दूसरों के संकल्प और विचार जान लेना बहुत कठिन है। किन्तु अपने मन की भावनाओं को बहुत स्पष्ट समझा, सुना और परखा जा सकता है, यदि औरों की सेवा करना चाहते हैं तो पहले अपनी सेवा की योजना बनाओ, अपना सुधार सबसे सरल है। साथियो! तुम जितना अपने अन्तःकरण का परिमार्जन और सुधार कर लोगे, यह संसार तुम्हें उतना ही सुधरा हुआ परिलक्षित होगा।
जब तुम दर्पण में अपना मुख देखते हो तो, चेहरे की सुन्दरता के साथ उसके धब्बे और मलिनता भी प्रकट होती है, तब तुम उसे प्रयत्नपूर्वक साफ कर डालते हो। मुख उज्ज्वल साफ और सुन्दर निकल आता है। प्रसन्नता बढ़ जाती है, बहुत अच्छा लगने लगता है।
अन्तःकरण भी एक मुख है। उसे चेतना के दर्पण में देखने और परखने से उसकी महानतायें भी दिखाई देने लगती हैं और सौंदर्य भी। आत्म-निरीक्षण की आवश्यकता इसलिये पड़ी कि उन छोटी-छोटी मलीनताओं को दूर करें, जो एक पर्त की तरह आत्मा के अनन्त सौंदर्य को प्रभावित और आच्छादित किये रहते हैं। जब वह महानतायें मिट जाती हैं तो आत्मा का उज्ज्वल, साफ और सुन्दर स्वरूप परिलक्षित होने लगता है और संसार का सब कुछ अच्छा और प्रिय मालूम होने लगता है।
मन से प्रश्न करना चाहिये- क्या तुम भयभीत हो? क्या तुम्हें इन्द्रिय-जन्य वासनाओं में मोह है? क्या तुम्हारे विचार गन्दे हैं? यदि हाँ तो सुधार के प्रयत्न में तत्काल जुट जाओ। अपना सुधार ही संसार की सबसे बड़ी सेवा है। जिस दिन इन प्रश्नों का उत्तर ‘नहीं’ मिलने लगेगा, उस दिन से तुम संसार में सबसे सुखी व्यक्ति होंगे। -महात्मा बुद्ध
दुःख मनुष्य की स्वाभाविक अनुभूति नहीं है। उसकी स्वाभाविक अनुभूति सुख है। यदि मनुष्य की स्वाभाविक अनुभूति दुःख होती तो मानव मात्र हर समय रोते, कलपते ही नजर आते। पर ऐसा होता नहीं। हर मनुष्य अपने जीवन में अधिकांशतः हँसता, खेलता और मौज मनाता दिखाई देता। दुःख मनाता हुआ तो वह यदा-कदा ही दिखलाई देता है। दुःख के प्रसंगों में भी वह सुख, शाँति और सन्तोष के सूत्र निकाल लिया करता है। बड़े से बड़े आघात को भी वह दिन दो दिन, माह दो माह में भूल जाता है और उसका शौक-सन्ताप धीरे-धीरे शीतल हो जाता है।
यदि मनुष्य की स्वाभाविक अनुभूति दुःख होती तो वह हर समय दुःखी ही बना रहता। और तब ऐसी स्थिति में उसका कुछ दिन भी जीवित सकना सम्भव न होता। इसके विपरीत वह एक लम्बी आयु तक जीता, खुशी-खुशी जीता है।
मनुष्य परमात्मा का अंश है। परमात्मा आनन्दस्वरूप है। अस्तु मनुष्य की सहज अनुभूति, सुख होना असंदिग्ध रूप से प्रमाणित है।
तब आखिर वह यदा-कदा भी दुःखी क्यों दिखलाई देता है? इसका कारण है। वह यह कि जब मनुष्य अपने स्वरूप को भूल जाता है, तब वह किन्हीं परिस्थितियों से प्रभावित होकर दुःखी दीखने लगता है। सब कुछ होने पर भी मनुष्य में विस्मरणशीलता की एक प्रवृत्ति रहती है। किन्तु यह प्रवृत्ति बुरी नहीं कही जा सकती। यदि मनुष्य का स्वभाव चिर-स्मरणशील हो तो एक बड़ी समस्या खड़ी हो जाये। मनुष्य जीवन में ऐसी न जाने कितनी घटनायें आ जाती हैं, जो दुःखद होती हैं। यदि मनुष्य मस्तिष्क में विस्मरण की प्रणाली न बनी हो तो वे दुःखद घटनायें बहकर बाहर न जा सकें और हर समय मस्तिष्क में जागरूक रहकर उसे पागल ही बना डालें।
अप्रिय घटनायें एक-एक कर इतनी जमा हो जायें कि फिर व उनसे एक क्षण भी अवकाश नहीं पा सकता। उसके मस्तिष्क में पुरानी स्मृतियाँ इतनी अधिक मात्रा में जमा हो जायें कि नई बातें सुनने, समझने, सोचने और ग्रहण करने के लिये स्थान ही न रह जाये, जिसके परिणाम स्वरूप मनुष्य का विकास ही रुक जाये। अपनी इसी विस्मरणशीलता के कारण वह अपना आनंदस्वरूप भूला रहता है।
जिस प्रकार मनुष्य अपनी आँखों से अपनी आंखें नहीं देख सकता और उन्हें देखने के लिये दर्पण का सहारा लेना पड़ता है। ठीक उसी प्रकार अपना स्वरूप स्मरण करने के लिये परमात्मा का स्मरण करना होगा। उसे जानकर ही हम अपने को सरलतापूर्वक जान सकते हैं।
यों तो कहने के लिये हम सब आस्तिक हैं। परमात्मा को जानते और मानते हैं। पर वास्तविकता यह है कि हम उसे जानते-मानते तो क्या, उसकी एक अबूझ-सी छाया मात्र, एक धुँधली-सी, भूली-बिसरी-सी स्मृति हमारे किसी कोने में पड़ी रहती है, जो यदा-कदा चमक भर जाती है। इतने मात्र का जानना नहीं कहा जा सकता। जानना तो तब माना जा सकता है, जब वह हर समय हमारे हृदय-पटल पर अंकित रहे, मनो-मंदिर में विराजमान बना रहे।
किन्तु यह सम्भव तभी हो सकता है, जब हम उसका बार-बार स्मरण करते रहें, उससे संपर्क बनाये रहें। जिन लोगों को हम कभी जानते थे, उनमें से बहुत से ऐसे लोग होंगे, जिनको हम अब बिल्कुल भूल गये हैं। इनका एक मात्र कारण यही होता है कि या तो हम उनके संपर्क में नहीं रहते या बार-बार उन्हें याद नहीं करते रहे होते हैं। सामान्य उपभोग की वस्तुयें भी जब बहुत दिन तक हमारे व्यवहार में नहीं आतीं तो हमारे स्मृति-पटल पर से उतर जाती हैं और हम उन्हें बिल्कुल भूल जाते हैं। विद्यार्थी प्रारम्भ में वर्णमाला या गिनती याद करता है। उसके पहले वह उनको जरा भी नहीं जानता था। पर बार-बार याद करते रहने पर एक दिन वे सब याद हो जाती हैं और तब तक बनी रहती हैं, जब तक उनसे किसी प्रकार का संपर्क बना रहता है। कुछ दिन को भी संपर्क हटा देने या याद न करने पर उनकी स्मृति बालक के मस्तिष्क से निकल जाती है। तथापि जब वह पूर्ण तन्मयता के साथ उन्हें आत्मसात् कर लेता है तो वे उसे आजीवन ही याद बनी रहती है।
स्मरण अथवा विस्मरण की जो बात किसी अन्य वस्तु अथवा व्यक्ति के विषय में है, वही परमात्मा के विषय में है। हम उसे बार-बार याद करते रहेंगे तो वह हमारे मस्तिष्क में जीता, जागता रहेगा और जब हम उसे याद करना छोड़ देंगे तो वह हमें विस्मरण हो जायेगा।
जो वस्तु जितनी सूक्ष्म होती है, उसे हृदयंगम करने के लिये उतने ही सूक्ष्म, एकाग्र तथा निर्द्वन्द्व, मनन, चिन्तन और स्मरण करने की आवश्यकता होती है। परमात्मा सूक्ष्माति-सूक्ष्म तत्व है, उसे साधारण और स्थूल बुद्धि द्वारा यदा-कदा मनन, स्मरण करने से हृदयंगम नहीं किया जा सकता। उसे हृदय की गहराई और सूक्ष्म विवेक द्वारा निरन्तर चिन्तन करने से ही धारण किया जा सकता है।
चिन्तन में हृदय की गहराई उसी के लिये आविर्भूत होती है, जिससे प्रेम होता है। प्रेमी के जीवन में उसका प्रियतम साँगोपाँग रूप से ओत-प्रोत हो जाता है। उसकी सारी भावनायें और कर्मों की सीमा अपने प्रियतम तक केन्द्रित हो जाती हैं। वह उसी के लिये जीता और उसी के लिये मरता है। प्रियतम प्रेमी का सर्वस्व बन जाता है और प्रेमी प्रियतम का रूप हो जाया करता है। तथापि यह प्रेम-भाव भी उसी के लिये उत्पन्न हो सकता है, जिसको सम्पूर्ण रूप से आत्म-समर्पण कर दिया जाये।
अस्तु, अपना स्वरूप जानने के लिये, परमात्मा का साक्षात्कार करने के लिये इस क्रम से चलना आवश्यक होता है- कि उसे संपूर्ण आत्म-समर्पण कर हृदय की गहराई से स्मरण किया जाये और यह स्मरण चिन्तन के आधार पर सम्भव हो सकता है। सतत् चिन्तन की सिद्धि तब ही सम्भव है, जब उपासना द्वारा परमात्मा के संपर्क में रहा जाये।
परमात्मा के प्रति विस्मरणशीलता दूर करने का उपासना से अच्छा और कोई उपाय नहीं है। जप, तप, पूजा, अर्चना आदि के जो भी विधान बनाए गये हैं, वे सब परमात्मा को अपने स्मृति-पटल पर बनाये रखने के लिये ही बनाये गये हैं। नित्य-प्रति जब नियत समय पर उपासना की जायेगी तो परमात्मा की स्मृति हृदय-पटल पर उसी प्रकार अंकित हो जायेगी, जिस प्रकार बार-बार याद करते रहने पर किसी बालक की गिनती अथवा पहाड़ा याद हो जाता है। किसी का संपर्क उसकी स्थायी याद के लिये सबसे बड़ा कारण है। हमें अपने परिवार और कुटुम्ब के लोग औरों की अपेक्षा अधिक याद क्यों रहते हैं? इसीलिये कि उनसे हमारा सतत् और घनिष्ठ संपर्क बना रहता है।
यह एक मनो-वैज्ञानिक सत्य है कि हम जिसके संपर्क में जितना अधिक आते हैं, उसके विषय में उतनी ही गहराई से जान जाते हैं। उसके वास्तविक स्वरूप से हमारा घनिष्ठ परिचय हो जाता है। कोई भी उपासना द्वारा जब परमात्मा के सतत् संपर्क में रहेगा तो अवश्य ही एक दिन उसके सत्यस्वरूप को जान ही जायेगा। परमात्मा को साक्षी करते ही उसे अपना सत्य स्वरूप स्मरण हो उठेगा। अपने आनंद रूप सत्यस्वरूप को जानते ही मनुष्य की सारी दुःखद अनुभूतियाँ दूर हो जायेंगी और वह सदा-सर्वदा के लिये अपनी स्वाभाविक अनुभूति में स्थिर हो जायेगा।
सुख की अनुपस्थिति ही दुःख का कारण है। किन्तु इस प्रकार जब कोई आनन्द रूप हो जायेगा, तब उसके पास किसी भी परिस्थिति में दुःख का कोई प्रयोजन ही न रह जायेगा। उस स्थिति में सुख तो सुख, दुःख भी सुख-रूप आभासित होने लगेगा।
संसार के समस्त आघातों को दूर करने के लिये अपने सहज एवं आनंदस्वरूप का स्मरण आवश्यक है। आत्मस्वरूप देखन के लिए परमात्म रूप दर्पण अपेक्षित है, परमात्मा की प्राप्ति सूक्ष्म-चिन्तन एवं मनन द्वारा ही हो सकती है। चिन्तन की यह सूक्ष्मता हृदय की गहराई से और हृदय की गहराई प्रेम द्वारा और प्रेम की उत्पत्ति सम्पूर्ण आत्म-समर्पण द्वारा ही सम्भव है। और इन सब का आदि सूत्र उपासना ही है। इस आध्यात्मिक क्रम को उपासना से प्रारम्भ कर दुःखों के आत्यांतिक अभाव तक आसानी से पहुँचाया जा सकता हैं
किन्तु यह उपासना प्रगतिवती हो तभी सकती है, जब इसका स्वरूप विशुद्ध आध्यात्मिक होगा। जो परमात्मा को छोड़कर अन्य किसी प्रयोजन से पूजा-पाठ या जप-तप किया करते हैं, उनकी वह उपासना वाँछित दिशा में फलीभूत नहीं होती। यद्यपि लोग सुख पाने के लिये ही सकाम उपासना किया करते हैं, तथापि यह उल्टा प्रयत्न ही है। सकाम उपासना करने का अर्थ है, अपने जीवन में और अधिकाधिक दुःखों की इच्छा करना। एक तो कामनायें यों भी दुःख का बहुत बड़ा हेतु हैं। फिर यदि उपासना द्वारा किसी ने अपनी लौकिक कामनाओं की सिद्धि भी करली, तब भी उसके दुःखों का अन्त कदापि न हो सकेगा। वह धन-दौलत, पुत्र-पौत्र पायेगा, शक्ति और सम्बल का अर्जन कर लेगा। किंतु वह सकाम उपासक यह कभी नहीं सोचता कि इन सब लौकिक लाभों के उपयोग अथवा उपभोग का परिणाम क्या होगा, वही विस्मरण, अज्ञान और अन्धकार डडडडडडडडडड।
ऐसी दशा में वह अपने दुःखों की नितान्त निवृत्ति की आशा कैसे कर सकता है। वह तो घूमघाम कर फिर उसी दुःख-दर्द के चक्र में पड़ जायेगा। चूँकि लौकिक कामनाओं के अनुसार वह जिन विभूतियों को माँगेगा और पायेगा, वे सब अपने निसर्गानुसार नश्वर ही होंगी। एक दिन उनका नष्ट हो जाना निश्चित है और वे एक शोक-सन्ताप देकर नष्ट हो भी जायेंगी। सकाम उपासना करना ठीक वैसी ही गलती है, जैसे कोई अनजान व्यक्ति रत्नोपम वस्तु का विनियम किसी रंगीन काँच से कर लेता है। जिस उपासना के आधार पर सच्चिदानन्द स्वरूप आत्मा और परमात्मा की प्राप्ति हो सकती है, उसके लिये उन भौतिक वस्तुओं का क्या माँगना जो किसी पुरुषार्थी व्यक्ति के हाथों का मैल कही गई हैं। उपासना कीजिये, निष्काम उपासना और उसके उपहार स्वरूप त्रिदानन्द की उपलब्धि कर सदा-सर्वदा के लिये संसार के दैहिक, दैविक और भौतिक पाप तापों से उस पार उतर जाइये।
‘मेरी’ का पति बहुत निर्धन था पर पति-पत्नी में अगाध प्रेम, अविचल निष्ठा, असीम पवित्रता थी।
वह प्रति वर्ष अपने विवाह की जयन्ती मनाया करते थे। उस दिन अपने विगत जीवन के कर्त्तव्य-पालन पर सन्तोष, प्रसन्नता और परस्पर कृतज्ञता व्यक्त करते थे। भूलों की क्षमा माँगते थे और आगे के लिये और भी सचेष्ट कर्त्तव्य पालन की प्रतिज्ञा लेते थे।
यह पहला ही विवाह दिवसोत्सव था, जब उनके पास एक दूसरे को देने के लिये कुछ नहीं था। मेरी के बाल बड़े सुन्दर थे पर उन्हें संवारने के लिये कंघा न था। पति के पास घड़ी थी पर उसकी चेन न थी। दोनों एक दूसरे को उपहार देना चाहते थे, पर क्या दें, यह दोनों की हैरानी थी।
दोनों बाजार गये। चुपचाप, अलग-अलग। मेरी ने अपने सुन्दर बाल कटवाकर बेच दिये, उनसे जो पैसा मिला पति के लिये घड़ी की चेन खरीद ली। पति ने अपनी घड़ी बेच दी और उससे मेरी के लिये कंघी खरीदी। दोनों नियत समय पर अपने-अपने उपहार लिये घर पहुँचे।
पर यह देखकर दोनों थोड़ी देर के लिये दुःखित हो गये कि जिस घड़ी के लिये चेन आई वह भी बिक गई जिन बालों के लिये कंघी आई वह भी कट गये। थोड़ी देर तक दानों दुःखी रहे पर दोनों ने एक दूसरे के प्रति अपनी प्रेम-भावना को याद किया तो उनका हृदय गद्-गद् हो उठा।
इस तरह का निश्छल और निष्काम प्रेम जहाँ भी होता है, वहीं ईश्वरीय सत्ता का वास्तविक संपर्क दिखाई देता है। प्रेम की सार्थकता निष्काम भावना में ही है। - ‘मेरी’ ज गिफ्ट’ से,
स्वर्ग पाने के लिये प्रायः लोग उत्सुक रहते हैं। स्वर्ग ऐ उपलब्धि मानी जाती है। मनुष्य की यह इच्छा होती है कि यह जिस स्थान पर है, वहाँ से आगे बढ़े। वह उन वस्तुओं को प्राप्त करे, जो उसके पास नहीं हैं। मनुष्य एक जीवन्त प्राणी ही नहीं, वह विवेक तत्व से भी समन्वित है। जीवन और विवेक का मिलन उसे उन्नति और प्रगति के लिये प्रेरित करता है। जिसमें यह दोनों तत्व मौजूद होते हैं, वे आगे बढ़ने और ऊपर उठने के प्रयत्न से विरत नहीं रह सकते। वे उसके लिये यथासाध्य प्रयत्न अवश्य करेंगे।
स्वर्ग एक उपलब्धि मानी गई है। उसको संसार से अलग भी माना जाता है। मानव-जन्म के उपलक्ष में संसार तो उसे मिल ही चुका होता है। अस्तु, अपनी प्रकृति के अनुसार इस मिले हुए से आगे पढ़कर, जो अब तक नहीं मिला है, उस स्वर्ग को पाना चाहता है। ऐसा करने में उसे पुरुषार्थ का श्रेय मिलता है, वृत्ति का संतोष होता है और उपलब्धि का गौरव प्राप्त होता है।
स्वर्ग पाने की लोग कामना मात्र ही नहीं करते, उसे पाने का प्रयत्न भी करते हैं। जप, तप, पूजा-पाठ, पुण्य, परमार्थ और साधना, उपासना में संलग्न होने के पीछे प्रायः स्वर्ग पाने की ही कामना छिपी रहती है। यद्यपि सकाम उपासना को अधिक श्रेष्ठ नहीं माना गया है, तथापि यदि वह कामना साँसारिक पदार्थों के आगे की वस्तुओं को पाने से सम्बन्धित है तो उसको किसी हद तक स्वीकार कर लिया जाता है।
स्वर्ग संसार से अलग बसा हुआ कोई देश अथवा स्थल नहीं है। जहाँ संसार समर जीतने वाले लोग जाकर रहते हैं। वास्तव में स्वर्ग मानव-जीवन की एक स्थिति है, जो इसी भूमि और इसी जीवन में पाई जा सकती है। जो इसी जीवन में उस स्थिति को नहीं पा सकता, वह लोकान्तर में, यदि कोई है भी, तो उस स्वर्ग को पा सकता है, यह सर्वथा संदिग्ध है। इस जीवन में भूमि का स्वर्ग पाने वाले ही उस स्वर्ग को पा सकने के अधिकारी हो सकते हैं। यदि वह स्वर्ग प्राप्ति है तो उसकी पात्रता इसी भूमि और इसी जीवन में उपार्जित करनी होती है।
स्वर्ग क्या है? स्वर्ग वह स्थिति है, जिसमें मनुष्य के आस-पास आनन्ददायक प्रियता ही प्रियता बनी रहे। संसार के सारे धर्म साहित्य में स्वर्ग का वर्णन आता है। उसके सम्बन्ध में न जाने कितनी कथायें पढ़ने को मिलती हैं। लोगों का स्वर्ग के लिये लालायित रहना, उसको पाने के लिये पुण्य तथा पुरुषार्थ का उपक्रम करना, परमार्थ तथा आध्यात्म का अनुसरण करना आदि पढ़ने को मिलता है। किसी धर्म अथवा मत सम्प्रदाय में स्वर्ग के स्वरूप और उसकी विशेषताओं के विषय में कोई भी मान्यता अथवा धारणा क्यों न रही हो, लेकिन उस सबका सार ही है कि वहाँ सब कुछ प्रिय तथा आनन्ददायक ही है। वहाँ पर ऐसे कारण नहीं हैं, जिनसे मनुष्य को कष्ट, क्लेश अथवा दुःख प्राप्त हो। ऐसा स्वर्ग जिसकी विशेषता आनन्द तथा प्रियता है, मनुष्य स्वयं अपने लिये इस पृथ्वी और इस जीवन में ही रच सकते हैं। अपने अन्दर तथा बाहर की परिस्थितियाँ इस प्रकार से निर्मित करली जायँ, जिससे न तो प्रतिकूलता का जन्म हो और न दुःख अथवा शोक-संताप का। वरन् इसके विपरीत प्रियता तथा आनन्द की अवस्थायें बनी रहें। यह मनुष्य के अपने वश की बात है। वह इस प्रकार का वाँछित स्वर्ग अपने लिये यहीं पर बना सकता है और निश्चित रूप से बना सकता है।
स्वर्ग की विशेषताओं में आनन्द के अतिरिक्त एक विशेषता अमरता भी है। ऐसी मान्यता है कि स्वर्ग प्राप्त कर लेने वाले देवकोटि में पहुँच जाते हैं और देवता अमर होते हैं, कभी मरते नहीं। अर्थात् स्वर्ग का अधिकारी अमरत्व का भी अधिकारी होता है। किन्तु सत्य बात यह है कि स्वर्ग की विशेषताओं में अमरता की उतनी प्रधानता नहीं है, जितनी की आनन्द की। यदि अमरता छोड़कर स्वर्ग से आनन्द की विशेषता हटाली जाय और वहाँ की परिस्थितियाँ संसार की तरह सामान्य दुःख-सुख और कष्ट, क्लेश देने वाली हो जायँ तो शायद उस एकाकी अमरता से भरा स्वर्ग बड़ा घोर और भयानक बन जाये। लोग उसके लिये लालायित तो क्या हों, उल्टे उसकी कल्पना से भी भयभीत होने लगें। यदि आनन्द से रहित अमरतापूर्ण स्वर्ग किसी अनायास ही मिलने लगे तब भी कोई उसे स्वीकार न करे। इस थोड़ी-सी अवधि के जीवन में जब आनंद का अभाव हो जाता है, दुख और क्लेश का दबाव बढ़ जाता है तो वह दुर्वह भार बन जाता है। लोग उससे पीछा छुड़ाने के लिये उत्सुक हो उठते हैं, तब भला निरानन्द अमरता से भरा वह युग-युग की अवधि वाला स्वर्गीय जीवन कितना भयानक और असह्य भार बन जाये। आनन्द-हीन अमरता की अपेक्षा लोग सानन्द नश्वरता को ही अधिक पसन्द भी करेंगे और श्रेय भी देंगे। आनन्द की प्रधानता के कारण ही स्वर्ग की अमरता का महत्व है, अन्यथा वह तो एक असीम कारागृह से अधिक कुछ नहीं है। नरक क्या है? आनंद रहित अमरता ही तो है, प्रतिकूलता से भी परिस्थितियां ही तो हैं, दुख और यातना से पूर्ण अवस्था ही तो है। स्वर्ग का महत्व अमरत्व के कारण नहीं, आनन्द के कारण है। और आनन्द की उत्पत्ति अनुकूल तथा प्रियतापूर्ण परिस्थितियों से होती है।
वह आनन्दपूर्ण स्वर्ग जो परलौकिक स्वर्ग की तरह अमरता वाला भले ही न हो पर जो आपके इस जीवन में ही मूर्तिमान हो सकता है, आप स्वयं अपने प्रयत्न से निर्माण कर सकते हैं। वह प्रियता जो आनन्द की जननी कही गई है।, आत्मीयता से उत्पन्न होती है। संसार में मनुष्य को जो कुछ अच्छा और प्रिय लगता है, वह आत्मभाव के कारण। संसार की कोई भी वस्तु कितनी ही सुन्दर और उपयोगी क्यों न हो, तब तक प्रिय नहीं लगती जब तक उसमें आत्म-भाव स्थापित न हो। किन्हीं दर्शनीय स्थानों को दो आदमी एक साथ देखते हैं। उनमें से एक उसके सुंदर दृश्य को देखकर आनन्दित और आत्म-विभोर हो उठता है, जबकि दूसरा व्यक्ति उसे देखकर अनमना बना रहता है। उसे उसमें न तो कोई आकर्षण अनुभव होता है और न प्रियता। इसका कारण ही है कि एक व्यक्ति उस दृश्य में तन्मय होकर उससे आत्मीयता स्थापित कर लेता है, जबकि दूसरा तटस्थ रहता है। यदि उस दृश्य की सुन्दरता ही प्रियता का कारण होता, तो दोनों व्यक्तियों को ही वह दृश्य एक समान सुन्दर और प्रिय लगता। प्रियतापूर्ण आकर्षण का कारण मनुष्य का आत्म-भाव है न कि किसी वस्तु की विशेषता या गुण।
एक और उदाहरण के लिये अपने बच्चों और परिजनों को ले लीजिये। अपने बच्चे और परिजन सबको बहुत प्रिय होते हैं। उनकी तुलना में दूसरे के बच्चे और परिजन जरा भी प्रिय नहीं लगते, फिर चाहे वे अपने बच्चों और परिजनों की अपेक्षा कितने ही अधिक अच्छे और गुणवान क्यों न हों। बच्चों के विषय में तो यहाँ तक देखा जाता है कि अपना काला-कलूटा और कुरूप बच्चे तक दूसरों के फूल जैसे सुंदर बच्चों की अपेक्षा कहीं अधिक प्रिय लगता है। अपने परिजनों की तुलना में भी अपने बच्चे ही अधिक प्रिय तथा सुन्दर लगते हैं। इस भेद का कारण कोई स्वार्थ अथवा द्वेष नहीं है, बल्कि वह आत्म-भाव है, जो व्यक्तियों में न्यूनाधिक मात्रा में स्थापित होता है।
और भी देखिये- बहुत बार ऐसा भी होता है कि अपने बच्चे की अपेक्षा अपना भतीजा, भाँजा अथवा कोई अन्य बच्चा ही अधिक प्रिय लगने लगता है। इस विपर्य का कारण भी यही है कि किन्हीं कारणों से अपने बच्चे की तुलना में दूसरे बच्चे से आत्मीयता अधिक हो जाती है। इस प्रकार देख सकते हैं कि प्रियता का कारण अथवा आधार गुण, सुन्दरता, स्वार्थ अथवा आत्म-जातता अथवा सम्बन्ध नहीं होता, बल्कि मनुष्य का अपना आत्म-भाव ही होता है, जो किसी से भी स्थापित हो सकता है। साराँश में इस बात को इस प्रकार कहा जा सकता है कि संसार की कोई भी वस्तु आप में न तो प्रिय है और न अप्रिय। किसी कारणवश जब किसी वस्तु में आत्मभाव जुड़ जाता है, तो वह प्रिय लगने लगती है और जिसमें आत्म-भाव नहीं जुड़ पाता अथवा किसी कारण से जुड़ा हुआ, आत्म-भाव टूट जाता है, तो वही वस्तु प्रियता रहित हो जाती है। प्रियता की उत्पत्ति आत्मीयता से होती है और किसी बात से नहीं।
मानव का सहज स्वभाव है कि वह अपने आस-पास प्रियजनों तथा प्रिय वस्तुओं को पाकर बड़ा सुखी और प्रसन्न होता है। जब तक उसकी मनभाई परिस्थिति उसे प्राप्त रहती है, दुःख शोक अथवा ताप का उसे अनुभव नहीं होता। इस प्रकार यदि हमारे आस-पास प्रिय वस्तुयें, प्रिय व्यक्ति और मन चाही अनुकूल परिस्थिति बनी रहे, तो क्या हम जीवन भर सुखी और संतुष्ट नहीं रह सकते? रह सकते हैं और निश्चित रूप से रह सकते हैं। जीवन भर निर्विघ्न रूप से सुखी और संतुष्ट रखने वाली परिस्थितियाँ ही जीवन की वह स्थिति है, जिसे हम धरती का स्वर्ग कह सकते हैं।
यदि आपको ऐसा स्वर्ग वाँछित तथा अपेक्षित है, तो अपने आत्म-भाव का विस्तार कर अनुकूल तथा प्रियतापूर्ण परिस्थितियां प्राप्त कर लीजिये। आज से ही अपने-पराये की संकीर्णता त्याग दीजिये। जन-जन को आत्मीयता का अमृत और प्रेम का प्रसाद बाँटने लगिये। अपने पड़ौसियों को अपना परिजन, दूसरे के बच्चों को अपना बच्चा और आगे बढ़कर जीव-मात्र को अपना आत्मीय समझिये और वैसा ही व्यवहार करिये। उनके लिये उसी प्रकार का त्याग और वैसी ही सेवा करने में तत्पर रहिये, जैसी की आप अपने प्रिय एवं परिजनों के लिये करने को तैयार रहते हैं। दूसरों के दुःख से उसी प्रकार दुःखी और सुख से उसी प्रकार सुखी होइये, जिस प्रकार अपने प्रिय एवं परिजनों के लिये होते हैं। और तब देखिये कि आप वह आनन्द और वह संतोष पाते हैं या नहीं, जिसको कल्पना किसी लोकान्तरिक स्वर्ग में की जाती है।
शुद्ध और निर्विकार बात तो यह हे कि अपनी दी हुई आत्मीयता के बदले में प्रेम अथवा प्रशंसा की कामना न की जाय और सारा सद्व्यवहार केवल अपनी ओर से एकाकी ही करते रहा जाय। इस निस्वार्थ-भाव में जो आनन्द और जो संतोष है, वह तो स्वर्गीय आनंद और सन्तोष से भी बढ़कर है। तथापि आत्मीयता के बदले में आत्मीयता मिलना स्वाभाविक है। जो जिसको प्रेम देता है, वह उससे प्रेम पाता है। जो जिसे अपना मानता है, जैसा व्यवहार करता है, वैसा ही अपनत्व और व्यवहार पाता भी है।
जब जन-जन को निस्वार्थ-भाव से आत्मीय मानकर तदनुसार व्यवहार करेंगे और दूसरों के आत्मीय बनकर तदनुसार व्यवहार पायेंगे, तो ऐसे किसी सुख-सन्तोष से वंचित रह सकते हैं, जिसकी कल्पना लोकान्तरित स्वर्ग में भी जा सकती है। आत्म-निर्मित पृथ्वी का यह स्वर्ग अधिक सत्य, अधिक सरल और अधिक महत्वपूर्ण है। यदि आपके इस आध्यात्मिक उपाय से पृथ्वी पर अपना स्वर्ग निर्माण कर लिया, तो निश्चय मानिये इसके उपलक्ष अथवा प्रतिफल में आप उस स्वर्ग को भी प्राप्त कर लेंगे, जिसका वर्णन मन मोह लेता है।
अश्वघोष को वैराग्य हो गया। भोग-विलास से अरुचि और संसार से विरक्ति हो जाने के कारण उसने गृह-परित्याग कर दिया।
ईश्वर-दर्शन और अभिलाषा से वह जहाँ-तहाँ भटका पर शाँति न मिली। कई दिन से अन्न के दर्शन न होने से क्षुधार्त और थके हुये अश्वघोष एक खलिहान के पास पहुँचे। एक किसान शाँति व प्रसन्न मुद्रा में अपने काम में लगा था। उसे देखकर अश्वघोष ने पूछा- ‘‘मित्र! आपकी प्रसन्नता का रहस्य क्या है?”
