चलते रहो-चलते रहो

ऐतरेय ब्राह्मण में इन्द्र और रोहिताश्व का एक प्रसंग आता है। उसमें इन्द्र रोहिताश्व को जीवन की सफलता का रहस्य बतलाते हुए कहते हैं-

“हे रोहित! जो पुरुष अपने आपको श्रम से थका नहीं डालता उसे लक्ष्मी प्राप्त नहीं होती।”

“बैठे हुए मनुष्य को पाप दबा लेता है। मेरा स्नेह और मित्रता वही पाता है, जो निरन्तर चलता रहता है। इसलिए चलते रहो, चलते रहो।”

“जो मनुष्य चलता है उसकी जंघाओं में फूल खिलते हैं। उसकी आत्मा भूषित होकर फल प्राप्त करती है। चलने वाले का पाप थक कर सो जाता है। इसलिए चलते रहो, चलते रहो।”

“बैठे हुए का सौभाग्य बैठा रहता है, खड़े होने वाले का सौभाग्य खड़ा हो जाता है, और उठ कर चलने वाले का सौभाग्य चल पड़ता है। इसलिए चलते रहो, चलते रहो।”

“सोने वाले का नाम कलि है, अंगड़ाई लेने वाला द्वापर है। उठकर खड़े होने वाला त्रेता है और चलने वाला कृत-युग है। इसलिए चलते रहो, चलते रहो।”

“चलता हुआ मनुष्य ही मधु पाता है। चलता हुआ ही स्वादिष्ट फल चखता है। सूर्य का परिश्रम देखो, जो नित्य चलता हुआ कभी आलस्य नहीं करता। इसलिए चलते रहो।”

रोहित और इन्द्र के इस प्रसंग में गतिशीलता का महत्व बतलाया गया। गति जीवन का पर्यायी है। जो गतिशील है, वह जीवित है। जो स्थिर है वह मृतक ही माना जायेगा। जो जीवन में उन्नति, विकास और श्रेय का काँक्षी है, उसे निरन्तर गतिशील रहना चाहिये। आलस्य, प्रमाद अथवा अकर्मण्यता मनुष्य के सौभाग्य के शत्रु हैं।

इन्द्र ने जो उपदेश रोहित को दिया है उसकी विवेचना करने और भावार्थ पर विचार करने से यही पता चलता है कि मनुष्य का सारा सौभाग्य उसकी गतिशीलता पर ही निर्भर रहता है। इस गतिशीलता का अर्थ केवल चलते रहने से नहीं है। इसका तात्पर्य व्यापक है और इसके अंतर्गत सारे पुरुषार्थ, सारे उद्योग और सारे कर्तृत्व का भाव आ जाता है।

इन्द्र कहते हैं कि जो पुरुष अपने आपको श्रम से थका नहीं डालता उसे लक्ष्मी प्राप्त नहीं होती। कितनी सरल और सार्थक बात है। यद्यपि संसार में चारों ओर श्री ओर श्रेय फैले पड़े हैं तथापि कहीं भी कोई ऐसा स्थान नहीं है जहाँ पर इनका कोई भण्डार एक स्थान पर रखा हो, जिससे मनुष्य जब चाहे जाकर अपनी वाँछित लक्ष्मी अथवा श्रेय उठालाये। श्री और श्रेय पसीने के मूल्य पर परिश्रम के उपलक्ष में मिलते हैं। वह भी केवल साधारण परिश्रम के बल पर नहीं। उसके लिये अपने को परिश्रम से थका डालना पड़ेगा।

रोहित एक राजकुमार था। उसके पिता के राजकोष में अपरिमित लक्ष्मी थी, जिसका वह अधिकारी था। तब इन्द्र को उसे इतने कड़े श्रम का उपदेश देने की क्या आवश्यकता पड़ गई? यह विचारणीय बात है। बात यह है कि इन्द्र यह जानते थे कि जो अपनी पैतृकता अथवा किसी संयोग से पाई लक्ष्मी पर निर्भर हो जाता है, वह आलसी और अकर्मण्य बन जाता है। यहाँ पर महात्मा इन्द्र ने रोहित को धनवान बनने और जीविका चलाने के लिए श्रम का उपदेश नहीं दिया है। यहाँ पर रोहित को उस पुरुषार्थ का उपदेश दिया गया है, जिसका सम्बन्ध आध्यात्मिक उन्नति से है।

आध्यात्मिक क्षेत्र की सफलता अखण्ड-पुरुषार्थ और कठोर कर्मण्यता पर निर्भर है। उसमें जिन साधनों, नियमों और संयमों का पालन अपेक्षित है वह किसी आलसी के वश की बात नहीं होती है। उनका निर्वाह तो कठिन परिश्रम और स्वावलम्बन पर निर्भतर व्यक्ति ही कर सकता है। आध्यात्मिक पुरुषार्थ का अभ्यास भी भौतिक पुरुषार्थ के स्त्रोत से ही निकलता है। जो अपने दैनिक जीवन में पुरुषार्थ और परिश्रम नहीं कर सकता, उसका अध्यात्म क्षेत्र में पुरुषार्थी बन सकना सम्भव नहीं।

साथ ही रोहित के माध्यम से पुरुषार्थ एवं परिश्रम का यह उपदेश समाज को भी दिया गया है। इन्द्र का स्पष्ट उपदेश है कि यदि किसी को रोहित की तरह धन सम्पत्ति अनायास भी मिल जाय तब भी उसे श्री एवं श्रेय प्राप्त करने के लिए कड़ा परिश्रम करना ही चाहिये। क्योंकि आत्म-अर्जित श्री में जो सौंदर्य एवं संतोष होता है, वह अनायास प्राप्त हो गये में नहीं। फिर जो सम्पत्ति किसी को यों ही मिल गई है, वह पता नहीं किन संस्कारों से दूषित अथवा भूषित है और उसका प्रभाव अपने संस्कारों पर क्या पड़े? आत्म-अर्जित श्री में ऐसा संशय नहीं होता। वहाँ विश्वास ही होता है और जीवन पर अनुकूल प्रभाव ही डालती है। यह नितान्त आवश्यक है। क्योंकि अर्थ के पुरुषार्थ के बाद मोक्ष के पुरुषार्थ की ओर भी तो जाना होता है।

इन्द्र ने दूसरी बात कही है- “बैठे हुए मनुष्य को पाप दबा लेता है। मेरा स्नेह और मित्रता वही पाता है, जो निरन्तर चलता रहता है। इसलिए चलते रहो, चलते रहो।” इसमें श्रम के सम्बन्ध में एक मनोवैज्ञानिक तथ्य का उद्घाटन किया गया है। “बैठे हुए मनुष्यों को पाप दबा लेता है।” अर्थात् जो कुछ करता नहीं, आलस्य और प्रमाद में पड़ा रहता है, उसका मानसिक पतन हो जाता है। खाली मस्तिष्क शैतान का घर कहा गया है। जब मनुष्य किसी काम में व्यस्त रहता है, तब उसका शरीर ही नहीं मन और मस्तिष्क भी उसी में संलग्न रहते हैं। काम के सम्बन्ध में ही विचार आते हैं और काम में ही अभिरुचि रहती है।

बेकार के विचार और बेकार की कल्पनाओं से वह मुक्त रहता है। लेकिन जब मनुष्य खाली रहता है, तो उसका मन मस्तिष्क भी खाली रहता है। लेकिन वे निष्क्रिय कभी नहीं होते। काम के अभाव में भी वे सक्रिय रहते हैं। ऐसी स्थिति में कुविचार आ आकर मन मस्तिष्क में जमा होते रहते हैं। इधर शरीर के कुछ न करने से इन्द्रियाँ आजाद होती हैं। उन पर जब किसी काम का भार नहीं होता तो वे विषयों की ओर भागने लगती हैं। इस प्रकार एक जैसी स्थिति में होने से इन्द्रियों और मन-मस्तिष्क के बीच संधि हो जाती है और तीनों मिल कर मनुष्य को पापों की ओर खींच ले जाते हैं। अस्तु अकर्मण्य का पापी हो जाना कोई आश्चर्य की बात नहीं।

इन्द्र आगे कहते हैं, मेरा स्नेह और मित्रता उन्हें ही मिलती है, जो निरन्तर चलते रहते हैं अर्थात् सक्रिय रहते हैं- कुछ काम करते रहते हैं। इन्द्र देवता हैं- जो स्वयं शहादत देते हैं कि मेरी अर्थात् देवों की कृपा उन्हें ही मिलती है, जो निरन्तर कर्मशील रहते हैं। अर्थात् देवता उनसे ही प्रसन्न होते हैं, जो निरन्तर काम करते रहते हैं। पहल बात तो यह है कि श्रमशील और परिश्रमी से सभी स्वभावतः प्रसन्न रहते हैं। फिर कर्मठ व्यक्ति पापात्मा नहीं होता। पाप रहित व्यक्ति से देवता प्रसन्न होने के लिए विवश हैं। उन्हें अनिवार्य रूप से प्रसन्न होना ही होता है।

काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, द्वेष, बैर-विरोध आदि जितने भी मूल और तद्जन्य पाप होते हैं, मनुष्य कार्यकाल में बिल्कुल भूला रहता है। इन्हीं को क्यों, सच्चा कार्यकर्ता तो काम में अपने तक को भूल जाता है। ऐसी निर्विकल्प समाधि की स्थिति में पापों के आने का कोई प्रश्न ही नहीं होता। सच्चा कर्मयोगी वास्तव में एक योगी होता है। देवताओं का उसका मित्र होना स्वाभाविक है। अस्तु निर्देश दिया गया है कि निरन्तर चलते रहो- सदैव कार्य में व्यस्त रहो बेकार मत बैठो।

इन्द्र ने आगे कहा है- “जो चलता है उसकी जंघाओं में फूल खिलते हैं, आत्मा विभूषित होकर फल लाती है।” सुन्दरता और प्रसन्नता श्रम के प्रतीक हैं। यह दोनों विशेषतायें श्रम के अधीन हैं। श्रम करने से स्वास्थ्य मिलता है और स्वस्थ मनुष्य ही प्रसन्न रह सकता है और सच्चा सौंदर्य भी स्वास्थ्य ही होता है। श्रम करने से रक्त तपता है, उसकी जीवन-शक्ति बढ़ती है, जो शरीर के सारे रोगों के कीटाणुओं को मार देती है। श्रम करने से जो पसीना बहता है, वह वास्तव में शरीर का विष और विकार ही होता है, जो वह बह कर बाहर हो जाता है। श्रम करने से क्षुधा तीव्र होती है, भोजन पूरी तरह अनुकूलता के साथ पचता है। गहरी निद्रा आती है। अवयव स्वस्थ और सुदृढ़ बनते हैं। इससे अधिक आरोग्य तथा स्वास्थ्य के लिए कुछ और नहीं चाहिये।

जंघाएं आधार अथवा नींव की प्रतीक हैं। मनुष्य जीवन का आधार श्रम के सिवाय और कुछ नहीं। श्रम से ही धन मिलता है। श्रम से ही अन्न और वस्त्र। श्रम से ही विद्या मिलती है और श्रम से ही सम्मान। जिसके जीवन का आधार ही खोखला होगा, वह कितने दिन खड़ा रह सकता है। हवा का एक झोंका ही उसे गिरा देगा। जीवन की स्तम्भता श्रम पर ही निर्भर है इसीलिये निरन्तर चलते रहने अर्थात् सक्रिय रहने को कहा गया है।

“चलते रहने वाले की आत्मा विभूषित होकर फल लाती है” -इसका तात्पर्य इस सिद्धान्त वाक्य की ओर संकेत करता है कि- स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ आत्मा का निवास होता है। जब शरीर और मन मस्तिष्क स्वस्थ होंगे तो आत्मा का स्वस्थ होना स्वाभाविक है। जिसकी आत्मा स्वस्थ एवं पुष्ट होती है, उसे ही आध्यात्मिक लाभ होता है। स्वस्थ आत्मा वाला व्यक्ति ही धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष के पुरुषार्थ चतुष्टय का सम्पादन करने में समर्थ हो सकता है। विभूषित अथवा जागरूक आत्मा वाला वैसा किये बिना रह ही नहीं सकता और जब वह पुरुषार्थ करेगा, परमार्थ पथ पर चलेगा, तो परम फलों को पायेगा ही, इसमें सन्देह नहीं। इसलिए निरंतर चलते रहने, पुरुषार्थ करते रहने का उपदेश किया गया है।

फिर कहा है- “बैठे, उठे और चलने वाले का सौभाग्य क्रम से बैठा रहता है, खड़ा हो जाता है और चल पड़ता है- मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है। सौभाग्य क्या है? कर्म फलों का उदय उनका भोग। कर्म कौन करता है? मनुष्य। अस्तु भाग्य का निर्माता स्वयं मनुष्य को ही माना जायेगा। जो बैठा है अर्थात् अकर्मण्य बना हुआ है, उसकी सौभाग्य लिपि किस प्रकार निर्मित हो सकती है। हाँ जो उठ पड़ा है अथवा कर्म करने को उद्यत हो गया है, उसकी भाग्य लिपि की तैयारी विधाता के घर होने लगती है। और जब इधर मनुष्य चल पड़ता है अर्थात् पुरुषार्थ करने लगता है तो उधर दैवी लेखक की लेखनी भी चलने लगती है और भाग्य लिपि तैयार होने लगती है। इसलिये बैठने का निषेध कर, चलने का आदेश दिया गया है।

अन्त में सोने, अंगड़ाई लेने, खड़े होने और चलने वाले को क्रम से कलियुग, द्वापर, त्रेता और कृतयुग अर्थात् सतयुग बतलाया गया है। युग और कुछ नहीं व्यक्ति, समाज, राष्ट्र अथवा संसार की परिस्थिति दशाओं का ही नाम है। जो सोता रहता है अथवा जब जहाँ सुषुप्ति होती है वहाँ अचेतनता और अन्धकार होता है, वहाँ पाप, ताप और परिताप से भरा कलियुग रहता है। जब जिस समय लोग जाग कर चेतना में आने लगते हैं, कलि का स्थान द्वापर अर्थात् सुन्दर समय आने लगता है। जब जिस समय लोग उठ कर खड़े हो जाते हैं, अर्थात् पुरुषार्थ के लिए उद्यत होते हैं उसकी तैयारी करते हैं तो त्रेता अर्थात् सुन्दर समय आ जाता है। और जब लोग पूरी तरह से चलने लगते हैं अर्थात् अपने कर्तव्यों में संलग्न हो जाते हैं तो सुंदरतम समय अर्थात् सतयुग आ जाता है। कर्तव्यों की महिमा के कारण ही सतयुग को कृतयुग भी कहा जाता है।

इन्द्र के इस सब कथन का साराँश यही है कि यदि सुख-शाँति, उन्नति और अभ्युदय चाहता है, अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष के फल चाहता है तो उसे निरन्तर अनुकूल श्रम करते ही रहना चाहिये। इसके सिवाय सफलता तथा सार्थकता का कोई और उपाय नहीं है।


Quotation

ऐसा कोई मंत्र नहीं जिसे फूँक कर कोई अपने को निम्नावस्था से शीघ्र ही उठा कर उच्च स्थिति पर पहुँचा दे। अन्य लोग दुःखद परिस्थितियों में जिन गुणों को अपना कर आगे बढ़े हैं, सिवा इसके कि आप भी उनका अवलम्बन करें सफलता का और कोई दूसरा मार्ग नहीं। परिश्रम, संयम, ईमानदारी और मितव्यय यह वह गुण हैं, जिनसे लोग छोटी स्थिति से बढ़े और सफल एवं सम्पन्न व्यक्ति बने। -बाइड


फूल की बात काँटों से

फूल की बात काँटों से :-

गुलाब के फूल और काँटों में विवाद चल पड़ा। फूल ने अभिमान में आकर कहा- “ओरे काँटे! तुझे मेरे पास रहते लज्जा नहीं आती। देख मेरी सुन्दरता कितनी अक्षुण्ण है, मुझे अमीर-गरीब सब प्यार करते हैं, मैं देवताओं के मस्तिष्क पर चढ़ता हूँ, सुन्दरियाँ मुझे गले से लगाती हैं। कहाँ मैं इतना सुन्दर, सुगन्धित और सम्मानित, कहाँ तू सूखा-सा दूसरों को कष्ट देने वाला काँटा, अच्छा होता तू मेरे समीप न जन्मा होता।

काँटा बहुत दुःखी हुआ उसने कहा- “ठीक कहते हो फूल। तुम्हारा सौंदर्य अकथ और अद्वितीय है पर क्या कभी यह सोचा कि तुम्हारी रक्षा हम काँटे ही करते हैं। हम न होते तो आज तुम्हारी हँसी मिट्टी में मिली होती, जो आता वही तुम्हें मसलकर फेंकता चला जाता। तुम्हारे सौंदर्य की रक्षा कर मैंने कोई अपराध किया है क्या?

फूल क्या उत्तर देता, लज्जा से सिर झुका कर चुप हो गया।


मुक्ति के लिए प्रयत्न

कुछ लोग धनी बनने की वासना रूपी अग्नि में अपनी समस्त शक्ति, समय, बुद्धि, शरीर यहाँ तक कि अपना सर्वस्व स्वाहा कर देते हैं। यह तुमने भी देखा होगा। उन्हें खाने-पीने तक की भी फुरसत नहीं मिलती। प्रातःकाल पक्षी चहकते और मुक्त जीवन का आनन्द लेते हैं तब वे काम में लग जाते हैं। इसी प्रकार उनमें से नब्बे प्रतिशत लोग काल के कराल गाल में प्रविष्ट हो जाते हैं। शेष को पैसा मिलता है पर वे उसका उपभोग नहीं कर पाते। कैसी विलक्षणता। धनवान् बनने के लिए प्रयत्न करना बुरा नहीं। इससे ज्ञात होता है कि हम मुक्ति के लिए उतना ही प्रयत्न कर सकते हैं, उतनी ही शक्ति लगा सकते हैं, जितना एक व्यक्ति धनोपार्जन के लिये।

मरने के बाद हमें सभी कुछ छोड़ जाना पड़ेगा, तिस पर भी देखो हम इनके लिए कितनी शक्ति व्यय कर देते हैं। अतः उन्हीं व्यक्तियों को, उस वस्तु की प्राप्ति के लिये जिसका कभी नाश नहीं होता, जो चिरकाल तक हमारे साथ रहती है, क्या सहस्त्रगुनी अधिक शक्ति नहीं लगानी चाहिए? क्योंकि हमारे अपने शुभ कर्म, अपनी आध्यात्मिक अनुभूतियाँ- यही सब हमारे साथी हैं, जो हमारी देह नाश के बाद भी साथ जाते हैं। शेष सब कुछ तो यही पड़ा रह जाता है।

यह आत्म-बोध ही हमारे जीवन का लक्ष्य है। जब उस अवस्था की उपलब्धि हो जाती है, तब यही मानव- देव-मानव बन जाता है और तब हम जन्म और मृत्यु की इस घाटी से उस ‘एक’ की ओर प्रयाण करते हैं जहाँ जन्म और मृत्यु- किसी का आस्तित्व नहीं है। तब हम सत्य को जान लेते हैं और सत्यस्वरूप बन जाते हैं।

-स्वामी विवेकानन्द


परमात्मा-सत्ता से सम्बद्ध होने का माध्यम

जो मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप को समझ लेता है, उसका सम्बन्ध परमात्म-तत्व से स्पष्ट और प्रकट हो जाता है। जिसकी अभिव्यक्ति उच्च शक्तियों के रूप में होकर संसार को प्रभावित करने लगती है और लोग उस व्यक्ति को अवतार, पैगम्बर, ऋषि, योगी आदि मान कर पूजने और मनन करने लगते हैं। वह एक दिव्य पुरुष बन जाता है।

परमात्मा-तत्व वह अनन्त-जीवन, वह सर्वोपरि चैतन्य और वह सर्वोपरि सत्ता है जो हम जगत के पीछे अदृश्य रूप से काम करती, इसका नियमन और नियन्त्रण करती है, और जिससे दृश्यमान जीवन आता है और सदा सर्वदा आता रहेगा। इसी अनन्त असीम और अनादि ज्ञान और शक्ति के भण्डार से सम्बन्ध स्थापित हो जाने से साधारण मनुष्य असाधारण बन कर अपने वास्तविक स्वरूप का ज्ञाता हो जाता है।

अणु-अणु का मूलाधार वह परमात्म-तत्व ही है। सब कुछ उसी से बनता और उसी चेतन-शक्ति से गतिशील होता है। आकार-प्रकार में भिन्न दीखते हुए भी प्रत्येक पदार्थ एवं प्राणी एक उसी तत्व का अंश है। जिस प्रकार समुद्र से उठाया हुआ एक जल-बिन्दु भिन्न दीखता हुआ भी मूलतः उसी का संक्षिप्त स्वरूप होता है और समुद्र की सारी विशेषतायें उसमें होती हैं, उसी प्रकार व्यक्तिगत जीवन और समष्टिगत जीवन सीमित और असीमित के मिथ्या भेद के साथ तत्वतः एक ही हैं। जो जीवात्मा है वही परमात्मा और जो परमात्मा है वही जीवात्मा। इस सत्य को जान लेना ही आत्म ज्ञान कहा गया है। जिन-जिन महापुरुषों ने आत्म-प्रकाश की प्राप्ति कर ली है, उन्होंने अपना अनुभव प्रकट करते हुए, इस सत्य की इस प्रकार पुष्टि की है कि हम अपना जीवन परमात्म-तत्व से एक दिव्य प्रवाह के रूप में पाते हैं अथवा हमारे जीवन का उन परमात्म-तत्व से ऐक्य है। हममें और परमात्मा में कोई भेद नहीं है। हम और हमारा ईश्वर एक सत्य के ही दो नाम और दो रूप हैं। यही ज्ञान अथवा अनुभव आत्मानुभूति, आत्म-प्रतीति अथवा आत्म-ज्ञान के अर्थ में मानी गई है।

प्रतीति के साथ शक्ति का अटूट सम्बन्ध है। जिसे अपने प्रति सर्वशक्तिमान की प्रतीति होती है, वह सर्वशक्तिमान और जिसको अपने प्रति निर्बलता की प्रतीति होती है निर्बल बन जाता है, और उसी के अनुसार उसका जीवन व्यक्त अथवा प्रकट होता है। अपने प्रति इस प्रतीति की स्थापना करने का प्रयास ही आत्म-ज्ञान की ओर अग्रसर होना है। जिसका उपाय आत्म-चिन्तन के सिवाय क्या हो सकता है? जब यह चिन्तना अभ्यास पाते-पाते अविचल, असंदिग्ध अतर्क और अविकल्प हो जाती है, तभी मनुष्य में आत्म-ज्ञान का दिव्य प्रकाश आपसे-आप विकीर्ण हो जाता है, दिव्य-शक्तियाँ स्वयं आकर उसका वरण करने लगती और वह साधारण से असाधारण, सामान्य से दिव्य और व्यष्टि से समष्टि रूप होकर संसार के लिए आश्चर्य, योगी, अवतार अथवा सिद्ध रूप हो जाता है।

आत्म-ज्ञान ही मनुष्य का सर्वोच्च लक्ष्य है। जिसने इस लक्ष्य की ओर ध्यान नहीं दिया, भौतिक विभूतियों के लोभ में इसकी उपेक्षा कर दी, उसने मानो मानव जीवन का सारा मूल्य गंवा दिया। जो अवसर परमात्मा से सम्बन्ध स्थापित करने और उससे बहने वाले दिव्य प्रकाश को ग्रहण करने की योग्यता उपार्जित करने के लिए मिला था, उसे अज्ञान के अन्धकार में अटकते-भटकते रह कर खो दिया। यह भूल मनुष्य जैसे विवेकशील प्राणी के लिए अनुचित और अवाँछनीय है। इस अविवेक को त्याग कर हर भटके हुए व्यक्ति को शीघ्र से शीघ्र सत्य-मार्ग पर आ ही जाना चाहिए।

जीवन का प्रत्येक क्षण अमूल्य और अलभ्य है, एक बार बीत जाने पर दुबारा नहीं मिलता। इसलिए भूल सुधारने में जितनी शीघ्रता की जायेगी, उतना ही हितकर होगा। मनुष्य की महत्ता इस एक जीवन में ही अपना सर्वोच्च लक्ष्य प्राप्त कर लेने की है। नहीं तो इतना तो कर ही लेना बुद्धिमानी है कि जो जीवन शेष है, अभी अपने अधिकार में है, उसको सत्य पथ पर नियोजित कर जितना जो कुछ बढ़ा जा सकें बढ़ चला जाये। इस अपेक्षित अभियान का तारतम्य आगामी जीवन में बना रहेगा और तब वह उसी निर्धारित सत्य मार्ग पर प्रारम्भ से ही चल पड़ेगा।

प्रायः लोगों में यह भ्रांत धारणा काम करती है कि शरीर छूट जाने के बाद उसके साथ जुड़ी हुई हर बात यहीं छूट जाती है। किन्तु सत्य इससे सर्वथा भिन्न है। शरीर छूट जाने पर भी जीवन का अन्त नहीं होता। जीवन तो एक अनन्त एवं अविच्छिन्न प्रवाह है, जो सदा सर्वदा एक तारतम्यता के साथ प्रवाहित होता रहता है। जीवन अमर है इसका कभी नाश नहीं होता, जीवात्मा इस स्थूल लोक को त्याग कर इसके पश्चात आने वाले लोक के नये आकार में जीवन-क्रम को पूर्ववत चालू रखता है। जीवात्मा का परमात्मा की ओर अग्रसर होने यही विधान है। वह कूद कर अथवा छलाँग लगाकर पूरे पथ को पार नहीं करता, वरन् क्रम-क्रम से सोपान-अनुसोपान पर पैर रखता हुआ ऊपर चढ़ता है। एक जीवन की सारी बातें दूसरे जीवन में उसके साथ यथावत सूक्ष्म संस्कारों के रूप में जाती हैं और अपनी गतिविधि निर्धारित करती हैं। इसलिये यह सोचकर कि अब तो जीवन का बहुत भाग बेकार चला गया है, अब हो भी क्या सकता है ठीक नहीं। शेष जीवन में जो सत्प्रयास प्रारम्भ कर दिया जायेगा वह भी अपने पूरे परिमाण के साथ आगामी जीवन का प्रारम्भ बनेगा।

