केवल अपने लिये ही जीना मानव-जीवन का निकृष्टतम दुरुपयोग है। जो केवल अपने लिये ही पैदा हुआ, अपने लिए ही बढ़ा और आप ही आप खा खेल कर चला गया, ऐसा व्यक्ति अपनी दृष्टि में सफल भले ही बनता रहे वस्तुतः वह असफल ही माना जायेगा।
इस सृष्टि में सफल जीवन उसका है जो दूसरों के काम आ सके। बादल समुद्र से जल ढोकर लाते हैं और प्यासी धरती को परितृप्त करने में लगे रहते हैं। समुद्र की महानता को सुरक्षित रखने के लिये नदियाँ उसमें अपनी आत्म-समर्पण करते रहने की परम्परा को तोड़ती नहीं। फूल खिलते हैं दूसरों को हँसाने के लिये, पौधे उगते हैं दूसरों के प्रयोजन पूर्ण करने के लिये। वायु चँवर ढुलाते रहने की अपनी पुण्य प्रक्रिया से समस्त जड़-चेतन को प्रमुदित करती रहती है। इसमें इनका अपना क्या स्वार्थ? सूर्य चन्द्रमा और नक्षत्र इस जगती को अहिर्निश प्रकाश प्रदान करते हुए भ्रमण करते हैं, यही जीवन की उपयोगिता एवं सार्थकता है।
सृष्टि का प्रत्येक जड़ परमाणु और कीट-पतंग जैसा प्रत्येक जीवधारी अपनी स्थिति से दूसरों का हित साधन करता है। पशु दूध देते और परिश्रम से हमारी सुविधायें बढ़ाते हैं। जब छोटे-छोटे अनियमित जीव-जन्तु तक परोपकार का व्रत लेकर जीवन-यापन करते हैं, तब क्या मनुष्य जैसे बुद्धिमान् और विकसित प्राणी के लिये यही उचित है कि वह अपने लिये ही जिये, अपने लिये ही बढ़े? और अपने लिये ही मर जाए?
- हेनरी थोरा
आत्मा के स्वरूप, स्वभाव और अनुभूति की व्याख्या करते हुए ऋषि ने बताया-विश्व के सम्पूर्ण प्राणियों में व्यास चेतना ही आत्मा है। वह अति गूढ़ निर्गम तत्व है इसलिये लोग प्रत्यक्ष नहीं देख पाते । स्पष्टतया चित्तवृत्तियाँ गतिशील जान पड़ती हैं इसलिये मन या चित्त को ही आत्मा होने का भ्रम होता है, वस्तुतः चित्त आत्मा नहीं है। वह परम प्रकाश -तत्व है।
एकमात्र चिन्तन ही वह उपाय है जिसके द्वारा चेतना की, आत्मा की अनुभूति और प्रगति सम्भव है। विद्वज्जन उसी अक्षर, अविनाशी, अजर-अमर आत्मा का चिन्तन करते हैं। लौकिक जीवन से उतना ही सम्बन्ध रखते हैं जितना आत्मा के आध्यात्मिक विकास के लिये आवश्यक है। अन्यथा आत्मा के गुणों और कौतुक का चिन्तन ही उनका स्वभाव होता है। उसी में असीम तृप्ति भी है।
दीर्घतमा के शिष्यों में उस दिन विलक्षण खामोशी थी। इतिहास, भूगोल, जीव-विज्ञान, रसायन विज्ञान के पाठ्यक्रम भली-भाँति समझ में आ जाते थे, किन्तु आत्म विद्या का विषय ही इतना गूढ़ और रहस्यपूर्ण है कि दीर्घतमा के बहुत प्रयत्न और विश्लेषण करने के बावजूद भी विद्यार्थी उसे समझ न पाये।
आत्मा का विषय प्रत्येक विद्यार्थी का अपना निजी विषय था, इसलिये उसकी सर्वोपरि आवश्यकता भी थी। जब वह कक्षा आती तो उनकी गम्भीरता भी बढ़ जाती और तन्मयता भी किन्तु आज भी आत्मा के चेतन स्वरूप का बोध विद्यार्थी को नहीं ही हो पाया।
मध्याह्न के पूर्व ही एकाएक बन्द की शंखध्वनि कर दी गई। विद्यार्थियों के हृदय “मैं क्या हूँ, कहाँ से आया हूँ, क्यों आया हूँ?” इन प्रश्नों को जानने के लिये पहले से ही बेचैन थे। गुरु द्वारा अकस्मात् विद्यालय बन्द कर दिये जाने की घोषणा से वे और भी बेचैन हो गये। सब विद्यार्थी एक-एक कर अपने पर्णकुटीरों में चले गये। मध्याह्न की हलचल उस दिन किसी ने नहीं सुनी। सम्पूर्ण आश्रम उस दिन विधवा की-सी शान्ति में डूबा हुआ था।
सूर्यदेव का रथ थोड़ा पश्चिम की ओर झुका और घण्टा पुनः बजा। विद्यार्थी एकत्रित हुए, किसी के हाथ में न तो लेखनी थी न भोज-पत्र। कोई घोषणा भी नहीं थी। छात्र एकत्रित हो गये तो ऋषि एक ओर चल पड़े, चुपचाप विद्यार्थियों ने भी उनका अनुगमन किया। एक ही पंक्ति में अनुशासनबद्ध विद्यार्थी गुरु का पीछा करते हुए चल रहे थे।
गाँगेय के श्मशान-घाट पर दल रुक गया। घाट की सीढ़ियों के सहारे एक शव अटका हुआ था। ऋषि उसके समीप पहुँच गये। सब विद्यार्थी सीढ़ियों पर पंक्तिबद्ध बैठ गये।
ऋषि ने पाठ शुरू किया। शव के एक-एक अंग की ओर संकेत करते हुए उन्होंने कहा-इन दोनों हाथों की तुलना अपने हाथों से करो, वैसी ही बनावट, माँसल उंगलियों से युक्त किन्तु ये हाथ न हिलते हैं, न डुलते हैं। आँखें हैं पर वह देखती नहीं, कान हैं पर यह सुनते नहीं। जिस मुख ने सैकड़ों सु-स्वादयुक्त पदार्थों को चखा, मुख आज भी वही है पर अब यह खा भी नहीं सकता, नाक साँस नहीं ले रही है। हृदय स्थान पर होने वाली धक-धक भी बन्द है। यह सारा शरीर ज्यों का त्यों है पर इसके लिये रूप, रस, गन्ध, आकाश, सूर्य-चन्द्रमा,प्रकाश, वर्षा, अग्नि आदि सम्पूर्ण वस्तुयें अस्तित्वहीन हैं।
इस शरीर को क्रियाशील बनाने वाली शक्ति इससे ऐसे ही अलग हो गई है जैसे अंगारे से ऊष्मा और जल से शीतलता। जब तक वह शक्ति थी तब तक यही शव क्रियाशील बना हुआ था, शक्ति न होने पर वही आज मुर्दा है।
चींटी-चिड़िया, हाथी, ह्वेल, गाय-बैल, गरुड़, कौवा गीध आदि से लेकर मनुष्य तक इन सबमें एक जैसी चेतनता है। किसी की शक्ति कम है, किसी की अधिक। वृत्तियाँ और संस्कार भी अलग-अलग हैं, किन्तु देखने-सुनने काम करने, इच्छाओं की पूर्ति में संलग्न रहने, प्रेम प्रदर्शित करने, काम व्यक्त करने, आहार-निद्रा, भय, मैथुन की प्रवृत्ति सबमें एक जैसी है। सभी में यह शक्ति एक ही गुण रूप वाली मिलेगी। यह शक्ति प्रत्येक प्राणी में सन्निहित है, समायी हुई है, इसीलिये इसे आत्मा कहते हैं। यह आत्मा ही प्रकाश, तत्व, शक्ति अथवा चेतना के रूप में विभिन्न शरीरों में व्याप्त है, यद्यपि उसका शरीर से कोई सम्बन्ध नहीं। वह अजर, अमर, अविनाशी और सतत् चेतनायुक्त है पर स्थूल पदार्थ के साथ संगम हो जाने के कारण ऐसा भासता है कि वह जन्म लेता है और मृत्यु को भी प्राप्त होता है। सुख-दुःख का कारण यही विभ्रान्ति ही है।
चेतना (आत्मा) विशुद्ध तत्व है। चित्त उसका एक गुण है। इच्छायें, वासनायें यह चित्त हैं, प्रवृत्तियाँ है किन्तु आत्मा नहीं, इसलिये जो लोग शारीरिक प्रवृत्तियों काम, भोग, सौंदर्य-सुख को ही जीवन मान लेते हैं वह अपने जीवन धारण के उद्देश्य से भटक जाते हैं। चेतना का जन्म यद्यपि आनन्द, परम आनन्द, असीम-असीम आनन्द की प्राप्ति के लिये ही हुआ है तथापि यह चित्तवृत्तियां उसे क्षणिक सुखों में आकर्षित कर पथ-भ्रष्ट करती हैं, मनुष्य इसी साँसारिक काम-क्रीड़ा में व्यस्त बना रहता है, तब तक चेतना की अवधि समाप्त हो जाती है और वह इस संसार से दुःख, प्रारब्ध और संस्कारों का बोझ लिये हुए विदा हो जाता है। चित्त की मलिनता के कारण ही वह अविनाशी तत्व, आप आत्मा इस संसार में बार-बार जन्म लेने को विवश होते हैं और परमानन्द से वंचित होते हैं सुखों में भ्रम पैदा करने वाला यह चित्त ही आत्मा का-चेतना का बन्धन है।
“आत्म-ज्ञान के बिना किसी भी काल में किसी को भी मुक्ति नहीं मिलती”-ऋषि इस विषय को आगे बढ़ाते हुए अपनी वक्तृता जारी किये हुए थे। तभी एक छात्र ने पूछा “गुरुदेव! यह आत्मा जब इतना सूक्ष्म, गूढ़ और रहस्यपूर्ण है तो उसे पाया कैसे जा सकता है? कैसे इन चित्तवृत्तियों के दाँव से छुटकारा पाया जा सकता है।”
संकेत पर छात्र बैठ गया-ऋषि ने शंका का समाधान करते हुए बताया -”मैं शरीर हूँ” जब तक जीव यह मानता रहेगा, तब तक करोड़ उपाय करने पर भी शाश्वत सुख-शान्ति, जो आत्मा का लक्ष्य है, नहीं उपलब्ध हो सकती। हम शरीर नहीं हैं, शरीर में तो हम बैठे हैं, वाहन बनाएं हैं घुसे हैं यह निश्चय है फिर भी हम अपने को शरीर मानकर सारा व्यवहार करते हैं पहले इस धारणा को बंद करना चाहिए और निश्चय करना चाहिए-मैं शरीर नहीं, शरीर इन्द्रिय, मन और बुद्धि आदि अन्तःकरण चतुष्टय से परे असंग शुद्ध आत्मा हूँ। कुछ दिन इस प्रकार का निरन्तर चिन्तन करने से अपनी आत्मिक धारणा पुष्ट हो जाती है और आत्म-कल्याण का मार्ग दिखाई देने लगता है।
ऋषि गम्भीर विवेचना में उतर गये। सूर्यदेव अस्ताचल की और बढ़ चले किन्तु आत्मा का विषय ही इतना आनंदप्रद था कि सम्पूर्ण छात्र निश्चल भाव से तन्मयता की मुद्रा में बैठे रहे। न उनकी जिज्ञासा तृप्त होती थी न उठने की किसी को इच्छा ही थी। आश्चर्य और कौतूहल से सभी ध्यानपूर्वक गुरुदेव की व्याख्या सुनने में निमग्न थे। ऋषि ने आगे बताया-
‘आत्मा स्वयं ज्ञान-स्वरूप है। ज्ञान की प्राप्ति की लिये कोई परिश्रम करने की आवश्यकता है न यत्न की। कठिन साधनों से अप्राप्त वस्तु के लिये प्रयत्न करना पड़ता है जो स्वयं ज्ञान रूप है उसे अपने आप को ढूँढ़ने के लिये न तो जंगलों में भटकने की आवश्यकता है न जीवन को शुष्क और कठोर बनाने की। अपने आप में अहंकार का जो भाव है केवल उसे मिटा देने की आवश्यकता है। क्योंकि यह भ्रम भी आत्मा की तरह अनादि और संत है इसलिये अपने शक्ति स्वरूप, ज्ञान स्वरूप चेतनता की धारणा को पुष्ट बनाने के लिये गहन चिन्तन की आवश्यकता पड़ती है। आत्मा की प्राप्ति के लिये जितने भी साधन और उपासनायें बताई गई हैं वह केवल इसी बात को परिपुष्ट करने के लिये हैं कि तुम शरीर नहीं, मन और इन्द्रियाँ भी नहीं हो इनसे परे अनन्त शक्ति स्वरूप आत्मा हो-आत्मा बन्धन रहित है। अपनी इच्छा संकल्प बल से कहीं भी विचरण कर सकती है। प्रकाश खेल खेलता है न उसका कोई बन्धु है न बान्धव, पुत्र न कलत्र, सब विविध रूप आत्मायें ही अपनी-अपनी चित्तवृत्तियों के कारण भाई, पिता माता ऐसे भासते हैं, यही बंधन है। इस बन्धन से छूटकर राग, द्वेष माया, ममता छोड़कर, केवल कर्तव्य पालन का ध्यान रखता हुआ जो व्यक्ति आत्मा में ही रमण करता है। आत्मा का ही चिन्तन करता है, आत्मा के गुणों के अनुरूप आचरण करता है अन्त में वह साँसारिक, सुख ऐश्वर्य और भोगों को भोगते हुए भी आत्मा को प्राप्त कर लेता है। मन, प्राण एवं प्रकृति के परिवेश से प्रकट में पृथक-पृथक प्रतीत होने पर भी हम आप सब वस्तुतः एक ही आत्मा की अभिव्यक्तियाँ हैं। इसे यों भी कहा जा सकता है कि आत्मा ही विभिन्न रूपों में व्यक्त होकर उन्मुक्त चेतना परमात्मा में परिणत होना चाहती है। जो इस तत्व रूप को खोजते हैं वह तो अपना लक्ष्य पा जाते हैं और जो अपने चित्त की अहंवृत्तियों में ही भूलते-भटकते रहते हैं वह सुख स्वरूप होने पर भी दुःख भुगतते हैं, बन्धन मुक्त होने पर भी बन्धनों में पड़े रहते हैं।
जीवन अवस्था में जो यह कहा करता था यह मेरा धन है, घर है, बार है, मैं खाता हूँ, मैं, पंडित हूँ, ज्ञानी हूँ। मेरा सौंदर्य सबसे-बढ़कर है आज वही बोलने वाला कहीं खो गया है यद्यपि शरीर ज्यों का त्यों विद्यमान है। मन और अहंकार से अपने को भिन्न समझने में ही आत्मा का सारा रहस्य छिपा हुआ है। चिन्तन से इसी सिद्धान्त की पुष्टि होती है।
यह आत्मा मन और अहंकार से अलग रहकर अपना काम किया करती है। मन और अहंकार वस्तुतः जागतिक अवस्था के कारण हैं जबकि आत्मा शाश्वत और अनादि है। बुधजन इसीलिये निरन्तर आत्मा का चिन्तन करते और अन्त में सुखपूर्वक उसी भाव में अन्तर्हित होकर परमात्मा की शरण में चले जाते हैं।
सूर्य लगभग ढल चुकने को था। सन्ध्या का समय हो चुका था। जब यह ध्यान कर उन्होंने अपना पाठ समाप्त किया तो विद्यार्थियों का भी ध्यान टूटा। उन्होंने अनुभव किया कि कुछ समय के लिये वे सब ऐसे लोक में चिन्तन की गहन स्थिति में पहुँच गये थे, जो आत्मा का यथार्थ लक्ष्य है। सबको अपना पाठ समझ लेने का सन्तोष था। ऋषि के पदों का अनुकरण करते हुए सभी विद्यार्थी गुरुकुल लौट आये और अपने-अपने सन्ध्या पूजन में लग गये ।
मनुष्यता की प्रतिमूर्ति—श्रीमती एना-राबर्टस्
कैंसर एक ऐसा भयानक रोग है जिसका नाम सुनकर ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं तब इस रोग से जो मनुष्य पीड़ित हो जाते हैं उसका कष्ट तो या तो कैंसर का रोगी ही जान सकता है अथवा कोई सहृदय व्यक्ति अनुभव कर सकता है। श्रीमती एना-राबर्टस् एक ऐसी ही सहृदय महिला थीं जिन्होंने कैंसर के रोगियों की पीड़ा अपनी आत्मा में अनुभूत की थी।
आज कैंसर के अच्छे-अच्छे उपचार खोजे जा चुके हैं। किन्तु यह प्रसंग उस समय का है जब यह एक असाध्य रोग समझा जाता था और इसका आक्रमण मृत्यु का ही संदेश माना जाता था।
कैंसर का रेडियम उपचार आज बड़ा ही सरल एवं सुगम हो गया है। किन्तु उस समय वैज्ञानिक इसके प्रयोग में लगे थे और रोग पर इसकी प्रतिक्रिया का अनुसंधान कर रहे थे। रेडियम का उपचार एक इतना खतरनाक उपाय था कि डाक्टरों की हिम्मत इसका प्रयोग करने में हारती थी। रुग्ण अंग के अतिरिक्त रेडियम की किरणें मनुष्य के जिस अंग पर पड़ जाती हैं वह अंग बिल्कुल गल जाता है। ऐसी दशा में उसकी ठीक-ठीक जाँच-पड़ताल किये बिना उसका प्रयोग बुद्धिमानी नहीं समझा जाता था।
अनुसंधान-कर्त्ता डॉक्टर किसी ऐसे साहसिक व्यक्ति की तलाश में थे जो अपने अंगों पर रेडियम के प्रयोग की अनुमति देकर कार्य को आगे बढ़ाने में सहायक बन सके। यह स्पष्ट प्राणोत्सर्ग करने की माँग थी। अन्त में एना राबर्टस् इस आत्मोत्सर्ग के लिए प्रस्तुत हुई। उसने कहा कि यदि मेरे एक के प्राण जाने से सहस्रों की प्राण रक्षा हो सके तो मुझे इसका शोक नहीं हर्ष ही होगा और उसने अपना वचन पूरा कर दिखाया।
आत्महीनता ही भय है, आत्मबल ही अभय। इसलिए अभय होने के लिए अपनी आत्मा को बलवान बनाना चाहिए। अपने जीवन-क्रम, विचारणा, संकल्प को इतना सशक्त बनाना चाहिए जिससे भय कहीं स्मरण ही न हो।
इसी बात की आकाँक्षा वेद को हुई उनने कहा-
अभयं मित्राद भयम्मित्राद भयं, ज्ञातादभयं परोक्षाद्।
अभयं नक्तमभयं दिवा नः सर्वा आशो मममित्रं भवन्तु॥
मित्र से मुझे अभय हो और शत्रु से भी मुझे अभय हो, ज्ञात से मुझे अभय हो और अज्ञात से भी मुझे अभय हो, दिन में मुझे अभय हो और रात में भी मुझे अभय हो। सब दिशाएं मेरी मित्र हों।
मित्र, पड़ोसी, परिजन जीवन व्यवहार में जिनके साथ संपर्क होता है वह भी सब हमारी ही तरह के आदमी होते हैं। दो हाथ दो पाँव, नाक, मुँह, आँख, दाँत, पेट, पीठ, सिर सब हमारी ही तरह। शारीरिक दृष्टि से कोई बड़ा अन्तर व्यक्ति और व्यक्ति के बीच नहीं होता है फिर एक दूसरे से डर किस लिये हो सकता है?
डर तभी हो सकता है जब हृदय कमजोर हो। हृदय कमजोर करने वाली एक ही वस्तु है संसार में चाहे उसे अविश्वास, अपघात, धोखेबाजी, बेईमानी कह लो अथवा पाप। मुख्य बात यह है कि हमें किसी से भय न हो इसके लिये यह भी आवश्यक है कि हम किसी के साथ क्षुद्रता न करें। जब कोई बुरी बात मन में आती है तभी मनःस्थिति कमजोर होती है और छुपाने का स्थान ढूँढ़ना पड़ता है। हमारे मन में उठने वाली भावनायें पवित्र हों योजनायें और विचार धारायें ऐसी हों जिनसे जीवन सुव्यवस्थित बनता हो, प्रगति होती हो, हमारे कार्य इतने स्वच्छ हों कि कभी किसी को ॐ गली उठाने का अवसर न मिले तो फिर डर भी किस लिये होगा? डर का घर नहीं रहेगा तो वह बसेगा कहाँ?
संसार में सब मित्र ही नहीं होते शत्रु भी होते हैं। विसंगतियाँ प्रत्येक क्षेत्र में पाई जाती हैं। आप अच्छे व्यक्ति हैं। आपकी भावनायें सदैव दूसरों का कल्याण चाहती हैं परोपकार, परमार्थ और पुण्य को जीवन का लक्ष्य मान कर चलने वाले लोगों के साथ भी खरपेंच लगाने वालों की कमी नहीं रहती। भलमनसाहत जितनी है दुष्टता भी उससे कम नहीं। इन्हीं को शत्रु कहा गया है।
पाप से बचो तो उसका संताप आक्रमण करता है-वाली बात है। नेकी पर चलो तो भी अहित चाहने वाले शत्रुगण सीधी राह नहीं चलने देते। उनसे भी भय होना स्वाभाविक है। इस भय से कैसे निपटा जाए, यह भी विचारणीय प्रश्न है।
ज्ञात को तो हम अपनी दृढ़ता, निश्चयता और सत्संकल्पों से अभय कर लेते हैं किन्तु अज्ञात से कैसे बचें यह भी जानना आवश्यक है।
फिर उसके लिये शक्ति और शौर्य अपेक्षित है। शत्रु का मुकाबला शक्ति से ही किया जा सकता है। शक्ति केवल शारीरिक नहीं वरन् मानसिक बौद्धिक और सामाजिक भी होनी चाहिए। शत्रु को परास्त करने के लिये शरीर बल भी चाहिये और जन-बल भी। वह दुश्मन की ताकत के अनुरूप होता है। एक व्यक्ति से अकेले लड़ा जा सकता है और अनेक से संगठित हो कर। अब शरीर की लड़ाई दिमागों में चली गई है। दाँव पेंच चलते हैं, कानून चलता है। इनसे सुलझने के लिये बौद्धिक शौर्य और मानसिक दृढ़ता भी आवश्यक है। मानसिक सन्तुलन, विचार शक्ति से ले कर कानूनी ज्ञान तक की बौद्धिक शक्तियों का आश्रय ही अज्ञात से अभय कर सकता है।
यहाँ तक पहुँचने के बाद एक चिन्ता उठ खड़ी हुई। दिन में मुझे अभय हो रात में भी अभय हो। दिन अर्थात् जो दिखाई देता है और रात अर्थात् जो बीत गई है दिखाई नहीं देती। अज्ञान की अवस्था का दूसरा नाम मनीषियों ने प्रारब्ध रखा है। पूर्व जन्मों में जो पाप और अनियमितताएं हो गई हैं और जिनका संस्कारीय सम्बन्ध अब तक जुड़ा हुआ है उनसे अभय कैसे हो?
