भारत में नदियों के मार्ग बदल गये, जंगलों के स्थान पर खेत बन गये, देश का स्वरूप बदल गया, शासन पद्धति बदल गई, जिस पर भी इस अस्थिर जगत में आप प्राचीन रीति-रिवाज को स्थिर करने में लगे हैं। अब जिस देश, काल और परिस्थितियों में रह रहे हैं, उनकी चिन्ता करें। यदि आप परिवर्तित परिस्थितियों में अपने आपको रहने योग्य नहीं बना लेते तो संसार से आपका नामो-निशान मिट सकता है। आप बहुत सोये हैं। अब उतना ही जागेंगे भी। अब सोने का युग बीत गया। अन्ध-विश्वास, पुराने रीति-रिवाज अब धीरे-धीरे दूर हो रहे हैं। बुद्धि और विवेक जाग रहे हैं। आलस्य उड़ता जा रहा है। आगे बढ़ने, सफलता पाने की क्रियाशीलता और चेतना के सभी ओर दर्शन होने लगे हैं।
यह आवश्यक है, बुराइयों के स्थान पर अच्छाइयों का बढ़ना मंगल भविष्य का प्रतीक है। किन्तु हम यह न भूलें कि सफलता का अर्थ केवल अर्थजन्य या बाह्य प्रगति ही नहीं है। हमारे भीतर एक दर्शन छुपा है, तत्व सन्निहित है, एक आत्मा निवास करता है वह, बहुत सूक्ष्म है, शाश्वत है इन्द्रियों से परे कल्पनातीत है, उसे साधना द्वारा जाना जा सकता है। अपने भीतर के इस तथ्य को जानने की जिज्ञासा जाग गई तो बाह्य जागृति का रंग सोने में सुहागे जैसा निखर उठेगा। परिवर्तन आत्मा की आकाँक्षा है उसे मूर्तरूप धारण करना चाहिये पर वह आत्मगत ही रहे।
-स्वामी रामतीर्थ
भगवान का भण्डार सभी सम्पदाओं, सिद्धियों तथा विभूतियों से भरा-पूरा है। ऐसा कोई भी अभाव वहाँ पर नहीं है, जिसकी त्रिकाल अथवा त्रिलोक में कल्पना की जा सकती है। ऐसे किसी भी ऐश्वर्य की कोई भी कल्पना नहीं कर सकता, जो उसके भण्डार में न हो और किसी भी विभव का वह परिमाण भी कल्पित नहीं किया जा सकता, जिसकी उस भण्डार से पूर्णतः पूर्ति न हो सके।
भगवान के इस भरपूर भण्डार के सारे सुख, सारे वैभव और ऐश्वर्य मनुष्य मात्र के लिये ही है। उस स्वयंभू एवं पूर्णकाम परमात्मा को किसी वैभव की आवश्यकता नहीं है। वे तो उसने अपनी सन्तान मनुष्य को बाँटने के लिये रख छोड़े हैं।
अब प्रश्न यह उठता है कि वह फिर उन सब सम्पदाओं को सब में बाँट क्यों नहीं देता, जिससे सबके दुःख दूर हो जायें और संसार में सर्वत्र सुख, सन्तोष तथा शाँति को को त्रिविधि समीर बहने लगे। इस प्रश्न का उत्तर यह हैं कि सभी जिज्ञासुओं को विश्व-विद्यालय स्नातक का प्रमाण-पत्र क्यों नहीं दे देता? क्यों हर सुवर्ण धातु को कुन्दन का महत्व नहीं मिल जाता, और क्यों नहीं हर सर्वसाधारण को महात्मा अथवा महापुरुष मान कर पूजा जाता है?
उत्तर अथवा कारण स्पष्ट है। जिसने क्रम-क्रम से अध्ययन द्वारा बी. ए. तक की परीक्षायें उत्तीर्ण नहीं की हैं, उसको स्नातक की उपाधि नहीं दी जा सकती। जिसने आग में तप कर अपनी सच्चाई तथा शुद्धता का प्रमाण नहीं दिया है वह सुवर्ण धातु कुन्दन के मूल्य की अधिकारिणी नहीं हो सकती और जिसने तप, त्यागमय जीवन अपना कर जन-सेवा एवं आत्मा के साक्षात्कार का प्रयास नहीं किया है, वह महात्मा अथवा महापुरुष किस आधार पर माना और पूजा जा सकता है? यही बात भगवान के भण्डार में रक्खे पुरस्कारों के विषय में भी है। जिसने उनके लिये अपनी पात्रता सिद्ध की वह उनका अधिकारी बना और इसी आधार पर आगे भी बनता रहेगा। और जो पात्रता सिद्ध नहीं कर पाया अथवा नहीं कर पा रहा है, वह वंचित ही रहा और आगे भी रहेगा। इस निष्पक्ष न्याय में किसी को शिकायत करने का मौका ही नहीं है।
अपनी पात्रता प्रमाणित करने के लिये हर व्यक्ति को कठिनाइयों तथा असुविधाओं की अग्नि परीक्षा देनी होती है, तप-त्यागमय पथ पर चल कर अपनी पारमार्थिक दृढ़ता का परिचय देना होता है। जो विवेकी पुरुष अभावों एवं आवश्यकताओं के दबाव में भी नीति का मार्ग नहीं छोड़ता, प्रलोभनों के बीच भी स्खलित नहीं होता, किसी भय, शंका अथवा अन्य कारणों से सन्मार्ग का त्याग नहीं करता, वस्तुतः वह ही नर-रत्न होता है, जो ईश्वरीय भण्डार की विभूतियों से विभूषित किया जाता है। जो लोभी, स्वार्थी, असंयमी अथवा इन्द्रिय लोलुप है, वह ईश्वरीय प्रसादों का उसी प्रकार अनाधिकारी है, जिस प्रकार कौआ यज्ञ भाग का।
ईश्वरीय पुरस्कारों की पात्रता श्रेष्ठता में निहित रहती हैं पुण्य परमार्थ, धार्मिकता एवं आस्तिकता के श्रेय-पथ पर चल कर यह श्रेष्ठता सहज ही प्राप्त की जा सकती है। जिस दिन मनुष्य का व्यक्तिगत स्वार्थ समष्टिगत स्वार्थ में मिल जायेगा, उसकी निजी सीमायें बढ़ कर समाज तथा संसार तक पहुँच जायेगी, उस दिन से वह श्रेष्ठता की परिधि में प्रवेश करने लगेगा। मनुष्य की भावना उस दिन इस प्रकार की बन जायेगी कि संसार में जो कुछ सुख, सुविधायें दिखलाई देती हैं, उनका निर्माण सबके सहयोग से ही सम्भव हो सका है।
हमारे पास जो कुछ इस समय वर्तमान है, जिन सुखसुविधाओं का हम उपभोग कर रहे हैं, वह अकेले हमारे एक के ही पुरुषार्थ का फल नहीं है। इसमें इसी समाज यहाँ तक सम्पूर्ण संसार का किसी-न-किसी रूप में सहयोग सम्मिलित है। अतः इसमें सभी का कुछ-न-कुछ भाग शामिल है। और हमें उनके उचित भाग का अपनी स्वार्थ सीमा से त्याग कर ही देना चाहिये। यहाँ तक कि हमारा यह शरीर, यह जीवन भी केवल एक हमारा ही नहीं है। इसके निर्माण तथा पालन पोषण उन्नत एवं विकसित होने में भी दूसरों का सहयोग सम्मिलित है। इसलिये सेवा द्वारा दूसरों का उपकार शोधन करते रहना हमारा महान् मानवीय कर्तव्य है, जिसे हमें निभाते ही चलना चाहिये, उसी दिन मनुष्य का विकास श्रेष्ठता में प्रारम्भ होने लगेगा।
जो संकीर्ण व्यक्ति स्वार्थवश दिन-रात अपनी व्यक्तिगत कामना वासनाओं की पूर्ति में लगे रहते हैं और उस प्रमोद में दूसरों के हितों, स्वार्थों, अधिकारों तथा सीमाओं की उपेक्षा करते रहते हैं, उनका श्रेष्ठ बनता तो दूर उल्टे वे उस स्थान से भी नीचे गिर जाते हैं, जहाँ पर वे खड़े होते हैं। व्यक्तिगत कामनाओं की लिप्सा मनुष्य के जीवन क्रम तथा चेष्टाओं में असंतुलन पैदा कर देती है। मनुष्य इतना अभिमानी बन जाता है कि वह किन्हीं भी उपायों से अपनी कामना पूर्ति को अधिकार समझने लगता है। और जब कोई व्यवधान, फिर चाहे वह स्वाभाविक अथवा उचित ही क्यों न हो, आता है तो वह अपने मस्तिष्क का संतुलन खो क्रोध से उन्मत्त होकर करने न करने योग्य काम करने पर उतर आता है। क्रोध से बुद्धि भ्रमित हो जाती है, विवेक नष्ट हो जाता है, तब ऐसी दशा में उससे यह आशा नहीं की जा सकती कि वह ऐसे काम न करेगा, जो समाज के लिये अहित कर सिद्ध हों। ऐसा स्वार्थी, अविवेकी अथवा उन्मत्त बुद्धि व्यक्ति जन्म जन्मान्तर न श्रेष्ठ बन सकता है और न भगवान के भण्डार में भरी विभूतियों का अधिकारी ही। उसे तो यों ही संसार में अभाव, असन्तोष तथा अशांति की दैन्यपूर्ण स्थिति में जलते-मरते जीवन के दिन पूरे करने होंगे।
स्वार्थपूर्ण कामनाओं के दास अपने मानवीय उत्तरदायित्वों पर जरा भी ध्यान नहीं देते और इन्द्रियों की वासना वृद्धि को ही जीवन का ध्येय बना लेते हैं। वे समाज, व्यक्तिगत स्वास्थ्य तथा प्रकृति की मर्यादाओं का विचार नहीं रखते। अन्त में उनकी मदान्धता विविध रूपों में आकर उन्हें घेरने, सताने लगती है। आन्तरिक अशांति, क्लेश, कुण्ठा तथा अनेकों बीमारियों, विकार एवं निर्बलतायें, जो उसके दुःख शोकों का कारण बनती हैं, सब वासना-मूलक मदान्धता का ही तो परिपाक हुआ करती है। इतने दैन्य एवं दीनता से घिरा मनुष्य उन ईश्वरीय उपहारों का अधिकारी किस प्रकार बन सकता है, जिसके अधिकारी तपो-व्रतधारी शुद्ध-बुद्ध तथा आत्म-निष्ठ श्रेष्ठ पुरुष ही हो सकते हैं?
अपने महान् भण्डार के रत्न गढ़ने में परमेश्वर पक्षपाती अथवा अन्यायी नहीं है, तथापि वह इतना अज्ञानी अथवा अबोध भी नहीं है, जो ऐसे मनुष्यों के बहकावे में आ जायें जो कभी कभी पूजा-पाठ, जप-तप तो करते हैं किन्तु तो अपनी आत्मा में श्रेष्ठता का विकास करते हैं और न ऐसे परोपकारपूर्ण कार्य ही करते हैं, जिनके पुण्य प्रकाश से उनका दूषित अन्तःकरण शुद्ध हो सके। संसार में ऐसे धूर्तों की भी कमी नहीं है, जो ऊँची सिद्धियों, ईश्वरीय भण्डार में सुरक्षित चिरन्तन सुख-शांति के उपहारों को प्राप्त करने के लिये घन्टों पूजा पाठ करते रहते हैं। किन्तु जब वर्षों तक यह कार्यक्रम चलाते रहने पर भी उनकी अशांत स्थिति में कोई अन्तर नहीं आता तब वे उस सबको जंजाल व्यर्थ का टंट-घंट बता कर छोड़ देते हैं और या तो ईश्वर की कृपा में अविश्वास करने लगते हैं अथवा नास्तिक होने तक पर उतारू हो जाते हैं। किन्तु यदि उनसे यह पूछा जाये कि आपने इस सबके साथ कोई पारमार्थिक कार्यक्रम भी चलाया है, जनसेवा की कभी व्रत लेकर उसे पूरा करने की चेष्टा की है, क्या कभी ईर्ष्या, द्वेष, क्रोध, लोभ आदि के विकारों से आत्मा को मुक्त करने का पुरुषार्थ किया है, तो इसका उत्तर मौन में देंगे। तब ऐसी स्थिति में यह आशा रखना कि वह महान् न्यायी ईश्वर उनके निःसार टंट-घंट से प्रसन्न होकर भण्डार का द्वार उनके लिये खोल देगा, दुराशा के अतिरिक्त और क्या हो सकती है। झूठे धार्मिक आधारों पर ईश्वर को छल सकने का दम्भ एक विडम्बना है, आत्म-प्रवंचना है।
श्रेष्ठता की परीक्षा इसी कसौटी पर होती है कि मनुष्य ने कितना स्वार्थ त्यागा है, और कितना परमार्थ अपनाया है। भजन-पूजन आदि यदि सच्चा हो तो निश्चय ही उसका प्रतिफल आंतरिक सुख-शांति के रूप में मिलना ही चाहिये। तृष्णा एवं वासनाओं से प्रेरित उपासना कोई वाँछित फलदायिनी नहीं होती। जैसे-जैसे मनुष्य स्वार्थ छोड़ता और परमार्थ अपनाता चलता है, वैसे-वैसे उसका मानसिक स्तर ऊँचा होता जाता है और उसमें सेवा तथा संयम के सक्रिय संकल्प बलवत्तर होने लगते हैं। उसकी वृत्ति संचय से विमुख होकर त्याग की ओर उन्मुख हो उठती है और यह सोचने के स्थान पर कि हमारी वासनायें कैसे पूरी हों यह सोचने लगता है कि वह कौन-सा कार्यक्रम तथा विचार-धारा अपनाई जाये, जिससे व्यक्तिगत इच्छायें, सार्वजनिक आवश्यकताओं में तिरोहित हो जावें। ऐसी स्थिति में आकर मनुष्य की आत्मा प्रकाशित हो उठती है और वह मनुष्यता से देवत्व की ओर उठकर, ईश्वरीय भण्डार में से मनोवाँछित उपहारों का अधिकारी बन जाता है।
दूसरों के हित में अपना हित, दूसरों के लाभ में अपना लाभ और दूसरों के कल्याण में अपना कल्याण समझने वाले, सबसे प्रेम और अनुराग रखने वाले, सर्वात्मा में रमण करने वाले, दूसरों का दुःख सुख अपना समझने वाले और जनता जनार्दन के लिये सब कुछ उत्सर्ग कर देने का उत्साह रखने वाले मनुष्य ही महापुरुष, महात्मा एवं महानुभावों की श्रेणी में आकर उस श्रेष्ठता को सिद्ध कर लेते हैं, जिससे अनन्त आन्तरिक शाँति, संतोष तथा सुख के रूप में ईश्वरीय अनुग्रह के अधिकारी बनते हैं।
श्रेष्ठता का क्रम अपनी आत्मा से प्रारम्भ होकर पत्नी, बच्चों, परिवार, सम्बन्धी, पड़ौसी, देश, जाति की सेवा में होता हुआ अन्त में विराट् विश्व अथवा विश्वात्मा की अनन्तता में तल्लीन हो जाता है। जिसमें ऐसा विराट्, ऐसा उन्नत, ऐसा श्रेष्ठ बनने का साहस हो, निकृष्ट स्वार्थ को जीत कर परमार्थ में सर्वस्व अर्पण कर देने की क्षमता हो वह तो उस महान परम तथा निर्द्वन्द्व भण्डारी, भगवान् के कोष में सुरक्षित अक्षय शाँति, अनन्त सन्तोष और अप्रतिहत आनन्द के रत्न पाने की कामना करे अन्यथा अपने अनौचित्यों तथा स्वार्थपूर्ण वासनाओं का दंड भोगता हुआ असन्तोष, अशांति एवं दुःख दर्दों के नरक में चुपचाप पड़ा रहे।
“इतने हमारे, बाकी हमारे नहीं” जब वह अलगावन वाली बात आ जाती है तब धर्म-अधर्म बन जाता है।
बिनोवा ने एक दफा बड़े मजे की बात कही थी। किसी ने उनसे पूछा- ‘‘आप महाराष्ट्रीय ब्राह्मण हैं? कोकणस्थ हैं या देशस्थ?” उन्होंने कहा- ‘‘मैं देश में रहता हूँ इसलिए देशस्थ हूँ। काया में रहा हूँ इसीलिये कायस्थ हूं और सबसे आखिर में मैं ‘स्वस्थ’ हूँ, तो सब कुछ हूँ। ऐसा ही आप मुझसे क्यों पूछते? मैं हिन्दू हूँ? इसलिए मुसलमान ऐसा नहीं है। मैं हिन्दुस्तान में रहता हूँ इसलिए तुर्किस्तान मैं नहीं हूँ, ऐसा नहीं है। हरिजन आश्रम में हूँ, इसलिए अहमदाबाद व गुजरात में नहीं हूँ, ऐसा नहीं है।”
धर्म में व्यापक वृत्ति होती है, धर्म आप सम्प्रदाय संकीर्ण होता है। हम कह चुके हैं विचार जब मिट जाता है, तो उसका सम्प्रदाय बन जाता है। धर्म में संकीर्णता सम्प्रदायों में संघर्ष होता है, धर्म संघर्ष के लिए नहीं है। मनुष्य से मनुष्य को मिलाने के लिए है
पूछा जायेगा कि अधर्म क्यों, धर्म के रूप में आता है? बात साफ है, आयेगा तो भगवान के नाम से ही आयेगा। शैतान का अपना स्वरूप इतना भद्दा है कि वह भगवान का ही नाम-रूप लेगा। इसलिए दुनिया धर्म है। जिनके कारण विरोध होता है, सत्य नहीं होता है, वे सब अधर्म है।
यदि गहराई के साथ तथ्य तक पहुँचने का प्रयत्न किया जाये तो पता चलेगा कि आनन्द का मूल-स्त्रोत प्रेम ही है। जहाँ प्रेम नहीं, वहाँ आनन्द का होना सम्भव नहीं, और जहाँ आनन्द होगा उसके मूल में प्रेम का होना अनिवार्य है।
संसार की कोई भी वस्तु या कोई भी व्यक्ति ले लिया जाये, यदि उसमें किसी के सुख की अनुभूति होती है तो निश्चय ही उस वस्तु या व्यक्ति में उस मनुष्य का प्रेम होगा। माता-पिता अपने बच्चे को देख कर आनन्द पाते हैं। यह आनन्द न तो बच्चे में निवास करता है और न माता-पिता की आँखों में। इसका निवास उनके उस प्रेम में होता है, जो बच्चे को देख कर उद्दीप्त हो उठता है।
धन देख कर लोभी व्यक्ति को बड़ा आनन्द मिलता है। इससे यह समझ लेना भूल होगी कि आनन्द का निवास धन में है। यदि ऐसा होता तो धन सबके लिये ही आनन्द का कारण होना चाहिये था। जब कि ऐसा होता कभी नहीं। एक निस्पृह व्यक्ति को न तो धन का भाव आनन्द देता है और न अभाव दुःख। धन को देख कर लोभी को आनन्द होने का कारण यही होता है कि उससे उसे प्रेम होता है। यह धन के प्रति प्रेम का ही तो कारण है कि धन पाकर लोभी को उतना ही आनन्द होता है, जितना दुःख उसके चले जाने पर होता है। इसी प्रकार कोई भी व्यक्ति अथवा वस्तु क्यों न हो, यदि उसके भावाभाव में सुख-दुख होता है तो यही मानना पड़ेगा कि मनुष्य को उसके प्रति प्रेम है।
दो मित्रो को ले लीजिये। उन्हें एक दूसरे को देख कर, मिल कर और परस्पर संपर्क में आकर बड़ा आनन्द आता है। इसका एक मात्र कारण वह प्रेम ही होता है, जो एक दूसरे के लिये उनके हृदयों में रहा करता है। इसी प्रकार जब किन्हीं स्वार्थों अथवा भ्रमों के कारण एक-दूसरे के प्रति वह प्रेम-भाव नष्ट हो जाता है, तब यद्यपि व्यक्ति वही दोनों बने रहते हैं किन्तु आनन्द की वह अनुभूति नहीं रहती, जो एक दूसरे को देख कर होती थी। आनन्द का निवास वस्तु या व्यक्ति में नहीं होता है। उसका निवास उस प्रेम में ही होता है, जो व्यक्ति या वस्तु के प्रति रहा करता है।
उदाहरण के लिए एक कवि, कलाकार अथवा भावुक व्यक्ति को ले लिया जाये और साथ ही एक सामान्य व्यक्ति को। दोनों तरह के व्यक्तियों के प्रथम वर्ग का कोई व्यक्ति जब प्रकृति के संपर्क में आता है तो आनन्द विभोर हो उठता है। उसे फूलों का सौंदर्य, पक्षियों का कलरव, नदियों का कल-कल, बादलों का उमड़ना, तारों का चमकना और चाँद का निकलना आदि आत्म-विस्मृत कर देते हैं, जब कि दूसरे सामान्य व्यक्ति को उनसे कोई भी आनन्द और सुख नहीं मिलता। इसका एक ही कारण है और वह यह कि कवि, कलाकार और भावुक व्यक्ति को प्रकृति से प्रेम होता है और दूसरे सामान्य व्यक्ति को नहीं।
