‘अब फिर से सतयुग आयेगा’-यह बोल रहा है महाकाल।
निश्चय ही दुनिया बदलेगी, निश्चित ही परिवर्तन होगा।
नव-भव्य भावना जागेगी, नवयुग का आरोहण होगा।
है कौन शक्ति जो रोक सके, अब काल-चक्र की प्रबल चाल॥
हैं वर्ष हजारों बीत चुके, अन्यायों को सहते-सहते।
हैं बीत चुकीं सदियाँ अनेक, इस कलियुग में रहते-रहते।
चल चुकी बहुत पर अब न चलेगी, कलि की कोई कुटिल चाल॥
अन्यायी, अत्याचारी की अब खैर नहीं, निश्चित जानो।
सत्ता-लोलुप मिट जायेंगे, चाहे मानो या ना मानो।
अब खड़ा हो चुका जन मानस, क्रांति की कर में ले मशाल॥
क्यों है निराश? क्यों है हताश? तू है भारत का सपूत।
आने वाले कल का तो तुझको ही बनना है अग्रदूत।
इसलिये भीरुता छोड़, प्रकट कर दे अपना पौरुष कराल॥
अब दूर नहीं है, वह दिन जब सब में मानवता आयेगी।
सब ओर विश्व में सत्य-न्याय की, धर्म-ध्वजा फहरायेगी।
टूटेंगे सब ये क्षुद्र बाँध, लहराएगा सागर विशाल॥
‘अब फिर सतयुग आयेगा’.........!
-रामकुमार ‘भारतीय’
बच्चे जब बहुत शरारत करते हैं, साधारण समझने बुझाने से नहीं मानते तो अध्यापकों को उनकी दूसरी तरह सबक सिखलाना पड़ता है। माता-पिता भी ऐसे अवसरों पर अपने बच्चों के साथ कड़ाई से पेश आते हैं और कई बार वह कड़ाई ऐसी कठोर होती है जो उन्हें बहुत समय तक याद रहती है और फिर वैसी शरारत करने से रोकती है।
साधारणतया पाप, दुष्कर्म न करने के लिये धर्म शिक्षा देने और अनीति से मन विरत करने की प्रक्रिया चलती रहती है। उससे बहुत लोग सम्भलते-सुधरते भी हैं। पर जो व्यक्ति उस पर ध्यान नहीं देते, उद्धत एवं उच्छृंखल आचरण करते हैं, अनीति बरतते और अपराध करते हैं उनके लिए राजकीय दंड व्यवस्था का प्रयोग किया जाता है। पुलिस उन्हें पकड़ती है, मुकदमा चलता है, न्यायाधीश भर्त्सनापूर्वक दंड व्यवस्था करता है, अपराधी को जेल ले जाया जाता है और वहाँ उसे कोड़े मारने से लेकर चक्की, कोल्हू में चलने तक, फाँसी से लेकर आजीवन कारावास तक की यातना दी जाती है। उद्दंडता का यही उचित परिष्कार है। सुधार के अन्य साधारण तरीके जब निष्फल हो जाते हैं तब दंड ही एकमात्र आधार रह जाता है। भगवान कृष्ण ने समझाने बुझाने के सभी शान्तिमय तरीके प्रयोग करके देखे पर जब कौरव दल उद्दंडता से विरत न हुआ तो आखिर महाभारत ही एकमात्र उपाय शेष रहा जो विवशता में उन्हें प्रयुक्त करना पड़ा। अगणित मनुष्य मारे गये, प्रचुर मात्रा में रक्तपात हुआ, धन-जन की अपार क्षति हुई, यह सम्भावना पहले से ही स्पष्ट थी, पर किया क्या जाय। दुष्टता जब अनियंत्रित हो जाती है तब उसे काबू में लाने के लिये और कुछ उपाय भी तो नहीं है।
कुत्ते गली मुहल्ले में ही रहते हैं, उनके छोटे-मोटे अपराधों को लोग सहन भी कर लेते हैं। पर जब वे पागल होकर लोगों को अन्धाधुन्ध काटते हैं तब उन्हें प्राण दंड ही दिया जाता है। नरभक्षी बाघों से आखिर कैसे पिण्ड छुड़ाया जाय? हाथी जब पागल होकर बेकाबू हो जाते हैं और शान्ति के लिये खतरा बन जाते हैं तब उन्हें निर्दयतापूर्वक वश में किया जाता है। मनुष्य के बारे में भी यही बात है। उसे एक नियत मर्यादा में रहना चाहिये। वासना और तृष्णा की ओर एक सीमा तक ही आकर्षित होना चाहिये। पूरी तरह स्वार्थ में ही नहीं डूब जाना चाहिये वरन् सार्वजनिक हित का भी, लोग-मंगल का भी ध्यान रखना चाहिये यदि वह ऐसा नहीं करता ओर स्वार्थान्ध होकर नर पशु की तरह-नर पिशाच की तरह आचरण करने लगता है तो उसे सुधारना हर कीमत पर आवश्यक हो जाता है। सीधी उँगली से घी नहीं निकलता तो टेढ़ी उँगली करके प्रयोजन पूर्ण करना होता है। भगवान ऐसा ही करते हैं। लोक मानस को संतुलित रखने के लिये-जन साधारण को नीति और धर्म की मर्यादा ही में रहने के लिये मार्ग-दर्शन-देवदूत भेजते हैं- जब तक उनके प्रयासों से काम बनता रहता है तब तक कठोरता नहीं बरतते। पर जब स्थिति बेकाबू हो जाती है, लोग धर्म और सदाचार को ताक पर उठाकर रख देते हैं और दल-बल की नीति अपनाकर अनैतिक उद्धतता पर उद्दंडतापूर्वक उतारू हो जाते हैं तो फिर उन्हें उचित शिक्षा देने के लिये ऐसे उपाय काम में लाने पड़ते हैं जिन्हें भयानक, लोमहर्षक, निर्दय, निर्मम कहा जाता है। मंगलमय-शिव, जब अनीति से क्षुब्ध होकर रौद्र रूप धारण करते हैं तब दशों दिशाओं में हाहाकार मच जाता है। उनके गले में पड़े हुए मृदुल सर्प विष भरी फुसकारें हुँकारते हैं, त्रिशूल अगणितों के उदर विदीर्ण करता है, डमरू-नाद से दिशाएँ काँपती है, नर मुण्डों से उनकी शृंगार सज्जा सज जाती है। औघड़ दानी के खप्पर में रक्त ही रक्त भरा होता है। ताण्डव की हर थिरकन पर ज्वालाएँ उठती हैं और उस गगनचुम्बी दावानल से विश्व का कण-कण संतप्त हो उठता है। उस ज्वाला में मल आवरण के, दोष दुर्विकार के जलने-गलने का विधान बनता है और उस जाज्वल्यमान ज्वाला-माल में वह सब कुछ जल-जल कर नष्ट हो जाता है, जो अवाँछनीय है, अनुपयुक्त है, अनर्गल है, अशुभ है।
कई बार इस विद्रूप विप्लव में गेहूँ के साथ घुन भी पिसते हैं। जो निर्दोष दीखते हैं वे भी चपेट में आ जाते है। पर वस्तुतः वे निर्दोष दीखते ही हैं-होते नहीं। अपराध करना एक पाप है। पर उसे रोकने के लिये प्रयत्न न करना निरपेक्ष भाव से खड़े देखते रहना भी, निरपराध होने का चिन्ह नहीं है। अपने काम से काम, अपने मतलब से मतलब रखने की नीति यों भली-भोली मालूम पड़ती है, पर वस्तुतः बड़ी ही संकीर्ण, ओछी और असामाजिक है। मनुष्य सामाजिक प्राणी है, उसकी प्रगति, शान्ति और सुरक्षा सामाजिक सुव्यवस्था पर निर्भर है। अस्तु उसे वैयक्तिक स्वार्थों और मानवतावादी आदर्शों की रक्षा के लिए, सामाजिक सुव्यवस्था के लिए समुचित योगदान करना चाहिए। अनीति और अव्यवस्था को रोकना चाहिए, चारों ओर फैले हुए पिछड़े मन को हटाने के लिए पूरा-पूरा प्रयत्न करना चाहिए। यह उसका सामाजिक कर्त्तव्य है जो वैयक्तिक कर्त्तव्यों की तरह ही आवश्यक है। कोई विचारशील व्यक्ति यदि अपने पिछड़े और बिगड़े समाज को सुधारने के लिए प्रयत्न नहीं करता तो उसकी उपेक्षा भी एक दंडनीय अपराध ही मानी जायेगी- भगवान की दंड संहिता में असामाजिक प्रवृत्ति भी एक पाप है और जो उदासीन बन कर अपने आप में ही सीमित रहता है वह अपनी क्षुद्रता, संकीर्ण और स्वार्थपरता का दंड अन्य प्रकार के अपराधियों की तरह ही भोगता है।
अपने मुहल्ले को आग लग रही हो और उसे बुझाने के लिए प्रयत्न न करके कोई व्यक्ति चुपचाप खड़ा उसका तमाशा देखे-एक व्यक्ति हत्या कर रहा हो और पास खड़ा व्यक्ति उसे रोकने समझाने का प्रयत्न न करे-पड़ोस में चोरी डकैती हो रही हो और यह सब देखते हुए भी सावधान न करें, तो उसकी भर्त्सना की जायेगी और यह कानूनी न सही, नैतिक दृष्टि से ही सही, आखिर अपराध ही है। किसी के पास बन्दूक हो वह अपने मुहल्ले में होने वाली डकैती को रोकने के लिए फायर न करें तो उस कायरता के उपलक्ष में उसकी बन्दूक जब्त की जा सकती है। पिछले स्वराज्य आन्दोलन में जिन गाँवों के आस-पास रेल की पटरी उखाड़ने, तार काटने, बीज गोदाम लूटने आदि की घटनायें होती थी, उन गाँवों के ऊपर सामूहिक जुर्माना करके सरकारी हानि का मुआवज़ा वसूल किया जाता था। सरकारी दलील यह थी कि हर नागरिक का कर्त्तव्य है कि वह सरकारी सम्पत्ति की सुरक्षा का पूरा-पूरा ध्यान रखे और कोई अनुपयुक्त बात होने की संभावना हो तो उसे रोके, अपराधियों को पकड़वाये। जहाँ के लोग ऐसा नहीं करते उन्हें दंडनीय ही माना जायेगा भले ही व्यक्तिगत रूप से उन्होंने वह अपराध न किया हो।
यह दलील भगवान की है। उन्होंने सामूहिक सुख-शान्ति और सुव्यवस्था की जिम्मेदारी हर मनुष्य के कंधों पर सौंपी है। स्वयं अपराध न करना ही काफी नहीं, दूसरों को अपराध करने से रोकना भी कर्त्तव्य है। स्वयं उन्नति करना, सदाचारी होना ही काफी नहीं, दूसरों को भी ऐसी ही सुविधा मिले इसके लिये प्रयत्नशील रहना भी आवश्यक है। जो इस ओर से उदासीन हैं वे वस्तुतः अपराधी न दीखते हुए भी अपराधी हैं। चोरी की तरह ही लापरवाही भी दंडनीय है। गेहूँ के साथ घुन पिसने की कहावत ऐसे ही लोगों पर लागू होती है।
अगले दिनों महाकाल का वह क्रिया कलाप सामने आने वाला है जिसमें अगणित लोगों को अनेक प्रकार के कष्ट सहने पड़ेंगे। महायुद्ध, गृह-युद्ध, शीतयुद्ध, व्यक्ति-युद्ध, प्रकृति-युद्ध आदि अनेक प्रकार के क्लेश, संघर्ष, उद्वेग, अवरोध सामने आने वाले हैं। इनसे हर व्यक्ति को ऐसे झटके, झकझोर लगेंगे कि उसे विवशता अथवा स्वेच्छा से अपनी वर्तमान रीति-नीति बदलने के लिए विवश एवं बाध्य होना पड़ेगा। सफलता और उन्नति के नशे में मनुष्य झूमता रहता है, हर्षोल्लास और वैभव सुविधा के वातावरण में मनुष्य का केवल अहंकार ही बढ़ता है, अहंकारी को आत्म-निरीक्षण की फुरसत कहाँ? उसे सुधारने समझाने का साहस कौन करे? इस विपन्नता को महाकाल की रुद्रता ही दूर करती है। वह दुःख दुर्भाग्य का शोक-संताप का ऐसा डंडा घुमाती है कि उसकी करारी चोटें खा-खा कर मनुष्य कराहता है। उस कराह के साथ-साथ ही उसे अपनी भूलों को खोजने तथा सुधारने की याद आती है। भूलों के रास्ते पर लाने का यह तरीका है तो निर्मम, पर साथ ही सकी अमोघता भी स्वीकार करनी पड़ेगी। आग से तपाने पर सोने का मैल जल जाता है और उसका खरापन निखर आता है। प्रकृति की मार खाकर दुष्टता भी पिघल जाती है और वह दूसरे सही ढाँचे में ढलने की स्थिति में पहुँच जाती है। लगता है महाकाल अगले दिनों सब करने जा रहे हैं। दृष्टि पसार कर निरीक्षण करने पर आज की परिस्थिति उसी का आभास देती है।
सरकारों के माध्यम से लड़े जाने वाले एक तीसरे भयानक महायुद्ध की पूरी-पूरी सम्भावना विद्यमान है। इस युग के वैज्ञानिक युद्ध बड़े रोमाँचकारी और व्यापक क्षेत्र को प्रभावित करने वाले होते हैं। उससे धन जन की अपार हानि होनी स्वाभाविक है। चिरकाल के सतत प्रयत्नों से जिस तथाकथित सभ्यता और समृद्धि का निर्माण किया गया है उसको ऐसी परिस्थितियों में भारी क्षति पहुँचती ही है। आज के युद्ध थोड़े से मनुष्यों को मारकाट कर समाप्त नहीं हो जाते वरन् अपने साथ अगणित प्रकार की नई समस्याएं एवं नई विकृतियाँ उत्पन्न करते हैं। तीसरे महायुद्ध के समय और उसके पश्चात् ऐसी अनेक पेचीदगियाँ पैदा होंगी जो मनुष्य जाति की वर्तमान विचारशैली और क्रियापद्धति को उलट-पलट कर रख देंगी।
साथ ही हमें यह भी जानना चाहिए कि महाकाल का युग निर्माण प्रत्यावर्तन केवल सरकारी और सेनाओं के माध्यम से लड़ी जाने वाली लड़ाई तक ही सीमित नहीं है वरन् उसका क्षेत्र बहुत व्यापक है। वर्ग संघर्ष और गृह युद्ध की परिस्थितियाँ उग्र से उग्रतर होती चली जा रही हैं। हड़तालें, घिराव, धरना, कलम-बन्द, आन्दोलन के पीछे केवल आर्थिक कारण ही नहीं, मनोभूमि का विक्षोभ भी है। इन आन्दोलनों का संचालन वे कर रहे हैं जो करोड़ों देशवासियों की अपेक्षा कहीं अधिक सुविधाजनक परिस्थितियों में है। भाषा, सम्प्रदाय, प्रान्त और छोटे-छोटे कारणों को लेकर अप्रत्यक्ष रूप से गृह-युद्ध जैसी, शीत-युद्ध जैसी स्थिति पैदा हो रही है। यह तो भारत की आंतरिक स्थिति की बात हुई, वस्तुतः समस्त विश्व में यही वातावरण व्याप्त है। गरम युद्ध का दावानल रुका तो शीत युद्ध की आग हर जगह सुलगती दिखाई दे रही है। यह शीत युद्ध भी लोक-मानस को भयावह झटके देने के माध्यम हैं। उनसे परेशान हुआ लोक-मानस कोई शान्ति मार्ग खोजने के लिए विवश होता है।
प्रकृति के कोप इन दिनों अप्रत्याशित नहीं हैं। मनुष्य की प्रकृति एवं वृत्ति इस अन्तरिक्ष आकाश को- सूक्ष्म प्रकृति को प्रभावित करती है। सतयुग में सज्जनों-चित प्रवृत्तियों जब अपनी प्रतिक्रिया आकाश में प्रवाहित करती हैं तब उसका परिणाम विपुल वर्षा, प्रचुर धन-धान्य, परिपुष्ट जलवायु, अनुकूल उपलब्धियों, सुखद परिस्थितियों आदि घटनाओं के रूप में सामने आता है। सतयुग में इस पृथ्वी पर सर्वत्र स्वर्णिम परिस्थितियाँ थी। प्रकृति मानवीय सुख साधना के अनुकूल चलती थी। ऋतुएं अपना ठीक काम करती थी और धरती-आकाश सभी मंगलमय उपलब्धियाँ उत्पन्न करते थे। मनुष्य की चेतन प्रकृति का सृष्टि की जड़ प्रकृति के साथ अद्भुत सामंजस्य एवं घनिष्ठ सम्बन्ध है। जब सज्जनता का बाहुल्य होगा तो सुख समृद्धि की परिस्थितियाँ भी उत्पन्न होंगी। किन्तु यदि दुष्टता, दुर्बुद्धि और दुष्कर्मों का पलड़ा भारी रहा तो बाह्य प्रकृति पर भी उसकी बुरी प्रतिक्रिया होगी। अकाल, भूकम्प, बाढ़ अतिवृष्टि, अनावृष्टि ईति-भीति का दौर बार-बार होता रहेगा, जिससे मनुष्य विविध विधि त्रास पाते रहेंगे।
लोगों के मनोविकार, मानसिक रोग आकाश में ऐसा रेडियो विकरण फैलाते हैं जिससे मंद और तीव्र शारीरिक रोगों एवं आधि-व्याधि की अप्रत्याशित रूप से उत्पत्ति और वृद्धि होती है, जिनके कारण जनसाधारण को हर घड़ी असह्य कष्ट सहने पड़ते हैं। कभी-कभी तो वे रोग महामारी और सामूहिक विक्षोभ के रूप में व्यापक बनकर फूट पड़ते हैं और भारी विनाश उत्पन्न करते हैं।
अपराधों की अभिवृद्धि भी एक भयानक विपत्ति है। उनके बढ़ने से समाज में एक प्रकार से गृह-युद्ध नहीं तो व्यक्त-युद्ध की परिस्थिति अवश्य पैदा हो जाती है। सहयोग और सद्भाव के प्रभाव में न तो व्यक्तियों की उन्नति होती है न समाज ऊँचे उठते हैं। वरन् असहयोग और दुर्भाव की प्रतिक्रिया सभी की प्रगति में बाधा उत्पन्न करती है और जहाँ इस प्रकार की दुर्बुद्धि पनपती है तो सारे परिवार को ही ले डूबती है।
इस प्रकार विभिन्न दिशाओं से पीड़ा और परेशानी मनुष्य को कोसती है तो उसे एक सर्वतोमुखी कष्ट प्रक्रिया व्यथा भरा अनुभव होता है। परिवार में सभी प्रतिकूल, बच्चे अवज्ञाकारी, वयोवृद्ध दुराग्रही होने से घर नरक बन जाता है, शरीर में अंग प्रत्यंगों में छुपे हुए रोग अहिर्निश उत्पीड़ित करते हैं, जिनके साथ अगणित अहसान किये थे, वे ही मर्मान्तक चोट पहुँचाते हैं, बढ़ी हुई तृष्णा एवं विलासिता के अनुरूप आर्थिक साधन नहीं जुटते, मित्रों के रूप में विश्वासघाती भेड़िये ही चारों ओर घूमते नजर आते हैं, परिस्थितियाँ चिन्ता, भय, शोक, निराशा, क्षोभ, उद्वेग का वातावरण बनाये रहती है, तो मनुष्य का शरीर और मन एक प्रकार से चिन्ता की आग में जलता रहता है और उस जलन से इतनी मर्मान्तक पीड़ा होती है कि मनुष्य अधपगलों की तरह ज्यों-ज्यों करके अथवा आत्महत्या करके उस व्यथा वेदना से पिंड छुड़ाते देखे जाते हैं। व्यक्तिगत और सामूहिक दुष्टता के दावानल में मनुष्य को ऐसी ही जलन में तो तिल-तिल करके झुलसना पड़ता है। नरम इसे नहीं कहें तो और किसे कहें?
