मानव जीवन का अनुपम सौभाग्य

मानव-जीवन भगवान् की दी हुई सर्वोत्तम विभूति है। इससे बड़ा वरदान और कुछ हो ही नहीं सकता। सृष्टि के समस्त प्राणियों को जैसे शरीर मिले हैं, जैसे सुविधा साधन प्राप्त हैं। उनकी तुलना में मनुष्य की स्थिति असंख्यों गुनी श्रेष्ठ है। दूसरे जीवों का सारा समय और श्रम केवल शरीर रक्षा में ही लग जाता है। फिर भी वे ठीक तरह उस समस्या को हल नहीं कर पाते इसके विपरीत मनुष्य को ऐसा अद्भुत शरीर मिला है जिसकी प्रत्येक इन्द्रिय आनन्द और उल्लास से भरी पूरी है, उसे ऐसा मन मिला है जो पग-पग पर हर्षोल्लास का लाभ ले सकता है। उसे ऐसी बुद्धि मिली है जो साधारण पदार्थों से अपनी सुख सुविधा के साधन विनिर्मित कर सकती है। मानव-प्राणी को जैसा परिवार, समाज साहित्य तथा सुख सुविधाओं से भरा पूरा वातावरण मिला है वैसा और किसी जीव का प्राप्त नहीं हो सकता।

इतना बड़ा सौभाग्य उसे अकारण ही नहीं मिला है। भगवान की इच्छा है कि मनुष्य उसकी इस सृष्टि को अधिक सुन्दर, अधिक सुखी, अधिक समृद्ध और अधिक समुचित बनाने में उसका हाथ बंटाये। अपनी बुद्धि, क्षमता और विशेषता से अन्य पिछड़े हुये जीवों की सुविधा को सृजन करे और परस्पर इस तरह का सद्व्यवहार बरते जिससे इस संसार में सर्वत्र स्वर्गीय वातावरण दृष्टिगोचर होने लगे। -संत तिरुवल्लुवर


दान-अहसान नहीं, एक प्रायश्चित

माता के स्तनों में उतना ही दूध उतरता है जितना बच्चे के शरीर निर्वाह के लिये आवश्यक है। इसमें कमी तो पड़ सकती है, पर बढ़ोतरी की कोई सम्भावना नहीं। शायद ही कभी ऐसी कोई माँ देखी गई हो जो बच्चे की आवश्यकता से अधिक दूध देती हो। धरती माता के बारे में भी यही बात है-प्रकृति माता के बारे में भी यही बात है। वे उतनी सुविधा सामग्री उत्पन्न करती हैं जितनी कि जीव-धारियों के उचित निर्वाह के लिये आवश्यक है। भगवान ने मनुष्य को शरीर दिया है साथ ही प्रकृति ने यह व्यवस्था की है कि उस शरीर की रक्षा के लायक सामग्री उत्पन्न एवं उपलब्ध होती रहे। यही विधान अनादि काल से चला आ रहा है और अनन्त काल तक चलता रहेगा।

इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए समाज के मूर्धन्य लोगों ने यह व्यवस्था बनाई कि हर व्यक्ति उतनी ही सुविधा सामग्री उपभोग करे जितनी कि उसके जीवित रहने के लिये आवश्यक है। अधिक का न तो संग्रह करे, न उपभोग। क्योंकि यदि कुछ लोग अधिक संग्रह एवं उपभोग करने लगेंगे तो उतना ही भाग दूसरे लोगों को कम पड़ेगा और उन्हें अभाव-ग्रस्त रहना पड़ेगा। समतल जमीन पर दीवार खड़ी की जाए तो उसमें जो मिट्टी लगेगी उससे कहीं न कहीं गड्ढा जरूर बनेगा। कोई व्यक्ति अमीर बन रहा होगा तो उतनी ही गरीबी किसी के पल्ले बँध रही होगी। इसलिये उचित यही समझा गया कि समाज में ऐसी व्यवस्था बनी रहे जिसके अनुसार हर व्यक्ति को उपभोग सामग्री लगभग समान रूप से मिलती रहे।

बेशक कई व्यक्तियों में प्रतिभा अधिक और कई में कम होती है। अधिक प्रतिभा सम्पन्न व्यक्ति अपनी कुशलता, चतुरता एवं बुद्धिमत्ता के बल पर अधिक उपार्जन कर सकते हैं। इस उपार्जन को प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए ताकि उपभोग की सुविधा सामग्री अधिक मात्रा में प्रस्तुत एवं विकसित हो सके। पर इस बात का प्रतिबन्ध रखा जाए कि वह प्रतिभाशाली व्यक्ति अपने उपार्जन का स्वयं की स्वामी न बन बैठे, स्वयं ही उसका उपभोग न करने लगे, संग्रह करके सृष्टि का आर्थिक संतुलन न बिगाड़ने लगे। इस प्रकार का प्रतिबन्ध सदा से चला आ रहा है जो सर्वथा उचित है। यह प्रतिबंध जितने कड़े होते हैं, उनका जितनी कड़ाई से पालन होता है, संसार में उतनी ही आर्थिक सुव्यवस्था रहती है। उसमें ढील पड़ी तो दुनिया में एक ओर अभाव दारिद्रय और दूसरी और व्यसन व्यभिचार का बोल बाला हो उठता है। मनुष्य-मनुष्य के बीच उत्पन्न हुई इस प्रकार की अवाँछनीय असमानता समाज में बगावत एवं उच्छृंखलता की दुष्प्रवृत्तियाँ बढ़ाती है।

अमीर लोग अपने धन के बल पर अगणित प्रकार के व्यसन व्यभिचार अपनाते हैं। उनकी सन्तानें कुमार्ग-गामिनी विलासी, अहंकारी, स्वार्थी बनती हैं और अवाँछनीय दुष्प्रवृत्तियों की शिकार होकर शारीरिक मानसिक पारिवारिक सामाजिक सभी क्षेत्रों में पतन एवं विनाश उत्पन्न करती हैं। दूसरी ओर वैसा ही विलासी जीवन जीने की उत्कण्ठा सामान्य व्यक्तियों में उत्पन्न होती है, वे उतना उपार्जन तो कर नहीं पाते, देखा-देखी से हविस भड़क उठती है इसलिये वे अनुचित रीति से धन कमाने पर उतारू होते हैं। असमानता ईर्ष्या को जन्म देती है। गरीबों में ईर्ष्या और विलासिता की हविस भड़काने का बहुत कुछ उत्तरदायित्व अमीरों का है। अपराधों की जड़ यही है। यहीं से विभिन्न प्रकार के पाप और अपराध उत्पन्न होते हैं। चोरी, डकैती, जेब कटी, लूट, ठगी, हत्या, बेईमानी, व्यभिचार आदि की जो विभिन्न वेष-भूषा धारण किये दुष्टतायें सामने आती हैं उनसे मानव-जाति को अतिशय कष्ट एवं क्लेश सहना पड़ता है। उत्पीड़न और असुरता भी बढ़ती है और घृणा, द्वेष, भय, आतंक से सारा समाज उद्विग्न हो उठता है।

इन अपराधों को रोकने के लिए राज्य व्यवस्था यथासम्भव कुछ प्रयत्न करती है। उसने पुलिस, कानून, कचहरी, जेल आदि का प्रबन्ध किया है, पर उससे फोड़े पर मरहम चुपड़ने जैसा अकिंचन ही प्रतिकार होता है। जनमानस में भड़कने वाली विलासिता की तृष्णा एवं ईर्ष्या अपना काम करती रहती है, और राज्य व्यवस्था को चकमा देकर अपराध निर्बाध गति से पनपते और व्यापक विक्षोभ एवं सन्ताप पैदा करते रहते हैं। इस संकट का स्थिर समाधान करना हो तो अन्ततः हमें समस्या के मूल तक जाना पड़ना और जहाँ से यह दुष्प्रवृत्तियाँ उत्पन्न होती हैं वही कुठाराघात करना होगा।

तत्वदर्शी मनीषियों ने, शास्त्रकारों ने उपरोक्त तथ्य को ध्यान में रखते हुए परिग्रह को पाप और अपरिग्रह को पुण्य घोषित किया। गीताकार ने कहा है-जो अपनी कमाई आप ही खा जाता है सो चोर है। उपनिषद्कार ने कहा है-जो दूसरों को बाँटे बिना खाता है वह माँस खाता है। ईसा ने कहा है-सुई के नथुने में होकर ऊँट का निकल जाना सम्भव है पर मालदार का स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर सकना सम्भव नहीं। इन उक्तियों और व्यवस्थाओं के पीछे एक ही संकेत है कि जिन्होंने अपने कौशल चातुर्य के बल पर कुछ इकट्ठा कर लिया हो वे उसे सज्जनतापूर्वक समाज को वापिस लौटा दे। दान इसी सज्जनता का नाम है। जिनके पास अपने समाज के जन साधारण की अपेक्षा अधिक सुविधा-सामग्री संचित है उनका न्याय-संगत सीधा-साधा कर्तव्य यही है कि उसे समाज में सत्प्रवृत्तियाँ पनपने के लिए वापिस कर दें। भारतीय धर्म में पग-पग पर दान-पुण्य की महिमा है। बिना दान के कोई धर्म कार्य सम्पन्न नहीं होता।

उपार्जन, संग्रह और उपयोग की पाशविक वृत्ति अति स्वाभाविक है। उसके लिए किसी को कहना सिखाना नहीं पड़ता। मन में बैठा असुर यह कार्य तो अपनी प्रबल प्रेरणा से स्वयं ही कराता रहता है। शिक्षा उस बात की दी जाती है, जिधर मन की स्वाभाविक प्रवृत्ति नहीं होती। धर्मशास्त्र पग-पग पर दान की -पुण्य की-त्याग की प्रेरणा इसीलिए देते हैं कि स्वार्थ के असुर की तुलना में परमार्थ का देवत्व भी जीवित रहे। ईश्वर प्राप्ति के लिए सबसे प्रधान साधन त्याग ही बताया गया है। भगवान उसे ही प्यार करते हैं-उसे ही अपनाते हैं जो अपनी त्याग वृत्ति का-अधिकाधिक प्रमाण प्रस्तुत करता है। संग्रही और भोग-माया भ्रमित कहे जाते हैं और माना जाता है कि उन्हें उच्च आध्यात्मिक स्थिति प्राप्त करने से सदा वंचित ही रहना पड़ेगा। साधु और ब्राह्मण की-वानप्रस्थ और संन्यास की दान और पुण्य की प्रचलित धर्म परम्पराएं यही उद्घोष करती हैं कि जो अपनी प्रतिभा एवं कुशलता का प्रतिफल स्वयं न लेकर समाज को वापिस कर देता है वही श्रेष्ठ है, वही सराहनीय है, वही धन्य है।

जिस समाज में हम पैदा हुए हैं वही हमारा परिवार है। हमें उन्हीं की तरह रहना चाहिये। घर के सारे व्यक्ति दुःख-दरिद्र से भरा कष्टकर जीवन बिताऐं और उनमें से एक आदमी गुलछर्रे उड़ाये तो उसे हर दृष्टि से घृणित कहा जाएगा, भले ही वह यह दलील देता फिरे कि मैंने कमाया है, इसलिये उस कमाई का मैं कुछ भी करूं। संयुक्त परिवार में ऐसी दलीलें निरर्थक मानी जाती हैं। सारा मानव समाज एक संयुक्त परिवार है। हर सहृदय व्यक्ति को वैसा ही अनुभव करना चाहिए। 90 प्रतिशत जनता जिस स्तर का जीवन-यापन करती है उसी स्तर का रहन-सहन, खर्च और उपभोग उन्हें भी रखना चाहिये, जो प्रतिभा सम्पन्न हैं। इसी में उनकी सज्जनता एवं महानता है। यदि वे ऐसा अनुभव नहीं करते, अपने देशवासियों की दुर्दशा से मुँह मोड़कर केवल अपनी, अपने कुटुम्ब की ही सुख-सुविधा सोचते हैं तो समझना चाहिये कि वे असामाजिक तत्व हैं, उन्हें हिंसक पशुओं की रीति-नीति पर चलने वाला हृदयहीन नर-पशु कहा जाए तो कुछ अत्युक्ति न होगी।

विवेक और न्याय की पुकार ने धर्म और आध्यात्म में इस तथ्य का समावेश किया है कि व्यक्ति उदार, दानी त्यागी और परोपकारी बने, और इसके लिये स्वेच्छापूर्वक अपनी कमाई का उतना अंश अपने लिए रखे जिससे समाज की औसत जिन्दगी जी सकना सम्भव हो, शेष को दान ही कर दिया जाए। कबीर की इस उक्ति में धर्म और आध्यात्म का पूरा-पूरा तत्व ज्ञान सम्मिलित है-

पानी बाढ्यो नाव में, घर में बाढ्यौं दाम।

दोनों हाथ उलीचिये, यही सयानो काम।

यदि प्रतिभा सम्पन्न होते हुए भी कोई व्यक्ति अपनी उपलब्धियों को दूसरे दीन-दुर्बलों की सहायता के लिये परित्याग करता है तो उससे समाज में बहुत ही मंगलमयी प्रतिक्रिया होगी । भोग और संग्रह से उत्पन्न हुए विक्षोभ द्वारा जिस प्रकार अपराधों का सृजन होता है उसी प्रकार त्याग, प्रेम, उदारता, महानता एवं सादगी का आदर्श उपस्थित करने पर परस्पर सेवा-सहायता की, उदारता, मित्रता की परम्परा प्रचलित होती है। देखा−देखी जैसे दुष्प्रवृत्तियाँ पनपती हैं वैसे ही सत्प्रवृत्तियाँ भी फैलती हैं। एक व्यक्ति उदार आदर्श उपस्थिति करे तो अनेकों को उस प्रकार का अनुकरण करने की भी आकाँक्षा उत्पन्न होती है। लोग वैसा करते भी हैं। सज्जन अपने भाषण से नहीं, चरित्र से जन मानस का निर्माण करते हैं। यदि यह उचित लगे कि संसार में प्रेम, सादगी, उदारता एवं आदर्शवादिता की परम्पराएं फैलें तो इसके लिये उन प्रतिभाशाली लोगों को आगे आना पड़ेगा जो प्रगतिशील एवं समर्थ हैं। बड़ों की बड़ी जिम्मेदारी भी है। साधारण सिपाही की अपेक्षा कप्तान से अधिक कर्तव्य-पालन की आशा रखी जाती है जिन्हें उपार्जन की चतुरता प्राप्त है उन्हें उस चातुर्य के आधार पर यह भी सोचना और करना चाहिये कि उनका संयुक्त परिवार, समाज सुखी रहे। इसके लिये जो कार्य सबसे आवश्यक, सबसे सरल है वह है कि अपनी सम्पन्नता को समाज-हित के लिए परित्याग कर दें। साधारण लोगों की तरह सादगी से रहें। जितना धन, बल, बुद्धिमान पास है उसे पिछड़ों को आगे बढ़ाने के लिये खर्च करना आरम्भ कर दें। इस दिशा में जो जितना साहस दिखा सकेगा वह उतना ही सच्चे अर्थों में बड़ा आदमी कहा जा सकेगा। अन्यथा अधिक कमाने और अधिक खाने की बुद्धिमत्ता अपनी दृष्टि से ही अच्छी हो सकती । हर विवेकशील उससे घृणा ही करेगा।

राजकीय स्तर पर भी इस तथ्य को स्वीकार कर लिया गया है जो कमाता है उसे स्वयं ही पूरा खा जाने का या अपने अंश-वंश के लिये जमा करके रख जाने का अधिकार नहीं है। उस उपार्जन को समाज के लिये वापिस किया जाना चाहिये। आमदनी के अनुरूप उत्तरोत्तर बढ़ते चलने वाले इनकम टैक्स रेट इसी आदर्श के अनुरूप हैं। सुपर टैक्स, सेल्स टैक्स, मृत्यु टैक्स आदि में अन्याय तनिक भी नहीं, वरन् सामाजिक न्याय के सिद्धान्त ही सन्निहित हैं। पूँजीवादी देशों में इस प्रकार की वापसी धीरे-धीरे थोड़ी-थोड़ी होती है किन्तु साम्यवादी देशों में इस संदर्भ में पहले से ही काफी कड़ाई कर दी गई है। प्रतिभाशाली व्यक्तियों की विशेषता उन्हें थोड़ी सम्पन्नता एवं थोड़ी -सी आवश्यक सुविधा जरूर देती है बाकी उसका सारा लाभ समाज को मिलता है।

लोहा, ताँबा, सोना आदि धातुओं की खानें एक स्थान पर निकलती हैं, पर उसका लाभ अन्य भू-भागों में रहने वालों को भी मिलता है। जहाँ खान निकले वहीं के लोग उन्हें उपभोग करें यह न्याय नहीं होगा। इस प्रकार जिस मस्तिष्क में प्रतिभायें उपजें वही उनका लाभ समेट कर बैठ जाए तो फिर खेत में ही अनाज और बाग में ही फलों का संग्रह करना पड़ेगा । दूसरे क्यों उससे लाभ उठा सकेंगे? बच्चों की विकास सुविधा के लिये उन्हें आवश्यक सहायता देना उचित है पर यह गलत है कि उन्हें उत्तराधिकार से इतनी सम्पत्ति दे दी जाए जिससे उन्हें फिर उपार्जन की चिन्ता ही न रहे। यह बालकों की प्रतिभा को कुँठित करने, और समाज में अस्वस्थ परम्परा प्रचलित करने की एक भयंकर बुराई है। इससे बालकों का भविष्य उज्ज्वल नहीं होता, अन्धकारमय ही बनता है।

जिन्हें असाधारण प्रतिभा प्राप्त है, जिनके सामान्य स्तर से अधिक आर्थिक साधन हैं, उन्हें स्वयं अधिक उपभोग करने की, बच्चों को सम्पत्ति बाँटने की, संग्रह करते रहने की विडम्बना का परित्याग करना चाहिये। अपने देश में पिछड़ापन बहुत है उसे दूर करने के लिए धन और प्रतिभा की भारी कमी पड़ रही है। जिनके पास वह हो उन्हें किसी पर अहसान जताने के लिए नहीं, यश और सम्मान पाने के लिए नहीं, वरन् इस प्रायश्चित्त के साथ समाज को लौटा देना चाहिये कि अब तक उसने ऐसा क्यों न किया? उदार एवं विवेकशील व्यक्ति के सामने तो हर घड़ी वह आवश्यकतायें विद्यमान रहती हैं जिनके लिए उन्हें योगदान करते ही रहना होता है। कठोर हृदय एवं अनुदार चित्त वाले व्यक्ति ही संग्रह कर सकते हैं। यह भूल जिनसे हुई उनके लिए प्रायश्चित्त यही है कि शरीर में संग्रहीत विष की तरह अनुचित संचय का परित्याग कर दें।


ज्ञान, कर्म और भक्ति-योग की समग्र साधना

मनुष्य तीन शरीर धारण किये हुए है। जिस प्रकार शरीर पर बनियान, उसके ऊपर कुर्ता, उसके ऊपर कोट पहनते हैं उसी प्रकार आत्मा पर तीन परिधान लिपटे हुए हैं। केले के तने में एक के भीतर एक पर्त निकलता है, प्याज के छिलके के भीतर एक छिलका होता है, उसी प्रकार जीव अपने ऊपर तीन शरीर धारण किये हुए है एक का नाम है स्थूल शरीर, दूसरे का सूक्ष्म शरीर, तीसरे का कारण शरीर। यह तीनों ही अविच्छिन्न रूप से एक दूसरे के साथ जुड़े हुए हैं और इन तीनों के समुचित विकास पोषण से ही जीव को अभीष्ट सुख शान्ति एवं विभूतियों की प्राप्ति होती है।

इन तीन शरीरों के रूप सुसंतुलित विकास ही साधना का एकमात्र प्रयोजन है। ईश्वरीय अनुकम्पा के लिये दैवी अनुग्रह प्राप्त करने के लिए भगवान् से कुछ कहना सुनना नहीं पड़ता। वह हर किसी को उसकी पात्रता के अनुदानों की निरन्तर वर्षा करता रहता है। यह सोचना ठीक नहीं कि जितना ज्यादा अनुरोध किया जाएगा उतना ही ईश्वर देगा। वरन् सच तो यह है कि वह सारी सृष्टि को एक विधि व्यवस्था के अनुसार चला रहा है, यहाँ तक कि वह स्वयं भी अपने नियमों में आबद्ध रहता है। यदि वह सुनिश्चित विधि व्यवस्थाओं का उल्लंघन करे तो सारा संसार ही अव्यवस्थित हो जाए। ईश्वरीय उपासना का अर्थ है- दैवी गुण कर्म स्वभाव से अपने आपको अलंकृत करना। इस दिशा में जो कुछ भी प्रयास किया जाएगा वह सारा का सारा साधना के अंतर्गत आ जाएगा।

जिस प्रकार व्यायामशाला में शरीर को -स्कूल में मस्तिष्क को और मन्दिर में आत्मा को परिष्कृत, परिपुष्ट करके सर्वांगीण जीवन विकास की व्यवस्था बनाई जाती है उसी प्रकार इन तीनों शरीरों में देवत्व की मात्रा बढ़ाकर आत्मबल बढ़ाया जाता है, आन्तरिक स्तर ऊँचा उठाया जाता है। इस दिशा में जितनी ही ठोस प्रगति होती है उतनी ही साधना सफल बन जाती है। हम पात्रत्व के अनुरूप ईश्वरीय विशेष अनुग्रह प्राप्त करते चलते हैं और बाह्य जीवन को समृद्धियों से तथा भीतरी जीवन विभूतियों से भरा-पूरा देखकर आनन्दित होते हैं। आन्तरिक जीवन की सफलताओं को ऋद्धियाँ और बाह्य जीवन की सफलताओं को सिद्धियाँ कहते हैं। सच्ची साधना इन दोनों ही स्तरों पर फलित होती है।

साधना के दो स्तर हैं एक असामान्य दूसरा सामान्य। असामान्य स्तर की साधना की सरकस में दिखाये जाने वाले कौतूहलपूर्ण करतबों से तुलना की जा सकती है। सरकस के कलाकार विशेष मनोयोग से, विशेष मुस्तैदी के साथ, विशेषज्ञों के प्रशिक्षण में विशेष रूप में शिक्षा प्राप्त करते हैं और वे पतले तार के ऊपर एक पहिये की साइकिल चलाने, आकाश में टँगे झूलों पर आश्चर्यजनक रीति से झूलने, ऊँची सीढ़ी से कूदने, कुंए में मोटर साइकिल चलाने जैसे आश्चर्यजनक प्रदर्शन कर सकने में सफल होते हैं। ऐसे कलाकारों को वेतन भी अधिक मिलता है और सरकस का भी आकर्षण बढ़ता है। योग साधनाओं की विशेष प्रक्रियाएं इसी स्तर की हैं। हठ-योग, लय-योग प्राण-योग, ऋजु-योग, कुण्डलिनी योग, ग्रन्थि भेद, पश्चागिन विद्या, तंत्र प्रयोग आदि 84 प्रकार के योग साधन इसी प्रकार के हैं इनके लिये असाधारण अभ्यास करने पड़ते हैं और असाधारण वातावरण में असाधारण क्रम का जीवन-यापन करना पड़ता है। वनवासी तपस्वी और योगी इसी स्तर का साधना मार्ग अपनाते हैं । इसके विशेष लाभ भी हैं और विशेष चमत्कार भी। पर सर्व साधारण के लिये यह अति कठिन मार्ग है।

सामान्य जीवन यापन में यह सब बन नहीं पड़ता। सरकस में काम करने वाली युवतियाँ यदि सामान्य गृहस्थ जीवन बिताना चाहें, बाल बच्चे उत्पन्न करें, चूल्हा-चक्की सम्भालें तो बेचारी सरकस के लायक स्वास्थ्य कहाँ सुरक्षित रख सकेंगी? उन्हें तो अविवाहित ही रहना होता है और उसी ढर्रे का जीवन क्रम बनाना पड़ता है जो सरकस में काम करने वालों के लिये सुविधाजनक है। विशिष्ट आत्मिक विभूतियों की जिन्हें आकाँक्षा है उनके लिये उपर्युक्त प्रकार का असामान्य साधना पथ भी है और उसका एक विशेष विज्ञान भी। पर उसकी चर्चा यहाँ अप्रासंगिक है। अखण्डज्योति के पाठक उस स्तर के नहीं हैं । उनके लिए सामान्य जीवन यापन ही सुविधाजनक है इसलिये साधना प्रकरण भी उन्हें सामान्य स्तर का ही उपयुक्त हो सकता है।

सामान्य स्तर की साधनाओं का भी अपना महत्व है। घर गृहस्थी सम्भालने वाले, साधारण जीवनक्रम अपनाने वाले भी यदि ठीक तरह से अपना कार्यक्रम निबाहें तो सरकस के कलाकारों से भी बढ़कर स्वास्थ्य, यश और धन कमा सकते हैं । जो लाभ सरकस वालों को मिलते हैं उससे भी बढ़कर उन्हें मिल सकते हैं। इसलिए यह सोचना ठीक नहीं कि यदि सामान्य परिस्थितियों का जीवनयापन करना पड़ता है तो आत्मिक प्रगति का मार्ग अवरुद्ध बना रहेगा और जो लाभ योगी यती प्राप्त करते हैं वह हमें प्राप्त न हो सकेगा। वस्तुतः आत्मिक प्रगति का मार्ग उनके लिये भी योगियों की तरह ही खुला पड़ा है। प्रश्न केवल रास्ते की पसन्दगी है। मंजिलें दोनों ही एक लक्ष्य पर पहुँचती हैं। रास्तों में दिखाई पड़ने वाले दृश्यों के मनोरंजन का अन्तर मात्र है। एक रास्ता बन पर्वतों नदी सरोवरों के सुरम्य दृश्य दिखलाता हुआ उस स्थान पर पहुँचाता है, दूसरा गाँव बस्तियों और खेत खलिहानों के जाने पहचाने दृश्य दिखाता हुआ वहीं पहुँचा देता है। दोनों में से किस रास्ते जाया जाए? कौन-सा अधिक आकर्षक है? इस प्रश्न पर मतभेद हो सकता है और पसंद भी अलग-अलग हो सकती है? इसीलिये अनादि-काल से प्रवृत्ति मार्ग और निवृत्ति-मार्ग के दो विधान बने चले आ रहे हैं।

अपने पाठकों को स्थिति के अनुरूप यहाँ सामान्य स्तर के साधना विधान की चर्चा करना ही उचित है। जो अधिकारी है उनके लिये षट्चक्र वेधन, कुण्डलिनी योग, ग्रन्थिभेदन, प्राण योग, हठ योग आदि की अन्यत्र चर्चा की जाएगी। इन पंक्तियों में तो उस सामान्य साधना विज्ञान का स्वरूप समझाया जाएगा जो सर्व साधारण के लिए गृहस्थ जीवन यापन करते हुए-कामकाजी दिनचर्या एवं परिस्थितियों के बीच भी सरल तथा सम्भव हो सकता है।

जिन तीन शरीरों की लेख के प्रारम्भ में चर्चा की गई है वे जीवन यापन के एक से एक बढ़कर सुविधा साधन हैं। इनकी शक्तियों का बहुत थोड़ा ज्ञान हमें है, जितना ज्ञान है, उसका सौवाँ भाग भी प्रयोग में नहीं लाया जाता यदि हम अपने आपको अपने तीन शरीरों को ठीक तरह जान लें, उनके भीतर विद्यमान अद्भुत क्षमताओं का स्वरूप समझ लें और उन्हें सही तरीके से प्रयोग में लाने लगें तो इसका परिणाम अद्भुत एवं आश्चर्यजनक ही हो सकता है। साधन-हीन अथवा सामान्य परिस्थितियों में उत्पन्न होकर जिन व्यक्तियों ने उन्नति के उच्च शिखर पर पहुँचने में सफलता पाई उनमें से प्रत्येक को किसी न किसी प्रकार अपने व्यक्तित्व के तीनों ही स्तरों को समर्थ बनाना पड़ता है। महापुरुष का अर्थ ही-व्यक्तित्व की दृष्टि से समग्र समर्थता है। प्रगति की धुरी यही है तीनों स्तरों की सफलतायें इसी उपलब्धि के ऊपर निर्भर रहती हैं।

