मूल-स्रोत का सम्बल

एक बीज डाला जाता है, तब वृक्ष खड़ा होता है। बीज सारे वृक्ष का मूल है। मनुष्य-जीवन का भी एक वैसा ही मूल है, चाहे उसे परमात्मा कहें, ब्रह्म या चेतना-शक्ति। जीवन के मूल-स्रोत से बिछुड़ जाने के कारण ही मनुष्य शाँति और जीवन की पवित्रता से अलग पड़ जाता है। मृत्यु के भय और जड़त्व के शून्य में निर्वासित हो जाता है।

मनुष्य अपने आपको जीवन मूल-स्रोत के साथ संयुक्त कर देता है तो वह विशाल प्रजा के सुख-दुःख के साथ एक तन हो जाता है। समष्टि में डूब कर व्यक्तिगत अहंता, स्वार्थ, संग्रह, हिंसा, छल की क्षुद्रताओं से बच जाता है। स्रोत के साथ एकात्म हो जाने पर मृत्यु, शून्यता और एकाकीपन का भय तिरोहित होता है।

वृक्ष का गुण है चारों ओर फैलना। हम भी फैलें। घर, परिवार, समाज, देश और विश्व के साथ प्रेम करें, स्नेह करें, आदर और सद्भाव भरें। किसी की छाया की आवश्यकता होती है, उसे छाया दें, सहारे की आवश्यकता होती है, उसे सहारा दें। अपनी व्यष्टि को विश्व-आत्मा के साथ घुलाने के लिये जितना फैल सकते हों, हमें फैलना चाहिये। वह हमारे जीवन का धर्म है। समष्टि में अपने को विसर्जित कर देना ही जीवन की सार्थकता है।

किन्तु जब हम फैलें तब भी अपने मूल-स्रोत को न भूलें, नहीं तो फिर उसी जड़ता और भय में खो जायेंगे, जिससे निकलने के लिये ही मनुष्य जीवन का आविर्भाव हुआ है।

-रोम्यां रोल


ईश्वर हमारा सच्चा जीवन सहचर है।

इस संसार में पग-पग पर कठिनाइयों और संकटों का सामना मनुष्य को करना पड़ता है। संसार संकटों का आलय कहा गया है। बहुत कुछ साधन होने पर भी आपत्तियाँ आ जाती हैं। उनसे छुटकारा का कोई मार्ग नहीं दीखता। मनुष्य बहुत कुछ हाथ-पैर मारता है लेकिन संकटों से निस्तार नहीं हो पाता।

ऐसी भयप्रद परिस्थितियाँ कभी-न-कभी प्रायः सभी मनुष्यों के सामने आती रहती हैं। ऐसा लगता है जैसे उसका सारा बल, सारे साधन समाप्त हो गये हैं। इस अंधकार में कोई साथ देने वाला नहीं है, जीवन भारी हो गया है। पैर लड़खड़ाने लग गये हैं। चारों ओर अन्धेरा ही छाया हुआ है। इस प्रकार वह निराशा और भय से घिर कर असहाय हो जाता है।

लेकिन फिर धीरे-धीरे सारा ज्वर शाँत होने लगता है। सभी ओर समाधान दीखने लगता है। वही साधन जिनकी शक्ति में अविश्वास होने लगा था, उसी अपने बल में, जिसमें अन्धेरा ही अन्धेरा दिख रहा था, विश्वास, श्रद्धा और प्रकाश आता दिखलाई देने लगता है। आपत्तियों और संकट के बादल छटने लगते हैं और निराश मनुष्य एक बार फिर अपने ही पैरों पर खड़ा हो जाता है। यह सब चमत्कार क्या है?

यह चमत्कार वह ईश्वरीय कृपा है जिसका उदय अपने भीतर से ही होता है। वह मनुष्य के आस्तिक भाव का लाभ है, उसी का प्रसाद है। यह लाभ उसे नहीं मिल पाता जो नास्तिक होता है, जिसके हृदय में उस सर्वशक्तिमान के प्रति विश्वास नहीं होता। नास्तिक व्यक्ति को ऐसा अप्रत्याशित सम्बन्ध प्राप्त नहीं होता। वह तो अपने साधनों, अपने बल और अपनी शक्ति के थकते ही पराजित हो जाता है और तब संकट और आपत्तियाँ उस व्यक्ति को पूरी तरह नष्ट कर देती है। ईश्वर उन्हीं पर करुणा करता है, जो उसके विश्वासी होते हैं, आस्तिक भाव से ओत-प्रोत होते हैं।

ईश्वर की यह महती कृपा ही है कि वह अपने विश्वासी की निरुपाय स्थिति में सहायता करता है। वह किसी का बन्धक नहीं होता, किसी का उस पर कोई इजारा नहीं होता। यदि वह सहायता न करे तो इसका कोई उलाहना नहीं। लेकिन नहीं वह अपने उस जन की सहायता बिना माँगे ही करता रहता है। क्योंकि वह करुणा सागर है, दया का आगार है। परमात्मा की इस कृपा के प्रति हम सबको कृतज्ञ ही रहना चाहिये।

अनेक लोग जरा-सा संकट आते ही बुरी तरह घबरा जाते हैं। हाय-हाय करने लगते हैं, उसे ईश्वर का प्रकोप मान कर भला-बुरा कहने लगते हैं। निराश और हतोत्साह होकर ईश्वर के प्रति अनास्थावान् होने लगते हैं। यह ठीक नहीं आपत्तियाँ संसार में सहज सम्भाव्य हैं। किसी समय भी आ सकती हैं। किन्तु उनसे घबराना नहीं चाहिये। उन्हें ईश्वर का अपने बच्चों के साथ एक खेल समझना चाहिये। जैसे कोई कागज का भयावह चेहरा लगा कर कभी-कभी बच्चों को डराने का विनोद किया करता है, उसी प्रकार ईश्वर भी संकट की स्थिति लाकर अपने बच्चों के साथ खेल किया करता है। उसका आशय यही होता है कि बच्चे भयावह स्थितियों के अभ्यस्त हो जायें और डरने की उनकी आदत छूट जाये। वे संसार में हर संकट का सामना करने के योग्य बन जांय। आपत्तियों को ईश्वर का खिलवाड़ समझ कर डरना नहीं चाहिये। उसमें उस खिलाड़ी का साथ देकर खेलते ही रहना चाहिये।

आपत्तियां उन्हीं के लिये भय का कारण बनती हैं, जो ईश्वर विश्वासी नहीं होते। उनमें ईश्वर के मंगल मन्तव्य का आभास नहीं देखते। अन्यथा संसार की किसी भी परिस्थितियां से डरने का कोई कारण नहीं। जिसे ईश्वर की कृपा में विश्वास है, उसकी सर्वशक्तिमत्ता में अखण्ड आस्था है, जो उसे अपना स्वामी सखा और माता, पिता समझता है, उसे किसी धातु से डरने का क्या अर्थ? डरना तो उसे चाहिये, जिसने उस सर्वशक्तिमान का साथ छोड़ दिया है।

जो उसके आदेशों और निर्देशों का उल्लंघन करने का अपराध करता है, जो ईश्वर के विरोध से नहीं डरता है, जो उसकी इच्छा का अनुसरण करने में आनाकानी करता है, डर तो उसके लिये है। जो उसकी अवज्ञा नहीं करता, आज्ञा में चलता है, अपना विश्वास सुरक्षित रखता है, उसको संसार में तो किसी से भय लगता है और न वह किसी परिस्थिति से विचलित होता है। अपने विश्वासी को ईश्वर बिना माँगे ही साहस, सम्बल और शक्ति देता रहता है। यह उसकी महती कृपा है। इसके प्रति हम सबको आभारी रहना चाहिये।

जीवन एक लम्बी यात्रा के समान है। सर्वथा एकाकी चल कर इसे आसानी से पूरा कर सकना सरल नहीं है। जब किसी यात्रा में कोई मनचाहा साथी मिल जाता है, तो वह बड़ी आसानी से कट जाती है। रास्ता लम्बा और नीरस नहीं लगता। लेकिन साथी सच्चा, सहयोगी और योग्य ही होना चाहिये। अन्यथा वह मात्रा को और भी संकटपूर्ण बना देगा। किन्तु संसार में ऐसे मन चाहे साथी मिलते कब हैं?

संसार में स्वार्थी, विश्वासघाती और आपत्ति के समय साथ छोड़ जाने वाले ही अधिक पाये जाते हैं। जीवन यात्रा के लिए सबसे योग्य एवं उपयुक्त साथी ईश्वर के सिवाय और कौन हो सकता है? वही एक ऐसा मित्र, सखा, स्वजन, सहायक और गुरु होता है, जो पूरे रास्ते साथ रहे, भूलने पर रास्ता दिखलाये, थकने पर सहारा दे और आपत्ति के समय हाथ पकड़ कर बाहर निकाल लाये। एक ईश्वर को छोड़ कर ऐसा साथी और कौन हो सकता है, जो जीवन भर साथ दे सके, पग-पग पर चेतावनी और सहारा दे सके किन्तु अपने इस उपकार के बदले में न तो कुछ ले और न माँगे। ऐसा निःस्वार्थ एवं हित-चिन्तक साथी, सखा और सहचर के उपकार यदि भुला दिए जाते हैं, तो इससे बढ़ कर कृतघ्नता और क्या हो सकती है?

जिसने ईश्वर से मित्रता कर ली है, उसे अपना साथी बना लिया है, उसके लिये यह संसार बैकुण्ठ की तरह आनन्द का आगार बन जाता है। जिसकी यह सारी दुनिया है, जो संसार का स्वामी है, उससे संपर्क कर लेने पर, साथ पकड़ लेने पर, फिर ऐसी कौन-सी सम्पदा, ऐसा कौन-सा सुख शेष रह सकता है, जिसमें भाग न मिले। जो स्वामी का सखा है वह उसके ऐश्वर्यों का भी भागी होता है।

ईश्वर के अनन्त उपकारों को कोई कृतघ्न नास्तिक ही भुला सकता है, श्रद्धालु आस्तिक नहीं। उस अहेतुक उपकार करने वाले के प्रति हमें सदैव विश्वासी एवं आस्थावान् ही रहना चाहिये। जब वह जीव को जन्म देने की सोचता है, तब उसके लिये सारी सुविधाएँ पहले से संचय कर देता है, जिससे जन्म लेने के बाद उसके प्यारे जीवों को कोई कष्ट न हो। उसकी मनोनीत माता को दो स्तन दे देता है। जन्म देते ही उनमें नित्यप्रति ताजा, स्वादिष्ट और स्वाददायक दूध पैदा करता रहता है। माता के हृदय में वात्सल्य और स्नेह उपजा कर अबोध जीव की सुरक्षा सेवा और देखभाल करने की प्रेरणा देता रहता है। यदि वह ऐसा न करे तो संसार में जीव का जीवन एक दिन भी नहीं चल पाये।

इतना ही क्यों? आगे चल कर भी वह जीवों पर अनन्त उपकार करता रहता है। उसे क्रमिक वृद्धि देता है, उसका विकास करता है, बल, बुद्धि और विवेक की कृपा करता है। यदि वह ऐसा न करे तो जीव भी जड़ की तरह अगतिशील ही बना रहे। न वह संसार में किन्हीं कर्तव्य को कर पाये और न उसका आनन्द उठा पाये। ऐसे चिर-कृपालु ईश्वर के उपकारों को किस प्रकार भुलाया जा सकता है?

इस संसार में क्या नहीं है? सुख, सौभाग्य, आनन्द-मंगल सभी तो इस संसार में भरा पड़ा है। किन्तु यह मिलता उन्हें ही है, जो इसके स्वामी परमात्मा के अनुकूल रहते हैं। उसके प्रतिकूल चलने वालों को संसार में दुःख और आपत्तियों के सिवाय और कुछ नहीं मिल पाता। जब इस जगत के स्वामी को अपना माता-पिता मानेगा उसकी आज्ञा में चलेगा, उसे हर प्रकार से प्रसन्न रखने व प्रयत्न करेगा, वही उत्तराधिकारी बनेगा और संसार का वैभव पायेगा। संसार का सारा वैभव हमारे पिता का है- जब यह विश्वास हृदय में जम जायेगा तो पुत्र भाव रखने वाला आस्तिक उस अतुल वैभव को अपना अनुभव करने लगेगा। उसे गरीबी, अभाव, दरिद्रता अथवा दुःख का अनुभव ही न होगा। जब साधारण साँसारिक राजा, रईसों के लड़के अपने आपको सम्पन्न और संतुष्ट अनुभव करते हैं और पिता के बल पर संसार में निर्भय होकर विचरते हैं, तब भला उस सर्वशक्तिमान् को अपना पिता मानने वाला क्यों तो किसी से डरेगा और क्यों अपने को विपन्न मान कर दुःखी होगा?

ईश्वर मनुष्य के भाव के अनुरूप ही अपना भी भाव बनाता है। जो उसमें पिता का भाव रखता है, वह बदले में उसकी ओर से पुत्र का भाव पाता है। अब ऐसा कौन-सा पिता होगा जो अपने पुत्र को अपनी सम्पदाओं से वंचित रखेगा अथवा उसे विपत्ति में पड़ा रहने देगा? वह तो उसका हर प्रकार से लालन-पालन करेगा और हर प्रकार से आपत्तियों से बचायेगा। ऐसे परम दयालु पिता का उपकार न मानना बहुत बड़ा पाप है।

संसार की इस लम्बी जीवन-यात्रा को एकाकी पूरा करने के लिए चल पड़ना निरापद नहीं है। इसमें आपत्तियाँ आयेंगी, संकटों का सामना करना होगा। निराशा और निरुत्साह से टक्कर लेनी होगी। इन सब बाधाओं और दुःखदायी परिस्थितियों से लड़ने के लिए एक विश्वस्त साथी का होना बहुत आवश्यक है। वह साथी ईश्वर से अच्छा कोई नहीं हो सकता। उसे कहीं से लाने-बुलाने की आवश्यकता नहीं होती है। वह तो हर समय, हर स्थान पर विद्यमान है। एक अणु भी उससे रहित नहीं है। वह हमारे भीतर भी बैठा हुआ है। किन्तु हम अपने अहंकार के कारण उसे जान नहीं पाते। उसी प्रकार जैसे किसी के घर में बड़ा भारी खजाना छिपा पड़ा हो और वह उसे अज्ञानवश न जान सके। जब किसी को अपनी छिपी सम्पत्ति का पता हो जाता है, तो वह उसे खर्च भले ही न करे तब भी उसे उसके बल पर एक सम्पन्नता एक विश्वास और एक बल अनुभव होता रहता है। जो अन्तरस्थ ईश्वर का विश्वास पा लेता है, समझ लेता है कि वह सर्वशक्तिमान हर समय उसके हृदय में विराजमान है, उसके साथ रहता है, उसे एक बड़ा आनन्ददायक आत्म-विश्वास बना रहता है। फिर उसे न किसी से भय लगता है और न वह किसी प्रकार की कमी अनुभव करता है। वह स्वयं ही अपने उस विश्वास के बल पर हर परिस्थिति से टक्कर से लेता है, प्रायः रो, कलय कर ईश्वर को पुकारने की भी आवश्यकता नहीं रहती।

ईश्वर हमारा महान उपकारी पिता है। वह हमारा स्वामी और सखा भी है। हमें उसके प्रति सदा आस्थावान रहना चाहिये और आभारपूर्वक उसके उपकारों को याद करते हुए उसके प्रति विनम्र एवं श्रद्धालु बना रहना चाहिये। इसमें हमारा न केवल सुख ही निहित है बल्कि लोक-परलोक दोनों का कल्याण भी।


अपना ओछापन क्यों बताऊँ ?

श्री रामकृष्ण परमहंस के गले में नासूर हो गया था। इसी समय शशिधर चूड़ामणि उनके पास आये और बोले- ‘‘स्वामी जी! यदि आप अपने मन को एकाग्र करके कहें कि ‘रोग चला जा, रोग चला जा’ तो आपका रोग अवश्य मिट जायेगा।”

परमहंस बोले- ‘‘जो हृदय मुझे सच्चिदानन्द माँ! का स्मरण करने हेतु मिला है, उसे मैं साँसारिक कार्य में क्यों लगाऊँ?” इस पर अनेक शिष्यों को संतोष नहीं हुआ। उन्होंने मिल-जुल कर आग्रह किया कि आप माँ! ही से कहें कि वह आपको रोग मुक्त कर दे।

इस पर रामकृष्ण परमहंस मुस्करा कर बोले- ‘‘मैं ऐसी मूर्खता क्यों करूं? माँ! तो दयामयी, सर्वज्ञ और सर्व-समर्थ है। उन्हें मेरे कल्याण के लिये जो उचित लगा, वही किया, फिर मैं उनकी व्यवस्था में छिछोरापन क्यों लाऊँ? अपना ओछापन क्यों बताऊँ?


प्रेम समस्त सद्-प्रेरणाओं का स्रोत

जीवन में जिन व्यक्तियों ने विशेष विकास और विस्तार पाया है, उसका मूल आधार, अधिकाँशतः प्रेम ही रहा है। बिना प्रेम के किसी क्षेत्र में विकास होना सम्भव नहीं। फिर चाहे वह क्षेत्र लौकिक रहा हो अथवा आध्यात्मिक।

दैवी भाव होने से प्रेम अपने प्रकाश में मोह, लोभ, स्वार्थ, ईर्ष्या, द्वेष आदि के अन्धेरे तथा कलुषित भाव नहीं आने देता है। बाधाओं का निराकरण होना ही विकास की परिस्थिति है। जीवन एक गतिशील प्रवाह है। इसे जिधर जिस दिशा में लगा दिया जाता है, यह उसी दिशा में बहता और बड़ता चला जाता है। प्रवाह के पथ में अवरोधों का अभाव उसके बढ़ने में सहायक होता है। प्रेम एक ऐसा गुण है, जो मनुष्य के आन्तरिक अवरोधों के साथ-साथ बाह्य अवरोधों को भी दूर करता है। असहयोग, असहायता और प्रवंचना जैसी प्रतिकूलतायें प्रेम से परिपूर्ण व्यक्ति के सामने नहीं आतीं और यदि संयोगवश आती भी हैं तो उनको प्रेम की वशीकरण शक्ति के प्रभाव से शीघ्र ही अनुकूल हो जाती है, जिससे मनुष्य जीवन का प्रवाह अबाध एवं अविच्छिन्न गति से बहता और बढ़ता हुआ अपने ध्येय को प्राप्त कर लेता है।

प्रेम में एक अलौकिक शक्ति रहा करती है। ऐसी शक्ति जिसकी तुलना बाहु-बल, धन-बल अथवा बुद्धि बल से नहीं की जा सकती। जिस कार्य को कोई बड़ा सम्राट् अपनी सम्पूर्ण शक्ति लगा कर नहीं कर सकता, उसे एक प्रेम परिप्लावित संत सहज ही में कर सकता है। जो द्वेष, जो विग्रह और जो संघर्ष वर्षों के शस्त्र-प्रयत्न द्वारा नहीं मिटाये जा सकते, वे प्रेमाधारित संधि द्वारा शीघ्र ही प्रशमन किये जा सकते हैं। दो व्यक्ति अथवा दो राष्ट्र जब मोह, भ्रम के कारण बहुत समय तक संघर्ष में लगे रहने के बाद युद्ध को विभीषिका और उसकी निरर्थकता का अनुभव कर लेते हैं, तब प्रेमपूर्ण पारस्परिकता का सहारा लेकर समस्याओं का निपटारा किया करते हैं। अभय और प्रेम का प्रादुर्भाव होते ही द्वेष मिट जाता है, दृष्टिकोण बदल जाता है और संधि की सम्भावनायें उन्मुक्त हो जाती है। प्रेम पर आधारित संधियों में ही स्थायित्व होता है। नहीं तो छलों, विवशताओं और स्वार्थों पर निर्भर मित्रता शीघ्र ही अस्तित्व हीन होकर संघर्ष की पुनरावृत्ति कर देती है।

हृदय की निष्कलंक निष्ठा का दूसरा नाम प्रेम है। निष्ठा ही वह तत्व है, जिसके आधार पर संसार का विकास होता चला आया है और आगे भी जो विकास होना है, उसका आधार भी यह निष्ठा ही होगी। निष्ठा रहित कर्तव्यों में वास्तविक जीवन का अभाव रहता है। व्यक्ति की उन्नति का भी आधार यह निष्ठा ही होती है। अनिष्ठावान व्यक्ति का हृदय आलस्य, अरुचि और अकर्तृत्व के दूषित भावों से उसी प्रकार भर जाता है, जैसे कोई पुराने भग्नावशेष धूल, मिट्टी और घास-फूस से आच्छन्न हो जाते हैं। विकास अथवा सफलता के लिये यह प्रतिकूल स्थित है, जिसमें विकास की आशा नहीं की जा सकती। इसके विपरीत जब आशा, कर्मठता, उत्साह एवं स्फूर्ति की स्थिति प्राप्त होती है तो मनुष्य जाने, अनजाने दोनों तरह से लक्ष्य की ओर स्वतः ही बढ़ता जाता है। यह प्रेरणापूर्ण अवस्था एकमात्र निष्कलंक निष्ठा से ही पाई जा सकती है।

