हममें से प्रत्येक अपना कर्त्तव्य निबाहे

युग परिवर्तन का अर्थ है विचार परिवर्तन। यदि जन-साधारण की वर्तमान मान्यताओं एवं आस्थाओं का स्तर बदला जा सके तो हाड़-माँस की दृष्टि से ज्यों का त्यों रहने पर भी मनुष्य आश्चर्यजनक रीति से बदल जायेगा। साधारण राजकुमार का भगवान बुद्ध, एक जघन्य डाकू का ऋषि बाल्मीक, दुर्दान्त हत्यारे का ऋषि अंगुलिमाल, वेश्या का साध्वी आम्रपाली, अशिक्षित जुलाहे का सन्त कबीर, अछूत का तत्त्वज्ञानी रैदास, व्यभिचारी का विल्वमंगल बन जाना विचारणाओं के परिवर्तन का ही चमत्कार है। मनुष्य का हाड़-माँस का आवरण भले ही न बदले विचारणाओं का परिवर्तन कुछ ही समय में किसी को भी देवता या असुर बना सकता है।

सामूहिक परिस्थितियों के बारे में यही बात लागू होती है। दुष्प्रवृत्तियों का समूह जहाँ रहता है वहाँ नरक की दुर्गंध उड़ती है और दुःख-दारिद्र एवं शोक का दावानल जलता रहता है। किन्तु वे व्यक्ति यदि अपनी गतिविधियों को बदल डालें सज्जनोचित रीति-नीति अपना लें तो देखते-देखते वहीं स्वर्ग का अवतरण उपस्थित हो जायेगा। सुविधा एवं साधन सामग्री ऐसे वातावरण से सहज ही प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हो जाती है। पारस्परिक स्नेह सहयोग एवं सौजन्य के द्वारा बड़ी से बड़ी कठिनाई का हल संभव हो जाता है। भावना-स्तर में प्रविष्ट हुई सत्प्रवृत्ति बाह्य-जीवन को समृद्धियों एवं विभूतियों से सहज ही परिपूर्ण कर देती है।

युग-निर्माण का अर्थ है व्यक्तित्व एवं विचार स्तर को सत्प्रवृत्तियों से ओत-प्रोत करना। विश्व शाँति का यही एकमात्र मार्ग है। हमें इस पुण्य परम्परा को पुनर्जीवित करके नये युग के अवतरण में महत्वपूर्ण योग देना है। मानव जाति का भविष्य उज्ज्वल है। अगला समय स्वर्गीय संभावनाओं से ओत-प्रोत है। गंगा आने वाली है-भागीरथों को उसकी पूर्व भूमिका-भर बनानी है। अगले दिनों मानव जाति का आध्यात्मिक उत्कर्ष होना है। इसके अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं। अनात्म संस्थाओं को अपना कर व्यक्ति निजी जीवन में नारकीय यंत्रणायें सह रहा है और सामूहिक दृष्टि से सर्वनाश के कगार पर खड़ा है। ईर्ष्या, द्वेष और लोभ-स्वार्थ से प्रेरित मनुष्य तृतीय युद्ध की विभीषिका में फंस सकता और अणु आयुधों से अपना सर्वनाश कर सकता है। तब विज्ञानाचार्य दार्शनिक आइन्स्टीन की भविष्यवाणी सार्थक होकर रहेगी जिसमें उसने कहा था कि-’तीसरा महायुद्ध अणु-आयुधों से और चौथा महायुद्ध पत्थरों से लड़ा जायेगा।’ तब मनुष्य के पास न इतना ज्ञान रहेगा और न साधन जिसके आधार पर वह पत्थर के अतिरिक्त और किसी शस्त्र का उपयोग कर सके।

सर्वनाश के कगार पर पहुँचने के उपराँत अब पीछे लौटने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं। मनुष्य बड़ा मूर्ख जानवर है पर उसकी बुद्धिमता में भी सन्देह नहीं। अनात्मक रीति-नीति अपना कर उसके दुष्परिणाम उसने देख लिये। इससे वह शिक्षा लेगा ही। मानना चाहिये कि वह आत्महत्या नहीं करेगा, जो देखा समझा और सीखा है उससे लाभ उठायेगा। अपने को बदलेगा और उस राह पर चलेगा जिस पर चलते हुए स्वयं जीवित रहना और दूसरों को जीवित रहने देना संभव हो सकता है। अगले दिन इसी प्रकार के आ रहे हैं। मनुष्य मूर्खता का अध्याय समाप्त कर बुद्धिमता का शुभारंभ करने जा रहा है। इस भवितव्यता में हमें अनुकूल भूमिका प्रस्तुत कर अपने को श्रेय-साधकों-भागीरथों की पंक्ति में खड़ा करना चाहिये। अखण्ड-ज्योति परिवार यही कर रहा है।

अखण्ड-ज्योति परिवार के वर्तमान सदस्यों में अब केवल सक्रिय कर्मठ, प्रबुद्ध एवं भावनाशील व्यक्ति ही रह गये हैं। कौतूहल के रूप में समय काटने के लिए जो लोग पत्रिका मंगाते थे और चंदा भेजने तक में बेतरह हीला-हुज्जत करते थे उनकी छटनी गत वर्ष कर दी गई है। अब हम लोग एक ऐसे छोटे परिवार के रूप में रह गए हैं जिनका विश्वास सद्विचारों को पढ़ने-सुनने तक ही सीमित न रह कर उन्हें कार्यान्वित करने पर भी है। जो आदर्शवाद को केवल पढ़ कर ही समाप्त नहीं कर देना चाहते वरन् उसे कार्य रूप में भी परिणत करने को उद्यत हैं। आदर्शवाद में किसी की कितनी निष्ठा है इसकी परीक्षा उसके गाल बजाने से नहीं वरन् प्रयत्न, परिश्रम को देख कर ही की जा सकती है। परमार्थ के पथ पर चलने वाले के लिये तपश्चर्या का अवलम्बन अनिवार्य रूप से करना होता है। ये ऊंचे लक्ष्य बिना कष्ट सहे-बिना त्याग किये पूरे हो ही नहीं सकते। उसे अध्यात्मवादी कौन कहेगा जिसने अपने लक्ष्य को सार्थक करने के लिए बढ़-चढ़ कर त्याग करने का साहस नहीं संजोया।

युग की सबसे बड़ी आवश्यकता मानवता की सबसे बड़ी सेवा-परमेश्वर की समयानुसार सर्वोत्तम उपासना नव-निर्माण योजना में योग-दान करने के लिए परिजनों का हमने जो आह्वान किया था वह निरर्थक नहीं गया। भगोड़े भाग गये। पर जिनमें वास्तविकता थी वे अभी भी जमे हुए हैं और हमारे कंधे से कन्धा लगा कर कदम से कदम मिला कर-चल रहे हैं। विचार क्राँति के लिये ऐसे भावनाशील व्यक्तियों की आवश्यकता थी कि जो अपना थोड़ा समय इस पुण्य प्रयोजन के लिये नियमित रूप से खर्च करते रह सकें। आखिर इसके बिना इतना बड़ा प्रयोजन पूरा हो भी कैसे सकता है? उसे एक व्यक्ति पूरा नहीं कर सकता। इसके लिए बड़ी सेना चाहिये भले ही वह रीछ-बंदरों जैसे साधन रहित किन्तु भावना सम्पन्न लोगों की ही क्यों न हो।

विचार क्राँति के लिए अखण्ड-ज्योति परिजनों को अपना ज्ञान यज्ञ निरन्तर चालू रखना है। ब्रह्म-विद्यालय को निरन्तर संचालित रखना है। हर परिजन के पास अखण्ड-ज्योति और युग-निर्माण पत्रिकाएं जाती हैं, उन्हें अपने परिवार के हर शिक्षित व्यक्ति को पढ़ाना और अशिक्षित को सुनाना एक अनिवार्य कर्त्तव्य बताया गया है। घर का एक भी व्यक्ति ऐसा न बचे जो इन विचारों से प्रेरणा ग्रहण न करता हो। इसके अतिरिक्त पड़ौस, रिश्तेदारी, मित्र, दफ्तर में जहाँ भी अपना प्रवेश, प्रभाव है, वहाँ इस विचारधारा को पढ़ाने एवं सुनाने की सुविधा उत्पन्न करनी चाहिए।

‘झोला पुस्तकालय’ ज्ञान-यज्ञ का सबसे बड़ा आधार है। एक झोला साथ रखा जाए जिसमें दोनों पत्रिकाओं के पुराने अंक तथा सस्ते ट्रैक्ट भरे रहें। उपयुक्त व्यक्तियों से इस साहित्य के महात्म्म को बता कर उनमें पहले पढ़ने का ज्ञान उत्पन्न करना और पीछे पढ़ने को देना। यह क्रम चलाते रहा जाए तो दिन में आसानी से दस-पाँच व्यक्तियों को यह प्रकाश प्रदान किया जा सकता है। यद्यपि देश में शिक्षितों की संख्या बहुत कम है, अभी 21-22 फीसदी ही पढ़े-लिखे लोग हैं फिर भी इनका महत्व कम नहीं। प्रयत्न यह करना चाहिए कि अपने प्रभाव एवं परिचय क्षेत्र के हर शिक्षित व्यक्ति तक यह विचारधारा अपना प्रकाश पहुँचा सके। अशिक्षितों को उसे सुनाने के लिए जहाँ जो भी सुविधा हो वहाँ वैसा प्रबंध करना चाहिए।

कार्य बहुत छोटा-सा, देखने में नगण्य-सा लगता है। पर इसका जो प्रभाव परिणाम हो सकता है, उसकी आज कल्पना कर सकना भी कठिन है। जिस विचारधारा का नव-निर्माण योजना के अंतर्गत सृजन किया जा रहा है वह अत्यन्त प्रेरक और असाधारण रूप से सामयिक प्रयोजनों को पूरा करने वाली है। इसे विचार क्राँति के लिए ही विनिर्मित किया जा रहा है। जिस स्थिति में जिस व्यक्ति द्वारा जिन भावनाओं के साथ इसे लिखा जा रहा है वह इतना प्रभावपूर्ण है कि उसे पढ़ कर कोई व्यक्ति जैसे का-तैसा नहीं बना रह सकता उसमें आवश्यक प्रेरणा एवं स्फुरणा उत्पन्न होनी ही है। अतएव दीखने में छोटा लगने वाला यह विचार-प्रचार कार्य उतना बड़ा पुण्य सिद्ध हो सकता है जिसकी तुलना में अन्य सब पुण्य तुच्छ रह जायेंगे। किसी को अन्न, वस्त्र, धन, दवा आदि की सहायता करके इतना लाभ नहीं पहुँचाया जा सकता जितना उसके विचार-स्तर को बदल कर संभव है। इसीलिए ज्ञान-दान को संसार का सबसे बड़ा दान कहा है। प्राचीन काल के साधु-ब्राह्मण इस ज्ञान-दान में निरत रहने के कारण ही भूसुर धरती के देवता कहलाते थे, और जन-साधारण के श्रद्धा-विश्वास का सम्मान प्राप्त करते थे। धर्म प्रचारक से आत्मा में प्रकाश उत्पन्न करने वाले से बढ़ कर इस धरती पर और कोई पुण्यात्मा हो भी नहीं सकता।

युग-निर्माण योजना के शत-सूत्री कार्यक्रम हैं। अनेक व्यक्तियों को अपनी-अपनी स्थिति के अनुरूप विश्व का नव-निर्माण करने के लिये अनेक प्रकार के रचनात्मक कार्यक्रम अपनाने हैं। पर ‘ज्ञान-यज्ञ’ सबका मूल है। इसके बिना क्षेत्र ही तैयार न होगा, साथी एवं सहानुभूति रखने वाले ही न मिलेंगे। इसलिये किसी को कहीं नव-निर्माण के लिए कुछ करना है तो पहल यहीं से करनी चाहिये कि इस विचारधारा से प्रभावित-सहमत-लोगों की संख्या बढ़ाई जाए। उन्हीं को साथ लेकर भविष्य में कोई रचनात्मक पद्धति आरंभ की जा सकती है।

ज्ञान-यज्ञ की साधन-सामग्री-पत्रिकायें तथा ट्रैक्ट माला खरीदने के लिए दस नये पैसे प्रति दिन निकालते रहने वाली बात निर्धन से निर्धन व्यक्ति के लिए कुछ कठिन नहीं। बशर्ते कि उसमें थोड़ी श्रद्धा विद्यमान हो। दस पैसे का अर्थ है-लगभग डेढ़ छटाँक अन्न अर्थात् एक रोटी का आटा। देश, धर्म, समाज और संस्कृति की एक महती आवश्यकता को पूरा करने के लिए एक रोटी का पेट खाली रख कर भी काम चलाया जा सकता है। निर्धन से निर्धन व्यक्ति इतना कर सकता है। उनकी बात अलग है जो अध्यात्मवाद को बातों के बताशे के रूप में ही देखते हैं और उसके लिए परमार्थ जैसा साहस आवश्यक नहीं समझते। उनके लिए इतना-सा त्याग भी बहुत भारी है, और सम्भवतः उतना भारी है जिसके लिए वे बेचारे बहाने बना कर अपनी असमर्थता सिद्ध करते रहेंगे।

अखण्ड-ज्योति के भावनाशील प्रत्येक परिजन को विचार क्राँति की मानव के भावनात्मक नव-निर्माण की महती आवश्यकता की गरिमा समझनी ही होगी और यह निश्चय करना ही होगा कि जो कर्त्तव्य उसके सामने हैं उसे बिना हिला-हुज्जत के पूरा करता रहे।


Quotation

वीरता के साथ विवेक भी

वह वीरता कैसी जिसमें शक्ति के साथ आत्म संयम न हो। वीरता उन्माद नहीं, वह आँधी नहीं है, जो उचित-अनुचित का विचार न करती हो। तुम्हें दूसरे क्षेत्रों में भी ध्यान दौड़ाना चाहिये, केवल शक्ति-बल पर टिकी हुई वीरता बिना पैर की होती है, उसके साथ विवेक का समभाव भी बना रहना चाहिये।

-जयशंकर प्रसाद


आत्म-कल्याण की त्रिविध श्रेय-साधना

स्वार्थ और परमार्थ जिसमें दोनों साधन सधते हों- अपना तथा सबका कल्याण जिसमें सधता हो, वही सच्चा अध्यात्म है। भजन का अर्थ केवल जप या ध्यान ही नहीं, वरन् सेवा भी है। भजन शब्द संस्कृत की ‘भज्’ धातु से बना है, जिसका अर्थ होता है सेवा। जिससे अपनी और दूसरों की सेवा बन पड़े, उसे सच्चा भजन कहना चाहिए। जिस भजन को सर्वांगपूर्ण कहा जा सकता है, जिससे वस्तुतः ईश्वर प्रसन्न हो सकता है, उसका स्वरूप सेवा से मिश्रित ही होना चाहिए।

गत अंक में गायत्री की उच्चस्तरीय साधना के अंतर्गत शुष्क मनःक्षेत्र को प्रेम-भावनाओं से ओत-प्रोत करने का साधन-विधान समझाया गया। यह बहुत ही महत्वपूर्ण एवं फलदायक है। अन्तःकरण में प्रेम तत्व का प्रादुर्भाव एवं विकास होना सच्ची आत्मिक प्रगति का चिन्ह है। प्रेम जिसके अन्तःकरण में पैदा हो, समझना चाहिए कि वहाँ परमेश्वर उत्पन्न हो गया। वह दिव्य प्रेम, उपकार, सेवा, सहायता, करुणा, दया आदि सत्प्रवृत्तियों के रूप में ही प्रकट होता है।

नामोच्चार और इष्टदेव का ध्यान उपासना-क्षेत्र की वे आरंभिक प्रक्रियायें हैं जिनसे मन की एकाग्रता में सहायता मिलती है। इस एकाग्रता का उपयोग संकीर्ण स्वार्थपरता से-तृष्णा एवं वासना से चित्त को विरत कर परमार्थ प्रयोजनों में संलग्न करने के निमित्त होना चाहिए। अन्तःकरण में सत्प्रवृत्तियों को जमाने, उगाने और बढ़ाने के लिए सेवा-साधना का अभ्यास करना पड़ता है। प्राचीन काल में प्रत्येक ब्रह्म-परायण व्यक्ति के जीवन में सेवा-धर्म के लिए प्रमुख स्थान रहता था। कोई ब्राह्मण, कोई साधु, कोई भक्त ऐसा न था जो ईश्वर की प्रतिकृति इस विश्व वसुधा को सुखी-समुन्नत बनाने के लिए आवश्यक योगदान न करता रहा हो। आज वही राजमार्ग हमारे लिये भी है। जीवन लक्ष्य की पूर्ति के लिए हमें सेवा-धर्म को अपनी भावना तथा प्रक्रिया में प्रमुख स्थान देना ही होगा अन्यथा न तो हम आत्मा को प्राप्त कर सकेंगे और न परमात्मा को।

नव-निर्माण के लिए जन-मानस के परिष्कार का जो पुण्य-परमार्थ अपनाने के लिए अखण्ड-ज्योति परिजनों को प्रेरणा दी गई है, उसे सामाजिक कार्यमात्र नहीं मान लेना चाहिए। वस्तुतः वह आत्मिक प्रगति की ज्ञानयोग, भक्तियोग, कर्मयोग की संगम साधना है। सद्विचारों का निरन्तर चिन्तन करना-सत्प्रवृत्तियों में भावना-स्तर को निमग्न करना वस्तुतः अन्तःकरण में परमेश्वर की प्रतिष्ठापना करने का ही एक महत्त्वपूर्ण प्रयोग है।

जिस प्रकार जिह्वा पर भगवान का नाम और मस्तिष्क में भगवान का रूप प्रतिष्ठापित करके जप और ध्यान की प्रक्रिया चलाई जाती है, उसी प्रकार अन्तःकरण में सद्भावों, सद्गुणों, सत्कर्मों, सत् स्वभावों की स्थापना करना भी उपासना ही है। भगवान नाम और रूप तक ही सीमित नहीं है। यह दो प्रक्रियायें तो आरंभिक हैं- भगवान का वास्तविक स्वरूप तो भावमय है। जितनी देर अन्तरात्मा में भावनायें विचरण करती रहें, समझना चाहिए उतनी देर, परमेश्वर ही विराजमान रहे। लोकमानस में सत्प्रवृत्तियों की पूर्ति होती है। जितनी देर इन क्रियाकलापों में संलग्न रहा जायेगा, उतनी देर अपने अन्तःकरण चतुष्टय में-मन-बुद्धि-चित्त व अहंकार में उच्च आदर्शों का रूप धारण कर परमेश्वर ही प्रतिष्ठापित रहेगा। युग-परिवर्तन के लिए आरंभ किये गये ज्ञान-यज्ञ में जन जागरण में जितनी देर हम लगे रहते हैं, वस्तुतः उतने समय भगवान के समीप रहने का उपासना का ही लाभ लेते हैं। यह आध्यात्मिक प्रयोग अपना भी कल्याण करता है और दूसरों का भी, इसलिए उसे सच्चा अध्यात्म, सच्चा भजन कहा जा सकता है। इस साधना के समय के अनुरूप श्रेष्ठतम स्तर की साधना को तपश्चर्या कहा जाये तो इसमें कुछ भी अत्युक्ति न होगी। प्रिय परिजनों को इस साधना में आध्यात्मिक प्रयोजन पूर्ण करने और जीवन लक्ष्य प्राप्त करने के उद्देश्य से संलग्न होना चाहिए। साधना सरल अवश्य है पर उसका प्रतिफल किसी भी कठोर तपश्चर्या से कम नहीं है।

नव-निर्माण योजना में जहाँ अपने समीपवर्ती लोगों को उत्कृष्टता की आदर्शवादिता की दिशा में अग्रसर होने की प्रेरणा देने के लिए कहा गया है, वहाँ यह भी बताया गया है कि आत्म-निर्माण के लिए उतनी ही तत्परता के साथ प्रयत्न किया जाये। अपना स्तर ऊंचा उठाने के लिए भी पूरा-पूरा प्रयत्न करना चाहिए। नव-निर्माण की साधना में यह भी एक महत्त्वपूर्ण अंग है।

प्रातःकाल नींद खुलते ही, अपने साथ वार्तालाप शुरू कर देना चाहिए। बिस्तर छोड़ने से पूर्व अपने आप के संबंध में कुछ आवश्यक आत्म-चिंतन, लकीर पीटने के रूप में नहीं वरन् निर्माणात्मक उद्देश्य की पूर्ति के लिए करना चाहिए।

हर एक दिन को एक नया जीवन और हर रात को एक पटाक्षेप-मृत्यु मानकर ऐसी योजना प्रातःकाल ही बना लेनी चाहिए कि हमारा आज का दिन हर दृष्टि से आदर्श स्तर का बीते।

पिछले दिनों किन दोष-दुर्गुणों का बाहुल्य अपने में रहा है और किन सत्प्रवृत्तियों की न्यूनता रही है? इसे बारीकी से आत्म-निरीक्षण करते हुए ढूंढ़ना चाहिए और योजना यह बनानी चाहिए कि आज के दिन उन दोषों को मिटाया या घटाया जाये। इसी प्रकार जो सद्गुण न्यून मात्रा में थे, उन्हें आज अधिक मात्रा में बढ़ाया, कार्यान्वित किया जाये।

आज के दिन की उठने से लेकर सोने तक की ऐसी दिनचर्या बना लेनी चाहिए जिससे समय के तनिक भी अपव्यय की गुंजाइश न रहे। हर क्षण सार्थक, श्रेष्ठ एवं उपयोगी कार्यों में लगे। इस दिनचर्या को दिन भर कड़ाई के साथ पालन करने का संकल्प करना चाहिए। कोई अनिवार्य व्यवधान आ जाये तो बात दूसरी है अन्यथा आलस्य, ढील-पोल एवं लापरवाही के कारण उस दिनचर्या में कोई व्यक्ति क्रम नहीं होना चाहिए।

समय के सदुपयोग की तरह धन के सदुपयोग की योजना प्रातःकाल बना लेनी चाहिए। अपना एक भी पैसा हानिकर एवं अनावश्यक कार्यों में खर्च न हो, जो व्यय किया जाये योजनाबद्ध बजट के अनुरूप हो। एक-एक पैसा केवल उन कार्यों में खर्च होना चाहिए, जो उपयुक्त आवश्यकताओं की पूर्ति में सहायक हो। धन उस मार्ग में कमाया जाना चाहिए जिसमें अनीति जुड़ी हुई न हो। अवाँछनीय कमाई से बनाई हुई खुशहाली की अपेक्षा ईमानदारी के आधार पर गरीबों जैसा जीवन बनाये रहना कहीं अच्छा है। यह नीति अपने रोम-रोम में बसी हुई रहनी चाहिए।

समय का सदुपयोग और धन का उपयोग, यह दो नियंत्रण जिसने कर लिए, समझना चाहिए कि उसने आत्मत-कल्याण की आधी मंजिल पार कर ली। 1. परिश्रमशीलता, मधुर एवं संयत भाषण, सादगी, स्वच्छता, उदारता, सज्जनता जैसे गुण यद्यपि कम महत्व के दिखाई पड़ते हैं पर वस्तुतः उनका बहुत बड़ा मूल्य है। भौतिक सफलता एवं आत्मिक प्रगति इन्हीं सद्गुणों के ऊपर अवलम्बित रहा करती है।

विचारों को विचारों से काटने की कला जिसने सीख ली, समझना चाहिये कि मानसिक अस्वस्थता पर उसने विजय प्राप्त कर ली। ईर्ष्या, द्वेष, शंका, सन्देह, भय, आवेश, क्रोध, कामुकता, लालच आदि दुष्प्रवृत्तियाँ समय-समय पर विभिन्न परिस्थितियों की घटनाओं के माध्यम से मन में उठती रहती हैं। इनके विरोध में उस विचारधारा को मन में संजोये रहना चाहिए, जो इन कुविचारों की काट कर सके। विचारों से विचार काटने की कला जिसने सीखली, समझना चाहिए कि उसने मानसिक उलझनों को सुलझाने का रहस्य सीख लिया। हर रोज प्रातःकाल आत्म-चिन्तन के समय यह देखना चाहिए कि अपने मनःक्षेत्र में आजकल किन अनुपयुक्त विचारों का घेरा है। उन विचारों को काटने के लिए विवेकशीलता एवं दूरदर्शिता के आधार पर ऐसा प्रतिरोधी विचार-प्रवाह विनिर्मित करना चाहिए जो उन कुविचारों को काटकर निरस्त कर सके।

