सरकार ने अब डाक दरें बढ़ा दी हैं। पोस्ट कार्ड, अन्तर्देशीय, लिफाफा, रजिस्ट्री, बी-पी. तार सभी की दरें बढ़ी हैं। पर पत्रिकाओं पर लगने वाले डाक खर्च को तो एक दम ढाई गुना कर दिया गया है। ‘अखण्ड-ज्योति’ और ‘युग निर्माण योजना’ पर अब तक दो-दो पैसे की टिकट लगा करती थी। अब पाँच पैसे की लगा करेगी।
दोनों पत्रिकायें अब तक भी घाटे में चलती रही हैं। प्रायः दस-बारह पैसे हर ग्राहक के पीछे लागत में कमी पड़ती थी। पर अब ढाई गुना पोस्टेज बढ़ जाने में तो घाटा इतना अधिक होगा, जिसके भार से पत्रिकाओं की कमर टूट सकती है और उन्हें निकालना बन्द करने की स्थिति आ सकती है।
इस आकस्मिक विपत्ति को एक विशिष्ट संकट मान कर परिजनों को उसके निवारण में सहायता करनी चाहिए। यह सहायता धनदान के रूप में नहीं- श्रमदान के रूप में ही अपेक्षित है। एक-एक दो-दो नये ग्राहक बढ़ाने का आपका प्रयत्न परिश्रम इन पत्रिकाओं पर आई इस विपत्ति का सामयिक समाधान हो सकता है। कुछ ग्राहक बढ़ जाने से घाटे के भार में थोड़ी कमी हो सकती है और पत्रिकायें जीवन धारण किये रहने में समर्थ हो सकती हैं। आशा है हर परिजन इस दिशा में थोड़ा प्रयत्न करना-अपना कर्त्तव्य समझेगा।
भौतिक प्रगति के लिए बलिष्ठ शरीर, प्रशिक्षित मस्तिष्क, आकर्षक व्यक्तित्व, अभीष्ट उपार्जन, परिपूर्ण परिवार, आवश्यक वातावरण तथा अनुकूल अवसर की अपेक्षा रहती है। यह साधन जिसे जितने मिल जाते हैं वह उतनी ही लौकिक सफलता प्राप्त कर लेता है।
आत्मिक प्रगति का मूल्य महत्व, सुख एवं प्रतिफल भौतिक सफलताओं की अपेक्षा सहस्रों गुना अधिक है। इतने पर भी उसके लिए दो साधन पर्याप्त हैं। एक भावनापूर्ण उपासना, दूसरा जीवन को उत्कृष्ट, अनुकरणीय बनाने की साधना। इन दोनों के लिए यदि स्थिर मति और प्रगाढ़ निष्ठा के साथ प्रयत्न किया जाय तो निस्संदेह आत्मिक प्रगति भी इसी तरह मिल सकती है, जैसी कि भौतिक प्रगति।
जीवन की महत्ता और सफलता उसकी आत्मिक प्रगति पर निर्भर है। भौतिक सफलतायें उतनी देर ही आनन्द देती हैं जब तक कि उनकी प्राप्ति नहीं होती है। जैसे ही वह मिली कि उनका आनन्द समाप्त हुआ। सच्चा और चिरस्थायी सुख और लाभ आत्मिक प्रगति पर ही अवलम्बित है। इसलिए जो मानव-जीवन का श्रेष्ठतम सदुपयोग करना चाहते हैं और जिस आनन्द के लिए यह जन्म मिला है, उसे प्राप्त करने के इच्छुक हैं उन्हें आत्मिक प्रगति के लिए तत्पर होना चाहिए और उसके दोनों आधारों का- उपासना और साधना का अवलंबन ग्रहण करना चाहिए। -स्वामी कृष्णानन्द
परिजन एक सुसंतुलित उपासना क्रम पूछते रहते हैं। उनके मार्ग दर्शन के लिए इस अंक में एक ऐसा न्यूनतम कार्यक्रम प्रस्तुत किया जा रहा है, जो सर्वसाधारण के लिए-संक्षिप्त सरल एवं अति उपयोगी है। जिनके पास अधिक समय है, जिनकी प्रगति उस मार्ग पर काफी आगे तक हो चुकी है, उनके लिए विशिष्ट साधनाओं के क्रम प्रस्तुत किए जा सकते हैं। ऐसे लोग ‘पंचकोशी गायत्री उपासना’ में संलग्न हैं। उनका ठीक तरह मार्गदर्शन किया जा रहा है।
कुछ वर्ष पूर्व- अज्ञातवास से लौटते ही हमने पंचकोशी साधना क्रम ‘अखण्ड-ज्योति’ में प्रकाशित करना आरंभ किया था और उसे तीन वर्ष छापा भी। पर देखा यह गया कि जिन्होंने आरंभ में बहुत उत्साह दिखाया था, उसमें से बहुत थोड़े ही अन्त तक ठहर सके। शेष एक-दो मंजिल चल कर ही लड़खड़ा गये। ऐसी दशा में उसका लगातार प्रकाशन व्यर्थ था। जो थोड़े से साधक अभी भी उस मार्ग पर चल रहे हैं, उनका मार्गदर्शन समीप बैठ कर वार्तालाप द्वारा अथवा पत्र-व्यवहार द्वारा किया जा रहा है।
जो निष्ठापूर्वक उस मार्ग पर चल रहे हैं, उनने आशातीत प्रगति भी की है। पर जो ‘आरंभ में शूर’ बन कर पहले बहुत उत्साह दिखाते हैं, किन्तु निष्ठा और धैर्य के अभाव में देर तक उस क्रम को जारी नहीं रख पाते, उनके लिए क्रमबद्ध प्रगति कर सकना कठिन होता है। वैसा ही हुआ भी। अगला साधना-क्रम कई व्यक्ति पूछते तो हैं पर जो करना चाहिये वह कर नहीं पाते। ऐसे लोगों को उच्चस्तरीय साधनाओं के सूक्ष्म मर्म बताना न बताना, कुछ महत्व नहीं रखता।
अन्नमय, मनोमय, प्राणमय, आनन्दमय, विज्ञानमय कोशों के शोधन एवं जागरण की प्रक्रिया कठिन तो अवश्य है, पर है बड़ी वैज्ञानिक और प्रभावशाली। उस आधार पर साधक अति महत्वपूर्ण सिद्धियाँ प्राप्त कर सकता है और अपने व्यक्तित्व को बाह्य और आन्तरिक दृष्टि से यदि समर्थ बना सकता है। उस क्रम को हम जानकारी के लिए अपने परिजनों को जाने से पूर्व बता जायेंगे। ‘अखण्ड-ज्योति’ अगले वर्ष सन् 1969 से पूर्णतया साधना पत्रिका बन जायेगी। नीति-धर्म, सदाचार का प्रसार कार्य ‘युग-निर्मा-पत्रिका’ करेगी। ‘अखण्ड-ज्योति’ अध्यात्म-तत्व ज्ञान का समग्र स्वरूप प्रस्तुत करने के लिए संलग्न होगी।
अगले तीन वर्षों में पंच कोशों की शेष उपासना का विज्ञान तथा विधान समझा दिया जायेगा। यह हम अपना कर्त्तव्य पालन करने की दृष्टि से करेंगे, पिछले अनुभवों के आधार पर यह आशा कम ही है कि अधिक लोग उस मार्ग पर दूर तक चल सकेंगे। बताना सिर्फ इसलिए आवश्यक समझा गया कि कोई बिरले ही सही- उस मार्ग पर यदि चलना चाहें तो उन्हें अभिष्ट जानकारी के अभाव में प्रगति पथ पर अग्रसर होने से वंचित न होना पड़े। उपलब्ध अनुभव और ज्ञान को सर्वसाधारण के लिए छोड़ जाना यह हमारा नैतिक कर्त्तव्य भी है। इसलिए अध्यात्म के गूढ़ रहस्य और उच्चस्तरीय गायत्री उपासना के विज्ञान-विधान ‘अखण्ड-ज्योति’ के माध्यम से हम सर्व-साधारण के सामने रख जाने के लिए यथासंभव कुछ कमी न रहने देंगे।
पिछले दिनों सर्वसाधारण के लिए उपयोगी सरल एवं संक्षिप्त उपासना पद्धति की माँग की जाती रही है। यह अंक उसी प्रयोजन की पूर्ति के लिए लिखा जा रहा है। जिनकी श्रद्धा सामान्य है, जिनके पास अवकाश भी कम है, किन्तु उपासना पथ पर अग्रसर होना चाहते हैं, उन्हें एक संतुलित उपासना पद्धति चाहिए ही। यह माँग और आवश्यकता ऐसी है, जिसकी पूर्ति की जानी चाहिए। अतएव यह अंक उसी समाधान के लिए लिखा जा रहा है।
उपासना के संबंध में एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि उसमें केवल पूजापरक कर्मकाण्ड ही काफी नहीं वरन् साथ में भावनात्मक समावेश भी होना चाहिए। ज्यों-त्यों कुछ पूजा-पत्री कर देने, थोड़ा जप कर लेने या कुछ पाठ कर लेने मात्र से काम नहीं चलेगा। आमतौर से लोग इतना ही करते हैं और समझ लेते हैं कि उनकी उपासना पूर्ण हो गई। कर्मकांड पूजा का एक महत्वपूर्ण अंग तो है पर उतने मात्र से उसमें पूर्णता नहीं आ सकती। उपासना के हर कर्मकांड के साथ आवश्यक भावनाओं का समन्वय रहे तभी उनमें प्रखरता आयेगी।
श्रद्धा में विश्वास का समुचित पुट रहना चाहिए। अपेक्षा, अवज्ञा और कौतूहल की तरह विधि-विधान की लकीरें पीट लेने से काम नहीं चल सकता। शारीरिक क्रियाओं के साथ-साथ उद्गारों का समन्वय भी अभीष्ट है। उसी आधार पर उपासना प्राणवान बनती है।
इसलिए हम सदा से इस बात पर जोर देते रहे हैं कि कोई साधक केवल मात्र पूजन, जप कर लेने से संतुष्ट न हो जाय, अन्यथा उसे वैसा ही खाली हाथ रहना पड़ेगा, जैसे कि और हजारों, लाखों लोग निराशा के अतिरिक्त और कुछ प्राप्त नहीं कर पाते। हमने अपने जीवन का लगभग सारा ही जीवन उपासना में लगाया है। और मंथन, चिन्तन, मार्गदर्शन, अध्ययन एवं अनुभव के आधार पर यह पाया है कि उपासना में पूजा के अतिरिक्त भावना और साधना का भी समन्वय होना चाहिए, तभी वह अभीष्ट परिणाम प्रस्तुत करने में समर्थ हो सकती है। जितना ध्यान पूजा पद्धति पर दिया जाता है, उससे भी अधिक भावना तथा साधना पर दिया जाना चाहिए। तीनों का सम्मिश्रण जहाँ भी होगा वहाँ सफलता निश्चित रूप से मिलेगी।
हमने अपना जीवन प्रयोग इसी क्रम पर आधारित रखा और संतोषजनक परिणाम प्राप्त किया। जिन लोगों की एकाँगी उपासना रही जो मात्र पूजा पद्धति को सब कुछ समझते रहे और उसी में संलग्न रहे, वे हमसे अधिक श्रम करते रहने पर भी आज खाली हाथ हैं। हमारा व्यक्तिगत अनुभव और शास्त्रों तथा ऋषियों का निर्देश समग्र साधना करने के पक्ष में है। हमारा अटूट विश्वास है कि यदि सर्वांगपूर्ण उपासना थोड़ी भी की जाय तो वह आशाजनक परिणाम उत्पन्न करेगी। उसके विपरीत एकाँकी पूजा पद्धति तक सीमित रहा गया तो किसी महत्वपूर्ण परिणाम की आशा नहीं की जा सकती। उपासना में भावना और साधना का जो जितना समन्वय कर लेगा, उसका श्रम उतना ही सार्थक होगा। यह एक सुनिश्चित तथ्य है और उसकी उपेक्षा किसी भी विवेकवान अध्यात्मवादी को नहीं करना चाहिये।
उपासना की भाँति ही साधना भी आत्मिक प्रगति का अनिवार्य अंक है। जीवन-शोधन और परमार्थ प्रक्रिया का समन्वय करने से साधना का प्रयोजन पूरा होता है। जिस प्रकार उपासना को पूजन, जप और ध्यान इन तीनों भागों में बाँटा जा सकता है, उसी प्रकार आत्म-निर्माण और समाज-निर्माण साधना के अविच्छिन्न अंग हैं। भगवान के स्मरण पर जितना ध्यान देना आवश्यक है, उतनी ही आवश्यकता जीवन शोधन की भी है। आदर्शवादी, उत्कृष्ट जीवन आस्तिकता का सबसे प्रमुख प्रमाण है। ऐसे भक्त जो अपने आचरण की शुद्धता लेकर ईश्वर के सन्मुख उपस्थित होते हैं, अपने प्रभु को प्रसन्न एवं द्रवित करने में निःसंदेह समर्थ होते हैं।
साधना-जीवन शुद्धि- जिसमें आत्म-शोधन और परमार्थ दोनों ही सन्निहित है, उपासना की सफलता का पथ-प्रशस्त करती है। जमीन अच्छी हो तो बीज उगने में सरलता होती है। भूमि बहुत दाम की खरीदी जाती है। बहुत परिश्रम उसको उर्वर बनाने में लगता है। खाद, पानी, जुताई, मेंड़बन्दी आदि की भारी व्यवस्था बना कर उस जमीन को जब उर्वर बना लिया जाता है, तब कोई भी फसल उसमें कोई उगाई जा सकती है। साधना भूमि निर्माण और उपासना बीज बोना है। बीज बोना थोड़े समय में, थोड़े खर्च में पूरा हो जाता है। इसी प्रकार उपासना घंटे, आधे घंटे करने से काम चल जाता है पर साधना में चौबीसों घंटे निरत रहना पड़ता है। हर घड़ी यह ध्यान रखना पड़ता है कि किसी भी समय कोई अनुचित विचार या कार्य अपने से न बन पावे। अधिक पुरुषार्थ इसी में करना होना है। उपासना में भावना का और साधना में विवेक का समावेश करना होता है। भावना, उपासना का और विवेकशीलता साधना को समग्र बनाती है। इसलिए अपने आध्यात्मिक क्रिया-कलापों में इनका जुड़ा रहना आवश्यक है।
इस अंक में एक ऐसी सर्वोपयोगी न्यूनतम उपासना का कार्यक्रम उपस्थित किया जा रहा है, जिसमें उपासना और साधना का आवश्यक समावेश है। व्यस्त रहने वाले या शरीर के दुर्बल लोगों के लिए भी यह कठिन नहीं है। सरल होते हुए भी यह अपनी सजीवता एवं सर्वांगपूर्णता के कारण इतनी प्रभावपूर्ण है कि इसका प्रत्यक्ष लाभ हर कोई अनुभव कर सकता है और प्राप्त अनुभवों के आधार पर यह प्रतिपादन साहसपूर्वक कर सकता है कि कभी किसी की उपासना निष्फल नहीं जाती। वह भौतिक एवं आध्यात्मिक प्रगति में निःसंदेह आश्चर्यजनक रीति से सफल होती है।
उपासना- आत्मिक प्रगति के लिए एक अति आवश्यक एवं अनिवार्य माध्यम है। जीवन-शोधन की साधना के साथ चलता हुआ उपासना क्रम आशाजनक परिणाम प्रस्तुत करता है, उससे जीवनोद्देश्य की प्राप्ति में भारी सफलता मिलती है। इसलिए तत्त्वदर्शी आत्म-वेत्ताओं ने उपासना को जीवन का एक अनिवार्य नित्य धर्म माना है। जो इस संदर्भ में उपेक्षा बरतते हैं, आलस्य, प्रमाद करते हैं, उनकी कटु-भर्त्सना शास्त्रकारों ने की है।
जिस प्रकार शरीर शुद्धि के लिए मलमूत्र विसर्जन, हाथ-मुँह धोना, स्नान करना आवश्यक है- दसों इन्द्रियों को मल रहित करना आवश्यक है- उसी प्रकार मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार के अन्तःकरण चतुष्टय की शुद्धि आत्म-चिन्तन, आत्म-शोधन, आत्म-निर्माण एवं आत्म-विकास की प्रक्रिया अपनाकर अंतः शरीर का परिशोधन आवश्यक है। नित्य कर्म केवल शरीर शुद्धि तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए वरन् नित्य धर्म के रूप में आन्तरिक मलीनताओं का निष्कासन भी नित्य किया जाना चाहिए।
शारीरिक स्वास्थ्य की तरह, बाह्य शुद्धि की तरह- मानसिक स्वास्थ्य और आंतरिक शुद्धि का भी ध्यान रखा जाना चाहिए। हम शरीर ही नहीं आत्मा भी हैं, इसलिये दोनों की संतुलित सुरक्षा के लिए नित्य-कर्म ही नहीं नित्य-धर्म भी आवश्यक माना जाना चाहिए। बाह्य शुद्धि-क्रिया को नित्य-कर्म कहते हैं और आन्तरिक शुद्धि को नित्य-धर्म। इन दोनों के लिए हमें तत्परतापूर्वक जागरूक रहना चाहिए। अन्यथा समग्र स्वास्थ्य को स्थिर न रखा जा सकेगा और जीवनोद्देश्य की प्राप्ति संभव न हो सकेगी।
अग्नि की समीपता से ही गर्मी प्राप्त की जा सकती है, उससे दूर रहने पर उष्णता के माध्यम से मिल सकने वाले लाभ प्राप्त न हो सकेंगे। ठण्ड लग रही हो तो जलती हुई आग की समीपता से वह कष्ट दूर हो जाता है, भोजन पचाना हो, पानी गरम करना हो तो इन वस्तुओं को आग के समीप रखना पड़ता है। चूल्हा कहीं और पदार्थ कहीं रखा जाय तो भोजन पकाने का उद्देश्य पूरा न हो सकेगा। इसी प्रकार समस्त शक्तियों के अधिपति परमात्मा से यदि दूर रहा जाय, उसके मास न बैठा जाय तो वे तत्व, गुण हमें प्राप्त न हो सकेंगे, जिनके आधार पर सामान्य नर-पशु महान नर-नारायण के रूप में विकसित होता है।
समीपता का लाभ और आनन्द सर्व विदित है। सगे-संबंधी दूर रहते हैं, तो मन उदास रहता है, पर जब वे साथ-साथ रहने का अवसर पाते हैं, तब आनन्दित और प्रमुदित रहते हैं। पति-पत्नी, माता-पुत्र, भाई-भाई, मित्र-मित्र जब साथ-साथ रहने का अवसर पाते हैं, तब उन्हें बड़ा संतोष होता है और बल मिलता है। विछोह में स्थिति बल जाती है। उदासीनता घेर लेती है और एकाकीपन, शैथिल्य एवं दौर्बल्य का अनुभव होता है। प्रियजनों के शरीर और मन एक दूसरे को बल, उत्साह एवं आनंद प्रदान करते हैं, यह एक सुनिश्चित तथ्य है। इसलिए हर कोई प्रियजनों की समीपता प्राप्त करने के लिए लालायित एवं प्रयत्नशील रहता है।
उपासना का अर्थ है- समीपता- पास बैठना। जीव का ईश्वर के समीप बैठना- इसी का नाम उपासना है। यों सत्ता की दृष्टि से ईश्वर इस विश्व के कण-कण में समाया हुआ है। हमारे शरीर और समीपवर्ती वातावरण में भी वह ओत-प्रोत है। तथ्य की दृष्टि से वह समीप है। पर तत्व की दृष्टि से फिर भी वह दूर ही बना रहता है। भावनात्मक दृष्टि से यदि समीपता न हो तो फिर अभीष्ट आनन्द नहीं मिल सकता। दो प्रियजन एक ही किले में कैद रहें, दोनों की कोठरियों में एक दीवार मात्र का अन्तर है, तो उतना व्यवधान ही दोनों को हजारों मील की दूरी जैसा कष्ट देता है।
भावनात्मक दृष्टि से समीपता के अभाव में आनन्द कहाँ? टकसाल में सिक्के ढालने वाले कारीगर रोज लाखों रुपये उठाते धरते हैं, पर उन्हें उस सम्पत्ति पर कोई प्रसन्नता नहीं होती। बैंकों के खजाँची अपने हाथों कितने धन की उलट-पुलट करते हैं पर उन्हें उससे क्या सुख मिलता है? जिस घर में हम रहते हैं, उनके नीचे की पृथ्वी को आर-पार खोद डाला जाय तो उसमें लाखों टन सोना, चाँदी, ताँबा आदि मूल्यवान धातुएं मिलेंगी। हम उस जमीन पर बैठे हैं, उसके स्वामी हैं फिर भी उससे लाभान्वित या आनंदित नहीं होते। कारण एक ही है- भावनात्मक समीपता का न होना।
जिस धन से हमारी भावनात्मक समीपता जुड़ जाती है, जिसे हम अपना समझते लगते हैं, उसी में रस और आनन्द मिलने लगता है। कोई पति-पत्नी बाल्यकाल से परस्पर परिचित रहे हों तो भी उन्हें तब वह आनन्द, उल्लास नहीं मिला होगा, जो कि प्रणय-सूत्र में बंध जाने के बाद मिलता है। पहले वे परिचित मात्र थे अब वे एक दूसरे से सम्बद्ध हो गये। परिचय और संबद्ध होने में भारी भावनात्मक अन्तर है, इसी अन्तर के आधार पर सुखानुभूति की नींव रखी होती है।
ईश्वर को हम जानते तो हैं- उसे अपने चारों ओर बिखरा भी अनुभव करते हैं, यह परिचय मात्र है। इतने मात्र से काम नहीं चलता। आनन्द तब आता है- लाभ तब मिलता है जब दोनों के बीच भावनात्मक एकता का संबंध सूत्र बंध जाता है। उपासना जीव और ईश्वर को एकनिष्ठ आत्मीयता के संबंध सूत्र में बाँध देने की एक सर्वमान्य एवं सुनिश्चित पद्धति है।
ईश्वर समस्त सद्गुणों, सत्प्रवृत्तियों, सद्भावनाओं एवं सुसंभावनाओं का मूल केन्द्र है। उसकी समीपता हमारे लिए वैसी ही उपयोगी है, जैसी शीत के कष्ट से काँपते हुए व्यक्ति के लिए अग्नि की समीपता। जीवनोद्देश्य की रसायन का परिपाक उस अग्नि की समीपता से ही संभव है। जल से दूर रहने वाली मछली की जो दुर्गति होती है, वैसी ही ईश्वर विमुख जीव को भी भुगतनी पड़ती है। जीवन एक बल्ब मात्र है, उसमें जो रोशनी चमकती है वह विद्युत धारा का चमत्कार है। चमकता तो निःसंदेह बल्ब ही है पर उसके भीतर काम करने वाली शक्ति पावर हाउस से आने वाली बिजली की ही है।
अनेक विद्युत उपकरण अपने अनोखे करतब दिखाते है। बल्ब, पंखे, रेडियो, रेफ्रिजरेटर, हीटर, कूलर, टेलीफोन आदि के आश्चर्यजनक और उपयोगी कार्य होने का मूल श्रेय उस विद्युतधारा की ही है। जिसके कारण यह सभी यंत्र गतिशील रहते हैं। यदि बिजली से उनका संबंध कट जाय तो वे निकम्मे से खिलौने मात्र बन कर रह जायेंगे। उनकी उपयोगिता तभी है, जब बिजली के प्रवाह के साथ जुड़े रहें। ठीक इसी प्रकार जीव जब भावनात्मक एकता के द्वारा ईश्वर के साथ जुड़ा रहता है, तब वह स्वयं प्रकाशवान रहता है और दूसरों को प्रकाशित करता है। यह संयोग यदि कटा रहे तो भीतर और बाहर अंधकार ही अंधकार छाया दृष्टिगोचर होता है। ईश्वर से वियुक्त होकर जीव तेलहीन दीपक की तरह, प्राण रहित शरीर की तरह निरुपयोगी बन कर रह जाता है। उसमें वह तेजस्विता रह नहीं जाती, जो सृष्टि में मुकुटमणि परमेश्वर के परम प्रिय राजकुमार-मनुष्य में स्वभावतः होनी चाहिये।
उपासना उसी अभाव की पूर्ति करती है। ईश्वर और जीव के बीच घनिष्ठ आत्मीयता के संबंधों को सजग एवं गतिशील बनाती है। कहावत है कि ‘दोस्ती और दुश्मनी पास रहने से बढ़ती है और दूर रहने से घट जाती है।’ ईश्वर और जीव की दोस्ती के बारे में भी यह युक्ति पूरी तरह लागू होती है। बार-बार पास बैठने से- हर दिन संपर्क बनाये रहने से- ईश्वर और जीव के बीच दोस्ती का रिश्ता मजबूत होता चला जाता है। यदि उपासना के विमुख रहें तो दोस्ती संभव नहीं- तब साधारण जान-पहचान मात्र रह जायेगी और वह उतनी लाभदायक सिद्ध न हो सकेगी।
उच्च राज्य कर्मचारियों एवं शासन सत्ताधीशों से जिनकी मित्रता होती है, वे दूसरों के लिए प्रभावशाली रहते हैं, स्वयं गर्व एवं गौरव अनुभव करते हैं, निर्भय और अनिश्चित रहते हैं और समय-समय पर उस दोस्ती से ऐसे लाभ भी उठा लेते हैं, जो सर्वसाधारण लोगों के लिए संभव नहीं। लोग इस तथ्य को समझते हैं, इसलिए राज्याधिकारियों से दोस्ती बढ़ाने में बहुत समय और धन खर्च करते हैं। इतनी समझ जिन्हें हैं वे शासनाध्यक्षों के शासनाध्यक्ष- परमेश्वर के साथ दोस्ती जोड़ने में न जाने थोड़ा समय और मनोयोग लगाने में क्या उपेक्षा बरतते हैं? जब यह दोस्ती संसार के किसी भी प्राणी की अपेक्षा असंख्य गुनी अधिक उपयोगी और लाभदायक सिद्ध हो सकती है।
संपर्क में गुणों के आदान-प्रदान की संभावना जुड़ी हुई है। बुरे लोगों के साथ बैठने का कुसंग व अच्छे लोगों के साथ बैठने का सत्संग अपना भला-बुरा परिणाम थोड़े ही समय में दिखा देता है। दुष्टों के साथ रहने से उन्हीं जैसे दोष-दुर्गुण साथी में पैदा हो जाते हैं। सज्जनों की संगति में बढ़ने वाले सद्गुणों का लाभ भी सहज ही अनुभव किया जा सकता है। चंदन वृक्ष के समीप उगे हुए जंगली पेड़-पौधे भी सुगंधित हो जाते हैं। नदी नालों में गिरा हुआ गंगा जल भी अपवित्र बन जाता है। संगति की महत्ता कौन नहीं जानता?
सामान्य बुद्धि का प्रयत्न यही रहता है कि सुसंगति का अवसर मिले। इसके लिए लोग क्लबों में सदस्य बनते हैं, संस्थाओं में प्रवेश करते हैं ताकि वहाँ ऊंचे लोगों के साथ संपर्क साधने का अवसर मिले। न जाने क्यों हम ईश्वर की सत्ता और महत्ता से अपरिचित हैं? और न जाने क्यों उससे संबंध साधने के लिए अति सरल और अति सस्ते उपाय- उपासना को उपेक्षापूर्वक त्यागते रहते हैं?