भगवान् ने गीता में जिस निष्काम कर्मयोग का निर्देश किया है, उसका मुख्य तात्पर्य निष्कलंक निष्ठा से ही है। कामनाओं के साथ जिन कर्तव्यों का आचरण किया जाता है, उनमें कुशलता की प्राप्ति नहीं होती। अस्पताल का एक नौकर व परमार्थ भाव वाला एक जन-सेवक, दोनों ही दूसरों की परिचर्या किया करते हैं। किन्तु जो दक्षता और जो प्रभाव जन सेवक की सेवा में रहता है, वह नौकरी मात्र का भाव रखने वाले कर्मचारी की सेवा में नहीं होता। इसका कारण यही है कि नौकर का उस काम में अपना स्वार्थ रहता है, कार्य के प्रति उसकी निष्ठा विवशता से बोझिल रहा करती है। वह अपने कर्तव्य का पालन करता तो है, किन्तु किसी यंत्र की तरह। उसके उस कर्तव्य में प्रेम-भाव का अभाव रहता है। कर्तव्य के प्रति जब तक निष्काम भाव का विकास नहीं होता, तब तक उसमें अपेक्षित कुशलता का भी समावेश नहीं होने पाता। विशुद्ध कर्तव्य भावना से किये जाने वाले कर्मों के प्रति मनुष्य का वास्तविक प्रेम जुड़ जाने से उसमें निष्ठा का भाव आप से आप आ जाया करता है जिसके कारण सारे काम कुशलता पूर्वक संपादित होते चले जाते हैं।

मानव-जीवन का संचालन जिस प्रेरणा द्वारा होता है, वह प्रेरणा प्रेम ही है। पवित्र होने के कारण प्रेम की प्रेरणा मनुष्य को ऊर्ध्व दिशाओं में परिचालित किया करती है। प्रेम में आडम्बर, प्रवंचना अथवा छल-कपट का भाव न रहने से मनुष्य की जीवन गति स्वभावतः परमार्थ दिशाओं की ओर उन्मुख होती रहती है। जो सौभाग्यवान सत्पुरुष निःस्वार्थ प्रेम की प्रेरणा से परिचालित होते हैं वे, इस जीवन में सुख-संतोष पाकर पर अथवा पारलौकिक जीवन में सद्गति के अधिकारी बना करते हैं। उन्हें प्रेम के प्रसाद द्वारा उत्कृष्ट और दैवी गतियाँ प्राप्त होती हैं। आत्मा से उद्भूत प्रेरणा मनुष्य को परमात्मा के प्रति जागरूक बनाती है तथापि मनुष्य की आत्मा भी पुण्य प्रेरणा का स्रोत बन तभी पाता है, जब उसको निःस्वार्थ और निष्कलंक प्रेम द्वारा कोमल, करुण और संवेदनशील बना लिया जाता है।

न केवल प्रेरणा ही, प्रेम मनुष्य जीवन की स्वाभाविक आवश्यकता भी है। इस आवश्यकता की पूर्ति हुए बिना जीवन जड़, अशाँत, असंतुष्ट और नीरस बना रहता है। जीव-मात्र प्रेम के आदान-प्रदान की सरस प्रक्रिया के आधार पर ही तो, इस संकट और आपदाओं से भरे संसार में सुखपूर्वक जीता चला जाता है। जीवन में जब तक प्रेम की प्राप्ति नहीं होती, एक अभाव, एक अशाँति और एक कुण्ठा का अरुचिकर अनुभव होता रहता है और मनुष्य शीघ्र ही जीवन से छुटकारा पाने की सोचने लगता है। जिन बच्चों को अभिभावकों का प्रेम नहीं मिलता, वे प्रारंभ से ही क्रोध, द्वेष, कर्कशता और कठोरता के आसुरी भावों से आक्राँत होने लगते हैं। उनका शारीरिक और मानसिक विकास अवरुद्ध हो जाता है। जिन पुरुषों को प्रेम नहीं मिल पाता, उनके अपराधी बन जाने की आशंका रहती है।

प्रेम के अभाव में अधिकाँश लोग समाज के विरोधी और विध्वंसक बन जाते हैं। मनुष्य के प्रच्छन्न आसुरी भावों का शमन प्रेम द्वारा ही होना सम्भव होता है। समाज में शाँति और व्यवस्था बनाये रहने के लिये जहाँ राजदण्ड की आवश्यकता है, वहाँ पारस्परिक प्रेम भी कुछ कम अपेक्षित नहीं होता। संसार के प्रायः सभी समाजों में राजदण्ड की व्यवस्था रहती है तथापि उनमें अपराध और अपकर्म करने वाले उसकी शाँति को क्षति पहुँचाते ही रहते हैं। इसका कारण प्रेम का अभाव ही होता है। यदि सभी व्यक्तियों को अपने पूरे समाज से प्रेम हो, समाज का सुख-दुःख, विकास, हास को वे अपनी ही हानि-लाभ समझें तो समष्टि रूप में सद्भावों की एक बड़ी सीमा तक वृद्धि हो सकती है।

पशु पक्षी आदि मनुष्येत्तर प्राणियों में अपने-अपने समूह के प्रति एक नैसर्गिक प्रेम होता है। इसी प्रेम के आधार पर कोई राज्य व्यवस्था अथवा दण्ड न होने से, उनमें कदाचित ही सामूहिक अशाँति और अव्यवस्था आने पाती है। अपराधों और अपकर्मों का कारण मनुष्य का आसुरी भाव ही होता है। प्रेम की पावन प्रेरणा से जिसका निराकरण किया जा सकना असम्भव नहीं है।

जिस प्रकार मनुष्य की आत्मा में प्रेम पाने की प्यास रहती है, उसी प्रकार उसकी आत्मा प्रेम प्रदान करने के लिये भी व्याकुल रहती है। जिसका प्रेम उसके अन्तःकरण में बन्द पड़ा रहता है और अभिव्यक्ति का अवसर नहीं पाता, उस मनुष्य का व्यक्तित्व भी पूरी तरह से पुष्ट और विकसित नहीं होने पाता। उसके जीवन प्रवाह की गति अवाँछित दिशा में मुड़ जाने की आशंका बनी रहती है। जिस प्रकार पानी, अग्नि, वायु का आवेग मार्ग न पाने से विस्फोट को जन्म दे देता है, उसी प्रकार मनुष्य के अन्तःकरण में बन्दी प्रेम का आवेग भी ध्वंसक बन सकता है। मनुष्य को मनुष्य का प्रेम स्वीकार करना ही चाहिये। प्रेम का आदान-प्रदान संसार की एक अनिवार्य आवश्यकता है, मानव-कल्याण का सम्पादन करने के लिए जिसकी पूर्ति की जानी ही चाहिये।

बहुत बार लोग इस शिकायत के आधार पर विपथगामी बन जाया करते हैं कि उन्हें न तो प्रेम मिला ही और न उनका प्रेम स्वीकार ही किया गया। ऐसे असफल व्यक्ति यदि ईमानदारी से अपने अन्तःकरण की खोज करें, तो उन्हें पता चल जाये कि उनकी शिकायत समीचीन नहीं है। अथवा उनकी प्रेम भावना में कोई दोष रहा होगा। प्रेम देने की भावना में जब किसी प्रच्छन्न नीति का समावेश रहता है, तब वह अमृत विष की तरह लोगों को अग्राह्य बन जाया करता है और प्रेम पाने की लालसा में निहित लाभ का भाव लोगों को विमुख बना देता है। निःस्वार्थ और निष्कलंक भाव ही प्रेम के आदान-प्रदान का सच्चा और पवित्र आधार है। इसके अभाव में यह स्वर्गीय विनिमय नारकीय विभीषिका के रूप में परिवर्तित हो जाया करता है।

असंघ अद्वैत भावना ही प्रेम का वास्तविक स्वरूप है। मनुष्य समस्त संसार को अपना स्वरूप मान कर हृदय का सारा प्रेम प्रदान कर दे और उस प्रदान में भी विशुद्ध बलिदान का भाव ही रक्खे, तो कोई कारण नहीं कि उसका वह पवित्र प्रेम स्वीकार न किया जाये। प्रेम देने वाले को प्रेम मिलना भी स्वाभाविक होता है। दिया हुआ प्रेम प्रतिध्वनि और प्रतिभास की तरह ही वापस आकर अपने मूल स्रोत मनुष्य के अन्तःकरण को सुख-शाँति से परिपूर्ण बना दिया करता है।

लोग दूसरों को प्रेम करते हैं। किन्तु अधिकाँशतः स्वार्थवश ही करते हैं। और इसी स्वार्थ-भावना के कारण ही प्रेम अपनी दिव्य सिद्धियों के साथ फलीभूत नहीं हो पाता। अपने से, अपने समाज, देश और संसार से प्रेम कीजिये पर निःस्वार्थ और निष्कलंक भाव से। तभी यह शक्ति, सम्बल, सुख-शाँति, विकास और पुष्टि का हेतु बन सकेगा अन्यथा एक विकार के समान अवाँछित प्रेरणा से जीवन का संचालन करता रहेगा।

प्रेम ईश्वर रूप है। उसकी साधना उसी भाव से करनी चाहिये। स्वार्थ के निकृष्ट और निम्न धरातल पर उतर कर प्रेम की अभिव्यक्ति करना एक पाप है। क्योंकि इससे प्रवंचना एवं प्रताड़ना को प्रश्रय मिलता रहता है। जिस समय मनुष्य के हृदय में प्राणी मात्र के प्रति निष्काम प्रेम का विकास हो जाता है, वह मनुष्य की स्थिति से दैवी स्थिति में जा पहुँचता है। इसी उपलब्धि के हेतु ही तो भगवान् ने गीता में स्पष्ट निर्देश किया है-

आत्मानं सर्वभूतेषु सर्वभूतानि चात्मनि। ईक्षते योग मुक्तात्मा सर्वत्र रूपदर्शिन॥

सभी भूत प्राणियों में एक ही आत्मा समाई हुई है, इसीलिए सभी को समभाव से देखते हुये सभी के साथ प्रेम करना चाहिये।


काम लेने की नीति

एक खेत में कुछ मजदूर निराई-गुड़ाई का काम कर रहे थे। एक घण्टा काम करने के बाद वे सब बैठ कर सुस्ताने और गप हाँकने लगे। खेत के मालिक ने उनसे कहा कुछ नहीं, खुद खुरपी लेकर काम करने लगा। मजदूरों ने स्वामी को काम करते देखा तो शरमा गये और दौड़ कर काम में जुट गये।

दोपहर हुआ। स्वामी मजदूरों के पास गया और बोला- भाइयो, काम बन्द कर दो और खाना खा लो और आराम कर लो। मजदूर खाना खाने चले गये और शीघ्र ही थोड़ा आराम करने के बाद फिर काम पर आकर डट गये। शाम को छुट्टी के समय पड़ौसी खेत वाले ने देखा कि उसका काम उससे दो गुना हुआ है। वह बोला- ‘‘भाई! तुम मजदूरों को छुट्टी भी देते हो और डांटते-फटकारते भी नहीं, तब भी तुम्हारा काम मुझसे ज्यादा होता है, जबकि मैं मजदूरों को छुट्टी नहीं देता और हर समय डांटता-फटकारता रहता हूँ।”

साधु स्वामी, बोला- ‘‘भैया, काम लेने की नीति में, मैं सख्ती से अधिक स्नेह एवं सहानुभूति को पहला स्थान देता हूँ। इसीलिए मजदूर पूरा जी लगा कर काम करते हैं, इससे काम ज्यादा भी होता है और अच्छा भी।’’


आत्म-कल्याण बनाम विश्व-कल्याण

परमार्थ और परोपकार के दो लाभ माने गये हैं- एक आत्मोद्धार, दूसरा विश्व-कल्याण।

देखने में तो यह अलग-अलग दो लाभ विदित होते हैं। पर वस्तुतः दोनों बातें हैं एक ही। व्यक्ति-व्यक्ति रूप में जब सारा मानव-समाज अपना सुधार अथवा कल्याण कर लेगा तो समस्त संसार का कल्याण स्वतः ही हो जायेगा। इसी प्रकार विश्व-कल्याण की व्यापक भावना के अंतर्गत व्यक्ति कल्याण की भावना आ ही जाती है। अपना सुधार विश्व-कल्याण और विश्व-कल्याण अपना उद्धार- दोनों एक ही बात हैं। अथवा यों कह लीजिये दोनों एक ही बात के दो दृष्टि-बिन्दु अथवा पक्ष हैं। दोनों में कोई अन्तर नहीं है।

जो दूरदर्शी बुद्धिमान व्यक्ति अपने सुधार पर जितना ध्यान देते हैं। अपनी त्रुटियों और दुर्बलताओं को खोजते और दूर करने का प्रयत्न करते हैं- वे एक प्रकार से उतना ही संसार का उपकार करते हैं। व्यक्ति का सुधार संसार का ही सुधार तो है और संसार का सुधार परोपकार कार्य ही होता है। जो अपनी परिस्थितियाँ सुधारता और भविष्य को उज्ज्वल बनाता चलता है, वह उतने ही अर्थों में संसार का भविष्य उज्ज्वल बनाता है।

जो लोग सोचते हैं कि अपनी उन्नति अपना उद्धार करना एक स्वार्थ मात्र है, वे भारी भ्रम में हैं। अपना उद्धार करना संसार का उद्धार करने का प्रथम चरण है। जो अपना उपकार आप नहीं कर सकता वह संसार अथवा किसी दूसरे का उपकार क्या कर सकता है? जो स्वयं अच्छा है, वही दूसरे को अच्छा बना सकता है। जो स्वयं उदार और निर्लोभ है, वह ही किसी दूसरे को इसकी शिक्षा दे सकने का अधिकारी है। हम संसार को जिस रूप में देखने की आकाँक्षा रखते हैं, सबसे पहले हमें स्वयं ही वैसा बनना पड़ेगा। व्यक्ति और संसार कोई भिन्न वस्तु नहीं। व्यक्तियों का समूह ही समाज और संसार कहलाता है। यदि हम संसार का कल्याण करना चाहते हैं, तो यह काम हमें अपने से ही आरंभ कर देना चाहिये। अपनी सेवा भी संसार की ही एक सेवा है।

यदि हम स्वयं बुरे हैं और संसार को अच्छा बनाना चाहते हैं, तो यह सम्भव न होना। फिर चाहे उसके लिये हम समाज में जाकर लोगों की सेवा ही क्यों न करते हैं। उन्हें ज्ञान का प्रकाश और सद्भावना का अमृत क्यों न बाँटते रहें। सबसे पहली बात है कि लोग हम पर विश्वास ही न करेंगे, दूसरे यदि कोई सुनने समझने को भी तैयार हो जाये तो उसका कोई उपयोगी प्रभाव न होना। तीसरे यदि एक बार यह दोनों बातें हो भी जांय तो भी हम जितना एक ओर सुधार करेंगे, उतना ही हमारी बुराइयाँ दूसरी ओर विकृति पैदा कर देगी। संसार का उपकार करने से पूर्व आवश्यक है कि पहले अपने पर उपकार कर आत्म-सुधार कर लिया जाय। अपनी सच्ची सेवा संसार की सेवा का ही एक अंग है। आत्मोद्धार को स्वार्थ मानना भारी भूल है।

आत्मोद्धार संसार का उपकार करने का एक सरल और सुगम उपाय है। अपना आपा ही अपने सबसे निकट होता है। अपने को अपने पर दूसरों की अपेक्षा अधिक अधिकार और नियंत्रण होता है। अपने को तो अपनी इच्छानुसार किसी ओर भी मोड़ा अथवा किसी आदर्श में ढाला ही जा सकता है। दूसरों पर हमारा कोई अधिकार नहीं होता। हम किसी से कुछ निवेदन ही कर सकते हैं, कुछ समझा सकते हैं और परामर्श दे सकते हैं। अपनी तरह बलपूर्वक किसी ओर चला तो नहीं सकते। यह निश्चित नहीं कि दूसरे लोग हमारी बात मानें ही। वे मान भी सकते हैं और नहीं भी मान सकते हैं। इस संदिग्ध स्थिति में विश्व-सुधार का कार्य सरलतापूर्वक नहीं किया जा सकता है। इसलिये अच्छा यही है कि संसार का एक अंग होने के नाते अपने माध्यम से संसार के उपकार में लगें। यही सबसे सही और सुगम तरीका है।

आत्मोद्धार, आत्मोपकार और आत्म-विकास को जो स्वार्थ मानते हैं, उन्हें समझ लेना चाहिये कि सदाशयता पूर्ण स्वार्थ भी परमार्थ ही होता है। अपनी आत्मा का स्वार्थ जिन विचारों और कार्यों द्वारा सिद्ध होगा, उन्हीं के माध्यम से संसार का हित साधन भी होगा। जिन गुणों से जिन उपायों से हमें आत्म-शाँति, आत्म-संतोष और आत्म-कल्याण का लाभ होगा, उनके सिवाय दूसरे और कौन से कारण और उपाय हो सकते हैं, जो दूसरों की आत्माओं में इन विशेषताओं का समावेश कर सकें? सारे संसार की आत्माएँ एक हैं और वे एक जैसे गुण-दोषों से सुखी और दुःखी होती हैं।

उत्कृष्ट स्तर का स्वार्थ वस्तुतः परमार्थ का ही एक रूप होता है। सत्कर्म एवं सद्गुण स्वयं ही परोपकार बन कर प्रकट होते हैं। लोक-कल्याण और आत्म-कल्याण की गतिविधियाँ भिन्न-भिन्न नहीं एक ही होती हैं। जो माध्यम आत्म-कल्याण का होता है, वही लोक-कल्याण का। अस्तु आत्मोद्धार को स्वार्थ मान बैठना ठीक नहीं।

लोभ, लोलुपता और परपीड़न की भावना से प्रेरित प्रवृत्तियाँ ही स्वार्थ हैं, जिनकी विद्वानों और मनस्वी व्यक्तियों द्वारा निन्दा और निषेध किया गया है। ऐसा संकीर्ण व्यक्ति मानवीय धर्म की उपेक्षा करने लगता है, जिससे वह संसार का तो अपकार करता ही है आप भी अपना पतन कर लिया करता है।

संकीर्ण, भौतिक एवं निकृष्ट स्वार्थ मिथ्या स्वार्थ माना गया है। ऐसा स्वार्थ वह उत्कृष्ट और सच्चा स्वार्थ नहीं होता जिसका परिणाम परमार्थ पुण्य के फल वाला होता है। झूठा स्वार्थ मनुष्य को वासनाओं और तृष्णाओं से ग्रसित कर कुकर्म करने को विवश करता है। ऐसे स्वार्थी व्यक्ति कोई तात्कालिक लाभ भले ही प्राप्त करलें पर अन्त में उसे लोक-निन्दा, अविश्वास, प्रण, असंतोष, विरोध, विक्षोभ, आत्मग्लानि, अशाँति आदि के कष्टदायक मानसिक एवं साँसारिक नरक में पड़ना पड़ता है। ऐसा निकृष्ट एवं निन्दित व्यक्ति क्या तो अपना उद्धार कर सकता है और क्या लोकोपकार है।

इन्हीं कारणों से ऐसे नारकीय स्वार्थ को मनीषियों ने निन्दित एवं हेय ठहराया है। परमार्थ का पूरक स्वार्थ उज्ज्वल और उन्नत स्वार्थ ही माना गया है। उसके संपादन में आरम्भ में थोड़ा-सा कष्ट भले हो, उससे इन्द्रियजन्य सुखों और लोभजन्य लाभों की पूर्ति भले ही न हो सके, वासनाओं और तृष्णाओं की पूर्ति भले ही न हो सके- पर अन्ततः वह सुखदायक और कल्याणकारी ही होता है। परमार्थपरक स्वार्थ वाले व्यक्ति अपने सदाचार और सद्-व्यवहार के कारण लोक-प्रियता का वह श्रेय प्राप्त कर लेते हैं, जो आत्म-शांति, आत्म-संतोष के साथ-साथ साँसारिक और पारलौकिक जीवन के लिये एक बड़ा सम्बल बनता है।

परमार्थ और परोपकार का अर्थ केवल यही नहीं है कि हम किसी को भोजन, वस्त्र और धन दें और न उसका अर्थ उन कामों तक ही सीमित है, जिससे किसी की सेवा हो सके या कोई कष्ट दूर किया जा सके। बल्कि यदि हम किसी को किसी ऐसी प्रवृत्ति से विरत कर देते हैं, जिससे वह किसी आगामी संकट से बच जाता है तो यह भी परोपकार ही माना जायेगा। दूसरे की गलतियों और बुराइयां हमें परेशान करती हैं, कष्ट देती हैं और हानि पहुँचाती हैं। अब यदि हममें परोपकार भावना नहीं है, तो हम उसे उसका दोष देंगे, प्रतिकार करेंगे। जिससे वह भी किसी कष्ट और संकट का भागीदार बन जायेगा। जिसकी प्रतिक्रिया उसके भावी जीवन को और नीरस तथा बुरा बना देगी।