जेल की सजा हो जाती है उससे छुटकारा पाना कठिन होता है पर उसे दंड से आगे वैसी भूल न करने की प्रेरणा दी जा सकती है। जीवन वस्तुतः इन परिस्थितियों से भी अधिक गूढ़ है। सामान्य स्थिति में अपने पूर्व जन्मों के कर्मों का लेखा जोखा किया जाना कठिन है, पर यदि अपनी वृत्तियों पर गौर किया जाये तो यह समझा जा सकता है कि अपनी मनोभूमि का झुकाव किस दिशा में है। प्रेम की दिशा क्या है और उस दिशा में मनुष्य कहाँ तक बढ़ सकता है उसके दुष्परिणाम क्या हो सकते हैं? इस तरह उनसे बचाव का पक्ष भी ढूंढ़ा जा सकता है।
एक व्यक्ति कामुक वृत्ति का है। उसकी चेष्टायें काम-वासना की ओर लगी रहती हैं। हर सौंदर्य को वह ललचाई दृष्टि से देखता है। समय असमय, संयोग असंयोग का उसे ध्यान नहीं रहता। इस दिशा में बढ़ता हुआ वह अपनी तमाम शारीरिक, मानसिक और आत्मिक शक्तियों का पतन कर लेता है फिर चारों ओर भय ही भय रह जाता है। यह हमारे विश्लेषण की एक पद्धति है।
ऐसे-ऐसे सैकड़ों तरह के प्रारब्ध मनुष्य के जीवन में देखे जाते हैं जिसकी जैसी वृत्तियाँ हों उसे वैसी ही प्रारब्ध-मनोभूमि का मान कर आत्म संशोधन करना चाहिए जिससे भविष्य के लिये अंतस्वरूप स्वच्छ और निष्कलुषित हो जाए। अभय की अन्तिम स्थिति जीवात्मा की यह निष्कलुषता ही है। निष्पाप व्यक्ति ही सब दृष्टियों से सशक्त और समर्थ होते हैं। भले ही उनमें साधनों का अभाव दिखाई दे। इसी का नाम जन्मान्तर पुरुषार्थ है।
इस तरह सब ओर से निष्कलुष हुआ व्यक्ति सर्वत्र आत्म-भाव से देखता है। उसे सम्पूर्ण विश्व में एक ही निर्मल निष्पाप, निर्गुण, निराकार आत्मा जाग्रत दिखाई देती है। यह आत्मानुभूति की परिपक्वता जिस दिन आ जाती है उस दिन मनुष्य पूर्ण रूप से भयमुक्त हो जाता है उसे एक ही आवाज सुनाई देती है-
अभयं नः करत्यन्तरिक्षमभयं द्यावापृथिवी उभे इमे।
अभयं पश्चाद भयं पुरस्तादुत्तरादधरादभय नो अस्तु।
यह अन्तरिक्ष मुझे अभय दे रहा है, ये द्याबा पृथिवी अभय दे रही है। मेरे पीछे और मेरे सामने, मेरे ऊपर और नीचे अभय ही अभय है।
जीवन का आरम्भ और अन्त
बहुत से लोग अनुचित साधनों और अवाँछनीय उपायों के बल पर उन्नति करते और जोर जुल्म के बल पर धनवान होते देखे जरूर जाते हैं किन्तु यह भी न भूलना चाहिए कि उनका अन्त बड़ा शोक पूर्ण होता है। मनुष्य के सारे समयों में उसका अन्तिम काल बहुत महत्वपूर्ण होता है। आयु के अन्तिम चरण में मनुष्य की सारी क्षमतायें समाप्त हो चुकती हैं।
आयु के पूर्व चरणों में जो मनुष्य बड़े से बड़े कष्ट सहन कर सकता है वह अन्तिम चरण में पहुँच कर कष्ट की कल्पना को भी नहीं सह पाता। तनिक सी निराशा थोड़ा-सा विषाद उसे मृत्यु के समान कष्टदायक हो जाता है।
जीवन के पूर्व काल में मनुष्य जो कुछ अच्छा बुरा इकट्ठा करता है जीवन के उत्तर-काल में उस निधि का भोग करता है। जिस प्रकार मनुष्य योनि के अतिरिक्त अन्य योनियों में मुक्ति के लिए कर्म नहीं किये जा सकते ठीक उसी प्रकार आयु का अन्तिम चरण कुछ कर सकने में असमर्थ रहता है अपने उत्तर जीवन को ध्यान में रख कर जो बुद्धिमान जीवन के पूर्व चरण में सत्कर्मों के बीज बोता है वह उसके फल खाता हुआ आनन्द प्राप्त करता है।
जीवन के पूर्व काल में मनुष्य जो कुछ अच्छा बुरा इकट्ठा करता है जीवन के उत्तर-काल में उस निधि का भोग करता है। जिस प्रकार मनुष्य योनि के अतिरिक्त अन्य योनियों में मुक्ति के लिए कर्म नहीं किये जा सकते ठीक उसी प्रकार आयु का अन्तिम चरण कुछ कर सकने में असमर्थ रहता है अपने उत्तर जीवन को ध्यान में रख कर जो बुद्धिमान जीवन के पूर्व चरण में सत्कर्मों के बीज बोता है वह उसके फल खाता हुआ आनन्द प्राप्त करता है।
किसी गाँव में एक बालक रहता था। उसने हाथी, बैलगाड़ी, रेल, मोटर आदि सभी सवारियाँ चढ़ी थीं। ऊँट के विषय में उसने सुना था चढ़ा नहीं था। उसकी इच्छा सदैव ऊँट की सवारी करने को हुआ करती थी।
एक बार वह घर को लौट रहा था। रास्ते में एक व्यापारी अपने ऊँट को बैठाकर नदी में स्नान करने चला गया था। ऊँट को विश्राम देने के लिए उसने काठी और नकेल दोनों खोल दी थीं। ऊँट देखते ही बालक प्रसन्नता से नाचने लगा। वर्षों की अधूरी साध पूरी करने का इससे सुन्दर अवसर कहाँ मिलता? छलाँग लगाई और ऊँट की पीठ पर जा बैठा। अपने स्वभाव के अनुसार ऊँट एकाएक उठा और रास्ते-कुरास्ते भाग चला। लड़का घबड़ाया पर क्या हो हो सकता था। नकेल भी नहीं, ऊँट को काबू कैसे करता। जिधर जी आया ऊँट उधर ही भागता रहा। बालक की घबराहट भी उतनी बढ़ती गई। मार्ग में दो पथिक जा रहे थे, बालक की घबराहट देख कर उनने पूछा बालक कहाँ जाओगे? लड़के ने सिसकते हुए जवाब दिया-भाई जाना तो घर था किन्तु अब तो जहाँ ऊँट ले जाये वहीं जाना है। इसी बीच वह एक पेड़ की डाली से टकराया और लहूलुहान को कर भूमि पर जा गिरा।
बालक की कहानी पढ़ कर लोग मन ही मन उसकी मूर्खता पर हँसेंगे पर आज संसार की स्थिति भी ठीक इस बालक जैसी ही है। मन के ऊँट पर चढ़ कर उसे बेलगाम छोड़ देने का ही परिणाम है कि आज सर्वत्र अपराध, स्वेच्छाचारिता, कलह और कुटिलता के दर्शन हो रहे हैं। मन के नियंत्रण में न होने के कारण ही लोग पारलौकिक जीवन की यथार्थता, आवश्यकता और उपयोगिता को भूल कर लौकिक सुख-स्वार्थ की पूर्ति में संलग्न हो गये हैं कि उन्हें भले-बुरे, उचित अनुचित का भी ध्यान नहीं रहा।
मनुष्य के शरीर में सभी कुछ महत्व का है और तो और नाखून पंजे, उँगलियाँ और पाँव, हाथ तक बड़े उपयोगी हैं, परन्तु मन का महत्व सर्वाधिक है। इसकी विलक्षण शक्तियाँ है। मनुष्य का सुख दुख, बन्धन और मोक्ष यह सभी मन के आधीन है। शास्त्रकार ने कहा है-”मन एवं मनुष्याणाँ कारणं बन्ध मोक्षयो” मनुष्यों के बन्धन ओर मोक्ष दोनों का कारण मन ही है। साँसारिक वैभव चाहिये तो उसको भी मन प्रदान करता है और परम-सुख, मोक्ष चाहिए तो उसका भी प्रदाता मन ही है। मनुष्य की सेवा में हर घड़ी मन ताबेदार सेवक की तरह तैयार खड़ा रहता है वह कभी थकता नहीं, कभी रुकता नहीं। कभी वृद्ध नहीं होता सतत् उद्योग उसका स्वभाव है। इच्छाएं करते रहना और उनकी पूर्ति के पीछे भागते फिरने में ही उसे आनन्द आता है मन की सामर्थ्य अपार है यह सब कुछ कर सकता है। किन्तु उसमें स्वेच्छाचारिता की बुराई भी है। अनियंत्रित मन नकेल रहित ऊँट की तरह ही मनुष्य को पथ भ्रष्ट करता और घर-जीवन लक्ष्य-की ओर ले जाने की अपेक्षा इन्द्रिय सुखों के बीहड़ में ले जाकर किसी रोग, शोक, कलह कुटिलता कुसंग कुमार, कुटेल से टकराकर पटक देता है। मनुष्य का जन्म जिस उद्देश्य की पूर्ति के लिये हुआ था उसका स्मरण भी नहीं आता, उल्टे यह जीवन भी नारकीय बन जाता है।
सारी सिद्धियों का मूल मनःसंयम में है। परन्तु वह केवल साधारण पुरुषार्थ से मिल जाने वाली नहीं। मन को साधना किसी भी पुरुषार्थ से, योग से बढ़कर है इसीलिए शास्त्रकार ने कहा-”जितं जगत केन? मनो हि यने” जिसने मन को जीत लिया उसने संसार को जीत लिया।
मन की शक्तियाँ विलक्षण हैं। मनुष्य का सुख-दुख बन्धन और मोक्ष मन के अधीन है। संसार में ऐसा कोई स्थल नहीं जहाँ मन न जा सके, लोक और परलोक में भी मन एक पल में जा सकता है। जिसे आंखें देख नहीं सकतीं, जो कान सुन नहीं सकते, मन उसे भी सरलता से ग्रहण कर सकता है उसकी चंचलता को रोका जा सके और पारदर्शी काँच की तरह स्वच्छ बनाया जा सके तो आत्म साक्षात्कार का नित्य निरतिशय सुख भी मन के आधीन है। “मन सैवानुद्रष्टव्यम्” आत्मसाक्षात्कार के लिए मन ही नेत्रवान् है ऐसा श्रुति में कहा गया है।
संसार में हम जो भी उन्नति और उत्कर्ष प्राप्त करते हैं। उनका मुख्य कारण हमारा स्वस्थ शरीर, परिपक्व ज्ञान, और सक्षम ज्ञानेन्द्रियाँ कही गई हैं। कानों से सुनाई न देता हो, पावों से चल न सकते हों, आँखों में देखने शक्ति न हो, तो कितनी ही कुशाग्र बुद्धि क्यों न हो, न तो किसी सफलता का सम्पादन कर सकता है और न अर्थोपार्जन। ऐसा व्यक्ति संसार में दीन-हीन ही रहेगा। अपनी साधारण जीवन यात्रा के लिए भी वह दूसरों का भार बनकर जियेगा। स्वस्थ और सक्षम ज्ञान और कर्मेन्द्रियाँ ही हमारे विकास के मुख्य साधन हैं परन्तु यह नहीं भूलना चाहिए कि इनका प्रवर्तक हमारा मन है। यदि मन असहयोग करे, कुमार्ग में चलने की हठधर्मी करे तो एक भी इन्द्रिय प्रयोजन की, काम की नहीं हो सकती। श्रेयमार्ग पर, इन्द्रियों की क्षणिक वासना में भटका कर शरीर को रोग-शोक का घर बना देने वाला अपना मन ही है।
मनुष्य का मन पारे की तरह है। अशुद्ध पारा खा लेने पर मनुष्य का जीवन संकट में पड़ जाता है किन्तु वही पारा जब शुद्ध और आयुर्वेदिक रीति से संस्कारित कर लिया जाता है तो वह एक अमूल्य औषधि बन जाता है। संस्कार ही मन मनुष्य के अमूल्य जीवन को नष्ट भ्रष्ट कर डालता है और यदि मनुष्य का मन सुसंस्कृत है तो वह इस लोक ओर परलोक में भी आनन्द प्राप्त करता है, उसका उद्धार हो जाता है।
मन की व्याख्या में इतना जान लेना आवश्यक है कि वह कोई स्थूल अंग नहीं है। हाथ को सरलता से बन्धन में लाया जा सकता है। नियंत्रित किया जा सकता है पर मन को नहीं। वह एक अदृश्य तत्व है। जीव के विचार करने के तंत्र को मन कहते हैं अन्तःकरण की जितनी उथल-पुथल है उसका कारण मन ही है। अंतर्जगत में क्रियाओं की प्रेरणा देने वाली शक्ति का नाम मन है वह प्रेरणायें अच्छी भी हो सकती हैं बुरी भी, उपयोगी भी हो सकती हैं और अनिष्टकारक भी। उपयोगी प्रेरणाओं पर चलने से अच्छे कार्य होते हैं अच्छे फल मिलते हैं वैसे ही बुरे विचारों का प्रतिफल बुरा होता है। इन्हीं दो अवस्थाओं में जागरुकता और दृढ़ता-पूर्वक अच्छाई को पकड़े रहने का नाम मनो-नियंत्रण है। मन की इच्छाओं में केवल उन्हीं को क्रियान्वित किया जाए जो आत्मा के विकास के लिये आवश्यक है। इससे अधिक इन्द्रिय सुखों की तृष्णा को दबाये रखना ही चतुराई है। मनोनिग्रह है जो इस कला को सीख लेते हैं उनका यह जीवन भी सफल होता है और परलोक भी। इसीलिये मन को ही बन्धन और मुक्ति दोनों का कारण बताया गया है।
प्रत्यक्ष प्रमाणों से उत्पन्न होने वाला ज्ञान वस्तुतः मन के द्वारा ही उत्पन्न होता है। जब शरीर को कोई कष्ट होता है। भूख लगती है, सर्दी या गर्मी की पीड़ा होती है, तब बुद्धि में ज्ञान की स्फुरणा बन्द हो जाती है। यद्यपि ज्ञान ही मनुष्य की विशेषता है, ज्ञान ही से मनुष्य का जीवन मधुर है और मोक्ष भी प्राप्त होता है पर ज्ञान अपने आप में कोई वस्तु नहीं, वह मन की शक्ति है । इसलिये ज्ञान से भी बड़ी शक्ति मन है और वही मनुष्य के कल्याण अकल्याण का मुख्य कारण कहा गया है।
ऋषियों ने प्रार्थना में कहा है-
यस्मिन्नृचः साम यजूँषि यस्मिन्प्रतिष्ठिता रथनाभाविवाराः।
यस्मिंश्चिचं सर्वमोतं प्रजानाँ तन्मे मनः शिव संकल्पमस्तु॥
(शुक्ल यजु॰ 34।5)
अर्थात्-रथ चक्र की नाभि में जिस प्रकार पहियों के अरे प्रतिष्ठित है उसी प्रकार ऋक् यजुः ओर सामवेद का ज्ञान मन में प्रतिष्ठित है। ऐसी अपार सामर्थ्य और शक्ति वाला हमारा मन शुभ संकल्प वाला हो।
मन की शक्ति अपार है। वेगवान होने के कारण वह शीघ्र वश में नहीं आता। बिगड़ उठे तो ऊँट में चढ़ने के इच्छुक बालक की तरह झकझोर कर रख देता है। यदि मन शुद्ध, पवित्र और संकल्पवान बन जाए तो हमारे जीवन की धारा ही बदल सकती है। जिसने मन को जीत लिया उसने जगत को जीत लिया की कहावत चरितार्थ हो सकती है।
एक बार एक मित्र ने सर जान हर्शल नामक प्रख्यात पश्चिमीय विद्वान से प्रश्न किया-”आपको सृष्टि में सर्वोत्तम वस्तु कौन-सी लगी” तो उन्होंने मुस्कराते हुए उत्तर दिया-
“भाँति-भाँति के संयोग-वियोग आए पर वह दृढ़तापूर्वक मेरे साथ बनी रहे, मेरे सारे जीवन में सुख और आनन्द का झरना बनी रहे। मेरे खिलाफ हवा चले, लोग मुझे बुरा कहें, धिक्कारें, रास्ता रोकें उस समय मुझे बे-परवाह बना दे। जीवन के दुःखों में मेरी ढाल बन जाये। ईश्वर से प्रार्थना करने का मुझे अवसर मिले तो मैं निवेदन करूंगा हे प्रभु मुझे विद्या पढ़ते रहने की रुचि दे। ज्ञान के धार्मिक महत्व को घटाये बिना यहाँ मैंने केवल उसके साँसारिक लाभ बताये हैं। विद्या की अभिरुचि कैसी आनंददायिनी है, सन्तोष का कैसा उन्मुक्त साधन है इतना ही मैंने यहाँ स्पष्ट किया है।
यदि मनुष्य का जीवन सामान्य भोगोपभोग और सामाजिक जीवन के कुछ ही स्तर पर ऊँचा चढ़ने में बीता, तो सारा मनुष्य जीवन तुच्छ गया यह समझना चाहिये, महानता की उच्च सीढ़ी पर प्रतिष्ठित होना चाहिये, ज्ञान ही उसका एक मात्र आधार है।
विद्वान किंग्सले ने एक स्थान पर लिखा है-ज्ञान से ही मनुष्य में ऊंचे उठने की पात्रता आती है, सुख और वैभव भी ज्ञान के बिना नहीं मिलते फिर आध्यात्मिक आनन्द तो उसके बिना मिलेगा ही कैसे? ईश्वर तक कोई चीज पहुँचा सकती है तो वह विद्या ही हो सकती है।
संसार विलक्षण है। यहाँ की प्रत्येक वस्तु विलक्षणता से परिपूर्ण है। संसार में ऐसा कौन व्यक्ति है जो आश्चर्यों के प्रति आकर्षित न होता हो। इस सृष्टि की रचना क्यों की गई और हमारा उसके प्रति क्या कर्तव्य है? हम शरीर क्यों धारण किये हुए हैं? यह प्रश्न जानने बड़े जरूरी हैं इसके लिये हमें अपनी धार्मिक वृत्ति को तेजस्विनी बनाकर आध्यात्मिक तत्व की खोज करनी चाहिए। ज्ञान की धार्मिकता के साथ मिलकर विद्या कहलाती है, यह विद्या ही मनुष्य को बन्धनों से मुक्त कराती है। जिन-जिन महापुरुषों ने बड़े-बड़े काम किये हैं उन्होंने वे काम समय का सदुपयोग, विद्याध्ययन और बौद्धिक-प्रतिभाओं के विकास के द्वारा ही किये हैं। दिन भर में 24 घंटे होते हैं। 8 घंटे काम करने के लिये निकाल दिये जायें तो अन्यान्य विकास कार्यों अथवा मनोरंजन के लिये 8 घण्टे बचते हैं। विद्याध्ययन सर्वोत्तम मनोरंजन है यदि इसके लिये प्रतिदिन 2 घण्टे का भी समय दिया जा सके तो संसार की अनेक वस्तुओं, परिस्थितियों, समस्याओं , जीवों, जीव-वृत्तियों, तत्वों को ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं । बढ़े हुए ज्ञान की पूँजी से साँसारिक सुख भी भुनाये जा सकते हैं और पारलौकिक अनुभूतियों का सुख भी प्राप्त किया जा सकता है।
पहले लोगों में आराधना की स्वाभाविक वृत्ति हुआ करती थी-”काव्य शास्त्र विनोदेन कालौगच्छति धीमताम्” का सिद्धान्त प्रायः सभी मानते हैं। भारतीय संस्कृति की प्रतीक देवी सरस्वती स्वयं विद्या अथवा ज्ञान का ही स्वरूप हैं। लोग उनकी आजीवन उपासना किया करते थे और इस प्रकार बिना श्रम संसार-समुद्र से पार उतर जाया करते थे।
अब स्थिति तब से भिन्न है। विद्यार्थी विद्यालय की शिक्षा समाप्त होते ही पुस्तकों को दूर रख देते हैं और उनकी और देखते भी नहीं। समस्याओं का उग्र होना शिक्षा की कमी नहीं बल्कि ज्ञान के अभाव का कारण है। ज्ञान मनुष्य की वृत्तियों को सतोगुणी बनाता है। विद्या मनुष्य को सौम्य, विनम्र और उदार बनाती है। जहाँ उसकी प्रतिष्ठा होगी क्यों तो वहाँ कलह और उपद्रव होंगे क्यों समस्यायें खड़ी होंगी। समस्याओं का अन्त करने के लिये सबसे पहले विद्या-बल बढ़ाना होगा। उसके लिये अधिक से अधिक साधन जुटाना होगा।
लोग अभाव और आर्थिक परिस्थितियों को कारण बताया करते हैं। कुछ लोगों को समय न होने की भी शिकायत होती है। मूल बात यह है कि व्यक्तियों को विद्याध्ययन का न तो महत्व ही मालूम होता है और न उनकी रुचि ही होती है। अनेक दृष्टान्तों से यह सिद्ध हो चुका है कि गरीबी विद्याभ्यास में बाधक नहीं है। पब्लियस, साइरस, इसप, किलेन्थिस, बुकर टी वाशिंगटन और टेरन्स आदि प्रतिभाशाली विद्वानों का प्रारम्भिक जीवन बड़ी ही कठिनाइयों में बीता है तो भी उन्होंने ज्ञानार्जन की महत्ता प्रतिपादित कर दिखाई। एपिक टेटस 10 वर्ष गुलाम रहा था। उसके मालिक ने उसका पैर ही तोड़ दिया था किन्तु बाद में उसने अपनी झोंपड़ी में बैठकर शास्त्रों का स्वाध्याय किया और विद्वता उपलब्ध की। रोम के तत्कालीन सम्राट आड्यान भी उसके पाँडित्य का लोहा मानते थे।
पाइथागोरस ज्यामिति शास्त्र का प्रकाँड विद्वान हुआ है, वह जीवनशास्त्र और नैतिक दर्शन का भी पंडित था। बहुत कम लोग जानते होंगे कि वह जंगल से लकड़ियाँ काट कर लाता था और उन्हें बेचकर अपनी आजीविका चलाता था।
