मनुष्य अपने आप में एक परिपूर्ण इकाई है। उसमें वे समस्त शक्तियाँ और सम्भावनायें जन्मजात रूप में विद्यमान् हैं, जिनके आधार पर किसी भी दिशा में पूर्णता एवं सफलता के उच्च-शिखर पर पहुँचना सम्भव हो सकता है।
समस्त दैवी शक्तियों का प्रतिनिधित्व मनुष्य की अन्तःचेतना करती है। प्रसुप्त पड़ी रहने पर वह भले ही अपना गौरव प्रकट न कर सके पर जब वह जाग जाती है तो यही अन्तःचेतना व्यक्तित्व में अगणित ऐसे सद्गुण प्रस्फुटित करती है, जिनसे किसी दिशा में चमत्कार प्रस्तुत किये जा सकते हैं।
बाहरी हानि-लाभ, सहयोग और अवरोध मनुष्य की प्राप्ति एवं अवगति के उतने बड़े कारण नहीं, जितने कि अपने आन्तरिक सद्गुण एवं दुर्गुण। व्यक्ति स्वयं ही अपने उत्थान, पतन का उत्तरदायी है। जिसने अपने को समझा, सम्भाला और बढ़ाया वह निश्चित रूप से प्रगति के पथ पर अग्रसर हुआ है। अपने भीतरी शक्ति-कोष को जगाने पर मनुष्य अपरिमित दिव्य-शक्तियों से विभूषित हो सकता है।
बाहरी सहायता की अपेक्षा करने की तुलना में यह अच्छा है कि मनुष्य अपने भीतर छिपी सत्प्रवृत्तियों को ढूंढ़े एवं उभारे। प्रगति का सार आधार व्यक्ति की अन्तःचेतना और भावनात्मक स्फुरण पर ही तो अवलम्बित है।
-जे. कृष्ण मूर्ति,
अनेक बार लोग कह उठते हैं कि- ‘‘यह हमारा व्यक्तिगत अनुभव है कि अधिक उपासना करने वाले लोग बहुधा विपन्न ओर दुखी ही रहा करते हैं।”
संसार का कोई भी सच्चा उपासक इस विपरीत कथन से सहमत नहीं हो सकता। उपासना का परिणाम तो संतोष, शाँति, प्रफुल्लता, आशा, विश्वास तथा आनन्द ही होता है। तब उसको धारण करने वाले को विपन्नता और दुख किस प्रकार हो सकता है? मनुष्य वृक्ष की घनी छाया में बैठे और उसका आतप-ताप दूर न हो, फूलों से भरी वाटिका में बिहार करे और उसका तन-मन न महक उठे, ऐसा किस प्रकार सम्भव हो सकता है? उपासना के माध्यम के परमात्मा के समीप रहने पर आत्मा में आनन्द का सागर न लहराने लगे यह सम्भव नहीं।
प्रेम, करुणा, आत्मीयता और आनन्द की पावन धारायें निरन्तर ही परमात्मा से प्रवाहित होती रहती हैं। इन्हीं अमरत्व तत्वों से ही तो संसार के प्राणियों और पेड़-पौधों का पालन-पोषण होता है। एक क्षण को भी यदि वह परम दयालु परमात्मा अपनी इस कृपा को रोक ले तो इस सुन्दर संसार को नष्ट होते देर न लगे। ऐसे आनन्द-कन्द परमात्मा के संसर्ग में आकर कोई विपन्न और दुःखी रहे, यह तो अत्यन्त आश्चर्य की बात है।
उपासना का परिणाम आत्मानन्द और आत्म-सन्तोष है। उपासना करने से इन्हीं की उपलब्धि होगी। भौतिक विभूति और आर्थिक उपलब्धियों के लिए पुरुषार्थ और परिश्रम का नियम निश्चित है। जो इस नियम का उल्लंघन करते हैं या करेंगे, उन्हें विपन्न रहना ही पड़ेगा। परमात्मा ने जब साधन, शंकित, उपाय एवं बुद्धि की व्यवस्था करके भौतिक उपलब्धियों का मार्ग प्रशस्त कर दिया तब क्या कारण है कि लोग उससे उपासना के पुरस्कार रूप धन-दौलत और सुख-सुविधा चाहते हैं। यह अनाधिकार चेष्टा है, जिसको स्वीकार नहीं किया जा सकता।
उपासना करते हुए भी जो विपन्न और दुःखी रहते हैं, वे सच्चे उपासक नहीं। प्रभु के पास उनका गमन ठीक वैसा ही होता है, जैसे कि कोई बच्चा मन्दिर की प्रार्थना में प्रसाद के लालच से शामिल होने जाता है। ऐसे लालची लोग उपासना का वह आनन्द नहीं पा सकते, जो भक्ति रस में डूबे हुए भावों के साथ प्रभु को आत्म-समर्पण करने वाले उपासकों को मिलता है। प्रभु के चरणों में अपनी अन्तरात्मा को निष्काम-भाव से अर्पण करने वाले भक्ति-विभोर और प्रसाद की मिठाई लेने के उद्देश्य से उपस्थित लोभी में जो अन्तर होता है, वही अन्तर सच्चे तथा वंचक उपासक में होता है।
अस्तु उनकी प्राप्ति भी अपनी-अपनी भावना एवं स्तर के अनुरूप ही होगी। एक उपासना के उसी फल को चाहता है, जो उसके साथ नियत है और दूसरा वह कुछ चाहता है, जिसकी निर्यात किन्हीं अन्य साधनों तथा उपायों से है। ऐसे ना-समझ और नियति विरोधियों की ओर वह परम दयालु परमात्मा भी कुछ अधिक ध्यान नहीं दे पाता। निदान वे विपन्न तथा दुखी बने रहते हैं।
भौतिक विभूतियों के लोभी उपासक का विपन्न रहना स्वाभाविक ही है। वह कुछ देर परमात्मा का चिन्तन अथवा भजन-पूजन करने के बाद अकर्मण्य होकर बैठ रहता है और प्रतीक्षा किया करता है कि अब उसकी उपासना के मूल्यरूप धन-दौलत और सुख-साधन का हेतु परमात्मा का वरदान उस पर बरसने वाला ही है, जिसके परिणामस्वरूप उसके लिए उन्नति, विकास तथा वैभव का द्वार स्वयं खुल जायेगा और वह बैठे बैठाये मुफ्त में ही मालामाल होकर सर्व सुख सम्पन्न हो जायेगा।
कितना गलत विश्वास और कैसी भ्रांत धारण है। पुरुषार्थ तथा परिश्रम के बल पर मिलने वाली भौतिक संपदायें यों बैठे-ही-बैठे किस प्रकार मिल सकती हैं। इसी वंचकता के कारण ही तो बहुत से अवास्तविक उपासक जीवन भर परमात्मा का भजन-पूजन करने के बाद भी विपन्न और दुखी बने रहते हैं और बाद में अपने इस कटु अनुभव को सिद्धांत के रूप में लोगों के सामने रोते हुए कहा करते हैं कि- ‘‘बहुधा देखा जाता है कि अधिक उपासना करने वाले लोग विपन्न तथा दुखी बने रहते हैं।”
उपासना स्वार्थ से नहीं प्रेम से प्रेरित होकर की जानी चाहिये। उपासना के पीछे निहित लक्ष्य भौतिक विभूतियों बाह्य उपलब्धियों तथा आर्थिक उन्नतियों का नहीं बल्कि आत्मिक, शाँति, संतोष तथा आनन्द का ही होना चाहिये। यही अनुकूलता एवं अनुरूपता है। ऐसा सच्चा और अनुकूल उपासक जब परमात्मा की समीपता में आता है तो उसमें दैवी श्रेष्ठताओं की अभिवृद्धि होती है। परमात्मा समस्त श्रेष्ठताओं का उद्गम है, उसका समीप्य आत्मा में अनुदिन श्रेष्ठताओं को ही स्थानांतरित करता चलता है। पर निन्दा, ईर्ष्या, द्वेष, लोभ, लालच आदि के अदैवी दोष उससे दूर होते जाते हैं और शीघ्र ही वह प्रभात कालीन समुद्री वायु की तरह निर्विकार तथा निरुद्विग्न होकर आनन्द में स्थित हो जाता है।
जो प्रेम और समर्पण की श्रेष्ठ भावनाओं को लेकर परमात्मा के पावन चरणों में जाता है, उसे उसका प्रति-पादित प्रेम प्राप्त होते देर नहीं लगती है। परमात्मा की उपासना का प्रतिफल पाने के लिए प्रतीक्षा तो उन्हें करनी पड़ती है, जो दीन-हीन भिक्षुक के समान उसके सामने उन वस्तुओं के लिये रिरियाते रहते हैं, जिनको वह शक्ति, विवेक, उपाय तथा अवसरों के रूप में पहले ही दे चुका है। केवल इन विशेषताओं का प्रयोग ही मनुष्य का काम रह जाता है। जिसने हल, बैल, जल, भूमि और शक्ति रखी है, उससे अब यह आशा करना ही वह खेती भी करे और उससे उत्पन्न फसल उसको दे दे तो एक दुराशा ही नहीं अनाधिकार चेष्टा है, जोकि किसी दशा और किसी मूल्य पर भी स्वीकार नहीं की जा सकती।
परमात्मा की उपासना का जो प्रतिफल नियत है, उसकी इच्छा के साथ उपासना करना समीचीन तथा न्यायसंगत है। जल से आग और आग से जल की आशा करना न केवल असंगत ही है बल्कि अन्यायपूर्ण मूर्खता है। उपासना से कामनाओं का कलुष मिटता है, जिससे मनुष्य के हृदय से याचकता का दोष निकल जाता है। उपासना से वासनाओं का शमन होता है, जिससे आन्तरिक शाँति की वृद्धि होती है। उपासना से तृष्णा का ताप नष्ट होता है, जिससे शाँति और सन्तोष की प्राप्ति होती है। उपासना से चिन्ता, भय, घृणा, अशाँति, दुष्टता तथा द्वेष के दोष मिटते हैं। आत्मा में प्रकाश तथा आनन्द की समाविष्टि होती है। न कि उससे धन-दौलत और सम्पदाओं की उपलब्धि होती है।
उपासना और आत्म-शाँति एक ही बात के दो पक्ष हैं। आत्मा जब अपनी आदि एवं उद्गम सत्ता की ओर उन्मुख होगी तो निश्चय ही आत्म-लोक और आनन्द की प्राप्ति होगी। आत्मा पर परमात्मा का प्रकाश पड़ते ही उसमें सत्-चित् आनन्द के रूप में उसका प्रतिबिम्ब प्रतिफलित हो उठेगा, जिससे साधारण मनुष्य भी परमात्मस्वरूप होकर नर से नारायण और अंश से अंशी बन जाता है। उपासना की इतनी बड़ी उपलब्धि छोड़ कर जो व्यक्ति उसके अन्धकार पर नश्वरता एवं निस्सारता से दूषित बाह्य एवं भौतिक संपत्तियों की कामना करते हैं, अवश्य ही उनकी बुद्धि पर तरस खाने को जी चाहता है।
मनुष्य धन-दौलत अथवा भौतिक विभूतियाँ क्यों चाहता है? इसीलिये कि उसे सुख-शाँति और संतोष मिले। और बहुत से लोग इसी लक्ष्य को आगे रख कर उपासना में निरत होते हैं। पर सोचने की बात है कि जब निर्लोभ उपासना के आधार पर अहेतुक, अविनश्वर, अक्षय और अनन्त आनन्द की उपलब्धि हो सकती है, तब निकृष्ट सुख को लक्ष्य बना कर उपासना करने में कौन-सा विवेक अथवा दूर दृष्टि है? निर्विकार उपासना द्वारा आत्मानन्द की उपलब्धि हो जाने पर जब किसी सुख की प्राप्ति शेष ही न रह जायेगी, तब धन-दौलत अथवा वैभव भण्डारों की क्या तो महत्ता रह जायेगी और क्या प्रपोज? उद्देश्य जीवन को सुखी बनाना है और जब वह उपासना द्वारा अनायास और अनाधारित रूप से आनन्दित हो सकता है, तब अनावश्यक आडम्बरों का बोझ अपने शिर पर रखना बुद्धिमानी नहीं कही जा सकती। जिस प्यास को मिटाने के लिये जिस उपाय से अमृत-सागर की उपलब्धि हो सकती है, उसी उपाय के आधार पर तालाब के दो चिल्लू पानी की आशा करना आंतरिक हीनता के सिवाय और कुछ भी नहीं है।
दरिद्रता की द्योतक भौतिक कामनाओं को साथ लेकर उपासना करने वाले सदा-सर्वदा ही दरिद्र बने रहते हैं। जबकि अवंचक उपासना के पुरुषार्थी निराधार रूप से देवताओं जैसे सुखी और सम्पन्न बने रहते हैं। उनकी कामनायें, तृष्णायें और वासनायें मिट जाती हैं और उनका जीवन मानसरोवर की तरह निर्मल, शाँत, शीतल और प्रसन्न हो जाता है।
उपासना जीवन की सर्वोपरि बुद्धिमता है। किन्तु तब जब वह निर्लोभ और निर्विकार रूप से की जाये। धन-दौलत और भौतिक सुख-साधन पुरुषार्थ और परिश्रम के प्रतिफल हैं। इनको उपासना के प्रतिफलों में जोड़ना क्षीर में क्षार मिलाने के समान असंगत है। इससे सारा रस और सारा उद्देश्य भंग हो जाता है। केवल निष्फलता और निराशा ही हाथ लगती है। आत्म प्रसन्नता के लिये उपासना कीजिये और भौतिक विभूतियों के लिये पुरुषार्थ। इन दोनों का संतुलन बनाये रखने वाला भीतर-बाहर दोनों ओर सुखी, शाँत, सम्पन्न और सन्तुष्ट बन कर लोक, परलोक के सारे पदार्थ पा जाते हैं।
एक सेब का मूल्य :-
तुर्की में जकीर नाम के एक फकीर हुए हैं। वह आईन नदी के किनारे कुटी बना कर रहते थे। एक दिन नदी में एक सेब बहता आ रहा था। जकीर ने उसे पकड़ लिया।
अभी उसे खाने की तैयारी कर ही रहे थे कि अन्तःकरण से आवाज आई- ‘‘फकीर! क्या यह तेरी सम्पत्ति है, क्या तूने इसे परिश्रम से पैदा किया है? यदि नहीं तो इसे खाने का तुझे क्या अधिकार?”
सेब झोले में डाल कर अब फकीर उसके स्वामी की खोज में नदी के चढ़ाव की ओर चल पड़े। थोड़ी दूर पर एक सेब का बाग मिला। कुछ सेब के वृक्षों की डालें पानी को छू रही थीं, फकीर ने विश्वास किया सेब यहीं से टूटा हुआ होगा।
उन्होंने बाग के स्वामी से कहा- ‘‘यह लिजिये आपका सेब नदी में बहा जा रहा था।” उसने कहा- ‘‘भाई, मैं तो बाग का रखवाला मात्र हूँ, इसकी स्वामिन तो बुखारा की राजकुमारी है।”
फकीर वहाँ से बुखारा के लिये रवाना हुआ। कई दिन की पैदल यात्रा के बाद वहाँ पहुँचा और वह सेब लेकर राजकुमारी जी के पास उपस्थित हुआ।
फकीर को एक सेब लेकर इस तरह आने का हाल सुन कर राजकुमारी हँस कर बोली- ‘‘अरे बाबा! इसको वहीं खा लेते, एक सेब यहाँ लाने की क्या आवश्यकता थी?”
फकीर न कहा- ‘‘राजकुमारी जी आपकी दृष्टि में एक सेब का कुछ भी मूल्य नहीं, पर इस एक सेब ने तो मेरा सारा धर्म, संयम और सारे जीवन की साधना नष्ट कर दी होती?”
समाज में ऐसे लोगों की कमी नहीं जो एक इसी चिन्ता में व्यस्त रहते हैं कि उनकी जीवन की प्रगति नहीं हो रही है। उनका सारा चिन्तन इस अवरोध के कारण खोजने में ही लगा रहता है। किन्तु कारण मिलता ही नहीं।
कभी उन्हें ऐसा लगता है कि उनकी प्रगति का अवरोध अर्थाभाव है। यदि उनके पास पैसा होता तो वे भी कोई व्यापार व्यवसाय करते। उससे और अधिक पैसा कमाते और उसके द्वारा और आगे बढ़ जाते और इस प्रकार धन से धन कमाते हुए बड़े आदमी बन जाते। उनके पास भी कोठी हो जाती, कार हो जाती, समाज में प्रतिष्ठा हो जाती और बस उनकी प्रगति की साध पूरी हो जाती।
कभी कोई सोचता है कि समाज ही उनकी प्रगति में बाधा उत्पन्न करता है। यदि समाज उन्हें रास्ता देता, उन्हें अवसर और अवकाश देता तो वे अब तक जीवन में बहुत दूर तक चल कर दिखला सकते थे। समाज ने उनका पथ अवरुद्ध किया, उनके साथ असहयोग किया, गति में रोड़े अटकाये। बस इसी से उनकी प्रगति न हो सकी और वे यथा स्थान पड़े रहे।
अनेक लोग स्वास्थ्य का रोना लेकर बैठे रहते हैं। जब तब कहते सुने जाते हैं- ‘‘क्या बतलायें प्रगति करने का जी तो बहुत करता है। उसकी योग्यता और क्षमता ड़ड़ड़ड़ है, साधन और सुविधा भी, अवसर भी आते रहते हैं। ड़ड़ड़ड़ मेरा स्वास्थ्य साथ नहीं देता। रोज ही कोई न कोई ड़ड़ड़ड़ जुकाम, खाँसी-खुर्रा अथवा ज्वर आदि लगा रहता है। जरा-सा काम किया नहीं कि रोग का जोर बढ़ जाता है, शरीर निढाल हो जाता है। मजबूरन आराम करना पड़ता है। अब बताओ कि स्वास्थ्य के इस असहयोग की स्थिति में प्रगति किस प्रकार हो सकती है।”
बहुत से लोग अपनी अप्रगति का दोष ईश्वर या प्रारब्ध को दिया करते हैं। कहते रहते हैं- ‘‘ईश्वर की इच्छा ही नहीं है कि मैं प्रगति करूं। जब कभी कोई कदम उठाता हूँ, वह कोई न कोई बाधा खड़ी कर देता है। भाग्य ही खराब है। जो काम करते हैं कुछ लाभ ही नहीं होता। कभी एक बार लाभ होता है तो दो बार घाटा आ पड़ता है। भाग्य की अनुकूलता या ईश्वर की इच्छा के बिना कोई भी उन्नति नहीं कर सकता। संसार में जिनके पास जो भी वैभव-विभव दिखलाई देता है वह सब भाग्य का खेल है। बिना भाग्य के कुछ भी तो नहीं होता है।
निस्सन्देह इस प्रकार विचार करने वाले बड़े दयनीय होते हैं। उनको यह ज्ञान नहीं होता कि प्रगति के रोकने वाले रोड़े अपने ही अन्दर होते हैं बाहर नहीं, और संसार में केवल एक आर्थिक प्रगति ही नहीं है और भी अनेक प्रकार की प्रगतियाँ हैं।
सबसे पहले ऐसे लोगों को यह समझ लेना चाहिये कि मनुष्य की इच्छा शक्ति में बड़ी शक्ति और बड़ा वेग होता है। ऐसी शक्ति जो परास्त नहीं की जा सकती और ऐसा वेग जो रोका नहीं जा सकता। ऐसे लोग उन लोगों के पास जायें और अध्ययन करें कि उनकी उस प्रगति के पीछे उनकी इच्छा शक्ति का कितना सहयोग रहा है।
उन्नतिशील व्यक्तियों के संपर्क में आने पर पता चलेगा कि उन्होंने जिस प्रगति के लिए इच्छा की, फिर उसको कभी बदला नहीं। एक बार खूब अच्छी तरह से सोच समझ कर इच्छा स्थिर कर लेने के बाद फिर वह उनका जीवन ध्येय बन जाती रही है। उनकी वह इच्छा केवल कोई प्रतिक्रिया अथवा उद्भावना न होकर एक संकल्प, दृढ़ संकल्प रही है। इच्छा में शक्ति ही तब आती है, जब उसका आन्दोलन समाप्त हो जाता है और संकल्प के रूप में परिपक्व हो जाती है।
संकल्प की तीव्रता, पवित्रता और सत्यता के प्रभाव से मनुष्य के आँतरिक शक्ति कोष्ठ खुल जाते हैं। उसमें इतना उत्साह, साहस और कर्मण्यता का उद्बोधन हो जाता है कि उसे अपने लक्ष्य के सिवाय न तो कोई बाधा दिखलाई देती है और न कोई अवरोध दृष्टिगोचर होता है। वह तन, मन को एकाग्र किये अपने लक्ष्य की ओर निरन्तर बढ़ता रहता है। पथ पर बाधायें आती हैं, उनका आना चिर स्वाभाविक है। किन्तु उनके आने पर उसकी गति उसका प्रवाह कुण्ठित नहीं होने पाता। या तो वह अपनी गति शक्ति से उन बाधाओं को पीछे ढकेल देता है अथवा तीव्रता से रास्ता बचा कर निकल जाता है। वह बाधाओं को पकड़ कर बैठ नहीं जाता और न उनके विषय में चिन्ता करता हुआ अपनी शक्ति और समय खराब किया करता है।
संकल्पशील व्यक्ति की गति पहाड़ी नदी की तरह होती है। अपने लक्ष्य-सागर की ओर एकनिष्ठ भाव से अपनी पूरी शक्ति के साथ जाती हुई नदी या दो बीच के पत्थरों को ढकेलती अवहेलती चली जाती है अथवा उसकी उपेक्षा कर आस-पास से मार्ग बना लेती है। वह किसी प्रकार अपनी गति में व्यवधान नहीं आने देती। यही तो वह विशेषता है, जिसके रोड़े तो दूर पहाड़ और जंगल ऊँचाई और निचाई उसके प्रवाह को रोकने में समर्थ नहीं हो पाते। और वह अपने लक्ष्य सागर को पा ही लेती है।
प्रगति की कामना करने और अप्रगति का दोष दूसरों को देने वालों को अपने अन्दर झाँक कर देखना चाहिये कि क्या जिस प्रगति को वे करना चाहते हैं, उसके लिये उनके अन्तःकरण में शत-प्रतिशत सच्ची इच्छा है या नहीं। निश्चय ही वे वहाँ उसका अभाव पायेंगे। जिस दिन वे इस अभाव को पूरा कर लेंगे उनमें पहाड़ी नदी की गतिशीलता आ जायेगी और वे अपना अभीष्ट अवश्य प्राप्त कर लेंगे।
समाज, ईश्वर अथवा प्रारब्ध को दोष देने वालों को भी अपने भीतर ही झाँक कर देखना चाहिये और खोज करनी चाहिये कि वे जिस प्रगति की आकाँक्षा करते हैं, वह प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप में समाज विरोधी अथवा अहितकर तो नहीं है। यदि ऐसा है तो उन्हें समाज का विरोध उठाना ही पड़ेगा और समाज निश्चय ही उनका विरोध करने का अधिकारी है। असामाजिक तत्वों का विरोध करना समाज का नैतिक धर्म है, जिसका निर्वाह किया ही जाना चाहिये।
यदि ऐसा नहीं है तो उन्हें देखना चाहिये कि कहीं वे अपने हाथ-पाँव छोड़ कर पूर्ण रूप से, अपनी प्रगति के लिए समाज पर ही तो निर्भर नहीं हैं। यदि ऐसा है तो भी वे अपनी मनोकामना में कृतकृत्य न होंगे। समाज का यह कर्तव्य नहीं है कि वह अवसरों को थाली में रख कर आपके सामने ले आये। अवसर तो इस व्यस्त और संघर्ष पूर्ण समाज की गति तथा कोलाहल में बिखरे रहते हैं। जिन्हें आवश्यकता होती है, जो प्रगति करना चाहते हैं, वे अपनी बुद्धि, विवेक तथा सूक्ष्म दृष्टि लगा कर उनकी खोज करते हैं और फिर उन्हें पकड़ कर अपने लक्ष्य-पथ की ओर चल निकलते हैं।
अप्रगति का दोष ईश्वर अथवा प्रारब्ध को देने वालों को यदि नास्तिक मान लिया जाये तो भी अनुचित न होगा। सीधी-सी बात है, जो ईश्वर को मानता है उसमें विश्वास रखता है, वह उसकी दया, करुणा और समदर्शिता में आक्षेप नहीं कर सकता। उस पर दयालु पिता ने अपने सभी पुत्रों के लिये उन्नति तथा प्रगति के द्वार समान रूप से खोल रक्खे हैं, ऐसी दशा में यह मानना या कहना कि ईश्वर की इच्छा नहीं है कि मैं तरक्की करूं। उस सर्वशक्तिमान की प्रतिष्ठा में धृष्टता है। ऐसे नास्तिक की सारी शक्तियाँ और सारी विशेषतायें नकारात्मक होकर कुण्ठित हो जाती हैं।
हाँ प्रारब्ध को एक बार कुछ आरोप अवश्य दिया जा सकता है। तथापि यह अवश्य मानना होगा कि उसकी निषेधात्मक शक्ति में भी हम स्वयं ही दोषी होते हैं। प्रारब्ध इस जन्म में पूर्वजन्म के कर्मों का परिपाक होता है। हो सकता है हमने उस जन्म में दूसरों की प्रगति में बाधा डाली हो, अपनी प्रगति तथा उन्नति को समाज के लिए कष्टदायक बनाया हो और उसी के अनुसार हमारे प्रारब्ध की इस प्रकार निषेधात्मक रचना हुई हो। प्रारब्ध मनुष्य के पूर्ण कर्मों के फलों का ही दूसरा नाम है।
तथापि मनीषियों ने मनुष्य को अपने भाग्य का निर्माता आप बतलाया है। जिस प्रकार किसी ने असत् अथवा निषेधनीय कर्मों द्वारा अपने अभाग्य का निर्माण किया है, उसी प्रकार वह सत् तथा स्वीकार्य कर्मों द्वारा सौभाग्य का निर्माण कर सकता है।
अस्तु, अपनी अप्रगति का दोष किसी दूसरे को देना अथवा उसका कारण कहीं बाहर देखना खोजना गलत है। मनुष्य अपने विचारों, भावनाओं तथा आन्तरिक स्थितियों के अनुसार ही प्रगति अथवा अप्रगति का भागी बनता है। उन्नत उपकारी तथा सामंजस्यपूर्ण लक्ष्य का निर्धारण करिये, अपनी पूरी इच्छा शक्ति के साथ शारीरिक, मानसिक जो भी क्षमतायें हैं पूर्णरूप से लगाइये ओर देखिये कि आपको समाज, ईश्वर, स्वास्थ्य तथा प्रारब्ध का सहयोग मिलता है या नहीं। लक्ष्य जितना ही व्यापक, उन्नत और लोभ रहित होगा यह सारा सहयोग भी उसी अनुपात से मिलेगा और उसी अनुपात से प्रगति होती जायेगी।
साथ ही यह न केवल खेद ही बल्कि आश्चर्य का भी विषय है कि अधिकाँश मनुष्य आर्थिक अथवा भौतिक प्रगति को प्रगति मानते हैं और उसी के लिये लालायित तथा प्रयत्नशील होते हैं। जब कि इससे कहीं ज्यादा सुन्दर और महत्वपूर्ण प्रगतियाँ मानव-जीवन में पड़ी हुई हैं।
चारित्रिक, नैतिक तथा आध्यात्मिक प्रगतियाँ उसी महत्वपूर्ण कोटि की प्रगतियाँ हैं। यदि इन्हें ही मनुष्य जीवन की वास्तविक प्रगतियाँ मान लिया जाये तो भी अत्यधिक उपयुक्त होगा। यदि मनुष्य आर्थिक प्रगति के लिए अपनी शक्ति का व्यय न करके उनका उपयोग इन पुण्य प्रगतियों में लगाये तो निस्संदेह उस सुख, उस आन्तरिक महत्व को पा सकता है, जिसके सन्मुख भौतिक सम्पदायें कोई मोल की भी न रह जायें।
कितना अच्छा हो कि मनुष्य आर्थिक प्रगति के लिये डडडड और पाप, पश्चाताप कमाने के स्थान पर अपने शारीरिक तथा मानसिक विकास की ओर अग्रसर हो संतोषपूर्ण जो ईमानदारी से मिलता है उसी में आवश्यकताओं को पूरा करता हुआ परोपकारी, परसेवी और परमार्थी बने तो समाज ही नहीं सारे संसार का सहयोग उसके लिये झुक पड़े और सारे खजाने उसके लिये खोल दिए जायें। तब भी उसे अपनी मन-शाँति और आत्मिक संतोष के सन्मुख उनकी न तो आवश्यकता रहे और न उसके प्रति आकर्षण। महात्माओं के पास एक कानी-कौड़ी भी नहीं होती पर बड़े-बड़े धनाढ्य तथा राज्याधिकारी भी उनके पैरों पर झुका करते हैं। यह चमत्कार उस आध्यात्मिक चरित्र का ही तो होता है, जिसका विकास वे साँसारिक लिप्साओं से दूर रह कर किया करते हैं।
भौतिकता को छोड़ कर आध्यात्मिक लक्ष्य की ओर चलने वालों को न तो समाज के सहयोग की अपेक्षा रहती है और न उसके विरोध की शिकायत। इसके लिये न तो धन की आवश्यकता होती है और न अवसर की आवश्यकता। यह तो केवल वह प्रगति है, जो बिना किन्हीं साधनों के स्वयं अपने आप अकेले की जा सकती है। इस प्रगति का विरोधी भी कोई नहीं होता है। यदि कोई होता है तो अपनी ही वृत्तियाँ। मनुष्य को चाहिये कि वह अपनी वृत्तियों पर नियन्त्रण रखता हुआ, संतोषपूर्वक अपने नैतिक तथा शारीरिक चरित्र का विकास करते हुए आध्यात्मिक प्रगति करे, उसी की कामना करे और उसी के लिये पुरुषार्थ। इसी प्रगति में संसार की सारी प्रगतियाँ और सारे सुख-वैभव सन्निहित हैं। जिसने आध्यात्मिक प्रगति कर ली, उसने मानो सारी प्रगति एक साथ ही कर ली, इसमें रंचमात्र भी सन्देह नहीं।
सत्य बोलने और न्याय देने की आवश्यकता आ पड़े तो अपनी जीभ को मुक्त कर दो। किसी को स्नेहपूर्ण समादर की आवश्यकता हो, तुम्हारे सामने उपकार के प्रति आभार प्रदर्शन का अवसर हो तो जीभ को मुक्त छोड़ दो। जीभ की मिठास जीवन का मधुरस है, उसे इन चार अवसरों पर पियो।
पर कड़वी जवान जंगल का शेर है उसके पास जाने से सभी डरते हैं, तुम उस पर हमेशा अंकुश रखा करो। बेरोक-टोक विचरण करने दोगे तो वह तुम्हारे जीवन को उजाड़ कर रख देगी। -रेमिसिस (मिश्र के सम्राट्)
आज हम उस आध्यात्मिक मार्ग को- जिस पर आगे चल कर शाश्वत सुख, अक्षय शाँति और अनिवर्चनीय संतोष का साक्षात्कार होता है- छोड़ कर भौतिकता के उस मार्ग पर दौड़ पड़े हैं, जिस पर अशाँति और असंतोष के सिवाय कुछ भी मिल सकने की सम्भावना नहीं। यही कारण है कि आजीवन सुख-शाँति के लिये लालायित तथा प्रयत्नशील रहने पर भी दुखी और अशाँत रहते हैं। विपरीत मार्ग पर अनुकूलता के मिलने का प्रश्न ही नहीं।
मनुष्यों के स्थायी सुख की समस्या हल करने के लिये समय-समय पर मार्ग-दर्शन कराने वाले अनेक लोग आते रहे और अपने-अपने ढंग से संसार का निर्देश तथा उपदेश करते रहे। उनके मानने वाले भी हुए और शीघ्र ही उस एक वर्ग का एक सम्प्रदाय बन गया। इस प्रकार धार्मिक वर्गों अथवा सम्प्रदायों, मत-मतान्तरों की संख्या तो बढ़ती गई किन्तु मूल समस्या जहाँ की तहाँ बनी रही।
सारे मत-मतान्तरों और सम्प्रदायों का दावा है कि उनका मार्ग और उनके उपदेश सच्चे हैं। मनुष्य को शाश्वत सुख की ओर ले जाने वाले हैं। जो उनका अनुसरण करेगा, स्वर्ग, मुक्ति अथवा मोक्ष का अधिकारी बनेगा, परमात्मा के सान्निध्य में पहुंच कर अमृत-पद प्राप्त करेगा। किन्तु सत्य उनके दावे के बिल्कुल विपरीत दृष्टिगोचर होता है। अन्य लोगों की बात तो दूर स्वयं उन सम्प्रदायों को मानने वाले, उनके उपदेशों और सिद्धांतों पर ईमान लाने वाले कष्टों के बीच यातना पूर्ण जीवन बिताते देखे जाते हैं। वर्तमान में तो वे सुखी नहीं हैं, भविष्य में भी सम्भावना नहीं दीखती।
इन विभिन्न सम्प्रदायों का प्रचार करने वालों का भले ही यह मन्तव्य न रहा हो किन्तु प्रत्यक्ष में देखा यह जाता है कि वे मनुष्य के लिये सुख के हेतु न बन कर विरोध एवं विद्वेष के कारण बन गये। उनके अनुयायी असमान सम्प्रदाय वालों से ही नहीं अपनी शाखाओं, प्रशाखाओं से लड़ने-झगड़ने और घृणा करने लगे। ऐसी प्रतिकूल अवस्था में सुख-शाँति कहाँ?