हमारे कारण वह समाज से खीझने लगेगा, उसका अपकार करेगा, जिसके फलस्वरूप आये दिन संकट में पड़ता रहेगा। यदि हम परोपकार भावना द्वारा उसे उसकी बुराई के लिये क्षमा करके यह सोचने पर विवश कर दें कि उसने एक अच्छे व्यक्ति की बुराई की है, जो उसे नहीं करनी चाहिये थी, तो भविष्य के लिए उसकी प्रवृत्तियों में सुधार होगा और वह आगामी संकटों से बचा रहेगा। व्यक्ति का यह सुधार एक बड़ा परोपकार ही नहीं पुण्य परमार्थ भी है।

किन्तु यह सुधार हम कर सकने में सफल तभी होंगे, जब अपनी प्रवृत्तियों को क्षमा एवं सहनशीलता द्वारा पवित्र बना सकें। एक आध्यात्मिक व्यक्ति की भाँति दूसरे की बुराई का कारण अपने भीतर खोजें और उसका निराकरण करें, तभी हममें वह गुण आ सकता है जिसके प्रभाव से बुरा व्यक्ति अच्छा बन जाता है। हमें सोचना होगा कि कोई वस्तु सजातीय एवं अनुकूल वायुमंडल में ही बढ़ती और पनपती है। दूसरे कोई बुराई करने का अवसर तभी मिलेगा, जब वैसी ही बुराई और त्रुटि अपने अन्दर भी हो। यदि अपना स्वभाव उत्कृष्ट, सहनशील एवं क्षमाशील है, बुरे के साथ भी उपकारपूर्ण सद्भावना और सहानुभूति है तो बुरे लोगों को भी अपने को उसके अनुरूप बनाने पर विवश होना पड़ेगा, अपना व्यवहार बदलना पड़ेगा।

जो व्यक्ति जितना ही अपने गुण, कर्म, स्वभाव को सुधारता है, वह ‘आत्मोद्धार ही विश्व-कल्याण हैं’-वाले सिद्धान्त के अनुसार उतना ही उपकारी माना जायेगा। ऐसा व्यक्ति तत्परतापूर्वक अपनी छोटी-से-छोटी बुराई की भी उपेक्षा नहीं करता, उसे भी जड़मूल से नष्ट कर देने में सचेष्ट रहता है। हम जितनी अधिक अपनी परिस्थितियाँ सुधारते चलेंगे। अपने भाग्य और भविष्य को उज्ज्वल और उन्नत बनाते चलेंगे, उतने ही अंश में संसार का उपकार करते चलेंगे।

अपना सुधार न कर परोपकार कार्यों में लगना एक विडम्बना मात्र ही सिद्ध होगा। अतएव आवश्यक है कि परोपकार का पुण्य पाने के लिए अपने सुधार, आत्मोपकार पर भी ध्यान दिया जाय। संसार का उपकार करने का सबसे सरल और सुगम तरीका आत्मोद्धार ही है। इसकी ओर ध्यान न देने वाले से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि उसका किया उपकार निःस्वार्थ और निष्कलंक होगा। न चाहते हुए भी निम्न प्रवृत्तियों के व्यक्तियों के परोपकार कार्यों में निकृष्ट स्वार्थ के समावेश हो जाने का भय बना रहता है।

अपने जीवन को सार्थक बनाने की दृष्टि से भी और विश्व हित साधन की दृष्टि से भी हमें सबसे पहले अपने व्यक्तित्व को निर्दोष व निष्कलंक बनाना चाहिये। हमारा व्यक्तित्व जितना उज्ज्वल और उन्नत बनता जायेगा, उसी अनुपात से हममें अंतर्ज्योति का तो जागरण होगा ही साथ साथ ही उतने अंशों में संसार का भी कल्याण होगा और इस प्रकार स्वार्थ में परमार्थ का समन्वय होगा और दोनों पक्ष सधते चलेंगे।


खोटे सिक्के

एक दिन एक साहूकार को शक हुआ उसके खजाने में कहीं खोटे सिक्के तो नहीं आ गये। यह जाँचने के लिये उसने सब सिक्के एक जगह इकट्ठे किये और उनकी पड़ताल शुरू की।

अच्छे सिक्के तिजोरी में और खराब सिक्के एक तरफ पटके जाने लगे तो खोटे सिक्के घबराये। उन्होंने परस्पर विचार किया- ‘‘भाई! अब तो अपने बुरे दिन आ गये, यह साहूकार अवश्य हम लोगों को छाँट-बीन कर तुड़वा डालेगा, कोई युक्ति निकालनी चाहिये जिससे इसकी नजर से बच कर तिजोरी में चले जायें।”

एक खोटा सिक्का बड़ा चालाक था। उसने कहा- ‘‘भाइयो, हम लोग अगर जोर से चमकने लगें, तो यह साहूकार पहचान नहीं पायेगा और अपना काम बन जायेगा।”

बात सबको पसन्द आयी। सब खोटे सिक्के दिखावटी चमकने लगे और सेठ की तिजोरी में पहुँचने लगे। खोटे सिक्कों को अपनी चालाकी पर बहुत अभिमान हुआ।

गिनते-गिनते एक सिक्का नीचे जमीन पर गिर पड़ा। नीचे पत्थर पड़ा था सिक्का उसी से टकराया। साहूकार चौंका- हैं यह क्या, चमक तो अच्छी है पर आवाज कैसी थोथी है। उसे शंका हो गई। दुबारा उसने फिर से सब सिक्के निकाले और पटक-पटक कर उनकी जाँच शुरू की। फिर क्या था असली सिक्के एक तरफ, नकली सिक्के एक तरफ।

खोटों की यह दुर्दशा देख कर एक नन्हा सा असली सिक्का हँसा और बोला- ‘‘मेरे प्यारे खोटे सिक्को! दिखावट और बनावट थोड़े समय चल सकती है, खोटाई अन्ततः इसी तरह प्रकट हो जाती है। कोई भी मनुष्य अपनी कमजोरी नहीं छिपा सकता।


सेवा विहीन जीवन-निन्दनीय

सेवा का मानव-जीवन में बहुत महत्व है। सेवा और सहयोग के आधार पर ही संसार का विकास और प्रगति हुई है और उसी आधार पर वह टिका हुआ है। यदि मानव-समाज से सेवा और सहयोग की प्रवृत्तियाँ सर्वथा समाप्त हो जांय, तो संसार की गतिविधि ही सहसा रुक जाये। एक अव्यवस्था और अराजकता जैसी स्थिति पैदा हो जाये।

मानव-समाज में जब-जब और जहाँ-जहाँ पारस्परिक सेवा, सद्भावना और सहयोग का ह्रास होता है, वहाँ उसका स्थान स्वार्थ और शोषण ले लेता है, जिसके परिणाम स्वरूप संघर्ष प्रारम्भ हो जाता है। लड़ाई, झगड़े और युद्ध शुरू हो जाते हैं। जब तक वह अवाँछनीय स्थिति बनी रहती है, मनुष्य की सामाजिक, आर्थिक, मानसिक और आत्मिक प्रगति रुकी रहती है। वह प्रस्तुत संघर्ष में ही एकाग्र होकर लगा रहता है। इस स्थिति से मानव-समाज की अपार क्षति होती है। ऐसी क्षति कि प्रायः जिसकी पूर्ति ही नहीं हो पाती।

युद्ध के समय बहुत से लोग मारे जाते हैं। कौन कह सकता है कि उन मरने वालों में बहुत से ऐसे लोग नहीं मर जाते होंगे, जो यदि उनको जीने का अवसर मिलता तो वैज्ञानिक, कलाकार, कवि, विद्वान, समाज-सेवी, सन्त और महात्मा होते। हजारों लाखों विधवाओं, अनाथों और बेसहारों की संख्या बढ़ जाती है। अभाव और अपूर्ति का भयंकर नर्तन होने लगता है, जिसमें पीढ़ियाँ, परिवार, राष्ट्र और समाज तक पिसने लगते हैं। ऐसे संघर्षों ने पृथ्वी पर से न जाने ऐसे कितने देश, कितने समाज और कितने राष्ट्र नाम शेष कर दिए, जिनका एक अस्तित्व था और अपना महत्व भी। किंतु यह सब होता कब है, जब संसार में सेवा और सहयोग की प्रवृत्तियाँ नष्ट होने लगती हैं। मानव-जीवन में सेवा का बहुत बड़ा महत्व है। जहाँ तक सम्भव हो इसको बनाये और बढ़ाये रखने का यथासाध्य प्रयत्न करते ही रहना चाहिये।

वह समाज अधिक समाज तक जीवित नहीं रह सकता, जिसके सदस्यों के बीच परस्पर सेवा, सहयोग की परमार्थ-परक प्रवृत्तियाँ न चलती रहें। परमार्थ परक सेवा ही मानव-जाति की सुरक्षा, विकास और शाँति का साधन है। सेवा-भावना के वरदान से व्यक्ति के अन्तःकरण से अहंजन्य ‘मैं’ का स्वार्थ-भाव निकल जाता है और व्यक्ति भी संकीर्ण परिधि से निकल कर व्यष्टि की व्यापकता में आ जाता है। उसका अपने प्रति सम्बोधन ‘मैं’ के स्थान पर ‘हम’ हो जाता है।

समाज में ऐसे सदस्यों की संख्या भी कम नहीं होती, जो रोगी, अपंग, अपाहिज, वृद्ध और वे सहारा होते हैं। उनमें अपने निर्वाह की शक्ति नहीं होती। दूसरों की सेवा सहायता की उन्हें अपेक्षा होती है। समाज के ऐसे दयनीय सदस्यों का गुजारा दूसरों के सहारे ही होता है। यदि समाज में पर-सेवा की भावना का सर्वथा अभाव हो तो ऐसे असमर्थ लोगों की क्या दशा हो जाये, इसकी कल्पना से ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं। ऐसे असहाय व्यक्ति बेचारे स्थान-स्थान पर रोते, कलपते पड़े रहें, एक ग्रास भोजन और थोड़े से वस्त्र के अभाव में अकाल में ही काल के गाल में पहुँचते रहें और जब तक जीवित रहें अपनी स्थिति को समाज के लिए अभिशाप बना दें।

ऐसे अपंग और अपाहिज व्यक्ति समाज में जो कुछ सुखी-दुःख जीवन काट पाते हैं, वह केवल दयावान सज्जनों की सेवा प्रवृत्ति के सहारे ही काट पाते हैं। ऐसे अनाथ और असहायों की आत्मा को नारकीय मौत से बचाने वालों का बड़ा दूरगामी पुण्य होता है। इसलिये दया को धर्म का मूल और अहंकार अर्थात् संकीर्ण ‘स्व’ को पाप का मूल घोषित किया गया है।

परमार्थवादी समाज में कोई व्यक्ति अपना पृथक अस्तित्व नहीं मानता। वह अपने को समाज का ही एक अंग मानता है, उसी आधार पर सोचता और काम करता है। परमार्थवादी समाज की एक विशेषता यह होती है कि उसका हर सदस्य हर काम को समाज-सेवा की भावना से करता है और उसके लिये अपनी शक्ति, योग्यता और क्षमता का कोई अंश बचा नहीं रहता। जिस समाज के सदस्य इस भावना और प्रेरणा वाले होंगे, उस समाज की दिन-प्रति-दिन उन्नति होना स्वाभाविक ही है। जिन समाजों को उन्नति और विकास की दिशा में प्रगति करते देखा जाये, उनके विषय में निर्विवाद रूप से यह घोषित किया जा सकता है कि उक्त समाज का जीवन दर्शन कुछ भी हो पर वह व्यवहारतः एक परमार्थवादी समाज है। उसके सदस्य सेवा और सहयोग के महत्व को केवल जानते ही नहीं बल्कि अपने जीवन में उस पुण्य परमार्थ को चरितार्थ भी करते हैं।

समाज की प्रगति का अर्थ केवल समाज की प्रगति ही नहीं होता है। समाज की प्रगति में व्यक्ति की प्रगति का भाव तो स्वभावतः अन्तर्हित ही रहता है। व्यक्ति की प्रगति समाज की प्रगति और समाज की प्रगति व्यक्ति की प्रगति होती है। यह बात ठीक हे कि यदि व्यक्ति-व्यक्ति अपनी प्रगति और उन्नति करता चले तो समाज की प्रगति तो आपसे आप ही होती चलेगी। किन्तु इसमें व्यक्ति के स्वार्थ परायण हो जाने की आशंका बनी रहती है, इसीलिये समाज की प्रगति के माध्यम से व्यक्ति की प्रगति को महत्वपूर्ण माना गया है। व्यक्ति समाज-सेवा की भावना से सब काम करता चले तो उसकी प्रगति भी आपसे आप ही होती जायेगी।

समाज-सेवा की भावना से काम करने वाले लोगों का मानसिक विकास बड़ी तीव्रता से होता है। ऐसा सेवाभावी व्यक्ति समाज के प्रति अपना उत्तरदायित्व अनुभव करता है और तब उसी के अनुसार अपना महत्व भी समझने लगता है। उसे अपना उत्तरादयित्व और कर्तव्य भार को वहन करने में बड़ी प्रसन्नता तथा उत्साह भी होता है। उसे इस भाव से बड़ा आत्मिक सुख और सन्तोष होता है कि वह समाज की सुरक्षा, विकास और शाँति व्यवस्था में हाथ बटाने का गौरवशाली काम कर रहा है। समाज-सेवा में आत्म-कल्याण की बड़ी सुनिश्चित सम्भावनायें निहित रहती हैं।

मानव-जीवन के लिए सेवा का बहुत महत्व है। यह बात ठीक है। किन्तु किस सेवा का महत्व है यह भी समझ लेना बहुत आवश्यक है। महत्व उन्हीं सेवाओं का है जो सर्वथा निःस्वार्थ तथा परमार्थपरक हों। कार, रोजगार, नौकरी, परिश्रम आदि जो कि मात्र जीविका और जीवन निर्वाह के लिये किया जाता है, वह पारमार्थिक सेवा नहीं है। जिनका मानव-जीवन के लिये अलग से महत्व हो, वे सेवायें निश्चित रूप से वही होती हैं, जो निज की आवश्यकताओं से अलग निःस्वार्थ भाव से बिना किसी लोभ, लाभ तथा आशा रखे की जाती है। और जिनमें केवल पर हित और परोपकार का भाव निहित रहता है। ऐसी सेवाओं का मूलाधार, दया, सहानुभूति, सम्वेदना, सहयोग, सामाजिकता आदि सद्गुण ही होते हैं।

केवल स्थूल लाभ ही नहीं, जिन सेवाओं के साथ बड़प्पन, प्रतिष्ठा और श्रेय का भाव भी जोड़ दिया जायेगा। वे भी अपने पारमार्थिक स्तर से गिर जायेंगी, फिर चाहे मनुष्य ने उसके लिये कितना ही अलाभ कर त्याग किया हो, कष्ट उठाया हो और विनम्रता का प्रदर्शन किया हो। पद प्रतिष्ठा तथा श्रेय की आकाँक्षा भी स्थूल लाभ के लोभ के समान सेवा के परमार्थ तत्व को दूषित कर देती है। मानव-जीवन में जिस सेवा के महत्व का प्रतिपादन किया गया है, वह न केवल स्वार्थ से ही मुक्त हो अपितु स्पृहा से भी रहित होनी चाहिये।

जन-सेवा तथा पद प्रतिष्ठा की भावना में परस्पर विपरीतता होती है। एक, एक छोर की वार्ता है, तो दूसरी दूसरे छोर की। इनमें परस्पर न तो कोई संगति है और न यह दोनों बातें समानान्तर गति से साथ-साथ चल सकती है। समाज-सेवा का पारमार्थिक सुख चाहने वाले को समझ लेना चाहिये कि सेवक का स्थान संसार में सबसे नीचा होता है। उसका स्थान जनता-जनार्दन के पैरों के नीचे है। जन-सेवक को पद प्रतिष्ठा, प्रशंसा और अहंकार की सारी स्पृहाओं तथा भावनाओं को त्यागना होगा, तभी वह अपनी सेवाओं से उस आत्मिक संतोष की अपेक्षा कर सकता है, जो कि मानव-जीवन का अभीष्ट लक्ष्य है। सेवा के साथ प्रशंसा तथा प्रदर्शन की कोई संगति नहीं- इस तथ्य का समर्थन महात्मा गाँधी के एक इस छोटे से संस्मरण से पूरी तरह हो जाता है-

“एक बार एक संन्यासी बापू के पास आया। बापू ने पूछा- ‘‘अपने यहाँ आने का कष्ट किस मन्तव्य से किया है।” संन्यासी बोले- ‘‘जन-सेवा करने के लिये।” बापू ने कहा- ‘‘यदि आपको जनता की सेवा करनी है, तो अपने ये गेरुये वस्त्र उतार दो नहीं तो लोग महात्मा समझ कर उल्टी आपकी सेवा करने लगेंगे।”

जन-सेवा में जिसका हृदय जितना अधिक, निःस्वार्थ, निस्पृह, निरहंकार, दयालु और संवेदनशील होगा, वह उतना ही बड़ा और सफल लोक-सेवक होगा। इन गुणों के अभाव में कोई क्यों न अपनी पूरी जिन्दगी ही सामाजिक मंच पर बिता दे, लोक-सेवा का न तो श्रेय पा सकता है और न सुख। उसका सारा जीवन यों ही प्रदर्शन और अपना पद खोजने में निकल जायेगा। निहित स्वार्थ के साथ लोक-सेवा में समय बरबाद करने वालों को न तो निर्दोष अर्थ प्राप्त हो पाता है और न परमार्थ। उनका जीवन रीता और अन्तःकरण कुण्ठित बना रहता है। ऐसे निहित स्वार्थ वाले जन-सेवी इस संसार से सुख और शाँति के साथ नहीं ग्लानि और पश्चाताप के साथ विदा होते हैं।

मानव-जीवन में जन-सेवा का एक विशेष महत्व है। उससे व्यक्ति और समष्टि दोनों का कल्याण होता है। किन्तु ऐसी सेवा जीवन निर्वाह के कार्यों से दया, सहानुभूति, संवेदना और सामाजिक भावना पर ही निर्भर होती है और फिर उसमें भी निःस्वार्थ, निस्पृहता एवं निरहंकार की भावना का होना नितान्त आवश्यक है। ऐसी सेवा ही वह पारमार्थिक सेवा है, जिसको मनुष्य को अपने जीवन में स्थान देना ही चाहिये। ऐसी सेवा से उसके लोक और परलोक दोनों बनते और सफल होते हैं।


सेवा, पर निःस्वार्थ

सेवा, पर निःस्वार्थ :-

भगवान्! के दो भक्त थे। एक बड़ा ईमानदार था, दूसरा बेईमान। पहला दिन भर मेहनत से काम करता। न कुछ चुराता और न फालतू समय बरबाद करता। पर शाम को जब भगवान के पास जाता तो अनेकों इच्छायें रखता- ‘‘मुझे घर चाहिए, पत्नी चाहिए, पुत्र चाहिए और चाहिए विपुल धन-सम्पत्ति कि जिससे सुख और सुविधापूर्वक रह सकूँ।”

दूसरा व्यक्ति दिन भर दायें-बायें करता। जहाँ अवसर मिलता कुछ-न-कुछ बचा कर चुपचाप अपनी जेब में रख लेता। जो कुछ मिलता अपने लिए अधिक रख कर दूसरों को कम देता। शाम को भगवान के पास जाता। प्रेम और श्रद्धा से सिर झुकाता और चुपचाप अपने घर लौटा जाता।

बेईमान की उन्नति होती गई। यह देख कर ईमानदार को बड़ी ईर्ष्या हुई। अपने भगवान से शिकायत की- प्रभुवर, मैंने आपकी सेवा इतनी सच्चाई और ईमानदारी से की पर आपने दिया बेईमान को सब कुछ।

भगवान् हँसे और बोले- ‘‘वत्स, बार-बार माँग कर परेशान करने की अपेक्षा तो तुम भी वैसा ही करते तो क्या बुरा था। अपने किये का भरपूर इनाम माँगते रहने पर तुम्हारी सेवा और साधना का महत्व ही क्या रह जाता? आत्म-सन्तोष के रूप में हमारा जो स्नेह और आशीर्वाद तुम्हें मिलता है, क्या उतने से तुम सन्तुष्ट नहीं रह सकते?