‘ईश्वर-दर्शन’ उसने संक्षिप्त उत्तर दिया। तो मुझे भी उस परमात्मा के दर्शन कराइये? विनीत-भाव से अश्वघोष ने याचना की।
अच्छा कहकर किसान ने थोड़े चावल निकाले। उन्हें पकाया, दो भाग किये, एक स्वयं अपने लिये, दूसरा अश्वघोष के लिये। दोनों ने चावल खाये, खाकर किसान अपने काम में लग गया। कई दिन का थका होने के कारण अश्वघोष सो गया। प्रचंड भूख में भोजन और कई दिन के श्रम के कारण गहरी नींद आ गई। और जब वह सोकर उठा तो उस दिन जैसी शाँति, हल्का-फुल्का, उसने पहले कभी अनुभव नहीं किया था। किसान जा चुका था और अब अश्वघोष का क्षणिक वैराग्य भी मिट गया था। उसने अनुभव किया अनासक्त कर्म ही ईश्वर-दर्शन का सच्चा मार्ग है।
प्रेम-तत्त्व को ज्ञानियों ने अमृत की संज्ञा दी है। निस्सन्देह प्रेम तीनों प्रकार से अमृत ही है। यह स्वयं अमर होता है। जिसकी आत्मा में यह आविर्भूत होता है, उसे अमर बना देता है। इसकी अनुभूति और इसका रस अमृत के समान अक्षय आनंद देने वाला होता है। प्रेम अमृत अर्थात् अमर होता है। यह तत्त्व ने तो कभी मरता है, न नष्ट होता है और न इसमें परिवर्तन का विकार उत्पन्न होता है। एक बार उत्पन्न होकर यह सदा-सर्वदा बना रहता है। संसार की हर वस्तु, अवस्था, विचार, परिस्थितियाँ, विश्वास, धारणाएं, मान्यतायें, प्रथायें यहाँ तक कि मनुष्य और शरीर तक बदल जाते हैं, किन्तु प्रेम अपने पूर्णरूप में सदैव अपरिवर्तनशील रहता है। यही इसकी अमरता है। प्रेम अमृत है, स्वयं अमर है।
प्रेम न स्वयं ही अमृत है, बल्कि जिसकी आत्मा में इसका आविर्भाव होता है, उसे भी अमर बना देता है। प्रेम की पूर्णता प्राप्त किये बिना, जिस प्रेममय को निर्यात के अधीन शरीर त्याग करना पड़ता है, वह पुनः शरीर धारण कर उसी स्थान से अपनी प्रेम-साधना को आगे बढ़ाता है। अवधि पूरी होने पर नियति उसका एक शरीर तो ले सकती है, किन्तु साधना पूरी करने के लिये उसका नया शरीर धारण करना वर्जित नहीं कर सकती। साधना के लिये एक ही जीवात्मा की यह शरीर परम्परा अमरता का ही तो लक्षण है। उपरान्त जब उसकी प्रेम साधना अपनी पूर्णता को प्राप्त होती है, तब तो प्रेमी जीवन-मरण की पुनरावृत्ति से ही मुक्त हो जाता है और मोक्ष नामक उस पद को प्राप्त कर लेता है, जो न के अमर ही होता है, बल्कि अक्षय शाश्वत होता है।
प्रेम-तत्त्व में अमृतानंद की अनुभूति होती है। प्रेम-तत्व से ओत-प्रोत आत्मायें प्रायः वीतराग हो जाती हैं। उनके विषय-भोग की वासनायें शान्त हो जाती हैं। इसलिये नहीं कि वे इसके योग्य नहीं रहते अथवा अक्षय हो जाते हैं, बल्कि वे प्रेम के अमृतानंद की उपस्थिति में विषय-भोगों की नश्वरता तथा मिथ्यात्व से अवगत हो जाते हैं। जो सत्य और सब कुछ पा सका है, वह मिथ्या तथा तुच्छता की कामना किस प्रकार कर सकता है। भौतिक रूप से प्रेमियों को प्रायः घाटे में रहना पड़ता है। वे त्याग और उत्सर्ग की मूर्ति होते हैं। अपने प्रेमास्पद के लिये सर्वस्व बलिदान कर देते हैं, तब भी प्रेम के प्रसाद से एक अनिवर्चनीय आनन्द से ओत-प्रोत बने रहते हैं। वे आत्म-तुष्ट, आत्मानन्दित तथा आत्म-सुखी बने रहते हैं। देश से प्रेम करने वालों, धर्म से प्रेम करने वालों, विचार और आदर्श से प्रेम करने वालों ने गोली, शूली, फाँसी और अंग-भंग की भयानक यातनायें पाईं, किन्तु प्रेम के प्रसाद से उनके मुख की आनन्दमयी मुस्कान कभी बन्द नहीं हुई।
यदि प्रेम में अमृत आनन्द का गुण न होता तो उसके आधार पर न तो कोई मर्मान्तक मानना सहन करता और न त्याग एवं उत्सर्ग के द्वारा प्राप्त निर्धनता और अभाव को अहोभाग्य मानता। प्रेम से परिपूर्ण आत्मा वाला उसके अक्षय आनन्द से भरा हुआ, गूंगे के गुड खाने जैसे अबोल आनन्द का रस लेता हुआ प्रतिक्षण संतुष्ट बना रहता है। प्रेम का अमृतानन्द सारे आनन्दों से ऊपर और स्पृहणीय है।
बहुत बार देखा जाता है कि लोग अपने प्रेमास्पद के लिये आँसू बहाते हैं। अपने आराध्य के सम्मुख मंदिरों में विलाप करते हैं। याचना करते हैं कि उन्हें शरीर कारा से मुक्त कर प्रेमास्पद के साथ एक रूप कर दिया जाय। इस प्रकार की व्याकुलता से व्याप्त मनुष्य को देखकर उसके भक्त अथवा प्रेमी होने का अनुमान होता है। किन्तु वे ही व्यक्ति जब अपने आस-पास के दुःखी और क्लान्त मनुष्यों को देखकर उनकी पीड़ा जानकर भी मौन और उदासीन बना रहता है। दया, संवेदना अथवा करुणा से द्रवित वही हो तो तुरन्त ही उसे प्रति बना प्रेमी का भाव बदल जाता है और मानना पड़ता है कि अमुक व्यक्ति यथार्थ रूप में प्रेमी नहीं है, बल्कि प्रेम प्रदर्शन करने वाला ढोंगी है। प्रेम-तत्व ओत-प्रोत व्यक्ति की आत्मा बड़ी करुण और हृदय बड़ा दयावान होता है। करुणा और दया प्रेम के प्रमुख प्रसाद हैं। अपने को प्रेमी मानकर भी जो अकरुण है, कठोर है, निश्चित रूप से वह आडम्बरी है, फिर भावातिरेक में वह अपन प्रेमास्पद अथवा आराध्य के लिये रो-रो कर नदियाँ क्यों न बहाता रहे। सच्चा प्रेमी-भोगी अणु-अणु में अपने प्रेमास्पद का ही आभास पाता है, वह सदा-सर्वदा सबके लिये करुणापूर्ण प्रेम को प्रसाद बाँटता रहता है।
किसी दीन-दुखी को देखकर उसका मार्मिक हृदय उसकी सेवा, सहायता किए बिना रह ही नहीं सकता। महात्मा गाँधी, महात्मा ईसा, सच्चे ईश्वर भक्त और मानवता के प्रेमी थे। महात्मा गाँधी अपन आश्रम के कोढ़ियों तक की सेवा-सुश्रूषा किया करते थे और महात्मा ईसा तो मार्ग में मिले दुःखियों का, जब तक दुःख दूर नहीं कर लेते थे, अपनी आगे की यात्रा तक स्थगित रखते थे। जहां वे ईश्वर को पाने और उसमें मिल जाने के लिये व्यग्र रहते थे, उसके लिए आँसू बहाते थे, वहाँ उसकी दुनियाँ के दुःखी लोगों की सेवा भी करते थे। महात्मा ईसा और महात्मा गाँधी यथार्थ रूप में भक्त और प्रेमी थे। मनुष्य को अपने आनन्द और आत्म-कल्याण के लिये आडम्बरपूर्ण प्रेम से बचना और सच्चे प्रेम को प्राप्त करने का प्रयत्न करना चाहिये।
प्रेम अमूल्य व निःस्वार्थ वस्तु है। प्रेम का काई मूल्य नहीं। प्रेम के सम्मुख संसार के सारे सुख, सारी सम्पदायें और सारी विभूतियां तुच्छ हैं। संसार के एक नहीं सैकड़ों ऐसे प्रेमी जन हुए हैं, जिन्होंने इस तत्व की रक्षा में धन-दौलत, कुटुम्ब-कबीला, जमीन-जायदाद यहाँ तक राज-सिंहासनों को तक तृण के समान त्याग दिया है। प्रेमियों ने प्रेम के स्थान पर उसके मूल्य में हँसते-हँसते अपने शीश दान कर दिये हैं। उन्होंने सब कुछ दे दिया, लेकिन प्रेम-त्याग की कल्पना तक नहीं की। प्रेम-धन के समक्ष संसार की सारी संपदायें तुच्छ तथा नगण्य हैं।
इतना अनमोल होने पर भी प्रेम निर्मूल्य ही है। न तो उसके लिये कोई मूल्य दिया जाता है और न लिया जाता है। यदि मनुष्य के पास बिना मूल्य बाँटने योग्य कोई वस्तु है तो वह प्रेम ही है। इस अमृत की कोई थाह नहीं। जन्म-जन्म तक झोली भर-भरकर बाँटते रहिये इसमें कमी नहीं होती। बल्कि ज्यों-ज्यों जितना अधिक प्रेम का प्रसाद बाँटा जाता है, उसका भण्डार उतना ही अधिक भरता जाता है। प्रेम का प्रसाद वितरण करने में न तो कोई पैसा लगता है और न कोई उपकरण। यही तो एक ऐसी संपत्ति इस भाग्यवान मनुष्य के पास है, जो अनमोल होने पर भी निर्मूल्य है। प्रेम का प्रसाद वाणी से, शरीर सेवा से, भावना से, विचार से, करुणा, दया, सहानुभूति, संवेदना आदि किसी भी रूप में संसार भर में वितरित किया जा सकता है। प्रेम के अमृत में न तो धन लगता है और न उसका दान करने में कुछ व्यय ही होता है। प्रेम का अमृत न केवल अमूल्य ही नहीं बल्कि निर्मूल्य भी है।
प्रेम रूपी संपत्ति को न तो कहीं से लाना होता है और न किसी से प्राप्त करना होता है मनुष्य की अन्तरात्मा में उसका सागर भरा हुआ है। ऐसा अथाह सागर कि जिसको हजारों जन्मों तथा संसार के प्राणियों को क्यों न बाँटा जाय, तब भी उसमें रंच-मात्र कमी नहीं आती। प्रेम का वह सागर ज्यों का त्यों लबालब भरा रहता है। प्रेम मनुष्य की आत्मा का स्वयं प्रकाश है। प्रकाश वितरण से उसमें किसी प्रकार की कमी नहीं आती। कोई भी प्रकाश कितनी ही वस्तुओं को आलोकित क्यों न करले अपना आभास कितने ही विस्तार में क्यों न डाले, किन्तु उसकी मूल मात्रा में जरा भी अन्तर नहीं आता। वह यथावत् पूरे का पूरा बना रहता है। तथापि आत्मा में वर्तमान प्रेम प्रकाश उपलब्धियाँ ही अनायास नहीं हो जाती। उसके लिए उपाय तथा साधना करने की आवश्यकता होती है।
जब तक मनुष्य आत्मा को आवृत किये मल, विक्षेप स्वार्थ, संकीर्णता आदि आवरण को नहीं हटायेगा, तब तक आत्मा में वर्तमान प्रेम-प्रकाश का उद्घाटन नहीं हो सकता। इन भौतिक आवरणों को हटाने के उपाय स्वरूप मनुष्य को संसार के दीन-दुःखी मनुष्यों के प्रति दया, करुणा तथा सहानुभूति का व्यवहार करना होगा। उनके दुःखों को अपना दुःख और उनके आँसुओं को अपने आँसू समझना होगा। अपनी शक्ति भर लोगों की सेवा-सहायता करनी होगी। और इस सहायक सहानुभूति को जागृत तथा विकसित करने का उपाय यह है कि संसार के इस चरम सत्य को स्वीकार कर लिया जाय कि मेरे सहित इस निखिल ब्रह्मांड के सारे प्राणी एक उस परम पिता परमात्मा की ही सन्तानें हैं। स्थल, नभ ता जलचारी जितने भी मनुष्य, पशु-पक्षी अथवा कीट-पतंग दृष्टिगोचर होते हैं, वे सब हमारे भाई ही हैं। मनुष्य का यह व्यापक भ्रातृ-भाव सहज ही सबके लिये हृदय में प्रेम का प्रवाह आन्दोलित कर देगा, जिससे आत्मा के उस पावन प्रकाश को आवृत रखने वाले सारे आवरण छिन्न-भिन्न होकर नष्ट हो जायेंगे आत्मा में वर्तमान प्रेम का अखण्ड प्रकाश निरावरण होकर फैलने लगेगा, जिसकी कृपा से तुच्छ मानव-जीवन एक अद्भुत उपलब्धि बन जायेगी। प्रेम आत्मा का सहज प्रकाश है, उसको किसी से पाने अथवा कहीं से लाने की आवश्यकता नहीं होती।
प्रेम मनुष्य की सर्वोपरि आवश्यकता है। मानव-आत्मा अथवा संसार से प्रेम रूपी अमृत का ज्यों-ज्यों ह्रास होता जाता है, मनुष्य दानव और संसार नरक बनता जाता है। इसका कारण प्रेम-तत्व की कमी ही तो है कि मनुष्य क्रूर, कपटी, स्वार्थी और शोषक बनकर अपने ही भाइयों को उत्पीड़ित करता है। उन्हें हानि पहुँचाता है और उसके फलस्वरूप अपनी आत्मा में ही नरक का निर्माण नहीं करता, बल्कि देहांतर के लोकों को भी अन्धकारपूर्ण बना लेता है। प्रेम के अभाव में ही धन-दौलत, मान-प्रतिष्ठा, परिवार, परिजन आदि सब कुछ होने पर भी मनुष्य सुख-शाँति की एक श्वास के लिये भी तरसता रहता है। प्रेम की कमी के कारण ही तो यह संसार, परमात्मा की यह सुन्दर रचना, जीव की यह कर्मभूमि जो उसके लिये स्वर्ग, मोक्ष, मुक्ति अथवा अमृतपद की साधिका है, उल्टे शोक-सन्ताप तथा मोह-बन्धनों और जन्म-मरण के दुःखदायी चक्र का करण बनती है। संसार में चारों ओर पनपने वाली त्राहि-त्राहि और शाँति की याचना के मूल में प्रेम की कमी ही तो काम कर रही है। प्रेम मानव-जीवन और संसार की सर्वोपरि आवश्यकता है। अस्तु कल्याणकारी मार्ग यही है कि आत्मा तथा संसार, अन्तर तथा बाह्य में स्नेह, सौजन्य तथा दया, करुणा व सहानुभूति की परिस्थितियाँ बढ़ाई तथा दृढ़ बनाई जाती रहें। मनुष्य अपने से, अपने परिवार से, पास-पड़ौस से, परिजन तथा संसार-जनों से यहाँ तक कि जीव-मात्र से सच्चा तथा नि-स्वार्थ प्रेम करे। प्रेम का विकास होते ही यह संसार जो आज अपनी परिस्थितियों से भयावह विदित होता है, शीघ्र ही स्वर्गीय सम्पदाओं से भर जायेगा, जिनके बीच मनुष्य न केवल इह लीला ही आनन्दपूर्वक चला सकेगा, बल्कि मुक्ति तथा मोक्ष का जीवन-लक्ष्य पाने में भी सुविधा का अनुभव करेगा।
वन-विहार के लिये आये हुये राजा का जहाँ पड़ाव था, उसी के पास एक कुएँ पर एक अन्धा यात्रियों को कुएँ से निकालकर जल पिलाया करता था। राजा को प्यास लगी। उसने अपने को पानी लाने भेजा। सिपाही वहाँ जाकर बोला- ‘‘ओ रे अन्धे एक लोटा जल इधर दे।”
सूरदास ने कहा- ‘‘जा भाग तुझ जैसे मूर्ख नौकर को पानी नहीं देता।” सिपाही खीझ कर वापस लौट गया। अब प्रधान सेनापति स्वयं वहाँ पहुँचे और कहा- ‘‘अन्धे भाई एक लोटा जल शीघ्रता से दे दो।” अन्धे ने उत्तर दिया- ‘‘कपटी मीठा बोलता है, लगता है पहले वाले का सरदार है। मेरे पास तेरे लिये पानी नहीं।” दोनों ने राजा से शिकायत की, महाराज बुड्ढा पानी नहीं देता। राजा उन दोनों को लेकर स्वयं वहाँ पहुँचा और नमस्कार कर कहा- ‘‘बाबा जी! प्यास से गला सूख रहा है, थोड़ा जल दें, तो प्यास बुझायें।” अन्धे ने कहा- ‘‘महाराज! बैठिये अभी जल पिलाता हूँ।”
राजा ने पूछा- ‘‘महात्मन्! आपने चक्षुहीन होकर भी यह कैसे जाना कि एक नौकर, दूसरा सरदार और मैं राजा हूँ।” बुड्ढे ने हँसकर कहा- ‘‘महाराज! व्यक्ति का वजन वाणी से पता चल जाता है, उसके लिये आँखों की कोई आवश्यकता नहीं।”
“वाणी को जानने से कोई लाभ नहीं, वाणी को प्रेरित करने वाली आत्मा को जानना चाहिये। गन्ध को जानकर क्या बनता है, यदि गन्ध ग्रहण करने वाली आत्मा को नहीं जाना जाता। रूप में ज्ञाता आत्मा को न जान कर रूप को जानने का प्रयत्न व्यर्थ है। जो शब्द सुनता है, उसे जानना चाहिये शब्द को नहीं। अन्न-रस के ज्ञान की कामना व्यर्थ है, उस आत्मा को जानना चाहिये, जो अन्न-रस का ज्ञाता है। कर्म, सुख-दुख, काम-सुख, पुत्रोत्पत्ति और गमनागमन को जानने से कोई लाभ नहीं, यदि इनके ज्ञाता और साक्षी आत्मा को न जाना जाय। हे प्रतर्दन! मन को जानने की जिज्ञासा भी व्यर्थ है, मननशील आत्मा को जानना चाहिये।’’
यह कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् के तृतीय अध्याय में भगवान इन्द्र ने प्रतर्दन ने कहा- ‘‘न वाचं विजिज्ञासीतवक्तारं विद्यात् न गन्ध विजिज्ञासीत घ्रातारं विद्यात्.................. न मनों विजिज्ञासीत मन्तारं विघात्।”
उपरोक्त संदर्भ में जितना अधिक चिन्तन करते हैं, उतने ही महत्वपूर्ण रहस्य प्रकट होते हैं। ऐसा लगता है कि उनको जाने बिना मनुष्य का यथार्थ कल्याण सम्भव नहीं। शास्त्रकार का यह थन कि सुन्दर स्वर-संगीत, सुगन्धित वस्तुयें, सुन्दर भोजन, रति, सुख-दुःख, साधन, श्रृंगार यह सब भौतिक आवरण हैं। इनके बीच घिरी हुई साक्षी आत्मा को जब तक नहीं जान लिया जाता, यह सारा ज्ञान निरर्थक है। यथार्थ सुख-शान्ति और बन्धन-मुक्ति दिलाने वाली आत्मा है, उसको जाने बिना मनुष्य शरीर और पशु शरीर में कोई अन्तर नहीं रह जाता।
प्रमाण, तर्क और विज्ञान-बुद्धि- इस युग का प्राणी कहता है, आत्मा का कोई अस्तित्व सम्भव ही नहीं तो जाना किसे जाय? आत्मा नाम की कोई वस्तु इस संसार में है ही नहीं, इस मूढ़ मान्यता के कारण ही भौतिक आकर्षण का मोह आज संसार में भयंकर रीति से बढ़ता और प्राणिमात्र को संकट, संघर्ष, अशाँति, उद्वेग, निराशा, कलह, वैमनस्य, युद्ध, अन्तर्द्वन्द्व से जकड़ता जा रहा है।
इसी उपनिषद् के अगले पन्नों में आत्मा के स्वरूप और उसकी प्राप्ति के उपायों का विवेचन किया गया है, पर उसे कहने की अपेक्षा आत्मा का अस्तित्व सिद्ध करना सर्वप्रथम आवश्यक है। प्रमाण, तर्क और वैज्ञानिक तथ्यों की कमी नहीं, यदि बुद्धिजीवी लोग श्रद्धा परायण आत्मा को जानने के इच्छुक नहीं तो प्रमाण-परायण आत्मा के अस्तित्व को स्वीकार करने में तो झिझक और हिचक न होनी चाहिये।
वैज्ञानिक धारणाओं के अनुसार कोई भी व्यक्ति जैव-ट्रव के सक्रिय परमाणुओं का समूह होता है, जो सारभूत रूप में करोड़ों वर्षों के जीव विकास क्रम की पुष्टि करता है। ये सक्रिय परमाणु सारे शरीर में उसकी अनुभूतियों में और मस्तिष्क में केन्द्रित होते हैं, इतना जान लेने के बाद विज्ञान अपने आप से प्रश्न करता है कि इन परमाणुओं की संरचना, गति और अनुभूतियों को रचने वाला, प्रेरणा और ग्रहण करने वाला कौन है? उनका उत्तर होता है- मौन। भारतीय-दर्शन वहीं से आध्यात्म का आविर्भाव मानता है और कहता है कि वह आत्मा है, आत्मा। उसे ही जानने का प्रयत्न करना चाहिये।
डा. टिमोदी लिपरी ने मन को ही सब कुछ माना और अध्यात्म की सत्ता वहीं तक स्वीकार की। मन एक रासायनिक तत्व है। अन्न के स्वभाव और गुण के अनुरूप उसका आविर्भाव होता है। मनश्चेतना के विस्तार तथा उसकी अभिव्यक्ति के लिये अनेक रासायनिक द्रव्यों का विकास हुआ है। भारतीय तन्त्र और तिब्बती ताँत्रिक साधनाओं में भी रासायनिक तत्वों के आधार पर मनश्चेतना के प्रसार और उसके द्वारा विलक्षण अनुभूतियों और दूरवर्ती ज्ञान को प्राप्त कर लिया जाता है। एलन गिसबर्ग ने भी उसी की पुष्टि की है और उनका विश्वास है कि जीव-चेतना का अन्त मन है, उसके आगे न कोई सूक्ष्म सत्ता है और न कोई अति मानस ज्ञान। पर अब पाश्चात्य वैज्ञानिकों ने ही इन ताँत्रिक साधनाओं के आधार पर ही अतीन्द्रिय और मनश्चेतना से परे किसी ऐसे तत्व का अस्तित्व स्वीकार करना प्रारम्भ कर दिया है, जो सर्व-दृष्टा, शाश्वत, मुक्त और स्वेच्छा से भ्रमण और स्वरूप ग्रहण करने वाला है, जो साक्षी चेतन और अपनी इच्छा से विकसित होने वाला है। इस विश्वास की पुष्टि और शोध के लिये ही ‘लीग फार स्प्रिचुअल डिस्कवरी’ की स्थापना हुई है। यह संगठन अनेक घटनाओं के आधार पर यह सिद्ध करने का प्रयत्न कर रहा है कि मनश्चेतना से परे भी कोई चेतन तत्व इस सृष्टि में विद्यमान है, शरीर धारियों का केन्द्र और मूल भी वही है।
स्काटलैण्ड के एक मकान में एक अंग्रेज दम्पत्ति रहते थे। दोनों को बहुत अधिक मदिरा पीने की आदत थी। 14 जुलाई 1876 को पति की मृत्यु हो गई। उसके दो वर्ष बाद ही पत्नी की भी अल्पायु में मृत्यु हो गई। अब इस मकान को कैप्टन मार्टिन नामक एक अंग्रेज ने किराये पर ले लिया और उसी में अपनी धर्म-पत्नी तथा बच्चों के साथ रहने लगे।
एक दिन मार्टिन की स्त्री ने घर में एक काले वस्त्र-धारण किये हुये स्त्री को देखा, उन्होंने समझा यह मेरी माँ है, जैसे ही वह उससे मिलने के लिये आगे बढ़ी कि वह स्त्री सीढ़ियों से ऊपर के कमरे में जल रही मोमबत्ती बुझा दी। फिर उसके बाद कोई दिखाई न दिया। इसके कई दिन बात वैसी ही छाया फिर दिखाई दी, पर प्रयत्न करने पर भी न तो उससे कोई बात-चीत की जा सकी, न उससे मिला ही जा सका। आगे बढ़ते ही वह छाया अदृश्य हो जाती। इस घटना को बाद में पड़ौसियों ने भी देखा और यह माना कि यह पूर्व अंग्रेज स्त्री की भटकती हुई आत्मा है। आत्माओं के इस तरह के क्रिया-कलापों की घटनायें भारतवर्ष में बहुतायत से होती हैं।
प्रसिद्ध साहित्यकार लार्ड ब्रोह्म के जीवन की एक अत्यन्त महत्वपूर्ण घटना आत्मा के अस्तित्व पर प्रकाश डालती है। उनके एक मित्र थे, उन्हें आत्माओं के अस्तित्व के सम्बन्ध में जानने का बड़ा चाव रहता था। दानों ऐसे लेख जिनमें कोई ऐसी जानकारी होती थी, ढूंढ़-ढूंढ़कर पढ़ते थे। उन्होंने सुना था कि भारतवर्ष में कुछ ऐसे योगी हैं, जो मृतात्माओं के साथ साक्षात्कार कराते हैं। एक दिन इस पर दोनों मित्रों ने निश्चित किया- ‘‘हम में से जिसकी मृत्यु हो, वह दूसरे से मिलने अवश्य आये।” यह बात मस्तिष्क में गहराई तक बैठ जाये, इसके लिये उन्होंने उंगली काट कर एक कागज में हस्ताक्षर भी किये।
कुछ दिन बाद मित्र सर्विस के लिये भारतवर्ष चला आया। इसके बाद 19 दिसम्बर 1799 की बात है, लार्ड ब्रोह्म अपने स्नानागार पहुँचे, कपड़े उतार कर कुर्सी में रखे और दरवाजा बन्द करके टब में स्नान करने लगे। ब्राह्म साहब लिखते हैं- ‘‘जैसे ही मैंने टब से अपना सिर बाहर निकाला कि देखता हूँ मेरे मित्र महोदय सामने कुर्सी पर बैठे हैं। दरवाजे बिल्कुल बन्द थे, मैं घबरा गया कि वह कोई प्रेत तो नहीं है और इसके बाद मुझे जब होश आया तो कुर्सी में कोई नहीं था, दरवाजे पहले की तरह बन्द थे। उसके 8-10 दिन बाद भारत से आया एक पत्र मिला, जिसमें यह लिखा था कि 19 दिसम्बर के दिन मित्र की मृत्यु हो गई है। इस घटना से मुझे पूरा विश्वास हो गया कि मृत्यु के बाद भी आत्मा रहती है और जागृत जीवन की उसमें तमाम स्मृतियाँ भी रहती हैं।”
विलियम हंटर नामक अंग्रेज की बहन आने गाँव में रहती थी और हन्टर दूर किसी शहर में सर्विस करता था। एक दिन बहन रात में सो रही थी। उसने स्वप्न में देखा कि एक रेल आ रही है उसका भाई पटरी पर आ गया, रेल उसे कुचलने वाली है, बहन भयंकर चीत्कार करके भाई को बचाने के लिये दौड़ी पर वह तो स्वप्न था, भंग हो गया न वहाँ कोई रेल थी और न कोई भाई।
दूसरे दिन सबेरे ही सूचना मिली कि उसका भाई रेल से कट कर मर गया है। यह घटना भी आत्मा के सूक्ष्म अस्तित्व और अमरता पर प्रकाश डालती है।
अहमद नगर जिले के श्री ऋषि महोदय के सम्बन्ध में पहले भी लिखा जा चुका है, वे मृत आत्माओं को बुलाकर उनसे बातचीत करने के आचार्य माने जाते हैं। यह विद्या विदेशों में भी है। स्वर्गीय “श्री डब्ल्यू स्टेटिड” मृतक आत्माओं से बातचीत करने में सिद्धहस्त थे।
एक बार एक फोटोग्राफर ने ‘डा. थयोव वरहाजमान’ का एक फोटो खींचा। जब फोटो खींच लिया गया तो डा. वरहाजमान ने कहा- मुझे ऐसा लगा जैसे फोटो खींचते समय कोई मेरे साथ हो, जबकि उनके साथ कोई भी दृश्य प्राणी खड़ा न हुआ था। लेकिन दूसरे दिन जब फिल्म धुल कर आई तो लोग यह देखकर दंग रह गये है कि उस फोटो के साथ ही स्वर्गीय ग्लेडस्टोन का फोटो आ गया था।
हमारे यहाँ यह कहा जाता है कि कथा-कीर्तन, संगीत, भजन, चित्रकला, जप-तप, ध्यान-धारणा के आधार पर मन को एकाग्र करके उसे आत्म-तत्व की शोध में नियोजित किया जा सकता है। निग्रहित मन की सत्ता इतनी सूक्ष्म और गतिशील हो जाती है कि उसे कहीं भी दौड़ाया जा सकता है और दूरस्थ स्थान को भी देखा और सुना जा सकता है। मन को जब आत्मा में केन्द्रित कर देते हैं, तो समाधि सुख मिलाता है।
दूसरे देशों में समाधि-सुख की कलपना तो की गई है, पर उसका कारण और कर्ता आत्मा को न मानकर मन को माना जाता है। मन यद्यपि अत्यन्त सूक्ष्म सत्ता है, पर वह अन्न की गैसीय स्थिति है, अन्न से रस, रक्त, माँस मेदा, मज्जा, अस्थि, वीर्य आदि सप्त धातुयें बनती हैं। वीर्य इनमें से स्थूल-तत्व की अन्तिम अवस्था है, वहाँ से मन, बुद्धि, चित्त अहंकार आदि अन्तःकरण चतुष्टय बनते हैं, इनको ज्ञान और मोक्ष का आधार माना गया है। अर्थात् यह मन के ऊपर अवलम्बित है कि वह साँसारिक पदार्थों में ही घिरा रहे अथवा सूक्ष्म-सत्ता को प्राप्त कर समाधि सुख प्राप्त करे। मन तो भी एक रासायनिक तत्व ही है, आत्मा नहीं।
अमेरिका के डाक्टर टिमोदीलियरी ने मन को अन्तिम स्थिति माना है और उसी के विस्तार को समाधि सुख। ड़ड़ड़ड़ और कुछ औषधियाँ मनश्चेतना का विस्तार कर देती डडडड जिससे अनेक गुना अधिक शक्ति अनुभव होती है, उस स्थिति में कामजन्य-सुख बहुत बढ़ जाता है। सामान्य स्थिति में भी अपने में शक्ति अनुभव होती है और बड़ा आनन्द आने लगता है। वह दरअसल चेतना को निम्न स्तर से उठाकर जगत् के मूल-भूत तत्वों के साथ एकाधिकार कर देने की क्षणिक स्थिति मात्र है। पर वह उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना आध्यात्मिक साधन। उससे अति-मानस तत्व की सत्यता अनुभव की जा सकती है।
इस दिशा में जैकी कैसन ने मनो-विस्तारक प्रयोगों का बड़ा महत्व है। वे प्रकाश की किरणों का विविध आकृतियों में संयोजित करती हैं और पानी के माध्यम से उन आकृतियों के छाया चित्र किसी पर्दे में प्रक्षेपित करती हैं। उन चित्रों को ध्यानपूर्वक देखने से मनुष्य सम्मोहन की स्थिति में पहुँच जाता है और उसे विचित्र प्रकार की अनुभूतियाँ होने लगती हैं, इससे भी आत्मा का अस्तित्व प्रमाणित होता है। यह अनुभूति यद्यपि क्षणिक होती है और पाश्चात्य वैज्ञानिक उसे सुख की संज्ञा दे देते हैं, पर यह वस्तुतः उस आत्मा के साथ एकाकार का क्षणिक आवेग है, समाधि सुख तो आत्मा में पूर्ण विलय के साथ ही मिलता है।
सोमरस के सम्बन्ध में भारतवर्ष में अनेक तरह की मान्यतायें प्रचलित हैं, उसका अलड्डअस हक्सले ने बहुत गुणगान किया है। उत्तरी योरोप में उसी तरह का एक पेय फ्लाई एगेरिक नामक कुकुरमुत्ते से तैयार किया जाता है। फिजी द्वीप-समूह के लोग काबा नामक पेय पीते हैं। एन्डियन तराई (अमरीका) के लोग आयाहुस्का नामक पेय पीते हैं, इससे उन्हें दिवास्वप्न जैसी अनुभूतियाँ होने लगती हैं। कई बार इस अवस्था में भविष्य की और मृत आत्माओं की विचित्र और सत्य बातें फलित होती हैं। मन उस अवस्था में किसी बड़े तत्व के साथ एकाकार करके ही वह क्षणिक अनुभूतियाँ प्राप्त करता है। वह तत्व यदि है तो उसे आत्मा कहेंगे। भले ही उसका स्वरूप समझने में विज्ञान जगत को कुछ समय लगे।
शाश्वत सुख हमारे जीवन का लक्ष्य है और आत्मा उसका केन्द्र। इन्द्रियाँ उसके विषय मात्र हैं, उन विषयों को लक्ष्य न बनाकर आत्मा को जानने का प्रयत्न करना चाहिये, यही बात उपनिषदकार ने कही है।
माता के गर्भ में शयन करते हुये ऋषि वामदेव विचार करते है- ‘‘अब मैं देवताओं के अनेक जन्मों को जान चुका हूँ। जब तक मुझे तत्वज्ञान नहीं मिला था, मैं संसार में पाप-कर्मों से उसी तरह घिरा था, जिस तरह पक्षी को पिंजरे में बन्द कर दिया जाता है।” पूर्व-जन्मों का स्मरण करते हुये ऋषि वामदेव ने शरीर धारण किया और उन्नत कर्म करते हुए स्वर्ग को पहुँच गये।
यह कथा ऐतरेयोपनिषद् के द्वितीय अध्याय के प्रथम खण्ड में है। शास्त्रकार इस अध्याय की पूर्वपीठिका में यह बताता है कि पिता के पुण्य कर्मों के निमित्त पिता का ही आत्मा पुत्र रूप में प्रतिनिधि बनकर जन्म लेता है। पुत्र के जन्म लेने पर पिता के पाप-कर्म कम होने लगते हैं, क्योंकि कोई भी पिता अपने पुत्र को बुरे कर्म करते देखकर प्रसन्न नहीं होता, वह यही प्रयत्न करता है कि जिन बुरे कर्मों के कारण मुझे कष्ट हुये हैं, उनका प्रभाव बच्चे पर न पड़े। जितने अंश में वह बच्चे का सुधार कर सकता है, उतना वह अपना भी सुधार कर लेता है और तब उसका दूसरा जन्म अर्थात् ऐसे संकल्प लेकर जन्म होता है कि अब मैं बुरे कर्म नहीं करूंगा, जिससे संसार में शाँतिपूर्वक परमात्मा का साधन करता हुआ, स्वर्ग की प्राप्ति करूंगा। यह संकल्प संस्कार बनकर उद्घटित होते हैं और जीव अपनी मुक्तावस्था को प्राप्त कर लेता है। जैसा ऋषि ने बताया है।
पुनर्जन्म, गर्भ में इस प्रकार का संकल्प, पिता के प्रतिनिधि रूप में पिता का ही पुत्र और इन सबका हेतु कर्मफल यह सब बातें कुछ अटपटी-सी लगती हैं। आज के विज्ञान-बुद्धि लोगों के गले नहीं उतरती और यही कारण है कि लोग कर्मों में गुणावगुण की संधि और पाप के फल- पश्चाताप की बात अंगीकार नहीं करते। कर्मफल पर विश्वास न करने का फल ही आज पाप, अनय और भ्रष्टाचार के रूप में फैला है।
गरुड़ पुराण में एक ऐसी ही आख्यायिका आती है, जिसमें बताया गया है कि यमलोक पहुँचने पर चित्रगुप्त नाम के यम-प्रतिनिधि सामने आते हैं। और उस व्यक्ति के तमाम जीवन में किये हुये कर्मों का, जिन्हें वह गुप्त-रीति से भी करता रहा, चित्रपट की भाँति दृश्य दिखलाते हैं, यमराज उन कर्मों को देखकर ही उन्हें स्वर्ग और नरक का अधिकार प्रदान करते हैं। शास्त्राकार इसी संदर्भ में यह बताते हैं कि हनन की हुई आत्मा (अर्थात् बुरे कर्मों से उद्विग्न और अशाँत मनःस्थिति) नरक को ले जाती है और सन्तुष्ट हुई आत्मा (नेक कर्मों से उल्लसित उत्फुल्ल और प्रसन्न मनःस्थिति) दिव्य-लोक प्रदान करती है।
चित्रगुप्त जैसी कोई व्यवस्था का होना काल्पनिक-सा लगता है, किन्तु आधुनिक शोधों ने उपरोक्त अलंकारिक कथानक में बड़ी ही महत्वपूर्ण सचाई को ढूंढ़ निकाला है। डा. बी. वेन्स ने सूक्ष्म दर्शक की सहायता से यह ढूंढ़ निकाला है कि मस्तिष्क में भरे हुए ग्रे मैटर (भूरी चर्बी जैसा पदार्थ भरा होता है) वे एक-एक परमाणु में अगणित रेखायें पाई जाती हैं। विस्तृत विश्लेषण करने के बाद वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि जो व्यक्ति कर्मठ क्रियाशील, सात्विक, सबसे प्रेम और सबका भला चाहने वाले होते हैं, उनके मस्तिष्क की यह रेखायें बहुत विस्तृत और स्वच्छ थीं पर जो आलसी, निकम्मे तथा दुष्ट प्रकृति के थे, उनकी रेखायें बहुत छोटी-छोटी थीं। माँसाहारी व्यक्तियों की रेखायें जले हुए बाल के सिरे की तरह कुण्ठित और लुँज-पुँज थीं।
वंशानुसंक्रमण की बात जो लोग जानते हैं, उन्हें पता है कि वीर्य का एक सेल किस प्रकार अपने पिता के सभी गुण यहाँ तक कि उसकी बौद्धिक क्षमतायें भी अपने में धारण किये रहता है। सूक्ष्म से सूक्ष्म बीमारियों तक का प्रभाव इन सेल्स पर होता है। अर्थात् ‘सेल्स’ का ‘नाभिक’ भाग अपने में अवचेतन मन के सारे भाव या अच्छे-बुरे विचार, जो अब तक नस-रेशों के रूप में विकसित हुए थे, अपने साथ धारण करके ले जाता है। यह सूक्ष्म संस्कार मृत्यु के समय जीवात्मा के साथ भी उसी प्रकार जाते और बने रहते हैं, जिस प्रकार वीर्य में सेल के साथ। आधुनिक वैज्ञानिक इस तरह सोचते हैं कि- सम्भवत मृत्यु के समय शरीर के ‘प्रोटोप्लाज्म’ नाम तत्व निकलकर किन्हीं वनस्पतियों में चले जाते हैं, फिर वनस्पति के गुण और अन्य जीव के गुणों में साम्य के अनुरूप कोई भेड़-बकरी, तोता, कुत्ता, बैल, गाय, भैंस या मनुष्य उसको खा लेता होगा और पूर्व शरीर वाला प्राणी यह नया जन्म-ग्रहण कर लेता होगा। यह एक विचित्र मान्यता है, जिसे भारतीय पुनर्जन्म सिद्धान्त के लिये हल्के-फुल्के ढंग से प्रस्तुत करते हैं। यह तुक तथा अब तक का परा मनोवैज्ञानिक खोजें भी उस सिद्धान्त की पुष्टि में सहायक ही होती हैं।
फ्रायड ने मनुष्य की मानसिक रचना का चित्रण करते हुए लिखा है- ज्ञानवान प्राणियों द्वारा भले-बुरे जो भी काम होते हैं उनका सूक्ष्मचित्रण अन्तःचेतना में ग्रामोफोन के रिकार्ड की तरह होता है। जिस प्रकार ग्रामोफोन ध्वनि एवं विद्युत-शक्ति से एक प्रकार का संक्षिप्त एवं सूक्ष्म एकीकरण होता है, उसी प्रकार मस्तिष्क भी अच्छे-बुरे कर्म और विचारों का रिकार्ड होता है।, ग्रामोफोन की तरह उसमें अत्यन्त बारीक लाइनें बिछी होती हैं और जब दुबारा उन पर विद्युत सुई घूमने लगती है, तो वह वही पुराने शब्द दोहराने लगता है, ठीक उसी प्रकार अवचेतन मन जब जागृत अवस्था में आता है, तो उसके मस्तिष्क में कोई नये विचार तब तक नहीं आते, जब तक पुराने विचार और अच्छे-बुरे कर्मों की रेखायें भरी रहती हैं। उन्हें जब टेप-रिकार्ड के फीते की तरह साफ कर दिया जाता है, तो मस्तिष्क नई संरचना और मौलिक चिन्तन सूझ-बूझ और आध्यात्मिक उपलब्धियों के लिये तैयार हो जाता है। सारा तप और प्रायश्चित-विधान इसी शुद्धिकरण और जीव को ऊर्ध्वगामी चेतना देने के लिये बनाया गया है, वह न तो असत्य है और न झुठलाये जाने योग्य। मानवीय सत्ता का सच्चा कल्याण इसी सिद्धान्त व पथ के अनुसरण में सन्निहित है।
मस्तिष्क के विश्व प्रसिद्ध शल्य-चिकित्सक डा. बिल्डर पेनफील्ड ने मस्तिष्क में एक ऐसी पट्टी का पता लगाया है, जो रिकाडिंग पद्धति के आधार पर काम करती है। उनके अनुसार यह पट्टी मस्तिष्क के उस भाग में है, जिसके बारे में अभी तक कुछ विशेष पता नहीं लगाया जा सका।
स्मरण की प्रक्रिया के बारे में डा. बिल्डर पेनफील्ड का कहना है कि वह काले रंग की दो पट्टियों में निहित है। यह पट्टियाँ लगभग 25 वर्ग इंच क्षेत्रफल में होती हैं, मोटाई इंच के दसवें भाग जितनी होती है। दोनों पट्टियाँ मस्तिष्क के चारों और लिपटी रहती हैं, यह पूरे मस्तिष्क को ढके रहती हैं। इन्हें ‘टेंपोरल कोरटेक्स’ कहा जाता है और यह कनपटियों के नीचे स्थित हैं। जब कोई पुरानी बातें याद करने का कोई प्रयत्न करता है, तो स्नायुओं से निकलती हुई विद्युत धारायें इन पट्टियों से गुजरती हैं, जिससे वह घटनायें याद आ जाती हैं। डा. पेनफील्ड ने मिरगी के कई रोगियों के मस्तिष्क का आपरेशन करते समय इन पट्टियों में कृत्रिम विद्युत-धारायें प्रवाहित की और यह पाया कि रोगियों की काफी पुरानी स्मृतियां ताजी हो गईं। एक रोगिणी को इस पट्टी पर हल्का करेन्ट दिया गया, तो वह एक गीत गुन-गुनाने लगी। वह गीत उसने पाँच वर्ष पहले सुना था। करेन्ट हटाते ही वह गीत फिर भूल गई। फिर करेन्ट लगाया, तो फिर गुन-गुनाने लगी।
अब डा. पेनफील्ड स्वयं भी इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि जागृत अवस्था में व्यक्ति जैसी भी घटनायें देखता, सुनता, करता रहता है, उनका विस्तृत रिकार्ड मस्तिष्क में बना रहता है, यदि कुछ नये प्रयोग विकसित किये जा सके, तो मस्तिष्क को इतना सचेतन बनाया जा सकेगा कि वह बहुत काल की स्मृतियों को ताजा रख सकेगा। तब सम्भवतः इस जीवन से अनंतर पूर्व-जन्मों की स्मृतियों की भी उलट सम्भव हो जायेगी।
यह थी खोज किन्तु कर्मफल उससे भी बहुत कठोर, सुनिश्चित और अन्तर्व्यापी है, इसलिये उस पर शीघ्र तो लोग विश्वास नहीं करते पर यह सारा संसार उससे प्रभावित है और एक दिन सारा संसार उसे मानने को और सत्कर्म करने को विवश होगा। उत्पीड़न और अत्याचार के सभी कर्म मनुष्य को कई जन्मों तक सताते हैं, उनका परिमार्जन आसानी से नहीं हो पाता।
यहाँ एक बात समझ लेनी चाहिये कि मन भी एक प्रकार का सूक्ष्म विद्युत है और वह मस्तिष्क की इस पट्टी में जहाँ याद-दास्तें छिपी हैं, अपने आप चक्कर लगाया करता है, इस चक्कर से उसके मानसिक बनावट के अनुरूप जैसे अच्छे-बुरे विचार होते हैं, वह उभरते हैं और मनुष्य उसी प्रवाह में काम करने लगता है। उसे प्रकृति की प्रेरणा मानकर कुछ लोग यह भूल करते हैं कि जो कुछ गन्दा, फूहड़ विचार उठा वही करने लगते हैं, पर जो लोग कर्मफल पर विश्वास कर लेते हैं, वे बुराइयों और बुरे विचारों के प्रति सावधान रहने लगते हैं और जीवन में अच्छाइयों का प्रसार करते हुए प्रसन्न रहने लगते हैं।
डा. पेनफील्ड के यहाँ एक मिरगी का रोगी आता था। उसे मिरगी आने से पहले एक भयानक सपना आया करता था कि वह किसी उजाड़ और डरावने मकान के दरवाजे पर खड़ा है। कोई उल्लू भयंकर आवाज में बोलता है। वह डरकर दरवाजा खोलने का प्रयत्न करता है। उसे मालूम था कि दरवाजा खुलते ही कोई भयानक दृश्य सामने आता है कि उसे देखते ही उसे मिरगी आ जाती है।, इसलिये वह बहुत प्रयत्न करता कि दरवाजा न खोले पर अज्ञात शक्ति उसे वैसा करने को विवश कर देती और उसे मिरगी आ जाती, जिसमें पड़ा वह घंटों तड़पता रहता।
सचेत अवस्था में भी जब इस रोगी को डाक्टर करेन्ट लगाते, तो उसके मुख-मण्डल पर भय की रेखायें छा जातीं। डाक्टर ने उस स्थान का पता लगा लिया और उतने अंश का आपरेशन करके निकाल दिया जिससे रोगी अच्छा हो गया।