निश्चय ही सभी धर्मों, मजहबों, सम्प्रदायों और मतों का मूल मन्तव्य और आधारभूत सिद्धांत सुखदायक ही हैं, और यदि उनका ईमानदारी से पालन किया जाये तो कोई कारण नहीं कि मनुष्य दुखी बना रहे। किन्तु कठिनाई तो यह है कि लोग धर्म के सच्चे स्वरूप और वास्तविक तत्व को भूल कर बाह्य क्रियाओं, रूढ़ियों तथा परम्पराओं के अन्ध-पालन को ही सर्वाधिक महत्व देने लगते हैं, आन्तरिक पवित्रता और सत्याचरण की ओर ध्यान नहीं देते। परमात्मा को सर्वव्यापी और सर्वाधार मानते हुए भी अपने भिन्न अस्तित्व की ही भावना रखते हैं। सारे मनुष्यों को उसी का अंश कहते हुए भी किसी से भ्रातृत्व-भाव रखने को तैयार नहीं। सबमें समानता की मान्यता रखते हुए भी जिस प्रकार अपने लिये सुख-सुविधा, न्याय और उदारता आदि की अपेक्षा करते हैं, उस प्रकार दूसरों के लिए उसकी आवश्यकता अनुभव नहीं करते। वास्तविकता यह है कि उनके यह सब आदर्श केवल मुख से कहने भर के लिये ही होते हैं, आचरण में उनका अस्तित्व शून्य ही रहता है।
व्यक्तिगत स्वार्थ के सम्मुख उन्हें मानवता, एकता, बन्धुत्व, एकात्मता, सत्य अथवा न्याय के आधारभूत सिद्धांतों को तिलाँजलि देते देर नहीं लगती। जहाँ हृदयों में विषमता और स्वार्थपरता का विष भरा हो वहाँ धर्म के सिद्धांतों का मौखिक प्रतिपादन क्या काम आ सकता है? मनुष्य धर्म अथवा आध्यात्मिकता का सत्यस्वरूप समझें और उन्हें नित्याचरण में प्रस्फुटित करने लगे तो सुख-शाँति के लिये नित्य नये सम्प्रदायों तथा सिद्धांतों की आवश्यकता ही न रह जाये। यदि आज हम सब विविध मतमतान्तरों के भ्रमजाल में न पड़ कर इस एक सत्य को अन्तःकरण में धारण करके तदनुरूप आचरण करने लगें कि सृष्टि के सारे प्राणी ईश्वर से प्रवाहित एक ही दैवी तत्व के भिन्न-भिन्न स्वरूप हैं, हम सबमें एक ही आत्मा ओत-प्रोत है और हम सबके सुख-दुख समान हैं तो निश्चय ही संसार के संकटों तथा दुख से मुक्त होकर शाश्वत सुख-शाँति के अधिकारी बन जायें। एकात्मता का यह भाव कोई कठिन बात नहीं है, आवश्यकता केवल उदारतापूर्वक विचार और विश्वास करने की है। सत्य को एक बार साहसपूर्वक स्वीकार कर लेने से मनुष्य का मस्तिष्क मुक्त होकर संकीर्ण सीमाओं के बाहर निकल कर सर्वव्यापी अनुभूति से ओतप्रोत हो जाता है।
यह अखिल विश्व एक ही अनन्त चैतन्य सत्ता से ओत-प्रोत है, जिसे परमात्म-तत्व भी कहा जाता है। न तो वह किसी से भिन्न है और न कोई उससे ही। सम्पूर्ण सृष्टि वस्तुतः उसी एक अगोचर परमात्म-तत्व की दृश्यमान अभिव्यक्ति है। हम सब उसी से उत्पन्न होते हैं, उसी में रहते हैं और उसी में लीन हो जाते हैं, उससे भिन्न हमारा कोई अस्तित्व नहीं है। हमारा जीवन उसी दिव्य प्रवाह की एक तरंग है, जो उसी से उठती और उसी में रमण करती रहती है। अन्तर केवल इतना है कि परम प्रवाह अनन्त, असीम और अगाध है और हम सब उस अपरिमेय कल्लोल की छोटी-छोटी कलायें हैं। भिन्न दीखते हुए हम और हमारा मूल, मूलरूप में उसी प्रकार एक हैं, जिस प्रकार एक किरण और किरणमाली सूर्य।
इस एक सत्य को स्वीकार कर लेने पर, कि अनन्त-जीवन रूप परमात्मा के साथ हमारी एकात्मता है, मनुष्य का मन बन्धन रहित होकर निष्पक्ष बन जाता है। तदनुसार ही उसका जीवन ढल जाता है। क्या करना है और क्या नहीं करना है, इसकी चिन्ता उसे नहीं करनी पड़ती, वह अनन्त एवं चेतन शक्ति स्वयं ही उसकी जीवन गति को नियन्त्रित एवं निर्देशित करने लगती है। जो दिव्य प्रवाह सारी सृष्टि में एक रस व्याप्त है, उसी में प्रवाहित होने लगने से यह भार स्वरूप संसार आनन्द का अगाध भण्डार अनुभव होने लगता है। जैसे-जैसे मनुष्य उस अनन्त जीवन के साथ अपने अंश रूप जीवन का ऐक्य अनुभव करता जाता है, वह वैसे-वैसे स्वर्गीय वातावरण में पहुँचता जाता है। उसकी समस्त आवश्यकतायें अपने आप पूरी होने लगती हैं- उसकी दुर्बलता-सबलता, निस्तेजता-तेजस्विता, भय-निर्भयता, शंका-समाधान, दुख-सुख और शोक-संताप में बदलने लगते हैं। उसे शाँति, शक्ति और समष्टि का साक्षात्कार होने लगता है।
मनुष्य के लिये दुखों का कोई कारण नहीं है। वह तो स्वयं ही सुख का स्वरूप है। दुख का कारण उसका स्वयं का अहंभाव है, जिसके आधार पर वह पिता-पुत्र, स्वजन, सम्बन्धियों के संकीर्ण घेरे में घिरा अपना सत्यस्वरूप नहीं पहचान पाता। अपना सम्बन्ध आत्मा से स्थापित करने के बजाय मोहवश संसार के असत्य नाते-रिश्तों में फँसा रहता है। आत्मा ही हमारा सच्चा बन्धु और हितैषी है- ऐसा विश्वास लेकर चलने वाले संकीर्णता से निकल कर व्यापकता की ओर अग्रसर होने लगते हैं, तब उस दशा में उनकी मनुष्य ही नहीं प्राणी मात्र अपने बन्धु और हितैषी दिखलाई देने लगते हैं। पशु-पक्षी और पेड़-पौधों में मित्र भाव उत्पन्न हो जाता है। सम्पूर्ण जगत् के अपने हो जाते हैं। इस विभुत्वपूर्ण स्थिति में आनन्द के अतिरिक्त और कौन-सी अनुभूति हो सकती है?
लोगों की यह धारणा भ्रांतिमूलक है कि परमात्मा किसी को सुखी अथवा समृद्धिशाली बनाता है। परमात्मा स्वयं अपने हाथ से किसी को वैसा नहीं बनाता। मनुष्य स्वयं ही अपने आचरणों से वैसा बन जाता है। जो जितना ही सर्वमूल परमात्म-तत्व की ओर अभिमुख होकर उसके आदेशों का पालन करता जायेगा, वह उतना ही आपसे आप सुखी और समृद्धिशाली बनता जायेगा। इसी बात को स्पष्ट करते हुए भगवान् ने गीता में कहा है- ‘‘आत्मा ही आत्मा का बन्धु और आत्मा ही आत्मा का शत्रु है। अर्थात् हम स्वयं ही अपने मित्र और स्वयं ही अपने शत्रु हैं और कोई दूसरा हमारा मित्र अथवा शत्रु नहीं है। जितने ही हम अपने अन्दर प्रवाहमान परमतत्व के प्रति अनुकूल होते जायेंगे, जगत् में हमारा और हमारे प्रति मित्र-भाव बढ़ता जायेगा और जितना ही हम इसके विपरीत डडडड में आचरण करेंगे, शत्रु-भाव की वृद्धि करते जायेंगे। जितना ही हम अपने आदर्शों को उन्नत और अपने हृदय को दिव्य-शक्ति की ओर उन्मुख होने का अवसर देंगे उतना ही एकात्मता से उद्भूत आनन्द के अधिकारी बन जायेंगे।
अहंकार जन्य भौतिक भावना ही दुखों का मूल कारण है। हमारी आत्मा की परिधि जितनी संकीर्ण होती जाती है, व्यक्तित्व का दायरा जितना छोटा होता जाता है उतनी ही घुटन हमें अनुभव होती है। इसके विपरीत ज्यों-ज्यों हम अध्यात्मवाद की ओर, आत्मा एवं परमात्मा के ऐक्य की ओर प्रसार करते जायेंगे, हम उन्मुक्त पक्षी की भाँति अनन्त के आनन्द-प्रवाह में बहने लगेंगे। अध्यात्मवाद का सारा तत्व केवल इस एक मान्यता में सन्निहित है कि हम सब एक ही दिव्य-प्रवाह की तरंगें हैं, जो एक साथ उसमें रमण कर रही हैं। हम सब न तो एक दूसरे से भिन्न हैं और न असमान। सर्वसाम्य ही हमारा व्यापक और वास्तविक स्वरूप है। हम सबको अपने समान समझें। दूसरों के सुख-दुख को अपना अनुभव करें। दूसरों की कठिनाइयों को अपनी कठिनाई और दूसरों की सुविधाओं को अपनी सुविधा मान कर चलें तो अन्याय अथवा स्वार्थ की कोई परिस्थिति ही न उत्पन्न हो। सभी भाई-भाई की तरह एक दूसरे से प्रेम और सहयोग करने लगें। ऐसी दशा में आत्म-संतोष और आन्तरिक उल्लास की अभिवृद्धि निरन्तर होती रहना स्वाभाविक ही है। जिस प्रकार विषम तत्व शरीर को व्याधियों को अधिकार में दे देते हैं, उसी प्रकार विषम भाव हमारे अन्तःकरण को मलीन कर दुखानुभूति के अनुकूल बना देते हैं। अन्यथा परम-तत्व के पावन प्रवाह से ओत-प्रोत सृष्टि में दुख-क्लेश हैं कहाँ?
जिन भौतिक विभूतियों के लिये हम अपने को स्वार्थी और संकीर्ण बना लेते हैं, सुख का निवास उनमें नहीं है। दुख का निवास स्वयं अपनी आत्मा में है, जिसका प्रस्फुटन आत्म-प्रसार के साथ ही होता जाता है। सब प्राणियों में भगवान् है, एक ही आत्मा सबमें समाया हुआ है, अपने ही समान सबको सुख-दुख होता है। अपमान और अन्याय सबको बुरा लगता है। इन तथ्यों को हृदयंगम कर लेना ही अध्यात्मवाद है, जो उस वास्तविक सुख-शाँति का आधार आदिकाल से मनुष्य जिसके लिये लालायित और प्रयत्नशील होता आ रहा है।
हमें इस बात को समझने और हृदयंगम करने में क्या कठिनाई हो सकती है कि जिस जगत् में हम रह रहे हैं, उसके पीछे एक ऐसी अनन्त एवं सामर्थ्यशाली सत्ता अवस्थित है, जो सबमें व्याप्त है, सबको जीवन प्रदान करती है और सबमें प्रकट होती है। वही इस संसार या विश्व का सर्वोच्च सत्य है। उस स्वयंभू तत्व में से ही यह सब कुछ आया है और सदा-सर्वदा आता रहेगा। हम सब उसी के अंश अथवा कलायें हैं। उसी से प्रकट हुए हैं और उसी में स्थित हैं। अन्य विषयों में भले ही कोई मतभेद रहे पर इस चिरन्तन सत्य के विषय में सारे धर्म, सम्प्रदाय और मत-मतान्तर एकमत हैं कि हमारे सबके पीछे, संसार के प्रत्येक पदार्थ के पीछे एक चैतन्य स्वरूप परमात्मा की सत्ता ही काम कर रही है। उसी में से प्रत्येक जीवन प्रकट होता है, फिर वह चाहे अपना हो या किसी दूसरे का। सारे व्यक्तिगत जीवन इसी समष्टि रूपी इस अनन्त प्रवाह से ही उद्भूत होते हैं।
जिसने संसार के इस सर्वोच्च सत्य को समझ लिया और आत्मा का सम्बन्ध परमात्मा से स्थापित कर लिया। उसे सारा संसार आत्मरूप ही अनुभव होने लगता है। उसके सारे बन्धन और सारी सीमायें टूट जाती हैं और वह आनन्द के अनन्त सागर में निमग्न हो जाता है। फिर उसके लिये न कोई कष्ट रह जाता है और न दुख। उसके रोम-रोम से इस प्रकार का अनिवर्चनीय संगीत मुखर होने लगता है-
“अहो, मैं अनन्त काल के लिये अनन्त जीवन में विद्यमान हूँ। अब मुझे सब वस्तुयें दिव्य जान पड़ती हैं। मैं स्वर्ग के योग्य पदार्थ ग्रहण करता हूँ और स्वर्गीय अमृत का पान करता हूँ। जब मैं इन्द्रधनुष में चमके हुए रंग देखता हूँ, तब मुझे उसमें अपनी ही आत्मा की सुन्दरता दिखाई देती है। जब मैं पक्षियों को आनन्दपूर्वक गाते हुए सुनता हूँ, तब ऐसा लगता है मानो मेरी आत्मा ही पक्षियों के रूप में गाती फिरती है। जब मैं फूलों को हँसते हुए देखता हूँ तब ऐसा अनुभव होता है, मानो मैं स्वयं ही उनमें सुन्दरता बन कर हँस रहा हूँ और सुगन्ध बन कर बिखर रहा हूँ”
स्वार्थ एवं संकीर्णता के बन्धन तोड़ो, अपने अनन्त रूप को पहचानो और आत्मा द्वारा परमात्मा से सामंजस्य स्थापित कर संसार के व्याप्त आनन्द तरंग के साथ प्रवाहित रहो, तुममें आनन्द और सुख-संतोष का आविर्भाव स्वयं होने लगेगा।
आज के संसार की अशाँति का मूल कारण धार्मिक अनास्था है। एक नई बर्बरता जिसने प्राचीन धर्म और संस्कृति को पदच्युत कर दिया है, के कारण मंगलमय विश्व अमंगलकारी परिस्थितियों से पूरित हो रहा है। लोगों ने ‘‘शक्ति के अधिकार में सब कुछ’’ की पाशविक धारणा बना ली है, इसी कारण छल, शोषण, अत्याचार, वर्गभेद और न जाने कितने दुराचार बढ़ गये हैं, आज की परिस्थिति में उद्धार का एक ही उपाय है और वह यह कि धर्म की सच्ची भावना का प्रवर्त्तन हो।
विश्व में जो भी वैभव, विकास की विभूतियाँ हैं, वह सब धर्म के किसी न किसी अंश को ही लेकर जन्मी है। विचारों की कोई भी गम्भीर साधना, विश्वासों की कोई भी खोज, सद्गुणों के अभ्यास का कोई भी प्रयत्न यह सब उन्हीं स्रोतों से उत्पन्न होते हैं, जिनका नाम धर्म है।
धर्म का बड़ा व्यापक अर्थ है। धर्म का अस्तित्व उन सभी परिस्थितियों में विद्यमान रहता है, जिनमें शाश्वत की झाँकी हो हो। मन के द्वारा सौंदर्य, शिवत्व और सत्य की खोज धर्म है। बच्चा माता के स्तनों का दूध पीता हुआ चपलता से कभी इधर, कभी उधर देखता है, कभी अधिकार पूर्वक किसी अंग को पकड़ता, झकझोरता है, उसमें जो पवित्रता और निष्कलुषता होती है वह धर्म है। जंगल में बैठा हुआ अशिक्षित व्यक्ति आकाश की ओर देखता है और प्रयोगशाला में बैठा हुआ वैज्ञानिक एक तत्व का ध्यानमग्न परीक्षण करता है एक अज्ञान से, दूसरा ज्ञान से परमात्मा की सृष्टि के प्रति आश्चर्य चकित होता है। स्थिति और अवस्था में भेद होते हुए भी दोनों ही धर्ममय स्थिति में है। जहाँ शाश्वत की खोज, जहाँ निष्कलुष आनन्द की सृष्टि, जहाँ उद्दात्त जीवन की निष्ठा है, वहाँ धर्म मूर्तिमान है। यह धर्म ही मनुष्य को ऊँचे उठाता है और समाज संसार में शाँति का सृजन करता है।
वाल्ट डिज्ने लिखते हैं- “एक बार मैं अपनी ‘मरुस्थल’ फिल्म बना रहा था तो पशु-पक्षियों के साथ मेरी मैत्री ऐसी प्रगाढ़ हो गई मानो उनका सारा जीवन मेरे लिए एक खुली पुस्तक है। हमारे आपके भीतर पशु-पक्षियों की जो आदतें आज भी देखने में आती हैं, वे स्पष्ट करती हैं कि पशुत्व से मनुष्यत्व तक की मंजिल बरसों के हिसाब से लम्बी रही हो, फासले के नाम पर कुछ ही इंचों की है। कल जो पशु था आज वही मनुष्य है। विकास की इस गति को कोई नहीं रोक सकता किन्तु मेरे लिये दुःख की सबसे बड़ी बात यह है कि पशु को हम अपने से हीन समझते हैं। इसके विपरीत बात असल में यह है कि पशु व मनुष्य में सिर्फ शरीर परिवर्तन का ही अन्तर होता है। गुण या अवगुण का नहीं। कई बार तो मैंने देखा है कि पशु-पक्षियों के जो गुण मनुष्य में आज विद्यमान है, वे ऐसे विकृत हो गये कि पशुओं को भी मेरी तो धारणा है, मनुष्यों से नफरत होती होगी।’’
मनुष्य में जो विशेषता है वह प्राणिमात्र में आत्मीयता प्रेम और विश्वास का आदान-प्रदान है। इसी का नाम धर्म है, यदि मनुष्य उससे वंचित है तो वह मनुष्य नहीं। मनुष्यता का गौरव केवल धार्मिकता है।
शिकारी रेनाल्ड ने लिखा है- “मेरे सामने एक रेगिस्तानी शेर का उदाहरण है। रेगिस्तानी शेर बड़ा खूँखार होता है। मरुस्थल के जीवन में स्वार्थपरता और क्रूरता स्वाभाविक से हो गये हैं किन्तु मैंने देखा कि बलवान से बलवान जानवर भी प्रेम, दया और भाई-चारे की मर्यादा नहीं तोड़ता। शेर पानी पीने गया। धूप और गर्मी का तो नाम ही रेगिस्तान है और भी छोटे-छोटे जीव पानी के लिए दौड़े आ रहे थे। शेर कुण्ड से काफी दूर छुप कर बैठ गया, यद्यपि वह बहुत प्यासा था। जब सब जानवर पानी पी गये तब वह कुण्ड के पास आया। थोड़ा पानी बचा था उससे प्यास नहीं बुझ सकती थी। थोड़े से पानी पर दृष्टि डाल कर उसने चारों ओर देखा, अजीब-सी तृप्ति उसकी आँखों से चमक रही थी। अब कोई जानवर पानी पीने के लिए शेष नहीं रहा जब उसे यह विश्वास हो गया तो उसने उतने ही पानी से गला सींच लिया। जंगल के राजा ने अपने प्राणों की अपेक्षा धर्म को प्यार किया और शक्ति का, सम्पन्नता का तकाजा भी तो यही है कि उसकी छाया में दूसरे फलें-फूलें।”
हमारे सामने यह बड़ा अनोखा उदाहरण है। मनुष्य समाज में शान्ति और स्थिरता का आधार भी यही है कि मनुष्य में दूसरों की आवश्यकताओं को पहचानने और प्राथमिकता देने में संकोच न करे, उसे अपने हित से बड़ा मानें। धर्म के बाह्यडम्बरों की आवश्यकता नहीं यदि मनुष्य हृदय की निर्मल भावनाओं को ही परिष्कृत और प्रसारित कर लेता है, तो यह बहुत बड़ी उपलब्धि है। इसी का नाम धर्म है। इसी का नाम धारण करना, जीवन लक्ष्य को प्राप्त करना, सत्य में समाहित होना आदि-आदि है। धर्म कोई वर्ग, सम्प्रदाय, कुल, जाति अथवा गोत्र की उच्चता, निम्नता का माप-दण्ड नहीं, वह अन्तरात्मा के परिष्कार का माध्यम और सुखी समाज का साधन है, जिसमें किसी का अहित न हो।
सच्चे अर्थों में धार्मिक व्यक्ति का धर्म बिलकुल सीधा सादा होता है। जिसमें धर्म-विश्वासों, धर्म सिद्धांतों के मनोभावों या आधिदैविक तत्वों की बेड़ियां नहीं होतीं। यह उस आत्मा की वास्तविकता का प्रतिपादन करता है, जो काल और देश के ऊपर व्याप्त है। वह मानव-मात्र को प्रेम, एकता, आत्मीयता से रहने, व्यवहार करने, बढ़ने और फलने-फूलने का समान अवसर प्रदान करता है। अपनी व्यवहारिक अभिव्यक्ति के लिये धर्म की सूक्ति है ‘‘जो भी भला करता है वह भगवान का है” न्यायपूर्वक आचरण करना, सौंदर्य से प्रेम करना और सत्य की भावना के साथ विनम्रतापूर्वक चलना यह सबसे ऊँचा और वास्तविक धर्म है। यह अनुभव किसी एक जाति या एक प्रदेश तक सीमित नहीं है।
