थाईजेन्ड ग्रीनलैण्ड पार्क में स्वामी विवेकानन्द का ओजस्वी भाषण हुआ। उन्होंने संसार के नव-निर्माण की आवश्यकता का प्रतिपादन करते हुए कहा- ‘‘यदि मुझे सच्चा आत्म-समर्पण करने वाले बीस लोक-सेवक मिल जायें, तो दुनिया का नक्शा ही बदल दूँ।”
भाषण बहुत पसन्द किया गया और उसकी सराहना भी की गई, पर सच्चे आत्म-समर्पण वाली माँग पूरा करने के लिए एक भी तैयार न हुआ।
दूसरे दिन प्रातःकाल स्वामीजी सोकर उठे तो उन्हें दरवाजे से सटी खड़ी एक महिला दिखाई दी। वह हाथ जोड़े खड़ी थी।
स्वामीजी ने उससे इतने सवेरे इस प्रकार आने का प्रयोजन पूछा, तो उसने रूंधे कंठ और भरी आँखों से कहा- भगवन्! कल आपने दुनिया का नक्शा बदलने के लिए सच्चे मन से आत्म-समर्पण करने वाले बीस साथियों की माँग की थी। उन्नीस कहाँ से आयेंगे यह मैं नहीं जानती, पर एक मैं आपके सामने हूँ। इस समर्पित मन और मस्तिष्क का आप चाहे जो उपयोग करें।
स्वामी विवेकानन्द गद्-गद् हो गये। इस भद्र महिला को लेकर वे भारत आये। उसने हिन्दू साध्वी के रूप में नव-निर्माण के लिए जो अनुपम कार्य किया उसे कौन नहीं जानता। वह महिला थी भगिनी निवेदिता- पूर्व नाम था मिस नोबल।
आस्तिकता का अर्थ और स्वरूप गहराई से न समझ सकने वाले संसार के कतिपय समाजों ने उसे एक निरर्थक ईश्वरवाद मान कर अपने से बहिष्कृत कर नये नैतिक स्वरूप का प्रवर्तन किया और आशा की कि इस प्रकार अपने समाज में स्थायी सुख-शाँति और सामान्य सदाचार को मूर्तिमान करने में सफल हो सकेंगे। किन्तु उनकी यह आशा पूरी होती नहीं दिखलाई दी।
इस नये प्रयोग को समाजवाद, राष्ट्रवाद अथवा साम्यवाद के नाम से पुकारा गया और कहा गया कि यदि समाज के लोग अपनी निष्ठा को न दिखने वाले ईश्वर की ओर से हटा कर इन यथार्थवादों में लगायें तो समाज में स्थायी सुख-शांति की स्थापना हो सकती है। पिछले पचपन-पचास वर्ष से इस नई विचार-धारा का परीक्षण एवं प्रयोग साम्यवादी कहे जाने वाले देशों में होता चला आ रहा है। किन्तु उसका परिणाम देखते हुए यही मानने पर मजबूर होना पड़ता है कि यह प्रयोग सफलता से आभूषित न हो सका। उदाहरण के लिए साम्यवाद की मूलभूमि रूस को ही ले लिया जाये और देखा जाये कि क्या उसका समाज अपनी नवीन आस्थाओं के आधार पर अपने जनसमूह के लिये वह वांछित सुख-शाँति अर्जित कर सका है, जिसके लोभ से उसने उनका प्रवर्तन किया था?
राष्ट्रवाद और समाजवाद का भरपूर शिक्षण एवं प्रशिक्षण देने के बावजूद भी क्या उसके समाज में वह मानवीय सदाचार प्रौढ़ हो सका है, जो सुख-शाँति का मूल-आधार है? यदि सच पूछा जाये तो वहां अपराधों की संख्या अधिक ही है, अपेक्षाकृत उन समाजों के जो अब भी आस्तिकता और ईश्वर में आस्था रखते हैं। भ्रष्टाचार मिटाने और सदाचार लाने के लिए राजदण्ड को कठोर से कठोर बना दिया गया है, दुष्प्रवृत्तियाँ रोकने के लिए उत्पीड़न और रक्तपात भी कम नहीं किया जाता तब भी मन्तव्य की सिद्धी होते नहीं दिखती।
ऊपर से देखने में तो ऐसा ही लगता है कि दमन, नियंत्रण और प्रतिबन्धों ने जनता का हृदय परिवर्तित कर दिया है। लोग समाजवाद और राष्ट्रवाद की दुहाई भी देते हैं। भ्रष्टाचार आदि अहितकर प्रवृत्तियों के प्रति घृणा भी दिखलाते हैं। किन्तु वास्तविकता यह है कि लोगों में खुल खेलने का साहस तो कम हो गया है पर भीतर-ही-भीतर अनैतिकता की आग बराबर सुलगती रहती है, जो अवसर पाकर भय और आतंक को एक ओर ठेल कर जब-तक प्रकट होती रहती है। यह तो सच्चा सुधार नहीं माना जा सकता।
दमन, दण्ड और आतंक के भय से यदि ऊपर-ऊपर से किन्हीं सदाचारों का प्रदर्शन करते रहा जाय और भीतर ही भीतर उसे मजबूरी अथवा अत्याचार समझा जाये तो उसे सच्ची सदाचार प्रवृत्ति नहीं माना जा सकता। सच्चा सदाचरण तो तब माना जायेगा जब बाह्य के साथ मनुष्य का हृदय भी उसे स्वीकार करे। अक्सर आने पर और कोई भय अथवा प्रतिबन्ध न रहने पर भी लोग सहर्ष उसकी रक्षा करें। आतंक से प्रेरित मनुष्य का कोई भी गुण, गुण नहीं बल्कि एक याँत्रिक प्रक्रिया होती है। जिसका न कोई मूल्य है न महत्व।
नये प्रयोग के अगुआ रूस में ही आये दिन शीर्षस्थ नेताओं को देशद्रोही ठहरा कर या तो मौत के घाट उतारा जाता है अथवा निर्वासित कर दिया जाता है, एक दिन के देशभक्त दूसरे दिन समाज-विरोधी करार दे दिए जाते हैं। यह घटनायें क्या प्रकट करती हैं? यही तो कि या तो अपदस्थ नेता ने भ्रष्टाचार का प्रमाण दिया है अथवा दूसरे पक्ष में वैसा करके अनैतिकता का परिचय दिया है। दोनों स्थितियों में बात एक जैसी ही है। अर्थात् उक्त समाज में वह सदाचार विकसित नहीं हुआ है जिसकी आशा से नास्तिकता परक समाजवाद अथवा राष्ट्रवाद का नया प्रयोग किया गया था।
वहीं क्यों जर्मनी, इटली, स्पेन, चीन आदि उसी विचार-धारा के देशों में तो सामाजिक एवं राष्ट्रीय सदाचार लाने के लिये प्रचण्ड अधिनायकवाद का अवलम्बन लिया गया और जनता का हृदय बदलने के लिए लोभहर्षक रक्तपात तक किया गया, किन्तु उसका फल, अशाँति, संघर्ष, असंतोष के सिवाय कुछ भी न निकला। आये दिन नेताओं में मार-काट और छीना-झपटी के समाचार आते रहते हैं। जब नये प्रयोगवादी देशों के शीर्षस्थ नेताओं के सदाचार की यह दशा है तो जनसाधारण का नैतिक स्तर क्या होगा, इसका अनुमान कर सकना कठिन नहीं है।
आशा की गई थी कि समाज के बुरे लोगों और उसके विरोधियों का दमन के बल पर कुचल डालने से जनता का हृदय परिवर्तन हो जायेगा और वह अच्छे रास्ते चल पड़ेगी। कुछ ही समय में समाज में सुख-शाँति की स्थायी स्थापना हो जायेगी। किन्तु यह केवल एक अत्याचार बन कर रह गया। उससे किसी वाँछित फल की उपलब्धि न हो सकी।
जनता का सुधार तो दूर स्वयं समाज के अगुओं में ही परस्पर विश्वासघात, भय, निष्ठुरता और आशंका के दोष समाहित हो गये। लोभ, स्वार्थ और अधिकार की लिप्सा ने उन्हें हद-दर्जे का ईर्ष्यालु, प्रतिस्पर्धी और निर्दयी बना दिया। यह नास्तिकता परक समाजवाद, राष्ट्रवाद अथवा साम्यवाद के नये प्रयोगों की असफलता के लक्षणों के सिवाय और कुछ नहीं है।
वास्तविक सदाचार के बीज आस्तिकता के ही पवित्र आँचल में रहते हैं। नास्तिकता से प्रेरित अन्य विचारों अथवा भावनाओं में नहीं। सर्वसाक्षी एवं सर्वशक्ति मान ईश्वर में विश्वास रखना ही एकमात्र ऐसा उपाय है जो सत्प्रवृत्तियों को किसी नीति अथवा प्रयोग के रूप में नहीं, वरन् मानव-जीवन भी मूलभूत आधार-शिला के रूप में हृदयंगम करने के लिये प्रेरणा देता है। ईश्वर के महत्व और उसकी सर्वोपरि सत्ता में मनुष्य की आत्मा स्वभावतः विनम्र रहती और आस्था रखती है। मनुष्य की सत्ता की भाँति उसकी सत्ता के प्रति ईर्ष्या, द्वेष, स्पर्धा अथवा घृणा नहीं रखती। जहाँ मनुष्य, मनुष्य के बल-प्रेरित नियमों एवं प्रतिबन्धों में विवशता का अनुभव करता है वहाँ प्रभु के दिए प्रतिबन्धों को एवं नियमों को शिरोधार्य करने में गौरव तथा सुख अनुभव करता है।
परमात्मा सत्य एवं शिव रूप है अस्तु उसमें विश्वास रखने वाला उसकी इच्छा का अनुगमन करने वाला आस्तिक कोई भी ऐसा काम करने से विरत ही रहने का प्रयत्न करेगा जो उसके मान्य परमात्मा के नियमों के विरुद्ध हो। सदाचार ही एक ऐसी प्रवृत्ति है जिसका आधार लेकर चलने से आरोग्य कामों की सम्भावना नहीं रह जाती। इसीलिए आस्तिक व्यक्ति बहुधा सदाचारी ही देखे जाते हैं।
आस्तिक व्यक्ति उपयोगिता-अनुपयोगिता की कसौटी पर कस कर मानवीय नैतिकता की महत्ता को कम या अधिक नहीं करते। उनकी दृष्टि में नैतिकता का महत्व एवं मूल्य निश्चित और स्थिर रहा करता है। उपयोगिता और अनुपयोगिता के आधार पर नैतिक नियमों की अदली-बदली करते रहने से सदाचार जीवन का आधार न रह कर एक साधारण-सा नियम मात्र रह जाता है जिसको आवश्यकतानुसार तोड़ डालने में कोई संकोच नहीं किया जाता।
उदाहरण के लिए माँसाहार को ले लीजिए। जहाँ आस्तिक व्यक्ति इसके प्रति एक स्थिर नैतिक भाव रखता है और किसी परिस्थिति में उसका प्रयोग पाप मानता है। वहाँ नास्तिक भौतिकवादियों की दृष्टि में इस सदाचार को कोई निश्चित महत्व नहीं होता, उपयोगिता अनुपयोगिता की दृष्टि से वह बढ़ता-घटता रहता है। इस विचारधारा के लोग जब आर्थिक, स्वाद अथवा किसी अन्य दृष्टि से माँसाहार की उपयोगिता स्वीकार कर लेते हैं तो फिर इसके पीछे निरीह प्राणियों की हत्या का जो पाप सन्निहित रहता है उसकी ओर उनका ध्यान नहीं जाता। वे निरापराध प्राणियों को मर्मांतक पीड़ा देकर उनका प्रणाघात करने में कोई हानि नहीं मानते और कुतर्क द्वारा विरोधियों का शमन करने का प्रयत्न करते हैं।
उपयोगितावादी इस प्रकार के नास्तिक लोग ही इससे आगे बढ़ कर मनुष्यों के सुख-दुख में पाप-पुण्य का विचार न करके उपयोगिता का ही दृष्टिकोण रखते हैं। जो व्यक्ति चिड़ियों के शिकार में माँस के लाभ और मनोरंजन की उपयोगिता को महत्व दे सकता है वह इसी नीति के आधार पर अवसर आने पर मनुष्यों का शिकार भी करने लगे तो कोई आश्चर्य की बात नहीं। संसार में जो भी आततायी और अत्याचारी हुए हैं और जिन्होंने मानव जाति का भयानक संहार किया है उन्होंने अपनी दृष्टि में उस नाहक रक्तपात की भी कोई-न-कोई उपयोगिता ही मानी है। आज के महायुद्ध तो उपयोगिता के नाम पर ही लड़े जाने लगे हैं। इस प्रकार का उपयोगितावाद मनुष्य को स्वार्थी एवं अवसरवादी ही बना सकता है, आदर्श सदाचारी नहीं। यह शक्ति और यह निष्ठा किसी सच्चे आस्तिक में ही सम्भव हो सकती है, जिसके लिए सदाचार का मूल्य जीवन के आधार के रूप में होता है, उपयोगिता के रूप में नहीं।
आस्तिकता का जन्म सदाचार से हो सकता है, किन्हीं को बड़े भौतिक लाभ न हों, फिर भी इसके द्वारा जो आध्यात्मिक लाभ होते हैं उनकी तुलना संसार के समस्त वैभव के साथ भी नहीं की जा सकती। उसके असंख्यों अभौतिक लाभ हैं। स्वर्ग और मुक्ति का प्राप्त होना, भव-बंधनों से छूटना, जीवन, जन्म का वास्तविक सुख मिलना, आत्म-बल, आत्म-शक्ति और आत्मानन्द के साथ ईश्वर की करुणा, उसकी कृपा आदि ऐसी उपलब्धियाँ हैं, जिनकी तुलना में भौतिक विभूति न केवल नगण्य ही हैं, बल्कि हेय भी हैं। आस्तिकता के आधार पर ईश्वर की महती कृपा पाकर जब जीवन के दुःखों से अनायास ही छुटकारा पाया जा सकता है, तो सुख-सुविधा के लिए अनैतिक आधार पर वैभव इकट्ठा करने के लोभ की कोई उपयोगिता नजर नहीं आती।
आस्तिकता का भौतिक जीवन में कोई उपयोग नहीं है- यह बात किसी प्रकार भी मान्य नहीं है। क्या संसार के परम आस्तिक भक्तजनों को कोई साँसारिक लाभ हुए ही नहीं? उन्हें भोजन, वस्त्र, मान सम्मान आदि साँसारिक उपलब्धियों में से किस बात की कमी रही है? यह बात दूसरी है कि उन्होंने भौतिक विभूतियों के प्रति अनासक्त रह कर ही उनका उपयोग किया है, साँसारिक उपभोगवादियों की तरह जीवन का लक्ष्य बना कर भोग नहीं किया है। वह ऐसा करते भी क्यों? जब उनकी उच्च एवं परिपक्व आस्तिकता ने उनके हृदय में अहेतुक आनन्द का सागर लहरा दिया था, तो वे इन नश्वर भोगों की ओर क्या तो आकृष्ट होते और क्या लालायित।
संसार में स्थायी सुख शाँति के लिए नित्य नये प्रयोगों एवं परीक्षणों को छोड़ कर यदि सदा सर्वदा के परखे और प्रामाणिक, सदाचार मूलक आस्तिकता का उपाय ग्रहण किया जाये, इसको ही मनुष्यों के हृदय में प्रेरित एवं स्थिर बनाया जाये, तो कोई कारण नहीं कि मानव जाति का हृदय अनुकूल दिशा में परिवर्तित न हो जाये और संसार में सत्प्रवृत्तियों के प्रवर्तन के आधार पर स्थायी सुख-शाँति न विराजने लगे। आस्तिकता का गुण मनुष्य को न केवल सदाचारी, सद् विचारी सदा संयमी ही बना देता है बल्कि आगे बढ़ कर वह जीव से ईश्वर, लघु से महान, अणु से विभु और मनुष्य से देवता बना देता है। ऐसे देवत्व प्राप्त मनुष्यों की बहुतायत से पृथ्वी पर स्वर्ग की रचना हो जायेगी, क्योंकि स्वर्ग का निवास ही किसी को देवता नहीं बनाता बल्कि देवताओं की विद्यमानता ही स्थान को स्वर्ग बनाती है।
किसी ने एक सन्त से पूछा- महाराज! जब सन्त और धूर्त सब एक ही तरह के कपड़ों में विचरण करने लगे तब तो हम लोगों के लिए बड़ी कठिन समस्या खड़ी हो जाती है। कोई ऐसा उपाय बताइये, जिससे धूर्तों से बच कर हम सन्तों की सेवा कर सकें।
सन्त ने मुस्कुराते हुए कहा- इसमें कौन-सी बड़ी बात है। धूर्त सेवा करवाने के फेर में रहते हैं और सन्त सेवा करने के फेर में। सन्त प्रत्येक स्थिति में सन्त जैसा व्यवहार करता है। धूर्त का व्यवहार अपनी स्वार्थ-सिद्धी के लिए चापलूसी और चतुराई से भरा रहता है। धूर्त माँगता है और सन्त देता है।
“य आत्मा पहतपाप्मा विजसरो विमृत्युर्विशो-कोर्विजिधत्सोऽपिपासः, सत्य कामः सत्य संकल्पः सोऽन्वेष्टष्यः, स विजितसितव्य।”
“जो निष्पाप जरा रहित, अमर्त्य, शोक रहित, भूख प्यास से रहित, सत्य काम, सत्य संकल्प है और जानने योग्य है, उसी आत्मा को जानता और खोजना चाहिये उसी की जिज्ञासा करनी चाहिये।”
आत्मा को क्यों खोजना चाहिए और उसकी ही जिज्ञासा क्यों करनी चाहिये? इसका उत्तर यही है कि संसार का वास्तविक तत्त्व आत्मा ही है। जो जन्म-मरण से रहित, शोक से मुक्त, नित्य और अविनाशी है। उसका ज्ञान हो जाने से मनुष्य उसी की भाँति ही भय, शोक, चिन्ता और मरण धर्म से मुक्त हो जाता है, अजर और अमर होकर संसार के लोगों एवं अनुभवों से ऊपर उठ कर चिर अविनाशी पद प्राप्त कर लेता है। इस नाशवान मानव जीवन की इससे बड़ी और इससे ऊँची उपलब्धि अन्य क्या हो सकती है?
मनुष्य एक ऐसा आनन्द प्राप्त करना चाहता है जो सत्य, अपरिवर्तनशील और अविनाशी हो। संसार के क्षण-भंगुर सुखों का उपभोग करने से उसकी यह प्यास पूरी नहीं होती। बल्कि इन उपभोगों से उसकी प्यास और भी बढ़ जाती है। उसे अन्त में अशाँति और सन्तोष का भागी बनना पड़ता है। इन्हीं नश्वर और मिथ्या भोगों में आनंद की खोज करता-करता वह जरा को प्राप्त करता है और फिर मृत्यु को। सारा बहुमूल्य जीवन योंही व्यर्थ में चला जाता है। इसी अवधि में वाँछित आनन्द की निधि रूप यदि आत्मा की खोज कर ली जाय, तब न तो जरा का भय रहे और न मृत्यु का। मनुष्य जीवन में भी उस शाश्वत आनन्द को पाता रहे और उसके बाद तो वह परमानन्दस्वरूप ही हो जाये।
हम सब जीवन में नाना प्रकार की सम्पत्ति, नाना प्रकार के पदार्थ ऐश्वर्य, साधन, उपकरण तथा वैभव आदि एकत्र करते हैं। इस संग्रह में निश्चय ही एक उद्देश्य होता है। यह पुरुषार्थ योंही किसी पागलपन से प्रेरित होकर नहीं किया जाता। और न यह सब संस्कार अथवा अभ्यासवश ही किया जाता है। इसके पीछे एक उद्देश्य एक मन्तव्य रहता है। यह मन्तव्य क्या होता है? वह होता है आनन्द की खोज। हम सबको यह भ्रम रहता है कि यदि हम किसी भाँति वैभवशाली बन जायें, हमारे पास धन और सम्पत्ति की बहुतायत हो जाये तो हम अवश्य सुखी हो जायें, हमारे लिये आनन्द की कमी न रहे। किन्तु क्या हमारा यह उद्देश्य पूरा हो पाता है? नहीं, निश्चित रूप से नहीं।
यदि धन, सम्पत्ति और वैभव विभूति से ही आनन्द के उद्देश्य की पूर्ति हो सकती होती तो इस विशाल संसार में न जाने कितने धन-कुबेर पड़े हैं। ऐसे-ऐसे धनवान इन धराधाम पर मौजूद हैं, जिनके धन वैभव की कोई गणना कोई परिमाण नहीं है, जिनकी नित्य-प्रति करोड़ों की आय है और जिनका आर्थिक साम्राज्य देश, देशान्तरों में फैला पड़ा है। वे सभी सूखी और संतुष्ट होने चाहिये थे। पर देखने में ऐसा आता है कि वे भी अन्य जन-साधारण की भाँति ही आनन्द के लिये लालायित रहते हैं। उस विपुल वैभव के बीच भी रोते-कलपते और शोक मनाते दृष्टि-गोचर होते हैं।
तथापि, इस निरर्थकता को देख सुन और अनुभव करने के बाद भी मनुष्य इन्हीं वैभवों की ओर ही दौड़ता रहता है। अपने जीवन की लगभग सारी अवधि इन्हीं वंचनाओं की प्राप्ति में लगा देता है। इसके दो कारण हैं। एक तो यह कि रात दिन इन्हीं को लक्ष्य बना कर जुटे रहने से, इन्हीं के बीच रहने और इन्हीं का चिन्तन व्यवहार करते रहने से इनके साथ मनुष्य की आसक्ति और ममता का भाव जुड़ जाता है। धीरे-धीरे यह अभ्यास इतना गूढ़ हो जाता है कि जीवन का एक अंग ही बन जाता है।
मनुष्य इन्हीं उपकरणों, साधनों और सामग्रियों को ही सर्वस्व मान बैठता है। युग-युग का, जन्म-जन्म का अभ्यास छूटना सरल नहीं होता। वह स्वभाव बन जाता है और तब मनुष्य उसकी निस्सारता और हानियों को जानता, मानता हुआ भी उन्हीं की ओर उत्सुक बना रहता है। दूसरी बात यह कि इस सबसे परे जो अविनाशी और चिदानन्दमय आत्म-तत्व है उससे उसका परिचय नहीं होता। जिसको वह जानता ही नहीं उसके प्रति आकर्षित होने का प्रश्न ही नहीं। आकर्षण तो उसी के प्रति होता है जिस का ज्ञान होता है और जिससे पहचान होती है। साँसारिक वैभव और भोगों से परे भी एक ऐसा सत्य तत्व है जिसे आनन्द का निवास माना गया है- यदि मनुष्य को यह ठीक-ठीक पता चल जाये तो वह आनन्द की प्राप्ति के लिये उसकी ओर भी आकर्षित हो। दो चीजें सामने होने पर ही तो कोई एक को छोड़ कर दूसरी या एक के साथ अन्य का भी चुनाव कर सकता है। और तब जो उसके लिये अधिक उपयोगी हो उसे ही ग्रहण कर दूसरी को छोड़ सकता है।
केवल एक साँसारिक वैभव के सामने होने और संभव मानने के कारण मनुष्य उन्हीं को दौड़-दौड़ कर पकड़ता है और उन्हीं में आनन्द की खोज करने का प्रयत्न करता है। असफल होता है- लेकिन फिर उन्हीं को पकड़ता और फिर असफल होता है। आत्मा का ज्ञान न होने से यह प्रक्रिया उसके लिए एक विवशता बनी हुई है। यदि आत्मा की प्राप्ति हो जाये तो निश्चय ही उसके इस स्वभाव में परिवर्तन हो जाये और तब उसका उद्देश्य भी पूरा हो जाये।
नश्वरता संसार का नियम है। इसकी कोई चीज भी स्थिर अथवा अविनाशी नहीं है। इसी नियम के अनुसार उपार्जित किया हुआ वैभव भी संध्या की छाया की तरह नष्ट हो जाता है। आज है कल नहीं रहता। और यदि किसी के पास युक्ति के आधार पर कुछ अधिक समय तक बना भी रहता है तो उसके नाश हो जाने का भय दुःखी बनाता रहता है। भोग-विलास, जिनमें डूब कर मनुष्य बड़ा आनन्द मनाता है, शीघ्र ही मनुष्य को नष्ट कर स्वयं भी नष्ट हो जाते हैं।
