आज का संसार अन्धविश्वासों और मूढ़ मान्यताओं की जंजीरों में जकड़ा हुआ है। इन जंजीरों से जकड़े हुए लोगों की दयनीय स्थिति पर मुझे तरस आता है। एक विचार जो मुझे दिन में निकले सूरज की तरह स्पष्ट दिखाई दे रहा है, वह यह है कि- व्यक्ति तथा समाज के समस्त दुःख उनमें समाये हुए अज्ञान के कारण ही हैं। अज्ञान का अन्धकार मिटे बिना सब लोग ऐसे ही भटकते और ठोकरें खाते रहेंगे।
संसार में प्रकाश कहाँ से उत्पन्न हो? यह प्रक्रिया बलिदानों द्वारा सम्भव होती रही है। बलिदानी वीर अपना उदाहरण प्रस्तुत कर लोगों के सामने एक परम्परा उपस्थित करते हैं, फिर दूसरे उन पदचिन्हों पर चलने लगते हैं। प्रकाश उत्पन्न करने की यही परम्परा अनादि काल से चली आ रही है। इस धरती पर जो सच्चे शूरवीर अथवा उत्तम व्यक्ति उत्पन्न होते रहे हैं उन्होंने त्याग और बलिदान का मार्ग ही अपनाया है क्योंकि अपने सुख को बलिदान करने से ही दूसरे के सुख की सम्भावना उत्पन्न होती है। इस युग में शाश्वत प्रेम और अनन्त करुणा से भरे प्रबुद्ध हृदयों की जितनी अधिक आवश्यकता है, उतनी पहले कभी नहीं रही। साहसपूर्ण कदम उठाने की आज जितनी आवश्यकता है उतनी पहले कभी नहीं रही।
इसलिये ए, प्रबुद्ध आत्माओ! उठो, संसार दुःख दारिद्रय की ज्वाला में झुलस रहा है। क्या तुम्हें ऐसे समय में भी सोते रहना शोभा दे सकता है? प्रकाश आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है और वह तुम्हारे जागरण एवं बलिदान ये ही उत्पन्न होगा।
-स्वामी विवेकानन्द
‘अखण्ड-ज्योति’ इस अंक से 29 वें वर्ष में चल रही है। गत 28 वर्षों में वह अपने पाठकों की नीति, धर्म, सदाचार, संयम, प्रेम, परमार्थ जैसे मानवीय सद्गुणों की शिक्षा देती रही है। विभिन्न स्तर के विभिन्न आधार पर लिखे गये उसमें जो लेख छपते रहें हैं उनके दो ही प्रयोजन रहे हैं, कि व्यक्ति अपने अन्तरंग जीवन में अधिक सद्भावना-सम्पन्न और बाह्य जीवन में परमार्थ-परायण बने। यही मार्ग ईश्वर प्राप्ति का है, यही आत्म कल्याण है। इसी पर चलने से लौकिक सुख मिलता है और पारलौकिक शाँति। समस्त ऋद्धि सिद्धियाँ उसके करतलगत हैं जिसने तपस्यायुक्त और उत्कृष्ट जीवन पद्धति अपनाई। जिसने यह राजमार्ग छोड़कर किसी मंत्र-तंत्र या पूजा पत्री के सहारे श्रेय साधन की पगडंडी ढूंढ़ी और उत्कृष्टता की उपेक्षा की, उसे मन बहलाने का क्षणिक आधार भले ही मिल गया हो, अन्ततः खाली हाथ रहना पड़ा। यही विचार पद्धति लगातार हमने कई वर्षों तक दी है और अपने प्रिय पाठकों की सद्गुण सम्पन्न, सत्कर्म परायण बनाने की लिए प्रयास किया है। इसी प्रयोजन के लिए विभिन्न लेख लिखे हैं।
अब यही पिष्टपेषण सदा जारी नहीं रखा जा सकता है। आखिर एक ही शिक्षा की पुनरावृत्ति कब तक ही जाती रहे? देखना होगा कि इतनी लम्बी अवधि का परिश्रम पाठकों का मनोरंजन एवं ज्ञानवर्धन करने तक ही सीमित रहा या उसने अन्तःकरण में भी कुछ ही दूरी तक प्रवेश करने में सफलता पाई। उन्हीं विचारों की सार्थकता है जो अन्तःकरण में प्रवेश कर, कार्य रूप में परिणित हो सकें। अन्यथा जिस प्रकार अन्य अनेक व्यसन हैं उसी प्रकार पढ़ना भी एक व्यसन मात्र ही कहा जायेगा। पसन्दगी की बात दूसरी है, किसी को तिलस्मी उपन्यास पसन्द आते हैं किसी को धर्म-चर्चा रुचिकर लगती है। हम लोग यही पठन-पाठन के एक व्यसन को ही बढ़ाते रहे तो समझना चाहिये इतनी लम्बी अवधि तक किया गया, इतना कठोर प्रयत्न एक प्रकार से निष्फल ही चला गया।
यदि ऐसा ही हो तो इस विडम्बना की और भी अधिक जारी रखने से क्या लाभ? हमारा चन्द वर्ष कार्य काल रहा है उसे ऐसे ही प्रयत्नों में हमें खर्च करना चाहिये, जिनकी कुछ उपयोगिता हो। अतएव अब प्रशिक्षण मात्र न करते रहकर परिवार का व्यवहारिक मार्ग दर्शन करने की प्रक्रिया अपनाई जा रही है। जो अब तक पढ़ा, सुना, लिखा, कहा गया है, उसे अब कार्यान्वित किया जाना चाहिए। जो खाया गया है उसे हजम किया जाना चाहिए।
उच्च विचारों की उपयोगिता तब है जब वे कार्य रूप में परिणित हों। किसी ने उन विचारों का सम्मान किया है इसकी परख भी उन्हें कार्यान्वित किये जाने से ही होती है। अब पढ़ाई बहुत दिन हो चुकी, कितना सीखा, क्या सीखा अब उसकी परीक्षा होनी है। परीक्षा के बिना खरे-खोटे की परख कैसे हो? अब हमें यही रीति-नीति अपनानी होगी। जिन उच्च विचारों को अपनाकर हमने समुन्नत जीवन जिया है उसी प्रकार का लाभ अपने प्रियजनों को भी मिले, इसी कामना से हमारी शिक्षण व्यवस्था चल रही है। यदि उसे इस कान से सुन उस कान से निकाल दिया गया तो फिर वह लाभ कैसे मिलेगा जो उत्कृष्ट विचारधारा का सान्निध्य लाभ करने वाले को मिलना चाहिये? निदान, हमें अब सारी शक्ति इस केन्द्र बिन्दु पर एकत्रित करनी चाहिये कि जो उत्तम है, जो सही है, जो लाभकर है उसे अपनाया भी जाय। कर्म पर अब सारा जोर देना होगा। क्योंकि उसी का अवलम्बन करने से कुछ प्रयोजन सिद्ध होने की सम्भावना है।
विगत अंक में पाँच व्यक्तिगत साधन प्रस्तुत किये गये हैं और प्रत्येक परिजन से अनुरोध किया गया है कि वह उन्हें मनोरंजन के लिये लिखा गया लेख मात्र न समझें वरन् कार्य रूप में परिणित करने का प्रयत्न करें। यह पंचसूत्री साधना पद्धति अति सरल है, उसमें कोई ऐसी कठिनाई नहीं है जो किसी को भारभूत प्रतीत हो, या जिसे करने में असमर्थता प्रकट करनी पड़े। अति सरल होते हुए भी वह अति प्रभावशाली है। उसे यदि श्रद्धा, तत्परता और नियमिततापूर्वक कार्यान्वित किया जाता रहे तो थोड़े ही समय में यह दिखाई पड़ने लगेगा कि अपने भीतर कितनी अधिक उत्कृष्टता का, कितनी तेजी से अभिवर्धन हो रहा है। यह अनुभूत प्रक्रिया है। अपने व्यक्तिगत जीवन में हम देर से इन्हीं प्रयोगों को चला रहे हैं। अतएव चिर-संचित अनुभव के आधार पर यह कह सकते हैं कि इस दिशा में उठाया हुआ प्रत्येक कदम आशाजनक सफलता उपस्थित करता है।
हम तीन शरीर धारण किये हुए हैं स्थूल, सूक्ष्म और कारण। इन तीनों के परिष्कार का राजमार्ग कर्म-योग, ज्ञान-योग और भक्ति ही अनादि काल से प्रचलित है। अन्य साधनों में किन्हीं विशिष्ट व्यक्तियों को ही सफलता मिलती है पर यह त्रियोग साधन पद्धति सर्व साधारण के लिये है। हर आयु का, हर स्थिति का, हर व्यक्ति समान रूप से इसका लाभ उठा सकता है। इसलिए परिजनों को कहा गया है कि वे उसे अपनायें। हम उनकी भरपूर सहायता करेंगे और उस सफलता के समीप तक पहुँचाने की चेष्टा करेंगे, जहाँ वे अपने भीतर नवजीवन, नव प्रकाश एवं नव-उल्लास का प्रत्यक्ष अनुभव कर सकें।
(1) कर्मयोग की साधना का गुरु मन्त्र है- “हर दिन नया जन्म, हर रात नई मौत”। प्रातःकाल उठते ही कल्पना करें कि हमें आज का नया जन्म मिलेगा और उसे भावना तथा व्यवहार दोनों स्तरों का आदर्श एवं उत्कृष्ट बनाने का प्रयत्न करेंगे। दिनभर की ऐसी दिनचर्या चारपाई पर पड़े-पड़े ही तैयार करली जाय, जिसमें एक क्षण भी समय बर्बाद करने की गुंजाइश न हो, आलस्य और प्रमाद के लिए कोई अवसर न हो, और उस दिनचर्या की पूरी सावधानी एवं पूरी कड़ाई के साथ दिन भर ठीक तरह से चलते रहने ही तत्परता बरती जाय। इसी प्रकार सवेरे ही सोच लिया जाय कि आज दिन में किस अवसर पर किस प्रकार ही दुर्भावना मन में उठने की गुंजाइश है। उस अवसर पर किन उच्च विचारों से उन दुर्भावनाओं का समाधान किया जाय, इसकी मानसिक रूपरेखा भी ली जाय। इस प्रकार सारा दिन परिपूर्ण पवित्रता और कर्तव्य परायणता के साथ निर्धारित कार्य पद्धति के अनुसार व्यतीत किया जाय। रात को सोते समय अपनी हर सम्पदा, हर प्रिय वस्तु एवं हर स्वजन सम्बन्धी को, भगवान् की धरोहर मात्र समझ कर उस पर से ममता हटाते हुए वैराग्य भाव से निद्रा देवी की गोद में-भगवती माता के आंचल में अपनी चेतना को लय कर दिया जाय। इसे उस आदर्श दिन की आदर्श-मृत्यु माना जाय।
देखने सुनने में यह साधारण-सी बात है, पर इस प्रयोग को नित्य नियमित रूप से सतर्कता एवं तत्परता के साथ जारी रखा जाय तो थोड़े ही दिनों में अपनी मनोभूमि में आशाजनक परिवर्तन होता है और लगता है कि महा मानवों जैसी अन्तःचेतना अपने भीतर उत्पन्न एवं विकसित हो रही है। कलुषित एवं गया गुजरा जीवन क्रम तेजी से बदल जाता है और ऐसा अनुभव होता है मानों आन्तरिक कायाकल्प ही हो चला, यही स्थिति सच्चे अध्यात्मवादी की होती है। इस स्थिति में कितना सन्तोष, आनन्द एवं उल्लास बढ़ता चलता है, इसे कोई भी साधक प्रत्यक्ष अनुभव कर सकता है।
(2) ज्ञानयोग की साधना के अंतर्गत दो कार्यक्रम हैं, एक जन्म दिन मनाना, दूसरा स्वाध्याय-सम्वर्धन। नियत जन्म तिथि पर एक छोटा उत्सव आयोजन हर साधक करे और उस दिन अपने जीवन का स्वरूप, उद्देश्य एवं उपयोग के बारे में बारंबार गम्भीर विचार किया जाय।
जन्मोत्सव तो एक दिन का होता है, जो घण्टे में उत्सव समारोह और एक दिन में उत्साह आनन्द समाप्त हो जाता है। पर जन्म दिन की स्मृति में अपने आप से तीन प्रश्न हर दिन या जब भी अवसर मिले पूछते रहा जाय। (1) भगवान् को सभी प्राणी समान रूप से प्रिय हैं, फिर मनुष्य को ही बोलने, सोचने, लिखने एवं असंख्य सुविधायें उपलब्ध रखने का अनुदान क्यों मिला? मनुष्य को हर दृष्टि से उत्कृष्ट स्तर का प्राणी बनाने में उतना श्रम क्यों किया? (2) जो सुविधायें, विभूतियाँ, सम्पदायें हमें उपलब्ध हैं उनका लाभ यदि हम अकेले ही उठाते हैं तो क्या यह उचित है? (3) क्या इस सुर दुर्लभ मानव शरीर का यही सदुपयोग है जो हम कर रहे हैं? इन तीनों प्रश्नों का उत्तर सहज ही अन्तःकरण में इस प्रकार उठेगा। (1) अपने उद्यान, इस संसार को अधिक सुन्दर और अधिक सुव्यवस्थित बनाने के लिये परमेश्वर को साथी सहचरों की जरूरत पड़ी, फलतः अपनी क्षमताओं से सुसज्जित एक सर्वांगपूर्ण प्राणी- मनुष्य इस प्रयोजन की पूर्ति के लिये बनाया। उसे विशेष साधन सुविधायें इसलिये दीं कि उनके द्वारा ईश्वरीय प्रयोजनों की पूर्ति में वह ठीक तरह समर्थ हो सकें। (2) अन्य प्राणियों के अतिरिक्त जितनी बौद्धिक, आर्थिक, प्रतिभा साधन अथवा विशेषतायें हैं वे सब विश्व-मानव की ही पवित्र अमानत हैं। इनका उपयोग लोक मंगल के लिए ही किया जाना चाहिये। शरीर रक्षा भर के आवश्यक उपकरण मात्र लेकर शेष साधनों का उपयोग विश्व कल्याण के लिये ही किया जाना चाहिये। (3) हम सदाचारी संयमी, परिश्रमी, उदार, सज्जन, हँसमुख, सेवा-भावी बने बिना मानव-जीवन को सार्थक नहीं बना सकते। इसलिये इन सद्गुणों का अभ्यास बढ़ाने के लिए जीवन या मन की रीति-नीति में उत्कृष्टता और आदर्शवादिता का-सभ्यता और सज्जनता का- पुरुषार्थ और साहस का समुचित समावेश अवश्य करना चाहिये।
मानव-जन्म का यह दर्शन, आदर्श और उद्देश्य पूरे साल भर तक हर दिन, हर घड़ी, हमारी दृष्टि में घूमता रहे ऐसी प्रेरणा जन्म-दिन के अवसर पर ग्रहण करनी चाहिए।
(3) ज्ञानयोग का दूसरा पक्ष है स्वाध्याय संवर्धन। आज व्यक्ति और समाज को बुरी तरह अज्ञान ने-विपरीत धारणाओं ने जकड़ रखा है। इस अन्धकार का निराकरण और विवेक-सम्मत विचारणा प्रदान करने वाले प्रकाश की आज महती आवश्यकता है। इस आवश्यकता की पूर्ति किये बिना दुःखद परिस्थितियों से- शोक सन्तापों से छुटकारा न मिल सकेगा। इसलिये हमें ऐसी प्रखर विचारणा एवं प्रेरणा उपलब्ध करनी चाहिए जो मनोभूमि को झकझोर कर रखदे और उल्टे मार्ग पर चलने से रोक कर सन्मार्ग पर चलने का साहस प्रदान करे। ऐसी विचार पद्धति युग निर्माण-योजना के अंतर्गत सत्साहित्य के रूप में सृजन की जा रही है। सो हमें ‘अखण्ड ज्योति’ तथा ‘युग निर्माण पत्रिका’ और छोटे ट्रैक्ट मनोयोगपूर्वक स्वयम् पढ़ने चाहिए, अपने परिवार के हर शिक्षित को पढ़ाने और अशिक्षित को सुनाने चाहिये। तथा परिचितों से संपर्क बनाकर इसे पढ़ने के लिये प्रोत्साहित करना चाहिए।
हर घर में एक छोटा ज्ञान मंदिर- युगनिर्माण पुस्तकालय रहना चाहिये। यही किसी परिवार की वास्तविक सम्पदा है। इस श्रेय साधन के लिये हर व्यक्ति दस पैसा और एक घण्टा समय अनिवार्य रूप से निकाले। ज्ञान यज्ञ की इस साधना को, युग परिवर्तन की आधार शिला समझ कर पूरी श्रद्धा और तत्परता से सम्पन्न करता रहे। झोला पुस्तकालय, इस युग की सबसे बड़ी लोक सेवा है। ज्ञान का प्रसाद बाँटने से बढ़कर और कोई परमार्थ नहीं हो सकता। इसलिये हर कोई झिझक छोड़कर विचार-क्रान्ति के लिये, लोक-मानस निर्माण करने के लिये इस पुण्य प्रक्रिया में उत्साहपूर्ण भाग ले।
(4) भक्तियोग में दो साधना हैं- औचित्य एवं विवेक को स्वीकार एवं कार्यान्वित करने का भावनात्मक साहस और प्रेम तत्व का अन्तःकरण में अभिवर्धन।
भक्त साहसी और शूरवीर होता है, वह प्रलोभनों एवं भयों के आगे झुकता नहीं। जो उचित है, जो सत्य है, उसी का समर्थन करता है। उस पर दृढ़ बना रहता है और उसी को अपनाने में दुनियादारों की सम्पत्ति की परवाह न करते हुए जो विवेक सम्मत है उसी पर अड़ा रहता है। सत् प्रवृत्तियों को अभ्यास में लाते समय अपनी बुरी आदतों से जो संघर्ष करना पड़ता है उसे वीर योद्धा की तरह करता है। अभावग्रस्त और कष्टग्रस्त जीवन जीकर भी वह आदर्शवादिता की रक्षा करता है, इसलिये वह तपस्वी कहलाता है। भक्त को ऐसा अनिवार्य रूप से तपस्वी बनना पड़ता है और वह खुशी-खुशी ईश्वर की प्रसन्नता प्राप्त करने का यह मूल्य चुकाता भी है।
अपने अन्तःकरण और बाह्य जीवन में आये दिन ऐसे संघर्ष आते रहते हैं जिनमें विवेक को मूढ़ता और सत्य को स्वार्थपरता परास्त करना चाहती है। ऐसे अवसर जब भी आवें हम शूरवीर, साहसी और संघर्षशील अर्जुन की भूमिका प्रस्तुत करना ईश्वरीय सन्देश समझें।
(5) भक्तियोग की दूसरी साधना प्रेमतत्व का भावनात्मक क्षेत्र में अभिवर्धन है। हम चिरकाल से ईश्वर के नाम का उच्चारण और स्वरूप का दर्शन एवं ध्यान मात्र करते रहे हैं। अब हमें उसे एक अभिन्न सहचर और अनन्य प्रेमी के रूप में देखना होगा। इस एकता और आत्मीयता से अन्तःकरण में प्रेम भावना बढ़ेगी। प्रेम ही परमेश्वर है। सच्चे प्रेम की अनुभूति ही ईश्वर की वास्तविक झाँकी है। दीपक पर पतंगा जल कर जैसे द्वैत को अद्वैत में बदलता है एवं जिस प्रकार दो अबोध बालक एक दूसरे के के गले लिपट कर समीपवर्ती बनते हैं उसी प्रकार हमें ईश्वर को अपनी अनन्य श्रद्धा प्रदान करनी चाहिये और बदले में उत्कृष्ट जीवन जीने के लिए आवश्यक प्रेरणा से भरा प्रकाश पाने की अनुभूति करनी चाहिये। हम ईश्वर को श्रद्धा समन्वित आत्म समर्पण करें, वह हमें प्रकाश प्रदान कर रोम-रोम प्रकाशित करे यह ध्यान बहुत ही उच्च स्थिति का है। सखा सहचर और मित्र ही नहीं, ईश्वर को हर घड़ी का साथी और सहयोगी समझें, निर्भय रहें और पवित्र बनें। ऐसी ध्यान भूमिका किसी भी साधक के मन में असाधारण उल्लास उत्पन्न कर सकती है।
ईश्वर के माध्यम से उत्पन्न और अभिवर्धन किया हुआ यह प्रेम तत्व हमारे जीवन के हर क्षेत्र में विकसित हो। हम दयालु, सहृदय, स्नेही, उदार और उपकारी बनें। जो भी अपने संपर्क में आवे उससे भावना भरी सज्जनता का व्यवहार करें। तो हम सच्चे ईश्वर भक्त और भक्तियोग के मर्मज्ञ कहला सकते हैं।
उपासना के समय अथवा जब भी अवसर हो भगवान का ऐसा भावपूर्ण ध्यान करना चाहिये। उपासना भावना का समावेश जितना-जितना होता जायेगा उतनी ही एकाग्रता तन्मयता बढ़ती जायेगी और आत्मा में अनिवर्चनीय आनन्द का अनुभव होने लगेगा।
यह पंचसूत्री साधना क्रम गत दिसम्बर अंक में बताया जा चुका है। यह उसी का सार है। उपासना और साधना दोनों का इसमें समन्वय है। पूजा और अर्चा यह दो साधना के पक्ष हैं। एक में भगवान के सान्निध्य का क्रम किसी निर्धारित समय पर चलाया जाता है। दूसरे में जीवन शोधन और लोकमंगल के लिये तपश्चर्या का परिचय दिया जाता है। जब तक यह उभयपक्षीय पूजा अर्चा एकत्रित नहीं होती तब तक बिजली के दोनों तार मिले बिना प्रकाश न होने की तरह अंतःकरण में अंधेरा ही बना रहता है। इसलिये अखण्ड-ज्योति परिवार के परिजनों को यह समन्वित साधना प्रक्रिया बताई गई है।
आत्म कल्याण के लिए बहुत लेख पढ़े जा चुके और बहुत प्रवचन सुने जा सके। यदि कुछ वास्तविक लाभ प्राप्त करना है तो इस राजमार्ग पर चलने का साहस करना चाहिये, जिस पर चलते हुए हम जीवन का अधिकाँश भाग लगा चुके। इसी प्रयास ने हमें सन्तोषजनक और उल्लास पूर्ण उपलब्धियाँ प्रदान की हैं।
जिस समय में हम लोग जी रहे हैं वह भारी उथल-पुथल का है। शताब्दियों और सहस्राब्दियों से मानव-जाति जिस अनीति का आश्रय लिये हुए है उसके प्रायश्चित का ठीक समय यही है। मानव-जाति एक श्रृंखला में बंधी हुई है। उसकी प्रगति का आधार पारस्परिक सहयोग है। इस सहयोग को नैतिक उत्तरदायित्व उठाने में भी स्थिर रखना चाहिये। यदि कुछ लोग अनीति, अनाचार एवं दुर्बुद्धि का आचरण करते हैं तो शेष लोगों का परम पवित्र कर्तव्य है कि उसे रोकें। कोई व्यक्ति अपने घर में आग लगावे तो उसे रोकना पड़ेगा अन्यथा सारे गाँव, मुहल्ले के जल जाने की आशंका है। इसी प्रकार समाज के किसी भाग में अनाचार उत्पन्न हो तो उसे रोकने की जिम्मेदारी सभी लोगों पर है। ठीक है यह कार्य शासन द्वारा पुलिस और न्यायालयों के माध्यम से भी किया जाता है पर वह प्रयोग बहुत ही अधूरा है। उसमें केवल कानून निर्धारित कुछ थोड़े से भयावह समझे जाने वाले अपराध ही पकड़े जा सकते हैं। उसमें भी 90 प्रतिशत दण्ड पाने से बचे रहते हैं। छुटपुट वैयक्तिक अनाचारों के विरुद्ध कोई कानून नहीं, उन्हें तो तभी रोका जा सकता है जब अन्य लोग अपने नैतिक बल, दबाव, भर्त्सना, निन्दा, प्रतिरोध, असहयोग आदि द्वारा उसे रोकें। यदि अन्य लोग उपेक्षा करें “हमें अपने काम से काम- हमें दूसरों से क्या मतलब” की नीति लेकर अनाचार के प्रति जो समाज उपेक्षा बरतता है वह वस्तुतः अपना कर्तव्य पालन न करने का, उपेक्षा बरतकर अपराधों को बढ़ने में सहायता करने का अपराधी होता है और उसे समयानुसार ईश्वरीय दण्ड मिलता है।
लोग शताब्दियों से विकृत दृष्टिकोण लेकर जीवन जी रहे हैं। फलस्वरूप सामाजिक परंपरायें भी भ्रष्ट होती चली आ रही है। भावनात्मक और क्रियात्मक अवसाद व्यापक पतन का रूप धारण कर मानव जाति को दानवीय स्तर पर घसीटता चला आया है और अब उसकी प्रतिक्रिया इतनी भयावह हो गई है कि हर व्यक्ति सुख-शांति गँवा बैठा है। उत्साह और उल्लास के कारक समाप्त हो गये। जिधर देखें उधर अविश्वास और छल-छिद्रों से- अनैतिकता और दुर्भावना से सारा वातावरण दुर्गन्धित हुआ दिखता है। फलस्वरूप लोग नारकीय परिस्थिति में रहने का- रोक-शोक, क्लेश-कलह, दुख-दारिद्र, उद्वेग, सन्ताप भरी परिस्थितियों का कटु अनुभव कर रहे हैं। फिर भी मानव-जाति चेती नहीं, अनाचार को बढ़ने न देने का सामूहिक उत्तरदायित्व सम्भाला नहीं, अपने मतलब से मतलब रखने की घृणित संकीर्णता अपनाकर लोग पड़ौस में घटने वाली दुर्घटनाओं- अनीति और प्रवंचनाओं की ओर से आँखें मूँदे मुँह मोड़े बैठे रहे।
ईश्वर की दृष्टि में यह महान् पातक है। पातकी को दण्ड देने की वह अपनी नीति सदा से सुस्थिर रखे हुए है। मनुष्य में परस्पर मिलजुलकर काम करने की उसने विशेषता उत्पन्न की है। उसी के बल पर वह बोलने, लिखने, सोचने, उपार्जन करने, सुख साधन उपलब्ध करने के लाभ ले सका है। यह विशेषता न मिली होती तो वह भी जंगली जानवरों की तरह एकाकी अभावग्रस्त निकृष्ट जीवन जी रहा होता। सामूहिक सहयोग ही वह विशेषता है जिसके आधार पर मानव समाज आगे बढ़ा, ऊपर चढ़ा है। इस ईश्वर प्रदत्त महान् वरदान का उपयोग भौतिक सुविधायें कमाने तक ही सीमित रखा जाय यह उचित नहीं। इसके साथ-साथ एक नैतिक उत्तरदायित्व यह भी जुड़ा हुआ है कि एक दूसरे को सन्मार्ग पर चलने की- कुमार्ग पर बढ़ने से रोकने की जिम्मेदारी उठाये।
अनाचार का बढ़ना तभी सम्भव होता है जब दूसरे लोग उसे सहन करते हैं अथवा रोकने में उपेक्षा बरतते हैं। दुष्टता को प्रोत्साहन उसी आधार पर मिलता है। स्वार्थपरता और संकीर्णता और कायरता अनीति की जननी है। देखने में यह दोनों बातें साधारण-सी लगती हैं पर वस्तुतः अनीति की जननी यही हैं। कानून की दृष्टि में जिस प्रकार हत्या, लूट, डकैती, बलात्कार आदि दण्डनीय अपराध हैं उसी प्रकार आध्यात्मिक दृष्टि से- ईश्वरीय कानून की दृष्टि से संकीर्ण स्वार्थपरता तक सीमित रहना और सामाजिक उत्तरदायित्वों की उपेक्षा करना भी एक भयावह पाप है। लोगों की इन्हीं दुष्प्रवृत्तियों के कारण व्यक्ति और समाज का पतन होता है और फिर सभी को इसका दुष्परिणाम भोगना पड़ता है। पिछले दिनों यही होता रहा है। दुर्बुद्धि बढ़ती रही है, समाज कुमार्गगामी होता रहा है। शेष लोग चुपचाप अपने बिलों में बैठे-बैठे दिन गुजारते और तमाशा देखते रहे हैं। छोटे-बड़े प्रतिरोधों द्वारा रोकने के लिये जो प्रयत्न किया जा सकता था वह नहीं हुआ है।
जिन्हें प्रतिभा उपलब्ध थी उन्हें समाज को संगठित कर अनीति का प्रतिरोध करना चाहिये था, पर उन्होंने भी वैसा कुछ नहीं किया। तथाकथित सन्त, महन्त, सिद्ध, भक्त, धनी, विद्वान और कलाकार बहुत हुए हैं पर वे अपनी शक्ति बुद्धि-कौशल दिखाने और अपनी प्रतिभा को चमकाने में ही सन्तुष्ट रहे हैं। व्यक्ति और समाज की बढ़ती हुई दृष्प्रवृत्तियों का नियंत्रण महान् आत्माओं का यही एक मात्र पवित्र कर्त्तव्य है। इस दृष्टि से लगता है पिछली शताब्दियां अभावग्रस्त असफल रहीं। उन्होंने इस स्तर की महान् आत्मायें नहीं के बराबर उगाईं। जो उत्पन्न हुई वे इतनी कम हैं कि उन्हें उंगलियों पर गिने जाने लायक अपवाद ही समझा जा सकता है।
ईश्वरीय दृष्टि में यही महानतम पातक है। जो समाज अपने भीतर सुधारक और संघर्षशील नेता उत्पन्न नहीं कर सकता वह बन्ध्या है। शताब्दियों से यह कलंक हमारे समाज के मुँह पर पुता है। इस अनुत्पादन ने ही सुख व शान्ति का दुर्भिक्ष पैदा कर दिया, अब उसका दण्ड प्रतिफल सबको भोगना पड़ रहा है। शास्त्रों के द्वारा, अन्तःकरण की पुकार के द्वारा ईश्वर हर व्यक्ति को उसके कर्तव्यों का उद्बोधन होता रहता है। पर जिसने उपेक्षा और अवज्ञा करना ही ठान लिया हो उनके लिये दण्ड के अतिरिक्त और मार्ग ही कौन सा शेष रहा जाता है।
जुलाई 67 की ‘अखण्ड ज्योति’ जिन्होंने ध्यानपूर्वक पढ़ी होगी उन्हें इस तथ्य का आभास हुआ होगा कि अगले दिन विश्व संकट की भयावह सम्भावनाओं से भरपूर है। उनमें अनेक अप्रत्याशित विपत्तियों के पहाड़ टूटेंगे और कुचल-कुचल कर मनुष्य को यह शिक्षा देंगे कि उसे सुख-सुविधायें उपलब्ध कर वासना और तृष्णा संकुलित घृणित जीवन जीने में ही मदमस्त नहीं रहना चाहिये वरन् सामाजिक उत्कृष्टता स्थिर रखने के लिये पुरुषार्थ करते रहने का, अपने महान् कर्त्तव्य को भी ध्यान में रखना ही चाहिए। इस तथ्य की उपेक्षा करके संसार को वर्तमान दुर्गति तक पहुँचा देने की जिम्मेदारी हम सब की है। इसलिये उस पाप का प्रायश्चित भी सामूहिक रूप से करना होगा। दैवी विपत्तियों के मर्मभेदी प्रहार हम सबको इसी कारण सहने के लिये विवश होना पड़ेगा।
दूरदर्शी तत्ववेत्ताओं ने सूक्ष्म जगत् में बन रही सम्भावनाओं का पूर्णाभास पाया है और उसकी पूर्व सूचना अपनी भविष्य वाणियों में दी है। ईसाई धर्म के अध्यात्म वेत्ताओं ने ‘सेविन टाइम्स’ की चर्चा करते हुए सन् 2000 के लगभग प्रलयंकर परिस्थितियाँ उत्पन्न होने का संकेत दिया है। मुसलमान धर्म में 14 वीं सदी कयामत की सदी कहकर पुकारी गई है। हिजरी सन् के हिसाब से यह 14 वीं सदी है। हिन्दू-धर्म के अगणित तत्व दर्शियों ने इस सम्बन्ध में विविध ग्रन्थों में लिखा है। अंतर्राष्ट्रीय युद्ध साधनों और दाववातों के क्रम को देखते हुए सूक्ष्मदर्शी राजनीतिज्ञों को भी यही आशंका है कि इस शताब्दी के दो रोमाँचकारी महायुद्ध चण्डी की रक्त पिपासा नहीं बुझा सके, अब एक सर्वनाशी तीसरा महायुद्ध होगा और वह अन्तिम युद्ध होगा। इसके बाद न किसी में लड़ने की शक्ति रह जायेगी और न उत्सुकता।
अक्टूबर 67 की ‘अखण्ड-ज्योति’ में महाकाल की इस विनाशलीला का कारण, आधार तथा माध्यम और भी अधिक विस्तारपूर्वक बताया गया है। उसमें कहा गया है कि- युद्ध ही एक मात्र महाकाल का दण्ड माध्यम नहीं वरन् और भी अनेक आधार हैं। रक्तपात के लिये युद्ध मोर्चे पर होने वाला घमासान ही नहीं- गृह युद्ध भी ऐसा आधार है जिससे फलस्वरूप उससे भी भयानक लोक सन्ताप उत्पन्न हो सकता है। पिछले दो युद्धों में करोड़ों लोग मारे गये और घायल हुए, इस बीच रूस, चीन जैसे कम्युनिस्ट देशों में आन्तरिक संघर्ष में- साम्यवादी सिद्धान्त स्वीकार न करने के अपराध में करोड़ों ही लोगों का वध कर दिया गया है। अभी-अभी गत वर्ष इन्डोनेशियाई उथल-पुथल में लगभग 50 लाख नागरिकों के मारे जाने का अनुमान लगाया गया है।
एक स्थान पर लड़े जाने वाला विश्व युद्ध तो अभी नहीं छिड़ा, पर पिछले दिनों काँगो, भारत, पाकिस्तान, तिब्बत, इन्डोनेशिया, वियतनाम, मिश्र, इसराइल आदि से जो संघर्ष हुए हैं उनमें विश्व युद्ध की भूमिका मौजूद है। छुटपुट बहुत लड़ाइयाँ मिलकर भी संसार में विश्व युद्ध जैसा संकट ही पैदा कर सकती हैं। देश में अराजकता अनेक स्तरों पर देखी जा सकती है और उसमें होने वाली हानि का भयावह अनुमान लगाया जायेगा। संसार के अन्य भागों में भी ऐसी ही उथल पुथल है। यह विभीषिका आगे और भी बढ़ सकती है और जन संहार की सम्भावनाओं को प्रत्यक्ष कर सकती है। रक्तपात के अतिरिक्त दुर्भिक्ष, अतिवृष्टि, अनावृष्टि, महामारी, दुर्घटनायें, बढ़ते हुए अपराध वे आधार हैं जिनसे मनुष्य जाति के सामने भयावह सम्भावनायें आ उपस्थित हों।
इन दिनों वैज्ञानिक क्षेत्र में एक भारी हलचल मची हुई है। खगोल शास्त्र के सभी ज्ञाता इससे चिन्तित हैं कि इसी वर्ष कहीं समस्त भूलोक के नष्ट हो जाने की दुर्घटना घटित न हो जाय। विश्वविख्यात वैज्ञानिक डा. स्टुअर्ट टामस बटलर ने अपने एक लेख में कहा है कि- एक नया तारा इकारस पृथ्वी की ओर बड़ी तेजी से लपकता आ रहा है और यदि वह अधिक समीप आ गया तो प्रलय उपस्थित कर सकता है। सन् 1942 में इसकी दूरी पृथ्वी से लगभग 42 लाख मील थी। सन् 57 में वह 4 लाख मील और समीप आ गया। आशंका है कि जून 68 के किसी दिन वह पृथ्वी के अति निकट होकर गुजरेगा तब यदि वह अपनी धुरी से जरा-सा भी धरती के आकर्षण से प्रभावित होकर झुक गया तो एक हजार हाइड्रोजन बमों के बराबर विस्फोट होगा और उससे सारी पृथ्वी विनाश के गर्त में समा जायेगी।
इकारस यदि पृथ्वी से टकराया तो सारी धरती अन्ततः बर्फ से ढके ध्रुव क्षेत्र में परिणित हो जायेगी। गिरते समय समुद्र उबलने लगेगा और आकाश जहरीली गैसों से भर जायेगा। यदि उसका आघात ध्रुव क्षेत्र को लगे तो उस भयंकर ऊर्जा से वहाँ की सारी बर्फ पिघल जायेगी और उसका पानी हजारों फुट ऊँचा फैलकर सारी धरती को जलमग्न कर देगा।
वैज्ञानिकों का यह भी कहना है कि यदि वह पृथ्वी से न भी टकराया तो भी अन्य नक्षत्रों के साथ उसका टकराव होगा और उसका प्रभाव भूलोक पर पड़ेगा। जो हो यह आशंकायें मूर्तिमान न भी हों, पृथ्वी नष्ट न भी हो तो भी अगले दिनों प्रकृति-कृत अथवा मनुष्य-कृत ऐसी विपन्न परिस्थितियां विनिर्मित होने की पूरी सम्भावना है, जिनके फल से मनुष्य को भारी झकझोरा लगे और वह अपनी वर्तमान रीति-नीति को बदलने को विवश हो जाय।
इन विभीषिकाओं को एक कौतूहल मात्र न समझना चाहिये और न यह सोचना चाहिये कि उन्हें देखने में बड़ा मजा आयेगा। यह विपत्ति हमारे और हमारे परिजनों पर आ सकती है। इसलिये समय रहते हमें वे उपाय करने चाहिये जिनसे भावी विपत्तियों से बचाव हो सके। यह हो सकता है। यदि हम महाकाल के प्रयोजन को समझें और जिस उद्देश्य से वे विपत्तियों का दण्ड विधान रच रहे हैं उस उद्देश्य को समझकर समय रहते उसी की पूर्ति में लग जायें तो हम अपना, अपने संसार का ही नहीं परमेश्वर का भी एक बड़ा बोझ हलका कर सकते हैं।
युगनिर्माण योजना का यही प्रयोजन है। वह हर प्रबुद्ध को सचेत करती है कि अपनी गति-विधियों को बदलें। अपने महान मानवीय उत्तरदायित्वों को समझें और व्यक्तिगत सुख सुविधायें बढ़ाने की संकीर्णता में उलझे न रहकर इस आपत्तिकाल में विश्व मंगल के लिये योगदान करने की महानता अपनावें। यह सुनिश्चित है कि अगले तीस वर्षों में वैयक्तिक संपत्ति नाम कोई चीज न रह जायेगी। जमीन, जायदाद, मकान, जेवर एवं नोट किसी व्यक्ति के स्वामित्व में न रहेंगे वरन् वे सार्वजनिक सम्पत्ति बन जायेंगे। हर व्यक्ति श्रम करेगा और जीवन के आवश्यक साधन प्राप्त करने का अधिकारी रहेगा। इन सम्भावनाओं के बीच दौलत को बेटे पोतों के लिए जोड़ते जमा करने की हविस में किसी को भी अपना मूल्यवान् समय नष्ट नहीं करना चाहिये। व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएं बढ़ाना और उनकी पूर्ति के लिये सिर फोड़ते रहना अगले दिनों मूर्खतापूर्ण ढर्रा सिद्ध होगा। जो विवश होकर किया जाने वाला है वह हमें स्वेच्छापूर्वक अभी से कर लेना चाहिये। पेट भरने को मुट्ठी भर साधन जुटाने के अतिरिक्त हमें अपना सारा समय, सारा मस्तिष्क, सारा श्रम और सारा धन व्यक्ति और समाज को उत्कृष्ट बनाने के लिए नियोजित करना चाहिये। समय की माँग हर प्रबुद्ध व्यक्ति से अपने में ऐसा परिवर्तन करने की है। जो स्वयं बदल सकेगा, वही युग को बदलने की भूमिका भी सम्पादित करेगा। जो स्वयं कीचड़ में डूबा हुआ खड़ा है, वह अन्य किसी को स्वच्छ कैसे करेगा? युग परिवर्तन की इस पुण्य वेला में यदि हम अपनी आस्थाओं, कामनाओं और गतिविधियों को बदल डालें तो समझना चाहिये कि युग परिवर्तन के एक महान केन्द्र स्वयं बन गये और अपने संपर्क में आने वालों में भी वह पुण्य प्रक्रिया प्रचलित प्रसारित होने लगेगी। यदि हमने अपने को तो बदला नहीं और दूसरों को उपदेश करने का पाण्डित्य दिखाना जारी रखा तो यह एक उपहासास्पद विडम्बना होगी। परिणाम तो इसका हो ही क्या सकता है?