गाँधी जी के जीवन में इसी विशेषता के दर्शन होते हैं। उन्होंने धर्म का दिखावा नहीं किया वरन् उसे जीवन की व्यवहारिकता में ढाला इसलिये वे एक महान आत्मा के रूप में प्रतिष्ठित हुये। वे सच्चे अर्थों में धार्मिक भावना को ग्रहण करने के लिए हमें प्रेरणा देते हैं, इसलिये वे हमें मान्य हैं। उनकी घोषणा है कि प्रेम मनुष्य की प्रकृति के अनुकूल है, यदि हम अपनी सामाजिक चेतना ऊपर प्रेम और सर्वात्म-भाव का प्रभाव पड़ने दें तो इसी से स्वतन्त्रता और सामाजिक उन्नति हो सकती है। इस घोषणा के आधे हिस्से को सफल करके उन्होंने अनूठा उदाहरण भारत ही नहीं समग्र विश्व को दिखा दिया। संसार उसे चमत्कार मानता है। पर वह धर्म की ही शक्ति थी, जिसने इतने भारी काम को इतना सरल बना कर दिया दिया। पीड़ा यह है कि सामाजिक उन्नति के दूसरे लक्ष्य की प्राप्ति के लिये उनका शरीर ही नहीं रहा। यह काम तो अब वर्तमान पीढ़ी को पूरा करना है।
स्वामी विवेकानन्द जी का कथन है- “भारत की संस्कृति अक्षय-अमर इसलिये रह सकी है कि उसने नीति को नहीं धर्म को ही अपने जीवन में अनुप्राणित किया है। नीति ऐसा कन्या है, जो वरमाला लेकर प्रेय के मण्डप में खड़ी पति की प्रतीक्षा करती रहती है किन्तु धर्म प्राणि मात्र को अपने गन्तव्य पर पहुँचाने वाला अविफल महायान है, वह धारण करता है, किसी के सहारे का भिखारी नहीं।’’
प्रश्न यह है कि धर्म-शास्त्र मनुष्य के लिये है या मनुष्य धर्म शास्त्र के लिये? हमारा उत्तर स्पष्ट है। हम किसी परम्परा के अन्ध-भक्त नहीं, किसी नियम के सेवक नहीं। अनेक दवाओं में जो सही होती है, जो डाक्टर स्वास्थ्य-कारक बताता है उसे ग्रहण कर लेते हैं, शेष उससे बढ़िया और कीमती होने पर भी हम नहीं खाते। जो सबके लिए हानि रहित और स्वास्थ्यकारी हो वही औषधि ग्रहणीय है। एक दूसरे के साथ न्याय के आधार पर काम करना, औरों की सहायता करना, सब पर दयादृष्टि रखना, शाश्वत-सत्य की उपासना करना, सर्व-मैत्री, सबसे प्रेम की भावना रखना यह बातें सबके लिये संतोषदायक, हितकर और आनन्ददायी है। इन्हें स्वीकार करने में कभी किसी भी मनुष्य को आपत्ति नहीं हो सकती। इन्हीं का नाम- धर्म-जीवन। जब ऐसे मानव जीवन का प्रवर्तन होगा, तभी सच्ची सुख-शाँति के दर्शन उपलब्ध होंगे।
जीवन की सर्वोपरि सफलता इसी बात में है कि मनुष्य अपने लिए सम्माननीय स्थिति प्राप्त करे, संसार से धनी, निर्धन, विद्वान, मूर्ख, निर्बल, बलवान सभी को एक दिन जाना पड़ता है। वह जो कुछ धन-दौलत, वैभव-विभूति, सुख-दुःख उपार्जित करता है, सब यहीं इसी संसार में छूट जाता है। कुछ भी साथ नहीं जाता है। साथ यदि कुछ जाता है तो जाती है वह शाँति-अशाँति, सुख-दुःख, श्रेष्ठता-निकृष्टता आदि जो मनुष्य के कर्मों के अनुसार आत्मा में संचित होती रहती है।
आत्मा में अशाँति और असंतोष का ताप लेकर जाने वाले परलोक में भी लोक जैसी ही दुःखदायी स्थिति पाते हैं। और जो शाँति-संतोष का सुखदायी अमृत आत्मा में संग्रह करके जाते हैं, वे लोक की तरह परलोक में भी आनन्द और उल्लास की स्थिति के अधिकारी बनते हैं। इस वाँछनीय सुख-शाँति और संतोष का अमृत उस सम्मान से भी संचय होता है, जो मनुष्य अपने सत्कर्मों द्वारा अर्जित करता है और जो जीवन की सफलता का द्योतक बन कर लोक-परलोक को शीतल बनाता है। इसीलिये सम्माननीय स्थिति को मानव-जीवन की सर्वोपरि सफलता माना गया है।
जीने को तो संसार में ऐसे लोग भी जीते और खाते-कमाते हैं, जिन्हें लोग अपने पास आने देने तक में संकोच करते हैं। मुख पर भला-बुरा कहते हैं। नाम आते ही घृणा से थूक देते हैं। मुँह लगाना और बात करना पसंद नहीं करते। और यथासम्भव उन्हें बहिष्कार की स्थिति में रखने का प्रयत्न करते हैं। इस प्रकार का हेय और निर्लज्ज जीवन, जीवन नहीं कहा जा सकता। जीवन तो वास्तव में उन लोगों का है, जिन्हें देखते ही लोग फूल की तरह खिल उठते हैं। बन्धुजन की तरह स्वागत करते हैं। नाम आते ही बड़ाई करने लगते हैं। और जिनसे व्यवहार करने में आत्म-गौरव और अहोभाग्य का अनुभव करते हैं। ऐसा सम्मानपूर्ण जीवन ही जीवन है। जिसे हर मनुष्य को प्राप्त करने का प्रयत्न करना चाहिये। मनुष्य होकर जो अपने लिए मनुष्यों के बीच अनादर और तिरस्कार अर्जित करता है, वह मनुष्य नहीं बल्कि मनुष्य के नाम पर एक कलंक ही होता है। मनुष्य जीवन की शोभा और सार्थकता इसी बात में है कि उसे सम्मान और गौरव के फूलों से सुन्दर और सुरक्षित बना कर रक्खा जाय।
संसार में ऐसे बहुत से लोग हैं जो अपने धन-वैभव और पद-प्रतिष्ठा के कारण सम्मानित होते दिखलाई देते हैं। सैकड़ों लोग उनके दरबार की हाजिरी देते और आदाब बजाते रहते हैं। सामने आते ही नमस्कार करते, उठ कर आवभगत दिखलाते और हाँ-हुजूरी के साथ चापलूसी की झड़ी लगा देते हैं। किन्तु इसके साथ पीठ पीछे आलोचना करते, नापसन्दी और घृणा प्रकट करते हैं। इस प्रवंचना में पड़े लोग यदि अपने को सम्माननीय स्थिति में समझते हैं, तो भारी भ्रम है। लोग स्वार्थ, भय, लोभ अथवा किसी विवशता के कारण उन्हें दिखावे का सम्मान देते रहते हैं। उनके मन में उनके लिये किसी प्रकार का आदर नहीं होता है।
सच्चे और वास्तविक सम्मान की स्थिति में तो वे लोग होते हैं, समाज के सम्मान व्यक्ति, बिना किसी लोभ, लालच अथवा विवशता के, जिनका आदर करते हैं और वही भाव पीठ पीछे रखते हैं जो मुख पर प्रकट करते हैं, जिनको सम्पन्नता और विपन्नता दोनों अवस्थाओं में मित्रों ही नहीं शत्रुओं तक से आदर-सम्मान मिलता रहे, वे ही महाभाग वास्तविक रूप से सम्माननीय स्थिति में माने जायेंगे। निश्चय ही यह बड़ी गौरव और गरिमापूर्ण स्थिति होती है।
इस प्रकार की सम्माननीय स्थिति धन-दौलत पद, स्थान, अधिकार, सत्ता अथवा बल-बुद्धि के आधार प्राप्त नहीं होती है। यह प्राप्त होती है सदाचरण सद्भावनाओं के द्वारा। जो सत्पुरुष मन, वचन व कर्म से किसी का अनिष्ट नहीं करता, किसी को धोखा नहीं देता, किसी को प्रताड़ित नहीं करता, किसी को दुःख नहीं देता, किसी के साथ अनुचित व्यवहार नहीं करता, बल्कि इसके विपरीत यथासम्भव सेवा करने, सहायता पहुँचाने, प्रेम, दया और सहानुभूति देने के लिए तत्पर रहता है वही समाज में सच्चे सम्मान का अधिकारी बनता है। जो नम्र उदार और भद्र व्यक्ति है, जो अधर्म, अकर्मों और अनर्थ का हेतु नहीं बनता, जो अपने व्यवहार, व्यापार और कर्मों में सत्य और ईमानदारी की प्रतिष्ठा करता है, समाज के हित और कल्याण में जो निष्ठावान बना रहता है, उस देवपुरुष का सम्मान भला कौन न करेगा?
इस प्रकार जन-मन में अपने लिये आदरपूर्ण स्थान बना लेने वाले सत्पुरुष बदले में उससे ऐसी श्रद्धा और ऐसी सद्भावना पाते हैं, जो उनके मानसिक और आत्मिक स्वास्थ्य के लिये अमृत के तुल्य गुणकारी होती है। जिसके फलस्वरूप वह सम्मानित व्यक्ति हर स्थिति में आत्म-पुष्ट, आत्म-प्रसन्न और आत्मानन्दित बना रहता है। लोगों की श्रद्धापूर्ण सद्भावनायें आनन्द की अव्यक्त तरंगों की तरह निरन्तर उसकी ओर बहती रहती है, जिन्हें उसकी पुलकित आत्मा ग्रहण करती और अनुदिन पुष्ट होती रहती है। लोगों के उज्ज्वल भाव उसके मन और बुद्धि में प्रकाशित होकर उसे आलोकित बनाते रहते हैं और अधिकारी आपसे-आप, मानव से महामानव और पुरुष से महापुरुष बनता जाता है।
प्रायः लोगों को अपने प्रति यह भ्रम होता है कि वे समाज में सम्मान के योग्य हैं किन्तु समाज उन्हें समुचित सम्मान नहीं देता है। वास्तव में यह बात बड़ी विचित्र-सी लगती है कि कोई व्यक्ति सम्मान के योग्य हो और समाज उसको सम्मान न दे। जब समाज में तिरस्कार योग्य दुष्ट व्यक्तियों का अधिकार- लाँछन और तिरस्कार मिलता ही रहता है, तब उसी समाज से सम्मान योग्य व्यक्ति का सम्मान न मिले यह बात समझ में आने वाली नहीं है। यदि समाज में इस प्रवृत्ति का अभाव होता कि तिरस्कार के योग्य को तिरस्कार दे और सम्मान के योग्य को सम्मान तो निश्चय ही संसार में न तो कोई तिरस्कृत दिखलाई देता और न सम्मानित। सारे लोग न जाने किस प्रकार की एक ही स्थिति में दिखलाई देते। जबकि ऐसा है नहीं। समाज में हर जगह तिरस्कार के योग्य व्यक्ति तिरस्कृत और आदर के योग्य व्यक्ति स्पष्ट रूप से आदृत दिखलाई देते हैं। तब सम्मान न मिलने की शिकायत करने वालों के साथ ही समाज ऐसा अन्याय क्यों करता? इस प्रसंग में अवश्य ही कोई भूल अथवा भ्रम काम कर रहा होता है।
अच्छा हो कि सम्मान न मिलने की शिकायत करने वाले पहले आत्म-परीक्षण करके यह देख लें कि वास्तव में वे समाज में सम्मान पाने के सच्चे अधिकारी हैं भी या नहीं। क्योंकि कभी-कभी मनुष्य को दंभ अथवा अहंकार के प्रतिघात के कारण यह भ्रम पैदा हो जाता है कि वह सम्मान योग्य है पर समाज उसे सम्मान न देने का अन्याय कर रहा है। इस आत्म-निरीक्षण का सबसे उचित उपाय यह है कि व्यक्ति लोभ, मोह आदिक विकारों से मुक्त और निरहंकार होकर अपने अन्दर दृष्टि डाले और देखे कि क्या वह अपनी दृष्टि में स्वयं सम्मानित है या नहीं है, यदि वह ईमानदारी से यह पता लगा लेता है कि वह अपनी दृष्टि में स्वयं सम्मानित नहीं है, तो समाज से सम्मान न मिलने की शिकायत नहीं करनी चाहिये क्योंकि वह इस योग्य नहीं होता।
जो अपनी दृष्टि में स्वयं सम्मानित नहीं है वह समाज की दृष्टि में भी सम्मानित नहीं हो सकता। मनुष्य अपनी दृष्टि में जिस प्रकार का होता है, समाज भी प्रायः उसे उसी दृष्टि से देखता है। व्यक्ति और समाज की मानसिक प्रतिक्रियायें लगभग एक जैसी ही होती हैं। और यदि इसके विपरीत मनुष्य आत्म-निरीक्षण से इस परिणाम पर पहुँचता है कि वह अपनी दृष्टि में सम्मानित है तो अवश्य ही उसकी शिकायत ठीक है। समाज सम्मान न देकर उसके साथ अन्याय कर रहा है।
लेकिन प्रसंग यहीं पर समाप्त नहीं हो जाता है। आगे यह देखना होगा कि उसका निर्णय सही भी है या नहीं। माना सम्मान न मिलने की शिकायत करने वाला व्यक्ति परोपकारी, परमार्थी, सेवाग्रामी, सद्भावों और सत्यनिष्ठ है। वह सम्मान पाने की सारी शर्तें पूरी करता है। तथापि यदि सारे सत्कर्मों और सद्भावों के साथ उसकी कोई कामना जुड़ी है, तब भी वह उस दिव्य स्थिति की योग्यता में कमी रखता है। धन दौलत, लाभ-लोभ की कामना न होते हुए भी यदि प्रतिकार में सम्मान मिलने की वाँछा भी उस स्थिति की योग्यता कम कर देती है। सच्चे और आत्म-संतोषदायी सम्मान पाने के लिये इस वाँछा के त्याग करने की सीमा तक निष्काम रहना पड़ता है। मौन, मूक और निस्पृह सत्कर्मों के धनी ही समाज से वह सच्चा और सार्थक सम्मान पाते हैं, जिसकी प्राप्ति आध्यात्मिक साधना के समान ही आत्म-तत्व को प्रसन्न और परिपुष्ट करती है।
इन सब योग्यताओं के होते हुए भी यदि किसी को उसका अधिकृत सम्मान नहीं मिलता तो कहना होगा कि समाज उसे समझने में प्रमाद कर रहा है अथवा गतिविधि के साथ उसके मानसिक स्तर को परख रहा है। क्योंकि कभी-कभी मनुष्य बहुत समय तक जब तक उनके सत्कर्म सम्मान के रूप में फलीभूत नहीं होते बड़े ही निःस्वार्थ और निस्पृह बने रहते हैं। किन्तु ज्योंही वे उस अहंकार उत्पन्न कर देने वाली स्थिति में पहुँचते हैं, विचलित हो जाते हैं और अपनी उस प्रतिष्ठा को अर्थागम का स्रोत बना कर भुनाने लगते हैं।
अस्तु समाज का दिया हुआ वह प्रसाद अपवित्र होकर दोनों के लिये अहितकर बन जाता है। व्यक्ति तो स्वार्थ का आखेट होकर आत्मा का हनन करने लगता है और समाज उसके शोषण का लक्ष्य बन जाता है। अस्तु समाज अपना सम्मान-भाव एक बड़ी परीक्षा लेने के बाद ही देता है। और यही नीति दोनों के लिए ठीक व कल्याणकारी भी है।
इस कठोर परीक्षा में उत्तीर्ण होने का उपाय यही है कि मनुष्य परमार्थ और परोपकार के सम्मानदायक कामों को परिणाम-हीन कर्तव्य समझ कर करे। यद्यपि कोई भी कार्य कारण और परिणाम से रहित नहीं होता तथापि अपनी उच्च मनोभूमि की सहायता से परिणाम की ओर से विरत अथवा विस्मरणशील किया जा सकता है, यह कोई असम्भव अथवा असम्भाव्य बात नहीं है। यदि यह बात असम्भव होती तो न तो शास्त्रों में निष्काम कर्म का उपदेश होता और न सर्वसाधारण में यह लोकोक्ति ही प्रचलित होती- ‘‘नेकी कर कुएँ में डाल।’’
‘‘जीवन को सम्माननीय स्थिति में रखना, सर्वोपरि सुखद अवस्था है। क्योंकि उसमें सुस्वाद और पौष्टिक आध्यात्मिक खुराक प्रचुर मात्रा में प्राप्त होती है। सात्विक, पुष्टिकर आहार ठीक रीति से यदि प्राप्त होता जाये तो शरीर की बल-वृद्धि होती है, स्फूर्ति आती है, अंग सुदृढ़ होते हैं। जीवन-शक्ति बढ़ती है और तेज बढ़ने लगता है। इसी प्रकार यदि आत्म-सम्मान का सात्विक पोषण पर्याप्त मात्रा में प्राप्त होता रहे तो मानसिक स्वास्थ्य की उन्नति होती है। बुद्धि बढ़ती है, सद्गुण विकसित होते हैं। कार्य शक्ति उत्पन्न करती है और बड़ी बाधाओं को पार करता हुआ, वह सफलता के उन्नति शिखर पर तीव्रगति से बढ़ता जाता है। अपने आपसे और दूसरों से प्राप्त सम्मान से प्रभावित वातावरण उसके मानसिक स्वास्थ्य की पुष्टि करेगा। प्रसन्नता, संतोष, शाँति, स्थिरता, आनन्द से उसका चित्त उमंगे लेता रहेगा। यह जीवन ही उसके लिये स्वर्ग होगा, भले ही वह धन-दौलत की दृष्टि से गरीब बना रहे।’’
सम्माननीय स्थिति प्राप्त करना जीवन की सर्वोपरि सफलता है। उसे पाने के लिये मनुष्य को परिणाम की ओर से विस्मरणशील बन कर परमार्थ परोपकार से प्रेरित सत्कर्म करते हुये सत्यनिष्ठ जीवन-यापन की पद्धति अपना कर चलना चाहिये। इस प्रकार का नीतिवान पुरुष सहज ही में लोक और परलोक दोनों को विजय कर लेता है।
एक बार साम्यवादी विचार-धारा का एक व्यक्ति गाँधी जी के पास जाकर बोला- दुनिया में इतना छल कपट, अशाँति और खून खराबी चल रही है फिर भी आप धर्म की बात करते हैं। बुराइयाँ और रक्तपात जितनी तेजी से बढ़ रहा है, उसे देखते हुए धर्म बेकार वस्तु है। बापू ने कहा- ‘‘महोदय, थोड़ा सोचिये कि उसे धर्म की मान्यता रहते इतनी अशाँति फैलाये हुए हैं तो उसके न रहने पर संसार की क्या दशा होगी?” इस पर उन सज्जन से कोई उत्तर देते न बन पड़ा।
यह एक सनातन एवं सर्वमान्य सत्य है कि संसार के प्राणी मात्र प्रसन्नता- एक चिरस्थायी प्रसन्नता चाहते हैं, और उसे पाने के लिये प्रयत्नशील भी रहते हैं। मनुष्य को जागने से लेकर सोने तक और काम करने से लेकर मनोरंजन करने तक की सारी क्रियायें, सारे कार्य-कलाप एक मात्र प्रसन्नता की उपलब्धि के लिये ही होते हैं। मनुष्य का एक काम भी ऐसा नहीं होता, जो प्रसन्नता के सुख का लक्ष्य करके न किया जाता हो।
यदि मनुष्य का सारा जीवन एक स्थायी प्रसन्नता पाने के लिये क्रियाशील रहता है तो इसके लिये उसे कोई दोष नहीं दिया जा सकता। उसे ऐसा करना ही चाहिये। प्रसन्नता की प्राप्ति उसका कर्तव्य और अधिकार दोनों ही हैं। मनुष्य जीवन की सार्थकता की प्रसनृनता पर निर्भर है। जो दुःखी, अप्रसन्न, क्षुब्ध अथवा अशाँत है, उसका जीवन निरर्थक एवं निःसार ही माना जायेगा। अप्रसन्नता असफलता का सबसे प्रमुख प्रतीक तथा चिन्ह है। दुःखी व्यक्ति न तो स्वयं का ही कुछ भला कर सकता है और न समाज का। जब मनुष्य मानसिक रूप से पुष्ट-तुष्ट एवं प्रसन्न होता है तभी उसमें वह सामर्थ्य प्रबुद्ध होती है, जिसे कल्याण कर्मों की जननी कहा जा सकता है। रो-झीक कर जीवन बिताना, मनुष्यता का अनादर तथा जीवन का अमाँगलिक विनाश है।
हँसते-खेलते हुए एक सुविकसित फूल की तरह प्रफुल्ल जीवन-यापन करना ही बुद्धिमत्ता है, पुण्य तथा पुरुषार्थ है। मनुष्य परमात्मा का अंश है, उसका ही एक स्वरूप एवं प्रतिबिम्ब है। इसलिये अपने अंशी की तरह ही उसका भी सत्य स्वरूप सत्-चित् आनन्द ही है। अपने इस स्वरूप को पाने का अधिकार ही नहीं है, अपितु परम पुनीत कर्तव्य है। जिसे पूरा करना ही चाहिये।
मनुष्य प्रसन्नता चाहता है और उसके लिये सतत् प्रयत्नशील भी है। किन्तु यह देख कर कम आश्चर्य नहीं होता कि वह उसे पा नहीं रहा है। इसके विपरीत अधिकाँश लोग रोते, झींकते हुए दुःखी तथा चिन्तित ही दिखाई देते हैं। संसार में ऐसे कितने व्यक्ति होंगे, जो वास्तविक रूप में जिन्हें प्रसन्न कहा जा सकता है?