यौवन के ढलते और जरा के आते ही संसार के भोग दुर्बल हो जाते हैं। उनका झूठा आनन्द भी ले सकने योग्य मनुष्य नहीं रह पाता। तब उनका ध्यान शेल की तरह शालता है। यदि मनुष्य प्रारम्भ में ही इनको निस्सार मानकर इनका व्यसन न पाल ले, इनसे आसक्ति न जोड़ ले तो बहुत हद तक इस मानसिक दुःख से बच सकता है। पर अज्ञान के कारण वह स्वभावतः ऐसा कर नहीं पाता।
मनुष्य आनन्द के लिये जिन साँसारिक सम्पदाओं का आधार लेता है उनमें आनन्द तो क्या पाता है, उल्टे उनके वियोग, अस्थिरता और परिवर्तनशीलता के साथ उनके विनाश की सम्भावना से बेचैन और दुःखी रहता है। सारा जीवन इस जाने वाले पदार्थों को रोकने में ही समाप्त कर देता है और एक दिन स्वयं भी शरीर छोड़ कर अनजान दिशा में चला जाता है। जिन पदार्थों को भोला मनुष्य सत्य समझ कर पकड़ता है, वे सब स्वप्न की तरह असत्य सिद्ध होते हैं। साँसारिक भोगों में दिखने वाला आनन्द कृत्रिम प्रकाश की तरह है। और तब जीवन में विषाद का घना अन्धकार छा जाता है, जिसमें भटकते हुए ठोकरें खाने के सिवाय कुछ भी शेष नहीं रह जाता।
यही कारण है कि मनीषियों ने साँसारिक सिद्धियों से परे अविनाशी एवं अपरिवर्तनशील आनन्द की निधान आत्मा को ही खोजने और पाने के महत्व पर अपना मत दिया है। आत्मा सत्य है, नित्य है, ज्योति-स्वरूप और आनन्दमय है। उसको पा लेने पर फिर कुछ पाना शेष नहीं रह जाता और जान लेने पर कुछ जानना नहीं रहता। मनुष्य के पुरुषार्थ की सार्थकता साँसारिक सुखों के उपकरण और उपादान संचय करने में नहीं है बल्कि आत्मा को प्राप्त करने के प्रयत्न में है।
यह जड़-चेतनमय जितना भी जगत दृष्टिगोचर होता है, इसका अपना अस्तित्व कुछ भी नहीं है। आत्मा के आधार पर ही इसका अस्तित्व निर्भर है। आत्मा ही मानव-जीवन का चरम सत्य है। आत्मा के प्रकाश में ही बाह्य संसार और मानव-जीवन का अस्तित्व प्रतिभासित होता है। आत्मा के पटल पर ही संसार और दृश्य जीवन का छाया नाटक बनता-बिगड़ता रहता है। संसार और कुछ भी तो नहीं, केवल आत्मा की अभिव्यक्ति और उसका ही विस्तार है। आत्मा एक चिरन्तन सत्य है। इससे पृथक् जो कुछ है वह असत्य है, भ्रमपूर्ण है और अग्राह्य है। वेदों में जिस “असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्माऽमृतंगमय”- का घोष किया गया है उसका संकेत साँसारिकता से ऊपर उठ कर आत्मा की ओर ही अभियान करने का है। क्योंकि आत्मा ही ज्योति रूप है, आत्मा ही शिव रूप है और वही अमृत रूप भी है। निश्चय ही मनुष्य को ऐसी कल्याणकारी आत्मा को पाने का प्रयत्न करते ही रहना चाहिये।
आत्म-जिज्ञासा से रहित जीवन भार स्वरूप ही बना रहता है। आत्म-जिज्ञासा से रहित मनुष्य को भय की कल्पनायें और पाप की भावनायें कभी चैन से नहीं रहने देतीं। यदि सुखी, शाँत और संतुष्ट जीवन बिताने की कामना है तो जीवन में आत्म-जिज्ञासा को स्थान देना ही होगा। उसकी खोज करनी ही होगी। जितना समय मनुष्य अहंकार के पोषण में लगाता है, साँसारिक उपलब्धियों की लालसा में व्यतीत करता है, यदि उसमें से कुछ निकाल कर आत्मा की खोज में लगाये, तो मंगल मार्ग पर बहुत कुछ आगे बढ़ सकता है।
अहंकार के वशीभूत होकर शारीरिक संतुष्टि तक सीमित रहने वाले अपनी भूल को तब समझ पाते हैं, जब जीवन में पतझड़ का समय आ जाता है और शरीर पीले पत्ते की तरह गिर जाने की स्थिति में होता है। उस पटाक्षेप के समय उसे निश्चय ही संसार की असारता, असत्यता और भंगुरता का ज्ञान और आत्मा की चिरंतनता और अविनश्वरता की प्रतीत होती है। तब समय निकल चुका होता है। उस अन्तिम समय में कुछ भी कर सकने का अवसर नहीं रहता। उस समय हाथ मल-मल कर पछताने के सिवाय और कुछ भी शेष नहीं रह जाता। उस समय इस पश्चाताप के साथ संसार छोड़ने पर विवश होना पड़ता है कि जिस सत्य की खोज के लिये सुरदुर्लभ मानव-जीवन मिला था, उसकी उपेक्षा कर, हाय, हम संसार की तुच्छ बातों में ही लगे रहे! हमने वह सब कुछ किया, जो नहीं करना था और वह कुछ भी नहीं किया जो कर्तव्य था। उस घड़ी उस आत्मा की उपेक्षा करने वाले व्यक्ति की क्या दशा होती होगी? उसके हृदय में किस भयानक पछतावे और विवशता की आग जलती होगी, इसे तो वही बतला सकते हैं जिन्होंने उस स्थिति का भोग किया है अथवा जो आगे चल कर एक दिन करेंगे।
कितना अच्छा हो कि मनुष्य आवश्यकता भर अपने साँसारिक कर्तव्य करता रहे और बाँकी का समय अध्यात्म मार्ग से आत्मा की खोज करने में भी लगाता रहे, तो उसके लोक-परलोक एक साथ बनते चलें। इस द्विमुखी साधना में जरा भी कठिनाई नहीं है। आत्म-जिज्ञासु व्यक्ति संसार में रमता हुआ भी उसकी अंधेरी वीथियों में नहीं भटकने पाता। उसकी वह जिज्ञासा उसके साथ रह कर प्रकाश का काम करती है। सांसारिकता कर्तव्यों के बाद वह उसको उसी प्रकाश मार्ग पर लौटा लाती है, जिसका अनुसरण इस वेद वाक्य को चरितार्थ कर देता है-
“असतो मा सद्गमय” “तमसो मा ज्योतिर्गमय” “मृत्योर्माअमृतं गमय”
और तब मनुष्य का न केवल वर्तमान जीवन बल्कि भूत भविष्यत् के भी सारे जीवन धन्य हो जाते हैं।
आत्म-विश्वास की कमी ही हमारी बहुत सी असफलताओं का कारण होती है, शक्ति के विश्वास में ही शक्ति है। वे सबसे कमजोर हैं, चाहे वे कितने ही शक्तिशाली क्यों न हों, जिन्हें अपने आप तथा अपनी शक्ति पर विश्वास नहीं है।
आत्म-विश्वास के द्वारा दुर्गम पथ भी सुगम हो जाता है।
आत्म-विश्वास की मात्रा हममें जितनी अधिक होगी उतना ही हमारा सम्बन्ध अनन्त जीवन और अनन्त शक्ति के साथ गहरा होता जायेगा।
-चाणक्य
प्रेम की पवित्र भावना मनुष्य की आत्मा में अक्षय शान्ति भर देती है। जस प्रकार निर्झर की धारा स्वयं भी शीतल रहती है और जो उसके पास आता है, उससे संपर्क स्थापित करता है उसको भी शीतलता प्रदान करती है, उसी प्रकार प्रेमी-हृदय व्यक्ति अपनी आत्मा में शीतलता का अनुभव तो करता है, साथ ही उसके संपर्क में जो भी आता है, वह भी आनंदित हो उठता है।
सन्त और महात्मा लोग प्रेम के अक्षय भण्डार होते हैं। उनके जीवन में स्थायी शाँति का निवास रहता है। कोई भी अभाव, कोई भी आपत्ति उनकी मनःशाँति को प्रभावित नहीं कर पाती। बहुत बार ऐसा संयोग भी आता है कि दुष्ट लोग उन्हें अकारण ही सताया करते हैं। पर हृदय में प्रेम का निवास रहने से वे उनकी दुष्टता को वैसे ही सहन कर लेते हैं, जिस प्रकार पिता अपने बच्चे का उपद्रव सहन कर लेता है। इतना ही क्यों वे उल्टे उसे आशीर्वाद देते हैं, उसकी सद्बुद्धि के लिए परमात्मा से प्रार्थना करने लगते हैं।
महात्मा ईसा प्रेम के भंडार थे। वे सारे मनुष्यों को अपने अंतरात्मा की गहराई से प्रेम करते थे। महात्मा ईसा पर कदाचित संसार में सबसे अधिक अत्याचार किया गया तथापि उनके मन में प्रतिकार की भावना नहीं आई। महात्मा ईसा ने जिस मनुष्य जाति का हित चाहा, जिसकी भलाई के लिये अपना संपूर्ण जीवन लगा दिया, उन्हीं मनुष्यों ने उन्हें ‘क्रूस’ पर ठोक दिया। उनको विविध प्रकार से शारीरिक यंत्रणायें दीं। उन्हें कोड़ों से मारा, पत्थरों की वर्षा की। प्रेम के देवता महात्मा ईसा ने किसी पर क्रोध तक नहीं किया। प्रेम के प्रसाद से उनके हृदय को प्राप्त हुई शीतलता जरा भी नष्ट न हुई। लोग उन्हें क्रूस पर टाँग कर कीलें ठोंक रहे थे और वे रो-रो कर परमात्मा से प्रार्थना कर रहे थे कि हे परमपिता! तू इन अबोधों पर क्रोध न करना, इनको क्षमा कर देना क्योंकि यह नहीं जानते कि क्या कर रहे हैं।
महात्मा महावीर को लोगों ने पागल कहा। उन्हें पत्थरों से मारा। उनके कपड़े फाड़ डाले, गाँव में ठहरने नहीं दिया। उनके पीछे कुत्ते दौड़ाये और जो भी यातना बन पड़ी दी। पर महात्मा महावीर उस सारे अत्याचार को समान भाव से सहन करते रहे, उन्होंने न तो किसी पर क्रोध किया और न किसी से प्रतिकार लिया। बल्कि वे भी सच्चे हृदय से मनुष्य जाति का हित चाहते और करते रहे। इस प्रकार की सहनशीलता और क्षमा का भाव उस प्रेम का ही प्रसाद था जो उनके हृदय में निवास कर रहा था।
संसार में त्रस्त और दुःखों से आक्राँत मनुष्य जब कहीं भी शाँति नहीं पाता तो किसी महात्मा अथवा सन्त की शरण में जाता है। उनके पास जाते ही उसका सारा शोक संताप नष्ट हो जाता है। उसका जलता हुआ हृदय शीतल हो उठता है। ऐसा इसलिये होता है कि महात्माओं के हृदय में प्रेम का निवास होता है। जिसके आधार पर वे संत्रस्त प्राणी को सच्ची सहानुभूति और सच्ची सम्वेदना दे पाते हैं। सहानुभूति तथा सम्वेदन ऐसी संजीवनी माना गया है, जो किसी भी प्रकार से दुःखी मनुष्य को आश्वस्त कर देती है। प्रेम एक दिव्य अमृत है, जिसका आदान-प्रदान मनुष्य को देवता के समान बना देता है।
प्रेम से शून्य मनुष्य नीरस मरुस्थल के सिवाय और कुछ नहीं होता। प्रेम-विहीन व्यक्ति के पास जाकर एक साधारण मनुष्य भी अपनी स्वाभाविक प्रसन्नता खो देता है। तब किसी का दुःख दूर हो सकना तो असम्भव ही है। हरे-भरे पत्तों से रहित वृक्ष के पास जाकर किसको छाया मिल सकती है और सूखा जलाशय किसकी प्यास बुझा सकता है?
प्रेम के प्रसाद से मनुष्य अजातशत्रु की स्थिति में पहुँच जाता है। वह तो किसी से शत्रुता नहीं रखता, साथ ही दूसरे लोग भी उससे बैर नहीं मानते। माना कि प्रेमी हृदय सन्त लोग जब किसी के प्रति बैर भाव नहीं रखते तो दूसरा उनसे क्यों बैर मानेगा। किन्तु यह प्रतिक्रिया हिंस्र-जीवों में तो नहीं होती। वे तो नैसर्गिक रूप से जीवों के शत्रु होते हैं। कोई जीव उनसे बैर माने या न माने पर वे पाते ही उनको मार तक डालते हैं। ऐसे स्वाभाविक हिंस्र जन्तु भी वनवासियों, ऋषि-मुनियों के समीप जाकर उनके सच्चे प्रेम से प्रभावित होकर हिरनों और गायों के साथ मित्र भाव से बिहार करने लगते थे। प्रेम ऐसा चमत्कार है, ऐसा जादू है जो अपना प्रभाव छोड़े बिना नहीं रहता।
चोर डाकू अपने से बैर न मानने वालों को भी सम्पत्ति हरण कर लिया करते हैं। किन्तु उनकी भी दृष्टि वृत्ति प्रेम के अमृत से शीतल हृदय वाले महात्माओं के पास पहुँच कर बदल जाती हैं और वे उनके प्रभाव से सज्जन बन जाते हैं। महात्मा नारद के संपर्क में आकर डाकू रत्नाकर वाल्मीकि बन गये, महात्मा बुद्ध के संपर्क में आकर अँगुलिमाल धर्म प्रचारक बन गया और तुलसीदास की कुटिया में चोरी करने वाले चोर लौट कर उनके पैरों गिरे और सदा के लिए अच्छे आदमी बन गये।
प्रेम में मनुष्य की जीवन धारा बदल देने की शक्ति होती है। अंबपाली एक प्रसिद्ध वेश्या थी। वह अपना शरीर बेचती थी। शान-शौकत से रहती थी और दिन रात पाप ही कमाया करती थी। किन्तु जिस दिन वह भगवान् तथागत के विश्व-प्रेम से प्रभावित हुई सारा वैभव और सारा भोग-विलास छोड़ कर महान भिक्षुणी बन कर कृतार्थ हो गई। सूर और तुलसी अपने जीवन में बड़े ही कामुक तथा स्त्री-लम्पट रहे, पर ज्यों ही उन्हें भगवत् प्रेम की अनुभूति हुई, वे परम वैष्णव भगवान् श्रीकृष्ण और राम के भक्त बन गये। सम्राट् अशोक की जीवन गाथा का प्रारम्भिक भाग अत्याचारी के रूप में अंकित है, पर जब उसे कलिंग के युद्ध में विनाश की विभीषिका की प्रतिक्रिया से मानवता के प्रति प्रेम की अनुभूति हुई, वह अशोक महान के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
अपने अनन्तर जीवन में उसने मनुष्य की भलाई के लिये बड़े-बड़े काम किये। लोगों को सन्मार्ग पर लाने के लिये अजस्र प्रयत्न किया। धर्म प्रचार के लिये अपने पुत्र और पुत्री को भिक्षु तथा भिक्षुणी बना कर देशान्तर में भेज दिया। प्रेम परमात्मा का सबसे श्रेष्ठ और सबसे पवित्र प्रसाद है। अपने अन्तर में इसका विकास करना अपनी आत्मा के लिये कल्याण का पथ-प्रशस्त करना है।
आत्मा में प्रेम का विकास मनुष्य को साधारण से असाधारण बना देता है। प्रेम से धैर्य, सहिष्णुता, क्षमा, दया, करुणा, त्याग और दृढ़ता की उपलब्धि होती है। प्रेम के आधार पर निर्भीक बना मनुष्य कहीं भी कोई भय नहीं रहता। वह अधिकाँशतः निरापद ही रहता है। फिर भी यदि संयोग अथवा पूर्व परिपाक के कारण उस पर कोई विपत्ति आ भी जाती है तो वह उसको प्रेम के सहजन्य गुणों के आधार पर सहन कर लेता है, उसके पार उतर जाता है।
किन्तु यह गुण, यह विशेषताएं उसी प्रेम में होती हैं, जो सत्य, सार्वकालिक और सार्वभौमिक होने के साथ-साथ स्थिर, निःस्वार्थ तथा असंदिग्ध होता है। सामयिक, एक देशीय अथवा संदिग्ध प्रेम में यह विशेषताएँ नहीं होती हैं। यदि एक मनुष्य अपनी पत्नी को प्यार करता है और वह उसके आधार पर अन्य से बैर शमन की आशा करता है, तो उसे निराश ही होना पड़ेगा। इससे आगे बढ़ कर भी यदि वह सारे संसार को क्यों न प्रेम करता हो, किन्तु अपने विरोधी से द्वेष मानता हो तब भी वह इतने व्यापक प्रेम के होते हुए एक इस छिद्र के कारण ही निरापद अथवा अजातशत्रु नहीं हो सकता है।
परिपूर्ण पात्र की विशेषता को एक छोटा-सा छिद्र भी व्यर्थ बना देता है। प्रेम यदि परिपूर्ण है तो पूर्ण शक्तिशाली है। उसमें रंच न्यूनता भी उसकी किसी विशेषता को प्रभावशाली न बनने देगी। जिस प्रकार परमात्मा की प्राप्ति होती है तो पूर्णरूप से होती है अथवा होती ही नहीं, उसी प्रकार से प्रेम की सिद्धि होती है तो पूर्ण रूप से होती है या होती ही नहीं।
तथापि जिस प्रकार परमात्मा की प्राप्ति के लिये यत्किंचित् प्रयत्न भी श्लाघ्य है, उसी प्रकार प्रेम की सिद्धी के लिये भी जितना अणु कण बन सके, प्रेम की साधना करते ही रहना चाहिये। जिस प्रकार बूँद-बूँद का संचय एक दिन घट भर देता है, जन्म-जन्म का प्रयत्न किसी जन्म से परमात्मा की प्राप्ति करा देता है, उसी प्रकार की थोड़ी-थोड़ी साधना भी एक दिन आत्मा को प्रेमस्वरूप बना देती है।
प्रेम की परिधि सीमित नहीं है और न उसका कोई प्रकार ही होता है। प्रेम का जन्म एक ही हृदय से एक जैसी ही अनुभूति के साथ होता है। प्रेम, प्रेम है, फिर चाहे वह नारी के प्रति हो, पुत्र के प्रति हो, समाज, देश अथवा सम्पूर्ण संसार के प्रति हो। उसका परिपाक आध्यात्मिक प्रेम में होता है और उसका फल भी एक ही है, आत्म-कल्याण। शर्त केवल यह कि प्रेम जिसे किया जाये सम्पूर्ण मन प्राणों से किया जाये, उसमें न तो कोई स्वार्थ और नाहीं कोई छिद्र शेष रक्खा जाये। सच्चा और पूर्ण स्थिति का प्रेम अन्त में परमात्मा की भक्ति का रूप बन जाया करता है। शीरी, फरहाद, सोनी, महीवाल, सूर, तुलसी आदिकों का प्रेम नारी के प्रति लौकिक रूप से प्रारम्भ होकर अन्त में अनन्त एवं आध्यात्मिक प्रेम में बदल गया जिसके बल पर उन्होंने शरीरान्तर में कल्याण का वरण किया है।
उनका लौकिक प्रेम पारलौकिक प्रेम बन गया। दशरथ का पुत्र प्रेम उनके कल्याण का संराधक सिद्ध हुआ। लक्ष्मण और भरत भ्रातृ प्रेम के आधार पर उन्नत स्थिति के अधिकारी बने। संयमराय, भामाशाह और बाजी प्रभु देशपाण्डे स्वामी के प्रति प्रेम के कारण महानता के अधिकार बने। इसी प्रकार भगतसिंह, रामप्रसाद, तिलक और गोखले जैसे देशभक्तों ने देश के प्रति प्रेम के आधार पर भव-बन्धन से छुटकारा पाया। ईसा, बुद्ध, महावीर और महात्मा गाँधी जैसी आत्मायें मानवता के प्रति असंध प्रेम के आधार पर मुक्त हुई हैं।
सच्चे प्रेमियों पर, उनकी आस्था की परीक्षा लेने के लिये एक नहीं हजारों संकट आते हैं। जो उन संकटों को हँसता हुआ सहता और अपने प्रेम मार्ग पर अविचलित रूप से चलता रहता है, वही वस्तुतः सच्चा प्रेमी होता है और वह ही उसके आधार पर निर्वाण का अधिकारी बन पाता है। मीरा ने कृष्ण से प्रेम किया उसके लिये पति तथा परिवार का कोप सहा, लोकापवाद की यातना सहन की, अपने चरित्र पर लगाये गये लाँछन की आग बुझाली किन्तु अपना प्रेम न छोड़ा। उसे राजरानी के पद से च्युत कर दिया गया, घर से निकाला गया, जाति से बहिष्कृत कर दिया गया, पर वह अपने प्रेम के पवित्र मार्ग पर चलती ही रही।
मीरा को यमुना में फेंका गया। पिटारी में उसके पास साँप भेजा गया और हलाहल का प्याला पीने को दिया गया, पर उसका असंदिग्ध प्रेम घटने अथवा विचचित होने के स्थान पर निरन्तर ही बढ़ता चला गया। यहाँ तक कि यमुना की साँवली धारा उसे कन्हैया की गोद लगी। काला सर्प पिटारी में शालिग्राम के स्वरूप में दिखाई दिया और हलाहल के श्याम रंग में उस कृष्ण प्रेम की मदमाती को साक्षात् श्याम सलोने के ही दर्शन हो गये। यही तो असंध तथा सम्पूर्ण प्रेम का लक्षण है कि मीरा के लिये संसार का अणु कण ही उसके प्रियतम का प्रतिबिंब नहीं बन गया बल्कि वह स्वयं भी श्याम रूप होकर एक दिन भगवान् श्यामसुन्दर में मिल गई।
प्रेम, प्रेम है, वह लौकिक हो अथवा आध्यात्मिक किन्तु हो पूर्ण असंध, असंदिग्ध तथा निःस्वार्थ, तो निश्चय ही चमत्कारिक, शक्तिशाली और भव-बंधन से मुक्ति का साधन होगा।
भीतवत्संविधातव्यं यावद् भयमनागतम्। आगतं तु भयं दृष्ट्वा प्रहर्तव्यमभीतवत्॥
जब तक भय का कारण आ न पहुँचे तब तक उससे डरते रह कर बचने का उपाय करते रहना चाहिए, किन्तु जब वह सिर पर आ ही पहुँचे तो उसे निडर होकर मार भगाना चाहिये।
शायद आपने अपने अन्दर यह पता लगाने का प्रयत्न कभी नहीं किया कि वहाँ कोई विचारक, कलाकार, नेता, समाज-सेवक, कोई बड़ा व्यापारी अथवा कोई महान व्यक्ति तो छिपा नहीं बैठा है? हाँ, आपने अवश्य ही इस बात में प्रमाद बर्ता है। अन्यथा आप आज इस साधारण स्थिति में न पड़े होते। अवश्य ही अब तक आप समाज, सेवा, कला अथवा वाणिज्य के माध्यम से अपना महत्वपूर्ण स्थान बना कर मानव जीवन को काफी दूर तक सफलता की ओर बढ़ा चुके होते।
भला आप अपने भीतर छिपे महापुरुष अथवा विशिष्ट व्यक्ति को खोज भी कैसे सकते थे? यह कर्तव्य तो तभी पूरा हो सकता था जब आप उसके लिये कुछ समय देते। एकान्त में जाकर और दुनिया की सामान्य बातों से दूर होकर थोड़ी देर अपने को महत्वपूर्ण व्यक्ति समझ कर गम्भीरतापूर्वक विचार करते, और अपने से बार-बार यह प्रश्न करके उत्तर माँगते कि क्या मैं ऐसा ही साधारण एवं स्वार्थपूर्ण जीवन बिताने और महत्वहीन मौत मर कर दुनिया से चले जाने के लिये ही संसार में आया हूँ। क्या केवल इस कमाने खाने और मर जाने भर के लिये ही मैंने अपने जन्म एवं पालन-पोषण द्वारा माता का शारीरिक और पिता का आर्थिक संस्थान जर्जर कर डाला है?