विज्ञान की यह शक्ति कर्मफल पर विस्तृत प्रभाव डालने वाली है। हम जिसे मन कहते हैं, वह एक प्रकार की विद्युत शक्ति है और वह उस स्मृति-पट्टी पर अपने आप भी घूमता रहता है। स्वप्नावस्था में भी यह क्रिया बन्द नहीं होती, उसे जहाँ पूर्व-जन्मों के उन स्मृतियों से गुजरना पड़ता है, जिसमें उत्पीड़न, भयंकरता, दण्ड, छटपटाहट, चोरी, दुष्टता जैसे कुकर्मों की रेखायें होती हैं, तो उसे तीव्र वेदना और अकुलाहट होती है। यही नहीं उस व्यक्ति में हीनता का अन्तर्भाव बढ़ता रहता है और ऐसा व्यक्ति जीवन में साधन और सुविधायें रहते हुए भी सुखी और शान्त नहीं रहता।
मिरगी के उस रोगी के बारे में यदि यह कहा जाये कि उसने पूर्व-जन्म धन या और किसी लोभ में किसी के घर का दरवाजा खोलकर किसी की हत्या की होगी, तो अतिशयोक्ति न होगी। ऐसे भयंकर दृश्यों के अंकन भी वैसे ही क्षिप्र, टेढ़े-मेढ़े और भयानक होते हैं, जब वह स्मृति उस व्यक्ति को आती होगी तो भय से मूर्छा आ जाती होगी। शरीर की छोटी से छोटी खुजली से लेकर दमा, श्वांस, क्षय, पक्षाघात, कुष्ठ आदि के कारण शरीर के विजातीय द्रव्य भले ही कहे जायें पर उन विजातीय द्रव्यों के उत्पादन का कारण मन और मन को पूर्व-जन्मों के कर्मों का फल ही कहना अधिक तर्क-संगत है। कोई भी व्याधि एवं पीड़ा कर्मफल के अतिरिक्त नहीं हो सकती।
भगवान अपनी इच्छा से किसी को दण्ड नहीं देते। कर्मफल ही दण्ड देते हैं। भगवान् तो बार-बार मनुष्य जीवन के रूप में जीव को वह अवसर प्रदान करते रहते हैं, जिससे वह विगत पापों का प्रायश्चित कर अपने शुद्ध-बुद्ध और निरंजन स्वरूप को प्राप्त कर ले जैसा कि ऋषि वामदेव ने अपने आप को उसी प्रकार पाप से जीवनमुक्त कर लिया, जैसे साँप केंचुली से छूट जाता है और परम स्वतन्त्रता अनुभव करने लगता है।
मैंने यही तो कहा था कि बुरी बात मत सोचा करो तुम्हें वह साधारण बात लगी, पर मन में आया हुआ, यह एक ही गन्दा विचार और व्यवहार में प्रयुक्त हुआ छोटा-सा अशुभ कर्म ही हृदय और आत्मा अमित वैभव को नष्ट कर डालता है। -लुइसकेन
इस संसार में भौतिकतावादी भी रहते हैं और अध्यात्मिक व्यक्ति भी। आकार प्रकार में भी उनमें कोई विशेष अन्तर नहीं होता। दोनों ही सामान्यतः समान रूप से खाते-पीते, सोते-जागते और काम-काज करते हैं। शारीरिक बनावट और मानवीय वृत्तियों में भी काई विशेष अन्तर नहीं होता। दोनों ही गृहस्थ बसाते हैं। दोनों साधारणतः एक जैसी परिस्थितियों में रहते और व्यवहार करते हैं। विपत्ति, सम्पत्ति, सुख-दुःख और उत्थान-पतन का काल-चक्र दानों को छूकर गुजरता है। दोनों के सामने हंसने और रोने के अवसर आते हैं और वे हंसते भी हैं और रोते भी हैं। साधारण रूप से देखने पर भौतिक ड़ड़ड़ड़ आध्यात्मिक व्यक्तियों में कोई अन्तर दिखाई नहीं ड़ड़ड़ड़। दोनों प्रकार के व्यक्ति एक जैसे दीखते और व्यवहार करते दृष्टिगोचर होते हैं। तथापि उनमें आकाश-पाताल का अन्तर होता है।
भौतिक और आध्यात्मिक व्यक्ति बाह्य आकार-प्रकार से मनुष्य ही होते हैं और साधारण दृष्टि से उनके बीच कोई अन्तर नहीं होता। उनके बीच जो मूल अन्तर होता है वह होता है आचार-विचार और जीवन के प्रति दृष्टिकोण का। भौतिक व्यक्ति लोभ और वितृष्णाओं से डडडड अधिकतावादी और आध्यात्मिक व्यक्ति संतोष डडडड होने से ‘उत्कृष्टतावादी’ होते हैं। जिसे अपने विषय ड़ड़ड़ड़ निश्चय करना हो कि वह वस्तुतः आध्यात्मिक व्यक्ति है अथवा भौतिक व्यक्ति, वह अपने आचार-विचार डडडड तटस्थ, होकर निरीक्षण करे और पता लगाये कि डडडड वृत्ति अधिकता की ओर जाती है अथवा उत्कृष्टता ड़ड़ड़ड़ ओर। यदि उसकी वृत्ति अधिकता की ओर जाती है, तो उसे निःसंकोच-भाव से स्वीकार कर लेना चाहिये कि वह भौतिक व्यक्ति है। और यदि वह पाये कि उसकी डडडड अधिकता में न होकर उत्कृष्टता में है, तो उसे ड़ड़ड़ड़ होकर परमात्मा को धन्यवाद देना चाहिये कि डडडड आध्यात्मिक वृत्ति का मनुष्य है। उसे अधिकार है कि वह अपने पर प्रसन्न हो और विश्वास कर ले कि उसका भविष्य उज्ज्वल है।
सामान्यतः लोग आस्तिक होते हैं और बहुत बार कुछ न कुछ भजन-पूजन और उपासना-अनुष्ठान भी करते रहते हैं। यह बातें बहुत कुछ इस बात की शिफारिस करती हैं कि ऐसे लोग अपने को आध्यात्मिक व्यक्ति मान लें। लेकिन यह मान लेने में भय न करना चाहिये कि मनुष्य की यह क्रियायें ही आध्यात्मिकता का प्रमाण नहीं हैं। आध्यात्मिकता वास्तव में वह आत्म-गौरव, आत्म-सन्तोष और आत्म-शाँति है, जो किन्हीं भी कार्य-व्यवहारों में उत्कृष्टता के समावेश से उत्पन्न होता है। यदि सच्ची भावना से विरत रहकर चार-चार घंटे भजन-पूजन किया जाय, अनेक यज्ञ अनुष्ठानों का आयोजन किया जाय, धर्म-कर्मों की झड़ी लगादी जाय, तो भी आध्यात्मिक उपलब्धि का प्रयोजन पूरा नहीं हो सकता और न ऐसा अन्यमनस्क धार्मिक व्यक्ति आध्यात्मिक ही माना जा सकता है। इससे भिन्न यदि कोई व्यक्ति भावनापूर्वक श्रेष्ठ साधनों तथा उत्कृष्ट उद्देश्य के साथ आध घण्टे भी भजन-पूजन कर लेता है, छोटा-सा अनुष्ठान पूरा कर लेता है, तो निश्चित रूप से वह आध्यात्मिक माना जायेगा और उसका अध्यात्म-परक प्रयोजन भी पूरा हो जायेगा। अध्यात्म का सम्बन्ध क्रियाओं की अधिकता से नहीं उनकी श्रेष्ठता तथा उत्कृष्टता से है।
अधिकता का लोभ छोड़कर उत्कृष्टता की ओर अग्रसर होने में आत्म-कल्याण की बड़ी गहरी सम्भावनायें सन्निहित हैं। आधिक्यवादी व्यक्ति बहुधा संसार-लोलुप होते हैं। उनकी इच्छा रहती है कि वे संसार-भोगों को अधिकाधिक मात्रा में भोगें। संसार की संपत्ति का अधिक से अधिक भाग उनके अधिकार आ जाय। संसार लोलुप जब आय की कामना करता है, तो उसकी असीमता में वह जाता है, किसी संख्या अथवा मात्रा में उसे संतोष नहीं होता। सौ के बाद हजार और हजार के बाद लाख- इसी तरह उसकी वित्त-वितृष्णा प्रसार पाती चली जाती है। जब वह मकान की कामना करता है तो चाहता है कि हो सके तो हर शहर और हर मोहल्ले, में उसकी कोठियाँ और हवेलियाँ हों। सवारियों की कल्पना करता है, तो बग्घी से लेकर स्थल, जल और वायु में चलने वाली हर सवारी चाहा करता है। भोजन और वस्त्रों के विषय में वह हर प्रकार और मूल्य की ओर उसकी जिज्ञासा दौड़ जाती है। सन्तानों से तो उसका जी भरता ही नहीं। तात्पर्य यह कि भौतिक अथवा संसार-लोलुप का विस्तारवाद किसी क्षेत्र में अपनी सीमा निर्धारित नहीं करना चाहता। वह संसार का सब कुछ अपने पक्ष में अधिकाधिक चाहा करता है।
यह बात ठीक है कि उपलब्धियों की एक निश्चित सीमा नहीं बाँधी जा सकती और न बाँधना ही चाहिये। इससे उन्नति, विकास और प्रगति में व्यवधान पड़ता है। अधिकाधिक उन्नति करना मनुष्य का लक्ष्य होना ही चाहिये। तथापि उसे अपने इस विस्तार अथवा आधिक्यवाद वर कुछ प्रतिबन्ध लगाने ही होंगे। ऐसा किए बिना वह अपने शस्त्र से आप घायल हो जायेगा, अपनी उन्नति से आप पतित हो जायेगा।
उन्नति और प्रगति पर लगाने योग्य प्रतिबन्ध है ‘उत्कृष्टता’। मनुष्य जिस सीमा तक चाहे उन्नति और विस्तार करता चले किन्तु इस बात का ध्यान रखे कि उसकी उस विस्तार गति में उत्कृष्टता का सन्निवेश बना रहे। आर्थिक विस्तार में उसे चाहिये कि वह कोई ऐसा व्यवसाय न करे जो निम्नकोटि का हो। लाभ के लिये असत्य, अशुद्धता व विश्वासघात का सहारा न ले। धोखा, ठगी, मक्कारी और कपट से अपने कार्य-कलापों को बचाये रहे। व्यापार में सच्चाई का व्यवहार करे, वस्तुओं की शुद्धता सुरक्षित रखे। उचित मुनाफा और लाभ कमाये। अपने व्यवसाय की उन्नति तथा प्रगति के लिये न तो अनुचित साधनों का प्रयोग करे और न गर्हित उपायों का अवलम्बन ले। साथ ही इस बात का ध्यान रखे कि उसका विस्तार किसी के ह्रास का कारण न बने और न शोषण अथवा परपीड़न का आधार लेकर ही आगे बढ़े। इस प्रकार की पवित्रता रखकर जो और जितना भी विस्तार किया जायेगा, वह श्लाघ्य ही होगा। इसके विपरीत जिस विस्तार अथवा विकास का आधार असत्य, अशुद्धता, शोषण और परपीड़न होगा, वह गर्हित तथा अवांछनीय माना जायेगा। इस प्रकार का निकृष्ट तथा अवांछनीय विस्तार मनुष्य के पतन का कारण बनता है। लोक-परलोक का कल्याण नष्ट कर देता है।
वह छोटी-सी प्रगति भी जो श्रेष्ठता और उत्कृष्टता अलंकृत हो, उस विशाल विस्तार की अपेक्षा कहीं अधिक शुभ, कल्याणकारी, महान् और वाँछनीय है, जो निकृष्ट उपायों को आधार बनाकर किया गया है। ‘थोड़ा किन्तु उत्कृष्ट’ एक ऐसा दिव्य सिद्धांत है, जो लोक से लेकर परलोक तक और भौतिकता से लेकर आत्मा तक सारे क्षेत्र में होने वाली क्रियाओं और उनके फलों को आध्यात्मिक बना देता है।
अधिकता का ध्येय लेकर चलने वाले कई लोग यदि उत्कृष्टता की रक्षा कर लेते हैं, तो यह सहता नहीं बल्कि एक अपवाद होगा। वैसे विस्तारवाद अथवा आधिक्यवाद में निकृष्टता की सम्भावना स्वाभाविक है। यही कारण है कि ज्ञानियों, विद्वानों और मनीषियों ने मनुष्यों को डडडड की शिक्षा दी है और तृष्णा, एष्णा और लोभ का निषेध किया है। अन्यथा वे- व्यक्ति और समाज के उत्थान का समर्थक विद्वान अप्रगति अथवा सीमाबद्धता के काँक्षी डडडड हो सकते। उन्होंने मनुष्य की अतिवादी और विस्तारवादी नीति का निषेध उनकी प्रगति अवरुद्ध करने के मन्तव्य से नहीं बल्कि इसलिये किया है कि लोभ और वितृष्णाओं तक वशीभूत विस्तारवाद में पड़ने वाला व्यक्ति जीवन ड़ड़ड़ड़ उत्कृष्टता की रक्षा नहीं कर पाता। यह स्खलन मनुष्य ड़ड़ड़ड़ उस आत्मा के लिए बड़ा अहितकर होता है, जो जीव का सर्वश्रेष्ठ सार और व्यक्ति की सबसे बड़ी सम्पदा मानी गई है। वह वैभव, वह संपत्ति, वह ऐश्वर्य, वह प्रतिभा, वह महानता और वह विस्तार आदि सारी उपलब्धियाँ, जिनका आधार आत्मघातिनी निकृष्टता रही हो उन्नति रूप में महान पतन ही होती है। जिसकी आत्मा गिर कर मलीन और निस्तेज हो गई, वह इन्द्रपद पाकर भी डडडड ही रहेगा, सर्वस्ववान होकर भी निकृष्ट बना रहेगा। डडडड उन्नति- उन्नति है, जो अस्तित्व के साथ व्यक्तित्व की डडडड संराधिका हो अन्यथा वह उस सोने के समान ही अग्राह्य डडडड जिसे पहनने से कान ही कट जायें।
ऐसा समझना कि भौतिकवाद कोई अपशब्द है अथवा भौतिकवादी कोई पापी लोग होते हैं, ठीक नहीं। मानव-जीवन में भौतिकवाद भी आवश्यक है। मनुष्य शरीर का जन्म ही पंच-भौतिकता से हुआ है। उसकी आवश्यकतायें भी भौतिक हैं। जिनकी पूर्ति भी भौतिक आधार पर ही हो सकती है। कोरा अध्यात्मवाद शरीर यात्रा को पूरा नहीं कर सकता। संसार में भौतिकता की भी आवश्यकता है किन्तु उसी सीमा तक, जहाँ वह आत्मा का क्षेत्र प्रभावित न कर सके। भौतिकता की आवश्यकता शरीर निर्वाह तक है, उसके आगे जब उसमें अतिशयता, आधिक्य अथवा विस्तार का दोष आ जाता है, तो यही शरीर निर्वाह की आवश्यकता अनुचित और अवांछनीय बन जाती है। शरीर डडडड उस निर्वाह के लिये, वस्तुतः जितने की आवश्यकता डडडड मनुष्य को कोई भी ऐसा काम करने की डडडड नहीं है, जिसका प्रभाव आत्मा पर कलुष फेंकने वाला हो।
यदि आवश्यकता भर भौतिकता को साथ लेकर ड़ड़ड़ड़ जीवन-यात्रा में चला जाय तो उससे आत्मा को किसी डडडड की हानि नहीं पहुँचती और भौतिकता का वह ड़ड़ड़ड़ कलुष निर्वाह जिससे आत्मा प्रभावित नहीं होती, ड़ड़ड़ड़ ही कही जायेगी। अध्यात्म संसार से अलग ड़ड़ड़ड़ विचित्र वस्तु नहीं है। वह उत्कृष्टता से अलंकृत ड़ड़ड़ड़ का एक दृष्टिकोण है, जिसके समावेश से क्या ड़ड़ड़ड और क्या आत्मिक कोई भी विषय अथवा व्यवहार ड़ड़ड़ड ही बन जाता है।
जीवन-यात्रा के लिये आवश्यक साधनों से आगे बढ़ ड़ड़ड़ड जब मनुष्य ‘आधिक्य’ अथवा विस्तार को अपना लक्ष्य ड़ड़ड़ड भौतिकवाद का उपासक बन जाता है और आत्म ड़ड़ड़ड की उपेक्षा करने लगता है, तब ऐसे निकृष्ट भौतिक ड़ड़ड़ड शब्द अवमाननापूर्वक उच्चारण किया जाता है ड़ड़ड़ड ऐसे ही निकृष्ट भौतिकवादी को निम्न दृष्टि से देखा ड़ड़ड़ड है। उत्कृष्टता द्वारा आत्मा की रक्षा करते हुए, जो ड़ड़ड़ड भी भौतिक उन्नति कर सकता है करे। ऐसा ड़ड़ड़ड और पवित्र व्यक्ति बाहर से भौतिक अथवा साँसारिक दीखता हुआ भी वस्तुतः आध्यात्मिक ही होता है। ऐसे महान् संसारियों का श्रेय-पथ सदैव निष्कंटक और निरापद रहता है।
किन्तु भौतिकता द्वारा अध्यात्म की साधना एक दुःसाध्य काम है। न तो यह साधना सामान्यतः की जा सकती है और न सर्व-साधारण इसे सुरक्षापूर्वक कर सकते हैं। इसीलिये समाज के शुभेच्दु ऋषि-मुनियों ने अनुभव और साधना के आधार पर यह सिद्धान्त स्थिर किया है कि मनुष्य को भौतिक वितृष्णाओं से दूर रहकर सन्तोषपूर्वक जीवन निर्वाह की शर्तें पूरी करते हुए, इस प्रकार जीवन-यापन करना चाहिये, जिससे संसार भी निभाता चले और आत्मा की भी रक्षा होती चले। इसी सिद्धान्त को ‘थोड़ा पर उत्कृष्ट’ के कतिपय शब्दों में भी व्यक्त किया जा सकता है।
जो अधिकता के स्थान पर उत्कृष्टता का ध्यान कर संसार में रमण करते हैं, वे वितृष्णाओं के संकट से बचे रहते हैं। उनका शरीर और आत्मा, लोक और परलोक साथ-साथ ही प्रेय और श्रेय दोनों के द्वारा समान रूप से सुशोभित और आनन्दित हो चलता है। अस्तु हम सबको अधिकता की वितृष्णा त्यागकर उत्कृष्टता को ही ग्रहण करना चाहिये। इस वाँछनीय ग्रहण द्वारा हमारा भौतिकवाद भी अध्यात्मवाद की तरह ही सुख एवं शाँतिदायक बन जायेगा।
जिब्राइल के निमन्त्रण पर हजरत मुहम्मद एक बार स्वर्ग गये। वहाँ ऊँचे-ऊँचे स्वर्ण महल देख कर उन्हें प्रसन्नता हुई, पर आश्चर्य भी क्योंकि वे सब खाली पड़े थे।
जिब्राइल से पूछा- ‘‘यह मकान किसके लिये हैं?” उसने बताया- ‘‘जो न तो क्रोध करते हैं, न किसी का अपमान, शाँत और उद्वेग रहित पुण्यात्मायें यहाँ रहती हैं।” पर यह खाली क्यों हैं, मुहम्मद ने फिर पूछा? जिब्राइल ने कहा- महापुरुष, ऐसे धरती में स्वर्ग बना लेते हैं, इसलिये वे यहाँ तक आते ही नहीं।”
एक बार सर आइजक न्यूटन से उनके एक मित्र ने प्रश्न किया- ‘‘धर्म के प्रति आपका क्या दृष्टिकोण है?” तो उन्होंने गम्भीर होकर कहा-
“मुझे नहीं पता मेरे प्रति लोगों की भावनायें क्या हैं? लोग विद्वान समझें यह उनकी कृपा, किन्तु जब मैं अपने सम्बन्ध में विचार करता हूं, तो ऐसा लगता है कि अज्ञ अल्पवय बालक की तरह किसी समुद्र के किनारे खेल रहा हूं। ज्ञान कण जो मैंने पाये हैं, वह अथाह सागर की सीपियों की तरह हैं, जो न तो अथाह हैं, न अन्तिम। जो अथाह और असीम है, वही शाश्वत और सत्य है, उसका रहस्य मैं समझ नहीं पाता हूँ।”
न्यूटन जैसा महान वैज्ञानिक जब उस असीम सत्ता का पूर्ण ज्ञान प्राप्त नहीं कर सका, तो उसने अपनी विद्या का अहंकार त्याग दिया। किन्तु आज के अल्प-बुद्धि व्यक्ति अहंकार के वशवर्ती होकर अपना और समाज का जीवन किस तरह विश्रृंखलित कर रहे हैं, यह सर्वविदित है। ज्ञान के लिये श्रद्धा आवश्यक है, जो श्रद्धालु नहीं, वह धार्मिक नहीं। धर्म वेत्ता के लिये निरहंकार होना आवश्यक है। वह तो कोई और ही शक्ति है, जो विश्व की महान व्यवस्था पालन और सृजन में समर्थ है।
एटामिक फिजीसियन लीज मिटनर कहते हैं- ‘‘मनुष्य से भी कोई ऊँची शक्ति है, वही परमाणु शक्ति पर नियन्त्रण कर सकती है।” यह ठीक है कि श्री लीज का कार्य क्षेत्र अणु शक्ति की ही खोज रहा है पर इसका तात्पर्य यह नहीं कि वे धर्म विमुख हो गये हों, उक्त कथन से यह बात स्पष्ट हो जाती है। हम भी तो यही मानते हैं कि परमात्मा परमाणु शक्ति से भी कोई सूक्ष्म सत्ता है, जो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का नियम और व्यवस्थापूर्वक संचालन करती है।
पिछले दिनों के धर्म-वेत्ताओं की एक महान भूल यह हुई कि उन्होंने विज्ञान को धर्म का विरोधी बताकर सामान्य जनता को भ्रम में डाल दिया। मानव-जीवन की सुख-शाँति के लिये यद्यपि विज्ञान अपूर्ण है, किन्तु वह तो धर्म विमुख है और न अनुपयोगी। यदि विज्ञान को पूरक मानकर धर्म का विवेचन किया गया होता, ड़ड़ड़ड़ धार्मिक मान्यताओं- आस्तिकता, ईश्वर विश्वास, कर्मफल, पुनर्जन्म, परलोकवाद की मान्यतायें असत्य नहीं कही डडडड वरन् उनकी सत्यता के प्रमाण ही निकलते। महान विद्वान वैज्ञानिक माइकेल रैक्जे आर्कबिशप आफ कैन्टर लिखते हैं- ‘‘पिछली शताब्दी के इतिहास से मालूम होता है कि धार्मिक विचारों वाला व्यक्ति अधिक गलतियाँ ड़ड़ड़ड़ सकता है, क्योंकि धर्म को सच्चा सिद्ध करने के लिए पूर्व का आश्रय लिया गया, जबकि आवश्यकता थी वैज्ञानिक तत्वों के समावेश की। वही बात विज्ञान के लिये भी डडडड उसे यदि धर्म-संगत न बनाया जाय, तो वह भी मनुष्य डडडड विनाश की ओर ले जायेगा। धर्म और विज्ञान दोनों डडडड पास-पास रहना चाहिये।”
विज्ञान और धर्म के क्षेत्र अलग-अलग हैं। ड़ड़ड़ड़ परिभाषा और कार्य प्रणाली अवश्य है, विज्ञान ड़ड़ड़ड़ भूत है, धर्म श्रद्धा का परिणाम किन्तु दोनों का डडडड मिलन बिन्दु है, जहाँ विज्ञान थक जाता है, उससे डडडड भावनायें ले जाती हैं। भावनायें थक जाती हैं, डडडड विज्ञान प्रादुर्भूत हो जाता है। इनमें से न तो ड़ड़ड़ड़ विज्ञान ही और न धर्म ही सन्तोष प्रदान कर डडडड यही बात फिजीसियन आर्थर कामटन ने इस प्रकार कही है-
“विज्ञान और धर्म के बीच कोई मतभेद ड़ड़ड़ड़ है। विज्ञान वास्तविकता की खोज का सही ड़ड़ड़ड़ और धर्म द्वारा जीवन में संतुष्टि का रास्ता खोजा डडडड है। विज्ञान निःसन्देह उन्नति कर रहा है, किन्तु ड़ड़ड़ड़ संसार जो विज्ञान मय है, पहले से भी अधिक ड़ड़ड़ड़ प्रेरणाओं की आवश्यकता अनुभव कर रहा है, ड़ड़ड़ड़ विज्ञानमय जीवन में शाँति और सन्तोष का आनन्द और अधिक की थकावट है।
अध्यात्मोपनिषत् का ऋषि कहता है-
“सन्तः शरीरे निहितो गुहायामज एकोनित्यमस्य पृथिवी शरीरं यः पृथिवी मन्तरे संचरन यं पृथिवी न वेदा।........................।”
अर्थात्- शरीर के भीतर हृदय रूपी गुहा में एक ‘अजन्मा नित्य’ रहता है। वह पृथ्वी के भीतर रहता है पर पृथ्वी उसे नहीं जानती। मन-बुद्धि, अहंकार, चित्त से भी अत्यन्त सूक्ष्म जिसे न कोई मार सकता है, न खण्ड और विनाश कर सकता है, वही सर्वभूतों का अन्तरात्मा है, देह इन्द्रियाँ आदि अनात्म पदार्थ हैं।
यह शास्त्र वचन है, इसलिये उसे मान्यता नहीं दी जा सकती है, ऐसा विज्ञानवादी कहें किन्तु यदि कोई वैज्ञानिक ही उक्त तथ्य को स्वीकार करने लगे तब तो उसे न मानने का कोई कारण नहीं रह जाना चाहिये।
मिसाइल एक्सपर्ट श्री वर्नहर वान ब्रान कहते हैं- ‘‘विज्ञान ने यह सिद्ध कि पदार्थ का नाश नहीं किया जा सकता, इसलिये जीवन और आत्मा का भी नाश नहीं किया जा सकता है। आत्मा अमर है। मैं अमर आत्मा में विश्वास करता हूँ।’’
उपनिषदकार ने अपने उक्त कथन में आत्मा के स्वरूप का विश्लेषण करते हुए, उसे अजन्मा और नित्य कहा है, अर्थात् इस सृष्टि का जहाँ आदि-अन्त है, वहीं आत्मा का भी आदि-अन्त है और चूँकि ब्रह्मांड को कोई अन्त नहीं। सनातनकाल से ही एक सुस्थिर व्यवस्था चल रही है, इसलिये आत्मा अथवा परमात्मा भी सनातन हैं, एक व्यवस्था है। प्रसिद्ध वायोलाजिस्ट श्री एडविन काँकलिन का तर्क है- ‘‘यदि जीवन का निर्माण अकस्मात सम्भव है तो यह भी सम्भव है कि एक छापाखाने में अकस्मात् भड़ाका हो और सारे शब्द स्वयं व्यवस्थित होकर एक शब्द कोष बना दें।”
किन्तु ऐसा कभी कहीं भी सम्भव नहीं है। आत्मा कर्मफल के विधान के अनुसार रूप परिवर्तित करती है। न तो उसका नाश ही होता है और न ही कर्मफल मिटते हैं, अर्थात् कर्म की गति के अनुसार संसार-चक्र चल रहा है, जो अच्छे श्रेष्ठ एवं विचारपूर्ण कार्य करता है, वह ऊर्ध्वगामी लोकों का आनन्द प्राप्त करता है, पाप और मूर्खता की जिन्दगी जीने वाला अधोगामी स्थिति में चिन्ता और विक्षोभ के कारण दुःखी रहता है।
उपनिषदकार का मत है कि- प्रारब्ध फल की सत्यता के लिये प्रमाणों की आवश्यकता नहीं-
प्रारब्धं सिध्यति तदा यदा देहात्मना स्थिति। -अध्यात्मोपनिषत् 56,
अर्थात् प्रारब्ध कर्म तो उसी समय सिद्ध होता है, जब देह के ऊपर आत्म-बुद्धि प्रकाशित हो।
इस उपनिषद् में यह भी कहा है कि जिस तरह छोड़ा हुआ बाण बाघ को बेधे बिना नहीं रहता, उसी प्रकार कर्मकम से आत्मा वंचित नहीं रह सकता। इसमें विज्ञान को कोई सिफारिश चल नहीं सकती।
यदि विज्ञान की यह बात ही मानली जाये कि संसार में न तो कोई कर्मफल है और न कर्मफल का नियन्त्रण करने वाला ईश्वर है, तो भी फिजीसियन जार्ज डैविस की बात तो माननी ही पड़ेगी-
“यदि ब्रह्माण्ड ने स्वयं अपने को उत्पन्न किया है तो इसको बनाने वाले शक्ति-केन्द्र भी तो स्पष्ट नजर आते हैं, उदाहरण के लिये पृथ्वी की सारी गति-विधियाँ, रहन-सहन, उत्पादन, क्रियाशीलता सूर्य की गति पर आधारित हैं। ऐसी स्थिति में मानना पड़ेगा कि ब्रह्माण्ड स्वयं भगवान है।”
जार्ज डेविस माण्डूक्योपनिषद के प्रथम मंत्र के आख्यान से शत-प्रतिशत मेल खा जाते हैं। इस मंत्र में भी यही बताया गया है कि- ‘‘सम्पूर्ण जगत ही ब्रह्म है, विराट्-विश्व को परमात्मा का रूप मान लेने से ही साकार उपासना का उद्देश्य पूरा होता है। पर तब किसी से छल-कपट, अभद्र-व्यवहार पाप और अत्याचार नहीं किया जा सकता। संसार के प्रत्येक पदार्थ और प्राणी के प्रति ईश्वर जैसी श्रद्धा रखने से उसके प्रति सहज ही सेवा और सद्-व्यवहार की भावना जागृत होती है, यही भावना विश्व-शान्ति एवं आत्म-कल्याण का प्रधान आधार होती है।”
अब जो विज्ञान का तर्क देकर भौतिक सुखों और निज स्वार्थों तक ही सीमित रहने की बात सोचते हैं उनके लिये थ्योरिटिकल फिजीसियन अल्बर्ट आइन्स्टाइन का प्रवचन पढ़ना चाहिये। आइन्स्टाइन का कथन है- ‘‘वह आदमी जो अपने ही जीवन को महत्व देता है और आपने साथियों के जीवन को निरर्थक मानता है तो वह केवल अभाग्यशाली ही नहीं है, बल्कि जीवन के योग्य भी नहीं है।”
बायोलाजिस्ट अल्बर्ट विनचेस्टर जब परीक्षण और प्रयोग करते-करते थक गये, तो उन्हें भी कहना ही पड़ा- ‘‘भगवान में गहरी और सच्ची आस्था ही सत्यता की गहराइयों तक पहुँचा सकती है। विज्ञान की सीमा क्षेत्र तो पदार्थ तक ही सीमित है। किन्तु धर्म की मापकता उससे भी सूक्ष्म भावनाओं तक जा पहुँचती है, इसलिये धर्म ही सत्य है।”
धर्म का उद्देश्य मनुष्य को परमात्मा की समीपता का सुख और जीवन लक्ष्य की प्राप्ति कराना है, इसलिये उसे जीवन में प्रमुख स्थान देकर ही मनुष्य स्थिर कल्याण की ओर अग्रसर हो सकता है। विज्ञान दृश्य जगत में सुख और सुविधायें बढ़ता है, इसलिये वह आवश्यक तो है पर प्रमुख नहीं। अदृश्य जीवन की आयु अनन्त है, अनन्त सुख के लिये लौकिक सुखों को- विज्ञान को प्रमुख मानना कोई बुद्धिमानी नहीं। हमें वह ज्ञान प्राप्त करना चाहिये, जो परमात्मा की प्राप्ति कराये, इस बात को एस्ट्रोनामर श्री जोन्स केपलर महोदय स्वीकार करते हुए लिखते हैं- ‘भगवान ज्ञान स्वरूप है और हम उसके बारे में बहुत कम जानते हैं।’
न्यूटन से लेकर केपलर तक सभी महान वैज्ञानिक कक्षा ‘क’ के विद्यार्थी की तरह धर्म की पाठशाला में आ बैठते हैं। तो फिर शेष विश्व के लिये भी आत्म-शान्ति और ईश्वर प्राप्ति का मार्ग धर्म ही रह जाता है, उसके विज्ञान लंगड़ा और अधूरा ही रहेगा। ऐतरेयोपनिषद् तृतीय अध्याय के दूसरे मंत्र में ईश्वर का ज्ञान प्राप्त करने का माध्यम ज्ञान, आदर्श विज्ञान, प्रतिज्ञान, मेधा दृष्टि, धैर्य, मनन, स्मृतः, संकल्प, गति, कामना आदि को बताया गया है। इनका विकास बाह्य पदार्थों से नहीं अन्तःवृत्तियों के द्वारा ही प्राप्त कर सकना सम्भव है। धर्म हमारी अन्तःवृत्तियों को जागृत और विकसित करता है, इसलिये उसका परित्याग कर हम जिन्दा नहीं रह सकते, विश्व-कल्याण के महान परिणाम भी उपलब्ध नहीं कर सकते।
एक थे पंडित जी! नाम था सज्जनप्रसाद, सज्जन और सदाचारी भी थे और ईश्वर-भक्त भी किन्तु धर्म का कोई विज्ञान सम्मत स्वरूप भी है, यह वे न जानते थे।
प्रतिदिन प्रातःकाल पूजा समाप्त करके पंडित जी शंख बजाते। वह आवाज सुनते ही पड़ौस का गधा किसी गोत्र-बन्धु की आवाज समझकर स्वयं भी रेंक उठता। पंडित जी प्रसन्न हो उठते कि यह कोई पूर्व जन्म का महान तपस्वी और भक्त था। एक दिन गधा नहीं चिल्लाया, पंडित जी ने पता लगाया। मालूम हुआ कि गधा मर गया। गधे के सम्मान में उन्होंने अपना सिर घुटाया और विधिवत तर्पण किया। शाम को वे बनिये की दुकान कुछ सौदा लेने गये। बनिये को शक हुआ- महाराज! आज यह सिर घुटमुन्ड कैसा?” “अरे भाई शंखराज की इहलीला समाप्त हो गई है।”
बनिया पंडित का यजमान था, उसने भी अपना सर घुटा लिया। बात जहाँ तक फैलती गई, लोग अपने सिर घुटाते गये। छूत बड़ी खराब होती है। एक सिपाही बनिये के यहाँ आया उसने तमाम गाँव वालों को सर मुड़ाये देखा- पता चला शंखराज जी महाराज नहीं रहे, तो उसने भी सिर घुटाया। धीरे-धीरे सारी फौज सिर-सपाट हो गई।
अफसरों को बड़ी हैरानी हुई। उन्होंने पूछा- भाई बात क्या हुई। पता लगाते-लगाते पंडित जी के बयान तक पहुँचे और जब मालूम हुआ कि शंखराज कोई गधा था, तो मारे शर्म के सबके चेहरे झुक गये।
एक अफसर ने सैनिकों से कहा- ‘‘ऐसे अनेक अन्ध-विश्वास समाज में केवल इसलिये फैले हैं कि उनके मूल का पता नहीं है। धर्म परम्परावादी नहीं, सत्य की प्रतिष्ठा के लिये है, वह सुधार और समन्वय मार्ग है। उसे ही मानना चाहिये।”
सत्य की महिमा अपार है। शास्त्रों और ऋषियों ने उसे धर्म और अध्यात्म का आधार माना है और कहा है, ‘सत्यमेव जयते नानृतम्’ अर्थात् सत्य ही जीतता है, असत्य नहीं। चिरस्थायी सफलता का आधार सत्य पर रखा गया होता है। असत्य के सहारे कोई व्यक्ति थोड़े समय तक लाभ प्राप्त कर सकता है, पर जब वस्तुस्थिति प्रकट हो जाती है, तब उस लाभ को समाप्त होते हुए भी देर नहीं लगती। सत्य का वट-वृक्ष धीरे-धीरे भले ही बढ़ता और फलता-फूलता हो पर जब वह परिपुष्ट हो जाता है, तब उसका आयुष्य हजारों वर्षों का बन जाता है। वट वृक्ष की जड़ें नीचे जमीन में भी चलती हैं और ऊपर की शाखाओं में से भी निकलकर नीचे आती हैं और जमीन में प्रवेश कर वृक्ष की पुष्टि और आयु बढ़ाने में सहायक होती हैं। दूसरे छोटे पेड़-पौधे प्रकृति के प्रवाह को देर तक नहीं सह पाते और शीघ्र ही बूढ़े होकर अपना आस्तित्व खो बैठते हैं। सत्य वट-वृक्ष के समान है। अन्य आधारों पर प्राप्त की गई सफलतायें बरसात घास-पात की तरह है, जो नित्य के सूर्य की प्रखरता सहन कर सकने में समर्थ नहीं होती। ग्रीष्म ऋतु में उनका अस्तित्व अक्षुण्य नहीं रह सकता।
उक्ति है कि “सत्य में हजार हाथियों के बराबर बल होता है। शारीरिक दृष्टी से यह बात सच भले ही न हो पर आत्मिक दृष्टि से पूर्णतया सही है। सत्यनिष्ठ व्यक्ति में इतना आत्म-बल होता है कि वह अकेला हजार मिथ्याचारियों से भिड़ सकता है और अंततः वही विजय प्राप्त करता है। जहाँ सत्य है वहां अन्य गुण अपने आप उत्पन्न हो जाते हैं, जहां असत्य है वहाँ दुर्गुणों का भंडार धीरे-धीरे बढ़ता चला जाता है। इसलिये आत्म-बल बढ़ाने के लिये, ईश्वर प्राप्त करने के लिये हमारे शास्त्रों में सत्य-निष्ठा को महानतम उपासना बताया है। भारतीय धर्म में सत्य को परमात्मा का स्वरूप माना है। सत्य को नारायण कहा गया है। सत्य-नारायण भगवान् की जय बोलने, कथा सुनने, व्रत रखने का अपने यहाँ चिर प्रचलन है। यह सत्य-नारायण कोई व्यक्ति या देवता नहीं है, वरन् सचाई को अन्तःकरण, मस्तिष्क और व्यवहार में प्रतिष्ठापित करने की प्रगाढ़ आस्था ही है। जो सत्य-निष्ठ है, वही सत्य-नारायण भगवान का समीपवर्ती साधक है। स्वर्ग और मुक्ति-सिद्धि और समृद्धि तो उसके कर लगता ही रहती है।
यही बात किसी सभ्यता, संस्कृति, जाति, समाज, अथवा संस्था पर लागू होती है, उसमें जितनी अधिक मात्रा में सचाई होगी, उतना ही उसका अस्तित्व सुदृढ़ बना रहेगा, उतना ही उसे फलने-फूलने का अवसर मिलेगा, उतना ही उसका सम्मान बढ़ेगा और उतना ही उसका विकास होगा। सचाई के अभाव में मिथ्या आधार को लेकर कितना ही विशाल कलेवर क्यों न खड़ा कर लिया जाय-कागज की नाव की तरह गलते, बालू के महल की तरह ढहते देर नहीं लगती। रामलीला समारोहों में कागज और बाँस की खपच्चियों से विशालकाय रावण बनाया जाता है। देखने वाले उसकी ऊँचाई और कलेवर देखकर कौतूहल और आश्चर्य अनुभव करते हैं, पर देखा यह जाता है कि उस समारोह में रावण-वध का जब समय आता है, तब कोई छोटा-सा आदमी दियासलाई एक कोने पर लगा देता है और वह विशालकाय आकृति थोड़ी ही देर में जल-जल कर भस्म हो जाती है। असत्य के आधार पर खड़े किये गये किसी भी आवरण का अन्त इसी प्रकार होता है। स्थिरता केवल सचाई में है और कही नहीं। असत्य के अन्धकार में सत्य को समझने में अक्सर लोगों को देर लग जाती है, इस देरी को धैर्यपूर्वक सहन करने की क्षमता यदि हम हो अन्ततः सत्य की ही विजय होने का सत्परिणाम कभी भी, कहीं भी देखा जा सकता है।
सत्य ही व्यक्ति के जीवन में बल एवं प्रकाश उत्पन्न करता है। सत्य के आधार पर समाज की शक्ति और क्षमता निखरती है। असत्य का आश्रय लेकर व्यक्ति और समाज का अधःपतन होता है। इसके विपरीत उत्थान की घड़ी तब आरम्भ होती है, जब सत्य का अवलम्बन ग्रहण करने की आकांक्षा प्रबल होती है और उसे अपनी गतिविधियों के आधार बनाने का साहस, सक्रियता धारण करके कार्यक्षेत्र में अग्रसर होती है।
सत्य भाषण वाणी का तप है, इससे ‘वाक् सिद्धि’ जैसी अनुभूतियाँ प्राप्त होती हैं, इसलिये सत्य-भाषण का हर किसी को अभ्यास करना चाहिये। उसके साथ ही प्रिय भाषण और हित भाषण के अलंकार भी जोड़ रखने चाहिये। सत्य तो बोलना ही चाहिये, पर साथ ही यह भी ध्यान रखना चाहिये कि वह प्रिय एव मधुर भी हो और उसे सम्भाषण से दूसरों का हित साधन भी होता हो। कटु, कर्कश, मर्मभेदी, दूसरों को लाँछित, तिरस्कृत एवं अपमानित करने वाला, जिसमें दूसरों के अहित की सम्भावना हो ऐसा अनावश्यक सत्य भी कई बार सच बोलने के महान् गुण को दोष-युक्त कर देता है, इसलिये इस विकृति से बचने के लिये सत्य को प्रिय और हित इन दो आदर्शों के साथ संयुक्त करके प्रयोग करने का निर्देश दिया है। अप्रिय और अहितकारी सत्य का भी निषेध किया है, ‘न् ब्रूयात सत्यमप्रियम्’।
यह भ्रम दूर किया जाना चाहिये कि सत्य को अपनाने से मनुष्य धन और सम्मान की दृष्टि से घाटे में रहता है और झूंठ का सहारा लेने पर आमदनी एवं इज्जत बढ़ सकती है। इसी प्रकार इस भ्रम का भी निवारण होना चाहिये कि सत्य बोलना अथवा सत्य का अवलम्बन कठिन है। वस्तुस्थिति उन भ्रान्त धारणाओं से सर्वथा विपरीत है। सत्य अति सरल है। जो बात जैसी है, उसे वैसी ही कह देने में मस्तिष्क पर कोई जोर नहीं पड़ता, कोई अबोध बालक या मन्द-बुद्धि भी बिना किसी कठिनाई के जो बात उसे मालूम है, ज्यों की त्यों कह सकता है। किन्तु यदि झूठ बोलना हो तो मस्तिष्क पर बहुत जोर देने की आवश्यकता पड़ेगी और ऐसी भूमिका बनानी पड़ेगी, जो पकड़ में न आ सके। मन्द-बुद्धि व्यक्ति झूठ बोले तो कहीं न कहीं ऐसी त्रुटि रह जाती है, जिससे वह अक्सर पकड़ में आ जाती है। कार्तिक के महीने में तरबूजे खाने की गप्प कोई मार तो सकता है, पर उसे भी ज्ञान होना चाहिये कि किस ऋतु में क्या चीज पैदा होती है। यदि इसमें चूक हुई तो बनावटी तुरन्त खुल जायेगी। बढ़ा-चढ़ा कर कही बात के भ्रम में कोई बिरले ही आते हैं, आमतौर से अधिकाँश लोग समझ जाते हैं कि अपनी शान या शेखी जताने के लिये अथवा दूसरों को उल्लू बनाने के लिये यह बातें गढ़ी जा रही हैं। ऐसा सन्देह होने पर उसकी इज्जत गिर जाती है और सामने भले ही न कहे पेट में उसे झूठा मान लिया जाता है और झूठा व्यक्ति किसी का विश्वास-पात्र नहीं हो सकता और न इज्जत पा सकता है, यह निश्चित है, झूठ सरल है, सत्य कठिन है। या मानने वालों को जानना चाहिये कि झूंठ बोलना और उसे खुलने न देना किसी अति चतुर का अति कठिन कार्य है, सामान्य बुद्धि के लिये तो वह एक प्रकार से असम्भव और इज्जत को दाव पर लगाने वाला है। जो असत्यवादी, अविश्वासी माना जाता है, उसे किसी का सच्चा सहयोग नहीं मिलता। स्वार्थ के लिये जो मित्र बने हुए थे, अवसर आने पर वे भी उसे धोखा देते हैं और गिरे में लात लगाते देखे जाते हैं।
इसी प्रकार यह भ्रम भी त्यागने ही योग्य है कि असत्य से बढ़ोतरी होती या आमदनी बढ़ती है। सत्य की आड़ में किसी को जब तक धोखा दिया जा सकता है, केवल तभी तक किन्हीं छद्म व्यवसायों को चलाया जा सकता है। वस्तुस्थिति देर तक छिपी ही नहीं सकती। कहते हैं कि “पारे को पचाया नहीं जा सकता और पाप को छिपाया नहीं जा सकता।” झूठ आज नहीं तो कल खुलने ही वाला है।
जब छल-कपट सामने आता है, कलई खुलती है तो जो लोग ठगे जाकर उसे लाभ दे रहे थे, वे अलग हो जाते हैं, दूसरों को सावधान करते हैं, फलस्वरूप इसका व्यवसाय ठप्प हो जाता है। असत्य का अवलम्बन लेकर बढ़ाने वालों को जड़-मूल से नष्ट होते देखा गया है। ईश्वर के इस शासन में ऐसी सुदृढ़ न्याय-व्यवस्था मौजूद है, जिसके अनुसार अनीति देर तक नहीं पनप सकती। इसके विपरीत ‘सत्य की जड़ सदा हरी, वाली उक्ति में पूर्ण सार्थकता है। इस असत्य अविश्वास भरे जमाने में सहसा सत्यनिष्ठा पर भी विश्वास नहीं होता, उसे भी सन्देह की दृष्टि से देखा जाता है, पर देर तक अपने आदर्शों पर जमे रहने के उपरान्त जब लोगों को यह विदित हो जाता है कि यहाँ सच्चाई, ईमानदारी और वास्तविकता है, तब लोग उसका सहयोग पाने, सहयोग देने के लिए आतुर रहने लगते हैं। उसके कार्यक्रमों में जन-सहयोग के कारण प्रगति होती है। उन्नति का एक आधार जन-सहयोग भी है। जिसे जन-सहयोग मिलेगा, उसे सफलता भी मिलेगी। श्रद्धा, आदर, सम्मान मिलने में जो आन्तरिक प्रसन्नता होती है, उसकी तुलना में संसार के सभी लाभ तुच्छ हैं। सबसे बड़ी बात आत्म-सन्तोष है। सत्यप्रवृत्तियाँ अपनाने से- सन्मार्ग पर चलने से आत्म-बल बढ़ता है और अन्तरात्मा इतना प्रफुल्ल रहता है, जितनी बड़ी से बड़ी समृद्धि अथवा सफलता प्राप्त करने पर भी सम्भव नहीं।
व्यक्तियों में महानता तथा देवत्व का अवतरण सत्य निष्ठा के आधार पर होता है, कुछ समय उन्हें सोने की तरह परख की कसौटी पर अवश्य चढ़ना पड़ता है, पर उस अग्नि-परीक्षा के बाद उनकी आभा और प्रामाणिकता अनेक गुनी बढ़ जाती है। परख की मंजिल जो धैर्यपूर्वक, साहस और दृढ़ता के साथ पार कर लेते हैं, उन्हें यही मानना ओर कहना पड़ता है कि सत्य में वस्तुतः हाथी के बराबर बल है। यही सिद्धान्त समाज व्यवस्था पर भी लागू होता है। जब सचाई की रीति-नीति अपनाई जाती है, तब संसार में किसी बात की कमी नहीं रहती। इस परिवर्तन के साथ युग बदलते हैं। जब यह सत्य का युग- नया युग बदलेगा, और समाज की समग्र सुख-शाँति की- रीति एवं समृद्धि का वातावरण उत्पन्न करेगा, इसमें सन्देह करने की रत्ती भर भी गुंजाइश नहीं है।