हर रात को सोते समय फिर प्रातःकाल की तरह आत्म-चिन्तन करना चाहिए। देखना चाहिए कि सबेरे जो योजना बनाई गई थी वह कार्यान्वित हुई या नहीं? त्रुटि हुई तो कितनी और क्यों? उसमें अपना कितना हाथ रहा और परिस्थितियों का कितना? जो कुछ अनुचित बन पड़ा हो, उसके लिए सताये हुए व्यक्ति की तरह आत्मा से तथा परमात्मा से हार्दिक क्षमा याचना करनी चाहिए और अगले दिन अधिक सतर्कतापूर्वक उस तरह के दोषों को न होने देने का संकल्प दुहराना चाहिए। तदुपरान्त, भगवान का स्मरण करते हुए शान्तिपूर्वक निद्रा देवी की गोद में चले जाना चाहिए।

इस प्रकार आत्म-निरीक्षण, आत्म-शोधन, आत्म-सुधार, आत्म-निर्माण एवं आत्म-विकास का आयोजन उपरोक्त प्रातः सायं की आत्म-चिन्तन साधना के आधार पर करते रहना चाहिए। शरीर के लिये कितनी शक्ति खर्च की? और आत्मा के लिये कितना प्रयत्न किया? यह प्रश्न बार-बार अपने से पूछना चाहिये और ऐसी गति-विधि निर्धारित करनी चाहिए जिससे अन्तरात्मा को सन्तोषजनक उत्तर एवं आधार मिल सके।

अखण्ड-ज्योति परिवार के प्रत्येक सदस्य को अपनी उपासना के साथ इस आत्म-निरीक्षण की साधना को भी जोड़ लेना चाहिये। इस आधार पर जीवन को उत्कृष्ट बनाने के लिये आँतरिक प्रकाश एवं मार्ग-दर्शन मिलता रह सकता है।

उपासना, आत्म-निर्माण एवं परमार्थ के लिये ज्ञान-यज्ञ-यह तीन पुण्य प्रक्रियायें यदि हमारे दैनिक जीवन में समुचित रूप से प्रतिष्ठापित हो जायें तो सामान्य घर-गृहस्थ की जिन्दगी जीते हुए भी हम कर्मयोगी एवं सच्चे आध्यात्मवादी की परम शाँतिपूर्ण स्वर्गीय मनःस्थिति उपलब्ध कर सकते हैं। मानव-जीवन को सार्थक एवं धन्य बनाने के लिये इसे त्रिविधि जीवन साधना की त्रिवेणी में हमें स्नान करते रहना चाहिए।


विश्व का भावी धर्म-अध्यात्मवाद

अध्यात्मवाद का केन्द्रबिन्दु इस तथ्य की धुरी पर घूमता है कि-”मनुष्य के भीतर असामान्य शक्तियों का भाँडागार छिपा पड़ा है। उन शक्तियों को विकसित करने के लिये गुण, कर्म स्वभाव को, अन्तःकरण को उत्कृष्ट स्तर पर विकसित किया जाए। यह विकास जितना ही होगा उतना ही भौतिक एवं आँतरिक जीवन में सुख-शाँति की, श्री समृद्धि की स्वर्गीय परिस्थितियाँ उत्पन्न होती चलेंगी।”

जप, तप, पूजा, ध्यान आदि की उपासनात्मक, क्रियात्मक पद्धति अपने आप में कोई लक्ष्य नहीं है। वह आत्मिक विकास की एक प्रक्रिया मात्र है। लोगों का यह समझना निताँत भ्रमपूर्ण है कि इन क्रिया-कलापों को अमुक समय तक या अमुक मात्रा में पूरा कर लेंगे तो अमुक देवता प्रसन्न होकर अमुक वरदान देगा। वस्तुस्थिति यह है कि अपना आत्मा ही सर्वोपरि देवता है और उसे जगाने, प्रसन्न करने के लिये व्यक्ति का समग्र निर्माण, गुण-कर्म स्वभाव का विकास अनिवार्य रूप से आवश्यक है। आध्यात्मिकता का प्रयोजन इसी आवश्यकता की पूर्ति करना है। प्राचीन काल में यही असली आध्यात्म सर्व-साधारण के व्यवहार में था, उसका सत्परिणाम भी सबके सामने था। व्यक्ति का देवोपम विकास हो सके तो स्वर्ग उसके पैरों तले बिखरा पड़ा ही रहेगा। भारत के प्राचीन इतिहास का पन्ना-पन्ना इसी तथ्य को अक्षरशः सत्य सिद्ध कर रहा है।

आज व्यक्तित्व के निर्माण वाली बात को आध्यात्मिक क्रिया-कलाप का अंग नहीं माना जा रहा है। बताया जा रहा है कि अमुक नदी, तीर्थ, तालाब के स्नान करने, अमुक तीर्थ मन्दिरों का दर्शन करने, अमुक कर्मकाँड को पूरा करने, अमुक पुस्तक का पाठ करने से आध्यात्मिक लक्ष्य की पूर्ति हो जायेगी। बेशक इन उपकरणों की आध्यात्मिक विकास के लिये उपयोगिता है पर यदि व्यक्तित्व के विकास वाले तथ्य को भुला दिया जाए तो फिर इस क्रिया-कलाप का कुछ भी महत्व नहीं रह जाता। भगवान जिस भजन से प्रसन्न होते हैं, उसमें जप-तप के साथ-साथ सर्वांगीण आत्म-विकास की प्रक्रिया अविच्छिन्न रूप से जुड़ी हुई है।

प्राचीन काल में हर व्यक्ति अपनी आध्यात्मिक साधना आजीवन चलाता रहता था। अपने दैनिक जीवन की हर विचारणा में, हर क्रिया-पद्धति में अध्यात्म आदर्शों की गुण, कर्म, स्वभाव की उत्कृष्टता का समावेश करता था। अतएव वह चाहे घर में रहे, चाहे वन में समान रूप से बाह्य और अन्तःजीवन के हर क्षेत्र में विकास होता चला जाता था और जीवन-लक्ष्य प्राप्त कर लेता था। आज के कल्पित अध्यात्मवाद में चरित्र निर्माण की उपेक्षा है। कहा जाता है कि दुष्प्रवृत्तियाँ अपनाये रहने पर भी उनके दुष्परिणाम से पूजा-पाठ का थोड़ा-सा उपचार ही बचा देगा। अमुक छोटी-सी प्रक्रिया कर दी जाए तो समस्त पापों का नाश हो जाता है। भजन करने वाले से प्रसन्न होकर भगवान उसके सब पापों को क्षमा करते रहते हैं। इस भ्राँत धारणा के कारण लोग सस्ते कर्म-कांडों को सब कुछ समझ बैठे और अध्यात्म के मूल तत्व अध्यात्म-विकास की उपेक्षा करने लगे। नकल को अपनाया असल को छोड़ दिया। वस्त्र को ही व्यक्ति समझ लिया। ऐसी दशा में वह लाभ कहाँ से मिलता जो असली वस्तु से मिलना चाहिये। मिट्टी की बनी सस्ती गौ दूध कहाँ से देगी? निष्प्राण अध्यात्मकों अपना कर कोई उन लाभों को कैसे प्राप्त कर सकता है जो प्राणवान अवलम्बन के नाम पर प्रचलित हैं? आज ऐसी विडम्बना अध्यात्मवाद के नाम पर प्रचलित है। फलस्वरूप उस मार्ग पर चलने वालों में योग व्यक्तियों की तुलना में कोई विशेषता दिखाई नहीं पड़ती। जबकि होना यह चाहिए था कि सच्चा अध्यात्मवादी सूर्य और चन्द्र की तरह चमकता। अपने प्रकाश से अपना ही नहीं अन्य अनेकों को भी प्रकाशवान करता।

अखण्ड-ज्योति असली अध्यात्म की प्रबल प्राण-प्रतिष्ठा करने के लिए अवतीर्ण हुई है। उसने अपने जीवनकाल से ही वस्तुस्थिति को सर्व-साधारण के सामने उपस्थित किया है। क्योंकि संसार का भावी निर्माण अध्यात्मवाद के नाम पर होने वाला है। वही समस्त संसार का, समस्त मानव जाति का एकमात्र धर्म होगा। उसी के आधार पर विश्व संस्कृति आचार-संहिता, विचारणा क्रिया पद्धति, सामाजिकता एवं राजनीति का निर्धारण होने वाला है। अतएव यह आवश्यक ही था कि मानव जाति के भावी भविष्य का निर्माण निर्धारण करने वाले इस तत्व ज्ञान का असली स्वरूप सर्वसाधारण के सामने रखा जाए और उसका व्यावहारिक स्वरूप समझाया जाए। पिछले 28 वर्षों में हम लोग अपने स्वल्प साधनों के अनुरूप यही करते रहे हैं।

युग-निर्माण की आधार भूमिका मान्यताओं एवं विचारणाओं का परिवर्तन है। दुर्भावनाओं की दुष्प्रवृत्तियों को अपना कर हमने नरक का-कलियुग का-वरण किया है। इस ढर्रे को बदल कर जब सद्भावनाओं का-सत्प्रवृत्तियों का-मार्ग अपनाया जायेगा तो कोई कारण नहीं कि स्वर्ग का-सतयुग का वरदान उपलब्ध न किया जा सके। मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता स्वयं है। भगवान ने वह सुविधा और स्वतंत्रता उसे दी है जिसके अनुसार वह इच्छानुसार मार्ग अवलम्बन करके कडुए-मीठे फल चखने का अनुभव ले सके। कुमार्ग पर चल कर कडुए फल चखने, ठोकरें खाने का अनुभव लिया जा चुका अब पीछे लौटकर सत्पथ पर चलने के अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं। सर्वनाश के गर्त में गिरने की अपेक्षा पीछे लौटना ही श्रेयस्कर समझा जायेगा। अनीति का और अधिक कडुए परिणाम देखने का साहस अब लोगों को रह भी नहीं गया है, इसलिए भूल तो सुधारनी ही पड़ेगी। पीछे तो हटना ही होगा। राह तो बदलनी ही होगी। वर्तमान सन्ध्याकाल इसी परिवर्तन की बेला का है। इस हेर-फेर की घड़ी में, प्रसव बेला में, हमें चतुर दाई की भूमिका अदा करनी है। सो-ही की भी जा रही है। युग-निर्माण आन्दोलन का यही प्रयोजन है। संसृति नये युग का प्रजनन कर रही है। इस कष्टकारक घड़ी में उनका बड़ा उत्तरदायित्व है जो संघर्ष बेला को सुव्यवस्थित बना सकने में समर्थ हैं। हमें इसी भूमिका का सम्पादन करना पड़ रहा है।

जिस विचार-धारा और क्रिया-पद्धति से विश्व का भावी निर्माण होने वाला है, उसका मानव जाति के सामने समान रूप से प्रस्तुत करना आवश्यक ही है। अध्यात्मवाद के असली स्वरूप को लोग लगभग भूल चुके हैं। धर्म और अध्यात्म के नाम पर उपहासास्पद विडम्बना मात्र ही खड़ी है। तथ्यों का लोप हो चुका है। हमें तथ्यपूर्ण आध्यात्म का अनुभव एवं रसास्वादन लोगों को कराना है ताकि हर समझदार व्यक्ति, हर कसौटी पर कस कर यह अनुभव कर सके कि व्यक्ति एवं समाज की सर्वांगीण प्रगति सर्वांगीण सुख-शाँति इसी मार्ग पर चल कर उपलब्ध की जा सकती है। इसी प्रयोग, परीक्षण के लिए आज युगनिर्माण योजना ने विवेकशील मानव का आह्वान किया है।


आप क्या करें-हम क्या करें?

अनावश्यक भीड़-भाड़ की छटनी कर देने के बाद अब अखण्ड-ज्योति परिवार में इस वर्ष थोड़े-से व्यक्ति ही बचे हैं। उन्हें काम-के भावनाशील एवं प्रबुद्ध कहा जाये तो कुछ अत्युक्ति न होगी। गत वर्ष छटनी इसी प्रयोजन के लिए भी की गई थी। अब अपने छोटे से परिवार से हम बड़े सन्तुष्ट और प्रसन्न हैं, क्योंकि मिल-जुलकर कुछ तथ्यपूर्ण काम कर सकना इन लोगों के सहयोग से संभव हो सकेगा।

अध्यात्म तत्त्व-ज्ञान को पढ़, सुन या समझ लेने पर से कुछ काम नहीं चलता। उसका लाभ तभी मिलता है, उसे आवश्यक नित्यकर्मों में तथा दैनिक जीवन की विचार पद्धति में सम्मिलित करने के लिए आवश्यक उत्साह एवं साहस उत्पन्न हो सके। अपने छोटे-से परिवार को इसी प्रयोग में निरत करना है। इस वर्ष जो थोड़े-से ही काम अपने प्रबुद्ध परिजनों को सौंपे जा रहें है, उन्हीं की चर्चा इस अंक में की जा रही है।

गत फरवरी अंक में ‘उच्चस्तरीय गायत्री साधना’ स्तम्भ के अंतर्गत जो भावनात्मक उपासना पद्धति बताई गई है, वह जितनी सरल है, उतनी ही प्रेरक भी है। प्रत्येक परिजन से आशा की गई है कि उसे आरंभ कर दिया जाये। आत्म-विकास में वह निश्चित रूप से बड़ी सहायक होगी।

इसी अंक में पीछे ‘आत्म-कल्याण की त्रिविधि साधना’ लेख के अंतर्गत प्रातः उठने और रात को सोते समय की आत्म-निरीक्षण साधना का उल्लेख है। वह हमारी जीवन साधना में अनिवार्य रूप से सम्मिलित होनी चाहिए। अध्यात्म को व्यवहार में परिणत करने की प्रेरणा उसी से मिलेगी। आलस्य और प्रमाद को उसी आधार पर जीता जा सकेगा। भूलों के सुधार के लिए वही अमोघ उपचार है। उसे हर परिजन कार्य-रूप में परिणत कर दे।

तीसरा कार्यक्रम विचार-निर्माण का है। लगभग सभी परिजनों के यहाँ दोनों पत्रिकायें जाती हैं। कुछ ही ढीले-पोले लोग बचे हैं, जिन्होंने युग-निर्माण पत्रिका अभी नहीं मंगाई है-ऐसे लोगों को उपेक्षा-अन्यमनस्कता छोड़ कर उसे भी मंगाना आरंभ कर देना चाहिए। इन दोनों पत्रिकाओं को स्वयं पढ़ें, अपने हर घर के शिक्षित के पढ़ाने और अशिक्षित को सुनाने का प्रबंध करें।

चौथा कार्य घर में ज्ञान-मन्दिर की, ब्रह्म विद्यालय की स्थापना का है निर्धन-से-निर्धन, व्यस्त-से-व्यस्त को विश्व के नव-निर्माण का महान प्रयोजन पूरा करने के लिए एक घंटा समय और 10 नये पैसे लगाते रहने की पुण्य प्रक्रिया अपनानी चाहिए। हमारे ‘झोला पुस्तकालय’ बड़े उत्साह से चले। सस्ते ट्रैक्ट 70 छप चुके हैं। आगामी जून तक 100 और तैयार हो जायेंगे। उन्हें 10 नये पैसा फंड से मंगाया जाता रहे और एक झोला में साथ रखा जाये। अपने परिचय एवं प्रभाव क्षेत्र में इन्हें देने और वापिस लेने का क्रम बराबर चलता रहे। यह ‘ज्ञान-यज्ञ’ मानव जाति के भावी निर्माण का अत्यंत महत्त्वपूर्ण आधार है। संकोच, झिझक, बहानेबाजी, आलस्य आदि किसी भी व्यवधान को इस मार्ग में नहीं आने देना चाहिए और समझना चाहिए कि यह छोटा दीखने वाला कार्य वस्तुतः अत्यन्त उच्चकोटि का परमार्थ है। इसी आधार पर अनेक आत्माओं में उत्कृष्टता का बीज बोया जाता है और उससे विशालकाय वट-वृक्षों, का महान व्यक्तित्वों का उत्पादन किया जाता है।

यह चारों ही कार्य एक-से-एक बढ़कर, एक-से-एक महत्त्वपूर्ण हैं। हम आशा करेंगे कि अपने छोटे परिवार में यह चारों की प्रक्रियायें कार्यान्वित होंगी। इनकी उपेक्षा न की जायेगी।

साहित्य-सृजन के अतिरिक्त एक दूसरा महत्त्वपूर्ण कार्य इस वर्ष से हम कर रहे हैं और व्यक्तित्व के समग्र निर्माण की जीवन कला से सर्वांगीण ज्ञान की शिक्षा परिवार के प्रत्येक व्यक्ति को देना आरंभ कर रहे हैं। हमारे कार्यकाल की अवधि मात्र 5 वर्ष शेष है। अपने वर्तमान परिजनों में से प्रत्येक को अपने समीप अधिक-से-अधिक रखने का हमारा विचार है। कारण यह है कि जिन तथ्यों की शिक्षा हम देते रहे हैं वह केवल साहित्य के माध्यम से ही पूरी नहीं हो सकती जिसके लिए यह भी आवश्यक है कि इस विद्या का व्यावहारिक पहलू भी जाना-समझा जाये और उन सिद्धान्तों को कार्यरूप में परिणत करते हुए जो कठिनाई होती है उन्हें हल करने का उपाय जाना जाये। इसके लिए सान्निध्य आवश्यक है।

प्राचीन काल में शिक्षा का आधार यही था। छात्र गुरुकुलों में तत्त्वदर्शी आचार्यों के सान्निध्य में रहकर शिक्षा प्राप्त करते थे। वहाँ उन्हें पुस्तकों का ही ज्ञान नहीं मिलता था वरन् साथ-साथ स्वभाव में सत्यप्रवृत्तियों के समावेश का व्यावहारिक प्रयोग भी हो जाता था। वातावरण का भारी प्रभाव पड़ता है। घरों के दूषित वातावरण में बच्चे अनेक दुर्गुण सीखते हैं। अतएव कच्ची उम्र सीखने की उम्र में उन्हें गुरुकुलों के वातावरण में रहने की व्यवस्था की जाती थी। पढ़कर जब वे घर आते थे तो पुस्तकीय ज्ञान ही नहीं वरन् परिपुष्ट प्रतिभाशाली व्यक्तित्व के निर्माण का लाभ भी उन्हें मिल जाता था। इस दुहरे ज्ञान को लेकर जब वे घर आते थे तो अपनी महान आन्तरिक विशेषताओं के कारण जीवन के हर क्षेत्र में आश्चर्यजनक सफलतायें प्राप्त करते थे। पारिवारिक जीवन में स्वर्ग का सृजन करते थे और भौतिक जीवन की समृद्धियों और विभूतियों से सुसज्जित बनते चले जाते थे। जब तक वह गुरुकुल पद्धति रही तब तक इस देश में प्रत्येक घर-नर रत्नों का भाँडागार बना रहा। अब वह आधार ही टूट गया तो व्यक्तियों की ढलाई का प्रयोजन कैसे पूरा हो?

यों कहने को आज भी कितने ही गुरुकुल जहाँ-तहाँ चल रहे हैं पर उनमें से अधिकाँश छात्रावास साहित्य-अध्ययन मात्र की सी सुविधा देते हैं। उनमें से बहुत कम ऐसे हैं जिनमें ऐसे अध्यापक हों जिनके संपर्क से छात्रों के व्यक्तित्व को चन्दन के समीप उगे हुए पौधों के सुगंधित हो उठने जैसे लाभ मिल सकें। गुजारे के लिए पढ़ाने की नौकरी करने वाले शिक्षक केवल पुस्तकें पढ़ा सकते हैं, जिनके पास स्वयं व्यक्तित्व नहीं वे छात्रों को व्यक्तित्व कहाँ से देंगे? इस एक अभाव के कारण गुरुकुलों की इमारतें तथा विधि-व्यवस्था लम्बी-चौड़ी होने पर भी वह परिणाम देखने को नहीं मिल रहा है कि जो भी छात्र वहाँ से निकले अपने प्रकाश से अपना क्षेत्र प्रकाशवान करता चला जाये। इस आवश्यकता की पूर्ति जहाँ से हो सके, ऐसे गुरुकुल कठिनाई से ही कहीं मिल सकेंगे?

कोई बड़ा गुरुकुल चलाने की स्थिति में अभी हम नहीं हैं, पर इतना अवश्य चाहते हैं कि वर्तमान अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्यों में से हर वर्ग के लोगों को अपने जीवन के अनुभवों एवं निष्कर्षों की पूँजी के आधार पर जिनसे हमने स्वयं प्रगति की है-उन सद्गुणों की सम्पत्ति का वितरण इन थोड़े से शेष दिनों में करते जाने की उत्कंठा प्रबल हो रही है। इसलिए प्रशिक्षण की ‘एक योजना इन दिनों बनाई है और उसे आगामी जून से कार्यान्वित करने जा रहे हैं।

इस प्रशिक्षण के अंतर्गत चार परिस्थितियों के व्यक्तियों के स्तर का ध्यान रखते हुए चार प्रकार के प्रशिक्षण होंगे। 1. अत्यधिक व्यस्त-व्यवसाय या नौकरी आदि में लगे हुए लोगों के लिए वर्ष में पन्द्रह दिन का शिक्षण शिविर। यह हर वर्ष जेठ सुदी प्रतिपदा से पूर्णिमा तक हुआ करेगा। 2. युवकों के लिए एक वर्ष का प्रशिक्षण जिसमें व्यावहारिक जीवन के हर पहलू की शिक्षा दी जायेगी। इस अवधि में कुछ ऐसे शिल्प भी सिखा दिये जायेंगे जिनके आधार पर यदि घर में निज का व्यवसाय न हो तो सुविधापूर्वक आजीविका भी उपार्जित की जाती रहे। 3. पारिवारिक उत्तरदायित्वों से निवृत्त लोगों के लिए चार वर्ष की शिक्षा जिसमें 1. गीता, रामायण, वेद उपनिषद् एवं धर्मशास्त्र का महत्वपूर्ण अध्ययन, 2. चौबीस पक्ष का एक गायत्री पुरश्चरण, 3. लोक-सेवा की भावनात्मक नव-निर्माण की योग्यता, 4. साधना तथा तपश्चर्या का यथा योग अभ्यास। 4. जूनियर हाईस्कूल (कक्षा 8) की योग्यता के 15 वर्ष से अधिक आयु के छात्रों के लिए 4 वर्षीय कालेज स्तर की शिक्षा। यद्यपि सरकारी उपाधि प्राप्त न की जा सकेगी, पर इस प्रशिक्षण से निकले हुए छात्रों में बी.ए. के छात्रों की तुलना में हर दृष्टि से कहीं अधिक ज्ञान होगा। वे नौकरी करना पसंद ही न करेंगे क्योंकि तब उनके पास इतना ज्ञान, अनुभव एवं मनोबल होगा कि वे दूसरों को नौकर रखने की बात ही सोच सकेंगे।

इन चार स्तर की शिक्षाओं का स्वरूप आगे चार लेखों में प्रस्तुत किया जा रहा है, और परिजनों से आशा की जा रही है कि वे स्वयं को एवं अपने परिवार के सदस्यों को इस शिक्षा व्यवस्था से लाभान्वित करने की चेष्टा करें। इस प्रशिक्षण का आरंभ मथुरा से अभी छोटे रूप में हो रहा है पर भविष्य में यह प्रक्रिया देश-व्यापी व विश्वव्यापी बनेगी और इस आधार पर व्यक्ति एवं समाज के नये निर्माण का महान प्रयोजन सफलता पूर्वक पूर्ण किया जा सकेगा।


जेष्ठ का पन्द्रह दिवसीय शिक्षण-शिविर

जेष्ठ सुदी प्रतिपदा से लेकर पूर्णिमा तक इस वर्ष शुक्ल पक्ष 14 दिन का पड़ेगा। इस पखवाड़े में गायत्री तपोभूमि में शिक्षण-शिविर चलेगा। अंग्रेजी तारीखों के हिसाब से 9 जून शुक्रवार से आरंभ होकर यह 23 जून शुक्रवार को समाप्त होगा।

वर्ष में एक बार अपने स्वजन सहचरों से मिलने, उनके साथ हंसने-खेलने, विचार-विनियम करने का अवसर ग्रीष्मऋतु के इस शिविर के समय निकल आता है। यों स्वल्प समय के लिए बीच-बीच में भी मिलना-जुलना होता रहता है, पर विस्तृत विचार-विनिमय करने अपनी बात कहने, दूसरों की सुनने का एक-दूसरे को अधिक निकटता और घनिष्ठता के साथ समझने का अवसर 15 दिन की अवधि में ही जरा अच्छी तरह मिलता है। गर्मी के दिन सबके लिये थोड़ी सुविधा के रहते हैं। स्कूलों की छुट्टियाँ रहने से अध्यापक एवं विद्यार्थी वर्ग आसानी से आ सकता है। कचहरियों की भी उन दिनों छुट्टी रहती है। किसान भी खेत-खलिहानों से निवृत्त हो जाता है।

