मनुष्यों और उनके स्वयम्भू नेताओं की भूलों तथा त्रुटियों के कारण संसार में जो भेदभाव, विरोध, मनोमालिन्य, संघर्ष का वातावरण उत्पन्न हुआ वह अब अपनी चरम-सीमा पर पहुँच चुका है और विनाश के प्रलयकालीन मेघों की भाँति पृथ्वी पर फटने ही वाला है। इस भीषण-भविष्य का कुछ परिचय जुलाई की अखण्ड-ज्योति में दिया गया था। इस प्रलयकाण्ड के लिये सूक्ष्म जगत् की शक्तियों में कैसा परिवर्तन हो रहा है और लोगों को गलत रास्ते से लौटाने के लिये महाकाल का डमरू क्या सन्देश सुना रहा है इस पर अक्टूबर के अंक में भरपूर प्रकाश डाला गया है।
अब इस अंक में हम पाठकों को यह दिग्दर्शन कराना चाहते हैं कि इस दैवी दण्ड के पश्चात् महाकाल द्वारा संसार का कूड़ा-कर्कट बुहार कर फेंक देने के उपरान्त नव-युग का निर्माण किस रूप में होगा? आपस की फूट और अहंकार जनित झूठे भेदभावों को बढ़ाने की सजा पाकर मनुष्य क्या शिक्षा ग्रहण करेंगे और उसके आधार पर किस प्रकार ‘विश्व-धर्म’, ‘विश्व-राज्य’, ‘विश्व-समाज’, ‘विश्व-भाषा’, ‘विश्व-न्यायालय’ आदि का निर्माण और स्थापना होगी।
इस अंक के लेखों को पढ़ कर पाठकों को मालूम होगा कि किस प्रकार पिछले कितने ही वर्षों से महापुरुष लोक कल्याणार्थ इन बातों की शिक्षा दे रहे हैं और अब वह अवसर ठीक सिर पर आ जाने से उन उपदेशों को कार्यरूप में परिणत करने के लिए कैसी-कैसी तैयारियाँ हो रही हैं। प्रतिदिन होने वाली घटनाओं और अन्य लक्षणों से अब युग-परिवर्तन में कुछ भी देर नहीं जान पड़ती। इसलिये प्रत्येक प्रबुद्ध व्यक्ति का धर्म है कि वह तुरन्त ही उद्यत और सन्नद्ध होकर इस दैवी-आदेश के पालन में अपनी शक्ति, साधन और सेवाओं को समर्पित कर दें।
-सत्यभक्त
युग-परिवर्तन का विषय बड़ा महत्वपूर्ण और साथ ही विवादग्रस्त भी है। हमारे ज्यादातर प्राचीन विचार के भाई तो इसको सुनकर ही चौंक पड़ते हैं। उनके मस्तिष्क में लाखों वर्ष के सतयुग और कलियुग के सिद्धान्त ने ऐसी जड़ जमा रखी है कि इस बात पर विश्वास ही नहीं होता कि, युग इतना शीघ्र बदल सकता है।
भारतीय पुराणों की मान्यता के अनुसार कालचक्र चार युगों में बँटा है- सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग। दूसरे धर्मों में भी इससे कुछ मिलता जुलता विभाजन देखने में आता है, जैसे ईसाइयों के ग्रन्थों में ‘गोल्डन एज’ (सुवर्ण-युग), ‘सिलवरएज’ (रौप्य-युग), ‘कौपरएज’ (ताम्र-युग), ‘आयरनएज’ (लौह-युग) का नाम मिलता है। जैनियों में ‘सुखमा’- ‘सुखुमा-दुखमा’- ‘दुखमा-सुखुमा’- ‘दुखमा’ आदि कालों का वर्णन मिलता है।
इन चार युगों में से कौन अच्छा है और कौन बुरा इसकी चर्चा साधारण जनता में प्रायः सुनने में आया करती है, पर जब हम इस पर गम्भीरता से विचार करते हैं तो उसमें कोई सार नहीं दिखलाई पड़ता। पहले से ही किसी काल-विभाग को खराब मान लेना और यह भावना बना लेना कि इस समय में तो पाप-कर्मों की वृद्धि होगी ही, न तो कोई तर्क संगत बात है और न इसमें किसी प्रकार की बुद्धिमानी ही कही जा सकती है। जिस प्रकार भाग्यवाद या तकदीर के सिद्धान्त ने भारतवासियों को आलसी और निरुद्योगी बना दिया है उसी प्रकार कलियुग के सिद्धान्त ने उनको तरह-तरह की हानिकारक रूढ़ियों में फंसने में सहायता पहुँचाई है। इस कलियुग सम्बन्धी भ्रामक धारणा के कारण पिछले वर्षों में समाज-सेवकों को बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा है। जब लोगों को किसी हानिकारक रूढ़ि को त्यागने या समयानुकूल किसी नई प्रथा को अपनाने के लिये कहा गया तो यही उत्तर मिला- “यह तो कलियुग है।” स्त्री शिक्षा, पर्दा प्रथा, अल्पायु में विवाह, वृद्ध विवाह, जाति प्रथा, दहेज प्रथा आदि किसी भी दोष दुर्गुण को त्यागने का परामर्श दिया गया तो कलियुग का बहाना प्रस्तुत कर दिया गया।
युग का आरम्भिक स्वरूप :-
पर इस जगह हम अपने पाठकों को यह अच्छी तरह बतला देना चाहते हैं कि चारों युगों की लाखों वर्षों की धारणा थोड़े ही समय की है और इसका विस्तार पौराणिक कथावाचकों ने ही किया है। अन्यथा वेद में ये शब्द तीन- तीन महीनों के अन्तर से एक वर्ष के भीतर होने वाले चार यज्ञों के लिये प्रयुक्त किये गये थे -
कृतयादि नव दर्श। त्रेतायै कल्पिनं।
द्वापरायाधि कल्पिनं। आसकन्दाय सभास्थाणुम्।
(यजुर्वेद 30 । 18)
इस प्रकार वैदिक-काल में कृत, त्रेता, द्वापर, आस्कन्द ये तीन-तीन महीनों पर होने वाले स्तोमों (यागों) के नाम थे। वेद की संहिता में चौथे स्तोम का नाम ‘आस्कन्द’ दिया गया है, पर कुछ समय बाद जब संहिता की व्याख्या के लिये ब्राह्मण ग्रन्थ बनाये गये, तो ‘आस्कन्द’ की जगह कलि, का नाम प्रयुक्त किया गया, जैसे-
कृताय सभावि नं। त्रेतायदि न वदर्शं।
द्वापरावहिः सदा। कलये सभा स्थाणुम।
(तै॰ ब्रह्मण 3-41)
वेद हिन्दू-धर्म के ही नहीं वरन् समस्त संसार के आदि ग्रन्थ माने जाते हैं। प्रायः सभी विदेशी विद्वानों तथा ऐतिहासिक खोज करने वालों ने उनको ‘संसार के पुस्तकालय की प्रथम पुस्तक’ कह कर सम्मानित किया है। इनसे पुराना मानव-समाज के निर्माण पर प्रकाश डालने वाला कोई अन्य स्रोत नहीं है। ब्राह्मण ग्रन्थ, आरण्यक, उपनिषद्, दर्शन, स्मृति, पुराण, महाकाव्य सब उनसे बाद में रचे गये हैं और उन सब का मूल किसी न किसी रूप में वेदों में ही है। यही कारण है कि हमने युग- विभाग का मूलस्वरूप वेदों में ही खोजने का उपक्रम किया और फलस्वरूप मालूम हुआ कि उस युग में जो यज्ञ योग हुआ करते थे उन्हीं के समय और अवधि को नियत करने के लिये कृत, त्रेता, द्वापर, कलियुग आदि काल सूचक शब्दों का प्रचलन हुआ था। फिर धीरे-धीरे विभिन्न विद्वानों द्वारा ये विभिन्न अर्थों में प्रयुक्त किये जाते रहे और ‘ऐतरेय ब्राह्मण’ में इनकी व्यक्ति और समाज की उन्नत और अवनत दशाओं के लिये भी व्यवहार में लाने लगे जैसे-
कलिःशयानो भवति संजिहानस्तु द्वापरः।
उत्तिष्टन्त्रेता भवति कृतं सम्पद्यते चरन्॥
अर्थात्- “जब व्यक्ति या समाज सुषुप्ति की अवस्था में रहता है तब कलियुग होता है। जब वह जम्हाई लेता है अर्थात् कुछ चैतन्य हो जाता है तब द्वापर होता है। जब उठ कर बैठ जाता है अर्थात् कार्य के लिये उद्यत हो जाता है तब त्रेता होता है और जब खड़ा होकर चलना आरम्भ कर देता है अर्थात् अपने कर्त्तव्य में पूर्णतः संलग्न हो जाता है तब उसे (कृतयुग या सतयुग) समझना चाहिये।”
शासन के प्रभाव से युग का आगमन :-
आगे चलकर चार युग का सिद्धान्त कुछ अधिक फैल गया और लोग उनके गुण, अवगुणों पर विचार भी करने लगे, पर फिर भी महाभारत के समय तक वर्तमान धारणा का कहीं पता नहीं था। उस समय विचारशील व्यक्ति यह नहीं मानते थे कि सतयुग, कलियुग आदि का समय बिल्कुल निश्चित कर दिया गया है और वह इतने लाख वर्ष तक अवश्य ही बने रहेंगे। इसके बजाय महाराज युधिष्ठिर के प्रश्न करने पर भीष्म पितामह ने स्पष्ट शब्दों में यह कहा है कि, सतयुग, कलियुग आदि का आधार राजा (शासक) द्वारा भला या बुरा शासन किया जाना ही है।
वे कहते हैं -
कालो वा कारणं राज्ञो राजा वा काला कारणम्।
इति ते संशयो मा भूद् राजा कालस्य कारणम्।79।
राजा कृतयुग स्रष्टा त्रेताया द्वापरस्य च।
युगस्य च चतुर्थस्य राजा भवति कारणम्।97।
कृतस्य करणाद् राजा स्वर्गमत्यन्तमश्नुते।
त्रेतायः करणाद् राजा स्वर्ग नात्यन्तमश्नुते।99।
प्रवर्तनाद् द्वापरस्य यथाभागमुपाश्नुते।
कलेः प्रवर्तनाद् राजा पापमत्यन्तमश्नुते।100।
(शान्ति पर्व, 69 वाँ अध्याय)
अर्थात् “हे युधिष्ठिर! काल राजा का कारण है अथवा राजा काल का, ऐसा संशय तुम्हें नहीं होना चाहिये। यह निश्चित है कि राजा ही काल का कारण होता है। राजा ही सतयुग की सृष्टि करने वाला होता है और राजा ही त्रेता, द्वापर तथा चौथे युग कलि की भी सृष्टि का कारण होता है। सतयुग की सृष्टि करने से राजा को अक्षय स्वर्ग की प्राप्ति होती है। त्रेता की सृष्टि करने से राजा को स्वर्ग तो मिलता है, परन्तु वह अक्षय नहीं होता। द्वापर का प्रसार करने पर वह अपने पुण्य के अनुसार कुछ काल तक स्वर्ग का सुख भोगता है, परन्तु कलियुग की सृष्टि करने से राजा को अत्यन्त पाप का भागी होना पड़ता है।
यहाँ पर लाखों वर्ष के पाप पूर्ण कलियुग की बात न कह कर यही सिद्धान्त प्रतिपादित किया गया है कि ‘यथा राजा तथा प्रजा।’ भीष्म पितामह के मतानुसार यदि शासक श्रेष्ठ, सदाचारी, न्यायी, सत्य प्रेमी हो और जनता को भी वैसा आचरण करने की प्रेरणा करे, तो इस पृथ्वी पर सतयुग की स्थिति लाकर लोगों को स्वर्ग सुख का अनुभव करा सकता है। इसके उदाहरण स्वरूप पिछले दो हजार वर्षों के भीतर ही होने वाले महाराज विक्रमादित्य, राजा भोज और महाराज हर्ष आदि का उल्लेख किया जा सकता है जिनके राज्य में कोई मूर्ख, दुष्कर्म करने वाला भूखा-नंगा न था और प्रजा अत्यन्त सुखपूर्वक रहकर धर्म का पालन करती थी। सर्वसाधारण के विचारानुसार ये राजा कलियुग के भीतर ही हुये थे, पर उनके सतयुगीन शासन की कथाएँ आज भी सब लोगों की जबान पर हैं। साथ ही पिछले सौ-पचास वर्षों में ही हम ऐसे राजाओं को भी देख चुके हैं जिनके राज्य में प्रजा का धन, मान, शील कुछ भी सुरक्षित न था और जिन्होंने अपने पापपूर्ण शासन के कारण जनता की स्थिति नरक तुल्य बना दी थी।
भगवान कृष्ण का युग सम्बन्धी मन्तव्यः -
महाभारत में ही एक अन्य स्थान पर भगवान् कृष्ण ने चारों युगों को सामयिक परिस्थितियों द्वारा उत्पन्न बतलाया है। जब वे पाण्डवों और कौरवों में संधि कराने के उद्देश्य से हस्तिनापुर गये थे तो उन्होंने कर्ण को युद्ध के लिये बहुत उत्सुक देखकर चेतावनी दी थी।
यदा द्रक्षसि संग्रामे श्वेताश्वं कृष्ण सारथिम्।
ऐन्द्रमस्त्रं विकुवणाबुभे चाप्याग्नि मारुते॥6॥
गाँडीवस्य च निर्घोषं विस्फूर्जितिंमिवाशनेः ॥
न तदा भविता त्रेता न कृते द्वापरे न च॥7॥
यदा द्रक्षसि संग्रामे कुन्तिपुत्र युधिष्ठिरम्।
जप होम समायुक्तं स्वाँ रक्षन्तं महाचमूम्॥8॥
आदित्यमिव दुधर्षम् तपन्तं शत्रुवाहिनीम्।
न तदा भविता त्रेता न कृतं द्वापरं न च॥ 9॥
(उद्योग पर्व अ॰ 142)
अर्थात्- “जब तुम संग्राम में श्वेत घोड़ों के सारथी कृष्ण को आग बगूले की तरह चारों तरफ दिखाई देते और गाँडीव धनुष की टंकार से वज्राघात करने वाले अर्जुन को देखोगे, तब न तो त्रेता रहेगा न कृतयुग और न द्वापर, जब जप होम आदि द्वारा सुर्य की तरह प्रचण्ड प्रताप का कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर को संग्राम में शत्रु सेना को संतप्त करते-करते और अपनी विशाल सेना की रक्षा करते देखोगे, तब न तो त्रेता रहेगा, न कृतयुग और न द्वापर।”
भगवान कृष्ण का आशय यही है कि यदि दुर्योधन के पक्ष वाले दुराग्रह के वशीभूत होकर पाण्डवों को युद्ध करने के लिये बाध्य कर देंगे तो फिर कृत, त्रेता और द्वापर के बजाय कलियुग (अर्थात् कलह) दिखाई पड़ने लगेगा। यहाँ पर उन्होंने स्पष्टतः सतयुग, त्रेता आदि युगवाची शब्दों को तत्कालीन परिस्थिति के लिये प्रयुक्त किया है।
मनुष्यों के कर्मानुसार युग-
इस सब का साराँश यह है कि प्राचीन मनीषियों ने युगों को कोई पूर्व निर्धारित और अटल विभाजन न मान कर मनुष्यों के कर्मानुसार ही उनका आना और जाना अथवा परिवर्तन होना बतलाया। उनका मुख्य उपदेश यही है कि मनुष्य जैसा कर्म करेंगे। वैसे ही युग में उनको अपना जीवन व्यतीत करना पड़ेगा। यदि हम आम बोयेंगे तो आम खायेंगे और बबूल बोयेंगे तो काँटों से अंगों का छिदाना पड़ेगा। परमात्मा की तरफ से मनुष्य को इतनी बुद्धि और स्वतन्त्रता दी गई है कि वह इनमें से चाहे जैसी बात चुन लें।
युगों के विभाजन की तुलना हम वर्ण व्यवस्था से कर सकते हैं। समाज का निर्माण करने वाले, विधान बनाने वाले मनीषियों ने समाज-संचालन की आवश्यकता और मनुष्यों की प्रकृति का निरीक्षण करके चार वर्ण बना दिये और मनुष्यों को यह सुविधा दे दी कि वे अपनी रुचि और योग्यता के अनुसार किसी भी वर्ण के कर्त्तव्य का पालन कर सकते हैं। वे चाहें तो वेदाध्ययन और तप-त्यागमय जीवन अपनाकर ब्राह्मण बन सकते हैं, लड़ाकू प्रकृति होने पर क्षत्रिय धर्म अपना सकते हैं, वाणिज्य और कृषि में रुचि रहने पर वैश्य बन सकते हैं, अपनी मोटी बुद्धि होने और दिमागी काम की शक्ति न होने पर सेवावृत्ति को पसन्द कर सकते हैं। अधिकाँश मनुष्य जिस वर्ण के अनुकूल कार्यों को अधिक मात्रा में अपनायेंगे उसी वर्ण की प्रधानता का समाज बन जायेगा।
लगभग यही बात युगों के विषय में है। विद्वानों और विचारकों ने समय, परिस्थिति और समाज तथा व्यक्तियों के विकास का अनुमान लगा कर काल का एक मोटा विभाजन कर दिया कि यदि मनुष्य ऐसे आचरण अधिक अपनायेंगे। कलियुग आयेगा और इससे विपरीत हो तो सतयुग अथवा त्रेता में पहुँच जायेंगे। इस सम्बन्ध में किसी प्रकार का सन्देह न रहे दूसरे शास्त्रकारों ने बहुत स्पष्ट रूप से कह दिया है-
तपः परं कृतयुगे, त्रेतायाँ ज्ञानमुच्यते।
द्वापरे यज्ञमित्याहुः, दानमेकं कलौयुगे।
अर्थात्- “सतयुग में तप की प्रधानता होती है। त्रेता ज्ञान प्रधान तथा द्वापर यज्ञ प्रधान होता है और कलियुग में केवल दान का ही महत्व शेष रह जाता है।” इससे हमको यह तात्पर्य समझना चाहिये कि हम जैसा शुभ या अशुभ कर्म करेंगे वैसा ही युग उपस्थित हो जायेगा। यही कारण है कि एक ही समय में विभिन्न देशों की स्थिति में पृथ्वी आकाश का सा अन्तर दिखाई पड़ता है। एक देश के निवासी लौकिक और पारलौकिक दृष्टि से दिन पर दिन उन्नति की चोटी पर चढ़ते नजर आते हैं जब कि उसी के मुकाबले में दूसरे देश के निवासियों की स्थिति दिन पर दिन गिरती नजर आती है और वे पतन के गर्त में पहुँच जाते हैं। इस वैषम्य पर विचार करते हुए एक लेखक ने ‘वेदान्त सूत्र’ के आधार पर यह प्रतिपादित किया था कि विभिन्न देशों और राष्ट्रों की अवस्था में यह वैषम्य आकस्मिक अथवा मनमाने ढंग से नहीं होता वरन् यह भी सृष्टि का एक नियम है इस सम्बन्ध में भगवान् व्यास ने चतुर्थ प्रपाठक में अपना मन्तव्य इस प्रकार प्रकट किया है-
द्विधड़ऽसुमन्तः क्रमर्द्धीतर बीजाभ्याम्॥ 10 ॥
भाष्य-द्विधेतिः असुमन्तः प्राणिनः क्रमर्द्धी तर बीजाभ्यो क्रमोन्नति क्रमावनत्योः शक्ति विशेषाभ्याम्।
तत्रयस्य बाहुल्यं भोगभूमौ द्वितीयस्य कर्म भूमौ द्रव्टव्यम्। अत्राच मनुजेषु ये क्रमर्द्धिषीं जिनस्तेषाँ प्रागुन्नतिर नुमीयताँ वियति विहंगानाम वोर्ध्वागामिनाम्।
अर्थात्- मनुष्यों की सृष्टि दो प्रकार की होती है। एक ‘क्रमोन्नति’ वाली और दूसरी ‘क्रमावनति’ वाली, प्रथम प्रकार की क्रम से उन्नति करने वाली प्रजा ‘भोग-भूमि’ (जैसे यूरोप, अमरीका आदि) में पाई जाती है और दूसरी प्रजा ‘कर्म भूमि’ (जैसे भारतवर्ष) में मिलती है। क्रमोन्नति बीज वालों की पहले अवनति और पीछे क्रमशः उन्नति होती जाती है। क्रमावनति बीज वालों की पहले उन्नति और पीछे क्रमशः अवनति होती है। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि जिन भारतवासियों की अभी अवनति हो रही है उनकी पहले उन्नति हुई थी और जिन विदेशियों की इस समय उन्नति दिखलाई पड़ रही है वे पहले अवनति की दशा में थे। इसका दृष्टान्त इस प्रकार है कि जैसे पक्षी आकाश में उड़ रहे हों तो उनमें से जो पक्षी क्रमशः ऊपर की ओर चढ़ रहा है उनकी उन्नति और जो नीचे उतर रहा हो उसकी अवनति का अनुमान करना चाहिये।
तद्वतार्युगानि व्यस्तैक क्रमाभ्याम्॥11।
भाष्य- तद्वतोरिति न द्वतो क्रमर्द्धी तरबीजतोर्व्यस्तैक क्रमाभ्याँ व्युत्क्रमानुक्रमाभ्याँ युगानि सत्यत्रेता बीजिनाँ कल्यादि सत्यान्ताति क्रमादनति बीजिनाँ तु सत्यादि कल्पन्तानि युगनिवर्त्तन्ते।
अर्थात्- उन दोनों (क्रमोन्नति तथा क्रमावनति बीज वालों) के युग व्युत्क्रम और अनुक्रम दो प्रकार के होते हैं। क्रमावनति वालों के सत्य, त्रेता, द्वापर तथा कलि- ये चार युग क्रमशः होते हैं। इसके विपरीत क्रमोन्नति वालों का प्रथम कलियुग होता है फिर क्रम से उन्नति की वृद्धि होते-होते सतयुग की सी उत्तम अवस्था आ जाती है। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि पहले भारत में सतयुग की अवस्था थी, जिसका क्रमशः त्रेता, द्वापर, कलियुग के रूप में ह्रास होता गया है। क्रमोन्नति वालों ने आरम्भ में (कलि में) जो थोड़ी उन्नति आरम्भ की वह आगामी युगों में क्रमशः बढ़ती हुई इस समय चरम सीमा पर पहुँच गई। अब उसके पुनः गिरने के लक्षण स्पष्ट हो रहे हैं। इससे अनुमान लगाना भी असंगत नहीं कि अब कर्मभूमि भारत में कलियुग समाप्त होकर पुनः सतयुग की दशा आने वाली है।
इस विवेचन से विदित होता है कि सतयुग और कलियुग ऐसी स्थिति में नहीं है जो अनिवार्य रूप से दस-बीस लाख वर्षों तक बनी रहे। वरन् वे मानव-समाज की उन्नत और अवनत दशाओं की ही सूचक हैं। यदि किसी देश में ऐसी आत्माओं का आविर्भाव हो जाता है जो अपने त्याग-तपस्या, परामर्श-भावना के बल पर समाज को सत्कर्मों की तरफ प्रेरित कर सकें तो वहाँ कलि की दशा के स्थान में सतयुग की दशा दिखाई पड़ना सर्वथा सम्भव है।
एक युग के भीतर दूसरे की अन्तर दशा :-
युग-परिवर्तन के विषय में एक मत यह भी है कि युगों का परिणाम तो पुराणों के लेखानुसार लाखों वर्ष का अवश्य है, पर प्रत्येक युग के भीतर अन्य युग की अन्तर और प्रत्यन्तर दशाएँ आती रहती हैं। मनीषियों का कथन है कि प्रत्येक युग में अन्य युगों का वर्तते रहना प्रकृति का नियम है। सतयुग में भी कलियुग वर्ता था और उस समय के चक्रवर्ती शासक हिरनाकुश ने धर्म और ईश्वर-निष्ठा को नष्ट करने की बड़ी कोशिश की थी। इसी प्रकार कलियुग के बीच में अब सतयुग भी बरतेगा। सृष्टि की दशा अब ऐसी हो गई है कि बिना सतयुग के आये वह ज्यादा दिन स्थिर नहीं रह सकतीं। इस समय मनुष्यों की शक्तियाँ ऐसी होती जा रही हैं कि यदि युग न बदले तो मानव जाति सौ, दो सौ वर्ष में ही नष्ट हो सकती है। पर ऐसा होना परमात्मा को इष्ट नहीं। इसलिये दैवी शक्ति युग-परिवर्तन का टेका (आधार) लगा कर इसकी रक्षा करेगी।
इस प्रकार एक युग में दूसरे युगों की दशा का वर्णन शास्त्रों और पुराणों में स्थान-स्थान पर मिलता है। महाभारत के आदि पर्व में कौरव-पाण्डवों की उत्पत्ति का वर्णन दुष्ट क्षत्रियों का संहार कर दिया तो उनकी स्त्रियाँ पुत्र की अभिलाषा से ब्राह्मणों की शरण में गई। इस प्रकार क्षत्रिय वंश की रक्षा होकर धीरे-धीरे उनकी उन्नति होती चली गई और राज्य व्यवस्था पुनः उनके हाथ में आ गई पर वे लोग धर्म-मार्ग पर चलने वाले थे- उनके सम्बन्ध में आदि पर्व अ॰ 64 में लिखा है-
प्रशासति पुनः क्षत्रे धर्मेणेमाँ वसुन्धराम्।
ब्राह्माद्यास्ततो वर्णा लेभिरे मुद्मुत्तमाम्। 24।
अर्थात्- “जब पुनः क्षत्रिय शासक-धर्मपूर्वक इस पृथ्वी का पालन करने लगे तब ब्राह्मण आदि वर्णों को बड़ी प्रसन्नता हुई।”
एवं कृतयुगे सम्यग् वर्तमाने तदानृप।
आपूर्यंत मही कृत्स्ना प्राणिभिर्बहुभिभृशम्॥26॥
अर्थात्- “इस तरह उस समय सब ओर ‘सतयुग‘ छा रहा था। सारी पृथ्वी नाना प्रकार के प्राणियों से खूब भरी-पूरी रहती थी । “
इसी प्रकार जब दुर्योधन का जन्म हुआ तो उसको कलियुग का आविर्भाव माना गया-
कलेरंशस्तु संजज्ञे भुवि दुर्योधन नृपः।
दुर्बुद्धिर्दुर्मतिश्चैव कुरुणामयशस्करः ॥
जगता यस्तु सर्वस्य विद्विष्टः कलिपूरुषः ।
यः सर्वां घातयामासं पृथिवीं पृथिवीपते॥
(आदि ॰ 67, 87, 88)
अर्थात्- “खोटी बुद्धि और दूषित विचार वाले कुरु-कुल- कलंक राजा दुर्योधन के रूप में इस पृथ्वी पर कलियुग का अंश ही प्रकट हुआ था। वह कलि स्वरूप पुरुष सब का द्वेष पात्र था। उसने सारी पृथ्वी के वीरों को लड़वा कर मरवा दिया।”
बृहस्पति का भ्रमण-काल और युगारम्भ :-
उपर्युक्त विवेचन से पाठकों को यह प्रतीत हो गया होगा कि युगों का परिवर्तन वैसा दीर्घकालीन और जटिल नहीं है जैसी कि सर्वसाधारण में धारणा बन गई है। युगों का परिवर्तन अवश्य होता है और लोगों के लिये उन्नति तथा अवनति, खुशहाली और तंगहाली, ज्ञान और अज्ञान के दौर समय-समय पर आया करते हैं। पर इन चारों युगों का परिणाम बारह हजार वर्षों का ही होता है जैसा कि महाभारत, भागवत और विभिन्न पुराणों में बतलाया गया है -
चत्वार्याहुः सहस्राणि वर्षाणाँ तत् कृतं युगम्।
तस्य तावच्छती संध्या संध्याँशश्च तथाविधः॥
त्रीणि वर्ष सहस्राणि त्रेतायुग महोच्यते।
तस्य तावच्छती संध्या संध्याँशश्च ततः परम्॥
तथा वर्ष सहस्त्रे द्वापरे परिमाणतः।
तस्यापि द्विशती संध्या संध्याँशश्च तथा विधः।
सहस्त्रमेकं वर्षाणाँ ततः कलियुग स्मृतम्।
तस्य वर्ष शतं संधि-संध्याँशश्च ततः परम्।
संधि संध्याँशयोस्तुल्यं प्रमाण मुपधारय॥
(वन पर्व 188-22 से 26)
अर्थात्- ‘चार हजार वर्षों का एक सतयुग बताया गया है। उतने ही सौ वर्ष उसकी संध्या और संध्याँश के होते हैं (अर्थात् सतयुग कुल मिलाकर 4000+400+400=4800 वर्ष का होता है। त्रेता तीन हजार वर्षों का होता है और उसकी संध्या तथा संध्याँश तीन तीन सौ वर्ष के होते हैं। इस प्रकार सब मिला कर 3000+300+300=3600 वर्ष का होता है।