देह, मन और हृदय के त्रिविधि परिधानों को स्थूल, सूक्ष्म एवं कारण शरीर को विकसित करने के लिये जो भी तरीके हैं उन सबको कर्मयोग, ज्ञानयोग, एवं भक्तियोग की परिधि में सम्मिलित किया जा सकता है। यही तीनों ही साधनायें -आत्मा के त्रिविधि परिधानों को सुविकसित एवं सर्वांग सुन्दर बनाने में समर्थ रही हैं । कर्म योग से शरीर, ज्ञान योग से मन और भक्ति योग से अन्तःकरण की महान महत्ताओं का विकास होता है। यों मोटे तौर से आहार व्यायाम से शरीर, शिक्षा से मन और वातावरण से अन्तःकरण के विकास का प्रयत्न किया जाता है पर यह तरीके बाह्योपचार मात्र हैं।

जड़ों की गहराई तक ले जाने और उपलब्धियों को चिरस्थायी बनाने के लिये कुछ अधिक गहराई में जाना पड़ता है और कुछ अधिक मजबूत प्रयत्न करने पड़ते हैं इन गहरे और मजबूर प्रयोगों से आध्यात्मिक क्षेत्र में साधना द्वारा गतिविधियाँ ही नहीं, प्रवृत्तियाँ भी बदल जाती हैं। यह परिवर्तन ही व्यक्तित्व को एक स्थिर ढाँचे में ढाल देने का प्रयोजन पूरा करता है।

तत्वदर्शी ऋषियों ने सर्व साधारण के लिये -जिस सामान्य स्तर की साधना पद्धति का निर्देश किया है उसे ही कर्म योग ज्ञान और भक्ति-योग की त्रिवेणी कहते हैं। इसमें स्नान करके जीव समस्त कषाय कल्मषों और पाप तापों से छुटकारा पाकर परम निर्मलता का मंगल आनंद उल्लास उपलब्ध करता है। यह त्रिविधि साधना जितनी सरल है उतनी ही महान् भी है। जिनने भी इस मार्ग को अपनाया उसी ने अपने भौतिक एवं आत्मिक जीवन को सुख-शांति, प्रगति एवं समृद्धि से परिपूर्ण किया है। आत्मबल बढ़ाने के लिए-आत्म -कल्याण का लक्ष्य प्राप्त करने के लिये-यह त्रिविधि साधना पद्धति निर्विवाद एवं निश्चित रूप से सफल होती रही है।

देश, काल, पात्र की स्थिति के अनुरूप साधनाओं के मूल उद्देश्य को सुरक्षित रखते हुए कार्य पद्धति में सामयिक हेर-फेर किये जाते हैं। सृष्टि के आदि से लेकर अब तक समय-समय पर ऋषियों ने इस त्रिविधि साधना का-विभिन्न विधि विधानों के रूप में, अपने समय के साधकों की मनोभूमि और समाज की परिस्थितियों का ध्यान रखते हुए, मार्ग-दर्शन किया है। आज की स्थिति के अनुरूप-अखण्ड ज्योति परिवार के -आज के साधक वर्ग के लिये -उपयोगी क्रिया विधान प्रस्तुत है।

युग निर्माण की प्रथम पंचवर्षीय योजना का प्रथम वर्षीय कार्यक्रम इसी प्रयोजन की पूर्ति के लिये है। इसमें तीनों शरीरों के परिपुष्ट करने के लिये कर्म योग ज्ञान योग और भक्ति योग का इस ढंग से समावेश किया गया है, जिसमें व्यक्ति एवं समाज के सर्वांगीण विकास का पुण्य प्रयोजन भली प्रकार पूर्ण हो सके।

प्रातःकाल आँख खुलते ही चारपाई पर पड़े-पड़े जिस प्रक्रिया को पूर्ण करने के लिये कहा गया है वह कर्म योग की आधार शिला है। हर दिन नया जन्म हर रात नई मौत की विचारणा हमें इस बात के लिये प्रेरित करती है कि आज का दिन एक अनुपम सौभाग्य माना जाए और उसका श्रेष्ठतम सदुपयोग किया जाए। इसके लिये क्या छोड़ना और क्या सीखना होगा इसकी योजना हर स्थिति के व्यक्ति की अलग-अलग ही हो सकती है और उसे वह अपनी परिस्थितियों के साथ ताल मेल बिठाकर स्वयं ही बना सकता है। जो कार्यक्रम बने उसके साथ-साथ किस स्तर की विचार धारा का समावेश रहना चाहिये यह एक महत्वपूर्ण पहलू है। काम को एक हलचल के रूप में ही किया जाए तो वह कर्म योग नहीं बनेगा। कर्मयोग वह कार्य है जो उच्च भावनाओं के साथ किया जाता है। दिनचर्या बनाकर यह भी निश्चित करना होगा कि जब वह काम किया जाए तो किस स्तर की भावनाएं उस समय मन में उठाई जायें। शरीर की हरकत और मन का भाव सम्मिश्रण मिलकर कर्मयोग बनता है। प्रातःकाल उठते ही दिनचर्या और भाव समन्वय का पूरा ढाँचा खड़ा कर लिया जाए और फिर दिनभर कड़ाई के साथ उस निर्धारण का पालन किया जाए तो खेती, दुकानदारी, नौकरी जैसा सामान्य जीवन-क्रम कर्म योग की साधना का फल प्रदान करेगा। रात को सोते समय अपनी सफलताओं के लिये ईश्वर के धन्यवाद और भूलों के लिये सम्बन्धित जीवों से सच्चे पश्चात्ताप के साथ क्षमा प्रार्थना करते हुए निद्रा देवी की-माता की गोद में शान्तिपूर्वक सो जाया जाए तो इस सामान्य क्रम के आधार पर हम दिन-दिन अधिक उत्कृष्ट स्तर के कार्य करते हुए अन्ततः इसी जीवन में सच्चे कर्मयोगी की तरह नर से नारायण बन सकते हैं।

सूक्ष्म शरीर का विकास करने के लिये मानसिक स्तर को परिष्कृत करने के लिये -ज्ञान योग की साधना है। उत्कृष्ट विचारों को मन में भरे रहना उसमें ईश्वर की भावनात्मक प्रतिमा प्रतिष्ठापित किए रहना ही है। इसलिए प्रेरक स्वाध्याय वस्तुतः एक प्रकार की ईश्वर उपासना ही है। यों रूढ़िवादी लकीर पीटकर कूड़े करकट जैसी किन्हीं बूढ़ी, पुरानी, किस्से कहानियों की किताबों को घोटते रहना भी आज स्वाध्याय के नाम से पुकारा जाता है पर वास्तविक स्वाध्याय वह है जिसकी एक-एक पंक्ति हमें व्यवहारिक जीवन में आदर्शवादिता एवं उत्कृष्टता की दिशा में अग्रसर करने की प्रेरणा से ओत-प्रोत हो। ऐसा स्वाध्याय दैनिक-जीवन का एक अविच्छिन्न नित्य-कर्म माना जाए। व्यक्ति एवं समाज के नव-निर्माण के लिये जो प्रेरक स्वाध्याय-साहित्य विनिर्मित हो रहा है उसके लिए आहार निद्रा जैसी दैनिक आवश्यकताओं की तरह ही समय निकाला जाए तो इससे ज्ञान-योग की महती आवश्यकता पूर्ण होती चलेगी।

ज्ञान-योग की साधना अपने तक ही सीमित न रहकर आज की परिस्थितियों के अनुरूप उसे ज्ञान-यज्ञ का भी रूप देना पड़ेगा। समाज में सबसे बड़ा दुर्भिक्ष सद्विचारणाओं का है। इस अकाल के कारण सारा संसार अपराधी, कुकर्मी और उद्धत बना हुआ है। शोक सन्ताप की-दुःख दारिद्रय की आग में जल रहा है । इस स्थिति को बदला ही जाना चाहिये। यह कार्य जन-मानस का स्तर बदलने से ही सम्भव है। विचारक्रान्ति आज की सर्वोपरि आवश्यकता है। ज्ञान-यज्ञ का महान् अभियान इसी आवश्यकता की पूर्ति करता है। अपने प्रभाव क्षेत्र में नवनिर्माण की विचार धारा को अधिकाधिक व्यापक बनाना एक ऐसा पुण्य परमार्थ है जिस पर मानव-जाति के उज्ज्वल भविष्य की सम्भावनाएँ निर्भर हैं। एक घण्टा समय और दस पैसा प्रतिदिन खर्च करना देखने में एक छोटा ही काम करते हैं पर वस्तुतः उसका सम्मिलित परिणाम इतना महान् है कि युग परिवर्तन की सम्भावना उतने मार्ग से भी मूर्तिमान हो सकती है। साधक का अपना ही नहीं, समस्त विश्व का कल्याण भी उससे हो सकता है।

भक्ति-योग का तात्पर्य है अन्तरात्मा में प्रेम भावनाओं का अविच्छिन्न निर्झर झरना। भगवान् को अपना अनन्यतम प्रेमी-माता-मानकर उभय पक्षीय प्रेम हिलोरे की अनुभूति का स्मरण करना एक ऐसा प्रभावकारी अभ्यास है जिससे रुँधे हुए प्रेम स्रोत पुनः सजल होने लगते हैं और यह स्रोत जब प्लावित होने लगते हैं तो उनकी सजलता समीपवर्ती सारे क्षेत्र को सरस, स्नेह सिक्त एवं हरा-भरा बना देती है। सच्चा प्रेमी-सच्चा भक्त -केवल ईश्वर की प्रतिमा की ध्यान छवि को ही प्यार नहीं करता वरन् ब्रह्माण्ड में संव्याप्त ईश्वरीय सत्ता से -प्राणि मात्र से अनन्य आत्मीयता भरा प्रेम सम्बन्ध स्थापित कर लेता है। करुणा, दया, सेवा, उदारता, सहृदयता, सद्भावना, सहानुभूति सज्जनता के रूप में उसको पग-पग पर उसे कार्यान्वित करना पड़ता है। प्रेमी न परिग्रही हो सकता और न स्वार्थी। ईश्वर भक्त के लिये एक ही मार्ग है, अपनी समस्त उपलब्धियों को विश्व मानव के चरणों पर भावना ही नहीं व्यवहार से भी समर्पित कर देना। इस समर्पण से कम में ईश्वर कभी किसी भक्त को अपनी कृपा करुणा-उदार अनुकम्पा प्रदान नहीं करता । ईश्वर भक्त को एक आदर्श चरित्र - लोक मंगल में अपना सर्वस्व समर्पण किये हुए परमार्थ परायण व्यक्ति के रूप में ही देखा जा सकता है। परिवार का पालन भी वह इसी दृष्टिकोण के साथ करता है और समस्त लोगों के साथ उसका व्यवहार क्रम इसी आधार पर चलता है।

फरवरी अंक में उपासना के साथ जिस भाव समन्वय का विधान बताया गया है वह आज की स्थिति में सर्वोत्तम भक्ति-योग है। एक वर्ष के छोटे बालक जैसा जिसका हृदय वासनाओं और तृष्णाओं से रहित है जिसका अन्तःकरण निर्मल एवं निश्चिन्त है वही भक्तियोग का अधिकारी है। उसे ही ईश्वर को अपना कहने और अपने को ईश्वर का बना देने का पात्रत्व मिलता है। इसी मनोभूमि पर पहुँचकर शबरी, मीरा,सूर, तुलसी, आदि भक्तों ने तथा सभी ऋषियों मुनियों ने ईश्वर दर्शन आत्म साक्षात्कार एवं ब्रह्म निर्माण का परमानन्द प्राप्त किया था। वही राज-मार्ग हमारे लिये भी खुला पड़ा है। नाम और रूप के आधार पर जप और ध्यान की साधना बहुत दिनों से हम करते रहे हैं। अब यदि उसमें उपरोक्त स्तर का भाव समावेश भी किया जा सके तो उससे भक्ति योग की आवश्यकता पूर्ण हो जाएगी।

हम एक साथ तीन शरीर धारण किये हैं और एक साथ तीन जीवन जीते हैं। हर शरीर एवं हर जीवन की अपनी विशेषता एवं अपनी महत्ता है। इनके विकसित एवं परिपुष्ट होने पर जो भौतिक एवं आध्यात्मिक लाभ मिलते हैं वे भी अनोखे हैं। अपने निर्माण एवं विकास में सफलता प्राप्त कर लेने का अर्थ है-संसार की समस्त बाधाओं को जीत लेना और प्रगति के समस्त अवरोधों को समाप्त कर देना। साधना इसी दिशा में अग्रसर होने का विज्ञान सम्मत, शास्त्र सम्मत अनुभूत उपाय है कर्म योग, ज्ञान योग और भक्ति योग की त्रिविधि साधना सम्पन्न करके इसी प्रयोजन की पूर्ति की जाती है। आरंभ कैसे और कहाँ से किया जाए, इसका पथ प्रदर्शन अपनी प्रथम पंच वर्षीय योजना के प्रथम तीन कार्यक्रम पूरा करते हैं। साधना की प्रगति के अनुरूप हर वर्ष आगे का पथ प्रदर्शन मिलता रहेगा जिस पर चलते हुए परिजन इतना आगे बढ़ सकते हैं कि उन्हें फिर आगे का मार्ग-दर्शन किसी दूसरे की सहायता पर अपेक्षित न रहेगा, वरन् अन्तःप्रकाश के आधार पर ही वे पूर्णता के लक्ष्य पर द्रुतगति से अग्रसर होते रहेंगे।

अपनी पंचवर्षीय प्रथम योजना देखने में ही एक सामाजिक कार्यक्रम सरीखी लगती है पर वस्तुतः वह एक ऐसी आध्यात्मिक योग साधना है जिसे अतिशय सरल और साथ ही अभिशाप महत्वपूर्ण कहा जा सकता है। इसमें व्यक्ति के लिये स्वर्ग मुक्ति की पूरी-पूरी सम्भावनायें विद्यमान हैं। वह उत्कृष्ट व्यक्तित्व उपलब्ध करके महापुरुषों की पंक्ति में बैठने का अधिकारी बन सकता है और उन सफलताओं तथा विभूतियों का अधिकारी बन सकता है जो समर्थ व्यक्तियों को अनायास ही मिलती रहती हैं। किसी को आश्चर्य में डाल देने वाले खेल तमाशे दिखा देना तो जादुई करामात है, आध्यात्म की जो असली ऋद्धि-सिद्धियाँ विकसित व्यक्तित्व के आधार पर मिलती हैं उन्हें पाकर मनुष्य उतना आगे बढ़ जाता है जिस पर पहुँचकर “भक्त के वश में भगवान् होने की” उक्ति सार्थक सिद्ध होती है।

व्यक्ति निर्माण की-समाज निर्माण की-युग परिवर्तन योजना इन तीन साधनाक्रमों पर अवलम्बित है जन्म दिनों का मनाना और मथुरा में आरम्भ किये गये विद्यालय को सफल बनाना यह दो कार्यक्रम शाखाओं और संचालक केन्द्र बिन्दु को सुदृढ़ बनाने वाले आधार हैं। ये सफल हो सकें तो त्रिविध साधना क्रम को विश्वव्यापी बना सकने की संगठनात्मक संभावना बढ़ जाएगी। इसलिए इन दो कार्यों को प्रथम पञ्चवर्षीय योजना के हाथ पैर कह सकते हैं। वस्तुतः उसका प्राण तो उपरोक्त त्रिविधि साधना क्रम पर ही अवलम्बित है, उसी से धरती पर स्वर्ग अवतरित होने का भगीरथ प्रयास पूर्ण होगा इसी माध्यम से सुख-शान्ति की सुधा-सुरसरि इस पुण्य धरित्री पर प्रवाहित करने का स्वप्न साकार बनेगा।


मैं भी मरना चाहता हूँ

मैं भी मरना चाहता हूँ-

जब नेपोलियन अपनी सेना को लेकर किले के बाहर निकला, सामने गगनचुम्बी आल्पस पर्वत सर ऊँचा किये खड़ा था। गर्व और मद भरी वाणी में मानो वह घोषणा कर रहा था मैं अजेय हूँ आज तक कोई भी पार नहीं कर सका है। केवल आकाश ही मुझसे ऊँचा है किसी मनुष्य की क्या ताकत जो कि मुझ पर पग रख सके।

नेपोलियन ने अपनी सेना को आज्ञा दी - ऊपर चढ़ जाओ। पर्वत की तलहटी में एक वृद्धा अपनी झोंपड़ी में बैठी लकड़ियाँ काट रही थी। नेपोलियन द्वारा सेना को दिये गये आदेश को उसने सुना, सुनकर नेपोलियन की ओर मुखातिब हुई और कहने लगी-व्यर्थ जान क्यों गँवाते हो? तुम्हारे जैसे सैंकड़ों मनुष्य यहाँ आये और मुँह की खाकर वापिस चले गये। उसकी सेना और उनके घोड़े देखते-देखते पर्वत के गर्भ में समा गये। उनकी हड्डियाँ तक आज शेष नहीं मिलीं। नेपोलियन ने हीरों का एक हार गले से उतारकर वृद्धा को भेंट किया और कहा-मैं तुझे धन्यवाद देता हूँ तूने मेरा उत्साह बढ़ाया है। मैं पर्वत की ऊँचाई देखकर घबरा रहा था, किन्तु तुम्हारी बातों ने मेरे उत्साह को दुगना कर दिया है। मैं भी दूसरे लोगों की तरह मरना चाहता हूँ यदि जीवित दूसरी ओर चला गया तो मेरे नाम का डंका बजाना तुम्हारा कर्तव्य होगा।

वृद्धा ने कहा-तुम पहले आदमी हो, जिसने मेरी बात सुनकर वापिस जाने से इन्कार किया। मुझे निश्चय है तुम जो करने या मरने का व्रत लेकर आये हो उसमें अवश्य सफल होगे। नेपोलियन वास्तव में सफल हुआ आल्पस ऊँची गर्दन करके उसकी विजय का डंका बजा रहा है।


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अपात्रता की दुःखद प्रतिक्रिया-

विज्ञान ने मनुष्य के लिए आज सुख सुविधा के प्रचुर साधन उपलब्ध कर दिये हैं। किन्तु देखने में यह आता है कि मनुष्य अधिकाधिक दुःखी होता जाता है। युग के इस विपरीत परिणाम का कारण है मनुष्य की अपात्रता। सुख के असंख्य साधन होने पर भी मनुष्य अपनी अपात्रता के कारण उनका उपभोग नहीं कर पा रहा है।

एक व्यक्ति प्यास से बुरी तरह विकल है और एक कुँए के पास भी पहुँच जाता है, किन्तु यदि उसके पास पानी भरने का साधन लोटा डोर आदि नहीं है तो वह पानी पाकर अपनी प्यास नहीं बुझा सकता । इसी प्रकार जब तक मनुष्य में अपात्रता रहेगी तब तक वह सुख को प्राप्त नहीं कर सकता फिर चाहे घर-घर में कल्प-वृक्ष ही क्यों न लगा दिया जाये।

मनुष्य की अपात्रता है पापपूर्ण हृदय। जब तक उसके हृदय से संकीर्णता, स्वार्थ, ईर्ष्या द्वेष आदि पाप दूर नहीं हो जाते कोई भी साधन उसे सुख नहीं दे सकते। इसके विपरीत यदि उसका हृदय पाप शून्य हो जाये तो बिना साधनों के भी सुख पा सकता है।

-आचार्य नरेन्द्र देव

जिज्ञासा जगाइये और अपना ज्ञान भंडार भरिए।

जिज्ञासा मानव-जीवन के विकास का बहुत बड़ा आधार है। जो जिज्ञासु है, जानने को उत्सुक है वही जानने का प्रयत्न भी करेगा। जो जिज्ञासु नहीं उसे जड़ ही समझना चाहिए। पेड़-पौधे यहाँ तक पशु-पक्षी भी कुछ नया जानने के लिये कभी उत्सुक नहीं होते । जिज्ञासा की विशेषता ही मनुष्य को पशुओं से भिन्न करती है। वैसे जिज्ञासा के अभाव में मनुष्य भी अन्यों की तरह दो हाथ-पैर वाला पशु ही है।

जिज्ञासा में स्वयं अपनी ज्ञान-शक्ति होती है। जिज्ञासा के जगते ही किसी बात को जाने सकने का सहायक ज्ञान स्वयं ही विकसित होने लगता है। ज्यों ज्यों जिज्ञासा गहरी होती जाती है ज्ञान भी बढ़ता जाता है, मनुष्य की जिज्ञासु वृत्ति ने ही उसे दार्शनिक, आध्यात्मिक, वैज्ञानिक एवं अन्वेषक बनाया है।

यदि जिज्ञासा ने होती तो मनुष्य में इस प्रकार के प्रश्न ही क्यों जागते कि वह क्या है? यह विराट् विश्व क्या है? इसका रचयिता कौन है? और इस सम्पूर्ण प्रपंच का प्रयोजन क्या है? इस सबका आदि कहाँ से प्रारम्भ होता है? अन्त कहाँ होगा? और क्यों इन प्रश्नों का उत्तर खोजने में परिश्रम करता। जिज्ञासा के अभाव में, मनुष्य आज जिस ज्ञानपूर्ण स्थिति में आया हुआ है, कभी नहीं आ पाता। यह जिज्ञासा की ही प्रेरणा है कि आज मनुष्य का ज्ञान भंडार इतना विशाल हो सका है और आगे इस ज्ञान भण्डार में जो कुछ भी वृद्धि होगी उसका भी मुख्य हेतु जिज्ञासा होगी।

आज यदि मनुष्य की जिज्ञासा-वृत्ति कुण्ठित अथवा तिरोहित हो जाए तो उसका ज्ञानाभिमान जहाँ का तहाँ ठप्प हो जाये और तब ग्रह-नक्षत्रों का वास्तविक अस्तित्व क्या है इसका पता लगाने की दिशा में चलते हुए प्रयास जहाँ के तहाँ रुक जायें और तब आगे भी कभी यह जान सकने की सम्भावना सदा सर्वदा के लिये समाप्त हो जाये कि आखिर इन मंगल, चन्द्र अथवा बुध आदि ग्रहों पर क्या है? इनका वास्तविक अस्तित्व क्या है? क्या इन पर भी उसी प्रकार जीवन का अस्तित्व हो सकता है जिस प्रकार कि हमारी पृथ्वी पर? यदि इनमें जीवन है तो वहाँ के जीव किस प्रकार के हैं? उनका कार्य-क्रम क्या रहता है? वे हम मानवों जैसे कर्म प्रधान मर्त्य है अथवा भोग प्रधान अमर्त्य? क्या हम मानवों की भाँति वहाँ पर भी मनुष्य पाये जाते हैं और क्या वे हमारी तरह की आत्मा परमात्मा और पुरुष प्रकृति पर विचार करते हैं? उनका आध्यात्मिक दृष्टिकोण क्या हो सकता है? उनकी साधन पद्धति क्या होगी? मनुष्य की भाँति उनके परम लक्ष्य मोक्ष की क्या परिभाषा होगी? उनकी भाषा क्या होगी और न जाने उनका साहित्य, सभ्यता, संस्कृति, कलाकौशल शिल्प एवं रहन-सहन किस प्रकार का होगा? उसमें और हम भूमिवासियों में क्या समानता और क्या अन्तर होगा?

आज मनुष्य का अन्तरिक्ष ज्ञान जिस सीमा तक पहुँच चुका है जिज्ञासा के अभाव में वह उसके आगे फिर न जा सकेगा। आज जिस अणु शक्ति को मनुष्य ने खोजकर आज्ञारत बना लिया है कल इस महाशक्ति को वह आगे बढ़ा सकता है ऐसी आशा नहीं रह सकती है।

यही नहीं कि जिज्ञासा के अभाव में मनुष्य का बढ़ता हुआ ज्ञान जहाँ का तहाँ रुक कर स्थिर हो जाएगा बल्कि वह धीरे-धीरे नष्ट भी हो जायेगा और आज का विकसित मनुष्य कुछ ही दिनों में फिर ‘कोरमकोर’ हो जायेगा। जिज्ञासा के आधार पर ही तो मनुष्य एक दूसरे से ज्ञान ग्रहण कर आगे बढ़ाता है। जब किसी में कुछ जानने, सीखने अथवा ग्रहण करने की उत्सुकता ही न रहेगी तब वह क्यों व्यर्थ में किसी विषय में माथा-पच्ची करेगा?

