हाड़-माँस का पुतला दुर्बलकाय मानव प्राणी शारीरिक दृष्टि से तुच्छ और नगण्य है। मामूली जीव-जन्तु, पशु-पक्षी जिस तरह का निसर्ग जीवन जीते हैं उसी तरह जिन्दगी की लाश नर-पशु भी ढोते रहते हैं। इस तरह की जिन्दगी जीने से किसी का जीवनोद्देश्य पूरा नहीं होता।
‘विचार’ ही वह शक्ति है जिसने मनुष्य को अन्य प्राणियों की तुलना में अधिक सुख-सुविधाएं उपार्जित करने में समर्थ बनाया। विचार का यह प्रथम चमत्कार है। इससे अगला चमत्कार तब प्रारम्भ होता है जब वह विचारणा की महान् शक्ति, जीवन का उद्देश्य, स्वरूप और उपयोग करने की सही जानकारी प्राप्त करने में प्रवृत्त होता है। इसी मार्ग एवं प्रयास का नाम तत्व-ज्ञान, दर्शन एवं अध्यात्म है। विचार-शक्ति का मूल्य और महत्व जिसे विदित हो गया वह अपनी इस ईश्वर प्रदत्त दिव्य विभूति को परम लक्ष्य की प्राप्ति में प्रयुक्त करता है। फलस्वरूप उसका सारा जीवन क्रम ही बदल जाता है, उसका प्रत्येक क्रिया-कलाप उत्कृष्टता और आदर्शवादिता से ओत-प्रोत बनता चला जाता है।
यही मानव जीवन का गौरव तथा आनन्द है। विचारशीलता का अवलम्बन लेकर जीने में ही मनुष्य जन्म की सार्थकता है। रोटी के लिये मरते-खपते रहना मनुष्य का नहीं तुच्छ जीवन-जन्तुओं का कार्य है। अच्छा हो हम अपनी-अपनी विचार शक्ति और जिन्दगी का मूल्य समझें और वह गतिविधियाँ अपनायें जो अपने स्तर और गौरव के उपयुक्त हैं।
-सन्त वास्वानी
संसार के सारे पदार्थ और सारी क्रियायें साधन हैं। साध्य है केवल आत्म-शाँति। यदि आत्मा में शाँति का अभाव है तो किसी के पास कितना ही वैभव, कितनी ही विभूति और कितनी ही शक्ति क्यों न हो, समाज में कितना ही आदर सम्मान क्यों न हो, उसे कोई भी ऐसी अनुभूति नहीं हो सकती जिसे सुख की संज्ञा दी जा सके।
इसी आत्म-शाँति के अभाव में, अपनी समझ से संसार का सारा सुख भोग लेने पर भी बड़े-बड़े सम्राटों और श्रीमन्तों को असन्तोष से भरी भयानक मृत्यु मरना पड़ता है। तड़प-तड़प कर उनके प्राण निकलते हैं और कलप-कलप कर वे संसार छोड़ते हैं। जब संसार का सुख भोग लिया, पदार्थों का आनंद ले लिया, तब अन्त समय में कलपना किसलिये?
स्पष्ट है कि ऐसे व्यक्ति की आत्मा में असन्तोष होता है जो जीवात्मा को रह-रह कर संसार की ओर ढकेलता है। असन्तोष का निवास वहीं रहता है जहाँ शाँति नहीं होती। आत्मा में जब असन्तोष का ज्वर है तो वहाँ पर शाँति की शीतलता नहीं ही होनी चाहिये।
आत्मशाँति की उपलब्धि संसार के सुखों और पदार्थों के भोग से सम्भव नहीं। उसकी प्राप्ति तो तब होती है जब मनुष्य के जीवन और आचरण में श्रेष्ठता का समावेश होता है। श्रेष्ठता ही आत्मशाँति का एकमात्र आधार है। श्रेष्ठ आत्मा वाले व्यक्ति कितने ही गरीब और एकाकी क्यों न हों उन्हें असन्तोष की यातना सहन नहीं करनी पड़ती है। विद्वान, परमार्थी, भक्त तथा परोपकारी व्यक्ति श्रेष्ठ आत्मा वाले ही होते हैं। इसी सम्बल के आधार पर ही तो वे अभावों से भरा अपना जीवन शाँति के साथ-साथ जीते हैं और सन्तोष के साथ छोड़ते हैं। उन्हें किसी तरह का मनस्ताप नहीं सताता। ऋषि मुनि, महात्मा, मनीषी, चिन्तक तथा दार्शनिक व्यक्ति न कभी धन वैभववान रहे हैं और न उन्होंने साँसारिक पदार्थों के भोग में ही अपना जीवन निमग्न किया। उनका जीवन सदा ही सरलतम तथा सादा रहा है। भोजन वस्त्र और निवास जितना साधारण कोटि का हो सकता है उनका रहा। दिनचर्या और परिश्रम उनका इतना कठिन और कठोर रहा है जो किसी के लिये कष्ट के समान ही हो सकता है। आगे भी इस कोटि के व्यक्ति इसी प्रकार अभाव भरा जीवन ग्रहण करेंगे और आज भी जो जहाँ हैं, जाकर देखा जा सकता है, ऐसा ही जीवनयापन करते दिखलाई देंगे। तब भी उनके समान सुखी तथा सन्तुष्ट कोई दूसरे कदाचित ही रह पाते हैं। इसका केवल एक ही कारण है, और वह है उनकी आत्म-श्रेष्ठता। जिसने अपनी आत्मा में श्रेष्ठता का विकास कर लिया है आत्मशाँति उसकी अपनी वस्तु हो ही जाती है। साध्य पर अधिकार हो जाने पर साधनों में चिपटे रहना किसके लिए श्रेयस्कर हो सकता है? सूर्य का प्रकाश उपलब्ध होने पर दीपक जलाने की आवश्यक ही नहीं रह जाती।
जिसका विकल्प आत्मशांति है, उस श्रेष्ठता का लक्षण है शुभ दर्शन। श्रेष्ठ व्यक्ति को सारे संसार में, सारी दिशाओं में, सारी घटनाओं तथा सारे संयोगों में केवल कल्याण के ही दर्शन होते हैं। यह शुभ के लिए ही शुभ कर्म करता है और उसके परिणाम को किसी भी रूप में शुभ ही देखता और कल्पना करता है। निराशा, निरुत्साह, खेद, दुःख, पश्चाताप, अमंगल अथवा असम्भाव्य की आकाँक्षा उसे विचलित नहीं कर पाती। जो स्थिति उसकी सफलता तथा सम्पन्नता में रहती है वही असफलता एवं विपन्नता में रहती हैं। उसका हर्ष, उसका सुख और उसका सन्तोष भंग नहीं होता।
दुनियाँ पर यदि दृष्टिपात किया जाये तो एक-दो नहीं सैकड़ों हजारों व्यक्ति हँसते, खेलते, बोलते, मुदित तथा प्रसन्न होते दिखलाई देंगे। उनको देख कर यह यह कहना कठिन हो जायेगा कि इनके जीवन में कोई दुःख, ताप, अशाँति या असन्तोष भी हो सकता है। कहने के लिये यह भी कहा जा सकता है कि ये सब श्रेष्ठ-आत्मा व्यक्ति होंगे, इन्हें आत्मशाँति मिल चुकी होगी तभी तो यह प्रसन्नता इनके मुख-मण्डलों पर विराजमान दिखलाई दे रही है।
पर बात वास्तव में वैसी नहीं होती। उनकी प्रसन्नता का रूप वही होता है जैसे कोई स्वप्न अथवा सन्निपात में हँसता या प्रसन्न होता है। उनकी वह प्रसन्नता मौलिक नहीं होती और न स्थायी ही। वह किसी संयोग की प्रतिक्रिया मात्र ही होती है। या तो वे उस समय किसी पदार्थ भोग से छले होते हैं अथवा लाभ अथवा प्राप्ति से विमोहित। उनके हर्ष का हेतु खोजकर हटा दिया जाये तो उनका उल्लास भी नष्ट हो जायेगा।
वास्तविक अथवा आध्यात्मिक हर्ष तो वह माना जायेगा जो अहेतुक हो। जिसका आधार आत्मा के अतिरिक्त और कुछ न हो। संसार के नश्वर और उसके क्षणिक भोग सुख से अनुभव होने वाला हर्ष एक छलना, सो भी नश्वर छलना के समान ही होता जिसका प्रवंचन भी अधिक देर तक नहीं ठहरता। यथार्थ तथा स्थायी प्रसन्नता उसी को कहा जा सकता है जिसका विकल्प दुःख कदापि न हो। आज किसी को व्यापार में लाभ हुआ है, किसी का विवाह हुआ है अथवा किसी को पुत्र की प्राप्ति हुई है। वह प्रसन्न तथा हर्षित दिखलाई देता है। इसका अर्थ यह नहीं कि उस उल्लास के माध्यम से उसकी आत्म-श्रेष्ठता व्यक्त हुई है। वह हर्ष, वह उल्लास, वह प्रसन्नता उक्त लाभ अथवा उत्सव की प्रतिक्रिया मात्र होती है जो पुनः आवेग समाप्त हो जाने पर शमन हो जाती है। और मनुष्य अपनी उदासीन स्थिति में वापस चला जाता है और पुनः खेद और दुःख अनुभव करने लगता है।
जो प्रसन्नता लाभ में बनी रही, वही हानि में भी स्थिर रहे, जो संपत्ति के समय अनुभव हो वही विपत्ति के समय, जो अनुकूलताओं में जाग्रत रहे और प्रतिकूलताओं में भी नष्ट न हो, वही सच्ची तथा श्रेष्ठता-जन्य प्रसन्नता मानी जायेगी।
आत्मा की श्रेष्ठता परमात्मा की उपासना से प्राप्त होती है। नास्तिक अथवा अनाध्यात्मिक व्यक्ति संसार का कोई भी वैभव, कोई भी पदार्थ और कोई भी भोग क्यों न प्राप्त कर ले पर उसे सच्ची आत्मोत्कृष्टि नहीं मिल सकती है। इस संसार में जो कुछ शुभ है, श्रेष्ठ है, उत्कृष्ट और मंगलमय है वह सब उस परमात्मा की ही विभूति है। उसी से सम्पन्न होती है और उसी में आश्रित है। सृष्टि का सौंदर्य, पृथ्वी की संपन्नता, सागर का भण्डार, वनस्पतियों का स्वाद, औषधियों की शक्ति, ग्रह-नक्षत्रों का प्रकाश, ऋतुओं का आनन्द और मनुष्य की अनुभूति शक्ति- सबक पीछे उस परमात्मा की ही विभूति विराजमान है। संसार की सारी श्रेष्ठताओं को परमात्मा का आभास ही माना गया है। परमात्मा से ही सब कुछ सुन्दर है और उसी से सब कुछ मंगलमय है। अस्तु आत्मा की श्रेष्ठता प्राप्त करने के लिए संसार के साधनों की ओर न जाकर परमात्मा की ही उपासना करनी चाहिए।
उपासना का अर्थ है- समीप बैठना, सामीप्य अथवा उपसंग। जिसके समीप उपस्थ रहा जायेगा उसकी विशेषता अपने में आ जाना स्वाभाविक ही होता है। गर्म लोहे के पास स्थित ठण्डा लोहा उसकी गर्मी ग्रहण करता हुआ स्वयं भी गर्म हो जाता है। हिम के संपर्क में आने वाली वस्तु ठण्डी हो जाती है। जंगल में चन्दन वृक्ष के समीप उगा वृक्ष भी उसके संपर्क से चन्दन जैसी ही गन्ध वाला हो जाता है और प्रकाश के संग में आने वाली वस्तु भी प्रकाशित हो उठती है। संपर्क, संसर्ग अथवा उपस्थिति को गुण दोषों की ग्राह्यता का बहुत बड़ा कारण माना गया है।
उपासना में रहने वाला व्यक्ति परमात्मा के समीप ही रहता है और उसके परिणामस्वरूप उसकी विशेषताएं ग्रहण करता रहता है। परमात्मा सारी श्रेष्ठताओं तथा उत्कृष्टताओं का विधान है। इसलिए वे गुण उस उपासक में भी आने और बसने लगते हैं। कोई कारण नहीं कि मनुष्य हिमाच्छादित पर्वतों के समीप रहे और शीतलता अनुभव न करे। फूलों से भरी वाटिका में रहने तथा तन मन सुगन्धित न हो उठे, ऐसा होना संभव नहीं। जो भी उपासना द्वारा परमात्मा का सामीप्य प्राप्त करेगा उसके समीप बना रहेगा, उसमें परमात्मा का गुण, श्रेष्ठता का स्थानान्तरण होना चिर स्वाभाविक ही है।
हजारों लाखों व्यक्ति नित्य ही पूजा-पाठ करते दिखलाई देते हैं। वे ऐसा भी समझते हैं कि उपासना कर रहे हैं। बहुत से दूसरे लोग भी उन्हें उपासक मान बैठते हैं। पर उनकी यह उपासना वाँछित फल के साथ सफल नहीं होती। न तो उन्हें श्रेष्ठता मिलती है और न आत्म-शाँति। वे पूजा-पाठ करने के बाद भी झूठ बोलते हैं, मक्कारी करते हैं। क्रोध लोभ और मोह के वशीभूत रहते हैं जिसके फलस्वरूप मन में न तो शीतलता और न आत्मा में संतोष की अनुभूति होती है, ज्यों के त्यों, शोक-संतापों, यातनाओं, त्रासों, शंकाओं, अभावों तथा असन्तोषों से पीड़ित रहा करते हैं। पूरी तरह से यथावत भव-रोगी बने रहते हैं। परमात्मा के वे श्रेष्ठ गुण, जिन्हें प्रेम, सौहार्द, करुणा-दया, आत्मीयता, आनन्द, सन्तोष, शाँति आदि के नामों से पुकारा जाता है, प्राप्त नहीं होते। शतशः सिंचन के बाद भी स्थाणु के स्थाणु ही बने रहते हैं, न उनमें कोई पल्लव प्रस्फुटित होते हैं और न फूल खिलते हैं।
परमात्मा की उपासना करने से उसकी श्रेष्ठताओं का आत्मान्तरित होना एक अटल सत्य है। इसमें अपवाद हो नहीं सकता। जब उपासना करता दिखलाई देने पर भी जिस व्यक्ति में श्रेष्ठ परिवर्तन के लक्षण दृष्टिगोचर न हों कोई भी बुद्धिमान व्यक्ति असंदिग्ध घोषणा कर सकता है कि वह उपासना, उपासना नहीं, बल्कि उसका आडंबर मात्र है, दिखावा है, प्रदर्शन है।
सच्ची उपासना का अर्थ है आत्मा को परमात्मा से जोड़ देना। ऐसा करने पर, जिस प्रकार प्रणाली द्वारा खाली जलाशय को भरे जलाशय से सम्बन्धित कर देने से उसकी जलराशि उसमें भी आने लगती है और रिक्त जलाशय भी उसकी तरह ही पूर्ण हो जाता है, उसी प्रकार आत्मा द्वारा परमात्मा से सम्बन्ध बना लेने से परमात्मा की श्रेष्ठताएं मनुष्य में भी प्रवाहित हो जाती हैं। किन्तु इस माध्यम के बीच कोई व्यवधान रख दिया जाये तो प्रवाह रुक जायेगा। जलाशय को जल और मनुष्य के श्रेष्ठता प्राप्त नहीं होगी।
आग के पास आने पर ठण्डा लोहा ऊष्मा प्राप्त करता है। पर यदि आग और उसके बीच लकड़ी का एक पटला रख दिया जाये तो लोहा आग की गरमी से वंचित रह जायेगा। इसी प्रकार जब उपासना की विधि में आत्मा और परमात्मा के बीच कामनाओं का व्यवधान डाल दिया जाता है तो मनुष्य परमात्मा के गुणों को ग्रहण करने से वंचित हो जाता है। जिन उपासकों में परमात्मा के लक्षण संकलित होते दिखलाई न दें समझ लेना चाहिये कि उसकी आत्मा और परमात्मा के बीच कामनाओं, वाँछनाओं तथा वासनाओं का व्यवधान पड़ा हुआ है और जब तक यह व्यवधान हटाया नहीं जायेगा, उपासना का वास्तविक फल प्राप्त होना सम्भव नहीं। अधिकाँश पूजा-पाठ तथा चन्दन-वन्दन करने वाले उपासना नहीं उपासना का आडम्बर ही किया करते हैं। या तो उसके आधार पर उन्हें अपना महत्व प्रदर्शन करने का भाव घेरे रहता है अथवा उनकी उपासना का लक्ष्य किसी कामना की पूर्ति रहता है परमात्मतत्व की प्राप्ति नहीं।
मनुष्य जीवन का चिर साध्य है आत्म-शाँति, जिसका आधार है वे श्रेष्ठताएं जो परमात्मा के स्वाभाविक गुण हैं और जिन्हें उपासना के आधार पर ही पाया जा सकता है। किन्तु सच्ची उपासना वह है जो केवल उपासना के निष्काम होकर की जाये।
निष्काम रूप से उपासना प्रारम्भ कर परमात्मा से आत्मा का सम्बन्ध स्थापित करिये और श्रेष्ठताओं की उपलब्धि कर सुख-शाँति के अक्षय आनन्द से भरे जीवन और अनन्त अन्त की परख कीजिए।
आन्ध्र में “पोतना” नाम के एक भक्त कवि हो गये हैं। ईश्वर-उपासना के कारण उनकी सूक्ष्म-बौद्धिक शक्ति का जागरण हुआ इसलिये बहुत अधिक संस्कृत न जानने पर भी उन्होंने भागवत् का तेलुगु अनुवाद किया। थोड़े ही दिनों में यह सफलता सारे आन्ध्र में चमक गई।
मित्रों ने सलाह दी कि यह ग्रंथ यदि राजा को समर्पित किया जाय तो इसका खूब प्रचार होगा और प्रचुर द्रव्य मिलेगा। पोतना ने उत्तर दिया- “समय पर सब ठीक हो जायेगा।” और जब उन्होंने समर्पण-पत्र लिखा तो उसमें यह शब्द थे- यह रचना मैंने द्रव्य के लिये नहीं की, प्राणियों की भलाई के लिये- परमात्मा की प्रेरणा से- लिखा है। इसमें मेरा कुछ नहीं यह भगवान की कृति भगवान को ही अर्पण करता हूँ।
क्या रागी और क्या विरागी, सभी यह कहते पाये जाते हैं कि- “यह संसार मिथ्या है, भ्रम है, दुःखों का आगार है।” किन्तु तब भी सभी जी रहे। ऐसा भी नहीं कि लोग विवशतापूर्वक जी रहे हैं। इच्छापूर्वक जी रहे हैं और जीने के लिए अधिक से अधिक अवधि चाहते हैं, सभी मरने से डरते हैं। कोई भी मरना नहीं चाहता।
दुःखों के बीच भी जीने की यह अभीप्सा प्रकट करती है कि संसार में अवश्य ही कोई ऐसा आकर्षण है जिसके लिये सभी लोग दुःख उठाने में तत्पर हैं। देखा जा सकता कि लोग सुन्दर फल-फूलों को प्राप्त करने के लिए कटीले झाड़-झंखाड़ों में धँस जाते हैं। मधु के लिए मधुमक्खियों के डंक सहते हैं। माणिक मोतियों के लिए भयंकर जन्तुओं से भरे समुद्र में पैठ जाते हैं। वे फूलों, फलों, मधु और माणिक, मोतियों के लिए काँटों, मक्खियों और मगरमत्स्यों की जरा भी परवाह नहीं करते। उनकी चुभन, दंश और आक्रमण को साहसपूर्वक सह लेते हैं।
तो इस दुःख और कष्टों से भरे संसार सागर में ऐसा कौन-सा फल, मधु अथवा रत्न है जिसके लिए मनुष्य दुःखों का भार ढोता हुआ भी खुशी-खुशी जीता चला जा रहा है और जब तक अवसर मिले जीने की इच्छा रखता है। निश्चय ही संसार का वह फल, वह मधु और वह रत्न प्रेम है, जिसके लिए मनुष्य जी रहा है और हर मूल्य पर जीना चाहता है। अब यह बात भिन्न है कि उसका अभीष्ट प्रेम साँसारिक है, वस्तु या पदार्थ के प्रति है अथवा प्रेम स्वरूप परमात्मा के प्रति है। दिशायें दो हो सकती हैं। किन्तु आस्था एक है और आकर्षण भी अलग-अलग नहीं हैं। इसी प्रेमरूप आधार पर संसार ठहरा हुआ है। इसी के बल पर सारी विधि व्यवस्था भी चल रही हैं। एक प्रेम ही संसार का सत्य और सार है।
प्रेम ही आनन्द का आधार है, और आनन्द ही मनुष्य की जिज्ञासा है। इस जिज्ञासा की पूर्ति के लिए ही जब मनुष्य सारे कष्ट उठाता हुआ सुख मानता है, तब यह जिज्ञासापूर्ण हो जाये, उसे प्रेम का सच्चा रूप प्राप्त हो जाये तब उसके आनन्द की सीमा कहाँ तक पहुँच जायेगी इसका अनुमान कठिन है। इसे तो भुक्त भोगी ही जान सकते हैं।
जिसके हृदय में प्रेम का प्रकाश जगमगा उठता है उनके जीवन में आनन्द ही आनन्द भर जाता है। इस हाड़ माँस से बने मानव शरीर में देवत्व की समाविष्ट का आधार प्रेम ही है। प्रेम की प्रेरणा से साधारण मनुष्य उच्च से उच्चतर बनता चला जाता है। प्रेम मानव जीवन की सर्वोच्च प्रेरणा है। शेष सारी प्रेरणाएं इसकी एक ही मूल प्रेरणा की आश्रित शाखा प्रशाखा है। स्वाधीनता और सद्गति दिलाने वाली भावना एकमात्र प्रेम ही है। संसार की रचना और प्रेरणा का सारा तत्व यह प्रेम ही है। इसी से जीवन समृद्ध बनता, दुःख की निवृत्ति होती है और परम लक्ष्य की प्राप्ति होती है। प्रेम परमात्मा रूप है, सत्य है, आनन्द और उल्लास का आदि तथा अन्तिम स्त्रोत है।
प्रेम एक दिव्य तत्व है। इसके परिणाम भी सदैव तीनों काल में दिव्य ही होते हैं। आत्म-विश्वास, साहस, निष्ठा, लगन और आशा आदि के जीवन्त भाव प्रेमामृत की सहज तरंगें हैं। जिस प्रकार पर्वतों पर संचित हिम कुछ काल में परिपाक होने पर जल के रूप में बह-बहकर धरती को सराबोर कर देता है। उसकी जलन, उसका ताप और उसकी नीरसता हर लेता है, उसी प्रकार हृदय में संचित प्रेम भी परिपाक के पश्चात बहकर मनुष्य और मनुष्यत्व दोनों को आनन्द, उल्लास और प्रसन्नता से ओत-प्रोत कर देता है। प्रेम का अभाव मनुष्य को नीरस, शिथिल, अतृप्त और कर्कश बना देता है, जिससे जीवन का सारा सौंदर्य सारा आकर्षण और सारा उत्साह समाप्त हो जाता है। जो प्रेम का आदान-प्रदान नहीं जानता वह निश्चय ही जीना नहीं जानता। वास्तविक जीवन का लक्षण प्रेम ही है।
संसार अन्धकार का घर कहा गया है। विषय, वासनाओं के आसुरी तत्व यहाँ पर मनुष्य को अन्धकार और ही प्रेरित करते रहते हैं। संसार की इन अन्धकारपूर्ण प्रेरणाओं के बीच प्रेम ही एक ऐसा तत्व है जिसकी प्रेरणा प्रकाश की ओर अग्रसर करती है। प्रेम ही आत्मा का प्रकाश है। इसका अवलम्बन लेकर जीवन पथ पर चलने वाले सत्पुरुष काँटों और कटुता से परिपूर्ण इस संसार को सहजानन्द की स्थिति के साथ पार कर जाते हैं। प्रेम का आश्रय परमात्मा का आश्रय है। इस स्थूल संसार को धारण और पोषण करने वाली सत्ता प्रेम ही है। यही प्रेम ही तो आत्मा के रूप में जड़-चेतन में परिव्याप्त हो रहा है। व्यक्ति और समष्टि में आत्मा का यह प्रेम-प्रकाश ही ईश्वर की मंगलमयी उपस्थिति का आभास करता है।
प्रेम का एक स्वरूप आत्मीयता भी है, जो कि मनुष्य की स्वाभाविक वृत्ति होती है। आत्मीयता की प्यास, प्रेम की आवश्यकता मनुष्य जीवन के लिए सहज स्वाभाविक है। इसी पूर्ति न होने से मनुष्य एक ऐसा अभाव अनुभव करता है जिसका कष्ट संसार के सारे दुःखों से अधिक यातनादायक होता है। बच्चा माँ से प्रेम चाहता है। पत्नी पति से प्रेम चाहती है और पुरुष नारी से प्रेम की कामना करता है। पड़ोसी-पड़ोसी से, राष्ट्र-राष्ट्रों से, मनुष्य-मनुष्यों से, यहाँ तक कि पशु और जड़ वस्तुएँ भी प्रेम और आत्मीयता की भूखी रहती हैं। प्रेम पाने पर पशु अपनी भंगिमाओं से और जड़-पदार्थ अपनी उपयोगिता के रूप में प्रेम का प्रतिदान करते हैं। प्रेम का यह आदान-प्रदान रुक जाए तो संसार असहनीय रूप से नीरस कटु और तप्त हो उठे। पदार्थ अनुपयोगी हो जायें, पशु बर्बर हो उठें और मनुष्य घृणा, क्रोध और द्वेष की भावना से आक्राँत हो अपनी विशेषता ही खो दें। चारों ओर ताप ही ताप परिव्याप्त हो जाये। प्रेम जीवन की एक महत्वपूर्ण आवश्यकता है जिसकी पूर्ति आदान-प्रदान के आधार पर होती रहनी चाहिए। तभी हम इस समस्त संसार के साथ विकास करते हुए अपने चरम लक्ष्य उस परमात्मा की ओर बढ़ सकेंगे जो अनन्तानन्द स्वरूप है, सत् है और चेतन है। प्रेम के आदान-प्रदान के बिना जीवन में सच्चा सुख, सच्ची शाँति और सच्चा सन्तोष कदापि नहीं मिल सकता। मनुष्य आदि से अन्त तक कलप-कलप कर जिएगा और तड़प-तड़प कर मर जायेगा।
प्रेम मनुष्यता का सबसे प्रधान लक्षण है और इसकी पहचान है त्याग अथवा उपसर्ग। यों तो प्रायः सभी मनुष्य प्रेम का दावा करते हैं। पर यथार्थ बात यह है कि उनका अधिकाँश प्रेम स्वार्थ से प्रेरित होता है। अपने ‘स्व’ अपने ‘अहं’ की पूर्ति के लिए प्रेम का प्रदर्शन करते हैं और ‘स्व’ की तुष्टि हो जाने पर आँखें फेर लेते हैं। यह वह प्रेम नहीं है जिसे मनुष्यता का लक्षण कहा गया है। यह तो अपनी इच्छाओं, आकाँक्षाओं और लौकिक आवश्यकताओं की पूर्ति का एक उपाय है, साधन है। इससे वह आध्यात्मिक भाव वह ईश्वरीय आनन्द जाग्रत नहीं हो सकता जो कि सच्चे प्रेम की उपलब्धि है और जिसको पाकर मानव जीवन कृतार्थ हो जाता है।
जहाँ सच्चा प्रेम है, आध्यात्मिक आत्मीयता है वहाँ त्याग, उत्सर्ग और बलिदान की भावना होना अनिवार्य है। प्रेम में देना ही देना होता है, लेने की भावना को वहाँ अवसर नहीं रहता। लेन-देन लौकिक जीवन का साधारण नियम है। इसमें प्रेम शब्द का आरोप करना अन्याय है। प्रेम जैसे पवित्र तथा इच्छा रहित ईश्वरीय भाव का अपमान करना है। प्रेम विशुद्ध बलिदान है। इसमें प्रेमी अपने प्रिय के लिए सब कुछ उत्सर्ग करके ही तृप्ति का अनुभव करता है। प्रेम में देना ही देना होता है लेना कुछ नहीं। जहाँ पर परिवार, समाज, राष्ट्र और संसार के लिए निस्वार्थ त्याग, निर्लेप बलिदान की भावना दिखलाई दे वहाँ पर प्रेम का अनुमान करना चाहिए। जिसमें दूसरों के लिए अपना सब कुछ दे डालने की भावना तो हो पर उसके बदले में कुछ भी लेने का भाव न हो तो समझना चाहिए कि उस मनुष्य में सच्ची मनुष्यता का निवास है, वह धरती पर शरीर से देवता और अपनी आत्मा से परमात्मा रूप है।
प्रेम संसार का स्थायी सत्य है। यों तो संसार के रूप में जो कुछ भी दिखलाई देता है, सब सत्य जैसा ही आभासित होता है। पर वह सत्य नहीं सत्य का भ्रम मात्र है। आज देखते हैं कि हमारा एक परिवार है, स्त्री है, बच्चे हैं, हम स्वयं हैं। जमीन है, जायदाद है, धन दौलत है, सम्पत्ति है, सम्पदा है। सब व्यवहार में आते हैं, सब सत्य जैसे भासित होते हैं। पर क्या यह स्थायी सत्य है। कारण आता है- परिस्थिति उपस्थित होती है तो जीवन की अवधि समाप्त हो जाती है, सब कुछ स्वप्न हो जाता है। करण आता है- परिस्थिति उत्पन्न होती है तो जमीन बिक जाती है, संपत्ति और संपदा समाप्त होती है, जो कुछ कल हमारा था आज दूसरे का हो जाता है। ऐसी परिवर्तनशील बातों को सत्य कैसे माना जा सकता है? सत्य वह है जो तीनों कालों में एक जैसा ही बना रहे। प्रेम ही केवल ऐसा सत्य है जो अपरिवर्तनशील और तीनों कालों में स्थिर बना रह सकता है। प्रिय के बिछुड़ जाने पर उसके प्रति रहने वाला प्रेम नहीं मरता। वह यथावत बना रहता है। जमीन जायदाद चली जाती है पर उसके प्रति लगाव समाप्त नहीं होता, धन चला जाता है पर उसके प्रति अभीप्सा बनी रहती है। प्रेम ही संसार का स्थिर तथा स्थायी सत्य है और सारी वस्तुएं नश्वर तथा परिवर्तनशील हैं। ऐसे प्रेम की साधना छोड़कर लौकिकता की आराधना करना सत्य को छोड़कर उसकी छाया पकड़ने की तरह अबुद्धिमत्तापूर्ण है।
प्रेम का ग्रहण परमात्मा की प्राप्ति है। इसी तथ्य को दृष्टिगत रखते हुए ही महात्मा ईसा ने कहा है- “हमें एक दूसरे को प्रेम करना चाहिए, क्योंकि प्रेम ही परमात्मा है। ईश्वर को वही जानता है जो प्रेम करता है।” प्रेम परमात्मा की उपासना का भावनात्मक रूप है। जो आत्मा को, परिवार को, राष्ट्र और समाज को प्रेम करता है। सारे मनुष्यों यहाँ तक कि समस्त जड़-चेतन में आत्मीयता का सच्चा भाव रखता है, वह परमात्मा का सच्चा भक्त है। प्रेम हृदय की उसे पवित्र भावना का वाचिक रूप है जो अद्वैत को बोध कराती है। उसे ‘मैं’ और ‘तुम’ का, अपने पराये का विलगाव नहीं रहता। समष्टिगत विशाल भावना का निःस्वार्थ परिपाक प्रेम है जिसकी आराधना मानव को महामानव और पुरुष को पुरुषोत्तम बना देती है। अस्तु इसी साध्य और महानता की उपासना श्रेयस्कर है, कल्याण तथा मंगलकारी है।
जिसकी चीज उसी ने ले ली-
रबी मेइर प्रख्यात पारसी धर्मगुरु हुये हैं। एक दिन जब वे पाठशाला में बच्चों को पढ़ा रहे थे तो उनके दोनों पुत्रों की मृत्यु हो गई। उनकी पत्नी ने मृत पुत्रों के शरीर चादर से ढक शयनागार में लिटा दिये। रबी मेइर शाम को घर लौटे। पत्नी ने एक गिलास शर्बत लाकर दिया। उसे पीते हुये रबी ने पूछा- “प्रिये! आज दोनों बच्चे दिखाई नहीं देते?”