द्वापर का मान दो हजार वर्ष का और उसकी संध्या और संध्याँश दो-दो सौ वर्ष की होती है। इस प्रकार यह 2400 वर्ष का होता है। कलियुग एक हजार वर्ष का कहा जाता है और संध्या तथा संध्याँश मिला कर वह बारह सौ वर्ष का हो जाता है।
सतयुग के सब से बड़े ऋषि और वर्तमान मन्वन्तर के आदि पुरुष भगवान् मनु ने भी अपनी स्मृति में यही सिद्धान्त प्रतिपादित किया है-
चत्वार्याहुः सहस्राणि वर्षाणान्तु कृतं युगम्।
तस्य तावद्घृती संध्या संध्याशश्च तथा विधः।
इतरेषु स सन्ध्याँशेषु च त्रिषु।
एक पादे न बर्तन्ते सहस्राणि शतानि च ॥
यदेतत् परिसंख्यातमादावेव चतुर्युगम।
एतद् द्वादश साहस्त्रं देवानाँ युगमुच्यते॥
(अ॰ 1-69 से 71)
अर्थात्- “चार हजार वर्षों का सतयुग कहा है। उसका संध्या तथा संध्याँश भी इसी हिसाब से घटते जाते हैं। अर्थात् त्रेता 3600 वर्ष का, द्वापर 2400 का और कलियुग 1200 का होता है। इन चारों युगों की संख्या मिलकर 12 हजार होती। यह देवताओं के एक युग के समान का होता है।
गणित ज्योतिष द्वारा इस विषय में खोज करने वालों ने इस परिवर्तन का सम्बन्ध बृहस्पति के भ्रमण-काल से बतलाया है। उनका कथन है कि जिस प्रकार पृथ्वी अपनी कक्षा पर सूर्य की एक परिक्रमा 365 दिन में लगाती है उसी प्रकार बृहस्पति को सूर्य की एक परिक्रमा लगाने में 12 वर्ष लगते हैं। इस बीच में वह बारहों राशियों को पार कर लेता है और जब जिस राशि में होता है उसी के गुणों के अनुसार उसकी प्रकाश तरंगें पृथ्वी पर प्रभाव डालती हैं। जिस समय वह सूर्य और चन्द्र के साथ कर्क राशि के मूल नक्षत्रान्त में राशि, कला और अंश के हिसाब से एक हो जाता है, तब कृतयुग आरम्भ होने का समय माना जाता है। यह बात ‘महाभारत’ में युग-दर्शन के साथ ही बतला दी गई है-
ततस्तुमुल संघाते वर्तमाने युग क्षये।
यदाचन्द्रश्च सूर्यश्च तथा तिष्यबृहस्पति।
एकराशौ समेष्यन्ति प्रयत्स्यति तदाकृतम्॥
काल वर्षीन पर्जन्यो नक्षत्राणि शुभानिच॥
प्रदक्षिण ग्रहाणाँच भविष्यन्त्यनुलोमगा।
क्षेमं सुभिक्षमारोग्यं भविष्यति निराँमयम्॥
(वनपर्व 160-88-92)
अर्थात्- “युग-परिवर्तन के अवसर पर बड़े संघर्ष और हलचल की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। जब सूर्य, चन्द्रमा और बृहस्पति एक साथ पुष्प नक्षत्र एवं तदनुरूप एक राशि कर्क में पदार्पण करेंगे तब सत्ययुग का प्रारम्भ होगा। उस समय मेघ समय पर वर्षा करेगा, नक्षत्र शुभ एवं तेजस्वी हो जायेंगे। ग्रह प्रदक्षिणा भाव से अनुकूल गति का आश्रय ले अपने पथ पर अग्रसर होंगे, उस समय सब का मंगल होगा, देश में सुकाल आ जायगा, रोग व्याधि का चिन्ह भी न रहेगा।”
बृहस्पति यद्यपि प्रति बारहवें वर्ष सूर्य, चन्द्र के साथ एक राशि पर आ जाता है, पर इन तीनों के एक साथ पुष्प नक्षत्र में समान अंशों में आने की घटना एक हजार चक्रों (12 हजार वर्षों) के बाद पुनः आती है। उस समय बृहस्पति से आने वाली ज्ञान-विज्ञान की प्रेरक तरंगों की तीव्रता बढ़ जाती है और उसके फलस्वरूप मानव-समाज अपनी अवस्था का सुधार करके वेग पूर्वक प्रगति करने में लग जाता है।
ज्योतिषियों के मतानुसार उपर्युक्त योग सम्वत् 2000 में आ चुका है और उसी समय कलि के 1200 वर्ष समाप्त होकर सत्ययुग की संख्या लग चुकी है, जो उपर्युक्त सिद्धान्त के अनुसार चार सौ वर्ष की होगी। यद्यपि हीन मनोवृत्ति के लोगों को इसका अनुभव नहीं होता और वे कलियुग के ही गीत गाते रहते हैं। पर जिन लोगों की आँखें खुली हुई हैं वे प्रत्यक्ष देख रहे हैं कि इस समय संसार में जो अभूतपूर्व हलचल मची है और सदैव महाभयंकर संग्राम तथा संसार के नाश की सम्भावना समाने खड़ी जान पड़ती है, वह एक मात्र युग-परिवर्तन का ही लक्षण है।
हम आपको यही बतलाना चाहते हैं कि युग परिवर्तन प्रकृति का एक स्वाभाविक नियम है, उसमें जादू या रहस्य जैसी कोई बात नहीं है। जिस प्रकार जाड़े के पीछे गर्मी और उसके बाद बरसात स्वभावतः आ जाती है उसी प्रकार समाज की दशा बहुत दूषित हो जाने पर उसके सुधार का चक्र घूमने लगता है और संघर्ष तथा नाश के अन्य साधनों द्वारा उन दोषों का निराकरण होकर नवीन सुव्यवस्था का आविर्भाव होने लग जाता है। इस परिवर्तन का कुछ नियम भी प्राचीन मनीषियों ने ज्ञात कर लिये थे और उन्हीं के आधार पर चार युगों का सिद्धान्त स्थापित किया है। पर इसका यह आशय कदापि नहीं कि हम पाप कर्मों को अनिवार्य समझ लें और अपनी त्रुटियों या दूषित प्रवृत्तियों के लिये कलियुग को जिम्मेदार ठहरायें। वरन् युग सिद्धान्त का लाभ यह है कि हम समाज की गति-विधि की तरफ से सतर्क रहें और काल प्रभाव से उसमें जो दोष प्रवेश कर उनको दूर करने में प्रयत्न शील रहें।
इसमें सन्देह नहीं कि वर्तमान में कुछ वर्ष संसार के इतिहास में बहुत अधिक महत्व के हैं। कुछ समय से हम दुनिया में पुरानी संस्थाओं, प्रथाओं और परम्पराओं के विरुद्ध जो भावना तीव्र वेग के साथ फैलती देख रहे हैं वह अब चरम-सीमा पर पहुँचने वाली हैं। चीन जैसे देशों में तो इस संघर्ष ने भयंकर तम रूप धारण कर लिया है। और भी अनेक देशों से प्रतिदिन रक्त रंजित क्राँति के समाचार आते ही रहते हैं। परिस्थिति को देखने से यही निश्चय होता है कि अब बहुत शीघ्र यह नाश-लीला दुनिया के एक बड़े भाग को तहस-नहस कर देगी और पुराने युग के शेष कूड़े -कर्कट को बहा कर नये युग की स्थापना कर दी जायेगी।
मनुष्य का ज्ञान बहुत परिमित है, उसे बहुत थोड़ी दूर की चीजें दिखाई देती हैं। वह अपने आस-पास जो कुछ देखता है, उसी को सत्य और सब कुछ समझता है। वह ख्याल करता है कि दुनिया इस समय हमको जैसी दिखलाई पड़ रही है वह हमेशा से वैसी ही है और आगे चल कर भी वैसी ही बनी रहेगी। यह बात केवल अशिक्षित या देहाती कहे जाने वाले लोगों की नहीं है, वरन् ज्यादातर पढ़े-लिखे, स्कूल, कालेजों की दो-चार परीक्षायें पास किये लोग भी इसी तरह के होते है। वे भी परिवर्तन-तत्व से अनजान होते हैं और इस कारण प्रचलित नियमों और रीति-रिवाजों में ऐसे लिपटे रहते हैं कि उनको छोड़ने या बदलने की बात सुनकर एकदम चौंक पड़ते हैं और जीवन से उसका विरोध करने लगते हैं। इस समय संसार ऐसे ही मनुष्यों से भरा पड़ा है। योरोप और अमेरिका के निवासी वैसे भारतवासी और एशिया के अन्य देशों के रहने वालों की अपेक्षा भौतिक साधनों में बहुत बढ़े-चढ़े हैं और ठाठ-बाठ और फैशन की जिन्दगी गुजारते हैं, पर वहाँ भी कुछ इने-गिने लोगों को छोड़ कर ज्यादातर लोग मानव-समाज के परिवर्तन के सम्बन्ध में अनजान ही देखने में आते हैं।
परिवर्तन अनिवार्य है :-
पर हम जानते हैं कि परिवर्तन संसार का अटल नियम है और कोई समय ऐसा नहीं होता जबकि वह अपना काम न करता रहता हो। यह सही है कि कभी उसकी गति बहुत धीमी रहती है और सामान्य जनता उसे अनुभव नहीं करती और कभी वह ऐसी सरपट चाल से दौड़ने लगता है कि घोर निद्रा में पड़े हुए भी घबड़ा कर उठ बैठते हैं। अंग्रेजी राज्य के आरम्भ से लगभग सौ साल तक यहाँ के निवासी प्रायः बिना किसी प्रकार की हलचल की अवस्था में पड़े रहे, जिससे उनकी यही धारणा बन गई कि अब दुनिया सदा इसी चाल से चलती रहेगी और हम तथा हमारी संतानें चैन के साथ खाने-कमाने में लगे रह कर जिन्दगी पूरी कर सकेंगे। पर परिवर्तन की शक्तियाँ अपना काम कर रही थीं और सन् 1994 में एक ऐसा धमाका हुआ कि जिसने स्थिति को एकदम बदल दिया। इस भयंकर धक्के के फलस्वरूप जो साम्राज्य सैकड़ों वर्षों से अटल-अचल समझे जाते थे उनकी जड़ हिल गई और कितने ही ऊँचे सिंहासन तथा रत्नजटित मुकुट धरती पर लुढ़कते हुये दिखाई पड़ने लगे। जर्मनी के कैसर और रूस के जार, जो सर्वशक्तिमान समझे जाते थे और जिनका आतंक दूर-दूर तक व्याप्त था, रास्ते के भिखारी की तरह हाथ पकड़ कर एक कोने में बैठा दिये गये।
द्वितीय महायुद्ध ने तो ‘जिसके राज्य में कभी सूरज अस्त नहीं होता था’ ऐसे ब्रिटिश साम्राज्य को खोखला बना दिया और उसे लाचार होकर भारतवर्ष और अन्य कितने ही देशों को स्वतन्त्र कर देना पड़ा। इसी परिवर्तन की लहर ने हिटलर जैसी नाचीज-हस्ती को संसार का सबसे प्रबल व्यक्ति बना दिया, जिसके सम्मुख एक बार समस्त संसार थर्रा गया और जो सभी प्रमुख देशों की सम्मिलित शक्ति को दबा कर कुछ समय के लिये समस्त योरोप का कर्ता-धर्ता बन गया। यह परिवर्तन का ही चमत्कार है कि जो चीन चालीस-पचास वर्ष पहले ‘अफीमची’ के नाम से दुरदुराया जाता था और पच्चीस वर्ष पहले जो जापानियों के सामने पदावनत हो रहा था आज सारे संसार को चुनौती दे रहा है और हर एक देश से लड़ने को तैयार हो रहा है। कुछ ही महीने पहले पच्चीस लाख की आबादी के- भारतवर्ष के एक जिले के बराबर वाले- इसराइल देश ने, जिसकी नींव रखे 20 वर्ष भी नहीं हुये- मिश्र, ईराक, सीरिया, अल्जीरिया जैसे 10 करोड़ की आबादी वाले देशों को चार-पाँच दिन के भीतर चारों खाने चित्त पछाड़ दिया, यह भी नये युग के आगमन का एक आश्चर्यजनक चिन्ह ही समझा जायगा।
बीसवीं शताब्दी की विशेषता :-
पर यदि गम्भीर रूप से विचार किया जाय तो इसमें आश्चर्य की कोई बात भी नहीं है। इतिहास और भावी परिवर्तनों के जानकारों की दृष्टि में बीसवीं शताब्दी में दुनिया की कायापलट होने का समय ही है। इसके आरंभिक काल से ही शिक्षा, धर्म, विज्ञान, राजनीति समाज आदि सभी क्षेत्रों में क्रान्तिकारी परिवर्तन हो रहे हैं। इस शताब्दी में हवाई जहाज, रेडियो, टेलीविजन आदि के आविष्कार हुये जिनसे संसार की दशा में बहुत अन्तर पड़ गया । इसी सदी में स्त्रियों की समानता का आन्दोलन उठा जिसने सामाजिक दशा में एक नया मोड़ ला दिया। इसी सदी में मजदूर आन्दोलन ने जोर पकड़ा और रूस की श्रमजीवी राज्य-क्रान्ति हुई जिसने राजनैतिक क्षेत्र में एक नये युग का श्रीगणेश कर दिया।
यह आने वाला नया संसार कैसा होगा इसके सम्बन्ध में अब तक सैकड़ों विद्वान मस्तिष्क लड़ा चुके हैं। हरएक उसे अपने विचारों के मुताबिक रूप देता है। उनमें से थोड़ी-थोड़ी बातें सभी की सच होंगी, पर एक बात निश्चित है कि आगामी युग अध्यात्म-प्रधान होगा। वर्तमान समय में सैकड़ों प्रकार की नई-नई उन्नतियाँ होने पर भी एक बड़ी कमी आध्यात्मिक भावना का अभाव है। यद्यपि लोगों ने अणु को वश में कर लिया और चन्द्रमा तक जा पहुँचे, पर अन्य मनुष्यों को अपनी ही तरह एक आत्मा से युक्त-परमात्मा का एक अंश समझने की भावना पैदा नहीं हुई। इसी कमी के फल से विद्या, ज्ञान, विज्ञान की समस्त प्रगति के होने पर भी उसका उपयोग नाश, स्वार्थपरता के लिये हो रहा है, जिससे यह जगत सुखी बनने की बजाय उल्टा आपत्तियों का आगार बनता जाता है। यह सब दुष्परिणाम भौतिकवाद, स्वार्थवाद की अधिकता का ही है। यदि मनुष्य अपने लाभ के साथ दूसरों के कल्याण की भी अभिलाषा रखता, तो आज संसार की दशा स्वर्ग से भी बढ़ कर सुखद शाँतिदायक होने से कुछ भी सन्देह न था।
नये युग का धर्म -अध्यात्म-
जो लोग अध्यात्म का अर्थ केवल पूजा पाठ, कथा वार्ता, उपवास-व्रत, तीर्थयात्रा, कर्मकाण्ड आदि को समझते हैं वे गलती पर हैं। ये बातें अध्यात्म-भावना उत्पन्न करने में सहायक हो सकती हैं, पर इनको स्वयं अध्यात्म नहीं कहा जा सकता। अध्यात्म तो तभी समझा जा सकता है जब मनुष्य में ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ की मनोवृत्ति उत्पन्न हो जाय और वह तदनुसार व्यवहार करने लगे। अध्यात्म को जानने और मानने वाला व्यक्ति कभी स्वार्थवादी नहीं हो सकता। वह प्रत्येक स्थिति में दूसरे व्यक्तियों और समाज के हित, कल्याण, सुख-सुविधा का ख्याल रखेगा, क्योंकि उसे अपने में और दूसरे व्यक्तियों में कुछ अन्तर ज्ञात नहीं होता। ऐसे लोगों की जिस समाज या देश में बहुतायत होगी वह कभी दुःखी या अधःपतित नहीं हो सकता, चाहे उसके साधन अधिक हों या अल्प। सुख-दुःख, शान्ति-अशान्ति, सहयोग फूट आदि बातों का आधार सामग्री की बहुतायत अथवा कमी नहीं वरन् अध्यात्म-भावना की न्यूनाधिकता ही है। उदाहरण के लिये योरोप, अमेरिका के प्रगतिशील देशों की स्थिति सामने है। वे लोग विद्या, कला, विज्ञान तथा धन में बहुत आगे बढ़े हुये हैं, वहाँ के गरीब और मजदूर कहलाने वाले भी अन्य देशों के मध्यवर्गीय लोगों की तरह रहते हैं, पर तो भी सबसे अधिक अशान्ति, संघर्ष, आपाधापी वहीं पर देखने में आती है। वे ही नाश के एक से बढ़ कर एक साधन और यंत्र तैयार करके मानव-सभ्यता के नाश होने का खतरा पैदा कर रहे हैं। वे ही जातीय द्वेष और वर्ग-संघर्ष को बढ़ाकर अशान्ति की वृद्धि के कारण बने हुये हैं।
सतयुग का सच्चा स्वरूप :-
हम लोग सदा ‘सतयुग‘, ‘कलियुग‘ आदि का नाम किया करते हैं, पुण्यकर्मों में सतयुग का और पाप रूप कार्यों में कलियुग का आरोपण किया करते हैं। यह ठीक है पर सतयुग का वास्तविक रूप यही है कि उस समय मनुष्यों में अध्यात्म भावना की प्रधानता रहती है और इसलिये मनुष्य एक दूसरे के साथ सद्व्यवहार ही करते हैं। जहाँ मनुष्यों के पारस्परिक सम्बन्ध सत्य, न्याय, सहानुभूति, उदारता पर आधारित होंगे वहाँ चाहे साधन-सामग्री की कमी भी हो तो भी दुःख, क्लेश, आधि-व्याधि का अस्तित्व नहीं रह सकता। ऐसी सतयुग की स्थिति का वर्णन ‘महाभारत’ (वन पर्व अ॰ 149) में हनुमान और भीम के संवाद में मिलता है। उसमें कहा गया है-
कृते नाम युगे तात यत्र धर्मः सनातनः।
कृतमेव न कर्तव्यं तस्मिन् काले युगोत्तमे॥
“कृतयुग में सनातन धर्म की पूर्ण स्थिति रहती है। उसका नाम कृतयुग इसीलिये पड़ा कि उस उत्तम युग के लोग अपना सब कर्त्तव्य कर्म स्वयं सम्पन्न कर लेते हैं।”
न विग्रहः कुतस्तन्द्री न द्वेषो न च पैशुनम्।
न भये नापि संतापो न चेर्ष्या न च मत्सरः॥
“कहीं लड़ाई-झगड़ा नहीं होता, कोई आलसी भी नहीं रहता द्वेष, चुगली, भय, संताप, ईर्ष्या और मत्सर आदि दोष भी दिखाई नहीं पड़ते।”
न साम ऋग्यजुर्वर्णां क्रिया नासीच्च मानवी।
अभिध्याय फलं तत्र धर्म संन्यास एव च॥
“उस समय साम, ऋक्, यजुः आदि का पृथक-पृथक विभाग नहीं होता अर्थात् सब लोगों के ज्ञान में एक समानता रहती है, मनुष्य एक मत होकर कार्य करते हैं, एक सा विचार रखते हैं और सब एक दूसरे के लिये स्वार्थ त्याग करते रहते हैं।
न तस्मिन् युगसंसर्गे व्याधयो नेन्द्रियक्षयः।
नासूया नापि रुदितं न दर्पो नापि वैकृतम्॥
“इसलिये उस युग में न तो किसी प्रकार की बीमारी होती है, न इन्द्रियों में क्षीणता आने पाती है। न कोई किसी का दोष-दर्शन करता था, न कोई रोता रहता था, न किसी में घमंड था और न कोई अन्य प्रकार का विकार पाया जाता था।”
यह समाज की उसी स्थिति का चित्र है जब लोग अपनी और संसार की वास्तविकता को अनुभव करके पारस्परिक भेदभाव को त्याग दे और पूर्णरूप से सहयोग तथा आत्मीयता की भावना रख कर अपने कर्तव्य कर्मों का पालन करें। उस समय लोगों के ज्ञान, कर्म, व्यवहार में ऐसा कोई अन्तर नहीं होता जिससे पारस्परिक मतभेद और विरोध की उत्पत्ति हो। आज धर्म का इतना होहल्ला हो जाने पर और धार्मिक ग्रन्थों का पहाड़ खड़ा हो जाने पर भी लोगों में घृणा, द्वेष और शत्रुता की भरमार देखने में आती है, पर सतयुग में एक भी धर्म ग्रन्थ न होने पर और न धर्म के नाम पर किसी प्रकार की बाहरी धूमधाम, प्रदर्शन होने, पर सब लोग उसके मूल तत्वों को समझने वाले और तदनुसार आचरण करने वाले होंगे, जिससे मानव-समाज निरन्तर प्रगति ही करता जायगा और उसमें अकारण विरोध, प्रतिस्पर्धा, शत्रुता की भावना का नाम भी सुनने में न आयेगा। ‘महाभारत’ में ही एक अन्य स्थान (शाँति पर्व 169) भीष्मपितामह ने राजा या समाज के नेताओं की रीति-नीति और न्याय व्यवस्था को ही समाज के सुधार और सतयुगीन होने का मुख्य आधार बतलाया है। जब देश की सामान्य जनता अपने प्रमुख व्यक्तियों से प्रेरणा ग्रहण करके सद्मार्ग पर चलती है, सदाचरण का पूरा-पूरा ध्यान रखती है तो संसार में से स्वयं ही पापों का लोप होकर सर्वत्र सत्य और न्याय का साम्राज्य दृष्टिगोचर होने लगता है-
ततः कृतयुगे धर्मो नाधर्मो विद्यते क्वचित।
सर्वेषामेव वर्णानाँ नाधर्मे रमते मनः॥
“उस सतयुग में धर्म ही रहता है, अधर्म का कहीं चिन्ह भी दिखाई नहीं देता तथा किसी भी वर्ण की अधर्म में रुचि नहीं रहती।”
योगक्षेमाः प्रवर्तन्ते प्रजानाँ नात्र संशयः।
वैदिकानि च सर्वांणि भवन्त्यपि गुणान्युतः॥
“उस समय प्रजा के योगक्षेम स्वतः सिद्ध होते रहते हैं, तथा सर्वत्र वेदानुकूल गुणों का विस्तार हो जाता है, इसमें सन्देह नहीं।”
व्याधयो न भवन्त्यत्र नाल्पयुर्द्दश्यते नरः।
विधवा न भवन्त्यत्र कृपाणो न तु जायते॥
“जगत में उस समय रोग नहीं होते, कोई भी मनुष्य अल्पायु नहीं होता, स्त्रियाँ विधवा नहीं होती तथा कोई भी मनुष्य दीन दुःखी नहीं होता है।”
अकृष्टपच्या पृथिवी भवन्त्योषधयस्तथा।
त्वक्पत्रफलमुलानि वीर्यवन्ति भवन्ति च॥
“पृथ्वी पर बिना जोते-बोये ही खाद्य पदार्थ तथा अन्य वनस्पतियाँ उत्पन्न होती हैं, उनकी छाल, पत्ते, फल और मूल सभी शक्तिशाली होते हैं।”
संसार में बीच-बीच में सतयुग की अवस्था आने और उस समय आदर्श मानव-समाज का दृश्य दिखाई पड़ने का वर्णन प्राचीन धर्मग्रन्थों में ही नहीं मिलता वरन् वर्तमान समय में ही छोटे बड़े सभी धर्म-प्रचारक और अध्यात्म ज्ञाता वर्तमान स्थिति को शीघ्र ही किसी आदर्श युग के आगमन का चिन्ह मान रहे हैं। उन लोगों ने इस सम्बन्ध में अनेक ग्रन्थों की रचना की है जिनमें मानव मात्र को विरोध, शत्रुता अथवा पार्थक्य की मनोवृत्ति त्याग कर एक पिता के पुत्रों-एक माता से उत्पन्न भाइयों की तरह रहने तथा व्यवहार करने का उपदेश दिया है। बंगाल की ‘अरुणाचल मिशन’ नामक संस्था की स्थापना करने वाले ठाकुर दयानन्द ने अपने एक उपदेश में कहा था-
“आगामी युग में यह पृथ्वी मानवों की नहीं ईश्वर की होगी। इसे ईश्वर का उत्तराधिकार समझ कर ही रखना होगा। सारी दुनिया एक पूर्ण वस्तु की तरह सारे मानव-समाज को दे दी गई है। प्रत्येक व्यक्ति पिता के घर में उसकी सम्पूर्ण जागीर (विश्व) का सम्मिलित उत्तराधिकारी और जिम्मेदार है। इस तरह का विश्व की सम्पत्ति को एक वर्ग दूसरे लोगों को वंचित रख कर, नहीं हड़प सकता । तब इस तरह एक मनुष्य द्वारा दूसरे मनुष्य का, एक जाति द्वारा दूसरी जाति का, एक देश द्वारा दूसरे देश का शोषण नहीं होगा। पिता ने जो दिया है उसका प्रत्येक व्यक्ति को यथार्थ आवश्यकतानुसार वितरण हो जाना चाहिये।
“संसार के सभी देश, संसार के सभी लोग एक संघ में संगठित हो जायेंगे। प्रत्येक देश उस संघ का समान और स्वतन्त्र इकाई (यूनिट) होगा। प्रत्येक इकाई स्वतन्त्र व्यक्तियों का संघ होगा जो समान अधिकार, स्वतन्त्रता और सुविधाओं का उपभोग करेंगे तथा जिनमें किसी प्रकार का कोई विभेद नहीं होगा।
“इकाई-संघ (यूनिट यूनियन) का प्रधान उत्तरदायित्व प्रत्येक व्यक्ति की आवश्यकता की पूर्ति करना होगा। प्रत्येक व्यक्ति चाहे वह पुरुष हो या स्त्री, इकाई-संघ से अपने जीवन की आवश्यक चीजें, अपने अधिकार से ही प्राप्त कर सकता है। इसके बदले इकाई संघ प्रत्येक व्यक्ति से उसके द्वारा की जा सकने वाली उच्चतम सेवा प्राप्त करेगा।”
इसी प्रकार ‘बहाई’ समाज के संस्थापक महात्मा बहा और उनके उत्तराधिकारियों ने पिछले सौ वर्षों में लगातार यह प्रयत्न किया है कि पृथ्वी के सब निवासी पारस्परिक मतभेदों और लड़ाई-झगड़े के कारणों को त्याग कर एक विश्व-समाज, विश्व-राज्य की स्थापना करें और उसके अनुशासन में सब अत्यन्त प्रेमपूर्वक रहने लगें। इन उपदेशों का साराँश ‘सतयुग‘ (मासिक -पत्र) के एक लेख में इस प्रकार दिया गया था-
“संसार में इस समय जो भयंकर परिवर्तन, अव्यवस्था दिखाई पड़ रही है, उससे चिन्तित नहीं होना चाहिये। संसार इस समय एक पुराने युग को छोड़ कर नये युग में प्रवेश कर रहा है, इसलिये ऐसी क्राँति होना अनिवार्य ही है। क्रान्ति और अव्यवस्था युग-परिवर्तन की निशानी होती है। जब एक युग मृत्यु के मुख में विलीन होने लगता है और नया युग कर्मक्षेत्र में प्रवेश करता है तो दोनों में तुमुल संघर्ष होना स्वाभाविक ही है। शोगी एफेराडी लिखता है-
“प्राचीन काल में जितने भी धर्म प्रवर्तक हो गये हैं, उन्होंने समय-समय पर एक ही दिव्य-ज्योति का प्रकाश प्रसारित किया है। उन सभी ने उस महान् दिवस के आगमन के मार्ग को प्रशस्त बनाया है, जिस दिन यह संसार पवित्र हो जायगा और मानवता अपना फल प्राप्त करेगी।
“बहाई संस्था का सिद्धान्त ईश्वर और उसके विभिन्न पैगम्बरों- प्रचारकों में एकता स्थापित करना है। इसके अनुसार मनुष्य का कर्त्तव्य है कि बिना किसी बन्धन के सत्य की खोज करे, सब प्रकार के अन्ध-विश्वासों और दुराग्रह से दूर रहे और यह विश्वास रखे कि धर्म का वास्तविक उद्देश्य सब मनुष्यों में एकता और प्रेम के भाव की वृद्धि और उसका एक मात्र लक्ष्य एक शान्तिपूर्ण, नियमबद्ध और उन्नतिशील समाज की स्थापना होनी चाहिये। यह पुरुष और स्त्री दोनों के लिये समान अवसर, समान अधिकार और समान सुविधाओं का प्रतिपादन करता है। यह अनिवार्य शिक्षा का समर्थन करता है, अमीरी और गरीबी के अत्यधिक अन्तर को मिटाना चाहता है, सेवा की भावना से किये गये काम की महिमा को सबसे अधिक मानता है और उसी को ईश्वर की सच्ची पूजा समझता है यह संसार भर में स्थायी रूप से शान्ति स्थापित करने की आवश्यकता स्वीकार करता है।”