जिन सत्प्रवृत्तियों की दिव्य शक्तियों की हमें जीव विकास के लिए- जीवनोद्देश्य की प्राप्ति के लिए आवश्यकता है। वे सभी ईश्वर में सन्निहित है। ईश्वर समस्त सत् संभावनाओं का केन्द्र है। इस एक ही उद्गम से हमारी सभी आवश्यकताएं पूर्ण हो सकती हैं। आवश्यकताओं और अभावों की पूर्ति के लिए कल्प-वृक्ष का स्मरण किया जाता है। बाह्य और आँतरिक तृप्ति की पयस्विनी कामधेनु मानी गई है। मृत्यु और जराजीर्णता से छुटकारा दिलाने वाला पदार्थ अमृत कहा जाता है लोहे को स्वर्ण में बदल देने की क्षमता पारस में बताई जाती है।
इन माध्यमों से मनुष्य के समस्त शोक-सन्तापों और अभावों का निराकरण हो सकने की बात कथा-पुराणों में कही तो जाती है पर उन्हें देखा कहीं नहीं जाता किन्तु यह सभी संभावनाएं ईश्वर में विद्यमान हैं। उसको स्पर्श करने वाला आप्तकाम बन जाता है, उसकी कोई कामना शेष नहीं रहती। कष्ट और अभावों का दुःख उसे नहीं सहना पड़ता। अग्नि कुण्ड में डाला हुआ पत्थर का टुकड़ा भी थोड़ी देर में अग्नि के गुण धर्म से परिपूर्ण होकर ज्वलन्त अंगारे जैसा बन जाता है। उसी प्रकार साधारण स्तर का तुच्छ-सा जीवधारी मनुष्य ‘देव’-सत्ता में परिणत हो जाता है।
लोहा पारस को छूकर सोना बनता है कि नहीं यह तथ्य संदिग्ध हो सकता है पर यह असंदिग्ध है कि जीव का ब्रह्म से संपर्क होना उसे देव-संज्ञा में परिणत कर देता है। भूसुर और भूदेव कल्पना की वस्तु नहीं, उन्हें देखा और परखा जा सकता है। नर-पशु को नर-देव में परिणत कर देने की क्षमता ईश्वर की समीपता में रहने से उपलब्ध हो सकती है। इस दिव्य सान्निध्य की पुण्य प्रक्रिया का नाम ही उपासना है। उपासना मानव जीवन का महानतम संबल है। उसे परम पुरुषार्थ कहा जाता है। संसार में जितनी भी विभूतियाँ सफलताएं और उपलब्धियाँ हो सकती है, उन सब में बड़ी यह है कि हम ईश्वर से परिचित मात्र न रह कर उसके साथ दोस्ती का रिश्ता जोड़ लें और उस समस्त वैभव के उत्तराधिकारी बन जांय जो उसके पास है। इसके बढ़ कर और कोई उपलब्धि इस जीवन में हो ही नहीं सकती। इसलिए बुद्धिमता एवं दूरदर्शिता इसी में है कि हम अन्य आवश्यक क्रिया-कलापों से कम नहीं वरन् अधिक महत्व ईश्वर की समीपता को लाभ दें और उसके लिए ‘उपासना’ की प्रक्रिया परिपूर्ण निष्ठा के साथ अपनाएं।
मानव प्राणी अनेक भूलें करता है। उनका दंड भी भोगता है। इन भूलों में सबसे बड़ी भूल है- उपासना के प्रति उपेक्षा। सृष्टि के संविधान में क्षमा के लिए गुंजाइश नहीं। हर किसी को अपने कर्मों का प्रतिफल भोगना पड़ता है। उपासना की उपेक्षा को चाहे भूल कहा जाय, चाहें उद्दंडता, उसका दंड हमें एक ऐसे भारी आत्मिक अभाव के रूप में भुगतान पड़ता है, जिसके कारण जीवन में न रस रह जाता है और न आनन्द। उत्कृष्टता की सरलता की अनुभूति ही वह अमृत है, जिसे पीकर आत्मा तृप्ति का अनुभव करती है और जिसका रसास्वादन करने के लिए वह बार-बार जन्म-मृत्यु का कष्ट सह कर भी, मानव शरीर धारण करने के लिए लालायित रहती है। निम्न स्तर के विचारों और कार्यों को तो कीचड़ ही कहा जा सकता। कृमि-कीट उसमें बुजबुजाते हुए अपने दिन गुजार सकते हैं, पर जिसकी आत्मा जाग पड़ी उसके लिए यह स्थिति असह्य है। उसकी तृप्ति और संतुष्टि उत्कृष्टता से ही संभव है।
मधुमक्खी और भौंरे केवल पुष्पों की समीपता से ही जीवित रह सकते हैं। जागृत आत्माएं केवल उत्कृष्टता की भूमिका का रसास्वादन करने के लिए जीवन धारण करती हैं। निकृष्टता की विचारणा और प्रक्रिया उन्हें मृत्यु जैसी कष्ट कारक होती है। यह स्तर कैसे प्राप्त हो? कहाँ से प्राप्त हो? इन प्रश्नों का उत्तर एक ही हो सकता है- ईश्वर की समीपता व उपासना। उपासना हमें वह प्रकाश और मार्ग दर्शन प्रदान करती है, जिससे समस्त उत्कृष्टताओं का समुच्चय भगवान हमारे समीप आता है और अपनी श्रेष्ठताओं से हमें ओत-प्रोत कर देता है।
प्रकृति और परमेश्वर के संयोग से यह जगत बना है। प्रकृति जड़ है। उसमें जड़ता और तमोगुण ही भरा है। स्थूल पदार्थ केवल इन्द्रिय सुख दे सकते हैं। वासना का क्षणिक सुख और तृष्णा का भ्रम जंजाल पैदा कर सकते हैं, उत्कृष्टता उनमें नहीं। उत्कृष्टता तो उच्चस्तरीय उस स्थिति में है, जिसे ईश्वर की समीपता कहते हैं। ईश्वर उत्कृष्ट है, वही हमें उत्कृष्टता प्रदान कर सकता है। संतोष और आनन्द से अन्तःकरण को परिपूर्ण कर सकने वाली स्थिति उत्पन्न करने की क्षमता ईश्वर की समीपता में है और उसी को प्राप्त करने के लिए उपासना की जाती है। इस आवश्यक नित्यकर्म का पालन करना ही हमारे लिए उचित है। उत्कृष्टता की अनुभूतियों के संपर्क में आकर ही हम उन दैवी सम्पदाओं के अधिपति बन सकते हैं, जिन्हें प्राप्त करने के लिए यह महान मानव जीवन उपलब्ध हुआ है।
उपासना एक ऐसे वटवृक्ष का बीज है, जिसकी छाया, पल्लव, पुष्प, फल और विशालता से सब का सब प्रकार हित होता है। ईश्वर की समीपता का लाभ उठा कर जीव अपनी शक्ति सामर्थ्य को अनन्त गुनी बढ़ा सकता है और महापुरुष की- भूदेव की- नर-नारायण की भूमिका सम्पादित कर सकता है। ईश्वर का सान्निध्य अनुग्रह प्रकाश और अनुदान जिसने प्राप्त कर लिया उसे और कुछ प्राप्त करना शेष नहीं रह जाता। इस उपलब्धि के फलस्वरूप क्या मिलता है, उसे वाणी से कहना और लेखनी से लिखना पर्याप्त नहीं, उसे तो अनुभव करके ही देखना चाहिये। पक्षी की छाती की गर्मी से सेये जाने पर अण्डे कुछ ही दिन में पक्षी के रूप में विकसित हो जाते हैं। यदि यह गर्मी न मिले तो वह गंदी-सी गोली सड़गल कर नष्ट हो जाती है। इसी प्रकार ईश्वर की समीपता में जीव का आशाजनक विकास होता है किन्तु यदि उससे वंचित रहना पड़े तो सड़ा हुआ जीवन जीने के अतिरिक्त और कुछ सार इस जीवन में रह नहीं जाता।
न्यूनतम आधा घंटा अवकाश हममें से हर एक को उपासना के लिए निकालना ही चाहिये। साढ़े 23 घंटे शरीर की आवश्यकतायें और समस्यायें सुलझाने में लगाये जा सकते हैं, तो क्या आत्मा की प्रगति और आवश्यकता की पूर्ति के लिये आधा घंटा भी खर्च नहीं किया जाना चाहिए? माना कि शरीर महत्वपूर्ण है और उसके तथा उससे संबंधित प्रियजनों के हित साधन के लिए काफी समय और श्रम लगाना पड़ता है, पर इसका अर्थ यह तो नहीं कि आत्मा सर्वथा उपेक्षणीय है। उसकी आवश्यकताओं को समझा ही न जाय, उसकी प्राप्ति एवं तृप्ति के लिये कुछ किया ही न जाय।
शरीरोपयोग में सारी शक्ति का लग जाना और बेचारी आत्मा को कुछ भी न मिलना ठीक कौरव पाँडवों के बीच चलने वाले अनौचित्य जैसा है। पाँडव पाँच गाँवों की माँग अपने गुजारे के लिये कर रहे थे और सारा विशाल राज्य कौरवों को दे रहे थे पर दुर्योधन सुई की नोंक के बराबर पृथ्वी देने को भी तैयार न हुआ। अन्ततः भगवान कृष्ण को महाभारत रचाने की व्यवस्था करनी पड़ी। हमारा अज्ञान एवं मोह दुर्योधन, दुःशासन की तरह सारी सामर्थ्य को शरीर सुख में ही खर्च कराना चाहता है और आत्मा अर्जुन के लिये आधा घंटा समय भी नहीं लगने देना चाहता। यह अनीति अन्ततः दुष्परिणाम ही उत्पन्न करेगी और आज जो शरीर हमारा एक मात्र लक्ष्य बना हुआ है वह भी चैन से न रह सकेगा।
लाभ को परखने की बुद्धि यदि हममें हो तो भी यह अनुभव लगाना कठिन नहीं होना चाहिये कि जितना श्रम शरीर को सुखी बनाने में खर्च किया जाता है उसका एक अंश भी यदि आत्म-कल्याण में खर्च किया जाय तो परिणाम अत्यधिक उत्साहवर्धक निकल सकता है। जिन दूरदर्शी महामानवों ने अपना समय ईश्वर उपासना में लगाया उनके चरित्र और वृतान्त पढ़ने का यह अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है कि वे घाटे में नहीं रहे, तृष्णा और वासना के दो पाटों की चक्की में पिसते रहने वालों की तुलना में वे अधिक ही लाभान्वित रहे जिनने ईश्वर का आश्रय ग्रहण करके उपासना के लिए श्रम किया और मनोयोग लगाया।
ऋषियों और संत-भक्तों के जीवन इसके प्रमाण हैं। उनने अपार आत्म-शाँति पाई, अपने आशीर्वाद और वरदान से असंख्यों के भौतिक कष्ट मिटाये, अंधेरे में भटकते हुओं को प्रकाश दिया और उन दिव्य विभूतियों के अधिपति बने जिन्हें ऋद्धि और सिद्धि के नाम से पुकारा जाता है। नाम गिनाने की आवश्यकता नहीं। प्रत्येक गृही और विरक्त सन्त का जीवन चरित्र इस कसौटी पर कसा जा सकता है और देखा जा सकता है कि कोल्हू के बैल की तरह ढर्रे का नीरस जीवन बिताने की अपेक्षा यदि उनने ईश्वर का आश्रय लेने का निर्णय किया तो कुछ घाटे में नहीं रहे।
उनने जो पाया वह कोई साधारण श्रमिक, व्यापारी, बुद्धिजीवी प्राप्त नहीं कर सकता। कम लाभ की अपेक्षा अधिक लाभ का व्यापार करना बुद्धिमता कही जाती है, फिर उपासना का आश्रय लेना क्यों दूरदर्शिता न मानी जायेगी? निःसंदेह यह उच्चकोटि की चतुरता कही जायेगी कि हम शरीर के स्वार्थों का ध्यान रखने के अतिरिक्त आत्म-कल्याण की भी आवश्यकता समझें और इसके लिए उपासना का आश्रय लेना आरंभ करें।
प्रियजनों के पास बैठने का अपना आनन्द है। ईश्वर और जीव के बीच इतना अधिक घनिष्ठ आत्म-भाव है, जितना संसार के किन्हीं प्राणियों का संबंधियों से नहीं पाया जाता। संसारी लोग प्रेम का मोल-तोल करते हैं, जिससे प्रयोजन सिद्ध होता है, प्रतिफल मिलता है, उससे दोस्ती निबाहते हैं अन्यथा उपेक्षा एवं अवज्ञा करने लगते हैं। ईश्वर के बारे में ऐसी बात नहीं, वह हमारा सच्चा प्रेमी है। निस्वार्थी भाव से हमारी पग-पग पर अपार सहायता करता है, उसने जो दिया है वह इतना अधिक है, जितना सृष्टि के किसी प्राणी को नहीं मिला। ऐसे प्रिय पात्र की समीपता में आनन्द ही आनन्द मिलना चाहिये। पति-पत्नी पास बैठकर आनन्द लाभ कर सकते हैं। मां-बेटे के बीच, मित्र-मित्र के बीच जो भावनात्मक आदान-प्रदान चलता है, उससे दोनों ही पक्ष उल्लसित होते हैं। फिर सच्चा प्रेमी, सच्चा मित्र, सच्चा सहयोगी परमेश्वर यदि पास में बैठे तो किस अभागे को आनन्द एवं उल्लास प्राप्त न होगा? उपासना एक आनन्द विभोर कर देने वाली भावनात्मक प्रक्रिया है, उसे यदि सही ढंग से अपनाया जा सके तो उपासक उतने स्वर्णिम क्षणों में आनन्द और उल्लास से ओत-प्रोत ही रह सकता है।
किन्तु खेद की बात है कि कितने ही व्यक्ति पूजा-पत्री बहुत करते हैं- घंटों उसमें लगाते हैं, पर वह संतोष एवं सुख प्राप्त नहीं कर पाते जो प्रिय पात्र के सान्निध्य में मिलना चाहिए। उनका मन नहीं लगता, किसी प्रकार शरीर से टंट-घंट करते रहते हैं, जीभ से कुछ मंत्र-तंत्र उच्चारण करते और हाथ से माला जपते हैं, पर चित्त की उद्विग्नता ज्यों की त्यों बनी रहती है। मन जहाँ तहाँ दौड़ लगाता रहता है। उस थोड़े समय को काटना कठिन पड़ जाता है। किसी प्रकार बेगार भुगता कर वह कृत्य पूरा किया जाता है।
नित्य कर्म समझ कर ज्यों-त्यों पूजा की लकीर पीटने वाले अधिक हैं, ऐसे कम हैं, जिन्हें उस समय पर प्रिय मिलन जैसा आनन्द अनुभव होता है। इस अभाव का कारण उपासना प्रक्रिया में रहने वाली एक ऐसी भूल है, जिसकी ओर ध्यान दिया या दिलाया नहीं गया। यदि यह भूल सुधार ली जाय तो उपासना हमारे जीवन की सबसे अधिक उल्लास और उत्साह भरी भूमिका हो सकती है।
हमें यह जानना ही चाहिये कि उपासना का प्रयोजन ईश्वर और जीव जैसे दो चेतन-तत्वों में समीपता एकता की स्थापना करना है। इसके लिए भावनात्मक माध्यम का प्रयोग अनिवार्य रूप से आवश्यक है। उपासना के साथ-साथ भावना को अविच्छिन्न रूप से जुड़ा ही रहना चाहिये। कर्मकांड को शरीर और भावना को प्राण कहा जा सकता है। शरीर और प्राण दोनों को मिला कर ही एक समग्र व्यक्तित्व विनिर्मित होता है। इसी प्रकार सजीव उपासना वही कहला सकती है, जिसमें पूजा प्रयोग के कर्मकांड के साथ-साथ स्नेह की अभिव्यंजना भी जुड़ी हुई हो। उल्लास इस अभिव्यंजना पर ही निर्भर है। जिनके मन नहीं मिले, केवल शरीर ही समीप है, उन्हें मिलने का आनन्द आयेगा? किन्तु यदि भावनाएं प्रबल हैं तो शरीर के दूर रहते हुए भी मन उत्साह से भरा रहता है और कल्पना के माध्यम से भी मिलन-सुख उपलब्ध होता रहता है। इस तथ्य को भुला कर जो लोग पूजा-पत्री का कर्मकाँड मात्र पूरा करते रहते हैं और भावनात्मक अभिव्यंजना का समन्वय नहीं करते। उन्हें ही मन न लगने की, आनन्द न आने की शिकायत रहती है। अन्यथा वे क्षण तो हर्षोल्लास से भरे हुए ही होने चाहिये। इस संबंध में बरती गई उपेक्षा ही वह भूल है, जिसके कारण उपासना एक बोझिल प्रक्रिया मात्र बन कर रह जाती है और आरंभिक उत्साह शिथिल होते ही कितने लोग उसे छोड़ बैठते हैं। यदि प्रारंभ से ही वस्तु स्थिति का ध्यान रखा जाय- सजीव उपासना क्रम अपनाया जाय-भावनात्मक तत्परता का समावेश रखा जाय- तो एक बार इस आनन्द का रसास्वादन करने के उपरान्त उपासना को छोड़ने का कोई नाम भी न ले।
सभी की पूजा के बाह्योपचार की पद्धति का आधार प्रायः एक ही होता है। किसी प्रतिमा के आधार पर भगवान को समीप विराजमान अनुभव करना, उसके स्वागत सत्कार की व्यवस्था करना, उसका नाम बार-बार रटना, गुणानुवाद करना और कुछ समर्पण करना। इन थोड़े से शब्दों में हर प्रकार की भारतीय उपासना पद्धति का समावेश माना जा सकता है। साकार और निराकार दोनों की पूजा करने का स्वरूप प्रायः यही है। ईश्वर को साकार मान कर उसकी प्रतिमा स्थापित करने वाले रोली, चन्दन, धूप, दीप, नैवेद्य, पुष्प, आरती आदि से पूजन करते हैं, निराकार मानने वाले चित्र अथवा प्रतिमा न रख कर ध्यान में प्रकाश आदि का कोई रूप बनाते हैं। अग्निहोत्र भी एक तरह की मूर्ति पूजा है। ईश्वर को अग्नि रूप में स्थापित कर वेद मंत्रों से उसकी स्तुति करते हुए, घृत हविष्य आदि की आहुतियाँ देना एक प्रकार से भोग लगाना ही है। नाम-जप दोनों ही मान्यताओं वालों को करना पड़ता है। कोई राम नाम लेता है कोई ओम नाम। अन्तर अक्षरों का है। तथ्य एक ही है। इसी प्रकार ईश्वर के गुणानुवाद गाने में कोई वेद मंत्रों का उच्चारण कर सकता है, कोई हनुमान चालीसा पढ़ सकता है, बात एक ही है।
पूजा पद्धतियों के आकार प्रकार में- बाह्य स्वरूप में अन्तर हो सकता है, पर मूल्य तथ्य एक ही है। हर उपासक को मिलते-जुलते क्रिया कलाप ही अपनी पूजा प्रक्रिया में रखने पड़ते हैं। सुविधा, रुचि और परम्परा के अनुरूप यदि कुछ अन्तर पड़ता हो तो हर्ज नहीं, हर पद्धति निर्दिष्ट लक्ष्य तक पहुँचा सकती है, यदि उसे भावनात्मक अभिव्यंजना में समाविष्ट रखा गया है।
पदार्थों, प्रक्रियाओं हलचलों का प्रभाव पर मन पर पड़ता है, इसलिए पूजा उपचार की प्रक्रिया को आवश्यक माना गया है। हलचलें हमारा ध्यान भगवान की उपस्थिति और उसकी समीपता का अनुभव कराती है, इसलिये पूजन वंदन के उपकरण काम में लाये जाते हैं। ईश्वर इन अक्षत, धूप, दीप, नैवेद्य आदि से प्रभावित या प्रसन्न नहीं होता। इनकी उन्हें आवश्यकता भी नहीं है। उपचारों का प्रयोजन मन में भगवान की समीपता की अनुभूति कराना है। जिस पूजा से साधक को ईश्वर की समीपता जितनी अधिक अनुभव होती हो उसे उतनी ही सफल माना जायेगा।
कई बार अस्वस्थता की अथवा साधनहीन एकाँकी जीवन होने की स्थिति में- अथवा उच्च भूमिका के विकसित होने पर केवल ध्यान द्वारा मानसिक पूजन करना पड़ता है। इससे भी पूजा प्रक्रिया का लाभ मिल जाता है। उपचार पदार्थों के न होने पर भावनात्मक पुरुषार्थ द्वारा मन पर ईश्वर की समीपता की अनुभूति यदि सीमित की जा सके तो वह ध्यान-साधना भी पूजा प्रक्रिया का प्रयोजन पूरा कर देती है। उपचार एवं कर्मकाँड का अपना महत्व है। किन्तु कर्म में उसे सम्मिलित रहना ही चाहिए, पर निरीक्षण यह भी करते रहना चाहिये कि समीपता की भावनात्मक अनुभूति हो रही है या नहीं? इस अनुभूति पर ही उपासना का मूल प्रयोजन सिद्ध होना निर्भर है।
उपासना काल में प्रयत्न यह किया जाना चाहिए कि पूजा में प्रयुक्त होने वाला पदार्थ- हर क्रिया-कलाप हर विधान हमारे अन्तःकरण पर ईश्वर की समीपता एवं मधुर मिलन की संवेदना अनुभूति आच्छादित करने में सहायक हो। जैसे कोई सजीव प्रियजन पास में बैठा हो और उसे सचमुच ही उन क्रिया-कृत्यों से दुलारा जा रहा हो यदि ऐसी मान्यता और भावना बन सकी तो समझना चाहिए कि उपासना का मूल प्रयोजन पूरा होने लगा। ईश्वर कहीं बहुत दूर रहता है, उसे पाने या बुलवाने की अभी अपनी सामर्थ्य कहां? ऐसी निराशात्मक एवं अविश्वास मूलक भावना उपासना का प्रयोजन ही नष्ट कर देती है। मान्यता यह होनी चाहिये कि प्रस्तुत प्रतीक या प्रतिमा सचमुच साक्षात ईश्वर है, वह एक सजीव व्यक्ति की तरह सामने प्रस्तुत है, और जो कुछ किया या कहा जा रहा है उसे वह पूरी तन्मयता और रुचिपूर्वक सुन समझ अथवा ग्रहण कर रहा है। चुपचाप ग्रहण कर रहा हो सो बात नहीं, वरन् वह हमारी हर प्रक्रिया को स्वीकार करते हुये प्रसन्नता एवं सद्भावना भी व्यक्त कर रहा है। अपने प्रेम का वह अनेक गुना अनुदान भी प्रदान कर रहा है।
ऐसी भावना एवं मान्यता जितनी स्पष्ट एवं तीव्र होगी, उसी अनुपात से हमारी उपासना प्रखर होगी और उसका प्रतिफल उतना ही उत्साहवर्धक होगा। भाव भरी पूजा पद्धति साधक के अन्तःकरण को पुलकित कर देती है। अपनी भक्ति भावना की प्रखरता- भगवान की मधुर मुसकान बन कर हमारे साथ हास-विलास भरा प्रेमालाप करने लगती है। और अनुभव होता है कि भक्त और भगवान दोनों अति निकट होकर एक अनिवर्चनीय आनन्द सागर में निमग्न हो रहे हैं।
उपासना का सफल स्वरूप यही है। क्रिया-कृत्यों के साथ भावना का समन्वय करने से उसमें सजीवता आती है। आरंभ में ऐसा न हो सके तो भी चिन्ता की बात नहीं। मन का स्वभाव क्रीड़ा कौतुकों में लगने का है। उसकी दौड़ बाह्य-मुखी है। अंतर्मुखी- एकाग्र होने में उसे काफी अड़चन लगती है, इसलिये आना-कानी भी बहुत करता है। किसी भी प्रेरणा से उत्पन्न हुआ आरंभिक उत्साह जब तक रहता है, तब तक तो मन लगता है पर जैसे ही वह आवेश शिथिल हुआ कि उचट जाता है और यदि मनोबल मजबूत न हुआ तो उसे छोड़ बैठने की नौबत आ जाती है। इस स्थिति से बचना ही उचित है। जब शिथिलता आने लगे तो हठपूर्वक मन को उसमें लगाना चाहिये।
कृषि कार्यों में लगाये जाने पर अल्हड़ बैल आरंभ में काफी परेशान करता है। नया घोड़ा ताँगे में चलने को सवार को पीठ पर बिठाने को कहाँ तैयार होता है? उन्हें बलपूर्वक काम में जोता जाता है। घोड़े को लगाम लगाई जाती है और चाबुक से सीधा किया जाता है। बैल की नाक में छेद कर रस्सी पहनाई जाती है और छड़ी से डरा कर काम कराया जाता है। बाजीगर रीछ-बन्दरों को सिखाते हैं, सरकस वाले हाथी, शेर आदि को सधाते हैं। इसमें उन्हें काफी चतुरता और कड़ाई का प्रयोग करना पड़ता है। मन के साथ भी यही रीति-नीति काम में लानी पड़ती है।
उसके साथ जबरदस्ती न की जाय तो आरंभिक दिनों में वह उपासना जैसे रूखे प्रसंग को ग्रहण करने से इनकार ही करने लगता है। यदि उसकी बात मान ली गई तो फिर भविष्य में किसी ऐसे प्रसंग पर उसे झुका लेना और भी कठिन हो जाता है। अतएव मन के असहयोग के आगे हमें झुकना नहीं चाहिये वरन् बलात्कारपूर्वक तब-तक उसे निर्धारित दिशा में जोते ही रहना चाहिये, जब तक कि वह उसका अभ्यस्त न हो जाय। मन में एक अच्छी विशेषता भी है कि वह जिस बात का अभ्यस्त हो जाता है फिर उसे सहज छोड़ता भी नहीं। हानिकारक व्यसनों और दुर्गुणों को जब वह मजबूती से पकड़ बैठता है तो कोई कारण नहीं कि उपासना जैसे श्रेय साधन को सदा-सर्वदा निबाहते रहने के लिये तत्पर न हो जाये। कठिनाई आरंभिक दिनों की ही है। इससे जब तक स्थिति अनुकूल न हो जाय तब तक उस दिशा में जंगली जानवरों को सधाने-सिखाने के समय बरती जाने वाली चतुरता एवं कड़ाई का हमें प्रयोग करते रहना चाहिये।
उपासना का उपचार सम्पन्न करते हुए- जप, पूजन, वंदन, अर्चन, स्तवन, ध्यान करते हुये- हमें यह अनुभूति भी करनी चाहिये कि इष्टदेव हमारे अति निकटवर्ती स्वजन, संबंधी, मित्र, कुटुम्बी एवं आत्मीय हैं। प्रियजनों के बीच अनेक रिश्ते होते हैं, उन्हीं में से एक रिश्ता उनसे स्थापित कर लेना चाहिये, माता, पिता, गुरु, बंधु, मित्र, पति आदि अपने से बड़े पक्ष का रिश्ता अधिक उपयोगी रहता है। कभी-कभी पुत्र, पत्नी आदि के रिश्ते भी स्थापित किये जाते हैं। कौशल्या, देवकी, यशोदा, सूरदास आदि ने बालगोविन्द को इष्ट माना था। फारसी भाषा के सूफी कवियों ने इश्क हकीकी की भक्ति धारा में भगवान को अपनी प्रेयसी के रूप में भी चित्रित किया है। उमरखय्याम की मधुशाला का एक अर्थ आध्यात्मिक भी लगाया जाता है और भक्ति को मद्य तथा ईश्वर को साकी-मद्य पिलाने वाली के रूप में चित्रित किया जाता है। ऐसी भावनायें काफी कठिन पड़ती हैं। सरल वे हैं जिनमें भगवान से अपने से ऊंचे रिश्ते का संबंध स्थापित किया जाता है। ऐसे रिश्तों में माता का संबंध सबसे बड़ा, सबसे सरल और सबसे भावपूर्ण है।
गायत्री उपासना में भगवान को माता के रूप में माना गया है। माता के प्रति बालक का प्रेम सब से सरल और स्वाभाविक है। क्या मनुष्य, क्या मनुष्येत्तर, पशु-पक्षी, कीटपतंग सभी अपने बच्चों को प्यार करते हैं। माता में तो वह प्यार और भी अधिक होता है। अन्य योनियों में तो बहुधा माता ही एक मात्र शिशु की संरक्षक एवं स्नेह भाजन होती है। अन्य रिश्तों में प्रेम का आधार गुण-दोष एवं लाभ-हानि होती है, पर माता का स्नेह इन सबसे ऊंचा, परम निःस्वार्थ और त्याग-बलिदानों से भरा पूरा होता।