इसी प्रकार एक व्यक्ति ईश्वर का गुण-गान सुन कर भाव-विभोर हो जाता है, तन, मन की सुख भूल जाता है, उसका हृदय गद्-गद् हो उठता है, शरीर पुलक उठता है और आँखों से आनन्द के आँसू बहने लगते हैं। पर दूसरा व्यक्ति कितनी ही कथायें सुने, कितना ही भजन कीर्तन में भाग ले, कितना ही ईश्वर का गुण गाये अथवा सुने किन्तु उसकी स्थिति यथावत बनी रहती है। उसे कोई विशेष आनन्द की उपलब्धि नहीं होती। इसका कारण यही होता है कि एक को ईश्वर से प्रेम होता है और दूसरे को नहीं। आनन्द का निवास न तो कथा-कहानी में है और न भजन कीर्तन में। उसका निवास तो उस प्रेम में होता है जो किसी को ईश्वर के प्रति होता है।
जिस प्रकार अन्धकार का अपना अस्तित्व कुछ नहीं होता, उसी प्रकार दुःख का भी अपना अस्तित्व कुछ नहीं होता। प्रकाश का अभाव ही अन्धकार होता है और प्रेम का अभाव ही दुःख है। दुःखों का जन्म मनोविकारों और वासनाओं से होता है। लोभ, मोह, ईर्ष्या, द्वेष आदि के निकृष्ट मनोभाव अथवा मनोविकार ही दुःख का हेतु बनते हैं। और वासनाओं आत्मा का सौंदर्य शोषण कर उसे दुःखों से भर देती है। मानव हृदय में इन मनोविकारों का अस्तित्व तभी तक रहता है, जब तक उसमें सच्चे प्रेम का प्रकाश नहीं फैलता।
हृदय में प्रेम का प्रकाश फैलते ही मनोविकार वैसे ही दूर हो जाते हैं जैसे दीपक के जल उठने से कक्ष का तिमिर नष्ट हो जाता है। प्रेम का स्वाद, रस और अनुभव मिलते ही मनुष्य का हृदय अलौकिक सौंदर्य से भर उठता है, उसकी आत्मा तृप्त हो जाती है, तब उसे न कोई वासनाएँ रहती हैं और न कामनाएँ। ऐसे निर्मुक्त हृदय में विकारों के रहने की सम्भावना नहीं रहती। मनुष्य निर्विकार एवं निष्कंठ होकर आनन्द से भर उठता है।
प्रेम में मनुष्य का जीवन बदल देने की शक्ति होती है। प्रेम के प्रसाद से मनुष्य की निर्बलता और दरिद्रता, शक्तिमत्ता और सम्पन्नता में बदल जाती है। अशांति और असंतोष तो प्रेमी-हृदय के पास फटकने तक नहीं पाते। प्रेम मनुष्य जीवन का सर्वश्रेष्ठ वरदान माना गया है। जिसने प्रेम पा लिया अर्थात् जिसके हृदय में प्रेम का जागरण हो गया, उसे समझो संसार की सारी सम्पदाएँ प्राप्त हो गईं। प्रेम पा जाने के बाद कुछ पाना शेष नहीं रह जाता। प्रेम की प्राप्ति ईश्वर की प्राप्ति मानी गई है, क्योंकि मनीषियों और महात्माओं ने प्रेम को परमेश्वर और परमेश्वर को प्रेम रूप ही माना है। हृदय में प्रेम-भावना की स्थापना होते ही उसका प्रभाव शरीर, आत्मा पर भी पड़ता है। प्रेम की अनुभूति अमृत रूप जो होती है। इसका संचार होते ही मन प्रसन्न, शरीर स्वस्थ और आत्मा उज्ज्वल हो उठती है।
मानवीय शक्तियों में प्रेम को सबसे बड़ी शक्ति माना गया है। हिंस्र जन्तुओं और अपराधी व्यक्तियों से भरे वनों में ऋषि-मुनियों के पास रक्षा के साधनों में न तो अस्त्र-शस्त्र होते थे और न सेना की शक्ति। उनके पास तो एक प्रेम की ही वह शक्ति रहती थी, जो सारी शक्तियों की सिरमौर मानी गई है। इसी शक्ति और बल के आधार पर वे शेर, चीते, भालू, भेड़िये और सर्प जैसे घातक जीवों को नम्र बना लेते थे और चोर, लुटेरों को श्रद्धा के लिये विवेक कर देते थे।
प्रेम में महानतम वशीकरण बल होता है। इससे शत्रु मित्र, घातक पालक बन जाते हैं। प्रेम द्वारा मनुष्य सारा संसार वश में कर सकता है। भक्त के वश में भगवान के रहने की जो बात कही जाती है, उसका आधार प्रेम ही तो है। प्रेम के बल पर ही उपासक पत्थर में भगवान के दर्शन कर लेता है। पीड़ित जनता प्रेम-पुकार द्वारा ही तो उसे धरती पर उतार लाती है। प्रेम की शक्ति अपार है, उसकी महिमा अकथनीय है।
प्रेम-भाव की प्राप्ति न पुस्तकों से होती है और न उपदेशों से। उसकी प्राप्ति धन तथा सम्पत्ति से भी नहीं होती और न मान और पद प्रतिष्ठा ही उसको सम्भव बना सकती है। शक्ति और सत्ता द्वारा भी प्रेम-भाव की सिद्धि नहीं हो सकती। जबकि लोग प्रायः इन्हीं साधनों द्वारा ही प्रेम-भाव को पाने का प्रयत्न किया करते हैं। पुस्तकें पढ़ कर लेखक के प्रति, उपदेश सुन कर वक्ता के प्रति, कुछ पाने की आशा में धनी के प्रति, शक्ति और वैभव देख कर सत्ताधारी के प्रति जो आकर्षण अनुभव होता है, उसका कारण प्रेम नहीं होता है। उसका कारण होता है, प्रभाव, लोभ और भय। वास्तविक प्रेम-भाव वहीं सम्भव है, जहाँ न कोई प्रभाव होगा, न स्वार्थ अथवा आशंका।
ऐसा वास्तविक और निर्विकार प्रेम-भाव केवल सेवा द्वारा ही पाया जा सकता है। सेवा और प्रेम वस्तुतः दो भिन्न-भिन्न वस्तुएं नहीं हैं। यह एक भाव के ही दो पक्ष हैं। जहाँ प्रेम होगा वहाँ सेवा-भाव होगा और जहाँ सेवा भाव होगा वहाँ प्रेम-भाव का होना अनिवार्य है। जिसके प्रति मनुष्य के हृदय में प्रेम-भाव नहीं होगा, उसके प्रति सेवा भाव का भी जागरण नहीं हो सकता। और जो सेवा-भाव सेव्य के प्रति प्रेम-भाव नहीं जगाता वह सेवा नहीं, स्वार्थपरक चाकरी का ही एक रूप होगा। जिसकी सेवा करने, मैं सुख शांति और गौरव का अनुभव हो समझ लेना चाहिये कि उस सेव्य के प्रति हृदय में प्रेम-भाव अवश्य नहीं है।
सच्चा सेवा-भाव की सेवा और में ही प्रतिबिम्बित होता है। जितनी अधिक और निस्वार्थ सेवा एक माता बच्चे की करती है, उतनी सेवा एक प्रेमी अपने प्रीति-भाजन और एक भक्त अपने भगवान की कर सकता है। जिस सेवा में भक्त और माता जैसा निःस्वार्थ-भाव नहीं होता वह आध्यात्मिक सेवा नहीं होती, जिसके द्वारा आनंद के मूल-स्त्रोत सच्चे प्रेम की प्राप्ति की आशा की जाती है। ऐसी निःस्वार्थ एवं अहेतुक सेवा सिवाय दीनों, गरीबों और दुखियों के सिवा किसी की भी नहीं की जा सकती। ऐसे पात्रों से कुछ पाने की आशा तो की ही नहीं जा सकती, अस्तु इनकी सेवा निःस्वार्थ सेवा ही हो सकती है। निःस्वार्थ सेवा ही सच्ची सेवा है, बाकी सारी सेवाएँ धन, सत्ता और स्वार्थ की दासता मात्र ही होती है। ऐसी सेवा में न तो प्रेम होता है, न सन्तोष, न आनन्द और न गौरव। सेवा द्वारा यदि आनंददायक प्रेम की अपेक्षा है तो मातृभाव से संसार के दीन-दुःखी और गरीब आदमियों की सेवा करना उचित है। वैसे जिसने अपनी मनोभूमि को इतना उन्नत बना लिया है कि उसमें किसी प्रकार का स्वार्थ घर न करने पावे तब तो संसार में किसी की भी सेवा से मनोवांछित प्रेम की प्राप्ति की जा सकती है।
आनन्द का मूल-स्त्रोत प्रेम है और सच्चा-प्रेम निःस्वार्थ भाव से ऐसों की सेवा करने से ही प्राप्त हो सकता है, जिनसे किसी प्रतिकार और प्रतिदान की आशा न की जा सके। यदि जीवन में सुख-सन्तोष और शाँति की आवश्यकता हो तो जन-सेवा के मार्ग से प्रेम प्राप्त कर उसकी पूर्ति सफलतापूर्वक की जा सकती है।
राजगढ़ की खबर है। पाँच ग्रामीण स्त्रियां घास काट रही थीं। बरसात के दिन थे। बड़ी-बड़ी घास खड़ी थी। पता चला नहीं। एकाएक एक स्त्री के हाथ में घास के साथ साँप आ गया संयोग था कि वह बिल्कुल फन के पास पकड़ में आया, इसलिए काट तो नहीं सकता था, पर उसकी भयंकरता देखते ही स्त्री बुरी तरह चिल्लाई। पास में घास काट रही स्त्रियों में से एक दौड़ी। पास पहुँची ही थी कि साँप ने पूँछ की तरफ से उसे भी पकड़ लिया उसके पाँव में कुण्डली मार ली।
बाकी सब यह दृश्य देखते ही भाग गईं। उनमें से मंगो शेष रही। उसने कहा- ‘‘बहन, घबराने से काम न चलेगा, तुम साहस करो और इसे मजबूती से पकड़े रहो मैं हैंसिये के वार से उसे काटे डालती हूँ।’’ वह स्त्री बुरी तरह डरी हुई थी, उसने कहा- ‘‘बहन, अगर मेरे हाथ से साँप छूटा तो खाये बिना न मानेगा।” अब क्या किया जाय, उसने सोचा साँप पूँछ से तो काटेगा नहीं इसलिए शक्ति लगा कर दूसरी स्त्री के पाँव से उसकी कुण्डली छुड़ाई पर अब उसने मंगो के पाँव में ही कुण्डली मार ली। दूसरी का छूटना था कि वह भी भाग ली। अब दो ही बचीं और साँप बुरी तरह फुसकार रहा था।
मंगो न कहा- ‘‘घबरा मत बहन अभी मैं हूँ। साँप को काटने न दूँगी।” उसने उस स्त्री के हाथ से थोड़ा ऊपर अपना हाथ बढ़ाकर साँप का फन अपने हाथ में पकड़ लिया। अब साँप के क्रोध का ठिकाना न था। पहली स्त्री किसी तरह तो बजाय इसके कि उसे बचाती खुद भी वहाँ से भाग गई। बेचारी मंगो अकेली रह गई। अब साँप को कैसे मारा जाय, यह प्रश्न और भी गम्भीर हो गया।
मंगो ने साहस से काम लिया। पास ही नदी थी उसमें पत्थर पड़े थे। मंगो वहीं पहुँची और अन्त में पत्थर से रगड़-रगड़ कर साँप की दम निकाल दी। अब तक आठ-दस ग्रामीण वहाँ पहुँच चुके थे। मंगो के इस साहसपूर्ण करतब को देख कर उनके मुख से “धन्य-धन्य” ही निकला। बाद में तत्कालीन रायसाहब लीलाधर ने महाराज वीरेन्द्र सिंह जी से इस वीरता के लिए मंगो को 101) रुपये का पुरस्कार दिलाया।
तन, मन और धन लौकिक जीवन की तीन विभूतियाँ मानी गई हैं। संसार के सुखों का आधार भी इन्हीं को कहा गया है। और शरीर स्वस्थ रहे, मन प्रसन्न रहे और अभाव का आक्रमण न हो तो फिर मनुष्य का सुखी रहना असम्भाव्य नहीं है। यद्यपि इनके संयोग से मिलने वाला सुख चिरस्थायी नहीं होता, तथापि जीवन में उसका भी एक महत्व और स्थान है। उसे हेय और नगण्य नहीं कहा जा सकता है।
लौकिक सुख हेय और नगण्य तब ही माना जाता है, जब इसकी अधिक लिप्सा मनुष्य के आत्मिक सुख में बाधा डालती है। वैसे सुखपूर्वक जीवन-यापन करना बुरा नहीं। संसार में जीव आया ही है सुख की खोज करने और उसको प्राप्त करने। किन्तु वह सुख मात्र साँसारिक नहीं है। वह शाश्वत सुख है जो आत्मा परमात्मा के साक्षात्कार से प्राप्त होता है। मनुष्य को लौकिक सुखों तक ही सीमित न रह जाना चाहिये। उसे चाहिये कि वह उनसे ऊपर उठ कर अलौकिक और आत्मिक सुख पाने का प्रयत्न करना चाहिये। हाँ, लौकिक सुख-सुविधा को वह उस उद्देश्य के लिए सोपान बना सकता है।
जो मनुष्य सुख से सर्वथा वंचित है, हर समय दुःखों क्लेशों और शोक-संतापों से घिरा रहता है, वह आत्मिक प्रगति कदाचित ही कर पाता है। कातर और दुःखी व्यक्ति साधारण प्रगति तक नहीं कर पाता, तब आत्मिक उन्नति तो और भी कठिन है। आत्मिक प्रगति के लिए जिस अखण्ड साधना की आवश्यकता है वह दुःखी अवस्था में नहीं की जा सकती। साँसारिक समस्याओं के समाधान के साथ ही आत्मिक साधना सम्भव है। समस्याओं के रहते और उनकी हठपूर्वक उपेक्षा करने से जो परिस्थितियाँ उत्पन्न होंगी, वे आत्मिक साधना में अवश्य अवरोध बन कर खड़ी होगी। साँसारिक समस्याओं की भी अपनी एक सत्ता होती है। जिसकी अवज्ञा कर सकना असम्भव नहीं तो सरल भी नहीं है।
संसार में समस्याओं की कमी नहीं। किसी के सम्मुख शारीरिक समस्या होती है, तो किसी के सम्मुख मानसिक और किसी को आर्थिक समस्या घेरे रहती है। किसी-न-किसी प्रकार की समस्या प्रायः सबके पीछे लगी रहती है। समस्याओं से सर्वथा रहित कदाचित ही कोई व्यक्ति रहता है। कोई यदि शरीर से दुःखी है, उसे रोग, निर्बलता, बुढ़ापा घेरे है तो कोई मन से उद्विग्न है। कहीं सम्मान में धक्का लग गया है। सन्तान नालायक निकल गई है और कोई विरोध उत्पन्न हो गया है। बहुत से जीविका, व्यय और व्यापार व्यवसाय में चढ़ाव उतार के कारण आर्थिक संकट में फँसे हैं। इस प्रकार शारीरिक, मानसिक और आर्थिक समस्याओं में से कोई-न-कोई समस्या सबके सामने खड़ी ही रहती है। इन समस्याओं का समाधान किए बिना उन्नति और प्रगति का मार्ग पा लेना बहुत कठिन है।
लोग अपनी समस्याओं को यथासाध्य सुलझाने का भी यत्न करते हैं। अर्थ संकट आ जाता है, तो सब कुछ भूल कर उसके सुलझाने में लग जाते हैं। शारीरिक समस्या खड़ी हो जाती है, तो उसका उपाय करने लगते हैं और जब कोई मानसिक उलझन में पड़ जाते हैं, तो उसका उपचार सोचते हैं। पर होता यह है कि एक समस्या सुलझाने में लगे रहने से संसार की दूसरी समस्याओं को अवसर मिल जाता है और वे अपना प्रभाव बढ़ा लेती हैं। जैसे शारीरिक समस्या में संलग्न होने पर आर्थिक संकट उठ खड़ा होता है और अर्थ संकट की ओर ध्यान देने पर मानसिक उद्विग्नता आ घेरती है।
इस प्रकार एक के बाद एक, कोई-न-कोई समस्या सामने आती रहती है और मनुष्य का जीवन उनको सुलझाने में ही तबाह हो जाता है, वास्तविक लक्ष्य के लिए कुछ नहीं कर पाता। यदि कोई ऐसा उपाय निकल आये जिसको प्रयोग में लाने पर सारी समस्याएँ एक साथ शमन होती रहें तभी कुछ काम बन सकता है। नहीं तो जीवन इसी प्रकार के ऊहा-पोह में व्यतीत हो सकता है।
सारी समस्याओं का एक सामान्य हल है अध्यात्मवाद। यदि शारीरिक, मानसिक और आर्थिक सभी क्षेत्रों में अध्यात्मवाद का समावेश कर लिया जाये और अपना दृष्टिकोण सर्वथा आध्यात्मिक बना लिया जाये तो सारी समस्याओं का समाधान साथ-साथ होता चले और आत्मिक प्रगति के लिये अवसर एवं अवकाश भी मिलता रहे। विषयों में सर्वथा भौतिक दृष्टिकोण रखने से ही सारी समस्याओं का सूत्रपात होता है। दृष्टिकोण में वाँछित परिवर्तन लाते ही सब काम बनने लगेंगे।
अध्यात्मवाद का व्यावहारिक स्वरूप है संतुलन, व्यवस्था एवं औचित्य। शारीरिक समस्या तब पैदा होती है, जब शरीर को भोग साधन समझ कर बरता जाता है। आहार, विहार और रहन-सहन को विलासपरक बना लिया जाता है। इसी अनौचित्य एवं अनियमितता से रोग उत्पन्न होने लगते हैं और स्वास्थ समाप्त हो जाता है। सरदी, जुकाम, सिर दर्द, रक्त-चाप, हृदय शूल, अजीर्ण और यहाँ तक कि कभी-कभी असाध्य राज-रोगों का शिकार बनना पड़ता है। ऐसी दशा में एक ही शारीरिक समस्या ही मनुष्य की सारी जिन्दगी अपने अर्थ लगा लेती है, तब वह कैसे परमात्मा का सामीप्य प्राप्त करने के लिये साधना कर सकता है और कब आत्मा का चिन्तन कर सकता है? रोगी रहने वाला मनुष्य किसी लौकिक और पारलौकिक प्रगति के लिए एक प्रकार से असमर्थ ही बन जाता है।
यह शारीरिक समस्या बड़ी आसानी से हल हो सकती है, यदि इसके विषय में दृष्टिकोण को आध्यात्मिक बना लिया जाय। पवित्रता अध्यात्मवाद का पहला लक्षण है। शरीर को भगवान का मन्दिर समझ कर उसे सर्वथा पवित्र और स्वच्छ रक्खा जाय, आत्म-संयम और नियमितता द्वारा शरीर-धर्म का दृढ़तापूर्वक पालन करते रहा जाय तो शारीरिक संकट की सम्भावना ही न रहे। वह सदा स्वस्थ और समर्थ बना रहे। अपने अनियम और असंयम द्वारा भगवान के इस पवित्र मन्दिर को ध्वंस करने का अपराध भयानक पाप का कारण बनता है। शरीर भगवान का मन्दिर हैं।
यह बात न तो कभी भूलनी चाहिये और न तत्विरोधी आचरण ही करना चाहिये। शरीर में आत्मा का निवास रहता है और आत्मा परमात्मा का ही अंश होता है, इस लिये शरीर भगवान का मन्दिर ही है। जो व्यक्ति भगवान के इस पवित्र मन्दिर का समुचित संरक्षण एवं सेवा करता रहता है, उसके सामने शारीरिक समस्याएँ खड़ी नहीं होती। यदि संयोगवश खड़ी भी हो जाती हैं, तो उनका शीघ्र ही समाधान हो जाता है। शरीर के विषय में आध्यात्मिक दृष्टिकोण रखने का सुफल आरोग्य होता है। जिसने नियमन एवं आत्म-संयम द्वारा आरोग्य की प्राप्ति कर ली उसने माना आत्मिक लक्ष्य की ओर एक मंजिल पार कर ली।