युद्ध, विनाश, प्राकृतिक प्रकोपों की बात इससे अलग है, वे ही मनुष्य को सब कुछ उलट पुलट कर रख देते हैं। रूस, चीन, यूगोस्लाविया, हंगरी, चैकोस्लेविया, पोलैण्ड, अलबानिया आदि देशों में जो साम्यवादी क्राँति हुई उसने करोड़ों व्यक्तियों को खून के आँसू बहाने के लिए और एक अप्रत्याशित परिस्थिति से जीवन यापन करने के लिए, अनभ्यस्त ढाँचे में ढलने के लिए विवश कर दिया। यह परिवर्तन प्रकृति-प्रकोपों से भी अधिक भयानक और निर्मम थे। आवश्यक नहीं कि तीसरे महायुद्ध में एटम बम गिरे तभी जापान के नागरिकों की तरह कोई विपत्ति आये। ऐसी भयावह क्रान्ति भी हमारे सामने आ सकती है जैसी उपरोक्त साम्यवादी देशों में हुई और उसने सामान्य जीवन क्रम को भयानक उत्पीड़न के साथ उलट-पुलट कर रख दिया।
चूँकि मनुष्य जाति अभी भी अनीति का मार्ग न छोड़ने के अपने दुराग्रह पर अड़ी हुई है इसलिये प्रत्यक्ष दीखता है कि हमें अगले ही दिनों महाकाल के कोप- भयानक विपत्तियों में होकर गुजरना पड़ेगा। सम्भव है यह दंड विधान हमें दुर्जनता का पथ छोड़ कर समानता अपनाने के लिए प्रेरित करे। ऐसा हो सका तो इन भावी विभीषिकाओं के भी नवयुग निर्माण की प्रसव-पीड़ा मान कर मंगलमय ही कहा जायेगा।
सृजन के देवता-ब्रह्म, पोषण के अधिष्ठाता-विष्णु और संहार के व्यवस्थापक भगवान शंकर है। त्रिदेवों की एक पूरक व्यवस्था के अंतर्गत ही इस विश्व ब्रह्मांड का क्रिया कलाप गतिशील हो रहा है। उत्पादन की प्रक्रिया प्राणधारियों तथा पदार्थों सहित चलते रहने से संसार की बढ़ोतरी होती है। जो उत्पन्न हुआ है उसका पोषण, अभिवर्धन होते रहने से प्रौढ़ता और परिपक्वता आती है। और जो उपजा है, बढ़ा है, पुष्ट हुआ है वह अन्ततः जराजीर्ण होने पर अनुपयोगी बन जाने के कारण कूड़ा-करकट मात्र रह जाता है, तब उसकी अन्त्येष्टि भी अभीष्ट होती है। विनाश-उत्पादन का अन्तिम छोर है। बीज का विनाश ही नये पौधे के उत्पादन का आधार है। पुरानी फसल कटने के बाद ही नई फसल के बोने उगाने का क्रम बनता है। प्राणी की मृत्यु न हो तो उसे नया जन्म धारण करने का अवसर कैसे मिले? सृष्टि का चक्र उत्पादन, अभिवर्धन और अवसान के चक्र पर घूम रहा है। अवसान न हो तो फिर उत्पादन के लिए नया पदार्थ कहाँ से आये? विधाता ने सृष्टि के आदि से जितना पदार्थ सृजा था उसी की उलट-पुलट होती रहती है और उसी की हेरा-फेरी से इस संसार में हलचल दीखती रहती है। अस्तु उत्पादन जितना क्राँतिमय हैं उतना ही अवसान भी। अवसान को अभिनव सृजन का शुभारम्भ कहा जाय तो यह सर्वथा उचित ही होगा।
भगवान शंकर का निवास स्थान श्मशान है। वे गले में मुण्ड-माला धारण करते हैं। मृत्यु के काल-पाश-महासर्प उनके कंठ में भुजाओं में, यज्ञोपवीत में लिपटे हुए हैं। तीक्ष्ण त्रिशूल उनका शस्त्र है। जब वे तीसरा नेत्र खोलते हैं तब चारों ओर आग बरसती है। कुपित होकर वे तीसरे नेत्र से जिसे भी देखते हैं वह जल-वल कर भस्म हो जाता है। कामदेव की मृग मरीचिका को एक बार उनके वीरभद्र, भैरव एवं नन्दी गण कितने विकराल हैं इसकी कल्पना करने मात्र से रोमाँच हो उठता है। जब प्रलय की आवश्यकता अनिवार्य हो जाती है तब वे ताण्डव नृत्य करने खड़े होते हैं। उनके चरणों की थिरकन जैसे-जैसे गतिशील होती चलती है वैसे ही जराजीर्ण कूड़ा-करकट प्रभूत दावानल में जल-जल कर अनन्त अन्तरिक्ष में विलय होता चला जाता है। पाप-पुरुष उनके चरणों में आ गिरता है। शिव-ताण्डव-नृत्य के चित्रों में एक उकड़ूं उलटे मुँह पड़ा हुआ भयभीत जीव दिखाई पड़ता है। उसी की पीठ पर नटराज के चरणों की थिरकन गतिशील होती है। यह पाप पुरुष मानव अन्तःकरण में निवास करने वाले पशु ही हैं, इसी की समय-समय पर असुर शब्द से भर्त्सना की जाती रहती है। ताण्डव नृत्य का प्रयोजन इस पाप पुरुष को परास्त करना उसकी माया मरीचिका को निरस्त करना ही है।
पाप पुरुष- असुरत्व मानवीय अन्तः चेतना में अनेक छन्द रूप धारण कर प्रवेश करता रहता है और उसे संकीर्ण स्वार्थ परता के- वासना और तृष्णा के- जाल जंजाल में फसाने के लिये विविध प्रलोभन एवं आकर्षण दिखाता रहता है। अविवेकी जीव इसी प्रलोभन में फंसता चला जाता है और अपनी ललक लिप्साओं की पूर्ति के लिए एक से एक अनोखे प्रपंच रचता रहता है। पाप पुरुष की प्रवंचना से जकड़ा हुआ प्राणी केवल वासना एवं तृष्णा की पूर्ति में ही रस लेता है, जीवनोद्देश्य एवं कर्त्तव्य धर्म की ओर तो आँख उठा कर देखने की भी इच्छा नहीं होती। इच्छा नहीं तो आवश्यकता कहाँ? सुविधा कहाँ? कामनाओं का इतना बड़ा पर्वत उसके सामने आ खड़ा होता है जिस पर चढ़ते-चढ़ते उसकी सारी शक्ति चुक जाती हैं, अभाव ही अभाव उसे चारों ओर दीखते हैं, जो उपलब्ध है वह अति न्यून दिखाई पड़ता है। ऐसी दशा में तुर्त-फुर्त बहुत कुछ समेट लेने, बहुत कुछ बरतने, बहुत कुछ भोग लेने के लिए अनीति का मार्ग ही एकमात्र अवलम्बन शेष रह जाता है। पाप पुरुष के जाल जंजाल में जकड़ा हुआ जीव अनीति ही सोचता है। अनीति ही बर्तता है। मर्यादाओं का पालन करने में उसे दरिद्रता पल्ले बंधती दीखती है। संचय रूखा और नीरस लगता है। अतएव उसे संचय और उपभोग की दिशा में दौड़ने में ही बुद्धिमानी प्रतीत होती है। इस घुड़दौड़ में कर्त्तव्य और आदर्श पिछड़ जाते हैं, अनीति ही एक मात्र सहचरी रह जाती है।
इस दयनीय दुर्दशा में पड़े हुए जीवधारी का उद्बोधन प्रबोधन करने समय-समय पर देवदूत, ऋषि, मनीषी, महापुरुष और अवतारी आते रहते हैं। उनके द्वारा समय-समय पर सामयिक मरहम पट्टी भी होती रहती है। मरम्मत से कुछ काम चल जाता है। प्रभावशाली धर्मोपदेष्टा अपने समय में एक सामयिक परिवर्तन भी उत्पन्न का देते हैं। उनके प्रयास कुछ सफल होते हैं। पर अन्ततः एक अवस्था ऐसी आ जाती हैं जब उस जरा-जीर्ण स्थिति को तोड़-फोड़ कर पुनः निर्माण का एक अभिनव सूत्रपात नये सिरे से करना पड़ता है। क्योंकि पाप पुरुष के चंगुल में फंसा हुआ व्यक्ति जब उद्बोधनों का भी कोई प्रभाव ग्रहण नहीं करता, मनोभूमि चिकने घड़े की तरह हो जाती है, एक दूसरे को उपदेश देने की विडम्बना रचते हैं और धर्माडम्बर का ढोंग रचने की कला में इतनी प्रवीणता बढ़ जाती है कि सुधारवाद के सारे प्रयत्न उस दंभ-प्रवाह में तिनके की तरह उड़ते-बहते चले जाते हैं। धर्मध्वजी दीखने वाले व्यक्ति ही जब धर्मद्रोह पर उतारू हों तब समझना चाहिये कि अब सुधार प्रयत्नों का अवसर चला गया अब मरहमपट्टी की स्थिति भी नहीं रही। इस विष-व्रण के लिए अब ‘मेजर आपरेशन’ की भयानक चीरफाड़ की अनिवार्य आवश्यकता उत्पन्न हो गई।
बाह्य दृष्टि से आज का संसार प्राचीन काल की अपेक्षा अधिक समृद्ध, अधिक साधन सम्पन्न और अधिक समर्थ है। लगता है हम प्रगति के पथ पर तेजी से बढ़ते चले जा रहे हैं। यह भौतिक मूल्याँकन सही भी हो सकता हैं। पर आत्मिक क्षेत्र में स्थिति बिलकुल उलटी है। भावनाओं में से उत्कृष्टता और आदर्शवादिता उठती सी चली जा रही है। आदर्श चरित्र के व्यक्ति जिनका भीतरी और बाहरी स्वरूप एक हो, ढूँढ़े नहीं मिलते। परस्पर आत्मीयता सहयोग सेवा और उदारता दरिद्रता इतनी व्यापक हो चली है कि किसी भी भयानक दुर्भिक्ष से उसकी विभीषिका लाखों गुनी अधिक है। यही मानव जाति का संसार का- सबसे बड़ा दुर्भाग्य है। इसी कमी के कारण साधन सामग्री की दृष्टि से यह समुन्नत समय आज नरक की आग में जल रहा है जबकि इतनी साधन सम्पन्नता मिलने पर सर्वत्र स्वर्गीय वातावरण परिलक्षित होना चाहिए था।
इस अभाव की पूर्ति पुनर्निर्माण से ही सम्भव हैं। पीतल के बर्तन जब टूट फूट जाते हैं तब उन्हें गला कर दुबारा नया ढाला जाता है। प्रेस के टाइप जब घिस जाते हैं जब उन्हें फौन्ड्री में गलने और नये सिरे से ढलने के लिए भेज दिया जाता हैं। मनुष्यों के अन्तःकरण भी अब टूटे बर्तनों और घिसे टाइपों की तरह दंभी होने के कारण बेकार हो गये हैं। अब उन्हें नये सिरे से गलना और ढलना पड़ेगा। गलाने और ढालने की फैक्ट्रियों में तेज आग की भट्टी जलती रहती है उन रद्दी धातुओं का प्रथम संस्कार उन्हीं से होता है। उनकी कठोरता को कोमलता में बदलने के लिए सब से प्रथम अग्नि संस्कार का ही आयोजन होता है। धातुओं को ढालने की छोटी भट्टियाँ मनुष्यों द्वारा बनाई जा सकती हैं। पर करोड़ों अरबों हृदय हीन घिसे टूटे मनुष्यों को उनके वास्तविक और उपयोगी स्वरूप में परिवर्तित करने के लिए जो भट्टी जलाई जायेगी उसके लिए बहुत बड़ी, बहुत व्यापक व्यवस्था होगी। महाकाल इसी की विधि व्यवस्था में इन दिनों लगा हुआ है।
महाप्रलय का अन्तिम ताण्डव नृत्य तब होता है जब पंचतत्वों से बनी प्रकृति जराजीर्ण हो जाती है। तत्व बूढ़े होने के कारण अपना काम ठीक तरह समयानुसार नहीं कर पाते। ऋतुएं समय पर नहीं आतीं और उत्पादन, पोषण, विनाश की क्रम व्यवस्था में व्यवधान उत्पन्न हो जाता है। धरती की उत्पादन और धारण शक्ति बीत जाती और ग्रह नक्षत्र अपना काम नियत समय से पूरा करने में असमर्थता प्रकट करते हैं। ऐसी स्थिति में महाकाल का अन्तिम ताण्डव नृत्य इस ब्रह्माण्ड को चूर्ण विचूर्ण कर छितरा बिखरा देने वाली महाज्वालायें प्रचण्ड करता है और एक नयी सृष्टि के सृजन की भूमिका सम्पादित करने के लिए महाकाली- फिर अपने प्रसव प्रजनन की तैयारी में लग जाती है। कालरात्रि की उस महानिशा का- महारात्रि का बड़ा शृंगार पूर्ण वर्णन पुराणों में मिलता हैं। महानिशा समाप्त होने पर फिर सृष्टि नये सिरे से उत्पन्न होती है।
यह महाप्रलय करोड़ों वर्ष बाद होती है। पर युग परिवर्तन के अवसर पर खण्ड प्रलय जैसा एक भयानक विस्फोट प्रायः होता रहता है। यह महाकाल के खण्ड नर्तन हैं, यों कहा इन्हें भी ताण्डव नृत्य ही जाता है। जब मानवीय मनोभूमि अत्यधिक दूषित होकर उस स्तर पर पहुँच जाती है कि सुधारक के सामान्य क्रिया कलाप निरर्थक सिद्ध होने लगें तो महाकाल को अपने तीव्र अस्त्रों का ही प्रयोग करना पड़ता है। प्रायः ऐसी ही परिस्थितियों में जन समाज को कड़े दंड देने के लिए लोमहर्षक प्रक्रिया अपनानी पड़ती है। इस भयानक क्रूर कर्म को करने के लिए अवसान के देवता-शंकर-जब रौद्र रूप धारण करते हैं और उथल-पुथल की रक्त रंजित क्रिया पद्धति अपनाते हैं तब उन्हें रुद्र कहते हैं। इस कल्प के आरम्भ से लेकर अब तक महाकाल को ग्यारह बार रुद्र रूप धारण करना पड़ा है। पुराणों में एकादश रुद्रों के नाम दिखाये गये हैं और उनके चरित्रों का विस्तृत वर्णन है।
महाकाल शंकर का एक नाम त्रिपुरारी भी है। प्राचीन काल में तीन दुर्दान्त दैत्य जन्में थे, तीनों सगे भाई थे। नाम तो उनके अलग-अलग थे पर उनने माया नगरी जैसे जादू भरे तीन नगर बसाये थे। इन तीन पुरों में ही उनने सारी दुनिया के लोगों को समेट कर बसा लिया था। माया नगरी का हर निवासी उन दैत्यों के प्रभाव में था। वे जैसा कहते वैसा ही वे सोचते और उन्हीं के निर्देशों पर कार्य करते। इससे संसार के समस्त निवासी आसुरी माया में भ्रमित हो गये, धर्म का लोप हो गया और अधर्म की विजय दुंदुभी बजने लगी। असुरता का वैभव चमका और तीनों पुरियाँ बड़ी समृद्धिशाली दीखने लगीं पर भीतर ही भीतर सब कुछ खोखला हो गया। उन नगरों के निवासी नाना प्रकार की आधि-व्याधियों में, शोक-सन्तापों में ग्रसित होकर नारकीय जीवन व्यतीत करने लगे। सर्वत्र हाहाकार मच गया।
धर्म ने प्रजापति से गुहार की, प्रजापति ने महाकाल को इसके लिए नियोजित किया क्योंकि वे ही परिवर्तनों के अधिष्ठाता देवता हैं। धर्म की पूरी बात भगवान शंकर ने सुनी और स्थिति को समझा। तीन पुर बसाने वाले वे तीन दैत्य यद्यपि अलग-अलग हैं पर वस्तुतः वे परस्पर पूर्णतया घुले-मिले हैं। उनके तीन पुर भी अलग-अलग दिखाई पड़ते हैं पर वस्तुतः वे परस्पर एक दूसरे का पोषण अभिवर्धन करते हैं। यह तीनों दैत्य साधारण रीति से नहीं मर सकते। उन्हें अभय वरदान यह मिला हुआ है कि जब वे मरेंगे तब एक साथ ही मरेंगे और एक ही शस्त्र से मरेंगे। वे दैत्य बड़े चतुर थे इसलिये उन्होंने ऐसा वरदान माँग रखा था। वे जानते थे कि हममें से एक को भी परास्त करना सहज नहीं, फिर तीनों को एक साथ चुनौती देने का तो साहस ही कौन करेगा। इस पर भी कोई लड़ने आये तो फिर उसके पास ऐसा शस्त्र नहीं हो सकता जो तीनों को एक साथ, एक ही बार में, एक ही क्षण मारे। यह असम्भव जैसा कार्य कोई नहीं कर सकेगा, इसलिए दैत्य होने के कारण अमर न हो सकने पर भी एक प्रकार से अमर ही बने रहेंगे।
भगवान शिव ने स्थिति पर विचार किया और उनने इन दैत्यों से समस्त मानवता का उद्धार करने का उपाय खोज निकाला। उन्होंने जो त्रिशूल बनाया था तो एक ही शस्त्र पर उसके तीन मुख होने के कारण वह तीन दैत्यों का एक साथ संहार कर सकता था। महाकाल ने पूरे वेग से त्रिशूल का प्रहार किया और त्रिपुर नामक तीनों दैत्यों की शक्ति को विदीर्ण कर डाला। धर्म की जीत हुई, अधर्म हारा। त्रिपुरों की तीनों माया नगरियों के मोहान्ध निवासियों को मुक्ति मिली। वे विवेक-पूर्वक स्वतन्त्र बुद्धि से सोचने और जो श्रेयस्कर दीखे उसे करने में लग गये। इस प्रकार मानवता पर आया हुआ एक महान संकट टल गया। भगवान महाकाल की इस विजय का सर्वत्र अभिवादन हुआ और इस महती विजय के उपलक्ष में उन्हें त्रिपुरारी कहा जाने लगा।
त्रिपुरों की तीन पुरी ये हैं-(1) लोभ, (2) व्यामोह, (3) अहं। यह तीनों आपस में जुड़े हुए हैं। धन को लक्ष्य बनाकर सोचने, करने और जीवित रहने वाला व्यक्ति नीति-अनीति का विचार किए बिना, जीवन के महान उद्देश्यों को भुलाकर केवल मात्र आपाधापी में- आवश्यक-अनावश्यक उपार्जन संग्रह में लगा रहता हैं। यह जानते हुए भी कि शरीर निर्वाह के लिए जितना आवश्यक है उसके अतिरिक्त यह बचा हुआ सारा संग्रह तथाकथित बेटे पोतों या सम्बन्धी कुटुम्बियों द्वारा लूट लिया जाता है, मनुष्य समझता नहीं, बदलता नहीं। लोभ की माया मरीचिका उसके विवेक का अपहरण कर लेती है और जाल में फंसे हुये पक्षी की तरह उसी दिशा में घिसटता जाता हैं जिसमें कि वधिक उसे खींचना चाहता है। लोभ की तृष्णा आज भी अधिकाँश लोगों पर छाई हुई है। भले ही परिस्थितियाँ अमीर न बनने दें पर सोचते सब वही हैं, करते सब वही हैं। कैसी खेदजनक विडम्बना है कि मनुष्य मानव जीवन की महत्ता, उसके उद्देश्य और उपयोग को पूर्णतया भूल जाता है उसकी ओर से विमुख बना रहता है और अनावश्यक अर्थ तृष्णा की ललक में मूल्यवान जीवन समाप्त कर देता है। जाते समय केवल पाप की गठरी ही सिर पर होती है। यह एक आसुरी सम्मोहन ही है जिसके जाल में विवेकशील समझा जाने वाला मानव प्राणी इस बुरी तरह जकड़ा हुआ है। जो करना चाहिए था कर नहीं पाता, जो नहीं करना चाहिए था उसे करने में लगा रहता है। त्रिपुर असुरों की जिस माया ने प्राचीन काल में मनुष्यों को सम्मोहित कर अपनी नगरी में बसा रखा था। आज भी लगभग वैसी ही स्थिति है।
त्रिपुर दैत्यों का दूसरा पुर है- व्यामोह। इन्द्रियाँ जो जीवन को सुसंचालित करने में रथ चक्र मात्र हैं आज विलासिता एवं उपभोग के आधार बन गई हैं। जिह्वा का चटोरापन और कामेन्द्रिय की लोलुपता हमारे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को चौपट करके रखे दे रही है। जिह्वा का चटोरापन व्यक्ति और परिवार का जितना नाश करता है काम-लोलुपता उससे हजारों लाखों गुनी क्षति पहुँचाती हैं। गृहस्थ जीवन की शान्ति, संतान की शुचिता, संस्कृति और सामाजिक सुव्यवस्था सभी पर इस दुष्प्रवृत्ति का घातक प्रभाव पड़ता है। मानसिक व्यभिचार तो शारीरिक विलासिता से भी अधिक व्यापक और भयावह बन चला है उसने भावनात्मक आदर्शवादिता और उत्कृष्टता को एक प्रकार से चौपट करके ही रख दिया है। विलासिता का यह व्यामोह जितना घातक है उतना ही हमें प्राणप्रिय लगा करता है, उसे त्रिपुर असुरों की माया मरीचिका कहें तो इसमें कुछ अत्युक्ति न होगी।
व्यामोह का दूसरा रूप है छोटे से घर में रहने वाले या जिनसे रक्त संबंध हैं उन थोड़े से व्यक्तियों को ही अपना मानना और उन्हीं के लिए आजीवन मरते-खपते रहना। लोग यह भूल ही गये हैं कि संसार भी हमारा कुटुम्ब हैं और संसार के पिछड़े और असमर्थ लोगों को उठाना भी हमारा एक कर्त्तव्य है। देश, धर्म, समाज संस्कृति की सेवा के लिए मनुष्य जीवन मिला है उसका किसी को ध्यान नहीं। जो सोचता है अपने बेटे-पोतों की ही बात सोचता है। भले ही वे समर्थ और स्वावलम्बी हों पर कमाई उन्हीं के लिए की जाती है। जोड़ समेट कर दिया उन्हीं को जाता है। जिनको संतानें नहीं हैं वे प्यासे से फिरते हैं और अपना नहीं तो पराया गोद धरते हैं। इस व्यामोह ने मूल्यवान व्यक्तियों का सत्यानाश करके रख दिया, वे बेटे पोतों से ऊपर उठ कर देश धर्म की कुछ बात सोचते तो न जाने क्या-क्या कर सकते थे, पर संकीर्णता का व्यामोह उनके गले में फाँसी के फेरे की तरह काल नाग बन कर लिपट रहा है। बेटे पोतों को कमाई खिलाकर उद्धत बनाने के निमित्त ही वे बने रहे, जो करना था उसके लिए उनमें उदारता जग ही न सकी। संकीर्णता के बन्धन तोड़कर वे एक कदम आगे न सोच सके न बढ़ सके। त्रिपुर दैत्यों की माया मरीचिका से सम्मोहित बेचारे निरीह प्राणी आखिर करें भी क्या? त्रिपुरों ने उनकी स्वतन्त्र चेतना तो नष्ट कर दी है, अब वे वही सोचते, वही करते हैं, जो वे दुर्दान्त दैत्य उन्हें सोचने करने को विवश करते हैं। आज नजर पसार कर देखते हैं तो स्थिति वही प्रतीत होती है, जब धर्म हाहाकार करने लगा था और अपनी प्राण रक्षा के लिए प्रजापति को जा पुकारा था।
त्रिपुरों का तीसरा पुर है अहंकार। मिट्टी से पैदा हुआ मिट्टी में मिलने वाला,- मलमूत्र और हाड़ माँस का ढेर- कीड़े-मकोड़े जैसा तुच्छ मानव प्राणी जब अपनी भौतिक उपलब्धियों पर इतराता है तब हंसी रोके नहीं रुकती। रूप-लावण्य की, वेश विन्यास की, शृंगार प्रसाधनों की उसे ऐसी धुन सवार है कि न जाने क्या बनना चाहता है, न जाने क्या देखना या दिखाना चाहता है। हर घड़ी यह अभागा नर कंकाल इसी उधेड़बुन में लगा रहता है कि अपनी वस्तु स्थिति को छिपा कर न जाने दूसरों की आँखों को धोखे में डाल कर कैसे से कैसा दीखने लगूँ। शरीर रक्षा पर जितना समय और धन खर्च किया जाता है उससे दूना चौगुना यह दुनिया शृंगार सज्जा पर खर्च कर रही है फिर भी जैसी कुरूप थी वैसी की वैसी बनी हुई है।
व्यवहार, बोल-चाल, शान-शौकत, ठाट-बाट, सजधज के स्वाँग और अमीरी के चोचले देख कर लगता है नाचीज सा आदमी कहीं पागल तो नहीं हो गया है। जीवन की आवश्यकताएं थोड़ी सी हैं, वो बड़ी आसानी से पूरी की जा सकती हैं पर ठाट-बाट तो सुरसा के मुख की तरह है जिसकी भूख कभी बुझती ही नहीं, जो भी कमाई है वह कम पड़ जाती है और विलासिता के साधन जुटाने में हर समय आर्थिक तंगी ही बनी रहती है। ब्याह-शादियों में अमीरी का जैसा भौंड़ा स्वाँग गरीब लोग बनाते हैं उसे देखकर हंसी रोके नहीं रुकती। अपनी छोटी सी हस्ती की सफलता और उपलब्धियों का लोग ऐसा ओछा और भौंड़ा विज्ञापन करते हैं कि कई बार यह शक होने लगता है कि आदमी अभी जंगली युग से आगे बढ़ पाया है या नहीं? सभ्य बनने की उसकी डींग कहीं आत्म प्रवंचना ही तो नहीं है? एक दूसरे के साथ इतरा कर बड़प्पन का रौब गाँठते हुए उद्धत, उच्छृंखल, अवज्ञा और तिरस्कारपूर्ण व्यवहार करते हैं। उच्छृंखलता, उद्दण्डता, गुण्डागर्दी बरतते हैं शोषण, उत्पीड़न, छल-द्वेष और अनाचार की रीति-नीति अपनाते हैं तब यही कहा जा सकता है कि अभी भी हम नर पशु, हीन, नर पिशाच ही बने हुए हैं। अहंकार मनुष्य का निकृष्टतम कमीनापन है। जो जितना उद्धत और अशिष्ट है, उच्छृंखल और अनियंत्रित हैं, ढोंगी और शेखीखोर हैं उसे उतना ही छोटा, हेय और नीच समझना चाहिए। दुर्भाग्य से वह अहंकार आज मानव जाति पर इस बुरी तरह आच्छादित है कि उसकी मूल सत्ता एवं आत्मा का स्वरूप ही उलट गया प्रतीत होता है। तथाकथित ‘स्वाभिमान’ के नाम पर लोग कितने अशिष्ट, कृतघ्न और ओछे बनते जा रहे हैं उसे देख कर यही कहा जा सकता है यह युग अहंकार की दानवी छाया माया से पूरी तरह आच्छादित हो चला है।
त्रिपुर दैत्यों ने अपनी माया नगरी में लोभ, व्यामोह और अहंकार की सत्ता स्थापित की ओर उनमें बसे हुए सभी लोगों को सम्मोहित कर कठपुतलियों की तरह अपने इशारों पर नचाया था। लगता है वर्तमान समय में भी वही स्थिति चल रही है। अशिक्षित, असभ्य लोगों से लेकर सुशिक्षित तथाकथित नेता, धर्मोपदेशक, कलाकार, विद्वान, ज्ञानी, गुणी सभी एक ही दिशा में चल रहे हैं। त्रिदोष जनित सन्निपात से हर कोई बहकी-बहकी बातें बक रहा हैं और उद्धत आचरण की कुचेष्टा बरत रहा हैं। दुष्परिणाम सामने है। व्यक्तिगत, शारीरिक, मानसिक, पारिवारिक, आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक, राजनैतिक हर क्षेत्र में ओर अव्यवस्था फैला रही है। जिधर भी दृष्टि पसारी जाय उधर अनुपयुक्त, अनावश्यक एवं अवाँछनीय के अतिरिक्त और कुछ दीखता ही नहीं। ऐसी विकृत एवं विपन्न अवस्था में विद्रोह, विस्फोटक, विक्षोभ, अशाँति, उद्वेग, अव्यवस्था, असंतोष, एवं शोक-संताप एवं दुख-दारिद्र की परिस्थितियाँ ही विनिर्मित हो सकती है। आज यही सब कुछ प्रस्तुत है। व्यक्ति की आत्मा मरणासन्न स्थिति में जा पहुँची है और समाज सर्वनाश के कगार पर खड़ा थर-थर कांप रहा है।
धर्म फिर हाहाकार कर कर उठा है। मानवता फिर चीत्कार करने लगी है। धरती पर फिर पाप का बोझ असह्य हो उठा है। सबने मिल कर प्रजापति से पुकार की है कि हे विधाता! इस दुर्विचार को सुधारो। प्रजापति, महाकाल को निर्देश कर चुके हैं। वे स्थिति को देख समझ रहे हैं और इसी निश्चय-निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि लाखों वर्ष पूर्व अतीत काल में त्रिपुरों ने जो उपद्रव मचाया था, वे अब पिछला पाठ भूल कर उसी की पुनरावृत्ति कर रहे हैं। उन्होंने अपनी माया-मरीचिका में पुनः इस संसार को जकड़ लिया है और पूर्वकाल की तरह इस स्वर्ग सुन्दर वसुन्धरा को शोक-संताप से निमग्न कर दिया है। पृथ्वी को उबारने के लिए वे अपने तीखे त्रिशूल पर फिर धार धर रहे हैं। भौतिक संहार तो होते ही हैं साथ ही उनके पीछे मूल प्रयोजन भावनात्मक वैयक्तिक, मानसिक तथा व्यावहारिक दृष्टि से मानवीय प्रवृत्तियों को उस दिशा में मोड़ देना हैं जिससे लोक मानस के लिए सत् का, शिव का, आनन्द का अमृतोपम रसास्वादन कर सकना सम्भव हो सके।
त्रिपुरारी महाकाल ने अतीत में भी त्रिविध माया मरीचिका को अपने (1) शिक्षण (2) संहार (3) निर्माण के त्रिशूल से तोड़-फोड़ कर विदीर्ण किया था, अब वे फिर उसी की पुनरावृत्ति करने वाले हैं। धर्म जीतने वाला है, अधर्म हारने वाला है। लोभ, व्यामोह और अहंकार के काल पाशों से मानवता को पुनः मुक्ति मिलने वाली है। संहार की आग में तपा हुआ मनुष्य अगले ही दिनों पश्चाताप, संयम और नम्रता का पाठ पढ़कर सज्जनोचित प्रवृत्तियाँ अपनाने वाला है। वह शुभ दिन शीघ्र लाने वाले त्रिपुरारी-महाकाल आपकी जय हो! विजय हो!
एक बार उद्धत ‘काम’ देवता को ऊत सूझी। लोग शान्ति से अपने दिन गुजार रहे थे। परिश्रम से कमाते, स्नेह-सहयोग से रहते, हंसी-खुशी के साथ संतोष का जीवन बिताते थे। काम देवता से यह सहन न हो सका। उसने लोगों को परेशान करने की ठानी और अपनी माया चारों ओर फैला दी।
काम देवता लोगों के मनों में घुस गया और हर एक में असीम कामनाएं भड़का दीं। लोग अपनी थोड़ी सी आवश्यकताएं थोड़े श्रम से पूरा कर लिया करते थे और शेष समय लोक मंगल में लगाते थे, इससे सभी को प्रसन्नता थी और सभी को शान्ति। पर जब कामनाएं भड़की तो लोग उद्विग्न हो उठे। किसी को धन संग्रह की, तो किसी को वासनाओं की, किसी को पदवी पाने की इच्छा भड़की। पहले यह ललक धीमी थी, पर जब सभी की प्रवृत्तियाँ उस ओर बह निकलीं तो एक दूसरे में प्रतिद्वन्द्विता ठन गई। सभी अपने साथियों से आगे बढ़ जाने को आतुर हो उठे। कौन ज्यादा धन जमा करे कौन ज्यादा विलासिता का आनन्द लूटे, कौन कितना अपनी अहंता का आतंक दूसरों पर प्रदर्शित करे, इस प्रतिस्पर्धा में ऐसी भगदड़ मची कि लोगों ने औचित्य का रास्ता छोड़ दिया और जैसे बने वैसे अधिकार, सफलता प्राप्त करने के लिये आतुर हो उठे।
इस प्रतिद्वन्द्विता में परस्पर संघर्ष छिड़ा। मन उत्तेजित हुआ, ईर्ष्या भड़की। द्वेष बढ़ा। उत्पीड़न और शोषण की घटनाएं बढ़ी तो प्रतिरोध सामने आया और फिर प्रतिशोध की आग धधकने लगी। इससे विश्वासी, अविश्वासी, मित्र, अमित्र और सज्जन, दंभी बन गये। बुद्धिमानों की बुद्धि कबूतर फंसाने के जाल बुनने में लग गई। पीड़ितों के क्रन्दन और उत्पीड़कों के अट्टहास से दिशाएं गूँजने लगीं उनकी प्रतिध्वनि ने आतंक फैला दिया। हर कोई भयभीत हो उठा, हर कोई सशंकित। मानवीय सम्मिलित सहयोग से जो आनन्द उल्लास मिलता था, प्रगति का जो पथ-प्रशस्त होता था उसके सारे द्वार अवरुद्ध हो गये। हर कोई अपनी चाल चलने और अपनी गोट हरी करने की शतरंज में इतना निमग्न हुआ कि और सब आवश्यक बातें उपेक्षा एवं विस्मृति के गर्त में गिरकर विलीन हो गई। जीवन निरानन्द ही नहीं भार भूत भी हो गया।
काम देवता को इतने से ही सन्तोष न हुआ। उसने इसी दुर्दशा में पड़े रहने और उससे मुक्ति होने के लिये आतुर न हो सकने की भी माया रच दी। विलासिता के एक से बढ़कर एक साधन प्रसाधन उत्पन्न कर दिये। इन्द्रियों भोगों को भड़काने वाली इतनी सामग्री रच दी कि क्या मस्तिष्क और क्या शरीर सर्वत्र उसी की माँग और पुकार बढ़ने लगी। बुद्धि ने विलासिता को जीवन का सर्वोपरि आनन्द माना और शरीर ने उसी के प्रसाधन जुटाने में संलग्न रहने की स्वीकृति दे दी। सजावट, शोभा, शृंगार, शान, वासना, विलास, क्रीड़ा-कौतुक का आकर्षण इतना बढ़ा कि कामना पीड़ित लोग इन प्रसाधनों पर अकाल पीड़ित विभुक्षितों की तरह टूट पड़े। लगने लगा अब विलासिता और कामनाओं की पूर्ति ही मानव जीवन का लक्ष्य रह गई है। वासना और तृष्णा की पूर्ति के अतिरिक्त और कोई दिशा ही मनुष्य के पास शेष न रही।
कामनाओं और वासनाओं द्वारा विविध बन्धनों में बंधते हुए मानव प्राणी की आत्मा इस दुर्दशा में पड़ी छटपटाने लगी। भगवान की पुनीत कृति और विश्व वसुधा अपने गर्व गौरव से पद दलित होकर जिस निकृष्ट और निर्लज्ज स्थिति पर पहुँचा दी गई उससे उसका मस्तक लज्जा से नत हो गया। मनुष्यता ने एक लम्बी उसाँस भर कर कहा- हाय, क्या मुझे इसी दयनीय स्थिति में पहुँचाने के लिए विधाता ने बनाया था।
काम देवता अपने इस कौतुक पर बड़ा प्रसन्न हो रहा था। उस ने सभी को अपने बंधन में बाँध लिया। सब को जीत लिया। अब किसे जीता जाय? सोचा कि इस दुनिया का एक नियन्त्रक भी है अब उसी पर चढ़ाई करनी चाहिए। सो ही उसने किया भी। भगवान का स्वरूप न्याय और व्यवस्था की स्थिति बनाये रखने के लिये संयम और तपश्चर्या की प्रेरणा करने वाला अनादि काल से चला आता था। काम देवता ने उसी को बदलने की माया रच दी।
भगवान का स्वरूप बदला, भक्तों ने उनकी भी दुर्दशा कर डाली जैसी संसार के लोगों की थी। उन्हें वासना और विलास का प्रतीक प्रतिनिधि बना दिया। शृंगार, रास, हास, विलास, भोग, उपभोग के माध्यम ही भगवान की पूजा कहलाने लगी। तप और त्याग, संयम और सेवा जो ईश्वर भक्तों के प्रमुख पूजा विधान थे, वे न जाने कहाँ तिरोहित हो गये और भगवान के चरित्र की चर्चा ऐसी होने लगी मानो वे काम पीड़ित एक साधारण विलासी, धन वैभव में प्रतिष्ठा अनुभव करने वाले और प्रशंसा का पुल बाँधने वालों से प्रसन्न रहने वाले हैं। जो उनकी दुर्बलताओं का समर्थन करे उसकी पाप दंड से छूट और कुपात्र होते हुए भी सत्पात्रों को मिलने वाले लाभ देने वाले अन्यायी के रूप में चित्रित किया जाने लगा। भक्ति का यही स्वरूप प्रचलित हो गया तो भगवान की आत्मा भी काँप उठी। हाय मुझ भगवान की इस दुष्ट काम देवता ने क्या दुर्गति कर दी!
