मनुष्य को मनुष्य बनाने वाला धर्म

“मेरे देशवासियों! विषम परिस्थितियों का अन्त आ गया। काफी रो चुके, अब रोने की आवश्यकता नहीं रही। अब हमें अपनी आत्म शक्ति को जगाने का अवसर आया है। उठो, अपने पैरों पर खड़े हो और मनुष्य बनो। हम मनुष्य बनाने वाला ही धर्म चाहते हैं। सुख, सफलता ही क्या सत्य भी यदि शरीर, बुद्धि और आत्मा को कमजोर बनाये तो उसे विष की भाँति त्याग देने की दृढ़ता आप में होनी चाहिए।”

“जीवन-शक्ति विहीन धर्म कभी धर्म नहीं हो सकता । उसका तो स्वरूप ही बड़ा पवित्र, बलप्रद, ज्ञानयुक्त है। जो शक्ति दे, ज्ञान दे हृदय के अन्धकार को दूर कर नव स्फूर्ति भर दे। आओ, हम उस सत्य की, धर्म की वन्दना करें। कामना करें और जन जीवन में प्रवाहित होने दें। तोता बोल बहुत सकता है। पर वह आबद्ध कुछ कर नहीं सकता । हम रागद्वेष, काम, क्रोध, मद, मत्सर, अज्ञान, कुत्सा, कुविचार, दुष्कर्म के पिंजरे में आबद्ध न हों । अच्छी बात मुँह से कहें और उसे जीवन में उतारें भी। हमारे मस्तिष्कों में जो दुर्बलता भर गई है उसे निकाल कर शक्तिशाली बनने के लिए कटिबद्ध हो जाना चाहिये।

-स्वामी विवेकानन्द


जीवन जीने की उत्कृष्ट रीति-नीति

एको द्वे वसुमती समीची इन्द्र आ पप्रौ पृथिवी मुतद्याम्।

॥ ऋ. वेद 3।30।31

पृथ्वी और द्यौलोक धन देते हैं। जब वर्षा होती है तो पृथ्वी अन्न देती है। किन्तु मनुष्य को चाहिए कि वह अन्य साधनों से भी अन्न प्राप्त करे, केवल दैव पर ही निर्भर न रहे।

इन्द्रा युवं वरुणा भूतमस्या धियः प्रेतारा

वृषभेव धेनोः।

सा नो दुहीयद् सवसेव गत्वी सहस्रधारा

पयसा मही गौः॥

॥ ऋ . वेद 4।41।5

हमारी प्रार्थना में बल हो, भावना हो ताकि देवता हमारी अभीष्ट कामना पूरी करें।

स्वस्ति पन्थामनु चरेम सूर्याचन्द्रमसाविव।

पुनर्ददताघ्नता जानता सं गमेमहि॥

॥ ऋ . वेद 5।51।15

हे मानवो! सूर्य और चन्द्रमा जिस प्रकार नियमित रूप से अपने निर्धारित पथ पर चलते रहते हैं उसी प्रकार तुम्हें भी न्याय का मार्ग नहीं छोड़ना चाहिए। सज्जनों के साथ समागम करने में कभी आलस्य न करें।

यस्ते यज्ञेन समिधा य उम्थैरर्केभिः सूनो

सहसो ददाशत् ।

य मर्त्येष्वमृत प्रचेता रायाद्यु म्नेन

श्रवसा विभाति

॥ऋ . वेद 6।5।5

जो अपने सद्गुणों के आधार पर श्रेष्ठ कर्म करने का प्रयत्न करते हैं उन्हें संसार में विद्या धन और यश मिलता है।

मा नो निदे च वक्तवेऽर्यो रन्सीररावणे

त्वे अक्रतुर्मम

॥ऋ. वेद 7।31।35

हे मनुष्यों! तुम कभी किसी को कटु वचन मत बोलना, किसी की निन्दा न करना, कृतघ्न न बनना। दुःखी लोगों की सहायता करते रहना। तुम्हारा प्रत्येक शुभ कर्म परमेश्वर को समर्पित हो।

ऋतावान ऋतजाता ऋतावृधो घोरोसो अनृतद्विषः।

तेषाँ वः सुम्ने सुच्छर्दिष्टमे नरः स्याम ये च सूरयः

॥ ऋ . वेद 7।66।13

हम सत्यमानी, सत्यवादी और सत्याचरण करने वाले हों। ऐसे ही व्यक्तियों की सदैव संगति प्राप्त हो।

मृत्योः पदं योपयन्तो यदैत द्राघीय आयुः प्रतरं

दधानाः।

आप्यायमानाः प्रजया धनेन शुद्धाः पूता

भवतं यज्ञिपासः

॥ ऋ. वेद 10।18।2

जो लोग दुराचार को मिटा कर सदाचार पर स्थिर रहते हैं वे उत्तम जीवन और दीर्घ आयुष्य प्राप्त करते हैं। धन और संतान युक्त होकर शारीरिक और मानसिक पवित्रता प्राप्त करते हैं।

इमं जीवेभ्यः परिधं दधामिमैषाँ नुगाद परो अर्थ मेतम्।

शतं जीवन्तु शरदः पुरचीरन्तमृत्युँ दधताँ पर्वतेन

॥ ऋ. वेद 19।18।4

मनुष्य का जीवन बहुत महत्वपूर्ण है इसे नीचता पूर्ण कर्मों में गंवाना अच्छी बात नहीं। इसलिये पुरुषार्थी बनकर सौ वर्ष जिएं अर्थात् दुराचार त्याग कर सदाचारी हों इससे मनुष्य पूर्ण आयु प्राप्त करता है।

उतत्वः पश्यन् न ददर्श वाचमुत त्वः

श्ररावन न श्रृणोत्येनान

॥ऋ॰ वेद 10।71।4

जो सदुपदेश सुने तो किन्तु अपने जीवन में धारण न करे वह अन्धे, बहरे के समान है।


सत्यमेव जयते नानृतम्

हर मनुष्य की अपनी एक तौल होती है । इसे आत्म-श्रद्धा कहें या आत्म-गौरव। हर व्यक्ति इसी आँतरिक तौल के आधार पर आचरण करता है, उसी के अनुरूप ही उसे दूसरों से प्रतिष्ठा भी मिलती है और साँसारिक सुखोपभोग भी मिलते हैं। अपने आपके प्रति जिसमें जितनी प्रगाढ़ श्रद्धा होती है वह उतने ही अंश में नेक, ईमानदार, सच्चरित्र, तेजस्वी और प्रतापी होता। इन सद्गुणों का बाहुल्य ही विपुल सफलता के रूप में परिलक्षित होता है।

अपनी तौल क्या है? अपनी वाणी विचार और क्रिया के सत्य असत्य का विवेचन ही वह माप है जिससे हम अपने सम्बन्ध की मान्यता स्थिर करते हैं। अर्थात् आत्म-श्रद्धा का आधार सत्य है। हम सत्य से जितना विमुख होते हैं उतना ही अपने आपसे अश्रद्धालु बनते हैं। आत्मा के प्रति श्रद्धा का न होना ही दीनता, कायरता और कमजोरी है। इसी बात को यों कहा जा सकता है कि जो सत्य के प्रति वफादार नहीं होते वह कायर और कमजोर दीन हीन और दुःखी होते हैं। अपनी ही नजर में जो गिर गया वह सैकड़ों के उठाये नहीं उठ सकता । जिसने सत्य का परित्याग कर दिया, समझना चाहिये सुख-स्वर्ग का मार्ग उसके लिये अवरुद्ध हो गया।

शास्त्रकारों ने सप्त मर्यादाओं में सत्य को दूसरा स्थान दिया है। “सत्मेव जयते नानृतम” “सत्य की ही जय होती है, असत्य की नहीं” “सत्य से बढ़ कर कोई धर्म नहीं।” इन शब्दों में सत्य की गरिमा का उल्लेख किया है। वेद में कहा है-

दृष्ट्वा रुपे व्याकरोत सत्यानृते प्रजापतिः

अश्रद्धामनृतेऽदधाच्छ्रद्धाँ सत्यं प्रजापतिः।

ऋतेन सत्यमिन्द्रियं विपीनं शुक्रमन्धस इन्द्रस्येन्द्रियमिदं पयोऽमृतं मधु॥

(यजु 19-77)

प्राण में अमृत है। अन्न और जल में भी जीवनामृत है। यह दोनों प्राणधारियों के शरीर की रक्षा करते हैं। इनके निकल जाने पर शरीर तेज और क्रियाशक्ति विहीन हो जाता है। उसी तरह सत्य न रहने से मनुष्य जीवन की सारी तेजस्विता का अन्त हो जाता है।

प्राचीन काल में सब स्त्री पुरुष सत्यनिष्ठ होते थे। मन, वचन और कर्म से भी सत्य का ही व्यवहार किया जाता था। तब मनुष्य का जीवन बिलकुल सीधा सादा, सरल, स्वाभाविक एवं प्राकृत था। स्वल्प आवश्यकताएं थीं इसलिये जीवन में बनावट लाने की लोगों को जरूरत ही न पड़ती थी । धीरे-धीरे साँसारिक सुखों में बढ़ोतरी हुई। यद्यपि वे अल्पकालिक थे किन्तु अत्यधिक आकर्षण के कारण यह लोग अपनी आवश्यकताएं बढ़ाने लगे। तब जीवन में कृत्रिमता भी आई । हानि से बचने और अपने लिये अधिक से अधिक सुखोपभोग करने के लिये असत्य का प्रयोग करने लगे।

तब विचारवान लोग प्रजापति के पास जाकर बोले- आदि पुरुष! सत्य की रक्षा कैसे हो? तब प्रजापति ने यह व्यवस्था कर दी कि भविष्य में जो सत्य का पालन करेगा उसे ही ऐश्वर्य प्राप्त होंगे अन्य को नहीं। यह नियम यथावत चल रहा है। सच्चा ऐश्वर्य सुख केवल सत्यशील को ही मिलता है।

आत्मा स्वयं शाश्वत सत्य है। असत्य होना तो असत्यवादी भी पसंद नहीं करता। झूठ बोलने वाले को कह दो “आप झूठ बोलते हैं” तो वह जल कर खाक हो जाता है और प्रतिशोध तक के लिये तत्पर हो जाता है। खेद है कि फिर भी लोग जीवन को असत्य के आचरण से कलुषित बनाते हैं और अपनी आत्मैश्वर्य को कमजोर बनाते हैं। सच्ची बात न कहने वाले और सच्ची बात छुपाने वाले दोनों ही इस अधिकार से वंचित होते हैं और धार्मिक जीवन की पवित्रता और दिव्य आनन्द से विमुख बने रहते हैं।

सत्य सरल भी है और स्वाभाविक भी। यदि तुच्छ अहंकार और स्वार्थमयता को प्रमुख न बनाया जाय तो सत्य छिपाने की आवश्यकता ही न पड़े । जो कुछ सत्य है उसी की अभिव्यक्ति हो फिर जीवन में जटिलता का समावेश हो ही नहीं। न विवादास्पद परिस्थितियाँ बने। सीधे सरल अवसर का लाभ स्वार्थपूर्ति के लिए करना ही धूर्तता है। इससे मनुष्य का सारा श्रेय और बड़प्पन गिर जाता है। छोटे व्यक्ति भी अपनी स्वाभाविक सरलता के कारण सामाजिक सम्मान और प्रतिष्ठा के पात्र बनते हैं। जब कि तथाकथित बड़े कहे जाने वाले लोग भी सत्य विमुख हो जाने से विश्वास खो देते हैं।

इतिहास प्रसिद्ध घटना है कि सत्य विमुख होने पर युधिष्ठिर जैसे धर्मात्मा, कुमारिल भट्ट जैसे विद्वान और आचार्य पिंगल ऋषि को भी अधःपतित लोकों में जाना पड़ा और हरिश्चन्द्र जैसे राजसी प्रकृति वाले व्यक्ति ने सत्य के बल पर ही उस शाश्वत आनन्द को पा लिया है। “साँच बराबर तप नहीं झूठ बराबर पाप” वाली कहावत भी जगत प्रसिद्ध है।

जीवन की पवित्रता और लक्ष्य सत्य-विच्युतों को यों नहीं मिला करते कि उनका सारा ध्यान असत्य बोलने से उत्पन्न हुई स्थिति को संभालने में ही लग जाता है। जिस किसान के खेत सींचने वाली नाली कमजोर होती है उसका अधिकाँश पानी इधर उधर ही फैल जात है। उसका बहुत समय केवल उसी सुधार में लग जाता है। और सिंचाई का महत्वपूर्ण प्रयोजन अधूरा ही रह जाता है। असत्य बोल कर धन कमाया जा सकता है पर जीवन का आनंद पवित्रता और लक्ष्य नहीं प्राप्त किया जा सकता है। एक झूठ को छिपाने के लिये सौ झूठ और बोलने पड़ते हैं। फिर उन सौ झूठों के लिए हजार बहाने ढूंढ़ने पड़ते हैं। ऐसे व्यक्ति को आत्मा या ईश्वर चिन्तन के लिए समय ही कहाँ मिलेगा ?

आत्मा के ऐश्वर्य और सत्य के शाश्वत स्वरूप को शाश्वत बनाए रखने के लिए सत्य बोलना, विचार करना और तदनुसार आचरण यह ‘सत्य देवता’ जिन्हें सिद्ध हो जाता है उन्हें परमात्मा को ढूंढ़ने के लिए और कहीं जाने की आवश्यकता नहीं। वह क्रमशः विश्व की परिस्थितियों का यथार्थ ज्ञान, आत्म साक्षात्कार करता हुआ, आत्मा में ही ईश्वरीय दर्शन का आनन्द लेता है। सत्य जीवन की मधुरता है और उसकी पूर्ण परिपक्वता जीवन लक्ष्य की प्राप्ति।

सत्य की प्रतिष्ठा होते हुए भी उसे छुपाने के अनेक प्रयत्न किये जाते हैं। सुख सौभाग्यों में पराजय और सामाजिक संघर्ष का यह बहुत बड़ा कारण है। इतना होते हुये भी मनुष्य की अन्तरात्मा सत्य की ओर झुकी रहती है। उसी सत्य को प्रमाणित करने के लिए उपनिषद् प्रार्थना करते हैं-

हिरण्यमयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्।

तत्वं पृषणं अपावृणतु सत्य धर्माय दृष्टये ॥

‘हे परमात्मन्! मनुष्य की आत्मा सत्य को प्रकाश में लाना चाहती है। किन्तु मन के प्रलोभन उस पात्र को ढके हुए हैं। हमें सत्य को ही देखने की दृष्टि दो।

यह प्रार्थना जीवन में चरितार्थ होती है तो भावनामय संसार का सत्य स्वरूप प्रकट हो जाता है। ऐसी दिव्य दृष्टि प्राप्ति होती है। जिससे सम्पूर्ण अन्तर्द्वन्द्वों से छूट कर जीव आत्मश्रद्धा का सुखोपभोग करता है। इसलिये हम जीवन में सदैव सत्य बोलें सत्य सुनें और ग्रहण करें।


दूध और पानी की मित्रता

दूध और पानी की मित्रता

दूध ने पानी से कहा- बन्धु किसी मित्र के बिना मेरा हृदय सूना है। आओ मैं तुम्हें हृदय से लगा लेना चाहता हूँ। पानी ने कहा भाई, तुम्हारी बात तो मुझे पसन्द है, पर यकीन नहीं होता कि अग्नि परीक्षा के समय भी तुम मुझसे अलग न होंगे। दूध ने वचन दिया -ऐसा ही होगा और दोनों में मित्रता हो गई, ऐसी कि उनके पृथक स्वरूप को पहचानना कठिन हो गया।

अग्नि एक रोज परीक्षा लेती है। और पानी को जलाती है। पर दूध है कि वह हर बार मित्र की रक्षा के लिए अपने आपको जला देता है। दूध की तरह जो लोग अपने दाम्पत्ति, पारिवारिक और सामाजिक जीवन में परस्पर विश्वास रखते हैं उन्हीं का मनुष्य जीवन धन्य होता है।


परमात्मा को जानने के लिये अपने आपको जानो।

सन्त वास्वानी से एक दिन कुछ लोगों ने प्रश्न किया “भगवान क्या है?” “भगवान ज्योतियों की ज्योति है-मध्यवर्ती सूर्य है” उन्होंने उत्तर दिया। लोगों ने फिर प्रश्न किया “इस ज्योति से, इस मध्यवर्ती सूर्य से अपना नाता कैसे जोड़ें?” वास्वानी ने पुनः समझाया- “बस सूर्यमुखी बन जाओ । जैसे सूर्यमुखी सदैव सूर्य के प्रति मुख किये रहता है यद्यपि उसकी देह में अन्य क्रियाएं अपनी-अपनी मर्यादा में चलती रहती हैं, जड़ें रस खींचती रहती हैं। पत्तियाँ साँस लेती रहती हैं। हवा में वह हिलता डुलता रहता है पर उसका सूर्यमुखी नाम इसीलिये पड़ा क्योंकि वह सदैव सूरज की ओर मुख किये रहता है, इसी तरह परमात्मा को पाने के लिये सदैव परमात्मा की ओर मुख किये रहो।

“किन्तु सूर्यमुखी बनें कैसे?” लोगों ने तीसरा प्रश्न किया। उन्होंने उत्तर दिया “अपने हृदय को तीव्र अभीप्सा से भर लो। एक बार खूब अच्छी तरह निश्चित कर लो कि मनुष्य जीवन का ध्येय अनन्त ऐश्वर्य, सुख सन्तोष, शांतिप्रद परमात्मा की प्राप्ति है। जब वह तुम्हारा लक्ष्य बन जायेगा तो भगवान की ओर मुख किये रहोगे और धन्य हो जाओगे।”

ईश्वर प्राप्ति की सच्ची आकाँक्षा का होना ही प्रधान बात है, परमात्मा कहीं अन्यत्र नहीं। उसे ढूंढ़ने प्राप्त करने और पहचानने का प्रयत्न नहीं किया जाता, इसीलिये अधिकाँश लोगों के हृदय अन्धकार से भरे हैं। लोगों के भीतर तामस का, रात का, अज्ञान का राज्य है। जब अपने हृदय को ही जीवन का केन्द्र बिन्दु बना लिया जाता है तो आनन्द स्वरूप परमात्मा का अस्तित्व वहीं झलकने लगता है, उसे ढूँढ़ने के लिये कहीं भागने की आवश्यकता नहीं पड़ती ।

हमारा हृदय हमारी आत्मा के विश्वास का ही अंश है। जिस तरह सूर्य की किरणें सूर्य का अंश हैं, पर पृथक दिखती हैं, उसी तरह आत्मा भी परमात्मा का अंश है, पर पृथक दिखता है। अपने को अपनी गहनतर आत्मा को विश्वात्मा का अंश जान लेना ईश्वर को जान लेना है।

मनुष्य अपने शरीर के बाह्य क्रियाकलापों की व्यस्तता से कुछ क्षण बचाकर शरीर, भावनाएं, मन और बुद्धि इनके परे अपनी चेतना की गहराई में डूब सकता है, यह सभी उसके गुण हैं, विशेषताएं हैं, पर वह स्वयं इनसे पर है। वह इनसे परे जाकर अपने को इनसे भिन्न, शक्तिशाली और परम तेजस्वी, सर्वदृष्टा, सर्वज्ञ, सर्वव्यापी, सर्वान्तर्यामी विशुद्ध आनन्द स्वरूप प्रकाश अनुभव कर सकता है।

जिन लोगों ने अपने भीतर ईश्वर की शोध की है वे सब अन्ततः इसी निष्कर्ष पर पहुँचे हैं। सबने यही बताया है कि मनुष्य चिन्तन के द्वारा मन, बुद्धि और भावनाओं पर ध्यान जमाता हुआ आत्मा के अस्तित्व तक पहुँचता है और इस अनुभव के बाद इस बोध को प्राप्त करता है कि वह परमात्मा जिसमें आत्मा विकसित हो जाती है, आत्माओं से भी परे और सभी में एक ही प्रकार से व्याप्त है।

एक गाँव में एक बार नानक का आगमन हुआ। वे कहते थे- ईश्वर सबके अन्दर है। हिन्दू, मुसलमान का कोई भेद नहीं । उस गाँव के नवाब ने उनसे कहा- आपके लिये तो मन्दिर और मस्जिद एक बराबर हैं तो क्या आप आज हमारे साथ मस्जिद में नमाज पढ़ने को तैयार हैं ? नानक ने बहुत आनन्दित होकर कहा- जरूर! जरूर!! परमात्मा की प्रार्थना में सम्मिलित होने से बड़ा आनन्द और क्या है?

फिर सब लोग मस्जिद गये और नमाज शुरू हुई। सब लोग नानक की नमाज देखना चाहते थे। किन्तु नानक चुपचाप एक कोने में खड़े हो गये और सबको देखने लगे। उनको इस प्रकार खड़ा देखकर नमाजिये बहुत गुस्सा हुए। वे नमाज भी पढ़ते जाते थे और बीच-बीच में नानक की ओर क्रोध से देख भी लेते थे। जल्दी-जल्दी किसी तरह बेचारों ने नमाज पूरी की और सब एक दम नानक पर टूट पड़े । किसी ने उन्हें धोखेबाज कहा, किसी ने वचन तोड़ने वाला। नवाब ने आँखें लाल पीली करके डाँटा, आपने नमाज क्यों नहीं पढ़ी? नानक हंसे और बोले आप लोगों ने भी नहीं पढ़ी, इसलिये हमने भी नहीं पढ़ी । आप लोगों का खेल देखता रहा, यदि आप नमाज पढ़ते रहते तो फिर मेरे लिये भी चुपचाप खड़ा रहना कठिन ही हो जाता।

उन नमाजियों की तरह जो लोग ईश्वर प्राप्ति की बात तो करते हैं किन्तु उनकी सारी उलझन जीवन के बाह्य क्रिया कलापों तक सीमित रहती है इसलिये उनका नानक, (उनका मन) भी आत्मानुभूति में खो नहीं पाता । जिस दिन शरीर और मन की सारी चेष्टाएं सिमट कर आत्मा में केन्द्रित हो जाती हैं, अन्धकार उसी दिन दूर हो जाता है और मनुष्य परमात्मा के निकट पहुँचा हुआ अनुभव करने लगता है।

‘मज्झिम निकाय’ में तथागत का एक सुन्दर उपदेश है, वह कहते हैं- कल्पना करो कि किसी मनुष्य के पैर में विष बुझा तीर चुभ गया है । यदि यह मनुष्य कहे, मैं तब तक तीर नहीं निकलवाऊँगा जब तक मुझे ज्ञात न हो जाये कि तीर चलाने वाले का नाम, कुल और गोत्र क्या था? वह ऊंचा था या मझले कद का। धनुष कैसा था प्रत्यंचा कैसी थी, तीर कैसा था?

