। तब हम ज्ञानरूपी अमृत का कलश लेकर संसार में ही अमर लोक की लीला करेंगे।”
-महायोगी अरविन्द
हमारे देश में चार युगों की कल्पना ने बड़ा अद्भुत रूप धारण कर लिया है। लाखों वर्ष तक किसी एक युग का बने रहना और उतने समय में जन्म लेने वाले सभी मनुष्यों का अनिवार्य रूप से भला या बुरा बन जाना एक ऐसी बात है जिस पर विश्वास करने से सिवाय हानि के किसी प्रकार का लाभ नहीं दिखाई देता। उदाहरण के लिये हम सदैव भारतवर्ष के अशिक्षित और अल्प शिक्षित मनुष्यों के मुँह से कलियुग की निन्दा और उसके कारण दुनिया में पापों की अधिकता की बात सुनते रहते हैं। इन बातों को सुनते-सुनते लोगों के मन में यह बात बैठ जाती है कि इस जमाने में पापों का किया जाना स्वाभाविक ही नहीं एक दैवी विधान है, जिसे मनुष्य की शक्ति नहीं रोक सकती। इस प्रकार की भावनाओं से मनुष्य का पापों का विरोध करने वाला संकल्प-बल ढीला पड़ जाता है और वह सत् कर्मों की अपेक्षा दुष्कर्मों की तरफ प्रेरित होने लगता है।
इसलिये जब महायोगी अरविन्द से सतयुग-आगमन के विषय में जिज्ञासा की गई तो उन्होंने यही समझाया कि सतयुग-कलियुग का निर्माता मनुष्य स्वयं ही है। वह चाहे तो सत् कर्म करता हुआ सतयुग बुला ले और चाहे तो दुष्कर्मों में लिप्त रह कर कलियुग की स्थापना करता रहे। यह अवश्य है कि परिस्थितियों तथा देश के सामाजिक, राजनीतिक वातावरण का प्रभाव मनुष्यों पर अवश्य पड़ेगा और उससे बुरी या भली प्रवृत्तियों को प्रेरणा मिलेगी। उदाहरण के लिये जिस प्रकार आजकल जन-संख्या की अनियंत्रित वृद्धि होती जाती है, उसमें मनुष्यों में संघर्ष का बढ़ना तथा अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिये अनुचित उपायों का आश्रय लेना अधिक सम्भव हो जाता है।
पर इन परिस्थितियों का निर्माता भी अधिकाँश में मनुष्य ही होता है। जैसे आजकल भारत तथा चीन जैसे देश आबादी को इस प्रकार बढ़ने दे रहे हैं कि वह उपज के अनुपात से कही अधिक परिणाम में दिखलाई दे रही है, पर अमरीका और इंग्लैण्ड की स्थिति इससे भिन्न है। वहाँ दस वर्ष में शायद 10 प्रतिशत वृद्धि होती हो पर भारत आदि में वह 20-25 प्रतिशत तक बढ़ जाती है। इंग्लैंड में पैदावार बहुत कम है इसलिये वहाँ वृद्धि भी इससे कहीं कम है।
इस परिस्थिति का मुख्य कारण यह है कि अब से सौ वर्ष तक ऐसी परिस्थिति थी कि मनुष्य प्रकृति का मुकाबला नहीं कर सकता था, वरन् जिस प्रकार प्रकृति रखती थी वैसे ही रहता था। इसलिये जितनी वृद्धि होती थी वह युद्ध, महामारी, अकाल आदि से बहुत कुछ खत्म हो जाती थी। इसका परिणाम यह हुआ कि अंक शास्त्रियों के मतानुसार ईसवी सन् के आरम्भ में समस्त पृथ्वी की जनसंख्या 10-20 करोड़ के बीच थी, वह सन् 1900 तक बढ़ कर कुल एक अरब हुई। पर इन 66 वर्षों में वही जनसंख्या 1 अरब से बढ़ कर पौने तीन अरब के लगभग पहुँच चुकी है। कारण यह है कि इस बीच में मनुष्य ने विज्ञान में जो उन्नति की है उसने महामारी और अकाल से होने वाली मृत्युओं को अधिकाँश में रोक दिया है और मनुष्य की आयु का औसत भी बढ़ा दिया है।