सच्चाई की परख :-
श्रावस्ती में वैदेहिका नाम की एक संपन्न महिला रहती थी। सौजन्य और माधुर्य के लिये वह सारे नगर में विख्यात थी। किसी भी दुःखी का दुःख उससे देखा नहीं जाता था। सब लोग उसकी मुक्तकंठ से प्रशंसा करते थे। तो भी वैदेहिका को कुछ अहंकार अवश्य रहता था।
वैदेहिका के परिवार में उसकी एक नौकरानी थी। नाम तो काली था, पर उस जैसा स्वामि-भक्त और कर्तव्य परायण उस समय सारी श्रावस्ती में कोई नहीं था। वैदेहिका उसे अपनी पुत्री की तरह मानती और प्रायः कहा करती कि उसके जीवन में काली से बढ़कर और किसी को स्नेह और आदर नहीं।
पर सच्चाई की परख तो समय पर होती है। कुछ ही दिनों में पता चल गया कि यह स्नेह और आदर तभी तक था, जब तक काली उपयोगिनी थी।
एक दिन किसी कार्यवश काली को रात देर तक जागना पड़ा। अतएव वह प्रातः शीघ्र उठ न सकी। देर से वैदेहिका के पास पहुंची तो वह क्रोध से उबल पड़ी- ‘‘आजकल तू बहुत ढीठ हो गई है। मेरे अन्न खाकर मुझसे ही बहाने बनाती है।”
काली ने झिड़की खाई और अपने काम में लग गई। सोचा, कोई कष्ट हुआ होगा, इसीलिये मालकिन को गुस्सा आ गया होगा।
संयोगवश दूसरे दिन काली को रात ज्वर हो आया। प्रातः हल्की नींद आ जाने से उस दिन कुछ और विलम्ब हो गया। वह जैसे ही वैदेहिका के पास पहुंची, क्रोध से आग बबूला वैदेहिका ने लोहे की छड़ उसके सिर पर दे मारी। काली अचेत भूमि पर गिर पड़ी। इस बीच और भी लोग इकट्ठे हो गये। एक वयोवृद्ध ने कहा- ‘‘वैदेहिका, आज तुम्हारा यश झूठा पड़ गया। सच्चे आदमी में क्षमा और धैर्य भी होता है।
पिण्ड को ब्रह्माण्ड का एक छोटा-सा नमूना बताया गया है। वृक्ष का सारा कलेवर एक छोटे से बीज में समाया रहता है। नन्हे से क्षुद्र कीट में मनुष्य शरीर का सारा ढाँचा विद्यमान है। सौर-मंडल के ग्रहों का पारस्परिक आकर्षण और क्रिया-कलाप जिस ढंग से चलता है, उसकी एक नन्हीं-सी प्रक्रिया परमाणु परिवार के इलेक्ट्रोन, न्यूट्रोन, प्रोटोन आदि प्रदर्शित करते हैं। इस प्रकार समस्त ब्रह्माण्ड मनुष्य देह-पिण्ड में- एक लघु कलेवर में दृष्टिगोचर होता है। हमारी इस छोटी-सी देह में वह सब कुछ विद्यमान है, जो इस निखिल विश्व ब्रह्मांड में उपस्थित दृश्य और अदृश्य इकाइयों में पाया जाता है। इस पृथ्वी की समस्त विशेषताओं को भी हम अपनी इस छोटी-सी देह में विद्यमान देख सकते हैं।
पृथ्वी की समस्त शक्तियों, विशेषताओं और विभूतियों के केन्द्र उसके सन्तुलन बिन्दु- उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव हैं। यहीं से वह सूत्र संचालन होता है, जिसके कारण यह धरती एक सजीव पिण्ड अगणित जीव-धारियों की क्रीड़ा-स्थली बनी हुई है। यदि ध्रुवों की स्थिति में किसी प्रकार आघात पहुंच जाय या परिवर्तन उपस्थित हो जाय तो फिर इस भू-मण्डल का स्वरूप बदल कर कुछ और ही तरह का हो जायेगा। कहा जाता है कि किसी ध्रुव के संतुलन केन्द्र पर यदि एक घूंसा मार देने जितना आघात भी पहुँचा दिया जाय, तो यह पृथ्वी अपनी कक्षा में लाखों-करोड़ों मील इधर-उधर हट जायगी और तब दिन, रात, ऋतु, वर्षा, सर्दी, गर्मी आदि का सारा स्वरूप ही बदलकर किसी दूसरे क्रम में परिणत हो जायेगा। यह छोटा-सा घूंसा आघात भू-पिण्ड का किसी अन्य ग्रह-नक्षत्र से टकराकर चूर-चूर हो जाने की स्थिति में डाल सकता है। कारण स्पष्ट है- ध्रुव ही तो धरती का सारा नियंत्रण करते हैं और उन्हीं के शक्ति संस्थान कठपुतली की तरह इस भू-मण्डल को विभिन्न क्रीड़ा-कलाप करने की प्रेरणा एवं क्षमता प्रदान करते हैं। दोनों ध्रुव ही तो उसकी क्रिया और चेतना केन्द्र-बिन्दु हैं।
जिस प्रकार पृथ्वी में चेतना में चेतना एव क्रिया उत्तर-दक्षिणी ध्रुवों से प्राप्त होती है उसी प्रकार मानव पिण्ड देह- भी दो ही अति सूक्ष्म शक्ति संस्थान हैं। उत्तरी ध्रुव है- ब्रह्मरंध्र- मस्तिष्क सहस्रार कमल। दक्षिणी ध्रुव है- सुषुम्ना संस्थान- कुण्डलिनी केन्द्र मूलाधार चक्र। पौराणिक कथा के अनुसार क्षीर-सागर में, सहस्र फन वाले सर्प पर विष्णु भगवान् शयन करते हैं। यह क्षीर-सागर मस्तिष्क में भरा श्वेत सघन स्नेह सरोवर ही है। सहस्र कमल एक ऐसा परमाणु है, जो अन्य डडडड की तरह ड़ड़ड़ड़ न होकर आरी के दाँतों की तरह कोण कलेवरों से ड़ड़ड़ड़ है। इन दांतों को सर्प फन कहते हैं। चेतना केन्द्र-बिन्दु- इसी ध्रुव कण में प्रतिष्ठित है। चेतन डडडड अचेतन मस्तिष्कों के अगणित घटकों को जो इन्द्रिय ड़ड़ड़ड़ एवं अतीन्द्रिय ज्ञान प्राप्त होता है, उसका आधार डडडड ध्रुव-विष्णु अथवा सहस्रार कमल है। ध्यान से लेकर समाधि तक और आत्मा चिन्तन से लेकर भक्तियोग तक की सारी आध्यात्मिक साधनायें तथा मनोबल, आत्म-बल एवं संकल्पजन्य-सिद्धियों का केन्द्र-बिन्दु इसी ड़ड़ड़ड़ पर है।
दूसरा दक्षिण ध्रुव- मूलाधार चक्र, सुमेरु संस्था सुषुम्ना केन्द्र है। जो मल-मूत्र के स्थानों के बीचों-बीच अवस्थित है। कुण्डलिनी, महासर्पिणी, प्रचण्ड क्रिया-शक्ति इसी स्थान पर सोई पड़ी है। उत्तरी ध्रुव का डडडड अपनी सहचरी सर्पिणी के बिना और दक्षिणी ध्रुव डडडड महासर्पिणी अपने महासर्प के बिना निरानन्द ड़ड़ड़ड़ जीवन व्यतीत करते हैं। मनुष्य शरीर विश्व की ड़ड़ड़ड़ विशेषताओं का प्रतीक प्रतिबिम्ब होते हुए भी तुच्छ जीवन व्यतीत करते हुए- कीट-पतंगों की मौत मर ड़ड़ड़ड़ है, कोई महत्त्वपूर्ण उपलब्धि प्राप्त नहीं कर पाता, ड़ड़ड़ड़ एक मात्र कारण यही है कि हमारे पिण्ड के, देह के ड़ड़ड़ड़ ध्रुव मूर्छित पड़े हैं, यदि वे सजग हो होते डडडड ब्रह्माँड जैसी महान चेतना अपने पिण्ड में भी परिलक्षित होती।
मूत्र स्थान यों प्रकार से घृणित एवं उपेक्षित स्थान है। पर तत्त्वतः उसकी सामर्थ्य मस्तिष्क में अवस्थित ब्रह्मरंध्र जितनी ही है। वह हमारी सक्रियता का केन्द्र है। यों नाक, कान आदि छिद्र भी मल विसर्जन के लिए प्रयुक्त होते हैं, पर उन्हें कोई ढकता नहीं। मूत्र यन्त्र को ढकने की अनादि एवं आदिम परिपाटी के पीछे वह सतर्कता है, जिसमें यह निर्देश कि इस स्थान से जो अजस्र शक्ति प्रवाह बहता है, उसकी रक्षा की जानी चाहिये। शरीर के अन्य अंगों की तरह यों प्रजनन अवयव भी माँस-मज्जा मात्र से ही बने हैं, पर उनके दर्शन मात्र से मन विचलित हो उठता है। अश्लील चित्र अथवा अश्लील चिन्तन जब मस्तिष्क में उथल-पुथल पैदा कर देता है, तब उन अवयवों का दर्शन यदि भावनात्मक हलचल को उच्छृंखल बनादे तो आश्चर्य ही क्या? यहाँ यह रहस्य जान लेना ही चाहिये। मूत्र संस्थान के मूत में बैठी हुई कुंडलिनी शक्ति प्रसुप्त स्थिति में भी इतनी तीव्र है कि उसकी प्रचण्ड धारायें खुली प्रवाहित नहीं रहने दी जा सकती हैं। उन्हें आवरण में रखने से उनका अपव्यय बचता है और अन्यों के मानसिक संतुलन को क्षति नहीं पहुंचती। छोटे बच्चो को भी कटिबन्ध इसलिये पहनाते हैं। ब्रह्मचारियों को धोती के अतिरिक्त लंगोट भी बाँधे रहना पड़ता है। पहलवान भी ऐसा ही करते हैं। संन्यास और वानप्रस्थ में यही प्रक्रिया अपनानी पड़ती है।
ब्रह्मरंध्र मस्तिष्क की सामर्थ्य से हम सभी परिचित हैं। पर कुण्डलिनी क्रिया-शक्ति के केन्द्र मूलाधार का रहस्य बहुत कम लोगों को मालूम है। उसी संस्थान का जादू है कि मनुष्य अपने समान एक नये मनुष्य को बना कर तैयार कर देता है, जबकि भगवान भी अपने जैसा नया भगवान बना सकने का साहस न कर सका। इन अवयवों का पारस्परिक स्पर्श होने से नर-नारी के बीच एक असाधारण भावना प्रवाह बहने लगता है। साथी के दुश्चरित्र और अविश्वस्त होने की बात मानते हुए भी परस्पर इतना आकर्षण हो जाता है कि व्यभिचार परायण नर-नारी भी एक दूसरे के लिये सभी मर्यादायें तोड़कर रोग, कलंक, पाप, परिवार-विग्रह एवं धन हानि की क्षति उठाते देखे गये हैं। विशुद्ध दाम्पत्य जीवन जीने वाले पति-पत्नी के पारस्परिक आकर्षण का केन्द्र जहाँ उनकी धर्म भावना है, वहाँ वह शारीरिक क्रिया कलाप भी हैं, जिनके कारण कुण्डलिनी बिन्दुओं का स्पर्श एक दूसरे के शरीर एवं मन पर जादुई प्रभाव डालता है और एक दूसरे को अपना वशवर्ती कर लेता है।
शिव लिंग के पूजा प्रचलन में एक महान आध्यात्मिक तत्व-ज्ञान का संकेत है, जिसमें व्यक्ति को सचेत किया गया है कि वह शरीर के इस अवयव में ईश्वरीय दिव्यशक्ति का अति उत्कृष्ट अंश समाविष्ट समझे और इस ब्रह्माण्ड को ईश्वर की क्रिया शक्ति-कुण्डलिनी का प्रतीक प्रतिनिधि माने। शिव लिंग का जल अभिषेक करने का तात्पर्य यह भी है कि इस शक्ति के महान आध्यात्मिक लाभों को प्राप्त करने के लिये यह आवश्यक है कि उसे शीतल रखा जाय, उदीप्त न होने दिया जाय। योगी-यती अपनी साधनाओं में यह तत्वज्ञान संजोये ही रहते हैं कि उन्हें ब्रह्मचर्य पूर्वक रहना चाहिये, ताकि पिण्ड की- देह की- मूलाधार क्रिया शक्ति कुण्डलिनी का अपव्यय न हो और वह बहिर्मुखी होकर अस्त-व्यस्त बनने, उच्छृंखल होने की अपेक्षा लौटकर ऊर्ध्वगामी दिशा पकड़ती हुई ब्रह्मरंध्र अवस्थित महासर्प के साथ तादात्म्य होकर परमानन्द- ब्रह्मानन्द का लक्ष्य प्राप्त कर सके।
कुण्डलिनी का एक अमोघ चमत्कार प्रजनन शक्ति- काम-क्रीड़ा और उसकी अनुभूतियों और प्रतिक्रियाओं के रूप में देखा समझा जाता रहा है। इस रूप में उसका उपयोग करने की इच्छा बोधवान बालकों से लेकर अशक्त वयोवृद्धों तक में पाई जाती है, भले ही वे उसे मूर्त रूप देने में तरुणों की तरह सफल न हो सकें। इतना मात्र परिचय वस्तुतः बहुत ही स्वल्प है। कुण्डलिनी काम-वासना के रूप में हमें जितना प्रभावित करती है, उससे लाखों गुना अधिक प्रभावित वह कर सकती है, सर्वांगीण-सर्वतोमुखी- क्रिया शक्ति के रूप में। भूखण्डों को काटकर वीरान बनाती चलने वाली उच्छृंखल नदियों को जब बाँध के रूप में रोका और नहरों के रूप में प्रवाहित किया जाता है, तो उससे सहस्रों एकड़ जमीन सींची जाती और उससे प्रचुर धन-धान्य की उत्पत्ति होती है। ठीक इसी प्रकार प्रजनन शक्ति को कामुकता की उच्छृंखलता से रोककर यदि यदि अन्य रचनात्मक कार्यों में लगा दिया जाय तो उसके सत्परिणाम आश्चर्यजनक होते हैं। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए आध्यात्मिक साधनाओं में इन्द्रिय संयम को- ब्रह्मचर्य को बहुत महत्व दिया गया है।
मल-मूत्र स्थान के मध्य अवस्थित मूलाधार चक्र का केन्द्र बिन्दु एक तिकोना कण है, जिसे ‘सुमेरु’ अथवा कूर्म कहते हैं। शरीर में समस्त जीवन कण गोल हैं, केवल दो ही ऐसे हैं, जिनकी आकृति में अन्तर है, एक ब्रह्मरंध्र स्थित सहस्रार कमल नाम से पुकार जाने वाला आरी की नोकों जैसी आकृति का ब्रह्मरंध्र- उत्तरी ध्रुव। दूसरा मूलाधार में अवस्थित चपटा, बीच में ऊँचा उठा हुआ- पर्वत या कछुए की आकृति वाला- दक्षिणी ध्रुव। इन दोनों पर ही जीव की सारी आधार शिला रखी है। स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर के-अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय, आनन्दमय कोशों के- अन्तःकरण चतुष्टय में, सप्त प्राणों के- मूल आधार यही दो ध्रुव हैं। इन्हीं की शक्ति और प्रवृत्ति से हमारा बाह्य और अंतरंग जीवन क्रम चलते रहने में समर्थ होता है।
उत्तरी ध्रुव सहस्रार कमल में विक्षोभ उत्पन्न करने और उसकी शक्ति को अस्त-व्यस्त करने का दोष, लोभ, मोह, क्रोध, अहंकार जैसी दुष्प्रवृत्तियों का है। मस्तिष्क उन चिंतनों में दौड़ जाता है, तो उसे आत्म-चिन्तन के लिए- ब्रह्मशक्ति संचय के लिए अवसर ही नहीं मिलता। इसी प्रकार दक्षिणी ध्रुव- मूलाधार में भरी प्रचण्ड क्षमता को कार्य शक्ति में लगा दिया जाय, तो मनुष्य पर्वत उठाने एवं समुद्र मथने जैसे कार्यों को कर सकता है। क्रिया शक्ति मानव प्राणी में असीम है। किन्तु उसका क्षय कामुकता के विष-विकारों में होता रहता है। यदि इस प्रवाह को गलत दिशा में रोककर सही दिशा में लगाया जा सके, मनुष्य की कार्य-क्षमता साधारण न रहकर दैत्यों अथवा देवताओं जैसी हो सकती है।
पुराणों में समुद्र मंथन की कथा आती है। यह सारा चित्रण सूक्ष्म रूप से मानव शरीर में अवस्थित कुण्डलिनी शक्ति के प्रयोग-प्रयोजन का है। हमारा मूत्र संस्थान-खारी जल से भरा समुद्र है। उसे अगणित रत्नों का भांडागार कह सकते हैं। स्थूल और सूक्ष्म शक्तियों की सुविस्तृत रत्न राशि इसमें छिपी हुई है। प्रजापति के संकेत पर एक बार समुद्र मथा गया। देव और दानव इसका मंथन करने जुट गये। असुर उसे अपनी ओर खींचते थे, अर्थात् कामुकता की ओर घसीटते थे और देवता उसे रचनात्मक प्रयोजनों में नियोजित करने के लिए तत्पर थे। इस खींच-तान को दूध में से मक्खन निकालने वाली, बिलोने की, मंथन की क्रिया चित्रित की गई है।
समुद्र मंथन उपाख्यान में यह भी वर्णन है कि भगवान् ने कछुए की रूप बनाकर आधार स्थापित किया। उनकी पीठ पर सुमेरु पर्वत ‘रई’ के स्थान पर अवस्थित हुआ। शेषनाग के साड़े तीन फेरे उस पर्वत पर लगाये गये और उसके द्वारा मन्थन कार्य सम्पन्न हुआ। कच्छप और सुमेरु मूलाधार चक्र में अवस्थित वह शक्ति बीज है, जो दूसरे कणों की तरह गोल न होकर चपटा है और जिसकी पीठ, नाभि ऊपर की ओर उभरी हुई है। इसके चारों ओर महासर्पिणी, कुण्डलिनी, साड़े तीन फेरे लपेट कर पड़ी हुई है। इसे जगाने का कार्य-मन्थन का प्रकरण उछाम वासना के उभार और दमन के रूप में होता है। देवता और असुर दोनों ही मनोभाव अपना-अपना जोर आजमाते हैं और मन्थन आरम्भ हो जाता है। कामुकता भड़काने और उसे रोकने का खेल ऐसा है जैसे सिंह को क्रुद्ध और उत्तेजित करने के उपरान्त उससे लड़ने का साहस करना। कृष्ण की रासलीला का आध्यात्म रहस्य कुछ इसी प्रकार का है। तंत्र में वर्णित पाँच भावों (मद्य, माँस, मीन वा मुद्रा, मैथुन सेवन) में पांचवां भाव मैथुन का है। उस प्रकरण की गहराई में जाने और विवेचन करने का अवसर नहीं। यहाँ तो इतना ही समझ लेना पर्याप्त है। कामुकता की उद्दीप्त स्थिति को प्रतिरोध द्वारा नियन्त्रित करने का पुरुषार्थ- समुद्र-मंथन का प्रयोजन पूरा करता है। रामकृष्ण परमहंस के जीवन चरित्र में ‘कुमारी पूजन’ की तंत्र प्रक्रिया का वर्णन आता है। इस अश्लील पूजा-पद्धति के पीछे तंत्र शास्त्र का प्रयोजन साधक की मनोभूमि में वह दृढ़ता उत्पन्न करना है जिसके अनुसार वह मनोबल को विचलित होने से बचा सके।
समुद्र-मंथन कुण्डलिनी शक्ति की स्थूल प्रेरणा- कामुकता को अन्य दिशा में नियोजित करना है। यों कामुकता भी विषयानन्द और सन्तान लाभ का सुख देती है, पर यह दो छोटे लाभ नगण्य है। समुद्र-मन्थन में 14 रत्न निकले थे। जिनमें अमृत, कल्प-वृक्ष, कामधेनु, जैसे अति उत्कृष्ट और अति महत्वपूर्ण भी थे। यह ऐतिहासिक अथवा पौराणिक उपाख्यान हमारे जीवन में चरितार्थ किया जा सकता है। कुण्डलिनी जागरण साधना में काम-वासना का निग्रह समुद्र-मंथन की भूमिका प्रस्तुत करता है। यों आगे चलकर आत्म-प्राण और महा-प्राण को इड़ा पिंगला के द्वारा सुषुम्ना तक पहुँचाने की साधना भी समुद्र-मंथन का दूसरा कार्यक्रम प्रस्तुत करती है, पर उसका प्रथम सोपान तो इन्द्रिय निग्रह पर ही अवलम्बित है।
उत्तरी ध्रुव सहस्रार विचार-शक्ति का और दक्षिणी ध्रुव, मूलाधार क्रिया-शक्ति का केन्द्र है। यह दोनों ही शक्तियाँ अद्भुत एवं महान् हैं। इनका समन्वय ही व्यक्ति को भौतिक एवं आत्मिक स्थिति को समुन्नत बनाने में समर्थ होता है। सहस्रार की विचारणात्मक साधनायें प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि स्तर की हैं। उनके अनेक प्रयोग और प्रयोजन हैं। उनकी चर्चा भी यथा अवसर करेंगे। इन पंक्तियों में तो कुण्डलिनी शक्ति का आरंभिक परिचय कराना और उसका प्रथम सोपान प्रस्तुत करना ही अभीष्ट है। अस्तु यहाँ इतना समझना और समझाना पर्याप्त है कि हम कुण्डलिनी के स्थूल स्वरूप की महत्ता समझें और यह अनुमान लगावें कि यदि उसे अन्तर्मुखी बनाकर प्रसुप्त दिव्य शक्तियों के जागरण में विधिवत् प्रयुक्त किया जा सके, तो अद्भुत एवं अनुपम लाभ उपलब्ध किये जा सकते हैं।
कुण्डलिनी शक्ति के बहिर्मुखी चमत्कार को देख लो। काम-वासना के कीड़े अपने और अपनी पत्नी के शरीर को बेतरह गलाते, घुलाते रहते हैं। विषयानन्द की एक हल्की-सी झाँकी ही उन्हें मिल पाती है। अपव्यय से अपने को खोखला कर डालने वाले उपयुक्त इन्द्रिय सुख भी तो प्राप्त नहीं कर पाते। कितनी बार निष्फलता के उपराँत कभी ही सन्तानोत्पादन में सफलता मिलती है। सो भी दीन-दुर्बल सन्तान के रूप में यदि वासनात्मक नियन्त्रण द्वारा कुण्डलिनी की बहिर्मुखी शक्ति को भी सुव्यवस्थित बना लिया जाय तो उसके प्रतिफल भी आश्चर्यजनक होते हैं। ब्रह्मचारी हनुमान लंका-दहन के उपरान्त समुद्र में कूद तो उनके कुछ उत्पादक कण जल में चले गये, उनको धारण कर मत्स्य कन्या ने मकरध्वज जैसे पराक्रमी को जन्म दिया। भीम का वनवासी पुत्र ‘घटोत्कच’ कितना शक्तिशाली था। व्यास द्वारा उत्पन्न किये गये तीन पुत्र पाण्डु, धृतराष्ट्र और विदुर आने ढंग के अनोखे थे। विश्वामित्र की कन्या शकुन्तला ऐसी सफल माता रही कि उसके पुत्र भरत के नाम पर इस देश का भारत नामकरण हुआ। लोमस पुत्री ऋंगी, व्यास पुत्र शुकदेव आदि की अगणित पौराणिक और ऐतिहासिक गाथायें मिलती हैं, जिनसे सिद्ध है कि कामुकता पर नियन्त्रण करने वाले ही सुसंतति उत्पन्न करने में समर्थ होते हैं। विषयानन्द का भी यदि कोई मूल्याँकन किया जाय, तो वह भी संयमी व्यक्तियों को ही प्राप्त होता है। कुण्डलिनी की संचित, परिपुष्ट एवं परिष्कृत शक्ति ही भौतिक प्रयोजनों को पूरा कर सकती है। जो उसके साथ खिलवाड़ करते रहते हैं, उन्हें तो शारीरिक अशक्ति और मानसिक अवसाद ही हाथ लगने वाले हैं। गृहस्थ जीवन में भी ब्रह्मचर्य की अधिकाधिक मर्यादाओं का पालन किया जाता रहे, तो उससे मनुष्य की शारीरिक एवं मानसिक दृढ़ता अक्षुण्य बनी रह सकती है।
मनुष्य शरीर में शारीरिक और मानसिक विद्युत-शक्ति का एक प्रचण्ड प्रवाह निरन्तर बहता रहता है। वैसे तो उसका प्रभाव समान लिंग वाले प्राणी पर भी पड़ता है, पर विपरीत लिंग की ओर तो वह विद्युत-धारा और भी तीव्रगति से प्रवाहित होती है। वासनात्मक आकर्षण का कारण यह विद्युत प्रवाह ही है। नर-नारी के संपर्क से वह धारा आकर्षण तक सीमित न रह कर प्रत्यावर्तन के रूप में बदल जाती है। दो तालाबों को एक नाली से जोड़ दिया जाय, तो अधिक ऊँचे जल का प्रवाह नीचे स्तर के जल की ओर प्रभावित होने लगेगा और यह प्रवाह तब तक चलता रहेगा, जब तक दोनों जल एक स्तर पर न आ जाय। उच्च मनोबल वाली आत्माओं को अपनी निधि का बचाव करने के लिये काम संयम करना पड़ता है। अन्यथा उनकी कृष्ट-साध्य संचित शक्तियाँ उस कामुक प्रवाह में बहकर दूसरे के पास चली जायँ और वह खाली हाथ रह जाय। रोगी और निरोग, पापी और पुण्यात्मा मूर्ख और बुद्धिमान स्वार्थी और परमार्थी भिन्न प्रकृति के दो प्राणी यदि विषय-बन्धन में बंधते हैं, तो निश्चित रूप से एक की विशेषतायें दूसरे में जायेंगी। बलवान पक्ष आपनी विशेषतायें दूसरे को देगा और उसकी दुर्बलतायें खरीद लेगा। उसमें कमजोर पक्ष लाभ में रहेगा और सबल पक्ष घाटा उठायेगा। नर-नारी का मिलन दोनों को स्तर एक जैसा बना देता है। पार्वती हिमांचल कन्या थी, पर शिव के साथ विवाह होने पर वे ‘अर्ध नारी नन्देश्वर’ की सहधर्मिणी ही नहीं अर्धांगिनी भी बन गई। शारीरिक मिलन मात्र में जब भारी सहानुभूति एक दूसरे में उत्पन्न हो जाती है, तो साथ में आत्म-मिलन भी रहने पर दोनों के व्यक्तित्वों का प्रत्यावर्तन नितांत स्वाभाविक है। महामानवों की धर्म-पत्नियाँ प्रायः अपने पतियों जैसी ही संपूजित एवं यशस्विनी हुई हैं। भले ही उनकी योग्यता न्यून रही हो। कारण स्पष्ट है, बौद्धिक स्तर भिन्न रहने पर भी आत्मिक स्तर एक हो जाता है और अध्यात्मिक मूल्याँकन की दृष्टि से वे पति-पत्नी एक ही स्तर के बन जाते हैं। देवताओं के साथ उनकी पत्नियों के नाम जुड़े होने का यही कारण है। सीता-राम, राधेश्याम, लक्ष्मी-नारायण, उमा-महेश, शची पुरन्दर, वाणी हिरण्यगर्भ आदि सपत्नीक नामों का उच्चारण इसी तथ्य को प्रतिपादित करता है।
श्री रामकृष्ण परमहंस की पत्नी शारदामणि, गाँधी जी की पत्नी कस्तूरबा की महानता उनके पतियों द्वारा प्रदत्त थी। हमारी पत्नी, माता भगवती देवी ने भी कुछ आध्यात्मिक उपलब्धियाँ ऐसे ही निकट संपर्क से प्राप्त की हैं। जब साधारण संपर्क, सम्बन्ध, सत्संग लोगों को प्रकाश एवं प्रेरणा प्रदान कर सकते हैं, तो शरीर एवं मन का अन्तरंग प्रत्यावर्तन प्राणियों की विशेषतायें एक दूसरे में परिवर्तन करे, तो इसमें अचंभे की कुछ भी बात नहीं है।
श्री रामकृष्ण परमहंस ने शक्तिपात द्वारा अपनी तपशक्ति एवं महत्ता विवेकानन्द को परिवर्तित कर दी थी। मरते समय उन्होंने अपने प्रिय शिष्य से कहा- ‘‘मेरे पास कुछ शेष नहीं है, जो था तुझे दे चुका।” यह आध्यात्मिक एवं समग्र शक्तिपात था। शारीरिक शक्तिपात काम-क्रीड़ा द्वारा करते रहने पर मनुष्य अपनी शक्तियों को अंशतः क्रमशः दूसरे को प्रदान करता रहता है। वह भी यदि उसे धारण करने योग्य न रहा तो केवल बर्बादी ही होती रहती है। इस प्रकार काम सेवन एक प्रकार का आत्म-क्षरण ही है। साँप किसी को काटकर जैसे निस्तेज, हतप्रभ हो जाता है, वैसे ही कामी व्यक्ति भी निस्वत्व होता चला जाता है। विचारशील व्यक्ति अपनी इस मूल्यवान निधि को सोच समझकर केवल उपयोगी प्रयोजन के लिये ही व्यय करते हैं।
कुण्डलिनी शक्ति का वासनात्मक प्रयोग आज सर्वत्र हो रहा है। उससे यह प्रचण्ड विद्युत-धारा ऐसे ही नष्ट-भ्रष्ट हो जाती है। यदि दाम्पत्य जीवन में भी इसका क्रमबद्ध प्रयोग हो सका होता, तो एक सशक्त पक्ष अपने दूसरे साथी को कुछ लाभ पहुँचा सका होता। पर वैसा भी तो नहीं होता। दोष, दुर्गुणों से भरे मनुष्य अपने दाम्पत्य जीवन में अपनी दुष्प्रवृत्तियाँ ही एक दूसरे को देकर नीचे की ओर ही धकेलते हैं। आध्यात्मिक दृष्टि से किये गये विवाहों में साथी की उच्च आत्मिक स्थिति परखी जाती थी, पर आज तो दूसरी ही कसौटियां सामने आ गईं, तो विवाह भी व्यक्तियों का एक दूसरे द्वारा अभिवर्धन करने का उद्देश्य खोकर नीचे धकेलने का ही आधार बने हुए हैं। विवाह करने वालों में से आज कोई बिरले ही ऐसे हैं, जो सावित्री, सत्यवान्, च्यवन, सुकन्या जैसा लाभ दूसरे को दे पाते हैं।
इन तथ्यों पर विचार करते हुए ब्रह्मचर्य की उपयोगिता का रहस्य सहज ही समझ में आता है। यह प्रकृति के विरुद्ध दुराग्रह नहीं वरन् शक्ति के उत्पादन, पोषण, संचय एवं सदुपयोग का महान् विज्ञान है, जिसे चिरकाल से परखा जाता और सही प्रमाणित किया जाता रहा है। हमें ब्रह्मचर्य की कुण्डलिनी महाशक्ति के संदर्भ में देखना, परखना होगा और संयम साधना द्वारा यह पथ प्रशस्त करना होगा, जिसके आधार पर कि पिण्ड के- दक्षिणी ध्रुव- मूलाधार के शक्ति-पुँज को शरीर और मन की अगणित दिव्य शक्तियों के अभिवर्धन में प्रयुक्त करके मानवीय महत्ता को देवोमय स्तर के उच्च-शिखर तक पहुँचाया जा सके।
कुण्डलिनी जागरण की एक फुस्कार से भी कितना काम चल सकता है, इसका छोटा-सा अनुभव हम अपने व्यक्तिगत जीवन में कर चुके हैं। उसकी क्षमता मस्तिष्क को इतना तीव्र बना सकती है कि चारों वेद, 108 उपनिषद्, छहों दर्शन, 20 स्मृति, 18 पुराण, प्रमुख ब्राह्मण एवं असंख्य ग्रन्थों का भाषान्तर तथा लगभग 300 से अधिक अन्य पुस्तकों का लेखन एक ही व्यक्ति द्वारा सम्पन्न हो सका, जो कार्य की विशालता को देखते हुए अचम्भा जैसा लगता है। सार्वजनिक क्षेत्र में संगठन, प्रचार एवं रचनात्मक कार्यों को देखते हुए भी लगता है कि 1000 व्यक्तियों द्वारा सम्भव हो सकने वाला कार्य एक व्यक्ति ने सम्पन्न किया और भी अनेक अनुभव ऐसे हैं जो अभी अप्रकट रखे गये हैं। वे बताते हैं कि अधूरी एवं आँशिक कुण्डलिनी की छोटी-सी हलचल भी मनुष्य की क्रियाशक्ति को कितनी बढ़ा सकती है। फिर समग्र कुण्डलिनी जागरण के आधार पर तो किसी की शक्ति कितनी बढ़ सकती है, इसकी कल्पना कर सकना भी कठिन है।
अध्यात्म की महान शक्ति इस विश्व की सर्वोपरि शक्ति है। उसे उपलब्ध करने के लिये हमें अपने उत्तरी और दक्षिणी दोनों ध्रुवों को साधन प्रक्रियाओं और तपश्चर्याओं द्वारा सजग करना चाहिये। दक्षिणी ध्रुव, मूलाधार का- एक प्रथम सोपान-ब्रह्मचर्य इस लेख में इंगित किया गया है, आगे उसके विभिन्न पक्षों पर समयानुसार प्रकाश डालते रहेंगे।
पांडिचेरी के प्रधान न्यायाधीश लुई जकालिफ्ट ने गुप्त विद्या की जानकारी के लिए सारे भारत वर्ष में भ्रमण किया-18 जनवरी 1866 को वे बनारस पहुँचे और पेशवा के महल में ठहर गये। त्रिवेन्द्रम का एक साधु भी गंगा तट पर पेशवा के महल में ठहरा था। उसका नाम था गोविन्द स्वामी।
एक दिन श्री जकालिपट ने उक्त साधु को कुछ चमत्कार दिखाने के लिये राजी कर लिया। साधु ने कई प्रकार के करिश्मे दिखाये, उसका वर्णन भी जकालिपट इस प्रकार करते हैं-
साधु पालथी मारकर बैठ गये। कई फुट की दूरी पर रखे हुए काँसे के कलश की ओर उन्होंने हाथ बढ़ाया, यद्यपि यह उसे छू नहीं लगा सकते थे, तो भी पाँच ही मिनट में इतना वजनदार कलश अपनी पेंदी से चारों ओर हिलने-डुलने लगा। फिर धीरे-धीरे साधु की ओर चलने लगा। जब थोड़ा ही अन्तर रह गया, तो कलश से विचित्र प्रकार की ध्वनियाँ निकलने लगीं। जबकि उसके अन्दर कोई यन्त्र नहीं था, केवल ऊपर तक पानी भरा था। फिर साधु ने उसे पीछे जाने का आदेश दिया। आश्चर्य कि कलश फिर अपनी जगह पर लौट गया। मेरे कहने पर उन्होंने कलश से ढोलक आदि अनेक वाद्य-यन्त्रों की स्वर लहरियाँ निकालीं। मैंने कहा अब 10-10 सेकेंडों के अन्तर से आवाजें चाहियें। घड़ी मिलाकर देखता तो आश्चर्य-चकित रह गया कि ठीक दस सेकेंड होने पर आवाज आती। इसके बाद उससे पूरे गीत की संगीत ध्वनि निकली, एक बार सारा घड़ा उलट-पुलट हो गया, पर पानी की एक बूंद भी नीचे न गिरी।
मेरे पूछने पर साधु ने बताया- ‘‘शरीर में ऐसी शक्ति विद्यमान है, जो बिना किसी भौतिक संपर्क से वस्तुओं को हिला-डुला सकती हैं, ठोस पिन्डों में गति उत्पन्न कर सकती है। वह किसी के मन की बात जानने और शाप, वरदान तक सफल करने में समर्थ है।
महाभारत युद्ध का बारहवाँ दिन था। कौरव सेना के सेनाध्यक्ष द्रोणाचार्य ने उस दिन चक्रव्यूह की रचना करके यह निश्चय किया था कि इसके द्वारा वे पांडवों का संहार कर डालेंगे। क्योंकि उनमें से कोई अर्जुन के अतिरिक्त चक्रव्यूह को तोड़ने की विधि नहीं जानता और अर्जुन को हम चालाकी से युद्ध क्षेत्र से दूर हटा देंगे। यह चाल किसी हद तक सफल हो गई और जब राजा युधिष्ठिर को इसका रहस्य मालूम हुआ तो वे घबरा गये। इस परिस्थिति में अर्जुन-पुत्र अभिमन्यु आगे बढ़ा और कहने लगा कि घबराने का कोई काम नहीं, मैं निश्चय ही चक्रव्यूह को भंग कर दूँगा-
द्रोणस्य दृढ़मत्युग्रमनीकप्रवरं युधि। पितृणाँ जयमाकाँक्षत्रवगाहेऽविलम्बितम्॥
नाहं पार्थे न जातः स्याँ न च जातः सुभद्रया। यदि में संयुगे कदिचंजीवितो नाद्यमुच्यते॥
अर्थात्- ‘‘हे महाराज! मैं अपने पितृवर्ग की विजय अभिलाषा से युद्ध-स्थल में द्रोणाचार्य की अत्यन्त भयंकर, सुदृढ़ एवं श्रेष्ठ सेना में शीघ्र ही प्रवेश करता हूं। यदि आज मेरे साथ युद्ध करके कोई भी वीर बच जाय, तो मैं अर्जुन का पुत्र नहीं और सुभद्रा की कोख से मेरा जन्म नहीं।’’
इसके पश्चात् अभिमन्यु ने शत्रु सेना में घुसकर जो वीरता दिखाई और अकेले ही बड़े-बड़े महारथियों को भगा दिया, उसकी कथा बहुत विख्यात है और उस वीर बालक के अद्भुत शौर्य की प्रशंसा में सैकड़ों पुस्तकें लिखी जा चुकी हैं। पर चक्रव्यूह वेधन करके फिर लौटने की विधि की जानकारी न होने से अन्त में उस अकेले को कई महारथियों ने मिलकर घेर लिया और अन्यायपूर्वक आक्रमण करके मार डाला। जब यह संशप्तकों को हराकर लौटने पर अर्जुन को ज्ञात हुआ, तो उसने यह घटना के मुख्य जिम्मेदार जयद्रथ को दूसरे ही दिन संध्याकाल तक मार डालने की शपथ खाई और प्रण किया कि “अगर मैं उसे कल सूर्यास्त से पूर्व न मार डालूं, तो स्वयं जल कर मर जाऊँगा।’’
दूसरे दिन युद्ध में अर्जुन ने भयंकर अस्त्र-शस्त्रों से युद्ध किया। उसकी कथा यहाँ वर्णन नहीं की जा सकती। पर फिर भी कौरवों ने अपनी पूरी शक्ति केन्द्रित करके जयद्रथ की रक्षा का प्रयत्न किया। जिससे अति भयंकर युद्ध होते-होते सूर्यास्त का समय निकट आ पहुँचा। यह देखकर भगवान कृष्ण को चिन्ता हुई और उन्होंने सोचा कि इस तरह लड़कर जयद्रथ नहीं मारा जा सकेगा। उन्होंने इस सम्बन्ध में कहा-
एताननिर्जित्य रणे षड् रथान् पुरुषर्षम। न शक्या सैन्घवो हन्तुँ यतो निर्व्याजसर्जुन॥
“हे नर-श्रेष्ठ अर्जुन रणभूमि में इन छः महारथियों को परास्त किये बिना सिन्धुराज को केवल माया द्वारा ही मारा जा सकता है।’’
योगमन्त्र विधास्यामि सूर्यस्यावरणं प्रति। अस्तंगत इति व्यक्तं द्रक्ष्यत्येकः स सिन्धुराज॥
“अतः मैं सूर्यदेव को ढ़कने के लिये कोई योगिक क्रिया करता हूँ, जिससे अकेला सिन्धुराज (जयद्रथ) ही उसे अस्त होता हुआ देख सके।”
हर्षेण जीविताकाँक्षी विनाशार्थ तव प्रभो। न गोप्स्यति दुराचारः स आत्मानं कथंचन॥
“तब वह दुष्टात्मा अपने जीवित रहने और तुम्हारे विनाश की आशा से प्रसन्न होकर अवश्य ही तुम्हारे सामने निकल आयेगा।’’
तत्र छिद्रे प्रहर्तव्यं त्वयास्य कुरुसत्तम।, व्ययेक्षर नैव कर्तव्य गतोऽस्तमिति भास्करः॥
“हे कुरुश्रेष्ठ! ऐसा अवसर आने पर तुम तुरन्त उसके ऊपर प्रहार करना। इस बात का भ्रम मत करना कि सूर्य वास्तव में अस्त हो गया है।’’
अन्त में ऐसा ही हुआ और अन्यायाचरण करने वाला जयद्रथ अर्जुन के बाणों से नष्ट होकर भूमिशायी हो गया। इस कथा में भगवान् कृष्ण द्वारा समय से पूर्व सूर्य को अस्त दिखला देने और उसे फिर प्रकट कर देने की जो घटना वर्णन की गई है, आधुनिक युग के अनेक शिक्षित व्यक्ति उस पर अविश्वास करते हैं। उनका कहना है कि ऐसा कार्य वास्तविक जगत् में हो सकना सम्भव नहीं, यह कवि की कल्पना मात्र है। यद्यपि काव्य-ग्रन्थों में कल्पना प्रसूत घटनाओं का मेल कोई असम्भव बात नहीं है और पौराणिक कथाओं के लिये पूरे ऐतिहासिक अथवा वैज्ञानिक प्रमाण देना भी आवश्यक नहीं, क्योंकि उनका मुख्य उद्देश्य सामान्य जनता को धर्मोपदेश, धर्माचरण की प्रेरणा देनी होती है।
अब अमरीका के एक मनोविज्ञान शास्त्री डा. राल्फ एलेक्जेंडर ने इच्छा-शक्ति को जागृत करके बादलों को इच्छानुसार हटाने और पैदा कर देने का प्रयोग किया है। वे बहुत वर्षों से मन को एकाग्र कर उसकी शक्ति से बादलों को प्रभावित करने का प्रयोग कर रहे थे। सन् 1951 में उन्होंने मैक्सिको सिटी में 12 मिनट के भीतर आकाश में कुछ बरसाती बादल जमा कर दिये। उस अवसर पर कई स्थानों के वैज्ञानिक और अन्य विद्वान् वहाँ इकट्ठे थे। पर डा. एलेक्जेंडर की शक्ति के सम्बन्ध में उनमें मतभेद बना रहा। तो भी सब ने यह स्वीकार किया कि जब आकाश में एक भी बादल न था, तब दस-बारह मिनट में बादल पैदा हो जाना और थोड़ी बूंदा-बाँदी भी हो जाना आश्चर्य की बात अवश्य है।
इसलिये डा एलेक्जेंडर ने फिर ऐसा प्रयोग करने का निश्चय किया, जिसमें किसी प्रकार का सन्देह न रहे। उन्होंने कहा कि “वे आकाश में मौजूद बादलों में से जिसको दर्शक कहेंगे, उसी को अपनी इच्छा-शक्ति से हटा कर दिखा देंगे।” इसके लिये ओण्टैरियो ओरीलियो नामक स्थान में 12 सितम्बर 1954 को एक प्रदर्शन किया गया। उसमें लगभग 50 वैज्ञानिक पत्रकार तथा नगर के बड़े अधिकारी इस चमत्कार को देखने के लिये इकट्ठे हुये। नगर का मेयर (नगर-पालिकाध्यक्ष) भी विशेष रूप से बुलाया गया, जिससे इस प्रयोग की सफलता में किसी को सन्देह न हो। यह भी व्यवस्था की गई कि जब बादलों को गायब किया जाय, तो कई बहुत तेज कैमरे उनका चित्र उतारते रहें। इसकी आवश्यकता इसलिये पड़ी कि कुछ लोगों का ख्याल था कि डा. एलेक्जेंडर दर्शकों पर “सामूहिक हिप्नोटिज्म” का प्रयोग करके ऐसा दृश्य दिखा देते हैं, वास्तव में बादल हटता नहीं। इससे मनुष्य का मन भ्रम में पड़ सकता है, पर तब आटोमेटिक कैमरा उस दृश्य का चित्र उतार लेगा, तो सन्देह की गुंजाइश ही नहीं रहेगी। कैमरे के चित्र में तो वही बात आयेगी, जो उसके सामने होगी। आगे की घटना के विषय में एक स्थानीय समाचार-पत्र “दी डेली पैकेट एण्ड टाइम्स” ने जो विवरण प्रकाशित किया वह इस प्रकार है-
“जब सब लोग इकट्ठे हो गये, तो डा. एलेक्जेंडर ने उनसे कहा कि वे स्वयम् एक बादल चुन लें, जिसको गायब कराना चाहते हों। क्षितिज के पास बहुत से बादल थे। उनके बीच-बीच में आसमान भी झलक रहा था। उनमें बादलों की एक पतली-सी पट्टी काफी घनी और अपनी जगह पर स्थिर थी। उसी को प्रयोग का लक्ष्य बनाया गया। कैमरे ने उसकी कई तस्वीरें उतार लीं।”
“डा. एलेक्जेंडर ने थोड़ी देर प्राणायाम किया, भौहें सिकोड़ी (त्राटक की क्रिया की) और टकटकी लगा कर बादलों की उसी पट्टी की ओर देखने लगे। अकस्मात् उन बादलों में एक विचित्र परिवर्तन दिखाई पड़ने लगा। बादलों की वह पट्टी चौड़ी होने लगी और फिर धीरे-धीरे पतली होने लगी। कैमरे चालू थे और हर सेकेंड में एक तस्वीर उतारे जा रहे थे। मिनट पर मिनट बीतते गये, पट्टी और पतली पड़ने लगी, उसका घनत्व भी कम होने लगा। धीरे-धीरे ऐसा लगने लगा मानो कोई रुई को धुन-धुन कर अलग कर रहा है। आठ मिनट के भीतर सब लोगों ने आश्चर्य से देखा कि वह पट्टी आसमान से बिल्कुल गायब हो गई है, जबकि आस-पास के बादल जहाँ के तहाँ स्थिर रहे।”
“लोगों की आँखें आश्चर्य से फटी जा रही थीं। पर डा. एलेक्जेंडर स्वयं अभी संतुष्ट नहीं थे। हो सकता है, कुछ लोग यह समझे कि यह सिर्फ दैवयोग की बात है। बादल तो बनते-बिगड़ते ही रहते हैं। उन्होंने लोगों से फिर किसी दूसरे बादल का चुनाव करने को कहा और फिर कैमरे उस नये बादल पर केन्द्रित कर दिये गये। उस दिन तीन बार यही प्रयोग हुआ और तीनों बार डाक्टर एलेक्जेंडर ने सफलतापूर्वक बादलों को गायब कर दिया। जब कैमरे की फिल्में साफ की गईं और फोटो निकाले गये, तो देखा कि हर बार बादलों का गायब होना उनमें पूरी तरह उतर आया है। तब वहाँ के प्रमुख अखबार ने इस समाचार को “क्लाउड डेस्ट्रायड बाई डाक्टर” (बादल डाक्टर द्वारा नष्ट किये गये) का बहुत बड़ा हैडिंग देकर प्रकाशित किया।
अमरीका में इस विद्या को “साइकोकिनासिस” अथवा पी. के. कहते हैं और इसका अभ्यास करने वालों का दावा है कि कुछ समय पश्चात् वे इसके द्वारा बादलों को ही नहीं अन्य अनेक पदार्थों को भी इधर-उधर कर सकेंगे।