आज भी जिनमें जिज्ञासा का प्राधान्य होता है। ज्ञान के क्षेत्र में वे ही आगे निकल पाते हैं । यदि जिज्ञासा की मात्रा में अन्तर न होता तो सभी एक जैसे समान स्तर के ज्ञानी, दार्शनिक, आध्यात्मिक, कवि, कलाकार, शिल्पी एवं वैज्ञानिक व अन्वेषक, होते। यदि जिज्ञासा के अभाव में यह सब सम्भव हो सकता तो संसार का प्रत्येक मनुष्य विद्यावान् एवं वैज्ञानिक हो सकता था। मनुष्य में ज्ञान का कम ज्यादा होना भी जिज्ञासा की मन्दता अथवा तीव्रता पर ही निर्भर करता है।

जो जिज्ञासु है वही गहरे पैठता है। जिज्ञासु की दृष्टि सामान्य लोगों से कुछ अधिक पैनी और खोजक होती है। किसी एक दृश्य अथवा घटना को कोई सामान्य व्यक्ति देखता है तो वह उसके लिये एक साधारण बात होती है किन्तु जब उसी विषय पर किसी जिज्ञासु व्यक्ति की दृष्टि पड़ जाती है तो वही साधारण बात कोई दर्शन कि अथवा कवित्वपूर्ण अभिव्यक्ति पाकर असाधारण बन जाती है जिज्ञासु के लिये संसार की हर घटना एक रहस्य एवं एक महत्व लिये रहती है। एक रसोइये के लिये भाप से बटलोई का ढक्कन उछलना नित्य-प्रति की सामान्य बात रहती है किन्तु स्टीविन्सन के लिये भाप से ढक्कन का उठना-गिरना एक असाधारण रहस्य की बात बनकर इंजिन के आविष्कार का हेतु बनी। एक माली के लिये पेड़ से फल गिरना सामान्यतम घटना है किन्तु उसके आधार पर पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण शक्ति के सिद्धान्त के आदि गुरु न्यूटन के लिये वह असाधारण महत्व की बात थी। इतनी असाधारण कि आगे चलकर उसी आधार सूत्र के बल पर अधर में लटके इस ब्रह्माण्ड के हर ग्रह-नक्षत्र की चाल तथा अवस्थान का रहस्य मालूम कर लिया गया।

जिज्ञासा ज्ञान की महान् जननी है। जिसने जो कुछ जानना चाहा उसे जानकर ही छोड़ा। प्रत्यक्ष में जानने को कोई सूत्र न होने पर भी जिज्ञासा मनुष्य को स्वयं से उसी प्रकार सूत्र निकाल कर दे देती है जिस प्रकार मकड़ी अपने अन्तर से जाल तन्तु निकाल लेती है। गहन के गहन अपराधों का कोई आधार न होने पर भी जासूस जिज्ञासा की तीव्रता के बल पर ही पता लगा लेते हैं। जिज्ञासा के बल पर ही मनुष्य ने शरीर विज्ञान, वनस्पति शास्त्र भूगोल एवं खगोल विद्याओं का ही नहीं, अपने आन्तरिक एवं आत्मिक रहस्यों को भी हस्तगत कर लिया है। मनुष्य की जिज्ञासु बुद्धि उस चींटी की तरह सतत प्रयत्निका होती है, जो सात परदों में छिपी हुई शक्कर को खोजकर ही दम लेती है। जिज्ञासु बुद्धि का सहज गुण होता है कि जब तक वह लक्षित रहस्य को खोज नहीं लेती, सन्तुष्ट नहीं होती। दिन-रात उसके पीछे लगी रहती है।

एक ही मिट्टी से बने हुए एक जैसे हाथ पैर और समान स्थिति के मनुष्यों में से जो आगे निकल गया है,ऊँचा चढ़ गया है और दूसरा जहाँ का तहाँ ही रह गया है उसका कारण जिज्ञासा का भाव ही होता है। निश्चय ही आगे निकल जाने वाले व्यक्ति में जिज्ञासा की प्रबलता रही होती है जब कि फिसड्डी में उसका अभाव होता है। जो जिज्ञासु है, कुछ जानना और सीखना चाहता है वह तो जाने सीखेगा ही और उसी आधार पर आगे भी बढ़ेगा। जिसमें कुछ सीखने तथा जानने अथवा पाने की जिज्ञासा ही न होगी, जहाँ का तहाँ जड़ की तरह पड़े रहने में सन्तुष्ट रहेगा, प्रगतिशीलता उसके लिये अनहोनी बात ही रहेगी।

कक्षा में शिक्षक पढ़ाता है, पचासों लड़के सुनते हैं किन्तु उनमें में दस कुछ प्राप्त कर लेते हैं और चालीस ज्यों के त्यों रह जाते हैं। इसका कारण यही होता है कि उन दस में जिज्ञासा की प्रबलता थी जब कि शेष चालीस में नहीं । जिज्ञासु की बुद्धि बड़ी ही ग्रहणीय होती है वह एक बार में ही कोई बात देख सुनकर ग्रहण कर लेती है और फिर कभी उसे भूलती नहीं, अजिज्ञासु बुद्धि बड़ी ही कुन्द एवं कुँठित होती है। हजार बार देखने-सुनने और पढ़ने पर भी वह न तो किसी बात को ठीक से समझ पाती है और न याद ही रख पाती है। जिज्ञासा का अभाव मनुष्य को बड़ा ही मन्द बुद्धि बना देता है।

एकाग्रता, तन्मयता एवं तल्लीनता के साथ विषय प्रवेश जिज्ञासु व्यक्ति के विशेष गुण होते हैं। जिज्ञासु जिस नवीन बात अथवा चीज को देखता है उसमें एकाग्र होकर तल तक पैठ करने का प्रयत्न किया करता है, जिज्ञासु व्यक्ति का दैनिक ज्ञान अजिज्ञासु की अपेक्षा बहुत कुछ तरो-ताजा रहता है, एक ही स्थिति के दो मित्रों में से एक देश-देशान्तर की गतिविधि से अधिक एवं प्रामाणिक रूप में अभिज्ञात रहता है जबकि दूसरे को अपने पास-पड़ौस की घटनाओं का भी ज्ञान नहीं रहता। यह अन्तर उनकी अपनी-अपनी जिज्ञासा के स्तर के कारण ही होता है।

जिज्ञासु व्यक्ति किसी बात के हर पहलू को जानने एवं समझने का प्रयत्न किया करता है और यथासम्भव अवश्य ही जानबूझ लेता है जबकि अजिज्ञासु व्यक्ति केवल तात्कालिक उपयोग पहलू के संक्षिप्त ज्ञान से ही संतुष्ट हो जाता है। इस संबंध में एक छोटी -सी कहानी प्रसिद्ध है जिससे पता चलता है कि जिज्ञासु व्यक्ति कितना चतुर एवं उपयोगी होता है।

एक बादशाह का एक बहुत ही मुँह लगा नौकर था। दिन-रात बादशाह की सेवा में लगा रहता था। एक दिन उसे विचार आया कि वह बादशाह की सेवा में दिन-रात लगा रहता है तब भी उसे केवल पाँच रुपये ही मिलते हैं जबकि मीरमुँशी, जो कभी कोई विशेष काम नहीं करता वेतन में पाँच सौ रुपये पाता है। निदान एक दिन प्रसन्न देख कर वह बादशाह से प्रश्न कर ही बैठा। सरकार मैं दिन-रात सेवा करता हूँ तो भी मुझे केवल पाँच रुपये ही मिलते हैं और आपका मीरमुँशी जो कभी कुछ नहीं करता है पाँच सौ रुपये वेतन पाता है। इस भेद का का क्या कारण है? बादशाह ने हँसकर कह दिया किसी दिन मौके पर बतलाऊँगा।

एक दिन एक घोड़ों का काफला उसकी सीमा से गुजरा। बादशाह ने अपने सेवक को भेजा कि जाकर मालूम कर यह काफला कहाँ जा रहा है?

नौकर गया और आकर बतलाया कि हुजूर वह काफला सीमा के कंधार देश जा रहा है।

अब बादशाह ने मीरमुँशी को भेजा। उसने आकर बतलाया कि यह काफला काबुल से आ रहा है और कंधार जा रहा है। उसमें पाँच सौ घोड़े और बीस ऊँट भी हैं मैंने अच्छी तरह पता लगा लिया है कि वे सब सौदागर हैं और घोड़े बेचने जा रहे हैं। इस समय उन्हें पैसे की सख्त जरूरत है यदि हजूर कुछ घोड़े खरीदना चाहें तो कम कीमत पर मिल सकते हैं। मैंने पचास ऐसे घोड़ों को छाँट लिया है जो नौजवान और बड़ी ही उत्तम जाति के हैं। बादशाह ने तुरन्त ही पचास घोड़े खरीद लिये जिससे उसे कम दामों पर अच्छे घोड़े मिल गये। काफिले के विषय में चिन्ता जाती रही और उन परदेशी सौदागरों पर बादशाह की गुण ग्राहकता का बड़ा अनुकूल प्रभाव पड़ा। बादशाह ने नौकर से कहा देखा तुम्हें पाँच रुपये क्यों मिलते हैं और मीरमुँशी को पाँच सौ क्यों? नौकर ने इस अन्तर के रहस्य को समझा और सदा के लिये सावधान हो गया।

जिज्ञासु व्यक्ति किसी भी बात की तह तक बैठ कर उसमें से किसी न किसी प्रकार की उपयोगिता खोज लाता है? जिज्ञासा शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक एवं आध्यात्मिक चारों उन्नतियों की हेतु होती है। मनुष्य को अपनी जिज्ञासा को प्रमाद पूर्वक कष्ट नहीं करना चाहिए उसे विकसित एवं प्रयुक्त करना चाहिए और यदि जिसमें जिज्ञासा नहीं है तो उसे चाहिए कि वह तब तन्मयता एवं गहरे पैठने के अभ्यास से उसे पैदा करे। क्योंकि जिज्ञासा भौतिक एवं आध्यात्मिक दोनों महान क्षेत्रों में प्रगति एवं उन्नति का आधार बनती है।


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आध्यात्म की एक छोटी-सी किरण मात्र से मानव-जीवन कमल की तरह खिल उठता है। सारी विकृतियाँ एक क्षण में विलीन हो जाती हैं। हृदय में प्रसन्नता, सदाचार, निर्भयता, उदारता और करुणा की वरुणा लहरा उठती है। आध्यात्मिक व्यक्ति का तन-मन शरद-ज्योत्स्ना की भाँति शीतल हो उठता है। न केवल वह ही शीतल हो उठता है अपितु उसके संपर्क में आकर ताप-संतप्त व्यक्ति भी शीतल हो उठता है। लोग आध्यात्म लाभ के लिये वर्षों प्रयत्न करते रहते हैं। किन्तु उसका अनुभव नहीं कर पाते । इसका कारण यह है कि वे केवल बाह्य साधनों पूजा-पाठ में ही अधिक संलग्न रहते हैं। आध्यात्म से वस्तुतः हृदय को पवित्र बनाइये मन को निर्मल कीजिये तत्काल ईश्वरीय प्रकाश, आध्यात्म की अनुभूति होगी।

-तपस्विनी श्रद्धा


सुख दुःख हमारे कर्मों का ही फल है।

सुख दुःख की विषमता संसार की विशेषता है । जिस ओर दृष्टि जाती है तो कोई सुखी और कोई दुःखी दिखाई देता है। दुःखी कोई भी नहीं रहना चाहता। सभी सुखी रहना चाहते हैं। उसके लिए प्रयत्न भी करते हैं। कभी सफल और कभी असफल भी होते हैं।

सुखी से सुख का कारण पूछिये वह उसे परमात्मा की कृपा, भाग्य का फल बतलायेगा। दुःखी से पूछिये तो वह उसका कारण भगवान का कोप और दुर्भाग्य का दोष बतलायेगा।

इस प्रकार के विपरीत कथनों पर विश्वास करने पर यही समझ पड़ता है कि परमात्मा भी मनुष्यों के प्रति असमानता की दृष्टि रखता है। वह किसी को सुखी तथा किसी को दुःखी बनाया करता है। इससे उसकी समदर्शिता पर आक्षेप आता है। क्या यह बात विश्वास करने योग्य हो सकती है कि परमात्मा असम दर्शी है? वह मनुष्यों से भेद-भाव बर्तता है। कोई भी बुद्धिमान व्यक्ति इस अनर्गल बात की हामी नहीं भर सकता।

प्रभु समदर्शी है। वह सबका पिता है। उसे अपने सभी पुत्र समान रूप से प्यारे हैं। वह किसी के बीच भेद भाव नहीं बर्तता। सबको समान दृष्टि से देखता है और सब पर समान कृपा रखता है। उसे असमानदर्शी कहना अथवा भेद-भाव बरतने वाला मानना उसकी महिमा, उसकी गरिमा और उसके ऐश्वर्य के प्रति धृष्टता करना है, जो किसी को भी नहीं करना चाहिये। अपने सुख दुःख और अच्छी बुरी परिस्थितियों का कारण मनुष्य स्वयं है, परमात्मा अथवा अन्य कोई व्यक्ति, शक्ति अथवा वस्तु नहीं ।

उदाहरण कि लिए लौकिक पिता को ही ले लीजिये। वह अपने सभी लड़कों को समान रूप से चाहता, प्यार करता और वस्तुएँ देता है, किन्तु उनमें से एक लड़का बीमार रहता है तो इसका कारण क्या यह माना जा सकता है कि वह इसलिए दुःखी या विषण्ण है कि उस पर उसके पिता की कृपा दृष्टि नहीं है। भला ऐसा कौन समझदार हो सकता है जो उस लड़के के दुःख में पिता की दृष्टि को हेतु बताये। स्पष्ट है कि उस लड़के ने अपने असंयम तथा अकर्मों से ही अपने लिये वह दुःखद स्थिति उत्पन्न की है। उसमें उसके पिता का रंच मात्र हाथ नहीं रहता। पिता चाहता है कि उसका पुत्र सुखी रहे, स्वस्थ बने, किन्तु तब तक उसकी यह इच्छा पूरी नहीं हो सकती जब तक लड़का उन परिस्थितियों के अनुरूप अपने कर्मों में सुधार नहीं करेगा। क्योंकि मनुष्य का सुख-दुःख उसके अपने कर्मों का ही फल है जो कि निश्चय ही योग्य है। उसको बदला नहीं जा सकता।

मनुष्य अपने दुःख का उत्तरदायी स्वयं है। उसका दोष दैव, दुर्भाग्य अथवा परमात्मा को देना योग्य नहीं। प्रारब्ध और आकस्मिक हानि-लाभ जो दैवी अनुग्रह या कोप समझे जाते हैं, वस्तुतः मनुष्य के अपने कर्म ही होते हैं। उसका कारण कोई बाहरी व्यक्ति, परिस्थिति, ग्रह नक्षत्र अथवा देवदानव नहीं होता । पूर्व जन्म में मनुष्य जो शुभाशुभ कर्म किया करता है उसका परिपाक ही वर्तमान जीवन में प्रारब्ध बनकर सामने आता है। जिसने सत्कर्म किये रहे होते हैं उसका प्रारब्ध सुख सम्पत्ति के रूप में प्रत्यक्ष होता और इसके विपरीत जिसने अपकर्म तथा पाप कर्म की गठरी बाँधी वह दुःख दारिद्रय के रूप में सामने खुलता है। मनुष्य अपने सौभाग्य अथवा दुर्भाग्य का निर्माता आप है उसका श्रेय अथवा दोष किसी दूसरे को देना भूल है।

मनुष्य अपने सुख दुःख का उत्तरदायी आप है यदि इस सत्य को अतर्क भाव से स्वीकार हृदयंगम कर लिया जाये, तो मनुष्य अपने पर, अपने आचार विचार, आहार बिहार और व्यापार व्यवहार पर विचार कर सकता है। अपने अन्दर अपनी कमियों एवं त्रुटियों को खोज सकता है और यदि वे कोई हैं तो उन्हें सुधार सकता है। दोष दूसरे के सिर मढ़ने से, उत्तरदायित्व और के कंधे पर डालने से, मनुष्य की दृष्टि अपनी ओर जाती ही नहीं। फलतः न वह आत्म-सुधार में तत्पर होता है और न उसके भाग्य में आलोक अक्षर अंकित किये जाते हैं। अस्तु जिन बुद्धिमानों को मानव जीवन के लक्ष्य सुख शाँति की यथार्थ जिज्ञासा है वह अपना उत्तरदायित्व अपने ऊपर लें। दूसरे को दोष देना छोड़ कर अपना सुधार करें और अपने श्रेय अथवा प्रेय के अधिकारी बनें।

प्रत्येक व्यक्ति सुख-समृद्धि की सम्पत्ति और वैभव-ऐश्वर्य की कामना करता है। किन्तु आश्चर्य की बात तो यह है कि वह यह समझना नहीं चाहता कि इन सारी विभूतियों का मात्र आधार पुण्य ही है। अतीत के शुभ कर्म ही कालान्तर में ऐश्वर्य और वैभव बनकर सामने आते हैं, किसी समय जिन्होंने सत्कर्मों में रुचि रक्खी है पुण्य परमार्थ पर श्रम किया है वे उसका फल आज सुख-सामग्री के रूप में पा रहे हैं। इसी प्रकार जो आज जिस प्रकार के बीजों को बो रहा है वह आगे चल उनका फल पायेगा। यह विधान निश्चित है इसमें हेरफेर अथवा परिवर्तन की गुँजाइश नहीं।

निःसन्देह देखने में आता है कि लोग खुले आम बेईमानी कर रहे हैं और धन-धाम के अधिकारी बनते जा रहे हैं। पाप कर्मों में रत हैं फिर भी दरिद्री नहीं दीखते। अन्याय, अत्याचार और अनीतिवर्त रहे हैं फिर भी धन दौलत और साधन सामग्री की कमी नहीं हैं। ऐसा देखकर यह भ्रम हो सकता है कि धन-दौलत, साधन-सामग्री और सुख सम्पत्ति के विषय में पाप-पुण्य की कोई सत्ता नहीं । प्रत्यक्ष के प्रमाण पाकर यह कहा जा सकता है यह सब झूठ है केवल विचार करने और मन को समझने का ढंग है।

इस भ्रम में पड़ने से पूर्व यदि इस पर ठीक से विचार किया जाये तो स्थिति स्पष्ट हो जायेगी। पापकर्म अथवा अनुचित कार्य करते हुए भी जो सुखी और सम्पन्न दिखाई देते हैं उसका यह अर्थ नहीं कि उनकी इस सम्पत्ति-सामग्री का सम्बन्ध वर्तमान कर्मों से ही है। उनके पास आने वाली सम्पत्ति पूर्व कर्मों का प्रतिफल है और आज के कर्म आगे के उपक्रम हैं जो कालान्तर में फलीभूत होने ही हैं। यदि ऐसा न होता तो वर्तमान में प्रत्येक व्यक्ति को प्रत्येक कर्म का एक समान ही फल मिलता। जब कि धन वैभव के लिए अपामार्ग अपनाने वाले अनेक अन्य लोग दीन−हीन और दरिद्री ही रह जाते हैं। इसी प्रकार अनेक सत्यव्रती धनी और अनेक निर्धन दिखाई देते हैं। इस विभिन्नता विषमता तथा विपरीतता का कारण पूर्व कर्मों का प्रभाव ही कहा जायेगा।

कर्म विपाक के इस सूक्ष्म एवं दार्शनिक विवेचन को छोड़कर यदि विषय को स्थूल एवं प्रत्यक्ष रूप में देखा जाए तो भ्रम और भी अधिक स्पष्ट हो जाता है। अपकर्म अपकर्म हैं। वह आदि अन्त और वर्तमान तीनों कालों में दुःखदायी होता है अन्तःकरण में पापकर्म के संकल्प का उदय होते ही आत्मा में एक बेचैनी पैदा होने लगती है। उसका विवेक बार-बार धिक्कारता और भर्त्सना करता है, मनुष्य सुख-चैन की नींद खो देता है। उसकी अन्तरात्मा बार-बार पुकार करती है कि तेरा यह संकल्प यह विचार यह भाव उचित नहीं, इनकी पूर्ति तेरे लिए अकल्याणकर परिस्थितियाँ पैदा करेगी, पाप कर्म के लिए मनुष्य का यह आदि अन्तर्द्वन्द्व कितना दुःखद, कष्टकर तथा मानसिक क्षय करने वाला होता है इसको तो कोई भुक्त -भोगी ही बतला सकता है।

जब मनुष्य अपनी अन्तरात्मा की आवाज दबा कर प्रत्यक्ष रूप में पाप कर्म में प्रवृत्त होता है तब उसे थोड़ा कष्ट नहीं भोगना पड़ता। समाज से छिपने, एक झूठ को छिपाने के लिए सौ झूठ के मढ़ने, राजदण्ड से डरने अपयश अपवाद और कलंक से बचने के लिए प्रयत्न करने में उसे कितना कष्ट होता होगा क्या इसका अन्दाज लगाया जा सकता है? क्या कभी बेईमानी से धन कमाने, सम्पत्ति सामग्री बनाने वाले को किसी ने सुख चैन की श्वाँस लेते देखा है। क्या किसी ठग चोर अथवा डाकू को किसी ने अपहरण की हुई वस्तु को निश्चिंत होकर भोगते देखा है। चोरी का माल उसकी छाती पर बैठे सर्प की तरह ही उसे हर समय डराता रहता है।

पाप कर्म खुलते हैं। कचहरी, पुलिस जेल आदि का दण्ड भुगतना पड़ता है। लोकापवाद और लाँछना की आग में जलना पड़ता है और बहुत बार तो बेईमानी की कमाई घर की सत्सम्पत्ति को भी डुबाकर दरिद्री बना देती है। साहूकार बनकर भी अनुचित मार्ग से साधना सम्पत्ति कमाने वाला वास्तव में चोर बना रहता है। उसकी सारी वृत्तियाँ चोर जैसी ही निष्कृष्ट एवं निम्न-कोटि की हो जाती हैं। इस स्थिति में किसी को कितना कष्ट होता होगा और कौन-सी दुर्दशा नहीं हो जाती होगी यह नहीं बताया जा सकता । जिस सुविधा साधन, धन दौलत अथवा वैभव ऐश्वर्य से सुख नहीं, शान्ति नहीं, प्रसन्नता अथवा प्रफुल्लता नहीं उसका होना न होना बराबर ही नहीं बल्कि असुखकर सम्पत्ति की वर्तमानता भयानक रूप से दुःखदायी बन जाती है। पाप अपने स्वभाव के अनुसार अपने आश्रयदाता को न केवल इस जन्म में ही खाता रहता है बल्कि वह जन्मान्तरों में साथ लगा हुआ लोक परलोक को नष्ट करता रहता है। इस प्रकार भ्रमवश पापी को बाहर से भरा पूरा देखकर अपकर्म का समर्थन करना भारी भूल है इससे हर बुद्धिमान् व्यक्ति को बचे ही रहना चाहिये।

सत्कर्म लोक परलोक, जन्म-जन्मान्तर सभी जगह और आदि, मध्य व अन्त। तीनों कालों में सदा सुखकर ही होता है, सच्ची साधन सामग्री, समृद्धि तथा धन धाम और उससे मिलने वाली सुख शाँति का हेतु पुण्य परमार्थ ही है। जो शुभ विचारों के साथ सत्कर्मों में निरत रहता है उसे न राज्य का भय रहता है और न समाज का। न लोक की चिन्ता करनी पड़ती है और न परलोक की। उसका हृदय प्रसन्नता, प्रफुल्लता तथा सुख शाँति से ओत प्रोत रहता है, चैन की नींद सोता है और निश्चिन्त होकर विचरता है।

जो कुछ कमाओ उचित मार्ग से और जो कुछ चाहो उसकी उपलब्धि निष्पाप प्रयत्नों द्वारा करो। किसी स्थान अथवा काल में दुःख का कोई कारण ही उत्पन्न न होगा। और यदि होगा भी तो उसकी आत्मा में भरा पुण्य परमार्थ का व्रत उसका प्रभाव न पड़ने देगा। पुण्य परमार्थी, सत्यव्रती यदि एक बार धनहीन भी रहता है तब भी उसका सन्तोष, उसका धैर्य उसको उम्र भर तक प्रसन्न और आन्तरिक सम्पन्नता से ओत प्रोत ही रखेगा। जिस धनहीनता का कोई आतंक नहीं वह रहे अथवा चली जाये इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता। पुण्य परमार्थ का निश्चित फल आत्मसुख व आत्म संतोष है।

स्थायी एवं यथार्थ सुख की आकाँक्षा है तो कर्म परिपाक में विश्वास रखकर पुण्य परमार्थ का मार्ग अपनाना ही होगा। नहीं तो झूठे सुख और सच्चे दुःख के बीच यों ही जीवन गँवाना होगा।


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मनुष्य की विपरीत बुद्धि-

मनुष्य की बुद्धि अब तक विपरीत बनी हुई है ओर अभी न जाने कब तक बनी रहेगी। मनुष्य को जो करना चाहिये वह न करके उल्टा ही करता है। श्रेय को समझता हुआ भी उससे विमुख होकर चलता है। सेवा, तप, त्याग, दया, क्षमा आदि मानवीय गुणों का कोई मूल्य अंकित ही नहीं करता, और यदि करता भी है तो बहुत ही बेमन से कृपणता के साथ थोड़ा-सा। इतना थोड़ा जो नहीं के बराबर ही समझा जाये।

इसके विपरीत यह पशु बल के सम्मुख नमन करता है। जो संसार को संहार के घाट उतारता या उतारने को उद्यत रहता है, उसकी वन्दना करता है उसका यश गाता है । उपद्रवी की पूजा करना और निरूपद्रवी की उपेक्षा करना मनुष्य की उल्टी बुद्धि ही नहीं तो क्या है? मानवता या मनुष्यता का अर्थ है अन्यायी के विरुद्ध असन्तोष और सज्जन के प्रति श्रद्धा रखना।

-संत तुकाराम

प्रगति के पथ पर नित्य नये कदम बढ़ते हैं।

प्रतिक्षण आगे बढ़ने का प्रयत्न करते रहना ही जीवन का लक्षण है और लक्ष्य भी। जो एक स्थान पर जम गया, ठहर गया वह जड़ एवं निर्जीव ही माना जायेगा।

संसार में जो भी विकास एवं उन्नति-दृष्टिगोचर हो रही है वह सब मनुष्य की प्रगतिशीलता का ही परिणाम है। यदि मनुष्य अपनी आदि अवस्था में ही सन्तुष्ट होकर स्थिर हो गया होता तो आज हम जो अपने को सभ्य एवं उन्नत दशा देख रहे हैं वह सम्भव न होता। मनुष्य जंगलों एवं गुफाओं में रहता हुआ आखेट के आधार पर जीवन बिता रहा होता। अन्य पशुओं की तरह मनुष्य भी आज तक नगण्य एवं निराधार जीवन बिताता हुआ पशु श्रेणी में ही रह रहा होता। यह सब प्रगतिशीलता का ही परिणाम है कि हम आज अपने को ऐसी सुसंस्कृत दशा में देख रहे हैं।

प्रगति प्रकृति का अटल नियम है। जो बढ़ता एवं विकसित होता रहता है वह ही जीवित रहता है, संसार उससे सम्बन्ध रखता है। विकास अथवा प्रगति अवरुद्ध होने पर किसी भी वस्तु को निरर्थक, निरुपयोगी तथा निर्जीव मानकर मूल्य घटा दिया जाता है।

मनुष्य की गति रुक जाने से वह मुर्दा समझ लिया जाता है। बच्चों का विकास रुक जाने पर उसे रोगी मान लिया जाता है। पेड़ पौधों का बढ़ना, फलना-फूलना अथवा पल्लवित होना बन्द हो जाने पर वह ठूँठ होकर इंधन बन जाता है। गति रुक जाने से नक्षत्र टूट जाते जाते हैं। प्रवाहहीन नदियाँ रेत बन जाती हैं और गतिहीन पवन तो निश्चय ही संसार की मृत्यु का कारण हो सकती है। संसार में जिस ओर देखिये गति एवं प्रगति ही नजर आती है। संसार का प्रत्येक अणु क्षण प्रत्यक्ष अथवा प्रच्छन्न रूप से निरन्तर चलता ही रहता है। जड़ कही जाने वाली वस्तुओं में भी एक आन्तरिक गति रहा करती है और इसी गति, इसी जीवन की अवधि तक वे उपयोगी बनी रहती हैं अन्यथा कूड़ा करकट बनकर बेकार हो जाती हैं।

मनुष्य चौरासी लाख योनियों में विकास एवं प्रगति करता हुआ मनुष्य योनि में पहुँचा है। इसी योनि में जाकर उसे आत्मा परमात्मा की जिज्ञासा हुई है और इसी योनि में विकास करके वह भौतिक बंधन से मुक्त होकर अपने परम लक्ष्य चरम विकास परमात्मा स्वरूप को प्राप्त कर सकता है। जो उसे ही करना चाहिये और जिसे प्राप्त करने के लिए कर्म, धर्म, परमार्थ एवं पुरुषार्थ द्वारा बुद्धिमान लगे ही रहते हैं। क्योंकि वे जानते हैं कि यदि हम इस मौलिक विकास ही परमाविधि मनुष्य शरीर से सन्तुष्ट होकर आगे लिए प्रगति अवरुद्ध कर देंगे तो निश्चय ही पुनः मानवेत्तर अधम योनियों में पतित हो कर हमारा विनाश हो जायेगा। मनुष्य का कल्याण इसी में है कि जब तक वह प्रेय से लेकर श्रेय तक की परमाविधि न पा जाये तब तक निरन्तर प्रगति करता हुआ उत्तरोत्तर विकास एवं उन्नति के लिए अधिक पुरुषार्थ करता रहे। प्रगति ही जीवन है और अगति ही दुर्गति एवं मृत्यु।

मनुष्य जाने अथवा अनजाने प्रगति करने को मजबूर है। वह एक स्थान पर स्थिर होकर खड़ा नहीं रह सकता यदि वह सावधानीपूर्वक स्वयं प्रगति करेगा तो उन्नति की ओर बढ़ता जायेगा अन्यथा प्रकृति की स्वाभाविक गतिशीलता उसे पतन की ओर ढकेल देगी। मनुष्य को इस अथवा उस ओर चलना ही पड़ेगा। वह किसी भी दशा में एक स्थिति अथवा स्थान पर रुका नहीं रह सकता।