‘कुपुत्रों जायेत् क्वचिदपि कुमाता न भवति’ पुत्र कुपुत्र हो जाता है पर माता, कुमाता नहीं होती। इस उक्ति के आधार पर माता का रिश्ता इस संसार में सर्वोपरि प्रेम का प्रतीक माना गया है। अतएव ईश्वर के साथ उसी का स्थापना अधिक श्रेयस्कर सिद्ध होती है। हम भगवान को अपनी माता मानें और उसी आधार पर भगवान हमें अपना पुत्र मानते हुए अनन्त वात्सल्य की वर्षा करे तो वह भावनात्मक आदान-प्रदान प्रेम परम्परा का एक महान घटक बन जाता है। ईश्वर को माता मान कर एक मातृ-प्रतिमा की अथवा ध्यान छवि की स्थापना के पश्चात् उपासना पथ पर प्रगति में गतिशीलता उत्पन्न होती है। भावनात्मक आदान-प्रदान के लिये इस प्रकार की स्थापना आवश्यक है।
इसके उपरान्त हमारी अनुभूति में दूसरी स्थापना यह होनी चाहिये कि इष्टदेव सर्वव्यापी और न्यायमूर्ति है। घट-घट में, कण-कण में समाये हैं। अपने रोम-रोम में, भीतर और बाहर उन्हीं की सत्ता ओत-प्रोत है। तिल भर भी जगह ऐसी नहीं जहाँ वे न हों। हर जड़-चेतन पदार्थ में, अपने समीपवर्ती और दूरवर्ती वातावरण में- उन्हीं का प्रकाश जगमगा रहा है। उन्हें हर जगह हम देख सकते हैं और वे हर पदार्थ में से अपनी सहस्रों आँखों द्वारा हमारे बाह्य और अन्तरंग स्तर को बारीकी से देखते रहते हैं। हमारा कोई कृत्य, कोई विचार कोई भाव उनसे छिपा नहीं रहता।
यह सर्वव्यापी सत्ता पक्षपात से सर्वथा दूर- पूर्णतया न्यायशील है। उनका व्यवहार निष्पक्ष न्यायमूर्ति जज की तरह है, जो अपने प्रिय से प्रिय के साथ पक्षपात और शत्रु के साथ भी अन्याय नहीं कर सकता। कर्म का माप दंड ही उसकी दृष्टि में किसी के भले-बुरे होने की कसौटी है। सत्कर्म, सद्भाव और सद्विचार ही उसे प्रिय हैं। इन्हीं विशेषताओं के आधार पर वह किसी की महत्ता आँकता है और इसी न्याय तुला पर तोल कर किसी से संतुष्ट अथवा रुष्ट होता है। निर्धारित धर्म मर्यादाओं को तोड़ने वाला ही उसका शत्रु कोप-भाजन अथवा विरोधी है और जो सृष्टि को सुव्यवस्थित बनाये रहने के लिये धर्म कर्त्तव्यों का उचित रीति से पालन करता है, वही उसका प्रिय पात्र स्नेह भाजन और सहायता का अधिकारी है।
कोई ईमानदारी न्यायाधीश पाप-पुण्य के आधार पर ही किसी को न्याय का पुरस्कार दे सकता है। व्यक्तिगत राग-द्वेष से वह ऊंचा उठा रहता है। किसी की निन्दा स्तुति से प्रभावित नहीं होता। यही प्रकृति परमेश्वर है। वह गये-गुजरे स्तर के उन लोगों के समक्ष नहीं हो सकता जो जरा-सी खुशी मद के फूल कर लट्टू हो जाते हैं, और बिना अधिकार एवं पात्रत्व का विचार किये मनमाने पुरस्कार देने लगते हैं। ईश्वर ऐसा निकृष्ट भी नहीं कि नैवेद्य, पुष्पमाला, आरती, तांबूल, इत्र-फुलेल जैसी रिश्वतें पाकर किसी के अनुचित प्रयोजन पूरे करने के लिये तैयार हो जाय। ईश्वर को खुशामदी और रिश्वतखोर मानना और उससे उस आधार पर तरह-तरह की आशाएं करना इस महान सत्ता के महान स्तर के हेय एवं घृणित सिद्ध करने कुचेष्टा है।
ईश्वर की स्थिति, रुचि, कार्य पद्धति एवं प्रेम प्रक्रिया का आधार यदि इस प्रकार ठीक से समझ लिया जाय तो हमारी उपासना परम प्रेरक और प्रकाशपूर्ण बन सकती है। तब हमें ईश्वर को अपने समीप और भीतर, बाहर ओत-प्रोत अनुभव करने के साथ-साथ अपनी विचार पद्धति और कर्म-पद्धति को सुधारना भी अनिवार्य रूप से आवश्यक प्रतीत होगा। हम कोई ऐसा विचार और कार्य न करें जो ईश्वर को अप्रिय हो, उसे रुष्ट करे। साधारण पुलिस दरोगा या सरकारी अफसर की उपस्थिति में कुख्यात चोर, उठाईगीरे भी अपनी हर बात पकड़े जाने के भय से मुँह बन्द रखते हैं फिर जो सर्वत्र ईश्वर में समाया हुआ निष्पक्ष न्यायकारी अनुभव करेगा वह उसके दंड भय से, रोष और कोप से सदा डरेगा और कोई दुर्भाव एवं दुष्कर्म करने को तैयार न होगा।
सच्ची आस्तिकता किसी व्यक्ति को निर्मल एवं निष्पाप ही बना सकती है। वह सदाचारी सज्जन के अतिरिक्त और कुछ हो ही नहीं सकता। जो पाप की कीचड़ में डूबा खड़ा है, वह भजन का आडम्बर बनाये रहने पर भी वस्तुतः नास्तिक है। आस्तिकता और दुष्टता का साथ-साथ निर्वाह नहीं हो सकता। जो ईश्वर से पाप कर्मों से डरता है- उसे इस संसार में किसी से भी डरने की जरूरत नहीं रह जाती। जो सदाचरण प्रिय- सद्भाव युक्त सन्मार्गगामी और सज्जन है, वस्तुतः वह ईश्वर का सच्चा भक्त है, भले ही उपासनात्मक क्रिया-कलाप उससे ठीक तरह न बन पड़े।
उपासक के मन में यह सुदृढ़ आस्था जमी होनी चाहिये कि ईश्वर उसके चारों ओर भरा-पूरा है, उसकी हर गुप्त प्रकट गतिविधि को हजार आँखों से देख रहा है और हर बुरे-भले कर्म का उचित दंड-पुरस्कार विनिर्मित कर रहा है। जब यह तथ्य भली प्रकार हृदयंगम कर लिया जाता है, तब सबसे पहले अपने चरित्र और स्वभाव का परिष्कार संशोधन करने की आवश्यकता अनुभव होती है। जहाँ जो त्रुटियाँ हैं, वहाँ उनका समाधान करना होता है। इतना साहस कर लेने पर जब अपना अन्तःकरण निर्मल और व्यवहार निष्पाप बनने लगता है तो ईश्वर के साथ सच्ची मित्रता स्थापित करने का द्वार खुल जाता है। चोर जब तक अपराधी मनोवृत्ति धारण किये रहता है, तभी तक पुलिस, जेल, अदालत से भयभीत रहता है किन्तु आचरण सुधरते ही वह पूर्ण निर्भय बन जाता है। तब वह किसी का- कोई उसका शत्रु नहीं रहता। अधिकारी भी उसे मान देने में संकोच नहीं करते। ईश्वर से मित्रता प्राप्त करने की प्राथमिक योग्यता निर्मल एवं निष्पाप होना है। इससे कम कीमत पर न भगवान को अपना बनाया जा सकता है और न हम भगवान के बन सकते हैं।
उपासना का अधिकार प्राप्त करने के लिये उपासक को जीवन-शोधन की प्रक्रिया तुरन्त आरंभ करनी चाहिये। मलीनताओं को हटाना चाहिये और उत्कृष्टताओं को जीवन-क्रम में समाविष्ट करना चाहिये। यह स्थिति जितनी-जितनी स्पष्ट होती जाती है, उतना ही उतना साहस ईश्वर से मित्रता करने को बढ़ता जाता है। डरता, झिझकता, लज्जा, भय और संकोच में डूबा- हेय और घृणित बना प्राणी इतनी ऊंची हस्ती के साथ जी खोल कर प्रेम करने का साहस नहीं कर पाता। साहस तब होता है, तब जी साफ हो। आतम-चिन्तन, आत्म-निरीक्षण, आत्म-शोधन, आत्म-निर्माण और आत्म-विश्वास में संलग्न होना वस्तुतः ‘ईश्वरीय-मित्रता’ का आधार साधन जुटाना ही है। इस प्रगति के साथ-साथ उपासक ईश्वर की ओर और ईश्वर उपासक की ओर स्वयं बढ़ने लगते हैं और बढ़ते-बढ़ते दोनों तादात्म्य और एकात्म होने का वह प्रयोजन की पूर्ण कर लेते हैं, जो ईश्वर की महान प्रतिकृति- मानव सृजन का पुण्य प्रयोजन है।
निर्मल मन और शुद्ध आचरण को साथ लेकर आरंभ की हुई उपासनात्मक आध्यात्मिक प्रगति का परिणाम परिपूर्ण निर्भयता के रूप में परिलक्षित होता है। अनुभव होता है कि ईश्वर हर घड़ी हमारे साथ है। एक सहयोगी सहचर की तरह- अंग-रक्षक सुरक्षा अधिकारी की तरह साथ-साथ आगे-पीछे चलता दिखाई देता है। ऐसी दशा में डर किसका? जब हथियाबन्द पुलिस गारद अपनी सुरक्षा के लिये तैनात हो जाता है, साथ-साथ चलता है, तब शत्रुओं और खतरों से छिपे होने पर भी निश्चिन्तता हो जाती है। सशक्त, सशस्त्र संरक्षक साथ हो तो डर दूर हो जाना, निर्भयता और साहस का बढ़ना स्वाभाविक है। जिसे सर्वशक्तिमान परमेश्वर अपने साथ-साथ, आगे-पीछे साथी संरक्षक की तरह चलता दृष्टि गोचर होता है, उसे बड़े-से-बड़ा खतरा भी तुच्छ मालूम देता है।
भविष्य की आशंकायें उसे तनिक भी विचलित नहीं करतीं। इतनी बड़ी हस्ती जब साथी, सहचर और संरक्षक के रूप में विद्यमान है, तब फिर इस संसार में किसी से डरने का कोई कारण ही नहीं रह जाता। जिसके साथ इतना बड़ा साथी हो- उसका साहस और सन्मार्ग पर आगे बढ़ चलने का उत्साह सहज ही प्रदीप्त रहना चाहिये। वह सिंह की तरह एकाकी निर्जन वन में दहाड़ता फिरता है और अपने बल-पुरुषार्थ से ही अपनी समस्याओं को हल कर लेता है।
स्वल्प साधनों में महती योजनायें बना डालना और उन्हें कार्यान्वित करने के लिये चल पड़ना केवल उसी के लिए संभव है, जिसका ईश्वर-विश्वास अटल है। सत्कर्मों का सहायक ईश्वर होता है। कर्त्तव्य पथ पर चलने की शक्ति ईश्वर देता है, परमार्थ परायण का पथ ईश्वर प्रशस्त करता है। जिसका ऐसा सुदृढ़ विश्वास है उसे उसी तरह के प्रमाण भी मिलते हैं, सचमुच यह अटूट श्रद्धा साधन-सामग्री के रूप में साकार बन कर सामने प्रस्तुत होती है। इतिहास के पृष्ठ ऐसे अगणित प्रमाणों और उदाहरणों से भरे पड़े हैं, जिनने अकिंचन स्थिति में उत्पन्न होकर, साधनों का पूर्णतया अभाव रहने, साथियों के सहयोग की संभावना न दीखने पर भी परमार्थ पथ पर चलने के दुस्साहस भरे कदम उठाये और उनका प्रयोजन इस तरह पूरा होता चला गया मानो वे महान कार्य उन्हीं के करने के लिए पूर्व निर्धारित रुके पड़े थे। सत्पात्र को सदुद्देश्य के लिये किये गये सत्प्रयत्नों में ईश्वरीय सहायता मिलती है, इसमें संदेह करने की गुंजाइश नहीं। जो चाहे अपने व्यक्तित्व को ईश्वरीय प्रेम भाजन बनाकर इस प्रयोग कर सकता है। उसे यह तथ्य निर्विवाद रूप से सत्य दृष्टिगोचर होगा।
उपासक की मनोभूमि में यदि उपरोक्त विशेषतायें हों तो भगवान की समीपता का आनन्द उपलब्ध होने में कुछ कठिनाई न रहेगी। तब केवल प्रेम भावना का समावेश शेष रह जायेगा। यह तत्व जितना-जितना जप-ध्यान के साथ-साथ धुलता जायेगा, उसी क्रम से उपासना में आनन्द की अभिवृद्धि होती चलेगी। प्रेमी की समीपता सदा सुखद होती है। भगवान को यदि अपना प्रेम-पात्र बना लिया गया है, उसे माता, गुरु या सखा के रूप में वरण कर लिया गया है, तो निस्सन्देह उसके साथ रहने की भावना अति सुखद होगी और उस अवसर पर मन खूब लगेगा। मन का स्वभाव यह है कि वह प्रेम-पात्र के पास, प्रिय वस्तु के साथ, प्रिय कल्पना के सान्निध्य में रहना पसंद करता है। दौड़-दौड़ कर वहीं जाता है। यदि हम ईश्वर को अपना प्रिय-पात्र बना लें तो मन फिर कहीं भागेगा, दौड़ेगा नहीं, वरन् जब भी ध्यान धारण में संलग्न होंगे, मन वहीं रमण करता रहेगा और चाहेगा कि उसी सुखद संदर्भ में अधिक से अधिक समय बिताने का अवसर मिले। तब मन न लगने का- जी उचटने का- चित्त न लगने का प्रश्न ही उपस्थित न होगा। मन को वश में करने- चित्त वृत्तियों को एकाग्र करने की गुत्थी तभी सुलझ सकती है, जब हम ईश्वर को अपना प्रिय संबंधी बना लें और उसके साथ रहने में वैसा ही सुख अनुभव करें, जैसा कि किसी परमप्रिय परिजन के साथ रहने पर अनुभव करते हैं। इसके अतिरिक्त मन को वश में करने तथा चित्त को एकाग्र करने का और कोई रास्ता है ही नहीं।
गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरित्र मानस का शुभारंभ करते हुए भवानी और शंकर की वंदना की है। ये दोनों क्या हैं, इसका स्पष्टीकरण करते हुए उन्होंने कहा है- ‘भवानीशंकरौ वन्दे श्रद्धाविश्वासरुपिणौ’। भवानी को उन्होंने श्रद्धा और शंकर को विश्वास के रूप में उल्लेख किया है। बात सोलह आने सच है। भवानी और शंकर में जो शक्ति हो सकती है, वह सारी-की-सारी ज्यों की-त्यों श्रद्धा और विश्वास में विद्यमान है। अध्यात्म तत्वज्ञान का सारा आधार इन्हीं पर है। दृश्य जगत के आधार पंच-तत्व हैं।
दिखाई देने वाले समस्त जड़ पदार्थ- मिट्टी, पानी, हवा, गर्मी और आकाश द्वारा विनिर्मित हैं। इसी प्रकार अध्यात्म जगत का समस्त विस्तार श्रद्धा और विश्वास पर रखा हुआ है। यदि इन आधारभूत तत्वों की कमी रहेगी, तो किसी उपलब्धि की आशा नहीं की जा सकेगी।
जिस प्रकार जड़ जगत में पंच-तत्वों का सुनिश्चित आधार है, इन्हीं के हेर-फेर से विभिन्न वस्तुएं उत्पन्न होती, बढ़ती और जराजीर्ण होकर नष्ट होती हैं, उसी प्रकार श्रद्धा, विश्वास के आधार पर भावनाओं का निर्माण होता है। यह भावनायें और मान्यतायें ही चेतन जगत में विविध विधि सृजनात्मक ताने-बाने बुनती हैं। श्रद्धा और विश्वास अपने आप में इस सृष्टि के महत्तम शक्ति-स्रोत हैं। इन्हीं के आधार पर व्यक्ति और पदार्थों के साथ हमारे सम्बंध जुड़े हुये हैं। आशा और उत्साह इन्हीं पर निर्भर है। सृजनात्मक प्रेरणा यही उत्पन्न करते हैं। भविष्य का निर्माण और निर्धारण इन्हीं के आधार पर संभव होता है। यदि यह दोनों तत्व चेतना क्षेत्र से अलग हटा दिये जायें तो फिर जीवन-जीवन कहलाने योग्य ही न रह जायेगा।
बीज बोने पर फसल पैदा होगी, शिक्षा प्राप्त कर लेने कर अच्छी कमाई कर सकेंगे, मजूरी करने पर वेतन मिल जायेगा, पत्नी वफादार रहेगी, भोजन विषैला नहीं है, मित्र दगा न करेगा, हम बहुत दिनों जीवित रहेंगे, बैंक में पैसा सुरक्षित है, युद्ध में जीतेंगे, पुरुषार्थ सफल होगा, आदि विश्वासों के आधारों पर कष्टसाध्य योजनायें बनाईं और कार्यान्वित जाती की हैं। यदि उपरोक्त निष्कर्षों पर से विश्वास उठ जाय तो इन कार्यों में हाथ डालने का साहस ही न हो। श्रम निरर्थक चले जाने और बीच में ही विपत्ति खड़ी हो जाने के भय से उनमें से किसी काम को करने का साहस न पड़ेगा। विश्वास के आधार पर ही उत्साह आता है, योजनायें बनती हैं और जोखिम भरे कठोर कार्यों में प्रवृत्त होने का सहास उत्पन्न होता है। यदि विश्वास उठ जाय तो फिर निराशा, अकर्मण्यता, आशंका, भय, विपत्ति और दरिद्रता के अतिरिक्त और कुछ भी हमारे हाथ न रह जायेगा।
गुरुजनों का सम्मान, कानून के प्रति आस्था, पारिवारिक उत्तरदायित्व का निर्वाह, सामाजिक मर्यादाओं की रक्षा, नागरिकता का पालन, अपनी कमाई पर निर्वाह, पुण्य की महिमा, धर्म की उपयोगिता, ईश्वर की विद्यमानता, कर्मफल की सच्चाई, मनुष्यता का गौरव, यशस्वी होने का संतोष, जैसे तथ्यों को हमारी श्रद्धा ही खड़ा किये हुए है। यदि इन आस्थाओं को उखाड़ फेंका जाय तो मानवीय संस्कृति नाम की कोई वस्तु शेष न रह जाय, सामाजिक ढाँचा क्षण भर में लड़-खड़ा जाय, हमें आदिम युग में लौटना पड़े और नर-पशुओं की तरह गुजर करनी पड़े। वह श्रद्धा ही है- जिसने पशुता की अगणित उच्छृंखलताओं को नियन्त्रित कर मनुष्य को सभ्य एवं सुसंस्कृत सामाजिक प्राणी बनने का अवसर दिया है।
कुतर्क और तात्कालिक लाभ की दृष्टि से उपरोक्त सभी श्रद्धा के आधारों का खण्डन किया जा सकता है और इन्हें तोड़ फेंकने में समर्थ व्यक्ति का नफे में रहना सिद्ध किया जा सकता है। दुष्ट दुरात्मा, आततायी, अत्याचारी, उद्दण्ड, उच्छृंखलता, अपराधी और विश्वासघाती मनोवैज्ञानिक दृष्टि से केवल इतने ही दोषी हैं कि उन्होंने अपने भावना क्षेत्र से मानवोचित श्रद्धा को उखाड़ फेंका और अनास्था के आदर्शों को मिटा डाला, फलतः वे स्वेच्छाचारी रीति-नीति अपना कर नर-पिशाचों जैसा आचरण करने लगे। जिसकी श्रद्धा जितनी दुर्बल होती जायेगी वह उतना ही पतित चरित्र बनता जायेगा। अनास्था की वृद्धि मानव जाति की सबसे बड़ी विपत्ति सिद्ध हो सकती है और बुद्धिजीवी समर्थ मनुष्य की क्रूरता इस सुन्दर ग्रह, पृथ्वी का अस्तित्व ही खतरे में डाल सकती है।
सामान्य जीवन में श्रद्धा-विश्वास पर ही सारे कारोबार चल रहे हैं। उधार लेन-देन के मूल में यह विश्वास ही काम कर रहा है कि जो दिया गया है, वह वापस लौट आयेगा। श्रेय और कर्म के परिणामों पर से विश्वास उठ जाय तो किसी से कुछ करते-धरते न बने। एक-दूसरे पर भरोसा न करें तो नौकरों से काम चलाना कठिन हो जाय। भोजन में किसी ने विष तो नहीं मिला दिया, इस आशंका से मुख में ग्रास रखना कठिन हो जाय। विचार करने पर हम देखते हैं कि श्रद्धा और विश्वास ही हमारे सभ्य जीवन को सुव्यवस्थित बनाये रहने के आधार हो सकते हैं।
आध्यात्मिक जीवन के तो इन्हें सर्वस्व ही कहा जा सकता है। ईश्वर, उसकी सत्ता, व्यवस्था, उपासना, उसकी नित्य परिणिति के पीछे श्रद्धा ही प्रधान आधार है। मस्तिष्कीय तर्क पदार्थ विज्ञान का अभी इतना विकास नहीं हुआ कि सूक्ष्म जगत और उसकी दिव्य संवेदनाओं को लैबोरेटरी में प्रत्यक्ष करके देखा जा सके। आत्मा हमारी अनोखी प्रयोगशाला है, उसकी अनुभूतियाँ किसी भौतिक प्रत्यक्षीकरण से कम महत्व की नहीं। सुख और दुःख की, प्रेम और घृणा की अनुभूतियों की वास्तविकता एवं स्थिति विज्ञान की प्रयोगशाला में सिद्ध नहीं की जा सकती है, तो क्या यह कहा जाय कि सुख दुःख अथवा प्रेम-घृणा जैसी कोई वस्तु इस संसार में नहीं है? अध्यात्म का आधार तर्क या प्रयोगशाला नहीं- आत्मा की अनुभूति है। और वह असत्य नहीं हो सकती। इन्द्रियों द्वारा अनुभव किये जाने वाले सुखों का विज्ञान के आधार पर कोई विवेचन नहीं हो सकता। आँखें जैसा कुछ देखती हैं, कान जैसा कुछ सुनते हैं, जीभ जैसा चखती है, कामेन्द्रिय जैसा अनुभव करती है, उस अनुभूति को विज्ञान एक मानसिक भ्राँति ही बता सकता है। सृष्टि का मूल अण्ड-संस्थान तेजी से घूम और चल रहा है, ऐसी आँधी-तूफान जैसी गतिशीलता ही विज्ञान द्वारा इस दृश्य जगत की स्थिति सिद्ध की जा सकती है।
सुखानुभूतियों को तो हमारी चेतना की एक अनोखी विशेषता बता सकता है और उसका कोई स्वरूप समझाने में असमर्थ है। अतएव यह मान कर चलना होता है कि तर्क एवं विज्ञान ही सब कुछ नहीं। जीव की चेतना सत्ता भी कोई इकाई है और उसकी अनुभूति भी उपहासास्पद नहीं ठहराई जा सकती। अध्यात्म- इसी आत्मानुभूति पर अवलम्बित है और उस आत्मानुभूति का प्रधान आधार ‘श्रद्धा’ है। श्रद्धा के परिकर- परिवार को ही यदि अध्यात्म कहा जाय तो इसमें कुछ भी अत्युक्ति न मानी जानी चाहिये। ईश्वर, धर्म, उपासना, सूक्ष्म जगत, आत्म-विकास यह सभी दिव्य सत्तायें हमारी प्रगाढ़ श्रद्धा पर अवलम्बित है।
श्रद्धा, कल्पना को नहीं, उस मान्यता, आस्था एवं दृष्टि को कहते हैं, जो आत्मानुभूति जैसे खरे आधार पर प्रमाणित होती है और जिसके असंख्य प्रमाण सृष्टि के आरंभ से लेकर आज तक के इतिहास में पग-पग पर भरे पड़े हैं। श्रद्धा एक सजीव शक्ति है जिसका आरोपण जहाँ भी किया जाय वहीं अभिनव चेतना उपज पड़ती है। आग को जिस वस्तु में भी लगा दिया जाय वही गरम और चमकीली हो जाती है।श्रद्धा का आरोपण जिस भी व्यक्ति अथवा पदार्थ पर किया जाय, वह दूसरों के लिये न सही उस आरोपण करने वाले के लिये तो दिव्य सत्ता से परिपूर्ण बन ही जाता है। देव आस्था का यही स्वरूप है।
निर्जीव प्रतिमाओं को देव भाव से देखने पर उनमें सचमुच देवत्व उत्पन्न हो जाता है और वे उस श्रद्धालु के लिये उसकी श्रद्धा के अनुरूप फल देने लगती हैं। ईश्वर के बारे में निर्धारित हमारी श्रद्धा उसे हमारे सामने ‘भक्त के वश में बने हुए भगवान’ का एक घटक बना कर प्रस्तुत कर देती है।
श्रद्धा से बनी भूत की कल्पना प्राण-घातक दुष्परिणाम उत्पन्न करती है। भय और आशंकाओं से आतंकित लोग अपना अच्छा खासा स्वास्थ्य खो बैठते हैं। आत्म-विश्वास और मनोबल के आधार पर चमत्कारी प्रतिफल उत्पन्न किये जाते हैं। यह सारे खेल श्रद्धा के ही हैं। साधना के सत्परिणामों की एक विशाल श्रृंखला है। अगणित साधक, अगणित प्रकार के सत्परिणाम साधना प्रयोगों के आधार पर प्राप्त करते हैं- इसके मूल में उनकी श्रद्धा की शक्ति ही सन्निहित होती है। साधक अपने ही नाम रूप साधना करके- अपने ही जैसा एक ‘छाया पुरुष’ निर्मित और सिद्ध कर लेते हैं। यह मनुष्य आकृति का देव बड़े-बड़े अनोखे काम करता है।
यह रचना हमारी श्रद्धा द्वारा ही की गई होती है। अनेक देवताओं का सृजन इसी प्रकार होता है। अन्तःकरण में कौन दिव्य शक्ति कितनी, कहाँ कैसी है यह प्रश्न अलग है। यहाँ तो यह कहा समझाया जा रहा है कि हमारी श्रद्धा- अपनी सामर्थ्य से, अपनी मान्यता, आकृति, रुचि और प्रयोजन का एक स्वतंत्र देव विनिर्मित कर सकती है। यह देवता उतने ही समर्थ होते हैं, जितनी हमारी श्रद्धा उन्हें बल प्रदान करती है। दुर्बल श्रद्धा से बने देव आकृति मात्र का दर्शन देने में समर्थ होते हैं। वे कुछ अधिक सहायता नहीं कर सकते। पर जिनकी श्रद्धा प्रबल है, उनके देव भी अद्भुत पराक्रम प्रस्तुत करते देखे जाते हैं।
श्रद्धा और विश्वास का सम्बल लेकर ही हमें अध्यात्म क्षेत्र में प्रवेश करना चाहिये। ‘‘ईश्वर है- उसकी सत्ता विद्यमान है- उसका सान्निध्य प्राप्त किया जा सकता है। और उसका प्रकाश मिल सकता है।’’ यह विश्वास जितना ही प्रखर एवं स्पष्ट होगा उतनी ही सफलता हमारी साधना प्रस्तुत करेगी। कितना जप करने से, कितने दिन में, ईश्वर की कितनी कृपा मिल सकती है? इस प्रश्न का उत्तर देने से पूर्व यह भी जानना होगा कि साधक की श्रद्धा में कितनी प्रखरता है? यदि अश्रद्धा और अविश्वास से, उदास मन से बेगार भुगतने की तरह कुछ पूजा-पाठ किया जा रहा है तो उसका परिणाम भी लंगड़े-लूले जैसा होगा। बहुत दिन में थोड़ा-सा लाभ दिखाई देगा। छोटे से दीपक की लौ से जल पात्र बहुत देर में गरम होगा, किन्तु यदि आग तीव्र हो तो थोड़ी ही देर में पानी खौलने लगेगा। उपासना का क्रिया-कृत्य पूरा कर लेना अभीष्ट परिणाम उत्पन्न नहीं करता। आवश्यकता श्रद्धा के समन्वय की भी है। यह समावेश जितना अधिक और जितना प्रखर होगा सत्परिणाम उतनी ही बड़ी मात्रा में और उतने ही शीघ्र दृष्टिगोचर होंगे।
उपासना की सफलता के लिये हमें अपनी मनोभूमि को श्रद्धासिक्त करना होगा। ईश्वर के अस्तित्व, उसके स्वभाव और कर्तृत्व पर वैसा ही विश्वास करना होगा जैसा कि हम उसके ऊपर अथवा अपने साधन, सहचरों पर करते हैं। भावनापूर्ण उपासना अपना प्रतिफल उत्पन्न किये बिना नहीं रहती, इस तथ्य पर भी हमारी परिपूर्ण मान्यता होनी चाहिये। और प्रयत्न यह किया जाना चाहिये कि अपने भावना-स्तर उपासना को प्रखर बनाने के अनुकूल बनता और बढ़ता चला जाय। अपने आपका निर्माण ही सबसे बड़ा और सबसे झंझट का काम है। यदि उसे पूरा किया जा सके तो कोई छोटी-सी भी उपासना पद्धति थोड़े दिनों में ही आशाजनक प्रतिफल उत्पन्न कर सकती है।