भावी विपत्तियों का जो दण्ड विधान मानवीय गतिविधियों में परिवर्तन लाने के लिये बन रहा है, उसे रोकना एवं हलका करना सम्भव है। अतीत के सामाजिक पापों का प्रायश्चित्त करने के लिये सबसे पहले हम स्वयं आगे बढ़ें, तृष्णाओं और वासनाओं से छुटकारा पाकर आत्म-सुधार और लोक-कल्याण के लिए समय निकालें। अपनी गतिविधियाँ सुधारें और संसार-हित में नियोजित करें, तो सत्परिणाम निश्चित रूप से सामने आयेगा। पाप जितना घटेगा, सुधारात्मक प्रयोग जितना अधिक प्रखर होगा उसी अनुपात से भावी विपत्तियाँ भी घटेगी। यही सबसे बड़ा परमार्थ है। हम परमार्थी रीति-नीति अपनायें, संकीर्ण-स्वार्थपरता की उपेक्षा कर नव-निर्माण के लिए अपना समर्पण करें तो यह त्याग, बलिदान अन्य असंख्यों की विपत्ति निवारण करने का माध्यम बन सकता है।
जिनके मन में इस प्रकार का दिव्य स्फुरण उठे उनके लिये व्यक्ति निर्माण के पाँच कार्यक्रम पिछले लेख में- और विस्तारपूर्वक दिसम्बर अंक में प्रस्तुत किये जा चुके हैं। व्यक्ति निर्माण के आवश्यक सद्गुणों का विकास लोक निर्माण के परमार्थ प्रयोजनों में लगने से ही सम्भव होता है। उसकी पंचसूत्री योजना इस अंक के अगले लेखों में है। हमें व्यक्ति निर्माण और समाज निर्माण के समन्वित 5+5 = 10 कार्यक्रमों में जुटना चाहिये। इसी प्रकार हम अपना और समस्त संसार का कल्याण कर सकेंगे।
आज का संसार अन्धविश्वासों और मूढ़ मान्यताओं की जंजीरों में जकड़ा हुआ है। इन जंजीरों से जकड़े हुए लोगों की दयनीय स्थिति पर मुझे तरस आता है। एक विचार जो मुझे दिन में निकले सूरज की तरह स्पष्ट दिखाई दे रहा है, वह यह है कि- व्यक्ति तथा समाज के समस्त दुःख उनमें समाये हुए अज्ञान के कारण ही हैं। अज्ञान का अन्धकार मिटे बिना सब लोग ऐसे ही भटकते और ठोकरें खाते रहेंगे।
संसार में प्रकाश कहाँ से उत्पन्न हो? यह प्रक्रिया बलिदानों द्वारा सम्भव होती रही है। बलिदानी वीर अपना उदाहरण प्रस्तुत कर लोगों के सामने एक परम्परा उपस्थित करते हैं, फिर दूसरे उन पदचिन्हों पर चलने लगते हैं। प्रकाश उत्पन्न करने की यही परम्परा अनादि काल से चली आ रही है। इस धरती पर जो सच्चे शूरवीर अथवा उत्तम व्यक्ति उत्पन्न होते रहे हैं उन्होंने त्याग और बलिदान का मार्ग ही अपनाया है क्योंकि अपने सुख को बलिदान करने से ही दूसरे के सुख की सम्भावना उत्पन्न होती है। इस युग में शाश्वत प्रेम और अनन्त करुणा से भरे प्रबुद्ध हृदयों की जितनी अधिक आवश्यकता है, उतनी पहले कभी नहीं रही। साहसपूर्ण कदम उठाने की आज जितनी आवश्यकता है उतनी पहले कभी नहीं रही।
इसलिये ए, प्रबुद्ध आत्माओ! उठो, संसार दुःख दारिद्रय की ज्वाला में झुलस रहा है। क्या तुम्हें ऐसे समय में भी सोते रहना शोभा दे सकता है? प्रकाश आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है और वह तुम्हारे जागरण एवं बलिदान ये ही उत्पन्न होगा।
-स्वामी विवेकानन्द
‘अखण्ड-ज्योति’ इस अंक से 29 वें वर्ष में चल रही है। गत 28 वर्षों में वह अपने पाठकों की नीति, धर्म, सदाचार, संयम, प्रेम, परमार्थ जैसे मानवीय सद्गुणों की शिक्षा देती रही है। विभिन्न स्तर के विभिन्न आधार पर लिखे गये उसमें जो लेख छपते रहें हैं उनके दो ही प्रयोजन रहे हैं, कि व्यक्ति अपने अन्तरंग जीवन में अधिक सद्भावना-सम्पन्न और बाह्य जीवन में परमार्थ-परायण बने। यही मार्ग ईश्वर प्राप्ति का है, यही आत्म कल्याण है। इसी पर चलने से लौकिक सुख मिलता है और पारलौकिक शाँति। समस्त ऋद्धि सिद्धियाँ उसके करतलगत हैं जिसने तपस्यायुक्त और उत्कृष्ट जीवन पद्धति अपनाई। जिसने यह राजमार्ग छोड़कर किसी मंत्र-तंत्र या पूजा पत्री के सहारे श्रेय साधन की पगडंडी ढूंढ़ी और उत्कृष्टता की उपेक्षा की, उसे मन बहलाने का क्षणिक आधार भले ही मिल गया हो, अन्ततः खाली हाथ रहना पड़ा। यही विचार पद्धति लगातार हमने कई वर्षों तक दी है और अपने प्रिय पाठकों की सद्गुण सम्पन्न, सत्कर्म परायण बनाने की लिए प्रयास किया है। इसी प्रयोजन के लिए विभिन्न लेख लिखे हैं।
अब यही पिष्टपेषण सदा जारी नहीं रखा जा सकता है। आखिर एक ही शिक्षा की पुनरावृत्ति कब तक ही जाती रहे? देखना होगा कि इतनी लम्बी अवधि का परिश्रम पाठकों का मनोरंजन एवं ज्ञानवर्धन करने तक ही सीमित रहा या उसने अन्तःकरण में भी कुछ ही दूरी तक प्रवेश करने में सफलता पाई। उन्हीं विचारों की सार्थकता है जो अन्तःकरण में प्रवेश कर, कार्य रूप में परिणित हो सकें। अन्यथा जिस प्रकार अन्य अनेक व्यसन हैं उसी प्रकार पढ़ना भी एक व्यसन मात्र ही कहा जायेगा। पसन्दगी की बात दूसरी है, किसी को तिलस्मी उपन्यास पसन्द आते हैं किसी को धर्म-चर्चा रुचिकर लगती है। हम लोग यही पठन-पाठन के एक व्यसन को ही बढ़ाते रहे तो समझना चाहिये इतनी लम्बी अवधि तक किया गया, इतना कठोर प्रयत्न एक प्रकार से निष्फल ही चला गया।
यदि ऐसा ही हो तो इस विडम्बना की और भी अधिक जारी रखने से क्या लाभ? हमारा चन्द वर्ष कार्य काल रहा है उसे ऐसे ही प्रयत्नों में हमें खर्च करना चाहिये, जिनकी कुछ उपयोगिता हो। अतएव अब प्रशिक्षण मात्र न करते रहकर परिवार का व्यवहारिक मार्ग दर्शन करने की प्रक्रिया अपनाई जा रही है। जो अब तक पढ़ा, सुना, लिखा, कहा गया है, उसे अब कार्यान्वित किया जाना चाहिए। जो खाया गया है उसे हजम किया जाना चाहिए।
उच्च विचारों की उपयोगिता तब है जब वे कार्य रूप में परिणित हों। किसी ने उन विचारों का सम्मान किया है इसकी परख भी उन्हें कार्यान्वित किये जाने से ही होती है। अब पढ़ाई बहुत दिन हो चुकी, कितना सीखा, क्या सीखा अब उसकी परीक्षा होनी है। परीक्षा के बिना खरे-खोटे की परख कैसे हो? अब हमें यही रीति-नीति अपनानी होगी। जिन उच्च विचारों को अपनाकर हमने समुन्नत जीवन जिया है उसी प्रकार का लाभ अपने प्रियजनों को भी मिले, इसी कामना से हमारी शिक्षण व्यवस्था चल रही है। यदि उसे इस कान से सुन उस कान से निकाल दिया गया तो फिर वह लाभ कैसे मिलेगा जो उत्कृष्ट विचारधारा का सान्निध्य लाभ करने वाले को मिलना चाहिये? निदान, हमें अब सारी शक्ति इस केन्द्र बिन्दु पर एकत्रित करनी चाहिये कि जो उत्तम है, जो सही है, जो लाभकर है उसे अपनाया भी जाय। कर्म पर अब सारा जोर देना होगा। क्योंकि उसी का अवलम्बन करने से कुछ प्रयोजन सिद्ध होने की सम्भावना है।
विगत अंक में पाँच व्यक्तिगत साधन प्रस्तुत किये गये हैं और प्रत्येक परिजन से अनुरोध किया गया है कि वह उन्हें मनोरंजन के लिये लिखा गया लेख मात्र न समझें वरन् कार्य रूप में परिणित करने का प्रयत्न करें। यह पंचसूत्री साधना पद्धति अति सरल है, उसमें कोई ऐसी कठिनाई नहीं है जो किसी को भारभूत प्रतीत हो, या जिसे करने में असमर्थता प्रकट करनी पड़े। अति सरल होते हुए भी वह अति प्रभावशाली है। उसे यदि श्रद्धा, तत्परता और नियमिततापूर्वक कार्यान्वित किया जाता रहे तो थोड़े ही समय में यह दिखाई पड़ने लगेगा कि अपने भीतर कितनी अधिक उत्कृष्टता का, कितनी तेजी से अभिवर्धन हो रहा है। यह अनुभूत प्रक्रिया है। अपने व्यक्तिगत जीवन में हम देर से इन्हीं प्रयोगों को चला रहे हैं। अतएव चिर-संचित अनुभव के आधार पर यह कह सकते हैं कि इस दिशा में उठाया हुआ प्रत्येक कदम आशाजनक सफलता उपस्थित करता है।
हम तीन शरीर धारण किये हुए हैं स्थूल, सूक्ष्म और कारण। इन तीनों के परिष्कार का राजमार्ग कर्म-योग, ज्ञान-योग और भक्ति ही अनादि काल से प्रचलित है। अन्य साधनों में किन्हीं विशिष्ट व्यक्तियों को ही सफलता मिलती है पर यह त्रियोग साधन पद्धति सर्व साधारण के लिये है। हर आयु का, हर स्थिति का, हर व्यक्ति समान रूप से इसका लाभ उठा सकता है। इसलिए परिजनों को कहा गया है कि वे उसे अपनायें। हम उनकी भरपूर सहायता करेंगे और उस सफलता के समीप तक पहुँचाने की चेष्टा करेंगे, जहाँ वे अपने भीतर नवजीवन, नव प्रकाश एवं नव-उल्लास का प्रत्यक्ष अनुभव कर सकें।
(1) कर्मयोग की साधना का गुरु मन्त्र है- “हर दिन नया जन्म, हर रात नई मौत”। प्रातःकाल उठते ही कल्पना करें कि हमें आज का नया जन्म मिलेगा और उसे भावना तथा व्यवहार दोनों स्तरों का आदर्श एवं उत्कृष्ट बनाने का प्रयत्न करेंगे। दिनभर की ऐसी दिनचर्या चारपाई पर पड़े-पड़े ही तैयार करली जाय, जिसमें एक क्षण भी समय बर्बाद करने की गुंजाइश न हो, आलस्य और प्रमाद के लिए कोई अवसर न हो, और उस दिनचर्या की पूरी सावधानी एवं पूरी कड़ाई के साथ दिन भर ठीक तरह से चलते रहने ही तत्परता बरती जाय। इसी प्रकार सवेरे ही सोच लिया जाय कि आज दिन में किस अवसर पर किस प्रकार ही दुर्भावना मन में उठने की गुंजाइश है। उस अवसर पर किन उच्च विचारों से उन दुर्भावनाओं का समाधान किया जाय, इसकी मानसिक रूपरेखा भी ली जाय। इस प्रकार सारा दिन परिपूर्ण पवित्रता और कर्तव्य परायणता के साथ निर्धारित कार्य पद्धति के अनुसार व्यतीत किया जाय। रात को सोते समय अपनी हर सम्पदा, हर प्रिय वस्तु एवं हर स्वजन सम्बन्धी को, भगवान् की धरोहर मात्र समझ कर उस पर से ममता हटाते हुए वैराग्य भाव से निद्रा देवी की गोद में-भगवती माता के आंचल में अपनी चेतना को लय कर दिया जाय। इसे उस आदर्श दिन की आदर्श-मृत्यु माना जाय।
देखने सुनने में यह साधारण-सी बात है, पर इस प्रयोग को नित्य नियमित रूप से सतर्कता एवं तत्परता के साथ जारी रखा जाय तो थोड़े ही दिनों में अपनी मनोभूमि में आशाजनक परिवर्तन होता है और लगता है कि महा मानवों जैसी अन्तःचेतना अपने भीतर उत्पन्न एवं विकसित हो रही है। कलुषित एवं गया गुजरा जीवन क्रम तेजी से बदल जाता है और ऐसा अनुभव होता है मानों आन्तरिक कायाकल्प ही हो चला, यही स्थिति सच्चे अध्यात्मवादी की होती है। इस स्थिति में कितना सन्तोष, आनन्द एवं उल्लास बढ़ता चलता है, इसे कोई भी साधक प्रत्यक्ष अनुभव कर सकता है।
(2) ज्ञानयोग की साधना के अंतर्गत दो कार्यक्रम हैं, एक जन्म दिन मनाना, दूसरा स्वाध्याय-सम्वर्धन। नियत जन्म तिथि पर एक छोटा उत्सव आयोजन हर साधक करे और उस दिन अपने जीवन का स्वरूप, उद्देश्य एवं उपयोग के बारे में बारंबार गम्भीर विचार किया जाय।
जन्मोत्सव तो एक दिन का होता है, जो घण्टे में उत्सव समारोह और एक दिन में उत्साह आनन्द समाप्त हो जाता है। पर जन्म दिन की स्मृति में अपने आप से तीन प्रश्न हर दिन या जब भी अवसर मिले पूछते रहा जाय। (1) भगवान् को सभी प्राणी समान रूप से प्रिय हैं, फिर मनुष्य को ही बोलने, सोचने, लिखने एवं असंख्य सुविधायें उपलब्ध रखने का अनुदान क्यों मिला? मनुष्य को हर दृष्टि से उत्कृष्ट स्तर का प्राणी बनाने में उतना श्रम क्यों किया? (2) जो सुविधायें, विभूतियाँ, सम्पदायें हमें उपलब्ध हैं उनका लाभ यदि हम अकेले ही उठाते हैं तो क्या यह उचित है? (3) क्या इस सुर दुर्लभ मानव शरीर का यही सदुपयोग है जो हम कर रहे हैं? इन तीनों प्रश्नों का उत्तर सहज ही अन्तःकरण में इस प्रकार उठेगा। (1) अपने उद्यान, इस संसार को अधिक सुन्दर और अधिक सुव्यवस्थित बनाने के लिये परमेश्वर को साथी सहचरों की जरूरत पड़ी, फलतः अपनी क्षमताओं से सुसज्जित एक सर्वांगपूर्ण प्राणी- मनुष्य इस प्रयोजन की पूर्ति के लिये बनाया। उसे विशेष साधन सुविधायें इसलिये दीं कि उनके द्वारा ईश्वरीय प्रयोजनों की पूर्ति में वह ठीक तरह समर्थ हो सकें। (2) अन्य प्राणियों के अतिरिक्त जितनी बौद्धिक, आर्थिक, प्रतिभा साधन अथवा विशेषतायें हैं वे सब विश्व-मानव की ही पवित्र अमानत हैं। इनका उपयोग लोक मंगल के लिए ही किया जाना चाहिये। शरीर रक्षा भर के आवश्यक उपकरण मात्र लेकर शेष साधनों का उपयोग विश्व कल्याण के लिये ही किया जाना चाहिये। (3) हम सदाचारी संयमी, परिश्रमी, उदार, सज्जन, हँसमुख, सेवा-भावी बने बिना मानव-जीवन को सार्थक नहीं बना सकते। इसलिये इन सद्गुणों का अभ्यास बढ़ाने के लिए जीवन या मन की रीति-नीति में उत्कृष्टता और आदर्शवादिता का-सभ्यता और सज्जनता का- पुरुषार्थ और साहस का समुचित समावेश अवश्य करना चाहिये।
मानव-जन्म का यह दर्शन, आदर्श और उद्देश्य पूरे साल भर तक हर दिन, हर घड़ी, हमारी दृष्टि में घूमता रहे ऐसी प्रेरणा जन्म-दिन के अवसर पर ग्रहण करनी चाहिए।
(3) ज्ञानयोग का दूसरा पक्ष है स्वाध्याय संवर्धन। आज व्यक्ति और समाज को बुरी तरह अज्ञान ने-विपरीत धारणाओं ने जकड़ रखा है। इस अन्धकार का निराकरण और विवेक-सम्मत विचारणा प्रदान करने वाले प्रकाश की आज महती आवश्यकता है। इस आवश्यकता की पूर्ति किये बिना दुःखद परिस्थितियों से- शोक सन्तापों से छुटकारा न मिल सकेगा। इसलिये हमें ऐसी प्रखर विचारणा एवं प्रेरणा उपलब्ध करनी चाहिए जो मनोभूमि को झकझोर कर रखदे और उल्टे मार्ग पर चलने से रोक कर सन्मार्ग पर चलने का साहस प्रदान करे। ऐसी विचार पद्धति युग निर्माण-योजना के अंतर्गत सत्साहित्य के रूप में सृजन की जा रही है। सो हमें ‘अखण्ड ज्योति’ तथा ‘युग निर्माण पत्रिका’ और छोटे ट्रैक्ट मनोयोगपूर्वक स्वयम् पढ़ने चाहिए, अपने परिवार के हर शिक्षित को पढ़ाने और अशिक्षित को सुनाने चाहिये। तथा परिचितों से संपर्क बनाकर इसे पढ़ने के लिये प्रोत्साहित करना चाहिए।
हर घर में एक छोटा ज्ञान मंदिर- युगनिर्माण पुस्तकालय रहना चाहिये। यही किसी परिवार की वास्तविक सम्पदा है। इस श्रेय साधन के लिये हर व्यक्ति दस पैसा और एक घण्टा समय अनिवार्य रूप से निकाले। ज्ञान यज्ञ की इस साधना को, युग परिवर्तन की आधार शिला समझ कर पूरी श्रद्धा और तत्परता से सम्पन्न करता रहे। झोला पुस्तकालय, इस युग की सबसे बड़ी लोक सेवा है। ज्ञान का प्रसाद बाँटने से बढ़कर और कोई परमार्थ नहीं हो सकता। इसलिये हर कोई झिझक छोड़कर विचार-क्रान्ति के लिये, लोक-मानस निर्माण करने के लिये इस पुण्य प्रक्रिया में उत्साहपूर्ण भाग ले।
(4) भक्तियोग में दो साधना हैं- औचित्य एवं विवेक को स्वीकार एवं कार्यान्वित करने का भावनात्मक साहस और प्रेम तत्व का अन्तःकरण में अभिवर्धन।
भक्त साहसी और शूरवीर होता है, वह प्रलोभनों एवं भयों के आगे झुकता नहीं। जो उचित है, जो सत्य है, उसी का समर्थन करता है। उस पर दृढ़ बना रहता है और उसी को अपनाने में दुनियादारों की सम्पत्ति की परवाह न करते हुए जो विवेक सम्मत है उसी पर अड़ा रहता है। सत् प्रवृत्तियों को अभ्यास में लाते समय अपनी बुरी आदतों से जो संघर्ष करना पड़ता है उसे वीर योद्धा की तरह करता है। अभावग्रस्त और कष्टग्रस्त जीवन जीकर भी वह आदर्शवादिता की रक्षा करता है, इसलिये वह तपस्वी कहलाता है। भक्त को ऐसा अनिवार्य रूप से तपस्वी बनना पड़ता है और वह खुशी-खुशी ईश्वर की प्रसन्नता प्राप्त करने का यह मूल्य चुकाता भी है।
अपने अन्तःकरण और बाह्य जीवन में आये दिन ऐसे संघर्ष आते रहते हैं जिनमें विवेक को मूढ़ता और सत्य को स्वार्थपरता परास्त करना चाहती है। ऐसे अवसर जब भी आवें हम शूरवीर, साहसी और संघर्षशील अर्जुन की भूमिका प्रस्तुत करना ईश्वरीय सन्देश समझें।
(5) भक्तियोग की दूसरी साधना प्रेमतत्व का भावनात्मक क्षेत्र में अभिवर्धन है। हम चिरकाल से ईश्वर के नाम का उच्चारण और स्वरूप का दर्शन एवं ध्यान मात्र करते रहे हैं। अब हमें उसे एक अभिन्न सहचर और अनन्य प्रेमी के रूप में देखना होगा। इस एकता और आत्मीयता से अन्तःकरण में प्रेम भावना बढ़ेगी। प्रेम ही परमेश्वर है। सच्चे प्रेम की अनुभूति ही ईश्वर की वास्तविक झाँकी है। दीपक पर पतंगा जल कर जैसे द्वैत को अद्वैत में बदलता है एवं जिस प्रकार दो अबोध बालक एक दूसरे के के गले लिपट कर समीपवर्ती बनते हैं उसी प्रकार हमें ईश्वर को अपनी अनन्य श्रद्धा प्रदान करनी चाहिये और बदले में उत्कृष्ट जीवन जीने के लिए आवश्यक प्रेरणा से भरा प्रकाश पाने की अनुभूति करनी चाहिये। हम ईश्वर को श्रद्धा समन्वित आत्म समर्पण करें, वह हमें प्रकाश प्रदान कर रोम-रोम प्रकाशित करे यह ध्यान बहुत ही उच्च स्थिति का है। सखा सहचर और मित्र ही नहीं, ईश्वर को हर घड़ी का साथी और सहयोगी समझें, निर्भय रहें और पवित्र बनें। ऐसी ध्यान भूमिका किसी भी साधक के मन में असाधारण उल्लास उत्पन्न कर सकती है।
ईश्वर के माध्यम से उत्पन्न और अभिवर्धन किया हुआ यह प्रेम तत्व हमारे जीवन के हर क्षेत्र में विकसित हो। हम दयालु, सहृदय, स्नेही, उदार और उपकारी बनें। जो भी अपने संपर्क में आवे उससे भावना भरी सज्जनता का व्यवहार करें। तो हम सच्चे ईश्वर भक्त और भक्तियोग के मर्मज्ञ कहला सकते हैं।
उपासना के समय अथवा जब भी अवसर हो भगवान का ऐसा भावपूर्ण ध्यान करना चाहिये। उपासना भावना का समावेश जितना-जितना होता जायेगा उतनी ही एकाग्रता तन्मयता बढ़ती जायेगी और आत्मा में अनिवर्चनीय आनन्द का अनुभव होने लगेगा।
यह पंचसूत्री साधना क्रम गत दिसम्बर अंक में बताया जा चुका है। यह उसी का सार है। उपासना और साधना दोनों का इसमें समन्वय है। पूजा और अर्चा यह दो साधना के पक्ष हैं। एक में भगवान के सान्निध्य का क्रम किसी निर्धारित समय पर चलाया जाता है। दूसरे में जीवन शोधन और लोकमंगल के लिये तपश्चर्या का परिचय दिया जाता है। जब तक यह उभयपक्षीय पूजा अर्चा एकत्रित नहीं होती तब तक बिजली के दोनों तार मिले बिना प्रकाश न होने की तरह अंतःकरण में अंधेरा ही बना रहता है। इसलिये अखण्ड-ज्योति परिवार के परिजनों को यह समन्वित साधना प्रक्रिया बताई गई है।
आत्म कल्याण के लिए बहुत लेख पढ़े जा चुके और बहुत प्रवचन सुने जा सके। यदि कुछ वास्तविक लाभ प्राप्त करना है तो इस राजमार्ग पर चलने का साहस करना चाहिये, जिस पर चलते हुए हम जीवन का अधिकाँश भाग लगा चुके। इसी प्रयास ने हमें सन्तोषजनक और उल्लास पूर्ण उपलब्धियाँ प्रदान की हैं।
जिस समय में हम लोग जी रहे हैं वह भारी उथल-पुथल का है। शताब्दियों और सहस्राब्दियों से मानव-जाति जिस अनीति का आश्रय लिये हुए है उसके प्रायश्चित का ठीक समय यही है। मानव-जाति एक श्रृंखला में बंधी हुई है। उसकी प्रगति का आधार पारस्परिक सहयोग है। इस सहयोग को नैतिक उत्तरदायित्व उठाने में भी स्थिर रखना चाहिये। यदि कुछ लोग अनीति, अनाचार एवं दुर्बुद्धि का आचरण करते हैं तो शेष लोगों का परम पवित्र कर्तव्य है कि उसे रोकें। कोई व्यक्ति अपने घर में आग लगावे तो उसे रोकना पड़ेगा अन्यथा सारे गाँव, मुहल्ले के जल जाने की आशंका है। इसी प्रकार समाज के किसी भाग में अनाचार उत्पन्न हो तो उसे रोकने की जिम्मेदारी सभी लोगों पर है। ठीक है यह कार्य शासन द्वारा पुलिस और न्यायालयों के माध्यम से भी किया जाता है पर वह प्रयोग बहुत ही अधूरा है। उसमें केवल कानून निर्धारित कुछ थोड़े से भयावह समझे जाने वाले अपराध ही पकड़े जा सकते हैं। उसमें भी 90 प्रतिशत दण्ड पाने से बचे रहते हैं। छुटपुट वैयक्तिक अनाचारों के विरुद्ध कोई कानून नहीं, उन्हें तो तभी रोका जा सकता है जब अन्य लोग अपने नैतिक बल, दबाव, भर्त्सना, निन्दा, प्रतिरोध, असहयोग आदि द्वारा उसे रोकें। यदि अन्य लोग उपेक्षा करें “हमें अपने काम से काम- हमें दूसरों से क्या मतलब” की नीति लेकर अनाचार के प्रति जो समाज उपेक्षा बरतता है वह वस्तुतः अपना कर्तव्य पालन न करने का, उपेक्षा बरतकर अपराधों को बढ़ने में सहायता करने का अपराधी होता है और उसे समयानुसार ईश्वरीय दण्ड मिलता है।
लोग शताब्दियों से विकृत दृष्टिकोण लेकर जीवन जी रहे हैं। फलस्वरूप सामाजिक परंपरायें भी भ्रष्ट होती चली आ रही है। भावनात्मक और क्रियात्मक अवसाद व्यापक पतन का रूप धारण कर मानव जाति को दानवीय स्तर पर घसीटता चला आया है और अब उसकी प्रतिक्रिया इतनी भयावह हो गई है कि हर व्यक्ति सुख-शांति गँवा बैठा है। उत्साह और उल्लास के कारक समाप्त हो गये। जिधर देखें उधर अविश्वास और छल-छिद्रों से- अनैतिकता और दुर्भावना से सारा वातावरण दुर्गन्धित हुआ दिखता है। फलस्वरूप लोग नारकीय परिस्थिति में रहने का- रोक-शोक, क्लेश-कलह, दुख-दारिद्र, उद्वेग, सन्ताप भरी परिस्थितियों का कटु अनुभव कर रहे हैं। फिर भी मानव-जाति चेती नहीं, अनाचार को बढ़ने न देने का सामूहिक उत्तरदायित्व सम्भाला नहीं, अपने मतलब से मतलब रखने की घृणित संकीर्णता अपनाकर लोग पड़ौस में घटने वाली दुर्घटनाओं- अनीति और प्रवंचनाओं की ओर से आँखें मूँदे मुँह मोड़े बैठे रहे।
ईश्वर की दृष्टि में यह महान् पातक है। पातकी को दण्ड देने की वह अपनी नीति सदा से सुस्थिर रखे हुए है। मनुष्य में परस्पर मिलजुलकर काम करने की उसने विशेषता उत्पन्न की है। उसी के बल पर वह बोलने, लिखने, सोचने, उपार्जन करने, सुख साधन उपलब्ध करने के लाभ ले सका है। यह विशेषता न मिली होती तो वह भी जंगली जानवरों की तरह एकाकी अभावग्रस्त निकृष्ट जीवन जी रहा होता। सामूहिक सहयोग ही वह विशेषता है जिसके आधार पर मानव समाज आगे बढ़ा, ऊपर चढ़ा है। इस ईश्वर प्रदत्त महान् वरदान का उपयोग भौतिक सुविधायें कमाने तक ही सीमित रखा जाय यह उचित नहीं। इसके साथ-साथ एक नैतिक उत्तरदायित्व यह भी जुड़ा हुआ है कि एक दूसरे को सन्मार्ग पर चलने की- कुमार्ग पर बढ़ने से रोकने की जिम्मेदारी उठाये।
अनाचार का बढ़ना तभी सम्भव होता है जब दूसरे लोग उसे सहन करते हैं अथवा रोकने में उपेक्षा बरतते हैं। दुष्टता को प्रोत्साहन उसी आधार पर मिलता है। स्वार्थपरता और संकीर्णता और कायरता अनीति की जननी है। देखने में यह दोनों बातें साधारण-सी लगती हैं पर वस्तुतः अनीति की जननी यही हैं। कानून की दृष्टि में जिस प्रकार हत्या, लूट, डकैती, बलात्कार आदि दण्डनीय अपराध हैं उसी प्रकार आध्यात्मिक दृष्टि से- ईश्वरीय कानून की दृष्टि से संकीर्ण स्वार्थपरता तक सीमित रहना और सामाजिक उत्तरदायित्वों की उपेक्षा करना भी एक भयावह पाप है। लोगों की इन्हीं दुष्प्रवृत्तियों के कारण व्यक्ति और समाज का पतन होता है और फिर सभी को इसका दुष्परिणाम भोगना पड़ता है। पिछले दिनों यही होता रहा है। दुर्बुद्धि बढ़ती रही है, समाज कुमार्गगामी होता रहा है। शेष लोग चुपचाप अपने बिलों में बैठे-बैठे दिन गुजारते और तमाशा देखते रहे हैं। छोटे-बड़े प्रतिरोधों द्वारा रोकने के लिये जो प्रयत्न किया जा सकता था वह नहीं हुआ है।
जिन्हें प्रतिभा उपलब्ध थी उन्हें समाज को संगठित कर अनीति का प्रतिरोध करना चाहिये था, पर उन्होंने भी वैसा कुछ नहीं किया। तथाकथित सन्त, महन्त, सिद्ध, भक्त, धनी, विद्वान और कलाकार बहुत हुए हैं पर वे अपनी शक्ति बुद्धि-कौशल दिखाने और अपनी प्रतिभा को चमकाने में ही सन्तुष्ट रहे हैं। व्यक्ति और समाज की बढ़ती हुई दृष्प्रवृत्तियों का नियंत्रण महान् आत्माओं का यही एक मात्र पवित्र कर्त्तव्य है। इस दृष्टि से लगता है पिछली शताब्दियां अभावग्रस्त असफल रहीं। उन्होंने इस स्तर की महान् आत्मायें नहीं के बराबर उगाईं। जो उत्पन्न हुई वे इतनी कम हैं कि उन्हें उंगलियों पर गिने जाने लायक अपवाद ही समझा जा सकता है।
ईश्वरीय दृष्टि में यही महानतम पातक है। जो समाज अपने भीतर सुधारक और संघर्षशील नेता उत्पन्न नहीं कर सकता वह बन्ध्या है। शताब्दियों से यह कलंक हमारे समाज के मुँह पर पुता है। इस अनुत्पादन ने ही सुख व शान्ति का दुर्भिक्ष पैदा कर दिया, अब उसका दण्ड प्रतिफल सबको भोगना पड़ रहा है। शास्त्रों के द्वारा, अन्तःकरण की पुकार के द्वारा ईश्वर हर व्यक्ति को उसके कर्तव्यों का उद्बोधन होता रहता है। पर जिसने उपेक्षा और अवज्ञा करना ही ठान लिया हो उनके लिये दण्ड के अतिरिक्त और मार्ग ही कौन सा शेष रहा जाता है।