जीवन प्रतिक्षण बढ़ता हुआ मनुष्य को मृत्यु की ओर लिए जा रहा है। किसी में शक्ति नहीं कि वह जीवन की इस प्रगति को एक स्थान पर रोके रहे। जहाँ अबुद्धिमान लोग अन्त की ओर प्रगति करते हुए जीवन की यों ही उपेक्षा करके प्रमाद एवं आलस्य के वशीभूत होकर व्यर्थ में बरबाद होने देते हैं वहाँ इस अन्तोन्मुख जीवन यात्रा को बुद्धिमान लोग महत्वपूर्ण मानकर एक क्षण भर भी व्यर्थ नहीं खोते और प्रबल पुरुषार्थ के बल पर इस निश्चित अन्त में श्रेय पूर्ण कार्यों में अनन्तता का समावेश कर देते हैं। संसार में हजारों लाखों ऐसे सुकृति हुए हैं जिन्होंने अन्त होने पर भी अनन्तता प्राप्त कर ली है और वे या तो परम पद पर प्रतिष्ठित हो गये हैं अन्यथा मानवता के इतिहास में अमर होकर जी रहे हैं। ऐसे अमृत पुरुषों ने प्रगति के महत्व को समझा है और मनुष्य की प्रकृत गति को पुरुषार्थपूर्वक श्रेयस्कर मोड़ दिया है। वे समय के प्रवाह में तिनके की तरह नहीं बहे हैं बल्कि शक्तिसम्पन्न पथिक की तरह मनोवाँछित दिशा में बलपूर्वक स्वयं चले हैं और गौरवपूर्ण निर्धारित गन्तव्य स्थल पर जानकारी के साथ पहुँचे हैं।

परमात्मा ने प्रत्येक मनुष्य को मनोवाँछित प्रगति का समान अधिकार एवं शक्ति दी है। अब जो इन सुविधाओं का सदुपयोग नहीं करता वह पतन के गढ़े में गिरता है।

ईश्वर के संसार रूपी साम्राज्य में अनन्त विभूतियाँ अपरिमेय ऐश्वर्य बिखरा पड़ा है। यह सब उसके उत्तराधिकारी पुत्र मनुष्य के लिये ही तो है। परम पिता परमात्मा की इच्छा है कि उसका प्रत्येक पुत्र अपने पुरुषार्थ से इस अनन्त ऐश्वर्य का स्वामी बने, श्रेय एवं सुख प्राप्त करे। यदि उसे यह वाँछनीय न होता तो वह मनुष्य को अनेक प्रकार से अनेक तरह की शक्तियाँ क्यों देता? क्यों तो उसे आगे बढ़ने की जिज्ञासा देता? क्यों तो उसको रहस्य समझने की बुद्धि देता? और क्यों प्रगति में किसी न किसी रूप में उसका सहायक होता? परमात्मा द्वारा मनुष्य को नित्य नवीनता की इच्छा दिया जाना इस बात का प्रमाण है कि उसे मनुष्य की उन्नति, प्रगति एवं विकास वाँछित है। अन्यथा वह मनुष्य को भी क्यों न अन्य पशुओं की तरह जड़ बुद्धि बनाता? मनुष्य की रुचि किसी एक चीज में स्थायी न रखने में उसका यही मन्तव्य है कि मनुष्य एक चीज पाने के बाद दूसरी लाने के लिए अग्रसर होता रहे। एक सोपान चढ़ने के बाद दूसरे के लिए कदम बढ़ाता रहे। मनुष्य की यह प्रगतिशीलता बनाए रहने के लिए वह संसार की नाना वस्तुओं में आकर्षण जगाता रहता है और जब मनुष्य एक वस्तु पा लेता है तो वह उसके लिए पुरानी आकर्षणहीन हो जाती है, फलतः वह अन्य नये आकर्षण वाली वस्तु को पाने के लिये प्रयत्नशील हो उठता है। इस आकर्षण एवं अनाकर्षक में एक यही रहस्य छिपा है कि मनुष्य सन्तुष्ट होकर अपनी प्रगति एवं परिश्रमशीलता न छोड़ दे वह किसी न किसी कारण से प्रगति करता ही रहे क्योंकि प्रगतिशील रहने पर ही मनुष्य अपने अंतिम श्रेय परमात्मा की प्राप्ति तक पहुँच सकता है।

व्यवसाय, सेवा, शिक्षा, धर्म अथवा राजनीति किसी क्षेत्र में भी क्यों न देख लिया जाये, जो व्यक्ति निरन्तर विकास एवं प्रगति का प्रयत्न करता रहता है वह अधिकाधिक सुदृढ़ होता एवं उन्नति करता जाता है, और जो लोग एक स्थान पर रुक कर आगे बढ़ने की इच्छा को त्याग देते हैं, कुछ ही समय में उन्हें निर्बल होकर मैदान से हटना पड़ता है। जो दुकानदार अपनी दुकान, अपने माल और अपने व्यवहार को समयानुकूल विकसित करते रहते हैं वे अपने ग्राहकों की संख्या एवं सद्भावना बढ़ाते रहते हैं। जो अधिकाधिक शिक्षा पाने के लिए जिज्ञासु रहता है वह किसी न किसी प्रकार अवसर निकालकर आगे पढ़ ही लेता है। एक साथ पढ़ने और एक जैसी परिस्थिति में विद्यालय छोड़ने वाले हजारों साथियों में सैंकड़ों केवल हाई स्कूल तक ही पढ़कर रह जाते हैं और सैकड़ों बी॰ ए॰ पास कर लेते हैं। इसका कारण यही होता है कि पिछड़े हुए लोगों की शिक्षा विषयक प्रगतिशीलता नष्ट हो गई होती है जब कि अन्य आगे पढ़ने का हौसला बनाए रहे होते हैं। प्रगति की इच्छा के अनुसार मनुष्य को आगे बढ़ने का अवसर मिलता ही रहता है ईश्वर उनकी मदद करता है जो अपनी मदद आप किया करते हैं।

नौकरी के विषय में बहुत बार देखा जाता है कि एक व्यक्ति क्लर्क का क्लर्क ही बना रहता है जब कि दूसरा उससे आगे बढ़कर हेड क्लर्क तथा अधिकारी तक बन जाता है। इसका कारण यही है कि एक अप्रगतिशील बना रहा और दूसरा प्रगतिशील। उसने आगे बढ़ने की जिज्ञासा की योग्यता पढ़ाई, परीक्षायें पास कीं, विभागीय प्रशिक्षण के लिए परिश्रम किया और उन्नति के साधनों पर अग्रसर हुआ । जो चलता-बढ़ता रहेगा वह उन्नति तो करेगा ही साथ ही एक सम्मानित, संतुष्ट तथा जीवन्त जिन्दगी भी जियेगा। जो रुक जाता है, आगे बढ़ने का प्रयत्न छोड़ देता है उसकी सारी शक्तियाँ एवं योग्यताएँ नष्ट हो जाती हैं और वह निकृष्ट जीवन का ही अधिकारी बनकर रह जाता है, उत्कृष्ट एवं संतुष्ट जीवन के लिए प्रगति करते रहना बहुत आवश्यक है।

प्रगतिशीलता जीवन में रस, अभिरुचि एवं आकर्षण उत्पन्न करती है, जबकि अप्रगतिशील की जिन्दगी में ने तो कोई नवीनता आती है, न कोई उत्साह रहता है। उसकी जिन्दगी लौकिक बनकर एक भार जैसी ही बन जाती है। प्रगतिशील व्यक्ति की जिन्दगी में नित्य नई सफलताओं के समारोह आते रहते हैं। उन्नति एवं उपलब्धियों से उसका जीवन एक उत्सव की तरह उल्लास एवं प्रसन्नता के साथ बीतता है। उसे यह अनुभव करके सुख मिलता रहता है कि उसकी जिन्दगी चल रही है, वह कुछ काम कर रहा है और अपने लक्ष्य की ओर आगे बढ़ रहा है।

उन्नति, विकास एवं प्रगति करना प्रत्येक व्यक्ति का परम पावन कर्तव्य है। यदि वह ऐसा नहीं करेगा तो उसके जीवन में जड़ताजन्य अनेक दोष आ जायेंगे। जो इस प्रसन्न मानव जीवन को एक यातना में बदल देंगे। निराशा, चिन्ता, क्षोभ, ईर्ष्या द्वेष आदि अवगुण प्रगति शून्य जड़ जीवन के ही फल हुआ करते हैं। जो आगे बढ़कर पाने का प्रयत्न नहीं करेगा वह किस प्रकार पा सकता है। और न पाने की स्थिति में उसे पाने वालों से डाह होगी ही, पीछे रह जाने से निराशा चिन्ता एवं क्षोभ होगा ही, जीवन को सुन्दर बदलने और अवगुणों से बचो रहने के लिए मनुष्य को प्रगति के पावन कर्तव्य से विमुख न होना चाहिए।

मनुष्य इस कर्मभूमि पर एक जगह पड़े-पड़े जीवन बिताने के लिए पैदा नहीं हुआ है। वह आया है नित्य नई प्रगति करके अपने परम जीवन लक्ष्य को पाने के लिए। जो जहाँ खड़ा है, उसे वहीं नहीं खड़ा रहना चाहिये उसे मन वचन कर्म से किसी न किसी रूप में परिस्थिति अनुसार कुछ न कुछ प्रगति करते ही रहना चाहिए । कोई कारण नहीं कि जब कोई दूसरा अपने परिश्रम एवं पुरुषार्थ का उपयोग करके नित्य नये श्रेयों एवं उपलब्धियों को प्राप्त करता रहता है तो हम उसे क्यों नहीं पा सकते। अब भी पा सकते हैं। किन्तु दिन-दिन पुरुषार्थ एवं अधिकाधिक परिश्रम द्वारा कदम-कदम बढ़ते हुए और उन्नति पथ पर चढ़ते हुए।


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पहले द्वेष दूर कर-

यदि तू भक्तिभाव से मन्दिर में आया है, और श्रद्धा से अपनी भेंट देवता को चढ़ाना चाहता है, और ऐसे समय भी तुझे याद आ जाये कि मेरा अमुक भाई किसी कारण से मेरे प्रति अपने मन में विरोध की भावना रखता है। तो पूजा की सामग्री और उपहार मंदिर के द्वार पर ही रख दे और वापिस जाकर पहले अपने बंधु को मना, उसके मन से अपना द्वेष दूर कर।

क्योंकि यदि किसी कारण से कोई तुझसे द्वेष मानता है तो ऐसा करने में उसे कुछ न कुछ तो कष्ट होगा ही। द्वेष आग के समान होता है जो कि तेरे कारण ही तेरे बन्धु का हृदय जलाता है। यदि तू जाकर उसका समाधान कर देगा, अपनी नम्रता से उसके मन की ज्वाला बुझा देगा तो वह तेरा बंधु सुखी हो जायेगा। और यदि तू ऐसा नहीं करता तो वह तेरे अभिमान के कारण मन ही मन जलता रहेगा जिससे तुझे दोष लगेगा और तेरी भेंट परमेश्वर के घर स्वीकार न की जा सकेगी।

-ईसा


सामूहिक उपवास द्वारा राष्ट्र एवं आत्मा की सेवा करिये।

‘भूखे भजन न होहि गुपाला’, वाली लोकोक्ति से सब लोग अवगत हैं। इसका ठीक-ठीक अर्थ यही है कि यदि मनुष्य जीवन की प्रारम्भिक आवश्यकताओं की आपूर्ति से व्यग्र एवं चिन्तित रहेगा तो उसका चित्त धर्म कर्म अथवा आध्यात्म मार्ग में नहीं लगेगा। धार्मिक प्रवृत्तियों को तभी प्रोत्साहित किया जा सकता है जब मनुष्य जीवन की मौलिक आवश्यकताओं, रोटी-कपड़े की चिन्ता से मुक्त रहे। जब दिन-रात भूख सता रही हो, बुभूक्षा चैन न लेने दे रही हो, तब कोई भी व्यक्ति वह उच्चस्तरीय आध्यात्मिक चिन्तन किस प्रकार कर सकता है जिसके लिए मानसिक प्रसन्नता एवं बौद्धिक संतुलन की नितान्त आवश्यकता है।

आज देश में यद्यपि धर्म-प्रसार, आध्यात्मिक प्रवर्तन तथा आत्म-उन्नति की अनेक योजनायें चल रही हैं, साथ ही भारतीय जनता स्वभाव से भी आध्यात्मिक दृष्टिकोण वाली है और वह यथासाध्य आध्यात्मिक विकास करना भी चाहती है, उसके लिए प्रयत्न भी करती है किन्तु उस दिशा में आपेक्षिक प्रगति होती दृष्टिगोचर नहीं हो रही है। इसका मुख्य कारण यही है कि ‘नर्हि सम्भव भूखे भजन’।

आज अन्नाभाव के संकट ने राष्ट्र के आर्थिक चारित्रिक तथा आध्यात्मिक आस्तित्व को कम्पित कर रखा है। राष्ट्र का नैतिक, चारित्रिक तथा आध्यात्मिक स्तर उठाने का प्रयत्न किया जा रहा है किन्तु वाँछित परिणाम के दर्शन दुर्लभ हो रहे हैं। और तब तक इस ओर किसी विशेष प्रगति की आशा भी नहीं की जा सकती जब तक किसी न किसी उपाय से इस अन्न संकट को पराभूत न कर लिया जाये।

ऐसे उपायों में जिनसे अन्न-संकट का प्रभाव भी कम हो और आध्यात्मिक भाव की अभिवृद्धि हो एक उपवास का उपाय भी है। उपवास का महत्व शारीरिक दृष्टि से तो है ही धार्मिक दृष्टि से भी बहुत है। ऋषियों ने भारतीय जीवन पद्धति में पर्वों, त्यौहारों, अनुष्ठानों, शुभ दिनों पर उपवास का विधान रक्खा है। उपवास का व्रत पालन करने से मनुष्य के विषय विकार दूर होते हैं। रोगों की सम्भावना कम रहती है। मानसिक स्फूर्ति तथा बौद्धिक प्रखरता की उपलब्धि होती है। प्रतिभा में चमक और पूजा में प्रकाश का समावेश होता है। उपवासों का प्रभाव मनुष्य की आत्मा पर बड़ा ही अनुकूल पड़ता है। आलस्य प्रमाद और तन्द्रा आदि दुर्गुणों में उपवास के नियम बहुत सहायक होते हैं। मासिक पाक्षिक अथवा साप्ताहिक उपवास रखने से पाचन क्रिया प्रखर रहती है। अनेक दिनों के एकत्र मल से मुक्ति मिलती है। उपवास के नियमों के साथ किया हुआ भोजन, भोजन न रहकर स्वास्थ्योपयोगी पथ्य बन जाता है। उपवास द्वारा किये हुए निर्विकार तन मन तथा बुद्धि आध्यात्मिक प्रगति में बहुत सहायक होते हैं।

अपनी स्थिति, परिस्थिति अथवा शारीरिक क्षमता के अनुसार प्रत्येक भारतीय को मासिक, पाक्षिक अथवा साप्ताहिक उपवास व्रत का पालन करना ही चाहिये। इस प्रकार आध्यात्मिक लाभ तो होगा ही खपत कम होने से अन्न संकट भी हल्का होने लगेगा।

जो वृद्ध, क्षीण अथवा रोगी हैं और साप्ताहिक उपवास व्रत निभाने की स्थिति में नहीं हैं वे मासिक अथवा पाक्षिक उपवास करें किन्तु जो स्वस्थ, तरुण अथवा सशक्त हैं उन्हें साप्ताहिक उपवास का नियम निर्वाह करना ही चाहिये। अच्छा तो यह है कि वे रविवार को पूरे दिन भर कुछ न खायें अन्यथा एक बार निरन्न भोजन करके दूसरे समय कुछ भी न खायें। और यदि इसमें भी कठिनाई हो तो एक समय अन्न लेकर दूसरे समय निराहार रहें अथवा शाक का ही भोजन करें।

उपवास बड़ा ही सुलभ एवं सुखद व्रत है। इसके निर्बलता की सम्भावना बतलाने वाले वास्तव में यह नहीं जानते कि उपवास का व्रत निर्बलता नहीं बढ़ाता बल्कि शारीरिक एवं मानसिक शक्तियों को प्रखर बनाता है। प्रत्येक श्रमिक ही क्यों लौह मशीन को भी सप्ताह में एक दिन आराम करने के लिए अवकाश दिया जाता है। इससे उसकी थकान दूर होती है। अवकाश वाले दिन उसकी सफाई की जाती है। जिससे अगले सप्ताह भर वह और अच्छी तरह काम करने योग्य बन जाती है जिन मशीनों से निरन्तर काम लिया जाता है वे शीघ्र ही क्षीण होकर अपनी कार्य क्षमता खो देती हैं। मनुष्य का शरीर भी एक यंत्र है। इसको भी आराम तथा पूर्णतया सफाई के लिए सप्ताह में एक दिन अवकाश चाहिए जिससे कि वह अगले सात दिनों तक अच्छी तरह काम कर सके और शीघ्र क्षीण होने से सुरक्षित रहे। तीसों दिन दोनों समय भर पेट खाते-पीते रहने से आंतें तथा पेट का पाचन संस्थान निर्बल हो जाता है जिससे अपच तथा मंदाग्नि आदि रोग उत्पन्न हो जाते हैं। पेट को किसी दिन भी अवकाश न देना उस पर अत्याचार करना है। अपने पर अत्याचार करने अथवा अपनी आत्मा को अवाँछनीय व्यवहारों से सताने वाला आध्यात्मिक उन्नति तो दूर साधारण भौतिक जीवन का भी सुख नहीं उठा सकता । शारीरिक, मानसिक, तथा आत्मिक तीनों दृष्टियों से उपवास की आवश्यकता है इस आवश्यकता की पूर्ति प्रत्येक धार्मिक तथा राष्ट्रीय जन को करनी ही चाहिये । उपवास व्रतों का महत्व बतलाते हुए भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है। विषया विनिवर्तन्ते, निराहारस्य देहिनः-

अर्थात् उपवास करने में मनुष्य के विषय शारीरिक और मानसिक रोग दूर होते हैं।

आध्यात्मिक लाभ की दृष्टि से चान्द्रायण आदि व्रतों का बहुत महत्व है। किन्तु यह बड़े-बड़े व्रत विशेष उद्देश्य विशेष स्थिति तथा विशेष अनुष्ठानों के लिए हैं, वर्तमान समय में एक साप्ताहिक व्रत की अनिवार्य आवश्यकता है। अनेक लोग सप्ताह में एक दिन भी उपवास रखने अथवा निरन्न भोजन करने से कठिनाई अनुभव करते हैं। इस कठिनाई का कारण और कुछ नहीं केवल यही है कि हम भारतवासी कुछ समय से, अन्न के कीड़े और स्वाद के लोलुप बन गये हैं। सप्ताह में एक बार निराहार अथवा शाकाहार की बात सुनकर ऐसे हताश से हो जाते हैं जैसे न जाने उन्हें कौन-सा पहाड़ टालने के लिए कहा जा रहा है। सप्ताह में एक दिन का उपवास क्षुधा को तीव्र करता है। भोजन तथा रस में आनन्द ही आता है और हर तरह से स्वास्थ्य के लिए हितकर है अध्यात्मिक जीवन पद्धति में विश्वास रखने वाले भारतीयों को भोजन के सम्बन्ध में यह पेटू पन शोभा नहीं देता विजय व्रत के नाम पर हम सबको अपने जीवन क्रम में रविवार, मंगलवार अथवा जो दिन सुविधाजनक लगे को निराहार उपवास करना ही चाहिये। इस प्रकार के लाभकारी व्रत के पालन से अन्न आपूर्ति का संकट भी मन्द होगा, स्वास्थ्य भी ठीक रहेगा और धार्मिक भावना के समावेश से आध्यात्मिक लाभ भी होगा।

सप्ताह में एक दिन अथवा एक जून भी निराहार न रह सकने वाले कम से कम अन्न त्याग का तो व्रत ले ही लें। यदि वे निराहार नहीं रह सकते तो निरन्नाहार ही करें। अन्न भोजन के स्थान पर कंद जैसे आलू शकरकंद, चुकन्दर शलजम अथवा फल ऋतु फल खीरा, ककड़ी फूट, खरबूजा, तरबूजा, आम अमरूद आदि पर रह सकते हैं। इनके अभाव अथवा कठिनाई में शाक भाजी का क्रम चला सकते हैं नहीं तो दूध, दही, छाछ आदि पर तो निर्वाह कर ही सकते हैं यदि इन छूटों, विकल्पों तथा सुविधाओं के बावजूद भी जिन्हें विजय व्रत कठिन विदित होता है उन्हें समझ लेना चाहिये कि वे अन्न के पूरी तरह कीड़े बन गये हैं, स्वादों, सो भी बँधे-टके स्वादों के हाथों पूरी तरह रहन हो चुके हैं। उनके जीवन में किसी भी शुभ परिवर्तन अथवा प्रगति का कोई अवसर नहीं रहा है। उनकी प्रवृत्तियों में से धार्मिक, आध्यात्मिक अथवा राष्ट्रीय प्रवृत्ति का बहिष्कार हो गया है और पेट के सिवाय उनके सामने किसी आदर्श का कोई मूल्य महत्व नहीं रह गया है। ऐसे रूढ़ एवं इन्द्रिय लोलुप व्यक्ति वर्षों तक ही जप तप पूजा पाठ क्यों न करते रहें आध्यात्म लाभ की दिशा में एक कदम भी आगे नहीं जा सकते।

ईमानदारी से किसी भी राष्ट्रीय अथवा सामाजिक उत्तरदायित्व का निर्वाह करना स्वयं में एक धार्मिक अथवा पारमार्थिक कृत्य है। फिर भी जिनको राष्ट्र अथवा समाज का नाम लेने से भौतिकता का गान होता हो वे इस साप्ताहिक उपवास व्रत में धार्मिक भावना का समावेश कर सकते हैं। उन्हें ऐसा समझ लेना चाहिए कि यह अन्न त्याग का व्रत लोक मंगल के लिए एक अनुष्ठान है, जिसका प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष दोनों प्रकार का फल भी संसार की अन्न संकटापन्न जनता के लिए समर्पित करते हैं। निष्ठा पूर्वक किसी व्रत का पालन करने से मनुष्य के आत्मबल एवं संकल्प शक्ति की वृद्धि होती है। उसमें दृढ़ प्रतिज्ञता तथा स्थिरता आती है किसी भी आपत्ति, संकट अथवा अप्रत्याशित प्रतिकूलता सहन कर सकने की क्षमता प्राप्त होती है। इस छोटे से विजय व्रत को निभाते-निभाते बड़े-बड़े व्रत तथा संकल्प निर्वाह का अभ्यास होगा जिससे आध्यात्मिक क्षेत्र में बढ़ने में काफी सहायता मिलेगी।

राष्ट्रीय न सही आध्यात्मिक भावना से ही उपवास व्रत का निर्वाह करने और बच्चों को इसका अभ्यास कराते रहने से घर के वातावरण में धार्मिकता का पुट प्रवेश पायेगा जो पूरे परिवार के लिए कल्याणकारी होगा। सप्ताह में एक बार भी श्रद्धापूर्वक निराहार रहने अथवा शाकाहार पर रहने से भी स्वभाव में सात्विक प्रवृत्तियों के बीज पड़ जायेंगे जो अवसर पाकर पूरी तरह से पुष्पित एवं पल्लवित होकर पूरा जीवन ही सात्विक बना देंगे। यह उपवास का विजय व्रत लेकर हम सबको आध्यात्मिक लाभ के साथ-साथ राष्ट्र की सेवा का परमार्थ पुण्य करना ही चाहिये।


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पाप से घृणा आवश्यक है-

पापों से मनुष्य को जब तक हार्दिक घृणा नहीं होती तब तक मनुष्य उन्हें छोड़ता नहीं। यह जानते, मानते और अनुभव करते हुए भी मनुष्य पाप करता रहता है कि इससे शारीरिक, मानसिक बौद्धिक, आध्यात्मिक, आर्थिक, सामाजिक तथा राष्ट्रीय हानि होती है।

पाप के स्वरूप में एक भयानक आकर्षण होता है, ऐसा आकर्षण जैसा एक शलभ के लिये दीप शिखा में। शिखा के सम्मोहन में फँसकर पतंगा अपने पंख जलाकर भी उसी की ओर रेंगता रहता है। यहाँ तक कि आखिर जलकर खाक ही हो जाता है।

क्या कारण है कि पाप के प्राणहन्ता सौंदर्य की ओर मनुष्य दौड़ता रहता है इसका प्रमुख कारण है सच्चे सौंदर्य का साक्षात्कार न होना। यदि मनुष्य को शिव सौंदर्य का दर्शन हो जाए तो वह पाप के झूठे आकर्षण से कदापि प्रेरित न हो।

मनुष्य यदि एक बार सच्ची आँखों से अपनी आत्मा की ओर देख ले तो उसे संसार के सारे पापों से घृणा हो जाए और वह निर्विकार हो उठे। मनुष्य की इस सौंदर्य विषयक भ्राँति ने ही इस स्वर्ग तुल्य पृथ्वी को बहुसंख्यक व्यक्तियों के लिए नरक में परिणित कर रखा है। ऐसे लोग ईश्वर की प्रशंसनीय कृति सुन्दरता को अपनी पाप-दृष्टि से कलुषित कर देते हैं। उनको प्रत्येक क्षण अपने निम्न स्वार्थ, पाशविक वासना, जघन्य रुचि की पूर्ति के अतिरिक्त और कोई विचार आता ही नहीं। इसके परिणामस्वरूप वे स्वयं तो पतन के गर्त में गिरते ही हैं। अपने निकटवर्ती जनों के लिए भी काँटे बोते हैं। जिसे आत्मकल्याण की तनिक भी इच्छा हो उसे सदैव पाप से घृणा करके सत्प्रवृत्तियों का चिन्तन ही करते रहना आवश्यक है।

-रामकृष्ण परमहंस

देव दर्शन के पीछे दिव्य दृष्टि भी रहे

दर्शन शब्द का अर्थ जहाँ देखना है वहाँ उसका एक अर्थ विवेचना या विचारणा भी है। अनेक लोग देव प्रतिमाओं, तीर्थ स्थानों, संत एवं सत्पुरुषों के दर्शन करने जाया करते हैं, वे इसमें पुण्य लाभ का विश्वास करते हैं। शुभ व्यक्तियों अथवा शुभ स्थानों का दर्शन करना शुभ ही है। किन्तु उसका वास्तविक लाभ तभी हो सकता है जब दर्शाना को देखने तक ही सीमित न रक्खा जाये प्रत्युत उसके अन्दर निहित विचारणा पर भी ध्यान दिया जाये। जितनी ही श्रद्धा भक्ति एवं भावना से किसी देव प्रतिमा, संत पुरुष अथवा तीर्थ स्थान के दर्शन क्यों न किये जायें ,उसमें वास्तविक लाभ तब तक सम्भव नहीं जब तक उस व्यक्ति प्रतीक अथवा स्थान की उन विशेषताओं को हृदयंगम न किया जायेगा जिनके कारण उनका महात्म्य है। केवल पलक उधार कर दर्शनीय को देख भर लेने से प्रयोजन सिद्ध नहीं हो सकता।

दृग-दर्शन मात्र से स्वर्ग, मोक्ष, सुख, शान्ति सम्पत्ति अथवा समृद्धि आदि का लाभ पाने का विश्वास रखने वालों की श्रद्धा को विवेकसम्मत नहीं माना जा सकता। उनकी वह अति श्रद्धा अथवा अति विश्वास एक प्रकार से अज्ञानजन्य ही होता है जिसे अन्ध-विश्वास अथवा अन्ध-श्रद्धा भी कह सकते हैं। श्रद्धा जहाँ आत्मा की उन्नति करती है मन-मस्तिष्क को सुसंस्कृत एवं स्थिर करती है, ईश्वर प्राप्ति के लिये व्यय एवं जिज्ञासु बनाती है, वहाँ मूढ़ श्रद्धा अथवा अन्ध-विश्वास उसे अवास्तविकता के अन्ध गर्त में ही गिरा देती है। अन्धविश्वासियों अथवा अन्ध-श्रद्धालुओं को अपनी अविवेकपूर्ण धारणाओं से लाभ की अपेक्षा हानि ही अधिक होती है, आज धर्म के नाम पर जो धूर्तता देखी जाती है उसका बहुत कुछ उत्तरदायित्व उन अन्ध-श्रद्धालुओं पर ही है जो धर्म के सत्य स्वरूप एवं कर्म की विधि और उसका परिणाम नहीं जानते। जनता की अन्ध-श्रद्धा के आधार पर न जाने कितने आडम्बरी एवं प्रवंचक लोग अर्थ एवं आदर का लाभ उठाया करते हैं। यही कारण है कि शास्त्रों में जहाँ श्रद्धा की प्रशंसा की गई वहाँ अन्ध श्रद्धा की निन्दा भी।