हमारा वर्तमान जीवन, वर्तमान की ही वस्तु है, ऐसा मानना समीचीन नहीं। हमारा जीवन पहले भी था और आगे भी रहेगा। जीवन का वास्तविक अस्तित्व अदृश्य जगत में ही रहता है। यही नहीं संसार की प्रत्येक वस्तु, प्रत्येक पदार्थ, जिसे हम देख रहे हैं, देख चुके हैं अथवा आगे देखेंगे, वह आज ही उत्पन्न नहीं हुई है। उसका अस्तित्व पहले से ही सूक्ष्म अथवा अदृश्य जगत में वर्तमान था। मनुष्य का प्रत्यक्ष जीवन स्थूल-लोक से प्रारम्भ होता दीखता अवश्य है, किन्तु वह वस्तुतः पहले से ही चला आता होता है। यह स्थूल शरीर जिसके छूट जाने को हम जीवन का अन्त मान लेते हैं, वास्तविक शरीर जिसे सूक्ष्म शरीर कहते हैं, का ऊपरी आवरण अथवा कलेवर मात्र है।

यह जो कुछ क्रिया कलाप करता दीखता वह उस सूक्ष्म शरीर की ही क्रिया होती है, जो इसके आधार पर प्रकट हुआ करती है। अपने इसी कलेवर के भीतर वह वास्तविक और शाश्वत सूक्ष्म शरीर वृद्धि करता हुआ पूर्णता को प्राप्त होता रहता है। जिस प्रकार छिलके के भीतर अनाज का दाना धीरे-धीरे विकसित होकर पकता रहता है और जब वह पूरी तरह पक जाता है तो बाहर निकल जाता है, जिससे ऊपर का छिलका बेकाम हो जाता है। उसी प्रकार सूक्ष्म शरीर के पूर्ण विकसित हो जाने पर अथवा परमात्म-तत्व को आत्मसात कर लेने पर स्थूल शरीर बेकार और व्यर्थ होकर गिर जाता है। अन्तर केवल इतना है कि अन्न का दाना अपने एक ही आवरण में पूरी तरह पक जाता है और सूक्ष्म शरीर अथवा जीवात्मा को पूर्ण विकास पाने के लिए अनेक बार स्थूल शरीर का कलेवर धारण करना पड़ता है, और जिस दिन वह आत्म प्रतीति की स्थिति में पहुँच जाता है, उसके बाद उसे फिर शरीर धारण करने की आवश्यकता नहीं रहती, वह अपने अनादि एवं अनन्त जीवन प्रवाह में स्त्रोत की तरह मिल कर तद्रूप हो जाता है।

यदि वास्तविक दृष्टि से विचार किया जाये तो पता चलेगा कि हमारा जीवन स्थूल शरीर नहीं, सूक्ष्म शरीर ही है। हम जो कुछ करते हैं, उसी रूप में करते हैं और जो कुछ आगे करेंगे, उसी रूप में। हमारा यह बाह्याकार कितना ही बदलता रहे किन्तु उसमें रहने वाला जीवात्मा कभी नहीं बदलता। हमारा जीवन अपरिवर्तनशील और अमर है और यही रहस्य संसार का सबसे बड़ा सत्य है।

हमारा यह वास्तविक जीवन अथवा सूक्ष्म स्वरूप क्या है? इस प्रश्न का उत्तर होगा ‘विचार’। विचार अपने में मूर्तिमान होते हुए भी सूक्ष्म सत्ता होने के कारण कभी स्पष्ट दिखलाई नहीं देते। उनकी मूर्तिमत्ता कार्यों के रूप ही प्रकट होकर सामने आती है। हमारे आस-पास की दुनिया में दिखलाई देने वाली हर वस्तु का सर्व प्रथम स्त्रोत विचार ही होता है। कोई भी वस्तु अथवा पदार्थ सर्वप्रथम विचार रूप में जन्म लेकर ही स्थूल रूप में प्रकट होता है। हम स्वयं अपना जन्म विचारों में ही धारण करते हैं। उन्हीं में पलते बढ़ते और व्यक्त होते हैं। हम जीवन रूप में विचार स्वरूप ही हैं। हम आज जो कुछ दिखलाई दे रहे हैं अथवा आगे दिखलाई देंगे, वह हमारे विचारों के सिवाय और कुछ न होगा। अपने जीवन को सत्य पथ पर नियोजित करने का अर्थ विचारों को उस दिशा में उन्मुख करने के सिवाय और कुछ भी नहीं है।

विचार ही मनुष्य का वास्तविक स्वरूप है। उसे केवल कोरी कल्पना अथवा हवाई उड़ान मानकर महत्व न देने वाले इतने सत्यस्वरूप की ओर से आँख बन्द कर लेते हैं। शाश्वत शक्ति से सम्बन्धित होने से विचारों को संसार की वास्तविक, प्रबल, सूक्ष्म और महान शक्ति माना गया है। विचारों के कारण ही मनुष्य उत्कृष्ट अथवा निकृष्ट बनता है।

समानता वाले दो पदार्थ एक दूसरे को अनायास ही अपनी ओर आकर्षित करते हैं। सृष्टि का यह नियम स्थायी और शाश्वत है। हम अपने जीवन के अनुकूल विचारों और शक्तियों को अदृश्य जगत से आकर्षित करते और स्वयं भी उनकी ओर खिंचते रहते हैं। हमारे विचार सत्य और सत् होंगे, हम सत्य और सत् तत्वों को अपनी ओर आकर्षित करेंगे और स्वयं भी उनकी ओर आकर्षित होंगे। इसके विपरीत असत्य एवं असद् विचारों के कारण हम अवाँछनीय तत्वों को आकर्षित करते और उनकी ओर बढ़ते जाते हैं। आत्म-विकास अथवा आत्म-निर्माण का दूसरा नाम विचार-निर्माण ही है।

हम जितने ही कुशल विचार शिल्पी होंगे, हमारी आत्मा का निर्माण उतना ही सुन्दर और स्थायी होगा। अपनी आत्मा का साक्षात्कार भी हम विचारों के द्वारा ही कर सकते हैं। विचारों के आदर्श में ही आत्मा का रूप प्रतिबिंबित होता है और विचार चक्षुओं से ही उसके दर्शन किये जा सकते हैं। विचार जितने उज्ज्वल और पवित्र होंगे, आत्मा का प्रतिबिम्ब उतना ही स्वच्छ और स्पष्ट दृष्टिगोचर होगा।

आत्म-चिन्तन जिसे आत्म-ज्ञान का उपाय माना गया है, अपने प्रति विचार करना ही तो है। विचार-शक्ति के द्वारा ही हम अपने प्रति किसी स्थायी प्रतीति का सृजन कर सकते हैं। विचार ही यह माध्यम है जो आत्मा और परमात्मा के बीच सम्बन्ध-सूत्र की भूमिका पूरी किया करते हैं। अपने विचारों को विचार द्वारा देखिये और पता लगाइये कि आप किस स्थिति में हैं। आपका जीवन यान ठीक उस पथ पर अग्रसर हो रहा है या नहीं जो परमात्म तत्व की प्राप्ति के सर्वोच्च लक्ष्य की ओर जाता है। यदि ऐसा है तो निरन्तर चलते जाइये और यदि कोई त्रुटि है तो रुकिये और अपने जीवन यान का दृष्टिकोण बदलकर ठीक दिशा में नियोजित कर लीजिये।

मनुष्य का सर्वोच्च लक्ष्य परमात्म-तत्व से स्थायी सम्बन्ध स्थापित करना है। और मनुष्य उस परम प्रवाह की एक अविच्छिन्न तरंग है यह प्रतीति प्राप्त कर लेना ही आत्म-ज्ञान माना गया है। इसका एक मात्र उपाय आत्म-चिन्तन है, जिसे विचार-क्रिया भी कह सकते हैं। इस प्रकार यदि हम इस विचार का अभ्यास करते हुए लगातार आगे बढ़ते रहें कि- “हम स्थूल नहीं सूक्ष्म जीवन हैं, जो अजर और अमर है, जिसका सीधा सम्बन्ध उस परमात्म-तत्व से ही रहता है। किन्तु अज्ञान का अन्धकार उस सत्य का अनुभव नहीं होने देता। इसलिये अब हम उस अन्धकार से निकल कर प्रकाश में आ गये हैं। हमारी यह प्रतीति निरन्तर बढ़ती जाती है कि हम बिन्दु रूप में सिन्धु और आत्मा के रूप में परमात्मा ही हैं, तो कोई कारण नहीं कि हम शीघ्र ही अपने सर्वोच्च लक्ष्य को प्राप्त न कर लें।

ऐसा विचार-आत्मा से ग्रहण करते ही वह सर्वव्यापक परमात्म-तत्व वह अनन्त जीवन हमारी ओर आकर्षित होता हुआ हमारे जीवन में और हमारा जीवन बढ़ता हुआ उसमें मिलने लगेगा और तब हमारे बीच के सारे व्यवधान और अवरोध व्यर्थ हो जायेंगे, फिर चाहे वह देहाभिमान हो अथवा मोहान्धकार।


सद्गुण साधना-सच्ची ईश्वर पूजा

सूर्य निकलता है। संसार में प्रकाश फैल जाता है। असंख्य लोग उसे देखते हैं। अब कोई यदि सूर्य की उपस्थिति में उसका प्रकाश नहीं देख पाता तो उसे अन्धा ही माना जायेगा। संसार में सब ओर ईश्वर की विद्यमानता है। जड़-चेतन में उसका दिव्य प्रकाश चमक रहा है। एक नहीं असंख्यों लोग ऐसे हुए हैं, जिन्होंने उस दिव्य प्रकाश को देखा है। उससे प्रेम किया है, उसका स्नेह, आनन्द और आलोक पाया है। अपनी आत्मा में उसका संकेत और सन्देश देखा-सुना है। जिसके आधार पर आध्यात्मिक लाभ पाया है। महात्मा, शिव और भक्त बने हैं। इस महान सत्य को अब जो नहीं देख पाता वह आँखों से न सही अन्तर से तो अन्धा है ही।

इस प्रकार का अनाध्यात्मिक अन्धत्व बुद्धि से मन से और विवेक से सम्बन्धित होता है। परमात्मा का दर्शन आत्मा के नेत्र- “विवेक’’- से होता है। जिन मनीषियों और महात्माओं ने ईश्वर की अनुभूति और उसका दर्शन पाया है, उन्होंने अपने विवेक को प्रखर और पवित्र बनाने के लिए प्रयत्न किया है। संसार के दोष और कलेशों से अपने को मुक्त किया है। अपने मनोदर्पण को मलों से मुक्त करके ही वे उस परम ज्योति का प्रतिबिम्ब अपने अन्दर देख सके हैं। उन भाग्यवान परमात्म जिज्ञासुओं ने ईर्ष्या, द्वेष, छल-कपट, आदि दोषों से दूर रह कर प्राणि-मात्र से प्रेम किया, उन्हें अपना ही अंश और अपना ही स्वरूप माना। अपने जीवन की सारी विशेषतायें, परोपकार और परमार्थ में यापन की और तब वे अपनी आध्यात्मिक जिज्ञासा में कृतकृत्य हो सके हैं।

यह सम्पूर्ण संसार परमात्म रूप है- ‘पुरुष सवेदं सर्वम्’ -यह सब कुछ परमात्म रूप ही है। अर्थात् हम अपने आस-पास जो कुछ देखते और पाते हैं, वह सब परमात्मा का ही तो रूप है। हम स्वयं परमात्मा के एक अंश हैं और दूसरे जीव भी उसी का अंश हैं। इस प्रकार संसार में ऐसा कौन रहा जाता है, जिसमें हमारा आत्मीय सम्बन्ध न हो। किस से विरोध करना अथवा बैर मानना अपनी आत्मा का विरोध करना है। आत्मा का विरोधी मनुष्य किसी भी श्रेय का अधिकारी नहीं हो सकता। परमपिता परमात्मा का दर्शन, उसकी अनुभूति तब ही प्राप्त हो सकती है, जब विवेक पर से संकीर्णता का आवरण उठा कर उसे व्यापक और विस्तृत बनाया जायेगा। अपने भीतर-बाहर और आस-पास एक परमात्मा को उपस्थित मानकर आचरण किया जायेगा।

संकीर्णता और परमात्मानुभूति परस्पर विपरीत विषय हैं। इसका अनुकरण करने से मनुष्य परमात्मा से दूर-दूर ही होता जाता है। गीता में भगवान ने स्पष्ट कहा है- “जो मुझ ईश्वर को सबमें और सबको मेरे अन्दर देखता है, वह योगी न मुझसे पृथक है और न मैं उसके पृथक हूँ।” इस प्रकार के व्यापक दृष्टिकोण वाला विवेकी पुरुष सब समय सर्वज्ञ परमात्मा का दर्शन पाता रहता है। उसके लिए वह वैसे ही स्पष्ट बना रहता है जिस प्रकार नेत्र वालों के लिए सूर्य का प्रकाश।

यह मान्यता कि ईश्वर का दर्शन ईश्वर की कृपा से ही होता है। जिसे यह चाहता है दर्शन देता है और जिसे नहीं चाहता दर्शन नहीं देता- सर्वथा भ्राँतिपूर्ण है। इसका आशय तो यही है कि सूर्य का प्रकाश मनुष्य को स्वयं नहीं मिलता। यह सूर्य की कृपा पर निर्भर है कि वह किसे दीखता है और किसे नहीं दीखता। इस प्रकार के पक्षपात का दोष ईश्वर की समान और व्यापक कृपा पर लगाना ठीक नहीं। वह सबके लिए सब स्थानों पर समान रूप से उपलब्ध है। कोई भी पात्रतापूर्वक उसे किसी भी स्थान पर देख और पा सकता है। ईश्वर सबका पिता है। उसे अपने सारे पात्र समान रूप में प्यारे हैं। जब संसार का एक साधारण पिता अपने सारे पुत्रों को बराबर प्रेम करता है, उन पर एक जैसी कृपा रखता है तो वह परमपिता ही अपने पुत्रों के बीच पक्षपात क्यों करेगा। तथापि जो पुत्र अपने गुणों द्वारा जितनी अधिक पात्रता प्राप्त कर लेगा, वह उसी के अनुसार उसकी अधिक कृपा का अधिकारी बन जायेगा। इसमें ईश्वर की न्यूनाधिक कृपा की बात नहीं है, यह उसके जिज्ञासुओं की पात्रता की विशेषता है। उसका कृपा सागर तो सब ओर से परिपूर्ण, सबके लिए मुक्त पड़ा है, जो जितना बड़ा पात्र लेकर जायेगा, भर लायेगा। अपनी अपात्रता का दोष पिता पर रखना अपनी एक और अपात्रता का प्रमाण देना है।

ईश्वर को अन्यत्र खोजने की अपेक्षा यदि उसे अपने अन्दर खोजा जाये तो उसका दर्शन अधिक शीघ्रता से हो सकता है। मनुष्य के अन्दर आत्मा का निवास है और वही आत्मा ईश्वर का केन्द्र है। ईश्वर की अनुभूति ईश्वर का निर्देश इस आत्मा द्वारा ही प्राप्त होता है। मनुष्य का आत्मा ईश्वर क साक्षी भी है। उसकी जागरूकता में मनुष्य उन कर्मों से विरत रहता है, जो ईश्वरीय विधान के विरुद्ध होते हैं। मनुष्य जब कोई अपराध या पाप करने को उद्यत होता है तो उसे अपने अन्दर एक निषेध करती हुई आवाज सुनाई देती है। यह आवाज यद्यपि स्थूल रूप में नहीं होती तो भी स्पष्ट सुनाई देती है।

पाप को उद्यत मनुष्य स्वयं अपने आपको तो मना करता नहीं और न कोई दूसरा ही उसके भीतर बैठा होता है, जो उस प्रकार मना करता है। तब यह आवाज किसकी होती है? निश्चय ही वह आवाज आत्मा की होती है। परमात्मा का केन्द्र होने से उसका प्रतिनिधि अंश होने से वह जीव के कर्मों पर पहरा देने के लिए सदा जागरूक रहती है। ज्योंही मनुष्य कोई अपकर्म करने पर उतरता है, यह तुरन्त उसे टोक देती है। इसके विपरीत जब वह कोई सत्कर्म करता है तो उसे शक्ति, साहस, उत्साह और प्रसन्नता प्रदान करती है।

आत्मा को यह कर्तव्य ईश्वर की ओर से सौंपा गया है कि वह उसके बच्चों, मनुष्यों को दुष्कर्मों से रोक कर सत्कर्मों में प्रवृत्त करे। संसार का वह पिता बड़ा दयालु और करुणा सागर है। वह नहीं चाहता कि उसकी सृष्टि के प्राणी मात्र में सर्वश्रेष्ठ प्राणी मनुष्य अपकर्मों द्वारा दुःख एवं यातनाओं का भागी बने। उस दयालु की सदैव ही यह इच्छा रहती है कि मनुष्य उसी की तरह सच्चिदानंद स्वरूप बने। आप अकेले ही कर्माकर्म का बोध कर सकना मनुष्य के लिए सहज नहीं। इसीलिये उसकी सहायता करने के लिए ईश्वर ने उसे वह कर्तव्य सौंपा है।

आत्मा में विश्वास करने वाला उसके निर्देशों का अनुसरण करने वाला बड़ी सरलता से एक श्रेष्ठ मानव बन जाता है। ईश्वर के आदेश से आत्मा मनुष्य को पुण्य-पथ पर चलने का ही निर्देश करती है। जिन मनुष्यों को संसार में विशेष व्यक्तियों के रूप में जाना जाता है। जो अन्य लोगों से ऊंचे और श्रेष्ठ होते हैं। वे निश्चय ही आत्मा के निर्देश पर चलने वाले होते हैं, आत्मा का अनुसरण करने वालों की बुद्धि विलक्षण हो जाती है। उनका विवेक प्रबल और हृदय निर्मल हो जाता है। मनुष्य की यह मंजुल स्थिति ही वह स्थिति है, जो परमात्म-दर्शन के लिए अपेक्षित होती है।

ईश्वर की अनुभूति किसी एक रूप में नहीं होती। वह किसी भी ऐसे सद्-रूप में हो सकती है, जिसको मनुष्य सबसे अधिक चाहता है, प्यार करता है। उसका का वह वाँछित स्वरूप उसके सम्पूर्ण जीवन में ओत-प्रोत हो जाता है और उसी के द्वारा वह ईश्वरीय शक्ति और ईश्वरीय आनन्द का अधिकारी बन जाता है। महात्मा गाँधी ने अपना ईश्वर सत्य और प्रेम के रूप में देखा और पाया। वे स्वयं कहा करते थे- ‘‘मेरा ईश्वर तो मेरा सत्य और प्रेम है। नीति और सदाचार ईश्वर के ही रूप हैं। सद्कर्मों और सद्-विचारों के परिणामस्वरूप मिलने वाला आनन्द ईश्वर है और मानवता का सर्वोत्कृष्ट गुण भी उस परमात्मा का ही एक स्वरूप है। ईश्वर के साक्षात्कार का मेरा प्रयत्न एक मात्र सच्चाई के साथ प्रेमपूर्वक मानवता की सेवा करना है। मैं तो ईश्वर को इन्हीं विशेषताओं में देखता हूँ और एक सीमा तक पाता भी हूं। इसके अतिरिक्त मैं उन विश्वासवादियों में नहीं हूं जो ईश्वर को स्वर्ग आदि अनदेखे स्थानों का निवासी मानते हैं।”

महात्मा गाँधी के कथन का सारा सार यही है कि ईश्वर का निवास मनुष्य की अपनी अन्तरात्मा में ही है और उसे किसी भी ईश्वरीय गुण के रूप में सिद्ध किया जा सकता है। एक दर्शन-शास्त्री की उक्ति है कि- ‘‘ईश्वर सबमें है किन्तु सब लोग ईश्वर में नहीं हैं।’’ इस सूक्ति का आशय परमात्मा की सार्वदेशिकता में सन्देह करना नहीं है। यों तो सत्य यह है कि जहाँ ईश्वर अणु-अणु में समाया हुआ है वहाँ अणु-अणु उसमें निहित है, उसी में अवतस्थ है। न कोई ईश्वर से रिक्त है और न ईश्वर किसी से रिक्त है। सब उसमें और वह सबमें एक रूप में रमा हुआ है। उक्ति का तात्पर्य यही है कि ईश्वर तो सबको स्मरण रखता है किन्तु सभी लोग उसको स्मरण नहीं रखते। जिस प्रकार वह परमप्रभु हमें हर समय याद रखता है उसी प्रकार यदि हम भी उसे याद रखें तो सारी समस्यायें एक साथ ही हल होती चलें।

ईश्वर का नाम लेना या कुछ देर उसकी पूजा कर देना मात्र ही उसका स्मरण नहीं है। यह तो एक साधारण क्रिया-कलाप है, जो लोग देखा-देखी या कहे-सुने से करने लगते हैं। इसमें ईश्वरीय स्मरण का कोई उद्देश्य नहीं रहता। जो वास्तव में सच्चाई के साथ ईश्वर कर स्मरण रखता है, वह कभी अपकर्मों और अपविचारों में प्रवृत्त नहीं होता। वह जानता है कि दुष्कर्मों और दुर्विचारों से ईश्वर अप्रसन्न होता है। ईश्वर को स्मरण रखने वाला, उससे प्रेम करने वाला और उसकी जिज्ञासा करने वाला भूल कर भी अपने आराध्य, अपने प्रभु को अप्रसन्न न करना चाहेगा। वह तो वही कर्म करेगा और उसी विचार-धारा में बहेगा, जो ईश्वर की कृपा उसकी प्रसन्नता सम्पादित करती है।

पूजा-पाठ, जप-ध्यान करते रहना और दूसरी ओर असत्य, अपकार और अनीतिपूर्ण आचरण करते चलने वाला यदि यह कहता है कि वह ईश्वर को स्मरण रखता है तो वह मिथ्यावादी और मिथ्या विश्वासी है। एक बार यदि अलग से बैठकर ईश्वर का नाम न जपा जाय, पूजा पाठ न किया जाय, किन्तु अपने विचार और व्यवहार में सत्य, प्रेम, नीति और सदाशयों की रक्षा करते रहा जाय तो इसको भी यथार्थ ईश्वर-स्मरण कहा जायेगा। जो दुर्गुणी है वह ‘भक्त’ होकर भी ईश्वर को भूला हुआ है और जो न ‘भक्त’ होते हुए भी सद्गुणों को आश्रय करता है वह उसको याद करने वाला है। ईश्वर का स्मरण उसकी उपासना सद्गुणों के प्रकटीकरण से होती है, शारीरिक अथवा वाचिक सेवा साधना से नहीं।

यदि ईश्वर की जिज्ञासा है। उसे पाने देखने और अनुभव की अभिलाषा है तो आत्मा क निर्देशित सद्गुणों की उपासना करिये। उन्हीं का विकास और अनुसरण करिये और उसी रूप में उसे पाने का प्रयत्न करिये। ईश्वर को पाने का यह सबसे सही, सरल और सुन्दर मार्ग है।

ईश्वर का दर्शन चर्मचक्षुओं से नहीं अन्तरात्मा द्वारा होता है। सत्कर्मों द्वारा आत्मा को विस्तृत व्यापक और निष्कलुष बनाइये। ईश्वर की झाँकी स्वतः ही उसमें जगमगा उठेगी। आत्मा का विकास आत्म-विश्वास द्वारा होता है। अपने को शरीर न मानकर आत्मा मानिये और उस रूप में अपने को ईश्वर का केन्द्र उसका निवास और उसी का अंश विश्वास कीजिये। ऐसा विश्वास दृढ़ होते ही आपमें आत्म-गरिमा का भाव, अपने महत्व का गौरव, अपने उत्तरदायित्व की पुनीतिमा प्राप्त हो जायेगी। तब आप क्षुद्र से महान, तुच्छ से श्रेष्ठ बनकर जीवन से स्वयं ईश्वरत्व की ओर बढ़ने लगेंगे। वासनाएं, विषमताएं और अज्ञान की बाधक श्रृंखलाएं आपसे-आप टूट कर गिर जायेंगी। सद्गुणों और सदाशयों से आपकी अन्तरात्मा विभूषित हो उठेगी और आप ईश्वर प्राप्ति के अपने लक्ष्य की ओर उन्मुख हो चलेंगे।


विज्ञान का पंख

मनुष्य को एक पंख उग आया। विज्ञान का पंख। उसने जोर लगाया और आकाश में उड़ गया। पर अब वह मुक्त और शाँत नहीं था। उसे चारों ओर से जटिलता की आँधियों ने सताना प्रारम्भ कर दिया।

मनुष्य बहुत घबराया। प्रार्थना की हे प्रभो! कैसे संकट में डाल दिया। इससे तो अच्छा था, हमें जन्म ही न देते।

आकाश को चीरती हुई काल पुरुष की आवाज आई- ‘‘वत्स, आत्म-ज्ञान का एक और पंख उगा। भीतर वाली चेतना का भी विकास कर, वही संतुलन पैदा कर सकेगी।


सत्यं शिवं सुन्दरम् -हमारा परम लक्ष्य

मनुष्य की रुचियाँ और प्रवृत्तियाँ उसकी अंतःचेतना की साक्षी होती हैं। वे इस बात का पता देती हैं कि उसकी आत्मा प्रसुप्त है या जागरूक। जागरूक आत्मा का लक्षण है- सत्यं शिवं और सुन्दरं की ओर उन्मुखता। प्रसुप्त आत्मा का लक्षण है इसके विपरीत असत्य, अशिव और असुन्दर की ओर गतिमानता।

संसार में किसी सुन्दर दृश्य, सुन्दर स्वरूप और सुन्दर गुण देखकर जिसकी आत्मा प्रसन्न, प्रफुल्ल और उल्लसित हो उठती है, उसमें स्वयं भी उस प्रकार का सौंदर्य अपने में पाने की ललक होती है तो समझना चाहिए कि उसकी आत्मा में जागृति का उन्मेष हो रहा है।

जागरूक आत्मा वाला व्यक्ति प्रकृति की गोद में गाते-खेलते पशु-पक्षियों, कल-कल करते झरनों और नदियों, गगनचुम्बी पर्वतमालाओं को देखकर ऐसा आनन्द अनुभव करता है मानों वह सब सुन्दर प्रसार उसकी आत्मा से ही प्रभावित होकर फैल गया है। वह उसे उसी प्रकार देखता है, जैसे दर्पण में अपना सुंदर प्रतिबिम्ब। किसी गायक का सुन्दर संगीत, कवि की रचना और चित्रकार की कला देखकर आत्म-विभोर होकर ऐसा अनुभव करता है मानो वह गीत, वह काव्य और वह आलेखन उसकी अपनी अनुभूतियाँ और अभिव्यक्तियाँ हों, जिन्हें वह स्वयं प्रकट कर स्वयं ही देख और सुन रहा है। जागरूक आत्मा वाले संसार के सारे शिव और सुन्दर तत्वों से तादात्म्य का अनुभव करते हैं।