इस दृष्टि से विचार करने पर हमको महायोगी अरविंद के इस वक्तव्य में किसी प्रकार की शंका नहीं होती कि युग का निर्माण हमारे अपने ही हाथ में है। हम अपनी भावनाओं, विचारों, कार्यों को जैसा अच्छा या बुरा रखेंगे वैसा ही युग भी बन जायगा। वर्तमान समय के किसी कवि ने भी इस बात को इन प्रेरणादायक शब्दों में कहा है कि-’मर्द वे हैं जो जमाने को बदल देते हैं।” यह ठीक है कि किसी भी युग या जमाने में सब मनुष्यों का एक-सा होना सम्भव नहीं है। पुराणों की कथाओं के अनुसार सतयुग में हिरनाकुश और त्रेता में रावण जैसे व्यक्ति थे ही जो अपने कर्मों से दानव और राक्षस कहलाये और जिन्होंने धर्म-विरुद्ध कार्यों द्वारा पाप-युग का दृश्य उपस्थित कर दिया। इधर ‘कलियुग’ कहे जाने वाले समय में विक्रमादित्य और भोज जैसे राजाओं की कथायें प्रसिद्ध हैं जिनके राज्य में शेर और बकरी एक घाट पर पानी पीते थे। इसलिये यही मानना पड़ता है कि जिस जमाने में जैसे व्यक्तियों तथा कर्मों की प्रधानता होगी वैसा ही युग बन जायगा।
युग परिवर्तन के चिन्ह-
हमारा यह निश्चित मत है कि वर्तमान समय में जो अत्यन्त संकटपूर्ण परिस्थिति पैदा हो गई है उसका कारण वर्तमान समय के मनुष्यों में स्वार्थपरता और अस्वाभाविक संचय की प्रवृत्ति का बहुत अधिक बढ़ जाना है। इस समय व्यापार, व्यवसाय, मालिक-मजदूर, निजी जायदाद आदि के नियम इतने दोषपूर्ण हो गये हैं कि उनके रहते समाज में कभी शाँति और सुख की आशा की ही नहीं जा सकती। आज हम देखते हैं कि एक तरफ खाद्य-सामग्री गोदाम में बन्द सड़ती जा रही है और दूसरी तरफ उससे बीस गज के फासले पर ही रहने वाले व्यक्ति भूख से मर रहे हैं। इधर कपड़े की किसी मिल में कपड़े का इतना स्टॉक जमा हो गया है कि कारखाने को कुछ समय के लिये बन्द कर देना पड़ता है और उधर उसी कारखाने में काम करने वाले मजदूरों में कितनों के ही पास तन ढकने को भी पूरा कपड़ा नहीं है। एक व्यक्ति पचास-सौ आलीशान मकानों का स्वामी बना हुआ अधिक किराया पाने की लालसा से दस बीस को खाली रखे हुए है और उसके पड़ोस में ही ऐसे लोग मौजूद हैं जिनको मकान के अभाव से एक गन्दी कोठरी में भेड़-बकरियों की तरह घिच-पिच रहना पड़ता है और इस तरह अपने स्वास्थ्य को खराब करना पड़ता है।
ऊपर जिन परिस्थितियों का वर्णन किया गया है वे सब ऐसी हैं जिनसे जन-समाज में अवश्य ही असन्तोष की उत्पत्ति होती है और उसके परिणाम स्वरूप प्रतिहिंसा, द्वेष, कलह, चोरी, डाका, हत्या आदि अनेक दोष बहुत अधिक बढ़ने लगते हैं। जब कुछ लोग होशियारी, चालाकी, तिकड़म, भ्रष्टाचार आदि किसी भी तरीके से बहुत सा धन-सम्पत्ति-सामग्री इकट्ठा कर लेने में सफल हो जाते हैं और कहने लगते हैं कि यह हमारी चीज है, हम इसका चाहे जो करें, तो अन्य लोग भी लूट-मार, चोरी-डाका, ठगी-जालसाजी आदि किसी भी विधि से उसको हथियाने का प्रयत्न करना आरम्भ कर देते हैं। एक तरफ तो धनवानों के तरह-तरह के हथकण्डों से काम लेते और अपना संचित धन निरन्तर बढ़ाते जाने से अन्य लोगों को भी उसी तरह के नीचे कार्य करके मालदार बनने की धुन लगती है और दूसरी तरफ जो लोग इन साधनों से वंचित रह जाते हैं वे जोर-जबर्दस्ती, छीना-झपटी की नीति को अपनाकर धनवानों के से ही गुलछर्रे उड़ाने की कोशिश करते हैं। इस तरह दोनों प्रकार से समाज और व्यक्तियों का नैतिक तथा आध्यात्मिक पतन होता है।