भक्त का समाधान हो गया। उसने अनुभव किया- आत्म-सुख और आत्म-शान्ति रूपी ईश्वर अनुग्रह के आगे एक सज्जन के लिए धन वैभव का कोई मूल्य नहीं।


कामनायें, असंगत न होने पायें

गीता में बतलाया गया है कि “कामनाओं से क्रोध का जन्म होता है और क्रोध से बुद्धि नष्ट हो जाती है। बुद्धि के नष्ट होने से मनुष्य मूर्खतापूर्ण अपकर्मों में प्रवृत्त हो जाता है। अपकर्म अशाँति और असन्तोष के कारण होते हैं।’’ यह क्रम स्पष्ट करता है कि अशाँति तथा असंतोष के दुःख का मूल कारण कामनायें ही होती हैं। यदि कामनाओं से छुट्टी पाली जाये तो दुःखों से आप ही आप मुक्ति मिल जाये।

किन्तु एक ओर यह भी माना जाता है कि कामनायें मानवीय प्रगति का आधार हैं। कामनाओं से ही कर्म प्रेरित होते हैं और कर्म मनुष्य को उन्नति की ओर ले जाते हैं। मनुष्य के मन में यदि कामनाओं का जन्म न हो तो मनुष्य जड़ पदार्थों की तरह निकम्मा हो जाये। पशुओं की तरह अप्रगतिशील बना रहे। सृष्टि के पारम्भिक काल में मनुष्य भी अन्य पशुओं की तरह ही एक पशु था। पशुओं की प्रवृत्तियों और जीवन स्थिति में जो जड़ता और अप्रगतिशीलता का दोष था वही मनुष्य की प्रवृत्तियों और जीवन स्थिति में था। पशुओं और मनुष्यों में कोई विशेष अन्तर नहीं था।

किन्तु ज्यों-ज्यों मनुष्य में चेतना और उसके साथ कामनाओं का जन्म होने लगा मनुष्य प्रगति करता हुआ आगे बढ़ने लगा, और बढ़ता-बढ़ता आज वह इस सुन्दर स्थिति में आ गया है। पशु कामनाओं के अभाव में जहाँ पहले थे, वहीं आज भी पड़े हुए हैं। उनमें भी यदि मानव प्राणी की तरह कामनाओं की प्रेरणा होती तो वे भी शायद अपनी आदि स्थिति में कुछ-न-कुछ आगे बढ़ लिये होते।

यह सारा संसार कामना के आधार पर ही बना और विकसित हुआ है। बताया गया है कि पहले केवल शून्य के सिवाय और कुछ नहीं था। एकाकी ईश्वर ही उस पूरे शून्य में परिव्याप्त हुआ स्थित था। अपने एकाकीपन से ऊब कर ईश्वर ने संसार की कामना की और वह बन कर तैयार हो गया। उसके अंश मनुष्यों की नित नूतन कामनायें उसे सँवारने और विकसित करने लगी। कामनाओं का मानव जीवन से बहुत बड़ा सम्बंध है। उनको हेय तथा हानिकर मानने में आपत्ति होती है।

तब आखिर इन विरोधी तथ्यों में सत्य क्या है? अपने स्थान पर ये दोनों तथ्य सत्य तथा मान्य हैं। कामनाओं के आधार पर ही मनुष्य की प्रगति तथा विकास होता है और कामनायें ही उसके दुःख का कारण भी हैं। जो कामनायें सृजनात्मक, शुभ और सामाजिक हित की होती हैं, वे तो मानव-जीवन के विकास की कारण होती हैं, इसके विपरीत जो कामनायें अशुभ, असुन्दर और समाज-विरोधी होती हैं, वे एक मात्र दुःख का कारण बनती हैं।

जिन कामनाओं में केवल अपना स्वार्थ ही समाया रहता है, उनको अशुभ कामनाएँ ही कहना होगा। फिर चाहे वे भोजन, वस्त्र, निवास, उन्नति, विकास और आत्मोद्धार सम्बन्धी ही क्यों न हों। अध्यात्म सम्बन्धी व्यक्तिगत कामनाओं को अशुभ कहने, सुनने में कुछ अटपटा जरूर लग सकता है पर बात सही है।

मानिये एक मनुष्य व्यक्तिगत आत्मोद्धार की कामना रखता है और उसके लिये प्रयत्नरत होकर गृह-त्याग कर देता है, तो क्या उसकी यह कामना उचित कही जा सकती है? यदि इस कामना को उचित कहा जा सकता है, तो फिर उसके गृह त्याग से जो संकट परिवार पर आयेगा उसका दायित्व किस पर होगा? निश्चय ही इसका दायित्व उस पर ही होगा, जो अपना आवश्यक कर्तव्य छोड़ कर व्यक्तिगत उद्धार के लिये चला गया है। कोई भी कामना, कितनी ही ऊँची क्यों न हो, यदि उसकी पूर्ति में किन्हीं ऐसे व्यक्तियों को कष्ट होता है, जिनको नहीं होना चाहिये, तो वे अनुचित हैं, अशुभ हैं। उनका परिणाम दुःख के सिवाय और कुछ नहीं हो सकता है।

बहुत-सी कामनायें ऐसी होती हैं जो समाज विरोधी न होने पर भी दुःखदायी होती हैं। वे कामनायें होती हैं अपनी स्थिति से परे की कामनायें। उदाहरण के लिये किसी ऐसे आदमी को लीजिये जो जीवन में एक उच्चपद पाने की आकाँक्षा रखता है। उसकी यह कामना व्यक्तिगत होते हुए भी अनुचित तथा अशुभ नहीं कहीं जा सकती। क्योंकि उसकी इस कामना से न तो समाज का विरोध होता है और न इससे किन्हीं ऐसे लोगों को कष्ट होगा, जिन्हें नहीं होना चाहिये। बल्कि ऐसी कामनाओं को तो शुभ ही कहा जाना चाहिये। वह इसलिये कि व्यक्तिगत होने पर भी ये समाज के लिए हितकारी होती हैं। व्यक्ति की उन्नति में ही तो समाज की उन्नति निहित रहती है। व्यक्ति, व्यक्ति रूप में उन्नति करते जाने पर भी पूरे समाज की ही उन्नति होती चलती है। व्यक्तियों से ही तो समाज बनता है। व्यक्ति की अच्छाई-बुराई समाज का ही विकास ह्रास होता है। व्यक्ति समाज का ही एक अंग होता है। जैसा स्वयं बनता है, मानो वैसा ही समाज को बनने में सहायक होता है। अस्तु, व्यक्तिगत ऐसी कामनाओं को बुरा नहीं माना जा सकता है।

तथापि व्यक्तिगत विकास की कामनायें भी यदा-कदा अशाँति और असन्तोष का कारण बन बैठती हैं। ऐसी कामनायें, जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है, वे होती हैं जो अपनी स्थिति के परे की होती हैं। कोई व्यक्ति जीवन में एक ऊँचा पद चाहता है। अच्छा है, ठीक है, बड़ा शुभ है। किन्तु क्या उसने इस कामना को पालने से पहले यह देख लिया है कि उसकी आकाँक्षा के अनुरूप उसकी स्थिति भी है? यदि उसने ऐसा नहीं किया है तो निश्चय ही उसकी पोषित कामना उसके लिये अशाँति और असन्तोष का कारण बनेगी। क्योंकि स्थिति की अनुरूपता के अभाव में उसकी पूर्ति सम्भव नहीं। अपूर्ण कामनाओं से दुःख होना स्वाभाविक ही है।

जीवन में कोई ऊँचा पद, केवल यों ही कामना मात्र करने से तो मिल ही नहीं जाता। उसके लिये तो विद्या, बुद्धि, योग्यता, शक्ति और अवसर आदि बहुत से साधनों की आवश्यकता होती है। यदि एक बार यह सब साधन भी हों और पुरुषार्थ, प्रयत्न तथा कर्मठता की कमी रह गई तब भी वह वाँछित पद नहीं मिल सकता, जिसके लिए कामना की जा रही है।

ऐसी दुर्लभ कामनाओं का जन्म भ्रम अथवा भावुकता के कारण हो जाता है और कभी-कभी ईर्ष्या-द्वेष तथा स्पर्धा के कारण भी। कहने-सुनने और कभी-कभी स्वयं भी मनुष्य को अपनी क्षमताओं के प्रति भ्रम हो जाता है, जिसके कारण वह अपनी क्षमताओं को कुछ बढ़ा-चढ़ा कर आँक बैठता है और उसी के आधार पर ऊँची-ऊँची कामनायें भी पाल लेने की भूल कर बैठता है।

भावुकता का प्रवाह भी मनुष्य को अपनी सही शक्तियों को समझने नहीं देता। कल्पना प्रधान होने से उसे बड़ी-बड़ी योजनायें और बड़े-बड़े महल बनाते देर नहीं लगती। किन्तु यथार्थ और कल्पना में तो जमीन आसमान का अन्तर होता है। जो महल कल्पना में बनते विलम्ब नहीं लगता, उनकी मूर्तिमत्ता में पूरा जीवन तक लग जाता और कभी-कभी वे पूरे नहीं हो पाते। इस प्रकार की कल्पना-जन्य आकाँक्षाएँ, अशाँति और असन्तोष के सिवाय मनुष्य को कुछ भी नहीं दे सकती हैं।

बहुत बार अनेक लोग, यद्यपि उनमें मौलिक महत्वाकाँक्षा नहीं होती तथापि दूसरों के प्रति ईर्ष्या और स्पर्धा के वशीभूत होकर महत्वाकाँक्षी बन बैठने की भूल कर जाते हैं। अमुक व्यक्ति ने ऐसा काम कर लिया है, इतनी उन्नति पर पहुँच गया है, मुझे भी ऐसा बनना चाहिये। यदि मैं ऐसा नहीं बनता तो उससे हेठा रह जाऊँगा- इसी प्रकार के निरर्थक विचार-विकार के आधार पर आकाँक्षाएँ पाल लेने का अर्थ होता है, अपने लिए अशाँति और असंतोष का प्रबन्ध कर लेना।

ईर्ष्या, द्वेष का आधार तो निकृष्ट होता ही है, स्पर्धावश और देखा-देखी भी आकाँक्षाओं का ताना-बाना बुन लेना ठीक नहीं। कोई व्यक्ति जो कुछ बना है, अपनी मौलिक प्रवृत्तियों और शक्ति क्षमताओं के आधार पर बना है। अब यह जरूरी नहीं कि किसी दूसरे की प्रवृत्तियाँ, शक्तियाँ और परिस्थितियाँ भी वैसी ही हों। यदि ऐसा है तो निश्चय ही उसकी स्पर्धा परास्त होगी, आकाँक्षा, आकाँक्षा ही रह कर उसके हृदय में शाँत ही रहेगी।

जीवन में यदि अशाँति और असंतोष से बचना है और सुख-शाँति में सरल स्निग्ध जीवन चलाना है, तो कामनाओं, आकाँक्षाओं के सम्बन्ध में बड़ा सतर्क और सावधान रहना होगा। वह सावधानी यह है कि हृदय में जन्म ने और पलने वाली कामनाओं का सम्पादन करते रहिये। जो कामनाएँ केवल स्वार्थमयी और समाज-विरोधी हैं, उन्हें काट कर वैसे ही फेंक दीजिये जैसे चतुर माली क्यारी में से बेकार की वनस्पति काट कर फेंक देता है। केवल वे ही कामनाएँ रखिये, जो अपनी उन्नति के साथ-साथ सामाजिक गति से भी सामंजस्य रखती हों।

कामनाओं के विषय में कल्पना और भावुकता की प्रेरणा से बचें रहिये। मनुष्य के ये दोनों विकार उसे यथार्थ से हटा कर स्वप्न-लोक में भटका देते हैं, जहाँ जाकर वह अपनी यथार्थ शक्ति, क्षमता और परिस्थिति के विषय में बहुमूल्यन करने की भूल कर बैठता है। प्रश्रय केवल उन्हीं कामनाओं को दीजिये, जो अपनी स्थिति, क्षमता और सम्बन्धित स्रोतों से मेल खाती हों। अपनी सीमा से बाहर की महत्वाकाँक्षाओं से शत्रु की तरह बचते रहना चाहिये। अपनी मौलिक प्रवृत्तियों के आधार पर ही अपनी कामनाओं का सृजन करना ठीक होगा, देखा-देखी अथवा संघर्ष से प्रेरित होकर दूसरों की तरह आकाँक्षाएँ पाल लेना गलत नीति है।

कामनाएँ उन्नति और प्रगति की प्रेरक हैं अवश्य किन्तु वे ही जो हमारे अनुरूप हों और हम स्वयं जिनके अनुरूप हों। असंगत और अयुक्त कामनाएँ अशाँति और असंतोष की जननी होती हैं। ऐसी ही कामनाओं को शास्त्रों में निषेध करते हुए क्रोध अर्थात् क्षोभ का हेतु और उसी क्रम में अशाँति एवं असन्तोष का कारण बतलाया गया है।


धूल का धूल

धूल का धूल :-

कौशाम्बी राज्य में एक बार भयंकर अकाल पड़ा। लोग दाने-दाने के लिए मोहताज हो गये। अनाज के भाव आसमान चूमने लगे। निर्धनों की मृत्यु का ताँता बँध गया। नगर-के-नगर और गाँव-के-गाँव खाली हो गये।

इसी नगर में चम्पक नाम का एक ईमानदार मजदूर रहता था। उसकी धर्म-पत्नी हव्या भी बड़ी ईमानदार और पति पारायण थी। वे दिन भर कड़ी मेहनत करते शाम को जो कुछ मिलता बच्चों को खिला देते और आप भूखे सो जाते।

पर कुछ दिन में उन्हें भी अन्न का मिलना बन्द हो गया। दोनों बच्चे अकाल देवता की भेंट चढ़ गये। एक दिन भूखा-प्यासा चम्पक हव्या के साथ घर लौटा रहा था। उसने रास्ते में सोने का एक कड़ा पड़ा हुआ देखा। पत्नी को कहीं उसका मोह न जाग पड़े इसलिये उसने उस कड़े के ऊपर धूल डाल दी।

हव्या अभिप्राय समझ गई उसने कहा- ‘‘स्वामी! नाहक धूल डाल रहे हैं, आप इतने निर्लोभ हैं, तो आपकी हव्या क्या आपके आदर्श से डिग सकती है।”

भगवान इन्द्र मजदूरों की इस ईमानदारी से अति प्रसन्न हुये। उन्होंने कहा- ‘‘जहाँ ऐसे कर्मठ और ईमानदार लोग रहते हों, वहाँ अकाल नहीं रह सकता। उस रात खूब जल वृष्टि हुई और अकाल दूर हो गया।”


विचार शक्ति ही सर्वोपरि है।

शारीरिक, सामाजिक, राजनीतिक और सैनिक संसार में बहुत प्रकार की शक्तियाँ विद्यमान हैं। किन्तु इन सब शक्तियों से भी बढ़ कर एक शक्ति है, जिसे विचार-शक्ति कहते हैं। विचार-शक्ति सर्वोपरि है।

उसका एक मोटा-सा कारण तो यह है कि विचार-शक्ति निराकार और सूक्ष्मातिसूक्ष्म होती है और अन्य शक्तियाँ स्थूलतर। स्थूल की अपेक्षा सूक्ष्म में अनेक गुना शक्ति अधिक होती है। पानी की अपेक्षा वाष्प और उससे उत्पन्न होने वाली बिजली बहुत शक्तिशाली होती है। जो वस्तु स्थूल से सूक्ष्म की ओर जितनी बढ़ती जाती है, उसकी शक्ति भी उसी अनुपात से बढ़ती जाती है।

मनुष्य जब स्थूल शरीर से सूक्ष्म, सूक्ष्म से कारण शरीर की और कारण शरीर से आत्मा और आत्म से परमात्मा की ओर ज्यों-ज्यों बढ़ता है, उसकी शक्ति की उत्तरोत्तर वृद्धि होती जाती है, और यहाँ तक कि अन्तिम कोटि में पहुँच कर वह सर्वशक्तिमान बन जाता है। विचार सूक्ष्म होने के कारण संसार के अन्य किसी भी साधन से अधिक शक्तिशाली होते हैं। उदाहरण के लिये हम विभिन्न धर्मों के पौराणिक आख्यानों की ओर जा सकते हैं।

बहुत बार किसी ऋषि, मुनि और महात्मा ने अपने शाप और वरदान द्वारा अनेक मनुष्यों का जीवन बदल दिया। ईसाई धर्म के प्रवर्तक ईसा-मसीह के विषय में प्रसिद्ध है कि उन्होंने न जाने कितने अपंगों, रोगियों और मरणासन्न व्यक्तियों को पूरी तरह केवल आशीर्वाद देकर ही भला-चंगा कर दिया। विश्वामित्र ऐसे ऋषियों ने अपनी विचार एवं संकल्प शक्ति से दूसरे संसार की ही रचना प्रारम्भ कर दी थी। और तो और इस विश्व ब्रह्माण्ड की, जिसमें हम रह रहें हैं, रचना भी ईश्वर के विचार स्फुरण का ही परिणाम है।

ईश्वर के मन में ‘एकोहम् बहुस्यामि’ का विचार आते ही यह सारी जड़ चेतनमय सृष्टि बन कर तैयार हो गई, और आज भी वह उसकी विचार धारणा के आधार पर ही स्थिति है और प्रलयकाल में भी विचार निर्धारण के आधार पर ही उसी ईश्वर में लीन हो जायेगी। विचारों सृजनात्मक और ध्वंसात्मक दोनों प्रकार की अपूर्व, सर्वोपरि और अनन्त शक्ति होती है। जो इस रहस्य को जान जाता है, वह मानो जीवन के एक गहरे रहस्य को प्राप्त कर लेता है। विचारणाओं का चयन करना स्थूल मनुष्य की सबसे बड़ी बुद्धिमानी है। उनकी पहचान के साथ जिसको उसके प्रयोग की विधि विदित हो जाती है, वह संसार का कोई भी अभीष्ट सरलतापूर्वक पा सकता है।

संसार की प्रायः सभी शक्तियाँ जड़ होती हैं, विचार-शक्ति, चेतन-शक्ति है। उदाहरण के लिए धन अथवा जन-शक्ति ले लीजिये। अपार धन उपस्थित हो किन्तु समुचित प्रयोग करने वाला कोई विचारवान व्यक्ति न हो तो उस धनराशि से कोई भी काम नहीं किया जा सकता। जन-शक्ति और सैनिक-शक्ति अपने आप में कुछ भी नहीं है। जब कोई विचारवान नेता अथवा नायक उसकी ठीक से नियन्त्रण और अनुशासन कर उसे उचित दिशा में लगाता है, तभी वह कुछ उपयोगी हो पाती अन्यथा वह सारी शक्ति भेड़ों के गल्ले के समान निरर्थक रहती है, शासन प्रशासन और व्यावसायिक सारे काम एक मात्र विचार द्वारा ही नियन्त्रित और संचालित होते हैं। भौतिक क्षेत्र में ही नहीं उससे आगे बढ़ कर आत्मिक और आध्यात्मिक क्षेत्र में भी एक विचार-शक्ति ही ऐसी है, जो काम आती है। न शारीरिक और न साम्पत्तिक कोई अन्ध-शक्ति काम नहीं आती। इस प्रकार जीवन तथा जीवन के हर क्षेत्र में केवल विचार-शक्ति का ही साम्राज्य रहता है।

किन्तु मनुष्य की सभी मानसिक तथा बौद्धिक स्फुरणायें विचार ही नहीं होते। उनमें से कुछ विचार और कुछ मनोविकार तथा बौद्धिक विलास ही होता है। दुष्टता, अपराध तथा ईर्ष्या-द्वेष के मनोभाव, विकार तथा मनोरंजन, हास-विलास तथा क्रीड़ा आदि की स्फुरणाएँ बौद्धिक विलास मानी गई हैं। केवल मानसिक स्फुरणाएँ वही विचारणीय होती हैं, जिनके पीछे किसी सृजन, किसी उपकार अथवा किसी उन्नति की प्रेरणा क्रियाशील रहती है। साधारण तथा सामान्य गतिविधि के संकल्प-विकल्प अथवा मानसिक प्रेरणायें विचार की कोटि में नहीं आती हैं। वे तो मनुष्य की स्वाभाविक वृत्तियाँ होती हैं, जो मस्तिष्क में निरन्तर आती जाती रहती हैं।

यों तो सामान्यतया विचारों में कोई विशेष स्थायित्व नहीं होता है। वे जल-तरंगों की भाँति मानस में उठते और विलीन होते रहते हैं। दिन में न जाने कितने विचार मानव-मस्तिष्क में उठते और मिटते रहते हैं। चेतन होने के कारण मानव मस्तिष्क की यह प्राकृतिक प्रक्रिया है। विचार वे ही स्थायी बनते हैं, जिनसे मनुष्य का रागात्मक सम्बन्ध हो जाता है। बहुत से विचारों में से एक दो विचार ऐसे होते हैं, जो मनुष्य को सबसे ज्यादा प्यारे होते हैं। वह उन्हें छोड़ने की बात तो दूर उनको छोड़ने की कल्पना तक नहीं कर सकता।

यही नहीं, किसी विचार तथा विचारों के प्रति मनुष्य का रागात्मक झुकाव विचार का न केवल स्थायी अपितु अधिक प्रखर तथा तेजस्वी बना देता है। इन विचारों की छाप मनुष्य के व्यक्तित्व तथा कर्तृत्व पर गहराई के साथ पड़ती है। रागात्मक विचार निरन्तर मथित अथवा चिन्तित होकर इतने दृढ़ और अपरिवर्तनशील हो जाते हैं कि वे मनुष्य के विशेष व्यक्तित्व के अभिन्न अंग की भाँति दूर से ही झलकने लगते हैं। प्रत्येक विचार जो इस सम्बन्ध से संस्कार बन जाता है, वह उसकी क्रियाओं में अनायास ही अभिव्यक्त होने लगता है।