जिस जीवन-कला का प्रशिक्षण इन ग्रीष्म शिविरों में किया जाता है, उसे सार्थक तभी बनाया जा सकता है जब पति-पत्नी दोनों ही मिल कर उस प्रकार की व्यवस्था बनायें। परिवार निर्माण के लिये तो पत्नी का सहयोग और भी अधिक आवश्यक है इसलिए शिक्षार्थियों को पत्नियों सहित आने को कहा जाता है। स्त्रियों के लिए उन दिनों घर पर छोड़ना कठिन होता है जब उनके बच्चे पढ़ने जाते हैं और समय पर तैयार करना पड़ता है। गर्मी के दिनों में स्कूलों की छुट्टियाँ रहने से बच्चों के साथ महिलायें भी सुविधापूर्वक आ सकती हैं। इसलिये ग्रीष्म ऋतु में ही कई वर्षों से एक शिविर का हर साल आयोजन किया जाता है। गर्मी जरूर इन दिनों अधिक पड़ती है फिर भी सुविधा का समय वही है।

अलग-अलग समय पर हमसे मिलने आने की अपेक्षा एक निर्धारित समय पर बहुतों का इकट्ठे हो जाना, सभी के लिए सुविधाजनक रहता है। हमें साहित्य सृजन का महत्वपूर्ण कार्य इन पाँच वर्षों में ही पूरा करना है। पत्र-व्यवहार से लेकर शाखा-सम्मेलनों में बाहार जाने तक प्रायः व्यस्तता ही बनी रहती है। जो मिलने आते हैं उनसे एक-एक करके अलग-अलग लम्बा वार्तालाप एवं मार्गदर्शन करने की भी असुविधा रहती है। श्िवर के पूरे 15 दिन हम और कुछ नहीं करते, आने वालों से परामर्श करने में, उनका मार्गदर्शन करने में ही लगे रहते हैं। जो बातें एक दिन में पूरी नहीं हो सकीं वह धीरे-धीरे पन्द्रह दिन में तो पूरी हो ही जाती हैं। इसलिए हमें विस्तारपूर्वक अपने विचार प्रकट करने और आगन्तुकों से विस्तृत विनिमय करने में वही समय सुविधा का रहता है।

आगन्तुकों को भी इस सुविधा से बहुत लाभ मिलता है। अन्य अवसरों पर उन्हें थोड़ी देर अपनी काम की बात कर लेने पर छुट्टी मिल जाती है। पर इस समय वे पूरे पन्द्रह दिन हमारे साथ हंसते-बोलते, पूछते-बताते रहते हैं। जीवन जीने की कला के हर पहलू पर इन दिनों हमारे क्रमबद्ध एवं शृंखला व्यवस्था में बंधे हुए भाषण होते हैं। जिनमें हर व्यक्ति को अपने सामने प्रस्तुत समस्याओं में से प्रायः प्रत्येक के हल मिल जाते हैं। अन्य व्यक्ति अपनी-अपनी समस्याओं, जिज्ञासाओं के संदर्भ में अनेक प्रश्न पूछते हैं, उनके उत्तर सुनने से वह जानकारी मिल जाती है जो अपने लिये भी बड़ी उपयोगी सिद्ध होती है।

तपोभूमि के स्थान की अपनी विशेषता है, उस भूमि में एक प्रेरणा-प्रद प्रभाव है। शिविर के दिनों में एक ही प्रकृति के, एक ही स्वभाव एवं एक ही मार्ग के चलने वाले व्यक्ति इकट्ठे होते हैं तो पारस्परिक आत्मीयता एक दूसरे को आनन्दविभोर कर देती है। तपोभूमि में लगभग 150 व्यक्तियों का स्थान है। इतने व्यक्तियों को ही स्वीकृति दी जाती है। यह सारा समाज एक घनिष्ठ आत्मीयता के साथ जितने दिन साथ-साथ रहता है उतने दिन ऐसा लगता है मानो वहाँ स्वर्ग का अवतरण हो चला। इस वातावरण को छोड़ते हुए लोगों के दिल टूटते हैं और कितने ही तो बिछोह की व्यवस्था से सिसकियाँ भर-भर कर रोते हैं। एक ही बात हर एक की जबान पर रहती है-’इन थोड़े दिनों में हम स्वर्ग में रहने का आनन्द अनुभव करके जा रहे हैं।’

इस परस्पर प्रेम, परिचय और सहयोग से आगे चलकर कई साँसारिक लाभ भी मिलते हैं। कितने ही व्यक्ति अपने लड़के-लड़कियों के विवाह के लिये उपयुक्त खाँचे मिला लेते हैं। अपने व्यापार, व्यवहार के लिए साथी ढूँढ़ लेते हैं और कई बार तो इस प्रकार के ताल-मेल बड़े ही उत्साहवर्द्धक सिद्ध होते हैं।

ब्रज की तीर्थ यात्रा का लाभ प्रत्यक्ष है। मथुरा, वृन्दावन, गोकुल, गोवर्धन, दाऊजी, नन्दगाँव, बरसाना आदि ब्रज के तीर्थों की सहयात्रा बसों में होती है, तो समय भी कम लगता है, किफायत भी अधिक होती है, जानकारी भी अधिक मिलती है और आनन्द भी अधिक आता है। सैर-सपाटे के लिए अक्सर लोगों का बड़ा मन रहता है और इसके लिये पैसा भी खर्च करते हैं। इस दृष्टि से भी मथुरा यात्रा बड़ी मनोरंजक और आकर्षक रहती है। यहाँ देखने को बहुत कुछ है।

जून के हर शिविर में जीवन जीने की कला का प्रशिक्षण रहता है। आनन्द और उल्लास से प्रगति और समृद्धि से, सफलता और सम्मान से ओत-प्रोत बलिष्ठ और प्रबुद्ध जीवन किस तरह जिया जा सकता है उस प्रश्न के विभिन्न पहलुओं पर विभिन्न दृष्टिकोणों से संक्षेप में बहुत कुछ सिखाया जाता है। इस वर्ष के शिविर में प्रश्नोत्तर की विशिष्ट पद्धति अपनाई जायेगी। शरीर, मन, परिवार, समाज, देश, व्यवसाय, मित्रता, शत्रुता, राजनीति, धर्म, संस्कृति, अध्यात्म आदि मानव जीवन से संबंधित अगणित प्रश्नों के सुलझे हुए उत्तर दिये जायेंगे। इससे हर आगन्तुक को अपनी उलझनों को सुलझाने एवं अवरोधों का हल उपलब्ध हो सकेगा।

जो परिजन अधिक व्यस्त रहते हैं, जिन्हें समय का अभाव रहता है, उन्हें भी इस शिविर में आना चाहिये। सफलता और समृद्धि के लिये वे दिन-रात व्यस्त रहते हैं फिर भी निराशा ही हाथ लगती है। ऐसे लोग अपने अवरुद्ध मार्ग को पुनः खोलने के लिए नये सिरे से प्रकाश प्राप्त कर सकते हैं। इस प्रकार प्रशिक्षण उनके लिए घाटे का नहीं लाभ का ही सौदा सिद्ध होगा।

प्रबुद्ध परिजनों को इन शिविरों में विशेष रूप से आमंत्रित किया जाता है। वे लौकिक और अध्यात्मिक जीवन की अनेक उलझनों, समस्याओं का समाधान यहाँ प्राप्त करेंगे। अपने व्यक्तित्व का, परिवार का, समाज का हित साधन के करने के लिए आवश्यक साहस और प्रकाश उपलब्ध करेंगे।

जिन्हें यज्ञोपवीत कराना हो, वानप्रस्थ लेना हो तथा बच्चों का नामकरण, विद्यारंभ, मुण्डन आदि संस्कार कराना हो उनके लिये भी यह अवसर उत्तम है। इसी बीच गंगा दशहरा को गायत्री जयन्ती पड़ती है। गायत्री उपासकों को अपने इष्टदेव की जयन्ती मनाने के लिए उसकी सिद्धपीठ में उपस्थित होना, एक आध्यात्मिक आवश्यकता की पूर्ति करना है। एक वर्ष में एक बार माता का दर्शन ऐसे पुण्य पर्व पर कर लिया जाए तो उससे अन्तःकरण में सन्तोष होना स्वाभाविक ही है।

तपोभूमि में निवास के लिये सीमित स्थान है इसलिये जिन्हें आना हो अप्रैल के अन्त तक पत्र भेज कर स्वीकृति प्राप्त कर लें। स्थान पूरा हो जाने पर किसी को भी अनुमति न दी जा सकेगी। हर आगन्तुक को अपनी भोजन-व्यवस्था स्वयं करनी चाहिये। इसके लिये आवश्यक बर्तन साथ लाने चाहिये, उसी में सुविधा रहेगी। जो न बना सकें उनके लिये मूल्य देकर खरीदने का भी प्रबंध रहेगा।


शिक्षा का उद्देश्य एवं प्रयोजन बदले

आज शिक्षा का उद्देश्य नौकरी बना हुआ है। स्कूल और कालेज में प्रवेश करते समय छात्रों के सामने एक ही उद्देश्य रहता है- नौकरी करना। अभिभावक भी उन्हें इसी आशा से पढ़ाते हैं कि हमारा बच्चा कोई नौकरी करेगा। शिक्षा क्षेत्र में फैला हुआ यह दृष्टिकोण न केवल अत्यन्त दोषपूर्ण ही है वरन् भगवती विद्या देवी का एक प्रत्यक्ष अपमान भी है।

जब अंग्रेजी राज्य था, सब काम अंग्रेजी में होता था, पढ़े-लिखे लोग हिन्दुस्तान में नहीं थे-अंग्रेजों को अपना काम चलाना था, पढ़े-लिखे लोगों का सहयोग आवश्यक था। इसलिए उन्होंने शिक्षा का प्रसार तो किया पर किया इस ढंग से कि उस पढ़ाई को पूरा करके युवक केवल नौकरी के ही काम के रह जायें। जो पढ़कर स्कूल-कालेजों से निकलता उसे नौकरी मिल जाती। उन दिनों सरकारी नौकरी होना बड़ी इज्जत की बात थी। लोग पटवारी, पतरोल, पोस्टमैन, पुलिस कांस्टेबल और चपरासी जैसे छोटे पदों पर काम करने वाले सरकारी कर्मचारियों से डरते थे, उनकी इज्जत करते थे और धौंस धपड़ में आकर भेंट पूजा भी करते थे, जिससे उन्हें वेतन के अतिरिक्त बाहरी आमदनी भी बहुत हो जाती थी। इस तरह रुतबा और दूसरे अति निर्धनों की तुलना में अच्छी आमदनी पाकर वे शिक्षित नौकर-पेशा लोग खुश भी रहते थे। उनके घर वाले भी शिक्षा के इस चमत्कार पर सन्तुष्ट रहते थे।

आज परिस्थितियाँ जमीन-आसमान जैसी बदल गयी। अब शिक्षा का प्रसार बहुत अधिक हो चुका। लड़कों ही नहीं लड़कियों की भी एक बड़ी फौज स्कूल-कालेजों से हर साल निकलती है। इन सबका लक्ष्य नौकरी होता है। सरकार में जितनी जगहें थीं वे लगभग घिर चुकीं, जो रिटायर होते या मरते हैं उन्हीं की जगहें खाली होती हैं। कोई एकाध नया विभाग खुलना हुआ तो उसमें थोड़ी-बहुत जगहें बढ़ जाती हैं। नौकरी चाहने वाले शिक्षितों की संख्या को देखते हुए यह जगहें ‘एक अनार सौ बीमार’ की कहावत चरितार्थ करती हैं। लाखों शिक्षित बेकार मारे-मारे घूमते हैं। एक दफ्तर से दूसरे से तीसरे में अर्जी लिये फिरते हैं। दस-बीस जगहों की आवश्यकता कभी अखबारों में छपती है तो उसके लिए हजारों गुनी अर्जियां पहुँच जाती हैं। सौ रुपये की जगह के लिए एम.ए. उत्तीर्ण बेकारों की लाइन लग जाती है।

हर साल नये लड़के स्कूल-कालेजों की पढ़ाई समाप्त करके लाखों की संख्या में निकलते हैं। वे पिछले साल के बेकारों की संख्या को और भी अधिक बढ़ाते चले जाते हैं। इस तरह ‘शिक्षितों की बेकारी’ देश की एक भयानक समस्या बनती चली जा रही है। यह बेकार लड़के निराश होकर अवाँछनीय कार्य करने पर उतारू होते हैं और कहना न होगा कि ‘शिक्षितों के पाप’ किसी भी समाज को सहज ही सर्वनाश के गर्त में गिरा सकने के लिए पर्याप्त होते हैं। अशिक्षित अपराधियों की दुष्टता एक सीमा तक ही दुष्परिणाम उत्पन्न करती है पर शिक्षितों की सूझ-बूझ तो ऐसे जाल बुनती है जिससे कानूनी पकड़ से बचते हुए अनेक लोग विघटनात्मक दुष्प्रवृत्तियों के शिकार बनते चले जाते हैं।

अभी शिक्षा का औसत 21-22 पहुँचा है। देश में अभी भी 80 प्रतिशत लोग अशिक्षित है। आगे शिक्षा का विकास होने वाला है। अन्य सभ्य देशों की तरह यहाँ भी दस-पाँच साल में 90 प्रतिशत लोग पढ़-लिख जायेंगे। तब भी यदि शिक्षा-क्षेत्र में फैला हुआ वर्तमान दृष्टिकोण बना रहा तो समस्या असाध्य हो जायेगी। 90 प्रतिशत शिक्षित लोग जब नौकरी चाहेंगे तो उन्हें बेचारे 10 प्रतिशत असमर्थ, अशिक्षित कैसे अपना नौकर रख सकेंगे?

संकट अभी भी चरम सीमा तक पहुँच गया है। तृतीय श्रेणी में उत्तीर्ण होने वाले हाईस्कूल के छात्रों को कालेजों में दाखिला नहीं मिलता, हर कालेज प्रथम-द्वितीय श्रेणी के छात्रों को ही अपने यहाँ भर्ती करना चाहता है। तीसरी श्रेणी वालों को दुत्कार दिया जाता है। नौकरी में तो और भी अधिक मुसीबत है। तीसरी श्रेणी में उत्तीर्ण छात्र, जो लगभग 65 प्रतिशत होते हैं, इण्टरव्यू तक में नहीं बुलाये जाते। अब द्वितीय श्रेणी में उत्तीर्णों की भी दुर्गति बढ़ती चली जा रही है। थोड़ी-बहुत पूछ है तो प्रथम श्रेणी वालों की, जो उत्तीर्ण छात्रों में से 10-15 प्रतिशत से अधिक नहीं होते। शेष को तो निराशा ही हाथ लगती है। कहीं उल्टी-सीधी सौ-डेढ़ सौ की नौकरी मिल गई तो उसी पर संतोष करके बेचारों को जिन्दगी का भार ढोना पड़ता है।

किसी जमाने में नौकरी शान-शौकत का कमाई खुशहाली का, रौब-दौब का, माध्यम रही होगी। आज तो वह 90 प्रतिशत नौकरों के लिये अपनी स्वाधीनता और तकदीर बेच देने जैसी मुसीबत है। 10-20 प्रतिशत ही ऊंची अच्छे वेतन की जगहें पाते हैं। कुछ कर्मचारियों को रिश्वत की आमदनी भी होती है, पर वह दिन दूर नहीं जब रिश्वतखोरी मिट जायेगी और हर कर्मचारी को अपने सूखे वेतन पर गुजारा करना पड़ेगा। बढ़ते हुए खर्च और आकाश चूमती हुई महंगाई को देखते हुए वर्तमान वेतनों की कमाई पर अपने बड़े परिवार का पालन-पोषण करना, बच्चों की शिक्षा-दीक्षा, दवा-दारु, ब्याह-शादी, मौत-मुसीबत का प्रबंध करना कितना कठिन है- इसे भुक्तभोगी ही जानते हैं।

अफसरों की बात-बात पर फटकार, हर समय डरे-डरे रहना, बदली हो जाने पर जगह-जगह के चूल्हे काले करते फिरना, बच्चों की पढ़ाई का सिलसिला बिगाड़ना, कहीं भी चिरस्थायी सच्चे हितैषी मित्र उत्पन्न न कर सकना कितनी कठिनाई भरी बातें हैं। खानाबदोशों की सी मारे-मारे फिरने वाली जिन्दगी भी भला कोई जिन्दगी है? नौकरी-पेशा करने वालों को क्या कभी कुटुम्ब परिवार के साथ रहने का आनन्द मिल सकता है? चार भाई, दो बहिन विवाह होते ही, नौकरी लगते ही तीतर-बितर हो गये। कोई पूरब गया, कोई पश्चिम। कभी विवाह-शादियों में इकट्ठे हो लिए तो गनीमत अन्यथा यदा-कदा चिट्ठी-पत्री से ही एक-दूसरे की कुशलक्षेम पूछ लेते हैं। माँ-बाप को बुढ़ापा काटने के लिए सोचना पड़ता है कि कहाँ रहें, कहाँ न रहें? इस स्थिति की तुलना उन लोगों से कीजिए जो कृषि-व्यवसाय आदि स्वतंत्र धंधा अपनाकर एक ही नगर में रहते हैं और सुख-दुःख में सारे कुटुम्ब परिवार का सहयोग पाकर मानसिक एवं सामाजिक दृष्टि से गर्व, साहस और सहयोग का बड़ा सुखद जीवन व्यतीत करते हैं।

शिक्षा नौकरी की दृष्टि से प्राप्त करना किसी जमाने में सुविधाजनक रहा होगा-तब के लिये वह बात ठीक थी, पर आज परिस्थितियाँ बिलकुल बदल गई हैं। ऐसी दशा में छात्रों को और अभिभावकों को भी परिस्थितियों के अनुरूप अपना विचार करने का ढर्रा बदलना चाहिए। पढ़ना और पढ़ाना तो हर किसी के लिए उचित है, पर उसमें मिला हुआ नौकरी वाला लक्ष्य सर्वथा हटा देना चाहिए। संसार भर में शिक्षा का प्रसार है। शिक्षित लोग अपने जीवन-यापन का स्वतंत्र क्षेत्र ढूँढ़ते हैं। नौकरी तो बहुत कम लोग पसन्द करते हैं। स्वतंत्र व्यवसाय में जीवन को स्वतंत्र रीति-नीति से बिताने का अवसर मिलता है। मर्जी के अनुसार काम करने, बदलने या बन्द की सुविधा रहती है। फिर भाग्य भी बिकता नहीं है। अपने पुरुषार्थ एवं प्रयत्न के अनुरूप अधिक उपार्जन करने और अधिक उन्नति करने की सुविधा रहती है। पराधीनता की तुलना में स्वाधीनता का जो आनन्द है थोड़े पैसों के अधिक लाभ के बदले उसे बेच नहीं दिया जाना चाहिए।

युग-परिवर्तन तथ्य के संदर्भ में शिक्षा-क्षेत्र में समाये हुए इस अनुपयुक्त दृष्टिकोण को हटाया जाना आवश्यक है। इसके स्थान पर यह मान्यता प्रतिष्ठापित की जानी चाहिए कि विद्या का उद्देश्य व्यक्तित्व की प्रखर एवं प्रसुप्त क्षमताओं को विकसित करना ही है। यह लाभ इतना बड़ा है जिसके ऊपर नौकरी लगने के तुच्छ प्रतिफल को निछावर करके फेंका जा सकता है।

हमें जानना चाहिए कि मनुष्य के अन्दर अगणित शक्तियाँ और संभावनायें छिपी पड़ी हैं। यदि उन्हें समुचित रीति से विकसित एवं परिपुष्ट करने का अवसर मिल जाये तो साधारण परिवार तथा परिस्थिति में पैदा हुआ व्यक्ति भी उन्नति के उच्च शिखर पर पहुँच सकता है। अमेरिका के राष्ट्रपतियों में से आधे से अधिक ऐसी परिस्थितियों में जन्में थे, जिनमें यदि हमारे जैसा निराशा का वातावरण रहा होता तो वे बेचारे मेहनत-मजदूरी करके किसी प्रकार पेट पालने और जिन्दा रहने में ही समर्थ हो सके होते। पर उन्होंने अपनी प्रस्सुप्त शक्तियों को जगाया। गुण, कर्म, स्वभाव को उत्कृष्ट स्तर पर ढाला, अपनी भावनाओं, प्रवृत्तियों एवं आदतों को संभाला, गतिविधियों को नियंत्रित एवं व्यवस्थित किया और जीवन की दिशा निर्धारित करके उस पर साहस एवं संकल्प पूर्वक कदम बढ़ाया। यही रीति नीतियाँ थीं, जिसके आधार पर वे आगे बढ़ सके। यही रीति-नीति है जिसे अपनाकर संसार के हर महापुरुष ने हर सफल एवं प्रतिष्ठित व्यक्ति ने गर्व, गौरव, प्रकाश और प्रेरणा भरी विभूतियों का वरण किया है। इस तथ्य को जितनी जल्दी समझ लिया जाये, उतनी ही जल्दी हम सर्वतोमुखी प्रगति की दिशा में अग्रसर होने का लाभ लेंगे।

शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य यही है। प्राचीन काल में हर शिक्षार्थी का पढ़ना-पढ़ाना इसी दृष्टि से होता था। अब समय आ गया है जबकि हमारी शिक्षा का उद्देश्य एवं स्वरूप इसी आधार पर विनिर्मित किया जाये। शिक्षा की सफलता इस बात में है कि शिक्षित व्यक्ति न केवल समुचित आजीविका ही उपार्जित करे, वरन् अपने पारिवारिक जीवन में स्वर्गीय वातावरण उत्पन्न करे। पत्नी के लिए देवता, बच्चों के लिए आचार्य, माता-पिता के लिए सन्तोष और भाई-बहिनों के लिए आधार अवलम्बन बन कर रहे। शरीर से स्वस्थ और मन से परिपुष्ट प्रमाणित हो। हर किसी का प्रियपात्र, विश्वासपात्र और श्रद्धापात्र बने। ऐसा प्रकाशवान जीवन जिये जिससे अनेकों प्रेरणा प्राप्त करें-शिक्षा का यही वास्तविक उद्देश्य हो सकता है। हमारी शिक्षा-व्यवस्था इसी स्तर की होनी चाहिए।

युग निर्माण योजना के अंतर्गत हम इसी स्तर की शिक्षा-प्रणाली का एक नमूना प्रस्तुत करने जा रहे हैं। जून से छात्रों के लिए दो प्रकार की शिक्षा व्यवस्था आरंभ की जा रही है-1. एक वर्षीय 2. चार वर्षीय। जो नवयुवक सरकारी स्तर की किसी पढ़ाई में लगे हुए हैं, या नौकरी की तलाश में लगे हुए हैं उन्हें बीच में एक वर्ष को बुलाया जा रहा है। पढ़ाई को बीच में रोककर भी एक वर्ष के लिए आया जा सकता है और मन में सोच लिया जा सकता है कि एक वर्ष फेल हो जाने से उसी कक्षा में रुके पड़े रहे। जिनके घरों में जिम्मेदारी उठाने वाले दूसरे लोग मौजूद हैं, जिन पर पारिवारिक भार पूरी तरह नहीं पड़ा है, वे भी एक वर्ष का समय निकाल सकते हैं। इस अवधि में क्या पढ़ाया जाएगा, उसकी चर्चा अगले लेख में है। संक्षेप में यही समझ लेना चाहिए कि वयस्क व्यक्तियों के लिए, प्रौढ़ों के लिए यहाँ जीवन-निर्माण का एक वर्षीय प्रशिक्षण है जिसे प्राप्त करने के बाद हर व्यक्तित्व को आशाजनक दिशा में परिवर्तित हुआ देखा जा सकता है।

चार वर्षीय पाठ्यक्रम के लिए न्यूनतम योग्यता जूनियर हाईस्कूल (आठवीं कक्षा) और आयु 15 वर्ष हो। इससे अधिक आयु और योग्यता वालों का अधिक स्वागत है। इस चार वर्ष की अवधि में जितना पढ़ाया जायेगा वह स्कूली दृष्टि से लगभग बी.ए. स्तर का तो होगा ही, इसके अतिरिक्त सामान्य ज्ञान उसका इतना अधिक बढ़ा-चढ़ा होगा कि वह जीवन की किसी भी दिशा में आशाजनक प्रगति कर सके। व्यक्तित्व के विकास की- गुण, कर्म, स्वभाव के परिष्कार की शिक्षा देना तो इस सारी योजना का उद्देश्य ही है। इसलिए उसकी प्रधानता तो रहेगी ही।