टस्कनी की फ्लोरण्टाइन एकेडमी कौन्सिल के उच्च और महान् प्रतिष्ठा के पद पर नियुक्त होने वाला प्रसिद्ध इटालियन लेखक जेली जात का दरजी था। उसने इतने ऊँचे पद पर पहुँच जाने पर भी अपना धन्धा दर्जीगिरी नहीं बन्द किया। वह कहा करते थे “मैंने इसी व्यवसाय के सहारे विद्या पाई है मुझे ज्ञान से इतना प्रेम हो गया है कि अपनी इसी आजीविका के सहारे मृत्युपर्यन्त ज्ञानार्जन करते रहने की हार्दिक अभिलाषा है।”
इटली का मेटास्टासिओं जब बालक था तो शहर की सड़कों में गाने गाया करता था। उससे जो पैसे मिलते थे उनकी किताबें और पत्र-पत्रिकायें खरीद कर अधिकाँश समय पढ़ने में लगाया करता था। अन्त में उसकी भावना सिद्ध हुई और वह एक दिन इटली का मशहूर कवि हुआ। डॉ॰ जान प्रीडा जो बुर्स्टर के पोप नियुक्त हुए थे उन्हें पढ़ने की अभिलाषा इतनी तीव्र हुई कि वह आक्सफोर्ड तक पैदल चलकर गये। फीस और खाने के लिये कोई सहारा नहीं था इसलिये वह कालेज के होटल में काम करने वाले रसोइये की मदद किया करते थे उसी से उन्हें इतने पैसे मिल जाते थे जिससे किसी तरह फीस और रोटी का साधन बन जाता था। वनस्पति शास्त्र के जन्मदाता मीनियस भी इसी तरह एक मोची के पास काम करते हुए पढ़े थे।
यह उदाहरण इसलिये दिये गये हैं कि आर्थिक स्थिति विपरीत हो तो भी ज्ञान की आराधना की जा सकती है पेट पालने के लिये कोई भी साधारण काम किया जा सकता है पर ज्ञान की उपयोगिता ओर आवश्यकता देखते हुए उसका परित्याग करना अथवा उधर से मुख मोड़ना अपने लिये ही हानिकारक होता है। ज्ञान मनुष्य की शोभा है। ज्ञान ही धन और ज्ञान ही जीवन है उसके लिये किया गया कोई भी बलिदान व्यर्थ नहीं जाता।
हम इस आध्यात्मिक आवश्यकता को भूल गये हैं। विद्या आत्म-कल्याण का साधन है पर अब उसे अर्थोपार्जन का माध्यम बनाकर पंगु कर दिया गया है इसीलिये हम नैतिक, आत्मिक, आध्यात्मिक क्षेत्रों में पिछड़ गये हैं। यह उपलब्धियाँ अब हमें तभी मिल सकती हैं जब ज्ञान को उचित प्रतिष्ठा दी जाए उसके लिये सर्वस्व न्यौछावर के भावना बनाई जाए।
यों ही पति के श्रेयों की साझीदार नहीं-
एक भेंट के अवसर पर श्रीमती ललिता शास्त्री ने अपनी रूस यात्रा के समय के अनुभव बताते हुए कहा कि उन्हें वहाँ जो बात सबसे अधिक पसन्द आई वह वहाँ के लोगों की परिश्रमशीलता है।
वहाँ के लोग न केवल परिश्रमी ही हैं बल्कि घर के कोने से लेकर राज्य परिषद तक में काम करने वाला हर आदमी इस दृष्टिकोण से काम करता है मानो वह कोई साधारण काम न करके राष्ट्रीय हित का बहुत बड़ा काम कर रहा है। उन्होंने बताया कि उनको रूस की यह परम्परा बहुत पसन्द आई कि वहाँ पति की स्थिति के अनुसार पत्नी योंही श्रेय नहीं पाती। जो महिलायें स्वयं ही अपनी सेवा अथवा गुणों से ऊँची उठी नहीं होतीं उन्हें पति के श्रेयों में साझीदार नहीं बनाया जाता, इसलिये पति के अनुरूप सम्मान पाने के लिये वहाँ के उच्चपदस्थ व्यक्तियों की पत्नियाँ भी जी तोड़ मेहनत तथा समाज सेवा किया करती हैं।
भाग्य के भरोसे अथवा संयोग की प्रतीक्षा में बैठे-बैठे समय बरबाद करने वाले जीवन में कभी सफलता प्राप्त नहीं कर सकते। सफलता परिश्रमपूर्ण तत्परता का ही फल है।
भाग्य के भरोसे अथवा संयोग की राह देखते रहने वाले स्वभाव से आलसी एवं दीर्घसूत्री हो जाते हैं, वे यह नहीं समझ पाते कि भाग्य पुरुषार्थ से बनाता है ओर संयोग कार्यक्षेत्र में उतरने पर ही प्राप्त होता है। जो कार्यक्षेत्र से दूर बैठा-बैठा अलसाता रहेगा उसके पास संयोग आ जाने की सूचना देने के लिये कोई नहीं आयेगा। लोगों को अपनी व्यस्तता में इतना बेकार समय कहाँ जो किसी व्यक्ति को बतलाने के लिए उसके पास चलकर जायें कि भाई अब उठो, आप जिस संयोग अथवा अवसर की प्रतीक्षा कर रहे थे वह आ गया है। फिर चाहे वह किसी का मित्र ही क्यों न हो ।
यदि एक बार यह भी मान लिया जाये कि समाज में आपके ऐसे हितैषी भी हैं जो किसी अवसर अथवा संयोग की सूचना देने में अपना समय खराब करने की उदारता बरत सकते हैं। तब भी वो जब तक वह सूचना देने के लिए आयेगा और आप तैयार होकर चलेंगे तब तक वह संयोग अथवा अवसर आधा निकल चुकेगा और आप सिर्फ उसकी पीठ ही देख सकेंगे।
ऐसा होने पर भी कि आपका कोई हितैषी मित्र जो कि दीर्घ-दृष्टि वाला है और आपकी सफलता हृदय से चाहता है, किसी अवसर की सूचना इतने पूर्व दें गया है जितने में आप तैयार होकर यथा समय यथा स्थान पहुँच सकें, यदि आप आलसी एवं दीर्घ-सूत्री हैं तब भी उस अवसर का उपयोग नहीं कर पायेंगे। आपका आलस्य दीर्घसूत्रता का सहारा पा कर उस बीच के थोड़े समय को भी बहुत समझ लेगा और निश्चिन्तता से पड़े रहने को मजबूर कर देगा। आप जल्दी न कर पायेंगे और यथा स्थान पहुँच कर देखेंगे कि आपको देर हो गई है, अवसर आपकी पहुँच के बाहर जा चुका है। तत्परता के अभाव में आपने अपनी हानि ही की होगी और उस मित्र को भी यह सोचने पर विवश किया कि आपको समय खराब करके सूचना देने जाना बेकार है और जिसका उसे हार्दिक दुःख होगा।
इस प्रकार अवसर खोते-खोते मनुष्य के मस्तिष्क से अवसरों की महत्ता निकल जायेगी और तब वह और अधिक भाग्यवादी बन कर सदा के लिए असफलता में विश्वास करने लगेगा।
जिसने प्रमाद, आलस्य एवं दीर्घसूत्रता के दोष से अपनी तत्परता तथा कार्यक्षमता को शिथिल कर लिया है यदि वह किसी समय जा कर अवसर को घेर भी लेता है तब भी वह अवसर बिगड़ैल घोड़े की तरह कमजोर हाथों से छूट कर जा सकता है। अवसर मिल जाने पर भी तो पुरुषार्थ के अनभ्यस्त लोग उसका लाभ नहीं उठा पाते।
सफलता चाहिए तो उद्योग, पुरुषार्थ तथा तत्परता के गुणों का विकास करना ही होगा। यह परिश्रमपूर्ण उद्योग घर बैठे-बैठे करने से जाग्रत नहीं हो सकते इसके लिये कार्यक्षेत्र में उतर कर संघर्ष करना होगा अभ्यास करना होगा। जो मनुष्य तत्परता पूर्वक कार्यक्षेत्र में डटा रहता है उसके लिये संयोगों एवं अवसरों की कमी नहीं रहती क्योंकि कार्यक्षेत्र ही एक मात्र उनके आवागमन का स्थान होता है जहाँ वे हर समय आते और जाते रहते हैं जिस वस्तु का जहाँ मिलना सम्भव है वह वहीं मिलेगी अन्यत्र बैठ कर उसकी प्रतीक्षा करना अथवा खोजना अपनी अज्ञता का परिचय देना है।
अनेक लोगों की तत्परता एवं उद्योगशीलता साहस के अभाव में अनुपयोगी हो जाया करती है। उनमें परिश्रम करने की प्रवृत्ति तो होती है किन्तु आगे बढ़ने का नया, और ऊँचा काम हाथ में लेने का साहस नहीं होता, निदान कोल्हू के बैल की तरह उनकी सारी जिन्दगी यथास्थान चक्कर काटते-काटते समाप्त हो जाती है और उनके हाथ में उतना ही कुछ जीवन के अन्तिम क्षण में रह जाता है जो जीवन के प्रारम्भ में था।
सफलता तो आगे बढ़ने, कुछ नया करने अथवा पुराने को ऊँचा उठाने से ही मिलती है। एक ही स्थान पर एक ही ढर्रे पर ढुलकते रहने से सारा परिश्रम, सारी तत्परता उसी सीमित दायरे में समाप्त हो जाती है और प्रगति के नाम पर शून्य ही हाथ रहता है।
जिसमें आगे बढ़ने कुछ नया करने अथवा ढर्रा बदलने का साहस नहीं है, अच्छा है कि वह प्रगति एवं उन्नति की आकाँक्षा न करे। यदि वह ऐसा नहीं करता तो इसका कोई निश्चय नहीं कि उसकी अनधिकार आकाँक्षा उसके लिए एक अनुताप नहीं बन जाएगी।
यदि उन्नति की आकाँक्षा है तो साहस संचय कीजिये और आगे बढ़िये, जो कुछ है भी वह जा सकता है, इस अनिष्ट आशंका को दूर भगाइये। संसार में कुछ खो कर ही कुछ पाया जा सकता है। खतरा पार करके ही विजय मिल सकती है। बीज गला कर ही फसल प्राप्त हो सकती है। बिना साहस किये और खतरा मोल लिये न तो कोई आज तक आगे बढ़ पाया है और न आगे ही उन्नति कर सकेगा। उन्नति एवं प्रगति के इस नियम को प्रकृति किसी के लिये अपवाद बना कर ईश्वरीय विधान में व्यवधान डालने का साहस नहीं कर सकती।
साहस संचय करने के लिए कहीं जाना नहीं होता वह मनुष्य की अपनी आत्मा में निवास करता हुआ इस बात की प्रतीक्षा किया करता है कि कब हमारा स्वामी पैर आगे बढ़ाये और कब मैं उठ कर अपना अस्तित्व प्रकट कर दूँ।
प्रगतिपथ पर अपना कदम बढ़ाइये आपका साहस साथ देगा। इस सत्य को, यद्यपि प्रमाण की आवश्यकता नहीं, तथापि यदि आप चाहते हैं तो किसी ऐसे अवसर की याद कर लीजिए जिसकी सम्भावना में आप भयभीत हो रहे थे किन्तु जब वह आ ही गया तो आपने उसका डट कर मुकाबला किया था। यह क्या बात थी? उस संयोग का सामना करने का इरादा, कदम बढ़ाते ही आप का साहस आपके साथ हो लिया था? यही साहसहीनता एवं आशंका आप को तब भी तो रही होगी जब आप पहले पहल अपनी वर्तमान स्थिति में उतरने के लिए बढ़ने लगे थे, किन्तु जब आप उसमें उतर ही गये तो आपकी सारी आशंका सारा भय जाता रहा, आपके साहस ने आपका साथ दिया और आप आज निःशंक होकर अपना काम कर रहे हैं। भय अथवा आशंका अनागत के प्रति होती है। समागत के प्रति नहीं और साहस का जागरण आगे बढ़ने पर ही होता है। ठिठकने अथवा पीछे हटने से नहीं यह एक स्वाभाविक नियम है। इसे अपनी दुर्बलता, अयोग्यता अथवा साहसहीनता समझ कर आगे बढ़ने से कदापि न रुकिये। प्रयत्न से जगाया हुआ एक बार का साहस फिर जल्दी सोता नहीं, यदि उसको निष्क्रियता की अफीम न खिला दी जाये। जो उन्नति चाहता है प्रगति का आकाँक्षी है वह जागे हुए साहस को सुलाने के लिए निष्क्रियता को प्रश्रय ही क्यों देगा? आप यदि उन्हीं प्रगति आकाँक्षियों में से हैं तो कदम बढ़ाइए साहस को जागने का अवसर दीजिये और आगे बढ़िए आप सफलता अवश्य प्राप्त करेंगे।
अनेक लोग इस प्रकार ऊहापोही होते हैं कि “यह करूं अथवा वह, करने में ही समय और अवसर गंवा देते हैं। इसके अतिरिक्त अनेक लोग तो बहुत ही कमजोर होते हैं। काम प्रारम्भ किया कदम बढ़ाया किन्तु जरा सी कठिनाई आते ही पीछे हट जाते हैं। कमजोर निश्चय वाले अनेक बार दूसरों के परामर्श पर ही निर्भर रहा करते हैं जिसने जो बतलाया उसी को करने के लिए चल पड़े। विचार वैचित्र्य होने से हर आदमी अपनी तरह से ही परामर्श देगा, तब ऐसी दशा में हर एक का परामर्श मानते रहने से कोई एक काम पूरा ही नहीं हो पायेगा। एक निष्ठा के अभाव में सफलता की आशा करना दिन में स्वप्न देखने के समान ही है।
इस प्रकार के अनिश्चय स्वभाव वाले लोग परावलम्बी ही होते हैं। उन्हें अपनी बुद्धि में न तो विश्वास होता है और न अपने निर्णय में पूरी आस्था। अनिश्चय एवं एक निष्ठा के अभाव में आदमी अस्त-व्यस्त हाथ-पैर मारता हुआ अपनी सारी शक्ति को बिखेर देता है जब कि किसी सफलता के लिए शक्तियों का संगठित एवं एकाग्र होना बहुत आवश्यक है।
सफलता पानी है तो दृढ़ निश्चयी बनिये। एक बार विवेकपूर्वक जो निश्चय कर लीजिए उसे पूरा करने में अपनी सारी शक्तियाँ संगठित रूप से नियोजित कर दीजिए। निश्चय करने से पूर्व अपने हितैषियों मित्रों एवं शुभचिन्तकों से परामर्श कर लेना ठीक हो सकता है किन्तु निश्चय हो जाने के बाद किसी के कहने से उसे बदलना अदृढ़ता का द्योतक होगा। अपनी क्षमताओं एवं योग्यता के अनुरूप जो काम उठाइये उसे पूरा करके ही मानिये। आपकी दृढ़ता निश्चय ही आपका कार्य सफल करेगी और आत्म-विश्वास, योग्यता एवं सफलता में वृद्धि करेगी। जब दूसरे काम में भी यही अड़चनें, यही कठिनाइयाँ आ सकती हैं, तब उनके डर से करते हुए काम को छोड़ कर नये सिरे से नया काम शुरू करने में कोई बुद्धिमानी नहीं है।
इस प्रकार निरालस्य होकर साहसपूर्वक तत्परता के साथ अडिग उद्योग करते हुए सिद्धान्त में आस्था रखिये कि पुरुषार्थ मेरा अधिकार है और फल परमात्मा का। आप अवश्य उन्नति करेंगे और जीवन में मनोवाँछित सफलता के अधिकारी बनेंगे।
न जाने यह मनुष्य की कौन-सी दुर्बलता है कि वह अपने किसी पीड़ित बन्धु को देख कर सम्वेदना के साथ सहायता के लिए दौड़ नहीं पड़ता। आज यदि एक मनुष्य दूसरे के दुख में हाथ बंटाने लगे तो संसार से दुःख दर्द को भागते देर न लगे। न जाने मनुष्य में यह सद्बुद्धि कब आयेगी? फिर भी इस ओर से निराश होने की तब तक आवश्यकता नहीं है जब तक इस धरती पर विलियम बूथ और एवे-पियरे जैसे जनसेवा का मार्ग दिखलाने और प्रेरणा देने वाले आविर्भूत होते रहें।
एक समय ऐसा भी रहा है जब इंग्लैंड और फ्राँस के लन्दन व पेरिस जैसे नगरों की गली-कूँचों और फुटपाथों पर हजारों अनाथ बच्चे और रोगी दोषी स्त्री-पुरुष भूखे प्यासे पड़े हुए पशुओं की तरह जीते और उन्हीं की तरह मरा करते ये। उन अभागों को एक टूक रोटी और दो चुल्लू पानी देने वाला तो दूर मनुष्यतापूर्ण दृष्टिकोण से भी देखने वाला कोई नहीं था। रोगी मरते , बच्चे रिरियाते, स्त्रियाँ व्यभिचार करतीं और पुरुष चोरी, उठाईगीरी और राहजनी करते, किन्तु फिर भी पेट की ज्वाला शान्त न हो पाती।
असहायों के नारकीय जीवन से उपजी बीमारियों और कुप्रवृत्तियों व अन्य विवादों का नागरिक जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ता था किन्तु फिर भी कोई इस ओर ध्यान न देता था। किसी को यह सोचने समझने की फुरसत न थी कि आखिर यह भी मनुष्य हैं इनके सुधार सहायता के लिये हमारा भी कुछ दायित्व है।
इंग्लैंड के विलियम बूथ और फ्रांस के एवेपियरे नामक दो-महात्माओं की दृष्टि अपने-अपने देश के इस कलंक पर पड़ी और उन्होंने मानव-जीवन का ईश्वरीय सम्बन्ध मानकर इन अभागों उद्धार किया।
यों तो आध्यात्मिक दृष्टि से मौन का महत्व अनन्त है। मौन को मानसिक-तप कहा गया है, जिसकी साधना मनुष्य को मुनि बना देती है। मौन का आश्रय लिये बिना कोई भी मुमुक्षु लक्ष्य की ओर अग्रसर नहीं हो सकता। जीवन की सारी साधनाओं में मौन का विशेष स्थान है। किन्तु लौकिक, दृष्टि तथा साँसारिक व्यवहार में भी इसका मूल्य, महत्व कम नहीं है।
मौन से मनुष्य में गम्भीरता की वृद्धि होती है। गंभीर व्यक्ति का आदर करने के लिये सभी तैयार रहते हैं। लोगों का उसमें विश्वास बढ़ता है। यहाँ तक कि पारिवारिक प्रसंगों तथा झगड़ों में लोग ऐसे बोझ वजन वाले व्यक्तियों का पंच तक बना लेते हैं और उसके निर्णय को शिरोधार्य करते हैं। मोहल्ले बस्ती में अल्पभाषी बड़े-बूढ़ों को सभी लोग आदर के भाव से देखते हैं। कम वाचालता अथवा अल्प भाषण के आधार पर यह सामाजिक आदर-भाव कुछ कम मूल्यवान् नहीं है।
यद्यपि सामाजिक सम्मान में व्यक्तिगत लाभ का दृष्टिकोण रखना उचित नहीं है। लोगों का आदर-भाव स्वयं एक बड़ा लाभ है। इससे व्यक्ति का आचरण, विचार भाव तथा आत्मा सब में निखार एवं अनुशासन आता है, जिससे जीवन में एक अनिर्वचनीय शीतलता एवं सन्तोष की अनुभूति आती है। उत्तरदायित्व का भाव बढ़ता है जो कि जीवन के हर क्षेत्र में उपयोगी होता है। तथापि इससे अन्य अनेक प्रकार के अनचाहे स्थूल लाभ भी होते हैं और हो सकते हैं। लोक-प्रिय व्यक्ति का कोई काम रुकने नहीं पाता। उसके दुःख-दर्द तथा अभाव आवश्यकता को लोग अपना समझते और हर समय यथासाध्य सहायता सहयोग करने को तैयार रहते हैं। लौकिक दृष्टि से यह लाभ जीवन विकास में कम उपयोगी नहीं होता।
जीवन में मौन समावेश कर लेने से अथवा अल्पभाषी स्वभाव का विकास कर लेने पर निश्चय ही व्यक्तित्व में गरिमा की वृद्धि होती है। मुख पर एक आभा का आभास वास करने लगता है। गरिमावान व्यक्ति परिचितों में ही नहीं अपरिचितों के बीच विदेश अथवा अनजान जगहों में अपना स्थान बना लेता है। बहुत बार रेलों, स्टेशनों तथा सार्वजनिक स्थानों आदि में लोग चुपचाप दूर खड़े व्यक्ति के लिये स्थान की व्यवस्था कर देते हैं, अपना स्थान तक देने को तैयार हो जाते हैं जब कि स्थान के लिये झक झक करने और लड़ने-झगड़ने वाले लोगों की सुविधा का कम ध्यान रखते हैं। बहुधा देखा जाता है तेज-तर्रार और वाद-विवाद करने वाले लोग खड़े रहते हैं और मौन तथा किनारा कश लोगों को बैठने का स्थान मिल जाता है। इस प्रकार की अनेक छोटी-मोटी सुविधायें जीवन में अनेक बार बड़े-बड़े कार्य सम्पादित कर देती हैं जब कि छोटी से छोटी असुविधा कुछ न कुछ प्रत्यक्ष न सही अप्रत्यक्ष मानसिक हानि तो करती ही है।
मित-भाषण अथवा मौन से वाणी में प्रभाव बढ़ता है। इसमें आध्यात्मिक प्रभाव क्या और कितना आ जाता है इस बात को छोड़कर यदि लौकिक प्रभाव पर विचार किया जाये तो एक मोटी-सी बात तो यह होती है कि अनावश्यक वाणी का अपव्यय न करे आवश्यकतानुसार समय पर बोला या बात की जाती है तो मौन द्वारा संचित शक्ति भी शब्दों के साथ बाहर निकलती है, विश्राम पायी हुई स्वर नलिकायें परिपूर्ण स्वर निष्क्रमण करती हैं जिससे न केवल आवश्यकतानुसार कथन का ही सम्मान होता है बल्कि शक्ति सम्पन्न धीर गम्भीर स्वर भी अपना एक विशेष अर्थ रखता है।