महात्मा बहा के उपदेशों में किसी खास मजहब के प्रति पक्षपात की कोई झलक नहीं होती थी और उन्होंने सदैव उन्हीं बातों की प्रेरणा दी जिनका समावेश मानव-धर्म में होता है। इसी का प्रभाव है कि आज से पचास वर्ष पूर्व भी उनका प्रचार अमरीका जैसे दूरवर्ती स्थान में हो गया था। उस समय भी हमने उनके जिन सिद्धान्तों को पढ़ा था और एक लेख के रूप में ‘ललिता’ मासिक पत्रिका (सन् 1918) में प्रकाशित कराया था, उसकी बातें भारतीय धर्म के ‘आत्मवत् सर्वभूतेषू’ सिद्धान्त पर ही आधारित है। उनका साराँश यहाँ दिया जाता है-
हे संसार के मनुष्यों। ईश्वरीय धर्म, प्रेम और एकता के लिये है। उसे फूट और कलह का कारण मत बनाओ।
हे संसार के मनुष्यों। एकता का झण्डा खड़ा कर दिया गया है। एक दूसरे को विदेशीपन की आँखों से मत देखो।
हे ईश्वर के पुत्रों। प्रथम उपदेश यह है कि तुम एक भले, स्वच्छ, प्रकाशयुक्त हृदय के अधिकारी बनो।
हे मनुष्य के पुत्र। मैंने तुझे प्रकाश के पेड़ से पवित्रतम फल लेने की आज्ञा दी है। तू उसका तिरस्कार करके तुच्छ वस्तुओं से सन्तुष्ट क्यों होता है।
सब का मूल ईश्वरीय ज्ञान है। इसी को प्राप्त करना प्रशंसनीय है।
ये उपदेश महात्मा बहा ने संसार में शान्ति, प्रेम, भ्रातृभाव की स्थापना हो, इसी भावना से दिये थे और इसके लिये सब प्रकार के कष्ट सहन करके अपनी सच्चाई का उदाहरण भी उपस्थित किया था। इस प्रकार के धार्मिक स्वातंत्र्य और निष्पक्ष विचारों के कारण उनके अनुयाइयों पर भी अकथनीय अत्याचार हुये और ईरान में ही बीस-तीस हजार व्यक्तियों को क्रूरतापूर्वक मार डाला गया। इसी का परिणाम है कि ईरान के तत्कालीन शासकों का वंशोच्छेद हो गया और बहाई धर्म सब लोगों की दृष्टि में सत्य, न्याय, समता का प्रचारक और सम्माननीय बन गया।
संसार का उद्धार योगी करेंगे :-
आधुनिक समय में भारतवर्ष में जो योग-सिद्ध पुरुष राजनीति और संसार की गतिविधियों के पूर्ण जानकार हुये हैं उनमें श्री अरविन्द का स्थान सर्वोच्च है। प्राचीन और अर्वाचीन दोनों प्रकार के ज्ञान का उनमें अपूर्व समन्वय हुआ था। विदेशों में उच्च से उच्च शिक्षा प्राप्त करके वे भारतीय अध्यात्म की ओर आकर्षित हुये और इस सम्बन्ध में इतना काम कर गये कि उनका देहावसान हो जाने के बाद भी लोग उनके उपदेशों से प्रेरणा लेकर योग और अध्यात्म के पथ पर अग्रसर हो रहे हैं। नीचे दिये गये उद्धरण में उन्होंने जहाँ ‘योगी’ शब्द का प्रयोग किया है, उसका आशय अध्यात्म-तत्व के अनुसार जीवन यापन करने वाले व्यक्ति से ही है। श्री अरविन्द ने, जिनको कुछ अंशों में दिव्य दृष्टि भी प्राप्त थी, अध्यात्म को ही दुनिया मुख्य धर्म और कर्त्तव्य कर्म बतलाया है। उनके एक लेख में जिसका शीर्षक था ‘संसार का उद्धार योगी करेंगे’ और जो जुलाई 1941 में ‘सतयुग‘ में प्रकाशित हुआ था, उन्होंने कहा था -
“इस समय भारत का सबसे बड़ा काम यही है कि वह पूर्ण-योगी मनुष्यों को पैदा करे। इस समय संसार का भविष्य उन्हीं पूर्ण योगियों पर निर्भर है। भविष्य में भारत को जिस विपुल विराट कर्म का भार अपने ऊपर लेकर खड़ा होना पड़ेगा उसकी सूचना स्वरूप सारे संसार में एक विचित्र विकास का होना आरम्भ हो गया है। आगामी तीस-चालीस वर्ष के भीतर संसार में एक विचित्र, पवित्र परिवर्तन होगा, सारी बातों में ही उलट फेर हो जायगा। उसके बाद जो नवीन जगत तैयार होगा उसमें भारत की सभ्यता ही संसार की सभ्यता होगी। भावी भारत का काम केवल अपने ही लिये नहीं है वरन् समग्र संसार के लिये है। अतएव अब भारत को उन्हीं पूर्ण योगी मनुष्यों की तैयारी में लगाना चाहिये जो इतने गुरुतर भार को सम्भाल सकने में समर्थ हों। योगियों के लिये सब कुछ सम्भव है। शिक्षा, समाज, राजनीति, शिल्प और वाणिज्य आदि सभी क्षेत्रों में योगियों की अपूर्व प्रतिभा एक विचित्र सृष्टि तैयार कर सकती है, यह निश्चय है। इस समय योगियों द्वारा ही संसार में एक नवीन परिवर्तन भगवान् करना चाहते हैं। पूर्ण योगी पुरुषों द्वारा जो कर्म तैयार होगा वही भावी जगत का सच्चा आधार होगा। बुद्धिजीवी या हृदयजीवी मनुष्य, चाहे वे कितने ही बड़े नेता अथवा कार्यकर्ता क्यों नहीं इस कार्य का भार नहीं सम्भाल सकेंगे। पूर्ण योगियों को पैदा किये बिना कभी भी कार्य पूर्ण नहीं हो सकता। आज उसी की साधना भी चल रहा है।
विश्व की संचालन शक्ति -
महर्षि रमण का आध्यात्मिक क्षेत्र में बहुत ऊँचा स्थान था। देश और विदेशों के जिज्ञासु उनके ऊँचे अरुणाचल पर्वत के छोटे से आश्रम में पहुँच कर आत्मोन्नति के सम्बन्ध में मार्ग दर्शन ग्रहण किया करते थे। महर्षि कभी साँसारिक बातों की तरफ ध्यान नहीं देते थे और ऐसा प्रसंग छेड़े जाने पर भी वर्तमान घटनाओं पर भली या बुरी सम्मति नहीं प्रकट करते थे। जब ‘पाल ब्रंटन’ नामक प्रसिद्ध अंग्रेज अध्यात्मवादी लेखक ने साहस करके उनसे प्रश्न किया कि “क्या महर्षि कृपा करके संसार के भविष्य के सम्बन्ध में अपने विचार प्रकट करेंगे, क्योंकि हम लोग बड़े संकट पूर्ण समय में होकर गुजर रहे हैं” तो उन्होंने कहा-
“तुम भविष्य की चिन्ता क्यों करते हो? तुमको तो वर्तमान समय का हाल भी ठीक तरह मालूम नहीं है। तुम वर्तमान समय को सम्भालो भविष्य अपने आप ही ठीक बन जायगा।”
यह उत्तर पाल ब्रंटन के लिये एक फटकार की तरह था। पर वह विदेशी अखबारों का ‘संवाददाता’ सहज में चुप होने वाला नहीं था। उसने कुछ घुमाकर फिर पूछा- “क्या संसार में पारस्परिक मित्रता और सहयोग का युग शीघ्र आरम्भ होगा? अथवा वर्तमान दुनिया आपस में लड़-झगड़ कर अंधकार के गर्त में जा गिरेगी?”
महर्षि को ऐसा प्रश्न पसन्द नहीं आया, तो भी उन्होंने कहा- “इस संसार पर एक महान् शक्ति शासन करती है और यह उसका काम है कि वह उसकी देखभाल करे। वह, जिसने कि इस संसार को जीवन प्रदान किया है, इस बात को अच्छी तरह जानता है कि इसे किस तरह पालना चाहिये। इस संसार का भार उसी के ऊपर है, तुम्हारे ऊपर नहीं।”
पाल ब्रंटन फिर भी हठ करता रहा और उसने कहा कि संसार की दशा इस समय जैसी कठिन होती जा रही है, उससे यह प्रकट नहीं होता कि वह विश्व-संचालक इस संसार के हित का कुछ विशेष ध्यान रखता है। पर महर्षि ने इसके सिवा कुछ नहीं कहा कि “जैसे तुम हो वैसा ही संसार भी है। अगर तुम अपने को नहीं समझ सकते तो संसार को समझने से क्या लाभ हो सकता है?” उनका आशय यही था कि जब संसार के मनुष्य स्वार्थ-साधन में ही संलग्न है और लाखों उपदेश सुनकर भी सत्य-मार्ग पर नहीं आते तो विश्व -संचालक शक्ति कर्मों का यथोचित फल देकर ही उनको सही रास्ते पर लायेगी।
नव-युग का मार्ग संकटों में होकर ही है -
मेहर बाबा भारतवर्ष में ही नहीं संसार के कितने ही देशों में अपने अध्यात्म और योग सम्बन्धी ज्ञान के लिये प्रसिद्ध हैं। वे चालीस वर्ष से अधिक समय से मौन रहते हैं और कहते हैं कि संसार के उद्धार का समय आ जायगा तभी मेरा मौन भंग होगा। अन्य अनेक सन्तों की तरह उनके अनुयायी और शिष्य भी उनको ‘अवतार’ की पदवी से विभूषित करते हैं। इस सम्बन्ध में तो हम कुछ कहना नहीं चाहते, क्योंकि जो संसार का पथ प्रदर्शक होगा दुनिया स्वयं ही उसकी तरह खिंच जायगी, पर मेहर बाबा ने आने वाले विश्व-संकट और नव-युग पर जो स्पष्ट विचार प्रकट किये हैं, वे अवश्य विचारणीय हैं-
“विश्व का तूफान जो कई दिनों से घुट रहा था, अब मानों फट कर बाहर निकल रहा है, और वह अन्तिम सीमा पर पहुँचते ही विश्वव्यापी दुर्घटना में परिणत होगा। भौतिक सुख की खींचातानी ने मनुष्यों को स्वार्थान्ध बना कर पारस्परिक विरोध की झड़का दिया है।
“इस समय संसार अंधकार और प्रकाश की महान् शक्तियों के संग्राम का अनुभव कर रहा है। एक ओर स्वार्थी मनुष्य है जो सुख और अधिकार प्राप्ति की पाशविक इच्छाओं की पूर्ति के लिये बेलगाम लालच और बेजोड़ द्वेष लिये अन्धे की तरह आगे बढ़ रहा है। कर्त्तव्य के अज्ञान से आदमी सभ्यता के नीच-तम स्तर तक पहुँच गया है। स्वार्थ और अज्ञान के बन्धनों में बँधे हुये लोग अपने दैवी ध्येय को भूल गये हैं। दूसरी ओर थोड़े ऐसे लोग भी हैं जो सहनशीलता, वीरता और स्वार्थ त्याग से अपनी शिवात्मा को प्रकट करते हैं।
“आज के दुःखदायी संघर्ष और उससे उत्पन्न होने वाले कष्टों से जिस नवीन मानवता का निर्माण होगा, उसमें भौतिक ज्ञान और उससे निर्मित व्यवहारोपयोगी साधनों को तुच्छ नहीं माना जायगा। भौतिक ज्ञान को अध्यात्म विरोधी मानना गलती है। भलाई और बुराई का आधार तो उस भौतिक ज्ञान के उपयोग करने के ढंग पर निर्भर है। जिस प्रकार कला के उचित प्रयोग से अध्यात्म-जीवन प्रकट होता है उसी प्रकार भौतिक शास्त्र का यही उपयोग भी अध्यात्म जीवन को प्रकट करने में सहायक हो सकता है। अब वह समय बहुत समीप आ गया है जब मनुष्य इस तथ्य को समझ कर दैवी मार्ग पर चलने की कोशिश करेंगे और संसार में एक नये युग का प्रकाश दिखाई पड़ने लगेगा।”
अध्यात्म जगत् के इन महामानवों और योग-सृष्टि से तीनों काल की घटनाओं को समझ सकने वाले मनीषियों ने जो कुछ कहा है, उससे महाभारत, मनुस्मृति, भागवत् आदि द्वारा प्रकट किये गये युग परिवर्तन के सिद्धान्त का पूर्णतः समर्थन होता है। यद्यपि युगों की गणना जैसे साधन और श्रमसाध्य विषय में सौ-पचास साल का अन्तर हो जाना असम्भव नहीं है, पर हम अभी तक उसी निर्णय को तर्कसंगत मानते हैं, जो सन् 1939 में हमने ‘सतयुग‘ के प्रथम अंक में प्रकाशित किया था। उसमें महाभारत और भागवत के ‘यदा चन्द्रस्य सूर्यस्य तथा तिष्य बृहस्पती’ वाले श्लोक के आधार पर (1 अगस्त 1943) को कलियुग-सतयुग की संधि का प्रथम दिवस माना गया था। हमने उसी समय लिख दिया था कि “इस समय युग परिवर्तन का मुहूर्त अवश्य हो गया है, पर सब लोगों को उसका अनुभव होने लगे इसमें 30-40 वर्ष अवश्य लग जायेंगे, क्योंकि मानव जाति के विकास का एक-एक ‘स्टेज’ सैकड़ों, हजारों वर्ष में पूरा होता है और धीरे-धीरे ही प्रकट होता है। इतना ही नहीं युग-परिवर्तन के ठीक अवसर पर तो तरह-तरह की हलचलों और विभिन्न दलों के झगड़ों के कारण परिस्थिति ऐसी संकटपूर्ण हो जाती है कि सुधार के बजाय उलटा बिगाड़ नजर आता है। तो भी युग- परिवर्तनकारी दैवी शक्तियाँ धीरे-धीरे अपना काम करती रहती हैं और अन्त में पुराने युग के बजाय नये युग की परिस्थितियाँ अपना स्थान ग्रहण कर लेती हैं।”
जुलाई के अंक में हमने बाइबिल, कुरान, ज्योतिषाचार्य केरो, नोस्टरडम आदि अनेक महापुरुषों द्वारा प्रकट किये गये जो भविष्य-कथन प्रकाशित किये थे, उनमें भी नया युग आने के सम्बन्ध में यही बातें कही गई हैं। वर्तमान समय में संसार में जो घोर अशांति फैली हुई है और हरएक देश लड़ाई के लिये नये से नये और भयंकर से भयंकर हथियार बनाने में अपना सर्वस्व झोंके दे रहा है उससे किसी बड़े संसार-संकट के आने और उसके द्वारा दुनिया की कायापलट होकर नये युग का प्रभाव भली प्रकार जमने लग जाने पर साधारण जन समुदाय भी उसे अनुभव करने लगेगा। ऐसा महान् परिवर्तन हजारों वर्षों में एक बार दिखाई पड़ता है और उस तरह के संकट भी संसार के ऊपर कभी-कभी ही आते हैं। इसलिये अपना तथा समाज का हित और कल्याण चाहने वाले सभी व्यक्तियों का कर्त्तव्य है कि वे धर्म, नीति, न्याय के नियमों पर इस प्रकार दृढ़ रहें कि जिससे आगामी दुर्घटनाओं का प्रभाव उन पर कम से कम पड़े और समाज की रक्षा तथा युग के युग निर्माण में भी वे अधिक से अधिक सहायक हो सकें।
भारतीय शास्त्रों में ‘धर्म’ को बहुत ऊँचा और व्यापक स्थान दिया गया है। जहाँ संसार की अन्य जातियों और देशों में धर्म को समाज-संगठन की अन्य जातियों और देशों में धर्म को समाज-संगठन या राज्य-व्यवस्था के सुसंचालन करने का एक साधन मानकर अपनाया गया है, वहाँ भारतवर्ष में आरम्भ से ही यह घोषणा कर दी गई कि धर्म मानव जीवन का एक मात्र आधार है। जब तक कोई व्यक्ति धर्म पर स्थिर है तभी तक वह ‘मनुष्य’ कहा और समझा जा सकता है अन्यथा वह अन्य पशुओं के समान एक प्राणी ही है। मीमाँसा दर्शन में सबसे पहले यही प्रश्न उठाया गया है कि ‘धर्म क्या है?’ और इसका उत्तर गिने हुये पाँच शब्दों में दे दिया है कि “यतोऽभ्युदय निःश्रेयस सिद्धि स धर्मः।” जिस आचरण से इस लोक और परलोक में कल्याण की प्राप्ति हो वही धर्म है।”
महाभारत में जब भीष्मपितामह से ‘धर्म’ का उपदेश करने को कहा गया तो उन्होंने बतलाया -
अक्रोधः सत्यवचनं संविभागः क्षमा तथा ।
प्रजनः स्वेषु दारेषु शौचमद्रोह एव च॥
आर्जवं भृत्यभरणं नवैते सार्ववर्णिकाः॥
(शान्ति पर्व 60-7,8)
अर्थात्- “कभी क्रोध न करना, सत्य भाषण, बाँट कर खाना, क्षमा-भाव, अपनी पत्नी से ही सन्तुष्ट रहना, पवित्रता, शत्रु-भाव न रखना, सरलता और आश्रितों का पालन करना- ये मनुष्य मात्र के योग्य धर्म-कर्त्तव्य हैं।”
इन ‘धर्मों’ में ऐसी कोई बात नहीं है जो संसार के किसी मजहब या ‘पैगम्बर’ के अनुयाइयों के विरुद्ध कही जा सके अथवा जिसे मानने में किसी को आपत्ति हो सके। अगर इनमें से केवल सत्य को ही ले लें तो उसी में संसार के बहुसंख्यक सद्गुणों का समावेश हो जाता है। इसी प्रकार क्षमा-भाव या दया भी ऐसी मनोवृत्ति है जिससे मनुष्य अनेक दोषों से बच कर देव-श्रेणी तक पहुँच सकता है। पवित्रता की भावना मनुष्यता का एक मुख्य लक्षण है। जिसमें इसका अभाव हो उसको कभी ऊँची निगाह से नहीं देखा जा सकता। आश्रितों का ठीक ढंग से पालन करना सज्जनता एक आवश्यक अंग है। ये सब बातें ऐसी हैं कि जिनके लिये न किसी प्रकार के प्रमाणों की आवश्यकता है और न दलीलों की। मनुस्मृति में धर्म का लक्षण बतलाते हुये यह भी समझाया है कि व्यवहार में इस सम्बन्ध में किस प्रकार की कार्य प्रणाली रखनी चाहिये-
विद्वभ्द्रिः सेवितः सद्भिर्नित्यमद्वेषरागिभिः।
हृदयेनाभ्यनुज्ञातो ये धर्मस्तं निबोधत॥1॥
कामात्मता न प्रशस्ता न चैवेहास्त्य कामता।
काम्योहि वेदाधिगमः कर्मयोगश्च वैदिकः॥2॥
(मनुस्मृति अ ॰ 2)
अर्थात्- “धर्म वह है जिसका रागद्वेष से रहित विद्वान सत्पुरुष आचरण करते हैं और जिस पर हृदय से विश्वास करते हैं। ऐसे धर्म का सार यह है कि स्वर्ग आदि के फल की इच्छा करना अच्छा नहीं है और धार्मिक नियमों और विधानों का त्यागना भी ठीक नहीं है, इसलिये सर्वोत्तम मार्ग यही है कि फल की इच्छा को त्याग करके धार्मिक विधानों का पालन किया जाय।”
निष्काम कर्म की महत्ता -
मनुस्मृति की यह शिक्षा संसार का सर्वोच्च धर्मतत्व है। त्याग और संन्यास का उपदेश एक सीमा तक ही व्यावहारिक हो सकता है और साँसारिक लोगों का बहुत थोड़ा भाग ही उसको वास्तविक रूप में स्वीकार कर सकता है। और कुछ नहीं तो शरीर-रक्षा और सृष्टि-क्रम को चालू रखने के लिये तो हमको जीवन निर्वाह के साधनों का उपार्जन, संग्रह और रक्षण करना ही पड़ता है। इसलिये जो धर्म प्रचारक केवल त्याग, तपस्या, ईश्वराराधन की चर्चा ही करे और साँसारिक व्यवस्थाओं से उसका समन्वय करने का मार्ग-दर्शन न करावे, वह चाहे ताड़ के पेड़ के समान ऊँचा भले ही दिखलाई पड़े पर सर्वसाधारण उसका अनुगमन नहीं कर सकते। भारतीय-धर्म की सर्वोच्च रचना श्रीमद्भगवद् गीता में इस सिद्धान्त को बड़ी स्पष्टता के साथ घोषित किया है-
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुभूँर्मा ते संगोस्त्व कर्मणि॥
“संसार में तुमको कर्म करने का ही अधिकार है फल का अधिकार नहीं है। तुम फल की वासना, चिन्ता त्याग दो और कर्म में भी पूर्णतः लगे रहो, यही सबसे बड़ा धर्म मार्ग है।”
यद्यपि भारतीय धार्मिक साहित्य अत्यन्त विशाल है, संसार के सब ग्रन्थों को इकठ्ठा किया जाय तो भी उसका परिणाम हमारे देश के धार्मिक साहित्य से अधिक नहीं हो सकता। एक दृष्टि से तो धार्मिक साहित्य का इतना अधिक और विविधतापूर्ण होना उलझन और भ्रम पैदा करने वाला जान पड़ता है, पर जब हम उसकी इस शिक्षा पर ध्यान देते हैं कि ‘परमात्मा तक पहुँचने के अनेक रास्ते हैं, जिनसे भिन्न-भिन्न प्रवृत्तियों के व्यक्ति अग्रसर होते हुये एक ही स्थान पर पहुँच जाते हैं।” अथवा जैसा गीता में कहा गया है-
“ये यथा माम् प्रपद्यन्ते ताँस्त्थैवभजम्यहम्।”
“भगवान को जो जिस प्रकार से भजता है वह उसको उसी रूप में प्राप्त होता है।” ये ऐसा सिद्धान्त है जिनमें सब धर्मों का समावेश हो जाता है। यही कारण है कि अतिप्राचीन काल से भारतीयों ने कभी किसी धर्म पर मतभिन्नता के कारण आक्रमण नहीं किया, वरन् जितने भी लोग इस देश में आक्रमणकारी के रूप में आये उनको भी मिलाकर अपना एक अंग ही बना लिया। यह बात दूसरी है कि आज स्थिति बदली हुई दिखाई पड़ती है। जिस प्रकार अधिक समय व्यतीत हो जाने पर प्रत्येक जीवित और जड़ पदार्थ में विकृति या निर्बलता आ जाती है उसी प्रकार हम लोग भी इस ऊँचे तत्व को बहुत कुछ भूल गये हैं और अपने धर्म को एक ऐसी चारदीवारी में घेर दिया है जिससे वह ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के बजाय ‘आठ कनौजिया नौ चूल्हे’ वाली स्थिति में पहुँच गया है।
इतिहासवेत्ताओं के मतानुसार प्राचीन संसार के अधिकाँश धर्मों का उद्गम वैदिक धर्म ही है। प्राचीन मिश्र, ईरान, यूनान, रोम आदि के निवासी तो आर्यों की शाखा ही माने जाते हैं और उनका धर्म भी वैदिक धर्म का एक रूपांतर ही था। दक्षिणी-पूर्वी एशिया के जावा, सुमात्रा, स्याम, कम्बोडिया आदि में भारतीय धर्म और संस्कृति के अवशेष भरे पड़े हैं। इतना ही क्यों मैक्सिको और अमरीका तक में भारतीय धर्म के प्रभाव का प्रमाण मिला है। ऐसी दशा में यदि हम अब फिर अध्यात्म-प्रधान भारतीय धर्म को शुद्ध रूप में विश्व-धर्म के सिंहासन पर बैठायें तो इसमें अनुचित क्या है? यद्यपि कुछ वर्षों से योरोप एशिया के कितने ही विद्वानों तथा धर्मप्रेमियों का ध्यान विश्व धर्म के सिद्धान्तों की विवेचना तथा प्रचार की तरफ जाने लगा है, पर हम देखते हैं कि उन सबका समावेश भारतीय धर्म में हो जाता है। कारण यही है कि हमारे धर्म का उद्भव भौतिक उन्नति का भी विधान है, पर उसे सदैव अध्यात्म के अनुकूल रखने का अदेश दिया गया है। ऐसी भौतिक प्रगति और सम्पदा जिससे आत्मा का पतन होता हो उसमें त्याज्य बतलाई गई है। यही सिद्धान्त ‘विश्व-धर्म’ का मूलमन्त्र हो सकता है।
ईश्वरीय प्रेम और मानव सेवा-
सब मजहबों में धर्म का अन्तिम उद्देश्य ईश्वरीय प्रेम और उसकी प्राप्ति माना गया है। जब तक मनुष्य की दृष्टि इस संसार की वस्तुओं और भौतिक सम्बन्धों पर ही रहती है, तब तक उसे आत्मिक ज्ञान हो सकना सम्भव नहीं होता। इसलिये सन्तों ने सदा यही उपदेश दिया है कि ईश्वर और आत्मा के प्रति सच्चे रहते हुये ही साँसारिक सम्बन्धों का पालन करो। भारतवर्ष में जैन, बौद्ध आदि जो अन्य मत चले हैं और विदेशों में जो ईसाई, इस्लाम, पारसी, यहूदी आदि मजहब पाये जाते हैं, उन सबने विभिन्न शब्दों और शैलियों में इसी सिद्धान्त का प्रतिपादन किया है। साथ ही यह प्रकट कर दिया गया है कि यह ईश्वरीय प्रेम और उसका स्मरण केवल काल्पनिक या विचारात्मक ही नहीं होना चाहिये वरन् वह प्रत्यक्ष अथवा कार्य रूप में भी प्रकट होना चाहिये जोकि परोपकार- मानव सेवा के सिवाय और कुछ नहीं हो सकता।
जैन धर्म भारत का अति प्राचीन मत है और एक प्रकार से भारतीय-धर्म में प्रचलित ज्ञान-मार्ग का अनुगामी है। उसके उपदेश वेद-पुराणों के सिद्धान्तों से बिल्कुल मिलते हुये ही हैं-
सब्बेहि भूएहि दयाणुकपी खंतिक्खते संजय वंभपारी।
सावज्जजोगं परिवज्जयंतो चरेज्जभिक्ख सुसमाहिं इन्दिमे॥
(उत्तराध्ययन 21। 13)
“सब प्राणियों पर दया करे, कठोर वचन भी सहन करे और बदला न ले। संयम और ब्रह्मचर्य का पालन करे। इन्द्रिय निग्रह करे और निष्पाप जीवन जिये।”
धम्मो मंगलं मुक्किट्ठं माहिंसा संजमो तपो।
देवा वितं नमंसति जस्सधम्मे सया मणो॥
“अहिंसा, संयम और तप इसी का नाम धर्म है, जो मनुष्य के लिये मंगलकारक होता है। जो धर्मशील होते हैं उन्हें देवता भी नमस्कार करते हैं।”
बौद्ध धर्म की भी ऐसी ही शिक्षा है-
न परो पर निकुब्बेथ नातिमंजेथ कत्थचिंन कचिं।
व्यारोसना पटिध सज्जा नाँञमं ञस्स दुरखमिच्छेया॥
(अभिधम्म पिटक)
“कभी किसी को मत ठगो, किसी का अपमान मत करो। वैर या प्रतिरोधवश किसी को दुःख देने की बात मत सोचो- यही मानव-धर्म है।”
ईसाई मजहब में प्रेम को सर्वोच्च स्थान दिया गया है और ईसा प्रेम तथा क्षमा के मूर्तिमान अवतार थे। उनका सबसे बड़ा उपदेश यही था कि “Love thy neighbour as thyself.” (तुम अपने पड़ोसी से भी उतना ही प्रेम करो जितना अपने से करते हो।) क्या यह कथन हमारे शास्त्रों के इन वाक्यों का ही रूपांतर नहीं है-
आत्मना प्रतिकूलानि परेषाँ न समाचरेत्।”
(जो बात तुमको दुःखदायी लगती है उसको किसी दूसरे के साथ भी मत करो।) ईसाई धर्म के एक प्रसिद्ध कवि सैमुअल टेलर ने कहा है-
॥द्ग श्चह्ड्डब्द्गह्लद्ध ड्ढद्गह्यह्ल ख्द्धश द्यशक्द्गह्लद्ध ड्ढद्गह्यह्ल,
्नद्यद्य ह्लद्धद्बठ्ठद्दह्य ड्ढशह्लद्ध द्दह्द्गड्डह्ल ड्डठ्ठस्र ह्यद्वड्डद्यद्य.