ईश्वर हमारे समीप तो पहले से ही है, उसे अनुभव करना मात्र शेष है। कषाय कल्मष का पर्दा हटते ही वह प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर होने लगता है। पुरुषार्थ ईश्वर को ढूंढ़ने में, बुलाने में, पाने में नहीं करना पड़ता वह तो सहज सुलभ है। प्रयत्न तो अपना क्रिया-कलाप और भावनात्मक स्तर सुधारने में करना होता है। लोग यही भूल करते हैं कि आत्म-सुधार की ओर से बेखबर रह कर केवल ईश्वर-ईश्वर पुकारते रहते हैं। ईश्वर पीठ पीछे खड़ा हंसता रहता है और कहता है- ‘‘जरा मुड़ कर देख मैं तो तेरे साथ ही हूँ। आँखों पर पर पड़ा अज्ञान और व्यामोह का पर्दा हटा और मुझे देख।’’
परखना यह चाहिये कि हमारी श्रद्धा, विश्वास दुर्बल तो नहीं हैं? ईश्वर की सत्ता और प्रकृति पर हमारा परिपूर्ण विश्वास है या नहीं? केवल अपना मतलब साधने के लिये ही कोई बिलाव दंडवत कर रहे हैं या ईश्वर की समीपता का लाभ लेना चाहते हैं? बगुला-भक्ति कोई स्वार्थ सिद्ध करने को होती है। उसे वेश्यावृत्ति अथवा भिक्षु-दीनता भी कहते हैं। ऐसे दंडवत कभी-कभी कुछ प्रयोजन तो सिद्ध कर देते हैं पर आत्मा और परमात्मा के बीच ऐसा संबंध स्थापित नहीं करा सकते, जिससे दोनों एकता और अभिन्नता का दिव्य आनन्द अनुभव कर सकें। सच्ची उपासना तो वह है जिसमें जीव अपना समस्त मोह कलेवर, अहंता परिवार- ईश्वर को समर्पण करता है और ईश्वर उसे उत्कृष्टता एवं आदर्शवादिता के प्रकाश से पूर्णतया प्रकाशवान कर देता है।
नियमित उपासना के लिए पूजा-स्थली की स्थापना आवश्यक है। घर में एक ऐसा स्थान तलाश करना चाहिये जहाँ अपेक्षाकृत एकान्त रहता हो, आवागमन और कोलाहल कम-से-कम हो। ऐसे स्थान पर एक छोटी चौकी को पीत वस्त्र से सुसज्जित कर उस पर काँच से मढ़ा भगवान का सुन्दर चित्र स्थापित करना चाहिये। गायत्री की उपासना सर्वोत्कृष्ट मानी गई है। इसलिये उसकी स्थापना की प्रमुखता देनी चाहिये। यदि किसी का दूसरे देवता के लिये आग्रह हों तो उन देवता का चित्र भी रखा जा सकता है। शास्त्रों में गायत्री के बिना अन्य सब साधनाओं का निष्फल होना लिखा है। इसलिये यदि अन्य देवता को इष्ट माना जाय और उसकी प्रतिमा स्थापित की जाय तो भी गायत्री का चित्र प्रत्येक दशा में साथ रहना ही चाहिये।
अच्छा तो यह है कि एक ही इष्ट गायत्री महाशक्ति को माना जाय और एक ही चित्र स्थापित किया जाय। उससे एकनिष्ठा और एकाग्रता का लाभ होता है। यदि अन्य देवताओं की स्थापना का भी आग्रह हो तो उनकी संख्या कम-से-कम रखनी चाहिये। जितने देवता स्थापित किये जायेंगे, जितनी प्रतिमाएं बढ़ाई जायेंगी- निष्ठा उसी अनुपात से विभाजित होती जायेगी। इसलिये यथासंभव एक अन्यथा कम-से-कम छवियाँ पूजा स्थली पर प्रतिष्ठापित करनी चाहिये।
पूजा-स्थली के पास उपयुक्त व्यवस्था के साथ पूजा के उपकरण रखने चाहिये। अगरबत्ती, पंच-पात्र, चमची, धूपबत्ती, आरती, जल गिराने की तस्तरी, चंदन, रोली, अक्षत, दीपक, नैवेद्य, घी, दियासलाई आदि उपकरण यथा-स्थान डिब्बों में रखने चाहिये। आसन कुशाओं का उत्तम है। चटाई में काम चल सकता है। आवश्यकतानुसार मोटा या गुदगुदा आसन भी रखा जा सकता है। माला चन्दन या तुलसी की उत्तम है। शंख, सीपी मूँगा जैसी जीव शरीरों से बनने वाली मालाएं निषिद्ध हैं। इसी प्रकार किसी पशु का चमड़ा भी आसन के स्थान पर प्रयोग नहीं करना चाहिये। प्राचीन काल में अपनी मौत मरे हुए पशुओं का चर्म वनवासी संत सामयिक आवश्यकता के अनुरूप प्रयोग करते होंगे। पर आज तो हत्या करके मरे हुए पशुओं का चमड़ा ही उपलब्ध है। इसका प्रयोग उपासना की सात्विकता को नष्ट करता है।
नियमित उपासना, नियत समय पर संस्था में, नियत स्थान पर होनी चाहिये। इस नियमितता से वह स्थान संस्कारित हो जाता है और मन भी ठीक तरह लगता है। जिस प्रकार नियत समय पर सिगरेट आदि की ‘भड़क’ उठती है, उसी तरह पूजा के लिये भी मन में उत्साह जगता है। जिस स्थान पर बहुत दिन से सो रहे हैं, उस स्थान पर नींद ठीक आती है। नई जगह पर अकसर नींद में अड़चन पड़ती है। इसी प्रकार पूजा का नियत स्थान ही उपयुक्त रहता है। व्यायाम की सफलता तब है जब दंड बैठक आदि को नियत संख्या में नियत समय पर किया जाय। कभी बहुत कम, कभी बहुत ज्यादा, कभी सबेरे, कभी दोपहर को व्यायाम करने से लाभ नहीं मिलता।
इसी प्रकार दवा की मात्रा भी समय और तोल को ध्यान में रख कर मनमाने समय और परिमाण में सेवन की जाय तो उससे उपयुक्त लाभ न होगा। यही बात अस्थिर संख्या की उपासना के बारे में कही जा सकती है। यथा संभव नियमितता ही बरतनी चाहिये। रेलवे की रनिंग ड्यूटी करने वाले, यात्रा में रहने वाले, फौजी, पुलिस वाले जिन्हें अक्सर समय-कुसमय यहाँ-वहाँ जाना पड़ता है, उनकी बात दूसरी है। वे मजबूरी में अपना क्रम जब भी, जितना भी बन पड़े, रख सकते हैं। न कुछ से कुछ अच्छा। पर जिन्हें ऐसी असुविधा नहीं उन्हें यथा संभव नियमितता ही बरतनी चाहिये। कभी मजबूरी की स्थिति आ पड़े तो तब वैसा हेर-फेर किया जा सकता है।
पूजा उपचार के लिये प्रातःकाल का समय सर्वोत्तम है। स्थान और पूजा उपकरणों की सफाई नित्य करनी चाहिये। जहाँ तक हो सके नित्यकर्म से शौच, स्नान आदि से निवृत्त होकर ही पूजा पर बैठना चाहिये। रुग्ण या अशक्त होने की दशा में हाथ-पैर, मुँह आदि धोकर भी बैठा जा सकता है। पूजा का न्यूनतम कार्य तो निर्धारित रखना ही चाहिये। उतना तो पूरा कर ही लिया जाय। यदि प्रातः समय न मिले तो सोने से पूर्व निर्धारित कार्यक्रम की पूर्ति की जाय। यदि बाहर प्रवास में रहना हो तो मानसिक ध्यान पूजा भी की जा सकती है। ध्यान में नित्य की हर पूजा पद्धति का स्मरण और भाव कर लेने को मानसिक पूजा कहते हैं। विवशता में ऐसी पूजा से भी काम चल सकता है।
सबसे पहले शरीर, मन और इन्द्रियों को- स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीरों की शुद्धि के लिये आत्म-शुद्धि के पंचोपचार करने चाहिये। यही संक्षिप्त ब्रह्म-संध्या है। (1) बायें हाथ में एक चम्मच जल रख कर दाहिने से ढंका जाय। पवित्रीकरण का मंत्र अथवा गायत्री मंत्र पढ़ कर उस जल को समस्त शरीर पर छिड़का जाय, (2) तीन बार, तीन चम्मच भर कर, तीन आचमन किये जांय। आचमनों के तीन मंत्र पुस्तकों में हैं, वे याद न हों तो हर आचमन पर गायत्री मंत्र पढ़ा जा सकता है। (3) चोटी में गाँठ लगाई जाय। अथवा शिखा स्थान को स्पर्श किया जाय। शिखा बंधन का मंत्र याद न हो तो गायत्री मंत्र पढ़ा जाय। (4) दाहिना नथुना बन्द कर बायें से साँस खींची जाय। भीतर रोकी जाय और बायाँ नथुना बन्द करके दाहिने छेद से साँस बाहर निकाली जाय। यह प्राणायाम है। प्राणायाम का मंत्र याद न हो तो गायत्री मंत्र मन ही मन पढ़ा जाय। (5) बाईं हथेली पर जल रख कर दाहिने हाथ की पाँचों उंगलियाँ उसमें डुबोई जांय और क्रमशः मुख, नाक, आँख, कान, बाहु, जंघा इन पर बाईं और दाईं और जल का स्पर्श कराया जाता, यह न्यास है। न्यास के मंत्र याद न होने पर भी गायत्री का प्रयोग हो सकता है। यह शरीर मन और प्राण की शुद्धि के लिये किये जाने वाले पाँच प्रयोग हैं। इन्हें करने के बाद ही देव पूजन का कार्य आरंभ होता है।
देव पूजन में सबसे प्रथम धरती-माता का- मातृ-भूमिका, विश्व-वसुन्धरा का पूजन है। जिस धरती पर जिस देश समाज में जन्म लिया है वह प्रथम देव है, इसलिये इष्टदेव की पूजा से भी पहले पृथ्वी पूजन किया जाता है। पृथ्वी पर जल, अक्षत, चंदन, पुष्प रख कर पूजन करना चाहिये। पृथ्वी पूजन के मंत्र याद न हों तो गायत्री मंत्र का उच्चारण कर लेना चाहिये।
इसके बाद इष्टदेव का- गायत्री माता का- पूजन किया जाय। 1. आह्वान, आमंत्रण के लिए अक्षत, 2. स्नान के लिए जल, 3. स्वागत के लिए चंदन अथवा रोली, 4. सुगंध के लिए अगरबत्ती, 5. सम्मान के लिए पुष्प, 6. आहार के लिए नैवेद्य कोई फल मेवा या मिठाई, 7. अभिवन्दन के लिए आरती, कपूर अथवा दीपक की। यह सात पूजा उपकरण सर्वसाधारण के लिए सरल हैं। पुष्प हर जगह- हर समय नहीं मिलते। उनके अभाव में केशर मिश्रित चन्दन से रंगे हुए चावल प्रयोग में लाये जा सकते हैं। प्रथम भगवान की पूजा स्थली पर विशेष रूप से आह्वान आमंत्रित करने के लिये हाथ जोड़कर अभिवन्दन करना चाहिये और उपस्थित का हर्ष व्यक्त करने के लिए माँगलिक अक्षतों (चावलों) की वर्षा करनी चाहिये। इसके बाद जल, चंदन, अगरबत्ती, पुष्प, नैवेद्य, आरती की व्यवस्था करते हुए उनका स्वागत, सम्मान करना चाहिये। यह विश्वास करना चाहिये कि भगवान सामने उपस्थित हैं और हमारी पूजा प्रक्रिया को- भावनाओं को ग्रहण स्वीकार करेंगे। उपरोक्त सात पूजा उपकरणों के अलग-अलग मंत्र भी हैं। वे याद न हो सकें तो हर मंत्र की आवश्यकता गायत्री से पूरी हो सकती है। इस विधान के अनुसार इस एक ही महामंत्र से कभी पूजा प्रयोजन पूरे कर लेने चाहिये।
इसके बाद जप का नम्बर आता है। मंत्र ऐसे उच्चारण करना चाहिये, जिससे कंठ, होठ और जीभ हिलते रहें। उच्चारण तो होता रहे पर इतना हल्का हो कि पास बैठा व्यक्ति भी उसे ठीक तरह से सुन समझ न सके। माला को प्रथम मस्तक पर लगाना चाहिये फिर उससे जप आरंभ करना चाहिये। तर्जनी उंगली का प्रयोग नहीं किया जाता, माला घुमाने में अंगूठा, मध्यमा और अनामिका इन तीनों का ही प्रयोग होता है। जब एक माला पूरी हो जाय तब सुमेरु (बीच का बड़ा दाना) उल्लंघन नहीं करते उसे लौट देते हैं।
अधिक रात गये जप करना हो तो मुँह बन्द करके- उच्चारण रहित मानसिक जप करते हैं। साधारणतया एक माला जप में 6 मिनट लगते हैं। पर अच्छा हो इस गति को और मंद करके 10 मिनट कर लिया जाय। दैनिक उपासना में- जब कि दो ही माला नित्य करनी हैं, गति में तेजी लाना ठीक नहीं। माला न हो तो उंगलियों पर 108 गिन कर एक माला पूरी होने की गणना की जा सकती है। घड़ी सामने रख कर भी समय का अनुमान लगाया जा सकता है।
न्यूनतम उपासना क्रम में एक माला गायत्री महामंत्र की आत्म-कल्याण के लिये और एक माला विश्व-कल्याण के लिए। दो को अनिवार्य माना गया है। इसके अतिरिक्त अधिक जप या किसी अन्य देवी-देवता का जप पाठ अपनी इच्छा और सुविधा पर निर्भर है। आत्म-कल्याण की भावनाओं की अभिव्यक्ति ‘गायत्री चालीसा’ में और विश्वकल्याण की रीति-नीति ‘युग-निर्माण सत्संकल्प’ में मौजूद है। इसलिए पहली आत्म-कल्याण की माला जपने के बाद गायत्री चालीसा का पाठ और दूसरी विश्व कल्याण की माला जपने के बाद युग-निर्माण सत्संकल्प का पाठ करना चाहिये।
आत्म-कल्याण की माला जपते समय गायत्री माता की गोदी में खेलने का और विश्व-कल्याण की माला जपते समय दीपक पर पतंगे का आत्म-समर्पण करने की तरह लोक-मंगल के लिये- विश्व-मानव के लिए अपने अस्तित्व को समर्पित करने का ध्यान भावनापूर्वक करते रहना चाहिये। दोनों ही ध्यान बड़े प्रेरक हैं। उन्हें परिपूर्ण श्रद्धा और प्रगाढ़ भावना के साथ इस प्रकार करना चाहिये कि सचमुच वैसी ही स्थिति अनुभव होने लगे।
इस ध्यान मिश्रित जप और ध्यान को पूरा होने पर विसर्जित करते हुए भगवान को नमस्कार, प्रणाम करना चाहिये और अक्षत वर्षा करके विदा करना चाहिये। पूजा के प्रारंभ में जल अग्नि को साक्षी करने के लिए जहाँ धूपबत्ती जलाई जांय वहीं एक छोटा लोटा जल भर कर कलश रूप में भी रखना चाहिये और पूजा के अन्त में उसे सूर्य नारायण की दिशा में- प्रातः पूर्व की ओर और सायं पश्चिम में- अर्घ चढ़ा देना चाहिये। अर्घ का मंत्र याद न हो तो गायत्री मंत्र से काम चल सकता है।
अधजली अगरबत्ती या दीपक की बत्ती दूसरे दिन काम में नहीं आती, इसलिए उसे पूजा के बाद भी जलती ही छोड़ देना चाहिये ताकि अपने आप जल कर समाप्त हो जाय।
प्रातःकाल एक बार तो इस तरह पूजा करना आवश्यक ही है। संभव हो सके तो शाम को भी करना चाहिये। शाम को एक माला आत्म-कल्याण की करने से भी काम चल सकता है। आत्म शुद्धि पाँच संध्या विधान और सप्त विधि पूजा सायंकाल को भी करनी चाहिये। घर के अन्य लोगों को भी स्त्री, बचों को भी यह प्रेरणा देनी चाहिये कि वे उस पूजा स्थली के समीप बैठकर कम-से-कम एक माला गायत्री मंत्र की सभी कर लिया करें। सप्त विधि पूजा एक बार कर ली गई हो तो बार-बार करने की आवश्यकता नहीं रह जाती। घर में पूजा स्थली की स्थापना- उसके निकट बैठ कर पूजा, उपासना का क्रम हर सद्गृहस्थ को अपने यहाँ चलाना चाहिये। स्वयं तो नियमित उपासना करनी चाहिये। प्रयत्न यह भी करना चाहिये कि परिवार के दूसरे लोग भी- दस-पांच मिनट वहाँ बैठ कर थोड़ी-बहुत उपासना अवश्य कर लिया करें। घर में आस्तिकता का- भक्ति भावना का वातावरण रहना परिवार की भावनात्मक समृद्धि और आत्मिक शुद्धि के लिए अति आवश्यक है।
आत्म-कल्याण के लिए गायत्री महामंत्र की पहली एक माला जप करते समय अपने को एक वर्ष आयु के छोटे बालक के रूप में अनुभव करना चाहिये और सर्वशक्तिमान गायत्री माता की गोद में खेलने, क्रीड़ा-कल्लोल करने की भावना करनी चाहिये। उनका पाय-पान करते हुए यह अनुभूति जगानी चाहिये कि इस अमृत दूध के साध मुझे आदर्शवादिता, उत्कृष्टता, ऋतंभरा प्रज्ञा, सज्जनता एवं सदाशयता जैसी दिव्य आध्यात्मिक विभूतियाँ उपलब्ध हो रही हैं और उनके माध्यम से अपना अन्तःकरण एवं व्यक्तित्व महान बनता चला जा रहा है।
ध्यान का स्वरूप नीचे दिया जाता है।
(1) प्रलय के समय बची हुई अनन्त जलराशि में कमल के पत्ते तैरते हुए बाल भगवान का चित्र बाजार में बिकता है। वह चित्र खरीद लेना चाहिये और उसी के अनुरूप अपनी स्थिति अनुभव करनी चाहिये। इस संसार से ऊपर नील आकाश और नीचे नील जल के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं। जो कुछ भी दृश्य पदार्थ इस संसार में थे वे इस प्रलय काल में ब्रह्म के भीतर तिरोहित हो गये। अब केवल अनन्त शून्य बना है जिनमें नीचे जल और ऊपर आकाश के अतिरिक्त और कोई वस्तु शेष नहीं। यह उपासना भूमिका के वातावरण का स्वरूप है। पहले इसी पर ध्यान एकाग्र किया जाये।
(2) मैं कमल पत्र पर पड़े हुए एक वर्षीय बालक की स्थिति में निश्चिन्त भाव से पड़ा क्रीड़ा-कल्लोल कर रहा हूँ। न किसी बात की चिन्ता है, न आकाँक्षा और न आवश्यकता। पूर्णतया निश्चिन्त, निर्भय, निर्द्वन्द्व, निष्काम जिस प्रकार छोटे बालक को मनोभूमि हुआ करती है, ठीक वैसे ही अपनी है। विचारणा का सीमित क्षेत्र एकाकीपन के उल्लास में ही सीमित है। चारों ओर उल्लास एवं आनंद का वातावरण संव्याप्त है। मैं उसी की अनुभूति करता हुआ परिपूर्ण तृप्ति एवं सन्तुष्टि का आनन्द ले रहा हूँ।
(3) प्रातःकाल जिस प्रकार संसार में अरुणिमा युक्त स्वर्णिम आभा के साथ भगवान सविता अपने समस्त वरेण्य, दिव्य भर्ग ऐश्वर्य के साथ उदय होते हैं उसी प्रकार उस अनन्त आकाश की पूर्व दिशा में से ब्रह्म की महान शक्ति गायत्री का उदय होता है। उसके बीच अनुपम सौंदर्य से युक्त अलौकिक सौंदर्य की प्रतिमा जगद्धातृ गायत्री माता प्रकट होती है। वे हंसती-मुस्कराती अपनी ओर बढ़ती आ रही हैं। हम बालसुलभ किलकारियाँ लेते हुए उनकी ओर बढ़ते चले जाते हैं। दोनों माता-पुत्र आलिंगन आनन्द से आबद्ध होते हैं और अपनी ओर से असीम वात्सल्य की गंगा-यमुना प्रवाहित हो उठती है दोनों का संगम परम-पावन तीर्थराज बन जाता है।
माता और पुत्र के बीच क्रीड़ा-कल्लोल भरा स्नेह वात्सल्य का आदान-प्रदान होता है। उसका पूरी मरह ध्यान ही नहीं भावना भूमिका में भी उतारना चाहिये। बच्चा माँ के बाल, नाक, कान आदि पकड़ने की चेष्टा करता है, मुँह नाक में अंगुली देता है, गोदी में ऊपर चढ़ने की चेष्टा करता है, हंसता, मुस्कराता और अपने आनन्द की अनुभूति उछल-उछल कर प्रकट करता है वैसी ही स्थिति अपनी अनुभव करनी चाहिये। माता अपने बालक को पुकारती है, उसके सिर पीठ पर हाथ फिराती है, गोदी में उठाती, छाती से लगाती, दुलराती है, उछालती है, वैसी ही चेष्टायें माता की ओर से प्रेम उल्लास के साथ हंसी-मुस्कान के साथ ही जा रही हैं ऐसा ध्यान करना चाहिये।
स्मरण रहे केवल उपर्युक्त दृश्यों की कल्पना करने से काम न चलेगा वरन् प्रयत्न करना होगा कि वे भावनायें भी मन में उठें, जो ऐसे अवसर पर स्वाभाविक माता पुत्र के बीच उठती रहती हैं। दृश्य की कल्पना सरल और भाव की अनुभूति कठिन है। अपने स्तर को वयस्क व्यक्ति के रूप में अनुभव किया गया तो कठिनाई पड़ेगी किन्तु यदि सचमुच अपने को एक वर्ष के बालक की स्थिति में अनुभव किया गया, जिसको माता के स्नेह के अतिरिक्त और यदि कोई प्रिय वस्तु होती ही नहीं, तो फिर विभिन्न दिशाओं में बिखरी हुई अपनी भावनायें एकत्रित होकर उस असीम उल्लास भरी अनुभूति के रूप में उदय होंगी जो स्वभावतः हर माता और हर बालक के बीच में निश्चित रूप से उदय होती हैं। प्रौढ़ता भुला कर शैशव का शरीर और भावना स्तर स्मरण कर सकता यदि संभव हो सका तो समझना चाहिये कि साधक ने एक बहुत बड़ी मंजिल पार कर ली।
मन प्रेम का गुलाम है। मन भागता है पर उसके भागने की दिशा अप्रिय से प्रिय भी होती है। जहाँ प्रिय वस्तु मिल जाती है वहाँ वह ठहर जाता है। प्रेम ही सर्वोपरि प्रिय है। जिससे भी अपना प्रेम हो जाय वह भले ही कुरुप या निरूप भी हो पर लगता परम प्रिय है। मन का स्वभाव प्रिय वस्तु के आस-पास मंडराते रहने का है। उपर्युक्त ध्यान साधना में गायत्री माता के प्रति प्रेम भावना का विकास करना पड़ता है फिर उसका सर्वांग सुन्दर स्वरूप भी प्रस्तुत है। सर्वांग सुन्दर प्रेम को अधिष्ठात्री गायत्री माता का चिन्तन करने से मन उसी परिधि में घूमता रहता है। उसी क्षेत्र में क्रीड़ा कल्लोल करता रहता है। अतएव मन को रोकने, वश में करने की एक बहुत बड़ी आध्यात्मिक आवश्यकता भी इस साधना के माध्यम से पूरी हो जाती है।
इस ध्यान धारणा में गायत्री माता को केवल एक नारी-मात्र नहीं माना जाता है। वरन् उसे सत् चित् आनंद स्वरूप समस्त सद्गुणों, सद्भावनाओं, सत्प्रवृत्तियों का प्रतीक, ज्ञान-विज्ञान का प्रतिनिधि और शक्ति सामर्थ्य का स्रोत मानते हैं। प्रतिमा नारी की भले ही हो पर वस्तुतः वह ब्रह्म चेतना क्रम दिव्य ज्योति बन कर ही- अनुभूति में उतरे।
जब माता के स्तन-पान का ध्यान किया जाय तो यह भावना उठनी चाहिये कि यह दूध एक दिव्य प्राण है जो माता के वक्षःस्थल से निकल कर मेरे मुख द्वारा उदर में जा रहा है और वहाँ एक धवल विद्युत-धारा बनकर शरीर के अंग-प्रत्यंग रोम-रोम में ही नहीं- वरन् मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, हृदय, अन्तःकरण, चेतना एवं आत्मा का समाविष्ट हो रहा है। स्थूल, सूक्ष्म, कारण शरीरों में अन्नमय कोश, मनोमय कोश, प्राणमय कोश, विज्ञानमय कोश, आनन्दमय कोशों में समाये हुये अनेक रोग-शोकों, कषाय-कल्मषों का निराकरण कर रहा है। इस पय-पान का प्रभाव एक कायाकल्प कर सकने वाली संजीवनी रसायन जैसा हो रहा है। मैं नर से नारायण, पुरुष से पुरुषोत्तम, अणु से विभु क्षुद्र से महान और आत्मा से परमात्मा के रूप में विकसित हो रहा हूँ। ईश्वर के समस्त सद्गुण धीरे-धीरे व्यक्तित्व का अंग बन रहे हैं। मैं द्रुतगति से उत्कृष्टता की ओर अग्रसर हो रहा हूँ। मेरा आत्म-बल असाधारण रूप में प्रखर हो रहा है।
दूसरी माला विश्व-कल्याण के लिए- युग-निर्माण के महान आन्दोलन की सफलता के लिए करनी चाहिये। अपने परिवार द्वारा प्रतिदिन 24 लक्ष गायत्री जप का जो संकल्प गत बसन्त पंचमी (3 फरवरी 1968) से आरंभ किया गया है, वह इस युग का महानतम पुरश्चरण है। इस युग में इतना बड़ा सामूहिक धर्मानुष्ठान आज तक नहीं किया गया। आज की आवश्यकता ऐसी है, जिसमें इतने शक्तिशाली अध्यात्म प्रयोग ही आशाजनक परिणाम उत्पन्न कर सकते हैं।
यह पुरश्चरण दस वर्ष तक चलेगा। इस महान् जप-यज्ञ में अखण्ड-ज्योति परिवार के हर सदस्य को भागीदार बनाना चाहिये और एक माला गायत्री जप और एक पाठ युग-निर्माण सत्संकल्प के भागीदारों का- नित्य ही करना चाहिये। न्यूनतम उपासना क्रम में जो दो माला गायत्री जप करने की व्यवस्था की गई है, उसमें एक माला आत्म-कल्याण के लिए है और दूसरी विश्व-कल्याण के लिए है।
युग-निर्माण के लिए जहाँ रचनात्मक एवं संघर्षात्मक प्रत्यक्ष शतसूत्री कार्यक्रमों की व्यवस्था है वही सूक्ष्म आध्यात्मिक प्रयोगों का भी समन्वय है। अन्तरिक्ष में आज दुष्प्रवृत्तियों का वातावरण बुरी तरह भर गया है। पिछले दिनों मानव जाति द्वारा जो अनेक दुष्कर्म किये जाते रहे हैं और कुविचार अपनाये जाते रहे हैं, उनकी प्रतिक्रिया आकाश में भयावह वातावरण की काली घटायें बन कर घुमड़ रही है। यही घटायें बार-बार विभिन्न विभीषिकाओं के रूप में बरस पड़ती हैं और अकाल, अतिवृष्टि, अनावृष्टि, भूकम्प, महामारी, दुर्घटनायें, युद्ध, अपराधों की वृद्धि, संघर्ष, क्लेश, शोक-संताप आदि के रूप में विपत्तियाँ प्रस्तुत करती हैं। अगले दस वर्ष बुरी संभावनाओं से भरे हुए हैं, उन्हें टालने के लिये ऐसी ही शक्तिशाली धर्मानुष्ठान की आवश्यकता थी जैसा कि अपना 24 लक्ष गायत्री जप का महापुरश्चरण अपने परिवार द्वारा संकल्पित हुआ है।
युग परिवर्तन के लिए- नव-निर्माण के लिए सतोगुणी सद्भावनाओं का ऐसा वातावरण आकाश में विनिर्मित किया जाना आवश्यक है। जिसके प्रभाव में जनमानस में आत्म-संयम और परमार्थ प्रयोजन के लिए साहसिक कदम उठाने की प्रेरणा उत्पन्न हो सके। इसके लिए चतुर्विधि स्थूल प्रक्रिया लेखनी, प्राणी, संगठन एवं शतसूत्री रचनात्मक कार्य पद्धति के माध्यम से कार्यान्वित की जा रही है, पर इतने से ही काम न चलेगा। इसके लिए अंतरिक्ष में ऐसी सूक्ष्म प्रेरणा का उत्पन्न किया जाना भी आवश्यक है जो अनायास ही जनमानस में युग परिवर्तन के अनुरूप हलचल, आकाँक्षा, प्रेरणा, स्फूर्ति एवं लगन उत्पन्न करे। वास्तविक काम दूसरों के कहने सुनने से नहीं- अपनी अन्तःकरण की प्रेरणा से ही होता है।