बकवासी की तरह बहुधा लोग मित-वक्ता की वाणी में अनृत अथवा असत्यता का सन्देह नहीं करते और अधिकतर उसके कथन का मूल्याँकन ही करते हैं। समाज में वचनों का मूल्याँकन कम महत्व की बात नहीं है। इससे साख बढ़ती और विश्वासपूर्ण वातावरण का निर्माण होता है।
मौन रहने से मुख पर एक सौम्यता तथा सरलता का भाव निवास करने लगता है जिससे समिति आदि भाव-भंगिमाओं में ही नहीं दृष्टि में आकर्षण का चमत्कार उत्पन्न हो जाता है, जो परकीयों को भी अपना और अनेक अवस्थाओं में विरोधियों को भी सहयोगी बना लेता है। इस सामान्य लाभ को शुभ लाभ की सूची में रक्खा जा सकता है।
अमौन अथवा वाचालता बेकार का बातूनी बना देता है। वाचाल स्वभाव का व्यक्ति एक छोटे तथा महत्वहीन प्रसंग पर बोलता बकता चला जाता है, जिससे स्वभाविक है कि उसकी बातों में अतिरेकता, अतिशयता, अतिशयोक्ति, व्यर्थता, अनुपयुक्तता, अनुपयोगिता यहाँ तक कि अनर्गलता का समावेश हो जाये। किसी के कथन के यह दोष जल्दी ही पहचान लिये जाते हैं तब लोग उसकी बातों पर विश्वास तो क्या ध्यान देना तक छोड़ देते हैं। अनेक लोग उससे बात करने से कतराते और चटुल लोग तो मखौल तथा उपहास तक करने लगते हैं। वाचाल व्यक्ति झूठे के नाम से बदनाम हो जाता है और बहुत बार लोग उसकी सही बात को भी लन्तरानी समझ लेते हैं। मौन अथवा मित भाषण इस वाचालता के दोष से बचाता और उससे होने वाली हानि से रक्षा करता है जो एक लाभ ही माना जायेगा।
वाचालता बहुत बार निन्दा स्तुति, वाद-विवाद, खंडन कहा-सुनी और यहाँ तक कि कभी-कभी कटुता तथा गाली-गलौज तक की नौबत ला देती है, जबकि मितभाषण में इस प्रकार की कोई सम्भावना नहीं रहती। कम बोलने का अभ्यासी चुपचाप दूसरे की बात सुनता रहता है, उसे बोलने, वाद-विवाद अथवा कहा सुनी में पड़ने के लिये तरंग ही नहीं आती। ऐसी दशा में उससे किसी की अप्रियता होने का प्रश्न ही नहीं उठता। बल्कि वह दो के बीच में समाधान करने वाला पंच बना लिया जाता है जिससे कण या दो कण ही सही उसकी मान्यता बढ़ती ही है।
मौन से मनुष्य में सहन-शक्ति की वृद्धि होती है इसका एक कारण तो यह है कि अधिक बात करने से मनुष्य की जिस प्राणशक्ति का व्यय होता है मौन के अभ्यास में उसकी बचत होती रहती है। शरीर में शक्ति का संचय सहनशक्ति बढ़ा देता है। जो जितना निर्बल होता है वह उतना ही असहनशील होता है यह एक स्वास्थ्य सम्बन्धी नियम है। निर्बल व्यक्ति की तरह शक्तिवान् व्यक्ति को जल्दी क्रोध नहीं आता। अनेक अप्रिय प्रसंगों को वह हंस कर टाल जाने की क्षमता रखता है। निश्चय ही मौन साधना से उस शारीरिक तथा मानसिक शक्ति का विकास किया जा सकता है। कहावत प्रसिद्ध है कि एक चुप सौ बालाओं को टालती है। जहाँ किसी अप्रिय प्रसंग के समय मौन हो जाने वाला पक्ष संघर्ष टालने में सहायता करता है वहाँ मौन का सामान्य अभ्यासी अपने मितभाषी अथवा मौन स्वभाव के कारण परिस्थिति का प्रारंभ ही नहीं होने देता। बहुत बोलने और बात करने से एक छोटी-सी बात भी तूल पकड़ जाती है। उत्तर-प्रत्युत्तर से क्रोध बढ़ता है और बात सुलझाने के स्थान पर अधिक उलझ जाती है। अप्रिय प्रसंग के समय मौन रहने वाला पक्ष प्रायः जनमत को अपने पक्ष में कर लेता है और असंघर्षशील अथवा सज्जन पुरुष का नाम पा लेता है इस प्रकार मौन के आधार पर सहनशीलता आती है और सहनशीलता के आधार पर संघर्ष अथवा कलह के दुष्परिणामों से बच जाना लाभ का ही विषय है।
गोपनीयता मौनता की विशेष देन है। वाचाल व्यक्ति न तो अपने रहस्यों अथवा मन्तव्यों की रक्षा कर सकता है और न दूसरे के । उसकी अनियंत्रित जुबान भेद उद्घाटन किये बिना चैन ही नहीं पाती। जबकि मौन द्वारा अपनी वाणी पर अधिकार वाला व्यक्ति रहस्यों को आसानी से हृदय में रखे रहता है। व्यवसाय, व्यापार तथा राजनीति के क्षेत्र में गोपनीयता का बहुत मूल्य है। संगोपन भाव वाले व्यक्तियों की वेदना, पीड़ा तथा अभावों को लोग नहीं जान पाते। संसार में दुष्टों प्रवंचकों, विरोधियों, असद्भावियों तथा बिडम्वकों की कमी नहीं। यह लोग दूसरे के भेद तथा रहस्यों अथवा मन्तव्यों को जान कर हानि पहुँचाने की कोशिश किया करते हैं। मौनता का अभ्यास बहुत हद तक इन असज्जनों की रक्षा किये रहता है। बहुत से लोग तो प्रदेशों, बाजारों यात्राओं तथा अपरिचितों में केवल इसी कारण ठगे जाते हैं कि अपनी व्यर्थ की वाचालता के कारण वे जल्दी ही खुल जाते हैं और अपने रहस्य बतला दिया करते हैं।
वाणी का अपव्यय न करने अथवा मौनता को महत्व देने से विचार-शक्ति बढ़ती है। बुद्धि अपेक्षाकृत अधिक स्थिर तथा संतुलित रहती है। संतुलित विचारों वाला हानि लाभ हित-अहित के प्रसंगों पर बड़े धैर्यपूर्वक सोच-समझ सकता है। संकट अथवा आपत्ति के समय मौन द्वारा प्रखर की हुई विचार शक्ति बड़ी सहायक सिद्ध होती है। कभी भी देखा जा सकता है कि जब मनुष्य किसी गहन प्रसंग पर सोचना चाहता है तब वह एकान्त की तलाश करता है। न तो वह उस समय बोलता और न किसी से बात ही करता है। बोलना और विचार दोनों क्रियाएं एक साथ नहीं हो सकतीं। विचारक जितने गहरे मौन में उतरता जाता है उतना ही समस्याओं का सार्थक हल खोज लाता है। महात्मा गाँधी को जब-जब किसी विकट समस्या पर विचार करना होता था, तब-तब वे अनेक दिनों का मौन व्रत ले लिया करते थे।
मौनता का गुण कार्य में एकाग्रता तथा दक्षता बढ़ा देता है। जो जितना मौन रहकर काम करता है वह उतना ही अधिक कुशल तथा सही काम कर लिया करता है। बातूनी का काम कभी भी पूरी मात्रा में सही-सही नहीं हो पाता। इस बात का एक बहुत बढ़िया उदाहरण महाभारत के सम्बन्ध में प्रसिद्ध है।
भगवान् वेद व्यास ने महाभारत लिखने का विचार बनाया तब उन्हें एक लेखक की आवश्यकता अनुभव हुई। क्योंकि उस वृहत् ग्रंथ के प्रसंगों पर विचार और लेखन क्रिया एक साथ नहीं चल सकती थी। उसमें अपेक्षाकृत अनेक गुना समय लगता। वे बोलते जायें और कोई लिखता जाये-इस प्रकार से ही वह महान कार्य सुविधापूर्वक अपेक्षित समय में हो सकता था। निदान उन्होंने गणेशजी का सहयोग प्राप्त किया। पूरी महाभारत लिख जाने के बाद व्यास जी ने पूछा-गणेशजी आप इस बीच में बोले बिल्कुल नहीं। गणेश जी ने कहा कि यदि मैं बीच बीच में बात करता चलता तो निश्चय ही आपका यह काम होना कठिन ही नहीं भार बन जाता। बोलने से मनुष्य की कार्यशक्ति का ह्रास होता है जबकि मौनता पूर्वक कार्य करने से कार्य में रुचि आती है और जल्दी होता है। इस प्रकार यदि विचार किया जाए तो पता चलेगा कि मौनता को महत्व देने से आध्यात्मिक ही नहीं न जाने कितने लौकिक लाभ होते हैं। जहाँ वाचालता एक दुर्गुण है वहाँ मौनता एक दैवी गुण है जिसका अपने में विकास करना ही चाहिए। किन्तु इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि मनुष्य बिलकुल बात ही न करे। मौनता का मूल मन्तव्य यह है कि जितना आवश्यक हो उतना ही बोला जाये। अनावश्यक वार्तालाप न करना अथवा यों ही निरर्थक दिन भर हा-हा, हू-हू न करते रहना भी मौन ही है। जिह्वा पर संयम रखकर और वाणी विषयक मितव्ययिता का अवलम्बन लेकर मनुष्य को अपनी शक्तियों में वृद्धि करना ही चाहिए। यह उसके जीवन के लिये बड़ा ही लाभदायक एवं हितकर होगा।
धन्य हैं वे जो विनम्र हैं-
तुम्हारे पास धन है, बल है, तुम्हारे बहुत से आज्ञाकारी सेवक भी हैं, तुम्हारे पुत्र और पौत्र भी हैं। तुम किसी के अधीन नहीं, तुम्हें किसी का भय नहीं। तुम अपने को बड़ा मानते हो और हो सकता है तुम बड़े हो भी। लेकिन तुम्हारा बड़प्पन तुम्हारे किसी काम ने आयेगा।
मैं फिर कहता हूँ कि तुम जिसे सब कुछ समझते हो वह कुछ भी नहीं। क्योंकि इस वैभव भंडार की मादकता ने तुम्हें अहंकारी बना दिया है। पिता को अहंकार से घृणा है। वह तो उन्हें ही अपने स्वर्ग-राज्य में प्रवेश देता है जो बच्चों के समान भले और भोले होते हैं। धन्य हैं वे लोग जो अभिमानी नहीं शिष्ट और विनम्र हैं। क्योंकि वे पृथ्वी का राज्य भोग कर पिता के स्वर्गीय राज्य में स्थान पाते हैं।
- महात्मा ईसा
- महात्मा ईसा
भगवान की अनेक शक्तियाँ हैं। उनके प्रयोजन, विधान, स्वरूप एवं प्रकरण भी अनेक हैं। जड़-चेतन जगत् के विविध क्रिया-कलापों को चलाने एवं बनाने बिगाड़ने के संदर्भ में अनेक तथ्य समुपस्थित होते हैं उनको कैसे सुव्यवस्थित रखा जाए, इस समस्या का हल करने में भगवान् अपनी शक्ति को अनेक भागों में विभक्त करके उन्हें विभिन्न कार्यों में लगा देता है। यही अवतारों का रहस्य है। समय-समय पर भगवान् की अनेक शक्तियाँ अनेकों प्रकार की अव्यवस्थाओं एवं आवश्यकताओं को हल करने के लिये अवतरित होती रहती हैं।
कालान्तर में उपयोगी वस्तुयें भी अनुपयोगी हो जाती हैं। समय जिस तीव्रता से आगे बढ़ता है, वस्तुएं, परिस्थितियाँ एवं मान्यताएं उस गति से बढ़ या बदल नहीं पातीं फलतः वे जीर्ण हो जाती हैं और अपनी उपयोगिता खो बैठती हैं। आज का बनाया हुआ उत्तम भोजन एक दो दिन बाद ही बासी हुआ, दुर्गन्धित एवं हानिकारक हो जाता है। बहुत दिन रखे रहने पर कपड़े जीर्ण हो जाते हैं। मजबूत इमारतें गिर पड़ती हैं, शरीर बूढ़े हो जाते हैं। उसी प्रकार प्रथाएं, परम्पराएं, मान्यताएं भी अपनी उपयोगिता खो बैठती हैं। समाज भी बिना बुहारे घर की तरह अवाँछनीय कूड़े करकट से घिर जाता है। ऐसी दशा में जीर्ण-शीर्ण अनुपयुक्त को हटा कर उसके स्थान पर अभिनव सृजन की आवश्यकता पड़ती है। इस उलट-पुलट के लिये भगवान् की विशेष शक्ति समय-समय पर विशेष रूप से अवतरित होती है। वैसे साधारण कार्य तो उसका निरन्तर सदा ही चलता रहता है।
काल के परिवर्तन का प्रयोजन पूरा करने वाली शक्ति “महाकाल” है। युग का परिवर्तन एवं प्रवर्तन इसी सत्ता द्वारा होता है। रुद्र नाम इसी का है। परिवर्तन सदा ही रौद्र-भयानक कष्टकारक होता है। इसलिये रुद्र की गतिविधियों को भी वैसा ही माना गया है। वह ताण्डव नृत्य करके प्रलय उपस्थित करता है। अपने तीसरे नेत्र से काम-भार को जलाकर भस्म कर देता है। उसके अंग-प्रत्यंग से फुसकारते हुए भयंकर विषधर लिपटे रहते हैं भयानक भूत, प्रेत, भैरव, बैताल उसकी सेना है। त्रिशूल की विदारिणी शक्ति को क्या कहा जाए? जब उसका डमरू बजता है तब दशों दिशा में तूफान उठ खड़ा होता है। ऐसा है वह भयानक रुद्र देवता युग परिवर्तन का अधिनायक महादेव महाकाल। इस रुद्रता के भीतर भी लोक-मंगल का महान प्रयोजन सन्निहित रहता है। इसलिये उसके शीश पर अमृतमय गंगा विराजमान है। शान्ति और शीतलता का प्रतीक चन्द्रमा विराजता है। सौजन्य, श्रद्धा, और सद्भावना का प्रतीक वृषभ उसका वाहन है। विष को वह न धरती पर जलाने के लिये बिखरा छोड़ता है और न उसे स्वयं ही पीता है। वरन् गले में अन्दर उल्टा लटका कर स्वयं नीलकण्ठ बनता है। ऐसा है यह महारुद्र-महाकाल।
इस महाकाल की अधिष्ठात्री शक्ति का नाम है-महाकाली । महाकाल एक तथ्य है- महाकाली उसका सक्रियता क्षमता। सूर्य करोड़ों मील दूर आकाश में विद्यमान् है, उसका लोक-लोकाँ तरकारी प्रभाव एवं प्रकाश का कार्य किरणें करती हैं। महाकाल को सूर्य कहा जाए तो महाकाली को किरण कह सकते हैं। तथ्य जो भी हो उसकी अनुभूति ही हमारे लिये प्रधान है। महाकाल के अस्तित्व की अनुभूति हम महाकाली द्वारा ही करते हैं। इसलिये उसे माँ कह कर पुकारते हैं। महाकाल पिता अवश्य है पर उसके साथ हमारा संपर्क माता महाकाली द्वारा ही होता है। युग परिवर्तन में महाकाल की इच्छा एवं प्रेरणा अवश्य रहती है पर उसका प्रयोजन पूर्ण करने का वास्तविक श्रेय उस महान सक्रियता-काली को ही है। व्यक्ति समाज एवं विश्व का परिवर्तन करने के लिये जिस महाशक्ति का समय-समय पर महारास, अट्टहास, प्रलय नर्तन होता है, उस विश्व मंगल की अभिनेत्री को महाकाली कहा जा सकता है।
पौराणिक गाथाओं में महाकाली की रोमाँचकारी लीलाओं का वर्णन मिलता है। जब असुरता का बाहुल्य हुआ, पाप बड़ा, दुष्टता पनपी और सृष्टि का, समाज का संतुलन बिगड़ कर अभाव अशाँति एवं अविवेक का नारकीय विक्षोभ व्यापक हुआ तो महाकाली ने अवतार लेकर दुष्टता को ललकारा, युद्ध किया और धूल में मिला दिया। शान्ति की स्थापना के लिये जो अशान्ति उत्पन्न होती है वस्तुतः वह वही महाशान्ति है। इसलिये दुर्ग अर्थात् कठिन को सरल करने का उत्तरदायित्व संवरण करने के कारण महाकाली को दुर्गा के नाम से भी पुकारा जाता है। शिव-अर्थात् कल्याण की यह दुर्गा-शक्ति अर्धांगिनी है। यों नर-नारी के योग्य में आमतौर से नर को प्रधान और नारी को गौण माना जाता जा रहा है पर यहाँ वैसा नहीं। शिव-शक्ति की प्रधानता है। शिक्षा शब्द में प्रारम्भिक ‘इ’ की मात्रा को शक्ति माना गया है। यदि वह न रहे तो शिव शब्द शव अर्थात् लाश मात्र होकर रह जाए। महाकाली के चित्र में शिव को भूमि पर पड़ा हुआ और उसकी छाती पर शक्ति को नृत्य करते हुए देखा जाता है। तात्पर्य यह है कि शिव को हृदय से समुचित उत्साह, उल्लास, शक्ति का नर्तन भाता है। यदि यह उपलब्धि उसे न मिले तो बेचारा साक्षी, दृष्टा, निर्विकार बन कर रह जाए।
महाकाल समय-समय पर अवतार लेता रहा है। युग परिवर्तन का प्रयोजन पूरा करने के लिये उसने समय-समय पर अनेक रूप धारण किये हैं तथा अनेक लीलायें की हैं। उनके बाह्य सब रूपों में भिन्नता रही है पर आन्तरिक उद्देश्य एक ही रहा है “परित्राणाय साधूनाँ विनाशायाच दुष्कृताम्-धर्म संस्थापनार्थाय-संभवामि युगे-युगे।”
महाकाल की उग्रता का शमन करने, उसके अन्तस्तल को उल्लासपूर्ण करने, क्षमता को घटने न देने की प्रक्रिया में व्यवधान न आने देने का कार्य महाकाली करती है। दोनों की मिली-जुली प्रक्रिया से वह महान उद्देश्य पूर्ण होता है जिसके लिये अवतरण हुआ था। विद्युत धारा में एक तार एक गरम-एक ‘पाजेटिव’ एक ‘नेगेटिव’ रहता है। यह सन्तुलन न रहे तो तारों में आग लग जाए और शक्तिशाली बिजलीघर भी अपना प्रयोजन पूर्ण न कर सके। महाकाल को अत्यधिक उग्र-रुद्र प्रयोजन पूरा करना पड़ता है। महाकाली उस प्रक्रिया को सुव्यवस्थित, संतुलित, शाँत सौम्य एवं गतिशील बनाये रहती है। यदि ऐसा न हो तो वह अवतरण अति उष्ण होकर विस्फोट का रूप धारण कर ले। शिवजी की प्रथम पत्नी दक्ष-सती जब तिरोधान हो गई तो उस अभाव की पूर्ति किये बिना काम न चला उमा के रूप में उसकी पुनः प्रतिष्ठा करनी पड़ी।
महाकाली को बोलचाल की भाषा में महाक्रान्ति भी कह सकते हैं। यह विवेकशील प्रबुद्ध देव आत्माओं के सहयोग से संभव होती है। निराश बैठे देवताओं के शरीर में से थोड़ी-थोड़ी शक्ति निकाल कर उसके एकत्रीकरण से प्रजापति ने दुर्गा का निर्माण किया है। उसी ने (1) मधुकैटभ, (2) महिषासुर एवं (3) शुँभ निशुँभ का वध किया। मधुकैटभ-अर्थात् मानसिक दुर्बलता, दुष्टता, भावनात्मक अव्यवस्था। महिषासुर-अर्थात् राजनैतिक उच्छृंखलता, नेतृत्व की दुष्ट दिशा, सत्ता का दुरुपयोग। शुँभ निशुँभ - अर्थात् सामाजिक और आर्थिक अव्यवस्था। संसार के यही तीन असंतुलन हैं। इन्हीं की गड़बड़ी से संसार में विविध विधि यातनायें सहनी पड़ती हैं। इस बिगाड़ को सुधार के रूप में परिणत करने के लिये (1) विचार क्रान्ति (2) राजनैतिक क्रान्ति (3) सामाजिक एवं आर्थिक क्रान्ति की आवश्यकता पड़ती है। महाकाली के इस अभिनव नर्तन एवं सृजन संहार के द्वारा ही अवतरण का अभीष्ट प्रयोजन पूरा होता है। महाकाल की इच्छा इसी प्रक्रिया से पूरी होती है।