कराह दोनों ही रहे थे, आत्मा भी, परमात्मा भी। मानव भी और विश्व-मानव भी। काम देवता की माया भरा जाल-जंजाल जितना आकर्षक था उतना ही दारुण भी। उसे पकड़े रहते बनता था और न छोड़ते। स्थिति असह्य हो उठी तो धरती आसमान की आत्मायें मिलकर भगवान शिव के पास पहुँची और उनसे विनय करते हुए बोली- महाकाल! विश्व की यह दयनीय दुर्दशा अब असह्य है। धरती पर विलासिता ही जीवित रहे और सभी उसकी विशेषतायें, सभी सुन्दरतायें समाप्त हो जाय यह उचित नहीं। सृष्टि का मुकुटमणि-परमेश्वर का उत्तराधिकारी मनुष्य केवल तृष्णाओं की पूर्ति के लिए अपने पुण्य अवतरण को कलंकित करता रहे यह अवांछनीय है। इस असह्य स्थिति को आप ही बदल सकते हैं, सो आप ही बदलें।
भगवान शंकर ने ध्यानमग्न होकर देखा तो स्थिति को वैसा ही पाया जैसा कि बताया जा रहा है। उन्होंने परिवर्तन की आवश्यकता को अनुभव किया और ऐसी ही परिस्थिति में बार-बार दुहराई जाने वाली अपनी प्रत्यावर्तन पद्धति को पुनः क्रियान्वित करने का निश्चय किया।
मनुष्य और भगवान दोनों को ही कलंकित करने वाले काम देवता के दुष्ट कौतुक पर भगवान शंकर बहुत कुपित हो उठे, उसे उचित दंड देने तथा इस माया मरीचिका को निरस्त करने के लिए त्रिशूल उठाया। भगवान शिव ने अपना तीसरा नेत्र खोला। उसके खुलते ही एक भयंकर दावानल प्रकट हुई, जिससे वह सारा माया कलेवर देखते-देखते घास-फूँस की तरह जल-वल कर भस्म हो गया, साथ ही काम देवता का कलेवर भी नष्ट हो गया। संसार को शान्ति मिली और मनुष्य अपने और भगवान अपने वास्तविक स्वरूप में आ गये। जब धरती माता और महिमामयी मानवता का चिर गौरव पुनः प्रतिष्ठापित हो गया तो देवता दुंदुभी बजाने लगे और दशों-दिशाओं में महाकाल का जय-जयकार होने लगा।
अतीत काल का यह कथानक आज फिर अपनी पुनरावृत्ति कर रहा है। काम देवता ने मानवीय चेतना में असंख्य प्रकार की कामनायें भड़का दी हैं। विलासिता के इतने अधिक आकर्षण विनिर्मित हो गये हैं कि उनका आकर्षण छोड़ते नहीं बनता। स्वार्थ बढ़ रहा है, पाप प्रचंड हो रहा है और नरक की ज्वालायें हर क्षेत्र में धधकती चली जा रही हैं। स्थिति फिर असह्य हो उठी हम सर्वनाश के कगार पर खड़े हैं। धरती और आकाश की आत्मायें सुरक्षा के लिए प्रार्थना करने में संलग्न हैं। सो लगता है कि महाकाल अब तीसरा नेत्र खोलने ही वाले हैं। मस्तिष्क के महा बिन्दु में अवस्थित यह तीसरा नेत्र और कुछ नहीं व्यापक विवेक ही है। उसी के उन्मीलन से अज्ञान का अवसान होता है और तभी असंख्य समस्याओं के समाधान का मार्ग निकलता है। वर्तमान ‘विचार क्रान्ति’ महाकाल का तीसरा नेत्र ही है जो प्रचंड दावानल का रूप धारण कर अज्ञान युग की सारी विडम्बनाओं को भस्मसात कर स्वस्थ और स्वच्छ दृष्टिकोण प्रदान करेगी। इन उपलब्धियों के बाद विश्व शान्ति के मार्ग में कोई कठिनाई शेष न रह जायगी।
इतिहास कई बार अपनी पुनरावृत्तियाँ किया करता है। ऋतुएं अपने चक्र पर घूम कर एक वर्ष बाद जहाँ की तहाँ आ जाती हैं। सूर्य जहाँ आज उदय हुआ था, 24 घन्टे बाद फिर वहीं आ उदय होता है। जीव जन्म लेता है, बढ़ता है मर जाता है, फिर इसके बाद उसी जन्मने, बढ़ने, मरने के क्रम को दुहराता है। पृथ्वी अपनी धुरी पर एक दिन में एक परिभ्रमण करती है और वर्ष में एक बार सूर्य की परिक्रमा करती है, यही क्रम वह अनादि काल से असंख्यों बाद दुहराती चली आती है। युग, मन्वन्तर, कल्प आदि अपने क्रम को दुहराते रहते हैं। ग्रह नक्षत्र अपनी धुरी और परिधि पर बार-बार निर्धारित क्रम से भ्रमण करते हैं। सृष्टि और प्रलय का चक्र भी यथावत चलता रहता है। समुद्र से बादल, बादल से वर्षा, वर्षा का जल समुद्र में इसके बाद वही क्रम। बीज से बीज। तात्पर्य यह कि इस संसार में सभी कुछ अपनी नियत क्रम व्यवस्था के अनुसार परिभ्रमण करते हुए बार-बार उसी केन्द्र बिन्दु पर आ पहुँचता है जहाँ से कि वह आरम्भ हुआ था। इतिहास का भी यही क्रम है। व्यक्तियों और घटनाओं में थोड़ा हेर-फेर होता रहता है पर वस्तुतः वही सब कुछ होता रहता है जो प्राचीन काल में कभी हुआ है। इसी तथ्य को प्रकट करने के लिये किसी पश्चिमी विद्वान ने कहा था कि ‘दियर इज नथिंग न्यू अण्डर दी सन’ (सूर्य के नीचे (विश्व में) कभी कोई नवीन बात नहीं होती।)
जराजीर्ण समाज व्यवस्था में बार-बार सुधार और परिवर्तन की आवश्यकता अनुभव होती है। कपड़ा मैला हो जाता है उसे फिर धोना पड़ता है। बर्तनों की हर दिन सफाई होती है। घर में रोज बुहारी लगती है। दाँत रोज माँजने पड़ते हैं। नहाना रोज पड़ता है। कारण यह है कि एक बार सफाई कर देने के बाद भी फिर मैल जमना आरम्भ हो जाता है और कुछ ही समय में मलीनता इतनी बढ़ जाती है कि दुबारा उसकी सफाई अनिवार्य हो जाती है। दिवाली पर हर साल मकान की लिपाई, पुताई, रंगाई न की जाय तो उसकी सुन्दरता और मजबूती दोनों को ही खतरा पैदा हो जायगा। इमारतें नहरें, सड़कें, मशीनें, मोटरें, सभी अपनी सामयिक मरम्मत माँगती हैं। यदि इसकी उपेक्षा की जाय तो वे बहुमूल्य वस्तुएं समय से बहुत पहले ही निकम्मी और बर्बाद हो जाती हैं। अतएव बुद्धिमान लोग जब भी आवश्यकता प्रतीत हुई कि तुरन्त सुधार की प्रक्रिया सम्पन्न करते हैं। यह एक निर्धारित क्रम है उसकी पुनरावृत्ति होती ही रहती है, होनी भी चाहिए। जराजीर्ण समाज व्यवस्था की भी समयानुसार मरम्मत होती है। सुधारकों का आवागमन बना रहता है। धर्मोपदेशक, समाज सुधारक, मार्ग दर्शक देवदूत, सन्त, ऋषि मुनि समय-समय पर आते हैं और अपने काल की तात्कालिक आवश्यकताओं को देखकर उनके सम्भालने सुधारने का अपने-अपने ढंग से प्रयत्न करते हैं। अब तक हर देश में, हर काल में, वहीं की भाषा और संस्कृति के आधार पर सुधार कार्य सम्पन्न करने वाली ऐसी अगणित आत्माएं अवतरित हो चुकी हैं, आगे भी होंगी।
परिस्थिति जब अधिक विषम हो जाती है तो उसके लिए महाकाल को अपने शस्त्र सम्भालने पड़ते हैं। छोटे-मोटे मकान, पुल मामूली इंजीनियर बना लेते हैं, पर यदि कोई बहुत बड़ा बाँध बनाना हो तो उसके लिए बड़े इंजीनियरों की आवश्यकता पड़ती है। कोई भारी बाँध टूट जाय और उसमें भरे हुए पानी से सैकड़ों मील प्रदेश डूब जाने का खतरा उत्पन्न हो जाय तो उस संकट का निवारण फिर मामूली इंजीनियरों के बस का काम नहीं रहता। फिर उस समस्या का हल विशेषज्ञों द्वारा ही खोजा जाता है। समाज में मामूली गड़बड़ियाँ तो बार-बार होती, उठती रहती हैं और उनका सुधार कार्य सामान्य सुधारकों द्वारा सम्पन्न हो जाता है, पर जब पाप अपनी सीमा का उल्लंघन कर जाता है, मर्यादाएं टूट जाती हैं, जन-मानस चिकने घड़े की तरह किसी शुभ प्रेरणा और सत् प्रभाव से प्रभावित होने की क्षमता खो बैठता है तब महासुधारक की जरूरत पड़ती है। इस कार्य को महाकाल स्वयं करते हैं, क्योंकि अन्ततः बिगड़ी, बेकाबू परिस्थितियों को काबू में लाने की जिम्मेदारी उन्हीं की है। अस्पतालों में छोटे आपरेशन ही सहायक डॉक्टर करते रहते हैं पर जब जान जोखिम का ‘मेजर आपरेशन’ करना हो तो उसमें सिविल सर्जन की उपस्थिति अनिवार्य हो जाती है। इन दिनों जन-जीवन जिस अनैतिक स्तर पर पहुँच गया है उसमें अब छोटे सुधार से, छोटे सुधारकों से काम चलता नहीं दीखता। अब उसके लिए बहुत बड़ी उलट-पुलट की- उथल-पुथल की- आवश्यकता अनिवार्य हो गई है। इस प्रयोजन की पूर्ति भगवान का प्रत्यावर्तन तत्व-महाकाल-करते रहे हैं। अब भी वे ही करने जा रहे हैं। प्राचीन काल में भी ऐसा ही होता रहा है। अब उसी की पुनरावृत्ति पुनः होने जा रही है।
आगामी कुछ ही वर्षों में संसार में एक भयानक उथल-पुथल होने जा रही है। इसकी एक हल्की झाँकी जैसी चर्चा जुलाई की अखण्ड ज्योति में की जा चुकी है। इस उथल-पुथल में भौतिक दृष्टि से कुछ ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न होने की सम्भावना है जिनमें मनुष्य जाति के कष्टों में अभिवृद्धि हो और उस प्रताड़ना से प्रभावित मनुष्य यह विचारने को विवश हो कि उस राह पर नहीं चला गया, जिस पर चलना चाहिए था। अनीति अन्ततः हानिकारक होती है, इतनी छोटी सी शिक्षा यदि लोग स्मरण रख सके और अपना सके होते तो प्रकृति को कुपित होकर अपना रुद्र रूप न धारण करना पड़ता और असंख्यों को जो अगणित कष्ट भोगने के लिए बाध्य होना होता है उसकी आवश्यकता न पड़ती।
भगवान का किसी से द्वेष नहीं वे तो परम कारुणिक और परम मंगलमय हैं। इसी से तो उन्हें शिवशंकर कहते हैं। भोला भी उन्हीं का नाम है।
भोला का अर्थ है- सरल सौम्य सज्जन। जो इस प्रकार की प्रवृत्ति का है वह भला दूसरों को कष्ट देने में मोद मनाने की नृशंसता क्या करेगा? विवशता ही इसके लिए उन्हें बाध्य कर देती है। मनुष्य जब अत्यधिक दुराग्रही, अहंकारी और ढीठ हो जाता है, सज्जनता की रीति-नीति को बेतरह तोड़ता है और दुष्टता पर उद्धततापूर्वक उतारू हो जाता है तभी उन्हें ऐसा कुछ करना पड़ता है जो कष्टकर और भयंकर दीखे। यद्यपि सड़ा फोड़ा चीरने के लिए माता द्वारा अस्पताल ले पहुँचना और डॉक्टर द्वारा वहाँ फाड़-चीर करना दोनों के ही काम निर्ममतापूर्ण दीखते हैं, पर उसमें रोगी का हित ही लक्ष्य में रहता है। दोनों ही यह चाहते हैं कि कष्ट पीड़ित का कष्ट मिटे और वह रोज-रोज की व्यथा वेदना से मुक्ति पाकर सुख-शान्ति का जीवन बिताये, भले ही कुछ क्षण इसके लिए उसे कष्ट उठाना पड़े। आज का मानव समाज भी विष व्रण से ग्रस्त रोगी की तरह है। उसके कल्याण का इन परिस्थितियों में यही मार्ग दीखता है कि फोड़ा चीर दिया जाय, ताकि सड़ा मवाद जो हर घड़ी वेदना उत्पन्न करता है निकल कर दूर हो जाय।
अवतारों का यही प्रयोजन सदा से रहा है। वे इस प्रकार की हलचल पैदा करने आते रहे हैं जिससे अशान्ति का अन्त होकर शान्ति की स्थापना हो। महाकाल समय पर इस प्रयोजन के लिए एक भावनात्मक प्रवाह उत्पन्न करते हैं। इस प्रवाह से जन-मानस उद्वेलित होता है। और उसमें से कितने ही ऐसे योद्धा निकल पड़ते हैं जो इस दैवी पुण्य प्रयोजन की पूर्ति के लिए असाधारण पुरुषार्थ कर दिखायें। अभीष्ट प्रयोजन को एक व्यक्ति नहीं वरन् अनेक मिल कर सम्पन्न करते हैं। भले ही उस अभियान के नेताओं में से किसी एक को विशेष ख्याति मिल जाय पर वस्तुतः होता वह भावनात्मक प्रवाह ही है जो सहज ही अनेक साथी सहयोगी बना कर खड़े कर देता है और कष्ट साध्य दीखने वाली परिवर्तन प्रक्रिया देखते-देखते सरल हो जाती है। आश्चर्यचकित लोग सूक्ष्म जगत की प्रभु प्रेरित विधि व्यवस्था को तो देख नहीं पाते, बाहर जो सबसे प्रमुख व्यक्ति दीखता है उसी के सिर पर श्रेय का सेहरा बाँध देते हैं। अवतारी या विजेता कोई एक घोषित किया जाता है- यह मनुष्यों की स्थूल दृष्टि की भूल भरी परख है। तत्वदर्शी जानते हैं कि एक व्यक्ति कितना ही बड़ा या समर्थ क्यों न हो वह अगणित मनुष्यों के सहयोग बिना कुछ नहीं कर सकता। और यह सामूहिक संघर्ष, असहयोग की प्रवृत्ति समय-समय पर महाकाल भड़काते हैं। वे निराकार हैं इसलिए उनका कार्यक्षेत्र भी सूक्ष्म जगत ही होता है। वे भाव स्वरूप- चेतना- हैं। इसलिए विश्वव्यापी चेतना तत्व में ही उनकी आकाँक्षा सक्रिय होती है। उसकी स्फुरणा से प्रबुद्ध व्यक्ति बड़े-बड़े काम करने लगते हैं। उन्हें सहयोग, श्रेय और साफल्य उपलब्ध होता है इसलिए लोग उन्हीं को प्रयोजन पूर्ण कर्ता, विजयी, उद्धारक, अवतार मानते हैं। वस्तुतः होता कुछ और ही है इन कठपुतलियों को नचाने वाला सूत्रधार पर्दे के पीछे छिपा बैठा रहता है, उसे चमड़े की आंखें देख कहाँ पाती हैं?
युग परिवर्तन की आवश्यकता पूर्ण करने के लिए अतीत काल में अनेक अवतार हुए हैं। कहीं दस का, कहीं चौबीस का वर्णन है। इन सब की सामयिक परिस्थितियाँ अलग थी, अस्तु उन्हें कार्यक्रम, स्वरूप, एवं साधन भी अपने ढंग के अलग जुटाने पड़े। पर उद्देश्य सभी का एक था-
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।
परित्राणाय साधूनाँ विनाशायच दुष्कृताम्।
धर्म संस्थापनार्थाय सम्भावामि युगे युगे।
इसी को रामायण में इन शब्दों में कहा गया है-
जब जब होहि धर्म की हानी।
बढ़हि अधर्म असुर अभिमानी॥
तब तब प्रभु धर मनुज शरीरा।
हरहि कृपानिधि सज्जन पीरा॥
अनीति और अवाँछनीयता को हटाकर उसके स्थान पर औचित्य एवं विवेक को प्रतिष्ठापित करने का दैवी प्रयोजन समय-समय पर अनेक हस्तियाँ सम्पन्न करती और यशस्वी होती रही हैं। महत्वपूर्ण अवसरों पर यह अवतरण प्रक्रिया अनादि काल से उपस्थित होती रही हैं। अब ठीक वैसी ही परिस्थितियाँ उत्पन्न हो जाने पर उसी प्रकरण की पुनरावृत्ति फिर हो रही है।
प्राचीन काल में उत्पादन और वैभव ‘ठप्प हो गया था, सभी देव असुर आलस और नैराश्य में ग्रसित मानस बैठे थे। तब महाकाल ने समुद्र मंथन के लिए प्रेरणा उत्पन्न की। देवता और असुरों का सम्मिलित सहयोग सम्भव हो गया। समुद्र में से ऐसे 14 रत्न निकले जिन्हें पाकर विश्व वसुधा की समृद्धि असंख्य गुनी बढ़ गई। समुद्र मंथन के आधार की आवश्यकता पड़ी, मंदराचल पर्वत की रई तो बन गई पर इतना भारी पर्वत रखा कहाँ जाय? उसका भार कौन सम्भाले तब कच्छप अवतार आगे आया। उसने आधार बनना स्वीकार किया। उसी की पीठ पर समुद्र मंथन हुआ। कच्छप अवतार की जय बोली गई। क्योंकि उनने एक बड़ा उत्तरदायित्व वहन किया था। फिर भी वे समुद्र मंथन की सारी प्रक्रिया को सम्पन्न करने वाले नहीं कहे जा सकते। जिस समय सर्प की रस्सी बनाई गई थी, जैसे जिन देवता और असुरों ने लम्बी अवधि तक अपार श्रम किया था, जिस समुद्र ने अपने गर्भ से निकाल कर वे रत्न दिये, उन सभी का सहयोग असामान्य था। वस्तुतः सभी की सम्मिलित विजय थी। तात्विक दृष्टि से देखा जाय तो इस उपलब्धि का श्रेय उसे भावनात्मक प्रवाह को है जिसने लोक-मानस में एक विशिष्ट प्रकार की हलचल उत्पन्न की और जिसने अप्रत्यक्ष रूप से उसके साधन उपकरण जुटाने का असम्भव कार्य सम्भव बना दिया। तो भी इतिहासकार उस उपलब्धि का श्रेय कच्छप अवतार को देते हैं। इसमें कोई बड़ा दोष भी नहीं है। पूरी न सही, एक महत्वपूर्ण भूमिका तो आखिर उनकी भी थी ही।
हर अवतार में उसी तथ्य की पुनरावृत्ति होती रही है। मर्त्य, कूर्म, वराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, कृष्णा, राम, बुद्ध के चरित्रों पर व्यापक दृष्टि डालने से यही तथ्य उभर कर ऊपर आ जाता है। अवतारी युग पुरुष बड़े-बड़े अद्भुत काम कर दिखाते हैं, वे आश्चर्यजनक होते हैं और अनुपम भी। पर दो बातें हर अवतार में एक सी रहती हैं- एक यह कि उनका अवतार उद्देश्य तत्कालीन अवांछनीय परिस्थितियों को बदलना रहता हैं और दूसरा यह कि इस प्रयोजन में जन-सहयोग की आवश्यक मात्रा सम्मिलित रहती है। भगवान कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत उठाया था तो उसमें अनेकों ग्वाल-बाल भारी पहाड़ से दब मरने का भय छोड़कर लाठी का सहारा लगाये खड़े थे। महारास रचाया तो अनेकों गोपियाँ अपने विषम बंधनों को तोड़कर उसमें सम्मिलित हो गई महाभारत रचाया तो साधन-हीन पाण्डवों के साथ एक बड़ी सेना आ खड़ी हुई। रचनात्मक हो या ध्वंसात्मक उनके हर काम में जन-सहयोग विद्यमान था। भगवान राम के प्रयोजन में- रीछ, वानर, गिद्ध और गिलहरी जैसे असंख्य सहयोगी सम्मिलित थे। बुद्ध के लक्ष-लक्ष अनुयायी देश-विदेशों में भ्रमण कर सत्य, अहिंसा का पाठ पढ़ाते थे। अशोक जैसे सम्पन्न, आनन्द जैसे प्रबुद्ध एवं अम्बपाली जैसे आकर्षक व्यक्तित्व उनके साथ थे। इन अवतारी नर पुरुषों ने अपने समय के जमाने को पलट देने में सफलता पाई। बुद्ध और गाँधी ने तो एक नया प्रयोग करके दिखाया कि बिना खून-खराबा और उत्पीड़न के भी जमाने को पलटा जा सकता है और अवतरण का उद्देश्य पूरा किया जा सकता है।
अब दसवाँ ‘निष्कलंक’ अवतार इन दिनों हो रहा है- हो चुका है। यह एक भावना प्रवाह है जिसका उद्देश्य है पिछले हजारों वर्षों की कलंक कालिमा को धोकर मानवता का मुख उज्ज्वल करना, कलंक को धो डालना। दसवें निष्कलंक अवतार के नाम पर अन्ततः उस अभियान की सफलता का सेहरा किस के सिर पर बाँधा जायगा, इसमें साधारण लोगों को भले ही दिलचस्पी हो, तत्वदर्शियों की दृष्टि में उसका रत्ती भर भी मूल्य नहीं। वे जानते हैं कि इतने बड़े प्रयोजन की पूर्ति कोई एक व्यक्ति नहीं कर सकता। भगवान अपने विशेष प्रतिनिधि इस संसार में जरूर भेजते हैं पर पूर्ण भगवान कभी जन्म नहीं ले सकता। यदि पूरा भगवान एक जगह जन्मे तो फिर शेष संसार की सारी व्यवस्था कौन सम्भाले। सदा अंश अवतार ही होते हैं, अवतरण की वेला में एक नहीं अनेक प्रबुद्ध आत्माएं एक साथ अवतरित होती हैं और वे मिलजुल कर दैवी प्रयोजनों की पूर्ति सम्भव करती है।
इस तथ्य को जानने वाले व्यक्तियों को नहीं प्रवाह स्त्रोत को पहचानने का प्रयत्न करते हैं। इन दिनों युग परिवर्तन का जो सुव्यवस्थित विश्व व्यापी भावना प्रवाह उद्वेलित हो रहा है उसके पीछे एक ही लक्ष्य है। मानवता के अतीत कालीन उज्ज्वल गौरव की पुनः प्रतिष्ठापना। लम्बी अवधि तक विदेशी शासन के अंतर्गत रहने और आवश्यक संघर्ष में कमी रहने देने की भीरुता का कलंक हमारे मस्तक पर एक कालिमा की तरह लगा हुआ है। हम अवाँछनीय को इसलिए सहन करते हैं कि हमें संघर्ष में पड़ने से कष्ट उठो पड़ेंगे, त्याग करने पड़ेंगे। यह कलंक साहसी शूरवीर और आत्मा को अमर मानने वाली जाति के लिए निस्सन्देह बहुत ही घृणित है। जन मानव से उद्वेलित वर्तमान भावना प्रवाह अब इसी दिशा में उमड़ चला हैं कि हम स्वाभिमानी, साहसी सत्यनिष्ठ, विवेकवान मनुष्यों की तरह जियेंगे और हमारे व्यक्तिगत तथा सामाजिक जीवन पर पिछली शताब्दियों में जो कलंक लग गये हैं उन्हें परिपूर्ण प्रायश्चित के साथ धोएंगे और उन परिस्थितियों को उत्पन्न करेंगे जो किसी गौरवमयी समाज के लिए उचित हैं। यह भावना प्रवाह निष्कलंक अवतार ही तो होगा।
प्राचीन काल में विवेक की पूजा होती थी, मूढ़ता एवं रूढ़िवादिता की नहीं। आज सब कुछ उल्टा है। ढर्रे की पूजा होती है विवेक को पददलित कर दिया गया है। मनुष्य मनुष्य के बीच पाई जाने वाली वंश जाति के नाम पर ऊंच नीच की भावना तथा नर नारी के बीच पाई जाने वाली ऊंच नीच की वृत्ति सर्वथा अनैतिक एवं अवांछनीय है। यह कलंक हम सभ्यताभिमानियों पर बुरी तरह लगा हुआ है कि हर बात न्याय की, नीति की, समता की, सत्य की करते हैं पर बरताव बिल्कुल उल्टा करते हैं। विवाह-शादियों में होने वाला अन्धाधुन्ध खर्च तथा अगणित अन्ध विश्वासों के कारण जन-जीवन को जो असीम क्षति उठानी पड़ रही है उसका विरोध करने में हीनता दिखाना हमारी विवेकशीलता को कलंकित करना है। व्यक्तिगत जीवन में हम जिस आलस, विलासिता, असंयम, स्वार्थ, अहंकार का असभ्य प्रदर्शन करते हैं उसने विश्व के सभ्य-समाज में हमारा स्थान कहाँ रहने दिया है? पारस्परिक सहयोग की जितनी उपेक्षा अब हम करते हैं उतनी प्राचीन काल में कभी नहीं की गई। क्या यह सब बातें हमें कलंकित नहीं करती। इस विपन्नता को दूर करने के लिए आज की दैवी प्रेरणा इसी दिशा में प्रवाहित हो रही है कि हम अपने व्यक्तित्व को, परिवार को, समाज को सभ्य एवं सुसंस्कृत बनाने के लिए वे प्रयत्न करें जिससे इन दिनों जो लाँछन अपने ऊपर लगाये जा रहे हैं उनका पूरी तरह परिशोधन, परिमार्जन एवं प्रायश्चित हो सके। हम संसार के सामने सभ्य, सज्जन, बनकर उपस्थित हों, अपने अद्यावधि सभी कलंकों को धो डालें और निष्कलंक समुज्ज्वल जीवन नये सिरे से जीना प्रारम्भ करें।
दशम अवतार हो चुका है- वह पढ़, बढ़ और परिपुष्ट हो रहा है। पौराणिक भाषा में उसका नाम हैं, निष्कलंक, क्योंकि वह हमारी वर्तमान तथा पिछली पीढ़ियों की दुष्प्रवृत्तियों, कलंकों को धोने आ रहा है। उसके द्वारा ऐसा भावात्मक प्रवाह उत्पन्न किया जा रहा है जिससे लोग अपनी व्यक्तिगत आवश्यकताओं तथा समस्याओं में उलझे होने की संकीर्णतापूर्ण बहानेबाजी को छोड़कर खुशी-खुशी लोक-मंगल के लिए भावनापूर्वक कटिबद्ध होंगे। इसके लिए बड़े-बड़े तप, त्याग करने में भी संकोच न करेंगे। निष्कलंक अवतार की यह प्रत्यक्ष प्रवाह प्रेरणा हम अपने चारों ओर होते हुए आसानी से देख समझ तथा अनुभव कर सकते हैं।
निष्कलंक अवतार के साथ किस व्यक्ति का नाम जोड़ा जायगा, यह बहुत पीछे की ओर बहुत ही महत्वहीन बात है। इसका निर्णय तीस वर्ष का घटना-क्रम तथा इतिहासकार करेगा। अभी उसकी ढूंढ़ तलाश तथा पहचान अनावश्यक भी है और निरर्थक भी। निष्कलंक अवतार द्वारा प्रादुर्भूत नव-निर्माण के लिए समुद्यत भावना प्रवाह को हम श्याम घटा ही की तरह आकाश में घुमड़ते हुए भली प्रकार देख सकते हैं और निष्कलंक अवतार की उपस्थिति के सम्बन्ध में विश्वस्त हो सकते हैं।