आज जनमानस निर्जीव मूर्छित एवं अन्धकारग्रस्त पड़ा है। इसको सजग, समर्थ एवं सत्पथगामी बनाने के लिए सूक्ष्म जगत में काम करने वाली आध्यात्मिक हलचल ही अभीष्ट परिणाम उत्पन्न करने में समर्थ हो सकती है। यही नव-निर्माण का वास्तविक आधार है। अतएव दिव्य प्रेरणा के आधार पर महत्तम गायत्री महापुरश्चरण आरंभ किया गया है और उसमें भागीदारी होने के लिए हर परिजन को प्रोत्साहित किया गया है। न्यूनतम उपासना क्रम एक माला जप इसी प्रयोजन के लिए- विश्व-कल्याण लिए रखा गया है।
प्रथम माला आत्म-निर्माण के लिए जपनी चाहिये और उसके बाद गायत्री चालीसा का एक पाठ करना चाहिये। दूसरी माला युग-निर्माण के लिए जपनी चाहिये और बाद में युग-निर्माण का सत्संकल्प पढ़ना चाहिये। प्रथम माला के साथ गायत्री माता की गोदी में खेलने का ध्यान पिछले लेख में बताया गया है। युग-निर्माण के लिए की जाने वाली दूसरी माला के साथ दीपक पर पतंगों के द्वारा आत्म-बलिदान करने वाला ध्यान है। समाज-कल्याण के लिए हम अपनी सत्ता एवं विभूतियों का समर्पण करें, यह भाव इस ध्यान का है। इसे इस प्रकार करना चाहिये-
‘‘मैं पतंगे की तरह हूँ। इष्टदेव दीपक की तरह। अनन्य प्रेम के कारण द्वैत को समाप्त कर अद्वैत की उपलब्धि के लिए- प्रियतम के साथ एकात्म होता हूँ। जिस प्रकार पतंगा दीपक पर आत्म-समर्पण करता है, अपनी आवश्यकता को मिटा कर प्रकाश पुंज में लीन होता है। उसी प्रकार मैं अपना अस्तित्व, अहंकार को मिटाकर ब्रह्म में- गायत्री तप तत्व में विलीन होता हूँ।’’
‘‘दीपक की ज्योति एक यज्ञ है और मैं उसका हविष्य। अपना अस्तित्व इस यज्ञाग्नि में होम कर मैं स्वयं परम पवित्र तेज पुंज हो रहा हूँ।’’
‘‘अपनी अहंता, ममता और द्विधा मिटा देने के बाद मैं आत्मा की परिधि से ऊंचा उठकर परमात्मा सत्ता के रूप में विकसित होता हूँ। और उसी स्तर की व्यापकता, उदारता, करुणा एवं महानता अपने अन्तरात्मा में धारण करता हूँ।’’
‘‘मैं अपनी समस्त श्रद्धा प्रभु को समर्पण करता हूँ। बदले में वे उतना ज्ञान, विवेक, प्रकाश एवं आनन्द मेरे कण-कण में भर देते हैं। मुझे अपने समान बना लेते हैं। वैसी ही रीति-नीति अपनाने की प्रेरणा एवं तत्परता प्रदान करते हैं।’’
यह ध्यान दीपक पर पतंगे के जलने की तरह आत्मा का परमात्मा में प्रेम विभोर होकर आत्म-समर्पण करने का है। जीव और ब्रह्म के बीच माया की प्रधान बंधन है। वही दोनों को एक दूसरे से पृथक किये हुए है। अहंता, स्वार्थपरता, ममता, संकीर्णता का कलेवर ही जीव की अपनी पृथकता एवं सीमा बांधता है। उसी की ममता में वह ईश्वर को भूलता और आदेशों की उपेक्षा करता है। इस अहंता कलेवर को यदि नष्ट कर दिया जाय तो जीव और ब्रह्म की एकता असंदिग्ध है। ईश्वरीय प्रेम में प्रधान बाधक यह ममता अहंता ही है।
ब्रह्म को दीप ज्योति का और अहंता कलेवर युक्त जीव को पतंगा का प्रतीक माना गया है। पतंगा अपने कलेवर को प्रिय पात्र दीपक में एकीभूत होने के लिये परित्याग करता है। आत्म-समर्पण करता है। कलेवर का उत्सर्ग करता है। अपनी सम्पदा विभूति एवं प्रतिभा को प्रभु की प्रसन्नता के लिये सर्वमेध यज्ञ कर्ता की तरह होम देता है। विश्व-मानव की पूजा प्रसन्नता के लिये साधक का परिपूर्ण समर्पण यही आत्म-यज्ञ है। इसमें अपने को होमने वाला, नरमेध करने वाला, ईश्वरीय सान्निध्य की सर्वोच्च गति को पाता है।
जिस माया मग्नता के कारण ईश्वर और जीव में विरोध था, उसका समर्पण कर देने पर ईश्वरीय अनन्त विभूतियों का अधिकारी साधक बन जाता है और उसे प्रभु का असीम प्यार प्राप्त होता है। बिछुड़ने की वेदना दूर होती है और दोनों से ओत-प्रोत होकर अनिर्वचनीय आनंद का रसास्वादन करते हैं।
इस ध्यान में याचना की नहीं आत्मदान की भावना है। उच्चस्तरीय साधना का यही आधार भी है। निम्न स्तर की प्राथमिकता उपासना में ईश्वर से साँसारिक लाभ अथवा आत्मिक अनुदान माँगे जाते हैं, पर जैसे-जैसे स्तर ऊंचा होता जाता है, साधक माँगने की तुच्छता छोड़ समर्पण की महानता अपनाने के लिए व्याकुल होता है। ध्यान अथवा भावना तक ही उसकी साधना सीमित नहीं रहती वरन् वस्तुतः वह विश्व के लिये, लोक-मंगल के लिये बड़े-से-बड़ा अनुदान देकर अपनी गणना बड़े से बड़े भक्तों में कराने का आत्म-संतोष उपलब्ध करता है। उसका व्यवहार अपने जीवन परिवार एवं समाज के प्रति इतना सज्जनतापूर्ण हो जाता है कि प्रतिक्रिया उसे दैवी वरदान की तरह चारों ओर से पुष्प वर्षा करती हुई परिलक्षित होती है। स्वर्ग सुख यही तो है। अहंता और मनता, वासना और तृष्णा के बन्धनों से मुक्त जीव को मरने पर मुक्ति मिलने की प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती है वह जीवित रहते हुए भी जीवन-मुक्त होता है।
विश्व कल्याण के लिए दूसरी माला उपरोक्त ध्यान के साथ पूरी करते हुए एक पाठ युग-निर्माण सत्संकल्प करना चाहिये।
दोहा- ह्रीं, श्रीं, क्लीं, मेधा, प्रभा, जीवन ज्योति प्रचण्ड। शाँति, क्राँति, जागृति, प्रगति, रचना शक्ति अखंड॥ जगत जननि, मंगल करनी, गायत्री सुखधाम। प्रणवो सावित्री, स्वधा, स्वाहा पूरन काम॥
भूर्भुवः स्वः ॐ युत जननी। गायत्री नित कलिमल दहनी॥ अक्षर चौबीस परम पुनीता। इनमें बसें शास्त्र श्रुति गीता॥ शाश्वत सतोगुणी सत रूपा। सत्य सनातन सुधा अनूपा॥ हंसारूढ़ सितंबर धारी। स्वर्ण काँति शुचि गगन बिहारी॥ पुस्तक, पुष्प कमण्डल माला। शुभ्र वर्ण तनु नयन विशाला॥ ध्यान धरत पुलकित हिय होई। सुख उपजत, दुःख-दुरमति खोई॥ कामधेनु तुम सुर तरु छाया। निराकार की अद्भुत माया॥ तुम्हरी शरण गहै जो कोई। तरै सकल संकट सों सोई॥ सरस्वती लक्ष्मी तुम काली। दिपै तुम्हारी ज्योति निराली॥ तुम्हारी महिमा पार न पावें। जो शायद शत मुख गुण गावें॥ चार वेद की मातु पुनीता। तुम ब्रह्माणी गौरी सीता॥ महामंत्र जितने जग माहीं। कोऊ गायत्री सम नाहीं॥ सुमिरत हिय में ज्ञान प्रकासै। आलस पाप अविद्या नासै॥ सृष्टि बीज जग जननि भवानी। कालरात्रि वरदा कल्याणी॥ ब्रह्मा विष्णु रुद्र सुर जेते। तुम सों पावें सुरता तेते॥ तुम भक्तन की, भक्त तुम्हारे। जननिहिं पुत्र प्राण ते प्यारे॥ महिमा अपरम्परा तुम्हारी। जय जय जय त्रिपदा भय हारी॥ पूरित सकल ज्ञान विज्ञाना। तुम सम अधिक न जग में आना॥ तुमहिं जानि कछु रहै न शेषा। तुमहिं पाय कछु रहै न क्लेशा॥ जानत तुमहिं तुमहिं ह्वै जाई। पारस परसि कुधातु सुहाई॥ तुम्हारी शक्ति दिपै सब ठाईं। माता तुम सब ठौर समाईं॥ ग्रह नक्षत्र ब्रह्माण्ड घनेरे। सब गतिवान तुम्हारे प्रेरे॥ सकल सृष्टि की प्राण विधाता। पालक पोषक नाशक त्राता॥ मातेश्वरी दया व्रत धारी। तुम सन तरे पातकी भारी॥ जापर कृपा तुम्हारी होई। तापर कृपा करें सब कोई॥ मन्द बुद्धि ते बुधि बल पावें। रोगी रोग रहित ह्वै जावें॥ दारिद मिटै कटै सब पीरा। नाशै दुःख हरै भव भीरा॥ गृह क्लेश चित चिन्ता भारी। नासै गायत्री भय हारी॥ सन्तति हीन सुसन्तति पावें। सुख सम्पत्ति युत मोद मनावें॥ भूत पिशाच सबै भय खावें। यम के दूत निकट नहिं आवें॥ जो सधवा सुमिरें चित लाई। अछत सुहाग सदा सुखदाई॥ घर वर सुखप्रद लहैं कुमारी। विधवा रहें सत्य व्रत धारी॥ जयति जयति जगदंब भवानी। तुम सम और दयालु न दानी॥ जो सद्गुरु सों दीक्षा पावें। सो साधन को सफल बनावें॥ सुमिरन करें सुरुचि बड़िभागी। लहैं मनोरथ गृही विरागी॥ अष्ट सिद्धि नव निधि की दाता। सब समर्थ गायत्री माता॥ ऋषि मुनि यती, तपस्वी जोगी। आरत, अर्थी, चिन्तित, भोगी॥ जो जो शरण तुम्हारी आवें। सो सो मन वाँछित फल पावें॥ बल बुधि विद्या शील स्वभाऊ। धन वैभव यश तेज उछाऊ॥ सकल बढ़े उपजें सुख नाना। जो यह पाठ करै धरि ध्याना॥
दोहा- यह चालीसा भक्ति युत, पाठ करे जो कोय। तापर कृपा प्रसन्नता, गायत्री की होय॥
हम आस्तिकता और कर्त्तव्यपरायणता को मानव जीवन का धर्म कर्त्तव्य मानेंगे।
शरीर को भगवान का मन्दिर समझ कर आत्म-संयम और नियमितता द्वारा आरोग्य की रक्षा करेंगे।
मन को जीवन का केन्द्र बिन्दु मान कर उसे सदा स्वच्छ रखेंगे।
कुविचारों और दुर्भावनाओं से इसे बचाये रखने के लिए स्वाध्याय एवं सत्संग की व्यवस्था रखे रहेंगे।
अपने आपको समाज का एक अभिन्न अंग मानेंगे और सबके हित में अपना हित समझेंगे।
व्यक्तिगत स्वार्थ एवं सुख को सामूहिक स्वार्थ एवं सामूहिक हित से अधिक महत्व न देंगे।
नागरिकता, नैतिकता, मानवता, सच्चरित्रता, शिष्टता, उदारता, आत्मीयता, समता, सहिष्णुता, श्रमशीलता जैसे सद्गुणों को सच्ची सम्पत्ति समझ कर इन्हें व्यक्तिगत जीवन में निरन्तर बढ़ाते रहेंगे।
साधना, स्वाध्याय, संयम एवं सेवा कार्यों में आलस्य और प्रमाद न होने देंगे।
चारों ओर मधुरता, स्वच्छता, सादगी एवं सज्जनता का वातावरण उत्पन्न करेंगे।
परम्पराओं की तुलना में विवेक को महत्व देंगे।
अनीति से प्राप्त सफलता की अपेक्षा नीति पर चलते हुए असफलता को शिरोधार्य करेंगे।
मनुष्य के मूल्याँकन की कसौटी उसकी सफलताओं, योग्यताओं एवं विभूतियों को नहीं, उसके सद्विचारों और सत्कर्मों को मानेंगे।
हमारा जीवन स्वार्थ के लिये नहीं, परमार्थ के लिये होगा।
संसार में सत्प्रवृत्तियों के पुण्य प्रसार के लिये अपने समय, प्रभाव, ज्ञान, पुरुषार्थ एवं धन का एक अंश नियमित रूप से लगाते रहेंगे।
दूसरों के साथ वह व्यवहार न करेंगे जो हमें अपने लिए पसंद नहीं।
ईमानदारी और परिश्रम की कमाई ही ग्रहण करेंगे।
पत्नीव्रत धर्म और पतिव्रत धर्म का परिपूर्ण निष्ठा के साथ पालन करेंगे।
‘मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है’ इस विश्वास के आधार पर हमारी मान्यता है कि हम उत्कृष्ट बनेंगे और दूसरों को श्रेष्ठ बनायेंगे तो युग अवश्य बदलेगा।
हमारा युग-निर्माण संकल्प अवश्य पूर्ण होगा।
ब्रह्म संध्या-शुद्धिकरण
ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा। यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यान्तरः शुचिः॥
आचमन
ॐ अमृतोपस्तरणमसि स्वाहा॥1॥ ॐ अमृतापिधानमसि स्वाहा॥2॥ ॐ सत्यं यशः श्रीर्मयि श्रीः श्रयतां स्वाहा॥3॥
शिखा-बंधन
ॐ चिद्रूपिणि महामाये दिव्यतेजः समन्विते। तिष्ठ देवि शिखा मध्ये तेजोवृद्धि कुरुष्व मे।
प्राणायाम
ॐ भूः ॐ भुवः ॐ स्वः ॐ महः ॐ जनः ॐ तपः ॐ सत्यम्। ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्। ॐ आपोज्योतीरसोऽमृतं ब्रह्म भूर्भुवः स्वः।
न्यास
ॐ वांग् में आस्येऽस्तु। मुख को। ॐ नसोर्मेप्राणोऽस्तु। नासिका के दोनों छिद्रों को ॐ अक्ष्णोर्मे चक्षुरस्तु। दोनों नेत्रों को। ॐ कर्णयोर्मे क्षोत्रमस्तु। दोनों कानों को। ॐ वाह् बोर्मे बलमस्तु। दोनों बाहों को। ॐ ऊर्वोर्मेऽओजोस्तु। दोनों जंघाओं को। ॐ अरिष्टानिमेऽंगानि तनूस्तन्वा में सह सन्तु। इससे सब शरीर पर जल छिड़कें।
पृथ्वी पूजन
ॐ पृथ्वि त्वया धृता लोका देवि त्वं विष्णुना धृता। त्वं च धारय मां देवि पवित्रं कुरु चासनम्।
पूजा पद्धति
आवाहन
आयातु वरदे देवि अक्षरे ब्रह्मवादिनो। गायत्रिच्छन्दसां माता ब्रह्मयोनिर्नमोस्तुते॥
आसन
रम्यसुशोभनं दिव्य सर्वसौख्यकरं शुभम्। आसन च मयादत्त गृहाण परमेश्वरि॥
स्नान
गंगा सरस्वती रेवापयोष्णी नर्मदा जलैः। स्नापितासि मया देवि तथा शाँति कुरुष्व मे॥
गंध
श्रीखंडं चन्दनं दिव्यं गन्धाढ्यं सुमनोहरम्। विलेपनं सुरश्रेष्ठे चन्दनं प्रतिगृह्यताम्॥
पुष्प
माल्यादीनि सुगन्धीनि मालत्यादीनि वे प्रभो। मया नीतानि पुष्पाणि गृहाण परमेश्वरि॥
धूप
वनस्पति रसोद्भूतो गंधढ्यो गंध उत्तमः। आघ्रेयः सर्वदेवनां धूपोऽयं प्रति गृह्यताम्॥
दीप
आज्यं च वर्ति संयुक्तं वह्निना योजितं मया। दीपं गृहाण देवेशि त्रैलोक्य तिमिरापहे॥
नैवेद्य
शर्कराघृत संयुक्तं मधुरं स्वादु चोत्तमम्। उपहार समायुक्तं नैवेद्यं प्रतिगृह्यताम्॥
आचमन
सर्वतीर्थ समायुक्तं सुगन्धि निर्मलं जलम्। आचभ्यताँ मया दत्तं गृहित्वा परमेश्वरि॥
अक्षत
अक्षताश्च महादेवि कुँकुमाक्ताः सुशोभिताः। मया निवेदिता भक्त्या गृहाण परमेश्वरि॥
आरती
कदली गर्भसम्भूतं कपूरं च प्रदीपितम्। आरात्रिकमहं कुर्वेपश्च में परदाभव॥
प्रदक्षिणा
यानि कानि च पापानि जन्मान्तर कृतानि च। तानि सर्वाणि नश्यन्तु प्रदक्षिणा पदे पदे॥
विसर्जन
उत्तमे शिखरे जाता भूम्यां पर्वतमूर्धनि। ब्राह्मणेभ्योऽभ्यनुज्ञाता गच्छ देवि यथा सुखम्॥
अर्घ्यदान
ॐ सूर्य सहस्रांशो तेजो राशे जगत्पते। अनुकम्पय मां भक्त्या गृहाणार्घ्यं दिवाकर॥
यदि उपरोक्त मंत्र याद हो सकें तो इनसे ब्रह्म संध्या और पूजा प्रक्रिया सम्पन्न करने में सुविधा रहेगी। यदि उन्हें याद करना कठिन हो तो सारे कार्य केवल गायत्री मंत्र से भी किये जा सकते हैं।
ज्योति अवतरण पुञ्ज साधना एक विशिष्ट उपासना पद्धति है। इसका अनुपम लाभ लेने से किसी को भी नहीं चूकना चाहिये। प्रस्तुत ध्यान साधना के लिये रात्रि का समय ही अधिक उपयुक्त है। यों उसे दिन में भी सुविधानुसार समय पर किया जा सकता है पर रात्रि की नीरवता में जितनी अच्छी तरह इसका सत्परिणाम मिलता है, उतना दिन में नहीं।
इसके लिये चित्र आदि की आवश्यकता नहीं। रात्रि को यदि कभी आँख खुल जाय तो बिस्तर पर पड़े-पड़े भी इसे किया जा सकता है। बैठ कर करनी हो तो दीवार मसंद आदि का सहारा लिया जा सकता है। आरामकुर्सी भी काम में लाई जा सकती है। शरीर को शिथिल, मन को एकाग्र करके सुविधा के समय इस साधना को करना चाहिये। समय कितना लगाना है यह अपनी सुविधा एवं परिस्थिति पर निर्भर है। पर जितना भी समय लगाना हो उसे तीन भागों में विभक्त कर लेना चाहिये। एक तिहाई में स्थूल शरीर, एक तिहाई में सूक्ष्म शरीर और एक तिहाई में कारण शरीर में ज्योति का अवतरण करना चाहिये। अनुमान से या घड़ी की सहायता से यह समय निर्धारित करना चाहिये। यों थोड़ी न्यूनाधिकता रहने से भी कोई हर्ज नहीं होता। पर क्रम ऐसा ही बनाना चाहिये, जिससे शरीर, मन और आत्मा तीनों स्तरों को समुचित प्रकाश मिल सके।
सूक्ष्म जगत में ईश्वरीय दिव्य प्रकाश की प्रेरणापूर्ण किरणें निरंतर बहती रहती हैं। उन्हें श्रद्धा, एकाग्रता और भावनापूर्ण ध्यान करके इस लेख में वर्णित विधि से कोई भी साधक ग्रहण कर सकता है। पर अपने परिवार के लिए इस साधना में संलग्न साधकों के लिये दो-दो घंटे के दो ऐसे समय भी नियुक्त हैं, जिनमें किन्हीं महान दिव्य शक्तियों द्वारा अपना शक्ति प्रवाह भी जोड़ दिया जाता है और उस समय ध्यान करने में विशेष आनन्द आता है और विशेष प्रभाव पड़ता है। यह समय रात्रि को 8 से 10 बजे और प्रातः 3 से 5 बजे का है। इन दोनों अवसरों में से तब जिसे सुविधा हो तब वह अपनी सुविधा के अनुरूप समय निर्धारित कर सकते हैं।
आरंभ में यह समय एक बार में आधा घंटे से अधिक का नहीं होना चाहिये। धीरे-धीरे समय बढ़ा कर एक घंटे तक का किया जा सकता है। रात्रि के पूर्वार्ध और उत्तरार्ध में दोनों बार भी यह साधन किया जा सकता है। तब दो बार में कुल मिलाकर एक घंटे से लेकर दो घंटे तक का यह समय हो सकता है। 24 घंटे में 2 घंटे इसके लिए अधिकतम समय हो सकता है। अधिक तेज के ग्रहण करने और धारण करने में कठिनाई पड़ती है, इसलिये ग्रहण उतना ही करना चाहिये जितना पचाया जा सके। कौन किस समय इस साधना को करे कितनी देर किस प्रकार बैठ कर करे यह निर्धारण करना साधक का अपना काम है। अपनी परिस्थितियों के अनुसार उसे अपनी व्यवस्था स्वयं ही बनानी चाहिये। पर जो क्रम या समय निर्धारित किया जाय, उसे उसी क्रम से चलाना चाहिये। समय और स्थिति का एक ही क्रम चलना किसी भी साधना की सफलता के लिए उचित एवं आवश्यक है।
ज्योति अवतरण साधना इस प्रकार करनी चाहिये-
(1) शरीर को बिल्कुल शिथिल कर देना चाहिये। और ऐसी भावना करनी चाहिये कि अपना मन, शरीर और आत्मा पूर्ण शाँत निश्चिन्त एवं प्रसन्न स्थिति में अवस्थित है। यह भावना पाँच मिनट करने से चित्त में ध्यान के उपर्युक्त शाँति उत्पन्न होने लगती है।
(2) ध्यान कीजिये कि अपने चारों ओर प्रकाश पुञ्ज फैला हुआ है। आगे-पीछे, ऊपर-नीचे सर्वत्र प्रकाश फैल रहा है। भगवती आदिशक्ति की आभा सूर्य मण्डल में से निकल कर सीधी आप तक चली आ रही है और आप उस प्रकाश के घेरे में चारों ओर से घिरे हुए हैं।
(3) यह प्रकाश किरणें धीरे-धीरे आपके शरीर में, त्वचा छिद्रों में प्रवेश करती हुई प्रत्येक अवयव में घुस रही हैं। हृदय, फेफड़े, आमाशय, आंतें, मस्तिष्क, हाथ, पैर आदि अंग उस प्रकाश पुंज को अपने भीतर धारण करके परिपुष्ट हो रहे हैं। जिह्वा, गुह्येन्द्रिय, नेत्र, कान, नाक आदि इन्द्रियाँ इस प्रकार से आलोकित होकर पवित्र बन रही हैं, उनकी असंयम वृत्ति जल रही है। पवित्रता की यह ज्योति शरीर के कण-कण को पवित्र बनाने में संलग्न है।
स्थूल शरीर में रक्त-माँस अस्थि आदि के बने हुए अवयवों के प्रकाश पुंज बनने और उनके परिपुष्ट, पवित्र, स्फूर्तिवान एवं ज्योतिर्मय होने का ध्यान करने के उपरान्त सूक्ष्म शरीर पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिये। सूक्ष्म शरीर का स्थान मस्तिष्क है।
(4) ध्यान करना चाहिये कि मस्तिष्क के भीतर मक्खन जैसे कोमल- बालू के जैसे बिखरे हुए कणों में अगणित प्रकार की मानसिक शक्तियों एवं विचारणाओं के केंद्र छिपे हुए हैं। उन तक आदिशक्ति माता के प्रकाश की धारायें पहुँच रही हैं और वे सभी कण उसके द्वारा रत्नकणों की तरह ज्योतिर्मय होकर जगमगाने लगे हैं।
(5) मन में छिपे हुए अज्ञानांधकार का असंयम, स्वार्थ, मोह, भय और भ्रम-जंजाल का इस प्रकाश के प्रवेश होने से विनाश हो चला और मानसिक संस्थान का कण-कण विवेक, उच्चविचार, सन्तुलन एवं सुरुचि जैसी विभूतियों से जगमगाने लगा। गायत्री माता की इस ज्योति द्वारा अपनी मनोभूमि को महापुरुषों जैसे स्तर की बनाया जा रहा है और हम उस प्रकाश को बड़ी श्रद्धापूर्वक अधिकाधिक मात्रा में मस्तिष्कीय कणों में ग्रहण एवं धारण करते चले जा रहे हैं।
सूक्ष्म शरीर में गायत्री माता के प्रकाश का प्रवेश अनुभव करने के बाद, हृदय स्थान में स्थित कारण शरीर में ज्योति धारणा का ध्यान करना चाहिये। उपनिषद् द्वारा ऋषियों ने अपनी योग-दृष्टि से जीव का स्वरूप अंगूठे की बराबर ज्योर्तिमय आभा के रूप में हृदय स्थान में निवास करता हुआ देखा है। इस आत्मा के छोटे से प्रकाश को भगवती आदिशक्ति का महान प्रकाश रूपी अनुदान मिलने से अपूर्णता के स्थान पर पूर्णता का प्रादुर्भाव होता है।
(6) ध्यान करना चाहिये कि आकाश में अनन्त प्रकाश की आभा अवतरित होकर अपने हृदय स्थान में अवस्थित आत्मा के अंगुष्ठ मात्र प्रकाश पुंज में प्रवेश कर रही है। उसकी सीमाबद्धता, संकीर्णता और तुच्छता दूर कर अपने सदृश बना रही है। लघु और महान का यह मिलन- अणु ज्योति और विभु ज्योति का यह आलिंगन परस्पर महान आदान-प्रदान के रूप में परिणत हो रहा है। जीवात्मा अपनी लघुता परमात्मा को सौंप रहा है और परमात्मा अपनी महानता जीवात्मा को प्रदान कर रहा है। बिछुड़े हुए गौवत्स की तरह दोनों मिल रहे हैं और एकता का दिव्य आनन्द उत्पन्न हो रहा है।
(7) जीवात्मा का लघु प्रकाश परमात्मा के परम प्रकाश से लिपट रहा है और दीपक पर जलने वाले पतंगे की तरह, यज्ञ कुण्ड में पड़ने वाली आहुति की तरह अपने अस्तित्व को होम रहा है। चकोर की तरह इस प्रकाश पुंज को चन्द्रमा मान कर आह्लादित हो रहा है और अनन्त आनन्द का अनुभव कर रहा है।
(8) इस मिलन के फलस्वरूप अन्तःकरण में सद्भावनाओं की हिलोरें उठ रही हैं, आकाँक्षायें आदर्शवादिता एवं उत्कृष्टता से परिपूर्ण हो चली हैं, ईश्वरीय संदेशों और आदर्शों पर चलने की निष्ठा परिपक्व हो रही है। विश्व के कण-कण में परम ब्रह्म को ओत-प्रोत देख कर ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की भावना प्रबल हो रही है और सेवा-धर्म अपना कर ईश्वर-भक्ति का मधुर रसास्वादन करने की उमंग उठ रही है। आत्मा की महिमा के अनुरूप अपनी विचारणा और कार्य पद्धति रखने का निश्चय प्रबल हो रहा है।
(9) अनन्त प्रकाश के आनंदमय समुद्र में स्नान करते आत्मा अपने आपको धन्य एवं कृत्य-कृत्य हुआ अनुभव कर रहा है।
इस संसार में जीवन को सफल बनाने की सबसे बड़ी शक्ति अध्यात्म ही है। उसी के द्वारा मनुष्य अपने को पहिचान सकता है और समस्त प्राणियों को एक ही महाशक्ति का अंश समझ कर उनके साथ अपनत्व का अनुभव कर सकता है। इस तरह की भावना हमारी शक्ति को अनेक गुण बढ़ा सकती है। ‘ज्योति-अवतरण’ की साधना से मनुष्य इस सर्वव्यापी आत्मत्व की वास्तविकता को बहुत कुछ अनुभव कर सकता है और उससे निश्चय ही इहलोक व परलोक में दैवी महानता का अधिकारी बन सकता है।
‘ज्योति अवतरण’ साधना का उद्देश्य आत्मा पर चढ़े मल आवरण और विक्षोभों के कषाय-कल्मषों को हटा कर आन्तरिक स्तर को शुद्ध करना है। जिस प्रकार अग्नि में पड़ कर सोना निर्मल बन जाता है, उसी प्रकार ‘ज्योति अवतरण’ का प्रभाव हर साधक पर यह पड़ेगा ही कि उसके दोष, दुर्गुण जलने लगेंगे और वह अपेक्षाकृत अधिक पवित्र एवं उज्ज्वल बनता चला जायेगा। अग्नि के समीप बैठने से जैसे गर्मी आती है, प्रकाश की समीपता में रहने वाली वस्तुयें भी प्रकाशवान हो जाती हैं, उसी प्रकार इस ‘ज्योति अवतरण’ साधना में साधक का अन्तःकरण क्रमशः अधिकाधिक पवित्र एवं प्रकाशवान बनता चला जाता है।