यह अत्यन्त स्पष्ट है कि श्रेय महाकाल को भले ही मिले, उसकी मर्मस्थली महाकाली के ही हाथ रहती है। त्रेता में जब रावण कालीन दुष्टता का शमन अनिवार्य हो गया तो भगवान् राम के रूप में महाकाल का अवतरण हुआ। राम ने महत्वपूर्ण भूमिकाएं सम्पादित कीं अनेक लीलायें की और अधर्म के स्थान पर धर्म की स्थापना में सफलता पाई। पर मर्म को समझने वाले जानते हैं कि उस महा अभियान की सफलता का सूत्र संचालन कौन कर रहा था? दुहरा नेतृत्व पीछे था। कौशल्या ने उनमें अपना अन्तःकरण निचोड़ कर उत्कृष्टता भर दी। कैकेयी ने वह परिस्थिति उत्पन्न की। उनका कार्य यद्यपि अप्रिय अरुचिकर और अनुपयुक्त लगता है तो भी उन्होंने साहसपूर्वक वह कार्य किया, जिससे अवतार अपना प्रयोजन पूरा कर सका। अन्यथा राम जैसे सुकुमार राजकुमार को वनवास में जाने, रीछ वानरों का संगठन करने एवं लंका जैसे सुन्दर प्रदेश में पहुँचकर असुरता के केन्द्र को नष्ट-भ्रष्ट कर सकना कैसे सम्भव होता? महाकाली ने कैकेयी के रूप में ही नहीं, सीता का रूप धारण करके भी अभीष्ट प्रयोजन साधा। वनवास में साथ रह कर उन्होंने राम अन्तःकरण को उल्लसित करने और वियोग की हलचल देकर क्रान्ति का अन्तिम अध्याय पूर्ण करने की व्यवस्था बनाई। सीता का जन्म ऋषियों के बूँद-बूँद रक्त एकत्रित घड़े में हुआ था। उनकी लंका से वापसी का श्रेयादि वानरों को मिला । इससे स्पष्ट है कि क्रान्ति किसी एकाकी व्यक्ति के द्वारा नहीं वरन् जनसमूह के प्रबल सहयोग में ही सम्भव होती है। राम का यश वर्चस्व एवं प्रयोजन पूर्ण करने में सीता का कितना महान योगदान रहा इसका विश्लेषण मोटी दृष्टि से नहीं, सूक्ष्म तत्व विवेचना की क्षमता से ही सम्भव हो सकता है।
महाकाल ने जब द्वापर में कृष्ण अवतार लिया तो देवकी यशोदा का वात्सल्य, कुन्ती का प्रोत्साहन आदि आशीर्वाद, द्रौपदी की श्रद्धा और राधा के स्नेह सौजन्य ने मिलकर उस केन्द्र बिन्दु को हर दिशा से सींचा। राधा कृष्ण की सर्वत्र सम्मिलित पूजा होती है। दोनों में अनन्य आत्मीयता थी, एक दूसरे में विलीन थे। शिव और शक्ति का सन्तुलन इसी रीति-नीति से सम्भव था। फिर भी यह प्रणय पवित्र था। पति-पत्नी के रूप में दृष्टिगोचर होते हुए भी वे वासनात्मक दांपत्ति से अत्यधिक ऊपर उठे हुए थे। रायण घोष कृष्ण जी के मामा थे। राधा विवाहित पत्नी थी। कथा है कि राधा का जब विवाह हो रहा था तब उनके पति रायण घोष ने नन्हे से बालक कृष्ण को दुलार वश गोदी में उठा लिया था। अग्नि परिक्रमा के समय भी उन्हें गोदी में लिये रहे। इससे स्पष्ट है कि राधा जी कृष्ण से कम से कम 25 वर्ष बड़ी थीं।
छोटे बालक का वासनात्मक प्रणय सम्भव नहीं। फिर कृष्ण ने मथुरा वृन्दावन छोड़ा है और सदा राधा यहीं बनी रही हैं, तब कृष्ण कुल 16 वर्ष के थे। आगे चलकर उनके कई विवाह भी हुए हैं। रुक्मणी, सत्यभामा, जाम्ववती आदि उनकी पटरानियाँ और कितनी ही रानियाँ थीं। यह सामान्य गृहस्थ जीवन हुआ। महाकाली राधा के रूप में अवतरित हुई। उसने कृष्ण को इतना अधिक बल दिया कि तत्व दर्शियों ने अपनी सूक्ष्म दृष्टि से राधा को ही कृष्ण की सहधर्मिणी माना और वे ही सर्वत्र कृष्ण के साथ संपूजित हैं। पति-पत्नी का भाव आत्म-समर्पण एवं एक दूसरे को बल देने की दृष्टि में सर्वोपरि प्रेरणाप्रद है। इसके लिये वासनात्मक जीवन तनिक भी आवश्यक नहीं। राधा कृष्ण के जीवन में वैसी गंध कहीं भी नहीं है। गोपियों वाला महारास भी आध्यात्मिकता की गंभीर दृष्टि से देखा जाए तो उसमें उस उल्लास के विकास का ही प्रयोजन है जो किसी भी आत्मा को अत्यधिक प्रखर बना सकता है। नर-नारी के बीच को अनावश्यक दीवार खड़ी कर दी गई है उसे महारास तोड़ता है। काम-चेष्टा रोकी जानी चाहिए पर नर-नारी के बीच पवित्र मिलन कर प्रतिबन्ध क्यों हो? इसी समस्या का हल भगवान् कृष्ण ने रास रचा कर किया है। महारास इस प्रकार का एक महा-भाव था जिसके माध्यम से अवतरण अत्यधिक प्रखर एवं समर्थ बन सका।
मीरा ने पति के रूप में कृष्ण को वरण किया और उनके शरीर का कोई अस्तित्व न होने पर भी वही आनन्द पाया जो प्रगाढ़ प्रेम के भरे-पूरे दाम्पत्ति जीवन में संभव है। इस प्रकार का प्रेम प्रणय शरीर की समीपता की कोई अपेक्षा नहीं करता।
महाकाल ने बुद्ध के रूप में अवतार लिया। उनकी स्थानापन्न माता ने उन्हें मदालसा की भाँति बहुत कुछ सिखाया था। राजा गोपीचन्द की माता की तरह उनने भी बुद्ध के मर्मस्थल को स्नेह सम्मिश्रित वात्सल्य के साथ सींचा था। तपश्चर्या के लिये कुछ समय बुद्ध को अपनी धर्मपत्नी यशोधरा तथा बालक राहुल को छोड़कर आत्म साक्षात्कार के लिये एकाकी जाना पड़ा। पर यह स्थिति अधिक दिन न रही । यशोधरा उनकी अनुगामिनी सहचरी होकर महाकाली की आवश्यकता पूर्ण करती रही। उनने महिलाओं में बुद्धत्व के जागरण का महान् उत्तरदायित्व अपने कन्धे पर उठाया और उसे आश्चर्यजनक सफलता के साथ निवाहा। बुद्ध को उससे भारी बल मिला, जो कमी थी वह चण्डी ने दूसरा रूप धारण करके पूरी कर दी। अंबपाली विश्व विख्यात नर्तकी थी, पर उसकी मूर्छित आत्मा जब जागी तो उसने, अपना गन्दा कलेवर उतार फेंका। अपना शरीर, मन-जीवन सब कुछ बुद्ध को समर्पण कर दिया और कुबेर जितनी विपुल सम्पत्ति उन्हीं के चरणों में अर्पित कर दी। इस अनुदान से तथागत को इतना अधिक बल मिला, जिसका वारापार नहीं। अवतरण का प्रयोजन पूर्ण करने में अम्बपाली की आत्माहुति को कितना श्रेय दिया जाए, इसका मूल्याँकन करने की क्षमता साधारण व्यक्ति में नहीं हो सकती ।
पिछले कुछ दिनों से ऐसी भ्राँति रही है कि नारी दोषों की खान है। उससे जो जितनी घृणा करता है, जितना दूर रहता है वह उतना ही बड़ा त्यागी या महात्मा है। यह मान्यता भारतीय दर्शन के सर्वथा विपरीत है। भारतीय धर्म वर्णाश्रम धर्म हैं। यहाँ ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यास चार आश्रम हैं। चारों से घिरा हुआ जीवन नारी के सान्निध्य से परिपूर्ण रहता है। शैशव में माता तथा उसी स्तर की मातृ-तुल्यायें अमृत बरसाती हैं। बहिनें सहचरी होती हैं। गृहस्थ में पति-पत्नी आत्म समर्पण करके द्वैत को अद्वैत में बदलते हैं। वानप्रस्थ और संन्यास में भी पत्नियाँ साथ रहती हैं। प्राचीन काल के अधिकाँश ऋषि, मुनि सपत्नीक जीवनयापन करते हुए अरण्य को विश्वमंगल के वरदान में परिणत करते थे। ब्रह्मा, विष्णु, महेश से लेकर छोटा-बड़ा प्रत्येक देवता सपत्नीक है। नारी-त्याग का आध्यात्म के साथ सम्बन्ध जोड़ना परले सिरे की भ्राँति हैं हाँ, उसका वासना परक रमणी रूप हेय है। इस दोष-दृष्टि को आत्मबल सम्पन्न व्यक्ति आसानी से छोड़ सकते हैं। अभी-अभी हमारे देखते महात्मा गाँधी ने भरे यौवन में 33 वर्ष की आयु में अपनी स्त्री को वासनारहित देखना आरम्भ किया, कस्तूरबा को अपनी पुण्य सहचरी माना और वे दोनों इसी पवित्र सम्बन्ध को आजीवन निवाहते रहे। महाकाल और महाकाली का सहचरत्व वासना परक निम्न स्तरीय नहीं होता। इसलिये अवतरण के प्रयोजन में रथ के दो पहियों को साथ-साथ चलता हुआ यदि देखा जाता है तो उसमें आश्चर्य जैसी कोई बात तनिक भी नहीं है, वरन् यह स्वाभाविक ही नहीं आवश्यक भी रहता है।
पिछले सौ वर्ष के अन्दर भी महाकाल के कई छोटे भूमिका अवतरण हुए हैं । उनने युग परिवर्तन की महत्वपूर्ण भूमिका सम्पादित की है। समकालीन जनता समकालीन नर-नारायणों का ठीक तरह मूल्याँकन नहीं कर पाती। वस्तुस्थिति का पता तो बहुत दिन बाद चलता है। ईसा को निरन्तर सताया और दुत्कारा जाता रहा, जिन्दगी भर में उनके केवल 13 अनुयायी बने जिनमें से एक तो उनकी जान का ग्राहक ही बन गया। अब 2 हजार वर्ष बाद लोगों ने उनका मूल्य समझा है और संसार की 3 अरब जनसंख्या में से एक तिहाई-एक अरब-ईसा धर्म के अनुयायी बन गये हैं। प्रायः सभी देव-दूतों को उनके समय में निन्दा, विरोध, अपमान, उपेक्षा, उपहास एवं उत्पीड़न का भागी बनना पड़ा है। इसलिये इस शताब्दी में हुए महाकाल के अवतरणों का लोग ठीक तरह मूल्य और महत्व समझ नहीं पा रहे हैं। फिर भी वस्तुस्थिति यही है कि कई असाधारण आत्मबल सम्पन्न देवदूत पिछले दिनों अवतरण हुए हैं और उनने युग परिवर्तन की भूमिका का आश्चर्यजनक रीति से शिलान्यास किया है। महाकाल के इन खण्ड अवतारों के साथ महाकाली अपनी छाप बराबर बनाये रही है और सदा की भाँति धर्म स्थापना में अपना-योगदान पूरी तरह देती रही है।
इन दिनों युग परिवर्तन की भूमिका सम्पादन के लिये जो चार खण्ड अवतार हुए हैं उनमें श्री रामकृष्ण परमहंस और योगी अरविन्द प्रमुख हैं। इन दोनों ने एक दूसरे से भिन्न प्रकार के कार्य किये हैं पर वे दोनों ही एक दूसरे के पूरक हैं। इन दोनों ने ही अपने ढंग से तप किये हैं और सूक्ष्म आकाश को इतना प्रभावी प्रखर एवं उष्ण बनाया है जिससे इन्हीं दिनों कितने ही युगनिर्माता महापुरुष उत्पन्न हो सके । इतिहास के पन्ने पलटने पर प्रतीत होता है कि भारत भूमि ने जितने उत्कृष्ट स्तर के एक साथ अनेक जन नेता इन पिछले सौ वर्षों में उत्पन्न किये हैं उतने चिरकाल से उत्पन्न नहीं हुए थे। भगवान बुद्ध के बाद पिछले 2000 वर्षों में महापुरुषों का उत्पादन प्रायः रुक सा गया था।
इस अवरोध को दूर करने के लिये आध्यात्मिक प्रचंड शक्ति की सक्रियता आवश्यक थी, जो दो देव दूतों के द्वारा बहुत हद तक सम्पन्न की गई।
श्री रामकृष्ण परमहंस ने ज्ञानयोग की और अरविंद ने भक्तियोग की भूमिका सम्पन्न की। दोनों के प्रकाश से सूक्ष्म जगत में अत्यन्त हलचल उत्पन्न हुई और उसी के प्रभाव से जन मानस एक दिव्य आभा से आलोकित हो उठा। फलस्वरूप विपन्न परिस्थितियों में भी हमारे लिए राजनैतिक स्वाधीनता प्राप्त कर सकता असम्भव जैसा दीखने वाला कर्म भी सम्भव हो गया। उन्होंने अपने-अपने ढंग से तपश्चर्या करके वह वातावरण उत्पन्न किया जिससे कितने ही प्रखर जन नेताओं का उद्भव सम्भव हो सका।
परमहंस की तपश्चर्या ने अपने समय में बंकिमचन्द्र, महात्मा मालवीय, लोकमान्य तिलक, गोपाल कृष्ण गोखले, जस्टिस रानाडे, दादा भाई नौरोजी, केशव चन्द्र सेन जैसी अनेकों ज्ञात अविज्ञात विभूतियों का सृजन किया। सन् 1857 का गदर के नाम से विख्यात स्वातंत्र्य युद्ध उन्हीं दिनों लड़ा गया। उस समय तात्याटोपे सहित नाना साहब और रानी लक्ष्मीबाई ने जो कुशल नेतृत्व किया उसकी सफलता इस अर्थ में है कि उस अभियान ने पराधीन मनोवृत्ति को उलट कर स्वातन्त्र्य आकाँक्षी बना दिया। कितनी ही सुधारवादी धार्मिक एवं सामाजिक संस्थायें उन्हीं दिनों जन्मी।
स्वामी विवेकानन्द रामकृष्ण परमहंस की ही प्रतिच्छाया थे। नास्तिक नरेन्द्र को उन्होंने अपनी शक्ति का बहुत बड़ा भाग दान देकर विवेकानन्द बनाया था। आर्थिक संकट में ग्रस्त असहाय युवक नरेन्द्र एक दिन दीन-हीन बना हुआ अन्य अनेक याचकों की तरह परमहंस से आशीर्वाद वरदान अपनी कठिनाइयों को हल करने के लिए माँगने आया था। उन्होंने इसे काली के पास भेज दिया कि जो माँगना हो उन्हीं से माँग ले। नरेन्द्र अर्थ याचना करने गया था पर माँ के सामने जाते ही उसकी भावना बदल गई और कहा-माँ मुझे ज्ञान दे, भक्ति दे, शक्ति दे, और शाँति दे। इनके अतिरिक्त मुझे और कुछ नहीं चाहिए। माँ ने उसे वही दिया और बालक आगे चल कर स्वामी विवेकानन्द बन गया परमहंस ने एक दिन उसके ऊपर लात रख दी तो समाधि लग गई। अन्त समय उन्होंने अपना बहुत बड़ा आत्म-बल अपने इस उत्तराधिकारी को दे दिया। उसी क्षमता के बल-बूते वे देश-विदेश में भारतीय संस्कृति को प्रकाशवान श्रद्धास्पद एवं पुनर्जीवित करने में समर्थ हुये। रामकृष्ण परमहंस के संपर्क में आने वाले लोगों को जो ज्ञान मिला है उसका संग्रह पुस्तकों में है। उसे पढ़ने से पता चलता है कि वे व्यक्ति और समाज को उत्कृष्ट स्तर की ओर अग्रसर करने के लिए कितना महत्वपूर्ण अमृत बरसाते रहते थे। जिह्वा से निकलने वाली बैखरी वाणी से ही नहीं, उन्होंने मध्यमा, परा, पश्यन्ती वाणियों से भी वातावरण को ज्ञान आभा से दीप्तिमान किया। विवेकानन्द उन्हीं के उद्घोषक थे, जिन्होंने भारतीय जनता के मस्तिष्क को समुद्र मंथन की तरह विक्षुब्ध कर दिया।
परमहंस की शक्ति जिन उद्गमों, स्रोतों से मिलती रही है वे महाकाली की दो प्रतिमाएं हैं। योगिनी भैरवी ने उन्हें अनेक गुह्य विद्याएं छह वर्ष तक सिखाई। अद्भुत तपश्चर्याएं कराई और वह क्षमता उत्पन्न कर दी, जिससे वे महाकाल का प्रयोजन अपनी सीमा मर्यादा के अनुकूल ठीक प्रकार पूरा कर सकें। दूसरी प्रतिमा उनकी धर्म पत्नी शारदा है, जिसने अपनी आत्मा की समस्त सरसता निचोड़ कर भावोन्मादी समझे जाने वाले रामकृष्ण की आत्मा को अमृत की तरह सींचा और वे सच्चे अर्थों में परमहंस हो गये। दोनों एक दूसरे को पूर्वजन्मों से जानते थे। वर्ष की बालिका शारदा जब परमहंस का कीर्तन देख रही थी तब उसने अपनी माँ से कहा था-यही महात्मा मेरा पति होगा। तक किसी ने उसकी बात पर ध्यान नहीं किया। रामकृष्ण युवा हो गये। उनके विवाह की चर्चा चली तो उनने घर वालों से कहा-व्यर्थ इधर-उधर समय नष्ट न करो मेरी सहचरी जय राम बाटी गाँव में है। जाओ वहाँ रामचन्द्र मुकर्जी के यहाँ उपयुक्त पात्री मौजूद है। 6 वर्ष की अबोध बालिका का विवाह 25 वर्ष के युवक के साथ होना लोकाचार की दृष्टि से अनुपयुक्त अवाँछनीय है, पर व्यवस्था सहज ही बन गई और विवाह हो गया। संतानोत्पादक व्यवस्था के लिये आयु की समानता आवश्यक है पर जिन्हें इन कार्यों के लिए नहीं, आत्मोत्थान की अपूर्णता पूर्ण करने के लिए आत्माहुति देनी ठहरी और विवाह को घनिष्ठता का प्रकटीकरण मात्र बनाना ठहरा उनके लिये आयु का कोई प्रश्न नहीं। आयु में 20 वर्ष का अन्तर होते हुए भी वे दोनों आजीवन अनन्य आत्मीय होकर रहे। युवती शारदा और प्रौढ़ रामकृष्ण बहुत समय तक एक ही कुटी में रहे। आत्मिक मिलन का उच्चस्तरीय आनन्द इतना उल्लासपूर्ण था कि वासनात्मक क्षुद्रता की ओर उनने आँख उठा कर भी नहीं देखा। प्राणतत्व का उद्वेग सूक्ष्म जगत में संव्याप्त ‘रयि’ तत्व में शान्त होता है। शारदा शान्ति की देवी की तरह आई और उस महाप्राण महाकाल पर स्नेह सुधा की अनवरत वर्षा करके उनकी क्षमता अनुपम बनाये रही। कहने वाले कहते रहे-उपहास करते रहे कि बाबा जी ने ब्याह कर लिया और सपत्नीक रहता है। पर परमहंस ने किसी के कथन पर नहीं वस्तु स्थित पर ही ध्यान रखा वे कहा करते थे-”यह शारदा है, सरस्वती है । ज्ञान देने आई है। यह मेरी शक्ति है।”
विवेकानन्द साँस्कृतिक दिग्विजय के लिए जब अमेरिका पहुँचे तब श्रीमती जार्ज, डबल्यु हैल ने और इंग्लैंड में कुमारी नोबुल ने उनको धर्म प्रचार कार्य में भारी सहायता की। अन्त में वह विवेकानन्द की शिष्या हो गई, उन्होंने हिन्दू धर्म ग्रहण किया, और भगिनी निवेदिता के नाम से प्रख्यात हुई। उन्होंने अपना जीवन ही विवेकानन्द के मिशन के लिए समर्पित कर दिया और भारत आकर एक साथी की तरह अनेक वर्षों तक भारतीय संस्कृति की महती सेवा करती रहीं और विवेकानन्द की उपयुक्त देखभाल करने में संलग्न रहीं।
महाकाल का दूसरा खण्ड अवतरण योगी अरविन्द के रूप में सामने आया। भारत के साँस्कृतिक पुनरुत्थान के लिए उन्होंने आरम्भ में हिंसक क्रान्ति की योजना बनाई, पर जल्दी ही वे समझ गये कि इस महान प्रयोजन को शस्त्र बल नहीं आत्मबल सम्पन्न करेगा। ये न केवल अपने में वरन् समस्त समाज में आत्मबल उत्पन्न करने के लिए पाण्डुचेरी में एकाकी रह कर प्रचंड तप करने लगे इस तप का अभीष्ट प्रभाव हुआ। गर्मी के दिनों में जिस प्रकार हवा गरम हो जाने से धूलि के बवंडर (वात-चक्र) घुमड़ते हुए फिरते हैं और जमीन पर पड़े हुए तिनके पत्तों को उड़ा कर आकाश में उठा ले जाते हैं इसी प्रकार उस तप की ऊष्मा ने सूक्ष्म वातावरण को गरम किया और साधारण स्तर के दीखने वाले कितने ही व्यक्ति देखते-देखते राष्ट्र का अद्भुत नेतृत्व करने लगे। सामान्य जनता में भी त्याग बलिदान की प्रचण्ड भावना जगी और उसने त्याग बलिदान का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया।
अरविन्द युग में कितने ही युग निर्माता पैदा हुए जिनमें महात्मा गाँधी, जवाहरलाल नेहरू, चितरंजनदास, लाजपतराय, सरदार पटेल, राजेन्द्र बाबू, अनेक मुख्य हैं। ऐनी बीसेन्ट आयरश महिला थीं पर उन्होंने भारतीय स्वतन्त्रता की ज्वाला जलाने में ऐतिहासिक भूमिका प्रस्तुत की । उन्होंने अपना सारा जीवन भारतीय पुनरुत्थान के लिए समर्पित कर दिया। सरोजिनी नायडू प्रभृति जन जागरण का बिगुल बजाने वाली महिलाओं की संख्या भी कम नहीं है। अहिंसक आन्दोलन की तरह भारत की हिंसक क्रान्ति भी अपने स्थान पर बड़ी शानदार रही है, वीरेन्द्रकुमार, रासबिहारी बोस, शचीन्द्र नाथ सान्याल, चन्द्रशेखर आजाद, भगतसिंह आदि के नाम बच्चे-बच्चे की जबान पर हैं। श्री दुर्गादेवी ने भारत के क्रान्तिकारी आन्दोलन को अपने स्नेहासिक्त एवं समर्थ व्यक्तित्व द्वारा जिस ढंग से सींचा उसकी तुलना करते नहीं बनती।