पर इस संक्राँतिकाल में कुछ ऐसे व्यक्ति भी निकल पड़ते हैं जो ‘अवतार’ होने का दावा करके संसार को भीषण परिस्थितियों से मुक्ति दिलाने का वायदा करते हैं। इससे अनेक सीधे-सीधे व्यक्ति भ्रम में पड़कर मार्ग च्युत हो जाते हैं और अवतार सम्बन्धी कार्यक्रम में सहयोग देने के बजाय उल्टी-सीधी बातें करने लगते हैं जिससे इस महान उद्देश्य को क्षति पहुँचती हैं। ऐसे तथाकथित ‘अवतार’ उन स्वार्थी और घुसपैठ करने वाले व्यक्तियों की तरह हैं जो जहाँ लाभकारी स्थिति देखते हैं वहीं वैसा ही रूप बनाकर उपस्थित हो जाते हैं। जैसे शासनाधिकार को पा जाने पर हजारों चलते पुर्जा व्यक्ति शुद्ध खद्दर की पोशाक पहनकर ‘गाँधी जी के अनुयायी’ बन बैठे और अन्त में काँग्रेस की नैया को डुबाने के निमित्त सिद्ध हुये इसी प्रकार ये ‘अवतार’ नामधारी भी महाकाल द्वारा जगत की दुरवस्था का सुधार करने के कार्यक्रम में इस प्रकार के ढोंग और स्वार्थपूर्ति की कार्यवाहियों द्वारा बाधा स्वरूप ही सिद्ध होते हैं।
इतिहास की पुनरावृत्ति होती रही है। अब फिर हो रही हैं। अवांछनीय अन्याय और अविवेक का उन्मूलन करने सद्भावनाओं एवं सत्प्रवृत्तियों का अभिवर्धन करने के लिए पिछले अन्य नौ अवतारों की तरह दसवाँ निष्कलंक अवतार फिर हो रहा है। आँख वाले उसका दर्शन कर सकते हैं और बुद्धि वाले ईश्वरीय व्यापार में साझीदार होकर वह सौभाग्य प्राप्त कर सकते हैं जिसके लिए उनका यश शरीर अनन्त काल तक उज्ज्वल नक्षत्रों की तरह चमकता रह सके।
पुरुष-सूक्त में भगवान के स्वरूप का दिग्दर्शन कराते हुए उसे “सहस्र शीर्षा पुरुषः सहस्राक्ष-सहस्र पात्” हजार सिर वाला, हजार आँख वाला, हजार हाथ पैर वाला बताया गया है। यों ब्रह्म एक है। पर विशेष अवसरों पर वह अपने विशेष साधनों, उपकरणों द्वारा अभीष्ट प्रयोजन की पूर्ति करता है। सृष्टि के संचालन में हजारों देव शक्तियाँ उसकी सहचरी बनकर विश्व-व्यवस्था की महान प्रक्रिया सम्पन्न करती हैं। युग परिवर्तन जैसे विशिष्ट अवसरों पर हजारों जीवन मुक्त उच्च स्तरीय आत्मायें उसकी सहचर बनकर महाकाल का प्रयोजन पूरा करती हैं।
सृष्टि के सृजन कर्ता ब्रह्मा जी की उत्पत्ति कमल पुष्प में से हैं। यह कमल पुष्प ‘सहस्रार दल कमल’ कहलाता है, जो मस्तिष्क के मध्य बिन्दु-ब्रह्मरंध्र में अवस्थित है। मूलाधार में अवस्थित कुण्डलिनी शक्ति को इस मानव पिण्ड का दक्षिण ध्रुव और मस्तिष्क स्थिति सहस्रार कमल को उत्तर ध्रुव माना गया है। देहधारी की समस्त भौतिक और आध्यात्मिक शक्तियाँ इन्हीं ध्रुवों में केन्द्रित रहती हैं। प्रमुखता अध्यात्म बल की है। सहस्रार कमल में केन्द्रित रहने के कारण ईश्वर की उत्पत्ति एवं स्थिति का केन्द्र बिन्दु उसे ही माना गया है।
क्षीर सागर में शेष शैय्या पर सोये हुए विष्णु का अलंकार इसी रहस्य का उद्घाटन करता है। शेष सर्प कुण्डलिनी शक्ति का प्रतीक है, उसके हजार फनों में सहस्रार कमल का संकेत है। यह सहस्र सिर, सहस्र आँखें, सहस्र हाथ पैर, सहस्रार कमल का वर्णन यह बताता है कि भगवान के महत्वपूर्ण क्रिया-कलाप सहस्रों शक्तियों की सम्मिलित प्रक्रिया द्वारा सम्पन्न होते हैं। शतपथ ब्राह्मण में इन्द्र को सहस्र अप्सराओं के साथ नृत्य करता हुआ बताया गया है और आगे चलकर उसी का रहस्योद्घाटन सूर्य का सहस्र किरणों के साथ अपनी क्रिया पद्धति गतिशील रखने के रूप में किया गया है। भगवान एक अवश्य है पर वे कुछ विशेष प्रयोजन पूर्ण करते हैं तब एकाकी नहीं रहते वरन् सहस्र रश्मियों वाले अंशुमाली की तरह प्रकट होते हैं। युग परिवर्तन जैसे प्रयोजनों में तो उनका ‘सहस्रशीर्षा’ रूप निश्चय ही विकीर्ण हो उठता है।
कृष्णावतार की लीलाओं में इस तथ्य को अलंकारिक रूप में और भी अधिक स्पष्ट किया गया है। कृष्ण लीला में ‘महारास’ की चर्चा सर्वोपरि रहती है। निविड़ निशा में सोती हुई गोपियों को वंशी बजा कर जगाना, घरों से बाहर एकान्त में उन्हें बुलाना और उनके साथ नृत्य करना, हर गोपी को पूर्ण कृष्ण के साथ नृत्य का अनुभव कराना, यह घटनाक्रम सामाजिक दृष्टि से अनुचित और अवाँछनीय प्रतीत होती है। पर जब हम इस आध्यात्मिक पहेली को बूझते हैं और इस अलंकार के पीछे छिपे मर्म को ढूँढ़ निकालते हैं तब हमें एक महत्वपूर्ण तथ्य का पता चल जाता है। अज्ञान व्यामोह की निविड़ निशा में सोती हुई प्रबुद्ध आत्माओं का ईश्वरीय वाणी-आत्म पुकार-की वंशी द्वारा उद्बोधन किया जाना-उनका एक सीमित परिवार की उपेक्षा कर विश्व परिवार के लिए गौतम बुद्ध की तरह आगे बढ़ चलना- ईश्वरीय प्रयोजन में सब का एक साथ तन्मयता पूर्वक जूट जाना यही सब तो महारास है। महाकाल को विशेष अवसरों पर ऐसा महारास रचना पड़ता है जिसमें उत्कृष्ट आदर्श लिए सहस्रों महामानव कार्यरत दिखाई पड़ें। गोपियाँ प्रबुद्ध आत्मायें हैं, वंशी-आत्मा की पुकार, महारास- ईश्वरीय विशेष प्रयोजन, निशा व्यामोह, परिजनों की उपेक्षा- स्वार्थ और संकीर्णता की परिधि का साहसपूर्वक उल्लंघन। इस महारास में जो सहस्रों गोपियाँ-प्रबुद्ध आत्माएं- भाग ले सकीं वे ब्रह्मानन्द का आनन्द लेती हुई अपने को बड़भागी अनुभव कर सकीं। जो सोती रह गई उन्हें पछताना पड़ा।
भगवान कृष्ण की सोलह हजार रानियाँ बताई जाती हैं। यों लौकिक दृष्टि से यह बात समझ से बाहर की है। महाभारत में उनकी एक दो पत्नियों का ही वर्णन है- रुक्मिणी-सत्यभामा आदि ही उनकी धर्मपत्नी हैं। सामाजिक मर्यादा की दृष्टि से यह उचित भी था। फिर यह हजारों रानियाँ क्या हैं, इस पहेली का हल भी उपरोक्त प्रकार का ही है। ईश्वरीय प्रयोजन में जो आत्मायें प्राणपण से जुट जाती हैं- उसी में अपना आत्म समर्पण कर देती हैं वे आत्मा-परमात्मा की प्राण प्रिय पत्नियाँ ही कहलायेंगी। पत्नी सम्बन्ध के साथ अश्लील कामक्रीड़ा और गोपनीयता का सम्बन्ध जुड़ जाने से सामाजिक क्षेत्र में वह रिश्ता अड़चन भरा और अचकचा सा लगता है, पर अध्यात्म चर्चा में इस प्रकार की कोई अड़चन नहीं है। आत्म समर्पण ओर अभिन्न एकता की जो भावनात्मक स्थिति है उसकी तुलना लौकिक रिश्ते में पति-पत्नी भाव से ही मिलती जुलती है। अन्य रिश्ते कुछ दूर पड़ जाते हैं। इसलिए सन्तों और सूफियों ने आत्मा और परमात्मा की एकता को प्रणय सूचक शब्दों में अनेक गीतों में गाया है। कबीर का सुरतियोग, मीरा का प्रणय योग एक उच्च आध्यात्मिक भूमिका है। उसमें जिस पति-पत्नी भाव की चर्चा है वह सामान्य गृहस्थ पद्धति से असंख्य गुनी ऊंची वस्तु है। श्रीकृष्ण भगवान की सोलह हजार रानियाँ उस अवतार की सहयोगिनी सोलह हजार प्रबुद्ध आत्माएं ही हैं। इस आलंकारिक दाम्पत्ति जीवन ने हर रानी को आठ-आठ सन्तानें दीं। अर्थात् इन लोगों ने आठ-आठ अपने उत्तराधिकारी और बनाये। वे स्वयं तो ईश्वरीय प्रयोजन में तत्पर रहे ही साथ ही उनकी प्रयत्नशीलता ने औसतन आठ-आठ साथी सहचर अनुयायी और बढ़ा दिये, यह उनकी सन्तानें थीं।
इस प्रकार के विवाह में नर-नारी लिंग भेद अपेक्षित नहीं। सुखी-सम्प्रदाय में पुरुष भी अपनी मनोभूमि को नारी जैसी मान कर पति रूप में ईश्वर की उपासना करते हैं। भक्ति योग में ऐसे अनेक साधन क्रम विद्यमान हैं। कृष्ण उपासना का क्रिया-कलाप तो बहुत करके इसी स्तर का है। नर भी उन्हीं गीतों को गाकर भाव-विभोर होते हैं जिन्हें नारियाँ अपने पतियों के संदर्भ में गा सकती हैं। गोपी कृष्ण का प्रेम प्रसंग वस्तुतः नर नारी भेद से असंख्य गुना ऊंचा है उसे विशुद्ध रूप से आत्मा-परमात्मा का मिलन बिन्दु ही कहा जा सकता है। कृष्णावतार के समय सहस्रों प्रबुद्ध आत्माओं ने परमात्मा के अभीष्ट प्रयोजन में आत्म समर्पण करके जो महारास रचाया उसी से अवतार का उद्देश्य पूर्ण हो सका। साथी सहचरों के बिना अकेले कृष्ण आखिर कर भी क्या सकते थे?
शरीर से हृदय का बहुत महत्व है। जीवन का श्रेय उसी को है। पर सहस्रों नाड़ियों द्वारा उसे रक्त अर्पण करने का जो प्रेम योग साधा जाता है उसी आधार पर शरीर जीवित है। समुद्र इसीलिए नहीं सूखता कि सहस्रों नदियाँ इसमें अपना योगदान अर्पित करती हैं। चक्रवर्ती शासक वही कहलाता है जिसमें सहस्रों राजा एक महा छत्र के नीचे प्रकाशित होते हैं। इसी एकीकरण के लिए प्राचीन काल में अश्वमेध यज्ञ का आयोजन होता था। उन्हें राजनैतिक महारास कहना चाहिये।
इन दिनों यही सब हो रहा है। अनेक जन्मों से जिनके पास आध्यात्मिक पूँजी संग्रहीत है, उन प्रबुद्ध आत्माओं को युग निर्माण योजना के कार्यक्रमों द्वारा अपने अवतरण उद्देश्य से परिचित और अभ्यस्त कराया जा रहा है। यह स्थूल प्रक्रिया हुई। सूक्ष्म स्तर पर वे परस्पर अभिन्न योग का अभ्यास कर रहे हैं। इस साधना की संक्षिप्त चर्चा इसी अंक के अन्तिम लेख में है। सब मिल कर एक केन्द्र बिन्दु का निर्माण कर रहे हैं। संग्रहीत ऋषि रक्त से सीता उपजी थी और संग्रहीत देव शक्ति से दुर्गा। यह संग्रह नदियों द्वारा समुद्र को किये गये योगदान की तरह एक केन्द्र बिन्दु को परिपुष्ट करेगा। और मंडल के ग्रह-उपग्रहों का सम्मिलित संगठित सौर परिवार जिस प्रकार विश्व ब्रह्मांड की स्थिति पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाल रहा हैं उसी प्रकार दशम निष्कलंक अवतार-नवनिर्माण का प्रचार अभियान भी एक अत्यन्त सामयिक भूमिका प्रस्तुत करेगा।
संसार की जराजीर्ण और अवाँछनीय परिस्थितियों के सामान्य सुधार प्रयत्न सफल न होते देख जब महाकाल ने ताण्डव नृत्य किया तो अनुपयुक्त कूड़ा करकट जल वल कर भस्म होने लगा। यह ध्वंस काल स्वरूप समय की स्थिति है। बड़े-बड़े महल कुछ ही समय में गिराये जा सकते हैं पर उनका बनाना कठिन होता है और समय साध्य भी। ध्वंस से निर्माण का महत्व अधिक है। जब ध्वंस हो चुका तो महाकाल का कार्य समाप्त हो गया और सृजन की देवी महाकाली आगे आई। उसने महाकाल से उनका ताण्डव बन्द कराया उन्हें भूमि पर लिटा दिया और स्वयं आगे बढ़कर सृजनात्मक क्रिया-कलाप में संलग्न हो गई।
महाकाली को पुराणों में इस प्रकार चित्रित किया गया है कि महाकाल भूमि पर लेटे हुए हैं और वे उनकी छाती पर खड़ी अट्टहास कर रही हैं। यों पति की छाती पर पत्नी का खड़ा होना अटपटा सा लगता है। पर पहेलियों में यह अटपटापन जहाँ कौतूहल वर्धक एवं मनोरंजक होता है वहाँ ज्ञान वर्धक भी। कबीर की उलटबांसी और खुसरो की ‘मुकरनी’ पहेलियों के रूप में सामने आती हैं और अपना रहस्य जानने के लिए बुद्धिमत्ता को चुनौती देती हैं। भूमि पर लेटे हुए शिव की छाती पर काली का खड़े होकर अट्टहास करना, घटना के रूप में घटित हुआ था या नहीं इस झंझट में पड़ने की अपेक्षा हमें उसमें सन्निहित मर्म और तथ्य को समझने का प्रयत्न करना चाहिये।
ध्वंस एक आपत्ति धर्म है- सृजन सनातन प्रक्रिया। इसलिए ध्वंस को रुकना पड़ता है, थक कर लेट जाना और सो जाना पड़ता है। तब सृजन को दुहरा काम करना पड़ता है। एक तो स्वाभाविक सृष्टि संचालन की रचनात्मक प्रक्रिया का संचालन-दूसरे ध्वंस के कारण हुई विशेष क्षति की विशेष पूर्ति का आयोजन। इस दुहरी उपयोगिता के कारण ध्वंस के देवता महाकाल की अपेक्षा स्वभावतः सृजन की देवी महाकाली का महत्व बहुत अधिक बढ़ा जाता है। शिव जब पड़े होते हैं तब शक्ति खड़ी है। शिव पीछे पड़ जाते हैं शक्ति आगे आती है। शिव सोये होते हैं और शक्ति जागृत रहती हैं। शिव का महत्व घट जाता है और शक्ति की गतिशीलता पूजी जाती है। महाकाल की छाती पर खड़े होकर महाकाली का अट्टहास करना इसी तथ्य का आलंकारिक चित्रण है।
शिव के हाथों में त्रिशूल अवश्य है, वे उसका अनिवार्य परिस्थितियों में प्रयोग भी करते हैं पर हृदय में उनके सृजन की असीम करुणा ही भरी रहती है। सृजन की देवी काली उनकी हृदयेश्वरी हैं। उसे वे सदा अपने हृदय में स्थान दिये रहते हैं। आवश्यकतानुसार वह मूर्तिमान गतिशील और प्रखर हो उठती हैं। ध्वंस के अवसर पर तो उसकी आवश्यकता और भी अधिक हो उठती है। आपरेशन के समय डॉक्टर को चाकू, कैंची, आरी, सुई आदि तीक्ष्ण धार वाले शस्त्रों की भी जरूरत पड़ती है, पर उससे भी अधिक सामग्री मरहम पट्टी की जुटानी पड़ती है। आपरेशन के समय किये गये घाव को भरा कैसे जाय? इसकी आवश्यकता भी डॉक्टर समझते हैं अतएव वे रुई, गौज, मरहम पट्टी दवायें आदि भी बड़ी मात्रा में पास रख लेते हैं। ध्वंस प्रक्रिया आपरेशन है तो निर्माण मरहम पट्टी। भगवान को ध्वंस करना पड़ता है पर मूल में अभिनव सृजन की आकाँक्षा ही रहती है। क्रूर कर्म में भी अनन्त करुणा ही छिपी रहती है। महाकाल की आन्तरिक इच्छा सृजनात्मक ही है, यही उनकी हृदयगत आकाँक्षा है। अस्तु शक्ति को शिव के हृदय स्थान पर इस प्रकार अवस्थित दिखाया गया है मानो वह हृदय में से ही निकल कर मूर्तिमान हो रही हो।
इस चित्रण का एक और भी उद्देश्य है कि विनाश के उपरान्त होने वाले पुनर्निर्माण में मातृशक्ति का ही प्रमुख हाथ रहता है। बाप द्वारा प्रताड़ना दिये जाने पर बच्चा माँ के पास ही दौड़ता है और तब वहीं उसे अपने आँचल में छिपाती, छाती से लगाती, पुचकारती और दुलारती है। मातृ-शक्ति करुणा की स्त्रोत हैं। अस्पतालों में नर्स का काम महिलायें जैसी अच्छी तरह कर सकती हैं उतनी पुरुष नहीं, छोटे बालकों को शिक्षा देने वाले वाले बाल मन्दिर-शिशु सदनों में महिलाओं द्वारा जैसी अच्छी तरह शिक्षण दिया जा सकता है उतना पुरुषों द्वारा नहीं। कारण कि उनके अन्दर स्वभावतः जिस करुणा, दया, ममता, सेवा, सौजन्य एवं सहृदयता का बाहुल्य रहता है, उतना पुरुष में नहीं पाया जाता। पुरुष प्रकृतितः कठोर है और नारी कोमल। दोनों का सम्मिश्रण सम्मिलित होने से एक संतुलित स्थिति बनती है अन्यथा एकाकी रहने वाले पुरुष सेना जैसे कठोर कार्यों के लिये ही उपयुक्त सिद्ध हो सकते हैं।
यदि वर्तमान अवांछनीय परिस्थितियों की जिम्मेदारी नर-नारी में से किसकी कितनी है इसका विश्लेषण किया जाय तो यही निष्कर्ष निकलेगा कि 90 प्रतिशत उद्धतता पुरुषों द्वारा बरती गई है, क्रूर कर्मों और दुर्भावनाओं के अभिवर्धन में उन्हीं का प्रमुख हाथ है। अपराधी, दुष्ट, दुरात्मा और दंडभोक्ता व्यक्तियों में पुरुषों की ही संख्या 90 प्रतिशत होती है। वर्तमान उद्धरता की जिम्मेदारी प्रधानतया पुरुषों की होने के कारण दंड भाग भी उन्हीं के हिस्से में आयेगा। भावी विनाश में प्रताड़ना उन्हीं के हिस्से में अधिक आने वाली है। नारी क्रूर कर्मों से बची रहती हैं उनमें उसका योगदान नगण्य होता है इसलिये वह अपनी आध्यात्मिक गरिमा के कारण पुरुष की अपेक्षा कहीं अधिक पवित्र, उज्ज्वल, सौम्य, रहने के कारण दुर्दैव की कोपभाजन नहीं बनती। शिव की छाती पर शक्ति के खड़े होने का एक तात्पर्य यह भी है कि आत्मिक श्रेष्ठता की कसौटी पर कसे जाने पर नारी की गरिमा ही अधिक भारी बैठती है। वही ऊपर रहती है। पुरुष इस दृष्टि से जब कि गिरा हुआ सिद्ध होता है तब नारी अपनी श्रेष्ठता को प्रमाणित करती हुई गर्वोन्नत प्रसन्न वदन खड़ी होती है।
भावी नव निर्माण में इमारतों, सड़कों, कल-कारखानों, सेना अथवा शस्त्रों का अभिवर्धन प्रधान नहीं, वरन् भावनात्मक निर्माण की प्रधानता रहेगी। इस क्षेत्र में नारी का ज्ञान, अनुभव तथा अधिकार असंदिग्ध है। इसलिये स्वभावतः जो जिसका अधिकारी है वही इस उत्तरदायित्व को वहन करेगा। भावी पुनरुत्थान में प्रधान भूमिका नर की नहीं नारी की होगी। विनाश की भूमिका का सरंजाम जुटाने में पुरुष आगे रहेगा, क्रूर कर्मों में उसी की बुद्धि आगे चलती है। सामान्य जीवन आनन्द की हत्या उसी ने की है। विश्व-शान्ति पर आक्रमण उसी ने किया है। अब अपनी दुष्टता की पूर्णाहुति में भी अपनी कला के दो-दो हाथ वही दिखावे तो उसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं। लेकिन भावनात्मक नवनिर्माण की, इसके तुरन्त बाद ही जिस पुनरुत्थान की आवश्यकता पड़ेगी उसे वह पूरा न कर सकेगा। यह कार्य नारी को करना है। इसी तथ्य को प्रतिपादित करती हुई महाकाल के थक जाने पर उसकी छाती पर महाकाली का हास−विलास होता चित्रित किया गया है।
पुरुष में अन्य विशेषतायें कितनी ही क्यों न हों, भावनात्मक क्षेत्र में, आध्यात्मिक क्षेत्र में- नारी से वह बहुत पीछे है। यही कारण है कि साधना क्षेत्र में नारी ने जब भी प्रवेश किया है वह पुरुष की तुलना में सौ गुनी तीव्र गति से आगे बढ़ी है। उसे इस दिशा में अधिक शीघ्र और अधिक महत्वपूर्ण सफलतायें मिलती हैं। माता को कन्यायें अधिक प्रिय होती हैं, उन्हें वे दुलार भी अधिक करती हैं और अनुग्रह भी। अध्यात्म की अधिष्ठात्री महाशक्ति का अवतरण अनुग्रह यदि नारी साधकों पर अधिक सरलता से, अधिक मात्रा में होता है तो यह उचित ही है। भावी नव निर्माण में जिस स्तर की क्षमता, योग्यता पूँजी एवं तत्परता की आवश्यकता होगी वह स्वभावतः नारी में ही प्रचुरता पूर्वक मिलेगी। इसलिये मर्माहत पुरुष को कसक कराह के साथ विश्राम करने देकर नारी ही आगे बढ़ेगी और वही पुनरुत्थान की परिस्थितियों का सृजन करेगी। समय-समय पर ऐसा होता भी आया है। पुरुष आध्यात्मवादियों की सफलताओं में प्रधान भूमिका नारी की रही है। वह सहयोग, ख्याति प्राप्त भले ही न कर सकी हो, पर तथ्य की दृष्टि से यही सुनिश्चित है कि आत्म बल के उपार्जन से किसी भी पुरुष को अद्भुत, असाधारण सहयोग किन्हीं नारियों का ही रहा है।
जून की ‘अखण्ड ज्योति’ के “महाकाल और उसका प्रत्यावर्तन” लेख में ऐसी ही कतिपय उदाहरणों की चर्चा की जा चुकी है। राम की महिमा का श्रेय सीता और कौशल्या को कम नहीं है। कौशल्या के प्रशिक्षण तथा सीता के सहयोग को यदि हटा दिया जाय तो राम का वर्चस्व फिर कहाँ रह जायगा? सीता के बिना राम का चरित्र ही क्या रह जाता हैं। उनकी सारी गतिविधियों के पीछे सीता ही आच्छादित है। कृष्ण की बाँसुरी में राधा ही रहती थी। देवकी और यशोदा का वात्सल्य कुन्ती का प्रोत्साहन और आशीर्वाद, द्रौपदी की श्रद्धा, गोपियों का स्नेह इन सब तत्वों ने मिल कर कृष्ण के कृष्णत्व की पूर्ति की थी। इन उपलब्धियों के अभाव में बेचारे कुछ कर पाते या नहीं इसमें सन्देह ही रहता।
बुद्ध का आध्यात्मिक प्रशिक्षण उनकी मौसी द्वारा सम्पन्न हुआ था। तपस्या के बाद लौटे तो उनकी पत्नी यशोधरा भी अनुगामिनी होकर आई। अम्बपाली के आत्म समर्पण के उपरान्त तो भगवान का प्रयोजन हजार गुनी गति से तीव्र हुआ। प्रतिभाशाली व्यक्त्वि जहाँ आते हैं वहाँ किसी भी दिशा में अभिवृद्धि होती है। पाण्डवों की महान भूमिका में द्रौपदी का “रोल” अत्यन्त प्रभावी है। एक नारी द्वारा पाँच नर रत्नों को प्रचुर बल प्रदान किया गया, यह नारी शक्ति भाण्डागार का चिन्ह है। मदालसा ने अपने सभी पुत्रों को अभीष्ट दिशा में सुसम्पन्न किया था। एक नारी असंख्य मानव प्राणियों को नर से नारायण बनाने में समर्थ हो सकती है। उसकी भावनात्मक सृष्टि इतनी परिपूर्ण है कि कृष्ण का सामयिक अस्तित्व न होने पर भी मीरा ने उन्हें पति रूप में साथ रहने और नाचने के लिए मूर्तिमान कर लिया था।
प्राचीन काल के तपस्वी, तत्वदर्शी एवं महामनीषी ऋषियों में से प्रत्येक सपत्नीक था। ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदि सभी देवताओं की पत्नियाँ, सरस्वती, लक्ष्मी, काली उनके वर्चस्व को स्थिर रखने में आधार स्तम्भ की तरह हैं। नारी के रमणी रूप की ही भर्त्सना की गई है अन्यथा उसकी समग्र सत्ता गंगा की तरह पवित्र, और अग्नि की तरह प्रखर है। पिछले दिनों भारतीय राजनैतिक क्रान्ति का नेतृत्व करने में ऐनी बेसेन्ट की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। लक्ष्मीबाई, सरोजिनी नायडू आदि कितनी ही महिलायें इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण काम कर चुकी हैं। इस क्रान्ति युग की परिस्थितियाँ उत्पन्न करने में जिन महामानवों ने गुप्त किन्तु अद्भुत पुरुषार्थ किया हैं उनमें रामकृष्ण परमहंस और योगी अरविन्द मूर्धन्य हैं। दोनों को नारी का शक्ति सान्निध्य प्राप्त था। परमहंस के साथ महायोगिनी- भैरवी तथा पत्नी शारदामणि और अरविन्द के साथ माताजी का जो अनुपम सहयोग हुआ उसी के बलबूते पर वे लोग अपनी महान भूमिका सम्पादित कर सके। ऐसे असंख्य उदाहरण भारत तथा विदेशों में विद्यमान हैं जिनसे स्पष्ट है कि आध्यात्मिक क्षेत्र में, भावनात्मक उपलब्धियों में नारी का वर्चस्व प्रधान है और इसी के सहयोग से नर को इस दिशा में महान सफलता मिली है। शिव की छाती पर शक्ति का खड़े होना इसी तथ्य का उद्घाटन करता है कि अन्य क्षेत्रों में न सही कम से कम आत्मबल की दृष्टि से तो नारी की गरिमा असंदिग्ध है ही।
भावी नव निर्माण निकट है। उसकी भूमिका में नारी का योगदान प्रधान रहेगा। अगले ही दिनों कितनी ही तेजवान नारियाँ अपनी महान महिमा के साथ वर्तमान केंचुल को उतार कर सार्वजनिक क्षेत्र में प्रवेश करेंगी और उनके द्वारा नव निर्माण अभियान का सफल संचालन सम्भव होगा। भावी संसार में, नये युग में हर क्षेत्र का नेतृत्व नारी करेगी। पुरुष ने सहस्राब्दियों तक विश्व नेतृत्व अपने हाथ में रख कर अपनी अयोग्यता प्रमाणित कर दी। उसकी क्षमता विकासोन्मुख नहीं विनाशोन्मुख ही सिद्ध हुई। अब वह नेतृत्व उसके हाथ से छिन कर नारी के हाथ जा रहा है। हमें उसमें बाधक नहीं सहायक बनना चाहिए। खिन्न नहीं प्रसन्न होना चाहिए। विरोध नहीं स्वागत करना चाहिये। भावी परिस्थितियों के अनुकूल हमें ढलना चाहिये। भावी परिस्थितियों के अनुकूल हमें ढलना चाहिये। इसी का संकेत उस चित्रण में सन्निहित है जिसमें महाकाल की छाती पर महाकाली की प्रतिष्ठापना प्रदर्शित की गई है।