स्वास्थ्य और आरोग्य का सम्बन्ध पौष्टिक पदार्थों से जोड़ना भूल है। अधिक या अधिक पुष्टिकर भोजन करने से न तो स्वास्थ्य बनता है और न आरोग्य की उपलब्धि होती है। इसका आधार है आत्म-संयम एवं नियमितता। इसके प्रमाण में हमारे सामने ऋषि-मुनियों का अनुकरणीय उदाहरण मौजूद है। खाद्य के नाम पर वे कतिपय फल और कन्द-मूल आदि का ही प्रयोग किया करते थे। तथापि सदा स्वस्थ निरोग और दीर्घजीवी बने रहते थे। उनके शरीर बड़े ही सुडौल, सुन्दर और सामर्थ्यवान होते थे। इसी क्षमता के बल पर ही तो वे बड़ी-बड़ी तपस्याएँ और साधनाएं कर सकने में सफल रहा करते थे। यदि हम शरीर के विषय में आत्म-संयम, नियमितता और युक्ताहार, बिहार का आध्यात्मिक दृष्टिकोण व्यवहार में लाते रहें तो शारीरिक समस्याओं का एक साथ समाधान हो जाय।
अब मन के क्षेत्र में आइये। मनुष्य का मन शरीर में भी अधिक शक्तिशाली साधन है। इसके निर्द्वन्द्व रहने पर मनुष्य आश्चर्यजनक उन्नति कर सकता है। किन्तु खेद है कि आज लोगों की मनोभूमियाँ बुरी तरह विकार-ग्रस्त बनी हुई हैं। चिन्ता, भय, निराशा, क्षोभ, लोभ और आवेगों का भूकम्प उसे अस्त-व्यस्त बनाये रहता है। स्थिरता, प्रसन्नता और सदाशयता का कोई लक्षण दृष्टि-गोचर नहीं होता। ईर्ष्या-द्वेष और रोष-क्रोध की नष्टकारी चिताएं जलती और जलाती ही रहती हैं।
ऐसे कितने लोग मिलेंगे जिनकी मनोभूमि इन प्रकोपों से सुरक्षित हो और जिसमें आत्म-गौरव, धर्मपरायणता और कर्तव्य-पालन की सद्भावनायें फलती-फूलती हों? अन्यथा लोग मानसिक विकारों, आवेगों और असद्विचारों के अर्ध विक्षिप्त से बने घूम रहे हैं। इस प्रचण्ड मानसिक समस्या का भी अध्यात्मवाद से ही समाधान हो सकता है। लोग मानसिक पवित्रता, उदार भावनाओं और मनःशांति का महत्व समझें और निःस्वार्थ, निर्लोभ एवं निर्विकारता द्वारा उसको सुरक्षित रखने का प्रयत्न करते चलें तो मानसिक विकास के क्षेत्र में बहुत दूर तक आगे बढ़ सकते हैं।
क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिये, किस प्रकार करना चाहिये और कौन-सी गतिविधि नहीं अपनानी चाहिये इस बात का उचित न्याय सामने रख कर चलने वाले आध्यात्मिक लोग बहुधा मानसिक समस्याओं से सुरक्षित बने रहते हैं। अपनी उन्नति करते चलें और दूसरों की उन्नति में सहायक होते चलें; अपनी स्थिति और दूसरों की स्थिति के बीच अन्तर से न तो ईर्ष्यालु बनें और न हीन भावी। इसी प्रकार असफलता में निराशा को और सफलता में अभिमान को पास न आने दें। मनःशांति का महत्व समझते हुए प्रतिकूल परिस्थितियों और विरोधों में भी उद्विग्न और क्रुद्ध न हों। सहिष्णुता, सहनशीलता, क्षमा, दया और प्रेम का प्रश्रय लेते चलें। मनःक्षेत्र में इस आध्यात्मिक दृष्टिकोण का समावेश कर लेने पर मानसिक समस्याओं के उत्पन्न होने का कोई प्रश्न ही नहीं रह जाता।
आर्थिक क्षेत्र में तो आध्यात्मिक दृष्टिकोण का महत्व और भी अधिक है। इस क्षेत्र में ही लोग अधिक अनात्मिक और अनियमित हो जाया करते हैं। आर्थिक क्षेत्र के आध्यात्मिक सिद्धाँत हैं- मितव्ययिता, संतोष, निरालस्य और ईमानदारी। मितव्ययी व्यक्ति को आर्थिक संकट कभी नहीं सताता। ऐसा व्यक्ति जीवन की अनिवार्य आवश्कताओं के सिवाय कृत्रिमता को कभी भी प्रश्रय नहीं देता। विलास, भोग और अनावश्यक सुख सुविधा के साधनों से उसका कोई लगाव नहीं होता और न वह प्रदर्शन की ओछी वृत्ति को ही अपनाया करता है। संतोष आर्थिक क्षेत्र में ईर्ष्या-द्वेष, प्रतिस्पर्धा, लोभ और स्वार्थपरता के पापों से बचा रहता है। आर्थिक क्षेत्र में आध्यात्मिक दृष्टिकोण रखने वाला व्यक्ति निरालस्य होकर भरपूर परिश्रम करता है। ईमानदारी के पारिश्रमिक द्वारा मितव्ययिता और संतोषपूर्वक जीवन-यापन करता हुआ सदा प्रसन्न रहता है। न तो उसे स्वार्थ की अधिकता सताती है और ईर्ष्या जलाती है और नाहीं ऐसे व्यक्ति के विरोध में कोई अन्य लोग ही खड़े होते हैं।
इस प्रकार तन-मन और धन के शक्तिशाली साधनों को उपयोगी बना कर व्यवहार जगत और आर्थिक जगत में समान रूप से आध्यात्मिक दृष्टिकोण रख कर चला जाय तो मनुष्य की सारी समस्याओं का एक साथ ही समाधान हो जाय और तब वह लौकिक और आत्मिक दोनों जीवनों में समान रूप से प्रगति कर सकता है।
एक दिन बलराम बाबू के घर की कुछ महिलायें श्री रामकृष्ण परमहंस के दर्शनों के लिए गईं। परमहंस ने उनका यथायोग्य सत्कार किया। परस्पर बातचीत चल रही थी तभी रमणी नाम की एक वेश्या उधर से गुजरी। उसे देखते ही सहज स्नेह भाव से महर्षि ने कहा- ‘‘क्या बात है? तुमने तो इधर आना ही छोड़ दिया।” महिलायें महर्षि के मुख से ऐसी बातें सुन कर असमंजस में पड़ गईं।
थोड़ी देर बाद वे महिलायें स्वामीजी के साथ काली मन्दिर में दर्शनार्थ पहुँची। माँ की प्रतिमा के समक्ष पहुँचते ही भाव कातर होकर वे गुनगुनाने लगे- ‘‘माँ! तुमने कितने रूप धारण किये, कभी गृहणी बन जाती हो, कभी वेश्या? तुम कितनी पवित्र, कितनी महान् हो?”
महिलायें समझ गईं कि घृणा व्यक्ति से नहीं दुष्प्रवृत्तियों से करनी चाहिये।
बहुत बार लोग इस प्रकार की अहंकार युक्त अभिव्यक्ति कर बैठते हैं कि “हमारे पास भगवान का दिया सब कुछ है। हमें किसी पर निर्भर होने की आवश्यकता नहीं और न हमें समाज की परवाह है।”
पर कहना न होगा कि उनका यह कथन समाज के प्रीति अहंकार जन्म धृष्टता के सिवाय और कुछ नहीं है। संसार में कोई भी मनुष्य समाज के सहयोग के बिना किसी योग्य नहीं बन सकता। वह जो कुछ बनता है समाज की सहायता से बनता है। इस प्रकार का अहंकार बहुधा वही लोग दिखाया करते हैं, जिन्हें धन, जन का बल होता है। किन्तु वे यह भूल जाते हैं कि उनके पास जो धन, जन की वृद्धि हुई है वह समाज की कृपा से ही हुई है।
धन जिसका कि लोगों को बड़ा जोम रहता है, समाज से ही उपलब्ध होता है। लोग धन के लिये व्यापार करते, खेती और उद्योग धंधों का अवलम्ब लेते हैं। एक व्यापारी जिन चीजों का व्यापार कर धन कमाता है, वे क्या सब उसकी उत्पन्न की हुई होती हैं? व्यापार का सारा माल मूल रूप में खेती में उत्पन्न होता है और खेती करने वाले किसान ही होते हैं, व्यापारी नहीं। इस प्रकार व्यापार के लिए व्यापारी को किसान पर निर्भर होना पड़ता है। उसे उसकी परवाह करनी होगी। किसान का असहयोग शीघ्र ही व्यापारी का पट्टा उलट सकता है।
व्यापार की बहुत-सी वस्तुएँ कारखानों में बनाई जाती हैं। उनका कच्चा माल भी अधिकतर खेतों में ही बढ़ा होता है। इस प्रकार कारखानों और कारखानेदारों को भी किसान पर निर्भर रहना पड़ता है। इतना ही क्यों? सारा कारखाना मजदूरों और कारीगरों के आधार पर चलता है। उसमें जो बिजली और मशीनरी लगी होती है, उसका निर्माण भी मजदूरों और कारीगरों द्वारा ही होता है। क्या व्यापारी और क्या कारखानेदार कोई न तो इतना आत्म-निर्भर नहीं होता जो समाज की परवाह न करने जैसी सामर्थ्य प्राप्त कर ले। उनका यह कहना कि उन्हें न समाज की परवाह है और न किसी व्यक्ति की- बिल्कुल झूँठ और कोरा दम्भ मात्र है।
इसी प्रकार खेतिहर को ले लीजिये। यदि वह सारी आवश्यक चीजें खेत में पैदा कर लेने के कारण यह कहता है कि वह बिल्कुल आत्म-निर्भर है या उसे समाज के दूसरे लोगों की अपेक्षा नहीं है, तो वह भी गलती पर है। माना वह जीवन की बहुत-सी आवश्यकताओं को पूरा करने वाली वस्तुयें अपने खेत में पैदा कर लेता है, तब भी वह पूरी तरह आत्म-निर्भर नहीं है। खेती के लिये उसे जिन बहुत से उपकरणों की आवश्यकता होती है, उनमें से कुछ भी तो वह खुद नहीं बना सकता। उनके लिए उसे बढ़ई, लुहारों, कारखानों और कारखानेदारों पर निर्भर रहना होता है। यदि यह सब लोग उसके साथ असहयोग करने लगें तो उसकी खेती का काम बन्द हो जाते देर न लगे।
यदि कभी मजदूर के मन में भी ऐसा अहंकार उत्पन्न हो जाये तो वह भी गलती पर होगा। यदि वह सोचले कि उसकी आत्म-निर्भरता का आधार तो उसका श्रम है, जो न किसी खेत में पैदा होता है और न किसी कारखाने में बनता है और न बाजार में बिकता है। वह तो उसके शरीर में रहता है, और निसर्ग द्वारा मिला होता है। यह बात सही होने पर भी पूरी तरह सही नहीं है। श्रम उसका अपना अवश्य होता है तथापि उसको काम देकर सहयोग न दिया जाये तो उसकी यह विशेषता बेकार चली जाये। जब उसे खेती, कारखानों और निर्माणों में लगाया जाता है, तभी उसका श्रम सार्थक होकर उसके काम आ पाता है। इस प्रकार मजदूर भी सर्वथा आत्म-निर्भर नहीं है, उसे भी उसी प्रकार अनेक वर्गों पर निर्भर रहना होता है, जिस प्रकार समाज के अनेक वर्ग उस पर निर्भर रहते हैं।
धन, जिसको कि मनुष्य की एक बड़ी शक्ति माना जाता है, समाज के सहयोग से ही किसी को मिल पाता है। धन पाने के लिये जब भी जो कुछ किया जायेगा, उसमें समाज के सहयोग की आवश्यकता पड़ेगी ही। पैसे के जोम में यह कहना कि मुझे न तो समाज की परवाह है और न किसी व्यक्ति की एक ऐसा झूँठा अहंकार है जिसका अर्थ समाज के प्रति धृष्टता के सिवाय और कुछ नहीं होता।
जहाँ तक जन-बल का प्रश्न है सो वह भी समाज द्वारा ही प्राप्त होता है। जन जिनका कि किसी को बल होता है समाज के ही सदस्य होते हैं। उनमें से कोई भी समाज के बाहर का व्यक्ति नहीं होता। समाज ही उनका पालन-पोषण करता है। समाज में ही वे जन्म लेते हैं और समाज की सम्पत्ति द्वारा ही उनकी वृद्धि होती है। यदि समाज ऐसे बलदायक जनों का सर्वथा बहिष्कार कर दे तो दूसरों की ताकत बनना तो दूर खुद उनका अपना अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाये। जन-बल भी किसी का अपना बल नहीं होता, वह भी समाज की ही देन होती है। समाज द्वारा पाये बल के आधार पर समाज की ही उपेक्षा करना कहाँ का न्याय माना जा सकता। व्यक्ति का अपना अस्तित्व कुछ नहीं। वह हर प्रकार से समाज पर ही निर्भर रहा करता है।
प्रत्येक समाज द्वारा ही सहायता पाकर आगे बढ़ता और ऊपर चढ़ता है। समाज का सहारा लिए बिना उसका एक कदम भी चल सकना सम्भव नहीं। प्रत्येक व्यक्ति की अपनी एक सीमित क्षमता होती है। कोई भी व्यक्ति न अपने में पूर्ण है और न सर्वथा आत्म-निर्भर। यदि एक डाक्टर चिकित्सा के क्षेत्र में योग्य होता है, तो एक इंजीनियर निर्माण के क्षेत्र में। यदि एक कलाकार अपनी रचना के क्षेत्र में माहिर होता है, तो राजनीतिज्ञ अपने क्षेत्र में। कलाकार चिकित्सा के क्षेत्र में डाक्टर पर निर्भर है, तो डाक्टर साहित्य के क्षेत्र में राजनीतिज्ञ को निर्भर बनाता है तो राजनीतिज्ञ के क्षेत्र में उसे राजनीतिज्ञ पर निर्भर होना पड़ता है। जीवन के सारे क्षेत्र आवश्यक होते हैं। पर कोई भी एक व्यक्ति स्वयं अपने आप हर क्षेत्र में अपना काम नहीं चला सकता। अपना क्षेत्र छोड़ कर उसे दूसरे क्षेत्र में किसी और पर निर्भर होना होगा।
इसके अतिरिक्त समाज पर निर्भरता के और भी रूप हैं। क्या कोई व्यक्ति जो अपने किसी विशेष क्षेत्र का समर्थज्ञानी है, योंही अपने आप ऐसा योग्य बन गया। नहीं ऐसा कदापि नहीं होता। वह अपने विषय का ज्ञान भी समाज के दूसरे लोगों से प्राप्त करता है। उदाहरण के लिये एक इंजीनियर को ही ले लीजिये। इंजीनियर बनने से पूर्व वह एक विद्यार्थी रहा होगा। वह ऐसी शिक्षण संस्थाओं में पढ़ा होगा, जिसे दूसरे लोगों ने बनवाया होगा और ऐसे लोगों ने उसे पढ़ाया होगा, जो स्वयं भी किन्हीं संस्थाओं में किन्हीं दूसरे लोगों द्वारा पढ़ाये गये होंगे। इसके अतिरिक्त किताबों तथा अन्य शिक्षा सामग्री की भी आवश्यकता पड़ी होगी। वह सब भी तो समाज के दूसरे लोगों द्वारा तैयार की जाती है। और सबसे बड़ी बात यह कि उसकी शिक्षा पर उसके अभिभावकों का जो पैसा खर्च हुआ होगा, वह भी उन्हें समाज की सहायता एवं सहयोग से ही तो मिला होगा। यही बात एक इंजीनियर पर ही नहीं कुछ हेर-फेर के साथ सभी लोगों पर घटित होती है। तब कोई भी व्यक्ति यह अहंकार कैसे कर सकता है कि उसे ने तो किसी व्यक्ति की परवाह है और न समाज की चिन्ता। और यदि वह यह सब जान कर भी अपने विचारों में सुधार नहीं करता तो कभी भी समाज द्वारा अपनी इस मिठाई का दण्ड पा सकता है।
जिस प्रकार बूँद-बूँद से सागर और ईंट-ईंट से भवन बनता है, उसी प्रकार जन-जन मिल कर विशाल समाज का निर्माण करते हैं। जिस प्रकार जल की एक प्रथम बूँद का अपना कोई अस्तित्व नहीं और जिस प्रकार दूसरों से पृथक रह कर एक अकेली ईंट, मिट्टी के एक निरर्थक ढेले से अधिक कोई महत्व नहीं रखती, उसी प्रकार समाज पृथक एक अकेले व्यक्ति का भी न तो कोई अस्तित्व है और न महत्व। अपनी विशाल राशि से अलग हुई पानी की एक अकेली बूँद को जिस प्रकार हवा का एक झोंका सुखा देता है, उसी प्रकार समाज से अलग एक अकेले व्यक्ति को समय की चपेट शीघ्र ही नष्ट कर देती है। जिस प्रकार परस्पर एक दूसरे से जुड़े रहने और एक दूसरे को सहारा दिये रहने पर प्रत्येक ईंट की भवन के रूप में सुरक्षा भी है और महत्व भी, उसी प्रकार पारस्परिक सहयोग और सहायता के आधार पर समाज के रूप में प्रत्येक व्यक्ति की रक्षा और महत्व है। समाज से पृथक रहकर न तो वह अपना अस्तित्व सुरक्षित रख सकता है और न व्यक्तित्व। अपने अकेलेपन पर अहंकार करना मनुष्य का बहुत बड़ा भोलापन है।
जो मनुष्य अहंकार भाव से प्रेरित होकर और समाज को ठेल कर आगे बढ़ना चाहते हैं वे अपने मन्तव्य में कभी सफल नहीं हो पाते। संसार के सफल एवं उन्नत व्यक्तियों की यदि जीवन गाथा देखी जाये, तो पता चलेगा कि अन्य गुणों के साथ सामाजिकता का गुण भी उनमें बहुत रहा है। वे सदैव ही समाज के प्रति विनम्र, उदार और हितैषी रहे होते हैं। उन्होंने कभी भी कोई ऐसा काम नहीं किया होता जिससे समाज की हानि और अवहेलना होती रही हो।
समाज की उपेक्षा कर चलने वाले अहंकारी व्यक्ति बहुधा अपराध कर्मों की ओर चले जाते हैं। अपराध वही लोग करते हैं, जिन्हें समाज की चिन्ता नहीं होती उसका हानि-लाभ नहीं दीखता। ऐसे लोग ही अपने व्यक्तिगत लाभ के लिए समाज की मर्यादाओं को लाँघते और उसकी सर्वमान्य मान्यताओं को ठुकराते चले जाते हैं और अन्त में अपने किये को दण्ड रूप में भरते हैं। ऐसे ही समाज विरोधी लोग जल जाते हैं, निन्दित और तिरस्कृत होते हैं। समाज जब उनकी अनुचित कार्यवाही की ओर ध्यान देता है, तब उनकी रक्षा सम्भव नहीं होती। वे जहाँ भी बचाव के लिये जाते हैं, वहीं उन्हें तिरस्कार, अवहेलना और असहयोग का भाजन बनना पड़ता है। ऐसे अहंकारवादी व्यक्तियों का अन्त बड़ा ही अशांत, अयोग्य और संतापपूर्ण होता है। उनका वह मानव-जीवन बिल्कुल बेकार चला जाता है, जिसका समाज के हेतु सदुपयोग कर वे यश और प्रतिष्ठा के अधिकारी बन सकते थे। समाज की उपेक्षा अपनी ही उपेक्षा है और उसकी हानि भी अपनी ही हानि होती है। इस सत्य को कभी भी न भूलना चाहिये।
व्यक्ति और समाज दोनों का कल्याण इसी बात पर निर्भर है कि व्यक्तिवाद का अहंकार छोड़ कर समाजवाद की उदारता ग्रहण की जाय। व्यक्ति की वास्तविक शक्ति और सच्चा लाभ समाज की ही शक्ति और समाज का ही लाभ होता है। अपनी किसी व्यक्तिगत शक्ति और समृद्धि के जोश में समाज की उपेक्षा का दम भरना वैसा ही खतरनाक है, जैसा कि किसी छोटी-सी बूँद का सागर से अलग होकर अपना अस्तित्व बनाये रखने का दम्भ। समाज की उपेक्षा में नहीं व्यक्ति का मंगल समाज के रंजन में है और वही हम सबको करना चाहिये।
दुख का आशीर्वाद :-
श्रीराम वन जाने लगे। जाने से पूर्व उन्होंने गुरु वशिष्ठ से आज्ञा ली- ‘‘गुरुदेव मुझे आशीर्वाद दें, ताकि अपना व्रत सम्पन्न करने में दुर्बलता न आये?” वशिष्ठ ने सहज स्नेह से पूछा- “राम! निःसंकोच कहना- जाने की इच्छा न हो तो राजाज्ञा रद्द करा दूँ।”
राम की आंखें भर आईं। सिर झुका कर उन्होंने कहा- ‘‘देव! मुझे सुख नहीं चाहिए। राम का जन्म दुःख पीने के लिए हुआ है मुझे दुःख का आशीर्वाद दीजिए।”