इस तादात्म्य का रहस्य यह है कि मनुष्य की आत्मा सम्पूर्ण सुन्दरताओं, कलाओं और श्रेष्ठताओं का भण्डार है। आत्मा में निवास करने वाली विशेषताएं और गुण किसी माध्यम का आधार पाकर बाहर प्रकट होती हैं। किन्तु इसका अनुभव होता उसको ही है जिसकी आत्मा प्रबुद्ध होती है। प्रसुप्त आत्मा वालों को उसका अनुभव उसी प्रकार नहीं होता, जैसे सोये हुए व्यक्ति को उसकी कलाकृति दिखलाने पर किसी प्रकार की प्रतिक्रिया नहीं होती। यह आत्मा की जागरूकता ही है, जो श्रेष्ठता, देवत्व कला, सौंदर्य और सद्गुणों की अभिरुचि और उनके प्रति आनन्दमयी अनुभूति को जन्म देती है।

आत्मा में यह विशेषता परमात्मा से अवतरित हुई है। प्रत्येक परमात्मा की प्रेरणा और दिव्य-विधान से जन्मा है। उसके विचार, उसके गुण और उसकी अनुभूतियाँ परमात्म-तत्व से ओत-प्रोत रहती हैं और यह सारे तत्व आत्मा में संकलित रहते हैं। प्रत्येक मनुष्य परमात्मा का अंश है। उसमें परमात्मा के वे सब गुण होने उसी प्रकार स्वाभाविक हैं, जिस प्रकार बूँद में सागर की विशेषताएं। मनुष्य भौतिक मानसिक और आध्यात्मिक सम्पदाओं से युक्त है। यह दूसरी बात है कि उसके अवगुणों और अपकर्मों के कारण उसकी आत्मा जागरण से वंचित हो और वह अपनी इन सम्पदाओं का अनुभव न कर पावे।

यदि आपकी अभिरुचि और प्रवृत्ति शिव और सुन्दर की ओर है तो समझ लेना चाहिए कि आपकी आत्मा में जागरूकता का लक्षण है। आपको अवसर है कि आप अपने इस आत्म-जागरण को सत्प्रयत्नों द्वारा विकसित करें, आगे बढ़ाएं, जिससे आप निरन्तर परमात्मा की ओर अग्रसर होते जाएं और शीघ्र ही अपने सच्चिदानन्द स्वरूप को पा लें। आत्मा की विशेषताओं की साक्षी के आधार पर यह विश्वास न करने का कोई कारण नहीं है कि आपका वास्तविक स्वरूप सच्चिदानन्द ही है।

जो व्यक्ति असुन्दर, अशिव, अपकर्मों और अपवित्रताओं में अरुचि न रखकर उनमें विशेषता देखता है- जैसे किसी के व्यसनों से प्रभावित होता है, किसी अपराधी के प्रति सहानुभूति रखता है, लोभी और स्वार्थी की नीति में चतुरता देखता है, डाकू, चोर और अत्याचारियों की कथाओं में रुचि लेता है, अदर्शनीय दृश्य देखने की उत्सुक होता है और पापियों की संगति से घृणा नहीं करता- तो मानना चाहिये कि उसकी आत्मा प्रसुप्त है और वह सृष्टि के सारे सुख सौंदर्य से वंचित हो गया है। जेलों, अस्पतालों और पागलखानों में दीखने वाली मानव-आकृतियाँ वे मनुष्य होते हैं, जिनकी आत्मा सोई होती है और इसी प्रसुप्ति के दोष से वे उन जगहों पर पहुँचे हैं।

आत्मा की प्रसुप्ति का कारण है मनुष्य का अज्ञान। उसका यह न जानना कि वह क्या है, संसार में आया क्यों है और उसका लक्ष्य क्या है? यदि वह इन तीन बातों का ज्ञान संचय कर ले तो निश्चय ही उसकी आत्मा में जागरण की स्थिति पैदा हो जाय। इन तीनों प्रश्नों का उत्तर कोई गोपनीय रहस्य नहीं है। इनका उत्तर बिल्कुल सीधा सरल एक और अन्तिम है। मनुष्य परमात्मा का अंश, उसका पुत्र और प्रतिनिधि है। संसार में आनन्द की खोज करने, उसको पाने और उसी क्रम में अपने को पहचान कर अपने लक्ष्य सच्चिदानन्द स्वरूप को पा लेने के लिए आया है।

अपने इस व्यक्तित्व, कर्तव्य और उद्देश्य की ओर से अज्ञानी रहने के कारण वह वासनाओं, तृष्णाओं, एषणाओं, मरीचिकाओं, कुरूपताओं और अमंगलों में अपनी चेतना को फंसाये रहकर आत्म-जागरण की ओर से विभोर रहता है। विषयों में सुख खोजना, पदार्थों में आसक्ति बढ़ाना, माया से मोहित होना और कामनाओं का पालन करना उसका स्वभाव बन जाता है। ऐसी विपरीतता में उसकी आत्मा का मोह निद्रा में मूर्छित पड़ा रहना कोई आश्चर्य की बात नहीं है।

जिसकी आत्मा सोती है वह मानो स्वयं सोता है। आत्म-प्रबोधन से रहित मनुष्य का आभौधितिक जागरण संसार स्वप्न में निमग्नता के सिवाय और कुछ नहीं है। संसार में आकर संसार को पाने का काँक्षी कृपण साँसारिकता के सिवाय सच्चिदानन्द स्वरूप को किस प्रकार पा सकता है? नश्वरता के उपासक को अमृतत्व मिल सकना सम्भव नहीं।

यदि आपको अपनी रुचियों और प्रवृत्तियों में कुरूपता, कुत्सा और कलुष-उन्मुखता का आभास मिले तो समझ लेना चाहिये कि आपकी आत्मा सोई हुई है और साथ ही यही भी मान लेना चाहिए कि यह एक बड़ा दुर्भाग्य है, एक प्रचण्ड हानि है। इतना ही क्यों वरन् तुरन्त उसे दूर करने के लिए तत्पर हो जाना चाहिए। यदि आप प्रमाद-वश जिस स्थिति में हैं उसमें ही पड़े रहना चाहेंगे तो निश्चय ही अपनी ऐसी क्षति करेंगे, जो युग-युग तक, जन्म-जन्मान्तरों तक पूरी नहीं हो सकती।

आत्मोन्मेष के उपायों में आपकी अपनी तुच्छताओं, क्षुद्रताओं तथा वासनाओं को त्यागना होगा। दुराचरण, दुर्विचार और दुष्कल्पनाओं को छोड़कर उन्नत, उदात्त और आदर्श रीति-नीति को ग्रहण करना होगा। अपने मनोविचारों और निषेधों को त्याग कर शिव और सुन्दर की साधना में लगना होगा। निश्चय ही यह एक साधना है, तप है, किन्तु ऐसा तप नहीं है, जो मनुष्य के लिए दुष्कर हो। इस तप की साधना के लिए पुनरपि आत्मा की ओर ही परिवृत होना होगा, क्योंकि आत्मा ही उन सब शक्तियों और साहसों का केन्द्र है, उक्त साधना में जिसकी आवश्यकता है। मनुष्य की आत्मा की उसका सबसे सच्चा मित्र और पथ-दर्शक है। उसी की प्रेरणा से मनुष्य सन्मार्ग, पवित्र प्रवृत्तियों और दिव्य गुणों की ओर अग्रसर होता है। अपनी आत्मा में विश्वास करिये और उसे अपने में अधिष्ठित वह परमात्मा ही समझिये जिसके लिए कहा गया है-

“एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा। कर्माध्यक्षः सर्वभूताधिवासः साक्षी चेता केवला निर्गुणाश्च॥”

“वह एक देव ही सब प्राणियों में छिपा हुआ है। सर्वव्यापक है और समस्त प्राणियों का अन्तर्यामी परमात्मा है। वही सबके कर्मों का अधिष्ठाता, सम्पूर्ण भूतों का निवास-स्थान, सबका साक्षी, चेतनस्वरूप एवं सबको चेतना प्रदान करने वाला, सर्वथा विशुद्ध और गुणातीत है।”

ऐसा सशक्त और उच्च आधार पकड़ लेने पर मनुष्य में पुण्य परिवर्तन न हो ऐसा सम्भव नहीं।

हम सब मनुष्य हैं। परमात्मा के पावन अंश हैं। हमारा मार्ग पवित्रता और हमारा लक्ष्य दिव्यता ही होना चाहिये। कलुष और कुत्सा हमारे अनुरूप नहीं। दुर्गुण हमारे व्यक्तित्व पर कलंक के समान हैं। वासनाएं और व्यसन, तृष्णाएं और मरीचिकाएं हमसे भिन्न नहीं हो सकतीं। हम आत्मावान मनुष्यों का निकृष्ट कामनाओं और विकृत वाँछाओं से क्या सम्बन्ध? यह सारे विचार आत्मा को सुला देने वाले उसे मूर्छित कर देने वाले विष ही हैं। हम सब शुद्ध, बुद्ध और निरंजन रूप है, संसार और उसकी माया हम सबके लिए वर्जित है। हम सबको मोह का, अज्ञान का त्याग कर संसार स्वप्न से जागकर अपना स्वरूप पहचानना और पाना है। यह महत् कार्य इस प्रसीमित जीवन में तभी पूरा हो सकता है, जब हम इसका प्रत्येक अणु क्षण अपने उसी दिव्य उद्देश्य के लिए नियोजित कर दें। अमरत्व पाने वाले की इच्छा रखने वाले के पास नश्वर भोगो की उपासना करने के लिए समय कहाँ?

हमें अपनी रुचियों और प्रवृत्तियों के दर्पण में अपनी उन्मुखता पहचाननी होगी और देखना होगा कि हम किस ओर, किस मार्ग पर जा रहे हैं? यदि हमारी रुचियाँ और प्रवृत्तियाँ शिव-सौंदर्य प्रिय है तो हमारी आत्मा में उन्मेष का लक्षण है, क्योंकि हरियाली की छटा उसी धरातल पर प्रकट होती हैं, पेड़ पौधे और लता गुल्म उसी भूमि पर उत्पन्न होते हैं, जिसके नीचे पानी होता है। सत्यं-शिवं-सुन्दरम् की अनुभूति और अभिरुचि उसी को होती है, जिसका आत्मा में जागरण होता है। यदि ऐसा है तो हमारी दिशा ठीक है। सावधानीपूर्वक उस पर चलते चला जाना चाहिए। इसके विपरीत यदि हम अपनी रुचि और प्रवृत्ति को कलुष एवं कुत्सा की ओर, पाप और अपराध की ओर, असभ्यता और अपकर्मों की ओर झुकता पाते हैं, तो तुरन्त सतर्क होकर दुरितों से संघर्ष छेड़ देना चाहिये और तब तक संघर्ष को बन्द नहीं करना चाहिये जब तक हमारी रुचियाँ और हमारी प्रवृत्तियाँ शिवोन्मुखी होकर न बतला दें कि आपकी आत्मा में जागरण प्रारम्भ हो गया है।

पापों के सारे पिशाच आपको छोड़ कर भाग गये हैं और अब दिव्यताओं और महानताओं के स्वागत की तैयारी करिये। अपने नवप्रशस्त पथ पर उस आत्म-विश्वास के साथ चल कर लक्ष्य की ओर उसी प्रकार बढ़ते जाइये, जैसे कोई सुकृती अधिकारपूर्वक स्वर्गीय मार्ग पर गर्वोन्नत मस्तक से निश्चिन्त चला जाता है। हम मनुष्यों के लिए यही योग्य है, यही अनुरूप और यही कल्याणपूर्ण कर्तव्य है।


सच्चाई जीवन की सर्वश्रेष्ठ रीति-नीति

जिस प्रकार सोना आग में तप कर और कसौटी पर कस कर ही अपना खरापन सिद्ध कर पाता है। इसी प्रकार व्यक्ति का खरापन तब ही सिद्ध हो पाता है, जब वह समाज में सत्याचरण का प्रमाण दे पाता है। एक बार खरा सिद्ध हुआ सोना संसार में कही भी अपना पूरा मूल्य पा जाता है। उसी प्रकार सत्याचरण का प्रामाणिक व्यक्ति सब जगह समाज का विश्वास प्राप्त कर लेता है।

सत्य मानव-जीवन की अनमोल विभूति है। जो अपने प्रति, अपनी आत्मा के प्रति, अपने कर्तव्यों के प्रति, परिवार, समाज और राष्ट्र के प्रति मन-वचन-क्रम से सच्चा रहता है वह इसी जीवन, इसी देह और इसी संसार में स्वर्गीय आनन्द प्राप्त करता है। उसके लिए सुख-शाँति और साधन संतोष की कमी नहीं रहती।

सत्य मानव जीवन की सबसे शुभ और कल्याणकारी नीति है। इसका अवलम्बन लेकर चलने वाले जीवन में कभी असफल नहीं होते। यह बात मानी जा सकती है कि सत्य का आश्रय लेकर चलने पर प्रारम्भ में कुछ कठिनाई हो सकती है। किन्तु आगे चलकर उसका आशातीत लाभ होता है। सत्य, पुण्य की खेती है। जिस प्रकार अन्न की कृषि करने में प्रारम्भ में कुछ कठिनाई उठानी पड़ती हैं और उसकी फसल के लिए थोड़ी प्रतीक्षा भी करनी पड़ती है। किन्तु बाद में जब वह कृषि फलीभूत होती है तो घर, धन-धान्य से भर देती है। उसी प्रकार सत्य की कृषि भी प्रारम्भ में थोड़ा त्याग, बलिदान और धैर्य लेती है। किन्तु जब वह फलती है तो लोक से लेकर परलोक तक मानव-जीवन को पुष्पों से भर कर कृतार्थ कर देती है।

सत्य मानव-जीवन को महानता और उत्कृष्टता के शिखर पर पहुँचाने वाला प्रशस्त और निरापद राज-मार्ग है। इस पर निष्ठापूर्वक चलने वाले पथिक को किसी भी देशकाल में भय अथवा संकट नहीं रहता। सत्य-निष्ठा व्यक्ति को पाप कर्मों से निरत रखती है। सत्यवादी व्यक्ति इस डर से कोई अकरणीय कार्य करेगा ही नहीं कि दण्ड अथवा निन्दा के भय से कहीं उसे असत्य का सहारा न लेना पड़े। जो अपकर्मों और अपाशयों से बचा रहता है, वह अपवाद, अपमान अथवा आघातों से भी सुरक्षित बना रहता है। सत्याश्रमी व्यक्ति का जीवन सुख और शाँति से भरा पुरा रहता है। उसकी प्रसन्नता में विघ्न डालने वाले तत्व उसके पास कदाचित ही आ पाते हैं।

सत्य मनुष्य के सम्मान, प्रतिष्ठा और आत्म-गौरव के लिए अमोघ कवच के समान होता है। जिसने इस कवच को धारण कर लिया है, उसके लिए अपमान, निन्दा और अपवाद का कोई कारण ही नहीं रहता। सत्यनिष्ठ व्यक्ति संसार में निर्भय होकर विचरण करता है और स्पष्ट होकर व्यवहार करता है। उसने तो कही भय होता है और न आशंका। वह अजातशत्रु होकर समाज को अपने व्यवहार से जीत लेता है।

सत्यनिष्ठ व्यक्ति अपने एक स्वरूप में स्थिर रह कर आत्म-लाभ जैसा सुख भोगता है। उसका अन्तःकरण दर्पण की तरह स्वच्छ और मस्तिष्क प्रज्ञा की तरह संतुलित रहता है। उसे न तो मानसिक द्वन्द्वों से त्रस्त होना पड़ता है और न निरर्थक वितर्कों से अस्त व्यस्त। वह जो कुछ सोचता है सारपूर्ण सोचता है और जो कुछ करता है कल्याणकारी करता है। मिथ्यात्व के दोष से मुक्त सत्यनिष्ठ व्यक्ति के पास कुकल्पनाओं का रोग नहीं आता। वह तो अपनी सीमा, अपनी सामर्थ्य और अपने साधनों के अनुरूप ही जीवन की कल्पनाएं किया करता है और अधिक से अधिक यथार्थ के धरातल पर ही विचरण किया करता है।

सत्य प्रिय व्यक्ति मिथ्यावादियों की तरह कल्पना की न तो ऊँची-ऊँची उड़ानें भरता है और न अनहोनी कामनाएं करता है। वह जानता है कि ऐसा करने से महत्वाकाँक्षाओं में, ऐसी महत्वाकाँक्षाओं में फैलना पड़ेगा जो उसकी स्थिति से बाहर की होंगी और तब हो सकता है कि किन्हीं कामनाओं अथवा वांछाओं के दबाव में आकर उनकी पूर्ति के लिए ऐसा काम करना पड़े जो असत्य के दोष से दूषित हो। सत्यनिष्ठ व्यक्ति जीवन में आकाँक्षाओं के पथ पर बड़ा सावधान होकर चलता है।

राग-द्वेष, लोभ, मोह और मद, मत्सर आदि दुर्गुणों से सत्यनिष्ठ व्यक्ति की कोई मित्रता नहीं होती। वह जानता है कि इन विकारों को प्रश्रय देना अपनी सत्यनिष्ठा के लिये खतरा पैदा करना है। यह विकार ही व्यक्ति के वे शत्रु हैं, जो उसे जीवन के पावन पथ से गिरा देते हैं। जिसके प्रति राग होगा उसके प्रति निष्पक्ष न रहा जायेगा। उसकी प्रसन्नता के लिये कुछ भी करना पड़ सकता है। जिससे द्वेष होगा उसका अनिष्ट चिन्तन का प्रेम पकड़ सकता है। लोभ तो सत्य का सबसे बड़ा शत्रु होता है। जिसे लोभ के पिशाच ने पकड़ लिया उसके सत्य की रक्षा हो ही नहीं सकती। लोभ सदैव ही अपने अधिकार से अधिक पाने की लिप्सा किया करता है। अधिकार से अधिक पाने के लिए छल-कपट और असत्य आदि अपकर्मों को ग्रहण करना पड़ता है।

इसी प्रकार मोह तो स्पष्ट अज्ञान ही है। अज्ञान से दूषित व्यक्ति जीवन में किसी भी व्रत का पालन ही कर पाता। मोहग्रस्त व्यक्ति अनिष्ट में इष्ट, हानि में लाभ और असत्य में सत्य का आभास पाने लगता है। मद और मत्सर अहंकार के ही दो प्रचंड प्रकार होते हैं। इनका प्रकोप व्यक्ति को कर्तव्य भ्रष्ट बना देता है। अहंकारी व्यक्ति स्वयं ही अपने की संसार में दूसरों से श्रेष्ठ मान बैठता है। अपनी बात मनवाना और दूसरे की बात न मानना उसका सहज स्वभाव होता है।

अपने दम्भ की रक्षा में उसके लिए कोई भी कार्य अकरणीय नहीं होता। इस प्रकार मद और मत्सर सत्य पालन में बहुत बड़ी बाधाएं हैं। सत्यनिष्ठ व्यक्ति इन विकारों से सदा सावधान रहता है। ऐसे विचार मुक्त व्यक्ति और एक देवता में क्या अन्तर रहा जाता है? सत्याश्रमी व्यक्ति को यदि देवता कहा दिया जाय तो भी कोई अतिशयोक्ति न होगी। निश्चय ही सत्यनिष्ठ व्यक्ति देवता ही होते हैं। धरती के देवता।

निर्विकार, निर्लेप और निर्भय जीवन जीने के लिए सत्य से बढ़कर कोई उपाय नहीं। सत्य एक ऐसी आध्यात्मिक शक्ति है, जो देश, काल, पात्र अथवा परिस्थितियों से प्रभावित नहीं होती। संसार में जहाँ जो भी धर्म-ग्रन्थ और आर्ष अभिवचन पाये जाते हैं, उनमें जिन नियमों की विशेषता दी गई है, सत्याचरण व सत्य भाषण उनमें सर्वप्रधान है। मनीषियों ने सत्य को मनुष्य के हृदय में रहने वाला ईश्वर बतलाया है और सत्य पर आरूढ़ रहने का उपदेश किया है। सत्य ही वह सार्वकालिक और सार्वदेशिक तथ्य है, जो सूर्य के समान हर स्थान पर समान रूप से चमकता रहता है।

सृष्टि के आदि में सत्य की जो महत्ता और श्रेष्ठता थी वैसी आज बनी बनी हुई है। कोई मानवीय नियम समय के अनुसार भले ही बदले और संशोधित किए गये हों किन्तु सत्य के नियम में आज तक परिवर्तन नहीं किया गया और न कभी किया जा सकता है। सत्य सारे जीवन और सारी सृष्टि का एक मात्र आधार है। सत्य की महत्ता बतलाते हुए महात्मा इमरसन ने एक स्थान पर कहा है- “जिस सुन्दरतम और श्रेष्ठतम आधार पर मनुष्य को अपना जीवन अवस्थित करना चाहिए वह है- सत्य। सत्य के विरुद्ध किया हुआ प्रत्येक आचरण मानव समाज के स्वस्थ शरीर में छुरी भौंकने के समान निन्दनीय है।”

आत्मिक उन्नति के जो साधन और उपाय ऋषियों, मुनियों और धर्म-प्रवर्तकों ने प्रतिपादित किए हैं, सत्य को उनमें सबसे पहला स्थान दिया है। कोई भी साधना, फिर वह कितनी ही ऊँची क्यों न हो, सत्य के बिना सफल नहीं हो सकती। सत्य सारे साधनों की आधार-शिला है। एक सत्य का आधार ले लेने के बाद यह अनिवार्य नहीं रह जाता कि आध्यात्मिक मार्ग में आगे बढ़ने के लिये अन्य बहुत से साधन भी किए जाएं। सत्य की महिमा वर्णन करते हुए शास्त्रकारों ने उसे सर्वोपरि साधन बतलाया है, एक सत्य का आधार ही व्यक्ति को संसार सागर से पार कर देता है। महाभारत के उद्योग पर्व में आया है-

“सत्य स्वर्गस्य सोपानं पारावारस्य नौरिव।’’

-समुद्र में नाव के समान सत्य स्वर्ग का सोपान है। अर्थात्- जिस प्रकार नाव का सहारा व्यक्ति को समुद्र के बीच से पार कर किनारे पर पहुँचा देता है उसी प्रकार सत्य व्यक्ति को संसार से पार कर स्वर्ग पहुँचा देता है।

शाँति पर्व में कहा गया है-

“नास्ति सत्यात्परो धर्मो नानृतात्पातकं परम। श्रुतिहिं सत्य धर्मस्य तस्यात्सत्यं न लोप्यते॥”

-सत्य के बढ़ कर कोई धर्म नहीं। असत्य से बड़ा कोई पाप नहीं है। सत्य ही धर्म का आधार है। अतएव सत्य का परित्याग कभी भी नहीं करना चाहिये।

सत्य का सम्पूर्ण तत्व है। उसके खण्ड नहीं किये जा सकते। सत्य बोला जाय और उसके अनुसार आचरण न किया जाय। सत्याचरण और सत्य भाषण तो किया जाय किन्तु मनोदशा उसके अनुसार न रखी जाय तो उसे सत्यनिष्ठा नहीं कहा जायेगा। ऐसे विखंडित सत्य से किसी प्रकार के लाभ की आशा नहीं की जा सकती। टूटा-फूटा, अस्त-व्यस्त अथवा कौटिल्यपूर्ण सत्य भी अमृत का ही एक स्वरूप है। सत्य का स्वरूप वर्णन करते हुए शास्त्रकार ने कहा है-

“सत्य यथाथे वांग् मनसे यथा दृष्टं तथानुमतिं तथा वांग् मनश्चेति, परत्र स्वबोध संक्रान्तये वागुप्ता सा यदि न वंचिता, भ्रान्ता वा, प्रतिपन्ति बन्ध्या व भवेत्।”

“सत्य का तात्पर्य है- वाणी के साथ-साथ मन का भी सच्चा होना। जैसा देखा जाय अथवा जैसा अनुमान किया जाय, वैसा ही भाव प्रकट करने का निश्चय रखते हुए बात कहना ‘सत्य’ माना जायेगा। उसमें छल न हो। दूसरों को भ्रम में डालने वाला अथवा वस्तुस्थिति से भिन्न ज्ञान देने का प्रयत्न न किया जाय।” इस प्रकार सर्वांगपूर्ण सत्य ही सत्य है, विखंडित सत्य-असत्य का ही एक प्रकार होता है।

जिस प्रकार सत्य का आचरण हर दशा में कल्याणकारी होता है, उसी प्रकार असत्य का आचरण हर प्रकार से अमाँगलिक होता है। भाषण, आचरण अथवा विचार किसी में भी असत्य का दोष मानव-जीवन में उसके अंतर और बाह्य दोनों में विषमता पैदा कर देता है। व्यक्तित्व को हर प्रकार से कलुषित और दोषपूर्ण बना देता है। असत्य का त्याग करना जीवन में आनन्द और विकास के बीज बोने के समान है। असत्य का त्याग और सत्य का आचरण मानव-जीवन की सबसे सुन्दर नीति है। इस नीति का अनुसरण करने वाला क्या भौतिक और क्या आध्यात्मिक किसी भी क्षेत्र में असफल नहीं होता। सत्य बोलने, सत्य के अनुरूप सोचने और सत्य से स्वीकृत कर्म करने से ही मनुष्य सत्यस्वरूप परमात्मा को प्राप्त कर सकता है।

सत्य की यह महत्ता कोई कल्पना अथवा वैज्ञानिक विलास नहीं है। यह एक ठोस और सारपूर्ण सिद्धान्त है। विद्वान् जोफसपार्कर ने कहा है- “असत्य अस्थिर और उतावला होता है। उसे कभी भी पहचाना और दण्डित किया जा सकता है। सत्य शांत और गम्भीर होता है। उसे ईश्वर का उच्च न्यायालय भी केवल सम्मानित ही कर सकता है।”

सत्य संसार की सबसे बड़ी शक्ति और सबसे प्रभावकारी नीति है। इस पर चलने वाला व्यक्ति न तो कभी अशाँत होता है, न भयभीत और न उसे असफल होने की आशंका रहती है। भय-शोक, संताप और अशांति आदि आसुरी दण्ड केवल असत्य परायणों के लिये ही निश्चित है। सत्य परायण के लिए लोक में शाँति और सम्मान एवं परलोक में स्वर्ग सुरक्षित रखा है, जिसे वह अधिकार पूर्वक प्राप्त कर लेता है।