अखण्ड-ज्योति परिवार के किशोरों और वयस्क नव-युवकों को इस शिक्षा-व्यवस्था का लाभ लेना चाहिए। बेशक उन्हें इस पढ़ाई से सरकारी नौकरी में काम आने वाली डिग्री नहीं मिलेगी। परीक्षा और उपाधियाँ हमारी अपनी होंगी, पर इतना निश्चित है कि यह पढ़ाई शिक्षार्थी को इस योग्य बनाकर भेजेगी जिससे वह आजीविका के क्षेत्र में कभी असफल न रहे-दूसरों को अपने यहाँ नौकर रखने की ही बात सोचे। वस्थ मन और स्वभाव के निर्माण का लाभ तो इतना बड़ा है जिसके उपलब्ध होने पर पेट पालने जैसी छोटी बात तो अत्यधिक सरल हो जाती है। जिनके घर में कृषि व्यवसाय आदि की व्यवस्था चली आ रही है, या जो अपने बच्चों को नौकरी के अभिशाप मुक्त रख कर स्वावलम्बी जीवन जीने की बात सोच सकें, वे अपने बच्चों को इस पढ़ाई के लिए प्रसन्नतापूर्वक भेज सकते हैं।

युग परिवर्तन नव-निर्माण की इस पुण्य बेला में शिक्षा को पराधीनता पाश में बाँधने वाली न रहने देकर उसे बाह्य एवं आँतरिक जीवन में स्वाधीनता प्रदान कराने वाली बनाया जाना है। इसी प्रयोग का सूत्रपात करने के लिए हमारी यह प्रशिक्षण योजनायें आरंभ हो रही हैं। इन्हें सफल बनाना प्रत्येक प्रबुद्ध व्यक्ति का कर्त्तव्य है।


जीवन विद्या का एक-वर्षीय प्रशिक्षण

अपने आप में समान रूप से सुविकसित, सुसंस्कृत और समाज के लिए उपयोगी एवं परिपुष्ट व्यक्तित्वों का निर्माण करने के लिए हमें शिक्षा प्रणाली के सुधार एवं परिवर्तन पर आवश्यक ध्यान देना होगा। मनुष्य हाड़-माँस का पुतला मात्र है, भौतिक दृष्टि से वह एक कमजोर-सा जानवर मात्र है। उसमें जो विशेषता, महानता दिखाई पड़ती है वह उसकी अन्तःचेतना ही है। इस अन्तःचेतना को सत्पथ गामिनी, सुव्यवस्थित एवं उत्कृष्ट स्तरीय बनाना ही शिक्षा का वास्तविक प्रयोजन है। सच्ची शिक्षा पशु को मनुष्य बना देने में सर्वथा समर्थ एवं सफल होती है।

शिक्षा का मतलब रोटी कमाने में सहायता करने वाली जानकारी मात्र नहीं है। पेट भरने की कला तो जानवरों को भी आती है। कितने ही अशिक्षित व्यक्ति ऐसे हैं जो प्रशिक्षितों से कहीं अधिक अर्थ उपार्जन करते हैं। शिक्षा वह है जो मनुष्य को सुसंस्कृत, सुविकसित, समर्थ और सर्वांगीण प्रतिभा सम्पन्न व्यक्तित्व का निर्माण करने में सहायता करे। प्राचीन काल में हमारी शिक्षा-पद्धति ऐसी ही थी। आज हमने उस प्रक्रिया को संस्कार विहीन बना दिया। मोटी-मोटी पुस्तकों में दिमाग को थका देने वाला ऐसा कूड़ा-करकट तो पढ़ाया जाता है जो व्यावहारिक जीवन में कदाचित ही कभी किसी के कुछ काम आता हो, पर व्यक्तित्व को विकसित करने वाले संस्कारों का अभिवर्धन करने के लिये तनिक भी ध्यान नहीं दिया जाता। ऐसी निकम्मी शिक्षा पद्धति का ही परिणाम है कि इस तथाकथित ऊंची शिक्षा को प्राप्त कर लेने के बाद भी जो लड़के समाज में आते हैं वे अपने निजी जीवन में, परिवार तथा समाज में उस ज्ञान का कोई आलोक उत्पन्न नहीं कर पाते।

युग-निर्माण के लिए शिक्षा पद्धति का सुधार एवं परिवर्तन अवश्य होगा। इस पुण्य प्रयोजन को हम आज छोटे रूप में-नमूना या मॉडल के रूप में जन साधारण के सामने प्रस्तुत करते हैं और आशा करते हैं कि प्रस्तुत आधार पर समाज के कर्णधार शिक्षा की नई रूपरेखा विनिर्मित करेंगे और उसी का सर्वत्र प्रसार होगा। शिक्षा का स्वरूप बदलने पर व्यक्ति और समाज का स्वरूप बदलना निश्चित है।

आगामी जून को हम कई प्रकार की शिक्षा प्रणालियों के विकास के लिए कुछ महत्वपूर्ण प्रयोग आरंभ कर रहे हैं। इनमें थोड़े-थोड़े शिक्षार्थी ले रहे हैं, और उन पर अपनी आदर्श शिक्षा प्रणाली का प्रयोग कर के देश के विचारशील लोगों के सामने एक अभिनव अनुभव उपस्थित करने जा रहे हैं। प्रयोगों का, शिक्षा व्यवस्था का, स्वरूप छोटा, अपने सीमित साधनों के अनुरूप सीमित कलेवर का, रखेंगे। फिर भी उसका महत्व अत्यधिक महत्वपूर्ण होगा। इस परीक्षण के क्या परिणाम होते हैं इसको विज्ञ जनों में उत्सुकता पूर्वक देखा जायेगा। क्योंकि संसार को भावी शिक्षा प्रणाली का ढाँचा, इन प्रयोगों के प्रकाश में ठीक तरह से खड़ा किया जाना है।

एक वर्षीय शिक्षा पद्धति 15 से लेकर 50 वर्ष तक के प्रौढ़ व्यक्तियों के लिए है। इसमें मानव जीवन से संबंधित अनेक समस्याओं का स्वरूप तथा उनको हल करने के लिए विभिन्न परिस्थितियों के अनुसार विभिन्न हल सुझाना प्रमुख आधार होगा। शिक्षार्थियों का व्यक्तित्व परिष्कृत करने के लिए जो बताया और कराया जाना आवश्यक है वह सब कुछ बताया और कराया जायेगा।

स्वास्थ्य जीवन का मूल आधार है। बिगड़े स्वास्थ्य को सुधारना, सुधरे को बनाये रखना और बढ़ाना किस प्रकार हो सकता है? मन की चंचलता, अस्थिरता, अस्त-व्यस्तता कैसे दूर की जा सकती है, और मन, मस्तिष्क को शाँत, सद्भावी, दूरदर्शी एवं सुसन्तुलित कैसे बनाया जा सकता है, इस विज्ञान को न केवल समझाया ही जायेगा वरन् अभ्यास भी कराया जायेगा। शरीर और मन की अस्वस्थता दूर करने के लिये एक प्रशिक्षणात्मक चिकित्सा व्यवस्था यदि इस एक वर्षीय प्रयोग को कहा जाए तो कुछ भी अत्युक्ति न होगी।

शरीर से बीमार तथा मन से विक्षिप्तों की चिकित्सा के लिये अस्पताल तो नहीं बन सकेगा पर साधारणतः जिनके ढीले मन कमजोर पड़ गये हैं वे इस शिक्षण का समुचित लाभ ले सकेंगे। स्वभाव परिवर्तन के लिए, वातावरण का परिवर्तन आवश्यक है। घरों में एक ढर्रे का वातावरण होता है। चिरकाल से उसमें रहते-रहते कुछ खास किस्म के अभ्यास बन जाते हैं और वे अपने समय पर आप ही उठते उभरते रहते हैं। इसलिए जीवन-क्रम में आवश्यक हेरफेर करना हो तो व्यक्ति को अपना निवास वातावरण बदलना पड़ता है। पूर्व काल में बच्चे घरों में रह कर नहीं गुरुकुलों के प्रेरणाबद्ध वातावरण में रह कर पढ़ते थे। घरों का ढर्रा उतना सुसंकृत नहीं होता, जितना गुरुकुलों का। इसलिए संस्कारों का निर्माण घरों के वातावरण में कठिनाई से ही सुधारा, बदला जा सकता है। कोई विरले ही मनस्वी ऐसे होते हैं जो अवाँछनीय घर, परिवार, पड़ोस या समाज में रहते हुए भी इस सबसे भिन्न प्रकार का, अनोखा, व्यक्तित्व विकसित कर सकें। साधारण स्तर के व्यक्ति तो उसी ढर्रे में ढल जाते हैं। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए व्यक्तित्वों का निर्माण करने वाली शिक्षा-प्रणाली का स्वरूप वही हो सकता है जिसमें शिक्षार्थी को किसी आदर्श वातावरण में रहने की सुविधा हो।

एक वर्षीय शिक्षा इसी आवश्यकता को पूरा करेगी। प्रातः उठने से लेकर सोने तक की सारी कार्यपद्धति एक विशेष ढांचे में ढल जायेगी। शिक्षार्थी की वाणी, व्यवहार, चाल-ढाल, रीति-नीति पर पूरा ध्यान रखा जायेगा और उससे जहाँ भूल होती होगी सुधारा जायेगा। जीवन विज्ञान के हर पहलू पर नित्य-नियमित काम लिए जायेंगे, साहित्य पढ़ाया जायेगा, नोट्स लिखाये जायेंगे, प्रश्नोत्तरों में बहुत कुछ कहा सुना जायेगा। इस सबके साथ सबसे बड़ी बात यह होगी कि छात्र की प्रत्येक गतिविधि पर कड़ी निगाह रखी जायेगी और उसे एक ढांचे में ढालने के लिए उस प्रकार संभाला जायेगा जिससे वह पुरानी अनुपयुक्त आदतों को छोड़ सके और प्रसुप्त सद्भावों को सुविकसित कर सके। इसे एक कायाकल्प प्रयोग कहना चाहिए। शिक्षार्थियों से आशा की जायेगी कि वे एक वर्ष के लिए इन छोटे बच्चों सदृश बन कर आवेंगे जिनकी गतिविधियाँ उनके माता-पिता की इच्छानुसार रहती हैं। अनुशासन शिक्षार्थियों की अनिवार्य योग्यता होगी। ढीठ, उच्छृंखल, अवज्ञाकारी, उद्दण्ड, अपनी मनमर्जी चलाने वाले किसी की न मानने वाले छात्रों को निकाल दिया जायेगा। जो कहना ही न माने, अनुशासन ही स्वीकार न करे आखिर उसे सुधारा, संभाला भी कैसे जायेगा?

व्यक्तित्व का निर्माण मानव जीवन का सबसे बड़ा लाभ है। यह विभूति जिसके हाथ आ गई उसकी प्रगति के लिए दसों-दिशायें खुल जायेंगी। पर इस विभूति को पाने के लिए शिक्षार्थी में अनुशासन पालन की उपयुक्त श्रद्धा होना निताँत आवश्यक है। जो इस प्रशिक्षण के लिए आवें-वे अपने को गीली मिट्टी के रूप में मान कर आयें, जिसे आसानी से उपयुक्त साँचे में ढाला जा सके।

इस शिक्षण में दिन-दिन का निर्धारण, पहनाव-उढ़ाव, बोलना, बात करना तथा जीवन की हर विधि व्यवस्था को ठीक तरह से रखना प्रधान रूप में सिखाया जायेगा। व्यावहारिक प्रशिक्षण का सही स्वरूप यही है। यों प्रशिक्षण की क्रमबद्ध व्यवस्था भी चलेगी ही।

प्रातः दो क्लास और सायंकाल दो क्लास कुल चार क्लास पढ़ाई के लिए चला करेंगी। 7.30 से 8.30 तक पहला और 9 से 10 तक दूसरा क्लास चलेगा। पहले क्लास में मानव जीवन से सम्बंधित, शरीर, मन, परिवार, धन, सम्मान, अध्यात्म आदि हर पहलू का स्वरूप समझाया जाया करेगा और उनमें विकृतियाँ आने के कारणों तथा सुधारने के उपायों पर विस्तृत चर्चा की जाया करेगी। शिक्षण भाषणों के आधार पर चलेगा, छात्र नोट्स लिखते जायेंगे। कोई पाठ्य पुस्तक निर्धारित नहीं रहेगी। हाँ पुस्तकालय में उन विषयों की अनेकों पुस्तकें रहेंगी जिन्हें छात्र सहायक शिक्षा के रूप में नियमित रूप से पढ़ते रहा करेंगे।

दूसरा क्लास संसार तथा समाज की विविध जानकारियाँ देने के लिए सामान्य ज्ञान का रहा करेगा। पृथ्वी की रचना, आकाशस्थ ग्रह नक्षत्र, जीव विज्ञान, वनस्पति-शास्त्र, संसार का भूगोल, संसार के विभिन्न देशों का राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक एवं साँस्कृतिक इतिहास, विभिन्न देशों की वर्तमान परिस्थितियाँ, संसार में चल रहे वर्तमान संघर्ष एवं विचार प्रवाह, अपने देश का अब तक का सर्वतोमुखी इतिहास, मध्यकालीन अन्धकार युग की खेदजनक परिस्थितियाँ, देश को पतन से उत्थान की ओर ले चलने वाली प्रवृत्तियों का इतिहास, राष्ट्र की वर्तमान परिस्थितियाँ तथा समस्या, भारतीय समाज का प्राचीन और अर्वाचीन ढाँचा, अपनी साँस्कृतिक विशेषतायें, वर्तमान सामाजिक दोष और उनको सुधारने के उपाय, हमारी आर्थिक आवश्यकतायें और उनकी पूर्ति का उचित मार्ग, अपराधों की प्रवृत्ति और उसका उन्मूलन, दुष्टों से निबटने के लिए किन आधारों का अवलम्बन करना पड़ता है, राजनीति के सिद्धाँत समाज-शास्त्र की पृष्ठभूमि, मनोविज्ञान के दैनिक जीवन में प्रयोग, सफल दांपत्य जीवन, बालकों के स्वस्थ विकास की विधि व्यवस्था, आत्मबल और मनोबल का अभिवर्धन, विश्व-धर्म और संस्कृतियों की तुलना, मानव जाति का उज्ज्वल भविष्य और उसका निर्माण आदि-आदि, व्यक्ति, समाज और विश्व से संबंधित समस्याओं पर इस सामान्य ज्ञान वाली कक्षा में आवश्यक जानकारी दी जायेगी। देश के कानूनों का उतना पक्ष भी समझा दिया जायेगा जिससे कभी अदालत कचहरी जाना पड़े तो वस्तुस्थिति समझने तथा उचित ढंग से न्याय प्राप्त करने में कठिनाई न पड़े। इसी प्रकार व्यापार, व्यवसाय तथा लोगों के साथ सद्भावनापूर्ण निर्वाह करने के लिए क्या रीति−नीति अपनानी चाहिए इसका ज्ञान अनेक उदाहरणों के साथ कराया जाता रहेगा।

सायंकाल की दो कक्षाओं में दो घंटे की शिक्षा और एक घंटे का संभाषण रहेगा। जिनके घर में अपनी कृषि व्यापार आदि हैं, जिनके पास कमाने के ढर्रे मौजूद हैं उनकी बात दूसरी है, पर साधारण छात्रों को कुछ ऐसे शिल्प भी सीख लेने चाहिएं जो समय पड़ने पर उनकी आजीविका समस्या हल करने में भी सहायक हो सके। इस दृष्टि से एक वर्ष में दो शिल्प-व्यवसाय सिखाने की व्यवस्था की गई है। 1. प्रेस व्यवसाय 2. साबुन व्यवसाय। एक बजे से तीन बजे तक यह दो शिल्प सिखाये जाया करेंगे।

जैसे-जैसे देश में शिक्षा बढ़ती जायेगी उसी अनुपात से मुद्रण व्यवसाय बढ़ेगा। अभी 20 प्रतिशत लोग पढ़े हैं। आगामी दस वर्ष में यह संख्या चौगुनी अर्थात् 80 प्रतिशत हो जायेगी। तब प्रेस भी उसी अनुपात से बढ़ेंगे। इस व्यवसाय में लाभ भी है, सम्मान भी है और विकास की गुँजाइश भी है। घाटे की कोई संभावना नहीं है। इसलिए एक वर्ष में प्रेस संबंधी हर पहलू का उतना क्रियात्मक ज्ञान करा दिया जायेगा कि अपना स्वतंत्र प्रेस खोल कर उसे सफलता पूर्वक चलाया जा सके। या किसी दूसरे प्रेस का मैनेजर बना जा सके।

अक्षर जोड़ना (कम्पोज), छपाई मशीनों की साज संभाल, उन्हें खोलना-कसना, पैर से छापने वाली मशीनों का ज्ञान, बिजली से चलने वाली मशीनों का चलाना तथा खोलना-कसना, पुस्तक बाइडिंग, नम्बरिंग, परफोरेटिंग, कटिंग आदि प्रेस संबंधी सभी छोटे-बड़े क्रिया-कलापों का ठीक तरह अभ्यास करा दिया जायेगा। ग्राहकों में काम कैसे मिलता है, छपाई के रेट कितने होते हैं, कागज कितने किस्म के होते हैं, वे कहाँ से किस भाव मिलते हैं, विभिन्न प्रकार के जाँब काम किस प्रकार, किस कागज, किस साइज और किस टाइप में छापे जाते हैं दूसरे प्रेसों की प्रतियोगिता में किस प्रकार खड़ा रहा जा सकता है, कर्मचारियों संबंधी उलझनें, प्रेस संबंधी सरकारी ज्ञान, रंगीन स्याहियों के अनेक सम्मिश्रण आदि वे सभी बातें सिखा दी जाती हैं, जो किसी प्रेस-मालिक या मैनेजर को जाननी आवश्यक है।

इस शिक्षा को प्राप्त कर कोई व्यक्ति पाँच हजार की पूँजी से ही प्रेस खोल सकता है, उससे अपनी आजीविका कमा सकता है। कई लोगों को, यहाँ तक कि महिलाओं को भी उसी काम में खपाकर सबके लिए आजीविका का कार्य खोला जा सकता है। अपनी स्थिति प्रेस खोलने की न हो तो किसी के यहाँ नौकरी की जा सकती है। वह भी न मिले तो कम्पोजीटर और मशीनमैन बनकर बेकारी का हल तो कभी भी निकाला जा सकता है। अखबार निकालना व पुस्तक-प्रकाशन का व्यवसाय भी प्रेस से सम्बंधित है, जिन्हें वैसी सुविधा है वे इस तरह के काम भी प्रेस के साथ-साथ चला सकते हैं।

दूसरा व्यवसाय साबुन का है। अनेक तरह के सस्ते महंगे, धोने के, नहाने के ठंडे गरम साबुन बनाने का शिल्प तो सिखाया ही जायेगा साथ ही यह भी बताया जायेगा कि इस व्यवसाय को बाजार में सफल बनाने का तरीका क्या है? दूसरे साबुन वालों से अच्छा और सस्ता माल कैसे तैयार किया जा सकता है? प्रतिद्वन्दिता में कैसे ठहरा जा सकता है? अपनी खपत कैसे बढ़ाई जा सकती है? प्रयोग में आने वाली वस्तुयें तेल, सोडा आदि कहाँ से, किस किस्म के, कितनी किफायत से मंगाये जा सकते हैं? आदि जानकारियाँ प्राप्त कर लेने के बाद कोई भी व्यक्ति सहायक धंधे के रूप में इस व्यवसाय को चला सकता है। आजकल साबुन का प्रचलन बहुत है। देश की शिक्षा और सभ्यता जैसे-जैसे बढ़ेगी साबुन की आवश्यकता भी बढ़ेगी। इसलिए इस व्यवसाय का भविष्य उज्ज्वल है। लाभ भी कम नहीं है।

आम तौर से हर व्यवसाय के कुछ गुप्त रहस्य होते हैं, जो कोई किसी को बताता नहीं। इसी जानकारी के अभाव में व्यवसाय असफल हो जाते हैं। यहाँ की शिक्षा में यह विशेषता होगी कि उपरोक्त शिल्प सिखाये ही नहीं जायेंगे वरन् सफलता से संबंध रखने वाले सभी आवश्यक रहस्य तथा उतार-चढ़ाव भी समझा दिये जायेंगे ताकि अजनबी होने के कारण इन कार्यों में जोखिम न उठानी पड़े।

एक वर्षीय शिक्षा में उपरोक्त दो शिल्प प्रधान हैं। दो छोटे सहायक शिल्प और भी सिखा दिये जायेंगे, जैसे रबड़ की मुहरें बनाना-यह कार्य प्रेस के साथ-साथ बड़ी आसानी से चल सकता है और लाभ भी बहुत हैं। 2. बत्ती बनाना साबुन के साथ यह कार्य भी बड़ी आसानी से चल सकता है।

चौथा काम वक्तृत्व कला तथा शस्त्र-संचालन का है। सप्ताह में तीन दिन भाषण देने की कला सिखाई जाया करेगी ताकि शिक्षार्थी अच्छी वक्तृत्व कला सीखकर समयानुसार अपने विचार धड़ल्ले से प्रकट कर सकें और जन समाज का नेतृत्व कर सकने की क्षमता उपलब्ध कर सकें। सप्ताह में तीन दिन शस्त्र-विद्या सिखलाई जाया करेगी जिसमें लाठी चलाने के विविध प्रयोग, छुरी, भाला, फरसा आदि को चलाने तथा उनसे अपने को बचाने के अभ्यास, निशानेबाजी, गुलेल, धनुष-बाण और बन्दूक चलाने का अभ्यास होगा, आत्म-रक्षा और स्वास्थ्य अभिवर्धन के लिये शस्त्र-संचालन का ज्ञान होना भी जीवन की एक महत्त्वपूर्ण आवश्यकता है। यह वक्तृत्व कला और शस्त्र कला चौथे क्लास में सिखाया जाया करेगा और छात्र एक वर्ष में दोनों ही कार्य भली प्रकार सीख लेंगे।

कुछ कार्य प्रतिदिन के अभ्यास में और भी रहेंगे- 1. अपना भोजन स्वयं पकाना 2. अपने कपड़े स्वयं धोना 3. नित्य-नियमित व्यायाम। व्यायामों में पी.टी. ढंग की कवायदों की प्रधानता रहेगी। भोजन सस्ता पड़े, अपनी मन-मर्जी का बने और उस कला का अभ्यास भी हो जाये इसलिए हर छात्र को भोजन बनाने की शिक्षा आदि से अन्त तक दें दी जायेगी। इसी प्रकार कपड़े धोना, प्रेस करना, संभालकर रखना आदि भी सिखाया जायेगा। रविवार का दिन विशेष खेल-कूद यात्रा, मनोरंजन आदि के लिए रहा करेगा। इन्हीं दिनों गृहशिल्प की भी कितनी ही बातें सिखा दी जायेंगी। टूटे बर्तनों की मरम्मत, चुचाती छतों को ठीक करना, धूप-धूप करती लालटेनों को सुधारना, स्टोवों की सफाई, कपड़े रंगना, किताबों की जिल्दें बनाना, चारपाई बुनना आदि ऐसे कितने ही गृहशिल्पों का अभ्यास भी करा दिया जाता है, जिनकी आये दिन आवश्यकता पड़ती है और जिनके न जानने पर हानि उठानी पड़ती है।

नित्य, सूर्योदय से पूर्व उठना, स्नान, संध्या, जलपान, भोजन, विश्राम, व्यायाम, बौद्धिक कक्षायें, शिल्प, शस्त्र-संचालन, भाषण, विचार-विनिमय, स्वाध्याय, विनोद जैसे कार्यक्रमों में बंटी हुई दिनचर्या, एक स्तर के शिक्षार्थियों का पारस्परिक स्नेह-सहयोग, शिक्षकों की अभिभावकों जैसी आत्मीयता, तपोभूमि का स्वर्गीय वातावरण, प्रतिदिन मिलने वाला अमृतोपम ज्ञान यह सब मिलाकर शिक्षार्थी के लिए यह अवधि बड़ी उल्लास, आनन्द और संतोष से भरी-पूरी बीतेगी।

जिन्हें सुविधा हो इस प्रशिक्षण में सम्मिलित होने का प्रयास करें। भोजन-वस्त्रों का अपना खर्च छात्र स्वयं वहन करेगा। शिक्षा, निवास, बिजली आदि की व्यवस्था निःशुल्क है।


तीन और चार वर्ष की शिक्षा-व्यवस्था

जिन्हें सरकारी नौकरी नहीं करनी है, योग्यता बढ़ानी है और योग्यता के बल पर अपने पैतृक अथवा किसी अन्य धंधे से आजीविका उपार्जित करनी है, उनके लिए ऐसी शिक्षा-व्यवस्था होनी चाहिए जिससे सर्वतोमुखी प्रतिभा का विकास करने के लिए ही परिश्रम करना पड़े। स्कूली पढ़ाई में यह दोष है कि उसमें ऐसे विषय पढ़ने पड़ते हैं, जो जीवन में कभी काम नहीं आते। स्कूल छोड़ते ही वे विस्मरण हो जाते हैं। छोटी-सी बात जो एक-दो बार पढ़ने-समझने से हृदयंगम हो सकती है, परीक्षा में सही उत्तर लाने के लिए बहुत बार घोटनी पड़ती है। इस प्रकार विद्यार्थी के समय का जो उपयोग उसकी प्रतिभा विकसित करने और जीवन में काम आने वाली बातें सीखने में लगना चाहिए था, वह भारभूत जंजाल में नष्ट होता रहता है।