स्नशह् ह्लद्धद्ग स्रद्गड्डह् त्रशस्र ख्द्धश द्यशक्द्गह्लद्ध ह्वह्य
॥द्ग द्वड्डस्रद्ग ड्डठ्ठस्र द्यशक्द्गह्लद्ध ड्डद्यद्य.
“उसी की ईश्वर-प्रार्थना सर्वोत्तम है जो उसके नाम पर सबसे बड़े और छोटे को सबसे ज्यादा प्रेम करता है। क्योंकि ईश्वर भी हम से बहुत अधिक प्यार करता है और इसी से उसने हमारी सृष्टि की है।”
प्रसिद्ध मुसलमान सन्त शेख सादी ने कहा है- ‘जिस प्रकार एक शरीर के विभिन्न अंग एक दूसरे से मिले रहते हैं वैसे ही परमात्मा के सब पुत्र भी एक दूसरे के अंग हैं। अगर एक को ज्वर हो जाय तो दूसरे भी बेचैन हो जायेंगे। मानव-सेवा से बढ़ कर और कोई धर्म नहीं है। मेरा प्रियतम परमात्मा सब हृदयों में निवास करता है, कोई भी हृदय उससे खाली नहीं है। वह हृदय धन्य है जो उसे प्रत्यक्ष कर देता है। क्योंकि परमात्मा प्रत्येक मनुष्य में निवास करता है इसलिये प्रत्येक का सम्मान करना चाहिये।”
वर्तमान समय में जबकि ईश्वर के अस्तित्व पर ही शंका उठाई जाती है ‘ईश्वरीय प्रेम’ का जिक्र करना विशेष उपयोगी नहीं होगा। पर हम उनको बतलाना चाहते हैं कि वे केवल शब्दों से न भड़के। प्राचीन काल की भाषा और वर्णन शैली में इसी तरह का प्रयोग लोगों को प्रभावित कर सकता था, इसलिये एक नहीं सभी सन्तों और महापुरुषों ने इसी ढंग की बातें लिखी हैं। ईश्वर से उन सबका उद्देश्य उसी एक सर्वव्यापी आत्मसत्ता से है जो विश्व के प्रत्येक कण में व्याप्त है। किसी भी विश्व-धर्म की कल्पना बिना अध्यात्म में नहीं की जा सकती और अध्यात्म का केन्द्र-बिन्दु अवश्य ही कोई चैतन्य-सत्ता होगी, फिर चाहे उसे किसी भी नाम से पुकारा जाय। जिस व्यक्ति का ध्यान ‘ईश्वरीय प्रेम’ की तरफ नहीं है और जो अन्य मनुष्यों को अपना भाई, अपने शरीर का एक अंग न समझ कर कमाई या शोषण का साधन मात्र समझता है, वह कभी धार्मिक नहीं हो सकता और न वह मनुष्य में पाये जाने वाले उच्च सद्गुणों को महत्व दे सकता है। इस तरह की प्रवृत्ति प्रायः पतन का ही कारण बनती है।
वर्तमान युग का परिवर्तन अनिवार्य है -
वर्तमान युग महान् परिवर्तनों और नवीनताओं का है। यद्यपि विद्या और ज्ञान का पुराने जमाने में भी अभाव न था और बीच-बीच में ऐसे भी युग आ चुके हैं जबकि वैज्ञानिक आविष्कारों और यन्त्र विद्या की अच्छी उन्नति हुई है, पर उस समय यह जानकारी थोड़े से विशेष व्यक्तियों और विशेष प्रदेशों तक ही सीमित रह जाती थी। इस समय हम प्रचार के साधनों के बढ़ जाने से विद्या, ज्ञान, विज्ञान का जो विश्व-व्यापी प्रकाश देख रहे हैं, वह स्थिति संसार में कदाचित कभी नहीं आई। यही कारण है कि इस समय विश्व-धर्म, विश्व राज्य और विश्व-भाषा जैसी बातें सम्भव मानी जाने लगी हैं और उनके लिये विचार-विमर्श भी किया जाने लगा है। अब भी जिन लोगों के मस्तिष्क केवल प्राचीन बातों और सिद्धान्तों से ही भरे हैं वे इन बातों की सम्भावना में तनिक भी विश्वास नहीं करते और इस प्रकार के विचार प्रकट करने वालों को हँसी का ही पात्र समझते हैं।
पर तो भी हम देख रहे हैं कि दुनिया बड़ी तेजी से बढ़ती चली जा रही है और लक्षणों से प्रतीत होता है कि वह अब अन्तिम मंजिल के निकट आ पहुँची है। हम यह भी स्वीकार करते हैं कि यह अन्तिम मंजिल बड़ी कठिन है- घोर संघर्षपूर्ण है, जिसमें जितना भी रक्तपात, बर्बादी, तोड़-फोड़ हो जाय कम है। कुछ लोग तो स्थिति की भयंकरता को देखकर मानव-सभ्यता के नष्ट हो जाने की ही आशंका करने लगे हैं। परिस्थिति की गम्भीरता और एक प्रलयकारी तूफान की सम्भावना को तो हम भी अस्वीकार नहीं करते, पर हमारा मत है कि मानव जाति इतनी मजबूत और चिमड़ी है कि वह इस घोर संकट-महान परीक्षा को पार करके उस विश्व-व्यापी सभ्यता और संस्कृति के युग में पदार्पण कर सकेगी।
वह युग कैसा होगा? आज ज्यादातर व्यक्ति उसको मान सकना तो दूर उसकी कल्पना करने में भी असमर्थ हैं। परिवर्तन और नवीन तत्वों, संस्थाओं के जन्म के विषय में अनजान होने से वे नये वातावरण, नये क्षेत्र और नये ढंग के समाज के विचार से भय खाते हैं। जैसे अनेक ग्रामीण जन किसी बड़े नगर में पहुँच कर हक्के-बक्के हो जाते हैं और चलने-फिरने, उठने-बैठने, बात-चीत करने आदि सभी बातों में असुविधा अनुभव करते हैं, और अपने सीधे-सादे, ढीले-ढाले ग्रामीण ढर्रे को ही अच्छा बतलाते हैं वही हालत आजकल नये युग के सम्बन्ध में अधिकाँश दुनियादार मनुष्यों की देखने में आती है।
इसमें सन्देह नहीं कि नया-युग प्राचीन के मुकाबले में होगा भी इतना अलग और दूसरी शकल-सूरत का कि अधिकाँश लोगों को उसके अनुकूल बन सकना, अपने को नई परिस्थितियों के अनुसार बदल सकना कठिन ही नहीं असम्भव होगा। जो हालत कि मिट्टी के दिये की रोशनी में रहने वाले की बिजली के हण्डों से प्रकाशित निवास स्थान में जाकर हो जाती है, अथवा सदा बैलगाड़ी पर यात्रा करने वाले को साठ मील प्रति घन्टा चाल की मोटर या सात आठ सौ मील की गति वाले वायुयान पर बैठा देने से जैसा अनुभव होता है, वैसा ही प्राचीनता के विचारों को दिमाग में भरे हुये और उसी तरह के रहन-सहन वालों को नये युग में होगा। ऐसी विपरीत परिस्थितियों में पड़कर अनेक व्यक्ति जिस प्रकार प्राणों से हाथ धो बैठते हैं, या मीठे पानी की मछली खारे पानी के समुद्र में पहुँचकर जिस प्रकार शायद ही जिन्दा बचती है, उसी प्रकार केवल एक ढर्रे पर चल सकने वाले व्यक्तियों की दशा उस समय दिखाई पड़ने लगेगी। यही कारण कि ऐसे व्यक्ति विश्व-धर्म, विश्व-राज्य और विश्व-भाषा जैसे शब्दों को सुनना भी नहीं चाहते और यदि कोई चर्चा करता है तो उसे तुरन्त सनकी या आधा पागल करार दे देते हैं।
फिर भी हम दृढ़तापूर्वक कहते हैं कि अधिक से अधिक दस बीस साल में ही वर्तमान दुनिया का तोड़ दिया जाना और सौ पचास वर्ष में नई दुनिया का ढाँचा बनकर खड़ा हो जाना निश्चय है। वह एक ऐसा दृढ़ तथ्य है जिसे आजकल के सभी विचारक, चाहे वे किसी भी धर्म या मजहब के अनुयायी क्यों न हों मानने से इनकार नहीं करते। वर्तमान युग में हमारे सबसे बड़े मार्ग दर्शक और धार्मिकों में अग्रगण्य, महात्मा गाँधी ने कहा है-
“हमारा माना हुआ धर्म अपूर्ण है, उसमें सदा परिवर्तन होते रहते हैं और होते रहेंगे। ऐसा होने से ही हम उत्तरोत्तर ऊपर उठ सकते हैं- सत्य की ओर ईश्वर की और निरन्तर आगे बढ़ सकते हैं। जब हम ‘मनुष्य कल्पित’ सब धर्मों को अपूर्ण मान लेते हैं, तो किसी को ऊँचा या नीचा मानने की बात नहीं रह जाती। सभी सच्चे हैं, पर सभी अपूर्ण हैं, इसलिये दोष के पात्र हैं। समभाव होने पर भी हम उनमें दोष देख सकते हैं। हमें अपने दोषों को भी देखना चाहिये। पर ऐसे दोषों के कारण उसका त्याग नहीं किया जाता, बल्कि दोष को दूर करना पड़ता है।”
धार्मिक विधानों में ऐसा सामयिक परिवर्तन होते रहना उचित ही नहीं अनिवार्य है। प्राचीन धर्मों में से किसी की परीक्षा की जाय यह स्पष्ट मालूम हो जायगा कि वह किस समय किस मानव-समुदाय की किन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये चलाया गया था? भिन्न-भिन्न देशों और युगों की परिस्थितियाँ एक दूसरे से बिल्कुल विपरीत होती हैं इसलिये धार्मिक प्रथायें भी उसी के अनुरूप चलानी पड़ती हैं। भारतवर्ष का मध्य-भाग कृषि प्रधान है। साल भर में दो-तीन फसलें तरह-तरह के अनाजों और अन्य खाद्य पदार्थों की होती हैं। इसलिये यहाँ धार्मिक विधानों में, पूजा पाठ में, अन्न के बने पदार्थों, मिठाइयों, फल-फूल आदि का ही विशेष उपयोग होता है। पर ईसामसीह जिस पैलेस्टाइन देश के निवासी थे वहाँ की अधिकाँश भूमि रेतीली या ऊसर-बंजर थी और लोगों के जीवन निर्वाह का मुख्य आधार नदियों और समुद्र से मछली पकड़ना और मुख्यता उन्हीं से भोजन की पूर्ति करना था। इसलिये उनके धार्मिक संस्कारों और उत्सवों आदि में मछलियों का ही जिक्र आता है, यद्यपि ईसामसीह बहुत अधिक दयालु प्रकृति के और परोपकारी थे। इसीलिये किसी विद्वान ने कहा है कि “मनुष्य स्वयं जो खाता है वही अपने देवताओं और ईश्वर को भी खिलाता है।” इस तरह के परिवर्तन अगर राजी से समय पर न किये जायें तो उससे कैसी हानि होती है, इस सम्बन्ध में उदाहरण देते हुये महात्मा भगवानदीन जी ने ‘आज का धर्म’ नामक पुस्तक में लिखा है-
“मुनासिब वक्त पर अगर धर्म और समाज की व्यवस्था में परिवर्तन न किया जाय तो उसका परिणाम अवश्य हानिकारक होगा। कोई बँगाली उत्तरी चीन में सिर नंगा रखने पर अड़ जाय तो जुकाम मोल ले बैठेगा और फिर भी अड़ा रहे तो जान से हाथ धो बैठेगा। अगर कोई गर्म देश का निवासी धार्मिक जन-समुदाय किसी कारणवश अथवा देश त्याग कर ठंडे देश में जा बसे और अपने रिवाजों को न बदले, तो वह नष्ट होने से कैसे बचेगा? समाज का कोई न कोई समझदार जरूर बदलाव की आवाज उठायेगा। अगर बदलाव पुराने विचारों से टकरायेगा तो उसको नये विचारों को जन्म देना पड़ेगा। यही कहलाने लगेगा नया धर्म।”
“दुनिया का कोई धर्म ऐसा नहीं जिसने अपना प्रचार ऐसे लोगों में किया हो, जो धर्म को जानते ही न थे। हर धर्म का जन्म किसी न किसी अन्य धर्म के मानने वालों में ही हुआ है। आदमी का बच्चा आदमी से ही शिशु रूप में जन्मेगा। यदि कोई यह कल्पना करे कि भगवान ने आरंभ में ही युवावस्था के पुरुष-स्त्री बना कर पृथ्वी पर बसा दिये तो यह विश्वास योग्य नहीं है। कोई न कोई धर्म भले ही सर्वप्रथम चला हो, पर धर्म-धारा अनादि है।”
यह माना जा सकता है कि आरम्भ में मनुष्य आज कल जैसे धर्म विधि विधानों से अनजान था। उसने प्रकृति के कामों को देखकर कुछ विचार बनाये और उनके आधार पर व्यवहार गढ़े। ये व्यवहार कुछ अपने आप बदलते रहे क्योंकि बदलाव व्यवहार का जीवन है। पर जब पुराने समाज को एक स्थान से दूसरे स्थान में जाना पड़ा, एक प्रकार के वातावरण से दूसरे प्रकार के वातावरण में प्रवेश करना पड़ा, तब व्यवहारों में विशेष उलट-फेर करने की आवश्यकता आ पड़ी। उलट-फेर के समय सब घबरा उठे। उन्हें ऐसा मालूम होने लगा मानो उलट-फेर करने से उनका धर्म नष्ट हो जायगा। धर्म नष्ट होने से समाज नष्ट हो जायगा। नासमझ लोगों का ‘धर्म’ ऐसी छोटी-छोटी बातों से भी नष्ट हो जाता है। पर यदि कोई समझदार आदमी खड़ा हो जाय तो वह सबको सही रास्ते पर मोड़ भी सकता है। इस सम्बन्ध में स्वामी विवेकानन्द जी की जीवनी की एक घटना, बड़ा अच्छा प्रकाश डालती है-
“जब स्वामी विवेकानन्द बेलूड़ (कलकत्ता) में रामकृष्ण मिशन का आश्रम बनवा रहे थे तो उसमें अनेक संथाली मजदूर काम करते थे। ये लोग आदिवासी माने जाते हैं और उनका रहन-सहन जंगलियों से कुछ ही ऊपर है। एक दिन स्वामी जी जब अन्य स्थानों का भ्रमण करते हुये आश्रम में आये तो उन्होंने इन मजदूरों के एक समुदाय को आश्रम में विशाल अहाते के एक कोने में झोंपड़ियाँ बना कर रहते देखा। स्वामी जी दरिद्रनारायण के उपासक थे और इन लोगों की गरीबी- न बदन पर कपड़ा, न पूरी भोजन-सामग्री- देखकर उनके हृदय में ठेस-सी लगी। उन्होंने संथालों से कहा कि रविवार के दिन तुम हमारे यहाँ भोजन करना। संथालों ने उनकी इस कृपा के लिये बड़ा आभार माना, पर उन्होंने ‘यह कठिनाई बतलाई कि “आपका भोजन खाने से हम धर्म-भ्रष्ट हो जायेंगे। पके हुये भोजन में नमक मिला रहता है और किसी अन्य जाति वाले का नमकीन भोजन खाने से हमारी जाति नष्ट हो जायगी, हमारा बहिष्कार कर दिया जायगा।” स्वामी जी को उनके अज्ञान पर तरस आया, पर उन्होंने उनकी बात से अप्रसन्न न होकर कहा कि “अगर नमक वाला भोजन करने से तुम्हारी जाति नष्ट होने का भय है तो हम बिना नमक का भोजन बनवा देंगे, तुम नमक अपने पास से मिलाकर भोजन कर लेना।”
इस छोटी-सी घटना से विदित होता है कि लोगों ने धर्म को कैसा पेचीदा और अन्ध श्रद्धा का विषय बना रखा है। जैसा कि एक कहावत है ‘सामने से एक तिनका भी प्रविष्ट करना कठिन है पर पीछे से चाहे हाथी को घुसादो’- जहाँ सुधार के नाम पर एक छोटा-सा परिवर्तन भी लोगों को स्वीकार नहीं होता वहाँ अप्रत्यक्ष रूप से पूरा का पूरा ढाँचा ही बदल दिया जाता है। “आज का धर्म’ में हिन्दू धर्म के परिवर्तनों पर विचार करते हुये कहा है-
“तीनों वेद तरह-तरह के विचारों से भरे पड़े हैं। उनसे सम्बन्ध रखने वाले ग्रन्थ तरह-तरह के व्यवहारों से भरे हैं। हर एक उपनिषद् एक नई विचार धारा लिये हैं। प्रत्येक दर्शन एक दूसरे से अलग है। आज सब उपनिषद्, सब दर्शन-ग्रन्थ, सब ब्राह्मण ग्रन्थ, सब संहितायें मिल कर भले ही एक ‘वेद’ के नाम से प्रसिद्ध हो, भले ही उनके मानने वाले अपने को ‘एक धर्मी’ और ‘एक समाजी’ समझते हों, पर एक समय था ये सब विचारधारायें अलग-अलग धर्म का रूप लिये थी और उनके अनुयायी सब आपस में ऐसे ही लड़ते-झगड़ते थे जैसे आज कल के भिन्न-धर्मी लड़ते रहते हैं। बाद में इन सब धाराओं का मेल बैठाने की बड़ी-बड़ी कोशिशें की गयी तब काम चलाऊ स्थिति प्राप्त हुई।”
अब धीरे-धीरे वह समय आ पहुँचा है जब विचार-स्वातंत्र्य एक सार्वजनिक चीज बन गया है और छोटे-बड़े सभी श्रेणी के व्यक्ति प्रचलित धर्मों की त्रुटियों का अनुभव करने लगे हैं। लोगों की समझ में यह बात भी आ गई है कि इस समय कोई एक खास धर्म नहीं वरन् सभी धर्म लोगों की आवश्यकता को देखते हुये अपर्याप्त और असामयिक सिद्ध हो रहे हैं। इसलिये विचारक लोग इस विषय में अपनी सम्मति देते रहते हैं कि इस समस्या को कैसे हल किया जाय? इस समय ऐसे विद्वानों की भी कमी नहीं जिन्होंने सब धर्मों की अच्छी बातों को मिलाकर और समय की आवश्यकतानुसार उनमें परिवर्तन तथा संशोधन करके एक ‘विश्व-धर्म’ का ढाँचा तैयार कर दिया है।
सत्य के खोजियों ने मनुष्य-मनुष्य के बीच पाये जाने वाले तरह-तरह के भेदभावों को- जो पुराने जमाने में प्रत्यक्ष जानकारी और अनुभव की कमी के कारण उत्पन्न हो गये थे- मिटाकर एक विश्व-धर्म, विश्व-राज्य आदि का महत्व और आवश्यकता प्रतिपादित की है। यद्यपि ये विचार प्राचीन काल में भी, विशेष रूप से भारतवर्ष में ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ और ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ के रूप में प्रकट किये गये थे, पर उस समय थोड़े से मनीषी और सज्जन प्रकृति के व्यक्ति ही इसका महत्व समझते थे और वैसा आचरण करने का प्रयत्न करते थे। पौराणिक कथाओं के अनुसार तो उस जमाने में अनेक व्यक्तियों मनुष्यों के लिये ही नहीं पशु-पक्षियों तक के लिये प्राणों का बलिदान कर दिया था। इसका कारण उन महानुभावों की विश्व-व्यापी आत्म-तत्व में दृढ़ निष्ठा होना ही था। पर उस समय सर्वसाधारण तक इन विचारों के पहुँचने का कोई साधन न था। इतना ही नहीं जो सामान्य धर्म-प्रचारक जन साधारण के संपर्क में आते भी थे और कथा आदि के रूप में उनको धर्म की बातें बतलाते थे, वे अपने लाभ की दृष्टि से राजाओं और श्रीमान लोगों का ही गुणगान करते थे। अठारहवीं शताब्दी में योरोप में रूसो, कान्ट, सेण्ट साइमन आदि विचारकों ने मानवीय अधिकारों का प्रतिपादन किया और एक तन्त्र के स्थान पर जनतन्त्र की स्थापना पर जोर दिया, पर उनके लेखों में विश्व-राष्ट्र और विश्व-धर्म जैसी कल्पना नहीं है।
हाँ मार्क्स ने सन् 1864 के आस पास च्ंखशह्द्मद्गह्ह्य शद्ध ह्लद्धद्ग ख्शह्द्यस्र ह्वठ्ठद्बह्लद्गज् (संसार के श्रमजीवियों मिलकर एक हो जाओ।) का नारा दिया और कहा कि संसार के सभी मजदूर एक ‘वर्ग’ के हैं और उनका हित इसी में है कि वे अपने विरोधी पूँजीपति वर्ग (कैपिटैलिस्ट्स) का संघबद्ध रूप में मुकाबला करें और संसार में एक वर्ग विहीन समाज की स्थापना करें। मार्क्स का सिद्धान्त आर्थिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है, पर वर्तमान समाज का अस्तित्व केवल अर्थ पर ही नहीं है। चाहे साम्यवादी कुछ भी कहें, पर अब भी ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो धर्म सम्बन्धी विषय को आर्थिक और राजनीतिक विषयों से अलग मानते हैं और उसके लिये बहुत कुछ हानि सहन कर सकते हैं। इसलिये मार्क्स का कम्यूनिज्म का सिद्धान्त महत्वपूर्ण होते हुये भी समस्त सामाजिक दोषों के निराकरण का उपाय नहीं हो सकता।
विश्व-धर्म के आधुनिक प्रचारक -
इस दृष्टि से विचार करने पर विश्वधर्म, विश्वराज्य और विश्वभाषा के आधुनिक प्रचारकों में सबसे पहले बहाई-समाज के संस्थापक महात्मा बहा की गिनती की जा सकती है। यद्यपि उनका जन्म ईरान के एक उच्च वंश में हुआ था और उनके पूर्वज बलपूर्वक पारसी धर्म को छोड़कर इस्लाम धर्म में दीक्षित किये जा चुके थे, पर उन्होंने जिन सिद्धान्तों और आदर्शों का प्रचार किया वे मुस्लिम धर्माधिकारियों को इतने इस्लाम विरोधी जान पड़े कि उन्होंने महात्मा बहा और उनके अनुयाइयों पर कहर बरसा दिया और हजारों निर्दोष पुरुष, स्त्री और छोटे-छोटे बच्चों तक को इतनी बेरहमी से मारा कि दुनिया त्राहि-त्राहि करने लगी।
इस बलिदान का परिणाम यह हुआ कि दुनिया के अनेक देशों के लोगों का ध्यान धीरे-धीरे बहाई सिद्धान्तों की तरफ हो गया। मैंने स्वयं इस सम्बन्ध में एक बड़ा लेख मेरठ से प्रकाशित होने वाली ‘ललिता’ मासिक पत्रिका में सितम्बर 1918 में छपाया था, जिसमें इसकी उपयोगी शिक्षाओं का वर्णन था। महात्मा बहा ने आरम्भ में ही सब धर्मों की महत्ता स्वीकार करते हुये कहा है-
“कोई एक सच्चाई दूसरी सच्चाई का खण्डन नहीं करती है। प्रकाश चाहे किसी भी दीप में हो रहा हो, प्रकाशमय है। गुलाब का फूल सदा सुन्दर होता है, चाहे वह किसी भी बाग में खिले। तारों में वही उज्ज्वलता होती है चाहे वे पूर्व दिशा में चमकें या पश्चिम में। पक्षपात को छोड़ दो ताकि सत्य के सूर्य से प्रेम कर सको, चाहे वह क्षितिज के किसी भी भाग से उदय हो।”
जब तक धर्म के सम्बन्ध में इस प्रकार की भावना का आश्रय नहीं लिया जायगा। तब तक विश्व-धर्म की बात मुँह से निकालना ही व्यर्थ है। भारतीय धर्म के मूल ग्रन्थों का यह मत तो हम पहले ही बतला चुके हैं कि उनके अनुसार ईश्वर प्राप्ति के सभी विभिन्न मार्ग ठीक हैं और देर था सबेर सब एक ही लक्ष्य पर पहुँच जायेंगे। महात्मा गाँधी ने भी उसी तथ्य का समर्थन करते हुये कहा था कि ‘सभी धर्म सच्चे हैं पर साथ ही उनमें अपूर्णता भी है’ इसलिये हमको सहानुभूतिपूर्वक उनमें संशोधन और समन्वय करने का प्रयत्न करना चाहिये। ऐसा करने से ही मनुष्य जाति का वर्तमान नाशकारी संघर्ष से परित्राण हो सकता है। यही बात ‘बहाई नियम’ की पुस्तक में भी कहीं गई है- “इस नवीन प्रकाशमान युग में ईश्वर ने जो ज्ञान संसार को प्रदान किया है, वही मनुष्यों का एकीकरण तथा धर्म की मूल एकता है। इसके फलस्वरूप राष्ट्रों के मध्य युद्ध का अन्त हो जायगा तथा ईश्वर के दिव्य प्रकाश से एक अखण्ड शान्ति का प्रसार होगा”
इस समाज के जो उद्देश्य 70 वर्षों पूर्व संसार में प्रचारित किये गये थे वे सब ऐसे हैं कि किसी भी मजहब का कोई भी व्यक्ति उनका विरोध या खण्डन नहीं कर सकता। जिस प्रकार भारतीय शास्त्रों में वर्णित धृति, क्षमा, निरहंकार आदि धर्म के लक्षण शाश्वत है उसी प्रकार ये नियम भी वर्तमान स्थिति में अनिवार्य हैं-
(1) मनुष्य मात्र की एकता, (2) सत्य का स्वतन्त्र अनुसंधान, (3) समस्त धर्मों की नींव एक है, (4) धर्म को अनिवार्य रूप से एकता का साधन होना चाहिये, (5) धर्म को विज्ञान तथा तर्क के अनुकूल होना चाहिये, (6) पुरुषों तथा स्त्रियों की समानता, (7) सब प्रकार के पक्षपातों का पूर्णरूप से त्याग, (8) विश्व-व्यापी शाँति, (9) विश्व -व्यापी शिक्षा, (10) अर्थ-समस्या का आध्यात्मिकता के आधार पर समाधान, (11) एक विश्व-व्यापी भाषा, (12) एक अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय।”