“दुःख किस लिए तात्!” वशिष्ठ ने साश्चर्य पूछा।
भगवन्! श्रीराम ने विनीत भाव से उत्तर दिया- ‘‘सुख का देश केवल अयोध्या तक सीमित है पर दुःख का देश तो आकाश और पृथ्वी की तरह निस्सीम है। मुझे योजन भर देश का राज्य नहीं, निःसीम देश का राज्य चाहिये।” वशिष्ठ राम के उत्तर से आत्म-विभोर हो उठे और उन्हें हृदय से लगा कर आशीर्वाद दिया।
इच्छा का अस्तित्व अनादि है। और शायद यह सदा-सर्वदा अपना अस्तित्व बनाये भी रहेगी। इच्छा का अभाव विकास और उन्नति का स्थगन है। संसार की सारी सक्रियता, मनुष्य की समग्र प्रेरणा इच्छा शक्ति में ही निहित है, उसी पर निर्भर है। जहाँ इच्छा नहीं, वहाँ जड़ता, शून्यता और निष्क्रियता के अतिरिक्त कुछ हो सकता है- ऐसी आशा नहीं की जा सकती।
इच्छायें मनुष्य में जीवन का चिन्ह हैं। जीवित मनुष्य ही तो नित्य नवीन इच्छायें किया करते हैं। कभी वह स्वास्थ्य की, कभी धन-सम्पत्ति की, कभी यश-प्रतिष्ठा की, तो कभी पुत्र-कलत्र आदि की। अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष- चारों पदार्थ भी तो मनुष्य की उदात्त एवं परिष्कृत इच्छाओं की ही तो अभिव्यक्ति करते हैं। इन्हें अथवा इनमें से किन्हीं को पाने के लिये मनुष्य इच्छा के द्वारा ही तो परिचालित होता है। जैसे ही कोई इच्छा मनुष्य के मानस में उदय हुई और उसने स्थिरता की स्थिति प्राप्त की वैसे ही मनुष्य उसकी पूर्ति के लिये क्रियाशील हो उठता है। इच्छायें मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति है, इस सत्य से इन्कार नहीं किया जा सकता।
यह सारा संसार इच्छाओं का ही प्रतिफलन है। परम पिता परमात्मा के हृदय इस माँगलिक इच्छा का स्फुरण हुआ- ‘‘एकोऽहं बहुस्याम” -और यह विशाल, विस्तृत और जड़-चेतनमय त्रिविध संसार शून्य से बदल कर साकार रूप में तत्काल मूर्तिमान हो उठा। संसार परमात्मा की इच्छा से उत्पन्न हुआ। जीवों का जन्म आदि इच्छा के आधार पर ही हुआ है। इसलिये उसका भी इच्छाओं का कर्ता होना स्वाभाविक ही है।
मनुष्य की इच्छायें मात्र स्वाभाविक प्रतिक्रिया ही नहीं साँसारिक व्यापार के लिये आवश्यक उपादान के रूप में भी आवश्यक हैं। मनुष्य यदि इच्छा न करे और उसके हृदय से इनके स्फुरण का सर्वथा तिरोधान हो जाये तो निरन्तर गति से आगे की ओर बढ़ता हुआ सृष्टि का यान जहाँ का तहाँ रुक कर ठहर जाये। सारे सृष्टि-क्रम में एक निष्चेष्टता, निष्क्रियता एवं जड़ता आ जाये। जिसका परिणाम जिस तरह रुक जाने से पानी सड़ने लगता है, हवा विषाक्त हो जाती है और यंत्र बेकार होकर क्षय होने लगते हैं, उसी प्रकार विनाश एवं व्यर्थता में सामने आने लगता है।
गति एवं प्रवाह के आधार पर ही संसार में सक्रियता एवं प्रखरता, उन्नति और विकास बने हुए हैं। ग्रह नक्षत्रों की गति रुक जाय तो प्रलय की सम्भावना उठ खड़ी हो। प्रकृति की गति रुक जाये तो वनस्पति सूख कर काष्ठ हो जाये। जीवों की गति रुक जाये तो शरीर मृतिका के रूप में बदल जाये। गति ही संसार का जीवन है और गति का आधार इच्छा है। इस प्रकार इस न्याय के आधार पर इच्छाओं की आवश्यकताओं से किसी प्रकार भी इनकार नहीं किया जा सकता।
किन्तु हर आवश्यकता, हर स्वाभाविकता और हर गतिविधि की एक समुचित सीमा एवं दिशा भी निर्धारित है। उसका व्यतिक्रम करने से लाभ के स्थान पर हानि की ही सम्भावना रहती है। भोजन मनुष्य की आवश्यकता है। जिसकी पूर्ति स्वास्थ्य एवं जीवन के लिये हितकर है। किंतु इसी आवश्यकता को सीमा के बाहर निकाल दिया जाये तो वही भोजन स्वास्थ्य एवं जीवन के लिये संकट उत्पन्न कर देता है। संसार, मनुष्य और ग्रह-नक्षत्रों में गति अपेक्षित है। किंतु यदि उनकी गति अपनी दिशा और सीमा का अतिक्रमण कर अनियंत्रित हो जाये तो क्या कुछ ही समय में सुन्दर और चहल-पहल से मुखरित संसार नष्ट-भ्रष्ट होकर श्मशान के रूप में न बदल जाये? मर्यादा का उल्लंघन विनाश एवं विध्वंस को खुला निमन्त्रण है।
इसी प्रकार आवश्यकता एवं गति की दिशा की उपयुक्तता और अनुपयुक्तता भी लाभ-हानि का अनिवार्य कारण हैं। अनुपयुक्त भोजन और जीवन की गति की दिशा मनुष्य का संयोग उन्हीं परिणामों से करते हैं, जिनकी गणना विनाशक फलों में की जाती है।
इच्छायें स्वाभाविक भी हैं और आवश्यक भी, किन्तु इनमें औचित्य का होना उससे भी अधिक आवश्यक है। मनुष्य को, जहाँ उचित इच्छायें, सुख-शांति, संतोष, उन्नति, प्रगति और सफलता की ओर ले जाती हैं, वहाँ अनुचित इच्छायें उसे क्लेश पूर्ण परिस्थितियों में डाल देती हैं। इच्छाओं का अनौचित्य अथवा उनकी अति मनुष्य जीवन को जिस अशांति एवं शोक-संतापों के हवाले कर देती है उतना उनका अभाव दुर्दशादायक नहीं होता। यदि इच्छा रहित मनुष्य जड़ की भांति यथास्थान पड़ा रहता है, तो अनुचित एवं अनियंत्रित इच्छायें उसे असंतोष की आग में ढकेल देती हैं।
आज ही नहीं, मनुष्य आदि काल से ही, सुख की कामना करता आ रहा है, और उसके लिये प्रयत्न भी। वह जो भी, शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक काम करता है, जो भी प्रबन्ध, व्यवस्था और उपार्जन करता है, खेती बाड़ी, व्यापार, व्यवसाय, घर-गृहस्थी, पुत्र-कलत्र आदिक डडडड भी काम और संग्रह करता है, एक मात्र सुख की कामना से प्रेरित होकर। इस एक कामना के अतिरिक्त डडडड सब क्रिया-कलाप के पीछे और कोई भी विशेष उद्देश्य नहीं रहता। तथापि वह अपने इस उद्देश्य-सुख की कामना पूर्ण करने में अब सफल न हो सका है। आदिम युग की डडडड से लेकर आज वैज्ञानिक युग तक वह अपनी इस डडडड की पूर्ति के लिये आकाश-पाताल एक करता आया डडडड उन्नति, विकास एवं अन्वेषण के क्रम को उसने एक डडडड के लिए भी अवरुद्ध न होने दिया। किन्तु वह अपनी वाँछित सुख-शांति को अब तक भी न पा सका है। डडडड डडडड उपलब्धियाँ दिन-दिन विपरीत दिशा डडडड विपरीत परिणामों में फलीभूत होती दिखाई दे डडडड हैं।
इस सब असफलता एवं अशाँति का और कुछ भी डडडड केवल एक ही प्रमुख कारण है और वह हैं- द्रौपदी डडडड की तरह दिन-दिन बढ़ता हुआ कामनाओं का डडडड एवं उच्छृंखलन। उसकी सुन्दर सुख-कामना, डडडड लिप्सा में बदल गई है। जब मनुष्य की लिप्सा और स्पृहा अपनी सीमा लाँघ कर अनियंत्रित हो जाती है, तभी आज जैसे असंतोष के समान अशुभ परिणामों की वृद्धि हो जाती है। मनुष्य एक उपलब्धि के बाद दूसरी और दूसरी के बाद तीसरी पाने की कामना को इतना बढ़ा लेता है कि वे शीघ्र ही असंतोष को जन्म दे देती हैं। कामनाओं की अति अथवा उनमें असन्तोष का दोष दुःख का बहुत बड़ा कारण है।
समुचित सुख-सौख्य पाने के लिये मनुष्य को अपने मनोरथों की एक सीमा रखनी ही चाहिये। अन्यथा अनियंत्रित मनोकामनाओं का रथ दौड़ता-दौड़ता किसी खड्ड अथवा खाई में ही शरण लेगा और जीवन के अशाँत अन्त में ही विश्राम पायेगा। अनियंत्रित और असंतुष्ट कामनायें अपनी अशिव प्रेरणा से अच्छे-खासे मनुष्य को गलत कामों की ओर लगा देती है। भ्रष्टाचार, मिलावट, कालाबाजार, रिश्वत-खोरी, घूंस, चोरी, डकैती, ठगी और शोषण का पाप धन की अनियंत्रित कामना का ही तो परिणाम है। अथवा ईश्वर के अंश आत्मवान, लोक-परलोक के अधिकारी मनुष्य को इन सब कुकृत्यों से क्या प्रयोजन अथवा लगाव हो सकता है?
भोग सुख की अतिरेकता ही तो मनुष्य को बहु-विवाह, व्यभिचार, अमर्यादा और उच्छृंखल के पाप के लिये प्रेरित करता है। जिसका फल रोग, शोक, अशांति, निन्दा, कलंक और अपयश के रूप में सामने आता है। स्वामी रामतीर्थ ने ठीक ही कहा है कि “मनुष्य के भय और चिन्ताओं का कारण उसकी अनुचित एवं अनियंत्रित इच्छायें ही तो हैं। अन्यथा इस उज्ज्वल जीवन के पास इन दुःखों का क्या कारण?”
जहाँ मनुष्यों का यह अधिकार है कि वह इच्छा करे और उसे पूरा करने का प्रयत्न करे- वहाँ उसका यह कर्तव्य भी है कि उसे एक सीमा तक पाकर सन्तोष करे और फिर उसकी कामना करे, जो उसके पास नहीं हैं। केवल एक ही कामना, धन और भोग सुख के लिए जीवन समर्पित कर देना, इनको अति एवं अनौचित्य पर पहुँचा देना किसी प्रकार भी न्याय-संगत नहीं है। धन, भोजन, वस्त्र, निवास, वाहन और जीवन के अन्य साधन संसार में सभी को समान रूप से आवश्यक हैं। यदि कोई मनुष्य अपने प्रयत्नों से वे सब-के-सब, दिन-पर-दिन अपने पास ही संग्रह करता जाये, तब तो यह पुरुषार्थ का दुरुपयोग ही माना जायेगा। समुचित इच्छा का प्रयत्न नहीं यह लिप्सा, तस्करता और शोषण है, जो मनुष्य को किसी प्रकार भी शोभा नहीं देता। इससे समाज में अशांति, असन्तोष और अव्यवस्था के साथ विषमता तो फैलती ही है, अपने लिये भी अशांति, असन्तोष बन्धन और वेदना की परिस्थितियां उत्पन्न होती रहती हैं।
मनुष्य के लिए धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष चार पुरुषार्थ बतलाये गये हैं। इसमें यदि केवल अर्थ और काम में ही संलग्न रह कर जीवन की इतिश्री कर दी गई तो वह जीवन सर्वथा असफल ही माना जायेगा। जहाँ अर्थ और काम की इच्छा को प्रश्रय दिया गया है, वहाँ धर्म और मोक्ष की कामना को भी प्रबुद्ध करना बहुत आवश्यक है। वास्तविकता तो यह कि यह चारों पुरुषार्थ काई अलग-अलग उपलब्धियाँ नहीं हैं। सच्चा पुरुषार्थ तो इसमें केवल एक मोक्ष ही है। बाकी के तीनों पुरुषार्थ तो उसके सहायक पुरुषार्थ ही हैं। पूर्व के तीनों पुरुषार्थों की गति उस दिशा में दी जाये दिशा में अन्तिम पुरुषार्थ मोक्ष की संभावना सरल और उपलब्ध हो सके। क्रम से चलते हुए अन्तिम पुरुषार्थ कर पहुँचने पर उसके लिये मनुष्य जितना भी परिश्रम, प्रयत्न और साधना कर सके करे। जितना भी आत्म-लाभ हो सके प्राप्त करे, मोक्ष के लिये जितनी भी कामना कर सके करे। केवल यही एक ऐसा क्षेत्र है, जहाँ पर मनुष्य अपनी कामना की बाग ढीली कर जितनी दूर तक दौड़ सके दौड़े क्योंकि उस दिशा में प्रकाश और सुख-शांति के अतिरिक्त अन्य कोई भी प्रतिकूल सम्भावना नहीं होती।
अनियंत्रित कामनाओं की तरह ही मनुष्य के लिए निष्क्रिय कामनाएँ भी एक अभिशाप ही हैं। कामना करने को तो कोई विद्यार्थी यह कामना कर लेता है कि वह एम. ए. पास हो जाये, किन्तु उसके लिए प्रयत्न नहीं करता, केवल मनो-मन्दिर में कामना के साथ खेल, खेल कर मनोरंजन करता रहता है। तो उसकी वह कामना कदापि पूरी नहीं हो सकती।
कामना के साथ प्रयत्न का किया जाना बहुत आवश्यक है। केवल कामना करने से न तो कोई विशेषता पा सकता है और न धन-दौलत। बिना प्रयत्न के साधारण भोजन की इच्छा तक पूरी नहीं हो सकती तब अन्य उपलब्धियों की पूर्ति की बात ही क्या हो सकती है? निष्क्रिय कामनाओं का दोषी व्यक्ति कामनाओं का जड़ पुतला बन कर न केवल इस जीवन में ही अतृप्त और अशाँत रहता है, अपने अगले जन्म में भी दीन और दरिद्र बनने की तैयारी कर लेता है।
शिथिल एवं अधूरी कामनाएँ भी अशांति का एक कारण होती हैं। कामनाओं में जब तक दृढ़ता, समायिकता और सक्रियता का समावेश नहीं होता, वे एक रोग की तरह मनुष्य के पीछे अकारण ही लगी रहती है। शिथिल कामना वाला व्यक्ति थोड़ा-सा प्रयत्न करके बड़ी उपलब्धि चाहने लगता है। और जब उसको नहीं पा सकता तो समाज अथवा परिस्थितियों को दोष देकर जीवन भर असफलता के साथ बँधा रहता है।
अपनी स्थिति के परे की कामनाएँ करना अपने को एक बड़ा दण्ड देने के बराबर है। मोटा-सा सिद्धान्त है कि “अपनी शक्ति के बाहर की गई कामनाएँ कभी पूर्ण नहीं हो सकतीं और अपूर्ण कामनाएँ हृदय में काँटे की तरह चुभा करती हैं।” मनुष्य को अपने अनुरूप, अपने साधनों और शक्तियों के अनुसार ही कामना करते हुए अपने पूरे पुरुषार्थ को उस पर लगा देना चाहिये। इस प्रकार एक सिद्धि के बाद दूसरी सिद्धि के लिए पूर्व सिद्धि और उपलब्धियों का समावेश कर आगे प्रयत्न करते रहना चाहिये। इस प्रकार एक दिन वह कोई बड़ी कामना की पूर्ति भी कर लेगा।
निःसन्देह कामनाएँ मनुष्य का स्वभाव ही नहीं आवश्यकता भी है। किन्तु उनका औचित्य, नियंत्रण, दृढ़ और प्रयत्नपूर्ण होना भी वाँछनीय है। तभी यह जीवन में अपनी पूर्ति के साथ सुख-शाँति का अनुभव दे सकती हैं अन्यथा अनियंत्रित एवं अनुपयुक्त कामनाओं से बड़ा शत्रु मानव-जीवन की सुख-शान्ति के लिए दूसरों कोई नहीं है।
मनुष्य के हर विचार का एक निश्चित मूल्य तथा प्रभाव होता है। यह बात रसायन-शास्त्र के नियमों की तरह प्रामाणिक है। व्यापारिक सफलता, असफलता, संपर्क में आने वाले दूसरे लोगों से मिलने वाले सुख-दुःख का आधार विचार ही माने गये हैं। विचारों को जिस दिशा में उन्मुख किया जाता है, उस दिशा के तदनुकूल तत्व आकर्षित होकर मानव मस्तिष्क में एकत्र हो जाते हैं।
सारी सृष्टि में एक सर्वव्यापी जीवन-तरंग आंदोलित हो रही है। प्रत्येक मनुष्य के विचार उस तरंग में सब ओर प्रवाहित होते रहते है, जो उस तरंग के समान ही सदाजीवी होते हैं। वह एक तरंग ही समस्त प्राणियों के बीच से होती हुई बहती है। जिस मनुष्य की विचार-धारा जिस प्रकार की होती, जीवन-तरंग में मिले वैसे विचार उसके साथ मिल कर उसके मानस में निवास बना लेते हैं। मनुष्य का एक दूषित अथवा निर्दोष विचार अपने मूलरूप में एक ही रहेगा ऐसा नहीं। वह सर्वव्यापी जीवन तरंग से अनुरूप अन्य विचारों को आकर्षित कर उन्हें अपने साथ बसा लेगा और इस प्रकार अपनी जाति की वृद्धि कर लेगा।
मनुष्य का समस्त जीवन उसके विचारों के साँचे में ही ढलता है। सारा जीवन आन्तरिक विचारों के अनुसार ही प्रकट होता है। कारण के अनुरूप कार्य के समान ही प्रकृति का यह निश्चित नियम है कि मनुष्य जैसा भीतर होता है, वैसा ही बाहर। मनुष्य के भीतर की उच्च अथवा निम्न स्थिति का बहुत कुछ परिचय उसके बाह्य स्वरूप को देख कर पाया जा सकता है। जिसके शरीर पर अस्त-व्यस्त, फटे-चीथड़े और गन्दगी दिखलाई दे, समझ लीजिये कि यह मलीन विचारों वाला व्यक्ति है, इसके मन में पहले से ही अस्त-व्यस्तता जड़ जमाये बैठी है।
विचार-सूत्र से ही आन्तरिक और बाह्य-जीवन का सम्बन्ध जुड़ा हुआ है। विचार जितने परिष्कृत, उज्ज्वल और दिव्य होंगे, अन्तर भी उतना ही उज्ज्वल तथा दैवी सम्पदाओं से आलोकित होगा, जिसका प्रकाश बाह्य द्वारा सम्पादित स्थूल कार्यों में प्रकट होगा। जिस कलाकार अथवा साहित्यकार की भावनायें जितनी ही प्रखर और उच्चकोटि की होंगी उनकी रचना भी उतनी ही उच्च और उत्तम कोटि की होगी।
भावनाओं और विचारों का प्रभाव स्थूल शरीर पर पड़े बिना नहीं रहता। बहुत समय तक प्रकृति के इस स्वाभाविक नियम पर न तो विश्वास किया गया और न उपयोग। लोगों को इस विषय में जरा भी चिन्ता नहीं थी कि मानसिक स्थितियों का प्रभाव बाह्य स्थिति पर पड़ सकता है और आन्तरिक जीवन का कोई सम्बन्ध मनुष्य के बाह्य जीवन से हो सकता है। दोनों को एक दूसरे से पृथक मान कर गतिविधि चलती रही। आज जो शरीर-शास्त्री अथवा चिकित्सक यह मानने लगे हैं कि विचारों का शारीरिक स्थिति से बहुत घनिष्ठ सम्बन्ध है, वे पहले बहुत समय तक औषधियों जैसी जड़-वस्तुओं का शरीर पर क्या प्रभाव पड़ता है- इसके प्रयोग पर ही अपना ध्यान केन्द्रित किये रहे।
इससे वे चिकित्सा के क्षेत्र में आन्तरिक स्थिति का लाभ उठाने के विषय में काफी पिछड़ गये। चिकित्सक अब धीरे-धीरे इस बात का महत्व समझने और चिकित्सा में मनोदशाओं का समावेश करने लगे हैं। मानस चिकित्सा का शास्त्र ही अलग बनता और विकास करता चला जा रहा। अनुभवी लोगों का विश्वास है कि यदि वह मानस-चिकित्सा-शास्त्र पूरी तरह विकसित और पूर्ण हो गया तो कितने ही रोगों में औषधियों के प्रयोग की आवश्यकता कम हो जायेगी। लोग अब यह बात मानने के लिए तैयार हो गये हैं कि मनुष्य के अधिकाँश रोगों का कारण उसके विचारों तथा मनोदशाओं में निहित रहता है। यदि उनको बदल दिया जाये तो वे रोग बिना औषधियों के ही ठीक हो सकते हैं। वैज्ञानिक इसकी खोज, प्रयोग तथा परीक्षण में लगे हुये हैं।