जुलाई 67 की ‘अखण्ड ज्योति’ जिन्होंने ध्यानपूर्वक पढ़ी होगी उन्हें इस तथ्य का आभास हुआ होगा कि अगले दिन विश्व संकट की भयावह सम्भावनाओं से भरपूर है। उनमें अनेक अप्रत्याशित विपत्तियों के पहाड़ टूटेंगे और कुचल-कुचल कर मनुष्य को यह शिक्षा देंगे कि उसे सुख-सुविधायें उपलब्ध कर वासना और तृष्णा संकुलित घृणित जीवन जीने में ही मदमस्त नहीं रहना चाहिये वरन् सामाजिक उत्कृष्टता स्थिर रखने के लिये पुरुषार्थ करते रहने का, अपने महान् कर्त्तव्य को भी ध्यान में रखना ही चाहिए। इस तथ्य की उपेक्षा करके संसार को वर्तमान दुर्गति तक पहुँचा देने की जिम्मेदारी हम सब की है। इसलिये उस पाप का प्रायश्चित भी सामूहिक रूप से करना होगा। दैवी विपत्तियों के मर्मभेदी प्रहार हम सबको इसी कारण सहने के लिये विवश होना पड़ेगा।
दूरदर्शी तत्ववेत्ताओं ने सूक्ष्म जगत् में बन रही सम्भावनाओं का पूर्णाभास पाया है और उसकी पूर्व सूचना अपनी भविष्य वाणियों में दी है। ईसाई धर्म के अध्यात्म वेत्ताओं ने ‘सेविन टाइम्स’ की चर्चा करते हुए सन् 2000 के लगभग प्रलयंकर परिस्थितियाँ उत्पन्न होने का संकेत दिया है। मुसलमान धर्म में 14 वीं सदी कयामत की सदी कहकर पुकारी गई है। हिजरी सन् के हिसाब से यह 14 वीं सदी है। हिन्दू-धर्म के अगणित तत्व दर्शियों ने इस सम्बन्ध में विविध ग्रन्थों में लिखा है। अंतर्राष्ट्रीय युद्ध साधनों और दाववातों के क्रम को देखते हुए सूक्ष्मदर्शी राजनीतिज्ञों को भी यही आशंका है कि इस शताब्दी के दो रोमाँचकारी महायुद्ध चण्डी की रक्त पिपासा नहीं बुझा सके, अब एक सर्वनाशी तीसरा महायुद्ध होगा और वह अन्तिम युद्ध होगा। इसके बाद न किसी में लड़ने की शक्ति रह जायेगी और न उत्सुकता।
अक्टूबर 67 की ‘अखण्ड-ज्योति’ में महाकाल की इस विनाशलीला का कारण, आधार तथा माध्यम और भी अधिक विस्तारपूर्वक बताया गया है। उसमें कहा गया है कि- युद्ध ही एक मात्र महाकाल का दण्ड माध्यम नहीं वरन् और भी अनेक आधार हैं। रक्तपात के लिये युद्ध मोर्चे पर होने वाला घमासान ही नहीं- गृह युद्ध भी ऐसा आधार है जिससे फलस्वरूप उससे भी भयानक लोक सन्ताप उत्पन्न हो सकता है। पिछले दो युद्धों में करोड़ों लोग मारे गये और घायल हुए, इस बीच रूस, चीन जैसे कम्युनिस्ट देशों में आन्तरिक संघर्ष में- साम्यवादी सिद्धान्त स्वीकार न करने के अपराध में करोड़ों ही लोगों का वध कर दिया गया है। अभी-अभी गत वर्ष इन्डोनेशियाई उथल-पुथल में लगभग 50 लाख नागरिकों के मारे जाने का अनुमान लगाया गया है।
एक स्थान पर लड़े जाने वाला विश्व युद्ध तो अभी नहीं छिड़ा, पर पिछले दिनों काँगो, भारत, पाकिस्तान, तिब्बत, इन्डोनेशिया, वियतनाम, मिश्र, इसराइल आदि से जो संघर्ष हुए हैं उनमें विश्व युद्ध की भूमिका मौजूद है। छुटपुट बहुत लड़ाइयाँ मिलकर भी संसार में विश्व युद्ध जैसा संकट ही पैदा कर सकती हैं। देश में अराजकता अनेक स्तरों पर देखी जा सकती है और उसमें होने वाली हानि का भयावह अनुमान लगाया जायेगा। संसार के अन्य भागों में भी ऐसी ही उथल पुथल है। यह विभीषिका आगे और भी बढ़ सकती है और जन संहार की सम्भावनाओं को प्रत्यक्ष कर सकती है। रक्तपात के अतिरिक्त दुर्भिक्ष, अतिवृष्टि, अनावृष्टि, महामारी, दुर्घटनायें, बढ़ते हुए अपराध वे आधार हैं जिनसे मनुष्य जाति के सामने भयावह सम्भावनायें आ उपस्थित हों।
इन दिनों वैज्ञानिक क्षेत्र में एक भारी हलचल मची हुई है। खगोल शास्त्र के सभी ज्ञाता इससे चिन्तित हैं कि इसी वर्ष कहीं समस्त भूलोक के नष्ट हो जाने की दुर्घटना घटित न हो जाय। विश्वविख्यात वैज्ञानिक डा. स्टुअर्ट टामस बटलर ने अपने एक लेख में कहा है कि- एक नया तारा इकारस पृथ्वी की ओर बड़ी तेजी से लपकता आ रहा है और यदि वह अधिक समीप आ गया तो प्रलय उपस्थित कर सकता है। सन् 1942 में इसकी दूरी पृथ्वी से लगभग 42 लाख मील थी। सन् 57 में वह 4 लाख मील और समीप आ गया। आशंका है कि जून 68 के किसी दिन वह पृथ्वी के अति निकट होकर गुजरेगा तब यदि वह अपनी धुरी से जरा-सा भी धरती के आकर्षण से प्रभावित होकर झुक गया तो एक हजार हाइड्रोजन बमों के बराबर विस्फोट होगा और उससे सारी पृथ्वी विनाश के गर्त में समा जायेगी।
इकारस यदि पृथ्वी से टकराया तो सारी धरती अन्ततः बर्फ से ढके ध्रुव क्षेत्र में परिणित हो जायेगी। गिरते समय समुद्र उबलने लगेगा और आकाश जहरीली गैसों से भर जायेगा। यदि उसका आघात ध्रुव क्षेत्र को लगे तो उस भयंकर ऊर्जा से वहाँ की सारी बर्फ पिघल जायेगी और उसका पानी हजारों फुट ऊँचा फैलकर सारी धरती को जलमग्न कर देगा।
वैज्ञानिकों का यह भी कहना है कि यदि वह पृथ्वी से न भी टकराया तो भी अन्य नक्षत्रों के साथ उसका टकराव होगा और उसका प्रभाव भूलोक पर पड़ेगा। जो हो यह आशंकायें मूर्तिमान न भी हों, पृथ्वी नष्ट न भी हो तो भी अगले दिनों प्रकृति-कृत अथवा मनुष्य-कृत ऐसी विपन्न परिस्थितियां विनिर्मित होने की पूरी सम्भावना है, जिनके फल से मनुष्य को भारी झकझोरा लगे और वह अपनी वर्तमान रीति-नीति को बदलने को विवश हो जाय।
इन विभीषिकाओं को एक कौतूहल मात्र न समझना चाहिये और न यह सोचना चाहिये कि उन्हें देखने में बड़ा मजा आयेगा। यह विपत्ति हमारे और हमारे परिजनों पर आ सकती है। इसलिये समय रहते हमें वे उपाय करने चाहिये जिनसे भावी विपत्तियों से बचाव हो सके। यह हो सकता है। यदि हम महाकाल के प्रयोजन को समझें और जिस उद्देश्य से वे विपत्तियों का दण्ड विधान रच रहे हैं उस उद्देश्य को समझकर समय रहते उसी की पूर्ति में लग जायें तो हम अपना, अपने संसार का ही नहीं परमेश्वर का भी एक बड़ा बोझ हलका कर सकते हैं।
युगनिर्माण योजना का यही प्रयोजन है। वह हर प्रबुद्ध को सचेत करती है कि अपनी गति-विधियों को बदलें। अपने महान मानवीय उत्तरदायित्वों को समझें और व्यक्तिगत सुख सुविधायें बढ़ाने की संकीर्णता में उलझे न रहकर इस आपत्तिकाल में विश्व मंगल के लिये योगदान करने की महानता अपनावें। यह सुनिश्चित है कि अगले तीस वर्षों में वैयक्तिक संपत्ति नाम कोई चीज न रह जायेगी। जमीन, जायदाद, मकान, जेवर एवं नोट किसी व्यक्ति के स्वामित्व में न रहेंगे वरन् वे सार्वजनिक सम्पत्ति बन जायेंगे। हर व्यक्ति श्रम करेगा और जीवन के आवश्यक साधन प्राप्त करने का अधिकारी रहेगा। इन सम्भावनाओं के बीच दौलत को बेटे पोतों के लिए जोड़ते जमा करने की हविस में किसी को भी अपना मूल्यवान् समय नष्ट नहीं करना चाहिये। व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएं बढ़ाना और उनकी पूर्ति के लिये सिर फोड़ते रहना अगले दिनों मूर्खतापूर्ण ढर्रा सिद्ध होगा। जो विवश होकर किया जाने वाला है वह हमें स्वेच्छापूर्वक अभी से कर लेना चाहिये। पेट भरने को मुट्ठी भर साधन जुटाने के अतिरिक्त हमें अपना सारा समय, सारा मस्तिष्क, सारा श्रम और सारा धन व्यक्ति और समाज को उत्कृष्ट बनाने के लिए नियोजित करना चाहिये। समय की माँग हर प्रबुद्ध व्यक्ति से अपने में ऐसा परिवर्तन करने की है। जो स्वयं बदल सकेगा, वही युग को बदलने की भूमिका भी सम्पादित करेगा। जो स्वयं कीचड़ में डूबा हुआ खड़ा है, वह अन्य किसी को स्वच्छ कैसे करेगा? युग परिवर्तन की इस पुण्य वेला में यदि हम अपनी आस्थाओं, कामनाओं और गतिविधियों को बदल डालें तो समझना चाहिये कि युग परिवर्तन के एक महान केन्द्र स्वयं बन गये और अपने संपर्क में आने वालों में भी वह पुण्य प्रक्रिया प्रचलित प्रसारित होने लगेगी। यदि हमने अपने को तो बदला नहीं और दूसरों को उपदेश करने का पाण्डित्य दिखाना जारी रखा तो यह एक उपहासास्पद विडम्बना होगी। परिणाम तो इसका हो ही क्या सकता है?
भावी विपत्तियों का जो दण्ड विधान मानवीय गतिविधियों में परिवर्तन लाने के लिये बन रहा है, उसे रोकना एवं हलका करना सम्भव है। अतीत के सामाजिक पापों का प्रायश्चित्त करने के लिये सबसे पहले हम स्वयं आगे बढ़ें, तृष्णाओं और वासनाओं से छुटकारा पाकर आत्म-सुधार और लोक-कल्याण के लिए समय निकालें। अपनी गतिविधियाँ सुधारें और संसार-हित में नियोजित करें, तो सत्परिणाम निश्चित रूप से सामने आयेगा। पाप जितना घटेगा, सुधारात्मक प्रयोग जितना अधिक प्रखर होगा उसी अनुपात से भावी विपत्तियाँ भी घटेगी। यही सबसे बड़ा परमार्थ है। हम परमार्थी रीति-नीति अपनायें, संकीर्ण-स्वार्थपरता की उपेक्षा कर नव-निर्माण के लिए अपना समर्पण करें तो यह त्याग, बलिदान अन्य असंख्यों की विपत्ति निवारण करने का माध्यम बन सकता है।
जिनके मन में इस प्रकार का दिव्य स्फुरण उठे उनके लिये व्यक्ति निर्माण के पाँच कार्यक्रम पिछले लेख में- और विस्तारपूर्वक दिसम्बर अंक में प्रस्तुत किये जा चुके हैं। व्यक्ति निर्माण के आवश्यक सद्गुणों का विकास लोक निर्माण के परमार्थ प्रयोजनों में लगने से ही सम्भव होता है। उसकी पंचसूत्री योजना इस अंक के अगले लेखों में है। हमें व्यक्ति निर्माण और समाज निर्माण के समन्वित 5+5 = 10 कार्यक्रमों में जुटना चाहिये। इसी प्रकार हम अपना और समस्त संसार का कल्याण कर सकेंगे।
जीवनोद्देश्य की प्राप्ति के लिये भजन ही नहीं व्यक्तित्व की उत्कृष्टता का अभिवर्धन भी आवश्यक है। ओछे और कमीने व्यक्तित्व दिन रात भजन करने पर भी रतीभर आत्मिक प्राप्ति नहीं कर सकते। इसके विपरीत जिनने अपना अन्तःकरण पवित्र और व्यक्तित्व समुन्नत बनाया है उनका दस-बीस मिनट भजन भी ईश्वर की उपलब्धि और आत्म-साक्षात्कार का लाभ दे सकता है। इस तथ्य को ‘अखण्ड-ज्योति’ परिजनों को हृदयंगम कराते हुये उन्हें आत्म-निरीक्षण, आत्म-शोधन और आत्म-निर्माण की दिशा में अग्रसर होने के लिए प्रोत्साहित, प्रेरित किया जा रहा है। पूजा, उपासना के सम्बन्ध में जितना सीखा सिखाया जा चुका है वह पर्याप्त है। उपासना के लिए यदि आधा घण्टा नित्य निकाला जा कसे तो पर्याप्त है। गाँधी जी की प्रार्थना आधा घण्टा ही होती थी पर उतनी ही देर में ईश्वर से सम्बन्ध जोड़ लेते थे। सन्त विनोबा जी की उपासना का भी थोड़ा-सा ही समय निर्धारित है। सच्चे मन और सच्चे ढंग से की गई थोड़ी-सी पूजा प्रार्थना भी चमत्कारी परिणाम उत्पन्न करती है। किन्तु यदि भावना-रहित, लक्ष्य-रहित, विवेक-रहित टंट-घंट दिन भर भी करते रहा जाय तो उसका परिणाम बालू से तेल निकालने की तरह ही होगा।
उपासना जीवन की अनिवार्य आवश्यकता है। इसके अनेक विधान हैं। इन सब विधानों में हमें गायत्री महामंत्र का जप और ध्यान सर्वोत्तम प्रतीत हुआ है। शास्त्र, पूर्वजों के निर्देश और हमारे व्यक्तिगत अनुभव तीनों का सम्मिलित निष्कर्ष गायत्री उपासना के पक्ष में ही जाता है। जो अन्य उपासना करते हैं वह भले ही उसे भी करते रहें पर हमारा अनुरोध है कि उसके साथ गायत्री उपासना अवश्य जोड़ दें। उचित तो यही है कि नियत समय पर, नियत विधि-विधान के साथ उपासना की जाय। पर जिनको किन्हीं कठिनाइयों के कारण इसमें अड़चन दिखाई पड़ती हो वे बिना स्नान के भी मानसिक जप और ध्यान करके काम चला सकते हैं। पूरा नहीं तो आधा परिणाम इसका भी होता है। 108 मन्त्र युगनिर्माण अभियान की सफलता में योगदान देने के लिये और 108 मन्त्र व्यक्तिगत आत्म-कल्याण के लिये हममें से हर एक को जपने चाहिये। माला न हो तो गणना उंगलियों पर की जा सकती है। नवरात्रियों में एक 24 हजार अनुष्ठान करने का प्रयत्न करना चाहिये। उच्चस्तरीय साधनाएं, पंचकोशी उपासना विशिष्ट साधकों के लिये हैं। उनका मार्ग-दर्शन साधन की मनोभूमि के अनुरूप व्यक्तिगत रूप से किया जाता है। पंचकोशी उपासना क्रम एक-दो वर्ष तो साधकों ने चलाया फिर उत्साह ठण्डा पड़ गया तो बहुत थोड़े साधक रह गये। अतएव ‘अखण्ड-ज्योति’ में वह साधना क्रम छापना बन्द करना पड़ा। जो साधक उस मार्ग पर चल रहे हैं उन्हें पत्रों द्वारा अगला मार्ग-दर्शन बराबर किया जा रहा है। सर्व साधारण के लिये सरल और स्वल्पकाल में सम्भव हो सकने वाला साधन ही चल सकता है। इसलिये दो माला 216 गायत्री मंत्र नित्य जपने की बात हर परिजन को कड़ाई के साथ निबाहनी चाहिये और जब भी अवसर हो भगवान के साथ अपनी अनन्यता एवं अभिन्नता का भावनापूर्ण ध्यान करना चाहिये। इतना नियमित बन पड़े तो भी कम सन्तोष की बात नहीं।
दवा थोड़ी होती है जरा-सी देर में खा ली जाती है पर उसका परहेज उपचार सारे दिन निबाहना पड़ता है। भजन थोड़ा रहे तो हर्ज नहीं पर उसके साथ जुड़े हुए आत्म-शोधन और परमार्थ प्रयोजन के दो महत्वपूर्ण आधार निश्चित रूप से जुड़े रहने चाहिये। इस प्रकार की साधना में असफलता की कोई सम्भावना नहीं वह लक्ष्य तक पहुँचा देने में निश्चित रूप से समर्थ होगी। अध्यात्म मार्ग के पथिकों के लिये जो नितान्त आवश्यक है। उसका मार्गदर्शन दिसम्बर के अंक में तथा इस अंक के प्रथम लेख में किया गया है। भावनात्मक सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्धन के लिये उस प्रक्रिया में उपाय और सुझाव प्रस्तुत किये गये हैं। उस पंच-सूत्री साधना क्रम को हमें दृढ़तापूर्वक चलाना चाहिये। सद्गुणों के अभिवर्धन के लिये पूरा-पूरा प्रयत्न करना चाहिये। यह ध्यान रखने की बात है कि सत्प्रवृत्तियां बढ़ाने का अभ्यास परमार्थ प्रयोजनों को अपना कर ही किया जा सकता है। केवल पढ़ने, सुनने, सोचने, विचारने भर से कल्पना लोक में विचरण तो किया जा सकता है पर व्यवहारिक जीवन में सेवा साधना के प्रत्यक्ष कार्यक्रम अपनाये बिना सद्गुणों का अभ्यास एवं अभिवर्धन हो ही नहीं सकता। इसलिये वैयक्तिक साधना क्रम अपनाने के साथ-साथ हमें पारमार्थिक सेवा कार्यक्रमों को भी अपने दैनिक-जीवन में जोड़े रहना चाहिये। इस अंक में-अगले लेखों में- एक ऐसी पंचसूत्री परमार्थ योजना प्रस्तुत की गई है जिससे आत्म-कल्याण और लोकमंगल के दोनों ही प्रयोजन पूरे होते हैं। साथ ही नवनिर्माण का एक अत्यंत आवश्यक उत्तरदायित्व पूरा करने का उद्देश्य भी बड़ी खूबी के साथ पूरा होता है।
जिस प्रकार आत्म-कल्याण के लिये (1) हर दिन नया जन्म, हर रात नई मौत, (2) जन्म दिवस, (3) ज्ञान-यज्ञ के लिये एक घण्टा समय और दस पैसा खर्च, (4) अविवेक और असत्य से संघर्ष एवं असहयोग (5) साधना में प्रेम भावना का समावेश यह पाँच साधन बताये गये हैं और उनके प्रयोग का स्वरूप समझाया गया है। उसी प्रकार परमार्थ प्रयोजन के लिये (1) सज्जनों का संगठन (2) सद्ज्ञान प्रसार केन्द्रों की स्थापना (3) हर व्यक्ति द्वारा युग निर्माण के लिये गायत्री मंत्र की एक माला का जप तथा सक्रिय शाखाओं द्वारा पंचकुंडी गायत्री यज्ञों का आयोजन (4) व्यवहारिक आध्यात्म का त्रिविध प्रशिक्षण। (5) रचनात्मक सेवा कार्यों का अभिवर्धन- यह पाँच कार्यक्रम प्रस्तुत किये गये हैं। इन्हें अपनाना, इनके अभिवर्धन में योगदान करना एक महत्वपूर्ण परमार्थ है। देश काल पात्र की स्थिति के अनुरूप अनेक परमार्थ प्रयोजन काल में लाये जाते हैं। आज की स्थिति में उपरोक्त कार्यक्रम से बढ़कर और कोई परमार्थ हो ही नहीं सकता। साधारण सेवा तो एक दूसरे को धन आदि देकर तथा सुविधायें बढ़ाकर भी की जा सकती है पर वे केवल किन्हीं के शरीरों को ही लाख पहुँचाने तक सीमित है। सच्चा चिरस्थायी और महान परमार्थ वह है जिससे किसी की आत्मा में उच्चस्तरीय प्रकाश उत्पन्न होता हो। यह पाँचों कार्यक्रम इसी प्रकार के हैं जिनके आधार पर लोगों की शारीरिक सुविधायें नहीं वरन् आत्मिक महानता का अभिवर्धन होता है और युग को पलट देने में- नारकीय वातावरण को बदल कर स्वर्गीय परिस्थितियों उत्पन्न करने में भारी सहायता मिलती है।
अस्तु हमें इन परमार्थ प्रयोजनों की पूर्ति में भी परिपूर्ण निष्ठा और तत्परता के साथ संलग्न होना चाहिये। बड़ी संस्थाओं, बड़े नेताओं की प्रतीक्षा न कर हमें स्वयं ही अपने छोटे साधनों और छोटे व्यक्तियों से इस प्रक्रिया का शुभारम्भ करना चाहिए। चूँकि इस प्रेरणा के पीछे दैवी प्रकाश काम कर रहा है इसलिये उसकी सहायता में किसी सन्देह की आशंका नहीं है। हम उत्साह प्रदर्शित करें तो श्रेय और यश के भागी बन सकते हैं, उपेक्षा करें तो पश्चात्ताप में कुड़कुड़ाते रह सकते हैं। महाकाल विनाश के साथ-साथ संरक्षण और निर्माण की प्रक्रिया को भी सजीवकर रहे हैं। डाक्टर जहाँ आपरेशन के साधन जुटाता है वहाँ घाव को सीने और बाँधने के लिए मरहम, रुई, पट्टी, सुई, धागा आदि का सरंजाम भी इकट्ठा करता है। एक ओर जहाँ मानव-जाति को अपने सामूहिक पापों का दण्ड भुगतने के लिए, न्याय-दण्ड का प्रहार सहने के लिए विवश होना पड़ रहा है दूसरी ओर पुनर्निर्माण की अभिनव रचना भी सजीव हो रही है। युग-निर्माण योजना मानव-जाति के घाव भरने का काम करेगी, उसकी पूर्ति में सहायक होकर हम दयालु, उपकारी एवं कर्तव्य परायण सज्जनों की पंक्ति में ही अपने को खड़े करेंगे। भगवान ऐसा प्रकाश साहस और अवसर हममें से हर एक को प्रदान करे यही प्रार्थना है।
संघशक्ति की सदा ही प्रमुखता रही है पर इस युग में तो उनका महत्व सर्वोपरि है। बुद्धि-बल, धन-बल, श्रम-बल- यह इन तीनों के चमत्कार इस संसार में बिखरे पड़े हैं। विभिन्न प्रकार की विभूतियाँ और समृद्धियाँ इन तीनों आधारों पर ही मनुष्य उपलब्ध करता है। इसलिये इनका महत्व विदित है। इन तीन बलों को उपार्जन करने के लिये विविध प्रयत्न भी करते हैं। सरस्वती के रूप में बुद्धि की, लक्ष्मी के रूप में धन की, श्रम के रूप में दुर्गा की पूजा उपासना करते हैं। पर उस संघशक्ति महत्व भुला देते हैं, जो सर्वोपरि है। गायत्री महामंत्र समूहवाद का मन्त्र है। इसका तत्व-ज्ञान “नः” शब्द में सन्निहित है। यह कहता है कि एकाकीपन में नहीं, संगठित एवं सम्मिलित प्रयत्नों में ही मानवीय कल्याण का श्रेय साधन छिपा हुआ है।
एकाकीपन में जड़ता और नीरसता है। कोई परमहंस स्थिति को पहुँचा हुआ व्यक्ति ही उसमें आनंद ले सकता है, तो भी तब जब विश्वात्मा के साथ अपनी आत्मा को ड़ड़ड़ड़ सूक्ष्म चेतनास्तर पर वसुधैव कुटुंबकम् का रस पीने लगे। अन्यथा एकाकी जीवन बहुत ही विकृत एवं कष्टसाध्य बन जाता है। जेल में कैदियों को सबसे बड़ी सजा ‘काल कोठरी’ की दी जाती है। उसे एक अलग कोठरी में बन्द रहना पड़ता है। काम कुछ नहीं करना पड़ता। दिन-रात फुरसत ही फुरसत रहती है। यह एकाकीपन कैदी को इतना अखरता कि उसे एक-एक दिन काटना- पहाड़ की तरह कठिन हो जाता है। झुण्ड छोड़कर जो वन्यपशु अकेले रहने लगते हैं वे बड़े क्रूर प्रकृति के हो जाते हैं। अकारण पेड़ पौधों को तोड़ते हैं और जीवों पर आक्रमण करते हुए अपनी दुष्टता का प्रदर्शन करते रहते हैं। मनुष्य सामाजिक प्राणी है, मनुष्यता का निखार सामूहिक जीवन में ही सम्भव है।
सम्मिलित जीवन में एक उल्लास भरी शक्ति उत्पन्न होती है। उसी की उपलब्धि के लिये गृहस्थ लोग परिवार बसाते हैं। विरक्त लोग अखाड़े, आश्रम, मठ तथा सम्प्रदाय खड़े करते हैं। मेले-ठेलों में जाना हर दृष्टि से असुविधाजनक, कष्टकर एवं खर्चीला ही पड़ता है, फिर भी लोग बड़े चाव के साथ जाने की तैयारी करते हैं, क्योंकि जन संकुल वातावरण में एक ऐसा आनन्द रहता है जिससे सहज ही बहुत आनन्द मिलता है। विवाह बरातों में जाकर प्रसन्न होने का यही कारण है। जुलूसों और सम्मेलनों में सम्मिलित होने वाले लोग तद्विषयक प्रेरणा और प्रोत्साहन लेकर लौटते हैं। गाँवों को छोड़कर लोग शहरों की ओर इसीलिये भागते रहते हैं कि वहाँ के जनसंकुल वातावरण में अनेक असुविधाएं रहने पर भी एक मानसिक सुख मिलता है।
सम्मिलन में केवल प्रसन्नता ही नहीं मिलती, उसमें शक्ति भी सन्निहित है। एकाकी व्यक्ति कितना ही समर्थ क्यों न हो कुछ बड़ा काम नहीं कर सकता, पर बहुत से आत्म सामर्थ्यवान् मिलकर भी बहुत बड़ा काम कर सकते हैं। टिड्डीदल फसलों और जंगलों को सफाचट कर देता है। चींटियों का एक छोटादल हाथी की सूंड में प्रवेश कर गजराज को मृत्यु के मुख में पहुँचा देता है। अभी-अभी कल परसों की बात है जनता ने हाथ उठाकर- वोट देकर देखते-देखते काँग्रेस पार्टी को शासन के उस मंच पर जा बिठाया, जिसके लिये अंग्रेजों को दो-सौ वर्ष छलबल समेत भारी प्रयत्न करना पड़ा था। समूह की शक्ति असाधारण है। इसी से कलियुग में संघशक्ति को सर्वोपरि माना गया है। नव-निर्माण के लिये हमें इसी महाशक्ति को जागृत एवं प्रयुक्त करना पड़ेगा। एकाकी प्रयत्नों से इतना बड़ा महा अभियान सम्पन्न नहीं हो सकता, चाहे उसका संचालक कितना ही समर्थ व्यक्ति क्यों न हो।
अवतारी महापुरुषों को भी जन-शक्ति का शस्त्र लेकर ही आगे बढ़ना पड़ा है। भगवान राम को मनुष्य सहयोगी न मिले तो रीछ व बानरों की सेना बनाकर असुरता से लड़ने चले। भगवान कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत उठाया तो उसके लिए ग्वाल बालों का सहयोग लिया। महाभारत में वे अकेले भी लड़ सकते थे पर पाण्डवों तथा उनकी छोटी सेना को संगठित करके ही उन्होंने उस कार्य को हाथ में लिया। शिवजी सर्व समर्थ हैं पर अपने प्रयोजनों की पूर्ति वे अपने वीरभद्र, नंदी, भूत, बेतालों की गण-सेना द्वारा ही कराते हैं। कथा प्रसिद्ध है कि जब असुरों से देवता हार गये तक वे प्रजापति के पास विजय का उपाय पूछने गये। प्रजापति ने देवताओं की थोड़ी-थोड़ी शक्ति इकट्ठी कर, उससे एक सम्मिलित शक्तिपुंज उत्पन्न किया जो दुर्गा के नाम से प्रख्यात होकर मधुकैटभ, महिषासुर, शुंभ−निशुंभ जैसे महा दानवों को सैन्य संहार करने में समर्थ हुई। असुरता से संत्रस्त ऋषियों ने परित्राण का कोई और उपाय न देखकर अपना थोड़ा-थोड़ा रक्त इकट्ठा किया उसे भूमि में गाढ़ा। कालान्तर में वही रक्त घट परिपक्वावस्था में राजा जनक को मिला और उसमें सन्निहित शक्ति को सीता के नाम से पुकारा गया। यह सीता शक्ति ही असुर साम्राज्य को विध्वंस करने की भूमिका बनी। संघ शक्ति सर्वत्र ऐसे ही चमत्कार उत्पन्न करती है।
युगनिर्माण के लिये हमें सज्जनों की- धर्मनिष्ठ व्यक्तियों की- शक्ति का एकीकरण करना पड़ेगा। वे आज बिखरे हुए हैं इसी से दुर्बल पड़ रहे हैं, हार रहे हैं, असुरता संगठित है इसलिए वह मोर्चे पर जीत रही है। डाकुओं के छोटे-छोटे दल संगठित होने के कारण अपने क्षेत्रों में भारी आतंक उत्पन्न कर देते हैं और सरकार की भारी शक्ति खर्च कराके भी देर तक पकड़ में नहीं आते। तब क्या सज्जनों का संगठन सृजनात्मक प्रयोजनों की पूर्ति में सफल नहीं हो सकता? असुरता से देवत्व की शक्ति कहीं अधिक है पर वह हारती एक ही कारण से है कि संगठन की ओर उपेक्षा बरतती रहती है। देव प्रकृति के व्यक्ति यदि संगठित होकर सदुद्देश्य के लिए कदम बढ़ायें तो आश्चर्यजनक सफलता सुनिश्चित है। हमें यही करना होगा। हर देव प्रकृति के व्यक्ति को संगठन का महत्व समझना होगा। उन्हें संघबद्ध होने के लिए आग्रह और अनुरोधपूर्वक तैयार करना होगा। उनकी सम्मिलित शक्ति को नव-निर्माण के लिए प्रयुक्त करना होगा। इस दिशा में जितनी सफलता मिलती जायेगी, युग परिवर्तन का पथ उतना ही प्रशस्त होता चला जायेगा। जब तक सज्जनों की संघ शक्ति का सृजन न हो सकेगा, तब तक हमारी महान योजनायें, दिवास्वप्न की तरह कल्पना लोक में ही विचरण करती रहेंगी।
यों आगे चलकर संगठित तो समस्त विश्व के सभी धर्म प्रेमियों को करना होगा, पर इसका आरम्भ अपने छोटे से ‘अखण्ड-ज्योति परिवार’ से कर रहे हैं। इस परिवार में अधिकाँश व्यक्ति पूर्वजन्मों की संचित अध्यात्म सम्पदा वाले हैं। इन्हें प्रयत्नपूर्वक ढूँढ़-ढूँढ़कर 28 वर्षों के प्रयत्न परिश्रम से एक झण्डे के नीचे एकत्रित किया गया है। व्यक्तिगत रूप से भी यह आत्मायें हमारे साथ अनेक जन्मों से जुड़ी हुई हैं। इनका संगठन अपेक्षा कृत सरल है। जब कभी थोड़ा प्रयत्न किया गया है वे आसानी से संगठित हो भी गई हैं। गायत्री परिवार के रूप में एक प्रयास किया गया था और 24 लाख के लगभग व्यक्तियों को कुछ ही समय में संगठित कर लिया गया था। उनमें से चार लाख व्यक्ति तो सहस्र कुण्डी गायत्री यज्ञ में सुदूर प्रदेशों की लम्बी और कष्ट साध्य यात्रा करके मथुरा आये थे। गायत्री प्रचार के उद्देश्य से किया गया वह प्रयत्न अपने समय पर- अपने ढंग से बहुत सफल रहा अब नव-निर्माण के लिये उससे कुछ ऊँचे स्तर के- अपेक्षा कृत अधिक निष्ठावान् व्यक्तियों को संगठित करने की आवश्यकता अनुभव की गई है तो वह संकल्प भी असफल न रहेगा।