धर्मपत्नी ने सन्तोष की मुद्रा में उत्तर दिया- ‘‘यहीं कहीं होंगे, लीजिये भोजन कर लीजिये।” यह कह कर उसने भोजन का थाल सामने रख दिया।
रबी मेइर भोजन करने लगे तो पत्नी ने धीरे से पूछा- “कल पड़ोसिन के गहने माँगे थे, आज वह माँगने आई थी कहिये तो उन्हें वापस कर दूँ।”
“यह भी कोई पूछने की बात है” रबी ने तुरन्त उत्तर दिया- “जिसकी वस्तु है वह लेना चाहता है तो देने वाले को दुःख और संकोच क्यों हो!”
रबी भोजन समाप्त कर उठ खड़े हुये। पत्नी बोली- आप ठीक ही कहते हैं। फिर वह उन्हें अपने साथ शयनागार में ले गई और चादर उठा कर दोनों मृत बच्चों के शव दिखा दिये।
रबी मेइर फूट-फूट कर रोने लगे। धर्मपत्नी ने कहा- “स्वामी! धन, सम्पत्ति, पुत्र, संबंधी सब परमात्मा की देन होते हैं, वही इन्हें लेने लगे तो हमें दुःख क्यों करना चाहिये?” रबी मेइर पत्नी के वचनों से बहुत शाश्वत हुये और परमात्मा को धन्यवाद दिया।
पता नहीं आपने कभी ध्यान दिया या नहीं- अन्तर में जब-तब एक आवाज उठा करती है कि- “अरे तू यह क्या कर रहा है? क्या इसीलिए तुझे यह सर्व सम्पन्न शरीर मिला है? उठ अपना स्वरूप, अपनी शक्ति पहचान और उन अच्छे कामों को कर जिनकी तुझसे अपेक्षा जा रही है।”
यह पुकार करने वाला कोई नहीं होता। परमात्मा ही होता है जो आत्मा-रूप मैं सबके अन्दर विद्यमान रहता है। अब जो इस आवाज का आदर करते और जाग उठते हैं वे संसार में श्रेयस्कर कार्य कर दिखलाते हैं, उनका ईश्वर उनकी पूरी सहायता करता है।
यह आवाज उस समय ही अधिकतर उठा करती है जब मनुष्य या तो स्वार्थ एवं संकीर्णता की परिसीमा पार करने लगता है अथवा वह काम करता है जो उसे नहीं करना चाहिये। अपनी क्षमताओं की तुलना में छोटा काम करते हुये जब कोई शक्तियों का अपमान करता है, तब भी यह आँतरिक आवाज टोका करती है।
इसका एकमात्र आशय यही होता है कि ऐ मेरे अंश- मनुष्य, तू ऐसा काम न कर जिससे कि मुझे लज्जा अथवा आत्मग्लानि हो, और नहीं वे छोटे-मोटे काम कर, क्योंकि तू अधिक ऊँचे काम करने के लिए नियुक्त किया गया है। ये निम्न अथवा हेय कार्य तेरी क्षमता अनुरूप नहीं हैं।
जो आस्तिक एवं आत्मविश्वासी इस परमात्म पुकार को सुन कर प्रेरित होते हैं, अपनी निहित शक्तियों का आह्वान करते और कटिबद्ध होकर दृढ़तापूर्वक कर्तव्यों में तत्पर हो जाते हैं, वे निश्चय यहीं अपना वर्तमान स्थिति से बहुत आगे बढ़ कर चाँद-सितारों की तरह चमक उठते हैं, फिर उनका अभियान आर्थिक हो अथवा आध्यात्मिक। इस परमात्म-पुकार का तकाजा है कि जो जहाँ पर है वहाँ पर न रहे। उससे आगे बढ़े और निरन्तर आगे बढ़ता ही जाये। मानवीय विकास एवं उन्नति की न तो कोई सीमा है और न विराम।
संसार के जितने भी महापुरुष आज जन साधारण के प्रेरणा केन्द्र एवं प्रकाश स्तम्भ बने हुये हैं उन्होंने इस आँतरिक पुकार की कभी उपेक्षा नहीं की। उन्होंने आवाज सुनी, जागे और तत्काल आयोजन में लग गये, आगे की ओर चल पड़े। ऐसे जागृतिवान महापुरुषों में से अमेरिका के भूत-भूतपूर्व प्रेसीडेन्ट जार्ज वाशिंगटन भी एक थे।
जार्ज वाशिंगटन अमेरिका के एक साधारण किसान के पुत्र थे। उनके पिता बहुत ही साधारण स्थिति के व्यक्ति थे। बेटे को हल, फाल, जमीन तथा कुदाल आदि ऐसे के अतिरिक्त उच्च शिक्षा जैसी कोई चीज दे सकने की कल्पना भी नहीं कर सकते थे। निदान वयस्क होने पर उन्होंने जार्ज वाशिंगटन को वे सब चीजें सौंप दीं।
वाशिंगटन भी तो प्रारंभ से लेकर अब तक उसी वातावरण में पला था। उसकी कल्पना भी उन चीजों, उन कार्यों और उस वातावरण से आगे कैसे जा सकती थी। खुशी-खुशी उसने हल लिया और पिता की तरह सामान्य रूप से खेती बारी में लग गया।
वाशिंगटन किसान बन गया। किन्तु उसकी आत्मा उस कार्य में तादात्म्य अनुभव नहीं कर रही थी। इसलिए नहीं कि खेती कोई निकृष्ट कार्य था, बल्कि इस आभास के कारण कि वह उसे भी ऊँचा कोई काम कर सकता है जिसमें राष्ट्र, समाज अथवा संसार का अधिक हित संपादित हो सके।
उसका आभास प्रकाश बना है और वह प्रकाश एक दिन, जब वह हल चला रहा था आवाज बनकर उसके अन्तराल में गूँज उठा- “वाशिंगटन क्या कर रहा है? यह खेती का काम तो कोई दूसरा भी कर लेगा। तू जिस उद्देश्य के लिए आया है उसे याद कर। देख देश की वेदी तुझे अपने उद्धार के लिए आह्वान कर रही है।” हर रुक गया और वाशिंगटन अपने उद्देश्य पथ पर अग्रसर हो उठा। महापुरुषत्व और मानवीय महिमा इसी संदेह रहित आत्मविश्वास, आस्था, आकस्मिकता एवं साहस के सुन्दर शिवालय में निवास करती है।
वाशिंगटन ने आवाज सुनी, जागा और अपने से कह उठा- अवश्य ही मैं बड़ा काम करने के लिए इस संसार में आया हूँ। मैं उसे करूंगा, और वह बड़ा काम है देश को विदेशियों की दासता से मुक्त कराना। संसार का कोई अवरोध जीवन की कोई भी कठिनाई, पथ का कोई संकट और साधनों का कोई भी अभाव मुझे मेरे अभीष्ट लक्ष्य से विचलित नहीं कर सकता। उसका संकल्प बलिदान बनकर उसके रोम-रोम में तद्रूप हो गया।
प्रयत्न अध्ययन एवं विचार से प्रारम्भ हुआ और तब तक चलता रहा जब तक पूर्ण परिपक्व होकर क्रियात्मक प्रेरणा में परिणित नहीं हो गया।
अपने इस विकास एवं निर्माण में वाशिंगटन को कितने प्रकार की कठिनाइयों से जूझना पड़ा होगा, इसको बतलाया नहीं जा सकता। केवल इस बात से एक धुँधला-सा आभास ही पाया जा सकता है कि एक दीन-हीन किसान के अनपढ़ पुत्र की स्थिति राष्ट्रोद्धार की महानता तक के दुरूह पथ को पार करना, अपने अध्यवसाय के बल पर संस्कारों एवं कुप्रवृत्तियों को जीतकर जीवन में ही पुनर्जीवन पा लेने से कम कठिन, साथ ही कम श्रेयस्कर नहीं है।
किन्तु जिन्हें कुछ करना ही है उनके लिए कष्ट, संकट, श्रम, श्राँति अथवा विश्राँति का क्या अर्थ? वे यदि कुछ जानते हैं तो काम-काम और निःस्वार्थ काम। वाशिंगटन ने समागत प्रतिकूलताओं का भी सहर्ष स्वागत करते हुये यही किया और एक दिन आया जब उन्होंने राष्ट्र के दासता पाश काट फेंके और राष्ट्र ने उनकी सेवाओं के मूल्याँकन के रूप में, उसके पास जो राष्ट्रपति का सर्वोच्च सम्मान था वह दिया और आज भी सैंकड़ों साल बीत जाने पर उनके नाम, उनकी प्रतिभाओं और उनके स्मारकों को वही सम्मान दिया जाता है।
प्रत्येक मनुष्य के जीवन का एक लक्ष्य होता है। वह यह कि वह जो कुछ है, वहीं नहीं रहना है, उसे जितना भी हो सके आगे बढ़ाना और ऊँचे चढ़ाना है। अपनी वर्तमान परिधि से निकल कर अधिक विस्तृत सीमाओं में प्रवेश करना है। जिस कक्षा के बाद दूसरी कक्षा पाना ही है। एक स्तर से उठकर दूसरा स्तर पकड़ना ही है और अन्त में उसे यह सन्तोष लाभ करना ही है कि उसने जीवन को कीड़े-मकोड़ों की तरह एक गढ़े में पड़े-पड़े नष्ट नहीं किया है। उसने उन्नति एवं विकास किया है। आगे बढ़कर चेतन होने का प्रमाण दिया है और अपने इस विश्वास को प्रकट कर दिया है कि यह सुर दुर्लभ मानव जीवन तृष्णा एवं वासनाओं की वेदी पर वध करने के लिए नहीं बल्कि किसी सदुद्देश्य, उच्च आदर्श की पवित्र वेदिका पर फूल की तरह उत्सर्ग कर देने के लिए है।
जिसे अपनी निकृष्ट नैतिक स्थिति, जीवन का निम्न स्तर काँटे की तरह नहीं चुभती, जिसकी हीनावस्था उसे तिरस्कृत नहीं करती, जो इस लाँछना एवं अपमान को यों ही सहन कर लेता है, उसे यदि मृत मान लिया जाये तो कोई दोष नहीं। जिसमें जरा भी जीवन है, थोड़ी मनुष्यता है वह जीवन के इस अपमान, इस लाँछना को सहन नहीं कर सकता। उसके हृदय में वेदना होगी, आत्म-ग्लानि होगी और परिस्थितियों को धिक्कार, पुरुषार्थ के लिये ललकार कर उठ खड़ा होगा और अडिग संकल्प के साथ सब कुछ बदलकर रख देगा। संसार में ऐसे भी महापुरुष हुये हैं जिन्होंने असम्भव माने जाने वाले परिवर्तनों को घटित करके दिखा दिया और उनमें से एक महाकवि कालिदास भी थे।
लोक-प्रसिद्ध है कि कालिदास एक वज्र मूर्ख लकड़हारे थे। इतने मूर्ख कि जिस डाल पर बैठते थे उसी को काटते हुये कई बार पथिकों द्वारा उतारे गए। इतने मूर्ख और इतने अज्ञानी कि ‘भेड़’ कहे और ‘भें’ कहकर चिढ़ाये जाते। न माँ न बाप न कोई भाई-बन्धु। यों ही विनोददायक होने से रोटी-लँगोटी मिल जाती थी। अब ऐसे प्रचण्ड मूर्ख के विषय में क्या कभी यह कल्पना की जा सकती थी कि वह एक दिन प्रकाँड पण्डित बनकर संसार का कवि-शिरोमणि बनेगा। किन्तु कालिदास ने संसार में न केवल इस कल्पना को ही जन्म दिया वरन् उसे अतिरूप में चरितार्थ कर के दिखला दिया। लगन एवं पुरुषार्थ की यही महिमा है।
तत्कालीन विदुषी राजकुमारी विद्योत्तमा से शास्त्रार्थ एवं पाँडित्य में पराजित होकर, चिढ़े हुये पण्डित लोग दैवात् विद्योत्तमा का विवाह छल से कालिदास से करा देने में सफल हो गये।
कालिदास और विद्योत्तमा का परिचय हुआ और प्रथम क्षण में ही उस विदुषी ने मूर्खराज कालिदास को पहचान लिया। उसने ‘हाय’ करके कपाल पर हाथ मारा और रोते हुये यह कहकर कालिदास को अपने कक्ष से बाहर ढकेल दिया कि- अपने से महान पति की आकाँक्षा रखने वाली मैं तुझ महामूर्ख को पति स्वीकार कर विद्या को अपमानित और अविद्या को आहत नहीं कर सकती। चला जा यहाँ से। मेरे साथ छल किया गया है।
कालिदास को धक्का मिला और उसकी आत्मा में एक झटका लगा। आत्म-विभोर कालिदास चौंक कर सहसा जाग उठे। उनकी आत्मा में अचेत पड़े मनुष्य की मूर्छा टूट गई। उनका अपमान हुआ इसकी पीड़ा तो उनके प्राणों तक में कसक ही उठी किन्तु उसे भी अधिक वेदना विद्योत्तमा के उन आँसुओं को देखकर हुई जिनके पीछे एक उज्ज्वल एवं उच्च दाम्पत्य जीवन की आकाँक्षा तड़प रही थी।
जागरण हो चुका था। कालिदास सोच सके- संभव है यह भारतीय ललना दुबारा विवाह न करे और योंही इतने महान एवं मूल्यवान जीवन को शोक-सन्ताप एवं पश्चाताप में जलाकर नष्ट कर डाले। समाज की इतनी बड़ी क्षति केवल इसलिए हो सकती है कि मैं अशिक्षित एवं असंस्कृत हूँ। कितना निसर्ग सुख हो यदि मैं अपने को इसके योग्य बना सकूँ। विचार आते ही अन्तराल से आवाज आई ‘क्यों नहीं पुरुषार्थ एवं संकल्प बल से क्या नहीं हो सकता?’ कालिदास चले गए और विद्योत्तमा आँखों में आँसू लिए बैठी रही।
और फिर चार-छः, दस-बारह, अनेकानेक वर्षों तक कालिदास का सम्बन्ध संसार की हर बात से टूटकर जुड़ गया। अध्ययन से दिन और रात, संध्या और प्रातः कब आए और कब गए कुछ पता नहीं। इन दशाब्दियों तक यदि कालिदास को कुछ ज्ञात था तो केवल अपनी एकाग्रता और अध्ययन।
कालिदास ने अध्यवसाय को तपस्या की सीमा में पहुँचा कर जो कुछ पाया वह लेकर चल दिये। विद्योत्तमा अपने कक्ष में वही वेदना लिए बैठी थी कि सहसा उसने दरवाजे पर थाप के साथ शुद्ध एवं परिमार्जित संस्कृत में सुना- “प्रियतमे द्वारमकपाटं देहि।” वह उठी द्वारा खोला- देखा-कौन! मैं महामूर्ख कालिदास! कालिदास मुस्करा उठे। विद्योत्तमा हर्ष विह्वल हो उठी। अब वह मूर्ख कालिदास की पत्नी वही महाकवि कालिदास प्रेरणादायिनी प्राणेश्वरी थी। दोनों के उस पुनर्मिलन ने कालिदास की साधना और विद्योत्तमा की वेदना सफल एवं सार्थक बना दी।
यह है संकल्पपूर्ण पुरुषार्थ एवं लगन का चमत्कार। जब दीन से दीन और मूर्ख से मूर्ख होने पर भी संसार में लोगों ने सर्वोच्च स्थितियों पर पदार्पण कर पुरुषार्थ की महिमा को प्रकट कर दिया जब कोई कारण नहीं कि हम आप कोई भी अपनी वर्तमान स्थिति से आगे बढ़कर श्रेय प्राप्त नहीं कर सकते।
मेरा सर्वोपरि उपहार-
आइजन हावर अमेरिका के राष्ट्रपति चुने गये। उपलक्ष्य में उन्हें देश-भर से लाखों उपहार मिले। इन उपहारों में एक मामूली झाड़ू भी थी। भेजने वाले ने लिखा था, “आपने अपने भाषण में कहा था कि यदि मैं चुन गया तो मेरा काम राज्यतन्त्र में व्याप्त गन्दगी को साफ करना होगा। मुझे विश्वास है कि मेरा यह नन्हा-सा उपहार आपको सदा आपके उस वचन की याद दिलाता रहेगा।” इन उपहारों की प्रदर्शिनी का उद्घाटन करते हुए, राष्ट्रपति ने उस झाड़ू को ऊँचा उठाते हुये कहा- यही है मेरा सर्वोत्तम उपहार! इसमें देश की आत्मा ने मुझसे सीधी बात-चीत की है।
एकाकी मनुष्य जीवन की शक्ति बड़ी सीमित और स्वल्प है। यदि सभी मनुष्य केवल अपने हित को हित मानें, निजी स्वार्थ तक ही सीमित रहें और जो उपेक्षित, कमजोर और पीड़ा से परेशान व्यक्ति हैं उनके प्रति अपनी सहानुभूति एवं संवेदना व्यक्त न करें तो संसार पीड़ाओं और निराशाओं का घर बन जाये। किसी स्वजन सम्बन्धी की सहानुभूति पाकर पीड़ित व्यक्ति को जो सन्तोष होता है वह किसी भी पुण्य से बेहतर है। सहानुभूति जीवन की महती भावना शक्ति है जो उसे कोमलता सरलता और आत्मानुभूति के आध्यात्मिक लक्ष्य तक सुविधापूर्वक पहुँचा देती है।
पूर्वारम्भ में जिन व्यक्तियों ने विश्व की दार्शनिक खोज और सत्य के ज्ञान के लिए तपश्चर्याऐं की अन्त में जब वे विश्व की विशालता और अनन्त की शक्ति की थाह नहीं पा सके, उनका असंतोष बढ़ता ही गया तो अन्त में इन्हें भी आत्मसन्तोष के लिए पीड़ित मानवता की सेवा के सहानुभूति पथ पर उतरना पड़ा। तब वे व्यक्ति महान से महानतर बन गये।
सहानुभूति से भी व्यक्तित्व में पूर्णता का विकास होता है इससे यह बात अच्छी प्रकार स्पष्ट हो जाती है। इसी के आधार पर मनुष्य अपनी निजता में भी विश्वात्मा, अनेक आत्माओं का प्रतीक बन जाता है। वह दूसरों के हृदय की बात सुनने लगता है, और इसी से वह आत्मा के गुणों का अध्ययन करने लगता है।
कन्फ्यूशियस, फ्रांसिस, बेकन तथा माओत्सेतुंग आदि आदि विद्वानों ने पहले सहानुभूति को ठगा जाने वाला तत्व समझा था, किन्तु बाद में वे जब जीवन की गहराइयों में उतरे तो उन्हें पता चला मनुष्य केवल सहानुभूति के कारण ही जिन्दा है। सहानुभूति का विस्तार और प्रसार हर घड़ी होना चाहिये। माओत्सेतुंग बड़े क्राँतिकारी रहे और हाल ही में फ्रेंच पत्रकार मोमानेत ने यह रहस्योद्घाटन किया कि माओ भी अब सहानुभूति की एक बूँद के लिए तरसते रहते हैं। यह संसार बना ही कुछ ऐसा है जिससे शक्तिशाली व्यक्ति को भी एक दिन सहानुभूति की आवश्यकता हो जाती है। यदि उसका एक सरल प्रवाह सामाजिक जीवन में बना रहे तो कष्ट और पीड़ाओं में भी मनुष्य की आशायें विनष्ट न हों, जीवन के प्रति उसकी श्रद्धा जागृत रहे।
‘ऐला वेलूदलकाक्स’ ने लिखा है- जब अपनी ओर देखो तो सख्ती से काम लो, किंतु जब तुम दूसरे मनुष्यों की ओर देखो तो नम्रता से काम लो। इस प्रकार के उपहास और निन्दा से दूर रहो तो निम्नस्तर के व्यक्तियों की जबान से निकलती और लोगों को पीड़ा पहुँचाती है। यह लक्षण ढूँढ़ना चाहिये जब हम किसी दूसरे के दुःख-दर्द को अपना सकें। ऐसी स्थिति में दोनों का उपकार होता है दोनों को सुख मिलता है।
सहानुभूति मनुष्य के जीवन में क्या जोड़ती और क्या घटाती है इस पर आज मनोविज्ञान भी बड़ी तत्परता से छान-बीन कर रहा है। कुछ मनोविज्ञानवेत्ताओं का निष्कर्ष है कि सहानुभूति देने वाले और लेने वाले दोनों की उम्र बढ़ती है। वह हृदय को शक्ति और भावनाओं को विशालता प्रदान करती है। कुत्तों और बिल्लियों पर प्रयोगशालाओं में प्रयोग किये गये, उनसे यह सिद्ध हुआ है कि सहानुभूति का स्पर्श होते ही फेफड़े गर्म हो जाते हैं, धमनियाँ अपने स्वाभाविक ताल पर स्थिर होने लगती हैं और रक्त का रंग निखरने लगता है।
फ्राँक लोवोस्की के उदाहरणों और खोजों से पता चलता है कि सहानुभूति देने वाले पर तो और भी उत्तम प्रभाव पड़ता है। जो सहानुभूति देते हैं वे व्यक्ति अधिकाँशतः दीर्घजीवी होते हैं। जिनके स्वभाव में आत्मीयता का और परदुःख-कातरता का यह भाव विशेष सजग होता है उनको अपने शरीर को रोगों से रक्षा के लिये औषधि नहीं ढूँढ़नी पड़ती। सहानुभूति भावना का अमृत है, जिसका सूक्ष्म लाभ आत्मदर्शन और स्थूल लाभपूर्ण निरोगता तक हो सकता है।
सम्भवतः इसी तथ्य की अनुभूति कर वाल्ट ह्विटमैन ने लिखा होगा- “मैं आपत्ति ग्रस्त मनुष्य से यह नहीं पूछता कि तुम्हारी दशा कैसी है, वरन् मैं स्वयं ही आपत्तिग्रस्त बन जाता हूँ, इससे मेरे हृदय को इतना बल मिला है कि मैं कह भी नहीं सकता।” फ्रेंच मनोविद्या विशारद गेवानियाँ लिखते हैं कि- दया और सहानुभूति की भावना मानसिक उत्थान की जितनी बड़ी दवा है। यदि तुम्हें संसार में कुछ अच्छा न लगता हो तो दूसरों के दर्द में सहायक बनना सीखो, इसी जीवन में वह आनन्द पाओगे कि उसके आगे सारे सुख भोग और वैभव फीके पड़ जायेंगे।
अल्वर्ट स्वाइत्जर का तो सारा जीवन ही मानव-प्रेम, करुणा और सहानुभूति की दार्शनिक अभिव्यक्ति है। एक बार उनसे किसी ने प्रश्न किया कि संसार में भीषण दुःख और कष्ट हैं इस सम्बन्ध में आपके क्या विचार हैं? इस पर उन्होंने हँस कर उत्तर दिया- “धरती में कभी वर्षा न हो, पानी की एक बूँद भी न रहे तो भी जब तक मनुष्य की आँखों में दया की चमक, मुख में प्रेम की भाषा और मन में सहानुभूति की तरंग है तब तक धरती कभी बंजर हो नहीं नहीं सकती।”
सौभाग्य की बात है कि मनुष्य के लिए यह पुण्य असीम और निर्बाध है। जिस सीमा तक हमने अपने आप पर, अपनी विचार और क्रियाशैली पर अधिकार पाया उसका अधिकाँश दूसरों के साथ सहानुभूति का व्यवहार करने में कर सकते हैं। इसके लिए आत्मविस्मृत होना पड़ेगा- अपने आप, अपने स्वार्थ, अपनी संकीर्णता को खोना होगा। जब तक हमें केवल अपना ध्यान होगा तब तक हम दूसरों का ध्यान नहीं रख कर सकते। दूसरों के कष्ट नहीं अपना सकते, दूसरों से प्रेम नहीं कर सकते। दूसरों के विचार में अपने आपको भूल जाना ही तो सहानुभूति है। उसका एक अंश पा जाने से भी मनुष्य का जीवन प्रेम से परिपूर्ण हो जाता है।
सहानुभूति के मार्ग की दो बाधायें हैं- “संकीर्णता और स्वार्थ।” जब तक दूसरों से घृणा करते रहोगे तब तक सहानुभूति का भाव आयेगा कैसे? सहानुभूति का वृत्त सीमित व संकुचित नहीं वह बड़ा विशाल है और केवल मनुष्य से मनुष्य के प्रेम की ही परिपुष्टि नहीं करता। वरन् जीवमात्र में आत्मानुभूति, दया करुणा और मैत्री की शिक्षा देता है। दीन-दुःखी की सेवा के लिए किया गया कर्म, चाहे वह मनुष्य हो अथवा पशु-पक्षी, परमात्मा की उपासना में गिना जाता है। उसका फल और पुण्य ईश्वर-आराधना से भी सौगुना बड़ा माना जाता है। अपने पराये, ऊँच-नीच, छोटे-बड़े का भेदभाव सहानुभूति को सार्थक नहीं करते वरन् उसकी परिभाषा को छोटा बनाते हैं। सहानुभूति सारे संसार के लिए एक जैसी हो वही सच्ची और सार्थक होती है।