जिस विद्या को अमरीका वाले अब सीखना आरम्भ कर रहे हैं, वह पूर्वी देशों में हजारों वर्षों से उपयोग में लाई जा रही है। आजकल भी मलाया के ध्यान-योगी “बमोह” इसी प्रकार बादलों को हटाकर मेघ बरसना रोक सकते। उनकी यह शक्ति इतनी सुनिश्चित मानी जाती है कि आधुनिक विचारों के व्यक्ति भी आवश्यकता पड़ने पर उनकी सहायता लेते हैं। अभी एक क्रिकेट मैच के समय ‘बमोह’ द्वारा प्रयोग करने के फलस्वरूप मैच कई दिन तक निर्विघ्न चलता रहा, जब कि उसके आस-पास सर्वत्र मूसलाधार वर्षा होती रही।
वास्तव में ये क्रियायें योग की साधारण शक्तियों से सम्बन्धित है। “योग-दर्शन” में कहा गया है-
स्थूलस्वरूपसूक्ष्मान्वयावर्थत्व सयमाद् भूतजयः।
अर्थात्- ‘‘पाँचों भूतों के स्थल-स्वरूप, सूक्ष्म, अन्वय, अर्थवत्त्व में संयम करने से भूतों पर जय प्राप्त होती है। अर्थात् उस अवस्था में सभी भूततत्त्व योगी की इच्छानुसार चलते हैं।”
बादलों का हटाना तो प्राणायाम को पूरी तरह सिद्ध कर लेने पर ही सम्भव हो जाता है। ऐसी स्थिति में यदि महायोगी भगवान् कृष्ण ने अवसर आने पर दस-पाँव मिनट के लिये सूर्य के सम्मुख कृत्रिम (मायामय) बादल उत्पन्न करके उसके अस्त हो जाने का भ्रम उत्पन्न कर दिया हो, तो इसमें कोई असम्भव बात नहीं। पर भारतीय प्रणाली की मुख्य विशेषता यही है कि उसका लक्ष्य आध्यात्मिक रहा है। ऐसी चमत्कारी शक्तियों की प्राप्ति होने पर भी साधकों के लिये यह स्पष्ट आदेश दे दिया जाता है कि उनका उपयोग स्वार्थ के लिये न करके परमार्थ संबन्धी कार्यों के लिये ही किया जाय।
“आज फाँसी लगने वाली है।” भगत सिंह ने विचार किया इससे अच्छा दिन कौन-सा आयेगा। आज तो किसी महापुरुष के दर्शन करने चाहिये। कहाँ, जेल में? नहीं, वहाँ कहाँ सम्भव? “वसीयत के बहाने मुझे लेनिन की जीवनी दे जाना।” कारागार के भीतर से सरदार भगत सिंह ने अपने वकील के पास खबर भेज दी। वकील ने वह पुस्तक भगत सिंह को पहुँचा दी। उधर फाँसी की तैयारी होने लगी, इधर भगत सिंह लेनिन का जीवन वृतान्त पढ़ने में निमग्न हो गये।
जेल अधिकारी उन्हें फाँसी के लिये लेने आये, उस समय वे अन्तिम अध्याय पढ़ रहे थे। उन्होंने अपना ध्यान पन्नों पर रखे हुए हाथ उठाकर कहा- ‘‘महाशय, अभी ठहरिये, एक क्राँतिकारी दूसरे क्राँतिकारी से मिल रहा है।” अधिकारी स्तब्ध रह गये, मौत के सन्नाटे में भी जीवन की निश्चलता। जहाँ थे वहीं रुक गये। पुस्तक का अन्तिम अध्याय समाप्त कर हर्ष से उछलते भगत सिंह उठ खड़े हुए और फाँसी के लिए झूमते हुए चल पड़े। फाँसी के फन्दे में झूलने तक वीरवर भगत सिंह का मनोबल आकाश की भाँति ऊँचा ही उठा रहा।
इस अद्भुत संसार में विभिन्न प्रवृत्तियों तथा मनोदशाओं के लोग पाये जाते हैं। एक ही स्थिति, परिस्थिति तथा दशा वाले अनेक लोगों में से कोई अत्यधिक दुःखी और व्यग्र देखे जा सकते हैं और अनेक यथासम्भव प्रसन्न तथा सन्तुष्ट।
निःसंदेह, ऐसे व्यक्ति विचित्र होने के साथ दयनीय भी कम नहीं होते, जो हर समय दुःखी और क्लान्त ही बने रहते हैं। मिलते ही दुःखों, कष्टों तथा कठिनाइयों का डडडड कर बैठ जाते हैं। आय कम हैं, खर्चा पूरा नहीं होता, बीबी बच्चे स्वस्थ ही नहीं रहते, दफ्तर में तनाव बना रहता है, तरक्की के चान्स आते ही नहीं या आकर निकल जाते हैं, कोई लाभ ही नहीं होता, बेचारे ऑफिसर के अन्याय, रोष अथवा पक्षपात के शिकार बने हुये हैं- इस प्रकार की व्यक्तिगत और समय बहुत खराब आ गया है, संसार विनाश के मुख पर खड़ा है, भ्रष्टाचार चरम-सीमा पर जा पहुँचा है, मानव-जाति का भविष्य खाते में है, समाज बहुत दूषित हो चुका है, सुधार की सम्भावनायें डडडड हो गई हैं, बढ़ती हुई वैज्ञानिक प्रगति हानि के ड़ड़ड़ड़ लाभ तो कर ही नहीं सकती, किसी समय भी युद्ध हो सकता है। मनुष्य का घोर पतन हो गया है, सदाचार तथा सज्जनता तो कहीं दीखती ही नहीं, मर्यादा और अनुशासन जैसी कोई वस्तु ही नहीं रह गई है-आदि आप-बीती सुनाते रहते हैं। उनकी व्यथा-कथा सुनने से ड़ड़ड़ड़ पता चलता है, मानो संसार के सारे दुःख, सारी डडडड इन्हीं बेचारे के भाग्य में भर दी गई हैं। संसार डडडड इन जैसा कष्ट-ग्रस्त दूसरा कोई न होगा।
विचार करने की बात है कि जिस मनुष्य के मत्थे, ऐसी मुसीबतें तथा चिन्तायें हों, क्या वह सामान्य मनो-ड़ड़ड़ड़ में संसार के सारे कार्य तथा व्यापार करता रह सकता है। किसी एक वास्तविक चिन्ता के मारे तो मनुष्य डडडड खाना-पीना, सोना-जागना हराम हो जाता है, और डडडड तक वह उससे मुक्ति नहीं पा लेता चैन की साँस नहीं लेता। परिश्रम और प्रयत्न में एड़ी-चोटी का पसीना एक कर देता है। तब इतनी चिन्ताओं वाले जीवन की गाड़ी ढकेलता हुआ सामान्य गति से चलता रह सकता है- ऐसी आशा नहीं की जा सकती। ऐसे व्यक्ति की केवल दो ही दशायें सम्भव हो सकती हैं- या तो उसे विक्षिप्त हो जाना चाहिये अथवा कोई महान पुरुष। किन्तु वह इनमें से कुछ नहीं होता। एक सामान्य-सा दुःखी तथा क्लान्त व्यक्ति ही बना रहता है।
बात दरअसल यह होती है कि ऐसे व्यक्ति सामान्यतः दूषित दृष्टिकोण के रोगी होते हैं। निषेधात्मक दृष्टि तथा नकारात्मक मनोवृत्ति के कारण उन्हें संसार की हर बात और हर वस्तु दोषपूर्ण दिखाई देती है। जिस प्रकार जिस रंग का चश्मा आँखों में चढ़ा लिया जाता है, संसार की प्रत्येक वस्तु उसी रंग की दिखाई देने लगती है। जबकि वास्तव में उस रंग की होती नहीं। यही दशा इस प्रकार के लोगों की होती है। दोष-दृष्टि होने से उन्हें दोष के सिवाय किसी व्यक्ति अथवा वस्तु में कोई अच्छाई ही नहीं दिखलाई देती। जबकि संसार में केवल बुराई अथवा कुरूपता ही नहीं है, अच्छाई और सुन्दरता भी है।
चेतन और जड़ से मिलकर बने हुए इस संसार की प्रत्येक वस्तु और व्यक्ति में अच्छाई-बुराई दोनों पाये जाते हैं। कोई भी वस्तु ऐसी न मिलेगी, जो या तो केवल बुरी हो या केवल अच्छी, दिन और रात, शुक्ल-पक्ष और कृष्ण-पक्ष की तरह हर बात के दो पहलू होते हैं। एक वस्तु जो एक स्थिति में बुरी होती है, दूसरी बार वही अच्छी खिलाई देने लगती है। मनुष्य के भीतर स्वयं दैवी और आसुरी वृत्तियाँ विद्यमान रहती हैं। हमारा स्वयं का बच्चा जब किसी समय शरारत या हठ कर रहा होता है, हमें खुद को बड़ा ढीठ और खराब मालूम होने लगता है और जब वही बालक दौड़कर पानी ले आता है, अपना पाठ सुना देता है, अच्छी-अच्छी प्यारी बातें करने लगता है, तब हमें बड़ा भला और अच्छा लगने लगता है। इससे वह बच्चा न तो बिल्कुल अच्छा ही माना जायेगा और न सर्वथा खराब अथवा बुरा ही। सड़ा-गला, कूड़ा-कचरा और मल-मूत्र सर्वथा बुरी वस्तुयें मानी जाती हैं, किन्तु सब यही सब पक कर खाद बन जाते हैं, तब सभी उसको एक मत से उपयोगी एवं आवश्यक मान लेते हैं और निःसन्देह वह हो भी ऐसा जाता है। तात्पर्य इस संसार की कोई भी वस्तु न तो केवल खराब ही है और न अच्छी। हर वस्तु के अच्छे-बुरे दोनों पहलू होते हैं। दोष रहित, निर्विकार और सदा शुद्ध तो एक मात्र परमात्म-सत्ता ब्रह्म ही है।
संसार तो गुण-दोषों का सम्मिलित स्वरूप है। तथापि जिन मनीषियों और महात्माओं ने अपने को पूर्ण शुद्ध और निर्विकार बना लिया है, उनका कहना तो यहाँ तक है कि मंगलमय भगवान की इस मंगलमय सृष्टि में दोष है ही नहीं। उनकी यह रचना भलाई, उत्कृष्टता, स्वच्छता, नैतिकता आदि के दिव्य गुणों के आधार पर की गई है। इसमें गन्दगी, बुराई और अपवित्रता है ही नहीं। पूर्ण शुद्ध-बुद्ध और सुन्दर परमात्मा की कृति में दोष और दूषण सम्भव भी किस प्रकार हो सकते हैं।
संसार की अच्छी-बुरी तस्वीर वस्तुतः हमारे दृष्टिकोण और मनोदशा का ही प्रतिफलन है। दूसरों को भले रूप में देखना, भले दृष्टिकोण और बुरे रूप में देखना, बुरे दृष्टिकोण का ही परिणाम है। एक ही कोई व्यक्ति किसी को भला और हमें बुरा दीखता है, तो इसको हम दोनों का दृष्टि वैचित्र्य ही माना जायेगा। यदि वह व्यक्ति अच्छा या बुरा ही होता, तो हम दोनों को अच्छा या बुरा ही दीखना चाहिये। जिस मरणासन्न रोगी कुत्ते को देखकर लोग घृणा से मुँह फेर लेते थे, उसको छू कर आती हुई, हवा से बचते थे, उसी में दया और प्रेम की पवित्रता से प्रकाशमान हृदय वाले ईसा मसीह ने भगवान की प्रभुता का दर्शन किया और विह्वल होकर गोद में उठा लिया।
एक मंदिर में भौतिक और आध्यात्मिक भिन्न दृष्टिकोण वाले दो व्यक्ति जाते हैं और प्रतिमा को ध्यानपूर्वक देखते हैं। जहाँ भौतिक दृष्टिकोण का व्यक्ति मूर्ति के पत्थर, मुकुट और साज-श्रृंगार तक सीमित रहकर उसका मूल्य और कोटि ही देखता रहता है, वहां आध्यात्मिक दृष्टिकोण वाला उसमें भगवान की झाँकी का दर्शन करता हुआ, भक्ति-भावना में विभोर हो जाता है। उसी प्रकार यदि चोर व्यक्ति उसको देखता है, तो उसे बड़ा ड़ड़ड़ड़ दीखता है और चारी के दाँव-घात सोचने लगता है और यदि कोई उदार दानी देता है तो सोचने लगता है कि ड़ड़ड़ड़ अभी यहाँ पर इस वस्तु या इस बात की पूर्ति नहीं हो पाती है, यह पूर्ति होनी चाहिये और उसकी उदार वृत्ति कुछ कर सकने के लिये प्रेरित हो उठती है।
संसार की भलाई-बुराई इतना महत्व नहीं रखती, जितना हि हमारा निज का दृष्टिकोण। यदि हमारा दृष्टिकोण दूषित नहीं है, तो हमको संसार में दोष दिखाई ही न देंगे और यदि दिखाई भी देंगे, तो न तो हमारा ध्यान नहीं उधर जायेगा और न हम उसको कोई महत्व ही देंगे। जिसे हम प्यार करते हैं, जिसके प्रति हमारी मनोभावना अनुकूल है, दृष्टिकोण स्निग्ध एवं सरल है, वह यदि कोई अप्रियता भी कर देता है, किसी बुराई या हानि का प्रमाण भी देता है, तो भी हमारे मन में उसके लिये द्वेष अथवा घृणा उत्पन्न नहीं होती, हम उसे हंसकर टाल देते है अथवा उधर ध्यान ही नहीं देते। इसके विपरीत डडडड हमारा दृष्टिकोण दूषित है, तो पीलिया के रोगी की तरह हमें सारा संसार पीला-पीला ही दिखाई देगा। किसी डडडड साधारण-सी भूल भी हमें पहाड़ जैसी दीखेगी और ड़ड़ड़ड़ अपना अप्रिय करने वाले से लड़ने-झगड़ने को तैयार हो जायेगा।
संसार का अपना कोई विशेष स्वरूप नहीं है। हर मनुष्य को उसके मनोभावों के अनुकूल ही दिखाई देता है। हमारा मानसिक प्रतिबिम्ब ही हमें वाह्य संसार ड़ड़ड़ड़ प्रतिफलित होता हुआ दिखाई देता है। दूसरे को भले ड़ड़ड़ड़ में देखना हमारी पुरोगामी मानसिक दशा का और ड़ड़ड़ड़ रूप में दिखना प्रतिगामी मानसिक का परिणाम है। मनुष्य का जैसा दृष्टिकोण होता है, उसके विचार भी उसी के अनुसार बन जाते हैं। सर्वत्र सच्चाई और अच्छाई डडडड दृष्टिकोण रखने वाले को संसार में कहीं भी अप्रिय डडडड अथवा प्रतिकूलता दिखलाई नहीं देती और दृष्टिकोण डडडड प्रतिगामी होते ही संसार में बुराई के सिवाय और ड़ड़ड़ड़ दिखाई ही नहीं देता। शिष्यों को इसी सत्य से अवगत कराने के लिये एक बार गुरु द्रोणाचार्य ने युधिष्ठिर से कहा कि एक बुरा आदमी खोज लाओ और दुर्योधन को एक अच्छा आदमी खोज लाने के लिये भेजा। कुछ देर बाद युधिष्ठिर और दुर्योधन अकेले की वापिस आ गये और उन्होंने क्रम से बतलाया कि आचार्य उनको कोई बुरा अथवा अच्छा आदमी नहीं मिला।
आचार्य ने शिष्यों को समझाया कि वह दोनों नगर में अच्छे-बुरे आदमियों की खोज करने गये, किन्तु अपनी शुभ मनोभावना के कारण युधिष्ठिर को कोई बुरा आदमी न दीखा और अशुभ दृष्टि-दोष के कारण दुर्योधन को कोई आदमी अच्छा ही न दिखलाई दिया। नगर के सारे आदमी वहीं थे, किन्तु इन दोनों को अपने मनोभावों और दृष्टिकोण के कारण सब अच्छे अथवा बुरे ही दिखाई दिये। संसार में न कुछ सर्वथा अच्छा है और न बुरा, यह सब हमारे अपने मनोभावों और दृष्टिकोण का ही परिणाम है कि संसार हमको किस रूप में दिखलाई देता है।
दोष दृष्टि अथवा दूषित मनोभाव रखकर संसार को बुरा देखते रहने से उसका तो कुछ नहीं बिगड़ता अपनी ही मनःशान्ति और संतोष नष्ट हो जाता है। सर्वत्र बुरा ही बुरा देखते रहने से जीवन बड़ा ही अशाँत एवं प्रतिगामी बनकर रह जाता है। इस दोष के कारण हम संसार में सर्वत्र बिखरे पड़े सौंदर्य और व्यक्तियों के प्रेम, सौहार्द और स्नेह से वंचित हो जाते हैं। हर ओर विरोध और प्रतिकूलताओं का ही वातावरण बना रहता है। सर्वत्र अच्छाई के दर्शन करते रहने और दूसरों को आत्मीय दृष्टि से देखने पर बुरे तत्व भी अनुकूल बन जाते हैं। अपने से शत्रुता मानने वाले के प्रति भी यदि विरोधी-भाव न रक्खे जायें और हर प्रकार से अपने स्नेह और अनुकूल दृष्टि की अभिव्यक्ति की जाये, तो निश्चय ही शत्रु भी लज्जित होकर विरोध से विरत हो जाये। ऋषियों के आश्रम में शेर, भालू जैसे हिंस्र जीव मनुष्यों के साथ हिले-मिले रहते थे। आश्रम-वासियों के अनुकूल मनो-भावों के कारण ही उनकी हिंसा-वृत्ति दबी रहती थी और वे उनसे मित्रता का सुख अनुभव किया करते थे। सबके प्रति सद्भाव और अनुकूल दृष्टिकोण रखने के कारण ही धर्मराज युधिष्ठिर अजातशत्रु कहे जाते थे।
दूषित दृष्टिकोण वाला व्यक्ति साधारण-सी कठिनाई का अनुचित मूल्याँकन कर अपनी परेशानियों की वृद्धि कर लेता है। तनिक-सा अभाव, छोटा-सा रोग अथवा साधारण-सी प्रतिकूलता उसे पहाड़ जैसी भारी और भयानक दिखाई देती है। जिससे वह अनावश्यक रूप से रोता-झोंकते रहता है। परिस्थितियों का प्रभाव मनोभूमि के अनुसार ही पड़ता है। आग का प्रभाव जितना सूखी लकड़ी पर पड़ता है, उतना गीली पर नहीं। बीमारी जितना शीघ्र दुर्बल को दबा लेती है, उतना शीघ्र सबल को नहीं। बलुई जमीन जितनी शीघ्र पानी सोख लेती है, उतनी शीघ्र दूसरी पक्की जमीन नहीं। रंग जितना गाड़ा और शीघ्र महीन और श्वेत कपड़े पर चढ़ता है, उतना मोटे, मैले पर नहीं। इसी प्रकार जो निर्बल दृष्टिकोण अथवा दूषित मनोभूमि के लोग हैं, जो जितना अधिक प्रतिकूलताओं के अनुकूल अपने को बनाये रहता है, वह उतना ही शीघ्र और गहराई तक उनसे प्रभावित होकर दुःखी होता है।
संसार में सफलता, सुन्दरता और सुख-शान्ति के लिये आवश्यक है कि अपना दृष्टिकोण परिमार्जित और मनोभूमि को तदनुकूल बनाया और रक्खा जाये, अन्यथा आघ्रक्त्त व्यक्ति की विकल दशा की तरह संसार की हर वस्तु व्यक्ति और परिस्थिति से एक असन्तोष और संताप के अतिरिक्त और कुछ न मिल सकेगा और हम संसार के सुख-शान्ति और सुन्दरता से सर्वथा वंचित रह जायेंगे।
पिता जिस राह चलता था, पुत्र उससे एक अलग राह बनाता चल रहा था। पिता ने यह देखा तो बहुत गुस्सा हुआ, उसने कहा- ‘‘मूर्ख, जाना हमें एक ही स्थान पर है, फिर भिन्न पथ क्यों बनाता है।” पुत्र ने शाँत भाव से कहा- पिताजी, यह देखने के लिये कि क्या तुम जिस पथ पर चल रहे हो, उससे भी कोई सीधा और सच्चा रास्ता है।”
शास्त्रों में अणिमा, गरिमा, महिमा, लछिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशत्व और वाशित्व आदि अष्ट सिद्धियों का वर्णन मिलता है। कहीं-कहीं इन सिद्धियों को परकाया प्रवेश, जल-असंग, उत्क्राँति, ज्वलन, दिव्य श्रवण, आकाश मार्ग-गमन आदि नाम दिये जाते हैं। शंकराचार्य ने सिद्धियों का विवेचन और तरह से किया है। किन्हीं रोगियों में विविधा सिद्धि, आत्म-सिद्धि और शरीर-सिद्धि आदि सिद्धियों के नाम दिये हैं। प्रकारान्तर के विवरण भेद-मूलक नहीं। सब एक ही हैं, नाम अलग-अलग हैं।
अपार शारीरिक बल, अद्भुत मनोबल, वाणी से कहे हुए आशीर्वाद और शापों का सफल होना शरीर सिद्धि के ही अंतर्गत आता है। यद्यपि सिद्धियों और चमत्कारों को आत्म-कल्याण में बाधक माना गया है, उससे साधक का अहंकार बढ़ता है और वह योग-भ्रष्ट हो सकता है। इसलिये उनका सार्वजनिक प्रदर्शन वर्जित है, तथापि शाप और वरदानों के द्वारा दूसरों का हित अथवा अहित करने की बात आदिकाल से प्रचलित रही है। जहाँ महापुरुषों का आशीर्वाद और वरदान प्राप्त करने के लिये लोग उनकी सेवा करते थे, अपनी पात्रता सिद्ध करते थे, वहाँ कई बार दुष्ट लोगों को दण्ड देने के लिये शाप का भी आश्रय लिया जाता था।
राजा प्रतापभानु और अरिमर्दन ब्राह्मणों के शाप से ही राक्षसकुल में पैदा हुये थे। परीक्षित को साँप ने काटा और उससे उनकी मृत्यु हो गई, वह भी शापवश ही था। श्रवणकुमार के पिता-माता के शाप का प्रभाव था कि पुत्र वियोग में चक्रवर्ती सम्राट् दशरथ का तड़प-तड़प कर निधन हुआ।
ऐसी सैकड़ों कथायें पुराणों में भरी हैं, वहीं आशीर्वादों द्वारा दूसरों को लाभ पहुँचाने के भी अनेक उदाहरण हैं। गुरु वशिष्ठ के आशीर्वाद से ही राम रावण को परास्त कर सके। यमाचार्य के आशीर्वाद से नचिकेता महायोगी और महर्षि विश्वामित्र के वरदान ने हरिश्चन्द्र को विश्वविख्यात कर दिया। रावण, कुम्भकरण, भस्मासुर, सहस्त्रार्जुन आदि के वरदान ही तो प्राप्त किये थे, योगी की शक्ति और संकल्प बल के अनुरूप एक ही नहीं सैकड़ों व्यक्तियों का कल्याण भी सम्भव है और अकल्याण भी।
अब यह बात पाश्चात्य देश भी मानने लगे हैं। विशुद्ध अन्तःकरण से, आहत अन्तःकरण से निकली हुई वाणी प्रायः असत्य नहीं हुआ करतीं, इसलिये कहा जाता है, कि दीन-दुःखी, पीड़ित, अपंग और पिछड़े हुओं के हैरान नहीं करना चाहिये। कहीं ‘आह’ न लग जाये। महापुरुषों, सन्तों और सच्चे अर्थों में लोक-कल्याण की भावना जाग गई है, जिनकी उनको सेवा करनी चाहिये, उनका न मालूम कौन-सा शब्द वरदान बन जाये। योग- ग्रन्थों में परमात्मा के स्वरूप का वर्णन करते हुये लिखा है- ‘‘वह संकल्प स्वरूप है, अपनी संकल्प शक्ति से ही वह विश्व का पालन, सृजन और विनाश किया करता है।” यद्यपि “प्राणै वा ब्रह्म’ प्राण ही ब्रह्म भी कहा गया है। पर इस प्रथम सूक्ति में कोई परिभाषायी भेद नहीं संकल्प मूल है और प्राण माध्यम जिस प्रकार कोई विचार पहले मस्तिष्क में उठता है, फिर उसकी विद्युत तरंगें सारे शरीर के प्राण को कम्पित करती हुई, हाथ को क्रियाशील होने की प्रेरणा देती हैं और हाथ काम करने लगता है, वहीं सामंजस्य, संकल्प और प्राण का है। मूल प्रेरणा संकल्प की होती है और कर्ता प्राण होता है। संकल्प की स्थिति के अनुरूप एक तरह के प्राण विशिष्ट प्राणों में कैसे परिवर्तित होते हैं, इनका वर्णन फिर कभी करेंगे, यहाँ इतना ही समझ लेना पर्याप्त है कि वायरस या विषाणु का संसर्ग जब किसी अन्य प्रकार के जीवाणुओं से होता है, तो वे उन सारे जीवाणुओं को अपने स्वरूप में बदल लेते हैं, इस तरह दूसरे प्रकार के अणु भी एक ही तरह का काम करने लगते हैं, इसी तथ्य को सिद्ध करके आर्थर कार्नबर्ग और डाक्टर आकोआ ने नोबुल पुरस्कार प्राप्त किया था।
मनुष्य भी परमात्मा की तरह का एक छोटा संकल्प है, जिस प्रकार परमात्मा सारे ब्रह्माण्ड को अपने संकल्प में घेरे रहता है, उसी प्रकार एक व्यक्ति एक निश्चित क्षेत्र के प्राणों को अपने संकल्प द्वारा एक तरह के अणुओं में परिवर्तित कर सकता है। यह संकल्प यदि विध्वंसक हो तो उसकी प्रतिक्रिया भी विध्वंस की हो जाती है और यदि सर्जक संकल्प है, तो वह बुरी परिस्थितियों और वस्तुओं को भी अच्छी परिस्थितियों में बदल सकता है। प्राचीन काल में ऋषि-आश्रमों में जाकर गाय और सिंह एक घाट पानी पी आते थे, वह संकल्प शक्ति का ही चमत्कार था। शाप और वरदान के साथ भी यही संकल्प विज्ञान जुड़ा हुआ है। विचार वेत्ता विद्वान भी संकल्प शक्ति की इस महान महत्ता को स्वीकार करते हैं।
“कोई विश्वास क्यों नहीं करेगा? यदि प्रत्यक्ष प्रमाण मिल जाये।” इस कथन की पुष्टि के लिये हम आपको महाराष्ट्र के जिला जलगाँव के अंतर्गत सोयगाँव ले जाना चाहेंगे। जलगाँव अजिष्ठा मार्ग पर पहुर नामक एक छोटा-सा गाँव है, वहाँ से शेदुर्णी जाने वाली कच्ची सड़क पर 3 मील दूर पर सोयगाँव अवस्थित है। इस गाँव में वाणी सििद्ध का एक अद्भुत चमत्कारी नीम का एक पेड़ है। जिसकी प्रत्येक डाल के पत्ते कड़ुवे हैं, किन्तु एक डाल ऐसी है, जिसमें आज भी इस विज्ञान के युग में भी मीठे पत्ते लगते हैं। अनेकों पत्रकार, नेता और भक्त लोग उसका दर्शन करने सोयगाँव जाते और प्रकृति के इस अद्भुत चमत्कार को देखकर आश्चर्य चकित हो जाते हैं।
इस चमत्कार का रहस्य प्रकृति की विलक्षणता नहीं एक साधु के वरदान का परिणाम है। शेदूर्णी में कड़ोवा महाराज नामक एक सन्त रहते थे। उन्हें भगवान् के दर्शन हुये थे, ऐसा लोगों का विश्वास है, किन्तु पाखण्डी लोग उन्हें द्वेष और तिरस्कार से कटु-कटु कहकर चिढ़ाया करते थे।
एक दिन वे सोयगाँव से गुजर रहे थे। इस नीम के पेड़ के नीचे कई लोग बैठे थे। उन्होंने कड़ोवा महाराज को तंग करना प्रारम्भ कर दिया। उनका कहना था- “यदि तुम्हें भगवान् के दर्शन हुये हैं, तो हमें भी कराओ अन्यथा तुम्हारा ढोंग नहीं चल सकेगा।”
महाराज थोड़ा मुस्कराये और निर्विकार भाव से बोले भाई- ‘‘भगवान् बड़ा शक्तिशाली, भयंकर और विकराल भी है, पहले उसे देखने का साहस और भाव उत्पन्न करो। अचानक देख लोगे तो डर जाओगे, मर जाओगे।” पर वे लोग इतने श्रद्धालु होते, तो छेड़खानी ही क्यों करते?
इस पर महाराज ने कहा- ‘‘अच्छा वह नीम की डाली देखते हो- सबने कहा हाँ। नीम कड़ुवा होता है पर यदि भगवान् है तो आज से इस डाली की पत्तियाँ जब तक यह वृक्ष रहेगा, मीठी ही रहेगी।” इतना कहकर कड़ोवा महाराज वहाँ से चले गये। पीछे लोगों ने चढ़कर पत्तियाँ तोड़ीं और चखीं तो वह सचमुच मीठी निकलीं और यह चमत्कार अब तक ज्यों का त्यों है। लोगों का यह भी विश्वास है कि इन पत्तों को खाने से शरीर की बीमारियाँ दूर होती हैं।
अब एक फकीर की ‘बद्दुआ’ का भी जिक्र समयोचित है। यह घटना स्वतन्त्र भारत के पूर्व की है, किन्तु अभी भी उसका प्रभाव वैसा ही है और उसका परिणाम इस समय पाकिस्तान में कराँची स्थित अमेरिका दूतावास भुगत रहा है।
कहते हैं, इस स्थान पर किसी पीर की मजार थी। उस पीर का एक शिष्य वहाँ बैठकर नित्य-प्रति कुरान शरीफ पढ़ा करता था। वह स्थान काफी दूर तक खुला हुआ था और वहाँ काफी स्थान भी था, इसलिये इमारत बनवाने के लिये श्री सोहराब जी रुस्तम जी पोतवाला ने यह जमीन खरीद ली और नींव खुदाई प्रारम्भ करा दी।
इस पर फकीर ने मना किया- इस स्थान पर इमारत खड़ी न करिये, यह पीर की मजार है और धार्मिक पूजा-पाठ, उत्सव के लिये सुरक्षित है किन्तु पोतवाला जी ने उसकी एक न सुनी। बिल्डिंग बननी प्रारम्भ हो गई।
इस पर उस फकीर ने शाप दिया, इस जमीन पर रहने वाला कभी जीवित और चैन से न रहेगा। यह कह कर वह वह फकीर कहीं अन्यत्र चला गया। कुछ लोग कहते हैं उसने वहीं साँस चढ़ाकर प्राणान्त कर दिया। पर पोतवाला जी ने इन सब बातों का बकवास कहकर मकान का बनवाना जारी रखा।
प्रतिक्रिया चार-छः दिन बाद ही दिखाई देने लगी। एक मजदूर को साँप ने काट लिया और वह मर गया। एक की गर्दन टूट जाने से मृत्यु हो गई। पोतवाला जी ने दुगुनी-तिगुनी मजदूरी दी, इसलिये मकान तो बनता रहा, पर एक-एक कर उनके वंश के लोग मरने लगे। एक दिन उनका भतीजा छत से गिरकर मर गया। उसको बचाने के प्रयत्न में स्वयं पोतवाला जी की मृत्यु हो गई। अब उस मकान का स्वामित्व पोतवाला के पुत्र दोराब जी के हाथ आ गया। वे भी अपने पिता के समान ही हठवादी थे, उन्होंने भी मकान बनाना जारी रखा, किन्तु कुछ ऐसा हुआ कि थोड़े ही दिन में एक जंग लगी खिड़की खोलते समय हाथ कट गया। जंग का जहर सारे शरीर में फैल गया और उनकी मृत्यु हो गई। इस तरह मकान तो बन गया, पर उस पर रहने वाला कोई न बचा।
कुछ दिन बाद चार अंग्रेजों ने उस मकान को किराये पर लिया। लोगों ने मना भी किया, किन्तु उन्होंने कहा- ‘‘न तो कोई आत्मा होती है, न कोई भूत प्रेत, सब अन्ध विश्वास है।” लोगों ने कहा- ‘‘भाई, अन्ध-विश्वास की अपनी सीमा है पर कही-कहीं सच्चाई भी होती है।’’ सच्चाई न हो तो अन्ध-विश्वास फैले कहाँ से?”
उन्होंने किसी की बात न मानी। पर पहले ही दिन चारों ने रात में एक ही स्वप्न देखा कि कोई कह रहा है- ‘‘तुम लोग इस घर में रहे तो तुम्हें हवा-पानी, आग और मिट्टी खा जायेगी।” चारों विस्मित तो हुये पर उन्होंने कहा यह सब अवचेतन मन की प्रतिक्रिया है। दिन भर इस तरह की चर्चा और विचार करते रहने से ही इस तरह का स्वप्न दिखाई दिया है।
किन्तु थोड़ ही दिन बीते थे कि उसमें से एक अंग्रेज लापता हो गया। बाद में पता चला कि वह एक गड्ढे में गिर गया, मजदूरों ने भूल से ऊपर से और मिट्टी पटक दी, जिससे वह उसी में दबकर मर गया। दूसरा अंग्रेज इंग्लैंड लौटते समय हवाई जहाज से गिरकर मर गया। तीसरे के शरीर में आग लग गई और उसकी भी मृत्यु हो गई। चौथे के मुंह से सोड़ावाटर की बोतल फट गई और उसकी भी मृत्यु हो गई। इस तरह चारों को मिट्टी हवा, आग और पानी ने खा लिया।
अब तक यह महान पूरी तरह भुतहा घोषित हो गया था। बाद में उसे गिरवा दिया गया। किन्तु जब अमेरिका ने अपना दूतावास कराँची में खोला तो अधिकारियों ने फिर वही जगह चुनी। लोगों ने मना भी किया पर अमेरिकन न माने, हाँ जब कई अंग्रेजों और उच्च अधिकारियों ने भी इस बात की पुष्टि की तो उस मजार के स्थान को छोड़ कर मशहूर डिजाइनर जे. न्यूतरासे ने दूतावास की बिल्डिंग का नक्शा बनाया। भूतपूर्व प्रेसीडेन्ट मेजर जनरल इस्कन्दर मिरजा और अनेक धार्मिक व्यक्तियों ने उस स्थान की पूजा की। तब से कोई मृत्यु तो नहीं हुई किन्तु जब अमेरिका के राष्ट्रपति जान्सन ने पाकिस्तान का दौरा किया, तो उनका विशेषज्ञ भीतर कमरे में अकेला रह गया। न किसी दरवाजे को साँकल लगी, न ताला फिर भी लाख प्रयत्न करने पर दरवाजे न खुले। तोड़कर ही बाहर के लोग अन्दर जा सके। दूतावास के निवासियों को ऐसी अनेक घटनाओं का सामना अभी भी करना पड़ जाता है। उन्हें कई प्रकार की आवाजें भी सुनाई देती हैं, पर चूँकि वे लोग मजार पर पूर्ण श्रद्धा रखते हैं, इसलिये अब कोई मृत्यु नहीं होती, किन्तु अभी लोगों का ख्याल है कि पाकिस्तान में विदेशनीति में परिवर्तन और अमेरिका की ओर से झंझट उस दूतावास पर लगे शाप का ही परिणाम है।
आशीर्वाद और शाप उच्च आत्माओं, पवित्र आत्माओं के लिये कोई बड़ी बात नहीं पर समझदार लोग उसे लाभान्वित भी हो सकते हैं और किसी दीन-दुखी की ‘बद्दुआ’ से बच भी सकते हैं।
काउड्रे के राजा सर एन्थनीब्राऊ ने सक्स जिले के साधुओं को लूटा-खसोटा और उन्हें निकाल बाहर किया। निकलने वाले अन्तिम साधु ने शाप दिया, उसके परिवार के लोगों की मृत्यु आग और पानी से हुआ करेगी। एक दिन श्रमिकों की भूल से आग लग गई और काउड्र महल जल गया। वाई काउन्ट मान्टेग्यू ह्वाइब नदी में डूब गया। इस परिवार के शेष सभी उत्तराधिकारी ऐसे ही मरे।
आंकड़े देने से बात कड़ुवी न होती तो बताते कि पाश्चात्य देशों में यौन-सदाचार’ की कितनी दुर्गति हुई है। इस दुर्गति के परिणामस्वरूप वहाँ के वैयक्तिक जीवन में रोग-शोक, चिन्ता, दुर्वासनायें पारिवारिक जीवन में क्रोध, ड़ड़ड़ड़, असंतोष और संताप एवं सामाजिक जीवन में अशाँति, उच्छृंखलता, उद्दंडता और शत्रुता का कितना भयानक वातावरण छा गया है। एक छोटा-सा प्रमाण यही है कि अमेरिका जैसे धनी देश के नागरिकों में 100 के पीछे 60 लोगों को नींद आने के लिये दवा की गोली लेनी पड़ती है, लोगों के मस्तिष्क तनाव और चिन्ताओं के बोझ से दबे रहते हैं, अपनी पत्नी पर भी भरोसा नहीं कर सकते वह किस क्षण तलाक दे दे और घर-बार छोड़ कर चली जाये।
अब यह प्रवाह धीरे-धीरे इस देश को भी छूने लगा है। बालकों के चरित्र और सहवास की मर्यादायें ढीली होने से स्वास्थ्य पर तो बुरा असर पड़ा ही है, सामाजिक जीवन में उच्छृंखल मनोवृत्ति का तेजी से विकास होता जा रहा है। वंशानु-संक्रमण की सारी तेजस्विता और स्वाभिमान नष्ट होता जा रहा है। बच्चे छोटी अवस्था से ही आत्म-हीनता (इनफीरियरिटी काम्प्लेक्स) से ग्रसित होते जा रहे हैं। आज का नवयुवक अपने भीतर इतनी आत्म-हीनता भरे हुये रहता है कि वह अपने आपको अच्छी तरह व्यक्त भी नहीं कर सकता।
यह फ्रायड जैसे कामुकता समर्थक दार्शनिकों की ही देन है- जिसने पाश्चात्य देशों को मनो-विज्ञान के नाम पर बहुत प्रभावित किया है और वहीं से वह आँधी अब इस देश में भी बढ़ती आ रही है। मार्क्स ने आर्थिक आवश्यकताओं को प्रधानता दी, जिससे लोगों के जीवन का एक लक्ष्य हो गया- ‘पैसा’। फ्रायड ने ‘काम-सुख’ ही इष्ट’ का सिद्धान्त देकर लोगों को वासना का अपराधी बना दिया। यदि आज के मनुष्य का मानसिक विश्लेषण किया जाय तो मिलेगा कि ईश्वर, आत्मा, ज्ञान, शिक्षा, प्रेम, व्यवहार, आदर, सत्कार, सामंजस्य, सहयोग, लोक-सुधार और पारलौकिक सद्गति आदि की कल्पना उन्हें छू भी नहीं गई- (1)पैसा और (2) काम सुख। यही दो लक्ष्य अब शेष रह गये हैं।
परमात्मा ने शरीर में जहाँ अनेक ऐसे यन्त्र लगाये हैं, जो इस जीवन और पारलौकिक सुखों की प्राप्ति में मदद देते हैं, वहाँ उन ग्रन्थियों की रचना भी की है, जिससे सृष्टि का क्रम न रुके। यहाँ निरन्तर गति और जीवन बना रहे। किन्तु उसकी भी अपनी मर्यादा है, उसे तोड़ने का साहस करना अपने, समाज और परमात्मा तीनों के प्रति विश्वासघात कहा जायेगा।
फ्रायड का कथन है कि ‘काम सेवन’ से ही मनुष्य का जन्म होता है, यह प्रकृति की देन है, इसलिये जो जितना अधिक अपनी वासना की पूर्ति कर सकता है, वह उतना ही सुखी है। वासना की सन्तुष्टि के लिये विवाह मर्यादाओं का उल्लंघन करना पड़े तो भी वह अपराध नहीं है। फ्रायड लिखते हैं कि छोटे बालक के मन में स्वयमेव अपनी माँ के साथ ही (इडिपुस काम्प्लेक्स) और पुत्री की अपने पिता के साथ (इलेक्ट्रा काम्प्लेक्स) काम सम्बन्ध स्थापित करने की इच्छा जाग उठती है। पुत्र अपनी माँ से मिलना चाहता है, किन्तु जब वह देखता है कि उसका पिता यह स्थान पहले ही ग्रहण किए हुए है, तो उसके मन में पिता के प्रति घृणा और दुर्भाव पैदा होने लगता है। घृणा और विद्वेष कई बार इतने भयंकर हो उठते हैं कि वह अपने पिता को मार डालने तक की बात सोचने लगता है, उसी प्रकार जब वह माँ के साथ काम सम्बन्ध स्थापित रखने के वंचित रखा जाता है, तो उसके अन्दर आत्म-हीनता की भावना विकसित होने लगती है। फ्रायड ने व्यक्तित्व के विकास और सभ्यता के मार्ग में इस प्रकार की आत्म-हीनता को अवरोध माना है और यह विश्वास व्यक्त किया है कि यदि ‘काम-वासना’ की पूर्ति को बिल्कुल स्वच्छन्द कर दिया जाये, तो मनुष्य सभ्यता और संस्कृति के चरम बिन्दु तक पहुँच सकता है। फ्रायड यह नहीं मानते कि इस तरह का विचार केवल एबनार्मल (अर्थात् कुछ असाधारण) लोगों में ही उठता है वरन् वे इसे नार्मल अर्थात् सहज वृत्ति मानते हैं।
अबोध बालक में इस तरह का यौन आकर्षण होना अयुक्ति ही नहीं बहुत हास्यास्पद बात है। भारतवर्ष में मृत्यु पर्यन्त माता के प्रति लोगों में इतनी पवित्रता होती है कि ऐसे गंदे और फूहड़ विचार मस्तिष्क में आते तक नहीं। पिता-माता के प्रति दुर्भाव आना सहज वृत्ति रही होती तो श्रवण कुमार अपने माता-पिता को कंधों पर चढ़ाते हुए न घूमता। राम दशरथ की बात ठुकरा देते और अयोध्या में गृह-युद्ध की स्थिति की बात पैदा कर देते। दुर्योधन जैसा अत्याचारी शासक भी अपने माता-पिता का उतना ही भक्त था, जितना किसी आदर्श संतान हो होना चाहिये। भरत कुमार के लिये तो वन में कोई अवरोध नहीं था पर उसने अपनी माँ की उपासना देवताओं की तरह की।
फ्रायड के इस थोथे सिद्धाँत की वास्तविकता प्रकट करते हुये, श्री इलाचन्द जोशी लिखते हैं- “फ्रायड अपनी सुन्दरी माता आमेलिया फ्रायड का पहला पुत्र था। आमेलिया के पति याकोब फ्रायड ने यह दूसरा विवाह किया था। जब फ्रायड का जन्म हुआ था, तब आमेलिया की आयु कुल 21 वर्ष की थी, प्रथम सन्तान के प्रति माँ का भी अत्यधिक स्नेह और लाड़-प्यार होता है, फ्रायड जन्मजात प्रतिभाशाली और तीव्र अनुभूतिशील बालक था। आश्चर्य नहीं कि इस प्रीकोशस बालक के मन में सचेत ही रूप में अपनी स्नेहशीला और सुन्दरी माता के प्रति बहुत छोटी अवस्था में ही तीव्र यौनाकांक्षा जाग उठी हो। फ्रायड कुतूहली और ईर्ष्यालु स्वभाव का भी था। पिता उसे कई बार डाँटता भी था, इसलिये पिता के प्रति दुर्भाव हो जाना स्वाभाविक हो सकता है।
अपने जीवन की इसी संस्कार जन्य कमजोरी को लगता है, फ्रायड ने एक सर्व-साधारण सिद्धान्त मान लिया और उसे ही सत्य सिद्ध करने में जीवन भर लगा रहा। मनुष्य जीवन की साधारण गति अधोमुखी होती ही है, सो उसे समर्थक भी मिलते गये और देखते देखते ‘फ्रायड के सेक्स’ ने सारे पाश्चात्य समाज को अपनी कुण्डली में बाँध लिया।
नैपोलियन 25 वर्ष की आयु तक काम-सुख तो क्या नारी के प्रति भी आकृष्ट नहीं हुआ था। न्यूटन के मस्तिष्क में यौनाकर्षण उठा होता तो उसने अपना बुद्धि-कौशल सृष्टि के रहस्य जानने की अपेक्षा अपरिमित काम-सुख प्राप्त करने में झोंक दिया होता। भीष्म और हनुमान प्रतिज्ञा बद्ध हो सकते हैं, पर न्यूटन के सामने तो वैसी कठिनाई थी ही नहीं। जन्मजात प्रतिभायें अधोमुखी ही नहीं ऊर्ध्वमुखी भी होती रही हैं और उनके काम-सुख की अपेक्षा अधिक सुख लोगों को मिलता रहा है। हमारे देश में तो सच्चे और शाश्वत सुख की प्राप्ति में काम-वासना को प्रधान बाधा माना गया है। रामकृष्ण परम हंस विवाहित होकर भी योगियों की तरह रहे, वे सदैव आनंद विह्वल रहते थे। स्वामी रामतीर्थ और भगवान् बुद्ध ने तो ड़ड़ड़ड़ सुख के लिये तरुणी पत्नियों का परित्याग तक कर दिया था। महर्षि दयानन्द ब्रह्मचारी होकर जिये। महात्मा गाँधी ने 36 वर्ष की अवस्था के बाद काम-वासना के बिल्कुल नियन्त्रित कर दिया था तो भी उनके जीवन में प्रसन्नता का फव्वारा बहता रहता था, तब फिर क्या ‘काम-सुख को प्रधान जीवन सुख और लक्ष्य’ की मान्यता दी जा सकती है।
‘रेतस’ को ऊर्ध्वगामी बनाकर जो उल्लास शक्ति प्रसन्नता प्रमोद और आनन्द मिलता है, योग-शास्त्रों डडडड उसकी बड़ी प्रशंसा की गई है और उसे अनवरत डडडड सुख से भी बढ़कर बताया गया है। यौनाकर्षण डडडड क्षणिक सुख की प्रेरणा देता है, इस प्रकार की तृप्ति आँशिक सुख भले ही मिल जाता हो पर बाद में शरीर और आत्मा की दुर्गति ही होती है। मनुष्य के विचार और क्रिया-कलाप सब निम्नगामी होते चले जाते हैं, व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में वह विद्रूप और उपद्रव खड़े हो जाते हैं, जिनकी चर्चा प्रथम पंक्तियों में गई है।
यह खेद करने से पूर्व कि हमारा वास्तविक विकास नहीं हो रहा है, हम विकास से वंचित हैं, प्रगति के अर्थ में कुछ भी आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं- यह सोचना चाहिए कि हमारी उन्नति और प्रगति हो क्यों नहीं हो रही है, हम उन्नति से वंचित हैं क्यों?