आपके इन तीखे प्रश्नों को बार-बार सुन कर आपके अन्दर का सोया हुआ विशिष्ट व्यक्ति अवश्य ही जाग कर यह उत्तर देता- ‘‘नहीं महाशय! ऐसा नहीं है, आप संसार में कुछ अच्छा, ऊँचा और कल्याणकारी काम करने के लिये ही आये हैं। आप मुझे अपने साथ लीजिए मेरे महत्व का मूल्याँकन एवं उपयोग कीजिए और देखिये कि आप समाज के ए क महान् व्यक्ति बन सकते हैं।’’
विश्वास रखिये संसार के प्रत्येक मनुष्य के भीतर कोई-न-कोई महान पुरुष सोया पड़ा रहता है। आपके अन्दर भी है। यदि ऐसा न होता तो एक साधारण ही नहीं दीन-हीन मजदूर का एक अपढ़ पुत्र अब्राहमलिंकन संसार का महान व्यक्ति न हो पाता। एक साधारण जिल्द साज की नौकरी करने वाला लड़का माइकल फैराडे संसार का आश्चर्यजनक वैज्ञानिक न होता। साधारण वकील के स्तर से महात्मा गाँधी विश्व-बन्धु बापू न हो पाते और दो पैसे की रोटी पर जीवन चलाने वाले स्वामी रामतीर्थ अध्यात्म क्षेत्र के महारथी और एक कारखाने में छोटी-सी नौकरी करने वाला लड़का फोर्ड संसार का महानतम उद्योगपति एवं धनकुबेर न हो पाता।
मनुष्यों का यह आश्चर्यजनक विकास और चकित कर देने वाली उन्नति प्रमाणित करती है किसी भी मनुष्य के विषय में कुछ नहीं कहा जा सकता है कि आगे चल कर वह जीवन के किस शिखर पर पदार्पण करेगा। संसार के सारे मनुष्यों में वे सारी क्षमतायें तथा विशेषतायें सन्निहित रहती हैं, जो किसी एक में भी हो सकती हैं और जो उन्नति पथ पर किसी का संवहन करने वाली होती है। आवश्यकता केवल अपने अध्यवसाय द्वारा उन्हें जगाने और काम में लाने की होती है। शक्तियों का उपयोग शक्तियों को बढ़ाता है, और बढ़ी हुई शक्तियाँ मनुष्य को उत्तरोत्तर उन्नति की ओर अग्रसर करती रहती हैं।
मनुष्य जब अपने को कर्तव्य कर्मों की शान पर चढ़ाता है, परिश्रम एवं पुरुषार्थ की आग में तपाता है तो उसके भीतर सोया पड़ा नेता, समाज सुधारक, लेखक, धर्मप्रचारक, वैज्ञानिक, कलाकार, सन्त अथवा उद्योगपति जाग कर ऊपर उभर आता है।
अपने भीतर सोये महापुरुष अथवा विशिष्ट व्यक्ति के लिये उद्बोधक कर्म न करके जो व्यक्ति प्रमाद, आलस्य, अविद्या अथवा अकर्मों में लगे रहते हैं, वे साधारण से अधिक सामान्य स्थिति में तो उतर सकते हैं किन्तु असाधारण स्थिति की ओर कदापि नहीं बढ़ सकते। विशिष्ट व्यक्तित्व के लिए जिन कठोर कर्मों तथा अखण्ड पुरुषार्थ की आवश्यकता है, उनकी पूर्ति भोग-विलास से भरी और ढीली-पोली जिन्दगी में नहीं की जा सकती। जिन महत्वाकांक्षियों को अपनी विशिष्टता में विश्वास और समाज में सम्मानपूर्ण स्थान की लगन होती है वे नियम संयम से आबद्ध एवं व्यवस्थित जीवन को स्वीकार कर परिश्रम के लिये दिन को दिन और रात को रात नहीं समझते। उन्हें घाम का ताप, शीत का कम्पन और वर्षा की बूँदें प्रभावित नहीं कर पातीं और नाहीं उनको पथ का कोई प्रलोभनपूर्ण अवरोध ही विरमा पाता है।
एक बार चल कर यदि वे विश्राम करते हैं, तो अपने लक्ष्य की छाया में, अपने उद्देश्य की तलहटी और मंजिल की मीनार पर। बीच में उनके लिये विश्राम का कोई भी स्थल नहीं होता और न भटका देने वाले प्रवंचक विश्राम भवनों की मरु-मरीचिका में वे विश्वास ही करते हैं। उन्हें तो लगन, उमंग और उत्साह का ऐसा नशा चढ़ा रहता है, जो जीवन में पूर्णता प्राप्त किये बिना उतरता ही नहीं।
अपने प्रति हमारा अपना दृष्टिकोण भी हमारे अन्दर सोये पड़े महान व्यक्ति को जगाने में सहायक होता है। जिस मनुष्य की अपने प्रति जिस प्रकार की ऊँची-नीची भावना होती है, उसका भविष्य भी उसी प्रकार का बनता चला जाता है। हमारे अर्धचेतन में वैसी ही शक्तियाँ उठ खड़ी होती हैं और उसी प्रकार की प्रेरणा देकर उस ही दिशा में अग्रसर करती रहती हैं, जिसके अनुरूप हमारी भावना होती है। यदि हमारे अपने प्रति हमारा निज का दृष्टिकोण उत्साह एवं आशा भरा है तो निश्चय ही वैसी ही सृजनात्मक शक्तियाँ प्रबुद्ध होकर हमारी सहायता करने लगेंगी।
इसके विपरीत यदि हमारा दृष्टिकोण निराशा एवं निउत्साहपूर्ण है तो निश्चय ही ऐसी आसुरी शक्तियों का जागरण होगा, जो आलस्य, अज्ञान, अवज्ञा तथा उपेक्षा दोष जागृत कर हमारी गति को अवरुद्ध बनाये रखेंगी। अपने को दिन-दिन आगे बढ़ाने के लिये अपने प्रति आशा एवं विश्वास का दृष्टिकोण रखिये। कभी भूल कर भी ऐसा न सोचिए कि आपकी शक्ति न्यून है आपके साधन नगण्य हैं, आपकी योग्यता अपर्याप्त है अथवा आप में साहस की कमी है। ऐसे हीन दृष्टिकोण और दीन भावना से भीतर का विशिष्ट व्यक्ति महत्वहीन होकर मर जायेगा और तब आपके विकास की कोई सम्भावना शेष न रहेगी।
संसार के सारे महापुरुष प्रारम्भ में हमारे आप जैसे ही साधारण श्रेणी तथा साधारण योग्यता एवं क्षमताओं के व्यक्ति रहे हैं। इतना होने पर भी उन्होंने अपने प्रति अपना दृष्टिकोण नीचा नहीं बनाया, निराशा की भावना को पास नहीं आने दिया। आत्म-विश्वास, उत्साह एवं अविरत अध्यवसाय के बल पर वे कदम-कदम आगे बढ़ते और बढ़ते ही गये यहाँ तक उन्होंने अपना महान-से-महान मनोनीत लक्ष्य प्राप्त ही कर लिया। आत्म-हीनता की भावना बहुत बड़ा अभिशाप है। यह जीवित को मृत तथा चेतन को जड़ बना कर अपंग कर देती है। आत्म-हीनता की भावना आते ही जीवन में सर्वत्र निराशा का अन्धकार घेर लेता है।
निराश व्यक्ति की नई शक्तियाँ जगाना तो दूर उल्टे उसकी जागरूक शक्तियाँ, कार्य क्षमतायें, आगे देख सकने की दृष्टि तथा परिस्थितियों का अध्ययन कर सकने वाली सूझ-बूझ तक समाप्त हो जाती है। ऐसे निराश व्यक्ति में न तो साहस शेष रहता है और न समाज में कोई व्यक्ति उसकी सहायता करने के लिये उत्साहित होता है। निराशा एवं दुर्दैव का साथ माना गया है। निराशा का अन्धकार आते ही मनुष्य को दुर्दैव का प्रकोप धर दबाता है।
यदि हम आशापूर्ण दृष्टिकोण से अपने अन्दर बैठे महापुरुष पर विश्वास लेकर आगे बढ़ते हैं तो हमारे सामने ऐसे मार्ग आप से खुलते चले जायेंगे, जिन पर चल कर अभीष्ट लक्ष्य तक आसानी से पहुँचा जा सकता है। लक्ष्य सिद्धि का विश्वास और उसकी दुरूहता अथवा दूरी की अकल्पना मनुष्य के मार्ग को बहुत कुछ सुखद एवं सरल बना देता है। विश्वास से जिस मनोबल का जन्म होता है, उसमें बड़ी प्रेरक एवं सृजनात्मक शक्ति होती है। वह मनुष्य को भय, शंकाओं एवं सन्देहों से दूर रख कर उमंग एवं उत्साह से भरपूर बनाये रहता है। इतने सम्बलों का भंडार लेकर चलने वाला ऐसा कौन-सा अभागा यात्री होगा जो अपने लक्ष्य तक पहुंचे बिना बीच में ही थक कर बैठ जाये।
निश्चय जानिये आपके अन्दर भी एक महापुरुष सोया पड़ा है। उसे वाँछित साधन एवं साधना द्वारा प्रबुद्ध कीजिये और समाज में अपना वह महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त कीजिये, जो कहीं न कहीं पहले से ही सुरक्षित रक्खा है। आज आप जिस विषय-वासना की कीचड़ में पड़े हैं, जिस भोग-विलास अथवा दिखावे का जीवन अपनाये हुये हैं, उसे त्यागिये और अपने अनुरूप उच्च विचारधारा-उदात्त कार्यशैली और उन्नत जीवन-लक्ष्य चुनिये। केवल इन्द्रिय सुख में भूले हुये आप अपने बहुमूल्य जीवन को कौड़ी मोल लुटा रहे हैं।
इसी जीवन का कुछ अंश यदि आप समाज सेवा, अध्ययन एवं परोपकार में लगा दें तो वह दिन दूर नहीं रहे जबकि समाज आपको सर आँखों चढ़ा कर आपको अपना मार्गदर्शक मान ले। उठिये और ऋषिकेश की तरह आज ही शुभारम्भ का पाञ्चजन्य फूँक दो और कुप्रवृत्तियों की कौरवीय सेना को निरस्त कर डालिये। आप से ऐसी आशा कैसे की जा सकती है कि संसार के उन हजारों महापुरुषों के जीवन से प्रेरणा लेकर आगे नहीं बढ़ेंगे जो प्रारम्भ में आप जैसे ही साधारण एवं सामान्य स्थिति के रहे हैं।
अपने मस्तिष्क को स्वार्थ-परक चिन्तन से मुक्त कर उज्ज्वल एवं उदात्त विचार-धारा को स्थान दीजिये। जो बुद्धिमान व्यक्ति समृद्धि एवं सिद्धि की दिशा में अपनी चिन्तन धारा को उन्मुख कर लेते हैं, वे मानो एक ऐसा पुण्य प्रतिपादित करते हैं जिसका सुफल उन्नति एवं यश के रूप में ही प्रतिफलित होता है।
यह संसार कर्मभूमि है। मनुष्य कर्म करने के लिये ही इस धराधाम पर अवतरित हुआ है। कर्म और निरन्तर कर्म ही सिद्धि एवं समृद्धि की आधार शिला है। कर्मवीर, कर्मयोगी तथा कर्मठ व्यक्ति कितनी ही निम्न स्थिति सामान्य श्रेणी और पिछड़ी हुई अवस्था में क्यों न पड़ा हो आगे बढ़ कर, परिस्थितियों को परास्त कर अपना निर्दिष्ट स्थान प्राप्त ही कर लेता है। कर्म की गति काल भी रोक सकने में असमर्थ है। उठिये अपना लक्ष्य प्राप्त करके दिशा देखिये कि वह किधर आपकी प्रतीक्षा कर रही है। अपने उद्योग को उद्यत और कर्म-शक्ति को चैतन्य कीजिये और यह मान कर जीवन पथ पर अभियान कीजिये कि आप एक महापुरुष हैं, आपको अपने अनुरूप अपने चरित्र बल पर समाज में अपना स्थान बना ही लेना है।
ईश्वर की सबसे बड़ी देन, सबसे महत्वपूर्ण प्रसाद- अपने मस्तिष्क को विकृतियों से निरामय बनाइये। उसमें विवेक एवं सद्बुद्धि का दीप प्रज्ज्वलित कीजिये, उसको निर्माण की दिशा में लगाइये और देखिये कि आपका निरामय एवं निर्विकार मस्तिष्क आपको कैसी-कैसी सृजनात्मक योजनायें प्रदान करता है। पतन के गर्तों, अवृत्ति के कुण्डों, निराशा की अंधेरी घाटियों से किस प्रकार जागरूक पुण्य प्रदर्शक तथा प्रहरी की तरह बचाये रहता है। आप बुद्धि तथा विवेक के प्रकाश में निर्विघ्न अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते चले जाइये। असफलता के त्रास अथवा विरोधों के भय से अपना अग्रगामी पग पीछे न हटाइये। आपको अपने अनुरूप स्थान मिलेगा। ऊंचा तथा महत्वपूर्ण स्थान मिलेगा-क्योंकि आप महान पुरुष हैं और अपनी महानता, अपने विशिष्ट व्यक्तित्व को अपने आचरण द्वारा व्यक्त ही करेंगे।
पार-दर्शक मन
मन का मैल मन में ही दबाते चले जाने से मन विषाक्त हो जाता है। उसकी प्रतिक्रिया मनुष्य जीवन में बड़ी खराब और कुरूप होती है। क्या ही अच्छा होता यदि हमारा मन पार-दर्शक होता- शीशे की तरह आर-पार होता। यदि ऐसा होता तो हम कितने सुखी रहते, कितने निर्मल होते। क्योंकि पार दीखने वाले शीशे में मैल ज्यादा दिन तक निभता नहीं। मन की बुराइयां भी प्रकट कर देने से मन के कुसंस्कारों का अन्त हो जाता है, और स्वच्छता को प्रवेश के लिये स्थान मिल जाता है। -सम्राट लुई,
एक लम्बे समय से अशाँत, असंतुष्ट तथा असुखपूर्ण जीवन जीते चले आ रहे हैं, आइये अब संतुष्ट तथा सुखी जीवन की योजना बना कर उस पर अमल करें तब देखें हमें दुःख अथवा असन्तोष किस प्रकार आक्रान्त कर सकते हैं?
सबसे पहले यह समझलें कि जीवन है क्या? क्योंकि जब तक उस मूल बात को ही न समझ लें, जिसकी सार्थकता के लिये योजना बना रहे हैं तब तक कोई बात बन भी कैसे सकती है।
जीवन एक अवधि, एक अवसर हे, जो जीवात्मा को परमात्मा की ओर से इसलिये दिया गया है कि वह संसार में अपना निवास बनाये रहे, कर्म करे और जिस दिन अपने स्वरूप का साक्षात्कार करले उस दिन मेरी अनन्त आनन्ददायिनी गोद में सदा सर्वदा के लिये चला आये। इस सब साधना को करने के लिये उसे सर्वशक्ति सम्पन्न यह मानव शरीर साधन के रूप में अनुग्रह किया गया है। और अधिकार नहीं, स्वतन्त्रता दी गई है कि वह जिस प्रकार चाहे इसका उपयोग कर सके। उसने शरीर का किस प्रकार उपयोग किया है इसका लेखा-जोखा तो इसके बाद लिया जायेगा। बीच में न उसे टोका जायेगा और न रोका जायेगा। हाँ, उसे सद्परामर्श देने के लिये बुद्धि-विवेक रूप में एक हित-चिन्तक अथवा मंत्री अवश्य दे दिया है, जिसका परामर्श मानने के लिये भी वह स्वतन्त्र है।
जीवन क्या है-यह समझ लेने के बाद यह भी आवश्यक है कि उसका उद्देश्य भी जान लिया जाये। हम जीवन-यान को किस दिशा में चलायें, किन रास्तों पर उसे डालें और किन उपत्यिकाओं से बचायें- इस विधान को तब तक ठीक से जाना समझा ही नहीं जा सकता, जब तक अभियान के सुनिश्चित लक्ष्य का निर्धारण न हो जाये। इसलिये आवश्यक है कि जीवन लक्ष्य अथवा उसके उद्देश्य को भी स्पष्ट कर लिया जाये।
जैसा की ऊपर जीवन की परिभाषा में संकेत किया गया है कि जीवन परमात्मा ने इसलिये दिया है कि जीवात्मा उस अवधि में आत्म-साक्षात्कार करके उसकी अनन्त आनन्ददायिनी गोद में सदा सर्वदा के लिये जा पहुँचे। इसी को निर्वाण, मोक्ष अथवा जीवन-मुक्ति कहा गया है और निःसन्देह जीवन का यह एक मात्र उद्देश्य एवं परम लक्ष्य भी है। मनुष्य का यह चरम लक्ष्य और कुछ नहीं निर्बंध, निर्मुक्त, निःसीम निर्भय, निर्विकार और निर्द्वंद्व आत्मा की अनन्त अथवा अक्षय आनन्दानुभूति का अपार हिल्लोह है। यह आत्म-बिन्दु की परमात्म सागर में परिसमाप्ति के पश्चात् तदाकार हो जाने का पूर्व प्रवर्तन ही है।
महान् मनुष्य जीवन के अनुरूप ही उसका लक्ष्य भी परम पवित्र तथा महान् है- इस सत्य से तो इनकार किया ही नहीं जा सकता। साथी ही यह सत्य भी स्वीकार करना होगा कि जब तक इस महान् जीवन को महानताओं से समाविष्ट करके यापन नहीं किया जायेगा तब तक इतना विशाल और व्यापक लक्ष्य कदापि नहीं पाया जा सकता।
इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिये हर मनुष्य बाध्य है। बाध्य इस अर्थ में कि जब तक वह इसे नहीं पा लेता तब तक उसे जन्म मरण के चक्र में पिसना और यदि अधिक प्रमाद किया जो अधम योनियों की नारकीय यातनाओं को हजारों लाखों वर्ष भुगतान होगा- इस भयानक सम्भावना को देखते हुए बुद्धि से रहित ऐसा व्यक्ति अभागा ही होगा जो अपने लक्ष्य कह ओर उदासीन होकर जीवन यापन में ऐसा प्रमाद बरतेगा जिससे कि अनन्त आनन्ददायिनी परमात्मा की गोद हाथ से निकल जाये और हजारों लाखों वर्षों की नारकीय कारावास की यातना हाथ आये।
जीवन यापन के अभियान की अवधि में स्थिर प्रसन्नता एवं एक आन्तरिक सुख की अनिवार्य आवश्यकता है। क्योंकि इसके अभाव में खिन्नता, चिन्ता अथवा असन्तोष का अभिशाप साथ लेकर इतने उच्चस्थ लक्ष्य को पाने की लम्बी यात्रा पूरी नहीं की जा सकती। खिन्न, चिन्तित तथा दुःखी अवस्था में जब साधारण कर्म-मार्ग में कदम नहीं उठ पाता, घर की दहलीज पहाड़ जैसी मालूम होती है, तब उस अवस्था में इतनी लम्बी यात्रा ठीक तरह पूरी की जा सकती है यह सम्भव नहीं हो सकता।
इसके लिये जब चित्त प्रसन्न रहता है हृदय में अखेद तथा अनुद्वेगपूर्ण शाँति विराजमान रहती है, तब क्रियाओं को अपेक्षित गति तथा उत्साह प्राप्त होता रहता है, जिससे यात्रा की दूरी, लक्ष्य की दुरूहता अथवा पथ की क्लाँति प्रभावित नहीं कर पाती और मनुष्य हँसता-खेलता अपेक्षित दिशा की ओर बढ़ता चला जाता है। प्रसन्न अवस्था में मनुष्य की बुद्धि तथा विवेक भी प्रबुद्ध तथा सक्रिय रहता है जिससे प्रकाश एवं सत् व असत् का ठीक-ठीक निर्णय भी होता चलता है। अभियान में गति हो, गति में उत्साह, पथ में प्रकाश तथा मार्ग की उपयुक्त दिशा का निर्णय होता चले तब संसार का कोई भी तो अवरोध बाधा नहीं दे सकता और न कोई मरीचिका ही पथ-भ्राँत कर सकती है। जिसकी यात्रा इतनी दृढ़ तथा निरापद है वह क्या कारण हो सकता है कि शीघ्र ही अपना लक्ष्य न पाले।
यात्रा को सुयोग्य बनाने के लिये केवल शारीरिक नहीं मानसिक प्रसन्नता तथा सुख-शाँति अपेक्षित है। और उसी अपेक्षा को पूर्ण करने के लिये लोग सुख-शाँति पाने का उपक्रम किया करते हैं। उसके लिये साधन-सुविधायें एकत्र किया करते हैं। किन्तु यह कम खेद का विषय नहीं है कि लोग यह भूल बैठे हैं कि वे यह उपक्रम किस लिये कर रहे हैं। अज्ञान के वशीभूत होकर साधन को साध्य मान बैठे हैं? शारीरिक सुख को वह सुख-समझ लिया है जो उनको यात्रा के लिये आवश्यक है। फल यह हुआ कि शरीर की उपासना में इस सीमा तक लग गये हैं कि मूल उद्देश्य को ही भूल गये।
शरीर एक ऐसा यंत्र, एक ऐसा साधन है कि इसको जितना आराम दो, जितना बिठलाये रक्खो यह उतना ही जड़ तथा निष्क्रिय होकर अपनी शक्ति तथा क्षमता खोता जाता है। इसकी सारी प्रखरता एवं विशेषता नष्ट हो जाती है। शीघ्र ही असाध्य होकर इतना आलसी हो जाता है कि फिर किसी कार्य के लिये भी उत्साहित नहीं होता है। रुग्ण एवं असहिष्णु हो जाता है। शरीर का स्वभाव भी बच्चों जैसा ही होता है। इसको जिस अभ्यास पर डालो उसी को पकड़ लेता है। अधिक विश्रान्ति दीजिये तो आलसी बन कर दिन-रात आराम के लिये ही रोता और हठ करता रहेगा और जितना काम लिया जाये उतना ही कर्मठ बनता है। यह बात सही है कि शरीर को भी विश्राम की आवश्यकता है। किन्तु काम के बाद काम की थकान ही इसको विश्राम का अधिकारी बनाती है। कार्य रहित विश्राम इसके अस्वास्थ्य का कारण बनता है।
अब आइये उन कारणों तथा हेतुओं पर थोड़ा विचार किया जाये जो सुख-शांति के वाहक तथा इसके विपर्य के प्रेरक बनते हैं।
सबसे पहले शारीरिक आरोग्य को ले लिया जाये। आरोग्य सुख का और अस्वास्थ्य दुःख का कारण है। आरोग्य की आधार शिला संयम तथा नियम ही है। बहुधा लोग संयम, नियम का अर्थ केवल व्रत-उपवास ही समझ लिया करते हैं। यद्यपि कभी-कभी किसी आवश्यक अनुष्ठान अथवा पथ्य दशा में इनकी आवश्यकता होती है तथापि यह संयम एवं नियम की अर्थ पूर्ति नहीं करते हैं।
संयम, नियम का प्रमुख आशय यह है कि जिह्वा की स्वाद लिप्सा अथवा रस-वैचित्र्य पर नियन्त्रण रक्खा जाये। भोजन के विषय में जिह्वा के संकेत पर नहीं बुद्धि तथा आवश्यकता के परामर्श पर चला जाये। स्वस्थ रहने के लिये भोजन में कौन से तथा कितने पदार्थ की आवश्यकता है, इसका ज्ञान तथा पालन ही संयम का सही स्वरूप है।
नियम का सीधा-सीधा अर्थ है जो कुछ खाया जाये वह समय पर और कम ही खाया जाये। इस समय तथा क्रम का व्यतिक्रमण न करना ही नियमता है। किंतु इन नियम एवं संयम को अनावश्यक रूप से इतना न कस दिया जाये कि वह शरीर को एक बोझ, एक बन्धन बन कर रह जाये। पदार्थों का चुनाव इस आधार पर किया जाये कि कौन-कौन-सी वस्तुयें शरीर तथा रुचि के अनुकूल हैं और कौन-कौन-सी प्रतिकूल। इस विषय में रुचि तथा पदार्थों में जितना परिमार्जन, सात्विकता तथा सामर्थ्य का समावेश होगा, शरीर उतना ही स्वस्थ तथा तेजस्वी रहेगा। इन सब बातों को हर व्यक्ति अपने अनुभव तथा अध्ययन के आधार पर आसानी से समझ लेता है।
शारीरिक स्वास्थ्य के बाद मानसिक स्वास्थ्य का क्रम है। जिस प्रकार, ज्वर, शीत, रेचन, मन्दाग्नि आदि शरीर के साधारण रोग हैं, उसी प्रकार ईर्ष्या, द्वेष लिप्सा लोलुपता, स्वार्थ, संकीर्णता, दुर्भाव आदि मन की व्याधियाँ हैं। और इन दोनों अस्वास्थ्यों का परिणाम अकर्मण्यता, आलस्य, निराशा, निरुत्साह एवं असफलता के रूप में फलीभूत होते हैं। तब फिर प्रसन्नता तथा सुख-शाँति की सम्भावना कहाँ। जिस प्रकार शारीरिक स्वास्थ्य के लिये असंयम दूर करके संयम की स्थापना आवश्यक है, उसी प्रकार मानसिक व्याधियों को हटा कर उसके स्थान पर प्रेम, पवित्रता, स्नेह, सौहार्द, उदारता, विशालता तथा सद्भावों की प्रतिष्ठा आवश्यक है। स्थानापन्नता के अभाव में विस्थापन अपूर्ण तथा असफल ही रहता है।
भौतिक साधन तथा उनका उपभोग सुख-शाँति में सहायक होते हैं, किन्तु जब तक ही जब तक उनका औचित्य बना रहता है। मर्यादा का उल्लंघन करते ही यह मानव-जीवन को अमूल बेलि की तरह लिपट जाते हैं और उसका सारा स्वत्व तथा तत्व शोषण कर लेते हैं। मनुष्य निर्जीव तथा रिक्त बन कर निष्प्रयोजन बन जाता है। भौतिक साधन तथा उपकरण जुटाइये, उनके लिये यथा सम्भव पुरुषार्थ कीजिये किन्तु यह किसी क्षण भी न भूलिये कि यह साधन मात्र ही हैं, साध्य नहीं हैं। इन सब को हमारा सेवक ही रहना चाहिये स्वामी न बन जाना चाहिये।
जिसकी इन्द्रियाँ पदार्थों की दासता स्वीकार कर लेती हैं, उन्हें अपने चरम लक्ष्य की ओर अभियान करने का न तो अवकाश ही रहता है और न शक्ति। साधनों को साधन तक ही सीमित रखना चाहिये। जिस प्रकार इनका अभाव दरिद्रता के दुःख की अनुभूति कराता है, उसी प्रकार इनकी अधिक तृष्णा भी दरिद्री बना देती है। तृष्णा एवं अभाव समान रूप से ही दारिद्रय के हेतु हैं। अन्तर केवल इतना है कि पहले से उत्पन्न दरिद्र प्रत्यक्ष होता है और दूसरे का अप्रत्यक्ष। किन्तु परिणाम दोनों का एक ही है। जो शारीरिक अथवा मानसिक रूप से प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष किसी रूप से भी दरिद्री है, उसकी उस विशाल एवं महान् लक्ष्य के लिये पात्रता नष्ट हो जाती है।
यदि गम्भीरता से विचार किया जाय तो कोई भी काम निष्काम होना सामान्यतः सम्भव नहीं जब निर्बन्ध तथा गतिमान रहने के लिये निष्कामता बहुत आवश्यक है। इस निष्कामना की पूर्ति केवल इतनी बात से हो सकती है कि प्राप्ति का पुरुषार्थ प्राप्ति की भावना से ही करना चाहिए लोभ की भावना से नहीं।
कामनाओं की अतिशयता भी अभिमान का एक बड़ा अवरोध है। संसार में विपुल पदार्थ तथा उनके असंख्यों प्रकार भरे पड़े हैं। उन सब की कामना करना ही कामनाओं की अतिशयता मानी गई है। ‘यह भी मिल जाए- वह भी मिल जाए’ की चपल वृत्ति अथवा प्रकारों के प्रति मन को आकर्षण मरीचिकाओं में भटका कर छोड़ देगा और तब मनुष्य क्षण-क्षण बदलते हुए संसार के माया-जाल में फँस कर रह जाएगा जो उसके उद्देश्य के लिए बड़ा ही अमाँगलिक होगा। सुख-शाँति में सहायक जिन उपकरणों की उपयोगिता हो उनको ही उपलब्ध करने का प्रयास कीजिए। वस्तुओं की बहुलता अथवा विविधता, उपयोगिता की वृद्धि करने में सक्षम नहीं होती। आवश्यकता एवं सामर्थ्य के अनुरूप उनकी मात्रा को पर्याप्त की सीमा तक ही रखना बुद्धिमानी है। इसके आगे बढ़ने का अर्थ होता है अपने चारों ओर अपने प्रयास से स्वयं ही जाल बिछाना।
इस प्रकार उपयोग तथा आवश्यकता को तुला पर तुले हुए पर्याप्त साधनों का संचय, उपभोग करते हुए, निर्लोभ कर्मों द्वारा बन्धनों का बहिष्कार करते हुए, स्वस्थ, संतुष्ट, शाँत तथा प्रसन्न जीवनयापन की योजना के साथ अपने चरम लक्ष्य की ओर उन्मुख रहिए आपके लोक-परलोक दोनों समान रूप से सफलता तथा आनन्द से अलंकृत होकर प्रकाशित हो उठेंगे।