प्रसन्नता के प्रति मानव प्रयत्नों की इस असफलता को देख कर यह विचार आये बिना नहीं रहता कि निश्चय ही या तो मनुष्य प्रसन्नता का सही अर्थ तथा स्वरूप ही नहीं समझता है अथवा उसके प्रयत्नों की दिशा ही गलत है।
इस उद्भूत विचार पर गहराई से मनन करने पर विदित होता है कि भ्रमवश मनुष्य की यह धारणा विश्वास के रूप में बदल गई है कि प्रसन्नता का सुख, साधनों की उपलब्धि एवं अनुकूलता पर निर्भर है। बाह्य साधनों का संपर्क अथवा उनका उपभोग मनुष्य की आत्मा में प्रसन्नता को जन्म देता है। यदि साधन-सुविधायें नहीं हैं तो उसको प्रसन्नता की ओर से निराश ही रहना होगा।
मनुष्य की यह धारणा भ्रान्त एवं असफलताजनक है। प्रमाण रूप में उन हजारों साधन सम्पन्न व्यक्तियों को देखा जा सकता है, जो जल के बीच प्यासी मछली की तरह तड़पते रहते हैं। आधुनिकतम उपलब्धियों से सजे भवन में रहते हुये, सुधा-स्वाद व्यंजनों की थाली के सम्मुख बैठे हुए और चमचमाती हुई मोटर गाड़ियों में चलते हुए भी वे अपने अंदर एक अभाव, एक रिक्तता, कसक और उद्विग्नता का अनुभव करते रहते हैं, रहने को वे इन्द्र की तरह रहते हैं, खाने को बहुमूल्य पदार्थों का भोग लगाते हैं, पहनने को रेशम तथा कंचन पहनते हैं किंतु अंदर से एक कंगाल की तरह दीन-हीन एक दुखिया की तरह निरीह और एक सजे हुए निर्जीव शरीर की तरह अनुभव करते रहते हैं। अपनी आन्तरिक निर्धनता को वे भले ही अपने बाह्य साधनों के द्वारा दूसरों से छिपाये रखें किंतु स्वयं अपने से तो छिपा ही नहीं सकते। इस प्रकार एक निर्जीव मशीन की तरह वे अपनी गलत धारणा के आधार पर प्रसन्नता के लिये बाह्य साधनों के संचय में ही अपना सारा जीवन लगा कर अन्त में एक असफल तथा अप्रसन्न मौत मर कर दुनिया से खाली हाथ चले जाते हैं। प्रसन्नता के प्रकाश की आधी किरण भी न पा पाते और इस प्रकार एक दिन अपने अज्ञान के अन्धकार में विलीन हो जाते हैं।
साधन सम्पन्न व्यक्तियों की यह असफलता प्रकट करती है कि प्रसन्नता का निवास बाह्य पदार्थों में नहीं मनुष्य के आन्तरिक आवास में है। प्रसन्नता वास्तव में एक ऐसी अनुमति है, जो बिना किसी बाह्य साधनों के स्वतः उद्भूत एवं अनुभव होती है। तन, मन से स्वस्थ एवं सुचारु व्यक्ति के मुख पर प्रसन्नता की झलक यों ही बिना किसी हेतु के बनी रहती है। उनका अन्तर बिना किसी सहायता के यों ही प्रसन्न एवं प्रकाशित रहता है। सुविधाओं में ही नहीं बड़ी-बड़ी असुविधाओं में भी उनका यह अमर प्रकाश मन्द नहीं होने पाता। साधारण संकटों की तो बात ही क्या जीवन पर संकट आ जाने पर भी वे हंसते और मुसकाते रहते हैं।
ईसा, सुकरात, बुद्ध, दयानन्द तथा गाँधी जैसे महात्मा, गुरु अर्जुन देव, गोविन्द सिंह, बन्दा वैरागी जैसे धर्मवीर तथा बिस्मिल, आजाद, भगत सिंह आदि देश-भक्त इस सत्य के जीते जागते उदाहरण हैं। जीवन भर देश-धर्म तथा मनुष्यता की सेवा में तिल-तिल मिटते तथा असुविधा एवं अभावपूर्ण परिस्थितियों में रहते हुए भी यह सब सदा प्रसन्न रहे और अन्त में हंसते-हंसते ही मृत्यु का आलिंगन कर अपना बलिदान पूरा कर दिया। प्रसन्नता एक आन्तरिक वैभव है उसको बाह्य साधनों के अधीन मानने की धारणा गलत है। अपनी इस भ्रान्त धारणा में सुधार न करने वाले ही साधनों के पीछे दौड़ते हुये अपने लक्ष्य-मार्ग से भटक कर दुःखों के गर्त में गिर जाया करते हैं।
यह बात सत्य है कि सन्तों, महात्माओं तथा बलिदानी वीरों का मानसिक स्तर, सामान्य लोगों से कुछ भिन्न होता है। वे सर्वथा अभाव की स्थिति में केवल अपने मानसिक बल पर प्रसन्न रह सकते हैं। केवल बाह्य साधनों में प्रसन्नता की खोज करना बालू से तेल निकालने और मरुमरीचिका के पीछे दौड़ने के बराबर है, जन-साधारण एवं सामान्य व्यक्तियों को प्रसन्नता के लिये साधनों के साथ अपने मानसिक सुधार की भी आवश्यकता होगी।
लक्ष्य के प्रति जिसकी धारणा गलत है, निश्चय ही उसकी प्राप्ति के लिये किये जाने वाले साधन भी सही नहीं हो सकते। सामान्यतः देखने में आता है कि जहां। किसी धनवान का ऊँचा और सजा हुआ मकान देखा, किसी का लम्बा-चौड़ा व्यापार देखा और अनुमान लगाया कि विश्वास बना बैठा कि यह मनुष्य आवश्यक ही प्रसन्न एवं सुखी होगा। इस प्रकार वह भी लक्ष्य प्राप्ति के लिये, धन के लिये अपने सारे जीवन और समग्र प्रयत्नों के केन्द्रीभूत कर देता है। किन्तु धनवान बन जाने के बाद भी व देखता है कि वह प्रसन्नता पाने के उद्देश्य में असफल ही रहा है। वह आज भी वैसा ही असंतुष्ट एवं अप्रसन्न है जैसा कि अधीनता की स्थिति मैं था। धनाढ्यता उसके प्रसन्नता-शून्य मानस की रिक्तता को नहीं भर सकी है। कहना न होगा कि यदि वह व्यक्ति अपने प्रयत्नों के प्रवाह को दो भागों में विभाजित कर साधन और मानसिक उत्थान दोनों की ओर उन्मुख करता है तो वह केवल धनता की अपेक्षा कहीं अधिक सुखी एवं प्रसन्न होता है।
धन की तरह बन, बुद्धि, विद्या, मान-सम्मान, आदर, प्रतिष्ठा आदि अन्य ऐश्वर्य भी स्वयं अपने आप किसी को भी प्रसन्नता प्रदान नहीं कर सकते। मनुष्य को प्रसन्नता तब ही मिल सकती है, जब वह अपने साधन और ऐश्वर्यों का उपभोग अपने आन्तरिक सुधार और उत्थान में लगाये।
धारणा और प्रयत्न की गलती के साथ-साथ प्रसन्नता प्राप्त न होने का एक कारण यह भी है कि हम उसे पाने के लिये उसके पीछे बुरी तरह दौड़ते फिर रहे हैं। हमारा यह दौड़ना उसी प्रकार का निरर्थक और हास्यास्पद प्रयास है, जैसे किसी हिरन का मरीचिका के पीछे और किसी अबोध बालक का अपनी आगे पड़ी छाया को पकड़ने के लिये दौड़ना। भ्रांति के कारण बाह्य पदार्थों में दिखने वाली प्रसन्नता एक छलावा है, धोखा है, जिसे प्राप्त करने का प्रयत्न अबोधता के अतिरिक्त और क्या कहा जा सकता। प्रसन्नता का निवास आपके अन्तर में, आपकी अन्तरात्मा में है। उसे वही खोजिये आपका प्रयास सफल और आपका जीवन सार्थक होगा, अपने लक्ष्य को पाकर आप कृतकृत्य हो जायेंगे।
इसी समाधान के साथ अब यह प्रश्न उठ सकता है, अन्तर में निवास करने वाली प्रसन्नता को कैसे खोजा और किस प्रकार प्राप्त किया जाये? इसके उत्तर में समझ लेना चाहिये कि प्रसन्नता एक निराकार अनुभूति मात्र है। वह कोई ठोस पदार्थ अथवा द्रव्य नहीं है, जिसको हाथ बढ़ा कर उठाया और पाया जा सकता है। प्रसन्नता को जगाने और उसकी पुलक प्राप्त करने के लिये कुछ ऐसे निराकार, साकार, भावात्मक प्रयत्न करने होंगे, जिन्हें यदि देना चाहें तो धर्म, परमार्थ, पुण्य अथवा अव्यापक की संज्ञा दी जा सकती है। प्रसन्नता प्राप्ति का रहस्य इन्हीं यज्ञीय अथवा मानवीय कृत्यों में अन्तर्भूत हुआ रहता है।
ईर्ष्या, द्वेष, छल, कपट, स्वार्थ एवं असंतोष आदिक विरोधी भावों को यदि हृदय से दूर कर दिया जाये तो कोई कारण नहीं कि मनुष्य जीवन से प्रसन्नता का अभाव दूर न हो जाये। मानसिक पवित्रता का दूसरा नाम प्रसन्नता ही है। जब कोई हृदय दुर्भावों से मुक्त होकर पवित्र हो जाता है, उसके विरोधी अथवा विपरीत भावों का विरोध हो जाता है तो उसमें प्रसन्नता की अनुभूति स्वयं जागृत हो जाती है।
ईर्ष्या-द्वेष, छल-कपट आदि का समाधान हो जाने पर मनुष्य के हृदय में श्रद्धा, प्रेम, सहानुभूति, उदारता और सौहार्द के भावों का समावेश हो जाना स्वाभाविक ही है, क्योंकि यह गुण उन दुर्गुणों के स्थानापन्न भाव हैं। दुर्गुणों के नष्ट होने पर यह गुण ठीक उसी प्रकार स्वयं आ जाते हैं, जिस प्रकार मद के उतर जाने से चेतना प्रबुद्ध हो उठती है।
यह सही है कि मानसिक मलों को सहज रूप से यों ही नष्ट नहीं किया जा सकता। इसके लिये साधना करनी ही होगी। और कहा जा सकता है असाधारण के पास इतनी शक्ति एवं समय कहाँ कि वह अपना मनोमालिन्य दूर करने के लिये साधन संलग्न हो सके। उसके पास परिवार और परिस्थितियों-जन्य इतनी समस्यायें होती हैं कि उनका हल खोजते-खोजते ही सारा जीवन निकल जाता है। इस प्रकार का कथन निराशा एवं निष्क्रिय भावना की अभिव्यक्ति के अतिरिक्त और कुछ नहीं कहा जा सकता। प्रसन्नता प्राप्त करने के लिये, साधना करने के लिये अलग से शक्ति अथवा समय की आवश्यकता नहीं है। उसका अभ्यास तो नित्य प्रति के कामों एवं व्यवहारों से ही किया जा सकता है।
सबको अपने समान ही ईश्वर का अंश समझ कर समानता एवं सम्मानपूर्ण व्यवहार करना दूसरों के दुख-सुख को अपना दुख-सुख समझना, यथाशक्ति किसी का उपकार करना और प्राणी-मात्र में बन्धुत्व का भाव रख कर दया, उदारता और सहानुभूति का व्यवहार करना कोई ऐसी बड़ी तपस्या नहीं है, जिसके लिये विशेष शक्ति और समय की आवश्यकता पड़े।
कभी भी अनुभव किया जा सकता है कि जब हम किसी की उन्नति, सफलता अथवा उपलब्धि को ईर्ष्या-द्वेष से परे होकर देखते हैं तो हमें एक अहेतुक तथा आत्मीय प्रसन्नता का अनुभव होता है। जिस दिन भी हमारा एक कार्य अथवा एक कथन किसी दूसरे को प्रसन्न कर देता है, वह दिन हमारे लिये बड़ा प्रसन्न दिन होता है। जब हम किसी के लिये कुछ त्याग करते हैं, तब हमारे हृदय में एक अनिवर्चनीय संतोष की पुलक उत्पन्न हो जाती है। जब हम किसी दुखी के साथ सहानुभूति प्रकट करते हैं, तो हमारे स्वयं आँसू निकल आते हैं, जिनमें एक आध्यात्मिक सुख की छाया तक होती है। इस प्रकार कहना न होगा कि जब हम दूसरे की प्रसन्नता में अपनी प्रसन्नता का एकीकरण कर देते हैं तो हमारे लिये संसार में किसी ओर और किसी भी परिस्थिति में अप्रसन्नता का कोई भी अवसर एवं अवकाश नहीं रह जाता।
निश्चय ही हमें प्रसन्नता प्राप्त करने के लिये सौहार्द, सहानुभूति और सौजन्य के व्यवहार को अपने जीवन में स्थायी स्थान देना ही चाहिये। और यदि हम जीवन के परम लक्ष्य प्रसन्नता जैसी महान उपलब्धि के लिये इतना छोटा तप, इतना साधारण प्रयत्न भी नहीं कर सकते तो हमें कोई अधिकार नहीं है कि हम उस आनन्द के लिये लालायित हों। हमें दुखी रहना ही चाहिये और उसकी शिकायत करने की अनधिकार चेष्टा से विरत होना चाहिये।
परमात्मा की कृपा और माता-पिता का उपकार ही साकार होकर हम सबको शरीर रूप में मिला है। इस बात को इस प्रकार भी कह सकते हैं कि मानव-जीवन की आधार-शिला उपकार ही है। इसलिये हमारा यह जीवन परोपकार में ही लगना चाहिये। इसी में इसकी सार्थकता है और इसी में कल्याण।
परोपकार के सदृश इस संसार में कोई दूसरा धर्म नहीं है। अपने अस्तित्व को संसार हित में बलिदान कर देने से जिस महान धर्मफल की प्राप्ति होती है, उसकी तुलना अन्य धार्मिक कर्मकांडों से नहीं की जा सकती। प्रसिद्ध सन्त मोओतजे कहा करते थे कि “यदि मेरे शरीर को पीस कर चूर्ण बना लेने में संसार के एक भी प्राणी का भला हो सकता है तो मैं उसके लिये सहर्ष तैयार हूँ।”
परोपकार के समान पुण्यदाता कोई भी दूसरा धर्म नहीं है। यदि ऐसा होता तो तपस्या में निरत महर्षि दधीचि देवों की भलाई के लिये अपना शरीर नहीं दे देते। वे शरीर की रक्षा करते और तपस्या करके बड़ी-बड़ी सिद्धियाँ प्राप्त और मुक्ति के लिये प्रयत्न करते रहते। किन्तु अवसर पाते ही उन्होंने तुरन्त ही परोपकार में अपना शरीर दान कर दिया। वे जानते थे कि हजारों वर्ष तप करने पर भी जो मुक्ति कठिनता से मिलती है, वह परोपकार में शरीर त्याग देने से तत्काल सरलतापूर्वक मिल जाती है।
परोपकार में सर्वस्व दे देने वाले एक दधीचि ही नहीं हुए। भारत में तो शिवि, हरिश्चंद्र, मोरध्वज, कर्ण, दिलीप आदि न जाने कितने महापुरुष ऐसे हुए हैं, जिन्होंने परोपकार को ही सर्वश्रेष्ठ धर्म माना और अवसर आने पर उसका सहर्ष निर्वाह भी किया। यह सारे मनीषी इस तथ्य से अनभिज्ञ नहीं थे कि यह शरीर कल्याण का साधन होने पर भी नाशवान है। मानव-जीवन का कोई ठीक नहीं कि किस समय समाप्त हो जाये। यह तब तक भी चल सकता है, जब तक साधना पूरी हो और बीच में भी समाप्त हो सकता है। जीवन का रहना और न रहना सदा संदिग्ध बना रहता है। शरीर से जहाँ पुण्य कर्म बनते हैं वहाँ कभी प्रमादवश इससे कोई त्रुटि भी हो सकती है। यही साधन साधना के बीच में व्यवधान भी खड़ा कर सकता है।
जीवन-प्रवाह तो ऊँचे-नीचे मार्गों के बीच से होकर बहता है। अस्तु इस शरीर, इस जीवन को परोपकार में समर्पित कर देना साधना का, धर्म का सबसे निरापद मार्ग है। इसी विवेचना के आधार पर इन्होंने अवसर पाते ही अपना जीवन परोपकार में लगा दिया और ऐसे ही सत्पुरुष क्षण-क्षण अपना जीवन परोपकार में ही लगाये चलते हैं। परोपकार से बढ़ कर और निरापद दूसरा कोई धर्म नहीं है।
प्राणिमात्र का हित, उपकार और कल्याण में रत रहना। मन, वचन, कर्म से दूसरे का हित चाहना और करना, किसी के अहित अथवा पीड़ा का विचार न करना और विश्व-बन्धुत्व की भावना को विकसित और विस्तृत करते रहना आदि सारी सदाशयतायें परोपकार ही मानी गई हैं। तथापि इनमें आध्यात्मिक शाँति और निष्कलंक धर्मफल का समावेश तभी होता है, जब इनके पीछे कोई स्वार्थ-भाव निहित न हो। अन्यथा यही पुण्य कर्म आत्मा के लिये एक प्रवंचना बन जायेगा।
परोपकार का भाव तो प्रकृति के समान निःस्वार्थ होना चाहिये। सूर्य, चन्द्र, वायु, नदी, वन, पहाड़ नित्य निरन्तर संसार के उपहार में ही लगे रहते हैं किन्तु उसके बदले में न कुछ माँगते हैं और न ही चाहते हैं। चुपचाप अपना सर्वस्व दान करते रहते हैं। सूर्य नित्य नियम से अपना प्रकाश और ऊष्मा संसार को देने के लिये पृथ्वी की परिक्रमा करते रहते हैं, किन्तु उसके बदले में किसी से कुछ चाहते नहीं। चन्द्रमा नियम से संसार को आलोक और शीतलता दान करते रहते हैं, किन्तु सर्वथा निःस्वार्थ-भाव से। इसी प्रकार वन-वृक्ष, नदी और पर्वत भी सदैव निःस्वार्थ-भाव से ही अपने फल-फूल, काष्ठ, जल और वनस्पतियाँ संसार को देते हुये कभी कोई प्रतिकार नहीं चाहते।
लोग जाते हैं अधिकारपूर्वक उनकी संपत्ति का भाग लेकर चले आते हैं। उनके भण्डार, उनकी सम्पत्ति सदा सर्वदा संसार हित के लिये खुली पड़ी रहती है। वे उसके लिये ना तो किसी का हाथ रोकते हैं और न प्रतिपादन के लिये हाथ फैलाते हैं। धन्य हैं ऐसे निःस्वार्थ, निष्काम और उदार परोपकारी ऐसे ही प्रतिकार रहित परोपकारी परमात्मा की कृपा और आत्मा की सच्ची शाँति के अधिकारी बनते हैं।
जब जड़ प्रकृति संसार का उपकार करने में इस गहरे निष्कामभाव से लगी रहती हैं तो चेतन होकर मनुष्य संसार के कल्याण में नहीं लग सकता? लग सकता है और आवश्यक लग सकता है। उसे लगाना भी चाहिये। परोपकार में निरत होने से केवल संसार का भला नहीं होता प्रत्युत अपना कल्याण भी होता है। मनुष्य के चरित्र की परीक्षा परोपकार की कसौटी पर ही होती है। जो इसमें अपने को उत्तीर्ण कर लेता है, वह सहज रूप से भवसागर से उत्तीर्ण हो जाता है।
परोपकार का पुण्य मनुष्य को सभ्य-सुसंस्कृत, उच्चविचार और भावना वाला बना देता है। परोपकार से मनुष्य का मन निर्मल और विकार रहित बनता है। उसके जीवन में सतोगुण की वृद्धि और आत्मा में आध्यात्मिक आलोक का समावेश होता है। परोपकार की भावना जितनी उच्च-विशाल और निष्काम होती जाती है, मनुष्य उतना ही परमात्मा के सान्निध्य की ओर बढ़ता जाता है। इस आत्मिक उन्नति और विकास का सुख अनिर्वचनीय है। इसका अनुभव तो वही त्यागी पुरुष कर सकता है, जो परोपकार के यज्ञ में अपने सर्वस्व को समिधा मान कर समर्पित कर देता है।
सत्पुरुषों की पहचान का सबसे बड़ा लक्षण है परमार्थ। कोई कितना ही सभ्य, शिष्ट और सुशील क्यों न दिखाई दे। नम्रता और विनय उसके शब्द-शब्द से टपकती चलती हो, मुख्य पर कितनी ही करुणा और कृतज्ञता का भाव विराजमान क्यों न रहे, यदि उसका जीवन परमार्थ पूर्ण नहीं है, उसके जीवन और वैभव को कोई अंश परोपकार एवं परमार्थ में नहीं लगता तो उसके उस प्रकार का वास्तविक मनुष्य नहीं माना जा सकता, जैसा कि वह ऊपर से दीखता है।
धनाढ्यता का लक्षण धन उपार्जन अथवा संचय की मात्रा नहीं है। उसका लक्षण उदारता ही है। जो जितना अधिक उदार और परोपकार है, वह उतना ही अधिक धनवान है। एक पैसे का उपकार करने वाला गरीब कहीं अधिक धनवान है, उस व्यक्ति की तुलना में जो करोड़ों का स्वामी होकर भी परोपकार के विषय में कृपणता करते हैं। जो परमार्थ में लीन है, तन, मन, धन से परोपकार एक परहित में निरत है, वही सज्जन है, वही सत्पुरुष है और वही धनवान है।
परोपकार केवल मानवीय गुण ही नहीं नहीं वह आध्यात्मिक सद्गुण भी है। इसकी आराधना करने से लोक और परलोक दोनों का बनाव बनता है। इसी गुण पर जहाँ आत्मा का उत्थान निर्भर है, वहाँ संसार और समाज का सृजन, व्यवस्था और विकास की धुरी भी इसी पर निर्भर रहती है। आज यदि समाज के सारे लोग केवल स्वार्थी बन जांय और दूसरों के हित का सम्पादन न करें तो कल ही समाज में घोर अनर्थ घटित होने लगे। अराजकता, संघर्ष और छीना-झपटी का बोल-बाला हो जाये, जो उद्दंड, बली और शक्तिशाली हों, वे सारे साधनों और सम्पत्ति पर अपना एकाधिपत्य स्थापित कर लें और जो सामान्य, साधारण अथवा अपेक्षाकृत निर्बल हों, वे बेचारे पिस कर ही रह जायें। परहित और परोपकार के बिना संसार का क्रम एक क्षण भी नहीं चल सकता। अस्तु आत्मा और समाज के कल्याण के लिये यथासाध्य परोपकार के कार्य करते रहना चाहिये।
माता-पिता सन्तान को जन्म देते हैं। उनके पालन-पोषण और विकास के लिये अपार कष्ट उठाते हैं। धन के लिये परिश्रम करते, सुख और सुविधा के के लिये चिन्ता करते, तन-पेट काट कर उन्नति और विकास की व्यवस्था करते, किन्तु वे यह सब करते हैं, निस्वार्थ भावना से ही। किन्तु माता-पिता को पहले से ही यह पता रहता है कि उनका पुत्र बड़ा होकर सेवा करेगा, उनके लिए सुख और आराम के साथ डडडड। तब भी वे बच्चों की सेवा में हर प्रकार का त्याग एवं उत्सर्ग करते ही रहते हैं। इतना ही नहीं संसार के कुपुत्रों का उदाहरण देख कर भी और स्वयं भी एक से कष्ट पाते हुए भी दूसरे का पालन -पोषण करते ही रहते हैं।
वे अपनी इस सेवा के पीछे किसी प्रकार के प्रतिकार की भावना नहीं रखते। बच्चे की सेवा वे सेवा-भाव से ही करते हैं। बच्चों द्वारा कष्ट पाने के उदाहरणों को देख कर भी वे सेवा से संकोच नहीं करते। उन्हें उसमें एक आनन्द एक सुख की उपलब्धि होती है। वह सुख, वह आनन्द किसी आशा के कारण नहीं होता है। वह सुख उस परमार्थभाव का ही होता है, जो सन्तान की सेवा में उनके अनजाने ही निहित रहता है। परोपकार के सम्बन्ध में इसी प्रकार माता-पिता की तरह ही निःस्वार्थभाव रखने से उसके द्वारा अनिवर्चनीय आनन्द, आध्यात्मिक आनन्द की उपलब्धि होती है।
परोपकार एवं परमार्थ से विमुख रहना समाज के साथ विश्वासघात करने के बराबर है। हम आज जो कुछ हैं या हमारे पास जो कुछ धन-संपत्ति, पद-प्रतिष्ठा और अवसर, संयोग है, वह सब समाज द्वारा हमारे ऊपर उपकार किये जाने का ही फल है। यदि समाज ने हमारी उपेक्षा की होती, हमारे हित से सर्वथा मुख मोड़ लिया होता तो हमारा अस्तित्व ही आपत्ति ग्रस्त हो जाता। थोड़ी दूर भी अपना जीवन चल सकना कठिन हो जाता। अस्तु समाज के प्रत्युपकार के लिए कुछ न करना कृतघ्नता ही होगी, उसकी अपेक्षाओं के प्रति विश्वासघात होगा। जो कि न तो लौकिक दृष्टिकोण से शुभ है और न पारलौकिक दृष्टि से कल्याणकारी। लोक और परलोक शरीर और आत्मा, सारे माननीय अनुबन्धों के मंगल के लिए परोपकार एवं परमार्थ में निरत रहना परमावश्यक है। इससे विमुख होना अपना वर्तमान और भविष्य दोनों को बिगाड़ लेना है। इसी तथ्य और अपने अनुभव के आधार पर ही तो महर्षि व्यास ने कहा है-