लोग परमात्मा के सम्बन्ध में भी ऐसे ही तर्क-वितर्क वाद विवाद करते हैं पर अपने हृदय में जीवन के बोझ, दुःख, कठिनाइयों, दैवी आपत्तियों का जो तीर चुभा हुआ है उसे निकालने की ओर किसी का ध्यान नहीं। हमें सर्वप्रथम आत्मा के दर्द को अनुभव करने की आवश्यकता है। बाह्य जीवन के प्रपंचों को छोड़कर अन्तर्मुख होने की बड़ी आवश्यकता है। बाहरी क्रियाओं को केवल सहयोगी मानना चाहिये। वे लक्ष्य सत्य या परमात्मा की प्राप्ति की साधन बनाई जा सकती नहीं है। इसलिये अपने शरीर मन और भावनाओं के केन्द्र बिन्दु को बेधने की आवश्यकता है, यह जानने की आवश्यकता नहीं कि कौन सा तत्व कितना सुखद है, किस सुख की प्राप्ति के लिये किधर दौड़ना चाहिये। जब इन सब बातों को साधन बना लिया जाता है तो आवश्यकताएं भी घट जाती हैं और लक्ष्य भी अपने समीप ही स्पष्ट होने लगता है। उसे पाने के लिये न तो लम्बे साधनों के लिये दौड़ना पड़ता है और न घर ही छोड़ना पड़ता है।

उपनिषदों ने- आत्मावारे श्रोतव्यो, मन्तव्यो, निदिध्यासितव्यः नाम्वतोऽस्ति विजानतः। -कहकर इसी तथ्य को व्यक्त किया है और बताया है कि विभिन्न साधनों से तुम अपने आपको पहचानो। जिस दिन आत्मशक्ति का विश्वास जाग जाता है उस दिन परमात्मा के अस्तित्व का विश्वास धमते देर नहीं। विश्वास का जमना उतना ही आनन्ददायक है जितना परमात्मा की प्राप्ति।

मनुष्य अपनी छिपी हुई शक्तियों को पहचाने बिना शक्तिशाली नहीं बन सकता। जो जैसा अपने को जानता है या जिसकी जैसी अभीप्सा है वह वैसा ही बन जाता है। अपने को जानना सब सिद्धियों में बड़ी सिद्धि है। लाखों में एक-दो होते हैं जो अपने को जानने का यत्न करते हैं। यत्न करने वालों में भी थोड़े से ऐसे होते हैं जो आत्मा के अस्तित्व को पहचानने के लिये देर तक अपने आपको निर्दिष्ट किये रहते हैं। जिसने भी मनुष्य देह में जन्म लिया है वह आत्मा के समीप पहुँचा दिया गया है। किन्तु थोड़े ही हैं जो उसमें प्रवेश पाते हैं।


Quotation

विद्वता युवकों को संयमी बना देती है। यह बुढ़ापे का आराम है, निर्धनता निर्धनता में धन का काम देती है और धनवानों के लिये आभूषण का काम करती है।

-सिसरो

शरीर में काम क्रोध, मोह सन्तोष , दण्ड, दया आदि अनेकों भावनायें हैं, यह सब या तो आनन्द की प्राप्ति के लिये हैं अथवा आनन्द में विघ्न पैदा होने के कारण है। आनन्द सबका मूल है वैसे ही आनन्द सबका लक्ष्य है। लक्ष्य और उसकी सिद्धि दोनों ही आत्मा में विद्यमान हैं जो आत्मा को ही लक्ष्य बनाकर आत्मा के ही द्वारा अपने आपको बेधता है वह उसे पाता भी है। आत्मा ही परमात्मा का अंश है, इसलिये आत्मा का ज्ञान हो जाने पर परमात्मा की प्राप्ति अपने आप हो जाती है।


जीवन सुन्दरतापूर्वक जिएं।

मनुष्य को जीवन सुन्दरतापूर्वक जीने के लिए मिला है। इसलिए नहीं कि वह रोते झींकते, आवश्यकता एवं अभावों के बीच तरस-तरस कर कट जाये, किसी ईंट पत्थर की तरह घिस-घिस कर नष्ट हो जाए। यह जीवन भौतिक एवं आत्मिक उन्नति द्वारा संतुष्ट होकर जीने के लिए ही मिला है और उसी प्रकार मनुष्यों को जीना भी चाहिए।

सामान्य रूप से जीवन सब को अच्छा लगता है, और सभी उसे सुन्दरतापूर्वक जीना भी चाहते हैं, उसके लिए प्रयत्न भी करते हैं। किन्तु ऐसे कितने सत्पुरुष संसार में हैं जो जीवन को अपेक्षित ढंग से जी पाते हैं। नहीं तो अधिकतम लोग शारीरिक अथवा मानसिक, बाह्य अथवा आन्तरिक रूप से दरिद्र तथा दयनीय रूप से जीते देखे जाते हैं।

जीवन यों ही सुन्दर तथा सुखमय नहीं बन जाता, उसे परिश्रम एवं पुरुषार्थ द्वारा सुन्दरता के साँचे में ढालना पड़ता है। आलस्य का परित्याग कर कठिन से कठिन कर्मों में प्रवृत्त होना पड़ता है। नीति और आदर्श की रक्षा करनी होती है। अपने आचरण और चरित्र में उदात्त भावों का जागरण करना होता है। जीवन को सुन्दर बनाने के इन्हीं आदर्शों के विषय में ऋग्वेद के ऋषि ने निर्देश किया है-

“त्रातारो देवा अधि वोचता नो

मा नो निद्रा ईशत मोत जल्पिः।

वयं सोमस्य विश्वह प्रियासः

सुबीरासो बिदथमा वदेम।

“रक्षा करने वाले देव! हमको आशीर्वाद दो,व्यर्थ की वार्ता और निद्रा दोनों हमसे दूर रहें। वीरों सहित हम धर्म की स्थिति में बोलें। जो कर्त्तव्यवान एवं कर्मठ है, वह देवताओं को प्रिय होता है। देव स्वप्न नहीं चाहते हैं। वे प्रमाद एवं आलस्य को दण्डित करते हैं।”

जो लोग यह समझते हैं कि आन्तरिक एवं बाह्य उन्नति के लिए एक मात्र ईश्वरोपासना ही वह साधना है, जिसके करते रहने से सदा वाँछित फल प्राप्त हो जायेंगे वे भ्रम में हैं। उपासना की आवश्यकता है, किन्तु वह आवश्यकता है ईश्वरीय प्रसन्नता के लिये जिससे कि उसको और शक्ति, स्फूर्ति, साहस एवं संलग्नता मिलती रहे और हम अबाध रूप से कर्तव्य पर चलते जाये। अन्य मोक्ष उपासना की सफलता सदा ही संदिग्ध है।

जीवन को सफल एवं सार्थक बनाने के लिए मनुष्य को अपनी पूरी शक्ति, पूरे प्रयत्न तथा पूरी आयु लगा देनी चाहिए। सफलता बहुत मूल्य पर ही मिलती है जो व्यक्ति थोड़े से प्रयत्न के साथ ही मनोवाँछित सफलता पाना चाहते हैं, वे उन लोगों जैसे ही संकीर्ण विचार वाले होते हैं जो किसी चीज को पूरा मूल्य दिए बिना ही हस्तगत करने को लालायित रहते हैं। ऐसे लोभी लालची व्यक्ति का चरित्र किसी भी समय गिर सकता है। वह मानवीय आदर्शों से जल्दी ही पतित हो सकता है। सदा फल की लालसा मनुष्य को मिथ्याचारी और बेईमानी बना सकती है। समाज में हम ऐसे कितने ही व्यक्तियों को देख सकते हैं, जो आज काम प्रारम्भ कर कल ही उसका फल चाहने लगते हैं और इसलिए नीति का त्याग कर अनीति को अपना कर चलने लगते हैं। अनीति द्वारा पाई हुई सफलता कभी भी यथार्थ रूप में संतोषदायक नहीं होती। अनीति का धन-धान्य मनुष्य के मन बुद्धि यथा आत्मा का पतन कर देता है, जिससे वह निर्बल और कायर हो जाता है कि यत्किंचित् प्रतिकूलता आने पर घबरा उठता है और शीघ्र ही जीवन से घबरा कर भागने की कोशिश करता है। यथार्थ उन्नति के लिए कोई अवधि निश्चित नहीं है और न उसे करना चाहिये। उचित आदर्शों के साथ अपना कर्त्तव्य करते रहना चाहिए समय आने पर सफलता आप से आप उपलब्ध हो जायेगी। सफलता के लिए आदर्शों का पतन तथा नीति का त्याग उचित नहीं। कहा भी गया है-

“सर्वमायुर्नभतु जीवनाय”

“जीवन की सार्थकता के लिए अपनी पूरी आयु लगा दो।”

बहुत बार लोग जीवन को निःसार, निरर्थक अथवा नश्वर समझ कर उसके प्रति उदासीन हो जाते हैं। वे उसे एक प्रकृत प्रवाह के साथ बहते देने के लिए छोड़ देते हैं और ईश्वर से प्राप्त सारी शक्तियों को लगाकर सुन्दर से सुन्दरतम बनाने का प्रयत्न किया जाता है। जीवन के प्रति उदासीनता, उससे भागने का ही कायरता पूर्ण लक्षण है। जीवन पाकर जो उसके प्रति अनुरक्ति नहीं रखता, उसमें प्रसन्नता एवं उल्लास की परिस्थितियाँ नहीं लाता, उसे सफल एवं सार्थक बनाने के लिए कर्म क्षेत्र में नहीं उतरता, वह परमात्मा के इस अनुदान का अपमान करता है और निःसन्देह अवज्ञा एवं अपवाद का विषय है। उसे कोई अधिकार नहीं कि वह समाज के साधन एवं उत्पत्ति का उपभोग कर उसे यों ही व्यर्थ करता रहे। यों तो रहने को समाज में सभी रहते हैं। खाते पीते और जीते हैं, किन्तु उनके जीवन के साथ सार्थकता का समन्वय नहीं किया जा सकता। उन्हें समाज में रहने का नैतिक अधिकार समाज की ओर से है। किन्तु यदि उनकी आत्मा से पूछा जाये तो उसका मत यही होगा कि वास्तव में इस शरीर को समाज की सम्पत्ति, उसके साधन तथा सामग्री के उपभोग का कोई अधिकार नहीं है, क्योंकि यह उसका बदला सार्थकता की सिद्धि में अपने अगाध परिश्रम एवं पुरुषार्थ द्वारा नहीं चुकाता। जीवन के प्रति उदासीन रहना अथवा उसे यों ही निरर्थकता के साथ बिता देना अनैतिकता है। एक आध्यात्मिक अपराध है। जीवन को निःसार अथवा निरर्थक समझने वाले अकर्मण्यता वादियों को ऋग्वेद की यह पावन ऋचा पर्याप्त प्रकाश प्रदान कर सकती है।

“ईशावास्यमिदं सर्वम्

आ रोहता भुर्जरसं वृणाना

अनुपूर्वं यतमाना यतिष्ठ।

इह त्वष्टा सुजनिमा सजोषा

दीर्घमायुः करति जीवसे वः”

-जीवन को स्वीकार करो और वार्धक्य का स्वागत करो। तुम सभी एक दूसरे के पीछे क्रम से प्रयत्न करते जाओ। सुन्दर वस्तुओं का विधायक देव तुम पर प्रसन्न हो और तुम्हारे जीवन को दीर्घ करे।

यही नहीं जीवन के प्रति अनुराग और उसकी उपादेयता को स्वीकार करते हुए- ‘जीवेम शरदः शतम’ की प्रार्थना की गई है। इस सौ वर्ष की आयु के लिये प्रार्थना करने में ऋषियों का क्या उद्देश्य हो सकता है यह तो किसी प्रकार भी माना ही नहीं जा सकता, कि उनकी यह प्रार्थना विषय भोग की कामना से प्रेरित रही हो। निश्चय ही आयु को अधिकतम चाहने के पीछे यही एक उद्देश्य रहा है कि हम सौ साल तक स्वास्थ्य के साथ जीवित रहें, समाज को उन्नत बनाने का प्रयत्न करें और आत्मा के उद्धार के लिए अधिक से अधिक पुरुषार्थ कर सकें, इतना पुरुषार्थ कि अपने वर्तमान जीवन में ही मोक्ष की व्यवस्था कर लें, इसके लिए आगामी जीवन पर निर्भर न रहना पड़े।

भारतीयों का सदैव से जीवन को सुन्दरतापूर्वक जीने का आदर्श रहा है। ऋषियों ने अपने सम्पूर्ण जीवन को साधना में लगाकर अपने अनुयायियों पर उन उपायों एवं आदर्शों को खोज-खोज कर अनुग्रह किया है, जिनके आधार पर जीवन को स्वर्ग सुख के साथ जीते हुए मोक्ष की प्राप्ति की जा सकती है। जब तक भारतवासी ऋषियों द्वारा निदिष्ट आदर्शों पर चलते रहे संसार में उनके लिए सफलता के द्वार खुले रहे। प्रत्येक व्यक्ति अपने में एक पूर्ण व्यक्तित्व बन कर निर्भय निर्द्वंद्व तथा श्रेयस्कर जीवन का अधिकारी बना रहा। उनको न कभी पराभव का मुख देखना पड़ा और न पराधीनता का। किन्तु जब वे प्रमाद आलस्य एवं अकर्मण्यतावश उन आदर्शों से गिर गये, उनको पराभूत एवं पराधीन होते देर न लगी। उनका राजनीतिक आर्थिक पराभव ही नहीं हुआ, आत्मा तक का पतन हो गया, जिससे वे आन्तरिक एवं बाह्य दोनों रूपों में दरिद्री तथा दयनीय बन गये। उनके जीवन का सारा रस सूख गया। जीवन का क्षण-क्षण काँटे की तरह कटु तथा असहनीय बन गया। उनके हृदय में एक अनुचित एवं असात्विक विरक्ति आ गई, जिससे जीवन के प्रति उदासीनता की ऐसी सम्भावना हो गई कि वे दीन-हीन पराधीन जीवन जीने में ही सन्तोष करके पड़ रहे। उत्साह, स्फूर्ति, साहस उल्लास एवं उन्नति की सारी विशेषताओं का हृास हो गया।

अब भारत से पराधीनता का अन्धकार दूर हो गया है। अवसर आ गया है कि हम सब ऋषि निर्दिष्ट आदर्शों को अपने जीवन में पुनः जाग्रत करें, उन उपायों एवं आचरणों को अपनाएं, जो जीवन की सार्थकता में सहायक होते हैं। ऋषियों द्वारा निर्दिष्ट जीवन पद्धति में आत्मा एवं शरीर लोक तथा परलोक दोनों का समन्वय है। जैसा कि कुछ लोगों का विचार रहता है कि वेद केवल पारलौकिक जीवन का ही निर्देश करते हैं और लोक जीवन के प्रति मौन हैं- गलत है। वेदों में इस लौकिक जीवन की सफलता को ही माध्यम बना कर पारलौकिक पूर्णता का आदर्श स्थापित किया गया है। धन, धान्य सदाचरण गुण एवं सत्प्रवृत्तियाँ ही वे आधार हैं, जिनकी सहायता से इहलोक तथा परलोक दोनों को सफल एवं सार्थक बनाया जा सकता है। ऋषियों ने लोक परलोक के भिन्न-भिन्न आदर्श स्थापित नहीं किये हैं। उन्होंने जहाँ धन-धान्य के उपार्जन पर बल दिया है, वहाँ सदाचरण की भी शिक्षा दी है जिससे लौकिक एवं दोनों जीवनों का एक साथ अनुरंजन होता है। कहा गया है-

“परि चिन्त मर्तो द्रविणं ममन्याद्

ऋतस्य पथा नमसा विरोसेत।”

मनुष्य को धन की चिन्ता करनी चाहिये। किन्तु उसे सन्मार्ग से ही प्राप्त करने का प्रयत्न करना और साथ-साथ देवाराधन भी करते रहना चाहिए।

असत्मार्ग से कमाया हुआ धन कालान्तर में मनुष्य की आत्मा का पतन तो कर ही देता है, समाज में ईर्ष्या, द्वेष, स्वार्थ एवं अपकर्मों को जन्म भी देता है जिससे उसकी शाँति भंग होती है और अच्छे-बुरे प्रत्येक व्यक्ति को उससे प्रभावित होना पड़ता है।

धन वृद्धि किसी भी समय भी मनुष्य में प्रमाद उत्पन्न कर सकता है। इस सम्भावना से सावधान रहने के लिये वेदों में सदाचार में निरत रहने का निर्देश किया गया है।

“अक्षैर्मा दीव्यः कृषिमित् कृषस्व

वित्ते समस्व बहु मन्यमानः।

तत्र गावः कितब तत्र जाया

तन्मे विचष्टे सवितायमर्यः”

जुआ मत खेलो, अपने खेतों को जोतो और बोओ। महत्वपूर्ण जान कर धन से आनन्दित हो, अपनी स्त्री और गायों की रक्षा की चिंता करो, यह सवितादेव का आदेश है। ईश्वर के ध्यान के साथ इहलौकिकता का- घर और खेती-बारी का यह कितना सुन्दर आदर्श है और वित्ते समस्व में कितनी व्यावहारिकता है।


Quotation

मनुष्य का सच्चा जीवन तब प्रारम्भ होता है जब वह यह अनुभव करता है कि शारीरिक जीवन अस्थिर है और वह संतोष नहीं दे सकता।

अपने जीवन को समय के किनारे पर पत्ती पर पड़ी हुई ओस की भाँति हलके-हलके नाचने दो।

जीवन के युद्ध में चोटें और आघात बरदाश्त करने से ही उसमें विजय प्राप्त होती है, उसमें आनन्द आता है।

-रवीन्द्र

मनुष्य जीवन को सुन्दर और सार्थक बनाने के लिये वेदों के ओज तेजपूर्ण आदर्शों को जीवन में उतारना ही होगा। असुन्दर अथवा निःसार जीवन जीना एक आध्यात्मिक अपराध है जिससे बचना प्रत्येक विचारशील मनुष्य का परम कर्तव्य है। लौकिक जीवन की सार्थकता ही पारलौकिक जीवन की सफलता की भूमिका है। उदासीन अथवा अकर्मण्य जीवन जीने के आदी लोगों को वेदों के दिव्य संदेशों का अनुकरण कर उदात्त जीवन के साथ समाज व राष्ट्र के लिए हितकारी बन कर मनुष्यता के मान का प्रतिपादन करना ही चाहिये।


विचार शक्ति का जीवन पर प्रभाव

विचार यद्यपि अगोचर होते हैं, किन्तु उनका प्रभाव गोचरता की पृष्ठभूमि पर स्पष्ट प्रकट होता रहता है, विचारों के प्रतिबिम्ब को प्रकट होने से रोका नहीं जा सकता। अविचारी व्यक्ति कितने ही सुन्दर आवरण अथवा आडम्बर में छिपकर क्यों न रहे किन्तु उसकी अविचारिता उसके व्यक्तित्व में स्पष्ट झलकती है।

नित्यप्रति के सामान्य जीवन का अनुभव इस बात का साक्षी है। बहुत बार हम किन्हीं ऐसे व्यक्तियों के संपर्क में आ जाते हैं जो सुन्दर वेश-भूषा के साथ-साथ सूरत शकल से भी बुरे और भद्दे नहीं होते, तब भी उनको देख कर हृदय पर अनुकूल प्रतिक्रिया नहीं होती। यदि हम यह जानते हैं कि हम बुरे आदमी नहीं हैं। और इस प्रतिक्रिया के पीछे हमारी विरोध भावना अथवा पक्षपाती दृष्टिकोण सक्रिय नहीं है तो मानना पड़ेगा कि वे अच्छे विचार वाले नहीं हैं। उनका हृदय उस प्रकार स्वच्छ नहीं है जिस प्रकार बाह्य वेष। इसके विपरीत कभी-कभी ऐसा व्यक्ति संपर्क में आ जाता है जिसका बाह्य वेष न तो सुन्दर होता है और न उसका व्यक्तित्व ही आकर्षक होता है तब भी हमारा हृदय उससे मिल कर प्रसन्न हो उठता है उससे आत्मीयता का अनुभव होता है। इसका अर्थ यही है कि वह आकर्षण बाह्य का नहीं अन्तर का है, जिसमें सद्भावनाओं तथा सद्विचारों के फूल खिले हुए हैं।

इस विचार प्रभाव को इस प्रकार भी समझा जा सकता है कि जब एक सामान्य पथिक किसी ऐसे मार्ग से गुजरता है जहाँ पर अनेक मृगछौने खेल रहे हों, सुन्दर पक्षी कल्लोल कर रहे हों तो वे जीव उसे देख कर सतर्क भले हो जाय और उस अजनबी को विस्मय से देखने लगें किन्तु भयभीत कदापि नहीं होते। किन्तु यदि उसके स्थान पर जब कोई शिकारी अथवा गीदड़ आता है तो वे जीव भय से त्रस्त होकर भागने और चिल्लाने लगते हैं। वे दोनों ऊपर से देखने में एक जैसे मनुष्य ही होते हैं किन्तु विचार के अनुसार उनके व्यक्तित्व का प्रभाव भिन्न-भिन्न होता है।

कितनी ही सज्जनोचित वेशभूषा में क्यों न हो, दुष्ट दुराचारी को देखते ही पहचान लिया जाता है। साधु तथा सिद्धों के वेश में छिप कर रहने वाले अपराधी अनुभवी पुलिस की दृष्टि से नहीं बच पाते और बात की बात में पकड़े जाते हैं। उनके हृदय का दुर्भाव उसका सारा आवरण भेद कर व्यक्तित्व के ऊपर बोलता रहता है।

जिस प्रकार के मनुष्य के विचार होते हैं वस्तुतः वह वैसा ही बन जाता है। इस विषय में एक उदाहरण बहुत प्रसिद्ध है। बताया जाता है कि भृंगी पतंग झींगुर को पकड़ लाता है और बहुत देर तक उसके सामने रह कर गुँजार करता रहता है यहाँ तक कि झींगुर उसे देखते-देखते बेहोश हो जाता है। उस बेहोशी की दशा में झींगुर की विचार परिधि निरन्तर उस भृंगी के स्वरूप तथा उसकी गुँजार से घिरी रहती है जिसके फलस्वरूप वह झींगुर भी निरन्तर विचार तन्मयता के कारण कुछ समय में भृंगी जैसा ही बन जाता है। इसी भृंगी तथा कीट के आधार पर आदि कवि वाल्मीकि ने सीता और राम के प्रेम का वर्णन करते हुए एक बड़ी सुन्दर उक्ति अपने महाकाव्य में प्रस्तुत की है।

उन्होंने लिखा कि सीता ने अशोक वाटिका की सहचरी विभीषण की पत्नी सरमा से एक बार कहा- सरमे! मैं अपने प्रभु राम का निरन्तर ध्यान करती रहती हूँ। उनका स्वरूप प्रतिक्षण मेरी विचार परिधि में समाया रहता है। कहीं ऐसा न हो कि भृंगी और पतंग के समान इस विचार तन्मयता के कारण मैं राम रूप ही हो जाऊँ और तब हमारे दाम्पत्य जीवन में बड़ा व्यवधान पड़ जायेगा। सीता की चिन्ता सुनकर सरमा ने हंसते हुए कहा- “देवी! आप चिन्ता क्यों करती हैं। आपके दाम्पत्य-जीवन में जरा भी व्यवधान नहीं पड़ेगा। जिस प्रकार आप भगवान राम के स्वरूप का विचार करती रहती हैं उसी प्रकार राम भी तो आप के रूप का चिन्तन करते रहते हैं। इस प्रकार यदि आप राम बन जाएंगी तो राम सीता बन जायेंगे। इससे दांपत्य जीवन में क्या व्यवधान पड़ सकता है ? परिवर्तन केवल इतना होगा कि पति पत्नी और पत्नी-पति बन जायगी।” इस उदाहरण में कितना सत्य है नहीं कहा जा सकता, किन्तु यह तथ्य मनोवैज्ञानिक आधार पर पूर्णतया सत्य है कि मनुष्य जिन विचारों का चिन्तन करता रहता है उनके अनुरूप ही बन जाता है। इसी संदर्भ से एक पौराणिक आख्यान में एक गुरु ने अपने एक अविश्वासी शिष्य की शंका दूर करने के लिये उसे प्रायोगिक प्रमाण दिया उन्होंने उस शिष्य को बड़े-बड़े सींगों वाला भैंसा दिखा कर कहा कि इसका यह स्वरूप अपने मन पर अंकित करके और इस कुटी में बैठकर निरन्तर उसका ध्यान तब तक करता रह जब तक वे उसे पुकारे नहीं। निदान शिष्य कुटी में बैठा हुआ बहुत समय तक उस भैंसे का और विशेष प्रकार से उसके बड़े-बड़े सींगों का स्मरण करता रहा। कुछ समय बाद गुरु ने उसे बाहर निकलने के लिये आवाज दी। शिष्य ने ज्यों ही खड़े होकर दरवाजे में शिर डाला कि वह अटक कर रुक गया। ध्यान करते-करते उसके सिर पर उसी भैंसे की तरह बड़े बड़े सींग निकल आये थे। उसने गुरु को अपनी विपत्ति बतलाई और कृपा करने की प्रार्थना की। तब गुरु ने उसे फिर आदेश दिया कि वह कुछ समय उसी प्रकार अपने स्वाभाविक स्वरूप का चिंतन करे। निदान उसने ऐसा किया और कुछ समय में उसके सींग गायब हो गये।

आख्यान भले ही सत्य न हो किन्तु उसका निष्कर्ष अक्षरशः सत्य है कि मनुष्य जिस बात का चिन्तन करता रहता है, जिन विचारों में प्रधानतया तन्मय रहता है वह उसी प्रकार का बन जाता है।

दैनिक जीवन के सामान्य उदाहरणों को ले लीजिये। जिन बच्चों को भूत−प्रेतों की काल्पनिक कहानियाँ तथा घटनाएं सुनाई जाती रहती हैं वे उनके विचारों में घर कर लिया करती हैं और जब कभी वे अंधेरे उजाले में अपने उन विचारों से प्रेरित हो जाते हैं तो उन्हें अपने आस-पास भूत प्रेतों का अस्तित्व अनुभव होने लगता है जबकि वास्तव में वहाँ कुछ होता नहीं है। उन्हें परछाइयों तथा पेड़ पौधों तक में भूतों का आकार दिखलाई देने लगता है। यह उनके भूतात्मक विचारों की ही अभिव्यक्ति होती है। जो उन्हें दूर पर भूतों के आकार में दिखलाई देती है। अंध विश्वासियों के विचार में भूत प्रेतों का निवास होता है और उसी दोष के कारण वे कभी-कभी खेलने-कूदने और तरह-तरह की हरकतें तथा आवाजें करने लगते हैं। यद्यपि उन्हें ऐसा लगता है कि उन्हें किसी भूत अथवा प्रेत ने दबा लिया है। किन्तु वास्तविकता यह होती है कि उनके विचारों का विकार ही अवसर पाकर उनके सिर चढ़ कर खेलने लगता है। किसी दुर्बुद्धि अथवा दुर्बलमना व्यक्ति का जब यह विचार बन जाता है कि कोई उस पर, उसे मारने के लिये टोना कर रहा है तब उसे अपने जीवन का ह्रास होता अनुभव होने लगता है। जितना-जितना यह विचार विश्वास में बदलता जाता है। उतना-उतना ही वह अपने को क्षीण दुर्बल तथा रोगी पाता जाता है। अन्त में ठीक-ठीक रोगी बन कर एक दिन मर तक जाता है। जबकि चाहे उस पर कोई टोना किया जा रहा होता है अथवा नहीं। फिर टोना आदि में उनके प्रेत पिशाचों में वह शक्ति कहाँ जो जीवन-मरण के ईश्वरीय अधिकार को स्वयं ग्रहण कर सकें। यह और कुछ नहीं तदनुरूप विचारों की ही परिणति होती है।

मनुष्य के आन्तरिक विचारों के अनुरूप ही बाह्य परिस्थितियों का निर्माण होता है। उदाहरण के लिये किसी व्यापारी को ले लीजिए। यदि वह निर्बल विचारों वाला है और भय तथा आशंका के साथ खरीद फरोख्त करता है, हर समय यही सोचता रहता है कि कहीं घाटा न हो जाये, कहीं माल का भाव न गिर जाये, कोई रद्दी माल आकर न फंस जाये, तो मानो उसे अपने काम में घाटा होगा अथवा उसका दृष्टिकोण इतना दूषित हो जायेगा कि उसे अच्छे माल में भी त्रुटि दिखने लगेगी, ईमानदार आदमी बेईमान लगने लगेंगे और उसी के अनुसार उसका आचरण बन जायेगा जिससे बाजार में उसकी बात उठ जायेगी। लोग उससे सहयोग करना छोड़ देंगे और वह निश्चित रूप से असफल होगा और घाटे का शिकार बनेगा। अशुभ विचारों से शुभ परिणामों की आशा नहीं की जा सकती।

कोई मनुष्य कितना ही अच्छा तथा भला क्यों न हो यदि हमारे विचार उसके प्रति दूषित हैं, विरोध अथवा शत्रुतापूर्ण हैं तो वह जल्दी ही हमारा विरोधी बन जायेगा। विचारों की प्रतिक्रिया विचारों पर होना स्वाभाविक है। इसको किसी प्रकार भी वर्जित नहीं किया जा सकता। इतना ही नहीं यदि हमारे विचार स्वयं अपने प्रति ओछे अथवा हीन हो जाएं, हम अपने को अभागा एवं अक्षम चिन्तन करने लगें तो कुछ ही समय में हमारे सारे गुण नष्ट हो जायेंगे और हम वास्तव में दिन-हीन और मलीन बन जायेंगे। हमारा व्यक्तित्व प्रभावहीन हो जायेगा जो समाज में व्यक्त हुए बिना बच नहीं सकता।