समाज एक सम्पूर्ण शरीर है और हम सब उसके अंग अवयव हैं। जिस प्रकार शरीर का अस्तित्व अंगों के सहयोग पर निर्भर है, उसी प्रकार सम्पूर्ण शरीर की सहायता से अंग और अवयव भी स्वस्थ रहते हैं। यह दोनों अन्योन्याश्रित हैं। पारस्परिक सहयोग के अभाव में इन दोनों का ही अस्तित्व शंका में पड़ जायेगा।
व्यक्ति का समाज के प्रति वही दायित्व है जो अंगों का सम्पूर्ण शरीर के प्रति। यदि शरीर के विविध अंग किसी प्रकार स्वार्थी अथवा आत्मास्तित्व तक ही सीमित हो जायें तो निश्चय ही सारे शरीर के लिए एक खतरा पैदा हो जाए। सबसे पहले भोजन मुँह में आता है। यदि मुँह स्वार्थी बन कर उस भोजन को अपने तक ही सीमित रख कर उसका स्वाद लेता रहे और जब इच्छा हो उसे थूक कर फेंक दे, तो उसके इस स्वार्थ का परिणाम बड़ा भयंकर होगा। जब मुँह का चबाया हुआ भोजन पेट को न जाएगा तो कहाँ से उसका रस बनेगा और कहाँ से रक्त माँस, मज्जा आदि? इस क्रिया के बन्द हो जाने पर शरीर के दूसरे अंगों और अवयवों को तत्व मिलना बन्द हो जाएगा। वे क्षीण और निर्बल होने लगेंगे और धीरे-धीरे पूरी तरह अस्वस्थ होकर सदा-सर्वदा के लिए निर्जीव हो जायेंगे। पूरा शरीर टूट जाएगा और शीघ्र ही जीवन हीन होकर मिट्टी में मिल जाएगा। यह सब अनर्थ, एक मुँह के स्वार्थ-परायण हो जाने से घटित होगा।
इसी प्रकार यदि मुँह स्वार्थी न बने पेट स्वार्थी बन जाए। अपने में आए हुए भोजन को अपने पास ही जमा करता रहे और उसे पचा कर रस प्रक्रिया को अवसर न दे तो भी यही अनर्थकारी स्थिति उत्पन्न हो जायगी। हाथ पैर, मन, मस्तिष्क आदि भी यदि स्वार्थी बन कर यह सोचने लग जाएँ कि मेरे श्रम का, उपार्जन का सारा लाभ तो मुँह और पेट को होता है तो मैं यों दूसरों के लिए क्यों कमाता और परिश्रम करता रहूँ? क्यों न चुपचाप बैठकर आराम करूं। तो भी वही अनर्थकारी स्थिति पैदा हो जाएगी।
हाथ-पैर काम नहीं करेंगे, सम्पूर्ण शरीर को भोजन देने में असहयोग करेंगे, तो एक तो जड़मूल से भोजन ही न मिलेगा और यदि किसी प्रकार मिल भी जाए तो उसको पकाने खाने आदि की प्रक्रिया न चल सकेगी। शरीर भूखा रहेगा, उसकी आवश्यकता पूरी न होगी, वह शिथिल और अस्वस्थ रहने लगेगा। ऐसी दशा में न केवल अन्य अंगों को ही हानि होगी बल्कि स्वयं स्वार्थी हाथ-पैर आदि भी निर्जीव हो जायेंगे। शरीर का कोई भी अंग यदि दूसरे अंगों के साथ स्वार्थवश असहयोग पर उतर आए तो सारे शरीर का ही अस्तित्व खतरे में पड़ जाय और तब इस सामूहिक अनर्थ से वह स्वार्थी अंग अथवा अवयव भी बचा नहीं रह सकता।
व्यक्ति की स्वार्थपरता सामाजिक जीवन के लिए विष के समान घातक है। जो व्यक्ति सामूहिक दृष्टि से न सोच कर केवल अपने स्वार्थ, अपने व्यक्तिवाद में लगे रहते हैं, वे सम्पूर्ण समाज को एक प्रकार से विष देने का पाप करते हैं। ऐसे व्यक्तियों की आत्मा कभी भी शांत और सुखी नहीं रह सकती। शीघ्र ही उसका लोक तो बिगड़ ही जाता है, परलोक बिगड़ने की भूमिका भी तैयार हो जाती है। समाज में व्यक्तिगत भाव का कोई स्थान नहीं है। जिसने शक्ति, समृद्धि, सम्पन्नता अथवा पद प्रतिष्ठा के क्षेत्र में उन्नति तो कर ली है, किन्तु अपनी इन सारी उपलब्धियों को रखता अपने तक ही सीमित है, किसी भी रूप में समाज को उसका लाभ नहीं पहुँचता तो उसकी सारी उपलब्धियां, समृद्धियाँ और सफलताएँ हेय हैं। ऐसे स्वार्थी व्यक्ति का कोई विवेकशील व्यक्ति तो आदर की दृष्टि से देखेगा नहीं, मूढ़ और मतिमन्द लोग भले ही उसको आदर, सम्मान देते रहें।
ऐसे संकीर्ण एवं स्वार्थपरायण व्यक्ति ही समाज के शोषक, शत्रु और अहित-चिन्तक कहे जाते हैं। वे अपने साधनों के बल पर समाज का अधिकाधिक शोषण करते हैं और इससे गरीबी, द्वेष, ईर्ष्या और कुत्सा का विष फैलता है। ऐसे व्यक्ति समाज के अस्वस्थ अंग होते हैं जो अपने दोष से सारे समाज के स्वास्थ्य और सुख चैन पर घातक आघात किया करते हैं। ऐसे असामाजिक एवं असहयोगी लोगों की जितनी निन्दा की जाय थोड़ी है।
समाज को पीछे धकेलने वाले, अविश्वास, सन्देह, धोखे-बाजी, भ्रष्टाचार, लूट खसोट, ठगी, शोषण, संघर्ष आदि के जितने भी अपराध-परक दोष होते हैं, वे सब एक स्वार्थ एवं व्यक्तिवाद की भावना से ही जन्म लेते हैं। उसके कारण ही पनपते, बढ़ते और समाज में संघर्ष, अशाँति और असुविधा की परिस्थितियाँ पैदा करते हैं। स्वार्थ परायणता को सारे पापों की जड़ मानना चाहिये। सुखी, सम्पन्न और विचारशील समाज का निर्माण तभी हो सकता है, जब उसके सदस्य संकीर्ण व्यक्तिवाद को छोड़ कर व्यष्टिवाद के व्यापक दृष्टिकोण को अपनाते हैं। समाज में जब तक पारस्परिक सहयोग, सहानुभूति, सौजन्य, त्याग, सेवा और संगठन की भावना का आविर्भाव नहीं होता उसका सामूहिक विकास नहीं होता।
कुछ थोड़े से व्यक्ति सारी सभ्यता और मनुष्यता को ताक पर रख कर यदि समृद्धिशाली बन भी जाते हैं, तो उससे समाज का तो हित नहीं होता है उस व्यक्तिवादी को भी सुख-चैन नसीब नहीं होता। वह अपने वैभव, अपनी समृद्धि को अपने तक सीमित किए सर्प की तरह उसकी रखवाली किया करता है। ऐसा पापी व्यक्ति समाज में संघर्ष और विघटन उत्पन्न कराने वाला सिद्ध होता है। संकीर्ण स्वार्थ से दूषित व्यक्ति सौ पापियों का एक पापी माना जाता है। वह समाज का सदस्य नहीं शत्रु होता है।
ऐसे समाज विरोधी स्वार्थियों की भर्त्सना करते हुए वेद में कहा गया है-
“मोघमन्नं विदन्ते अप्रचेता” सत्यं ब्रवीमि वद इति स तस्य, न आर्यमणं पुष्यति नोसखयं, केवलाघो भवति केवला दी।”
स्वार्थ पूर्ण संकीर्ण मनोवृत्ति वाले व्यक्ति के पास का संग्रहित धन, धन संग्रह नहीं किया, वरन् अपनी मृत्यु को ही संग्रह कर लिया है। जो अपने भाई, बहन को कुछ नहीं देता, जो अपना ही ध्यान रखता है, अपने लिए ही संग्रह करता है, वह केवल पाप रूप है, चोर है।
सारा धन, सारा वैभव और सारी विभूतियाँ जो किसी मनुष्य के पास आती हैं, सब समाज से ही आती है, कहीं आकाश से सहसा नहीं टपक पड़तीं। यदि सर्वथा सत्य कहा जाए तो- तो कहना होगा कि जिसके पास जो कुछ भी है, उसमें उस व्यक्ति का कुछ नहीं होता, वह सब समाज की ही सम्पत्ति होती है। मनुष्य जब पैदा होता है तब वह अपने साथ कुछ भी नहीं लाता और जब संसार से जाता है तब भी साथ कुछ नहीं ले जाता। समाज की सम्पत्ति समाज के ही पास छूट जाती है। जन्म लेने के समय बच्चा नितान्त असहाय एवं असमर्थ होता है। उसकी रक्षा और वृद्धि, परोक्ष अथवा प्रत्यक्ष किसी न किसी रूप में समाज द्वारा ही की जाती है। समर्थ होकर वह समाज की सहायता से उन्नति करता और समृद्ध बनता है।
यदि समाज उसके साथ सहयोग करना छोड़ दे तो शीघ्र ही उसका अस्तित्व समाप्त हो जायेगा। अब ऐसी स्थिति जो व्यक्ति समाज से पाई विभूतियों को उसके अर्थ में यापन नहीं करता और जबरदस्ती उन्हें अपनी समझ कर अपने तक ही सीमित रख कर स्वार्थ परायण बना रहता है, तो निश्चय ही उसे चोर और कृतघ्न कहा जायेगा। इस कृतघ्नता के पाप से बचने के लिए मनुष्य को स्वार्थ नहीं परमार्थ को ही प्रश्रय देना चाहिये।
परमार्थ वृत्ति के अभाव में समाज और व्यक्ति दोनों नष्ट हो जाते हैं। व्यक्तिगत लाभ, स्वार्थ सिद्धि और समृद्धि के लिये मनुष्य कितना भी क्यों न करे, वह कितना ही सम्पन्न, शक्तिशाली और वैभवशाली क्यों न बन जाये। किन्तु परमार्थ और दूसरों के प्रति त्याग, प्रेम, सहायता, सहयोग एवं सहानुभूति की भावना के अभाव में वह समाज के लिये उपयोगी सिद्ध नहीं हो सकता। और जो उसके लिये उपयोगी नहीं, समर्थ होकर सहायक नहीं वह समाज पर एक कलंक मात्र है। ऐसे कलंक रूप स्वार्थी व्यक्ति न केवल समाज के लिये ही घातक होते हैं बल्कि उनका स्वयं का भी विकास रुक जाता है। क्योंकि समाज के साथ ही व्यक्ति और व्यक्ति द्वारा ही समाज का विकास सम्भव है। आत्म-कल्याण और सामाजिक हित के लिए मनुष्य को स्वार्थी नहीं, परमार्थी होना चाहिये।
अनेक बार अनेक लोग व्यक्तिवाद से प्रेरित होकर यह दावा करने का साहस करने लगते हैं कि उन्होंने अपना विकास अपने प्रयत्न एवं पुरुषार्थ के बल पर किया है- समाज ने उनकी कोई सहायता नहीं की, बल्कि पीछे खींचने कह ही प्रयत्न किया है। ऐसे लोग, शायद कुछ ऐसे लोगों को ही समाज समझने की भूल करते हैं, जिन्होंने उन्हें प्रत्यक्ष सहयोग नहीं दिया होता है। सोचने का यह विचार-कोण समीचीन नहीं। कुछ इने-गिने लोग ही समाज नहीं होते। समाज एक विशाल और व्यापक संस्था है। पूरा समाज जिसका असहयोग करने लगता है उसका विकास तो दूर, जीना भी दूभर हो जाता है।
ऐसे लोगों को अपने विचार-कोण बदल कर यह समझना चाहिये कि व्यक्ति और उसका व्यक्तित्व समाज से पृथक कोई वस्तु नहीं है। जिस प्रकार किसी वृक्ष के फल मनुष्यों द्वारा की गई उसकी सेवा और सुरक्षा का ही परिणाम होता है, उसी प्रकार मनुष्य की सारी सफलता भी समाज की कृपा का ही परिणाम होता है। यद्यपि समाज के अंतर्गत वे भी आते हैं, तथापि माता-पिता को यदि छोड़ भी दिया जाये तब भी मनुष्य के विकास में समाज का बहुत हाथ रहता है। मनुष्य जिसके बीच बढ़ता, पढ़ता और अनुभव प्राप्त करता है वह सब समाज ही तो होता है।
वह जो कुछ सीखता समाज में सीखता है और जो कुछ पाता है समाज से पाता है। कोई भी वस्तु जो जीवन विकास के लिए आवश्यक होती है, समाज के सामूहिक प्रयत्न द्वारा ही बनाई जाती है। उदाहरण के लिए अन्न ही ले लीजिए- इसे सभी लोग नहीं उगाते लेकिन उपयोग सभी लोग करते हैं। अन्न का उत्पादन किसान किया करते हैं। किन्तु वे जिन साधनों और उपकरणों से कृषि का काम करते हैं, उनका उत्पादन अन्य लोग किया करते हैं। एक हल बनने में ही न जाने कितने लोगों का श्रम तथा मस्तिष्क लगा करता है, तब कहीं जाकर वह तैयार हो पाता है।
ऐसे ही वस्त्र, पुस्तकें मकान और अन्य सुविधा तथा आवश्यकता की सारी चीजें, प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से पूरे समाज के सम्मिलित प्रयत्न तथा सहयोग का ही परिणाम होती हैं। जिसको खाने-पीने, रहने और पढ़-लिख कर विकास करने का अवसर मिला है उसे भूल कर भी यह न सोचना चाहिये कि उसने अपना विकास अपने अकेले दम पर कर लिया है।
व्यक्ति तथा समाज वस्तुतः एक ही वस्तु हैं। दोनों का विकास दोनों पर समान रूप से निर्भर है। कोई एक बात पूरे समाज से एक साथ कह सकना सम्भव नहीं, इसलिए वह उपायों द्वारा व्यक्तियों से ही कही जाती है। व्यक्ति को सामाजिक बनने को कहने का अर्थ यही है कि वह बात पूरे समाज से कही गई है। व्यक्ति यदि आपको सुधार कर समाज अर्थात् दूसरे लोगों का हितैषी और सहयोगी बन जाय तो यह समझना चाहिये कि पूरा समाज ही वैसा बन गया। व्यक्तिवादी बन कर केवल स्वार्थ में ही लगे रहना असामाजिकता है। इससे व्यक्ति तथा समाज दोनों की हानि एवं अकल्याण होता है। इसी अमंगल को बचाने के लिए मनुष्य को स्वार्थी नहीं परमार्थी और व्यक्तिवादी से सामाजिकवादी बन कर लोकहित के काम करते ही रहना चाहिए।
“संयम से ही विकास होता है। वृक्ष की जड़ें पृथ्वी के साथ जकड़ी हुई हैं, इसीलिए वह ऊँचा होकर फलों से शोभा पाता है। वृक्ष कहे कि यह जड़ों का बन्धन किसलिए? मुझे इन्हें तोड़ कर स्वच्छंद ऊपर उठने दो, तो क्या ऐसा होने पर वृक्ष सुसज्जित रह सकेगा? वह पृथ्वी से जकड़ा हुआ है, इसलिए ऊँचा उठ सका और फल-फूल सका। सितार के तार बँधे होने के कारण ही दिव्य-संगीत सुना सकते हैं। यह सब संयम की महिमा है। संयम बिना सुसंस्कृति नहीं, विकास नहीं।” -रवीन्द्रनाथ ठाकुर
‘परोपकारायमिदं शरीरम्’- भारतीय धर्म संस्कृति में परोपकार की बड़ी महिमा बताई गई है।
परोपकार का आशय है किसी का भला करना अथवा हित करना। मानव समाज एक दूसरे की सहायता पर ही निर्भर है। जीवन धारण करने से लेकर जीवन-यापन और समापन करने तक मनुष्यों को परस्पर सहयोग और सहायता की आवश्यकता पड़ती है। इसके अभाव में जीवन चल सकना सम्भव नहीं।
किन्तु इस प्रकार की समाजव्यापी सहायता और सहयोग को परोपकार नहीं कहा जा सकता। यह तो जीवन-निर्वाह की एक सार्वजनिक व्यवस्था है। इस सेवा और सहायता का आधार विनिमय है। इसमें एक मनुष्य एक तरह से सहयोग करता है तो दूसरी तरह से उसका बदला पाता है। परोपकार का आधार त्याग एवं उत्सर्ग होता है। किसी की, की हुई किसी भलाई का जब किसी प्रकार का कोई मूल्य अथवा बदला नहीं लिया जाता तो वह सुकृत्य परोपकार कहा जा सकता है। इसी प्रकार के उपकार का आध्यात्मिक महत्व होता है और इसी का भारतीय धर्म संस्कृति में बखान किया गया है।
परोपकार के बहुत से प्रकार और बहुत से रूप हो सकते हैं। जिन्हें प्रथम द्वितीय और तृतीय श्रेणी में बाँटा भी जा सकता है। इस विभाजन को समझने के लिये तृतीय श्रेणी से चलिये।
तृतीय श्रेणी का परोपकार वह होता है जिसके द्वारा किसी व्यक्ति का सामयिक हित होता है। जैसे किसी भूखे को भोजन करा देना, किसी रोगी अथवा आहत को अस्पताल पहुंचा देना, किसी याचक को पैसा दे देना, शीत पीड़ित को वस्त्र अथवा खोये को उसके गन्तव्य स्थान तक पहुँचा देने की सहायता कर देना आदि तृतीय श्रेणी का परोपकार होता है।
तृतीय श्रेणी के इन उपकारों से किसी का कोई सामयिक हित ही हो सकता है, उसका कोई स्थायी हित नहीं होता और न इस प्रकार का उपकार किसी के जीवन को स्थिरता प्रदान कर सकता है। जिस उपकार से किसी को जीवन विकास में जितनी कम सहायता मिलती है वह उतनी ही सामान्य कोटि का उपकार माना जाता है।
द्वितीय श्रेणी के परोपकार उनको कहा जा सकता है, जिससे किसी का दूरगामी हित होता है। जैसे किसी को नौकरी करा देना, उसकी जीविका का प्रयत्न करा देना। कार-रोजगार में निःस्वार्थ सहायता करा देना। किसी को घातक रोगों से मुक्ति दिला देना। किन्हीं व्यक्तियों अथवा परिवारों का वैमनस्य मिटा देना, किसी को निराशा अथवा निरुत्साह के अन्धकार से निकाल देना अथवा किन्हीं की स्थायी शत्रुता को मिटा देना आदि सत्कर्म द्वितीय श्रेणी के परोपकार माने गये हैं।
द्वितीय श्रेणी के इन उपकारों से निश्चय ही किन्हीं को दूरगामी लाभ तो होता है, तथापि जीवन-समस्याओं का स्थायी समाधान नहीं होता। एक अवधि के बाद उपकृत के जीवन में पुनः उसी प्रकार की समस्याएँ उठ सकती हैं। और उसके लिए पुनः किसी उपकारी की आवश्यकता हो सकती है। द्वितीय श्रेणी के उपकारों से किसी को दूरगामी लाभ तो हो सकता है किन्तु समस्याओं का स्थायी हल नहीं होता।
जिन उपकारों से मनुष्य का स्थायी हित होता है, वह अपने जीवन के विकास और उसकी समस्याओं का हल करने की क्षमता पाता है वह उपकार प्रथम श्रेणी का माना जायेगा। मनुष्य को इस योग्य बनने में सहायता देना कि उसे किसी पर निर्भर न रहना पड़े, किसी का आश्रय न देखना पड़े और किसी का सहारा लेकर न खड़ा होना पड़े। निस्सन्देह प्रथम श्रेणी के परोपकार हैं। इस श्रेणी में वे सारे उपकार आ जाते हैं जिनसे किसी में जीवन-जीने की योग्यता का विकास होता है
किसी को शिक्षा दिला देना अथवा किसी को कोई कार-रोजगार करा देना निश्चय ही प्रथम श्रेणी का परोपकार है। किन्तु यह धन-साध्य परोपकार है। ऐसे उपकारों का पुण्य ले सकना सब के सामर्थ्य की बात नहीं है। यह तो साधन-सम्पन्न तथा धनवान व्यक्ति ही कर सकते हैं। किन्तु परोपकार का पुण्य सब के लिए वांछनीय है, और सभी क्यों न चाहेंगे प्रथम श्रेणी का परोपकार करना। ऊँचे से ऊँचा परोपकार सबको ही करना चाहिए क्योंकि इसके बिना जीवन को उच्च गति नहीं मिलती।
अब प्रश्न यह है कि जो सामान्य व्यक्ति हैं, जो साधन सम्पन्न और धनवान नहीं हैं तो वे क्या जीवन भर प्रथम श्रेणी का परोपकार कर सकने से वंचित ही रह जायेंगे? नहीं ऐसा नहीं। उपरोक्त उपकारों के अतिरिक्त प्रथम श्रेणी के उपकारों के और भी प्रकार हैं, जिनका निर्वाह कोई भी सामान्य से सामान्य व्यक्ति कर सकता है। वे उपकार हैं ज्ञान-दान और गुण, अथवा चरित्र-निर्माण।
किसी को ज्ञान-दान करने के लिए किसी को धन अथवा साधनों की आवश्यकता नहीं रहती। आवश्यकता रहती है, केवल इस बात की कि उपकारभावी व्यक्ति प्रयत्नपूर्वक स्वतः भी ज्ञान संचय करता रहे। भारतीय ऋषि-मुनियों के पास न कभी साधनों की प्रचुरता रही और न धन की। तथापि वे समाज के सर्वश्रेष्ठ उपकारी माने जाते हैं। संसार में सबसे अधिक सम्मान उनको मिला। अपने जीवन काल में तो उनकी पूजा होती ही रही, आज हजारों वर्ष बीत जाने पर भी जन-मानस में उनका वही स्थान बना हुआ है।
भारतीय ऋषि-मुनियों को सर्वश्रेष्ठ माने जाने का एक मात्र कारण यही है कि उन्होंने अज्ञान के अन्धकार में भटकती हुई मानवता को ज्ञान का आलोक दिया। समाज के प्रति उनका यह बहुत बड़ा उपकार था। ज्ञान का आलोक पाया हुआ मनुष्य संसार के सारे दुःखों से छूट जाता है। उसे न तो त्रयताप व्यग्र कर पाते हैं और न कोई अभाव दुःखी कर पाता है। ज्ञान के आधार पर वह अपनी सारी समस्यायें और कठिनाइयाँ स्वयं हल कर लिया करता है। इसके लिए उसे किसी का मुखापेक्षी नहीं बनना पड़ता और न किसी का सहारा खोजना पड़ता है। इसीलिए ज्ञान-दान को प्रथम श्रेणी का उपकार माना गया है।
ज्ञान-दान से बढ़ कर संसार में कोई दान नहीं। जिसे यह प्राप्त होता है उसका जीवन कृतार्थ हो जाता है। धन अथवा साधन देकर किसी का उतना उपकार नहीं किया जा सकता जितना कि ज्ञान देकर। किसी से धन की सहायता पाकर कोई मनुष्य, माना अपना विकास कर सकता है। कार-रोजगार बढ़ा सकता है। तब भी ज्ञान के अभाव में धन उसको वह वाँछित सुख नहीं दे सकता जिसकी मानव जीवन में अपेक्षा की जाती है। वह सुख, वह शाश्वत सुख तो केवल ज्ञान से ही प्राप्त हो सकता है जिसको पाकर आत्मा संतुष्ट हो जाती है। कोई व्यक्ति जीवन में कितनी ही उन्नति क्यों न कर ले, किन्तु जब तक उसकी आत्मा को सुख चैन नहीं मिलेगा उसका कल्याण न होगा वह एक अभाव और अशाँति से निरन्तर व्यग्र बना रहेगा।
इतना ही क्यों अज्ञान की दशा में उसका धन और उसका भौतिक विकास अन्ततः उसके पतन का कारण बन जायेगा। ज्ञानहीन धनाढ्यता की दशा में संसार के नाशकारी भोग-विलास और विषय-वासना की अनुचित वृत्तियाँ मनुष्य पर अपना घेरा डाल देती हैं। उसमें इच्छाओं और तृष्णाओं का जंगल उत्पन्न कर देती हैं। धन की सहायता की अपेक्षा ज्ञान की सहायता कहीं श्रेष्ठ है। भारतीय ऋषि-मुनियों ने मानव-समाज की यही तो सहायता की है जिसके लिए वे आज भी पूज्य बने हुए हैं और युग-युग तक मानवता उनका उपकार मानती रहेगी।
लेकिन वे आदरणीय मनीषी संसार का यह उपकार कर तभी सके हैं, जब उन्होंने पहले प्रचण्ड साधना द्वारा स्वतः ज्ञान का भण्डार एकत्र किया था। योंही वे कुछ थोड़ी-सी पुस्तकें पढ़ कर ही ज्ञानी नहीं बन बैठे थे। उन्होंने जीवन का अधिकाँश भाग अध्ययन, मनन और चिन्तन में लगाया था। संयम और साधना द्वारा अपना विवेक परिपक्व किया था और अपने ज्ञान भण्डार को अनुभव की तुला पर तोल कर प्रामाणिक बना लिया था और तब इतनी साधना करने के बाद वे समाज को ज्ञान-दान करने के योग्य हो पाये थे। उन्होंने उस ज्ञान के बल पर मानवता के प्रति सर्वश्रेष्ठ उपकार किया। जिसके लिए वे तब भी पूजित रहे, आज भी हैं और आगे भी पूजनीय बने रहेंगे। ज्ञानोपकार से बढ़ कर संसार का कोई अन्य परोपकार है ही नहीं।
ज्ञान-दान से मनुष्य का सर्वांगीण, अक्षय और स्थायी लाभ होता है। ऋषियों के दिए उस मूलभूत ज्ञान को ही आधार बना कर मनुष्यता तब से अब तक विकास करती चली आ रही है। यदि उन पूर्व पुरुषों ने यह उपकार न किया होता और केवल अर्थ की साधना ही सिखाई होती, केवल वही साधन खोज कर दिए होते जिनसे शारीरिक भोगों की ही सुविधा हो सकी होती तो शायद मनुष्य अब तक मानव-पशु की अवस्था में ही होता। न तो उसे आत्मा का ज्ञान हो पाता और न ईश्वर का परिचय। शरीर ही उसकी आत्मा होती और शरीर ही परमात्मा जिसकी तृप्ति करते रहना ही उसकी पूजा होती। वह आज की तरह धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष को क्रम-क्रम से प्राप्त कर सकने का मार्ग न पा पाता। आज की सुन्दर सभ्यता आनन्ददायी संस्कृति और कल्याणकारी धर्म, जिसके कारण हम मनुष्य संसार के सर्वश्रेष्ठ प्राणी बने हैं उन ऋषि मुनियों का वह उपकार ही है जिसको उन्होंने ज्ञान-दान के रूप में हम पर किया है। ज्ञान-दान संसार का सर्वश्रेष्ठ उपकार है।
गुण अथवा चरित्र विकास भी प्रथम श्रेणी के उपकार माने गये हैं। यह भी ज्ञान-दान के अंतर्गत ही आते हैं। जो दिया हुआ ज्ञान मनुष्य को गुणी अथवा चरित्रवान नहीं बना सकता वह या तो ज्ञान नहीं है अथवा उसका देने वाला स्वयं चरित्रवान नहीं। अन्यथा गुण एवं चरित्र तो ज्ञान के अनिवार्य अनुबन्ध हैं। ज्ञान के साथ उनका आ जाना अपरिहार्य होता है।
संसार का सर्वश्रेष्ठ उपकार करने के लिए मनुष्य को स्वयं ज्ञानी, गुणी तथा चरित्रवान बनना चाहिए और इन विशेषताओं को बिना किसी स्वार्थ अथवा लोभ के समाज में वितरित करना चाहिए। किन्तु इसका यह अर्थ कदापि नहीं कि जो सर्वश्रेष्ठ उपकार कर सकने की परिस्थिति में नहीं है, वह उपकार के कार्यों की ओर से विमुख अथवा उदासीन हो जाये। जो प्रथम श्रेणी का उपकार नहीं कर सकता उसको द्वितीय अथवा तृतीय श्रेणी का ही उपकार करते रहना चाहिए। समाज के जीवन और संसार के विकास के लिए परोपकार की प्रवृत्तियाँ बहुत आवश्यक हैं वह चलती ही रहनी चाहिए- इससे लोकहित भी होगा और आत्म-कल्याण भी।
मोक्ष का महामंत्र-
“आत्म-शोध है” भिक्षुओ! इसके लिये तुम्हें जंगल-जंगल भटकने की आवश्यकता नहीं। परम-पद तुम्हारे बिलकुल समीप है।
एक स्त्री दर्पण के सामने बैठी अपना चेहरा देख रही थी। और बड़ी तत्परता से उसे सुन्दर और निर्मल बनाने का प्रयत्न कर रही थी। मैंने देखा- वह बड़े ध्यान से चेहरे में लगी गन्दगी को ढूंढ़ती है और उसे साफ करती है। आत्म-परीक्षण के सम्बन्ध में भी यही बात है। अपनी चेतना के दर्पण में अपने आपको देखो और ढूंढो कहीं काम, क्रोध, भय, उद्विग्नता, असन्तोष, असंतुलन तो नहीं छिपा हुआ है? तुम्हारे विचार गन्दे तो नहीं हैं? इंद्रियों पर तुम्हारा नियन्त्रण है या नहीं?