गायत्री परिवार के संगठन में एक माला महामंत्र का जप करने मात्र की सरल शर्त थी। सरल कार्य तो बालक भी कर लेते हैं। बालकों को रीछ बन्दर वाले भी इकट्ठे कर लेते हैं। प्रौढ़ों का एकीकरण, वह भी उनका जो तप त्याग और सेवा साधना का व्रत लेकर आगे आयें कुछ कठिन है। इस प्रयोजन में इतने अधिक व्यक्ति इतनी जल्दी इकट्ठे नहीं हो सकते। फिर भी निराशा जैसी कोई बात नहीं। यह धरती वीर विहीन नहीं हुई है। ऊँचे स्तर के लोग भी यहीं हैं। उनकी मूर्छा भर जागनी है। अपने स्वरूप, कर्तव्य और उत्तरदायित्व को जिस दिन वे समझ सके उसी दिन दीन-दरिद्र की तरह रोता बिलखता जीवन जीने की अपेक्षा वे प्रकाशवान् गतिविधियाँ अपनाने के लिये मुड़ पड़ेंगे और देखते-देखते युग-पुरुषों की महान भूमिका सम्पादित करने लगेंगे। इसी महान् जागरण की प्रेरणा फूँकने के लिये हमारी भावी तपश्चर्या का कार्यक्रम बना है। किन्तु तब तक हाथ पर हाथ रखकर बैठे रहने की आवश्यकता नहीं है। सज्जनों की सम्मिलित शक्ति को जागृत करने का प्रयत्न हमें आज से ही आरम्भ कर देना चाहिए। उसका काम चलाऊ स्वरूप तो हम इस बसन्त-पंचमी तक ही खड़ा कर सकते हैं।
जहाँ-जहाँ अखण्ड-ज्योति पहुँचती है वहाँ यह तलाश किया जाना चाहिए कि पत्रिका के सदस्य कौन-कौन हैं। अधिक उत्साही व्यक्ति उनसे व्यक्तिगत रूप से मिलें और अनुरोध करे कि अगले वर्ष संघबद्ध होकर रहना है। किसी सुविधा के दिन सबको एकत्रित किया जाय और युगनिर्माण शाखा के नाम से एक संगठन बना लिया जाय। किसी सदस्य का कमरा कार्यालय के लिए उपलब्ध कर लिया जाय। यह स्थान नगर के बीच में होना चाहिये जहाँ पहुँचने में सबको सुविधा हो और बिना संकोच के सदस्यगण इकट्ठे होकर परस्पर हँसने बोलने में किसी प्रकार का बन्धन एवं संकोच अनुभव न करें।
शाखा के लिये कई रजिस्टर बनाने चाहिये। प्रथम रजिस्टर में सदस्यों और सहायकों की नामावली रहे। सदस्य वे माने जायें जो पैसा खर्च कर ‘अखण्ड ज्योति’ को मँगाते हैं। सहायक वे माने जायें जो पैसा तो खर्च नहीं करते पर दूसरों से लेकर नियमित रूप से पढ़ लेते हैं। पत्रिका पढ़ लेने की शर्त इसलिए रखी गई है कि प्रस्तुत विचार धारा का जिन्हें नियमित प्रशिक्षण मिल रहा होगा, उन्हीं से नियत प्रयोजन के लिए, नियत क्रिया पद्धति से कुछ काम करने की आशा की जा सकती है। जिन्हें पढ़ने, सुनने, समझने का अवसर ही नहीं मिलता वे पूरी बात से परिचित ही न होंगे। युग-निर्माण शब्द के उल्टे सीधे अर्थ लगावेंगे और ऐसा ऊटपटाँग काम करेंगे, ऐसी ऊलजलूल बातें करेंगे, जिनसे लक्ष्यपूर्ति में सहायता मिलना तो दूर उलटी बाधा उत्पन्न हो। नव निर्माण की विचारधारा वर्तमान मान्यताओं में भारी उथल पुथल उत्पन्न करती है। पुराने सड़े-गले ढर्रे को अपनाये बैठे रहने वाले व्यक्ति अभीष्ट बारीकियों को समझ नहीं पाते फलतः प्रगति के स्थान पर विकृति उत्पन्न करते हैं। हमें क्या सोचना चाहिए और क्या करना चाहिए इसका ठीक तरह प्रशिक्षण ‘अखण्ड-ज्योति’ और युग-निर्माण’ पत्रिकायें ही करती हैं। जो उन्हें पढ़ते तक नहीं उनसे मिशन को गतिशील बनाने की भला क्या आशा की जायेगी। अनजान लोगों की भीड़ इकट्ठी करके बड़ा संगठन बना लेने का विडम्बना भरी मोह नहीं करना चाहिये। संख्या से नहीं उत्कृष्टता से काम चलेगा भले ही वह थोड़ी ही क्यों न हो।
प्रथम रजिस्टर में सदस्यों और सहायकों की नामावली नोट करनी चाहिए। दूसरे में मीटिंगों की कार्यवाही दर्ज की जाती रहे। तीसरे में हिसाब रहे। चौथे में पुस्तकालय की पुस्तकें तथा संस्था की सम्पत्ति नोट रहे। पांचवें में पुस्तक देने और वापिस लेने की जानकारी रहे। छठवें में सदस्यों और सहायकों की जन्मतिथियाँ नोट रहें और जन्मोत्सव मनाये जाने सम्बन्धी-व्यवस्था दर्ज की जाय। यह छः रजिस्टर जो रहने ही चाहिये। आवश्यकतानुसार घटाये बढ़ाये भी जा सकते हैं।
शाखा के केन्द्र स्थान पर एक ‘नव निर्माण पुस्तकालय’ होना अनिवार्य रूप से आवश्यक है। अपना समस्त प्रकाशन उसमें रहे व्यक्तिगत रूप में जो सदस्य अपने यहाँ ‘ज्ञान-मन्दिर’ बनाये हुए हैं और झोला पुस्तकालय चला रहे हैं सो तो चलने ही देने चाहिये। साथ ही एक केन्द्रीय पुस्तकालय अवश्य रखा जाना चाहिये ताकि जिन तक साहित्य नहीं पहुँच पा रहा है उन तक पहुँचाने की प्रवृत्ति प्रचलित की जा सके। इसी प्रकार हर सदस्य और सहायक का जन्मोत्सव मनाने का प्रबन्ध भी किया जाय। इस सम्बन्ध में पिछले अंकों में बहुत कुछ लिखा जाता रहा है। ‘जन्म-दिवसोत्सव कैसे मनायें?’ ‘जन्म-दिवसोत्सव पद्धति’ की पुस्तकें पढ़कर उसकी रूपरेखा आसानी से समझी जा सकती है। छोटे बच्चों के जन्मोत्सव मनाना उनके माँ-बाप का काम है। शाखा का अपने सदस्यों और सहायकों के जन्मोत्सव मनाने पर ही ध्यान केंद्रित रखना चाहिए। जन्मोत्सवों के माध्यम से इन सदस्यों को महत्वपूर्ण प्रेरणाएं ही जा सकती हैं और उन्हें अधिक सक्रिय बनाया जा सकता है। अस्तु पुस्तकालय और जन्मोत्सवों का कार्य जिस दिन शाखा स्थापित हो उसी दिन से हाय में ले लेना चाहिए। अन्य कार्य सुविधानुसार पीछे भी किये जा सकते हैं। दस वर्षीय यज्ञानुष्ठान के अंतर्गत हर सदस्य को एक माला गायत्री जप नव-निर्माण के लिये करने का अनुरोध किया गया है। उसे व्यापक बनाने का प्रयत्न शाखा स्थापना के साथ-साथ ही आरम्भ कर देना चाहिये। इस जप संकल्प में कोई भी सम्मिलित हो सकता है। इसमें सदस्य या सहायक का प्रतिबन्ध नहीं। हर सदस्य को अपने प्रभाव क्षेत्र में अधिक जप-भागीदार उत्पन्न करने का उत्तरदायित्व इसी अवसर पर सम्भाल लेना चाहिये।
चुनाव केवल एक कार्य वाहक का किया जाय। जो सबसे अधिक उत्साही, कर्मठ, भाग-दौड़ करने में समर्थ और विनम्र, साथ ही शिक्षित हो। ऐसे व्यक्ति को शाखा का कार्यवाहक नियुक्त कर देना चाहिये। शेष सब लोग सभासद रहें। प्रधान, उपप्रधान, मंत्री उपमंत्री, निरीक्षक आदि कोई न बने। यह झंझट हर जगह ईर्ष्या, द्वेष, अहंकार और अड़ंगे पैदा करता है। इसी विडंबना के कुचक्र में अनेक उपयोगी संस्थायें नष्ट हो गई और जो बची हैं उनकी नाव इसी भँवर में डूबने जा रही है। पद लोलुपता से बढ़कर लोक मंगल के कार्यों में और कोई विघ्न नहीं। इसलिये अपने संगठन को इस जंजाल से पहले ही बचा लिया जाय। एक कार्यवाहक की नियुक्ति पर्याप्त है। जब कभी कारण-वश बदलाव आवश्यक हो जाय तक सब लोग मिलजुल कर प्रेमपूर्वक दूसरा नियुक्त करलें। हर साल चुनाव करने की कोई आवश्यकता नहीं।
हर स्थानीय संगठन अपने आप में स्वतन्त्र है। उनके ऊपर क्षेत्रीय प्रान्तीय आदि संगठन न बनेंगे। केन्द्र से जो प्रकाश मिलता है उसके अनुरूप दिशा निर्धारित करने में यह संगठन सहायता ले सकते हैं। किसी तरह का बन्धन उसके साथ भी नहीं है। युग-निर्माण योजना एक विचार पद्धति एवं कार्य पद्धति मात्र है। उसे बन्धनात्मक झंझटों से जबड़ा नहीं गया है। स्थानीय संगठन ही इसके लिये पर्याप्त हैं। प्राचीन काल में सभी धर्म, सम्प्रदाय एवं आन्दोलन इसी आधार पर चलते और फलते-फूलते थे। अब जब से ‘डेमोक्रेसी’ की सरकारी पद्धति धर्म संगठनों और संस्थाओं में घुस पड़ी तब से जो पदलोलुपता का रोग सरकारों में है वही इन संगठनों में भी घुस पड़ा और धूर्त लोग अपने स्वार्थ साधन के लिए उस तन्त्र का दुरुपयोग करने लगे। हमें इस जंजाल से अपने संगठन-क्रम को सर्वथा बचाये रखना है। केवल छोटे स्थानीय संगठन ही पर्याप्त माने जायेंगे। उनका नैतिक एवं बौद्धिक मार्ग-दर्शन मात्र केन्द्र करेगा।
हाँ, निर्धारित विचारधारा से प्रतिकूल आचरण अथवा प्रमाद करने पर प्रतिबन्ध रहेगा। ऐसे संगठनों को बिरादरी से ‘बहिष्कृत’ करने का दण्ड दिया जा सकेगा।
‘अखण्ड-ज्योति-परिवार’ के हर सदस्य को स्थानीय शाखा के रूप में संगठित हो जाना चाहिये। सूत के कच्चे धागे मिलकर एक ऐसे मजबूत रस्से का रूप धारण करते हैं जिससे मदोन्मत्त गजराज को बाँधा जा सके। बँधी हुई सींकों की बुहारी झाड़ने का काम ठीक तरह करती है। संघबद्ध सज्जनों का समाज ही युग बदलने जैसे महान् अभियान को सफलतापूर्वक सम्पन्न कर सकता है।
अच्छी दुनियाँ बनाने के लिए कई क्षेत्रों में कई प्रकार के प्रयत्न किये जा रहे हैं। राजनैतिक क्षेत्र में ‘विश्व-संघ’ का संगठन खड़ा किया गया है, उसका उद्देश्य अच्छी दुनियाँ की रचना है। अपने स्तर पर वह संगठन भी काम कर रहा है। विज्ञान का कोई विश्वव्यापी संगठन तो नहीं है पर जो स्थानीय संगठन हैं अथवा जो वैज्ञानिक शोध कार्यों में लगे हुए हैं उनका दावा भी यही है कि वे अपने वैज्ञानिक उपकरणों द्वारा दुनियाँ को अधिक सुखी बना सकेंगे। आर्थिक क्षेत्र भी यही दावा करते हैं। छोटे-बड़े उद्योगों की स्थापना के पीछे यही उद्देश्य बताया जाता है। सामाजिक स्तर पर सर्वोदय, सत्य समाज आदि संगठनों का यही प्रयत्न है कि उनकी रीति-नीति अपना लेने पर दुनियाँ में सुख-शान्ति स्थापित होगी। विश्व-शान्ति के नाम पर और भी कितने ही प्रयत्न अपने-अपने ढंग के चल रहे हैं। इस समर्थित ‘शान्ति परिषद’ और अमेरिका समर्थित ‘शान्ति सेना’ अपना उद्देश्य यही बताते हैं। धार्मिक क्षेत्र में ऐसे कई प्रयत्न हुए। बहाई धर्म और ब्रह्माकुमारी से लेकर अनेक तथाकथित अवतारों तक, अनेक व्यक्तियों और संस्थाओं का प्रयत्न इसी दिशा में है।
इस प्रकार विभिन्न स्तरों पर चल रहे प्रयत्नों के होते हुए भी आशाजनक परिणाम सामने न आने का एक ही कारण है कि जिस आध्यात्मिक स्तर पर यह प्रयत्न किये जाने चाहिये थे उसे नहीं अपनाया गया। मनुष्य वस्तुतः आत्मा है। आत्मा में परिवर्तन उत्पन्न होने से ही उसकी विचार धारा एवं कार्य पद्धति में वास्तविक हेर-फेर हो सकता है। अन्यथा बाह्य परिस्थितियां एवं मान्यताएँ यदि बदल दी जाँय तो आत्मिक स्तर गिरा रहने पर मनुष्य बदलेगा नहीं, वह गुप्त प्रकट धूर्तताएँ बरत कर विकृतियाँ ही उत्पन्न करता रहेगा। उदाहरण के लिए विभिन्न राजनैतिक दलों के राज-नेता हमारे सामने हैं। डडडड का लक्ष्य, कार्यक्रम, घोषणा पत्र, दृष्टिकोण सभी कुछ डडडड है। उनमें से किसी भी दल की घोषित विचारणा या कार्यपद्धति ठीक तरह कार्यान्वित हो तो समाज में सुख-शान्ति समृद्धि की संभावना मूर्तिमान हो सकती है। पर देखा यह जाता है कि बेचारे अनुयायी तो दूर, दलों के मूर्धन्य राज-नेता भी अपने व्यक्तिगत जीवन में उस नीति को कार्यान्वित नहीं करते। कहते कुछ हैं, करते कुछ हैं। फलतः न तो उनकी आत्मा इतनी प्रबल होती है कि वह वातावरण को वस्तुतः प्रभावित कर सके और न उनके अनुयायी ही इतने निष्ठावान होते हैं कि नेताओं के चरित्र की उपेक्षा कर उनके प्रवचनों से ही प्रभाव ग्रहण करलें। फलस्वरूप “पर उपदेश कुशल” बनने की विडम्बना चलती रहती है। लकीर पिटती रहती है। हथकण्डों के आधार पर लोग अपनी गाड़ी खींचते रहते हैं। वास्तविक काम कुछ हो नहीं पाता। राजनैतिक दलों के राजनेताओं की तरह, अन्याय क्षेत्रों में भी यह दुर्दशा है। भौतिक स्तर पर किये गये प्रयत्न क्षणिक लाभ ही दे सकते हैं। वास्तविकता का स्तर तो आत्मा है। जब तक आत्मिक स्तर पर परिवर्तन के प्रयत्न न किये जायेंगे तब तक ठोस परिणाम सामने न आयेगा। हमारा प्रयत्न मूल को सींचने का है, हम मनुष्य का परिवर्तन उसकी आत्मा से आरम्भ करने का प्रयास कर रहे हैं ताकि उसका बाह्य जीवन भी उत्कृष्ट बने और उस उत्कृष्टता का सामूहिक परिपाक देव-समाज के रूप में- सतयुग के रूप में सामने आये।
अपनी ‘युग-निर्माण योजना’ एक आध्यात्मिक प्रक्रिया है। दिसम्बर अंक में स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर के परिष्कार के लिये कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग का एक सर्वांगपूर्ण कार्यक्रम प्रस्तुत किया गया है। अपने सामूहिक प्रयत्न भी इसी आधार पर हैं। उपासना के साथ अध्यात्म तत्व ज्ञान का शुभारम्भ होता है। अतएव हमें भक्तियोग के अंतर्गत उस ओर भी पूरा-पूरा ध्यान देना है। विचार परिवर्तन आंदोलन के मूल में आध्यात्मिक तत्व ज्ञान को अविच्छिन्न रूप में जोड़ रखा गया है। अतएव हमें उपासना को अनिवार्य और व्यापक बनाते हुये अपने कदम आगे बढ़ाने हैं।
‘युग-निर्माण योजना’ का भावी स्वरूप विश्वव्यापी होगा। उसे हर देश के- हर धर्म के- हर समाज के लोग समान रूप से स्वीकार शिरोधार्य करेंगे। पर अभी उसका आरम्भ ‘अखण्ड-ज्योति-परिवार’ के परिजनों से किया गया है। जो कार्यक्रम इस प्रथम चरण में बनाये जा रहे हैं वे यह सोच कर बनाये जा रहे हैं कि उन्हें हमारे परिजन तुरन्त कार्यान्वित करेंगे और फिर उनके पुरुषार्थ से यह प्रक्रिया आगे के क्षेत्रों में बढ़ती फैलती चली जायेगी। इसलिए प्रारम्भिक विचार और कार्य इस स्तर के हों जिन्हें अखण्ड-ज्योति-परिवार के सदस्य सरलतापूर्वक अविलम्ब कार्यान्वित कर सकें। भारतीय धर्म में छुटपुट शुभ कार्य भी प्रार्थना, उपासना के साथ आरम्भ किये जाते हैं तो ‘युग-निर्माण’ जैसे महानतम कार्य के मूल में उपासना का आधार न रहे यह कैसे हो सकता है? गायत्री-मन्त्र भारतीय धर्म और संस्कृति का मूल है। इसमें वह शिक्षा भी है और यह शक्ति भी है जिसके आधार पर व्यक्ति और समाज का स्तर उत्कृष्ट बनाया जा सके। अनादि काल से हमारे पूर्वज इस अवलम्बन को अपना कर अपनी आँतरिक और लौकिक महानता अक्षुण्ण बनाये रहने में समर्थ हुए। अब हमें उनका स्तर पुनः प्राप्त करने के प्रयास में उनकी उपासना पद्धति को अपनाना चाहिये। कहना न होगा कि भारती धर्म की अनादि उपासना केवल ‘गायत्री’ है। वही हमारा गुरु मन्त्र है। वही हमारे तत्वज्ञान का सार और धर्म एवं संस्कृति का आधार है। गायत्री उपासना में वह अलौकिक दिव्य शक्ति विद्यमान है कि यदि ठीक तरह उसका प्रयोग किया जा सके तो विश्वव्यापी वातावरण बदला जा सकता है और विश्व-शाँति का शिलान्यास ठोस आधार पर किया जा सकता है।
पिछले दिनों में लगातार अपने यही प्रयास चल रहे हैं। नवयुग की उदीयमान वेला में गायत्री महाशक्ति का उदय ब्रह्म-मुहूर्त की ऊषा की तरह हो रहा है। लोग इस आदि शक्ति को-ब्रह्म शक्ति को न एक प्रकार से भूल ही चुके थे। 20 वर्षों के प्रबल प्रयत्नों के साथ उसे जन-मानस में उतारने का जो विश्वव्यापी अभियान उत्पन्न किया गया, उसके फलस्वरूप, इस देश में ही नहीं- लगभग संसार के सभी देशों में करोड़ों व्यक्ति निष्ठापूर्वक गायत्री उपासना में संलग्न हो सके। गायत्री तपोभूमि की स्थापना, गायत्री परिवारों का संगठन, अलभ्य गायत्री साहित्य का निर्माण, गायत्री यज्ञों की देशव्यापी श्रृंखला आदि प्रयत्नों के आधार पर इस दिशा में जितना कार्य हुआ है, उसका मूल्याँकन आज नहीं हो सकता, उसे तो भावी इतिहासकार ही आंकेंगे। अभी तो हमें इतना जान लेना ही पर्याप्त है कि युग-निर्माण के शुभारम्भ के लिए उपासनात्मक प्रक्रिया की अनिवार्य आवश्यकता थी, उसका प्रचलन एक संतोषजनक सीमा तक हो चुका। अब इसका विशेष प्रयोग इस दस वर्षीय अभियान के लिए करना है, जिसका आरम्भ इसी बसंत पंचमी- 3 फरवरी 1968 शनिवार से होने जा रहा है।
गायत्री व्यक्तिगत उपासना भी है पर उसे सामूहिक प्रयत्नों में भी सर्वोपरि सफलता के साथ प्रयुक्त किया जा सकता है। इस महामन्त्र का “नः” शब्द यही इंगित करता है कि गायत्री व्यक्ति को ही नहीं समाज को भी- समूह को भी- पलट देने में- सुधार देने में समर्थ है। यह क्षमता और किसी मन्त्र में नहीं। इसलिए उसे गुरु मन्त्र के साथ-साथ राष्ट्र मन्त्र भी कहा गया है। युग-निर्माण प्रक्रिया में इसका उपयोग अनिवार्य रूप से आवश्यक है यही सोच कर गत् बीस वर्षों से इस संदर्भ में अथक प्रयत्न करके उसे लोक मानस में एक सुपरिचित तथ्य बना दिया गया। अब नवनिर्माण कार्यक्रम में उसका विशेष प्रयोग किया जाना है।
दिसम्बर अंक के अन्तिम लेख में गायत्री यज्ञों का दस वर्षीय उपासनात्मक कार्यक्रम छपा है। 200 शाखाओं द्वारा 5-5 कुण्डों के गायत्री यज्ञ होते रहने से हर वर्ष 1000 कुण्डों का एक वैसा ही महायज्ञ सम्पन्न होता रहेगा जैसा सन् 58 में मथुरा में किया गया था। ऐसे यज्ञों की तुलना- अश्वमेध यज्ञ से की जाती है। त्रेता में भी दस अश्वमेध यज्ञ आसुरी वातावरण को निवृत्ति के लिये गंगा तट पर काशी में किये गये थे, जिनकी स्मृति और साक्षी ‘दशाश्वमेध घाट’ अभी भी बना हुआ है। अब पुनः उस पुण्य प्रयोजन की पुनरावृत्ति हो रही है। सन् 68 से लेकर सन् 78 तक यह क्रम चलेगा। हर वर्ष एक खण्ड सहस्र कुण्डी यज्ञ- अश्वमेध- सम्पन्न होगा। इसके लिए समस्त शाखाओं से पूछा गया है कि क्या इस प्रकार का संकट उठाने में समर्थ है? बात केवल साहस-भर की है। सफलता तो अज्ञात शक्ति दिलायेगी। व्यक्ति बेचारा क्या कर सकता है। संकल्प पुरुषार्थ और साहस की परख हो रही है। जहाँ आत्मबल होगा वहाँ और सब कुछ ठीक हो जायेगा। 200 संकल्प माँगे गये हैं आधा है वे जल्दी ही प्राप्त हो जायेंगे।
यज्ञ 200 स्थानों पर हुआ करेंगे, पर उस महासंकल्प के मूल में गायत्री जप भी सम्मिलित रहेगा। यों लगभग 24 लाख व्यक्तियों को गायत्री की विधिवत दीक्षा दी गई है। पर इस अभियान में केवल 24 हजार साधकों को निमन्त्रित किया गया है। जो दस वर्ष तक युग-निर्माण अभियान के भागीदार की हैसियत से 10 वर्ष तक एक माला गायत्री महामन्त्र का जप नित्य करते रहने का संकल्प ले सकें ऐसे 24 हजार व्यक्ति ही आमन्त्रित किये गये हैं। आशा है यह संख्या भी जल्दी ही पूरी हो जायेगी। इसमें कोई बीज मन्त्र नहीं लगाना है। साधारण गायत्री मन्त्र जब भी सुविधा हो- दिन में किसी भी समय एक माला जप कर सकते हैं। जब के बाद “यह एक माला युग-निर्माण अभियान की सफलता के लिए है।” ऐसा उच्चारण कर देना चाहिये। एक माला जप करने के बाद युग-निर्माण सत्संकल्प का एक पाठ अवश्य किया जाना चाहिए ताकि जप करने वाले को यह पता चलता रहे कि आखिर यह ‘युग-निमार्ण योजना’ है क्या जिसके लिए वे जप साधना कर रहे हैं। जिस दिन स्नान न बन पड़े उस दिन आपत्ति धर्म के रूप में मानसिक जप करके भी काम चलाया जा सकता है। इस प्रकार यह भागीदारी हर नर-नारी- बाल-वृद्ध के लिए अति सरल बना दी गई है।
24 हजार भागीदारी द्वारा एक माला नित्य जप करने से प्रति दिन 24 लाख जप होते हैं। हर दिन एक 24 लक्ष अनुष्ठान ‘अखण्ड-ज्योति परिवार’ के सदस्यगण करेंगे। यह क्रम दस वर्ष तक जारी रहेगा। यह सामूहिक जप इतना प्रखर- इतना प्रबल और इतना समर्थ हो जायेगा कि इसके फलस्वरूप अन्तरिक्ष में युग बदल देने वाली अदृश्य शक्ति पर्याप्त मात्रा में आविर्भूत होगी और विश्व-मंगल के लिए आशाजनक परिणाम उत्पन्न करेगी।
कहना न होगा कि व्यक्तिगत पृथक-पृथक प्रयासों की अपेक्षा- सामूहिक सम्मिलित प्रयत्नों का परिणाम- अत्यधिक मात्रा में होता है। अलग-अलग मन के कुछ महत्व नहीं रखते पर एक सूत्र में पिरोई हुई माला में बँध कर वे गौरवान्वित होते हैं। अलग-अलग रह कर सीकें वह काम नहीं कर सकतीं जो एक बुहारी में बँधने पर करती हैं। अलग बूँदों का क्या महत्व, पर मिल जाने पर वे एक विशाल जलाशय के रूप में परिलक्षित होती हैं। सम्मिलन से जो सामूहिक शक्ति उत्पन्न होती है उसका उतना ही बड़ा लाभ हर इकाई को मिलता है। जिन बूँदों से मिल कर समुद्र बना है, इकट्ठी हो जाने के बाद उनमें से हर बूँद परिपूर्ण समुद्र का गौरव लाभ करती है। कुटुम्ब के हर सदस्य को परिवार की सम्मिलित शक्ति का पूरा-पूरा लाभ मिलता है। इसी प्रकार इन 24 हजार भागीदारों का एक आध्यात्मिक सम्मिलित कुटुम्ब बनेगा और उसकी सम्मिलित शक्ति का लाभ हर सदस्य उठा सकेगा। उससे उसका आत्मबल भी बढ़ेगा और समूहगत नव-निर्माण प्रक्रिया को भी सफलता मिलेगी।
सक्रिय सदस्य दिसम्बर-जनवरी में यह प्रयत्न करें कि अपने क्षेत्र में जो भी गायत्री उपासक हों उन तक यह सन्देश पहुँचा दें और जो एक माला जप के भागीदार होना चाहें, उनके पूरे पते तथा हस्ताक्षर एक ही कागज पर इकट्ठे कर लें और उस संग्रह को बसन्त पंचमी को श्रद्धांजलि के रूप में मथुरा भेज दें। हर सक्रिय सदस्य अपने संपर्क परिवार में से 10 भागीदार संग्रह करले और आगे उनकी नियमितता की देख-भाल रखे रहने का भी भार अपने ऊपर रखे। जो टूट जाय उनके स्थान पर नये उत्पन्न करता रहे- तो 2400 सक्रिय गायत्री उपासकों द्वारा 2400 भागीदार स्थिर रखे जा सकते हैं।
24000 सक्रिय कार्यकर्ता इस प्रतिदिन 24 लक्ष अनुष्ठान के जप यज्ञ में यजमान- अध्वर्यु- माने जायेंगे। उनके जिम्मे इस भागीदार उत्पन्न करके और उनकी देखभाल रखने की- टूटने पर नये उत्पन्न करने की जिम्मेदारी रहेगी। इस प्रकार 24 लक्ष जप प्रतिदिन बड़ी सरलता और व्यवस्थापूर्वक सम्पन्न होता रहेगा।
‘अखण्ड-ज्योति’ का प्रत्येक सदस्य अध्वर्यु भागीदार के रूप में इस जप अनुष्ठान में किसी न किसी भाँति भाग लेगा, ऐसी आशा है।
यज्ञ के दो पक्ष हैं एक भावनात्मक दूसरा वैज्ञानिक, भावना पक्ष में त्याग, सेवा, उदारता, प्रेम, परोपकार को यज्ञ कहते हैं। जिन कार्यों से मनुष्य स्वयं कष्ट उठा कर भी दूसरों को सुखी बनाने का प्रयत्न करता है वे सभी यज्ञ श्रेणी में आते हैं। भारतीय संस्कृति इसी प्रकार के तत्व ज्ञान से ओत-प्रोत है, इसलिए उसे यज्ञ संस्कृति कहते हैं।
यज्ञ का दूसरा पक्ष वैज्ञानिक है। भौतिक विज्ञान की पहुँच केवल पंच तत्वों तक- पदार्थ परमाणुओं तक है, पर यज्ञ विज्ञान जड़ और चेतन के बीच की एक विचित्र विज्ञान पद्धति है। जड़ पदार्थों और चेतन यन्त्रों के समन्वय से एक ऐसी शक्ति उत्पन्न होती है जो प्रकृति को आवश्यकताओं के अनुरूप झुकाने और मानवीय अन्तःकरण में अभीष्ट स्फुरण भरने में समर्थ है। यज्ञ द्वारा प्राणप्रद वर्षा, रोगों कीटाणुओं का शमन, वायु शुद्धि, सशक्त उत्पादन की अभिवृद्घि आदि लाभ प्रसिद्ध हैं। इसके अतिरिक्त मनुष्य की व्यक्तिगत प्रवृत्तियों को सुधारने और सामूहिक विचार धाराओं को मोड़ने में भी यज्ञ प्रक्रिया का महत्वपूर्ण योगदान है। यज्ञ एक सर्वांगपूर्ण चिकित्सा पद्धति है जिसके द्वारा शरीर के विभिन्न अवयवों में समाये विभिन्न रोगों का निराकरण हो सकता है और मानसिक दोष दुर्गुणों का, प्रकृति और प्रवृत्ति का परिवर्तन किया जा सकता है। दुर्गुणी व्यक्ति यज्ञ के सान्निध्य से सद्गुणी बन सकते हैं। यदि थोड़ा प्रयत्न किया जाय तो प्राचीन काल की तरह एक सर्वतन्त्र समर्थ ऐसा चिकित्सा शास्त्र विनिर्मित हो सकता है जो मनुष्यों की शारीरिक ही नहीं-मानसिक चिकित्सा में भी जादू जैसा काम करे और मानव जाति को महान संकटों से छुड़ाये।
सामूहिक मनोवृत्तियों का संशोधन एवं परिष्कार करने में यज्ञ की अपनी अद्भुत उपयोगिता है। यदि वातावरण में कुत्सित दुष्प्रवृत्तियाँ भर गई हों तो उनके समाधान में यज्ञ-उपचार एक कारगर उपाय के रूप में प्रयुक्त हो सकता है। प्राचीन काल में ऐसा होता भी रहा है। रावण द्वारा फैलाई हुई अनीति से विक्षुब्ध वातावरण का समाधान करने के लिए भगवान राम ने दस अश्वमेध यज्ञ किये थे। कौरवों की अनीति से उत्पन्न विक्षोभ के शमन को एक यज्ञ प्रयोग भगवान कृष्ण ने महाभारत समाप्त होते ही कराया था। राजनीतिक विकृतियों के समाधान के लिए राजसूय और नैतिक विकृतियों के निवारण के लिए वाजपेयी यज्ञों की प्रथा प्राचीन काल में प्रचलित थी। सामूहिक मनोभूमि का परिष्कार ऋषि मुनि इन्हीं आयोजनों द्वारा किया करते थे। ताँत्रिक एवं सकाम यज्ञों से व्यक्तिगत लाभ हानि के परिणाम उत्पन्न करने वाले यज्ञों का भी विधान है।