राजा दक्ष चतुर बहुत थे, उनकी चतुरता इतनी प्रसिद्ध हो गई थी कि लोग उनके इस गुण के कारण ही असली नाम भूल कर ‘दक्ष’ अर्थात् ‘चतुर’ नाम से पुकारने लगे। तप त्याग के बलबूते नहीं, वे चतुरता के द्वारा ही ऊंचे पद पर पहुँचे थे। चतुरता परमार्थ प्रयोजन में लगे तो ही श्रेयस्कर है अन्यथा वह अनुपयुक्त दिशा में लगने पर संसार के लिए एक संकट बन जाती है। इससे कुकर्मी चतुरों की तुलना में भले-भोले मूर्खों को मुक्त कण्ठ से सराहा जाता हैं। जड़ भरत व्यवहार में बुद्धू थे, फिर भी उनका अन्तःकरण निर्मल था, उद्देश्य ऊंचा था अतएव उन्हें महान ऋषियों की गणना में गिना जाता है। दक्ष को प्रजापति का- शासक का उत्तरदायित्व मिल गया था, पर वे उस योग्य थे नहीं।
दक्ष ने एक यज्ञानुष्ठान किया उसमें उनकी पुत्री सती बिना बुलाये भी आई और उनने अपने पिता को वह करने के लिये- उस मार्ग पर चलने के लिये कहा जो उनके लिये शोभनीय था। दक्ष न माने, अपने ही रास्ते चलते रहे। सती को मार्मिक आघात लगा और उसने आत्महत्या कर ली।
मनुष्य में चातुर्य बहुत है। इसी से तो वह सृष्टि का मुकुट मणि बना हुआ है। इस चातुर्य का उपयोग जब वह संकीर्ण एवं घृणित स्वार्थों की पूर्ति में निरंकुश होकर करता है तो उसका निज का भी और समस्त समाज का भी घोर अहित होने लगता है। आत्मा उसे रोकती है, मनुष्यता की सीमा में रहने की पुकार करती है, पर जब अहंकारी जीव नहीं मानता अपनी दक्षता की धुन में किसी की नहीं सुनता, तो उद्धत आचरण से क्षुब्ध आत्मा एक प्रकार से नैतिक आत्महत्या कर बैठती है। सामाजिक दृष्टि से ऐसा उद्धत आचरण मनुष्यता को आत्म हत्या करने के लिए विवश करता है। दक्ष के उद्धत आचरण से क्षुब्ध उसकी पुत्री सती ने आत्म-हत्या कर ली। पुराणों में ऐसा वर्णन मिलता हैं।
सती, दक्ष की पुत्री थी पर विवाही भगवान शंकर को थी। सती अर्थात् सत प्रवृत्ति, अर्थात्- नैतिकता-प्रबुद्धता-विवेकशीलता-मनुष्यता। कल्याणकर्त्ता भगवान शंकर उसे प्राणप्रिय रखते थे। उसी के साथ उनका आनन्द जुड़ा हुआ था। सती शिव की अर्धांगिनी बनी हुई थी। अर्ध नारी नटेश्वर- शिव के शरीर का आधा भाग नारी और आधा नर जैसा चित्रित किया जाता है। इसका अर्थ है कि ‘सती’ (सत्प्रवृत्ति) उनके अस्तित्व में इतनी अधिक घुली हुई है कि दोनों की सत्ता और महत्ता एक ही मानी समझी जा सकती है। सत् है वही शिव है। जो सत्प्रवृत्ति है वही भगवती है। सत्य ही नारायण है। मनुष्यता को भगवान का प्रिय प्रत्यक्ष रूप कहा जाय तो यह उचित ही है। सती और शिव का जोड़ा ऐसा ही था।
भगवान शिव को जब यह पता चला कि दक्ष की उद्धतता इस सीमा तक बढ़ गई है कि उनकी प्राणप्रिया सती को आत्महत्या करनी पड़ी है तो उनके क्षोभ का पारावार न रहा। वे सती के बिना रह नहीं सकते थे। सत्प्रवृत्ति को, मनुष्यता को, जिस चतुरता के- दक्षता के कारण आत्महत्या करने को विवश होना पड़े उसके प्रति समर्थ शंकर को कुपित होना ही चाहिये। शिवजी ने प्रतिनिधि स्वरूप वीरभद्र को काली, भैरव, नन्दी आदि गणों के साथ दक्ष की माया नगरी का विध्वंस करने का आदेश दिया। वहाँ पहुँचते-पहुँचते उन गणों ने दक्ष और उसके स्वार्थी- पक्षपातियों का कचूमर निकाल कर महानाश का दृश्य उपस्थित कर दिया। दक्ष की नगरी वीरभद्र ने तोड़-फोड़ कर रख दी। भैरव ने प्रजापति के समर्थक सहयोगियों की बड़ी मिट्टी खराब की। नन्दी ने शासन शृंखला के सूत्रों को तोड़-फोड़ कर फेंक दिया। दक्ष की चतुरता धूल में मिल गई। उसकी चिर संचित कमाई देखते-देखते चूर्ण विचूर्ण हो गई। शंकर ने दक्ष को उसकी कुमार्गगामिता का छटावेश हटाकर वस्तु स्थिति का प्रकटीकरण करने की दृष्टि से इतना दंड देना आवश्यक समझा कि उसका मानवी सिर काटकर वहाँ बकरे का चिपका दिया। दक्ष का, चतुरता का वास्तविक स्वरूप यही था। वह हर घड़ी मैं-मैं बखानता था और वाचालता से प्रभावित कर लोगों को भुलावे में डालता था। यही दोनों गुण बकरे में होते हैं। वह हर घड़ी मैं-मैं, की रट लगाता हैं और अनर्गल शब्दोच्चारण की आदत से अपनी ओर दूसरों का ध्यान आकर्षित करता है।
आज भी ‘दक्षों’ ने यही कर रखा है। ये तथाकथित चतुर लोग- समाज के मूर्धन्य बने बैठे व्यक्ति चतुरता तिकड़म को ही अपना आधार बनाये हुए हैं दूसरों के सहारे वे छल-बल से आगे बढ़े-ऊंचे उठे हैं। तप और त्याग का नाम भी नहीं, ऐसे मूर्धन्य लोगों का बाहुल्य व्यक्ति और समाज की आत्मा को कुचल मसल रहा है। इससे मनुष्यता आत्महत्या जैसी स्थिति में जा पहुँचती है। यह स्थिति महाकाल को असह्य है। सदाचरण में ही भगवान के संसार की शोभा है। वे हरी-भरी-फली मानवता में ही मोद मानते हैं। यह सती ही उसकी सहचरी है। इसे जो आघात पहुँचाता है वही भगवान का सबसे बड़ा शत्रु है। स्थिति जब असह्य हो जाती है तब महाकाल को अपना ध्वंस शस्त्र प्रयुक्त करना पड़ता है। दक्ष की सारी शासन सत्ता विधि व्यवस्था नन्दी गणों ने देखते-देखते विध्वंस के गर्त में फेंक दी थी। आज का मानवीय चातुर्य- जो सुविधा साधनों की अभिवृद्धि के अहंकार में- अपनी वास्तविक राह छोड़ बैठा है, उसी दुर्गति का अधिकारी बनेगा जैसा कि दक्ष का सारा परिवार बना था।
मृत सती की लाश को कंधों पर रख कर रुद्र उन्मत्तों की तरह विचरण करने लगे। उनके शोक और क्षोभ का पारावार न था। ऐसा विकराल और रुद्र रूप देख दसों दिशाएं काँपने लगीं। सती के- सत्प्रवृत्ति के न रहने की स्थिति उन्हें असह्य थी। आपे से बाहर होकर वे हुँकारें भरने लगे। उनके श्वाँस-प्रश्वाँस से अग्नि की भयानक लपटें निकलने लगीं। उनचासों पवन, आँधी, तूफान बन कर स्थिति को प्रलय में बदलने का आयोजन करने लगे।
देवता काँपे। स्थिति विषम हो गई। विचार हुआ। सृष्टि के पालक और पोषक विष्णु आगे आये। उन्होंने चक्र सुदर्शन से सती के मृतक शरीर को ग्यारह हिस्सों में काट दिया। वे टुकड़े दूर-दूर फेंके गये। सती मर तो सकती नहीं, वे अमर हैं। आत्महत्या की थी पर उनकी सत्ता नष्ट कैसे होती। यह ग्यारह टुकड़े जहाँ भी गिरे वहाँ एक शक्ति पीठ की स्थापना हुई। संसार में ग्यारह शक्ति पीठ प्रसिद्ध हैं। हर जगह एक नई सती उत्पन्न हुई। शिव अपनी सहधर्मिणी को- ग्यारह गुनी विकसित पाकर संतुष्ट हो गये और ग्यारह रुद्रों के रूप में पुनः आनन्दपूर्वक अपने नियत-नियमित कार्य में लग गये। 1 और 1 के अंक समीप आ जाने से 11 बन जाते है। शिव और सती का-परमात्मा और सत्प्रवृत्ति का सुयोग जब कभी भी-जहाँ कहीं भी-होगा वहीं एक और एक मिल कर ग्यारह होने की उक्ति चरितार्थ होती है। शिव सती का सौम्य समन्वय एकादश शक्ति पीठ और एकादश रुद्रों का आनन्द उत्पन्न करता हो तो इसमें आश्चर्य ही क्या?
पौराणिक गाथा की पुनरावृत्ति उसी घटना-क्रम के साथ फिर सामने आ रही है। दक्षों ने हर क्षेत्र के नेतृत्व पर अपना आधिपत्य किया हुआ है। समाज के मूर्धन्य बने व्यक्ति न अपना व्यक्तित्व उत्कृष्ट बना रहे हैं और न आदर्शवादिता की प्रवृत्ति बढ़ने दे रहे हैं। जन साधारण बड़ों की देखा-देखी हेय स्तर पर अधःपतित होता चला जा रहा है। मनुष्यता मर रही है। सत्प्रवृत्तियां मूर्छित पड़ी हैं। लगता है सती ने आत्म-हत्या कर ली है। यह स्थिति महाकाल को असह्य है, उनकी सारी प्रसन्नता सती के साथ-सत्प्रवृत्ति के साथ जुड़ी हुई है। इस आत्म-हत्या के लिये जो भी दोषी होंगे उन्हें रास्ते पर लाने के लिये कड़ा पाठ पढ़ाने की आवश्यकता पड़ती है तो रुद्र उसकी व्यवस्था करना भी जानते हैं। उनके भैरव, वीरभद्र और नन्दी गण उथल-पुथल और तोड़-फोड़ की कला में प्रवीण हैं। दक्ष का अहंकार कैसे चूर-चूर किया जाता है, इसे वे जानते हैं। सम्भवतः अशान्ति से शान्ति उत्पन्न करने का प्रकरण फिर दुहराया जाय। महायुद्ध-गृहयुद्ध, प्रकृति प्रकोप जैसे वीरभद्र सम्भवतः मनुष्य की कुमार्ग पर जा रही दक्षता को पुनः पीछे लौटने और रास्ते पर लगने के लिये विवश करें। सम्भव है आज जिस अनैतिक चतुरता को सर्वत्र सराहा जाता है कल उसी को बकरे के मुँह वाली बकवासी-अहंकारी-बताकर तिरस्कृत और बहिष्कृत किया जाय।
आज अनैतिक चतुरता ने समस्त समाज को अस्त-व्यस्त और त्रस्त कर दिया है जो हरकतें न्याय-नीति की दृष्टि से स्पष्टतः घृणित और निन्दनीय हैं, वे ही खुले आम दुहराई जा रही हैं और जनता तथा सरकार दोनों उसका निराकरण करने में अपने को असमर्थ पा रहे है। मालूम होता है इस उच्छृंखलता को मिटाने के लिये दैवी शक्ति को ही कोई योजना करनी पड़ेगी।
महाकाल का विक्षोभ एक ही तरह शान्त हुआ था-एक ही तरह शान्त हो सकता है, उनकी प्राणप्रिय सती को पुनः पुनर्जीवित किया जाय। सती के शव से एकादश सतियाँ प्रादुर्भूत हुई थी, ग्यारह शक्ति पीठ बने थे। हम मानवता के उन्नायक अगणित शक्ति केन्द्र ऐसे स्थापित करें जो भगवान शिव के संसार को सुरम्य, सुविकसित और सुसंस्कृत बनाये रखने में समर्थ हो सकें। रुद्र कोप से बचने का यदि कोई उपाय हो सकता है-यदि कभी कोई समाधान होगा तो वह उसी स्तर का होगा जैसा कि उपरोक्त पौराणिक उपाख्यान के अनुसार अतीत काल में हो चुका है।
एक नगरी थी लंका। जिसका राजा था अहंकार, प्रपंच स्वार्थ और वासना का प्रतिनिधि-रावण। रावण की नीति थी-अपने असीम स्वार्थों की असीम पूर्ति और उसके लिये हर किसी का उत्पीड़न। उदारता उसके पास नाम को भी न थी। अपने सारे शरीर-बल, बुद्धि-बल और परिवार-बल का उपयोग वह दूसरों को आतंकित करने और मनमानी बरतने में करता था। इस प्रकार की अनीति का मार्ग अवलम्बन करने वाले आरम्भ में फूलते-फलते भी देखे गये हैं। रावण भी खूब फूला-फला। उसका कुटुम्ब परिवार बढ़ा। कहते हैं कि एक लाख पूत और सवा लाख नाती उसके थे। यह तो उसका निजी परिवार था। एक से एक बड़े मायावी साथी उसके थे।
त्रिजटा जो अनेक रूप बना सकती थी, मरीच जो अनेक वेश बदल सकता था, कुम्भकरण जिसके योजनों लम्बे नाक, कान थे, दूर-दूर की बातों को सूँघ, सुन सकता था, मेघनाद, खरदूषण, सुबाहु आदि अगणित पराक्रमी उसके साथ थे। आतंकवादी के साथी कितने ही हो भी जाते हैं। इस सहयोग, साझीदारी में ही दुष्ट दुरात्माओं को लाभ दिखाई पड़ता है। सो रावण का परिवार बढ़ा और देखते-देखते लंका सोने की बन गई। लंका में वरुण पानी भरते थे, पवन बुहारी लगाते थे, अग्निदेव भोजन पकाते थे। निदान सभी देवता बंधन में बंध हुये विवश उनकी नगरी की सेवा शुश्रूषा में जुटे रहने लगे। संसार में सर्वत्र रावण और उसकी नगरी की ख्याति फैल गई। सब कोई उस आतंक के आगे नत मस्तक होकर झुक गये। सर्वत्र अन्धकार छा गया। लोग इस आतंक से दुःखी तो बहुत थे पर उपाय सूझ न पड़ता था। निराशा छाई हुई थी। दुर्दैव को कोसने के अतिरिक्त किसी से कुछ बन न पड़ रहा था।
अविवेक का उद्धत आचरण करने का अवसर मिलता है और वह सफल होता चलता है तो उसका आतंक फैलना स्वभाविक है। आतंक के आगे दुर्बल नतमस्तक होने में अपनी खैर मानते हैं और दुष्ट उसमें सम्मिलित रह कर साझीदारी का अधिक लाभ पाने की नीति अपनाते हैं। व्यक्ति हो चाहे तथ्य, चलते इसी मार्ग पर हैं। फलतः अनाचार का रावण जब भी अवसर मिलता है अपना साम्राज्य व्यापक बना लेता है। मायावी साथियों की इसे कमी नहीं रहती। सोना खिंच-खिंचकर उन दुरात्माओं की नगरी केन्द्र भूमि में ही इकट्ठा होने लगता है। पूँजीवाद की बढ़ोतरी साधारण जनता को जर्जर करके रख देती है। यही रावण राज्य का स्वरूप है। वह ऐतिहासिक भी हो सकता है, और तथ्यात्मक भी। त्रेता युग में रावण नाम का एक आतंकवादी व्यक्ति भी हो गया है। पर तथ्य के रूप में वह आज भी जीवित है। अविवेक जन्य अनाचार की तूती आज भी बोल रही है। व्यक्ति और समाज सभी उसके आतंक राज्य में नतमस्तक खड़े हैं।
बुद्धिवादी और समर्थ लोगों ने इसका विरोध करके अपने को झंझट में डालने की अपेक्षा साझीदारी का रास्ता अपना लिया हैं। एक से एक बड़े मायावी मारीच और खरदूषण इस आतंक राज्य में सम्मिलित हो गये हैं। प्राचीन काल में रावण राज एक शासन तंत्र के रूप में केंद्रीभूत था। आज उसने बौद्धिक विकृति का रूप धारण कर जन मानस को सम्मोहित और आतंकित किया है। लोगों को सोचने और करने की दिशा उसी ओर बह रही है- जिस ओर वह उद्धत अविवेक अपनी सफलताओं का दर्प दिखाता हुआ- बहने और चलने के लिए विवश करता हैं। स्वतन्त्र विवेक को लोग खो बैठे हैं, अनुपयुक्त ढर्रे की लकीर पर अपना जीवन-रथ चला रहे हैं फिर वह चाहे दुर्गति के गर्त में गिरने ही क्यों न जा रहा हो। आज की भावनात्मक नैतिक और सामाजिक परिस्थितियों के मूल में लगता है अमूर्त रावण का ही आतंक राज प्रतिष्ठापित हो रहा है। सोने की नगरी लंका हर किसी का लक्ष्य बनी हुई है। उन के वैभव के अतिरिक्त और किसी की कुछ चाह है ही नहीं। प्रकाश का उपहास करने वाले- अन्धकार में सुख सन्तोष मानने वाले- निशाचरों की सेना वर्षा के उद्भिजों की तरह दिन दूनी, रात चौगुनी बढ़ती चली जा रही है। इन परिस्थितियों में मानवता को संत्रस्त होना ही पड़ेगा, दुःख दारिद्रय और शोक संताप ही तो रावण राज्य की उपलब्धियाँ हैं।
मनुष्य मूर्ख तो हैं पर विचारशून्य नहीं। लोगों में से डरपोक तो बहुत हैं पर साहस और शौर्य का सर्वथा अन्त कभी नहीं होता। स्वार्थियों और संकीर्ण स्तर वालों का बाहुल्य सदा रहा हैं, पर लोक मंगल को जीवन का लक्ष्य बनाने वाले सत्पुरुषों से धरती माता की गोदी सर्वथा सूनी नहीं होती। व्यक्ति और समाज की दुर्दशा से क्षुब्ध होने वाले और उन विकृतियों का सुधारात्मक उन्मूलन करने के लिये ऐसी अन्धेरी परिस्थितियों में ज्योति किरण की तरह कुछ आत्मायें जन्मती हैं और उस विपन्नता से जूझ पड़ती हैं। साधन स्वल्प होते हुए भी वे सदुद्देश्य का समर्थन करने के कारण दैवी शक्ति का अनुग्रह प्राप्त करती है और अन्ततः लोग साधनहीन विवेक को विजयी और साधन सम्पन्न अविवेक को परास्त हुआ देखते हैं।
ऐसा ही रावण काल में भी हुआ। लोक-मंगल में अभिरुचि रखने वाले बुद्धिजीवी-ऋषि मुनि- एकत्रित हुए और उनने विचार किया कि विश्व वसुधा को शोक संताप में डुबा देने वाली इस विपन्न परिस्थिति का अन्त कैसे हो?
सब ने एक मत से स्वीकार किया कि सत्पुरुषों की सम्मिलित शक्ति-महाकाली-ने ही आदि काल में असुरता से लोहा लिया था और वही अब रावण युग का अन्त करने में समर्थ होगी। उन्हें पता था कि एक समय जब असुरता से परास्त देवताओं के पास आत्म-रक्षा का कोई उपाय शेष न रहा था तो वे प्रजापति की शरण गये थे। प्रजापति ने सब देवताओं की थोड़ी थोड़ी शक्ति लेकर इकट्ठा किया। उस सामूहिक शक्ति पिण्ड में प्राण फूँका तो भगवती दुर्गा महाकाली प्रकट हुई थी। उसने अपनी हुँकार से दशों दिशाओं को कंपा दिया और असुरों को लड़ने के लिये ललकारा। असुर लड़ने आये तो महिषासुर (अहंकार) मधुकैटभ (लोभ) और शुँभ-निशुँभ (व्यामोह) तीनों ही दुर्दान्त दैत्यों को उस महाशक्ति के हाथों प्राण गंवाने पड़े थे। एकत्रित ऋषियों ने कहा अब भी वही स्थिति है और वही उपाय। व्यापक असुरता से एक-एक करके लोहा नहीं लिया जा सकता। उसे हटाना मिटाना हो तो सम्मिलित संगठित शक्ति का आयोजन करना होगा।
मत निश्चित हुआ। हर प्रबुद्ध व्यक्ति ने अपना-अपना रक्त अपना-अपना योगदान दिया। और उस अगणित रक्त बिन्दुओं से भरे घड़े को जमीन में गाढ़ दिया गया। घड़ा पकता रहा- संगठन पलता रहा- अब उसमें सजीव महाशक्ति महाकाली परिपूर्ण रूप में बनकर तैयार हो गई। प्रश्न आया इसे सम्भाले कौन इसका उद्घाटन कौन करे? उपयुक्त व्यक्ति की तलाश की गई तो वह निकले राजा जनक। कर्मयोगी-ब्रह्मज्ञानी जनक राजा तो थे, पर रोटी अपना पसीना बहा कर खेती करके कमाते थे। प्रजा की सेवा तो करते थे पर उससे पारिश्रमिक नहीं लेते थे। सम्पत्ति तो क्या देह को भी अपना न मानते थे और जो कुछ उनके पास है उसे जनता की सम्पत्ति मान कर चलते थे इसलिए लोग उन्हें विदेह भी कहते थे। ऐसे ही नर-रत्न महाक्रान्ति के सफल संचालक, पोषक एवं पिता प्रणेता बनने के अधिकारी हो सकते हैं। कथा है कि जनक जब कृषि कर्म में निरत थे तो हल की नोक से वह घड़ा टकराया और उसमें बैठी कन्या बाहर निकली। जनक ने उसे उठाया और छाती से लगा लिया। उसका नाम रखा सीता। हल की नोंक को संस्कृत में सीता कहते हैं। हल की नोंक से हलवाहे और अधिक श्रमिक ने जिसे उगाया-उपजाया हो उस युग प्रवृत्ति का सीता के नाम से सर्व साधारण ने परिचय पाया।
सीता जनक के घर में पली, खेली और बड़ी हुई। अब वह विवाह योग्य हो चली थी। जनक इस विचार में मग्न थे कि इसका विवाह किस वर्ग के, किस प्रकृति के, किस योग्यता के, किस स्तर के व्यक्ति से किया जाय। इतने में सीता ने इशारे में अपने पिता के सम्मुख वह हल उपस्थित कर दिया। जनक के घर महाकाल-शिव का एक पुराना धनुष सुरक्षित रखा था। वह बहुत भारी था और बहुत बड़ा, उसे हर कोई नहीं उठा सकता था। सीता ने उसे एक घर के कौने से उठाकर दूसरे कौने में रख दिया। मानों पिता को संकेत किया हो कि अब धनुष के प्रयोग का- सार्वजनिक संघर्ष का समय आ गया। कोई ऐसा धनुर्धर ढूँढ़ा जाय जिसका स्तर और साहस और आत्मबल महाकाल के इस महाविनाशक अस्त्र को धारण कर सकने के योग्य हो। उस युग की यही तो सबसे बड़ी आवश्यकता थी। उसे जो पूरा कर सके वही तो महाशक्ति को धारण एवं वरण कर सकता है। वह अनादि काल में ही अपनी पसन्दगी घोषित कर चुकी है-
यो माँ जयति संग्रामे, यो में दर्पो व्यमोहति।
यो में विजयते लोके, स में भर्ता भवष्यति॥
अर्थात् जो मुझे संग्राम में जीते जो मेरा दर्प सम्भाले, जो विजयी बनने की क्षमता रखे वही मेरा पति होगा। महाशक्ति सीता को जो धारण कर सके और शिव पिनाक को उठा कर असुरता के विरुद्ध उस पर शर सम्भाल सके ऐसा वर ढूँढ़ा जाय। निदान स्वयंवर रचाया गया। राम इस कसौटी पर खरे उतरे। दूसरे विवाहेच्छुक वैभवशाली तो बहुत थे पर उनमें राम जैसा आत्मबल न था, अतएव इतना बड़ा उत्तरदायित्व उठाने में समर्थ न हो सके। राम ने शिव धनुष उठा लिया। सीता की विजय माला उन्हीं के गले में पड़ी। शक्ति और शिव का द्वैत मिट कर जब अद्वैत हो गया तब इस काल धारा का प्रवाह फूटा जो युग परिवर्तन के लिए अभीष्ट था।
राम सीता का विवाह गृहस्थोपयोग के लिए नहीं किसी प्रयोजन के लिए-एक अपूर्णता को पूर्णता में परिवर्तित कर समय की महती आवश्यकता सम्पन्न करने के लिए हुआ था। सो कुछ ही दिन बाद परिस्थितियों ने मोड़ ले लिया। वनवास की तैयारियाँ हुई और सीता समेत राम लक्ष्मण वनवास के लिए चल दिये। सिया हरी गई और वे लंका पहुँची। उनका पदार्पण लंका की काया पलट करने के लिए था। वहाँ आतंक का उद्गम बदलकर ज्ञान और भक्ति के प्रतीक विभीषण को प्रतिष्ठापित किया जाना था। भगवती ने इसी के लिए अभीष्ट परिस्थितियाँ विनिर्मित कीं। सिया हरण न होता तो शायद लंका का कायाकल्प भी न हो पाता। राम ने संस्कृति सीता के अपहरण को असह्य माना और वे दुर्दान्त दानव रावण को परास्त करने के लिए कटिबद्ध हो गये।
राम के पास न कोई सेना थी और न साधन। परदेश में मामूली सा धनुष बाण लिए दोनों भाई वनवासी की तरह घूम रहे थे। आतंक के विरुद्ध लड़ने के लिए न साधन थे, न सुविधा, न परिस्थिति थी, न व्यवस्था। पर उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और अकेले अपने मार्ग पर बढ़ चले। सचाई और न्याय का समर्थन लोग करना तो चाहते हैं पर तब-जब किसी पर्वत जैसे ऊंचे, भारी और सुदृष्ट व्यक्तित्व का नेतृत्व मिले। राम इन्हीं विशेषताओं के प्रतीक थे। उन्होंने समर्थ लोगों में अपने महान अभियान का सन्देश पहुँचाया और सहयोग की याचना की। पर न तो एक भी भूपाल साथ आया और न धनपति। वे तो विजयी के साथी होते हैं क्योंकि उन्हीं की सहायता में उन्हें लाभ रहता है। दुर्बल दीखने वाले को सहायता देने में उन्हें अपना भौतिक लाभ तो दीखता नहीं, ऐसी दशा में वे घाटे का सौदा करें भी क्यों? अमीरी अपना बचाव पहले देखती है। सत्य और न्याय से उसे सहानुभूति भले ही हो पर सहायता तो सफल और समर्थ की ही करना लाभदायक होता है। इस प्रत्यक्ष तथ्य की वह उपेक्षा कैसे करें? सो राम की पुकार व्यर्थ चली गई। एक भी समर्थ जन को उनका साथ देने का साहस नहीं हुआ।
राम ने गरीबों का द्वार खटखटाया और उन्हें बताया कि थोड़ी सी सुविधाएं भोगते हुये आराम की निर्जीव जिन्दगी काटने की अपेक्षा अधर्म से लड़ने और धर्म को प्रतिष्ठापित करने के ईश्वरीय प्रयोजन में सहयोग देते हुए मर जाना बेहतर है। मजेदार जिन्दगी की तुलना में शानदार जीवन उत्तम है। सो यह बात रीछ वानरों की समझ में आ गई। भले और भोले लोग- चतुर और समर्थ लोगों की अपेक्षा ईश्वर के अधिक निकट होते हैं सो ईश्वरीय सन्देश उन्हीं को प्रभावित करता है। रीछ वानरों ने घर, शरीर और सुविधाओं का मोह छोड़ा और वे सच्चे शूरमाओं की तरह निहत्थे होते हुए भी युग दानव के विरुद्ध संघर्ष में कूद पड़े। दीखता यही था कि शायद इतना बड़ा आतंक पराजित न हो सके, शायद हम साधन विहीन लोग ही इस संघर्ष में खड़े न रह जायें। पर उनकी आत्मा ने कहा- न्याय और औचित्य के लिये लड़ने का प्रयत्न अपने आप में एक बहुत बड़ी विजय है, इस संघर्ष का हर कदम धर्म सैनिक की सफलता है। भौतिक विजय या पराजय के झंझट में क्यों पड़ा जाय?