अब लोग इस बात को अधिकाधिक अनुभव करते जाते हैं कि इस समय संसार में जो दोष-दुर्गुणों की निरन्तर वृद्धि हो रही है, उसका सबसे बड़ा कारण यह सम्पत्ति पर अधिकार कायम करने की चेष्टा है। यह सच है कि जनसंख्या का सीमा से बाहर बढ़ते जाना उसका प्रत्यक्ष कारण है, पर यदि लोग लोभ, लालच, अति-परिग्रह की वृत्ति को अपनाये रहें, तो चोरी-डाके आदि में कमी नहीं हो सकती। ईसामसीह के जीवन-काल में समस्त संसार की जनसंख्या बीस करोड़ के लगभग ही थी और जगह-जगह सैकड़ों कोस लम्बी-चौड़ी जमीनें खाली पड़ी थीं तो भी उस समय मार-काट की कमी नहीं थी। अब तो लोग फिर भी किसी कारणवश, किसी का कोई कसूर बता कर लड़ते हैं, पर उस समय बड़े राजा बिना मतलब ही ‘विजय-यात्रा’ (या नाश-यात्रा) पर निकल पड़ते थे और रास्ते में जो भी राज्य आता था उसे लूटते-पाटते, मारते-काटते आगे बढ़ते चले जाते थे।
आत्म-भाव की स्थापना-
इसलिये आगामी युग में जो सबसे बड़ा परिवर्तन होगा वह मनुष्य-मनुष्य के बीच में आत्म-भाव की स्थापना होगी। वैसे तो यह बात बड़ी कठिन जान पड़ती है, पर यदि समाज और सरकार इसका निश्चय कर लें और बालकों को आरम्भ से वैसे ही शिक्षा दी जाय तो ज्ञानपूर्वक नहीं तो स्वभाववश एक दूसरे से आत्मीय की भाँति व्यवहार करने लगेंगे। जो नियम परम्परागत रीति-रिवाजों में मिल जाते हैं तो लोग चाहे उनका पूरा मर्म न समझ सकें पर पालन करने लग जाते हैं। इसका उदाहरण आज के मंदिरों और तीर्थों के दर्शन तथा पूजा-उपासना से मिल सकता है। यद्यपि बहुत थोड़े लोग इनका रहस्य समझते हैं पर पालन करने वाले व्यक्तियों की संख्या करोड़ों है। ये लोग चाहे पूजा-उपासना, जप-ध्यान आदि का पूरा लाभ न उठा पाते हों तो भी असत् कर्मों से बहुत कुछ बचे रहते हैं और अनेक धीरे-धीरे शुद्ध रूप में व्यवहार भी करने लगते हैं।
अध्यात्म-भावना के प्रसार का परिणाम यह होगा कि मनुष्यों का दृष्टिकोण विशाल बनेगा और वे विश्व-मानव की भावना को ग्रहण करने लगेंगे। आजकल विभिन्न देशों के निवासियों में जो वेषभूषा, भाषा, शिष्टाचार के नियम, सामाजिक रीति-रिवाज के अन्तर पाये जाते हैं, उस समय पारस्परिक सद्भावना, सहयोग और मिलते-जुलते रहने से दिन पर दिन घटते जायेंगे। इससे विभिन्न जातियों और नस्लों के व्यक्तियों के बीच भेद भावना मिटने में बड़ी सहायता मिलेगी और सौ-दो सौ वर्ष बाद ऐसा समय आ जायगा जब कि एक परम पिता के पुत्र होने के नाते समस्त मनुष्य अपने को एक ही मानव जाति का सदस्य समझने लगेंगे।
संसार में इस प्रकार के मानव-धर्म का विकास होने से वर्तमान समय में जो विभिन्न मजहब वालों में बहुत अधिक घृणा की भावना पाई जाती है वह प्रेम-भाव में बदल जायगी। लोग समझने लगेंगे कि अपने जीवन को उत्कृष्ट बनाना और उसे पर-सेवा, परोपकार में लगाना ही सच्चा धर्म है। शेष बातें कर्मकाँड मात्र हैं, जिनको अपनी इच्छानुसार किया जा सकता है। यदि मूल ठीक दशा में रहेगा तो फूल और फल अपने आप ठीक हो जायेंगे। इस पर आजन्म चलते रहने से लौकिक लाभों के साथ अन्त में मोक्ष का सुख मिलना स्वाभाविक ही है।
ऐसा समय आने पर आजकल भौतिकवाद की अधिकता के कारण व्यक्तियों तथा समाज में जो दोष-दुर्गुण पाये जाते हैं उनका स्वयमेव निराकरण हो जायगा। आज हिन्दू, मुसलमान, ईसाई सब प्रकट में धर्म-कार्यों में भाग लेते हैं और उनमें करोड़ों रुपया खर्च करते हैं, पर जिनकी बाहरी और भीतरी भावनाओं में एकरूपता न होने से उनका कोई अच्छा फल देखने में नहीं आता। आगामी समय में चाहे मनुष्य मंदिरों में आजकल की तरह नियमित रूप से न जायें पर वे उन देवता-स्वरूप व्यक्तियों के सच्चे भक्त, अनुयायी और आदेशों का पालन करने वाले होंगे जो समाज के लिये आत्मोत्सर्ग कर के सार्वजनिक सुख और कल्याण की वृद्धि करेंगे। इसी तरह उनकी तीर्थयात्राएँ भी सन्त एकनाथ की तरह होंगी जिन्होंने रामेश्वर पर चढ़ाया जाने वाला गंगाजल एक प्यास से भरते हुये गधे को पिला दिया और उसकी प्राण रक्षा की। इसी प्रकार उस समय सर्वश्रेष्ठ यज्ञ महाभारत में वर्णित उस तरह के परोपकार के कार्यों को समझा जायगा जिसका वर्णन एक न्यौला ने राजसूय यज्ञ के अवसर पर युधिष्ठिर को सुनाया था।