सच्चे हृदय की सहानुभूति एक दिन शत्रु को भी मित्र बना देती है। तालमूट की एक कहानी है- किसी गाँव में एक सन्त रहता था। वह दीन-दुःखियों के घर जाता और उन्हें हल्का करने की कोशिश करता, इसमें उसकी लोकप्रियता बढ़ी, प्रतिष्ठा और सम्मान बढ़ा। कुछ व्यक्तियों को यह सम्मान अखरा और उन्होंने उस सन्त का अपमान करना शुरू कर दिया। उस पर कई तरह के दोषारोपण किये गये। उपहास किया गया और हँसी उड़ाई गई। सन्त के हृदय में इससे बड़ी चोट पहुँची। उन्होंने स्थान बदल लिया। अन्यत्र जाकर अपनी यह साधना प्रारम्भ कर दी। इनके चले जाने पर पुनः परिस्थितियाँ ऐसी बनीं जिससे लोगों ने उन उदारमना महात्मा की आवश्यकता अनुभव की, तब लोगों को अपनी भूल का पता चला। वे महात्माजी को साथ तो न ला सके पर उनके प्रति श्रद्धा का भाव कुछ ऐसा बना कि उन्हीं में से कई लोग उस वृत्ति वाले बने और उन्होंने सहानुभूति की आवश्यकता को अनुभव किया। सन्त को इसका पता चला तो वे बहुत प्रसन्न हुये और सेवा-भावना की उनकी आस्था और भी दृढ़ हो गई।
प्रेम प्रतिदान माँगता है पर सहानुभूति उनसे भी की जाती है जो हमें नहीं करते, इसलिये सहानुभूति बड़ी है। सहानुभूति दूसरों का प्रेम पाने का सर्वोत्तम उपाय है और आत्मसन्तोष का सर्वसुलभ साधन है। जिस व्यक्ति, जिस समाज में सहानुभूति जिन्दा रहती है, दुःख-दर्द और अभार में भी वहाँ के प्राणी राहत अनुभव करते हैं और दिव्यप्रेम के आदान-प्रदान का सुख प्राप्त करते हैं।
मनुष्य अपनी छिपी शक्तियों को पहचाने बिना शक्तिशाली नहीं बन सकता। मानव-देह में एक चिरन्तन आध्यात्मिक सत्य छिपा हुआ है, जब तक वह मिल नहीं जाता इच्छायें उसे इधर से उधर भटकाती, दुःख के थपेड़े खिलाती रहती हैं। सत्यामृत की प्राप्ति नहीं होती तब तक मनुष्य बार-बार जन्मता और मरता रहता है, न कोई इच्छा तृप्त होती है न आत्मसन्तोष होता है। जबकि मनुष्य की सारी क्रियाशक्ति प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में उसी की प्राप्ति के लिए निरन्तर प्रयत्नशील रहती है।
अपने आपको, अपनी चेतन सत्यता को पहचानना आसान बात नहीं है। विद्यमान परिस्थितियाँ ही धोखा देने के लिए पर्याप्त होती हैं, फिर जन्म-जन्मान्तरों के प्रारब्ध इतने भले नहीं होते जो मनुष्य को साधारण ही क्षमाकर दें। हमारा असली व्यक्तित्व इतना स्पष्ट है कि उसकी भावानुभूति एक क्षण में हो जाती है, वह परदों में नहीं रहता फिर भी वह इतना जटिल और कामनाओं के परदों में छुपा हुआ है कि उसके असली स्वरूप को जानना टेढ़ा पड़ जाता है। साधना, उपासना करते हुए भी बार-बार पथ से विचलित होना पड़ता है। ऐसी असफलतायें ही जीवन लक्ष्य में बाधक हैं।
श्रद्धा वह प्रकाश है जो आत्मा की, सत्य की प्राप्ति के लिए बनाये गए मार्ग को दिखावा रहता है। जब भी मनुष्य एक क्षण के लिए लौकिक चमक-दमक, कामिनी और कंचन के लिये मोहग्रस्त होता है तो माता की तरह ठण्डे जल से मुँह धोकर जगा देने वाली शक्ति यह श्रद्धा ही होती है। सत्य के सद्गुण, ऐश्वर्य-स्वरूप एवं ज्ञान की थाह अपनी बुद्धि से नहीं मिलती उसके प्रति सविनय प्रेम भावना विकसित होती है उसी को श्रद्धा कहते हैं। श्रद्धा सत्य की सीमा तक साधक को साधे रहती है, सँभाले रहती है।
श्रद्धा के बल पर ही मलिन चित्त अशुद्ध चिन्तन का परित्याग करके बार-बार परमात्मा के चिन्तन में लगा रहता है। बुद्धि भी जड़-पदार्थों में तन्मय न रहकर परमात्म ज्ञान में अधिक से अधिक सूक्ष्मदर्शी होकर दिव्य भाव में बदल जाती है। स्वयं का ज्ञान और तार्किक शक्ति इतनी बलवान नहीं होती कि मनुष्य निरन्तर उचित अनुचित, आवश्यक-अनावश्यक के यथार्थ और दूरवर्ती परिणामों की आत्मा के अनुकूल होने का विश्वास दे सके। तर्क प्रायः व्यर्थ से दिखाई देते हैं। ऐसे समय जब अपने कर्मों के औचित्य का अनौचित्य को परम प्रेरक शक्ति के हाथों सौंप देते हैं तो एक प्रकार की निश्चिन्तता मन में आ जाती है। मन का बोझ हलका हो जाता है। जिसकी जीवन पतवार परमात्मा के हाथ में हो उसे किसका भय? सर्वशक्तिमान से सम्बन्ध स्थापित करते ही मनुष्य निर्भय हो जाता है, उसके स्पर्श से ही मनुष्य में अजय बल आ जाता है। व्यक्तित्व में सद्गुणों का प्रकाश और दिव्यता झरने लगती हैं। जीवन में आनन्द झलकने लगता है। यह सम्बन्ध और स्पर्श जब तक सत्य की पूर्ण प्राप्ति नहीं होती तब तक श्रद्धा के रूप में प्रगट और विकसित होता है। वह एक प्रकार से पाथेय है इसलिये उसका मूल्य और महत्व उतना ही है जितना अपने लक्ष्य का, गन्तव्य का, अभीष्ट का, आत्मा, सत्य अथवा परमात्मा की प्राप्ति का।
परमात्मा के प्रति अत्यन्त उदारतापूर्वक आत्मभावना पैदा होती है वही श्रद्धा है। सात्विक श्रद्धा की पूर्णता में अन्तःकरण स्वतः पवित्र हो उठता है। श्रद्धायुक्त जीवन की विशेषता से ही मनुष्य-स्वभाव में ऐसी सुन्दरता बढ़ती जाती है जिसको देखकर श्रद्धावान स्वयं सन्तुष्ट बना रहता है। श्रद्धा सरल हृदय की ऐसी प्रतियुक्त भावना है जो श्रेय पथ की सिद्धि कराती है। इसीलिये शास्त्रकार कहते हैं-
भवानी शंकरौ वन्दे श्रद्धा-विश्वास रूपिणौ। याभ्यां बिना न पश्यन्ति सिद्धः स्वान्तस्थमीश्वरम्। (रामायण, बाल कांड)
“हम सर्वप्रथम भवानी और भगवान प्रकृति और परमात्मा को श्रद्धा और विश्वास के रूप में वदन करते हैं जिसके बिना सिद्धि और ईश्वर-दर्शन की आकाँक्षा पूर्ण नहीं होती।”
ज्ञान-भक्ति का निरूपण करते हुए तुलसीदासजी उत्तर कांड में लिखते हैं-
सात्विक श्रद्धा धेनु सुहाई। जो हरि कृपा हृदय बस आई॥
जप तप व्रत जम नियम अपारा। जो श्रुति कह शुभ धर्म अचारा॥
तेई तृन हरित चरै जब गाई।.........॥
एहि विधि लेसै दीप तेजराशि विज्ञानमय। जातहिं जासु समीप जरहिं मदादिक सलभ सब॥
अर्थात्- जब तक मनुष्य के अन्तःकरण में श्रद्धारूपी गाय का जन्म नहीं होता तब तक जप, तप, यम, नियम, व्रत आदि जितने भी धर्माचरण हैं उनमें मनुष्य की बुद्धि स्थिर नहीं रहती। यह श्रद्धा ही जीवन की कठिनाइयों में मनुष्य को पार लगाती है। और आत्मगुणों का विकास करती हुई उसे विज्ञानयुक्त परमात्मा के प्रकाश तक जा पहुँचाती है।
श्रद्धा का आविर्भाव सरलता और पवित्रता के संयोग से होता है। पार्थिव वस्तुओं से ऊपर उठने के लिए सरलता और पवित्रता इन्हीं दो गुणों की अत्यन्त आवश्यकता होती है। इच्छा में सरलता और प्रेम में पवित्रता का विकास जितना अधिक होगा उतना ही अधिक श्रद्धा बलवान होगी। सरलता के द्वारा परमात्मा की भावानुभूति होती है और पवित्र प्रेम के माध्यम से उसकी रसानुभूति। श्रद्धा दोनों का सम्मिलित स्वरूप है। उसमें भावना भी है रस भी। जहाँ उसका उदय हो वहाँ लक्ष्य प्राप्ति की कठिनाई का अधिकाँश समाधान तुरन्त हो जाता है। अविश्वस्त व्यक्तियों के आगे थोड़ा-सा भी काम आ जाता है तो उससे उन्हें बड़ी हड़बड़ाहट होती है। किन्तु यदि उसी काम को साहस और भावना के साथ हाथ में लिया जाता है तो घबराहट और कठिनता भी आनन्द में बदल जाती है। जो बोझ का काम प्रतीत होता था वही सरलता से प्राप्त कर लेने योग्य बन जाता है।
प्राचीन काल में पवित्र अन्तःकरण वाले महान पुरुषों द्वारा अज्ञान अन्धकार में भटकते हुए लोक-जीवन को सत्य मार्ग पर अग्रसर करने का माध्यम उनके द्वारा जगाई हुई श्रद्धा ही होती रही है। शिष्यों को श्रद्धा का पूर्ण पाठ साधना की स्थिरता के लिए तप भी आवश्यक था, युग और परिस्थितियाँ बदल जाने पर आज भी आवश्यक है। परमात्मा सत्य है उसके गुण और स्वभाव अपरिवर्तनशील हैं इसी तरह वहाँ तक पहुँचने का मार्ग और माध्यम भी अपरिवर्तित ही है। उसे आज भी पाया और अनुभव किया जा सकता है, पर उस स्थिति की परिपक्वता के बीच में जो साधनायें, परिवर्तन, हलचल, कठिनाईयाँ और दूरभिसन्धियाँ आती हैं उनमें लक्ष्य प्राप्ति की भावना की स्थिरता के लिए श्रद्धा आवश्यक है।
श्रद्धा तप है। वह ईश्वरीय आदेशों पर निरन्तर चलते रहने की प्रेरणा देती है। आलस्य से बचाती है। कर्तव्य पालन में प्रमाद से बचाती है। सेवा धर्म सिखाती है। अन्तरात्मा को प्रफुल्ल, प्रसन्न रखती है। इस प्रकार तप और त्याग से श्रद्धावान व्यक्ति के हृदय में पवित्रता एवं शक्ति का भण्डार अपने आप भरता चला जाता है। गुरु कुछ भी न दे तो भी श्रद्धा में वह शक्ति है जो अनन्त आकाश से अपनी सफलता के तत्व और साधन को आश्चर्यजनक रूप से खींच लेती है। ध्रुव, एकलव्य, अज, दिलीप की साधनाओं में सफलता का रहस्य उनके अन्तःकरण की श्रद्धा ही रही है। उनके गुरुओं ने तो केवल उनकी परख की है। यदि इस तरह की श्रद्धा आज भी लोगों में आ जाए और लोग पूर्ण रूप से परमात्मा की इच्छाओं पर चलने को कटिबद्ध हो जायें तो विश्वशाँति, चिर-सन्तोष और अनन्त समृद्धि की परिस्थितियाँ बनते देर न लगे। उसके द्वारा सत्य का उदय, प्राकट्य और प्राप्ति तो अवश्यम्भावी ही हो जाता है। इसी बात को शास्त्रों में संक्षेप में इस प्रकार कहा गया है-
श्रद्धायांल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः। ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमविरेणाधिराच्छति॥ (गीता)
“जितेन्द्रिय तथा श्रद्धावान पुरुषों को ही ज्ञान मिलता है और ज्ञान से ही परमात्मा की प्राप्ति होती है। सत्य समुपलब्ध होता है।”
नीति-शास्त्र का कथन है-
न पिवन्ति नद्यः स्व्यमेव स्वोदकं, न फलानि खादन्ति स्वयमेव वृक्षाः। घराघरो वर्षति नात्महेतवे, परोपकाराय सतां विभूतयः॥
“नदियाँ स्वयं अपने जल को नहीं पीतीं। न वृक्ष स्वयं अपने फल खाते हैं। बादल भी स्वयं अपने लिए नहीं बरसते- सज्जनों की सम्पदायें परोपकार के लिए ही होती हैं।”
इस उदाहरण में दिए और इसी तरह के अन्य प्राकृतिक उपादानों का महत्व इसीलिए है कि वह अपने द्वारा मानव जाति का ही नहीं प्राणीमात्र का उपकार करते हैं। जो उपादान उपकारी नहीं होते अथवा जो उपकार करने की प्रवृत्ति को छोड़ देते हैं उनकी सार्थकता नष्ट हो जाती है, महत्व समाप्त हो जाता है।
नदियों, वृक्षों और बादलों का महत्व तभी तक रहता है जब तक वे जल, भोजन और सिंचन की अपनी प्रवृत्ति बनाए रहते हैं, पर-सेवा और परोपकार में लगे रहते हैं। सूखने अथवा रीता हो जाने पर उनका महत्व समाप्त हो जाता है। संसार उनकी उपेक्षा कर देता है।
यही बात मनुष्य जीवन पर भी घटित होती है। मानव जीवन की सार्थकता तभी तक है जब तक वह कुछ न कुछ परमार्थ और परोपकार में लगता है। परोपकार भाव सच्चे मनुष्य का लक्षण है। यों तो संसार में स्वार्थी, कृपण और संकीर्ण व्यक्ति भी जीते और रहते हैं, पर उनका जीवन मानवीय नहीं। केवल स्वार्थ के साथ अपने लिए ही जीना अथवा सब कुछ करते रहना पशु-प्रवृत्ति का जीवन है, जो मनुष्य के लिए लज्जा की बात है। स्वार्थी मनुष्य का जीवन महत्त्वहीन तथा निःसार ही माना जायेगा।
मनुष्य प्रकृति के माध्यम से परमात्मा की ओर से न जाने कितना क्या पाते रहते हैं। मनुष्य का परम कर्तव्य है कि वह प्रकृति अथवा परमात्मा के प्रति इसका आभार प्रकट करे। कृतघ्नता सबसे बड़ा पाप है। किन्तु मनुष्य प्रकृति अथवा परमात्मा के प्रति उपकार के बदले में प्रत्युपकार कर भी क्या सकता है? प्रत्युपकार के लिए न तो उस तक पहुँचा ही जा सकता है और न सीधे-सीधे उसे हमारे प्रत्युपकार की आवश्यकता है। तथापि परमात्मा की कृपा के प्रति कृतज्ञता प्रकट करनी आवश्यक है। उसका सुन्दर-सा उपाय यही है कि उसके उपकार का प्रत्युपकार हम उसकी सृष्टि को दें अर्थात् संसार के प्राणियों के साथ उपकारी कार्यों का व्यवहार करें।
परमात्मा के उपकार का लाभ तो पशु भी उठाते हैं। वे परिस्थितिवश दासता रूप में तो मनुष्य का भला कर सकते हैं, पर स्वतन्त्रतापूर्वक स्वेच्छया प्रत्युपकार कर सकने में असमर्थ होते। यह सुविधा तो केवल मनुष्य को ही मिली है। उसे इसका लाभ उठाकर परमात्मा के उपकार का बदला उसकी सृष्टि का उपकार कर के देना ही चाहिए। मनुष्य शरीर का महत्व इसी में है कि इसके द्वारा संसार के दुःखी, पीड़ित और आवश्यकताग्रस्त प्राणियों का कुछ न कुछ हितसाधन करते ही रहा जाये। आज की यह योग्यता फिर कभी मिलेगी या नहीं, निश्चयपूर्वक कुछ नहीं कहा जा सकता। और यदि स्पष्ट ही कहा जाये तो यह योग्यता फिर नहीं मिलेगी, क्योंकि इस मानव शरीर का मिलना निर्भर ही इस शर्त पर है कि मनुष्य पुण्य परमार्थ और परोपकार करता रहे। इसलिए बुद्धिमानी इसी में है कि मनुष्य आज की अपनी योग्यता और सामर्थ्य का यथासम्भव परोपकार पथ में उपयोग करता चले। इससे परमात्मा के प्रति कृतज्ञता का कर्तव्य भी पूरा होगा और आगे भी मनुष्य शरीर की सम्भावना निश्चित होगी।
संसार के सभी धर्मों और विद्वानों ने एक स्वर में परोपकार की महत्ता स्वीकार की है। प्रसिद्ध पाश्चात्य विद्वान विक्टर ह्यूगो ने लिखा है- “परोपकार के लिए हम जितना अपने को जुटाते हैं, उतना ही हमारा हृदय भरता जाता है।” परोपकार-पुण्य से मनुष्य की चेतना न केवल विकसित ही होती है बल्कि ऊर्ध्वमुखी भी होती है। उसका हृदय विकसित, विशाल और महान हो जाता है। उसे अपने में एक पूर्णता का अनुभव होने लगता है। किसी का संकट घटा देने, आवश्यकता के समय सहायता करने, रोगी के सेवा-सुश्रूषा करने अथवा क्षुधित को भोजन करा देने से जो उस व्यक्ति की आत्मा को शाँति और सन्तोष प्राप्त होता है उसी का प्रतिफल परोपकारी के अन्तःकरण को प्रभावित कर उसकी आत्मा को प्रभावित कर असीम तृप्ति का समावेश कर सकता है।
संसार में यों तो एक से एक बढ़कर सुखी और सम्पन्न व्यक्ति दिखाई देते हैं। पर उनसे यदि सत्य का आधार देकर पूछा जाये- कि क्या वे वास्तविक रूप से सुखी हैं तो उनका उत्तर अधिकाँशतः नकारात्मक ही होगा। वे कह सकते हैं कि उन्हें संसार में सम्पत्ति-सुख, स्वास्थ्य-सुख, सन्तान-सुख, सामाजिक-सुख आदि सारे सुख मिले हुए हैं, तब भी इस सुख में एक अनजाना-सा अभाव अतृप्ति, असन्तोष और न्यूनता खटकती रहती है। ऐसा अनुभव होता रहता है, इस सुख में वह सुख नहीं मिल पा रहा जो मिलना चाहिये और शायद जो मिल भी सकता है।
यह कल्पना अथवा भावुकता मात्र नहीं है बल्कि एक सत्य है। इस प्रकार की एक अतृप्ति बड़े सुखी और सम्पन्न व्यक्ति को रहा करती है। इस अतृप्ति, इस कमी का कारण क्या है? इसका कारण है संसार से सब कुछ पाकर भी प्रत्युपकार के रूप में उसके साथ कुछ न करने की कृतघ्नता, जो खटका बनकर सुख साधनों में भी अतृप्ति के अंकुर उगा देती है। संसार के सारे सुख इंद्रियजन्य ही होते हैं जो शरीर तक ही सीमित रहते हैं। इनसे आत्मा की तृप्ति नहीं हो पाती। आत्मा की तृप्ति परमार्थपूर्ण परोपकार से ही होती है। मनुष्य की आत्मा स्वभावतः बड़ी ईमानदारी और न्यायपरायण होती है। संसार से सब कुछ पाकर जब बदले में उसे कुछ न देने का अभ्यास किया जाता है तो उसे एक पीड़ा, एक वेदना होती है, जिसका प्रभाव मनुष्य के हृदय में अभाव को जन्म देता रहता है। जो परोपकारी आत्मा की इस वेदना का कारण दूर करते रहते हैं वे संपन्नता की दशा में ही नहीं अभाव की दशा में भी एक अपूर्व सुख-सन्तोष और तृप्ति का अनुभव करते रहते हैं।
संसार की सारी साधनाओं को फल दूरगत होता है। किन्तु परोपकार की साधना ही ऐसी साधना है, सुख-शाँति और सन्तोष के रूप में जिसका फल तुरन्त ही मिलता रहता है। परोपकार से उत्पन्न सन्तोष की तुलना स्वार्थजन्य सुख से कदापि नहीं की जा सकती। जहाँ पहला सुख मिथ्या और प्रवंचनापूर्ण होता है वहाँ दूसरा सत्य और कल्याणकारी होता है। जीवन में सत्य और उच्चकोटि के सुख को पाने के लिए परोपकार धर्म का पालन करना निताँत आवश्यक है। मनुष्य अपनी ही सुख-सुविधा और वृद्धि-समृद्धि की ही बात न सोचता रहे वरन् उसे दूसरों को भी सुखी तथा संकटरहित बनाने का प्रयत्न भी करते रहना चाहिये। ऐसा किये बिना न तो लोक में सुख-शाँति मिलती है और न परलौकिक कल्याण का निश्चय होता है। परोपकार को परम धर्म ही नहीं परम पुण्य भी समझना चाहिये।
परोपकार एवं परमार्थ से न केवल व्यक्ति का ही मंगल होता है बल्कि उससे समाज और संसार का भी कल्याण होता है। सहायता, सौहार्द एवं सहानुभूति के आधार पर जिन व्यक्ति यों का कष्ट दूर किया जायेगा, संकट में जिनका हाथ बटाया जायेगा, उनमें भावनापूर्ण मानवता की चेतना विकसित होगी। वे स्वयं भी दूसरों की सहायता और सहयोग का महत्व समझने लगेंगे। उनकी आत्मा का विकास होगा, अन्तःकरण में दैवी भावना का जागरण होगा जिससे वे स्वयं भी तन-मन-धन किसी भी रूप से, यथासाध्य परोपकार तथा परहित में प्रवृत्त होने लगेंगे। इस प्रकार अच्छे, सदाशयी नागरिकों, गम्भीर भद्र पुरुषों की संख्या में वृद्धि होगी जो समाज तथा संसार के लिए एक कल्याणकारी बात ही मानी जायेगी।
परमार्थपूर्ण परोपकार मानव जाति की सुरक्षा, विकास और सुख-शाँति का साधन है। आज हम संसार अथवा समाज का जो भी विकसित स्वरूप देखते हैं यह सब पूर्व पुरुषों का ही उपकार है। यदि वे अपने ज्ञान, परिश्रम, पुरुषार्थ एवं उदार भावना द्वारा प्रगति एवं विकास के बन्द द्वार न खोज जाते तो आज मनुष्य जाति यहाँ पर न दिखाई देती बल्कि अतीत के उन्हीं बन्द कपाटों से सिर मार रही होती। इस उपकार के लिए मनुष्य जाति अपने पूर्व पुरुषों की ऋणी है।
किन्तु इस ‘ऋणी’ शब्द में निहित विनय-भाव से ही कृतज्ञता की पूर्ति नहीं हो जाती। इसके लिए उपकार का बदला उपकार से ही देना होगा। हम सबको वह करते ही रहना चाहिये जिससे विश्व-कल्याणकारी परोपकार की परम्परा चलती ही रहे। सेवा, सहयोग, त्याग और बलिदान के बल पर जिस प्रकार संसार आगे बढ़ा है उसी प्रकार वह इन्हीं प्रवृत्तियों द्वारा ही और आगे बढ़ेगा। प्रगति ही संसार का जीवन है। जिस दिन प्रगति का यह क्रम रुक जाएगा मनुष्य जाति अविराम भयानक अन्धकार में डूब जायेगा।
यदि मानव-समाज को जीवित रखना है तो उसके सदस्यों के बीच परस्पर सेवा, सहयोग, दया, सहानुभूति आदि की परोपकारी प्रवृत्तियाँ चलती ही रहनी चाहिये। हमें परोपकार को जीवन का एक अनिवार्य व्रत समझ ग्रहण कर लेना ही चाहिये और यह भ्रम हृदय से निकाल ही देना चाहिये कि परोपकार का आधार धन ही है अथवा समाज के लिए कोई बहुत बड़ा त्याग करना है। परोपकार वास्तव में एक आध्यात्मिक भावना है जिसे कभी भी किसी भी परिस्थिति में किसी भी यथासाध्य सत्कर्म द्वारा मूर्तिमान किया जा सकता है। इसे सब कर सकते हैं और सबको करना ही चाहिये।
एक बार हनुमानजी की भेंट अर्जुन से हुई। हनुमान राम के भक्त थे, अर्जुन श्रीकृष्ण के। दोनों में बहस छिड़ गई। हनुमानजी कहने लगे राम बली हैं, अर्जुन कहते श्रीकृष्ण बली हैं।
बहस का अन्त न होते देख परीक्षा करने का निश्चय हुआ और शर्त तय हुई कि जो हारे वह आत्महत्या करले।