तपस्वी अरविन्द के महान उद्देश्य और प्रचंड तप का स्वरूप समझने के लिए फ्रान्स के महान दार्शनिक पालरिचार्ड पाण्डुचेरी गये थे। उन्होंने अभियान की महत्ता को समझा और अपनी धर्मपत्नी को उस एकाकी संत के लिए आवश्यक सुविधा प्रस्तुत करने के लिए आग्रहपूर्वक छोड़ दिया। पालरिचार्ड का वह अनुपम त्याग था। पतिभक्त देवी ने पति के साथ रह कर शरीर प्रयोजन पूरा करने की अपेक्षा विश्व मानव की सेवा में सतत उस ऋषि की सेवा का आदेश शिरोधार्य किया और वे पाण्डुचेरी में ही स्थायी रूप से बस गई । माता जी के नाम से विख्यात परम श्रद्धास्पद यही महान महिला अरविन्द की शारीरिक मानसिक व्यवस्था बनाती रही और उनका उग्र तप निर्बाध गति से चलता रहे उसकी अभीष्ट सुविधा उत्पन्न करती रहीं। इतना ही नहीं, उन्होंने अरविन्द आश्रय के संचालन एवं इनके महान मिशन को सशक्त बनाने के लिये अपने को होम कर दिया। महाकाल के साथ महाकाली के अस्तित्व की इसे एक दिव्य झाँकी ही समझा जाना चाहिए।
महाकाल और महाकाली का श्रद्धा-विश्वास का रूप भावना क्षेत्र का युग्म कहा जा सकता है। संघर्ष और क्रान्ति के रूप में उनकी उग्रता देखी जा सकती है त्याग और सेवा के रूप में वही युग्म व्यक्ति की उत्कृष्टता प्रकट करता है। प्रबुद्धों में उसे विवेक एवं निष्ठा के रूप में देखा जा सकता है। चरित्र और प्रीति से रूप में सभ्यता प्रतीक बनता है। वीर्य और कर्मण्यता के रूप में यही मानवता का प्रतिनिधित्व करता है। अनाचार के स्थान पर सदाचार की स्थापना, असंतुलन को बदल कर संतुलन की प्रतिष्ठापना करना इस युग्म का प्रधान प्रयोजन है समय-समय पर इस प्रयोजन की पूर्ति के लिए इस महा युग्म को विविध रूपों में विविध क्रियाकलाप सम्पन्न करते हुए अवतरित होना पड़ता है। सामयिक परिस्थितियाँ उसे तात्कालिक विधि व्यवस्था जुटाने के लिए प्रेरित करती हैं। इसलिए उनके क्रियाकलापों का उद्देश्य “परित्राणाय साधूनाँ विनाशायाच दुष्कृताम्” एक होते हुए कार्य पद्धति सदा ही बदलती रहती है।
कोई व्यक्ति जन्मजात रूप से देवदूत नहीं होता। महाकाल और महाकाली उसे किसी विशेष अवसर पर अपना वाहन बनाते हैं और देह धारी के माध्यम से वे सूक्ष्म सत्ताएं अपना काम करती हैं। अदृश्य शक्ति का क्रिया-कलाप किसी दृश्य माध्यम से ही चरितार्थ हो सकता है। इसलिए वह जिसे उपयुक्त पात्र समझती है, समयानुसार वरण कर लेती है। वाल्मीकि, अंगुलिमाल, अम्बपाली, सूरदास आदि का आरम्भिक जीवन निम्न स्तर का था। पर जब उस महाशक्ति ने उनमें प्रवेश किया तो उनकी पूर्व भूमिका बदलते देर न लगी। आमतौर से ऐसा ही होता है। सामान्य स्तर के दीखने वाले व्यक्ति कई बार उपयुक्त अवसर पर अपनी पुरानी मान्यताओं आकाँक्षाओं और गतिविधियों को साँप की केंचुली की तरह उतार फेंकते हैं और समीपवर्ती लोगों के उपहास एवं विरोध की परवा न करते हुए उत्कृष्ट युग परिवर्तन की भूमिका सम्पन्न करने के प्रयोजन के लिए, असीम साहस के साथ करवट बदलने लगते हैं तब समझना चाहिए कि इन नर-नारियों पर महाकाल महाकाली की दिव्य धारा अवतरित हो रही है। स्वर्ग से पृथ्वी पर उतरते समय भगवती सुरसरी ने शिव जी की जटाओं को वाहन चुना था। समय समय पर कितने ही नर-नारी इन जटाओं का प्रयोजन पूर्ण करते हैं।
इसी अंक में एक लेख आगामी तीस वर्षों में घटित होने वाली घटनाओं की जानकारी तथा युग-निर्माण का स्वरूप समझाने के लिए छप रहा है इस प्रयोजन की पूर्ति के लिए एक पूर्ण अवतार अवश्य तीस वर्ष उपरान्त लगभग 2000 में प्रकट होगा। अभी उसके लिये उपयुक्त पात्र नर-नारी जन्म ले रहे हैं। जिनमें जीवन मुक्त आत्मायें प्रवेश करेंगी और उन्हें युग परिवर्तन अभियान के विभिन्न उत्तरदायित्वों का भार सौंपेंगी। अगले दिनों सप्तऋषियों, उनकी सातों पत्नियों, शिवि, दधीच, हरिश्चन्द्र, प्रहलाद, ध्रुव, अंगद, हनुमान, भरत, लक्ष्मण, भीष्म द्रोणाचार्य, अर्जुन, भीम, कर्ण बुद्ध, महावीर, गाँधी, दयानन्द, जैसी आत्माएं अवतरित होंगी। गार्गी मैत्रेयी, भारती, कुन्ती, द्रौपदी, सावित्री, अनुसूया, मीरा लक्ष्मी बाई, जैसी देवियाँ अवतरित होंगी। और उनके सहकार से महाकाल एवं महाकाली का महान उद्देश्य पूरा होगा।
अगले दस वर्ष अत्यधिक क्षोभ और संकट के हैं। इनमें अगणित प्रकार के त्रास मानव जाति को सहने पड़ेंगे ताकि सर्व साधारण की समझ में यह कडुआ पाठ भली प्रकार आ जाए कि स्वार्थ, छल, विलासिता एवं दुष्टता से भरा हुआ निष्ठुर जीवन लाभकर नहीं हानिकर है। यह तथ्य, उपदेशों से ही नहीं कटु अनुभवों से भी सीखा जाता है। अतएव दुष्टता पर उतारू मानव प्राणी के लिये इस प्रकार के कटु प्रशिक्षण एवं कठोर दंड विधान की भी प्रकृति व्यवस्था करती है। वैसी ही दंड नीति हमें अगले दस वर्षों में भोगनी पड़ेगी। साथ-साथ वह लोकशिक्षण एवं सृजनात्मक अभियान भी चलता रहेगा जिसके आधार पर उपयुक्त समय आने पर आवश्यक परिवर्तन सहज ही सम्भव हो सके।
वर्तमान काल में भी महाकाल का क्रिया-कलाप सुव्यवस्थित रीति से चल रहा है। पिछले दिनों अवतरित रामकृष्ण परमहंस योगी अरविंद जैसी सत्ताएं नहीं रहीं। पर उनका सम्मिलित तप तेज दूसरे शरीर में प्रवेश करके अभीष्ट उद्देश्य की पूर्ति की व्यवस्थाएँ जमा रहा है। महाकाली अपनी सहचरी नव दुर्गाओं को अवतरित कर रही है। पर उन्हें पहचान सकना समकालीन लोगों के लिए सम्भव नहीं। आज तो उन्हें सामान्य मनुष्य जैसा ही देखा-माना जाएगा और अन्य देव-दूतों की तरह सताया चिढ़ाया जाएगा। युग परिवर्तन की पृष्ठभूमि भीतर ही भीतर सुदृढ़ रूप से बन रही है। महाकाल की इच्छा अपूर्ण नहीं रह सकती। महाकाली अपनी सृजनात्मक और संघर्षात्मक प्रक्रिया को प्रचंड करने में संलग्न है। अनेक प्रबुद्ध आत्माओं के भीतर प्रबल हलचल मच रही है ओर तुच्छ स्वार्थों का घेरा तोड़ कर साहसपूर्वक अनेक नर-नारी महाकाल और महाकाली की इच्छा पूर्ण करने के लिए उनके प्रकाश को आत्मसात् कर रहे हैं। वे आगे बढ़ेंगे ही, नवनिर्माण की ऐतिहासिक भूमिका सम्पादन करेंगे ही।
यह शताब्दी अपने आप में अत्यधिक महत्वपूर्ण है। पाश्चात्य जगत ने भौतिक विज्ञान के आविष्कार का आश्र
परमब्रह्म परमात्मा की चेतना, प्रेरणा, सक्रियता, क्षमता एवं समर्थता को गायत्री कहते हैं, यह इस विश्व की सर्वोपरि शक्ति है। अन्य छुट-पुट शक्तियाँ जो विभिन्न प्रयोजनों के लिए प्रयुक्त होती हैं, वे देव-नामों से पुकारी जाती हैं। यह समस्त देव शक्तियाँ उस परम-शक्ति की किरणें ही हैं, उनका अस्तित्व इस महत्व के अंतर्गत ही है, उत्पादन, विकास एवं निवारण की त्रिविध देव शक्तियाँ ब्रह्मा विष्णु महेश के नाम से विख्यात हैं। पंच तत्वों की चेतना को आदित्य, वरुण, मरुत, द्यौ, अन्तरिक्ष कह कर पुकारते हैं। इन्द्र, बृहस्पति, अर्यमा, पूषा, तष्ट्रा, गणेश, अश्विनी, वसु, विश्वे देवा आदि सृष्टि के विभिन्न प्रयोजनों में संलग्न शक्तियाँ ही हैं। चूँकि ये दिव्य हैं, प्राणियों को उनका अपार अनुराग मिलता है, इसलिए उन्हें देवता कहते हैं और श्रद्धापूर्वक पूजा, अर्चना एवं अभिवन्दना करते हैं। यह सभी देवता उस महत्त्व के स्फुल्लिंग हैं जिसे आध्यात्म भाषा में गायत्री कह कर पुकारते हैं। जैसे जलते हुए अग्निकुण्ड में से चिनगारियां उछलती हैं, उसी प्रकार विश्व की महान शक्ति सरिता गायत्री की लहरें उन देव शक्तियों के रूप में देखी जाती हैं। सम्पूर्ण देवताओं की सम्मिलित शक्ति को गायत्री कहा जाए तो यह उचित ही होगा।
हमें जितना भी कुछ वैभव, उल्लास मिलता है वह शक्ति से मूल्य पर ही मिलता है। जिसमें जितनी क्षमता है वह उतना ही सफल होता है और उतना ही वैभव उपार्जित कर लेता है। इन्द्रियों में शक्ति रहने तक ही भोगों को भोगा जा सकता है। ये अशक्त हो जायें तो आकर्षक से आकर्षक भोग भी उपेक्षणीय और घृणास्पद लगते हैं। नाड़ी-संस्थान की क्षमता क्षीण हो जाए तो शरीर का सामान्य क्रिया-कलाप भी ठीक तरह चल नहीं पाता। मानसिक शक्ति घट जाने पर मनुष्य की गणना विक्षिप्तों और उपहासास्पदों में होने लगती है। धन-शक्ति न रहने पर दर-दर का भिखारी बनना पड़ता है। मित्र-शक्ति न रहने पर एकाकी जीवन सर्वथा निरीह और निरर्थक प्रतीत होने लगता है। आत्मबल न होने पर प्रगति के पथ पर एक कदम भी यात्रा नहीं बढ़ती। जीवनोद्देश्य की पूर्ति आत्मबल से रहित व्यक्ति के लिये सर्वथा असंभव ही है।
अतएव शक्ति का संपादन भौतिक एवं आध्यात्मिक दोनों क्षेत्रों में सफलता प्राप्त करने के लिए नितान्त आवश्यक है। हमें यह जान ही लेना चाहिए कि भौतिक-जगत में जितनी पंच भूतों को प्रभावित करने एवं आध्यात्मिक जगत में जितनी भी विचारात्मक भावात्मक तथा संकल्पात्मक शक्तियाँ हैं उन सब का मूल उद्गम एवं असीम भाण्डागार वह महत्त्व ही है जिसे गायत्री नाम से भी संबोधित किया जाता है। इस भाण्डागार में जितने ही गहरे उतरा जाए उतनी ही बहुमूल्य रत्न-राशि उपलब्ध होने की सम्भावना बढ़ती चली जाती है।
विश्व के आत्मोत्कर्ष इतिहास पर दृष्टिपात करने से यही प्रतीत होता है कि चरित्र को उज्ज्वल एवं विचारों को उत्कृष्ट रखने के अतिरिक्त हमारे महान पूर्वजों ने उपासनात्मक सम्बल गायत्री महामंत्र को ही पकड़ा था, और इसी सीढ़ी पर चढ़ते हुए वे देव पुरुषों में गिने जाने योग्य स्थिति प्राप्त कर सके थे। देवदूतों, अवतारों, गृहस्थियों, महिलाओं, साधु, ब्राह्मणों, सिद्ध पुरुषों को ही नहीं साधारण सद्गृहस्थों का उपास्य भी गायत्री ही रही है। और उस अवलम्बन के आधार पर न केवल आत्मकल्याण का श्रेय साधन किया है वरन् भौतिक सुख सम्पदाओं की साँसारिक आवश्यकताओं को भी आवश्यक मात्रा में उपलब्ध किया है। ऐसे कितने प्रमाण देखने में आते हैं।
ब्रह्मवैवर्त पुराण के 23 वें अध्याय में सावित्र्युपा ख्यान नाम से गायत्री महिमा पर एक सुन्दर कथानक का वर्णन है। महर्षि नारद भगवान विष्णु से पूछते हैं- भगवान् गायत्री उपासना का इतिहास क्रम किस प्रकार चला? उसके उत्तर में भगवान ने उत्तर दिया-
ब्रह्मणा वेद जननी पूजिता प्रथमे मुने।
द्वितीये च देवगणैस्तत्पश्चाद्विदुष्णं गणौः।
तथा चाश्वपितः पूर्व पूजया मास भारते।
अर्थात्-हे नारद, वेदजननी गायत्री की पहले ब्रह्मा ने फिर देवताओं ने, फिर गृहस्थी ब्राह्मणों ने उपासना की। राजाओं में प्रथम अश्वपति ने उपासना की।
अश्वपति का परिचय और उपासना का नियम विधान बताने के उपराँत भगवान ने नारद जी से कहा-
साच राज्ञी महासाध्वी वशिष्ठ स्योपदे शतः।
चकाराराधने भक्त्या सावित्रीश्चैव नारदः।
राजा और रानी को सावित्री की आराधना करते हुए जब बहुत दिन व्यतीत हो गये तो एक दिन आकाशवाणी हुई कि तुम दश लक्ष गायत्री का विशेष जप करो।
शुश्रावाकाशवाणीञ्च नृपेन्द्रश्चा शरीरिणीम्।
गायत्रीदश लक्षं च जपं कुर्वाति नारद।
आकाशवाणी सुनकर उनने 10 लक्ष जप का विशेष अनुष्ठान प्रारम्भ किया।
इसी बीच एक बार महर्षि पाराशर राजा अश्वपति से भेंट और उनने राजा को गायत्री उपासना की महत्ता बताते हुए कहा-
सकुज्जपश्च गायत्र्या पापं दिन कृतं हरेत्।
दशधा प्रजपान्नृपणं दियारात्र्यय मेवच।
गायत्री के एक बार जप से दिन में किये पाप, तथा दश बार जप से दिन-रात के पापों का नाश होता है।
एवं क्रमेण राजर्षे दश लक्षं जपं कुरु।
साक्षात् द्रक्ष्यसि सावित्रीं त्रिजन्म पातक क्षयात्।
सो हे राजन् इसी क्रम से तुम भी जप करो। फलस्वरूप तुम्हारा तीन जन्मों के पापों का क्षय हो जाएगा और साक्षात् गायत्री माता का दर्शन करोगे।
दत्वा ज्ञान नृपेन्द्राय प्रथयौ स्वालयं मुनीः।
राजा सम्पूज्य सावित्री ददर्श वर मा पच।
इस प्रकार मुनि राजा को ज्ञान देकर आश्रम चले गये और गायत्री की उपासना कर राजा ने भगवती का साक्षात्कार और वरदान प्राप्त किया।
भगवती गायत्री ने प्रकट होकर कहा-
जानामि ते महाराज यत्तो अनसि वर्तते।
वाँछितं तव पत्न्या च सर्व दास्यामि निश्चितम्।
साध्वी कन्याभिलाषंच करोति तव कामिनी।
त्वं प्रार्थयसि पुर्त्र च भवष्यति क्रमेण ते।
“राजन् मैं तुम्हारी और तुम्हारी पत्नी की अभिलाषा को जानती हूँ। तुम दोनों की कामनाओं को पूर्ण करूंगी। रानी कन्या की और तुम पुत्र की कामना करते हो तो क्रमशः तुम दोनों की कामना पूर्ण करूंगी।”
तदनुरूप उन्हें पुत्र तथा कन्या की प्राप्ति भी हुई।
अन्यान्य महापुरुषों ने तथा देवताओं ने भी गायत्री उपासना का अवलम्बन लिया है। उसमें उन्हें अभीष्ट आत्म-शक्ति प्राप्त हुई है और उस शक्ति-भण्डार के अधिकारी बन उनने अपने को ऐसा प्रकाशवान बनाया है जिनके प्रकाश से अभी तक संसार में सर्वतोमुखी प्रकाश आलोकित ही रहा दिखाई देता है।
गायत्री वेद मातास्ति साद्या शक्तिर्मता भुवि। जगताँ जननी चैव तामुपासेऽहमेवहि॥
भगवान् शंकर कहते हैं-गायत्री वेदमाता है। यही आदि शक्ति कहलाती है। वही विश्व-जननी है। मैं उसी की उपासना करता हूँ।
प्रभावेणौव गायत्र्याः क्षत्रियः कौशिको वशी। राजर्षिर्त्व परित्यज्य ब्रह्मर्षिपदमीयिवान्॥
सामर्थ्य प्राप चातुच्चैरन्यद्भुवन सर्जने।
किं किं न दद्याद्गायत्री सन्यगेवमुपासिता॥ दुर्लभा सर्वमत्रेषु गायत्री प्रणवान्विता।
न गायत्र्यधिकं किंचित त्र्यीषु परिगीयते॥
(स्कन्द पुराण-काशीखण्ड)
“संयमी एवं तपस्वी क्षत्रिय-विश्वामित्र महर्षि गायत्री मंत्र की आराधना के प्रभाव से ही राजर्षि पदवी को त्यागकर ब्रह्मर्षि बन गये थे फिर उन्होंने अन्यान्य लोकों की सृष्टि करने की श्रेष्ठ सामर्थ्य भी प्राप्त कर ली थी। अच्छी प्रकार से श्रद्धापूर्वक समराधित गायत्री कौन-कौन सा लाभ प्रदान नहीं करती? निस्सन्देह प्रणव मंत्र से युक्त गायत्री समस्त मंत्रों में अतीव दुर्लभ है। इसलिए वेदत्रयी मंत्र से बढ़कर अन्य कोई मन्त्र नहीं माना जाता।”
कौशिल्या सुप्रजा राम पूर्वा संध्या र्प्रवतते।
उत्तिष्ठ नरशार्दूल कर्तव्यम् देवमाह्निकम्॥
तस्यर्षेः परमोदारं वचः श्रुत्वा नरोत्तमौ।
स्नात्वा कृतोदको वीरो जपेतु परमं जपम्॥
“हे कौशल्या के सुपुत्र राम! अब संध्या का समय हो गया है अतः हे नरशार्दूल ! उठ कर अपने नित्य कर्मों को करो । विश्वामित्र जी के ऐसे प्रेमयुक्त वचनों को सुनकर दोनों भाई उठ बैठे और स्नान करके गायत्री-जप में तत्पर हो गये।”
अवतीर्य रथात् तूर्ण कृत्वा शौचं यथाविधि। रथमोचनमादिश्य सन्ध्यामुपविवेशह॥
- महाभारत-उद्योग पर्व
“हस्तिनापुर को जाते समय कृष्ण जी ने रथ से उत्तर कर शौचादि क्रिया करके यथाविधि सन्ध्या की।”
कृतोदकानुजप्यः स हुताग्नि समलंकृतः।
(महाभारत)
“फिर हस्तिनापुर पहुँचकर उन्होंने स्नान, हवन और गायत्री जप किया।
सप्त-कोटि महामन्त्र गायत्री नायकाः स्मृताः आदि देव उपासन्ते गायत्री वेद मातरम्॥
सप्त कोटि महामन्त्रों में गायत्री सर्वोपरि सेना नायक के समान है । देवता इसी की उपासना करते हैं, यही चारों वेदों की माता है।
भगवान शंकर भी कहते हैं-जहाँ गायत्री माता है, वहाँ शक्ति ठहरती है। वह विश्व जननी है। मैं उसी की उपासना करता हूँ। शंकर जी ही नहीं प्रत्येक प्रमुख देवता तथा भूमण्डल के सभी महापुरुषों ने अपनी साधना में गायत्री का आश्रय लिया है। भगवान कृष्ण का कथन है।
जपताँ जुह्यताँ चैव नित्यं च प्रवतात्मनाम्। ऋषीणाँ परमं जप्लं गुह्यमेतन्नराधिप॥
-महाभारत
“हे युधिष्ठिर! नित्य जप और हवन करने के लिये ऋषियों का परम मंत्र गायत्री ही है।”
संसार में अनेक देवताओं के रूप में जो अनेक शक्तियाँ दृष्टिगोचर हो रही हैं जिनकी सहायता से हमारा जीवन धारण, पोषण, अभिवर्धन एवं श्रेय साधन हो रहा है वे गायत्री महाशक्ति के अंतर्गत आती हैं। इसे यों भी कहा जा सकता है कि वे गायत्री स्वरूप ही हैं। विश्व-व्यापी जल तत्व ही नदी सरोवरों, कूप, तालाबों, जलाशयों, हिमिशृंगों, समुद्र ओर बादलों में विभिन्न रूप, स्वाद और स्थिति में दिखाई पड़ता है। उसी प्रकार एक ही गायत्री महातत्व अगणित देव शक्तियों के रूप में देखा और जाना जा सकता है। शास्त्र कहता है-
आदित्य देवा गन्धर्वा मनुष्या-पितरो सुराः तेषाँ सर्व भूतानाँ माता मेदिनी मातामही, सावित्री, गायत्री जगत्युर्वी पृथ्वी बहुला विद्याभूता।
-नारायणोपनिषद्
देव, गंधर्व, मनुष्य, पितर, असुर इनका मूल कारण अदिति अविनाशी तत्व है। यह अदिति सब भूतों की माता मेदिनी और मातामहि है। उसी विशाल गायत्री के गर्भ में विश्व के सम्पूर्ण प्राणी निवास करते हैं।