दैनिक उपासना के लिए पिछले पृष्ठों पर अभी (1) प्रातः 3 से 5 अथवा रात्रि को 8 से 10 बजे के बीच की जाने वाली ‘ज्योति-अवतरण’ की साधना, (2) नित्य पूजन-आत्म-शुद्धि के पाँच विधान- सप्तविधि उपचार अर्चन और एक माला एवं एक चालीसा पाठ आत्मकल्याण के लिए- एक माला सत्संकल्प पाठ युग-निर्माण के लिये करने का प्रकार बताया गया है। मालाओं की संख्या कम भले ही हो पर जप के साथ ध्यान अवश्य जुड़े होने चाहिये। आत्म-कल्याण वाली माला के साथ माता की गोदी में क्रीड़ा-कल्लोल करने और पय-पान करने का और विश्व-कल्याण वाली माला के साथ दीपक पर पतंगे की तरह विश्व-मानव के लिए आतम-समर्पण करने का ध्यान बताया गया है।
मालायें भले ही दो रहें पर यदि उनके साथ यह ध्यान जुड़ा रहेगा तो निस्संदेह उसमें प्रखरता एवं सजीवता उत्पन्न होगी। यह सजीव उपासना हमारे सूक्ष्म, स्थूल और कारण शरीरों को प्रभावित करेगी और जीवन क्रम में ऐसा हेर-फेर उत्पन्न करेगी, जिससे अपने अध्यात्म की अभिवृद्धि का परिचय अपने को और दूसरों को भली प्रकार मिल सकेगा। शरीर में रक्त-माँस बढ़ने का प्रमाण, परिचय अपने को और दूसरों को आसानी से लग जाता है, फिर कोई कारण नहीं कि अन्तरंग में अध्यात्म की अभिवृद्धि से जीवन-क्रम में उत्पन्न हुई दिव्यता का प्रमाण परिचय न मिले। सच्चे उपासक की जीवन सुगंधि हर दिशा को सुवासित करती है।
यह दैनिक उपासना क्रम हुआ। वर्ष में दो बार विशेष तपश्चर्यायें करनी चाहिये। आश्विन और चैत्र की नवरात्रियों के 9-9 दिन विशिष्ट साधना के लिए अति उपयुक्त हैं। जिस प्रकार दिन और रात्रि के मिलन अवसर को संध्याकाल कहते हैं और प्रातः साँय के संध्याकाल में उपासना करना महत्वपूर्ण मानते हैं, उसी प्रकार शीत और ग्रीष्म ऋतुओं के मिलन की यह ऋतु संध्या 9-9 दिन के लिए- नवरात्रि के रूप में- वर्ष में दो-बार आया करती हैं। शरीर और मन के विकारों का निष्कासन- परिशोधन इस अवसर पर बड़ी आसानी से हो सकता है। जिस प्रकार बीज बोने की एक विशेष अवधि आती है और चतुर किसान उन दिनों सतर्कतापूर्वक अपने खेतों में बीज बो देते हैं, उसी प्रकार इन नवरात्रियों में भी कुछ तपश्चर्या की जा सके तो उसके अधिक फलवती होने की संभावना रहती है। स्त्रियों को महीने में जिस प्रकार ऋतुकाल आता है, ‘उसी प्रकार नवरात्रियाँ प्रकृति की भी ऋतुकाल है। इन दिनों यदि आध्यात्मिक बीजारोपण किये जांय तो उनके फलित होने की संभावना निश्चय ही अधिक रहेगी।
आश्विन सुदी प्रतिपदा से लेकर नवमी तक और चैत्र सुदी प्रतिपदा से लेकर नवमी तक 9-9 दिन की दो नवरात्रि होती हैं। एक तीसरी नवरात्रि जेष्ठ सुदी प्रतिपदा से नवमी तक भी होती है। दशमी को गायत्री जयंती होने के कारण यह 9 दिन का पर्व भी मानने और मनाने योग्य है। पर यदि उसकी व्यवस्था न न पड़े तो 6-6 महीने के अन्तर से आने वाली आश्विन और चैत्र की दो नवरात्रियाँ तो तपश्चर्या के लिये नियत रखनी ही चाहिये। तिथियाँ अक्सर घटती-बढ़ती रहती हैं। साधना उस झंझट में नहीं पड़ती।
नवरात्रियों का अर्थ नौ रातें हैं। रातें न कभी घटती हैं, न बढ़ती हैं। इसलिये जिस दिन प्रतिपदा हो- नवरात्रि का आरंभ हो उस दिन से लेकर पूरे नौ दिन इसके लिए नियत रखने चाहिये। 9 वें दिन अपना जप साधना पूरा होने पर चाहें तो उसी दिन अपनी साधनापूर्ण कर सकते हैं अथवा सुविधानुसार एक दिन आगे बढ़ा कर दशमी को दसवें दिन भी अनुष्ठान की पूर्णाहुति रखी जा सकती है। यदि कोई सामूहिक उत्सव आयोजन उस अवसर पर कुछ बड़े रूप में बन पड़े तब तो नवमी और दशमी दो दिन की बात बहुत ही उत्तम है।
आश्विन में दशमी को विजय-दशमी पड़ती है। ज्येष्ठ सुदी दशमी को गंगा जयन्ती अथवा गायत्री जयंती होती है। चैत्र सुदी 9 को राम-नवमी का पर्व है। तब दशमी का तो कोई विशेष पर्व नहीं होता पर जिस प्रकार आश्विन ज्येष्ठ में नवमी को भी कोई पर्व न होने पर भी उस दिन पूर्णाहुति की जाती है, उसी प्रकार चैत्र में उसकी कोई विशेषता न होने पर भी द्विदिवसीय वर्धक्रम में उसे भी सम्मिलित रखा जा सकता है। जहाँ पूूर्णाहुति एक दिन में करनी हो वहाँ नवमी को अथवा दो दिन के सामूहिक कार्यक्रम में नवमी, दशमी दो दिन का आयोजन रखना चाहिये। उसमें भी तिथियों की बटा-बढ़ी को महत्व नहीं देना चाहिये।
नवरात्रियों की नौ दिवसीय साधना 24 सहस्र गायत्री अनुष्ठान के साथ सम्पन्न करनी चाहिये। गायत्री परम सतोगुणी- शरीर और आत्मा में दिव्य तत्वों का- आध्यात्मिक विशेषताओं का अभिवर्धन करने वाली महाशक्ति है। यही आत्म-कल्याण का मार्ग है। हमें यही साधन इन दिनों करना चाहिये। यों कई लोग तमोगुणी रक्त-माँस से सराबोर वध संहार करने वाले देवी देवताओं की भी पूजा उपासना करते हैं। यह ताँत्रिक विधान है। ताँत्रिक प्रयोग मनुष्य में तमोगुणी तत्वों को बढ़ा सकते हैं, उससे कोई साँसारिक प्रयोजन पूरा हो भी सकता है। पर तमोगुण के वातावरण में आत्मिक प्रगति की आशा नहीं की जा सकती। इसलिये श्रेय पथ के पथिकों को गायत्री अनुष्ठान ही नवरात्रियों में करने चाहिये।
24 हजार जप का लघु गायत्री अनुष्ठान होता है। प्रतिदिन 27 माला जप करने से 9 दिन में 240 मालायें अथवा 2400 मंत्र जप पूरा हो जाता है। माला में यों 108 दाने होते हैं पर 8 अशुद्ध उच्चारण अथवा भूल-चूक का हिसाब छोड़ कर गणना 100 की ही की जाती है। इसलिये प्रतिदिन 27 माला का क्रम रखा जाता है। मोटा अनुपात घंटे में 10-11 माला का रहता है। इस प्रकार प्रायः ढ़ाई घण्टे इस जप में लग जाते हैं। प्रातःकाल उतना समय न मिलता हो तो प्रातः सायं दोनों समय मिला कर इस संख्या को पूरा किया जा सकता है। प्रातःकाल स्नान करके बैठना चाहिये और दैनिक पूजा की तरह ही आत्म-शुद्धि के पाँच विधान, पूजा के सात उपचार पूरे करके जप आरंभ कर देना चाहिये। अन्त में सूर्य को अर्घ दान करना चाहिये।
यदि जप प्रातः पूरा नहीं हो सकता है तो सायंकाल उसे पूरा कर लेना चाहिये। ध्यान इतना ही रखना चाहिये कि एक घण्टा रात्रि जाने से पूर्व ही शेष जप पूरा कर लिया जाय। अधिक रात गये मानसिक जप तो हो सकता है पर उसकी गणना अनुष्ठान में नहीं होती है। सायंकाल स्नान की आवश्यकता नहीं। हाथ-मुँह धोकर शेष उपासना की पूर्ति की जा सकती है। अधिक देर बैठने से घुटने दर्द करते हों, तो खड़े होकर भी कुछ जप किया जा सकता है। बीच में पेशाब के लिए उठना पड़े तो फिर हाथ-पैर धोकर बैठना चाहिये और जप आरंभ करने से पूर्व तीन आचमन कर लेने चाहिये। स्त्रियों को यदि बीच में अशुद्धि काल आ जाय तो चार दिन बंद रखें और जितने दिन का जप शेष रहा था, उसे पीछे पूरा कर लें।
इस प्रकार का व्यवधान जब पड़े तो 10 माला उस संदर्भ में अधिक कर लेनी चाहिये। अनुष्ठान के दिनों में यज्ञोपवीत पहनना तो अधिक आवश्यक है। जो पहनते हैं वे आरंभ के दिन नया बदल लें। जो नहीं पहनते उन्हें कम-से-कम 9 दिन के लिए तो पहन ही लेना चाहिये, पीछे न पहनना हो तो उतार भी सकते हैं। जिनकी गोदी में बहुत छोटे बच्चे हैं और साथ सोने के कारण पेशाब टट्टी में अक्सर यज्ञोपवीत गंदा कर सकते हैं, उन्हें छोड़ शेष स्त्रियाँ भी अनुष्ठान के दिनों यज्ञोपवीत पहन सकती हैं। किन्तु यदि परम्परावश जनेऊ न भी पहने तो भी अनुष्ठान तो बिना किसी हिचक के कर सकती है। उपासना क्षेत्र में नर-नारी को एक समान अधिकार है। ईश्वर के लिए पुत्र-पुत्री दोनों समान हैं। यह भेदभाव तो संकीर्ण बुद्धि का अभागा मनुष्य ही करता रहता है।
अनुष्ठान काल में जप तो पूरा करना ही पड़ता है, कुछ विशेष तपश्चर्यायें भी इन दिनों करनी होती हैं, जो इस प्रकार है-
(1) नौ दिन तक पूर्ण ब्रह्मचर्य से रहा जाय। यदि स्वप्न दोष हो जाय तो दस माला प्रायश्चित की अधिक की जाय।
(2) नौ दिन उपवास रखा जाय। उपवास में कई स्तर हो सकते हैं, (अ) फल-दूध पर (ब) शाकाहार, (स) खिचड़ी दलिया आदि राँध कर खायें। आलू, टमाटर, लौकी आदि शाक में नमक भर डालना चाहिये। मसाला इन दिनों छोड़ दिया जाय। बिना नमक या शकर का साधारण भोजन भी एक प्रकार का उपवास ही है। जिनसे जैसा बन पड़े उन्हें अपनी शारीरिक स्थिति के अनुरूप उपवास का क्रम बना लेना चाहिये। फलाहार- शाकाहार दो बार किया जा सकता है। अन्नाहार लेना हो तो एक बार ही लेना चाहिये। सायंकाल दूध आदि लिया जा सकता है। प्रातःकाल खाली पेट जिनसे न रहा जाय, वे दूध, छाछ, नींबू, पानी शरबत जैसी कोई पतली चीज ले सकते हैं।
(3) भूमि शयन, चारपाई का त्याग। पृथ्वी या तख्त पर सोना।
(4) अपनी सेवायें स्वयं करना। हजामत, कपड़े धोना, स्नान आदि दैनिक कार्य बिना दूसरों के श्रम का उपयोग किये स्वयं ही करने चाहिये। भोजन बाजार का बना नहीं खाना चाहिये। स्वयं पकाना संभव हो तो सर्वोत्तम अन्यथा अपनी पत्नी, माता आदि का। घनिष्ठ परिजनों की सेवा ही उसमें ली जा सकती है।
(5) चमड़े की बनी वस्तुओं का त्याग। चूँकि इन दिनों 99 प्रतिशत चमड़ा पशुओं की हत्या करके ही प्राप्त किया जाता है और वह पाप उन चमड़ा उपयोग करने वालों को भी लगता है। इसलिये चमड़े के जूते, पेटी, पट्टे आदि का उपयोग उन दिनों न करके रबड़, कपड़ा आदि के बने जूते, चप्पलों से काम चलाना चाहिये।
यहाँ पाँच नियम अनुष्ठान काल में पालन किये जाने चाहिये। जप का शतांश हवन किया जाना चाहिये। प्रतिदिन हवन करना हो तो 27 आहुतियाँ और अन्त में करना हो तो 240 आहुतियों का हवन करना चाहिये। अच्छा यही है कि अन्त में किया जाय और उसमें घर परिवार के अन्य व्यक्ति भी सम्मिलित कर लिये जांय। यदि एक नगर में कई साधक अनुष्ठान करने वाले हों तो वे सब मिल कर एक सामूहिक बड़ा हवन कर सकते हैं, जिसमें अनुष्ठानकर्ताओं के अतिरिक्त अन्य व्यक्ति भी सम्मिलित हो सकें। हवन में सुगंधित पदार्थ अधिक हों, थोड़ी मात्रा में जौ, तिल, चावल, शकर और घी भी मिलाया जाय। गायत्री हवन पद्धति में सारा विधि विधाएं लिखा है। ध्यानपूर्वक उसे पढ़ने और किसी जानकार की सहायता से समझने पर हवन की पूरी विधि आसानी से सीखी, समझी जा सकती है। उतना न बन पड़े तो भी ताँबे के कुण्ड में अथवा मिट्टी की वेदी बना कर उस पर आम, पीपल, बरगद, शमी, ढाक आदि की लकड़ी चिननी चाहिये और कपूर अथवा घी में डूबी रुई की बत्ती से अग्नि प्रज्वलित कर लेनी चाहिये। सात आहुति केवल घी की देकर इसके उपरान्त हवन आरंभ कर देना चाहिये। आहुतियाँ देने में भी तर्जनी उंगली काम नहीं आती है। अंगूठा, मध्यमा अनामिका का प्रयोग ही जप की तरह हवन में भी किया जाता है। मंत्र सब साथ-साथ बोलें, आहुतियाँ साथ-साथ दें। अन्त में एक स्विष्टकृत आहुति मिठाई की। एक पूर्णाहुति सुपाड़ी, गोला आदि की खड़े होकर। एक आहुति चम्मच से बूँद-बूँद टपका कर वसोधारा की। इसके बाद आरती, भस्म धारण, घृत हाथों से मल कर चेहरे से लगाना, क्षमा-प्रार्थना, साष्टाँग परिक्रमा आदि कृत्य कर लेने चाहिये। इन विधानों के मंत्र में न आते हों तो केवल गायत्री मंत्र का भी हर प्रयोजन में प्रयोग किया जा सकता है। अच्छा तो यही है कि पूरी विधि सीखी जाय और पूर्ण विधान से हवन किया जाय। पर वैसी व्यवस्था न हो तो उपरोक्त प्रकार से संक्षिप्त क्रम भी बनाया जा सकता है।
पूर्णाहुति के बाद प्रसाद वितरण, कन्या भोजन आदि का प्रबंधन अपनी सामर्थ्य अनुसार करना चाहिये। अच्छा तो यह है कि एक दिन या दो दिन का सामूहिक आयोजन किया जाय, जिसमें गायत्री महाशक्ति का स्वरूप और उपयोग संबंधी प्रवचन हों। अधिक लोगों को आमंत्रित, एकत्रित किया जाय और उन्हें भी इस मार्ग पर चलने के लिये प्रेरित किया जाय। अन्त में सत्संकल्प दुहराया जाना हमारे हर धर्मानुष्ठान का आवश्यक अंग होना चाहिये।
जो उपरोक्त अनुष्ठान नहीं कर सकते वे 240 गायत्री चालीसा का पाठ करके अथवा 240 गायत्री मंत्र लिख कर भी सरल अनुष्ठान कर सकते हैं। इसके साथ पाँच प्रतिबंध अनिवार्य नहीं, पर ब्रह्मचर्य आदि नियम जितने कुछ पालन किए जा सकें, उतने ही उत्तम हैं।
अनुष्ठान काल में अक्सर आसुरी शक्तियाँ विघ्न-बाधायें उपस्थित करती रहती हैं। कई भूलें और त्रुटियाँ भी रह जाती हैं। इन विघ्नों का संरक्षण और त्रुटियों का दोष परिमार्जन करते रहने के लिए कोई भी अनुष्ठानकर्ता हमारी सेवाओं का लाभ उठा सकता है। जवाबी पत्र भेज कर नवरात्रि से पूर्व ही गायत्री तपोभूमि मथुरा के पते पर हमें सूचना दी जा सकती है। उनके अनुष्ठान को निर्विघ्न एवं सफलतापूर्वक सम्पन्न कराने के लिये नौ दिन तक संरक्षण परिमार्जन करते रहेंगे।
जो हवन न कर सकते हों उनके बदले का हवन भी गायत्री तपोभूमि की यज्ञशाला में किया जा सकता है। जो अनुष्ठान स्वयं नहीं कर सकते, उनके लिए जप, हवन, तर्पण मर्दन, मुद्रा, अभिषेक, हवन, पूर्णाहुति, कन्या भोज, प्रसाद वितरण आदि समस्त अंग-उपाँगों समेत सर्वांगपूर्ण अनुष्ठान विद्वान कर्मकाँडी ब्राह्मणों द्वारा कराया जा सकता है। जिन्हें ऐसी आवश्यकता हो पत्र द्वारा आवश्यक जानकारी प्राप्त कर लें।
यथासंभव नवरात्रियों में अनुष्ठानों की विशेष तपश्चर्या की व्यवस्था बनानी चाहिये। इससे शरीर और मन में भरे विकारों को परिशोधन करने में बड़ी सहायता मिलती है।
न्यूनतम उपासना प्रक्रिया के अंतर्गत ज्योति-अवतरण ध्यान तथा नित्य पूजा एवं जप का सरल विधान बताया गया है और नवरात्रियों में अनुष्ठानों की तपश्चर्या करते रहने का सुझाव दिया गया है। यह क्रम व्यस्त समय वाले लोगों के लिये भी कुछ कठिन नहीं है। यदि अन्तःकरण में आकाँक्षा जाग पड़े तो प्रातः सोकर उठते ही चारपाई पर पड़े-पड़े आधा घण्टे का ध्यान और नित्य-कर्म के उपरान्त आधा घण्टे की पूजा-प्रक्रिया यह समय अथवा विधान ऐसा नहीं है जिससे कहीं साँसारिक कार्यों में अड़चन पड़ती हो। प्रश्न केवल रुचि और आकाँक्षा का है, यदि मन को जागृत किया जा सके तो जीवनोद्देश्य को पूर्ण करने की दिशा में इतने मात्र से महत्वपूर्ण प्रगति हो सकती है।
नवरात्रियों में कुछ समय तो अधिक लग जाता है और कुछ अड़चनें भी सहनी पड़ती हैं, पर इससे कई-कई गुने कष्ट साँसारिक कार्यों के लिये बार-बार सहने पड़ते हैं, तो आत्म-कल्याण के लिए इतनी अड़चन सह लेना भी कुछ मुश्किल नहीं है। जिनमें निष्ठा है, वे साँसारिक कार्यों का बहुत अधिक दबाव रहने पर भी इतना समय बड़ी आसानी से निकाल लेते हैं। यों उपासना का क्षेत्र बहुत विशाल और व्यापक है। जिनके पास समय है, अभिलाषा है, निष्ठा है, उनके लिए एक से एक महत्वपूर्ण और चमत्कारी साधना-क्रम मौजूद है। उन्हें अपनी मनोभूमि और परिस्थिति के अनुसार मार्गदर्शन प्राप्त करना चाहिये। इस अंक में तो न्यूनतम कार्यक्रम ही प्रस्तुत किया जा रहा है।
जितना महत्व उपासना का है उतना ही साधना का भी है। हमें उपासना पर ही नहीं साधना पर भी ध्यान और जोर देना चाहिये। जीवन को पवित्र और परिष्कृत संयत और सुसंतुलित उत्कृष्ट और आदर्श बनाने के लिए अपने गुण, कर्म, स्वभाव को उच्च स्तरीय बनाने के लिये निरन्तर प्रयत्न करना चाहिये। इस प्रयत्न का नाम ही जीवन-साधना अथवा साधना है। उपासना पूजा को निर्धारित समय का क्रिया-कलाप पूरा कर लेने पर समाप्त हो जाती है, पर साधना चौबीस घण्टे चलानी पड़ती है। अपने हर विचार और हर कार्य पर एक चौकीदार की तरह कड़ी नजर रखनी पड़ती है कि कहीं कुछ अनुचित अनुपयुक्त तो नहीं हो रहा है। जहाँ भूल दिखाई दी कि उसे तुरंत सुधारा- जहाँ विकार पाया कि तुरंत उसकी चिकित्सा की- जहाँ पाप देखा कि तुरन्त उससे लड़ पड़े। यही साधना है। जिस प्रकार सीमा रक्षक प्रहरियों को हर घड़ी शत्रु की चालों और घातों का पता लगाने और जूझने के लिए लैस रहना पड़ता है, वैसे ही जीवन संग्राम के हर मोर्चे पर हमें सतर्क और तत्पर रहने की आवश्यकता पड़ती है। इसी तत्परता को साधना कहा जा सकता है।
यह सोचना ठीक नहीं कि भजन करने मात्र से पाप कट जायेंगे और ईश्वर प्रसन्न हो जायेंगे, अतएव जीवन को शुद्ध बनाने अथवा कुमार्गगामिता से बचने की आवश्यकता नहीं, इसी भ्रमपूर्ण मान्यता ने अध्यात्म के लाभों से हमें वंचित रखा है। यह भ्रम दूर हटाया जाना चाहिये और भारतीय अध्यात्म का तत्वज्ञान एवं ऋषि-अनुभवों के आधार पर यही निष्कर्ष अपनाना चाहिये कि उपासना और साधना आध्यात्मिक प्रगति के दो अविच्छिन्न पहलू हैं। दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। एक के बिना दूसरा अपूर्ण है। जिस तरह अन्न और जल, रात और दिन, शीत और ग्रीष्म, स्त्री और पुरुष जोड़ा है, उसी प्रकार उपासना और साधना भी अन्योन्याश्रित है। एक के बिना दूसरा अकेला असहाय एवं अपूर्ण ही बना रहेगा, इसलिये दोनों को साथ लेकर अध्यात्म मार्ग पर प्रगतिशील होना ही उचित और आवश्यक है।
सच्चे आस्तिक एवं सच्चे ईश्वर भक्त का जीवन-क्रम उत्कृष्ट आदर्शवादी एवं परिष्कृत होना ही चाहिये। नशा पीने पर मस्ती आनी ही चाहिये। भक्ति का प्रभाव सज्जनता और प्रगतिशीलता के रूप में दीखना ही चाहिये। इसलिये हमारी उपासना क्रम साँगोपाँग होना चाहिये और उसमें आत्म-निरीक्षण, आत्म-सुधार, आत्म-निर्माण एवं आत्म-विकास की परिपूर्ण प्रक्रिया जुड़ी ही रहनी चाहिये। उपासना और साधना का स्वतंत्र अस्तित्व हैं। एक को कर लेने से दूसरे की पूर्ति हो जायेगी यह सोचना उचित नहीं। लाखों साधु-बाबा, पंडा-पुजारी भजन ध्यान में नित्य घण्टों समय लगाते हैं पर उनका प्रायः जीवन घृणित एवं निकृष्ट स्तर का बना रहता है।
इससे स्पष्ट है कि उपासना अपने स्थान पर, अपने प्रयोजन के लिए ठीक है, पर वह साधना की आवश्यकता पूरी नहीं कर सकती। यदि कर सकी तो हर भजन करने वाला, उत्कृष्ट चरित्र वाला पाया जाता। पर ऐसा होता कहाँ है? इससे स्पष्ट है कि हमें साधना के लिए पृथक से प्रयत्न करना होगा। जीवन शोधन और जीवन विकास की साधना पद्धति को उतना ही- उससे भी अधिक महत्व देना होगा- जितना कि उपासना को देना है। साधना रहित उपासना विडम्बना मात्र बन कर रह जाती है। किन्तु यदि साधना को सर्वांगपूर्ण बना लिया है- जीवन को उत्कृष्ट बना लिया जाय- तो बिना उपासना के भी अध्यात्म प्रयोजन की पूर्ति हो सकती है।
ईश्वर की भावनात्मक पूजा की तरह ही सद्-आचरण द्वारा भी उपासना की जा सकती है। हम निष्पाप बनें इतना ही पर्याप्त नहीं वरन् यह भी आवश्यक है कि अपने कर्म एवं स्वभाव में सद्गुणों का समुचित समावेश करके दिव्य जीवन बनावें और उसके द्वारा अपना और समस्त समाज का कल्याण करें। व्यक्तित्व को परिष्कृत और विकसित करते हुए ही हम आत्मिक प्रगति के मार्ग पर बढ़ते हैं और पूर्णता का लक्ष्य प्राप्त कर सकने में सफल होते हैं।
अतएव यही सनातन क्रम चला आता है कि हर आध्यात्म-प्रेमी ईश्वर की उपासना के साथ जीवन को उत्कृष्ट बनाने की साधना भी करे। इसके लिये भी एक क्रम विधान है, उसे अगले लेखों में प्रस्तुत किया जा रहा है।
साधना के लिये उपासना की भाँति ही आधे घंटे या कम-से-कम 15 मिनट का समय प्रतिदिन प्रातःकाल निकालना चाहिये। यह सोकर उठते ही चारपाई पर बैठ कर भी पूरा किया जा सकता है। अथवा नित्य-कर्म, पूजा आदि से निवृत्त होकर फिर थोड़ी देर से इस चिन्तन क्रम को पूरा करना चाहिये। अपने कार्यक्रम से ही सबेरे ही इसको भी किसी स्थान पर फिट कर लेना चाहिये। पूजा में ही आगे-पीछे इसे भी मिला सकते हैं। समय और क्रम की बात परिजनों के ऊपर ही छोड़ी जा रही है, ताकि वे एक दो दिन में अपनी सुविधानुसार इसे भी यथावत जमा लें।
यों जीवन साधना का क्रम सारे दिन हर समय चलने का है। पर उसका प्रारंभ, शुभारंभ एक चिन्तन पद्धति के साथ किया जाना चाहिये। इस पद्धति के तीन अंग हैं- (1) जीवन के स्वरूप, उद्देश्य एवं उपयोग को समझना और उसके अनुरूप गतिविधियों का निर्माण करना, (2) ‘हर दिन नया जन्म, हर रात नई मौत’ सूत्र के अनुसार जीवन का श्रेष्ठतम उपयोग करने के लिये दिन भर की शारीरिक कार्य पद्धति एवं मानसिक विचार पद्धति का निर्धारण करना। (3) रात को सोते समय मृत्यु के समय आवश्यक वैराग्य का अनुभव करना। इन तीन चिन्तन क्रम में से दो प्रातः और तीसरे को रात्रि के सोते समय प्रयुक्त करना चाहिये।
वर्ष में जिस दिन अपना जन्म दिवस पड़ता हो, उस दिन उसे समारोहपूर्वक मनाना चाहिये और साथ ही दिन भर मानव-जीवन की महत्ता का अनुभव करते हुए उसके श्रेष्ठतम उपयोग की भावी रीति-नीति निर्धारित करनी चाहिये। वर्तमान क्रिया पद्धति में जो दोष हों उन्हें सुधारना चाहिये और जो नया क्रम दिनचर्या में सम्मिलित हो उसे करना चाहिये। यह बात वर्ष में एक बार जन्म-दिन समारोहपूर्वक मनाने के बारे में हुई। पर उतने से ही काम न चलेगा। हर दिन प्रातःकाल उठते ही बिस्तर पर बैठ कर अपने आपसे इस संदर्भ में तीन प्रश्न पूछने चाहिये और उनके उत्तर भी स्वयं ही उपलब्ध करने चाहिये। पर प्रश्नोत्तर प्रातःकाल जीवन का क्रम आरंभ करते हुए नित्य ही दुहराने चाहिये ताकि जीवन का स्वरूप, उद्देश्य और उपयोग सदा स्मरण बना रहे और उस स्मरण के आधार पर अपनी दिशायें ठीक रखने में भूल-चूक न होने पावे।
अपने आपसे तीन प्रश्न पूछने चाहिये-
(1) भगवान को सभी प्राणी समान रूप से प्रिय पात्र हैं। फिर मनुष्य को ही बोलने, सोचने, लिखने एवं असंख्य सुख, सुविधायें प्राप्त करने का विशेष अनुदान क्यों मिला? मनुष्य को हर दृष्टि से उत्कृष्ट स्तर का प्राणी बनाने में इतना असाधारण श्रम क्यों किया?