यहाँ यज्ञ की चर्चा ‘युग-निमार्ण-अभियान’ के संदर्भ में की जा रही है। गायत्री को माता और यज्ञ को पिता कहा गया है। दोनों का अविच्छिन्न युग्म है। एक दूसरे के पूरक हैं। गायत्री अनुष्ठानों की पूर्णता यज्ञ आहुतियों के साथ जुड़ी हुई है। 24 वर्ष में सम्पन्न हुये अपने 24 लाख के 24 महा पुरश्चरणों की पूर्णाहुति हमें भी सहस्र कुण्डी गायत्री महा यज्ञ के साथ सम्पन्न करनी पड़ी थी। अब जबकि प्रति दिन 24 लक्ष गायत्री जप करने का आयोजन दस वर्ष के लिए इस बसन्त पंचमी से आरम्भ किया जा रहा है तो उसके साथ यज्ञ आयोजन भी जुड़ा हुआ रखना पड़ेगा। अस्तु 5-5 कुण्डी के 200 यज्ञ हर वर्ष कर के सहस्र कुण्डी एक खंड यज्ञ की व्यवस्था चालू करनी होगी। समर्थ शाखाओं से इसके लिए अनुरोध किया गया है। बात छोटी-सी है, जिनमें साहस और आत्मबल होगा वे उसे बड़ी आसानी से पूरा कर लेंगे। दैवी कार्य में दैवी सहायता मिलना सुनिश्चित है। शर्त केवल इतनी-सी है कि नीयत साफ हो और पुरुषार्थ में कमी न रखी जाय।
इन पंच कुण्डी यज्ञों का अपना एक विशेष स्वरूप होगा और विशेष लक्ष्य। पाँच कुण्डी रखने का मोटा लाभ तो यह है कि कम समय में अधिक व्यक्ति यज्ञानुष्ठान में सम्मिलित हो सकते हैं। एक कुण्ड की यज्ञशाला में एक बार में 7 से अधिक व्यक्ति नहीं बैठ सकते। पर पाँच कुण्डी यज्ञशाला में बीच में 7 और किनारे वाले कुण्डों में 4 × 4 = 16, इस प्रकार 25 व्यक्ति एक साथ बैठ सकते हैं। 100 व्यक्तियों को आहुतियाँ देनी हों तो 4 पारी में लगभग ढ़ाई घंटे में कार्य पूरा हो सकता है। एक ही कुण्ड हो तो इसी कार्य में चौगुना समय चाहिए। इसके अतिरिक्त अपनी पंचवर्षीय योजना और पंचसूत्री योजना के कार्यक्रम का प्रतीक भी एक-एक कुण्ड है। व्यक्ति निर्माण के लिए हमें पाँच कार्यक्रम अपनाने हैं और पाँच योजनाएँ ही सामूहिक योजनाएँ हैं। अस्तु हर एक का प्रतिनिधित्व एक कुण्ड करेगा। पंचमुखी गायत्री में पाँच कोषों के अनावरण का संकेत भी कुण्डों की इस संख्या से होता है। देखने में जन-संकुल ऐसी यज्ञशाला शोभायमान लगती है। इसका सुसज्जित मण्डप भी कलात्मक और आकर्षक ढंग से बनाया जा सकता है। एक यज्ञशाला के छाया उपकरण तथा पत्र, कलश आदि सामान अन्य यज्ञों में काम आते रह सकते हैं। इस प्रकार खर्चे में भी बचत हो सकती है।
स्मरण रखना चाहिए कि केवल पंचकुण्डी गायत्री यज्ञों के ही यह आयोजन नहीं हैं वरन् इनके साथ ‘युग-निर्माण-योजना’ भी जुड़ी हुई है। इस योजना के अंतर्गत बिना सम्मेलन का कोई यज्ञ न होगा। “युग-निर्माण योजना सहित गायत्री यज्ञ” के इन आयोजनों में आहुतियों तथा पूजा उपचार के विधान के साथ-साथ उसकी आत्मा सद्बुद्धि की प्रेरणा को भी जोड़ रखा गया है। यह आयोजन तीन दिन चला करेंगे और तीनों दिन यज्ञ कार्य के साथ-साथ विचार परिवर्तन की पुण्य प्रक्रिया का सुव्यवस्थित आयोजन रहा करेगा। कर्मकाण्ड शरीर है और प्रशिक्षण आत्मा। इस तथ्य को पूरी तरह ध्यान में रखा जायेगा। आधा ध्यान- आधा श्रम- आधा समय- आधा धन- यज्ञ कार्य में और आधा ध्यान, समय, धन तथा श्रम सम्मेलन में लगाया जायेगा। गायत्री महामन्त्र के अंतर्गत जिस उत्कृष्ट विचारणा का और गायत्री महायज्ञ के अंतर्गत जिस त्याग, तप तथा सत्कर्मों की प्रेरणा है उसे उपस्थित लोगों को हृदयंगम कराने का प्रभावशाली प्रयत्न किया जाना चाहिए। आयोजन की यही आत्मा है। कर्मकांड के इस प्रशिक्षण में ही सार्थकता है।
पिछले दिनों लोग देवताओं को प्रसन्न करने के लिए आहुतियों की व्यवस्था पर सारा ध्यान लगाते रहे हैं और उसी में सारा समय तथा धन खर्च करते रहे हैं। इन आयोजनों से लाभ तथाकथित ‘पंडित’ नाम धारियों का होता रहा है। आहुतियों में थोड़ा-सा खर्च करा के वे ही लोग वस्त्र, पात्र, दान, दक्षिणा, भोजन आदि के नाम पर अपने और अपने साथियों के लिए समेट ले जाते रहे हैं। जिसे लाभ नहीं मिला उसने कोई न कोई दोष, निषेध निकाल कर लोगों को वरगलाया और अश्रद्धा उत्पन्न की। इस प्रकार यज्ञ पंडितों के हाथ की कठपुतली बने रहे। जहाँ चाहा उनने बनाया, जहाँ चाहा बिगाड़ा। आयोजन की धनराशि में से कितना बड़ा अंश वे हड़प लें, इसी के दाव-घात लगाते रहे। जहाँ दाल न गली वहाँ तरह-तरह के विघ्न उत्पन्न करते रहे। अपने यज्ञों को इस जंजाल में ये पूर्णतया मुक्त रखा जाना है। अपने सामूहिक यज्ञ एक केन्द्र से, एक स्थान से, एक संकल्प के अंतर्गत, एक आचार्यत्व में चल रहे हैं। उनके आरम्भ का शुभारम्भ शुभ मुहूर्त में हो चुका है। अन्यत्र जहाँ कहीं यह आयोजन होंगे वहाँ वे अंग अथवा अंश मात्र होंगे। इसलिए उनमें पृथक पुरोहित ब्रह्मा, आचार्य अथवा मुहूर्तों की आवश्यकता न पड़ेगी। एक नारियल आचार्य के स्थान पर प्रतिष्ठापित कर- बाकी सब सदस्य मिल-जुल कर निर्धारित हवन पद्धति के अनुसार-सामूहिक मन्त्रोच्चार के साथ सारी व्यवस्था बना लिया करेंगे। इस प्रकार पूर्ण शास्त्रसम्मत पद्धति भी बन जायेगी और विघ्नकर्ताओं के जंजाल से उसे मुक्त रखा जा सकेगा। अपने में से कोई प्रशिक्षित व्यक्ति बड़ी आसानी से यज्ञ की सारी व्यवस्था बड़ी सुन्दरतापूर्वक जमा लिया करेंगे, और स्वल्प व्यय में सारी प्रक्रिया उत्तमतापूर्वक सम्पन्न हो जाया करेगी। इस कार्य में (1) गायत्री यज्ञों की विधि व्यवस्था (2) गायत्री यज्ञ की व्याख्या, पुस्तकें समुचित मार्गदर्शन कर सकती हैं।
युग-निर्माण सम्मेलन में प्रवचन सुनने के लिए अधिकाधिक व्यक्तियों को अनुरोधपूर्वक- व्यक्ति रूप में आमन्त्रित करके बुलाना चाहिये और प्रवचनों की पूर्ण व्यवस्था ऐसी करनी चाहिये जिससे सुलझे मस्तिष्क के कुशल वक्ता नव निर्माण की विचारधारा का ठीक तरह प्रतिपादन कर सकें। स्थानीय प्रगतिशील विचारधारा के लोगों को नव निर्माण विचारधारा का साहित्य देकर उन्हें व्यक्ति तथा समाज के पुनरुत्थान विषय पर प्रवचन की तैयारी करने को कहा जा सकता है। तथाकथित सन्त, महन्त, कीर्तनकार, कथा-वाचक प्रवचन का पेशा करने के कारण जगह-जगह बुलाये जाते हैं। पर उनकी विचारधारा सर्वथा प्रतिगामी, पलायनवादी, भाग्य समर्थक, परावलम्बी एवं पुरातन पंथी होती है। वे पौराणिक किस्से, कहानी सुनाकर लोगों का मनोरंजन तो कर देते हैं पर उनमें काम की बात कुछ नहीं होती वरन् प्रतिगामिता-भरी बातें जन-मानस में उलटे अन्ध-विश्वास उत्पन्न करती है। अतएव उनसे बचना ही श्रेयस्कर है चूँकि यज्ञ एक धर्म कृत्य है इसलिए आमतौर से धार्मिक कहे जाने वाले लोग ही ऐसे अवसरों पर प्रवचन करने के लिए बुला लिए जाते हैं। समाज और संस्कृति का यह दुर्भाग्य ही है कि जहाँ अन्य धर्मावलंबी पुरोहित वर्ग अपने वर्गों में प्रबल प्रेरणाएँ भरता है वहाँ हिन्दू समाज के तथाकथित धर्म-वक्ता अत्यन्त सड़ी-गली बेसिर पूँछ की- प्रतिगामी बकवास करके सुनने वालों में उलटे बुद्धि भ्रम उत्पन्न करते हैं। कथा, पुराणों के नाम पर आमतौर से हमें यह जंजाल सुनने को मिलता है जिससे सुनने वालों का तनिक हित साधन होने की सम्भावना नहीं। अतएव हमें युग-निमार्ण-सम्मेलन के लिए समय से बहुत पूर्व ऐसे प्रगतिशील वक्ता तलाश कर रखने चाहिये जो नव निर्माण विचारधारा को भली प्रकार समझते हों और उसे ठीक ढंग से प्रतिपादित करने के लिए मनोयोग पूर्वक देर से तैयारी कर रहे हों। यह भूलना न चाहिए कि अपना उद्देश्य नये संसार की अभिनव रचना करना है। अतएव निर्धारित धर्म-वक्ता को बुला कर यदि हम प्रतिगामी विचारधारा जनता को देने लगे तब तो समझना चाहिए कि सारा गुड़ गोबर ही होगा। किसी को जन-मनोरंजन की कला आती है और धार्मिक माना जाता है इन दो ड़ड़ड़ड़ के आधार ही किसी को युग निर्माण सम्मेलन की डडडड वेदी पर नहीं बिठाया जाना चाहिये।
इन सम्मेलनों के लिए अधिकारी वक्ता और गायक गायत्री तपोभूमि में तैयार किये जा रहे हैं। सुविधानुसार यहाँ से भी बुलाये जा सकते हैं। अन्यथा स्थानीय अथवा समीपवर्ती क्षेत्र से कोई प्रवचन कला में प्रवीण व्यक्ति अपना विषय, अपना साहित्य कुछ समय पूर्व देकर प्रवचन के लिए प्रस्तुत कराये जा सकते हैं। अपनी गीत पुस्तकों में से मिशन के अनुरूप गा सकने वाले संगीतज्ञ भी इसी प्रकार तैयार किए जा सकते हैं। निदान, सम्मेलन की विचार दिशा निर्धारित लक्ष्य के पूर्णतया अनुकूल रहनी चाहिये। सुनने वाले एक विशेष प्रकाश लेकर जायें, युग-निर्माण की भावना मनोभूमि में उगा, जमा सके तो ही यह समझना चाहिए की सम्मेलन सफल हुआ। अन्यथा धर्म प्रवचनों के नाम पर जिस प्रकार मनोरंजन मात्र देकर जनता को प्रतिगामिता की ओर धकेला जाता है वैसा ही यहाँ पर होने लगा तो समझना चाहिये कि गायत्री और यज्ञ दोनों की आत्मा के साथ मखौल मात्र करके एक तमाशा खड़ा किया गया।
इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुये पंच-कुण्डी गायत्री यज्ञ और युग-निर्माण सम्मेलन के सम्मिलित तीन दिवसीय आयोजन जहाँ भी सम्भव हो वहाँ उत्साह पूर्वक किये जाँय। अच्छा हो नियत तिथियों पर हर साल नियत स्थानों में ऐसे आयोजन होते रहें। आवश्यकता हो तो स्थान बदले भी जा सकते हैं पर जिनने संकल्प लिये हैं वे एक आयोजन हर साल करते रहने की व्यवस्था किसी न किसी प्रकार बना लिया करें। ब्रह्म-भोजों, प्रीति-भोजों का झंझट न पाला जाय। बाहर से आने वाले अतिथियों के ठहराने, भोजन-भर की व्यवस्था की जाय। इस प्रकार के बिलकुल छोटे आयोजन तो कम में भी हो सकते हैं पर यदि कुछ अच्छा आयोजन करना हो तो हवन, पण्डाल, बिछावन, इश्तहार, माइक, रोशनी, प्रवचन, प्रसाद आदि में 500) से 1000) तक खर्च करने से काम चल सकता है। अधिक बड़ा आयोजन हो तो अधिक धन भी खर्च हो सकता है। हर हालत में मितव्ययिता के काम डाले जाय, क्योंकि आज अन्न की कमी है। वनस्पतियों की सामग्री ही काम में लाई जाय। घी के स्रुवा छोटे छेद के रख कर उसमें भी थोड़ी किफायत की जा सकती है। आहुतियों की संख्या नियत नहीं की गई है इसलिए जहाँ अधिक किफायत करनी पड़े वहाँ हर कुण्ड पर दो व्यक्ति-एक घी एक सामग्री वाला बिठा कर भी काम चलाया जा सकता है। शेष लोग पूर्णाहुति की आहुति डालें और मन्त्र बोलें तो भी काम चल सकता है।
गायत्री उपासना के साथ-साथ सामूहिक गायत्री मन्त्रों का भी प्रसार होना चाहिये। द्रव्य यज्ञ भी और ज्ञान यज्ञ भी दोनों की संकुलित व्यवस्था रहे तो हमारे यह आयोजन अन्तरिक्ष में यह आध्यात्मिक चेतना उत्पन्न कर सकते हैं जिनके आधार पर जन-मानस को उत्कृष्टता की दिशा दी जा सके और सम्मिलित होने वालों को एक नया प्रकाश मिल सके। शास्त्र ने यज्ञ को श्रेष्ठतम सत्कर्म कहा है। आज की परिस्थितियों में जिस उद्देश्य से, जिस आधार पर, जिस स्तर के इन युग-निर्माण सम्मेलनों सहित गायत्री यज्ञों का आयोजन किया जा रहा है वे अपनी उपयोगिता के कारण निस्संदेह सर्वोपरि सत्कर्म हैं। इन आयोजनों का साहस हर सचेतन और समर्थ केन्द्र द्वारा किया जाना चाहिये ताकि अपना हर वर्ष सहस्र कुंडी खण्ड यज्ञ करने का- दस वर्ष में दस अश्वमेध यज्ञ करने का संकल्प पूर्ण हो सके। इसका परिणाम हर आयोजक के लिए परम मंगलमय परिणाम उत्पन्न करेगा।
मनुष्य जैसा कुछ दिखाई पड़ता है-समाज का जैसा भी कुछ स्वरूप है, वह उसमें सन्निहित तात्कालिक विचारधाराओं का प्रतिबिंब मात्र है। मान्यताएँ एवं आस्थाएँ ही हैं जो अन्तःकरण में आकाँक्षा, प्रेरणा बनकर विकसित होती है और उन्हीं के आधार पर क्रिया-कलापों का सृजन होने लगता है। व्यक्ति जो कुछ करता दिखाई पड़ता है वस्तुतः उसकी जड़ में वे मान्यता ही हैं जो उसके अन्तःकरण में बद्धमूल होकर प्रतिष्ठापित हो गई हैं। विभिन्न मनुष्यों और विभिन्न समाजों के बीच क्रियाकलाप एवं रहन-सहन का जो स्तर दिखाई पड़ता है उसका कारण और कुछ नहीं उनकी आस्थाओं में सन्निहित भिन्नता मात्र ही है। जिन आदर्शों और मान्यताओं को मनुष्य अपना लेता है, उसी के अनुरूप उसकी गतिविधियों का सृजन होता रहता है।
सन्त इमरसन ने एक महत्वपूर्ण भविष्य-वाणी की थी कि “भविष्य में संसार से युद्धों का अन्त सदा के लिए हो जायेगा” उनका कथन था कि आज लोगों के मनों में शत्रु, आक्रमण, योद्धा, संपत्ति, संघर्ष, विजय की जो विचारणा उत्पन्न और प्रतिष्ठापित करदी गई है वही युद्धों का कारण है। भविष्य में विश्व-बन्धुत्व, विश्व-नागरिकता, विश्व परिवार के विचार उत्पन्न होंगे और विजय के स्थान पर त्याग और सेवा में लोग रस लेने लगेंगे। तब कोई किसी का शत्रु न रहेगा। हर कोई किसी की सहायता करने की बात सोचेगा। मानवीय प्रकृति में इस प्रकार का अंतर लाया जाना पूर्णतया संभव है। संसार का बुद्धिजीवी वर्ग प्रबल प्रयत्नों के द्वारा यह कर सकता है। विचारधाराओं और आस्थाओं के परिवर्तन के साथ-साथ मनुष्य की प्रकृति बदल आयेगी। फलतः युद्धों का भी अन्त हो जायेगा।”
यह भविष्य-वाणी केवल कल्पना नहीं एक सुनिश्चित सचाई है। भविष्य में जन-मानस का वन निर्माण होगा। विचार-क्राँति का एक तूफान आयेगा और उस तूफान में आज की समस्त कुंठाएं और विकृतियाँ हलके-फुलके तिनकों की तरह उड़ कर तितर-बितर हो जायेंगी। नये विचारों के अनुरूप नया समाज बनेगा। नया व्यक्ति ढलेगा। नई परम्परायें प्रतिष्ठापित होंगी और नई गतिविधियों की नई हलचलें सर्वत्र दृष्टिगोचर होने लगेंगी।
यह सोचना ठीक नहीं कि वर्तमान कुत्सित मान्यताओं में मनुष्य को कोई सुविधा, आकर्षण, सुख अथवा लाभ है और भावी उत्कृष्ट विचारधाराएँ अपनाने पर उसे असुविधाओं एवं कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा, इसलिए लोग वर्तमान रीति-नीति छोड़ कर नई रीति-नीति अपनाने के लिए प्रस्तुत न होंगे। सचाई कुछ दूसरी ही है। आज की मान्यताएँ जीवन को बहुत ही भारी, बहुत ही खर्चीला, बहुत उलझा हुआ और कष्टसाध्य बनाए हुए हैं। इस भार को ढोने में उसकी कमर टूटी जा रही है। बाहर से कोई जरा भी शौक-मौज की बात भले ही कहले, करले पर अन्तरंग खोल कर देखा जाय जो वहाँ कष्ट, व्यथा, कुढ़न, झुँझलाहट, अशाँति, खीज और असन्तोष के अतिरिक्त और कुछ है ही नहीं। हर स्तर का व्यक्ति अपने अन्तरंग में अपने ढंग की लगभग ऐसी ही स्थिति बनाये बैठा है। अपने साथियों से-अपनी परिस्थितियों से-किसी को सन्तोष नहीं है। बाह्य और अन्तरंग जीवन में हर व्यक्ति असंतुष्ट पाया जायेगा।
चूँकि उत्कृष्ट विचारों की दुनियां का व्यावहारिक स्वरूप हमारी आँखों के आगे स्पष्ट नहीं है, वैसी स्थिति देखने को कहाँ मिले- कहीं वैसे दृश्य आँखों के आगे नहीं आते, इसलिए बात पूरी तरह समझ में नहीं आती। यदि कहीं ऐसा समाज अथवा वातावरण सामने आ जाय जिसे देखकर उत्कृष्ट जीवन की सुविधाओं का अनुमान लगाया जा सके तो निश्चित रूप से लोग उन स्थितियों में अपने को बदलने के लिये तैयार हो जायेंगे और यह अनुभव स्पष्टतया करेंगे कि कुत्सित आस्थाओं को लेकर भारभूत जीवन जीने की अपेक्षा उत्कृष्ट विचारणाओं को अपना कर जीना कितना सरल, सुखद, शाँति और उल्लास से परिपूर्ण है। वह दिन आयेगा-लाया जायेगा-जबकि लोग निकृष्टता की कष्टकर विभीषिका ही हानि को समझेंगे और उसे घृणापूर्वक परित्याग करेंगे। वह दिन आयेगा-लाया जायेगा-जबकि लोग उत्कृष्टता की सुखद सम्भावनाओं का मूर्तिमान देखेंगे और उसे निष्ठापूर्वक हृदयंगम करने के लिए तत्पर होंगे। नवयुग बदला हुआ दृष्टिगोचर होगा। तब सन्त इमर्सन की भविष्य-वाणी के अनुसार केवल युद्धों का ही अन्त नहीं होगा, वरन् रोग, शोक, ईर्ष्या, उद्वेग, अभाव, असन्तोष आदि सभी विकृतियों का समाधान हो जायेगा। तब मनुष्य परस्पर परिपूर्ण स्नेह सद्भाव के साथ रहेंगे। उन परिस्थितियों में मनुष्य को देवता और समाज को स्वर्ग कहने-मानने-में किसी को कोई आपत्ति न रह जायेगी।
यह परिवर्तन तोप, तलवारों से संभव नहीं। दण्ड, कानून के प्रतिबन्धों का प्रभाव केवल शरीर पर पड़ता है। शरीर रोक, रखा जाय और मन प्रतिकूल दिशा में चले तो वह प्रतिबन्ध देर तक कायम नहीं रह सकते। मनुष्य इतना चतुर है कि अपनी अन्तरंग आकाँक्षाओं की पूर्ति के लिये प्रतिबन्धों को तोड़ कर कोई न कोई गुप्त-प्रकट मार्ग निकाल लेता है। किसी को मार भी डाला जाय तो उसकी आत्मा नये जन्म में फिर उन्हीं पूर्व संचित संस्कारों के अनुरूप काम करना शुरू कर देती है। व्यक्ति का परिवर्तन उसके विचारों का परिवर्तन ही है। आस्थाएँ बदलने से व्यक्ति का दृष्टिकोण बदलता है और उसकी सारी क्रिया पद्धति ही बदल जाती है। जो व्यक्ति आज नरक में पड़ा हुआ है- दूसरों को नरक में घसीट रहा है- वह यदि भावनात्मक स्तर पर पलटा खा जाय तो उसकी सारी गतिविधियाँ उलटी हो सकती हैं। वही अपने लिए स्वर्गीय दृष्टिकोण सृजन करके उत्कृष्ट जीवन जी सकता है और अपने समीपवर्ती वातावरण में स्वर्गीय सुगन्ध से हर किसी को आनन्द विभोर कर सकता है। असली परिवर्तन दृष्टिकोण का-विचारधाराओं का परिवर्तन ही है, जिसके आधार पर व्यक्ति ही नहीं समाज संसार और युग सब कुछ बदला जा सकता है।
जन आस्थाएँ बदलने के लिए ऐसे दृश्य और अवसर विनिर्मित किए जाने चाहिये जिन्हें प्रत्यक्ष देख कर लोग यह अनुमान लगा सकें कि उत्कृष्ट विचारणाएँ एवं आस्थाएँ किस प्रकार की परिस्थितियाँ उत्पन्न कर सकती हैं। यह प्रयोग और परीक्षण लोगों को वस्तुस्थिति समझाने में सहायक सिद्ध होंगे। ऐसे आश्रमों की, परिवारों की, छात्रावासों की, सहकारी निर्वाह समितियों की स्थापना इस दृष्टि से बहुत उपयोगी रहेगी, जिसमें उत्कृष्ट जीवन स्तर के दृष्टिकोण सम्पन्न व्यक्ति साथ-साथ रह कर उत्कृष्ट जीवन जियें और उपलब्ध सुविधाओं की जानकारी सर्व साधारण को देकर उन्हें वैसे ही अनुकरण की प्रेरणा दें। लोग बुरी बातों की नकल कर सकते हैं तो अच्छाई की भी नकल करेंगे। बुराई से अच्छाई की शक्ति अधिक है। इसलिए बुराई जिस तेजी से फैलती है अच्छाई यदि ठोस तथ्यों पर आधारित हो तो उससे भी अधिक तेजी के साथ फैल सकती है।
पर यहां तो बहुत आगे की बात हो गई। अभी तो हमें क-ख-ग-घ शुरू करना है। उत्कृष्ट मनोभूमि के लोग हैं कहाँ, जिनका समूह एकत्रित किया जाय? उत्कृष्टता एक दिन में पैदा नहीं होती वह बहुत समय के स्वाध्याय, सत्संग, चिंतन, मनन से क्रमशः उत्पन्न और परिपक्व होती है। जो भावावेश में एक ही क्षण दुर्जन से सज्जन बन जाते हैं उन्हें फिर फिसल कर दूसरे ही दिन अपनी पुरानी जगह पहुँचने में देर नहीं लगती। इसलिए नई दुनियाँ बसाने के लिए आज जो क्रम शुरू किया जाता है वह यह है कि उत्कृष्टता की विचारणा का वैज्ञानिक और बुद्धिसंगत, तर्क और प्रयासों से परिपुष्ट स्वरूप जन साधारण की मनोभूमि तक पहुँचाने के लिए अथक प्रयत्न किया जाय।
पिछले दिनों धर्म और अध्यात्म की शिक्षा शास्त्र वचन, ऋद्धि-सिद्धि, देवता की प्रसन्नता, स्वर्ग-मुक्ति जैसे पारलौकिक अप्रत्यक्ष आधारों पर दी जाती रही है। अभी भी कथा प्रवचनों का वही आधार चल रहा है। इस बुद्धिवादी युग में वे आधार अप्रामाणिक माने जा रहे हैं और उनकी उपेक्षा की जा रही है। इस उपेक्षा के पीछे एक कारण धर्म का वह स्वरूप भी है जो किसी समय श्रद्धालु मनोभूमि के लिए समाधानकारक रहा होगा पर आज बुद्धिवादी युग में तर्क और प्रमाण की कसौटी पर अपनी उपयोगिता सिद्ध नहीं कर पाता। फलतः लोग उसे संदिग्ध प्रामाणिक एवं काल्पनिक कहकर उपेक्षा में डाल देते हैं। धर्म का वास्तविक स्वरूप वैसा पोला नहीं है जैसा कि आज समझा और समझाया जाता है। उसके पीछे ठोस आधार है। तर्क, प्रमाण और सच्चाई के आधार पर धर्म में अध्यात्म के सिद्धांत पूरी तरह खरे हैं। आवश्यकता इस बात की है कि समय के अनुरूप बुद्धिसंगत ढंग से उस उत्कृष्ट विचारधारा को प्रस्तुत किया जाय। यह आवश्यकता और ठीक ढंग से पूरी की जा सके तो कोई कारण नहीं कि वर्तमान पीढ़ी उसे स्वीकार न करे। साम्यवाद की नई विचारधारा बुद्धि संगत ढंग से प्रस्तुत की गई तो मास वर्ष के भीतर संसार की आधी से अधिक आबादी ने उसे स्वीकार ही नहीं कार्य रूप में परिणत करना भी आरम्भ कर दिया। अध्यात्मवाद-साम्यवाद की तुलना में कहीं अधिक स्थायी, कहीं अधिक उत्कृष्ट- कहीं अधिक सर्वांगपूर्ण- कहीं अधिक भावनात्मक है। इसलिए यदि उसे बुद्धिसंगत ढंग से प्रस्तुत किया जा सके तो कोई कारण नहीं कि जनता उसे स्वीकार न करे और लोक रीति में उसे उचित स्थान न मिले।
‘युग-निर्माण-योजना’ के अंतर्गत इसी महत्वपूर्ण कार्य को सर्वोपरि तत्परता के साथ हाथ में लिया गया है। उत्कृष्टता की अध्यात्म विचारधारा को आज की परिस्थितियों के साथ मिलाकर इस ढंग से विनिर्मित किया जा रहा है कि उसे हर व्यक्ति ठीक तरह समझ सके और उसकी उपयोगिता स्वीकार कर सके। नई दुनियाँ बना सकने योग्य- उत्कृष्ट विचारधारा के निर्माण का कार्य जिस ढंग से किया जा रहा है उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा हर विचारशील और दूरदर्शी बुद्धिजीवी ने की है। यह तथ्य एक स्वर से स्वीकार किया जा रहा है कि युग-निर्माण की विचारधारा यदि ठीक तरह समझी और समझाई जा सके तो निश्चित रूप से लोगों के दृष्टिकोण बदल सकते हैं, उन्हें नए ढंग से सोचने का आधार मिल सकता है। इस आधार पर व्यक्ति और समाज की नई गतिविधियों का- नई रीति-नीतियों का सृजन किया जा सकता है।
ऐसी विचारधाराओं के निर्माण का कार्य अत्यन्त सस्ते और अत्यन्त प्रेरक साहित्य के रूप में ‘युग-निर्माण योजना’ के केन्द्रीय कार्यालय द्वारा किया जा रहा है। 200 के लगभग निबन्ध तथा 100 के करीब जीवन-चरित्रों की ट्रैक्ट सीरीजें प्रस्तुत हो चला। और भी बहुत कुछ लिखा जाने को है। अनेक भाषाओं में इनके अनुवाद की तैयारियाँ हैं। पर लिखते या छापते चलने से ही कुछ काम नहीं बनने वाला है। इससे भी अधिक महत्वपूर्ण कार्य है-इन विचारों को जन-जन के मन-मन तक पहुँचाने की प्रचार प्रक्रिया। यदि उसकी व्यवस्था न हो सकी तो यह सारी लिखाई, छपाई कूड़े-कचरे के ढेर में पड़ी सड़ती रहेगी और चूहे दीमकों की खुराक बन कर-पंसारियों के यहाँ रही की पुड़ियाओं में बँध कर नष्ट हो जायगी। निर्माण जितना महत्वपूर्ण है-प्रसार उससे भी महत्वपूर्ण है। निर्माण एक या कुछ व्यक्ति भी कर सकते हैं पर प्रसार के लिए तो अनेक व्यक्तियों का श्रम एवं मनोयोग चाहिये। यदि हम यह व्यवस्था ठीक तरह बना सकें तो समझना चाहिए कि व्यक्ति-निर्माण की समाज-निर्माण की एक बहुत बड़ी मंजिल पार करली।
यह भली-भाँति समझ लिया जाना चाहिए कि व्यक्ति और कुछ नहीं विचारणाओं और आस्थाओं का प्रतीक मात्र है। उसकी समस्त गतिविधियों उसकी अन्तःनिष्ठा की प्रतिबिंब है। समाज व्यक्तियों का समूह ही तो है। जिस स्तर के व्यक्ति होंगे समूह समाज भी वैसा ही होगा। यदि हमें उत्कृष्ट व्यक्ति, उत्कृष्ट-समाज एवं उत्कृष्ट युग अपेक्षित हो तो उसका एकमात्र उपाय यही है कि हर मनुष्य की उत्कृष्ट विचार-धाराओं से लगातार सम्बन्ध रखने की एक सुनियोजित व्यवस्था बनाई जाय। उत्कृष्ट विचारणाओं से प्रभावित व्यक्ति ही- उत्कृष्ट रीति-नीति स्थिर रूप से अपना सकते हैं और उन्हीं की संख्या वृद्धि उत्कृष्टता के नये युग का सृजन कर सकती है।
मनुष्य का सरल सुखद और उल्लासपूर्ण जीवन जिस कारण कष्ट-साध्य, विक्षुब्ध और अभावग्रस्त बना हुआ है वह और कुछ नहीं केवल कुत्सित दृष्टिकोण ही है। हमारी विचार पद्धति उल्टी हो गई है। समस्याओं पर जिस ढंग से सोचना चाहिए उस ढंग से नहीं सोचते। सोचते उस तरह हैं जिस तरह नहीं सोचना चाहिये। कुछ ऐसा बुद्धिभ्रम इन दिनों उत्पन्न हो गया है कि दिशा भूलकर लक्ष्य से ठीक उल्टी दिशा में हम चल पड़े हैं। फलस्वरूप जो मिलना चाहिए था वह नहीं मिल रहा है और वह मिल रहा है जिसकी न आवश्यकता है और न उपयोगिता। इस बुद्धि-भ्रम ने ही हमें भूल-भुलैयों में भटकाया और जंजालों में उलझाया है। इस उलझन से निकलने के लिये बुद्धि-भ्रम का निराकरण करने के अतिरिक्त और कोई भी ऐसा मार्ग नहीं।