राम, रावण का ऐतिहासिक युद्ध होने की तैयारी हो गई। बाधाओं का सेतु बाँधना था। नल-नील ने रीछ, वानरों की सहायता में पत्थर के टुकड़े जुटाये और जल पर तैरने वाला पुल बनाने की तैयारी की। भगवान राम ने कहा- भौतिक साधन तो जुटाने ही चाहिये पर परिवर्तन के देवता ‘महाकाल’ को भी साथ लेना चाहिये। क्योंकि सूक्ष्म रूप में उन्हीं की शक्ति बड़े प्रयोजन को सम्पन्न करती है। सच तो यह है कि हम सब उन्हीं की प्रेरणा से इतना दुस्साहस एकत्रित कर सके हैं और आगे उन्हीं के संकेतों पर चलते हुये अभीष्ट उद्देश्य की प्राप्ति में सफलता प्राप्त करेंगे। सेतुबन्ध के स्थान पर राम ने अपने ईश्वर-मार्गदर्शक रामेश्वर-महेश्वर-महाकाल की प्रतिष्ठापना की और आराधना अर्चा के साथ आत्म समर्पण करते हुये कहा- “हे महान! आपकी इच्छा पूर्ण हो, हम सब आपकी भृकुटि संकेतों पर बलिदान होने के लिये खड़े हैं।” महेश्वर ने उन्हें आशीर्वाद दिया और कहा- “मेरा प्रयोजन पूर्ण करने में संलग्न बालकों! तुम्हें श्रेय मिलेगा, यशस्वी होंगे और उज्ज्वल नक्षत्रों की तरह अनन्त काल तक चमकोगे। मेरी विजय, तुम्हारी ‘विजय गिनी जायगी।’ महाकाल के आशीर्वाद ने राम दल का साहस सैकड़ों गुना बढ़ा दिया।
बूढ़ा जटायु जानता था कि मेरी शक्ति स्वल्प है, रावण से जूझने का क्या परिणाम हो सकता है, यह भी उसे विदित था, फिर भी उसने सोचा जीवन की इससे बड़ी सार्थकता और सफलता दूसरी नहीं हो सकती कि उसका उपयोग न्याय धर्म की रक्षा करने और लोकमंगल के अभिवर्धन में हो सके। इस अनुपम अवसर को वह दूरदर्शी चूकने वाला न था, सो रावण से लड़ पड़ा और मारा गया। हो सकता है किसी कायर पर इसका बुरा असर पड़ा हो और कुछ उमंग उठ रही हो तो इस प्रकार की हानि उठाने से बचने के लिये डर कर अपना हौसला खो बैठा हो। पर दुनिया में सभी तो डरपोक नहीं हैं, कुछ ऐसे भी हैं जिनका शौर्य अवसर आने पर ही उभरता है। जटायु की यशस्वी मौत पाने के लिए अनेकों दिल वालों के दिल छाती की ठठरी में छिपे रहने की अपेक्षा बाहर निकल कर दो-दो हाथ दिखाने और कुछ कर गुजरने के लिए मचलने लगे।
इन्हीं दिल वालों में से थी एक गिलहरी। उसने सोचा मैं बहुत छोटी जरूर हूँ- साधन विहीन भी, पर इससे क्या आखिर मैं कुछ तो हूँ ही और जो कुछ है उसे लेकर लोक मंगल के लिये आत्म बलिदान करने के लिये मातृ मन्दिर में जा पहुँचने का अधिकार हर किसी को है- सो मैं ही क्यों सकुचाऊं। जितना ईश्वर ने दिया है उसी को लेकर उसके आगे आत्मसमर्पण क्यों न करूं। गिलहरी को एक सूझ आई। वह अपने बालों में धूलि के थोड़े से कण भर ले जाती और समुद्र में छिड़क आती। उसका यह अनवरत श्रम देखकर-देखने वालों ने हैरत में भर कर उससे पूछा- “आखिर यह सब क्यों कर रही हो, इसका क्या परिणाम होने की आशा हैं?”
गिलहरी ने कहा- “राम समुद्र पार जाकर रावण से लड़ने खड़े हैं। नल-नील समुद्र पर पुल बनाने में जुटे हुए हैं, हनुमान समुद्र को छलाँग चुके, फिर क्या इस बाधा के सागर को पाटने में मेरा कोई योगदान न होना चाहिए? छोटी हूँ तो क्या, बालों में थोड़ी बालू भर कर समुद्र में डालती रहूँगी तो आखिर इस बाधाओं के सागर को कुछ पाटा ही जा सकेगा। इस छोटे प्रयत्न से कितने समय में क्या परिणाम होगा, यह सोचना मेरा काम नहीं। सचाई के समर्थक एक ही बात जानते हैं- जो अपने पास है उसे लेकर आगे बढ़ना और निष्ठापूर्वक सतत संघर्ष में अपनी अंतिम बूँद समर्पित कर देना। सो ही तो मैं कर रही हूँ।”
बहस आगे नहीं बढ़ी। पूछने वाले को उसी के एक साथी ने यों कह कर चुप कर दिया कि “उस टिटहरी की कथा याद करो जिसने अपने अण्डे बहा ले जाने के अपराधी समुद्र से लोहा लिया था और चोंच में बालू भर कर उसे पाटने का दुस्साहस किया था। जानते नहीं, ऐसे दुस्साहसी भगवान का सिंहासन हिला देते हैं और उनकी सहायता में उन्हें नंगे पैरों आना पड़ता है। टिटहरी के समर्थन में अगस्त ऋषि आये थे और उनने तीन चुल्लू में सारा जल पी कर अभिमानी समुद्र को इस बात के लिए विवश किया था कि अपने अनीति भरे कदम वापिस ले ले। जीत जब टिटहरी की ही रही तो यह गिलहरी अपने लक्ष्य तक क्यों न पहुँच सकेगी।” पूछने वाला निरुत्तर था, निदान बहस बन्द हो गई और गिलहरी का अभिनन्दन करने राम उसके पास पहुँचे और अपने श्यामल हाथों की उंगलियाँ उसकी पीठ पर फेर कर एक ऐसा स्मृति पदक दिया जो हर छोटे समझे वाले साधन विहीन की हिम्मत अनन्त काल तक बढ़ाता रहेगा। कहते हैं कि तभी राम द्वारा पीठ पर फेरी हुई उंगलियों की रेखायें अभी भी उस गिलहरी के वंशजों की पीठ पर एक शानदार पदक की तरह अंकित हैं।
जो हो राम, रावण युद्ध होकर रहा। एक से बढ़कर एक आतंकवादी असुर उस संग्राम में भूमिशायी हो गये। सोने की लंका जल-वल कर खाक हो गई। रामराज्य की स्थापना हुई और उसका विजयोत्सव विजया दशमी बड़े ठाठ-बाठ से मनाई गई। सभी क्षेत्रों ने आश्चर्य किया- भला इतना साधन सम्पन्न रावण सपरिवार इतनी आसानी से कैसे मारा गया? समाधान कर्ता ने बताया इसमें तनिक भी अचम्भे की बात नहीं। पाप तो अपनी मौत मरता है। उसकी चमक बादल में चमकने और कड़कने वाली बिजली की तरह होती हैं जो कुछ ही समय में अपनी उछल-कूद दिखाती और फिर अपनी इस मूर्खता पर पछताती संकुचाती हुई मुँह छिपा कर बैठ जाती है। आश्चर्य की बात तो यह कही जा सकती है कि साधन हीन राम दल ने इतनी बड़ी विजय का श्रेय प्राप्त कैसे कर लिया? सो हे समीक्षक, पूरी बात समझो, अन्ततः सत्य ही जीतता है। अनीति का अन्त करने के लिये जब महाकाल की थिरकन गतिशील होती है तो असम्भव दीखने वाली बातें सम्भव होने में देर नहीं लगती।
रावण का आतंक आखिर समाप्त हुआ ही, स्वार्थ और अविवेक का वर्तमान आतंक जिसने आज जनमानस को बुरी तरह सम्मोहित कर लिया है और दसों-दिशाओं में हाहाकार भरा नारकीय वातावरण प्रस्तुत कर दिया है आखिर यह भी तो समाप्त होना ही है। सो लगता है वह समय आ पहुँचा। रीछों, वानरों, जटायुओं और गिलहरियों की वर्तमान हलचलें और नाटकीय ढंग में बदलती हुई विश्व रंगमंच की परिस्थितियाँ यही बताती हैं कि महाकाल का नवनिर्माण प्रत्यावर्तन, प्रचण्ड प्रकाश की तरह अगणित अन्तःकरणों में प्रवेश करके कुछ कर गुजरने की प्रेरणा भर रहा है- इसे आतंक युग की समाप्ति का स्पष्ट प्रमाण नहीं तो और क्या कहा जाय? इसे नवयुग के-रामराज्य के आगमन का शुभ संकेत नहीं तो और क्या माना जाय?
अति प्राचीन काल में सहस्रबाहु नामक एक मदान्ध राजा हुआ है। कहते हैं उसकी हजार भुजायें थीं इसी से उसका नाम सहस्रबाहु पड़ा। हो सकता है भुजायें उसकी दो ही हों। पर पाँच सौ सहयोगी राजा उसके ऐसे रहे हों जो हर बात में उसका समर्थन करते हों, उनका बल पराक्रम अपने अधिनायक के साथ पूरी तरह जुड़ा हुआ हो और वह उनकी शक्ति को अपनी शक्ति-उनकी भुजाओं को अपनी भुजा-मानता हो। आलंकारिक भाषा की यह उपमा इसी प्रकार ठीक प्रतीत होती है। सहस्रबाहु चक्रवर्ती राजा था। उसके सहयोगी एवं आधीन राजाओं का विशाल भूखण्ड का शासन था।
सहस्रबाहु की निरंकुशता और स्वेच्छाचारिता का महर्षि जमदग्नि विरोध करते थे, वे उसे अनीति न करने के लिये और प्रजाजनों को अनीति न सहने के लिये समझाते थे। इस पर राजा बहुत क्रुद्ध हुआ, उसने महर्षि जमदग्नि का अपमान किया। अपमान ही नहीं किया वरन् उन्हें इतनी शारीरिक पीड़ा भी दी, जिससे उनका देहावसान हो गया। जमदग्नि के पुत्र परशुराम जी को यह समाचार मिला तो वे बड़े दुःखी हुए। क्रोध उन्हें बहुत आया। जिस देश के राजा इतने उद्धत हो जायं कि साधु, ब्राह्मणों का-लोक सेवी बुद्धिजीवियों का सहयोग तो दूर सम्मान भी न कर सकें तो उनसे प्रजा का हित सम्पादन कैसे होगा? इतना ही नहीं जिस निरंकुश शासन में ऋषियों का निर्मम उत्पीड़न हो, उसका तो ईश्वर ही रक्षक है। राजा की निरंकुशता से भी अधिक परशुराम जी को दुःख इस बात का हुआ कि प्रजाजन इस अन्याय को चुप बैठे देखते सुनते रहे, अनीति के प्रतिरोध का भी साहस उनमें रहा। जहाँ के नागरिक अनीति के विरुद्ध आवाज न उठा सकें, प्रतिशोध न सही, प्रतिरोध की भी भावना जिनमें न रहे, उन्हें मृतप्रायः ही कहना चाहिये।
पिता की मृत्यु का युवक परशुराम को दुःख अवश्य था, पर इससे भी अधिक दुःख उन्हें इसका था कि शासन इतना उद्धत हो उठा कि औचित्य का प्रतिपादन करने वाले बुद्धिजीवी तत्व को सहन कर सकना उसके लिये सम्भव न हो सका। इसके अतिरिक्त उनके लिये यह भी कम कष्ट की बात न थी कि प्रजाजनों की प्रतिरोध शक्ति कुण्ठित हो गई। अनीति को सहन करना, उसके प्रतिरोध के लिये कुछ न करना कायरता और भीरुता का चिन्ह है, जिस समाज में ऐसे लोगों का बाहुल्य हो जाय उसका भविष्य स्पष्टतः अन्धकार पूर्ण है। अपने पिता के अपमान और अवसान को वे व्यक्तिगत हानि मान कर चुप होने के लिये मन को समझाते तो भी उनकी आत्मा शासन की दुष्टता और प्रजाजनों की भीरुता को सहने के लिये तैयार न हुई। उनके अन्दर एक आग जलने लगी, जो कहती थी संसार को प्रगतिशील और शान्ति युक्त रहना हो तो अनीति का उन्मूलन होना ही चाहिए। अपनी शक्ति नगण्य हो तो भी जितना सम्भव हो उतना तो करना ही चाहिये।
असहनीय अवाँछनीय दुष्काल को उलट-पुलट डालने वाले महाकाल के पास परशुराम जी गये और अनीति उन्मूलन की शक्ति उपलब्ध करने के लिये भगवान शंकर की कठोर तपश्चर्या पूर्वक आराधना करने लगे। अस्थिर मति, भावावेश ग्रस्त, उतावले, अधीर और तनिक सी कठिनाई आने पर लक्ष्य छोड़ बैठने वाले ओछे मनुष्यों की देवता कोई सहायता नहीं करते। वे जानते हैं कि साहसी दृढ़ प्रतिज्ञ, उदार और आत्म विश्वासी लोग ही कोई बड़ा काम कर सकते हैं। जिनमें यह गुण न हो उन्हें वरदान आशीर्वाद या सहायता देना व्यर्थ है। वे बड़ी बातें सोच तो सकते हैं पर बड़े काम कर नहीं सकते, ऐसे लोगों को कोई वरदान देना अपने आशीर्वाद को भी उपहासास्पद बनाना है। इसलिये शंकर जी उनकी तपश्चर्या और दृढ़ता को बहुत दिन तक परखते रहे। जब उन्हें विश्वास हो गया कि आदमी जीवट का है तो परशुराम जी को बुलाया अपना स्वरूप दिखाया और कहा-” हे लोक मंगल की आकाँक्षा करने वाले, दृढ़व्रती उठ, मेरा सहयोग तेरे साथ है। निस्वार्थ भाव से परमार्थ प्रयोजन में सज्जन हर निष्ठावान की मनोकामना पूरी करता आया हूँ, तेरी भी पूरी करूंगा।”
परशुराम ने महाकाल के चरणों में मस्तक झुका दिया और विनयपूर्वक कहा- “प्रभो, यदि मैं व्यक्तिगत स्वार्थ के लिये रत्ती जितनी याचना भी आपसे करूं तो मुझे घृणित कुत्ते की तरह आप दुत्कार दें, पर मैं तो लोक मंगल के लिये आपसे कुछ माँगने आया हूँ। सो आप प्रसन्न हैं तो मुझे वह दें जिससे उन मस्तिष्कों का उच्छेदन कर सकूँ जो पाप और अन्याय से- अविवेक और अज्ञान से ग्रसित होकर अपना और संसार का विनाश कर रहे हैं।
महाकाल ने प्रसन्नता व्यक्त की और एक प्रचंड परशु उस युवक के हाथ में थमा दिया। वह अजेय था, अमोध भी। इसे पाकर परशुराम बड़े प्रसन्न हुये। अब उन्होंने उन दुर्दान्त दैत्यों को चुनौती देना आरम्भ किया जिन्होंने कि उस समय के समाज की सज्जनता, प्रखरता और सुख शान्ति को कुचल कर रख दिया था। जगह-जगह संघर्ष आरम्भ हुए। संघर्ष छोटे भी थे और बड़े भी। एक और सशस्त्र साधन सम्पन्न सेनायें थीं, दूसरी और परशुराम का परशु। संघर्ष हर स्तर पर हुए पर पुराणकारों के अनुसार विजयी अंततः परशुराम का परशु ही हुआ। अनाचारियों के इतने सिर कट-कट कर जमीन पर गिरे कि एक बात समस्त संसार में से अनाचारियों का पूरी तरह सफाया ही हो गया। कहते हैं कि छिपे दुष्टों को की खोज चलती रही और वे छद्म वेश में जहाँ भी पाये गये उनके सिर काटे गये। कथा है कि इक्कीस बार ऐसे प्रयत्न हुए और उस समय की दुर्बुद्धि का पूर्णतया सफाया हो गया।
कथा में से तथ्य निकाला जाय तो स्पष्टतः यही है कि व्यापक अनाचार का निवास है मानवीय मस्तिष्क। रावण के दस सिरों में एक गधे का भी था। गधा अर्थात् मूर्ख। वह समझदार तो था पर मूर्खता भी कम न थी। इसी तथ्य को आलंकारिक रूप में कहने के उद्देश्य से उसका एक सिर गधे जैसा दिखा कर प्रतिपादित किया गया है। सभी अनाचारियों के सिर परशुराम जी ने काट डाले, इसका अलंकार यह है कि उनके सिरों का- दिमागों का- आमूल-चूल परिवर्तन कर दिया। यह अभियान 21 बार चलाया गया, ताकि विषबेलि का कोई अंकुर कहीं छिपा न रह जाय। भावनात्मक एवं बौद्धिक दुर्बुद्धि मनुष्य में गुप्त रूप से छिपी रहती है तो उसके बरसाती घास की तरह फिर उग आने और फैलने-फूलने लगने की आशंका बनी रहती है। इसलिये उसे 21 बार उन्मूलन करना ही उचित है। परशुराम जी ने वही किया भी।
परशु का अर्थ है प्रबल प्रचार। समर्थ ज्ञान यज्ञ। प्रभावी लोक शिक्षण। जन मानस परिवर्तन के लिये सुनियोजित अभियान आवश्यक था। परशुराम जी ने इसी शस्त्र का उपयोग किया और महाकाल भगवान सदाशिव ने उन्हें दिया भी वही था, यह शस्त्र धातुओं का बना भले ही न हो पर उसकी सामर्थ्य वज्र से बढ़ कर है। इन्द्र का लौह वज्र राज दंड- जब कुण्ठित हो गया था तब तपस्वी दधीच की अस्थियों का मानवीय ‘अणुबम’ प्रयोग किया गया था। वृत्रासुर जैसा अपराजेय असुर उसी से मरा था। पिछले दिनों इस शस्त्र का कितने ही लोग बड़ा सफल प्रयोग करते रहे हैं। ईसाइयों के मजहब को जन्मे दो हजार वर्ष भी नहीं हुए कि उन्होंने अपने प्रभावी प्रचार के बल बूते संसार की एक तिहाई जनता को- एक अरब मनुष्यों को अपने धर्म में दीक्षित कर लिया। साम्यवाद का जन्म हुए एक शताब्दी भी पूरी नहीं हुई कि उसने डेढ़ अरब लोगों के मस्तिष्कों पर कब्जा कर लिया। इसी का नाम सच्चे अर्थों में सिर काटना है।
तलवार से या फरसे से किसी का सिर काटने मात्र से कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होता। इससे घृणा, द्वेष, रोष, असंतोष और प्रतिशोध पनपता है। क्रिया की प्रतिक्रिया, प्रतिक्रिया का कुचक्र, शान्ति का नहीं अशान्ति का सृजन करता है। सिर काटने का सही तरीका किसी के विचार बदल देना ही है। वाल्मीकि, अंगुलीमाल, अजामिल, विल्वमंगल जैसे दुराचारी सन्त बन जायं, तो इस मस्तिष्क परिवर्तन को सिर काटना ही कहा जायगा। सिरफिरों के सिर सही करने के लिये कभी-कभी तलवार और फरसों की भी जरूरत पड़ सकती है, पर बेहतर तरीका विचारों के बदल देने का ही है। परशुराम जी ने यही अभियान चलाया था, महाकाल ने उन्हें सफलता का आशीर्वाद वरदान दिया और सहयोग का प्रतीक प्रचंड परशु भी। उनकी रचनात्मक और संघर्षात्मक शक्तियाँ निर्धारित दिशा में लगी तो लोक मानस पर उसका प्रभाव पड़ा ही। तेजस्वी और निखरे हुए व्यक्तित्व, निस्वार्थ भाव से जिस लोक कल्याण कार्य को हाथ में लेते हैं तो उसमें ईश्वर की सहायता भी मिलती है और सफलता का पथ प्रशस्त होने में देर नहीं लगती।
वर्णन है कि दैत्य सहस्रबाहु की हजार भुजाओं में से परशुराम जी ने अपने पैने कुल्हाड़े के प्रहारों से 998 भुजायें काट डाली। बेचारे की केवल दो बांहें ही शेष रह गई। अनीति के समर्थक तभी तक साथी बने रहते हैं जब इस साझेदारी में निर्बाध रीति से लाभ ही लाभ दिखता है। जब उन्हें लगता है कि प्रतिरोध प्रचण्ड हो रहा और अपने को लांछित एवं लज्जित होने के साथ-साथ परास्त भी होना पड़ेगा तो उन्हें अनीति का साथ छोड़ते देर नहीं लगती। सहस्रबाहु अन्ततः अकेला दो भुजा वाला ही बचा।
आज भी इतिहास उस प्राचीन कथा गाथा की पुनरावृत्ति कर रहा है। पाप के सहस्रबाहु के अनेक साथी सहचर मिल रहे हैं और अपना योगदान देकर उसे समर्थ बना रहे हैं। अन्याय को, अविवेक को जब सफलता मिलती है तो वह मदान्ध हो जाता है। प्रबुद्धता उसे रोकती टोकती है तो उसे तिरस्कृत ही नहीं करता प्राणघातक चोट भी पहुँचाता है। सहस्रबाहु ने जमदग्नि के साथ जो दुर्व्यवहार किया उसकी तुलनात्मक घटनायें पग-पग पर, पल-पल पर देखी जा सकती हैं। सहस्रबाहु को अजेय होने का अभिमान था, आज की भौतिक सभ्यता भी कुछ ऐसी ही अहंकार साधे बैठी है।
पाप का प्रतिरोध मानवता की पुकार है, वह पुकार किसी न किसी परशुराम के सिर पर चढ़ कर बोलती और अपना काम करती है। भगवान का आशीर्वाद सहयोग और साधन-परशु-उसे मिलता है। फलतः ऐसे तेजस्वी ईश्वरीय प्रतिनिधि वह काम कर सकने में समर्थ होते हैं जो दिखने में कठिन ही नहीं असम्भव जैसा प्रतीत होता है। समस्त पृथ्वी पर बिखरे हुए अनाचारियों के सिर काट डालना, सो भी एक बार नहीं 21 बार यह एक अत्युक्ति लगती है। पर यदि अज्ञान के विरुद्ध समर्थ संगठित सुनियोजित एक ऐसा सद्ज्ञान अभियान आरम्भ किया जाय जो जन मानस को समुद्र मंथन की तरह मथ डाले तो उससे सूर्य जैसा तेज, चन्द्रमा जैसी शान्ति, लक्ष्मी जैसी समृद्धि, ऐरावत हाथी जैसी स्थिरता, धन्वन्तरी जैसा आरोग्य, कल्पवृक्ष जैसी विपुलता, कामधेनु जैसी तृप्ति और अमृत जैसी पूर्णता उपलब्ध हो सकती है। लगता है इन दिनों यही सब कुछ हो रहा है। युग निर्माण के लिये प्रतिष्ठापित किया हुआ ज्ञान यज्ञ लगता है अज्ञान और अनाचार से संबद्ध इस विश्व वसुन्धरा पर अमृतमयी शाँति की घटायें बरसाने में सफल होगा और कोई परशुराम अपने महाकाल प्रदत्त परशु के द्वारा अनाचार से उद्विग्न कोटि-कोटि सिरों को काट कर उनके स्थान पर गणेश जैसे पूज्य सिरों को प्रतिष्ठापित करेगा।
इतिहास! तेरी पुनरावृत्ति सफलता पूर्वक सम्पन्न हो।
देवताओं की संख्या बहुत बड़ी है, उनमें महादेव केवल-शिव शंकर को कहते हैं। महा का अर्थ है बड़ा। अन्य देवता उतने बड़े नहीं जितने महादेव। इसलिये शिव के अतिरिक्त और किसी को भी महादेव नहीं कहा जाता। बड़प्पन, किसी के समर्थ, वैभवशाली एवं विभूतिवान होने से नहीं मिलता वरन् लोक मंगल से, त्याग बलिदान एवं परदुःख निवारण के लिये करुणा की मात्रा पर निर्भर रहता है। इस कसौटी पर अन्य सभी देवताओं की तुलना में महाकाल शिव ही सर्वोत्कृष्ट सिद्ध हुये।
समुद्र मंथन से जो गरल निकला, उससे समस्त विश्व के जल जाने की सम्भावना थी। इस विभीषिका को संसार पर आने वाली भयानक विपत्ति को भगवान शिव ने समझा और निश्चय किया कि इस भारी विपत्ति को वे अपने ऊपर लेंगे और विश्व मंगल के लिये बलिदान को जो बड़ी से बड़ी सीमा हो सकती हैं उस तक पहुँचेंगे। महा गरल जिसकी एक बूँद मात्र से समस्त विश्व विष विमूर्छित हो सकता था। शिव ने शिरोधार्य किया और वे उसे पी गये। प्रतिक्रिया क्या हुई उसे दूसरे लोग नहीं जानते पर नीलकंठ का गला अनन्त काल से लेकर अब तक रुंधा हुआ है। विष अभी तक उनके कंठ में बैठा है। ‘पीर पराई’ न जानने वाली दुनिया जय-जय कार करके अपने घर चली गई पर इस विष पान की प्रतिक्रिया क्या हुई इसे वही जानते हैं जिस पर बीती। इस त्याग ने उन्हें महादेव बना दिया।
दूसरे देवता जहाँ अपने लिये पर्याप्त मात्रा में सुविधा साधन एकत्रित करके मोद-प्रमोद भरा जीवन यापन करते हैं वहाँ शिव का तौर-तरीका बिल्कुल अलग है। उन्होंने निहंग निर्वस्त्र रहना स्वीकार किया, उतना अपरिग्रह जितना सम्भव था शिवजी ने अपनाया। लोक मंगल के लिये हर घड़ी मरण का वरण करने के लिये तैयार रहने की निष्ठा का प्रतीक उनका श्मशान में निवास करना है। सर्प रूपी विकारों और प्रलोभनों से वे डरते नहीं, भागते नहीं और अपने से लिपटाये रहने पर भी वह सामंजस्य संतुलन बनाये रहते हैं। पर सर्प दंश की-अवांछनीय दुर्दशा में उन्हें कभी भी नहीं पड़ना पड़ता। भूत प्रेतों पतितों, पीड़ितों, उपेक्षितों और उपहासास्पदों को जहाँ दूसरे सब दुरदुराते हैं वहाँ शिव सेना में वे ही भरे पड़े हैं। ऐसे पतित पावन को नहीं तो फिर और किसे महादेव कहा जायगा? जिसका ललाट उज्ज्वल चरित्र के कारण चन्द्रमा की तरह चमकता हो वह देवताओं का भी देवता-महादेव-नहीं तो और क्या है?