Quotation

दूसरे को जीतने से भला है अपने आपको जीतो। अपने आपको जीतने का अर्थ है मन को जिधर वह चाहे उधर मत दौड़ने दो। जब वह वासना की ओर झुके तो उसे संयम की ओर उठाओ, जब वह लोभ, लालच करे तो उसे जीवन नश्वरता दिखाओ। दूसरों पर ऐंठ और ऐब करने की प्रवंचना से बच कर यदि सीधी सच्ची सरल राह चल सको तो समझ लो संसार समर के सच्चे विजेता तुम हो। उस विजय की विभूतियाँ तो अनायास ही मिलेंगी। -बटलर


प्रेम-साधना हमें परमात्मा से मिला देती है।

परिश्रम के पश्चात विश्राम, क्षुधा के पश्चात भोजन और कष्ट के पश्चात सुख का आनन्द मिलता है- इसी प्रकार मिलन का आनन्द विछोह के बाद ही मिलता है। दो स्नेही जन एक स्थान पर रह कर जब नित्य मिलते हैं तो नवीनता समाप्त हो जाने पर मिलन का आनन्द शिथिल हो जाता है। किन्तु जब वे दोनों सुहृद कुछ समय अलग रहने के बाद मिलते हैं तो मिलन का आनन्द सहस्त्रों गुना हो जाता है।

परमात्मा एकाकी था। उसे अपने एकाकीपन से विरक्ति हुई और चाहा कि एक से बहुत हो जाऊँ। उसके अन्तर में ‘एकोहं बहुस्यामि’ की ध्वनि होते ही सृष्टि रचना का काम आपसे आप प्रारम्भ हो गया और जड़-चेतनमय यह सारा संसार बन कर तैयार हो गया।

संसार और कुछ नहीं एक परमात्मा का ही अंश है। उसी से उत्पन्न हुआ है और उसी में लीन हो जायेगा। चेतन सृष्टि परमात्मा का विशेष अंश है और उसमें व्यक्ति विशिष्ट- वह परमात्मा की समीपता के क्रम में सबसे आगे और सबसे पहले हैं। व्यक्ति अन्य जीवों की अपेक्षा परमात्मा के अधिक निकट है। इन दोनों के बीच पारस्परिक प्रेम की धारा भी अधिक गहरी है। यों तो परमात्मा को अपनी सृष्टि के अणु-अणु से प्रेम है। किन्तु तब भी व्यक्ति से कुछ अधिक प्रेम-भाव है। इसका कारण यह है कि अन्य सृष्टि की उत्पत्ति जहाँ माया के माध्यम से हुई है, वहाँ मनुष्य जीवात्मा के रूप में उसका सीधा-सीधा अपना अंश है, जिसे व्यक्ति ने अपने विवेक द्वारा समझ कर उसके प्रति जिज्ञासा उत्पन्न कर ली है।

तो मनुष्य परमात्मा का विशिष्ट अंश है। उसने ‘बहुस्यामि’ की इच्छा से अपने इन अंशों को अपने से पृथक कर संसार में बिखेर दिया है। इसलिये कि बिछोह के बाद मिलन का अनिवर्चनीय आनन्द प्राप्त हो सके। इस मिलन का माध्यम क्या हो सकता है? प्रेम और केवल प्रेम। बिछोह से बड़ी प्रेम की तड़पन ही वह साधन है, जो व्यक्ति को परमात्मा की ओर और परमात्मा को व्यक्ति की ओर आकर्षित करती है। इसलिए प्रेम को शक्ति की परमात्मा मिलन की बहुत बड़ी साधना माना गया है। जिन दो के बीच प्रेम नहीं होता वे परस्पर कभी नहीं मिल पाते।

परमात्मा से मिलन का आनन्द एक लम्बी साधना और लम्बी अवधि के बाद होता है। इस बीच जीव अपने प्रेम की कसौटी की अभिव्यक्ति कहाँ करे? किस माध्यम से अपनी इस आनंददायक वेदना को सहन करे? इसका एक ही उपाय है। परमात्मा के अंश जीव-मात्र से प्रेम किया जाय। जिस प्रकार प्रियजन की वस्तुएं और उसके अनुबन्ध भी प्रिय होते हैं, विरही उनमें ही अपने प्रेमास्पद का प्रतिबिंब देखकर उसकी याद से संतोष कर लेता है, उसी प्रकार जीवों का पारस्परिक प्रेम उस एक परमात्मा के प्रति प्रेम का ही एक प्रकार है। और यही कारण है कि जहाँ परस्पर प्रेम, सौहार्द और आत्मीयता होती है, वहाँ भाव रूप परमात्मा की उपस्थिति मानी जाती है और उसी के मिलन जैसा आनन्द छाया रहता है। मनुष्य का पारस्परिक प्रेम परमात्मा से ही प्रेम का एक रूप है।

मानव-जीवन परमात्मा की महती कृपा है। व्यक्ति और कुछ भी तो नहीं, परमात्मा का ही एक अंश है, जिसको परमात्मा ने स्वयं ही अपने से पृथक कर पुनर्मिलन के लिए निर्मित किया है। परमात्म मिलन ही मानव-जीवन का ध्येय है। इस ध्येय की पूर्ति प्रेम द्वारा ही हो सकती है। जिन मनुष्यों के बीच परस्पर प्रेम सौहार्द और सहयोग की भावना रहती है, जो दूसरों से प्रेम और प्राणी मात्र पर दया का भाव रखते हैं, और जो सबके प्रति स्नेह एवं शिष्टता का व्यवहार करते हैं, वे सब परमात्मा से मिलने के अपने ध्येय की ओर ही अग्रसर होते रहते हैं।

परमात्म से मिलन का उपाय साधना, उपासक तथा योग आदि भी बतलाया गया है। किन्तु यह उपाय भी तभी सफल होते हैं जब इनमें भी प्रेम की प्रधानता होती है। यह प्रेम श्रद्धा, भक्ति, आस्था, विश्वास आदि किसी रूप में भी हो सकता है। श्रद्धा अथवा प्रेम से रहित कोई भी साधना सफल नहीं हो सकती। प्रेम की व्याकुलता ही परमात्मा से मिलाने में समर्थ है। इसके बिना सारे तप कठोर तितिक्षा के सिवा और कुछ नहीं होते।

आध्यात्म का मूल मंत्र प्रेम ही बताया गया है। भक्ति साधना से मुक्ति का मिलना निश्चित है। जिस भक्त को परमात्मा से सच्चा प्यार होता है, वह भक्त भी परमात्मा को प्यारा होता है। उपनिषद् का यह वाक्य ‘रसो वै सः’ इसी एक बात की पुष्टि करता है- ‘‘परमात्मा प्रेम रूप है’ इसका स्पष्ट तात्पर्य यही है कि जिसने प्रेम की सिद्धि कर ली है, उसने मानो परमात्मा की प्राप्ति कर ली है अथवा जहाँ प्रेमपूर्ण परिस्थितियाँ होंगी, वहाँ परमात्मा का वास माना जायेगा। परमात्मा की प्राप्ति आनन्द का हेतु होता है।

प्रेम का आनन्द अनिवर्चनीय है। वह एक ऐसा आनन्द होता है, जिसकी तुलना में संसार का दूसरा कोई आनन्द नहीं रखा जा सकता। प्रेम की इस अनुभूति का आनन्द कबीर ने लिया और एक स्थान पर कहा है- ‘राम बुलावा भेजिया कबिरा दीना रोय। जो सुख प्रेमी संग में सौ बैकुण्ठ न होय।’ भक्त प्रेम के आनन्द में वैकुण्ठ का निवास तुच्छ मानता है। और उसको प्रेम के वातावरण से निकाल कर प्रेमी जनों से पृथक करके स्वर्ग ले जाने की बात कही जाती है तो वह रोने लगता है, उसे अपार दुख होने लगता है। प्रेम का आनन्द ऐसा ही आनन्द है।

किन्तु प्रेम में इस प्रकार के अनिवर्चनीय आनन्द की प्राप्ति तभी होती है, जब वह सच्चा हो, निःस्वार्थ हो। झूठा प्रेम तो शत्रुता की नींव होता है, दुख और क्लेश का आधार होता है। बहुत बार लोग अपने मतलब से बड़ा प्रेम दिखलाने लगते हैं। बहुत से लोग इस प्रवंचना में आ भी जाते हैं। मतलब निकल जाने अथवा उस विषय में निराश हो जाने पर स्वार्थी व्यक्ति का प्रेम समाप्त हो जाता है और तब वह अपने सामयिक प्रेमास्पद की ओर आँख उठा कर भी नहीं देखता, मिलने पर पीठ फेर लेता है। उसका यह व्यवहार वहीं से बुराई, मनोमालिन्य अथवा शत्रुता का सूत्रपात कर देता है। इसलिए कहा गया है कि एक बार प्रेम भले ही न किया जाये, पर स्वार्थपूर्ण प्रेम का नाटक न किया जाये। नहीं तो इसमें हित के स्थान पर अहित होता है। आनन्द के स्थापन पर दुख मिलता है।

आनन्द, संतोष, प्रफुल्लता और आत्म-भाव आदि की दिव्य अनुभूतियाँ वहीं प्राप्त हो सकती हैं, जहाँ निर्मल और निःस्वार्थ प्रेम की पावन गंगा बहती है। जिन परिवारों मित्रों और सुहृदजनों के बीच सच्चा प्रेम रहता है, उनके बीच क्या सम्पन्नता और क्या विपन्नता- किन्हीं भी स्थितियों में कलह, क्लेश तथा विवाद नहीं होता। उनका सारा जीवन एक स्निग्ध पुष्कारिणी की भाँति आनन्द की शीतलता और सरलता से भरा रहता है। यह मानव-जीवन की एक महान उपलब्धि है। प्रेम विहीन जीवन एक शुष्क मरुस्थल के समान होता है। उसमें रस अथवा आनन्द का एक कण भी नहीं मिल सकता, फिर चाहे उसमें कितनी ही धन-दौलत और सुख-साधन क्यों न भरे हों।

प्रेम द्वारा शत्रु को भी वश में किया जा सकता है। प्रथम तो जो प्रेमी हृदय होते हैं, वे स्वभावतः अजातशत्रु होते हैं। संसार में उनसे द्वेष करने वाला कोई नहीं होता। और यदि अपने दुष्ट स्वभाव-वश कोई उनसे द्वेष मानने भी लगता है तो भी वह उनके सम्मुख आकर विनत हो जाता है। सच्चे संत और महात्माओं को न जाने कितने चोर, डाकू मिले उन्होंने उनको हानि पहुँचानी चाही। किन्तु पास जाते ही उनके आन्तरिक प्रेम से प्रभावित होकर पैरों पर ही गिरे हैं। बहुत से डाकू और दुष्ट लोग महात्माओं की प्रेमानुभूति से विवश होकर संत तक बन गये हैं।

आकस्मिक घटनाओं को यदि छोड़ दिया जाय तो भी ऋषि-मुनियों के आश्रम का हाल पढ़कर भी इस सत्य की पूर्णतः पुष्टि हो जाती है। पूर्वकालीन ऋषि आश्रमों में शेर, चीते आदि हिंस्र जन्तु भी आते थे और ऋषियों से बोलने के बात तो दूर वे अपने स्वभाव विरोधी गाय और हिरनों से भी नहीं बोलते थे। उनके साथ उठते, बैठते और खेलते थे। इसका कारण और कुछ नहीं, ऋषि का वह सच्चा प्रेम ही होता था, जो जीव मात्र की मैत्री के रूप में उसके अन्तर में प्रवाहित होता रहता था। उसी के संपर्क में आकर सारे जीव अपना द्वेष-भाव भूल जाया करते थे।

साँसारिक जीव ही नहीं, ईश्वर तक प्रेम के वश में हो जाता है। ‘भक्त के वश में भगवान’- यह कथन आज नया नहीं है। यह युगों से अनुभूत किया हुआ एक सत्य है। जिन महात्माओं, संतों और साधुजनों ने भगवान की भक्ति की है, उससे निश्छल-प्रेम किया है, उन्होंने भगवान को अपने वश में कर लिया है। उसे दर्शन देने के लिये मजबूर कर लिया है। तुलसी, सूर, नानक आदि सन्त इसके प्रमाण है। प्रेम का यह प्रभाव कोई चमत्कार नहीं है बल्कि यह एक आध्यात्मिक तथ्य है। प्रेम की हिलोरें जिस मानस में उठती रहती हैं, जो सहृदय भक्त संसार के अणु-अणु में अपने प्रेमास्पद परमात्मा को ही देखता है, उसकी आत्मा का स्तर असाधारण कोटि तक उन्नत हो जाता है। उसमें समग्र दिव्य गुणों का विकास हो जायेगा। उसके चरित्र और आचरण में आदर्शवाद का समावेश हो जायेगा, जिससे वह महान और पवित्र कर्म ही करेगा। समाज अथवा आत्मा विरोधी कर्म उससे हो ही नहीं सकता। ऐसे सुकर्मी और पवित्र भक्त पर आत्मा स्वयं ही आसक्त हो जाता है और उसकी पुकार पर प्रकट होकर दर्शन देता है।

यह प्रेम का ही प्रभाव है जो पाषाण को भी भगवान बना देता है। मूर्ति क्या है? पाषाण की एक प्रतिमा मात्र। उसमें अपनी व्यक्तिगत विशेषता कुछ नहीं होती। किन्तु यही साधारण प्रस्तर प्रतिमा तब परमात्मा के रूप में बदल जाती है और वैसा ही प्रभाव सम्पादन करने लगती है, जब भक्तों की प्रेम भावना उसमें समाहित हो जाती है। भक्त का प्रेम पाते ही पाषाण-खण्ड अपनी शोभा, आकर्षण, तेज और प्रभाव में सजीव हो उठता है। प्रतिमा पूजन का तत्व-ज्ञान यही है कि परम परमात्मा, ब्रह्म, सामान्य जनों के लिये अज्ञेय और असाध्य होता है। उससे प्रेम किया जा सकता है, उसकी भक्ति भी की जा सकती है, किन्तु यह भावना मानसिक अस्थैर्य के कारण निराधार रह जाती है।

मनुष्य की भावना एक आधार चाहती है, एक ऐसा अवलंब चाहती है, जिसका सहारा लेकर वह ठहर सके और अपनी वाँछित दिशा में विकसित भी हो सकते हैं। मानव की भक्ति भावना को आधार देने के लिए ही मूर्ति पूजा का आविष्कार किया गया है। युग-युग से परमात्मा का प्रतीक के रूप में मूर्ति पूजन होता आ रहा है और लोग उस माध्यम से आनन्द और सद्गति पाते चले जाते हैं। इस प्रयोग में एक महान आध्यात्मिक तथ्य वर्तमान है। वह यह कि जिस किसी में, अपनी भावना का आरोपण कर प्रेम किया जायेगा, वह वस्तु चाहे जड़ हो या चेतन, सजीव हो अथवा निर्जीव व्यक्ति की भावना के अनुसार ही फलीभूत होने लगती है।

मूर्ति पत्थर अथवा धातु की बनी एक निर्जीव प्रतिमा होती है। किन्तु भक्त से परमात्मा की भावना पाकर वह उसके लिए भगवान ही बन जाती और तदनुसार ही फल देने लगती है। तथापि मूर्ति में यह विशेषता आती तब ही है, जब भगवान के साथ अखण्ड आस्था और असंध श्रद्धा का भी समावेश हो।

प्रेम संसार का अमृतत्व माना गया है। अमृत की तरह ही इसमें आनन्द और अमरता का गुण होता है। प्रेमी का हृदय प्रतिक्षण आनन्द से परिप्लावित रहता है और परमात्मा से सान्निध्य पाकर वह अमर पद तो पा ही लेता है। इसलिये इन दोनों स्थितियों को पाकर मानव-जीवन को सफल और सार्थक बनाने के लिए प्रेम की साधना करनी ही चाहिये। यह साधना अपने आस-पास से प्रारम्भ कर जीव मात्र को लेते हुए निखिल ब्रह्मांड तक विस्तृत की जा सकती है, और प्रेम ही परमात्म है इस तथ्य वाक्यांश को अपने इसी जीवन में चरितार्थ कर मुक्ति और मोक्ष का लाभ उठाया जा सकता है।


आत्मिक प्रगति सद्ज्ञान पर निर्भर

संसार में अच्छे और बुरे दोनों तरह के लोग पाये जाते हैं, पर इससे यह नहीं माना जा सकता कि ईश्वर अच्छे और बुरे दोनों तरह के व्यक्तियों को पैदा ही करता है। ईश्वर की सृष्टि में जो भी व्यक्ति उत्पन्न करता है उन सबको एक जैसा ही उत्पन्न करता है। आगे चल कर वे अपने ज्ञान-अज्ञान के कारण ही अच्छे-बुरे बन जाते हैं। जो ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं, वे अच्छे बन जाते हैं और जो अज्ञान में ही पड़े रहते हैं, उनका बुरा होना स्वाभाविक ही है।

बुरे व्यक्तियों के जीवन में पैठ कर यदि उनकी बुराई का स्त्रोत खोजा जाये तो पता चलेगा कि वह जो कुछ अपकर्म करता है, उसका मुख्य कारण उसका अज्ञान ही है। ज्ञान के अभाव में वह जीवन-गति की सही दिशा को न तो पहचान पाता है और न उसका निर्माण कर पाता है। कर भी कैसे पाये। जो काम ज्ञान का है वह अज्ञान द्वारा सम्पादित भी कैसे हो सकता है? धन, पद और प्रतिष्ठा पाकर ही यदि कोई समझ बैठे कि वह जीवन की ठीक दिशा में चल कर आया है और ठीक ही दिशा में चलता जा रहा है तो भी ठीक न होगा।

धन, वैभव और पद प्रतिष्ठा व्यक्ति कि अच्छाई का प्रमाण नहीं है। इन विभूतियों के स्वामी बहुधा स्वार्थी, क्रूर और कठोर देखे जा सकते हैं। उनके द्वारा लोगों को सुख मिलने के स्थान पर कष्ट और क्लेश ही अधिक मिलता है। यह तो अच्छाई के लक्षण नहीं हैं। अच्छाई के लक्षण तो हैं, सेवा, सहायता, सहयोग, सहानुभूति, प्रेम और उदारता आदि। जिस व्यक्ति में यह गुण हैं उसे अच्छा ही कहना होगा फिर चाहे उसके पास धन वैभव और पद प्रतिष्ठा हो या न हो।

अच्छाई के द्योतक ये मानवीय गुण ज्ञान के आधार पर ही मिल सकते हैं। गुणों को जन्मजात उपलब्धि मानना स्वयं में एक अज्ञान है। संसार के सारे बालक समान मनोभूमि लेकर पैदा होते हैं। उनमें से बहुत से अपने गुण कर्म और स्वभाव के अनुसार आदर्श पुरुष बन कर संसार में आदरणीय बन जाते हैं, और बहुत से नीच, निकृष्ट और अपराधी बन कर समाज में त्रास के कारण बनते हैं। इस विषय का कारण इसके सिवाय और कुछ नहीं होता कि आगे चल कर आदर्श व्यक्ति बनने वाले बालकों को अवश्य ही ऐसा संग, वायु-मंडल और बुद्धि मिल गई होती है, जिससे उन्हें गुण विकासक ज्ञान की प्राप्ति हो गई होती है और निश्चय ही वे बालक जो समाज में त्रास का कारण बन जाते हैं, प्रतिकूलताओं से घिरे रह कर अज्ञान के शिकार बन गये होते हैं। मानवीय गुणों का विकास न होने से वे समाज विरोधी बन जाते हैं। इसलिये अच्छाई या बुराई को व्यक्ति की जन्मजात उपलब्धि न मान कर ज्ञान, अज्ञान का परिणाम ही मानना होगा।

ज्ञान व्यक्ति को शीलवान शिष्ट और विनम्र बनाता है। इन गुणों का परिणाम समाज में आदर, सम्मान और सहयोग के बिना कुछ हो ही नहीं सकता। जो समाज में इस प्रकार की स्थिति पा लेता है, उसे आत्म-विकास में बड़ी सुविधा रहती है। यही आत्म-विकास परमानन्द की ओर आने वाला आध्यात्मिक मार्ग है। अज्ञान का दोष मनुष्य को दुराचारी, उद्दंड और अविनयी बना देता है। ऐसा व्यक्ति समाज में अपने लिये असम्मान और असहयोग ही उत्पन्न कर लेता है। इस विरोध के कारण उसका मन-मस्तिष्क अशान्त बना रहता है और वह आत्म-विकास की ओर न बढ़ पाने से अपने ध्येय से भ्रष्ट हो जाता है। उसका वह मानव-जीवन जिसमें वह आत्मा को पा सकता था, परमात्मा को पहचान सकता था और परमानन्द प्राप्ति की दिशा में बढ़ सकता था व्यर्थ चला जाता है। वह दिन दिन प्रपंच में फँसता चला जाता है।

ज्ञान की महिमा अपार है। ज्ञान की कृपा से एक सामान्य व्यक्ति बढ़ कर महापुरुष बन जाता है। संसार में जितने भी महापुरुष और प्रतिभा प्रधान व्यक्ति हुए हैं, सब ज्ञान के आधार पर ही उस उच्च-स्तर पर पहुँचे हैं। भगवान राम, कृष्ण, गौतम बुद्ध, ईसा, और सुकरात आदि जो भी युग प्रवर्तक महात्मा और महापुरुष हुए हैं, वे सब ज्ञान का विकास करके ही वैसे बन सके हैं। यदि ध्यान में निष्पक्ष होकर देखा जाय तो पता चलेगा कि प्रारम्भ में वे सब भी सामान्य मनुष्यों की तरह ही थे। पर बाद में उन्होंने ज्ञान के लिए पुरुषार्थ किया, उसे पाया और उसके आधार पर लोक-रंजन के कार्य कर आदर्श पदवी पर पहुँचे।

जो व्यक्ति अपने जीवन को सफल एवं सार्थक बनाना चाहता है, उसे ज्ञानार्जन के लिए पुरुषार्थ करना ही होगा। जीवन सार्थक तब ही हो सकता है, जब उसकी गति उसकी दिशा और उसका पथ उपयुक्त हो। इसका निर्धारण सिवाय ज्ञान के और किसी प्रकार हो ही नहीं सकता। जो लोग यह सोच कर कि जीवन एक स्वाभाविक प्रक्रिया है, उसकी गति स्वतः निर्धारित है या होती है, प्रवृत्तियों की प्रेरणा से जब जिधर चाहा चलते रहते हैं वे कदापि किसी सार्थक लक्ष्य पर नहीं पहुँच सकते। उनका सारा जीवन धरातल प्रेरित पानी की तरह यों ही निर्लक्ष्य बहता हुआ नष्ट हो जाता है। किन्तु जिस पानी को एक सुनियोजित गति दे दी जाती है वह उपकारी नहर अथवा विद्युतदायक बाँध बन जाता है। इसी प्रकार नियोजन पाया मानव-जीवन भी उपकारी बन कर सार्थक हो जाता है, और अपने किसी ऊँचे लक्ष्य को प्राप्त कर लेता है।

मानव जीवन की सफलता एवं सार्थकता का एकमात्र मार्ग सन्मार्ग ही है। ज्ञान द्वारा ही सन्मार्ग का निर्धारण होता है और ज्ञान के सम्बल पर ही आजीवन उस पर चल सकना सम्भव हो सकता है। सन्मार्ग का पता तो एक बार किसी ज्ञानी से भी विदित किया जा सकता है। किन्तु उस पर चल सकना अपने ज्ञान के आधार पर ही सम्भव हो सकता है। दूसरे का ज्ञान किसी दूसरे को सन्मार्ग बता तो सकता है पर उस पर चला नहीं सकता है।

मनुष्य के दोनों जीवन भौतिक और आत्मिक ज्ञान के आधार पर ही सफल बनते हैं। भौतिक जीवन में जिस साधन सुविधा की मुख्यता होती है, वह योंही तो मिल नहीं जाती। उसके लिये भी उपाय करना होता है। अब वह उपाय चाहे विद्या हो, चाहे व्यापार हो और चाहे उद्योग हो, बिना ज्ञान के नहीं किया जा सकता। अज्ञानी की संसार में कोई गति नहीं है। उसे अन्धकार में भटकते और ठोकरें खाते रहने के सिवाय और कुछ नहीं मिलता। जिस प्रकार साधन, सुविधाओं को पाने का आधार ज्ञान है, उस प्रकार उनके उपयोग के लिये भी ज्ञान की आवश्यकता है।

साधन सुविधा और वैभव विभूति की तो प्राप्ति हो जाय लेकिन उसके उपयोग के विषय में अज्ञानी ही रहा जाय तो इसका परिणाम प्रतिकूल ही होगा। अज्ञान प्रेरित साधनों का उपयोग मनुष्य को पतन की ओर ले जाता है। ज्ञान के अभाव में साधन सम्बल युक्त व्यक्ति बहुधा कुमार्गगामी हो जाते हैं। अपना नाश करने के साथ-साथ दूसरों के लिए भी असुविधाजनक बन जाते हैं।

आत्मा का क्षेत्र तो विशुद्ध रूप से ज्ञान का ही क्षेत्र है। वहाँ अज्ञान के एक बिन्दु की भी गुजर नहीं। आत्मा का विकास गुण, कर्म, स्वभाव की उत्कृष्टता पर निर्भर है। जिसने दया, क्षमा, प्रेम और सहानुभूति के गुण विकसित कर लिये हैं, जिसने परोपकार और परमार्थ ही अपने कर्मों का आधार बना लिया है और जिसने स्वभाव को काम, क्रोध, मद, लोभ आदि दोषों से मुक्त कर लिया है, आत्मा का क्षेत्र उसके लिए ही खुलता है। किन्तु गुण, कर्म, स्वभाव का निर्माण जिस तत्व के आधार पर होता है, उसका नाम ज्ञान ही है।