उत्तर एक ही हो सकता है- ‘अपने उद्यान- इस संसार को अधिक सुन्दर और सुव्यवस्थित बनाने के लिये परमेश्वर को साथी सहचरों की जरूरत पड़ी और अपनी क्षमताओं से सुसज्जित एक सर्वांगपूर्ण प्राणी- मनुष्य इस प्रयोजन की पूर्ति के लिए बनाया। विशेष साधन सुविधायें इसलिये दीं कि उनके द्वारा वह ईश्वरीय प्रयोजनों की पूर्ति ठीक तरह कर सके।’
(2) दूसरा प्रश्न अपने आपसे पूछना चाहिये कि- ‘जो सुविधायें, विभूतियाँ संपदायें हमें उपलब्ध हैं- उनके लाभ यदि हम अकेले ही उठाते हैं तो इसमें क्या कोई हर्ज है?’
उत्तर एक ही मिलेगा- ‘अन्य प्राणियों के अतिरिक्त जितनी भी बौद्धिक, आर्थिक, प्रतिभायुक्त एवं अन्य किसी प्रकार की विशेषतायें हैं, वे विश्व मानव की ही पवित्र अमानत हैं और इनका उपयोग लोक-मंगल के लिये ही किया जाना चाहिये। शरीर रक्षा भर के आवश्यक उपकरण के अतिरिक्त इन साधनों का विश्व-कल्याण के लिए ही उपयोग किया जाय।’
(3) तीसरा प्रश्न अपने आपसे करना चाहिये कि- ‘क्या इस सुरदुर्लभ मानव शरीर का सही सदुपयोग हो रहा है?’
उत्तर यही मिलेगा- ‘हम सदाचारी, संयमी, परिश्रमी, उदार, सज्जन, हंसमुख, सेवाभावी बने बिना मानव जीवन को सार्थक नहीं बना सकते। इसलिये इन सद्गुणों का अभ्यास बढ़ाने के लिए जीवनयापन की रीति-नीति में उत्कृष्टता और आदर्शवादिता का, सभ्यता और सज्जनता का पुरुषार्थ और साहस का समुचित समावेश करना चाहिये।’
इन्हीं प्रश्नोत्तरों में अध्यात्म तत्वज्ञान का सारा सन्निहित है। यदि यह प्रश्न जीवन की महान समस्या के रूप में सामने आयें और उन्हें सुलझाने के लिए हम अपने पूरे विवेक का उपयोग करें तो भावी जीवन यापन के लिए एक व्यवस्थित दर्शन और कार्यक्रम सामने आ खड़ा होगा। यदि इस तत्वज्ञान को ठीक तरह हृदयंगम किया जा सका तो आकाँक्षाओं और कामनाओं का स्वरूप बदला हुआ होगा। रीति-नीति और कार्य पद्धति में वैसा परिवर्तन-परिलक्षित होगा जैसे आत्म-ज्ञान सम्पन्न मनुष्य में प्रत्यक्षतः दृष्टिगोचर होना चाहिये।
(2) इसके बाद- ‘हर दिन नया जन्म-हर रात नई मौत।’ इस सूत्र को मन-ही-मन दुहराना चाहिये और भावना करनी चाहिये कि आज का दिन हमें एक नये जन्म के रूप में मिला है। वस्तुतः निद्रा और जागरण- मृत्यु और जन्म का ही एक छोटा नमूना है। उसमें असत्य भी कुछ नहीं। सचमुच की मृत्यु भी एक लंबी रात की गहरी नींद मात्र है। हर दिन को एक जन्म कहा जाय तो ऊपर से ही हंसी की बात लगती है, वस्तुतः वह एक स्थिर सचाई है। अतएव इस मान्यता में अत्युक्ति और निराधार कल्पना जैसी भी कोई बात नहीं है।
आज का नया जन्म अपने लिये एक अनमोल अवसर है। कहते हैं कि चौरासी लाख योनियों के बाद एक बार मनुष्य शरीर मिलता है, उसका सदुपयोग कर लेना ही शास्त्रकारों ने सबसे बड़ी बुद्धिमता मानी है। अस्तु हमें प्रातःकाल चारपाई पर पड़े-पड़े ही विचारना चाहिये कि आज का दिन अनमोल अवसर है, उसे अधिक से अधिक उत्कृष्टता के साथ व्यतीत करना चाहिये। कोई भूल, उपेक्षा, अनीति, दुर्बुद्धि उसमें न रहे। आदर्शवादिता का, सद्भावना और सदाशयता का उसमें अधिकाधिक समावेश रहे, ऐसा दिन भर का कार्यक्रम बना कर तैयार किया जाय।
आमतौर से आलस्य, ढील-पोल, शिथिलता में हमारा अधिक से अधिक समय बर्बाद होता है। तत्परता स्फूर्ति, परिश्रम और दिलचस्पी के साथ करने पर जो कार्य एक घण्टे में हो सकता है, उसी को अधिकतर लोग दो-दो, चार-चार घंटे में पूरा करते हैं। आलस्य, अधूरा मन, मन्दगति, रुक-रुक कर शिथिलतापूर्वक काम करने में- और ऐसे वैसे-ज्यों-त्यों-बेकार बहुत-सा समय गुजार देने की आदत बहुतों की होती है और उनका आधा जीवन प्रायः इस आलस्य प्रमाद में ही बर्बाद हो जाती है। यह बुरी आदत संभव है, थोड़ी बहुत मात्रा में अपने भीतर भी हो, उसे बारीकी से तलाश करना चाहिये और निश्चय करना चाहिये कि आज हर काम पूरी तत्परता और फौजी उत्साह के साथ करेंगे। समय ही जीवन है। वही ईश्वर प्रदत्त हमारी एक मात्र सम्पत्ति है। समय का सदुपयोग करके ही हम अभीष्ट आकाँक्षापूर्ण करने और मंगलमयी उपलब्धियाँ प्राप्त कर सकने में सफल हो सकते हैं। समय की बर्बादी एक प्रकार की मन्द आत्म-हत्या है। संसार में जितने भी महापुरुष हुए हैं, उनमें से प्रत्येक ने अपने समय का एक-एक क्षण ठीक तरह उपयोग करके ही अभीष्ट सफलतायें प्राप्त की हैं। इसलिये आज समय के सदुपयोग की, एक पल भी बर्बाद न होने की, आलस्य शिथिलता एवं अन्यमनस्कता से लड़ने की पूरी तैयारी करनी चाहिये और दिन भर के समय विभाजन की दिनचर्या ऐसी बननी चाहिए जिसमें वक्त की बर्बादी के लिए तनिक भी गुँजाइश न रहे। जो आवश्यक काम पिछले कई दिनों से टलते चले रहे हों, जिनकी उपयोगिता अधिक हो, उन सबको सुविधा हो तो आज ही करने के लिए नियत कर लेने चाहिये। दिनचर्या ऐसी बने जो सुविधाजनक भी हो और सुसंतुलित भी। अति उत्साह से ऐसा कार्यक्रम न बना लिया जाय जिसको पूरा कर सकना ही कठिन पड़ जाय।
शारीरिक कार्यक्रमों के साथ-साथ मानसिक क्रिया पद्धति भी निर्धारित करनी चाहिये। किस कार्य को किस भावना के साथ करना है, इसकी रूपरेखा मस्तिष्क में पहले से ही निश्चित रहनी चाहिये। समय-समय पर बड़े ओछे-संकीर्ण, स्वार्थपूर्ण हेय विचार मन में उठते रहते हैं। सोचना चाहिये कि आज किस अवसर पर किस प्रकार का अनुपयुक्त विचार उठने की संभावना है, उस अवसर के लिये विरोधी विचारों के शस्त्र पहले से ही तैयार कर लिये जांय।
आरंभ में बुरे विचारों को उठने से रोक सकना कठिन है। हाँ जब वे उठें तो उन्हें, ठीक विरोधी विचार धारा पैदा करके काटा जा सकता है। लोहे से लोहा कटता है, विचारों से विचार भी काटे जा सकते हैं। कामुकता के अश्लील विचार यदि किसी नारी के प्रति उठ रहे हैं, तो उसे अपनी बेटी, बहिन, भानजी आदि के रिश्ते में सोचने की- सफेद चमड़ी के भीतर मल-मूत्र रक्त-माँस की घृणित दुर्गंध भरी होने की- कल्पना करके उनको शमन किया जा सकता है। आवेश, उत्तेजना, क्रोध, उतावली की बुरी आदतें कइयों की होती हैं। जब वैसे अवसर आयें तब गंभीरता, धैर्य, दूरदर्शिता, सज्जनता, शांति जैसे विचार अपने में उस समय तत्काल उठाने की तैयारी करनी चाहिये।
दिन भर के समय विभाजन तथा विचार संघर्ष की योजना बनानी चाहिये और ऐसी दिनचर्या तैयार करनी चाहिये, जिसमें शरीर से ठीक तरह कर्त्तव्य पालन और मन में ठीक तरह सद्भाव चिन्तन होता रहे। इस कार्य के लिए पन्द्रह मिनट से लेकर आधा घण्टे का समय पर्याप्त होना चाहिये। उस निर्धारित दिनचर्या को कागज पर नोट कर लेना चाहिये और समय-समय पर जाँचते रहना चाहिये कि निर्धारण के अनुरूप कार्यक्रम चल रहा है या नहीं? जहाँ भी चूक होती हो वहीं उसे तुरन्त सुधारना चाहिए। यदि सतर्कतापूर्वक दिनचर्या के पालन का ध्यान रखा जाय, शारीरिक आलस्य और मानसिक प्रमाद से पग-पग पर लड़ते रहा जाय तो प्रातःकाल की निर्धारित योजना रात को सोते समय तक ठीक ही चलती रहेगी।
इस प्रकार हर दिन नया जन्म वाले मंत्र का आधा भाग रात को सोते समय तक पूरा होते रहना चाहिए। हर घड़ी अपने को सतर्क, सक्रिय, जागरूक रखा जाय, चूकों को बचाने के लिए सतर्क रहा जाय- उत्कृष्टता का जीवन में अधिकाधिक समावेश करने के लिए प्रयत्न किया जाय- तो निस्सन्देह वह दिन पिछले अन्य दिनों की अपेक्षा अधिक सन्तोषप्रद, अधिक गौरवास्पद होगा। इस प्रकार हर दिन पिछले दिन को तुलना में अपेक्षाकृत अधिक आदर्श बनता चला जायेगा और कर्मयोग के तत्व दर्शन में हमारी जीवन पद्धति ढलती चली जायेगी।
(3) अब मंत्र का आधा भाग प्रयुक्त करने का अवसर आता है- ‘हर रात नई मौत’ इस भावना को रात्रि में सोते समय प्रयुक्त करना चाहिए। सब कामों में निवृत्त होकर जब निद्रा देवी की गोद में जाने की घड़ी आये। तब कल्पना करनी चाहिये कि- ‘एक सुन्दरी नाटक का अब पटाक्षेप हो चला। यह संसार एक नाट्यशाला है। आज का दिन अपने को अभिनय करने के लिए मिला था, सो उसको अच्छी तरह खेलने का ईमानदारी से प्रयत्न किया। जो भूलें रह गईं उन्हें याद रखेंगे और अगले दिन वैसी पुनरावृत्ति न होने देने की अधिक सावधानी बरतेंगे।’
‘अनेक वस्तुयें इस अभिनय में प्रयोग करने को मिलीं। अनेक साथियों का साथ रहा। उनका सान्निध्य एवं उपयोग जितना आवश्यक था कर लिया गया, अब उन्हें यथा समय छोड़ कर पूर्ण शाँति के साथ अपनी आश्रयदात्री माता निद्रा- मृत्यु की- गोद में निश्चिंत होकर शयन करते हैं।’
इस भावना में वैराग्य का अभ्यास है। अनासक्ति का प्रयोग है। उपलब्ध वस्तुओं में से एक ही अपनी नहीं, साथी व्यक्तियों में से एक भी अपना नहीं। वे सब अपने परमेश्वर के और अपने कर्त्तव्य की उपज हैं। हमारा न किसी पर अधिकार है, न स्वामित्व। हर पदार्थ और हर प्राणी के साथ कर्त्तव्य बुद्धि से ठीक व्यवहार कर लिया जाय, यही अपने लिए उचित है। इससे अधिक मोह, ममता के बंधन बाँधना- स्वामित्व और अधिकार की अहंता जोड़ना- निरर्थक है। अपना तो यह शरीर भी नहीं- कल परसों इसे धूलि बन कर उड़ जाना है- तब जो संपदा, प्रयोग-सामग्री, पद, परिस्थिति, उपलब्ध है उस पर अपना स्वामित्व जमाने का क्या हक? अनेक प्राणी सृष्टि के आदि से लेकर अब तक अपने कर्म भोगों को भुगतने अनेकों के साथ आये दिन संयोग-वियोग करते रहते हैं। अपने साथ भी आज कितने ही प्राणी एक सज्जन साथी की तरह रहे हैं, इनके लिए कर्त्तव्य धर्म का ठीक तरह पालन किया जाय इतना ही पर्याप्त है। उनसे आवश्यक ममता जोड़कर ऐसा कुछ न किया जाय जिससे अनुचित पाप कर्मों में संलग्न होना पड़े।
यह विवेक हमें रात को सोते समय जागृत करना चाहिए और अनुभव करना चाहिए कि अहंता और ममता के बंधन तोड़ कर एकात्म भाव से भगवान की मंगलमय गोदी- निद्रा मृत्यु में परम शाँति और सन्तोषपूर्वक निमग्न हुआ जा रहा है।
इस प्रकार की मनोवृत्ति का विकास होने से जीवन के अनेक क्षेत्रों में प्रगति होने की संभावना रहती है और अन्त में मानव-जन्म की सार्थकता उपलब्ध हो सकती है। इस प्रकार की भावना बनी रहने से मनुष्य माया-मोह के हानिकारक बंधनों से अधिकाँश में विमुक्त रहता है और आत्मोद्धार का वास्तविक लक्ष्य उसकी दृष्टि से ओझल नहीं होने पाता। इस प्रकार जो साधक जीवन के वास्तविक रहस्य को हस्तगत कर लेता है, उसको फिर व्यर्थ के जंजाल में नहीं फंसना पड़ता।
किसी दिन सचमुच ही मृत्यु आ जाय तो इन परिपक्व वैराग्य भावनाओं के आधार पर बिना भय और उद्वेग के शाँतिपूर्वक विदा होते हुए- मरणोत्तर जीवन में परम शाँति का अधिकारी बना जा सकता। यह भावना लोभ और मोह की जड़ काटती है। कुकर्म प्रायः इन्हीं दो आन्तरिक दुर्बलताओं के कारण बन पड़ते हैं। हर रात को एक मृत्यु मानने से जीवन में आदर्शवादिता एवं उत्कृष्टता का समावेश करने की प्रेरणा मिलती है। यही प्रेरणा कर्मयोग की आधार शिला है।
हममें से प्रत्येक को ‘हर दिन नया जन्म-हर रात नई मौत’ के भाव-मंत्र की साधना करनी चाहिए। इससे स्थूल शरीर में कर्मयोग का समावेश इस क्षेत्र में होगा और देवत्व के जागरण की एक महती आवश्यकता को पूरा करने का सरल मार्ग उपलब्ध होगा।
मानव-जीवन ईश्वर की एक अनमोल अमानत है। इसे आदर्श एवं उत्कृष्ट बनाना ही अपनी बुद्धिमता और दूरदर्शिता का परिचय देना है। भगवान ने हमारी पात्रता की कसौटी के रूप में यह मनुष्य शरीर दिया है और यह परखा है कि हम इसका उत्तरदायित्व संभालने की स्थिति में हैं या नहीं? यदि इस कसौटी पर खरे उतरे तो ऋषित्व एवं देवत्व जैसे उच्च उत्तरदायित्व प्रदान कर अन्ततः अपना ही अंग बना लेता है, पर यदि मनुष्यत्व जैसी परीक्षा में सफल न हो सके, इतना छोटा उत्तरदायित्व भी संभाल न सके तो जिस स्तर के हम हैं उसी निम्न योनि में पड़े रहने के लिये वापिस भेज देता है। गैर जिम्मेदार सरकारी कर्मचारी ‘रिबर्ट’ कर छोटे पदों पर उतार दिये जाते हैं। हमें भी अपनी निकृष्ट मनोभूमि के अनुरूप निम्न योनियों में उतरना पड़ सकता है।
अस्तु प्रयत्न यह होना चाहिये कि मानव-जीवन महान उत्तरदायित्व को वहन करने के लिये हम पग-पग पर सतर्कता बरतें। निम्न योनियों के संचित कुसंस्कारों को हटायें और मानवोचित गुण कर्म स्वभाव की- सद्भावनाओं और सत्प्रवृत्तियों की अभिवृद्धि करें। यह प्रयत्न तभी सफल हो सकता है जब हर घड़ी अपने आपके ऊपर चौकसी रखी जाय। अपने संबंध में असावधान रहने से- उसी ढर्रे पर अपनी गाड़ी भी लुढ़कने लगती है, जिससे आस-पास घिरे हुए निकम्मे लोगों का जीवन फूहड़पन के साथ बर्बाद होता चला जा रहा है। आवश्यकता ऐसी विवेकशीलता की है, जो अपने संबंध में सतर्कता बरतने और दूसरे गंदे लोगों का अनुकरण न करके अपना मार्ग स्वतः निर्धारण करने का साहस प्रदान कर सके।
ऐसा साहस ही अध्यात्म है- जो आदर्श जीवन जीने की गतिविधियों का निर्माण करे और उसी रास्ते पर साहसपूर्वक घसीट ले चले। जिन लोगों के बीच हमारा रहना है उनमें से अधिकाँश बड़े स्वार्थी, संकीर्ण, ओछे गंदे लोग हैं, इनकी कोशिश अपने ही ढर्रे पर साथियों को भी घसीट ले चलने की होती है। वे उत्कृष्ट जीवन जीने वालों का मजाक बनाते हैं। निन्दा और विरोध करते हैं और तरह-तरह की अड़चनें खड़ी करते हैं। जो इनसे डर गया वह गन्दा जीवन जीने के लिए विवश होगा पर जिसने साहस करके अपना पथ स्वयं निर्धारण करने का संकल्प कर लिया और पड़ोसियों की उपेक्षा करके उत्कृष्टता गतिविधियाँ अपनाने के लिये दृढ़तापूर्वक चल पड़ा वही जीवनोद्देश्य की प्राप्ति में सफल होता है। अध्यात्म साहसी शूरवीरों का- आदर्शवादी और उत्कृष्ट लोगों का मार्ग है।
देवी-देवताओं को मंत्र-तंत्र से सिखा कर उनसे तरह-तरह की मनोकामनायें सहज ही प्राप्त कर लेने के सपने देखने वाले, थोड़ी-सी टंट-घंट के बदले स्वर्ग मुक्ति लूट ले जाने लेने वाले धूर्त, अपना मन सस्ते सपने देखने में बहलाते रह सकते हैं, पर रहना उन्हें खाली हाथ ही पड़ता है। जो जीवन-शोधन का पुरुषार्थ कर सकने का साहस नहीं कर सकते, उन्हें आत्मिक प्रगति, ईश्वर की प्रसन्नता और उन दिव्य विभूतियों की आशा नहीं करनी चाहिये, जिन्हें पाकर मनुष्य-जीवन धन्य और सार्थक बनता है। कीमती वस्तुयें उचित मूल्य देकर ही खरीदी जा सकती है। अध्यात्मिक विभूतियाँ और देवी संपदायें जीवन-शोधन से कम मूल्य पर आज तक न कोई खरीद सका है और न भविष्य में कोई खरीद सकेगा। सस्ते मूल्य पर आत्मिक सफलतायें मिलने के प्रलोभन विडम्बना भरे हैं। उनसे हर विवेकशील को अपना पिण्ड शीघ्र ही छुड़ा लेना चाहिए और साहसपूर्वक जीवन-शोधन के उस राज-मार्ग पर चल पड़ना चाहिये, जिस पर चले बिना कल्याण का लक्ष्य प्राप्त कर सकता किसी के लिये भी संभव नहीं हो सकता।
यह कार्य एक निर्धारित समय पर थोड़ी पूजा-उपासना जैसी प्रक्रिया अपना कर सम्पन्न नहीं किया जा सकता। हर घड़ी आत्म-निरीक्षण की दृष्टि अपने ऊपर रखने से ही यह प्रयोजन सिद्ध होता है। साधना के प्रथम चरण में अपने शरीर और मन पर- कार्य और विचारों पर बारीकी से तीखी नजर रख कर यह देखना होता है कि मनुष्यता के गौरव को गिराने वाले- पशु-स्तर के- कुसंस्कार अपने में कितने समाये हुए हैं? गुण, कर्म, स्वभाव में किन पशु प्रवृत्तियों का समावेश है? उन्हें धीरे-धीरे, एक-एक करके छोड़ने का संकल्प करना चाहिये। अपने कुसंस्कारों से लड़ना चाहिये। उनकी हानियों पर विचार करना चाहिये। और एक-एक करके अपने दोष, दुर्गुणों को छोड़ते चलना चाहिये।
आहार-बिहार संबंधी कितनी ही कुटेवें अपने अन्दर हो सकती हैं। नशे, व्यसन, व्यभिचार, आलस्य, कटु-भाषण, क्रोध, आवेश, असंयम, मलीनता, लापरवाही, आशंका, चिन्ता, भय, कायरता, निराशा, उच्छृंखलता जैसे छोटे-मोटे स्वभाव जन्म दोष ऐसे होते हैं, जो देखने में मामूली से लगते हैं, पर प्रगति के पथ पर भारी अवरोध उत्पन्न करते हैं। चोरी, हत्या, धोखा, बेईमानी, बलात्कार जैसे बड़े पाप तो कोई विरले ही करते हैं, उनके लिए कानून में दंड व्यवस्था भी है पर छोटे दुर्गुणों की ओर कोई ध्यान नहीं दिया जाता। असल में पतन की जड़ यही होते हैं और आगे चल कर उन्हीं की वृद्धि होती चलने से व्यक्ति क्रूर-कुकर्मी, नर-पिशाच बन जाता है। इसलिये इन विष वृक्षों के छोटे-मोटे पौधे भी अपने जीवन क्षेत्र में उग रहे हों तो उन्हें एक एक करके उखाड़ फेंकते चलने के लिये कटिबद्ध हो जाना चाहिये। अपने दैनिक क्रिया-कलापों और उनके साथ जुड़े हुए विचारों एवं उद्देश्यों को परखते रहना चाहिये कि निकृष्ट स्तर के- नर-पशुओं के- स्तर पर तो नहीं चल रहे हैं। यदि इनमें दोष पाये जांय तो तुरंत उसके स्थान पर सुधरी हुई रूप-रेखा उपस्थित करनी चाहिये और दोष के स्थान पर गुण को- अनुपयुक्त के स्थान पर उपयुक्त को- प्रतिष्ठित करना चाहिये। जो गलत किया जा रहा है, उसके स्थान पर सही क्या हो सकता है, यह निर्णय करने के लिये पक्षपात रहित विवेक की आवश्यकता है।
आम-तौर से हर मनुष्य अपने साथ रियासत और पक्षपात करता है। यह भूल सुधारनी चाहिये। जैसे गलत विचार या गलत काम अपने हैं, यदि वैसे ही कोई दूसरा करे और पूछने आवे कि मुझे इन्हें कैसे छोड़ना चाहिये? और इनके स्थान पर क्या रीति-नीति अपनानी चाहिये? तो इसके उत्तर में हम निश्चय ही बहुत कुछ उपदेश और परामर्श दे सकते हैं। वही उपदेश और परामर्श अपने को देना चाहिये। अपने भीतर एक नया न्यायाधीश, उपदेशक, गुरु, भगवान विकसित कर लेना चाहिये। वही अपना सुधार और मार्ग-दर्शन कर सकता है। इसी के परामर्श पर चलना चाहिये। एक-एक करके इसी प्रकार अपने दोष दुर्गुणों का अन्त होगा। आत्म-शोधन को एक महान साधन मान कर उसमें निरन्तर संलग्न रहने से ही हम निर्मल, निर्दोष, निष्पाप और निष्पक्ष, सद्विवेक महामानव बन सकेंगे। आध्यात्मिक प्रगति के लिये यही राज-मार्ग है।
जीवन-साधना का दूसरा चरण अपने भीतर सद्गुणों का, उत्कृष्टताओं, योग्यताओं और क्षमताओं का विकसित करना है। असत्य, हिंसा, चोरी, व्यभिचार, नशा आदि दुर्गुणों को छोड़ देना ऐसा ही है, जैसे किसी पौधे की जड़ को काटने में लगी हुई दीमक को हटा देना। इससे एक कठिनाई तो दूर हुई पर पौधे के विकास का पथ प्रशस्त कहाँ हुआ? उसके लिए खाद-पानी की उपयुक्त आवश्यकतायें भी पूरी करनी होंगी। अन्यथा बेचारा पौधा बढ़ेगा कैसे? मानवोचित योग्यता और विशेषताओं को बढ़ाने में उस शक्ति को लगा देना चाहिये जो दोष दुर्गुणों में बर्बाद होने से बचाई गई है। बहुत-सा समय मनोयोग और धन बेकार बातों में नष्ट किया जाता रहता है। उस बर्बादी को बचा लेना ही काफी नहीं वरन् यह भी आवश्यक है कि उस बचत से अपनी विशेषताओं को बढ़ाया जाय। रोग दूर करने के लिए चिकित्सा, उपचार करना चाहिये पर यह भी ध्यान रखना चाहिये कि रोग जन्य दुर्बलता दूर करने के लिए पौष्टिक आहार-बिहार का भी प्रबंध किया जाय। दोषों को हटा देना औषधि उपचार की तरह है। गुणों का अभिवर्धन उत्तम आहार-बिहार का प्रबंध करने की तरह।
अपनी शारीरिक और आत्मिक क्षमतायें बढ़ाना जीवन साधना के अनिवार्य अंग हैं। आहार बिहार का संयम किये बिना- ब्रह्मचर्य, व्यायाम, स्वच्छता, विश्राम, सात्विक आहार का ध्यान रखे बिना शारीरिक स्वस्थता को स्थिर नहीं रखा जा सकता है, इसलिए इन बातों पर पूरा ध्यान देना चाहिये। आलस्य को सबसे बड़ा शत्रु मानना चाहिये। समय के एक-एक क्षण का सदुपयोग करना चाहिये। बेकार कभी भी नहीं बैठना चाहिये। दिनचर्या ऐसी बनानी चाहिए, जिसमें समय की बर्बादी के लिए तनिक भी गुँजाइश न रहे।
मानसिक स्वरूप की रक्षा के लिए चिन्ता, निराशा, आशंका, भय, क्रोध, आवेश, ईर्ष्या, द्वेष, जैसे मनोविकारों से बचना आवश्यक है। कामुकता भरी कल्पनायें अति घातक हैं। उनसे मस्तिष्क की सारी पवित्रता नष्ट हो जाती है। संतानोत्पादन की आवश्यकता समझ में आ सकती है पर अश्लील विचारों का मस्तिष्क में घुमाते रहना और बहुमूल्य मनोयोग को किसी रचनात्मक चिन्तन में लगाने की अपेक्षा इन बे-सिर-पैर की बातों में नष्ट करना सर्वथा अवाँछनीय है। इसी प्रकार उपरोक्त अन्य मनोविकार भी मस्तिष्क की सारी सृजनात्मक क्षमता को अपने ही जंजालों में उलझाए रह कर उसे नट करते रहते हैं। इतना ही नहीं वरन् मानस क्षेत्र को विषैला कर उसे इतना दुर्बल बना देते हैं कि किसी महत्वपूर्ण योजना को बनाने और उसे ठीक तरह चलाने की क्षमता ही नहीं बनती है।
अतएव मनोविकारों ने यदि मस्तिष्क में अड्डा जमा लिया हो तो सफाई करने के लिए तत्पर होना ही चाहिए। उत्साह, धैर्य, साहस, संतुलन, विनोद, संतोष, परिश्रम, संयम जैसे सद्गुणों को विकसित करना चाहिए। जीवन हल्का-फुलका होना चाहिए। हंसते-खेलते हल्के मन से सारे काम करने चाहिए। हर काम जिम्मेदारी और तत्परता से करना चाहिए पर मस्तिष्क पर उसका दबाव और तनाव जरा भी नहीं पड़ने देना चाहिये। जीवन एक खेल की तरह जानना चाहिये। प्रतिकूल परिस्थितियाँ, हानियाँ एवं आशंकाओं को मस्तिष्क पर हावी नहीं होने चाहिये। जो हंसी-खुशी की हल्की-फुल्की जिन्दगी जी सकता है वही जीना जानता है। भारी लाभ की तरह जिन्दगी की गाड़ी रोते, कलपते खींचने वाले अविवेकियों की तरह नहीं। हमें दृष्टा और साक्षी की तरह हंसी-खुशी भरा जीवन जीना चाहिये। पाप और कुविचारों को मस्तिष्क में प्रविष्ट नहीं होने देना चाहिये। तृष्णा और वासना की लानत को नहीं ओढ़ना चाहिये। यह दोनों ही चुड़ैल ऐसी हैं जो बेशकीमती जिन्दगी को अपने ही कुचक्र में फंसा कर नष्ट कर देती हैं। हमें संतोषी होना चाहिये संग्रही नहीं। कामुकता, धन-संचय और वाहवाही लूटने की विडम्बनायें बाल-बुद्धि की प्रतीक है। इन बचकानी बातों में अपनी शक्तियाँ नष्ट होने से से बचा कर उन कार्यों में लगानी चाहिये जो आत्म-कल्याण और विश्वकल्याण के महान प्रयोजनों को पूरा करने के लिये आवश्यक हैं।
स्वाध्याय नित्य करना चाहिये। जीवन-निर्माण के लिए उपयुक्त सत्साहित्य नित्य पढ़ना चाहिये। मस्तिष्क पर सारे संसार में फैले हुए अनुपयुक्त वातावरण की छाप अनायास ही पड़ती रहती है। इस मलीनता को रोज स्वच्छ करने के लिए स्वाध्याय तथा सत्संग ही एक मात्र उपाय है। इस जमाने में सत्संग के नाम पर भ्रम-जंजाल में भटका देने वाले साधु बाबाओं और कथा-वाचकों की ऐसी माया फैली पड़ी है जो सीधे रास्ते पर चलने वाले को उल्टा भटका दे। अब सत्संग भी लगभग असंभव है क्योंकि विचारशील व्यस्त रहते हैं और जिनके पास समय है, वे उल्टे भ्रम में डालते हैं। सामाजिक विचारशील और चरित्रवान लोगों का सत्संग उनके साहित्य से ही मिल सकता है। युग-निर्माण योजना द्वारा प्रस्तुत सत्-साहित्य ही हमारी स्वाध्याय की आवश्यकता को पूरा कर सकता है।
शरीर और मन ही नहीं आत्मिक स्तर का विकास भी किया जाना चाहिये। इसके लिए परामर्श प्रयोजनों के कुछ कार्य अवश्य करने चाहिये। दान-पुण्य नाम पर धन की बर्बादी करने वाले बहुत हैं, हमें विवेकपूर्ण परमार्थ करना चाहिये। जिससे विश्व में सत्प्रवृत्तियों को, सदाचरण को, सद्भावनाओं को प्रोत्साहन मिले, वे ही कार्य परमार्थ हैं। ऐसे परमार्थ कार्यों में अपने समय, श्रम, बुद्धि, मनोयोग, धन एवं व्यक्तित्व का एक अंश नियमित रूप से लगाते रहना चाहिये। हमें अपने लिए ही नहीं, दूसरों के लिए भी जीना चाहिये। इस संसार से हमने बहुत कुछ पाया है। आहार, वस्त्र, विद्या, व्यवहार, धन, मनोरंजन आदि सब कुछ समाज का ही दिया हुआ है, इसके बदले हमें भी कुछ ऐसे प्रयत्न निरन्तर करते रहने चाहिये, जिनसे इस संसार की उत्कृष्टता में अभिवृद्धि होती चले।
आत्म-बल वृद्धि के लिए उपासना, आत्म-शोधन और परमार्थ तीनों का ही समावेश आवश्यक है। भगवान का नित्य स्मरण करे। अपने दोष, दुर्गुणों से नित्य संघर्ष करे और उन्हें हटावे। सद्गुणों और योग्यताओं को बढ़ाने के लिए नित्य पुरुषार्थ करे। निजी, पारिवारिक एवं सामाजिक उत्तरदायित्वों को पूरी-पूरी ईमानदारी और तत्परतापूर्वक निबाहे। जीवन अपने और अपने घर वालों के लाभ में ही न जी डाले वरन् देश, धर्म, समाज, संस्कृति को ऊंचा उठाने के लिए भी समुचित ध्यान दे, प्रयत्न करे और जितना संभव हो अधिक से अधिक त्याग भी करे। उसी रीति-नीति पर सुसंचालित जीवन क्रम ‘साधना’ कहलाता है। हमें ईश्वर की उपासना और जीवन को साधना, उत्कृष्ट भावनाओं के साथ करनी चाहिये। तभी जीवनोद्देश्य की प्राप्ति संभव हो सकेगी।
आध्यात्मिक प्रौढ़ता का चिन्ह है- परमार्थ परायणता। पेड़ जब पुष्ट हो जाते हैं, तब मांगते किसी से नहीं हर घड़ी देते ही रहते हैं। लकड़ी, पत्ते, पुष्प, फल, छाया, सुगंध का अनुदान वे निरंतर अपरिचित रूप से दूसरों को देते रहते हैं, यही उनका स्वाभाविक धर्म बन जाता है। अध्यात्म की भूमिका में जैसे-जैसे मनुष्य विकसित होता जाता है, वैसे-वैसे उसका परमार्थ पराग भी खिले हुए कमल पुष्प की तरह दसों दिशाओं में उड़ने लगता है। उसकी उदारता, करुणा, महानता, सदाशयता एक घड़ी चैन से नहीं बैठती, वह लुटाने के लिये व्याकुल रहती है, गाय के थन में जरा भी दूध जमा हुआ कि वह कराहने लगती है, जब तक उसे खाली नहीं कर देती, तब-तक बेचैनी अनुभव करती है। पेड़ अपने परिपक्व फलों को बिना किसी के मांगे धरती पर टपकाते रहते हैं ताकि आवश्यकता ग्रस्तों को मधुर अनुदान अनायास ही बिना मूल्य मिल जाय। यही आध्यात्मिकता है।
जैसे-जैसे मनुष्य का आंतरिक स्तर विकसित होता जाता है, वह इस विश्व वसुंधरा को अधिक सुंदर, अधिक सुविकसित, अधिक सुसंस्कृत बनाने के लिये तत्पर दिखाई देता है। सेवा और अनुदान ही उसके प्रिय विषय और प्रिय व्यसन बन जाते हैं। अपने लिए वह स्वर्ग, मुक्ति या सिद्धि में से किसी की कामना नहीं करता वरन् यही सोचता रहता है कि जो कुछ मुझे मिला है, उसे विश्व-भावना को अधिक सुसज्जित बनाने के लिए किस तरह उस सबको लौटा दूं।
देवत्व का स्वरूप है दया और दान। इस संसार में जो दुख और दैन्य है उसे देखना पड़ता है, उससे उसका हृदय पिघल पड़ता है। ‘संत हृदय नवनीत समाना’ सूक्ति के अनुसार उसकी पिघलती हुई करुणा एवं सदाशयता इस बात के लिए विवश करती है कि पीड़ित मानवता के घावों पर मरहम लगाने के लिए उसके पास जो कुछ बल, बुद्धि, विद्या, संपत्ति तथा स्थिति है उसका अधिकाधिक भाग समर्पण करे। ऐसी स्थिति में वह अपना घर परिवार थोड़े लोगों में सीमाबद्ध नहीं करता। बेटे, पोतों को ही उसकी सारी विभूतियों का लाभ मिलना चाहिए ऐसा नहीं सोचता, वरन् सभी को अपना समझता है और मोह-वश किन्हीं संबंधियों के लिये मरते-खपते रहने की संकीर्णता छोड़ कर हर दर्दमंद की- हर पिछड़े व्यक्ति की सेवा सहायता करने में तत्पर हो जाता है।
हममें से हर एक को परमार्थ-परायण होना ही चाहिये। उसके पास इस प्रश्न का प्रामाणिक उत्तर होना चाहिये कि विश्व-मानव की सेवा में उसका उदार अनुदान क्या रहा? कितना रहा?