महान प्रयोजनों की पूर्ति महादेव से ही सम्भव है। महादेव को प्रसन्न करने में, उनका अनुग्रह प्राप्त करने में क्षुद्र, निकम्मे एवं पतित स्तर के नरपशु नहीं वरन् महामानव ही समर्थ होते हैं संसार पर जब-जब विपत्तियाँ आई हैं तब-तब महादेव की महाकाल की सहायता अपेक्षित हुई है और उसे उपलब्ध करने में महामानव ही समर्थ हुए हैं। विभिन्न परिस्थितियों में इन महामानवों की अनिवार्य आवश्यकता होती है जो अपनी महत्ता से महादेव को प्रभावित कर उनका अनुग्रह प्राप्त कर सकने में सफल हो सकें। विपन्नताग्रस्त युग जब तक ऐसे महामानव पैदा नहीं करता तब तक उसका परिणाम भी सम्भव नहीं होता।
प्राचीन काल में राजा सगर के 60 हजार पुत्र अपने दुष्कर्मों के फलस्वरूप कपिल मुनि के शाप से शापित होकर जल मरे और उनकी चितायें अनन्त काल तक जलने के लिये, उन उद्धतों की आत्माओं को जलाने के लिये निरन्तर प्रज्ज्वलित रहने लगीं। इस प्रकार चिरकाल व्यतीत हो गया। कई पीढ़ियाँ बीत गई तब सगर वंश में एक महामानव जन्मा भागीरथ। बालक भागीरथ थोड़ा समर्थ हुआ तो उसने अपने पितरों को इस प्रकार नरक की अग्नि में जलते देखा। वे उससे बहुत दुखी हुये और उनके परित्राण का उपाय सोचने लगे। व्यापक संकट निवारण का एक ही उपाय उन्हें बताया गया तप। तब से ही महादेव प्रसन्न होते हैं और इस दैवी सहयोग से बड़े-बड़े कठिन कार्य संभव हो जाते हैं। गंगा अवतरण जैसा कठिन कार्य तप से ही सम्भव हो सकता था। स्वर्ग से उतर गंगा की धारा जब पृथ्वी पर आती तभी सगर-सुतों का उद्धार होना था।
भागीरथ ने तपस्वी जीवन स्वीकार किया, वे स्वार्थ सिद्धि के लिये नहीं, परमार्थ प्रयोजन के लिये प्रचण्ड तप करने लगे। वास्तविक तप की परख धैर्य, निष्ठा, दृढ़ता एवं अडिग संकल्प की कसौटी पर की जाती है। आवेश ग्रस्त उतावले लोग तुर्त-फुर्त बहुत कुछ पा लेने के लिये व्याकुल रहते हैं। अभीष्ट मनोरथ की प्राप्ति में तनिक भी विलम्ब या अवरोध उन्हें सहन नहीं होता। ऐसे छिछोरे दैवी अनुग्रह के अधिकारी नहीं हो सकते, इस बात को भागीरथ जानते थे। इसलिये उन्होंने अगणित विघ्न-बाधाओं, अवरोधों और कठिनाइयों का सामना करते हुये चिरकाल तक अपनी सतत साधना जारी रखने का निश्चय किया। अतः कालान्तर में इनका पुरुषार्थ सफल हुआ। स्वर्ग में रहने वाली गंगा पृथ्वी पर आने को सहमत हो गई। भागीरथ ने तप द्वारा यह कठिन कार्य सम्भव बना दिया कि अज्ञान ग्रस्त संसार में स्वर्गीय ज्ञान-गंगा का अवतरण हो। अविवेक से समुत्पन्न, अनाचार की दावानल में जलते हुए अगणित मानव पुत्रों का उद्धार आखिर और कर भी कौन सकता है।
अज्ञान ग्रस्त लोगों के मस्तिष्क में ज्ञान की गरिमा प्रविष्ट करने का कार्य, सद्विचारों को फैलाने का आयोजन बड़ा दुरूह है। इसमें भयानक प्रतिक्रिया होती रही है। इसी प्रतिक्रिया की लपेट में सुकरात, ईसा, मंसूर, दयानन्द, गाँधी आदि न जाने कितनों को अपने प्राण खोने पड़े और न जाने कितनों को अपार यातनायें सहनी पड़ी। स्वर्ग से-ऊंचे से नीचे-गिरते समय धारा जमीन में गड्ढा कर देती है और वह गड्ढा अपनी भयानकता से कुछ दुर्घटना घटित न कर दे इसलिये उसके लिये महाकाल शिव की कृपा, अनुग्रह अपेक्षित हुआ। तपस्वी भागीरथ ने वह भी प्राप्त कर लिया। गंगा शिव की जटाओं में उतरीं और फिर वहाँ से पृथ्वी पर बह निकली। जलते हुए सगर सुतों का श्मशान, अशान्त संसार शान्त हो गया। ज्ञान की गंगा जहाँ बहेगी शान्ति क्यों न होगी। भागीरथ की तपस्या का सत्परिणाम समस्त संसार को मिला, सभी ने उन्हें सराहा।
ऐसी ही एक घटना अतीत काल में और भी हुई थी। बारह वर्ष तक लगातार दुर्भिक्ष पड़ा। इन्द्र देव ने कुपित होकर दुष्ट दुरात्मा प्रजा जनों के दुष्कर्मों का दंड देने के लिये उन्हें वर्षा का अनुदान देना बन्द कर दिया। पानी न बरसने से घास-पात, पेड़-पौधे, जलाशय सब सूख गये। अन्न उपजना बन्द हो गया। तृषित और क्षुधित प्राणी त्राहि-त्राहि करके प्राण त्यागने लगे। सर्वत्र हाहाकार मच गया। स्थिति असह्य हो गई तो मनीषियों ने विचार किया कि आकाश से जल धारा का अवतरण कैसे हो? निष्कर्ष यही निकला कि देवता तप और त्याग से ही प्रसन्न होते हैं। उनके कुपित होने का एकमात्र कारण प्रजाजनों का अनाचार है। यदि त्याग तप की अवरुद्ध परम्परा पुनः प्रचलित हो उठे तो देवताओं का मन पिघलते देर न लगे और अभीष्ट वर्षा का अभाव सहज ही दूर हो जाय।
धरती वालों ने उत्कृष्टता और आदर्शवादिता की परम्पराओं को अपनाना-कुमार्ग छोड़ कर सत्मार्ग पर चलना-पुनः आरम्भ कर दिया है, देवताओं को इस बात का विश्वास दिलाने और प्रमाण देने की आवश्यकता पड़ी। इसके लिए नरमेध रचाया जाना था। बहुत दिन से बलि प्रथा बन्द हो गई थी, उसका नये सिरे से शुभारम्भ करना था। लोग हिचकिचा रहे थे, यज्ञीय बलि के लिये अपने को कौन प्रस्तुत करे? पहला साहस कौन दिखाये? प्रश्न- चुनौती जैसा बनता जा रहा था, चारों ओर सन्नाटा छाया हुआ था। लगता था नरमेध का आयोजन हो न सकेगा, कोई अपनी बलि देगा नहीं, तब फिर बारह वर्ष से चले आ रहे दुर्भिक्ष का अन्त भी न होगा। नरमेध आयोजन की व्यवस्था सुनकर लोगों में जिस आशा का संचार हुआ था वह प्रमुख साधन बलिदान की व्यवस्था न बनने के कारण निराशा में परिणत होने लगी।
सन्नाटे को चीरते हुये एक व्यक्ति आगे बढ़ा- नाम था उनका-’शुनिशेप’। उसने यज्ञ के अध्वर्यु और ऋत्विजों को सम्बोधित करते हुये कहा “यज्ञीय बलिदान के लिये मैं सर्वप्रथम प्रस्तुत हूँ।” आशा की किरणें फूटीं यज्ञ आयोजन प्रारम्भ हुआ, एक के बाद एक लोग बलि के लिये आगे बढ़ने लगे। परम्परा प्रचलित हुई तो आदमियों का ताँता लग गया। मनुष्यों की बदली हुई मनोवृत्ति का परिचय पाकर आशुतोष शिव प्रसन्न हुये और उन्होंने दुर्भिक्ष निवारण के लिये विपुल वर्षा की व्यवस्था कर दी। प्राणियों के दुःख दूर हुये और सर्वत्र सुख शान्ति भरे मोद मंगल मनाये जाने लगे।
परिस्थिति आज भी ठीक उसी तरह की हैं। मनुष्यों ने अपनी नैतिक मर्यादायें छोड़ दी हैं, परमार्थ का उदार मानवीय दृष्टिकोण भुला दिया गया और हर कोई अपने व्यक्तिगत संकीर्ण स्वार्थों की पूर्ति में बेतरह व्यस्त हो गया। इसके फलस्वरूप वैयक्तिक और सामाजिक जीवन में असंख्य विकृतियाँ उलझनें और समस्यायें उत्पन्न होनी ही थीं और उसकी प्रतिक्रिया अगणित शोक संतापों के रूप में ही उपस्थित हो सकती थी। आज साधनों का अभाव भले ही न हो भावनात्मक दुर्भिक्ष इतना विषम है कि नारकीय दावानल में जलते हुए प्राणी हर दिशा में हाहाकार कर रहे हैं। महाकाल कुपित होकर कठोर प्रताड़ना का सरंजाम जुटाने में व्यस्त हैं।
स्थिति को बदला कैसे जाय? इसका एक ही उपाय है लोग अपनी रीति-नीति बदलें- भावनात्मक परिवर्तन करें और तौर तरीके उलटें-स्वार्थ निमग्नता को परमार्थ प्रयोजनों की अभिरुचि में परिवर्तित करें। देवता ऐसी ही मनोभूमि के लोगों को प्यार प्रदान करते हैं, उन्हीं पर उनका अनुग्रह बरसता है। इस उदात्त दृष्टि एवं जीवन पद्धति का नाम ही यज्ञ है। यज्ञ का मेरुदंड है- बलिदान। निरीह पशुओं का खून बहा डालना तो एक पैशाचिक कृत्य है। बलिदान का मर्म है परमार्थ के लिये अधिकाधिक आत्मसंयम और तप, त्याग का उदार परिचय-अपने लिये कम से कम रख कर अपनी क्षमता, योग्यता और समृद्धि का परमार्थ के लिये उत्सर्ग। यही मानवोचित पुण्य परम्परा है। जब तक ऐसे यज्ञानुष्ठान घर-घर में होते रहते हैं तब तक देवता प्रसन्न होकर विपुल सुख शान्ति की वर्षा करते रहते हैं। पर जैसे ही लोगों ने यज्ञ से मुख मोड़ा कि दैवी अनुग्रह की वर्षा बन्द हो जाती है। यज्ञ अग्निहोत्र को भी कहते हैं। अग्निहोत्र यज्ञीय परम्परा का एक प्रतीकात्मक पुण्य प्रदर्शन है। वास्तविक यज्ञ है- परमार्थ परायण जीवन जीने का निश्चय। देवता यही चाहते हैं और यही करने वालों को विभूतियाँ प्रदान करते हैं। स्वार्थरत-यज्ञ विरोधी-लोग दैवी कोप के भोजन बनते हैं और उन्हें वस्तुओं का न सही-सुख शान्ति भरी परिस्थितियों का असह्य दुर्भिक्ष अवश्य त्रास देता है। अस्तु परिस्थिति बदलने की योजना बनाने वालों को बलिदानों की व्यवस्था करनी होती है-नरमेध रचाने होते हैं। ऐसे आयोजन खड़े करने होते हैं जिनसे अधिकाधिक तप त्याग करने की परम्परा प्रचलित हो सके। गाँधी जी अभी कुछ ही दिन पूर्व ऐसे नरमेध के ब्रह्मा रह चुके हैं जिसमें हजारों लाखों बलिदानियों ने बढ़-चढ़ कर जौहर दिखाये थे। उस नरमेध से सन्तुष्ट हुए देवताओं ने भारत को हजार वर्ष की गुलामी से मुक्त किया और स्वाभिमानी, पुरुषार्थी लोगों की पंक्ति में बैठ सकने का अवसर प्रदान किया। यह एक कदम पूरा हुआ- यज्ञ का एक खंड चरण भी सम्पन्न हुआ। अभी दो चरण और शेष हैं। विश्व के भावनात्मक नव निर्माण की आवश्यक पृष्ठभूमि की रचना और उसकी संघर्षात्मक स्थिति आने पर अधिक से अधिक बलिदान करने की तैयारी।
इन पुण्य प्रयोजनों के लिये बातूनों और ढोंगियों की नहीं बलिदानियों की आवश्यकता अनुभव की जा रही है। अभियान तैयार है पर बलिदान का अवसर आते ही चतुर लोग बगलें झाँकते और बहाने बनाते दिख पड़ते हैं। किसी को फुरसत की कमी है, किसी की आर्थिक स्थिति खराब है तो कोई तथाकथित झंझटों में फंसा हैं- बेचारा क्या करे? धूर्त बहाने बाज इस प्रकार अपनी आत्मा को धोखा देकर किसी प्रकार मन बहला सकते हैं पर देवता तो असलियत जानते हैं। उन्हें तो इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण चाहिये कि धरती वालों ने बलिदानी परम्परायें अपनाई या नहीं इस प्रमाण के लिये आगे बढ़ने और साहस दिखाने से ही तो नरमेध पूरा हो सकता है उसी से तो देवताओं का कोप अनुग्रह में बदल सकता है।
आज फिर शुनिशेप आगे कदम बढ़ा सकें, बलिदानों की परम्परा पुनः प्रचलित हो सके तो वर्तमान विश्व संकट का समाधान हो सकता है। सगर के 60 हजार जलते हुए बेटे-भारत के 50 करोड़ नागरिक-विश्व की तीन अरब प्रजा श्मशान में जलती हुई चिताओं जैसी जिन्दगी जी रहे हैं। इन्हें शान्ति प्रदान करने के लिये ज्ञान गंगा का अवतरण आवश्यक है। गंगावतरण की सम्भावना विद्यमान है- पर भागीरथ नहीं। दुर्भिक्ष का अन्त कर विपुल वर्षा का सरंजाम नरमेध रचा पड़ा है- पर शुनिशेप अभी भी चुप्पी साधे बैठे हैं। न जाने कब तक गंगा को भागीरथों की प्रतिक्षा करनी पड़ेगी, न जाने कब तक नरमेध का यज्ञकुण्ड बलिदानी शुनिशेपों की बाट जोहता रहेगा?
हम इस अभाव की पूर्ति कर सकें तो युग की एक महती आवश्यकता पूरी हो जाय। इतिहास को अपनी पुनरावृत्ति का अवसर मिल जाय।
आँधी, तूफान आने के समय जो पेड़ अकड़े खड़े रहते हैं वे अक्सर उखड़ जाते हैं किन्तु जो नम जाते हैं- झुक जाते हैं- वे आसानी से बच जाते हैं। बेंत जैसे पौधे और गिलोय जैसी बेलें किसी भी आँधी तूफान में अपना अस्तित्व इसलिये बचाये रखने में समर्थ होते हैं कि वे समय की गति को समझ कर अपनी रीति-नीति बदल देते हैं। आँधी का प्रवाह जिधर झुकने के लिये उन्हें विवश करता है उधर झुक जाते हैं।
बेशक आदर्शों को छोड़ने के सम्बन्ध में कोई समझौता नहीं हो सकता। पाप के साथ पटरी नहीं बिठाई जा सकती। पर इतना तो हो ही सकता है कि जहाँ अपनी भूल हो वहाँ दुराग्रह छोड़ दिया जाय। इतनी समझदारी तो बरतनी ही चाहिये कि जब तक अनीति का दंड सिर पर आ गरजे तब तक पैर रोक कर चलने और हाथ रोक कर करने की बात स्वीकारी जाय। चोर भी जब पकड़ा जाता है और अदालत के सामने लाया जाता है तो सज्जनता और दीनता का इजहार करता है ताकि कठोर दंड से थोड़ा बहुत बचाव सम्भव हो सके। महाकाल का कठोर दंड जब कि सिर पर आ पहुँचा है, हमें चाहिये कि अपनी गतिविधियाँ बदल दें। उस दिशा में झुक जायें जिधर अगले ही दिनों झुकने के लिये सर्व-साधारण को विवश होना पड़ेगा। समय से पूर्व सम्भल जाना बुद्धिमानी है। जो सूर्योदय से पूर्व उठ बैठते हैं वे नफे में रहते हैं।
अब तक जो हो चुका सो हो चुका पर अब अविलम्ब हमें सुधारना और बदलना चाहिये, यह निष्कर्ष इस उद्बोधन का है जो भविष्य की सम्भावनाओं की चर्चाओं के साथ प्रस्तुत किया गया है। महाकाल समय पलट देने के लिए समुद्यत हैं। यह गंदा और फूहड़ जमाना निकम्मा और नाकारा सिद्ध हो चुका है आज की रीति-नीति असफल सिद्ध हो चुकी है। जिस दिशा में हम चल रहे हैं वह दिन-दिन अधिकाधिक संकट उत्पन्न करती चली आई है और अब सर्वनाश की सम्भावना सामने आ खड़ी हुई है। ऐसी दशा में वापिस लौटने और दिशा बदलने के अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं। दुराग्रहपूर्वक यही रीति-नीति जारी रखी गई तो मानवीय अस्तित्व को सुरक्षित रख सकना भी सम्भव न रह जायगा।
गर्मी आने पर भी जो जाड़े के गरम कपड़े धारण किये रहने का आग्रह करता है उसे नासमझी ही कहा जायगा। जब तक पोल चल सकती थी चल गई पर अब जब कि मनुष्य जाति के भावनात्मक पुनर्निर्माण का सारा सरंजाम तैयार खड़ा है तब पुराने ढर्रे पर अड़े रहने से कोई लाभ नहीं। नये युग में संकीर्ण स्वार्थपरता का लक्ष्य लेकर जीना और तृष्णा, वासना के गोरख धंधों में उलझे रहना शायद ही किसी अत्यन्त घृणित व्यक्ति के लिये संभव हो। आज तो यही लोक रीति है और सब इसी चाल-ढाल में मदमस्त हैं, पर कल तो यह सब आमूलचूल बदलने वाला है। दौलत समेटने, अहंकार को पोसने और विलासिता के ठाठ-बाठ जमाने की आज की लोक नीति अगले कल एक अजायब घर की चीज बनने जा रही है। तब कोई इस ढर्रे पर न जियेगा। हर व्यक्ति अपने अन्तरंग जीवन में उत्कृष्टता और बाह्य जीवन में आदर्शवादिता को प्रश्रय देगा। इस प्रतिस्पर्धा में जो जितना आगे बढ़ जायेगा। संकीर्ण स्वार्थों की गंदगी में लिपटे हुए लोग तो अस्पर्शों जैसे घृणित बने खड़े होंगे। तब राई, रत्ती दान पुण्य या कुछ कर्मकाण्ड पूरे करके कोई स्वर्ग मुक्ति के सपने न देखेगा वरन् जीवन को सांगोपांग रूप से उत्कृष्ट बनाने की जीवन साधना द्वारा ही आत्म कल्याण की मंजिल पार किया करेंगे।
उस नवयुग के आगमन की संभावना स्पष्ट है। आगामी विश्व व्यापी उथल-पुथल- समग्र क्राँति- उसी की पूर्व सूचना प्रसव पीड़ा है। अच्छा हो ईश्वर की इच्छा में अपनी इच्छा मिलाकर कर हम चलें। आँधी तूफान से टकराने की अपेक्षा समय रहते अपने को झुका लें। जो अवश्यम्भावी है, जो उचित है उसके अनुकूल चलना ही ठीक है। ‘अखण्ड ज्योति’ परिवार में यही रीति-नीति अपनाने का अभ्यास डालने के लिये शत सूत्री युग निर्माण योजना का आविर्भाव हुआ है। उस आचार संहिता को अपना कर अपने भावना स्तर और क्रिया कलाप को उस प्रकार का छोर दिया जा सकता है जो नव युग में हर किसी को शिरोधार्य-स्वीकार करना पड़ेगा। परमार्थ में रुचि बढ़े, लोक मंगल में कुछ श्रम, समय लगे तो धीरे-धीरे उस प्रकार का अभ्यास हो जायगा, जो नव युग के अनुरूप, अनुकूल है। एक बारगी बदलना कठिन पड़ेगा। इसलिये शुभारम्भ आज से ही करना उपयुक्त है।
स्वयं तो हम बदलें ही, दूसरे उन सब को भी बदलने की प्रेरणा दें, जिनको वस्तुतः प्यार करते हैं और हित चाहते हैं। स्त्री, पुत्र, भाई, भतीजे, कुटुम्बी, सम्बन्धी, मित्र, परिजन सभी को इस प्रकार की प्रेरणा करें कि सभी अपनी रीति-नीति बदलें सुधारें। यह कर्त्तव्य हमें इन दिनों अधिक तत्परतापूर्वक पालन करना चाहिये। क्योंकि महाकाल की भावी दंड व्यवस्था अन्धाधुन्ध नहीं सप्रयोजन हैं। यदि लोग बदल जाते हैं, सुधर जाते हैं तो उस क्रूर कर्म की विशेष आवश्यकता न रह जायगी। हमारा परिवर्तन भावी आपत्तियों को टाल सकने या घटा सकने में समर्थ हो सकता है। विश्व मानव की आज सबसे बड़ी सेवा यही हो सकती है कि हम जन साधारण को दुर्बुद्धि त्यागने और सत्मार्ग पर चलने के लिये रजामन्द करने का प्रयत्न करें। युग निर्माण योजना एक ऐसा ही व्यापक कार्यक्रम है। महाकाल की इच्छा भी पूरी हो जाय और हम काल दंड के प्रहारों से बच भी जायं इसका यदि कोई उपाय हो सकता हैं तो वह- युग निर्माण योजना के क्रिया कलापों के माध्यम से जन मानस में अभीष्ट परिवर्तन प्रस्तुत कर देना ही होगा। यही आज का सबसे बड़ा परमार्थ है।
युग परिवर्तन एक बहुत बड़ा प्रयोजन है। उसके लिये तदनुरूप बड़े साधनों एवं उपकरणों की भी आवश्यकता होगी। यह साधन उत्कृष्ट स्तर के व्यक्तियों के रूप में अभीष्ट होंगे। संसार का भावनात्मक परिवर्तन करने के लिये भावनाशील- श्रद्धा और सद्भावना के धनी व्यक्तियों की आवश्यकता पड़ेगी। इन दिनों वही सब जुटाया जा रहा है विभिन्न क्षेत्रों में, विभिन्न क्षमता सम्पन्न ऐसे व्यक्तियों का इन दिनों सृजन हो रहा है जो आगे चल कर युग निर्माताओं की महत्वपूर्ण भूमिका बड़ी खूबी से सम्पादन कर सकें।
यह एक विचित्र और विलक्षण रहस्य है कि जन्मजात रूप से तो महामानव कोई विरले ही- यदाकदा ही उत्पन्न होते हैं। शेष तो बीच में से ही उस महाकाल की दृष्टि में आते हैं और देखते-देखते कुछ से कुछ बन जाते हैं। पूर्ण अवतारों की बात जाने दीजिए, मध्यावतार अकसर जीवन के किसी मध्यकाल उन्हें अपनी भुजाओं में कस लेते हैं और देखते-देखते वे कुछ से कुछ बन जाते हैं।
बुद्ध जन्मजात अवतार नहीं थे। यदि होते तो उन्हें आरम्भ से ही अपन उद्देश्य का ज्ञान होता और विवाह करने, बच्चा उत्पन्न करने और उन्हें बिलखता छोड़ने की भूल न करते। गाँधी जी जन्मजात अवतार नहीं थे। यदि होते तो उनको लगभग तीस वर्ष तक की आयु तक इधर-उधर भटकना न पड़ता। रामायण के पात्रों में हनुमान, अंगद, सुग्रीव, जामवन्त, जटायु आदि की भूमिकायें बड़ी महत्वपूर्ण हैं। पर वे लोग यदि जन्मजात महापुरुष होते तो उनका जीवन क्रम आरम्भ से ही निर्धारित दिशा में चल रहा होता। बाल्मीकि, अंगुलिमाल, अंबपाली, सूरदास, सम्राट अशोक आदि के जीवन आरम्भ में कलुषित ही तो थे। अगणित सन्त, महात्माओं एवं महापुरुषों के जीवन क्रम ऐसे ही हैं जिन्हें ध्यानपूर्वक देखने से स्पष्ट होता है कि वे जन्मजात रूप से कोई महानता लेकर नहीं आये थे। जीवन का बहुत बड़ा भाग उन्होंने निरर्थक अथवा अस्त-व्यस्त गंवाया। समयानुसार उनकी अन्तः चेतना ने पलटा खाया, दिशा बदली और फिर वे कुछ से कुछ हो गये। इससे प्रकट होता है कि महानता का कोई पूर्व संचित कण यदि अन्तःकरण में विद्यमान है तो वह कभी भी प्रतिफलित हो सकता हैं। महाकाल की एक दृष्टि किरण उसका कायाकल्प कर सकती है। गर्मी के दिनों में घास सूख जाती है। पर वर्षा आते ही उसकी सूखी जड़े फिर हरी हो जाती है और घास की बेल देखते ही देखते भूमि को हरितमा से ढक देती है।
अनेक महात्माओं में पूर्व जन्मों की महानता प्रचुर मात्रा में विद्यमान रहती है। आवश्यक नहीं कि वह जन्मते ही प्रकट हो जाय। ऐसे महामानव आरम्भिक जीवन में सामान्य स्तर की नगण्य जैसी महत्व की गतिविधियों में रहते देखे जाते हैं। पर जैसे ही उपयुक्त अवसर आता है साहसपूर्वक अपनी पूर्व भूमिका में परिणत, परिवर्तित हो जाते हैं। इस दुस्साहस में ही इतनी महानता छिपी रहती है।
महाकाल का प्रबुद्ध आत्माओं में अवतरण स्वाति बूँद की तरह होता है, जिससे साधारण दिखने वाली सीपी को अपने गर्भ से महान मोती उगाने का सौभाग्य मिलता है। इस अनुग्रह से सामान्य व्यक्तित्व देखते-देखते महान हो जाता है।