कई बार तो परीक्षा के औंधे-सीधे गोरखधंधे जैसे जंजाल में उलझकर होनहार लड़के अनुत्तीर्ण हो जाते हैं। इसकी प्रतिक्रिया उन पर हीनता की, आत्मग्लानि की ऐसी भयानक छाप डालती है कि वे एक प्रकार से टूट ही जाते हैं। उनकी मनोभूमि दो कौड़ी की हो जाती है। परीक्षा में फेल होना ऐसा मानसिक घाव लगता है कि शिक्षार्थी फिर जीवन की हर परीक्षा में ही फेल होता चला जाता है। ऊंची नौकरी लग गई तो पढ़ाई की भरपाई, अन्यथा वह अभिभावकों को स्वाहा करने और जीवन-रस चूस लेने वाली अभिशाप जैसी मूर्खता तो बनी बनाई है ही।

इस जंजाल से होनहार छात्रों को छुटकारा दिलाने के लिए हमें ऐसी शिक्षा प्रणाली का उदाहरण प्रस्तुत करना होगा जो यह सिद्ध कर सके कि सही शिक्षण क्रम किस प्रकार का होना चाहिए। कोसने, गाली देने और कुड़कुड़ाने से काम न चलेगा। वर्तमान शिक्षा-प्रणाली के दोष सरकारी और गैर-सरकारी स्तर पर बताये और स्वीकार किये जाते हैं पर कोई यह नहीं बताता कि आखिर स्वस्थ शिक्षा प्रक्रिया होनी किस प्रकार की चाहिए? इसी प्रश्न का उत्तर हमें एक रचनात्मक ढाँचा खड़ा करके देना होगा।

योजना यह बनाई गई कि जूनियर हाईस्कूल (कक्षा 8) तक पढ़े छात्रों के लिए चार वर्ष का और हाईस्कूल तक पढ़े छात्रों के लिए तीन वर्ष का एक ऐसा पाठ्यक्रम हो, जिसे पूरा करने पर शिक्षार्थी की योग्यता बी.ए. पास लड़कों की तुलना में कहीं अधिक हो।

1. हिन्दी, अंग्रेजी और संस्कृत ये तीनों भाषायें सारी शिक्षा अवधि में नित्य नियमित रूप से पढ़ाई जायेंगी। अंग्रेजी में ऐसी योग्यता उत्पन्न कर दी जायेगी कि छात्र धड़ल्ले से अंग्रेजी बोल सकें, पत्र लेख आदि शुद्ध, सही रूप में लिख सकें। संस्कृत का भी ऐसा अच्छा ज्ञान इस अवधि में हो जायेगा जिसके आधार पर धर्मशास्त्रों को अच्छी तरह समझ सकना संभव हो सके। हिन्दी की योग्यता साहित्य रत्न की-एम.ए. जैसी होगी। तीनों भाषाओं के एक अच्छे ज्ञाता की जो योग्यता होनी चाहिए वह इस अवधि में हो जायेगी।

इस भाषा शिक्षण के साथ टाइप राइटिंग भी जुड़ा हुआ है। हिन्दी के टाइपराइटर और अंग्रेजी के टाइपराइटर कक्षाओं में रहेंगे और छात्र उन पर टाइप राइटिंग सीखते रहेंगे। पढ़ाई समाप्त करने तक यह कला इतनी आ जायेगी कि नौकरी करनी हो तो टाइपिस्ट की नौकरी मिल सके। अदालतों में जाकर या बाजार में दुकान जमाकर बाजार का टाइप-कार्य करते हुए स्वतंत्र आजीविका कमाई जा सके। ऐसा भी हो सकता है कि टाइप-राइटिंग का स्कूल खोल लिया जाये। स्कूली लड़के फीस देकर उसमें सीखने आया करें और इससे अपनी सम्मानप्रद आजीविका उपार्जित होती रहे।

2. भाषा के अतिरिक्त उपयोगी जानकारी का प्रशिक्षण चलेगा। इसके अंतर्गत गणित (अर्थमेटिक) इतना पढ़ाया जायेगा, जिसके आधार पर देशी और अंग्रेजी ढंग से बही-खाते, सालाना बेलेन्स शीट, सेलटैक्स, इन्कम टैक्स की तैयारी, व्यापारी पर लगने वाली सभी प्रकार के टैक्सों की कानूनी जानकारी और उस संबंध में सही तरीके से कागज रखने का ज्ञान, टैक्स संबंधी मुकदमों का स्वरूप और उनसे निपटने के अनेक तरीके आदि की व्यावहारिक शिक्षा दी जायेगी।

नये सिक्के, बाँट, माप एवं ब्याज संबंधी सभी प्रकार के वे गणित, जिनके काम आने की जीवन में तनिक भी संभावना हो सकती है, लिखकर गणित करने की अपेक्षा मौखिक हिसाब जोड़ने की कुशलता पैदा की जायेगी।

3. भूगोल, इतिहास इतना पढ़ाया जायेगा कि जिससे विश्व ब्रह्माण्ड में बिखरे हुए ग्रह-नक्षत्रों में पृथ्वी का स्थान कहाँ और कितना है? पृथ्वी अन्य ग्रह-नक्षत्रों से कितनी प्रभावित है? पृथ्वी के जन्म से लेकर अब तक का उसका इतिहास, महाद्वीपों की स्थिति, संसार के वर्तमान देशों का राजनैतिक, साँस्कृतिक एवं सामाजिक इतिहास, विभिन्न देशों की आधुनिक विशेषताएं तथा समस्यायें, संसार के विभिन्न समाजों के जीवन-स्तर तथा शासन-स्वरूप। विज्ञान की अब तक की प्रगति तथा उसकी भावी संभावनायें, विश्व का भावी संभावित स्वरूप, जीव-विकास का इतिहास, भारतवर्ष का राजनैतिक, सामाजिक, धार्मिक एवं आर्थिक इतिहास, देश की विभिन्न समस्यायें आदि भूगोल-इतिहास का मिश्रित स्वरूप इस प्रकार पढ़ाया जायेगा कि संसार के आरंभ होने से लेकर अब तक का स्वरूप आँखों के आगे खड़ा हो सके। इसी प्रकार के आधार पर ही वर्तमान की उलझनों को सुलझाना और भविष्य के निर्माण का ढाँचा संभव हो सकता है।

4. शरीर-विज्ञान में, अनाटोमी, फिजियोलॉजी, नक्शे, चित्र और मॉडलों के आधार पर इस प्रकार पढ़ाया जायेगा, जिससे यह पता चल सके कि शरीर के विभिन्न अवयवों का स्थान, स्वरूप और कार्य कैसा है? उनमें बीमारी कैसे होती है और फिर से किस चिकित्सा-पद्धति से किस आधार पर कितना सुधारा जा सकता है? रोगों की निवृत्ति प्रकृति द्वारा कितनी होती है और चिकित्सा से क्या सहायता मिलती है?

रैडक्रास सोसायटी से सहायता प्राप्त फर्स्ट एड, घरेलू, जड़ी-बूटियों द्वारा सामान्य रोगों की सामान्य चिकित्सा, रोगी की परिचर्या जैसे उपचार सीखने को मिलेंगे। आहार के विभिन्न स्तर, उनके गुण-दोष, भोजन सही ढंग से पकाने, रखने, परोसने तथा खाने की कला, स्नान, सफाई, निद्रा, संयम आदि शरीर-संरक्षण का विधि-विधान प्रत्येक अंग को सक्रिय गतिशील, निरोग, एवं प्रफुल्ल रखने वाले वैज्ञानिक व्यायाम, फौजी ढंग की कवायदें, यह शरीर-विज्ञान का अंग होंगी। दैनिक रहन-सहन का अभ्यास इस तरह ढाला जायेगा कि आजीवन बीमार पड़ने की नौबत ही न आये।

शस्त्र-विद्या का थोड़ा-सा प्रयोग एक वर्षीय प्रशिक्षण में भी है पर उतनी कम अवधि में उस विषय का सामान्य ज्ञान ही हो सकता है। इस परिपूर्ण शिक्षण में लाठी चलाना, भाला, छुरा, फरसा, गुलेल, धनुष-बाण एवं बन्दूक चलाने का अधिक अच्छी तरह-अधिक भेद-उप-भेदों के साथ शिक्षण कराया जायेगा।

5. मानसिक स्वास्थ्य संवर्द्धन के लिए इस अवधि में वैसे ही प्रयत्न किए जायेंगे जैसे शरीर को स्वस्थ बनाने के लिए मनोविज्ञान, मन-बुद्धि-चित्त अहंकार के अन्तःकरण चतुष्टय का स्वरूप एवं गुण-कर्म, विचारों की शक्ति, चिन्तन की दिशा मोड़ डालने की कला, बुद्धिमत्ता एवं दूरदर्शिता का विकास, साहस, धैर्य एवं मनस्विता का अभ्यास, श्रमशीलता और तन्मयता की प्रवृत्ति, नम्रता, मधुरता, शिष्टता, सज्जनता एवं अनुशासन प्रिय स्वभाव, नियमितता एवं व्यवस्था का गुण, समय और धन को ठीक तरह खर्च करने की आदत, कामनाओं और वासनाओं का नियंत्रण, अनुपयुक्त विचारों को हटाकर उनके स्थान पर उपयुक्त विचारों को स्थापना आदि मानसिक स्वास्थ्य संवर्द्धन के लिए बौद्धिक एवं व्यावहारिक दोनों ही तरह से-थ्योरी और प्रेक्टिस दोनों ही तरीकों से-मानसिक स्वास्थ्य संवर्द्धन की शिक्षा-व्यवस्था नियमित रूप से चलती रहेगी।

6. लोक-व्यवहार के उपयुक्त तरीकों को सिखाने की शिक्षा-व्यवस्था का समुचित समावेश रखा गया है। धर्मपत्नी के साथ बच्चों के साथ, भाई-बहिनों के साथ, माता-पिता के साथ, परिजनों के साथ, कैसी स्थिति में किस प्रयोजन के लिए किस प्रकार, कितना क्या व्यवहार किया जाये, उस व्यवहार में कितना उतार-चढ़ाव रहे, यह एक पूरा पारिवारिक व्यवहार शास्त्र है। इसकी ठीक जानकारी न रहने से परिवार में क्लेश, द्वेष, अव्यवस्था फैलती है। यह प्रशिक्षण बतायेगा कि कुटुम्ब को स्वस्थ, सुव्यवस्थित एवं समृद्ध बनाने का क्या तरीका है? कुटुम्ब वस्तुतः एक समाज एवं राष्ट्र है, उसके संचालन में भी वैसी ही योग्यता अपेक्षित है जैसी किसी देश के प्रधान मंत्री में होनी चाहिए। साम, दाम, दण्ड, भेद का उसमें समुचित उपयोग करना पड़ता है। यह कैसे किया जाये, जिससे परिवार में स्वर्ग अवतरित हो-यह शिक्षा-व्यवस्था इस पाठ्यक्रम का प्रमुख अंग है।

घर से बाहर समाज के अन्य लोगों से साथ समुचित व्यवहार करके उनकी सहानुभूति, सद्भावना एवं सहायता सम्पादित करना लौकिक जीवन को समुचित बनाने के लिए नितान्त आवश्यक है। अपने कर्मचारियों से, मालिकों से, पड़ौसियों, रिश्तेदारों से, मित्रों से, शत्रुओं से, किस अवसर पर कैसे बरता जाता है, इसका व्यावहारिक ज्ञान कितना लाभप्रद है- इसे साधारण लोग नहीं समझते, जो समझते हैं वे उसका आशाजनक प्रतिफल उपलब्ध करते हैं। लोक-व्यवहार का जानना आवश्यक समझकर उसे इस शिशा-पद्धति में समन्वित रखा गया है।

(7) भावात्मक विकास के लिये-आत्मबल बढ़ाने के लिए जिस उत्कृष्ट दृष्टिकोण की, आस्थाओं की, मान्यताओं की आवश्यकता है, उसकी पूर्ति आध्यात्मिक ज्ञान एवं धर्मशास्त्र के आधार पर होती है। गीता, रामायण, वेद, अपनिषद् आदि के आधार पर इस विषय का प्रशिक्षण भी चलेगा। भारतीय धर्म एवं संस्कृति की विशेषताएँ व उपयोगिताएं तुलनात्मक ढंग से पढ़ाई जायेंगी।

जन नेतृत्व करने के लिए भाषण की कला जानना आवश्यक है। छात्रों को यह अभ्यास कराया जाता रहेगा कि वे घर में, मित्रों में, गोष्ठियों में तथा सभा सम्मेलनों में किस प्रकार अपने विचारों को धारा-प्रवाह किन्तु सुसन्तुलित ढंग से व्यक्त कर सकते हैं। नव-निर्माण के लिए जिन रचनात्मक प्रवृत्तियों का प्रसार किया जाता है, उनकी शिक्षा भी इसी वर्ग के अंतर्गत दी जाती रहेगी।

(8) आजीविका उपार्जन के लिये ऐसे शिल्प-व्यवसायों का भी इस शिक्षा -व्यवस्था में समावेश है जिसके आधार को कोई भी व्यक्ति अपने पारिवारिक भरण-पोषण के उपयुक्त आजीविका आसानी से कमा सके और बचे हुए समय को आत्म-निर्माण, परिवार-निर्माण तथा समाज-निर्माण के कार्यों में लगाकर जीवन को लौकिक और पारलौकिक दोनों ही दृष्टियों से सफल बना सकें।

एक वर्षीय शिक्षण में (1) प्रेस-व्यवसाय (2) साबुन व्यवसाय दो उद्योगों की शिक्षा रखी गई है। उनके साथ ही रबड़ की मुहरें बनाना तथा मोमबत्ती बनाना, दो छोटे सहायक उद्योग भी हैं। यह क्लास इस चार वर्षीय शिक्षा-क्रम के प्रथम वर्ष में भी रहेगा। शेष तीन वर्षों के लिये अन्य उद्योगों की व्यवस्था बनाई जा रही है-(1) घड़ी-साजी (2) रेडियो-ट्रांजिस्टरों की मरम्मत तथा उनका निर्माण (3) मोजे, बनियान आदि हौजरी-उद्योग (4) निवाड़ उद्योग (5) ड्राई क्लीनिंग-पेट्रोल से तुरन्त ऊनी, रेशमी सूती कपड़े धो देना (6) खिलौने-प्लास्टिक के, टीन के, कागज की लुगदी के बनाना (7) बिस्किट, डबल रोटी, लेमनजूस की गोलियाँ बनाना। (8) मधुमक्खी पालन जैसे उद्योगों के बारे में व्यवस्था बनाई जा रही है। हर वर्ष इनमें से दो उद्योग बढ़ाए जायेंगे। तीन वर्ष वालों को 6 और चार वर्ष वालों को 7 उद्योग सीखने का अवसर मिल सकता है। छात्र को एक उद्योग में उसकी रुचि के अनुसार विशेषज्ञ बनाया जाएगा। शेष की सामान्य जानकारी रहेगी। उपरोक्त सभी उद्योग ऐसे हैं जिनके आधार पर कोई जानकार रोटी कमाने की समस्या को आसानी से हल कर सकता है और स्वतन्त्र स्वाभिमानी जीवन बिता सकता है।

आरंभ के वर्ष में प्रेस तथा साबुन दो ही उद्योगों का प्रबंध किया है। छात्रों की अभिरुचि के अनुरूप अगले वर्षों में हर साल दो उद्योगों की शिक्षा व्यवस्था बढ़ाई जाती रहेगी। इस प्रकार आगामी 4 वर्ष में यह शिल्प शिक्षा व्यवस्था एक-एक कदम आगे बढ़ती हुई सर्वांगपूर्ण हो जायेगी।

इस सारे प्रशिक्षण की कोई फीस नहीं है। निवास, बिजली आदि की व्यवस्था भी निःशुल्क है। छात्रों को जो खर्च करना है वह उनके अपने खाने पहनने-भर का है। दो-दो, तीन-तीन छात्र मिलकर अपना भोजन पका लिया करेंगे। जब तक उन्हें बनाना अच्छी तरह न आ जायेगा तब तक शिक्षक उन्हें साथ बैठ कर सिखाते रहेंगे। इस तरह थोड़े ही दिनों में हर छात्र इस दिशा में स्वावलम्बी हो जायेगा और अपनी स्थिति के अनुरूप सस्ते या महंगे में गुजारा कर सकेगा।

साधारणतया हर विषय का प्रशिक्षण भाषणों द्वारा किया जाया करेगा। छात्र उनके नोट लिखा करेंगे। इनके लिए काफी, स्याही, कलम अपनी खर्च होंगी। इन विषयों की विशेष जानकारी के लिए पुस्तकें लाइब्रेरी में रहेंगी जिन्हें छात्र सुविधानुसार पढ़ते रह सकते हैं। शिल्प तथा व्यायाम तथा शस्त्र शिक्षा के साधन भी विद्यालय ही निःशुल्क उपलब्ध करेगा। छात्रों को इसके लिए कुछ भी खर्च नहीं करना है।

पोशाक सभी छात्रों की एक सी होगी। कुर्ता, जाकेट, धोती, कंधे पर दुपट्टा। जाड़े के दिनों में यही पोशाक गरम रह सकती है। भीतर स्वेटर पहना जा सकता है। व्यायाम एवं शस्त्र शिक्षा के लिए खाकी नेकर तथा खाकी आधी बाँहों की कमीज प्रयुक्त होगी। छात्र अपने साथ पहनने, ओढ़ने, बिछाने के आवश्यक वस्त्र तथा भोजन पकाने खाने के बर्तन लेकर आवेंगे।

उपरोक्त प्रशिक्षण जूनियर हाई स्कूल वालों के लिए 4 वर्ष का और हाई स्कूल वालों के लिए 3 वर्ष का है। जिन्हें दाखिला लेना हो वे अप्रैल के अन्त तक अपने आवेदन पत्र भेज दें। स्थान सीमित रहने से इस वर्ष थोड़े ही छात्र लिए जायेंगे।


वानप्रस्थों की आध्यात्मिक शिक्षा साधना

जिनकी पारिवारिक जिम्मेदारियाँ निवृत्त हो चुकी हैं, बच्चे कमाने-खाने लगे हैं, उपार्जन एवं व्यवस्था का उत्तरदायित्व दूसरों ने संभाल लिया है, नौकरी से निवृत्त होकर पेंशन, फंड आदि की व्यवस्था बना ली है अथवा जिन्हें पैतृक उत्तराधिकार में गुजारे जितनी सम्पत्ति मिल गई है, उनके लिए यही उचित है कि अपना शेष जीवन धन उपार्जन करते रहने की तृष्णा में ही बर्बाद न करे। बाल-बच्चों को प्यार करना उचित है, पर उनके मोह में अपना जीवनोद्देश्य नष्ट करना उचित नहीं। नाती-पोतों को गोदी खिलाते रहने की और आराम से दिन काटने की रीति-नीति निरुद्देश्य निकम्मे व्यक्तियों के लायक है। जिनमें थोड़ा जीवन है, विवेक है, अन्तः प्रकाश है, उन्हें अपनी गतिविधियाँ आदर्शवादिता के ढांचे में ढालनी चाहिए।

जब तक परिवार की जिम्मेदारियाँ अपने सिर पर हैं तब तक घर की सीमा में बंधे रहना ही होता है, पर जब बड़े बच्चे ने घर संभाल लिया तो उसके ऊपर छोटे भाई बहनों की जिम्मेदारी भी चली जाती है। प्राचीन काल में यही प्रथा थी, बड़े बच्चे को उत्तराधिकारी-युवराज बना कर लोग आत्मकल्याण के लिए आत्मोत्थान की दिशा में चल पड़ते थे। वानप्रस्थ जीवन व्यतीत करके अपना और समस्त संसार का भला करते थे। ढलती आयु में वही मार्ग अपनाना हर विवेकशील व्यक्ति के लिए उचित है।

बचपन की लौकिक शिक्षा-साधना जवानी में गृहस्थ को सुखी समृद्धि बनाती है। ढलती आयु में पुनः वैसा ही समय आता है। वानप्रस्थ में आध्यात्मिक शिक्षा-साधना का पुनः वैसा ही अवसर आता है। इससे मरणोत्तर जीवन बनता है। आत्मा को परमात्मा की दिशा में बढ़ने का अवसर मिलता है और समस्त संसार की, देश, धर्म, समाज, संस्कृति की सेवा करने का मंगलमय सौभाग्य मिलता है। जीवनकाल में ढलती आयु के गृह निवृत्त वानप्रस्थ ही लोक निर्माण की समस्त सत्प्रवृत्तियों का संचालन करते थे। वे ही अपने समय एवं समाज के सच्चे नेता और निर्माता होते थे। खेद है कि ढलती आयु के- गृह निवृत्त व्यक्ति भी तृष्णा-वासना के कीचड़ में पड़े सड़ रहे हैं और मानव जाति को उज्ज्वल भविष्य की संभावनाओं से वंचित कर रहे हैं।

उपरोक्त स्तर के व्यक्तियों को शेष जीवन का सदुपयोग करने के लिए विशेष रूप से आमंत्रित किया जा रहा है। उनके लिए एक चार वर्षीय शिक्षा-साधना की समग्र योजना बनाई गई है जो- 1. साधना 2. स्वाध्याय 3. सेवा, इन तीनों भागों में विभक्त है।

1. साधना वर्ग में चार वर्षों के अंतर्गत एक 24 लक्ष्य गायत्री महापुरश्चरण कराया जायेगा। इसके लिए गायत्री तपोभूमि की सिद्ध पीठ हर दृष्टि से उपयुक्त है। यहाँ अखण्ड-ज्योति व नित्य यज्ञ व्यवस्था रहने से तथा गायत्री माता के सान्निध्य में निरन्तर जप पुरश्चरण होते रहने से भूमि में वह प्रभाव है जिससे गायत्री साधना भली प्रकार सफल हो सकती है। साथ-साथ उच्चस्तरीय पञ्चकोषी गायत्री उपासना का भी साधना क्रम चलेगा। अन्नमय कोष, प्राणमय कोष, मनोमय कोष, विज्ञानमय कोष, आनन्दमय कोष इन पाँचों आवरणों के हटने से आत्म साक्षात्कार तथा ब्रह्म निर्वाण का लक्ष्य पूरा होता है। इन कोष के अनावरण से आत्मा की प्रसुप्त अन्तः कक्षायें जागृत होती हैं और ये छिपी पड़ी दिव्य विभूतियों का अनुभव होता है। इस साधना क्रम के आधार पर बढ़ी हुई आत्म शक्ति से साधक आत्मकल्याण का श्रेय प्राप्त करते हुए मानव जाति की, समस्त संसार की महती सेवा कर सकने में समर्थ हो सकता है।

2. स्वाध्याय वर्ग के अंतर्गत गीता, रामायण, वेद, उपनिषद्, दर्शन, धर्मशास्त्र आदि की नियमित शिक्षा चलेगी। चार वर्षों में अध्यात्म, धर्म एवं नीति के संबंध में प्राचीन ऋषियों की आर्य पद्धति का सार एवं निष्कर्ष भली प्रकार समझा जा सकेगा।

इस ज्ञान से अपनी अन्तः चेतना जगेगी, अज्ञान का अन्धकार हटेगा, आत्मा प्रकाशवान होगी, ज्ञान-योग सधेगा तथा वह क्षमता प्राप्त होगी जिसके आधार पर समस्त मानव जाति को चिरस्थायी सुख शाँति का सन्देश दिया जा सकेगा। भविष्य में भारतीय तत्व ज्ञान ही संसार भर का, मानव मात्र का आदर्श बनेगा। इसलिए भारतीय दर्शन एवं तत्व ज्ञान का प्रकाश मानव मात्र तक पहुँचाया जाना आवश्यक है। इस प्रयोजन की पूर्ति वे ही धर्मोपदेशक कर सकेंगे जिन्होंने आर्ष सद्ग्रंथों का ठीक तरह अध्ययन किया हो। अपनी शिक्षा पद्धति इस प्रकार की है, जिसमें संस्कृत का अधिक ज्ञान न होने पर भी उपरोक्त शास्त्रों का अध्ययन नियमित रूप से कराये जाने के कारण इस शिक्षा को पूरी करने के बाद एक कुशल धर्म नेता की आवश्यकता पूरी कर सकने जैसी क्षमता शिक्षार्थी में उत्पन्न हो सकती है।