अतएव आवश्यक है कि किसी विचार से रागात्मक सम्बन्ध स्थापित करने से पूर्व इस बात की पूरी परख कर लेनी चाहिये कि जिसे हम विचार समझ कर अपने व्यक्तित्व का अंग बनाये ले रहे हैं, वह वास्तव में विचार है भी या नहीं? कहीं ऐसा न हो कि वह आपका कोई मनोविकार हो और तब आपका व्यक्तित्व उसके कारण दोषपूर्ण बन गये। प्रत्येक शुभ तथा सृजनात्मक विचार व्यक्तित्व को उभारने और विकसित करने वाला होता है और प्रत्येक अशुभ और ध्वंसात्मक विचार मनुष्य का जीवन गिरा देने वाला होता है।

विचार का चरित्र से घनिष्ठ सम्बन्ध होता है। जिसके विचार जिस स्तर के होंगे, उसका चरित्र भी उसी कोटि का होगा। जिसके विचार क्रोध प्रधान होंगे वह चरित्र से भी लड़ाकू और झगड़ालू होगा, जिसके विचार कामुक और स्त्रैण होंगे, उसका चरित्र वासनाओं और विषय-भोग का जीती जागती तस्वीर ही मिलेगा। विचारों के अनुरूप ही चरित्र का निर्माण होता है। यह प्रकृति का अटल नियम है। चरित्र मनुष्य की सबसे मूल्यवान सम्पत्ति है। उससे ही सम्मान, प्रतिष्ठा, विश्वास और श्रद्धा की प्राप्ति होती है। वही मानसिक और शारीरिक शक्ति का मूल आधार है। चरित्र की उच्चता ही उच्च जीवन का मार्ग निर्धारित करती है और उस पर चल सकने की क्षमता दिया करती है।

निम्नाचरण के व्यक्ति समाज में नीची दृष्टि से ही देखे जाते हैं। उनकी गतिविधि अधिकतर समाज विरोधी ही रहती है। अनुशासन और मर्यादा जो कि वैयक्तिक से लेकर राष्ट्रीय-जीवन तक ही दृढ़ता की आधार शिला है, निम्नाचरण व्यक्ति से कोई संबंध नहीं रखती है। आचरण हीन व्यक्ति और एक साधारण पशु के जीवन में कोई विशेष अन्तर नहीं होता। जिसने अपनी यह बहुमूल्य सम्पत्ति खोदी उसने मानो सब कुछ खो दिया, सब कुछ पा लेने पर भी चरित्र का अभाव मनुष्य को आजीवन दरिद्री ही बनाये रखता है।

मनुष्यों से भरी इस दुनियाँ में अधिकाँश संख्या ऐसों की ही है, जिन्हें एक तरह से अर्ध मनुष्य ही कहा जा सकता। वे कुछ ही प्रवृत्तियों और कार्यों में पशुओं से भिन्न होते हैं, अन्यथा वे एक प्रकार से मानव-पशु ही होते हैं। इसके विपरीत कुछ मनुष्य बड़े ही सभ्य, शिष्ट और शालीन होते हैं। उनकी दुनिया सुन्दर और कला-प्रिय होती है। इसके आगे भी मनुष्यों की एक श्रेणी चली गई है, जिनको महापुरुष, ऋषि-मुनि और देवता कह सकते हैं। समान हाथ-पैर और मुँह, नाक, कान के होते हुए भी और एक संसार में, एक ही वातावरण में रहते हुए, मनुष्यों में यह अन्तर क्यों दिखलाई देता है। इसका आधारभूत कारण विचार ही माने गये हैं। जिस मनुष्य के विचार जिस अनुपात में जितने अधिक विकसित होते चले जाते हैं, उसका स्तर पशुता से उसी अनुपात से श्रेष्ठता की ओर उठता चला जाता है। असुरत्व, पशुत्व, ऋषित्व अथवा देवत्व और कुछ नहीं, विचारों के ही स्तरों के नाम हैं। यह विचार-शक्ति ही है, जो मनुष्य को मनुष्य से देवता और राक्षस बना सकती है।

संसार में उन्नति करने के लिये धन, अवसर आदि बहुत से साधन माने जाते हैं। किन्तु एक विचार-साधन ऐसा है, जिसके द्वारा बिना किसी व्यय के मनुष्य अनायास ही उन्नति करता जा सकता है। मनुष्य के विचार परमार्थ-परक, परोपकारी और सेवापूर्ण हों तो समाज में उसे उन्नति करने के लिये किन्हीं अन्य साधनों की आवश्यकता नहीं रहती। विचारों द्वारा मनुष्य बहुत बड़े समुदाय को प्रभावित कर अपने अनुकूल कर सकता है। साधनापूर्ण व्यक्तियों को अपनी ओर आकर्षित कर सकता है। विचारों की विशालता मनुष्य को विशाल और उनकी निकृष्टता निकृष्ट बना देती है। विचार संपत्ति से भरे-पूरे व्यक्तित्व को उन्नति करने के लिये किन्हीं अन्य उपकरणों, उपादानों और साधनों की अपेक्षा नहीं रहती। अकेले विचारों के बल पर ही वह जितनी चाहे उन्नति करता जा सकता है।

मन और मस्तिष्क, जो मानव-शक्ति के अनन्त स्रोत माने जाते हैं और जो वास्तव में है भी, उनका प्रशिक्षण विचारों द्वारा ही होता है। विचारों की धारणा और उनका निरन्तर मनन करते रहना मस्तिष्क का प्रशिक्षण कहा गया है। उदाहरण के लिये जब कोई व्यक्ति अपने मस्तिष्क में कोई विचार रख कर उसका निरन्तर चिन्तन एवं मनन करता रहता है, वे विचार अपने अनुरूप मस्तिष्क में रेखायें बना देते हैं, ऐसी प्रणालियाँ तैयार कर दिया करते हैं कि मस्तिष्क की गति उन्हीं प्रणालियों के बीच ही उसी प्रकार बंध कर चलती है, जिस प्रकार नदी की धार अपने दोनों कूलों से मर्यादित होकर। यदि दूषित विचारों को लेकर मस्तिष्क में मन्थन किया जायेगा, तो मस्तिष्क की धारायें दूषित हो जायेगी, उनकी दिशा विकारों की ओर निश्चित हो जायेगी और उसकी गति दोषों के सिवाय गुणों की ओर न जा सकेगी। इसी प्रकार जो बुद्धिमान मस्तिष्क में परोपकारी और परमार्थी विचारों का मनन करता रहता है, उसका मस्तिष्क परोपकारी और परमार्थी बन जाता है और उसकी धारायें निरंतर कल्याणकारी दिशा में ही चलती रहती हैं।

इस प्रकार इस में कोई संशय नहीं रह जाता कि विचारों की शक्ति अपार है, विचार ही संसार की धारणा के आधार और मनुष्य के उत्थान-पतन के कारण होते हैं। विचारों द्वारा प्रशिक्षण देकर मस्तिष्क को किसी ओर मोड़ा और लगाया जा सकता है। अस्तु बुद्धिमानी इसी में है कि मनुष्य मनोविकारों और बौद्धिक स्फुरणाओं में से वास्तविक विचार चुन ले और निरन्तर उनका चिन्तन एवं मनन करते हुए, मस्तिष्क का परिष्कार कर डाले। इस अभ्यास से कोई भी कितना ही बुद्धिमान, परोपकारी, परमार्थी और मुनि, मानव या देवता का विस्तार पा सकता है।


Quotation

मेरे बच्चो! आज मैं तुम्हें एक बहुत बड़ा सन्देश देने खड़ा हुआ हूँ और वह यह है कि तुम कभी किसी अनीति एवं अविवेक-युक्त मान्यता या परम्परा को अपनाने की बौद्धिक पराधीनता को स्वीकार न करना। सम्भव है इस संघर्ष में तुम अकेले पड़ जाओ, तुम्हें साथ देने वाले लोग अपने हाथ सिकोड़ लें, पर तो भी तुम साहस न हारना। तुम्हारे दो हाथ सौ हाथ के बराबर हैं, इन्हें तान कर खड़े हो जाओगे तो बहुमत द्वारा समर्थित होते हुए भी कोई मूढ़ता तुम्हें झुकने के लिए विवश न कर सकेगी। जब तक तुम्हारी देह में प्राण शेष रहे, सत्य के समर्थन और विवेक के अनुमोदन का तुम्हारा स्वाभिमान न गले, यही अन्त में तुम्हारे गौरव का आधार बनेगा।

-स्वामी विवेकानन्द


दोष-दृष्टि को सुधारना ही चाहिए

क्या कभी अपने यह सोचा कि आप पग-पग पर खिन्न, असंतुष्ट, उद्विग्न अथवा उत्तेजित क्यों रहते हैं? क्यों आपको समाज, संसार मनुष्यों, मित्रों, वस्तुओं, परिस्थितियों यहाँ तक अपने से भी शिकायत रहती है? आप सब कुछ करते, बरतते और भोगते हुए भी वह मजा, आनन्द और प्रसन्नता नहीं पाते, जो मिलनी चाहिये और संसार के अन्य असंख्यों लोग पा रहे हैं। आप विचारक, आलोचक, शिक्षित, और सभ्य भी हैं, किन्तु आपकी यह विशेषता भी आपको प्रसन्न नहीं कर पाती। स्त्री-बच्चे, घर, मकान सब कुछ आपको उपलब्ध है। फिर भी आप अपने अन्दर एक अभाव और एक असंतोष अनुभव ही करते रहते हैं। घर, बाहर, मेले-ठेले, सफर, यात्रा, सभा-समितियों, भाषणों, वक्तव्यों- किसी में भी कुछ मजा ही नहीं आता। हर समय एक नाराजी, नापसन्दी एवं नकारात्मक ध्वनि परेशान ही रखती है। संसार की किसी भी बात, वस्तु और व्यक्ति से आपका तादात्म्य ही स्थापित हो पाता है।

साथ ही आप पूर्ण स्वस्थ हैं। मस्तिष्क का कोई विकार आपमें नहीं है। आपका अन्तःकरण भी सामान्य दशा में है और आस-पास में ऐसी कोई घटना भी नहीं घटी है, जिससे आपकी अभिरुचिता एवं प्रसादत्व विक्षत हो गया हो। ऐसा भी नहीं हुआ कि विगत दिनों में ही किसी ऐसे अप्रिय संयोग से सामंजस्य स्थापित करना है, जिसकी अनुभूति आज भी आपको विषाण बनाये हुए हैं।

वास्तव में बात बड़ी ही विचित्र और अबूझ-सी मालूम होती है। जब प्रत्यक्ष में इस स्थायी अप्रियता का कोई कारण नहीं दिख पड़ा, फिर ऐसा कौन-सा चोर, कौन-सा ठग आपके पीछे अप्रत्यक्ष रूप से लगा हुआ है, जो हर बात के आनन्द से आपको वंचित किए हुये आपके जन्म-सिद्ध अधिकार प्रसन्नता का अपहरण कर लिया करता है। इसको खोजिये, गिरफ्तार करिये और अपने पास से मार भगाइये। जीवन में सदा दुःखी और खिन्नावस्था में रहने का पाप न केवल वर्तमान ही बल्कि आगामी शत-शत जीवनों तक को प्रभावित कर डालता है।

देखिये और जरा ध्यान से देखिये कि आपके अन्दर ‘दोष-दर्शन’ करने की दुर्बलता, तो नहीं घर पर बैठी है। क्योंकि ‘दोष-दर्शन’ का दृष्टिकोण भी जीवन को कुछ-कुछ ऐसा ही बना देता है। दोष-दर्शन और संतोष, दोष-दर्शन और प्रसन्नता, दोष-दर्शन तथा सामंजस्य का नैसर्गिक विरोध है। दोष-दृष्टि मनुष्य के हृदय पर उसके मानस पर एक ऐसा आवरण है, जो न हो बाहर की प्रसन्न- किरणों को भीतर प्रतिबिम्बित होने देता है और न भीतर का उल्लास बाहर ही प्रकट होने देता है। इसे मनुष्य एवं आनन्द के बीच एक लौह दीवार ही समझना चाहिये। लीजिये दोषदर्शी व्यक्तियों की दशा से अपना मिलान कर लीजिये और यदि अपने में दोष पायें तो तुरन्त सुधार कर डालिये, जिससे, अगले दिनों में आप भी उस प्रकार प्रसन्न रह सकें, जिस प्रकार लोग रहते हैं और उन्हें रहना ही चाहिये।

दोष-दर्शन से दूषित व्यक्ति जब किसी व्यक्ति के संपर्क में आता है, तब अपने मनोभाव के अनुसार उसके अन्दर बुराइयाँ ढूँढ़ने लगता है और हठात् कोई न कोई बुराई निकाल ही लेता है। फिर चाहे वह व्यक्ति कितना ही अच्छा क्यों न हो। उदाहरण के लिये किसी विद्वान महात्मा को ही ले लीजिये। लोग उसे बुलाते, आदर सत्कार करते और उसके व्याख्यान से लाभ उठाते हैं। महात्मा जी का व्याख्यान सुन कर सारे लोग पुलकित, प्रसन्न व लाभान्वित होते हैं।

उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा करते और अपने उतने समय को बड़ा सार्थक मानते। अनेक दिनों, सप्ताहों तथा मासों तक उस सुखद घटना का स्मरण करते और ऐसे संयोग की पुनरावृत्ति चाहने लगते। अधिकाँश लोग उस व्याख्यान का लाभ उठा कर अपना ज्ञान बढ़ाते, कोई गुण ग्रहण करते और किसी दुर्गुण से मुक्ति पाते हैं। वह उनके लिए एक ऐसा सुखद संयोग होता है जो गहराई तक अपनी छाप छोड़ जाता है, ऐसे ही सुव्यक्ति गुणाग्राही कहे जाते हैं।

अब दोष-दृष्टा को ले लीजिये। उसकी स्थिति बिल्कुल विपरीत होती है। जहाँ अन्य लोग उक्त महात्मा में गुण ही देख सके वहाँ उसे केवल दोष ही दिखाई दिये। उसका हृदय महात्मा के प्रशंसकों के बीच, उनकी कुछ खामियों के रखने के लिये बेचैन हो जाता। जब अवकाश अथवा अवसर न मिलता तो प्रशंसा में सम्मिलित होकर उनके बीच बोलने का अवसर निकाल कर कहना प्रारम्भ कर देता- ‘‘हाँ, महात्मा जी का व्याख्यान था तो अच्छा- लेकिन उतना प्रभावोत्पादक नहीं था, जितना कि लोग प्रभावित हुए अथवा प्रशंसा कर रहे हैं। कोई मौलिकता तो थी नहीं। यही सब बातें अमुक नेता ने अपनी प्रचार-स्पीच में शामिल करके देशकाल के अनुसार उसमें धार्मिकता का पुट दे दिया था। अजी साहब क्या नेता, क्या महन्त सबके-सब अपने रास्ते जनता पर नेतृत्व करने के सिवाय और कोई उद्देश्य नहीं रखते। यह सब पूजा, प्रतिष्ठा व पेट का धन्धा है।”

यदि लोग सच्चाई से विमुख होकर उससे सहमत न हुए तब तो वह वाद-विवाद के लिये मैदान पकड़ लेता है और अन्त में अपना दोषदर्शी चित्र दिखा कर लोगों की हीन दृष्टि का आखेट बन कर प्रसन्नता खो कर और विषण्ण होकर लौट आता है। जहाँ गुण ग्राहकों ने उस दिन महीनों काम आने वाली प्रसन्नता प्राप्त की, वहाँ दोष-दृष्टा ने जो कुछ टूटी-फूटी प्रसन्नता उस समय पास में थी वह भी गवाँ दी।

दोष-दर्शन की प्रक्रिया जोर पकड़ ही चुकी थी, उसकी सखी-सहेली झल्लाहट, खीझ, कुढ़न, कुण्ठा, अरुचि आदि सब साथ ही लगी हुई थीं। निदान घर आकर भोजन अच्छा न लगा पत्नी निहायत बेसऊर दिखाई देने लगी। बच्चे यदि सोते मिले तो नालायक हैं। शाम से ही सो जाते हैं। और यदि जगते मिले तो लापरवाह और तन्दुरुस्ती का ध्यान न रखने वाले बन गये। तात्पर्य यह कि उस दिन जहाँ अन्य सब लोग अधिक-से-अधिक प्रसन्नता के अधिकारी बने वहाँ दोषदर्शी के लिये हर बात खेदजनक और दुःखदायी बन गई।

किसी मित्र सम्बन्धी अथवा आत्मीयजन ने मानिये जन्म-दिन अथवा किसी अन्य शुभ अवसर पर अपनी योग्यता एवं समाज के अनुसार कोई उपहार दिया अथवा भेजा। कोई भी व्यक्ति इस सम्मान और स्नेह से पुलकित हो उठता और आभार भरा धन्यवाद देते-देते न अघाता। किन्तु दोषदर्शी तो अपने रोग से मजबूर ही रहता है। यद्यपि वह आभार एवं धन्यवाद न प्रकट करने की असभ्यता नहीं करता तथापि और कुछ नहीं उसमें इतना ही शामिल कर देता कि आपने बेकार यह चीज भेजी। यह तो मेरे पास पहले से ही थी और मुझे ऐसा रंग यह डिजाइन पसन्द नहीं है। यह रंग और प्रकार उपहार के रूप में बहुत आम और सस्ते हो गये हैं। इससे अच्छा यह होता कि आप सद्भावना और बधाई के ही दो शब्द दे देते। बात भले ही सही रही हो। किन्तु इस भावना ने, इस दोष-दृष्टि ने उसको स्वयं तो प्रसन्न नहीं ही होने दिया साथ ही अपने मित्र और स्वजन की प्रसन्नता भी छीन ली।

यही बात नहीं कि दोष-दृष्टा केवल दूसरों में ही बुराई और कमियाँ देखता हो। स्वयं अपने प्रति भी उसका यही अत्याचार रहा करता है। उदाहरण के लिये वह बाजार से अपने लिये कोई वस्तु खरीदने जाती है। पहले तो वह कितनी ही प्रकार की चीजें क्यों न दिखलाई जायें, उसे पसन्द ही नहीं आती, सबमें कोई-न-कोई दोष दिखलाई देता है। वस्तु के निर्दोष होने पर भी वह अपनी और से किसी दोष का आरोपण कर ही लेगा। अपनी इस प्रक्रिया से थक जाने के बाद जब चीज लेकर घर आता है। तब भी उसका पेट अप्रशंसा से भरा नहीं होता। चीज डाली और कहना आरम्भ कर दिया- ‘‘खरीदने को खरीद तो अवश्य लाया लेकिन कुछ पसन्द नहीं आई। यदि पत्नी इस बात को नहीं मानती और चुनाव की प्रशंसा करती है, तो झूठी प्रशंसा का करने का आरोप पाती है। जब तक वह अपनी पसन्द, बाजारदारी, चीज की पहचान के विषय में आलोचना नहीं कर लेता, बुराई नहीं निकाल लेता, अपनी अकल और अनुभव को कोस नहीं लेता चैन नहीं पड़ता। इस प्रकार वह इस प्रसन्नता के छोटे अवसर को भी खिन्नता से कडुआ बना ही लेता है।

तात्पर्य यह है कि दोष-दर्शी कितने ही सुन्दर स्थान, वस्तु और व्यक्ति के संपर्क में क्यों न आये अपने अवगुण के प्रभाव से उससे मिलने वाले आनन्द से वंचित ही रहता है। निदान इस लम्बे-चौड़े संसार में उसे न तो कहीं आनन्द दीखता है और न किसी वस्तु में सामंजस्य का सुख प्राप्त होता है। उसे हर व्यक्ति, हर वस्तु और हर वातावरण अपनी रुचि के साथ असमंजस उत्पन्न करती ही दीखती है। जबकि गुण-ग्राहक हर व्यक्ति, हर वस्तु और हर वातावरण में सामंजस्य और सुन्दरता ही खोज निकालता है। यही कारण है कि गुण-ग्राहक सदैव प्रसन्न और दोषान्वेषक सदा खिन्न बना रहता है।

वस्तुतः बात यह है कि संसार की प्रत्येक वस्तु गुण-दोषमय ही है। कोई भी वस्तु एवं व्यक्ति ऐसा नहीं हो सकता कि जिसमें या तो गुण-ही-गुण भरे हों अथवा दोष-ही-दोष। अपनी दृष्टि के अनुसार हर व्यक्ति उसमें गुण या दोष देख कर प्रसन्न अथवा खिन्न हुआ करता है।

बुद्धिमान व्यक्ति अपने लाभ और हित के लिये हर बात के अच्छे-बुरे दो पहलूओं में से केवल गुण पक्ष पर ही दृष्टि डालता है। क्योंकि वह जानता है, कि विपक्ष पर ध्यान देने, उसको ही देखते रहने से मन को अशाँति के अतिरिक्त और कुछ हाथ न लगेगा, दोष-दृष्टि रखने और दोषान्वेषक करने से घृणा तथा द्वेष का ही प्रादुर्भाव होता है, जिसका परिणाम कलह-क्लेश अथवा अशाँति असन्तोष के सिवाय और कुछ नहीं होता। इससे वस्तु अथवा व्यक्ति की तो कुछ हानि होती नहीं अपना हृदय कलुषित और कलंकित होकर रह जाता है।