यदि अपनी स्थिति पर खेद करते रहने के बजाय उसके कारणों वर विचार किया जाये, तो पता चलेगा कि हमने जो विचार और कार्य पद्धति अपना रक्खी है, वह ही ठीक नहीं है और इसीलिये हम उन्नति और विकास से वंचित बने हुये हैं। हम सोचते यह हैं कि संसार की सारी सम्पदा, सारा वैभव और सारे सुख-साधन हमें ही प्राप्त हो जाये। हमें हास-विलास और आमोद-प्रमोद की परिस्थितियाँ मिले, हम समाज में सबसे अधिक धनवान् और शक्तिशाली बने, समाज में हमारी पूजा प्रतिष्ठा हो।
न केवल इस प्रकार सोचते ही हैं, बल्कि उसके अनुरूप अपने आचरण का भी व्यवहार करते हैं। व्यापार में अधिक से अधिक मुनाफा कमाना चाहते हैं। नौकरियों में दूसरों को पीछे ढकेल कर आगे बढ़ जाना चाहते हैं। सार्वजनिक स्थानों पर दूसरों की चिन्ता नहीं करते। जहाँ भी रहते और भी जाते हैं, अपनी ही सुख-सुविधा और लाभ पर ध्यान रखते हैं। दूसरे की सुविधा-असुविधा अथवा सुख-दुख का कोई ध्यान नहीं रखते। हमारे ये स्वार्थ-परक विचार और कार्य ही हमारी उन्नति एवं प्रगति में बाधक बने हुए हैं।
हम यह नहीं सोच पाते कि हम केवल एक अकेले व्यक्ति नहीं हैं। हमारा अस्तित्व सामाजिक है। हमारा सर्वस्व अभिन्न रूप से हमारे समाज के साथ जुड़ा हुआ है। जितनी देर तक हम अपने को एक अलग इकाई मानकर अपनी उन्नति और विकास के लिये सोचते और कार्य करते रहेंगे, हमें निराश ही रहना पड़ेगा। जब तक हमारा जीवन-कोण और कार्य-पद्धति समष्टिगत न होकर व्यक्तिगत रहेगा, हमें अपनी स्थिति पर इसी प्रकार खेद करते रहने पर विवश होना पड़ेगा।
हमें न केवल सोचना ही होगा, बल्कि यह आस्था लानी होगी कि हमारा जीवन व्यक्तिगत नहीं, समष्टिगत है। हमें केवल अपने को आगे रखकर सोचने का कोई अधिकार नहीं है। समष्टिगत सोचना और उसी के अनुसार आचरण करना ही हमारा कर्तव्य भी है और अधिकार भी। जिस दिन से हम अपनी यह आस्था बनाकर उसके आधार पर अपने आचरण का सुधार कर लेंगे, हमारी प्रगति के द्वार आपसे आप खुलने लगेंगे।
हमारा जीवन समाज का दिया हुआ है। वह हमारी व्यक्तिगत सम्पत्ति नहीं है। समाज की एक धरोहर है। इसका उपयोग समाज के कल्याण और उसके हित के लिये ही होना चाहिये। इस तथ्य को तब ही चरितार्थ किया जा सकता है, जब हम यह आधार लेकर चलें कि हमारा जीवन अपने व्यक्तिगत रूप में भले ही कुछ कष्टपूर्ण क्यों न हो पर दूसरों के लिये यह हितकारी हो। दूसरों का सुख और दूसरों की सुविधा ही हमारी सुख-सुविधा है और दूसरों का दुख-क्लेश हमारा दुख-क्लेश है- यह परमार्थ भाव मनुष्य में जिस व्यक्तित्व का विकास करता है, वह बड़ा आकर्षक होता है। इतना आकर्षक कि समाज की शक्ति और विकास मूलक सद्भावनायें आपसे-आप खिंचती चली आती हैं। पूरा समाज उसका अपना परिवार बन जाता है, कुटुम्ब के रूप में बदल जाता है। ऐसी बड़ी उपलब्धि मनुष्य को किस ऊँचाई पर नहीं पहुँचा सकती।
किन्तु यहाँ पर भी एक सावधानी बरतने की आवश्यकता है। बहुत बार लोग प्रारम्भ में सामाजिक बने रहते हैं। समाज के लिये सोचते और बहुत कुछ करते हैं, किन्तु जब उस परमार्थ के परिणामस्वरूप किसी पद पर पहुँच जाते हैं, तो स्वार्थ में पड़ जाते हैं। लोभ में आकर अपने लिये संचय एवं संग्रह करने लगते हैं। वे समाज के उस अनुग्रह को अपना अधिकार और अपनी सम्पत्ति मानकर चलने लगते हैं। बस यहीं से उनका पतन प्रारम्भ हो जाता है। आवश्यकता इस बात की है कि कोई भी शक्ति, सम्पदा, पद अथवा प्रतिष्ठा, वह चाहे सद्व्यवहार के परिणामस्वरूप समाज के बीच से अर्जित हुई हो अथवा संयोगवश उत्तराधिकार में मिल गई हो, कभी भी अपनी व्यक्तिगत सम्पत्ति न मानी जानी चाहिये।
किसी भी क्षेत्र में पाई हुई शक्ति, पद अथवा प्रतिष्ठा, होती तो अपने ही हाथ में है, उसका आवश्यकता भर व्यक्तिगत रूप में उपयोग भी किया जा सकता है तथापि यह कभी न भूलना चाहिये कि उस पर अन्ततः अधिकार समाज का ही है। उसे उसके लाभ से वंचित रखकर केवल अपने तक सीमित कर लेने का हमें कोई अधिकार नहीं है। और यदि हम ऐसा करते हैं, तो गलती करते हैं, अनाधिकार चेष्टा करते हैं, जिसका दण्ड हमें अधिकार-वंचना के रूप में किसी समय भी मिल सकता है।
हम जियें, खूब हँसी-खुशी और आनन्दपूर्वक जियें, यह ठीक भी है और इसका हमें अधिकार भी है। तथापि हमें अपनी हँसी-खुशी में दूसरों को भी भाग देना चाहिये। हम तो आमोद प्रमोद और आनन्द-मंगल मनाते चलें और हमारे आस-पास का समाज दुःख के आँसुओं से भीगता रहे, तो हमारी हँसी-खुशी एक सामाजिक अपराध है। हमें अपने व्यक्तिगत आमोद-प्रमोद में इस सीमा तक नहीं डूबा रहना चाहिये कि आस-पास का क्रन्दन ही सुनाई न दे। आस-पास के क्रन्दन के बीच भी जो उपेक्षा-भाव से खुशियाँ मनाता रहता है, उसे तो क्रूर और अकरुण व्यक्ति मानना होगा। ऐसे समाज के विरोधी व्यक्ति को समझ लेना चाहिये कि उसकी यह क्रूर पाशविक वृत्ति शीघ्र ही उसकी सारी हँसी-खुशी छीन लेगी। हँसी-खुशी तो उसी की स्थायी और सुरक्षित रह पाती है, जो अपने साथ दूसरों को भी उसमें भागीदार बनाकर मंगल मनाया करता है।
संसार के अन्य समाजों की बात तो नहीं कही जा सकती पर अपने भारतीय समाज की यह पद्धति कभी नहीं रही कि दूसरों के कष्ट-क्लेशों की उपेक्षा करके आनन्द मनाया जाये। आनन्द जीव की सहज प्रवृत्ति है। यह सुर-दुर्लभ मानव शरीर मिला ही अनंत आनन्द को पाने और मनाने के लिये। फिर भी एकाकी आनन्द मनाने का निषेध भी है। दूसरों से साथ मिलकर ही आनन्द का उपभोग वास्तविक उपभोग है। अन्यथा वह एक अन्याय है, अनुचित है और चोरी जैसी बात है। हमें आनन्द का संभोग मिला है, उसकी सुविधा उपलब्ध है, तो हमें उसे जन-जन को साथ लेकर मनाना चाहिये। भारतीय संस्कृति और धर्म में सामूहिक मेले, त्यौहार, पर्व और पारिवारिक उत्सव मिल-जुलकर मनाने का नियम है। नीतिकारों ने व्यक्तिगत एकाकी आनन्दोपभोग को अनुचित कहा है। भारतीय संस्कृति के अंतर्गत जिन पर्वों, त्यौहारों मेलों एवं उत्सवों की व्यवस्था की गई है, उन सबको सामाजिक आधार पर मनाने का निर्देश भी दिया गया है।
इस सामूहिक आनन्दोपभोग के पीछे एक बड़ा कल्याणकारी मंतव्य सन्निहित है। वह यह कि इससे समाज के संगठन, सद्भावना, शक्ति और पारस्परिक प्रेम की वृद्धि होती है। लोगों में बन्धुत्व की भावना का विकास होता है। समाज को पीछे धकेलने वाली ईर्ष्या-द्वेष और स्वार्थ की विकृतियों का हतोत्साहन होता है। समाज में अमन चैन और सुख-शाँति का वातावरण स्थिर होता है। व्यक्ति व्यक्ति और व्यक्तियों के साथ पूरा समाज उन्नति और प्रगति की और अग्रसर हो चलता है। संसार में प्रतिष्ठा और नेकनामी का गौरव प्राप्त होता है।
यदि हमारी उन्नति नहीं हो रही है, हम विकास के पथ पर नहीं बढ़ पा रहे हैं, तो इसका कारण यही हो सकता है कि हम सम्पूर्ण समाज को सामने न रखकर केवल अपने लिये ही सोचते और आचरण करने की गलती करते हैं। उन्नति और विकास की आधार-शिला सामूहिक भावना है। व्यक्तिगत विचार संकीर्णता का द्योतक है और संकीर्ण व्यक्ति संसार में कभी उन्नति नहीं कर सकता। यदि उन्नति की इच्छा यथार्थ है और निश्चय ही हम जीवन में कुछ उल्लेखनीय कार्य करना चाहते हैं, तो व्यक्तिगत- के संकीर्ण दायरे से बाहर आकर समष्टिगत भावों में विस्तार लाना होगा। हमें वहीं कुछ करना होगा जो रचनात्मक और समाज के लिये हितकारी हो। हमें केवल अपने व्यक्ति के लिये नहीं सम्पूर्ण समाज के लिये जीना होगा और यह मानकर चलना होगा कि हमारे पास आज जो कुछ है, वह सब समाज के लिये उसका हित करने के लिये ही है और आगे भी भविष्य में जो कुछ उपलब्ध होगा, वह सब भी समाज का अनुग्रह होने से उसी का होगा। जिसे उसी के हित और कल्याण में लगाना होगा।
इस प्रकार जिस दिन हमारे प्रयत्नों और प्रवृत्तियों का आधार ‘बहुजन हिताय’ की भावना बन जायेगी, हमें अपनी प्रगति एवं विकास के लिये प्रवंचित न होना होगा। समाज स्वयं ही हमें हाथों-हाथ ऊपर उठा लेगा। हमें सहयोग और सहायता की कमी न रहेगी। हम न स्वयं एकाकी रह जायेंगे और न हमारे प्रश्न और हमारी समस्यायें ही हमारी मात्र रह जायेंगी। वे सब की, पूरे समाज की बन जायेंगी और पूरा समाज उन्हें हल करने में हमारा साथ देने लगेगा। इसीलिये तो वेदों में स्थान-स्थान पर कहा गया है-
‘समानी प्रया सहवोऽन्नभागः’- तुम्हारे खाने-पीने के स्थान और भाग एक जैसे हों। ‘समानी व आकृतिः समानो हृदयानिव’-तुम्हारे हृदय की संकल्प भावनायें एक जैसी हों। ‘संगच्छह्मम् सम्बद्ध्वम्”-तुम्हारी गति और वाणी में एकता हो- आदि-आदि।
इस प्रकार सामूहिक और सामाजिक भावना को जीवन में स्थान देने पर व्यक्ति एवं समाज दोनों की उन्नति एक साथ और एक समान होती चलती है। अस्तु, व्यक्तिगत विकास के लिये भी सामाजिक वृत्ति का विकास करना होगा।
समाज से विलग अस्तित्व नहीं :-
कौत्स्य से उनके एक गुरुभाई नीरभ्र बहस कर रहे थे। कौत्स्य का मत था कि संन्यासियों तथा संसारियों, सभी को अपने जीवन में लोक-सेवा तथा परमार्थ को प्रमुख स्थान देना चाहिये, इसी से जीवन का वास्तविक उद्देश्य सिद्ध होता है। नीरभ्र का मत था कि अपने आत्म-कल्याण, पूजा, उपासना द्वारा आत्मा की मुक्ति के प्रयास को जीवन में प्रथम स्थान देना चाहिये। एक दूसरे को समझाने का, अपनी बात प्रमाणित करने का प्रयास चल रहा था।
अन्त में नीरभ्र ने तर्क प्रस्तुत किया- “आत्मा को बन्धन मुक्त करना परम लक्ष्य है। लोक सेवा आदि तो अज्ञान जनित माया की भ्रान्तियाँ हैं।”
कौत्स्य का उत्तर था- “आत्मा तो परमात्मा का अंश होने के नाते सहज मुक्त है। उसे मुक्त कराने की कल्पना भी क्या माया की भ्राँति नहीं?”
इतना विवाद हो लेने के पश्चात भी कोई पक्ष संतुष्ट नहीं हुआ। आश्रम की परिचारिका दीपा ने सारी बातें सुनी और जाकर आचार्य देवदत्त से कह दीं। देवदत्त बहुत देर तक उस पर विचार करते रहे फिर कुछ सोचकर एक ओर चल दिये।
सायंकालीन आरती समाप्त हुई और सभी स्नातक भोजनशाला की और चल पड़े। नियमपूर्वक सबको भोजन परोसा गया, एक नीरभ्र ही ऐसे विद्यार्थी थे, जिनके पास अब तक भी थाली नहीं पहुँची थी। हाँ, इसी समय परिचारिका ने एक पत्र दिया- नीरभ्र ने उसे खोलकर पढ़ा- आचार्य देव के अक्षर थे, लिखा था- “यदि अन्न देने वाला अन्न देने से इन्कार कर दे तो क्या आप अपना विद्याभ्यास जारी रख सकते हैं? क्या मुक्ति आपका जीवन ध्येय है औरों का नहीं? यदि हाँ तो क्या आपका यह उत्तरदायित्व नहीं कि आप समाज की वह सेवा करने के लिये तत्पर हों, जिससे वह भी उस शाश्वत लक्ष्य का अनुगमन कर सके?”
जो बात तब समझ में न आई थी, वह अब आ गई और उसके साथ ही भोजन का थाल भी।
सारे प्राणियों को आत्मवत् मानने वाले को पण्डित कहा गया है। इसी प्रकार अन्य प्राणियों को अपने से भिन्न मानने वाले को अज्ञानी मानना होगा। पण्डित, विद्वान अथवा बुद्धिमान् अपनी आत्मा का विस्तार करने वाला होता है। अज्ञानी अपनी आत्मा को केवल अपने शरीर तक ही सीमित रखता है। पण्डित का लक्षण है, आत्म-विस्तार और अज्ञानी का संकीर्णता।
संसार में कदाचित् ही कोई ऐसा मनुष्य हो, जो पंडित न बनकर अज्ञानी बनना चाहेगा। तथापि अपनी इस कामना में कोई-कोई ही सफल हो पाते हैं, नहीं तो बहुतायत ऐसे लोगों की है, जो इच्छा तो पण्डित बनने की रखते हैं, लेकिन बनते जाते हैं अज्ञानी। इसका कारण यह है कि वे आत्म-विस्तार नहीं कर पाते। आत्म-विस्तार में कौन तत्व बाधक होता है, इस बात को न जानने के कारण ही उनका आत्म-विस्तार स्थगित रहता है और वे पण्डित बनने के स्थान पर अज्ञानी बनते जाते हैं।
आत्म-विस्तार में बाधक तत्व मुख्यतः अहंकार ही है। अहंभाव मनुष्य को पराकाष्ठा का संकीर्ण एवं स्वार्थी बना देता है। संसार का सबसे व्यापक तत्व परमात्मा ही है। इसीलिये वह सबसे महान और सबसे श्रेष्ठ माना जाता है। यदि परमात्मा भी सर्वव्यापक न होकर एक देशीय होता, तो उकसा उतना मान-सम्मान न होता, जो अब हो रहा है। परमात्मा किसी को अपने से भिन्न मानने की संकीर्णता कभी नहीं करता। वह न केवल सबको अपनी प्रिय सन्तान की तरह पालता ही है, बल्कि सबको अपनी चेतना से ओत-प्रोत बना देता है। हम मनुष्यों पर तो उसकी विशेष कृपा है। उसने वे सारे तत्व और सारी शक्तियाँ मनुष्य में बीज रूप से भर दी हैं, जो उसमें स्वयं विद्यमान है।
अपनी उन शक्तियों का विकास एवं विस्तार करके मनुष्य स्वयं भी उस सर्वशक्तिमान के समान ही बन सकता है और जिन बुद्धिमान मनीषियों ने ऐसा किया है, वे ऋषि मुनियों की स्थिति में पहुँच कर उसके समकक्ष बने हैं। जिस प्रकार परमात्मा अपनी सारी शक्ति, सारी ड़ड़ड़ड़ लोक-कल्याण और जनहित के लिये वितरित करता रहता है, उसी प्रकार उक्त मनीषियों एवं महात्माओं ने भी अपने गुण, अपनी विद्या, अपनी विभूतियाँ, अपनी कृपा, करुणा और सद्भावनायें संसार के हित में वितरित कर अलौकिक मान एवं आदर प्राप्त किया है। उन्होंने अपनी इस उदारता के बल पर ही ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ की भावना का ड़ड़ड़ड़ और पण्डित बने।
यदि उस सर्व-शक्तिमान परमात्मा में ‘अहंकार’ दोष होता, तो निश्चय ही वह भी संकीर्णता के दोष से दूषित होकर अपनी सर्वशक्तिमत्ता, सर्वव्यापकता को सर्वस्वामित्व की विशेषता खो देता। तब उसकी तो पूजा और प्रतिष्ठा नहीं ही होती, साथ ही संसार की रचना नष्ट हो जाती। संसार की स्थिति परमात्मा की उस निरहंकार भावना पर ही निर्भर है, जो उदारता के रूप उसकी दान-वृत्ति में प्रकट होती है।
अहंकार मनुष्य को इतना स्वार्थी बना देता है कि वह न केवल अपने गुण और अपनी विभूतियाँ अपने तक ही सीमित रखता, उनका लाभ किसी दूसरे को नहीं देता डडडड बल्कि अपने अहंकार की तुष्टि के लिये दूसरों की विशेषताओं तथा विभूतियों का भी शोषण करने का प्रयत्न करता है। यह स्वार्थपूर्ण निकृष्ट प्रयत्न समाज एवं ड़ड़ड़ड़ के विकास में बहुत घातक सिद्ध होता है। यदि ऋषि-मुनियों और मनीषियों में अहंकार अर्थात् केवल अपने तक सीमित रहने की संकीर्णता होती और वे अपनी ड़ड़ड़ड़ ज्ञान-विभूति को लोक-कल्याण के लिये वितरित न डडडड केवल निज के स्वार्थ के लिये अपने पास ही संग्रह डडडड रहते, तो मानव-जाति का जो विकास आज दृष्टिगोचर होता है, वह किस प्रकार सम्भव होता। अथवा ड़ड़ड़ड़ ही ज्ञानी, विज्ञानी, विद्वान् तथा वैज्ञानिक जन अपने को अहंकार-वश अपने तक ही सीमित रख लें और लोक-कल्याण के लिये उसका वितरण न करें, तो क्या मानव-जाति की प्रगति यहीं पर ही रुककर न रह जाये। तब प्रगति का स्थगन पतन के सिवाय और क्या हो सकता है।
जगत्-पिता परमात्मा जिस प्रकार स्वयं निरहंकार और उदार है, निश्चय ही वह चाहता है कि उसकी संतानें भी उसी की तरह निरहंकार और उदार बने। ऐसा पिता कौन होगा, जो यह न चाहें कि उसकी सन्तान भी उसी की तरह गुणवान, कीर्तिवान व श्रेयवान न बने। जीव को अपनी चेतना और शक्तियाँ देने में उसका उद्देश्य यही है कि वह भी उसी की तरह लोक-कल्याण में उनका यापन करे। किन्तु खेद है कि मनुष्य अहंकारवश उसके उस उद्देश्य के विपरीत काम करता दिखलाई देता है। निश्चय ही जो परमात्मा के उद्देश्य के विरुद्ध चलता है, उसकी इच्छा के विपरीत आचरण करता है, वह उस परम प्रभु का द्वेषी है। इसी प्रकार अहंकारी व्यक्ति को नास्तिकता का लाँछन भी लगाया जा सकता है। नास्तिक वह नहीं, जो परमात्मा पर विश्वास नहीं करता अथवा जो उस पर निर्भर नहीं रहता। बल्कि वास्तविक नास्तिक वह है, जो परमात्मा में आस्था प्रकट करता हुआ भी उसके विरुद्ध आचरण करता है।
अहंकारी न केवल प्रभु विरोधी ही होता है, वह समाज विरोधी भी होता है। अहंकारी का असहयोगी होना स्वाभाविक है जो सब कुछ अपने लिये ही करना चाहेगा, सब कुछ अपने लिये ही संग्रह करेगा, केवल अपनी ही सुख-सुविधा पर दृष्टि रखेगा, वह दूसरे के जीवन-यापन, उसकी उन्नति और प्रगति में किस प्रकार सहायक तथा सहयोगी हो सकता है? समाज का अस्तित्व ही पारस्परिक सहयोग, प्रेम और मैत्री-भावना पर टिका हुआ है। यदि इस भावना का सर्वथा अभाव हो जाये, तो हर मनुष्य अकेला रह जाय। ऐसी दशा में उसके दुःखों का पारावार ही न रह जाये। आज भी संसार में जितने दुःख, क्लेश और संघर्ष दिखाई देते हैं, उनका कारण मनुष्य की अहंमन्यता ही है। यदि इस दोष का परिमार्जन कर दिया जाय, तो संसार के बहुत से दुःख और क्लेश आपसे-आप शमन हो जायें।
मनुष्य के यह सोचने का हेतु अहंकार ही है कि मैंने अपना विकास आप ही किया है, उसने समाज से कोई सहयोग नहीं लिया। यदि मनुष्यों में सहयोग की सामाजिक भावना न रही होती, तो कोई भी मनुष्य उन्नति न कर पाता। यह मानव-समाज भी पशुओं के समूह के समान ही अविकसित पड़ा रहता। उदाहरण के लिये रामू नाम के उस लड़के को लिया जा सकता है, जो दैवयोग से भेड़ियों के बीच पला था और बाद में किन्हीं शिकारियों के हाथ लग गया था। वह लखनऊ के एक अस्पताल में लाया गया। यद्यपि रामू की आयु लगभग आठ दस वर्ष की हो चुकी थी लेकिन उसमें मनुष्यों के कोई लक्षण विकसित न हुए थे। उसके सारे लक्षण भेड़ियों जैसे थे। वह उन्हीं की तरह चारों हाथ-पैरों पर चलता था। उन्हीं की तरह गुर्राता और आवाज करता था। उन्हीं की तरह कच्चा माँस खाना पसन्द करता था।
रामू के यह लक्षण इस बात का प्रमाण हैं कि मनुष्य का विकास स्वयं नहीं होता। समाज की सहायता और सहयोग से ही वह मनुष्य बन पाता है। ऐसी दशा में यह अहंकार करना कि किसी ने अपना विकास स्वयं किया है। वह बिना किसी की सहायता के अपने पैरों आप खड़ा हुआ, अज्ञान के सिवाय और क्या है। पशुओं के बच्चे तो पैदा होने के कुछ समय बाद ही आत्म-निर्भर होने लगते हैं, किन्तु मनुष्य के बच्चे को आठ-दस वर्ष की अवधि तक सर्वथा दूसरों के सहयोग पर निर्भर रहना पड़ता है। यदि उसे प्रारम्भ में सहयोग से वंचित कर दिया जाय, तो वह जीवित तक नहीं रह सकता, फिर स्वयं सारा विकास कर लेना बहुत दूर की बात है। किन्तु अहंकारी व्यक्ति इस तथ्य को स्वीकार करने के लिये तैयार नहीं होता। यह समाज के प्रति उसकी कृतघ्नता के सिवाय और क्या कहा जा सकता है?
अहंकार का दोष मनुष्य को साधारण मनुष्यता तक से गिरा देता है। इसकी वृद्धि मनुष्यों को पिशाच बना देती है। अहंकार असुरता का प्रधान लक्षण है। मनुष्य में जितना अधिक अहंकार होता है, उसमें उतनी ही गहरी आसुरी वृत्ति होती है। दृष्टता का जन्मदाता अहंकार को ही माना गया है। अपराधियों को दुष्कर्म की प्रेरणा देने वाले तत्वों में अहंकार का स्थान प्रमुख है। चोर, डाकू जो दूसरों को लूटते और हानि पहुँचाते हैं, उसकी प्रेरणा में धन का लोभ कम होता है, अहंकार का ही हाथ अधिक होता है। यदि किसी उपाय से अपराधियों के मस्तिष्क से अहंकार का तत्व निकाला जा सके, तो इसमें सन्देह नहीं कि वे शीघ्र अच्छे और भले आदमी बन जायें।
अहंकार की वृत्ति मनुष्य को आततायी बना देती है। सिकन्दर, तैमूर, नादिरशाह आदि जो भी महत्वाकाँक्षी आक्रमक हुए हैं और जिन्होंने अकारण ही मानव-जाति का संहार किया है, वे अहंभाव से ही पीड़ित रहे हैं। यदि उनमें अहंभाव की प्रधानता न रही होती, तो वे अपनी शक्तियों को किन्हीं ऐसे कामों में लगाते, जिनसे मनुष्य-जाति का हित साधन होता। उनके अहंकार ने उन्हें उन कर्मों की प्रेरणा दी, जिनके कारण वे इतिहास के काले पृष्ठों पर अंकित किये गये। कितना अच्छा होता कि वे संसार विजय करने का विचार करने से पूर्व अपने अहंभाव को विजय करते- ऐसा करने पर उन्हें जिन कर्मों की प्रेरणा मिलती, उन्हें देव कोटि के मनुष्यों में पहुँचा देते।
मनुष्य में कितने ही महान और कितनी ही संख्या में गुण क्यों न भरे हों, यदि उसमें एक अहंकार का दोष मौजूद है, तो वह उसके सारे गुणों को झूठा बना देगा। उनका विकास रुक जायेगा और उसके गुणों से संसार को तो कोई लाभ नहीं होगा, साथ ही वह स्वयं भी उनका कोई लाभ न उठा पायेगा। अहंकार गुणी से गुणी व्यक्ति को भी अगुणी बना देता है। मनुष्य के दोषों में जो दोष परमात्मा को सबसे अधिक अप्रिय है, वह है ‘अहंकार’ परमात्मा अपने जीवों को बन्धन मुक्त देखना चाहता है, अहंकार उसके लिये बन्धनों का सृजन करता है। इसलिये जब परम प्रभु जीवों पर दया करना चाहता है, तो डडडड उनके अहंकार को सबसे पहले नष्ट करता है। उनका डडडड जब किसी सफलता से मतवाला होने लगता है, तब वह ऐसा उपाय कर देता है कि उसका सारा अहंकार चूर हो जाता है।
नारद, विश्वामित्र, दुर्वासा आदि ऋषियों और ड़ड़ड़ड़ नल, ययाति आदि राजाओं का अहंकार उसने बात की बात में नष्ट करके उनकी लौकिक एवं पारलौकिक प्रगति को निरापद बना दिया। अहंकार पर आघात को परमात्मा की महती कृपा ही मानना चाहिये और समझ लेना चाहिये कि परमात्मा ने ऐसा कर उसके उस मानसिक विरोध का शमन कर दिया है, जो किसी समय भी उसको पतन के गहरे गड्ढे में गिरा सकता था।
निःसन्देह, जिसने अपने अहंकार को नष्ट कर डाला है, अपने आचरण में नम्रता, विनय और सहानुभूति का समावेश कर लिया है, उसने मानो अपने लोक और परलोक दोनों का मार्ग निष्कंटक बना लिया है। अहंकार के नष्ट होते ही मनुष्य का आत्म-विस्तार प्रारम्भ हो जाता है और शीघ्र ही वह ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ की भावना में निमग्न होकर जीवन में ही परमपद का आनंद पाने लगता है। निश्चय ही निरहंकार व्यक्ति, पंडित, विद्वान और बुद्धिमान ही होता है, क्योंकि वह अपनी आत्मा में सब ड़ड़ड़ड़ आत्मा और सब की आत्मा में अपनी आत्मा का दिव्य दर्शन करता है।
अटलांटा को जूपिटर ने आशीर्वाद दिया था, तुझसे तेज कोई भी न दौड़ सकेगा, इसलिये उसने अहंकारवश यह घोषणा कर दी, “जो उसे दौड़ में परास्त करेगा, वह उसी से विवाह करेगी।”
बहुत से लोग आये पर वे अटलांटा को दौड़ में हरा न सके। एक मनुष्य ने जूपिटर (भगवान्) से प्रार्थना की, “हे प्रभु! मुझे अटलांटा से प्रेम है, किन्तु उसकी तरह दौड़ने की शक्ति नहीं है। मुझे वह शक्ति दो प्रभो! “मूर्ति बोली- ‘‘पुत्र! यह वरदान तो अटलांटा को ही मिला है, पर हाँ एक उपाय है- अहंकारी व्यक्ति को विवेक नहीं होता, तुम दौड़ के रास्ते में कुछ स्वर्ण मुद्रायें बिखेर देना फिर जीत तुम्हारी होगी।” उस व्यक्ति ने ऐसा ही किया। अटलांटा दौड़ी तो पर सिक्कों के लालच में बार-बार रुकी और वह आदमी आगे निकल गया। उसने अटलांटा को भी पा लिया और स्वर्ण मुद्राओं को भी।
माघ वदी अमावस्या, 5 फरवरी सन् 1962 को कालकूट नामक अष्टग्रही योग पड़ा था। एक स्थान पर अनेक ग्रहों का एकत्रित होना अनिष्टकारक माना जाता है, इसलिये इस घटना को लेकर देश-विदेश में तरह-तरह की भविष्य-वाणियाँ की गई थीं। पिछले महाभारत युद्ध के समय एक राशि पर सात ग्रह आने से विश्व-युद्ध जैसी विभीषिका आई थी और उससे व्यापक मार-काट और जन-धन की हानि हुई थी, इसलिये उस घटना को ही आधार मानकर दैवज्ञों ने यह आशा व्यक्त की थी कि इस, ग्रह-योग से विनाश के दृश्य उपस्थित होंगे। संसार में भीषण तोड़-फोड़, मार काट और विस्फोट होंगे और प्रलय जैसी स्थिति उत्पन्न हो जायेगी।
एक स्थान पर अनेक ग्रहों का एकत्रित होना, उसी प्रकार होता है, जिस तरह देश की आपातकालीन स्थिति के समय चोटी के नेता बैठते हैं और स्थिति को कैसे सम्भाला जाय, इस तरह का विचार विनिमय करते हैं। जो निर्णय और निष्कर्ष लिये जाते हैं, उन्हें तत्काल लागू कर दिया जाना ही न तो कोई सिद्धान्त है और न ऐसा होता ही ह। निष्कर्षों पर देर तक विचार विमर्श चलता रहता है, तब कहीं कार्यक्रम क्रियान्वित हो पाते हैं, यदि नेताओं में परस्पर भिन्न मत हों तो निर्णयों में प्रायः और भी देर होती है पर एक बात सर्वथा सत्य है कि किसी न किसी रूप में इस तरह के सम्मेलन कुछ नई तरह की हलचलें, तीव्र प्रतिक्रिया वाले निर्णय देने वाले होते हैं, उनसे कुछ न कुछ उखाड़-पछाड़ होती अवश्य है।
यह ग्रहयोग ऐसा ही था। इसे अंश योग भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि चन्द्रमा 4 फरवरी को सायं 5:35 बजे सूर्य के साथ हो लिया था। ग्रहों की बैठक में दोनों साथ-साथ आये थे, किन्तु 5 फरवरी को सांयकाल 5:48 बजे ही चन्द्रमा मकर राशि को पार कर 300 अंश आगे निकल गया। इससे वह कुम्भ का साथी हो गया और इस तरह अष्टग्रही योग सप्तग्रही योग ही रह गया।
इन दिनों निःसन्देह पृथ्वी पर पाप ताप का बोझ बहुत बढ़ गया है, बहुत समझाने-बुझाने पर भी लोग अनैतिकता का आश्रय छोड़ने को तैयार नहीं। स्वार्थ और तृष्णा, झूँठ और फरेब, जालसाजी और धोखेबाजी की प्रबलता के कारण कहीं भी शान्ति, सुव्यवस्था और सुरक्षा नहीं। खाते-पीते लोग भी आशंकित और आतंकित रहते हैं।
इस ग्रहयोग में मानवीय उच्छृंखलता को किस प्रकार सुधारा जाय, उस पर भी विचार करना था, पर चन्द्रमा का यह विचार था कि दंडनीय प्रक्रिया को सरल होना चाहिये। एकदम प्रलय से नन्हा-सा जीव डर जायेगा, इसलिये उन विभीषिकाओं को हल्का किया जाना चाहिये। जिनकी ग्रहयोग को तैयारी करनी थी। चन्द्रमा के इस भिन्न मत के कारण परिषद की शक्ति कमजोर पड़ गई।
कहते हैं कि चन्द्रमा की तरह के कुछ और ग्रह भी इस पक्ष में थे कि मानव-जाति को अभी बना रहना चाहिये, इसलिये कोई बड़ा विस्फोट न किया जाय, किन्तु उग्रवादी शक्तियाँ जोरदार थीं, इसलिये दूसरे ग्रहों ने भी चन्द्रमा की तरह ‘परिषद’ में वाक्-आउट किया। 9 फरवरी को शुक्र भी कुम्भ में चला गया, इसलिये कुल 6 ग्रह ही रह गये। 12 फरवरी की शाम 6 बजे सूर्य ने भी परिषद की सदस्यता छोड़ दी। 25 फरवरी तक शेष ग्रहों की सूक्ष्म-वार्ता बराबर जारी रही, किन्तु उस दिन रात्रि 9 बजे गुरु ने भी कुम्भ में प्रवेश करके अपने समर्थन से स्तीफा दे दिया। अब कुल 4 ग्रह ही रह गये। इसी प्रकार 3 मार्च को भौम, 10 मार्च को बुध भी न केवल अलग हो गया वरन् उसने वक्र गति भी करली। युद्ध और प्रलय की अतिशय इच्छा रखने वाले शनि और केतु दो ही रह गये। और इस तरह यह विभीषिका काफी हद तक शाँत हो गई।
किन्तु इस ग्रह-विग्रह का यह अर्थ नहीं लगाना चाहिये कि अब स्थिति ऐसी हो गई कि अनैतिकता और स्वार्थपरता की बढ़ती विभीषिका की तरफ से आँख मूँदली जायें। यद्यपि कुछ ग्रहों ने मनुष्य के सुधार के लिये सृजनात्मक दृष्टिकोण अपनाने की आशा की थी और उस पर पूर्ण सहमति न होने से ही उन्हें सदस्यता से अलग होना पड़ा था, किन्तु युद्ध और उत्पात की शक्तियाँ अभी भी काफी सशक्त हैं, उस पर दूसरे ग्रहों का आँशिक समर्थन है ही। ऐसा न होता तो थोड़े ही समय के लिये क्यों न सही सभी ग्रह क्यों एकत्रित होते? इसलिये उत्पात होंगे यह निश्चयपूर्वक कहा जा सकता है।
सम्मेलन समाप्त हुआ था, पर कूटनीति तब से बराबर चल रही है, उस समय भी एक ही पखवाड़े में दो ग्रहण हुये थे, और अभी भी कुछ दिन पूर्व इसी आश्विन वदी अमावस्या को सूर्य ग्रहण और आश्विन शुक्ल पूर्णमासी को चन्द्र-ग्रहण- एक पखवाड़े में दो ग्रहण पड़कर चुके हैं। इस सम्बन्ध में दैवज्ञों का कथन है- “एक पाख दो गहना, राजा मरै कि सेना” अर्थात् एक पक्ष में दो ग्रहण पड़ने से या तो राजा की मृत्यु होती है अथवा भारी संख्या में सेना मारी जाती है।
उन दिनों अपना निजी अभिमत व्यक्ति करते हुए हमने लिखा था- “इस कुयोग से मानव जाति को विशेष संकट सहने पड़ेंगे। यद्यपि ऐसी आशंका कतई नहीं है कि योग के दिनों में प्रलय हो जायेगी या उसी समय एटम-बम चलेंगे। जो लोग ऐसी आशंका करते हैं, उन्हें जान लेना चाहिये कि उन दिनों भी ऐसी ही स्थिति रहेगी, जैसी कि यह पंक्तियाँ पढ़ने वाले दिन हैं। योग के 25 दिनों में कोई आश्चर्यजनक घटना न घटेगी। साधारण दिनों की भाँति ही वे दिन भी शाँति से बीतेंगे। पर सूक्ष्म जगत् में ग्रह-योग की जो प्रतिक्रिया होगी, उसके फलस्वरूप संसार के प्रत्येक भाग में और जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में कठिनाइयाँ बढ़ने का वातावरण बनना प्रारम्भ हो जायेगा, जैसे-जैसे समय बीतता जायेगा, वे कठिनाइयाँ सामने आती जायेंगी और आगामी दस वर्षों तक बनी रहेंगी।”
इस मान्यता के आधार पर हमें सन् 1968 में भी सन् 1962 प्रतीत हो रहा है। जिनकी कल्पना उस समय की गई थी, व अब घटित हो रही हैं। पाठक उन्हें अपनी खुली आँखों से देख सकते हैं।
अष्टग्रही योग के सम्बन्ध में श्री शरद मोझरकर 19 नवम्बर 1961 के साप्ताहिक हिन्दुस्तान में जो भविष्यवाणियाँ प्रस्तुत की थीं, उनका साराँश यह था- “हिमांचल चल की ओर से भारत पर आक्रमण की हर सम्भावना है। चीन की धमकियाँ सत्य में बदलेगी। नेहरू जी डडडड कुण्डली के मारक स्थान पर यह ग्रहयोग उपस्थित हो रहा है, जो अच्छा संकेत नहीं है। नेता, मन्त्री और ड़ड़ड़ड़ में भेदभाव उग्र होंगे। वे अपने हित के आगे देश-हित को भूल बैठेंगे। चुनाव स्थगित हो सकते हैं पर यदि हुये तो कांग्रेस विजयी रहेगी, किन्तु राजनैतिक परिवर्तन होंगे इंग्लैंड, स्पेन, बेल्जियम, अल्जीरिया और सऊदी अरब को विभिन्न हलचलों का सामना करना पड़ेगा। डडडड प्राकृतिक कोप, भूकम्प, धरती फटना आदि घटनायें डडडड होंगी। रूस और अमेरिका प्रत्यक्ष तो नहीं पर मित्र डडडड के माध्यम से युद्ध करेंगे। गुरु के समान शुभ ग्रह डडडड उपस्थित होने से उग्रता में कमी आयेगी, जो लोग ईश्वर उपासना, जप-तप, भक्ति और आचरण सुधार करेंगे, उन्हें कष्ट कम होंगे और इस अशाँति के घेरे में भी उन्हें शाँति एवं धैर्य मिलेगा।”
ज्योतिष्मती पत्रिका के ग्रीष्मांक में इस योग डडडड सम्बन्ध में श्री कालीदास घोष ने लिखा था- “इस योग का प्रभाव सन् 1994 तक रहेगा, रेल, इंजनों, परिवहन की दुर्घटनायें होंगी, आधुनिक सभ्यता के मलवे से नवीन रक्तबीज उत्पन्न होगा। युद्ध का देवता मंगल विश्वव्यापी युद्ध करेगा।” इसी पत्रिका में ज्योतिर्विद् श्री ड़ड़ड़ड़ राजू गोपालकृष्ण मूर्ति का कथन है- “सूर्य के साथ डडडड का होना युद्ध का सूचक है। सभी देशों के शासकों की रातें जागते गुजरेगी। रक्तपात होगा, विश्व शाँति बार-बार भंग होगी। सीमा विवाद चलेंगे। बड़े नेताओं की साखें गिरेंगी। फसलें नष्ट होंगी, अकाल और ड़ड़ड़ड़ बढ़ेगी, तूफान-आँधी, नाव दुर्घटना, युद्ध, मुद्रा अवमूल्य संक्रामक रोग आदि घटित होंगे।”