यदि इनका सही उत्तर न मिले तो उन बुराइयों को मिटाने में लग जाओ, उस स्त्री की तरह जब तुम्हें अपने आन्तरिक चेहरे की निर्मलता पर सन्तोष हो जायेगा, उसी दिन तुम मोक्ष, परम-पद पा, आत्म-कल्याण की स्थिति प्राप्त कर लोगे। -भगवान् बुद्ध,
आकाँक्षायें मनुष्य जीवन की प्रेरणा-स्त्रोत हैं। आकाँक्षाओं के अभाव में जीवन की गतिशीलता समाप्त हो जाती है। तथापि यही आकाँक्षायें जब विकृत हो जाती हैं तो सम्पूर्ण जीवन को अशाँति तथा असन्तोष की आग में जलने के लिए फेंक देती हैं।
आज-कल प्रायः हम सभी लोगों का जीवन संतोष तथा शाँति की सुख-शीलता से वंचित हो गया है। जीवन संघर्ष इतना बढ़ गया है कि इस पर बैठ कर दो मिनट सोच-विचार करने का समय भी नहीं मिलता। दिन-रात एक टाँग से भागते, दौड़ते, सुख-सन्तोष की सम्भावनायें लाने के लिए कोई प्रयत्न अछूता नहीं छोड़ते फिर भी विकल तथा क्षुब्ध ही रहना पड़ रहा है। जीवन की प्रेरणा- उसके सत्य तथा यथार्थ रूप के दर्शन ही नहीं होते। जहाँ और जिधर सुख-शाँति के लिए जाते हैं, उधर प्रतिकूल परिणाम ही हाथ आते हैं। ऐसे कितने लोग हो सकते हैं जो जीवन में अपेक्षित सुख-सन्तोष का साक्षात्कार कर पाते हों। आजीवन श्रम करते रहने, जीवन-रस सुखाते रहने और दौड़-धूप करते रहने पर भी रिक्तता, खिन्नता तथा सन्ताप की प्राप्ति निःसन्देह बड़े खेद तथा चिन्ता का विषय है। इसके आधार-भूत कारण की खोज निकालना, नितांत आवश्यक हो गया है।
इस असफलता पर गम्भीरतापूर्वक विचार करने से तो इसी परिणाम पर आना होता है कि हमें लक्ष्य-पथ से भटका देने में हमारी स्वयं की विकृत आकाँक्षाओं का गहरा हाथ है। जो आकाँक्षायें जीवन की प्रेरणा स्त्रोत हैं वही विकृत हो जाने पर प्रवंचक बन कर जीवन के सहज तथा अभीष्ट पथ से हमें इधर-उधर ले जाकर अशाँति तथा असन्तोष के कंटकाकीर्ण मार्गों पर घसीट रही हैं। निश्चय ही जीवन में अभीष्ट सुख-शाँति पाने के लिए विकृत आकाँक्षाओं को संस्कृत तथा परिष्कृत करना होगा अथवा उन्हें अकल्याणकारी साथियों की तरह छोड़ ही देना होगा। जो प्रेरणा पाप बन कर अपने लिए भयानक हो उठे उसका परित्याग कर देना ही उचित है।
विकृत आकाँक्षायें बड़ी भयावनी होती हैं। उनका अभिचार शीघ्र ही मनुष्य को सत्पथ से भटका कर विपथ पर खींच ले जाता है। उसकी तृष्णा इतनी बढ़ा देता है कि असत्य सत्य और मरीचिका जल दिखलाई देती है। और मनुष्य उस बाज पक्षी की तरह मूढ़मति हो जाता है, जो जमीन पर पड़े काँच के टुकड़े में अपना प्रतिबिम्ब देख कर झपटता और उससे टकरा कर आहत हो जाता है। वास्तविकता की पृष्ठ-भूमि बहुत ही कठोर और कर्कश होती है। इस पर चल कर लक्ष्य तक पहुंचने के लिए बड़ी ही दृढ़ता तथा सतर्कता एवं धैर्य की आवश्यकता होती है। किन्तु स्वार्थपूर्ण विकृत आकाँक्षाओं की माया मनुष्य को इतना कल्पनाशील तथा लोलुप बना देती है कि वह हर ध्येय को नितांत सरल तथा अपने योग्य मान लेता है।
इसका फल यह है कि वह अपनी महत्वाकाँक्षाओं के साथ शीघ्र ही आकाश में उड़ जाता है और शीघ्र ही वेग कम होने से नीचे पृथ्वी पर गिर कर आहत होता और कराह उठता है। जिस सुख-शाँति के लिए उसने उड़ान की थी, वह तो मिली नहीं उल्टा अशाँति, पीड़ा तथा असन्तोष का भागी बनना पड़ा। विकृत आकाँक्षाओं का विष बड़ा तीव्र होता है। इसका अभ्यस्त मनुष्य एक अजीब नशे से प्रमत्त रह कर जीवन के ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर ही भागता फिरता रह कर अन्त में अशाँति तथा पश्चाताप के साथ विदा हो जाता है।
इसी प्रकार की विकृत आकाँक्षाओं के नशे-बाज एक सज्जन का उदाहरण है कि उनको राजनीति में आगे बढ़ने की धुन सवार हुई। अपनी इस धुन को पूरा करने के लिये वे विगत दस पंद्रह वर्षों से लगे हैं, किन्तु हर बार असफलता की पीड़ा पाने पर भी अभी उससे बाज न आये हैं। यद्यपि न तो कोई लक्ष्य है और न कोई उपयोग फिर भी उन्हें एम.एल.ए. बनने की धुन है। इसके लिए वे दो-बार चुनाव के मैदान में हार चुके हैं। पर घर की काफी पूँजी फूँक चुके हैं, किन्तु फिर भी उनकी वह धुन नहीं हुई।
जब मिलते हैं अपनी असफलता का ही रोना रोते हैं, एक नई अशाँति, नया असंतोष उन्हें घेरे रहता है। आर्थिक नुकसान तथा पराजय की ग्लानि काँटे की तरह उनके हृदय में कसकती रहती है। अपनी इस सनक में काफी स्वास्थ्य खराब कर चुके हैं, फिर भी न जाने क्यों एम.एल.ए. पद के लिए पीछे पड़े हैं।
जब-जब इन सज्जन से कहा गया कि आपकी यह इच्छा जब आपको किसी प्रकार सुख-चैन से रहने नहीं देती, हर बार प्रयत्न में असफलता और हानि उठानी पड़ी है, फिर क्यों उसके पीछे पड़े हैं? जबकि न तो उसका आपके लिए कोई उपयोग है और न वह जीवन के लिये कोई आवश्यक ही है। इस पर उनका जो उत्तर रहा है वह विचारणीय है। बोले-
“क्या करें, राजनीति का यह नशा ही कुछ ऐसा है, जो कोई दशा क्यों न हो जाय, छुड़ाये नहीं छूटता। सोच रहा हूं कि किसी प्रकार चुनाव जीत जाता, एम.एल.ए. बन कर एक बार विधान सभा पहुँच पाता तो बात बन जाती, पराजय का कलंक धुल जाता। और अब तक जो हानि हुई है वह मिनटों में पूरी हो जाती। इसलिए बार-बार असफल होने पर भी इसके पीछे पड़ा हुआ हूँ। कभी तो समय आयेगा ही और हमारे लिए भी समाज में सम्मान और समृद्धि का द्वार खुल जायेगा।’’
कहना न होगा कि इस प्रकार की विकृत आकांक्षा रखने वाले व्यक्ति दया के पात्र हुआ करते हैं। ऐसे ही विकृत आकाँक्षा वाले अपने जीवन के सहज सुन्दर मार्ग से भटक कर उन रास्तों पर पड़ जाते हैं, जहाँ उनकी सारी सुख-शाँति छीन ली जाती है। जिन आकाँक्षाओं का कोई उद्देश्य नहीं, कोई उपयोग नहीं अथवा जिनके पीछे कोई हितकर प्रेरणा मौजूद न हो, वह मृग-मरीचिका के सिवाय और क्या कहीं जायेंगी? निश्चित ही है कि जब-जब मनुष्य की आकाँक्षायें नशे का रूप धारण कर लेती हैं, तब वे उसे उस नशे-बाज की तरह बना देती हैं जो मदाँध होकर नाली में गिरता रहता है किन्तु अपना सुधार नहीं करता। यह बात दूसरी है कि शराब का नशे-बाज गन्दी नाली में गिरता है और आकाँक्षाओं का नशे-बाज अशाँति एवं असन्तोष के दल-दल में।
वास्तविक आकाँक्षायें तो वही कही जायेंगी जिनके पीछे कुछ उद्देश्य, हित, आदर्श, आवश्यकता अथवा उपयोगिता की प्रेरणा मौजूद है। योंही किसी लोभ-लालच अथवा स्वार्थ से प्रेरित होकर ऊट-पटाँग आकाँक्षाओं को पाल लेना कोई बुद्धिमान है? यह तो उसकी कबाड़ी जैसा काम है जो अपने घर में जगह-जगह से उठा कर तमाम निरर्थक और निरुपयोगी वस्तुओं का ढेर लगा लिया करता है।
आकाँक्षायें जीवन की प्रेरणा स्त्रोत अवश्य हैं किन्तु उनको समझने, परखने के लिए विवेक की भरी अपेक्षा है। अपने हृदय में पालने से पहले अपनी आकाँक्षाओं की परीक्षा कर लेना और यह समझ लेना परम आवश्यक है कि इनमें कोई यथार्थ तथा उपयोगी तत्व भी अथवा यह केवल वह माया-जाल है जो मनुष्य के सहज सुन्दर जीवन को भुलावे की राहों पर भटका देता है और मनुष्य अपनी सहज शाँति, मानसिक व्यवस्था और बौद्धिक संतुलन खो बैठता है।
किन्हीं स्वार्थ और प्रलोभनपरक आकाँक्षाओं के पीछे भागते फिरना बुद्धिमानी नहीं है। मनुष्य की जिन आकाँक्षाओं के पीछे एक मात्र स्वार्थ बुद्धि की प्रेरणा होती है वे आकाँक्षायें निकृष्ट स्तर की ही होती हैं और निकृष्टता, किसी श्रेयता और श्रेष्ठता का सम्पादन कर सकेगी यह सर्वथा असम्भव ही है। श्रेय और श्रेष्ठता की संवाहिका उच्च, निर्लोभ तथा निःस्वार्थ आकाँक्षायें ही होती हैं।
थोड़ी बहुत आकाँक्षायें सभी में होती हैं। इस संसार में सर्वथा इच्छाशून्य हो सकना सम्भव नहीं है। आकाँक्षायें जीवन का चिन्ह हैं, अग्रसर होने की प्रेरणा हैं। मनुष्य में इनका होना स्वाभाविक ही है। फिर भी अकल्याणकारी इच्छाओं को मनुष्य की स्वाभाविक आकाँक्षाओं में स्थान नहीं दिया जा सकता है। मानिये, यदि कोई चोरी, मक्कारी, लूट-पाट और दूसरों का शोषण करके धन प्राप्त करने की आकाँक्षा करता है, किसी भी अनीति और अन्यायपूर्ण प्रयत्नों से धनाढ्य बनना चाहता है तो क्या उसकी यह आकाँक्षा उचित और स्वाभाविक मानी जायगी? नहीं कदापि नहीं। यह तो आकाँक्षा नहीं है। इसको तो उसकी आसुरी और आततायी वृत्ति ही कहा जायेगा।
इसी प्रकार यदि कोई व्यक्ति में स्थान पाने, अपना प्रभाव जमाने की आकाँक्षा रखता है और उसे मूर्तिमान करने के लिये निर्बल एवं असहाय व्यक्तियों को सताता उनको ताड़ना देता है, और इस प्रकार अपना आतंक फैलाता है तो क्या उसकी यह आकाँक्षा उचित कही जायेगी? यह तो एक मात्र उसका पागलपन ही माना जायेगा। समाज में स्थान पाने, लोगों को प्रभावित करने के लिये तो सेवा, परोपकार और सहयोग, सहायता एवं सद्-व्यवहार तथा सदाचरण का ही मार्ग निर्धारित किया गया है। इससे विपरीत मार्ग पर चल कर उद्देश्य की पूर्ति के लिये प्रयत्नशील होने वाला व्यक्ति तो समाज का शत्रु ही माना जायेगा।
तब भला वह उसके सम्मान और श्रद्धा का पात्र किस प्रकार बन सकता है? समाज में गुण्डों, लफंगों और धूर्तों का भी जिक्र होता है। किन्तु यह उनकी नामवरी नहीं, बदनामी ही होती है। जिसके प्रभाव में आतंक अथवा भय का पुट हो, जिसका नाम घृणा, तिरस्कार और अपमान के साथ लिया जाये वह समाज में प्रभाव पाने का आकाँक्षी कैसा? वह तो बुद्धिहीन मूर्ख ही है, जो अपने लिये अपनी विकृत आकाँक्षा की प्रेरणा से विनाशकारी परिस्थितियां सृजन कर रहा है।
मनुष्य की वे आकाँक्षायें ही वास्तविक आकांक्षायें हैं, जिनके पीछे स्वयं उसका तथा समाज का हित सन्निहित हो। जो आकाँक्षायें समाज अथवा अपनी आत्मा की साधक न होकर बाधक होती हैं, वे वास्तव में दुष्प्रवृत्तियाँ ही हुआ करती हैं, जो लोभ और मोहवश आकाँक्षा जैसी जान पड़ती हैं। विनाशात्मक आकाँक्षायें रखने वाले व्यक्ति रावण, कंस, दुर्योधन जैसे दुष्ट महत्वाकाँक्षियों के ही संक्षिप्त संस्करण होते हैं जो जीवन में एक बूँद भी सुख-शाँति और सन्तोष नहीं पा सकते और मरणोपरान्त युग-युग तक धिक्कारे जाते रहते हैं।
आज की हमारी अशाँति, असन्तोष और सन्ताप से भरी हुई जिन्दगी का मुख्य कारण हमारी विकृत आकाँक्षायें ही हैं, जो लोभ की मरु-मरीचिका और मोह की मृग-तृष्णा में भटकती हुई उस पथ पर नहीं आने देतीं, जिस पर स्वर्गीय शाँति, निसर्ग सन्तोष और अप्रतिहत शीतलता के दर्शन हो सकते हैं। अपनी आकाँक्षाओं की परीक्षा कीजिये, उन्हें सत्य एवं यथार्थ की कसौटी पर परखिये, हित-अहित की तुला पर उनका मानाँकन करिये और जो भी बाधक आकाँक्षायें हो उन्हें तुरन्त अपनी मनोभूमि से निकाल बाहर करिये। उचित, उपयोगी और रम्य, रंजक आकाँक्षाओं को पालिये उनकी पूर्ति के लिये अबाध प्रयत्न एवं अखण्ड पुरुषार्थ करिये, सुन्दर, शिष्ट और सुशील मार्ग का अवलम्बन कीजिये और तब देखिये कि आपके जीवन में स्थायी और अक्षय सुख-शाँति का समावेश होता है या नहीं?
भारतवर्ष की भौतिक उन्नति इसलिए नहीं लुट गई कि यहाँ के लोग धर्म और परमार्थ-निष्ठ होते हैं वरन् भारत की विकसित और हरी-भरी फुलवारियां इसलिए लुट गईं कि उनके आस-पास काँटों और झाड़ियों की बाड़ी नहीं रही। कष्टों के काँटे और झंझावातों की झाड़ियों के बीच जीवन सुरुचि का उद्यान विकसित होता है। इसलिए मेरे प्यारे काँटों और झाड़ियो। तुम मुबारक हो, धर्म और संस्कृति, जीवन के उच्चादर्शों और भौतिक उन्नतियों के तुम्हीं रक्षक हो। तुम दूर न होना ताकि मेरे देशवासी निरन्तर फलते-फूलते रहें। तुम्हारी बाड़ में उनका विकास सुरक्षित रहे। कष्ट उनके जीवन का अंग बना रहे। -स्वामी रामतीर्थ
सृष्टि का आदि क्रम चला था तब देव और दानवों से भी प्रबल शक्ति मनुष्य की मानी जाती थी। मानव हर क्षेत्र में इनसे बढ़ कर था। विद्या, बल, बुद्धि, वैभव सब में अग्रणी मनुष्य ही था। वह जब भी इच्छा करता था दानवों को दबोच लेता था और देवों को परास्त कर डालता था। मानव-शक्ति से उन दिनों सभी भयभीत रहते थे।
एक दिन देव-दानवों ने सृष्टा ब्रह्मा से शिकायत की- “आपने मनुष्य को इतना सशक्त बनाया है, वह सबको भयभीत रखता है, उसकी शक्ति के आगे किसी की नहीं चलती। समस्त धरती का वैभव उसके हाथ है हम लोग केवल उसके आश्रित रह गये हैं। हमें भी वह अधिकार दीजिये जिससे स्ववश जी सकें, मनुष्य से डरने की बात का अन्त आप ही कर सकते हैं।”
ब्रह्मा जी ने विचार किया और उत्तर दिया ‘‘जब तक मनुष्य को मानवी- ‘नारी’ की शक्ति मिलती रहेगी वह अजेय है, अजेय रहेगा, हम उसके लिये कुछ नहीं कर सकते।” देव-दानव चले आये पर वह यह रहस्य जान गये कि मनुष्य को कैसे परास्त किया जा सकता है। इसके बाद जब भी कभी मनुष्य से लड़ने का अवसर मिला उन्होंने सर्वप्रथम नारी-शक्ति का हनन किया तब मनुष्य निःशक्त होता गया और देव तथा दानव प्रबल होते गये।
एक बार ऐसा ही एक प्रसंग भगवान् राम के समक्ष आया था। मेघनाथ ने इतना भयंकर युद्ध किया कि रीछ और बन्दरों की सेना व्यथित और व्याकुल हो उठी। राम ने विभीषण से मन्त्रणा की। विभीषण ने बताया- भगवन्! मेघनाथ अपनी पतिव्रता और साध्वी पत्नी सुलोचना की शक्ति के कारण अजेय है। जब तक उसे वह शक्ति मिलती रहेगी तब तक मेघनाथ कदापि जीता नहीं जा सकता?