“जीवितं सफलं तस्य, यः परार्थोद्यतः सदा” -जीवन उसी का सफल एवं सार्थक है, जो सदा परोपकार में प्रवृत्त रहता है, निश्चय ही, परोपकारी को न पाप का भय रहता है और न पतन का। वह तो लोक अथवा परलोक सब जगह श्रेय का ही अधिकारी बनता है।
एक थे राजा। एक दिन उन्होंने मन्त्रियों और सभासदों से प्रश्न किया- ‘‘किसी काम के लिये ठीक अवसर कैसे जानना चाहिये?’’ किसी ने कहा- ‘‘ग्रह नक्षत्रों की गति जानने वाले ज्योतिषी से पूछकर, किसी ने कहा बड़े बुजुर्गों से पूछ कर काम का समय निश्चित करना चाहिये।” पर इन उत्तरों से राजा का मानसिक समाधान न हुआ। तब वे एक साधु के पास पहुँचे और वही प्रश्न किया।
साधु कुछ न बोला। कुटी के सामने क्यारियाँ गोड़ता रहा। राजा चुपचाप लौट आया।
दूसरे दिन पानी बरसता रहा, राजा वहाँ न जा पाये। तीसरे दिन वह फिर कुटी पर पहुँचे और अपना प्रश्न दुहराया। पर पहले की भाँति आज भी वह साधु क्यारियों में फूल लगाते रहे।
शाम हुई, राजा ने प्रश्न किया- ‘‘भगवन्! आपने मेरे प्रश्न का सामाधान नहीं किया।” साधु ने हँसकर कहा- ‘‘तुम्हारे प्रश्न का उत्तर तो उसी दिन दे चुका पर तुम समझे ही नहीं।”
अब राजा की समझ में आया- जो काम सामने है वही सबसे उपयुक्त अवसर है। उसी में जुटे रहने से हर काम समय से पूरे हो जाते हैं।
मानवाकार शरीर पाकर ही कोई मनुष्य नहीं बन जाता। मनुष्य बनने के लिए विद्या की नितान्त आवश्यकता है। बिना विद्या के कोई भी मनुष्य को अच्छाई-बुराई, कर्म-अकर्म, सद्-असद् और पाप-पुण्य का ज्ञान न हो तो उसमें और एक ज्ञानहीन पशु में क्या अन्तर रह जाता है? पशुओं की तरह आचरण करने वाला, उन्हीं की तरह अनबूझ जीवन जीने वाला और उन्हीं की तरह सहसा प्रवृत्तियों से प्रेरित होकर क्रियाशील हो उठने वाला मनुष्य, मनुष्य की तरह महान उपाधि का अधिकारी किस प्रकार हो सकता है? भले ही वह आकार में मनुष्य जैसा हो, मनुष्यों के बीच रहता हो और उन्हीं की तरह बोली बोलता हो पर होता वह वास्तव में पशु प्राणी ही। उसे केवल पशु न कह कर मानव-पशु कहा जा सकता है। तथापि इससे मूल सत्य में कोई अन्तर नहीं पड़ता।
मनुष्य, मनुष्य कहलाने का अधिकारी तभी है, जब उसका हर काम समझा और शोधा हुआ हो। उसका हर कदम कल्याण की दिशा में पड़ता हो। उसे क्या करना चाहिये और क्या नहीं करना चाहिये, इसका स्पष्ट निर्णय कर सकने की क्षमता हो। अपने समान अन्य प्राणियों की सुख-सुविधा का ध्यान रखने वाला। देशकाल के अनुसार व्यवहार करने वाला और समष्टि में व्यष्टि को विलीन कर देने वाला ही सच्चा मनुष्य हो सकता है। सहानुभूति, सम्वेदना, प्रेम, दया और प्रगतिशीलता मनुष्य के आवश्यक लक्षण माने गये हैं। जो इन गुणों और लक्षणों से सर्वथा रहित है, वह अभी मनुष्य की कोटि में नहीं आया है। उसे चाहिये कि वह अपने में मानवीय गुणों और लक्षणों का विकास करे और अपनी ‘मानव’ उपाधि को चरितार्थ कर दिखाये।
मानवीय विशेषताओं की प्राप्ति ज्ञान द्वार ही संभव है। जो अपने को अज्ञान के अन्धकार में डाले हुए है और ज्ञान द्वारा उस नरक से निकलने का प्रयत्न नहीं करता वह इस सुरदुर्लभ अवसर को मिट्टी मोल खो रहा है। अपनी ऐसी क्षति कर रहा है, जिसकी पूर्ति सम्भव नहीं। चौरासी लाख योनियों में मनुष्य एक अन्धकारपूर्ण पाशविक जीवन ही तो बिता कर मनुष्य शरीर में आता है। अब यदि इसमें भी वही पाशविक क्रम जारी रक्खा जाये, तो इससे बड़ी मूर्खता क्या हो सकती है।
मनुष्य शरीर मिला ही इसलिये है कि तम से ज्योति की ओर, मृत्यु से अमृत की ओर और अज्ञान से ज्ञान की ओर अग्रसर हुआ जाये। जो इस मानव जीवन का मूल्य समझते हैं वे हर सम्भव उपाय से अज्ञान के गर्त से निकलने का प्रयत्न करते हैं और निकल-निकल कर प्रकाश में प्रतिष्ठित होते हैं।
ऐसा नहीं कि यह उन्नति, यह प्रगति किन्हीं विशेष मनुष्यों के लिए सम्भव हो। यह सब समान रूप से हर मनुष्य के लिए सम्भव है और हर मनुष्य इसका पूरा अधिकारी है। किंतु यह अधिकार मूर्तिमान तभी हो सकता है, यह सम्भावना तभी चरितार्थ हो सकती है, जब उसके लिए अक्षय जिज्ञासापूर्वक उचित दिशा में प्रयत्न किया जाये।
संसार में सारे बीज समान विशेषताओं वाले होते हैं। वह यह कि सभी वृक्ष बन सकने की सम्भावना निहित रहती है। तथापि सभी बीज वृक्ष नहीं बन पाते। वृक्ष वे ही बीज बन पाते हैं जिनको खाद, पानी आदि की सुविधा होती है, उन्हें वे उपयुक्त साधन प्राप्त होते हैं, जो उसकी विशेषता को विकसित करने में सहायक होते हैं। अन्यथा, जो बीज इनसे वंचित रह जाते हैं, वे बीज रह कर ही अपनी सम्भावना और क्षमता का उपयोग नहीं कर पाते।
मनुष्य जीवन में उन्नति करने की एक से एक बढ़कर सम्भावनायें छिपी हुई हैं। उसकी अन्तरात्मा अद्भुत शक्तियों का भण्डार है। किन्तु यह प्रस्फुटित, पल्लवित और प्रकट तभी होती हैं, जब उन्हें उपयुक्त साधन प्रदान किये जाते हैं। जिस प्रकार बीज के विकास के साधन खाद पानी आदि हैं, उसी प्रकार मानवीय विकास के लिए ज्ञान और विद्या रूपी साधन की आवश्यकता है। ज्ञान द्वारा ही मनुष्य को अपनी शक्तियों का आभास होता है। जब तक अविद्या अथवा अज्ञान का अन्धकार उसे घेरे रहता है, वह न तो अपनी शक्तियों को देख पाता है और न समझ पाता है। फिर उनके उपयोग की तो बात ही क्या हो सकती है। राम सेवक हनुमान में इस विस्मृति एवं स्मृति का अच्छा उदाहरण मिलता है।
देवी सीता की खोज चल रही थी। उसी क्रम में समुद्र पार लंका में उनके खोजने की बात चली। किन्तु समुद्र को पार कर लंका जाये कौन? लोगों ने हनुमान का नाम प्रस्तावित किया। वे थे भी सेना में सबसे बलवान एवं स्फूर्तिवान। समुद्र के किनारे जाकर उन्हें ऐसा लगा कि वे उसके पार न जा सकेंगे। साहस टूटने लगा। मन्त्री जामवन्त ने वस्तुस्थिति पर विचार कर समझ लिया कि यद्यपि महावीर के लिए समुद्र पार जाना सम्भव है, किन्तु इस समय वे अपनी शक्ति का ज्ञान न होने से आने को असमर्थ मान रहे हैं। उन्होंने तत्काल उनको उनकी शक्ति का ज्ञान कराया। सम्बोध पाते ही उन्हें अपनी अन्तःशक्ति का स्मरण हो आया और वह समुद्र जो आत्मबोध के अभाव में दुस्तर दिख रहा था साधारण गड्ढा-सा विदित होने लगा। बस फिर क्या था? उन्होंने अपनी शक्ति का उपयोग किया और कर्तव्य में सफल हो गये।
इसी स्थान पर यदि हनुमान पहले ही समुद्र पार करने को उद्यत हो जाते और कोई व्यक्ति उनको उनकी शक्ति के प्रति शंका उत्पन्न कर देता अथवा आत्म-विश्वास का विस्मरण करा देता तो वह सुन कर कार्य भी उनके लिए दुस्कर हो जाता और वे अपने इस कर्तव्य में असफल होकर वह उत्कर्ष न पा सकते, जो उनके चरित्र के इतिहास में मिला है। मनुष्य की अंतरात्मा में अनंत शक्तियां विद्यमान हैं। किन्तु उनका स्फुरण तभी सम्भव है, जब उनका ज्ञान भी हो।
जिन मनुष्यों को अपनी जिन शक्तियों का स्मरण होता जाता है, वे उसी के अनुरूप अपना विकास करते जाते हैं। जिन्हें अपनी शिल्प शक्ति का स्मरण हो जाता है, वे शिल्पी, जिन्हें काव्य-शक्ति का स्मरण हो जाता है, वे कवि और जिन्हें कलात्मक-शक्ति का स्मरण हो जाता है, वे जीवन में कलाकार बन जाते हैं। इसी प्रकार जिन महात्माओं को यह याद आ जाता है कि वे शुद्ध-बुद्ध परमात्मा के ही अंश हैं, वे निश्चय ही उसी स्वरूप को प्राप्त कर लेते हैं। जिनको जिस वस्तु का पता ही नहीं, वह उसका उपयोग कर ही नहीं सकता। जिसको अपनी शक्तियों का आभास ही नहीं है, वह उनका उपयोग कर किस प्रकार उत्कर्ष को प्राप्त कर सकता है? इसलिये जीवन के उत्कर्ष और और उसकी प्रगति के लिये शक्तियों का स्मरण होना नितान्त आवश्यक है।
निश्चय ही शक्तियों का स्मरण ज्ञान द्वारा ही सम्भव है और ज्ञान की उपलब्धि का उपाय स्वाध्याय और सत्संग के सिवाय और क्या हो सकता है? स्वाध्याय और सत्संग मानवीय जीवनाकाश में सूर्य और चन्द्रमा के समान चमकने वाले दो प्रकाश-केन्द्र हैं। जिस जीवन में इनका उदय हो जाता है, वहाँ अविद्या का अन्धकार रह ही नहीं सकता। इसके विपरीत जिस जीवन में इनको उदय करने का प्रयत्न न किया जायेगा, वहाँ अज्ञान के अन्धकार के सिवाय और किसी माँगलिक स्थिति की आशा ही नहीं की जा सकती।
यह बात सही है कि आज के युग में सत्संग की सुविधा कठिन है। एक तो सत्संग के योग्य उपयुक्त विद्वानों एवं महात्माओं की विरलता है। दूसरे यदि उनका कहीं पता भी चल जाता है, तो उनके पास जाने और रहने के लिए समय और धन दोनों की कमी पड़ती है। फिर जो महात्मा जन सत्संग के योग्य होते हैं उनका भी अपना एक जीवन का कार्यक्रम होता है। आत्मोत्कर्ष और आत्म-मुक्ति के लिये उन्हें भी जप-तप, पूजा-पाठ और भजन-कीर्तन अथवा चिन्तन-मनन करने के लिए समय की बहुत आवश्यकता रहती है।
वे तो अपनी साधना से निकाल कर कुछ सीमित समय ही तो किसी जिज्ञासु को दे सकते हैं। और उतने सीमित अथवा यदा-कदा समय से कुछ काम बनता नहीं। ज्ञान प्राप्ति के लिये तो निरन्तर नित्य सत्संग की आवश्यकता होती है, जो सहज रूप से सम्भव नहीं। तथापि लोग महात्माओं को खोजते और उनके सत्संग का लाभ उठाते हैं।
इस प्रकार की कृपण स्थिति में अच्छा यही है कि स्वाध्याय को ही स्वाध्याय एवं सत्संग दोनों मान लिया जाये। स्वाध्याय तो वह कि जो कुछ थोड़ा-बहुत पढ़ा जाये उसको अपने अन्दर ठीक तरह से मनन और आत्मसात् किया जाये। और सत्संग वह कि योग्य व्यक्तियों की पुस्तकों को ही उनका स्वरूप और उसके विषय को ही उनका प्रवचन मान लिया जाये। निःसन्देह ऐसी निष्ठा एवं आस्था रखने वालों को पुस्तक का सान्निध्य भी विद्वान के संपर्क की तरह ही फलीभूत होता है। पुस्तकों के माध्यम से वर्तमान एवं दूरस्थ व्यक्तियों का ही नहीं सुदूर भूतकाल में चले गये, विद्वानों, चिन्तकों, मनीषियों तथा महात्माओं का सत्संग प्राप्त किया जा सकता है।
आप अपने घर पर ही अपने संचय से पुस्तक उठाते जाइये और व्यास, वाल्मीकि, कालिदास, अरस्तू, सुकरात, ईसा, विवेकानन्द, रामतीर्थ, महात्मा गाँधी जिसे चाहिये मिल लीजिये। उनके विचार जान लीजिये और मनमाना ज्ञान प्राप्त कर लीजिये। किसी वाचनालय में चले जाइये और पत्र-पत्रिकाओं द्वारा संसार के किसी भी महापुरुष, राजनेता अथवा महात्मा से संपर्क स्थापित कर लीजिये। वाचनालय की तिपाई पर बैठे हुए संसार का घटनाचक्र जान लीजिये। अस्तु आज के व्यस्त और संकुल जीवन में ज्ञान प्राप्त करने का स्वाध्याय से बढ़ कर कोई उपाय नहीं है।
हम, आज सब मनुष्य हैं। वास्तविक मनुष्यता की उपलब्धि करना ही हम सबका लक्ष्य है, जोकि ज्ञान के बिना सम्भव नहीं है। ज्ञान की उपलब्धि सबसे सुगम एवं साध्य साधन आज स्वाध्याय ही है। पुस्तकालयों से माँग कर अथवा खरीद कर जिस प्रकार हो सके खोज-खोज कर सत्साहित्य का स्वाध्याय, चिन्तन और मनन करते रहना ही चाहिये और सत्साहित्य वही हो सकता है, जो हमें ज्ञान का ऐसा प्रकाश प्रदान करे, जिसमें हम अपने को अपनी आत्मा को और अपनी शक्तियों को ठीक से पहचान सकें।
सत्साहित्य वही है, जो हमें उन सत्कर्मों, विचारों, गुणों और विशेषताओं की सिद्धि के लिये अग्रसर करे। जिन्हें पाकर हम मानव और वास्तविक मानव बन कर इस जीवन को सार्थक तथा सफल बना सकें। जिस प्रकार पारस को छू कर लोहा सोना बन जाता है, उसी प्रकार ज्ञान पाकर साधारण मनुष्य असाधारण, जीवात्मा, परमात्मा और भवबन्धन टूट कर मुक्ति में परिणत हो जाते हैं। ज्ञान सर्वोत्तम तत्व है, उसे प्राप्त ही करना चाहिये।
माँ ने कहा- ‘‘बच्चे, अब तुम समझदार हो गये हो। स्नान कर लिया करो और प्रतिदिन तुलसी के इस वृक्ष में जल चढ़ाया करो। तुलसी की उपासना ही हमारी परम्परा पुरखों से चली आ रही है।”
बच्चे ने तर्क किया- ‘‘माँ तुम कितनी भोली हो। इतना भी नहीं जानती कि यह तो पेड़ है? पेड़ों की भी कहीं पूजा की जाती है। इसमें समय व्यर्थ खोने से क्या लाभ है?”
लाभ है मुन्ने! श्रद्धा कभी निरर्थक नहीं जाती। हमारे जीवन में जो विकास और बौद्धिकता है, उसका आधार श्रद्धा ही है। श्रद्धा छोटी उपासना से विकसित होती है और अन्त में जीवन को महान बना देती है, इसलिये यह भाव भी निर्मूल नहीं।
तब से विनोबा भावे जी ने प्रतिदिन तुलसी को जल देना प्रारम्भ कर दिया। माँ की शिक्षा कितनी सत्य निकली उसका परिणाम अब आपके सामने है।
यह सुर दुर्लभ मानव-जीवन संसार को अनमोल उपलब्धि है। जिसको यह मिल गया उसे मानो सब कुछ मिल गया। वह इसलिये कि संसार की सारी संपदाएँ और सारी उपलब्धियाँ उसके अनुरूप पुरुषार्थ पर निर्भर हैं। और प्रभु ने हर प्रकार के पुरुषार्थ के योग्य उसे शक्ति, साहस, बुद्धि और विवेक दिया हुआ है। अब यह और बात है कि यह सब होते हुए भी कोई आलस्य, प्रमाद और अज्ञान के वशीभूत रह कर लक्ष्य पूर्ण पुरुषार्थ न करे और असफलता के साथ संसार से मर कर चला जाए।
ऐसे बहुमूल्य जीवन को संसार के तुच्छ विकारों और विषयों में लगा कर मिटा डालना पाप है। निरुद्देश्य रूप से जीवन की शक्तियों का विनाश करना आत्म-घात के पातक के समान है। उदाहरण के लिए यदि कोई धन की लिप्सा में असत्य और बेईमानी का आश्रय लेता है। चोरी, डकैती अथवा ठगी, मक्कारी से भरे काम करता है तो वह आत्म-हत्या ही करता है। यों तो शास्त्रों में आत्मा को निर्विकार, अजर और अमर बताया गया है। गीता में उसके लिए कहा गया है-
“नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः। न चैनं क्लेदयत्यापो न शोषयति मारुतः॥’’
-इस प्रकार आत्मा को शस्त्र छेदन नहीं कर सकते, अग्नि भस्म नहीं कर सकता, जल गीला नहीं कर सकता और वायु सुखा नहीं सकता।
किन्तु इस स्थूल हत्या के अतिरिक्त एक सूक्ष्म हत्या भी होती है। वह किसी वस्तु का अनुपयोग अथवा दुरुपयोग। किसी के पास साधनों की सुविधा हो और वह उनका उपयोग न करे, उन्हें ज्यों का त्यों पड़ा-पड़ा सड़ने गलने दे। न तो अपनी उन्नति में उपयोग करे और न किसी दूसरे के हित में काम लाये तो यह उसकी हत्या ही मानी जायेगी। इसी प्रकार यदि कोई शक्ति अथवा साधन का उपयोग किन्हीं को लजाने, सताने, आतंक जमाने और ऐसे कामों में लगाता है जिससे उसकी स्वयं अथवा समाज की हानि होती है तो वह शक्ति-साधन की हत्या ही है। किसी वस्तु का उसका समुचित उपयोग न करना उसकी हत्या ही है।
स्थूल चीजों को छोड़कर यदि सूक्ष्म अथवा निराकार चीजों को- जैसे ज्ञान ही ले लिया जाय तो उसकी भी हत्या की जाती है। किसी ने अपने पुरुषार्थ से पाया अथवा उसे ईश्वर ने दिया- यदि किसी के पास ज्ञान है और वह उसका उपयोग नहीं करता- अर्थात् न तो स्वयं संसार के बन्धनों और कष्टों से छूटने का प्रयत्न करता है और न उस ज्ञान का उपयोग कर समाज का अन्धकार दूर करता है तो यह अनुपयोगिता उस ज्ञान की हत्या ही होगी। उसका क्या होगा? वह मन मस्तिष्क में बन्द पड़ा नष्ट होता हुआ एक दिन बिल्कुल समाप्त हो जाता है। किसी को हाथ से न मार कर यदि कहीं एकांत में बंद कर दिया जाये और जीवन के साधन-भोजन, जल, आदि न दिये जाएं और वह मर जाए तो क्या बन्द करने वाला व्यक्ति उसकी हत्या के पाप से बच जायेगा? नहीं कदापि नहीं। वह उसका हत्यारा ही माना जायेगा। किसी को मार डालना अथवा किसी के लिए मृत्यु के कारण जुटा देना उसकी हत्या के समान ही है।
इस प्रकार धन की लिप्सा में जब कोई पाप मार्गों का अवलम्बन लेता है तो वह आत्मा का हनन ही करता है। चोरी, डकैती करने अथवा किसी को ठगने अथवा धोखा देने से जो राज-दण्ड अथवा सामाजिक दण्ड मिलेगा उससे मनुष्य की यथार्थ प्रगति रुक जायेगी। प्रगति का अवरोध भी एक प्रकार से आत्म-हत्या ही है। साथ ही उन पापों का जो कुप्रभाव आत्मा पर पड़ेगा उससे उसका तेज नष्ट होगा, मलीनता आएगी वह उस तेजोमयी आत्मा की हत्या ही मानी जायेगी। दीपक को बुझा देना अथवा अग्नि का ताप नष्ट कर देना उसकी हत्या ही तो है।
आनन्द के लोभ में लोग व्यसनों तथा विषय-वासनाओं में संलग्न हो जाते हैं। अज्ञानवश काम सेवन और मद्यपान आदि की अधिकता कर लेते हैं। यह आनन्द पाने का उपाय न होकर एक प्रकार से आत्म-हत्या ही है। अधिक काम सेवन से क्या होगा? सारा भोज, वीर्य और तेज नष्ट हो जायेगा। शरीर खोखला हो जायेगा। प्रतिमा नष्ट हो जायेगी। बुद्धि और विवेक मन्द पड़ जायेंगे। ऐसी स्थिति में मनुष्य के शारीरिक, बौद्धिक तथा मानसिक एवं अध्यात्मिक स्वास्थ्य नष्ट हो जायेंगे। वह संसार के त्रय तापों से ग्रसित रहने लगेगा। कोई उन्नति कर सकना तो उसके लिए असम्भव हो ही जायेगा उल्टे-पतन के गर्त में गिरता चला जायेगा। यह आत्म-हत्या ही है।
लोग सुख, आनन्द, स्वास्थ्य और मनोरंजन के लिए शराब आदि नशे करने लगते हैं। इससे वह अपनी आर्थिक, शारीरिक और सामाजिक तीनों प्रकार की हानि करता है। मद्य का व्यसन मनुष्य को इस हद तक गिरा देता है कि एक समय ऐसा आता है कि वह अपनी जमीन, जायदाद तो दूर पत्नी के गहने-कपड़े तक बेचने लगता है। नशा और दरिद्रता दोनों सगों जैसे साथी हैं, जहाँ नशे का व्यसन होगा वहाँ दरिद्रता का रहना अनिवार्य है। जहाँ दरिद्रता होगी वहाँ कोई न कोई शारीरिक, मानसिक अथवा बौद्धिक व्यसन जरूर छिपा होगा। नशेबाज ऋणी ही नहीं हो जाते बल्कि वे तरह-तरह के नैतिक तथा सामाजिक अपराध भी करने लगते हैं। जिससे राजदण्ड और सामाजिक निन्दा एवं तिरस्कार की यातना भोगनी पड़ती है। नशेबाजों का शरीर अन्दर-अन्दर गल कर निर्जीव हो ही जाता है। बहुधा अनेक भयंकर रोगों के रूप में भी मद्य का विकार बाहर उभर आता है। नशे तो विष का ही एक रूप होते हैं। विष पान करने का जो परिणाम होना चाहिए वह नशा पीने खाने से होता है। इसे आत्म-हत्या के सिवाय और क्या कहा जा सकता है?
इनके अतिरिक्त आत्म-हत्या के और भी अनेक रूप एवं प्रकार हैं। ऐसे प्रकारों में निराशा, चिन्ता, उत्तेजना, क्रोध, ईर्ष्या-द्वेष आदि मानसिक विकारों तथा आवेगों को गिनाया जा सकता है। निराश रहने वाला व्यक्ति क्या यह कहने का साहस कर सकता है कि वह अपने को जीवित रखे हुए है। जब वह अपने अन्तर के अन्धकार और बाहर के उदासीनता में अपने को डाले हुए आहें भरता रहेगा, निकम्मा बना पड़ा रहेगा तो किसी प्रकार कह सकता है कि वह अपनी हत्या नहीं कर रहा है। मैं क्या कर सकता हूँ? मेरे पास कोई शक्ति, सामर्थ्य नहीं है। मुझे तो असफलता ही मिलती रहती है। मेरा भाग्य खराब है। ईश्वर मेरे विरुद्ध है। सफलता, प्रगति अथवा उन्नति का प्रकाश देखना मेरे प्रारब्ध में ही नहीं है- इस प्रकार की अनहोनी बातें करने वाला निराश व्यक्ति अपने प्रति आत्म-हत्या का ही अपराधी होता है।
अपने हृदय और आत्मा में चिन्ता की चिता जलाते रहने वाला यदि यह कहे कि वह आत्म-हत्या का उपक्रम नहीं कर रहा है तो ऐसे झूठे आदमी की बात का कौन विश्वास करेगा? यह तो वैसी ही बात हुई कि आग में लकड़ी तो बढ़ाता जाए और कहे यह बुझ जाए कि वह उसे जला थोड़े रहा है। चिन्ता तो प्रत्यक्ष चिता है, आग है, ज्वाला है। जो लोग इसे पाल लेते हैं वे दिन-रात अन्दर ही अन्दर जलते रहते हैं। कुछ समय बाद उनकी उस आन्तरिक जलन के लक्षण बाहर भी दिखाई देने लगते हैं। शरीर सूखने लगता है। मुख पर कालिमा आ जाती है। आहार विकृत हो जाता है। बाल गिर जाते हैं। दाँत कमजोर हो जाते हैं। आँखों की ज्योति मन्द हो जाती है। शरीर निःशक्त और निढाल हो जाता है। इस प्रकार चिन्ता द्वारा अपने को इस दुर्दशा में डाल लेना आत्म-हत्या नहीं तो और क्या है?