वास्तव में तब ऐसा समय आयेगा जब कि अध्यात्म कहने-सुनने या मन के भीतर ही गुप-चुप भजन-जप करने की चीज नहीं रहेगी वरन् उसका उपयोग नित्यप्रति जीवन की प्रत्येक क्रिया में होगा। यद्यपि उस समय भी मनुष्य व्यापार, नौकरी, मजदूरी, कारीगरी, कलाकारिता आदि सब कार्य करेंगे, धन भी कमायेंगे, उसका उपभोग भी करेंगे पर उनके दृष्टिकोण में एक बहुत बड़ा अन्तर पड़ जाएगा। आज लोग धन को ही सब सुखों का साधन मान रहे हैं और इसलिये जिस तरह भी धन प्राप्त किया जाय वही ठीक मार्ग है- वही धर्म है! इसके विपरीत उस समय लोग जो कार्य करेंगे वह कर्तव्य की भावना, सेवा के ख्याल से, समाज के ऋण को चुकाने के उद्देश्य से करेंगे जिससे खाने-कमाने का काम ज्यों का त्यों रहने पर भी समाज की स्थिति में जमीन-आसमान का अन्तर पड़ जायगा और दुःखों का सबसे बड़ा कारण दूर हो जायगा।
धर्म और समाज विषयक विचारों में इस प्रकार संशोधन हो जाने से अन्य छोटी-बड़ी विधियों, संस्कारों परम्पराओं आदि में स्वयमेव सुधार हो जायेगा। आज लाख सर पीटने पर भी दहेज का दैत्य हमारा पीछा नहीं छोड़ रहा है, मृतक भोजों की हजार-हजार, पाँच-पाँच सौ व्यक्तियों की दावतें शेष बचे हुये घर वालों को भी मटियामेट कर रही हैं। प्रत्येक छोटे-बड़े संस्कार में नेग-जोग की प्रथायें लोगों की जेब खाली करती रहती हैं, पर आगे चल कर इनका स्वरूप सर्वोपयोगी और कल्याणकारी बन जायगा। सर्वोत्तम ब्रह्म विवाह के लिये हमारे यहाँ जो विधि बतलाई गई है, वह ऐसी है कि दम्पत्ति पर अत्यन्त उच्चकोटि के संस्कार छोड़ते हुए बिना किसी प्रकार के खर्च या आडम्बर के पूरी हो सकती है। इसी तरह मृतक संस्कार के लिये प्राचीन ग्रन्थों में जैसी व्यवस्था देखने में आती है, उसमें भी लम्बी-चौड़ी दावतों की जरा भी आवश्यकता नहीं। छोटे-मोटे रीति-रिवाजों और नेग-जोगों में जो मनमाना खर्च किया जाता है उसका कारण अपनी शान दिखलाना ही होता है पर भावी समाज में से यह सब प्रवृत्तियाँ दूर हो जायेंगी और प्रत्येक मनुष्य ऐसी उलझनों से बच कर सुखी जीवन व्यतीत कर सकेगा।
राजनीतिक परिवर्तन-
जो युग अभी गुजर रहा है, उसमें अधिक शक्ति और प्रभाव राजनीति का माना जाता है और उसी से सब देशों की जनता के भाग्य का फैसला होता है। सर्वसाधारण का जीवन सुखी है या दुःखी इसका आधार मुख्यतः इसी बात पर है कि वहाँ के राजपुरुष सचाई से जनहित को ध्यान में रख कर काम करते हैं या इसके विपरीत आचरण करते हैं। जहाँ के स्वार्थी राजनैतिक नेता अपने उच्च पदों को कायम रखने के लिये राजनीति और अनाचार से काम लेने में भी संकोच नहीं करते वहाँ के लोग अवश्य दुःखी रहते है और उनका जीवन प्रायः संकटपूर्ण रहता है। खेद के साथ कहना पड़ता है कि आज कल हमारे देश में और अनेक अन्य देशों में भी ऐसी ही स्थिति दिखलाई पड़ रही है।