दर्शन करने के सम्बन्ध में भी भोले लोगों की यह श्रद्धा उन्हें दर्शन के मूल प्रयोजन एवं उससे होने वाले लाभ से वंचित ही रखती है। लाखों करोड़ों लोग प्रति वर्ष तीर्थों तथा तीर्थ पुरुषों के दर्शन करने देश के कोने-कोने से आते-जाते हैं। अनेकों लोग तो प्रतिदिन प्रातः सायं मन्दिरों में देव प्रतिमा के दर्शन करने जाया करते हैं। किन्तु क्या कहा जा सकता है कि इन लोगों को वह लाभ होता होगा जो उन्हें अभीष्ट रहा करता है निश्चय ही नहीं। उन्हें इस बाह्य दर्शन द्वारा एक भ्रामक आत्म-तुष्टि के अतिरिक्त और कुछ नहीं मिल सकता।

यदि केवल देवप्रतिमा देवस्थान अथवा देवपुरुष को देखने मात्र से, हाथ जोड़ने, दण्डवत् करने, पैसा अथवा पूजा प्रसाद चढ़ा देने भर से ही किसी के पापों का मोक्ष हो जाता, दुःख दारिद्रय दूर हो जाता, पुण्य, परमार्थ स्वर्ग, मुक्ति आदि मिल सकते, मन, बुद्धि आत्मा की उन्नति हो सकती, जीवन में तेजस्विता, देवत्व अथवा निर्द्वन्दता का समावेश हो सकता तो दिन-रात देव-प्रतिमाओं की परिचर्या करने वाले पुजारियों, मन्दिरों की सफाई सँभाल करने वाले सेवकों को यह सभी लाभ अनायास ही मिल जाते। उनके सारे दुःख द्वन्द्व दूर हो जाते और सुख-शान्ति पूर्ण स्वर्गीय जीवन के अधिकारी बन जाते। किन्तु ऐसा देखने में नहीं आता। मन्दिरों के सेवक और प्रतिमाओं के पुजारी भी अन्य सामान्य जनों की भाँति ही अविशेष जीवन में पड़े-पड़े दुःखों, द्वन्द्वों तथा शोक संतापों को सहते रहते हैं। उनके उक्त जीवन में रंचमात्र भी परिवर्तन नहीं होता, यद्यपि उनकी पूरी जिन्दगी देव प्रतिमाओं के सानिध्य एवं देवस्थान की सेवा करते-करते बीत जाती है।

अनेक लोगों की धारणा रहती है कि दर्शन कर लेने, फूल माला, चढ़ा देने, दीपदान कर देने अथवा दण्डवत् प्रदक्षिणा का क्रम पूरा कर देने मात्र से ही देवता प्रसन्न होकर अभीष्ट मनोरथों को पूरा कर देंगे इस प्रकार के भ्रान्त विश्वासी यह नहीं समझ पाते कि परमात्मा के प्रतिनिधि देवता उन निकृष्ट कोटि के लोगों की तरह नहीं होते जो हुजूर में हाजिरी दे देने अथवा कोई भेंट-उपहार उपस्थिति कर देने, प्रशंसा अथवा स्तवन वाक्यों का उच्चारण कर देने मात्र से प्रसन्न हो जाते हैं और अपनी खुशामद पसन्द आदत के कारण चाटुकार के दुर्गुण नहीं देखते और अपने निकट कर लेते हैं यदि देवताओं की प्रकृति इसी प्रकार की होती तो उनमें और साधारण अधिकारियों में कोई भेद न रहता खुशामद सुन कर अथवा किन्हीं अन्य प्रकारों से प्रसन्न होकर वे किसी पर भी अनुग्रह कर देते।

देवताओं की प्रसन्नता खुशामद पसन्द लोभी व्यक्तियों की तरह सस्ती नहीं होती। उनकी अनुकम्पा प्राप्त करने के लिये किसी को भी कदम-कदम पर अपने दोष दुर्गुणों को दूर करना होगा, जीवन को पवित्र तथा पुण्य पूर्ण बनाना होगा। अपने मन वचन कर्मों में देवत्व का समावेश करना होगा। जिसके लिये आत्म-संयम, त्याग तथा तपश्चर्यापूर्वक जीवन साधना करनी होगी। दिव्यता की यह उपलब्धि श्रम एवं समयसाध्य है जिसको केवल वह व्यक्ति प्राप्त कर सकता है, जो क्षण-क्षण पर अपने आचार विचार तथा व्यवहार में सावधान रह कर चलेगा। देव अनुग्रह के उपयुक्त पात्रता प्राप्त किये बिना कोई भी व्यक्ति केवल देवदर्शन अथवा दक्षिणा-प्रदक्षिणा द्वारा मनोरथ की सिद्ध नहीं कर सकता।

साधारण उपक्रमों द्वारा यदि देवताओं का अनुग्रह हो सकता, परमात्मा को प्रसन्न किया जा सकता तो ऋषि मुनि कष्टसाध्य तपश्चर्या में आजीवन अपने तन मन को न तपाते, वे भी कोई ऐसा ही सरल सस्ता मार्ग निकाल कर अपने उद्देश्य में कृतकृत्य हो जाते।

देवताओं, महात्माओं तथा देवस्थानों का दर्शन करना शुभ है। उनका एक सीमा तक महत्व भी है और उपयोगिता भी, किन्तु हमें उस तथ्य से भी अपरिचित अथवा अनभिज्ञ न रहना चाहिये जिसके आधार पर दर्शन करने जैसी साधारण बात को इतना महत्व प्राप्त है। यदि देव प्रतिमाओं, सत्पुरुषों तथा देवस्थानों के दर्शन के पीछे वर्तमान उपयोगी तथ्य को नहीं समझते तो देव मूर्तिओं का देवस्तर प्रतिमाओं, महात्माओं का सामान्य व्यक्तियों और तीर्थ स्थानों का साधारण शहरों अथवा गाँवों से अधिक कोई महत्व न होगा। तथ्य को देखे, समझें और हृदयंगम किये बिना दर्शनों का वास्तविक प्रयोजन सिद्ध न होगा।

किसी माँगलिक उपलब्धि के किये शुभ दर्शन प्रारम्भिक उपक्रम मात्र है। जब तक हम जो चीज देखते नहीं उसके जानने के विषय में उत्कंठा नहीं होती, जब तक जिसके विषय में जानकारी नहीं होती उसके गुणों का पता नहीं होता और जब तक गुणों का ज्ञान नहीं होगा उन्हें अपनाने का प्रयास नहीं किया जा सकता। देखने से, दर्शन करने से परिचय होता है, किसी के विषय में ज्ञान होता है। ज्ञान से श्रद्धा और श्रद्धा से तथ्य तक पहुँचने का उत्साह प्राप्त होता है। तथ्य का ज्ञान होते ही वह हृदय में आप से आप पैठ जाता है जिससे मनुष्य का आचरण भी यथा योग्य ही ढल जाता है। इस क्रम में आगे बढ़ने पर ही दर्शनों का यथार्थ लाभ हुआ करता है। कोई यदि यह समझता है कि केवल मात्र किसी शुभ शुभाश्रय को पलक उधार कर देख भर लेने से अभीष्ट उद्देश्य की पूर्ति हो जायेगी तो वह भारी भ्रम है।

दर्शन करने की सार्थकता तभी है जब हम दर्शनीय की विशेषताओं को अपने जीवन में भी प्रतिष्ठित करें। दर्शनार्थ जाने का अर्थ है हृदय के गुण ग्रहण करने का उपक्रम करना। यदि कोई राम, कृष्ण, शिव अथवा हनुमान जी के दर्शन करने जाता है और प्रतिमा को नमस्कार कर अथवा कुछ पूजा पत्री चढ़ाकर चला आता है तो उसका दर्शन अधूरा है। दर्शन तभी पूरा होगा जब हम उनके चारु चरित्र की जानकारी प्राप्त करें और उसे अपने जीवन का आदर्श बना कर चलें। मन्दिर में जा कर राम के दर्शनों द्वारा उनका अनुग्रह तभी प्राप्त किया जा सकता है जब हम उन्हीं की तरह ही माता-पिता के प्रति श्रद्धा, भाइयों के प्रति सौहार्द, पत्नी के प्रति अनन्य स्नेहवान बनने का प्रयत्न करें प्रतिमाओं के दर्शन में जो बुद्धिमान व्यक्ति अपने सत्प्रयोजन की सिद्धि के लिये प्रेरणा प्राप्त करता है वास्तव में दर्शन तो वही करता है बाकी तो लाखों करोड़ों दर्शक उस बच्चों की तरह झूठे आत्म संतोष से बहलाते रहते हैं, जिसे दूध न पिलाने के मन्तव्य से माँ शहद लगी चुसनी मुँह में दे देती है। बच्चा उसे यह समझ कर चूसता रहता है कि वह माँ का स्तन पी रहा है। बच्चा बहल जाता है और उसका रोना-धोना बन्द हो जाता है। तदापि उस चुसनी से दूध का प्रयोजन पूरा नहीं होता तथापि बालक की व्यग्रता, तथा आकाँक्षा कुछ देर को अवश्य बहल जाती है और उसे झूठा आत्म-संतोष हो जाता है। यही हाल उन दर्शकों का समझना चाहिये जो केवल किसी देव प्रतिमा को आँख से देख भर लेने से ही किसी उद्देश्य की पूर्ति की आशा बाँध लेते हैं।

यही बात किसी सत्पुरुष अथवा महात्मा के दर्शनों में भी है। जिनने महापुरुषों का दर्शन उनके हाड़ माँस के भौतिक एवं बाह्य शरीर तक ही सीमित रखा और उनके हृदय, उनके विचारों अथवा गुणों में गहराई तक घुसने का प्रयत्न नहीं किया, उन्होंने दर्शन ठीक उन धोबी, नाई, ड्राइवर, रसोइया, चपरासी आदि बाह्य सेवकों की तरह ही किये जो महात्मा गाँधी को दिन रात देखते रहे किन्तु कोई विशेष लाभ न उठा सके। जब कि उनकी शारीरिक सेवा न करते हुये भी उनके यथार्थ दर्शक जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल, डॉ॰ राजेंद्र प्रसाद और संत विनोबा भावे संसार के श्रेष्ठतम व्यक्तित्व बन गये । इस विषमता एवं विपर्यय का कारण यही रहा कि जहाँ उक्त सेवकों की दृष्टि तथा भक्ति गाँधी जी के पंच भौतिक शरीर तक ही सीमित थी वहाँ इन प्रधान पुरुषों न उनके चारु चरित्र एवं आदर्श विचारों के भी दर्शन किये। व्यक्ति के स्थान पर व्यक्तित्व को प्रधानता देकर दर्शन करने वाले स्वभावतः तत्पुरुषों के समान ही महान बन जाते हैं। दर्शन लाभ की पूर्णता विचार एवं आचार को मिला कर ही होती है केवल शरीर देख लेने अथवा चरण स्पर्श कर लेने मात्र से नहीं।

तीर्थावलोकन की सार्थकता तभी है जब कोई वहाँ जा कर यह जाने की इस-इस स्थान पर ऐसे क्या कार्य सम्पादित हुये हैं जिनके कारण इसकी इतनी महिमा है। इसके पीछे ऐसा कौन-सा उज्ज्वल इतिहास है जिससे आलोक पाने के लिये संसार के कौन-कौन से लोग दौड़े चले आ रहे हैं। इस प्रकार की जानकारी पाये और उसे शिक्षा लिये बिना ही जो व्यक्ति लौट आता है वह मानो रीता ही लौट आया है। उसे तीर्थस्थल जाने और उसका दर्शन करने का कोई लाभ नहीं हुआ।

किसी भी विशिष्ट व्यक्ति, वस्तु अथवा स्थान का देखना, देव अथवा दिव्यता का दर्शन करना तभी सार्थक होता है जब उसके गुणों, महत्व अथवा विशेषताओं को सूक्ष्मता से देखें उनकी महत्ता को समझें, हृदयंगम करें और जीवन विकास के लिये उससे प्रेरणा एवं शिक्षा ग्रहण करें अन्यथा उथला एवं दृग-दर्शन कुतूहल तृप्ति के अतिरिक्त अधिक लाभ न कर सकेगा?


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अबोधों की बात महत्वहीन है-

किसी सत्य की खोज करके संसार के सामने रखते समय यह विश्वास न रखना चाहिए कि लोग उसे आसानी से स्वीकार कर लेंगे। संसार हर उस नई बात से, चाहे वह उसके लिये प्रत्यक्ष रूप में हो, कितनी भी उपयोगी तथा कल्याणकारी क्यों न हो, प्रारम्भ में विचकता ही है। इसमें उसमें कोई दोष नहीं है, वह अपने प्राचीन संस्कारों के कारण ही ऐसा करता है।

संसार अधिकतर अबोध ही रहता है और अपनी इस अबोधता के कारण ही उसके संस्कारों में एक ऐसी कायरता घर कर जाती है जो उसे किसी नई खोज या नये निष्कर्ष को स्वीकार करने से भय दिखाती है। संसार की यह कायरता धीरे-धीरे दूर होती है। इसमें सहसा क्राँति उत्पन्न कर देने से किसी भयानक सांस्कारिक संघर्ष का भय रहता है। मनुष्य को सच्चे हृदय से काम करना चाहिए और धैर्यपूर्वक निर्लिप्त भाव से परिणाम की प्रतीक्षा करनी चाहिए।

-बंकिम चन्द्र

महत्ता प्राप्ति से उद्धत न बना जाए

मान, सम्मान, आदर प्रतिष्ठा की इच्छा कुछ न कुछ सबके हृदय में रहती है। कौन ऐसा होगा जो यह न चाहे कि लोग उसे आदर की दृष्टि से देखें, उपयुक्त स्थान दें, उसकी और उसके कार्यों की सराहना करें। निःसन्देह सभी में यह इच्छा रहती है। विशेषता पाकर मनुष्य को बड़ा आत्मसंतोष तथा आत्मसुख मिलता है।

मान और बड़प्पन की इच्छा होना बुरा नहीं है। यह वह आकाँक्षा है जो मनुष्य को महान कार्य करने लिये प्रेरित करती है। यदि मनुष्य के हृदय से यह प्रेरक भाव निकल जाये तो वह इस प्रकार का कोई काम करने में श्रम तथा त्याग न करे जो संसार की सेवा अथवा शोभा का सम्पादन कर सके।

होना तो यह चाहिये कि हम मनुष्य होने के नाते, ईश्वर का विशेष अंश होने की महत्ता से प्रेरित होकर संसार की सेवा करें उसकी शोभा बढ़ायें। उसमें अधिकाधिक सुख शाँति की परिस्थितियाँ उत्पन्न होने में योगदान करें। तथापि यदि एक बार मान बड़ाई पाने की भावना से भी श्रेयस्कर कार्यों को करते हैं तब भी किसी हद तक आलोचना अथवा निन्दा की बात नहीं है। किन्तु जब किसी का यह भाव मनुष्यता की सीमा से बाहर आकर संसार पर बड़प्पन थोपने की दिशा में प्रेरित करने लगता है तो निश्चय ही वह निन्दा का ही नहीं घृणा का विषय बन जाता है। अपने सत् एवं महान कार्यों द्वारा बड़प्पन पाने का प्रयत्न यद्यपि राजस भाव है तथापि किसी सीमा तक क्षम्य है। किन्तु जब बड़प्पन की भावना भूख बन कर किसी प्रकार भी अपनी तृप्ति पाने के लिये तड़पने लगती है तब वह पैशाचिक प्रवृत्ति की परिधि में चली जाती है। यह प्रवृत्ति संसार ही नहीं स्वयं अपने लिये भी भयंकर एवं विनाशकारी होती है। बड़प्पन की इस तृष्णा को इस सीमा तक नहीं बढ़ने देना चाहिये।

अनेक लोग अपने दम्भ को तुष्ट करने और समाज में महत्ता पाने के लिये बहुधा गलत उपायों का आश्रय ले लिया करते हैं। साधारण, अशिक्षित तथा असभ्य लोग विशेषता पाने के लिये वेश-भूषा, और वस्त्राभूषणों पर निर्भर हो कर तरह तरह के फैशन बनाते और प्रदर्शन किया करते हैं। आज जो फैशन के नाम पर तरह-तरह के वेश विन्यास चल रहे हैं, प्रसाधनों तथा उपकरणों पर पानी की तरह पैसा खर्च किया जा रहा है उसके पीछे विशेषता, महत्ता, प्रशंसा अथवा प्रतिष्ठा पाने का भाव ही छिपा रहता है। बड़ी दावतें, शराब और नाच रंग का आयोजन करने वाले भी इसी झूठी प्रशंसा एवं प्रतिष्ठा से प्रेरित होकर करते हैं। शादी ब्याह में प्रदर्शन पर अपने को मिटा देने वाले अधिकतर इसी लिप्सा से पीड़ित रहा करते हैं। किन्तु खेद का विषय है कि वे यह नहीं समझ पाते कि समाज में महत्ता तथा प्रतिष्ठा पाने के कुछ और ही मार्ग होते हैं। इन थोथे प्रदर्शनों से हानि के सिवाय कोई श्रेय हाथ नहीं लगता। त्याग, तपस्या सेवा परोपकार, परमार्थ, विद्या तथा मानवता पूर्ण भावनायें ही वे विषय हैं जिनका अवलम्बन करने पर सच्ची महत्ता अथवा प्रतिष्ठा प्राप्त हुआ करती है।

अनेक बार जब यह आकाँक्षा हठ में बदल जाती है तब ध्वंसात्मक मार्ग का अनुसरण करने लगती है। संसार के सारे आक्रान्ता, आततायी, अत्याचारी तथा आतंकवादी महत्वाकांक्षा की इसी निम्न कोटि से ग्रस्त रहे हैं। जब वे गुणों के अभाव में त्याग, तपस्या अथवा सेवा का मार्ग न अपना सके तो उन्होंने उद्दण्डता तथा आतंक का मार्ग अपना लिया और संसार पर अपना महत्व तथा सिक्का थोपने के लिये उन प्रयत्नों को अपना चले जो आज भी मनुष्यता के नाम पर कलंक बने हुए हैं।

बहुत बार मनुष्यों के सामान्य जीवन में देखा जा सकता है कि अपनी क्षमता न होने पर बहुत से लोग अपना बड़प्पन प्रकट करने के लिये आगे बढ़े अथवा ऊँचे उठे लोगों को नीचे गिराने की कोशिश किया करते हैं। उनकी आलोचना, निन्दा तथा उपेक्षा किया करते हैं और सोचते हैं कि इस प्रकार लोग उन्हें बुद्धिमान, महान, अप्रभावित तथा उक्त महापुरुष के समकक्ष समझने लगेंगे। समाज में विशेषता पाने के इस तरीके को हीनता के सिवाय और क्या कहा जा सकता है?

समाज में, अनेक लोग जब गुणों के अभाव अथवा दुर्गुणों के कारण प्रतिष्ठा नहीं पाते तो वे डाह से प्रेरित होकर उद्दण्ड बन जाते हैं। झगड़ा फसाद, मारपीट और चोरी डकैती पर उतर आते हैं और तरह-तरह से लोगों को सता और आतंकित करके अपनी महत्ता की तृषा मिटाने का प्रयत्न किया करते हैं। अयोग्य विद्यार्थी अपनी इसी हीनता के कारण कक्षा के सुयोग्य एवं प्रखर विद्यार्थियों के स्वभावतः विरोधी बने रहते हैं। वे विद्या के सहक्षेत्र में उन्हें प्रभावित नहीं कर पाते तो उद्दण्डता का मार्ग ग्रहण कर अपना रोब जमाने का प्रयत्न किया करते हैं। रावण, कंस, हिरण्यकशिपु, हिटलर, लड़ाकू नेपोलियन, तैमूर तथा नादिर आतंकवादी आक्रान्ता महत्ता की इसी तृष्णा से पीड़ित थे। सद्गुणों के अभाव में जब उनका महत्वाकाँक्षी दम्भ, महत्ता न पा सका, पूजा एवं प्रतिष्ठा से वंचित रहा तो वे अकारण ही अपनी दुर्बलता से दुनिया के दुश्मन बनकर हठात् अपनी महत्ता थोपन के लिये ध्वंस के मार्ग पर दौड़ पड़े। किन्तु क्या वे इतना सब रक्त बहा कर और संसार को त्रास देकर कोई बड़प्पन कोई प्रतिष्ठा अथवा कोई आदर सम्मान पा सके? बल्कि मनुष्य की पैशाचिक वृत्ति के उदाहरण बनकर और शिर पर पाप एवं अपवाद की गठरी बाँध कर संसार से उठ गये।

माना जा सकता है कि इनमें शक्ति थी, मनोबल और विश्वास था, साहस और समझ थी जिसके आधार पर वे संसार को अपने आतंक से आक्रान्त कर सके। किन्तु क्या उनकी यह विशेषतायें उनके लिये एक शब्द प्रशंसा और एक बूँद प्रतिष्ठा का अर्जन कर सकी हैं। कितना अच्छा होता कि उन्होंने अपनी इन विशेषताओं को ध्वंस में न लगाकर सृजन में लगाया होता। संहार के स्थान पर सेवा का मार्ग अपनाया होता आतंक के स्थान पर संराधन को श्रेय दिया होता तो जीवन काल में जो पूजा प्रतिष्ठा होती वह तो होती हो आज इतिहास में उनका नाम सूर्य चन्द्र की तरह चमकता होता। लोग श्रद्धापूर्वक उनका नाम लेते और गौरव गरिमा के प्रति सिर नवाते। किन्तु महत्ता के प्रति मनुष्य के उस दुराग्रह को क्या कहा जाए? दम्भ की उस दुर्बलता को किन शब्दों में कोसा जाये? जो देवता बन सकने वाले मनुष्य को पिशाच की श्रेणी से भी नीचे गिरा देती है। अधैर्य, असहिष्णुता तथा गुणहीनता की स्थिति में जगी हुई महत्व की आकाँक्षा मनुष्य को गलत मार्ग पर ही ढकेल देती है। महत्वाकाँक्षा बुरी बात नहीं है, बड़प्पन अथवा महत्ता की इच्छा अच्छी कही जा सकती है किन्तु कब जब इसके पीछे पात्रता वर्तमान हो अथवा उसे उत्पन्न करने का प्रयत्न चल रहा हो। अन्यथा उसका जो पाप होता है वह मत्थे चढ़े बिना नहीं रहता।

नेपोलियन बाल्यकाल से महत्वाकाँक्षी था। वह समाज में अपना विशेष मूल्य एवं महत्व चाहता था। उसकी बड़ी इच्छा थी कि लोग उसका आदर करें, शिर नवाये और यह मानें कि नेपोलियन बोनापार्ट संसार का एक विशेष व्यक्ति है। उसकी यह कामना ही इस बात का द्योतन करती है कि उसमें उस पात्रता की कमी थी उन गुणों का अभाव था जो मनुष्य को चुपचाप महान् पथ पर लगा देते हैं और अनायास ही उससे ऐसे काम कराने लगते हैं जिन के कारण बिन चाहे ही उसकी महत्ता हो जाती है प्रतिष्ठा मिलने लगती है। नेपोलियन की महत्वाकाँक्षा अहंमन्यताजन्य थी।

नेपोलियन ने अपनी बहुमूल्यता, विशेषता तथा प्रशंसा प्रतिष्ठा के लिये मार्ग तथा क्षेत्र के निर्वाचन पर विचार किया। उसे ऐसा लगा कि यदि वह लेखक बन सके तो निश्चय ही समाज में अपनी महत्वाकाँक्षा को मूर्तिमान देख सकेगा। उसने अपने अन्दर लेखक के गुण, उसकी विशेषताओं तथा पात्रता के भावाभाव पर विचार नहीं किया और एक ऊँची आकाँक्षा के साथ उस क्षेत्र में उतर पड़ा। वह सत्तरह से चौबीस वर्ष तक लेखक बनने का प्रयत्न करता रहा किन्तु सफलता न पा सका। उसे तो एक महान लेखक के रूप में प्रतिष्ठा पाने की जल्दी थी। वह जल्दी से जल्दी अपने नाम की ध्वजा उड़ते देखना चाहता था। इसलिये वह अध्ययन एवं अभ्यास पर समय एवं श्रम को पर्याप्त मात्रा में न दे सका। उसका उद्देश्य लेखक अथवा विचारक बनने का नहीं था क्योंकि उसमें इसके बीजाणु ही नहीं थे। उसका उद्देश्य इस माध्यम से समाज में महत्व प्राप्त करने का था। उसने जल्दी-जल्दी कार्सिका इतिहास नामक एक पुस्तक लिख डाली जो उसे अपनी महत्वाकाँक्षा तथा अहंमन्यता के कारण बड़ी ही सफल तथा महान् लगी। उसने उसे बड़े गर्व के साथ उस समय के प्रसिद्ध विद्वान एब्बे रेनाल के पास सम्मति के लिये भेज दी।

निष्पक्ष विद्वान ने अपनी सम्मति देते हुए पुस्तक वापस कर दी कि और “गहरी खोज के साथ पुस्तक दुबारा लिखो।” नेपोलियन ने तो पुस्तक प्रशंसा के लिये भेजी थी। एब्बे रेनाल की सम्मति से उसे बड़ी झुँझलाहट हुई। अनन्तर उसने ‘प्रेम’, ‘आनन्द’ तथा ‘भान’ आदि विषयों पर अनेक लेख लिख कर लिवरे पुरस्कार की प्रतियोगिता में भेज दिये जो कि असफल घोषित कर दिये गये। इस घटना ने नेपोलियन को बिल्कुल निराश कर दिया और उसका विचार बन गया कि समाज मुझे मान्यता देना नहीं चाहता -बस यहीं से उसका मार्ग गलत हो गया और उसमें संसार पर हठात् महत्ता थोप देने की प्रतिहिंसा जाग उठी। इस प्रतिक्रिया का दोष उसकी उस अहंमन्यता को था जिसके कारण लोग अपनी अपात्रता की ओर न देखकर समाज से द्वेष मानने लगते हैं।

प्रतिहिंसा से प्रेरित नेपोलियन सैनिक क्षेत्र में चला गया और अपनी सम्पूर्ण शक्तियों को केन्द्रित एवं नियोजित कर बहुत कुछ कर दिखाया। किन्तु उस बहुत कुछ का मूल्याँकन कुछ भी न हुआ। वह सैनिक बना, सेनापति बना, आक्रामक हुआ और विजय पर-विजय प्राप्त की, सारे यूरोप पर आतंक बन कर छा गया, शासक एवं सम्राट बना किन्तु फिर भी उसका उद्देश्य असफल ही रहा। साहस, वीरता, पुरुषार्थ एवं संलग्नता के गुणों की शक्ति तथा विशेषता तो अवश्य ही उसके माध्यम से प्रभावित हुई किन्तु नेपोलियन का व्यक्तित्व अपने उद्देश्य में सफल न हो सका। जिस मूल्य, महत्व एवं प्रतिष्ठा के लिये वह लालायित था, जिस महत्ता की उसे आकाँक्षा थी वह न मिल सकी । इसके स्थान पर वह इतिहास के वामपक्ष में लिखा जाकर आलोचना, निन्दा, भर्त्सना तथा अपवाद का पात्र जरूर बन गया। यदि नेपोलियन ने अहंमन्यता के वशीभूत न होकर, उचित मार्ग पर चलकर इसका चतुर्थांश भी कर दिखाया होता तो शायद वह संसार के महानतम व्यक्तियों में गिना जाता। उसकी पूजा प्रतिष्ठा उससे शत सहस्र गुना अधिक होती जिसकी कि वह कामना कर रहा था।