दान-पुण्य की अनेक दिशायें हैं उनमें सभी लोग कुछ-न-कुछ कर रहे हैं। किंतु सबसे उपयोगी एवं आवश्यक होने पर सबसे अछूती, सबसे उपेक्षित सद्ज्ञान संवर्धन की दिशा की सूनी पड़ी है। लोक-मानस का स्तर ऊंचा उठाने पर ही मानव-समाज का उज्ज्वल भविष्य अवलंबित है, ऐसे सर्वोपरि कार्य के लिये लोगों की उपेक्षा उनकी विवेक हीनता ही प्रकट करती है। जो परमार्थ आंखों से दिखे, लाभ लेने वाले तुरंत प्रशंसा करे इस दृष्टि से तो उथले-हल्के ब्रह्म-भोज जैसे कार्यों को ही किया जा सकेगा। सद्ज्ञान संवर्धन न तो आंखों से दिखता है, न तुरंत वाहवाही बांधता है, इसलिए उसे करने के लिए कोई विवेकवान, दूरदर्शी और सत्परिणामों का मूल्यांकन करने वाला ही साहस कर सकता है। हमें इसी श्रेणी का परमार्थी होना चाहिये। हमारी सारी उदारता इस केंद्र पर केंद्रीभूत होनी चाहिये कि अपना अज्ञान-ग्रस्त अंधेरे में भटकने वाला समाज- सद्ज्ञान का प्रकाश प्राप्त कर सत्पथगामी बन सके। ऐसी प्रवृत्तियों में कम-से-कम हम थोड़े लोगों को तो- एक छोटे परिवार को तो- उन्मुख होना ही चाहिये।
ज्ञान-यज्ञ का विस्तृत कार्यक्रम बहुत दिनों से प्रस्तुत किया जाता रहा है। अपने घरों में ज्ञान-मंदिर की स्थापना के लिए प्रतिदिन दस पैसा खर्च करते रहने का अनुरोध कितने दिनों से किया जाता रहा है। अपनी वाणी और बुद्धि को एक घंटा रोज विचार-क्रांति का प्रकाश अपने संपर्क के लोगों तक पहुंचाने में खर्च करते रहने की प्रेरणा कितने दिनों से दी जाती रही है। इसे अनसुनी नहीं किया जाना चाहिये। इस प्रक्रिया का मूल्य कम नहीं आंका जाना चाहिये। परमार्थ के लिए धन, समय, श्रम, बुद्धि खर्च करने के लिये विवेकपूर्ण अगणित मार्ग खुले पड़े हैं। युग-निर्माण-योजना के शतसूत्री कार्यक्रमों में उनकी विस्तृत चर्चा है। जिसके पास जितना धन और समय हो वह उनमें मुक्त-हस्त से लगाये। पर न्यूनतम उपासना की प्रस्तुत प्रक्रिया के अंतर्गत इतना परमार्थ तो हर किसी को करना ही चाहिये कि वह दस पैसा प्रतिदिन ज्ञान-दान के लिये निकालता रहे। उस पैसे घर में ज्ञान-मंदिर स्थापित करे। दोनों पत्रिकायें और ट्रेक्टों का मूल्यवान रत्न-कोष घर में जमा करे। घर के हर सदस्य को उसे पढ़ाने, सुनाने की व्यवस्था करे और परिचित संबंधियों तक उसका प्रकाश पहुंचायें।
इससे सस्ता, इससे सरल और इससे महत्वपूर्ण परमार्थ आज की परिस्थितियों में दूसरा नहीं हो सकता। इसलिए युग की सर्वोपरि मांग और ईश्वर की महती आकांक्षा की पूर्ति के लिए हमें इतना परमार्थ करने के लिए तो कटिबद्ध होना चाहिये।
युग-निर्माण का- मानव-समाज के भावनात्मक परिवर्तन का मूल आधार- दृश्य जगत नहीं वरन् सूक्ष्म आकाश एवं मानवीय अंतःकरण का गुह्य स्तर है। उसे प्रभावित परिष्कृत न किया जाय तो बाह्य हलचल पानी के बबूले की तरह थोड़े समय तक अपना क्रिया-कलाप गतिशील रख कर ठंडी हो जायेगी।
स्थिर प्रत्यावर्तन आध्यात्मिक आधार पर ही संभव है। समाज-सुधार जैसी हलचलें आंदोलनों द्वारा संपन्न हो सकती है, पर व्यक्ति की आस्था, निष्ठा, मान्यता, आकांक्षा और भावना का अंतरंग गुह्य स्तर छूने और बदलने का कार्य आध्यात्मिक प्रक्रिया अपना कर ही संभव किया जा सकता है। इस दिशा में भी अपने प्रयत्न समानांतर चल रहे हैं। काम करने वाले के हाथ-पांव वजन उठाने लायक और नाव चलाने लायक मजबूत हों, उसके लिए प्रारंभ में ही 24-24 लक्ष के 24 गायत्री महापुरश्चरण करने पड़े। इसके पश्चात गायत्री उपासना का व्यापक प्रसार किया गया और सुसंगठित यज्ञ आंदोलन को जन्म दिया गया है। शतकुंडी और सहस्र कुंडी यज्ञ मथुरा में हुए। देश भर में उनकी श्रृंखला विस्तृत की गई। यह समस्त आध्यात्मिक कार्यक्रम सूक्ष्म अंतरिक्ष को निर्मल बनाने और जन-मानस के गुह्य अंतरंग को परिष्कृत करने के लिये ही चले हैं। निस्संदेह ऐसी साधनात्मक प्रवृत्तियां ही चेतन मानव-प्राणी की चेतना को परिवर्तित और परिष्कृत करने में समर्थ होती हैं। जानने वाले जानते हैं कि इनका प्रभाव परिणाम आशातीत एवं आश्चर्यजनक ही हुआ है।
अब गत बसंत-पंचमी से एक महत्तम सामूहिक महापुरश्चरण जन-मानस में अध्यात्म-चेतना जागृत करने के लिए- युग परिवर्तन की पुण्य प्रक्रिया सफलतापूर्वक संपन्न करने के लिए- आरंभ किया गया है। यह धर्मानुष्ठान इस युग का अनुपम एवं अभूतपूर्व है। नित्य चौबीस लक्ष जप गायत्री महापुरश्चरण बहुत बड़ी बात है, लाखों-करोड़ों मनुष्यों में से कोई एक बड़ी कठिनाई से इसे पूरा कर पाता है, किंतु जो कर लेता है वह धन्य हो जाता है। 24 लक्ष महापुरश्चरण की उपलब्धियां कितनी महान हैं- इससे क्या कुछ मिलता है, इसे सर्वसाधारण को समझाना कठिन है। इसे वे ही जान सकते हैं, जिन्होंने इस मार्ग में गहराई से प्रवेश करके स्वयं कुछ अनुभव प्राप्त किया है। निस्संदेह 24 लक्ष गायत्री महापुरश्चरण बहुत बड़ी बात है। यदि कोई उसे विधिवत् और समग्र तपश्चर्याओं के साथ सम्पन्न कर सके तो धन्य जीवन होकर ही रहता है। ऐसा महापुरश्चरण जो जीवन में एक बार भी कठिनाई से हो पाता है। हर दिन सम्पन्न होता रहे तो उसके द्वारा बड़े से बड़े परिणामों की ही आशा की जा सकती है।
सूक्ष्म अन्तरिक्ष को- विश्व-मानव की अन्त चेतना को- परिष्कृत करने के लिए जिस महत्तम गायत्री महापुरश्चरण का शुभारंभ किया गया है, उसकी संक्षिप्त चर्चा गत दो अंकों में की जा चुकी है। इस महान जप-यज्ञ में 24000 भागीदार होंगे। हर भागीदार को एक माला गायत्री महामंत्र का जप तथा एक सत्संकल्प का पाठ युग परिवर्तन की पुण्य प्रक्रिया सम्पन्न करने के लिये करना होगा। आत्म-कल्याण की एक माला इसके अतिरिक्त उसके साथ एक गायत्री चालीसा पाठ भी जुड़ा हुआ है। इस प्रकार हर भागीदार को दो मालायें जपनी होंगी और दो पाठ हर दिन करने होंगे। इस प्रकार हर दिन 24 लक्ष जप का एक महापुरश्चरण 24 हजार संकल्प पाठ और 24 हजार गायत्री चालीसा पाठ हम लोग हर दिन सम्पन्न किया करेंगे। अन्तरिक्ष में एक विशिष्ट वातावरण विनिर्मित करने की दृष्टि से इस सामूहिक साधना का अतिशय प्रभावशाली परिणाम प्रस्तुत होगा।
यह पुरश्चरण दस वर्ष के लिये हैं। बसन्त-पंचमी संवत् 2024 (3 फरवरी 68) को इसका आरंभ हुआ। दस वर्ष बाद इसी दिन इसकी पूर्णाहुति हो जायेगी। कहना न होगा कि आगामी दस वर्ष विश्व-संकट की दृष्टि में बहुत ही कंटकाकीर्ण है। इनमें अगणित प्रकार की आपत्तियों की आशंकाएं पग-पग पर भरी पड़ी हैं। हमारा विश्वास है कि इस महत्तम पुरश्चरण की शक्ति से उसे बहुत हद तक- तीन चौथाई कम किया जा सकेगा।
यह ‘न्यूनतम साधना अंक’ इसीलिये प्रस्तुत किया गया है। इसमें एक सुव्यवस्थित सरल साधना पद्धति है। हम चाहते हैं कि परिवार का हर सदस्य इसे अपनाये। दैनिक उपासना के लिए हर कोई थोड़ा समय लगाये। दैनिक साधना में हर किसी को निष्ठा हो। इस प्रक्रिया के अंतर्गत ही महत्तम गायत्री महापुरश्चरण की भागीदारी भी सम्मिलित है। एक माला अपने लिए, एक विश्व-कल्याण के लिए करने से सहज ही उस महापुरश्चरण का भागीदार बना जा सकता है। अपने परिवार के- संपर्क के लोगों को भी इस साधना क्रम में सम्मिलित होने की प्रेरणा देनी चाहिये।
मथुरा केन्द्र के साथ जो लोग कभी- किसी रूप में संबंधित रहे हैं, उन्हें भी यह संदेश पहुँचाना चाहिये ताकि प्रस्तुत महापुरश्चरण की पूर्ति हो सके। यों अब तक लगभग 24 लाख व्यक्तियों को गायत्री की शिक्षा-दीक्षा दी गई है पर हम चाहते हैं कि अन्त में उनमें से 24 हजार व्यक्ति निष्ठावान अवश्य रह जांय। ऐसे निष्ठावानों की परख प्रस्तुत महापुरश्चरण की भागीदारी के रूप में ही करेंगे।
तीन वर्ष बाद हमारी भावी तपश्चर्या का क्रम आरंभ होगा। वह अपने निज के लिये मुक्ति या सिद्धि प्राप्त करने के लिये नहीं- वरन् भावनाशील, संस्कारवान आत्माओं को महापुरुष बना सके उतना साहस और बल प्रदान करने के लिये होगा। उसका लाभ किन्हें मिले? इसकी परख पात्रता की परीक्षा पर ही निर्भर रहेगी। यह परख करने के लिए एक छोटी कसौटी प्रस्तुत महापुरश्चरण की भागीदारी को निर्धारित किया गया है। अपने परिवार में अब परखे हुए निष्ठावान लोगों को ही रहना और रखा जाना है। इसलिये भी यह कसौटी एक चुनौती के रूप में प्रस्तुत की गई है कि जो हमें श्रद्धास्पद मानते हैं, वे हमारा मार्गदर्शन भी ग्रहण करें।
यह छोटी साधना जो निष्ठापूर्वक अविचल भाव से चला सकेंगे, वे आगे की उच्च साधनाओं के अधिकारी माने जायेंगे, उन्हें हमारे संचित ज्ञान और अनुभव का ही नहीं अनुदान एवं सहयोग का भी लाभ मिलेगा। हम जहाँ कहीं भी रहेंगे उन्हें आवश्यक प्रकाश प्रदान करेंगे और इसके लिये शक्ति भर प्रयत्न करेंगे कि वे अध्यात्म की उच्च भूमिका में प्रवेश करने का आनन्द लाभ करें। ऊंची उपासनाओं के विधान बता देने से किसी का कुछ प्रयोजन सिद्ध नहीं हो सकता। पंच-कोषों का अनावरण, षट्चक्र वेधन, कुंडलिनी जागरण आदि की क्रिया-प्रक्रियायें विस्तारपूर्वक बताई, समझाई जा सकती हैं, पर इतने मात्र से किसी को कोई लाभ न होगा। उस मार्ग पर चलने के लिए शक्ति प्राप्त करना यह सबसे बड़ा काम है। और पूरा कराने में सहायक कोई अनुभवी गुरु ही हो सकता है। और वह इस प्रकार की सहायता देने के लिए किसी के बातूनीपन से नहीं वरन् उसकी निष्ठा से ही प्रभावित होता है। सर्व शक्तिमान गायत्री के मर्म और रहस्य तक पहुँचने की क्षमता जिस आधार पर उपलब्ध हो सकती है। उसका प्रथम सोपान अपनी यह न्यूनतम उपासना पद्धति होती है, जिसमें महत्तम गायत्री महापुरश्चरण की भागीदारी जुड़ी हुई है।
प्रतिदिन 24 लक्ष गायत्री महापुरश्चरण सम्पन्न करने के महान धर्मानुष्ठान में सम्मिलित होने वालों की गतिविधियों पर आवश्यक देख-भाल और जाँच पड़ताल रखी जा सके, इसके लिए उन भागीदारों के पीछे एक ऋत्विज की नियुक्ति की जा रही है। आरंभ में पाँच भागीदारों की देख-भाल करने वाले भी ऋत्विज ही माने जायेंगे, पीछे उन्हें प्रयत्न करके अपने निरीक्षण क्षेत्र में दस साधक सम्मिलित कर लेने चाहिये। यह नियंत्रण क्रम इसलिये रखा गया है कि निर्धारित संख्या में कोई गड़बड़ी न होने पावे। कई व्यक्ति उत्साह में आरंभ तो कर देते हैं पर पीछे शिथिलता अथवा किसी अड़चन के कारण उसे छोड़ बैठते हैं और इसकी सूचना भी नहीं देते। ऐसी दशा में हम यह सोचते रहें कि अनुष्ठान की निर्धारित संख्या पूरी हो रही होगी तो पुरश्चरण खंडित एवं अधूरा ही रह जायेगा। ऐसा न होने पावे इसलिए ‘ऋत्विजों’ को पाँच या दस साधकों की देख-भाल रखने और यदि वे न करें तो उनके बदले का जप स्वयं करने का- उत्तरदायित्व सौंपा गया है। जहाँ कहीं भी यह भागीदारी आरंभ हो वहाँ ऋत्विजों की नियुक्ति भी अनिवार्य होनी चाहिये। जहाँ कई व्यक्ति नहीं हैं- केवल एक ही है- वहाँ भी उस साधक को भागीदार तथा ऋत्विज दोनों का कर्त्तव्य निबाहना होगा।
इस अंक में एक छपा ‘ऋत्विज् फार्म’ लगाया गया है। से भर का ‘ऋत्विज’ लोग मथुरा भेजें। अब साधारण भागीदारों से छपे प्रतिज्ञा-पत्र भरने की आवश्यकता अनुभव नहीं की गई। कितने लोग छपे फार्मों को एक कौतूहल समझ कर दूसरों की देखा-देखी भर देते हैं और पीछे उस प्रतिज्ञा का स्मरण नहीं रखते। इसलिये अब की बार हाथ से लिखे प्रतिज्ञा-पत्र उचित समझे गये हैं। इससे कागज छपाई डाक खर्च आदि का व्यर्थ का झंझट भी बचता है। जो नैष्ठिक साधक इस महापुरश्चरण में भागीदार बनें, वे अपने ऋत्विज को इस आशय का प्रतिज्ञा-पत्र अपने हाथ से लिख कर दे दें।
‘अ.भा. गायत्री परिवार मथुरा द्वारा संचालित महत्तम गायत्री महापुरश्चरण का मैं भागीदार बनता हूँ प्रतिदिन गायत्री महामंत्र की एक माला आत्म-कल्याण के लिए और एक माला युग-निर्माण के लिए करता रहूंगा। उपासना एवं साधना का निर्धारित क्रम अपनाये रहूँगा। यदि साधना बंद या स्थगित रखूँगा तो उसकी सूचना अपने ऋत्विज को तथा मथुरा केन्द्र को दे दूँगा।’
हस्ताक्षर--------------------
पूरा पता--------------------
जन्म तिथि-------------------
इन लिखित प्रतिज्ञा-पत्रों को मथुरा भेज देना चाहिये। ऋत्विज अपने फार्म में इन सब के पते लिख दें।
प्रतिज्ञा-पत्र भरने और ऋत्विज फार्म भेजने का कार्य गायत्री जयन्ती (ज्येष्ठ सुदी 10, दिनाँक 6 जून 1968) तक पूरा कर लेना चाहिये। गुरु-पूर्णिमा को इन सबके स्वीकृति-पत्र भेज दिये जायेंगे। प्रत्येक परिजन को इसमें अपना योगदान देना ही चाहिये।
ऋत्विज (जो अन्य भागीदारों की देख-भाल भी रखे) का पूरा नाम, पता -------------------------------------------
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क्रमाँक भागीदारों के नाम तथा पूरे पते
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10.
दिनाँक ----------------- हस्ताक्षर ऋत्विज् -----------------
(1) विश्व का भावनात्मक नव-निर्माण करने के उद्देश्य से अ.भा. गायत्री परिवार मथुरा द्वारा सूक्ष्म जगत एवं जन-मानस का परिष्कार करने के लिये ‘महत्तम गायत्री महापुरश्चरण’, बसंत पंचमी सं. 2024 (3 फरवरी 1968) से आरंभ किया गया है। इसके अंतर्गत प्रतिदिन 24 लक्ष गायत्री जप होगा। यह क्रम दस वर्ष तक चलेगा।
(2) इस महापुरश्चरण के अंतर्गत 24000 व्यक्ति प्रतिदिन एक माला गायत्री महामंत्र का जप तथा एक युग निर्माण सत्संकल्प का पाठ किया करेंगे। यह एक माला जप और एक संकल्प पाठ करने वाले महापुरश्चरण में भागीदार कहे जावेंगे।
(3) दस भागीदारों की देख-भाल करने तथा उनका उत्तरदायित्व संभालने के लिये एक ‘ऋत्विज्’ नियुक्त होगा।
(4) ऋत्विज यह फार्म भर कर ‘गायत्री तपोभूमि मथुरा’ के पते पर भेजें। अपने भागीदारों के पूरे पते लिख दें। आरंभ में दस भागीदार न हो सकें तो 5 से भी आरंभ में किया जा सकता है। पीछे धीरे-धीरे संख्या बढ़ाते हुए 10 पूरे कर लें।
(5) यदि साधारण पत्र में इससे पूर्व भागीदारों की सूचना मथुरा भेजी जा चुकी है तो भी इस फार्म को भर कर भेजना चाहिए। हर ऋत्विज के आधार पर एक नया फार्म भरना चाहिए। इसी फार्म की नकल सादे कागज पर इसी साइज में बना कर आवश्यकतानुसार अधिक फार्म तैयार कर लेने चाहिए और उन्हें भर कर भेजना चाहिए।
(6) सर्वत्र अधिकाधिक भागीदार और ऋत्विज बनाने का प्रयत्न पूरे उत्साह के साथ किया जाय। अपने क्षेत्र में अधिक भागीदार बनाने की प्रतिस्पर्धा चलाई जाय। ताकि इस युग के इस महापुरश्चरण की ठीक तरह पूर्ति हो सके।
(श्रीमती विद्यावती मिश्र)
किया निवेदन निवेदिता ने, धन्य आपको पाकर। हुई, हो गया जीवन सार्थक भरत-भूमि में आकार॥
गुरु बोले ‘हे देवि, जन्म-भू सबसे ज्यादा पावन। सबसे पुण्य-कर्म उसका ही है पूजन आराधन॥
उसे छोड़ना उचित नहीं है मेरा कहना मानो। जन्म-भूमि वापिस जाने का निश्चय मन में ठानो॥
भगिनी कुछ क्षण मौन रही नयनों में जल-कण आये। वाणी के भी पूर्व जिन्होंने अपने भाव बताये॥
बोली, ‘‘पृथ्वी मेरी जननी, जनक नील अंबर है। भौगोलिक सीमा में बन्दी रहा न मेरा घर है॥
जहाँ कहीं रम गया हृदय, मैंने आवास बनाया। काया के पहले ही मेरा अंतस् भारत आया॥
यदि बोने हों फूल, उर्वरा धरती क्यों न चुनें हम। यदि सुनना संदेश भला फिर अनहद क्यों न सुनें हम॥
वहीं रहें हम क्यों न जहाँ पर मिले शाँति का साधन। बार-बार मिलता न किसी को आखिर यह मानव तन॥
भारत मेरा, मैं भारत की, होकर सदा रहूँगी। जन्म कहीं भी हुआ यहाँ की निजको सदा कहूँगी॥
मेरे विनत निवेदन को गुरु समझें नहीं अवज्ञा। बोल रही इसमें मेरी आत्मा की पावन प्रज्ञा॥
इतना कह वह झुकी चरण में और रुंध गया स्वर था। बढ़ा हिमालय के पूजन को भावों का सागर था॥
गुरु ने फेरा हाथ शीश पर आशीर्वाद दिया यह। शाप-ताप पीड़ित मानव की सेवा करो यहीं रह॥
ऐसा लगा कि पूर्ण हो गयी थी इस भाँति परीक्षा। कहते हैं दूसरे दिवस ही गुरु ने दे दी दीक्षा॥
स्वामी विवेकानन्द की विदेशी शिष्या भगिनी निवेदिता
*समाप्त*