जो आदमी अपने प्रति उच्च तथा उदात्त विचार रखता है अपने व्यक्तित्व का मूल्य कम नहीं आँकता उसका मानसिक विकास सहज ही हो जाता है। उसका आत्मविकास आत्मनिर्भरता और आत्मगौरव जाग उठता है। इसी गुण के कारण बहुत से लोग जो बचपन से लेकर यौवन तक दब्बू रहते हैं आगे चल कर बड़े प्रभावशाली बन जाते हैं। जिस दिन से आप किसी दब्बू डरपोक तथा साहसहीन व्यक्ति को उठ कर खड़े होते और आगे बढ़ते देखें, समझ लीजिये कि उस दिन से उसकी विचारधारा बदल गई और अब उसकी प्रगति कोई रोक नहीं सकता।

विचारों के व्यक्ति निर्माण में बड़ी शक्ति होती है। विचारों का प्रभाव कभी व्यर्थ नहीं जाता। विचार परिवर्तन के बल पर असाध्य रोगियों को स्वस्थ तथा मरणासन्न व्यक्तियों को नया जीवन दिया जा सकता है। यदि आपके विचार अपने प्रति अथवा दूसरे के प्रति ओछे, तुच्छ तथा अवज्ञापूर्ण हैं तो उन्हें तुरन्त ही बदल डालिये और उनके स्थान पर ऊंचे तथा उदात्त तथा यथार्थ विचारों का सृजन कर लीजिए। वह विचार-कृषि आपके चिन्ता-निराशा अथवा पराधीनता के अन्धकार से, भरे जीवन को हरा-भरा बना देगी। थोड़ा-सा अभ्यास करने से यह विचार परिवर्तन सहज में ही लाया जा सकता है। अपने व्यक्तित्व को प्रखर तथा उज्ज्वल बनाने के लिए भजन-पूजन के समान ही थोड़ा बैठ कर एकाग्र मन से इस प्रकार आत्म-चिन्तन करिये और देखिये कि कुछ ही दिन में आपमें क्राँतिकारी परिवर्तन दृष्टिगोचर होने लगेगा।

विचार कीजिए-”मैं सच्चिदानन्द परमात्मा का अंश हूँ। मेरा उससे अविच्छिन्न सम्बन्ध है। मैं उससे कभी दूर नहीं होता और न वह मुझसे ही दूर रहता है। मैं शुद्ध-बुद्ध और पवित्र आत्मा हूँ। मेरे कर्तव्य भी पवित्र तथा कल्याणकारी हैं उन्हें मैं अपने बल पर आत्म-निर्भर रह कर पूरा करूंगा। मुझे किसी दूसरे का सहारा नहीं चाहिये, मैं आत्म-निर्भर, आत्म-विश्वासी और प्रबल माना जाता हूँ। असद् तथा अनुचित विचार अथवा कार्यों से मेरा कोई सम्बन्ध नहीं है और न किसी रोग दोष से ही मैं आक्राँत हूँ। संसार की सारी विषमतायें क्षणिक हैं जो मनुष्य की दृढ़ता देखने के लिये आती हैं। उनसे विचलित होना कायरता है। धैर्य हमारा धन और साहस हमारा सम्बल है। इन दो के बल पर बढ़ता हुआ मैं बहुत से ऐसे कार्य कर सकता हूँ जिससे लोक मंगल का प्रयोजन बन सके। आदि आदि।

इस प्रकार के उत्साही तथा सदाशयतापूर्ण चिन्तन करते रहने से एक दिन आपका अवचेतन प्रबुद्ध हो उठेगा आपकी सोई शक्तियाँ जाग उठेंगी, आपके गुण कर्म स्वभाव का परिष्कार हो जायेगा और आप परमार्थ पथ पर, उन्नति के मार्ग पर अनायास ही चल पड़ेंगे और तब न आपको चिन्ता, न निराशा और न असफलता का भय रहेगा और न लोक-परलोक की कोई शंका। उसी प्रकार शुद्ध-बुद्ध तथा पवित्र बन जायेंगे जिस प्रकार के आपके विचार होंगे और जिनके चिन्तन को आप प्रमुखता दिए होंगे।


Quotation

वृद्धावस्था में बाल बूढ़े होकर सफेद हो जाते हैं, दाँत टूट जाते हैं। आँख और कान जीर्ण हो जाते हैं, पर एक तृष्णा ऐसी है, जो तरुणी ही बनी रहती है।

-अज्ञात


यज्ञमय जीवन ही मनुष्य जीवन की सार्थकता

सहयज्ञाः प्रजाः सृष्टवा पुरोवाच प्रजापतिः।

अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक्॥

-गीता अध्याय 3 श्लोक 10

सृष्टि के आदि काल में ब्रह्माजी ने अन्य जीवधारियों की तरह मनुष्य को भी सिरजा। पृथ्वी पर आकर मनुष्य ने पशु-पक्षियों और वन्य जीवधारियों के क्रिया-कलापों का अनुकरण किया। पशुओं की तरह हो वह केवल अपने पेट की चिन्ता करता था, परस्पर लड़ने वाले पशुओं की तरह उसे भी हिंसा में अधिक रुचि थी, बलवान कमजोर को हड़प लेता था, कमजोर दूसरे की चोरी कर लेता था। इन पाशविक गुणों के कारण मनुष्य की बड़ी दुर्दशा हुई, वह बहुत हैरान हुआ। निदान पितामह ब्रह्माजी के पास लौट कर शिकायत की- महाभाग! आपने हमें जीवन क्या दिया, इसमें तो कष्ट ही कष्ट, दुःख ही दुःख, पीड़ाएं ही पीड़ाएं हैं।

ब्रह्माजी काफी देर तक विचार करते रहे। उन्हें दुःख और आश्चर्य इस बात का था कि मनुष्य को वह सब कुछ दिया जो किसी भी पार्थिव प्राणी को उपलब्ध नहीं। उस जैसा सुन्दर शरीर किसी के पास नहीं, किसी जीव में इतनी बुद्धि नहीं, जितनी मनुष्य को दी। चाहे तो सुख के साधनों से धरती को पाट दे, उसे खुल कर बोलने और विचार करने की सामर्थ्य दी। उसे सर्व-समर्थ और भोग करने वाली सुन्दर इन्द्रियाँ दीं, उनके साधन दिये, मेरे पास जो कुछ भी सर्वोत्तम पदार्थ थे वह सब मनुष्य को दिये। फिर भी वह सुखी क्यों नहीं?

ब्रह्माजी ने विचार किया और कारण जाना। उन्होंने मनुष्य को बुला कर कहा पुत्र मैंने तेरे साथ ही यज्ञ को उत्पन्न किया है। जाओ तुम यज्ञ करो, उससे फलोगे, सुखी और सन्तुष्ट रहोगे। जब तक तुम इसे अपनाये रहोगे, अपने भीतर और बाहर ओत-प्रोत किये रहोगे तब तक तुम्हारा कल्याण होगा।

सुखी, सन्तुष्ट एवं समुन्नत जीवन के लिए ब्रह्माजी ने जिस यज्ञ, तप की प्रतिष्ठा की, अग्निहोत्र उसका प्रतीक है। हव्य, घृत जौ, तिल, चावल आदि पुष्टिकारक अन्न और सुगन्धित औषधियाँ अग्नि में डालते हैं। अग्नि इन स्थूल पदार्थों को गैस में बदल देती है। गैस की शक्ति स्थूल पदार्थों की अपेक्षा अनन्त गुनी अधिक मानी गई है। पवन उस सुगन्ध और पुष्टता को सर्वत्र फैला देता है। जिससे तमाम जीवधारियों का भी कल्याण होता है।

यज्ञ को यदि बाह्य प्रतीक माना जाय तो उसकी अन्तरंग प्रेरणा को परमार्थ मानना पड़ेगा। अर्थात् परोपकार की भावना से ही यज्ञ किया जाता है। मेरे पास जो कुछ है वह अग्नि वायु के माध्यम से समस्त सृष्टि के प्राणियों में बंट जाय, सब उसका उपभोग करें यह विशुद्ध परमार्थ भाव है। इसी अनुपात में उसका मूल्य और महत्व स्थूल की अपेक्षा बहुत अधिक है।

अपनी प्रिय वस्तुओं का उपभोग आप न करके उसे विश्व कल्याण के लिये निःस्वार्थ होम देते हैं। उससे सन्तुष्ट हुये जीव, वनस्पतियाँ, पर्जन्य आदि भी मनुष्य के लिये अनुकूल परिस्थितियाँ जुटाते रहते हैं। और मनुष्य आरोग्य, सुख-साधन, फल-फूल, धन-धान्य आदि नाना प्रकार की वस्तुएं पाता और आनन्दित होता है।

स्थूल यज्ञ के लाभ ही असंख्य है। गीता कहती हैं-

अन्नादि भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसंभवः।

यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः॥

“अन्न से भूत प्राणियों की उत्पत्ति होती है। अन्न वर्षा से उत्पन्न होता है। वर्षा यज्ञ से होती है। यज्ञ सत्कर्मों से उत्पन्न होता है। सत्कर्मों का ही दूसरा नाम यज्ञ है।”

इस श्लोक में यज्ञ के लाभों का दिग्दर्शन कराया गया है और उसके मूल पर भी प्रकाश डाल दिया गया है। सत्कर्म ही यज्ञ हैं। अग्निहोत्र उसका प्रतीक है। प्रतीक इतना लाभदायक हो सकता है तो उसमें अन्तर्निहित मूल भावना का लाभ तो अनन्त गुना होना चाहिये।

यह बात जीवन के किसी भी क्षेत्र में चरितार्थ देखी जा सकती है। मनुष्य जीवन के सुखों का मूल सत्कर्म है। एक दूसरे की सेवा, सहानुभूति, पोषण, रक्षण, प्रेम, दया, करुणा, उदारता, त्याग, आदि सद्गुणों का जितने अंशों में व्यवहार करता है उसके अनुरूप ही वह दूसरों की आत्मीयता, स्नेह, सहयोग और सच्ची सहानुभूति प्राप्त करता है। सुख के यथार्थ आधार ही यही हैं।

धन हो, सम्पत्ति हो, शरीर भी सुन्दर और स्वस्थ हो पर उससे कोई प्रेम करने वाला न हो, कोई दया करने वाला, सहयोग करने वाला न हो तो उसका जीवन, शुष्क नीरस और निष्प्राण सरीखा व्यतीत ही होगा। यह लाभ मनुष्य को तब मिलते हैं जब वह स्वयं भी दूसरों के साथ वैसा ही व्यवहार करता है। हमें दूसरा व्यक्ति उतना ही प्रेम करता है जितना हम उसे करते हैं।

परिवार को ही लीजिये। धर्मपत्नी, बच्चे, छोटे भाई, छोटी बहनें कमाई की दृष्टि से अनुपयोगी होते हैं। फिर भी उनका प्रतिपालन प्रेम, स्नेह, करुणा, दया और उदारता के साथ उससे भी अधिक किया जाता है। जितना मनुष्य अपने आपका नहीं करता। आगे चल कर जब वही व्यक्ति बुड्ढा हो जाता है तो बालकों की वह पूर्व कृतज्ञता ही उस पर बरसती है और वह अक्षम स्थिति में भी शानदार जिन्दगी बिता लेता है। यही ब्रह्म यज्ञ है।

मनुष्य अपनी शक्तियों का उपयोग परमार्थ के लिए जितना अधिक करेगा उसका प्रतिफल भी वह उतना ही अधिक पायेगा।

सामान्यतः सत्कर्मों का एक क्षेत्र परिवार मान लिया गया है। पर मनुष्य की शारीरिक और बौद्धिक शक्ति और सामर्थ्य को देखते हुए वह सीमा बिलकुल छोटी है। परमात्मा ने मनुष्य को जो विभूतियाँ और विशेषतायें दी हैं। वह इस बात के लिए हैं कि वह सृष्टि के अन्य अबोध जीवनधारियों के रक्षा, उत्पाद और विकास की बात सोचे। सत्कर्मों का दायरा व्यक्ति के रुधिर सम्बन्धों तक ही न रह कर समस्त मानव जाति और प्राणधारियों के लिए ही होना चाहिए। मनुष्य को उपलब्ध हुई विभूतियाँ इन्हीं ईश्वरीय प्रयोजनों की पूर्ति में व्यय होनी चाहिएं। जो व्यक्ति ईश्वर की भाँति ही उसकी सृष्टि को सुखी एवं सुन्दर बनाने में अपने अस्तित्व, योग्यता, शक्ति, साधन और सामर्थ्य सौंपते रहते हैं वे मनुष्य जीवन के संयोग को सार्थक करते और आत्म कल्याण का लाभ पाते हैं।

यदि ऐसा न किया जाए तो मनुष्य से बढ़ कर और कोई कृतघ्न न होगा। हमें इस संसार में जो कुछ प्राप्त है वह यज्ञ का प्रसाद ही है। अर्थात् दूसरों ने वह वस्तुएं उदारतापूर्वक हमारे लिए दान की हैं तभी हम आज भी समुन्नत स्थिति में खड़े हुए हैं। पिता ने वीर्य और माँ ने अपना रज, रक्त, माँस एवं पोषण देकर हमें अवतीर्ण किया, गुरुजन, शिक्षकगण ज्ञान देते हैं, वह पुस्तकें जो हम पढ़ते हैं। सैंकड़ों लोगों के श्रम और सहयोग से बनी है। उन्होंने इन वस्तुओं के बनाने में अपनी शक्ति और समय न लगाया होता तो वह हमें कहाँ से मुहैया होती? हमारे कपड़े हमारा अन्न हमारा निवास सब दूसरों के प्रत्युपकारों के मूर्तिकार स्वरूप हैं। जिस भावना से वह हमारे लिए उपलब्ध की गई हैं वही भावना और उदारता हम दूसरे के लिए व्यक्त न करें तो हम चोर ही कहे जायेंगे। स्वार्थ और परमार्थ के समन्वय से ही जीवन की पूर्णता का तालमेल बैठता है केवल स्वार्थ ही स्वार्थ का ध्यान रखा जाए तो मनुष्य जीवन अपूर्ण माना जायेगा। यही नहीं उसको सब ओर से निन्दा, भर्त्सना, असहयोग के दुष्परिणाम भी भुगतने पड़ रहे होंगे और वह निश्चय ही दुःखी भी होगा। संग्रही, स्वार्थी, तृष्णाएं जिनकी कभी शाँत नहीं होती जो दूसरों की बात कभी मन में भी नहीं लाते वे कभी सुखी नहीं रह सकते। उनके पीछे सैंकड़ों अड़ंगे, असहयोग, संघर्ष और अशाँति के क्षण जुड़े हुए होंगे।

इन दुःखों से छुटकारा पाने का एकमात्र उपाय यज्ञीय जीवन ही है। अग्निहोत्र तो उसका प्रतीक है, उसका ही महत्व है पर मूल बात यह है कि मनुष्य को त्यागी, परमार्थी और परोपकारी होना चाहिये। सत्कर्मों के द्वारा उसे अपनी उन्नति करनी चाहिये और अपनी योग्यता के द्वारा दूसरों की सुख, शाँति और सुविधाएं बढ़ाने में भी पूरा-पूरा सहयोग करना चाहिये।

इस मन्त्र में गीतकार ने इन्हीं तथ्यों को सूत्रबद्ध करते हुये कहा है- प्रजापति ने पहले यज्ञ सहित प्रजा को रचकर कहा- इस यज्ञ से तुम फलो-फूलो, यह यज्ञ ही तुम्हारी अभीष्ट कामनाओं को पूर्ण करेगा।


ते सज्जन मन प्रान-प्रिय

यह तो केवल लौकिक रीति है कि लोग सौंदर्य, धन सम्पत्ति और साँसारिक वैभव पर रीझते हैं। परमात्मा की नीति उससे भिन्न है। वह केवल गुणों से प्यार करते हैं। स्थूल साधनों से की गई थोड़ी सी स्तुति और साधना से मनुष्य जीता जा सकता है। देवता मनाये जा सकते हैं किन्तु परमात्मा का प्यार केवल गुणी और संतत सदाचारी व्यक्ति को मिलता है। सद्गुणी व्यक्ति बिना किसी तप साधना के भी परमात्मा को जीत लेते हैं और उसके प्राणप्रिय बन जाते हैं।

इस तथ्य को रामायण विशद् विस्तार के साथ गाती है, अरण्य काण्ड में नारद के पूछने पर भगवान राम बताते हैं- मुझे इन गुणों से सम्पन्न व्यक्ति भाते हैं-

निज गुण श्रवण सुनत सकुचाहीं।

परगुण सुनत अधिक हरषाहीं॥

सम सीतल नहिं त्यागहिं नीति।

सरल सुभाव सबहिं सन प्रीति॥

जप तप व्रत संयम अरु नेमा।

गुरु गोविन्द विप्र पद प्रेमा॥

श्रद्धा क्षमा मयत्री दाया।

मुदिता मम पद प्रीति अमाया॥

विरति विवेक विनय विज्ञाना।

बोध जथारथ वेद पुराना॥

दंभ मान पद करहिं न काऊ।

भूलि न देहिं कुमारग पाऊ॥

गावहिं सुनहिं सदा मम लीला।

हेतु रहित पर हित रत सीला॥

इन चौपाइयों में भगवान ने साधना उपासना की उपयोगिता तो बताई है, पर यह भी स्पष्ट कर दिया है कि मुझे पाने के लिये श्रद्धा, विश्वास, संयम, विरति, विनयशीलता, प्रसन्नता और सरल स्वभाव आदि गुणों का आविर्भाव भी आवश्यक है।

गुणों के प्रति अपने अपार प्रेम की पुष्टि करते हुए वह उत्तर काण्ड में भरत से बताते हैं-

विषय, अलंपट सील गुनाकर।

पर दुःख दुःख सुख सुख देखे पर॥

सम अभूतरिपु विमद विरागी।

लोभामरष हरष भय त्यागी।।

कोमल चित्त दीनन पर दाया।

मन बच क्रम मम भगति अमाया॥

सबहिं मान प्रद आप अमानी।,

भरत प्राण सम मम ते प्राणी॥

विगत काम मम नाम परायन।

साँति विरति विनती मुदितायन।।

सीतलता सरलता मयत्री।

द्विजपद प्रीति धर्म जनयत्री॥

सम दम नियम नीति नहिं डोलहिं।

परुष बचन कबहूँ नहिं बोलहिं॥

दोहा-

निंदा स्तुति उभय सम ममता मम पदकंज।

ते सज्जन मम प्रानप्रिय गुन मंदिर सुखपुँज॥

कामी संयमी, शीलवान् जो दूसरों के दुःख में दुःखी सुखी होते हैं, शत्रु मित्र में पक्षपात न करने वाले, अभिमान रहित लोभ लालच रहित विनयी, दयावान, मन, वचन और कर्म से ईश्वरनिष्ठ, दूसरों को बड़प्पन देकर स्वयं छोटे बने रहने वाले, शाँत, सरल विनयशील, विश्वमित्र, ज्ञानवानों के प्रति श्रद्धा है जिनके अन्तःकरण में, विषय विकारों के दमन में जिनकी रुचि है, भूलकर भी जो अनीति की राह पर पग नहीं धरते, कठोर शब्द नहीं बोलते, हे भरत! ऐसे सज्जन व्यक्ति मुझे अपने प्राणों से भी अधिक प्रिय हैं।

इसी बात को इस तरह कहा जाय तो भी ठीक ही है कि ईश्वरीय विभूति की इच्छा करने वाले प्रत्येक साधक को, जिज्ञासु को उपासना, तज की तरह गुणों के परिष्कार की साधना अनिवार्य रूप से करनी चाहिये। गुण रहित उपासना कभी किसी की फलित नहीं हो सकती पर उपासना रहित गुण मनुष्य की जीवात्मा को ऊर्ध्वगामी बना सकते हैं। उसे स्वर्ग और मुक्ति के पद पर प्रतिष्ठित कर सकते हैं।

लौकिक दृष्टि से भी ऐसे व्यक्ति घाटे में नहीं रहते। वह संसार को उसी प्रकार प्रकाश देते हैं जिस तरह रात की अंधियारी को मिटाकर भोर की पौ फूटती है। उनकी सर्वत्र प्रशंसा और प्रतिष्ठा होती है, गुणी व्यक्ति सबको प्यारे लगते हैं। बालकाण्ड में गोस्वामी तुलसीदास जी लिखते हैं-

साधु चरित सुभ चरित कपासू।

निरस बिसद गुनमय फल जासू॥

जो सह दुःख पर छिद्र दुरावा।

वंदनीय तेहि जगजस पावा॥

काकभुसुण्डि जी के प्रश्न करने पर उत्तर काण्ड में इस की पुष्टि और भी खुल कर हुई -

पर उपकार बचन मन काया।

संत सहज सुभाव खगराया॥

संत सहहिं दुःख परहित लागी।

पर दुःख हेतु असन्त प्रभागी।

संत हृदय संतत सुखकारी।

विश्व सुखद जिमि इन्दु तमारी।

दुर्गुणों में सने लोग तो अपनी शक्यों सामर्थ्यों को कुँठित कर लेते हैं। सामाजिक प्रतिष्ठा से तो गिरते ही हैं उनकी अपनी दलित आत्मा ही इतना बोझ बन जाती है कि यह शरीर जो विश्वात्मा की अनुभूति के लिये महामन्त्र के रूप में मिला है, भार हो जाता है। यह बात सज्जन पुरुषों के लिये नहीं। अरण्यकाण्ड में राम नारद जी से कहते हैं-

षट विकार जित अनघ अकामा।

अचल अकिंचन शुचि सुख धामा॥

अमित बोध अनीह मित भोगी।

सत्यसार कवि कोविद योगी॥

सावधान मानद मद हीना।

धीर धर्मगति परम प्रवीना॥

गुनागार संसार दुःख रहित विगत संदेह।

तजि मम चरन सरोज प्रिय तिन्ह कहुँ देह न गेह॥

रामायण भी कहती है कि ऐसे गुणी व्यक्तियों का सान्निध्य जिसे मिल जाये उसे अपने ऊपर परमात्मा की कृपा ही समझनी चाहिए और प्रयत्नपूर्वक उनके सत्संग का लाभ उठाना चाहिए-

संत विटप सरिता गिरी धरनी।

पर हित हेतु सबन्ह कै करनी॥

संत हृदय नवनीत समाना।

कहा कविन्ह परि कहैं न जाना॥

निज परिताप द्रवइ नवनीता।

पर दुःख द्रवहिं सन्त सुपुनीता॥

गिरजा सन्त समागम सम न लाभ कछु आन।

बिनु हरि कृपा न होइ सो गावहिं वेद पुरान॥

लोगों का यह तर्क है कि संसार में संत सज्जन लोग ठगे जाते हैं और असंत, धूर्त लोग मौज उड़ाते हैं, यह तथ्य कसौटी पर खरा नहीं उतरता। गुणी व्यक्ति न तो कभी अभावग्रस्त रहता है, न ठगा जा सकता है । अन्ततः वह धरती के स्वर्गीय सुखों का भी उपभोग करता है। बालकाण्ड में एक प्रसंग आता है। विश्वामित्र जी श्री राम और लक्ष्मण को दशरथ जी से दुष्टों के विनाश और सत्कर्मों की रक्षा के लिये माँग ले गये। सब जानते थे कि निशाचरों के साथ संघर्ष में राम और लक्ष्मण को कष्ट होगा, पर तो भी उन्होंने परोपकार व परमार्थ का पथ नहीं त्यागा । राम ने असुरों को भगाकर यज्ञों की रक्षा की। उधर जनकपुरी में भी उन्हें धनुष भंग का यश मिला और सीता जी के साथ विवाह हुआ। यह समाचार गुरु वशिष्ठ ने सुना तो वह भाव-विभोर हो गये और उनकी वाणी फूट पड़ी-

सुनि बोले गुरु अति सुख पाई।

पुण्य पुरुष कहुँ महि सुख छाई ॥

जिमि सरिता सागर महुँ जाहीं।

यद्यपि ताहि कामना नाहीं॥

तिमि सुख सम्पति बिनहि बुलाये।

धरम सील पहिं जाहिं सुभाये॥

उपर्युक्त पंक्तियों का निष्कर्ष यह है कि मनुष्य अपने गुणों का परिष्कार करते हुए साँसारिक सुखों का निष्काम भाव से उपभोग करे, ऐसे व्यक्ति को परमात्मा स्वयं अपने पास बुला लेता है, अपना प्यार प्रदान करता है।


विपत्तियों को कैसे जीता जाय?