रमेशचंद्र शास्त्री और पं. हरदेव शर्मा ने भी जाती उत्पात, भयानक, बाढ़-भूकम्प आदि की पुष्टि की है और लिखा है कि- ‘‘सन् 62 से 72 तक आगामी दस वर्ष में भारी राज्य-क्राँतियाँ और प्राकृतिक प्रकोप होंगे।” डडडड जनवरी 1962 के साप्ताहिक हिन्दुस्तान में श्री केदार दत्त जोशी ने भी ऐसी सम्भावनाओं पर प्रकाश डालते हुए लिखा था- ‘‘विश्व के दक्षिण भाग में कोई विचित्र परिस्थिति आकर व्यापक रूप ले सकती है। चन्द्रमा मकर में होने से वायु की दिशा में आतंक होंगे। सूर्य के मकर में आने से राज्यों में परिष्कृत परिवर्तन होंगे। मंगल उच्च मकर में होने से खनिज पदार्थों के हेतु कलह उत्पात मचेंगे। विश्व में अशान्ति फैलेगी, किन्तु भारतवर्ष का नैतिक स्तर उठेगा, कुविचारों का समूलोच्छेदन करने वाली कोई शक्ति उदित होगी। उसका प्रभाव बढ़ता जायेगा, यह शक्ति रूसी संस्था के रूप में होगी, जो भारतवर्ष ही नहीं सारे संसार में विचार-क्रांति उत्पन्न करेगी। बड़े-बड़े लोग उस धार्मिक किन्तु विचारों को प्रमुखता देने वाली संस्था के झंडे के नीचे आ जायेंगे, इससे इस देश का बड़ा हित होगा। उन्नति की परिस्थितियों का तेजी से विकास होगा।”
इस तरह की अनेक भविष्य-वाणियाँ हुई हैं, जिनमें जबर्दस्त साम्य पाया गया है। प्रायः सभी ज्योतिर्विदों ने यह घोषणा की है, इस ग्रहयोग का असली प्रभाव तो तब देखने योग्य होगा, जब इसका मध्यान्तर अर्थात् सन 1967 गुजर जायेगा। उसके बाद सन् 1972 तक परिवर्तनों में व्यापक तीव्रता आयेगी।
पिछले 5 वर्षों के इतिहास और समाचारों पर एक दृष्टि दौड़ाते हैं, तो उपरोक्त सभी भविष्य-वाणियाँ सत्य प्रतीत होती हैं। कच्छ विवाद, भारत-पाकिस्तान और चीन-भारत युद्ध हममें से सबने देखा। अभी लंका के साथ ड़ड़ड़ड़ द्वीप का झगड़ा उठ खड़ा ही हुआ है। मध्यपूर्व में इजराइल ने अरबों को करारी शिकस्त दी। चेकोस्लोवाकिया में वह हुआ, जिसकी कभी आशंका भी नहीं थी।
ईरान में ऐसा भयंकर भूकम्प जैसा पिछले दिनों आया कभी नहीं आया था। बिहार, राजस्थान और गुजरात डडडड सूखे को कोई भूला नहीं सकता। नेताओं की हत्यायें, राज्यों के संविदों का आना और एक-एक करके सबका टूटकर राष्ट्रपति शासन लागू होना। अभी यह पंक्तियाँ लिखते समय सिक्किम, भूटान, दार्जिलिंग और कलकत्ता में भारी वर्षा से तबाही, बाढ़ और भूकम्प और भूस्खलन के रोमाँचकारी समाचार आ रहे हैं। भूटान के राजपरिवार को हवाई जहाज खाना पहुँचा रहे हैं। समुद्री तूफान में पिछले दिनों धनुष्कोटि पूरी तरह समा चुका है। अभी पाकिस्तान और चीन की धमकियाँ चल रही हैं, न जाने कब नया रंग लायें।
बगदाद में राज्य-क्रांति हुई। अरब में नेतृत्व के लिये भीतरी अशाँति फैली है घाना और काँगो में राज्य-क्रांति, वियतनाम में रक्तपात, तुर्की की सैनिक-क्राँति और अभी अभी पेरू और पनामा पर सैनिक सत्ता का समाचार आया है। यह सब परिवर्तन उसी ग्रहयोग की लम्बी श्रृंखला के एक अंग हैं।
पिछली भविष्य-वाणियाँ सत्य हो रही हैं और आगे के दैवयोग बनते चले जा रहे हैं। अब इस अष्ट-ग्रही नाटक उत्तरार्द्ध प्रारम्भ हो गया है, कहीं अधिक व्यापक और महत्वपूर्ण है।
अभी यह प्राकृतिक प्रकोप न केवल जारी रहेंगे, वरन् उनके घनीभूत और व्यापक होने की सम्भावना है। युद्धों का विस्तार होगा। विश्व-शाँति की शक्ति सक्रिय होने से सर्वग्राही अणु विश्व युद्ध तो नहीं होगा, किन्तु महायुद्ध हो सकते हैं और उसकी लपेट में अमेरिका, रूस सहित भारत वर्ष भी आ सकता है। उत्तरी क्षेत्र से युद्ध की सम्भावनायें विद्यमान् हैं और वे आश्चर्यजनक होंगी। कई चौंकाने वाली घटनायें होंगी। शासन में ऐसे नाम और चेहरे उदित होंगे, शायद जिनके लोग अभी नाम भी न जानते होंगे।
1947 की एक शाम ‘जिन डिम्सन’ नाम की अमरीकी ज्योतिर्विद् महिला के पति एक भोज दे रहे थे। अनेक पूर्वी देशों के राजदूत और अधिकारी उपस्थित थे। नई दिल्ली पर चर्चा चल पड़ी तो जिन डिम्सन ने कहा- “इस वर्ष भारतवर्ष स्वतन्त्र हो जायेगा, किन्तु गाँधी जी की हत्या, वह भी एक हिन्दू के हाथ, कर दी जायेगी और हिन्दुस्तान दो भागों में बंट जायेगा। एक मुसलमानों का एक हिन्दुओं का। इसी संदर्भ में उन्होंने यह भी कहा था-
भारत का भविष्य अति उज्ज्वल है। इस भूमि पर कुछ होनहार आत्मायें उदित होंगी और जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में विश्व का मार्ग-दर्शन करेंगी। धर्म और नैतिकता का चरम उत्कर्ष भारतवर्ष में होगा और वहाँ से ही उसकी किरणें सारी दुनिया में फैलेंगी। एक बहुत पुरानी उपासना पद्धति का जिसको भारतीय भूल गये हैं, तेजी से प्रसार होगा और भारतवर्ष दुनिया के सब देशों स ज्यादा उन्नति करेगा।” इस अवसर पर सर गिरजा शंकर बाजपेई भी उपस्थित थे, उन्होंने और एक भारतीय कर्नल ने इन तमाम बातों को मानने के लिये इनकार कर दिया था, किन्तु पाठक आधी से अधिक बातें सत्य हुई देख चुके हैं और अब इतिहास जो नई करवट ले रहा है, उसके उत्तरार्द्ध को लोग आगे देखेंगे।
यहाँ के नेता वह सफल होंगे, जो धार्मिक विचारों के होंगे। पूँजीपतियों पर प्रतिबन्ध लगेगा। अगले पाँच वर्षों में उन लोगों को अधिक संकटों का सामना करना पड़ेगा, जो व्यापार में अनैतिकता बर्तते हैं, अर्थात् मिलावट, कम तोल, कीमतें बढ़ाने की साजिशें करते हैं। बुरे लोगों पर से लोगों का विश्वास उठेगा। प्रतिष्ठा घटने से मानसिक अशाँति बढ़ेगी, तब यह अपराधी तत्व स्वतः अपना मन बदलने को विवश होंगे। इस तरह के विचार ड़ड़ड़ड़ अरविन्द, रामकृष्ण परमहंस, महर्षि रमण, सन्त ड़ड़ड़ड़ आदि सूक्ष्म-तत्वदर्शी महर्षियों ने भी बहुत पहले डडडड किये थे। महाकाल उनकी प्रतिष्ठा करने को समुद्यत रहा है। ऐसी स्थिति में प्रत्येक व्यक्ति का यह कर्तव्य है कि वह युग की इस आकाँक्षा और होने वाले परिवर्तनों को समझें और उसके अनुरूप स्वयं भी उस मार्ग पर चलने का प्रयास करे, जिस पर चलने में सम्पूर्ण मानव-जाति का कल्याण है।
भारतीय धर्म, संस्कृति और तत्व दर्शन जिसने डडडड विश्व को प्रकाश और आत्म-ज्योति प्रदान की है वह डडडड विश्व अन्तरिक्ष पर प्रकट होना चाहती है, ग्रहयोग डडडड के सहयोग और सहायतार्थ प्रस्तुत हुआ है, जो डडडड स्वागत करने को तैयार रहेगा, वह हर व्यक्ति भाग्यशाली और समझदार माना जायेगा। प्रस्तुत परिस्थितियों डडडड आँख मूँदने वालों की दुर्दशा तो ऐसे ही होगी, डडडड शिकारी के डर से शुतुरमुर्ग बालू में मुँह घुसेड़ कर अपने को सुरक्षित अनुभव करता है।
नव निर्माण की-विचार धारा को जन ज-न के मस्तिष्क एवं अंतःकरण में प्रतिष्ठापित करना, युग परिवर्तन कार्यक्रमों में सबसे प्रथम एवं सबसे प्रधान है। विचार बदलने से- व्यक्ति बदलेगा और व्यक्ति के बदलने का नाम ही समाज एवं संसार का बदलना है।
अखण्ड-ज्योति परिवार के हर परिजन को एक घंटा समय और दस पैसा नित्य निकालकर उसे युग-परिवर्तन की विचार-धारा व्यापक बनाने के लिये खर्च करते रहने का अनुरोध किया गया था। अधिकाँश ने उसे स्वीकार भी किया। पर उन स्वीकार करने वालों में भी अभी से शिथिलता आती दिख रही है।
कई स्थानों में झोला पुस्तकालय प्रारम्भ भी किये गये हैं और उनके आशाजनक परिणाम भी परिलक्षित हुए हैं, पर व्यापक पुनरुत्थान अभियान की दृष्टि से उतने प्रयत्न नाकाफी है।
हमने अपना कर्तव्य पूरा कर दिया। अब तक 200 निबन्ध परक ट्रैक्ट 40 जीवन-चरित्र और 20 कहानी-कविता ट्रैक्ट तैयार कर दिये हैं, 20 ट्रैक्ट गायत्री सम्बन्धी भी तैयार हो गये हैं, वह भी दिसम्बर के अन्त तक छप जायेंगे, अब परिजनों को अपना उत्तरदायित्व पूरा करना चाहिये। आगे ट्रैक्टों की सूची दी गयी है, उसे देखकर जिनके झोला पुस्तकालय अभी अधूरे हैं या प्रारम्भ नहीं किये, मंगाकर विचार-प्रसार का यह कार्य इसी माह प्रारम्भ कर देना चाहिये। विश्व को प्रौढ़ विचार देने का हमने संकल्प लिया है, उसे सफल होते देखना है, तो किसी भी परिजन को अब अपने इस संकल्प में शिथिलता नहीं आने देनी चाहिये।
नव-निर्माण के निबन्ध ट्रैक्ट
नव-निर्माण की विचार धारा एवं कर्म-पद्धति को व्यापक बनाने के लिये लागत मात्र मूल्य के अत्यन्त सस्ते, सुन्दर, आकर्षक और प्रेरणाप्रद ट्रैक्ट छापे गये हैं। अब तक निम्नलिखित 200 ट्रैक्ट छप चुके हैं। प्रत्येक का मूल्य 25 पैसे है।
(1) विवाह के आदर्श और सिद्धान्त। (2) तीन दिन का सत्यानाशी विवाहोन्माद। (3) विवाहोन्माद के लिये बुद्धि क्यों बेच दी जाय? (4) विवाह-शादियों का असह्य अपव्यय। (5) इस हृदय-द्रावक स्थिति को कब तक सहा जायेगा? (6) यह कुरीतियाँ मिट रही हैं और मिटेगी। (7) विवाह का वातावरण धर्मानुष्ठान जैसा रहे। (8) धर्म विवाहों की रूपरेखा। (9) आदर्श विवाहों का प्रचलन कैसे हो? (10) प्रगतिशील जातीय संगठनों की आवश्यकता। (11) हम भाग्यवादी नहीं कर्मवादी बनें। (12) अन्ध-विश्वासी नहीं विवेकशील बनिये। (13) अन्ध-विश्वास से लाभ कुछ नहीं हानि अपार है। (14) भिक्षा व्यवसाय देश और समाज का कलंक। (15) मन्दिर जन-जागरण केन्द्र बनें। (16) उनसे जो पचास के हो चले। (17) साधु की महान परम्परा और जिम्मेदारी। (18) ब्राह्मण अपना उत्तरदायित्व संभालें। (19) स्वच्छता का प्रथम गुरुमन्त्र (20) दर्शन तो करें- पर इस तरह। (21) आलस्य छोड़िये, परिश्रमी बनिये! (22) पक्षपात त्यागें, औचित्य अपनायें! (23) माँसाहार मानवता के विरुद्ध है। (24) तम्बाकू- एक भयानक दुर्व्यसन। (25) प्राणियों के प्रति निर्दयता न करें। (26) अपव्यय का ओछापन। (27) मृतक भोज की क्या आवश्यकता? (28) नारी को तिरस्कृत न किया जाय। (29) अशिष्टता न कीजिये! (30) ईमानदारी का परित्याग न करें। (31) खाद्य समस्या और उसका हल। (32) आहार में असंयम न बरतें। (33) सन्तान की संख्या न बढ़ाइये। (34) गन्दगी की घृणित असभ्यता। (35) शाकाहारी व्यंजन। (36) व्यायाम- हमारी एक अनिवार्य आवश्यकता। (37) वृक्षारोपण- एक पुनीत पुण्य। (38) शाक उगायें, अन्न बचायें। (39) पुस्तकालय- सच्चे देवालय। (40) निरक्षरता का कलंक धो दिया जाय। (41) परिवार को सुसंस्कृत कैसे बनायें? (42) हम सच्चे अर्थों में आस्तिक बनें। (43) संस्कारों की परम्परा। (44) पर्व और त्योहारों से प्रेरणा ग्रहण करें। (45) लोक-निर्माण के लिये जन-गायन। (46) विवाह-दिवसोत्सव कैसे मनावें? (47) जन्म-दिवसोत्सव इस तरह मनावें। (48) गायत्री-यज्ञों की विधि-व्यवस्था। (49) गायत्री-यज्ञों की विधि-व्याख्या। (50) प्रबुद्ध व्यक्ति धर्मतन्त्र संभालें। (51) सत्कार्यों का अभिनन्दन किया जाय। (52) पुंसवन संस्कार विवेचन। (53) नामकरण संस्कार विवेचन। (54) अन्नप्राशन संस्कार विवेचन। (55) चूड़ाकर्म विवेचन। (56) विद्यारम्भ संस्कार विवेचन। (57) यज्ञोपवीत संस्कार विवेचन। (58) विवाह संस्कार विवेचन। (59) वानप्रस्थ विवेचन। (60) अन्त्येष्टि संस्कार विवेचन। (61) मरणोत्तर संस्कार विवेचन। (62) बाल-विवाह की भयंकरता से समाज को बचाया जाय। (63) बच्चों को सद्गुणी कैसे बनायें? (64) छात्रों का निर्माण अध्यापक करें। (65) हरिजन उत्कर्ष के लिये बड़े कदम उठें। (66) नारी उत्थान के लिये महिलायें आगे आवें। (67) पशु-बलि हिन्दू धर्म का कलंक। (68) नव-निर्माण के लिये जन-सम्मेलन। (69) विधवा विवाह शास्त्र विरुद्ध नहीं। (70) क्या मनुष्य पशु-पक्षियों से भी गिरा रहेगा। (71) खाया कैसे जाय? (72) शरीर को स्वस्थ रखिये। (73) आरोग्य का आधार शारीरिक श्रम। (74) कपड़ों से जकड़े न रहिये। (75) ब्रह्मचर्य- जीवन की अनिवार्य आवश्यकता। (76) सर्वोपयोगी सरल व्यायाम। (77) स्वस्थ रहना है तो यह खाइये। (78) कब्ज से कैसे बचें और कैसे छूटें? (79) श्वास सही तरीके से लीजिये। (80) दूध पियें तो इस तरह। (81) उत्कृष्ट और परिकृष्ट जीवन। (82) मन की तुष्टि आत्मा की दुर्गति। (83) मन के हारे हार है, मन के जीते जीत। (84) अपने दोषों को ढूंढ़े और निकालें। (85) मरने से डरना क्या? (86) कलात्मक जीवन जियें। (87) जिंदगी हँसते-खेलते जियें। (88) सुखी इस तरह रहा जा सकता है। (89) जीवन श्रेष्ठ व सार्थक बनें। (90) जीवन लक्ष्य भुला न दिया जाय। (91) सन्तोषी सर्वदा सुखी। (92) मत असन्तुष्ट रहिये, मत खिन्न हूजिये। (93) कामना और वासना की मर्यादा। (94) अपना दृष्टिकोण बदलें। (95) असन्तोष की आग में यों न जलें। (96) धन्योगृहस्थाश्रमः। (97) परिवार को सुसंस्कार बनायें। (98) परिवार का पालन ही नहीं निर्माण भी। (99) सुखी और सफल दाम्पत्य जीवन। (100) दाम्पत्य जीवन में स्वर्ग का अवतरण। (101) क्या नारी इस दुर्दशा में पड़ी रहेगी? (102) सुयोग्य नारी-सुख गृहस्थ (103) पुत्र की कामना से उद्विग्न क्यों? (104) धन का उपार्जन और उपयोग। (105) मित्रता क्यों, कैसे और किससे? (106) स्वाध्याय में प्रमाद न करें। (107) बोलिये तो पर इस तरह। (108) बच्चों का भावनात्मक विकास। (110) बच्चों का प्रशिक्षण घर की पाठशाला में। (111) चरित्र का निर्माण सबसे बड़ा निर्माण। (112) सद्गुण बढ़ायें सुसंस्कृत बनें। (113) व्यक्तिवाद नहीं- समूहवाद। (114) परोपकारी और सेवाभावी बनिये। (115) स्वार्थ और परमार्थ का समन्वय। (116) अपना सुधार संसार की सबसे बड़ी सेवा। (117) पहले अपने को सुधारें। (118) उद्धरेदात्मनात्मानम्। (119) संयम हमारी एक महत्वपूर्ण आवश्यकता। (120) मनोबल की चमत्कारी शक्ति (121) अनर्थकारी गलत-फहमियों से बचे रहें। (122) धैर्य सब सफलताओं का मूल है। (123) ज्ञान-योग की साधना। (124) कर्म-योग की रीति-नीति। (125) भक्ति-योग का वास्तविक स्वरूप। (126) प्रेम ही परमेश्वर है। (127) उपासना जीवन की अनिवार्य आवश्यकता। (128) हम ईश्वर से विमुख न हों। (129) गृहस्थ एक योग साधना। (130) आत्मा की पुकार अनसुनी न करें। (131) हम सशक्त और साहसी बनें। (132) सफलता आत्मविश्वासी को मिलती है। (133) जो करें मन लगाकर करें। (134) आराम नहीं, काम कीजिये। (135) वे गरीब बच्चे महान् कैसे बनें? (136) मित्रता करें पर समझ-बूझ कर। (137) बचत ही आपकी असल आय है। (138) उतावली न करें-उद्विग्न न हों (139) दूसरों के दोष-दुर्गुण ही न देखा करें। (140) प्रतिकूल परिस्थितियों में भी उद्विग्न न हों? (141) कठिनाइयों से डरिये नहीं- लड़िये। (142) निराशा को पास न फटकने दें। (143) आवेशग्रस्त होने की अपार हानि। (144) विचारों की उत्कृष्टता प्रगति का मूल मंत्र (145) मानसिक स्थिति का स्वास्थ्य पर प्रभाव। (146) न डरिये न अशांत हूजिये। (147) अहंकार में डूब मत जाना (148) सज्जनता की राह। (149) हम दुर्बल नहीं, शक्तिशाली बनें। (150) धर्म-रक्षा से आत्म-रक्षा होगी। (151) मर्यादाओं का उल्लंघन न करें। (152) समय का सदुपयोग करें। (153) हम सुख शान्ति से वंचित क्यों हैं? (154) सशक्त दीर्घजीवन का राजमार्ग। (155) अपूर्णता से पूर्णता की ओर (156) काम आयेंगे अपने ही हाथ। (157) विद्या की सम्पत्ति निरन्तर बढ़ाते रहें। (158) अपना उत्साह शिथिल न होने दें। (159) टोना टोटका, जन्तर मन्तर (160) जीतता है सत्य ही, असत्य नहीं। (161) बच्चों का निर्माण घर की पाठशाला (162) उत्तम साहित्य से संपर्क स्थापित कीजिये। (163) अति भावुकता से सावधान (164) उच्च शिक्षित कन्या की विवाह समस्या (165) झूठी आलोचना से परेशान न रहें। (166) अपनी आर्थिक स्थिति डगमगाइये मत। (167) प्रशंसा की सृजन शक्ति से आश्चर्यजनक सुधार (168) झोला पुस्तकालय- अमृत कलश। (169) ज्ञान-यज्ञ का उद्देश्य और स्वरूप। (170) गो-रस बेचना हरिमिलन, एक पन्थ दो काज। (171) मनुष्य में देवत्व। (172) खर्च करना भी सीखिये। (173) कर्ज से पीछा क्यों कर छूटे? (174) गृहस्थाश्रम- एक कर्त्तव्य धर्म। (175) छोटी उम्र में बड़े काम। (176) जीतेंगे हिम्मत वाले। (177) आपको सौ वर्ष जीवित रहना चाहिये। (178) बचत करना भी सीखिये। (179) बुराइयों के अंधकार में प्रकाश की किरणें। (180) धरती पर स्वर्ग। (181) दुर्दैव को चुनौती। (182) विनोद और उल्लास की प्रवृत्तियाँ। (183) हमारा स्वास्थ्य संकट और उसका समाधान। (184) तेजस्वी और मनस्वी संतति। (185) पतिव्रत की महिमा- पत्नीव्रत की गरिमा। (186) समस्यायें अनेक-हल एक। (187) व्यक्ति का परिवर्तन ही युग-परिवर्तन। (188) सौभाग्य का द्वार- सम्मिलित परिवार। (189) यत्र नार्यास्तु पूज्यन्ते। (190) आन्तरिक सुख ही वास्तविक सुख। (191) बुढ़ापे से टक्कर लीजिये। (192) खाते समय इन बातों का ध्यान रखें। (193) हमारी युग-निर्माण योजना। (194) हमारा युग-निर्माण सत्संकल्प (195) संगठित परिवार-स्वरूप और आदर्श। (196) परिवार का विकास एवं सन्तुलन। (197) गृहस्थ ही नहीं सद्गृहस्थ बनें। (198) अमृत और पारस। (199) सफलता के तीन साधन। (200) आत्मा और उसका तत्व-दर्शन।
कविता और कहानियों की नई ट्रैक्ट माला
इस पुस्तिकाओं के पृष्ठ निबन्ध ट्रैक्टों की अपेक्षा अधिक हैं। उसी अनुपात से इनका मूल्य भी अधिक रखा गया है। इन पुस्तिकाओं का मूल्य 40-40 पैसा है। 12 कहानियों और 10 कविताओं के कुल 22 ट्रैक्ट इस सीरीज में इस वर्ष छपे हैं।
12-कहानी ट्रैक्ट
1. समाधि दीप, 2. ज्योति बुझती नहीं 3. प्रकाश की ओर, 4. भगवान के दरबार में, 5. एक थे राजा, 6. प्रेरणाप्रद कथा-गाथायें, 7. सौम्य संवाद, 8. अविस्मरणीय संस्मरण, भाग-1, 9. अविस्मरणीय संस्मरण, भाग-2, 10 अविस्मरणीय संस्मरण भा-3, 11. सन्त समागम, 12. प्रेरक प्रसंग।
10- कविता ट्रैक्ट
1. ज्योति किरण, 2. नवयुग का नया निर्माण, 3. अपना दीप जलाओ, 4. अभिवन्दना, 5. अभिव्यंजना, 6. युग निमन्त्रण, 7. मंगल किरण, 8. अवतार कथा, 9. नव-प्रभात, 10. प्रभात किरण।
जीवन चरित्र की ट्रैक्ट-माला
युग-निर्माण योजना का उद्देश्य राष्ट्र की भावी पीढ़ी को सशक्त, समर्थ और विचारवान् बनाता है। यह तेजस्विता महापुरुषों की जीवन-शैलियों के अनुसरण से सम्भव होती है। अब तक इस सीरीज में चालीस ट्रैक्ट छप चुके हैं, इन पुस्तिकाओं का मूल्य 40-40 पैसा रखा गया है।
1. जगद्गुरु शंकराचार्य। 2. स्वामी विवेकानंद। 3. महावीर स्वामी। 4. ईश्वरचन्द्र विद्यासागर। 5. महर्षि कर्वे। 6. ठक्कर बाबा। 7. महापुरुष लेनिन। 8. महर्षि कार्लमार्क्स। 9. पवित्रात्मा ब्रह्म। 10. ठाकुर दयानन्द। 11. महाप्रभु चैतन्य। 12. स्वामी केशवानन्द। 13.प्रभु जगद्बन्धु। 14. महात्मा एण्ड्रूज। 15. अब्राहम लिंकन। 16. केशवचंद्र सेन। 17. राजा राम मोहनराय। 18. गोपालकृष्ण गोखले। 19. श्रीमती ऐनी बेसेन्ट। 20. रामकृष्ण परमहंस, 21. महायोगी अरविन्द। 22. दादाभाई नौरोजी। 23. सन्त कबीर 24. महारानी अहिल्याबाई। 25. गुरु गोविंदसिंह। 26. टोयोहिको कागावा। 27. वीर शिवाजी। 28. दुर्गादास। 29. महात्मा फ्राँसिस। 30. स्वामी सहजानन्द। 31. वीर सावरकर। 32. सिस्टर निवेदिता। 33. मास्टर प्रभु दयाल। 34. समर्थ गुरु रामदास। 35. सन्त तुकाराम। 36. कमाल पाशा। 37. महापुरुष मेजिनी। 38. लाला लाजपत राय। 39. गैरीबाल्डी। 40. मदन मोहन मालवीय।
दस रुपये से अधिक की पुस्तकें लेने पर 15 प्रतिशत और 100) से अधिक पर 25 प्रतिशत कमीशन दिया जाता है और डाक अथवा रेल व्यय मँगाने वाले को देना पड़ता है। जिन्हें रेल से मँगाना हो अपने रेलवे स्टेशन का नाम भी लिखे। पता पूरा और स्पष्ट लिखना चाहिये।
पुस्तक मंगाने का पता :-
युग-निर्माण योजना (अखण्ड-ज्योति संस्थान) मथुरा।
देवताओं के त्रिदेव प्रमुख हैं। ब्रह्मा, विष्णु, महेश की उत्पादक, पोषक, संहारक शक्ति के द्वारा ही इस विश्व को जीवन, विकास एवं परिवर्तन की प्रक्रिया चल रही है। इन तीन देवों की अपनी निज की क्षमता नहीं वरन् वह आद्यशक्ति भगवती से ही उधार ली गई है। चन्द्रमा की चमक अपनी नहीं, वह सूर्य की आभा से चमकता है और उस आभा का प्रतिबिम्ब हमें चन्द्रमा की चंद्रिका के रूप में परिलक्षित होता है।
इस तथ्य का उपरोक्त पुराण में कतिपय कथा उपाख्यानों द्वारा इस प्रकार प्रतिपादन किया गया है-
इस संदर्भ में कुछ प्रमाण इस प्रकार है -
ये स्तुर्वान्त जगन्मातर्भवतीमम्बिकेति च। जगत्मयीति मायेति सर्वतेषां प्रसिद्धचति॥
जो आपकी जगत्माता- जगत् की माता, अम्बिका जगतमयी और इसी अनादि कारण शक्ति के रूप में स्तुति किया करते हैं, उनके समस्त कार्य सिद्ध हो जाया करते हैं।
सर्वशक्तिः पराविष्णो ऋग्यजुः साम संचिता। सैषा त्रयीतपत्यंहो जगतश्च हिनस्ति या॥
सैष विष्णुः स्थितिः स्थित्यां जगतः पालननोतः। ऋग्यजुः सामभूतोऽन्तः सवितुर्द्विज! तिष्ठति॥
सम्पूर्ण संसार को सृजन पालन एवं संहारात्मक रूप से प्रकट करने वाली भगवती अपरा स्वयं सर्वतन्त्र, स्वतन्त्र शक्ति है, सर्वशक्ति विष्णु की पराशक्ति एवं ऋग्यजुः और साम संज्ञा वाली है। यही त्रयी रूप में संसार में प्रकाशित होकर सृष्टिस्थिति और संहार करती है।
मासि मासि खेर्या यस्तत्र तत्रहि सा परा। त्रयी मयी विष्णु शक्तिरनस्थानं करोतिवै॥
ऋचः स्तुवन्ति पूर्वाह्ने मध्याह्ने च यजूँषि वैः। वृहद्रथन्तरादीनि सामान्यंगक्षये रविम्॥
अंग सैषा त्रयी विष्णो ऋग्यजुः साम संज्ञिताः। विष्णु शक्ति खथानं सदादित्ये करोति सा॥
ब्रह्मा द्वारा रजोगुण धारण करने से सृजन, विष्णु द्वारा सत्व गुण के धारण करने से जगत् का पालन तथा सर्ग के अन्त में इस सम्पूर्ण विश्वाण्ड को अपने में लीन करने यह त्रिमूर्ति स्वरूप वाली है और सविता में ऋग्यजुः और सामभूत होकर यह निवास किया करती हैं। पूर्वाह्न में ऋक्, मध्याह्न में यजुः और सायंकाल में वृद्धद्रथन्तरादि साम श्रुतियां सूर्य स्तुति किया करती है। यही आदित्य में निवास करने वाली वेदत्रयी है।
न केवलं रवेः शक्तिर्वैष्णवी सा त्रयीमयी। ब्रह्माऽथ पुरुषो रुद्रस्त्रयमेतत्त्रयी मयम्॥
एवं सा सात्विकी शक्तिर्वैष्णवी या त्रयीमयी। आम सप्तगणस्थं तं भास्वन्तमधितिष्ठति॥
यह केवल रवि की शक्ति विष्णु स्वरूपिणी ही नहीं है प्रत्युत ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र इन तीनों से युक्त एवं त्रयीमयी है। इस प्रकार से यह त्रयीमयी आद्या शक्ति अपने सातों गणों में अवस्थित सूर्यदेव में समाविष्ट हैं।
देवी भागवत पुराण में भगवती गायत्री महाशक्ति की महत्ता का सविस्तार वर्णन है। उसे समस्त देवताओं का उपास्य और समस्त मन्त्रों का शिरोमणि बताया गया है। अनादि काल से उसी की सर्वत्र महिमा गाई जाती है और उपासना को प्रधानता दी जाती रही है। शास्त्र-इतिहासों में ऐसा ही विवरण मिलता है और देवताओं द्वारा अपनी उपासना का रहस्योद्घाटन करते हुए, इसी महाशक्ति को अपना इष्टदेव प्रतिपादित किया जाता रहा है। शक्तियों का केंद्र वस्तुतः यही महामन्त्र है। इसी उपासना से मनुष्यों से लेकर देवताओं तक का कल्याण होना सिद्ध होता रहा है।
ड़ड़ड़ड़न्नाहं स्वतन्त्र्त्रोऽस्मि शक्तयधौनोऽस्मि सर्वथा। तमेव शक्तिं सततं ध्यायामि च निरन्तरम॥ नतः परतरं किंिचज्यानामि कमलोद्भव।,
भगवान् विष्णु ने शक्ति स्वरूपा देवी की प्रशंसा करते हुये एक बार पद्मयोनि ब्रह्मा जी से कहा था कि मैं भी स्वाधीन नहीं हूँ और देवी की शक्ति की अधीनता में रहता हूँ। उसी के बलबूते पर सब कुछ करने की सामर्थ्य मुझमें है। अतएव मैं निरन्तर उसी का सर्वदा ध्यान किया करता हूँ क्योंकि इससे परे हे कमलोद्भव! मैं किसी को नहीं जानता हूँ।
तेन चाप्यहमुक्तोऽस्मि तथैव सुनिपुंगव। तस्मात्वमपि कल्याण पुरुषार्थाप्तिहेतवे॥
असंशयं हृदाम्भोजे भज देवी पदाम्बुजम्। सर्व दास्यति सा देवी यद्यदिष्टं भवेतव॥
नारदेनैव मुक्तस्तु व्यासः सत्यवती सुतः। देवी पादाब्ज निष्णातस्तपसे प्रययौ गिरौ॥
देवर्षि नारद जी ने व्यास महर्षि से कहा कि ब्रह्म जी ने फिर मुझसे भी, हे मुनियों में परम श्रेष्ठ! यही देवी का प्रबल-शक्ति के विषय में कहा था। इसलिये हे कल्याण! आप भी पूर्ण पुरुषार्थ प्राप्ति के लिये बिना किसी सन्देह के अपने हृदय कमल में उसी देवी का भजन करो। उसके ड़ड़ड़ड़ कमल की भक्ति से वह भगवती आपको जो-जो भी अभीष्ट होगा, वह सभी कुछ प्रदान करेगी। इस प्रकार से ड़ड़ड़ड़ के द्वारा कहे जाने पर सत्यवती के पुत्र व्यास जी ड़ड़ड़ड़ के चरणों में निष्णात होकर पर्वतों में तपश्चर्या करने के लिये चले गये थे।
चिन्तयन्तु महामायां विद्यां देवीं सनातनीम्। सा विधास्यति नः कार्यं निर्गुणा प्रकृति परा॥
ब्रह्म विद्यां जगद्धात्रीं सर्वेषां जननी तथा। मया सर्वमिहं व्याप्तं त्रैलोक्यं सचराचरम्॥
एक बार परम दुःखित देवों से ब्रह्मा जी ने कहा कि महामाया सनातनी भगवती विद्यादेवी का ध्यान करो। वही परा निर्गुण स्वरूपा हमारा सम्पूर्ण कार्य कर देगी। वह ब्रह्म-विद्या, जगत् की धात्री और सब की माता है, जिसके द्वारा यह सम्पूर्ण चराचर त्रैलोक्य व्याप्त हो रहा है।
गायत्री का ही दूसरा नाम सावित्री है। शास्त्रों में कहीं उसे गायत्री, कहीं सावित्री कहा गया है। आत्म-कल्याण के क्षेत्र में जब उसे प्रयुक्त किया जाता है, तब गायत्री नाम से और लौकिक सुख, सुविधाओं की आम वृद्धि में जब उसका प्रयोग होता है, तब सावित्री कहते हैं। यह प्रयोग भेद से नामों में अन्तर आता है। मूलतः वह उसी एक महातत्व का वर्णन है। दिव्य-भाव सम्पन्न होने से उसे देवी कहते हैं और समस्त ऐश्वर्यों का उद्गम केन्द्र होने से उसे भगवती कहा जाता है। बार-बार एक ही शब्द का उच्चारण अटपटा लगता है, इसलिये साहित्यिक सुविधा एवं सौंदर्य की दृष्टि से गायत्री, सावित्री, देवी, भगवती आदि नामों का उल्लेख है। उसी महाशक्ति का आधार लेकर समस्त देव सत्तायें अपने कार्य संचालन में समर्थ हो रही हैं-
मन्त्राणां चैव सावित्री पापनाशे हरिस्मृतिः। अटादश पुराणामां देवी भागवत यथा॥
समस्त मन्त्रों में सावित्री का मन्त्र सर्वोपरि एवं श्रेष्ठ होता है, जिस तरह हरि के स्मरण से पापों का नाश होता है और अठारह पुराणों में देवी भगवती सर्वोत्तम पुराण है, वैसे ही सावित्री मन्त्र होता है।
न गायत्रयाः परो धर्मो न गायत्र्याः परन्तपः। न गायत्र्याः समो देवो न गायत्र्याः पाते मनुः॥
गातारं त्रायते यस्माद गायत्री तेन सोच्यते।
गायत्री से परे कोई भी नहीं है- गायत्री से परम अन्य कोई भी तपश्चर्या नहीं है। गायत्री के समान अन्य कोई भी देवता नहीं है। गायत्री का मन्त्र सब मन्त्रों में श्रेष्ठ है। जो कोई इस गायत्री गायन अर्थात् जाप किया करता है, उसकी यह सावित्री त्राण किया करती है। इसलिये इसका गायत्री- यह नाम कहा जाता है।
यस्याः प्रभावमखिलं नोह वेदधाता तो वा हरिर्नगिरिशोनर्हि चाप्यनन्तः। अंशांशकी अपिचते किमुतान्य देवा स्तस्यै नमोऽस्तु सततं जगदम्बि कायाः।
जिस देवी का पूर्व प्रभाव ब्रह्मा, हरि, शिव और शेष कोई भी नहीं जानता है, इनके अंशांश भी नहीं जानते हैं। अन्य देवों की तो बात ही क्या? उस जगत् की माता को सर्वदा नमस्कार है।
समय-समय पर ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र ने माता गायत्री का स्तभव करते हुए अपनी क्षमता का मूल आधार इसी महाशक्ति को स्वीकार किया है। ऐसे उपाख्यानों तथा स्तवनों से इतिहास, पुराणों के अगणित पृष्ठ भरे पड़े हैं-
देवि त्वमस्य जगतः किल कारणं हि ज्ञातं भया सकल वेद वचोभिरम्ब। सांख्या वदन्ति पुरुषं प्रकृति च मां तां, चैतन्य भावरहितां जगतश्च कत्रींम्। किं तादृशासि कथमत्र जगन्निवासश्चै, तन्यता विरहितो विहितस्त्वयाऽद्य॥
नाट्यं तनोषि सगुणा विविध प्रकारं नो वेत्तिकोऽपि तन कृत्य विधान योगम्। ध्यायन्ति यां मुनिगणाः नियतं त्रिकालं सन्ध्येति नाम परिकल्प्य गुणा सुरेशि॥ बुद्धिर्हि बोध करणा जगतां सदा त्वं श्रीश्चासि देवि। सततं सुखदा सुण्णाम्। कीर्त्तिस्तथा मतिधृनी किल कान्ति रे व, श्रद्धा रतिश्च सकलेषु जनेषु मातः।
ब्रह्मा जी भगवती सावित्री का स्तवन करते हुए कहते है- ‘‘हे देवि! आप इस संपूर्ण जगत् की कारण स्वरूप हैं, इसका ज्ञान मैंने समस्त वेदों के वचनों से प्राप्त किया है। जनता और सांख्यवादी जिसको प्रकृति-पुरुष कहते हैं और उसको चैतन्य भाव से रहित जगत् की करने वाली बताते हैं। क्या आप ऐसी ही हैं? यदि ऐसा ही है तो यह चैतन्य रहित जगत् का निवास कैसे किया है। आप सगुण होकर विविध बाह्य क्रिया करती है। आपके विधान के योग को कोई भी नहीं जान पाता है। मुनिगण आपको तीनों कालों में ध्यान किया करते हैं। हे सुरेशि! इसीलिये आपका नाम संध्या- यह परिकल्पित किया गया है। जगतों में बोध करने वाली, आप बुद्धि सदा सुरों को सुखद श्री हैं। हे माँ! आप समस्त जनों में कीर्ति-मति धृति-श्रद्धा और रति रूप वाली हैं।
नातः परं किल वितर्द्धशतैः प्रमाणं प्राप्तं मया यदिह दुःखगतिं गतेन। त्वं ड़ड़ड़ड़ सर्व जगतां जननीति सत्यं निहालुतां वितरता हरिणात्र दृष्टम्। त्वं देवि विदुषामयि दुर्विभाव्या वेदोऽपि नूनमखिलार्थ तया न वेद। यस्मात्वमुद्भवमसौ श्रुतिराप्नुवाना प्रत्यक्षमेवसकलं तृव कार्यमतत्। करतै चरित्रम खिलम्भुवि वेद धीमान् नाहं हरिर्नच भवो न सुरास्तथान्ये। ज्ञातुं क्षमाश्च मुनयो न ममात्मजाश्च दुर्वाच्य एव महिमा तब सर्वलोके। यज्ञेषु देवि! यदि नाम न ते वदन्ति स्वाहेति वेद विदुषो हवने कृतेऽपि। न प्राप्नुबन्ति सततं मखभागधेयं देवास्त्वमेव ड़ड़ड़ड़ वृत्तिहासि।
अत्यन्त दुःखित दशा को प्राप्त होने वाले मैंने ड़ड़ड़ड़ ही वितर्क करके भी इससे अधिक अन्य कोई भी ड़ड़ड़ड़ प्राप्त नहीं किया है। निद्रित अवस्था में पहुँच ने वाले डडडड हरि ने यही देखा है कि आप सम्पूर्ण जगतों की ड़ड़ड़ड़ हैं। हे देवि! बड़े-बड़े वेदों के तत्व ज्ञाता, विद्वानों की डडडड समझ में आपका स्वरूप नहीं आता है। साक्षात् स्वयं डडडड भी सम्पूर्णतया आपको नहीं जानता है। इस श्रुति डडडड उद्भव भी आपसे ही हुआ है, आपका यह समस्त डडडड प्रत्यक्ष ही है। कौन-सा ऐसा बुद्धिमान् है, जो इस ड़ड़ड़ड़ में आपका पूर्ण चरित्र जानता है? मैं स्वयं नहीं जानता हूँ, न विष्णु और न शिव ही जानते हैं। तथा अन्य साधुगण भी कोई आपके चरित्र को नहीं जानते हैं। ड़ड़ड़ड़ और मेरे पुत्र कोई भी स्वार्थ नहीं हैं। आपकी महिमा समस्त लोक में अनिवर्चनीय ही है। हे देवि! यज्ञों में डडडड ज्ञाता लोग स्वाहा, इस आपके नाम को नहीं कहते हैं। हवन करने पर भी देवगण मख का भाग प्राप्त नहीं डडडड है। देवों की वृत्ति आप ही देवी हैं।