शरीर-रचना के सम्बन्ध में जाँच करने वाले एक प्रसिद्ध वैज्ञानिक ने अपनी प्रयोगशाला में तरह-तरह के परीक्षण करके यह निष्कर्ष निकाला है कि मनुष्य का समस्त शरीर अर्थात् हड्डियां, माँस, स्नायु आदि मनुष्य की मनोदशा के अनुसार एक वर्ष में बिल्कुल परिवर्तित हो जाते हैं और कोई-कोई भाग तो एक-दो सप्ताह में ही बदल जाते हैं।
इसमें सन्देह नहीं कि चिकित्सा के क्षेत्र में मानसोपचार का बहुत महत्व है। सच बात तो यह है कि आरोग्य प्राप्ति का प्रभावशाली उपाय आन्तरिक स्थिति का अनुकूल प्रयोग ही है। औषधियों तथा तरह-तरह की जड़ी बूटियाँ का उपयोग कोई स्थायी लाभ नहीं करता, उनसे तो रोग के बाह्य लक्षण दब भर जाते हैं। रोग का मूल कारण नष्ट नहीं होता। जीवनी-शक्ति जो आरोग्य का यथार्थ आधार है, मनोदशाओं के अनुसार बढ़ती-बढ़ती रहती है। यदि रोगी के लिये ऐसी स्थिति उत्पन्न कर दी जाये कि वह अधिक-से-अधिक प्रसन्न तथा उल्लसित रहने लगे, तो उसकी जीवन-शक्ति बढ़ जायेगी, जो अपने प्रभाव से रोग को निर्मूल कर सकती है।
बहुत बार देखने में आता है कि डाक्टर रोगी के घर जाता है, और उसे खूब अच्छी तरह देख-भाल कर चला जाता है। कोई दवा नहीं देता। तब भी रोगी अपने को दिन भर भला-चंगा अनुभव करता रहता है। इसका मनोवैज्ञानिक कारण यही होता है कि वह बुद्धिमान डाक्टर अपने साथ रोगी के लिये अनुकूल वातावरण लाता है और अपनी गतिविधि से ऐसा विश्वास छोड़ जाता है कि रोगी की दशा ठीक है, दवा देने की कोई विशेष आवश्यकता नहीं है। इससे रोगी तथा रोगी के अभिभावकों का यह विचार दृढ़ हो जाता है कि रोग ठीक हो रहा है। विचारों का अनुकूल प्रभाव जीवन-तत्व को प्रोत्साहित करता और बीमार की तकलीफ कम हो जाती है।
कुछ समय पूर्व कुछ वैज्ञानिकों ने इस सत्य का पता लगाने के लिये कि क्या मनुष्य के शरीर पर आन्तरिक भावनाओं का कोई प्रभाव पड़ता है, एक परीक्षण किया। उन्होंने विभिन्न प्रवृत्तियों के आदमियों को एक कोठरी में बन्द कर दिया। उनमें से कोई क्रोधी, कोई विषयी और कोई नशों का व्यसनी था। थोड़ी देर बाद गर्मी के कारण उन सबको पसीना आ गया। उनके पसीने की बूंदें लेकर अलग-अलग विश्लेषण किया गया। और वैज्ञानिकों ने उनके पसीने में मिले रासायनिक तत्वों के आधार उनके स्वभाव घोषित कर दिये जो बिल्कुल ठीक थे।
मानसिक दशाओं अथवा विचार-धाराओं का शरीर पर क्या प्रभाव पड़ता है, इसका एक उदाहरण बड़ा ही शिक्षा-प्रद है- एक माता को एक दिन किसी बात पर बहुत क्रोध हो गया। पाँच मिनट बाद उसने उसी आवेश की अवस्था में अपने बच्चे को स्तनपान कराया और एक घण्टे के भीतर बच्चे की हालत खराब हो गई और उसकी मृत्यु हो गई। शव परीक्षा के परिणाम से विदित हुआ कि मानसिक क्षोभ के कारण माता का रक्त तीक्ष्ण परमाणुओं से विषैला हो गया और उसके प्रभाव से उसका दूध भी विषाक्त हो गया था, जिसे पी लेने से बच्चे की मृत्यु हो गई।
यही कारण है कि शिशु-पालन के नियमों में माता में परामर्श किया गया है कि बच्चे को एकान्त में तथा निश्चिंत एवं पूर्ण प्रसन्न मनोदशा में स्तनपान करायें। क्षोभ अथवा आवेग की दशा में दूध पिलाना बच्चे के स्वास्थ्य तथा संस्कारों के लिए हानिकारक होता है। जिन माताओं के दूध पीते बच्चे, रोगी, रोने, चिड़-चिड़े अथवा क्षीणकाय होते हैं, उसका मुख्य कारण यही रहता है कि वे मातायें स्तनपान के वाँछित नियमों का पालन नहीं करतीं अन्यथा वह आयु तो बच्चों के ताजे तन्दुरुस्त होने की होती है। मनुष्य के विचारों का शरीर की अवस्था से बहुत घनिष्ठ सम्बन्ध होता है। यह एक प्राकृतिक नियम है।
इस नियम की वास्तविकता का प्रमाण कोई भी अपने अनुभव के आधार पर पा सकता है। वह दिन याद करें कि जिस दिन कोई दुर्घटना देख हो। चाहे उस दुर्घटना का सम्बन्ध अपने से न रहा हो तब भी उसे देख कर मानसिक स्थिति पर जो प्रभाव पड़ा उसके कारण शरीर सन्न रह गया, चलने की शक्ति कम हो गई, खड़ा रहना मुश्किल पड़ गया, शरीर में सिहरन अथवा कंपन पैदा हो गयी, आंसू आ गये अथवा मुख सूख गया। उसके बाद भी जब-जब उस भयंकर घटना का विचार मस्तिष्क में आता रहा शरीर पर बहुत बार उसका प्रभाव होता रहा।
विचारों के अनुसार ही मनुष्य का जीवन बनता-बिगड़ता रहता है। बहुत बार देखा जाता है कि अनेक लोग बहुत समय तक लोकप्रिय रहने के बाद बहिष्कृत हो जाया करते हैं, बहुत से दुकानदार पहले तो उन्नति करते रहते हैं, फिर बाद में उनका पतन हो जाता है। इसका मुख्य कारण यही होता है कि जिस समय जिस व्यक्ति की विचार-धारा शुद्ध, स्वच्छ तथा जनोपयोगी बनी रहती है और उसके कार्यों की प्रेरणा स्त्रोत बनी रहती है, वह लोकप्रिय बना रहता है। किन्तु जब उसकी विचार-धारा स्वार्थ, कपट अथवा छल के भावों से दूषित हो जाती है तो उसका पतन हो जाता है। अच्छा माल देकर और उचित मूल्य लेकर जो व्यवसायी अपनी नीति ईमानदारी और सहयोग की रखते हैं, वे शीघ्र ही जनता का विश्वास जीत लेते हैं, और उन्नति करते जाते हैं। पर ज्योंही उसकी विचार-धारा में गैर-ईमानदारी, शोषण और अनुचित लाभ के दोषों का समावेश हुआ नहीं कि उनका व्यापार ठप्प होने लगता है। इसी अच्छी-बुरी विचार-धारा के आधार पर न जाने कितनी फर्मे और कम्पनियाँ नित्य ही उठती गिरती रहती हैं।
विचार-धारा में जीवन बदल देने की कितनी शक्ति होती है, इसका प्रमाण हम महर्षि बाल्मीकि के जीवन में पा सकते हैं। महर्षि बाल्मीकि अपने प्रारम्भिक जीवन में रत्नाकर डाकू के नाम से प्रसिद्ध थे। उनका काम राहगीरों को मारना, लूटना और उससे प्राप्त धन से परिवार का पोषण करना था। एक बार देवर्षि नारद को उन्होंने पकड़ लिया। नारद ने रत्नाकर से कहा कि तुम यह पाप क्यों करते हो? चूँकि वे उच्च एवं निर्विकार विचारधारा वाले थे, इसलिये रत्नाकर डाकू पर उनका प्रभाव पड़ा, अन्यथा भय के कारण किसी भी वंचित व्यक्ति ने उसके सामने कभी मुख तक नहीं खोला था। उसका काम तो पकड़ना, मार डालना और पैसे छीन लेना था, किसी के प्रश्नोत्तर से उसका कोई सम्बन्ध नहीं था। किन्तु उसने नारद का प्रश्न सुना और उत्तर दिया- ‘‘अपने परिवार का पोषण करने के लिये।”
नारद ने पुनः पूछा कि “जिनके लिये वह इतना पाप कमा रहता है, क्या वे लोग पाप में भागीदार बनेंगे।” रत्नाकर की विचार-धारा आँदोलित हो उठी, और वह नारद को वृक्ष से बाँध कर घर गया और परिजनों से नारद का जिक्र किया और दूसरे प्रश्न का उत्तर पूछा। सबने एक स्वर से निषेध करते हुए कह दिया कि हम सब तो तुम्हारे आश्रित हैं। हमारा पालन करना तुम्हारा कर्तव्य है, अब उसके लिये यदि तुम पाप करते हो तो इससे हम लोगों का क्या मतलब? अपने पाप के भागों तुम खुद होंगे।
परिजनों का उत्तर सुन कर रत्नाकर की आंखें खुल गईं। उसकी विचारा-धारा बदल गई और नारद के पास आकर दीक्षा ली और तप करने लगे। आगे चल कर वही रत्नाकर डाकू महर्षि बाल्मीकि बने और रामायण महाकाव्य के प्रथम रचयिता। विचारों की शक्ति इतनी प्रबल होती है कि देवता हो राक्षस और राक्षस को देवता बना सकती है।
जिस प्रकार उपयोगी, स्वस्थ और सात्विक विचार जीवन की सुखी व संतुष्ट बना देते हैं। उसी प्रकार क्रोध, काम और ईर्ष्या-द्वेष के विषय से भरे विचार जीवन को जीता जागता नरक बना देते हैं। स्वर्ग-नरक का निवास अन्यत्र कहीं नहीं मनुष्य की विचार-धारा में रहता है। देवताओं जैसे शुभ उपकारी विचार वाला मन की स्वर्गीय स्थिति और आसुरी विचारों वाला व्यक्ति नरक जैसी स्थिति में निवास करता है। दुःख अथवा सुख की अधिकाँश परिस्थितियाँ तथा पतन-उत्थान की अधिकाँश अवस्थायें मनुष्य की अपनी विचार-धारा पर बहुत कुछ निर्भर रहती हैं। इसलिये मनुष्य को अपनी विचार-धारा के प्रति सदा सावधान रह कर उन्हें शुभ तथा माँगलिक दिशाओं में ही प्रेरित करते रहना चाहिये।
असन्तोष एक घातक दुर्गुण है। यह जिसको अपना आखेट बना लेता है, उसकी जीवन-वाटिका के सारे फूल जला डालता है। जीवन की ताजगी और हरियाली का अपहरण कर लेता है। आशा एवं उत्साह सफलता तथा प्रसन्नता से इसकी गहरी शत्रुता है। असंतुष्ट रह कर यदि कोई सुख-शांति की इच्छा करता है तो वह उस सुनी वस्तु का पाना चाहता है, जिसका या तो अस्तित्व ही नहीं अथवा उसके प्रयत्नों की विपरीत दिशा में विद्यमान है। असंतोष अथवा अभाव की भावना स्वभाव के लिए विजातीय तत्व है, जिसकी वर्तमानता से मनुष्य मानसिक ही नहीं शारीरिक रोगी तक हो जाता है।
असंतोष का जन्म अधिकतर ईर्ष्या अथवा हिंसा की भावना से होता है। जब कोई अपने ऊपर दृष्टि डाल कर किसी अपने से अधिक धनवान, बलवान अथवा मानवान को देखता है और यह सोचने लगता है कि यह हमसे अधिक सुखी तथा सम्पन्न है। प्रगति एवं उन्नति में हमसे बहुत आगे बढ़ा हुआ है, समाज में इसका बहुत मान-सम्मान है जबकि मेरा कम या बिल्कुल नहीं है, तब उस अपने उस लक्षित व्यक्ति के प्रति ईर्ष्या होने लगती है, जो अपने गर्भ में सारी सुख-शांति के घातक शत्रु असन्तोष को लेकर आती और ईर्ष्यालु के हृदय में उसका प्रजनन कर देती है। उसके बाद तो एक से दूसरे और दूसरे से तीसरे अवगुण के जन्म की एक परम्परा लग जाती है, जोकि बहुमूल्य मानव-जीवन की धूल उड़ा कर रख देती है।
इस प्रकार देखा जा सकता है कि दृष्टिकोण की एक छोटी-सी गलती, विचार पद्धति की साधारण-सी भूल से कितनी बड़ी क्षति होती है। यह बात सच है कि संसार में आंख मूंद कर नहीं चला जा सकता। आंखें खोल कर ही चलना होगा, तब इस स्थिति में अपने से बढ़े-चढ़े लोगों पर दृष्टि जायेगी ही, उनका वैभव और ऐश्वर्य दिखाई पड़ेगा ही और इससे दृष्टा के मन में कोई अतिरिक्त भाव उत्पन्न ही होगा। सही है कि सामान्य लोग ऋषि, मुनि, योगी अथवा परमहंस की स्थिति वाले नहीं होते, समभाव जिनका स्वभाव होता है, जिनके लिये ऐश्वर्य एवं दरिद्रता में, लोष्ठ एवं कंचन में कोई भेद नहीं होता। उनके लिये सारे पदार्थ, सारे मनुष्य और सारी परिस्थितियाँ एक जैसी ही होती हैं, वे राग-द्वेष से मुक्त कामना एवं वासनाओं से रहित तटस्थ स्थिति वाले ही होते हैं। उन पर, उनके समाधानपूर्ण मन पर हर्ष अथवा विषाद की कोई प्रतिक्रिया नहीं होती।
यह एक ऊँची स्थिति है एक सिद्ध पद है। यद्यपि इसको पाने वाले भी प्रारम्भ में हम आप जैसे सामान्य स्थिति के ही लोग होते हैं, किन्तु अपने अविरत पुरुषार्थ एवं अध्यावसाय से इस अवस्था को प्राप्त होते हैं। तथापि सामान्य दशा में, साधारण जीवन-यापन की स्थिति में हम साधारण लोगों से इस अतीत अवस्था की अपेक्षा नहीं कर सकते, संसार में स्मरण एवं व्यवहार निरत व्यक्तियों में अतिरिक्त भाव अथवा विषम प्रतिक्रियायें होना कोई अस्वाभाविक नहीं हैं। सम्पन्नता देख कर हर्ष और विपन्नता देख कर विषाद आ जाना अधिक अमान्य नहीं है। अमान्य है केवल उन भावों, विचारों, प्रतिक्रियाओं अथवा अनुभूतियों की अवाँछित दिशा में प्रवाहित होना, जोकि हमारे अन्दर दूसरे की स्थिति से तुलना करने पर प्रकट होती है।
दूसरे की तुलना में अपने को कम देख कर अथवा अपनी तुलना में अन्य को बढ़ा-चढ़ा देख कर मन में अतिरिक्त भाव आ सकता है। किन्तु यह कदापि आवश्यक नहीं कि वह भाव अथवा विचार ईष्यात्मक ही हो। यह आगन्तुक भाव श्रद्धा, प्रशंसा अथवा आदर का भी हो सकता है। यह भाव स्वयं भी उन्नति-कर, उस स्थिति में पहुँचने का संदेश एवं प्रेरणा वाला भी हो सकता है, और साधु, सज्जन और कर्मठ लोगों में आते ही हैं इसी प्रकार के विधेयक भाव। किसी की उन्नति देख कर उनमें ध्वंसक, कष्टकर निषेधात्मक विचार नहीं उठते।
हम किसी की उपलब्धियों को देखते और उसके वैभव का विचार करते हैं और हममें उसके प्रति ईर्ष्या अथवा द्वेष का भाव जागृत होता है, कोई हिंस्र अथवा हवस की कटुता सुगबुगाती है तो तत्काल समझ लेना चाहिये कि हमारे विचार खतरे से खाली नहीं है, अवश्य ही हममें मानसिक दौर्बल्य घर कर रहा है, शीघ्र ही असन्तोष और निरुत्साह का आक्रमण हम पर हो सकता है और हम किसी समय भी पतन गर्त के यात्री बन सकते हैं। हमारी अब तक की सारी उपलब्धियाँ हमारे लिये ही मूल्यहीन हो जायेंगी, हमारे मन में उनके प्रति न कोई रुचि रहेगी और न आस्था, शीघ्र ही हम अपने को दीन-हीन, दुःखी और वंचित समझने लगते हैं, अपने को बदनसीब समझने का रोग हमें लग सकता है और यह अपावन स्थिति किसी भी प्रकार आत्मघात से कम पाप वाली न होगी। अस्तु अपनी स्थिति को देखते ही तुरन्त सावधान हो जाना चाहिये, ईर्ष्या के भाव को खतरे की घण्टी समझ कर सतर्कतापूर्वक प्रतिरक्षा की तैयारी में लग जाना चाहिये। शीघ्रता से प्रेम सौहार्द एवं अपनत्व आदि के दैवीगुण को जगा-जगा कर मोर्चे पर जमा देना चाहिये, जिससे कि विध्वंसक आसुरी-भाव हमारे जीवन को कटु और संतप्त बनाने के लिये आक्रांत न कर सकें।
यदि दूसरे की उन्नति और सफलता को देख कर हमें हर्ष होता है, तद्वत् स्थिति पाने के लिये परिश्रम एवं पुरुषार्थ की प्रेरणा मिलती है, उसके उन गुणों की खोज और ग्रहण की तत्परता होती है, जोकि उसकी उपलब्धि के आधारभूत सिद्धान्त हैं, तो हमें समझ लेना चाहिये कि हमारी विचार-धारा का प्रवाह ठीक दिशा की ओर ही उन्मुख है, हम ठीक रास्ते पर जा रहे हैं, हमारा मार्ग निरापद एवं प्रशस्त है। हमें उसे सुन्दर मार्ग पर अविरत गति से चलते ही रहना चाहिये, जिसका परिणाम हमारे लिये अक्षय उपलब्धियों का भण्डार लेकर आयेगा, जिससे कि हम सदा सर्वदा के लिये सम्पन्न एवं संतुष्ट हो जायेंगे। तथापि अपने मार्ग की निरापदता और अपनी गति एवं दिशा की समीचीनता पर हमें इतना संतोष नहीं कर लेना चाहिये कि हममें से सतर्कता, सम्बद्धता अथवा तत्परता के भाव कम हो जायें और हम प्रमाद के वशीभूत होकर असावधान हो जायें। प्रमाद का भाव भी कुछ कम भयप्रद नहीं है।
कभी-कभी यह सन्तोष, विश्वास और निर्भयता की आड़ लेकर दूर प्रभावक रोगों के छोटे-छोटे कीटाणु स्वास्थ्य के प्रति अतिविश्वास के कारण उत्पन्न असंयम की आड़ लेकर शरीर में वास कर लेते हैं और कालान्तर में अवसर पाकर अपना करिश्मा दिखाने लगते हैं। इसलिये मनुष्य को सौख्यावस्था में भी प्रमाद जैसे आसुरी दूतों से सावधान ही रहना चाहिये। इससे बचाव का एक छोटा-सा उपाय यह है कि अपनी उन्नति और सफलता में अपनी शक्तियों और क्षमताओं में पूर्ण विश्वास रखते हुए भी अपने पर अधिक विश्वास न करें। अपने मार्ग और लक्ष्य की उपयुक्तता पर विश्वास रखते हुए अपने पर कड़ी दृष्टि रखने की जरूरत है। क्योंकि हम कभी-कभी स्वयं ही किसी अदृश्य आसुरी प्रेरणा से अपने को धोखा दे बैठते हैं। हम हैं तो आखिर मनुष्य ही, दैवी और आसुरी शक्तियां हमसे अधिक प्रबल होती हैं, जिससे कि हम शीघ्र ही उनके प्रभाव में आ जाते हैं।
हममें ईर्ष्या-द्वेष का जन्म प्रायः तब ही होता है, जब हम किसी की तुलना में अपने की दीन-हीन एवं अभावग्रस्त एवं पिछड़ा हुआ मानते लगते हैं। यदि हममें यह भाव बना रहे कि हम किसी से भी नीचे और पिछड़े हुए नहीं दिन-दिन उन्नति एवं प्रगति करते जा रहे हैं और वह दिन दूर नहीं जब हम भी इस स्थिति में पहुँच जायेंगे, जिसमें अमुक व्यक्ति इस समय वर्तमान है तो हमारे हृदय में ईर्ष्या, द्वेष का भाव न आकर उत्साह और अधिकाधिक पुरुषार्थ की ही प्रेरणा पैदा होने लगे। यह प्रेरणा हर प्रकार से वाँछनीय एवं हितकर है।