पर हमारा विश्वास है कि यह स्थिति अधिक समय तक कायम नहीं रह सकती। शीघ्र ही मनुष्य युद्ध की निस्सारता को समझ कर सह-अस्तित्व के सिद्धान्त को स्वीकार कर लेंगे और एक वास्तविक राष्ट्रसंघ बनाने की तरफ अग्रसर होंगे। इस स्थिति के आने के पूर्व एक विश्व-युद्ध होने की आशंका इस समय बहुत प्रबल हो उठी है। यह युद्ध बहुत नाशकारी होगा और उसमें जर्जर होकर-थक कर ही राष्ट्रों को सह-अस्तित्व की बुद्धि आयेगी। तो भी जहाँ तक विश्वास है, इस युद्ध में अणु-अस्त्रों (एटम और हाइड्रोजन बम) का उपयोग नहीं होगा। जैसा हाल ही में अमरीका के प्रेसीडेण्ट ने कहा था- “हाइड्रोजन बम का प्रयोग कोई पागल ही करेगा।” कारण यह है कि अणु-अस्त्रों का प्रयोग जिस प्रकार शत्रु के लिये नाशकारी होता है, वैसे ही अपने लिये भी घातक सिद्ध होता है। यदि कई राष्ट्रों द्वारा इस हथियार का अधिक मात्रा में प्रयोग किया जाय तो तीन-चौथाई से भी अधिक जन संख्या के नष्ट हो जाने के साथ ही समस्त पृथ्वी का वायुमण्डल ऐसा विषाक्त हो जायगा कि उसमें रह कोई व्यक्ति महा रोगी बने बिना न रहेगा।
भविष्य में जो सरकार बनेगी वह आजकल से बहुत कुछ भिन्न होगी। उदाहरण के लिए हमारे देश में प्रजातन्त्र है, पर अब यह स्पष्ट हो गया है कि इस प्रणाली में भ्रष्टाचार की बहुत गुंजाइश है और दुष्ट तथा धूर्तों को मनमानी करने का बहुत ज्यादा मौका मिलता है। अमरीका, इंग्लैण्ड जैसा पूँजीपति शासन प्रायः युद्धों का कारण बनता है। रूस, चीन जैसा कम्यूनिस्ट शासन व्यक्तिगत स्वाधीनता और आत्मविकास में विशेष रूप से बाधक सिद्ध होता है। इसलिये भविष्य का शासन बुद्धि-जीवी और त्याग-भावना वालों का होगा और उसका उद्देश्य जीवन के विविध क्षेत्रों तथा विभिन्न देशों में समन्वय कायम रखना ही होगा। वह स्थिति समाजवाद की होगी और आगे चल कर अराजकतावादियों के आदर्शानुसार मनुष्यों के व्यक्तिगत तथा सामाजिक जीवन में से सरकार का हस्तक्षेप बहुत ही कम कर दिया जायगा। मनुष्यों को सहकारिता, भ्रातृभाव, एकात्मता के आदर्शों के अनुसार व्यवहार करने की शिक्षा और प्रेरणा दी जायगी, जिससे तुच्छ स्वार्थ जनित संघर्ष समाप्त हो जायगा और मानव-समाज एक सच्चे देव युग में पदार्पण करेगा।
पिछले लेखों में संसार के कितने ही प्रसिद्ध भविष्य-वक्ताओं और राजनीतिज्ञों के जो मत दिये गये हैं, उनमें कुछ अन्तर देख कर शायद पाठकों के मन में एक शंका उत्पन्न हो जाये। क्योंकि इसमें युद्ध का होना बतलाया है किसी ने सन् 70 में किसी ने 75-76 में। ऐसी दशा में एक सामान्य पाठक के मन में जिज्ञासा होती है- “यदि विश्व-युद्ध का ठीक समय बतला दिया जाता तो बड़ा अच्छा होता।”
इस अंक में हमने जितनी भविष्य-वाणियों को प्रकाशित किया है वे ज्योतिषियों की नहीं हैं, जो बाजार में बैठ कर भावी घटनाओं का ठीक घण्टा-मिनट तक बतलाया करते हैं! वे या तो आध्यात्मिक शक्ति प्राप्त सन्तों की हैं अथवा राजनीति विज्ञान के ज्ञाताओं की। अध्यात्मज्ञानी सूक्ष्म जगत में होने वाले परिवर्तनों का निरीक्षण करके आगामी घटनाओं के स्वरूप का निर्णय करते हैं और राजनीतिज्ञ वर्तमान में होने वाली घटनाओं और विभिन्न श्रेणियों के व्यक्तियों के मनोभावों के आधार पर भावी परिवर्तनों की रूपरेखा का अनुमान लगाते हैं। इन दोनों में से कोई ज्योतिषियों की तरह भावी घटनाओं की तिथि ‘घण्टा’ मिनट बतलाने का दावा नहीं करता और न उसका कोई महत्व समझता है। उनका लक्ष्य तो मानव जाति की प्रगति पर विचार करना और उसका मार्गदर्शन करना ही होता है। जिस प्रकार हमारे यहाँ के प्राचीन ऋषि-मुनियों ने दैवी परिवर्तनों का वर्णन करते हुये दिव्य-वर्ष की कल्पना की है अर्थात् मनुष्यों के एक वर्ष को देवताओं का एक दिन बतलाया है, उसी प्रकार मानव-इतिहास के ज्ञाता शताब्दियों का वर्णन करते हैं। राजनीतिज्ञ भी दशाब्दियों से कम की बात प्रायः नहीं करते। कारण यही है कि सामूहिक कार्यों की तुलना व्यक्तिगत कार्यों से नहीं की जा सकती।