इस विषय में ज्ञान एक शक्ति, एक सम्बल और एक साधन है। जब तक यह न जाना जाये कि मानवीय गुण क्या है, उनका स्वरूप और प्रवर्तक क्या है, उनको किस प्रकार कहाँ से पाया जा सकता है, तब तक उनकी उपलब्धि सम्भव नहीं। इसी प्रकार जब तक यह ज्ञान न हो कि परोपकार क्या है, परमार्थ किसे कहते हैं और उनका स्वरूप कितने प्रकार का होता है तब तक उसे कर्मों में मूर्तिमान कर सकना सम्भव नहीं। स्वभाव के दोष क्या हैं, वे क्यों और किन परिस्थितियों में उठते और शमन होते हैं? उनसे क्या क्या हानि हैं और उनके निष्कासन से क्या-क्या लाभ हो सकते हैं, जब तक की इसका निर्णय न कर लिया जाय, तब तक अनुकूल स्वभाव का निर्माण किस प्रकार किया जा सकता है। यह सब क्षमता एकमात्र ज्ञान से ही प्राप्त हो सकती है, किसी अन्य उपाय से नहीं।

लौकिक और आत्मिक जीवन की सफलता के लिये इतने बड़े साधन ज्ञान को पाया किस प्रकार से जा सकता है? अन्य उपलब्धियों की तरह ज्ञान भी एक ऐसी उपलब्धि है, जिसे पाने के लिए प्रयास करना होता है। ज्ञान प्राप्ति के प्रयास की अनेक शाखाएं हैं। जैसे सत्संग, स्वाध्याय, चिन्तन, मनन और अनुभव। जिज्ञासा लेकर ज्ञानी पुरुषों के पास जाया जाय और उनसे सत्संग प्रदान करने की प्रार्थना की जाय। वे जो कुछ कहें अथवा बतलायें वह ध्यान से सुना जाये और विश्वासपूर्वक उसे न केवल हृदयंगम किया जाये बल्कि उस पर यथोचित आचरण भी किया जाये। उन व्यक्तियों के लिए जिन्हें शिक्षा का अवसर नहीं मिला है, सत्संग ही एक उपाय है। जिससे ज्ञान की प्राप्ति हो सकती है।

जो शिक्षित हैं, जिन्होंने विद्या प्राप्त की है, जिनके लिये स्वाध्याय की सुविधा है, उनको कहीं किसी के पास जाने की आवश्यकता नहीं है। वे अपने घर पर ही पुस्तकों और अपनी शिक्षा की सहायता से ज्ञान प्राप्त करने का पुरुषार्थ कर सकते हैं। किन्तु स्वाध्याय और पठन में एक बड़ा अन्तर होता है। पठन तो केवल उस पढ़ने को कहते हैं, जो सरसरी दृष्टि से मनोरंजन के लिये कोई पुस्तक पढ़ी जाती है। स्वाध्याय एक पुरुषार्थ है। उसे करते समय चित्त की सारी वृत्तियाँ एकाग्र कर विषय पर ही केन्द्रित करनी पड़ती है। एक-एक अक्षर, एक-एक वाक्य और एक-एक प्रकरण ध्यान से ग्रहण करते हुए पढ़ना पड़ता है। इसके अतिरिक्त जब जितना भी पढ़ा होता है उस पर तब तक चिन्तन और मनन करना पड़ता है, जब तक वह पूरी तरह बुद्धिसात् न हो जाय। इस प्रकार बुद्धिसात् हुआ विषय जब आचरण में उतर आता है, तभी वह सच्चा ज्ञान बनता है। ऐसे परिपक्व ज्ञान में कितना आनन्द और कितनी शक्ति होती है इसे स्वाध्यायवान ही जान सकते हैं।

स्वाध्याय के लिए निर्वाचित विषय ऊंचा आदर्श और पुनीत होना आवश्यक है। ओछे और निम्नकोटि का साहित्य स्वाध्यायी को भी अपने समान ही बना लेता है। स्वाध्याय के लिए धार्मिक, आध्यात्मिक और दार्शनिक, साहित्य जो किन्हीं प्रामाणिक व्यक्तियों द्वारा ही प्रणयन किया गया हो उचित होता है। निरर्थक, निस्सार और अनुपयोगी साहित्य पढ़ने वाला एक बार किन्हीं विषयों का विद्वान भले हो जाये किन्तु ज्ञानी नहीं हो सकता। बहुत कुछ जानते हुए भी उसकी जीवन-गति एक सीमित परिधि में ही चक्कर लगाती रहेगी।

ज्ञान प्राप्ति का एक उपाय अनुभव भी है। साँसारिक चेष्टाओं को ध्यानपूर्वक देखा और समझा जाये। दूसरे व्यक्तियों के गुण, कर्म, स्वभाव का परिचय पाकर उनके व्यवहार का परिणाम देखा समझा जाये और उससे शिक्षा प्राप्त की जाय। बुरे काम करने वाले किसी व्यक्ति को यदि हम पतन और परिताप के गढ़े में गिरते देखें तो विश्वास कर लेना चाहिये कि वह मार्ग जिस पर अमुक व्यक्ति चल रहा था चलने योग्य नहीं है। इसी प्रकार जब सत्कर्म करने वालों को सुख-शान्ति, संतोष और सम्मान का अधिकारी बनते देखें तो मान लेना चाहिये कि यही मार्ग हमारे चलने योग्य है।

इसी प्रकार मनुष्य अपने रहन-सहन, आचार, व्यवहार और गुण-कर्मों के परिणाम को देख भी शिक्षा ले सकता है। अपना सुधार कर अपने को ठीक मार्ग पर चला कर ठीक लक्ष्य पर पहुँच सकता है। तात्पर्य यह कि सत्संग, स्वाध्याय, चिन्तन-मनन और अनुभव के आधार पर व्यक्ति को सद्ज्ञान प्राप्त करने का निरन्तर प्रयास करते ही रहना चाहिये।

बिना ज्ञान के न तो जीवन सफल होता है और न सार्थक। अज्ञानावस्था में भौतिक और आत्मिक दोनों जीवनों का नाश हो जाता है। इसलिये इस अंधकार से निकल कर ज्ञान रूपी प्रकाश की ओर बढ़ते ही रहना चाहिये। इसमें प्रमाद अथवा आलस्य करने का अर्थ है अपने सुर दुर्लभ मानव जीवन को नष्ट कर देना, जिसमें भौतिक उन्नति तो की ही जा सकती है, आत्म-प्रकाश भी पाया जा सकता है।


जीवन काटें नहीं, उसे उत्कृष्ट बनायें

प्रायः लोग दो प्रकार का जीवन जीने का प्रयत्न करते हैं। एक सामान्य, दूसरा विशेष। सामान्य जीवन से तात्पर्य है जैसा भी चल रहा है एक ढर्रा चल रहा है। प्रसन्नता मिल गई उठाली, तकलीफ आ पड़ी सहन करली। लाभ हो गया बड़ा अच्छा, हानि हो गई दुख मना लिया। भोजन, वस्त्र और निवास की सुविधा हो गई ठीक है, नहीं तो भाग्य ईश्वर समाज सरकार आदि को कोस लिया और बाद में संतोष कर लिया। मतलब यह कि न तो जीवन का कोई उद्देश्य होता है और न समुचित व्यवस्था और गति। ऊबड़-खाबड़, उल्टा-सीधा, जो भी रास्ता पड़ गया चलते चले जाते हैं।

दूसरा जीवन विशेष जीवन होता है। इसका स्वरूप होता है एक सुनिश्चित व्यवस्था और विधि से उद्देश्यपूर्ण जीवन बिताना। ऐसे जीवन का उद्देश्य सफलतापूर्वक उन्नति की ओर बढ़ कर श्रेय प्राप्त करना होता है। इसमें महत्वाकांक्षा होती है। परिस्थितियों को अपने अनुकूल बनाये रखने का उत्साह होता है। कलापूर्ण जीवन-विधि का विकास और समाज में प्रतिष्ठित बन कर रहने की चाह होती है।

प्रथमोक्त ढर्रे की जीव-पद्धति वस्तुतः मानवीय जीवन-पद्धति नहीं होती। वह तो एक पशु-पद्धति है। समय का प्रवाह जिस प्रकार जिधर हांकता लिये जाता है चले जा रहे हैं। परिस्थितियों ने मारा चुपचाप रो लिये और समय ने धकेला गिर पड़े। अवसर अथवा संयोग मिल गया, उठकर चल पड़े नहीं तो यथास्थान पड़े एड़ियां रगड़ हरे हैं, यह भी कोई जीवन है। यदि ईश्वर को मनुष्य के लिए इसी प्रकार का जीवन वाँछित होता तो वह उसे भी अन्य पशुओं की तरह ही दो पैरों को चलने वाला एक पशु ही बनाता है। उसे बुद्धि, विवेक, चेतना, विवेचना, प्रतिभा और विचारणा आदि के विशेष गुण न देता। ईश्वर कर यह अनुदान गवाही देता है कि मनुष्य-जीवन जन्तु-जीवन की तरह बिताने के लिए नहीं है। मनुष्य, मनुष्य की तरह ही जीवन बिताने के लिए संसार में भेजा गया है। जो इस उद्देश्य को पूरा नहीं करता वह अपनी मनुष्यता का अपमान और ईश्वरी इच्छा की अवहेलना करता है। इस अपराध के दण्ड स्वरूप निश्चय ही उसे दुबारा मनुष्य जीवन नहीं मिलेगा।

आगामी जन्मों को छोड़िये। वह वर्तमान जीवन में वह कौन-सा सुख संतोष प्राप्त कर लेता है। ऐसे निरुद्देश्य और अस्त-व्यस्त जीवन-दृष्टि वाले सिवाय रो-रो कर जीवन बिताने के और कुछ नहीं कर पाते। कभी स्वास्थ्य ठीक नहीं है, कभी आजीविका की समस्या खड़ी हो गई। कभी पारिवारिक कलह प्रारम्भ हो गई, तो कभी बच्चो की शिक्षा और उनके रोजगार की चिन्ता सवार हो गई। कभी आय-व्यय का संतुलन बिगड़ गया और ऋण लेने को दौड़ना पड़ रहा है।

इन बाह्य समस्याओं के बाद मानसिक समस्यायें भी कम नहीं घेरतीं। चिन्ताओं और संतापों के कारण मस्तिष्क हल्का हो गया, मानसिक धरातल में दरार पड़ गई। विचार-शक्ति और स्मरण-शक्ति जवाब दे गई। किसी बात का निर्णय हो नहीं पाता। हर समय द्विधा की स्थिति बनी रहती है। मानसिक निर्बलता से क्रोध शीघ्र आ जाता है। अभाव के काम, क्रोध, लोभ और ईर्ष्या की प्रवृत्तियाँ प्रबल हो जाती हैं। भविष्य में अंधेरा रहता, वर्तमान संतप्त रहता और अतीत भी कोई संतोष नहीं दे पाता। संतोष, शाँति और तृप्ति कोसों दूर चली जाती है। सुख का प्रश्न ही नहीं पैदा होता। ऐसी आपत्तियों और विपत्तियों से बन्दी बना मनुष्य जीवन का क्या लाभ उठा सकता है? यह सब उद्देश्य हीन प्रकृत जीवन पद्धति अंगीकार करने का ही नतीजा होता है।

विशेषतापूर्ण जीवन ही वास्तविक मानव-जीवन है। जो जीवन कल की अपेक्षा आज प्रगति की ओर नहीं बढ़ता वह मृत है, निर्जीव है। श्रेष्ठ और श्रेष्ठतर जीवन-यापन के लिए नित्य नये प्रयत्न करते रहना मनुष्यता का लक्षण है। मनुष्य को बुद्धि, विवेक और विचार-शक्ति इसलिये दी गई है कि वह समझदारी के साथ प्रगतिपूर्ण जीवन यापन करे।

श्रेष्ठ जीवन तब तक यापन नहीं किया जा सकता जब तक मनुष्य का कोई निश्चित लक्ष्य न हो। लक्ष्य भी निकृष्ट अथवा निम्नकोटि का नहीं। उच्च और उदात्त ही होना चाहिये। मनुष्य के जिस लक्ष्य में केवल मात्र स्वार्थ अथवा अपना हित ही सम्मिलित होता है वह निम्नकोटि का होता है। उच्चकोटि का लक्ष्य वही माना जायेगा, जिसमें व्यक्तिगत उन्नति के साथ-साथ समान के हित का भाव भी निहित हो। किसी का लक्ष्य उच्च-कोटि की विद्या प्राप्त कर सकना हो सकता है। निश्चय ही यह लक्ष्य एक ऊँचा लक्ष्य है। किन्तु यही ऊँचा लक्ष्य तब निम्नकोटि का हो जाता है, जब केवल अपने लिए ऊँचा पद, प्रतिष्ठा और धन कमाने का ही भाव रहता है। अवश्य ही विद्या के उपहार स्वरूप ये उपलब्धियाँ होती हैं और पानी भी चाहिये।

निम्नता यह नहीं है कि कोई अपने पुरुषार्थ के बदले में पद, प्रतिष्ठा अथवा सम्पत्ति चाहता है, निम्नता यह है कि इनको पाकर अपने तक ही सीमित कर लिया जाये। पद, प्रतिष्ठा और सम्पत्ति के लिए प्रयत्न करिये लेकिन साथ ही यह उद्देश्य रखिये कि मैं अपने पद से उपर्युक्त लोक-सेवा का संपादन करूंगा, प्रतिष्ठा के प्रभाव से लोगों को सही मार्ग पर चलाऊंगा। परिवार, देश और समाज का नाम ऊँचा करूंगा। अपने स्वार्थ के लिए कभी उसका दुरुपयोग न करूंगा। धन प्राप्त कर जहाँ अपना जीवन स्तर ऊँचा करूंगा, वहाँ उसका एक भाग गरीबों और आवश्यकता ग्रस्तों की सहायता के लिए भी लगाऊँगा। धर्म और परोपकार में खर्च करूंगा। इस प्रकार जब स्वार्थ में परमार्थ का भी समन्वय कर लिया जाता है तो कोई लक्ष्य उदात्त और आदर्श बन जाता है। ऐसे ही ऊँचे लक्ष्य सामने रखकर उसकी ओर व्यवस्था पूर्वक बढ़ने वाले ही उस प्रकार का जीवन बिता पाते हैं जिस प्रकार का एक मनुष्य को बिताना चाहिये।

किन्तु लक्ष्यपूर्ण जीवन पथ पर प्रगति करना कोई नैसर्गिक प्रक्रिया नहीं है। उसके लिये एक सुनियोजित और व्यवस्थित कर्म परम्परा की आवश्यकता होती है। यह कर्म परम्परा बिना समुचित ज्ञान के प्राप्त नहीं होती। आदर्श जीवन जीने के लिए जीवन कला का ज्ञान होना परम आवश्यक है। इस कला से अनभिज्ञ व्यक्ति कितनी ही शक्ति, सामर्थ्य और जिज्ञासा क्यों न रखता हो, निश्चय ही उस विधि से जीवन-यापन नहीं कर सकता, जिसके द्वारा किसी उल्लेखनीय सफलता का लक्ष्य पाया जा सकता है। जीवन कला का ज्ञान रखने वाले ही अपने पथ में आये कंटकों और अवरोधों को बुद्धिमानी से दूर करते हुए आगे बढ़ पाते हैं। जो अज्ञानी और अनभिज्ञ हैं वे शीघ्र ही कंटकों और अवरोधों में उलझ कर अपनी प्रगति की हानि कर लेते हैं।

इस जीवन कला को सीखने का एक उपाय तो है अनुभव। मनुष्य एक प्रकार से चला। देखा कि इस प्रकार चलने में यह हानि हुई, यह अवरोध अथवा संकट आया। इतना समय लगा और इतना चल पाये। उसने अनुभव पाया कि उसकी यह प्रगति इस प्रकार ठीक नहीं है। अपने इस अनुभव से सीख पाकर वह दूसरा रास्ता ग्रहण करता है। यह भी रास्ता उसका पूर्व परिचित नहीं है। उसे फिर ऐसे मोड़ों, घुमावों और भ्रांतियों का सामना करना पड़ता है, जो उसकी प्रगति के लिए ऋणात्मक सिद्ध होती है। उसने वह रास्ता भी छोड़ा और तीसरे मार्ग से यात्रा प्रारम्भ की। इस अनजान पथ पर भी उसे वही कठिनाई आ सकती है। अपने इस प्रकार के अनुभवों से वह यह तो जान जायेगा कि अमुक, अमुक मार्ग उसकी प्रगति के लिये उपर्युक्त नहीं है। पर यह न जान पायेगा कि आखिर अन्तिम और उपर्युक्त मार्ग है कौन-सा।

यदि इस प्रकार बहुत से रास्ते देखने के बाद वह सही रास्ता पा भी गया तो उसके पास, उस घूमने में बरबाद हो जाने के कारण, उतनी शक्ति और समय ही शेष न रहेगा कि वह उस पथ से अपने अन्तिम लक्ष्य तक पहुंच सके। इस प्रकार कामों, व्यक्तियों और योजनाओं के विषय में भी वह ऊमता-घूमता रह सकता है। आज जो व्यक्ति चुने वे कल अनुपयोगी सिद्ध हो गये। उनको छोड़ कर दूसरे चुने लेकिन व्यर्थ। आज योजना बनाई, किन्तु प्रयोग के बाद पता चला कि यह तो असफल रह गई। दूसरी बनाई और प्रयोग की उसका भी वही परिणाम निकला। इस प्रकार अनेक बार व्यक्तियों, विचारों और योजनाओं को अदलते-बदलते रहने में यह अनुभव तो हो सकता है कि कौन-सी योजना, व्यक्ति और विचार उसके लिए उपयोगी नहीं हैं। किन्तु यह ज्ञान प्राप्त नहीं हो सकता कि उपयोगी बातें क्या हैं? और जब ज्ञान होता है तो समय बहुत दूर जा चुका होता है। अस्तु, केवल अपने अनुभव के आधार पर मार्ग, विचार और योजना बदलते हुए सफलता की ओर बढ़ने वाले प्रायः अपने लक्ष्य को पा नहीं पाते।

जीवन का एक अनुभव एक बहुत बड़ा मूल्य लेकर प्राप्त होता है। और जीवन प्रगति के लिए अनेक प्रकार के अनुभव और ज्ञान की आवश्यकता होती है। उन सब अनुभवों को खरीद कर चलने वाले के हाथ अनुभवों के सिवाय लक्ष्य नहीं आ सकता। उसका सारा समय, सारे साधन और सारा जीवन अनुभव प्राप्त करने में ही व्यय हो जायेगा और तब आगे बढ़ने के लिए, यात्रा पूरी करने के लिये, उसके पास सम्बल ही शेष न रह जायेगा। व्यापार अथवा अन्य प्रयोगों में नित्य नये अनुभव पाने और प्रयोग करने में व्यस्त रहने वाले बहुधा दिवाला और असफलता ही भागी बनते हैं।

अपने नित्य नये प्रयोगों के आधार पर अनुभव पाकर चलने वालों को यह आशा नहीं करनी चाहिये कि वे कोई बड़ी सफलता अथवा बड़ा लक्ष्य पा सकेंगे। ऐसा व्यक्ति अनुभवी तो हो सकता है किन्तु सफल व्यक्ति नहीं।

तथापि बिना अनुभव और ज्ञान के प्रगति भी कैसे हो सकती है? इसका उपाय है। वह यह कि अपने पूर्व पुरुषों, विद्वानों और गुरुजनों के अनुभवों से लाभ उठाया जाये। उनकी शिक्षाओं और निर्देश किए हुये मार्ग पर चला जाय और उनकी बतलाई हुई कला के अनुसार जीवन का प्रयोग करने का प्रयत्न किया जाये।

समाज के विद्वानों, मनीषियों और चिंतकों का लक्ष्य होता है, मार्ग प्रवर्तन। वे अपने जीवन का उपयोग अपनी व्यक्तिगत उपलब्धियों के लिए नहीं करते। वे उसका उपयोग उन अनुभवों के लिये ही करते हैं, जो उनके समाज और आने वाली पीढ़ी के लिए उपयोगी तथा हितकर हों। वे अपना सारा जीवन इसी उद्देश्य के लिए उत्सर्ग करके अनुभवों और शिक्षाओं का भण्डार अपने समाज को दे जाते हैं।

उन्नति और प्रगति के इच्छुक व्यक्ति जीवन के प्रयोगकर्ता तो होते नहीं, जो अपना सारा समय और साधन उसके लिए उत्सर्ग कर दें। उन्हें तो एक स्थूल लक्ष्य पाना होता है। इसलिये उन्हें अपने व्यक्तिगत अनुभवों में समय खराब न करके- मनीषियों, विद्वानों, गुरु और साहित्यकारों के प्रगाढ़ और प्रशस्त अनुभवों का लाभ उठा कर चलते रहना चाहिये।

यह लाभ व्यक्तिगत संपर्क से तो उठाया ही जा सकता है। किन्तु इससे भी अधिक लाभ उन ग्रन्थों और पुस्तकों से उठाया जा सकता है, जो वे अपने और दूसरों के अनुभवों के परिणामों के रूप में दे जाते हैं और जो किसी भी समय कहीं भी उपलब्ध हो सकती है।

लक्ष्यपूर्ण मानवोचित जीवन, विशेष जीवन होता है। जिसका कोई निश्चित लक्ष्य और ऊँचा उद्देश्य हो। उस ओर प्रगति करने के लिये ज्ञान और अनुभव की आवश्यकता है। उसके लिये अपना समय और साधन व्यर्थ न करके अपने पथ-प्रदर्शकों के किये अनुभवों और शिक्षाओं का लाभ उठाना चाहिये और यह लाभ व्यक्तिगत संपर्क और पुस्तकों, दोनों द्वारा उठाया जा सकता है।


अधिक बलवान

द्रोणाचार्य कौरव सेना के सेनापति नियुक्त हुये। पहले दिन का युद्ध वीरतापूर्वक लड़े तो भी विजय-श्री अर्जुन के हाथ रही।

यह देखकर दुर्योधन को बड़ी निराशा हुई। वह गुरु द्रोणाचार्य के पास गये और कहा- “गुरुदेव! अर्जुन तो आपका शिष्य मात्र है, आप तो उसे क्षण भर में परास्त कर सकते हैं, फिर यह देर क्यों?”

द्रोणाचार्य गम्भीर हो गये और कहा- “आप ठीक कहते हैं, अर्जुन मेरा शिष्य है, उसकी सारी विद्या से में परिचित हूँ, किन्तु उसका जीवन कठिनाई से संघर्ष करने में रहा है और मेरा सुविधापूर्वक दिन बिताने का रहा है। विपत्ति ने उसे मुझसे भी अधिक बलवान बना दिया है।


दाम्पत्य-जीवन को सफल बनाने वाले कुछ स्वर्ण-सूत्र

पति-पत्नी में कभी झगड़ा नहीं होना चाहिये। यह शोभनीय भी नहीं है और कल्याणकारी भी नहीं है। पति-पत्नी के झगड़े का मतलब है पूरे परिवार का नाश और उनके प्रगाढ़ प्रेम का अर्थ है, सुन्दर परिवार, सुखदायी गृहस्थ। पति-पत्नी के पारिवारिक लड़ाई-झगड़े के कुछ बाह्य और कुछ मनोवैज्ञानिक कारण होते हैं। उनमें से अकर्तव्यशीलता भी एक विशेष कारण है। यदि पति-पत्नी परस्पर अपने बाह्य और मनोवैज्ञानिक कर्तव्यों को सावधानीपूर्वक पूरा करते रहें तो उन दोनों में कभी कोई लड़ाई-झगड़ा न हो।

बाह्य कर्तव्यों में पति का सबसे पहला कर्तव्य है कि वह पत्नी के स्वास्थ्य का अपनी ओर से पूरा ध्यान रखे। बहुत स्वार्थी पति अपनी सेवा लेने के साथ-साथ पत्नी को हर समय किसी न किसी काम में लगाये रखते हैं। उनका विचार रहता है कि पत्नी से जितना ज्यादा से ज्यादा काम लिया जा सके, लिया जाना चाहिये। वह तो काम करने और सेवा करने के लिये आई ही है। जगह पर पानी, जगह पर खाना, यहां तक कि कपड़े-लत्ते और किताब, कागज, स्याही, दवात, तक जगह पर ही लेते हैं। किसी वस्तु अथवा किसी काम के लिए जगह से उठना जानते ही नहीं। यहाँ तक कि कलम पेंसिल तक उसी से बनवाते और फाउंटेनपेन में रोशनाई तक उससे हीं भरवाया करते हैं। इतना ही नहीं इन तुच्छ कामों के लिए भी उन्हें आराम करती हुई अथवा कोई और आवश्यक काम करती हुई पत्नी को उठा देने में जरा भी दया या संकोच नहीं करते। बहुत से बाबू साहबों को तो पत्नी ही कोट-पतलून और टाई-जूते पहनाती है और हर रोज जूते पर पालिश किया करती है।

रसोई और नाश्ते के सम्बन्ध में तो उसे जितना हैरान किया जा सकता है किया जाता है। और यह मुसीबत छुट्टी के दिन तो और भी बढ़ जाती है। जरा यह बनाना, थोड़ा वह भी बना लेना, आज सुबह इसकी चाय है, शाम को उसका भोजन है, बहुत दिन से यह नहीं बना, वह चीज खाये तो कई दिन हो गये- की ऐसी रेल लग जाती है कि बेचारी पत्नी को दिन भर दम मारने और चूल्हें, अंगीठी के पास से उठने की फुरसत नहीं मिलती। आप तो कोच, कुरसी या चारपाई पर पड़ गये और मिनट-मिनट पर तरह-तरह की फरमाइशें चलाने लगे। अपनी इस नवाबी में उन्हें इस बात का जरा भी ध्यान नहीं रहता है कि उनकी इस फैल-सूफी से बेचारी पत्नी की हड्डी-हड्डी टूट जाती है।

किसी प्रकार यदि बेचारी को थोड़ा-सा आराम का अवसर मिल भी जाता है तो फिर उनकी ऐसी गप्प और हा-हा-ही-ही चलती हैं कि उसके आराम का सारा समय पलक उठने, गिरने, जम्हाने और अलसाने में ही निकल जाता है और वह फिर थकी-थकी उठ कर दूसरे समय के काम में लग जाती है। यदि सौभाग्य ही कहिये, उनकी पत्नी कलाकार अर्थात् संगीत या वाद्य की जानकार हुई तब तो गारंटी के साथ उसके दिन का ही नहीं रात का भी आराम का समय बहुत-सा बेकार चला जाता है। खा-पीकर आराम से पड़कर पति देवता को संगीत लहरी की इच्छा होती है और वह पत्नी को महफिल लगाने के लिये मजबूर कर देते हैं। जब संगीतज्ञ पत्नी से विवाह किया है तो फिर उसका लाभ क्यों न उठाया जाये? काम के बाद ही तो वह समय मिलता है, जिसमें उनकी कला का रस लिया जा सकता है। अनेक महानुभाव तो आप आराम से पड़ कर यदि उससे पैर नहीं दबवाते तो आधी-आधी रात तक उपन्यास सुना करते हैं। उनका तो कार्य दस बजे दिन से आरम्भ होता है, पत्नी का यदि चार पाँच बजे से आरम्भ होता है तो इससे क्या। वह तो अपनी जानते हैं पत्नी अपना मरे भुगते।