यह एक प्रकट रहस्य है कि समुद्र मंथन करके चौदह रत्न ढूंढ़ निकालने की तरह उन आत्माओं को तलाश कर लिया गया है जो पिछले युगों में महाकाल का पुण्य प्रयोजन पूरा करने में शानदार भूमिका सफलतापूर्वक प्रस्तुत करती रही हैं। जब आवश्यकता पड़ी है महाकाल ने उन्हें सेवा निवृत्त सैनिकों की तरह युद्धकाल की आवश्यकताओं को देखते हुए पुकार बुलाया है और वे खुशी-खुशी अपने चारों ओर बिखरे हुए मकड़ी के जाले जैसे जाल-जंजालों को तोड़-मरोड़ कर उस पुकार को पूरा करने के लिये उपस्थित होते रहे हैं। जिन्होंने अतीत में अपने-अपने समय पर महामानव, युग पुरुष, लोकनायक और वीर बलिदानी बनने का महानतम गौरव प्राप्त किया है, वे उस अनुपम-अलौकिक-आनन्द का रसास्वादन जानते हैं, अतएव जब अवसर आता है तब उस सुअवसर का लाभ उठाने के लिए सबसे आगे आ जाते हैं। महारास में कृष्ण की वंशी सुन कर गोपियाँ अपना लौकिक जाल-जंजाल छोड़ कर उस अमृत का रसास्वादन करने को दौड़ पड़ी थीं। इस रहस्य की अब पुनरावृत्ति होने जा रही है। नव निर्माण का कठिन कार्य एक प्रकार का धर्मयुद्ध है। इसमें प्रवृत्त होने की शंख ध्वनि से जब दिशायें गुँजन करने लगीं तो प्रबुद्ध आत्माओं के लिए भीरुता धारण किए रहना कठिन है। उन्हें अपने जाल जंजाल तोड़ कर उस महान आह्वान की पूँजी में संलग्न होना ही होगा।
इस संध्याकाल में सभी उच्च आत्मायें महाकाल का पुण्य प्रयोजन पूर्ण करने के लिये उसी तरह विद्यमान हैं जिस प्रकार सभी ऋषि, मुनि वनवासी अपने निकटवर्ती जलाशय पर संध्यावन्दन करने के लिए एकत्रित हो जाते हैं या विवाह, शादी जैसे उत्सवों में सभी कुटुम्बी संबंधी जमा होते हैं। युग परिवर्तन ऐसा ही अवसर है, इसमें अनादि काल से लेकर अब तक की प्रायः सभी प्रबुद्ध आत्माएं मनुष्य शरीरों में विद्यमान हैं। विश्वामित्र, अत्रि, कपिल, कण्व, व्यास, वशिष्ठ, भारद्वाज, याज्ञवलक्य, गौतम, नारद, लोमश, महावीर, बुद्ध, शंकराचार्य, कुमारिल आदि ऋषि, विवेकानन्द, रामतीर्थ, रामदास, तुकाराम, एकनाथ, ज्ञानेश्वर, कबीर, नानक, रैदास, रामकृष्ण परमहंस, सूर, तुलसी आदि सन्त, अर्जुन, द्रोण, भीष्म, कर्ण आदि योद्धा, चाणक्य, शुक्राचार्य आदि नीतिज्ञ, हरिश्चन्द्र, शिवि, दधीच, मोरध्वज, कर्ण, भामाशाह जैसे उदार परोपकारी, अनुसूया, मदालसा, कुन्ती, द्रौपदी, सुभद्रा, सत्यवती, मैत्रेयी, गार्गी भारती, दुर्गावती, लक्ष्मीबाई, अम्बपाली, मीरा, शबरी, अहिल्याबाई, सारन्धा आदि जैसी देवियाँ, अभिमन्यु ध्रुव, प्रह्लाद, फतेसिंह, जोरावर जैसे वीर बालक इन दिनों मौजूद हैं। वे साधारण जीवन व्यतीत कर रहे हैं। अभी वे साधारण स्थिति में हैं। पर अगले ही दिनों उनको असाधारण बनते देर न लगेगी। लोग आश्चर्य करेंगे कि कल का साधारण समझा जाने वाला व्यक्ति आज इतना असाधारण-इतना महान कैसे बन गया। यह सब महाकाल का युग निर्माण प्रत्यावर्तन- महारास का दिव्यदर्शन जैसी ही अद्भुत घटना होगी।
नव निर्माण की सीमा केवल भारत ही नहीं सारा विश्व है। किन्तु यह कार्य आरम्भ भारत से हो रहा है। कारण कि इस परिवर्तन का आधार अध्यात्म है। भारत अध्यात्म की मातृभूमि है। इसलिये इस प्रकार का श्रीगणेश यहीं से हो सकता है। यह शुभारम्भ अवश्य गीता गायक भगवान कृष्ण की जन्मभूमि से हो रहा है पर उसका क्षेत्र व्यापक है। यह प्रकाश विश्व के कोने-कोने में पहुँचाना है और सारी दुनिया को ही मानवता के उच्च आदर्शों को अपनाने के लिये प्रशिक्षित करना है। अस्तु इस अभियान को विश्व आन्दोलन ही कहना चाहिये। इस प्रयास में विश्व भर की सभी आत्माओं का योगदान रहता है। अतएव वे भी भारत भूमि में ही इन दिनों अवतरित हो रही हैं। कुछ के जन्म हो चुके, कुछ के होने वाले हैं। विश्व के सभी धर्मों के देवदूतों का आगमन हो रहा है। समय पर जिनने विश्व की राजनैतिक, सामाजिक, नैतिक, बौद्धिक, आर्थिक परिस्थितियों को सुधारने के लिये अपने ढंग से मानव जाति की महत्वपूर्ण सेवा की हैं, ऐसी अनुभवी, प्रशिक्षित और परखी हुई आत्मायें फिर अवतरित हो रही हैं।
जो जन्म ले चुकी वह समय पर अपना आवरण हटा कर प्रकट होंगी। जिनका जन्म नहीं हुआ वे घर ढूंढ़ रही हैं। कई आत्मायें उपयुक्त नर नारियों के रज वीर्य में प्रवेश कर चुकी हैं और अवसर मिलने पर वे जन्म धारण कर लेंगी। इस दृष्टि से कुछ ही समय में भारत महापुरुषों की एक रत्नराशि के रूप में अपना अस्तित्व प्रकट करेगा।
अखण्ड ज्योति परिवार के सदस्यों में ऐसी अनेक उच्चस्तरीय आत्मायें विद्यमान हैं। वे जब कभी अपने बारे में विचार करती हैं तो उन्हें स्पष्ट विदित होता है कि वे साधारण नहीं असाधारण हैं। इन दिनों उनकी आत्मा जोरों से कोंच रही हैं और निर्धारित लक्ष्य के अनुरूप कोई साहसपूर्ण कदम बढ़ाने के लिये जोरदार धक्के देकर विवश कर रही है। अपने परिवार में ऐसी अनेक आत्माओं को नव निर्माण के लिये ऐतिहासिक भूमिका प्रस्तुत करते हुये देखा जाय तो उसे आश्चर्य नहीं स्वाभाविक मानना चाहिये। क्योंकि वे साधारण परिस्थितियों में पड़े हुए तो हैं पर वस्तुतः साधारण नहीं हैं। समय आने पर वे साहसपूर्वक आगे बढ़ेंगे और अवतरण उद्देश्य पूरा करेंगे।
अगले दिनों निश्चित रूप से एक बहुत बड़ी घटना घटित होने वाली है। इतनी बड़ी जिसकी तुलना में इतिहास की पिछली सभी परिवर्तन चर्चाएं फीकी पड़ जायेंगी। प्राचीन काल में विज्ञान का इतना विकास नहीं हुआ था। जनसंख्या की दृष्टि से मनुष्य इतने अधिक नहीं बढ़े फैले थे, और न यातायात की इतनी त्वरा सुविधाएं थीं जितनी आज हैं। आज तो सारा संसार एक नगर की गली मुहल्ले जैसा हो गया है। उन दिनों विद्वान तो थे पर सर्वसाधारण तक विचार शीलता की हवा नहीं पहुँची थी। थोड़े ही लोग शक्ति सम्पन्न होते थे इसलिये उन्हीं की हार-जीत संसार की स्थिति बदल देती थी। पर आज स्थिति एवं शक्ति का स्रोत नागरिकों तक जा पहुँचा है। इसलिये अब हर क्षेत्र का दायरा बहुत बढ़ गया है। इसी दृष्टि से भावी परिवर्तन अब तक के सभी परिवर्तनों की अपेक्षा अधिक बड़ा, अधिक व्यापक और अधिक उथल-पुथल भरा होगा।
क्या राजनैतिक, क्या दार्शनिक, क्या वैज्ञानिक, क्या समाज-शास्त्री, क्या अर्थ विशेषज्ञ, क्या अध्यात्मवादी सभी एक स्वर से यह अनुभव करते हैं कि जिस रास्ते पर आज दुनिया चल पड़ी है वह गलत और अनुचित है। इसकी प्रतिक्रिया हमें हर बीसवें साल एक ऐसा महायुद्ध लड़ने के लिये विवश करती है जिसमें उत्तरोत्तर धन जन की अपार हानि होती है और नई-नई समस्याएं, उलझनें और गुत्थियाँ उठ खड़ी होती हैं। इसके अतिरिक्त मानव जाति की वर्तमान विचारधारा जन साधारण के जीवन को दिन-दिन अधिक बोझिल अधिक अशान्ति और अधिक जटिल, अधिक कष्टकर और अधिक असफल बनाती चली जा रही है। आज भी कम विपन्नता नहीं है, आज भी सर्व साधारण को इन परिस्थितियों के कारण बहुत असंतोष, बहुत रोष और बहुत कष्ट है फिर यदि यही वातावरण बना रहा और जैसी कि सम्भावना है अगले दिनों और भी बिगड़ा तो यह दुनिया मनुष्यों के रहने लायक न रह जायगी। उलझनें इतनी अधिक बढ़ेंगी कि लोग उन्हीं से उलझ उलझ कर बुरी तरह मर-खप कर नष्ट हो जायेंगे।
यह परिस्थिति हर विचारशील को यह सोचने के लिए विवश करती है कि आज की रीति-नीति को बदला जाना चाहिये। बदलाव के स्वरूपों और तरीकों में अन्तर है पर यह निष्कर्ष सर्व सम्मत है कि आदमी को नेक और उदार होना चाहिये तथा उसकी गतिविधियाँ ऐसी हों जो एक दूसरे से टकराने की नहीं स्नेह सहयोग की स्थिति पैदा करें। साधनों को विनाश के लिये नहीं विकास के लिये प्रयुक्त किया जाय। यही युग की पुकार है, यही महाकाल की आकांक्षा। पर दुनिया एक नशे बाज की तरह हैं, जिसे अपने पुराने ढर्रे के दोष विदित होते हुए भी उसे बदलने में बड़ी कठिनाई प्रतीत होती है। परिवर्तन की बात सुन कर उसका जी घबराता है, डर लगता है। जो है सो ठीक। जो ढर्रा चल रहा है उसी लकीर पर लुढ़कते रहने में लोग सुविधा सोचते हैं। विवेक एवं औचित्य के स्थान पर सर्वसाधारण की रुचि पुराने ढर्रे पर चलते रहने की है। यदि इस रुचि को बदला न जाय, लकीर के फकीर बने रहने की रूढ़ि गत परम्पराओं से चिपके रहने की आदतों को न सुधारा जाय तो फिर तेजी से सर्वनाश के निकट जा पहुँचना ही एकमात्र परिणाम शेष रह जायगा।
अस्तु भावनात्मक एवं क्रिया पद्धति की वर्तमान रीति-नीति में साधारण सुधार नहीं भारी परिवर्तन आज की एक अनिवार्य आवश्यकता बनकर सामने आया है और वह पूरा होकर रहेगा। जन मानस में यह अभिलाषा अव्यक्त रूप से काम कर रही है। वे स्वयं बदलना भले ही पसन्द न करें पर परिस्थितियों को जरूर बदला देखना चाहते हैं। ऐसी जन आकाँक्षा को अध्यात्मवादी दैवी प्रेरणा के रूप में देखते हैं। विश्व की सूक्ष्म परिस्थितियों का ज्ञान रखने वाले तत्वदर्शी इस प्रवाह के पीछे परब्रह्म परमात्मा की महा प्रेरणा को कर्म करता हुआ मानते हैं। महाकाल ऐसी ही ईश्वरी शक्ति है जो अवाँछनीय परिस्थितियों में अवाँछनीयता को बदल देने का अपना काम अनादि काल से अभीष्ट अवसरों पर बड़ी खूबी के साथ सम्पन्न करती रही है। उसी महाशक्ति की हलचलों को इन दिनों हर तत्वदर्शी अनुभव करता है और भावी परिवर्तन को अवश्यंभावी मानता है। स्वभावतः ऐसे व्यापक परिवर्तनों के अवसर पर अवाँछनीय तत्व प्रतिरोध करते हैं, गड़बड़ फैलाते और बाधा डालते हैं। उन्हें इस उद्धतता का सबक सिखाने के लिये दैव दंड के करारे प्रहार होते हैं। जितने बड़े परिवर्तन होते हैं उतने ही उसके प्रतिरोध भी खड़े होते हैं और उतने ही कड़े वज्र दंड बरसते हैं। पहले भी यही होता रहा है अगले दिनों भी यही होने वाला है। जुलाई के अंक में इसी सम्भावना की चर्चा है। इस अक्टूबर अंक में इतिहास की उन थोड़ी सी घटनाओं का वर्णन हैं जिनसे परिवर्तनकाल में घटित होने वाले क्रिया-कलाप का दिग्दर्शन हो सकता है। इतिहास अपनी पुनरावृत्ति करता रहता है। अब फिर लगभग उसी आधार पर थोड़े हेर-फेर के साथ घटनाचक्र प्रवर्तित होने वाला है।
यह महत्वपूर्ण जानकारियाँ इसलिये प्रस्तुत की गई हैं कि यदि सम्भव है तो समय रहते अपने को और दूसरों को बदलने की चेष्टा की जाय, इससे महाकाल के कार्य में सरलता होगी, कष्टों में संसार को बहुत कुछ राहत मिल जायगी और उपद्रवों की उग्रता अनावश्यक विक्षोभ पैदा करने में रुक जायगी। जिम्मेदार, ईमानदार और थोड़े ऊंचे उठे हुये लोगों को करना भी यही चाहिये। आपत्तिकाल में तो आपत्ति धर्म पालन करना ही चाहिये, आग को बुझाने के लिये अपने दैनिक कार्यों और सुविधाओं को छोड़ना ही उचित है। इसी औचित्य का उद्बोधन इस रहस्योद्घाटन का लक्ष्य है। अगला समय कैसा आयेगा उससे बदली हुई रीति-नीति किस प्रकार की होगी, इसकी चर्चा अगले अंक में- नवम्बर की अखण्ड ज्योति में परिजन देख सकेंगे। अच्छा हो कि हम अपने को और दूसरों को उसी दिशा में झुकाने की और महाकाल की क्रिया पद्धति में अनुकूलता उत्पन्न करने की चेष्टा करें।
यहाँ यह बात भली प्रकार समझ लेनी चाहिये कि इस परिवर्तन प्रक्रिया की अभीष्ट पृष्ठभूमि तैयार करने की ईश्वरीय जिम्मेदारी कुछ विशेष आत्माओं पर सौंपी गई है। उनमें से बहुत कुछ को अखण्ड ज्योति परिवार के अंतर्गत संगठित कर दिया गया है। जो बाहर हैं वे भी अगले प्रवाह में साथ हो लेंगी। यों देखने में हम लोग एक साधारण स्तर का जीवन जीते हैं और बाहर से कोई विशेषता अपने अन्दर दिखाई नहीं पड़ती, फिर भी “परमार्थ प्रयोजनों के लिये बहुत कुछ कर गुजरने की अभिलाषा” एक ऐसा तत्व है जिसे ईश्वरीय प्रकाश एवं पूर्व जन्मों के संचित उत्कृष्ट संस्कारों का प्रवाह कह सकते हैं। अपनी यही विशेषता है। जिसकी उत्कृष्ट आकाँक्षाएं मर गई वस्तुतः वही मृतक है। जिसके भीतर जितनी ईश्वरीय प्रयोजनों में सहयोगी बनने की तड़पन है वह उतना ही दिव्य आत्मा है। तड़पन पानी के सोतों की तरह है जो पहाड़ जैसी कठोरता को चीर कर बाहर निकल आती है। साधारण परिस्थिति के लोग भी उपयुक्त अवसर पर अपनी तड़पन को क्रियान्वित करने का जब साहस कर बैठते हैं तब वह साहस ही ईश्वरीय अवतरण के रूप में उन्हें सूर्य, चन्द्रमा की तरह चमका देता है। तड़पन का फूट पड़ना, इसी का नाम अवतरण है।
अपने परिवार में एक से एक बढ़ कर उत्कृष्ट स्तर की आत्माएं इन दिनों मौजूद हैं। वे जन्मी भी इसी प्रयोजन के लिये हैं। ऐसे महान अवसरों पर उत्कृष्टता सम्पन्न सुसंस्कारी आत्माएं ही बड़ी भूमिकाएं प्रस्तुत करने का साहस करती हैं। आन्तरिक साहस उनकी साँसारिक सुविधाओं को मकड़ी के जाले की तरह तोड़-फोड़ कर रख देता है और लगता है कि यह व्यक्ति अपनी विषम परिस्थितियों के कारण कोई कहने लायक काम न कर सकेगा। देखा जाता है कि वही ऐतिहासिक महापुरुष स्तर के काम करता है। यह और कुछ नहीं उत्कृष्ट सुयोजनों के लिये दुस्साहस कर बैठने की हिम्मत ही है, जिसे ईश्वरीय प्रेरणा के रूप में परखा जा सकता है। हममें से अनेकों परिजन अभी अपनी ऐतिहासिक भूमिका प्रस्तुत करने की बात सोच रहे हैं। कई उसके लिये कदम बढ़ा रहे हैं। कई दुस्साहसपूर्वक अग्रगामी होने की स्थिति को छू रहे हो। यह शुभ लक्षण है। यह इस बात के प्रमाण हैं कि जो कार्य हमें सौंपा गया हैं, जिसके लिये अपना यह महत्वपूर्ण जन्म है अब उसकी पूर्णता के लिए अभीष्ट प्रकाश एवं साहस अपने अन्दर उत्पन्न हो चला और वह करने का समय आ गया जो इन दिनों- ठीक इन्हीं दिनों करना आवश्यक है।
इतिहास अपनी पुनरावृत्ति कर रहा है। अपना परिवार एक ईश्वरीय महान प्रयोजन की पूर्ति में सहायक बनने के लिये पुनः आ इकट्ठा हुआ है। अच्छा हो हम अपने को पहचानें और अतीत काल की सूखी स्मृतियों को फिर हरी कर लें। निश्चित रूप से हम एक अत्यन्त घनिष्ठ और निकटवर्ती आत्मीय परिवार के चिर आत्मीय सदस्य रहते चले आ रहे हैं। समय आने पर इसका रहस्य भी खुल जायगा, पर अभी जब तक वह समय नहीं आया। हम लोग एक हल्की सी झाँकी इस रूप में पा सकते हैं कि परस्पर हम में से किसका क्या संबंध रहा है। और कितने समय पूर्व, किसने, किस प्रकार की दिव्य भूमिकाएं सम्पादित की थीं। थोड़ा सा प्रयत्न करने पर यह अनुभव आसानी से हो सकते हैं। ऐसी जानकारी आत्मज्ञान की दृष्टि से श्रेयस्कर एवं सहायक ही होगी। रात्रि के अन्तिम भाग में प्रायः अन्तः चेतना अधिक स्पष्ट एवं निर्मल होती है। उस समय आँख खुलने पर बिस्तर में पड़े-पड़े ही अन्तःकरण को सामान्य विचारों से खाली करके इस अनुभव के लिये खुला छोड़ देना चाहिये कि अपने अतीत जन्मों एवं क्रिया-कलापों की हलकी सी अनुभूति उससे प्रस्फुटित हो। कई दिन ऐसा प्रयास करते रहने से अनुभव में स्थिरता आ जायगी। हिलते हुये पानी की लहरों में प्रतिबिम्ब ठीक से नहीं दिखता पर जैसे-जैसे पानी का हिलना स्थिर होता जाता है प्रतिबिम्ब स्पष्ट दिखने लगता है। ठीक उसी प्रकार आरम्भ के दिनों में इस प्रकार की अनुभूति अस्त-व्यस्त रहेंगी, उसमें एक दूसरे से भिन्न प्रकार के-परस्पर विरोधी एवं विसंगत अनुभव भी आयेंगे पर थोड़े ही दिनों में कुछ अनुभूतियाँ बार बार, अधिक स्पष्ट और अधिक वास्तविक प्रतीत होने लगेंगी। वे कई जन्मों की होंगी। इस प्रकार की अनुभूतियों को नोट करते रहा जाय तो स्थिति की बहुत कुछ सफाई हो सकती है। कम से कम तीन महीने के प्रयास जारी रखने पर उसमें जो आभास मिले उसका स्पष्टीकरण करने में हम भी सहायता कर सकते हैं, यह अनुभव परिजनों में यह विश्वास उत्पन्न करेंगे कि हम लोग किस सुदृढ़ घनिष्ठता एवं प्रगाढ़ आत्मीयता के स्नेह सूत्र में परस्पर आबद्ध चले आ रहे हैं और अब एक विशेष प्रयोजन के लिये विवाह शादी के अवसर पर इकट्ठे होने वाले स्वजन सम्बन्धियों तरह पुनः एकत्रित हो गये हैं। शरीर से दूर रहते हुए भी हम लोग वस्तुतः कितने अधिक निकट हैं।
रात्रि को सोते समय और प्रातः उठते समय हम लोग परस्पर मित्रता, घनिष्ठता, समीपता और अभिन्नता का ध्यान कर सकें तो उससे एक महत्वपूर्ण प्रगति होगी। हम लोगों के व्यक्तित्वों में एक दूसरे का समावेश होने लगेगा। यह आत्मिक आदान-प्रदान दोनों के लिए उपयोगी हैं। हमें चार वर्ष बाद एक अनुपम तपश्चर्या में संलग्न होना है। उस समय तक अपने व्यक्तित्व में अनेक आत्माओं का समावेश हो जायगा तो वह तपश्चर्या प्रखर होगी और उसका श्रेय एवं प्रतिफल भी उतने ही अंशों में उन्हें मिलता रहेगा, अंडों को चिड़िया अपनी छाती के नीचे दबाए बैठे रहती है तो चिड़िया की गर्मी से अंडे पकते रहते हैं। यह परम्परा आध्यात्मिक क्षेत्र में भी चलती रहती है। अधिक सामर्थ्यवान गुरुजन अपने से स्वल्प शक्ति वालों को अपने शक्ति कोष में से एक अंश देते रहते हैं। इस आदान-प्रदान में समीपता की आवश्यकता होती है। यह समीपता दूर रहते हुए भी उपरोक्त प्रकार से घनिष्ठता, समीपता, एकता एवं अभिन्नता का ध्यान करने से भी सम्भव हो सकती है। ध्यान जितना ही भावनापूर्ण होगा उतना ही उसका परिणाम भी अधिक स्पष्ट होगा। इस क्रम को अपना कर हम एक दूसरे के अधिक निकट आ सकते हैं और अपने वास्तविक स्वरूप एवं कर्त्तव्य को अधिक अच्छी तरह पहचान सकते हैं।
जो हो हमें युग परिवर्तन की वास्तविकता को समझना चाहिये और प्रबुद्ध आत्माओं की तरह अपने कंधों पर कार्य उत्तरदायित्वों को पूरा साहस समेट कर वहन करना ही चाहिये। हमें उस दिशा में अग्रसर होना ही चाहिये जिसके लिये इन विषम परिस्थितियों में अपना विशेष अवतरण हुआ है।
हर हर प्रलयंकर शिव शंकर जागे करने ताँडव नर्तन।
अब महाकाल की ज्वाला में होगा युग का प्रत्यावर्तन॥
जब जब वसुन्धरा में फैली पापों की कलुष कालिमायें,
अत्याचारों की अनल बढ़ी, फैली अभद्र की ज्वालायें,
दल, दम्भ, द्वेष, पाखण्ड, झूठ, अन्याय, अपार वासनायें,
इतिहास साक्षी है अपना, कहती अतीत की गाथायें-
तब तब त्रिशूल के कैलाशी करते तम-भव-भय, अघमर्षण।
फिर उसके बाद नये युग का निर्माता करता नव सर्जन॥
जब क्रूर कंस का इस धरती पर व्यापक अत्याचार हुआ,
दुर्योधन, कृप, शिशुपाल आदि से पीड़ित सब संसार हुआ।
तब महाशक्ति श्री कृष्णचन्द्र का पुण्य रूप अवतार हुआ,
फिर हुआ महाभारत ऐसा भीषणतम नर संहार हुआ।
था काँप गया सारा विभुवन सुनकर उनका अम्बुद-तर्जन।
नव-सृष्टि हुई विकसित जैसे माली करता उपवन कर्त्तन॥
लेकर नृसिंह का रूप पुनः हिरणाकश्यप को संहारा,
फिर एक बार अति रौद्र राम ने रावण को भी ललकारा,
जब राजाओं के महा-दम्भ से पीड़ित हुआ विश्व सारा,
तब महाकाल ने परशुराम का महा-प्रचण्ड रूप धरा।
थे सहने पड़े कराल शूल सारे जग को अतिशय कर्षण।
तब कहीं हुआ था इस जग में सुख-शाँति सौम्यता का वर्षण॥
रावण दुर्योधन, दुःशासन सब हैं प्रतीक अन्यायों के,
अत्याचारों, दम्भों, पाखण्डों, द्वेष और दुर्भावों के,
अब काल-प्रलय भी आ पहुँचा ले सेनानी विपदाओं के,
फिर से डगमग होगी धरती टूटेंगे दल ताराओं के।
रणचण्डी थहराने वाली होने वाला दुर्मद गर्जन।
आधियाँ-व्याधियाँ फूटेंगी बन महाकाल का कलि-मर्दन॥
-बलराम सिंह ‘परिहार’
*समाप्त*