उन्नति और विकास का मार्ग कठिनाइयों के कंकरीले पथ से ही जाता है। जो व्यक्ति जीवन में कठिनाइयों से घबराता है उसे उन्नति की आकाँक्षा नहीं करनी चाहिए। उन्नति का अर्थ ही ऊंचाई है, जिस पर चढ़ने के लिये अधिक परिश्रम करना पड़ता है। समतल पर चलने की अपेक्षा कहीं अधिक पसीना बहाना पड़ता है। पतन की ओर चलने में मनुष्य को न तो कोई विशेष श्रम करना पड़ता है और न उसे अधिक विलम्ब लगता है। यदि दो आदमियों में से एक को निम्नगामी और दूसरे को ऊर्ध्व गामी मार्ग पर चलाया जाये तो जहाँ एक निश्चित दूरी पर पहुँचने के लिये निम्नगामी को एक दिन लगेगा वहाँ ऊर्ध्वगामी को चार दिन लग जायेंगे। जहाँ निम्नगामी को कोई परिश्रम न करना होगा वहाँ ऊर्ध्वगामी पसीना-पसीना हो जायेगा।

उन्नत मार्ग में कठिनाईयाँ स्वाभाविक हैं। यदि ऐसा न होता तो संसार में सभी महान बन सकते, कोई साधारण सामान्य अथवा पतित होता ही नहीं। कठिनाईयों पर विजय पाना ही उन्नतिशीलता है।

मनुष्य एक देव है और पशु भी। किन्तु इन दोनों में जो अन्तर है वह यह कि मनुष्य एक प्रगतिशील तथा उन्नतिप्रिय प्राणी है, जब कि पशु आदि से अन्त तक प्रकृत अवस्था में रहता है। प्रगति क्या है, उन्नति किसे कहते हैं इस विषय में वह कुछ भी नहीं जानता। वह जिस अवस्था में उत्पन्न होता है अन्तिम दिन तक उसी अवस्था में रहता है। कठिनाइयों को समझने, उनसे लड़ने और बचने के विषय में विचार करने की बुद्धि उसमें नहीं होती । अपनी भय वृत्ति की प्रेरणा से ही वह किसी संकट का अनुमान कर पाता है और उसी की प्रेरणा से बचाव के लिये भागता, छिपता या लड़ता मरता है। जिस समय उसकी यह भय वृत्ति उसको भागने की प्रेरणा देती है वह भाग खड़ा होता है और जिस समय लड़ने मरने की प्रेरणा देती है लड़ने मरने लगता है। उसका यह काम बुद्धि संगत नहीं होता। वह धैर्यपूर्वक विचार करके अपना कर्तव्य नहीं कर पाता। संकट से भागने अथवा लड़ने में उसकी कायरता अथवा वीरता का समावेश नहीं होता। वह भागता है तो भय की प्रेरणा से और लड़ता है तो भी उसी की प्रेरणा से।

मनुष्य की विशेषता है बुद्धिपूर्वक निश्चय करके कोई कर्तव्य करना। जो आवेगों, आवेशों और प्रकृत प्रवृत्तियों से प्रेरित होकर कोई काम करता है उसे मनुष्य के रूप में होने पर भी पशुओं की कोटी में ही मानना चाहिए। बाहर से मनुष्य दिखने पर भी अन्दर से वह पशु ही है। उन्नति की कामना मनुष्य की दिव्य विशेषता है। अपने को मनुष्य मानने वाले व्यक्ति का कर्तव्य है कि वह जीवन में अधिक से अधिक उन्नति करने का प्रयत्न करे।

जैसे कि निश्चित है उन्नति का मार्ग कठिनाइयों के बीच से जाता है। अतएव प्रत्येक उन्नतिकाँक्षी व्यक्ति को कठिनाइयों को समझने और उनसे लड़ने की क्षमता प्राप्त कर लेना चाहिए।

कठिनाइयाँ क्या हैं? कठिनाइयाँ जीवन की वे प्रतिकूल परिस्थितियाँ हैं जो ध्येय पथ पर चलते हुए व्यक्ति के लिये गतिरोध उत्पन्न करती हैं। यह परिस्थितियां मनुष्य-जन्य तथा निसर्ग-जन्य दोनों प्रकार की हो सकती हैं। मनुष्य जन्म परिस्थितियाँ उन अवरोधों को कह सकते हैं जो एक मनुष्य दूसरे के मार्ग में स्पर्धा, ईर्ष्या, द्वेष अथवा अहंकार से प्रेरित होकर छल-कपट, वंचना, प्रतारणा आदि विश्वासघात, अपवाद, विरोध अथवा विवाद आदि के रूप में उपस्थित करता है। निसर्गजन्य अवरोध आकस्मिक आधि-व्याधि अथवा दुर्घटनाओं को कह सकते हैं। इस प्रकार के गतिरोध किसी भी मनुष्य के जीवन में किसी भी समय सम्भाव्य हैं। अतएव इनका सामना करने के लिये मनुष्य को प्रत्येक क्षण प्रस्तुत रहना चाहिए।

संकट हजार प्रकार के हो सकते हैं। कौन-सा संकट किस समय उपस्थित हो सकता है। इसका पूर्वाभास सदैव सम्भव नहीं और न यही सम्भव है कि हर संकट का सामना करने के लिये कोई मनुष्य उनके अनुरूप हर प्रकार का प्रबंध पहले से करके रख ले। अस्तु कोई न कोई एक ऐसा उपाय निकालना ही बुद्धिमानी होगी जो किसी भी प्रकार के संकट का सफल और सदा सहायक उपचार हो और यह एक मात्र सर्वतोमुखी उपचार-मनुष्य का अपना दृष्टिकोण ही है।

मनुष्य के दृष्टिकोण से ही मित्र शत्रु और शत्रु मित्र दिखने लगता है। यह मनुष्य के दृष्टिकोण का ही फल है कि कभी अच्छी बात बुरी और बुरी बात अच्छी लगने लगती है। यह मनुष्य का दृष्टिकोण ही मानना चाहिये कि कभी वह साधारण घटना में ही घबरा उठता है और कभी बड़े-बड़े संकटों में भी हंसता रहता है। अच्छाई, बुराई, शत्रुता, मित्रता, सम्पत्ति, विपत्ति, कठिनता, सरलता, प्रतिकूलता, अनुकूलता आदि सारे द्वन्द्व मनुष्य के अपने दृष्टिकोण के ही प्रतिबिम्ब हैं वैसा इनका कोई अपना स्वरूप नहीं होता। यदि मनुष्य अपने में समता का दृष्टिकोण विकसित कर ले तो सारी विषमतायें आप से आप ही नष्ट हो जायें।

जीवन में अनेक ऐसे अवसर आते रहते हैं जब मनुष्य का चित्त बहुत खिन्न हो जाता है। कार्यों में निरुत्साह और हृदय में विषाद छा जाता है चारों ओर निराशा और प्रतिकूलता ही दृष्टिगोचर होने लगती है। इस प्रकार की स्थिति किसी भी उन्नतिकाँक्षी व्यक्ति के लिये हानिकारक है। इस प्रकार के प्रतिगामी वातावरण से समय और सामर्थ्य दोनों की क्षति होती है। हर कदम पर आगे बढ़ने वाले को प्रत्येक क्षण प्रफुल्ल, प्रसन्न और उत्साहित रहना बहुत आवश्यक है।

संसार में जो भी विषमतायें दिखाई देती हैं वह सब हमारे दृष्टिकोण का ही प्रतिफल है। अंधेरे में बैठकर सारी दुनिया अंधेरी और उजाले में रह कर देखने से उजेली मालूम होती है। यदि शत्रु के प्रति हमारा दृष्टिकोण बदल कर मित्रतापूर्ण हो जाये तो शत्रु को देखकर हमें जो ईर्ष्या द्वेष अथवा घृणा होती है वह बदल जाय, जिसके फलस्वरूप हमारे हृदय की प्रसन्नता अक्षुण्ण बनी रहे और उसके अभाव में होने वाली हानि से हम बच जायें।

यही बात परिस्थितियों और कठिनाईयों के विषय में भी लागू होती है। कठिनाईयों को जब हम अपना विरोधी मान कर उनके प्रति अपना दृष्टिकोण भिन्नतापूर्ण बना लेते हैं तो उनके उपस्थित होते ही हम क्षुब्ध और अधीर हो उठते हैं, जिससे हमारा मानसिक संतुलन बिगड़ जाता है और हम उनका हल निकाल सकने में असमर्थ हो जाते हैं। हल के अभाव में ही कठिनाईयाँ गतिरोध बन कर हमारा पथ अवरुद्ध कर लेती हैं।

यदि कठिनाइयों के प्रति हम अपना दृष्टिकोण सौम्य रक्खे, उन्हें सावधान, सचेत और अधिक गतिशील बनाने वाला देवदूत समझें तो उनके आने पर हम लाभ ही उठा सकते हैं।

समतापूर्ण दृष्टिकोण मनुष्य का सबसे बड़ा हित साधक है। इसकी उपलब्धि मनुष्य को तब ही होती है जब वह संसार की प्रत्येक कार्य विधि को ईश्वर की इच्छा मानता है। अनुकूलताओं को गले लगाने और प्रतिकूलताओं से घृणा करने वाला मनुष्य जीवन में कभी उन्नति नहीं कर सकता। संसार में एकमात्र अनुकूलताओं की आशा लेकर चलने वाले मनुष्य को विफलताओं की मरुभूमि में भटकना ही पड़ेगा। अपने सम्पूर्ण मन मस्तिष्क से जो अनुकूलताओं का ही उपासक बना रहता है और प्रतिकूलताओं के लिये जरा भी स्थान नहीं रखता उसे सदा सम्भाव्य प्रतिकूलता के अवसर पर विचलित होकर अस्त-व्यस्त हो जाने के लिये सदैव प्रस्तुत रहना चाहिए। अनुकूलताओं में प्रसन्न और प्रतिकूलता में रोने वाले व्यक्ति भूले की तरह आगे-पीछे जाते हुए एक ही स्थान पर रहते हैं न वे आगे बढ़ पाते हैं और न उन्नति कर पाते हैं।

संसार के प्रत्येक घटनाक्रम में ईश्वरीय आदेश का दृष्टिकोण रखकर ही अपना कर्तव्य करते रहना चाहिए।

ऐसी दशा में उसे खिन्न और हतोत्साह होने का कोई अवसर न होगा। खिन्नताओं, व्यग्रताओं, भयों और विषादों से मुक्त रहकर जो प्रत्येक परिस्थिति में परिपूर्ण रहकर कार्य करता है वह अवश्य उन्नति के शिखर पर पहुँचता और यह अहेतुकी प्रसन्नता का दृष्टिकोण, ईश्वर में अडिग विश्वास और संसार के प्रत्येक क्रिया-कलाप को उसकी ही इच्छा समझने से उपलब्ध हो सकता है।


समाज परिवर्तन में बुद्धिजीवियों की भूमिका

राष्ट्रों, राज्यों और जातियों के जीवन में आदि काल से उल्लेखनीय धार्मिक सामाजिक, साँस्कृतिक और राजनैतिक क्रान्तियाँ हुई हैं। उन परिवर्तनों में श्रेय भले ही एक व्यक्ति या वर्ग के मार्ग दर्शन को मिला हो, सच्ची बात यह रही है कि बुद्धिजीवियों, विचारवान व्यक्तियों ने उन क्रान्तियों को फैलाया, जन-जन तक फैलाया और सफल बनाया।

सर्वसामान्य जनता में विवेचन की शक्ति नहीं होती । आहार-विहार जैसे मोटे विषयों में उचित अनुचित, संयम-असंयम, लाभ-अलाभ का साधारण ज्ञान भी जिन्हें न हो उन्हें व्यापक उन्नति, सार्वभौमिक परिस्थितियों और उच्चतर जीवन प्रणाली की आचार संहिता समझाना कोई साधारण बात नहीं है। यह कार्य दो वस्तुओं में धुरी की तरह केवल प्रबुद्ध व्यक्ति ही कर सकते हैं। समुद्र अपने आप में अथाह है अगम्य है पर वह स्वतः धरती की प्यास बुझाने में असमर्थ है। उसके लिए मध्यस्थ जलधार की आवश्यकता होती है।

बादल समुद्र से जल लेकर प्यासी भूमि की तृष्णा हरते हैं। भूमि सूर्य किरणों से जीवन प्राप्त कर अन्न उगा देती है। पौधे धरती से रस लेकर मधुर फल देते हैं। पहाड़ का जल लेकर नदियाँ चलती हैं। और सारे प्रान्तों में बाँट आती हैं। इन मध्यस्थों का महत्व अपने उद्गम से कम नहीं, क्रिया शक्ति के सहयोग में उससे कुछ अधिक ही है। प्रकट में तो वही मुख्य कारण होते हैं।

यह एक सामान्य सिद्धान्त है। उसके स्थूल दर्शन राष्ट्रों के इतिहास में संभव है। संसार में आज जितने प्रगतिशील देश हैं वे सब एकाएक ही इतने समृद्ध और उन्नतिशील नहीं बन गये, उन्हें प्रबुद्ध व्यक्तियों ने उठाया है इसके इतिहास विद्यमान हैं।

रूस की सामाजिक अर्थव्यवस्था शिक्षा, वैज्ञानिक प्रगति की मिसाल दी जाती है। बहुत कम लोग जानते होंगे कि इस शताब्दी के पूर्व वहाँ तीन चौथाई जनता से भी अधिक लोग अशिक्षित थे, निर्धन और वैज्ञानिक क्षेत्र में बिलकुल पिछड़े थे। एकाएक तीव्र परिवर्तन हुआ जिसके पीछे बुद्धिजीवियों की एक सुव्यवस्थित क्रान्ति टिकी हुई है। पढ़े-लिखे लोगों के त्याग लगन और परिश्रम का चमकता हुआ अध्याय जुड़ा हुआ है।

1920 से लेकर 1960 तक केवल शिक्षा जगत में जो क्रान्ति हुई उसका लेखा प्रस्तुत करते हुये विद्वान रूसी लेखक ए. पुत्को ने एक स्थान पर बताया है कि 1920 में 10 लाख में केवल 3000 व्यक्ति ऐसे थे जिन्होंने उच्चतर स्कूल की शिक्षा प्राप्त की थी इसके बाद प्रबुद्ध व्यक्तियों के माध्यम से सार्वजनिक शिक्षा प्रणाली का संगठन हुआ और देश में अकाल विनाश की परिस्थितियों में भी निरक्षरता उन्मूलन के पाठ्यक्रम गाँवों में, क्लबों, निवास गृहों और औद्योगिक संस्थाओं में प्रसारित किये गये। तथाकथित साँस्कृतिक क्रान्ति का उद्देश्य राष्ट्र में वैज्ञानिकों, लेखकों और कलाकारों की आवश्यकता की पूर्ति करना भी था। इस आंदोलन में लेनिन, कोन्सतान्तिन त्सियोल्कोवस्को एवं इवान पवलोव जैसे अगुआ थे पर सफलता का श्रेय थोड़े से व्यक्तियों को दिया जाता है, जिन्होंने सम-विचारक पैदा करने और साँस्कृतिक क्रान्ति का प्रसार करने में अथक परिश्रम और त्याग दिखाया। फल यह हुआ 1940 में 110000 और 1960 तक उच्चस्तर शिक्षितों की संख्या 334000 तक पहुँची, इन्हें विशेषज्ञ स्नातक कहा जाता है।

यह उत्पादन केवल शिक्षा का है। विज्ञान, उद्योग विकास इंजीनियरिंग कला संस्कृति के क्षेत्र में रूस ने जो उन्नति की वह भी आज सारी दुनिया के सामने है। रूस यह बात मानता है कि यह परिवर्तन थोड़े से बुद्धिजीवियों के श्रम और सहयोगी से ही संभव हुआ है।

विश्व का दूसरा समृद्ध और संभ्रांत राष्ट्र अमेरिका है। वहाँ के सामाजिक साँस्कृतिक, कानूनी औद्योगिक शिक्षा और वैज्ञानिक क्षेत्र में जो तीव्र परिवर्तन हुये हैं उसका इतिहास भी काफी पुराना नहीं है।

लगभग 1920 में अमेरिका के कुल 9 व्यक्ति राजधानी वाशिंगटन में “सरकारी अनुसंधान संस्थान” की रूपरेखा लेकर एकत्रित हुए थे। इन्होंने “बुकिंग इन्स्टीट्यूशन” नामक संस्था की स्थापना की। इसमें सरकार उलटने की कोई बात न थी। संस्थान का उद्देश्य अमेरिका के कानूनी प्रशासन, शिक्षा, विज्ञान के क्षेत्र में क्रान्तिकारी परिवर्तन लाना था। इन क्रान्तिकारी कार्यक्रमों को “बुकिंग इन्स्टीट्यूशन” ने केवल व्यवस्थित ढाँचा देकर प्रकाशित किया और उसे उभारा वहाँ के प्रबुद्ध व्यक्तियों ने। इस अभियान ने अमेरिका में बौब बुड, जौन गार्डनर, चाली हौर जैसे कर्मठ और प्रभावशाली व्यक्ति पैदा कर दिये। कहा जाता है कि इन लोगों ने क्रान्ति को वैसा ही मोड़ दिया जैसे कुछ समय पूर्व ब्रिटेन में ‘प्रोटेस्टेन्टों’ ने किया था। चूँकि संस्थान के विषय सार्वजनिक नीति अर्थव्यवस्था, परिवहन निर्वाचन कानून, सरकारी नौकरी मालिक मजदूरों के सम्बन्ध आदि थे इसलिये कोई भी व्यक्ति उससे अछूता न रहा और ऐसी आन्धी आई कि कानूनी मामले ही नहीं सामाजिक रहन-सहन और राष्ट्रीय प्रगति में ठोस परिवर्तन हुये । अमेरिका की इस प्रगति का इतिहास भी प्रबुद्धों के पसीने से लिखा गया है।

इन राष्ट्रों ने राष्ट्रीय समस्याओं, नये सृजन, नये आविष्कारों के समाधान के लिये बौद्धिक शक्ति का उपयोग किया और उससे बहुमुखी विकास का वातावरण बनाया। आज दोनों देश समृद्धि के उच्चशिखर पर हैं।

क्यूबा एक छोटा सा देश है। उसकी शक्तियाँ सीमित थीं पर बुद्धिजीवियों की शिक्षा व्यवस्था ने कमाल का इतिहास प्रस्तुत किया । जितने पढ़े लिखे लोग थे अशिक्षितों को ढूँढ़ ढूँढ़ कर पढ़ाने में लग गये। आज क्यूबा में एक अशिक्षित व्यक्ति नहीं है। निरक्षरता क्यूबा से निर्वासित कर दी गई यदि पूछा जाय किसने? तो एक ही उत्तर मिलेगा। प्रबुद्ध नागरिकों ने।

चीन और जापान में भी जो राजनैतिक परिवर्तन और सामाजिक सुधार हुए हैं उनमें बुद्धिजीवियों का ही योगदान मुख्य रहा है। सच बात तो यह है कि सृष्टि के आदि से अब तक समाज की रीति-नीति, व्यवस्था आदि का संचालन प्रबुद्ध व्यक्तियों के ही हाथ रहा है। उनकी मनोदिशा कैसी रही मार्गदर्शन कैसा रहा? उपलब्धियों का स्वरूप क्या रहा? इन सब विषयों में तर्क और विवाद हो सकता है पर यह निर्विवाद सत्य है कि अच्छी बुरी जैसी भी परिस्थितियाँ उठी हैं। उनको प्रसारित बुद्धिजीवियों ने किया है।

समस्त क्षमताओं की तुलना में विवेचन की क्षमता मनुष्य की बुद्धि से सबसे अधिक घनिष्ठ रूप में सम्बन्धित है। इसलिए प्रबुद्ध व्यक्ति कठिन और मार्गदर्शक जटिल समाधानों को भी सम्बद्ध व्यक्ति के लिए सरल बना देता है। अथवा उसे अपने समीप वातावरण की बौद्धिक बनावट, रीति-रिवाज, रहन-सहन का अधिक पता होता है इसलिए वह महापुरुषों के क्रान्तिकारी कार्यक्रमों को सरल बना कर प्रस्तुत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा लेता है यह भूमिका ही किसी भी देश व परिस्थितियों के उत्थान व पतन में मुख्य सहयोगी रही है चाहे वह रूस की शिक्षा और साँस्कृतिक क्रान्ति रही हो, चाहे अमेरिका की औद्योगिक और आर्थिक क्रान्ति।

समाज की कुँठाओं को काटने की तेजी भी यदि किसी में हो सकती है तो वह प्रबुद्ध व्यक्ति ही हो सकते हैं उन्हें छोड़ कर या उनके बिना कोई क्रान्तिकारी परिवर्तन लाना सम्भव नहीं।


Quotation

समझदार आदमी वह नहीं है जो कभी गलती नहीं करता, क्योंकि ऐसा मनुष्य जो भूल नहीं करता दुनिया में न कभी हुआ न हो सकता है। किन्तु समझदार वह है जो छोटी मोटी गलती करता है और जल्दी ही गलती को ठीक करने की योग्यता रखता है।

मूर्ख लोग दूसरों की बुद्धि पर चलने वाले होते है। परन्तु सज्जन लोग स्वयं परीक्षा करके नई अथवा पुरानी बातों को ग्रहण करते है।

-लेनिन


सभ्य समाज की सुसंस्कृत रचना और पुस्तकालय

रौम्याँ रोला ने एक बार भाषण में कहा- “किसी राष्ट्र का लोक तन्त्रात्मक जीवन विघटित और विश्रृंखलित हो जाता है तो उसे सभ्य और सुसंस्कृत बनाने के लिये मूक विचार क्रान्ति की आवश्यकता होती है।”

“मूक विचार क्रान्ति का तात्पर्य क्या है?” यह पूछा गया तो उन्होंने उत्तर दिया- पुस्तकालय! ऐसे पुस्तकालय जो ज्ञान के माध्यम से सामाजिक जीवन में व्याप्त बुराइयों, क्लेश और संतापों को मिटाने में योगदान दे सकते हों। पुस्तकालय, धर्म, संस्कृति, सम्प्रदाय छोटे-बड़े, ऊंचे-नीचे से परे एक ऐसी संस्था है जिसमें प्रत्येक व्यक्ति अपनी ज्ञानशक्ति और क्षमताओं का विकास कर सकता है।”

डॉ. एस. आर. रंगनाथन को पुस्तकालय विज्ञान पर लगभग 50 शोधग्रन्थ लिखने पर भारत सरकार ने पद्मश्री की उपाधि से विभूषित किया। ग्रन्थ लिखना अपने आप में उतना महत्वपूर्ण नहीं था जितना अपने सिद्धान्त को व्यवहारिक सिद्धि प्रदान करना। श्री रंगनाथन कोई उद्योगपति या साधन सम्पन्न नहीं हैं । इस युग में भारत में लेखक की आय ही कितनी होती है, तो भी उन्होंने पुस्तकालय विज्ञान विभाग के विकास के लिये अपनी कमाई का कण-कण जोड़कर 1 लाख रुपये की पूँजी मद्रास विश्वविद्यालय को भेंट की। इस अनुपम त्याग के पीछे उनका एक ही संकल्प है कि राष्ट्र के बौद्धिक चरित्र का विकास हो। पुस्तकालय को उसका प्रमुख उपादान बताते हुए उन्होंने लिखा है-

“हम अपने समाज में जिन मानवीय आदर्शों की स्थापना करना चाहते हैं, धर्म आध्यात्म, संस्कृति और नैतिकता का प्रकाश समुपलब्ध करना चाहते हैं उसकी पूर्ति तो कानून कर सकता है न प्रबुद्ध तंत्र । इसका आधार सामाजिक शिक्षा ही हो सकती है। एक ऐसी खिड़की होनी चाहिए जो भीतर बैठे हुए व्यक्ति को सूर्य का प्रकाश लाकर देती रहे। पुस्तकालय ही वह माध्यम हैं जो जिज्ञासा की अग्नि को प्रज्वलित किये रह सकते हैं। सामाजिक शैक्षणिक संस्था के रूप में वे मानव हृदय को नैतिकता की दिशा देते रह सकते हैं।”

रूस की सामाजिक के चेतना के विकास में पुस्तकालयों ने असाधारण रूप से काम किया है। स्टैलिन को हटे हुए अभी बहुत समय नहीं हुआ । इतने थोड़े से समय में अधिक औद्योगिक, वैज्ञानिक और साँस्कृतिक दिशा में जो भारी परिवर्तन हुए हैं उनमें पुस्तकालयों का सर्वाधिक योगदान माना जाता है। उल्लेखनीय है कि दुनिया में सर्वाधिक पुस्तकालय रूस में हैं। किंवदन्ती है कि यदि रूस के पुस्तकालयों में लगी हुई अलमारियां एक पंक्ति में लगाई जाएं तो मास्को और रोम को जोड़ा जा सकता है।

मनुष्य के विकास के लिये तथ्यों, घटनाओं, जीवन चरित्रों, प्रसंगों निबन्धों का विविधतापूर्ण विचार पुँज चाहिए। परिवर्द्धित ज्ञान ही बौद्धिक कार्य कुशलता को परिष्कृत बनाये रख सकता है। परिष्कृत ज्ञान और विवेक ही स्थायी प्रगति की ओर अग्रसर कर सकता है।

विद्यालयों में उतनी व्यवस्था सम्भव नहीं। वहाँ शिक्षा के सीमित उद्देश्य रहते हैं, इसलिये पाठ्यक्रम और विधियाँ भी सीमित रहती हैं। विद्यालय मनुष्य का विकास करने में समर्थ नहीं वे केवल मनोभूमि की प्रारम्भिक तैयारी कर सकते हैं। किन्तु व्यवहारिक जीवन का मार्गदर्शन उतने से होना तो सम्भव नहीं। उसका क्षेत्र विशाल है। आवश्यकतायें विशाल हैं उसी के अनुरूप ज्ञान का क्षेत्र भी विशाल और बहुमुखी होना चाहिए। तभी तो प्रत्येक व्यक्ति अपनी विशेषता और आवश्यकता के अनुकूल अपना सही रास्ता चुन सकता है। यह सब सम्भव है पर जिस समृद्ध ज्ञान की कल्पना यहाँ दी जा रही है वह वैयक्तिक रूप से नहीं जुटाई जा सकती उसके लिये पुस्तकालय चाहिएं। स्थान-स्थान पर मुहल्ले-मुहल्ले गाँव-गाँव और हर विद्यालय में पुस्तकालय चाहिएं। पुस्तकालय ही एक मात्र मस्तिष्कीय पोषण प्रदान कर सकते हैं।

‘ज्ञान का विकास नियमित शनैः−शनैः और आजीवन होता है। विद्यालय की शिक्षा प्रारम्भिक अवस्था में थोड़े दिन के लिये होती है। इसलिये मूल आवश्यकता की पूर्ति पुस्तकालय करते हैं विद्यालय सहायक मात्र हैं।

आर्थिक, औद्योगिक, वैज्ञानिक और मनुष्य जीवन की अनेक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये जहाँ सामान्य पुस्तकालयों की आवश्यकता है वहाँ भारत की अपनी विशिष्टता का मान रखना भी आवश्यक है। हम एक ऐसे धार्मिक वातावरण में पले हैं कि वह हमारे रक्त में समा गया है। जिस तरह सम्पूर्ण विश्व की व्यवस्था के लिये नैतिकता, भाईचारा, परस्पर सहयोग, प्रेम आत्मीयता आदि मानवीय मूल्यों की प्रतिष्ठा चाहिये, हमारी विशिष्टता को उसी प्रकार दर्शन, आध्यात्म अर्थात् जीव, आत्मा, परमात्मा का भावना-सम्मत पुष्ट ज्ञान भी चाहिए। हम इस विशिष्टता से बच नहीं सकते क्योंकि वही हमारा जीवन है। उसकी विश्व के लिये उपयोगिता भी है।

इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए पुस्तकालयों की रचना के लिये राजतन्त्र पर आधारित नहीं रहा जा सकता । उसके लिये अपनी ही सामाजिक व्यवस्था बनानी पड़ेगी। ऐसे पुस्तकालय स्थापित करने होंगे जो भारत की साँस्कृतिक परम्पराओं और सनातन सिद्धान्तों की रक्षा कर सकें अज्ञान, भय लोभ, स्वार्थ, हिंसा, प्रतिशोध प्रतिकार की दुर्भावनाओं को नष्ट कर शोषण विहीन अपरिग्रह, स्नेह और सहयोग से परिपूर्ण सुरक्षित समाज खड़ा करने का सन्देश दे सकें।

ज्ञान का उद्देश्य स्वार्थ से बदल कर परमार्थ होना चाहिए। जब तक मनुष्य का जीवन दर्शन दृष्टिकोण पारलौकिक नहीं होता तब तक उद्देश्य नहीं बदलेंगे। ज्ञान और शिक्षा से समृद्ध होते हुए भी समाज की दिशा न बदलेगी। इसलिये हमें भारतीय पुस्तकालयों की अपनी विशिष्टता बनाये रखनी होगी। उन्हें वही रूप देना होगा जो हमारी दृष्टि में किसी तीर्थ स्थल या देवस्थान का होता है। भारतवर्ष में समाजवाद और लोकतन्त्र का यथार्थ विकास यहीं से प्रारम्भ होगा और इसके अतिरिक्त दूसरा कोई उपाय नहीं है।

आज धन को ही प्रतिष्ठा सम्मान, गौरव ज्ञान एवं योग्यता का मापदण्ड मान लिया गया है। इसलिये धन एकत्र करने की भावना सर्वत्र घर करती जा रही है। जिसके पास धन वही गुणों का भी अधिष्ठाता माना जाता है। उसमें ज्ञान, चरित्र धर्म और नैतिकता का भले ही अभाव हो, यदि धन है तो सब कुछ है यह भावना हमारे समाज का बड़ा अहित कर रही है। पर यह मापदण्ड बदले कैसे यह विचारणीय प्रश्न है। इन बातों पर विचार करते हुए हम पुनः उसी स्थान पर लौटते हैं और यह अनुभव करते हैं कि यह कार्य ज्ञान आराधना की पूर्ति से सम्पन्न हो सकेगा। यह ज्ञान भौतिक और सामान्य विषयों तक तो दूसरे देशों में भी है हमें मनुष्य की फिलॉसफी में उतरना होगा। यह भी देखना होगा कि यह विश्व-प्रपंच, कौतुक और चमत्कार क्या है जो विशाल ब्रह्माण्ड के रूप में खड़ा है।

इस जीवन-दर्शन के अनुरूप जो ज्ञान दे सकें वही पुस्तकें और पुस्तकालय हमारे लिये उपयोगी साबित हो सकते हैं उन्हीं से समाजवाद और लोकतन्त्र की सफलता मिल सकती है। उन्हीं की स्थापना के लिये, प्रयत्नशील होने की आवश्यकता है। सभ्य और सुसंस्कृत समाज की रचना में इनसे भारी योगदान मिल सकता है।


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प्रार्थना से ऐसी बहुत सी बातें हो जाती हैं जिनको दुनिया स्वप्न में भी नहीं सोचती । अतः एक झरने के समान रात-दिन अपनी आवाज मेरे लिये ऊपर उठाओ। अन्यथा जो मनुष्य अपने मस्तिष्क के भीतर एक अन्धकारमय जीवन व्यतीत करते हैं, वे भेड़ और बकरियों से उत्तम किस प्रकार हो सकते हैं? यदि ईश्वर को जान कर भी वे अपने लिये और मित्रों के हित में प्रार्थना करने को अपने हाथ नहीं उठाते।

-नोसन


शुद्ध मनोरंजन उपयोगी ही नहीं आवश्यक भी

व्यक्तित्व के विकास के लिये शिक्षा, स्वास्थ्य, संपर्क और उपयुक्त वातावरण आवश्यक है। पर इन सभी साधनों को जीवित, जागृत रखने का मुख्य साधन है मनोरंजन । स्वस्थ मनोरंजन के अभाव में मनुष्य का जीवन शुष्क नीरस और कुँठित हो जाता है। आगे बढ़ने की, कठिनाइयों से संघर्ष, विपरीत परिस्थितियों में भी क्रियाशीलता बनाये रखने के लिये शुद्ध मनोरंजन आवश्यक है।

मनोरंजन आत्मा की चाह है इसीलिये तो जो व्यक्ति मनमौजी स्वभाव के होते हैं, जिनमें हास्य विनोद का प्रवाह चलता रहता है ऐसे व्यक्ति मन को बहुत भाते हैं। जो भी परिचित लोग होते हैं वे ऐसे व्यक्तियों के पास बैठने के लिये लालायित बने रहते हैं। इससे पता चलता है कि धन साधन सम्पत्ति की अपेक्षा आह्लाद से आदमी को अधिक संतोष मिलता है। इस प्रकार का सन्तोष ही क्रियाशीलता की अभिनव प्रेरणा प्रदान करता है।

कठोर नियन्त्रण, तप, व्रत, उपवास के माध्यम से मन को नियन्त्रण में लाना कई बार तात्कालिक परेशानियों से बचा तो सकता है पर जो कार्य मन के सहयोग से ही निबटाये जाते हैं वे काम खूबसूरत भी होते हैं। मन को मित्र बनाकर काम लेने से वह काम बिलकुल सरलता से हो सकते हैं जो कठोरतापूर्वक मनो नियंत्रण से काफी देर में और कष्टपूर्वक पूरे होते हैं। इसलिये मनुष्य के जीवन में मनोरंजन का सर्वाधिक महत्व है।

गांधी, नेहरू, टैगोर, तिलक, गोखले, बिनोवा भावे, पटेल, गालिब, सुकरात, टॉलस्टाय, शेक्सपीयर, बर्नार्डशा, नैपोलियन, हिटलर, स्टालिन, चार्ली, चर्चिल, अब्राहीम लिंकन, बट्रेन्ड रसेल, मार्कट्वेन, डार्विन, आइन्स्टीन इत्यादि संसार के सैंकड़ों महापुरुषों के जीवन में अन्य बातें, गुण परिस्थितियाँ अलग-अलग रही होंगी किन्तु मनोरंजन का गुण सबमें एक जैसा रहा है। यह सभी लोग हास्य विनोद से हमेशा अपने आप को तरोताजा किये रहते थे। लोग असमंजस में पड़ते हैं कि इन व्यक्तियों के जीवन में जो संघर्ष रहे, उनमें वे कैसे स्थिर बने रहे किस प्रकार इतनी कठिनाइयों के बावजूद उनकी आत्मशक्ति स्वस्थ, सशक्त और सतत क्रियाशील रही? वह उनका विनोदी स्वभाव ही रहा जिसने प्रत्येक परिस्थिति में नया बल दिया।

गाँधी जी कहा करते थे- “मैं केवल इसीलिये जिन्दा हूँ क्योंकि मनोरंजन मेरा स्वभाव है। हंसी मन की गाँठें खोल देती है। मेरे मन की ही नहीं तुम्हारे मन की भी।” “जब मैं स्वयं हँसता हूँ तो मेरे मन का बोझ हलका हो जाता है।” उक्त कथन रवीन्द्र नाथ टैगोर का है।

बेकन का कहना था- हंसमुख स्वभाव दीर्घ आयु का एक सर्वोत्तम साधन और सर्वप्रिय बनने का सुलभ उपाय है। इससे आयु और प्रतिष्ठा दोनों में वृद्धि होती है।

स्टर्न कहते हैं- “मुझे लगता है कि हर बार जब कोई मनुष्य मुस्कराता है या अधिक हंसता है तो वह अपने जीवन की वृद्धि करता है।”

“किसी व्यक्ति के हृदय में सहयोग, सहानुभूति और संवेदना की कितनी मात्रा है मैं इसकी पहचान इस बात से करता हूँ कि वह व्यक्ति प्रफुल्ल रहता है या नहीं। जो हंस सकता है वही औरों को हंसा सकता है। औरों के दिल का दर्द जान सकता है। “मुस्कान प्रेम की भाषा है” यह होमर ने कहा था।

दुःख इस बात का है कि गरीबी अशिक्षा और संकीर्णता के कारण जन-सामान्य या तो मनोरंजन के महत्व को समझते नहीं अथवा उसे हेय दृष्टि से देखते हैं। अशुद्ध मनोरंजन की ओर आकर्षित होकर शक्ति साधन तथा समय का दुरुपयोग करते हैं। उद्योगीकरण के प्रसार के साथ-साथ आज का जीवन अत्यन्त व्यस्त और संघर्षमय होता जा रहा है। उधर स्वस्थ मनोरंजन के अभाव में आत्मिक दुर्बलताएं बढ़ती जा रही हैं इसलिये प्रत्यक्ष प्रगति और भौतिक लाभों के होते और बढ़ते हुए भी लोग दुःखी हैं। अतः जन-सामान्य के लिये स्वस्थ मनोरंजन की व्यवस्था करना बहुत आवश्यक है।

स्वस्थ मनोरंजन वह है जो मन के अतिरिक्त शारीरिक शक्ति और स्वभाव को भी रंजित करे, शुद्ध करे। इस दृष्टि से खेल-कूद जैसे- बालीबाल, फुटबाल, हाकी, कुश्ती, कबड्डी, क्रिकेट, तैरना, दौड़ करना, साँस्कृतिक कार्यक्रम, नृत्य, संगीत, वाद्य, बौद्धिक आयोजन-अंताक्षरी, वार्तालाप, वाद-विवाद, लेख और कविता प्रतियोगिताएं यह सब शुद्ध और उत्पादक मनोरंजन हैं। सफाई, सजावट, शृंगार यह भी मनोरंजन के ही अंग हैं यह सभी गुणकारी और लाभकारी भी हैं।

भारतीय संस्कृत के अनेक तत्वों में संस्कारों का महत्व भी इसी दृष्टि से है। इनका उद्देश्य मन और आत्मा की सुषुप्त शक्तियों का उद्बोधन करना होता है। वह जिस रीति-नीति पर आधारित है उसे स्वस्थ मनोरंजन ही कहा जा सकता है।

संस्कारित मनोरंजन का ज्ञान न होने के कारण लोग विकृति की ओर आकर्षित हो गये हैं। “काम” मनोरंजन है पर वह शुद्ध नहीं क्योंकि वह शारीरिक शक्ति को कम करता है। इसे मनोरंजन की आम परिभाषा मान लेने के कारण समाज में शारीरिक, मानसिक और आत्मिक दुर्बलता के ही द्वार नहीं खुले चारित्रिक, नैतिक दुर्बलताएं भी तेजी में बढ़ी हैं। जनसंख्या बढ़ना स्वस्थ मनोरंजन की अवहेलना से ही हुआ है। यह देखकर कोई भी कह सकता है कि व्यक्ति ही नहीं समाज और राष्ट्र के उत्थान के लिये भी संस्कारित मनोरंजन की अत्यधिक आवश्यकता है।

आज के विद्यार्थियों और युवा वर्ग पर यह आरोप लगाया जाता है कि उनमें स्वच्छन्दता, अनुशासन-हीनता, व्यर्थ घूमने गप्प लड़ाने, रेडियो सुनने, सिनेमा देखने की बुरी आदतें बढ़ने से समाज का अहित हो रहा है। बात सही है किन्तु अपराधी ये लोग नहीं हैं। प्रारम्भ से ही अभिभावकों की यही कमी ही उन्हें इन अवाँछित दिशाओं में प्रेरित करती है। उन्हें स्वस्थ मनोरंजन से वंचित रखा जाता है । बच्चों को तो आत्मिक आह्लाद चाहिए आपने दिशा न दी, उसने स्वयं ढूँढ़ ली- यदि गलत ढूँढ़ो तो दोष आपका है क्योंकि आपने उसका शुद्ध मार्गदर्शन नहीं किया है।

मनोरंजन का आपके अपने बच्चों के लिये भी असाधारण महत्व है पर उसकी मनोवैज्ञानिक और सामाजिक स्वस्थ परम्पराओं का ज्ञान होना भी आवश्यक है। मनोरंजन जो अन्तर्चेतना को प्रबुद्ध कर सकता है। वही उपयोगी भी है और आवश्यक भी। रचनात्मक मनोरंजन चाहे वह वाणी विनोद हो अथवा खेलकूद उसी से मन के बोझ को हटाकर उसे हलका रखना सम्भव होता है।

यदि यह स्वस्थ परम्पराएं विकसित होंगी तो सामाजिक एकता बढ़ेगी। स्वास्थ्य सुधार की सृजनात्मक दिशा मिलेगी। आक्रामक भावनाओं का शमन होगा। नेतृत्व के गुणों का विकास होगा।

मनोरंजन के अभाव में विचारों के आदान प्रदान का अवसर नहीं बनने पाता । अनैतिक कार्यों को प्रोत्साहन मिलता है। जनसंख्या में वृद्धि का मूल कारण ही स्वस्थ मनोरंजन का अभाव है। लोगों ने काम-प्रवृत्ति को ही मुख्य मनोरंजन समझ लिया है। यदि परिवार नियोजन में लगाये जा रहे विपुल खर्च को स्वस्थ मनोरंजनों के विकास में लगाया जा सके तो प्रजनन में वृद्धि का औसत निःसंदेह कम हो सकता है।

अतएव मनोरंजक साधनों का विकास व्यक्ति और समाज ही नहीं राष्ट्र के विकास के लिये भी आवश्यक है। इसकी उपेक्षा न की जानी चाहिए।


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हे प्रभु, मैं आपको धन्यवाद देता हूँ कि आपने मुझे सारे दिन ठीक-ठीक चलाया । हे नाथ, रात को मेरी रक्षा कीजिये कि मैं प्रातःकाल का प्रकाश देख सकूँ और मेरे हृदय से सारी बुराई को निकाल दीजिये । मैं ये सारी बातें आपकी कृपा रूप चाहता हूँ।

-एक भक्त


उद्धत बन कर असन्तोष न भड़कायें

असंतोष से असंतोष का जन्म होता है। यदि आज हम किसी के लिए असंतोष के कारण बनते हैं तो यह न समझना चाहिये कि उसे सता कर हम स्वयं सुख शाँति से रह सकेंगे। पहली बात तो यह है कि मनुष्य की प्रवृत्ति प्रायः प्रतिशोधगामिनी होती है। उसकी प्रेरणा रहती है कि जिसने उसके साथ दुःखद व्यवहार किया है उसके साथ भी वैसा ही दुःखद व्यवहार करके बदला लिया जाये। यद्यपि बदला लेने से भी अपना असन्तोष तुष्ट नहीं होता है, क्योंकि प्रतिशोध से पुनः प्रतिशोध का प्रत्यावर्तन होता है और इस प्रकार विद्वेष की कष्ट एवं हानिमूलक परम्परा लग जाती है, जिससे सूत्रपाती तथा प्रतिशोधी दोनों ही समान रूप से अशाँत तथा सन्तप्त रहते हैं। एक बार की क्षमा सदा के लिए आग को शीतल कर देती है। तथापि ऐसी उन्नत बुद्धि के लोगों की अभी बहुतायत नहीं है। लोग जल्दी ही प्रतिशोध के लिये प्रेरित हो उठते हैं।

एक बार यह भी मान लिया जाए कि जिसके साथ अनीति बरती गई है, वह प्रतिरोध के लिए उद्यत न होगा। फिर उसका कारण चाहे उसकी निर्बलता हो अथवा क्षमाशीलता, तब भी असन्तोष के बीच बोने वाले को इसका विश्वास नहीं होता। उसका अपराधी मन बार-बार यही कह कर उसे सन्त्रस्त तथा अशान्त रक्खेगा कि इस समय न सही जब भी अवसर मिलेगा अमुक व्यक्ति उसको हानि पहुँचाने का प्रयत्न करेगा। दूसरे की ओर से क्षमाशीलता की कितनी ही सम्भावना क्यों न हो किन्तु असन्तोष का कारण उपस्थित करने वाले को सन्देह, शंका तथा भय बना ही रहता है जिसके फलस्वरूप वह अशाँत एवं उद्विग्न ही बना रहता है। इसीलिए सज्जन पुरुष समाज में असन्तोष के कारण उत्पन्न करने में संयम से काम लेते हैं। वे अपनी सीमाओं में रहते हुए स्वयं तो शाँतिपूर्वक रहते हैं, दूसरों को भी उसी प्रकार रहने का अवसर देते हैं।

समाज में असंतोष उत्पन्न करने वाले लोगों में ऐसे व्यक्तियों का औद्धत्य प्रदर्शन प्रथम है जो अपने सामाजिक स्तर से ऊपर का रहन-सहन अपना कर अपने को अनावश्यक रूप से धनवान, सम्पन्न तथा सुखी प्रकट करते हैं और दूसरों को यह सोचने का अवसर देते हैं कि मैं अमुक व्यक्ति से गरीब, दीन-हीन तथा अभावग्रस्त हूँ, फिर चाहे वह उतना अभावग्रस्त हो भले ही न। किन्तु यह मनुष्य का सहज स्वभाव है कि अपने से बढ़-बढ़ कर किसी को देखने पर उसकी तुलना में अपने को गरीब तथा हीन समझने लगता है। यद्यपि यह स्वभाव अच्छा नहीं है। यह मनोवृत्ति और इस प्रकार की भावना निकृष्ट ही है तथापि साधारण मनोभूमि के लोगों की मनोवृत्ति के लिए किया ही क्या जा सकता है। इसके लिए अपने को हीन समझने वाले को उतना दोषी नहीं माना जा सकता जितना कि उसे, जिसने व्यर्थ प्रदर्शन से दूसरों को इस प्रकार असन्तोषपूर्ण विचारधारा में बह जाने के लिए प्रेरित किया है।

धनलिप्सु तथा किसी बहाने उसका प्रदर्शन करने वाले लोग समाज के अहितकारी तत्व होते हैं। उन्हें अपने अहंकार की तुष्टि के समक्ष समाज के सन्तुलन तथा उसकी वर्गीय शाँति की जरा भी परवाह नहीं होती। भारत सम्पन्न देश नहीं है। अभी इसका अर्थतन्त्र इतना विकसित नहीं हुआ कि लोग अमेरिका, इंग्लैंड वालों की तरह शान-शौकत तथा तड़क-भड़क के साथ रह सकें। अपना देश अभी गरीब ही है। उसकी औसत आय अपर्याप्त है। साधन, योग्यता, क्षमता, आदि सभी आधार निर्बल तथा स्वल्प ही हैं। कारण राष्ट्रीय आय की सीमा बहुत छोटी है। अपनी देश की आय को दृष्टिगत करते हुए हम सब तथा अन्य सारे राष्ट्रजनों का कर्तव्य हो जाता है कि अपने ऊपर, अपने रहन-सहन तथा उत्सव, समारोहों पर उतना ही खर्च करने का प्रयत्न करें जितनी कि एक भारतीय की औसत आय अनुमान है। उससे अधिक खर्च करने का अर्थ है कि समाज में विषमता को नंगा कर असंतोष को उद्दीप्त करना। यह निश्चित रूप से एक नैतिक अपराध है, सामाजिक अहित है।

स्वाभाविक है कि जो अधिक खर्च करता है उसके पास अधिक होना ही चाहिये और दूसरों से अधिक होने का अर्थ यही होगा कि वह अवश्य ही ऐसे उपाय काम में लाता है जिससे भारतीयों की औसत आय से अधिक धन उसके पास आ सकें। किसी स्थान को ऊँचा करने के लिए जो मिट्टी जमा की जायेगी, उसके लाने के लिए किसी स्थान को खाली करना पड़ता है। इसका सीधा-साधा अर्थ यही है कि यदि एक स्थान ऊँचा होगा तो कहीं न कहीं उसी के अनुपात से गड्ढा हो जायेगा। एक व्यक्ति के पास औसत आय से अधिक धन है। इसका सीधा अर्थ यही है कि अन्य अनेक व्यक्ति प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से उतने से वंचित हो गये हैं जितनी कि उसकी आय बढ़ी है, सम्पन्नता वृद्धि हुई है। भारत में तो यह समस्या और भी विषम है। यहाँ एक आदमी के सम्पन्न होने का अर्थ होता है हजारों आदमियों का अभावग्रस्त हो जाना।

यह अर्थशास्त्र का सुनिश्चित सिद्धाँत है कि कोई एक व्यक्ति तब ही धनवान हो सकता है जब अन्य अनेकों की राष्ट्रीय आय का भाग उसके पेट या पेटी में चला जाय। धनलिप्सुओं को इस संग्राहक प्रवृत्ति के कारण ही तो भारतीय समाज में इतनी भयानक विषमता दृष्टिगोचर होती है और इतना गहरा असन्तोष प्रकट हो रहा है। गरीब इसलिये असंतुष्ट है कि वह गरीब और दूसरे अमीर हैं और धनवान इसलिये भयभीत हैं कि कहीं उनकी अमीरी पर आँच न आ जाए, कहीं उनकी आय कम न हो जाय। गरीब अभाव से परेशान है और अमीर उनके बढ़ते हुए असन्तोष से। इस प्रकार क्या अमीर और क्या गरीब कोई भी तो सन्तुष्ट तथा शाँतिपूर्ण जीवन व्यतीत करता नजर नहीं आता है, इसका मुख्य हेतु एक ही है। वह है लोगों की अर्थ-लिप्सा तथा वित्तेषणा।

यह व्यापक असन्तोष मिटाने का एक ही उपाय समझ में आता है। यह तो संभव नहीं कि सारे लोगों को अमीर किया जा सके किन्तु यह किसी प्रकार भी कठिन नहीं कि लोग सभ्यता के नाते, अपने मानसिक संतोष के लिए अथवा राष्ट्रीय दृष्टिकोण से ही अपनी अर्थ-लिप्सा अथवा वित्तेषणा को छोड़ दें, कम कर दें। अमीर अथवा गरीब सभी का आर्थिक असंतोष कम करने के लिए यही उपाय सरल तथा समीचीन समझ में आता है। धन में, वास्तव में यह एक बड़ा दोष है कि यह होता है तब भी अशाँत रखता है और नहीं होता है तब भी असंतुष्ट! निःसन्देह बुद्धिमान उसी को कहा जाता है जो इस धन-पिशाच की उपासना से विरत रहता है। जितना आवश्यक हो उतना लो, रक्खो और खर्च करो, बाकी को देश के अर्थतन्त्र तथा राष्ट्रीय आय के परि एवं प्रत्यावर्तन में गतिशील होने दिया जाये। इसे अपने पास रोक कर रख लेना उचित नहीं। इससे ही समाज में असंतोष का जन्म होता है। जो अमीर तथा गरीब दोनों ही वर्गों को समान रूप से प्रभावित करता है। इसी सामाजिक संतोष तथा सर्वव्यापी सुख शाँति के लिए ही तो भारतीय धर्म तथा संस्कृति में अपरिग्रह वृत्ति को उदात्त तथा आदर्श वृत्ति बताया गया है।

लोग कार-रोजगार करते हैं। बड़े-बड़े उद्योग चलाते हैं। बड़ी-बड़ी पूँजियाँ लगा कर घना उत्पादन करते और बेचते हैं। उद्योग के अनुसार उनकी आय भी ऊंची होती है। उस आय को फेंका तो नहीं जा सकता अथवा विषमता दूर करने के लिए उसमें आग नहीं लगाई जा सकती है और न समाज में उसका वितरण कर के असमानता दूर की जा सकती है। यह ठीक है। किन्तु यह तो किया ही जा सकता है कि उसे दान पुण्य के मार्ग से समाज में पुनः वापस किया जा सकता है। बैंकों तथा सरकारी कोषों में जमा कर प्रत्यावर्तन के लिए अवसर दिया जा सकता है। तात्पर्य यह कि उसे अपनी व्यक्तिगत तिजोरी में बन्द न रख कर कोई भी ऐसा उपाय किया जा सकता है कि राष्ट्रीय धन राष्ट्र के सब ओर चक्कर लगाता रहे। साथ ही अपेक्षाकृत अपना खर्च तथा अपना रहन-सहन उस सीमा तक रक्खा जा सकता है जिससे कि समाज की आर्थिक असमानता नंगी होकर नाचने न लगे। स्थिति, परिस्थिति के अनुसार यह विषमता किन्हीं अंशों तक मान्य हो सकती है, किन्तु यह अन्तर आकाश-पाताल जैसा तो नहीं ही होना चाहिये।

अर्थोपासकों ने यह विषमता पराकाष्ठा तक बढ़ा रक्खी है। समय इसे अब अधिक देर तक सहन नहीं कर सकता। लोग इसको मिटाने की दिशा में प्रयत्नशील हो उठे हैं। संत बिनोवा के भूदान यज्ञ से लेकर सरकार की दिन-दिन अग्रसर होती हुई कर-नीति इस बात की मुखर चेतावनी है कि वित्तेष्णु लोग अपनी अर्थ तृष्णा को त्याग कर युग-वाणी को समझें और इसके पहले ही अपनी संग्राहक अथवा प्रदर्शनकारी नीति को छोड़ दें, कि युग बल उन्हें बलपूर्वक ऐसा करने पर विवश कर दे। ऐसी दशा में वह सम्मान, वह श्रेय न मिल सकेगा जो अपने आप स्वयं अपना सुधार कर लेने से सम्भव है।