ईसाइयों का ‘क्वेकर’ सम्प्रदाय -
ईसाई धर्म के मुख्य सिद्धान्त क्षमा और प्रेम है। महात्मा ईसा ने इन सिद्धान्तों को केवल मुख से ही नहीं कहा वरन् इन पर पूर्ण रूप से आचरण किया और अपने को बलिदान कर दिया। इस महान आत्म-त्याग के प्रभाव से ईसाइयों में सदैव ऐसी आत्मायें प्रकट होती रहती हैं जो त्याग और तपस्या के मार्ग को अपना कर प्राणियों की सेवा और परोपकार के मार्ग पर चलकर उज्ज्वल उदाहरण उपस्थित करती हैं। ऐसे लोगों ने ही कुछ सौ वर्ष पहले ‘क्वेकर’ सम्प्रदाय की स्थापना की थी जिसके अनुयायी बहुत सादा और कठोर जीवन अपना कर धर्मकार्यों में अपने साधन और शक्ति का उपयोग करते थे। ये लोग मानव-जाति की एकता तथा विश्व-शाँति में भी विश्वास रखते थे और इन्होंने सन् 1640 इंग्लैण्ड के बादशाह चार्ल्स द्वितीय के सम्मुख अपने सिद्धान्तों का घोषणा-पत्र उपस्थित करते हुये कहा था-
‘हम सभी प्रकार के युद्ध तथा कलह और किसी भी उद्देश्य या बहाने को आधार बना कर संघर्ष उत्पन्न करने के विरुद्ध हैं और समस्त संसार के सम्मुख हमारी यही प्रतिज्ञा है। ईसा की जो आत्मा हमारा पथ-प्रदर्शन करती है वह बदलने वाली नहीं है। वह ऐसी नहीं है कि एक बार हमें बुराई से दूर रहने का आदेश देकर फिर बुराई की ओर ले जाय। हम निस्सन्देह रूप से जानते हैं और विश्व के समक्ष निष्ठापूर्वक घोषणा करते हैं कि सत्य की ओर ले जाने वाली ईसा की आत्मा कभी भी इहलोक अथवा परलोक के प्रभुत्व के लिये किसी भी व्यक्ति के विरुद्ध हमें अस्त्र-युद्ध की ओर न ले जायगी।”
ये क्वेवर लोग कैसे पक्के मानवतावादी होते थे इसका एक नमूना डेलवेयर (अमरीका) के निवासी टामस गैरेट की घटना से मिलता है। पाठक जानते होंगे कि अमरीका में हब्शियों को दास बना कर उन पर अमानुषिक अत्याचार करने की कलंकपूर्ण प्रथा बहुत अधिक फैली हुई थी। इसने वहाँ के कई प्रदेशों में इतनी गहरी जड़ जमाली है कि इसका उच्छेद करने के परिणाम स्वरूप दो महामानवों- लिंकन और कैनेडी को अपना बलिदान कर देना पड़ा है। टामस गैरेट सामान्य नागरिक होते हुये भी इस पापपूर्ण प्रथा के विरुद्ध थे और वे गोरे होते हुये भी काले हब्शी गुलामों की, जो किसी प्रकार राक्षस रूपी मालिकों से जान बचाकर भाग जाते थे हर तरह से सहायता किया करते थे। दास प्रथा के पक्षपातियों ने उनको इसी ‘अपराध’ के लिये गिरफ्तार कर लिया और कारावास तथा जुर्माने की सजा दी गई। जुर्माना इतना भारी था कि उसने गैरेट को आर्थिक दृष्टि से बिल्कुल कंगाल बना दिया। फिर भी उन्होंने भरी अदालत में सिर ऊँचा करके जोरदार शब्दों में कहा-
“जज। तूने मेरे पास एक डालर (रुपया) भी नहीं रहने दिया। लेकिन मैं तुझसे और इस अदालत में उपस्थित सभी लोगों से कहना चाहता हूँ कि यदि किसी को ऐसे भगोड़े की जानकारी हो, जिसे रहने के स्थान और सहायता देने वाले की दरकार हो, तो उसे टामस गैरेट के पास भेज दिया जाय। टामस गैरेट मित्र की तरह उसकी मदद करेगा।”
इस प्रकार के सच्चे मानवतावादियों के उदाहरण चाहे संसार भर में दस-बीस ही हों तो भी वे इस सत्य पर हमारी आस्था को दृढ़ करने के लिये पर्याप्त हैं कि यह संसार वास्तव में एक ही ‘स्रोत’ से प्रकट हुआ है और वर्तमान समय के घोर संघर्षों और कलह के होते हुये भी अन्त में एक होकर रहेगा। इस विश्वास को अभी कुछ समय पहले ईसाई धर्म के एक बहुत बड़े नेता सर फ्राँसिस यंगहस्वैण्ड ने एक घोषणा पत्र में दुहराया था-
“संसार का पुनर्संगठन सूक्ष्म जगत में आरम्भ हो गया है। इसके पहले एक श्रेष्ठ संसार की रचना के लिये इतना अधिक उत्साह और तत्परता कभी दिखलाई नहीं पड़ी। संसार में नवीन युग की स्थापना के लिये हमको सब धर्मों के अनुयाइयों की आध्यात्मिक प्रेरणा पर सबसे अधिक भरोसा रखना चाहिये। जिस प्रकार यह नवयुग किसी एक देश के रहने वालों की कोशिश से नहीं आयेगा, वरन् उसके लिये सभी देशों के निवासियों को परिश्रम करना पड़ेगा, उसी प्रकार यदि संसार के सभी धर्मों के अनुयायी विश्व कल्याण के लिये आध्यात्मिक शक्ति उत्पन्न करना चाहते हैं तो उनको भी मिलकर एक होना पड़ेगा।” (कामनवील, मेलबोर्न)
केवल धर्म-प्रचारक ही नहीं योरोप के दार्शनिक और अन्य विद्वान भी इस सत्य को बहुत समय से अनुभव करने लग गये थे कि संसार का अन्तिम लक्ष्य एक विश्वव्यापी मानव-समाज की स्थापना करना ही है और वह एक दिन अवश्य प्राप्त होगा। फ्रान्स के महान् दार्शनिक हेनरी बर्गर्सा ने एक स्थान में लिखा था-
“हमको समझ लेना चाहिये कि तमाम मनुष्यों का ईश्वर एक ही है। उसकी एक ही झलक द्वारा, जो सब मनुष्यों को प्राप्त हो सकनी सम्भव है। पारस्परिक कलह का अन्त हो जायगा।”
इंग्लैंड के महान् इतिहासकार ‘कार्लाइल’ ने अपने च्स्द्बद्दद्धठ्ठह्य शद्ध ञ्जद्बद्वद्गह्यज् (साइन्ज आफ टाइम्स), ग्रन्थ में कहा है-
च्च्ञ्जद्धद्ग श्चद्यड्डद्बठ्ठ ह्लह्ह्वह्लद्ध, क्द्गह्ब् श्चद्यड्डद्बठ्ठ, ख्द्ग ह्लद्धद्बठ्ठद्म, द्बह्य ह्लद्धड्डह्लंक्तशठ्ठद्ग द्धड्डह्य ड्ड द्धद्बद्दद्धद्गह् खद्बह्यस्रशद्व, ड्ड द्धद्बह्लद्धद्गह्ह्लश ह्वठ्ठद्मठ्ठशख्ठ्ठ ह्यश्चद्बह्द्बह्लह्वड्डद्य ह्लह्ह्वह्लद्ध द्बठ्ठ द्धद्बद्व, द्बह्य ह्यह्लह्शठ्ठद्दद्गह्, ठ्ठशह्ल ह्लद्धड्डठ्ठ ह्लद्गठ्ठ द्वड्डठ्ठ ह्लद्धड्डह्ल द्धड्डक्द्ग द्बह्ल ठ्ठशह्ल, ठ्ठशह् ह्लद्धड्डठ्ठ ह्लद्गठ्ठ ह्लद्धशह्वह्यड्डठ्ठस्र, ड्ढह्वह्ल ह्लद्धड्डठ्ठ ड्डद्यद्य द्वद्गठ्ठ ह्लद्धड्डह्ल द्धड्डक्द्ग द्बह्ल ठ्ठशह्ल, ड्डठ्ठस्र ह्यह्लड्डठ्ठस्र ड्डद्वशठ्ठद्द ह्लद्धद्गद्व ख्द्बह्लद्ध ड्ड ह्नह्वद्बह्लद्ग द्गह्लद्धद्गह्द्गड्डद्य ड्डठ्ठद्दद्गद्यद्बष् श्चशख्द्गह्, ड्डह्य द्बद्ध ख्द्बह्लद्ध ड्ड ह्यशख्ह्स्र शह्वह्ल शद्ध ॥द्गड्डक्द्गठ्ठज्ह्य शख्ठ्ठ ड्डह्द्वशह्वह्ब्, ख्द्धद्बष्द्ध ठ्ठश ड्ढह्वष्द्मद्यद्गह् ड्डठ्ठस्र ठ्ठश ह्लशख्द्गह् शद्ध ड्ढह्ड्डह्यह्य ख्द्बद्यद्य द्धद्बठ्ठड्डद्यद्यब् ख्द्बह्लद्धह्यह्लड्डठ्ठस्र.ज्ज्
अर्थात्- “यह एक सरल, स्पष्ट और परम सत्य बात कि जिस महापुरुष में दैवी प्रज्ञा और अभी तक सर्वसाधारण से अज्ञात आध्यात्मिक शक्ति विद्यमान है, वह दस, बीस या हजार-दस हजार व्यक्तियों की अपेक्षा ही नहीं वरन् संसार के उन सभी मनुष्यों से अधिक शक्तिशाली है, जिनमें ये गुण नहीं पाये जाते। वह महात्मा एक सूक्ष्म शक्ति के प्रभाव से संसार भर में इस प्रकार दृढ़ रहता है, मानो उसके हाथ में ईश्वरीय शस्त्रागार का एक ऐसा विशेष खड्ग हो जिसके मुकाबले में संसार की समस्त सैनिक सज्जा प्रभावहीन सिद्ध हो जाय।”
इस सब का आशय यही है कि यद्यपि पश्चिमी जगत में गत सौ-डेढ़ सौ वर्षों से वैज्ञानिक सिद्धान्तों का अधिक जोर रहा है, जिसने धर्म और ईश्वर सम्बन्धी विचारों की जड़ हिला दी थी, तो भी वहाँ के जन-मानस में एक चैतन्य सत्ता के आधिपत्य और तदनुसार आचरण की भावना विद्यमान थी और वह बराबर वहाँ के विचारशील विद्वानों द्वारा प्रकट होती रहती थी। परिणाम यह हुआ कि बड़े-बड़े पदवीधारी भी उससे प्रभावित हुये और टॉलस्टाय, क्रोपाटकिन, बरट्रैण्ड रसल जैसे राजवंशों से सम्बन्धित व्यक्ति उसमें सम्मिलित हो गये और मानव मात्र की एकता और समानता का प्रतिपादन करने लगे। बरटैण्ड रसल जैसे अनीश्वरवादी ने भी सन् 1954 में एक घोषणा में स्पष्ट कह दिया-
च्च्ढ्ढ ड्डश्चश्चद्गड्डद्य ड्डह्य ड्ड द्धह्वद्वड्डठ्ठ ड्ढद्गद्बठ्ठद्द ह्लश द्धह्वद्वड्डठ्ठ ड्ढद्गद्बठ्ठद्दह्य; ह्द्गद्वद्गद्वड्ढद्गह् ब्शह्वह् द्धह्वद्वड्डठ्ठद्बह्लब् ड्डठ्ठस्र द्धशह्द्दद्गह्ल ह्लद्धद्ग ह्द्गह्यह्ल. ढ्ढद्ध ब्शह्व ष्ड्डठ्ठ स्रश ह्यश, ह्लद्धद्ग ख्ड्डब् द्यद्बद्गह्य शश्चद्गठ्ठ ह्लश ड्ड ठ्ठद्गख् श्चड्डह्ड्डस्रद्बह्यद्ग, द्बद्ध ब्शह्व ष्ड्डठ्ठ ठ्ठशह्ल, ठ्ठशह्लद्धद्बठ्ठद्द द्यद्बद्गह्य ड्ढद्गद्धशह्द्ग ब्शह्व ड्ढह्वह्ल ह्वठ्ठद्बक्द्गह्ह्यड्डद्य स्रद्गड्डह्लद्ध.ज्ज्
“मैं एक मानव की हैसियत से अन्य मानवों से आग्रह पूर्वक कहना चाहता हूँ कि- केवल यही स्मरण रखो कि तुम मनुष्य हो और शेष समस्त भेदभावों को भूल जाओ। अगर तुमने ऐसा किया तो तुम्हारे सामने एक नये स्वर्ग का द्वार खुल जायगा और यदि तुम ऐसा करने से विमुख रहे तो सिवाय ‘विश्व-व्यापी-मृत्यु’ के तुमको और कुछ नहीं मिल सकता।”
भारतीय विचारक :-
भारतीय विचारक अपने अध्यात्मवादी दृष्टिकोण के कारण सदा से विश्व मानवता के उपासक रहे हैं। इस युग में भी श्री रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानन्द, स्वामी रामतीर्थ, ठा॰ रवीन्द्रनाथ, महर्षि रमण, महायोगी अरविन्द आदि ने जो कुछ कहा है वह किसी एक देश या किसी विशेष धर्म को लक्ष्य करके नहीं कहा है वरन् उनके उपदेश संसार के सभी मनुष्यों के लिये हैं और वे यही चाहते थे कि सब लोग उनसे लाभ उठावें। यही कारण है कि सब देशों के व्यक्ति उनके पास आते थे और आध्यात्मिकता का प्रसाद ग्रहण करते थे। इन शिक्षाओं का साराँश बंगाल के ठाकुर दयानन्द ने अब से पचास वर्ष पूर्व अपनी ‘विश्व शान्ति’ नामक बंगला पुस्तक में इस प्रकार दिया था-
“मानव जाति के जीवन-इतिहास में एक संधि काल आया हुआ है। विश्व-रंगमंच पर से एक तरफ होकर प्राचीन निकला जा रहा है और दूसरी तरफ से नवीन आकर उसका स्थान ग्रहण कर रहा है। आज पुराना संसार टूट रहा है और नये का निर्माण हो रहा है। किसी भी इमारत का निर्माता पहले उसको अपने मन में बना लेता है, तब वह स्थूल रूप में प्रकट होती है। विश्व रचना के पीछे भी एक ऐसा ही ‘प्लान’ ‘डिजाइन’ या ‘स्कीम’ है। वह ‘अतिमानव’ संसार की दृष्टि से अगोचर रह कर इस नये जगत की सृष्टि कर रहा है। संसार के नर नारियों की जीवन धारा इसी योजना के प्रभाव से परिवर्तित हो रही है। पर वे अधिकाँश में अज्ञान, अनिच्छा, ताड़ना से बाध्य होकर बदल रहे हैं। इन लोगों का व्यवहार नदी की धारा के विरुद्ध तैरने के समान है, इसी से सर्वत्र इतनी अशान्ति, दुःख, कष्ट दिखाई पड़ रहे हैं। यदि वे भगवान की योजना को समझ कर परिपूर्ण इच्छा से धारा के साथ तैरने लगें तो संसार के सब दुःख मिट सकते हैं और विश्व-मानवता का प्राकट्य होकर सर्वत्र सुख -शान्ति दिखाई पड़ने लगेगा।”
थियोसॉफी की आध्यात्मिक विचार-धारा-
भारतीय धर्म को विश्व-व्यापी रूप देने में ‘थियोसोफिकल सोसाइटी’ ने बड़ा काम किया है। यद्यपि यह प्रचार-कार्य मैडम ब्लेवटस्की, कर्नल अल्काट, एनी बेसेन्ट जैसे विदेशी महानुभावों ने चलाया, पर इसमें सन्देह नहीं कि उन्होंने भारतीय धार्मिक आदर्शों को बहुत परिष्कृत रूप देकर सभ्य-संसार के सभी देशों में सुपरिचित बना दिया। थियोसॉफी का आधार भारतीय अध्यात्म ही है और इसलिये इस समाज का नाम हिन्दी में ‘ब्रह्मविद्या समाज’ ही लिखा जाता है। आध्यात्मिकता के आधार पर यह भी एक ही मानव-जाति और विश्व-मानव की अनुयायी है। इसका समर्थन करते हुये इसके वर्तमान अध्यक्ष श्री जिनराजदास ने एक पुस्तिका में लिखा है-
“मनुष्य जाति जीवन की एकता को भूल कर सुख और शान्ति की खोज में, नाना प्रकार के स्वार्थ साधन में निरन्तर लगी रहने पर भी सुख और शान्ति के निकट नहीं पहुँच पा रही है, उल्टे ईश्वर की सर्वव्यापकता के सत्य-सिद्धान्त को भूल कर अकेले अलग-अलग सुखी बनने के लिये जितना ही अधिक हाथ पैर मार रही है, वह उतना ही जीवन की समस्याओं को जटिल बना कर उसके जाल में फँस कर अपना नाश कर रही है। जीवन की समस्याएँ आज ऐसी उलझन में पड़ गयी हैं कि मनुष्य-मनुष्य में, जाति-जाति में, सम्प्रदाय-सम्प्रदाय में, राष्ट्र-राष्ट्र में, सम्पूर्ण मनुष्य जाति परस्पर संघर्ष की ज्वाला में भस्म होने को दौड़ी जा रही है। यह ब्रह्म विद्या ही एक ऐसा मार्ग है जिसके अध्ययन और आचरण द्वारा इस समय सम्पूर्ण जीवन की एकता, और मनुष्य-मनुष्य में चाहे वह स्त्री हो या पुरुष, हिन्दू हो या मुसलमान, बौद्ध हो या ईसाई, एशिया का रहने वाला हो या योरोप, अफ्रीका और अमेरिका का, बड़ा हो या छोटा, अमीर हो या गरीब सब में एकता और भ्रातृभाव की स्थापना हो सकती है।”
सत्य-समाज का बुद्धिवाद और तर्कवाद-
वर्तमान समय में सत्य-समाज के संस्थापक ने विश्व धर्म, विश्व-राष्ट्र और विश्वभाषा की चर्चा उठाई है और उनके सिद्धान्त भी बहाई-समाज के समान मनुष्यों के भाई चारे और शान्ति की शिक्षा देने वाले हैं। यद्यपि अभी देश में उनका प्रचार अधिक नहीं हो सका और सत्य-समाज का संगठन कुछ सौ या हजार लोगों तक ही सीमित है, पर तो भी उनके विचार ध्यान देने योग्य और महत्वपूर्ण हैं। उनकी पहली विशेषता तो यह है कि वे भारतीय परिस्थिति को ध्यान में रख कर निश्चित किये जाते हैं और दूसरी यह कि किसी खास धर्म से सम्बन्ध न जोड़ कर सर्व-धर्म-समभाव की भावना से प्रकट किये गये हैं। उनका यह भी कहना है कि “कोई शास्त्र मेरे लिये प्रमाण नहीं, मैं इस दुनिया को ही महा शास्त्र मानता हूँ”-
भाई पढ़ले यह संसार।
खुला हुआ है महा शास्त्र यह शास्त्रों का आधार।
“विकासवाद के आधार पर जब धर्मों का अध्ययन किया जाता है तो विदित होता है कि जिस युग में मनुष्य का जितना विकास हुआ उस युग में पैदा होने वाला धर्म भी उतना ही विकसित था। जंगली-युग का धर्म भी जंगली ढंग का होगा वैज्ञानिक युग का वैज्ञानिक ढंग का। इसलिये मेरी दृष्टि में न तो कोई ‘धर्म’ पूर्ण सत्य होता है न सदा-सर्वदा के लिये उपयोगी। वह अपने देश काल की माँग पूरी करता है। जिस प्रकार मानव जाति का क्रमशः विकास हुआ उसी प्रकार धर्म का भी विकास धीरे-धीरे हुआ है। इसलिये मैं प्राचीनता के कारण किसी धर्म को महत्व नहीं देता वरन् कोई अन्य कारण न हो तो प्राचीनता से उसके अविकसित होने की ही कल्पना करता हूँ।
“इतना होने पर भी मैं राम, कृष्ण, महावीर, बुद्ध, जरथुस्त्र, ईसा, मुहम्मद, कार्लमार्क्स आदि का सम्मान करता हूँ, उनकी पूजा करता हूँ, उनकी मूर्ति बना कर रख लेता हूँ। इसका कारण यह है कि उनको अपने युग का प्रवर्तक मानता हूँ। एक बात यह भी है कि संयम आदि के क्षेत्र में आज का मनुष्य इतना विकसित नहीं हो गया है कि इन महात्माओं के जीवन से प्रेरणा न ले सके।”
इस प्रकार सत्य-समाज के संस्थापक प्राचीन अथवा अपने पराये धर्म का आग्रह दूर करके विज्ञान, तर्क, उपयोगिता, मानव मात्र का कल्याण आदि के आधार पर ही विश्व-धर्म की प्रतिष्ठा करना चाहते हैं। वर्तमान में प्रचलित विशेष समुदाय के लिये पृथक धर्म को आप बिल्कुल स्वीकार नहीं करते-
“हाँ, मैं ऐसे युग की कल्पना करता हूँ जिसमें मनुष्य को ‘धर्म’ की जरूरत न रहेगी मनुष्य मात्र एक सुसंस्कृत कुटुम्ब के समान बन जायगा। इसी प्रकार यह भी कल्पना की जा सकती है कि एक युग ऐसा आयेगा जब मनुष्य संयम आदि के कारण बीमार न होगा, जिसके लिए अस्पताल, डॉक्टर, वैद्य आदि की जरूरत होती है। ये सब अच्छी कल्पनाएँ हैं, इनको आदर्श मानकर आगे बढ़ने में प्रगति ही होती है। फिर भी जब तक मनुष्य का उतना विकास नहीं हो पाया है तब तक शरीर-चिकित्सा की व्यवस्था रहेगी ही। उसी तरह अभी धर्म-संस्था का रहना भी अनिवार्य है।”
तो भी सत्य समाज संसार में एक ही धर्म, समाज, राज्य, अर्थनीति, भाषा आदि का एक होना अनिवार्य बनता है। उसकी कितनी ही पुस्तकों में नये विश्व-धर्म का आदर्श स्पष्ट कर दिया गया है। ‘नई दुनिया का नया समाज’ शीर्षक कविता में वे कहते हैं-
जगत में आया सत्य-समाज,
इकट्ठे करने सब सुख साज।
दिखाता मानवता का राज,
नई दुनिया का नया समाज।
अंध श्रद्धाओं से अति दूर किये,
निष्पक्ष विवेक विचार।
समन्वय नय से जो भरपूर,
भरा है न्याय भरा है प्यार।
यहाँ पूजित होता विज्ञान।
रूढ़ि का यहाँ न अत्याचार।
साँप्रदायिकता यहाँ न पुष्ट,
जगत्कल्याण धर्म का सार।
न मेरे-तेरे का अभिमान,
न्याय की विजय सत्य का राज।
दिखाता मानवता का साज,
नई दुनिया का नया समाज॥
यहाँ सब एक, यहाँ सब नेक,
समन्वय से सब का सम्मान।
सकल शास्त्रों का शास्त्र विवेक,
देव का देव सत्य भगवान्॥
पुरुष नारी का दर्जा एक,
लिंगमद का न किसी को ध्यान।
एक ही जाति एक ही राष्ट्र,
एक सब मानव की संतान॥
बुलायें यहीं स्वर्ग-अपवर्ग,
यहीं मिल जायें जब सुखसाज।
दिखाता मानवता का राज,
नई दुनिया का नया समाज॥
इसमें जो एक मानव-जाति और एक-सी सभ्यता संस्कृति, नैतिकता आदि का आदर्श उपस्थित किया है वह सराहनीय है, और प्रत्येक विश्व-भावना का प्रेमी उसका अभिवादन ही करेगा। फिर भी कार्य रूप में इसका परिणाम अत्यन्त अल्प निकल रहा है। इसके कई कारण हो सकते हैं, जिनमें एक यह भी हो सकता है कि अपनी सच्चाई प्रतिपादित करने के लिये इनकी कई रचनाओं में दूसरों का खण्डन भी किया गया है। यह प्रवृत्ति विश्व-प्रेम और विश्व-मानवता की भावना के अनुकूल नहीं है और इससे विरोधी वातावरण की ही वृद्धि होती है। जिससे प्रगति रुक जाती है और कार्यकर्ता व्यर्थ के खंडन मडन में फँसकर अपने उद्देश्य से भटक जाता है। यह अवस्था केवल इसी समाज की नहीं है, वरन् भारतवर्ष में कई अवतार और ‘विश्वात्मा, नामधारियों की भी ऐसी ही हालत हो रही है। वे बार-बार भारतवर्ष ही नहीं समस्त संसार के उद्धार करने की घोषणा करते रहते हैं, पर वर्षों बीत जाने पर भी अभी कोई कहने लायक काम करके नहीं दिखा सके हैं। यह बड़े दुःख की बात है। जिन समाजों का जन्म ही खंडन-मंडन के लिये हुआ है और जो अपने जन्म से आज तक इसी को गौरव का विषय समझे हुये हैं उनके लिये तो कुछ कहने की आवश्यकता ही नहीं है, पर जिन लोगों का उद्देश्य वर्तमान संकटकाल में मानव-जाति को सत्य मार्ग का दर्शन कराना, मानव-धर्म का सन्देश सुनाना है, वे भी यदि अन्य मानवतावादी धर्मोपदेष्टा की निन्दा या विरोध करें तो इसे अनुचित ही कहा जायेगा। ऐसे अनुचित और स्वार्थ भाव से दूषित वाद-विवाद का क्या परिणाम होता है इस सम्बन्ध में गोस्वामी तुलसीदास की एक उपमा हमको बहुत ठीक जान पड़ी-
हरित भूमि तृण संकुलित, समुझि परै नहीं पंथ।
जिमि पाखण्ड विवाद ते, लुप्त होंय सद्ग्रंथ॥
निस्सन्देह धर्म और जीवन का सच्चा मर्म इस प्रकार के खंडन-मंडन में लुप्त हो जाता है। इसीलिये सच्चे धर्म सेवी अब भी अपना काम बिना किसी की निन्दा, कुत्सा के करते चले जाते हैं, और यह दुनिया इतनी बड़ी है कि उन सबको अपनी योग्यतानुसार पर्याप्त सेवा क्षेत्र प्राप्त हो रहा है। इसलिये हम एक ‘विश्व-धर्म’- ‘विश्वात्मा’ में विश्वास रखने वाले सब महानुभावों तथा संस्थाओं से यही अनुरोध करेंगे कि वे निन्दात्मक प्रवृत्ति, अनुचित प्रतिस्पर्धा को त्याग कर जहाँ तक सम्भव हो सहयोगपूर्वक विश्व-समाज की स्थापना के लिये प्रयत्न करते रहें।
आध्यात्मिक-धर्म ही स्थिर रहेगा :-
प्राचीन और नवीन व्याख्याकारों की बातों पर गम्भीरता से विचार करने पर यह तथ्य तो स्पष्ट ही है कि धर्म और अध्यात्म का सम्बन्ध अनिवार्य है। भविष्य में धर्म का रूप चाहे कितना भी बदल जाय और उसको विज्ञान तथा तर्क के अनुकूल बना दिया जाय, पर उसकी आधार शिला अध्यात्म ही रहेगी। शायद कुछ पाठक कहने लगें कि भारतवर्ष का धर्म तो पूर्णतया आध्यात्मिक रहा, पर जैसी दुर्गति इसकी हुई वैसी किसी की नहीं हुई। ऐसी शंका करने वालों से हम यही निवेदन करेंगे कि वे ‘अध्यात्म’ और ‘अन्धविश्वास’ को एक ही मानने न लग जायें। भारतवर्ष में जब तक अधिक या कम अध्यात्म रहा तब तक यह ‘जगतगुरु’ और ‘चक्रवर्ती’ माना जाता रहा पर जब अध्यात्म का स्थान ‘अन्धविश्वास, ढोंग, गुरुडम जातिवाद, ने ले लिया तो इसका पतन हो गया।