जिस दिन हम सही ढंग पर विचार करना और सही आधारों का अपनाना आरम्भ करेंगे उसी दिन हमारी शारीरिक, मानसिक, आर्थिक, पारिवारिक, सामाजिक, राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय समस्याओं का समाधान बड़ी सरलता-पूर्वक हो जायेगा। इस युग की यही सबसे बड़ी आवश्यकता है। स्वस्थ विचारों की प्रतिष्ठापना करके ही समर्थ व्यक्ति और समर्थ समाज की रचना की जा सकती है। औंधे विचारों को पलटकर सही विचार का साहस जन-साधारण में उत्पन्न करना- यही हमारी उस विचार-क्रान्ति का स्वरूप है जो नये युग का- नये व्यक्ति का- नये समाज का- नव-निर्माण करने में समर्थ हो सकती है। संक्षिप्त में विचार-क्रान्ति ही इस युग की सर्वोपरि आवश्यकता और साधना है।
युग-निर्माण योजना का प्रथम सृजन और प्रथम चरण यही है। जिन उत्कृष्ट सम्भावनाओं के स्वप्न हम देखते हैं उनका बीजारोपण विचार क्रान्ति के द्वारा ही सम्भव है। अपना ज्ञान-यज्ञ अभियान इसी प्रयोजन की पूर्ति के लिये है। इस पुण्य प्रयोजन में सम्मिलित- भागीदार होने के लिए ‘अखण्ड-ज्योति’ के समस्त परिजनों का आह्वान इसीलिये किया गया है कि वे अग्रणी बनकर नव प्रभात का यह संचार करें जिससे अगले क्षणों हर किसी को प्रखर प्रकाश से लाभान्वित होने का अवसर मिल सके।
एक छोटी साधना हममें से हर एक को अनिवार्य रूप से करनी है कि अपने संपर्क के लोगों को विचार शुद्धि के लिए प्रयत्नपूर्वक विवश करें। युग-निर्माण योजना के अंतर्गत जिन साहित्य का सृजन किया जा रहा है वह अपने ढंग का अभिनव, अद्भुत है। यों धर्म, सदाचार, अध्यात्म आदि के नाम पर बहुत विचार और बहुत साहित्य उपलब्ध हैं, पर ‘युग-निर्माण’ की विचारणा अपने आपमें मौलिक है। उसके अंतर्गत युग की हर समस्या पर सूक्ष्म विवेचन किया गया है और समाधान इस ढंग से उपस्थित किया गया है जिसे बेजोड़ कहा जा सकता है। प्रचलित कुत्सित मान्यताओं पर पग-पग पर प्रहार किये गये हैं और नीर-क्षीर विवेक की एक स्वस्थ दृष्टि, लोक मानस को प्रदान की है। यह विचारणा हर मस्तिष्क को- हर दिल को- झकझोर डालने में समर्थ है। व्यक्ति को बदल देने की, उसके विचारों और क्रिया-कलापों को उलट देने की परिपूर्ण क्षमता इस विचारणा में विद्यमान है।
अस्तु, ज्ञान-यज्ञ के अंतर्गत हमें स्वयम् स्वाध्यायशील बनना है। बहुत ध्यानपूर्वक दोनों पत्रिकाओं और ट्रैक्टों को पढ़ना है ताकि अपना अन्तरंग और बहिरंग जीवन सुदृढ़ आधार पर विनिर्मित करने की प्रेरणा मिल सके। इसके साथ ही परिवार के हर शिक्षित अशिक्षित सदस्य को इस विचारणा के संपर्क में लाने का पूरा-पूरा प्रयत्न करना है। जो शिक्षित हैं उन्हें अनुरोध और आग्रहपूर्वक इस विचार पद्धति को पढ़ने समझने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए और जो पढ़े नहीं हैं उन्हें सुनाने के लिये परिवार गोष्ठी का आयोजन किया जाना चाहिये। निबन्ध व ट्रैक्ट, जीवन चरित्र, कथा साहित्य सभी में रोचकता है। यदि उसे प्रतिदिन सुनाने का क्रम ठीक तरह जमा लिया जाय तो परिवार का हर सदस्य अधिक सुनने के लिये स्वयं लालायित रहने लगेगा और सुनाने के लिए आग्रह करेगा। परिवार के सदस्यों के विचार बदलने से ही अपना विचार परिवर्तन समग्र माना जा सकता है। अन्यथा एक घर में रहने वालों की दिशायें ही जब पृथक-पृथक हों तो सम्मिलित रहना एक विडम्बना मात्र रह जायेगा। परिवार का आनन्द तब है जब सब के विचार एक से हों और उस एकता में भी उत्कृष्टता समाई हुई हो। ऐसे परिवारों में ही स्वर्गीय आनन्द रहता है। ज्ञान-यज्ञ के हर अध्वर्यु को अपने परिवार के साथ इस प्रकार का प्रयत्न करना ही चाहिये। जिस प्रकार घर के लोगों के लिये भोजन, वस्त्र, दवा, शिक्षा, मनोरंजन आदि का प्रबन्ध करते हैं उसी प्रकार उनके भावनात्मक उत्कर्ष के लिये उत्कृष्ट विचारणा उपलब्ध करने का भी साधन अवश्य जुटाना चाहिये।
मित्रों और परिचितों से मिलना होता ही है। काम की और बेकाम की बहुत-सी बातें उनसे की जाती हैं। इसी संदर्भ में युग-निर्माण विचारणा की चर्चा, प्रशंसा भी की जा सकती है और उनमें उत्सुकता उत्पन्न कर तद्विषयक पुस्तकें पढ़ने दी जा सकती है। यह कार्य लगता ही रूखा और झंझट जैसा है, वस्तुतः व्यवहार में अति सरल और आकर्षक है। दो-चार अंक या ट्रैक्ट मनोयोग से पढ़ने के बाद ही मित्रों की चर्चा का विषय वही बन जाता है और फिर बातचीत का प्रधान विषय वही रहने लगता है। इस प्रकार दिशा के मुड़ने में अपना, मित्रों का और समस्त संसार का लाभ है। थोड़ा प्रयत्न किया जाय तो मित्रों में नव-निर्माण की विचारणा का प्रवेश कोई भी बड़ी आसानी से करा सकता है। यह कराया ही जाना चाहिये।
दस पैसा प्रतिदिन इस प्रयोजन के लिये निकालते रहना उन्हें तनिक भी कष्टकर प्रतीत न होगा जिन्होंने उत्कृष्ट विचारणा का महत्व और उसके द्वारा उपस्थित होने वाले महान् सत्यपरिणाम को ठीक तरह समझ लिया है। हाँ, जिनकी समझ में यह तथ्य आया ही नहीं, उन्हें आर्थिक तंगी का- फुरसत न मिलने का बहाना बनाकर झूठा आत्म-सन्तोष कर लेने में संकोच न होगा। वे इसे झंझट भी समझेंगे और बेकार भी मानेंगे। ‘अखण्ड-ज्योति’ के पाठकों की मनोभूमि इतनी घटिया नहीं हो सकती। इसलिये उनसे सहज ही आशा की जायेगी कि ज्ञान-यज्ञ में भागीदार रहकर अपना, अपने परिवार का, अपने मित्रों का भावनास्तर ऊँचा उठाने में निश्चित रूप से तत्पर रहेंगे और इस महान् प्रयोजन के लिये एक घण्टा समय और इस पैसा रोज खर्च करने में संकोच न करेंगे। प्रसन्नता की बात है कि यह प्रक्रिया लगभग सभी परिजनों ने अपना ली है, जो शेष हैं वे इस बसन्त पंचमी से अपना लेंगे, यह आशा सहज ही की जा सकती है।
ज्ञान-यज्ञ का यह वैयक्तिक स्वरूप हुआ। इसे और भी बड़ा रूप मिल जाना चाहिए। हर केन्द्रीय स्थान पर, हर, कस्बे में कम से कम एक रिटायर्ड सुशिक्षित, स्वाध्यायशील व्यक्ति ऐसा उत्पन्न किया जाना चाहिए जो परमार्थ बुद्धि से महान कार्य में अपना पूरा समय लगाने लगे। प्रातःकाल से लेकर मध्याह्न अथवा तीसरे पहर तक उन्हें अपना झोला-पुस्तकालय लेकर अपने क्षेत्र के शिक्षित व्यक्तियों के पास जाना चाहिए और नवनिर्माण साहित्य का महत्व समझाकर उनमें पढ़ने की उत्सुकता उत्पन्न करनी चाहिए। तब जिस व्यक्ति की जैसी मनोभूमि हो, उसके अनुरूप उसे वह पुस्तक पढ़ने देनी चाहिए। मनुष्य की रुचि, प्रवृत्ति और आवश्यकता के अनुरूप साहित्य देने का मनोविज्ञान जिसकी समझ में आ गया वह घर-घर में उत्सुक रहने वाले पाठक उत्पन्न कर लेगा। जो यह न समझ सका, रुचि से विपरीत साहित्य बाँटने लगा वह असफल रहेगा। उसकी उपेक्षा होगी और श्रम व्यर्थ चला जायेगा। इसलिये आरंभ पाठक की रुचि और आवश्यकता को देखकर करना चाहिए और पीछे धीरे-धीरे सभी साहित्य पढ़ाने की स्थिति लानी चाहिए। अध्यापक, अध्यापिकाएं, वयस्क छात्र और छात्राएं इस साहित्य के अच्छे पाठक हो सकते हैं। इस वर्ग में पहुँचने का विशेष रूप से प्रयत्न किया जाना चाहिए। युवक समाज में यह साहित्य अधिक लोकप्रिय होता है। जिन्हें पढ़ने में रुचि नहीं, जिनकी उम्र ऐसे ही बीत चुकी, ऐसे लोगों में उत्सुकता उत्पन्न करना कठिन तो अवश्य है पर असम्भव नहीं।
प्रातःकाल वे प्रचारक महोदय इस प्रकार झोला पुस्तकालय कन्धे पर लटकाकर निकलें और लोगों की सुविधा के समय का ध्यान रखते हुए उनसे मिलें। पुस्तकें पढ़ने देने और वापिस लेने का काम चलावें। साँयकाल किसी मन्दिर, पार्क, चौराहे, घाट अथवा हाट बाजार में जहाँ सुरुचिपूर्ण व्यक्तियों का अधिक आवागमन रहता हो एक स्थान नियत कर अपनी दुकान लगा लिया करे। दुकान के चारों ओर आकर्षक बोर्ड लगे हों, जो उस साहित्य का महत्व बताते हों। सुसज्जा का ध्यान रखने से आकर्षण बढ़ता है और लोगों का ध्यान खिंचता है, इस तथ्य को जो भी ध्यान में रखेगा वह अधिक ग्राहक प्राप्त करेगा। जो पुस्तक देखे उसे आवश्यक जानकारी भी देते रहा जाय तो अधिक पुस्तकें ग्राहक को थमाई जा सकती हैं। जहाँ सम्भव हो निश्चित दुकान भी खोली जा सकती है। पहियेदार गाड़ी पर भी दुकान लगाई जा सकती है। हर जगह एक प्रशिक्षित प्रचारक ऐसा होना ही चाहिए जो नवनिर्माण के सत्साहित्य को लोगों तक पहुँचाने में अपनी सारी सामर्थ्य लगाता रहे। झोला-पुस्तकालय में मुफ्त पुस्तकें पढ़ने वाले भी अक्सर प्रिय लगने वाली पुस्तकें खरीदते रहते हैं। उनमें जो अधिक प्रभावित हो उन्हें कुछ किफायत खर्च करके अपने घर में नवनिर्माण पुस्तकालय रखने की प्रेरणा की जा सकती है। इस तरह भी कुछ साहित्य बिकता रह सकता है।
भविष्य में इन साहित्य प्रचारकों के माध्यम से हर क्षेत्र में सुविधापूर्वक साहित्य पहुंचाया जाना संभव होगा। इसलिए प्रयत्न हर जगह कम से कम एक प्रचारक उत्पन्न करने का किया जाय। उनके लिए कमीशन की व्यवस्था भी की गयी है। जिससे हाथ खर्च के लिए थोड़ी आजीविका भी मिलती रह सके। यों यह कार्य कोई बहुत बड़े लाभ का नहीं है, बड़ी कमाई के उत्सुक व्यक्तियों को इसमें कुछ विशेष आकर्षण नहीं है, पर जो लोग मंगल की दृष्टि से- मानवीय दृष्टिकोण के परिष्कार की दृष्टि से यह कार्य करेंगे उन्हें आत्मसन्तोष बहुत अधिक होगा। जो थोड़ी-सी आजीविका मिल जायेगी उसे भी वे एक दिव्य प्रसाद समझ कर सन्तुष्ट रह सकेंगे। जिन्हें इस कार्य में रुचि हो, वे कमीशन आदि के संबंध में पत्र व्यवहार कर सकते हैं।
जहाँ पूरा समय देने वाले प्रचारक न मिल सकें, वहाँ सामान्य पुस्तक विक्रेता अथवा दूसरे दुकानदार अपने यहाँ अन्य वस्तुओं के साथ-साथ यह साहित्य भी विक्रय के लिए रख सकते हैं। पर ध्यान यही रखना होगा कि यह साहित्य अपने आप कम ही बिकेगा। जहाँ रखा जाय वहाँ आकर्षक ढंग से काँच की आलमारी आदि में सजाया जाय। ग्राहकों को उसका महत्व समझाया जाय और खरीदने पढ़ने का अनुरोध किया जाय तभी उसे लोगों के गले उतारा जा सकता है। जिनमें इस प्रकार की प्रतिभा हो केवल वे ही इस प्रचार की- विक्रय की बात सोचें। बहुत सीधे, संकोची, बातचीत करने में झिझकने वाले जिन्होंने पूरी तरह यह साहित्य पढ़ा न हो, वे प्रचारक बनने की बात न सोचें। उन्हें सफलता न मिलेगी। क्योंकि यह जनता की माँग का साहित्य नहीं है, इसे तो किसी प्रकार लोगों के गले मढ़ना है। जिनमें इतनी चतुरता हो वे ही इस उलझन भरे कार्य में सफल हो सकते हैं।
ज्ञान यज्ञ को अधिकाधिक व्यापक बनाया जाना चाहिए। हममें से हर व्यक्ति, व्यक्तिगत रूप से तो इस पुण्य प्रयोजन में एक घण्टा समय और दस पैसा प्रति दिन लगावे ही। साथ ही सामूहिक प्रचार कार्य की व्यवस्था भी हर जगह होनी चाहिए। एक छोटी दुकान, एक रिटायर्ड प्रचारक हर स्थान पर नियमित रूप से काम करे तो समझना चाहिए कि विचार क्रांति की दिशा में एक बहुत बड़ा परिवर्तन हो चला। और नवनिर्माण की आधारशिला मजबूती के साथ रख जाने की व्यवस्था बन गई।
प्रशिक्षण में दो वस्तु काम करती हैं- एक विचार दूसरा प्राण। विचार सुदूर प्रदेशों तक आसानी से जा पहुँचते हैं किन्तु प्राण की एक निर्धारित सीमा है। वह एक समीपवर्ती सीमित क्षेत्र तक ही अपना प्रभाव छोड़ता है इसलिए प्रेरक प्रशिक्षण के लिए सत्संग एवं सान्निध्य की भी आवश्यकता पड़ती है। विचारों को रेडियो, टेपरिकार्डर आदि वाणी माध्यमों द्वारा, अथवा पत्र, पुस्तक आदि लेखन माध्यमों द्वारा, सुदूर स्थानों तक भेजा जा सकता है। व्यक्ति के न रहने पर भी यह माध्यम किसी मनस्वी व्यक्ति के विचारों द्वारा चिरकाल तक लोगों तक पहुँचते रहते हैं। व्यासजी अब नहीं हैं पर उनकी विचारधारा महाभारत द्वारा- वाल्मीकि की रामायण द्वारा और वशिष्ठ की योगवशिष्ठ द्वारा हम अभी भी प्राप्त कर सकते हैं। किन्तु उन प्रखर आत्माओं द्वारा अपने मुख से अपने समीपवर्ती लोगों को जो कुछ स्वयं सुनाया, सिखाया होगा, उसका लाभ अब प्राप्त नहीं किया जा सकता। क्योंकि अब वे विचार ही उपलब्ध हैं, उन प्राणवानों का प्राण तिरोहित हो गया। अतएव सान्निध्य में ही जो उपलब्ध हो सकता है उस प्राण का लाभ प्राप्त कर सकना हमारे लिए कठिन है।
ऋषियों के आश्रम में गाय-सिंह एक घाट पानी पीते हैं। किन्तु आश्रम से दूर चले जाने पर उसी जंगल में उनका स्वाभाविक बैर फिर उभर आता है और अवसर मिलने पर वही सिंह उसी गाय को चीर-फाड़ कर खा जाता है। कारण स्पष्ट है। ऋषि का प्राण एक सीमित क्षेत्र में- आश्रम की परिधि में उसी प्रकार सक्षम था जैसे भट्टी की गर्मी हवा को थोड़ी दूर तक ही गरम रखती है। वह दायरा समाप्त होते ही विशेषता रहित सामान्य स्थिति आ जाती है। भगवान श्रीकृष्ण ने जो उपदेश अर्जुन को दिये थे वे शब्द अभी भी हमें पढ़ने सुनने को गीता में मिल जाते हैं, पर कृष्ण के व्यक्तित्व और सान्निध्य का प्रभाव पाकर अर्जुन को जो प्रकाश एवं उत्साह मिला था वह हमें नहीं मिलता क्योंकि अब केवल विचार ही उपलब्ध हैं- वह प्रेरक प्राण जो उस समय मौजूद था इस समय प्राप्त नहीं। फलस्वरूप गीता का वह लाभ नहीं मिल पाता जो अर्जुन को मिला था। भगवान बुद्ध के प्रवचन अभी भी उपलब्ध हैं पर उन्हें सुन कर कितने अंगुलिमाल साधु और कितनी अम्बपाली साध्वी बन पाती होंगी, कुछ कहा नहीं जा सकता। नारद की शिक्षायें पुस्तकों में लिखी हैं पर उन्हें सुन कर कोई ध्रुव, प्रहलाद, वाल्मीकि जैसी करवट ले पाता होगा यह कहना कठिन है, क्योंकि अब उनके विचार ही उपलब्ध हैं- प्राण नहीं। और यह तथ्य स्पष्ट है कि विचार ही नहीं प्राण भरा व्यक्तित्व भी प्रभाव प्रेरित करने में अपनी उपयोगिता रखता है।
नालन्दा विश्वविद्यालय में प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए संसार-भर के छात्र इसलिए भी आते थे कि वहाँ महामनीषी आचार्यों का व्यक्तित्व विद्यमान था। सुकरात की पाठशाला में राजकुमार पढ़ने आते थे। ऋषियों के गुरुकुलों में उच्च परिवारों के बालक पढ़ने जाते थे, इसलिए नहीं कि पढ़ाई कोई और नहीं पढ़ा सकता था वरन् कारण यह था कि तेजस्वी व्यक्तियों का सान्निध्य अपने आप में एक शिक्षा है। वे वाणी से एक शब्द भी न पढावें तो भी परोक्ष रूप से एक प्रेरक प्रभाव छोड़ते हैं और उस प्रभाव से प्रभावित व्यक्तियों को एक नया प्रकाश, एक नया प्रभाव प्राप्त करने का अवसर मिलता है। यह बीजाँकुर कालान्तर में उन प्रभावित व्यक्तियों को अनेक प्रकार उत्कर्ष प्राप्त करने की सुविधा प्रदान करता है।
संस्कारवान आत्माओं की मूर्च्छा जगाते और स्फुरण भरने के उद्देश्य से एक विशेष तपश्चर्या में चले जाने का हमारा समय अब समीप आ पहुँचा है। केवल साड़े तीन वर्ष शेष हैं। इस अवधि में हमारी यह उत्कट अभिलाषा है कि ‘अखण्ड-ज्योति’ के परिजनों को कुछ समय अपने पास रखकर प्रशिक्षण प्रदान करें। अब घूमना-फिरना हमारे लिए कठिन दिखता है। शरीर अभी से गड़बड़ी फैलाने लगा है। विचार था कि इस अवधि में देशव्यापी दौरा करके परिवार के समस्त परिजनों से मिलने भेंटने का क्रम बनायेंगे, पर अब वह बनता नहीं दिखता। अब इस अवधि का उपयोग गायत्री तपोभूमि में रहकर परिजनों के प्रशिक्षण में करेंगे। अतएव विचार यही किया गया है कि कुछ कार्यक्रमों के अंतर्गत विभिन्न परिस्थितियों और मनोभूमियों के परिजनों को मथुरा बुलाया जाय और उन्हें वह प्राणपूर्ण प्रकाश प्रदान किया जाय जो दूर रहकर केवल पत्र पुस्तकों के माध्यम से प्रदान कर सकना सम्भव नहीं हो सकता।
एक प्रशिक्षण क्रम किशोर बालकों और युवकों के लिए एक वर्षीय प्रशिक्षण का बनाया गया है जो जेष्ठ में गायत्री जयन्ती से आरंभ होकर उसी तिथि तक चला करेगा। इसमें जीवन जीने की कला प्रशिक्षण प्रमुख है। साथ ही कुछ शिल्प भी जोड़ दिए गए हैं ताकि इस शिक्षा के साथ-साथ स्वावलंबनपूर्वक आजीविका कमाने की बात भी सिखाई जा सके। पहले सोचा गया था कि तीन वर्षीय और चार वर्षीय शिक्षण क्रम भी चलाये जायें, पर तपोभूमि में स्थान की कमी है। लम्बी अवधि के शिक्षणों में वह स्थान थोड़े ही छात्र घेरे रहेंगे और बहुत से उत्सुक छात्र उस लाभ से वंचित रह जायेंगे। इसलिए थोड़ों को बहुत लाभ देने की अपेक्षा बहुतों को थोड़ा-थोड़ा लाभ देने की बात अधिक उपयुक्त समझी गई। तदनुसार अब यही तय हुआ है कि एक वर्ष के ‘जीवन क्रिया’ प्रशिक्षण चला करें। इनमें अपने परिवार के जितने युवक किशोरों के लायक स्थान है उतने हर वर्ष बुला लिए जाया करें और उन्हें शिल्प गौण रूप से और जीवन कला प्रधान रूप से सिखा कर एक आदर्श व्यक्ति- नर-रत्न बनाने का प्रयत्न किया जाया करे। इस प्रशिक्षण में एक बहुत ही भावनाशील कर्मठ इंजीनियर भोपाल पोलिटैकनिक में लेक्चरार की ऊँचे वेतन की गजेस्ट्रेड पोस्ट छोड़कर रूखी रोटी खाने के लिए गत एक वर्ष से तपोभूमि में आ गये हैं। श्री बीरेस्वर उपाध्याय इस ‘युग निर्माण विद्यालय’ के प्राचार्य हैं। भगवानदास सुर्यवंशी और श्री केशवदेव उपाध्याय जैसे सज्जनों ने भी अपनी अच्छी नौकरियाँ छोड़कर सेवा भाव से इस विद्यालय के संचालन में अपनी सेवायें दी हैं और अध्यापन कार्य कर रहे हैं। यह ‘टीम’ छात्रों को एक सुसंस्कृत नागरिक ढालने के साथ-साथ शिल्प शिक्षा का उत्तरदायित्व प्रधान रूप से उठाये हुये है। हमारा प्रत्यक्ष और परोक्ष शिक्षण तो है ही। आशा की जानी चाहिये कि जो भी छात्र, एक वर्ष यहाँ रहकर जायेंगे वे अपने साथियों की तुलना में बहुत कुछ ऊँचे स्तर की स्थिति में पहुँचेंगे और अपना तथा अपने परिवार का सच्चे अर्थों में हित साधन करेंगे।
‘युग-निर्माण विद्यालय’ के शिल्प विभाग में चार शिक्षण हैं।
(1) प्रेस सम्बन्धी परिपूर्ण जानकारी जिसके आधार पर स्वयं अपना प्रेस चलाना, किसी प्रेस का मैनेजर बनना अथवा कोई नौकरी पा लेना सरल हो सकता है। प्रेस का उद्योग ऐसा है जो 5-6 हजार की छोटी पूँजी में आरंभ किया जा सकता है। और आसानी से 200 रुपये मासिक के करीब आजीविका हो सकती है। घर के भाई-भतीजों को इस काम में खपाया जा सकता है और स्त्री बच्चे तक को बाइंडिंग की मजूरी मिलती रह सकती है। अगले दिनों शिक्षा प्रसार के साथ-साथ प्रेस काम भी बढ़ने वाला है। इसलिए उद्योग के न तो फेल होने की आशंका है न महंगी सस्ती के चक्कर में घाटा पड़ने की सम्भावना है। सम्मान का पेशा है। नौकरी करनी हो तो भी कम्पोज छपाई आदि की नौकरी कहीं भी मिल सकती है। जो व्यापारिक रहस्य कहीं भी नहीं सिखाये जाते वे हमारे यहाँ इस तरह बता दिये जाते हैं जिनसे सफलता असंदिग्ध हो सके।
(2) दूसरा प्रशिक्षण बिजली विभाग का है। बिजली का करोबार अब दिन-दिन बढ़ फैल रहा है। बिजली से चलने वाले हर तरह के यंत्रों की, मोटरों की मरम्मत, फिटिंग, सुधार, निर्माण, मशीनों में बिजली की फिटिंग आदि हर कार्य भले प्रकार व्यवहारिक और सैद्धांतिक रूप से समझा दिया जाता है। पंखा, रेडियो, हीटर, मोटर आदि बिजली की मुलम्मासाजी, हर बिजली के यन्त्र की ऐसी जानकारी करा दी जाती है जिससे इन सब यन्त्रों को सुधारना लगाना एवं बनाना सम्भव हो सके। इस कारीगरी को जानने वाला कोई भी व्यक्ति कहीं भी अच्छी आजीविका कमाने में सफल हो सकता है। बहुत ही कम पूँजी में इस प्रकार की दुकान खोल सकता है।
(3) कुटीर उद्योगों में- प्लास्टिक के फाउन्टेन पेन, पेन्सिल, खिलौने, बटन, शीशी बनाना। नहाने और धोने के साबुन बनाना। फिनायल, वैसलीन, बूट पालिश, तरह-तरह की स्याहियाँ, माथे की बिंदी आदि रासायनिक वस्तुएँ बनाना। मोजे बुनने की मशीनें चलाना, फीते बुनना, तरह-तरह के खिलौने बनाना, नट-बोल्ट, पेच, कब्जे आदि डाई यन्त्र से बनने वाली बीसियों चीजें काटना। लकड़ी की खराद पर तरह-तरह की वस्तुएं बनाना। जैसे कुटीर उद्योग आदि सिखाये जाते हैं। अभी इस विभाग में ऐसी छोटी-छोटी और भी बिजली तथा हाथ से चलने वाली मशीन लगाई जा रही हैं जो एक हजार से कम पूँजी में चल सकें और चलाने वाले को अच्छी आजीविका दे सकें।
(4) गृह-शिल्प- इसमें घरेलू काम-काज की हर जानकारी दी जायेगी। सूती, ऊनी, रेशमी कपड़ों की सिलाई, धुलाई, रँगाई, रफू करना, बर्तनों की मरम्मत, रँजाई, भलाई, कलई करना। लालटेन, गैस बत्ती, स्टोव आदि की मरम्मत। पलँग, चारपाई तरह-तरह की डिजाइन से बुनना। टूटी चारपाइयों की मरम्मत। ऊनी स्वेटर बुनना। मकानों की पुताई, किवाड़ तथा फर्नीचरों की रँगाई तथा वार्निश, फाउन्टेन पेन, टार्च आदि की मरम्मत, घड़ीसाजी, निर्धूम चूल्हा, दुर्गंध रहित टट्टी, वाष्प द्वारा भोजन पकाना, घर में पुष्प और शाक-भाजी का उत्पादन, घरेलू औषधियाँ आदि अनेक परिवार उपयोगी क्रिया-कौशल।
यह चार वर्ग शिल्प शिक्षण के रहेंगे। इनमें से प्रेस और बिजली के प्रमुख हैं। इनमें से एक में विशेषता प्राप्त करनी होगी। शेष तीन की सामान्य जानकारी करा दी जायेगी। इस तरह एक प्रकार से बीस-तीस छोटे शिल्पों का सामान्य ज्ञान और एक बड़े शिल्प का विशेष ज्ञान उपलब्ध करने वाला छात्र किन्हीं भी परिस्थितियों में कहीं भी अपनी आजीविका अर्जित कर सकता है। उसकी निर्माण बुद्धि का ऐसा विकास हो सकता है जिसके आधार पर उसकी सूझ-बूझ रचनात्मक कार्यों में गतिशील होकर सफलता की अनेक सम्भावनाएँ प्रशस्त कर सके।
जीवन जीने की कला- जिसमें शारीरिक, मानसिक, पारिवारिक, आर्थिक, धार्मिक, आध्यात्मिक, सामाजिक, साँस्कृतिक, राजनीतिक समस्याओं का समाधान और सुख शांतिमय प्रगतिशील जीवन की सभी कुंजियां उपलब्ध की जा सकती हैं। इस शिक्षण की अपनी विशेषता है। शिल्प भी यों आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है पर वस्तुतः यह शिक्षा ‘जीवन निर्माण’ की ही है जिसकी उपयोगिता एवं महत्ता संसार की अन्य किसी सफलता एवं विभूति के साथ नहीं तोली जा सकतीं।
विचार यह है कि इन चार वर्षों में 60 छात्र प्रति वर्ष के हिसाब से 240 छात्रों का एक वर्षीय प्रशिक्षण हम अपनी देख-रेख में चलायेंगे। यों यह विद्यालय तो पीछे भी चलता रहेगा पर 240 घरों में 240 छात्ररूपी ऐसे चन्दन वृक्ष हम अपने हाथों लगा जाना चाहते हैं जिनकी सुगन्ध से वह परिवार, नगर एवं क्षेत्र सुवासित होता रहे। अस्तु परिवार के हर सदस्य से कहा गया है कि हर घर से कम से कम एक छात्र एक वर्ष के लिए हमें अवश्य दिया जाय। समझ लेना चाहिये लड़का 1 वर्ष फेल हो गया। पीछे उस छूटी हुई शिक्षा में भर्ती किया जा सकता है। यह एक वर्ष किसी भी छात्र के जीवन में एक ऐसी अनुपम उपलब्धि सिद्ध हो सकता है जिसे वह आजीवन स्मरण रखे और सराहे।
यह शिक्षा पूर्णतया निःशुल्क है। शिक्षा, रोशनी, पलंग, फर्नीचर, पुस्तकालय आदि का कोई खर्च नहीं। हां भोजन, वस्त्र का अपना खर्च स्वयं करना होगा। दो-दो छात्र मिल कर भोजन बना लेते हैं, इसमें किफायत भी रहती है और सुविधा भी। हर स्तर के छात्र अर्थ व्यवस्था के अनुरूप निर्वाह की व्यवस्था बना सकें और भोजन बनाना भी सीख लें इस दृष्टि से यह पद्धति अधिक उपयोगी सिद्ध हुई है।
इस वर्ष का प्रथम सत्र चल रहा है। अगला सत्र जेष्ठ- जून से आरम्भ होगा। इसके लिए नियमावली तथा आवेदन-पत्र मँगाकर इच्छुक छात्रों का दाखिला अभी से करा लेना चाहिए। सीमित स्थान और शिक्षार्थियों की संख्या अधिक रहने से पूर्व ही स्थान प्राप्त कर लेना उत्तम है।
जिन्हें घर-गृहस्थी चलानी पड़ती है, नौकरी व्यवसाय आदि की जिम्मेदारियाँ उठानी पड़ती हैं, उन्हें अधिक समय इस प्रकार के प्रशिक्षण के लिए नहीं मिल सकता। किशोरों एवं युवकों की पीठ पर बड़े लोग कमाने वाले होते हैं इसलिए वे एक वर्ष के लिए घर से बाहर जा सकते हैं, पर उत्तरदायित्व से व्यस्त व्यक्तियों के लिए यह सम्भव नहीं। किन्तु शिक्षण तो उन्हें भी मिलना चाहिए। सान्निध्य का आनन्द पूरा नहीं तो अधूरा ही हम लोग उठा सकें ऐसा रास्ता निकालना चाहिए। इसके लिए शिविरों की श्रृंखला नियोजित की गई है।