कोई ज्योतिषी एक व्यक्ति के सम्बन्ध में भावी घटना का ठीक समय बताने में सफल हो सकता है, पर सामूहिक कार्यों में, जहाँ निरन्तर विभिन्न प्रवृत्तियों के व्यक्तियों के कार्यों का घात-प्रतिघात होता है, ऐसा नियत समय का निर्देशन करना असंगत होता है। सामुदायिक घटनाओं का स्वरूप और क्षेत्र विशाल होता है और उनके लिये विस्तृत काल विभाग की ही गणना की जाती है। यही कारण है कि प्राचीन सन्तों ने मानव जाति को चेतावनी देते हुये बीसवीं सदी का ही उल्लेख किया है। आज हम प्रत्यक्ष इतिहास के रूप में तीन विश्व युद्धों का वर्णन-पृथक पृथक करते हैं पर उनकी सूक्ष्म दृष्टि में वे तीनों एक ही थे। आज भी हम जब अन्तःदृष्टि से विचार करते हैं तो हमें वे तीनों स्पष्टतः एक ही शृंखला की तीन कड़ियाँ प्रतीत होते हैं।
इस प्रकार के व्यापक दृष्टिकोण से जब हम आजकल की और निकट भविष्य की घटनाओं पर विचार करते हैं और उनका सूक्ष्म जगत में गतिशील शक्तियों से सामंजस्य करते हैं तो इसी निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि अब मनुष्य जाति के इतिहास में एक बहुत बड़े परिवर्तन का समय बिल्कुल समीप आ गया है - मानवता एक नई सीढ़ी पर चरण रखने ही वाली है। पिछले पचास-साठ वर्षों से संसार के सभी देशों में जो जागरण, संघर्ष, क्राँति की लहर फैल रही है, वह इसी परिवर्तन का बाह्य लक्षण है। अब यह संघर्ष अपनी चरम सीमा पर पहुँच चुका है और इसका अन्तिम निर्णय शीघ्र ही होना अनिवार्य है।
दूरदर्शी भविष्यवेत्ता कीरो ने सन् 1925 में इस संघर्ष युग का अन्त सन् 1980 से पहले बतलाया था। अमरीका की वर्तमान सन्त महिला जीन डिक्सन भी 1980 तक विश्व युद्ध हो जाना और उसके बाद नये युग की स्थापना का कार्यारम्भ होना निश्चित बतला रही हैं। चीन के कर्ता-धर्ता ‘माओ’ ने सन् 65 में कहा था कि “दस-पन्द्रह वर्ष के भीतर विश्व युद्ध होना अटल है।” चीन के पड़ोसी फिलीपाइन के प्रेसीडेन्ट मार्कास ने इसी 8 मई को स्पष्ट कहा है कि हमें दस वर्ष के भीतर चीन के आक्रमण का पूरी तरह से भय है।
वर्षों से समाचार पत्रों के लेखक आगामी महायुद्ध के दो मुख्य योद्धा अमरीका और रूस को बतलाते आये हैं और यह बात अभी तक सही है। पर विश्व के रंग मंच पर एक नई शक्ति- चीन का प्रवेश हुआ है और इसमें सन्देह नहीं कि इससे राजनीतिक क्षेत्र के पुराने अनुमान बदल जायेंगे। अमरीका और रूस के शासकों का एक स्थान पर बैठ कर सलाह करना इसी का प्रतीक है। अमरीका चीन से कहाँ तक भयभीत हो रहा है यह नीचे लिखे ताजा समाचार से प्रकट होता है-
“वाशिंगटन, 22 जून। चीन के आणविक विकास के सम्बन्ध में सही भविष्य-वाणी करने में ख्याति प्राप्त अमरीकी वैज्ञानिक श्री राल्फ ई॰ लेघ ने कहा है कि 1970 तक चीन 100 उद्जन बम अथवा उद्जन प्रक्षेपणास्त्र बना लेने में सफल हो जायगा।” एक अन्य अमरीकी अधिकारी ने यह भी कहा है कि चीनी प्रक्षेपणास्त्र बहुत जोरदार बनाया गया है जो अन्य महाद्वीपों तक जा सकता है।