अब भी भारतवर्ष अध्यात्म से सूना नहीं है और व्यक्तिगत रूप में यहाँ अनेक महापुरुष ऐसे मिल सकते हैं जो स्वार्थ त्याग कर अपना समस्त जीवन विश्व हित के लिये अर्पण कर चुके हैं। इसलिये जब अवसर आयेगा तो भारतवर्ष ही धर्म के विषय में संसार का मार्ग-दर्शन करेगा। पर इससे पहले हमारा कर्तव्य है कि स्वयं अपने देश की अध्यात्म-धारा को परिष्कृत करें और लोगों को सच्चे अध्यात्म का सन्देश सुनायें। यह सच है कि यहाँ की साधारण जनता में भी अध्यात्म के कुछ बीजाँकुर मौजूद हैं, पर उसमें अन्धविश्वास और हानिकारक रूढ़ियां इतनी अधिक हैं कि वह बीज पनप नहीं पाता और व्यवहार में वे अन्य देश वालों से कहीं अधिक भौतिकतावादी सिद्ध होते हैं। इसलिये हमको पहले भारतीय जनता में और फिर अन्य देशों के निवासियों में आध्यात्मिक भावना जागृत करने का प्रयत्न करना चाहिये।
गायत्री-परिवार में जिस युग निर्माण योजना का प्रचार किया जा रहा है उसका उद्देश्य अपने देशवासियों को आध्यात्मिकता और विश्व-मानवता का प्रशिक्षण देना है। वैसे यह काम बहुत बड़ा और विशाल साधनों से ही पूरा हो सकने वाला है, पर यदि छोटी संस्थायें भी एक सीमित क्षेत्र में इन सिद्धान्तों का प्रचार और शिक्षा देने की व्यवस्था कर सकें तो एक बहुत बड़ा काम हो सकता है। इसलिये हम फिर यही कहेंगे यह विश्व-समाज की योजना तभी सफल होगी जब अनेक कार्यकर्ता और संस्थायें शुद्ध भाव से इस प्रयत्न में संलग्न होंगे और यह भावना रखते हुये कि ‘यह भगवान का काम है’ आपस में सच्चा सद्भाव और सहयोग रखते हुये संयम की ओर अग्रसर होंगे।
“जातीय या राष्ट्रीय पक्षपात केवल धोखा और स्पष्ट पथ है, क्योंकि ईश्वर ने हम सबको एक ही जाति में उत्पन्न किया है। आरम्भ में भिन्न-भिन्न भू-प्रदेशों की न कोई परिधि थी और न उनकी कोई सीमा रेखा थी। कोई जाति किसी भू-प्रदेश की विशेष स्वामिनी न थी। ईश्वर की दृष्टि में विविध जातियों में कोई भेदभाव न था। फिर मनुष्य इस प्रकार के पक्षपातों के शिकार किस लिये बनते हैं? ऐसे धोखे के कारण उत्पन्न हुये युद्ध को हम कैसे जारी रख सकते हैं? ईश्वर ने मनुष्यों को इसलिये उत्पन्न नहीं किया कि वह एक दूसरे का विनाश करते रहें। प्रत्येक जाति, वंश और सम्प्रदाय अपने स्वर्ग स्थित पिता के प्रसाद का एक-सा भाग प्राप्त करते हैं। पिछले समयों में कहा जाता था कि अपने देश से प्रेम रखना ही धर्म या विश्वास है परन्तु अब ईश्वरीय आदेश के आधार पर हम कहते हैं कि उस मनुष्य का विशेष महत्व नहीं जो केवल अपने देश से प्रेम रखता है, बल्कि महिमा के योग्य वह आदमी है जो सारे संसार से प्रेम रखता है।”
इन शब्दों में एक मानवतावादी सन्त ने संसार के ऊपर छाये हुये भयंकर संकट और उसको दूर करने का उपाय प्रकट कर दिया है। यद्यपि भारतवर्ष में अभी पचास वर्ष पहले हम ‘स्वदेश-प्रेम’ के श्रद्धायुक्त गाने गा चुके हैं, पर तब भी हमारा उद्देश्य यह नहीं था कि हम दूसरे देशों से घृणा करें या उनको अपना जन्मजात शत्रु मान लें। इसके विपरीत हमारे स्वाधीनता-संग्राम के संचालक महात्मा गाँधी ने सदा यही कहा कि “हम अँगरेज जाति और इंग्लैंड से कभी द्वेष या घृणा नहीं कर सकते, क्योंकि उसने हमको ऐसे अनेक नर-रत्न दिये हैं जिन्होंने संसार की सेवा करने में, उसे उन्नत बनाने में, मानवीय ज्ञान की वृद्धि करने में अपना जीवन अर्पण कर दिया है। हम भी उससे लाभ उठा कर आज प्रगति-पथ पर अग्रसर होने में समर्थ हो रहे हैं।”
महात्माजी की यह मनोवृत्ति कोई नवीन या निराली न थी, वरन् भारतीय आदर्श सदा से यही रहा था। जिस जाति ने हजारों वर्ष पहले ‘वसुदैव कुटुम्बकम्’ का जयघोष किया, जिसने ‘चक्रवर्ती’ पदवी प्राप्त करके किसी राष्ट्र या जाति को मिटाने का दुराग्रह नहीं किया, जिसने आक्रमणकारी विदेशियों को भी शान्ति स्थापन हो जाने के बाद अपने में सम्मिलित कर लिया, वह जातीय-घृणा की समर्थक कैसे हो सकती थी? यद्यपि भारतवासियों को पिछले हजार वर्षों में विदेशी शासन के कारण बहुत से कष्ट और हानि सहन करनी पड़ी, पर उसने अपने इस प्राचीन आदर्श की अवहेलना न की। अब भी स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद से ही वह लगातार विश्व-शान्ति, संसार के समस्त राष्ट्रों के संगठन तथा सब में अधिकाधिक सहयोग के लिये प्रयत्नशील रहा है।
विश्व-प्रेम और स्वदेश प्रेम में ऐक्य :-
यद्यपि कुछ संकीर्ण विचारों के अदूरदर्शी और कट्टरपन्थी इस मानवोचित विचार धारा के महत्व को न समझ कर साम्प्रदायिकता, राजनीतिक दलबन्दी, पृथकतावाद, फूट तथा द्वेष किन्हीं गीत गाते रहते हैं और विश्व-शाँति के अनुयाइयों को कल्पना लोक में विचरण करने वाला अथवा जीवन-संग्राम से भयभीत होने वाला बतलाते हैं। पर हम इसके लिये भी उनकी निन्दा नहीं करते। मतभेद का रहना स्वाभाविक ही है और सब लोग एक साथ किसी उच्च-आदर्श का पालन करने को तैयार भी नहीं हो सकते। फिर भी हममें और उनमें कोई बड़ा अन्तर नहीं है। विश्व-समाज में विश्वास रखने का यह अर्थ नहीं कि हम अपने देश की सेवा और हित कामना करने से विमुख हो जायें। हमारा देश भी विश्व का एक अंग है, इसलिये यह कैसे सम्भव है कि हम विश्व-सेवा का दावा करते हुये अपने देश की सेवा न करें। वरन् हम में से अधिकाँश को ऐसी परिस्थितियाँ प्राप्त होने की कोई सम्भावना नहीं जब कि हम विदेश जाकर विश्व-व्यापी समस्याओं के समाधान में प्रत्यक्ष भाग ले सकने में समर्थ हो सकें। ऐसी दशा में हमारा सेवा-क्षेत्र प्रायः अपना देश ही रहेगा और हम अपने निकटवर्ती व्यक्तियों की सेवा करके ही विश्व-सेवा के आदर्श में भागीदार बन सकेंगे।
यह आध्यात्मिक मार्ग की बहुत बड़ी विशेषता है। कर्म के समान होने पर भी फल हमारी मनोवृत्ति के अनुसार अच्छा या बुरा होगा। जब हम लूटमार के अभिलाषी किसी आक्रमणकारी के विरुद्ध युद्ध करते हैं, तो प्रकट में दोनों पक्षों के सैनिकों की स्थिति एक-सी होती है, दोनों ही शस्त्रों का प्रयोग करके एक दूसरे को मारने का प्रयत्न करते हैं, पर मनोवृत्ति में अन्तर होने से एक आततायी और दूसरा न्याय रक्षा के लिये बलिदान कहा जाता है। इसलिये हमारा आग्रह यही है कि अपने देश के सच्चे सेवक रहते हुए आप ‘विश्व-मानव’ के महत्व को भी समझिये। हम भारतवासी तो ‘भगवत् गीता’ के सिद्धाँतों के अनुयायी हैं जिसमें भगवान ने विराट रूप दिखला कर यह बतला दिया है कि यह समस्त संसार वास्तव में एक ही स्रोत से उत्पन्न हुआ है और इसमें भिन्नता, अन्तर का भाव रखना अज्ञान है। भगवान को जड़ और चेतन के बीच भी एकता, प्रेम-भाव रखने का उपदेश देते हैं, फिर अगर हम मनुष्य मात्र को अपना भाई मान कर विश्व-निर्माण में भाग लें, उसका समर्थन करें तो इसमें ‘सनक’ की क्या बात हो सकती है?
संसार का विभाजन कृत्रिम है-
जैसा आरंभ में कहा जा चुका है वर्तमान समय में राष्ट्रों का जो विभाजन हम देख रहे हैं वह कृत्रिम है। जब सृष्टि का आरंभ हुआ अथवा जब से मानव-जाति पृथ्वी पर निवास करने लगी, तब विभिन्न देशों की कोई सीमा नियत न थीं, न कोई जाति किसी विशेष भू-खण्ड की अधिकारी मानी जाती थी। वरन् जब तक कृषि की जानकारी और भली प्रकार प्रचलन न हो गया तब तक एक मनुष्य स्वयं ही एक स्थान पर घर बनाकर नहीं रहने लगते थे। जब वहाँ किसी तरह की असुविधा होते देखते या कहीं उससे अधिक सुविधा वाले स्थान को पा जाते तो स्थान परिवर्तन कर लेते थे, और इसके लिये सैकड़ों मील की यात्रायें करते थे। इस आवागमन में विभिन्न मनुष्य समुदाय एक-दूसरे से मिल भी जाते थे और कभी दो-चार टुकड़ों में भी बंट जाते थे। इस कारण उस समय मनुष्य जाति एक ही मानी जाती थी और उसका नेता ‘मनु’ कहा जाता था। संसार के सबसे पुराने ग्रंथ माने जाने वाले वेद में, जो आदिकालीन मानव-सभ्यता का हजारों वर्ष पुराना एकमात्र लिखित विवरण है, कहा है-
समानोमंत्र समितिः समानी समानं मनः सह चित्तमेषाम्।
समानं मंत्रमभि मन्त्रये वः समानेन वो हविषा जुहोमि॥
समानी व आकूति समाना हृदयानि वः।
समानमस्तु वो मनो यथा व सुसहासति॥
(ऋग्वेद 10-12-191)
अर्थात् ‘सब मनुष्यों का हार्दिक भाव, संगठन, विचार, चित्त एक समान हों और ये सब एक ही उद्देश्य से प्रेरित होकर कर्म करें। तुम्हारे व्यवहार, हृदय, मन में एकता रहे और तुम एकमत होकर सुदृढ़ सहयोग तथा संगठन पूर्वक रहो।’
इसमें किसी विशेष जाति, वर्ण अथवा मजहब का उल्लेख नहीं है। उस समय मनुष्यों में इस प्रकार के अन्तर उत्पन्न भी नहीं हुये थे। यद्यपि उस समय भी कभी-कभी खाद्य सामग्री अथवा अन्य प्रकार की सुविधाओं के लिये दो अपरिचित समुदायों में मुठभेड़ हो जाती थी और वे पत्थर, लकड़ी आदि से लड़ भी लेते थे, पर कोई किसी को नीचा, असभ्य, पतित, बहिष्कृत नहीं समझता था। ये सब ‘मनुष्य’ ही और सामान्य अवस्था में एक-दूसरे के साथ समानता का ही बर्ताव करते थे।
इतना ही नहीं यहाँ के अनेक मनीषियों की भावना यहाँ तक थी कि जब हम परमात्मा के अंश हैं- उसके सन्तान रूप में हैं तो हम किसी एक स्थान अथवा किसी विशेष समुदाय से बंध कर कैसे रह सकते हैं? इसलिये उनके अन्तरतम् से यह ध्वनि निकलती थी-
माता च पावर्ती गौरी पिता देवो महेश्वरः।
भ्रातरो मानवाः सर्वे स्वदेशो भुवनत्रयम्॥
निस्संदेह भावना की यह बहुत ऊंची उड़ान है। पर भारतीय संन्यासी का यही आदर्श है कि वह किसी भी वस्तु, स्थान व व्यक्ति में अपनी आसक्ति न रहने दें। उसके लिये आज्ञा दी गई है कि जंगल में भी कभी एक पेड़ के नीचे दो रात न सोवे। ऐसे सर्व-त्यागियों के लिये तीनों लोक घर के समान हों तो क्या आश्चर्य है? वैसे भी प्रत्येक आस्तिक-ईश्वर भक्त के लिये यह आदर्श सदैव स्मरण करने योग्य है।
पर सभ्यता पर सम्पत्ति का वृद्धि के साथ दुनिया में अधिकार लिप्सा और बंटवारे की प्रवृत्ति बढ़ती गई और लोग अपने अधिकार क्षेत्र के चारों ओर दीवारें खड़ी करने लगे। उनमें से हर एक की यह अभिलाषा रहती है कि मेरा इलाका (अधिकार क्षेत्र) दूसरों से बड़ा हो जाय और इसके लिये यह अकारण दूसरों पर आक्रमण और लूटमार की प्रवृत्ति को अपनाता रहता है। यही आजकल के युद्धों का कारण है। आज इसने बहुत विशाल तथा जटिल रूप धारण कर लिया है, जिसके कारण संसार भर में एक अभूतपूर्व हलचल और आतंक का दृश्य दिखलाई पड़ रहा है। इस प्रकार के युद्ध की भयंकरता अनैतिकता का वर्णन करते हुये विश्व-शाँति के एक महान उपासक ने कहा है-
‘मुझे यह जान कर आश्चर्य होता है कि मनुष्यों में अभी तक यह राक्षसपन विद्यमान है। अन्यथा यह कैसे संभव हो सकता है कि मनुष्य प्रातःकाल से सायंकाल तक लड़ाई करते जायें एक दूसरे की हत्या करें और अपने ही जाति-भाइयों का खून बहायें। और वह भी किसलिये? केवल किसी जमीन के टुकड़े को अपने अधिकार में करने के लिये। पशु भी जब लड़ते हैं तो उनकी लड़ाई का कोई न कोई पूर्ववर्ती उचित कारण होता है। यह कैसी भयंकर बात है कि मनुष्य, जो उच्चतर ज्ञान-राज्य के अधिकारी हैं, एक भूखण्ड की प्राप्ति के निमित्त अपने ही मानव-भाइयों को मार डालने या पद दलित करने पर उतरे आयें, इतनी उच्च श्रेणी का प्राणी भूमि जैसी छोटी-सी वस्तु प्राप्त करने के लिये लड़ाई करे।
‘भूमि किसी एक की नहीं बल्कि सबकी है। भूमि मनुष्य का घर नहीं, यह तो उसका समाधि-स्थान है। मनुष्य कितना ही महान विजयी क्यों न हो, कितने ही देशों को अपने आधीन क्यों न कर ले, पर वह इन विध्वंस किये भू-प्रदेशों में से किसी एक को भी पूर्ण रूप से अपने अधिकार में नहीं रख सकता, सिवाय उस छोटे से टुकड़े के जहाँ पर उसकी समाधि बनाई जाती है। युद्ध तो मनुष्य वे अपनी वासना को तृप्त करने के लिये बनाया है। केवल थोड़े से व्यक्तियों की वासना की पूर्ति के लिये अनगिनती घर बरबाद किये जाते हैं और हजारों-लाखों स्त्री-पुरुषों के हृदय टुकड़े-टुकड़े कर दिये जाते हैं।’
जब से अणुशक्ति का अस्त्र के रूप में प्रयोग करने का आविष्कार हो गया है तब से तो यह अवस्था बहुत ही गंभीर हो उठी है। अब तक युद्धों के फलस्वरूप यदि हजारों या लाखों मनुष्यों के मरने की संभावना रहती थी तो अब एक ही घंटे में दस-बीस करोड़ के मरने या पूरे देश के नष्ट हो जाने की कल्पना किसी भी समय सत्य सिद्ध हो जाना संभव हो गया है। जब से यह खतरा उत्पन्न हुआ है तब से एक विश्व-राज्य और विश्व समाज की माँग बहुत अधिक जोर पकड़ गई है। अब सभी समझदार व्यक्ति चाहे वे किसी भी देश और धर्म के क्यों न हों वह अनुभव करने लगे हैं कि जब विज्ञान ने मनुष्य के हाथ में इतनी बड़ी शक्ति दे दी है तब उसका कल्याण इसी में है कि पृथक जातीयता और राष्ट्रीयता के भेदों को मिटाकर एक संघ-शासन को ही समस्त पृथ्वी की शासन व्यवस्था सौंप दी जाय। अन्यथा यदि किसी युद्धोन्मादी ने सच्चे या झूठे बहाने से अणु-अस्त्र से आक्रमण आरंभ कर दिया तो 24 घंटे के भीतर ही इस हरी भरी धरती का अधिकाँश भाग श्मशान में परिणित हो जायेगा। इस संबंध में वास्तविक स्थिति क्या है इसका कुछ परिचय श्रीमती कैथिलन लाँसडेल ने अपनी ‘क्या विश्व शाँति संभव है?’ नामक पुस्तक में इन शब्दों में दिया है-
‘यदि भविष्य में परमाणु तथा उद्जन अस्त्रों से सुसज्ज संसार में कोई सिरफिरा आक्रमणकारी हो जाय, तो वह संसार को और उसके साथ-साथ अपने राष्ट्र को भी नष्ट कर देगा और उसे किसी चमत्कार के सिवा और कोई ऐसा करने से न रोका सकेगा। ऐसा होने पर परमात्मा ही हमारी रक्षा करे। निरस्त्र संसार में ऐसा नहीं हो सकता। ऐसे सिर-फिरे लोग शस्त्रों से सुसज्ज संसार में ही पैदा होते हैं। यदि भविष्य में आणविक युद्ध होगा तो अधिक संभव यही है कि उसका सूत्रपात भय की भावना करेगी।’
आज यह अनुमान पूरी तरह सही सिद्ध हो रहा है। चीन कई दिन से यह धमकी दे रहा है कि उसने कई हजार मील तक मार करने का प्रक्षेपणास्त्र बना लिया है और हाल ही में उसने इसका परीक्षण भी किया था। चीन के सिर पर इस समय युद्ध का भूत जिस प्रकार सवार है उससे दुनिया के सभी राष्ट्र चिंतित हो रहे हैं। वह छोटे-बड़े सभी राष्ट्रों को चुनौती दे रहा है और सब के दूतावासों से छेड़खानी कर रहा है। भारत की सीमा पर तो उसने बिना कारण फौज जमा ही कर रखी है और चाहे जब गोले-गोली छोड़ कर वातावरण को गर्म बनाता रहता है। इस परिस्थिति से अमरीका भी भयभीत हो गया है और अपनी रक्षा का तैयारी कर रहा है। इस संबंध में अभी जो समाचार अखबारों में छपा है उसमें कहा गया है-
‘सैनफ्राँसिस्को (अमरीका) 19 सितम्बर। अमरीका ने चीन के संभावित आणविक हमले से बचने के लिये 5 अरब डालर के खर्च पर प्रक्षेपणास्त्र विरोधी व्यवस्था लागू करने का निश्चय किया है। यह घोषणा अमरीका के प्रतिरक्षा मंत्री श्री मैकनमारा ने कल यहाँ की थी। श्री मैकनमारा ने यह चेतावनी भी दी कि यदि चीन ने अमरीका पर आक्रमण करने का पागलपन किया तो अमरीका न केवल उसकी सैन्य शक्ति नष्ट कर देगा वरन् अमरीकी प्रत्याक्रमण से उसका समाज भी नष्ट हो जायेगा। उन्होंने आशा प्रकट की कि चीन ऐसी गलती न करेगा, पर उस स्थिति को भी नजर-अंदाज नहीं किया जा सकता जब चीन सही स्थिति का मूल्याँकन करने में गलती कर जाये।
‘श्री मैकनमारा ने कहा कि चीन अपनी कठिनाइयों के बावजूद आणविक हथियारों और इनकी प्रक्षेपण प्रणाली के विकास के लिये बड़े साधन जुटा रहा है।
‘उन्होंने सोवियत संघ से भी अपील की कि वह भी आक्रमण तथा बचाव दोनों प्रकार की प्रक्षेपणास्त्र प्रणालियों के संबंध में अमरीका से बातचीत करके उन्हें सीमित कर दे। उन्होंने कहा कि सोवियत संघ की प्रक्षेपणास्त्र रोकने की प्रणाली इतनी तगड़ी नहीं है कि वह अमरीकी आक्रमण को सोवियत संघ के भीतर घुसने और वहाँ क्षति पहुँचाने से रोक सके। फिर भी इस तथ्य को स्वीकार करना ही पड़ेगा कि प्रथम अमरीकी आक्रमण के बावजूद रूस अमरीका को नष्ट करने की क्षमता रखता है।’
श्री मैकनमारा ने बताया कि अमरीका के पास अभी 1000 प्रक्षेपणास्त्र राकेट, 41 पोलारिस पनडुब्बियाँ 656 प्रक्षेपणास्त्र राकेटों से सज्जित तथा लगभग 600 दूर मारक बमवर्षक हैं जिनका 40 प्रतिशत सदा कार्यवाही के लिये तैयार रहता है।
इसी प्रकार दो सप्ताह पहले रूस की तरफ से पश्चिमीय देशों को चेतावनी देते हुए कहा गया था कि अगर वे रूस के विरुद्ध कोई कार्यवाही का विचार कर रहे हैं तो वह उन्हीं के लिये घातक सिद्ध होगा। समाचार इस प्रकार है-
‘मास्को 3 सितम्बर। सोवियत उप-प्रतिरक्षा मंत्री मार्शल निकोलाई क्राइलोव ने चेतावनी दी है कि यदि पश्चिमी देशों ने नया युद्ध शुरू किया तो रूस में जो आणविक प्रक्षेपणास्त्र पश्चिमी देशों के घनी आबादी वाले प्रशासकीय तथा राजनैतिक केन्द्रों की ओर निशाना साधे हुये हैं, वे छोड़ दिये जायेंगे। रूस के सरकारी समाचार ‘इजेवेस्तिया’ के रविवारीय संस्करण के एक लेख में मार्शल क्राइलोव ने यह मत प्रकट किया है कि सैनिक संस्थानों की तरह प्रशासकीय केन्द्र (राजधानी) भी वैध-लक्ष्य माने जाते हैं। सोवियत समाचार एजेंसी ‘तास’ के अनुसार सरकार ने राकेट परीक्षणों की एक नई शृंखला प्रारंभ किये जाने की भी घोषणा की है और सभी देशों के विमानों तथा जहाजों को चेतावनी दी है कि सोवियत पूर्वी तट से लगभग 1500 मील के घेरे में आने से बचें।’
इन सब खबरों का वास्तविक आशय क्या है? यही कि ये बड़े-बड़े राष्ट्र भावी विनाश से भयभीत होकर अनगिनती धन युद्ध की तैयारी तथा आक्रमण से बचाव की विधियों पर खर्च कर रहे हैं। अमरीका ने जितनी युद्ध सामग्री अपने पास बतलाई है उसमें अगर कई खरब रुपया भी खर्च हो गया हो तो आश्चर्य नहीं। यह तो उसने केवल अणुबमों को फेंकने की सामग्री का विवरण बतलाया है, इनके अतिरिक्त जो कई हजार अणुबम और हाइड्रोजन बम उसने तैयार करके रखे हैं, उनमें से एक-एक बम पर कई करोड़ की लागत आती है। इस प्रकार इन बड़े कहलाने वालों का आर्थिक भार से कचूमर निकल जाय तो भी आश्चर्य नहीं।
फिर इतना रुपया टैक्स के रूप में देने से प्रजा की क्या हालत होगी यह भी विचारणीय है। कुछ समय पहले प्रकाशित एक सूची से विदित होता है कि कौन देश अपने कुल व्यय (बजट) का कितना प्रतिशत शस्त्रीकरण पर खर्च करता है-
आस्ट्रेलिया 1.2 प्रतिशत, कनाडा 2.6, फ्राँस 26, जर्मनी 13, इटली 24, जापान 35, नार्वे 15, स्वीडेन 10, इंग्लैंड 12, अमेरिका 12, अमरीका 18, रूस 6।
ये आँकड़े 1951 के हैं। जब कि अणु अस्त्रों का निर्माण आरंभ ही हुआ था। इसमें अब तक न जाने कितना अन्तर पड़ गया होगा। उदाहरणार्थ सन् 1955 में ही इंग्लैण्ड का प्रतिरक्षा व्यय 12 से बढ़ कर 32 तक पहुँच गया था।
इससे पाठक सहज ही में अनुभव कर सकते हैं कि आज संसार की जो राजनीतिक अवस्था है, उसका कितना घातक परिणाम प्रत्येक व्यक्ति को सहन करना पड़ रहा है। ऊपर तो केवल नये शस्त्रीकरण की बात कही गई है, पर वास्तव में इस समय सेना पर किया जाने वाला सब प्रकार का प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष व्यय इतना अधिक बढ़ गया है कि उसका परिणाम अधिकाँश देशों में कुल राष्ट्रीय बजट का आधे के लगभग हो जाता है। अब आप कल्पना कीजिये कि यदि वर्तमान समय में भारत जैसे किसी देश का कुल बजट 50 अरब का है और उसमें से 25 अरब पाकिस्तान और चीन के भय से सैनिक तैयारी में खर्च कर दिया जाता है तो जनता की उन्नति तथा सुख-सुविधाओं की वृद्धि करने वाली योजनाओं की क्या अवस्था होगी?