इधर, दूसरी ओर यह भी आवश्यक है कि स्वल्प साधनों वाले तथाकथित लोग देखा-देखी अमीरी का नशा अपने सिर पर सवार करते जा रहे हैं। उसे न करें। उन्हें देखना और विचार करना चाहिए कि वे इस भूल में पड़ कर भटकते जा रहे हैं। देखा−देखी, अमीरी का प्रदर्शन करने के लिए वे लोग जो प्रदर्शनकारी गतिविधि अपनाते चले जा रहे हैं, वह उसी प्रकार का दोष है जिसके कारण गंभीर अर्थलिप्सुओं की निन्दा की जाती है। एक ओर अपना सुधार करने में लगें और दूसरी ओर विकृतियों को प्रश्रय देते चलें यह ठीक नहीं। इस प्रकार तो समग्र समाज का न तो सुधार हो सकेगा, न विषमता दूर होगी और न अशाँति तथा असन्तोष ही दूर होगा। यह तो तभी सम्भव होगा जब अमीर अपनी अर्थोपासना का त्याग करें और गरीब लोग ठाठ-बाट की जिन्दगी की ओर भटके हुए अपने कदम को रोकें।

अपनी राष्ट्रीय आय के अनुकूल सादगी, मितव्ययिता तथा सामान्य श्रेणी का ही जीवनयापन करने से इस समस्या का हल होना है। सामान्य जीवन जहाँ आज की राष्ट्रीय आवश्यकता है वहाँ यह एक मानवीय गुण भी तो है। आज ही क्या, सम्पन्नता के दिनों में भी जिस देश के लोग साधारण जीवन में विश्वास रखते, सादे रहन-सहन का महत्व समझते रहते हैं उस राष्ट्र का अर्थतन्त्र कभी डाँवाडोल नहीं होता। उस पर आर्थिक संकट आने की संभावना कम होती जाती है।

इसके अतिरिक्त मितव्ययिता तथा सादा जीवन मनुष्य को अनेक दुर्गुणों तथा दुराचारों से भी बचाये रखता है। दुर्गुण तथा दुराचारों का आगमन होता ही है मिथ्या तथा अपव्ययता के माध्यम से। धन की धूमधाम बुद्धि को इतना भ्रमित कर देती है कि यह समझ में नहीं आ पाता कि हम जिस मार्ग से चल रहे हैं अथवा जो जीवन पद्धति अपना रहे हैं वह निरापद नहीं है। अधिक महंगी तथा खर्चीली जिन्दगी अपनाने से स्वाभाविक है कि अधिक आय के साधन अपनावे जाएं। अन्धाधुन्ध आय कभी भी सद्साधनों से नहीं होती। अपनी इस अनावश्यक एवं अनर्गल लिप्सा को पूरा करने के लिये मनुष्य को मोह वंश अनुचित मार्ग ही अपनाने पड़ते हैं। इसलिये अपना नैतिक तथा राष्ट्रीय आचरण बचाने के लिए सम्पन्न लोगों को मितव्ययिता और गरीब लोगों को अनुकरण का स्वभाव छोड़ना ही होगा । यही वह मार्ग है जिस पर चल कर समाज में स्थायी शाँति तथा संतोष लाया जा सकता है।


परिवर्तन ही सत्य

परिवर्तन ही सत्य

एक बाग में दो वृक्ष थे। एक बिलकुल सूख गया था दूसरे में सुन्दर फूल लग रहे थे। सूखे वृक्ष में एक गीध रहता था, हरे वृक्ष में कोयल निवास करती थी।

दोनों में प्रायः विवाद हो जाया करता था। गीध कहता था संसार मिथ्या है, कोयल कहती संसार सत्य है। बहस में कभी-कभी गरमा-गरमी भी हो जाती थी। कुछ दिन बीते सूखे वृक्ष में से कहीं एक हरी डाल फूट पड़ी और हरा वृक्ष सूख कर ठूँठ हो गया । अब भी गीध और कोयल में झगड़ा होता, पर गीध अब संसार को सत्य कहता और कोयल उसे मिथ्या बताती।

एक दिन एक कौआ उधर आ निकला। उसने दोनों का झगड़ा सुना तो हंस कर बोला- भाइयो-बहनों! व्यर्थ झगड़ा न करो। न संसार सर्वथा सत्य है न बिलकुल मिथ्या । संसार परिवर्तनशील है इसलिये झगड़ने की अपेक्षा जो प्रगट है उसे ही सुन्दर और सफल बनाना बुद्धिमानी है। परिवर्तनों के अनुरूप जो अपने जीवन को ढालते हैं वही इस संसार के सही अर्थ को जानते हैं।


परिश्रम करने वाले ही आगे बढ़ते हैं।

जीवन में उन्नति करने के लिए जिन गुणों की आवश्यकता है, उनमें परिश्रम का मुख्य स्थान है। प्रतिभा को उन्नति का आधार मानने वालों को यह बात न भूलनी चाहिए कि परिश्रम प्रतिभा का पिता है। जिस प्रकार रस्सी की रगड़ से कुँए पर पड़ी शिला पर निशान या चिन्ह बन जाता है। उसी प्रकार परिश्रम से प्रतिभा उत्पन्न होती है परिश्रम के अभाव में प्रतिभा बेकार पड़ी रहती है, पर काम करते-करते योग्यता का विकास हो जाया करता है। “करत-करत अभ्यास के जड़मत होत सुजान” का सिद्धाँत मात्र सूक्ति ही नहीं, बल्कि यह पुरुषार्थी एवं परिश्रमी व्यक्तियों का अनुभव सिद्ध सत्य है।

संसार में जो भी लौकिक-पारलौकिक विभूतियाँ भरी पड़ी हैं, वे परिश्रम के आधार पर ही प्राप्त की जा सकती हैं। सम्पत्ति, समृद्धि अथवा सम्पन्नता तीनों परिश्रम एवं पुरुषार्थ की ही अनुगामिनी हैं। संसार में अब तक जो भी उल्लेखनीय व्यक्ति हुये हैं उन्होंने प्रतिभा की अपेक्षा परिश्रम पर अधिक विश्वास किया है। प्रतिभा भी अपना चमत्कार तभी प्रकट कर पाती है जब उसे परिश्रम का सहयोग प्राप्त होता है। नहीं तो संघर्ष के अभाव में अरणी में छिपी आग की तरह प्रतिभा भी मनुष्य के भीतर छिपी-छिपी बेकार बनी रहती है।

बम्बई के वेंकटेश्वर प्रेस एवं प्रकाशन गृह का संस्थापक तथा स्वामी जब मारवाड़ से रोटी-रोजी की तलाश में बम्बई आया था तब उसके पास न प्रतिभा थी और न पैसा। शरीर पर पहने हुये कपड़ों के सिवाय उसके पास और कुछ भी नहीं था। यदि उसके पास कुछ था तो केवल परिश्रमशीलता का ही सम्बल था।

कुछ समय तक बुकसेलर के पास नौकरी करने के बाद मितव्ययिता से बचाये पैसों से छोटी-छोटी पुस्तकें खरीद कर शहर में बेचना शुरू किया। वह युवक सुबह से शाम तक फेरी लगाता रहता था जब तक वह उस दिन की सारी पुस्तकें नहीं बेच लेता था। कुछ ही समय में कन्धे पर किताबों का झोला लटकाये निरन्तर फेरी लगाते हुये उस परिश्रमी युवक को लोग पहचानने और अधिकतर उससे ही पुस्तकें खरीदने लगे। उसके परिश्रम ने लोगों को प्रभावित किया और लोगों ने उसे सहानुभूति दी। धीरे-धीरे वह एक अच्छा पुस्तक विक्रेता बन गया। अपनी दुकान में अथक परिश्रम करते-करते उसने इतना कमा लिया कि अब बड़ी पुस्तकें बेचने तथा छपाने लगा। इस काम में भी उसने इस सीमा तक परिश्रम किया कि उसमें एक अच्छे प्रकाशन की प्रतिभा जाग उठी। निदान उसने अपने परिश्रम के बल पर साहस इकट्ठा कर के अपना स्वयं का प्रेस लगा लिया और धीरे-धीरे इतना विकास किया कि आज भी बम्बई का यह भारत प्रसिद्ध प्रेस तथा प्रकाशन गृह उसके परिश्रम तथा पुरुषार्थ की यशगाथा गा रहा है। उस प्रतिभा तथा पैसे से रहित युवक ने अपने परिश्रम के बल पर दोनों चीजें पाकर अपने जीवन को सफल करके दिखला दिया।

भारत के टाटा, बाटा, बिड़ला आदि धनकुबेरों ने अपने अनुभव बतलाते हुये यही कहा है कि वे लोग जन्मजात प्रतिभा तथा धन सम्पन्न नहीं थे। उनकी इस विशाल सम्पत्ति का मूलाधार वह अबाध परिश्रम ही रहा है जिससे उन्होंने कभी मुँह नहीं चुराया। परिश्रम करते-करते उनमें प्रतिभा का भी विकास होता गया जिससे वे इतने लम्बे-चौड़े कारोबार की स्थापना कर सके प्रबन्ध एवं संचालन में सफल हो सके।

पण्डित ईश्वरचन्द विद्यासागर जन्मजात प्रतिभा के धनीमानी कहे जाते हैं। किन्तु क्या उनकी वह प्रतिभा किसी काम आ सकती यदि वे अठारह-अठारह घंटे काम न करते । पैसे के अभाव में निवास स्थान पर प्रकाश का प्रबन्ध न कर सकने पर यदि वे सड़क पर लगी लालटेनों के नीचे रात-रात भर न पढ़ते तो क्या उनकी प्रतिभा उन्हें आगे बढ़ने और ऊंचे चढ़ने में सहायक हो सकती थी? निताँत निर्धन, दीन-हीन तथा अयोग्य माने जाने वाले अब्राहम लिंकन के पास प्रतिभा से अधिक परिश्रम का बल था। उसी परिश्रम के बल पर जंगल से लकड़ी काटना, शहर ले जाकर बेचना तथा बारह-बारह मील के इर्द−गिर्द में घूम कर किताबें लाना और रात-रात भर पढ़ना आदि उनकी परिश्रमशीलता के बल पर ही सम्भव हो सका। जीवन में सैंकड़ों बार अविराम असफल होने पर भी अन्त में अमेरिका के राष्ट्रपति के पद पर पहुँचने में अब्राहम लिंकन की प्रतिभा की अपेक्षा परिश्रम को अधिक श्रेय है। प्रतिभा के अभाव में परिश्रम एवं पुरुषार्थ लक्ष्य तक पहुँचाने में समर्थ हो सकता है जब कि परिश्रम के अभाव में प्रतिभा एक कदम भी आगे नहीं बढ़ा सकती। यह सत्य एवं असंदिग्ध बात है।

यह समझना कि परिश्रम द्वारा सम्पत्ति कमा लेने के बाद परिश्रम की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती, कमाई हुई सम्पत्ति के बल पर आराम से जिन्दगी बिताई जाये- ठीक विचार नहीं है। यदि एक बार सम्पत्ति अथवा सुविधा के साधन जुटा कर परिश्रमशीलता को त्याग दिया जायेगा तो वह सम्पत्ति कुछ दिन भी न ठहर सकेगी। कारण स्पष्ट है कि तब निठल्ला होकर व्यक्ति केवल खर्च करने पर ही लग जायेगा। खर्च चलता रहेगा। और आय रुक जायगी। फलतः सम्पत्ति का सारा संचय समाप्त हो जायेगा, इसके अतिरिक्त कभी अनेक ऐसी आकस्मिक घटनाएं हो जाती हैं जिनसे बड़ी-बड़ी सम्पत्तियाँ नष्ट हो सकती हैं और तब परिश्रमशीलता के अभाव में आदमी अपनी क्षति पूर्ति न कर सकने के कारण दरिद्री ही बना रहता है।

निष्क्रिय बैठे रहने से मनुष्य को अनेक प्रकार के व्यसन घेर लेते हैं। उसका शरीर रोगों का शिकार बन जाता है। तब ऐसी दुर्दशा में उसकी सम्पत्ति पानी की तरह ही बहने लगती है। अपरिश्रमशील व्यक्ति कभी स्वस्थ नहीं रह सकता और आरोग्य के अभाव में वह अपनी सम्पत्ति का कोई सुख भोग भी नहीं कर सकता। इन दोषों से बचे रहने और अपने उपार्जन का सुख सन्तोष पाने के लिए मनुष्य को सदा परिश्रम करते रहना चाहिए।

संसार के बड़े-बड़े धनकुबेर, जिनके पास इतनी संपत्ति रही होती है कि केवल वे ही नहीं अनेक पीढ़ियाँ जीवन भर सुख-सुविधापूर्वक रह सकती हैं, अपने कारोबार में मजदूर से भी अधिक परिश्रम करते रहते हैं। जहाँ कोई मजदूर सामान्यतः आठ-दस घंटे ही काम किया करता है वहाँ बुद्धिमान व्यवसायी अठारह-अठारह घंटे काम में पिसा रहा करता है। उसका पूरा जीवन ही कार्य का प्रतिरूप बन जाया करता है। वे इस तथ्य को भली भाँति जानते हैं कि उन्होंने जिस परिश्रमशीलता के बल पर यह उच्चस्तरीय अवस्था प्राप्त की है वह उसका त्याग कर देने पर ठहर नहीं सकती। लक्ष्मी की कृपा उद्योगी सिंह पर ही होती है। अपरिश्रमी व्यक्ति तो दरिद्रता का ही कृपा पात्र हुआ करता है।

उन्नति की आकाँक्षा करने से पहले मनुष्य को अपने को परख कर देख लेना चाहिये कि ऊंचे चढ़ने के लिए जिस श्रम की आवश्यकता होती है उसकी जीवन वृत्ति उसमें है भी या नहीं। यदि है तो उसकी आकाँक्षा अवश्य पूर्ण होगी। अन्यथा इसी में कल्याण है कि मनुष्य उन्नति की आकाँक्षा का त्याग कर दे नहीं तो उसकी आकाँक्षा स्वयं उसके लिए कंटक बन जायगी।

सच्चा, सुगम तथा सुखदायक जीवन परिश्रमशील व्यक्ति का ही अधिकार है। ऐसा संतोषपूर्ण जीवन आलसी अथवा अपरिश्रमशील व्यक्ति नहीं पा सकते। जिसका जीवन समृद्ध, सुखी तथा सन्तोषपूर्ण दिखाई दे आप बिना किसी सन्देह के समझ लें कि यह भाग्यवान व्यक्ति परिश्रमी एवं उद्योगी है। क्योंकि वह जो कुछ सुख सन्तोष भोग रहा है, वह श्रम के अतिरिक्त कोई दूसरा देवता नहीं दे सकता। भारत के पूर्वकालीन ऋषि-मुनि परिश्रम एवं कर्तव्यपरायणता का महत्व भली भाँति जानते थे। इसीलिए वे जान बूझ कर अधिक से अधिक कम सुख-सुविधापूर्ण जीवन अपनाया करते थे। वे जंगलों में रहते अपने हाथ से स्वयं सब काम करते और कठिन जीवन साधना में लगे रहते थे। वे प्रायः उषाकाल से लेकर अर्ध रात्रि तक शारीरिक अथवा मानसिक श्रम करते ही रहते थे।

ऋषि मुनि ही नहीं पूर्वकालीन राजा-महाराजा तक श्रमशीलता के महत्व को स्वीकार करते थे और इसीलिए राजमहलों में सब साधन होने पर भी वे राजकुमारों को ऋषियों के आश्रम में पढ़ने के लिए भेजा करते थे। इसमें उनका मन्तव्य यही रहता था कि राजकुमार आश्रमों के कठिन जीवन में रह कर कर्मठ बन जायेंगे। जबकि राजमहलों में उनके आलसी एवं विलासी हो जाने का भय हो सकता है।

आश्रमों में राजकुमार, आश्रम की सफाई से लेकर लकड़ी काटने तथा पानी भरने आदि के सारे काम स्वयं अपने हाथों से ही करते थे। यह इसी परिश्रम के अभ्यास का ही फल होता था कि जन्मजात कमलवत् कोमल राजकुमार चट्टान की भाँति कठोर एवं कर्मठ बन जाते थे, जिसके बल पर वे जीवन की बड़ी से बड़ी विपत्ति में न तो विचलित होते थे और न भोग-विलास में लिप्त हो पाते थे। उनका जीवन खरादे हुए हीरे की तरह ही आजीवन तेजस्वी बना रहता था। परिश्रम मानव-चरित्र को चमकाने वाली खराद की तरह है। इस शान पर चढ़ा कर मनुष्य को अपने जीवन का मूल्य-महत्व बढ़ाना ही चाहिए।

अनेक लोग परिश्रमी होने पर भी परिश्रम के लाभ नहीं उठा पाते। इसमें दोष परिश्रम का नहीं होता, परिश्रम करने के ढंग का होता है, निरर्थक परिश्रम कभी भी फलवान नहीं हो सकता। परिश्रम वही फलीभूत होता है जिसके करने में मनुष्य की रुचि हो और जिसकी दिशा ठीक हो। विरत दशा अथवा अनुपयोगी दिशा में किया हुआ परिश्रम अवश्य निष्फल जाता है।

जो मनुष्य रो-झींक कर मजबूरी के साथ कराहता हुआ काम किया करता है वह चौबीसों घण्टों जीवन-भर परिश्रम क्यों न करता रहे कभी सफल नहीं हो सकता। उसका किया हुआ कोई काम सुचारु तथा उपयुक्त नहीं होगा। ऐसे बेकार कार्यों का पारिश्रमिक नगण्य ही होता है और ऐसे बेगारी लोगों को कोई भी नहीं पूछता। उनकी परिश्रमशीलता पसीने के सिवाय उन्नति अथवा समृद्धि के रूप में कभी फलीभूत नहीं होती। रसपूर्वक परिश्रम करने वाले के सारे काम सफल एवं सुचारु रूप से होते और समाज में उनका ठीक-ठीक मूल्याँकन किया जाता है। परिश्रमशीलता में रुचि, रस, उत्साह तथा व्यवस्था का समावेश होना बहुत आवश्यक है।

उचित दिशा में ही किया हुआ परिश्रम मनुष्य की उन्नति का कारण होता है। उपजाऊ, उर्वर तथा उदार दिशा ही परिश्रम की उचित दिशा है। मनुष्य की जिस दिशा में गति सम्भव और उपलब्धि निश्चित हो उसी दिशा में परिश्रम करना चाहिये। अनुदार अथवा वंध्या भूमि पर बोये हुये बीज कभी भी फलीभूत नहीं होते। मनुष्य को परिश्रमी होने के साथ अपने परिश्रम की दिशा का भी ज्ञान होना चाहिए। तभी वह जीवन में सफल एवं समृद्ध हो सकेगा अन्यथा अषाढ़ में बरसे मेघ की तरह उसका सारा श्रम व्यर्थ चला जायेगा।


एक निश्चय- एक अमल

एक निश्चय- एक अमल-

एक लड़के ने एक बहुत धनी आदमी को देख कर धनवान बनने का निश्चय किया। कई दिन तक वह कमाई में लगा रहा और कुछ पैसे भी कमा लिये। इसी बीच उसकी भेंट एक विद्वान से हुई तब उसने विद्वान बनने का निश्चय किया और दूसरे ही दिन से कमाई-धमाई छोड़ कर पढ़ने में लग गया। अभी अक्षर अभ्यास ही सीख पाया था कि उसकी भेंट एक संगीतज्ञ से हुई उसे संगीत में अधिक आकर्षण दिखाई दिया, अतः उस दिन से पढ़ाई बन्द कर दी और संगीत सीखने लगा।

काफी उम्र बीत गई न वह धनी हो सका न विद्वान। न संगीत सीख पाया न नेता बन सका। तब उसे बड़ा दुःख हुआ। एक दिन उसकी एक महात्मा से भेंट हुई। उसने अपने दुःख का कारण बताया। महात्माजी मुस्करा कर बोले- ‘बेटा! दुनिया बड़ी चिकनी है जहाँ जाओगे कोई न कोई आकर्षण दिखाई देगा। एक निश्चय कर लो और फिर जीते-जी उसी पर अमल करते रहो तो तुम्हारी उन्नति अवश्य हो जायेगी। बार-बार रुचि बदलते रहने से कोई भी उन्नति न कर पाओगे।’ युवक समझ गया और अपना एक उद्देश्य निश्चित कर उसी का अभ्यास करने लगा।


सज्जनों से ही मित्रता करें।

मनुष्य सामाजिक प्राणी है। उसका समाज जितना ही घनिष्ठ एवं विस्तृत हो उतना ही वह सुखी रह सकेगा। मछली जल में रहती है, यह जल जितना अधिक एवं जितना स्वच्छ होगा उतना ही उसे सुख मिलेगा। थोड़े जल में मछली का आनन्द सीमित हो जाता है और यदि वह जल मैला-कुचैला, गन्दा, दूषित हो तो उस बेचारी को साँस लेने एवं जीवित रहने में कठिनाई पड़ेगी। यही बात मनुष्य के बारे में भी है। उसके जितने घनिष्ठ सच्चे, सुयोग्य मित्र जितनी अधिक संख्या में होंगे वह उतना ही सुखी-सन्तुष्ट एवं समुन्नत हो सकेगा। इसके विपरीत यदि मित्र कम होंगे, जो होंगे वे भी झूठे विश्वासघाती, कुसंस्कारी एवं निकृष्ट स्तर के होंगे तो उनके द्वारा सदा त्रास, असंतोष, क्षोभ, हानि एवं पतन की ही सम्भावना रहेगी।

मित्रता व्यक्ति एवं समाज की व्यवस्था एवं प्रगति के लिए एक आवश्यक तत्व है। इसलिए हर व्यक्ति के लिए यह आवश्यक है कि वह उसे सम्पादित करने के लिए निरन्तर प्रयत्नशील रहे। मित्रों से भरी-पूरी जिन्दगी सरल, सफल और सुखद होती देखी गई है। उसमें रस भी रहता है और उल्लास भी। अतएव आमतौर से सभी उसके लिए लालायित रहते हैं और यथासम्भव ऐसे प्रयत्न भी करते हैं जिससे मित्र-मण्डल की अभिवृद्धि होती है, यह उचित भी है और आवश्यक भी।

किन्तु इस युग में जिस प्रकार औचित्य का प्रत्येक मार्ग कंटकाकीर्ण हो गया है उसी प्रकार मित्रता की मंजिल भी बड़ी जटिल हो गई है। आम तौर पर नकली, झूँठी, निकम्मी और पतनोन्मुख मित्रता का ही बोलबाला रहता है और उस जंजाल में फंस कर अनेक व्यक्ति भारी जोखिम उठाते और पछताते देखे गये हैं। जब व्यक्तियों में से श्रेष्ठता का तत्व ही घटता चला जा रहा है तो उनसे सच्ची और अच्छी मित्रता की भी आशा क्यों की जाय? मतलब के लिए गधे को बाप बनाने की कला में प्रवीण व्यक्ति एक नाटक की तरह मित्रता का स्वाँग खड़ा कर देते हैं। आँधी तूफान की तरह उसे बढ़ाते हैं और किसी भोले आदमी को उसकी उसी पकड़ में जकड़ कर ऐसी पटक लगाते हैं कि बेचारा चारों खाने चित्त हो जाता है। मित्रता का यही स्वरूप आज आम तौर से देखा जाता है, इसलिए इस दिशा में पूरी तरह सतर्क रहने की आवश्यकता है। ऐसा न हो कि चले थे मित्रता का आनन्द लेने मिले उलटा छल और कपट, शोक एवं संताप।

मित्र की तलाश के लिए कदम बढ़ाने से पूर्व यह भली प्रकार समझ लेना चाहिए कि केवल नैतिक आस्था वाले, उत्कृष्ट व्यक्तित्व के व्यक्ति ही सच्ची मित्रता कर सकने और निबाहने योग्य होते हैं। जिन व्यक्तियों का निजी जीवन घृणित एवं पतनोन्मुख रहा है वे कदाचित ही किसी के सच्चे मित्र होते हैं, जब समय आता है अपने असली रूप में प्रकट होते हैं और मित्र की ही चोटी साफ कर देते हैं। जिसके पास न उत्कृष्टता है न आदर्शवादिता वह मित्रों को कुछ नहीं दे सकता। उसके पल्ले आजीवन जो घृणित निकृष्टता बंधी रही है वह उसे ही तो अपने मित्र को दे सकता है। झूठे, चोर, गंवार, जुआरी, बेईमान, गुण्डे, बदमाश प्रकृति के मनुष्य न तो किसी के मित्र हो सकते हैं और न होंगे। उनकी जहाँ भी घनिष्ठता बढ़ेगी वे वहीं सर्वनाश प्रस्तुत करेंगे। इसलिए मैत्री के इच्छुक हर भावनाशील व्यक्ति को आरम्भ से ही यह ध्यान रखना होगा कि वह किसी दुष्ट, दुराचारी से घनिष्ठता बढ़ाने की जोखिम न उठायें। आरम्भ में ऐसे लोगों के माध्यम से कोई प्रयोजन सिद्ध होता, लाभ मिलता दिखाई पड़े तो भी उसे छोड़ देना चाहिए, क्योंकि वह आरम्भिक तनिक-सा लाभ अन्ततः बहुत बड़े घाटे की परिस्थिति उत्पन्न करता है।

मित्रता के लिए वे ही व्यक्ति उपयुक्त हो सकते हैं जो प्रकृतितः सज्जन हैं। जिनके गुण, कर्म, स्वभाव में शालीनता एवं उत्कृष्टता का समुचित समावेश है, ऐसे लोग ही किसी को कुछ प्रकाश एवं आनन्द प्रदान कर सकते हैं। ओछे व्यक्ति अपनी कालौंछ से अच्छे को भी कलंकित कर देते हैं। अतएव मित्रता बढ़ाने से पूर्व हजार आँखों से देखना और हजार हाथों से टटोलना चाहिए कि वह घृणित स्तर का तो नहीं, उसका पिछला चरित्र स्वार्थपूर्ण तो नहीं रहा है। अपनी धर्मपत्नी से विश्वासघात करने वाले व्यभिचारी जिससे भी प्रेम का नाटक रचते हैं उस बेचारी को गर्त में डुबाने के अतिरिक्त और कुछ प्रयोजन सिद्ध नहीं कर सकते। ऐसे वासनात्मक प्रेम-जंजाल में फंस कर अनेक नर-नारी अपने भविष्य को अन्धकारमय बनाते और सिर धुन-धुन कर पछताते देखे गये हैं। इसी प्रकार आर्थिक अथवा बल प्रयोग के लाभ का लोभ देकर जो दुष्ट दुराचारी किसी को अपने मित्रता पाश में बाँध लेते हैं अन्ततः उसकी दुर्गति कर के ही छोड़ते हैं।