इतना ही क्यों? चिन्ता की मात्रा और तारतम्यता अब अधिक हो जाती है तो मनुष्य विक्षिप्त, पागल और उन्मादी तक हो जाता है। वे जहाँ तहाँ बैठे बकते झकते रहते हैं। संसार का कोई काम नहीं कर सकते। किसी मसरफ के नहीं रह जाते। अपने को ऐसी दशा में खींच लाने वाले लोग आत्म-हत्याओं की श्रेणी में ही आते हैं।
उत्तेजना, आवेग अथवा क्रोध आदि विकारों को पोषण देने वाले लोग भी आत्म-हत्यारे ही माने जायेंगे। उत्तेजना प्रधान व्यक्ति जरा-सा कारण उपस्थित होने पर भी विस्फोट जैसे फूट उठते हैं। अपने प्रवाह में वे हित-अनहित की ओर ध्यान नहीं दे पाते। जो कुछ सींग समाते हैं तत्काल कर बैठते हैं। ऐसे ही आदमी दूसरों की ही नहीं अपनी भी स्थूल रूप से हत्या कर डालते हैं। उत्तेजना प्रधान व्यक्ति अपने मस्तिष्क की शाँति और मन की स्थिरता खो देते हैं। उनके पूरे शरीर में एक तनाव बना रहता है। जिससे वे कभी भी शान्ति और सन्तोष अनुभव नहीं करते आवेश में वे दिन में बहुत बार मरते-जीते रहते हैं। उत्तेजना प्रधान व्यक्तियों की विवेक-बुद्धि तथा कार्य-दक्षता न केवल मिट ही जाती है, बल्कि उसे प्राप्त करने की क्षमता भी चली जाती है। वह एक तरह से मूढ़ और जड़ बन जाता है। मूढ़ता और जड़ता को मनुष्य की मृत्यु ही माना गया है। अस्तु उत्तेजना पाते रहने वाले को यदि आत्म-हत्यारा कह दिया जाय तो कोई अतिश्योक्ति न होगी।
क्रोध का उदय होते ही मनुष्य सबसे पहले बौद्धिक रूप में मर जाता है। गीता में कहा ही गया है-
“क्रोधाद् भवति संमोहः संमोहात्स्मृति विभ्रमः। स्मृति भ्रंशाद बुद्धिनाशा बुद्धिनाशा प्रणश्यति।”
- ‘‘क्रोध से संमोह (अविवेक) पैदा होता है, संमोह से स्मृति का भ्रंश होता है और स्मृति भ्रंश से बुद्धि का नाश होता है और बुद्धि के नाश से मनुष्य आप नष्ट हो जाता है।
इस नियम के अनुसार जब मनुष्य क्रोध करता है तो निश्चय ही अपने विनाश की तैयारी करता है यदि वह उसे बलपूर्वक रोक नहीं लेता। क्रोध की बहुतायत से जिसने अपने बुद्धि विवेक का नाश कर डाला वह यदि पागलों की तरह शरीर से जीवित भी रहा तो भी बुद्धिमान लोग उसे जीवित नहीं मान सकते। क्रोधी व्यक्ति अपनी बुद्धिनाश द्वारा ही विनाश के बीज नहीं बोलेता बल्कि अपने रस दोष से शत्रुओं तथा विरोधियों की संख्या भी बढ़ा लेता है। चारों ओर शत्रुओं, विरोधियों, असहयोगियों से घिरा हुआ मनुष्य कब तक अपना मंगल मना सकता है वह किसी के प्रतिशोध अथवा सामाजिक असहयोग की भेंट चढ़कर एक दिन निश्चय ही नष्ट हो जायेगा। इस प्रकार क्रोधी व्यक्ति कुमार्ग से अपनी ही हत्या करके आत्म-हनन का दोषी बनता है।
ईर्ष्या-द्वेष तो मनुष्य जीवन के लिए साक्षात् विष ही माने गये हैं। जो ईर्ष्यालु अथवा दैवी स्वभाव का है वह सुख-शान्ति से सदा के लिए वंचित हो जाता है। यदि वह स्वयं उन्नति करता है तो दूसरों से द्वेष करता है और यदि किसी दूसरे को उन्नति करते देखता है तो ईर्ष्या से जलता रहता है। यह जीवन भी कोई जीवन है। जो एक क्षण के लिए भी सुख-शान्ति अथवा संतोष न पा सके, वह तो जीवन मृत की उस स्थिति में रहता है जो प्राण-हीन मूल्य से भी जघन्य होती है। इस प्रकार ईर्ष्या-दोष का पालन करने वाले भी आत्म-घाती हुआ करते हैं।
स्थूल रूप से अपने प्राण खो देना ही आत्म-हत्या नहीं है। विकारों, व्यसनों तथा दोषों द्वारा अपने को अस्वस्थ, निर्बल, निरातेज, मूढ़ अथवा अविवेक को बनाना अथवा अपने आचरण द्वारा समाज में विरोध, निंदा, अपयश तथा जस-भोग उत्पन्न करना भी अपने लिए आत्म-घात करने के समान ही है। अस्तु अपनी-अपनी क्षमताओं और गुणों की हर प्रकार से रक्षा करते हुए मनुष्य को आत्म-हत्या के पाप से बचे रहकर उन्नति, प्रगति और सुख-शांति के रूप में अपने जीवन को दीप्तमान ही बनाने का प्रयत्न करना चाहिये। यह सुर-दुर्लभ मानव-जीवन अनमोल है। ईश्वर का उपहार उसकी धरोहर है। इसे व्यर्थ में खोना अथवा इसका दुरुपयोग करना आत्म-हत्या के समान दोषपूर्ण माना गया है।
तुर्की ने कोशूढ़ को कैद कर लिया। जेल में पड़े कोशूढ़ के सामने शर्त रखी गई यदि- आप इस्लाम स्वीकार कर लें तो आपको मुक्त किया जा सकता है।
कोशूढ़ ने विचार किया और हंसकर उत्तर दिया- ‘मृत्यु और लज्जा इन दोनों में से किसे स्वीकार किया जाये आज तक मेरे सामने ऐसी उलझन नहीं पड़ी। मृत्यु जीवन का अनिवार्य भाग है तो फिर उससे डरकर अपना सिर क्यों नीचा करूं।’ जब मेरे पास सब कुछ था तब मैंने अपना धर्म न बदला, आज केवल वही मेरा साथी है तो मैं उसे कैसे छोड़ दूँ? ईश्वर की आज्ञा पूरी करो। मरने के लिये तैयार हूँ, कलंक लगाने के लिए नहीं।
मानव जीवन श्रेष्ठतम उपलब्धि मानी गई है। मनुष्य को मनुष्य रूप में श्रेष्ठता पूर्वक ही जीवन यापन करना चाहिये। ऊँचा आचार-विचार, ऊँची भावनायें, उन्नत आदर्श और उदात्त व्यवहार ही मनुष्य की शोभा है। जीवन को सार्थक और समृद्ध बनाने के लिए श्रेष्ठता की सिद्धि करना बहुत आवश्यक है। मनुष्य होकर भी जो श्रेष्ठ जीवन का सुख न ले सका उसको असफल ही माना जायेगा।
जिसको सिद्धि वाँछित है उसे श्रेष्ठता का स्वरूप समझ लेना आवश्यक है। श्रेष्ठता क्या है? इस प्रश्न के उत्तर में कहा जायेगा कि शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक प्रसन्नता, बौद्धिक गरिमा और आत्मिक-बोध का भाव मिलकर ही किसी मनुष्य को श्रेष्ठ बनाते हैं। पद-प्रतिष्ठा, आदर-सम्मान, विभव-ऐश्वर्य, शक्ति, बल और बहुत कुछ क्षमतायें होने पर भी यदि मनुष्य में उपरिकथित चातुर्य का अभाव है तो उसे पूर्ण श्रेष्ठ मनुष्य नहीं माना जा सकता। पूर्ण श्रेष्ठता की सिद्धि के लिए उपर्युक्त चार विशेषताओं का होना अनिवार्य माना जायेगा।
शारीरिक स्वास्थ्य क्या है? मोटा-तगड़ा और भारी-भरकम होना स्वास्थ्य का लक्षण नहीं है। स्वास्थ्य का लक्षण है शरीर की सुडौलता। अवयवों का गठन, पेशियों का संतुलन, दृढ़ता और आवश्यक माँसलता सुडौलता की शर्तें हैं। शरीर से सुडौल और सन्तुलित होने पर भी जिस में स्फूर्ति और कार्य क्षमता की कमी है उसे पूर्ण स्वस्थ नहीं माना जा सकता। और लोग हों चाहे न हों किन्तु पहलवान वर्ग के प्रायः सभी लोग शरीर से सुडौल और सुन्दर होते हैं। किन्तु उनमें स्फूर्ति और कार्य क्षमता की कमी होती है। कुश्ती और कसरत के अभ्यस्त काम को छोड़कर पहलवान कदाचित ही स्फूर्ति और कार्य क्षमता का प्रमाण दे पाते हैं। अपने उन दो कामों को छोड़कर दिन भर अलसाने अथवा सोने के सिवाय और कोई काम उनके वश का नहीं होता।
जो मनुष्य शारीरिक सौष्ठव के साथ-साथ स्फूर्ति और कार्य क्षमता से भी संपन्न है, वही वास्तव में पूर्ण स्वस्थ माना जायेगा। ऐसे लोगों के पास आलस्य, सुस्ती तथा थकान नहीं आती। जितनी देर उन्हें जो कार्य करना होता है एक भाव से अविचलित हुए करते रहते हैं। काम करने, दौड़ने, खेलने, बोलने आदि क्रियाओं तक में उनकी स्फूर्ति प्रकट होती रहती है। अवयवों, पेशियों और अंगों से पुष्ट स्फूर्ति और श्रम सम्पत्ति से सम्पन्न व्यक्ति के सम्बन्ध में व्याधियों की कल्पना भी नहीं की जा सकती- और प्रकृति, परिस्थिति अथवा संयोग से उसके सम्मुख ऐसी परिस्थिति आ भी जाती है तो वह अपनी सुरक्षित क्षमता से जल्दी ही उस पर नियन्त्रण पा लेता है।
मानसिक प्रसन्नता का लक्षण है- मनोबल, दृढ़ता, अचंचलता, उत्साह, साहस, निर्भीकता, निष्ठा, कर्त्तव्य परायणता और सद्भावना आदि गुण जो मानवजीवन की सुख-शांति और सफलता के विधायक तत्व होते हैं, जिसका मन निर्बल, चंचल, निरुत्साही, भीत तथा निष्ठाहीन होगा, निश्चित है कि उसका मन मलीन और विपरीत दशा वाला होगा। मलीन और निर्बल मन का शंकाओं, संदेहों, विक्षेपों आदि कि असद् तत्वों से भरा रहना स्वाभाविक है। जिसके मन की दशा ऐसी दयनीय होगी वह श्रेष्ठता की साधना में सफल हो सकेगा ऐसा नहीं माना जा सकता। जिसका मन निरोग, निर्विकार और निर्मल होगा उसका मन न केवल प्रसन्न ही रहेगा बल्कि प्रेम, सहानुभूति, दया, करुणा आदि की सद्भावनाओं से भरा रहेगा। जिसे गुणों की यह सम्पत्ति प्राप्त हो जाये उसे श्रेष्ठता की ओर बढ़ने से कौन रोक सकता है?
बौद्धिक गरिमा के अंतर्गत बुद्धि की निर्णायक शक्ति, सन्तुलित चिन्तन, उच्चविचार, शान्ति और शासन आदि के ऐसे गुण आते हैं जो किसी भी विषम परिस्थिति में मनुष्य को सहायक होते हैं। जो अच्छाई-बुराई, कर्तव्य-अकर्तव्य, सत्य-असत्य, पथ और विपथ में निर्णय कर सकने वाली बुद्धि से रहित हैं, जिसकी बुद्धि चंचल, अशान्त और असंतुलित होगी, जिसमें इन्द्रियों और मन पर शासन करने की योग्यता न होगी वह व्यक्ति श्रेष्ठता की दिशा में आवश्यक प्रगति कर सकने की आशा नहीं कर सकता। जिसकी बुद्धि योग्यता पूर्वक निर्णय दे सकती है, ऊहापोह को समय नष्ट करने से वारित रख सकती है। इन्द्रियों तथा मानसिक वृत्तियों पर शासन रखकर उन्हें कर्तव्य पर चला और अकर्तव्य से रोक सकती है वह किसी भी श्रेष्ठता को प्राप्त कर सकने के लिए योग्य मानी जा सकती है।
श्रेष्ठता की सिद्धि के लिए सबसे महान शक्तिशाली और महत्वपूर्ण गुण है आत्मबोध। जिसमें आत्मबोध की कमी है, आत्मा की शक्तियों की प्रतीति नहीं है, आत्म-विश्वास का अभाव है और जो यह अनुभव नहीं करता कि आत्मा परमात्मा का अंश है, जो मानव देह में जीव को वह दिव्य-चेतना और दिव्य-प्रकाश देने के लिए अवतरित हुई है जिसको अपनाकर मनुष्य किसी भी उन्नत ही नहीं उन्नततम शिखर पर चढ़ सकता है। वह मनुष्य सब कुछ गुणी, बली और विपुलता पूर्ण होने पर भी प्रगति के नाम पर एक कदम भी नहीं बढ़ सकता। जिसने जीवन के मूलतत्व को ही नहीं जाना उसने अन्य सब बातें जान भी लीं तब भी वह अनजाना ही माना जाएगा। आत्म-बोध सम्पन्न व्यक्ति निरन्तर अपने अन्दर एक अलौकिक सम्बल, एक अविच्छिन्न साथी और एक शक्तिशाली सहायक का अनुभव करता है। आत्म-बोध से आत्म-विश्वास और परमात्मनिष्ठा की पुष्टि होती है। इतने बल सम्बल के साथ श्रेष्ठता की ओर बढ़ने वाले का लक्ष्य पूरा न हो, यह सम्भव नहीं।
किन्तु ये चतुर्वर्गीय गुण आप से आप प्राप्त नहीं होते। इन्हें उपाय, युक्ति और साधना द्वारा उपार्जित किया जाता है। इन गुणों की सिद्धि के लिए बहुत कुछ छोड़ना और बहुत कुछ ग्रहण करना पड़ता है। उन परिस्थितियों में रहना अथवा वैसी परिस्थितियाँ बनानी पड़ती हैं जो इनकी साधना में सहायक हो सकें।
इन गुणों को विकसित करने का उपाय है- संक्षिप्त जीवन-विधि। जिसका आशय है बहुवाद का परित्याग। जो लोग जीवन के विविध क्षेत्रों अथवा विषयों का अनावश्यक फैलाव कर लेते हैं वे श्रेष्ठता के संराधक गुणों का न तो विकास कर पाते हैं और न उनकी रक्षा। आवश्यकताओं, संपर्कों, साधनों, सुविधाओं, सुखों, मनोरंजनों, सम्बन्धों तथा परिवार आदिक बातों में आधिक्य तथा विस्तार का समावेश कर लेते हैं वे प्रायः श्रेष्ठता की रक्षा में असफल ही रहते हैं। अधिकता के पालन में अधिक हाथ-पाँव मारने और भाग-दौड़ करनी होती है। ऐसी विवश व्यग्रता में श्रेष्ठता सम्बन्धी आदर्शों, नीतियों और मर्यादाओं का पालन कर सकना कठिन होता है। जब-तब और जहाँ-तहाँ स्खलन होता ही रहता है।
यह समझने के लिये कि विस्तार अथवा फैलाव से श्रेष्ठता विरोधी अनेक दोष और परिस्थितियाँ उत्पन्न होती रहती हैं- किन्हीं दो-एक प्रसंगों पर विचार कर लिया जाय। यदि कोई व्यक्ति जीवन में आवश्यकताओं का विस्तार कर लेता है तो वह वाँछनीय श्रेष्ठता की रक्षा न कर पायेगा। मनुष्य की मूल आवश्यकताएं हैं भोजन, वस्त्र और आवास। यदि मनुष्य परिश्रमी है और उसने इन मूल आवश्यकताओं को सामान्यता से आगे नहीं बढ़ाया है तो वह मान्य-मर्यादाओं और आदर्शों के साथ जीवनयापन कर सकता है। वह ईमानदार, सच्चा और सरल रह सकता है। उसे श्रेष्ठता विरोधी दुर्गुण ग्रहण करने का पाप न करना पड़ेगा। यदि वह अपनी सामान्य आवश्यकताओं को असामान्य बना लेता है अथवा अन्य बहुत-सी कृत्रिम आवश्यकताओं का विस्तार कर लेता है तो उसे उनकी पूर्ति के लिए अनुचित गतिविधि अपनाने के लिए मजबूर होना पड़ेगा। अनौचित्य की पूर्ति अनौचित्य द्वारा ही करनी पड़ती है।
सामान्य आवश्यकता है भोजन। दिन में दो बार कुछ ऐसा खाद्य-पदार्थ मिल जाए जिससे उदरपूर्ति होती रहे और अस्वास्थ्य की भी सम्भावना न हो। बस इसके अतिरिक्त और भोजन की आवश्यकता नहीं है। ऐसा सामान्य भोजन पूरी ईमानदारी और सत्य के साथ परिश्रम पूर्वक कहीं भी सरलता से पाया जा सकता है। अब यदि विस्तार करके इस आवश्यकता का अर्थ- मेवा, मिष्ठान, पकवान, दूध, दही, लस्सी, रबड़ी, चाय, काफी, माँस, मछली, अंडा आदि विविध व्यंजन और प्रकार मान लिया जाये, दो समय से चार छः समय तक बढ़ा दिया जाए तो इसकी पूर्ति सरल साधनों द्वारा सम्भव नहीं। इसके लिए अतिरिक्त धन और साधनों की आवश्यकता होगी जिन्हें उपलब्ध करने में उन उपायों और युक्तियों का सहारा लेना पड़ेगा जो श्रेष्ठता के विरोधी होंगे।
सामान्य वस्त्रों की आवश्यकता पर यदि परिधान, रेशम, नायलोन और वस्त्रों के प्रकार तथा परिमाण का अनावश्यक विस्तार कर दिया जायेगा तो इस अनुचित आवश्यकता के लिये अनुचित उपाय ही काम में लाने होंगे। आवास की आवश्यकता एक साफ-सुथरे, साधारण मकान से पूरी हो सकती है। किन्तु यदि इसे कोठी, महल, हवेली और बंगले तक बढ़ा दिया जाये और रहन-सहन के साधनों का अर्थ शाही शान-शौकत मान लिया जाये तो निश्चय ही उसकी पूर्ति में उन आदर्शों और मर्यादाओं का बलिदान करना होगा जो मानवीय श्रेष्ठता के आधार होते हैं।
सुख-सुविधाओं का अर्थ होता है थोड़े से साधन जो परिश्रम के बाद मनुष्य को उतना आराम दे सकें जितने से उसकी थकान दूर हो जाए और वह दूसरे दिन परिश्रम करने के लिये ताजा बन सके। यदि इसी साधारण सी आवश्यकता को ऐशो-इशरत और लास-विलास के साधनों तक बढ़ा दिया जाए तो उनकी पूर्ति में अनुचित उपायों की आवश्यकता से किस प्रकार बचा जा सकता है? इसी प्रकार अनौचित्य की पूर्ति के लिये अनौचित्य का अवलम्बन वाला नियम हर अनावश्यक विस्तार पर लागू होता है। कामनाओं-वासनाओं का विस्तार पाप के लिये, सम्पन्न और सम्बन्धों का विस्तार उलझनों, परिवार और प्रियतम का विस्तार अशान्ति तथा चिन्ता के लिये विवश करेगा। किसी भी विषय, प्रसंग अथवा क्षेत्र में क्यों न हो विस्तारवाद से मनुष्य का विस्तार नहीं हो पाता।
श्रेष्ठता के लक्षण हैं- शान्ति, सन्तोष, सन्तुलन सद्भावना, सदाशयता, सदाचरण, सत्य, सरलता आदि सद्गुण। किन्तु इनकी रक्षा विस्तारवाद ने नहीं हो सकती। इन दिव्य गुण-रत्नों को तभी सुरक्षित रखा जा सकता है, जब मनुष्य अपनी जीवन-विधि में संक्षिप्तता का समावेश करे। उसके साथ जिस दिशा में जो भी अनावश्यक विस्तार लग गया हो उसे काट कर फेंक दे। थोड़ी आवश्यकताएं, थोड़ी कामनाएं, थोड़ा संपर्क, थोड़ा मनोरंजन, थोड़ा परिवार, थोड़े साधन, थोड़ी सुविधा और सुख रखने वाला ही इस संसार में सरलता, सत्य और आदर्श पूर्वक जीवनयापन कर सकता है। वही उन मर्यादाओं, नीतियों और रीतियों का पालन कर सकता है जो श्रेष्ठता की संराधिका होती हैं। संक्षेप से रहने वाला हर विशेष रूप से बच रहता है और विस्तारवादी दिन-दिन माया-जालों में फंसता हुआ निकृष्टता की ओर गिरता जाता है।
एक बार भगवान कृष्ण से भेंट करने उद्धव गये। उद्धव और माधव दोनों छुटपन से दोस्त थे। द्वारपाल ने कहा- “इस समय भगवान पूजा में बैठे हैं, इसलिये अभी थोड़ी देर आपको ठहरना होगा।” समाचार पाते ही भगवान शीघ्र ही पूजा कार्य से निवृत्त होकर उद्धव से मिलने आये। कुशल प्रसन्न के बाद भगवान ने पूछा- “उद्धव, तुम किसलिए आये हो?”
उद्धव ने कहा- “यह तो बतलाऊंगा, पहले मुझे यह बताइये कि आप पूजा किसकी कर रहे थे?” भगवान ने कहा- “उद्धव तुम यह नहीं समझ सकते।” लेकिन उद्धव कब मानने वाले थे। उन्होंने जिद्द की। तब भगवान ने कहा- ‘‘उद्धव, तुझे क्या बताऊं? मैं तेरी ही पूजा कर रहा था।’’
“उद्धव माधव की पूजा करता है और माधव उद्धव की पूजा करता है। भगवान भक्त की पूजा करते हैं और आप भगवान की। इस आदर्श, से भगवान बताना चाहते हैं कि- ‘‘जो मालिक हैं, वे मजदूरों के सेवक बनें, जो शासक हैं, वे प्रजा के सेवक बनें, शिक्षक विद्यार्थियों के सेवक बनें, माता-पिता अपनी सन्तान के सेवक बनें, उद्योगपति श्रमिकों के सेवक बनें, जिस किसी की जिम्मेदारी का काम मिला है, वे सब सेवक बनकर काम करेंगे तो दुनिया के सारे झगड़े मिट जायेंगे।” -विनोबा।
मनुष्य जीवन की परिपूर्णता के लिये तप आवश्यक डडडड ज्ञान-साधना + श्रम-साधना = तप। ज्ञान और श्रम दोनों का व्यक्तित्व अपने आप में अपरिपूर्ण है इसलिये बौद्धिक वाणी को श्रमशील होना चाहिए और श्रमिक को स्वाध्यायशील भी। इस बात को वेद में यों व्यक्त किया है-
संज्ञपनं वा मनसोऽथो संज्ञपनं हृदः। अथो भगस्य यच्छ्रान्तं तेन संज्ञपयामि वः॥ -अथर्व 6।74।2
अर्थात्- हे शिष्य! तू मन और हृदय के ज्ञान से सम्पन्न बन, वैसे ही ऐश्वर्य प्राप्ति के लिये परिश्रमी भी बन।
मनुष्य जीवन के विकास के लिये ज्ञान की, शिक्षा की कितनी आवश्यकता है यह कोई कहने की बात नहीं। सार्वजनिक, लोक सेवाओं से लेकर वैयक्तिक जीवन की सुख सुविधाओं के लिये भी ज्ञान परमावश्यक है। बुद्धिमान व्यक्तियों के जीवन में अधिक आकर्षण और सुभीता प्रतीत होता है। जब कि अशिक्षित व्यक्तियों को पग-पग पर औरों का आश्रित लेना पड़ता है फिर भी काम नहीं बनता। शिक्षित व्यक्ति कहीं भी चले जाते हैं। अशिक्षित व्यक्ति बिना सहारे के रेल की टिकट भी खरीद नहीं सकते। मनुष्य समाज में जो सुविधायें और श्रेष्ठतायें हैं उनका अधिकाँश उपभोग चतुर व्यक्ति करते हैं। अनपढ़ और गंवार लोग उनसे जो कुछ बचता है उतने में ही विवश होकर सन्तोष करते हैं।
शिक्षा या बौद्धिक चतुराई यद्यपि ज्ञान की सीमा में नहीं आते तथापि वे उसके अंश मात्र होने से भी इतने लाभदायक हैं। परिपूर्ण ज्ञान की परिभाषा, वेद ने बताई। उसे विद्या कहते हैं। वह केवल बुद्धि विकास को ही ज्ञान नहीं मानते। मन का ज्ञान अर्थात् मानसिक शक्तियों का विकास। दोनों का संयोग ही ज्ञान है। एक शब्द में उसे विद्या या अध्यात्म कहा जा सकता है।
मन का विकास इतिहास, भूगोल, रसायन शास्त्र, जीवविज्ञान, कृषि विज्ञान, गणित, अर्थशास्त्र, समाज शास्त्र, शरीर शास्त्र, नागरिक शास्त्र आदि से होता है। साँसारिक वस्तुओं के विश्लेषण की जितनी अधिक दक्षता बढ़ती जाती है यह माना जाता है कि वह व्यक्ति उतना ही अधिक बुद्धिमान है आरे साँसारिक कर्त्तव्यों को उतनी ही सफलता और सरलता से पूरा कर सकता है इसीलिये उसे बड़ी जिम्मेदारियाँ दी जाती हैं और उसी परिणाम में सेवा का लाभ और पारिश्रमिक भी।
मनोबल का विकास ही साहस, सूझ-बूझ, कुशलता, कलाकारिता, योग्यता का प्रतीक है। किन्तु केवल बौद्धिक योग्यता ही मनुष्य को पूर्णतया सन्तुष्ट नहीं कर पाती। हृदय और उसके उद्गार भी ऐसे हैं जिनकी आवश्यकता मनुष्य ही नहीं, साधारण जीवधारियों को भी होती है। प्रेम, स्नेह, वात्सल्य, सौजन्य, श्रद्धा, निष्ठा, आस्था का स्थान मनुष्य जीवन में मानसिक शक्तियों से भी अधिक है। पढ़े-लिखे व्यक्ति यदि हृदय हीन हैं तो अपार सम्पत्ति और सफलता होने पर भी उनका व्यक्तिगत जीवन दुःखी रहता है पर जिन लोगों के जीवन में प्रेम, ममत्व, आत्मीयता, विश्वास की भावनायें होती हैं वे अनपढ़ होने पर भी बड़े प्यारे लगते हैं। बहुत से अशिक्षित व्यक्तियों के कौटुम्बिक दांपत्ति और सामाजिक सम्बन्ध बड़े मधुर होते हैं यह सब हृदय का ज्ञान कहलाता है। उसकी आवश्यकता बौद्धिक ज्ञान ने अधिक है। पर साँसारिक दृष्टि से दोनों ही आवश्यक हैं इसको उनका एक सम्मिलित रूप दिया गया है। शास्त्रकार उसे ‘संज्ञान’ या ‘विद्या’ कहते हैं।
आधुनिक शिक्षा केवल शिक्षा ही विद्या नहीं जबकि जीवन में अधिकतम विकास और सन्तुष्टि के लिये उभयनिष्ठ स्थिति आवश्यक है। हम जो ज्ञान प्राप्त करें वह बुद्धि विकास के साथ-साथ आत्म-विकास का भी माध्यम होना चाहिये। व्यक्ति को यह भी जानना चाहिये कि यह संसार, संसार के पदार्थ, पदार्थों से उत्पन्न परिस्थितियाँ ही सब कुछ नहीं हैं वरन् एक चेतन तत्वात्मा भी है, उसके सोचने, विचारने, व्यवहार करने का अपना तरीका भी है। उसके गुण संस्कार और आवश्यकतायें पृथक हैं। इसी तरह उसके विकास की प्रक्रिया भी भिन्न है। इन सब बातों का ज्ञान अध्यात्म कहलाता है। जब शिक्षा के साथ अध्यात्म का समावेश हो जाता है तो वह पूर्ण विद्या बन जाती है। शास्त्रकार ऐसे ही ज्ञान को ज्ञान मानते हैं। मानवीय समस्याओं के हल की क्षमता और जीवन-लक्ष्य की प्राप्ति ऐसे ही ज्ञान से सम्भव है।
इन पंक्तियों में जीवन की परिपूर्णता के लिये तप के एक अंश की व्याख्या की गई है। तप का दूसरा भाग है शरीर का तप-परिश्रम। श्रम का संयोग न होना ज्ञानी मनुष्य को भी या तो अवसाद और अभाव की ओर ले जायेगा अथवा उसे भ्रष्टाचार की दिशा में अग्रसर करेगा। आज जो सामाजिक जीवन में विकृति दिखाई दे रही है वह श्रम के सम्मान के अभाव के कारण ही है। ज्ञान एकाँगी है और उसका व्यवहार भी एकाँगी। बुद्धि जीवियों ने यह धारणा बना ली है कि शारीरिक श्रम अनपढ़ों का काम है और अनपढ़ यह कहते हैं कि उनका काम केवल श्रम करना है, पढ़ना-लिखना नहीं। इस भ्रान्त धारणा ने निरक्षरों को तो पशु श्रेणी के श्रम में ला दिया और पढ़े-लिखे लोगों को अज्ञानियों की सी स्थिति में। पढ़े-लिखे आज अधिक भ्रमित हैं उनके जीवन में अधिक भ्रष्टाचार, कलह, कटुता, क्लेश और अशान्ति है। श्रम के प्रति निरादर की भावना में बुद्धि जीवियों को भोगवादी बना कर उनकी रचनात्मक क्रियाशीलता को पंगु कर दिया है। इसीलिये चाहते हुए भी लोग ऐश्वर्य की प्राप्ति नहीं कर पा रहे।
बहुत धन कमा लेना ऐश्वर्य नहीं कहलाता। ईश्वर भौतिक और आध्यात्मिक गुणों के संयोग से बना है, ऐश्वर्य में भी उसी प्रकार आध्यात्मिक उन्नति उतनी ही आवश्यक है जितनी भौतिक। इसके लिये विद्या और श्रम दोनों का सम्मिलित तप आवश्यक है। तप से ही ऐश्वर्य की सिद्धि होती है।
श्रम केवल उपार्जन बढ़ाने के लिये ही नहीं आवश्यक बताया गया, वरन् वह चरित्र का एक स्थायी अंग है। जिस तरह मक्खियाँ केवल वहीं जमा होती हैं जहाँ गन्दगी होती है उसी प्रकार बुराइयाँ, शारीरिक और मानसिक रोग वहीं जन्म लेते हैं जहाँ आलस्य की, परिश्रम से जी चुराने की, गन्दगी जमा होती है। सम्भवतः मनीषियों ने आलस्य हो इसीलिये पापों का जनक कहा है क्योंकि श्रम की गति रुक जाने से ही रोग और शोक पैदा करने वाले विकार उत्पन्न होते हैं?