इसलिये संसार के हितैषी और शाँति के अनुयायी वर्षों से यह प्रचार कर रहे हैं कि संसार में भिन्न-भिन्न शासनों की जगह एक केन्द्रीय शासन-विश्व सरकार की स्थापना की जाय, जो समस्त देशों में समन्वय बनाये रखे और जो उल्टे रास्ते पर चलता दिखाई दे उसको तुरन्त रोक दे। योरोपियन लेखकों ने तो ऐसी सैकड़ों स्कीमें तैयार की हैं जिनमें से कुछ काल्पनिक और कुछ यथार्थवादी हैं। उन स्कीमों पर संक्षिप्त प्रकाश डालने का भी स्थान इस छोटे लेख में नहीं है, पर हम इतना बतला देना चाहते हैं कि संसार में सैकड़ों भिन्न-भिन्न परस्पर विरोधी शासकों के होने से किसी भी देश की जनता का जरा भी लाभ नहीं है, वरन् सब तरह से हानि ही हानि है। यह बात इतनी स्पष्ट है कि राजनीतिज्ञ भी जो इस पारस्परिक तनाव के अधिकाँश में जिम्मेदार हैं, इसकी सच्चाई को स्वीकार करते हैं और उन्होंने दो बार बहुत कुछ उद्योग और व्यय करके इसको कार्य रूप में परिणत करने का प्रयत्न भी किया है।
प्रथम योरोपीय महायुद्ध के समाप्त होने पर सन 1919 में ‘लीग आफ नेशंस’ (राष्ट्रसंघ) की स्थापना की गई जो अनेकों वर्ष तक लिखा पढ़ी करके शाँति स्थापना का प्रयत्न करती रही। फिर द्वितीय महायुद्ध के कारण जब उसका अन्त हो गया तो 1946-47 के लगभग संयुक्त राष्ट्र-संघ (यू.एन.ओ.) का निर्माण किया गया, जिसके अधिवेशन न्यूयार्क (अमरीका) में बराबर होते रहते हैं और जो अपनी शक्ति और परिस्थिति के अनुसार संसार के सभी भागों में युद्धों को रोकने का प्रयत्न करती रहती हैं। पर जब प्रमुख राष्ट्रों का प्रश्न आ जाता है तो यह असमर्थ सिद्ध होती है। जैसे वियतनाम में अमरीका लड़ रहा है तो वहाँ बार-बार प्रस्ताव करने पर भी इसका प्रभाव नहीं पड़ता। इसी प्रकार अभी इसराइल और अरब राष्ट्रों संघर्ष में मिश्र के राष्ट्रपति नासिर के इनकार कर देने पर उसकी शाँति रक्षक सेना को हट जाना पड़ा।
अब अन्तर्राष्ट्रीय स्थिति बहुत खतरनाक होती जा रही है और युद्ध की तैयारी इतनी अधिक हो गई है कि यदि किसी दिन प्रातःकाल सोकर उठने पर यह सुनने में आवे कि रात के दस पाँच घंटों के भीतर ही संसार के सौ-पचास करोड़ व्यक्ति समाप्त हो गये और बड़ी-बड़ी राजधानियाँ भस्म हो गई हैं, तो भी यह असंभव नहीं है। जब युद्धों के संचालक-सेनानायक खुल कर कहते हैं कि हमारे राकेटों का निशाना संसार की महत्वपूर्ण राजधानियों की तरफ लगा हुआ और दस मिनट के भीतर उद्जन बमों को हजारों मील के फासले पर बसे नगरों तक पहुँचाया जा सकता है तो दो-एक दिन में ही वर्तमान मानव सभ्यता का सर्वनाश या अर्द्धनाश हो जाने में क्या आश्चर्य है?
हथियारों की दौड़ और राष्ट्र नायकों के दुराग्रह को देखकर विश्व बन्धुत्व के उपासक वर्षों पहले से सब राष्ट्रों के संचालकों से पारस्परिक प्रतिस्पर्धा तथा मतभेद मिटा कर एक विश्व संगठन बनाने की अपील कर रहे हैं। महात्मा बहा द्वारा इस संबंध में सबसे पहले प्रयत्न किया गया और अब से सौ वर्ष पहले भविष्यवाणी के रूप में संसार के शासकों को चेतावनी दी गई कि यदि वे राष्ट्रीय भेद-भावों को बढ़ते रहने देंगे तो अन्त में सबका नाश अवश्यंभावी है। अब से पचास वर्ष पहले भी बंगाल के ठाकुर दयानन्द ने जिन्होंने विश्व-प्रेम का प्रसार करने के लिये ‘अरुणाचल मिशन’ की स्थापना की थी, ‘पीस कान्फ्रेंस’ (शाँति परिषद) के पास तार द्वारा एक अपील भेजी थी जिसमें ‘विश्व राज्य’ की योजना की संक्षिप्त रूप रेखा इस प्रकार बतलाई गई थी-
‘प्रत्येक देश के निवासी कुछ वर्षों के लिये अपने में से एक व्यक्ति को राष्ट्रपति चुन लें, जो एक परिषद् की सहायता से वहाँ की व्यवस्था करे और ये विभिन्न देशों के राष्ट्रपति मिल कर अपने में से एक ‘प्रमुख-राष्ट्रपति’ चुन लें की एक मंत्रि-मंडल के द्वारा समस्त राष्ट्रों के कार्य का परीक्षण करता रहे। ये मंत्री भी विभिन्न राष्ट्रों द्वारा लिये गये प्रतिनिधि ही होंगे। यह विश्व-शासन सभा अन्तर्राष्ट्रीय मामलों में विभिन्न देशों की कार्यवाहियों का समन्वय करती रहेगी? जिससे सब अपना विकास और वृद्धि करते रह सकें और कोई किसी से अनुचित लाभ न उठा सके।
‘ये सब राष्ट्रपति और प्रमुख-राष्ट्रपति अपने को प्रजा का प्रतिनिधि, भगवान का सेवक समझेंगे और समस्त देशों के निवासियों को अपने भाई की तरह मानेंगे। वे जनता तथा भगवान के सम्मुख अपने को संसार की शाँति, खुशहाली और प्रगति के लिये उत्तरदायी समझेंगे।’
ठाकुर दयानन्द ने इस स्कीम को संसार के समस्त शासकों, प्रसिद्ध नेताओं और समाचार पत्रों के पास भी भेजा। कहीं-कहीं इसकी चर्चा हुई, पर सत्ता के भूखे राजनेता अपने रास्ते पर ही चलते रहे।
सत्य समाज का ‘नया संसार’-
‘सत्य समाज’ के संस्थापक का कथन है कि ‘मैं इसी दुनिया में एक ऐसे नये संसार का दर्शन करना चाहता हूँ जिसमें न साम्राज्यवाद को न पूँजीवाद, न धर्म के झगड़े हों न जाति के, धन की महत्ता हो न पशु-बल की। सारी दुनिया एक राष्ट्र हो, मनुष्य-मात्र की एक जाति जो, नर-नारी का अधिकार और मन समान हो, सत्य ही ईश्वर हो, विवेक ही शास्त्र हो। सारे विश्व का एक कुटुम्ब हो, एक की जायदाद सब की जायदाद हो, कोई गरीब न हो। सत्य समाज के द्वारा मैं ऐसे ही नये संसार की तरफ इस दुनिया को ले जाना चाहता हूँ।’
इनकी योजना के अनुसार विश्व-राष्ट्र-शासन की इकाई ग्राम पंचायत में जनसंख्या के अनुसार दस से पन्द्रह तक सदस्य होंगे, जिनके चुनाव में ग्राम का प्रत्येक व्यक्ति मत देगा। कोई उम्मीदवार स्वयं खड़ा नहीं हो सकता, वरन् कम से कम पचास मतदाता हस्ताक्षर करके किसी को खड़ा कर सकते हैं। चुनाव में किसी को प्रचार करने की आज्ञा नहीं होगी। इस तरह के प्रतिनिधियों की पंचायत गाँव का हिसाब-किताब, साधारण झगड़ों का निपटारा, वाचनालय, स्कूल, सफाई आदि व्यवस्था का कार्य करेगी। इसी प्रकार जिले की पंचायत और प्राँत की पंचायत का चुनाव भी वयस्क मतदाताओं द्वारा किया जायेगा। पर राष्ट्र की पंचायत का चुनाव प्रान्तों की पंचायतों द्वारा होगा और समस्त राष्ट्र पंचायतें मिल कर विश्व-संघ का निर्माण करेंगी।
‘विश्व-संघ का कार्य विश्व-न्यायालय, अन्तर्राष्ट्रीय पुलिस, अन्तर्राष्ट्रीय यातायात, सबेडडडडडड समुद्री स्टेशनों का प्रबंध, सोना, चाँदी, लोहा, कोयला, तेल आदि की खानों का प्रबंध, अन्तर्राष्ट्रीय लेन−देन आदि होगा। राष्ट्रीय पंचायत के हाथ में राष्ट्रीय न्यायालय, राष्ट्रीय पुलिस, अन्तर्प्रान्तीय यातायात और लेन−देन आदि होगा। प्रान्तीय पंचायत में प्रान्त से संबंध रखने वाले सब विषय होंगे, और यही बात जिला पंचायतों के संबंध में समझना चाहिये।’
यह कुछ लोगों के विचारों के नमूने हैं। इसका आशय इतना ही है कि दुनिया में फैले हुये दोषों और उनके कारण होने वाली निर्दोष लोगों की दुर्दशा को देख कर सभी विचारशील लोगों का ध्यान किसी नये परिवर्तन की तरफ आकर्षित हो रहा है। इस समय संसार ज्ञान-विज्ञान में उन्नति करके उत्पादन को इतना बढ़ा चुका है कि यदि न्याय और बुद्धि से समाज की व्यवस्था की जाय तो सभी लोग काफी सुख से जीवन व्यतीत कर सकते हैं। पर व्यवहार में इसका उल्टा परिणाम देखने में आ रहा है। गरीब और अभावग्रस्त लोग ही नहीं इस समय साधन सम्पन्न लोग भी बहुत कम सुखी हैं। और सच भी यह है कि जब गाँव और शहर, छोटे और बड़े, मूर्ख और विद्वान सब में स्वार्थ-भावना ही अधिकाधिक व्याप्त हो रही है, तो कोई कैसे सुखी हो सकता है? आजकल प्रतिदिन युद्ध की तैयारियाँ और अशाँति फैलने की जो खबरें आती रहती हैं और अणु अस्त्रों का आतंक फैलाया जा रहा है, उससे लोगों की मानसिक अवस्था भी अशाँत बनी रहती है। इस अनिष्टकारी अवस्था का प्रतिकार तभी संभव है जब संसार के विचारशील शासक और विद्वान मिलकर पारस्परिक मतभेदों को दूर करें और संसार में एक केन्द्रीय शासन-संस्था ऐसी स्थापित करें जिससे विभिन्न देशों में कलह और संघर्ष के कारण सदैव के लिये मिट जायें।
‘एक महत् चेतना की सशक्त धारा आ रही है जिसके प्रवाह में राष्ट्रों की पूर्वाग्रहों और संकीर्णताओं की दीवारें चूर-चूर हो जायेंगी और तब विश्व के समस्त राष्ट्र प्रेम का महोत्सव मनायेंगे’ ये उद्गार आज से 59 वर्ष पूर्व बंगाल निवासी विश्व-एकता के महान प्रचारक ठाकुर दयानन्द ने प्रकट किये थे। उन्होंने कहा कि ‘मैं देख रहा हूँ कि संसार में विश्व बन्धुत्व की भावना परिव्याप्त हो गयी है और एक ही विश्वधर्म पूर्व और पश्चिम की मिलन-भूमि बन गया है।’ यद्यपि आज भी अधिकाँश पढ़े लिखे लोगों को विश्व-समाज की स्थापना, विश्व के सभी स्त्री-पुरुषों का भाई-बहिन की तरह रह सकना कठिन ही नहीं असंभव जान पड़ता है, पर उस सूक्ष्म-जगत के दृष्टा को उस समय भी यह प्रत्यक्ष दिखाई पड़ रहा था कि संसार के वातावरण में विश्व-भावना का तत्व उत्पन्न हो गया है और इसी शताब्दी के भीतर यह परिपक्व होकर एक नये जगत की रचना का कार्यारंभ कर देगा।
वैसे तो विश्व की एकता और मनुष्यों के भ्रातृभाव के सिद्धाँत की घोषणा अति प्राचीनकाल से होती आ रही है, पर उस समय यह भावना प्रायः व्यक्तिगत ही होती थी। कोई महापुरुष अथवा उनका अनुयायी छोटा-सा समुदाय इसके अनुकूल आचरण भी करके दिखा देता था, पर इसका संसारव्यापी प्रचार और व्यवहार कभी देखने में नहीं आया। गत शताब्दी से ही अनेक महापुरुषों ने विश्व समाज की आवाज उठाई है। इनमें योरोप, अमरीका, एशिया आदि सभी भूखण्डों के महानुभाव सम्मिलित हैं। ये सब मानवतावादी सिद्धाँत के अनुयायी हैं। यद्यपि भिन्न-भिन्न देशों के निवासी और भिन्न भाषा-भाषी होने के कारण वे प्रायः एक-दूसरे से अपरिचित ही रहे, पर उन सब के अन्तःकरण में यह एक भावना अवश्य पाई जाती है कि सभी मनुष्य भाई-भाई हैं और उनको लड़ने के बजाय परस्पर में मिल कर ऐसी संस्थाओं का निर्माण करना चाहिए जिससे विश्व-एकता और विश्व-समाज का मार्ग प्रशस्त हो। इस तथ्य का स्पष्टीकरण करते हुए ॥ह्वद्वड्डठ्ठ ष्ठद्गह्यह्लद्बठ्ठब् (ह्मूमैन डेस्टिनी) के लेखक ‘लकाम्ते द नाय’ ने कहा है-
‘व्यक्तियों और राष्ट्रों के लिये अब वह समय आ गया है कि वे अपने अभीष्ट को पहिचानें। यदि सभ्य देश शाँति चाहते हैं, तो इस समस्या को भौतिक रूप से हल करें। विगत युग की प्राचीन धारणाओं में सब ओर दरारें पड़ गई हैं, उन्हें धागों अथवा इने-गिने उच्चवर्ग के व्यक्तियों द्वारा पारस्परिक संधि-पत्रों से मजबूत नहीं बनाया जा सकता। शाँति का निर्माण मनुष्य के आन्तरिक परिवर्तन द्वारा होना चाहिये। युद्धों और दोषों का मूल हमारे अन्दर है। यदि शत्रु हमारे अन्तरतम में रहने को स्वतंत्र हो, तो बाहरी सुरक्षा के प्रयास निरर्थक होंगे।’
वर्तमान पारस्परिक विरोधी स्थिति-
जैसा हम इस अंक में अन्यत्र बतला चुके हैं इस कठिन परिस्थिति का मूल कारण यही है कि मनुष्य ने यंत्र विज्ञान और साधन-सामग्री में जितनी उन्नति कर ली है उतनी प्रगति उसने मानसिक और भावनात्मक क्षेत्र में नहीं की है। भौतिक प्रगति की निगाह से तो वह लाठी और पत्थरों से लड़ने के बजाय राकेट और अणुबम तक पहुँच गया, गर्मी और जाड़े से पीड़ित होने की बजाय ‘एयर कंडीशण्ड’ निवास गृहों में रहने लगा पर मानव-एकता और भ्रातृभाव की निगाह से वह उल्टा पिछड़ गया। उसने समाज में अमीर और गरीब, शोषक और शोषित की ऐसी श्रेणियाँ उत्पन्न कर दी जो कभी मिल ही नहीं सकती। इसके साथ ही पूरब और पश्चिम के नाम पर भी मानव सभ्यता में ऐसे-ऐसे भेदभाव पैदा हो गये हैं जिनका वास्तविक एकीकरण हो सकना आसान नहीं है।
इस अवस्था को बदल कर मानव मात्र की समता, एकता, भ्रातृभाव की स्थिति लाना केवल लेखों और भाषणों द्वारा संभव नहीं है। वर्तमान समय में मनुष्य पारस्परिक आध्यात्मिक संबंध को भूल कर भौतिक सफलताओं को ही अधिकाधिक महत्व देता जाता है। इसका परिणाम यह हुआ है कि सम्पत्ति, भूमि, सत्ता के लिये व्यक्तियों और राष्ट्रों का संघर्ष उग्र से उग्रतर होता चला जाता है और होते-होते आज मानव-सभ्यता के पूर्णतः विनष्ट हो जाने की संभावना सामने खड़ी दिखाई पड़ रही है। यदि मनुष्य को इस भीषण-भविष्य से अपनी रक्षा करनी है तो उसको अवश्य ही अविलम्ब ऐसे कदम उठाने पड़ेंगे जिससे पुरानी हानिकारक, भेदभाव पूर्ण अवस्था का अन्त होकर नवीन समयानुकूल सामाजिक व्यवस्था का निर्माण हो सके। यह एक बड़ा महत्वपूर्ण और गंभीर विषय है और इस संबंध में संसार के बड़े-बड़े मनीषी अपने विचार प्रकट करते रहते हैं। इस संबंध में नीचे देश और विदेशों के कुछ महान विचारकों की सम्मतियाँ दी जा रही हैं जिससे पाठक इस समस्या के विविध पहलुओं की कुछ जानकारी प्राप्त करके स्वयं भी कुछ सोच सकेंगे।
महात्मा गाँधी का भारतीय दृष्टिकोण-
सबसे पहले हमारा ध्यान महात्मा गाँधी की तरफ जाता है, जिनको ‘इस युग का सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति’ स्वीकार किया जा चुका है और जो वास्तव में मनुष्य मात्र के कल्याण का लक्ष्य रख कर ही कोई बात कहते थे। उनके सामाजिक व्यवस्था संबंधी विचारों का स्पष्टीकरण करते हुये श्री हरिभाऊ उपाध्याय ने लिखा है-
‘गाँधी जी कोरे आदर्शवादी नहीं थे। वह आदर्श का उल्लेख करके उसके व्यावहारिक रूप पर विशेष जोर देते थे। अतएव उनके लेखों को पढ़ते समय सदैव इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि कौन-सी बात को वे आदर्श-व्यवस्था के लिये कह रहे हैं, कौन-सी वर्तमान अवस्था के लिये और कौन-सी संधिकाल के लिये। अपने सामाजिक आदर्श में वे अराजकतावादी कहे जा सकते हैं, जिसका अर्थ यह होता है कि समाज में किसी प्रकार की कोई सरकार न रहे, सब लोग अपने घर-घर के राजा हो जावें। इसी आदर्श को उन्होंने कहीं ‘राम-राज्य’ कहीं ‘सर्वोदय’ कहीं ‘अहिंसक-स्वराज्य’ के नाम से पुकारा है। लेकिन समाज की अन्तिम अवस्था का यह चित्र एकाएक समझ में नहीं आता। क्या सचमुच मनुष्य इस पृथ्वी तल पर कभी इतना उन्नत देवता या सन्त, मुनि की तरह निस्पृह-निरपेक्ष हो जायेगा, जिसके लिये किसी छोटी या बड़ी सामूहिक व्यवस्था (शासन) की बिल्कुल आवश्यकता न रहे?’
यह आदर्श वर्तमान समय के अधिकाँश मनुष्यों के विचारों और धारणाओं से इतना भिन्न है कि जिसके संभव होने पर उनको विश्वास नहीं हो पाता। वे यह देख रहे हैं कि वर्तमान समय में जो सामाजिक व्यवस्था प्रचलित है वह निरन्तर बढ़ते और बदलने वाले भौतिक साधनों से मेल नहीं खाते और इससे एक हानिकारक संघर्ष अधिकाधिक उग्र रूप धारण करता जाता है तो भी उनको कोई ऐसा मार्ग दिखलाई नहीं पड़ता जिससे इसका निराकरण किया जा सके। गाँधी जी के दूसरे बड़े अनुयायी श्री किशोरलाल मशरुवाला ‘जड़मूल से क्राँति’ नामक पुस्तक में लिखते हैं-
‘इस विषय में कहीं भी मतभेद नहीं है कि जगत आज अतिशय अस्वस्थ है। विज्ञान और उद्योगों में बहुत कुछ विकास हुआ है और हर रोज बढ़ता जाता है। मानव जाति के आदिकाल से लेकर सन् 1800 तक के लम्बे समय में भी कुल उत्पादन जितना नहीं हुआ उतना अनन्त प्रकार का उत्पादन पिछले दो-सौ वर्ष में हुआ होगा। पुराणों तथा योगशास्त्र में वर्णित सिद्धियाँ हम प्रत्यक्ष होती देखते हैं और बिना योग साधे उनका उपयोग कर सकते हैं। पर आश्चर्य यह है कि फिर भी तंगी का पार नहीं, दुखों का अन्त नहीं, शाँति-सुलह सन्तोष का नाम नहीं, इन्सान, इन्सान को देखकर प्रसन्न नहीं होता। वह बाघ और साँप से भी ज्यादा घातक और जहरीला बन गया है। कोई देश या कोई समाज ऐसा नहीं जिससे यह मानवता का अभाव बहुत अधिक मात्रा में दिखलाई न पड़ रहा हो। हमारे जीवन में कहाँ खराबी है? सुख के साधन हमारे लिये दुःख रूप-शाप के समान क्यों हो गये, इस पर हम सबको विचार करना चाहिये।’
क्राँति कब सफल हो सकेगी?