3. सेवाओं में सर्वश्रेष्ठ सेवा मनुष्य की भावनायें सुधारने तथा प्रवृत्तियाँ विकसित करने की है। प्राचीन काल में साधु ब्राह्मण इसी सेवा धर्म में संलग्न रह कर अपने लिए अक्षय पुण्य लाभ करते और संसार की सुख-शाँति बढ़ाते थे। उनकी इस सेवा के फलस्वरूप ही आज तक इन साधु ब्राह्मणों का कलेवर पहन कर साधारण व्यक्ति भी जनता का सम्मान और अनुराग प्राप्त करते देखे जाते हैं।

अपना समाज आज अनेक दृष्टि से पिछड़ गया है उसको प्रगतिशील बनाने के लिए अनेक रचनात्मक कार्यों का आरंभ एवं संचालन करना पड़ेगा। स्वास्थ्य संवर्धन के लिए व्यायामशालायें, शिक्षा के लिए प्रौढ़ पाठशालायें तथा रात्रि पाठशालायें, ज्ञान वृद्धि के लिए पुस्तकालय, अर्थ व्यवसाय के लिए गृह उद्योग, स्वभाव सद्गुणों का निर्माण करने के लिए संस्कार शिक्षा, नव जागृति के लिए सभा-सम्मेलन, कुरीतियों एवं अनैतिकताओं का विरोध करने के लिए प्रतिरोधात्मक संघर्ष, सत्प्रवृत्तियों का अभिनन्दन, आदि-आदि अनेक रचनात्मक प्रक्रियायें प्रतिष्ठापित, संचालित एवं परिपुष्ट करनी होंगी। वानप्रस्थों को ही भावी लोक नेतृत्व करना है इसलिए उन्हें इस प्रकार की जानकारियाँ, मार्ग की कठिनाइयाँ तथा सफलता की सम्भावनायें विस्तारपूर्वक सिखाई समझाई जायेंगी।

आश्विन की नवरात्रियों में हर वर्ष गीता सम्मेलन का आयोजन हुआ करेगा। जिसमें यही शिक्षार्थी मिल-जुल कर भाषण किया करेंगे। उन्हें अभ्यास हो जायगा कि देश-भर में जब ऐसे सम्मेलनों का आयोजन किया जाना है तो अपने लोग ही मिल-जुल कर किस तरह उनकी आवश्यकता पूरी कर लिया करें। गीता-कथायें, रामायण-कथायें, सत्य नारायण-कथायें अब घर-घर, मुहल्ले-मुहल्ले और गाँव-गाँव आरंभ की जानी हैं। साँस्कृतिक पुनरुत्थान की रीति-नीति यही तो हो सकती है। वानप्रस्थ इस प्रयोजन की पूर्ति के लिए पूरी तरह प्रशिक्षित होंगे।

पुँसवन, नामकरण, अन्नप्राशन, मुण्डन, विद्यारंभ, यज्ञोपवीत, विवाह, वानप्रस्थ, अन्तेष्ठि आदि संस्कार और श्रावणी, विजय-दशमी, दिवाली, गीता जयन्ती, बसन्त पञ्चमी, होली, गंगा दशहरा, गुरु पूर्णिमा आदि त्यौहारों को प्रेरणाप्रद ढंग से मनाने की शिक्षा, गायत्री यज्ञों के आधार पर विशाल धर्म सम्मेलन बुलाने की सफल योजना आदि-आदि धर्म आयोजनों की व्यवस्था एवं प्रक्रिया कैसे पूरी की जा सकती है इसमें यह वानप्रस्थ शिक्षार्थी भली प्रकार प्रशिक्षित किए जायेंगे। ऐसे ही अन्य धर्मानुष्ठानों की शिक्षा इस अवधि में उन्हें मिल जायेगी जिसके आधार पर वे एक सुयोग्य पुरोहित का उत्तरदायित्व संभाल सकें।

जिस प्रकार की शिक्षा-व्यवस्था गायत्री तपोभूमि में की गई है, वैसी ही देश के कौने-कौने में आरंभ की जानी है। इसलिए यह वानप्रस्थ इस विद्यालय में थोड़ा-थोड़ा प्रशिक्षण कार्य भी करेंगे और यहाँ की शिक्षण व्यवस्था को सीखेंगे ताकि यहाँ के जाने के बाद वे ऐसी ही संस्थायें स्वतः रूप में भी चला सकने के योग्य हो सकें।

अन्य शिक्षार्थियों की तरह यह वानप्रस्थ भी अपना निर्वाह खर्च स्वयं वहन करेंगे। निवास व्यवस्था यहाँ है। वे अपनी पत्नी समेत भी रह सकेंगे।


युग बदल रहा है-हम भी बदलें

अखण्ड-ज्योति के किसी अंक में हम एक महत्त्वपूर्ण भविष्यवाणी कर चुके हैं कि अब से तीस वर्ष पश्चात् इस संसार की मानव-समाज की स्थिति आज के सर्वथा भिन्न होगी। युग सर्वथा पलटा हुआ दिखाई देगा सन् 2000 के लगभग इस दुनिया को आज की आँखों में देखा जाए तो सब कुछ बदला हुआ ही दिखाई देगा। यों पिछले तीन सौ वर्षों में विज्ञान की प्रगति ने संसार की बाह्य परिस्थितियों में जमीन आसमान जैसा अंतर ला दिया है। रेल, मोटर, तार, डाक, रेडियो, जलयान, वायुयान, बिजली, कल-कारखाने, सिनेमा आदि मनोरंजन, चिकित्सा आदि की दिशा में जो प्रगति हुई है और उसके कारण जो साधन-सुविधायें बढ़ी हैं उन्हें यदि आज के तीन सौ वर्ष पूर्व का आदमी आकर देखे तो भौचक्का रह जायेगा। उसे यकीन न होगा कि यह वही दुनिया है जिसमें वह रह रहा था। उन दिनों तीर्थ यात्रा के लिए पैदल ही जाना पड़ता था, सड़कें थीं नहीं, बीहड़ मार्गों में से चारों धाम की यात्रा करके कोई विरले ही जीवित लौटते थे। पर आज तो हवाई जहाज की यात्रा करके दो दिन में चारों धाम के दर्शन करके घर लौट आया जा सकता है। इस प्रकार की अगणित साधन-सुविधायें बढ़ जाने से तीन सौ वर्ष पूर्व और अब के सुविधा साधनों में आश्चर्य चकित कर देने वाला परिवर्तन हो गया है।

विज्ञान की क्राँति ने तीन सौ वर्ष में दुनिया का नक्शा बदला है। ज्ञान की क्राँति तीस वर्षों में मानव-जाति की भावनात्मक स्थिति में इसी तरह की आश्चर्य चकित कर देने वाली उलट-पुलट उत्पन्न करेगी। तीस वर्ष बाद के मनुष्य के सोचने, चाहने और करने का तरीका आज से इतना भिन्न होगा कि उसे भावनात्मक युग परिवर्तन कहने में किसी को कोई आपत्ति न होगी।

यह आगामी तीस वर्ष मानव जाति के लिये अत्यधिक कष्टकारक और अशाँति, बेचैनी से भरे हैं, वैसे ही जैसे प्रसव के दिनों में किसी जननी के लिये हर क्षण वेदना और बेचैनी से भरा होता है। परिवर्तन सभी कष्टकर होते हैं। महंगाई, सूखा, अकाल, संघर्ष, अवरोध, अव्यवस्था, की दुःखदायक घटनायें रोज ही देखी सुनी जाती हैं। अगले दिनों और बड़े प्रकृति प्रकोप के लिये, छोटे और बड़े, ठंडे और गरम युद्ध के लिये हमें तैयार रहना चाहिए। निकम्मी मिट्टी जब उपयोगी बर्तनों या खिलौनों के रूप में परिवर्तित होती है तब उसे कुम्हार द्वारा रौंदने, मसलने, पीटने, सुखाने, पकाने की अनेक कष्टसाध्य प्रक्रियाओं में होकर गुजरना पड़ता है। अगले तीस वर्ष में मनुष्य जाति को सुसंस्कृत परिवर्तन के लिये तैयार होने के लिये भाँति-भाँति की प्रताड़नाओं के लिये तैयार होना होगा। यह मनुष्य इतना भला है भी तो नहीं कि समझने से सहज ही मान जाए और कुमार्ग छोड़ कर सन्मार्ग पर चलने लगे। हठवादियों को जिस तरह ठीक किया जाता है प्रकृति हमारे साथ अगले दिनों वही कठोर व्यवहार करने जा रही है।

उपरोक्त तथ्यों से किसी को डरने या परेशान होने की जरूरत नहीं है, वरन् आवश्यकता इस बात की है कि ईश्वर की इच्छा के अनुरूप अपनी गति विधियों का निर्माण कर हम अपने को बुद्धिमान दूरदर्शी एवं सौभाग्यशाली कहलाने का लाभ प्राप्त करें। लंका टूटने वाली, असुर मरने वाले थे, राम जीतने वाले थे, इस तथ्य को जिन रीछ वानरों ने, वे अल्प साधन सम्पन्न होते हुए भी इतिहास में अजर-अमर रहने जैसी भूमिका सम्पादन कर सके। गंगा के अवतरण की संभावना से परिचित भागीरथ ने जो तप किया उससे वे धन्य हो गये। गंगाजी को भागीरथी कहलाना पड़ा। भारत स्वतंत्र होने वाला है, इस संभावना का आभास पाकर जो व्यक्ति आगे बढ़ चले वे तिलक, गाँधी, पटेल, नेहरू, सुभाष आदि के नाम से विख्यात हुए। ईश्वर की इच्छा में सहायक बन कर अग्रिम पंक्ति में चल सकने का साहस एकत्रित कर लेना वस्तुतः बहुत बड़ी बुद्धिमानी है। ऐसे दुर्लभ अवसर कभी-कभी ही आते हैं, जो उन्हें चूक जाते हैं, उनके हाथ केवल पश्चाताप ही शेष रहता है।

अखण्ड-ज्योति परिवार के परिजनों को यह प्रेरणा दी जाती रही है कि वे बदलती हुई संभावनाओं को विवेक की दिव्य दृष्टि से देखें और यह निर्णय करें कि ऐसे मध्यकाल में उनका विशेष कर्त्तव्य है या नहीं? मूढ़ की एक ही पहचान है कि वह जिस ढर्रे में बंध गया उसी में कोल्हू के बैल की तरह घूमता रहता है। वह न अपनी कोई भूल सुधारता है और न किसी श्रेष्ठ संभावना के लिये तैयार होता है। इस स्तर के लोगों से और कहना सुनना बेकार है, वे और सोचने-समझने, छोड़ने, पकड़ने की स्थिति में हैं ही नहीं तो उनसे सिरफोड़ी कौन करे? उन्हें तो प्रकृति के थपेड़े ही रास्ते पर लाते हैं। समझना, समझाना विवेकशील लोगों के लिये ही संभव होता है। सो अखण्ड ज्योति परिवार का संगठन हमने 28 वर्ष के परिश्रम के बाद इसी दृष्टि से किया है कि प्रबुद्ध आत्माएं बदलते युग के अनुरूप अपने कर्त्तव्य धर्म को पहचाने और भी महत्वपूर्ण घड़ियों का विवेकशील लोग जिस तरह उपयोग किया करते हैं वैसे ही वे भी करें।

भगवान् की इच्छा युग परिवर्तन की व्यवस्था बना रही है। इसमें सहायक बनना ही वर्तमान युग में जीवित प्रबुद्ध आत्माओं के लिये सबसे बड़ी दूरदर्शिता है। अगले दिनों में पूँजी नामक वस्तु किसी व्यक्ति के पास नहीं रहने वाली है। धन एवं सम्पत्ति का स्वामित्व सरकार एवं समाज का होना सुनिश्चित है। हर व्यक्ति अपनी रोटी मेहनत करके कमायेगा और खायेगा। कोई चाहे तो इसे एक सुनिश्चित भविष्यवाणी की तरह नोट कर सकता है। अगले दिनों इस तथ्य को अक्षरशः सत्य सिद्ध करेंगे। इसलिये वर्तमान युग के विचारशील लोगों से हमारा आग्रह पूर्वक निवेदन है कि वे पूँजी बढ़ाने, बेटे पोतों के लिये जायदादें इकट्ठी करने के गोरख-धंधे में न उलझें। राजा और जमींदारों को मिटते हमने अपनी आँखों देख लिया अब इन्हीं आँखों को व्यक्तिगत पूँजी को सार्वजनिक घोषित किया जाना देखने के लिए तैयार रहना चाहिए।

भले ही लोग सफल नहीं हो पा रहे हैं पर सोच और कर यही रहे हैं कि वे किसी प्रकार अपनी वर्तमान सम्पत्ति को जितना अधिक बढ़ा सकें, दिखा सकें उसकी उधेड़ बुन में जुटे रहें। यह मार्ग निरर्थक है। आज की सबसे बड़ी बुद्धिमानी यह है कि किसी प्रकार गुजारे की बात सोची जाए। परिवार के भरण-पोषण भर के साधन जुटाये जायें और जो जमा पूँजी पास है उसे लोकोपयोगी कार्य में लगा दिया जाए। जिनके पास नहीं है वे इस तरह की निरर्थक मूर्खता में अपनी शक्ति नष्ट न करें। जिनके पास गुजारे भर के लिए पैतृक साधन मौजूद हैं, जो उसी पूँजी के बल पर अपने वर्तमान परिवार को जीवित रख सकते हैं वे वैसी व्यवस्था बना कर निश्चित हो जायें और अपना मस्तिष्क तथा समय उस कार्य में लगायें, जिसमें संलग्न होना परमात्मा को सबसे अधिक प्रिय लग सकता है।

जो जितना समय बचा सकता है वह उसका अधिकाधिक भाग नव-निर्माण जैसे इस समय के सर्वोपरि पुण्य परमार्थ में लगाने के लिये तैयार हो जाए। समय ही मनुष्य की व्यक्तिगत पूँजी है, श्रम ही उसका सच्चा धर्म है। इसी धन को परमार्थ में लगाने से मनुष्य के अन्तःकरण में उत्कृष्टता के संस्कार परिपक्व होते हैं। धन वस्तुतः समाज एवं राष्ट्र की सम्पत्ति है। उसे व्यक्तिगत समझना एक पाप एवं अपराध है। जमा पूँजी में से जितना अधिक दान किया जाए वह तो प्रायश्चित मात्र है। सौ रुपये की चोरी करके कोई पाँच रुपये दान कर दें तो वह तो एक हल्का सा प्रायश्चित ही हुआ। मनुष्य को अपरिग्रही होना चाहिए। इधर कमाता और उधर अच्छे कर्मों में खर्च करता रहे यही भलमनसाहत का तरीका है। जिसने जमा कर लिया उसने बच्चों को दुर्गुणी बनाने का पथ प्रशस्त किया और अपने को लोभ-मोह के माया बंधनों में बाँधा। इस भूल का जो जितना प्रायश्चित कर ले, जमा पूँजी को सत्कार्य में लगा दे उतना उत्तम है। प्रायश्चित से पाप का कुछ तो भार हल्का होता ही है। पुण्य परमार्थ तो निजी पूँजी से होता है। वह निजी पूँजी है- समय और श्रम। जिसका व्यक्तिगत श्रम और समय परमार्थ कार्यों में लगा समझना चाहिए कि उसने उतना ही अपना अन्तरात्मा निर्मल एवं सशक्त बनाने का लाभ ले लिया।

युग-निर्माण योजना की क्रिया पद्धति इसी धुरी पर घूमती है। हमने अपने प्रत्येक परिजन को गंभीर चेतावनी और प्रबल प्रेरणा के साथ इस दिशा में मोड़ने के लिये प्रयत्न किया है कि यह युग बदलने का अनुपम अवसर है। हममें से हर प्रबुद्ध आत्मा का कुछ विशेष कर्त्तव्य एवं कुछ विशेष उत्तर दायित्व है। भगवान का प्रयोजन पूरा करने में सहयोगी होना वर्तमान युग के जीवित अध्यात्मवादियों के लिये विवेक की सबसे बड़ी चुनौती है। इसे समझा और स्वीकारा जाए।

परमार्थ प्रयोजनों के लिये समय का अभाव केवल एक ही कारण से रहता है कि मनुष्य तुच्छ स्वार्थों को सर्वोत्तम समझता है और उन्हीं की पूर्ति को प्रमुखता देता है। जो कार्य बेकार लगेगा उसी के लिये समय न बचेगा। परमार्थ को बेकार की बात माना जायेगा तो उसके लिये समय कहाँ से बचेगा? भगवान की युग की पुकार को उपेक्षणीय माना जायेगा तो उसके लिए श्रम या धन खर्च करने की सुविधा कहाँ रह जायेगी? अपनी आत्मा को मिथ्या प्रवंचनाओं से नहीं ठगना चाहिए। समय,श्रम या धन न बचने का बहाना नहीं बनाना चाहिए। प्रबुद्ध, विवेकशील एवं जागृत आत्माओं से परमेश्वर कुछ बड़ी आशा करता है। उसी के अनुरूप हमें अपनी गतिविधियों को मोड़ना चाहिए।

शेष जीवन किस प्रकार किस क्रम से खर्च करें, यह एक अत्यन्त महत्वपूर्ण प्रश्न है। अपने स्नेही सहचरों को इस प्रश्न के हल करने में सहायता देने के लिये ही एक व्यवस्थित योजना सामने प्रस्तुत हुई है। उसकी अपेक्षा करके हम अपने विवेक एवं सौभाग्य का ही तिरस्कार करेंगे। ऐसा होना नहीं चाहिए। हमें परिवार के आवश्यक उत्तर दायित्वों को पूरा करने में जितनी शक्ति लगाना अनिवार्य है, उसके अतिरिक्त जो भी बचे उस समय, श्रम एवं धन को उस प्रयोजन में लगा देना चाहिए जिससे मानव जाति का भविष्य निर्माण करने का संतोष और सम्मान हमें मिल सके। सोचते-विचारते बहुत दिन बीत गये अब समय आ पहुँचा है जबकि साहसपूर्वक अपने आपको ही परिवर्तित कर डालना चाहिए। अपने आपको परिवर्तित करके ही हम युग परिवर्तन की भूमिका सच्चे अर्थों में प्रस्तुत कर सकेंगे।


पंच वर्षीय योजना के पाँच कार्यक्रम

नव निर्माण का जो शुभारंभ इन दिनों किया गया है वह अगले तीस वर्षों में पूरी तरह शाखा प्रशाखाओं समेत विशाल वट वृक्ष के रूप में पल्लवित, पुष्पित और फलित होगा। पर उसका महत्वपूर्ण भाग बीजारोपण तो आज ही करना है। साँस्कृतिक पुनरुत्थान का जो विशाल भवन खड़ा होने जा रहा है उसकी नींव तो इन्हीं दिनों भरी जा रही है। हमारे जीवन के अन्तिम अध्याय का यह अतीव सौभाग्य भरा सुअवसर है, जबकि पिछले 30 वर्षों में युग-निर्माण की पृष्ठभूमि बनाने के उपरान्त अब उसे व्यवस्थित क्रिया-कलाप का रूप दे रहे हैं।

यह हमारी प्रथम पंच वर्षीय भावात्मक नव-निर्माण की युग परिवर्तन की योजना है। हमारी हार्दिक इच्छा यह है कि अपने परिवार का प्रत्येक सदस्य इसमें सच्चे मन से भाग ले। यों हम जिस जमाने में रह रहे हैं वह बड़ी दुर्बल मनोभूमि वाले, आन्तरिक दृष्टि से छोटे, संकीर्ण, ओछे और बौने लोगों का जमाना है। इन दिनों दृढ़ संकल्प किन्हीं विरलों में ही दीख पड़ते हैं। जिनका थोड़ा मन अच्छे कामों की ओर चलता है वे भी क्षणिक आवेश के बाद अपनी गर्मी खो बैठते हैं और उसी पुराने निर्जीव ढर्रे पर घूमने लगते हैं। ऐसे लोग अपने परिवार में भी कम नहीं, फिर भी उसमें जीवित और जागृत लोगों का बाहुल्य है। ऐसी प्रत्येक प्रबुद्ध आत्मा से हमें यही आशा है कि वे इस ऐतिहासिक अवसर पर अपनी भूमिका एवं जिम्मेदारी का सही ढंग से निर्वाह करेंगे और इस योजना को सफल बनाने में सच्चे मन से योग देंगे।

हमें केवल एक ही पंचवर्षीय योजना पूरी करानी है। शेष चार को हमारे उत्तराधिकारी पूरी करेंगे। पाँच-पाँच वर्ष की पाँच योजनाओं में हम विश्व के नये निर्माण का स्वप्न पूर्ण तथा साकार होने का विश्वास रखते हैं और यह मान ही लेना चाहिए कि यह संभावना सुनिश्चित रूप में पूरी होकर रहेगी। योजना के प्रथम चरण में हमने साथी स्वजनों को प्रबल अनुरोध के साथ हमारे कदम से कदम मिला कर चलने के लिये आह्वान किया है। आशा यही करनी चाहिए कि इसे सहायक स्वजन अस्वीकार न करेंगे।

इन पाँच वर्षों में प्रथम वर्ष की योजना इस अंक के साथ प्रस्तुत की जा रही है। अगले चार वर्षों में इसी प्रकार एक-एक वर्ष का कार्यक्रम प्रस्तुत किया जाता रहेगा। सन् 67 में कार्य आरंभ होकर सन् 72 का राष्ट्रीय चुनाव कराने के उपराँत हम अपनी इन स्थूल गति-विधियों को विश्राम दे देंगे। दूसरी अगली पंच वर्षीय योजना दूसरों को आरंभ करनी है। वे दूसरे लोग वे होंगे जो इस योजना में समुचित सहयोग देकर अपनी आन्तरिक, समर्थता परिपुष्ट कर लेंगे।

प्रथम पंच वर्षीय योजना के प्रथम वर्ष में पाँच कार्यक्रम रखे गये हैं। जिनमें से तीन की चर्चा पिछले पृष्ठों पर हो चुकी है। 1. उच्चस्तरीय उपासना 2. भावनात्मक नव निर्माण का ज्ञान यज्ञ 3. जीवन निर्माण की सर्वांगपूर्ण शिक्षा। इन तीनों का स्वरूप हमें भली-भाँति समझ लेना चाहिए।

1. फरवरी अंक में प्रस्तुत जिस उच्चस्तरीय गायत्री उपासना की प्रेरणा दी गई है वह जितनी सरल है उतनी प्रखर भी है। उसे श्रद्धापूर्वक अपनाये रहने वाले के अन्तःकरण में प्रेम तत्व का ऐसा निर्झर उद्भूत होगा जिससे वह स्वयं भी आनन्द उल्लास से ओत-प्रोत रहे और अपने साथियों को भी स्नेह सौहार्द में द्रवित कर दे। यही सच्चा भक्तियोग है। प्रथम वर्ष में जो शिक्षण है उसे ठीक तरह कर लिया गया तो अगले वर्ष और भी अधिक प्रेरक प्रकाश प्राप्त करने का मार्ग दर्शन मिलेगा और इस प्रकार पाँच वर्ष में उपासक की मनोभूमि में आशाजनक उत्कर्ष दृष्टिगोचर होगा। इसी उपासना का अविच्छिन्न अंग है आत्म विकास। प्रातः सोकर उठते ही और सोते समय जिस विचारणा के द्वारा जीवन-क्रम व्यवस्थित किया जाता है उसे उपासना का अनिवार्य अंग माना जाए। हम जितने-जितने सुसंस्कृत, सुव्यवस्थित होते चलेंगे उतनी ही हमारी उपासना सफल होगी।

2. योजना का दूसरा अंग है भावनात्मक नव-निर्माण के प्रारंभ में किया गया ज्ञान-यज्ञ, भगवान को मन्दिरों तथा ध्यान भूमिका में जिस प्रतिमा के साथ देखा जाता है वह तो उसके स्मरण का आरंभिक प्रयास मात्र है। वस्तुतः भगवान मनुष्य के अन्तःकरण में उच्च भावनाओं का रूप धारण करके ही उपस्थित होता है। किसी को भगवान मिला कि नहीं, इसकी पहचान यह नहीं है कि स्वप्न में या अर्ध तन्द्रा में अमुक कल्पित छवि के दर्शन हुए या नहीं, यह तो मस्तिष्क की एक सुखद सी लहर मात्र है। असली भगवान की प्राप्ति तब समझनी चाहिए जब ऊंची से ऊंची भावनाएं आत्मा में उठने लगें, तब समझना चाहिए कि असली भगवान का प्रकाश जीवन में आ गया। जो ध्यान जप तो घण्टों करें पर जिसके अन्तःकरण में स्वार्थ, संकीर्णता, आलस्य, अवसाद जैसी कमीनी प्रवृत्तियाँ भरी पड़ी हों, समझना चाहिए कि वह व्यक्ति अभी भगवान से लाखों कोस दूर है।