मनुष्य हर समय पढ़ता नहीं रह सकता। मन की शक्ति की भी एक सीमा है। वह उतना ही पचा सकता है जितना उसका क्षेत्र है। मन को विश्राम देने के लिये बुद्धि जीवियों को तो शारीरिक श्रम की आवश्यकता हो जाती है। जितना समय दिमागी काम से बचे उतने में परिश्रम करना चाहिये। यह कोई आवश्यक नहीं कि फावड़ा ही चलाया जाय। रुचि और सुविधानुकूल कोई भी रचनात्मक और मनोरंजक काम किया जाये। यदि उसमें शारीरिक अवयवों का संचालन होता है तो वह श्रम है। उपज की दृष्टि से ही नहीं विद्या और आचरण की रक्षा के लिये भी ऐसा श्रम आवश्यक है। निरोगिता तो उसका एक स्थूल लाभ मात्र है।
उसी प्रकार शारीरिक श्रम की भी एक सीमा है। शरीर थक जाये तो मन और आत्मा को सजग रख कर अपनी चेतनता को विकारों की ओर जाने से रोका जाता है। उसके लिये स्वाध्याय ही सर्वोत्तम साधन है।
पढ़े-लिखे लोग शारीरिक श्रम किया करें और शारीरिक श्रम करने वाले ज्ञान प्राप्ति का उपक्रम बनाया करें तो मनुष्य जीवन को समृद्ध, ऐश्वर्य युक्त और परिपूर्ण बनाया जा सकता है। इस मन्त्र में ऋषि ने यही तथ्य प्रकट किया है।
दिन भर राम-राम जपना ही भजन नहीं है। यदि आप अपने दोषों को ढूँढ़ने और उन्हें निकालने में लग जाते हैं तो यह निश्चित मानिये कि आप ईश्वर की ओर अग्रसर हो रहे हैं। मन की मलिनता, अन्तर के पाप जिन उपायों से मिटें वह सब ईश्वर के भजन हैं। भले ही उसमें नाम-जप सम्मिलित न हो। -मेहर बाबा
कहा जाता है कि आत्म-दर्शन, जीवन लक्ष्य की प्राप्ति सुख, धन, यश वैभव का विकास, ईश्वर दर्शन यह सब सौभाग्य, संयोग मनुष्य जीवन में पुण्य के प्रतिफल होते हैं। जो जितना पुण्य करता है, उसी अनुपात में सुख-शान्ति मिलती है। जिसके पुण्यों की मात्रा अधिक होती है वह धरती और स्वर्ग सर्वत्र आल्हाद और आनन्द का जीवन-यापन करता है।
इसी संदर्भ में यह भी है कि पुण्य सत्कर्मों से प्राप्त होते हैं। ऐसे कार्य जिनमें दूसरों का उपकार होता हो, दूसरों को सुख मिलता हो, उन्नति होती हो, प्रसन्नता, प्रेरणा और प्रकाश मिलता हो, वह सभी कार्य पुण्यार्जन के पाथेय माने जाते हैं। यह कहना चाहिये कि सुख, शान्ति, सौभाग्य के आधार सद्गुण और सत्कर्म हैं।
व्यावहारिक दृष्टि से देखा जाये तो सत्कर्म सदैव घाटे का ही सौदा जान पड़ेगा। अपनी कमाई का एक अंश निकाल का दूसरों को देने के उपकार में अपना घाटा है, किसी के रुके हुए काम को पूरा करो तो अपना समय जाता है, श्रम खर्च होता है और कई बार तो कटुता, उपहास और अपमान के क्षण भी केवल इसी कारण आते हैं। अच्छे काम करते हुये भी लोगों के ईर्ष्या, द्वेष, क्रोध का भाजन बनना पड़ता है। तात्पर्य यह कि परमार्थ पथ अपने आपको खाली करने- अपना कमाया लुटाने का पथ है। भौतिक दृष्टि से उसमें हानियाँ ही हानियाँ हैं।
किन्तु इन सब परिस्थितियों में एक गुण ऐसा भी है जो इन समस्त विषमताओं, त्याग और तपश्चर्याओं को पुण्य में बदल देता है वह है सन्तोष। सन्तोष आत्मा की सन्निकटता प्राप्त करने का अमोघ उपाय है। जहाँ सन्तोष है, वहीं सच्चा पुण्य है और जहां पुण्य है वहाँ परमात्मा का प्रकाश विद्यमान है, इसलिये सन्तोषी व्यक्ति अपना जीवन लक्ष्य बड़ी आसानी से प्राप्त कर लेते हैं।
मनुष्य-जीवन में जो अशान्ति है वह तृष्णाओं की बाढ़, कामनाओं के अनियन्त्रण और असन्तुलित भोग की आकाँक्षा के कारण है। छोटे-छोटे जीवन-जन्तु अल्प क्षमता और स्वल्प साधन होते हुये भी दिन-भर इधर से उधर चहकते-फुदकते और नित्य नवीनता का दर्शन करते हुये आनन्द लाभ किया करते हैं। उनकी स्वाधीनता के मूल में सन्तोष की ही वृत्ति काम करती है। मनुष्य के जीवन की भी आवश्यकतायें बहुत थोड़ी हैं। पेट भरने के लिये थोड़ा-सा भोजन और तन ढाँपने को थोड़ा-सा कपड़ा। वर्षा, धूप, शीत से बचाव के लिये मिट्टी के झोपड़े से काम चल जाता है। इतनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये कोई बड़ी लम्बी-चौड़ी दौड़-धूप की आवश्यकता नहीं। साधारण-सी आवश्यकतायें साधारण प्रयास से ही दूर हो जाती हैं। यदि मनुष्य उतने से संतोष कर लिया करे तो शक्ति, ज्ञान और नवीनता के दर्शन का आनन्द वह हर घड़ी प्राप्त कर सकता है। उसके लिये उसे कहीं बाहर न भटकना पड़े।
सन्तोष की चाह सबको होती है, पर ऐसा लगता है कि आवश्यकताओं की तात्कालिक पूर्ति को ही लोग संतोष मानते हैं। क्षणिक तृप्ति में सन्तोष की अभिव्यक्ति नहीं होती। सन्तोष एक विशाल भावना है जो कुछ न होने पर भी अनन्त भण्डार के स्वामित्व का आनन्द अनुभव कराती है। सन्तोष वह प्रकाश है जो आत्मा के पथ को आलोकित करता है और आत्मा जैसी विशाल एवं व्यापक सत्ता की महत्ता के द्वार खोल देती है, फिर मनुष्य को सांसारिक और तात्कालिक भोग नहीं भाते फिर सद्गुणों का अधिक से अधिक विकास ही लक्ष्य रह जाता है, उसमें मनुष्य की असीम तृप्ति का अनुभव और आनन्द मिलता है।
“तत्वामृत” सुभाषित-ग्रन्थ में कहा गया है-
संतोषामृत तृप्तानां यत्सुखं शान्तिरेव च, न च तद्धनलुब्धानामितश्चेतश्च धावताम्।
अर्थात्- जिस व्यक्ति ने सन्तोष का अमृतपान कर लिया। जिसके जीवन में सन्तोष नहीं वह तृष्णाओं के पीछे भागता फिरता और दुःख पाता है।
यैः संतोषोदकं पीतं निर्ममत्वेन वासितम्। त्यंक्तं तैर्मासं दुःखं दुर्जनेनेव सौहृदम॥
जो लोग ममता रहित होकर सन्तोष रूपी जल का पान करते हैं उन्हें किसी प्रकार मानसिक कष्ट नहीं होता। सन्तोष का परित्याग कर देने वाले सज्जन व्यक्ति भी बुरे हो जाते हैं।
आध्यात्मिक जीवन का तो सोपान ही है- संतोष। सन्तोष मनुष्य को अल्प में तृप्ति दिलाता है, जबकि आध्यात्म का भी उद्देश्य यही है कि मनुष्य शरीर किसी बहुत बड़े उद्देश्य की प्राप्ति के लिये हुआ है। यह उद्देश्य आत्मानुभूति या ईश्वर दर्शन है। पर यदि देखा जाये तो साँसारिक बखेड़े ही इतने बगर गये हैं, फैल गये हैं कि लोगों को उन्हीं से अवकाश नहीं मिलता। बाह्य जीवन की सफलता और समृद्धि को ही जीवन का लक्ष्य मान लिया गया है। इसीलिये वास्तविक लक्ष्य की ओर ध्यान भी नहीं जाता। बहिर्मुखी परिस्थितियों से बचकर अंतर्मुखी जीवन का लक्ष्य और आनन्द प्राप्त करने का एक ही तरीका है और वह है- सन्तोष। हमें जो कुछ रूखा-सूखा खाने को मिल जाये उसी पर संतोष करना चाहिये और यह मानना चाहिये कि भोजन शरीर धारण किये रहने की आवश्यकता है भोजन के लिये शरीर नहीं धारण किया। थोड़े से धन से अपना काम चल सकता है। जीवन आवश्यकतायें बढ़ाने के लिये नहीं। बढ़ाई जायें तो वह कोई पाप नहीं किन्तु इसमें पाप होने की संभावनायें बढ़ जाती हैं। ईमानदारी से अपने लिये साधन जुटाये ही कितने जा सकते हैं। यदि इतनी कर्मठता और परिश्रमशीलता आ जाय कि मनुष्य अथाह साधन-सम्पत्तियों का स्वामित्व प्राप्त कर ले तो भी शरीर के भीतर वाली और महाकाल के बीच बार-बार जन्मने और मृत्यु होने वाली परिस्थितियों के अध्ययन, ज्ञान और तदनुकूल आचरण का अवसर ही नहीं बन पाता। इसलिये जब कभी आध्यात्मिक विकास का क्षण उपस्थित होता है, तो वहीं तुरंत ही यह प्रश्न पैदा होता है क्या आप कम से कम में गुजर कर सकते हैं? क्या आप थोड़े में संतुष्ट रह सकते हैं? व्रत कराने का उद्देश्य भी यही होता है कि सन्तोष की भावना चिरस्थायी बन जाये। यदि संतोष की प्राप्ति हो जाये तो आध्यात्मिकता की मंजिल बहुत आसान हो जाती है।
पूर्व पुरुषों के जीवन से यह बात स्पष्ट हो जाती है। उनमें जो शक्ति और ज्ञान था, उससे वह आज की अपेक्षा करोड़ों गुना अधिक संपत्ति का स्वामित्व बना सकते थे। वैज्ञानिक उपलब्धियाँ पैदा कर सकते थे। तब जनसंख्या अधिक न थी इसलिये साधन और सुविधायें भी अब की अपेक्षा सैकड़ों गुनी अधिक थीं पर उन लोगों ने भौतिक सम्पत्ति को महत्व नहीं दिया। वह यह जानते थे कि मनुष्य जितनी आवश्यकतायें बढ़ायेगा सुखों की तृष्णा और आकर्षण उतना ही बढ़ेगा, उतना ही जीवन जटिल, अस्त-व्यस्त, संघर्षमय, दुःखी और अपावन बनेगा। असन्तुष्ट व्यक्ति को मिला हुआ शरीर सुख भी तृप्ति नहीं दे सकता, इसलिये सन्तोष को ही उन्होंने पुण्य का आध्यात्मिक उन्नति का प्रमुख आधार माना और उसके लिये सम्पूर्ण भौतिक सुखों को तिलाँजलि दे दी। यह कोई कहने की बात नहीं कि इस कारण उस जमाने में कितनी महत् आध्यात्मिक उन्नति हुई उसका एक कण आज भी विद्यमान है जो उसे ढूंढ़ लेते हैं वे उतने से ही अक्षय सुख और अनन्त आनन्द की अनुभूति पाया करते हैं।
सन्तोष इस दृष्टि से धन ही नहीं महान् पुण्य है, जो व्यक्ति को आत्मा की सन्निकटता की ओर ले चले उसे पुण्य ही कहना चाहिये। इसका दूसरा एक पहलू और भी है और वह यह कि जहाँ संतोष है वहाँ अभाव दिखाई देने पर भी लौकिक दृष्टि से किसी सुख का अभाव न होगा। शान्ति, सुख और स्वात्मानुभूति ही नहीं स्वास्थ्य, साधनों का विकास और शक्ति का आधार भी सन्तोष ही है, इसलिये वह सब गुणों का राजा है। जहाँ सन्तोष है वहाँ सब कुछ है।
असन्तोष ही सबसे बढ़कर दुःख है और संतोष ही सबसे बड़ा सुख है, अतः सुख चाहने वाले पुरुष को सदा संतुष्ट रहना चाहिए।
सन्तोष-सेतु जब टूट जाता है तब इच्छा का बहाव अपरिमित हो जाता है। -प्रेमचंद्र (प्रेमपचीसी)
वैज्ञानिक अध्यात्म के प्रतिपादन की दिशा में बढ़ते कदम
गत अंक में ‘हम अध्यात्म को बुद्धिसंगत एवं वैज्ञानिक स्तर पर प्रतिपादित करेंगे।” लेख के अंतर्गत यह विचार व्यक्त किया गया था कि ‘वर्तमान बुद्धिवादी पीढ़ी के समझ सकने योग्य ढंग एवं आधार पर हमें अध्यात्म की महत्ता एवं उपयोगिता का प्रतिपादन करना चाहिए।’
यह आवश्यकता आज की महती आवश्यकता है। कारण कि पिछले दिनों बुद्धिवाद एवं विज्ञान का जो विकास हुआ है, उसने भौतिक सुविधाओं को भले ही बढ़ाया हो, आध्यात्मिक आस्था को दुर्बल बनाया है। विज्ञान ने जब मनुष्य को एक पेड़-पौधा मात्र बनाकर रख दिया और उसके भीतर किसी आत्मा को मानने से इनकार कर दिया, ईश्वर के अस्तित्व को अस्वीकृत किया, इस सृष्टि को सब कुछ अणुओं की स्वाभाविक गतिविधि के आधार पर स्वसंचालित बताया, तो स्वभावतः विज्ञान को प्रत्यक्ष प्रमाणों के आधार पर अति प्रामाणिक मानने वाली बुद्धिवादी नई पीढ़ी उसी मान्यता को शिरोधार्य क्यों न करेगी? प्रत्यक्ष है कि विचारशील वर्ग अनास्थावान होता चला जा रहा है और यह एक भयानक परिस्थिति है क्योंकि बुद्धिजीवी वर्ग के पीछे जनता के अन्य वर्गों को चलने के लिये विवश होना पड़ता है। आज के थोड़े-से अनास्थावान बुद्धिजीवी कल परसों अपनी मान्यताओं से समस्त जन-समाज को आच्छादित किये हुए होंगे।
आध्यात्मिक मान्यतायें सदाचार, सहयोग, सद्भाव, सेवा, सद्भावना, पुण्य, संयम एवं त्याग, बलिदान जैसी सत्प्रवृत्तियों की रीढ़ है। आत्म-कल्याण, ईश्वरीय प्रसन्नता, पुण्य-परमार्थ, स्वर्ग-नरक, कर्मफल आदि मान्यताओं के आधार पर ही मनुष्य अपनी चिरसंचित पशुता-पैशाचिकता पर नियन्त्रण करने और लोक-कल्याण के लिए नितान्त आवश्यक सत्प्रवृत्तियों को चरितार्थ करने में समर्थ होता है। यदि वह आधार ही नष्ट हो गया- यदि उन मान्यताओं को कपोल कल्पित मान लिया गया तो फिर न किसी को संयमी बनने की आवश्यकता अनुभव होगी, न सदाचारी होने की। न पुण्य अभीष्ट होगा, न परमार्थ। न त्याग की बात कोई करेगा, न बलिदान की। फिर मनुष्य “खाओ-पीओ मौज उड़ाओ” के आदर्श को अपना कर हर अनैतिक कार्य करने के लिये तैयार हो जायेगा। ताकि वह अधिक मौज-मजा उड़ाने का अधिक अवसर प्राप्त कर सके।
कानूनी पकड़ एवं दण्ड से बचने का रास्ता अब अतिसरल है। कानून बहुत ही ढीले-पीले हैं। फिर जिन पर कानून पालने के लिए विवश करने की- दण्ड देने-दिलाने की जिम्मेदारी है, वे राज्य कर्मचारी ही कहाँ दूध के धुले हैं? अपराधी से साँठ-गाँठ रखने की कला उन्हें भी आ गई है और उस दुर्बलता से हर भ्रष्टाचारी- हर सामाजिक मर्यादाओं का उल्लंघन करने वाला पूरा-पूरा लाभ उठाता है, उठा सकता है। केवल कानून के द्वारा अपराध रोक सकने की बात सोचना उपहासास्पद है। मनुष्य केवल अपनी अन्तरात्मा की पुकार- और ईश्वरीय सत्ता के रोक- अनुग्रह का विचार स्मरण रखकर ही कुमार्ग से बचना और सन्मार्ग अपनाना है। यदि आत्मा और ईश्वर कोई है ही नहीं, कर्मफल देने की कोई अज्ञात और व्यवस्था है ही नहीं, तो फिर पाप प्रवृत्तियों को अपनाकर शौक-मौज के साधन जुटाने से कोई चूके क्यों? आज यही विचार बुद्धिजीवी पीढ़ी के मस्तिष्क में घूम रहे हैं। और उसका नैतिक स्तर दिन-दिन दुर्बल होता चला जा रहा है।
यह विभीषिका इतनी भयानक है कि इसकी भावी सम्भावनाओं का स्मरण करने मात्र से आँखों के सामने अँधेरा छा जाता है। शुतुरमुर्ग की तरह बालू में मुँह ढक कर खतरा टल गया, ऐसा सोचना मूर्खता है। सब कुछ अपने आप ठीक हो जायेगा, ऐसी मान्यता वास्तविकता से दूर है। जहाँ धर्म अध्यात्म का प्रकाश नहीं पहुँचा है वह अफ्रीका आदि प्रदेशों के जंगली लोग अभी भी नर माँस खाते और एक से एक बढ़कर घृणित एवं नृशंस रीति-रिवाज अपनाये बैठे हैं। अपने आप सब कुछ ठीक होने वाला होता तो सृष्टि के आरम्भ से लेकर अब तक लाखों वर्षों में वे अपने आपको सभ्यता के उच्च स्तर तक से आने में समर्थ हो गये होते। अपने आप कुछ नहीं होता- सब कुछ करने से होता है। ऋषियों ने लाखों वर्ष तक तप, त्याग, मनन-चिन्तन करके अध्यात्म और धर्म का अति महत्वपूर्ण कलेवर खड़ा किया है। उसे जन-मानस में प्रविष्ट कराने के लिए अगणित साधु ब्राह्मणों ने तिल-तिल करने अपना जीवन जलाया है। अगणित धर्म ग्रंथ लिखे गये हैं और उन्हें पढ़ने, सुनने, समझने तथा हृदयंगम करने की स्थिति उत्पन्न करने के लिये अगणित मानतावादी परम्पराओं या रीति-रिवाजों, प्रक्रियाओं, पूजा-पद्धतियों एवं कर्मकाण्डों का प्रचलन किया है। लगातार उस विचार-धारा से संपर्क बनाये रखने के लिये, उन्होंने धर्म एवं अध्यात्म का विशालकाय ढाँचा खड़ा किया है। मन्दिर, तीर्थ, कथा, कीर्तन, पूजा, पाठ, दान-पुण्य, साधन, संयम आदि सारा धर्म प्रकरण इसीलिये है कि मनुष्य की अध्यात्म एवं धर्म के मान्य सिद्धान्तों पर आस्था बनी रहे और वह संयमी, सदाचारी, परमार्थी एवं आदर्शवादी जीवन जीने के लिए- गतिविधियाँ अपनाने के लिये अन्तःप्रेरणा के आधार पर तत्पर हो सके।
यदि ऋषियों द्वारा प्रादुर्भूत धर्म संस्कृति का आविर्भाव न हुआ होता तो वन्य प्रदेशों को उद्धत जंगली जातियों की तरह समस्त जन-समाज पशु प्रवृत्तियां अपनाये होता और उसकी बौद्धिक विशेषता पतनोन्मुख होकर इस संसार पैशाचिक कुकर्मों की आग जला रही होती। ईश्वर अपने आप सब कुछ कर लेगा यह सोचना ठीक नहीं। गत 70 वर्षों में संसार का 70 फीसदी भाग बौद्धिक एवं राजनैतिक स्तर पर साम्यवादी शासन के अंतर्गत आ गया। इसका विवरण गत अंक में दिया जा चुका है। जिस तीव्र गति से अब वह चक्र घूम रहा है उसे देखते हुए अगले 30 वर्ष में शेष 30 प्रतिशत भाग भी उसी मान्यता के क्षेत्र में चला जा सकता है।
बुद्धिवाद और विज्ञान के द्वारा प्रतिपादित उन मान्यताओं के सम्बन्ध में हमें सतर्क होना होगा जो मनुष्य को अनास्थावान एवं अनैतिक बनने की प्रवृत्ति को बढ़ाती हैं। विचारों को विचारों से- मान्यताओं को मान्यताओं से- प्रतिपादनों को प्रतिपादनों से काटा जाना चाहिए। समय-समय पर यही हुआ भी है। वाममार्गी विचार-धारा को बौद्धों ने हटाया और बौद्ध धर्म के शून्यवाद का समाधान जगद् गुरु शंकराचार्य के प्रबल प्रयत्नों द्वारा हुआ। लोगों को केवल तलवार, बन्दूकों की लड़ाइयाँ ही स्मरण रहती हैं। असली लड़ाइयाँ तो विचारों की लड़ाइयाँ हैं। वे ही जन-समूह के भाग्य का निर्माण करती है। प्रजातंत्र सिद्धान्त के जन्मदाता रूसो और साम्यवाद के प्रवर्तक कार्लमार्क्स की विचारधाराऐं पिछली शताब्दियों से मानव समाज का भाग्य निर्माण करती रही हैं। पूँजीवाद, समाजवाद, अधिनायकवाद की विचारधाराओं ने भी अपने ढंग से अपनी महत्वपूर्ण सूचिकायें प्रस्तुत की हैं। बाह्य संघर्षों की पृष्ठभूमि में मूलतः यह विचारधाराऐं काम करती हैं। देशों और जातियों का उत्थान पतन उनकी आस्थाओं और प्रवृत्तियों के आधार पर ही होता है, होता रहा है, हो सकता है।
उत्कृष्ट आदर्शों के प्रति अनास्था उत्पन्न करने वाली आज की बुद्धिवादी और विज्ञानवादी मान्यता जिसे तेजी से अपना प्रभाव क्षेत्र बढ़ाती चली जा रही है उसकी भयंकरता को दुर्धर्ष संभावना का मूल्यांकन कम नहीं किया जाना चाहिए। उसका प्रतिरोध करने के लिए तत्परता पूर्वक खड़ा होना चाहिए। युग के प्रबुद्ध व्यक्तियों की यह महती जिम्मेदारी है। इसकी न तो उपेक्षा की जानी चाहिए और न अवज्ञा। हमें एक ऐसा विचार-मोर्चा खड़ा करना चाहिए जो भौतिकवादी अनास्था से पूरी तरह लोहा ले सकें। यदि यह कार्य सम्पन्न किया जा सका तो समझना चाहिए कि मानव-जाति के मस्तिष्क को, धर्म संस्कृति और अध्यात्म को अंधकार के गर्त में गिरने से बचा लिया गया। पर यह मोर्चा खड़ा न किया जा सका, उसे सफलता न मिली तो परिणाम प्रत्यक्ष है। कुछ ही दिन बाद हम जंगली संस्कृति के, नास्तिकता के, पशु प्रवृत्तियों के पूरी तरह शिकार हो जायेंगे और लाखों वर्षों की मानवीय संस्कृति आत्मदाह करके अपना करुण अन्त प्रस्तुत करेगी।
समय रहते चेतने में ही बुद्धिमानी है। बुद्धिमत्ता की भूमिका प्रस्तुत करनी चाहिए। वही शुभारम्भ किया भी गया है। गत अंक में ‘अपनों से अपनी बात’ में स्तम्भ में ‘बुद्धि सम्पन्न एवं विज्ञान सम्पन्न अध्यात्म के प्रतिपादन’ की चर्चा इसी दृष्टि से की गई है। यह कहना सही नहीं कि धर्म, अध्यात्म-ईश्वर आत्मा आदि का प्रतिपादन बुद्धि का नहीं श्रद्धा का मिश्रण है। अन्ध-श्रद्धा नहीं- विवेक सम्पन्न श्रद्धा ही स्थिर और समर्थ हो सकती है। प्राचीन काल के ऋषियों ने भी बुद्धि की शक्ति से ही अध्यात्म का सारा कलेवर खड़ा किया गया था। प्राचीन काल में श्रद्धा, शास्त्र और आप्त वचन जन मान्यता के आधार थे। अब यदि दिमाग, तर्क और प्रमाण उसके आधार बन गये हैं तो कोई कारण नहीं कि आज की जन मनोभूमि के अनुसार अध्यात्म सिद्धान्तों का प्रतिपादन और समर्थन न किया जा सके।
कार्य कठिन है। अति विस्तृत और अति श्रम साध्य है। उसके लिए भारी मनोयोग, अध्यात्म और व्युत्पन्न मति की आवश्यकता है पर इस संसार में अभाव तो किसी वस्तु का नहीं। आखिर कठिन काम भी तो मनुष्यों ने ही किये हैं। यह काम भी भी ऐसा नहीं है जो न किया जा सके। सही आधार पर किये गये प्रतिपादन जब मनुष्य के अन्तःकरण में बैठ जाते हैं तो उनके अनुसार वे आचरण भी करते हैं। गान्धी युग में जब लोगों को “स्वतन्त्रता प्राप्ति की उपयोगिता और उसके लिए त्याग बलिदान की आवश्यकता” समझाई गई तो लाखों लोगों ने बड़े से बड़े त्याग, बलिदान उसके लिए किये। हजारों ने फाँसी और गोली खाकर अपने जीवन निछावर कर दिये। ठीक आधार पर पक्की तरह जो आदर्श लोगों सिखा समझा दिया जाता है उसके लिए वे कष्ट सहते हुए भी आगे बढ़ते हैं। प्राचीन काल में धैर्य और आध्यात्म की मान्यताएँ जब लोगों के गले उतर गई थीं तो भारतीय समाज का हर सदस्य देवोपम उत्कृष्ट जीवन जीने में अपनी शान और बहादुरी समझता था भले ही उसे उसमें कितना ही बड़ा कष्ट क्यों न सहना पड़ता रहा हो। आगे भी यही रीति-नीति बरती जीती रहेगी। जब भी कोई आदर्श उस युग की मनोभूमि का आधार लेकर सिखाया समझाया जायेगा तो वस्तु स्थिति को लोग समझेंगे और उस पर आवरण भी करेंगे। यदि हम अध्यात्मवादी मान्यताओं का आज विज्ञान, तर्क और प्रमाणों के आधार पर प्रतिपादन कर सकते हों तो निस्संदेह जन समाज को उसे स्वीकार करने में काई आपत्ति न होगी। और यह भी निश्चित है कि जो बात अन्तःकरण की गहराई में स्वीकार की जाती वह आचरण में भी अवश्य उतरती हैं।