दो शिविर जेष्ठ में और दो अश्विन में 9-9 दिन के करते रहने का क्रम बनाया गया है। जेष्ठ बदी दौज से लेकर गंगा दशहरा तक एक शिविर होगा। एकादशी की छुट्टी पुरानों के जाने और नयों को आने के लिए रहेगी। जेष्ठ शुक्ल 12 से आषाढ़ बदी 5 तक दूसरा शिविर रहेगा। चूंकि गायत्री तपोभूमि में स्थान कम और आगन्तुकों की संख्या बहुत ज्यादा रहती है इसलिए आधे-आधे दो बार में बाँट दिए जाते हैं। 9 दिन में एक 24 हजार का लघु गायत्री अनुष्ठान हो जाता है। घर में रहकर सवा लक्ष अनुष्ठान करने की अपेक्षा इस सिद्ध पीठ में रहकर करने पर यह 24 हजार का लघु अनुष्ठान ही अधिक फलप्रद होता है। प्रति दिन जप यज्ञ के अतिरिक्त दोनों समय दो मार्मिक प्रवचन होते हैं, जिनसे व्यावहारिक अध्यात्म का एक श्रृंखलाबद्ध पद्धति सुनियोजित प्रशिक्षण किया जाता है। इन्हीं 9 दिनों में दो दिन के लिए ‘बस’ किराए पर कर दी जाती है जो मथुरा, वृन्दावन, गोकुल, महावन, ब्रह्मांड घाट, रमन रेती, दाऊजी, गोवर्धन, राधाकुण्ड, जतीपुरा, नन्दगाँव, बरसाना और व्रज के सभी तीर्थों के दर्शन करा लाती है। किराये में भी किफायत रहती है। एक मार्गदर्शक साथ जाकर सब समझा भी देता है और बिना झंझटखोरों से उलझे शाँतिपूर्वक यह यात्रा भी पूरी हो जाती है।
और ठीक यही क्रम अश्विन के दो शिविरों में रहता है। अश्विन सुदी प्रतिपदा से लेकर नवमी तक नवरात्रि में 9 दिन का प्रथम शिविर रहता है। दसमी छुट्टी आवागमन के लिए रहती है। अश्विन सुदी 11 से लेकर कार्तिक बदी चतुर्थी तक यही क्रम चलता है। 9 दिन में एक अनुष्ठान, तीर्थ यात्रा, प्रवचन तथा व्यक्तिगत समस्याओं पर विस्तारपूर्वक विचार-विनिमय यह क्रम सभी शिविरों में समान रूप से चलता रहता है। स्कूलों की छुट्टियां कई प्राँतों में दशहरा से लेकर दिवाली तक की होती हैं, उनमें अध्यापकगण छात्र तथा दूसरे शिक्षा संस्थाओं से सम्बन्धित व्यक्ति आसानी से आ सकते हैं। जेष्ठ और अश्विन में दोनों ही बार प्रथम शिविरों में भीड़ अधिक रहती है इसलिए उनमें कुछ अपवादों को छोड़कर केवल पुरुषों को ही स्वीकृति मिलती है। दूसरे में संख्या हलकी हो जाती है इसलिए उनमें महिलाओं को साथ लाने की भी छूट रहती है।
यों व्यक्तिगत परामर्श और प्रवचनों द्वारा आगन्तुकों को उनकी समस्याओं को हल करने वाला मार्गदर्शन संतोषजनक मात्रा में मिल जाता है, पर विशेष शिक्षण अविश्रुत वाणी से उन्हें और भी मिलता है जो उनके अन्तःकरण में प्रतिस्थापित होकर जीवन-भर फलता फूलता रहता है। वैखरीवाणी मुख से बोली और कान से सुनी जाती है। उसका प्रभाव स्वल्प होता है। असली शिक्षा मध्यमा, परा और पश्यन्ती वाणियों द्वारा मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार के मर्म-स्थलों में प्रविष्ट की जाती है। सो इन शिविरों में आने वाले प्रत्यक्ष अनुभव करते हैं कि उन्हें कान के माध्यम से तो नहीं, दूसरे रहस्यमय माध्यमों द्वारा भी बहुत कुछ सिखाया गया है। यह शिक्षा उन्हें चिरकाल तक स्थायी प्रकाश एवं प्रोत्साहन प्रदान करती रहती है, जो जीवन को सुविकसित बनाने में आशाजनक रीति से फलप्रद सिद्ध होता है।
इन चारों शिविरों में प्रायः सात-आठ सौ शिक्षार्थियों से विचार-विनमय हो सकता। 3 वर्षों में 2400 परिजनों से इस प्रकार सत्संग सान्निध्य हो सके तो हम दानों के लिए ही श्रेयस्कर होगा। आगन्तुक प्राणपूर्ण प्रकाश प्राप्त करेंगे और हमें स्वजनों से मिलकर कौटुम्बिक आनन्द मिलेगा। जब तब घण्टे दो घण्टे मिल लेने और कुशल क्षेम पूछ लेने से अपना भी मन नहीं भरता। अन्य समयों में हमें भी व्यस्तता रहती है इसलिए यह शिविरों का समय दोनों के लिए ही अनुकूल एवं सुविधाजनक रहता है। हमारा भी पुरा ध्यान, मनोयोग, प्राण और प्रयत्न प्रशिक्षण में रहता है, इसलिए उस अवधि में बहुत प्रयोजन पूरा हो जाता है। बीच-बीच में एक-दो दिन के लिए दर्शन करने का निमित्त लेकर आने वालों को वह लाभ एवं आनन्द नहीं मिल सकता जो शिविर में आने वालों को। अतएव जिन्हें सुविधा हो वे परिजन इन शिविरों में हमें मिललें। यों यह शिविर तो हमारे बाद भी चलते रहेंगे पर स्वजनों के साथ हँसने-खेलने का, मन की बात कहने-सुनने का जो अवसर हमें मिल सकता है उस लाभ से अपने को वंचित ही रहना पड़ेगा। अतएव प्रेमी परिजनों को इस पंक्ति में पहले ही खड़े होने की तैयारी करनी चाहिये। परिवार बड़ा है, मिलन केवल 2400 से ही सम्भव है। इसलिए जो पहले से सतर्क न रहेंगे, ध्यान न रखेंगे वे इस फिर न मिलने वाले आनन्द से वंचित रह जायेंगे, हमें भी उनकी कुछ महत्वपूर्ण सेवा न कर सकने का पश्चात्ताप ही रह जायेगा। अब देशव्यापी दौरा करने या यज्ञ आयोजनों में पहुँचने की हमारी सम्भावना कम ही है। स्वास्थ्य गड़बड़ी फैलाने लगा है। अतएव सुखद मिलन के लिए यह शिविर ही एकमात्र माध्यम रह जाते हैं।
किशोर और युवकों की एक वर्षीय और प्रौढ़ों की 9 दिवसीय शिविर शिक्षा के अतिरिक्त तीसरी शिक्षा चार मास की उन लोगों के लिए है जो पारिवारिक उत्तरदायित्व से निवृत्त हो चुके हैं, जिनके पास अवकाश है और भावी जीवन को परमार्थ प्रयोजन में लगाने की बात सोचते हैं।
चातुर्मास साधना किसी तीर्थ स्थान में जाकर करने की प्राचीन धर्म परम्परा भी है। आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, अश्विन यह चार महीने वर्षाऋतु के साधना एवं शिक्षण के लिए ढलती आयु में परम पुनीत माने गये हैं। गायत्री तपोभूमि में रह कर नियम साधनों के साथ-साथ सवा-सवा लक्ष के तीन अनुष्ठान हो सकते हैं। यज्ञ नित्य करने का अवसर मिलता है। (1) गुरु पूर्णिमा (2) श्रावणी (3) कृष्ण जन्माष्टमी (4) पितृ अमावस्या (5) अश्विन नवरात्रि (6) विजयदशमी (7) शरद पूर्णिमा। यह सात पर्व इस बीच में आते हैं जिन्हें शास्त्रोक्त विधि से मनाने का अनुपम अवसर मिलता है। श्रावण में झूले के मेले मथुरा वृन्दावन के प्रसिद्ध हैं। जन्माष्टमी का मेला देखने लाखों व्यक्ति आते हैं। गुरु पूर्णिमा को गोवर्धन का मेला तो इतना विशाल होता है कि उसमें सम्मिलित होने के लिए सुदूर प्रदेशों से जन समूह उमड़ता चला आता है। श्रावण मास में विविध नियमोपनियमों के साथ साधनायें करने की विविध पद्धतियां प्रचलित हैं। रुद्राभिषेक आदि कितने ही धर्म कृत्य उन दिनों होते हैं। चातुर्मास में आने वालों के लिए एक सुव्यवस्थित साधना पद्धति बना दी जाती है जिसमें पर्व तथा उत्सवों का आनन्द भी सम्मिलित रहे।
इस साधना के साथ लोक के लिए क्षमता प्राप्त करने का एक विशेष प्रशिक्षण क्रम भी जोड़ दिया गया है। रामायण एवं गीता के माध्यम से युग-निर्माण विचारधारा के अनुरूप प्रवचन करने की शिक्षा दी जाती है और प्रवचन करने का अभ्यास प्रति दिन कराया जाता है। प्रयत्न यह किया जायेगा कि चातुर्मास करके जाने वाला साधक एक कुशल वक्ता बन जाय और प्रवचनों द्वारा लोक-मंगल के लिए कुछ महत्वपूर्ण कार्य कर सकने में समर्थ हो सके।
गायत्री महायज्ञ ठीक तरह करा सकने की प्रक्रिया, जन्म दिन, विवाह दिन एवं संस्कारों का विधान, पर्व त्यौहार मनाने की पद्धति जैसे कर्मकाँडों में उसे निष्णात बना दिया जाता है। सत्यनारायण कथा, गीता कथा, रामायण कथा जैसे आयोजन कर सकने की योग्यता उत्पन्न की जाती है। इन माध्यमों से धर्म मंच का अवलम्बन लेकर यह चातुर्मास के शिक्षार्थी अपने क्षेत्र में साँस्कृतिक पुनरुत्थान एवं नवनिर्माण का प्रकाश उत्पन्न कर सकते हैं। विविध प्रकार के रचनात्मक कार्यक्रम वहाँ किस प्रकार जमाये, उगाये तथा बढ़ाये जायें, उनके मार्ग में आने वाले अवरोधों से किस प्रकार निपटा जाय यह सारी शिक्षा इसी अवधि में मिल जाती है और यह साधक शिक्षार्थी एक अच्छे धर्मोपदेशक का उत्तरदायित्व सँभाल सकने के लिए ठीक तरह प्रशिक्षित हो जाता है।
अपनी युग-निर्माण योजना का आधार धर्म, अध्यात्म एवं संस्कृति है। इसलिए जो विभिन्न कार्यक्रम आगे कार्यान्वित किये जाने हैं उनके मूल में धर्म प्रेरणा एवं आध्यात्मिक तत्व-ज्ञान ही प्रमुख रहेगा। इस आधार को व्यापक बनाने के लिए कुशल, निस्वार्थ, अनुभवी, कार्य निवृत्त लोकसेवियों की ही आवश्यकता पड़ेगी, उन्हें इस चार मास के प्रशिक्षण द्वारा तैयार किया जायेगा। इस उत्पादन की एक व्यवस्थित परम्परा अपनी कार्य-पद्धति का प्रमुख अंग है। इसे इसी वर्ष से आरम्भ कर रहे हैं। ‘अखण्ड-ज्योति’ परिवार में जो भी इस प्रकार के ढलती आयु के अवकाश प्राप्त व्यक्ति हों उन्हें अनुरोधपूर्वक आमन्त्रित किया जा रहा है। साधना, स्वाध्याय, सेवा और संयम की चतुर्विधि तपश्चर्या चातुर्मास से जो कर सकें उन्हें सौभाग्यवान कहा जाना चाहिये। ऐसे सौभाग्यवानों का प्रशिक्षण करने का अवसर हमें तीन वर्ष मिलेगा यह हमारा भी एक सौभाग्य ही होगा।
सत्प्रवृत्तियों का प्रसार केवल प्रवचनों से ही नहीं होता वरन लोक-शिक्षण के लिए ऐसे रचनात्मक कामों की आवश्यकता होती है जिन्हें करने या देखने से उस विचार एवं कार्यपद्धति का स्वरूप प्रत्यक्ष अनुभव में आये। दान देना चाहिए यह कहते रहने की अपेक्षा स्वयं दान देने से या किसी अन्य द्वारा दान दिये जाने की प्रत्यक्ष घटना देखकर उस तरह का प्रभाव अधिक गहराई तक पड़ता है। गाँधीजी ने अंग्रेज सरकार के कानून तोड़ने के लिए जनता से कहा था, साथ ही उसका प्रत्यक्ष कार्यक्रम ‘नमक बना कर कानून तोड़ना’ भी सामने रखा था। वह कानून लोगों ने तोड़ा तो देखा देखी वह प्रेरणा व्यापक हुई और देश के कोने-कोने में यह प्रक्रिया दुहराई गई। यदि केवल उपदेश मात्र दिया गया होता, एक दूसरे को ‘यह करना चाहिये’-‘वह करना चाहिये’- मात्र कहते रहने, क्रियात्मक काम कोई न करता तो सत्याग्रह आँदोलन वह व्यापक रूप न बन पाता।
मार्गदर्शन एवं प्रशिक्षण आवश्यक है। उसके लिए प्रवचन एवं लेखन का माध्यम अपनाया जाना भी उचित है, पर साथ ही यह भी ध्यान रखना चाहिये कि उस प्रकार की घटनाएँ भी आँखों के सामने आनी चाहिये। उस मार्गदर्शन को व्यवहारिक रूप भी धारण करना चाहिये। जन-मानस को वास्तविक रूप में तो घटनाएं ही प्रभावित करती हैं। इसलिये हर प्रबल आंदोलन को सफल बनाने के लिये उसके साथ रचनात्मक कार्यों की श्रृंखला भी जोड़ी जाती है। कार्य को देखकर ही उसके अनुकरण की प्रवृत्ति पैदा होती है।
युग-निर्माण योजना के अंतर्गत दो भावनाओं की प्रतिष्ठापना है। एक-हर व्यक्ति अधिक उत्कृष्ट, संस्कृत, कर्मठ, निस्पृह एवं सहृदय बने, इससे- हर व्यक्ति उदार, परोपकारी, सेवाभावी, परमार्थ परायण होना चाहिये। वैयक्तिक जीवन में उत्कृष्टता और सामूहिक जीवन में सेवा सद्भावना यह मनुष्य की महानता है और महानता सम्पन्न व्यक्तित्वों का अभिवर्धन ही ‘युग-परिवर्तन’ का चिन्ह है। यह प्रवृत्ति बढ़ रही है या नहीं इसका परीक्षण करना हो तो उसकी परख बढ़ते हुये लोक-मंगल कार्यों को देखकर ही लगाई जा सकती है। सदुपदेश ग्रहण किये जा रहे हैं या नहीं उसका अन्दाज भी इसी तरह लगेगा कि लोगों ने परमार्थ पथ पर किस गति से चलना आरम्भ किया। अतएव सद्भावनाओं के प्रसार के साथ तथ्य भी जुड़ा रहना चाहिये कि सद्प्रवृत्तियाँ कार्य रूप में परिणित होती दिखाई पड़ें।
युग-निर्माण योजना के अंतर्गत शतसूत्री कार्यक्रम इसीलिये जोड़ा गया है कि उससे इस महाअभियान में सम्मिलित होने वाले प्रत्येक व्यक्ति की वास्तविकता का पता चलता रहे। जो आदर्शवादिता के, उत्कृष्टता के, अध्यात्म के तत्वज्ञान पर आस्था रखता है उसे अपनी आस्था जबानी जमा खर्च तक सीमित नहीं रखनी चाहिये वरन् व्यावहारिक जीवन के क्रिया-कलापों से सिद्ध करना चाहिये कि उसने अपने भीतर देवत्व की प्रवृत्ति विकसित की है और आचरण में उसका परिचय देना आरम्भ किया है। इसका स्वरूप यही हो सकता है कि हम अपने वैयक्तिक स्वार्थों, सुविधाओं, कामनाओं, लालसाओं में कमी करते चलें और आदर्शवादी रीति-नीति अपनाने में जिस साहस और तप त्याग का परिचय देना पड़ता है उसे साहसपूर्वक अपनायें। सद्गुणों का अभ्यास सेवा कार्यों से ही होता है। तैरना सीखने के लिये तालाब में घुसना पड़ता है। आन्तरिक महानता का अभिवर्धन अभ्यास करने के लिये परमार्थिक- रचनात्मक- कार्यों में संलग्न होना पड़ता है, उसके लिये समय, श्रम और धन लगाना पड़ता है। यह हो सकता है कि किसी के पास दान के लिये धन न हो, पर समय तो हर कोई बचा सकता है और उसे परमार्थ प्रयोजनों में लगा कर अपनी आँतरिक महानता का परिचय दे सकता है।
पिछले दिनों मध्यकालीन लोगों का यह ख्याल था कि थोड़ा-सा भजन, कथा, कीर्तन, व्रत-उपासना, यात्रा दर्शन, हवन, पूजन आदि धार्मिक कर्मकाँड कर लेने से पाप दूर करने, स्वर्ग मुक्ति मिलने, ईश्वर प्रसन्न होने का प्रयोजन पूर्ण हो जाता है। इस मान्यता के लोग थोड़ी पूजा-पत्री करके परमार्थ प्रयोजन और आत्म-कल्याण के बारे में आत्म-सन्तोष कर लेते थे, निश्चिन्त हो जाते थे। पर अब तर्क, अनुभव, प्रमाण और कारणों ने इस मान्यता को मिथ्या सिद्ध कर दिया है। वेद, शास्त्र तथा ऋषि-मुनियों के प्रतिपादन इससे भिन्न हैं। वे कहते हैं व्यक्तित्व की उत्कृष्टता ही किसी व्यक्ति के अध्यात्मवादी एवं ईश्वर परायण होने की कसौटी है और जो उस कसौटी पर खरा होगा वह स्वार्थपरता की सिद्धि में ही न लगा रहकर लोक-मंगल की प्रवृत्तियों में अवश्य संलग्न होगा। उसकी परमार्थ परायणता जितनी प्रखर होगी वह उतना ही आन्तरिक महान एवं ईश्वर परायण होगा। सचाई यही है। सर्वव्यापी विश्वात्मा भगवान की आन्तरिक पूजा उसकी दुनियाँ को अधिक सुन्दर एवं सुव्यवस्थित बना कर ही की जा सकती है और इसके लिये लोक सेवा की दिशा में अधिक त्याग बलिदान का साहस प्रदर्शित करना होगा। युग-निर्माण योजना के शतसूत्री कार्यक्रम इसीलिये हैं कि जो व्यक्ति जिस स्थिति में है, जिस योग्यता का है, वह अपनी क्षमता के अनुरूप अपने क्षेत्र में कुछ न कुछ समय लोक-मंगल के लिये- परमार्थ प्रयोजन के लिये- रचनात्मक सत्कर्म अभिवर्धन के लिये यथा सम्भव प्रयास करे। ऐसा व्यक्ति एक भी न हो जिसे शिश्नोदर परायण नरपशु की श्रेणी में गिना जाय, जिसके जीवन क्रम में परमार्थिक सेवा कार्यों का लेखा-जोखा नगण्य हो। कोई व्यक्ति कितना ही, अयोग्य असमर्थ हो लोक-मंगल के लिये कुछ तो कर ही सकता है। जहाँ सत्प्रवृत्तियाँ चल रही है उनमें अपना योगदान कोई भी जोड़ सकता है। हर व्यक्ति अलग से कोई योजना या प्रवृत्ति खड़ी नहीं कर सकता और न अलग-अलग डेढ़ ईंट की मस्जिद बनाने की जरूरत है। मिल-जुलकर जो रचनात्मक कार्यक्रम बने हों उनमें अपना योगदान जोड़ कर उस प्रक्रिया को आसानी से परिपुष्ट किया जा सकता है। नई योजना कोई विरले ही खड़ी कर सकते हैं और उसकी व्यवस्था स्थिर रूप से जमाये रहने की प्रतिभा किन्हीं-किन्हीं में होती है पर मिलजुल कर आरम्भ किये गए सत्प्रयत्नों में योगदान देकर उन्हें प्रखर कोई भी बना सकता है।
शतसूत्री योजना के अंतर्गत जहाँ जिस प्रकार के रचनात्मक कार्य सम्भव हों वहाँ उन्हें आरम्भ करना चाहिये और हर सदस्य को उसी निर्धारित कार्यक्रम में इस प्रकार जुट जाना चाहिये मानो वह उसी का निजी कार्य या उत्तरदायित्व है। जहाँ कोई रचनात्मक कार्य नहीं हो रहा है वहाँ युग-निर्माण योजना की विचार पद्धति से अधिकारिक लोगों को परिचित कराना, यह एक कार्य तो ऐसा है जिसे किसी का सहयोग न मिलने पर भी एकाकी व्यक्ति कर सकता है। दूर रहकर भी मथुरा केन्द्र को परिपुष्ट करके उसके द्वारा अधिक सेवा शक्ति उत्पन्न करने की प्रक्रिया तो कोई भी अपना सकता है। जिनके पास समय नहीं वे उतने समय दूसरों को सेवा कार्य में संलग्न करने के लिये आर्थिक सहायता कर सकते हैं। ऐसे अनेक कार्यकर्ता हैं जो लोक-मंगल के लिये बहुत काम करने के भारी अरमान मन में दबाये बैठे हैं पर पारिवारिक उत्तरदायित्व के बोझ से दबे होने के कारण कुछ कर नहीं पाते। जिनके पास आर्थिक साधन हैं वे थोड़ी अर्थ-सहायता कर अपने स्थान पर उन्हें लोक-सेवा का अवसर दे सकते हैं।
अकेले आगे बढ़कर दूसरों का सहयोग लेकर अथवा किसी चलते हुये रचनात्मक कार्य में भागीदार बनकर लोक-मंगल की सत्प्रवृत्तियों को गतिशील करना चाहिये। इससे अपने सद्गुण बढ़ते हैं, आत्म-सन्तोष मिलता है, समाज को स्वस्थ और सुन्दर बनने की स्थिति बनती है और सबसे बड़ी बात यह होती है कि देखा-देखी अन्य लोग भी उस प्रकार के सेवा कार्यों का अनुकरण करते हैं। कुप्रवृत्तियाँ एक दूसरे की देखा-देखी ही संसार में बढ़ी हैं। नशेबाजी में लाभ एवं आनंद जैसी कोई बात नहीं, केवल देखा-देखी ही है, जिसने एक से दूसरे को यह छूत लगाई और बीड़ी, चाय जैसी हानिकर वस्तुएँ जीवन की एक आवश्यकता बन गई। दुष्प्रवृत्तियों की भाँति सत्प्रवृत्तियाँ भी बढ़ती हैं। एक स्थान पर सत्कर्म आरम्भ होते हैं उनकी विज्ञप्ति प्रशस्ति और चर्चा होती है तो अनेक अन्यों के मन में भी वैसा ही करने की आकाँक्षा उठती है। प्रचलन बढ़ता है और धीरे-धीरे वे गतिविधियाँ अपना विस्तार करती चली जाती हैं। जिस प्रकार दुष्प्रवृत्तियों ने संसार को बिगाड़ा है उसी प्रकार बढ़ती हुई सत्प्रवृत्तियां दुनिया में सृजनात्मक हवा पैदा कर सकती है और संसार का पुनः निर्माण हो सकता है।
जिस प्रकार साधारण लोग अपने व्यक्तिगत वर्चस्व व्यक्तित्व को सुविकसित सिद्ध करने के लिये मकान, जायदाद, वाहन, आभूषण, अस्त्र, नौकर, सजावट, ठाट-बाठ आदि का साधन जुटाते हैं, उसी प्रकार हर उत्कृष्ट अंतःकरण और मनोभूमि के व्यक्ति को सार्वजनिक लोक-मंगल के कार्यों का आरम्भ, अभिवर्धन करना चाहिये। इसी आधार पर उसकी वास्तविक महानता आँकी जा सकती है। सारा समय पेट पालने में ही खर्च नहीं कर दिया जाना चाहिये, सारी बुद्धि वासना और तृष्णा की परिधि में ही भ्रमित नहीं रहनी चाहिये, सारा धन आपा-पूती के साधन जुटाने में ही खर्च नहीं होना चाहिये, सारा श्रम लौकिक प्रयोजनों की पूर्ति में ही संलग्न नहीं रहना चाहिए वरन् इन विभूतियों का जितना अधिक अंश बच सके उसे लोक-मंगल के परमार्थ प्रयोजनों में लगाने का साहस करना चाहिये। इसी में वास्तविक बुद्धिमत्ता और दूर दर्शिता सन्निहित है। इस रीति-नीति को अपनाये बिना न जीवनोद्देश्य की पूर्ति हो सकती है, और न आत्म-संतोष मिल सकता है। किसी का सच्चा गौरव, वर्चस्व और महत्व उसके उन सत्कर्मों से ही है जिनसे गिरे हुए समाज को ऊँचा उठाने का प्रकाश एवं अवसर उपलब्ध होता है।
यदि इस तथ्य को हृदयंगम किया जा सके तो हमारे अन्तःकरण में विश्व के नवनिर्माण में योगदान करने की हूक उठेगी। यही ईश्वर की वाणी और यही आत्मा की पुकार है। इसका अनुसरण कर सकता है वही भगवान का भक्त और आत्मा का आराधक माना जायेगा। वही आत्म-कल्याण के साथ-साथ विश्व-कल्याण का महान श्रेय साधन कर सकने वाला महाभाग कहलायेगा।
सेवा धर्म ही अध्यात्म का प्रतिफल है। परमार्थ पथ पर अग्रसर होने वाले को सेवा-धर्म अपनाना होता है। जिसके हृदय में दया, करुणा, प्रेम और उदारता है वही सच्चा अध्यात्मवादी है। इन सद्गुणों को- दिव्य विभूतियों को- जीवन क्रम में समाविष्ट करने के लिए सेवा धर्म अपनाने के अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं। भारतीय धर्म में दान का अत्यधिक महत्व है। छोटे से लेकर बड़े तक- संकल्प छोड़ने से लेकर देव दर्शन तक कोई काम दान के बिना आरम्भ नहीं होता। दान-पुण्य यह दोनों शब्द एक तरह से पर्यायवाची बन गये हैं। दान में ही पुण्य है, पुण्य तभी होगा जब दान किया जाय। यह मान्यता सिद्धांततः ठीक है। भगवान किसी की आन्तरिक उदारता देख कर ही प्रसन्न होते हैं। आत्मा का साक्षात्कार सद्गुणों के बिना सम्भव नहीं। उत्कृष्टता और उदारता का समन्वय सेवा धर्म में है। दान सेवा का ही एक छोटा रूप है।
मोटी परिभाषा में किसी को धन देने का नाम दान माना जाता है, पर यह दान का बहुत ही भौंड़ा अर्थ है। अविवेकपूर्वक प्रयोग से तो यह अर्थ एक प्रकार से अनर्थ ही उत्पन्न कर देता है। दान के नाम पर आजकल तथाकथित धर्मजीवी लोगों का व्यवसाय चलता है। मुफ्त के माल पर गुलछर्रे उड़ाकर यह निकम्मे लोग, जनता को अन्धविश्वास एवं भ्रम जंजाल में फँसाते हैं। यह दान नहीं दान के अर्थ का अनर्थ है। आपत्तिग्रस्त लोगों की उतनी सहायता करनी चाहिए जिससे वे अपने पैरों पर खड़े होने लायक हो जायें, जो लोक-मंगल में अपना सारा जीवन निछावर किये हुए हैं ऐसे ब्राह्मणों की निर्वाह व्यवस्था करना भी दान है। व्यक्तिगत रूप से इन दो ही प्रयोजनों के लिए खर्च किया धन दान है। असली दान तो जनमानस में सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्धन के लिए होने वाले प्रयासों में है। दान केवल धन का ही नहीं होता, धन दे सकने की स्थिति तो इस घोर आर्थिक तेजी के जमाने में किन्हीं विरलों में ही होती है। फिर ऐसे अधिकारी पात्र भी ढूंढ़ें नहीं मिलते जिन्हें देने पर धन की सार्थकता मानी जाय। सर्व साधारण के लिए उपयुक्त दान पुण्य, श्रम, समय, बुद्धि देकर किये जाने वाले पारमार्थिक कार्यों से ही हो सकता है। अपनी आजीविका का एक अंश भी इस प्रकार के सत्कार्यों में लगाया जा सकता है। सेवा धर्म का यही स्वरूप है। जिन प्रयत्नों से यह संसार अधिक सुन्दर, अधिक समुन्नत, अधिक उत्कृष्ट, अधिक सद्भावना युक्त, अधिक समर्थ बने वे ही सेवा धर्म की सच्ची भूमिका प्रस्तुत करते हैं। मुफ्त में अनधिकारियों को लाभ देने के प्रयास सस्ती वाहवाही दे सकते हैं पर उससे मुफ्तखोरी की दुष्प्रवृत्ति ही बढ़ती है। अन्न-क्षेत्र, प्याऊ, धर्मशालाएँ चलाने और ब्रह्मभोज करने में लोग दान पुण्य का आभास मान लेते हैं। वस्तुतः होना यह चाहिए कि श्रम करके भोजन पाने की, रस्सी बाल्टी से पानी खींच कर पानी पीने की, उचित किराया देकर ठहरने की और जो लोक-मंगल में लगे हैं उन्हीं ‘ब्राह्मणों’ के निर्वाह की व्यवस्था की जाय। जो आसानी से अपना काम चला सकते हैं, आर्थिक तंगी में नहीं हैं, उन्हें मुफ्त में लाभ देना एक निरर्थक ही नहीं, हानिकारक प्रयोग है। इसलिए लोग दूसरों का दान निर्लज्ज होकर स्वीकार करते हैं जबकि उसे स्वीकार करना केवल अपंग, असमर्थों अथवा लोकसेवियों को ही चाहिये।
सेवा धर्म अपनाये बिना किसी श्रेयार्थी का लक्ष्य पूरा नहीं हो सकता। इसलिए उसका समावेश जीवन क्रम में निश्चित रूप में करना चाहिए पर साथ ही यह भी परख लेना चाहिए कि अपना प्रयत्न संसार में सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्धन के लिए- विश्व-मानव की भावनात्मक सेवा की कसौटी पर खरा उतर रहा है या नहीं? युग-निर्माण योजना एक प्रकार की सार्वभौम आध्यात्मिक उपासना है। शतसूत्री कार्यक्रम इसी दृष्टि से हैं कि मनुष्य उन्हें अपनाकर सेवा धर्म की सार्थक साधना कर सके और अपना तथा समस्त संसार का सच्चा हित साधन कर सके। परिस्थिति के अनुरूप कौन क्या सेवा कर सकता है इस बात को ध्यान में रखकर अनेक प्रकार के सेवा कार्यों की एक सूची बनाई गई है, जिनमें सौ तरह के सेवा कार्य हैं। उनका विस्तृत उल्लेख एक रुपया मूल्य की ‘हमारी युग-निर्माण योजना’ पुस्तक में है। उनमें से कुछ चुने हुये सूत्र इस लेख में प्रस्तुत किये जा रहे हैं ताकि सामूहिक सत्प्रयत्नों के अंतर्गत उनका समावेश करके सेवा धर्म की सार्थक साधना कर सकें-
(1) सबसे पहली और सबसे आवश्यक सेवा अपनी है। अपने भीतर उत्कृष्टता का अभिवर्धन करना संसार की तथा ईश्वर की सबसे बड़ी सेवा है। हम उत्तम बनें तो ही समाज संसार तथा वातावरण उत्तम बनेगा। इसके लिए गत अंक में पाँच वैयक्तिक साधना कार्यक्रमों का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीरों के परिष्कार के लिए कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग की साधना सर्वोपयोगी और सर्व सुलभ है। इस प्रक्रिया को हम सभी अपनावें। निष्ठापूर्वक इसे नित्य कार्यान्वित करें। इस माध्यम से हमारी अन्तःभूमिका दिन-दिन उत्कृष्ट, पवित्र और समर्थ बनती चली जायेगी। इस उपलब्धि द्वारा हम आत्मा और परमात्मा की सच्ची सेवा कर सकेंगे। पाँच वैयक्तिक कार्यक्रम ये हैं-(1) हर दिन नया जन्म हर रात नई मृत्यु (2) जन्म दिवस की प्रेरणा (3) ज्ञानयज्ञ के लिए एक घण्टा समय, दस पैसा नित्य खर्च (4) अविवेक के विरुद्ध सत्याग्रह संघर्ष (5) उपासना में भावना का समावेश।