ऐसे और भी सैकड़ों अलंकारपूर्ण पौराणिक कथानक हैं, उन सब का रहस्य यही है कि मातृ-शक्ति से बढ़ कर मनुष्य के पास दूसरी शक्ति नहीं है। नारी का स्नेह, नारी का समर्पण, नारी का वात्सल्य, नारी का सौहार्द, नारी का विश्वास, नारी की सेवा- ऐसी शक्तियाँ हैं, जिन्हें पाकर मनुष्य अमोघ और अक्षय शक्ति वाला बन जाता है। जिसकी पीठ पर माँ का, स्त्री का हाथ होता है वह अविजित ही संसार में सफलता प्राप्त करता है और आगे बढ़ता है।
किसी भी समाज का साँस्कृतिक एवं आध्यात्मिक स्तर समाज में नारियों की स्थिति में निर्धारित होता है। इतिहास, पुराण के व्यापक परिप्रेक्ष्य देखने से पता चलता है कि नारी के अंतस् की मातृत्व निर्माण एवं नेतृत्व की शक्तियाँ ही पुरुष का शारीरिक, मानसिक, भौतिक एवं आध्यात्मिक विकास करती रही हैं, मनुष्य को जीवन-पथ पर आगे बढ़ाती रही हैं।
स्त्री शाँति स्वरूपा और पूजनीया है, वह परिवार की शोभा है, देवी है, ज्योति है। उसकी ज्योति से सम्पूर्ण परिवार प्रकाशित होता रहता है, उसके अभाव में घर सुनसान लगता है। वह घर की प्राण है। प्राणि मात्र के दुःख दर्द को समझने, स्वार्थ को परमार्थ में ढालने की विराट् चिन्तन वृत्ति पुरुष को नारी ने ही दी है।
सामाजिक संगठन, समुन्नति की प्रेरक भी वही है। राष्ट्र का यश, सौभाग्य और लक्ष्मी भी वही है। जिस देश और जाति में नारी का पूज्य स्थान होता है वही देश और जातियाँ गौरव प्राप्त करती हैं, सिर ऊँचा उठा कर स्वाभिमान क साथ अमर रहती हैं।
अथर्ववेद कहता है-
ब्रह्मापरं युज्यतां ब्रह्म पूर्व ब्रह्मान्ततो मध्यतो ब्रह्म सर्वतः। अनाव्याधां देवपुरां प्रपद्य शिवा स्योना पतिलोके विराज॥ -अथर्व 14/1/64
“हे मनुष्यो! पत्नी के पीछे ब्रह्म (उच्चता, महानता) हो, आगे ब्रह्म हो और अन्त तक ब्रह्म हो। इस प्रकार ब्रह्म से सर्वत्र घिरी हुई वह पति हृदय में राज्य करे।”
आगे, पीछे और मध्य में ब्रह्म होने का अर्थ उसे चतुर्दिक उच्चता, महानता के वातावरण में रखना है। कन्या के रूप में सर्वाधिक स्नेह और उत्तराधिकार भी उसे चाहिये। शिक्षा, स्वास्थ्य संवर्धन और सामाजिक व्यवहार का उपयुक्त और पूर्ण वातावरण उसे मिलना चाहिये। मध्य अर्थात् जब वह पति-गृह में आवासिनी बने तब वह घर की साम्राज्ञी, रानी, सत्तारूढ़ बन कर रहे। घर की सम्पूर्ण स्थिति का संचालन उसकी आज्ञा से हो। सहचरत्व की उपेक्षा न की जाये। उसकी अनुमति के बिना पति भी कोई कार्य न करे। अन्य ही नहीं पुरुष स्वयं भी पत्नी के अनुशासन में रहे।
और जब वह माँ बने तो बच्चा उसकी आज्ञा का पालन कर उसकी उच्चता सिद्ध करे। सेवा, सुश्रूषा द्वारा सम्मानित की गई माँ का स्नेह और वात्सल्य इतनी बड़ी शक्ति है कि वह परमात्मा भी नहीं दे सकता। भारत में परमेश्वर की पिता के समान ही नहीं, किन्तु माता के समान पूजा होती है। माता का शब्द यहाँ सबसे प्यारा और सबसे समीप का सम्बन्ध माना गया है। कोई कष्ट होता है, बड़ा दुःख सिर पर आता है, तब उस समय हम परमात्मा की भी उतनी याद नहीं करते जितना हृदय तल से, माँ की याद करते हैं। हमें उस समय मालूम होता है कि मां से बढ़ कर संवेदनशील, करुणामय, दयार्द्रचित्त और सहायक और दूसरा कोई नहीं हो सकता। ऐसी शक्ति तो सचमुच सम्माननीय ही नहीं पूजनीय है।
“समाज में नारी एक बहुत बड़ी शक्ति है। घर का सारा व्यवहार उन्हीं के हाथ में आज तक रहा, आगे भी रहेगा। बच्चों का प्रजनन और पालन ही नहीं, पोषण भी उसी के हाथ है। बच्चों में जो संस्कार बचपन में माता की तरफ से होते हैं, उससे अधिक संपर्क दूसरा कोई संस्कार जीवन भर में नहीं उभार पाता। मित्रों, पड़ोसियों और कुटुम्बियों का भी असर होता है, लेकिन बिल्कुल बचपन में अगर माता भक्तिमान, श्रद्धावान हो तो उसके द्वारा जो संस्कार बच्चों को मिलता है, वह सबसे ज्यादा बलवान होता है, जीवन में उत्थान के पहियों को तेजी से ऐसे ही संस्कार खींच पाते हैं।
अपने देश में भगवती दुर्गा की महिमा बहुत गाई जाती है। दुर्गा शक्ति की प्रतीक हैं। नारी में शक्ति की इतनी सुन्दर कल्पना अन्यत्र कहीं नहीं हुई। उसमें भी पुरुषों के सदृश चैतन्य-तत्व भरा पड़ा है, उसे जगाने की आवश्यकता है। हमारा गौरव नारियों के शरीर सजाने में, रूप-परायण अथवा भोग-परायण बनाने में नहीं वरन् उन्हें शक्ति, सरस्वती और साध्वी बनाने में है। नारी में उन निष्ठाओं का विकास होना ही चाहिये जिनकी प्रतिच्छाया हम भावी सन्तति और समाज में देखना चाहते हैं।
स्त्री के गुण लज्जा, भय या संकोच नहीं विनय, आत्म-श्रद्धा, निर्भयता, शुचिता, आत्म-सौंदर्य का भाव हमारी माताओं में जगाया जाय, ताकि वे इन गुणों को पका कर भावी सन्तानों को स्तन-पान करायें और उनमें भी वैसे ही तेजस्विता, मनस्विता, वीरता, समर्थता, मेधा के भाव भरते हुए चले जायें, और अतीतकालीन गौरव एक बार फिर से स्पष्ट हो पड़े।
मानवी शक्ति का जागरण ही विश्व परिवर्तन का आधार है। नारी विधेयात्मक शक्ति है। जो काम पुरुष शक्ति-ताँडव द्वारा करता है, नारी उसे सहज स्नेह, सरलता और सौम्यतापूर्वक सम्पन्न कर लेती है। युग परिवर्तन का महत्वपूर्ण प्रयोजन पूर्ण करने के लिए सर्वतोभावेन-उसी को जगाना चाहिए। उसी को बढ़ाना चाहिए और विश्व-शाँति के उपयुक्त वातावरण बनाने की उसी से याचना करनी चाहिए। नारी-तत्व को प्रतिष्ठित पूजित किए बिना हमारा उद्धार नहीं हो सकता।
गरीबी एक अपराध है और आधुनिक सभ्यता की देन है, जहाँ भाई का नाता भी ‘पोजीशन’ की मर्यादाओं में बँधा है, जहाँ श्रद्धा, भक्ति, यहाँ तक कि जीवन-संगिनी पत्नी के प्रेम की भी कीमत है। यह आधुनिक सभ्यता है। -अज्ञात
कहने को तो आज-कल पढ़े-लिखे सुशिक्षित व्यक्ति भी इस युग को सभ्यता और संस्कृति के विकास का युग मानते हैं, पर वस्तुस्थिति ठीक इससे विपरीत है। यदि अधिक चमकीले वस्त्र, सुन्दर केश-सज्जा, बढ़िया इमारतें, मोटर-रेल आदि वैज्ञानिक यातायात के साधन और केवल लच्छेदार व्यावहारिक भाषा को ही सभ्यता और संस्कृति का प्रतीक मानना हो तब तो बात अलग है, लोग प्रसन्नता पूर्वक अपने आपको सभ्य एवं सुसंस्कृत मान सकते हैं, किन्तु यदि सभ्यता और संस्कृति मानवता के प्रतीक माने जांय तो वह भी देखना पड़ेगा कि करुणा, दया, क्षमा, संवेदना, सहानुभूति तथा सौहार्द आदि सामाजिक गुणों के प्रति लोगों के अन्तःकरण में कितना आदर भाव है। इनके आधार पर ही किसी युग के सभ्य एवं संस्कृत होने का सही अनुमान किया जा सकता है।
आज की सामाजिक स्थिति को मानवता की तुला पर तोलें तो परिणाम बड़े निराशा-जनक मिलते हैं। इन दिनों मनुष्य में पाशविकता के अधिक लक्षण दिखाई दे रहे हैं फिर भला ऐसी प्रवृत्ति रखने वाला मनुष्य अपने आपको सभ्य एवं सुसंस्कृत किस मुँह से कहता है?
मनुष्य समाज को गिराने वाली अनेक दुष्प्रवृत्तियाँ हैं पर हमारी दृष्टि में माँसाहार उनमें से सबसे अधिक घृणित है। माँसाहार मनुष्यों में निष्ठुरता, क्रूरता, निर्दयता, स्वार्थ साधन आदि समाज विरोधी प्रवृत्तियों की वृद्धि करने वाला सिद्ध होता है। इससे मालूम पड़ता है कि लोगों के आध्यात्मिक गुण नष्ट हो चुके हैं और वह अपने स्वाद, स्वास्थ्य और स्वार्थ के लिये बड़े-से-बड़ा अपराध कर सकते हैं। जिस समाज में ऐसे अनात्मवादी व्यक्ति विद्यमान हों उसमें मानवता के गुणों की कदापि आशा नहीं की जा सकती।
माँस-भोजन मानवता की स्थापना एवं स्थिरता के लिये बहुत बड़ी बाधा है। यह सब जानते हैं कि एक सुखी समाज के लिये स्वस्थ गुणों के नागरिकों का होना कितना आवश्यक है। व्यक्ति का सद्गुणी होना उसके आन्तरिक सदाचार पर निर्भर है अर्थात् सभ्य समाज की रचना तभी हो सकती है, जब लोगों के मन स्वच्छ हों। यद्यपि अभी पाश्चात्य विद्वान इस बात को नहीं जान पाये पर हमारे तत्त्वदर्शी ऋषि-मुनियों ने इस बात को बहुत पहले जान लिया था कि मन और कुछ नहीं अन्न का सूक्ष्म संस्कार मात्र है।
अर्थात् मनुष्य के आहार का जो गुण होगा उसके मन में भी वैसे ही गुणों का, विचारों का जन्म होगा और जैसे लोगों के विचार होंगे, आचरण भी वैसे ही होंगे। इस वैज्ञानिक तथ्य की पूर्ण जानकारी के बाद ही स्वच्छ आहार ग्रहण करने की आवश्यकता का प्रतिपादन किया गया था और भोजन-व्यवस्था को अनेक कड़े नियमों से प्रतिबन्धित कर दिया था।
भोजन की स्वच्छता, सादगी, सफाई और उसे भावनापूर्वक ग्रहण करने की भारतीय प्रणाली मनोवैज्ञानिक ही न थी, वह विचार-विज्ञान की गहन कसौटी पर कसी हुई थी। यदि मानव के निर्माण में उसकी प्रवृत्तियों के बनने में भोजन का कोई प्रभाव न होता तो मनीषी-जन उसकी खोज, गुण-अवगुण की उपयोगिता एवं अनुपयोगिता पर इतना गहन तथ्यान्वेषण न करते।
माँस से मनोवृत्तियाँ क्रूर, दुस्साहसी, निर्दय और निष्ठुर होती हैं, तो इन दुर्गुणों से समाज भी निश्चित रूप से प्रभावित होता ही है। जो व्यक्ति माँस के लिये जीवों पर दया नहीं कर सकता वह अपने बाल-बच्चों के प्रति दयालु होगा ऐसी कल्पना नहीं की जा सकती। क्या आश्चर्य- यदि ऐसी कोई स्थिति बन जाय, जब अन्न न मिले और माँस के लिये दूसरे जीवों का अभाव हो जाय तो मनुष्य-मनुष्य का ही माँस न खाने लगे।
हम आज के मनुष्यों को जीवन-दर्शन की गहराई पर उतारना चाहते हैं और उसे यह बताना चाहते हैं कि मनुष्य और अन्य जीवों के मध्य केवल शारीरिक असमानता है। ज्ञान, पशुओं को भी होता है, मनुष्य जितना विचार तो पशु-पक्षी भी कर लेते हैं, हर्ष, शोक से वे भी पीड़ित होते हैं। प्राणों का मोह उन्हें भी उतना ही होता है जितना मनुष्यों को, फिर आत्मिक दृष्टि से अन्य जीवों और मनुष्यों में भेद-भाव कहाँ रहा? एक आत्मा दूसरी आत्मा को मार कर खा जाय, इससे कुत्सित अपराध और क्या हो सकता है।
स्वास्थ्य रक्षा की दृष्टि से भी माँस मनुष्य का स्वाभाविक आहार नहीं है। माँस भक्षण में सामयिक उत्तेजना और शक्ति का अनुभव हो सकता है, पर स्वास्थ्य को स्थायी रूप से सुदृढ़ और कार्यक्षम बनाने के लिये उसे कभी अधिक महत्व नहीं दिया जा सकता। इस सम्बन्ध में केवल भारतीय विद्वान या ग्रन्थ ही पर्याप्त प्रकाश नहीं डालते अपितु वर्तमान समय में योरोप और अमेरिका के वैज्ञानिकों, शरीर-शास्त्र वेत्ताओं तथा प्रसिद्ध डाक्टरों ने भी जो खोज परीक्षण एवं अनुभव किये हैं और जो निष्पत्तियाँ दी हैं, उनसे भी यही सिद्ध होता है कि माँसाहार स्थायी स्वास्थ्य की समस्या हल नहीं कर सकता, वरन् उससे अनेकों प्रकार के रोग उत्पन्न होते हैं।
इंग्लैंड के प्रसिद्ध डा. हेनरी परडो ने लिखा है- ‘‘मैं ऐसे अनेक व्यक्तियों को जानता हूँ जो माँसाहार त्याग कर शाकाहारी बन जाने से पहले की अपेक्षा अधिक स्वस्थ हो गये और कब्ज, गठिया, मृगी आदि रोगों से छुटकारा पा गये। मैं निस्संकोच कह सकता हूँ कि जो व्यक्ति पूर्णतया शाकाहार पर रहते हैं वे माँसाहारियों की अपेक्षा रोगों के शिकार बहुत कम होते हैं।”
डा.रसैल ने अपनी ‘सार्वभौम भोजन’ नामक पुस्तक में लिखा है- ‘‘जहाँ माँसाहार जितना कम होगा वहाँ कैंसर की बीमारी भी उतनी ही कम होगी।” डा.पर्कस ने अपने व्यक्तिगत अनुभव का उल्लेख किया है कि “माँसाहार के कारण ही वे बहुत दिनों तक सिर-दर्द, मानसिक थकावट तथा गठिया से ग्रसित रहे।”
डा. हेग ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “डाइट एण्ड फूड” में लिखा है- ‘‘शाकाहार से शक्ति उत्पन्न होती है और माँसाहार से उत्तेजना बढ़ती है, परिश्रम के अवसर पर माँसाहारी शीघ्र थक जाता है। जिसे इसकी आदत पड़ जाती है, वह शराब आदि उत्तेजक पदार्थों की आवश्यकता अनुभव करता है। यदि वे न मिलें तो सिर-दर्द, उदासी, स्नायु, दुर्बलता आदि का शिकार हो जाता है। ऐसे लोग निराशा-ग्रस्त होकर आत्म-हत्या करते हैं। इंग्लैण्ड में माँस और शराब का प्रचार बहुत अधिक है, इसलिए वहाँ आत्म-हत्यायें भी बहुत अधिक होती हैं।”
इसी प्रकार मेरी एस. ब्राउन, डा. क्लाडसन, जार्ज बर्नार्ड शा, डा. लम्स शैप तथा लन्दन की “वेजीटेरियन ऐसोसियेशन” आदि ने भी माँसाहार से स्वास्थ्य पर पड़ने वाले बुरे प्रभाव पर काफी विस्तृत प्रकाश डाला है।
माँसाहार से इस प्रकार की हानियाँ होने का मुख्य कारण उसमें पाया जाने वाला “यूरिक एसिड” नामक तत्व होता है जो शरीर के भीतरी अंगों में विषैला प्रभाव डालता है। यह “मूत्राम्ल” जब अधिक मात्रा में खून में मिल जाता है तो मस्तक में दर्द, हिस्टीरिया, निद्रा-नाश, श्वास अजीर्ण और यकृत आदि अनेक रोग हो जाते हैं और लोगों का स्वास्थ्य नष्ट हो जाता है।
माँसाहार से शरीर में शक्ति आती है, यह ख्याल करना बिल्कुल गलत है। कुछ दिन पूर्व कानपुर के किन्हीं ऐसे दो अखाड़ों के पहलवानों में कुश्तियाँ हुईं जिसमें एक अखाड़े के पहलवान अधिकाँश मुसलमान थे और माँस-भक्षण करते थे और दूसरे में सब हिन्दू थे जो विशुद्ध दूध, फल, घी और मेवों का इस्तेमाल करते थे। इस प्रतियोगिता में उस समय लोगों के आश्चर्य का ठिकाना न रहा, जब मुसलमान पहलवानों में से एक भी विजयी नहीं हुआ जबकि देखने में वे अधिक मोटे ताजे थे। इस घटना से अखाड़े का उस्ताद इतना प्रभावित हुआ कि उसने तमाम मुसलमान पहलवानों का माँसाहार बन्द करा दिया।
सन् 1898 में एक ऐसी ही प्रतियोगिता जर्मन में हुई। इसमें माँसाहारियों और शाकाहारियों में सत्तर मील पैदल चलने की होड़ हुई। प्रतियोगिता में बीस माँसाहारी थे, 6 शाकाहारी। शाकाहारी माँसाहारियों से बहुत पहले गन्तव्य स्थान पर पहुँच गये। सबसे कम समय, 14 घण्टे में सत्तर मील की दूरी तय करने वाला शाकाहारी ही था, 20 माँसाहारियों में से केवल एक व्यक्ति इस दूरी को तय कर सका और वह भी अन्तिम शाकाहारी के एक घण्टे बाद। उस एक को छोड़ कर शेष केवल 45 मील तक चल सके, इसके बाद उन्हें वहाँ से मोटरों पर लाना पड़ा।
सन् 1899 में क्वेटा नामक एक स्थान में एक ऐसी ही दिलचस्प रस्साकसी प्रतियोगिता रखी गई। इसमें एक ओर माँसाहारी अंग्रेज थे दूसरी ओर सिख रेजीमेंट के निरामिष जवान। कुछ देर की खींचतान के बाद अँग्रेज जवानों के हाथ छिल गये और उन्हें रस्सा छोड़ना पड़ा। शाकाहारी जवानों की उसमें जीत हुई।
माँस की तरह अण्डा भी पक्षियों का भ्रूण ही होता है, उसे यदि पूर्ण जीवित पक्षी न माना जाय तो भी उसमें जीव का अंश तो होता ही है। आखिर बच्चा तो उसी से बनता है। यदि केवल स्वास्थ्य बनाने का ही प्रश्न हो तो उससे स्वादिष्ट और अधिक शक्तिवर्द्धक पदार्थ इस संसार में मौजूद हैं, उनका प्रयोग किया जा सकता है। दूध और घी की शक्ति अण्डों से हजार गुना अधिक होती है। फल और मेवों से भी स्वास्थ्य को सुदृढ़ और शरीर को अधिक बलवान बनाया जा सकता है। प्राकृतिक साधन माँस की अपेक्षा स्वादिष्ट और गुणकारी भी होते हैं।
धार्मिक, नैतिक, शारीरिक अथवा सामाजिक- किसी भी दृष्टि से देखा जाय शाकाहार ही मनुष्य का प्राकृतिक भोजन है। जहाँ माँसाहार से तामस, काम, क्रोध, आलस्य प्रमाद, जड़ता आदि दुर्गुणों की वृद्धि होती है, वहाँ शुद्ध शाकाहार से स्फूर्ति, पवित्रता, प्रसन्नता, शक्ति तथा दीर्घ आयुष्य प्राप्त होता है।
पहली माँसाहार की स्थिति सामाजिक जीवन को अधःपतित बना कर लोगों के लिये अनेक उपद्रव खड़ी कर देती है जिसके फलस्वरूप लोग नारकीय यंत्रणाओं में फँसे रहते हैं, पर दूसरी स्थिति से समाज का देवत्व जागता है। सुख और समृद्धि का वातावरण बनता है। आज इस बात की प्रतीक्षा की जा रही है कि ऋषियों की इस पवित्र भूमि से माँसाहार का घृणित अपराध किस दिन दूर होगा?
ज्ञान प्राप्ति के लिये अति उत्सुक एक भक्त के आग्रह से एक दिन कबीर ने कहा- वत्स, पैर के नीचे की शिला को उठा। शिष्य ने तुरन्त शिला उठाई। शिला के नीचे भौंयार था। दोनों भीतर घुसे। अन्दर एक दरवाजे पर लिखा था। ‘अपने कान काटने वाला इस दरवाजे को खोल सकेगा।’
कबीर ने अपने दोनों कान काट डाले। वह दरवाजा खुला और कबीर अन्दर गये और पुनः दरवाजा बन्द हो गया। भक्त ने खोलने का प्रयत्न किया तो अन्दर से आवाज आई कि मैंने जैसा किया वैसा करने पर ही द्वार खुलेगा। भक्त भी कान काट कर अन्दर गया। दूसरे दरवाजे पर इसी प्रकार लिखा था। कबीर नाक काट कर अन्दर घुस गये। भक्त ने भी अनुसरण किया और वह अंदर दाखिल हुआ। तीसरे पर लिखा था। ‘जिसको अन्दर आना हो वह पहले अपना सिर काटे’ कबीर तो सिर उड़ा कर अन्दर चले गये पर भक्त बाहर ही रहा। नाक, कान, और मस्तक जाने के बाद क्या उपयोग? वह इसी विचार से डूबा हुआ था कि उसे नींद आ गई।
जब नींद खुली तो वहाँ दूर से कबीर आते दिखाई दिये। ‘क्या मेरी राह देख रहे हो?’ कबीर ने पूछा। ‘मैं तो कुछ समझ ही नहीं सका गुरुदेव! यह रहस्य सरलता से समझ में आने लायक नहीं है।’
‘तो क्या गुरुदेव, मेरे नाक-कान क्या अब सदा के लिये गये?
‘वे तो गये ही, इसमें क्या सन्देह?’
‘पर भगवन्! आपके तो कान-नाक पूर्ववत् हो गये हैं। मेरी भी पूर्ववत् कीजिये न प्रभु!’
यह कैसे हो सकता है? सिर काटा होता, तो सब अंग मेरे समान पूर्ववत् हो जाते।’
गायत्री वेद-जननी चारों वेदों की माता होते हुए एक वेद-मन्त्र भी है। वेद के हर मन्त्र का एक छंद, एक ऋषि और एक देवता होता है। उनका स्मरण उच्चारण करते हुए विनियोग किया जाता है। गायत्री महामंत्र का- गायत्री छन्द- विश्वामित्र ऋषि और सविता देवता है। सविता बोल-चाल की भाषा में सूर्य को कहते हैं। सविता की अधिष्ठात्री देवी होने के कारण गायत्री का दूसरा नाम सावित्री भी है। सविता और सावित्री का युग्म प्रख्यात है। कहते हैं सावित्री में जो शक्ति है वह सविता की है। यों सविता, परमब्रह्म परमात्मा को भी कहते हैं और उसकी प्रेरक विधेयक, निर्मात्री, संचारिणी ह्लादिनी, चेतना शक्ति को-गायत्री को-सावित्री कहा जा सकता है। यह ज्ञान-दृष्टि हुई। विज्ञान-दृष्टि में सविता को परमात्मा का तेजपुञ्ज ब्रह्म बताते हैं, जिसके प्रभाव और प्रकाश में यह सारा दृश्य जगता, सक्रिय रहता है। उस सविता की समग्र क्षमता एवं स्थिति को-प्राण-प्रक्रिया को सावित्री माना गया है।
शरीर और प्राण में जो सम्बन्ध है वही सविता और सावित्री में है। प्राणी के अस्तित्व को प्रकाश एवं अनुभव में लाने के लिए शरीर चाहिए और शरीर सजीव बना रहे उसके लिए उसमें प्राण की स्थिति आवश्यक है। दोनों की ‘अन्योन्याश्रय’ सम्बन्ध है। एक के बिना दूसरे की गति नहीं, स्थिति नहीं, उपयोगिता नहीं, शोभा नहीं। इसी प्रकार सविता और सावित्री एक दूसरे के लिए जुड़े हुए हैं। दोनों का एक मिश्रित युग्म है। अलंकार रूप से सावित्री को सविता को पत्नी भी कहते हैं।
मोटे अर्थ में यह प्रातः उदय होने वाला, साँयकाल अस्त होने वाला, प्रकाश और गर्मी देने वाला, अग्नि पिंड भी, सूर्य है- सविता है। उसकी भी अपनी शक्ति एवं क्षमता है। इस संसार का सारा क्रिया-कलाप उसी के प्रभाव से हो रहा है। इसलिये उसकी स्थूल जगत् में विभिन्न प्रकार की हलचलें उत्पन्न करने वाली क्षमता को लौकिक सावित्री कहा जा सकता है। वैज्ञानिक इसी अदृश्य और अविज्ञात महाशक्ति सावित्री के विभिन्न पक्षों का अनुसंधान आविष्कार करने में सृष्टि के आदि से लेकर अद्यावधि पर्यन्त प्रयत्नशील हैं। उन्होंने बहुत कुछ पाया भी है।
अग्नि-तत्व पता लगा कर मनुष्य ने जिस दिन उसका उपयोग जाना उस दिन उसने ऐसा अनुभव किया मानो उसने कोई महान् शक्तिशाली देवता को अपने घर आँगन में प्रतिष्ठित रहने के लिये मना लिया हो। अग्नि के आविष्कार ने बन्दरों की तरह अस्त-व्यस्त जीवन व्यतीत करने वाले मानव प्राणी को व्यवस्थित बनाने में महान योगदान दिया। इसके उपरान्त वर्तुलाकार लुढ़कने से उत्पन्न होने वाली गतिशीलता का पता लगा कर उसने पहिये का निर्माण किया और विभिन्न प्रकार के वाहन और यंत्र बनाना सम्भव हो सका।
आज तो बिजली, भाप, ईथर, अणु आदि क्षेत्रों में काम करने वाली सहस्त्रों शक्तियों को जान लिया गया है और उनके आधार पर विज्ञान के चरण द्रुत गति से अग्रसर हो रहे हैं। अन्यान्य ग्रह, नक्षत्रों पर चढ़ाई करने की योजनायें बन रही हैं, इस धरती पर एक-से-एक अद्भुत आविष्कारों की तैयारी है, मनुष्य शरीर का काया कल्प करके उसे चिरस्थायी बनाने की योजना है। यह सावित्री शक्ति के कतिपय पक्षों की जानकारी का परिणाम है। सावित्री- प्रकृति चेतना के बारे में जितना अब तक जाना जा सका है उससे अभी असंख्य गुना जानना शेष है। सीमित बुद्धि वाला मानव प्राणी अनन्तकाल तक नई-नई उपलब्धियाँ प्राप्त करता रहे, तो भी प्रकृति की असीम शक्तियों की पूरी तरह जानकारी प्राप्त कर सकना संभव न हो सकेगा। सावित्री का भाण्डागार अपरिमित है। इतना अपरिमित- जिसकी कल्पना भी हम पूरी तरह नहीं कर सकते।
सावित्री- सविता की शक्ति है। यह अग्नि-पिंड सूर्य की तरह इस पृथ्वी पर जिस प्रकार की शक्तियों का वितरण-विकिरण करता है उसी की खोज-बीन में हम लगे हैं। पर यही सूर्य अन्य अनेक ग्रह, नक्षत्रों पर वहीं की स्थिति के अनुरूप अन्यान्य प्रकार की विचित्र और विलक्षण प्रकार की शक्तियों का सृजन करता है। यदि इन सब सूर्य के प्रभाव से प्रभावित ग्रह-नक्षत्रों तक पहुँच सकना हमारे लिये सम्भव हो सके तो पता चले कि हमारी इस छोटी-सी पृथ्वी पर जो विज्ञान अब तक प्रकाश में आया है उससे सर्वथा भिन्न प्रकार का वैज्ञानिक-वातावरण उन ग्रह पिण्डों पर फैला पड़ा है।
हम लोग पृथ्वी के आकर्षण में जितना भार अनुभव करते हैं, आकर्षण रहित ग्रहों में उतना बिल्कुल भी न होगा। पक्षियों की तरह हर कोई वहाँ आकाश में सुगमता पूर्वक उड़-उछल सकता होगा। तब वहाँ इस सम्बन्ध में जो वैज्ञानिक नियम कार्य में आ रहे होंगे, वे हमारी पृथ्वी पर प्रचलित नियमों से सर्वथा भिन्न होंगे। यह एक उदाहरण मात्र है। सृष्टि में फैली पड़ी असीमित शक्तियाँ पृथ्वी पर ही इतनी व्यापक हैं कि उसकी सम्पूर्ण खोज मनुष्य के वर्तमान साधनों द्वारा सम्भव नहीं, फिर सविता के विस्तृत प्रभाव-क्षेत्र- ग्रह-नक्षत्रों में बिखरी पड़ी विचित्र स्तर की शक्तियों की जानकारी एवं उससे लाभान्वित होने की सुविधा तो मिल ही कैसे सकेगी? कहने का तात्पर्य इतना भर है कि चमकने वाले उदीयमान अग्नि-पिण्ड- सूर्य की (सविता की) क्षमता, (सावित्री) जब इतनी विस्तृत है तो असली सविता, परब्रह्म परमात्मा की पंचतत्वों से अत्यन्त ऊँचे स्तर की चेतना के- सावित्री के बारे में तो कहा ही कैसे जाय?