पूषार्यमा मरुत्याँश्च ऋषियोऽपि मुनीश्वराः।
पितरो नाग यक्षाश्च गर्न्धवप्सरा गणाः॥
ऋग्यजु सामवेदाश्च अथर्वांगि रसानि च॥
त्वमेव पंच भूतानि तत्वानि जगदीश्वरि॥
ब्राह्मी सरस्वती सन्ध्या तुरीया त्वं महेश्वरी।
त्वमेव सर्व शस्त्राणि त्वमेव सर्व संहिता॥
पुराणानि च तन्त्राणि महागम मतानि च।
तत्सद् ब्रह्म स्वरुपा किंचित्सद् सदात्मिका॥ परात्परेशी गायत्री नमस्ते मातरम्बिके
- वशिष्ठ संहिता
पूषा, अर्यमा, मारुत, ऋषि, मुनि, पितर, नाग, यक्ष गंधर्व, अप्सरा, ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, अंगिरस, पंचभूत, ब्राह्मी, सरस्वती एवं सन्ध्या-हे मातेश्वरि तुम ही हो । सर्व शास्त्र संहिता पुराण, तन्त्र, आगम-निगम तथा और भी जो कुछ इस संसार में है सो हे! ब्रह्म-रूपिणी पराशक्ति गायत्री तुम ही हो।
त्वयैतद् धार्यते विश्वं त्वयैतत्सृज्यते जगत्। त्वयै तत्पाल्यते देवि त्वमत्सन्ते च सर्वदा।
(सप्तशती 1। 73)
“हे देवी! तुम्हीं इस विश्व की धारण करने वाली हो, तुम्हीं इसकी सृष्टि करने वाली हो, तुम्हीं इसका पालन करने तथा सदैव इसका अन्त करने वाली भी हो।”
सप्तर्षि प्रीतिजननी माया बहुवर प्रदा। शिवयोः कर नेत्रोत्था ह्याश्रुस्वेद समुद्भवा।
“सप्त ऋषियों की प्रीति उत्पन्न कराने वाली बहुत वर देने वाली माया, शिव और शक्ति के हाथ, नेत्र से उत्पन्न और उन्हीं के अश्रु पसीना से उत्पन्न तुम्हीं हो।
शक्ति स्वभाविकी तस्य विद्या विश्व विलक्षणा।
एकानेकस्वरुपेण भाँति भानोरिव प्रभा॥
अनन्ताः शक्तियस्तस्य इच्छाज्ञाना क्रियादयः।
इच्छाशक्ति महेशस्य नित्या कार्य नियामिका॥
ज्ञानशक्तिस्तु तत्कार्यं कारणं करणं तथा।
प्रयोजनं च तत्वेन बुद्धिरुपाध्यवस्यति॥
यथेप्सितं क्रिया शक्तिर्यथाध्यवसितं जगत्॥
कल्पयत्यखिलं कार्य क्षणात् संकल्प रुपिणी॥
(शिवपुराण-वायुसंहिता)
“विश्व-लक्षण वाली विद्या उस परब्रह्म की स्वाभाविक शक्ति है। वह सूर्य की प्रभा की तरह एक ही अनेक रूपों में प्रकट होती है। इच्छा, ज्ञान, क्रिया आदि उसकी अनन्त शक्तियाँ हैं। ये ही दैवी शक्तियाँ संसार के समस्त कार्यों का नियन्त्रण करती हैं। उसी की शक्ति ही कार्य और कारण के रूप में काम करती है और वही अपनी संकल्प शक्ति से अनादि काल से इसका संचालन करता आया है।”
भ्रमति प्रकृतिस्तावत्संसारे भ्रमरुपिणी।
यावन्न पश्यति शिवं नित्यतृप्तमनामपम्॥
संविन्मात्रैक धर्मित्वात्काकतालीय योगतः। संविद्देवशिवं स्पृष्ट् वा मन्मप्येव भावत्यलम्॥
प्रकृतिः पुरुषं स्पृष्ट्वा प्रकृतित्वं समुज्झति तदन्तस्त्वेकताँ गत्वा नदीं रुपमिवार्ण वे ॥
(योग व॰ 6(2) 85) 16-19)
“भ्रमण शालिनी, स्पन्दात्मिका, परमेश्वर की चित्त शक्ति प्रकृति इच्छापूर्वक तब तक संसार में भ्रमण करती है जब तक कि वह नित्य, तृप्त अनामय शिव को नहीं देखती। स्वयं भी संवित् रूप होने के कारण, यदि वह अकस्मात् कभी शिव को स्पर्श कर लेती है तो तुरन्त ही उसके साथ तन्मयी हो जाती है। तब वह शिव के साथ एकता को प्राप्त करके अपने प्रकृति रूप को इस प्रकार खो देती है, “जैसे समुद्र में गिर कर नदी अपने नदी रूप को खो डालती है।”
द्रवशक्तितथाम्भासु तेजशक्तितथाऽनले। शून्यशक्तिस्तथाकाशे भावशक्तिर्भवास्थितौ॥ ब्रह्मणासर्वशक्तिर्हि दृश्यते दशदिग्गता।
नाशशक्तिर्विनाशेषु शोकशक्तिश्च शोकिषु॥ आनन्दशक्तिर्मुदिते वीर्यशक्तिस्तथा भटे।
सर्गेषु सर्गशक्तिश्च कल्पान्ते सर्वशक्तिता ॥
(योग॰ व॰ 3।500।8, 9, 10)
“जल में द्रव-शक्ति, अग्नि में तेज-शक्ति, आकाश में शून्य-शक्ति, जगत की स्थिति में भाव-शक्ति, दश दिशाओं में सर्व साधारण-शक्ति, विनाश में नाश-शक्ति, शोक करने वालों में शोक-शक्ति, प्रसन्न रहने वालों में आनन्द-शक्ति, योद्धाओं में वीर्य-शक्ति, सृष्टि में सर्जन-शक्ति, और कल्प के अन्त में सब-शक्तियाँ उसी में दिखाई देती हैं।”
भागीरथी मर्त्यलोके पाताले भोगवत्यपि।
त्रिलोक वाहिनी देवी स्थानत्रयनिवासिनी॥
मृत्युलोक में भागीरथी, पाताल में भोगवती (स्वर्ग में सीता)-ये त्रिलोक वासिनी देवी तीनों लोकों में विद्यमान् है।”
भूर्लोकस्था त्वमेवासि धरित्री लोकधारिणी।
भूवोलोके वायुशक्तिः स्वर्लोके तेजसो निधिः॥
भूलोक में लोक धारण करने वाली धरित्री तुम्हीं हो। भुवः लोक में वायु-शक्ति और स्वर्ग लोक में तेज तुम्हीं हो।”
महर्लोके महासिद्धिर्जनलोके जनेत्यपि।
तपस्विनी तपोलोके सत्य लोके तु सत्यवाक्॥
“महर्लोक में महासिद्धि, जन लोक में जननी तपो लोक में तपस्विनी और सत्यलोक में सत्य कहने वाली तुम्हीं हो।”
गंगा च यमुना चैव विपाशा च सरस्वती।
सरयूर्देविका सिंधुर्नर्मदैरावती तथा॥
गोदावरी शतद्रुश्च कावेरी देव लोकगा।
कौशिकी चन्द्रभागा च वितस्ता च सरस्वती।
गंडकी तपनी तोया गोमती वेगवत्यपि॥
“गंगा, यमुना, विपाशा, सरस्वती सरयु देविका, सिन्धु, नर्वदा, ऐरावती, गोदावरी, शतद्रु, कावेरी, कौशिकी, चन्द्रभागा, वितस्ता, सरस्वती, गण्डकी, तपनी, करतोया, गोमती, वेगवती आदि समस्त सरिताएं तुम्हीं हो।”
इडा च र्पिगलाचैव सुषुम्णा च तृतीयका।
गाँधारी हस्तिजिह्वा च पूषाऽपूषा तथैव च ॥
अलंवुषा कुहूश्चैव शंखिनी प्राणवाहिनी।
नाड़ी च त्वं शरीरस्था गीयसे प्रक्तनैर्बुधै॥
“इडा, पिंगला, सुषुम्ना, गाँधारी, हस्तिजिह्वा, पूषा, अपूषा, अलम्वुषा, कुहू शंखिनी, प्राणवाहिनी-ये शरीर में टिकी हुई समस्त नाड़ियाँ भी तुम्हीं हो।”
हृत्पद्मस्था प्राणशक्तिः कण्ठस्था स्वप्ननायिका।
तालुस्था त्वं सदाधारा बिन्दुस्था बिन्दुमालिनी॥
मूले तु कुण्डली शक्ति र्व्यापिनी केशमूलगा॥
“हृदय कमल में टिकी हुई प्राणशक्ति, कंठ में स्थित स्वप्न शक्ति, तालु में सदा धारा, भौं के मध्य में बिन्दु मालिनी, मूलाधार में कुण्डली शक्ति, केश मूल में व्यापिनी शक्ति तुम्हीं हो।”
शिखामध्यासना त्वं हि शिखाग्रेतु मनोन्मनी।
किमन्यद बहुप्रोक्तेनयत् किंचिज्जगतीत्रये॥
“शिखा के मध्य में तुम्हीं विराजमान हो और शिखा के अग्र (ब्रह्मरन्ध्र) में मनोन्मनी भी तुम्हीं हो बहुत कहाँ तक कहा जाए, तीनों लोकों में जो कुछ है वह सब तुम्हीं हो।”
तर्त्सवं त्वं महादेवि शिवे संध्ये नमोस्तु ते।
इतीदं कीर्तिहं स्तोत्रं संध्यायाँ बहुपुण्यवम्॥
“हे श्रीजी और संध्याजी! तुमको नमस्कार है इस स्तोत्र का सन्ध्या समय पाठ करने से अत्यन्त पुण्य होता है।”
कमला विष्णुलोके च गायत्री ब्रह्मलोकदा।
रुद्रलोके स्थिता गौरी हरार्धांगनिवासिनी॥
“तुम्हीं विष्णु लोक में कमला, ब्रह्मलोक में गायत्री रुद्र लोक में महादेवजी के अर्द्धांग में निवास करने वाली गौरी के रूप में निवास करती हो।”
आनन्द जननी दुर्गा दशधा परिपठ्यते।
वरेण्या वरदाचैव वरिष्ठ वर वर्णिनी॥
“तुम्हीं आनन्द देने दश भाँति की दुर्गा हो जिनको इस प्रकार कहा जाता है-वरेण्या, वरदा, वरिष्ठा वरवर्णिनी।”
गरिष्ठा च वराहा च वरारोहा च सप्तमी।
नीलगंगा तथा संध्या सर्वदा भोग मोक्षदा॥
“गरिष्ठा,वराहा, वरारोहा, नीलगंगा, संध्या तथा भोगनोक्षदा।”
हंसस्था गरुडारुढा तथा वृषभवाहिनी।
ऋग्वेदाध्यापिनी भूमौ दृश्यते या तपस्विभि॥
“ब्राह्मी हंसारूढ़, सावित्री वृषभवाहिनी और सरस्वती गरुणारुढ़ है। इनमें से ब्राह्मी ऋग्वेदाध्यापिनी, भूमितल में तपस्वियों द्वारा देखी जाती है।”
ब्रह्माँड में संव्याप्त अनेक शक्तियाँ इस जगत् का संचालन एवं नियंत्रण करती हैं। उन्हीं के कारण पर संसार इतना सुन्दर और गतिशील दिखाई पड़ता है। यदि यह शक्तियाँ न होतीं और केवल जड़ पदार्थ ही इस संसार में भरे होते तो यहाँ सम्मान जैसी नीरवता का ही साम्राज्य होता। न कोई हलचल होती न परिवर्तन की गुंजाइश रहती । तब न प्राणियों, वनस्पतियों का आविर्भाव होता और न उनके कारण जो विविध विधि क्रिया-कलाप चल रहे हैं उनकी कोई सम्भावना रहती। संसार का जो भी स्थूल सूक्ष्म स्वरूप हमारे सामने उपस्थित है उसके मूल में वे अदृश्य शक्तियाँ ही काम कर रही हैं जिन्हें देवताओं अथवा देवियों के नाम से पुकारा जाता है। स्मरण रखने की बात यही है कि यह सारा शक्ति परिवार जगज्जननी गायत्री महाशक्ति का ही सृजन निर्माण, वैभव एवं परिवार है। हम गायत्री महाशक्ति को अपने में जितना ही धारण करते हैं उतना ही वह अधिकार प्राप्त हो जाता है जिससे विश्वव्यापी शक्ति शृंखला के साथ अपना सम्बन्ध स्थापित कर सकें। उन्हें अभीष्ट प्रयोजनों के लिये प्रयुक्त कर सकें। यह क्षमता जिन्हें उपलब्ध हो जाती है वे सिद्ध पुरुष कहलाते हैं। सामान्य मनुष्यों को इन शक्तियों के आधिपत्य में रहना पड़ता है, वे परिस्थितियों के दास रहते हैं पर जिन्हें शक्तियों से सम्बन्ध बनाने एवं उन्हें मोड़ने का अधिकार मिल जाता है वे परिस्थितियों को अपने अनुकूल बना लेते हैं। इस अनुकूलता के आधार पर वे अपना और असंख्य दूसरों का भला कर सकते हैं। शक्तिरूपा गायत्री के बारे में शास्त्र कहते हैं-
भ्राजते दीप्यते यस्माज्जगदन्ते हरत्यपि।
कालाग्नि रुप मास्थाय सप्तार्चिः सप्तरश्मिभिः॥
(याज्ञ॰ सं॰)
“जिस तेज के प्रताप से यह जगत् शोभित, वर्द्धित एवं सचेतन होकर अन्त में समाप्त हो जाता है वही सप्तार्चि तथा सप्तरश्मि युक्त सत्ता काल रूपी अग्नि की भाँति रूप धारण करती है।”
आदिशक्ते जगन्मातर्भक्तानुग्रह कारिणी।
सर्वत्र व्यापिकेऽनंते श्रीसंध्ये ते नमोस्तु ते॥
“आदिशक्ति, जगन्माता, भक्तों पर अनुग्रह करने वाली, सर्वत्र व्यापिका, अनन्ता, श्री, संध्या तुम्हारे लिये नमस्कार है।”
त्वमेव संध्या गायत्री सावित्री च सरस्वती।
ब्राह्मी च वैष्णवी रौद्री रक्त श्वेता सितेतरा।
“संध्या, गायत्री, सावित्री, सरस्वती, ब्राह्मी, वैष्णवी, रौद्री, रक्ता श्वेता, कृष्णा तुम्हीं हो।”
ततः परा पराशक्तिः परमा त्वम् हि गीयसे।
इच्छाशक्तिः क्रिया शक्तिर्ज्ञान शक्तिस्त्रिशक्तिदा॥
“तुम्हीं परा, परमा शक्ति कही जाती हो। इच्छाशक्ति और ज्ञानशक्ति भी तुम्हीं हो।”
इन्द्रियाणामधिष्ठात्री भूतानाँ चाखिलेषु या।
भूतेषु तस्यै व्याप्त्यै देव्यै नमोनमः।
चितिरुपेण या कृत्स्नमेतद् व्याप्यस्थिता जगत।
(दुर्गा सप्तशती)
“जो देवी समस्त इन्द्रियों और समस्त भूतों की अधिष्ठात्री है उस सर्वव्यापक महाशक्ति को हम नमन करते हैं। वही इस समस्त जगत् का चेतन रूप रखने वाली है।”
गायत्री वा इदम् सर्व भूतं यदिदं किंचवाग्वे।
गायत्री वग्वा इदम् सर्व भूतं गायत्री त्रायते च॥
“यह जो कुछ है, निश्चय से गायत्री है। गायत्री ही सारे जगत की सार और वाणी है। क्योंकि वाणी ही सारे संसार को बनाती और रक्षा करती है।
सुप्ता नागोपमा ह्येषा स्फ रन्ती प्रभवा स्वया।
अहिवत् सन्धिसंस्थाना वाग्देवी बीज संज्ञका॥
ज्ञेया शक्तिरियं विष्णोर्निभया र्स्वगभास्वरा।
सत्वं रजस्तमश्चेति गुणत्रय प्रसूतिका॥
(योग शास्त्र)
“वह देवी सोयी हुई नाग के समान मालूम होती है तथा अपने ही प्रकाश से दीप्त है। वह सूर्य के समान ही सन्धि स्थान में रहती है तथा वाग्देवी के बीज के नाम से विख्यात है। इसे विष्णु की शक्ति जानना चाहिए। यह निर्भय, स्वर्ण के समान आभा वाली है तथा सत्व, रज और तम इन तीनों गुणों का प्रसूति स्थान है।”
यजुर्वेद पठन्ती च अंतरिक्षे विराजते।
सा सामगापि सर्वेषु भ्राम्यमाण तथा भुवि॥
“सरस्वति यजुर्वेद पढ़ती हुई अंतरिक्ष में विराजमान् होती है और सावित्री सामवेद गाती हुई पृथ्वी तल पर सर्वजनों में भ्रमती है।”
रुद्रलोकं गता त्वं हि विष्णुलोकनिवासिनी
त्वमेव ब्रह्मणो लोकेऽमर्त्यानुग्रहकारिणी॥
“सावित्री रुद्र लोक में सरस्वती विष्णु लोक में और ब्रह्मलोक में विराजमान रहती हैं-ये सब प्राणियों पर कृपा करने वाली हैं।”
मानव शरीरों में अनेक शक्तियाँ हैं, उनके मस्तिष्क एवं हृदय में इतनी अद्भुत क्षमतायें हैं जिनका कोई वारापार नहीं। देखने में सभी मनुष्य लगभग एक जैसे प्रतीत होते हैं। हाड़, माँस, इन्द्रियाँ, अंग, अवयव, आहार-विहार, स्वभाव, अभ्यास, लम्बाई चौड़ाई की दृष्टि से मानव प्राणियों में कुछ बहुत ज्यादा अन्तर दिखाई नहीं देता पर उनमें जो सूक्ष्म विशेषताएं सन्निहित हैं उन्हीं की न्यूनाधिकता में कोई गई-गुजरी स्थिति में पड़ा रहता है कोई उन्नति के उच्च शिखर पर जा पहुँचता है । बहुतों को इन क्षमताओं के अभाव में दुःख दारिद्रय से भरा शोक-सन्ताप ग्रस्त जीवन जीना पड़ता है पर जिनमें कुछ विशेषताएं प्रतिभा के रूप में अधिक होती हैं, वे उन उपलब्धियों के कारण अनेक दिशाओं में सफलताएं प्राप्त करते हैं और सुख-शाँति का लाभ लेते हुए यशस्वी एवं तेजस्वी जीवन व्यतीत करते हैं।
मानवीय शरीर एवं मस्तिष्क में सन्निहित शक्तियों को वैयक्तिक अभ्यास से भी बढ़ाया जाता है पर वे एक दैवी वरदान के रूप में भी न्यूनाधिक मात्रा में लोगों को मिलती हैं। यह दिव्य प्रतिमाओं एवं सूक्ष्म शक्तियों का वरदान मनुष्य की आध्यात्मिक प्रगति पर ही निर्भर है। कहना न होगा कि आध्यात्मिक उच्चस्तर की प्राप्ति में उपासना का अद्भुत महत्व है और उपासनाओं में सर्वोपरि सर्वसुलभ, सर्वांगीण गायत्री उपासना ही है। उसी की अनुकम्पा मानव-जीवन में विभिन्न प्रतिभाओं के रूप में प्रकाशवान होती है।
त्वं भूमि सर्व भूतानाँ प्राणः प्राणवताँ तथा।
धीः श्रीः कान्तिः क्षमा शान्ति श्रद्धा मेधा धुतिः स्मृति
त्वं मुदगीथेऽधं मात्रासि गायत्री व्याहृति स्तथा॥
-देवी भागवत
“तुम सब प्राणियों के धारण करने वाली भूमि हो प्राणवानों में प्राण हो। तुम्हीं धी, श्री, कान्ति, श्रद्धा, मेधा, धृति, स्मृति हो। तुम हो ॐकार की अर्धमात्रा उद्गीथ हो, तुम ही गायत्री व्याहृति हो।”
या श्रीः स्वयं सुकृतिनाँ भवनेष्व लक्ष्मीः।
पापात्मनाँ कृतधियो हृदयेषु बुद्धिः॥
श्रद्धा सताँ कुलजन प्रभवस्य लज्जा।
ताँ त्वाँ नताः स्म परिपालय देवि विश्वम्॥
“वह भगवती सज्जनों के घर में लक्ष्मी रूप में निवास करती है। वही विवेकशून्यों के हृदय में बुद्धि का प्रादुर्भाव करती है। वही कुलीन जनों में दुष्कर्मों से लज्जा का भाव उत्पन्न करती है। साराँश यह है कि वही समस्त जगत का पालन तथा संचालन करने वाली शक्ति है।
कीर्ति कान्तिन्च नैरुज्यं सर्वेषाँ प्रियताँ व्रजेत्।
विख्यातंचापि लोकेषु भुक्त्वान्ते मोक्षमाप्नुयात्॥
“महादेवी की कृपा से ही कीर्ति, कान्ति, आरोग्य, सर्वप्रियता और संसार में यश आदि की प्राप्ति होती है और अन्त में मोक्ष, लाभ भी निस्सन्देह होता है।
या देवी सर्वभूतेषु विद्यारुपेण संस्थिता (सप्तशती)
“वह देवी ही सब भूतों (प्राणियों) में विद्या के रूप में प्रतिष्ठित है।”
ऐसी महाशक्ति की शरण में हमें जाना ही चाहिए, उसका सान्निध्य एवं संपर्क ग्रहण करना ही चाहिए। इस पारस मणि का स्पर्श कर निस्सन्देह हम अपने लोह जैसी कुरूपता एवं अपूर्णता को सर्वांगीण सौंदर्य एवं समग्र वैभव के रूप में परिणत कर सकते हैं।
सफल उपासना के मूल में जिस अविच्छिन्न श्रद्धा की आवश्यकता है वह इस महाविद्या के तत्व ज्ञान को भली प्रकार जान लेने से ही सम्भव है। इस लिये जिस प्रकार किसी भी कार्य के करने से पूर्व उसका स्वरूप एवं प्रतिफल जानना आवश्यक होता है उसी प्रकार गायत्री विद्या के बारे में भी आवश्यक जानकारी पूरे मनोयोग के साथ प्राप्त करनी चाहिए।
परिपूर्ण जानकारी का प्रयोजन यही है कि उस संबंध में अभीष्ट श्रद्धा उत्पन्न हो और उसके आधार पर नियम-बद्ध, क्रमबद्ध, व्यवस्थित और भावनापूर्ण उपासना संभव हो सके। इसी स्तर की उपासना अभीष्ट परिणाम उत्पन्न करती है। तभी वे सत्परिणाम उत्पन्न होते हैं जिनका वर्णन शास्त्रों एवं ऋषियों ने पग-पग पर किया है।
गायत्री उपासना में नियमितता एवं क्रमबद्धता आवश्यक है। जो श्रद्धा विश्वास की दृढ़ता होने पर ही सम्भव हैं। जब तक कौतूहल के रूप में अधूरे मन से कोई कार्य किया जाता है तब तक तन्मयता के अभाव में वह अस्त-व्यस्त ही रहता है। श्रद्धा होने से तत्परता एवं लगन उत्पन्न होती है, तब नियमित उपासना एक स्वभाव बन जाता है। ऐसी दशा में ही अभीष्ट परिणाम भी होता है।
जो गायत्री को जानता है वह उसके मर्म स्वरूप एवं प्रतिफल में परिणत होने के कारण तत्परतापूर्वक उपासना भी करता है, ऐसे व्यक्ति का मन भी लगता है। मन लगा कर जो भी कार्य किया जाता है उनमें सफलता मिलती ही है फिर उपासना में सफलता क्यों न मिलेगी?