जब घर में ही धुल जाते हैं तो आवश्यक क्या कपड़े इस परवाह से पहने जायें कि कम से कम चार पाँच दिन तक साफ रह सकें? हर दूसरे, तीसरे दिन कपड़ों का एक ढेर उसके लिये तैयार रहता है। बच्चों के कपड़ों के साथ वह दोपहर को पति देवता के कपड़े धोती, सुखाती और लोहा करती है। इस प्रकार बहुधा पत्नियों से इतना काम लिया जाता है कि जरा आराम करने का अवसर नहीं मिलता, जिसका फल यह होता है कि उसका स्वास्थ्य खराब हो जाता है, उसका स्वभाव चिड़चिड़ा हो जाता है और वह बात-बात पर झल्लाने, रोने लगती है। गृह-कलह आरम्भ हो जाता है।

वे बुद्धिमान गृहस्थ जिन्हें पारस्परिक प्रेम सद्भावना और सुख-शाँति वाँछित है, पत्नी से उतना ही काम लें जितना उचित और आवश्यक है। जो उनके अपने काम हों वे सब स्वयं ही करें। पारिवारिक जीवन में आलस्यपूर्ण नवाबी चलाना ठीक नहीं। पत्नी के पास घर गृहस्थी और बच्चों का पहले से ही इतना काम होता है कि उसे समय नहीं रहता। इस पर अपना काम सौंप कर काम की इतनी अति न कर दीजिये कि उसका शरीर टूट जाये। पत्नी जितनी अधिक स्वस्थ और प्रसन्न रहेगी उतनी ही मधुर और सरस होती चली जायेगी।

बहुत से स्वार्थी लोग बड़प्पन और अधिकार के अहंकार में हर वस्तु में अपना ‘लाइन्स-शेयर’ (सिंह भाग) रखते हैं। वे नाश्ते और भोजन की सबसे अच्छी चीजें सबसे अधिक मात्रा में स्वयं उपभोग करते हैं। जो कुछ उल्टा-सीधा, थोड़ा बहुत बचता है, वह प्रसाद रूप में पत्नी बेचारी को मिलता है। यही हाल बाजार से लाये फल, मेवा, मिठाई आदि में भी होता है। यह बहुत ही हेय, तुच्छ और क्रूर स्वार्थ है। इस व्यवहार की अधिक पुनरावृत्ति होने और यह समझ लेने पर कि पति का इसमें केवल स्वार्थ ही नहीं अहंकार भावना और कमाई का अधिकार भी शामिल है, यदि पत्नी का मन उससे फिर जाता है तो उसे ज्यादा दोष नहीं दिया जा सकता। ऐसे स्वार्थी पशुओं से पत्नी ही नहीं पूरे संसार को घृणा करनी चाहिये। वे इसी योग्य होते हैं।

अच्छे और भले पति हर अच्छी वस्तु को प्रेमपूर्वक अपनी प्रियतमा को ही अधिक से अधिक खिलाने-पिलाने में संतोष और सुख अनुभव करते हैं। चूँकि वे कमाई करते हैं इसलिये उन्हें अपना यह कर्तव्य अच्छी तरह याद रहता है कि कही संकोच-वंश पत्नी किन्हीं वस्तुओं को जी भर कर न खाने का अभ्यास न कर ले अथवा खाने में संकोच करे। वे अपने आप अपने सामने अथवा अपने साथ बिठा कर खिलाने का ही यथा सम्भव प्रयत्न करते हैं। ऐसे पतियों की पत्नी कितनी प्रसन्न और सुखदायक रहती हैं इसका अनुमान सहज नहीं।

पहनने, पहनाने में भी यह विषमता अच्छी नहीं। अनेक पति अपने लिए तो जब तब अच्छे से अच्छे और नये कपड़े बनवाते रहते हैं, तब भी कमी महसूस करते रहते हैं। किन्तु पत्नी की वर्षों पहले खरीदी दो-चार साड़ियाँ उन्हें शीघ्र ही खरीदीं जैसी मालूम होती है। जैसे सुन्दर कपड़े अपने लिये बनवाते हैं, वैसे पत्नी के लिए नहीं। ऐसे ‘फैलसूफ’ पति अपनी पत्नी का पूरा प्यार कभी नहीं पा सकते। उचित यह है कि पुरुष होने के नाते पति मोटे, सस्ते और सादे कपड़े पहने और पत्नी को अच्छे से अच्छे कपड़े पहनाये। वह सुन्दर है सुकुमार है, वस्त्र उसकी शोभा है।

अपने से अच्छे कपड़े पत्नी को पहनाने वाले पति अपनी पत्नी पर बिना मंत्र के वशीकरण कर देते हैं और प्यार में बदली उसकी कृतज्ञता का आनन्द प्राप्त करते हैं। यदि अपने से अच्छे न भी पहनाये जायें तो कम से कम उस स्तर और उस मात्रा का तो प्रबन्ध किया ही जाना चाहिये, जो स्वयं अपने लिये करते हैं। इसी प्रकार साबुन, तेल आदि का भी प्रबन्ध पत्नी के लिये अपने से अच्छा ही करना चाहिये।

इन कतिपय पदार्थिक कर्तव्यों के साथ-साथ पति को कुछ मनोवैज्ञानिक कर्तव्यों का भी निर्वाह करना चाहिये। इनमें से सबसे पहला कर्तव्य है प्रशंसा। उसके भोजन, और श्रृंगार की प्रशंसा कीजिये और प्रशंसा की आँखों से ही उसे देखिये। इससे उसको बड़ी पुलक और सुख की सिरहन प्राप्त होती है। उसे यह विश्वास रहता है कि पति को मैं और मेरे काम पसन्द हैं। यह पसन्दगी की भावना हर नारी की एक साध होती है। इस पर वह अपना आराम और सुख-सुविधा तक निछावर करने को तैयार रहती है।

पत्नी के सेवा करते समय कभी भी उदास, उदासीन व तटस्थ मत रहिये। उससे हँसते-मुस्काते और एकाग्र होकर बात करने का प्रयत्न करिये। इससे उसको यह बड़ा संतोष रहता है कि पति उसको देखकर खिल उठता है, मेरी साधारण-सी बात में भी उसे रस आता है और शीघ्र ही मुझमें खो जाता है। वह इसे नारीत्व की विजय समझती है और नारी होने का अभिमान करने लगती है, जिसको प्रेम रूप में वह आभार स्वरूप समर्पित कर देती है।

बाजार से जब भी आइये कुछ न कुछ उसकी पसन्द की वस्तु अवश्य लेकर आइये। स्त्रियों का स्वभाव भी कुछ बच्चों जैसा होता है, अपनी पसन्द की छोटी-सी वस्तु भी पाकर बहुत अधिक प्रसन्न हो जाती हैं। यह और इस प्रकार के अन्य बाह्य और मनोवैज्ञानिक कर्तव्यों का पालन करने वाले पतियों की पत्नियाँ सदा प्रसन्न रहती हैं और किसी भी स्थिति में गृह-कलह उपस्थित नहीं कर पाती हैं।

किन्तु नियम है कि ताली एक हाथ से कभी नहीं बजती। आदान के अभाव में प्रदान सम्भव नहीं होता। पति के साथ पत्नी को भी ऐसे कारण उपस्थित नहीं करना चाहिये, जिससे पति का उसकी ओर से मन फिरने की सम्भावना हो जाय।

सबसे पहले तो उसे पति की उचित सेवा में न तो प्रमाद करना चाहिये और न अरुचि ही। पति को जो कुछ पसन्द है खाने की वस्तुओं में उनका समावेश करते रहना चाहिये। दिन भर के परिश्रम के बाद रुचि कर भोजन और पत्नी की आवभगत उसको पूरी तरह ताजा कर देने के लिए पर्याप्त है। पति के आने पर जो पत्नियाँ उसकी सेवा स्वागत भूल कर अपनी गाथा लेकर बैठ जाती हैं या तत्काल बाजार का काम बतलाने लगती हैं, वे उसकी अनुकूलता कभी प्राप्त नहीं कर सकतीं।

खरीद फरोख्त के समय पति की आवश्यकताओं को प्राथमिकता दीजिये और सदैव यह ध्यान रखना चाहिये कि उसके कपड़े ज्यादा पुराने, फटे अथवा कम नहीं होने चाहिये। खाने-पीने की वस्तुओं में प्रयत्न करिए कि पति को अधिक न सही पुरुषोचित भाग तो मिलना ही चाहिये। पौष्टिक पदार्थों के उपयोग में पति की बराबरी करने का प्रयत्न न कीजिये और न अपने ऊपर इस स्पर्धा से अधिक खर्च करिये कि जब वह इतना व्यय करते हैं तो मैं क्यों न करूं। अपने वस्त्रों का स्तर यथा-सम्भव उतना ही रखिये जितना कि पति का हो।

पति की आर्थिक कमी अथवा कम कमाई की आलोचना तो कभी करनी ही नहीं चाहिये। जहाँ तक संभव हो ऐसी-व्यवस्था रखिये कि उसका आभास कम से कम ही हो। पति की आर्थिक आलोचना करने का अर्थ है उसका मन अपनी ओर से विमुख कर देना। बाजार अथवा बाहर जाते समय अपनी फरमाइश की सूची पेश करने और आने पर उनके लिए तलाशी लेने लगने का स्वभाव पति को रुष्ट कर देने वाला होता है। पति के प्रिय मित्रों की अनुचित आलोचना करना अथवा उनका सम्बन्ध विच्छेद कराने का प्रयत्न करना पति के एक सुन्दर सुख को छीन लेने के बराबर है। पति के मित्रों को स्वजन और शत्रु को शत्रु मानना पत्नी का प्रमुख कर्तव्य है जो पत्नियाँ अपना स्वतन्त्र अस्तित्व मान कर केवल अपने मित्र को मित्र और अपने विरोधी को विरोधी मानती हैं, वे अपने दोनों के बीच खाई खोदने की भूल करती हैं।

इसके अतिरिक्त संकट के समय में भी पति के पास मुस्काती हुई ही रहो। पति के सम्मुख गन्दी दशा में रहने वाली स्त्रियाँ अपने प्रति घृणा को जन्म देती हैं। अनेक स्त्रियों का स्वभाव होता है कि पति के पीछे तो वह खूब सजी-धजी रहती है, बाहर सज-धज कर निकलती हैं लेकिन घर में खासतौर से पति के सम्मुख गंदा व पुराना कपड़ा पहन कर आती हैं। उनका ख्याल रहता है कि पति उनके पास कपड़ों की कमी समझ कर और नयी साड़ियाँ लाकर देगा। किन्तु यह प्रयत्न उल्टा है। इससे पति उसे स्वभाव से गन्दा समझ कर कपड़े लाकर देना बेकार समझते हैं। सदा मधुर और मृदुल बोलिये। नारियों की मीठी वाणी और अनुकूल मुस्कान का जादू पुरुष पर अधिकार जमा लेता है। यदि इस प्रकार पति-पत्नी एक दूसरे की भावनाओं का ध्यान रखते हुए अपने यह कतिपय बाह्य और मनोवैज्ञानिक कर्तव्यों का पालन करते रहें तो उनके बीच कभी कलह-क्लेश होने की सम्भावना ही न रहे और दाम्पत्य-जीवन का अधिक से अधिक आनन्द पा सकते हैं।


अपना मूल्य,आप ही न गिरायें

अनेक लोगों का स्वभाव होता है कि वे अपने को अकारण ही दीन-हीन और क्षुद्र समझा करते हैं। सदैव ही अपना कम मूल्याँकन किया करते हैं। साथ ही इसे एक आध्यात्मिक गुण मानते हैं। उनका विचार रहता है कि ‘‘अपने को छोटा मानते रहने से, अपना महत्व कम करते रहने से मनुष्य अहंकार के पाप से बच जाता है। उसकी आत्मा में बड़ी शाँति और संतोष रहता है। यह एक विनम्रता है। छोटे बन कर चलने वाले समाज में बड़ा बड़प्पन पाते हैं।’’

यह विचार यथार्थ नहीं। मनुष्य को संसार में वही मूल्य और वही महत्व मिलता है, जो वह स्वयं अपने लिए आंकता है। उससे कम तो मिल सकता है लेकिन अधिक नहीं। सीधी-सी बात है कि जब कोई व्यक्ति स्वयं ही अपनी किसी वस्तु का एक पैसा मूल्य आँकता है तो समाज अथवा संसार को क्या गरज पड़ी कि वह उसका दो पैसा मूल्य लगाये। बाजारों में किसी समय भी मूल्याँकन की वह रीति देखी जा सकती है। जो दुकानदार अपनी किसी वस्तु का एक निश्चित मूल्याँकन कर लेता है और यह विश्वास रखता है कि उसकी वस्तु का उचित मूल्य यही है, जो समाज से अवश्य मिलेगा, तो वह उतना पाने में सफल भी हो जाता है। यदि कोई उसके बतलाये मूल्य का अवमूल्यन भी करता है तो वह उससे सहमत नहीं होता। इसके विपरीत वह दुकानदार जो कहने-सुनने पर अपने बतलाये मूल्य को कम कर देता है कभी भी ठीक मूल्य नहीं पाता और उसी मूल्य पर संतोष करना पड़ता है जो ग्राहक से मिलता है।

आत्म-अवमूल्यन आत्म-हत्या जैसी किया है। जो लोग आवश्यकता से अधिक दीन-हीन, क्षुद्र और नगण्य बन कर समाज में अपनी विनम्रता और शिष्टता की छाप छोड़ना चाहते और आशा करते हैं कि इस आधार प यश मिलेगा, वे मूर्खों के स्वर्ग में विचरण करते हैं। समाज में किसी को उतना ही मूल्य, उतना ही यश, सम्मान और प्रतिष्ठा मिलती है, जितना वह स्वयं अपने व्यक्तित्व का लगाते और ठीक समझते हैं। आत्म-निर्धारित मूल्य से अधिक किसी को अपने व्यक्तित्व का मूल्य नहीं मिलता।

नगण्यता के मार्ग से अपने लिये सम्मान अर्जन की विधि एक छल है, विडंबना है और आवश्यकता से अधिक अपने मूल्य का दुराग्रह दम्भ है। यह दोनों बातें गलत हैं। ठीक यह है कि विनम्रता प्रदर्शन के लिए नगण्यता न व्यक्त कीजिये वरन् अपना उचित महत्व प्रकट किया जाये और हमारा जो वास्तविक महत्व है उससे अधिक का दम्भ न किया जाये। इस नीति पर चलने वालों का समाज में सदैव ही उचित मूल्य और महत्व मिलता रहता है।

इस प्रकार के व्यक्तियों के अतिरिक्त एक प्रकार के व्यक्ति और भी होते हैं। जिन्हें दीन मनोवृत्ति वाला कह सकते हैं। ऐसे व्यक्ति यथार्थ रूप में अपने को दीन-हीन और नगण्य समझते हैं। उनकी दृष्टि में अपना कोई मूल्य महत्व नहीं होता। हर समय इसी क्षोभ में घुला करते हैं कि वे बड़े ही निर्बल, निराश, अयोग्य और सारहीन व्यक्ति हैं। न संसार में कोई उल्लेखनीय काम कर सकते हैं और न समाज में अपना स्थान बना सकते हैं। उनके जीवन का न कोई मूल्य है न महत्व। वे धरती पर एक बोझ के समान जिए चले जा रहे हैं।

इस दीन-हीन मनोवृत्ति के लोग निश्चय ही बड़े दयनीय होते हैं। ऐसे जीवन को यदि आत्म-हत्या मान लिया जाय तब भी अनुचित नहीं। किसी शस्त्र से अपना घात कर लेने अथवा अपने विचारों भावों और कल्पनाओं से अपनी आत्मा का तेज उसकी श्रेष्ठता नष्ट करते रहने में कोई अन्तर नहीं। वह शास्त्रीय हनन है यह वैचारिक आत्म हनन। ऐसे आदमी आदमी मनोरोगी होते हैं। जो भी अपने अन्दर इस दीन-वृत्ति का आभास पाये उन्हें जपता उपचार करने में तत्पर हो जाना चाहिये। अन्यथा उनका सारा जीवन योंही रोते-झींकते, कुढ़ते- कलपते बीत जायेगा और उसका कोई लाभ उन्हें प्राप्त न होगा।

यह एक निश्चित नियम है कि जिस प्रकार का हम अपने को मानते रहते हैं, यदि वैसे नहीं हैं तो भी वैसे बन जायेंगे। संसार भी उसी के अनुसार हमें मानेगा। संसार में अनेक ऐसे धनवान, बलवान, विद्वान और प्रतिभावान व्यक्ति हैं समाज जिन्हें बड़े ही निम्न दृष्टि से देखता है। न कोई उन्हें महत्व देता है और न किंचित मूल्याँकन करता है। वे स्वयं भी अपने व्यवहारों, बातों और व्यक्तित्व में दीनहीन और मलीन बने रहते हैं। न हृदय में कोई उल्लास होता है, न मुख पर कोई तेज, ओज और न आत्मा में अपनी विशेषताओं का विश्वास। बहुत कुछ होकर भी नगण्यतम जीवन का भार ढोते रहते हैं। इसका कारण और कुछ नहीं उनकी अपनी आत्मा-हीनता और अवमूल्यन ही होता है। उनके दीन-मलीन और मिथ्या विचार ही प्रेत की तरह उनकी विशेषताओं का रक्त चूस लेते हैं। हीन व्यक्ति मानव आकार में एक चलते डोलते कंकाल के सिवाय और कुछ नहीं होते। ऐसा धिक्कारपूर्ण जीवन बिताने में क्या सुख और क्या संतोष हो सकता है- नहीं कहा जा सकता है।

यदि आपका स्वभाव दैन्यपूर्ण है तो उसे बदलिये अन्यथा आपकी सारी शक्तियाँ, सारी विशेषतायें और सारी महानतायें नष्ट हो जायेंगी और तब समाज आपका मूल्य दो कौड़ी का भी लगाने को तैयार न होगा। आप एकांत में शाँत और निष्पक्ष चित्त होकर बैठिए और विचार करिये कि आप क्या हैं और अपने को क्या मानते है? ऐसा करते समय यदि आपकी विचार-धारा दीनता की ओर जाती है और आप यही सोचने लगते हैं कि आप तो बड़े गरीब, कमजोर और अयोग्य हैं तो तुरन्त ही अपनी विचार-धारा पर प्रतिबन्ध लगा दीजिये और सोचिये कि आप वस्तुतः वैसे हैं भी या अपने प्रति वैसा होने का भ्रम ही है।

निश्चय ही यह आपका भ्रम ही है। क्योंकि संसार में कोई भी मनुष्य मूल रूप से न तो निर्बल होता है और न निर्धन। उसका अपना दृष्टिकोण ही उसे वैसा बना देता है। मनुष्य परमात्मा का अमर पुत्र है। वह अपने पिता के दिव्य गुणों से विभूषित है। उसके अन्दर अपरिमित आध्यात्मिक सम्पदायें भरी हुई हैं। उसका दीन-हीन और निर्बल होना सम्भव नहीं। उसका आत्म-विस्मरण ही उसे वैसा बनाये रहता है। अपने सत्य-स्वरूप को पहचानिये, उसका चिन्तन करिये, आपका सारा दैन्य दूर हो जायेगा और आप अपने को संसार में सर्वशक्तिमान परमात्मा का उत्तराधिकारी अनुभव करेंगे।

आप संसार के सर्वश्रेष्ठ प्राणी हैं। आपकी शक्तियों और सम्पदाओं का पारावार नहीं। आप अखण्ड और अनन्त भौतिक, मानसिक, बौद्धिक और आत्मिक शक्तियों से सम्पन्न कर संसार में अवतरित किए गये हैं। जैव-विज्ञान का नियम है कि किसी जीव के पिता में जो गुण होते हैं, वही उसकी सन्तान में आते हैं। स्वस्थ पिता की सन्तान स्वस्थ, गुणी पिता की सन्तान गुणी और अयोग्य पिता की सन्तान का अयोग्य होना स्वाभाविक है। तब आप परमात्म की सन्तान होकर दीन-हीन और मलीन किस प्रकार हो सकते हैं? यह भ्रम आपको तभी तक रहता है, जब तक आप अपनी पैतृकता को भूले हुए हैं। अपनी पैतृकता याद कीजिये और आप में सारे ईश्वरीय गुण स्फुरित हो उठेंगे।

यहाँ पर इतना और स्पष्ट हो जाय कि केवल पैतृकता स्मरण करने से ही काम नहीं चलेगा। उसमें विश्वास करना होगा उसे अपने अन्दर अनुभव भी करना होगा। विश्वास रहित स्थिति नकारात्मक ही होती है। जब तक जो पुत्र अपने पिता की परम्परा में विश्वास नहीं करेगा, वह उसका उत्तराधिकारी किस प्रकार बन सकता है और बिना उत्तराधिकार के उसकी सम्पदाओं का स्वामी भी कैसे बनेगा। आत्म-स्फुरण के लिए अपने में और अपनी पैतृक परम्परा में प्रतीति करना नितान्त आवश्यक है। ऐसा करने पर ही आप अपने मन्तव्य में कृतकृत्य हो सकेंगे अन्यथा नहीं।

दैन्य का रोग दूर करने के लिए अपनी चिन्तन धारा बदलनी पड़ेगी। मनुष्य की आत्मा में अद्भुत शक्तियाँ छिपी पड़ी हैं। उनका चिन्तन करने से वे जाग पड़ती हैं और मनुष्य के चरित्र में समाविष्ट होकर अपना चमत्कार दिखलाने लगती हैं। आत्म-निन्दा के स्थान पर यदि आत्म-प्रशंसापूर्वक अपना चिन्तन किया जाय तो पता चलेगा कि हम एक उदात्त चरित्र और महान शक्तियों वाले व्यक्ति हैं। हम भी उन दैवी गुणों और विभूतियों के भण्डार हैं, जिनका कोई दूसरा है या हो सकता है। इस प्रकार के अनुकूल चिन्तन अभ्यास से निश्चय ही आपका चरित्र चमक उठेगा, आपकी शक्तियाँ विकसित हो उठेंगी और आप संसार में बहुत से उल्लेखनीय कार्य कर सकेंगे।

आत्म-चिन्तन एक अद्भुत कला है। इससे जहाँ आपको अपने गुणों का आभास होगा वहाँ उन न्यूनताओं का भी पता चलेगा, जो आपको दैन्य की ओर ले जाती हैं। आत्म-चिन्तन करने पर आप जिस किसी समय ऐसी कमी अपने में पायें, जो आपको दीनता अथवा हीनता की ओर ले जाती हों उसे तुरन्त दूर करने का प्रयत्न करिये। यदि आपका धनाभाव आपको दीन बनाता है तो या तो संतोष और सादगी में सुख लीजिए अथवा किसी ऐसे क्षेत्र में उद्योग कीजिए, जिसमें धन प्राप्ति के लिए अवसर हो। यदि अज्ञान के कारण आप में हीन भावना घर किए है तो अध्ययन, मनन और सत्संग का क्रम चलाइये। ऐसा पुरुषार्थ करिये जिससे आपको ज्ञान की उपलब्धि हो। यदि आप अपने को निर्बल अनुभव करते हैं तो अपने में साहस स्वास्थ्य और विश्वास की अभिवृद्धि करिए। साहसपूर्ण साहित्य पढ़िए और साहसी वीर और धीर पुरुषों का संग करिए। तात्पर्य यह है कि जो अभाव अथवा त्रुटि आपको दीनता की ओर ढकेलती हो उसे उपायपूर्वक दूर करने में जग जाइये।

संसार में कोई जन्मजात महान अथवा शक्तिवान पैदा नहीं होता। सभी एक जैसी क्षमताओं और विशेषताओं को लेकर पैदा होते हैं। अन्तर केवल यह होता है कि जो अपनी आत्मा में निहित शक्तियों में विश्वास करके आत्म-चिंतन द्वारा उन्हें जगाते और उपयोग में लाते हैं वे आगे बढ़ जाते हैं, और जो अपने प्रति हीन भावना के शिकार बने रहते हैं, वे यथास्थान जीवन का बोझ ढोते रहते हैं। संसार में जितने भी वैज्ञानिक, तत्ववेत्ता, विचारक, विद्वान, विजयी, दर्शन-शास्त्री, कलाकार और राजनेता अथवा जन-नेता हुए हैं, उन्होंने अपनी शक्तियों में विश्वास किया, अपने अस्तित्व को पहचाना उसे विकसित किया और उसके आधार पर संसार में बड़े-बड़े काम कर दिखलाये। उन्होंने स्वयं अपना उचित मूल्याँकन किया और संसार से वही मूल्य प्राप्त कर लिया।

निश्चय ही आप ही महान हैं। आप में भी एक महापुरुष छिपा हुआ है। अपनी हीन भावना त्यागिये, अपनी पैतृक-परम्परा में विश्वास कीजिये। आत्म-चिन्तन द्वारा अपनी महानताओं विशेषताओं और क्षमताओं का द्वार खोलिये और देखिये कि आपके अन्दर सोया महापुरुष जाग पड़ा है। अपने को दीन-हीन और मलीन माने रहना अपनी हत्या करनी है।

इस पातक से बचिए और परमात्मा की दी हुई शक्तियों का आदर करिए, उन्हें उन्नति और प्रखर बनाइए, आप शीघ्र ही एक उन्नत चरित्र के असाधारण व्यक्ति बन कर समाज में अपना मूल्य और स्थान पा लेंगे। याद रखिए जो मनुष्य अपने को जैसा मानता है, वह वैसा ही बन जाता है और तब समाज उसका उसी मान-दण्ड द्वारा मूल्याँकन करता है। आप भी दूसरों की तरह संसार के महत्वपूर्ण व्यक्ति हैं, उपाय कीजिए और समाज से अपना पूरा मूल्याँकन कराने में सफल हो जाइये।


मधु का तालाब

मधुमक्खी उड़ती-उड़ती एक फूल पर जा बैठी और मकरन्द चूसने लगी। एक तितली भी वही मँडरा रही थी, उसने पूछा- “बहन, यह क्या कर रही हो, हमें भी तो बताओ?”