हमारे देश की अधिकाँश जनता चीन को अब भी पुराना ‘अफीमची चीन’ समझे बैठी है और उसकी हँसी उड़ाया करती है। पर उनको समझ लेना चाहिए कि वर्तमान ‘कम्यूनिस्ट चीन’ कुछ और ही बला है और कुछ वर्षों में वही काम कर दिखायेगा जो दूसरे महायुद्ध में हिटलर ने किया था। इस समय भी वह अपने आस-पास के सभी देशों से किसी न किसी प्रकार का विवाद खड़ा कर रहा है। भारत से तो वह सशस्त्र युद्ध ही कर चुका है, रूस से भी सीमा विवाद शुरू कर दिया है। इण्डोनेशिया के घरेलू मामलों में हस्तक्षेप के कारण वहाँ हजारों चीन-पक्षपाती मारे जा चुके हैं। अब बर्मा में भी उसके प्रचार कार्य के फलस्वरूप भयंकर उपद्रव शुरू हो गया है। नेपाल से समाचार आया है। कि चीनी दूतावास वहाँ भी प्रचार करने लगा है जिससे सरकार असन्तुष्ट है। अभी भारतीय संसद में चीन पर आरोप लगाया गया है कि वह भारत के बंगाल और आसाम प्राँत में घुसपैठ करके स्वतंत्र कम्यूनिस्ट शासन स्थापित करने का षडयन्त्र कर रहा है। चाऊ-एन-लाई इसी समय भी अमरीका से युद्ध होने की बात खुल्लमखुल्ला कह रहे हैं। ऐसी परिस्थिति में संसार की शाँति किसी भी दिन भंग हो जाय इसमें कोई आश्चर्य नहीं।
“वर्तमान घटनाओं से हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं विश्वयुद्ध का दो-चार साल में ही हो जाना असम्भव नहीं है। यदि युद्ध को टालने वाली शक्तियों ने अधिक जोर लगाया तो कुछ ही दिन बचाव हो सकता है, तो भी अधिक से अधिक दस वर्ष के भीतर उसका हो जाना अनिवार्य है।”
पर आध्यात्मिक दृष्टिकोण रखने वाले व्यक्तियों के लिये इन घटनाओं का आशय कुछ और ही प्रतीत होता है। वे न किसी खास दल की हार-जीत को बड़ी बात समझते हैं, न उनको सौ-दो सौ करोड़ व्यक्तियों के मरने की चिन्ता होती है। वे इस प्रकार के दैवी विधान को सदैव कल्याण कारी मानते हैं। आत्मा के अमरत्व में उनका विश्वास होता है अतः वे मरने-जीने का भी शोक या हर्ष नहीं करते। इसलिये वे होनहार की तरफ से निश्चिन्त रह कर अपने कर्तव्य-कर्म पर दृढ़ रहना ही सर्वोच्च धर्म मानते हैं। युग-निर्माण-योजना के अनुयायियों के लिये हम यही मार्गदर्शन करते हैं।
‘अखण्ड ज्योति के इस भविष्यवाणी अंक में निकट भविष्य में घटित होने वाले घटना क्रम का जो उल्लेख किया गया है। उसे किसी साधारण ज्योतिषी या भविष्य-वक्ता की कल्पना नहीं समझा जाना चाहिये। इसके पीछे कुछ ठोस आधार हैं और वे समयानुसार सामने आते चले जायेंगे।
इन सम्भावनाओं से किसी को डरने या परेशान होने की आवश्यकता नहीं है। वरन् परिस्थितियों के अनुरूप आवश्यक तैयारी करने और अपने को ढालने की तैयारी करना ही दूरदर्शिता है। समय का बदलना निश्चित है। आज की जिन अनुपयुक्त परिस्थितियों में हमें रहना पड़ रहा है वे देर तक इसी रूप में नहीं रह सकतीं इस घुटन से छुटकारा मिल सके ऐसी परिस्थितियाँ एवं सम्भावना महाकाल उत्पन्न करता चला आ रहा है।
अगले दिन बहुत ही उलट-पुलट से भरे हैं। उनमें ऐसी घटनायें घटेंगी ऐसे परिवर्तन होंगे जो हमें विचित्र भयावह एवं कष्टकर भले ही लगें पर नये संसार की अभिनव रचना के लिए आवश्यक हैं। हमें इस भविष्यता का स्वागत करने के लिए-उसके अनुरूप ढलने के लिए-तैयार होना चाहिये। यह तैयारी जितनी अधिक रहे उतना ही भावी कठिन समय अपने लिये सरल सिद्ध होगा।