अर्जुन ने श्रीकृष्ण का ध्यान किया और तुरन्त समुद्र में एक विशाल पुल बाँध दिया और हनुमान जी बोले- अब यदि तुम्हारे राम बली हैं तो इस पुल को तोड़ दो। यदि न तोड़ सके तो राम का पराक्रम घटिया माना जायेगा।
हनुमानजी जोश में भर गये। उन्होंने शरीर का शतयोजन विस्तार किया और पुल पर कूद पड़े। भक्तों के इस झगड़े का पता भगवान् को हुआ तो वे बहुत चिन्तित हुये। यदि हनुमान की रक्षा करते हैं तो अर्जुन का अन्त होता है। अर्जुन जीतते हैं तो हनुमान की मृत्यु निश्चित है। सोच विचार कर उन्होंने स्वयं ही अपना शरीर पुल के नीचे लगा दिया। हनुमानजी ने जैसे ही अपना कदम बढ़ाया कि उनके भार से भगवान् का शरीर फट गया और खून बहने लगा। हनुमानजी ने राम को पहचाना, वे कूदकर उनके पास पहुँचे और दुःख करने लगे। अर्जुन ने कृष्णरूपी भगवान् को पहचाना वे भी दौड़ कर विलाप करने लगे। भगवान ने समझाया- “अच्छा होता आप लोग विवेक से काम लेते। मैं एक हूँ, मेरे ही अनेक रूप संसार में फैले हैं। इसलिये किसी से झगड़ा नहीं करना चाहिये। कोई विवाद आए तो उसे विवेक से हल कर लेना चाहिये।”
समय को सम्पत्ति कहा गया है। यह गलत भी नहीं है। समय का सदुपयोग करके ही लोग धनवान बनते हैं, विद्वान तथा कर्तृत्ववान बनते हैं। कभी किसी प्रकार भी एक क्षण खराब करना अपनी बड़ी हानि करना है।
जिस प्रकार समय का सदुपयोग लाभकारी होता है उसी प्रकार समय का दुरुपयोग हानिकारक होता है। खाली हाथ बैठा नहीं जा सकता। मनुष्य यदि कोई शारीरिक कार्य न करता हो तो उसके मानसिक तुरंग दौड़ रहे होंगे। जिन विचारों के पीछे कोई उद्देश्य नहीं होता, जिनके उपयोग की कोई योजना नहीं होती, वे मन मस्तिष्क को विकृत कर देते हैं। फिजूल की कल्पनायें मन में इच्छाओं का जागरण कर देती हैं, ऐसी इच्छायें जिनका कोई स्पष्ट स्वरूप नहीं होता, यों ही मन में उमड़-घुमड़ कर मनुष्य को इधर-उधर लिए घूमती हैं। ऐसी इच्छाओं में काम-वितर्क जैसी विकृत इच्छायें ही अधिक होती हैं।
चौबीस घण्टों में ज्यादा से ज्यादा सामान्य लोग आठ दस घण्टे ही काम किया करते हैं। बाकी का समय उनके पास बेकार ही रहता है। उस बेकार समय में आठ घण्टे के लगभग नहाने-धोने, सोने में निकल जाते हैं, तब भी उसके पास चार-छः घण्टे तक का समय बिल्कुल बेकार रहता है। इस समय में या तो लोग इधर-उधर मारे-मारे घूमते हैं या यार-दोस्तों के साथ गप मारते, ताश-चौपड़ या शतरंज खेलते हैं। बहुत लोग इसी समय में सिनेमा या स्वाँग देखने जाते हैं या घर में ही बैठकर पत्नी से मुँह-जोरी या बच्चों पर शासन चलाते हैं, जिससे गृह-कलह होते हैं। घर का वातावरण खराब होता, बच्चों की हँसी-खुशी मिट जाती है। तात्पर्य यह कि अपने खाली समय में लोग कुछ ऐसा ही काम किया करते हैं जिसका कोई लाभ तो होता ही नहीं उल्टे कोई हानि या बुराई ही पैदा होती है।
यदि मनुष्य शेष समय का सार्थक सदुपयोग करना सीख जाए तो बहुत-सी बुराईयों से बच जाय और कुछ लाभ भी उठा सकता है। समय का सदुपयोग ही उन्नति का मूल मन्त्र है। स्त्रियों के पास पुरुषों से भी अधिक फालतू समय बचता है। भोजन बनाने खिलाने के उपरान्त उनके पास कोई काम नहीं रहता। काम से निपटकर या तो पड़ी-पड़ी अलसाया करती हैं, या सोया करती हैं अथवा दूसरी स्त्रियों के साथ बैठ कर बातें करेंगी। निन्दा और आलोचना-प्रत्यालोचना का प्रसंग चलायेंगी और कोई बहाना मिल जाने से लड़ाई-झगड़ा करेंगी। फालतू रहना झगड़े-फसाद को आमन्त्रित करना है। यदि पढ़ी-लिखी हुई तो मासिक पत्र-पत्रिकाएं और उपन्यास वगैरह पढ़ती रहेंगी सो भी निरुद्देश्य। न ज्ञान के लिए, न स्वास्थ्य, मनोरंजन के लिए। केवल अपना यह फालतू समय काटने के लिये।
आज समय बड़ा तंगी का है। युग पुकार-पुकार कर चेतावनी दे रहा है, ‘उठो तन्द्रा छोड़ो, हर समय काम में जुटे रहो। अपने समय के प्रत्येक क्षण का सार्थक उपयोग करो। संसार आगे बढ़ रहा है तुम बहुत पीछे छूटे जा रहे हो। अपनी, अपने परिवार और अपने समाज, राष्ट्र की उन्नति के लिए काम करो। सुस्ती, आलस्य, तुच्छ मनोरंजन, व्यर्थ की टीका-टिप्पणी करने अथवा लड़ने-झगड़ने में समय और शक्ति बरबाद मत करो। समय उस मनुष्य का विनाश कर देता है तो उसे नष्ट करता रहता है। इसलिए उठो, चेतो और हर क्षण काम में लगे रहो। जो समय जा रहा है वह बहुत मूल्यवान है। एक बार निकल जाने के बाद फिर वापस नहीं आता। वर्तमान का विकृत अभ्यास भविष्य के आगामी समय को नष्ट कर डालता है। जीवन की अवधि सीमित है। इसी सीमित अवधि में सभी कुछ कर डालना है।
युग की पुकार उपयोगी तथा शिक्षाप्रद है। समय का सदुपयोग सारी उन्नतियों का मूलमन्त्र है। राष्ट्र, देश, समाज पिछड़ा हुआ है, व्यक्तिगत उन्नति रुकी हुई है। यह सब अभियान समय का सदुपयोग करने से ही आगे बढ़ेगा। आलस्य, प्रमाद, अकर्मण्यता तथा ठल्लेनबीसी हानिकारक है। इसमें शरीर सुस्त और मन मृत जैसा हो जाता है। कार्यक्षमता कम हो जाती है, दक्षता कुण्ठित हो जाती है। मनुष्य संकीर्णता के दायरे में पड़ा-पड़ा मर जाता है। इसलिए जिसके पास जो कुछ समय शेष बचे उसका बुद्धिमानीपूर्वक सदुपयोग करते ही रहना चाहिये। एक नहीं ऐसे अनेक कार्य हो सकते हैं जो फालतू समय में किये जा सकते हैं। उनसे आर्थिक लाभ भी हो सकता है और मनोरंजन की आवश्यकता भी पूरी हो सकती है।
निश्चय ही हर सामान्य व्यक्ति के पास बहुत-सा फालतू समय बचता है। परन्तु सभी यह शिकायत करते देखे जाते हैं कि उनके पास समय की कमी है। सारे काम-काज और दौड़-धूप के दम मारने की फुरसत नहीं मिलती। लेकिन यह बात सत्य से दूर है। उन्हें काम की बहुतायत तथा समय की कमी का भ्रम बना रहता है। यह भ्रम पैदा होने का कारण है। वह यह कि लोग अपना सारा काम अव्यवस्थित तथा अस्त-व्यस्त ढंग से किया करते हैं। जिससे जिस काम में जितना समय लगना चाहिये उससे कहीं अधिक लग जाता है। काम पूरे नहीं हो पाते और सदैव सिर पर सवार रहते हैं। दिन निकल जाता है, रात आ जाती है और बहुत से काम अनकिये पड़े रहते हैं। लोग यह समझते हैं कि उनके पास काम अधिक है और समय कम, जिससे वे हर समय परेशान और व्यग्र रहते हैं।
यदि काम का बटवारा समय के अनुसार रहे और निर्धारित समय के लिए निश्चित किया हुआ काम तत्परतापूर्वक एक क्षण भी नष्ट किये बिना पूरी तन्मयता और शक्ति से किया जाय तो कोई भी काम अपेक्षित समय से अधिक समय न ले। सारे काम समय से पूरे हो जायेंगे। लोग समय और काम का बटवारा करते नहीं। जब जिस काम को चाहा पकड़ लिया और जिसको चाहा छोड़ दिया। काम का समय है लेकिन अलसा रहे हैं। करने के लिए अभी सोच ही रहे हैं। या धीरे-धीरे कर रहे हैं। बैठकर सुस्ताने लगे। ये ऐसे दोष हैं जो समय तो खराब कर ही देते हैं और साथ ही किसी काम को पूरी सफलता के साथ पूरा भी नहीं होने देते। निदान समय का अभाव बना रहता है और काम पड़े रहते हैं।
यदि किये जाने वाले कामों की योजना पहले से ही बनी रहे, यह निश्चित रहे कि कौन-सा काम किस समय प्रारम्भ करके कब तक खत्म कर देना है तो यह दिक्कत न रहे। निश्चित समय आते ही काम में लग जाया जाये और प्रयत्नपूर्वक समय तक समाप्त कर दिया जाये। इसका सबसे सरल तथा उचित उपाय यह है कि दूसरे दिन के सारे कामों की योजना रात में ही बना ली जाये कि दिन प्रारम्भ होते ही कौन-सा काम किस समय प्रारम्भ करना है और किस समय तक उसे समाप्त कर देना है। तो कोई कारण नहीं कि हर काम अपने क्रम से अपने निर्धारित समय पर शुरू होकर ठीक समय पर समाप्त न हो जाये। बहुत से लोग काम का दिन शुरू होने पर- आज क्या-क्या करना है- यह सोचना प्रारम्भ करते हैं। न जाने कितना काम का समय इस सोच-विचार में ही निकल जाता है। बहुत-सा समय पहले ही खराब करने के बाद काम शुरू किये जायेंगे तो स्वाभाविक है आगे चलकर समय की कमी पड़ेगी और काम अधूरे पड़े रहेंगे जो दूसरे दिन के लिए और भी भारी पड़ जायेंगे। बासी काम बासी भोजन से भी अधिक अरुचिकर होता है। इसलिए बुद्धिमानी यही है कि दूसरे दिन किये जाने वाले काम रात को निश्चित कर लिये जायें। उनका क्रम तथा समय भी निर्धारित कर लिया जाये और दिन शुरू होते ही बिना एक क्षण खराब किये उनमें जुट पड़ा जाये और पूरे परिश्रम तथा मनोयोग से किए जायें। इस प्रकार हर आवश्यक काम समय से ही पूरा हो जायेगा और बहुत-सा खाली समय शेष बच रहेगा, जिसका सदुपयोग कर मनुष्य अतिरिक्त लाभ तथा उन्नति का अधिकारी बन सकता है। समय की कमी और काम की अधिकता की शिकायत गलत है। वह अस्त-व्यस्तता का दोष है जो कभी ऐसा भ्रम पैदा कर देता है।
जहाँ तक फालतू समय का प्रश्न है, उसका अनेक प्रकार से सदुपयोग किया जा सकता है। जैसे कोई भी पढ़ा-लिखा व्यक्ति बच्चों की ट्यूशन कर सकता है। किसी नाइट स्कूल में काम कर सकता है। किसी फर्म अथवा संस्थान में पत्र-व्यवहार का काम ले सकता है। अर्जियाँ तथा पत्र टाइप कर सकता है। खाते लिख सकता है, हिसाब-किताब लिखने-पढ़ने का काम कर सकता है। ऐसे एक नहीं बीसियों काम हो सकते हैं जो कोई भी पढ़ा-लिखा व्यक्ति अपने फालतू समय में आसानी से कर सकता और आर्थिक लाभ उठा सकता है। बड़े-बड़े शहरों और विशेष तौर से विदेशों में अपना दैनिक काम करने के बाद अधिकाँश लोग जगह-जगह ‘पार्ट टाइम’ काम किया करते हैं।
पढ़े-लिखे लोग अपने बचे हुये समय में कहानी, लेख, निबन्ध, कविता अथवा छोटी-छोटी पुस्तकें लिख सकते हैं। इससे जो कुछ आय हो सकती है वह तो होगी ही साथ ही उनकी साहित्यिक प्रगति होगी, ज्ञान बढ़ेगा, अध्ययन का अवसर मिलेगा और नाम होगा। कदाचित् पढ़े-लिखे लोग परिश्रम कर सकें तो, यह अतिरिक्त काम उनके लिए अधिक उपयोगी, लाभकर तथा रुचिपूर्ण होगा।
बिना पढ़े लोग रात-दिन चलने वाले कारखानों में खोज सकते हैं। किसी मशीनी कारखाने में जाकर श्रम कर सकते हैं। रात को दुकानों में होने वाले बहुत से कामों में श्रम कर सकते हैं। मजदूर-वर्ग के लोग लकड़ी, सींक, कांस, सेंठा, नरकुल, बाँस, घास, पटेरा, पतेल, वनस्पतियाँ, औषधियाँ, जड़ी-बूटियाँ जैसी न जाने कितनी चीजें लाकर बाजार में बेच सकते हैं। अत्तारों और हकीम वैद्यों से उनकी आवश्यकता मालूम कर बहुत-सी जंगली चीजें सप्लाई कर सकते हैं। जानवरों का चारा, पत्ते, बेर, करौंदा, जामुन, मकोय, बेल, कैथ आदि बहुत तरह के जंगली फल लाकर बेच सकते हैं। अनेक लोग इन्हीं चीजों के आधार पर अपनी पूरी जीविका चलाया करते हैं। मिट्टी, रेत तथा दातूनों की सप्लाई भी बड़े-बड़े शहरों में लाभदायक होती है। काम करने की लगन तथा जिज्ञासा होनी चाहिये दुनियाँ में काम की कमी नहीं है।
इसी प्रकार न जाने कितने घरेलू धन्धे तथा कुटीर उद्योग हैं जिन्हें करके समय का सदुपयोग किया जा सकता है। उनमें से कढ़ाई बुनाई, कताई-सिलाई तो साधारण है, इसके अतिरिक्त तेल, साबुन, डलिया, झाबे, चटाई, झोले, लिफाफे, थैले, चूरन, चटनी, अचार, मुरब्बे आदि का भी काम किया जा सकता है। इन कामों में लगभग सभी सामान्य घरों की स्त्रियाँ दक्ष होती हैं। फसल पर आम, नीबू, आँवला, खीरा, ककड़ी, तरबूज, करेला आदि के अनेक प्रकार के अचार बनाकर बाजार में सप्लाई किये जा सकते हैं। बहुत से परिवार पापड़, बरियाँ तथा मंगौड़ियाँ बनाकर भी बनियों को सप्लाई करते रहते हैं। पढ़ी-लिखी योग्य स्त्रियाँ अपने घर पर सिलाई-कटाई का छोटा-मोटा स्कूल चला सकती हैं। बहुत-सी परिश्रमी नारियाँ हाथ से सिलने योग्य कपड़ों को दर्जी से लेकर सीकर अर्थ लाभ कर सकती हैं। अनेक परिवार मिलकर अपने घरों पर कताई-बुनाई, दरी-कालीन तथा निवाड़ बुनने के छोटे कारखाने लगा सकते हैं, जिनको घरों की स्त्रियाँ अपने खाली समय में आराम से चला सकती हैं। कागज, गत्ता तथा मिट्टी के खिलौने और कपड़ों की गुड़ियां बनाकर बेची जा सकती हैं। इस प्रकार के और भी न जाने कितने काम हो सकते हैं जिनको घर की स्त्रियाँ अपने फालतू समय में आसानी से कर सकती हैं। आजकल घरों में हाथ से बनी देशी चीजों का समाज में बड़ा आदर किया जाता है। परिश्रमपूर्वक तथा कम मुनाफे पर करने से यह सब काम आसानी से चल सकते हैं।
गरीब आदमियों की अपेक्षा अमीर स्त्री-पुरुषों के पास फालतू समय अधिक होता है। एक तो उनके पास विशेष काम नहीं होता, जो होता भी है वह अधिकतर नौकर-चाकर ही किया करते हैं। उन्हें पैसे की इतनी आवश्यकता भी नहीं होती जिसके लिये वे मगज और शरीरमारी करें। तब भी स्वास्थ्य, कार्यक्षमता तथा विविध प्रकार की बुराइयों तथा व्यसनों से बचने के लिए उन्हें अपने फालतू समय में कुछ न कुछ काम करना ही चाहिये। ऐसे लोग अपने मनोरंजन के लिए बागवानी कर सकते हैं। निरक्षरों को निःशुल्क साक्षर बना सकते हैं। समाज सेवा तथा परोपकार के बहुत से काम कर सकते हैं।
इस प्रकार शेष समय में पढ़े-लिखे, अपढ़ तथा गरीब अमीर पुरुष सभी कुछ न कुछ अपने योग्य काम कर सकते हैं। फिर वह चाहे आर्थिक हो अथवा अनार्थिक। इस कार्य को करने में जितना महत्व समय के सदुपयोग का है उतना पैसे का नहीं। फालतू समय में काम करते रहने वाले अनेक रोगों तथा बुराईयों से बच सकते हैं। इसलिए ठल्लेनबीसी करने के बजाय कुछ न कुछ काम करना चाहिये।
पारिवारिक कलह तथा अव्यवस्था से ऊब कर लोग संस्था को ही तोड़ देने की पेशकश करने लगे हैं। किन्तु उन्हें इस विषय में पाश्चात्य देशों के उदाहरण से शिक्षा लेनी चाहिये। कुछ समय में योरोपीय देशों में सम्मिलित परिवार प्रथा को तोड़कर सुख-शाँति के प्रयोग किए जा रहे हैं। किन्तु वाँछित उद्देश्य की पूर्ति होती नहीं दीखती।
विवाह होते ही तरुण, माँ-बाप और छोटे भाई-बहनों को छोड़कर परिवार से अलग हो जाते हैं। कुछ समय तो इनके दिन सुख-चैन से बीतते, फिर पति-पत्नी में कहा सुनी होने लगती है। उसका जहाँ एक कारण सद्गुणों का अभाव है वहाँ दूसरा कारण यह भी है कि जब पति-पत्नी अलग अकेले रहते हैं तब केवल उन दोनों को ही समस्याओं का सामना करना पड़ता है जिससे जल्दी ही चिड़चिड़े बन जाते हैं। कोई समस्याओं में हाथ बटाने वाला नहीं होता। यह सुविधा तो सम्मिलित परिवार में ही सम्भव हो सकती है। सम्मिलित परिवार की समस्या सारे परिजनों की होती है। हर आदमी उसमें हाथ बटाता है। उनका दबाव किन्हीं दो पर नहीं पड़ता। सम्मिलित परिवारों में एक दूसरे के अनेक लोग सहायक रहते हैं। थोड़ा-थोड़ा करके सारा भार तथा उत्तरदायित्व बट जाता है, सभी हल्के रहते हैं।
पृथक परिवारों में यह सुविधा नहीं रहती। सारी पारिवारिक, आर्थिक, सामाजिक तथा वैयक्तिक समस्याओं का भार दो पति-पत्नी पर ही पड़ता है, जिससे वे शीघ्र ही थक जाते हैं और एक दूसरे से लड़ने-झगड़ने लगते हैं। तलाक और सम्बन्ध-विच्छेद की स्थिति आते देर नहीं लगती। इसका भी कारण है। वह यह कि सम्मिलित परिवारों में गुरुजनों का दबाव रहता है। पति-पत्नी का झगड़ा ज्यादा नहीं बढ़ पाता। एक तो वे अदब तथा शर्म के मारे स्वयं ही लड़ने में संकोच करते हैं, दूसरे जब कभी उनमें कहा-सुनी की नौबत आती है तो दूसरे लोग मध्यस्थ बनकर उनको समझाते हैं और बात जहाँ की तहाँ समाप्त हो जाती है। वह बढ़कर तलाक तथा सम्बन्ध-विच्छेद तक नहीं पहुँच पाती।
परिवार से टूट-फूट कर लोग अलग घर तो जरूर बना लेते हैं लेकिन पारिवारिक सुख-शाँति से वंचित ही बने रहते हैं। पति-पत्नी तो आपस में झगड़ते ही रहते हैं, साथ ही जब बच्चे हो जाते हैं तो वह भी ज्यों-ज्यों बढ़ते जाते हैं, समस्यायें बढ़ाते जाते हैं। अनेक प्रकार की अवाँछनीय बातें करते और सयाने होने पर परिवार से अलग जा बसते हैं। बूढ़े माता-पिता बुद्धिमत्तापूर्वक जो कुछ जवानी में मितव्ययिता से बचा पाते हैं, वही उनके बुढ़ापे का सहारा और सम्बल बनता है। जो बच्चों को लाड़-प्यार देने के लिए खाली हाथ ही बने रहते हैं उनका बुढ़ापा बुरी तरह कंटकाकीर्ण हो जाता है। इस प्रकार पाश्चात्य देशों में तरुण माता-पिता को अनाथ छोड़ने का पाप भी लेते हैं, पारिवारिक सुख-शाँति भी नहीं पाते।
परिवार के सम्मिलन पृथक पृथकता पर घर की सुख-शाँति निर्भर नहीं है। उसका हेतु कुछ और ही है। वह है परिजनों का सद्गुणी होना। परिवार के लोग यदि सद्गुणी हैं तो परिवार चाहे मिलकर चले चाहे पृथक उसमें शाँति बनी रहेगी। और यदि वे दुर्गुणी हैं तो किसी भी अवस्था में सुख-शाँति रह सकना सम्भव नहीं। अच्छा यही है कि आपस में मिलजुलकर रहा जाय और सारे परिजनों को अधिक से अधिक सद्गुणी बनाया जाये।
सोचने की बात है कि जब पृथक परिवार प्रथा पाश्चात्य देशों में सफल नहीं हो रही है, जहां न विधवाओं का प्रश्न है, न वृद्धों की समस्या। वैधव्य जैसा वहाँ कोई दुर्भाग्य नहीं है और वृद्धता के विषय में भी कोई चिन्ता की बात नहीं है। एक तो वहाँ लोग प्रायः सम्पन्न होते ही हैं, दूसरे बेसहारा वृद्धों के लिए सरकार की ओर से वृत्तियाँ भी मिलती हैं जिससे वे अपनी जीवन नौका पार लगा लेते हैं। बीमारी की दशा में अस्पताल और नर्सें अच्छी देखभाल कर देती हैं। किन्तु भारतीय समाज में इन सुविधाओं का अभाव है। विधवाओं की समस्या का कोई समुचित हल कुरीतियों तथा जड़ रूढ़ियों के कारण, कार्यान्वित नहीं हो पा रहा है। अनाथालयों की दशा गिर गई हैं। वृद्धों तथा अपाहिजों के लिए ऐसी वृत्तियों की कमी है जिनके सहारे वे अपना शेष जीवन ठीक प्रकार से यापन कर सकें। भारतीय सभ्यता तथा समाज रचना का तकाजा है कि यहाँ सम्मिलित परिवार प्रथा सुरक्षित रक्खी जाये। जरूरत केवल इस बात की है कि परिवारों का वातावरण तथा सदस्यों का स्वभाव सम्मिलित प्रथा के अनुकूल ढाला जा सके, जिससे कि उनमें कलह, विद्वेष अथवा विवाद की परिस्थितियाँ न पनपने पावें। पारिवारिक सुख-शाँति सम्मिलित अथवा पृथक परिवार प्रथा पर निर्भर नहीं है। वह निर्भर है सदस्यों के गुण कर्म स्वभाव की श्रेष्ठता पर।
सभी अभिभावक चाहते हैं कि उनके बच्चे और उनके परिजन श्रेष्ठ बनें, आपस में प्रेमपूर्वक मिलजुल कर रहें। उसके लिए वे सभी को समझाते और ऊँच-नीच सुझाते हैं। झगड़ने वाले सदस्यों को वे प्रेम का महत्व बतलाते, मिलजुलकर रहने के लाभों से अवगत कराते और हर अवसर पर कुछ न कुछ उपदेश देते रहते हैं। किन्तु उसका कोई स्थायी प्रभाव नहीं पड़ता। एक-आध दिन के लिए सदस्य शाँतिपूर्वक रहते हैं और फिर लड़ने-झगड़ने लगते हैं। इस प्रभावहीनता के दो कारण हैं। एक तो यह कि यह उपदेश क्रम केवल उस समय चलता है जब कोई सदस्य आपस में लड़-झगड़ रहे होते हैं। उसके बाद बन्द हो जाता है। यदि यही उपदेश झगड़ा हो अथवा न हो, प्रतिदिन नियमित रूप से चलता रहे तो उनके संस्कार बनते रह सकते हैं और धीरे-धीरे सुधार हो सकता है। दूसरा कारण यह रहता है कि अभिभावक उपदेश तो देते रहते हैं किन्तु स्वयं वैसा आचरण नहीं करते। आचरण के अभाव में उपदेश का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। दीपक दीपक से जलता जरूर है किन्तु जलते हुए दीपक से, बुझे हुये से नहीं। जो स्वयं गुणवान है वही दूसरों को गुणवान बना सकता है। जो स्वच्छ है वही दूसरों को स्वच्छ बना सकता है। सच्चा उपदेश आचरण का प्रभाव है। जो उपदेश दिया जा रहा है, यदि वह उपदेशक के आचरण में चरितार्थ नहीं है तो उसका रंच प्रभाव भी किसी पर नहीं पड़ेगा। इस विषय में एक उदाहरण बहुत प्रसिद्ध है-