वैज्ञानिक अपनी प्रयोगशालाओं के माध्यम से प्रकृति की विलक्षणताओं का- सावित्री की गरिमा में- यत्किंचित ज्ञान एवं उपयोग जानने का प्रयोग करते और जो उपलब्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं, उनसे साँसारिक सुविधायें बढ़ाने का प्रयत्न करते हैं। इसी स्तर का एक वैज्ञानिक प्रयोग आत्म-विद्या विशारद योगीजन भी करते हैं। वे अपने शरीर एवं मन की प्रयोगशाला में प्रस्तुत अद्भुत अविज्ञात शक्ति संस्थानों की सहायता से प्रकृति की सूक्ष्मता के साथ अपना सम्बन्ध जोड़ते हैं और वहाँ से वैसी ही विलक्षण उपलब्धियाँ प्राप्त कर लेते हैं, जैसे गोताखोर समुद्र में डुबकी लगा कर वहाँ छिपी पड़ी-राशि को बटोरते रहते हैं। तथाकथित ऋषि-मुनियों का आधार यही है।
जो कार्य किन्हीं शक्तिशाली यन्त्रों के द्वारा हो सकता है वही कार्य शरीर संस्थान के वैज्ञानिक प्रयोग द्वारा भी हो सकता है। इसी प्रणाली का नाम ‘तंत्र’ है। जिस प्रकार बन्दूक चला कर किसी का प्राण हरण किया जा सकता है, वैसे ही तंत्रोक्त ‘कृत्या’ से भी अनिष्ट उत्पन्न हो सकता है। जिस प्रकार विद्युत सम्बन्धों से धातुओं के स्वरूप को बदला जा सकता है, उसी प्रकार ताँबे को सोने में परिणत करने में असफलता प्राप्त की जा सकती है। कितने सिद्ध पुरुष ऐसा करते भी रहे हैं। नागार्जुन, रावण आदि ऐसे ही असुर सम्प्रदाय के ताँत्रिक वैज्ञानिक थे जिन्होंने निर्धारित तपश्चर्यायें करके शरीरों से इतनी अणु-शक्ति संचालित कर ली थी कि वे अपने मनोबल के द्वारा अभीष्ट वस्तुयें तथा परिस्थितियाँ उत्पन्न कर लेते थे।
दक्षिणमार्गी ऋषि-मुनि इसी प्रयोजन को अपने ढंग की सात्विक योग साधनाओं से सम्पन्न करते थे। इसलिये उनकी पद्धति मंत्र-योग कहलाती थी। दक्षिण और वाममार्ग में सात्विक और तामस का अन्तर रहने के कारण उन्हें तंत्र-विद्या और मंत्र-विद्या का अलग-अलग नाम दिया गया है। जहाँ तक परिणामों का सम्बन्ध है दोनों के प्रतिफल लगभग समान हैं। जो भौतिक लाभ मंत्र-योगी उठा सकता है, वही चमत्कार उत्पन्न कर सकना तंत्र-योगी के लिए भी सम्भव है। सविता की महाशक्ति सावित्री एक ही है, उससे संपर्क बनाने में अनेक तरीके हो सकते हैं, इनमें से एक तरीका शरीर यंत्र को माध्यम बना कर साधना विधान के प्रयोग का है, दूसरा वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं के माध्यम से उपकरणों एवं यंत्रों के माध्यम से लाभान्वित होने का है।
आज यह यंत्र-विज्ञान उस क्षेत्र में काम करने वाले निष्ठावान कार्यकर्ताओं के कारण सफलतापूर्वक काम कर रहा है। तंत्र और मंत्र क्षेत्रों के वैज्ञानिकों ने तपश्चर्या की कठोरता से डर कर उधर से मुँह मोड़ लिया, फलस्वरूप वहाँ सुनसान ही दृष्टिगोचर हो रहा है। आवश्यकता इस बात की है कि वैज्ञानिक तत्परता के साथ, इस क्षेत्र में भी काम किया जाता रहे और ऋषि-मुनियों की बातें कल्पना समझी जाने का अवसर न आने देकर उस विज्ञान को मानव जाति के कल्याण में प्रस्तुत किया जाय।
यहाँ प्रसंग सविता और सावित्री का चल रहा है। पंच-भौतिक जगत् में यह उदीयमान सूर्य ही सविता है और उसके प्रभाव से उत्पन्न होने वाली अगणित शक्तियों का पुञ्ज ही सावित्री है। इस युग्म से हमें बड़ा लाभ होता है। उसी के प्रभाव से हम जीवित हैं और अभीष्ट साधन सामग्री उपलब्ध कर रहे हैं। श्रुतियों में सूर्य को “जगत् की आत्मा” बताया गया है। उसी से वह प्राण प्रादुर्भूत होता है जिसके कारण प्राणियों के लिये शरीर धारण किये रह सकना, वनस्पतियों का उगना, पंच-तत्वों का सक्रिय रह सकना सम्भव है। यदि सूर्य ठण्डा हो जाय तो देखत-देखते यह धरती हिम-पिण्ड की तरह ठण्डी हो जाय और यहाँ सब कुछ निर्जीव हो जाय, जीवन का किंचित लक्षण भी यहाँ दिखाई न पड़े। इसलिये इस अग्नि पिण्ड सविता का भी हमारे भौतिक जीवन में असाधारण महत्व है।
सविता की असाधारण रहस्यमयी शक्तियों का- सावित्री का उपयोग हम यंत्रों के माध्यम से तो कर ही रहे हैं। चाहे तो तंत्र और मंत्र योगों द्वारा भी वैसे ही लाभ उठा सकते हैं जैसे कि भौतिक-विज्ञान वाले उठा रहे हैं या उठाने की बात सोचते हैं। यह सूर्य-योग चाहे किसी भी विधि से किया जाय, भौतिक जीवन में सुविधायें बढ़ाने के लिये बड़ा उपयोगी सिद्ध होता रहा है, आगे यह उपयोगिता और भी बढ़ने की सम्भावना है।
असली सविता जो गायत्री मंत्र का देवता है- इस उदीयमान सूर्य से भी ऊँचा है। उसे असंख्य सूर्यों का सूर्य- परम शक्ति-स्त्रोत, इस सृष्टि का विधाता, नियामक और परिपुष्ट कर्ता, विधाता, प्रजापति कहा जाता है। उसके साथ सम्बन्ध, संपर्क बना कर यदि सान्निध्य लाभ किया जा सके तो दृश्य सूर्य की अपेक्षा वह आध्यात्मिक सविता- हमारे लिए असंख्य गुने सुख-साधन प्रस्तुत कर सकता है। परमात्मा की परम शक्ति गायत्री की- सविता की अविच्छिन्न क्षमता सावित्री की-उपासना करके हम वह लाभ ले सकते हैं, जिसके लिये यह मानव शरीर उपलब्ध हुआ है। वस्तुतः गायत्री उपासना-सावित्री साधना ही हमारा जीवन लक्ष्य हो सकता है, होना चाहिये।
ऐसा भ्रम किसी को नहीं करना चाहिये कि गायत्री से सावित्री कोई भिन्न हो सकती है। एक ही शक्ति के दो नाम हैं। जब वह शक्ति भौतिक प्रयोजनों की पूर्ति के लिए प्रयुक्त की जाती है तब उसे सावित्री कहते हैं और जब वह आध्यात्मिक प्रयोजनों के लिए काम आती है, तब उसी को गायत्री कहने लगते हैं। मृत शरीर को जलाते समय जो अग्नि जलती है वह ‘लोहिता’ और भोजन बनाने की भट्टी में जलने वाली को ‘रोहिता’ कहते हैं। लोहिता और रोहिता यह दो नाम प्रयोग में आने वाले विभाजन के अनुरूप है। वस्तुतः अग्नि एक ही है। इसी प्रकार उस महाशक्ति को परा और अपरा सावित्री और गायत्री के नाम से पहचाना जाता है। सविता-तत्व के साथ संबद्ध होने के कारण उसे सावित्री कहा गया है। सावित्री का देवता होने के कारण उस परम-तत्व को सविता कहते हैं। यह गायत्री का ही स्वरूप है।
गायत्री में जिस वरेण्य, भर्ग, देव, सविता का स्मरण चिन्तन किया जाता है, वह परम तेजस्वी सर्व शक्तिमान्, सर्वेश्वर सविता, प्रसविता परमात्मा ही है। और उस परमात्मा की सर्वतोमुखी, सर्वोपरि शक्ति को चाहे गायत्री कहें अथवा सावित्री वस्तुतः एक ही महत्तत्व से उसका प्रयोजन है। सावित्री और गायत्री की एकता के कुछ प्रमाण देखिये-
‘यश्चैवं विद्वानेव वेदानांमातो सावित्री संपद मुषनिषद् मुपास्ते इति।’ (गोपथ ब्राह्मण)
‘इस प्रकार विद्वान वेद-माता को सावित्री के नाम से कहते हैं।’
ओंकार पूर्विकास्तिस्रो महाव्याहृतयोऽव्यया। त्रिपदा चैव सावित्री विज्ञेयं ब्रह्मणों मुखम्॥
“ओंकारपूर्वक तीनों महाव्याहृतियों तथा त्रिपदा सावित्री मंत्र वेद का मुख कहा जाता है।”
एकाक्षरं परब्रह्म प्राणायामः परं तपः सावित्र्यास्तु परं नास्ति मौनात्सत्यं विशिष्यते॥
(मनु. 2/83)
“एक ओंकार ही परब्रह्म है, प्राणायाम मुख्य तप है, सावित्री से बढ़ कर कोई शक्ति नहीं है और मौन की अपेक्षा सत्य-भाषण की महिमा विशेष है।”
नमो नमस्ते गायत्री सावित्री त्वां नमाम्यहम्। सरस्वति नमस्तुभ्यं तुरीये ब्रह्मरूपिणी॥
“हे गायत्री! हे सावित्री! मैं आपको प्रणाम करता हूँ और मेरा आपके चरणों में बार-बार अभिवादन समर्पित है। हे सरस्वती! आपके लिये मेरा नमस्कार अर्पित है। हे तुरीये! आप ब्रह्म के स्वरूप वाली हैं।”
नमस्ते देवि गायत्री सावित्री त्रिपदेक्षरे। अजरे अमरे मातस् त्राहि माँ भवसागरात्॥
(वशिष्ठ संहितायं वांत्रिक स्तोत्र)
“हे तीन पदों वाली गायत्री, सावित्री देवी! हम तुझे नमस्कार करते हैं। हे अजर-अमर माता! मेरी भवसागर से रक्षा करो।”
सच्चिन्मपि परे देवि गायत्री ब्रह्मरूपिणी। आज्ञामय त्वं सावित्री परिवारार्चनाय मे॥
“हे सच्चित्मयि! हे परे! हे देवि! हे ब्रह्म के स्वरूप वाली गायत्री देवि! हे सावित्री! अब आप मुझे सेवक को परिवारार्चन करने के लिये आज्ञा प्रदान करें।”
समस्त देवताचक्र मुनि पितृ गणावृते। आरत्रिकं गृहाणेदं सावित्री मम सिद्धये॥
“हे समस्त देवों के समूह- मुनिगण और पितृगण आवृते! हे सावित्री! अब मेरी सिद्धि के लिये इस आरात्रिक (आरती) को ग्रहण कीजिये।”
नमस्ते देवि गायत्री सावित्री त्रिपरेऽक्षरे। अजरे अमरे मातस्त्राहिं माँ भवसागरात्॥
“हे देवि! हे गायत्री! हे सावित्री! हे त्रिपदे! आप अक्षर हैं, आपको मेरा नमस्कार समर्पित किया जाता है। हे जरा से रहिते! हे अमरे! हे माता! आप मेरी इस संसार रूप सागर से रक्षा कीजिये।”
नमस्ते सूर्य संकाशे सूर्यसावित्रिकेऽमले। ब्रह्मविद्ये महाविद्ये वेदमातानमोऽस्तुते॥
“हे सूर्य के समान रूपवाली! हे सूर्य सावित्री! हे अमले! आप ब्रह्मविद्या हैं, आप महाविद्या हैं तथा वेदों की माता हैं। आपके लिये यह मेरा प्रणाम समर्पित किया जाता है।’’
उपरोक्त प्रमाणों में गायत्री-सावित्री को एक ही माना गया है। इनमें थोड़ा अन्तर किया भी जाय तो वह इतना ही हो सकता है कि भौतिक प्रयोजनों में प्रयुक्त इस ब्रह्म शक्ति को सावित्री और अध्यात्म प्रयोजन में होने पर उसे गायत्री कहा जाय। सावित्री जप का लाभ ‘स्वर्ग’ अर्थात् सुख-सुविधाओं का अभिवर्धन बताया गया है और गायत्री उपासना से मोक्ष लाभ अर्थात् वासना एवं तृष्णा के बन्धनों से छुटकारा मिलना प्रसिद्ध है।
कहा गया है कि-
सावित्री जप्यनिरतः स्वर्गमाप्नोति मानवः। गायत्री जप्यानिरतो मोक्षोपायं च विन्दति॥
“सावित्री के जप करने वाले को स्वर्ग और गायत्री के जप करने वाले को मोक्ष की प्राप्ति होती है।”
सावित्री का स्वरूप वर्णन करते हुये बताया गया है-
सावित्री त्रिपदा ज्ञेया षटकुक्षिः पंचशीर्षका। अग्निवर्णमुखा शुक्ला पुण्डरीकदलेक्षणा॥
(सूत संहिता-गायत्री विवरण)
“सावित्री तीन पाद, षटकुक्षिः और पाँच मस्तक वाली है। वह अग्निवर्ण की मुख वाली, शुभ्र और कमल नेत्रों वाली है।”
दैविक, दैहिक और भौतिक इन तीनों क्षेत्रों में सावित्री का आधिपत्य होने के कारण उसे तीन पाद वाली कहा गया है। कहते हैं कि वामन भगवान् ने तीन चरणों में राजा बलि के तीनों लोक वाले राज्य को नाप लिया था। सावित्री के तीन पाद भी तीनों लोकों तक लम्बे हैं। अर्थात् उनके प्रभाव से तीनों लोकों में अपनी स्थिति सुख-शाँतिमय बनती है। तीन लोक में आकाश, पाताल और पृथ्वी को भी कहते हैं। पर यहाँ दैविक, दैहिक, भौतिक अर्थात् आध्यात्मिक, शारीरिक और संपत्ति-परक तीनों ही क्षेत्रों में सावित्री का प्रकाश पहुँचता है और उस महाशक्ति की उपासना से इन सभी क्षेत्रों में आनन्द उल्लास की परिस्थितियाँ उत्पन्न होती हैं।
षटकुक्षि का तात्पर्य षट्चक्र जागरण से है। शरीर में छिपे हुए छहों शक्ति संस्थान सावित्री उपासना से जागृत हो जाते हैं। किसी मिल में छः इंजन हों और वे ठण्डे पड़े रहें तब वो सारी मिल बन्द पड़ी रहेगी, पर यदि वे एक-एक करके सभी चालू हो जांय तो मिल अपनी पूरी रफ्तार से चलने लगेगी और देखते-देखते उत्पादन का ढेर जमा हो जायेगा। षट्-चक्र मानव-शक्ति में छिपे हुये अत्यन्त शक्तिशाली बायलर, इंजन, जनरेटर हैं। उनके सक्रिय होने पर मनुष्य साधारण जीव नहीं रह जाता वरन् उसकी गणना सिद्ध पुरुषों में होने लगती है। इस षट्-चक्र जागरण के विधि-विधान में सावित्री सान्निध्य को ही प्रधान आधार माना गया है, इसलिए उसे छः कुक्षि वाली- छः साधनाओं वाली-बताया गया है।
पाँच मस्तक, पाँच कोषों के नाम से प्रख्यात है। अन्नमय कोष, मनोमय कोष, प्राणमय कोष, विज्ञानमय कोष, आनन्दमय कोष यह पाँच आवरण जीव के ऊपर हैं। इनमें से प्रत्येक को एक रत्न भाण्डागार कहना चाहिये। प्रत्येक की शक्ति क्रमशः एक-से-एक की अधिक है। हममें से अधिकाँश व्यक्ति अन्नमय कोष, स्थूल शरीर की क्षमता का ही थोड़ा-सा सहारा लेकर भौतिक सुख-साधन जुटाते रहते हैं।
सामान्य मनुष्यों की गति इतनी ही है। पर जो प्रबुद्ध व्यक्ति शेष चार कोषों को भी समर्थ, सक्रिय, सुविकसित बना लेते हैं उनकी क्षमता देवोपम होती चली जाती है। यंत्र-कोषों का परिष्कार सावित्री साधना से ही सम्भव होता है। उसे पंच-मुखी भी कहते हैं- चित्रों में सावित्री के पाँच मुख भी चित्रित किये जाते हैं। इस बहुमुखी अलंकार का तात्पर्य सावित्री की शक्ति से पाँच कोषों के जागरण की सम्भावना व्यक्त करना ही है।
उसे श्वेत अग्नि की आभा वाली कहा गया है। अर्थात् शुभ्र प्रकाश उसका स्वरूप है। इसी आधार पर उनका ध्यान किया जाता है, सावित्री शक्ति सूर्य जैसे प्रकाश एवं ताप से परिपूर्ण है। उसका ध्यान करने में प्रकाश के मध्य में उपस्थित आकृति की ही भावना करनी पड़ती है। सविता की अधिष्ठात्री होने के कारण वह स्वयं भी प्रकाश-पुञ्ज है। प्रकाश युक्त ही उसका ध्यान करना पड़ता है। साधक को वह अन्धकार से प्रकाश की ओर ले जाती और उसे विशिष्ट ब्रह्मवर्चस, प्रचण्ड ओज एवं प्रखर तेजस्विता प्रदान करती है। इसीलिये उसे शुभ अग्नि-वर्ण वाली कहा गया है।
कमल नेत्र का तात्पर्य है बड़ी आँखें। कमल सब पुष्पों में बड़ा एवं सब से शोभायमान माना गया है। नेत्र देखने का काम करते हैं। कमल नेत्र का अलंकार दूर दृष्टि एवं दिव्य-दृष्टि का संकेत करता है। सावित्री की उपासना साधक को यही विशेषतायें प्रदान करती है। वह इसकी सम्भावना को देखता है, दूर की बात सोचता है, सुदूर भविष्य का निर्माण करता है। जो बातें छोटे आँख वालों को, ओछे लोगों को सूझ नहीं पड़ती वह उस कमल नेत्र वाली सावित्री के भक्तों को सूझती हैं और वे उपलब्ध दिव्य-दृष्टि के माध्यम से अपना ही नहीं अन्य असंख्यों का भी कल्याण करते हैं।
सावित्री की महिमा वर्णन करते हुए शास्त्रकार ने उसे तीन पाद वाली, छः कुक्षि वाली, पाँच मस्तक, शुभ्र अग्नि एवं कमल नेत्र वाली बताया है। वस्तुतः यह सभी विशेषण उस महाशक्ति में विद्यमान है। जो ठीक तरह अविच्छिन्न श्रद्धा और निर्धारित विधि-विधान के साथ उसकी उपासना में संलग्न होता है, उसे किसी भी दिशा में- किसी भी क्षेत्र में असफल एवं अभाव-ग्रस्त नहीं रहना पड़ता।
कहा जा चुका है कि सावित्री का देवता सविता है। इसलिये उसे अधिष्ठान देवता के साथ अविच्छिन्न रूप से सुसम्बद्ध माना गया है। सावित्री उपासना में सविता का आधार लेना ही पड़ता है। सूर्य जैसे प्रकाश के साथ सम्बद्ध करके ही गायत्री का ध्यान किया जा सकता है। गायत्री का चित्र अथवा विग्रह जहाँ कहीं भी होगा वहीं प्रकाश मंडल अवश्य चित्रित किया जायेगा। अन्य देवताओं का चित्रण प्रकाश-वलय से रहित भी हो सकता है पर गायत्री का नहीं। क्योंकि वह सविता की ही शक्ति है। शक्ति और शक्तिवान का समन्वय तो होना चाहिये। इसीलिये गायत्री को- सावित्री को- सूर्य प्रकाश के साथ सदा ही सम्मिलित किया जाता है।
गायत्रीं स्मरेद्घीमान् हृदि वा सूर्यमंडले। कल्पोक्त लक्षणेनैव ध्यात्वाऽभ्यर्च ततो जयेत्॥
“बुद्धिमान पुरुष को हृदय में और सूर्य मंडल में गायत्री का स्मरण करना चाहिये और कल्पोक्त लक्षण से ही ध्यान तथा अभ्यर्चन करके उसके पश्चात् जप करना चाहिये।’’
आत्मा में अनन्त दिव्य तेज भरा पड़ा है वह गायत्री का ही भर्ग है। वह तेजस्विता से ही है, जठराग्नि बन कर शरीर का भोजन पचाती, उष्णता प्रदान करती और गतिशील सक्रियता प्रदान करती है। वही मस्तिष्क में बुद्धि, हृदय में भावना, व्यक्तित्व में प्रतिभा और जीवन में महानता बन कर विद्यमान रहती है। इसी प्रकाश से आत्म-साक्षात्कार, ईश्वर दर्शन का लाभ होता है। आँखों की पुतलियों में जिस प्रकार छोटा-सा प्रकाश बिन्दु हमें संसार का सुन्दर दृश्य देख सकने का अवसर देता है वैसे ही आत्मा में स्थित वह परम तेज हमें तत्त्वदर्शी बनाता है, अज्ञान से छुड़ा कर प्रकाश की ओर ले जाता है।
आत्मा का स्वरूप प्रकाशयुक्त माना गया है। ध्यान प्रयोजनों में आत्मा को सदा प्रकाश ज्योति मान कर चला जाता है। आत्म- साक्षात्कार ज्योति-पुञ्ज के रूप में ही होता है। आकृतियों वाले इष्टदेव तो हमारे कल्पना चित्र मात्र हैं जो ध्यान धारण में परिपक्वता लाने तक ही काम आते हैं। उससे ऊँची स्थिति में तो ब्रह्म-ज्योति ही एक मात्र अवलम्बन रह जाती है। यही आध्यात्मिक यज्ञाग्नि है इसी को आदित्य दिव्य-आभा- अखण्ड-ज्योति कहते हैं। यह आभा जिसे जितनी मात्रा में मिलती जाती है, वह परब्रह्म परमात्मा के साथ- सविता देवता के साथ एकाकार होता चला जाता है। संसार के समस्त जड़-चेतन में यही ज्योति प्रकाशमान है। इसी से देव शक्तियाँ और पंच-तत्व अपना कार्य कर सकने में समर्थ होता है। ग्रह-नक्षत्रों में यह प्रकाश जगमगा रहा है। हमारा कल्याण इस प्रकाश में ओत-प्रोत होने से ही होता है।
कहा भी है-
आदित्यार्न्तगतं यच्च ज्योतिषां ज्योतिरुत्तमम्। हृदये सर्वभूतानां जीवभते स तिष्ठति॥
हृद्व्योम्नि तपति ह्योप वाह्य सूर्यस्य चान्तरे। अग्नौ वा धूमकेतौ च ज्योतिषश्चित्रकरञ्च यत्।
प्राणिनां हृदये जीव रूप तया य एवभर्गस्तिष्ठति स। एव आकाशे आदित्यमध्ये पुरुषरूपया विद्यते॥
(याज्ञ. सं.)