जानन्ति ये न तब देवि! परं प्रभावं ध्यायन्ति हरिहरावधि मन्द चिन्तां। ज्ञातं मयाऽद्य जननि। ड़ड़ड़ड़ प्रमाणं यद्विष्णुरप्यतितरां विवशोऽद्यशैतं। धन्यास्त डडडड भूवि भक्तिपरास्तवांध्रौ त्यक्त्वान्य देव भजनं त्वयि ड़ड़ड़ड़ भावाः। कुर्वनित देवि! भजनं सकलं निकामं ड़ड़ड़ड़ समस्त जननीं किल कामधेनुम्। त्वं शक्तिरेव डडडड प्रभावा त्वन्निर्मितं च सकलं खलुभाव मात्रम्। त्वं डडडड निजविनिर्मित मोह जाले नाट्ये यथा विहरते ड़ड़ड़ड़ वहोवै॥ विष्णु स्वय प्रकटितः प्रथमं युगादौदत्ता च शक्ति रमलाखलुणनाय मात च सर्वमखिलं विवशीकृतोऽद्य डडडड चते वब त्थाम्ब करोषि नूनम्।
सावित्री देवि की महिमा का वर्णन करते हुये ब्रह्मा जी कहते हैं, हे देवि! जो आपका अतुल प्रभाव नहीं जानते हैं, वे ही लोग आपको त्याग कर मन्दबुद्धिता के कारण हरि और हर का ध्यान, भजन किया करते हैं। इस महीमंडल में वे पुरुष परम भाग्यशाली एवं धन्य हैं जो अन्य देवों को छोड़कर आपके चरणों में भक्तिभाव से लीन रहते हैं। दे देवि! आपको सब की माता और कामनाओं की पूर्ति करने वाली समझकर समस्त जगत् आपका निष्काम भजन किया करता है। यह सम्पूर्ण जगत् आपका ही बनाया हुआ है। आप ही की शक्ति इसमें विद्यमान है। एक नर की भाँति इसमें आप ही विहार किया करती हैं। विष्णु को अपने ही पालन के लिये प्रकट किया है और उसे शक्ति प्रदान की है, आपको रुचि के अनुरूप ही वह सब करते हैं।
भगवान विष्णु की अपने कार्य-संचालन की शक्ति कहाँ से प्राप्त हुई? इसका वर्णन इस प्रकार आता है कि एक बार उन्हें अन्तःप्रेरणा यज्ञ करने की हुई। उस समय यज्ञ से गायत्री तेज प्रादुर्भूत हुआ और उसने आकाशवाणी के माध्यम से वरदान देकर विष्णु को सामर्थ्य सम्पन्न बनाया। यह प्रकट ही है कि भगवान् राम और भगवान् कृष्ण जिनकी उपासना इन दिनों बहु प्रचलित है, विष्णु देव के अवतार हैं।
एकस्मिन्समये विष्णु वैकुण्ठे संस्थितः पुरा। सुधासिन्धु स्थितं द्वीपं सस्मार मणिमणितम्॥
यत्र दृष्टवा महामाया मनजश्चासदितः शुभः। यज्ञं कर्तुं मनश्चक्रे आम्बिकाया रमापतिः॥
जुहुवस्ते हविः कामं विधिवत्परिकल्पिते। कृतेतु वितते होमे वागुवस्वाहा शारीरिणी॥
विष्णुं तदा समाभाष्य सुस्वरा मधुराक्षरा। विष्णो त्वं भव देवानां हरेः श्रेष्ठतमः सदा॥
त्वो जनाः पूजयिष्यन्ति वरहस्त्वं भविष्यसि। अवतारेषु सर्वेषु शक्तिस्ते सहचारिणी॥
भविष्येति ममांशेन सर्व कार्य प्रसाधिनी। सधमिष्यसि तत्क्षर्व महत्त वरदानतः।
तास्त्वया नावमनतव्या सर्वदा गर्वलेशतः। पूजनीयाः प्रपलेन माननीयाश्च सर्वथा॥
अर्थ- एक समय विष्णु बैकुण्ठ में विराजमान थे। उस समय उन्होंने सुधोदघि में मणियों से मंडित एक मण्डप का दर्शन किया था और वहाँ से ही महादेवी के मन्त्र को प्राप्त किया था। फिर रमा के स्वामी के हृदय में देवी का यज्ञ करने की प्रेरणा हुई। सविधि परिकल्पित हवि से होम किया। विस्तृत होम होने के बाद आद आकाशवाणी के द्वारा देवी ने कहा था, जिसको सुस्वर मधुराक्षरों में विष्णु ने सुना था। आकाशवाणी में कहा- ‘‘हे विष्णु! मैं परम प्रसन्न होकर तुमको वरदान देती हूँ कि तुम हरि से भी श्रेष्ठ देवों में प्रमुख बना जाओगे। लोग तुम्हारी पूजा करेंगे और तुम मेरी कृपा से वरदान दे सकोगे। तुम जो भूभार हरणार्थ अवतार धारण करोगे, उनमें मेरी शक्ति तुम्हारे साथ रहेगी। मेरे ही अंश से वह समस्त कार्य सिद्ध करेगी। यह मेरा वरदान होगा कि वह सभी कुछ करेगी। अतः तुम उसका अपमान गर्व में आकर मत करना और उसका सदा अर्चन एवं समादर करना।
देवी की महिमा का वर्णन भगवान् विष्णु अपने मुख से इस प्रकार से करते हैं-
ज्ञातं मयाऽखिलमिदं स्वयि सन्निविष्टं त्वत्तोऽस्थ सम्भ वलयावपि मातरद्य। शस्तिश्च तेऽस्य करणे विनत प्रभा वा ज्ञाताधुना सकल लोकमयीति नूनम्॥ विस्तीर्य्य सर्वमखिलं सदसद्धिकारं संदर्शयस्य विकलं पुरुषाय काले। तत्वैश्च षोड़शभिरेव च सप्तभिश्च भासीन्द्रजालमिवै नः किल रंजनाय॥
हे माता! मैंने भली भाँति समझ लिया है कि यह सम्पूर्ण विश्व आपके ही अन्दर सन्निविष्ट हो रहा है और अब आप ही से इसका सम्भव और लय भी होता है। इसकी रचना करने में आपकी शक्ति विस्तृत प्रभाव वाली है और अब यह जान लिया है कि आप निश्चय ही समस्त लोकों से परिपूर्ण हैं। सद् और असद् विकारों से युक्त इस विश्व का विस्तार करके समय पर पुरुष को आप इसका विकल स्वरूप दिखा देती हैं। सोलह और सात तत्वों से यह हमारे रंजन के लिये एक इन्द्रजाल की भाँति प्रतीत होता है।
विद्या त्वमेव मनु बुद्धिमतां नराणां शक्तिमतां सदैव। त्वं कीर्ति कान्ति कमलामल तुष्टिरूपा मुक्तिप्रदा विरतिरेव मनुष्यलोके। गायत्र्यसि प्रथम वेदकला त्वमेव स्वाहा स्वधा गभवती सगुणा धार्मात्रा। आम्नाय एव विहितो निगमो भवत्या संजीवनाय सततं सुर पूर्वजान्तम्॥
भगवान् विष्णु सावित्री देवी से कहते हैं कि जो बुद्धिमान पुरुष हैं, उनकी विद्या आप ही हैं और जो शक्तिशाली हैं, उनकी शक्ति भी आपका ही स्वरूप है। इस मनुष्य लोक में आप की कीर्ति-कांति और अमल, तुष्टि स्वरूपिणी मुक्तिप्रदा विभूति भी हैं। वेद की प्रथम कला गायत्री आप ही हैं। स्वाहा-स्वधा और सगुण, अर्धमात्रा भगवती आप ही हैं। आपने देवों और पूर्वजों के रंजनार्थ आम्वाय और निगम का विधान किया है।
भगवान् शिव! भी सावित्री का स्तवन करते हुए कहते हैं-
युविं विहाय तवान्तक सेवनं के इहवांच्छिति राज्यमकणकम्। त्रुटिरसौ किल यति युगात्मतां न निकटं यदि तेंऽकि सरोरुहम्। तयसि ये निरता मुनयोऽमला स्तव विहाय पदाम्बुज पूजनम्। जननि ते! विधिना किल वंचिताः परिभवो विभवे परिकल्पितः॥ न तपसा न हमेन समाधिना न च तथा विहितैः क्रतुभिर्यथा। तब पदाब्ज पराग निषेवरणाद्भवति मुक्ति रजेभव सागरान्॥
हे माता! कौन ऐसा मूर्ख है, जो इस भूमण्डल में आपकी सान्निध्य-सेवा का परित्याग करके निष्कण्टक राज्य की इच्छा किया करता है, अर्थात् आपके समीप में स्थित रहकर सेवा के महत्व के सामने राज्य की प्राप्ति भी तुच्छ है। ऐसी त्रुटि फिर युगों तक दुःखद होती है, यदि कोई आपके चरण-कमल के समीप में नहीं पहुँचता है। जो मुनिगण आपके चरण-कमल का त्याग कर निरन्तर तपस्या करने में ही निरत रहा करते हैं, हे जननि! वास्तव में विधाता ने उन्हें वंचित ही कर दिया है, और विभव में भी उनका परिभव कर दिया है। तप, समाधि, दम तथा ऋतुओं के करने पर भी इस भवसागर से छुटकारा उस प्रकार का नहीं हो सकता है, जैसा केवल आपके चरण-कमलों का समाश्रय लेने से होता है।
एवं सत्ययुगे सर्वे गायत्री जप तत्पराः। तर हृल्लेखयी चापि जपे निष्रगात मानसाः॥
न विष्णु पासना नित्या देदेनोक्ता तु कुत्रचित्। न विष्णु दीक्षा नित्यास्ति शिवस्योपि तथैवच॥
गायत्र्युपासना नित्या सर्ववेदैः समीरिता। यया बिना त्वघः पातो ब्राह्मणास्यास्ति सर्वथा॥
तवता कृत्कृत्यत्नं नान्यापेक्षा द्विजस्य हि। गायत्री मात्र निष्णातो द्विजो मोक्षमवाप्नुयात्॥
युयदिन्यन्न वा कुर्यादिति प्राह मनुः स्वयम्। विहाय तां तु गायत्रीं विष्णू पास्ति परायणः॥
शिवोवास्ति रतो विप्रो नरकं याति सर्वथा। तस्मादाद्य युगे राजन् गायत्री जप तत्पराः॥
देवी पदाम्बुजरता आसन्सर्वे द्विजोसमाः॥
अर्थ- सत्ययुग में सभी लोग गायत्री के जाप करने में तत्पर थे। अन्य युगों में भी जाप में सब निष्णात मन वाले थे। भगवान् विष्णु की उपासना नित्य है- ऐसा वेद में कहीं पर भी नहीं कहा गया है। विष्णु और शिव की दीक्षा भी नित्य नहीं है। केवल एक गायत्री की उपासना ही नित्य है- ऐसा सभी वेदों में स्पष्टतया बतलाया है, जिसके बिना ब्राह्मण का तो सर्वथा अधःपतन हो जाता है। ब्राह्मण के लिये उतना ही अर्थात् गायत्री मन्त्र का जाप करना सफलता प्राप्त करने के लिये पर्याप्त होता है। उसे फिर अन्य किसी की अपेक्षा नहीं रहती है। केवल एकमात्र गायत्री की उपासना में निष्णात द्विज मानव-जीवन के परम पुरुषार्थ स्वरूप मोक्ष को प्राप्त कर लिया करता है। महर्षि मनु ने कहा है कि गायत्री के जपाराधना करने वाला द्विज अन्य कुछ करे या कुछ भी न करे अर्थात् अन्य किसी के भी करने की उसे संगति प्राप्त करने के लिये आवश्यकता नहीं होती है। गायत्री पर त्याग करके जो केवल विष्णु की उपासना करने में निरत रहता है अथवा शिवोपासना में प्रेम करता है, ऐसा विप्र सर्वथा नरकगामी होता है। इसलिये हे राजन्! आप अर्थात् कृत युग में सभी गायत्री के जप करने में परायण रहा करते थे। सभी द्विज भगवती के चरण-कमल में रति करने वाले हुये थे।
भारतीय धर्म में अनादि काल से प्रचलित और सर्वश्रेष्ठ मानी गई गायत्री उपासना का आश्रय लेकर हम भी अपने महान् पूर्वजों की तरह आत्मिक और भौतिक समृद्धियों से पूरी तरह लाभान्वित हो सकते हैं।
अखण्ड-ज्योति का 29 वाँ वर्ष इस अंक के साथ समाप्त होकर अगला 30 वाँ वर्ष आरम्भ होगा। इस पिछले छोटे से जीवनकाल में उसने जो कुछ किया है, वह निस्सन्देह अनुपम और अद्भुत ही कहा जायेगा। एक लाख से अधिक प्रबुद्ध कार्यकर्त्ताओं की एक बड़ी सेना उसने संगठित करके नव-निर्माण के कार्य क्षेत्र में उतारी है। इतना बड़ा और इतना सफल प्रयास इन दिनों शायद ही कोई हुआ हो। स्वतंत्रता संघर्ष का दौर समाप्त हो जाने के बाद भावनात्मक नव-निर्माण की दिशा में रचनात्मक प्रयत्न आवश्यक थे, उनका शुभारम्भ किया जाना समय की सबसे बड़ी माँग थी, सो पूरी करने के लिये अखण्ड-ज्योति ने अपने स्वल्प साधनों की कठिनाइयाँ रहते हुये भी जो कार्य किया है, उसे भावी पीढ़ियां गर्व और गौरव के साथ स्मरण करती रहेंगी।
अनाचार और विसंगठन की दुष्प्रवृत्तियाँ इन दिनों इतनी तेजी पर हैं कि उनकी तुलना आँधी तूफान, बाढ़ और भूकम्प जैसी विभीषिकाओं से ही की जा सकती है। पापा और अज्ञान इन दिनों पूरे जोश, आवेश पर हैं। ध्वंसात्मक आसुरी प्रवृत्तियाँ मनुष्यता को निगल जाने के लिए सुरक्षा की तरह मुँह फाड़े खड़ी हैं। ऐसे समय में ‘अखण्ड-ज्योति’ के प्रयत्न ‘नक्कार खाने में तूती’ की तरह स्वल्प प्रतीत हो सकते हैं और उनका कोई प्रत्यक्ष परिणाम दृष्टिगोचर नहीं भी हो सकता है। पर यह भी जान ही लेना चाहिये कि अनाचार की बाढ़ की एक बड़ी सीमा तक रोका गया है और मस्तिष्कों में वह प्रकाश पैदा किया गय है जिनके आधार पर अवाँछनीय से लड़ने के लिए जन-मानस में आवश्यक उत्साह एवं साहस उत्पन्न हो सके। यह प्रयत्न कम मूल्यवान् नहीं। कुछ ही दिनों में यह देखा जा सकेगा कि अखण्ड-ज्योति ने जो बीच बोये थे, वे उगे ही नहीं- फले-फूले ही नहीं वरन् उनके आश्रय में नये युग की नई सम्भावनायें विनिर्मित हुईं।
अखबार अनेक निकलते हैं और अनेक रुचियों के पाठक उनमें से अपने अनुकूल साहित्य खरीदते, पढ़ते रहते हैं। धार्मिक, अध्यात्मिक पत्र भी अनेक निकलते हैं और उन्हें उस प्रवृत्ति के लोग मँगाते, अपनाते हैं। उस प्रक्रिया की तुलना अखण्ड-ज्योति से नहीं की जा सकती। वह जानकारी मात्र देने का- पिसे को पीसने का- जो कहा जाता रहा है, उसे दुहराने का ढर्रा अपनाकर किसी तरह विज्ञापन या दान के सहारे अपना जीवन-क्रम चलाती रहने वाली पत्रिका नहीं है। उसका अपना ढंग, उद्देश्य, क्रिया-कलाप सबसे अनोखा और सबसे भिन्न है। नये युग की सन्देश-वाहिका के रूप में वह अवतीर्ण हुई है और नये व्यक्तित्व, नया समाज, नया विश्व बनाने के लिये अनवरत भागीरथ प्रयत्न कर रही है। जिनमें इस प्रयोजन के उपयुक्त क्षमता देखी गई है। उन्हें ढूँढ़-ढूँढ़कर एक सूत्र में पिरोया है, उन्हें सोते से जगाया है, दिशा बताई है और लक्ष्य की और दृढ़ता के साथ चल पड़ने के लिये आवश्यक उत्साह एवं साहस प्रदान किया है।
अखण्ड-ज्योति के लेख कागज पर काले अक्षर छाप देने मात्र की प्रक्रिया नहीं है वरन् उनकी एक-एक पंक्ति में एक दर्द, एक आग और एक प्रकाश भरा रहता है। आत्मिक अनुभूतियों के आधार पर उन्हें लिखा जाता है, यही कारण है कि उन प्रेरणाओं को पाठक अनसुनी न कर सके और नव-निर्माण के महान् अभियान में लाखों व्यक्ति जुट गये। उनके द्वारा जो किया जा रहा है और जो सोचा जा रहा है, उसे देखते हुए यह आशा एक सुनिश्चित सम्भावना बनती जा रही है कि कल इस पृथ्वी पर देवत्व उतरेगा और यहाँ स्वर्गीय परिस्थितियों का निर्माण होगा।
आज की सर्वग्राही असुर विभीषिकायें कम प्रबल नहीं हैं। यों इतिहास में रावण, कंस, जरासन्ध, हिरण्यकश्यप आदि के द्वारा विनिर्मित असुर वातावरण की चर्चा मिलती है और पता चलता है कि इस दुष्ट वातावरण से अगणित लोग प्रभावित होकर असुर कर्म करने लगे थे। फिर भी उसकी एक सीमा रही। सीमित भू-भाग में ही उसका प्रभाव रहा। आत्मा, परमात्मा, कर्म, पुनर्जन्म, स्वर्ग-नरक की मान्यताओं में उनकी आस्था पूर्णतया नष्ट नहीं हुई थी। इसलिये दुष्कर्म करते हुये भी अन्तः करण से काँपते रहते थे और कोई सुधारने वाला मिल जाय तो आसानी से सुधर भी जाते थे। पर आज की परिस्थिति तब की अपेक्षा बहुत अधिक विषम है। अब कोई व्यक्ति राक्षसराज बनकर नहीं प्रगटा है, जिसे धनुष-बाण से मारा जा सके। इस शताब्दी में भौतिकवादी प्रतिपादन- असुरता के अति व्यापक और अति प्रभावशाली रूप में सामने आये हैं। वे लोभ या भय से लोगों को अपना अनुचर बनने के लिये विवश नहीं करते वरन् भोले-भोले लोगों के मस्तिष्कों पर इस तरह कब्जा कर लेते हैं, मानों वे वस्तुतः तर्क, प्रमाण, उदाहरण एवं प्रत्यक्ष परख के आधार पर सौ फीसदी सही हों। लोग उन्हें सही मानते और अपनाते हैं, फलतः उनकी विचारणा और क्रिया-पद्धति एक सभ्य कलेवर ओढ़कर-सिद्धान्तवाद का जामा पहनकर- असुरता से ओत-प्रोत हो जाती है। वर्तमान पीढ़ी की यही स्थिति है। शिक्षित समाज उसी रंग में रंगता चला जा रहा है।
आज के लंगड़े-लूले, काने-कुबड़े विज्ञान प्रतिपादनों ने यह निष्कर्ष निकाला है कि- ‘ईश्वर कोई नहीं, आत्मा का अस्तित्व कहीं नहीं, मनुष्य की चेतना एक जड़ प्रकरण की हलचल मात्र है। जिसका प्रजनन के साथ आरम्भ होता है और मरण के साथ अन्त हो जाता है। परलोक कहीं नहीं, यदि राजदण्ड से बचा जा सके तो दुष्कर्मों के दण्ड को फिर कोई सम्भावना नहीं। आक्रमण और शोषण हर बलवान का जन्मसिद्ध अधिकार है। वासनाओं की मनमानी पूर्ति से ही व्यक्तित्व सबल होता है, संयम की बात सोचना हानिकारक है आदि, आदि। इन प्रतिपादनों को जब साइन्स, तर्क, मनोविज्ञान, दर्शन आदि का कलेवर पहना कर प्रमाणित किया जा रहा हो, तब जन-साधारण के मन में आदर्शवादिता, उत्कृष्टता, संयम, सदाचार, पुण्य, परमार्थ के लिये कोई स्थान कैसे रहेगा, फिर लोग अनाचार के आकर्षण को क्यों त्यागना चाहेंगे? फिर स्वेच्छाचार पर कोई नियन्त्रण रह कहाँ जायेगा? आज की स्थिति यही है। तथाकथित शिक्षा जैसे-जैसे बढ़ रही है, उसी क्रम में अनास्थायें भी बढ़ रही हैं। बेचारा अशिक्षित पाप-पुण्य की- स्वर्ग-नरक की बात सोच सकता है, पर तथाकथित सुशिक्षितों के लिये यह सब दकियानूसी मान्यतायें। प्रगतिशीलता की परिभाषा अब अनास्था बढ़ाती चली जा रही है।
फलस्वरूप दुर्भावनाओं और दुष्प्रवृत्तियों का उफान भी दिन-प्रति-दिन प्रबल होता चला जा रहा है। चारों ओर स्वार्थ, संघर्ष प्रबल होते चले जा रहे हैं। अपराधों की बाढ़ अपनी सभी मर्यादायें तोड़ देना चाहती हैं। फलतः रोग-शोक, दुःख-दारिद्रय, क्लेश-कलह, उद्वेग-संशय से मनुष्य समाज बुरी तरह आक्रांत होता चला जा रहा है।
इस स्थिति को यथावत बनी रहने दिया जाय और जिस क्रम में उफान आ रहा है और वैसे ही उबलने दिया जाय तो सभ्यता, संस्कृति, धर्म, ईमान, शान्ति, सदाचरण के लिये ही नहीं समस्त मानवता के विनाश का संकट पैदा हो जायेगा। गृह-कलह और परस्पर संघर्ष में यादव कुल की तरह लड़-झगड़कर सभी वर्ग और सभी देश नष्ट हो जायेंगे। एक सामूहिक आत्म-हत्या की स्थिति कुछ ही दिनों में सामने आ उपस्थित होगी। असुरता का यह कलेवर अति भयंकर है। उसका सामना करना पिछले सभी देवासुर संग्रामों की अपेक्षा अति कठिन है। पिछले जमाने में असुरों को कोई बलशाली देवात्मा तीन-तलवारों की लड़ाई से परास्त कर देता था। अब जब कि वे असुर जन-मानस में अनास्था एवं स्वेच्छाचार की एक उपयोगिता एवं वास्तविकता, जैसा दर्शाते जब अपना अड्डा जमा बैठे हैं, तब उन्हें किन तीर-तलवारों से किस मैदान में लड़ाई छेड़कर मारा जाय? यदि मारा जा सके तो इन प्रतिपादनों से प्रभावित जनता नारकीय दुष्परिणामों में तिल-तिल जलकर अपना अन्त करेगी। इस स्थिति को भी अन्य मनस्क होकर उपेक्षापूर्वक यथावत् चलते और बढ़ते नहीं देखा जा सकता।
इस विषम धर्म-संकट की घड़ियों में अखण्ड-ज्योति की तलवार की धार पर चलने जैसा कठिन कर्त्तव्य पालन करना पड़ रहा है। उसे उसी मोर्चे पर अड़ाया गया है। भौतिकवादी मान्यताओं का प्रभाव चला तो शिक्षित वर्ग से है, पर वह घने जंगलों में रहने वाले अशिक्षितों तक जा पहुँचा है। था तो वह पहले भी पर उस जमाने में लोग उसे पाप मानते थे और भीतर ही भीतर डरते तथा धिक्कारते रहते थे और उस अनीति से निकल सकने पर अपना सौभाग्य मानते थे। अब निर्भय और निःशंक होकर एक उपयोगी सिद्धान्त के रूप में असुरता में सराहा और अपनाया जा रहा है। ऐसी दशा में तीन अरब जनसंख्या वाले इस संसार में फैली हुई इस दुर्बुद्धि से लोहा लेना, उसे असत्य, अवाँछनीय, अहितकर और त्याज्य सिद्ध करना निस्सन्देह कठिन कार्य है। वह भी तब, जबकि अखण्ड-ज्योति एकाकी इस महान् अभियान में जुटी हुई है और उसके साधन अति स्वल्प हैं।
जो हो, जो काम सौंपा गया है, उसे अखण्ड-ज्योति ने अपनी शक्ति और सामर्थ्य को एक-एक कर निचोड़ कर, पूरा करने का प्रयत्न किया है। जितने साधन थे उसकी तुलना में हजारों गुनी अधिक सफलता मिली है। पर इतने मात्र से संतोष थोड़े ही किया जा सकता है, जो काम करने को पड़ा है, वह अति विस्तृत है, अभी मंजिल बहुत लम्बी है और इस पर देर तक-कठिन व्यवधानों से टकराते हुए आगे बढ़ना है। ध्यान इस अगली मंजिल का ही रखना है। रुकने का कोई प्रश्न नहीं। असुरता के विरुद्ध जो संघर्ष छेड़ा गया है, उसमें विराम नहीं किया जा सकता है।
देवत्व परास्त हो जाय, धर्म हार जाय, विवेक कराहता रहे, चिर-संचित मानव-सभ्यता को निर्बल कर दिया जाय, यह नहीं होने दिया जायेगा। लड़ाई जारी रखी जायेगी, दुनिया के योद्धा, नेता, धनी, बुद्धिमान्, विद्वान साथ न दें तो निराश न बैठा जायेगा। रीछ-वानरों को-अपने नगण्य स्तर के परिजनों को लेकर अखण्ड-ज्योति आगे आयेगी, और सोने की लंका में साधन सम्पन्न-कुम्भकरणों, मेघनाथों, रावणों को ललकारेगी। विजय दूर हो तो हर्ज नहीं। आगे बढ़ना और लड़ना अपना काम है, सो उसे बिना राई-रत्ती हिचकिचाहट लाये, दिन-दूने-रात चौगुने उत्साह के साथ जारी रखा जायेगा।
अभिलाषा इतनी भर है कि अपने परिवार से जो आशायें रखी गई हैं, उन्हें कल्पना मात्र सिद्ध न होना पड़े। अखण्ड-ज्योति परिजन अपना उत्साह खो न बैठें और जब त्याग, बलिदान की घड़ी आवे, तब अपने को खोटा सिक्का सिद्ध न करने लगें। मनुष्य की महानता उसकी उन सत्प्रवृत्तियों की चरितार्थ करने में है, जिनसे दूसरों को प्रकाश मिले। जिसमें ऐसा कुछ नहीं- जो उदरपूर्ण और प्रजनन प्रक्रियाओं तक सीमाबद्ध है, उसे नर-पशु ही कहा जा सकता है। हम नहीं चाहते कि हमारे बड़ी आशाओं के साथ संजोये हुए सपनों की प्रतिमूर्ति- परिजन उसी स्तर के चित्र हों, जिसका कि घर-घर में कूड़ा-कटकर भरा पड़ा है।
इस महत्वपूर्ण वेला में जो अपने कर्त्तव्यों का स्मरण रख सकें और जो उसके लिये वासना और तृष्णा को एक सीमा में नियन्त्रित रखकर कुछ अवसर अवकाश युग की पुकार- ईश्वरीय पुकार को सुनने, समझने और तद्नुसार आचरण करने में लग सकें, वे ही हमारी आशाओं के केन्द्र हो सकते हैं। उन साथी, सहचरों, में हम आगे बढ़ते और निर्धारित मोर्चों पर लड़ते हुए आगे बढ़ेंगे।
गत अंक में एक प्रथम कर्त्तव्याचरण परिजनों के सम्मुख रखा था कि अपने परिवार को जागृत, सुगठित और विस्तृत बनाया जाय, ताकि निर्धारित लक्ष्य की पूर्ति के लिए अधिक व्यापकता और अधिक सफलता के साथ आगे बढ़ा जा सके। उम्मीदें, अन्यमनस्क, विसंगठित, थोड़े से लोग उस समस्त विश्व को अपना कार्यक्षेत्र बनाकर उसका तेजी से भावनात्मक नव-निर्माण करने का काम ठीक तरह न कर सकेंगे। इसलिये उत्कृष्टता भी चाहिये और विशालता भी। हमारे परिजनों का मनोबल, साहस, त्याग और पुरुषार्थ बढ़ा-चढ़ा होना चाहिए, साथ ही उनकी संख्या भी बढ़नी चाहिये। इस आवश्यकता की पूर्ति हम सब मिल-जुलकर बड़ी आसानी से कर सकते हैं।
परस्पर मिल-जुलकर हमें एक टीम की तरह गठित होना चाहिये। जहाँ जितने परिजन हैं, उन्हें समय-समय पर मिलन-गोष्ठी के रूप में इकट्ठे होते रहना चाहिये। जन्म-दिनों के मनाने के माध्यम से यह प्रक्रिया बड़ी सरलता और बड़ी सफलतापूर्वक चलती रह सकती है। अखण्ड-ज्योति परिवार के सभी सदस्यों के जन्म-दिन मनाये जाया करें, और उनमें वे सदस्य उत्साहपूर्वक भाग लेते रहा करें तो थोड़े ही दिनों में सबमें परस्पर प्रेम-भाव बढ़ता चला जायेगा। परिचय की घनिष्ठता और बार-बार मिलते रहने की क्रम-श्रृंखला हमें निश्चित रूप से संगठित करेगी और यह संगठन एक समर्थ शक्ति के रूप में परिणत होगा, जन्म-दिन मनाने के कार्यक्रम जहाँ भी चल पड़े, वहाँ बहुत ही आशाजनक परिणाम उत्पन्न हुये हैं। वहाँ की शाखा अति संतोषजनक ढंग से प्रगति कर रही है।
हम चाहते हैं कि हर जगह यह प्रक्रिया चल पड़े। जहाँ भी अखण्ड-ज्योति पहुँचती है, वहाँ के एक-दो व्यक्ति आगे बढ़ें, उत्साह से काम लें। स्थानीय अन्य सदस्यों से संपर्क बनायें, उन्हें इकट्ठा करें या उनके घरों पर जाकर संगठन का महत्व समझायें और उसके लिये उत्साह पैदा करें। एक बार में नहीं- दो चार बार के मिलन में सफलता अवश्य मिल जायगी और अपने विचारशील सदस्य संगठित होने में में उदासीनता दिखाने की अपेक्षा उत्साह प्रदर्शित करने लगेंगे। एक का उत्साह दस में उत्साह भर सकता है। एक सक्रिय दस में सक्रियता उत्पन्न कर सकता है। इस तथ्य में संदेह की गुंजाइश नहीं। जहाँ कहीं संगठित कार्य बड़े आशाजनक ढंग में चल रहे हैं, वहाँ मूलतः एक-दो व्यक्ति की लगनशील हैं- उन्हीं की तत्परता ने एक संगठन खड़ा किया है और उसे सुसंचालित बना रखा है।
जहाँ कहीं भी एक-दो व्यक्ति खड़े हो जायेंगे, वहीं अपना प्रथम चरण आगे बढ़ जायेगा। परिवार संगठित हो जायगा और जन्म-दिन मनाने की प्रक्रिया बड़ी आसानी से चलने लगेगी। अब यह चल ही पड़नी चाहिए, हम चाहते हैं कि हम अपना जीवन-क्रम समाप्त करने से पूर्व यह देखकर जायें कि हमारे परिजन हर जगह संगठित हो गये और निष्क्रियता छोड़कर सक्रियता के क्षेत्र में प्रवेश कर गये। हमारे लिये यह एक बहुत बड़े संतोष की बात होगी। जहाँ इतना होने लगेगा, वहीं से हमें भविष्य में भी कुछ होने की आशा रहेगी, जो इतना भी न कर सकें उनमें और कुछ बड़ी आशा किस आधार पर रखी जाय।
युग-निर्माण का दूसरा चरण है- झोला पुस्तकालय। अपने सभी कर्मठ सदस्यों को झोला पुस्तकालय चलाना चाहिये। छोटे ट्रैक्ट गजब की प्रेरणा और रोशनी से भरे पड़े हैं। उन्हें हमने हृदय की कलम और भावनाओं की स्याही से लिखा है। उन्हें जो पढ़ेगा, अवश्य बदलेगा- जैसा था वैसा बना नहीं रह सकता। भले ही वह परिवर्तन प्रत्यक्ष दिखाई न पड़े पर अन्तरंग में हलचल निश्चित रूप से उठेगी और उसे ऊँचा उठने एवं आगे बढ़ने के लिये विवश करेगी। युग-परिवर्तन का आधार विचार परिवर्तन है। विचार परिवर्तन की प्रक्रिया प्रेरक तथ्यपूर्ण और बुद्धि-संगत विचार ही प्रस्तुत करती है। छोटे ट्रैक्टों में यह सब कुछ है। जब तक लगभग 200-250 पुस्तिकायें छप चुकीं, यह सब मिलाकर लगभग 75) रु. का है। उनमें से अधिकांश तो परिजनों ने मंगा भी लिया है, जो न मंगा पाये हों अब मंगा लेना चाहिये और इस वर्ष का प्रकाशन जो अब पूरा हो चुका, लेकर अपना पुस्तकालय पूरा कर लेना चाहिये।
यह आशा नहीं रखनी चाहिये कि कोई हमारे घर पर आकर यह साहित्य माँगेगा या पढ़ेगा। यह तो हमीं को करना है कि अपने दफ्तर में, दुकान पर, कार्यक्षेत्र में जिनसे भी संपर्क बने, उनसे अन्य बातों से मिलाकर अपनी बात छेड़ी जाय, प्रस्तुत पुस्तिकाओं की प्रशंसा करके उन्हें पढ़ने की रुचि पैदा की जाय और यदि थोड़ा भी उत्साह दिखाई दे तो उस पुस्तिका को सर्वप्रथम देना चाहिये, जो उनकी किसी समस्या से अथवा वर्तमान रुचि से संबंधित हो। इस तरह इन पुस्तिकाओं का देना और वापिस लेने का क्रम अपने अन्य कामों के साथ-साथ चलाया जा सकता है और थोड़ी-सी दिलचस्पी लेने लगने मात्र से अपने संपर्क क्षेत्र में पत्र पत्रिकाओं को नये प्रकाश का लाभ दिया जा सकता है। अध्यापक और अध्यापिकायें अपने छात्रों में बड़ी आसानी से यह प्रवृत्ति चला सकते हैं और भावी पीढ़ी के भावनात्मक नव-निर्माण में भारी योगदान दे सकते हैं।
झोला पुस्तकालयों की हलचलें हमारी आशा का केन्द्र है। जहाँ यह हलचलें गतिशील होंगी, केवल उन्हीं स्थानों या व्यक्तियों के बारे में यह माना जा सकेगा कि वहाँ हमें तथा हमारे मिशन को समझा गया है और हमारे साथ चलने के लिये कदम बढ़ाया और हमारा भार हल्का करने के लिये कंधा लगाया गया है। अपनी विचार-धारा को व्यापक बनाने में सबसे सरल और सबसे महत्वपूर्ण कार्य झोला पुस्तकालय ही है। जो उस छोटी प्रक्रिया को संचालित कर सकता है, वह अपने महान् मिशन की- हमारा व्यक्तिगत संतुष्टि की एक अत्युत्तम साधना कर रहा है, यही कहा, माना और समझा जायेगा।
तीसरा चरण अति साधारण और बिलकुल सामयिक है, उसे इसी महीने, इन्हीं दिनों- आज ही उठाया जाना चाहिये। अखण्ड-ज्योति और युग-निर्माण पत्रिकाओं ने अपना कलेवर और स्तर यकायक बहुत ऊँचा उठा दिया है, क्योंकि उन्हें जो कार्य जितनी शीघ्र और जितनी व्यापकता से करना है, उसे देखते हुये यह वृद्धि नितान्त आवश्यक एवं अनिवार्य थी, साथ ही मूल्य भी बढ़ा है। कलेवर पृष्ठ स्तर बढ़ने की बात से तो कौन प्रसन्न न होगा, पर मूल्य बढ़ने वाली बात अखर सकती है और कुछ कमजोर तबियत के वे लोग जो नये-नये ही किसी के ड़ड़ड़ड़, सुनने या दबाव से सदस्य बने थे, कच्चे पड़ जाते हैं और सदस्यता छोड़ सकते हैं। इस संबंध में सतर्कता बरती जाय। सदस्य घटने नहीं देने हैं वरन् बढ़ाने हैं। इसके बिना अपना कार्यक्षेत्र संकुचित होता ड़ड़ड़ड़ जायगा और मिशन की व्यापकता में भारी बाधा उत्पन्न होगी। इस वर्ष तो नये सदस्य बढ़ाने का लक्ष डडडड जाना चाहिये और उसे पूरे उत्साह के साथ पूरा किया जाना चाहिए। यह सामयिक कार्य है, इसी महीने आरम्भ और इसी महीने समाप्त होने वाला है, पर है अति महत्वपूर्ण और अति आवश्यक।
इस महीने हमें एकाकी या कई परिजनों की सम्मिलित टोली के रूप में सक्रिय होना चाहिए। वर्तमान सदस्यों से आग्रहपूर्वक चन्दा जमा करना चाहिये और नये विचारशील लोगों को ढूंढ़-ढूंढ़कर उन्हें अक्टूबर, नवम्बर, दिसम्बर के तीनों अंक नमूने के रूप में दिखाते हुये नये सदस्य बनाना चाहिये। पत्रिकाओं के स्तर एवं कलेवर को देखते हुये 6) रु. किसी भी प्रकार अधिक नहीं। जो पत्र-दान या विज्ञापन पर नहीं चलते उनकी पंक्ति में अपनी पत्रिकायें सबसे सस्ती और सबसे अच्छी है। इन्हें मंगाने के लिये किसी भी विवेकशील को तैयार किया जा सकता है। प्रभावशाली परिजनों की टोली एक सप्ताह के लिये भी अपने नगर में निकल पड़े, तो अब की अपेक्षा दूने-चौगुने सदस्य सहज ही बन सकते हैं और युग-निर्माण आन्दोलन का क्षेत्र उसी अनुपात से बढ़कर मिशन की सफलता में चार चाँद लगा सकता है।
इस अंक के साथ एक रसीद बही जैसा पृष्ठ लगा है। जिनसे चन्दा वसूल किया जाय, उन्हें यह रसीद काटकर दी जा सकती है और उनका पैसा इकट्ठा ही चैक ड्राफ्ट या बीमे से भेजा जा सकता है। मनीआर्डरों में उन दिनों बहुत देर हो जाती है और अंक पहुंचने में अनावश्यक विलम्ब होता है, इसलिए पैसा भेजने के उपरोक्त तरीके अधिक सुविधाजनक एवं कम खर्चीले हैं।
अखण्ड-ज्योति के हर सदस्य को इस महीने यह सामयिक कर्तव्य पालन करना चाहिये कि वह कम से कम तीन नये सदस्य और बढ़ायेगा। सच्चे मन से निश्चय करने भर की बात है, संकल्प किसी का भी अधूरा नहीं रहेगा।
अखण्ड-ज्योति ने, उसके परिवार ने- अब तक जो किया है, वह आशाजनक और उत्साह-वर्धक है। आगे उसे ऐसा करना है-उतना करना है- जो मानव-जाति के भाग्य भविष्य का निर्माण करने में महत्वपूर्ण भूमिका प्रस्तुत करे। उसके लिये इस वर्ष के इस अन्तिम महीने में उपरोक्त तीन कार्य पूरे कर लेने चाहिये ताकि अगले वर्ष के लिये अधिक प्रभावशाली और अधिक व्यापक योजनायें बना सकना सम्भव हो सके।
(माया वर्मा)
क्यों न चरण में दानवता लौटेगी होकर क्षार? जब कि रुद्र बन गरल पिया करता मैं बारम्बार॥
बढ़ी असुरता जब इस भू पर बढ़ा बहुत अभिमान। हार चला देवत्व एक क्षण, कठिन हो गया त्राण॥ तब मैंने ही अस्थि-पुंज का करके पुण्य प्रदान। दिखलाया वह पंथ, मनुजता का जिसमें कल्याण॥
त्याग, तपस्यामय जीवन है यद्यपि असि की धार। पर मैं उस पर ही चलता हूँ, सुख-सुविधायें वार॥
थी छोटी-सी बात, मगरकर दिया राज्य का त्याग। क्षण-भंगुर वैभव से मुझे न रहा कभी अनुराग॥ सोने की लंका में केवल लगी इसी से आग। स्वार्थ, असंयम, अनाचार ने खुल कर खेली फाग॥
वेध गई जब हृदय, विभीषण की अति करुणा पुकार। बहुत कष्ट झेले थे तब बदला था वह संसार॥
और एक दिन, जब दुरितों से थी यह भू बेहाल। महाधूर्त दुर्योधन ने थी चली स्वार्थमय चाल॥ उठना पड़ा मुझे ही उसका मर्दित करने भाल। रचना पड़ा महाभारत तब काट सका वह जाल॥
क्षुद्र, भोगमय स्वार्थ हेतु वे भूल गये थे प्यार। इसी हेतु निष्काम कर्म का करना है पड़ा प्रसार।
नास्तिकता बढ़ चली और जब मिटा धर्म-विश्वास। दूर बहुत हो गया क्षीण हो, सत्य, विवेक, प्रकाश॥ स्वार्थ घिरा जन-जन के मन पर, हुआ पुण्य का नाश। त्यागे राहुल और यशोधरा, चला काटने पाश॥
समझाया यह भव नश्वर है, जगत् भोग निःसार। ममता, प्रेम, दया, करुणा का, करो सभी विस्तार॥
जब भी धर्म नष्ट होता और बढ़ता है अज्ञान। स्वार्थ निरत हो तुच्छ कर्म करते हैं कुछ इंसान॥ लक्ष्य-बिन्दु से चरण भटकते, होते आकुल प्राण। तब-तब मैं करता रहता हूँ- सतत् गरल का मन।
मैं मानव हूँ, दिव्य तेज का स्रोत-शक्ति आगार। मेरे इंगित पर चलती जग-नौका की पतवार॥
*समाप्त*