आज अध्यात्म का प्रतिपादन जिन आदर्शों पर जिस ढंग से किया जाता है वे जन मानस में गहराई तक प्रवेश नहीं करते। कथा, पुराणों, धर्म शास्त्रों, किम्वदंतियों एवं परंपराओं की प्रामाणिकता पर अब लोगों के मन में अति संदेह उत्पन्न हो गया है। वे उन्हें किन्हीं व्यक्तियों की ऐसी कल्पनायें मानते हैं जिनकी उपयोगिता एवं वास्तविकता प्रमाणिकता नहीं होती। शंका शंकित और संदिग्ध मन से हम धर्मोपदेश सुना तो लेते हैं पर उसकी यथार्थता एवं व्यवहारिकता पर विश्वास नहीं करते। यही कारण है कि धर्मोपदेशों का विशालकाय कलेवर इतने बड़े आडम्बर के साथ विद्यमान रहते हुए भी उसका जन जीवन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा है। धर्म के बाह्य आवरणों को एक-एक पक्षपात के रूप से अपना लेते हैं पर आचरण में उन आदर्शों का प्रवेश तनिक भी नहीं होने देते जो धर्म की आत्मा है। इसका एक ही कारण है कि अध्यात्म को उन आदर्शों पर नहीं समझाया जाता जो आज की जन मनोभूमि के अनुरूप हों। आज हर व्यक्ति तर्क, प्रमाण और विज्ञान को आधार मानता है। इस युग में कोई भी मान्यता केवल इन तीन आधारों पर ही प्रामाणिक एवं ग्राह्य बन सकती है।
इस युग में मनीषियों का पवित्र कर्त्तव्य है कि वे अपने समय की आवश्यकता को समझें और उसको एक व्यवस्थित विचार पद्धति विनिर्मित करने में संलग्न हों। युग-निर्माण के महान प्रयोजन की पूर्ति के लिए यह नितान्त आवश्यक है। इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए पिछले दिनों जीवन जीने की कला का- व्यवहारिक अध्यात्म का- प्रतिपादन किया भी जा रहा है। लगभग दो-ढ़ाई सौ ट्रैक्ट इसी प्रयोजन की पूर्ति के लिए छपे हैं। ‘अखण्ड-ज्योति’ और ‘युग-निर्माण-योजना’ दोनों ही पत्रिकाएं इसी प्रयोजन की पूर्ति में संलग्न हैं और आवश्यक गोला-बारूद- विचार प्रवाह प्रस्तुत करती चली आ रही हैं। आगे यह प्रयत्न भी इसी गति से और भी अधिक तीव्र गति में आगे बढ़ेंगे।
इसी दिशा में एक नया प्रयत्न गत गायत्री जयन्ती से आरम्भ किया गया है, वह यह है कि उच्चस्तरीय अध्यात्म का आध्यात्मिक दर्शन शास्त्र एवं तत्वज्ञान का प्रतिपादन विज्ञान की वर्तमान धाराओं के अनुरूप करने के लिए विशाल पैमाने पर कार्य आरम्भ किया जायेगा। ‘विचार विज्ञान’ और पदार्थ विज्ञान-फिलासफी और साईंस की लगभग 600 शाखायें हैं। पिछले दिनों संसार भर में इन शाखाओं ने भारी प्रगति की है। आज से बीस वर्ष पूर्व यह कहा जाता था कि- “जहाँ विज्ञान समाप्त होता है वहाँ से अध्यात्म आरम्भ होता है।” “विज्ञान और अध्यात्म का क्षेत्र सर्वथा पृथक् एक दूसरे से सर्वथा असंबद्ध है।” पर अब ऐसी स्थिति नहीं रही। गत बीत वर्षों में विज्ञान ने अति तीव्रगति से प्रगति की है और उसका हर चरण अध्यात्म के समर्थन की ओर बढ़ा है। लगता है कि यह प्रगति क्रम जारी रहा तो अगले पचास वर्षों में अध्यात्म और विज्ञान दोनों इतने समीप आ जायेंगे कि दोनों का एकीकरण एवं समन्वय असम्भव न रहेगा।
सर्व साधारण की जानकारी प्रायः बहुत पिछड़ी हुई बनी रहती है। प्रगति के नवीन चरण उसमें प्रायः अविज्ञात ही बने रहते हैं। डार्विन का विकासवादी सिद्धान्त अब नयी खोजों के आधार पर उपहासास्पद बनता चला जा रहा है और फ्रायड के कामुकता समर्थक मनोविज्ञान के अब धुर्रे उड़ा दिये गये हैं। नवीन शोधन में विकासवाद और मनोविज्ञान को अध्यात्म की दिशा में काफी आगे तक बढ़ा दिया है और लगता है उनके बढ़ते जाते कदम अध्यात्म के समर्थन की दिशा में ही बढ़ रहे हैं। अणुविज्ञान के आचार्य आइन्स्टाइन की नवीन खोजों ने अणु-सत्ता की पीठ पर एक सचेतन उत्कृष्ट सत्ता के (ईश्वर के) आस्तित्व को स्वीकार किया है। पर वह उतने ऊँचे स्तर के क्षेत्र में है कि सर्व साधारण तक उसकी जानकारी मुद्दतों बाद पहुँचेगी और तब तक अनास्थावादी मान्यताएँ इतनी प्रखर हो जायेंगी कि उन्हें हटाना, मिटाना शक्य न रहेगा। आदिम पशु प्रवृत्तियों को हटाकर दैवी संस्कृति का मनुष्य को अभ्यस्त बनाने में लाखों वर्षों का लम्बा समय लगा है। यदि अनास्था पुनः आदिम युग में जा पहुँची तो उसे फिर नये सिरे से आस्था के रूप में परिणत करना बहुत कठिन हो जायेगा। इसलिये समय की पुकार है कि प्रतिरोध आज से ही, इसी घड़ी से ही आरम्भ किया जाये। चूहे के एक छोटे से बिल से यदि पानी चूने लगे तो थोड़े समय में ही बढ़ते-बढ़ते वह विशालकाय बाँध को ढहा देने में समर्थ होता है। छेद का पानी समय रहते रोका जाना चाहिये। अब तो यह छेद काफी चौड़ा हो चुका है। अब भी इसे न रोका गया तो मानवीय संस्कृति के लिये एक अति दुखदायी संकट उत्पन्न हो जायेगा।
दर्शन और तत्वज्ञान के उद्गम से ही कोई विचार-पद्धति एवं आचरण प्रक्रिया प्रादुर्भूत होती है। अध्यात्म का दर्शन और तत्वज्ञान प्रतिपादन करने के लिये ही वेद, उपनिषद्, दर्शन, ब्राह्मण, आरण्यक आदि का आविर्भाव हुआ। ईश्वर, जीव, प्रकृति के विभिन्न भेद-उपभेदों की चर्चा रही। दर्शन ही विचार और आचरण का मूल आधार है। इसलिये ईश्वर, आत्मा, धर्म, स्वभाव, कर्मफल आदि के दार्शनिक सिद्धाँतों को सही ढंग से प्रतिपादित करना होगा। संसार की दिशा मोड़ने वाले दार्शनिकों ने मानवीय आस्थाओं का मूलभूत विश्लेषण अपने ढंग से किया है और यदि व लोगों को ग्राह्य हुआ तो निस्संदेह जन समूह की गतिविधि भी उसी दिशा में सोचने, करने और बढ़ने के लिये प्रेरित प्रभावित हुई है। अब भी यही किया जाना है। हम अध्यात्म के दार्शनिक सिद्धाँतों का विज्ञान, तर्क यह प्रमाणों के आधार पर प्रतिपादन कर सके तो निस्संदेह जन-मानस को पुनः उसी प्रकार सोचने और करने को तत्पर किया जा सकता है, जिस पर कि भारतीय जनता लाखों वर्षों तक आरूढ़ रहकर समस्त विश्व का प्रकाशपूर्ण मार्ग-दर्शन करती रही है।
कार्य जितना महत्वपूर्ण है उतना ही विशाल भी है। इसे सम्पन्न करने की प्रेरणा मिली है तो किया यह भी जायेगा। इस दिशा में निम्न कदम उठाये गये हैं-
(1) विचार-विज्ञान और पदार्थ-विज्ञान को लगभग 600 शाखा-प्रशाखायें अब तक विकसित हुई हैं। उनकी आवश्यक जानकारी प्राप्त करने के लिये आवश्यक अध्ययन एक विद्यार्थी के रूप में हमने आरम्भ कर दिया है। इस सम्बन्ध में जो साहित्य उपलब्ध हैं सो देश से तथा विदेशों से मंगाया है। ग्रेजुएट स्तर के लोगों से उनके जाने समझे हुये विषयों पर नोट तैयार कराये जा रहे हैं ताकि जो विषय अनेक पुस्तकें पढ़ने पर समझा जा सकता है, उसे नोटों के आधार पर कम समय में समझा जा सके।
(2) अध्यात्म को बुद्धिवादी एवं वैज्ञानिक आधार पर प्रतिपादित करने के लिये यत्र-तत्र कतिपय विद्वानों ने भी छुट-पुट कार्य किया है। इस सबको जानना, समझना एवं ढूंढ़ना भी एक बड़ा कार्य है। विदेशों में भी जब-तब कोई-कोई विचारक इस दिशा में सोचते और प्रयत्न करते रहे हैं। किन्हीं-किन्हीं प्रकाशकों ने एकाध पुस्तक जहाँ-तहों से छापी भी हैं। किन्हीं पत्र-पत्रिकाओं में भी जब-तब इस सम्बन्ध में कुछ लेख छपते रहते हैं। इस सामग्री को एकत्रित करना, पढ़ना और समझना भी आजकल हमारे अध्ययन का एक प्रिय विषय है।
(3) संस्कृत साहित्य में- शास्त्रों में अध्यात्म विषयों का विवेचन बहुत हुआ है उसमें से बहुत-सा एक दूसरे से भिन्न ही नहीं विरोधी भी है। इस संदर्भ में हमें सभी कुछ पढ़ना, समझना होगा और उन परस्पर विरोधी मान्यताओं में से वह तथ्य निकालना पड़ेगा जिनके आधार पर अध्यात्म की एक सुव्यवस्थित रूप-रेखा बन सके और किसी जिज्ञासु के सामने क्रमबद्ध रूप से एक मान्य प्रक्रिया की तरह रखा जा सके।
(4) अध्यात्म द्वारा कितने ही व्यक्ति अपने निजी जीवन में कितने ही प्रकार की सिद्धियां प्राप्त कर चुके हैं। जिन अष्ट सिद्धियों और नव-निद्धियों का वर्णन योग-शास्त्रों में मिलता है। उनको प्रत्यक्ष प्रदर्शित करने वाले एवं दूसरों को उन विशेषताओं से लाभान्वित करने वाले एवं विश्वास परिपक्व करने वाले कितने ही व्यक्ति हुये हैं। उनके प्रामाणिक विवरण उपलब्ध करने का भी शोध कार्य चल रहा है। यों किंवदंतियों के रूप में तो हर बाबाजी के कितने ही चमत्कारों की दन्त कथायें प्रचलित हैं, पर उनसे कुछ काम चलता नहीं। विवरण प्रामाणिक हों और उनकी सचाई सिद्ध की जा सकती हो तभी कोई बुद्धिवादी उस पर भरोसा करेगा। इस सम्बन्ध में शोध इसलिये हो रहा है कि लोग यह जान सकें कि अणु एवं तत्व ही सब कुछ नहीं है। इसके ऊपर भी कोई ऐसी सत्ता है जो साइन्स के मोटे नियमों को झुठला देती है और ऐसे कार्य कर दिखाती है जिसका समाधान साइंस के सिद्धांतों से किसी भी प्रकार नहीं किया जा सकता। यह चमत्कार अध्यात्म विद्या की पुष्टि में बहुत सहायक हो सकते हैं।
(5) नई या पुरानी पत्र-पत्रिकाओं में छपे उपरोक्त संदर्भ के लेखों एवं समाचारों में से अपने काम की वस्तु तलाशी जा रही है।
जब यह अध्ययन एवं संकलन समुचित मात्रा में जमा हो जायेगा तब एक-एक अध्यात्म सिद्धाँत का प्रतिपादन विज्ञान एवं तत्व-ज्ञान की अनेक शाखाओं-प्रशाखाओं द्वारा करने के लिये कलम उठाई जायेगी। कुछ लिखा तभी जायेगा जब प्रतिपादित विषयों की पुष्टि के लिये अनेकों आधारों द्वारा प्रमाणित कर सकने लायक प्रचुर सामग्री जमा हो जाये। यों इस सम्बन्ध में सामान्य चर्चा एवं जानकारी “अखण्ड-ज्योति” के अक्टूबर अंक में प्रारम्भ कर दी जायेगी, पर उसका ठोस प्रतिपादन समग्र आधार इकट्ठे हो जाने पर ही किया जायेगा।
हमारा कार्य काल अब अति स्वल्प- मात्र तीन वर्ष शेष है। इसलिये इस कार्य की प्रगति संतोष जनक स्तर तक पहुँचाने के लिये हमें अत्यधिक कार्य भार सहन करना पड़ेगा। अतएव सुविधा की दृष्टि से इस प्रयोजन के लिये कुछ साथी सहगामियों की आवश्यकता पड़ेगी। हम चाहते हैं “अखण्ड-ज्योति” परिवार के सदस्यों में से कुछ ऐसे लोग इस कार्य में हाथ बंटाने के लिये आगे आवें। (1) जिनकी शिक्षा ग्रेजुएट स्तर की हो (2) जो अध्ययनशील प्रकृति के हों। जिनको पढ़ने में मन लगता हो और समझ आता हो (3) जिनका जीवन-क्रम अति व्याप्त न हो और जो नियमित रूप से कुछ समय बिना किसी अर्थ या डडडड लाभ की आकांक्षा किये लगाते रह सकें।
ऐसे व्यक्ति दो प्रकार के हो सकते हैं (1) जो अपनी निजी कार्य करते जायें इस कार्य में थोड़ा समय अपने घर रहते हुये ही लगाते रह सकें। (2) वे जिनके ऊपर आर्थिक उपार्जन की जिम्मेदारी नहीं है। परिवार के उत्तरदायित्व से जो निवृत्त हो चुके हैं या जिन पर हैं ही नहीं। ऐसे व्यक्ति मथुरा आकर रह सकते हैं, उनके भोजन आदि का खर्च तो हमारे चौके में चलता रहेगा। जो यहाँ रहेंगे वे अध्ययन कार्य यहीं रहकर करते रहेंगे और हमारे कार्य में सहयोग करते रहेंगे। पर जो अपने घर रहकर काम करना चाहें उनके लिये लिखित क्रिया-पद्धति रहेगी। ऐसे महानुभाव कार्य आरम्भ करने से पूर्व एक बार मथुरा आकर मिल लें तो उनकी मनोभूमि और परिस्थिति के अनुरूप कार्य करने की पद्धति और भी अच्छी तरह बताई समझाई जा सकती है।
(1) विचार-विज्ञान और पदार्थ-विज्ञान की जो शाखायें पढ़ी हों उनका सामान्य ज्ञान एवं परिचय प्रमाण और उदाहरणार्थ समेत संक्षिप्त एवं सरल रीति से इस प्रकार नोट्स बनाकर लिख भेजें, जिन्हें पढ़कर उस विषय को शाखा-प्रशाखाओं समेत भली प्रकार समझा जा सकता है। विचार-विज्ञान के अंतर्गत- मनोविज्ञान, भारतीय तथा विदेशी दर्शन, तर्कशास्त्र, अर्थशास्त्र, धर्मशास्त्र, शिक्षा-विज्ञान, नीति शास्त्र, अर्थशास्त्र, नागरिक शास्त्र, समाज शास्त्र, मानवीय संस्कृति का इतिहास, अन्तर्राष्ट्रीयता, भाषा शास्त्र, संगीत शास्त्र इत्यादि-इत्यादि। और पदार्थ विज्ञान के अंतर्गत भौतिकी, रसायन, जीव-विज्ञान, शरीर-विज्ञान, प्रजनन-विज्ञान, वंश-विज्ञान, कीटाणु विज्ञान, भू-विज्ञान, खनिज-विज्ञान, खगोल-विज्ञान, गणित, अंकशास्त्र (स्टेस्टिक्स) इत्यादि-इत्यादि।
इन सभी विषयों का जितना अंश स्कूल, कालेजों में पढ़ाया जाता है उतना सामान्य ज्ञान इस विषयों के अध्यापकों द्वारा नोट्स लिख कर संकलित किया जाना है। इन विषयों पर जो उच्च स्तरीय शीघ्र कार्य हो रहा है उसके लिये देशी और विदेशी विश्व विद्यालयों में अलग ढूंढ़-खोज का क्रम चलाया जायेगा। उन विषयों पर पी.एच.डी. करने वालों ने जो “थीसिस” लिखे होंगे, उन्हें ढूंढ़ा पढ़ा जायेगा और उनमें जो अपने काम के विषय होंगे उन्हें इकट्ठा किया जायेगा।
(2) अध्यात्म नीति, सदाचार आदि विषयों पर जिन पुस्तकों में वैज्ञानिक एवं बुद्धिवादी ढंग से विचार किया गया है उन्हें अपनी समीपवर्ती लायब्रेरियों में ढूंढ़ना, उनकी लिस्ट बनाना। उन लिस्टों को देखकर यह सोचा जायेगा कि उनमें से किस का कौन अंश अपने लिये संग्राह्य एवं उपयोगी है। ऐसी पुस्तकें विश्व विद्यालयों, कालेजों की लायब्रेरियों तथा बड़े पुस्तकालयों में, थियोसोफिकल सोसायटी आदि के स्वाध्याय कक्षों में, बड़े बुकसेलरों के यहाँ ढूंढ़ी जा सकती है। जहाँ पढ़ने को मिल सकती हों वहाँ उस तरह और जहाँ खरीदनी पड़े वहाँ खरीदा जा सकता है। इन पुस्तकों में से अनेक काम के साराँश नोट किये जायें।
(3) अध्यात्म की विभिन्न साधना पद्धतियों के बारे में जो विधान हों उनका भी संग्रह किया जाय। चमत्कारों, सिद्धियों एवं अलौकिक संदर्भों को इकट्ठा किया जाय। चमत्कारों, सिद्धियों एवं ऐसे अलौकिक संदर्भों को इकट्ठा किया जाय जिनसे आत्मा की स्थिति और शक्ति का परिचय मिलता है। पुस्तकों के अतिरिक्त ऐसे विषय पत्र-पत्रिकाओं में भी ढूंढ़े जा सकते हैं।
(4) ऐसे लोगों से संपर्क स्थापित करना जो विषय में दिलचस्पी रखते हों, उनसे उपरोक्त विषय की जानकारियाँ तथा पुस्तकों के बारे में पूछताछ करना, यदि उनके पास कुछ उपयोगी पुस्तकें हों तो पढ़ने के लिए लेना।
(5) अपने मन से तथा अपने संपर्क क्षेत्र के किन्हीं मनीषियों के मन से अपने विषय की कुछ संगतियां, जानकारियाँ उपलब्ध हों उन्हें नोट करते रहना और यहां भेजना। अपने विषय में उपयोगी सिद्ध हो सकने वाली पुस्तकों के लेखकों तथा प्रकाशकों के पूरे पते मालूम करना और उनसे पत्र-व्यवहार करके अभीष्ट वस्तुयें उपलब्ध करने की तैयारी करना।
चेष्टा यह की जानी चाहिए कि अपने विषय का साहित्य पढ़ने के लिये उधार मिल जाय, पर जहाँ ऐसा सम्भव न हो वहाँ आवश्यक पुस्तकें खरीदी भी जायेंगी। जिनके पास समय हो उन्हें यदि वे अपने यहाँ ऐसी पुस्तकें ढूंढ़ न सकेंगे तो अन्यत्र से उपलब्ध करके पुस्तकें उनके पास भेजी जाती रहेंगी और उनमें से काम के संदर्भ एकत्रित किये जाते रहेंगे।
जिन्हें इस संदर्भ से कुछ जानकारी हो, कोई सुझाव या परामर्श देने हों, जो कुछ समय लगा सकते हों, मथुरा आकर रह सकते हों, उन सभी स्वजनों का सहयोग इन पंक्तियों द्वारा सादर आमन्त्रित किया जा रहा है। कार्य की विशालता और महानता को देखते हुये परिवार के प्रबुद्ध परिजन इस दिशा में हमारा हाथ बंटायेंगे ऐसी आशा है।
युग-निर्माण योजना की विचार-पद्धति थोड़े ही समय से जनसाधारण के सामने आई है। छोटे ट्रैक्टों के रूप में उसे अधिक व्यवस्थित रूप से समझा- समझाया गया है। छोटे ट्रैक्टों का प्रकाशन डेढ़ वर्ष पूर्व ही आरम्भ या गया है, इस थोड़े समय में ही उनकी उपयोगिता जनसाधारण द्वारा इतनी अच्छी तरह समझी जा सकेगी, ऐसी आशा न थी, पर सफलता आश्चर्यजनक एवं आशातीत मिली।
छोटे ट्रैक्टों के रूप में इस विचार-धारा ने थोड़े ही समय में व्यापक रूप धारण किया। जनमानस में ऐसे साहित्य की भूख पहले से ही थी, उपयुक्त ढंग से जब उसे प्रस्तुत किया गया तो सर्वत्र उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा ही नहीं की गई, उसे स्वागत सत्कारपूर्वक अपनाया भी गया। झोला पुस्तकालयों के रूप में यह साहित्य अब जन-जन के पास घर-घर उत्साहपूर्वक पहुँचाया और भावनापूर्वक पढ़ा जा रहा है। यही कारण है कि अब तक निबन्ध, जीवन-परिचय, कथा, कविता विषयों पर कुल मिला कर 275 के करीब ट्रैक्ट प्रकाशित कर सकना सम्भव हो सका।
इस प्रेरणाप्रद युग-परिवर्तनकारी विचार-धारा का प्रचार अभी केवल हिन्दी भाषी क्षेत्र में हो सका है। यों भारत की आधी जनता हिन्दी समझती है पर शेष अहिन्दी भाषी जनता के लिये इस ज्ञान के द्वार अवरुद्ध ही हैं। विदेशों में तो इस ज्ञान की अत्यधिक आवश्यकता अनुभव की जा रही है। इसकी माँग भी है, पर लाभ बेचारे वही उठा पाते हैं, जो हिन्दी जानते हैं। अंग्रेजी आदि भाषा जानने वालों को तो इस प्रकाश से वंचित ही रहना पड़ता है।
इस अभाव को दूर करने के लिये अन्य भाषाओं में भी युग-निर्माण विचार-धारा को सस्ते ट्रैक्टों के रूप में छापने का निश्चय किया गया है। विश्व भाषाओं में से अंग्रेजी को और भारतीय भाषाओं में गुजराती, मराठी, बंगला को पहले हाथ में लिया जा रहा है। इस प्रकार चार भाषाओं में इस साहित्य के अनुवाद-प्रकाशन की भाषाओं को भी हाथ में लिया जायेगा।
यह सारा प्रकाशन सार्वजनिक सम्पत्ति डडडड गायत्री तपोभूमि द्वार किया जा रहा है। इसका ड़ड़ड़ड़ हानि का उत्तरदायित्व गायत्री तपोभूमि का होगा। ड़ड़ड़ड़ जुटाने का अति कठिन कार्य चिन्ता में डाले हुये है पर डडडड अन्ततः उसका भी कोई हल निकलेगा।
अभी अनुवाद कार्य आरम्भ करा रहे हैं। अंग्रेजी, गुजराती, मराठी, बंगला भाषाओं के अच्छे जानकार सुशिक्षित परिजनों का सहयोग उसमें आवश्यक है। जिनकी इन भाषाओं में अच्छी प्रगति हो- प्रवाह युक्त अच्छा बढ़िया अनुवाद कर सकें, उनकी सेवायें आमन्त्रित की जा रही। इसके लिये कोई आर्थिक पारिश्रमिक न दिया जा सकेगा। सेवा-भाव से ही यह सहायता करनी पड़ेगी। अनुवादक के नाम पुस्तक पर मूल लेखक के नाम के साथ छपते रहेंगे।
जो सज्जन उपरोक्त सेवा के लिये अपनी शिक्षा तथा योग्यता को उपयुक्त समझते हों, वे अखण्ड-ज्योति का कोई एक लेख अनुवाद करके उस भाषा में भेजें ताकि उस सम्बन्ध में कुछ अधिक अनुमान लगाया जा सके।
विचार तो आगे इन भाषाओं में युग-निर्माण पत्रिका निकालने का भी है। यदि ऐसा बन पड़ा तो इन अनुवाद कर्ताओं की सेवायें निरन्तर काम आती रहेंगी।
अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्यों में से जो उपरोक्त भाषाओं के जानकार हों, और अपनी भाषा में अनुवाद पसन्द करते हों, वे अपने नाम नोट करादें। यदि उनकी संख्या संतोषजनक रही तो युग-निर्माण-योजना को उस भाषा में प्रकाशित करने की भी तैयारी की जायेगी।
अन्य भाषाओं के जानकार, अपने भाषा क्षेत्र में इस विचार-धारा को व्यापक बनाने के लिए प्रयत्न करेंगे तो मानव समाज की एक महती सेवा कर सकने का श्रेय प्राप्त करेंगे। ऐसा सहयोग सादर आमन्त्रित है।
(बलराम सिंह परिहार)
जब जब ज्योति ज्ञान की जग में गई जलाई है। हुआ दुःख दुविधाओं का अन्त विजय जीवन ने पाई है॥
धरती माता के कण-कण में है अकूत भण्डार ज्ञान का, नदी पर्वतों में पत्ते-पत्ते में बहता प्राण ज्ञान का, सूर्य चन्द्रमा निहारिकाओं में बसता विज्ञान ज्ञान का, यह संसार सत्य पूछो तो एकमात्र है पिण्ड ज्ञान का, पाकर जिसे प्रशस्त पन्थ होता मनुष्य के परित्राण का,
और उसी ने शक्ति, श्रेय, संपत्ति दिलाई है। हुआ दुख दुविधाओं का अन्त विजय जीवन ने पाई है॥
नश्वर तन के अन्तस्थल में एक अदृश्य तत्व रहता है। अग्नि, मरुत, आकाश सभी में प्राणों का अमृत बहता है॥ बसा हुआ जो कण-कण, तृण-तृण में समष्टि का प्रण गहता है। उस अदृश्य सत्ता से ही जीवन का दृश्य-सत्य लहता है॥ उसे जान कर मुक्त बनो नर! बारम्बार ज्ञान कहता है।
ऐसे पथ-दृष्टा को पाना भूरि भलाई है। हुआ दुख दुविधाओं का अन्त विजय जीवन ने पाई है॥
पिप्पलाद ने उस प्रकाश के लिये सदा पीपल फल खाये, कण्वधौर ने जीवन के क्षण उसी ज्ञान के लिये लगाये, व्यास, गणेश, अगस्त्य आदि ने, सारे इन्द्रिय सुख बिसराये, कश्यप, उद्दालक, वशिष्ठ ने सदा ज्ञान के दिये जलाये, कण-कण अन्न बीन कर खाने वाले ऋषि कणादि कहलाये,
अब भी उनके महाज्ञान की कीर्ति समाई है। हुआ दुःख दुविधाओं का अन्त विजय जीवन ने पाई है॥
यह भी ज्ञान कि प्रकृति शक्तिमय, किन्तु पुरुष को भी पहचानो, ज्ञान और विज्ञान युगल में एक समन्वय की गति आनो, अमृतत्व की प्राप्ति कराये उसे लक्ष्य जीवन का मानो, पड़े रहो मत, कुण्ठाओं में उठो श्रेय पथ अनुसधानो, ज्ञान यज्ञ के लिये करवटें बदलो, अपने को भी जानो,
यह पावन सन्देश सभी के हित सुखदाई है। हुआ दुःख दुविधाओं का अन्त विजय जीवन ने पाई है॥
*समाप्त*