यदि हम ईमानदारी से दूसरों की तुलना से डडडड होकर अपनी प्रगति का लेखा देखना शुरू कर दें, अपनी वर्तमान स्थिति का ठीक-ठीक मूल्याँकन करने लगें, तो देखेंगे कि हमारे सामने असंतोष का कोई भी तो कारण नहीं है, हम केवल अपना गलत मूल्याँकन करने के कारण ही इस हीन-भाव में फंसे हुए हैं। सबसे प्रथम और सर्वोपरि संतोष का कारण तो हमारे पास यही है कि हम मनुष्य हैं। मनुष्य जीवन पाना एक महानतम सफलता एवं प्रगति का चिन्ह है। क्या हमको यह उपलब्धि अनायास ही बिना किसी पुरुषार्थ अथवा प्रगति के ही मिल गई है? नहीं ऐसा कदापि नहीं है। इसको पाने के लिए हमको चौरासी लाख गण्य योनियों की डडडड यात्रा पूरी करती पड़ी है।
हम कोटि-कोटि वर्षों तक श्वास-श्वास चल-चल कर ही इस जीवन तक आ सके हैं। उस लम्बी यात्रा में हमको कितने त्याग करने और कितने कष्ट उठाने पड़े होंगे, इसका अनुमान नहीं लगाया जा सकता। उस समय की यात्रा में हम किन-किन भयानक परिस्थितियों से गुजरे होंगे, इसको आज जान सकना तो सम्भव नहीं है किन्तु इतना तो कहा ही जा सकता है कि मानव-जीव जैसी महानतम उपलब्धि के लिए कष्टों और बलिदान की बड़ी तपस्या ही तपनी पड़ी होगी। कोई ऊँची वस्तु बिना तप-त्याग के मिल ही नहीं सकती है।
क्या चौरासी लाख योनियों के कोटि-कोटि वर्षों तक अबाध संग्राम को लड़ने के बाद मनुष्य जीवन के रूप में जो विजय प्राप्त की है, वह कुछ कम मूल्यवान उपलब्धि है अथवा किसी प्रकार भी कम संतोष की बात है। तब कोई कारण नहीं दीखता कि मनुष्य जीवन का उत्तम उपहार पाकर भी हम असंतुष्ट एवं क्षुब्ध ही बने रहें। कल्पवृक्ष पाने के बाद दीन-हीन और अभाव की भावना कैसी। इतने पर भी हम असंतुष्ट रहते हैं तो यह हमारी भूल और कमी है। हमारे संस्कारों की दुरभिसंधि है, जिसे शिव संकल्पों द्वारा नष्ट-भ्रष्ट करके अपने को मुक्त ही कर लेना चाहिये।
जब कभी हम यह सोचने लगते हैं कि संसार में अनेक व्यक्ति हमसे अच्छी स्थिति में हैं तो वहीं पर हम यह क्यों नहीं सोचते कि न जाने कितने व्यक्ति हमसे भी अधिक गई गुजरी परिस्थिति में जीवन बिता रहे हैं। यदि हम हजारों से कम धनवान हैं तो लाखों से हमारी आर्थिक स्थिति अच्छी है। यदि हममें गुणों का बाहुल्य नहीं है तो बहुत से ऐसे व्यक्ति इस संसार में मौजूद हैं, जिनको अपने अवगुणों से ही समय नहीं मिलता। यदि किसी की अपेक्षा हमारा मान, सम्मान में कम है तो यह कम संतोष की बात नहीं है कि हम उन दुवृर्त्तियों से बचे हुए हैं, जिनके कारण मनुष्य अपराधी बन कर समाज में तिरस्कार और अपमान का भाजन करता है, जिनको जन-जन की घृणा और अवहेलना का लक्ष्य बनना पड़ता है।
मानवेत्तर योनि वाले जीवों को देखिये और उनकी स्थिति से अपनी स्थिति की तुलना कीजिये तो कोई कारण नहीं है कि उनकी अपेक्षा अपनी स्थिति को हजारों गुना श्रेष्ठ पाकर आत्म-संतोष की अनुभूति न हो। तुलना करते समय अपनी तुलना अपने से ऊँचे और अपने से निम्न स्थिति होने वालों से कीजिये, आपको असंतुष्ट होने का कोई कारण नहीं रह जायेगा।
दूसरों की प्रगति देख कर भी यदि हम यह सोच सकें कि यह आज जिस स्थिति में है उसी स्थिति में हमेशा से नहीं रहा है। एक दिन यह भी निम्न स्थिति में रहा है किन्तु आज अपने पुरुषार्थ एवं अध्यवसाय से उच्च स्थिति में जा पहुंचा है। तो कोई कारण नहीं कि इसकी तरह ही हम भी अपने पुरुषार्थ एवं अध्यवसाय के बल पर इस जैसी स्थिति में न पहुँच सकें। यह कितनी विचित्र बात है कि धनवान अपनी चिन्ताओं और व्यग्रताओं से पस्त होकर अधनवान को अधिक सुखी एवं संतुष्ट समझ कर दुखी होता है और निर्धन धनवान को देख कर ईर्ष्या करने लगता है। इन दोनों में वस्तुतः कोई अन्तर नहीं है। दोनों ही अपनी-अपनी तरह से संतुष्ट एवं असंतुष्ट हैं। धनता अथवा निर्धनता, संपन्नता और विपन्नता सुख-दुख का हेतु नहीं है। सुख-दुःख का एक मात्र हेतु है अपना-अपना दृष्टिकोण।
मनुष्य होकर भी अन्दर असंतोष का विष बनाये रखना स्वयं अपनी कमी है, उसे दूर कर दीजिये आप असंतोष से छुटकारा पा जायेंगे। अपने जीवन को उन्नति के मार्ग पर लगाइये, अपनी प्रगति का मूल्याँकन करने के लिये नीचे की ओर देखिए और उन्नति का उत्साह पाने के लिये ऊपर की ओर नजर दौड़ाइये। अपने पिछड़ेपन को क्रन्दन का नहीं प्रेरणा का कारण मानिये और भूल कर भी न तो अपना कम मूल्याँकन कीजिये और न अपने को दीनहीन तथा अभागा मानिए, ईर्ष्या-द्वेष से बच कर चलिये, किसी से हिर्स न करके अपनी ओर तथा अपनी परिस्थितियों पर दृष्टि रखिये तब देखिये कि असंतोष का कोई भी कारण आपके पास नहीं रह जाता है।
पारिवारिक जीवन की परिभाषा करते हुए एक विद्वान ने कहा है- ‘‘परिवार परमात्मा की ओर से स्थापित एक ऐसा साधन है, जिसके द्वारा हम अपना आत्म-विकास सहज ही में कर सकते हैं, और आत्मा में सतोगुण को परिपुष्ट कर सुखी, समृद्ध जीवन प्राप्त कर सकते हैं। मानव-जीवन की सर्वांगीण सुव्यवस्था के लिये पारिवारिक जीवन प्रथम सोपान है। मनुष्य केवल सेवा, कर्म और साधना में ही पूर्ण शाँति प्राप्त कर सकता है।” पारिवारिक जीवन की यह परिभाषा, निस्सन्देह बड़ी ही उचित एवं समीचीन है। गहराई से विचार करने से इसकी यथार्थता प्रकट हो जाती है।
समाज रचना का कार्य स्वयं परमात्मा ने मनुष्य के विचारों और भावनाओं में स्वयं उत्तर कर किया है। उसी ने समय-समय पर उसके विकास और विस्तार को मानवीय विवेक द्वारा आगे बढ़ाया है। वही उसमें आ जाने वाले विकार और विकृतियों को दूरदर्शी व्यक्तियों द्वारा प्रकट करता है और उन्हें सुधारने की प्रेरणा देता है। इसलिये परिवार संस्था को परमात्मा की ही रचना इच्छा अथवा निर्देश मानना चाहिये और उसी के अनुरूप उसका सेवन एवं संचालन करना चाहिये। जो लोग परिवार को अपने मनमाने ढंग से चलाते और सेवन करते हैं, वे एक अहंभाव से प्रेरित होते हैं और परमात्मा की इच्छा का विरोध करते हैं।
परिवार की उपर्युक्त परिभाषा में दूसरी बात यह बतलाई गई है कि वह एक साधन के रूप में स्थापित किया गया है। साधन काहे का? अपना आत्म-विकास करने का। कहना न होगा, जिस प्रकार मानव शरीर कर्म करने का साधन है और जिसके समुचित प्रयोग अथवा उपयोग से जीवन में उल्लेखनीय उपलब्धियाँ पाई जा सकती हैं, उसी प्रकार परिवार साधन का उचित और समीचीन उपयोग आत्म-विकास का लक्ष्य पूरा कर सकता है। जब डडडड उपयोग ठीक रहता है, साधन सुरक्षित रहता है और अच्छी तरह काम आता रहता है। दुरुपयोग होते ही वह क्षीण नष्ट होने लगता है और आदमी साधनहीन होकर निरुपाय हो जाता है।
संयम, नियम और औचित्य का पालन करते रहने से शरीर स्वस्थ बना रहता है, उसकी शक्ति अक्षुण्ण बनी रहती है, स्फूर्ति, उत्साह और कार्य दक्षता सुरक्षित रहती है, पुरुषार्थ होता रहता है और सफलताएँ आती रहती हैं। पर ज्यों ही शरीर का अनुचित उपयोग किया गया नहीं कि वह शिथिल व शक्तिहीन हो जाता है। उसकी दक्षताएँ और विशेषताएं समाप्त हो जाती हैं। वह चलता फिरता मिट्टी का एक पिंड मात्र रह जाता है। तब न तो परिश्रम हो पाता है, न पुरुषार्थ, उन्नति, विकास, प्रगति अथवा किसी प्रकार की सफलता की सम्भावना समाप्त हो जाती है, जीवन असफल और अनुपयोगी बन जाता है। इंजन, मशीन, यन्त्र अथवा हल, बैल, भूमि आदि साधन नष्ट कर दिये जायें, तो न तो अन्न ही उत्पन्न किया जा सके और न उत्पादन। धन समाप्त कर दिया जाये तो न तो व्यापार हो सकता है और न जीवन का कोई काम चल सकता है।
साधनाओं के नष्ट अथवा निःसार हो जाने से सारे उद्देश्य अपूर्ण ही रह जाते हैं। इसी प्रकार यदि परिवार रूपी साधन को निर्बल, निकम्मा अथवा अयोग्य बना लिया जाये तो उसके द्वारा प्राप्त होने वाला आत्म-विकास का लक्ष्य जहाँ का तहाँ पड़ा रह जाये और यह संस्था अथवा इसका उपयोग कुछ भी न रह जाये। जिस उद्देश्य के साधना जितने अधिक प्रखर, सशक्त और उपयुक्त होंगे, वह उद्देश्य उसी अनुपात से अपनी पूर्णता के साथ प्राप्त होगा। मलीन साधनों से मलीन और उज्ज्वल साधनों से उज्ज्वल लक्ष्य की प्राप्ति होती है।
परिवार साधन है। उसका उद्देश्य है आत्म-विकास आत्मा में सतोगुण की परिपुष्टि, सुखी और समृद्ध जीवन। और उसका प्रयोग है सेवा, कर्म और साधना। डडडड बच्चों की शिक्षा-दीक्षा और ब्याह-शादी के लिए बचायेगी। पुरुष परिवार को उन्नत और बच्चों को योग्य बनाने के लिए अधिक-से-अधिक कमायेगा और पत्नी उसमें से अधिक-से-अधिक बचाने का प्रयत्न करेगी।
इस प्रकार घर की समृद्धि में वृद्धि होगी ही। कोई भी एकाकी आदमी उतना समृद्धिशाली नहीं देखा जाता, जितना कि पारिवारिक गृहस्थ। वह रहने के लिए घर और बच्चों के लिये कारोबार की व्यवस्था करता ही है, फिर चाहे थोड़ी कर सके अथवा बहुत। अनन्तर बच्चे बड़े होकर कमाने लगते हैं, एक से दो और तीन की कमाई आने लगती हैं और परिश्रमी और बुद्धिमान गृहस्थों की सुख समृद्धि उत्तरोत्तर बढ़ती जाती है। यह अवसर पारिवारिक व्यक्ति को ही रहता है, एकाकी को नहीं क्योंकि उसके लिए न तो उसे इच्छा होती है और न आवश्यकता। उसका तो अपना शरीर होता है। मतलब भर का बचाया और खा-पीकर पड़ रहे। इस प्रकार देखा जा सकता है कि पारिवारिक अथवा गृहस्थ-जीवन में आत्म-विकास, सतोगुण और सुख-समृद्धि की पूरी-पूरी संभावना रहती है। निःसंदेह परिवार सर्वांगीण उन्नति का एक महत्वपूर्ण सोपान है, जिस पर योग्यतापूर्वक चढ़ कर मनुष्य जीवन का परम लक्ष्य पा सकता है।
किन्तु यह सब संभव होगा तभी जब इस साधन को साधन मान कर सावधानीपूर्वक उपयोग में लाया जाये। इस साधन को अधिक दक्ष, प्रखर और सशक्त बनाने के लिए सतत् प्रयत्न किया जाता रहे, जो सदस्यों को सुयोग्य, बच्चों को सुशील, सुशिक्षित और अनुशासित बनाने के रूप में होगा। परिवार का गुण, कर्म स्वभाव के रूप डडडड निर्माण करना ही इस साधन को उद्देश्य के योग्य सक्षम बनाना है। इसका उपाय शिक्षा, प्रेम, त्याग, बलिदान, सेवा और सदाचरण की शिक्षा और व्यक्तिगत उदाहरण ही माना गया है।
जहाँ इस साधन को साध्य मान कर, भोग-विलास डडडड अवसर बनाया गया कि वह नष्ट हो जायेगा। तब उस दशा में न तो प्रेम रह जायेगा, न त्याग और न कोई आत्मीयता। बच्चे अनिच्छित, रोगी, निकम्मे और अनुशासनहीन होंगे। स्वास्थ्य और सौहार्द समाप्त होकर डडडड एवं स्पृहा बढ़ जायेगी, परिवार नरक का जीता-जागता द्वार बन जायेगा। परिवार का पालन और समुचित निर्माण ही इस साधन को प्रखर, उज्ज्वल और सक्षम बना सकता है। और तभी आत्म-विकास अथवा आत्म-वृद्धि का उद्देश्य पूरा हो सकता है, अन्यथा नहीं। इसीलिये शास्त्रों में कह गया है-
“गृहस्थ एव यजये गृहस्थस्तष्यते तपः। चतुर्णामाश्रमाणान्तु गृहस्थस्तु विशिष्यते॥”
“गृहस्थ ही वास्तव में यज्ञ करते हैं। गृहस्थ ही वास्तविक तपस्वी हैं। इसीलिये चारों आश्रमों में गृहस्थाश्रम ही सबका सिरमौर है।”
गृहस्थ-जीवन एक तप है, एक साधन है। इसका समुचित प्रयोग करके ही वास्तविक लक्ष्य प्राप्त किया सकता है। गृहस्थ को तपस्वी का जीवन बिताते हुए जीवन को सुविधापूर्वक उन्नति एवं विकास की ओर धीरे-धीरे बढ़ा चले जाना चाहिये।
दिन का अधिकांश समय, एक बच्चा एकान्त में बिताता। न खाने में कोई तर्क, न बाहर निकलने की इच्छा। कहीं जाना होता तो अपनी राह जाता और अपनी राह आप लौट आता।
पिता की चिन्ता हुई। एक दिन पूछ ही लिया- ‘‘बेटा! आजकल काम-धन्धा कुछ नहीं करते। कुछ कष्ट रहता है क्या?”
बेटे ने विनीत भाव से उत्तर दिया- ‘‘पिता जी! आप ही तो कहते थे- मनुष्य को शांति का जीवन बिताना चाहिये।” पिता ने हंस कर कहा- ‘‘बेटे! चुपचाप पड़े रहने का नाम शांति नहीं। कैसी भी स्थिति हो धैर्य रखकर, अनिवार्य दुःखों को स्वयं वीरतापूर्वक झेलता हुआ भी उद्विग्न न हो उसे शांति कहते हैं।”
मनुष्य एक प्राणी है। प्राणी उसे कहते हैं- जिसमें प्राण हों। प्राण निकल जाने पर शरीर निर्जीव होकर सड़ गल जाता है, इसलिए मृत्यु होते ही उसे जलाने, गाड़ने, बहाने आदि का प्रबन्ध करना पड़ता है। मनुष्येत्तर जीवों के मरते ही उनके शरीर को समाप्त करने के लिए श्रृंगाल, कुत्ते आदि पशु, गिद्ध, कौए, चील आदि पक्षी और चींटे, गिड़ार आदि नष्ट करने के लिए जुट पड़ते हैं। प्राण निकलते ही प्राणी का भौतिक अस्तित्व समाप्त हो जाता है। मनुष्य अथवा अन्य जीव-जन्तुओं के जीवित रहने और विविध क्रिया-कलाप करते रहने का सारा श्रेय इस प्राण-शक्ति को ही है। जिसमें यह तत्व जितना न्यूनाधिक होता है, उसी अनुपात से उसकी सशक्तता, समर्थता, प्रतिभा एवं स्थिति में कमीवेशी दिखाई पड़ती है। मनुष्य अन्य प्राणियों से श्रेष्ठ एवं समर्थ इसीलिये है कि उसमें प्राण तत्व का दूसरों की अपेक्षा बाहुल्य रहता है।
सजीवता, प्रफुल्लता, स्फूर्ति, सक्रियता, जैसी शारीरिक विशेषताएं तथा मनस्विता, तेजस्विता, प्रतिभा, चतुरता जैसी मानसिक विभूतियाँ और कुछ नहीं प्राण-रूपी सूर्य की किरणें, प्राण-रूपी समुद्र की लहरें हैं। इतना ही नहीं अध्यात्मिक स्तर पर पाई जाने वाली, सहृदयता करुणा, कर्तव्य निष्ठा, संयम-शीलता, तितीक्षा, श्रद्धा, सद्भावना, समस्वरता जैसी महानताएँ भी इस प्राण शक्ति की ही उपलब्धियाँ हैं। प्राण एक विद्युत है, जो जिस क्षेत्र में भी जिस स्तर पर भी प्रयुक्त होती हैं, उसी में चमत्कार उत्पन्न कर देती है।
प्राण-शक्ति, जीवन-शक्ति का ही दूसरा नाम है। जो जितना सजीव है, उसे उतना ही प्राणवान कहेंगे। यह शक्ति शरीर में चमकती है तो व्यक्ति रूप-लावण्ययुक्त, निरोग, दीर्घजीवी, परिपुष्ट एवं प्रफुल्ल दिखाई देता है। उसे परिश्रम से ग्लानि या थकान नहीं वरन् प्रसन्नता प्राप्त होती है। मन में प्राण का बाहुल्य हो तो मस्तिष्क की उर्वरता अत्यधिक बढ़ जाती है। स्मरण शक्ति सूझ-बूझ, कुशाग्रता, बुद्धिमता, तुलनात्मक-निर्णय-क्षमता, एकाग्रता जैसी विशेषताएं उत्पन्न हो जाती हैं। अध्यात्म क्षेत्र में इस महत्ता का संचार होने पर व्यक्ति में शौर्य, साहस, अभय एवं सन्मार्ग पर निरन्तर चलते रहने का पुरुषार्थ उत्पन्न हो जाता है। सद्गुणों एवं सद्भावनाओं की भी उसमें कमी नहीं रहती।
यह प्राण-शक्ति ही प्राणी की विशेषता है, यही उसकी वास्तविक सम्पत्ति है। इसी के मूल्य पर भौतिक समृद्धियाँ एवं सफलताएँ मिलती हैं। इसलिए यह कहना उचित ही है कि जिसके पास जितनी प्राण-शक्ति है, वह उतनी ही जीवन संग्राम में विजय वरण करता है। उतना ही यशस्वी बनता है। प्राण का उपार्जन ही, समस्त सम्पत्तियों की अधिपति महासम्पत्ति का उपार्जन करना है। यह महासम्पत्ति-जिसके पास जितनी मात्रा में हो वह उतना ही अपने अभीष्ट लक्ष्य में सफल होता चला जाता है। प्राणवान व्यक्ति भले ही डाकू, तस्कर, ठग, शासक, नेता, वैज्ञानिक, अध्येता, व्यापारी, कृषक, सैनिक, महात्मा आदि कोई भी क्यों न हो, अपने प्रयोजन में असाधारण सफलता प्राप्त करेगा। अपनी दिशा में उन्नति के उच्च शिखर पर अवस्थित दिखाई देगा। अस्तु इस प्राण की सभी को आवश्यकता रहती है। यह बात अलग है कि कौन उसके लिये प्रयत्न करता है और कौन हाथ पर हाथ रखे बैठा रहता है? किसे उससे प्राप्त करने का मार्ग विदित है और कौन उससे अपरिचित रह रहा है?