यो हवा एव वित् ब्रह्मवित् पुण्याँ च कीर्ति लभते। सुरभीचं गन्धान्। सोऽपहतपास्या अनन्ताँश्चिय मश्रुते। य एवं वेद यश्चैव विद्वान एवमेताँ वेदानाँ मातरम्। सावित्री संपदमुषनिषदमुपास्ते।
- गोपथ ब्राह्मण
जो गायत्री के गहन तत्व को जानता है, वह सच्चा उपासक, पुण्य, कीर्ति, लक्ष्मी आदि को प्राप्त करता हुआ, परमश्रेय को प्राप्त करता है।
अपनो से अपनी बातें-
(श्री ‘भारतीय योगी’)
एक बार फिर विश्व के ऊपर युद्ध की काली घटाएं इकट्ठी होने लगी हैं। वियतनाम का युद्ध भीषण रूप धारण कर ही रहा है और राष्ट्रसंघ के महासचिव ऊथाँत ने चेतावनी दी है कि-”इससे चीन के साथ युद्ध का खतरा पैदा होना स्पष्ट है और उसके परिणामस्वरूप मानवता का अस्तित्व संशय में पड़ जाएगा।” अब पूर्वी एशिया में अरब गणराज्य तथा इसराइल का संघर्ष उग्र रूप में उठ खड़ा हुआ है और इसराइल के प्रधान ने भी चेतावनी दी है कि-”यदि इसराइल पर आक्रमण किया गया तो इसका परिणाम विश्व-युद्ध ही होगा।” ऐसी परिस्थिति में किस दिन सचमुच युद्ध का शंखनाद हो जाएगा और भयंकर संहारक अस्त्र अपनी दानवी शक्ति से निर्दोष नर-नारियों का संहार करने लगेंगे, यह कोई नहीं कह सकता। प्रतिदिन अखबारों में छपने वाली घटनाओं और अन्य लक्षणों से यह स्पष्टतः प्रकट होता है कि संसार तेजी से युद्ध की तरफ बढ़ता जा रहा है और आज नहीं तो कल उसका होना अनिवार्य ही है।
युद्ध की तैयारियाँ तो द्वितीय महासमर के समाप्त होते ही सन् 1947 से शुरू हो गई थीं और बीच में एकाध बार ऐसा मौका भी आ चुका है जब विश्वव्यापी महासंग्राम छिड़ते-छिड़ते कुछ खास व्यक्तियों के प्रयत्न और प्रभाव से जैसे-तैसे रुक गया। इस समय भी संकट की सूचना मिलते ही महासचिव ऊथान्त तुरन्त मिश्र पहुँच गये हैं और राष्ट्रपति नासर को समझने की कोशिश कर रहे हैं। भारत भी युद्ध नहीं चाहता और उसने संघर्षरत राष्ट्रों से शान्ति की अपील की है। सम्भव है पहले की तरह इस बार भी भगवान भयत्रस्त लोगों की प्रार्थना सुन ले और दुनिया को फिर चन्द दिन शाँतिपूर्वक रह सकने का वरदान प्राप्त हो जाए। पर ‘बकरे की माँ कब तक खैर मनायेगी’ वाली कहावत के अनुसार साल-दो साल बाद यही आग फिर भड़केगी और संसार के रंग-मंच पर महाकाल का ताण्डव नृत्य दिखाई पड़ने लगेगा।
यों तो युद्ध सदा से होते रहे हैं और उनके कारण अनेक राजसिंहासन तथा राष्ट्र नष्ट-भ्रष्ट हो चुके हैं। गत पचास वर्षों के भीतर ही दो विश्वव्यापी महासमर हो चुके हैं जिनने दुनिया का नक्शा ही बदल दिया है। जिन देशों का पृथ्वी पर डंका बज रहा था वे प्रायः नाम शेष हो गये और नये-नये राष्ट्र संसार के नायक और सूत्रधार बन गये। इस बार जिस युद्ध के बादल गरज रहे हैं वह दस-पाँच देशों को ही मटियामेट नहीं करेगा वरन् समस्त मानव-जति को उथल-पुथल कर डालेगा। उससे केवल संसार की राजनीति और आर्थिक व्यवस्था की कायापलट ही न होगी वरन् समाजों और धर्मों (मजहबों) की जड़े भी हिल जायेंगी। जो परम्पराएं, रूढ़ियां, रीति-रिवाजें, कर्मकाँड, धर्मोत्सव आदि आज अनिवार्य समझे जाते हैं, जिनका पालन किये बिना नाव डूब जाती है, नाक कट जाती है, वे आगामी युद्ध के पश्चात धुंए की तरह अंतरिक्ष में उड़ जायेंगे और फिर ढूंढ़ने से भी उनका पता न लगेगा। उसमें मानवजाति का अभूतपूर्व संहार ही न होगा वरन् उस सभ्यता और आदर्शों की भी काया पलट हो जाएगी जिनको सामान्य विद्या बुद्धि के व्यक्ति अटल और अचल समझे बैठे हैं।
इस प्रकार की घटना को अनहोनी या अतिरंजित समझ लेना ठीक न होगा। गत पाँच-छः हजार वर्षों का जो इतिहास प्राप्त हो सका है, उसके अनुसार इसी बीच में मिस्र, बैबिलोनिया, असीरिया, ईरान, यूनान, रोम आदि की भूमण्डल में प्रसिद्ध सभ्यताएं पूर्णतया नष्ट हो चुकी हैं। अब से 25-30 हजार वर्ष पहले अटलाँटिक महासागर में एक महाद्वीप की सभ्यता संसार में सर्वश्रेष्ठ थी, ऐसा पता कुछ शोध करने वाले विद्वानों ने लगाया है। पर वह भी काल के थपेड़ों-भूकम्प के धक्कों से विनष्ट हो गई और वहाँ के इने-गिने व्यक्ति ही बच कर अन्य स्थानों में पहुँच सके जहाँ उन्होंने नई सभ्यताओं को जन्म दिया। कुछ विद्वानों के मतानुसार इसी घटना का वर्णन बाईबल में नूह की नाव के रूप में किया गया है। जल-प्रलय की घटना भारतीय पुराणों में भी पाई जाती है और उसका सम्बन्ध मनु से बतलाया गया है।
इसलिये यदि इस बार भी युद्ध और किसी तरह की महामारी आदि से मानव-सभ्यता का एक बड़ा भाग नष्ट हो जाये तो यह बात दैवी विधान के प्रतिकूल नहीं समझी जा सकती ? हमारे शास्त्रकार और भविष्यवेत्ता तो सदा से यह कह चुके हैं कि जब-जब पृथ्वी पर धर्म और नीति का अत्यन्त ह्रास हो जाता है और अनीति तथा पाप का बोलबाला होने लगता है, मनुष्य परमार्थ, परोपकार का भाव त्याग निरन्तर स्वार्थपरायण और निर्दयी बन जाते हैं, तब-तब ही प्रकृति और भगवान कोई ऐसी योजना प्रस्तुत कर देते हैं जिससे पापी-समुदाय का अन्त होकर सज्जनों के उपयुक्त वातावरण फिर से उत्पन्न किया जाता है। इस सिद्धान्त की घोषणा सबसे स्पष्ट और उच्च स्वर में ‘श्रीमद्भगवद् गीता’ ने की है-
यदा यदा हि धर्मस्यग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥
परित्राणाय साधूनाम विनाशाय न दुष्कृताम्।
धर्म संस्थापनार्थाय संभवामि युगे-युगे॥
संसार में जब कभी धर्म (सत् कर्मों) की अत्यन्त न्यूनता हो जाती है और दूषित (रीति-रिवाज) अधिक बढ़ जाते हैं, उस समय भगवान संतों की रक्षा और दुष्टों के शमन के लिये अपनी शक्ति को किसी रूप में प्रकट करते हैं।
‘योग वशिष्ठ’ में भी महर्षि वशिष्ठ ने कहा है-”जब पृथ्वी पर मनुष्यों का भार बहुत अधिक बढ़ जाता है तो भगवान् युद्ध, अकाल, महामारी, भूकम्प आदि किसी उपाय से उनको नष्ट करके भार को हल्का करते हैं।”
भविष्य-वर्णन का एक पद महात्मा सूरदास जी के नाम से प्रसिद्ध है, जिसमें कहा गया है-
एक, सहस्र नौ सौ के ऊपर ऐसा योग परे।
सहस्रवर्ष लौं सतयुग बीते धर्म की बेल बढ़े॥
इस भविष्यवाणी में हमको एक विशेष ध्यान देने योग्य बात यह जान पड़ती है कि ईसाइयों की ‘बाइबिल’ में भी भविष्य-कथन करते हुए कहा है कि-
“मैंने एक ईश्वरीय दूत (फरिश्ते) को आकाश से आते देखा जिसके हाथ में एक बड़ी जंजीर थी। उसने शैतान को जंजीर से बाँध कर अथाह गड्ढे में डाल दिया और उसे बन्द कर दिया। उसके पश्चात् एक हजार वर्ष तक पृथ्वी पर ईश-पुत्र ईसा का धर्म-राज्य रहेगा।”
सूरदास जी तथा बाईबल दोनों की भविष्यवाणियों में एक हजार वर्ष तक सतयुग या धर्मयुग के गुजरने की बात को दिव्य दृष्टि का चमत्कार कहें तो अनुचित न होगा। क्योंकि ये दोनों भविष्यवाणियाँ एक दूसरे से बहुत अन्तर पर और एक दूसरे से सर्वथा अनजान होते हुए कही गई थीं। महात्मा सूरदास जी ने जो सम्वत् 1900 के बाद नया युग आने का वर्णन किया है उसका आशय शाके सम्वत् से हो सकता है जो इस समय समस्त देश में प्रचलित है और जिसका 1886 वाँ वर्ष गुजर रहा है।
मुसलमानी धर्म के अनुयाइयों ने भी अपने मजहब के सम्बन्ध में लिखा है कि चौदहवीं सदी के अन्त में कयामत हो जाएगी और इस्लाम खत्म होकर कोई नया धर्म उसका स्थान ले लेगा। इस समय चौदहवीं सदी चल रही ही और इसके समाप्त होने में 13 वर्ष की देर है।
एक अन्य मुस्लिम सन्त शाह नियामत उल्ला ने अब से 800 वर्ष पहले एक भावी घटनाओं की पुस्तक कविता में लिखी, जो इस समय पटना की “खुदाबख्श लाइब्रेरी” में रखी है। उसमें सन् 1914 और 1936 के दोनों महायुद्धों का वर्णन बड़ी स्पष्टता से किया है। तीसरे महायुद्ध के विषय में उसमें लिखा है कि “अलिफ ‘(अमरीका) इस युद्ध में एक प्रधान दल होगा। उसके मुकाबले में रूस और जर्मनी एक होकर और संसार को क्षण भर में नष्ट करने वाले हथियारों को लेकर उतर आयेंगे। अँग्रेजों को इस युद्ध में इतनी हानि उठानी पड़ेगी कि वे अपनी सभ्यता सहित संसार से मिट जायेंगे।”
आधुनिक भविष्यवक्ता -
वर्तमान समय में शिक्षित व्यक्तियों का विश्वास अधिकाँश में ज्योतिष और भविष्य कथन जैसी बातों पर से उठता जाता है और अनेक ‘गुप्त-विद्या’ वाले व्यक्ति जैसा ढोंग फैलाते या बहकाते हैं, उसे देखकर इसे अस्वाभाविक भी नहीं कहा जा सकता। पर इस पर जमाने में भी भारत वर्ष ही नहीं योरोप और अमरीका जैसे विज्ञान क्षेत्र में प्रगतिशील देशों में भी बड़े-बड़े भविष्यवक्ता मौजूद हैं और इन देशों के प्रभावशाली नेता तथा शासन-सूत्र के संचालक उन पर पूरा विश्वास करते हैं। इसका कारण यही है कि ज्योतिष सामुद्रिक, शकुन शास्त्र के अतिरिक्त कुछ मनुष्यों में एक स्वाभाविक शक्ति भी होती है जिससे उनको होनहार का आभास मिल जाता है। इसका सम्बन्ध आध्यात्म-जगत से होता है उसका संकेत तत्वतः ठीक ही सिद्ध होता है।
अमरीका में एक कैथोलिक-सम्प्रदाय की महिला जीन डिक्सन की इस दृष्टि से बड़ी ख्याति है। महायुद्ध के विजेता प्रेसीडेंट रुजवेल्ट भी उससे अनेक बार पूछा करते थे। उसने रुजवेल्ट की मृत्यु, प्रेसीडेण्ट कैनेडी की हत्या, महात्मा गाँधी की हत्या के विषय में पहले ही बतला दिया था। आगामी महायुद्ध के विषय में उसने जो कुछ कहा है उसका साराँश इस प्रकार है-
कुछ समय बाद चीन और रूस का संघर्ष गम्भीर रूप धारण कर लेगा और उससे विश्वव्यापी युद्ध की शुरुआत हो जाएगी। अमरीका भी चीन के विरुद्ध है, इससे चीन को काफी क्षति उठानी पड़ेगी। यह युद्ध सन् 1980 के आस-पास होगा और इसकी आग में सारी दुनिया के लोगों को झुलसना पड़ेगा। यह ऐसा भयंकर होगा कि वर्तमान समय की साधन सामग्री को ही नहीं, मानवजाति के विचारों, मान्यताओं, आदर्शों एवं गतिविधियों को भी बदल कर रख देगा। तब एक नई और उत्कृष्ट आध्यात्मिकता का विकास होगा और एक ऐसे नये-युग की आधारशिला रखी जाएगी जिसमें विश्वशाँति अक्षुण्ण रह सके। यह परिवर्तन सन् 1999 के पश्चात् स्पष्ट दिखाई पड़ने लगेगा। इसका नेतृत्व करने वाला महापुरुष सन् 1965 में जन्म ले चुका है।
इसराइल राष्ट्र के आत्मदर्शी विद्वान प्रो॰ हरार ने वर्तमान तीन चार वर्षों में भयंकर युद्ध होने की बात निश्चित रूप से कही है और अपनी सचाई को प्रमाणित करने के लिये अपनी भविष्यवाणियों का कई साक्षियों के सामने टेप रिकार्ड करा दिया है। उनकी मुख्य बातें इस प्रकार हैं-
“वियतनाम का युद्ध 1960 तक चलेगा और अमरीका को सफलता प्राप्त होगी। 1970 तक रूस और चीन का विरोध भी युद्ध का रूप ग्रहण कर लेगा जिसका प्रभाव समस्त एशिया पर पड़ेगा। इसी बीच अरब और इसराइल में भी युद्ध होगा जिसमें दोनों पक्षों की काफी हानि होकर अन्त में संधि हो जाएगी। सन् 1968 में मिश्र के राष्ट्रपति नासर की भी हत्या की संभावना है। 1970 में ही एक बहुत भयंकर तूफान आयेगा जिससे सीरिया, लेबनान, जार्डन और इसराइल का बहुत बड़ा भाग नष्ट हो जाएगा।
मैक्सिको के ज्योतिर्विज्ञान ज्ञाता अहारो अमाया ने कहा है कि-”सन् 1965 से 1991 तक का समय इस शताब्दी में सबसे भयंकर सिद्ध होगा। तीसरे महायुद्ध की शुरुआत इसी काल में हो जाएगी।
राजनीतिज्ञों के उद्गार -
भविष्य वक्ताओं की बात को छोड़ भी दें तो इस समय सभी प्रमुख देशों के सूत्र-संचालक स्वयं शीघ्र ही तीसरा महायुद्ध आरम्भ होने की आशंका प्रकट कर रहे हैं। वे युद्ध को अपने लिये भी नाशकारी मानते हैं, पर उनकी दृष्टि में संसार की गति-विधि को देखते हुए यह अनिवार्य जान पड़ता है।
इस संसार का सबसे शक्तिशाली और साधन सम्पन्न राष्ट्र अमरीका माना जाता है। उसके सूत्र संचालक प्रेसीडेण्ट जान्सन ने गत वर्ष अपनी पुत्री लूसी से कहा था कि-”हो सकता है कि इतिहास में तुम्हारे पापा को तीसरा विश्व युद्ध शुरू करने वाला माना जाए। कारण यह है कि मैं किसी को यह बतला देना चाहता हूँ कि हम बड़े से बड़ा खतरा उठाने को भी तैयार हैं।”
फिलीपाइन के प्रेसीडेंट फर्डीनेंस ने इसी 8 मई को कहा था कि-”कम्यूनिस्ट चीन दस साल के भीतर फिलीपाइन तथा अपने सभी पड़ोसी एशियाई देशों को सैनिक ताकत के बल पर हथियाने की कोशिश करेगा। इसी भय के कारण हमें अपनी रक्षा के लिये अमरीका पर निर्भर रहना पड़ा है।”
स्वयं चीन के राष्ट्रपति माओ ने तीन-चार वर्ष पूर्व स्पष्ट रूस से कहा था कि-”मेरा यह अटल विश्वास है कि आगामी 10, 15 वर्षों में विश्वयुद्ध अवश्य होगा।”
हर एक संकट के लिये तैयार रहिए-
अब एक बात तो निश्चय ही समझ लेनी चाहिए कि कोई भी कारण क्यों न हो संसार में संकट-युग का आगमन हो चुका है। आकाश में तरह-तरह की आपत्तियों और विपत्तियों के बादल छाये हुये हैं जो किसी भी समय बरस सकते हैं। सावन भादों के महीनों में जब गहरे बादल इकट्ठे हो जाते हैं तो अनुभवी व्यक्ति मौसम की भविष्यवाणी करते रहते हैं जो ठीक ही होती है। अन्तर इतना ही है कि किसी स्थान में एक समय और किसी में दूसरे समय वर्षा होती है। कहीं इतना पानी गिरता है कि जल-थल एक हो जाते हैं और कहीं मामूली बूँदा-बाँदी ही होकर रह जाती है। कहीं पर कुछ छींटे मात्र ही आते हैं। पर इससे जहाँ वर्षा बहुत कम हुई या नहीं हुई तो वहाँ के निवासियों का भविष्यवाणी को झूठ समझ लेना अनुभवहीनता का परिचय देना ही है। यही बात युद्ध के सम्बन्ध में भी है। विश्वव्यापी परिवर्तनों के ज्ञाता, एक-एक व्यक्ति का अथवा किसी खास दिन का वर्णन नहीं करते वरन् समग्र मानव-समाज के उत्थान-पतन, नाश और निर्माण सम्पत्ति और विपत्ति की दृष्टि से ही विचार करते हैं। इसी दृष्टि से हम भी यहाँ जो कुछ बतलायेंगे वह आगामी तीस वर्ष अर्थात् सन् 2000 तक घटित होने वाली घटनाओं और परिवर्तनों की एक झलक ही होगी।
हमने आज से 27 वर्ष पूर्व एक भविष्यवाणी प्रकाशित की थी। जिसमें सन् 1965 से नये युग के परिवर्तन की बात कही गई थी। यद्यपि लोग हमसे कहते हैं कि अभी नवयुग या धर्मयुग कहाँ है? अभी तो दुष्कर्म बढ़ते ही जा रहे हैं और दिन प्रतिदिन बढ़ती हुई महंगाई के कारण लोग तड़फड़ा रहे हैं? हमारा कहना है कि यह घोर महंगाई, भ्रष्टाचार और अगले तीन-चार वर्षों में आने वाला महाभयंकर अकाल तथा उसके पश्चात् महामारी ही धर्मयुग आने के चिन्ह हैं। इस पापों लदी गन्दी दुनिया में धर्मयुग कैसे आ सकता है? इसलिये जब तक इसकी पूरी तरह सफाई न हो जाएगी और दुष्कर्मी लोगों को यहाँ से हटा न देंगे तब तक धर्मयुग के प्रत्यक्ष रूप से प्रकट होने की कल्पना करना निराधार है। हम इस सफाई की प्रक्रिया को और अनुपयुक्त दूषित तत्वों के निराकरण को नवयुग आगमन का ही एक अंश मानते हैं। इसलिये जैसे-जैसे संसार पर संकट और विपत्तियों के बादल घने होते जा रहे हैं, हमको नवयुग आगमन पर अधिकाधिक आस्था और विश्वास होता जाता है।
भयंकर अकाल और नई बीमारी भी-
इस समय मानव-जाति के सामने केवल युद्ध का ही खतरा नहीं है वरन् अकाल और महामारी के दो खतरे भी स्पष्ट रूप से मौजूद हैं। इस समय अन्न की कमी का अनुभव तो भारत और अन्य कई देशों में किया ही जा रहा है, और खाद्य पदार्थों का भाव बेतरह तेज हो गया है। फिर भी अधिक दाम देने पर किसी तरह अन्न मिल जाता है पर आगे वास्तव में ऐसे अकाल पड़ने वाले है जिनमें न्यूयार्क विश्व-विद्यालय (अमरीका) के अनुसंधान विभाग के संचालक श्री रेमण्ड ईवेल ने भविष्यवाणी की है कि-
“एशिया, अफ्रीका तथा दक्षिणी अमेरिका के अविकसित देश इतिहास में एक अभूतपूर्व अकाल के दरवाजे पर खड़े हुए हैं। अगर इस स्थिति का सामना करने के लिये तुरन्त व्यापक प्रयत्न नहीं किये गये तो सन् 1970 के आरम्भ में ही भारत पाकिस्तान और चीन में भयंकर अकाल का खतरा उपस्थित है 1980 तक तो एशिया, अफ्रीका तथा लेटिन अमरीका के कई दूसरे देश भी इस व्यापक अकाल के कौर बन सकते हैं।
इसी प्रकार जन-संख्या की वृद्धि से संसार में संहारकारी महामारी का भय उत्पन्न हो रहा है । इस सम्बन्ध में लन्दन के कई डाक्टरों ने परीक्षा करके यह घोषित किया है-”निकट भविष्य में जिस महामारी के फैलने की शंका की जा रही है उसका नाम ‘एशियाई फ्ल्यू’ रखा गया है। डाक्टरों ने चूहों पर परीक्षण करके यह पता लगाया है घनी आबादी वाले चूहों में अकेले रहने वाले चूहों की अपेक्षा रोग-कीटाणुओं से संघर्ष करने की क्षमता कम रह जाती है।
हमने ‘योग वशिष्ठ’ के श्लोक के आधार पर मानव जाति का भयंकर अनिष्ट करने वाली जिन चार विभीषिकाओं का वर्णन ऊपर किया है उनमें से तीन की संभावना आज के वैज्ञानिक और राजनीतिज्ञ भी जोर-शोर से प्रकट कर रहे हैं। तब चौथी दैवी आपत्ति-भूकम्प, ज्वालामुखी, जल प्लावन, तूफान आदि भी इनको सहयोग देने आ पहुँचे तो कोई आश्चर्य की बात नहीं!
दूषित कर्मों को त्याग कर सत्कर्मों को अपनाइये-
महर्षि वशिष्ठ और आजकल के वैज्ञानिकों का मत इस सम्बन्ध में पूर्णतया मिल जाना कोई आश्चर्य की बात नहीं है, कर्मफल का सिद्धान्त अटल है। मानव-जाति यदि प्रकृति के विरुद्ध चलेगी, नैतिक और चारित्रिक मर्यादाओं का उल्लंघन करेगी, सेवा सहानुभूति, अनुकम्पा जैसे मानवीय गुणों को त्याग कर स्वार्थ, नृशंसता, परस्वापहरण आदि के दोषों को ग्रहण करेगी तो उसे अवश्य उसका दण्ड सहन करना पड़ेगा।
अब भी समय है कि लोग चेतें आँखें खोलें और सेवा तथा सहानुभूति के मार्ग को अपना कर पिछली भूलों के लिये प्रायश्चित करें। भगवान् की दृष्टि में मनुष्य-मात्र उसका पुत्र है और उसे पृथ्वी, जल, वायु आदि पर एक समान अधिकार प्राप्त है। आज संसार में जो विपत्तियाँ दिखाई पड़ रही हैं और निकट भविष्य में जिनका भयंकर रूप हमको दिखलाई पड़ता जाएगा उनका प्रतिकार यही है कि हम अपने अन्य मानव-भाइयों का अपकार करने के स्थान पर सदैव उपकार करने का प्रयत्न ही करते रहें।
तम का पर्दा चीर धरा पर ज्योतिपर्व आया है!
आज निराशा-डूबी वाणी फिर से मुखर हुई है
लाजभरी अनबोल रागिनी उर-पुर में उतरी है
चेतनता ने सतरंगी चूनर फिर लहराई है
प्यासे मरु पर तृप्ति रूपिणी सोम-सुधा छहरी है
शुभ्र धेनुएँ पय स्त्रवती हैं, वत्स द्वार आया है!!
आज आस्थाओं की कलियाँ विहँसी, क्यारी झूमी
ज्योति विहग चहके,जागृति की शाश्वत वाणी गूँजी
अवसादों का गढ़ टूटा, जीवन ने ली अँगड़ाई
ज्योतिर्धारा में मानस की कलुष-कालिमा छूटी
दूर हुआ शैथिल्य, प्राण में प्रबल वेग आया है!
स्वप्न हिले, मिट गई भ्राँति, धरती को गँध मिला है
हटा विस्मरण, आत्मरूप का नूतन क्षितिज खुला है
तम की सब आसक्ति मिटी बह चले प्रभाती के स्वर
प्राची में नूतन जीवन की विकसी अरुण कला है
देवधरा ने भैरव स्वर में मुक्ति राग गाया है!
तपो पूत प्रज्ञा ने हैं फौलादी हाथ उठाए
विगत निद्र धरती सुत ने निष्ठामय चरण बढ़ाए
डगर-डगर में गूँज रही है जागृति की शहनाई
निर्वासित तम गहन गुहाओं में मुँह पड़ा छिपाए
मन-आँगन में मानवता का नव सुवास छाया है!
तम का पर्दा चीर धरा पर ज्योतिपर्व आया है!!
- भ. श. भारद्वाज प्रदोप्त
*समाप्त*