मधुमक्खी ने कहा- “मधु इकट्ठा कर रही हूँ और फिर अपने काम में जुट गई।’’

तितली हँस कर बोली- “बहन तुम भी कितनी नादान हो। छोटे से फूल में कहीं मधु रखा है, बेकार समय और शक्ति खराब कर रही हो? आओ हम दोनों चल कर कहीं मधु के तालाब की खोज करें।”

मधुमक्खी कुछ न बोली, चुपचाप अपने काम में लगी रही। तितली सारा वन छानती रही।

शाम को दोनों घर लौटीं तो मधुमक्खी के पास मधु का ढेर जमा था और तितली खाली हाथ लौट रही थी।


अपनों से अपनी बात- -

निरन्तर स्वस्थ और निरोग रहने के लिए हर प्रकार से साफ-सुथरा रहना बहुत आवश्यक है। गन्दगी वह चाहे बाहर की हो अथवा भीतर की आरोग्य के लिए नितान्त हानिकारक है। रोग के कीटाणु गन्दगी में ही पैदा होते, पलते और पनपते हैं। स्वच्छता एक दैव गुण है। इससे स्वास्थ्य, उत्साह, शक्ति, उल्लास और प्रसन्नता के साथ सौंदर्य और आकर्षण की उपलब्धि होती है। व्यक्तित्व उज्ज्वल और प्रभावशाली बनता है। इसके विपरीत गन्दगी, अस्वास्थ्य, मलीनता और जुगुप्सा का कारण होती है।

गन्दगी से ढके अच्छे-अच्छे व्यक्तित्व प्रभावहीन होकर निःसार बन जाते हैं। आचार्यों ने स्वच्छता को जीवन और मलीनता को मृत्यु का पर्याय बतलाया है। स्वच्छता में लक्ष्मी और मलीनता में दारिद्रय का निवास रहता है। स्वच्छता मनुष्य का प्रथम और आधारिक कर्तव्य है। जिसने पूरी तरह शुद्ध और स्वच्छ रहना सीख लिया उसने मानो एक बड़ी उपलब्धि करली।

स्वच्छता के क्रम में सबसे पहला स्थान शरीर का है। जिसका शरीर हर प्रकार से शुद्ध और साफ रहता है उसका मन प्रसन्न और आत्मा सतेज रहती है। उसकी बुद्धि प्रखर और स्मृति तीव्र हो जाती है। अच्छे धुले और चमकीले कपड़े पहने रहने से ही कोई स्वच्छ नहीं हो जाता। गन्दे शरीर पर अच्छे और साफ कपड़े भी अशोभनीय लगते हैं। कोई मलमल अथवा रेशम का साफ सुथरा कुरता या कमीज पहने हो और उसके गले में पसीने और मैल की काली काली रेखायें बनी हों, हाथ-पैरों पर मैल की पर्त जमी हों, बालों में धूल और कानों के आस-पास गर्द इकट्ठी हो तो उस पर उस सुन्दर और साफ कुरते कमीज की क्या शोभा?

दांतों में मैल जमा हो, आंखों में कीचड़ भरी हो, मुख से गन्दी हवा और शरीर से पसीने की गन्ध निकल रही हो तो ऐसे व्यक्ति को, साफ-सुथरे वस्त्र पहने होने पर भी आप-पास बिठाने में संकोच करेंगे। सुन्दर से सुन्दर वेश भूषा और व्यक्तित्व भी शारीरिक गन्दगी के कारण घृणास्पद बन जाते हैं। गन्दे आदमी को समाज में कोई पसंद नहीं करता, फिर चाहे वह विद्वान, धनवान अथवा कलाकार ही क्यों न हो? समाज में घृणा और अवमानना से बचने के लिए मनुष्य को हर प्रकार से साथ सुथरा रहना चाहिये।

शारीरिक शुद्धता एवं स्वच्छता के लिए स्नान का बहुत महत्व है। स्नान शारीरिक स्वच्छता का सबसे उपयोगी और सरल तरीका है। इसलिये मनुष्य को नित्य नियम से स्नान करते रहना चाहिए। तथापि जो स्नान विधिपूर्वक ठीक से नहीं किया जाता उससे उसका प्रयोजन सिद्ध नहीं होता। खूब मलमल कर विमल स्नान करना ही स्नान करने के उद्देश्य को पूरा करता है। यों तो अधिकाँश लोग नित्य नियम से स्नान करते हैं। यहाँ तक कि स्नान किए बिना पानी तक नहीं पीते, किन्तु क्या वे स्नान का उद्देश्य पूरा करते हैं? ऐसे लोग शीघ्रता से उल्टा-सीधा दो-चार लोटा पानी सिर पर डालकर छुट्टी पाते हैं। बहुधा देखा जाता है कि उनके कूल्हे, कमर और हाथ-पाँव के टखने और एड़ियां बिना भीगी रह जाती हैं। इस प्रकार का सूक्ष्म स्नान, स्नान का कोई प्रयोजन पूरा नहीं करता।

स्नान करने का अर्थ है शरीर का अंग-प्रत्यंग ठीक तरह से धोकर साफ करना। ऐसा विमल स्नान पानी के स्पर्श मात्र से पूरा नहीं होता। उसके लिए या तो कोई जलाशय हो अथवा किसी बड़े बर्तन में ढेर-सा पानी लेकर बैठा जाये और स्नान किया जाय। अंगों पर पानी डालकर उन्हें अलग-अलग खूब रगड़ कर साफ किया जाये। नहाते समय यदि अंग-प्रक्षालन के लिए यदि एक तौलिया भी काम में लाया जाये तो अच्छा रहेगा। हाथ से रगड़ने से शरीर का मैल उस तरह साफ न होगा, जिस तरह तौलिया की सहायता से रगड़ कर नहाने से। यदि नित्य न सही तो कम से कम सप्ताह में दो तीन बार साबुन तो लगाया ही जाना चाहिए। साबुन के स्थान पर दही, मठ्ठा और मिट्ठी का भी प्रयोग बतलाया गया है, शरीर को एक बार भिगो कर उस पर साबुन लगा कर पहले खूब मलना चाहिये। उंगलियों गाइयों, जोड़ों और पार्श्वों को साबुन के साथ रगड़ कर साफ कर लेना चाहिये और तब पानी डाल-डाल कर साबुन का झाग और उसके साथ मिला मैन धो डालना चाहिये।

इस प्रकार खूब अच्छी तरह मल-मल कर नहाने के बाद शरीर का अंग-प्रत्यंग अच्छी तरह किसी सूखे कपड़े अथवा निचोड़े हुए तौलिया से पोंछ डालना चाहिये। यह क्रम केवल गरमी या बरसात में ही नहीं जाड़ों की ऋतु में भी पूरी तरह चलाना चाहिए। इस प्रकार परिश्रम और पूर्णरूपेण किया हुआ जाड़ों का स्नान गरमी अथवा बरसात के स्नान की अपेक्षा अधिक आनन्द एवं लाभदायक होता है। स्नान के बाद गन्दे कपड़े कभी नहीं पहनना चाहिये। जहाँ तक हो सारे कपड़े दूसरे-तीसरे दिन धोते रहना चाहिए और नीचे पहने जाने वाले, बनियान और लंगोट आदि तो नित्य प्रति ही धोने चाहिए। नहाने के बाद बिना धोये अण्डरवियर तो कदापि नहीं पहनना चाहिए। इस प्रकार जब आप खूब अच्छी तरह से पूरा स्नान कर स्वच्छ कपड़े पहनेंगे तब आपको एक अपूर्व उल्लास लघुता और आनन्द की अनुभूति होगी। मन प्रसन्न और आत्मा पर पवित्रता की प्रतिक्रिया होगी।

ऋषियों ने आवश्यकता के अनुसार स्नान के छः प्रकार बतलाये हैं-

‘नित्यं नैमित्तिकं काम्यं क्रियांगं मलकर्षणम्। क्रिया, स्नानं तथा षष्ठ षोढा स्नानं प्रकीर्तितम्॥

नित्य, नैमित्तिक, काम्य किसी धर्म क्रिया का अंग स्वरूप, मैल को हटाने वाला और क्रिया स्वरूप। स्नान के यह छः प्रकार कहे गये हैं।

प्रतिदिन प्रातःकाल शौचादि के पश्चात् और भजन-पूजन से पूर्व किया जाने वाला स्नान ‘नित्य’ कहलाता है। मुर्दा, चाण्डाल, गन्दगी आदि के संसर्ग के कारण किया जाने वाला स्नान “नैमित्तिक” होता है। पुण्य आदि नक्षत्रों में कामनापूर्वक किया जाने वाला स्नान ‘काम्य’। देवोपासना या पितृ-श्राद्ध आदि के अवसर पर किया जाने वाला स्नान ‘क्रियाँग’। शरीर की स्वच्छता के लिए किया जाने वाला स्नान ‘मलकर्षण’ और किसी सरिता अथवा तीर्थ आदि में सविधि स्नान करता ‘क्रिया स्नान’ कहा जाता है।

यद्यपि इन छहों प्रकार के स्नानों में स्वास्थ्यदायक नियमों का समावेश किया गया है तथापि पाँचवाँ ‘मलाकर्षण’ स्नान ही वह स्नान है, जो शारीरिक स्वच्छता के लिए अपेक्षित है और जिसकी विधि ऊपर बताई गई है। अन्य प्रकार के स्नानों में स्वच्छता से अधिक पवित्रता का दृष्टिकोण है। साथ ही विज्ञजनों ने स्नान के पानी के विषय में भी व्यवस्था दी है। सबसे प्रथम महत्व गंगा का है, तत्पश्चात क्रम से नदी, झरना, तालाब और कुएँ के पानी से स्नान करना अधिक लाभदायक बतलाया गया है। इसी बात को चिकित्सा वैज्ञानिकों ने इस प्रकार एक वाक्य में ही कह दिया है कि बन्द अथवा ठहरे जल की अपेक्षा खुले और बहते जल में स्नान करना अधिक लाभदायक है। इसका मुख्य कारण यह है कि जो विद्युत शक्ति उन्मुक्त जल में जाग्रत रहती है, वह बन्द अथवा बँधे जल में नहीं रहती। अब इनमें से जो भी सुविधा जिसे हो उसका उपयोग करना चाहिए। किन्तु हर दशा में स्नान खूब अच्छी तरह रगड़-रगड़ कर ही करना चाहिए।

साँगोपाँग स्नान सभी अंगों का एक साथ मार्जन करने की विधि है। इसके अतिरिक्त कुछ ऐसे अंग हैं जिनकी सफाई नित्य ही पृथक रूप से करनी चाहिए। यह अंग हैं दाँत, मुँह, नाम और आँख। एक तो स्नान करते समय इनको ठीक से पृथक रूप से साफ नहीं किया जा सकता, दूसरे इनकी सफाई ऊपर से सम्भव भी नहीं।

दाँतों की सफाई के लिए केवल उंगली से रगड़ना भर ही पर्याप्त नहीं है। यद्यपि अनेक लोग मंजन और टूथपेस्ट आदि का प्रयोग किया करते हैं, तब भी दांतों की सफाई के लिए दातौन का उपयोग सबसे उत्तम है। अपने यहाँ नीम की दातौन सबसे अच्छी और उपयोगी बतलाई गई है। यह मिल भी आसानी से जाती है और इसमें कीटनाशक तत्व भी विद्यमान रहता है। दातौन को दांतों से चबाकर उसके सिरे पर ब्रुश जैसा बना लिया जाता है। इससे दांतों का व्यायाम भी होता है और उससे रगड़ कर दाँत का हर हिस्सा अच्छी प्रकार साफ किया जा सकता है। साथ ही उसका रस दाँतों और मसूड़ों में लग कर उनको कीटाणु और रोग रहित बना रहता है। नीम के अतिरिक्त अन्य प्रकार के पेड़ों के दातौन भी उपयोगी बतलाये गये हैं। विष्णु स्मृति में दातौन सम्बन्धी पूरा विधान देते हुए इस प्रकार लिखा है-

“न मधुरम् नाम्लम्, नोर्द्ध्वशुष्कं, न शुशिरम्। न प्रतिगंधि, न पिच्छिलम्, न दक्षिणाभि मुखम्। अद्यच्चोदंमुखः प्रांग्मुखोवा। वटासनार्क, खदिरकरंज वदर सर्ज्ज निम्बारि मेदापा मार्ग मलती ककुभ बिल्वा नामन्त्यतमम्। कषाय तिक्तं कटु कंच।”

दातौन, मधु, अम्ल, ऊपर से सूखी, मुरझाई दुर्गन्ध युक्त और पनीली न होनी चाहिये। दक्षिण की ओर मुँह करके दातौन न करें, उत्तर या पूर्व की ओर करें। बड़, आसान, आम (मदार), खदिर (खैर), करंज, बेर, सर्ज, नीम, अरिमेद, अपमार्ग, मालती, ककुभ और बेल के वृक्ष की दातौनों में से कोई एक करनी चाहिये। दातौन कसैली, तिक्त या कटु स्वाद वाली होनी चाहिये।”

दातौन के विषय में नारदादि ऋषियों का निर्देश है कि वह आठ अंगुल लम्बी और छिलका सहित ही लेनी चाहिये। मंजनों और टूथपेस्टों की अपेक्षा दातौन का व्यय नगण्य ही है। फिर आजकल बाजार में बिकने वाले मंजन आदिक अधिक विश्वास भी नहीं होते। जहाँ नित्य ताजा दातौन न मिल सके वहाँ दातूनों को पानी में भिगोकर रखा और काम में लाया जा सकता है।

जीभ को उंगली से तो साफ किया जी जा सकता है। साथ ही दातौन को बीच से फाड़कर उसकी जीभी भी की जा सकती है। अच्छा तो यही है कि दोनों समय के भोजन के बाद दातौन करना चाहिये नहीं तो प्रातःकाल शौच से निवृत्त होकर तो इसे नियमित रूप से करें हीं। मुँह को पूरी तरह से साफ रखने के लिए बार-बार न तो कोई चीज खानी चाहिये और जब-जब खाई जाये तो मुख को खूब धो डालना और कुल्ला कर डालना चाहिये।

नासा रंध्रों की सफाई, सिनक और पानी चढ़ा कर और उंगली डालकर खूब अच्छी तरह की जानी चाहिये। श्वास के साथ उसमें बहुत-सा गर्द गुबार जाकर जमा हो जाता है, जिससे उसमें बहुत तरह की गन्दगी जमा हो जाती है। नाक की सफाई नित्य प्रति बहुत आवश्यक है। नाक का सम्बन्ध फेफड़ों से है। यह श्वास लेने के एक मात्र साधन भी हैं। यदि इनमें गन्दगी रह गई तो वह श्वास के साथ अन्दर जाकर विविध व्याधियाँ पैदा कर सकती हैं।

शरीर में आँखों के महत्व से कौन इनकार कर सकता है? साथ ही यह सबसे कोमल अवयव होता है। इनकी सफाई भी विधिपूर्वक की जानी चाहिये। एक साधारण विधान तो कुल्ला करते और मुख धोते समय इनको हल्के-हल्के रगड़ कर साफ करने का है ही। किन्तु इतने मात्र से ही इनकी पूरी सफाई नहीं हो जाती। इनका यथाविधि प्रक्षालन किया जाना चाहिये। हाथ में लेकर बार-बार पानी के छींटे मार कर तो इनका प्रक्षालन होता ही है, किंतु यह अपर्याप्त है। किसी चौड़े वर्तन में साफ पानी भर कर उसमें आंखों को डुबाकर बार-बार खोलना, मूदना चाहिये। इस प्रकार आँखों का पर्याप्त और समुचित प्रक्षालन हो जायेगा। इस काम के लिए पानी जितना शुद्ध और स्वाभाविक रूप से शीतल होगा, उतना ही लाभ होगा।

शरीर को स्वस्थ और स्वच्छ रखने के लिये जो व्यक्ति इन कतिपय नियमों का नियमित रूप से पालन किया करता है, वह न केवल आरोग्य का सुख ही पाता है दीर्घ-जीवी भी होता है। स्वच्छता सिद्ध करने के लिए शारीरिक स्वच्छता का प्रथम क्रम है। जो मनुष्य पूरी तरह से शरीर स्वच्छ रख सकता है, वह आगे चलकर आन्तरिक स्वच्छता में भी सफल हो सकता है। शारीरिक स्वच्छता को शारीरिक का तप माना गया है। इसका भौतिक लाभ है सो तो है ही, आध्यात्मिक लाभ भी कम नहीं होता। शारीरिक स्वच्छता में प्रमाद करना पाशविक वृत्ति का परिचय देना है। इसलिए मनुष्य को न तो इसमें प्रमाद करना चाहिये और न इस ओर उदासीन ही होना चाहिये।

हम अध्यात्म को बुद्धि-संगत एवं वैज्ञानिक स्तर पर प्रतिपादित करेंगे

पिछले दिनों विज्ञान एवं बुद्धिवाद ने एक सीमा तक अच्छी प्रगति की है। इस प्रगति के कितने ही अच्छे परिणाम हुए हैं। विभिन्न प्रकार के वैज्ञानिक आविष्कारों ने मानवीय सुविधाओं और सुख साधनों को बढ़ाया है। बुद्धिवाद ने कितने के भ्रम जंजालों से छुड़ा कर वस्तुस्थिति की बहुत कुछ जानकारी कराई है और वास्तविकता-अवास्तविकता को परखने की एक उपयुक्त कसौटी दी है। भावी प्रगति की सम्भावनाओं को उससे बल ही मिला है।

किन्तु इस समुद्र मंथन में अमृत के साथ वारुणी और कालकूट भी उद्भुत हुआ है। तर्क और विज्ञान ने कुछ मान्यतायें हमें ऐसी प्रदान की है, जिन पर विश्वास करने के कारण मानवीय आदर्शवादिता को- धार्मिकता को भारी आद्यात लगा है और चिर-संचित संस्कृति के विनष्ट होने का खतरा उत्पन्न हो गया है। इस प्रकार के प्रतिपादनों में से कुछ यह है-

(1) जड़ परमाणुओं की रासायनिक क्रियाओं के कारण चेतन उत्पन्न होता है। वह बनता, बिगड़ता रहता है। मानवीय अस्तित्व भी एक संयोग मात्र है, जो बनता-बिगड़ता रहता है। उसमें कोई आत्मा नामक अलग सत्ता नहीं। शरीर के साथ-साथ ही जीवन का अन्त हो जाता है।

(2) प्रगति स्वसंचालित है। उसके सब काम अपने आप चल रहे हैं। ईश्वर जैसी किसी नियामक सत्ता का अस्तित्व नहीं। जो कुछ हो रहा है संयोग-वश हो रहा है।

(3) सामाजिक दण्ड व्यवस्था के अतिरिक्त कर्मफलों का कोई ईश्वरीय प्रतिफल- दण्ड पुरस्कार नहीं मिलता।

(4) प्रकृति की स्वाभाविक प्रेरणा का अनुसरण करना यही प्राणी का स्वाभाविक धर्म है। कर्तव्य-अकर्तव्य का निर्णय इस प्रकृति प्रेरणा के आधार पर ही करना चाहिये।

(5) प्रकृति बलवान को जीवित रखना एवं पुष्ट करना और निर्बलों को मिटाना चाहती है।

(6) काम-वृत्ति की तृप्ति आवश्यक है। इसके रोकने से मस्तिष्कीय उलझनें (कांप्लेक्स) पैदा होती हैं। मनोवैज्ञानिकों के मतानुसार बच्चों द्वारा माता का दुग्धपान भी एक प्रकार का काम-सेवन है।

(7) शारीरिक पोषण और खाद्य सुविधा के लिए माँस खाना चाहिये। किसी की पीड़ा को महत्व नहीं देना चाहिये।

इस प्रकार की मान्यतायें विज्ञान और बुद्धिवाद ने हमें दी है। चूँकि अब हर बात के लिए प्रत्यक्षवाद और तर्क कसौटी माना जाने लगा है, इसलिये उपरोक्त हर प्रकार के सिद्धान्त लोगों के मनों में गहरे बैठते चले जा रहे हैं और उन्हीं के आधार पर आन्तरिक आस्थाओं का निर्माण हो रहा है। फलतः मनुष्य नैतिक और सामाजिक दृष्टि से उच्छृंखल होता चला जा रहा है। नीति की मर्यादायें उसे अनुपयुक्त एवं अवास्तविक लगती हैं। फलतः वह प्रत्यक्ष विरोध उनका भले ही न करें, व्यवहार में उनका उल्लंघन गुप्त एवं प्रकट रीति से निरन्तर करता रहता है।

यों मनुष्य भी एक प्रकार का पशु ही है। बुद्धि बल का सहारा मिल जाने से यह पशुता और भी अधिक मुखर हो उठनी है। व्यक्ति को नैतिक एवं सामाजिक बनाये रखने के लिए उस पर भावनात्मक, आस्थापरक नियन्त्रण आवश्यक है। इसी बन्धन प्रतिबन्ध के कारण वह कर्तव्य, आदर्श, संयम, परमार्थ जैसी उन सत्प्रवृत्तियों को अपनाये रह सकता है, जिनके कारण कि मानवीय समाज की प्रगति सम्भव हो सकी है। धर्म और अध्यात्म का सारा कलेवर इसी आधार पर खड़ा किया गया है कि व्यक्ति अपने पाशविक कुसंस्कारों से छुटकारा पाकर आदर्शवाद को देवत्व अपनाने के लिए तत्पर एवं अग्रसर हो सके। उन मान्यताओं एवं आस्थाओं के निर्माण में मनीषियों का लाखों वर्षों का अध्यवसाय जुड़ा हुआ है। यदि यह दीवार ढह जाती है तो सर्वत्र उच्छृंखल और अनैतिकता का ही बोलबाला होकर रहेगा।

“जब मनुष्य पेड़-पौधों की तरह एक सामयिक उत्पादन मात्र है। शरीर के साथ ही उसका अन्त हो जाना है तो वह आदर्शवाद का मार्ग अपना कर कष्ट एवं झंझटों में क्यों पड़े? ऐश, आराम का जीवन बिताने की रीति-नीति क्यों न अपनायें?”

“जब परमात्मा का अस्तित्व ही नहीं तो बुरे कर्मों से डरने- स्वर्ग-नरक का भय करने की क्या आवश्यकता? सामाजिक दण्ड से अपने को बचाते हुए पाप करते रहने, मर्यादायें तोड़ते रहने में क्या हानि?”

“प्रकृति की स्वाभाविक प्रेरणा तो दूसरों के उपार्जित सुख-साधन छीन लेने की भी होती है। सभी जीव प्रायः ऐसा ही करते हैं। ऐसी दशा में दूसरों की कमाई या अधिकार का ध्यान रखने की अपेक्षा, जैसे भी बने वैसे अपना स्वार्थ साधन क्यों न करें?”

“जब प्रकृति बलवान को जीवित रखना और दुर्बलों को नष्ट करना चाहती है तो हम दुर्बलों को नष्ट कर अपने को परिपुष्ट बनाने का अवसर क्यों चूकें? बड़ी मछली छोटी मछली को खाने में संकोच नहीं करती तो दुर्बलों को सता कर अपना लाभ कमाने में हम संकोच क्यों करें?”

“काम वृत्ति की तृप्ति आवश्यक है और बहिन, बेटी, माता आदि के रिश्ते तक अन्य जन्तुओं में बाधक नहीं माने जाते तो मनुष्य ही इस सम्बन्ध में कोई बन्धन क्यों स्वीकार करें?”

“जब पर-पीड़ा का सिद्धान्त व्यर्थ समझ कर अन्य जीवों का प्राण स्वाद या पुष्टि के नाम पर हरण किया जा सकता है तो मनुष्यों को भी अपने स्वार्थ के लिये किसी भी सीमा तक- यहाँ तक कि प्राण हरण करने तक सताने में क्या हर्ज?”