अपने दृष्टि-दोष के कारण प्रायः अच्छी चीजें भी बुरी और गुण भी अवगुण होकर हानिकारक बन जाते हैं। जैसे स्वाँति-जल का ही उदाहरण ले लीजिये। स्वाँति की बूँद जब सीप के मुख में पड़ जाती है, तब मोती बन कर फलीभूत होती है और यदि वही बूँद साँप के मुख में पड़ जाती है तो विष का रूप धारण कर लेती हैं। वस्तु एक ही है किन्तु वह उपयोग और संपर्क के गुण दोष के कारण सर्वथा विपरीत परिणाम में फलीभूत हुई।

किसी में गुण की कल्पना न कर सकने के कारण दोषदर्शी अविश्वासी भी होता है। वह किसी की सद्भावना एवं सहानुभूति में भी कान खड़े करने लगता है। प्रेम एवं प्रशंसा में भी स्वार्थपूर्ण चाटुकारिता का दोष देखता है। इसलिये संपर्क में आने और स्नेहपूर्ण बरताव करने वाले हर व्यक्ति से भयाकुल और शंकाकुल रहा करता है। उसे विश्वास ही नहीं होता कि संसार में कोई निःस्वार्थ और निर्दोष-भाव से मिल कर हितकारी सिद्ध हो सकता है। विश्वास, आस्था, श्रद्धा, सराहना से रहित व्यक्ति का खिन्न असंतुष्ट और व्यग्र रहना स्वाभाविक ही है, जैसा कि दोष-दर्शी रहता भी है।

यदि आपको अपने अन्दर इस प्रकार की दुर्बलता दिखी हो तो तुरन्त ही उसे निकालने के लिए और उसके स्थान पर गुण-ग्राहकता का गुण विकसित कीजिये। इस दशा में आपको हर व्यक्ति, वस्तु और वातावरण में आनंद, प्रशंसा अथवा विनोद की कुछ-न-कुछ सामग्री मिल ही जायेगी। दूसरों के गुण-दोषों में से उस हंस की तरह केवल गुण ही ग्रहण कर सकेंगे, जोकि पानी मिले हुए दूध में से केवल दूध-दूध ही ग्रहण कर लेता है और पानी छोड़ देता है।

दूसरों की अच्छाइयों को खोजने, उनको देख-देख प्रसन्न होने और उनकी सराहना करने का स्वभाव यदि अपने अन्दर विकसित कर लिया जाये तो आज दोष-दर्शन के कारण जो संसार, जो वस्तु और जो व्यक्ति हमें काँटे की तरह चुभते हैं, वे फूल की तरह प्यारे लगने लगें। जिस दिन यह दुनिया हमें प्यारी लगने लगेगी, इसमें दोष, दुर्गुण कम दिखाई देंगे, उस दिन हमारे हृदय से द्वेष एवं घृणा का भाव निकल जायेगा और हमें हर दिशा और हर वातावरण में प्रसन्नता ही आने लगेगी। दुःख, क्लेश और क्षोभ, रोष का कोई कारण ही शेष न रह जायेगा।


परिवार का आदर्श और विकास

एक ही रक्त और कुल के क्यों न हों अनेक लोगों का एक साथ रहना मात्र ही पारिवारिक जीवन नहीं है। एक साथ एक घर में अनेक भाई और उनके बच्चे रहते हों किन्तु वे आपस में लड़ते, संघर्ष करते और कलह मचाते रहें, तो इससे पारिवारिक जीवन का उद्देश्य पूरा नहीं होता। इस प्रकार तो वह एक घर परिवार न कहा जाकर संग्राम-स्थल ही कहा जायेगा।

अनेक पशु-पक्षी समूह बना कर रहते हैं। साथ-साथ चरते, घूमते, उठते, बैठते, सोते और जागते हैं किन्तु उनको एक परिवार नहीं कहा जा सकता। परिवार का प्रमुख लक्षण है, एक-दूसरे से प्रेम, सहानुभूति, आत्मीयता और स्वार्थ रहित सेवा-भाव। एक-दूसरे के लिये त्याग तथा उत्सर्ग की तत्परता। जिस मानव समूह में एक दूसरे का सुख-दुःख अपना सुख-दुःख न बन सका, वहाँ पारिवारिक भावना नहीं मानी जायेगी। पशु-पक्षी का साथ रहते हुए भी इसी आत्म-भाव के अभाव में पारिवारिक नहीं माने जाते। पारिवारिक जीवन का लक्षण है- ‘‘प्रेम, आत्मीयता, सहयोग, सहायता, संवदेना, सद्भाव तथा सबके प्रति यथायोग्य व्यवहार सबकी मंगल-कामना, सबकी सुख-सुविधा का विचार आदि के सात्विक गुण।” जहाँ बड़ों का छोटों के प्रति आशीर्वाद नहीं, छोटों में गुरुजनों के प्रति आदर और विनम्रता का भाव नहीं, जहाँ भाई-भाई और भाई-बहन में एकात्मकता नहीं वहाँ पारिवारिक भावना का अभाव है, यही मानना ही पड़ेगा।

परिवार का अर्थ है- एक-दूसरे की साँसारिक सुख में सहायता के साथ आत्मोन्नति में यथासाध्य सहयोग करना। जहाँ लोग एक-दूसरे का अधिकार छीनना चाहते हों, एक-दूसरे से ईर्ष्या व डाह करते हों, पीछे खींचने का प्रयत्न करते और अपने स्वार्थ पर ही दृष्टि रखते हों, वहाँ परिवार कहाँ? वहाँ तो पाशविक समूह जैसी भावना ही समझना चाहिये।

घर में जब प्रत्येक सदस्य दूसरे के लिए त्याग करने को तत्पर रहे, उसका अपना स्वार्थ दूसरों के स्वार्थ के साथ जुड़ा हो, एक की पीड़ा सबकी पीड़ा और एक की उन्नति सबकी उन्नति बन कर प्रकट हो, तब समझना चाहिये कि हम पारिवारिक जीवन यापन कर रहे हैं। दूसरे हमसे अच्छा खायें पहनें, घर की सुख-सुविधा का उपभोग पहले दूसरे लोग करें, हमारी खुशी इसी में है। हमारा कर्तव्य तो अधिकाधिक त्याग और दूसरों की सुख-शाँति और विकास में सहायक होना है। ‘मेरे रहते किसी को दुःख-तकलीफ न हो आदि की उदार भावना ही पारिवारिक भावना को प्रकट करती है।

परिवार की प्रतिष्ठा हमारी प्रतिष्ठा, परिवार की उन्नति हमारी उन्नति, उसकी समृद्धि हमारी समृद्धि और उसका लाभ-हानि हमारा लाभ-हानि है, ऐसी आत्म-भावना पारिवारिकता का विशेष लक्षण है। हम कोई ऐसा काम न करें, जिससे परिवार की प्रतिष्ठा पर आँच आये। किसी सदस्य पर कोई अवाँछनीय प्रभाव पड़े, परिवार की उन्नति में अवरोध उत्पन्न हो अथवा उसकी समृद्धि एवं वृद्धि में प्रतिकूलता आये, ऐसा सतर्क भाव ही तो पारिवारिकता कहा जायेगा। जहाँ यह सब बातें पाई जांय, वहाँ समझना चाहिए कि लोग वास्तविक रूप में परिवार बन कर रह रहे हैं। जहाँ स्वार्थ, वैषम्य, विचार-वैषम्य, भाव-वैषम्य अथवा सुख-दुःख में विषमता की गन्ध पाई जाये वहाँ मानना होगा कि एक साथ अनेकों के रहने पर भी वहाँ परिवार भावना नहीं है। लोग किसी कारणवश एक साथ रहे जा रहे हैं।

परिवार एक पवित्र तथा उपयोगी संस्था है। इसमें मानव की सर्वांगीण उन्नति का आधार सहयोग, सहायता और पारस्परिकता का भाव रहता है। यह भाव वह शक्ति है जिसके आधार पर मनुष्य आदि जंगली स्थिति से उन्नति करता-करता आज की सभ्य स्थिति में पहुँचा है। सहयोग की भावना ही मनुष्य जाति की उन्नति का मूल कारण रही है। एकता, सामाजिकता, मैत्री आदि की सहयोग मूलक शक्ति ने ही आज मानव सभ्यता को उच्चता पर पहुँचा दिया है। सभ्यता के प्रारम्भिक युग में जिस व्यक्ति ने सहयोग की शक्ति समझ कर उसका प्रकटीकरण तथा प्रवर्तन किया होगा, वह निश्चय ही एक बड़ा दार्शनिक तथा समाज हितैषी महापुरुष रहा होगा। सहयोग की शक्ति जान कर लोगों ने अपनी स्थूल तथा सूक्ष्म विशेषताओं को मिला कर संगठन की चेतना प्रबुद्ध की होगी और कन्धों-से-कन्धा, विचार-से-विचार, शक्ति-से-शक्ति तथा साधन-से-साधन मिला कर एक तन-मन से काम किया होगा, जिसके फलस्वरूप सभ्यता तथा मानवीय समृद्धि के एक के बाद एक द्वार खुलते चले गये होंगे।

आज भी तो पूरा समाज सहयोग और पारस्परिकता के बल पर ही चल रहा है। यदि समाज से सहयोग की भावना नष्ट हो जाये तो तुरन्त ही चलते हुए कारखाने, होती हुई खेती और बढ़ती हुई योजनाएँ व विकास पाती हुई कलायें, शिल्प, साहित्य आदि की प्रगति रुक जाये और कुछ ही समय में समाज जड़ता से अभिभूत होकर नष्ट हो जाये। सहयोग मानव विशेषताओं में एक बड़ी विशेषता है, परिवार में जिसका होना नितान्त आवश्यक है। इसी पर परिवार बनता, ठहरता, चलता और उन्नति करता है।

परिवार में जब तक सच्ची पारिवारिक भावना नहीं होती उसका उद्देश्य पूरा नहीं होता। आज सच्ची पारिवारिक भावना के अभाव में ही तो परिवार टूटते, बिखरते जा रहे हैं। उनकी शक्ति तथा दक्षता नष्ट होती जा रही है। उनकी वृद्धि, समृद्धि रुकती जा रही है और दिन-दिन उन्हें दीनता, दरिद्रता घेरती चली आ रही है। पारिवारिक भावना के अभाव में ही भाई-भाई लड़ते, बहनें एक-दूसरे से मन-मुटाव मानती, सास-बहू के बीच बनती नहीं और देवरानी, जिठानी एक-दूसरे से डाह व ईर्ष्या करती हैं। जितने मुकदमें दूसरों के विवाद के नहीं चलते उससे कई गुने मुकदमें पारिवारिक कलह के कारण दायर होते और चलते रहते हैं। चाचा-ताऊ, बाप-बेटों और बाबा-पोतों तक में संघर्ष होता चलता है।

इस अनिष्ट का एकमात्र कारण यही है कि एक परिवार होते हुए भी वे सब पारिवारिक भावना से रहित होते हैं। अपना भिन्न तथा पृथक अस्तित्व मानते और तदनुरूप ही आचरण करते हैं। सच्ची पारिवारिक भावना का विकास तो तब ही होता है, जब परिवार का प्रत्येक सदस्य अपना अस्तित्व पूरे परिवार में मिला कर अभिन्न हो जाता है। इस आत्म विसर्जन के पुण्य से ही लोगों में सच्चे प्रेम और सच्ची आत्मीयता का विकास होता है।

परिवारों से मिल कर समाज और समाज से राष्ट्र का निर्माण होता है। यदि परिवार, संगठित, शक्ति सम्पन्न और समृद्ध हो जायें तो समाज तो वैसा आप-ही-आप बन जायेगा। उसके लिये अलग से कोई प्रयत्न करने की आवश्यकता न रह जायेगी। परिवारों में सच्ची पारिवारिक भावना का अभाव किन कारणों से हुआ है, या हो रहा है, यदि इस पर विचार करते हैं, तो यह विदित होता है कि आज का हमारा रहन-सहन और आचार-विचार इसके लिए मुख्य उत्तरदायी हैं।

हम परिवार तो बड़े शोक से बसा लेते हैं, किन्तु उसका उचित निर्माण नहीं करते। वह अपने आप स्वतंत्र रूप से कुशकंटकों की भाँति जिधर चाहता बढ़ता और विकसित होता चला जाता है। यदि किसी चतुर माली की तरह हम अपने परिवार को एक सुन्दर वाटिका मान कर उचित पालन और निर्माण करें तो निःसन्देह उसका एक-एक सदस्य खुशनुमा फूल की तरह गुणों की सुगन्ध से भर कर खिल उठे, जिससे न केवल परिवार को ही बल्कि अन्य लोगों को सुख की प्राप्ति हो।

परिवार का निर्माण बच्चों के निर्माण से प्रारम्भ होता है। बच्चों का समुचित निर्माण तभी सम्भव है, जब हमारे उतने ही बच्चे हों जितनों का ठीक से पालन और देख-रेख की जा सके, जिनको शिक्षित और सुयोग्य बनाने के लिये हमारे पास साधन हों। परिस्थिति से परे अनावश्यक बच्चे पैदा करते जाने वाला गृहस्थ लाख प्रयत्न करने पर भी अपने परिवार का वाँछित निर्माण नहीं कर सकता। जिस बोझ को उठाया ही नहीं जा सकता उसको लक्ष्य तक नहीं ले जाया जा सकता। इसलिए परिवार निर्माण का मुख्य आधार छोटा तथा नियोजित परिवार ही मान कर चलना चाहिये।

बच्चों को केवल भोजन-वस्त्र दे देना और उनकी शिक्षा के लिये प्रबन्ध कर देने मात्र से उनका निर्माण नहीं हो सकता। स्कूलों में बच्चों को केवल पुस्तकीय शिक्षा ही मिल पाती है। आचरण की शिक्षा, गुण कर्म तथा स्वभाव की शिक्षा जो उनके निर्माण के लिए अत्यावश्यक है, वह आज के शिक्षालयों में नहीं मिलती है।

बच्चों के निर्माण में पिता का व्यक्तिगत आचरण बहुत महत्व रखता है। बच्चे सहज ही अनुकरणशील होते हैं, वे जैसा पिता को करते देखते हैं, वैसा ही सीख लेते हैं। अतः पिता को अपना रहन-सहन, आचार-विचार और स्वभाव उसके अनुकूल रहना चाहिये, जिस आदर्श में वह अपने बच्चों को ढालना चाहता है। यदि पिता अपने इस महान दायित्व को समझे और अपने को त्याग, प्रेम, परिश्रम, पुरुषार्थ, सदाचार के आदर्श के रूप में प्रस्तुत करे तो कोई कारण नहीं कि उसके बच्चे न बन जायें। जो पिता स्वार्थी, क्रोधी, कर्कश, और व्यसनी विलासी होता है, वह न तो आदर का पात्र रहता है और न उसके बच्चे ही अच्छे बन पाते हैं।

माता के व्यक्तिगत आचरण का प्रभाव कन्याओं पर विशेष रूप से पड़ता है। जो मातायें अधिक साज सज्जा, श्रृंगार, फैशन, पाउडर, लिपस्टिक और गहनों में रुचि रखती हैं और सास, ननद, देवरानी, जिठानी आदि से लड़ती-झगड़ती रहती हैं, उनकी कन्यायें भी फैशनेबुल, छबीली और विलास-प्रियता की शिकार बन जाती हैं और उनके स्वभाव में भी विवाद, असहयोग और कलह के अंकुर उग आते हैं। माता-पिता को चाहिये कि परिवार के सारे सदस्यों तथा व्यक्तियों से यथायोग्य प्रेम और आदर का व्यवहार करें, सबके लिये त्याग तथा उदार भावना को प्रश्रय दें, अधिक-से-अधिक सादगी और शालीनता से रहें, इससे उनके बच्चों पर पारिवारिकता के अनुकूल प्रतिक्रिया होगी। वे प्रेमभाव की मिठास और त्याग का महत्व समझेंगे।

अभिभावकों के व्यक्तिगत आचरण के साथ परिवार का वातावरण भी बच्चों और सदस्यों के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका प्रस्तुत करते हैं। जिन घरों में दिन-रात लड़ाई-झगड़ा तथा आपा-धापी होती रहती है। उस परिवार के बच्चे और अन्य सदस्य परस्पर सहयोग का मूल्य नहीं समझ सकते। उनमें स्वार्थ और कलह की प्रमुखता हो जायेगी। चाचा-ताऊ आदि जो भी सदस्य एक परिवार में रहते हों, जो भी भाई-बहन एक घर में रहते हों उन सबको अपना तथा अपने बच्चों से अधिक ख्याल भाई-बहन के बच्चों और उन खुद का रखना चाहिये। परिवारों में बच्चों के प्रति अपना-अपना भाव रखने से ही अधिकतर कलह के अंकुर उगते हैं। यदि सब बच्चों को अपना बच्चा और अपने को उनका सगा अभिभावक समझा जाये और वैसा ही प्रेमपूर्ण व्यवहार किया जाये तो कोई कारण नहीं कि सबमें समान रूप से प्रेम-भाव न बना रहे और सारे बच्चे समान रूप से सारे गुरुजनों का आदर न करें अथवा अनुशासन न मानें। सारे प्रौढ़ सभी बच्चों को अपने बच्चे और सारे बच्चे सभी गुरुजनों को अपना शुभ-चिन्तक और अभिभावक मान कर वैसा ही आचरण करने लगें, तो निश्चय ही परिवार में दृढ़ता और स्थिरता के साथ-साथ सुख-शाँति की परिस्थितियाँ रहने लगें।

इसके साथ परिवार का वातावरण अधिक-से-अधिक पवित्र तथा शालीन रहना चाहिये घरों में ऐसा साहित्य ऐसे चित्र तथा ऐसे मनोरंजन को नहीं धँसने देना चाहिये जिससे बच्चों के स्वभाव अथवा आचरण पर अवाँछनीय प्रभाव पड़े। घरों में गन्दी मजाक, तानाकशी और हल्का विनोद अथवा गाली-गलौज का वातावरण नहीं होना चाहिये। रूढ़िवादिता, कुरीतियाँ और कुप्रथाओं के बहिष्कार से भी बच्चों के निर्माण में बहुत कुछ सहायता मिलेगी। पारिवारिक रूढ़ियों और अन्ध-विश्वास बच्चों पर इतना बुरा प्रभाव डालते हैं कि वे जीवन भर के लिये पढ़े-लिखे होने पर भी विचारों की स्वतन्त्रता तथा नवीनता से वंचित रह जाते हैं। यह विकृति उन्हें निश्चित रूप से पक्षपाती, दुराग्रही तथा स्वार्थी बना देती है।

इस प्रकार व्यक्तिगत आचरण, घरेलू वातावरण तथा विचार विकृति दूर कर परिवार का निर्माण कीजिये, आपके घरों से कलह, क्लेश तथा फूट-टूट की दूषित विकृति दूर हो जायेगी और उसके स्थान पर सच्ची पारिवारिकता, सहयोग, प्रेम तथा पारस्परिकता की भावना बढ़ेगी, जिससे परिवार के साथ, समाज तथा देश का कल्याण होगा।


शारीरिक-श्रम के प्रति अनास्था न रखें

शारीरिक-श्रम का सम्बन्ध प्रतिष्ठा अथवा श्रेष्ठता से जोड़ना उचित नहीं। यह धारणा केवल भ्रामक ही नहीं अपितु हानिकारक भी है कि शारीरिक-श्रम करना तुच्छता का द्योतक है। शारीरिक-श्रम करते रहना मनुष्य का नैसर्गिक स्वभाव है। यदि शारीरिक-श्रम मनुष्य के लिये आवश्यक न होता तो प्रकृति ने उसे उसके अनुकूल परिस्थितियों में उत्पन्न न किया होता। मनुष्य के लिये आहार की वह सुविधा नहीं है, जो पशु-पक्षियों को प्राप्त है। उसे रोटी के लिये न जाने कितने प्रकार का श्रम करना पड़ता है। वह यों ही अन्य पक्षियों की भाँति वनस्पति के आधार पर अपना जीवन नहीं चला सकता। उसे उसके लिये खेती से लेकर भोजन तक की प्रक्रिया में ढेरों शारीरिक-श्रम करना पड़ता है।

आज मनुष्य श्रम-जीवी तथा बुद्धिजीवी, दो वर्गों में विभाजित हो गया है। धनवान तथा निर्धन के दो वर्ग ही गये हैं। किन्तु यह विभाजन तथा अन्तर प्राकृतिक नहीं है। वह निर्मित है, इससे प्रकृति का मूल मन्तव्य समाप्त नहीं हो जाता, वह अपनी ओर से सभी को समान रूप से उत्पन्न करती है और शारीरिक-श्रम के योग्य शरीर देती है। उसने मानव शरीर का निर्माण भी कुछ ऐसे ढंग से किया है कि बिना शारीरिक-श्रम किये वह कुण्ठित बना रहता है। प्रारम्भ में बच्चे हाथ-पैर हिलाने से लेकर खेलने-कूदने का श्रम करते रहते हैं। यही कारण है कि उनका शरीर शीघ्रता से विकसित होता जाता है।