महत्वाकाँक्षा बुरी नहीं, सम्मान एवं आदर की इच्छा है, किन्तु जब यह अहंमन्यता, राग, द्वेष, प्रतिहिंसा, स्पर्धा, ईर्ष्या अथवा अपात्रत्व से दूषित हो जाती है तो विष बनकर अपने आश्रयदाता को नष्ट कर देती है। हीनता से भड़की हुई महत्ता की भावना प्रायः ध्वंसक बना देती है। जिससे मनुष्य ऐतिहासिक होकर भी अपयश के कारण लोक-परलोक दोनों में पाप एवं अपवाद का भागी बनता है। मनुष्य के मूल्याँकन का सही मापदण्ड सफलता अथवा असफलता नहीं है बल्कि वह मार्ग और वह राजनीति है जिसे उसने अपने अभियान का आधार बनाया है।


Quotation

जहाँ शक्ति का भण्डार न्यून पड़ जाता है, वहाँ सस्ती सधुता अकस्मात् आ जाती है। इसके विपरीत जिस मनुष्य में शक्ति का अपार भंडार है उसे प्रयत्नपूर्ण उद्देश्यों की ललकार स्वीकार करने में प्रसन्नता प्राप्त होती है। वह शक्तियुक्त जीवन व्यतीत करता है।

जनता किसी की प्रशंसा शक्तिमान अधिकारियों के मुँह से सुनती है तो उसकी दृष्टि में उस प्रशंसित मनुष्य का आदर-सम्मान शतगुण हो जाता है। सम्पत्ति शक्ति की प्रतीक है। इसलिये सम्पत्ति को पूर्णता-प्राप्ति के हेतु गतिमान और प्रवाह युक्त होना चाहिये। क्योंकि शक्ति क्रियाशील और गतिमान होती है। -टैगोर

स्वच्छ रहें-उच्च बनें

सदा साफ -सुथरे रहिये क्योंकि आप मनुष्य हैं। गंदगी पशुओं का दुर्गुण है। मनुष्य की शोभा नहीं। मनुष्य और पशु में जो एक मूल अन्तर है वह सफाई और गंदगी का है।

पशु जहाँ बैठता है वहीं मल-मूत्र किया करता है। गंदगी अपने शरीर में लथेड़ लेने पर उसको दूर करने की चिन्ता नहीं करता। इसी गंदी आदत के कारण वह पशु कहा जाता है। अब चूँकि मनुष्य ऐसा नहीं करता, वह पशु से श्रेष्ठ उपाधि मनुष्य से विभूषित किया जाता है।

जिस मनुष्य में जिस मात्रा में जितनी अधिक गन्दी आदत हो उसे उतनी मात्रा में पशु ही मानना चाहिए, जिस प्रकार पशु को गन्दा रहने पर लोग उसे उसको दोष लगाकर बुरा-भला नहीं कहते उस प्रकार मनुष्य का यह दोष क्षमा नहीं किया जा सकता।

सफाई की अपेक्षा किसी पशु से की भी नहीं जा सकती और न उसको इस दोष के लिये अपराधी ठहराया जा सकता है। इसलिये कि परमात्मा ने उसे गन्दगी पहचानने की बुद्धि नहीं दी है।

किन्तु मनुष्य गन्दगी के दोष से मुक्त नहीं किया जा सकता। परमात्मा ने उसे गन्दगी पहचानने वाली आँख सूँघ सकने वाली नाक और निर्णय कर सकने वाला मस्तिष्क दिया है।

मनुष्य-जीवन सर्वश्रेष्ठ योनि है। एक कम चौरासी लाख योनियों में अपने कर्म-योग की किश्तें चुकाता हुआ कोई जीव न जाने कितने दिनों में इस योनि में आकर अपने बंध छुड़ाने के लिये कर्म करने की स्वतन्त्रता पाता है। इसीलिये मनुष्य योनि कर्मयोनि के साथ अन्तिम योनि मानी जाती है। किसी जीव के लिये मनुष्य योनि वह अलभ्य एवं अन्तिम अवसर है जिसमें या तो वह अपने गुण कर्म, स्वभाव का परम परिष्कार करके आत्म लोक की कक्षा में पहुँचकर परमात्मा को प्राप्त कर सकता है। सदा सर्वदा के लिये भव-बंधन से मुक्त हो सकता है। अथवा पुनः न जाने कितने युगों के लिये मनुष्येत्तर विवश योनियों में भटकने के लिये चला जायेगा। अपने इसी उद्धार कार्यक्रम के लिये ही परमात्मा ने मनुष्य को विशेष इन्द्रियाँ और विशेष विवेक बुद्धि अनुग्रह की है जिससे कि वह भला बुरा, ऊँच-नीच गुण दोष तथा मलीनता-मंजुलता को ठीक से पहचान सके।

कायिक, वाचिक एवं मानस परिष्कार ही मनुष्यता की पहली पहचान है। जो अपने इन लक्षणों से रहित दिखाई देता है उसे मनुष्य होने पर भी पशुओं की गन्दी वृत्ति का साझीदार ही समझना चाहिए।

स्वच्छता न केवल मनुष्यता बल्कि देवत्व का लक्षण है और गन्दगी न केवल पशुता बल्कि असुरता का चिन्ह है। इस प्रकार गन्दे आदमी को केवल पशु न कहकर असुर कहना ही अधिक ठीक रहेगा।

इस प्रकार गंदे रहकर असुरता को अपनाने वाले मनुष्य जीवन में देवत्व पाना तो दूर ठीक-ठीक मनुष्यता भी प्राप्त नहीं कर सकते। जो अपना बाह्य साफ नहीं रख सकता, जिसमें कि केवल हाथ-पैर के स्थूल परिश्रम की ही आवश्यकता होती है, वह अपने अन्तर एवं अन्तरात्मा की सफाई क्या कर सकेगा, जिसमें कि अत्याधिक कठिन एवं सूक्ष्म परिश्रम की आवश्यकता होती है।

बाह्य स्वच्छता आन्तरिक स्वच्छता की ओर बढ़ने का पहला कदम है। अनास्था एवं उपेक्षा जो कि आन्तरिक उन्नति के सबसे बड़े बाधक शत्रु हैं बाह्य स्वच्छता रखने के प्रयत्न में दूर हो जाते हैं। जिसे गन्दगी नापसन्द होगी वह एक क्षण को मलीन दशा में नहीं रह सकता। गन्दे होते ही कपड़े धोयेगा। स्वच्छता के लिये नित्य नियमित स्नान करेगा। घर द्वार साफ रक्खेगा। यहाँ तक कि अपने पास पड़ोस तक में गन्दगी न रहने का भरसक प्रयत्न करेगा। ऐसा करते रहने से न तो उसको आलस धर दबायेगा ओर न उपेक्षा वृत्ति ही उस पर हावी हो सकेगी। उसमें परिश्रम करने, तत्परता और नियमित काम करने की आदत के साथ दोष दूर करने की अभिरुचि पैदा होगी। इस प्रकार के अभ्यास मनुष्य ही को स्वभावतः आन्तरिक परिष्कार एवं प्रसन्नता की ओर अग्रसर करते हैं। परमात्मा को मनुष्य का साधन पवित्रता सब से प्रिय है और पवित्रता की पहली शर्त स्वच्छता है। अस्तु प्रभु की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिये आवश्यक है कि मनुष्य पवित्र बनने के लिये स्वच्छता का अभ्यास करे, साफ -सुथरा रहना सीखे।

साफ-सुथरे मनुष्य के साधन न केवल उसको ही परमात्मा की ओर बढ़ाते हैं बल्कि परमात्मा को भी अपनी ओर आकृष्ट किया करते हैं। इस प्रकार यह दोहरा अभियान शीघ्र ही मनुष्य को परमात्मा से मिला कर बंधनमुक्त कर देता है।

अस्तु मनुष्य को चाहिए कि अपना मानव-जीवन धन्य करने के लिये गंदगी की असुरता का त्याग करके स्वच्छता का देवत्व अपनाये। स्वच्छता में स्वर्ग की समीपता और मलीनता में नर्क का निवास होता है।

गन्दगी मनुष्य की मानसिक हीनता की परिचायक होती है। जिसके मन की वृत्तियाँ सुरुचिपूर्ण होंगी वह किसी प्रकार भी गन्दा रहना पसन्द नहीं करेगा। जिसे अपने कपड़ों की सफाई, शरीर की स्वच्छता और उठने-बैठने व रहने की जगह की झाड़-बुहार की परवाह नहीं होती वह वास्तव में मनुष्य कहलाने योग्य नहीं होता। मनुष्यता के प्रति जिसके मन में जरा भी आदर होगा वह गन्दगी की पाशविक वृत्ति को अपने पास फटकने तक न देगा। नित्य प्रति शरीर की सफाई करेगा, गन्दे होते ही कपड़े धो डालेगा और अपने आस-पास के स्थान को झाड़-बुहार कर रखेगा।

अपरिष्कृत मनोवृत्ति के मनुष्यों में ही गंदगी पसन्द अथवा सहन करने का दोष रहता है। मानसिक परिष्कार ही वास्तव में मनुष्यता है। जिसका मन परिष्कृत होगा स्वभाव सुरुचिपूर्ण होगा वह गन्दगी कदापि सहन न करेगा।

स्वच्छता का सुन्दर स्वरूप न देखने तक ही कोई गन्दगी स्वीकार किये रहता है पर जैसे ही उसे स्वच्छता का सौंदर्य अनुभव होने लगता है उसको गन्दगी से घृणा हो जाती है। जब समय-समय पर साफ -सुथरी स्थिति में आने पर स्वभाव से गंदे लोगों की भी मनोवृत्ति परिमार्जित एवं परिष्कृत हो जाती है तब स्थायी रूप से हर समय साफ -सुथरा रहा जाये तब किसी की भी मनोवृत्ति कितनी परिष्कृत एवं ऊँची हो जायेगी इसका अनुमान सहज में ही लगाया जा सकता है।

ठीक-ठीक मनुष्य बनने और अपनी मनोवृत्तियों को स्थायी रूप से उन्नत एवं परिष्कृत रखने के लिये हम सब को हर समय हर प्रकार से सुथरा तथा स्वच्छ रहना चाहिए। स्वच्छ रहने से मन प्रसन्न रहता है स्फूर्ति बनी रहती है और जीवन के प्रति एक सुन्दर रुचि उत्पन्न होती है, जिससे मनुष्य अधिक से अधिक सुख सम्पन्नता एवं सफलता की ओर अग्रसर होता है।

तन से पहले मन शुद्ध करो-

अशुद्ध वह नहीं करता जो कुछ मुँह में जाता है, अशुद्ध वास्तव में वह करता है जो मुँह से बाहर निकलता है। क्योंकि जो मुँह में जाता है वह पेट में पच कर संडास में निकल जाता है। किन्तु जो कुछ मुँह से निकलता है वह मन की गन्दगी की गवाही देता है वही मनुष्य को गन्दा करता है।

गाली, असत्य, निन्दा और चुगली आदि विकार मुख द्वारा मन से निकलते हैं और यही मनुष्य को अशुद्ध बनाते हैं। बिना हाथ धोये भोजन करना उतना अशुद्ध नहीं है जितना कि गंदी बात कहना।

इसीलिये मैं तुमसे कहता हूँ कि बाह्य क्रियाओं से पूर्व अपने मन को शुद्ध करने का प्रयत्न करो। क्योंकि पिता के स्वर्ग राज्य में तन की नहीं मन की शुद्धता पर विचार किया जाता है।

-सेंट पाल

पंचगव्य की तेजवर्द्धिनी, जीवन दायिनी शक्ति

डॉ. मैकनीकाफ साहब को एक बार यह सोचकर बड़ा विस्मय हुआ कि 6 करोड़ आबादी वाले जर्मन देश में शतजीवियों की संख्या केवल सौ ही है जबकि केवल 50 लाख आबादी वाले बल्गेरिया में शतायु पुरुषों की संख्या 5000 से भी अधिक है। उन्होंने इसके कारण की खोज के लिये बल्गेरिया निवासियों के स्वास्थ की विस्तृत जाँच की और यह पाया कि उन लोगों के आहार में गाय के दूध और दही (योगुर्ट) की मात्रा अधिक रहती है। गो-दधि में कुछ ऐसे विशेष प्रकार के बैक्टीरिया पाये जाते हैं जो अन्न नली साफ रखते हैं उसमें मल नहीं जमा होने देते जिससे शारीरिक शक्ति का अधिकाँश भाग अवयवों के पोषण और विकास करने में लगता है। रोग और बीमारियों के निरोध से बची हुई शक्ति ही उनकी तेजस्विता और दीर्घ-जीवन का कारण है। बल्गेरिया निवासियों के इस सौभाग्य की स्मृति में ही डॉक्टर साहब ने उक्त बैक्टीरिया जाति का नाम “बेसिलस बल्गेरिक्स” रखा।

यह खोज बहुत ही सामान्य और साधारण माना जानी चाहिए-उस तुलना में जो उपलब्धि शताब्दियों पूर्व भारतीयों को हुई थी। यहाँ का जन-जीवन अधिकाँश गौ माता पर निर्भर था। अन्न को केवल सहायक मात्रा में ही लिया जाता था। आहार की अधिकाँश आवश्यकता दूध से पूरी की जाती थी। बच्चों को काफी युवक हो जाने तक केवल दुग्धाहार ही कराया था जिससे उनके शरीर एक प्रकार से रोग-प्रूफ हो जाते थे। दीर्घ जीवन-दायिनी शक्तियों के कारण ही वे लम्बी आयु और प्रचुर भोग सौ वर्ष तक सुखपूर्वक भोगते थे। गौ की महत्ता का मुख्य कारण यही था। उस पर एक प्रकार से सम्पूर्ण लौकिक और भौतिक सुख टिका हुआ था। उसे देखते हुए गौ को इतनी अधिक आध्यात्मिक प्रतिष्ठा देना सर्वथा बुद्धि संगत ही था।

गाय के दूध के आश्चर्यजनक लाभों से आज सारा संसार परिचित है, हम भूल गये हैं। इंग्लैंड जैसे छोटे देश में 1932 और 1936 के मध्य गौरक्षा और दूध पर चालीस करोड़ रुपया व्यय किया गया जबकि इसी वर्ष केवल अधिक दूध पीओ अभियान के प्रचार में 9 लाख रुपया खर्च किया। सरकार ने गर्भिणी स्त्रियों, बच्चे वाली माताओं, शिशुओं, स्कूल जाने वाले बच्चों और श्रमिक मजदूरों को बिना मूल्य या बहुत कम पैसों में दूध दिया ताकि लोग माँसाहार की प्रवृत्ति त्याग दें और गाय के दूध के लाभों से लाभान्वित हो सकें। ब्रिटिश युवकों की ऊँचाई और तोल बढ़ जाने के अनेक आँकड़े दि इकानामिस्ट पत्रिका के 10 जून सन् 1936 पृष्ठ 594 में देखे जा सकते हैं। पत्रिका में बताया गया है।

“हमारे भोजन में कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, चिकनाई, खनिज लवण और विटामिन सम्मिलित हों तो हम अधिक स्वस्थ और दीर्घजीवी हो सकते हैं। यह सब तत्व गाय के दूध में विद्यमान हैं गाय के दूध की प्रोटीन इतनी अच्छी होती है कि स्वयं 95 प्रतिशत पच जाती है और साथ में 5 प्रतिशत गेहूँ की प्रोटीन को भी पचा देती है। केवल गेहूँ 20 प्रतिशत प्रोटीन दे सकता है पर यदि उसमें दूध का सम्मिश्रण हो जाता है तो 50 प्रतिशत प्रोटीन शरीर को मिल जाती है। गाय के दूध की चीनी श्रेष्ठ बलदायक और अतिरिक्त पाचन शक्ति देने वाली होती है।

निर्बल हुए बच्चों, युवकों और माताओं के स्वास्थ्य तथा शारीरिक विकास में गाय के दूध से आश्चर्यजनक परिवर्तन किये जा सकते हैं। डॉ. एच.एच.सी. कैरीमेन के अनुसार लन्दन मेडिकल रिसर्च कौन्सिल के परिणामों से यह जानकर लोग आश्चर्य में पड़ गये कि विकासशील बालक की क्षुधा पूर्ति के लिए जितना आहार पर्याप्त है उसमें यदि 12 औंस गाय के दूध की वृद्धि कर दी जाए तो प्रत्येक बच्चे के वजन में औसतन 4 से 7 पौंड तक ही वार्षिक वृद्धि होगी और वार्षिक ऊँचाई का मान 1.85 इञ्च से 2.65 इञ्च तक पड़ेगा। इस निष्कर्ष से प्रभावित होकर स्काटलैंड में पाठशाला दूध (स्कूल-मिल्क) की योजना चलाई गयी जो बाद में योरोप और एशिया में सर्वत्र लोकप्रिय हुई।

गाय के दूध में 25 प्रकार के खनिज लवण जिनमें कैल्शियम हड्डी बनाने, फास्फोरस हड्डी और मस्तिष्क बनाने, लोहा रक्त में लाली बनाये रखने, आयोडीन शरीर में शक्ति और स्फूर्ति के लिये व थाइराइड ग्लैंड्स को ठीक रखने के लिये बहुत आवश्यक है। वे ऐसी अवस्था में उपलब्ध हैं कि हमारा शरीर उन्हें सुगमता से पचा लेता है। लवणों की कमी से जब शरीर में कोई रोग हो जाता है तब आयोडीन, फास्फोरस, कैल्शियम आदि से युक्त दवाइयाँ डॉक्टर लोग सेवन के लिये देते हैं पर अक्षम शरीर उन्हें पचा नहीं पाते। अतः औषधियों की प्रतिक्रिया हानिकारक हो सकती है, उनका विजातीय द्रव्य कुछ मात्रा में जमा रह जाता है जो कभी भी किसी दूसरे रोग के रूप में फूट सकता है।पर यदि खनिज तत्वों की पूर्ति के लिये गाय के दूध का सेवन किया जाए तो वह स्वयं ही ऐसी औषधि का काम पूरा कर देता है। गर्भकाल में केवल दूध पीने की आयु तक बालक इन लवणों का बड़ा भाग माता से ही ग्रहण कर लेता है इसीलिये चरक आदि आयुर्वेद ग्रन्थों में गर्भिणी को अधिक दूध देने की आवश्यकता बताई गई है। ऐसा न करने से बच्चा और सच्चा दिनों निर्बल हो सकते हैं।

दूध की तरह गाय के दूध से जमाया हुआ दही भी बड़ा गुणकारी होता है कई बार तो वह दूध की अपेक्षा अधिक गुणवर्धक समझा जाता है। दूध में जो चर्बी या फेट्स होते हैं-दही के रूपांतर में वे समाप्त हो जाते हैं और वह सुपाच्य और रोग निरोधक हो जाता है। इस सम्बन्ध में विस्तृत खोजें की गई हैं उनसे पता लगा है कि एक क्यूबिक सेन्टीमीटर दूध में 5 से 10 लाख तक ऐसे अणु रहते हैं जो रोगाणुओं को मारने का काम करते हैं, दही में उनकी संख्या सौ गुनी अधिक बढ़ जाती है। इसलिए दही या मट्ठा दूध की अपेक्षा अधिक स्वास्थ्य-वर्द्धक हो जाता है। इससे शरीर में ताजगी, प्रसन्नता और आरोग्यता बढ़ती है। दही सेवन करने से मानसिक शीतलता, चैतन्यता और मुख की लावण्यता में वृद्धि होती है। यह अनुभूत प्रयोग है इन लाभों को कोई भी व्यक्ति कुछ दिन के निरन्तर प्रयोग से ही देख सकता है।

शक्ति-पदार्थ के रूप में गौ घृत को अमृत तुल्य माना गया है। मद्रास के सेनेटरी कमिश्नर डॉ. किंग साहब ने अनेक परीक्षणों से सिद्ध किया था कि प्लेग की बीमारी के समय गाय के घी से मिश्रित चावल और केसर से प्लेग दूर होता है। जबलपुर टी॰बी॰ सैनीटोरियम में गौघृत के हवन से 80 टी॰ बी॰ के बीमारों को लाभ पहुँचा । गाय के दूध की चिकनाइयों से श्रेष्ठ होती हैं स्वाद, सुगन्ध और सात्विकता में गाय के घी की कोई तुलना नहीं। इसमें कृमिनाशक गुण विशेष होता है सभी वनस्पति तत्व होने पर भी गाय का घी सुपाच्य और शक्तिवर्द्धक होता है।

गाय के गोबर और मूत्र में ऐसे तत्व होते हैं जो रोगाणुओं को नष्ट करने में भारी सामर्थ्य रखते हैं घरों के चौके इसी लिये गोबर से लीपे जाते हैं। गोमय शरीर में मलकर स्नान से चर्म रोग दूर होते हैं। गोबर को उबाल कर लेप करने से गठिया जैसा रोग अच्छा होता है, कटे घाव को जोड़ने की भी शक्ति गोबर में होती है। इसी तरह गौमूत्र के बारे में-चरक संहिता में लिखा है-

गव्यं सुमधुरं किञ्चद् दोषघ्नं कृमिकुष्ठनुत्

कण्डूघ्नं शमपेत पीतं सम्यग्दोषोदरेहितम्

“अर्थात्-गोमूत्र के सेवन से कृमि रोग कोढ़ खुजली प्लीहा आदि रोग दूर हो जाते है।” गोबर और गोमूत्र की खाद की उपजाऊ शक्ति का मुकाबला आधुनिक रासायनिक खादें नहीं कर पाती हैं, यह बात वैज्ञानिक भी मानते हैं।

उपरोक्त लाभ आज भी प्राप्त किये जा सकते हैं पर इसके लिये गौ पालन और गौ संरक्षण आवश्यक है। अपने स्वास्थ्य तथा सम्पत्ति की रक्षा भी हम गाय की सुरक्षा रख कर कर सकते हैं। इस सम्बन्ध में दो मत नहीं हो सकते ।

गायत्री की उच्चस्तरीय साधना-


गायत्री का स्त्री-स्वरूप क्यों?

कई व्यक्ति पूछते हैं-गायत्री महाशक्ति को नारी रूप में क्यों पूजा जाता है जब कि अन्य सभी देवता नर रूप हैं। इसी प्रकार यह भी कहा जाता है कि गायत्री मंत्र में सविता देवता की प्रार्थना के लिये पुल्लिंग शब्दों का प्रयोग हुआ है, फिर उसे नारी रूप क्यों दिया गया?

इन शंकाओं के मूल आधार में मनुष्य की वह मान्यता काम करती है जिसके अनुसार नर को श्रेष्ठ और नारी को निकृष्ट माना गया है। घरों में नारियाँ नर की सेवा पूजा करती हैं, उसके अधिकार आधिपत्य में रहती हैं, उन्हें छोटा या हेय माना जाता है। स्त्री का वर्चस्व स्वीकार करने में पुरुष अपना अपमान मानते हैं। किसी स्त्री अफसर के नीचे पुरुष कर्मचारियों को काम करना पड़े तो बाहर से कुछ न कहते हुए भी भीतर कुड़कुड़ाते हैं। किसी घर में स्त्री की बात चलती हो, पुरुष अनुगामी हो तो उसकी मखौल उड़ाई जाती है। नर की नारी के प्रति जो यह सामन्तकालीन तिरस्कार बुद्धि है उसी से प्रभावित होकर उसे यह सोचना पड़ता है कि वह नारी शक्ति की पूजा क्यों करे? जब नर देवता मौजूद हैं तो नारी के आगे मस्तक झुका कर अपने नरत्व को हेय क्यों बनाया जाए?