एक महात्मा इसके लिए प्रसिद्ध थे कि उनके उपदेश का दूसरों पर बड़ा अनुकूल प्रभाव पड़ता है। वे जिससे जो कुछ कह देते हैं वह वैसा ही करने लगता है। महात्मा जी का यह प्रभाव सुनकर एक स्त्री अपने दस साल के बालक को लेकर उनके पास गई और कहा- “महात्माजी यह बच्चा गुड़ बहुत खाया करता है। डाक्टरों ने बतलाया है कि यदि यह गुड़ खाना बन्द नहीं करेगा तो बहुत बीमार पड़ जायेगा। आप कृपा करके इसे समझा दें जिससे गुड़ खाना बन्दकर दे। हम लोगों के कहने का तो इस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।”
उस स्त्री की बात सुन कर महात्माजी कुछ गम्भीर हो गये, और थोड़ी देर विचार करने के बाद बोले- “इसको दस दिन बाद लेकर आना, तब मैं इसको गुड़ छोड़ने के लिये समझा दूँगा।” स्त्री चली गई।
दस दिन बाद लड़के को लेकर फिर आई। महात्माजी ने लड़के को गुड़ न खाने के लिए समझाया और उसने उनकी बात मान ली। वहाँ बैठे अनेक आदमियों ने महात्मा से पूछा कि यह बात तो वह उस दिन भी कह सकते थे तब क्या कारण था कि उस दिन न कहकर आज दस दिन बाद कही।
महात्माजी ने बतलाया कि तब मैं स्वयं गुड़ खाया करता था। यदि उस दिन लड़के को उसे छोड़ देने के लिए उपदेश देता तो उसका प्रभाव न पड़ता। इन दस दिनों में मैंने गुड़ खाना छोड़ दिया और उसके प्रति अरुचि उत्पन्न करली। इस प्रकार मैं उपदेश करने का अधिकारी तो हो ही गया, साथ ही आशा है कि उपदेश का पूरा-पूरा प्रभाव बालक पर पड़ेगा। आचरणशून्य आदर्श का उपदेशदाता न तो अधिकारी है और न उसका वाँछित प्रभाव ही पड़ता है।
प्रायः सभी अभिभावक चाहते हैं कि हमारे बच्चे, स्त्री, परिजन सभी अच्छे बनें, अच्छे रास्ते पर चलें, जैसा वे चाहें बनें। इसके लिए वे उन्हें समय-समय पर बहुत प्रकार से समझाते भी रहते हैं, उपदेश भी करते हैं, किन्तु सब बेकार चला जाता है। न बच्चे सुधरते हैं और न परिजन इच्छानुकूल आचरण करते हैं। उसका कारण केवल यही है कि वे उन्हें उपदेश तो बहुत कुछ करते हैं किन्तु यह आदर्श स्वयं अपने आचरण में चरितार्थ नहीं करते।
कहना न होगा कि दुर्गुणी परिजन उतना ही दुःख देते हैं जितना शरीर में लगा हुआ कोई रोग। पारिवारिक सुख-शाँति के लिए परिजनों का सुधार करना उसी प्रकार आवश्यक है जिस प्रकार शरीर को सुखी रखने के लिये रोग का उपचार। रोग, आग और दुर्गुण बड़ी जल्दी बढ़ जाने वाले होते हैं। रोग की यह समझकर उपेक्षा कर दी जाय कि जरा-सी सर्दी-जुकाम है, इसकी क्या परवाह की जाय, तो यही छोटा-सा रोग बढ़कर भयंकर रूप धारण कर लेता है और तब उसका उपचार दुःसाध्य हो जाता है। चिनगारी समझकर आग की उपेक्षा कर दी जाय तो वह धीरे-धीरे बढ़कर दावानल का रूप धारण कर लेती है। इसी प्रकार दुर्गुण के प्रवेश करते ही यदि सुधार का प्रयत्न न किया जायेगा तो जल्दी ही वह स्वभाव का अंग बन जायेगा और तब उससे छुटकारा पा सकना सरल न रहेगा। इसलिए आवश्यक है कि अभी कोई विशेष बिगाड़ नहीं हुआ है कोई खास देर नहीं हुई है, इसलिए परिजनों के सुधार में आज से ही तुरन्त लग जाना चाहिये। ज्यों-ज्यों विलम्ब होता जायेगा बच्चे तथा परिजनों के दुर्गुण स्वभाव का अंग बनते जायेंगे और तब उनके सुधार के लिए बहुत प्रयत्न करना होगा और सफलता की आशा ज्यादा न रहेगी।
जो पारिवारिक सुख-शाँति के लिये सच्चाई के साथ इच्छुक हो गया उसे ही परिवार के सुधार में उसी तत्परता से लग जाना चाहिये जिस प्रकार स्वस्थ रहने का अभिलाषी व्यक्ति शरीर को निरोग करने में लग जाता है। किन्तु यह काम केवल समझाने बुझाने अथवा उपदेश देने से नहीं होगा। उपदेश का यदि कोई प्रभाव पड़ता भी है तो बहुत छोटी सीमा तक। गुणों की दिशा में परिवार का पूरा कायाकल्प तभी सम्भव होगा जब अभिभावक स्वयं अपना आचरण आदर्श बनायें, और ऐसा कुछ भी न करें कि जिसका बुरा प्रभाव बच्चों अथवा परिजनों पर पड़े अथवा जो आप उनमें नहीं देखना चाहते।
व्यक्तिगत आचरण के अभाव में परिवार सुधार की आकाँक्षा और उसके लिए दिये जाने वाले उपदेश निराशाजनक ही रहेंगे। यदि किसी को अपनी इस आकाँक्षा को मूर्तिमान देखना है कि उसके बच्चे भले, भोले, आज्ञाकारी और कुशाग्र बुद्धि बनें समाज की सेवा और संसार में उन्नति करें। उनका शील स्वभाव समुज्ज्वल बनकर न केवल उन्हें बल्कि अभिभावकों को भी प्रशंसनीय बना दें, सारे परिजन परस्पर पर प्रेम भाव, त्याग-भावना और उदारतापूर्वक रहें तो उसे स्वयं अपने चरित्र में इन गुणों का विकास करना होगा। अन्यथा उनकी यह आकाँक्षा उसी प्रकार अतृप्त रह जायेगी जिस प्रकार अकर्मण्य निर्धन व्यक्ति किसी भी सुख-सुविधा के लिए तरसकर रह जाते हैं।
परिवार सुधार के प्रयत्न में बच्चों का विशेष ध्यान रखने की आवश्यकता है। जो प्रौढ़ हो चुके हैं उनके संस्कार दृढ़ तथा श्रमसाध्य हो चुके होते हैं किन्तु बच्चे विकासोन्मुख होते हैं। उनकी मनोभूमि कोमल तथा अनुकरणीय होती है। कोई भी डाला हुआ संस्कार वे शीघ्रता से ग्रहण कर लेते हैं। यदि पढ़ने वाला बच्चा ठीक से पढ़ता-लिखता नहीं है तो इसका उत्तरदायित्व तो शिक्षक के सिर जा सकता है किन्तु यदि उसकी आदतें खराब हैं स्वभाव अपरिवारिक है तो उसका दोष माता-पिता पर ही आयेगा। जिस प्रकार कोई बालक शिक्षक से अक्षर ज्ञान प्राप्त करता है। उसी प्रकार वह माता-पिता से स्वभाव ग्रहण करता है। ग्रहण ही नहीं करता बल्कि वह उनके गुण दोषों में स्वयं ढलता जाता है। जिन माता-पिता में परस्पर कलह, संघर्ष और मनोमालिन्य चलता रहता है, उनके बालक भी स्वभावतः द्वेषी, ईर्ष्यालु, घृणा करने वाले और कटुवादी हो जाते हैं। उनमें अश्रद्धा तथा अनादर्श का दोष उत्पन्न हो जाता है, जो आगे चल पूरे परिवार, समाज और यहाँ तक धर्म तथा ईश्वर के प्रति अवज्ञा के रूप में प्रकट होता रहता है। ऐसे दुर्गुणी बालक स्वयं सुखपूर्वक रह सकेंगे अथवा पारिवारिक सुख-शाँति का आदर कर सकेंगे ऐसी आशा नहीं की जा सकती।
बच्चे अधिक लाड़-प्यार और उपेक्षा से, और परिजन स्वार्थ, अनुदारता, अधिकार भावना के प्रदर्शन से विद्रोही हो जाते हैं। इसलिए हर बुद्धिमान अभिभावक अपने सद्गुणों का विकास कर समुचित रूप से बालकों का पालन-पोषण तथा निर्माण करे तो उसकी पारिवारिक सुख-शाँति निश्चय ही निश्चित हो जायेगी।
भगवान ने गीता में कहा है-
“श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाद् ज्ञान यज्ञः परंतपः। सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते॥”
“हे परंतप! द्रव्य-यज्ञ से ज्ञान-यज्ञ श्रेष्ठ है। क्योंकि जितने भी कर्म हैं वे सब ज्ञान में ही समाप्त होते हैं। ज्ञानदान सर्वोपरि पुण्य है, शुभ कार्य है।”
अपने उपरोक्त कथन में भगवान ने द्रव्य-यज्ञ और ज्ञान-यज्ञ की तुलना में ज्ञान-यज्ञ को द्रव्य-यज्ञ से श्रेष्ठ बतलाया है। ऐसा क्यों है- इस पर विचार करने से पूर्व यह समझ लेना आवश्यक है कि द्रव्य-यज्ञ और ज्ञान-यज्ञ है क्या? द्रव्य-यज्ञ का एक अर्थ अथवा आशय सामग्री द्वारा अग्नि में मन्त्रोच्चार के साथ हवन करना है। दूसरा तात्पर्य यह है कि द्रव्य अर्थात् भौतिक विभूतियों का धर्मोक्त व्यवहार करना। अपवर्ग चतुष्टय के अर्थ की उपलब्धि और उसका उपभोग। द्रव्य-अर्थ अथवा विभूतियों को इस प्रकार से उपार्जित करना जिससे न तो समाज में किसी को कष्ट हो और न अपने को प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष में किसी कलंक, अपवाद, भय अथवा आशंका का भोगी बनना पड़े। साथ ही उसका उपभोग एवं उपयोग इस प्रकार करना जिससे अपना, अपनी आत्मा का और समाज का सच्चा हितसाधन हो- द्रव्य-यज्ञ कहा जा सकता है।
यज्ञ का सूक्ष्म अर्थ पदार्थ एवं क्रिया के यापन की उस विधि की ओर संकेत करता है जिसके अंतर्गत परमार्थ का कोई न कोई भाव चल रहा हो। जो मनुष्य शुभ उपायों द्वारा द्रव्य उपार्जन करता है, उसके उपार्जन में समाज की आर्थिक उन्नति की भावना रखता है, अपने धनाभाव को दूर करना नैतिक कर्तव्य समझता है, प्राप्त धन में आत्मभाव न रखकर उसको समाज की सम्पत्ति मानता है और उसी भाव से आगे क्रियाशील रहने के लिए अपने पर जरूरत-भर खर्च करता है, वह इस ढंग से कि उसका पूरी तरह तन, मन और बुद्धि की शक्ति का विकास करने में उपयोग हो। शेष का उचित भाग समाज के कल्याण के लिए दान द्वारा, सहायता द्वारा अथवा संस्थापना द्वारा खर्च करता है, परमार्थ परोपकार और पुण्य कार्यों में लगाता है वह निश्चय ही द्रव्य-यज्ञ करता है। जिसका फल किसी प्रकार भी अग्निहोत्र से कम नहीं होता।
जिस प्रकार इस द्रव्ययज्ञ का कर्मयोग से सम्बन्ध है, उसी प्रकार ज्ञानयज्ञ का सम्बन्ध ज्ञानयोग से है। द्रव्य की भाँति ही ज्ञान का उपार्जन करना, उसका संचय तथा अभिवर्धन करना, शारीरिक, साँसारिक संकटों के काटने और आत्मा के बन्धन दूर करने के साथ संसार में विद्या का प्रकाश फैलाने, अविद्या को मिटाने, माया मोह को नष्ट करने में उसका यापन और वितरण करना- ज्ञानयज्ञ ही कहा जायेगा।
विधिभाव से करने और सूक्ष्म दृष्टि से निरीक्षण करने पर विदित होगा कि इन दोनों यज्ञों का परम-परिणाम एक ही है तथापि भगवान ने द्रव्ययज्ञ की अपेक्षा ज्ञानयज्ञ को श्रेष्ठ बतलाया है। वह किन कारणों से? उनमें से एक कारण तो भगवान ने स्वयं ही प्रकट कर दिया है- वह यह कि जितने भी कर्म हैं उनकी परिसमाप्ति ज्ञान में ही होती है। निश्चय ही इन कर्मों की परिसमाप्ति का अध्यात्मिक अर्थ तो यही है कि ज्ञान प्राप्त हो जाने पर किये हुये कर्मों के सारे अच्छे-बुरे फल नष्ट हो जाते हैं और पुण्य पाप दोनों के बन्धनों से छूटकर सर्वथा मुक्त हो जाता है, अपनी मूल परिस्थिति को प्राप्त कर लेता है। इसी तात्पर्य को इन शब्दों में भी कहा जा सकता है कि ज्ञानी को कर्मों का बन्धन नहीं लगता वह सर्वथा उससे मुक्त रहता है। ऐसा क्यों होता है? इसलिए कि ज्ञानी जो कुछ करता है करने योग्य कर्तव्यों को परमात्मा के लिए ही, उसकी आज्ञा अनुभव करता हुआ ही करता है। वह जो कुछ करता है उसका फल भी उसी को समर्पित कर देता है। ऐसे त्यागी तथा निर्लिप्त ज्ञानी पुरुष को कर्मों का फल बोध भी किस प्रकार रहता है।
किन्तु इसके अतिरिक्त- “कर्म की परिसमाप्ति ज्ञान में होती है”- का एक भौतिक तथा लाक्षणिक अर्थ भी है। वह यह कि ज्ञान में ही कर्मों की पराकाष्ठा होती है अर्थात् कर्म का साँगोपांग ज्ञान रखने वाला कर्म को पारंगत कुशलता के साथ करता है और उसी के अनुसार उसके पुरस्कार का अधिकारी होता है।
भगवानोवाचित इस कारण के अतिरिक्त ज्ञानयज्ञ की श्रेष्ठता के अन्य कारण भी हैं। जैसे- द्रव्ययज्ञ का आयोजन करने में बहुत से उपादान एवं उपकरणों की आवश्यकता होती है, जबकि ज्ञानयज्ञ के लिए किन्हीं विशेष साधनों की जरूरत नहीं होती। द्रव्य-यज्ञ का संपादन करने के लिए द्रव्य की जरूरत है पर ज्ञानयज्ञ में इसकी आवश्यकता नहीं है। ज्ञानयज्ञ के लिए जिज्ञासा और बुद्धि दो साधनों की जरूरत है वह मनुष्य को निसर्ग रूप से ही मिले रहते हैं। विचार कृषि के लिए स्वाध्याय और स्वाध्याय के लिए पुस्तकों की जो आवश्यकता है वह किसी भी योग्य पुस्तकालय से पूरी हो सकती है। पुस्तकें माँगकर भी काम चलाया जा सकता है। इसके अतिरिक्त वह स्वाध्याय सत्संग के माध्यम से भी किया जा सकता है। इसमें तो किसी प्रकार के व्यय की आवश्यकता है ही नहीं।
बिना धन के द्रव्य-यज्ञ कठिन है। इसलिए उसकी आराधना के लिए आर्थिक पुरुषार्थ करना ही होगा। आज की दुनियाँ में यदि आर्थिक पुरुषार्थ की प्रकृति सर्वथा पवित्र एवं निष्कलंक बनाये रखना असम्भव नहीं तो कम से कम कठिन तो है ही। किन्तु ज्ञानयज्ञ की साधना में ऐसी कोई कठिनाई नहीं है। थोड़ा सजग रहकर ज्ञान का उपार्जन पवित्रतापूर्वक किया जा सकता है। अनैतिक एवं अनुचित विचार-संस्कार से थोड़ा सतर्क रहकर विशुद्ध एवं कल्याणकारी ज्ञान का अर्जन किया ही जा सकता है।
द्रव्ययज्ञ के विस्तार के लिए जो दान अथवा परोपकार का आयोजन चलाना होगा उसमें प्रदत्त धन के किसी अपात्र के पास पहुँच जाने की आशंका हो सकती है। वह अपात्र उसका दुरुपयोग कर हित में अहित की सम्भावना उपस्थित कर सकता है। किन्तु ज्ञानयज्ञ में यह आशंका नहीं रहती। उसके लिए पात्र अपात्र का बन्धन नहीं होता। बल्कि ज्ञान का दान उनके लिए तो और भी उपादेय है जो पथ भूले हुये हैं और अविद्या के अन्धकार में भटक रहे हैं। और यदि सच कहा जाय तो ज्ञानदान के अधिक अधिकारी वही हैं जिनका मार्ग ठीक नहीं है, जिनके संस्कार विकृत हो गये हैं।
द्रव्य क्षरणशील उपादान है। वह आज है तो यह निश्चय नहीं कि कल भी रह सकता है। ऐसी स्थिति में किसी भी द्रव्य-याज्ञिक को किसी समय भी अधनता का सामना करना पड़ सकता है और तब उसके उस कार्यक्रम में व्यवधान पड़ सकता है। किन्तु ज्ञानयज्ञ में उसकी संभावना नहीं रहती। ज्ञान ही एक ऐसा तत्व है जो क्षरणशीलता से सर्वथा मुक्त रहता है। ज्ञान बढ़ता है घटता तो कदापि नहीं और नाश तो उसका कभी होता ही नहीं है। द्रव्य-यज्ञ का द्रव्य तो साथ ही नहीं उसका पुण्य ही साथ जाता है, जबकि ज्ञान-पुण्य साथ भी मनुष्य के साथ जाता है। जिससे पुण्य-बल पर या तो परिपाक में वह बन्धन मुक्त हो जाता है अथवा परिपक्वता के लिए उसे मनुष्य योनि ही प्राप्त होती है जिसमें होश आते ही पूर्वजन्मीय ज्ञान प्रतिविम्बित हो उठता है।
द्रव्य-यज्ञ से परमार्थ पथ में किसी की द्रव्य द्वारा एक छोटी सीमा तक ही सहायता सम्भव हो सकती है और वह भी कुछेक पात्रों को ही। किन्तु ज्ञानयज्ञ में एक पुस्तक, एक प्रवचन और एक पर्यटन द्वारा सैंकड़ों हजारों की भुक्ति से लेकर मुक्ति तक सहायता की जा सकती है। द्रव्यदान पाकर कोई बहुत कम समय तक ही अपनी कठिनाई दूर रख सकता है, किन्तु जिसको ज्ञान दान कर दिया जाता है उसके लिए तो कठिनाइयाँ महत्वहीन हो जाती हैं। दूसरे वह उस ज्ञान द्वारा हर देशकाल में अनुकूलताएं अर्जित कर सकता है। जहाँ धन उसे कुछ समय तक ही सहायक तथा लाभकर होगा वहाँ ज्ञान उसे आजीवन ही नहीं जीवनोपराँत भी साथ देता रहता है। इन्हीं सब सुविधा व्यवस्था के कारण ही ज्ञानयज्ञ को द्रव्ययज्ञ से श्रेष्ठ बताया और माना गया है।
ज्ञानयज्ञ का पारलौकिक फल जो होता है वह तो होता ही है। इस लोक में भी उसका लाभ कम नहीं होता। ज्ञान द्वारा ही तो मनुष्य को आत्मा की अमरता का, परमात्मा की व्यापकता एवं विभुता का, उसके प्रेम, न्याय और अनुकम्पा का और मानव जीवन के महान कर्त्तव्यों का बोध होता है। ज्ञान द्वारा ही कुविचारों और कुकर्मों के प्रति घृणा होती है और परमार्थ पथ पर चलने की प्रेरणा होती है। ज्ञान के आधार पर मनुष्य साधनहीन स्थिति में भी अपनी आत्मिक शाँति और मानसिक स्थिरता बनाए रहता है। अभाव, आवश्यकतायें अथवा गहनताएं अपनी तृप्ति के लिए उसे अनुचित मार्ग पर ढकेल सकने में सफल नहीं हो पातीं। ज्ञानवान मनुष्य अनबूझ अथवा प्राकृतिक प्रेरणा के वश होकर कोई काम नहीं करता। वह जो कुछ करता है भली भाँति सोच-विचार कर विवेकपूर्वक ही करता है, जिससे वह कर्म के दुष्परिणामों और उनके बन्धनों से बहुतायत में बचा रहता है। ज्ञान आलोक परलोक के विस्तृत पथ पर प्रकाश एवं दिशिदाता ध्रुवतारों की भाँति सदैव साथ बना रहता है- जिससे मनुष्य के पथभ्रष्ट होने का भय नहीं रहता और वह सरलतापूर्वक अपने लक्ष्य तक पहुँच जाता है।
ज्ञान ही मनुष्य को अन्य जीवधारियों से भिन्न तथा उत्कृष्ट बना देता है। अन्यथा मनुष्य भी अन्य प्राणियों की भाँति एक साधारण जन्तु ही है। ज्ञान के आधार पर ही वह अपनी मानसिक तथा शारीरिक क्षमताओं एवं योग्यताओं का विकास कर उन्नति करता है और सृष्टि में परमात्मा के बाद अपना विशिष्ट स्थान बनाता है। मानवीय प्रतिभा का विकास ज्ञान द्वारा ही होता है। उसके विवेक में आध्यात्मिक प्रकाश का कारण ज्ञान ही होता है और ज्ञान के आधार पर ही मनुष्य आत्मा-परमात्मा सत्य-असत्य, प्रकृति और पुरुष को पहचान कर उसे यथायोग्य सम्बन्ध स्थापित कर पाता है।
ज्ञान की महिमा अपार है। जो ज्ञानार्जन के लिए उत्सुक होता है उस पर परमात्मा की महती कृपा ही समझनी चाहिये। ज्ञान की जिज्ञासा इस बात की सूचना है कि मनुष्य का भवबन्धन से त्राण पाने का संयोग आ लगा है। जिन्होंने भी संसार के दुःखों में त्राण पाया है और पारलौकिक संसार में अपना स्थान सुरक्षित किया है उन्होंने एकमात्र सद्ज्ञान का ही अवलम्ब लिया है। संसार के दुःखों से परित्राण पाने के लिये मनुष्य को सदैव ही ज्ञान की आवश्यकता रही है। इसलिए सभी यज्ञों में श्रेष्ठ मनुष्य को ज्ञानयज्ञ का ही यजन एवं विस्तार करते रहना चाहिए। फिर उसके लिए शिक्षा, स्वाध्याय अथवा सत्संग जिसकी भी आवश्यकता हो उसे पूरा करने में प्रमाद अथवा आलस्य नहीं करना चाहिये।
ज्ञान ही सच्चा तीर्थ-स्नान -
प्रयाग के सेट्टिराज की कन्या अर्बुद पांचाल के धनी सेठ पुत्र मणियार को व्याही गई। अर्बुद शिक्षिता थी, ज्ञानवान थी, वैसे ही उसके विचार, कार्य, योजनायें भी स्वच्छ सुन्दर और पवित्र होती थीं। ससुर के यहाँ पैर रखते ही उसने घर को एक नई रोशनी में बदल दिया।
मणियार महान् ईश्वर भक्त था, किन्तु उसका वैयक्तिक जीवन, कुविचार और बुरे आचरणों में ग्रस्त होने के कारण, दुःखी और अशान्त था।
अर्बुद ने कहा- स्वामी दुःख और अशान्ति का कारण स्वच्छ मन है, आप ज्ञान के प्रकाश से पहले अपने अन्तर-तम को मिटाइये, तभी शान्ति मिलेगी। मणियार ने कहा- नहीं! हम लोग तीर्थ-स्नान करने चलेंगे। तीर्थ-स्नान से मन पवित्र हो जाता है।
अर्बुद स्त्री थी झुकना पड़ा। तीर्थ-यात्रा पर चलने से पूर्व उसने एक पोटली में कुछ आलू बाँध लिये। जहाँ-जहाँ मणियार ने स्नान किया उसने इस आलुओं का भी स्नान कराया। घर लौटते-लौटते आलू सड़ गए। अर्बुद ने उस दिन भोजन की थाली में वह आलू भी रख दिये। उनकी दुर्गन्ध पाकर मणियार चिल्लाया- यह दुर्गन्ध कहाँ से आ रही है?