वर्तमान युग की इस कटु सचाई को ध्यान में रखते हुए मित्रता बढ़ानी चाहिए। मित्रता, आवश्यक, उचित और लाभदायक भी है पर यह उद्देश्य पूरा तभी हो सकता है जब सज्जनों के साथ वैसा सुयोग बनता हो। अपने आस-पास जो सज्जन, सद्भावी चरित्रवान एवं सुयोग्य व्यक्ति हों, उनकी जानकारी प्राप्त करनी चाहिये और क्रमशः उनके साथ मित्रता बढ़ानी चाहिए। जब तक ऐसे लोग न मिलें, अपने परिवार के लोगों को ही अपना सच्चा मित्र बनाए रखने तक सीमित रखना चाहिये। अपने सद्गुणों के आधार पर सज्जनतापूर्ण व्यवहार करते रहने से, उनके गुण, कर्म, स्वभाव में शालीनता एवं विचारों में उत्कृष्टता बढ़ाते चलने से अपने घर के लोग भी श्रेष्ठ मित्रों की आवश्यकता पूरी कर सकते हैं। पति-पत्नी, भाई-भाई, पिता-पुत्र आदि सम्बन्धी आपस में सच्चे मित्र हो सकते हैं। घर से बाहर केवल सज्जन प्रकृति के लोगों से ही मित्रता बढ़ानी चाहिये। दीन-दुःखियों की सहायता-दुरात्माओं की उपेक्षा, प्रगतिशील लोगों की प्रशंसा कर के काम चलाया जा सकता है, पर मित्रता बढ़ाने के लिए पूरी तरह यह ध्यान रखना चाहिये कि निठल्ले, निकम्मे, दुष्ट, दुराचारी और दुर्मुखी लोगों को किसी भय या प्रलोभन के वशीभूत होकर भी मित्र नहीं बनाना चाहिए। थोड़ी घनिष्ठता हो भी जाय तो ऐसे लोगों को अपनी दुर्बलताओं का रहस्य तो कदापि नहीं बताना चाहिए अन्यथा वे उसी कमजोरी का अनुचित लाभ उठाते रहेंगे और अवसर आने पर उसे प्रकट कर के अपने लिये विपत्ति खड़ी कर देंगे।

मित्रता के मार्ग की इन विभीषिकाओं को ध्यान में रखने के उपरान्त धैर्यपूर्वक उसके समीपवर्ती क्षेत्र में सज्जनों की खोज करनी चाहिये और उनसे मैत्री बढ़ानी चाहिये। ऐसे लोगों से भले ही बहुत गहरी घनिष्ठता न हो जावे उनका थोड़ा परिचय और संपर्क भी बड़े काम का सिद्ध हो सकता है। ऊँचे स्तर के सुयोग्य व्यक्ति न मिलें तो भी उतना तो करना ही चाहिये कि मित्र-मण्डली में जो हों वे सामान्य स्तर के भले और भोले व्यक्ति हों। कोई उनकी विशेषता भले ही न हो पर दुष्टता से तो बचे हों। दुष्ट लोगों में चतुरताजन्य आकर्षण होता है, उस आकर्षण से वे मित्रों को फंसाते-पछाड़ते रहते हैं। प्रयत्न यह होना चाहिये कि ऐसे लोगों से बच कर अपनी घनिष्ठता उनके साथ बढ़ाई जाय, जिनसे लाभ भले ही न हो पर खतरे की आशंका तो न करनी पड़े।

सच्चे और अच्छे मित्र भले ही थोड़ी संख्या में हों, भले ही वे व्यक्ति घनिष्ठ न होकर सामान्य सद्भाव संपर्क के ही हों, वे हर मानव के लिये लाभदायक हो सकते हैं। हमें अपने को भी इसी स्तर का बनाना चाहिये कि जो हमसे मित्रता करे उसे अपने सौभाग्य की सराहना करनी पड़े। सज्जनता और शालीनता ही सच्ची मित्रता का प्रयोजन पूरा करती है इसलिए मैत्री का अलिप्त एवं लाभ लेने अथवा देने वाले व्यक्ति में इन श्रेष्ठताओं का होना अनिवार्य रूप से आवश्यक है।


Quotation

प्रख्यात अमरीकी उद्योगपति श्री एण्ड्रयू कार्नेगी से एक बार किसी ने प्रश्न किया- किसी उद्योग में सफलता प्राप्त करने के लिए बुद्धि, श्रम और पूँजी में से कौन सर्वाधिक आवश्यक है।

तीनों आवश्यक हैं भाई!-कार्नेगी ने हंसते हुए उत्तर दिया- आपका प्रश्न तो ऐसा ही है जैसे कोई यह पूछे कि तीन पैर की तिपाई में किस पैर का महत्व सबसे अधिक है।

गायत्री की उच्चस्तरीय साधना-


गायत्री का शक्तिस्रोत-सविता देवता

गायत्री माता का ध्यान सदा सूर्य मण्डल के मध्य में विराजमान महाशक्ति के रूप में किया जाता है। “सूर्य मण्डल मध्यस्था” विशेषण के साथ ही उसे समझा और समझाया जाता है। साकार उपासना करने वाले-पुस्तक, पुष्प, कमंडलु, माला धारण किये हुये मातृ-शक्ति का सूर्य मंडल के मध्य में विराजमान ध्यान करते हैं। निराकार उपासना करने वाले चिदाकाश एवं महदाकाश में प्रतिष्ठित तेज मंडल के रूप में उसका ध्यान करते हैं। उपासना का क्रम निराकार हो अथवा साकार दोनों ही स्थितियों में सूर्य मंडल की स्थापना अनिवार्य रूप से रहेगी। प्रकाश के तेजोवलय को समन्वित किये बिना गायत्री महाशक्ति का ध्यान हो ही नहीं सकता।

गायत्री भावयेद्देवी सूर्यांसारकृताश्रयाम।

प्रातर्मध्याह्वे ध्यानं कृत्वा जपेत्सुधीः॥

“बुद्धिमान मनुष्य को सूर्य के रूप में स्थित गायत्री देवी का प्रातः, मध्याह्न और सायं त्रिकाल ध्यान कर के जप करना चाहिए।”

(शाकानन्दतरंगिणी 3।4।1)

जप के साथ ध्यान अनिवार्यतः किया जाता है। वह जप किस काम का जिसके साथ ध्यान जुड़ा हुआ न हो। नाम और रूप दोनों का जोड़ा है। भगवान का नामोच्चारण करते समय उसके रूप की भी धारणा करनी पड़ती है। साकार उपासना करने वाला गायत्री माता को सूर्य मंडल के मध्य में अवस्थित मान कर अथवा उनके मुखारविन्द के चारों ओर तेज मंडल की भावना कर के ध्यारों का उद्देश्य पूरा करते हैं। निराकार उपासना करने वाले प्रकाश बिन्दु तथा उदीयमान सूर्य जैसे विशाल तेज मण्डल का ध्यान करते हुए जप के द्वारा उपासना क्रम चलाते हैं। गायत्री महामन्त्र की उपासना विधि यही है कहा है-

सविता सर्वभूतानाँ, सर्वभावाच्श्च सूयते।

सवनात्प्रेरणाच्चैव सविता तेन चोच्यते॥

“जब प्राणियों में सब प्रकार के भावों को सविता ही उत्पन्न करता है। उत्पन्न और प्रेरणा करने से ही यह सविता कहा जाता है।”

वरेण्यं वरणीयच संसार भय भीरुभिः।

आदित्यार्न्तगतं यच्च भर्गाख्यिं वा मुमुक्षुभि॥

“संसार के भय से भीत और मोक्ष की कामना वालों के लिए सूर्य मण्डल के अंतर्गत जो श्रेष्ठ तेज है वह वन्दनीय है।”

देवस्य सवितुर्यच्च भर्गमर्न्तगत विभुम्।

ब्रह्मवादिन एवाहुर्वरेण्यम् तच्च धीमहि॥

“सविता देव के अंतर्गत तेज को ब्रह्मज्ञानी वरेण्य अर्थात् श्रेष्ठ कहते हैं, उसी का हम ध्यान करते हैं।”

सन्ध्या योग में इसका और भी अधिक स्पष्टीकरण किया गया है और बताया गया है कि जिस भावना का हम ध्यान करते हैं वह मन को एकाग्र करने के लिए कोई प्रकाश गोलक मात्र नहीं वरन् वह परम तेजस्वी परमात्मा है जो हमारी बुद्धि, अन्तःचेतना, भावना एवं आस्था को सन्मार्ग की ओर प्रेरित करता है।

चिन्तायामो वयं भर्गो धियो योनः प्रचोद्यात्।

धर्मार्थ काम मोक्षेषु बुद्धि वृत्ती पुनः पुनः॥

“हम उस तेज का ध्यान करते हैं जो हमारी बुद्धि में धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की बार-बार प्रेरणा करता है।”

बुद्वेर्बोधयिता यस्तु चिदात्मा पुरुषो विराट्।

सवितुस्तद्वरेण्यन्तु सत्यधर्माणमीश्वरम्॥

“बुद्धि को सन्मार्ग पर लगाने वाला जो विराट चिदात्मा पुरुष है, वही सत्य धर्म वाला ईश्वर रूप वन्दनीय सविता है।”

अगस्त्य और पाराशर ऋषियों ने भी इसी तथ्य की पुष्टि की है। गायत्री महामन्त्र का ध्यान करते समय जिस सविता को धारण करने की प्रेरणा है वह रोशनी एवं गर्मी ही नहीं देता वरन् हमारी अन्तः चेतना को उत्कृष्टता की दिशा में वह प्रेरणा भी देता है जिससे जीवनोद्देश्य को प्राप्त कर सकना सम्भव हो सके।

यो देवः सवितास्माकं धियो धर्मादिगोचराः।

प्रेरयेत्तस्य यर्द्भगस्तं वरेण्यमुपास्महे॥

-अगस्त्य

“सविता नामक जो देवता हमारी बुद्धि को धर्मादि में लगाते हैं उनके वन्दनीय तेज की हम उपासना करते हैं।”

देवस्य सवितुर्भर्गो वरणीयच धीमहि।

तद्स्माकं धियो यस्तु ब्रह्मत्वेव प्रचोदयात्॥

-पाराशर

“सविता देवता के प्रशंसनीय तेज का हम ध्यान करते हैं जो हमारी बुद्धि को ब्रह्मत्व में प्रेरित करे।”

प्रत्येक वेद मन्त्र का एक देवता है जिसकी शक्ति से ही यह मन्त्र सिद्ध एवं फलित होता है। गायत्री महामंत्र का देवता ‘सविता’ है। ‘तत् सवितुः’ इस आरम्भिक पद में उस सविता का उल्लेख करते हुए आगे उसी का ध्यान और धारणा करने का निर्देश दिया गया है। गायत्री की शक्ति इस सविता देवता पर ही अवलम्बित है।

सविता कहते हैं “सूर्य” को। गायत्री को एक प्रकार से सूर्य का मन्त्र भी कहा जाता है। ‘पुनातु माँ तत् सवितुर्वरेण्यम्’ इस अन्तिम पद वाले स्तोत्र में सूर्य देवता का ही स्तवन किया गया है। इसलिये कितने ही उपासक सूर्य की आराधना के लिये गायत्री का उपयोग करते हैं। गायत्री को माता रूप में मानने वाले साधक भी उसका रूप “सूर्य मण्डल मध्यस्था” सूर्य मंडल के बीच में अवस्थित स्वरूप का, मातृदेवी के रूप में ही ध्यान करते हैं। किसी भी रूप में गायत्री मंत्र की उपासना की जाय ‘सूर्य’ का उससे अविच्छिन्न सम्बन्ध अनिवार्य रूप से रखना होगा। गायत्री का देवता ही सूर्य है तो उसका स्वरूप भी साथ में होना स्वाभाविक है।

स्थूल विज्ञान की दृष्टि से सूर्य एक अग्निपिण्ड है, जो आकाश में अवस्थित अनन्त आकाश गंगाओं में से ‘स्याइरल’ नामक एक आकाश गंगा के परिवार के लगभग डेढ़ खरब तारों में से एक छोटा-सा तारा मात्र है। इसका व्यास करीब 9 लाख मील अर्थात् पृथ्वी की तुलना में 110 गुना बड़ा है। उसके परिवार में 9 ग्रह हैं तथा प्रत्येक ग्रह के अनेक उपग्रह हैं। बुध, शुक्र और पृथ्वी का एक-एक चन्द्रमा है। मंगल के दो, बृहस्पति के बारह, शनि के नौ, वरुण के पाँच, हरिग्रह के दो और पीतग्रह के चार। इनके अतिरिक्त हजारों छोटे ग्रह तथा ग्रहिकाएं एवं अगणित, धूमकेतु, पुच्छल तारे इस सौर परिवार में सम्मिलित हैं। यह सब सूर्य की प्रबल आकर्षण शक्ति में जकड़े हुए उसकी परिक्रमा करते रहते हैं। अपने इस सारे परिवार को लेकर सूर्य ‘स्याइरल’ आकाश गंगा की परिक्रमा करता है। इस एक परिक्रमा में उसे पच्चीस करोड़ वर्ष लगते हैं। ज्योतिषियों का अनुमान है कि जबसे सूर्य पैदा हुआ है तब से अब तक वह सोलह ऐसी परिक्रमाएं कर चुका है।

स्थूल पदार्थ विज्ञान अभी तक सूर्य के सम्बन्ध में ऐसी ही जानकारियाँ एकत्रित कर सका है। तथा उसकी किरणों से सप्त रंग, विद्युत प्रवाह एवं आणविक विकरण का कुछ हद तक पता लगा सका है इस दिशा में और भी जानकारी एकत्रित की जा रही है पर यह सब सूर्य के स्थूल रूप का ही परिचय है। जैसे मनुष्य की सत्ता का विश्लेषण करने के लिए उसके शरीर सम्बन्धी जानकारी प्राप्त कर लेना पर्याप्त नहीं माना जा सकता, उसकी विद्या, बुद्धि, गुण, कर्म, स्वभाव, प्रवृत्ति, भावना, चेतना एवं आत्मा का पता लगाना भी आवश्यक होता है। इसके बिना केवल शरीर विश्लेषण के आधार पर जो परिचय प्राप्त किया जायगा वह अधूरा ही रहेगा। इसी प्रकार सूर्य की आत्मा का भी जानना आवश्यक है। इसके बिना गायत्री मन्त्र का साधक इस अग्नि पिण्ड सूर्य के जान लेने मात्र से अपना प्रयोजन पूर्ण नहीं कर सकता।

एक अनन्त चैतन्य, जीवन एवं शक्ति का समुद्र इस विश्व में लहरा रहा है। जड़ प्रकृति का परमाणु संकुल, उस चेतन सत्ता की तरंगों से ही तरंगित होकर गतिवान हो रहा है। जड़ पदार्थों में अपनी निज की कोई शक्ति या चेतना नहीं है। जब प्रलय होती है तो वह सब राख के ढेर के समान निष्प्राण, गतिहीन हो जाता है। संसार में जो कुछ हलचल हो रही दीखती है उसके मूल में वह चेतना का महाभाँडागार ही काम कर रही है। जैसे देह के निर्जीव कलेवर में आत्मा का ही संसार गतिशील रहता है वैसे ही जड़ प्रकृति में जो चेतना होती दिखाई पड़ती है उसका कारण वह चेतना सागर ही है जिसके लिए गायत्री मन्त्र में ‘सविता’ शब्द का प्रयोग हुआ है। यह प्रकाश पिण्ड सूर्य उस सविता का एक बाह्य-शरीर-स्थूल कलेवर मात्र है।

सूर्य की गर्मी और रोशनी हर किसी को दीखती है, यह उसकी स्थूल शक्ति है। इसके भीतर एक और भी सूक्ष्म सत्ता उसके अन्तर में मौजूद है वह है- जीवनीशक्ति। प्राणियों को उत्पन्न करने, पोषण और अभिवर्धन करने का विश्वव्यापी कार्यक्रम उस सूर्य की आत्मा पर ही आधारित है। रोशनी और गर्मी मशीनों से भी पैदा की जा सकती है, पर उनसे जीवन नहीं मिल सकता। वैज्ञानिक जानते हैं कि यदि सूर्य न होगा तो पृथ्वी पर जीवन का भी कोई चिन्ह शेष न रहेगा।

स्विता सर्वभावानाँ सर्वभावाँश्च सूयते।

सवनात् प्रेरणाच्चैव सविता तेन चोच्यते॥

-(बृहत् योगि याज्ञवल्क्य)

“सविता (सूय) से ही सब पदार्थ-दृश्य और अदृश्य की उत्पत्ति हुई है, प्रसव-धर्म के कारण उसका नाम सविता हुआ है।”

श्रुति में सूर्य को “संसार की आत्मा” बताया गया है। आकाश में दौड़ने वाले सूर्य के बाह्य कलेवर को गर्मी और रोशनी का पिण्ड कह सकते हैं, पर उसकी आत्मा जगत का जीवन है। इस जीवन-शक्ति का दूसरा नाम प्राण-शक्ति भी है। सूर्य की आत्मा को ही महाप्राण कहा गया है। उस महाप्राण की बूंदें विभिन्न प्राणियों में अल्प प्राण के रूप में दृष्टिगोचर होती हैं।

गय कहते हैं प्राण को। त्री कहते है-त्राण उद्धार उत्थान करने वाली को। प्राणशक्ति का उत्थान करने वाली विद्या को गायत्री कहा जाता है। अपने देवता सविता से गायत्री महामन्त्र में प्राण शक्ति अभिप्रेत होती है। और उसी का एक अंश अपने में धारण करके गायत्री उपासक अपने आपको धन्य बनाता है।

सूर्य के माध्यम से प्रस्फुटित होने वाला महाप्राण पर-ब्रह्म परमात्मा का वह अंश है जिससे इस विश्व-ब्रह्माँड का संचालन होता है। एक से अनेक बनने का ब्रह्म-संकल्प ही महाप्राण बन कर फूट पड़ा है। यह निर्झर जिस दिन तक झर रहा है उसी दिन तक सृष्टि है। जिस दिन परम प्रभु उस संकल्प को समेट लेंगे उसी दिन महाप्राण शाँत हो जायगा और फिर महाशून्य के अतिरिक्त और कुछ भी शेष न रहेगा। यह ब्रह्मा-संकल्प-महाप्राण-परब्रह्म की सत्ता से भिन्न कोई बाहरी पदार्थ नहीं वरन् उसी का एक अविच्छिन्न अंग हैं। परमात्मा अनंत है उसकी सत्ता असीम है। उस अनन्त, असीम, अचिन्त्य का एक भाग जो सृष्टि के संचालन में, उसकी समस्त प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित रखने में लगा हुआ है, उस महाप्राण को ही सूर्य की आत्मा-सविता देवता समझना चाहिये। प्राणी का जीवधारी का-सीधा सम्बन्ध इसी से है।

जीवन की बाह्य और आँतरिक सुव्यवस्था के लिए प्रगति और शाँति के लिए परब्रह्म की महाप्राण सत्ता को अधिकाधिक मात्रा में उपलब्ध करना प्राणी के लिए अभीष्ट होता है। इसी प्रयोजन की पूर्ति के लिए गायत्री महामन्त्र द्वारा सविता देवता की उपासना की जाती है।

यह भ्रम नहीं रहना चाहिए कि गायत्री महामन्त्र की शक्ति इस अग्नि-पिण्ड सूर्य पर अवलम्बित है। यह तो रोशनी और गर्मी मात्र देता है। यह सब तो बिजली की मशीनों से भी प्राप्त किया जा सकता है। इतने मात्र के लिए किसी उपासना की क्या आवश्यकता थी? गायत्री सूर्य की आत्मा- सविता शक्ति के साथ उपासक को सम्बन्धित करती है जिसके द्वारा वह परब्रह्म महाप्राण को अपने शरीर और अन्तःकरण में आवश्यक मात्रा में धारण करके लौकिक सुख एवं आत्मिक शाँति को अनुभव करता हुआ जीवन के परम लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है।

यह महाप्राण जब शरीर क्षेत्र में अवतीर्ण होता है तो आरोग्य, आयुष्य, तेज, ओज, बल, उत्साह, स्फूर्ति, पुरुषार्थ, इन्द्रिय शक्ति के रूप में दृष्टिगोचर होता है जब वह मनः क्षेत्र में अवतीर्ण होता है तो उत्साह, स्फूर्ति, प्रफुल्लता, साहस, एकाग्रता, स्थिरता, धैर्य, संयम आदि सद्गुणों के रूप में देखा जा सकता है। जब उसका अवतरण आध्यात्मिक क्षेत्र में होता है तो त्याग, तप, श्रद्धा, विश्वास, दया, उपकार, प्रेम, विवेक आदि के रूप में दिखाई देता है। तीनों ही क्षेत्र उस महाप्राण से जैसे-जैसे भरते जाते हैं वैसे ही मनुष्य अपूर्णता से पूर्णता की ओर, लघुता से विभुता की ओर, तुच्छता से महानता की ओर बढ़ने लगता है। आत्मकल्याण का, लक्ष्य प्राप्ति का यही मार्ग है। गायत्री के द्वारा सविता देवता को-महाप्राण को उपलब्ध करने का प्रयोजन ही यही है।

सविता देवता यद्यपि सूर्य का ही दूसरा नाम है। पर यह भली प्रकार समझ लेना चाहिये कि जो अन्तर शरीर और आत्मा का है वही सूर्य और सविता का है। गायत्री महामन्त्र का देवता सूर्य वही महाप्राण है। उसका स्पष्टीकरण शब्दों में स्थान-स्थान पर विस्तारपूर्वक किया गया है।

योऽसावादित्ये पुरुषः सोऽहम्।

-मैत्रेयी उपनिषद् 6।35

“जो सूर्य है सो मैं हूँ।”

प्राणी वै अर्क।

-शतपथ 10।4।7।23

“प्राण ही सूर्य है।”

सएष वैश्वनरो विश्व रुपः प्राणेऽग्निरुदयते।

-प्रश्नोपनिषद् 1।7

सूर्य के उदय होने पर सारे विश्व में प्राणाग्नि का संचार होने लगता है।’

सहस्ररश्मि शतघा वर्तमानः।

प्राणः प्रजानामुदंयत्येष सूर्यः॥

-शत. 6।71/20

“प्राण ही सहस्र रश्मियों वाला, सैकड़ों प्रकार से वर्तमान प्रजा को उत्पन्न करने वाला सूर्य है।”

भोऽसौ तपन्नुदेति ससर्वेषाँ भूतानाँ प्राणाना दायो देति।

-श्रुति.