भगवान को नारी रूप में पूजने से किसी की कोई हानि नहीं वरन् लाभ ही है। माता के हृदय में अपार वात्सल्य है। जितनी करुणा एवं ममता माता में होती है उतनी और किसी सम्बन्धी में नहीं। उपासना के लिये भगवान के किसी घनिष्ठ सम्बन्धी के रूप में ही मान्यता प्रदान करनी पड़ती है। निराकार ब्रह्म का ध्यान संभव नहीं। ध्यान के बिना उपासना नहीं हो सकती। निराकारवादी भी ध्यान उपासना प्रयोजन के लिए प्रकाश का ध्यान करते हैं। प्रकाश ही आखिर पंचभूतों के अंतर्गत आता है। ध्यान भूमिका में प्रयुक्त किये जाने वाले प्रकाश बिन्दु एवं सूर्य मंडल का एक आकार बन ही जाता है इसलिए उपासना में कोई न कोई आकार तो निर्धारित करना ही पड़ता है। इस आकार के साथ जितनी ही आत्मीयता ममता, घनिष्ठता होगी उतना ही मन लगेगा और चित्त एकाग्र होगा और भावनात्मक तन्मयता की और दृष्टि के साथ भगवत् प्राप्ति की ओर प्रगति होती चली जाएगी।

जिनके साथ घनिष्ठता स्थापित की जाती है उनके साथ कोई रिश्ता बन जाता है। रिश्ते का अर्थ है-असाधारण घनिष्ठता। परिवार के सदस्य कुटुम्बी और कन्याओं के आदान-प्रदान में सम्बन्धित रिश्तेदार कहलाते हैं। उससे अतिरिक्त लोगों को मित्र कहते हैं, गुरुजन भी। इन्हीं वर्गों में स्वाभाविक प्रेम बढ़ता है। इनके सान्निध्य में सुख और वियोग में दुख मिलता है। भगवान को प्राप्त करने के लिए उससे प्रेम सम्बन्ध दृढ़ करना होता है और उसके लिए उसे कोई प्रेम-पात्र कुटुम्बी रिश्तेदार अथवा मित्र जैसा सम्बन्ध स्थापित करना पड़ता है। इस सम्बन्ध, मान्यता में जितनी अधिक आत्मीयता होगी उतनी ही प्रतिक्रिया भी मिलेगी। गुम्बज अथवा कुँए की प्रतिध्वनि की तरह हमारा प्रेम ही ईश्वरीय प्रेम एवं अनुग्रह बन कर हमारे पास वापिस लौटता है। जिस स्तर का भाव या प्यार हम भगवान के प्रति व्यक्त करते हैं उसी के अनुरूप दीवार पर मारी हुई रबड़ की गेंद की तरह लौटकर भगवान की अनुकंपा हमारे पास आ जाती है। इसलिये भगवान को कोई न कोई सम्बन्धी मान कर चलना होता है। उस मान्यता के आधार पर ही हमारी उपासना में प्रगति होती है।

भगवान से कोई भी सम्बन्ध स्थापित किया जा सकता है। उस एक को ही किसी भी आत्मीय भावना के साथ देखा जा सकता है। उसके लिए हर मान्यता उपयुक्त है। कहा भी है-

त्वमेव माता च पिता त्वमेव, त्वमेव भ्राता च सखा त्वमेव।

त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव सर्वं मम देव देव॥

प्रार्थना में जिन सम्बन्धों को गिनाया गया है उनमें माता का सम्बन्ध सर्व प्रथम है, वह सर्वोपरि भी है। क्योंकि माता से बढ़ कर परम निस्वार्थ, अतिशय कोमल करुणा एवं वात्सल्य से पूर्ण और कोई रिश्ता हो ही नहीं सकता। जब हम भगवान को माता मान कर चलते हैं तो उसकी प्रतिक्रिया किसी सहृदय माता के वात्सल्य के रूप में ही उपलब्ध होती है। इन उपलब्धियों को पाकर साधक धन्य हो जाता है।

पिता से माता का दर्जा सौ गुना अधिक बताया गया हैं। यों पिता भी बच्चों को प्यार करते हैं पर उस प्यार का स्तर माता की तुलना नहीं कर सकता। इसलिये सब में भगवान को माता मान कर चलना अपने ही हित में है। इसमें अपने को ही अधिक लाभ होता है।

नारी के प्रति मनुष्य में एक वासनात्मक दुष्टता की प्रवृत्ति जड़ जमाये बैठी रहती है। यदि इसे हटाया जा सके -नर और नारी के बीच काम-कौतुक की कल्पना हटाई जा सके तो विष को अमृत में बदलने जैसी भावनात्मक रसायन बन सकती है। नर और नारी के बीच जो रयि और प्राण विद्युत धारा सी बहती है। उनका संपर्क वैसा ही प्रभाव उत्पन्न करता है जैसा कि बिजली के नेगेटिव और पॉजिटिव धाराओं के मिलन से विद्युत संचार का माध्यम बन जाता है। माता और पुत्र का मिलन एक अत्यन्त उत्कृष्ट स्तर की आध्यात्मिक विद्युतधाराओं का सृजन करता है। मातृ स्नेह से विहीन बालकों में एक बड़ा मानसिक अभाव रह जाता है भले ही उन्हें साँसारिक अन्य सुविधाएं कितनी ही अधिक क्यों न हों। पत्नी बहिन, पुत्री आदि के रूप में भी नारी नर को महत्वपूर्ण भावनात्मक पोषण प्रदान करती है और उसकी मानसिक अपूर्णता को पूर्ण करने में सहायक होती है। यह साँसारिक स्तर की बात उपासना के भावना क्षेत्र में भी लागू होती है। माता का नारी रुप ध्यान भूमिका में जब प्रवेश करता है तो उसमें प्राण की एक बड़ी अपूर्णता पूरी होती है।

युवती नारी के रुप में माता का ध्यान करके हम नारी के प्रति वासना दृष्टि हटा कर पवित्रता का दृष्टिकोण जमाने का अभ्यास करते हैं। इसमें जितनी ही सफलता मिलती है उतना ही बाह्य जगत में भी हमारा नारी के प्रति वासना दृष्टि रखने में मन हटता जाता है। उस प्रकार नर नारी के बीच जिस पवित्रता की स्थापना हो जाने पर अनेक आत्मिक बाधाएं कुंठाएं एवं विकृतियाँ दूर हो सकती हैं उसका लाभ सहज ही मिलने लगता है। गायत्री माता का ध्यान एक वृद्ध नारी का नहीं वरन् एक युवती का होता है। युवती में यदि उत्कृष्टता की तथा पवित्र दृष्टि रखी जा सके तो समझना चाहिए कि आत्मिक स्तर सिद्ध योगियों जैसा तेजस्वी बन गया। गायत्री उपासना में इस महाशक्ति को नारी रूप देकर इस एक महत्वपूर्ण आध्यात्मिक आवश्यकता की पूर्ति का प्रयत्न किया गया है।

भाषा विज्ञान की दृष्टि में ‘शक्ति स्त्रीलिंग‘ है। इसलिए यदि ध्यान कल्पना में उसे नारी रूप में निश्चित किया जाए तो उसमें अनुचित कुछ भी नहीं है। उस महामंत्र में सविता देवता के लिये पुल्लिंग शब्दों का प्रयोग भले ही हुआ है वह है तो स्तुति ही, प्रार्थना ही। प्रार्थना और स्तुति दोनों ही स्त्रीलिंग हैं। इसी दशा में यदि गायत्री को स्त्री रूप में निश्चित किया जाता है तो इसमें बुराई क्या है। सच तो यह है कि शक्ति तत्व को स्त्री पुरुष के वर्गों में विभक्त ही नहीं किया जा सकता यह विभाजन तो शरीरधारी प्राणियों में सन्तानोत्पत्ति प्रयोजन के लिये होता है। दिव्य शक्तियाँ न तो शरीर-धारी हैं और न उन्हें प्रजनन ही करना है ऐसी दशा में उनमें वास्तविक लिंगभेद नहीं। उन्हें नर-नारी के रूप में तो ध्यान सुविधा के लिये ही चित्रित किया जाता है अथवा भाषा में जिस प्रकार लिंग प्रयुक्त होता है उसी आधार पर उनका शरीर बना दिया जाता है। यह वस्तु वास्तविक नहीं वरन् मानवी कल्पना का खेल है।

अग्नि स्त्रीलिंग है तेजस् पुल्लिंग। शब्दों में लिंग भेद है पर वस्तु एक ही है। वायु स्त्रीलिंग और मरुत पुल्लिंग है। बात एक ही है पर शब्दों के आधार पर लिंग बदल गया। उपवन पुल्लिंग है, वाटिका स्त्रीलिंग एक ही चीज के दो स्वरूप। शैय्या और पलंग एक होते हुए भी लिंग पृथक है। चन्द्रमा को हिन्दी में नर और अंग्रेजी में नारी मानते हैं। वस्तुतः चन्द्रमा एक ग्रह पिंड-मात्र है वह नर है न नारी। भाषा और कल्पना में उसे नर नारी के रूप में खींचा जाता है। परब्रह्म की सर्वोपरि शक्ति को स्त्री कहा जाए या पुरुष यह हमारी भाषा और कल्पना पर निर्भर है। वस्तुतः यह लिंगभेद से परे है। उपासना में गायत्री की तुलना नारी रूप में करके हम अपना ही साधनात्मक एवं भावनात्मक प्रयोजन पूर्ण करते हैं। अतएव इसमें सन्देह तथा विवाद की कोई गुंजाइश नहीं है।

नर की जननी होने के कारण वस्तुतः नारी उससे कहीं अधिक श्रेष्ठ एवं पवित्र है। उसका स्थान सम्भवतः बहुत ऊँचा है। माता का पूज्य स्थान पिता एवं उस से भी ऊँचा है। पुरुष की अपूर्णतायें नारी के स्नेह सिंचन से ही दूर होती हैं । इसलिए यदि नारी के रूप में हमारा उपास्य इष्ट हो तो वह एक औचित्य ही है। अनादिकाल से भारतीय धर्म में ऐसी ही मान्यता चली आ रही है, जिसके अनुसार माता को ही नहीं पत्नी को भी पति से अधिक एवं प्रथम सम्मान मिला है। पत्नी-पत्नी के सम्मिलित नामों में पत्नी की प्राथमिकता है। लक्ष्मी-नारायण, सीताराम, राधेश्याम, उमा-महेश, शची-पुरन्दर, माता-पिता, गंगा-सागर, आदि नामों में पत्नी को ही प्राथमिकता मिली है। कारण उसकी वरिष्ठता ही है। इस दृष्टि से भी यदि देवता का पुल्लिंग स्वरूप अधिक उत्तम है या स्त्रीलिंग स्वरूप, तो उसका सहज उत्तर नारी के रूप में ही जाएगा। ऐसी दशा में यह शंका संदेह करना उचित नहीं कि गायत्रीशक्ति को नारी का रूप देकर उसे जो पूज्य स्थान पर बिठाया गया है उसमें कुछ अनुचित हुआ है। नर की श्रेष्ठता का अहंकार ही इस प्रकार के प्रश्नों को सृजन करता है।

उपरोक्त तथ्यों के पुष्टि में अगणित शास्त्रीय प्रमाण मिलते हैं उसमें से कुछ का उल्लेख नीचे किया जाता है-

अचिन्त्यस्याप्रमेयस्य निर्गुर्णस्य गुणात्मनः।

उपासकानाँ सिद्धयर्थ ब्रह्मणो रूप कल्पना॥

“परब्रह्म की सभी शक्तियाँ अचिन्त्य और निर्गुण है। उन स्वरूपों को उपासकों को समझाने के उद्देश्यों से ऋषियों ने उनके रूपों की कल्पना करके मूर्तियों को बनाया है।”

भेद उत्पत्तिकाले वै सर्मा प्रभवत्यज।

दृश्यादृश्य विभेदोऽयं द्वैविध्ये सति सर्वथा॥

नाऽहं नारी पुमाँश्चाहं न क्लीवं सर्गसंक्षये।

सर्गे सति विभेदः स्यात् कल्पितोऽयं धिया पुनः॥

अहं बुद्धिरहं श्रीश्च धुतिः कीर्तिः स्मृतिस्तथा।

श्रद्धा मेधा दया लज्जा क्षुधा, तृष्णा तथा क्षमा॥

(देवी भागवत)

“उत्पत्ति के समय सृष्टि के अर्थ से ही भेद प्रतीत होता है। यह दृश्य, अदृश्य का विभेद-द्वैतभाव सदैव रहता है। अर्थात् सृष्टि-दशा में ब्रह्म और ब्रह्म शक्ति दोनों स्वतन्त्र रूप से प्रकट होते हैं। प्रलय हो जाने पर न मैं स्त्री हूँ न पुरुष और क्लीव हूँ, केवल सृष्टिकाल में ही बुद्धि द्वारा कल्पित भेद दृष्टि में आता है। सृष्टि की विकास अवस्था में ही बुद्धि, श्री, धृति, कीर्ति, स्मृति, श्रद्धा, मेधा, दया, लज्जा, क्षुधा, पिपासा और क्षमा मैं ही हूँ।”

अरुपं भावनागम्यं परं ब्रह्म कुलेश्वरि।

अरुपाँ रुपिणी कृत्वा कर्मकाण्डरता नरः॥

(कुलार्णव तंत्र)

“वह ईश्वरी शक्ति अरूप और केवल भावनागम्य है। पर कर्मकाण्ड में संलग्न मनुष्य उस अरूप में से ही रूप की कल्पना कर लेते हैं।”

“एवं विधो यो भगवान चिदात्मा सा एव गायत्री ..........गायत्री परमेश्वरावेवास्थैव चेतनापुरुषस्य द्वे नामनी ध्यानेन तु स्त्री लिंग।”

(विष्णु धर्मोत्तर)

“इस प्रकार जो भगवान है वही गायत्री है। गायत्री और परमेश्वर ये उस चेतन-पुरुष के ही दो नाम हैं परन्तु ध्यान के लिये वह (गायत्री रूप में) स्त्रीलिंग है।

जगन्माता च प्रकृतिः पुरुषश्च जगत्पिता।

गरीयर्साति जगताँ माता शतगुणैः पितु॥

(ब्रह्मवैवर्त पुराण)

“जगज्जननी प्रकृति है और जगत का पिता पुरुष है। जगत में पिता से सौ गुना अधिक महत्व माता का है।”

न बाला न च त्वं वयस्था न वृद्धा,

न च स्त्री न षणढः पुमानैव च त्वम्।

सुरो नासुरो नरो वा न नारी,

त्वमेका परब्रह्मरुपेण सिद्धा॥

(महाकाली स्तवन)

“हे महामाया! न तुम बालिका हो, न वयस्क हो न वृद्ध हो, स्त्री, क्लीव और पुरुष भी तुम नहीं हो, न देवता हो, न दानव हो, न नर हो, न नारी हो, तुम केवल परब्रह्म स्वरूपिणी हो।”

अचिन्त्यापि, साकारशक्ति स्वरुपा,

प्रतिव्यक्त्यधिष्ठान सत्त्वैक मूर्तिः।

गुणातीतानिर्द्वन्द्व बौधैकगम्या,

त्वमेका परब्रह्म रुपेण सिद्ध॥

(महाकाली स्तवन)

“तुम अचिन्तनीय होते हुए भी साकार मूर्ति रूपा हो प्रत्येक प्राणी में सत्वगुण रूप में विराजमान् रहती हो तथा गुणातीत हो। केवल तत्वज्ञान से ही तुम जानी जाती हो । तुम्हीं परब्रह्म रूप से प्रसिद्ध हो।

त्वं स्त्री त्वं पुमानसि त्वं,

कुमार उत वा कुमारी।

त्वं जीर्णो दण्डेन वंचसि त्वं,

जातो भवसि विश्नतो मुखः॥

(श्वे. 4-3)

“तू स्त्री है, तू पुरुष भी है, तू ही कुमार और कुमारी है, तू वृद्ध होकर लाठी के सहारे चलता है और तू ही उत्पन्न होकर सब ओर मुख वाला हो जाता है।”

सा च ब्रह्म स्वरूपा च नित्या सा च सनातनी।

यथात्मा च तथा शक्तिर्यथाग्नौ दाहिका स्थिता॥

अत एव हि यीगीन्दै स्त्री पुम्भेदा न मन्यते।

सर्व ब्रह्ममयं ब्रह्मन् शश्वत् सदपि नारद॥

(देवी भाग 9। 1। 10। 11 )

“वही ब्रह्म प्रकृति ब्रह्म स्वरूपा, नित्या और सनातनी है। पर ब्रह्म परमात्मा के अनुरूप सभी गुण उस प्रकृति में निहित हैं जैसे अग्नि में दाहिका शक्ति सदा रहती है इसी से परम योगीगण स्त्री-पुरुष में भेद नहीं मानते। हे नारद! वे कहते हैं कि सत्-असत् जो कुछ भी है सब ब्रह्ममय है।”

‘कामधेनु तंत्र’ में कहा है कि-

“युवती सा समाख्याता सा महाकुण्डली परा॥”

अर्थात् “वह परा जैसी महा कुण्डली अर्थात् महागायत्री युवती के रूप में कही गई है।”

स तस्मिन्नेवाकशे स्त्रिमाजगाम बहुशोभः मानामुमाँ हैमवतीम्।

“इन्द्रादि देवताओं को ब्रह्मज्ञान प्रदान करने को ब्रह्म स्थान में जो प्रतिमा प्रकट हुई उसी स्त्री-मूर्ति का दर्शन इन्द्र को हुआ।”

जगद्धात्रीं महामायाँ ब्रह्मरुपाँ सनातनीम्।

दृष्ट् वा प्रमुदिताः सर्वे देवताप्सर किन्नराः॥

(वृहद् विष्णु पुराण)

“जगन्माता, महामाया, ब्रह्ममाया, ब्रह्मरूपा, सनातनी महाशक्ति को देख कर देवगण, गंधर्व, अप्सरा, किन्नर सब परम हर्षित हुए।”

जयखिला सुराराध्ये जय कामेशि कामदे।

जय ब्रह्ममयि देवि ब्रह्मानन्द रसात्मिके।

(लितोपास्यान 8।2)

“हे महादेवी! तुम ही समस्त देवताओं की आराध्या हो, तुम्हीं सर्व कामनाओं की ईश्वरी और उनको पूर्ण करने वाली हो।”

त्वमेव सर्वजननी मूलप्रकृतिरीश्वरी।

त्वमेवाद्या सृष्टिविधौ स्वेच्छया त्रिगुणात्मिका॥ कार्यार्थे सगुणा त्वं च वस्तुतो निर्गुणा स्वयम्।

पर ब्रह्मस्वरुपा त्वं सत्या नित्या सनातनी॥

तेजः स्वरूपा परमा भक्त नुग्रहविग्रहा।

सर्वस्वरुपा सर्वेशा सर्वाधारा परात्परा।

सर्वबीज स्वरुपा च सर्वपूज्या निराश्रया।

सर्वज्ञा सर्वतोभद्रा सर्व मंगल मंगला॥

(ब्रह्मवैवर्त पु. प्रकृति 2166।7।10)

“तुम्हीं विश्वजननी, मूल प्रकृति ईश्वरी हो, तुम्हीं सृष्टि उत्पत्ति के समय आद्यशक्ति के रूप में विराजमान रहती हो और स्वेच्छा से त्रिगुणात्मिका बन जाती हो। यद्यपि वस्तुतः तुम निर्गुण हो तथापि प्रयोजन वश सगुण हो जाती हो। तुम परब्रह्मस्वरूप, सत्य, नित्य एवं सनातनी हो । परम तेजस्वरूप और भक्तों पर अनुग्रह करने के हेतु मानव शरीर धारण करती हो। तुम सर्वस्वरूपा, सर्वेश्वरी सर्वाधार एवं परात्पर हो। तुम सर्वबीजस्वरूप, सर्व पूज्य एवं आश्रय रहित हो। तुम सर्वज्ञ, सब प्रकार से मंगल करने वाली और सर्व मंगलों की भी मंगल हो।

कथं जगत् किमर्थं तत् करोषि के न हेतुना।

नाहं जानामि तद्देव यतोहं हि त्वदुद्भवः॥

(शक्तिदर्शन)

“हे देवी! तुम किसके लिये, किस हेतु जगत् की सृष्टि करती हो -मैं इस बात को नहीं जानता क्योंकि मैं तुम से उत्पन्न हूँ।”

माया ख्यायाः कामधेनोर्वत्सौ जीवेश्वराबुभौ।

(शक्तितत्त्व विमर्शिनी)

“जीव और ईश्वर दोनों माया रूपी कामधेनु के दो बछड़े हैं।”

उपरोक्त में परब्रह्म को नारी रूप में चित्रण करने का रहस्य प्रकट किया गया है। नर और नारी में से किसे प्राथमिकता मिले? इस प्रश्न के उत्तर में नृतत्व विज्ञान का, जीव विज्ञान का भी सहारा लिया जा सकता है। शोधकर्त्ता इसी निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि प्राथमिकता नारी को ही है। पहले भूमि बनी, बीजों का आविर्भाव उसके उपरान्त हुआ।

नृतत्ववेत्ता ‘हेवलाक ऐलिस’ इस निष्कर्ष पर पहुँचे है कि मानव जाति का आरम्भ नारी से ही होता है। पुरुष का आस्तित्व पीछे प्रकाश में आया। उन्होंने लिखा है-

“प्राथमिकता और प्रकृति के नियमानुसार पहले नारी की ही उत्पत्ति हुई। साधारणतया प्राणीमात्र की उत्पत्ति नारी जाति पर ही अवलंबित है। प्राणी जगत् की सृष्टि के लिये पुरुष की आवश्यकता ही न थी अथवा गौण थी। रज और वीर्य के संयोग से विभिन्न गुणों द्वारा जीवन-शक्ति को परिपुष्ट एवं प्रस्फुटित करने के हेतु लाभ की दृष्टि से पुरुष जाति का पीछे से विकास हुआ।”

नारी में देवत्व की मात्रा पुरुष की तुलना में कहीं अधिक है। इसलिये जहाँ पुरुष को अपने गुण, कर्म, स्वभाव की उत्कृष्टता होने पर ही पूज्य पद एवं सम्मान मिलता है वहाँ नारी को उसकी जननी, भगिनी, कन्या आदि विशेषताओं के कारण जन्मजात सम्मान मिल जाता है। उनके हृदय में वह विशालता विद्यमान है जिसके आधार पर शिशु को अपने शरीर का रस निचोड़ कर प्रदान कर सकती है। इन्हीं विशेषताओं के कारण मानवी होते हुए भी उसे देवी कहा जाता है। अधिकाँश स्त्रियों के नाम के अन्त में देवी पद जोड़ा जाता है जैसे शकुन्तला देवी, उर्मिला देवी, भगवती देवी आदि। शास्त्र कहते हैं-

स्त्रीषु प्रीतिर्विशेषेण स्त्रीप्वपत्यं प्रतिष्ठितम्।

धर्मार्थो स्त्रीषु लक्ष्मीश्च स्त्रीषु लोकाः प्रतिष्ठिताः॥

(चरक संहिता-चि. स्था. अ. 2)

“प्रीति का निवास अधिकतर स्त्रियों में ही होता है। सन्तान की जननी भी वे ही होती हैं। धर्म स्त्रियों में रहता है, लक्ष्मी भी स्त्रियों में रहती है। इसलिये संसार स्त्रियों में ही स्थित है।”

नारी रूप में परमात्मा का दिव्य दर्शन हम पग-पग पर कर सकते हैं। इस प्रकार की दिव्य-दृष्टि जिसे प्राप्त है उसे सच्ची आध्यात्मिक सिद्धि प्राप्त हुई समझनी चाहिये। गायत्री उपासना में नारी प्रतिमा को वन्दनीय मानकर मनुष्य को पवित्रतम बनाने का प्रयत्न किया गया है नारी वस्तुतः मूर्तिमान महामाया ही है। देखिये-

जननी जन्म काले च स्नेह काले च कन्यका।

भार्या भोगाय सम्पृक्ता अन्तकाले च कालिका

एकैव कालिका देवी बिहरन्ती जगत्त्रये॥

“वही महामाया जननी रूप में हमको जन्म देती है, कन्या रूप में हमारी स्नेह की पात्र बनती है, भार्या के रूप में भोगदात्री बन जाती है और अन्त समय में कालिका के रूप में हमारी इहलीना संवरण कर देती है। इस प्रकार एक ही महादेवी तीनों लोकों में विचरण करती रहती है।”

तन्त्र ग्रन्थों में नारी को भगवान् की मूर्तिमान प्रतिमा मानकर उसकी विधिवत् पूजा करने का विधान है। विभिन्न आयु तथा स्थिति की नारियों को विभिन्न देवियों के रूप में पूजनीय मानकर उनका वंदन-अर्चन किया जाता है। ब्राह्मण भोजन की तरह ही कन्या भोजन का भी पुण्य माना गया है। नवरात्रियों में पुरश्चरणों के अन्त में तो विशेष रूप से कन्या भोजन करने की ही परम्परा ब्राह्मण तो विद्या, तपश्चर्या एवं सेवा के आधार पर ब्राह्मणत्व प्राप्त करते हैं पर कन्याओं में वह तत्व जन्मजात रूप से स्वभावतः अनायास ही विद्यमान रहता है इस संदर्भ में तन्त्र ग्रन्थ का अभिमत देखिये-

“एक वर्ष की आयु वाली बालिका ‘कुमारी’ कहलाती है, दो वर्ष वाली ‘सरस्वती’, तीन वर्ष वाली ‘त्रिधामूर्ति’, चार वर्ष वाली ‘कालिका’, पाँच वर्ष की होने पर ‘सुभगा’, छः वर्ष की ‘उमा’, सात वर्ष की ‘मालिनी’, आठ वर्ष की ‘कुब्जा’, नौ वर्ष की ‘काल-संदर्भ’, दसवें में ‘अपराजिता’ ग्यारहवें में ‘रुद्राणी’, बारहवें में ‘भैरवी’, तेरहवें वर्ष में ‘महालक्ष्मी’, चौदह पूर्ण होने पर ‘पीठनायिका’, पन्द्रहवें में ‘क्षेत्रज्ञा’ और सोलहवें में ‘अम्बिका’ मानी जाती है इस प्रकार जब तक ऋतु का उद्गम न हो। तभी तक क्रमशः संग्रह करके प्रतिपदा आदि से लेकर पूर्णिमा तक वृद्धि-भेज कुमारी पूजन करना चाहिये।”

(रुद्रयामल-उत्तराखण्ड)

“आठ वर्ष की बालिका गौरी, नौ वर्ष की रोहिणी और दश वर्ष की कन्या कहलाती है । इसके बाद वही महामाया और रजस्वला भी कही गई हैं। बारहवें वर्ष से लेकर बीसवें तक वह सुकुमारी कही गई हैं।”

(विश्वसार तन्त्र)

“यजमान को चाहिए कि दस कन्याओं का पूजन करें। उनमें भी दो वर्ष से लेकर दस वर्ष तक की अवस्था की कुमारियों का ही पूजन करना चाहिए। दो वर्ष की आयु वाली है वह ‘कुमारी’-तीन वर्ष की ‘त्रिमूर्ति’-चार वर्ष की ‘कल्याणी’-पाँच वर्ष की ‘रोहिणी’-छः वर्ष की ‘कालिका’-सात वर्ष की ‘चण्डिका’-आठ वर्ष की वर्ष की ‘शाम्भवी’-नौ वर्ष की ‘दुर्गा’ और दस वर्ष की ‘सुभद्रा’ कही गई है। इनका मंत्रों द्वारा पूजन करना चाहिए। एक वर्ष वाली कन्या को पूजा से प्रसन्नता नहीं होगी, अतः उसका ग्रहण नहीं है और ग्यारह वर्ष से ऊपर वाली कन्याओं का पूजा में ग्रहण वर्जित है।”

“जो कुमारी को अन्न, वस्त्र, जल अर्पण करता है उसका वह अन्न मेरु के समान और जल समुद्र के सदृश अक्षुण्य और अनन्त होता है। योगिनी तन्त्र के कथनानुसार पूजा का फल अवर्णनीय है, इसलिये सभी जाति की बालिकाओं का पूजन करना चाहिए कुमारी पूजन में जाति भेद का विचार करना उचित नहीं काली-तंत्र में कहा गया है कि-”सभी बड़े-बड़े पर्वों पर अधिकतर पुण्य मुहूर्त में और महानवमी की तिथि को कुमारी पूजन करना चाहिए। सम्पूर्ण कर्मों का फल प्राप्त करने के लिये कुमारी पूजन अवश्य करें।” ‘वहन्नीलतन्त्र’ के अनुसार-”पूजित हुई कुमारियाँ विघ्न, भय और अत्यन्त उत्कट शत्रु को भी नष्ट कर डालती हैं। रुद्रयामल में लिखा है कि-कुमारी साक्षात् योगिनी और श्रेष्ठ देवता है। विधियुक्त कुमारी को अवश्य भोजन कराना चाहिए। कुमारी को पाद्य, अर्घ्य, कुंकुम और शुभ चन्दन आदि अर्पण करके भक्तिभाव से उसकी पूजा करें।

- कुञ्जिका तन्त्र

कुमारी कन्याओं तक ही यह दिव्य भाव सीमित नहीं माना गया है। वरन् उसका क्षेत्र अत्यंत विशाल है। प्रत्येक नारी में देवत्व की मान्यता रखना और उसके प्रति पवित्रतम श्रद्धा रखना एवं वैसा ही व्यवहार करना उचित है जैसा कि देवी देवताओं के साथ किया जाता है। नारी मात्र को भगवती गायत्री की प्रतिमायें मानकर जब साधक का हृदय पवित्रता का अभ्यास हो जाए तो समझना चाहिए कि उसके लिये परम सिद्धि की अवस्था अब समीप है शास्त्र उसी प्रकार की मनोभूमि बनाने का हमें निर्देश करते हैं और बताते हैं-

सर्मस्त्रीनिलया, जगदम्बामयं पश्य स्त्रीमात्रमाविशेषतः।

“स्त्री-मात्र को जगत्माता और जगत्गुरु मान कर पूजो।”

गायत्री बा इदं सर्वम्

(नृसिंह पूर्णतापनीयोपनिवह 4-2)

“यह समस्त सृष्टि गायत्री स्वरुप ही है।”

विद्यासमस्तास्तव देवि भेदाः,

स्त्रिय समस्तासकला जगस्तु।

स्तकैकया पूरितमम्व व्वैतत्

वास्ते स्तुतिः स्तव्य परा परोक्ति॥

इस सम्पूर्ण संसार में जो परा-अपरा विद्यायें हैं सो आपका ही भेद हैं। इस संसार में समस्त नारियाँ आपका ही भेद हैं। संसार में समस्त नारियाँ आपका ही रूप हैं।

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।

यत्र नार्यो न पूज्यन्ते श्मशानं तत्र वैगृहम्॥

-मनु

“जहाँ नारी की पूजा होती है, वहाँ देवता निवास करते हैं जहाँ नारी का तिरस्कार होता, वह घर निश्चय ही श्मशान है।”

स्त्रीणाँ निन्दाँ प्रहारं च कोटिल्यं चाप्रियं वचः। आत्मनो हितमान्विच्छन्देवी भक्ते विवर्जयेत्॥

अपना कल्याण चाहने वाला, माता का उपासक स्त्री निन्दा न करे, न उन्हें मारे, न उनसे छल करे न, छल करे न उनका जी दुखाये।

नारी मात्र के प्रति उच्च भाव रखने और उनके साथ सहृदय सद्व्यवहार करने से व्यक्ति एवं समाज का सर्वांगीण उत्कर्ष हो सकता है। भावात्मक पवित्रता से बढ़ मनुष्य के पास और कोई श्रेष्ठता हो नहीं सकती।