अर्बुद ने हँस कर कहा- यह आलू तो तीर्थ-स्नान करके आये हैं फिर भी इनमें दुर्गन्ध है क्या? मणियार समझ गया यदि मन को ज्ञान के जल से न धोया जा सका तो सचमुच तीर्थ-स्नान व्यर्थ है। वह उस दिन से ज्ञान आराधना में जुट गया।
भोजन, वस्त्र की भाँति जीवन में एक और भी वस्तु की नितान्त आवश्यकता है- और वह है मनोरंजन। मनोरंजन के अभाव में जीवन नीरस और शुष्क बन जाता है। जीवन में नई स्फूर्ति, नया उत्साह और नई शक्ति लाने के लिए कुछ न कुछ मनोरंजन की नित्य आवश्यकता है।
मनुष्य का मन सारी शक्तियों का केन्द्र है। उसके कुण्ठित और क्लाँत रहने से मनुष्य की शक्ति भी शिथिल हो जाती है। मनोरंजन से मन की कुण्ठा और क्लाँति दूर होती है। नई शक्ति का द्वारा खुल जाता है। दिन भर का काम करने के बाद यदि साँयकाल थोड़ा-सा मनोरंजन हो जाया करे तो दूसरे दिन के लिये मन फिर ताजा और शक्तियाँ नई हो जायें और काम में पूरी रुचि बनी रहे। अधिकतर लोग जीविका कमाने के लिये एक जैसा कार्य ही नित्य करते रहते हैं। इस एक रास्ता के कारण मन बड़ा मलीन और जब-तब निषेधी हो जाया करते हैं। दो-चार दिन काम करने के बाद वह असहयोग करके और कंघा डालने लगता है। कार्य की गति कम हो जाती है, दक्षता जाने लगती है। यही तो कारण है कि हर विभाग और कारोबार में सप्ताह में एक दिन की छुट्टी अनिवार्य की गई है। इस अवकाश का यही आशय है कि छः दिन निरन्तर काम करने के बाद एक दिन सब लोग अवकाश मनायें और मनोरंजन करें जिससे सप्ताह भर के लिए उनकी शक्ति फिर हरी और स्वस्थ हो जाये। जीवन में ताजगी, रुचि और प्रखरता के लिए मनोरंजन की नितान्त आवश्यकता है।
मनोरंजन से प्रसन्नता प्राप्त होती है। प्रसन्नता को दैवी वरदान की तरह फलदायक बतलाया गया है। उससे स्वास्थ्य बढ़ता और आरोग्य प्राप्त होता है। विवेक की वृद्धि होती है और दीर्घजीवन का लाभ होता है। प्रसिद्ध विद्वान् तथा दार्शनिक नायर ने प्रसन्नता का महत्व बतलाते हुए कहा है- ‘‘जब भी सम्भव हो सदा हँसो और प्रसन्न रहो, प्रसन्नता एक सर्वसुलभ, सुन्दर और सफल औषधि है जो जीवन के अनेक रोग दूर कर देती है।” डा. स्टर्क की भी ऐसी ही उक्ति है। वे कहते हैं- “मुझे विश्वास है कि हर बार जब कोई व्यक्ति हँसता, मुस्काता है तो वह उसके साथ-साथ अपने जीवन में वृद्धि करता रहता है।” इसी प्रकार विश्व प्रसिद्ध चिकित्सा शास्त्री डा. सेम्पसन ने अपना अनुभव बतलाते हुए एक स्थान पर लिखा है-
“एक रोगी मेरे पास लाया गया। उसकी स्थिति चिन्ताजनक रूप से गम्भीर थी, उसके बचने की उम्मीद छोड़ी जा चुकी थी। लेकिन मैं निराश न था। मेरे पास यह जानने का एक सफल प्रयोग था कि यह रोगी बच सकता है अथवा नहीं। निदान मैंने उससे विनोदपूर्ण ढंग से हाल पूछना प्रारम्भ किया। मेरे विनोद से उसके मुख पर प्रसन्नतापूर्ण मुस्कुराहट की रेखायें उभर आईं। बस मुझे विश्वास हो गया कि मृत्यु अभी इसका कुछ बिगाड़ नहीं सकती। मैंने उसके साथ आये चिंतित सम्बन्धियों को गारन्टी के साथ बतला दिया कि चिंता करने की कोई बात नहीं है। आपका रोगी अवश्य बच जायेगा, क्योंकि उसमें अभी हँसने, मुस्काने की क्षमता शेष है और निश्चय ही कुछ समय की चिकित्सा के बाद वह पूरी तरह स्वस्थ हो गया।”
प्रसन्नता में अनंत जीवनी शक्ति का निवास रहता है। सदा प्रसन्न रहने वाला व्यक्ति कभी असफल नहीं होता। संसार के किसी भी महापुरुष का जीवन देख लिया जाये, उनके अन्य गुणों से साथ प्रसन्नता का गुण प्रधान रूप से जुड़ा हुआ मिलेगा। हर स्थिति एवं परिस्थिति में एक रस, प्रसन्न रहना महापुरुषों की सफलता का सबसे बड़ा रहस्य है। प्रसन्नता मनुष्य की कार्य क्षमता को कई गुना बढ़ा देती है। प्रसन्न मन व्यक्ति एक घंटे में जितना काम कर लेता है, खिन्न मन और व्यग्र मस्तिष्क वाला व्यक्ति उतना काम एक दिन में भी नहीं कर पाता। इसके अतिरिक्त प्रसन्नता की स्थिति में जो कार्यकुशलता आती है, वह क्लान्त मनःस्थिति में नहीं। जो कार्य प्रसन्नतापूर्ण उत्साह के साथ प्रारम्भ किया जाता है वह अवश्य पूर्ण और सफल होता है। कार्यारम्भ की प्रसन्नता उसकी सफलता की पूर्व सूचना है। जो काम रोते, झींकते और खिन्न मन से प्रारम्भ किया जाता है, उसका पूर्ण तथा सफल होना संदिग्ध ही रहता है। ऐसी स्थिति में किए हुए काम बहुधा असफल ही रहते है। प्रसन्नता का स्थान जीवन में अमृत के समान है।
अब विचार यह करना है कि जीवन की इस अनिवार्य आवश्यकता की पूर्ति हम कहाँ तक करते हैं। भोजन वस्त्र तथा घर-बार के प्रबन्ध में तो दिन-रात लगे रहते हैं किन्तु इस मानसिक आवश्यकता की पूर्ति के लिए कितना और क्या प्रबन्ध करते हैं? अस्सी प्रतिशत व्यक्तियों के पास इसका उत्तर नकारात्मक होगा। ऐसा क्यों है? इसलिये कि हम सब जीवन में मनोरंजन तथा प्रसन्नता का महत्व नहीं समझते। बल्कि यह धारणा बनाये बैठे हैं कि हँसना खेलना और मनोरंजन, मनोविनोद करना बड़े आदमियों के चोचले हैं।
सोच कर खेद होता है कि यह धारणा कितनी गलत और हानिकारक है। हम स्वयं ही अपने आप अपनी प्रसन्नता का निसर्ग सिद्ध अधिकार अस्वीकृत कर देते हैं। मनोरंजन, मनोविनोद तथा हँसी-खुशी पर न तो अमीरों का एकाधिकार है और न यह धन अथवा साधनों पर ही निर्भर है। पशु-पक्षी जो खुले मैदानों और विस्तृत आकाश में कूदते, उड़ते और गाते फिरते हैं, तरह-तरह की क्रीड़ा और कौतुक करते हैं, अमीर और तालेवर नहीं होते। न इनके मिल चलते हैं और न बड़ी-बड़ी फर्में। न तो इनके तिजोरियाँ होती हैं और न बैंकों में बड़े-बड़े खाते। इतना ही नहीं उनके पास मनोरंजन तथा मनोविनोद के वैसे साधन भी नहीं होते जैसे कि मनुष्य को प्राप्त हैं। तब भी वे मनोविनोद करते हैं और प्रसन्न रहते हैं। क्या मनुष्य इन सबसे भी गया-गुजरा है जो इस प्रकार की निराश तथा मत भावना तथा धारणा बनाए बैठा है।
हमें स्वयं प्रसन्न रहना और पूरे परिवार को प्रसन्नता का अवसर देते रहना चाहिये। प्रसन्नता योंही बहुत-सी चिंताओं तथा व्यग्रताओं को कमकर देती हैं। यदि आज से ही हम और हमारा परिवार नियमित रूप से प्रसन्न रहने लगे तो कल से ही उसमें क्रान्तिकारी परिवर्तन होता दिखलाई देने लगे। जो स्त्रियाँ कुण्ठित और विपण्ण बनी रहती हैं, उनके चेहरे खिल उठें, उनके मन सरस और मधुर हो जायें। उनकी पारस्परिक कलह जिसका कारण खिन्नता होती है, दूर होने लगे और उनके कर्कश स्वभाव में सरसता का समावेश हो जाय। वे बच्चे जो दिन-रात रें-रें करते रहते हैं, माँ को जोंक की तरह चिपटे या रोते हुए हर समय उसका पल्लू पकड़े पीछे लगे रहते हैं। हँसते, खेलते और आत्मोल्लसित होते दीखने लगें, उनके हाथ-पाँव खुल जायें और मन खिल उठे। घर में हर ओर सुन्दरता तथा स्वास्थ्य का वातावरण दिखलाई दे। परिवार को प्रसन्न देखकर ऐसा कौन होगा, जो खुद भी प्रसन्न न हो उठे और जिसकी मानसिक कटुता अथवा कुण्ठा कम न हो जाये। प्रसन्न रहना और पूरे परिवार को प्रसन्न रखना प्रत्येक गृहस्थ का आवश्यक कर्तव्य है, जिसे पूरा करना ही चाहिये।
प्रसन्न रहने के लिए किन्हीं विशेष साधनों की आवश्यकता नहीं होती और न अधिक पैसे की। परिवार के लिये थोड़ा-सा मनोरंजन जुटा देना ही काफी होगा। इस मनोरंजन के साधन के रूप में यदि कोई बजा सके तो कोई छोटा-सा वाद्य लाया जा सकता है। यह वीणा, सितार, ढोल, ढफ कुछ भी हो सकता है। साँयकाल सब कामों से निबटकर सारे सदस्य एक स्थान पर बैठें और बजाने वाला वाद्य बजायें और सारे लोग भजन कीर्तन के साथ उसकी संगत करें। एक घंटे ऐसा कर लेने से पर्याप्त मनोरंजन हो जायेगा और सारा परिवार ताजा तथा स्फूर्तिवान बन जायेगा। काम की थकान और मानसिक तनाव दूर हो जायेगा। गहरी नींद आयेगी दूसरे दिन काम में खूब जी लगेगा।
यदि कोई बजाने वाला न हो तो भी कोई हर्ज नहीं बिना वाद्य के भी भजन कीर्तन अथवा सुन्दर कविता का पाठ चल सकता है। बच्चे याद की हुई कोई कविता अथवा प्रार्थना सम्मिलित रूप से भी गा सकते हैं और अलग-अलग भी। भजन कीर्तन के अतिरिक्त पठन-पाठन का भी कार्यक्रम चलाया जा सकता है। किसी धर्म पुस्तक, गीता, रामायण, महाभारत अथवा भागवत्, प्रेम-सागर आदि ग्रन्थों को पढ़ा, सुना जा सकता है। कहानी अथवा पहेली बुझोबल भी चल सकता है और उससे भी मनोरंजन हो सकता है।
रोना-गाना थोड़ा बहुत सभी को आता है। किन्तु इसमें इतना ध्यान अवश्य रखना है कि गाना अश्लील, अवाँछित अथवा अनर्गल न हों। वे भाव, भक्ति अथवा सद्-विचारों से ही भरे हों। गन्दे गानों द्वारा मनोरंजन करने से मानसिक, शारीरिक स्वास्थ्य पर ही नहीं, आचरण पर भी बुरा प्रभाव पड़ेगा। इसका विचार न रखने से हित में अहित होगा और मनोरंजन का उद्देश्य पूरा न हो सकेगा।
छुट्टी के दिन अथवा अवकाश के समय बाहर किसी वन-वाटिका में जाकर प्राकृतिक संसर्ग में मनोरंजन कर सकते हैं। भोजन साथ लेते जायें अथवा वहीं बनायें तो और भी अच्छा रहे। गरमी के दिनों में नदी तालाब में स्नान और जाड़ों के दिनों में धूप स्नान के लिए बाहर निकल जाना भी कम मनोरंजक नहीं है। बरसात के दिनों में किसी दिन हरे-भरे मैदान में घूमना और बरसते पानी में नहाना, खेलना और मौज मनाना भी अच्छा मनोरंजन है। इस प्रकार के न जाने छोटे-छोटे कितने कार्यक्रम हो सकते हैं, जिनके द्वारा पूरा परिवार मनोरंजन का आनन्द प्राप्त कर सकता है।
जो लोग मनोरंजन के लिए नाच, स्वाँग, नौटंकी अथवा सिनेमा देखने जाते हैं, वे ठीक नहीं करते। यह मनोरंजन स्वस्थ नहीं होते, इससे मानव वृत्तियों पर बुरा प्रभाव पड़ता है। पैसा भी ज्यादा खर्च होता है। इसके स्थान पर यदि यह पैसा बचाकर किसी-किसी दिन घर में उत्सव मनाया जा सकता है। इसके लिए जन्म-दिवस, विवाह दिवस अथवा कोई मंगल दिवस नियुक्त किया जा सकता है। वैसे भी भारतीय संस्कृति में नित्य ही कोई न कोई पर्व त्यौहार लगा ही रहता है। मनोरंजन के लिये शराब, भंग, ठंडाई अथवा और कोई नशीला कार्यक्रम बनाना तो बहुत ही घातक है। ऐसा मनोरंजन करने वाले अपने परिवार के लिए विनाश की भूमिका तैयार करते हैं। खाली दिनों में यार-दोस्तों के साथ गंदी गप्प मारना भी अनुचित मनोरंजन है। अवकाश के समय में किसी पुस्तकालय अथवा वाचनालय में जाकर समाचार तथा पत्र-पत्रिकाओं का आनन्द उठाया जा सकता है। मोहल्ले-बस्ती के पढ़े-लिखे लोग पुराण की कथा वार्ता का कार्यक्रम चला सकते हैं, उनमें अनपढ़ लोग भी शामिल होकर मनोरंजन तथा ज्ञान पा सकते हैं। ऐसी ही गोष्ठियाँ समाचार-पत्र पढ़ने और सुनाने के लिए बनाई जा सकती हैं, जिनमें समाचार-पत्रों का पढ़ना और समाचारों की विवेचना की जा सकती है। इससे लोगों का मनोरंजन तो होगा ही साथ ही विश्व चेतना की भी वृद्धि होगी। तात्पर्य यह है कि दैनिक जीवन की सामान्य गति से तथा वातावरण से अलग होकर कुछ ऐसा कार्यक्रम चलाया जाना चाहिये जिससे मन को प्रसन्नता मिले और उतनी देर के लिए चिन्ताओं से मुक्त रहा जा सके।
मनोरंजन दो प्रकार का होता है। एक शारीरिक और दूसरा मानसिक। शारीरिक श्रम करने वाले- मजदूर, किसान, दुकानदार, कारीगर, फेरी वाले आदि लोगों को मानसिक मनोरंजन करना चाहिए और बैठ कर लिखने, पढ़ने, क्लर्की करने वाले अथवा कोई और बौद्धिक श्रम करने वालों के लिए शारीरिक मनोरंजन ठीक रहेगा। ऐसे लोग कोई भी हॉकी, फुटबाल, बॉलीबॉल, क्रिकेट, बैडमिंटन का खेल खेल सकते हैं। नित्य प्रति घूमने जा सकते हैं। नदी तालाब में यदि तैर सके तो तैरा भी जा सकता है।
मनोरंजन जीवन की एक अनिवार्य आवश्यकता है। इसकी पूर्ति न करने से जीवन में नीरसता, शुष्कता तथा कुण्ठाओं की बहुतायत हो जाती है। दिन भर के काम के बाद यदि थोड़ा-सा मनोरंजन कर लिया जाये तो निश्चय ही चिन्तायें तथा कुंठाएं कम होती हैं और शारीरिक मानसिक स्वास्थ्य के साथ आयु में भी वृद्धि होती है। कार्यक्षमता बढ़ती है और जीवन के प्रति माँगलिक रुचि बनी रहती है। इसलिये सभी को कुछ न कुछ मनोरंजन करना ही चाहिये।
परमार्थ मानव जीवन का सच्चा स्वार्थ है। ‘परम माने बड़ा, वास्तविक अर्थ माने प्रयोजन स्वार्थ। जो वास्तविक स्वार्थ बड़ा स्वार्थ है, उसी को परमार्थ कहते हैं। धन कमाना, स्वाद चखना, अहंकार जताना, यह बहुत छोटे और क्षणिक लाभ हैं। वास्तविक चिरस्थायी लाभ वह है जिसके आधार पर आत्मा की सुख-शान्ति और मुक्ति का पथ प्रशस्त हो सके। शरीर वाहन है, आत्मा स्वामी। वाहन की सुविधा, सुरक्षा का ध्यान तो रखा जाये पर स्वामी की सर्वथा उपेक्षा न कर दी जाय। यह तथ्य जिसकी समझ में आ जाता है वह आत्म कल्याण की विचारणा और क्रिया पद्धति को प्राथमिकता देता है। शरीर और परिवार के निर्वाह की भी वह व्यवस्था करता है पर आत्मा के लक्ष्य और उद्देश्य को साधने के लिए भी यह समुचित प्रयत्न करता है। उन महान प्रयोजनों में भी उसका समय, श्रम, पुरुषार्थ और मनोयोग कम-से-कम उतना तो लगता ही है, जितना शरीर निर्वाह में। हर दूरदर्शी और विवेकशील व्यक्ति की गतिविधि यही हो सकती है। वह जानता है कि शरीर तो कुछ दिन का साथी है।
सुख-दुःख, उत्थान-पतन का प्रतिफल तो अनन्त काल तक आत्मा के सामने ही आने वाले हैं। इसलिए शरीर मोह की एक सीमा होनी चाहिए और उसकी वासनाओं की पूर्ति में इतना न उलझ जाना चाहिए कि आत्मिक स्वार्थों की पूर्ण उपेक्षा ही होने लगे। उसके लिए फुरसत न मिलने आर्थिक तंगी का बहाना करके अब तो मन बहलाया जा सकता है, पर जब शरीर वृद्ध, रुग्ण अथवा मृत हो जाता है, तब भूल समझ में आती है और सूझता है कि इस तुच्छ वाहन के मनोरंजन में बहुमूल्य मानव जीवन चला गया और जो करना चाहिए था, उसको सर्वथा भुला दिया गया। वह घड़ी घोर पश्चात्ताप की होती है। तब अपनी भूल का पता चलता है किन्तु समय बीत चुका होता है और हाथ मल-मल कर पछताने के अतिरिक्त और कुछ शेष नहीं रहता।
अच्छा हो कि समय से पूर्व चेतें, अपने स्वरूप को समझें, आत्मा के हित साधन की बात सोचें और परमार्थ पथ के पथिक बनें। केवल राम नाम लेने से आत्मिक उद्देश्य पूरे हो सकते हैं, इस भ्रान्त धारणा को मन में से हटा देना चाहिए, इतना सस्ता आत्म-कल्याण का मार्ग नहीं हो सकता। पूजा उचित और आवश्यक है पर उसकी सफलता एवं सार्थकता तभी सम्भव है जब जीवन क्रम भी उत्कृष्ट स्तर का हो। अन्यथा तोता रटंत किसी का कुछ हित साधन नहीं कर सकती। नाम जप कर लेने मात्र से परमार्थ प्रयोजन सिद्धि हो जायगी यह सोचते रहना, सस्ते नुस्खों में मन बहलाते रहना उचित नहीं। हमें यथार्थवादी होना पड़ेगा। जीवन साधना के प्रधान अंग परमार्थ को अपनाना पड़ेगा। परमार्थ का, परम स्वार्थ का स्वरूप- आत्म-निर्माण है। जिससे लोक-मंगल के लिए सेवा धर्म अपनाना अपनी परोपकार परायण सेवा प्रवृत्ति का परिचय देना नितान्त आवश्यक है। जिसकी आत्मा में विश्व मानव की सेवा करने, इस संसार को अधिक सुन्दर सुव्यवस्थित एवं सुखी बनाने की भावनायें उठती रहती हैं और इस मार्ग चलने की प्रबल प्रेरणा करती है- वस्तुतः सच्चा परमार्थी और ईश्वर भक्त वही है। उसी का नाम-जप सार्थक कहा जा सकता है।
परमार्थ का जितना तत्व, जितना अंश हमारे जीवन क्रम में सम्मिलित होगा उतनी ही आन्तरिक शान्ति मिलेगी और उतना ही आत्म-कल्याण का पथ प्रशस्त होगा। परमार्थ साधना के बिना सेवा, धर्म का व्रत पालन किये बिना मनुष्य जन्म की सार्थकता एवं सफलता नहीं मानी जा सकती। इसलिए हर अध्यात्मवादी को अपने शारीरिक एवं साँसारिक स्वार्थों को सीमित रख कर आत्मिक स्वार्थों की पूर्ति के लिए अधिकाधिक ध्यान देते चलने का क्रम बढ़ाना पड़ता है। यदि हम में कटु वास्तविकता और कठोर सचाई स्वीकार करने का साहस हो तो यही मानना पड़ेगा कि आत्म-कल्याण के लिए उदारता एवं लोक-सेवा में परायण होने की रीति-नीति अपनाई जाय। इसी में आत्म-कल्याण, लोक-कल्याण एवं ईश्वर की सच्ची प्रसन्नता का रहस्य सन्निहित है।
युग परिवर्तन की इस पुनीत बेला में परमार्थ के कुछ महत्वपूर्ण उत्तरदायित्व अनायास ही हमारे सामने आ उपस्थित हुए हैं। प्रबुद्ध आत्माओं को विश्व के नव-निर्माण का उत्तरदायित्व वहन करना होगा। यह प्रयोजन अपनी उदारता, सेवा, साधना और परमार्थ प्रवृत्ति के अभिवर्धन से ही पूर्ण हो सकता है। जो संकीर्ण स्वार्थों तक सीमाबद्ध रह कर लोक मंगल के लिए कुछ भी योगदान नहीं कर सकते, उन्हें जागृत आत्मा नहीं कहा जा सकता। सोचते रहने, पढ़ते रहने, सुनते रहने से कुछ भला नहीं हो सकता। प्रयोजन तो काम करने से सिद्ध होता है। नव-निर्माण का उत्तरदायित्व आज युग पुरुष ने जागृत, प्रकाशवान एवं प्रबुद्ध आत्माओं के कंधे डाला है, उचित यही है कि हम उसे आगे बढ़कर हँसी-खुशी स्वीकार करें और निर्धारित दिशा में भावना एवं तत्परता के साथ अग्रसर हों।
नव-निर्माण का एक ही माध्यम है जन-मानस की दिशा मोड़ना। हजार वर्ष की गुलामी ने हमारे विचार संस्थान को जर्जर कर दिया है। हमारी आस्थाएं, मान्यताएं, आकांक्षाएं, विचारणाएं सब कुछ उल्टी हो गई हैं और विकृत स्थिति तक जा पहुँचा है, जिस सड़ी-गली और अवाँछनीय ही कहा जा सकता है। अपने पूर्व आदर्शों से हम सर्वथा भटक गये हैं। भारतीय महापुरुष, हमारे पूर्वज, जिन परम्पराओं, मर्यादाओं और क्रिया पद्धति को हमारे लिए एक थाती एवं विरासत के रूप में छोड़ गए थे, उनका हमने एक प्रकार से पूर्णतया परित्याग कर दिया है और ऐसी निकृष्ट रीति-नीति को अपना लिया है, जिसे सर्वथा अभारतीय, अधार्मिक, अवाँछनीय और अनुपयुक्त ही कहा जा सकता है। वस्तुतः विकृतियों और दुष्प्रवृत्तियों से जन-मानस को छुटकारा दिलाना- प्राचीन भारतीय, धार्मिक एवं आध्यात्मिक आदर्शों के अनुरूप जन-मानस का पुनः निर्माण करना यही तो युग-निर्माण योजना है। आज का सर्वोपरि परमार्थ यही है। आज की आवश्यकता यही है। आज का सामयिक धर्म कर्तव्य यही है। आत्म-कल्याण का उद्देश्य पूरा करने के लिए इसी पुण्य प्रयोजन में हमें सम्मिलित होना होगा। विश्व की सुख-शान्ति और मानवीय महानता की प्रतिष्ठापना उसी मार्ग पर चलने से होगी। जन मानस का संशोधन परिमार्जन किये बिना- विकृत आस्थाओं और विचारणाओं को बदले बिना और किसी प्रकार इस युग की कठिनाइयों, आपत्तियों, उलझनों, समस्याओं और विभीषिकाओं का समाधान नहीं किया जा सकता। आज की परिस्थितियाँ इसी समग्र धर्म को पालन करने और उसी का सरंजाम इकट्ठा करने की प्रेरणा हमें देती है।
मनुष्य बाँस की पोली बाँसुरी की तरह है- उसमें जैसी फूँक फूँकी जाती है, वैसे स्वर निकलते हैं। मनुष्य दर्पण की तरह है उसका जीवन आन्तरिक मान्यताओं का स्वरूप ही उस दर्पण में दिख पड़ता है। विचारधारा जैसी फूँक फूँकती है, मनुष्य वैसा सोचता, बोलता और करता है। इसलिए समाज को बदलना हो तो व्यक्तियों को बदलना पड़ेगा। व्यक्तियों को बदलना हो तो उनकी आस्थाएं और विचारणाएं उलटनी पड़ेंगी। उल्टे को उल्टा कर देने से सीधा हो जाता है। आज उलझी हुई लोकमानस को उलट दिया जाय तो व्यापक नरक को सुव्यवस्थित स्वर्ग एवं सतयुग में बदला जा सकता है। असुर को मनुष्य और मनुष्य को देवता बनाने का जादू विचार परिवर्तन गर्भ में छिपा हुआ है। विचार बदल जाने को ही कायाकल्प कहते हैं। शरीरों का कल्प कठिन है, पर अन्तःकरण का कल्प पूर्णतया सम्भव है। अगणित दुष्ट दुरात्मा सद्विचारों का पारस छूकर अपनी लोहे जैसी कलुषित कालिमा से मुक्त हुए हैं, और बहुमूल्य स्वर्ण की तरह सम्मानित हुए हैं। इस संसार में एक ही चमत्कार है- विचारों का परिवर्तन। डाक्टर नर को नारी और नारी को नर बनाने में असमर्थ है पर आध्यात्म की प्रेरणा विचार परिवर्तन का प्रकाश देकर पशु को मनुष्य और मनुष्य को देवता बनाने में पूर्णतया समर्थ है। समय आ गया जब कि इस जादू का व्यापक परिमाण में प्रयोग किया जाना चाहिए।