“इस सूर्य से ही सब प्राणियों का प्राण प्राप्त होता है।”

सएष वैश्वानरो विश्व रुपः प्राणाग्नि रुदयति।

“यह प्राण ही सर्वव्यापी अग्नि के रूप में प्रकट होता है।”

आदित्यो वै बाह्यप्राण उदयत्येषत्द्येनं चाक्षुषं प्राणामनुगृह्णीते।

-प्रश्नोपनिषद् 1/7

“बाह्य जगत में यह प्राण आदित्य रूप होकर दशों दिशाओं में विद्यमान है।”

विश्व रुपं हरिणं जात वेदसं

परायणं जयोतिरेकं तपन्तम्।

सहस्र रश्मिः शतधा वर्तमानः

प्राणः प्रजानामुदयत्येष सूर्यः॥

-प्रश्नोपनिषद् 1।8

‘विश्वरूप, व्यापक, सर्वाधार, प्रकाशवान् तप्त किरणों वाला यह सूर्य समस्त जीवों का प्राण होकर उदय होता है।’

सूर्याद् भवन्ति भूतानि सूर्येण पालितानि तु।

सूर्ये लयं प्राप्नुवन्तियः सूर्यः सोऽहमेव च॥

-सूर्योपनिषद्

“सूर्य ही से सब प्राणी उत्पन्न होते हैं, उसी से उनका पालन होता है, उसी में वे लय हो जाते हैं, जो सूर्य है सो ही मैं हूँ।”

गायत्री का देवता सविता-सूर्य-विश्व के जीवन का, ज्ञान और विज्ञान का केन्द्र है। अन्य समस्त देव शक्तियों का केन्द्र भी वही है। चारों वेदों में जो कुछ वह सब भी इस सविता शक्ति का विवेचन मात्र है। तप, श्रद्धा और साधना के द्वारा योगीजन इसे ही प्राप्त करने में संलग्न रहते हैं। नाम रूप सुविधानुसार कोई भी माना जाय पर वस्तुतः यह सविता देवता ही सबका उपास्य है। उसी को प्राप्त करने के लिये प्रत्येक साधक को प्रयत्नशील होना पड़ता है। देखिये-

उद्यन्तं वादित्यं मग्निरनु समारोहति।

सुषुम्नः सूर्य रश्मिः चन्द्रमा गर्न्धवः॥

“इस सूर्य के अंतर्गत ही अग्नि, सुषुम्ना, चन्द्र, गंधर्व आदि हैं।”

ऋग्भिः पूर्वान्हेदिवि देव ईयते,

यजुर्वेदेतिष्ठति मध्यअहः।

सामवेदेनास्तमये महीयते, वेदैरसून्यस्त्रिभिरेति सूर्यः॥

-श्रुति

“यह सूर्य प्रातः ऋक् से, मध्याह्न को यजु से और सायंकाल साम से युक्त होता है।”

ऋचोऽस्य, मण्डलं सामान्यस्य मूर्तिर्यजूणिच।

त्रयीमयोऽयं भगवान् कालात्म कलकृद्विभुः॥

-सूर्य सिद्धांत

“ऋक् सूर्य का मण्डल और यजुः तथा साम उसकी मूर्ति है। वही काल रूप भगवान है।”

नत्वा सूर्य परंधाम ऋग् यजुः साम रुपिणम्।

-सूर्य पुराण

“ऋक् यजु साम रूपी परंधाम सूर्य को नमस्कार है।”

सएष वैश्वानरो विश्व रुपः प्राणोअग्नि रुदयते।

तदेतदृचान्युक्तम्।

-प्रश्नोपनिषद् 1।7

“यह उदय होने वाला सूर्य ही वैश्वानर (जठराग्नि) और विश्व रूप प्राण है। यही ऋचाओं में कहा गया है।”

अथोत्तरेण तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया विद्ययात्मा नमन्विष्यादित्यमभिः जयन्ते एतद्वै प्राणानामायतनमेतदमृतम मयमेतत्परायण मेतस्यान्न पुनरावर्तन्त इत्येषनिरोधः।

“तप, ब्रह्मचर्य, श्रद्धा तथा विद्या द्वारा जो आत्मा की खोज कर उस आदित्य को प्राप्त करते हैं वे पुनः जन्म नहीं लेते, यह आदित्य ही प्राणों का आश्रय है। वही मोक्ष है, वही पद है, जीव को उसी से परम आश्रय मिलता है।”

भवद्भूतं भविष्यं च जंगमंस्थावरं चयत्।

अस्यैकं सूर्यमैवैकं प्रभवं प्रलयंविदुः।

असतश्च सतश्रैव योनिरेषा प्रजापतिः।

तदक्षरं चाव्ययंच यच्चैतद ब्रह्मशाश्वतम्।

कृत्वैवहि त्रिधात्माननेषु लोकेषुतिष्ठति।

वेदान् यथायथं सर्वान् निवेश्य स्वेषु रश्मिषु।

-सूर्योपनिषद्

“जो जड़ चेतन पदार्थ इस संसार में अब मौजूद हैं, भूतकाल में थे या भविष्य में होंगे वे सभी सूर्य से उत्पन्न हुए और उसी में लीन होते हैं। यह सूर्य ही प्रजापति है। यह सत् असत् की योनि है। अक्षर, अव्यय, शाश्वत, ब्रह्म यही है। यह तीनों लोकों में व्याप्त है। समस्त देवता इसी की किरणें हैं।”

आदित्योह्यदि धूतत्वात् प्रसूत्या सूर्य उच्यते।

परंज्योतिः तमः पारे सूर्येऽयं सवितेति च॥

-सूर्य सिद्धाँत

“वह समस्त जगत का आदि कारण है इसलिए उसे आदित्य कहते हैं। सबको उत्पन्न करता है इसलिए सविता कहते हैं। अन्धकार को दूर करता है इससे उसे सूर्य कहा जाता है।”

अथादित्य उसेयन्यत्प्राचीदिशं प्रविशति तेन प्राच्यान् प्राणन रश्मिषु संनिधत्ते। यद्दक्षिणाँ यत्् प्रतीची यदुदीची यदधो यद्दृर्थं यदन्तरा दिशो यर्त्सवप्रकाशयति तेन सर्वान् प्राणान् रश्मिषुसंनिधत्ते।

-प्रश्नोपनिषद् 1।16

“पूर्व उदय होता हुआ सूर्य अपनी किरणों से पूर्व पच्छिम, उत्तर, दक्षिण नीचे ऊपर तथा उनके कोणों की सभी दिशाओं को प्रकाशित करता है। उसकी किरणों में समस्त जगत का प्राण धारण किया जाता है।

अपश्यं गोपायमनिपद्यमान

माच पराच पथिभिश्चरन्तम्।

स सध्रचीः स विषूचीर्व सान

आनरीवर्ति भुवनेष्वन्तः॥

-ऐतरेय

“मैंने प्राण को देखा है। साक्षात्कार किया है। यह प्राण सब इन्द्रियों का रक्षक है। यह कभी नष्ट नहीं होता। यह नाड़ियों द्वारा शरीर में दौड़ता रहता है। मुख और नासिका द्वारा यह आता और जाता है। यह शरीर में वायु रूप है पर ब्रह्माँड में सूर्य रूप है।”

इस सविता की उपासना में संलग्न ऋषि, मुनि योग के द्वारा अपनी आत्मा को उस तेजपुँज महाप्राण परब्रह्म में प्रविष्ट करते हैं। शुकदेवजी अपनी साधना को पूर्ण करते हुए जिस स्थिति में प्रविष्ट हुए उसका उल्लेख महाभारत में इस प्रकार मिलता है-

तस्माद् योग समास्थायत्यनत्वागृहकलेवरम्।

वायुभूतः प्रवेक्ष्यामि तेजोराशिं दिवाकरम्॥

-महा.

शुकदेवजी ने कहा- “मैं योग में स्थित होकर इस देह को त्याग कर तेजो-राशि सूर्य में वायुभूत होकर प्रवेश करता हूँ।”

उपनिषद्कारों ने इस महा उपास्य सविता देवता की उपासना का निर्देश करते हुए उसकी महान महत्ता पर भी प्रकाश डाला है और उसे आत्मिक मलीनताओं का वितरणकर्त्ता माना है।

सूर्यश्चव मा मन्युश्च मन्युपतयश्च मन्युकृतेभ्यः

पापेभ्यो रक्षन्ताम। यद्रात्र्या पापमकार्षम्।

मनसावाचा हस्ताभ्याम्। पद्भ्यामुदरेण शिश्न।

रात्रिस्तवलुम्पतु। यत् किंच दुरितं मयि।

इदमहं माममृतयोनौ सूर्ये ज्योतिषी जुहोमि स्वाहा।

-(तै. आ. प्र. 10 अ 32)

“जगत का प्रेरक सूर्य उन पापों से मेरी रक्षा करे जो क्रोधादि वृत्तियों द्वारा उत्पन्न हुये हैं। जो रात्रि में मैंने पाप किया है, मन, वाणी और हाथों द्वारा, पैर, उदर और उपस्थेन्द्रिय द्वारा (किया है) रात्रि में वह लुप्त हो जाय। यह मैं अपने आपको अमृत की योनि में-जो कि सूर्य-ज्योति रूप परमात्मा है उसमें- आहुति रूप देता हूँ- स्वाहा बोल कर देता हूँ।”

य इह वा व स्थिरचरनिकराणाँ निजनिकेनानाँ मन-इन्द्रियासुरगणननात्मनः स्वयमात्माऽन्तर्यामी प्रचोदयात्॥

-(ब्रह्मोपनिषद्)

“आप सबके आत्मा हो और अन्तर्यामी हो। जगत में जितने चराचर प्राणी हैं वे सब आपके ही आधार पर रहते हैं। और उनके अचेतन जैसे मन, इंद्रिय और प्राणों के आप ही प्रेरक हो।”

त्रिकाल संध्या में प्रातः मध्याह्न, सायंकाल के लिए तीन प्रतीकों का उल्लेख है। प्रातः ब्राह्मी, मध्याह्न वैष्णवी और सायं शाँभवी गायत्री के हंसारूढ़, गरुणारुढ़, वृषभारूढ़ स्वरूपों का वर्णन है। वस्तुतः यह तीन वेदों का ही त्रिविध स्वरूप है। सविता देवता प्रातः ऋग्वेद, मध्याह्न यजुर्वेद और सायंकाल सामवेद स्वरूप होता है। वेदों में जिन तीन विज्ञान का भण्डार है उसे साधक के अन्तःकरण में अभिप्रेत करता है। ऋग् से ज्ञान योग, यजु से कर्मयोग, साम से भक्ति योग का सम्बन्ध है। सविता देवता का ध्यान हमारी मनोभूमि को इन तीनों योगों की साधना के उपयुक्त बनाता है। इन्हीं तीनों तथ्यों का ब्रह्मा, विष्णु, महेश के रूप में उल्लेख है। ऋग्-ब्रह्मा, यजु-विष्णु और साम-शिव है। इन तीनों के द्वारा त्रिकाल संध्या द्वारा गायत्री उपासना करने वाले को ज्ञान, वैभव एवं सद्गुणों की उपलब्धि होती है। इसी आधार पर एक ही पर ब्रह्म महत्व सविता को तीन प्रकार से तीन चित्रों में चित्रित किया गया है-

ऋग्भिः पूर्वान्हे दिवि देव ईयते,

यजुर्वेदे तिष्ठति मध्य अन्हः।

सामवेदेनास्तमेय महीयते,

वेदैरसून्यस्त्रिभिरेति सूर्यः॥

“पूर्वाह्न (प्रातःकाल) में सूर्य ऋक् द्वारा मध्याह्न में यजुः द्वारा, मध्याह्न में यजुः द्वारा, अस्त काल में सोम द्वारा युक्त होते हैं।”

महर्षि याज्ञवलक्य ने इसी सविता की उपासना का विधान वर्णन करते हुये उसकी महत्ता,विशेषता एवं उपलब्धियों को संक्षिप्त किन्तु सारगर्भित शब्दों में इस प्रकार वर्णन किया है-

ऊँ नमो भगवते आदित्याखिल जगतात्मस्वरुपेण कालस्वरुपेण चतुर्विधि भूतनिकायानाँ ब्रह्मादिस्तम्ब पर्यन्तानामर्न्तहदयेषु बहिरपि चाकाश दवोपाधि नाऽव्ययधीयमानो भवानेक एव क्षणलवनिमेषावयवोपचितसंवत्सरगणे नामामादानविसर्गाभ्यामिमाँ लोकयात्राममुवहाते।

(याज्ञवलक्य)

“मैं ऊँकार स्वरूप भगवान को नमस्कार करता हूँ। हे भगवन्! आप समस्त जगत के आत्मा और काल स्वरूप हो। ब्रह्मा से लेकर तृणपर्यन्त जितने प्राणी हैं उन सबके हृदय में और बाहर भी आकाश के समान व्याप्त रह कर, फिर भी सब उपाधियों से पृथक होकर आप एक अद्वितीय ईश्वर हैं। आप ही क्षण, लव, निमेष, इत्यादि अवयव वाले संवत्सरों द्वारा तथा जल के खींचने तथा प्रदान के द्वारा समस्त जगत का जीवन चालन करते हो।

प्रत्येक गायत्री उपासक को जप के साथ ध्यान भी करना चाहिए यह ध्यान चाहे माता के रूप में साकार हो अथवा प्रकाश पुँज के रूप में निराकार। दोनों ही स्थितियों में ‘सूर्य मंडल मध्यस्था’ की भावना के साथ परम तेजस्वी, सद्बुद्धि प्रेरक, सविता देवता की ध्यान-धारणा अवश्य करनी चाहिए। सावित्री और सविता का अन्योन्याश्रय सम्बन्ध है। दोनों का अविच्छिन्न युग्म है। इसलिये गायत्री तप के साथ-साथ सविता की ध्यान-धारणा को भुलाया न जाना चाहिए।


हमारे व्यक्तिगत प्रतिनिधि और उनके दौरे

गत जून में और इसी अंक में छपे ‘महाकाल और उसका युगनिर्माण प्रत्यावर्तन’ लेख को तथा जुलाई के अंक में प्रस्तुत भविष्य की सम्भावनाओं को पाठकों ने ध्यानपूर्वक पढ़ा होगा तो वे निश्चित रूप से इस निष्कर्ष पर पहुँचे होंगे कि वर्तमान समय साधारण नहीं असाधारण समय है। ऐसे उथल-पुथल भरे अवसरों पर प्रबुद्ध आत्माओं के कंधों पर कुछ विशेष उत्तरदायित्व आया करते हैं और उन्हें वे साहसपूर्वक भी करने पड़ते हैं।

युग परिवर्तन के संध्याकाल को एक पुण्य पर्व की तरह माना जाना चाहिए और इसे उपेक्षा तथा आलस में नहीं बिताया जाना चाहिए। समय निकल जाता है और सामयिक कर्तव्य पालन नहीं किये जाते तो उसके लिये केवल पश्चाताप ही करना शेष रह जाता है। पिछले स्वाधीनता संग्राम में जिसने साहसपूर्वक सामयिक कर्तव्यों का पालन किया उन्होंने यश, पद आत्म-सन्तोष आदि बहुत कुछ पाया पर जो लोग झाँकते रहे उन्हें उस समय की भूल आज शूल सी चुभती है। अब वैसा समय फिर कहाँ आने वाला है।

राम की सेना में सम्मिलित होने वाले साहसी रीछ वानरों ने खोया कम पाया ज्यादा। दूसरे रीछ वानर भी उन दिनों रहे होंगे। वे उस समय अपने को बुद्धिमान मानकर उस झंझट से बचे बैठे भी रहे होंगे, पर उनकी वह बुद्धिमानी कसौटी पर सही सिद्ध नहीं हुई। वे उस सुअवसर को गंवाकर सम्भवतः पछताते ही रहे होंगे।

लाखों वर्ष बाद वैसा ऐतिहासिक समय अब फिर आया है जिसमें प्रबुद्ध आत्माओं को अपना वर्चस्व एवं गौरव प्रकट करने का अवसर मिलेगा। भीरु और संकीर्ण लोगों के लिये बहाने बहुत हैं पर जिनमें आन्तरिक प्रकाश विद्यमान है वे कठिन से कठिन परिस्थिति में रहते हुए भी अपनी भावनात्मक प्रेरणा के आधार पर थोड़ा-थोड़ा करते रहने पर भी बहुत बड़ी मंजिल पार कर सकते हैं।

अखण्ड ज्योति परिवार में बड़े प्रयत्नपूर्वक लम्बी खोजबीन के उपरान्त आत्मिक पूँजी से सुसम्पन्न पूर्व जन्मों की संस्कारवान आत्माओं को एकत्रित किया गया है । वे हमारे साथ व्यक्तिगत रूप से भी चिरकाल से घनिष्ठतापूर्वक संबद्ध हैं। इनका अवतरण इस महत्वपूर्ण अवसर पर महाकाल का कुछ विशेष प्रयोजन पूर्ण करने के लिये हुआ है। इन्हें अपने कंधों पर आई हुई जिम्मेदारी पूरी करनी ही चाहिए। युगनिर्माण की पुण्य प्रक्रिया सम्पन्न करने के लिये अपना आवश्यक योगदान देना चाहिए। उचित यही है कि रोटी कमाने तथा शरीर मात्र की आवश्यकताओं का जिस प्रकार ध्यान रखा जाता है उतनी ही तत्परता अपने महान आध्यात्मिक कर्तव्यों को पूरा करने के लिये भी बरती जानी चाहिए।

‘अपनों से अपनी बात’ स्तम्भ के अंतर्गत हम एक वर्ष से मार्मिक उद्बोधन देते चले आ रहे हैं। यह सिलसिला देर तक चलता नहीं रह सकता। हमारा कार्यकाल मात्र चार वर्ष शेष रह गया है। युग देवता की पुकार तीव्र होती चली जा रही है। कर्तव्य पालन की ठीक घड़ी सामने आ पहुँची। ऐसी विषम परिस्थितियों में समझाने फुसलाने और घिघियाने, दाँत निपोरने की विडम्बना को समाप्त ही किया जाता है । जो जाग सकते हों वे जाग जाएं। जिन्हें जागते हुए भी सोने का बहाना करना है उनसे बार-बार कहना सुनना भी बेकार है।

स्पष्टतः युग परिवर्तन की पुण्य प्रक्रिया का श्रीगणेश शुभारम्भ करने की स्वर्ण युग के बीजारोपण की महान जिम्मेदारी अखण्ड ज्योति परिवार के सदस्यों पर आई है। उसे महाकाल ने विचार-पूर्वक सौंपा है। अस्तु यह आवश्यक समझा गया है कि अन्तिम उद्बोधन के रूप में एक बार फिर उन सबको झकझोर कर निर्धारित दिशा में चलने के लिये तत्पर किया जाय। हमें स्वयं ही परिजनों के घर इस पुण्य प्रयोजन के लिये जाना था। पर समय कम और कार्य अधिक होने के कारण इस प्रयोजन के लिये अपने परम विश्वस्त व्यक्तिगत प्रतिनिधि एवं संदेशवाहक भेज रहे हैं।

युगनिर्माण-योजना के जुलाई अंक में श्री रमेश चन्द्र शुक्ल के बिहार दौरे की और अगस्त अंक में लीलापति शर्मा के मध्य प्रदेश दौरे की सूचना छपी है। इन दोनों की आत्मिक उत्कृष्टता, प्रामाणिकता एवं अब तक की परखों के आधार पर उन्हें उस योग्य माना गया है कि उन्हें अपने व्यक्तिगत प्रतिनिधि का कार्य भार सौंपा जा सके। एक-एक करके यह लोग देश भर के सभी प्रान्तों का दौरा करेंगे। वह प्रत्येक परिजन से संपर्क स्थापित कर उन्हें उनके कर्तव्यों की दिशा में अधिक सतर्क एवं तत्पर होने का अनुरोध करेंगे आशा है पाठक उन्हें अपने यहाँ आने पर उचित महत्व प्रदान करेंगे और ध्यानपूर्वक उन्हें सुनेंगे।

आत्म-निर्माण, परिवार-निर्माण को त्रिविध युग परिवर्तन प्रक्रिया को हमें अपने दैनिक जीवन में अन्य साँसारिक कार्यों की तरह ही स्थान देना चाहिए। उपासना में भावना का समावेश और हर दिन नया जन्म वाली साधना पद्धति आत्म-निर्माण का उद्देश्य पूरा करेगी। ज्ञान-यज्ञ अपने घर में रहने वाले तथा घर से बाहर बिखरे पड़े परिवार का अभिनव निर्माण करेगी। समाज-निर्माण के लिये यों शतसूत्री कार्यक्रम बहुत पहले घोषित किया जा चुका है पर उसका आरम्भ अपने परिवार के सदस्यों को शाखा संगठन के अंतर्गत संगठित करने और जन्मदिन मनाने की प्रक्रिया द्वारा आरम्भ किया जाना चाहिए। जहाँ यह दो कदम आगे बढ़ गये वहाँ अन्य रचनात्मक एवं संगठनात्मक कार्यक्रम की पूर्ति हो सकने की भी आशा की जा सकेगी।

हमारे संदेशवाहक प्रतिनिधि प्रत्येक परिजन से मिलने भेजे जा रहे हैं। वे उनसे पूछेंगे कि उनमें जो पढ़ा, सुना है उसकी क्या प्रतिक्रिया हुई? क्या आन्तरिक स्फुरण हुआ? इस संदर्भ में अन्तरात्मा ने क्या प्रकाश दिया? और उस प्रकाश के अनुरूप कुछ करने के लिये कितना साहस उभरा? इन प्रश्नों के उत्तर जो मिलेंगे, उससे हमें वस्तु स्थिति का पता चल जायगा और उसी आधार पर अपने प्रयत्नों की असफलता का मूल्याँकन करेंगे। अपनी आत्मा और अपने परमात्मा के सामने इसी मूल्याँकन के आधार पर हमें भी अपना स्पष्टीकरण प्रस्तुत करना है।

जिन प्रबुद्ध परिजनों के पास हमारे प्रतिनिधि पहुंचे उनका कर्तव्य है कि अपने आवश्यक कार्यों को छोड़ कर भी थोड़ा समय निकालें और अपने क्षेत्र में भ्रमण करने के लिये इन प्रतिनिधियों के साथ रहें और उनका प्रयोजन सफल बनाने में आवश्यक सहयोग करें। स्थानीय कार्यकर्ताओं के सहयोग से ही उस क्षेत्र के परिजनों के साथ संपर्क स्थापित कर सकना ठीक तरह सम्भव हो सकता है।

अभी श्री रमेश चन्द्र शुक्ल को बिहार और उत्तर प्रदेश के पूर्वीय जिलों के दौरे पर और पं. लीलापति शर्मा को मध्यप्रदेश और राजस्थान के कुछ भागों में भेजा जा रहा है। किन्तु यह दौरे आगे देश भर में होंगे। उसकी सुविधा के लिये परिजन अपने-अपने जिलों के नक्शे बाजार से खरीद कर या हाथ से ऐसे बना कर भेज सकें, जिनमें रेल और मोटर मार्ग भी दिखाये गये हों तो प्रतिनिधियों को यात्रा में सुविधा मिलेगी, जो अपने जिलों में उनके साथ रह सकने की स्थिति में हों वे भी अपने नाम नोट करा दें ताकि समय पर उनका सहयोग लिया जा सके।


अखण्ड ज्योति संस्थान का महत्वपूर्ण प्रकाशन

धर्म-मंच से नव-निर्माण के ग्रन्थ

1. गीता-कथा- मूल्य 6), 2. गीता पद्यानुवाद- मू. 3), 3. अभिनव संस्कार पद्धति- मू. 2 50, 4. पर्वों की प्रेरणा और पद्धति- मू. 2), 5. सत्यनारायण व्रत कथा- मू.)75, 6. सत्यनारायण पद्यानुवाद- तर्ज राधेश्याम में सत्यनारायण का छन्दबद्ध अनुवाद। मू.) 25, 7. भारतीय संस्कृति की रूपरेखा- मू. 2)।

आध्यात्मिक एवं साधनात्मक पुस्तकें

(मूल्य प्रत्येक का एक-एक रुपया)

1. ईश्वर और उसकी प्राप्ति 2. वेदों का दिव्य संदेश 3. पंथ अनेक लक्ष्य एक 4. आप सर्वशक्तिमान हैं। 5. आत्म-कल्याण का राजमार्ग 6. जिन्दगी कैसे जिएं? 7. सद्गुणों की सच्ची सम्पत्ति 8. अपना उद्धार आप करें। 9. आशा की जीवन-ज्योति। 10. विचारों की अलौकिक शक्ति । 11. संकल्प शक्ति के अद्भुत चमत्कार। 12. प्रगति के पथ पर । 13. मनुष्य का मूल्याँकन । 14. चिन्ता छोड़िये-प्रसन्न रहिये । 15. इन दुर्गुणों को छोड़िए। 16. मानसिक कमजोरियों से कैसे बचें?

नव-निर्माण का दर्शन एवं मार्ग

(मूल्य प्रत्येक का एक-एक रुपया)

1. हम बदलें तो दुनिया बदले। 2. समाज की अभिनव रचना। 3. समस्त समस्याओं का एक ही हल। 4. नये युग की नई प्रेरणा। 5. हमारी युगनिर्माण-योजना। 6. विष से अमृत की ओर। 7. शिखा और यज्ञोपवीत का रहस्य। 8. मनुष्य में ईश्वर की झाँकी। 9. नये युग का सूत्रपात। 10. जीवन संग्राम में कैसे जीतें? 11. विदेशियों से हम इतना तो सीखें। 12. राष्ट्र की निर्मात्री नारी। 13. प्रभावशाली वक्ता बनने की कला। 14. आप लेखक कैसे बनें?

आरोग्य रक्षा और प्राकृतिक चिकित्सा

(मूल्य प्रत्येक का एक-एक रुपया )

1. आरोग्य रक्षा के रहस्य। 2. क्या खाएं कैसे खाएं? 3. बलवर्द्धक व्यायाम। 4. शक्ति का स्रोत प्राणायाम। 5. कब्ज कैसे दूर हो? 6. प्राकृतिक चिकित्सा विज्ञान। 7. तम्बाकू घातक विष है। 8. तुलसी के चमत्कारी गुण।

बाल-निर्माण साहित्य

(मूल्य प्रत्येक का एक-एक रुपया)

1. शिशु जन्म से पूर्व। 2. शिशु और अभिभावक। 3. हमारे महान उत्तराधिकारी। 4. बच्चे और उनका मनोविज्ञान। 5. बालकों का नव-निर्माण। 6. बाल विकास की समस्यायें। 7. बच्चों को कैसे सुधारा जाए? 8. बच्चों की शिक्षा-दीक्षा। 9. बालकों को इन दुर्गुणों से बचाइये। 10. बच्चे सद्गुणी कैसे बनें? 11. बालकों को इस तरह सुधारिये।

पारिवारिक समस्याओं का हल

(मूल्य प्रत्येक का एक-एक रुपया)

1. परिवार और उसका निर्माण। 2. सुख शाँतिमय गृहस्थ। 3. सुसंतुलित परिवार। 4. मितव्ययी बनिये- सुखी रहिये।

कथा इतिहास और जीवन चरित्र

(मूल्य प्रत्येक का एक-एक रुपया)

1. धर्म पुराणों की सत कथाएं। 2. चरित्र-निर्माण की कथाएं। 3. भारत की महान विभूतियाँ। 4. संसार के महापुरुष। 5. बड़ों की बड़ी बातें। 6. व्रत और त्यौहार।

कविता और गायन

(मूल्य प्रत्येक का एक-एक रुपया)

1. युग सन्देश। 2. युग गायन। 3. युग वीणा। 4. उद्बोधन । 5. दोहा अंताक्षरी।

10) से अधिक की पुस्तकें लेने पर 15 प्रतिशत कमीशन। डाक खर्च मंगाने वाले के जिम्मे।

पता- अखण्ड-ज्योति संस्थान, मथुरा ।


तुम दीपक से जलते जाओ


तुम दीपक से जलते जाओ (Kavita)

जब-जब सौ सौ बाँह पसारे

खड़ा तिमिर हो बीच राह में,

तुम दीपक से जलते जाओ।

उठती झंझाओं को आखिर मिट इक दिन जाना ही होगा।

बढ़े प्रलय तो, उसे सहम कर आखिर रुक जाना ही होगा॥

मंजिल दूर भले हो लेकिन उर में दृढ़ विश्वास यही है।

क्षुब्ध धरा के इस आँगन में सुख को फिर आना ही होगा।

पग-पग से तुम डगर नापते,

अंगारों पर चलते जाओ॥

तुम दीपक से जलते जाओ।

ज्योति तुम्हारी बिखरे, जो भूतल से अम्बर तक छा जाये।

और सिसकती मानवता फिर विहंसे मंगल मोद मनाये॥

पर यह भी सच है, इसमें तुमको तिल-तिल कर जलना होगा।

हो सकता है, क्रूर काल तुमको ठोकर भी देता जाये।

पर तुम गिर-गिर कर फिर-फिर,

उठ-उठ कर पुनः संभलते जाओ!

तुम दीपक से जलते जाओ।

जग में जीते वही परिस्थितियों से जो टकराया करते।

चट्टानों को तोड़ लात से अपना मार्ग बनाया करते॥

उन सुमनों का ही सौरभ अब तक छाया सारे कानन में।

जो काँटों से बिंधते, लेकिन म्लान न हो मुस्काया करते॥

सौरभ का आगार ढूँढ़ना जो चाहो,

तो काँटों में भी पलते जाओ।

तुम दीपक से जलते जाओ।

-अनिल पटेरिया ‘निर्झर’

*समाप्त*