जन-जन के मन-मन में भगवान की प्रतिष्ठापना करने की महानतम भक्ति-भावना का प्रकाश हमें देवर्षि नारद के, भगवान बुद्ध, शंकराचार्य एवं प्राचीनकाल के सच्चे साधु ब्राह्मणों के पद-चिन्हों पर चल कर करना होगा। युग-निर्माण योजना के अंतर्गत युग परिवर्तन की समस्त संभावनाओं में परिपूर्ण अत्यन्त तेजस्वी साहित्य का सृजन किया जा रहा है। इसका प्रसार अपने परिवार एवं परिचय क्षेत्र में करने की जो कार्य पद्धति चल रही है उसे अग्रसर करके प्रस्तुत ज्ञान यज्ञ को सफल बनाने में हमें आवश्यक योगदान देने, एक घंटा समय-दस पैसा रोज खर्च करने की जो प्रेरणा दी गई है, वह देखने में छोटी बात भले ही लगे पर उसका परिणाम इतना महान, इतना उत्साहवर्धक हो सकता है कि उसे संसार का ऊंचे से ऊंचा परमार्थ कहने में भी कोई अत्युक्ति नहीं मानी जा सकती।

3. योजना का तीसरा अंग है-जीवन निर्माण की शिक्षा का व्यापक एवं व्यवस्थित आयोजन। उत्कृष्ट व्यक्तियों का निर्माण उत्कृष्ट स्तर की शिक्षा ही कर सकती है। शिक्षा का उद्देश्य पेट पालन की कला में प्रवीणता उत्पन्न करना ही नहीं, व्यक्तियों में महानता उत्पन्न करना भी होना चाहिए। इस दृष्टि से आज की शिक्षा प्रणाली को सर्वथा असफल ही कहा जा सकता है। हमें मानव जाति के सम्मुख नई शिक्षा पद्धति उपस्थित करनी है।

जून में मथुरा में जिस प्रशिक्षण व्यवस्था को आरंभ करने की घोषणा है कि वह एक शुभारंभ एवं क्रियात्मक मार्ग दर्शन मात्र है। यहाँ प्रयोग किए जायेंगे और यहाँ से वे अध्यापक, उपाध्याय तैयार किये जायेंगे जो देश भर में इस स्तर की शिक्षा पद्धति का अपने-अपने क्षेत्रों में प्रसार करें। हम गुरुकुल विद्यालय चलाते, पर हमारे साधन बहुत स्वल्प हैं। गायत्री तपोभूमि में एक सौ से अधिक छात्रों को रखने एवं पढ़ाने का स्थान नहीं है। इसलिए हम प्रधानतया एक वर्षीय शिक्षा को ही प्रमुखता देते जा रहे हैं। 18 से लेकर 50 वर्ष तक के ऐसे व्यक्ति उसमें पढ़ेंगे जो स्वावलम्बन पूर्वक अपनी आजीविका चलाने की कला सीखकर अपना शेष समय रचनात्मक कार्यों में लगावें। इस शिक्षण में यों 1. प्रेस व्यवसाय-रबड़ की मुहरें तथा 2. साबुन मोमबत्ती यह दो ही कार्य रखने की घोषणा की गई है। परन्तु प्रयत्न यह कर रहे हैं कि इसी स्तर के दस-बारह उद्योग सिखाने का प्रबंध हो जाए। जिससे, जिन्हें जो उद्योग अपनी परिस्थिति के अनुरूप अनुकूल लगे उसे वे अपना सकें। अपने स्त्री-बच्चों के द्वारा उस गृह-उद्योग को अपने घर में चलाने की व्यवस्था करके आजीविका का प्रश्न हल कर लें, और शेष समय नव निर्माण की विचार धारा को व्यापक बनाने में लगावें। संभव हो तो इसी स्तर का विद्यालय भी अपने क्षेत्र में चलावें ताकि वहाँ के लोगों को आजीविका तथा स्वावलम्बन की दिशा में प्रगति करके इन निर्माणात्मक कार्यों में योग देने की सुविधा मिल सके।

ढलती आयु के गृह निवृत्तों को झकझोरे बिना राष्ट्र को सच्चा नेतृत्व नहीं मिल सकेगा। नौकरी के लिए समाज सेवा करने वाले अपना गौरव खो बैठते हैं। इसलिये उनके ऊपर परिवार की आर्थिक जिम्मेदारी नहीं रही, उन्हें समाज की बहुमूल्य सम्पत्ति ही माना जायेगा। इसकी बर्बादी नहीं ही होने देनी चाहिये। इस स्तर के लोग मोहग्रस्त स्थिति में पड़े घरों में घुसे सड़ते रहें तो इसे मानव समाज का एक दुर्भाग्य ही कहा जा सकता है। इस वर्ग को प्रशिक्षित करके आत्म-कल्याण और विश्व कल्याण के लिए सुयोग्य बनाना चार वर्षीय वानप्रस्थ शिक्षण का उद्देश्य है। आशा करनी चाहिए कि इस प्रशिक्षण में आये हुए व्यक्ति ‘निकम्मे, बुढ़ऊ’ की घृणित स्थिति से उठ कर राष्ट्र के भाग्याकाश में उज्ज्वल नक्षत्रों की तरह चमकेंगे। वे यहाँ से जाने के बाद अपने-अपने क्षेत्रों में जीवन निर्माण की शिक्षा व्यवस्था का भी आयोजन करेंगे।

पन्द्रह से अठारह वर्ष तक की आयु में लड़कों का एक वर्ग ही आरंभ किया जा सके तो बहुत है। नमूने के लिए हम लोगों को बताना चाहते हैं कि किशोरवय सबसे महत्त्वपूर्ण, सबसे भयानक समय है। इसी अवधि में लड़कों का स्वभाव एवं चरित्र बनता बिगड़ता है। इस वय को संभाल लिया गया-तो समझना चाहिये कि उज्ज्वल भविष्य की सारी संभावनाएं मूर्तिमान होंगी। अन्यथा यदि बिगड़ने की और पैर बढ़े तो सर्वनाश सत्यानाश निश्चित है। किशोरों का निर्माण एक बहुत बड़ी जीवन कला है। इस कला का प्रयोगात्मक स्वरूप लोगों के सामने हम रखने जा रहे हैं ताकि लोग इस पद्धति की समग्र रूप-रेखा, देख समझ सकें।

वस्तुतः यह मथुरा में आरंभ किया जा रहा प्रशिक्षण एक मार्ग दर्शक नमूना भर है। यह व्यवस्था देश के कौने-कौने में, गाँव-गाँव में बनानी होगी। तपोभूमि में 100 छात्रों का स्थान मुश्किल ही है। यहाँ सारा देश कैसे पढ़ेगा? अभी तो 3 से 5 वर्ष वाले छात्रों के शिशु मन्दिर और 5 से 15 वर्ष तक की प्राथमिक, माध्यामिक शिक्षा व्यवस्था बनाई, चलाई जानी है, जिनका प्रयोग मथुरा में ही नहीं वरन् अन्यान्य स्थानों पर जहाँ साधन होंगे वहाँ होना है।

कार्य अत्यन्त विशाल है, उसे कैसे किया जाए, इसका मार्गदर्शन करने, व्यावहारिक स्वरूप बताने के लिए मथुरा में जून से शुभारंभ किया जा रहा है, इसे सफल बनाने के लिए प्रयत्न करना हर अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्य का पवित्र कर्त्तव्य है। इन समस्याओं पर विस्तृत विचार-विनिमय करने के लिये उन्हें 14 दिन के शिविर में 9 से 22 जून तक मथुरा आना आवश्यक है। तथा जो प्रौढ़, किशोर, वृद्ध उपर्युक्त तीनों शिक्षाओं के उपयुक्त जान पड़े, उनसे व्यक्तिगत संपर्क स्थापित करके इन प्रशिक्षणों में सम्मिलित होने की प्रेरणा देनी चाहिए। अध्यापक, चिकित्सक या ऐसे ही दूसरे वे लोग जिनका जन-संपर्क अधिक रहता है, यदि आवश्यक दिलचस्पी लें तो अच्छे शिक्षार्थी अभीष्ट मात्रा में उपलब्ध हो सकेंगे, यह प्रक्रिया यदि ठीक से चल पड़ी तो युग-निर्माण योजना का एक महत्वपूर्ण अंग पूरा होने लगेगा।

4. हमारी प्रथम पंचवर्षीय योजना के प्रथम वर्षीय कार्यक्रम का चौथा अंग है- प्रबुद्ध व्यक्तियों के जन्म दिन मनाना। पिछले कई अंकों के कई लेखों में तथा ट्रैक्टों में इस बात पर बहुत जोर दिया गया है कि प्रबुद्ध परिजनों को जन्म दिन मनाने की प्रेरणा दी जाए। यह प्रक्रिया जहाँ भी आरंभ हुई है वहाँ बड़े उत्साहवर्धक परिणाम निकले हैं। 1. जिसका जन्म दिन मनाया जाता है उसे उस दिन अपने जीवन की महत्ता समझने और भावी जीवन को अधिक सुन्दर ढंग से बिताने के लिए कदम उठाने की प्रेरणा मिलती है। 2. मित्रों, कुटुम्बियों एवं गुरुजनों द्वारा आशीर्वाद, अभिवादन, पुष्प उपहार, दीपदान, जल-पान आदि के आकर्षक कार्यक्रम द्वारा जिसका जन्मदिन होता है उसे बहुत उत्साह मिलता है जो प्रगति की प्रेरणा देने में उपयोगी सिद्ध होता है। 3. इस आयोजन से उस व्यक्ति से संपर्क रखने वाले जो नये लोग आते हैं, उनमें यह विचार धारा फैलने का अवसर मिलता है। 4. साप्ताहिक हवनों की अपेक्षा यह घर-घर पर होने वाले सत्संग सम्मेलन अधिक सफल होते हैं और उससे संस्था का संगठन बढ़ता एवं मजबूत होता है।

इन लाभों पर ध्यान रखते हुए जहाँ जितने अखण्ड-ज्योति सदस्य हैं उन सबका जन्म दिन मनाने की व्यवस्था हर जगह बना ली जाए। छोटे बच्चों के जन्म दिन मनाने का आरंभ संस्था के जिम्मे पर छोड़ा जाए, यह कार्य उनके माता-पिता का है। संगठित रूप में केवल वयस्कों के जन्म दिन मनाये जाएं जिससे उन्हें कुछ प्रेरणा दी जा सके। बच्चों के जन्म दिन तो एक खुशी मनाना मात्र है। उपर्युक्त प्रयोजन तो परिवार के वयस्क व्यक्तियों के जन्म दिन मनाने से ही पूरा होता है। हर जगह यह प्रचलन आरंभ किया जाए। अखण्ड-ज्योति का एक भी सदस्य ऐसा न बचे जिसका जन्म दिन न मनता हो।

अब हम स्वयं अपने परिजनों के जन्म दिन अपनी पूजास्थली पर बैठकर मनाया करेंगे और उनके लिये विशेष प्रेरणा एवं विशेष आशीर्वाद भेजा करेंगे। उसके लिए अखण्ड-ज्योति परिवार के सभी सदस्यों की जन्म-तिथियाँ मंगाई जा रही हैं। जो पंचवर्षीय स्थायी सदस्यता फार्मों के साथ लिख चुके हैं, उन्हें छोड़कर शेष सभी अखण्ड-ज्योति के सदस्य अपनी जन्म-तिथि महीना, सन-संवत् सहित लिखकर भेज दें। उस अवसर पर हम उन्हें प्रेरणाप्रद संदेशों से भरी एक छोटी उपहार पुस्तिका भी भेजा करेंगे। पाँच वर्ष तक यह पुस्तिकाएं हमारे एक चिर-स्मरणीय उपहार की तरह जिनके पास रहेंगी, वे उनसे आजीवन महत्वपूर्ण प्रेरणाएं प्राप्त करते रहेंगे। हमें भी इस निमित्त से साल में एक बार उनका विशेष स्मरण आया करेगा और उनसे अपनी आत्मीयता का आनन्द अधिक मात्रा में उपलब्ध कर लिया करेंगे।

5. योजना का पाँचवा अंग है-भावनात्मक नव-निर्माण का सर्वांगपूर्ण साहित्य सृजन एवं उसका व्यापक प्रसार। अब तक अखण्ड-ज्योति एवं युग-निर्माण पत्रिकाओं द्वारा एक छोटे क्षेत्र में अपने परिचित परिजनों में हम युग के अनुरूप अध्यात्म तत्व ज्ञान का प्रसार करते रहें है। आगे यह क्षेत्र अत्यन्त व्यापक और विशद् बनना है। हमारे सामने समस्त राष्ट्र, समस्त विश्व, समस्त मानव समाज है, उसका सर्वांगीण भावनात्मक परिवर्तन करने के लिए अभिनव प्रेरणाओं का क्षेत्र भी उसी अनुपात से बड़ा किया जाना है। अत्यंत सस्ते, लागत मात्र मूल्य के ट्रैक्टों को इस प्रयोजन की पूर्ति के लिए उपयुक्त समझा गया है। 70 ट्रैक्ट सितम्बर में छपे थे। लगभग 100 और नये मई-जून तक छप जायेंगे। यह विचारात्मक निबंध ट्रैक्ट हैं। आगे जीवन चरित्रों की, कला साहित्य की कविताओं की प्रेरणाप्रद ट्रैक्ट मालाएं भी उसी योजना के अंतर्गत प्रकाशित होने जा रही हैं। कमरों में लगाने के छोटे-बड़े साइज के आदर्श वाक्य भी छपेंगे जो भिन्न स्तर के वातावरण में फिट बैठ सके। इस समस्त साहित्य का एक-एक अक्षर ऐसा प्रखर एवं प्रेरणाप्रद होगा जो पढ़ने वाले की विचारधारा पर सीधी चोट करे, उसे अनुपयुक्त ढंग से सोचने का तरीका बदल कर सही ढंग से विचार करने की रीति-नीति विदित हो जाए। विचार क्राँति का महान प्रयोजन यह साहित्य पूरा करेगा। इसे पढ़ों को पढ़ाया जाना और अनपढ़ों को सुनाया जाना एक आवश्यक कार्य है, जो हमें ही पूरा करना है।

लिखने-लिखाने की व्यवस्था की जा रही है। हिन्दी में लिखे-छपे इस साहित्य को भारत की 14 भाषाओं में अनुवादित प्रकाशित किया जाना है। इतना ही नहीं, इसे संसार की समस्त भाषाओं में भी प्रस्तुत किया जायेगा।

अखण्ड-ज्योति के वर्तमान पाठकों से गत अंक में अनुरोध किया गया था कि वे हिन्दी के अतिरिक्त किसी अन्य भाषा पर अच्छा अधिकार रखते हों, और साहित्य की दृष्टि से ऊंचे स्तर का अनुवाद कर सकते हों तो वे अपनी सेवाएं हमें दें। कई सज्जनों के पत्र भी आये हैं। अभी इतना ही करना चाहिये कि अखण्ड-ज्योति के किसी लेख का अनुवाद करके वे हमारे पास उस भाषा में भेज दें। उससे अनुमान लगाया जायेगा कि उनका साहित्यिक ज्ञान एवं अनुवाद प्रवाह किस स्तर का है। घटिया लड़खड़ाती, अस्त-व्यस्त भाषा के अनुवाद उपयुक्त न होंगे। उनसे आवश्यक प्रयोजन पूरा न होगा। इसलिए प्रथम परीक्षण के बाद जिनसे अनुवाद करने का अनुरोध किया जाए उन्हें ही वह कार्य हाथ में ले लेना चाहिये। अपनी ही इच्छा से कोई अनुवाद शुरू नहीं कर देना चाहिये। क्योंकि एक क्रमबद्ध व्यवस्था के साथ ही अनुवाद होंगे। एक ही पुस्तक को कई व्यक्ति अपनी मनमर्जी से अनुवाद करने और भेजने लगें तो एक को छोड़कर सबका परिश्रम व्यर्थ चला जायेगा। गुजराती, मराठी, बंगला, अंग्रेजी, तमिल, तेलगू इन छः भाषाओं को प्रथम हाथ में लिया है। जिन्हें इनका अच्छा ज्ञान हो वे कोई भी अखण्ड ज्योति का एक लेख अनुवाद करके भेज दें। उसी को देख कर उन्हें आगे शुरू करने के लिये अनुरोध किया जायेगा।

यह कार्य अत्यन्त विशद् एवं महान् है। ईसाई मिशन ने अपना धर्म समस्त विश्व में लगभग 600 भाषाओं में अनेक सस्ती पुस्तकों द्वारा पहुँचाया है। हमें भी इस मार्ग का अनुकरण करना होगा। जहाँ लिखने-छापने का प्रश्न काफी पेचीदा है, वहाँ इसका प्रसार भी नये ढंग से गठित करना होगा। वर्तमान पुस्तक विक्रेता इसे बेचने को तैयार नहीं होते। क्योंकि यह चीज जन-रुचि की नहीं, गन्दे उपन्यासों की तरह अंधाधुंध नहीं बिकती। फिर इनमें कमीशन की भी बहुत स्वल्प गुंजाइश है। ऐसी दशा में इनके विक्रय प्रसार की मशीन भी अपनी निज की ही गठित करनी पड़ेगी। जो सज्जन किसी अन्य वस्तु की दुकान चलाते हैं वे एक अलमारी इस साहित्य की भी रख सकते हैं और जो भी ग्राहक आवे उससे इस साहित्य की भी चर्चा एवं प्रेरणा कर सकते हैं।

कुछ सज्जन इस कार्य में पूरी तरह संलग्न होकर सेवा भाव से तथा थोड़ी आजीविका कमाने के लिए भी इस महान कार्य में जुट सकते हैं। सबेरे से दोपहर तक थैलों में भरकर शिक्षा-संस्थाओं तथा पढ़े-लिखे लोगों में इस साहित्य को दिखाने ले जा सकते हैं। शाम को 3-4 घंटे बाजार में या अपनी बैठक में पुस्तकालय एवं विक्रय विभाग चला सकते हैं। ढकेलने की गाड़ी में सजा कर भी इसे उपयुक्त लोगों के पास, पार्कों के समीप, मेले-ठेलों में ले जाया जा सकता है। इस तरह से थोड़ी आजीविका कमा लेंगे और उस पर सन्तोषपूर्वक गुजर करना वैसा ही है जैसा प्राचीनकाल के ऋषि कन्द-मूल, फल, घास के बीज खाकर अपना गुजारा कर लेते थे और जीवन को जन-कल्याण के कार्यों में समर्पित किये रहते थे। इस गतिविधि को अपनाने वाले लोग अपने परिवार में से निकलने चाहिये। हर शहर, कस्बे में अपने ऐसे कार्यकर्त्ता होने चाहिए। इस आवश्यकता की पूर्ति के लिये उपयुक्त कार्यकर्त्ताओं की तलाश अभी से की जानी चाहिये। यह विक्रय विभाग संभवतः जून के बाद काम करने लगेंगे। तब तक उतनी संख्या में ट्रैक्ट हो जायेंगे, जिनके आधार पर विक्रय की उपर्युक्त प्रकार की व्यवस्था बन सके। इसलिए इस संदर्भ में पूरा या अधूरा समय लगाकर कुछ कार्य कर सकने वाले सज्जन अभी से पत्र-व्यवहार करना आरंभ कर सकते हैं।

उपर्युक्त पाँच कार्यक्रम हमारी प्रथम पंचवर्षीय योजना के पहले वर्ष के हैं। इनके शुभारंभ में प्रत्येक परिजन को यह विचार करना है कि वह किस प्रकार उसमें योगदान कर सकता है। आत्म-निर्माण और समाज-निर्माण के दोनों मोर्चों पर परिवार के प्रबुद्ध व्यक्ति को अपना कर्त्तव्य निर्धारित करना चाहिए। हम में से एक भी ऐसा न रहे जो इस युग के इस महानतम अभियान में निरपेक्ष होकर अलग बैठा रहे। संस्कृति-सीता को वापिस लाने का त्रेता युगी अभियान, रीछ-बन्दरों के ही नहीं-बालों में धूलि भर कर समुद्र पाटने में सहायता करने वाली गिलहरी तक के सहयोग से आगे बढ़ा था। युग-निर्माण अभियान भी अखण्ड-ज्योति परिवार के हर प्रबुद्ध सदस्य से उसकी स्थिति के अनुरूप सहयोग की अपेक्षा करेगा।

उपर्युक्त पाँच कार्यक्रम हमारी प्रथम पंचवर्षीय योजना के पहले वर्ष के हैं। इनके शुभारंभ में प्रत्येक परिजन को यह विचार करना है कि वह किस प्रकार उसमें योगदान कर सकता है। आत्म-निर्माण और समाज-निर्माण के दोनों मोर्चों पर परिवार के प्रबुद्ध व्यक्ति को अपना कर्त्तव्य निर्धारित करना चाहिए। हम में से एक भी ऐसा न रहे जो इस युग के इस महानतम अभियान में निरपेक्ष होकर अलग बैठा रहे। संस्कृति-सीता को वापिस लाने का त्रेता युगी अभियान, रीछ-बन्दरों के ही नहीं-बालों में धूलि भर कर समुद्र पाटने में सहायता करने वाली गिलहरी तक के सहयोग से आगे बढ़ा था। युग-निर्माण अभियान भी अखण्ड-ज्योति परिवार के हर प्रबुद्ध सदस्य से उसकी स्थिति के अनुरूप सहयोग की अपेक्षा करेगा।

फार्म 4

1. प्रकाशन का स्थान- मथुरा

2. प्रकाशन का अविध क्रम- मासिक

3. मुद्रक का नाम- श्रीराम शर्मा आचार्य

राष्ट्रीयता- भारतीय

पता- जन जागरण प्रेस, मथुरा।

4. प्रकाशक का नाम- श्रीराम शर्मा आचार्य

राष्ट्रीयता- भारतीय

पता- अखण्ड-ज्योति संस्थान, मथुरा

5. सम्पादक का नाम- श्रीराम शर्मा आचार्य

राष्ट्रीयता- भारतीय

पता- अखण्ड-ज्योति संस्थान, मथुरा

6. स्वत्वाधिकारी- श्रीराम शर्मा आचार्य,

अखण्ड ज्योति संस्थान, मथुरा अखण्ड-ज्योति संस्थान, मथुरा

मैं, श्रीराम शर्मा आचार्य यह घोषित करता हूँ कि ऊपर दिए गए सब विवरण मेरी अधिकतम जानकारी और विश्वास के अनुसार सत्य हैं।

(हस्ता.) श्रीराम शर्मा, आचार्य

(हस्ता.) श्रीराम शर्मा, आचार्य


छोटा किन्तु महान् शुभारंभ

पाँच तत्वों से शरीर बनता है, इसलिए शरीर रचना में मिट्टी पानी, हवा, आग, आकाश का योगदान अनिवार्य है। यदि इन तत्वों का समन्वय न हो तो शरीर का निर्माण ही न हो सके। इसी प्रकार शरीर-रक्षा के लिए भोजन, वस्त्र, निद्रा, साँस, सफाई, की पाँचों क्रियायें आवश्यक हैं। इनकी व्यवस्था न हो तो पाँच तत्वों से बन जाने पर भी शरीर जीवित न रह सके। इन तथ्यों पर विचार करने से स्पष्ट हो जाता है कि जीवन का आरंभ पाँच तत्वों का एकीकरण होने पर और उस जीवन की रक्षा पाँच उपकरण होने पर ही संभव है। यह दोनों ही व्यवस्थायें जीवन धारण की दृष्टि से नितान्त आवश्यक हैं।

इतने पर भी यह नहीं कहा जा सकता है कि शरीर निर्माण एवं उसे जीवित रहने के साधन बन जाने पर जीवन का शरीर धारण का उद्देश्य पूरा हो गया। मानव शरीर किसी महान प्रयोजन के लिए मिला है, उस लक्ष्य पूर्ति में यदि जीवन गतिविधियाँ संलग्न हों तो ही यह माना जायेगा कि शरीर धारण की प्रक्रिया सार्थक हुई। भगवान का राजकुमार मानव प्राणी अपने पिता के इस परम सुरम्य संसार की अव्यवस्था दूर कर उसे सुन्दर, सुरम्य, सुविकसित बनाने आता है। पिता का राज्य कुत्सित एवं गर्हित परिस्थितियों से भरा न रहे यह देखना और व्यवस्थाओं का संचालन राजकुमार का काम है। उत्तराधिकार में जहाँ राजकुमार को अनन्त वैभव मिलता है वहाँ उसे जिम्मेदारियाँ भी उठानी पड़ती हैं। उन जिम्मेदारियों को ठीक तरह वहन करने के लिए एक सर्वांगीणपूर्ण साधन-यंत्र चाहिए, वही शरीर है। शरीर सबसे महत्वपूर्ण सबसे बड़ा सर्वांगपूर्ण साधन है, जिसके माध्यम से जीव के लिए अपना प्रयोजन पूरा कर सकना संभव होता है। शरीर न हो तो आकाश में घूमता हुआ बेचारा वायुभूत जीव इस सृष्टि की सुव्यवस्थिता में-अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी करने में-भला कैसे सफल हो सकेगा?