मनुष्य का अंतःकरण बदल डालने से उसका बाह्य जीवन बदलेगा। व्यक्तियों के बदलने से समाज-संसार का बदलना सुनिश्चित है। समाज और कुछ नहीं व्यक्तियों का समूह मात्र ही तो है। व्यक्ति बदले या समाज बदले। समाज का, समूह का, बदलना ही युग परिवर्तन है। अतएव हम इस तथ्य को बार-बार भली प्रकार समझ लेना चाहिए कि आज ही विपन्न परिस्थितियों को बदलने की सच्ची इच्छा हो तो सच्चा मार्ग भी अपनाना पड़ेगा। धन, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि का बढ़ना ही उचित है। पर उतने मात्र से कुछ काम नहीं चलेगा। अन्तरंग में दुष्टता भरी पड़ी हो तो यह समृद्धि एवं सभ्यता सर्प को दूध पिलाने की तरह व्यक्ति और समाज के लिए और अधिक संकट उत्पन्न करेगी। साधन सम्पन्न दुरात्मा के लिए एक भयानक विपत्ति एवं दुर्धर्ष अभिशाप ही सिद्ध हो सकती है। इससे तो वे कम भयंकर हैं जो दुष्ट है पर समर्थ एवं साधन सम्पन्न नहीं। सुख सुविधा के साधनों को बढ़ाना चाहिए पर साथ ही आन्तरिक महानता एवं सज्जनता भी बढ़नी चाहिए। अन्यथा बढ़ी हुई भौतिक शक्ति एवं सम्पन्नता प्राचीन काल के रावण, कंस, भस्मासुर, सहस्रबाहु, हिरण्यकश्यप, वृत्रासुर आदि का उदाहरण ही प्रस्तुत करेगी। संसार में सम्पन्नता एवं सुविधा बढ़ाने से भी पूर्व मानवीय अन्तःकरण के स्तर को ऊँचा उठाने की आवश्यकता है। इस महती आवश्यकता की आज उपेक्षा की जा रही है, फलतः भौतिक उन्नति की योजनायें किन्हीं समस्याओं को सुलझाने में समर्थ नहीं हो रही है। बढ़ती हुई समृद्धि उसकी आन्तरिक दुष्टता को आग में घी डालने की तरह बढ़ा रही हैं।
अशिक्षितों की अपेक्षा शिक्षित, निर्बलों की अपेक्षा बलवान्, निर्धनों की अपेक्षा धनी आदि संसार पर अधिक विपत्ति बरसा रहे हैं। कारण स्पष्ट है पहले जब वे असमर्थ थे तब उनकी दुष्टता भी सीमित दुष्परिणाम उत्पन्न कर पाती थी, अब जितने ही साधन बढ़े उतनी ही अधिक विभीषिकाएं वे उपस्थित करते चले जा रहे हैं। दोष साधन सामग्री का नहीं दुष्टता के निराकरण पर ध्यान देने का है। सम्पत्ति बढ़े तो साथ ही सज्जनता भी बढ़े। उस संतुलन का ध्यान रखकर ही सच्ची प्रगति सम्भव है। आज हमारा नेतृत्व यही भूल कर रहा है। सम्पदा बढ़ाने की बात सोचें यह तो उचित है पर सज्जनता बढ़ाने के अनुकरणीय आदर्शों के अभिवर्धन करने की दिशा में कुछ न करें यह अक्षम्य है। ऐसी उपेक्षा से उस तथा कथित समृद्धि अभिवर्धन का कोई शुभ परिणाम निकलने वाला नहीं है।
इस घुटन भरे वातावरण का- अन्याय अविवेक एवं असन्तोष भरे लोक-मानस का परिवर्तन, पुनर्निर्माण आज की वह महती आवश्यकता है जिसकी देर तक उपेक्षा करना अवाँछनीय परिणाम उत्पन्न करेगा। राजनैतिक स्वतन्त्रता प्राप्त करने के बाद इन 20 वर्षों में हमारे देश का भावनात्मक पतन ही हुआ है। लोग स्वार्थों की लड़ाई लड़ने में लग गये हैं। अराजकता की स्थिति बढ़ती चली जा रही है। इसका एक मात्र कारण जन-मानस में उत्कृष्टता एवं आदर्शवादिता के बीज बोने, उगाने और बढ़ाने के सच्चे निर्माण की दिशा में बढ़ती गई उपेक्षा ही है।
वैयक्तिक एवं सामूहिक स्तर पर हमें आज की इस महती आवश्यकता पर सबसे अधिक ध्यान देना चाहिए। वह उपाय सोचने चाहिए जिनसे जन-मानस में आदर्शवादिता की प्रतिष्ठापना हो सके। वह प्रयत्न करने चाहिए जिससे लोग वर्तमान में सड़ी-गली मान्यताओं से घोर घृणा करने लगें और उनको परित्याग करने में संकोच, झिझक और भीरुता त्याग कर आदर्शवादी आस्थाओं को अपनाने में साहस का परिचय दे सकें। यह विचार शुद्धि- विचार क्रान्ति ही विश्व के- व्यक्ति के नवनिर्माण का प्रयोजन पूरा करेगी। हमारी युग निर्माण योजना यही सन्देश- यही प्रकाश- लेकर सर्व साधारण के सन्मुख उपस्थित होती है। वह हर प्रबुद्ध व्यक्ति को प्रोत्साहित करती है कि लम्बी-चौड़ी वैयक्तिक सुख-सुविधाओं की उन्नति और समृद्धि की बात सोचना कुछ दिन के लिए स्थगित करे और अपना ध्यान विचार क्राँति की सामयिक आवश्यकता को पूरा करने में लगादें। स्वार्थ को सीमित कर परमार्थ की महती आवश्यकता को पूर्ण करने की ओर यदि हम आवश्यक ध्यान देने लगें तो अपने जीवन का परम लक्ष्य प्राप्त कर सकते हैं और संसार के नये निर्माण में ऐतिहासिक योगदान कर सकते हैं।
सन् 2000 के लगभग जो विषम समय आ रहा है। उसके सम्बन्ध में भारतीय धर्म ग्रन्थों में पूर्व चेतावनियाँ विद्यमान हैं। अध्यात्म-तत्व वेत्ताओं ने इस संदर्भ में मनुष्य जाति को कितनी ही आगाही की है। ईसाई और मुसलिम धर्मों में भी इसी तरह की सम्भावनाएं व्यक्त की गई हैं। मुसलमान तो चौदहवीं सदी में (वर्तमान शताब्दी) में कयामत (प्रलय) की सम्भावना मानते हैं। ईसाई धर्म ग्रन्थों में भी ऐसे ही उल्लेख हैं। बाइबिल की एक भविष्यवाणी इस तरह है-
“दूसरे फरिश्ते ने अपना ‘ट्रम्पेट’ बिगुल बजाया और उससे बड़ा भारी जलता हुआ पहाड़ समुद्र में गिरा। जिसके कारण समुद्र का एक तिहाई हिस्सा खून-ही-खून से भर गया। समुद्र के एक तिहाई प्राणी मर गये और एक तिहाई जहाज डूब गये।” -रिवेलेशन, अध्याय 8,
इस संदर्भ में तृतीय महायुद्ध और उसमें प्रयुक्त होने वाले अणुबमों और उद्जन बमों की चर्चा बहुत दिन से हो रही है। तृतीय युद्ध की सम्भावना का अनुमान वर्तमान अन्तर्राष्ट्रीय तनाव और उसकी बढ़ती हुई पेचीदगियों को देख कर, हर कोई अनुमान लगा सकता है। ऐसे घातक अस्त्रों द्वारा लड़े जाने वाले युद्ध का क्या परिणाम होगा, इसकी कल्पना जापान पर हुए महायुद्ध में गिरे दो अणुबमों के दुष्परिणाम को देखकर सहज ही की जा सकती है। उस स्थिति में पूर्ण प्रलय नहीं तो खण्ड प्रलय की स्थिति तो आ ही सकती है।
इस आशंका में एक नया अध्याय और जुड़ा है। अन्तरिक्ष विद्या के जो वैज्ञानिक आकाश में भ्रमण करते ग्रह नक्षत्रों एवं उल्काओं का, उनकी गति विधियों का अन्वेषण करते रहते हैं, उन्होंने एक ऐसे विशालकाय उल्कापिण्ड नवजात नक्षत्र ‘इकारस’ का पता लगाया है जो आकाश गंगा से टूट कर किसी अनिश्चित दिशा में, अनिश्चित मार्ग से बढ़ता हुआ चला जा रहा है। निर्धारित और निश्चित कक्षा अपनी वह अभी बना नहीं सका है, इसलिए वह किधर जा भटके और किस ग्रह नक्षत्र से जा टकराए कुछ कहा नहीं जा सकता। सर्वेक्षण से पता चला है कि यह नक्षत्र पृथ्वी की ओर लपकता चला आ रहा है। जून में वह पृथ्वी के अति निकट होकर गुजरेगा। तब इस बात की भी आशंका रहेगी कि वह पृथ्वी के किसी भाग से आ टकराये और यहाँ खण्ड या पूर्ण प्रलय की स्थिति उत्पन्न कर दे।
इस सम्बन्ध में 10 दिसम्बर 67 के ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’ (दिल्ली) अंक में पृष्ठ 20, 21 पर ‘मनु सावधान’ शीर्षक से एक लेख छपा है। उसके कुछ अंश नीचे उद्घृत किये जाते हैं। जिससे पाठकों की उस उल्का पिण्ड के बारे में अधिक जानकारी मिल सके।
“डा. स्टुअर्ट टामस बटलर ने अपने एक प्रकाशित लेख में यह कहा था कि एक नव तारक के पृथ्वी ग्रह के अधिक निकट आ जाने से प्रलय की आशंका है। उन्होंने अन्तरिक्ष विषयक विस्तृत अध्ययन और खोज के आधार पर यह बताया है कि पृथ्वी को सबसे अधिक खतरा नवजात एक छोटे नक्षत्र ‘इकारस’ से है। पृथ्वी से उसकी दूरी लगभग 42 लाख मील है। लेकिन सन् 48 और 57 के मध्य उसकी कक्षा 4 लाख मील खिसक आई है। सन् 1968 में जून के किसी दिन वह नक्षत्र पृथ्वी के बिल्कुल निकट से गुजरेगा। किसी भी क्षण वह नक्षत्र अपनी धुरी से जरा भी पृथ्वी की ओर झुक गया तो एक हजार उद्जन बमों के बराबर विस्फोट से समस्त पृथ्वी विनाश के गर्त में समा जायेगी।”
“इकारस में जिस विस्फोट की आशंका है उसका अन्तरिक्ष पर दबाव पड़ने से, और विस्फोटों से भयंकर भूकम्प आयेंगे। जिससे मीलों क्षेत्र में बड़ी दरारें पड़ जायेंगी। तथा विशाल चट्टानें वायुमंडल में उड़ कर, अत्यन्त प्रलयकारी दृश्य उपस्थित करेंगी। ‘इकारस’ के पृथ्वी से टकराने के फलस्वरूप सारी पृथ्वी ध्रुव क्षेत्र में परिणत होकर बर्फ की मोटी पर्त से ढक जाने की आशंका है। यदि यह पृथ्वी के अनबसे क्षेत्र से टकरा गया तो भी उसका भयंकर परिणाम अवश्यम्भावी है। यदि कहीं यह न्यूयार्क या शिकागो जैसे घने बसे क्षेत्र से जा टकराया तो करोड़ों व्यक्ति तुरन्त समाप्त हो जायेंगे। उससे भी गम्भीर परिणाम ‘इकारस’ के जल में गिरने से होंगे। प्रचण्ड ऊर्जा से बड़े क्षेत्र में समुद्र उबलने लगेगा, समुद्र के तल और भीतरी चट्टानों, खोलों में ज्वालामुखीय विस्फोट सारी पृथ्वी को हिला देंगे। उनसे उत्पन्न लावे की जहरीली गैस से पृथ्वी का एक बड़ा भाग नष्ट हो जायेगा। लावे से जल भाप में बदल जायेगा और गर्म जल की धारायें बहने लगेंगी।’’
डा. एन. वर्क की गणना के अनुसार एक बार में समुद्र का चार हजार मील लंबा समुद्री जल भाप में परिवर्तित हो जायेगा। अन्य विनाशकारी प्रभावों के अतिरिक्त भीषण बाढ़ भी आयेगी। वर्ष भर जाड़े की ऋतु बनी रहेगी, तथा समुद्र की विकराल लहरें बड़े-बड़े शहरों को बहा ले जायेंगी। यदि ‘इकारस’ एटलाँटिक महासागर में गिर पड़े तो सारे अमेरिका तथा योरोप का अधिकाँश भाग जलमग्न हो जायेगा। सबसे भयंकर स्थिति तब होगी जब ‘इकारस’ ध्रुव क्षेत्र से जा टकरायेगा। उससे उत्पन्न भीषण ऊर्जा से ध्रुव क्षेत्र का हिम पिघल जायेगा। पिघले जल से समुद्र में पानी की सतह हजारों फुट ऊँची होने पर सारी पृथ्वी जल मग्न हो जायेगी।”
“वैज्ञानिकों के अनुसार केवल 25 हाइड्रोजन बमों के ध्रुव क्षेत्र में विस्फोट होने से सारी पृथ्वी पानी में डूब सकती है। ‘इकारस’ की संहारक शक्ति एक हजार हाइड्रोजन बमों के तुल्य आँकी जा रहा है। ‘इकारस’ धीरे-धीरे पृथ्वी की ओर बढ़ रहा है। कई वैज्ञानिकों का कहना है कि वह अपनी वर्तमान स्थिति से विचलित होगा और उस स्थिति की सम्भावना 1968 के जून में आँकी जा रही है। यदि स्वयं उसकी स्थिति में परिवर्तन न भी हुआ तो भी सौरमंडल के अन्य तारों की स्थिति परिवर्तन से उसके साथ टकराव होगा। वैज्ञानिक इस बात पर विचार कर रहे हैं कि कोई भी भीषण घटना घटित होने से पूर्व क्या पृथ्वी को विनाश से बचाया जा सकता है?”
मनुष्य जाति को जिन विभीषिकाओं का सामना करना पड़ सकता है, उनमें से एक विभीषिका की ओर उपरोक्त वैज्ञानिक की खोज संभावना तथा आशंका का भी इशारा करती है। अनेक अन्य कारण तो पहले से ही विद्यमान हैं। मनुष्य की कुमार्गगामिता उसे तत्काल लाभदायक दीखती है पर वह यह नहीं सोचता कि अन्ततः इन दुष्प्रवृत्तियों से अन्तरिक्ष विकृत होता है और वह दैवी प्रकोप के रूप में व्यक्ति और समष्टि के लिए कितने भयंकर संकट लेकर उपस्थित होता है। यदि इस तथ्य को समझा जा सके तो हमारी दुष्प्रवृत्तियों पर अंकुश लगे और महाकाल का विनाश-शस्त्र उठने से पूर्व ही रुक जाय।
पिछले दिनों मानवीय दुष्प्रवृत्तियों ने अन्तरिक्ष को, सूक्ष्म जगत को जितना कलुषित एवं विकृत किया है, उसका संशोधन करके इन दैवी विपत्तियों से मानव समाज को बचाया जा सकता है। यह बचाव आध्यात्मिक आधार पर ही सम्भव है। तपस्वी इसके लिए तप कर रहे हैं- करने जा रहे हैं। तप के बल से भारी से भारी विपत्ति टल सकती है। इन विभीषिकाओं एवं सम्भावनाओं को भी टाला जाना सम्भव है। जन साधारण को भी इस दिशा में कुछ करना चाहिए। हमारा दस अश्वमेध आयोजन, जिसमें प्रतिदिन 24 लक्ष गायत्री अनुष्ठान और हर वर्ष सहस्र कुण्डी के गायत्री यज्ञ दस वर्ष तक करना सम्मिलित है, लोक-मंगल की दृष्टि से एक महत्वपूर्ण सुरक्षा का प्रयत्न है। विश्व-मंगल में अभिरुचि रखने वाले धर्म प्रेमी इन आयोजनों को सफल बनायें यह उचित है और आवश्यक भी।
यह अंक पाठकों के हाथ में पहुँचेगा, तब तक 3 फरवरी को सद्ज्ञान की देव गंगा- वीणापाणि- भगवती सरस्वती का जन्मोत्सव बसन्त-पंचमी (3 फरवरी) को सम्पन्न हो चुका होगा। अखण्ड ज्योति के हर सदस्य ने उसे किसी-न-किसी रूप में मनाया होगा, क्योंकि हम सबके लिए यह एक विशिष्ट पारिवारिक शुभ दिन है। इसी दिन ‘अखण्ड-ज्योति’ प्रकाशित हुई, इसी दिन ‘युग-निर्माण-योजना’ आरम्भ हुई, इसी दिन ‘गायत्री तपोभूमि’ की नीव रखी गई, इसी दिन ‘यज्ञ आन्दोलन’ प्रारंभ किया गया एवं हमारा आध्यात्मिक जन्म-दिन भी है। अपनी ‘उपासना’ भी इसी दिन से आरम्भ की, लोक-मंगल के कार्यक्रमों में भी इसी दिन हमने हाथ डाला और अब जीवन की अन्तिम तप साधना भी इसी दिन से आरम्भ होगी। इसलिए व्यक्तिगत रूप से हमारे लिए और सामूहिक रूप से समस्त परिवार के लिए यह एक प्रेरणापूर्ण प्रकाश पर्व है। इसे उत्साहपूर्वक मनाये जाने में हमारी आन्तरिक अभिव्यञ्जना की अभिव्यक्ति ही होती है। इस सम्बन्ध में जहाँ जितना उत्साह देखने को मिले वहाँ उतनी ही निष्ठा आँकी जा सकती है। इस संदर्भ में बरती जाने वाली उपेक्षा को हमारे प्रति- हमारे मिशन के प्रति उपेक्षा कहा जाय तो उसे अनुचित नहीं कहा जायेगा।
बसन्त पेड़-पौधों को पुष्प पल्लवों से लाद देता है। कोयलें, कूकतीं, तितलियाँ फुदकतीं, भ्रमर गूँजते हैं, मधु-मक्खियाँ अति उत्साहपूर्वक मधु संचय के पुरुषार्थ में लगती हैं और देखते-देखते अपना छत्ता शहद से भर लेती हैं। हर नर तनधारी के मन में उत्साह जगता है, पशु प्रवृत्ति में यह उत्साह कामुकता की ओर मुड़ जाता है। देव प्रवृत्ति में यही उत्साह उत्कृष्टता के सम्पादन में लगता है। हर हालत में आन्तरिक हलचल अवश्य उत्पन्न होती हैं। इस उत्साह को 40 दिन तक मनाये जाने वाले देशव्यापी बसंतोत्सवों के रूप में देखा जा सकता है। अब तो मनुष्य बड़ा आलसी, स्वार्थी और संकीर्ण होता जाता है। अन्यथा कुछ दिन पूर्व तक देहातों में गीत वाद्य, नृत्य आदि की इन दिनों धूम मची रहती थी और इस धूम-धाम की पूर्णाहुति अति उत्साह के पर्व होली के दिन की जाती थी। अब भी जहाँ उत्साह पूर्णतया नहीं मर गया है वहाँ कई तरह के साँस्कृतिक हर्षोत्सवों का आयोजन होता दिखाई देता है।
अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्य निश्चित रूप से चुने हुए मणि-मुक्ता हैं। 29 वर्ष के परिश्रम से हमने बहुत खोज-बीन के बाद इन आध्यात्मिक संचित पूँजी के धनी मानियों को एकत्रित किया और एक माला में पिरोया है। वे आज राख से ढके हुए अंगार की तरह निष्क्रिय भले ही दिखाई पड़ते हैं, पर वस्तुतः उनके भीतर एक चिनगारी मौजूद है, जो अवसर मिलते ही अपनी उष्णता एवं प्रकाश ज्योति का परिचय देगी। ऐसे लोगों की अन्तरात्माएं इस शुभ अवसर पर उल्लासित न हों, ऐसा संभव नहीं। अजान की आवाज सुनते ही हर दीनदार मुसलमान नमाज पढ़ने को उठ खड़ा होता है। मन्दिर में होने वाली शंख-ध्वनि सुन कर हर भावनाशील हिन्दू उपासना के लिए प्रस्तुत होता है। बिगुल बजते ही सैनिक दौड़ कर मैदान में पंक्ति बद्ध हो जाते हैं। घण्टी बजते ही सर्कस का खेल आरम्भ हो जाता है। इस वर्ष का बसन्तोत्सव कुछ ऐसी ही नवीन प्रेरणा लेकर उपस्थित हुआ है। जिसका उद्देश्य हम में से हर किसी की उदासीनता, उपेक्षा एवं अकर्मण्यता का निराकरण करके रख देना है।
कहना न होगा कि यह ऐतिहासिक अवसर है। हजारों वर्षों बाद युगान्तर का पुण्य पर्व आता है। जब आता है तब जागृत आत्माओं के कन्धों पर कुछ विशेष जिम्मेदारी डालता है। आग लगने पर फायर ब्रिगेड वाले पुकारे जाते हैं और उन्हें तत्परतापूर्वक अपना काम पूरा करना होता है। उपद्रव होने पर पुलिस को पुकारा जाता है, सीमा आक्रमण का मुकाबला करने के लिए सैनिकों को तुरन्त मोर्चा सम्भालना पड़ता है, दुर्घटना में घायलों की मरहम पट्टी करने के लिए डाक्टरी दस्ता सब काम छोड़कर उसी में जुट जाता है, बाढ़, भूकम्प, अग्निकाण्ड, महामारी आदि आकस्मिक विपत्तियों में पीड़ितों की सेवा सहायता के लिए हर सहृदय व्यक्ति को तुरन्त दौड़ना पड़ता है। आज की स्थिति ठीक ऐसी ही है।
युगान्तर, प्रसव पीड़ा की तरह इस संसार के लिए मानव-जाति के लिए विषम विभीषिकाओं जैसी अगणित समस्यायें लेकर आँधी-तूफान की तरह बढ़ता चला आ रहा है। ऐसे आपत्तिकाल में कोई जागृत आत्मा “निर्वाह में व्यस्त होने” का बहाना लेकर अपने महान आध्यात्मिक उत्तरदायित्व की उपेक्षा नहीं कर सकती। ऐसे अवसरों पर आत्मा की, परमात्मा की, भाव भरी पुकार को अनसुना कर सकना किसी पाषाण हृदय के मूढ़ मानव के लिए ही सम्भव हो सकता है।
यों बसन्त हर वर्ष आता है। अखण्ड-ज्योति परिवार भी 28 बसन्त गुजार चुका है। कभी वैसी आवश्यकता नहीं समझी गई जैसी आज है, इसलिए कभी कोई विशेष सन्देश एवं उद्बोधन भी उपस्थित नहीं किया गया। पर अब मजबूरी है। सोते बच्चों को जगाने में माँ-बाप को क्या प्रसन्नता होगी? पर जब मजबूरी की बात हो- स्कूल जाने का समय हो चला हो- तब तो जगाना ही पड़ता है। अब हमें भी परिजनों को ऐसी ही मजबूरी में झकझोरना पड़ रहा है।
यह बसन्तोत्सव पूरे उत्साह के साथ मनाया जाय, यह प्रेरणा गत अंक में दी जा चुकी है। सम्भवतः अधिकाँश ने उसे किसी-न-किसी रूप में मनाया भी होगा। पर उतने से ही काम न चलेगा। एक दिन का हवन या उत्सव तो एक छोटी हलचल मात्र है। उसे देर तक कार्य पद्धति के रूप में परिणत किया जाना चाहिये। 40 दिन का बसन्तोत्सव माना जाता है, बसन्त-पंचमी से उसका आरम्भ होता है और होली के दिन उसकी पूर्णाहुति। यह सारी अवधि पर्व काल है। चन्द्र, सूर्य ग्रहणों का आरम्भ और अन्त होने के समय का ही उल्लेख होता है पर वस्तुतः जितनी देर ग्रहण रहता है वह सारा ही समय पर्व काल है। ठीक इसी प्रकार बसन्त-पंचमी और होली की दो तिथियाँ आदि अन्त की गणना है। इन्हें यज्ञ का अग्नि स्थापना और पूर्णाहुति कर्म कह सकते हैं। आहुतियां तो बीच के समय में ही होती हैं। हमारा बसन्त पर्व पूरे 40 दिन तक चलना चाहिये।
आत्म-निर्माण और लोक-निर्माण की 5-5 प्रक्रियायें गत दिसम्बर, जनवरी के अंकों में विस्तार पूर्वक बताई जा चुकी हैं। उन्हें अपने वैयक्तिक जीवन में और समीपवर्ती क्षेत्र में कार्यान्वित करने का ठीक यही 40 दिन का समय है। यदि थोड़ा उत्साह और पुरुषार्थ दिखाया जा सके, तो इस अवधि में युग-निर्माण की दिशा मैं आशाजनक प्रगति हो सकती है। बसन्त-पंचमी के दिन यदि उत्सव न मनाया जा सका हो तो वह अंक पहुँचते ही कोई सुविधा का दिन नियत करना चाहिए और उस दिन उत्सव एक छोटे गायत्री यज्ञ, सामूहिक जप, सत्संकल्प पाठ, 29 दीप दान, संगीत प्रवचन के साथ मना लेना चाहिए।
अपनी संस्था का- प्रवृत्ति, प्रक्रिया एवं लोक-सेवा का यह 29 वाँ बसन्त है। यही हमारी असली आयु है। इसलिए 29 दीपक जला कर, 29 पुष्प चढ़ा कर अपने मिशन के प्रति श्रद्धाञ्जलि अर्पित करने का एक कार्यक्रम हर जगह बनाया जा सकता है। अच्छा हो ऐसे आयोजन सामूहिक रूप से बड़े पैमाने पर अधिक लोगों की उपस्थिति में मनाये जांय और उस अवसर पर उपस्थित लोगों को युग-निर्माण-योजना की भावना एवं क्रिया पद्धति से परिचित कराने के लिए कुछ विशेष तैयारी की जाय। पर यदि इतना न बन पड़े तो भी एक छोटा पारिवारिक उत्सव तो हर कोई कठिनाई के कर सकता है। अपने ही बच्चे, पड़ौसी और कुटुम्बी एकत्रित कर ऐसा घरेलू उत्सव मनाने में किसी की कोई खास कठिनाई नहीं होनी चाहिए।
हवन के खर्च से गरीब को भी नहीं डरना चाहिए। स्त्री, पुरुष या कोई भी व्यक्ति 24 आहुतियाँ देकर बहुत सस्ते में यज्ञीय परम्परा को प्रतिष्ठित कर सकते हैं। एक सामग्री होमे दूसरा घी। शेष उपस्थित लोग मंत्रोच्चारण तथा क्रियाकलापों में भागीदारी रहें। आहुति केवल पूर्णाहुति की ही डालें। इस प्रकार पूरा यज्ञ कार्य भी हो सकता है और खर्च एक रुपये के आस-पास में चल सकता है। जहाँ आर्थिक कठिनाई हो वहाँ इस तरह काम चलाया जा सकता है। तब इस आयोजन में केवल उत्साह और प्रयत्न के होने न होने मात्र की समस्या रह जाती है, जिसे सुलझा ही लेना चाहिए। इन 40 दिनों की की अवधि में बसन्तोत्सव मनाये जाने का छोटा बड़ा प्रबन्ध हर परिजन को करना चाहिए। उपेक्षा किसी की भी नहीं करनी चाहिए।
उत्सव एक शुभारम्भ है। हमारा आध्यात्मिक उत्साह इस 40 दिन की अवधि में पूरी प्रौढ़ता के साथ बना रहना चाहिए। नव-निर्माण के रचनात्मक कार्यों में इन दिनों हमारी कुछ महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ होनी चाहिए। आत्म-निर्माण और लोक-निर्माण के लिए वैयक्तिक एवं सामूहिक स्तर पर उत्साहपूर्वक प्रयत्न किए जाने चाहिए। पहला काम आत्म-निर्माण का है। (1) उपासना, (2) जीवन शोधन, (3) परमार्थ, यह तीन स्तम्भ अध्यात्म के हैं। इन्हीं को भक्ति योग, कर्मयोग और ज्ञानयोग कहते हैं। इन्हीं से कारण, सूक्ष्म और स्थूल कर्तव्यों का परिष्कार होता है। इस तथ्य को पिछले दो अंकों में विस्तारपूर्वक समझाया जा चुका है। अधिकांश परिजन इस दिशा में पहले से ही प्रयत्नशील हैं। उन्हें अब अपनी तत्परता एवं निष्ठा और अधिक बढ़ा देनी चाहिए। जिन्होंने कोई खास आरम्भ नहीं किया है उन्हें अब ठीक इन्हीं दिनों आरम्भ कर देना चाहिए।