जब हम भगवान को माता के रूप में पूजते हैं तो वे भी हमारे लिये माता जैसा वात्सल्य लेकर प्रस्तुत होते हैं। कहना न होगा कि पिता की तुलना में माता का हृदय अत्यधिक कोमल होता है। वह अपने पुत्र एवं भक्त के प्रति सहज ही करुणार्द्र हो उठती है। माता की शरण लेने वाला अपेक्षाकृत सदा ही अधिक लाभ में रहता है। ऐसे उदाहरण भी हैं-

पिते वत्वत्प्रेयाजननि परि पूर्णागसि जने।

हित स्त्रोती वृत्या भवति च कदाचित्कलुषधीः॥

कि येतन्निदोषः व इहं जगतीति त्वमुचितैः।

रुपापै विस्यार्थ स्वजनयसि माता तद सिनः॥

- पराशर भट्ट

“परम पिता परमात्मा जब अपराधी जीव पर पिता के समान कुपित हो जाते हैं तब आप ही उन्हें समझाती हो कि- यह क्या करते हो? इस संसार में पूर्ण निर्दोष कौन है? उनका क्रोध शान्त कर आप ही उनमें दया उपजाती हैं। इसलिये आप ही हमारी दयामयी माता हैं।”

पुरतः पतितं देवी धारण्याँ वायसं तदा।

तच्छिरः पादयो स्तस्य योजयामास जानकी॥

(रामायण)

“जब काक रूपी जयन्त तीनों लोकों में आश्रय न पाकर रामचन्द्रजी की शरण आकर दूर पड़ गया तो जानकी जी ने उसका सिर रामचन्द्रजी के पैरों में रखकर उसकी रक्षा की प्रार्थना की।

मातमैथिलि राक्षसी स्त्वयि तदैवाद्रपिराधास्त्वया। रक्षन्त्या पवनात्सजाल्लघु तरा रामस्य गोष्ठी कृता॥ काकं ते च विभीषणं शरणभित्युक्ति क्षमौ रक्षतः। सानरसान्द्र महागस सुख यतु क्षान्तिस्त्वया कस्यिका॥

“रामचन्द्रजी ने शरण आने पर ही काक और विभीषण की रक्षा की । उसमें उनका क्या बड़ा गौरव रहा। जानकी जी की महानता तो देखा, उनने अपराध करने वाली राक्षसियों के बिना कोई प्रार्थना किये ही दण्ड देने को उद्यत हनुमान जी से छुड़ा दिया। जानकी जी की करुणा रामचन्द्रजी से कहीं बड़ी है।

अस्तु नारी को हेय या छोटा मानकर उसे पूजा के अयोग्य होने की कुशंका मन में नहीं उठने देनी चाहिए और न यह सोचना चाहिए कि पुल्लिंग देवता का पूजन मातृ के पूजन से अधिक उत्तम है। माता ही प्रथम देवता है। गायत्री माता की शरण लेकर हम अपने ऊपर चढ़े हुए चिन्ताओं, कुण्ठाओं, दैन्य दुर्भावों एवं शोक-संतापों से छुटकारा पा सकते हैं। इस रहस्य को जानने वाला आध्यात्म विद्या का मर्मज्ञ भावनापूर्ण हृदय से उस महाशक्ति के प्रति अपनी अभिव्यंजना व्यक्त करते हुए कहता है-

ॐ नमस्ते देविः! गायत्री! सावित्री! त्रिपदेऽक्षेट।

अजरे! अमरे! मातस्राहि माँ भवसागरात्॥

ब्रह्मविद्ये! महाविद्ये! वेदमातर्नमोऽस्तु ते।

अनन्त कोटि ब्रह्माण्ड व्यापिन! ब्रह्मचारिणि॥ नमोन्मस्ते गायत्री! सावित्री! त्वाँ नमाम्यहम्।

सरस्वति! नमस्तुभ्यं तुरीये! ब्रह्मरुपिणी॥

(वसिष्ठ-संहिता)

“हे देवी गायत्री! हे सावित्री! हे त्रिपदा स्वरूपा! हे अक्षरा ॐ स्वरूपा! हे अजर-अमर स्वरूपा! मेरा तुझे नमस्कार है। हे माता! भवसागर से मेरी रक्षा कर। हे ब्रह्म विद्ये! हे महाविद्ये! हे वेदमाता! हे अनन्त कोटि ब्रह्माण्डों से व्यापक! हे ब्रह्मचारिणि! तुझे नमस्कार है-नमस्कार है। हे गायत्री! हे सावित्री! हे सरस्वती! तुरीय ब्रह्मरूपिणी तुझे मेरा नमस्कार है।”

अपनों से अपनी बातें-


यह पुण्य परम्परा इस मास से आरम्भ कर ही दें।

गत मास अखण्ड ज्योति परिजनों की जन्म तिथि पूछी गई थी। उसका उद्देश्य जन्म दिन प्रथा का प्रचलन करना ही था-कोई ज्योतिष जन्मपत्री वर्षफल आदि जैसी बात उसमें नहीं थी। जन्म-दिन मनुष्य जीवन की महत्ता एवं दिशा के समझने समझाने का सबसे महत्वपूर्ण दिन है। यों स्वभावतः मनुष्य को अपना नाम, अपना स्वरूप, अपना यश, अपना अस्तित्व अत्यधिक प्रिय होता है। अपना जन्म दिन भी हर व्यक्ति के लिए उसकी मानव योनि प्राप्त करने की महत्ता सफलता का प्रतीक होने के कारण बहुत ही आनन्द एवं उल्लास का दिन है। उसे मनाने से जहाँ भौतिक आनन्द उल्लास प्रीति करने का लाभ है वहाँ उससे आत्म-चिंतन की उपयुक्त घड़ी पर कोई निर्माणात्मक निर्णय लेने की सम्भावना भी है। इस उत्सव आयोजन में इकट्ठे होने वाले विचारशील लोगों में परस्पर प्रेम भाव बढ़ता है, सृजनात्मक संगठन होता है और एक प्रेरणाप्रद परिपाटी के शुभारम्भ का अवसर मिलता है। युग-निर्माण योजना जिस उद्देश्य को लेकर बनी है उसकी पूर्ति के बीजाँकुर भी इस कार्यक्रम में सन्निहित हैं। वह प्रचलन निश्चय ही व्यक्ति निर्माण और तदनुसार समाज निर्माण का बहुत कुछ प्रयोजन पूरा करेगा।

मनुष्य जीवन स्वरूप एवं उद्देश्य को जितनी अच्छी तरह जन्म दिन के अवसर पर सोचा समझा जा सकता है उतना और किसी दिन नहीं। उस दिन हमें जीवन तत्व पर विस्तारपूर्वक विचार करना चाहिए और वह दिशा ढूँढ़नी चाहिए जिस पर चल कर जीवनोद्देश्य की पूर्ति सम्भव हो सके।

मनुष्य जन्म परमात्मा का एक अनुपम वरदान है। उसे प्राणी का सर्वोत्तम सौभाग्य भी कह सकते हैं। आज हमें उस सौभाग्य का मूल्य मालूम नहीं पड़ता पर जिस दिन तुलनात्मक अध्ययन का अवसर मिलेगा, उस दिन पता चलेगा कि यह अलभ्य अवसर अपने ढंग का अनुपम था। जीवन के लिए इससे बड़ी मंगलमय परिस्थिति इस धरती पर और कुछ हो ही नहीं सकती जैसी कि मनुष्य शरीर का उपयोग करने के दिनों में उपलब्ध होती है।

पृथ्वी बड़ी तेजी से अपनी धुरी पर घूम रही है और सूर्य की परिक्रमा के लिए भी हजारों मील प्रति घण्टा की द्रुत गति से दौड़ी जा रही है। हम उस पर रहते हैं-सारी जिन्दगी काट डालते हैं पर धरती स्थिर ही मालूम पड़ती रहती है। पानी के जहाज, हवाई जहाज, रेल आदि द्रुतगामी वाहनों में खिड़की बन्द करके बैठ जाएं तो मामूली हिलने-जुलने का अनुभव तो होता है पर यह पता नहीं चलता कि हम कितनी तेजी से दौड़े या उड़े जा रहे हैं। शरीर के भीतर का हर अवयव आश्चर्यजनक गति से निरन्तर कार्य संलग्न है। रक्त संचार, श्वास-प्रश्वाँस, पाचन प्रणाली, दोषों का बनना बिगड़ना, स्नायुओं का सिकुड़ना फैलना, ज्ञान तन्तुओं में विद्युत संचार, मस्तिष्क की अद्भुत शक्तिमत्ता आदि बातें किसी वैज्ञानिक को आश्चर्यचकित करने के लिए पर्याप्त हैं, पर हमें कुछ पता नहीं चलता कि भीतर क्या कुछ हो रहा है। लकड़ी के खम्भे की तरह हम अपने आपको एक चलता फिरता पुतला मात्र समझते हैं। आयु तेजी से बढ़ती जाती है, मौत तेजी से निकट आती जाती है पर हमें कुछ पता ही नहीं चलता कि आखिर क्या कुछ हो रहा है। शरीर में रोग कीटाणु घुसे बैठे रहते हैं और चुपके-चुपके हमें खोखला करते हुए मौत के मुँह में धकेल देते हैं पर हम अपनी बुद्धि से समझ ही नहीं पाते कि ऐसा भी कहीं कुछ हो रहा है।

हमें पता न चले, बुद्धि समझ न पावे, यह बात दूसरी है, पर इसमें लक्ष्य तो ज्यों के त्यों रहेंगे। हमें अपना जीवन भार लगता हो, अभावग्रस्त, दरिद्र, असफल दिन गुजारते प्रतीत होते हों या दुर्भाग्य के कारण चित्त खिन्न रहता हो तो रहा करे इससे इस तथ्य में रत्तीभर भी अन्तर नहीं आता है कि हम इस भूलोक-सृष्टि में सर्वोपरि सौभाग्य लाभ कर रहे हैं। जीवन में जो अभाव रहते हैं हम सदा उन्हें ही देखते रहते हैं जो उपलब्धियाँ हैं उन पर कभी विचार ही नहीं करते। कभी किसी दिन यह सोचने लगें कि हमें जो कुछ मिला है वह कितना अनुपम है, कितना महान है कितना अद्भुत है तो हममें से जो अपने को निर्धन, चिन्तित, खिन्न, असफल कहते रहते हैं वे भी अनुभव करें कि वे कितने बड़े सौभाग्यशाली और कैसी अनुपम विभूतियों के अधिपति हैं।

शरीर छूटने पर वस्तुस्थिति का बोध होता है। तब प्रतीत होता है कि चौरासी लाख योनियों से निकल कर करोड़ों वर्ष बाद अलभ्य अवसर मिला था, मनुष्य शरीर पाया था उसे बाल क्रीड़ा में गँवा दिया। अब फिर अन्धकारमय भविष्य सामने है। फिर उन्हीं योनियों में भ्रमण करने के लिए 84 लाख योनियों में लाखों करोड़ों, वर्ष के लिए जाना पड़ेगा। यह अवसर कितना सुन्दर था, कितनी सुविधायें थीं इसमें। दूसरे जीव-जन्तु पशु-पक्षी जिस बोलने-चालने, पढ़ने लिखने, खाने खेलने सोचने समझने की कल्पना भी नहीं कर सकते, जिस आहार-विहार की सुविधा उनके लिए एक असम्भव जैसी वस्तु है वह सभी इस मानव शरीर में प्राप्त थे। दूसरे प्राणियों की तुलना में यह नर जन्म इतना ही ऊँचा था जितना मनुष्यों की तुलना में स्वर्गवासी देवताओं का। इस सुअवसर का सदुपयोग करना न आया, केवल छोटी-छोटी बातों को लेकर रोते झींकते, कुढ़ते-खीजते और काटते रहे। वह न कर सके जो करना चाहिये था, वह न सोच सके जो सोचना चाहिये था। तब पश्चाताप के अतिरिक्त और कुछ हाथ नहीं रहता। अच्छा यही है कि समय रहते चेता जाए और मानव जीवन के उद्देश्य एवं स्वरूप को समझकर उसके सदुपयोग के लिए सावधान हुआ जाए।

इस महत्वपूर्ण समस्या पर सारा ध्यान एकाग्र करने और उसे सुलझाने के लिए वर्ष में एक दिन एक आध्यात्मिक पर्व आता है वह है अपना जन्म दिन। इस त्यौहार को यदि ठीक तरह मनाया जाए तो सोता मनुष्य जाग सकता है, पथ भ्रष्ट अपना सही रास्ता पा सकता है भ्रमग्रस्त वस्तुस्थिति समझ सकता है। इसलिए आवश्यक है कि प्रत्येक श्रेयार्थी अपना जन्म-दिन एक प्रेरणाप्रद वातावरण उत्पन्न करते हुए उत्साहपूर्वक हर वर्ष मनाया करे।

भारतीय धर्म का प्रत्येक पर्व, त्यौहार एक विशेष समस्या की ओर ध्यान आकर्षित करने और उसका हल समझाने के उद्देश्य से बना है। दिवाली अर्थव्यवस्था पर,बसन्त पंचमी विद्या के प्रश्न पर होली स्वच्छता पर, गुरु पूर्णिमा अनुशासन पर, श्रावणी आध्यात्मिक कर्तव्यों पर, दशहरा स्वास्थ्य संवर्धन पर विशेष रूप से ध्यान देने के लिए है। जन्म दिन ही एक त्यौहार है। सच पूछा जाए जो व्यक्तिगत दृष्टि से यह सबसे बड़ा त्यौहार है। अन्य त्यौहारों में सामूहिक रूप से विचार करना होता है और सामाजिक समस्याएं सुलझानी पड़ती हैं किन्तु जन्मदिन व्यक्तिगत समस्याओं पर, विशेषतया जीवनोद्देश्य को समझने और उसके लिए आवश्यक सतर्कता बरतने की प्रेरणा देने के लिए आता है। इसलिए उसका महत्व अन्य सभी त्यौहारों से अधिक है।

सभ्य संसार में सर्वत्र जन्म-दिन मनाए जाने की प्रथा है। हर प्रगतिशील देश के नागरिक अपना जन्मदिन मनाते हैं। उस दिन उसके मित्र शुभ चिन्तक उसे बधाई देने, अपनी शुभ कामना प्रकट करने और उत्साह बढ़ाने आते हैं। अपने-अपने ढंग से मनोरंजन के, जलपान के, गीत वाद्य के कार्यक्रम रखते हैं। अपने भारतवर्ष में यह प्रथा चिरकालीन है। प्रत्येक भारतीय धर्मानुयायी को अपना जन्म-दिन कैसे मनाना चाहिए, इसकी एक सुव्यवस्थित पद्धति निर्धारित है। हवन, देवपूजन, दीपदान, पंच तत्व पूजन, मृत्युंजय जप, आरती आशीर्वाद आदि का धार्मिक विधान निर्धारित है। इसके अतिरिक्त स्वजन सम्बन्धी उसे पुष्प भेंट करने आते हैं। जलपान से आगंतुकों का स्वागत सत्कार किया जाता है। गीत, वाद्य की व्यवस्था रहती है। जीवन समस्या को समझने और उसे उपर्युक्त ढंग से हल करने की प्रेरणाएं और प्रवचन होते हैं। घर की सजावट, नये -वस्त्र, तिलक, चंदन, देव दर्शन आदि की जहाँ जैसी व्यवस्था बन पड़ती है वहाँ वैसा किया जाता है। बहुत दिन पहिले से ही तैयारी की जाती है और स्वजन सम्बन्धियों को उस दिन आग्रहपूर्वक आमन्त्रित किया जाता है। प्रेमीजन भी पहिले से ही उत्सुकतापूर्वक उस दिन की बाट जोहते रहते हैं डायरी में ऐसी तिथियाँ नोट रखते और उस दिन गुलदस्ता पुष्पहार आदि उपहार लेकर पहुँचते हैं। यह जन्म दिन का बाह्य स्वरूप हुआ।

आध्यात्मिक स्वरूप यह है कि जिसका जन्म दिन हो वह एकान्त चिन्तन द्वारा यह विचार करे कि क्या हमने अब तक का जीवन वैसे ही बिताया जैसा कि उसे बिताना चाहिये था? यदि नहीं, तो उस भूल को तुरन्त क्यों न सुधारा जाए? जो सुधार परिवर्तन सम्भव है वह आज से ही क्यों न आरम्भ किया जाए? वे दुर्गुण अपने में कौन-कौन से हैं जो प्रगति में बाधक बन बैठे हैं, उन्हें ढूंढ़ा पहचाना और हटाया जाए। वे सद्गुण कौन-कौन से हैं जो अपने में नहीं हैं, उनका महत्व समझा जाए। और उन्हें स्वभाव में सम्मिलित करने के लिये योजनाबद्ध तैयारी की जाए।

इस प्रकार की विचारणा को दृढ़तापूर्वक हृदयंगम किया जाए, उसके प्रकाश में भावी जीवन की व्यवस्थित रूप रेखा बनाई जाए, इस पर संकल्प पूर्वक मजबूती के साथ चलने का व्रत लिया जाए तो जन्म दिन मनाने का आध्यात्मिक उद्देश्य ठीक तरह पूरा हो सकता है। इस प्रकार की विचारणा आस्था और प्रगति मानव जीवन के सदुपयोग के लिये ठोस आधार उपस्थित कर सकती है, करती रही है। इस लिये इस बात की महत्वपूर्ण आवश्यकता अनुभव की गई कि देश में जन्म दिन मानने की प्रेरणा भरी प्रक्रिया को एक व्यापक आन्दोलन के रूप में गतिशील किया जाए। यह परम्परा यदि चल पड़ी तो उससे व्यक्ति निर्माण के पुण्य प्रयोजन में भारी सहायता एवं सफलता मिलेगी। अतएव युग-निर्माण योजना की प्रथम पंचवर्षीय योजना के प्रथम वर्षीय कार्य-क्रम में जन्म दिन मनाने की प्रेरणा को एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम माना गया है। अब इसे व्यावहारिक रूप देने के लिये हम में से प्रत्येक को तत्परतापूर्वक प्रयत्न करना चाहिये।

अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्य, परिजन इस वर्ष छंटनी योजना के कारण काफी घट गये हैं। पर जो रह गये हैं वे भावनाशील, सक्रिय, विवेकशील और आदर्शवाद में निष्ठा रखने वाले हैं, इसमें सन्देह नहीं। इसलिये देश-व्यापी, विश्वव्यापी परम्परा का प्रचलन करने के लिये अपने उस वर्त्तमान-दस हजार व्यक्तियों के परिवार में कार्य आरम्भ कर देना चाहिये।

यह अंक मिलने पर हर परिजन को अपना जन्म दिन मनाने की तैयारी आरम्भ कर देनी चाहिये। जन्म दिन का पूजा-विधान जन्म दिवसोत्सव और विवाह दिवसोत्सव संस्कार पुस्तिका में और उसका विवेचन व्याख्यान जन्म दिवसोत्सव इस तरह मनायें पुस्तिका में है। पहली का मूल्य 40 पैसा और दूसरी का 20 पैसा है। जिसके पास यह पुस्तिकायें न हों वे 60 पैसा मूल्य और 15 पैसा पोस्टेज कुल 75 पैसे भेज कर उन्हें मथुरा से मँगा सकते हैं। इस आधार पर अपना जन्म दिन मनाने की तैयारी हर परिजन को आरम्भ कर देनी चाहिये।

इस प्रक्रिया को आरम्भ करने के लिये संगठित रूप से कार्य किया जाए तो अधिक सुविधा रहेगी और अधिक सफलता मिलेगी। अखण्ड-ज्योति के सदस्य मिला कर एक छोटी समिति कार्य के लिये संगठित कर सकते हैं। या-दो व्यक्ति ही आगे बढ़ कर स्थानीय व्यवस्था जमाने के लिये प्रयत्नशील हो सकते हैं। अपने यहाँ जितने भी अखण्ड-ज्योति के सदस्य हैं उन सब के पास जाकर उनकी जन्म तिथियाँ नोट कर लेनी चाहिएं। उस दिन उन्हें क्या करना है, यह विस्तारपूर्वक समझा देना चाहिये परिवार के सभी सदस्यों को उसमें उपस्थित होने की सूचना दे देनी चाहिये। निजी मित्र, कुटुम्बियों को आमन्त्रित एवं सूचित करने का कार्य संबद्ध व्यक्ति को स्वयं ही करना चाहिये। आयोजन का समय ऐसा रखा जाए जो सभी के लिए सुविधा का हो। ऐसा समय तो प्रातःकाल हो सकता है या फिर रात्रि को। उस समय सभी आगंतुक पुष्प उपहार ले कर उपस्थिति हों और निर्धारित, धार्मिक कर्मकाण्ड , हवन, देव पूजन, दीप दान, पंचतत्व का पूजन, आशीर्वाद सम्पन्न हो, और गीत वाद्य एवं छोटे प्रवचनों का आयोजन हो। उत्सव का स्थान आकर्षक ढंग से सजाया जाए। हवन में पति-पत्नी दो ही आहुति दें और शेष उपस्थित व्यक्ति केवल पूर्णाहुति में ही एक आहुति डालें तो हवन का खर्च कम हो सकता है। तब एक रुपया में भी हवन आयोजन हो सकता है। सभी आगन्तुक आहुति दें इसकी कोई आवश्यकता नहीं। उपहार में लोग केवल पुष्प ही लावें। मिठाई आदि कीमती भेटें लाने की प्रथा नहीं चलाई जानी चाहिये। इससे सबको बदला चुकाने में असुविधा होगी। उसी प्रकार आगन्तुकों के स्वागत में गर्मी में शरबत ओर जाड़े में औषधियों की चाय जैसी कोई सस्ती चीज ही रहे। मिठाई, नमकीन, फल आदि खर्चीली चीजें साधन-सम्पन्न तो जुटा सकते हैं पर गरीबों को असुविधा होगी। इसलिये प्रचलन ऐसा होना चाहिये जो हर स्थिति के व्यक्ति के लिये समान रूप से सुविधाजनक हो। जिस व्यक्ति का जन्म दिन है यदि अपने जीवन में कोई नया सद्गुण ग्रहण करने या कोई दुर्गुण छोड़ने की स्थिति में हो तो उसे अपने निश्चय की सूचना उस अवसर पर एक घोषणा के रूप में देनी चाहिये। जिसका उपस्थित लोगों द्वारा हर्षोल्लास के रूप में स्वागत-समर्थन किया जाए। स्थानीय सुविधा के अनुसार मनोरंजन की कई और बातें इस प्रक्रिया में सम्मिलित करके उसे आकर्षक बनाया जा सकता है।

यह प्रचलन अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्यों में आरम्भ किया जा रहा है पर आगे चल कर इसका जन-जन में प्रचार होगा। यह प्रेरणा हर व्यक्ति का आत्म-निर्माण करके समाज निर्माण की महती आवश्यकता पूरी करने में आश्चर्यजनक रूप से सहायक होगी। इसलिये प्रचलन को अग्रगामी बनाने में हमें पूरे उत्साह से काम करना चाहिये।


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शिविर सम्बन्धी आवश्यक सूचनायें

जून में होने वाले 15 दिवसीय शिक्षण शिविर में सम्मिलित होने वाले परिजनों की संख्या आशा से बहुत अधिक हो गई है। गायत्री तपोभूमि में जितने व्यक्तियों के ठहर सकने की व्यवस्था है उससे यह संख्या लगभग दूनी हो चली है।

ऐसी दशा में आने वाले को मना करके निराश करने की अपेक्षा यह उचित समझा गया है कि 7-7 दिन के दो शिविर करके दोनों में आधे-आधे शिक्षार्थियों को आने दिया जाए। अस्तु, अब पहला शिविर 9 से 15 जून तक होगा। 16 को विश्राम रखा जाएगा ताकि आने वाले एक दिन पहले आकर ठीक तरह ठहर सकें। 17 से दूसरा शिविर आरम्भ होगा जो 23 तक चलेगा। इस प्रकार अब 14 दिन की अपेक्षा यह शृंखला 15 दिन चलेगी।

जिन्हें यहाँ से तारीख 13 अप्रैल तक स्वीकृतियाँ भेजी गई हैं, उन सब शिविरार्थियों को 8 जून की शाम तक प्रथम शिविर में सम्मिलित होने के लिये आ जाना चाहिये। जिन्हें 14 अप्रैल के बाद यहाँ से स्वीकृति-पत्र भेजे गये हैं वे 16 जून को शाम तक आ जाएँ। ताकि अगले दिन प्रातः से ही प्रशिक्षण आरम्भ हो सके।

एक वर्षीय, तीन वर्षीय प्रशिक्षण के शिक्षार्थियों तथा वानप्रस्थों को जिन्हें विद्यालय में सम्मिलित होना है, उन्हें दूसरे शिविर में ता॰ 16 जून को आना चाहिये ताकि वे एक शिविर में भी रह लें और इसके तुरन्त बाद अपनी शिक्षा चालू कर दें।

शिविर में सम्मिलित रहने वालों के लिये यद्यपि होटल पद्धति की कुछ भोजन व्यवस्था भी की गई है। पर वह थोड़ी महंगी पड़ेगी और भोजन भी इच्छानुसार न मिलेगा। इसलिये अपना भोजन अपने आप बनाने वाली बात अधिक अच्छी है। जो लोग वैसा प्रबन्ध कर सकें वे अपने साथ भोजन पकाने और खाने के बर्तन आदि भी साथ लेते आवें।

पहले जब 14 दिन का शिविर था तब तीन तीर्थ-यात्रा के लिये बीच में छुट्टी भी कर दी गई थी। अब नई व्यवस्था में वैसा न हो सकेगा । 7 दिन का थोड़ा-सा समय तो शिक्षण में लगना ही चाहिए। इसलिये जिन्हें तीर्थ-यात्रा करनी है वे शिविर समाप्त होने के बाद वृन्दावन, गोकुल, गोवर्द्धन आदि जा सकते हैं।

शिविर से लेकर तीनों प्रशिक्षणों तक में से किसी भी प्रशिक्षण में सम्मिलित होने वालों को अपना भोजन आदि का व्यय स्वयं ही वहन करना होगा। यह बात भली प्रकार ध्यान में रख कर ही आना चाहिये। इसलिये आवश्यक खर्च की व्यवस्था घर से करके ही आना चाहिये।


नीलकण्ठ विष पियो


नीलकण्ठ विष पियो (Kavita)

घट-घट ने रस नहीं, द्वेष-विष की धारा ढुलकाई,

आज सुधा की नहीं, धरा पर बाढ़ गरल की आई।

देवों का दल दुबक रहा दनुजों की मति चकराई,

इसे तुम्हारे सिवा कौन पी सकता है विष-पायी।

सुधा सुरों का पेय सुरा असुरों ने पीना सीखा,

मानव तेरे बाँट पड़ा है यही हलाहल तीखा।

अधर फिरायें विष-धारा तो कायरता ही होगी,

तुम्हीं हुये यदि मीत, पिये विष किसमें क्षमता होगी।

मुकर गये तो फिर अंकित होगा कालिख का टीका,

मर्त्यलोक के महामहिम का होगा गौरव फीका।

अमिय सुरा मत माँग मनुज, यह तेरा पेय नहीं है,

यह औरों का भाग इसे पीने में श्रेय नहीं है।

इनकी ओर निहार ललकना दुर्बलता है भारी,

नीलकण्ठ विष पियो विश्व का आज तुम्हारी बारी।

इसे तुम्हारे सिवा पान कर कौन पचा सकता है?

विष प्लावन से आज धरा को कौन बचा सकता है।

उठता हुआ उफान शान्त हो, हे अगस्त्य, विष सोखो,

एक बूँद रह जाए न भू पर इस प्लावन को रोको।

तोड़ो सपनों की समाधि अब जागो कर्मठ योगी,

पियो पियो यह विश्व हलाहल मधु वितरो उद्योगी।

-श्री लाखनसिंह भदौरिया “शैलेन्द्र”