प्राण-शक्ति को उपार्जन करने के कई भौतिक उपाय भी हैं और एक सीमा तक उन उपायों से प्राण-शक्ति बढ़ाई भी जा सकती है। उन भौतिक उपायों की समयानुसार फिर कभी चर्चा करेंगे। इन पंक्तियों में अध्यात्मिक मार्ग पर चल कर किस प्रकार उच्च-स्तरीय प्राण-शक्ति का अर्जन, अभिवर्धन किया जा सकता है, उसी का उल्लेख करेंगे।
गायत्री महामन्त्र का प्रमुख लाभ प्राण-शक्ति उपलब्ध करना ही है। उसकी उपासना यदि ठीक प्रकार की जाय तो उपासक में प्राण-शक्ति की अभिवृद्धि शीघ्र ही होने लगती है और वह उस अभिवर्धन के आधार पर कई तरह की सफलतायें प्राप्त करने लगता है। कहने वाले इसे गायत्री माता का अनुग्रह आशीर्वाद कहा करें पर वस्तुतः होता यह है कि उस उपासना से साधक में विकसित रूप से प्राण-शक्ति बढ़ती चली जाती है, उससे उसके व्यक्तित्व में कई प्रकार के सुधार, परिवर्तन होते हैं, कई तरह के आकर्षण बढ़ते हैं, फलस्वरूप कठिनाइयों के अवरोध कार्य में से हटते हैं और सफलताओं का पथ-प्रशस्त होता है।
यह आन्तरिक परिवर्तन बहुत ही सूक्ष्म होता है, इसलिये वह मोटे-तौर पर दिखाई नहीं देता, पर थोड़ी गम्भीरतापूर्वक निरीक्षण करने से कितनी ही विशेषतायें गायत्री उपासना में संलग्न व्यक्ति में दिख पड़ती है। प्रगति का आधार मनुष्य का विकसित व्यक्तित्व ही है। देवता किसी की भौतिक सहायता नहीं करते, वे व्यक्ति के व्यक्तित्व में कुछ वैसे सुधार कर देते हैं, जिससे वह सफलता पर सफलता प्राप्त करता हुआ, अभीष्ट प्रयोजन की दिशा में तेजी से आगे बढ़ता चला जाता है। गायत्री की उपासना वस्तुतः प्राण-शक्ति की ही उपासना है। जिसे जितना प्राण बल उपलब्ध हो गया समझना चाहिये, उसकी उपासना उतने ही अंशों में सफल हो गई।
गायत्री का देवता सविता है। सविता का भौतिक स्वरूप रोशनी और गर्मी देने वाले अग्नि-पिण्ड के रूप में परिलक्षित होता है, पर उसकी सूक्ष्म सत्ता प्राण-शक्ति से ओत-प्रोत है। वनस्पति, कृमि, कीट, पशु-पक्षी, जलचर, थलचर और नभचर वर्गों के समस्त प्राणी सविता देवता द्वारा निरन्तर प्रसारित प्राण-शंकित के द्वारा ही जीवन धारण करते हैं। वैज्ञानिकों का निष्कर्ष है कि इस जगती पर जो भी जीवन के चिन्ह हैं, वे सूर्य की सूक्ष्म विकिरणशीलता के ही प्रतिफल है। सावित्री उस प्राणवान सविता देवता की अधिष्ठात्री है। उसकी स्थिति को अनन्त प्राण-शक्ति के रूप में आँका जाय तो कुछ अत्युक्ति न होगी।
गायत्री मंत्र का नामकरण उसकी इसी विशेषता के आधार पर हुआ है। गायत्री शब्द के तीन अक्षरों में यही भावार्थ ओत-प्रोत है।
सत-पथ ब्रह्मांड में कहा गया है-
सा हैषा गयांस्तत्रे प्राणाः वै गयास्तत्प्राणांस्तत्रे। तद्यद गयांस्तत्रे तस्याद् गायत्री नाम। (सत-पथ 14/8/15/7)
अर्थात् कह गये हैं प्राण को। त्री अर्थात् त्राण रक्षण करने वाली, जो प्राण की रक्षा करे उस शक्ति का नाम गायत्री हुआ।
और भी देखिए-
गयाः प्राणा उच्यन्ते, गयान् प्राणान् त्रायते सा गायत्री। -सन्ध्या भाष्य,
‘गय’ प्राण को कहते हैं, जो प्राणों की रक्षा करे उसे गायत्री कहते हैं।
गायत्रं त्रायते इति वा गायत्री प्राच्यते तस्यात् गायन्तं त्रायते यतः। -याज्ञवल्क्य,
प्राणों का संरक्षण करने वाली होने से उसे गायत्री कहा जाता है।
गायतस्त्रायसे देवि तद्गायत्रीति गद्यसे। गयः प्राण इति प्रोक्तस्तस्य त्राणादपीति वा॥ -नारद,
“जो गाने के त्राण (रक्षा) करे वह दैवी गायत्री कही जाती है अथवा जो गय अर्थात् प्राणों का त्राण करने वाली है वह गायत्री है।”
गातारं त्रायते यस्याद् गायत्री तेन गीयते। -स्कन्द पुराण 9/51,
गायन करने वाले का त्राण उद्धार करती है, इसलिए उसे गायत्री कहते हैं।
तेषाएते पंच ब्रह्मपुरुषा स्वर्गस्य लोकस्य द्वार पालस्य एतानेकं पंच ब्रह्म पुरुषात् स्वर्गस्य लोकस्य द्वारपाल वेदास्य कुले वीरो जायते प्रतिपद्यते स्वर्ग लोकम्। -छाँदोग्य
हृदय की चैतन्य ज्योति गायत्री- ब्रह्म रूप है। उस तक पहुँचने के लिए व्यान, अपान, समान, उदान ये पाँच प्राण द्वारपाल हैं। इनको वश में करना चाहिए, जिससे कि हृदयस्थित गायत्री स्वरूप ब्रह्म की प्राप्ति सम्भव हो सके। इस क्रिया से उपासना करने वाले को स्वर्ग-सुख प्राप्त होता है और उसकी कुल परम्परा से वीर जन उत्पन्न होते हैं।
‘गा’ चेति सर्वगा शक्ति, ‘यत्री’ तत्र नियंत्रिका।
अर्थात् ‘गा’ शब्द यह सर्व गायत्री शक्ति का बोधक है। उस शक्ति को जो नियंत्रण करने वाली सत्ता उसे ‘यत्री’ कहना चाहिए। गायत्री अर्थात् सर्वव्यापी परा और अपरा प्रकृति पर नियन्त्रण करने वाली आत्म-चेतना।
‘गा’ कारो गतिदः प्रोक्त ‘य’ कारो शक्ति दायिनी। ‘त्र’ त्राताच तथा विद्धि। ‘ई’ कार स्वयं परम्।
‘गा’ कार से गति देने वाली, ‘य’ कार से शक्ति-दायक ‘त्र’ से त्राण करने वाली और ‘ई’ कार स्वयं परम तत्व का बोधक है।
सर्वलोकान् व्यहारन्तीति व्याहृतयः।
गायत्री तदित्यादिका चतुर्विशत्यक्षराऽष्टाक्षर-पादपरिच्छेदेन त्रिपदी। तस्या भेदत्रय माह। प्राण वै गयास्तेषां त्रायाणां (त्राता) गायत्री। गायन्ते त्रायते वा गायत्री। सवितृप्रकाशनार्थत्वात् जगतः प्रसवित्री सावित्री। वाग्रूप त्वात् सरस्वती। -सन्ध्या भाष्य,
“सब लोकों को जो बतलाती है, प्रतिपादन करती हैं, सूचित करती हैं, वे व्याहृतियाँ कहलाती हैं।”
“गायत्री ‘तत्’ से आरम्भ होकर चौबीस अक्षर वाली है और आठ-आठ अक्षरों की तीन पदों के कारण वह त्रिपदी कहलाती है। इसका भेद बतलाते हुए यह कहा है कि ‘प्राण’ अर्थात् ‘गय’ उसका रक्षण करने वाली वह ‘गायत्री’। अर्थात् गायत्री का जप करने से प्राणों की रक्षा होती है, इसलिये इसका नाम ‘गायत्री’ हो गया है। यही गायत्री सूर्य के समान प्रकाश करने वाली होने से, जगत् को उत्पन्न करने वाली होने से ‘सावित्री’ के नाम से कही जाती है और यही वाणी रूप में होने से ‘सरस्वती’ कही जाती है।
गायत्री में सन्निहित प्राण-शक्ति वस्तुतः परम ब्रह्म परमात्मा का ब्रह्म तेज ‘भर्ग’ ही है। निराकार विश्वव्यापी चेतना के रूप में इसे अनुभव किया जा सकता है। भावों का भगवान मनुष्य अथवा देवता का रूप धारण कर लोक-मंगल के लिए विभिन्न स्तर की लीलाएँ करता रहता है पर वैज्ञानिक का परब्रह्म सचेतन प्राण-शक्ति के रूप में उस विश्व ब्रह्मांड के कण-कण में सन्निहित एवं सक्रिय बना हुआ विद्यमान है। इसका बाहुल्य देवदूत, अवतार, महामानव, नर-रत्न, ऋषि, मनीषी आदि के रूप में देखा जा सकता है। गीता के विभूति योग में भगवान ने अपनी विशेष स्थिति जिन प्राणियों या पदार्थों में वर्णन की है- उनमें इस प्राण-शक्ति की अधिकता ही कारण है।
गायत्री के माध्यम से हम उस ब्रह्म चेतना प्राण-शक्ति से ही अपना संपर्क बनाते और अधिक सचेतन बनने का उपक्रम करते हैं। मनुष्य के सचेतन का ब्रह्म संपर्क इस प्राण-शक्ति के माध्यम से ही होता है। इसलिये गायत्री उपासना को ब्रह्म विद्या के नाम से उपनिषदों, ब्राह्मण ग्रन्थों तथा आरण्यकों में वर्णन किया गया है। ब्रह्म की चर्चा, विवेचना एवं स्तुति प्राण के रूप में भी की गई है।
कहा गया है-
कतमएको देव इति। प्राण इति स ब्रह्म तदित्यावक्षते। -वृहदारण्यक
वह एक मात्र देव कौन है?- वह प्राण है। उसे ही ब्रह्म कहा जाता है।
प्राणो ब्रह्म इति ह स्याह कौषीतकिः। - ब्रह्म संहिता
प्राण ही ब्रह्म है, ऐसा कौषीतकि ऋषि ने व्यक्त किया है।
प्रजापतिश्चरति गर्भे त्वमेव प्रति जायसे। तुभ्य प्राण प्रजास्त्वि या बलिं हरन्ति यः प्राणौः प्रतिष्ठति। -प्रश्नोपनिषद्
हे प्राण! आप ही प्रजापति हैं, आप ही गर्भ में विचरण करते हैं। आप ही पिता-माता के अनुरूप होकर जन्म लेते हैं, यह सब प्राणी आपको ही आत्म-समर्पण करते हैं। वह प्राणों के साथ ही प्रतिष्ठित हो रहा है।
प्राणो ब्रह्म इति हस्माह पैंग्यः। - ब्रह्म संहित
पैंग्य ऋषि ने कहा- प्राण ही ब्रह्म है।
प्राणो विराट् प्राणो देष्ट्री प्राणां सर्व उपासते। प्राणोह सूर्य चन्द्रमाः प्राणमाहुः प्रजापतिम्॥ -अथर्व
प्राण ही विराट् है, वही सब का प्रेरक है। इसी से सब उसकी उपासना करते हैं। प्राण ही सूर्य है, चन्द्रमा है और वही प्रजापति है।
प्राणाय नमो यस्य सर्वमिदं वशे। यो भूतः सर्वस्येश्वरो यस्मिन् सर्व प्रतिष्ठितम्॥ -अथर्व
जिसके अधीन यह सारा जगत है, उस प्राण को नमस्कार है। वही सब का स्वामी है। इसी में यह सारा जगत प्रतिष्ठित है।
सर्वा ऋचः सर्वे वेदाः सर्वे घोष एकैव व्याहृतिः प्राणएव प्राणं ऋच इत्येव विद्यात्। -एतरेय,
जितनी ऋचायें हैं, जितने वेद हैं, जितने शब्द हैं, जितनी व्याहृतियां हैं, ये सब प्राण हैं। उन्हें प्राण रूप समझ कर उन्हीं की उपासना करनी चाहिये।
प्राणो वा ज्येष्ठः श्रेष्ठश्च। -छाँदोग्य
प्राण ही बड़ा है और प्राण ही श्रेष्ठ है।
प्राण एव स पुरिशेति। तं पुरिशेते इति पुरिशयं। सन्त प्राणं पुरुष इत्याचक्षते। -गोपथ,
शरीर रूपी पुरी में निवास करने से उसका स्वामी होने के कारण प्राण ही पुरुष कहा जाता है।
सत पथ ब्राह्मण में कई स्थानों पर प्राण को प्रजापति कहा गया है।
प्राणो हि प्रजापतिः 4/5/5/13
प्राण उ वै प्रजापतिः 8/4/1/4
प्राणः प्रजापतिः 6/3/1/9
सर्व ही दं प्राणोनावृतम्। -एतरेय,
यह सारा जगत् प्राण से आवृत है।
प्राण स्येदं वशे सर्व त्रिदिचे सा प्रतिष्ठितम्। मातेव पुत्रान् रक्षस्व श्रींच प्रसांच विधेहि न इति॥ -प्रश्नोपनिषद्
इस विश्व में जो कुछ है वह सब प्राण के अधीन है। जो कुछ स्वर्ग में है, वह भी प्राण के ही अधीन है। हे प्राण! तू हमें माता के समान पाल और लक्ष्मी तथा जीवन-शक्ति प्रदान कर।
स एष वैश्वानरो विश्व रूपः प्राणोदऽग्नि रुदयेत्। -पिप्पलाद,
यह प्राण ही सारे संसार में वैश्वानर रूप से प्रकट होता है।
अमृतमु वै प्राणः (सत. 9/1/2/32)
“इस मर्त्यपिण्ड को अमृतत्व से संयुक्त रखने वाला प्राण ही है।”
अराइव रथ नाभौ प्राणो सर्व प्रतिष्ठितम्। ऋचो यजूंषि सामानि यज्ञः क्षत्रं ब्रह्म च॥
“रथ चक्र की नाभि में लगे अरों के समान ऋक् की ऋचाएँ, यजु-साम के मन्त्र, यज्ञ, क्षत्रिय, ब्राह्मण आदि सभी इस प्राण में निहित हैं।”
प्रजापतिश्चरसि गर्भे त्वमेव प्रतिजायते। तुभ्यप्राण प्रजास्त्विमा बलिं हरन्ति यः प्राणौः प्रतिष्ठम्॥
“प्रजापति तू ही है, गर्भ में तू ही विचरण करता है और तू ही माता-पिता के समान आकृति वाला होकर उत्पन्न होता है। हे प्राण! यह सब देहधारी तुझे बलि देते हैं। तू देहगत अन्य प्राणों के साथ प्रतिष्ठित है।”
हमारे साँसारिक जीवन को सफल और सार्थक बनाने में भी प्राण का महत्व सर्वोपरि है। जो व्यक्ति यहाँ पर अधोगति की स्थिति में पड़े रहते हैं, उनमें या तो प्राण-शक्ति की न्यूनता होती है अथवा वे उसका प्रयोग गलत तरीके से करते हैं। गायत्री-विज्ञान और उसका विधिवत अभ्यास प्राणों का सदुपयोग करना सिखलाता है। इसलिये गायत्री उपासक यदि अपने लक्ष्य की पूर्ति में दृढ़तापूर्वक लगा रहेगा तो वह अवश्य अपने लोक और परलोक का सुधार कर सकेगा।
“हमारी साहित्यिक गतिविधियाँ क्या हैं” इस संबंध में अनेक महानुभाव पत्र लिख कर पूछा करते हैं। अपने जीवन में जो आध्यात्मिक एवं साधनात्मक उपलब्धियाँ हैं, उनका प्रकाश जन-साधारण तक पहुँचाने की यह विचार-प्रक्रिया हमारे जीवन का विशिष्ट अंग रही है। इस संस्थान ने व्यक्ति और समाज को नव-निर्माण की प्रेरणा देने वाला अलभ्य साहित्य प्रकाशित किया। वेद उपनिषद् दर्शन आदि आर्ष साहित्य तो लिखा ही है, अन्य छोटी-छोटी पुस्तकें भी लिखी हैं, जिन्हें पढ़ कर लोग आध्यात्मिक साधना, उपासना, जीवन-निर्माण, परिवार-निर्माण और समाजोत्थान का कार्य बिना किसी पथ-प्रदर्शन के भी कर सकते हैं। इन पुस्तकों से सैकड़ों हजारों लोगों ने लाभ उठाया है- अन्धकार में प्रकाश पाया है।
अपने सभी परिजनों को उसकी विस्तृत जानकारी देने के लिये यहाँ सम्पूर्ण प्रकाशन की सूची दे रहे हैं, इससे पत्र लिख कर पूछने वाली कठिनाई हल्की होगी और इस साहित्य से लाभ उठाने का अवसर भी मिलेगा।
गायत्री महाविज्ञान (तीनों भाग)
प्रथम भाग- गायत्री विद्या का वैज्ञानिक आधार, गुप्त शक्तियों का रहस्य, नित्य उपासना, अनुष्ठान-विधि, गायत्री संबंधी शंकाओं का समाधान, अनेक कष्टों का निवारण एवं अनेक कामनाओं की पूर्ति के लिए लगाये जाने वाले बीज-मन्त्रों का साधना विधान, आत्म-साक्षात्कार एवं ऋद्धि-सिद्धियों का मार्ग, स्त्रियों की विशेष उपासना-विधियाँ आदि अनेक महत्वपूर्ण विषयों का सुबोध ढंग से प्रतिपादन। मूल्य 3.50
द्वितीय भाग- गायत्री द्वारा वाममार्गी तान्त्रिक विधान के अनुसार मारण, मोहन, उच्चाटन, वशीकरण, मुद्रा आदि के अनेक विधानों का वर्णन तथा गायत्री गीता, गायत्री स्मृति, गायत्री संहिता, गायत्री उपनिषद्, गायत्री रामायण, गायत्री हृदय, गायत्री पंजर, गायत्री लहरी, गायत्री सहस्त्रनाम आदि का संग्रह। मूल्य 3.50
तृतीय भाग- गायत्री महामन्त्र द्वारा 24 प्रकार के योगाभ्यासों की साधना विषयक विधान। जपयोग, प्राणयोग, शब्द-योग, नाद-योग, हठयोग, कुण्डलिनी-योग, षट्चक्र-वेधन की साधनायें तथा अन्नमय-कोष, मनोमय-कोष, प्राणमय कोष को सिद्ध करने के रहस्यमय मार्ग का दिग्दर्शन। मूल्य 3.50
गायत्री यज्ञ विधान (दोनों भाग)
प्रथम भाग- गायत्री यज्ञ का विज्ञान, लाभ एवं महत्व का तर्क, प्रमाण शस्त्र एवं विज्ञान के आधार पर बहुत ही खोजपूर्ण वर्णन। मूल्य 2.00
द्वितीय भाग- गायत्री यज्ञ करने की शास्त्रोक्त विधि प्रक्रिया, जलयात्रा, मण्डप प्रवेश, वेदी पूजन, कुशकण्डिका, अग्निस्थापन, आहुति मन्त्र, पूर्णाहुति, वसोधारा, घृत अवघ्राण, भस्मधारण, अभिसिंचन आदि का पूरा विधि-विधान, जिसे समझ कर बड़े यज्ञों का आचार्यत्व किया जा सकता है। मूल्य 2.00
3. गायत्री चित्रावली
विविध प्रयोजनों के लिए गायत्री माता का ध्यान करने योग्य आर्ट पेपर पर छपे 24 तिरंगे चित्र तथा सरल भाषा में उनका महत्व प्रतिपादन। मूल्य 1.50
4. गायत्री का मन्त्रार्थ
अनेकों ग्रन्थों में, अनेकों ऋषियों द्वारा गायत्री महामन्त्र के अनेकों प्रकार से किए हुए अर्थों का संग्रह, राक्षस राज रावण का किया हुआ अर्थ भी इसमें है। मूल्य 1.50
5. छोटा गायत्री प्रचार साहित्य-सेट 1.25
6. संक्षिप्त हवन-विधि 0.20
7. दैनिक साधना विधान 0.20
8. गायत्री माता के तिरंगे चित्र, चालीसा 6-6 पैसे और युग-निर्माण सत्संकल्प 2 पैसे डडडड
पर्व और संस्कार मनाने के ऐसे सरल रूप का आग्रह किया जा रहा था, जिसमें कुछ समझने सोचने की आवश्यकता न पड़े और अजनबी भी उन पुस्तकों को खोल कर पर्व या संस्कार करा सके। इस माँग के अनुरूप हर संस्कार, पर्व की अलग-अलग पुस्तकें तो नहीं पर दो-दो को मिला कर एक-एक छोटी पुस्तक छपा दी गई है। आयोजन करते समय उपस्थित सुशिक्षितों के पास एक-एक पुस्तक हो तो सभी साथ-साथ मन्त्रोच्चारण करके उस क्रियाकलाप की शोभा बहुत ही सुन्दर रीति से बढ़ा सकते हैं।
पर्व पुस्तकें
(1) श्रावणी पर्व विधान मूल्य 50 पैसे
(1) पितृ-अमावस्या पर्व विधान 40 पैसे
(1) विजय-दशमी और दीपावली पर्व 50 पैसे
(1) गीता-जयन्ती और बसन्त-पंचमी पर्व 40 पैसे
(1) शिवरात्रि और होलिका पर्व विधान 50 पैसे
(1) गायत्री जयन्ती और गुरु पूर्णिमा पर्व 40 पैसे
संस्कार पुस्तकें
(1) पुँसवन और नामकरण संस्कार 40 पैसे
(7) पुंसवन और नाम करण संस्कार 40 पैसे
(8) अन्न-प्राशन चूड़ाकर्म और विद्यारम्भ 40 पैसे
(9) यज्ञोपवीत और वानप्रस्थ संस्कार 40 पैसे
(10) विवाह संस्कार 50 पैसे
(11) मरणोत्तर और अंत्येष्टि संस्कार 50 पैसे
(12) जन्म-दिवसोत्सव, विवाह-दिवसोत्सव 40 पैसे
धर्म-मंच से युग-निर्माण का प्रेरणाप्रद साहित्य
(1.) रामायण कथा 6.00, (2) गीता-कथा 6.00, (3) गीता पद्यानुवाद 3.00, (4) अभिनव संस्कार पद्धति 2.50, (5) पर्वों की प्रेरणा और पद्धति 2.00, (6) सत्य-नारायण कथा 0.75 पैसे, (7) सत्यनारायण पद्यानुवाद 0.40 पैसे
नव-निर्माण का प्रेरणाप्रद साहित्य
मनुष्य जीवन की विभिन्न समस्याओं पर रचनात्मक दृष्टिकोण रख कर यह 1) मूल्य की पुस्तकमाला लिखी गई है। आत्म-निर्माण एवं आत्म-विकास के लिये हम क्या करें, शरीर, सम्बन्धियों एवं समाज के उत्थान के लिये क्या करें, उसका भावनात्मक एवं क्रियात्मक मार्गदर्शन प्रस्तुत पुस्तकों में मिलेगा। प्रत्येक पुस्तक का मूल्य कुल 1) रु.