(1) उपासना (भक्ति योग):-
(1) नियमित उपासना हमारे जीवन का एक अनिवार्य अंग रहे। कभी किया कभी नहीं, यह ढील-पोल अब बन्द करनी चाहिए। अन्य उपासनाएं जो भी करनी हो करते रहें पर एक माला, 108 मन्त्र-गायत्री के हर किसी को नित्य जपने चाहिए। जिन्हें शारीरिक निर्बलता या अन्य असुविधा हो वे प्रातः उठते ही हाथ-मुँह धोकर पालथी मार कर बैठें और 6 मिनट में वह गायत्री मन्त्र मौन मानसिक जप करके उपरोक्त संख्या पूरी करलें। इतना तो हर कोई कर सकता है। बाल, वृद्ध, रोगी आसक्त, व्यस्त, नर-नारी किसी के लिए भी यह कठिन नहीं है। इसके बाद एक पाठ युग-निर्माण सत्संकल्प का अवश्य होना चाहिए। हम को एक बार इस आधार पर अपने मिशन की रूप-रेखा मस्तिष्क में घुमा लेना आवश्यक है। इसलिए जप के साथ यह पाठ भी आवश्यक रूप से जुड़ा रहना चाहिए। यह न्यूनतम एवं अनिवार्य है। अधिक जितना जिससे बन पड़े स्नान, पूजन आदि के साथ पूरे विधिविधान के साथ प्रसन्नतापूर्वक करते रहना चाहिए। अपने घर में एक पूजा स्थली स्थापित करनी चाहिए, जहाँ महिलायें साँयकाल दीपक, आरती और दोनों के समय चौके में बने हुए भोजन का भोग लगाने की प्रक्रिया जारी रख सकें।
छोटे बच्चों को भी इतना तो सिखा ही देना चाहिए कि वे माता-पिता, बड़ों की तरह इस पूजा वेदी के समीप जाकर प्रणाम किया करें। युग-निर्माण संकल्प का सामूहिक पाठ हमारे घरों का एक आवश्यक धर्म कृत्य बन जाना चाहिए। अपने यहाँ यह क्रम चल रहा हो तो अपने प्रभाव परिचय के अन्य लोगों के यहाँ इस आस्तिकता एवं उपासना की प्रक्रिया को फैलाया जाय।
(2) जिनकी उपासना देर से चल रही है। उन्हें अब ध्यान साधना की ओर कदम बढ़ाने चाहिए। ‘उपासना में भावना का समावेश’ पर पूरा ध्यान दिया जाना चाहिए। परमेश्वर को अपना जीवन सहचर साथी, सभी मान कर उससे अनन्त प्रेम करना उसकी सत्ता में अपनी सत्ता-उसकी इच्छा में अपनी इच्छा समर्पित करना, प्रेम का सच्चा स्वरूप है। परमात्मा से केवल प्रकाश और साहस माँगा जाय, उसे अपनी प्रेम की सच्चाई प्रकट करने का प्रमाण सेवा और पवित्रता की प्रवृत्ति बढ़ा कर दिया जाय। साँसारिक पदार्थ न माँगे जाय न उसके लिए रोया गिड़गिड़ाया जाय। सच्ची भक्ति का यही स्वरूप है। वह केवल आत्म-कल्याण और ईश्वरीय प्रेम प्राप्ति के लिए की जाती है। लौकिक कामनाओं को जब तक भक्ति के साथ जोड़ रखा जायेगा तब तक उसमें वास्तविकता नहीं आ सकती, इसलिए जिनका उपासना क्रम देर से चल रहा है। अब उन्हें स्तर की उत्कृष्टता बढ़ानी चाहिए और उपासना में प्रेम भावना का समन्वय कर अपने सारे जीवन-क्रम को प्रेम, सेवा, मधुरता, पवित्रता, त्याग और परमार्थ की भावना से ओत-प्रोत करना चाहिए ताकि उन्हें इसी जीवन में स्वर्ग और मुक्ति का प्रत्यक्ष रसास्वादन उपलब्ध होना तत्काल आरम्भ हो जाय।
जीवन शोधन (कर्मयोग):-
आत्म निरीक्षण, आत्म-सुधार, निर्माण और विकास ही कर्मयोग का सच्चा स्वरूप है। अपनी समीक्षा करने में पक्षपात करने से ही हमारे भीतर असंख्य दोष दुर्गुण बढ़े हैं और अनौचित्य से संघर्ष करने का शौर्य, साहस खो बैठने से वे जमकर बैठ गए हैं- हटने का नाम नहीं लेते। हमें अपनी शारीरिक और मानसिक त्रुटियों को बारीकी से ढूँढ़ना पड़ेगा और उन्हें हटाने के लिए अनवरत संघर्ष करते रहने को जीवन साधना का अविच्छिन्न अंग बनाना पड़ेगा। उत्कृष्ट आदर्श और दिव्य जीवन के निर्माण का यही एक मात्र राजमार्ग है। हर महामानव ने यही जीवन साधना की है और इसी मार्ग पर चलते हुए जीवनोद्देश्य प्राप्त करने में सफलता पाई है। हमें भी यही मार्ग अपनाना होगा। अन्यथा आध्यात्मिक प्रगति- महानता की उपलब्धि एक दिन स्वप्न बनी रहेगी। जिस पवित्रता के आधार पर ईश्वर को प्रसन्न और आकर्षित किया जा सकता है, वह एकमात्र जीवन साधना की चिरकालीन तपश्चर्या से ही प्राप्त होता है। पूजा पाठ की औपचारिक पद्धतियाँ उस दिशा में सहायक तो हैं पर लक्ष्य तक ही पहुँचा सकतीं। अपूर्णता से पूर्णता की ओर तुच्छता से महानता की ओर प्रगति का एक माध्यम जीवन-साधना ही है। उसी के आधार पर आत्मा को परमात्मा, नर को नारायण, पुरुष को पुरुषोत्तम बनाने का अवसर मिलता है।
(1) कर्मयोग से परिपूर्ण जीवन के लिए- प्रातः, सायं ‘हर दिन नया जन्म हर रात नई मौत’ का चिन्तन करते हुए अपने को अधिकाधिक पवित्र उत्कृष्ट एवं आदर्श बनाने का प्रयत्न जारी रखना चाहिए। दिन भर की शारीरिक और मानसिक दिनचर्या पर सतर्कतापूर्वक नियन्त्रण रखना और रात को वैराग्य की भावना के साथ निश्चित होकर निद्रा माता की गोद में सो जाना। यह क्रम यदि एक वर्ष तक नियमपूर्वक जारी रखा जा सके तो इस प्रकार से आध्यात्मिक कायाकल्प हो सकता है। लोगों को पूजा पाठ का मनोवाँछित लाभ न मिलने की शिकायत करते सुना जाता है, पर जीवन साधना का सत्परिणाम न मिले ऐसा कदापि सम्भव नहीं। जो चाहे परीक्षा करके देख ले। एक वर्ष के लिए यह परीक्षा हममें से प्रत्येक को आरम्भ कर देनी चाहिए और यदि लाभ हो तो आगे भी जारी रखना चाहिए।
(2) स्वाध्याय आत्मा का भोजन है। अपना पेट काट कर भी, आवश्यक कार्यों में कमी करके भी जीवन साहित्य को पढ़ने के लिए समय निकालना चाहिए। मानसिक शुद्धि के लिए, आत्मा की क्षुधा बुझाने के लिए ऐसा स्वाध्याय नितान्त आवश्यक है। एक घण्टा समय और दस पैसा रोज इस ज्ञान यज्ञ के लिए जिनने अभी खर्च करने का क्रम नहीं बनाया है, उन्हें अब बना लेना चाहिए। इसमें न तो कंजूसी करनी चाहिए और न उपेक्षा बरतनी चाहिए। पेड़ के सहारे बेल ऊँची चढ़ती है। स्वाध्याय और सत्संग के सहारे आत्मिक स्तर उठता है। उपयुक्त स्वाध्याय और सत्संग घर बैठे उपलब्ध करने की जो प्रक्रिया युग-निर्माण के अंतर्गत चल रही है, उस लाभ से किसी को भी वंचित नहीं रहना चाहिए। जेवर, जायदाद और नोट नहीं, परिवार की सच्ची सम्पत्ति जीवन निर्माण का प्रेरणाप्रद साहित्य है। अपने घर में एक ज्ञान मन्दिर- घरेलू नव निर्माण पुस्तकालय- रखना चाहिए, जिससे स्वयं को, अपने परिवार को, पड़ौसी और मित्रों को प्रेरणाप्रद प्रकाश मिलता रहे। यह ज्ञान यज्ञ हर घर में चलते रहना चाहिए। अखण्ड-ज्योति और युग-निर्माण पत्रिकाएं तथा सस्ते ट्रैक्टों में कुछ पैसा खर्च करके इसी 40 दिन की अवधि में हमें अपना ज्ञान मन्दिर आरम्भ कर लेना चाहिए और दस पैसा प्रतिदिन इस ज्ञान-यज्ञ के लिए निकाल कर आगे भी इस भण्डार को बढ़ाने का क्रम जारी रखना चाहिए।
(3) परमार्थ (ज्ञान-योग):-
स्वार्थ, लौकिक समुदाय इकट्ठा करने की प्रवृत्ति और परमार्थ आत्मिक पारलौकिक विभूतियाँ एकत्रित करने की आकाँक्षा को कहते हैं। अज्ञान का अर्थ है स्वार्थ में लिपटे रहना और ज्ञान का तात्पर्य है परमार्थ के लिए पुरुषार्थ करना। गायत्री मंत्र में इसी सद्ज्ञान की ऋतम्भरा प्रज्ञा की आराधना है, जिससे हमारा अन्तःकरण स्वार्थ से विरत होकर परमार्थ पथ पर अग्रसर हो। ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ असतो मा सद्गमय, मृत्योर्माऽमृतंगमय’, की पुकार में इसी आन्तरिक उपलब्धि के लिए आत्मा ने परमात्मा से पुकार की है। सो हमें आत्म-कल्याण और लोक-मंगल दोनों ही प्रयोजन सिद्ध करने वाले इस महान अवलम्बन ही को दृढ़तापूर्वक पकड़ना चाहिए। परमार्थ के लिए अपने, समय, श्रम, धन, उत्साह एवं पुरुषार्थ की उचित मात्रा में नियोजित करना चाहिये।
कहना न होगा कि इस युग की- संसार की- मानव जाति की समस्त विपत्तियों का एकमात्र कारण दुष्प्रवृत्तियों का बढ़ना है। अनुपयुक्त विचारणायें, मान्यतायें, आस्थायें अपना कर ही मनुष्य दुर्दशा के गर्त में गिरा है। आज या आज से हजार वर्ष बाद जब कभी भी विश्व-कल्याण का दिन आना होगा, उसका आधार विचार शुद्धि, विचार क्रान्ति होगा। इसलिए छुट पुट पुण्य धर्मों से मिलने वाले क्षणिक परिणामों से सन्तुष्ट न होकर हमें दूरदर्शी बुद्धिमानों की तरह मानव जाति की व्यथा हरने के लिए सद्ज्ञान का प्रकाश जन-जन के अन्तःकरण में पहुँचाने- प्रतिष्ठापित करने का प्रयत्न करना चाहिए। इस ज्ञान दान से बढ़कर इस युग का और कोई परमार्थ हो नहीं सकता।
(1) हमें झोला पुस्तकालय चलाने चाहिये। यही इस युग की सच्ची देव पूजा है। भगवती सरस्वती की, माता गायत्री की, वास्तविक आराधना इसी रूप में हो सकती है। प्रतिमाओं के मन्दिर नहीं- ज्ञान के मन्दिर स्थापित करना इस युग की माँग है। बड़े पुस्तकालय तो मिलजुल कर संगठित रूप से बन सकते हैं, उनके लिए धन भी चाहिये। पर झोला पुस्तकालय को निर्धन से निर्धन और व्यस्त से व्यस्त व्यक्ति भी चला सकता है। अपने परिचितों और मित्रों में सद्ज्ञान साहित्य पहुँचाने और वापिस लेने का छोटा-सा, झंझट, मन से संकोच त्याग देने पर बड़े मजे में चलता रह सकता है। यह परमार्थ देखने में छोटा भले ही लगता है, पर है असाधारण अति महान्। इसके फलस्वरूप सैंकड़ों, हजारों आत्माओं के जीवन क्रम में आशाजनक प्रकाश उत्पन्न हो सकता है और वे बदल कर कुछ-से-कुछ बन सकते हैं। इस परिवर्तन का सारा पुण्य उस झोला पुस्तकालय चलाने वाले को नहीं तो और किसे मिलेगा?
(2) हर क्षेत्रों से एक ऐसा प्रचारक नियुक्त करने का प्रयत्न करते रहें जो नव-निर्माण साहित्य को पढ़ाने और बेचने में अपना सारा समय लगाये और इस साहित्य से थोड़ी आजीविका भी प्राप्त करता रहे।
(3) संगठन की शक्ति को भुलाया नहीं जा सकता। इस युग में संगठन ही एकमात्र सच्ची शक्ति है जिसके आधार पर व्यक्ति और समाज को कुमार्ग पर चलने से विरत कर सन्मार्ग पर चलने के लिए विवश किया जा सकता है। इस शक्ति का उद्भव हमें अखण्ड-ज्योति परिवार के परिजनों में उन्हें युग-निर्माण शाखाओं के अंतर्गत संगठित करके आरम्भ करना चाहिये। जहाँ जितने परिजन हैं वे इन 40 दिनों के भीतर हो। अपना संगठन बनालें और एक-मात्र कार्यवाहक पदाधिकारी नियुक्त करलें। उसका कार्यालय स्थान भी नियुक्त हो जाना चाहिये।
शाखा को सबसे पहले दो काम हाथ में लेने चाहिये। (1) सदस्यों के जन्मोत्सव मनाने की योजना बनाना। (2) शाखा कार्यालय में नव-निर्माण पुस्तकालय स्थापित करना है। जन्मोत्सव मनाकर प्रत्येक परिजन को उसका जीवनोद्देश्य, जीवन का स्वरूप और जीवन का लक्ष्य समझाया और उत्कृष्टता के मार्ग पर अग्रसर किया जा सकता है। नव-निर्माण पुस्तकालय, शाखा सदस्यों तथा आत्म-विचारशील लोगों की मनोवृत्तियों में, सत्प्रवृत्तियों एवं सद्विचारणाओं का बीजारोपण करेगा। व्यक्ति और समाज का निर्माण करने के लिए यह दोनों ही कार्य नितान्त आवश्यक हैं। इसके बाद शतसूत्री रचनात्मक कार्यक्रमों में से जहाँ जिन्हें कार्यान्वित किया जा सके उसे करना चाहिये। पर्व और संस्कार मनाने का क्रम भी संगठित शाखायें आसानी से चला सकती है।
(4) अन्तरिक्ष की शुद्धि के लिए दस अश्वमेधों का जो संकल्प अखण्ड-ज्योति परिवार ने किया है उसमें भागीदार होने तथा दूसरों को भागीदार बनाने के लिये दौड़धूप करनी चाहिये। हर दिन 24 लक्ष गायत्री मंत्र जप कर अनुष्ठान पूरा करने के लिये ऐसे 24 हजार भागीदारों की आवश्यकता है जो एक माला (108) गायत्री मंत्र जप एवं सत्संकल्प पाठ नित्य करते रहें। स्वयं को तथा अपने परिवार में हर सदस्य को इसमें भागीदार बनाना चाहिये तथा संपर्क के जिन लोगों को इसके लिये तैयार किया जा सके करना चाहिए। 10 व्यक्ति अपने प्रभाव क्षेत्र में बनाकर 10 हजार गायत्री-मंत्र जप हर रोज कराने का प्रयत्न हर शाखा संगठन को करना ही चाहिये। बड़ी शाखायें 25 हजार जप भी हर दिन कराने की प्रतिज्ञा में सफल हो सकती हैं।
(5) इस जप का हवन भी होता है। सो गायत्री जयन्ती, गुरु पूर्णिमा, विजय-दशमी, बसन्त पंचमी, होली इन पाँच पर्वों पर एक एक कुण्ड से पाँच सामूहिक हवन हर वर्ष हर शाखाओं को करते रहना चाहिये। और उन अवसरों पर युग-निर्माण विचारधारा पर बोलने के लिए सम्मिलित वक्ताओं को प्रवचन करने के लिए पहले से ही तैयार करना चाहिये। बड़ी शाखायें 5 कुण्डों का क्षेत्रीय यज्ञ कर सकती हैं, जिनमें समीपवर्ती शाखाओं के प्रतिनिधियों को एकत्रित किया जाय। हवन, नामकरण, विद्यारम्भ, मुण्डन, यज्ञोपवीत आदि संस्कार कराये जांय। ऐसे आयोजनों में मथुरा से हमारे प्रतिनिधि भी यज्ञ प्रवचन, संस्कार एवं मार्गदर्शन के लिए भेजे जा सकते हैं। जहाँ सम्भव हो ऐसे पंचकुण्डी सामूहिक यज्ञों की व्यवस्था की जाय, उनके साथ युग-निर्माण सम्मेलन अनिवार्य रूप से जुड़े रहने चाहिये। आहुति-यज्ञ की ही तरह ज्ञान-यज्ञ को भी समान महत्व का मानना चाहिए और दोनों की समान तत्परता के साथ व्यवस्था करनी चाहिये।
परमार्थ प्रयोजनों में हमारी प्रशिक्षण कामना का पूर्ण करना, और इस सेवा से अधिक लोगों को लाभ देने की व्यवस्था करना भी एक बहुत बड़ा काम है।
(6) अपने परिवार, गाँव या क्षेत्र से कम-से-कम एक 15 वर्ष से 40 वर्ष तक आयु का व्यक्ति एक वर्ष के जीवन कला प्रशिक्षण में भेजना चाहिये, जो आत्म-सुधार और आर्थिक स्वावलम्बन की शिक्षा प्राप्त कर अपना कल्याण करने के अतिरिक्त उस क्षेत्र में भी उस सत् प्रवृत्तियों को फैला सकने में समर्थ हो सके।
(7) शिल्प-शिक्षा में इस वर्ष कितने ही नये उपयोगी विषय बढ़ाये गये हैं। उनके आकर्षण से स्वावलम्बन प्रिय छात्र प्रसन्नता से इस शिक्षण में आ सकते हैं। नियमावली मंगा लेनी चाहिये और उसे अधिकाधिक किशोरों को पढ़ाकर इस शिक्षा के लिए प्रोत्साहित करना चाहिये।
ढलती आयु के गृह कार्यों से निवृत्त व्यक्तियों को जेष्ठ सुदी 15 से अश्विन सुदी 15 तक 4 महीने चातुर्मास साधना तथा शिक्षा के लिए मथुरा भेजना चाहिये। जो जन-नेतृत्व, जन-जागरण की योग्यता प्राप्त करने के साथ-साथ एक महत्वपूर्ण उपासना क्रम भी इस तीर्थ स्थान पर रहकर पूरा करलें।
(8) आगामी जेष्ठ में 9-9 दिन के दो शिविर होंगे। प्रथम शिविर जेष्ठ सुदी 2 (29 मई) से लेकर गायत्री जयंती जेष्ठ सुदी 10 (6 जून) तक है। एकादशी एक दिन की छुट्टी पुराने लोगों को जाने और नयों को आने के लिए रहेगी। दूसरा शिविर जेष्ठ सुदी 12 (8 जून) से लेकर अषाढ़ वदी 5 तक (16 जून) रहेगा। इन्हें परामर्श शिविर कहना चाहिए। वैयक्तिक समस्याओं के समाधान एवं हल इन दिनों प्रस्तुत किये जायेंगे, जिनके आधार पर जीवन की अगणित कठिनाइयों और समस्याओं को सुलझाया जा सके। हर आगंतुकों की व्यक्तिगत समस्याओं को सुलझाया जा सके। हर आगंतुकों की व्यक्तिगत समस्याओं के संबंध में उन्हें विशेष परामर्श दिये जायेंगे। व्रज के समस्त तीर्थों की सामूहिक यात्रा का कार्यक्रम भी उसी में सम्मिलित है।
प्रयत्न यह करना चाहिये कि स्वयं इन शिविरों में आयें और दूसरे विचारशीलों को भी लायें। 9 दिन में एक गायत्री अनुष्ठान भी यहाँ रह कर करें। तीर्थ यात्रा तथा समस्याओं के समाधान का महत्वपूर्ण परामर्श भी प्राप्त करें। जिन्हें जिस शिविर में आने की सुविधा हो वे पहले से ही स्वीकृति प्राप्त कर लें। ताकि स्थान की कमी के कारण देर से आया हुआ प्रार्थना-पत्र अस्वीकृत होने की कठिनाई न आने पावे। एक वर्षीय छात्रों को तो अभी से अपना स्थान सुरक्षित कराना चाहिये। क्योंकि 60 छात्र लेने हैं अधिक का स्थान विद्यालय में नहीं है। देर से आवेदन पत्र भेजने वालों को अगले वर्ष के लिये प्रतीक्षा में ठहरना पड़ेगा। चार महीने और एक वर्ष के लिए आने वाले शिक्षार्थी भी दूसरे शिविर में सम्मिलित रहेंगे।
उपरोक्त त्रिविध शिक्षा से अधिक लोग लाभ उठा सकें और हमें भी इन थोड़े दिनों में कुछ महत्वपूर्ण शिक्षा सेवा करने का अवसर मिल जाय इसके लिए सब परिजनों को यह प्रयत्न करना चाहिये कि उनके क्षेत्र में अधिकाधिक व्यक्ति इन प्रशिक्षणों के लिए मथुरा पहुँचें।
परमार्थ की दृष्टि से ज्ञान-योग सबसे उत्तम है। ज्ञान-यज्ञ से बढ़ कर कोई यज्ञ नहीं। ज्ञान दान से बढ़ कर कोई दान नहीं। यही महान अभियान अपनी संस्था द्वारा चलाया जा रहा है। इन गतिविधियों में अपनी गतिविधियाँ जोड़ कर हमें आत्म-कल्याण और लोक-मंगल का सम्मिलित परमार्थ प्रयोजन सिद्ध करना चाहिये। ज्ञान-योग की साधना में उपरोक्त कार्यक्रम आज की स्थिति में सर्वोच्च है।
सद्ज्ञान की देवी- ऋतंभरा प्रज्ञा की प्रेरक- वीणापाणि सरस्वती का जन्मदिन बसन्त-पंचमी इसी प्रेरणा को लेकर आता है। इस प्रकाश को अपना कर ही हम भगवती की सच्ची आराधना कर सकते हैं और अपने मिशन के प्रति सच्ची श्रद्धाञ्जलि अर्पित कर सकते हैं।
बसन्तोत्सव- अपनी पुण्य प्रक्रिया का जन्मोत्सव गत 3 फरवरी बसन्त-पंचमी से आरम्भ हुआ है। इस धर्मोत्सव को पूरे 40 दिन चलना चाहिये। इस अवधि में उपासनात्मक, जीवन शोधन परक तथा पारमार्थिक पुण्य प्रयोजनों के लिए- भक्ति-योग, कर्म-योग और ज्ञान-योग की साधना के लिए- सच्ची श्रद्धा और तत्परता के साथ हम पूरा-पूरा प्रयत्न करें। इसकी पूर्णाहुति होली के दिन प्रेम मिलन- गायत्री यज्ञ तथा युग-निर्माण कार्यक्रमों के साथ सम्पन्न की जाय। 40 दिन में यों सवालक्ष गायत्री अनुष्ठान होता है। यह 40 दिन यदि आत्म-कल्याण और लोक-मंगल की प्रस्तुत प्रक्रिया को सफल बनाने में लगाये जा सकें तो समझना चाहिये, एक अतिशय उच्च कोटि का धर्मानुष्ठान सम्पन्न हो गया। इसे सम्पन्न करने का हम अपने प्रत्येक परिजन से- अन्तःकरण की पूरी गहराई के साथ आग्रहपूर्वक अनुरोध करते हैं और आशा करते हैं जो किया जायेगा उसका विवरण भी हमें यथासमय प्राप्त होगा।
एक अति आवश्यक कर्तव्य
युग-निर्माण आन्दोलन की गतिविधियों को जन्म देने, बढ़ाने, फैलाने, परिपुष्ट करने और सफल बनाने में अपनी दोनों पत्रिकाएं प्रधान माध्यम हैं। अतएव इनके अधिकाधिक पाठक बढ़ाने का प्रयत्न किया जाना चाहिये। प्रबुद्ध परिजन टोली बना कर निकलें। पुराने ग्राहकों से चन्दा वसूल करें और नये बनाने के लिए नमूना लेकर विचारशील लोगों से मिलें। यह अभियान 40 दिन चलाना चाहिये। अपना परिवार और अभियान बढ़ाने से ही नव-निर्माण का पुण्य प्रयोजन सफल होगा।
हमारा कोई सहयोग समर्थन नहीं
गोरे गाँव (बम्बई) निवासी श्री ‘अवधूत’ नामक सज्जन इन दिनों यह विचार कर धन एकत्रित कर रहे हैं कि उन्हें ‘आचार्य जी ने कोई गायत्री देवालय बनाने और 24 लाख रुपया इकट्ठा करने का सपना दिया है।’ यह प्रचार नितान्त असत्य है। हमने कोई सपना या सन्देश नहीं दिया।
कुछ समय पूर्व उन्होंने हमें एक योजना बताई थी और आर्थिक तथा अन्य प्रकार की सुव्यवस्था करने का आश्वासन दिया था। तदनुसार हमने सहज स्वभाव एक आशीर्वाद पत्र भी लिख दिया था। पर अब स्थिति बिल्कुल भिन्न विदित हुई तो वह आशीर्वाद रद्द कर दिया गया है।
सर्वसाधारण को सूचित किया जाता है कि उनकी योजना तथा धन संग्रह पद्धति में हमारा कोई सहयोग, नियन्त्रण, परामर्श एवं समर्थन नहीं है। जो उन्हें सहयोग दें अपने उत्तरदायित्व पर दें। -श्रीराम शर्मा आचार्य,
(बलराम सिंह परिहार)
आओ जीवन ज्योति जगायें, गई अंधेरी रात रे। नये जन्म सा, नई शक्ति ले आया नया प्रभात रे॥
कल भी था जीवन पर उसमें हुये अनेकों पाप रे, आलस, द्वेष, अविद्या, तृष्णा, लोभ, मोह, संताप रे, छापे रहे पवित्र आत्मा पर बनकर अभिशाप रे, विगत हुई अज्ञान निशा तो, जागी पुनः प्रकाश दिशा रे, उस प्रताड़ना मय जीवन से मुक्त बने यह गात रे। नये जन्म सा, नई शक्ति ले आया नया प्रभात रे॥
जो इस सारे जग को देता पावन पुण्य प्रकाश रे, जीवों को चेतनता देता, फलों को मृदुहास रे, यह धरती, अंबर तारागण ही जिसका इतिहास रे, जो स्वामी, सृष्टा सब विभु का, ध्यान करें पहले उस प्रभु का, हरियाली भर देती जिनकी करुणा की बरसात रे। नये जन्म सा, नई शक्ति ले आया नया प्रभात रे॥
व्यसन-वासना के धोखे में कल तक शक्ति गंवाई रे, पाई थाह न लौकिक सुख की अंधी दौड़ लगाई रे, ऐसी चली स्वार्थ की आंधी, प्रभु की याद न आई रे। लेकिन उसने साथ न छोड़ा, रुख विष से अमृत को मोड़ा, अब तो यह नश्वर शरीर ही बनें पुण्य जलजात रे। नये जन्म सा, नई शक्ति ले आया नया प्रभात रे॥
आज करें वह कर्म कि जिससे शुभ सजे संसार रे। आया बनें पवित्र, करें इस जग का भी उपकार रे, शिव-संकल्प करें आओ मिल धरती का उद्धार रे। विकसें सुप्त शक्तियां मन की, ऐसी रहे व्यवस्था दिन की, सौम्य, सुरुच, कोमल रसाल के जैसे नूतन पात रे। नये जन्म सा, नई शक्ति ले आया नया प्रभात रे॥
*समाप्त*