भावी नर संहार में आसुरी प्रवृत्ति के लोगों को अधिक पिसना पड़ेगा। क्योंकि महाकाल का कुठाराघात सीधा उन्हीं पर होना है। “परित्राणाय साधूनाँ विनाशायश्च दुष्कृताम्” की प्रतिज्ञानुसार भगवान को युग-परिवर्तन के अवसर पर दुष्कृतों का ही संहार करना पड़ता है। हमें दुष्ट दुष्कृतियों की मरणासन्न कौरवी सेना में नहीं, धर्म-राज की धर्म संस्थापना सेना में सम्मिलित रहना चाहिये। अपनी स्वार्थपरता, तृष्णा और वासना को तीव्र गति से घटाना चाहिए और उस रीति-नीति को अपनाना चाहिये जो विवेकशील परमार्थी एवं उदारचेता सज्जनों को अपनानी चाहिये।
संकीर्णताओं और रूढ़ियों की अन्य कोठरी से हमें बाहर निकलना चाहिए। अगले दिनों विश्व-संस्कृति, विश्व-धर्म, विश्व-भाषा, विश्व-राष्ट्र का जो भावी मानव समाज बनेगा उसमें अपनी-अपनी महिमा गाने वालों और अपनी ढपली अपना राग गाने वालों के लिये कोई स्थान न रहेगा। पृथकतावादी सभी दीवारें टूट जायेंगी और समस्त मानव समाज को न्याय एवं समता के आधार पर एक परिवार का सदस्य बन कर रहना होगा। जाति लिंग या सम्पन्नता के आधार पर किसी को वर्चस्व नहीं मिलेगा। इस समता के अनुरूप हमें अभी से ढलना आरम्भ कर देना चाहिये।
धन-संचय और अभिवर्धन की मूर्खता हमें छोड़ देना ही उचित है, बेटे पोतों के लिए लम्बे चौड़े उत्तराधिकार छोड़ने की उपहासास्पद प्रवृत्ति को तिलाँजलि देनी चाहिये क्योंकि अगले दिनों धन का स्वामित्व व्यक्ति के हाथ से निकल कर समाज, सरकार के हाथ चला जायगा। केवल शिक्षा, स्वास्थ्य, संस्कार एवं सद्गुणों की सम्पत्ति ही उत्तराधिकार में दे सकने योग्य रह जायगी। इसलिए जिनके पास आर्थिक सुविधायें हैं वे उन्हें लोकोपयोगी कार्यों में समय रहते खर्च करदें ताकि उन्हें यश एवं आत्म-संतोष का लाभ मिल सके। अन्यथा वह संकीर्णता मधुमक्खी के छत्ते पर पड़ी डकैती की तरह उनके लिये बहुत ही कष्ट-कारक सिद्ध होगी।
लंका विजय में श्री राम के साथी रीछ-वानरों की तरह गिद्ध और गिलहरी की भाँति हमें युग-निर्माण योजना के महान अभियान में तत्परतापूर्वक संलग्न होना चाहिये। यह प्रयत्न एवं पुरुषार्थ नव युग के स्वागत की सच्ची अगवानी का महत्वपूर्ण आयोजन माना जायगा। विवेकशील और दूरदर्शी प्रबुद्ध व्यक्तियों को इस महत्वपूर्ण समय का उपयोग इसी दिशा में कदम उठाते हुए करना चाहिये। जो समय रहते अपने को बदल सकेंगे वस्तुतः वे ही शाँति और सन्तोष अनुभव करेंगे।
निःशंक हमने दिया जलाया
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ओ आंधियों तुम न सनसनाओ,
निःशंक हमने दिया जलाया,
प्रभंजनों की चुनौतियों पर।
पवन झकोरों के पालने में, खिलाई नव ज्योति की कलायें,
प्रकाश पल पल प्रखर हुआ है, घिरी हैं जब-जब तिमिर घटायें,
ओ बिजलियों तुम न तमतमाओ,
खुली डाल पर नीड़-बनाया,
अनल-घनों की चुनौतियों पर।
अपार विष हम पचा चुके हैं, धरा को उससे बचा चुके हैं,
हमारे कुरुक्षेत्र को पता है प्रलय स्वयंवर रचा चुके हैं,
कुवृत्तियों तुम न कुनमुनाओ,
अनय का हमने नशा उतारा,
अधम-जनों की चुनौतियों पर।
दुशासनों के पते नहीं हैं, मिटा असुरता का दर्प सारा,
मिला धूल क्रूरता कंस की मनुष्यता को सदा उबारा,
ओ विषधरो! तुम न फनफनाओ,
कन्हैया को नाचना सिखाया,
उठे फनों की चुनौतियों पर।
हमारा पथ लो प्रकाश का है, ध्येय तिमर के विनाश का है,
सभी का मंगल लिए हृदय में, हमारा हर पग विकास का है,
हमें न रण दुन्दुभी सुनाओ,
नये सृजन का बिगुल बजाया,
प्रलय-क्षणों की चुनौतियों पर।
ओ आंधियों तुम न सनसनाओ,
निःशंक हमने दिया जलाया,
प्रभंजनों की चुनौतियों पर।
-लाखनसिंह भदौरिया “ शैलेन्द्र
*समाप्त*