(2) दूसरा सेवा कार्य सामूहिक स्तर पर नवनिर्माण की आधार शिला रखने वाले कार्यक्रमों को हर जगह उत्पन्न एवं गतिवान बनाने का है। ऐसे पाँच आयोजनों का विस्तृत वर्णन इसी अंक में है। (1) सज्जनों को संगठन सूत्र में संबद्ध करना (2) ज्ञानयज्ञ का व्यापक विस्तार (3) गायत्री जप और यज्ञ आयोजनों का विस्तार (4) किशोरों के लिए एक वर्षीय, वयस्क लोगों के लिए 6 दिवसीय, कार्यनिवृत्तों के लिए चातुर्मासीय प्रशिक्षण (5) रचनात्मक सेवा कार्यों में योगदान। यह प्रवृत्तियां हर जगह चल पड़े ऐसा प्रयत्न किया जाय तो युग-निर्माण योजना की नींव सुदृढ़ आधार पर रखी जा सकती है। और यह प्रक्रिया वह प्रवाह उत्पन्न कर सकती है जिससे सर्वत्र असंख्य रचनात्मक कार्य आगे बढ़ते और सफल होते दृष्टिगोचर होने लगें।
(3) सच्चे देवमन्दिर- ज्ञान मन्दिर- पुस्तकालयों की स्थापना। प्रचलित ढंग के सड़े-गले कूड़ा करकट से भरे पुस्तकालय व्यर्थ हैं, जिनमें दूध थोड़ा और विष अधिक रहता है। श्रेयस्कर पुस्तकें, पत्रिकाएं थोड़ी और विचारोत्तेजक साहित्य भरपूर। ऐसे पुस्तकालय ज्ञानवर्धन नहीं करते वरन् दुष्प्रवृत्तियाँ फैलाते हैं। हमें हर जगह ऐसे पुस्तकालय स्थापित कराने चाहिये जिनमें केवल सृजनात्मक साहित्य हो। चूंकि ऐसी चीजें पढ़ने की जनता में रुचि नहीं, इसलिए पुस्तकें इकट्ठी कर देने से काम न चलेगा। हर पुस्तकालय में एक व्यक्ति ऐसा अवश्य हो जो घर-घर जाकर पुस्तक देने और वापिस लाने का क्रम चलाता हो। उत्तम साहित्य इसी प्रकार लोकप्रिय हो सकता है। और जिनमें ऐसी व्यवस्था है वही पुस्तकालय सार्थक हैं। अब देव मन्दिर नहीं, ज्ञान-मन्दिर बनने चाहिये। इनका पुष्य सर्वोपरि है। कोई नगर पुस्तकालय रहित न हो ऐसा प्रयत्न करें।
(4) व्यायामशालाओं की हर जगह स्थापना। व्यायाम की उपयोगिता बताकर हर नर-नारी, बाल-वृद्ध को उनके उपयुक्त मार्गदर्शन करना। स्वास्थ्य मेले तथा प्रतियोगिताओं का प्रचलन। लाठी तथा अस्त्र-शस्त्र सिखाने की शिक्षा। आसन, प्राणायाम, सूर्य नमस्कार का प्रशिक्षण। नारियों को वैयक्तिक व्यायाम की प्रेरणा। बाल क्रीड़ा उद्यान बनाना। युवकों में सामूहिक व्यायाम के लिए रुचि उत्पन्न करना।
(5) शिक्षा का प्रसार। अपने देश में 20 फीसदी शिक्षा है और 80 प्रतिशत अशिक्षित हैं। इस कलंक को धोना, विशेषतया प्रौढ़ शिक्षा एवं रात्रि पाठशालाओं द्वारा बड़ी आयु के नर-नारियों की शिक्षा व्यवस्था। स्कूलों का अभिवर्धन एवं उनकी उन्नति।
(6) साक्षरता एवं सामान्य ज्ञान अभिवर्धन की व्यवस्था। कन्या पाठशालाओं की स्थापना, घर-घर जाकर कन्याओं को पढ़ाने की प्रेरणा, सिलाई तथा अन्य कुटीर उद्योगों की शिक्षा, प्रेरणाप्रद गीत याद कराना, विचार गोष्ठियां, तीसरे पहर उन्हें एकत्रित होकर उपयोगी सामाजिक शिक्षा प्राप्त करने की व्यवस्था। प्रौढ़ महिलाओं को शिक्षा देकर प्राइवेट रूप से सरकारी परीक्षाओं में सम्मिलित कराने की पाठशालाएँ।
(7) विवाहों में जेवर, दहेज एवं अपव्यय का विरोध, मृत्यु भोज, अन्धविश्वास, बाल-विवाह, अनमेल विवाह आदि कुरीतियों का उन्मूलन, भिक्षा व्यवसाय को मिटाना, नर-नारी को समान नागरिक अवसर मिल सके ऐसी विचारणा को प्रोत्साहन। फैशनपरस्ती मिटाकर सादगी का सम्मान, जाति-पाँति के नाम पर ऊँच-नीच की भावना को हटाना। कन्या पुत्र में भेद न करना। सीमित संतानोत्पादन। मूढ़ताओं को हटाकर विवेकशील समाज की रचना।
(8) चोरी, बेईमानी, छल, शोषण, हराम की कमाई रिश्वत, अकीर्ति, उच्छृंखलता, आलस, श्रमशीलता को हेय मानना। कायरता, अश्लीलता, गाली बकना, विलासिता आदि दृष्प्रवृत्तियों का उन्मूलन। सदाचार, सचाई, सज्जनता, पुरुषार्थ, ईमानदारी, मधुरता जैसी सत्प्रवृत्तियों का अभिवर्धन।
(9) माँसाहार तथा जीवों को मार कर बनाई जाने वाली औषधियों का निषेध। पशुओं के साथ निर्दयता न होने देना। मारे हुये पशुओं के चमड़े का त्याग, शिकार खेलने के दुर्व्यसन की रोक, घायल घोड़े, गधे, बैल आदि से काम न लेना न दूसरों को लेने देना। देवताओं को पशु बलि से कलंकित न करने देना, गौ-रक्षण, जीव दया जैसी मानवोचित सत्प्रवृत्तियों का अभिवर्धन।
(10) शराब, गाँजा, चरस, अफीम, तम्बाकू पान दुर्व्यसनों का प्रतिरोध।
(11) शाक, भाजी, फूल एवं वृक्षों का आरोपण, वनस्पति हरियाली बढ़ाना, जहाँ खाली जगह हो वहाँ अन्न उगाना। गो दुग्ध की डेरियाँ चलाना। झूठन छोड़ने की बर्बादी की रोक।
(12) हाथ की चक्की, भाप से पका भोजन, मसालों का प्रचलन घटाना, स्वच्छता की आदत, मुँह ढक कर न सोना, ब्रह्मचर्य पालन जैसे स्वास्थ्यवर्धक नियमों की आदत उत्पन्न करना। साप्ताहिक उपवास का प्रचलन।
(13) मन्दिरों को सामाजिक एवं भावनात्मक प्रेरणा का केन्द्र बनाना, साधु और पुरोहितों को लोक सेवा के कार्य करने की प्रेरणा देना, वानप्रस्थ-आश्रम का पुनः प्रचलन। दीवारों पर आदर्श वाक्य लिखने का आँदोलन।
(14) जन्म दिवसोत्सवों और विवाह दिवसोत्सवों का व्यापक प्रचलन, पुंसवन, सीमन्त, नामकरण, अन्न प्राशन, विद्यारम्भ, यज्ञोपवीत, विवाह, वानप्रस्थ आदि संस्कारों को उत्साहपूर्वक मनाने की प्रथा आरम्भ करना और इन माध्यमों से वैयक्तिक एवं पारिवारिक जीवन उत्कृष्ट बनाने की समग्र शिक्षा देना। आदर्श विवाहों के आयोजन इस उद्देश्य के लिए प्रगतिशील जातीय सम्मेलनों की व्यवस्था।
(15) श्रावणी, कृष्ण जन्माष्टमी, विजयादशमी, दिवाली, गीता जयन्ती, बसन्त पंचमी, शिवरात्रि, होली, गायत्री जयन्ती, गुरु पूर्णिमा आदि पर्वों का सामूहिक रूप से मनाना और उनके माध्यम से जन साधारण को समुचित समाज निर्माण की शिक्षा देना।
(16) हर व्यक्ति को नियमित ईश्वर उपासना करने तथा स्वाध्याय के लिए समय नियत रखने की आवश्यकता अनुभव कराना।
(17) सत्कार्यों का अभिनन्दन, सहकारी उपभोक्ता भण्डार स्थापना, कविता सम्मेलन, अंताक्षरी सम्मेलन, संगीत शिक्षा, प्रेरक गीतों का प्रचलन, आदर्श चित्रों की प्रदर्शनी, प्रेरक अभिनयों की व्यवस्था, जीवन कला के शिक्षण शिविर, धर्म प्रचार की पद यात्रा, गीता सम्मेलन और रामायण सम्मेलनों का आयोजन, प्रेरक सत्य नारायण कथा का प्रवचन।
(18) दुष्प्रवृत्तियों के निवारण और सत्प्रवृत्तियों के हृदयंगम करने के लिए लोगों को तैयार करना और उनसे इस प्रकार के प्रतिज्ञापत्रों पर हस्ताक्षर कराना।
(19) युग-निर्माण शाखाओं के वार्षिकोत्सवों का सर्वत्र आयोजन।
(20) नवनिर्माण के लिए जीवन अर्पण करने वाले सुयोग्य नर-नारियों की एक बढ़ी सेना संगठित करना। जिनकी निजी आजीविका है वे उससे गुजर करते हुये सामाजिक कार्य करें। जिन पर पारिवारिक जिम्मेदारी नहीं है वे निर्वाह मात्र लेकर समाज का काम करें। जिनके ऊपर बड़े परिवार की जिम्मेदारी है वे थोड़ा समय उसी में से निकाला करें। इस प्रकार नवनिर्माण के लिए समय देने वाले जितने सुयोग्य और ईमानदार व्यक्ति मिल सकें उन्हें ढूढँना चाहिए। और नवनिर्माण के लिए उत्साहपूर्वक जुट जाने की प्रेरणा देनी चाहिए। युग निर्माताओं की एक बड़ी सेना संगठित करना निताँत आवश्यक समझा जाय।
संक्षिप्त में यह बीस आधार ऐसे हैं जिनमें शतसूत्री योजना का सार आ जाता है। हममें से हर व्यक्ति को इन कार्यों के लिए सचेष्ट रहना चाहिए। शाखा संगठन के द्वारा मिल-जुल कर इन प्रवृत्तियों के अभिवर्धन के लिए स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप कुछ काम करने का उपाय सोचना चाहिए और जहाँ जो बन पड़े उसे कार्यान्वित करना चाहिए। नवनिर्माण का क्षेत्र व्यापक है। शारीरिक, मानसिक, पारिवारिक, आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक, आध्यात्मिक, राजनैतिक हर क्षेत्र में काम करने की आवश्यकता है। जिनकी क्षमता जैसी है वे वैसी प्रवृत्तियाँ अपने क्षेत्र में बढ़ावें। संगठित और सामूहिक रूप से हर कार्य अधिक अच्छी तरह होता है, इसलिए एकाकी ही न लगे रहकर संगठन करना चाहिए और सम्मिलित रूप से कार्य करना चाहिए। शाखाओं के संगठन इसी उद्देश्य से किये जाते हैं। रचनात्मक कार्य में रुचि लेकर हम सेवा धर्म के सच्चे अनुयायी और अनुगामी बन सकते हैं। इसी मार्ग पर चलते हुए अपना और सबका कल्याण किया जा सकता है।
बसन्त पंचमी भगवती सरस्वती का जन्म दिन है। पुराणों में वर्णन है कि ज्ञान की अधिष्ठात्री वीणापाणि देवी शारदा माघ सुदी पंचमी को इस मर्त्य लोक में अवतरित हुईं। उन्होंने अज्ञानग्रस्त मानव को ज्ञान का प्रकाश दिया और उस नर-पशु की नीरस मनोभूमि में सरसता का, संगीत साहित्य कला का-संचार किया। इसी वरदान को पाकर वह स्नेह, सौंदर्य एवं उल्लास का रसास्वादन कर सकने में समर्थ हुआ। इन्हीं अनुभूतियों ने शिश्नोदर परायण कुत्सित जीवन में देवत्व की गरिमा को संजोया और इस धरती पर रहकर स्वर्गीय उपलब्धियों में आनन्द विभोर रहने की स्थिति प्राप्त कर सकने में समर्थ हुआ।
भगवती सरस्वती का यह जन्म दिन हर वर्ष जड़-चेतन प्रकृति में नवीन उत्साह और उल्लास का प्रस्फुरण करता है। इस पुण्य पर्व को बसंत ऋतु अपने परिधान से सँजोती है। चारों ओर फैली हुई पुष्पों की मनोरम दृश्यावली आँखों को हर्षातिरेक से भर देती है। खेतों में सरसों, मटर, अरहर, आदि की फसलें सुनहरी फूलों से भरी होती हैं। वृक्षों पर नये कोंपल आए हुए होते हैं और उन पर बौर फूला होता है। कोकिल-कूकती है, मोर बोलते हैं, पपीहा बोलते हैं, हर प्राणी में एक नया उल्लास भरा होता है। शरीराध्याय की भूमिका में अवस्थित प्राणियों के मनों में काम संचार होता है और वे प्रजनन प्रयोजन के इच्छुक होते हैं। भावनात्मक भूमिका में अवस्थित आत्माओं को प्रकाश की ओर अग्रसर होने की प्रेरणा जागृत होती है और उनकी गतिविधियों में भी कर्म कौशल से भरी अभिनव थिरकन उत्पन्न होती है। माँ शारदा का जन्म दिन ऐसी ही दिव्य चेतना साथ लेकर हर वर्ष इस पृथ्वी पर आता है और प्रसुप्त अन्तःकरणों में चेतना की एक नई स्फुरणा जगा जाता है।
युग निर्माण योजना के पुण्य प्रयोजन का शुभारम्भ भी इसी पुनीत दिन से हुआ है। अब से लगभग 40 वर्ष पर्व हमारे सामान्य जीवन में एक दिव्य प्रेरणा इसी दिन अवतरित हुई। गुरुदेव ने इसी दिन दर्शन दिये, जीवन-दर्शन की दिशा मोड़ी, 24 गायत्री महापुरश्चरणों की तपश्चर्या का आरम्भ कराया, अखण्ड दीपक की स्थापना हुई। इस आरम्भ का उद्देश्य नवनिर्माण के उपयुक्त क्षमता उपार्जित करने की तैयारी मात्र था। किसी व्यक्तिगत प्रयोजन के लिए नहीं नवनिर्माण के पूर्ण भूमिका के रूप में ही। इस प्रकार एक आधार का शिलान्यास किया गया। वह बसन्त पंचमी यह आलोक लेकर न आई होती तो हमारा व्यक्तिगत जीवन अन्य साधारण व्यक्तियों की तरह पेट, परिवार का साधन जुटाते ऐसे ही समाप्त हो चला होता। अपना वास्तविक आध्यात्मिक जन्म दिन हम इसी पुण्य पर्व को मानते हैं। शरीर तो शायद अश्विन की किसी तिथि में जन्मा पर उस जन्म का क्या मूल्य? जिस दिन ने हमें प्रकाश पथ पर अग्रसर किया उसी को सदा हमने अपना जन्म दिन माना है। हमारे व्यक्तिगत भावनात्मक जीवन का ही नहीं यह उस मिशन का भी जन्म दिन है जो हमारे जीवन क्रम के साथ अविच्छिन्न रूप से जुड़ा हुआ है।
अपने जीवन का हर महत्वपूर्ण कार्य बसन्त पंचमी के शुभ मुहूर्त से ही आरम्भ होता रहा है। ‘अखण्ड-ज्योति पत्रिका’ बसन्त पंचमी से आरम्भ हुई। इसलिए इसका जन्म दिन भी यही है। गायत्री तपोभूमि का शिलान्यास बसंत पंचमी के दिन किया गया। शतकुंडी गायत्री महायज्ञ के लिए एक वर्ष तक चलने वाली यज्ञ श्रृंखला इसी दिन से आरंभ हुई। सहस्र कुण्डी गायत्री महायज्ञ का संकल्प इसी दिन किया गया। गायत्री साहित्य का लेखन कार्य इसी वर्ष से शुरू किया था। वेदों का भाष्य बसन्त पंचमी से हुआ। साधना मार्ग की कुछ विशेष उपलब्धियाँ जिनका वर्णन करना उचित न होगा हमें सदा बसन्त पंचमी को ही होती रही हैं। इस प्रकार यह पुण्य पर्व हमारे छोटे से जीवन का प्रकाश स्तम्भ रहा है। समस्त विश्व के लिए- चर-अचर के लिए तो वह अनादि काल से परम मंगलकार्य, उल्लास के अवतरण का प्रतीक बना ही चला आ रहा है।
युग-निर्माण योजना का कार्य हमारी साधना आरम्भ के दिन से ही चल रहा है। उसका क्रमिक विकास होता चला आया है। यह जन्म इसी प्रयोजन के लिए मिला है। जो श्वास शेष हैं वह भी इसी कार्य में समाप्त होंगी। 6॥ वर्ष पूर्व अज्ञात वास से लौटने पर तो विशेष रूप से यही काम कन्धे पर आया है। यों 16 वर्ष पूर्व गायत्री प्रचार के लिए भी हमें इसी दिन नवनिर्माण की आध्यात्मिक चेतना का शुभारम्भ करने के लिए ही संलग्न किया गया था। गायत्री परिवार इसी प्रयोजन के लिए था। अब उसका विकसित रूप युग-निर्माण के रूप में है। 3॥ वर्ष से अपने ठीक क्रम से सफलतापूर्वक वह आन्दोलन चलता आ रहा है। इन दिनों उसी की प्रथम पंचवर्षीय योजना चल रही है। क्रमशः इस आँदोलन का भारी विस्तार होना है, उसे विश्वव्यापी स्वरूप धारण करना है।
इसी संदर्भ में इस बसन्त पंचमी से पूरी शक्ति लगाकर पूर्ण सुगठित एवं सुव्यवस्थित गति प्रदान करने का अवसर आ पहुँचा। छुटपुट रीति से अब तक बहुत कुछ होता रहा है। बहुत कुछ हो चुका। पर अब परिवार के हर सदस्य को अपनी पूरी तत्परता के साथ इस दिशा में कदम बढ़ाना है। इसके लिए एक सामूहिक संकल्प- सामूहिक अभियान इसी दिन से आरम्भ कर रहे हैं। कोई कर रहा है कोई नहीं कर रहा है, कोई सुन रहा है कोई नहीं सुन रहा है, कोई ध्यान दे रहा है कोई नहीं दे रहा है, अब यह स्थिति नहीं चलेगी। अब एक गुट होकर काम करना ही एकमात्र मार्ग रह गया है। अब सजग और सतर्क होकर तत्परतापूर्वक प्रबुद्ध आत्माओं के कन्धों पर आये उत्तरदायित्वों को पूरा करने के लिए कन्धे से कन्धा और पैर से पैर मिलाकर आगे बढ़ने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं। जागरूक आत्माओं का परिवार अब और अधिक देर तक अवसाद और अपेक्षा का कलंक नहीं लगाये रह सकता।
आगामी 3 फरवरी 68 को आने वाली बसंत पंचमी एक सुनिश्चित कार्यपद्धति को कार्यान्वित करने की प्रक्रिया का सतत् शुभारम्भ होने का ऐतिहासिक उत्सव बनेगी। यों उस दिन मथुरा में कोई बड़ा दृश्य उत्सव आयोजन नहीं होने जा रहा है। पर उस दिन एक अदृश्य आयोजन बहुत बड़ा होगा। उसका विवरण अभी तो नहीं पर समयानुसार प्रकट होगा।
‘अखण्ड-ज्योति परिवार’ के हर सदस्य को उस दिन साधारण काम-काज की छुट्टी रखनी चाहिये और वह पूरा दिन ‘युग-निर्माण’ की प्रेरक प्रवृत्तियों को गतिशील बनाने के लिए एक प्रेरक आयोजन की व्यवस्था में बिताना चाहिए। अपने परिवार के जहाँ जितने व्यक्ति हैं वे उस दिन एक स्थान पर एकत्रित हो सकें, इसकी तैयारी यह अंक मिलते ही आरम्भ कर देनी चाहिये। सभी से मिल लेना चाहिये और अनुरोधपूर्वक आयोजन में सम्मिलित होने का अनुरोध करना चाहिये। समय ऐसा रखा जाय जो सभी के लिए अनुकूल हो। उस दिन सभी परिजन संघबद्ध हो जाँय। जहाँ भी ‘अखण्ड-ज्योति’ के सदस्य हैं वहाँ एक ‘युग-निर्माण शाखा’ गठित करली जाय। अधिकाँश स्थानों पर बहुत-बहुत सदस्य हैं, जहाँ कम हों वहाँ प्रयत्नपूर्वक उस अवधि में बनाए जा सकते हैं। तक भी उत्साही कार्यकर्ता यदि खड़ा हो जाय तो अपने यहाँ पाँच सदस्य बनाने और उन्हें संगठित करने के लिए-व्यवस्था कर सकता है। एक कार्यवाहक चुनना है, शाखा कार्यालय का स्थान नियत करना है, पुस्तकालय जमाना है। यह कार्य बसन्त पंचमी से पूर्ण भी किये जा सकते हैं और उन सुगठित शाखा का उस दिन उत्सव रखा जा सकता है। जहाँ इतना न बन पड़े वहाँ इतना तो करना ही चाहिए कि उस दिन सब सदस्य इकट्ठे होकर एक शाखा स्थापित कर लें। गायत्री महामन्त्र के 24 अक्षर हैं। इस बसन्त पंचमी पर आशा की जायेगी कि न्यूनतम 2400 शाखाओं की स्थापना की सूचना तो उपलब्ध हो ही जायेगी। उत्साही कार्यकर्ताओं का थोड़ा-सा प्रयत्न इस प्राथमिक आवश्यकता की पूर्ति बड़ी सरलता के साथ कर सकता है।
संघबद्ध होकर हम वैयक्तिक आत्म निर्माण और सामूहिक युग-निर्माण के कार्यक्रमों को कार्यान्वित करने के लिए पूरी तत्परता के साथ प्रयत्न आरम्भ कर दें। वैयक्तिक पंचसूत्री आत्म-कल्याण साधनाओं की विस्तृत चर्चा दिसम्बर अंक में की जा चुकी है। उसी का साराँश इस अंक के प्रथम लेख में है। प्रातः और सायंकाल का आत्मचिंतन, सद्ज्ञान साधना, जन्मधारण की प्रेरणा का स्मरण, अविवेक से संघर्ष और उपासना में भावना का समावेश, यह जीवन साधना की पद्धति हममें से हर एक के जीवन क्रम का अंग बने इसके लिए हर सदस्य से व्यक्तिगत रूप से भली-भाँति विचार विनमय किया जाय और इस आत्मोत्कर्ष के पुनीत कार्य का उसकी रुचि को अभिवर्धन किया जाय।
पाँच कार्यक्रम भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। युग-निर्माण आँदोलन में सदस्यों के परिवार के लोग भी किसी न किसी रूप में सम्मिलित रहें। इसके लिए हमें एक माला गायत्री मन्त्र का जप तथा सत्संकल्प का एक पाठ करने के लिए तैयार करना चाहिए। अपने प्रभाव में जो और लोग आ सकें, उन नर-नारी, बाल-वृद्धों को उपरोक्त साधना क्रम के आधार पर नवनिर्माण के पुण्य परमार्थ में सम्मिलित रहने के लिए प्रयत्न किया जाय तो हर जगह बहुत धर्म प्रेमी लोग आसानी से तैयार हो सकते हैं। 24 लक्ष जप का एक पुरश्चरण नित्य होने का संकल्प है। उसकी पूर्ति सबके सम्मिलित प्रयत्नों से ही होगी। इसलिए हर जगह- हर सक्रिय कार्यकर्ता- हर शाखा संगठन- इसके लिए प्रयत्न करे और अपनी देख-रेख में जिनका जप आरम्भ कराया हो उनके पूरे पते समेत लिस्ट मथुरा भेजें।
एक हजार कुण्डों के गायत्री यज्ञ हर साल करने हैं। 5 कुण्डों के 200 आयोजन में यह बँटा रहेगा। पाँच कुण्डों के आयोजन कहीं भी-जहाँ सक्रियता थोड़ी भी हो बड़ी आसानी से हो सकते हैं। अपने इतने बड़े परिवार में ऐसे 200 व्यक्तियों की- शाखाओं की- तो अपेक्षा की ही जायेगी। संकल्प आने पर उनके लिए तीन दिन की एक निश्चित तिथि नियत कर दी जायेगी, जिस पर 10 वर्ष तक उनका आयोजन हर वर्ष होता रहे और एक श्रृंखला में आयोजन रहने से हमारे प्रतिनिधि भी उन आयोजनों में संदेश एवं आशीर्वाद लेकर पहुँचते रहे।
इस बसन्त पंचमी को हर जगह एक छोटा यज्ञ आयोजन तथा उत्सव होना चाहिए। कई व्यक्ति हमारा जन्म दिन पूछते हैं और उस अवसर पर अपनी श्रद्धा भावना की अभिव्यक्ति करना चाहते हैं। उन्हें बसंत पंचमी नोट कर लेनी चाहिए। और स्मरण रखना चाहिए कि 57 दीपक जलाकर या 57 पुष्प चढ़ाकर यह श्रद्धाँजलि पूर्ण नहीं की जा सकेगी। उसमें श्रम समय और श्रद्धा का समावेश भी होना चाहिए। हमारे मिशन की पूर्ति के लिए जो जितना परिश्रम करता है वह उतना ही अधिक हमारा आत्मीय एवं शुभचिन्तक है। दण्डवत, प्रमाण, मानता आदि की नहीं, हमारी आत्मा को श्रम और श्रद्धा की भूख है। नवनिर्माण आयोजनों में अपना योगदान देकर ही कोई अपनी सच्ची सद्भावना हमारे प्रति व्यक्त कर सकता है। उसी से हमारी आँतरिक भूख और प्यास बुझती है। अच्छा हो इस बसन्त पंचमी के आयोजन सर्वत्र मनाये जायें और उनमें नवनिर्माण की वैयक्तिक और सामूहिक पंचसूत्री योजनाओं को कार्यान्वित करने के लिए कुछ साहसपूर्ण निश्चय किये जाय।
गाँवों में युग-निर्माण साहित्य के विक्रय केन्द्र स्थापित किये जा सकते हैं। हर शाखा सदस्य के जन्मोत्सव मनाने की योजना पूरी साल भर के लिए इसी अवसर पर बना ली जानी चाहिए और उन तिथियों की एक लिस्ट मथुरा भी भेज दी जानी चाहिए। शतसूत्री कार्यक्रमों में से ही कहीं कुछ सम्भव हो तो उसकी व्यवस्था भी बनानी चाहिए। हमारे द्वारा प्रशिक्षण का लाभ लेने और हमें वह सौभाग्य सुअवसर देने के लिए हर सदस्य से अनुरोध है। हमारा बाहर जाना अब कठिन है इसलिए सान्निध्य के लिए शिविरों में आते रहने को समय निकालना चाहिए। जो कार्यनिवृत्त हो चुके वे चातुर्मास की साधना और शिक्षा के लिए मथुरा आयें। हर घर से एक किशोर बालक एक वर्ष की औद्योगिक तथा जीवन-कला की शिक्षा के लिए भेजा जाय। इन शिक्षार्थियों के रूप में हमारी स्मृति जहाँ बनी रहेगी वहाँ सजीव स्मारक बने रहेंगे। एक वर्ष फेल होने जैसा जोखिम उठाकर हमें शिक्षार्थी किशोर हर घर से मिलने चाहिए।
यह भूलना नहीं चाहिए कि ‘अखण्ड-ज्योति’ -हमारी वाणी है। उसी के माध्यम से इतना बड़ा अभियान आँदोलन चलाया जा रहा है। जो उसे पढ़ते हैं वे ही हमारी प्रेरणाओं से परिचित होते और हलचल करते हैं। अस्तु जिन्हें नवनिर्माण में आस्था है-उन्हें ‘अखण्ड-ज्योति’ और ‘युग-निर्माण योजना’ पत्रिकाओं के सदस्य बनाने का पूरा प्रयत्न करना चाहिये। इसलिए अपने साथियों और परिजनों पर आवश्यक प्रभाव एवं दबाव भी डालना चाहिए। पत्रिकाओं के पाठक घटने, बढ़ने के साथ आँदोलन का स्वरूप घटना, बढ़ना सुनिश्चित रूप से जुड़ा हुआ है। इसलिए यदि इस अभियान से सहानुभूति न हो तो पत्रिकाओं के ग्राहकों के संबंध में उपेक्षा बरतनी, अन्यथा जड़ सींचने की तरह सदस्य बढ़ने का भरपूर उत्साह और आग्रह के साथ प्रयत्न करना चाहिए। इसके लिए यह जनवरी का महीन ही सबसे उपयुक्त समय है। क्योंकि पत्रिकाओं का वर्ष यहीं से आरम्भ होता है। बीच में भी ग्राहक बनते तो हैं पद उनसे हिसाब सम्बन्धी सदा झंझट ही बना रहता है।
यह बसन्त पंचमी अपने ढंग की अनोखी है। दस अश्वमेधों के समान दस-खंड सहस्रकुंडी यज्ञों का हर वर्ष तक हर दिन 24 लाख जप होने का अभूतपूर्व धर्मानुष्ठान इसी दिन से आरम्भ होने जा रहा है। पाँच वैयक्तिक और पाँच सामूहिक साधना क्रम भी इस दिन हर एक को कार्यान्वित करने हैं। इसके लिए आवश्यक उत्साह हर परिजन को मिले, ऐसी प्रार्थना उन भगवती सरस्वती से है, जिनका इस बसन्त पंचमी को पुनीत जन्मदिन है। वीणापाणि की महाशक्ति हममें से हर एक को, एक दूसरे से बढ़-चढ़ कर त्याग बलिदान करने की स्फूर्ति, भावना और हिम्मत प्रदान करे ऐसी प्रार्थना है।
सन् 1970 से 1985 तक भीषण भुखमरी
स्टेन फोर्ड विश्वविद्यालय (अमेरिका) के जीव-विज्ञान विशेषज्ञ प्रोफेसर पाल इहरलिच ने लन्दन से प्रकाशित होने वाले ‘ब्रिटिश वीकली’ में लिखा है कि “मनुष्य जाति अपना पेट भरने के संघर्ष में हार चुकी है। इसके फलस्वरूप 1970 से 1985 के बीच करोड़ों व्यक्ति भूख से मर जायेंगे। अब हम ‘अधिक अन्न उपजाने’ का कोई भी कार्यक्रम क्यों न शुरू करें, इस बीच में अनगिनत व्यक्तियों को खाद्याभाव से मरना ही होगा। इस परिस्थिति का मुख्य कारण यही है कि संसार की जनसंख्या दिन प्रति दिन बढ़ती जाती है और खाद्य-पदार्थों की उपज उस हिसाब से निरन्तर कम पड़ रही है।
(श्रीमती मायादेवी सक्सेना)
वीर देश की ओ संतानो! तुम्हें निमन्त्रण,सेतुबंध की नींव आज तुमको रखनी है।
एक राम थे जिनकी सीता गई चुराईकिया बहुत उद्योग तभी वह वापस आई।एकाकी थे राम उस समय निर्जन वन मेंपर प्रतिबिंबित हुये रीछ बानर के मन में।और आज भी अपनी संस्कृति की सीता को,हर ले गया प्रपंची कोई परदेसी हो।
वीर देश के ओ सिपाहियो! तुम्हें निमंत्रण,अब रावण से नहीं स्वयं से ही लड़ना है।
अपना घर? हाँ साथी अपना ही घर है यह,किन्तु कहाँ अपनत्व रह गया है जीवन में?भाई में भ्रातृत्व कहाँ है आज भरत-सा?शक्ति कहाँ? अंजनि सुत जैसी-मन लक्ष्मण-सीकहाँ गई वे मर्यादायें वर्णाश्रम की?पावनता खो गई कहाँ मुनि के आश्रम की?
भारत के ओ धर्म जीवियो! तुम्हें निमन्त्रण,जन-जन को फिर आज मनुजता सिखलाना है।
सत्कर्मों की पुण्य पताका हम फहरायें,सज्जनता और प्यार आज घर-घर में लायें,परित्यक्ता सी अपनी संस्कृति की सीता को,करके मृदु मनुहार, चलो वापस ले आयें,फिर चाहे जितने बिद्द जायें काँटे पथ पर,कितनी ही बाधायें आयें विविध वेष घर,
सद् पथ के ओ सुदृढ़ राहियो! तुम्हें निमंत्रण।अपने जैसे ही अनेक निर्मित करना है॥
*समाप्त*