ठीक यही बात युग परिवर्तन के-भावनात्मक नव-निर्माण का प्रयोजन पूरा करने के-महान लक्ष्य के संबंध में लागू होती है। इस योजना के अंतर्गत विश्व का सर्वांग, सुन्दर नव निर्माण किया जाना है। इस प्रयोजन की सिद्धि के लिए आवश्यक आधार की, अभीष्ट पृष्ठभूमि की आवश्यकता होगी। वह न हो तो फिर योजना को मूर्त रूप कैसे मिलेगा? व्यक्ति और समाज की अभिनव रचना करने के लिए उत्कृष्टा स्तर के व्यक्तित्व चाहिएं। इट, चूना न हो तो इमारत कैसे बने? सूत, कपास न हो तो कपड़ा कहाँ से बने? अन्न, जल न हो तो भोजन किस प्रकार बने? बाँस और फूँस न हो तो छप्पर किस तरह छाया जाए? युग परिवर्तन के लिए भावनाशील और कर्मठ व्यक्ति चाहिए। यह दो गुण जिनमें होंगे वे ही युग-निर्माण की भूमिका सम्पादन कर सकेंगे, अन्यथा वाणी और लेखनी के द्वारा किये जाने वाले प्रयत्न एक विडम्बना बन कर रह जायेंगे।

युग-निर्माण की प्रथम पंचवर्षीय योजना के प्रथम वर्ष में कार्यान्वित करने के लिए जो पाँच कार्यक्रम प्रस्तुत किए गए हैं उन्हें भूमि निर्धारण कहना चाहिए। कोई सुन्दर उद्यान लगाना हो तो पहले जमीन को उसके उपयुक्त बनाना पड़ता है। झाड़-झकाँड काटना, समतल करना, मेंड़ बाँधना, खाद देना, जोतना इन पाँच संस्कारों के द्वारा जब भूमि का निर्धारण पूरा हो जाता है तब उसमें जिस प्रकार के पौधे उगाने हो उनका आरोपण किया जाता है। ऊसर भूमि में तो कोई भी पौधा लगाया जाए वह सूख ही जायेगा। आज जन-मानस की स्थिति ऊसर भूमि की तरह है। रोज-रोज भाषण, प्रवचन सुनने, लेख, ग्रंथ पढ़ने पर भी मन जहाँ का तहाँ रहता है। चिकने घड़े पर जैसे पानी नहीं ठहरता वैसे ही उत्कृष्टता के आदर्शों को लोग सुन समझ तो लेते हैं पर उन्हें ग्रहण रत्तीभर भी नहीं करते। इस कान से सुन उस कान से निकाल देने वाली उक्ति ही सर्वत्र चरितार्थ होती दीखती है। कठोर जमीन पर विपुल पानी की वर्षा भी बहुत काम नहीं करती। जिस जमीन में थोड़ा पोलापन होगा उसी में वर्षा का जल प्रवेश करेगा और उसी में पौधे अंकुरित होने की संभावना बनेगी। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए योजना के प्रथम वर्ष में केवल एक काम हाथ में लिया गया है- भूमि निर्धारण। इस अंक में प्रस्तुत पाँचों आयोजन केवल इस प्रारंभिक आवश्यकता को पूर्ण करेंगे।

इसका अर्थ यह नहीं है कि योजना इतनी-भर है जितनी कि प्रथम वर्ष में बनाई या बताई गई। यह तो किसी विशाल भवन की नींव खोदने और उसे मजबूत पत्थरों से भरने-भर की बात है। इस आधार पर आगे महल खड़ा होगा और उस महल में जो महान कार्य होते हैं उसकी व्यवस्था बनेगी। यह कार्य अगले दिनों के हैं। नींव के गड्ढे खुदने उसमें कंकड़ पत्थर भरे जाने का क्रिया-कलाप होते देख कर किसी को निराश नहीं होना चाहिए। कोई बड़ा कार्य इस स्थान पर होना चाहिए था, यहाँ तो कारखाने का उत्पादन दिखाई देना था, पर यहाँ तो गड्ढे खुद रहे हैं, कंकड़-पत्थर भरे जा रहे हैं, यह देख कर मोटी बुद्धि वाले को निराशा हो सकती है। वह सोच सकता है कि यहाँ बड़ी-बड़ी मशीनें चलनी थीं, यहाँ हर घंटे में हजारों गज कपड़ा बुना जाना था, पर वह तो कुछ दीखता नहीं गड्ढे खुदने और कंकड़-पत्थर भरने जैसी छोटी बात यहाँ हो रही है, भला इस प्रकार वस्त्र उत्पादन का लक्ष्य कैसे पूरा होगा? यह तो निराशा जैसी बात हुई।

किन्तु दूरदर्शी, विवेकशील दर्शक के लिए उसमें कोई परेशानी की बात नहीं। वह जानता है वस्त्र उत्पादन के लिए जो कारखाना चलेगा-उसके लिए इमारत तो चाहिए ही और इमारत बनानी है तो उसकी नींव भी खुदेगी और भरी भी जायेगी। काम यहीं से तो शुरू होगा। खुले आकाश के नीचे तो मशीनें खड़ा नहीं की जा सकती? इसके लिए छायादार स्थान की सबसे पहली आवश्यकता है। कारखाना चलने से पहले उसी का प्रबंध करना पड़ता है। इस प्रयोजन के लिए इमारत बनती देख कर कोई विवेकशील एवं दूरदर्शी दर्शक प्रसन्न ही होगा और विश्वास करेगा कि जब कारखाने की इमारत बननी शुरू हो गई तो अगले दिनों इसकी अन्य व्यवस्थाएं भी बनती चली जायेगी। नव-निर्माण जैसा महान प्रयोजन एक बड़ा कारखाना चल पड़ने और उसके वस्त्रों से शीत निवारण का प्रयोजन पूरा होने जैसी बात है, उसकी पूर्ति के लिए इमारत बनते देख कर कोई उतावला व्यक्ति ही नाक-भो सिकोड़ सकता है। जिसे यह ज्ञान है कि बड़े काम के लिए बड़े साधन चाहिए, वह एक क्रियाबद्ध व्यवस्था का आरंभ होते देख कर आशाजनक भविष्य की उज्ज्वल संभावना सहज ही सोच सकता है और उस प्रयास की सराहना कर सकता है। वह जानता है कि कहने-भर से, चाहने भर से हथेली पर सरसों नहीं जमती। बड़े प्रयोजन की पूर्ति के लिए आवश्यक एवं उपयुक्त साधन पहले जमा करने पड़ते हैं। योजना के प्रथम वर्ष में यही प्रयत्न किया गया है।

अगले दिनों हमें बड़े-बड़े काम करने है। युग परिवर्तन कार्य अपने देश और अपने समाज के नव-निर्माण से आरंभ करके उसे विश्वव्यापी बनाना है अपने सामने अनेक समस्याएं उलझी पड़ी हैं, अनेक आवश्यकताएं अपनी पूर्ति के लिए पुकार रही है, उनका समाधान उचित रीति से करने के लिए विशालकाय व्यवस्थाएं जुटाई जानी हैं। किन्तु यह सब कौन करे- किन साधनों से करे, यह प्रथम प्रश्न है। उत्कृष्ट व्यक्तित्व जो नव-निर्माण के महान प्रयोजन की पूर्ति के लिए अभीष्ट क्षमता से संभव हो, वे ही हमारी प्रथम आवश्यकताएं हैं। महल बनाने के लिए भूमि खोदने के लिए सबसे पहले फावड़ा चाहिए। फावड़ा न हो तो योजना का आरंभ कैसे हो? बातूनी, कायर, स्वार्थी, संकीर्ण और ओछे मनुष्यों से अपना समाज भरा पड़ा है। जिनकी भावनाएं उत्कृष्टता से भरी हुई हों और जिनकी गतिविधियाँ आदर्शवादिता के लिए तड़पे ऐसे व्यक्ति जब तक उभर कर ऊपर न आवें तब तक बिल्ली के गले में घण्टी बाँधने जैसे कठिनाई ही होगी। आरंभ इसी आवश्यकता की पूर्ति से किया जाना चाहिए-वही किया भी जा रहा है।

देश के सामने महंगाई, अन्न संकट की समस्या है। अपराध बढ़ रहे हैं और व्यक्ति अपने को असुरक्षित समझने लगा है। पारस्परिक व्यवहार इतने दूषित हो गए हैं कि किसी पर विश्वास करना कठिन हो रहा है पर बिना विश्वास किए काम नहीं चलता है। माँसाहार की दुष्प्रवृत्ति, गो तथा दूसरे उपयोगी प्राणियों को सफाचट करती जा रही है। नशेबाजी में विपुल धन खर्च होता है और बदले में अस्वस्थता पल्ले बंधती है। शिक्षा केवल 20 प्रतिशत तक पहुँच सकी, 80 प्रतिशत अब भी देश में अनपढ़ हैं। गरीबी के कारण जीवन-विकास के सभी द्वार बन्द हैं। विवाह-शादियों में होने वाला अपव्यय समाज की कमर तोड़कर रखे दे रहा है। देश का आधा अंग-स्त्री समाज पिंजड़ों में बंद पक्षियों की तरह बेबस, बेजबान और बेकार होकर जी मर रहा है। जाति-पाँति, ऊंच-नीच और भेदभाव ने समाज को हजारों टुकड़ों में बाँट कर विसंगठित कर दिया है। रूढ़िवादिता, ढोंग और अन्धविश्वास ने लोगों को बौद्धिक पराधीनता में जकड़ दिया है। सर्वसाधारण का स्वास्थ्य बुरी तरह गिरता जा रहा है। राजनेता जिस अदूरदर्शिता और घटिया चरित्र का परिचय दे रहे हैं, उससे उद्विग्नता और निराशा बढ़ रही है। पड़ौसी चीन-पाकिस्तान आक्रामक बने हुए हैं। अंतर्राष्ट्रीय राजनीति और वैज्ञानिक प्रगति विश्व मानव के लिए सर्वनाश का कारण बनी हुई है। विलासिता की अभिवृद्धि से लोग कायर और कुचाली बनते चले जा रहे हैं। स्वार्थपरता और संकीर्णता ने प्रत्येक क्षेत्र को धूर्तता, दुष्टता और अनैतिकता को बाहुल्य से भर दिया है।

उपरोक्त प्रकार की अगणित समस्यायें हमारे सामने हैं। ये अपने हल माँगती है। यदि इन्हें ऐसे ही पड़ा रहने दिया गया तो अगले थोड़े ही दिनों में सर्वनाशी और सर्वग्राही संकट मानव-समाज के सामने उठ खड़ा होगा और लाखों-करोड़ों वर्ष की संग्रहीत सभ्यता सहित मानव समाज अपनी सामूहिक आत्म-हत्या करने के लिए विवश हो जायेगा। इस विभीषिका से बचने के लिए हमें प्रत्येक क्षेत्र, स्तर के रचनात्मक आयोजन कार्यान्वित करने होंगे। नरक को स्वर्ग में परिणत करने के लिए अगणित प्रकार के अगणित स्तरों के प्रमाणित कलेवरों के, अगणित रचनात्मक एवं संघर्षात्मक आयोजन प्रस्तुत करने पड़ेंगे। सर्वांगीण उत्कर्ष के लिए सर्वांगीण योजनाएं अनिवार्य रूप से आवश्यक होंगी। छोटे-मोटे बाँध बनाने के लिए कितने इंजीनियर, कितने ओवरशियर, कितने मजदूर, कितने यंत्र, कितने वाहन, कितने साधन और कितने धन की आवश्यकता पड़ती है-यह हम रोज ही देखते हैं। फिर युग-निर्माण जैसे महान निर्माण के लिए कितने व्यक्तियों और कितने साधनों की जरूरत पड़ेगी इसका अनुमान लगाना कुछ अधिक कठिन नहीं होना चाहिए। जादू की फूँक मार देने मात्र से इतने बड़े प्रयोजन पूर्ण नहीं होते। इसके लिए वैसी ही महान उपलब्धियाँ विनिर्मित करनी पड़ेंगी जैसा कि महान लक्ष्य एवं आयोजन है।

बात फिर घूम-घामकर वहीं आ जाती है। यह सब करेगा कौन? देश में न पैसे की कमी है, न योग्यता की, न साधनों की, न सुविधाओं की। कमी केवल एक ही बात की है-इंसान बहुत छोटे, ओछे और बौने हो गये हैं। उन्हें वासना और तृष्णा की कीचड़ अपने दलदल में बुरी तरह फंसाये हुए है। बेचारे नाली के कीड़ों की तरह बुज-बुजाती हुई जिन्दगी जीते हैं। आदर्शवादिता और उत्कृष्टता उनके लिये कहने या सुनने भर की ऐसी चीज है जिसे व्यवहार में लाने की कोई आवश्यकता नहीं। ऐसे लोग स्वयं ही धरती के भारभूत हैं। जिन्दा रहकर स्वयं ही परेशान नहीं होते, दूसरों को भी अपार कष्ट देते हैं। इन क्षुद्र प्राणियों को दयनीय ही कहा जा सकता है, भले ही वे मनुष्य का कलेवर धारण कर शौक-मौज की जिन्दगी जीते हों। इस स्तर के लोग, जो स्वयं एक समस्या बने रहते हैं, वे देश, धर्म, समाज, संस्कृति के पुनरुत्थान में-विश्व-भाग्य के नव-निर्माण में-भला क्या योग दे सकते हैं?

मर्मस्थल यही है। हमें यहीं चोट करनी होगी। परिवर्तन यही से आरंभ करना होगा। व्यक्ति को ओछा न रहने देकर ऊंचा बनाने का कार्य उसी स्तर से आरंभ करना होगा, जिस पर कि वह आज है। छोटे बच्चों को लकड़ी की तीन पहिए वाली गाड़ी दी जाती है ताकि वे उसे पकड़कर खड़े हो सकें और चलने का अभ्यास कर सकें। इसका अर्थ यह नहीं कि भविष्य में उसे मोटर चलाने ही नहीं दी जायेगी। जरूर वह बड़े-बड़े वाहन और यंत्र चलायेगा पर आज जबकि उसका शरीर नन्हा-सा है, उसी के उपयुक्त लकड़ी की तीन पहिए की गाड़ी देनी होगी। हमारी प्रथम पंचवर्षीय योजना का प्रथम वर्षीय कार्यक्रम मानवीय महानता की दृष्टि से अभी शिशु जीवन बिताने वाले जन-साधारण के लिए है। देखने में बात छोटी है- पर उसमें वे सभी महान संभावनाएं बीज रूप में विद्यमान हैं जो ठीक तरह विकसित की जा सकीं तो एक महान वट-वृक्ष के रूप में परिणत होंगी।

अगले कुछ ही दिनों में एक महानतम-सर्वांगीण, सार्वभौम, आन्दोलन एक प्रचण्ड दावानल की तरह प्रकट होने वाला है। उसके अनेक रूप और अनेक प्रकार होंगे, अनेक नामों से, अनेक संस्थाओं-संगठनों के द्वारा अनेक रूपों में अनेक व्यक्तियों द्वारा वह चलेगा। धर्म-क्षेत्र से लेकर अर्थ-क्षेत्र, समाज-क्षेत्र, राज्य-क्षेत्र तक में एक महानतम विचार-क्राँति उत्पन्न होगी। वह विचार परिवर्तन नये युग का सृजन करेगा। उस प्रयोजन की पूर्ति के लिए अनेक सृजनात्मक प्रवृत्तियाँ चलेंगी और अनेक धरती को लाल कर देने वाले संघर्ष होंगे। युग-परिवर्तन की बात आज हंसी दिल्लगी जैसी लगती है पर उसकी प्रचण्डता अगले दिनों हर आँखों वाला देख सकेगा। इस समुद्र मन्थन के बाद जो अमृत निकलेगा उसी को पीकर मानव जाति देवत्व, अमरत्व एवं धरती पर स्वर्ग अवतरित करने वाले सतयुग का आनन्द उपलब्ध करेगी।

अखण्ड-ज्योति परिवार द्वारा आरंभ की गई इस पुण्य प्रक्रिया का, युग-निर्माण योजना का यही प्रयोजन है। इसके लिए जन-मानस में उत्कृष्टता की विवेकशीलता की, लोक-मंगल के लिये मानवोचित कर्त्तव्य पालन करने की, ज्योति का जागरण किया जाना आज की सर्वप्रथम सर्वप्रधान आवश्यकता है। हमारा प्रथम चरण इसी के लिये है। 1. अन्तरात्मा में प्रेमतत्व का अमृत निर्झर स्रवित करने के लिए हमारी इस बसंत पंचमी से आरंभ हुई साधना अनुपम प्रतिफल उत्पन्न करेगी। प्रातः सायं आत्म-निरीक्षण और दिनचर्या के सुव्यवस्थित निर्धारण से व्यक्तित्वों में प्रखरता आयेगी। लोग प्रतिभाशाली, सुसंस्कृत, सहृदय एवं सुविकसित बनेंगे।

2. ज्ञान-यज्ञ से ब्रह्म विद्यालयों के प्रचलन से अंधेरी कोठरियों में विवेक के दीप जलने लगेंगे। जिसने कभी विवेकशील, विचारकता, तथ्य एवं सत्य की दृष्टि से सोचा तक नहीं, ढर्रे की रूढ़िवादिता में ही सोचते-विचारते रहें उन्हें हमारा ज्ञान-यज्ञ एक नई दिशा देगा।

3. शिक्षा-पद्धति में आमूलचूल परिवर्तन करने की जिस प्रयोगात्मक प्रक्रिया का मथुरा में जून से शुभारंभ होने जा रहा है, उसके द्वारा हजारों ऐसे प्रबुद्ध व्यक्तियों कुछ ही दिनों में विनिर्मित होंगे जो अपनी निजी समस्याओं को ही नहीं सुलझाये वरन् देश और समाज की समस्याओं का हल करने वाले युग-निर्माताओं की कमी भी पूर्ण कर सकें।

4. जन्म-दिनों की प्रेरणा सज्जनों को संगठित करेगी और उन्हें जीवन के सर्वोत्तम सदुपयोग का व्यावहारिक मार्गदर्शन करेगी। जीवनों को वास्तविक जीवन बनाने में सहायक होगी।

5. विचार-क्राँति के लिए उपयुक्त भावनापूर्ण प्रेरक साहित्य जन-मानस की दिशा को उस ओर मरोड़कर रख देगा जिधर विश्व-कल्याण की वास्तविक संभावनाएं सन्निहित हैं।

प्रस्तुत पंचसूत्री योजना, मानव जाति के उज्ज्वल भविष्य का सर्वांगीणपूर्ण निर्माण कर सकने वाले साधन उत्पन्न करेगी। उच्चस्तरीय भावनायें जाग पड़ने से आज के निकम्मे प्रतीत होने वाले व्यक्ति ही कल नर-रत्नों और महापुरुषों में परिणत हो जायेंगे। आज जो स्वयं भार बने हुए हैं, कल दूसरों के भारी उत्तरदायित्व अपने कंधों पर वहन करेंगे। उनके प्रयत्नों से ऐसी सत्प्रवृत्तियाँ विनिर्मित, विकसित एवं सफल होंगी जो व्यक्ति और समाज को आज की विपन्न परिस्थितियों को आमूल-चूल परिवर्तन करके सतयुग का स्वर्गीय वातावरण सृजन करें।

नई पीढ़ी में संसार की महान आत्मायें अवतरित होने वाली हैं। वे आत्माएं ‘यदा-यदा हि धर्मस्य---’ वाली प्रतिज्ञा को पूर्ण करेंगी। उनका जन्म होगा ऐसे माता-पिता द्वारा जो स्वयं विचार-व्यवहार की उत्कृष्टता के कारण ऐसी आत्माओं को जन्म देने और पालने-पोसने के लिए उपयुक्त सिद्ध हो सकें। यह प्रयोजन वे ही दम्पत्ति एवं परिवार पूरा करेंगे जो उक्त पंचसूत्री कार्यक्रम अपनाकर पहुँच और आदर्शपूर्ण वातावरण उत्पन्न कर सकें।

भावनात्मक निर्माण की-युग-निर्माण की प्रथम पंचवर्षीय योजना का प्रथम वर्षीय कार्यक्रम सरल एवं छोटा होते हुए भी महान है। इसे सफल बनाने में योगदान देकर हमें अपना युग-धर्म पालन करना ही चाहिए।


यह प्रश्न अपने आपसे पूछिये

यह अंक युग-निर्माण की प्रथम पंचवर्षीय योजना के प्रथम वर्षीय पाँच कार्यक्रमों का परिचय कराने के लिए छापा गया है। इसे मात्र पढ़ने भर की सामग्री नहीं समझना वरन् इसे ऐतिहासिक अवसर पर प्रबुद्ध आत्माओं के सामने प्रस्तुत एक चुनौती समझना चाहिए।

इस अंक को प्रत्येक परिजन कम-से-कम दो बार पढ़े और शाँतचित्त से एकाग्रतापूर्वक एकान्त में बैठकर यह निश्चय करे कि इस महान अवसर पर उसका कुछ कर्त्तव्य है या नहीं? यदि आत्मा करे कि युग की पुकार को सुनना और उसके अनुरूप कुछ करना उचित एवं आवश्यक है, तो इस उत्तर को ईश्वर का संदेश मानकर अपना कुछ कर्त्तव्य निर्धारित करना चाहिए। युग की चुनौती को स्वीकार करना चाहिए।

अखण्ड-ज्योति परिवार के प्रत्येक सदस्य के सामने यह पाँच प्रश्न उपस्थित हैं। देश, धर्म और समाज पर संस्कृति की ओर से उसके सम्मुख एक चुनौती प्रस्तुत है। बन पड़े तो इसे स्वीकार करना चाहिए।

1. क्या आपने उच्चस्तरीय उपासना आरंभ करके अपनी आत्मा से प्रेम रूपी परमात्मा की प्रतिष्ठापना आरंभ कर दी? क्या आपने सोते और उठते समय अपनी दिनचर्या में कार्य-पद्धति एवं विधि-व्यवस्था का नियमित निर्धारण क्रम आरंभ कर दिया?

2. भावनात्मक नव-निर्माण के लिये अपने परिवार और परिचितों तक उत्कृष्ट विचारणा का प्रकाश पहुँचाना आरंभ किया या नहीं? इस प्रयोजन के लिये एक घण्टा समय और दस पैसे खर्च करते रहने का साहस किया या नहीं?

3. जून से आरंभ होने वाले त्रिविध प्रशिक्षण की चर्चा अपने प्रभाव-क्षेत्र में प्रारंभ कर दी या नहीं? आपके प्रयत्न से कुछ शिक्षार्थी जा सकने योग्य प्रोत्साहन प्राप्त कर सकें, इसके लिए आप पूरा-पूरा प्रयत्न कर रहे हैं या नहीं?

4. आपने अपनी जन्म-तिथि मथुरा लिख भेजी क्या, अपना अगला जन्म-दिन मनाने की तैयारी कर रहे हैं क्या? स्थानीय सदस्यों के साथ विचार-विमर्श करके संगठित रूप से इस प्रकार के आयोजन मनाने की योजना बना ली क्या?

5. नव-निर्माण की सर्वांगीण प्रेरणा देने वाले- सस्ते ट्रैक्ट साहित्य को अपने क्षेत्र में व्यापक बनाने की कोई योजना बना रहे हैं क्या? इसके लिए किन्हीं उपयुक्त व्यक्तियों को आपने प्रोत्साहित किया है क्या? क्या आप हिन्दी के अतिरिक्त कोई अन्य भाषा बहुत अच्छी तरह जानते हैं? यदि जानते हैं तो बिना किसी आर्थिक लाभ की आशा किये अनुवाद-कार्य के लिए अपनी सेवाएं देंगे क्या?


VigyapanSuchana

एक विशेष अनुरोध

इस वर्ष छंटनी कार्यक्रम के कारण अखण्ड-ज्योति की सदस्य संख्या बहुत घट गई है। बेकार लोगों का हट जाना तो ठीक हुआ पर उनकी स्थानपूर्ति अच्छे लोगों से होनी चाहिए अन्यथा उसका प्रभाव अपने महान मिशन पर पड़ेगा। एक नया सदस्य बढ़ाने की चेष्टा प्रत्येक परिजन को करनी चाहिए। इस मास इसके लिए विशेष रूप से प्रयत्न किया जाये।

इन पाँचों प्रश्नों को अपने आपसे बार-बार पूछना चाहिए। जो कुछ आप कर सकते हैं, किन्तु आलस्यवश नहीं कर रहे हैं, उसे करना शीघ्र ही आरंभ कर दें। आपकी गणना उन परिजनों में नहीं होनी चाहिए जिनके बारे में यह कहा जा सके कि उनने समर्थ होते हुए भी इस महान अभियान के लिए कुछ नहीं किया था।

*समाप्त*