हमारे यहाँ इसके लिये जो उपाय बतलाये जाते हैं वे व्यवहार की दृष्टि से नहीं वरन् धर्म, ईश्वर और प्राचीन संस्कृति के नाम पर ही उनका निश्चय किया जाता है। यह कहने की आवश्यकता है कि इन बातों का प्रभाव थोड़े से उच्च मनोवृत्ति वालों पर ही पड़ता है, शेष लोग सब कुछ सुन और समझ कर भी उसी मार्ग पर चलते हैं जिससे उनको भौतिक लाभ हो, स्वार्थ की पूर्ति हो सके। महात्मा जी ने इनका आधार अहिंसा और सत्य पर रखा, पर इन आदर्शों का अनादि काल से उच्चारण और प्रशंसा करते हुये भी कितने मनुष्य इन पर चलते हैं यह किसी से छिपा नहीं है। इसलिये व्यावहारिक दृष्टि से विचार करने वालों का मत है कि इस उद्देश्य की पूर्ति जहाँ जैसे मार्ग से संभव हो उसी प्रकार की जानी चाहिये। समस्त संसार और सब प्रकार के व्यक्तियों के लिये ‘अहिंसा’ और ‘प्रेम’ का साधन ही काम नहीं दे सकता। योरोप के महान मानवतावादी प्रिंस क्रोपाटकिन का कहना है-
‘क्राँति से हमारा तात्पर्य क्या है? उसका अर्थ यह नहीं है कि शासकों में परिवर्तन कर देना। उसका वास्तविक अर्थ है सामाजिक सम्पत्ति के ऊपर जनता का अधिकार, उसका आशय है उन सब शक्तियों को नष्ट कर देना, जो अब तक मनुष्य समाज की प्रगति में बाधक रही है। लेकिन क्या क्राँति किसी सरकार द्वारा निकाले हुये निर्देशों द्वारा हो सकती है? कोई सरकार, चाहे वह एक आदर्श क्राँतिकारी सरकार ही क्यों न हो, जनता में कोई नई लहर पैदा नहीं कर सकती और हमारे विध्वंस तथा पुनर्निर्माण के महान कार्य में बहुत ही कम सहायक हो सकती है। सामाजिक क्राँति के फलस्वरूप जो आर्थिक क्राँति होगी, वह इतनी विशाल और गंभीर होगी, वह सम्पत्ति और वितरण की मौजूदा व्यवस्थाओं में इतने और ऐसे परिवर्तन करेगी कि किसी मनुष्य के लिये यह असंभव है कि भावी-समाज की विभिन्न संस्थाओं का विस्तृत वर्णन कर सके।’
हमारे यहाँ की सर्वोदय-समाज की मान्यता भी इससे मिलती-जुलती ही है। उसके एक नेता श्री धीरेन्द्र मजूमदार ने इस समस्या पर काफी सोच विचार कर ‘शासन-मुक्त समाज की ओर’ नामक पुस्तक लिखी है, उसके आरंभ में ही उन्होंने कह दिया है शासन-मुक्त भावी-समाज का विवरण बता सकना असंभव है। इसका कारण उन्होंने यही बतलाया है-
‘सबसे पहले यह समझने की आवश्यकता है कि अगर कोई व्यक्ति किसी लक्ष्य की ओर जाने के मार्ग में अपने सामने बहुत बड़ा खड्ड- बहुत बड़ा गड्ढा देखता है तो वह उस मार्ग को छोड़ देता है। उस समय यह जरूरी नहीं होता कि उस मार्ग को छोड़ने से पहले यह मालूम कर किया जाय कि सही मार्ग क्या है? चाहे दूसरा मार्ग मालूम हो या न हो पर पहले मार्ग को तो वह छोड़ ही देगा और दूसरे मार्ग की खोज में लग जायेगा। इस खोज ढूंढ़ में वह कुछ समय भटकेगा भी। फिर कोई न कोई एक मार्ग उसको सूझ जायेगा। जो सिद्धाँत व्यक्ति के लिये लागू हैं वही समाज के लिये भी है। अगर समाज को आज ऐसा दीखता है कि शासन-संस्था ही मनुष्य के लिये संकट का कारण बन रही है और उसके विकास में एक रोड़े की तरह सिद्ध हो रही है तो उसे त्याग देना ही चाहिये। अतः जब हम से यह प्रश्न किया जाता है कि ‘आप जो शासन-मुक्त समाज की बात करते हैं, तो बतायें कि आगामी समाज का स्पष्ट स्वरूप क्या होगा?’ तो उत्तर में हम कहेंगे कि हमें शासन-मुक्ति चाहिये। बदले में कैसा समाज होगा, उसकी स्पष्ट धारणा धीरे-धीरे निकालनी होगी। आज हम उसे पूरी तरह नहीं बता सकते।’
आध्यात्मिकता की आधार शिला होगी-
इन धारणाओं का एक कारण यह है कि इन तमाम लेखकों ने इस समस्या पर भौतिक घटनाओं और प्रमाणों के आधार पर ही विचार किया है। अपरोक्ष (सूक्ष्म) जगत पर ही उनकी दृष्टि नहीं है अथवा उस ओर उनकी प्रवृत्ति नहीं है। अन्यथा यह समझने में उनको कठिनाई नहीं होती कि संसार में घोर उथल-पुथल और हजारों परस्पर विरोधी आन्दोलनों के होते हुए भी सब लोग सूक्ष्म-जगत में एक पहले से ही निश्चित योजना की तरफ अग्रसर हो रहे हैं। चाहे अधिकाँश व्यक्ति इस संबंध में अनजान हों पर वे दैवी योजना के अनुसार उस भावी-समाज की रचना में ही सहयोग दे रहे हैं जो वर्तमान समय की अपेक्षा बहुत उच्च होगी। संसार क्रमशः भौतिकता के कुपरिणामों से सावधान होकर अध्यात्म के मार्ग को ग्रहण करने की चेष्टा कर रहा है और यही भावी विश्व समाज का आधार होगा। अध्यात्म की शक्ति ही संसार को स्वार्थ जनित कलह से छुड़ा कर शाँति के क्षेत्र में पहुँचा सकती है। इसलिये भारतीय मनीषियों का कार्यक्रम सदा संसार को अध्यात्म मार्ग का उपदेश देना ही रहा है और आज हम भी इसी मार्ग को ग्रहण करके संसार-संकट को मिटाने के लिये प्रयत्नशील हैं।
इतिहास की साक्षी-
धार्मिक जगत को छोड़ कर सब हम इस समस्या पर इतिहास, अर्थ-व्यवस्था की दृष्टि से विचार करते हैं तो उससे भी अन्तिम निष्कर्ष यही निकलता है कि यद्यपि भूतकाल में अपनी असमर्थता और साधनों के अभाव से विभिन्न देशों के निवासी एक दूसरे से पृथक रहे हैं और पारस्परिक भय अथवा स्वार्थपूर्ति के लिये वे एक-दूसरे से संघर्ष भी करते रहे हैं। पर अब प्रगति पथ पर अग्रसर होते-होते ऐसा अवसर आ पहुँचा है जब मानव-जाति के लिये सब विषयों में एक से नियम बना कर एक विश्व-राष्ट्र बनाना अनिवार्य है। इन परिवर्तनों का उल्लेख करते हुये श्री एच.जी. वेल्स ने अपने जगत प्रसिद्ध ग्रंथ Outline of History (संसार के इतिहास की रूपरेखा) के अन्त में लिखा है-
‘मानव जाति के इतिहास में इसके पश्चात् जो दूसरा दर्जा (स्टेज) आयेगा वह समस्त मानवों में ऐक्य स्थापित करके उनका एक समाज बनाना होगा, जिससे वे एक ही लक्ष्य स्थिर करके अग्रसर होंगे और सब के प्रयत्न एक ही दिशा में उन्मुख होंगे। इस ‘संसार के इतिहास’ संबंधी ग्रंथ में हम आदि काल से वर्तमान समय तक के परिवर्तनों पर दृष्टिपात कर चुके पर अभी तक किसी अन्तिम निर्णय पर नहीं पहुँच सके। करोड़ वर्ष पहले जो जीवन की धारा आरंभ हुई थी, और पाँच लाख वर्ष पूर्व मनुष्य ने अपनी जो साहसिक यात्रा आरंभ की थी वह अब तक बड़ी समस्या के रूप में परिणत हो गई है। प्रश्न होता है कि इसके पश्चात क्या होगा? हम जान चुके हैं कि सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्र में क्रमशः प्रगति करते-करते मनुष्यों के बड़े-बड़े समुदाय बन चुके हैं। ये संगठन छोटे से पारिवारिक फिर्क की इकाई से बढ़ कर करोड़ों की संख्या वाले विशाल राष्ट्रों के रूप में परिणित हो चुके हैं। फिर भी संसार की वैज्ञानिक उन्नति-तार, टेलीफोन, वायुयान-जल, स्थल, वायु से आवागमन के साधनों की निरन्तर उन्नति को देखते हुये ये विशाल संगठन भी समस्त संसार की तुलना में बहुत छोटे हैं। उपरोक्त परिवर्तनों के कारण मनुष्य परिस्थिति से सामंजस्य बनाये रखने के लिये महाविशाल संगठन की आवश्यकता अनुभव कर रहा है। वर्तमान समय में सर्वत्र जो सामाजिक अशाँति, आर्थिक झगड़े और युद्ध आदि दिखलाई पड़ रहे हैं वे इस सामंजस्य की स्थापना के ही प्रयत्न हैं।
‘हमारे सच्चे राष्ट्र की स्थापना का कार्य अब आरंभ हो रहा है और इसके निर्माण में प्राणपण से चेष्टा करना प्रत्येक मनुष्य का कर्त्तव्य है। वह राष्ट्र समस्त संसार के राष्ट्रों का सम्मिलित राष्ट्र (स्नद्गस्रद्गह्ड्डद्य खशह्द्यस्र स्ह्लड्डह्लद्ग) होगा। आज यह सम्मिलित ‘महाराष्ट्र’ ही मानव जाति का एक मात्र लक्ष्य है। आज समस्त मानव जाति का ‘विधाता पुरुष’ ही हमारा उपास्य देव है। जिस प्रकार काल प्रभाव से प्राचीन जातियों के देवता आज विस्मृति के गर्भ में लोप हो गये हैं उसी प्रकार यह ‘राष्ट्रवाद’ का देवता भी गायब हो जायेगा। आज हमारी सच्ची राष्ट्रीयता ‘मानवता’ ही है।’
अन्त में श्री वेल्स ने स्पष्ट कह दिया है कि इस तरह के महान परिवर्तन आरंभ में स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर नहीं होते ‘वे रात में एक चोर की तरह चुपचाप मन के भीतर प्रविष्ट होते हैं’ और एक दिन अकस्मात दिखाई देता है कि वे अत्यन्त वेगवान और जगद्व्यापी बन गये हैं। इसका मुख्य आधार धर्म ही होगा पर वह धर्म जो भ्रष्टाचार और पुरोहितों के झंझटों से पूर्णतया मुक्त होगा। उन्होंने इस प्रकार के विश्व राष्ट्र के मूल-सूत्र’ (क्चह्शड्डस्र स्नह्वठ्ठस्रड्डद्वद्गठ्ठह्लड्डद्यह्य) का वर्णन करते हुये स्पष्ट कहा है-
च्ढ्ढह्ल, ख्द्बद्यद्य ड्ढद्ग ड्ढड्डह्यद्गस्र शठ्ठ ष्शद्वद्वशठ्ठ ख्शह्द्यस्र ह्द्गद्यद्बद्दद्बशठ्ठ, क्द्गह्ब् द्वह्वष्द्ध ह्यद्बद्वश्चद्यद्बद्धद्बद्गस्र ह्वठ्ठद्बक्द्गह्ह्यड्डद्यद्बभ्द्गस्र ड्डठ्ठस्र ड्ढद्गह्लह्लद्गह् ह्वठ्ठस्रद्गह्ह्यह्लशशस्र. ञ्जद्धद्बह्य ख्द्बद्यद्य ठ्ठशह्ल ड्ढद्ग ष्टद्धह्द्बह्यह्लद्बड्डठ्ठद्बह्लब् ठ्ठशह् ढ्ढह्यद्यड्डद्व ठ्ठशह् क्चह्वस्रस्रद्धद्बह्यद्व ठ्ठशह् ड्डठ्ठब् ह्यह्वष्द्ध ह्यश्चद्गष्द्बड्डद्यद्बभ्द्गस्र द्धह्शद्व शद्ध ह्द्गद्यद्बद्दद्बशठ्ठ, ड्ढह्वह्ल ह्द्गद्यद्बद्दद्बशठ्ठ, ह्लद्धद्ग श्वद्बद्दद्धह्लद्धशद्यस्र ख्ड्डब्, ह्लद्धद्ग द्मद्बठ्ठद्दस्रशद्व शद्ध ॥द्गड्डक्द्गठ्ठ, ड्ढह्शह्लद्धद्गह्द्धशशस्र, ष्ह्द्गड्डह्लद्यक्द्ग ह्यद्गह्क्द्बष्द्ग ड्डठ्ठस्र ह्यद्गद्यद्ध द्धशह्द्दद्गह्लद्धह्वद्यठ्ठद्गह्यह्य द्गह्लष्. ्नठ्ठस्र ह्लद्धद्बह्य ख्शह्द्यस्र ह्यह्लड्डह्लद्ग ख्द्बद्यद्य ड्ढद्ग ह्यह्वह्यह्लड्डद्बठ्ठद्गस्र ड्ढब् ह्वठ्ठद्बक्द्गह्ह्यड्डद्य द्गस्रह्वष्ड्डह्लद्बशठ्ठ द्गह्लष्. ञ्जद्धद्गह्द्ग ख्द्बद्यद्य ड्ढद्ग ठ्ठशह्ल ड्डह्द्वद्बद्गह्य, ठ्ठश ठ्ठड्डक्द्बद्गह्य ड्डठ्ठस्र ठ्ठश ष्द्यड्डह्यह्यद्गह्य शद्ध ह्वठ्ठद्गद्वश्चद्यशब्द्गस्र श्चद्गशश्चद्यद्ग, ख्द्गड्डद्यह्लद्धब् शह् श्चशशह्.ज्
(ह्रह्वह्लद्यद्बठ्ठद्ग शद्ध ॥द्बह्यह्लशह्ब्)
अर्थात्- ‘यह विश्व-राष्ट्र एक सामान्य धर्म के ऊपर स्थापित होगा। वह धर्म स्वाभाविक सत्य के ऊपर आधारित होगा जिसे सर्वसाधारण ठीक तरह से समझ सकेंगे और पालन कर सकेंगे। यह न ईसाई धर्म होगा, न मुसलमान, बौद्ध और न कोई अन्य विशेष धर्म। यह केवल शुद्ध धर्म होगा जिसमें किसी प्रकार की भ्रष्टता न होगी और सन्तजनों द्वारा प्रदर्शित ‘आठ-मार्ग’ के अनुकूल होगा जैसे परलोक का सुधार, भ्रातृभाव, जीव सेवा और अहंकार का त्याग आदि।’
नये समाज की रूपरेखा-
कितने ही विचारशील लेखकों ने नये जगत की रूपरेखा निबंध, कहानी, उपन्यास आदि के रूप में प्रकट की है। उनकी सम्पत्ति है कि जब संसार के समस्त मनुष्य देश, जाति, मजहब के नाम पर पैदा किये गये झूठे भेदभाव को त्याग देंगे और गलत ढंग के स्वार्थ को त्याग कर परस्पर सच्चा सहयोग करने लगेंगे तो यह संसार वर्तमान की अपेक्षा बहुत अधिक बदल जायेगा। जिस तरह हजार वर्ष पहले का कोई व्यक्ति यदि इस समय दुनिया में वापस आ जाय तो उसको हर जगह रेल, मोटर, हवाई जहाज, बिजली, रेडियो, चल-चित्र आदि देख कर भ्रम होने लगेगा कि यह दुनिया है या कोई दूसरी, उसी प्रकार आज कल के मनुष्यों को सौ, दो-सौ वर्ष बाद आने वाला संसार की सर्वथा नया और अजनबी जैसा जान पड़ेगा। वर्तमान समय में भी उसके लिये कैसे-कैसे परिवर्तन सोचे जा रहे हैं इसके लिये हम नमूने के तौर पर दो चार विद्वानों की रचनाओं में से उनके विचार नीचे दे रहे हैं-
‘सत्य-समाज’ ने आगामी मानव-समाज की विशेषता के संबंध बहुत कुछ विचार और किया है। उनकी ‘संस्कृति समस्या’ नामक पुस्तक में इस बात पर प्रकाश डाला गया कि वर्तमान समाज की किन त्रुटियों का निराकरण करने से नये समाज की स्थापना संभव हो सकेगी। यह विवेचन भारतीय दृष्टिकोण से किया गया है इसलिये हमारे लिये विशेष सिद्ध हो सकता है-
सबसे पहले हमको जाति-समभावी बनना है, जिससे जात-पाँत, ऊंच-नीच के भेदभाव मिट कर एक सुव्यवस्थित समाज बन सके।
यही बात धर्म-समभाव के संबंध में है। हिन्दू मुसलमान, बौद्ध, जैन आदि सभी में समन्वय स्थापित होना आवश्यक है।
प्रान्तीयता की भावना भी घातक है। हिन्दी, मराठी, बंगाली, गुजराती आदि का द्वन्द्व हटाना जरूरी है।
इन भेदभावों के मिटाये जाने पर अन्य राष्ट्रों के साथ मिलकर विश्व-राष्ट्र की योजना सफल बनाना आवश्यक है जिससे अमेरिका, रूस, जर्मन, इंग्लैण्ड, चीन, जैसे देश स्पर्धा करके संसार को युद्ध की आग में न झोंक दें।
रंगभेद, गोरे-काले का भेद मिटाया जाय जिससे अमरीका में हब्शियों पर और दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों पर अत्याचार होना, जैसे अन्यायपूर्ण कृत्य बन्द हों।
सब संसार में एक बोली हो जिससे सब लोग एक दूसरे के मनोभाव समझ सकें और आपस में मित्र बन सकें।
जनसंख्या और खाद्य सामग्री के उत्पादन में समन्वय किया जाय। इसके बिना भुखमरी और अशाँति फैलती है।
श्रम की प्रतिष्ठा पूर्ण रूप से कायम की जाय। इसी से पूँजीवाद का विष शमन हो सकेगा और हरामखोरी तथा मुफ्तखोरी की प्रवृत्तियाँ दूर होंगी?
इसमें सन्देह नहीं कि जब तक लोगों में वर्तमान समय में भीतर घुसे दोषों को निकाल कर उनके मन को परिष्कृत न किया जायेगा तब तक नवयुग नहीं आ सकता। विशेषतः जाति और संप्रदाय ऐसी चीजें हैं जो मनुष्यों में अनिवार्य रूप से पृथकत्व-फूट की भावना की वृद्धि करती है। इसी प्रकार भाषा भेद से मनुष्यों की पारस्परिक घनिष्ठता में व्याघात होता है और गरीब-अमीर तथा काले-गोरे का अन्तर ईर्ष्या और द्वेष को जन्म देता है। जब इन बाधाओं को दूर हटा दिया जायेगा तभी सच्चे अर्थों में एक विश्व संघ की स्थापना का प्रयत्न किया जा सकेगा। जब तक उपरोक्त दोष बने रहेंगे तब तक तो यदि किसी विश्वव्यापी संगठन का प्रयत्न किया भी जायेगा तो वह वर्तमान संयुक्त राष्ट्र संघ आदि की तरह दिखावटी और निरर्थक ही सिद्ध होगा।
विश्व शासन-व्यवस्था-
आगामी विश्व-समाज का एक अन्य चित्र भी है जिसमें उस समय की शासन-व्यवस्था पर प्रकाश डाला गया है। इसके अनुसार ‘संसार भर का एक विश्व-पंचायती विधान स्थापित होगा जिसमें राष्ट्रों, रंगों, धर्मों, श्रेणियों के लोग पूर्णतया एक हो जायेंगे, पर उसमें भाग लेने वाले राष्ट्रों और देशों की स्वतंत्रता की रक्षा की जायेगी। इस विश्व-पंचायती-विधान में एक संसार भर की विश्व-धारा सभा होगी जिसके सदस्य सारी मनुष्य जाति के प्रतिनिधि होते हुये अपने राष्ट्र के सर्वसाधन सम्पन्न अधिकारी भी होंगे। यही सब सदस्य मिल विश्व-पंचायत में ऐसे नियम बनायेंगे जो संसार के सभी देशों पर समान रूप से लागू होंगे। ये कानून ऐसे होंगे जिनसे सब देशों का पारस्परिक संबंध मधुर और न्यायपूर्ण बनेगा। संसार भर की एक प्रबंधकारिणी संस्था होगी, जिसकी सहायता के लिये एक अन्तर्राष्ट्रीय सेना होगी जो उन नियमों को कार्यरूप में परिणत करायेगी, जिन्हें विश्वधारा सभा ने बनाया है। इस प्रकार विश्व-पंचायत के सदस्यों की अखण्ड एकता की पूर्ण रक्षा हुआ करेगी।’
आगे चल कर जीवन संबंधी अन्य आवश्यक कार्यों पर विचार करते हुये कहा गया है- ‘संसार भर का एक न्यायालय होगा और संसार भर में पत्र व्यवहार करने और यातायात करने की ऐसी पद्धति प्रचलित की जायेगी जिसमें कोई देश किसी प्रकार की रुकावट पैदा न कर सकेगा। सारे संसार की एक राजधानी होगी जो विश्व-संस्कृति के लिये केन्द्र का कार्य करेगी। यह एक ऐसा केन्द्र होगा जिससे संगठित करने वाली शक्तियाँ उत्पन्न हुआ करेंगी। संसार भर के लिये एक भाषा होगी जो या तो बनाई जायेगी या प्रचलित भाषाओं में से प्रेमपूर्वक चुन ली जायेगी। संसार के लिये एक विश्व-लिपि, एक विश्व-साहित्य, सारे संसार के लिये एक ही विश्व-सिक्का, एक ही प्रकार की विश्व-व्यापक नाप-तोल आदि ऐसी बातें होंगी जो सब राष्ट्रों के बीच अटूट संपर्क और एक दूसरे को समझाने की सुविधायें उत्पन्न करेंगी। इस नये समाज में विज्ञान और धर्म, जो मानव जीवन की बड़ी प्रबल शक्तियाँ हैं, मिलजुल कर कार्य करेंगी और इस प्रकार मानव-जाति में एकता की वृद्धि करेंगी। इस विधान के अंतर्गत समाचार पत्र मनुष्य जाति के विभिन्न विचारों को प्रकट करने के लिये पूर्णतया स्वतंत्र होंगे किन्तु वे किसी धनाढ्य व्यक्ति या संस्था के हाथों में पड़ कर कोई कुटिल प्रचार न कर सकेंगे।’
सामाजिक परिवर्तनों का पूर्वाभ्यास-
वर्तमान सामाजिक व्यवस्था को बदल कर उसके स्थान पर नई व्यवस्था स्थापित करने का कार्य इतना विशाल और अनगिनती शाखा-उपशाखाओं से युक्त है कि उनका वर्णन एक लेख क्या एक ग्रंथ में भी संभव नहीं हो सकता। इसलिये हम भावी-समाज की कुछ ऐसी झाँकियाँ (वर्तमान अवस्था से मुकाबला करके) दिखाना चाहते हैं जिससे पाठकों को स्वयं ही प्रस्तावित परिवर्तनों का महत्व अनुभव होने लगे। यह वर्णन श्री राहुल साँकृतायन की ‘बाईसवीं सदी’ पुस्तक में है। यह इस ढंग से किया गया है मानों कोई व्यक्ति उस भावी-समाज में पहुँच कर उसकी नवीन व्यवस्थाओं की तुलना पुरानी संस्थाओं से कर रहा है। सब से पहले वर्तमान व्यापार प्रणाली के दोषों की आलोचना सुनिये-
‘पहले किसी प्रकार भी धनी बनने की बीमारी का बड़ा प्रकोप था। उस समय लोगों को ऐसा करने की स्वाधीनता भी थी। उस समय किसी वस्तु का मूल्य राष्ट्रीय आवश्यकता पर निर्भर नहीं था। धन की इच्छा वाले धनिक इस बात की कब परवाह करते थे, कि अमुक व्यवसाय में देश का श्रम तथा जीवन बरबाद होगा या सार्थक? वह तो देखते थे कि बाजार में माँग किस चीज की है। बस, उसी की तैयारी के लिये बड़े-बड़े कारखाने खोल देते थे, जिनमें लाखों आदमी काम करते थे। शराब, सिगरेट, अफीम यद्यपि हानिकारक वस्तुयें थीं, किन्तु उनकी उपज के लिये लाखों आदमी और लाखों बीघे जमीन फंसी रहती थी। आजकल नये संसार में वैसी बात कहाँ चल सकती है?’
आजकल की अदालतें कैसी निकम्मी चीजें हैं और शिक्षा प्रणाली कितनी निरर्थक है इसका कुछ परिचय निम्न उद्धरण से मिल सकेगा-
‘पैसे का नाम उठ जाने तथा वैयक्तिक सम्पत्ति के न रह जाने से फल-फूल, खेती-बारी, कल-कारखाना सब कुछ राष्ट्रीय है, और इसीलिये अब उतने नियमों की भी भरमार नहीं है। इन्कम टैक्स का कानून, बन्दोबस्त कानून, कोर्ट फीस, आबकारी, काश्तकारी, लगान, ज्वाइंट स्टाफ कंपनी आदि-आदि सैकड़ों कानूनों का अब कोई काम नहीं रहा। दीवानी मामलों की जड़ ही खत्म हो गई, क्योंकि धन-धरती किसी व्यक्ति की न होकर समाज की है। फौजदारी कानून का आकार भी बहुत घट गया है, क्योंकि धन-धरती के अपहरण विषयक चोरी-डकैती आदि अपराध अब संभव ही नहीं। एक व्यक्ति का दूसरे-व्यक्ति को हानि पहुँचाने के कारण भी अब नाम-मात्र को रह गये हैं, क्योंकि इन सब की जड़ वही व्यक्तिगत स्वामित्व ही था।
उन निकृष्ट पेशों और दूषित शारीरिक तथा मानसिक स्थिति वाले लोगों के विषय में कैसा सुधार हुआ इसका विवरण पढ़िये-
‘आजकल संसार में कितने ही पेशों का अस्तित्व नहीं रहा। वकील, मुख्तार, सोख्तार, बैरिस्टर ही नहीं, भंगी, रंडी, भिखमंगे, पंडे, भाट, मुजावर, कसाई आदि भी अब नहीं रह गये हैं। खिदमतगार, लौंडी, आका भी नहीं। बाल-विवाह, अनमेल विवाह का भी पता नहीं। तिलक, दहेज, नाच तमाशा, बड़ी-बड़ी बारात और उनमें हाथी, घोड़े, पालकी, आतिशबाजी आदि कुछ भी नहीं। देवताओं और पीरों के अड्डों की पूजा, बलिदान और कुर्बानियों का भी निशान नहीं। जाति-भेद, रंग-भेद भी नहीं। पैतृक बीमारियाँ तथा राजरोग, कुष्ठ, दमा, बवासीर, पागलपन, राजयक्ष्मा, उपदंश आदि सुनने में नहीं आते। इन बीमारियों से पिछली शताब्दी (21 वीं शताब्दी) में राष्ट्र को बहुत संघर्ष करना पड़ा, तब विजय मिली। ऐसे सब रोगियों (नर और नारी दोनों) को औषधि-प्रयोग से सन्तानोत्पत्ति के अयोग्य बना दिया गया और उन्हें हटाकर पृथक रखा गया। यह काम बहुत कठिन था और हुआ भी एकदम नहीं। किन्तु जब एक बार राष्ट्र ने अपने हित की बात को समझ कर उसे करने की ठान ली तो भला वह काम हुये बिना कब रह सकता था? यह राष्ट्र ही के प्रयत्न का फल है कि पृथ्वी पर अंधे, लूले, लंगड़े, बहरे, गूँगे, काने, बुद्धिशून्य तथा विकृत-इन्द्रिय व्यक्ति खोजे भी नहीं मिलते।’
हम समझते हैं कि कितने ही पाठक इन बातों को कोरी कल्पना कह कर हंसने लगेंगे, पर इस प्रकार के भाव-प्रदर्शन में कोई बुद्धिमानी नहीं है। इससे यही प्रकट होता है कि उनमें इतनी क्षमता नहीं कि वर्तमान घटनाओं के आधार पर सौ-पचास वर्ष आगे चल कर होने वाले परिवर्तनों का अनुमान कर सकें। क्राँतिकारी परिवर्तन भी होते ही रहे हैं, यह हम पिछले अनुभवों से जानते हैं। सौ वर्ष पहले अधिकाँश यात्रायें पैदल या बैल गाड़ियों पर हुआ करती थीं। कहीं-कहीं घोड़ा-गाड़ी और ऊंट गाड़ी आदि से भी काम लेते थे। पर आज पैरों से चलना प्रायः बन्द सा होता जाता है। प्रत्येक व्यक्ति साइकिल से लेकर हवाई जहाज तक किसी न किसी यंत्र का प्रयोग करके ही चलता है। हमारे देखते-देखते यातायात के संबंध में यह क्राँतिकारी परिवर्तन हो गया। अब लोग एक नगर से दूसरे नगर और एक देश से दूसरे देश तक की तो बात या शहर के भीतर भी जहाँ तक संभव हो सवारी से चलते-फिरते हैं। यदि सौ वर्ष पहले कोई दूरदर्शी व्यक्ति साधारण लोगों से यह बात कहता तो वे कदापि इसको न मानते और कहने वाले को गप-शप उड़ाने वाला ही बतलाते।
यही बात आप आगामी समाज की पुनः संबंध में भी समझ लें। समय के प्रभाव से महान् परिवर्तन हो ही जाते हैं, इस अवसर पर में पारस्परिक स्पर्धा और स्वार्थपरता ने ऐसी परिस्थिति पैदा कर दी है कि जिसके कारण कोई भीषण संघर्ष होकर यह परिवर्तन बहुत शीघ्र और व्यापक रूप से होगा। इसलिये हम अपने पाठकों का ध्यान सदैव इस परिवर्तन की संभावनाओं की तरफ आकर्षित किया करते हैं, जिससे वे सावधान होकर दूषित और समय के प्रतिकूल प्रणाली को त्याग कर समयानुकूल मार्ग को अपनावें। इसमें सबसे मुख्य बात यही है इस समय जो पृथकता और अपना ही स्वार्थ देखने की मनोवृत्ति मनुष्य में घर कर गई है वह अन्त में दुःखदायी बन जायेगी और इस युग-परिवर्तन के जमाने में तो और भी घातक सिद्ध होगी। हमको निश्चय रूप से यह समझ लेना है कि यह परिवर्तन केवल मनुष्य का सोचा हुआ नहीं है वरन् दैवी-योजना और दैवी इच्छा से उपस्थित हो रहा है।
जुलाई के अंक में हम संसार के ऊपर मंडराते हुये युद्ध संकट की जो चेतावनी दे चुके हैं वह जैसे-जैसे समय बीतता जायेगा पूरी होती दिखाई देगी। जैसा उसमें कहा गया था, तीसरे महायुद्ध का केन्द्र इसराइल (यहूदी) और अरब का संघर्ष ही बनता जाता है। विश्व-बन्धुत्व और विश्व-कल्याण की भावना रखने वालों को एकता और शाँति की शक्तियों को बढ़ावा देकर इस संकट को हलका करने की चेष्टा करनी चाहिये। यह कार्य क्यों और कैसे किया जाय इसी का मार्ग-दर्शन इस अंक में किया गया है।
First
6
8
Last
::1::
अब जीवन की चाह बन चुकी मिटने की अभिलाषा,
विश्व शाँति में राग भर रही, अगर क्राँति की भाषा।
वृद्ध जगत, जर्जर समाज है, रूढ़ि-ग्रस्त मानव है,
मेरे आगे पड़ा हुआ विधवा संसृति का शव है।
अब है कितनी देर, जगो, मेरे प्रलयंकर जागो,
राह देखता सर्वनाश, जागो शिवशंकर जागो॥
::2::
दानवता है मुक्त और पशुता ने है बल पाया,
अनाचार है नियम, विषमता विश्व-मोहनी माया।
छल है साधन, लूट यहाँ संयम, परवशता क्रम है,
अट्टहास अनहद है, इसका सत्य स्वयं ही भ्रम है।
भूमि अस्थि बन चुकी, कफ़न बन करके अम्बर जागो,
राह देखता सर्वनाश, जागो शिवशंकर जागो॥
::3::
शोषण का हो अन्त, विश्व शोषित के स्वर में बोले,
‘निर्बल की जय’ सत्ता का शाश्वत सिंहासन डोले।
परा प्रकृति के उपहारों के सब समान अधिकारी,
नहीं किसी तक सीमित भू की अचल सम्पदा सारी।
जीवन बन कर फूट पड़ी नवयुग के निर्झर जागो,
राह देखता सर्वनाश, जागो शिवशंकर जागो।
-विद्यावती मिश्र
*समाप्त*