कार्य विभाजन के कारण आज समाज में जो श्रमजीवी तथा बुद्धिजीवी दो वर्ग बन गये हैं, उनमें से बुद्धिजीवी वर्ग केवल शारीरिक-श्रम करने के कारण ही बुद्धिजीवी वर्ग की दृष्टि में तुच्छ समझा जाता है। बुद्धिजीवी लोग ऐसे काम को श्रेष्ठ मानते हैं, जिसमें शारीरिक श्रम न करना पड़े। उनकी दृष्टि में शारीरिक-श्रम करना, खेती, दस्तकारी, तकनीक तथा कारीगरी के श्रम-साध्य काम तुच्छ तथा अप्रतिष्ठित होते हैं। सामाजिक प्रतिष्ठा का मानदण्ड वे कुर्सी पर बैठ कर काम करने, दस-बीस आदमियों पर हुक्म चलाने को मानते हैं।

देश का अधिकाँश शिक्षित वर्ग इसी झूँठी प्रतिष्ठा का भ्रम पाले बेकारी का शिकार हुआ दीखता है। वह हर प्रकार की कठिनाई सह लेता है किन्तु शारीरिक-श्रम का कोई काम करने के लिये तैयार नहीं होता। उसे इसमें तुच्छता का अनुभव होता है। कुर्सी पर बैठ कर सौ रुपये की क्लर्की करने को, सौ बीघे खेती का मालिक बनने से अधिक प्रतिष्ठापूर्ण समझता है। प्रतिष्ठा की यह भ्रान्त धारणा बड़ी चातक है। इससे समाज में आलस्य, अकर्मण्यता, वर्गवाद तथा बेकारी की प्रवृत्तियों को प्रोत्साहन मिलता है। देश की गरीबी का एक मुख्य कारण इस प्रकार श्रम का अपमान किया जाना भी है। भारत का अधिकाँश युवक समाज श्रमिक तथा किसान न बन कर सफेदपोश बाबू बनना चाहता है, फिर चाहे इसकी खोज में उसकी काम करने और उन्नति करने की आधी आयु ही क्यों न बेकार चली जाये। वे किसी दफ्तर की साधारण-सी नौकरी पाने के लिये बरसों सड़कों की खाक छानते फिर सकते हैं। याचना-पत्र लिये स्थान स्थान पर भाग दौड़ सकते हैं। साक्षात्कारों के लिये पचासों बार सैकड़ों रुपया खर्च करके आ-जा सकते हैं। वृद्ध पिता पर बोझ बने रह सकते हैं किन्तु यह नहीं कर सकते कि घर की खेती अथवा व्यवसाय में लग कर उसे आगे बढ़ायें और न उनसे यही होगा कि यदि घर में खेती व्यवसाय नहीं है, तो कोई कारीगरी, दस्तकारी तथा मशीनरी का काम पकड़ लें और आनन्दपूर्वक श्रम करते हुए शीघ्र ही आत्म-निर्भर हो जायें। किन्तु वह श्रम साध्य काम करने में तो उनकी प्रतिष्ठा चली जायेगी। कितनी भ्रामक व विपरीत भावना है। बेकार रह कर जगह-जगह जूतियाँ चटकाते-फिरने में तो प्रतिष्ठा जाती नहीं, प्रतिष्ठा जाती है, पसीना बहा कर ईमानदारी से रोजी कमाने और स्वावलम्बी होने में!

परिश्रम मानव-जीवन का मूलाधार है। यही तो वास्तविक पूँजी है, जो मनुष्य को प्रकृति से जन्मजात अधिकार तथा विरासत में मिली है। जो इस पूँजी का समुचित उपयोग करता है उसके जीवन-पथ में कठिनाइयों का आगमन कम-से-कम होता है। सफलता तथा उन्नति श्रम की अनुचरियाँ मानी गई हैं। पता नहीं लोगों के दिमाग में यह गलत धारणा क्यों घर किये बैठी है कि परिश्रम से बचने में कोई सुख है। परिश्रम करने से शरीर थकता है और उसकी शक्ति क्षीण हो जाती है। पर सत्य बात यह है कि श्रम करने से शरीर पुष्ट होता है। उसकी कार्य क्षमता बढ़ती है।

श्रम के अभाव में शरीर के अंगों-प्रत्यंगों का समुचित विकास अवरुद्ध हो जाता है। केवल मानसिक अथवा आराम के काम करते रहने से शारीरिक शक्तियाँ कुण्ठित हो जाती हैं। आलस्य, प्रमाद, उद्योगहीनता, निष्क्रियता आदि के दुर्गुण तो आ ही जाते हैं, साथ ही शरीर विविध रोगों का घर बन जाता है। शरीर स्फूर्ति-हीन होकर निर्जीव-सा हो जाता है। शारीरिक श्रम से दूर रहने से मनुष्य का जीवन एकांगी तथा अपूर्ण रह जाता है। श्रम के अभाव में शरीर के शिथिल हो जाने पर कुछ ही समय में मनुष्य का मन तथा मस्तिष्क भी कुण्ठित हो जाते हैं। उनकी प्रखरता नष्ट हो जाती। मन, मस्तिष्क आदि निराकार अवयवों को साकार शरीर से अलग समझना भूल है। इनके अस्तित्व भिन्न-भिन्न तथा इनका श्रम पृथक है, यह धारणा समीचीन नहीं।

जिस प्रकार शरीर के विभिन्न अंग अपना काम अलग करते दिखाई देने पर भी समग्र शरीर के पोषण में सबका सहयोग समान रूप से ही रहता है, उसी प्रकार जब शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक तथा आत्मिक सभी शक्तियों से समुचित काम लेंगे, उनका ठीक ढंग से समन्वय करेंगे, तभी उनके व्यक्तित्व की अपूर्णता पूरी होगी और वे शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक एवं आत्मिक रूप से प्रखर तथा कार्यक्षम बन पायेंगे।

स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मन तथा स्वस्थ आत्मा का निवास होता है- यह बात अक्षरशः सत्य है। जिसका शरीर अस्वस्थ है, रोगी है, वह किसी प्रकार का बौद्धिक कार्य सम्पादित कर सकता है अथवा कोई आध्यात्मिक साधन निभा सकता है, ऐसा सम्भव नहीं। किसी भी क्षेत्र में उन्नति और विकास करने के लिए शरीर का स्वस्थ एवं निरोग होना हर प्रकार से वाँछनीय है। शारीरिक स्वास्थ्य और निरोगता सब प्रकार के परिश्रम पर निर्भर है। प्रकृति ने मनुष्य का शरीर हर प्रकार का काम-काज और श्रम करने के लिये ही बनाया है। उसके श्वास यंत्र की रचना भी इस प्रकार की गई है कि यदि खुले स्थान में खूब परिश्रम करके भरपूर श्वाँस, प्रश्वांस ली जायें तो शरीर के दूषित एवं अस्वास्थ्य कर तत्व बाहर निकल जाते हैं और बाहर की शुद्ध वायु भीतर जाकर रक्त को शुद्ध और प्रखर बनाती है।

शुद्ध रक्त ही आरोग्य का मुख्य आधार माना गया है। श्रम करते रहने से शरीर के विषैले और विजातीय तत्व पसीने के रूप में बाहर निकलते रहते हैं, भोजन पूरी तरह पच पर आवश्यक पोषक तत्वों का निर्माण करता है। रोगों की जड़ पेट, आमाशय और मलाशय में गंदगी इकट्ठी नहीं होने पाती, जिसके परिणाम स्वरूप शरीर सदा स्वस्थ तथा भला-चंगा बना रहता है। आरोग्य और स्वास्थ्य की स्थिति में मनुष्य का मन तथा आत्मा आप ही आप प्रसन्न तथा प्रखर बने रहते हैं। शारीरिक शिथिलता सारी शिथिलताओं की जड़ है। श्रम में निष्ठा रख कर इस अभिशाप को पास न आने देना ही चाहिये।

शारीरिक श्रम से भागते रहने से न केवल शारीरिक क्षमतायें तथा बौद्धिक प्रखरतायें ही कुण्ठित नहीं हो जाती अपितु मनुष्य में अनेक प्रकार की और भी त्रुटियाँ तथा विकृतियाँ भी आ जाती हैं। श्रम न करने से मंदाग्नि का रोग हो जाता है, जिससे भोजन की रुचि कम हो जाती है। किसी भी पदार्थ और वस्तु में स्वाद और रस नहीं आता। उसकी पूर्ति वह विविध प्रकार के मसाले तथा खट्टे, मीठे रसों की अनावश्यक वृद्धि कर करने का प्रयत्न किया करते हैं। भोजन की रुचि बढ़ाने के लिये अनेक लोग शराब तथा भंग आदि का प्रयोग करने लगते हैं। श्रम और गहरी नींद का घनिष्ठ सम्बन्ध है। श्रम-जन्य थकान के बिना नींद में कमी आ जाती है। उसकी पूर्ति के लिये लोग गुदगुदे गद्दों तथा तोशक तकियों का सहारा लेकर पंखा, कूलर अथवा हीटर का प्रयोग कर अपने को विलासी बना डालते हैं। श्रम-जन्य मानसिक संतोष के अभाव में मनोरंजन का सहारा लेकर सिनेमा, सर्कस तथा क्लब आदि के अभ्यस्त बन जाते हैं। रात-रात भर नाच गानों के चक्कर में पड़े रहते हैं। इस प्रकार खान-पान और रहन-सहन की अव्यवस्था तथा अनुपयुक्तता के फल-स्वरूप मनुष्य कामुक तथा अहिष्णु बन जाता है। थोड़ी-सी अनुकूलता पाकर उसका काम उत्तेजित तथा क्रोध प्रकट हो उठता है। ऐसा निकृष्ट जीवन को ग्रहण किए हुये किसी मनुष्य से अधिक उन्नति की आशा नहीं जा सकती।

शारीरिक-श्रम करने में अप्रतिष्ठा की धारणा बहुत घातक है। भोजन-वस्त्र जैसी मूलभूत आवश्यकता की पूर्ति परिश्रम से ही होती है। यदि सारे किसान मजदूर, शिल्पी तथा कारीगर अप्रतिष्ठा को हेतु समझ कर अपने कामों से विरत हो जायें, तो क्या संसार में बाबू-गिरी को महत्व देने वालों का जीवन एक दिन भी चल पाये? बड़े-बड़े धनवान और साहूकार जो बिना कमाये खाते और गद्दों पर पड़े-पड़े जीवन बिताते हैं और अपने को श्रेष्ठ तथा भाग्यवान होने का अभिमान करते श्रमिकों और किसानों को तुच्छ दृष्टि से देखते हैं, क्या यह नहीं समझ पाते कि उनके इस वैभव का आधार, इस आराम अभिमान का हेतु किन्हीं लोगों का श्रम ही है, जिसका फल सामाजिक व्यवस्था के कारण उन्हें न मिल कर तुम्हें मिल रहा है। उत्पादन का सम्बन्ध श्रम से ही है। बिना परिश्रम के किसी प्रकार का उत्पादन सम्भव नहीं। समाज में भोजन-वस्त्र की मूल आवश्यकता की पूर्ति करने के लिये जो श्रमिक अपना खून-पसीना एक करते हैं, प्रतिष्ठा के मात्र वे माने जायेंगे, या कि वे आलसी जो पड़े-पड़े दूसरों के श्रम पर आराम और ऐश किया करते हैं।

समाज की इसी भ्रान्त धारणा के कारण देश में लोगों की निष्ठा श्रम के प्रति कम होती जा रही है। श्रम के प्रति इस प्रकार की हीन भावना केवल भारत में ही विशेष रूप से पाई जाती है। यही कारण है कि वह संसार के अन्य श्रमशील देशों से हर प्रकार के साधनों की प्रचुरता होने पर भी पिछड़ा हुआ है। उसकी आर्थिक स्थिति अनस्थिर तथा शारीरिक दशा शोचनीय बनी हुई है। श्रम के प्रति अनास्था ही उन्हें गरीबी तथा अभाव का जीवन बिताने के लिए विवश कर रही है। यह अनास्था जन-जीवन में कितनी दूर तक धँसती जा रही है, इसका अनुमान इस एक छोटी बात से लगाया जा सकता है कि ब्याह-शादी के लिए अच्छे खेतिहर अथवा कारीगर लड़के की अपेक्षा लोग छोटी-सी सोफियानी नौकरी करने वाले बाबू को अधिक महत्व तथा प्राथमिकता देते हैं। फिर चाहे उसकी आर्थिक और शारीरिक क्षमता हीन ही क्यों न हो। श्रम के प्रति अनास्था ही वह कारण है कि देश में मशीनों और यन्त्रों पर अधिकारपूर्वक काम करने वाले लोगों की कमी है और तकनीकी विकास की प्रगति रुकी हुई है। उद्योगों और योजनाओं के लिये तकनीशियन्स विदेशों के बुलाने पड़ रहे हैं।

श्रम का महत्व समझने वाले इंग्लैंड, आस्ट्रेलिया और कनाडा जैसे छोटे-छोटे देश थोड़ी-सी जमीन में ही इतना अन्न उपजा लेते हैं कि अपनी पूर्ति के बाद दूसरे देशों को भेज सकते हैं। कुछ समय पूर्व जो रूस संसार के पिछड़े देशों में गिना जाता था और शक्ति के सम्बन्ध में नगण्य माना जाता था, श्रम की महिमा समझने से आज संसार का अग्रगण्य देश बना हुआ है। वे श्रम के आधार पर बर्फीली, चट्टानी और अनुपजाऊ मानी जाने वाली भूमि से भी उपजें प्राप्त कर रहे हैं।

कहना न होगा कि जिन सम्पन्न अथवा बुद्धिजीवियों के पास श्रम सम्बन्धी काम नहीं है। उनकी जीविका बिना पसीने के ही चल जाती है, उन्हें भी अपने शेष समय में कुछ-न-कुछ शारीरिक श्रम करते रहना चाहिये- ऐसा शारीरिक श्रम जो कुछ-न-कुछ उत्पादन कर सके। इसके लिये बागवानी, काष्ठ-कला, वस्त्र-कला और थोड़ी-सी खेती, चाहे अपने आस-पास ही सही करनी ही चाहिये। फल, सब्जी और शाक तो कुछ-न-कुछ उपजाना ही चाहिये। यदि यह नहीं तो वे कुटीर-उद्योग के किसी कताई अथवा बुनाई का काम ही अपना सकते हैं। इस प्रकार जब संपन्न और बुद्धिजीवी भी श्रम के कार्य करने लगेंगे, तो समाज में श्रम की प्रतिष्ठा बढ़ेगी? पीढ़ियाँ श्रमशील बनेंगी, वर्गवाद का भेद कम होगा और स्वास्थ्य के साथ राष्ट्र की सम्पन्नता भी बढ़ेगी।


जाति, उपजातियों का दायरा चौड़ा किया जाय

वर्ण, कुल, गोत्र, जाति, उपजाति के आधार पर कन्याओं के लिये वर प्राप्त करने में अभिभावकों को कितनी परेशानी और मुसीबतों का सामना करना पड़ता है, यह सर्वविदित है। एक सीमित क्षेत्र और गोत्र में लड़के ढूंढ़ने पर दो-चार मिलते हैं, इसलिए उनके अभिभावक लम्बी रकमों दहेज के रूप में माँगते हैं। सामाजिक विघटन का यह एक जबर्दस्त कारण है।

निर्धनों को अपनी बच्चियों के विवाह छाती के पहाड़ मालूम पड़ते हैं। सवर्ण कुल होना आवश्यक होता है, धन होता नहीं जिससे बड़ी आयु की कन्या हो जाने पर भी योग्य लड़के नहीं मिल पाते। फलस्वरूप अयोग्य बूढ़े कई विवाह किए हुये अधेड़ व्यक्तियों के साथ झख मारकर विवाह करना पड़ता है। इन परिवारों में ब्याही लड़कियों के जीवन भी उतने ही नारकीय बनते हैं। उच्च कुल में श्रेष्ठतायें होनी चाहिए, परम्परागत जातिवाद के कारण उनका तो बिल्कुल अन्त-सा हो गया। ढोल की पोल बची है। ऊपर से स्रवण कहे जाने वाले लोगों के आचार-विचार, रहन-सहन बड़े ही निम्न-स्तर का अधोगामी बना हुआ है।

वर्ण-भेद सामाजिक व्यवस्था के लिये उपयोगी है, वहाँ उसके सैद्धाँतिक आधार का बना रहना भी आवश्यक है, अन्यथा जातियों का बिल्कुल भी महत्व नहीं रह जाता। जातियों का संगठन गुण-कर्म स्वभाव की दृष्टि से हुआ है, अब जब उच्च जातियों में उच्च गुण-कर्म स्वभाव का अभाव ही है, तो उच्च वर्ण कैसे? निम्न वर्ण के लोग यदि उत्कृष्ट स्वभाव, शिक्षा और रहन-सहन वाले हों तो उन्हें उच्च प्रतिष्ठा क्यों न मिले?

शास्त्रकार इस संबंध में बिल्कुल स्पष्ट रहे हैं। अनेक उदाहरण हैं जिनमें जातियों का वर्गीकरण वंशानुगत क्रम से नहीं गुण, कर्म स्वभाव के विभाग के अनुसार किया गया है। शाँतिपर्व (महाभारत) में मोक्ष धर्म के संदर्भ में भृगु मुनि से प्रश्न किया गया है- ‘‘हे मुनि! काम, क्रोध, लोभ, भय, चिंता, क्षुधा और श्रम आदि सभी बातें एक-सी हैं, तब वर्णभेद क्यों मानते हैं? पसीना, भूख, कफ, पित्त, रक्त सबके शरीर में रहते हैं, तब एक वर्ण दूसरे वर्ण अलग क्यों माना जाता है?’’