यह उपलब्धियाँ हैं जो वर्तमान बुद्धिमान ने एवं भौतिकवाद ने हमें दी हैं। फलस्वरूप व्यक्ति और समाज में से मर्यादा, नैतिकता आदर्शवादिता एवं उत्कृष्टता का स्तर लड़खड़ाने लगा है और दीखता है कि यह क्रम जारी रहा तो एक-दो पीढ़ियों में ही मनुष्य सर्वथा अनास्थावान, अधार्मिक, पूर्ण स्वार्थी, भोगवादी और मर्यादाओं का उल्लंघन करने वाला बन जायेगा, ऐसे लोगों से भरा हुआ समाज पारस्परिक विद्वेष, असहयोग एवं संघर्ष की आग में ही जल कर नष्ट हो जायेगा।

अन्न आदि पदार्थों को दुर्भिक्ष का मुकाबला किया जा सकता है। आक्रमणकारी शत्रुओं से भी निपटा जा सकता है। महामारी, इति भीत, बाढ़, भूकम्प आदि वृष्टि, अनावृष्टि जैसे संकटों के बीच भी जिन्दा रहा जा सकता है। पर इस अनास्थापूर्ण अव्यवस्था के फलस्वरूप जो सर्वग्राही, सर्वभक्षी, सत्यानाशी विभीषिका उत्पन्न होने जा रही है उसके दुष्परिणामों से बचना- संस्कृति एवं समाज को बचा सकना कठिन है। विज्ञान द्वारा आविष्कृत अणुबम भौतिक-जगत को नष्ट करने के लिए और बुद्धिवाद द्वारा आविष्कृत अवस्था चेतन जगत की चिर-संचित सभ्यता एवं संस्कृति का सर्वनाश करने के लिए कटिबद्ध खड़े हैं।

इन विषम परिस्थितियों में समाज के मूर्धन्य मनीषियों को कुछ विशेष प्रयत्न करना होगा और इस बाढ़ को रोकने के लिए एक मजबूत बाँध-निर्माण करना होगा। अन्यथा यह बाढ़ हमारी सब कुछ जमा पूँजी बहा ले जायेगा। आस्तिकता, धार्मिकता एवं अध्यात्म की उपेक्षा ही नहीं जा रही, उसे काल्पनिक, मनगढ़ंत एवं निहित स्वार्थों की प्रतिकृति बताया जा रहा है। यदि समुचित ऐसा ही माना जाने लगा तो सदाचार एवं परमार्थ की भावनाओं को मानव-जीवन में प्रतिष्ठित रखा जा सकना असम्भव हो जायेगा और यह सुन्दर संसार मनुष्य के द्वारा ही नारकीय अग्नि में जला कर नष्ट-भ्रष्ट कर डाला जायेगा।

भौतिकवादी विचार-धाराओं में काफी आकर्षण हैं। कमजोर, कच्चे मस्तिष्कों को बहका लेने की कार्य क्षमता उसमें है। विज्ञान और बुद्धिवाद के अधूरे और एकाँगी विकास ने लोगों को भौतिकवादी बनने की प्रबल प्रेरणा दी है। साम्यवाद एक प्रकार से भौतिकवाद का ही प्रतीक है। धन के सम वितरण और सम्पत्ति पर समाज का नियन्त्रण यह दो सिद्धान्त अध्यात्मवाद और साम्यवाद दोनों में ही एक से हैं। इस अर्थ व्यवस्था को छोड़ कर साम्यवाद के अन्य सभी सिद्धांत भौतिकवाद का समर्थन करते हैं और यह विचार-धारा नगण्य से समय में- मात्र 60-70 वर्षों में इतनी तेजी से फैली है कि संसार का बहुमत आज प्रायः उसी के पक्ष में हो चला।

साम्यवादी शासन के अंतर्गत चीन, तिब्बत, कोरिया, अलवानिया, रूस, पोलैण्ड, हंगरी, चेकोस्लाविया, यूगोस्लाविया आदि देश आते हैं, उनकी आबादी लगभग डेढ़ अरब है। दुनिया की संख्या 3 अरब है। इसका अर्थ यह हुआ कि 70 वर्ष के भीतर आधी दुनिया पर उस विचार-धारा का कानूनी शासन हो गया। अन्याय देशों में भी लाखों, करोड़ों की संख्या में कम्युनिस्ट फैले हुए हैं, इस दृष्टि से संसार का बहुमत इतने थोड़े समय में अनीश्वरवादी भौतिकवादी हो गया।

यही क्रम चलता रहा तो आगामी 50 वर्ष में सारा संसार इसी विचार-धारा का अनुयायी होगा। साम्यवाद के अर्थ-सिद्धान्त से हमारा कोई विरोध नहीं, वरन् एक सीमा तक समर्थन है। किन्तु उसका भौतिक दर्जन-शास्त्र ऐसा है जो व्यक्ति एवं समाज की उत्कृष्ट मर्यादाओं को तोड़ने के लिए प्रोत्साहित करता है। साम्यवाद में तो अपना कुछ दर्शन-शास्त्र समाज के निर्माण का अपना विधान फिर भी है। जिन्हें विशुद्ध भौतिकवादी कहना चाहिये, वे तो सर्वथा आस्था रहित है।

बुद्धिवाद ने ऐसे ही अनास्थावान जन-समूह का निर्माण किया है। और वह साम्यवाद से भी अधिक तीव्र गति से बढ़ता चला जा रहा है। कहने भर के आस्तिक एवं धार्मिक बनने वाले लोगों में से भी अधिकांश भीतर ही भीतर भौतिकतावादी मान्यताओं को आचरण में उतारते हैं और अपराधी, अवांछनीय, असामाजिक एवं निकृष्ट स्वार्थों से ओत-प्रोत जीवन जीते हैं। यह स्थिति हमारे भविष्य को अन्धकारमय बनने की ही सम्भावना प्रकट करती है।

इन भयावह परिस्थितियों में मानवीय आदर्शों के प्रति श्रद्धा रखने वाले और विश्व-शांति के सपने देखने वाले आस्तिक एवं धार्मिक भावना सम्पन्न प्रबुद्ध व्यक्तियों को- मनीषियों को- कुछ विशेष उत्तरदायित्व एवं कर्तव्य अनुभव करना होगा और इस भौतिकवादी अनास्था की बाढ़ रोकने के लिए कुछ रचनात्मक योजनाबद्ध कार्यक्रम अपनाना पड़ेगा। इस दिशा में यदि उपेक्षा बरती जाती है तो उसका परिणाम मानव की भावनात्मक स्थिति को डाँवाडोल ही कर देगा। इतिहासकार इस उपेक्षा को अक्षम्य मानेंगे।

आज आवश्यकता इस बात की है कि काँटे से काँटा निकाला जाय। जिस भाषा को लोग समझने लगे हैं, उसी भाषा में उन्हें समझाया जाय, जिस स्तर की उनकी समझ है, उसी स्तर पर खड़े होकर उनके तर्कों और मान्यताओं को उल्टा किया जाय। ऐसा कर सकना पूर्णतया सम्भव है। आध्यात्मिक एवं धार्मिक सिद्धान्त कच्ची मिट्टी के बने नहीं हैं। वे बहुत ही मजबूत आधार पर खड़े हैं। बात केवल इतनी भर है कि पुराने समय के लिये शास्त्रों एवं आप्त पुरुषों को प्रमाण मान कर उस आधार से धर्म मान्यताओं का प्रतिपादन करते थे और अब तर्क, प्रमाण, उदाहरण आदि को ठीक समझा जाता है। इन कसौटियों पर भी धर्म के सिद्धान्त पूर्णतया खरे हैं पर कठिनाई यह है कि धर्म-पक्ष से इस प्रकार का, इस स्तर का बुद्धि-संगत प्रतिपादन नहीं हो रहा है, जो अनास्थावानों को प्रभावित कर सके।

पुराने ढर्रे का प्रतिपादन बुद्धिवादियों को स्वीकार नहीं। नये ढर्रे के अनुभव समझने, समझाने की क्षमता पुराने स्तर के धर्मवादियों में नहीं। फलतः खाई चौड़ी होती चली जा रही है और एक-दूसरे से दिन प्रति दिन दूर हटते चले जा रहे हैं और संकट की घटायें अधिक सघन घिरती जा रही हैं। प्रयत्न यह होना चाहिये कि धर्म, आस्तिकवाद, आदर्शवादिता, मर्यादा एवं कर्तव्यपरायणता के प्राचीन आदर्शों को- बुद्धि-संगत ढंग से विज्ञान, तर्क, आधार और प्रमाणों के अवलम्बन से इस प्रकार प्रतिपादित किया जाय कि हर बुद्धि-जीवी को उसे स्वीकार करने के लिए- सहमत होने के लिए बाध्य होना पड़े। यह कार्य कठिन अवश्य है पर असम्भव नहीं। क्योंकि सच्चाई को प्रतिपादन करना प्रत्येक आधार पर- प्रत्येक स्तर पर- सम्भव हो सकता है। यदि ऐसा सर्वांगपूर्ण प्रतिपादन बन सके तो अवास्तविकता, अधार्मिकता एवं उच्छृंखलता की बाढ़ को निश्चयपूर्वक रोका जा सकता है।

हमें यही करना होगा। इसके लिये व्यापक तैयारी में लगना होगा। समय कम है- काम हिमालय जैसा- समुद्र जैसा बड़ा है। इस कार्य को करने के लिए ऐसे व्यक्ति की आवश्यकता है, जो अध्यात्मवाद और भौतिकवाद दोनों को ठीक तरह संमिश्रण कर सके। इस दिशा में छुट-पुट प्रयत्न तो जहाँ तहाँ से हुए हैं पर समग्र और साँगोपाँग तैयारी के साथ पूरी मोर्चे बन्दी के साथ यह कार्य कहीं से भी नहीं हुआ। अब समय आ गया है कि इस अभाव की पूर्ति की जाय। हर्ष की बात है कि यह कार्य उस समर्थ सत्ता की प्रेरणा से इसी गायत्री जयंती से आरम्भ कर दिया गया है। हमारे कार्यकाल का जो थोड़ा-सा समय शेष है, उसी में इसे पूरा करना होगा, यही थोड़ी अड़चन की बात है पर उसका उपाय भी सोच किया गया है।

कार्लमार्क्स ने सारे जीवन भर शोध की और तब साम्यवाद की बाइबिल- ‘कैपीटल’ पुस्तक तैयार की। हमारे पास समय कम है तो उस अध्ययन कार्य को अपने समर्थ परिजनों से करा सकते हैं। भौतिकवाद की विचार परक एवं विज्ञानपरक लगभग 600 शाखायें हैं। इन सभी की जानकारी होने पर ही वैज्ञानिक एवं बुद्धि सम्बल अध्यात्मवाद को समग्र रूप से प्रतिपादित किया जा सकेगा। इसके लिए जितना लिखा है, उससे हजार गुना अधिक पढ़ना पड़ेगा।

इस कार्य में अखण्ड-ज्योति परिवार के ग्रेजुएट स्तर के परिजनों की सहायता अभीष्ट है। जिनके पास एक-दो घण्टे रोज का अवकाश है और उस समय को हमारी इस सहायता में लगाना चाहें वे अपने नाम नोट करादें और अपनी शिक्षा का पूरा विवरण सूचित कर दें ताकि उनके स्तर का काम उन्हें दिया जा सके।

फिलहाल दो प्रकार के काम इन सहयोगियों से कराने होंगे। (1) उनकी शिक्षा में जो अपने काम का अंश होगा- उतने को सारांश रूप में लिख भेजने को कहा जायेगा। (2) कुछ बड़े ग्रन्थ पढ़ने के लिए दिये जायेंगे और उनमें से निर्दिष्ट प्रसंग ढूंढ़ने को कहा जायेगा। इस प्रकार इस प्रसंग में अगणित आवश्यक संदर्भ इकट्ठे होते चले जायेंगे और फिर उस सामग्री में से जो अंश उपयोगी होगा, उसका कोई भाग किसी आध्यात्मिक सिद्धान्त की पुष्टि में प्रयुक्त किया जाता रहेगा। इस प्रकार सहयोगी व्यक्ति को विशाल अध्ययन एक महान कार्य में सहयोगी बनने का अवसर मिलेगा और हमें वह अध्ययन जो पूरे एक जीवन में भी सम्भव नहीं, कुछ ही वर्षों में पूरा कर लेने का अवसर मिल जायेगा। कार्य की सरलता इसी प्रकार होगी।

अंग्रेजी, संस्कृत, हिन्दी अथवा अन्यान्य भाषाओं के ग्रेजुएट स्तर के व्यक्ति ही इस कार्य में सहयोगी हो सकेंगे। स्वल्प शिक्षा वालों की सेवाओं से काम न चलेगा। अतएव जिन्हें अवकाश एवं उत्साह हो वे पत्र-व्यवहार कर लें। वैसे इन सहयोगियों को एक बार मथुरा आकर मिलना ही होगा, तभी पूरी बात समझाई जा सकेगी। ऐसे लोग भी अभी से लेकर दशहरा, दिवाली तक किन्हीं छुट्टियों में मथुरा आने की तैयारी करें तो मिलने पर उन्हें आवश्यक परामर्श दिया जा सकेगा। एक बात स्मरणीय है कि इस प्रकार के सहयोग के लिए किसी को कोई आर्थिक सहायता न दी जा सकेगी।

भौतिकवादी अनास्था से संघर्ष करने के लिए प्रौढ़ प्रखर, तर्क सम्मत, आधार, प्रमाण समेत- विज्ञान सम्मत विचार-धारा की आवश्यकता है। मानव समाज को अवाँछनीय दिशा में जाने से रोकने के लिए आज की महती एवं सर्वोपरि आवश्यकता रही है। इस अभाव की पूर्ति करके निस्सन्देह एक अति महत्व का महान कार्य सम्पादित किया जा सकेगा।


पिछले और आगामी शिविर

जून के दोनों शिविर बड़ी सफलता के साथ सम्पन्न हुए। गायत्री तपोभूमि में जितने लोगों के लिए ठहरने लायक स्थान है, उससे कहीं अधिक प्रथम शिविर में बाधक आये। दूसरे में तो वह संख्या दूनी हो गई। दो-ढाई सौ के स्थान में पाँच सौ को ठहरना पड़ा। स्वीकृति का प्रतिबंध लगाते हुए भी, स्वजनों की भावना उमड़ती चली गई और संख्या इतनी अधिक हो गई कि निवास, स्नान, प्रवचन आदि के अवसरों पर बुरी तरह ठूँस-ठाँस करके काम चलाना पड़ा। तपोभूमि के जीवनकाल में अब तक जितने शिविर हुए हैं, उनकी तुलना में यह इस वर्ष के शिविर सबसे बड़े थे।

यों गायत्री तपोभूमि में रहकर 24 हजार का छोटा अनुष्ठान कर लेना भी- अपने घर रह कर 24 लाख का बड़ा अनुष्ठान करने के समान प्रभावशाली सिद्ध होता रहा है। कारण कि इस भूमि को सिद्ध पीठ जैसी संस्कारवान बनाने के लिए प्रत्येक सम्भव प्रयत्न किया गया है। यह भूमि महर्षि अंगिरा की तपस्या-स्थली रही है। यज्ञशाला में निरन्तर प्रज्वलित रहने वाली यज्ञाग्नि का अपना महत्व है। 24 तीर्थों का जल, रज, 1125 करोड़ हस्तलिखित गायत्री मंत्र, प्रतिदिन का यज्ञ, अखण्ड जप, नवरात्रियों में 24 लक्ष से भी अधिक का सामूहिक पुरश्चरण आदि प्रक्रिया अपना महत्व रखती हैं। 108 कुण्डों के यज्ञ और 24 दिन के गंगा जल उपवास पर इस भूमि का परिष्कार किया गया था। आध्यात्मिक सफलता के लिए ऐसे ही स्थान तलाश करने पड़ते हैं। इन्हें ‘सिद्ध-पीठ’ कहते हैं। ऐसे स्थानों पर की गई उपासना निश्चित रूप से अधिक सफल एवं प्रभावी परिणाम उत्पन्न करने वाली सिद्ध होती है।

गायत्री तपोभूमि में रहकर उपासना करने का लाभ अब तक लाखों व्यक्ति उठा चुके हैं। यहाँ के वायु मंडल में वह संस्कार हैं, जिनके कारण साधक की आत्मा सहज ही खिल पड़ती है और वह आनन्द मिलता है, जो घर या अन्य स्थान पर सम्भव नहीं। यही कारण है कि जब भी अवसर मिलता है, निष्ठावान उपासक अपनी साधना करने के लिए यहाँ दौड़े आते हैं। विशेष अवसरों पर होते रहने वाले शिविरों के इसके अतिरिक्त लाभ भी हैं। इन दिनों दोनों समय डेढ़-डेढ़ घण्टे के दो प्रवचन गायत्री महाशक्ति का रहस्य, विवेचन, दर्शन, तत्वज्ञान, अभ्यास, कर्मकाण्ड, अनुभव आदि समझाने के लिए उस व्यक्ति के होते रहते हैं, जो इस मार्ग पर काफी दूरी तक सारे जीवन भर चलता रहा है और जिसने ज्ञान एवं अभ्यास की दृष्टि से कुछ कहने लायक मर्म एकत्रित किये हैं। यह प्रशिक्षण अनुपम हैं। शिविरों में आने वाले इस अलभ्य लाभ से भी लाभान्वित होते हैं। और 9 दिन में किये जाने वाले छोटे अनुष्ठान स्वर्ण सुगन्ध की तरह दुहरे आनन्द, उल्लास से भर जाते हैं।

इन विशेषताओं के कारण गायत्री जयन्ती, विजय दशमी जैसे पर्वों में आयोजित शिविरों में सदा से ही अनेकों साधक गायत्री तपोभूमि में आते रहते हैं। वे जानते हैं कि अपने कुलपति के विचारों का लाभ तो पत्रिकाओं, पुस्तकों एवं पत्रों से प्राप्त किया जा सकता है, पर प्राणों के प्रभाव का लाभ मिल सकना समीपता से ही सम्भव है। ऋषियों के आश्रमों में सिंह और गाय एक घाट पर पानी पीते और साथ-साथ रहते थे पर वहाँ से चले जाने पर उनमें वह बात नहीं रहती। कारण एक ही है कि विशिष्ट आत्माओं का प्राण प्रवाह एक सीमित क्षेम में ही काम करता है, उससे लाभ उठाने के लिए सान्निध्य की समीपता की आवश्यकता पड़ती है।

सत्संग का लाभ इसी दृष्टि से है। यों मोटे तौर पर अध्यात्म के सिद्धान्तों को हर कोई जानता है, सत्संग प्रवचनों में भी उन्हीं सिद्धान्तों की व्याख्या विवेचना होती है। किन्तु किसी प्राणवान की समीपता आशाजनक प्रभाव परिणाम उत्पन्न कर देती है, इसका कारण और कुछ नहीं, केवल इतना ही है कि जहाँ प्राण प्रवाह बहता है, वहाँ उसकी समीपता से वैसा ही लाभ होता है जैसा शीतल झरने के पास जाकर प्यास बुझाने और स्नान करके थकान उतारने का। चूँकि गायत्री तपोभूमि के शिविरों में यह लाभ चिर-काल से मिलते चले आ रहे हैं, इसलिये उसका परिचय सभी को है। अतएव साधना करने के लिए यहाँ आने के लिए जब भी अवसर मिलता है, निष्ठावान लोग यहाँ आने का अवसर निकालते रहते हैं।

इन दिनों के शिविरों में अधिक संख्या में लोग आने लगे हैं, इसका एक कारण यह भी है कि अब हमारे प्रस्थान करने में केवल तीन वर्ष का समय शेष रह गया है। स्वजनों से मिलने की अपनी भी तीव्र अभिलाषा रहती है। कोई बूढ़ा करने को होता है तो अपने कुटुम्ब, परिवार के लोगों को देखने, मिलने की उसकी कामना प्रबल हो जाती है। वैसा ही कुछ-कुछ अपना भी मन हो गया है। न जाने क्यों अपने आत्मीय परिजनों से मिलने की उनसे अपने जी की बात कहने और उनकी सुनने की अभिलाषा बनी रहती है। यह हमारी अभिलाषा भी परिजनों के पास पहुँचे बिना नहीं रहती, बेतार के तार द्वारा वह निर्दिष्ट अन्तःकरणों तक जा पहुँचती है और वहाँ हलचल मचाती है। कितने परिजन इसी खिचाव से खिंचते चले आते हैं। कितनेक स्वयं भी इतने भावुक एवं सहृदय होते हैं कि जिस व्यक्ति को अपने पिता तुल्य माना, असीम प्यार और सहयोग पाया उसके पास कुछ सम मिल बैठने से उनका भी अंतस् उमड़ता है और अन्तःकरण का उमड़ना हर कठिनाई को सरल एवं हर प्रक्रिया को सम्भव बना देता है। परिस्थितियां अनुकूल न होने पर भी लोग मथुरा आने की बात सोचते हैं और यह सोचना उसकी व्यवस्था भी बना देता है।

गायत्री परिवार बहुत बड़ा है। उसके लाखों सदस्य हैं। प्रमुख सदस्य प्रायः शिविरों में आते रहते हैं। इसलिए उनका परस्पर मिलना भी हो जाता है। अपने विशाल परिवार को देखकर किसे आनन्द, उल्लास का अनुभव न होगा? परिजनों का यह पारस्परिक स्नेह-मिलन अपने ढंग का अनोखा हर्षोल्लास है। जिसके कारण एक ही छोटी कोठरी में अपरिचित लोगों को भी ठूँस-ठूँस कर भेड़-बकरियों की तरह भर देने पर भी अगणित असुविधाओं के बीच भी- ऐसा अनुभव होता है, मानो स्वर्गीय सुख मिल रहा है। एक कुटुम्ब के- न एक भावना के- यह आदर्श के परिजन परस्पर कितने अधिक निकट सम्बन्धी हो सकते हैं और पारस्परिक मिलन का कितना अधिक आनन्द उठा सकते हैं, इसका अनुभव इन शिविरों में होता है।

गायत्री अनुष्ठान जीवन की गहन गुत्थियों को सुलझाने वाले प्रवचन, पारस्परिक मिलन ही नहीं। इन शिविरों का एक अतिरिक्त लाभ हैं- उपयुक्त प्रकाश एवं परामर्श की उपलब्धि। हर व्यक्ति के सामने कुछ समस्यायें, उलझनें, चिन्तायें एवं कठिनाइयाँ होती हैं। वह उनका हल समाधान ढूंढ़ना चाहता है। इस कार्य में उसे किसी उपयुक्त मार्गदर्शक के परामर्श और सामर्थ्यवान के सहयोग की आवश्यकता पड़ती है। यदि यह दोनों बातें मिल जायें तो तीन चौथाई कठिनाई हल हो जाती हैं। सुलझा हुआ जीवन ही शाँतिपूर्वक प्रगति के पथ पर अग्रसर हो सकता है।

इसलिये प्रस्तुत समस्याओं के सुलझाने में अभीष्ट सहायता मिल सके तो हर व्यक्ति के लिए यह एक बहुत बड़ी बात होती है। कहना न होगा कि ऐसे लाभ इन शिविरों में आने वाले हर व्यक्ति को मिलते हैं और प्रत्येक को अपना काफी भार हल्का हुआ अनुभव करने का अवसर मिलता है।

यह शिविर क्रम बहुत ही उपयोगी सिद्ध हुआ है। दो-चार दिन के सभा, सम्मेलन, व्याख्यान, प्रवचन एकाँगी सिद्ध होते हैं। कुछ लोग कहते और कुछ सुनते रहते हैं। इससे मनोरंजन मात्र होता है। मिलजुल कर पारस्परिक विचार विनियम किये बिना मनुष्यों की भिन्न मनोभूमि, स्थिति एवं उलझनों को उपयुक्त समाधान नहीं मिल सकता, इस तथ्य को अनुभव कर लेने पर बड़े सम्मेलन बुलाने की अपेक्षा तपोभूमि में चिरकाल से शिविरों की प्रक्रिया आरम्भ की गई है। थोड़े व्यक्ति आवें- 9 दिन रहें तो काम की बात बहुत हो जाती हैं। इस दृष्टि से यह शिविर बहुत ही उपयोगी, कारगर एवं सफल सिद्ध हो रहे हैं।

अब अगला शिविर आश्विन नवरात्रि में है। 23 सितम्बर से नवरात्रि आरम्भ होगी और 1 अक्टूबर को समाप्त होगी। 9 दिन, 23 सितम्बर से लेकर 1 अक्टूबर तक ही पूरे होते हैं। विजय-दशमी भी इस बार 1 अक्टूबर की है। उसी दिन पूर्णाहुति होगी। आगन्तुकों को 22 की शाम तक आ जाना चाहिये। स्वीकृति का नियम सदा की भाँति बना रहेगा। जिन्हें आना है वे अभी से स्वीकृति प्राप्त कर लें ताकि उस समय असुविधा न हो।

व्रज के तीर्थों को दर्शन करने के लिए जाने की जिनकी इच्छा हो उनके लिए सम्मिलित बस सस्ते किराये पर कर दी जाती है। भोजन में शाकाहार या दलिया खिचड़ी आदि का क्रम चलेगा, जो साधक मिलजुल कर पकाते रह सकते हैं। जून के शिविर में छोटे बच्चों वाली महिलाओं को भी आने की छूट रहती है, क्योंकि उन दिनों युग-निर्माण विद्यालय की इमारत खाली रहने से स्थान की थोड़ी सुविधा रहती है। आश्विन में विद्यालय चलता है इसलिये स्थान की कमी रहती है। सम्मिलित ठहरना पड़ता है।

इसलिये अश्विन शिविर में केवल पुरुष ही आवें। महिलायें आवें तो ऐसी आवें, जिनके पास छोटे बच्चे न हों और जिन्हें अन्य स्त्रियों के साथ सम्मिलित ठहरने में असुविधा न हो। परिवारों के लिए जिस तरह जून में अलग कमरे दिये जा सके थे, अश्विन में स्थान की कमी रहने से वैसा न किया जा सकेगा। इसलिये इस प्रकार का अनुरोध करना पड़ रहा है।

आश्विन शिविर में मथुरा आने के लिए अभी से तैयारी कीजिए और समय रहते अपने लिए स्वीकृति प्राप्त कर लीजिये।

जिन्हें जून के शिविरों में आने की स्वीकृति मिली थी किन्तु कारण-वश उनमें सम्मिलित न हो सके, वे अश्विन नवरात्रि के शिविर में आने का प्रयत्न करें। स्वीकृति दुबारा माँग लें।


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महत्तम गायत्री पुरश्चरण में हम सभी भागीदार हों :-

अखण्ड-ज्योति परिजनों द्वारा 24 लक्ष जप प्रतिदिन करने का जो महत्तम गायत्री पुरश्चरण चल रहा है, उसमें हममें से प्रत्येक को भाग लेना चाहिये। अप्रैल अंक में इस सम्बन्ध में बहुत कुछ बताया जा चुका है। उसे ध्यानपूर्वक पढ़ा जाय। और इस साधना पद्धति को अपनाने का प्रयत्न किया जाय।

यह साधना क्रम सर्व साधारण के लिए सरल है। साथ ही अति महत्वपूर्ण एवं प्रभावशाली है। इसमें सम्मिलित रहने से हम अपना भी और समस्त समाज एवं विश्व का भी कल्याण कर सकेंगे।

अब तक जिन सज्जनों ने ऋत्विज का उत्तरदायित्व ग्रहण किया है और अपने साथ अनेक साधक तत्पर किये हैं, उन सबको बधाई। साथ ही दूसरों से भी अनुरोध है कि वे भी इस महान साधना उपक्रम में भागीदार बनें।


वरदान नहीं माँगा करते

(भोलानाथ ‘बिंब’)


वरदान नहीं माँगा करते (Kavita)

जिनको विश्वास अडिग निज पर वरदान नहीं माँगा करते!

कब जाना शलभ विचारे ने जलना उसकी नादानी है। शबनम का कतरा क्या जाने, वह मोती है या पानी है॥ कंटक में कलियाँ पली चरख कर फल बनी अलि मंडराया। व क्या जाने अलि कब तक है जब तक यह खिली जवानी है॥ जो देने में ही सुख पाते, प्रतिदान नहीं माँगा करते। जिनको विश्वास अडिग निज पर वरदान नहीं माँगा करते!

जिनको सागर पर गर्व वही लहरें अपहृत हो जाती हैं। बन मेघ श्याम अम्बर के नीले आँगन में छा जाती हैं। सागर का प्रेम अगाध विकल हो आवाहन करता जाता। ये सजल घटाएं सावन बन धरती पर चू-चू जाती हैं॥ जिनको वसुधा से प्रेम स्वर्ग का दान नहीं माँगा करते। जिनको विश्वास अडिग निज पर वरदान नहीं माँगा करते!

सूरज की किरणें प्रखर सही गति देती जीवन देती है। तिमिरावृत पथ को ज्योति दान फूलों को यौवन देती है॥ पर हुई प्रशंसित सदा चाँद की असल चाँदनी स्वप्नमयी। इन सूर्य रश्मियों की सदैव शशि किरणें लाँछन देती है॥ है कर्म क्षेत्र से नेह जिन्हें सम्मान नहीं माँगा करते। जिनको विश्वास अडिग निज पर वरदान नहीं माँगा करते!

*समाप्त*