“जिस ज्योति की प्रभा से सारे तामसिक भाव दूर हो जाते हैं, वह ज्योति ही श्रेष्ठ वस्तु है, उसे आदित्य के अंतर्गत समझना होगा। वही समस्त जीव-जगत के हृदय में चेतयिता (चेतन) बन कर निवास करती है। बाह्य सूर्य के भीतर जो ज्योति आकाश में प्रकाश पाती है, वही ज्योति जीवन के हृदयाकाश में भी प्रकाश पाती है। वह ज्योति अग्नि, धूमकेतु, नक्षत्र आदि से भी अधिक उज्ज्वल है। वही भर्ग-देवता प्राणियों के हृदय में जीव-रूप में अर्थात् चेतन रूप में विराजमान है। वही बाह्य जगत के अन्तःकरण में विराट् पुरुष के रूप में विराजमान होकर जगत को सचेतन करता है।”
अग्निश्च या मन्युश्च मन्युयतपश्चमन्युकृतेभ्यः। पापेभ्योरक्षन्ताम्। यदह्रा पापम्कार्षम् शिरना॥ मनसा वाचा हस्ताभ्याम्। षद्भ्यामुदरेण शिश्ना। अहस्तदवलुम्पत। यत्किं च चुरितं मयि। इदमहं माममृतयोनौ सत्ये ज्योतिषि जुहोमि स्वाहा॥
(तै.आ.10-32)
“अग्नि अर्थात् प्रकाशमय और अर्थात् ज्ञानमय परमात्मा और उनकी शक्तियाँ उन पापों से मेरी रक्षा करें जो कि क्रोधादि वृत्तियों के कारण उत्पन्न हुये हैं। जो पाप मैंने दिन में किया है, मन, वाणी या हाथों द्वारा किया है, पैरों, उदर और उपस्थेद्रिय द्वारा किया है, वह लुप्त हो गया। जो कुछ पाप मुझ में हैं, वह लुप्त हो जाय। यह मैं अपने आपको अमृत की योनि में- जो कि सत्य- ज्योति रूप परमात्मा है, उसमें आहुति रूप देता हूँ- स्वाहा बोल कर देता हूँ।”
वेदों में जिस अग्नि का सहस्रों मंत्रों में वर्णन एवं स्तवन किया गया है वह चूल्हे में जलने वाली अग्नि नहीं वरन् व्यष्टि और समष्टि को हर दिशा में प्रकाशित प्रभावित करने वाली दिव्य तेजस्विनी दिव्य-ज्योति है। यही यज्ञाग्नि है। इसी का वैश्वनर रूप में- आदित्य और सविता रूप से पूजन अर्चन किया जाता है। अग्नि और सूर्य में भी वही दिव्य तेजस्विता विद्यमान है। इसलिये उसे उनमें उपस्थित होते हुए भी भिन्न माना गया है। श्रुति कहती है-
योऽग्नौ तिष्ठन्नग्नेरन्तरो यमग्निर्न वेद यस्याग्नि। शरीरं योऽग्निमन्तंरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याभ्यमृतः॥
“जो अग्नि में रह कर अग्नि से भिन्न है, अग्नि जिसको नहीं जानते, अग्नि जिसका शरीर है, जो अग्नि के भीतर रह कर अग्नि को नियंत्रित करता है, वही तुम्हारा अन्तर्यामी आत्मा है।”
सावित्री का देवता सविता वह नहीं जो सवेरे उगता और साँय को अस्त होता है। यह उसकी एक प्रतिमा मात्र है। सूर्य आवरण है और सविता उसकी आत्मा। जो सर्वत्र प्रकाश, जीव, जागृति, चेतना उत्पन्न करता है वह सविता है। यों दृश्य सूर्य में भी यह गुण हैं, पर आत्मा में इन विशेषताओं को प्रेरक एवं संस्थापक सविता परब्रह्म परमात्मा ही है। सावित्री उसी की अविच्छिन्न शक्ति है। इन दोनों का अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है। एक का कार्य दूसरे पर पूर्णतया निर्भर हैं। एक देवता है दूसरा देवी। एक प्राण दो शरीर की तरह दोनों को अविभाज्य ही समझना चाहिये।
सावित्री- गायत्री के माध्यम से ही सविता परब्रह्म तक हमारी पहुँच हो सकती है। माता के द्वारा ही पिता से सम्बन्ध और परिचय होता है। माता का माध्यम न हो तो पिता का परिचय, सम्बन्ध एवं अनुग्रह प्राप्त हो सकना किसी भी प्रकार सम्भव नहीं हो सकता। ठीक इसी प्रकार गायत्री महाशक्ति का सहारा लिये बिना परब्रह्म के सृष्टि साम्राज्य में आत्मा को खुल खेलने, युवराज बनने और अनन्त ऐश्वर्य पर अधिकार करने का भी सौभाग्य नहीं मिल सकता।
उपनिषद् में इस तथ्य को और भी विस्तारपूर्वक- विवेचना एवं उदाहरणों के साथ प्रस्तुत किया गया है उल्लेख इस प्रकार मिलता है-
कस्सविता का सावित्री? अग्निरेव सविता पृथिवी सावित्री।
कस्सविता का सावित्री? वरुण एव सविताऽऽपस्सावित्री॥
कस्सविता का सावित्री? वायुरेव सविताऽऽकाशस्सावित्री।
कस्सविता का सावित्री? यज्ञ एव सविता छंदांसि सावित्री॥
कस्सविता का सावित्री? स्तनयित्नुरेव सविता विद्युत्सावित्री।
कस्सविता का सावित्री? आदित्य एव सविता द्यौस्सावित्री॥
कस्सविता का सावित्री? चन्द्र एव सविता नक्षत्राणि सावित्री।
कस्सविता का सावित्री? पुरुष एव सविता स्त्री सावित्री॥
एवं ज्ञात्वा विद्वान् कृतकृत्यो भवति, सावित्र्या एवं सलोकतां जुषतीत्युपनिषद।
“सविता और सावित्री कौन है? इस प्रश्न के उत्तर में कहा गया है कि अग्नि सविता है, पृथ्वी सावित्री है, वरुण सविता है और जल सावित्री है। वायु सविता है और आकाश सावित्री है। यज्ञ सविता है और ऋचा सावित्री है। मेघ सविता है और विद्युत सावित्री है। सूर्य सविता है और आकाश सावित्री है। चन्द्र सविता और नक्षत्र सावित्री हैं। मन सविता और वाणी सावित्री है। पुरुष सविता और स्त्री सावित्री है, इस सर्व व्यापक तेजोमय सावित्री को जो विद्वान् जानते हैं वे कृत-कृत्य हो जाते हैं। सावित्री से ही सालोक्य मोक्ष प्राप्त होता है।”
प्रश्नोत्तर के रूप में सविता और सावित्री का रूप उपरोक्त मंत्र में पूछा है और उसी में उदाहरण समेत समाधान भी किया गया है। सविता और सावित्री के जोड़े को उदाहरण समेत अन्य युग्मों के सदृश बताकर जिज्ञासु की शंका का समाधान किया गया है।
अग्नि, सविता है और पृथ्वी सावित्री है। वरुण सविता और जल सावित्री, वायु सविता और आकाश सावित्री, आदित्य सविता और आकाश सावित्री है।
पृथ्वी में यदि गर्मी न रहे तो वह ठण्डी पड़ जाय, उसकी उत्पादन शक्ति समाप्त हो जाय, जो कुछ भी सौंदर्य पृथ्वी पर दृष्टिगोचर होता है, उसका पता भी न चले।
जल दृश्य पदार्थ है, वरुण उसकी अधिष्ठात्री शक्ति- आत्मा है। वायु का निवास आकाश में है। आकाश न हो तो वायु कहाँ रह सकेगी? वायु न हो तो आकाश का उपयोग क्या रहेगा? इसी प्रकार आदित्य की निर्भरता द्युलोक पर है।
मंत्र बड़ा है, उसमें कितने ही युग्मों का उदाहरण देकर जिज्ञासु को यही तथ्य हृदयंगम कराने का प्रयत्न किया गया है कि जीवन का साध्य लक्ष्य- ब्रह्म है और उसका साधन-गायत्री। यदि किसी को ब्रह्म को वस्तुतः प्राप्त करना हो। ब्राह्मी स्थिति, ब्रह्म परायणता- ब्रह्म निर्वाण एवं ब्राह्मणत्व उपलब्ध करने की आकाँक्षा करता हो तो उसे ब्रह्म-तेज की- ब्रह्मवर्चस की- अधिष्ठात्री देवी- सावित्री गायत्री का अवलम्बन ग्रहण करना चाहिए।
नव-निर्माण को इतना तो करें ही :-
जिस महान् उद्देश्य और कार्यक्रम को लेकर हम अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्यगण चल रहे हैं, उसकी सफलता पर व्यक्ति और समाज की प्रगति अवलम्बित है। इस मिशन को जितनी सफलता मिलेगी, उतनी ही विश्व-शाँति, धर्म-राज्य एवं नवयुग की स्थापना निकट आती चली जायेगी।
अपने मिशन की सफलता इस बात पर निर्भर है कि उसका कार्यक्षेत्र बढ़े। अभी परिवार के जितने सदस्य हैं वे कार्य की गुरुता एवं महत्ता को देखते हुए बहुत ही कम हैं। प्रयत्न यह होना चाहिए कि अपना परिवार बढ़े और युग-निर्माण आन्दोलन का- नैतिक एवं साँस्कृतिक पुनरुत्थान का दायरा अधिकाधिक बढ़ता चला जाय। प्रकाश और प्रवाह को इसी प्रकार व्यापक बनाया जा सकेगा। हम में से प्रत्येक का परम पवित्र कर्तव्य है कि अखण्ड-ज्योति और युग-निर्माण पत्रिकाओं के नये सदस्य बढ़ाने और पुरानों का प्रोत्साहित करने के लिए भरसक प्रयत्न करें। क्योंकि अपनी वाणी और प्रेरणा इन पत्रिकाओं के माध्यम से होती है।
इस मास उत्साही परिजन टोलियाँ बना कर निकलें और दोनों पत्रिकाओं के सदस्य बढ़ाने का शक्ति सामर्थ्य भर उत्साहपूर्वक प्रयत्न करें।
फार्म 4
1. प्रकाशन का स्थान- मथुरा
2. प्रकाशन का अवधि-क्रम- मासिक
3. मुद्रक का नाम- श्रीराम शर्मा आचार्य राष्ट्रीयता- भारतीय पता- जन-जागरण प्रेस, मथुरा।
4. प्रकाशक का नाम- श्रीराम शर्मा आचार्य राष्ट्रीयता- भारतीय पता- अखंड-ज्योति संस्थान मथुरा।
5. सम्पादक का नाम- श्रीराम शर्मा आचार्य राष्ट्रीयता- भारतीय पता- अखंड-ज्योति संस्थान मथुरा।
6. स्वत्वाधिकारी- श्रीराम शर्मा आचार्य, अखंड-ज्योति संस्थान मथुरा।
मैं, श्रीराम शर्मा आचार्य यह घोषित करता हूँ कि ऊपर दिये गये सब विवरण मेरी अधिकतम जानकारी से विश्वास के अनुसार सत्य हैं।
(हस्ता.) श्रीराम शर्मा आचार्य,
एक बार अपने परिजनों के साथ कुछ दिन लगातार रहने- अपने जी की पूरी बात कह लेने और उनकी पूरी बात सुन लेने के उद्देश्य से परिजनों को हमने ज्येष्ठ और आश्विन के शिविरों में मथुरा आने के लिए आमन्त्रित किया है। प्रसन्नता की बात है कि वह निमन्त्रण प्रायः सभी भावनाशील आत्मीय जनों ने स्वीकार कर लिया है। आशा है, इन तीन वर्षों में क्रमशः अधिकाँश परिजन मथुरा आयेंगे और इन 9-9 दिनों के शिविरों में सम्मिलित रहेंगे। यह विचार विनियम शिविर कहलायेंगे। हम लोग मिल बैठ कर व्यक्तिगत और सामूहिक सभी स्तर की समस्याओं पर परस्पर विचारों का आदान-प्रदान कर सकें और किन्हीं उपयुक्त निष्कर्षों पर पहुँच सकें, यही इन शिविरों का प्रमुख प्रयोजन है।
इस बार गर्मियों के अवकाश में गत वर्ष की भाँति दो शिविर रखे गये हैं। प्रथम शिविर दिनाँक 28 मई से आरम्भ होकर दिनाँक 6 जून तक 9 दिन चलेगा। दिनाँक 7 जून को एक दिन अवकाश-दिन, इसलिये रखा गया है कि प्रथम शिविर के लोगों को जाने और दूसरे शिविर के आगन्तुकों के ठहराने की व्यवस्था बन सके। दूसरा शिविर दिनाँक 8 से 16 जून तक चलेगा। चूँकि गायत्री तपोभूमि में 250 से अधिक व्यक्तियों के ठहरने का स्थान नहीं है। इसलिये दो बार ज्येष्ठ में, दो बार आश्विन में शिविर करने पड़ते हैं। फिर विचार विनियम भी अधिक लोगों के साथ एक ही समय में नहीं हो सकता।
इसलिये चार शिविर ही उपयुक्त समझे गये हैं। स्थान की कमी और आने वालों की इच्छा अधिक रहने की बात ध्यान में रखते हुए स्वीकृति लेकर ही आने का नियम बनाया गया है। इस नियम का पालन किये बिना सब प्रकार की सारी अव्यवस्था ही हो सकती है। इसलिये आगन्तुकों से अनुरोध है कि वे यथासम्भव शीघ्र ही स्वीकृति प्राप्त कर लें और यह स्पष्ट लिख दें कि वे किस शिविर में आना पसन्द करेंगे। जिनकी गोदी में छोटे बच्चे हैं, ऐसी महिलाओं को न लाना ही उचित है। ऐसे रोगी जिनके कारण दूसरों को असुविधा हो या छूत लगे वे भी इन अवसरों पर न आयें।
चार महीने के लिए आने वाले साधक और एक वर्ष के लिए आने वाले शिक्षार्थी दूसरे शिविर में आयें और शिविर का लाभ लेकर तुरन्त ही अपना शिक्षण आरम्भ कर दें। शिविर आरम्भ होने से एक दिन पूर्व ही मथुरा आ जाना चाहिए, ताकि जिस दिन से कार्य आरम्भ होना है, उस दिन से सभी कार्यक्रमों में सम्मिलित रहा जा सके।
9 दिन में एक 24 हजार गायत्री का लघु अनुष्ठान यहाँ आकर प्रायः सभी को करना चाहिये। दो दिन ब्रज के सभी तीर्थों की यात्रा बस द्वारा करने की भी व्यवस्था बनाई गई है, जो उसमें जाना चाहे जा सकेंगे। भोजन-व्यय सभी को अपना उठाना होगा। जो लोग चाहें स्वयं बना लिया करेंगे। शेष के लिए, दलिया, खिचड़ी, चावल, दाल जैसी रांध कर बनाई जाने वाली वस्तुओं की व्यवस्था करा दी जायेगी। ऐसा भोजन सस्ता भी पड़ता है और हल्का भी रहता है। अनुष्ठान के दिनों में ऐसा हल्का भोजन एक प्रकार उपवास ही है। थाली, लोटा जैसे आवश्यक बर्तन सभी को साथ लेकर आना चाहिए।
शिविर में सम्मिलित होने की स्वीकृति प्राप्त करने के लिये जो पत्र भेजे जाँय उनमें अपना पूरा नाम, पता आयु, शिक्षा, जाति, व्यवसाय आदि का भी उल्लेख करना चाहिये। साथ में यदि स्त्री, बच्चे आदि हों तो उनका पूरा एवं स्पष्ट विवरण भी लिखना चाहिये। आवेदन-पत्र एक अलग कागज पर लिखना चाहिये, ताकि उसे फाइल में लगाया जा सके।
देर में आवेदन-पत्र भेजने वालों की यदि ज्येष्ठ शिविरों में स्थान न मिल सका तो उन्हें आश्विन के लिए रुकने को कहा जायेगा।
एक वर्ष के लिए नव-जीवन कला एवं उद्योगों की तथा चार महीने के लिए साधना तथा धर्म प्रचारक का प्रशिक्षण ज्येष्ठ का दूसरा शिविर समाप्त होते ही आरम्भ हो जायेगा। इन प्रशिक्षणों में सम्मिलित होने वाले सज्जन दिनांक 8 जून से आरम्भ होने वाले दूसरे शिविर का भी लाभ उठा सकें, इस दृष्टि से उन्हें दिनाँक 7 जून को ही मथुरा आ जाना चाहिये।
आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, आश्विन यह चार महीने चातुर्मास साधना के हैं। इनमें गायत्री तपोभूमि में रह कर कई अनुष्ठान किये जा सकते हैं। इसी अवधि में गोवर्धन परिक्रमा, ब्रज परिक्रमा, झूलों के मेले, जन्माष्टमी उत्सव, बलदेव-जयन्ती, रामलीला, विजय-दशमी आदि ब्रज के प्रसिद्ध एवं मनोरंजक उत्सव आयोजन होते हैं, जिन्हें देखने लाखों व्यक्ति देश भर से आते हैं। आमतौर से सभी व्यवसाय वर्षा में हल्के रहते हैं। जिन्हें घर में थोड़ा अवकाश हो, जिनकी छुट्टियाँ बाकी हों वे चार महीने के लिए मथुरा आने का प्रयत्न करें।
इस चार महीने की अवधि में प्रवचन करने की शिक्षा विशेष रूप से दी जायेगी। गीता और रामायण के माध्यम से आत्म-कल्याण और समाज-निर्माण के तथ्यों को समझने और प्रतिपादित करने की आवश्यक क्षमता उत्पन्न की जायेगी। इसी अवधि में षोडश संस्कारों का कराना, पर्व और त्यौहारों का मनाना, छोटे बड़े गायत्री यज्ञों का कराना जैसे सभी आवश्यक धार्मिक कर्मकाण्डों की रीति-नीति भली प्रकार सिखा दी जायेगी। नव-निर्माण के लिए रचनात्मक कार्यक्रमों को गतिशील बनाने का प्रशिक्षण भी इसी अवधि में पूरा करा दिया जायेगा। जिन्हें अवकाश मिल सके उन्हें इस चातुर्मास प्रशिक्षण में सम्मिलित होने का प्रयत्न करना चाहिये। स्वीकृति समय से पूर्व यथासम्भव जल्दी ही प्राप्त कर लेनी चाहिये।
एक वर्ष का प्रशिक्षण संजीवन विद्या का है। जीवन में कैसे जियें? जीवन की विभिन्न समस्याओं और उलझनों का कैसे हल करें? प्रगति के पथ पर अग्रसर कैसे हों? भौतिक एवं आध्यात्मिक उत्कर्ष का आनन्द कैसे लें? विभिन्न विघ्न-बाधाओं से कैसे लड़ें? सफल गृहस्थ कैसे बनें? आंतरिक अशांतियों से छुटकारा कैसे पायें? जीवनोद्देश्य कैसे पूरा करें? जैसी महत्वपूर्ण जीवन समस्याओं पर सुव्यवस्थित अध्यापन और मार्गदर्शन का प्रवेश इस प्रशिक्षण में सन्निहित है। ऐसे महत्वपूर्ण विषय पर ऐसा सर्वांगपूर्ण शिक्षण क्रम यह अपने ढंग का अनोखा है। आशा की जानी चाहिये कि इस शिक्षा को प्राप्त करके जो जायेंगे वे एक प्रखर व्यक्तित्व जीवन जी सकने का लाभ प्राप्त करेंगे।
साथ में आर्थिक स्वावलंबन की दृष्टि से कई महत्वपूर्ण उद्योग भी सिखाये जाते हैं। जैसे (1) प्रेस व्यवसाय, (2) बिजली विज्ञान के आवश्यक सभी शिल्प, (3) रेडियो, ट्रांजिस्टरों की मरम्मत तथा निर्माण, (4) घड़ी-साजी, (5) हर तरह के साबुन बनाना, (6) मोजे, बनियान, स्वेटर आदि मशीनों से बुनना, (7) प्लास्टिक के फाउन्टेन-पैन, पेंसिलें, बटन आदि बनाना, (8) चश्मों के हर नम्बर के लेंस तैयार करना, (9) तरह-तरह के खिलौने बनाना, (10) घर में काम आने वाले लगभग सभी शिल्पों तथा मरम्मतों की शिक्षा- गृह-शिल्प आदि-आदि यह सभी उद्योग ऐसे हैं जिनके आधार पर कोई भी व्यक्ति सहज ही आर्थिक दृष्टि से स्वावलंबी हो सकता है और अच्छी आय कर सकता है।
एक वर्ष के लिए यह प्रशिक्षण प्राप्त कर कोई भी नवयुवक जीवन में आशाजनक सफलता प्राप्त कर सकेगा। एक वर्ष के लिए फेल होने जैसे खतरा उठा कर भी इस शिक्षा प्राप्त करना चाहिये। स्कूलों की पढ़ाई तो इस शिक्षा के बाद भी जारी रखी जा सकती है।
चार महीने और एक वर्ष वाले प्रशिक्षण के लिए जिन्हें आना हो, वे नियमावली मँगालें और आवेदन-पत्र भेज कर स्वीकृति प्राप्त करें।
इस युग में सबसे बड़ा, सबसे व्यापक, सबसे महत्वपूर्ण और सबसे आवश्यक धर्मानुष्ठान गत बसन्त-पंचमी से आरम्भ किया गया है। उसके अंतर्गत प्रतिदिन 24 लक्ष का एक गायत्री महापुरश्चरण हुआ करेगा और इसमें 24 हजार भागीदारों का भाग होगा। एक माला (108 मंत्र) जप और युग-निर्माण सत्संकल्प का एक पाठ इस पुरश्चरण के हर भागीदार को नित्य करना होगा। यह समाज कल्याण के लिए-नवयुग-निर्माण के लिए होगा। व्यक्तिगत कल्याण और उत्कर्ष के लिए एक माला गायत्री मंत्र की यह भागीदार और भी किया करेंगे। इस प्रकार प्रतिदिन उन्हें दो माला का जप करना पड़ेगा। व्यक्तिगत कल्याण के लिये एक पाठ गायत्री चालीसा का और समाज कल्याण के लिए एक पाठ युग-निर्माण संकल्प का भी साथ-साथ करने से दो पाठ भी होते रहेंगे। इस प्रकार दो माला जप और दो पाठ करने वाले नैष्ठिक साधक माने जायेंगे।
अधिक उपासना कितनी भी हो सकती है पर न्यूनतम दो माला जप और दो पाठ उपरोक्त क्रम से नित्य होने ही चाहिये। ऐसे 24 हजार नैष्ठिक साधक इस महा-अनुष्ठान के भागीदार रहेंगे। अभी इस वर्ष का इतना ही संकल्प है। स्थिति के अनुरूप इसे सवा करोड़ या चौबीस करोड़ प्रतिदिन का भी किया जा सकता है।
उपासना के पीछे दृढ़-निष्ठा का बल ही प्रधान कार्य करता है। दुर्बल-निष्ठा वाले- कभी किया, कभी छोड़ा वाले शिथिल मनोभूमि के लोग वह आनन्द एवं लाभ नहीं उठा सकते, जो निष्ठावानों के लिए ही सम्भव है। इसलिये इस अनुष्ठान के माध्यम से निष्ठावान उपासकों को आगे बढ़ाया गया है। यह अनुष्ठान दस वर्ष तक चलेगा। इसलिये इन भागीदारों में वे ही आवेंगे, जिनका अन्तःकरण अपेक्षाकृत अधिक श्रद्धा एवं निष्ठा से भरा है। ऐसी मनोभूमि वालों की कुछ आध्यात्मिक सहायता की जाय तो वह फलवती भी होती है। चंचल और अस्थिर चित्त वाले तो इधर-उधर भटकते मात्र रह कर अपना समय ही गँवाते हैं। इसलिए उपासना के इस महा-अनुष्ठान उपक्रम का एक उद्देश्य निष्ठा की परिपक्वता प्रतिष्ठापित करना भी है।
यों इस महापुरश्चरण के अंतर्गत पाँच-पाँच कुण्ड के 200 सामूहिक यज्ञ भी होंगे जिससे एक हजार कुण्ड की योजना हर वर्ष पूरी होती रहेगी। पर इसकी अन्तिम पूर्णाहुति दस वर्ष बाद होगी। आगामी दस वर्ष ही मानवीय भाग्य और भविष्य के निर्धारण में अति महत्वपूर्ण भूमिका सम्पादित करने वाले हैं, इसलिये इसी अवधि में अपना महापुरश्चरण चलेगा। इसकी अन्तिम पूर्णाहुति किस रूप में कितनी विशाल होगी, इसकी चर्चा अभी से करना अप्रासंगिक होगा।
यह महापुरश्चरण ठीक तरह चलता रहे, सब भागीदार नियमित रूप से अपना कर्तव्य निबाहते रहें और अनुष्ठान की निर्धारित संख्या में कोई व्यक्ति-क्रम न होने पाये इसके लिए हर दस भागीदारों के पीछे एक ऋत्विज वरण होने की व्यवस्था की गई है। ऋत्विज अपने जिम्मे के भागीदारों से संपर्क रखेगा और यह पता लगाता रहेगा कि वे जप संख्या ठीक तरह पूरी कर रहे हैं या नहीं? यदि कोई सदस्य शिथिल पड़ता है तो उसके स्थान पर नया भागीदार बनाना अथवा उस कमी को पूरा करना का ऋत्विज का काम है। चूंकि यह पुरश्चरण का प्रथम चरण है इसलिये ऋत्विजों पर पाँच भागीदार की ही फिलहाल जिम्मेदारी छोड़ी गई है, वे प्रयत्न करेंगे कि एक वर्ष में यह पाँच की संख्या बढ़ कर दस हो जाय।
इस अंक में एक फार्म संलग्न है। उपासना में श्रद्धा रखने वाले हर धर्म-प्रेमी का कर्तव्य है कि वह अपने क्षेत्र में कम-से-कम पाँच भागीदार बना कर स्वयं ऋत्विज का उत्तरदायित्व ग्रहण करें और संलग्न फार्म में अपने सदस्यों का नाम पता भर कर मथुरा भेजें। आशा है यह महापुरश्चरण बड़े शान और सफलता के साथ सम्पन्न होगा। आवश्यक संख्या 24 हजार भागीदार शीघ्र पूरे हो जायेंगे।
1. हम आस्तिकता और कर्तव्य-परायणता को मानव जीवन का धर्म कर्तव्य मानेंगे।
2. शरीर को भगवान् का मन्दिर समझ कर आत्मसंयम और नियमितता द्वारा आरोग्य की रक्षा करेंगे।
3. मन को जीवन का केन्द्र बिन्दु मानकर उसे सदा स्वच्छ रखेंगे।
4. कुविचारों और दुर्भावनाओं से इसे बचाए रखने के लिए स्वाध्याय एवं सत्संग की व्यवस्था रखे रहेंगे।
5. अपने आपको समाज का एक अभिन्न अंग मानेंगे और सबके हित में अपना हित समझेंगे।
6. व्यक्तिगत स्वार्थ एवं सुख को सामूहिक स्वार्थ एवं सामूहिक हित से अधिक महत्व न देंगे।
7. नागरिकता, नैतिकता, मानवता, सच्चरित्रता, उदारता, आत्मीयता, समता, सहिष्णुता, श्रमशीलता जैसे सद्गुणों को सच्ची संपत्ति समझकर इन्हें व्यक्तिगत जीवन में निरन्तर बढ़ाते रहेंगे।
8. साधना, स्वाध्याय, संयम एवं सेवा कार्यों में आलस्य और प्रमाद न होने देंगे।
9. चारों ओर मधुरता, स्वच्छता, सादगी एवं सज्जनता का वातावरण उत्पन्न करेंगे।
10. परम्पराओं की तुलना में विवेक को महत्व देंगे।
11. अनीति से प्राप्त सफलता की अपेक्षा नीति पर चलते हुए असफलता को शिरोधार्य करेंगे।
12. मनुष्य के मूल्याँकन की कसौटी उसकी सफलताओं, योग्यताओं एवं विभूतियों को नहीं, उसके सद्विचारों और सत्कर्मों को मानेंगे।
13. हमारा जीवन स्वार्थ के लिए नहीं, परमार्थ के लिए होगा।
14. संसार में सत्प्रवृत्तियों के पुण्य प्रसार के लिए अपने समय, प्रभाव, ज्ञान, पुरुषार्थ एवं धन का एक अंश नियमित रूप से लगाते रहेंगे।
15. दूसरों के साथ व व्यवहार न करेंगे जो हमें अपने लिए पसन्द नहीं।
16. ईमानदारी और परिश्रम की कमाई ही ग्रहण करेंगे।
17. पत्नीव्रत धर्म और पतिव्रत धर्म का परिपूर्ण निष्ठा के साथ पालन करेंगे।
18. मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है, इस विश्वास के आधार पर हमारी मान्यता है कि हम उत्कृष्ट बनेंगे और दूसरों को श्रेष्ठ बनायेंगे तो युग अवश्य बदलेगा।
19. हमारा युग-निर्माण संकल्प अवश्य पूर्ण होगा।
*समाप्त*