आध्यात्मिक, धार्मिक एवं साधनात्मक-
ईश्वर और उसकी प्राप्ति। 2. वेदों का दिव्य संदेश। 3. पन्थ अनेक लक्ष्य एक। 4. आप सर्व शक्तिमान हैं। 5. आत्म-कल्याण का राज-मार्ग। 6. जिन्दगी कैसे जियें? 7. सद्गुणों की सच्ची सम्पत्ति। 8. अपना उद्धार आप करें। 9. आशा की जीवन-ज्योति। 10. विचारों की अलौकिक शक्ति। 11. संकल्प शक्ति के अद्भुत चमत्कार। 12. प्रगति के पथ पर। 13. मनुष्य का मूल्याँकन। 14. चिन्ता छोड़िये-प्रसन्न रहिये। 15. इन दुर्गुणों को छोड़िये। 16. मानसिक कमजोरियों से कैसे बचें?
नव-निर्माण का दर्शन एवं मार्ग-
हम बदलें तो दुनिया बदले। 2. समाज की अभिनव रचना। 3. समस्त समस्याओं का एक ही हल। 4. नये युग की नई प्रेरणा। 5. हमारी युग-निर्माण योजना। 6. नये युग का सूत्रपात। 7. विष से अमृत की ओर। 8. शिखा और यज्ञोपवीत का रहस्य। 9. मनुष्य में ईश्वर की झाँकी। 10. जीवन संग्राम में कैसे जीतें? 11. आप लेखक कैसे बनें? 12. प्रभावशाली वक्ता बनने की कला? 13. राष्ट्र की निर्मात्री नारी। 14. विदेशियों से इतना तो सीखें।
आरोग्य-रक्षा और प्राकृतिक चिकित्सा-
1. आरोग्य रक्षा के रहस्य। 2. क्या खायें? कैसे खायें? 3. बलवर्धक व्यायाम। 4. शक्ति का स्त्रोत प्राणायाम। 5. कब्ज कैसे दूर हो? 6. प्राकृतिक चिकित्सा ज्ञान। 7. कल्प चिकित्सा। 8. तम्बाकू घातक विष है। तुलसी के चमत्कारी गुण।
डडडड निर्माण साहित्य-
1. शिशु जन्म से पूर्व। 2. शिशु और अभिभावक। 3. हमारे महान उत्तराधिकारी। 4. बच्चे और उनका मनोविज्ञान। 5. बालकों का नव-निर्माण। 6. बाल-विकास की समस्यायें। 7. बच्चों को कैसे सुधारा जाय? 8. बच्चों की शिक्षा-दीक्षा। 9. बालकों को इन दुर्गुणों से बचाइये। 10. बच्चे सद्गुणी कैसे बनें? 11. बालकों को इस तरह सुधारिये।
पारिवारिक समस्याओं का हल-
1. परिवार और उसका निर्माण। 2. सुख-शांतिमय गृहस्थ। 3. सुसंतुलित परिवार। 4. मितव्ययी बनिये-सुखी रहिये।
कथा इतिहास और जीवन-चरित्र-
1. धर्म पुराणों की सत् कथायें। 2. चरित्र-निर्माण की कथायें। 3. भारत की महान विभूतियाँ। 4. संसार के महापुरुष। 5. बड़ों की बड़ी बातें। 6. व्रत और त्यौहार।
कविता और गायन-
1. युग-संदेश। 2. युग-गायन। 3. युग-वीणा। 4. उद्बोधन। 5. दोहा अन्त्याक्षरी।
नव-निर्माण के शतसूत्री कार्यक्रमों को व्यापक बनाने के लिये लागत मात्र मूल्य के अत्यन्त सस्ते, सुन्दर, आकर्षक और प्रेरणाप्रद ट्रैक्ट छापे गये हैं। इन्हें स्वयं पढ़ना और दूसरों को पढ़ाना या सुनाना जन-मानस को सुसंस्कृत एवं परिष्कृत करने के लिये आवश्यक है। अब तक 170 ट्रैक्ट छप चुके हैं। प्रत्येक का मूल्य 25 पैसे है।
(1) विवाह के आदर्श और सिद्धान्त। (2) तीन दिन का सत्यानाशी विवाहोन्माद। (3) विवाहोन्माद के लिये बुद्धि क्यों बेच दी जाय? (4) विवाह-शादियों का असह्य अपव्यय। (5) इस हृदय-द्रावक स्थिति को कब तक सहा जायेगा? (6) यह कुरीतियाँ मिट रही हैं और मिटेगी। (7) विवाह का वातावरण धर्मानुष्ठान जैसा रहे। (8) धर्म विवाहों की रूपरेखा। (9) आदर्श विवाहों का प्रचलन कैसे हो? (10) प्रगतिशील जातीय संगठनों की आवश्यकता। (11) हम भाग्यवादी नहीं कर्मवादी बनें। (12) अन्ध-विश्वासी नहीं विवेकशील बनिये। (13) अन्ध-विश्वास से लाभ कुछ नहीं हानि अपार है। (14) भिक्षा व्यवसाय देश और समाज का कलंक। (15) मन्दिर जन-जागरण केन्द्र बनें। (16) उनसे जो पचास के हो चले। (17) साधु की महान परम्परा और जिम्मेदारी। (18) ब्राह्मण अपना उत्तरदायित्व संभालें। (19) स्वच्छता का प्रथम गुरुमन्त्र (20) दर्शन तो करें- पर इस तरह। (21) आलस्य छोड़िये, परिश्रमी बनिये! (22) पक्षपात त्यागें, औचित्य अपनायें! (23) माँसाहार मानवता के विरुद्ध है। (24) तम्बाकू- एक भयानक दुर्व्यसन। (25) प्राणियों के प्रति निर्दयता न करें। (26) अपव्यय का ओछापन। (27) मृतक भोज की क्या आवश्यकता? (28) नारी को तिरस्कृत न किया जाय। (29) अशिष्टता न कीजिये! (30) ईमानदारी का परित्याग न करें। (31) खाद्य समस्या और उसका हल। (32) आहार में असंयम न बरतें। (33) सन्तान की संख्या न बढ़ाइये। (34) गन्दगी की घृणित असभ्यता। (35) शाकाहारी व्यंजन। (36) व्यायाम- हमारी एक अनिवार्य आवश्यकता। (37) वृक्षारोपण- एक पुनीत पुण्य। (38) शाक उगायें, अन्न बचायें। (39) पुस्तकालय- सच्चे देवालय। (40) निरक्षरता का कलंक धो दिया जाय। (41) परिवार को सुसंस्कृत कैसे बनायें? (42) हम सच्चे अर्थों में आस्तिक बनें। (43) संस्कारों की परम्परा। (44) पर्व और त्योहारों से प्रेरणा ग्रहण करें। (45) लोक-निर्माण के लिये जन-गायन। (46) विवाह-दिवसोत्सव कैसे मनावें? (47) जन्म-दिवसोत्सव इस तरह मनावें। (48) गायत्री-यज्ञों की विधि-व्यवस्था। (49) गायत्री-यज्ञों की विधि-व्याख्या। (50) प्रबुद्ध व्यक्ति धर्मतन्त्र संभालें। (51) सत्कार्यों का अभिनन्दन किया जाय। (52) पुंसवन संस्कार विवेचन। (53) नामकरण संस्कार विवेचन। (54) अन्नप्राशन संस्कार विवेचन। (55) चूड़ाकर्म विवेचन। (56) विद्यारम्भ संस्कार विवेचन। (57) यज्ञोपवीत संस्कार विवेचन। (58) विवाह संस्कार विवेचन। (59) वानप्रस्थ विवेचन। (60) अन्त्येष्टि संस्कार विवेचन। (61) मरणोत्तर संस्कार विवेचन। (62) बाल-विवाह की भयंकरता से समाज को बचाया जाय। (63) बच्चों को सद्गुणी कैसे बनायें? (64) छात्रों का निर्माण अध्यापक करें। (65) हरिजन उत्कर्ष के लिये बड़े कदम उठें। (66) नारी उत्थान के लिये महिलायें आगे आवें। (67) पशु-बलि हिन्दू धर्म का कलंक। (68) नव-निर्माण के लिये जन-सम्मेलन। (69) विधवा विवाह शास्त्र विरुद्ध नहीं। (70) क्या मनुष्य पशु-पक्षियों से भी गिरा रहेगा। (71) खाया कैसे जाय? (72) शरीर को स्वस्थ रखिये। (73) आरोग्य का आधार शारीरिक श्रम। (74) कपड़ों से जकड़े न रहिये। (75) ब्रह्मचर्य- जीवन की अनिवार्य आवश्यकता। (76) सर्वोपयोगी सरल व्यायाम। (77) स्वस्थ रहना है तो यह खाइये। (78) कब्ज से कैसे बचें और कैसे छूटें? (79) श्वास सही तरीके से लीजिये। (80) दूध पियें तो इस तरह। (81) उत्कृष्ट और परिकृष्ट जीवन। (82) मन की तुष्टि आत्मा की दुर्गति। (83) मन के हारे हार है, मन के जीते जीत। (84) अपने दोषों को ढूंढ़े और निकालें। (85) मरने से डरना क्या? (86) कलात्मक जीवन जियें। (87) जिंदगी हँसते-खेलते जियें। (88) सुखी इस तरह रहा जा सकता है। (89) जीवन श्रेष्ठ व सार्थक बनें। (90) जीवन लक्ष्य भुला न दिया जाय। (91) सन्तोषी सर्वदा सुखी। (92) मत असन्तुष्ट रहिये, मत खिन्न हूजिये। (93) कामना और वासना की मर्यादा। (94) अपना दृष्टिकोण बदलें। (95) असन्तोष की आग में यों न जलें। (96) धन्योगृहस्थाश्रमः। (97) परिवार को सुसंस्कार बनायें। (98) परिवार का पालन ही नहीं निर्माण भी। (99) सुखी और सफल दाम्पत्य जीवन। (100) दाम्पत्य जीवन में स्वर्ग का अवतरण। (101) क्या नारी इस दुर्दशा में पड़ी रहेगी? (102) सुयोग्य नारी-सुख गृहस्थ (103) पुत्र की कामना से उद्विग्न क्यों? (104) धन का उपार्जन और उपयोग। (105) मित्रता क्यों, कैसे और किससे? (106) स्वाध्याय में प्रमाद न करें। (107) बोलिये तो पर इस तरह। (108) बच्चों का भावनात्मक विकास। (110) बच्चों का प्रशिक्षण घर की पाठशाला में। (111) चरित्र का निर्माण सबसे बड़ा निर्माण। (112) सद्गुण बढ़ायें सुसंस्कृत बनें। (113) व्यक्तिवाद नहीं- समूहवाद। (114) परोपकारी और सेवाभावी बनिये। (115) स्वार्थ और परमार्थ का समन्वय। (116) अपना सुधार संसार की सबसे बड़ी सेवा। (117) पहले अपने को सुधारें। (118) उद्धरेदात्मनात्मानम्। (119) संयम हमारी एक महत्वपूर्ण आवश्यकता। (120) मनोबल की चमत्कारी शक्ति (121) अनर्थकारी गलत-फहमियों से बचे रहें। (122) धैर्य सब सफलताओं का मूल है। (123) ज्ञान-योग की साधना। (124) कर्म-योग की रीति-नीति। (125) भक्ति-योग का वास्तविक स्वरूप। (126) प्रेम ही परमेश्वर है। (127) उपासना जीवन की अनिवार्य आवश्यकता। (128) हम ईश्वर से विमुख न हों। (129) गृहस्थ एक योग साधना। (130) आत्मा की पुकार अनसुनी न करें। (131) हम सशक्त और साहसी बनें। (132) सफलता आत्मविश्वासी को मिलती है। (133) जो करें मन लगाकर करें। (134) आराम नहीं, काम कीजिये। (135) विनोद और उल्लास की प्रवृत्तियाँ। (136) मित्रता करें पर समझ-बूझ कर। (137) बचत ही आपकी असल आय है। (138) उतावली न करें-उद्विग्न न हों (139) दूसरों के दोष-दुर्गुण ही न देखा करें। (140) प्रतिकूल परिस्थितियों में भी उद्विग्न न हों? (141) कठिनाइयों से डरिये नहीं- लड़िये। (142) निराशा को पास न फटकने दें। (143) आवेशग्रस्त होने की अपार हानि। (144) विचारों की उत्कृष्टता प्रगति का मूल मंत्र (145) मानसिक स्थिति का स्वास्थ्य पर प्रभाव। (146) न डरिये न अशांत हूजिये। (147) अहंकार में डूब मत जाना (148) सज्जनता की राह। (149) हम दुर्बल नहीं, शक्तिशाली बनें। (150) धर्म-रक्षा से आत्म-रक्षा होगी। (151) मर्यादाओं का उल्लंघन न करें। (152) समय का सदुपयोग करें। (153) हम सुख शान्ति से वंचित क्यों हैं? (154) सशक्त दीर्घजीवन का राजमार्ग। (155) अपूर्णता से पूर्णता की ओर (156) काम आयेंगे अपने ही हाथ। (157) विद्या की सम्पत्ति निरन्तर बढ़ाते रहें। (158) अपना उत्साह शिथिल न होने दें। (159) टोना टोटका, जन्तर मन्तर (160) जीतता है सत्य ही, असत्य नहीं। (161) बच्चों का निर्माण घर की पाठशाला (162) उत्तम साहित्य से संपर्क स्थापित कीजिये। (163) अति भावुकता से सावधान (164) उच्च शिक्षित कन्या की विवाह समस्या (165) झूठी आलोचना से परेशान न रहें। (166) वे गरीब बच्चे महान बनें? (167) अपनी आर्थिक स्थिति डगमगाये मत। (168) प्रशंसा की सृजन शक्ति से आश्चर्यजनक सुधार। भोला पुस्तकालय अमृत कलश। (170) ज्ञान-यज्ञ का उद्देश्य और स्वरूप (171) गोरस बेचना हरिमिलन एक पन्थ दो काज। (172) मनुष्य में देवत्व।
कविता और कहानियों की नई ट्रैक्ट माला
इन पुस्तिकाओं के पृष्ठ ट्रैक्टों की अपेक्षा अधिक हैं। उसी अनुपात से इनका मूल्य भी अधिक रखा गया है। इन पुस्तिकाओं का मूल्य 40-40 पैसा है। 12 कहानियों और 7 कविताओं के कुल 19 ट्रैक्ट इस सीरीज में इस वर्ष छपे हैं।
12 कहानी ट्रैक्ट- 1. समाधि द्वीप, 2. ज्योति बुझती नहीं 3. प्रकाश की ओर 4. भगवान के दरबार में 5. एक थे राजा 6. प्रेरणाप्रद कथा गाथायें, 7. सौम्यवाद, 8. अविस्मरणीय संस्मरण, भाग-1, 9. अविस्मरणीय संस्मरण भाग-2, 10. अविस्मरणीय संस्मरण भाग-3, 11. सन्त समागम, 12. प्रेम-प्रसंग।
8. कविता ट्रैक्ट-
1. ज्योति किरण 2. नवयुग का नया निर्माण 3. अपना दीप जलाओ 4. अभिवन्दना 5. अभिव्यंजना 6. युग निमन्त्रण 7. मंगल किरण 8. अवतार कथा।
जीवन चरित्र की ट्रैक्ट माला
युग-निर्माण योजना का उद्देश्य राष्ट्र की भावी पीढ़ी को सशक्त, समर्थ और विचारवान बनाना है। यह तेजस्विता महापुरुषों की जीवन शैलियों के अनुसरण से सम्भव होती है। अब तक सीरीज में बत्तीस ट्रैक्ट छप चुके हैं, इन पुस्तिकाओं का मूल्य 40-40 पैसा रखा गया है।
1. जगद्गुरु शंकराचार्य 2. स्वामी विवेकानन्द 3. महावीर स्वामी 4. ईश्वर चन्द्र विद्यासागर 5. महर्षि कर्वे 6. ठक्कर बाबा, 7. महापुरुष लेनिन 8. महर्षि कार्लमार्क्स 9. पवित्रात्मा बहा 10. ठाकुर दयानन्द 11. महाप्रभु चैतन्य 12. स्वामी केशवानन्द 13. प्रभु जगद्बन्धु 14. महात्मा एण्ड्रूज 15. अब्राहम लिंकन 16. केशव चन्द्र सेन 17. राजा राम मोहनराय 18. गोपाल कृष्ण गोखले 19. श्रीमती ऐनी बेसेन्ट 20. रामकृष्ण परमहंस 21. महायोगी अरविन्द 22. दादाभाई नौरोजी 23. सन्त कबीर 24. महारानी अहिल्याबाई 25. गुरु गोविन्द सिंह 26. टोयोहिको कागावा 27. वीर शिवाजी 28. दुर्गादास 29. महात्मा फ्रांसिस 30. स्वामी सहजानन्द 31. वीर सावरकर 32. सिस्टर निवेदिता।
इन पुस्तकों का मूल्य लागत से थोड़ा ही अधिक रखा गया है। इसलिए कमीशन देना सम्भव नहीं रहा। डाक व्यय में राहत देने के लिए 10 रु. कीमत से अधिक की पुस्तकों पर 15 प्रतिशत कमीशन दिया जाता है। 100 रु. से अधिक की पुस्तकें मंगाने पर 25 प्रतिशत अधिकतम कमीशन देने की व्यवस्था है। पर डाक व्यय हर स्थिति में मंगाने वाले को ही देना पड़ता है। बड़े आर्डरों के साथ 10 रु. पेशगी और समीपवर्ती रेलवे स्टेशन का नाम लिखना आवश्यक है।
*समाप्त*