भृगु इस पर उत्तर देते हैं- ‘‘एक ब्राह्मण ही वर्ण था इसलिए वर्णों में कोई विशेष अन्तर नहीं है। पहले ब्रह्मा ने एक ही वर्ण के लोग पैदा किए फिर उन्हें गुण-कर्म-स्वभाव के अनुसार विभिन्न वर्णों में विभक्त किया।’’

महाभारत में ही अन्यत्र कहा है-

एक वर्णमिदं पूर्व विश्वमासीद युधिष्ठिर। कर्म क्रिया विभेदेन चातुर्वण्यं प्रतिष्ठितं॥ 42।18 8

अर्थात्- हे युधिष्ठिर पहले एक ही वर्ण था गुण-कर्म और स्वभाव के अनुसार पीछे उसी के चार वर्ण किये गये।

अध्याय 42 भविष्य पुराण के ब्रह्मपर्व में लिखा है- ‘‘यदि एक पिता के चार पुत्र हैं, तो उन चारों की एक ही जाति होनी चाहिये। परमेश्वर सबका पिता है। इसलिये मनुष्य समाज में जाति भेद का कोई औचित्य नहीं है।’’ कठोपनिषद् में इस बात को पूरी तरह स्पष्ट किया गया है। गीता में भगवान कृष्ण ने स्वयं कहा है- ‘‘चातुर्वर्णं मया सृष्टं गुण कर्म विभागशः’’ ‘‘हे अर्जुन! मैंने गुण, कर्म, स्वभाव से चार वर्णों की सृष्टि की है।’’

प्राचीनकाल में सामान्य रीति-रिवाजों में ही नहीं विवाहादि तक में वर्णाश्रम धर्म को मान्यता उपरोक्त सिद्धाँत के आधार पर ही थी। आज की अपेक्षा पूर्वज अधिक धार्मिक थे, पर वे सामाजिक मामलों में पूर्णतया बुद्धि, विवेक और सिद्धान्तवादी थे। आज जैसी विचार संकीर्णता उनमें न थी। उच्च गुण, कर्म, स्वभाव वाली कन्या के लिये वर भी उच्च गुण, कर्म, स्वभाव वाला ढूंढ़ा जाता था। वर्ण में गुणों की दृष्टि से मेल होना आवश्यक था, जाति की दृष्टि से नहीं। अन्तर्जातीय विवाहों का प्रचलन इसी बात की पुष्टि है। कन्याओं के लिये ही नहीं लड़कों के लिए वधुयें भी उच्च गुणों वाली ढूंढ़ी जाती थीं और यदि उपयुक्त कन्या उपलब्ध हो जाती थी, तो निम्न कुल में पैदा होने पर भी उससे प्रसन्नतापूर्वक विवाह कर लिया जाता था। वह विवाह सामाजिक मान्यता प्राप्त होते थे। इससे लोगों की श्रेष्ठता वरीयता में कोई अन्तर नहीं आता था। इसके सैंकड़ों उदाहरण हैं-

व्यास और पराशर मुनि अपने समय में नहीं अब भी विद्वानों में प्रतिष्ठित और पूज्य हैं, उनका जन्म निम्न वर्ण की कन्याओं से हुआ। व्यास की माँ कैवर्त्त पुत्री थी। पाराशर की माँ श्वपाक (चांडाल) के घर जन्मीं थी। श्रृंगी ऋषि कश्यप, वेद ताण्ड्य, कृप, कक्षीवान, कमाठादि, मतंग दोण, दत्त, आयु, यवक्रीत, मात्स्य, द्रपद, यह सभी ऋषि नीच कुलों में उत्पन्न हुए, वाद में तपश्चर्या के प्रभाव से इन्होंने ऋषित्व प्राप्त किया।

चित्रमुख नामक वैश्य ने अपनी पुत्री वशिष्ठ के पौत्र पाराशर को ब्याही थी। वीतहव्य क्षत्रिय था उसने ब्राह्मण कन्या से विवाह किया। राजा नीप क्षत्रिय ने शुक्राचार्य ब्राह्मण की कन्या हात्वी से विवाह किया। ब्रह्मदत्त इन्हीं के पुत्र थे इन्हीं के कुल में मुद्गल का जन्म हुआ जिनसे ब्राह्मणों का मौद्गल्य गोत्र चला।

वशिष्ठ मुनि गणिका पुत्र थे, उन्होंने कर्दम क्षत्रिय की पुत्री अरुन्धती से विवाह किया। इनका पुत्र शक्ति हुआ जिसने चाण्डाल कन्या अदृश्यन्ति से विवाह किया। प्रियव्रत क्षत्रिय था उसने विश्वकर्मा की पुत्री बर्हिष्मति से विवाह किया। ययाति क्षत्रिय ने शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी से विवाह किया। महामुनि मातंग की माता ब्राह्मणी थी और पिता नाई कुल में जन्मे थे।

प्रतिलोम विवाहों की तरह अनुलोम विवाह भी शास्त्र मर्यादा से बाहर नहीं थे। विश्वामित्र ने देवलोक की अप्सरा मेनका से संबंध स्थापित किया। उनकी पुत्री शकुन्तला दुष्यन्त को ब्याही गई, जिनके पुत्र भरत के नाम पर इस देश का नाम भारतवर्ष पड़ा। श्रृंगी ब्राह्मण ने राजा दशरथ की पुत्री और भगवान श्री रामचन्द्र की बहन शांता से विवाह किया। प्रियव्रत क्षत्रिय की कन्या उर्जस्वती से शुक्राचार्य ने विवाह किया। जमदग्नि ने सूर्यवंशी कन्या रेणुका से विवाह किया। परशुराम उन्हीं के पुत्र थे। भगवान कृष्ण यदुकुल में वे उन्होंने अपनी बुआ सुभद्रा का विवाह क्षत्रिय कुल में अर्जुन के साथ किया।

क्षत्रिय कन्या पद्मा, लोपामुद्रा ने क्रमशः पिप्पलाद और अगत्स्य से विवाह किया। यह दोनों ही ब्राह्मण थे। मान्धाता क्षत्रिय की कन्या से सौभरि और जनश्रुति की कन्या से रयिक्व ब्राह्मण के विवाह होने का उल्लेख मिलता है। इन सब विवाहों में गुण, कर्म, स्वभाव के अनुरूप जोड़ी की उपयुक्तता ही थी। जहाँ यह समझा जाता था कि विपरीत कुल में जन्म लेने पर भी किसी कन्या और वर के गुणों में समानता है वहाँ उनका संबंध होने में कोई आपत्ति न की जाती है, न हीं किसी को जाति से बहिष्कृत किया जाता था। ऐसे विवाहों को इस दृष्टि से और भी समर्थन मिल जाता था कि योग्य दम्पत्ति होने से सन्तान भी तेजस्वी, साहसी, वीर और बलवान होगा। तब ऐसा ही विश्वास किया जाता था। कुन्ती ने अपने पुत्र भीम का विवाह हिडम्बा राक्षसी से करने की अनुमति देते हुए कहा था, इनकी जो सन्तान होगी, वह बहुत वीर और बलवान होगी। वीर घटोत्कच्छ इन्हीं का पुत्र था और महाभारत काल के अद्वितीय वीरों में गिना जाता था।

समाज को उत्कृष्ट नागरिक प्रदान करने का उद्देश्य रख कर इस तरह के अन्तर्जातीय विवाहों का प्रचलन हो तब तो कहना ही क्या पर यदि सामान्य दृष्टिकोण से भी अन्तर्जातीय विवाहों का प्रचलन होता है, तो कन्याओं के लिए योग्य वर ढूंढ़ने और दहेज के कुचक्र से बचने की आधी समस्या का तुरंत अन्त हो सकता है।

शक, हूण और यूची आदि अनेकों जातियाँ हिन्दू जाति में इस तरह विलीन हो गई कि ढूंढ़ने पर भी आज उनका स्वतंत्र अस्तित्व नहीं मिल सकता। अन्य जातियाँ विभेद हिन्दू बन सकती हैं तो अन्तर्जातीय भेदभाव क्यों रखा जाय? क्यों न इस तरह समाज में अन्तर्जातीय विवाहों का प्रचलन किया जाये। यदि ऐसा होता है तो वह शास्त्र-सम्मत, बुद्धि-संगत और सिद्धाँत रूप से उपयोगी ही रहेगा जिसकी शास्त्रकारों ने पुष्टि की है।


गायत्री द्वारा प्राण-शक्ति का अभिवर्धन


अपनों से अपनी बात-

अप्रैल अंक दो बार पढ़ें और कुछ ठोस कदम उठायें

अप्रैल का पिछला- अंक न्यूनतम उपासना अंक था। उसमें एक ऐसी उपासना पद्धति का निर्धारण किया गया है, जो व्यस्त लोगों के लिए भी थोड़े समय में सम्पन्न हो सकने वाली और अति सरल है। कष्टसाध्य अनेक बंधन प्रतिबंधों से जुड़ी हुई- बहुत समय लेने वाली साधनायें अक्सर सर्वसाधारण के उपर्युक्त नहीं होती। उन्हें कोई विरले ही श्रद्धावान और सुविधा सम्पन्न व्यक्ति कर पाते हैं। अधिकाँश को तो रोजी-रोटी और अन्यान्य समस्याओं में उलझे रह कर व्यस्त जीवन जीना पड़ता है। ऐसे लोगों के लिए सरल साधना पद्धति ही उपयुक्त पड़ती है। अतएव गत अंक में एक ऐसी सर्वांगपूर्ण सुनिश्चित साधना पद्धति का निर्धारण किया गया है। जो हर स्तर के व्यक्ति के लिए सरल पड़े और बिना किसी विशेष अड़चन के उसे भली प्रकार पूरा किया जा सके।

जप, ध्यान, पाठ, पूजन की प्रक्रिया हम बहुत दिनों से बताते-सिखाते चले आ रहे हैं। उसे अनेकों ने अपनाया भी है यह प्रसन्नता की बात है। उपासना प्रथम चरण है, साधना उससे अगला। उपासना अति सरल है। थोड़ी देर पालथी मार कर बैठना और कुछ समय भगवान का नाम स्मरण एवं पूजन वन्दन कर लेना कोई ऐसा भार नहीं है जिसे उठाया न जा सके। रुचि न हो तो फुरसत न मिलने की बात भी कही जा सकती है पर यदि तनिक भी इच्छा और रुझान हो तो दस-बीस मिनट- घण्टा, आध घण्टा बड़ी सरलता से लगाया जा सकता है। हम में अधिकाँश व्यक्ति अनेक निरर्थक कार्यों में समय बर्बाद करते रहते हैं। समय का मूल्य समझने वाले एक-एक क्षण का उपयोग करने वाले- निरंतर तत्परतापूर्वक कर्म पथ पर चलते रहने वाले लोग कितने हैं? अपने अभागे देश में समय की बर्बादी कितनी होती है यह सर्वविदित है। निरर्थक घिस-घिस में ही जीवन का अधिकाँश भाग चला जाता है। मंद गति से छुट-पुट काम करते हुए लोग अक्सर दो-चार घण्टे में हो सकने वाले काम में प्रायः सारा दिन गंवा देते हैं। ऐसी स्थिति में भजन-पूजन के लिए घण्टा, आध-घण्टा, दस-बीस मिनट निकाल सकना उनके लिए कुछ भी कठिन नहीं होना चाहिये, जिनके मन में इस ओर थोड़ी-सी भी सच्ची लग्न एवं रुझान हो। बाल संभालने और टीप-टाप बनाने में जितना समय लगता है, उतने से भी कम समय में नियमित उपासना आसानी से हो सकती है। वह निश्चय ही अति सरल प्रक्रिया है- इसलिए प्रथम शिक्षण उसी का किया गया है।

इसका अर्थ यह नहीं कि गाड़ी एक पहिये से ही चलती रहेगी। प्रथम चरण उठने के बाद दूसरा चरण उठना ही चाहिये। मंजिल इसी क्रम से पूरी हो सकती है। कोई एक पैर ही आगे बढ़ा ले पर दूसरा उठाने-बढ़ाने को तैयार न हो तो फिर प्रगति का क्रम बनेगा ही कैसे? उपासना के साथ साधना अविच्छिन्न रूप से जुड़ी हुई है। अध्यात्म का पथ इन दोनों पहियों पर ही गतिशील होता है। जो भजन तो बहुत करता है पर चारित्रिक एवं भावनात्मक विकास की ओर से विमुख है, उसका भजन कदाचित ही कुछ प्रयोजन पूरा करे। रोटी और पानी का- दिन और रात का- जिस प्रकार जोड़ा है, वैसे ही उपासना और साना का ‘अन्योन्य’ संबंध है। एक-दूसरे पर पूर्णतया अवलंबित है। दोनों के समन्वय से ही समग्र प्रतिफल उत्पन्न होता है।

यह ठीक है कि आरंभिक छात्र को सर्वप्रथम सरल प्रक्रिया आरंभ कराई जाती है और इसके बाद धीरे-धीरे कठिन पाठ याद करने को कहा जाता है। अध्यात्म पथ पर अग्रसर होने का क्रम भी यही है। सबसे पहले साधक को थोड़ा भजन-पूजन बता दिया जाता है। उसे वह आसानी से कर लेता है क्योंकि उस निर्धारित कर्मकाण्ड को पूरा कर लेने के अतिरिक्त जीवन-क्रम में कोई हेर-फेर करने की कठिनाई उसमें जुड़ी नहीं रहती। इतना अभ्यास होने के बाद व्रत, उपवास, तप, तितीक्षा, संयम, ब्रह्मचर्य, दान, पुण्य आदि ऐसे साधन बताये जाते हैं, जो कष्टसाध्य प्रतीत होते हैं और साहस धैर्य एवं श्रद्धा के बल पर ही उन्हें पूरा किया जा सकता है। उपासना का प्रथम चरण भजन-पूजन अति सरल और तप त्याग कुछ कठिन है पर अभ्यास से उन्हें भी पूरा कर ला जाता है।

आत्मिक प्रगति की मंजिल में दूसरा चरण साधना का है। साधना का अर्थ है मन व शरीर की गति विधियों का निरीक्षण नियंत्रण एवं नये सिरे से निर्माण। यह कार्य अपेक्षाकृत कठिन तो है पर है अनिवार्य। उसकी न तो उपेक्षा की जा सकती है और उससे बच कर किसी सीधी पगडंडी को पकड़ा जा सकता है। जीवनोद्देश्य का राजमार्ग ‘साधना’ के पुल पर होकर ही जाता है। इसे छोड़ने से आत्मिक प्रगति के पथ का अपरिहार्य गतिरोध उत्पन्न हो जाता है।

कितने ही व्यक्ति ऐसे देखने में आते हैं जो भजन-पूजन में तत्परतापूर्वक लगे रहते हैं किन्तु जीवन निर्माण की साधना अनावश्यक समझते हैं। ऐसे लोगों की अन्तःभूमिका का यदि निरीक्षण, विश्लेषण किया जाय तो वह खाली-खोखली ही दिखाई देती है। लगता है, उनका श्रम निरर्थक चला गया। चन्दन वह जिसमें सुगंध आये। सोना वह जिसमें जंग न लगे। आग वह जो गरम हो। भजन वह जो जीवन क्रम में उत्कृष्टता का समावेश करे- व्यक्तित्व को प्रखर एवं परिष्कृत बनाये। गंदा और घटिया स्तर का जीवन जीने वाला व्यक्ति ईश्वर के परिचय और प्रकाश से दूर ही माना जायेगा भले ही वह कितनी ही संख्या में माला क्यों न जपता हो।

आत्म-मार्ग के तत्त्वदर्शी सदा ही यह प्रशिक्षण करते रहे हैं कि श्रेयार्थी को उपासना के साथ-साथ साधना को भी जुड़ा रखना चाहिये। तभी उसे सन्तोषजनक लाभ मिल सकेगा। यही प्रयत्न अपना भी रहा है। उपासना को हम प्रारंभिक चरण मानते रहे हैं और उसकी पूर्ति के लिए साधना का समावेश करने के लिए पूरा-पूरा जोर देते रहे हैं। यही ऋषि प्रणीत सनातन एवं आर्ष-परम्परा है। जो भजन-पूजन का अलंकारिक, अत्यधिक महात्म्य बता कर- उतने में ही स्वर्ग मुक्ति, ऋद्धि-सिद्ध मिल जाने की बात कहते हैं, उनका प्रतिपादन अशास्त्रीय अनार्ष एवं अवैज्ञानिक है। यही कारण है कि अधूरा भजन करने वाले खाली हाथ रहते और अन्ततः अश्रद्धालु बनते देखे जाते हैं।

हमारे साथी सहचर भी ऐसे ही भटकने वाले लोगों की संख्या बढ़ाते रहें यह उचित नहीं। हमें न केवल अपना ही कल्याण करना है वरन् दूसरों के लिए प्रकाश पुञ्ज भी बनना है। स्वयं मंजिल पर पहुँचना है और दूसरों का पथ-प्रशस्त करना है। इसलिये अपने लिए उचित यही है कि एक सर्वांगपूर्ण- सुव्यवस्थित प्रक्रिया अपनायें। स्वयं अभीष्ट लाभ प्राप्त करें और दूसरों के लिए ऐसे आकर्षण उत्पन्न करें, जिसके लिए अनायास ही सब की अभिरुचि उत्पन्न हो सके।

गत अंक में ऐसी ही सरल किन्तु सर्वांगपूर्ण पद्धति प्रस्तुत की गई है। जप-पूजन की प्रक्रिया बहुत पहले- आरंभिक शिखा प्रक्रिया के साथ ही बता दी गई थी। परिजनों ने उसे अपना भी लिया है। अब वह समय आ गया, जब कि दूसरा कदम भी उठाया जाय। उपासना में साधना का समन्वय कर सकने की स्थिति में अब अपने परिजन पहुँच चुके हैं, इसलिये उनके कंधों की मजबूती जाँच लेने के बाद यह उपयुक्त ही प्रतीत हुआ कि वह आधार भी जोड़ लेने के लिए कहा जाय जो आत्मिक प्रगति के लिये अनिवार्य रूप से आवश्यक है।

वर्षा के दिनों में खेत जोतने पर अधिक ध्यान दिया जाता है। आसौज के महीने तक जुताई पूरा हो जाती है, तब कई महीने से चल रहे कार्यक्रम में थोड़ा हेर-फेर करना पड़ता है। बीज बोने का एक नया सिलसिला शुरू करते हैं। इसके बाद सिंचाई, निराई, गुड़ाई, रखवाली आदि की वे नई जिम्मेदारी उठानी पड़ती हैं, जो वर्षा के दिनों में जुताई आरंभ करते समय तनिक भी आवश्यक न थीं। यह तर्क ठीक नहीं कि अषाढ़ से आश्विन तक लम्बे समय में जबकि खेत जोतने की सीधी-सीधी कार्य पद्धति अपनाये रहे तो अब अगले महीनों में हेर-फेर का झंझट क्यों उठाया जाय?

प्रगति की मंजिल में समय-समय पर आवश्यक परिवर्तन करने होते हैं। विद्यार्थी प्रारंभिक कक्षाओं में जो पढ़ता है- वह पढ़ाई ऊंची कक्षाओं में नहीं चलती रह सकती। बचपन की पोशाक जवानी एवं बुढ़ापे में काम नहीं आ सकती। आत्मिक प्रगति के आरंभ काल में थोड़ा-सा जप-पाठ बताया गया हो तो यह नहीं कहना चाहिये कि उतना ही पर्याप्त है। आगे इसमें कुछ और क्यों जोड़ा जाय? चिड़िया का बच्चा आरंभ में पैरों से चलता है पर कुछ बड़ा होने पर उड़ने भी लगता है। उपासना का विकास साधना में होना आवश्यक है। इन दोनों पंखों के आधार पर ही हम आत्मिक प्रगति के उन्मुक्त आकाश में ठीक तरह उड़ सकते हैं।

अखण्ड-ज्योति परिवार के हर सदस्य से इस सर्वांगपूर्ण साधना पद्धति का अनुरोध गत अंक में किया गया है और आशा की गई कि उसे अपनाने का तत्परतापूर्वक प्रयत्न किया जायेगा। साधना और उपासना की समन्वित प्रक्रिया को अपनाने वाले 24 हजार साधकों द्वारा इस युग के अभूतपूर्व महत्तम गायत्री महापुरश्चरण को पूरा किया जाना है। पुरश्चरणों में जप-संख्या की पूर्ति ही पर्याप्त नहीं होती वरन् कर्ताओं का स्तर प्रधान रहता है। उत्कृष्ट स्तर के साधक ही किसी मंत्र का समुचित प्रतिफल उत्पन्न कर सकते हैं। प्रतिदिन 24 लक्ष जप वाला महत्तम गायत्री महापुरश्चरण ऐसे ही साधकों द्वारा सम्पन्न होना है जो उपासना को ही पद्धति न मान बैठे हों वरन् साधना को भी अनिवार्य रूप से आवश्यक समझ कर उसके लिए अभीष्ट पुरुषार्थ करने के लिए कटिबद्ध हों।

अपने परिवार में अधिकाँश परिजन ऊँचे स्तर के हैं। पूर्व जन्मों के सुसंस्कार पर्याप्त मात्रा में जिनके पास संचित हैं उन्हें ही विशेष प्रयत्न के साथ ढूंढ़ा और एक माला में पिरोया गया है। अखण्ड-ज्योति परिवार का यही स्वरूप है। ऐसे लोगों से यह आशा सहज ही की जा सकती है कि वे उपयुक्त समय पर आवश्यक उद्बोधन पाकर अपने उच्चस्तरीय कर्त्तव्यों के प्रति सजग होंगे और जो करना ही चाहिये उसे करने में आनाकानी न करेंगे। कितने ही परिजन लम्बे समय से जप-भजन करते चले आ रहे हैं। कितने ही ऐसे भी हैं जिनने इस दिशा में सक्रिय कदम नहीं उठाये हैं।

समय आ पहुँचा है कि सभी को अब सजग एवं तत्पर हो जाना चाहिये। नव-निर्माण की- युग परिवर्तन की- आवश्यकता अपना हल चाहती है। समय की पुकार प्रबुद्ध आत्माओं का आह्वान कर रही है। यह एक ऐतिहासिक संधि-बेला है। परीक्षा की ऐसी घड़ियाँ कभी-कभी ही- हजारों वर्ष बाद आती हैं। जो उससे चूक जाते हैं उन्हें पछताने के अतिरिक्त और कुछ हाथ नहीं आता। परीक्षा के दिन आना-कानी करने वाले विद्यार्थी को पूरे एक वर्ष पश्चात्ताप करना पड़ता है। यह अवसर भी ऐसा ही है, जिसमें हर प्रबुद्ध परिजन को अपना आध्यात्मिक उत्थान करना चाहिये। साधना युक्त उपासना में संलग्न होना चाहिये। सक्रिय कार्यकर्ताओं को ‘ऋत्विज’ की जिम्मेदारी उठानी चाहिये। ‘महत्तम गायत्री महापुरश्चरण’ में भागीदार बनना चाहिये और नव-निर्माण के लिए प्रबुद्ध आत्माओं के कंधों पर आये हुए उत्तरदायित्वों को आगे बढ़कर स्वीकार, शिरोधार्य करना चाहिये।

अप्रैल का अंक हर सदस्य को दो बार पढ़ना चाहिये और आगामी गायत्री-जयंती 7 जून 68 तक अपने द्वारा उठाये हुए कदम की सूचना दे देनी चाहिये ताकि गुरुपूर्णिमा 10 जुलाई 68 तक अंतिम गणना करके यह निश्चित किया जा सके कि निष्ठावान परिजनों का अपना परिवार कितना बड़ा है। भविष्य में हमारा सारा ध्यान उसी अपने छोटे परिवार को सींचने सम्भालने पर केन्द्रीभूत रहेगा।


VigyapanSuchana

ट्रेक्टों का मूल्य

प्रेस संबंधी अधिकांश वस्तुओं तथा मजदूरी की अधिकाधिक वृद्धि के कारण अब 20 पैसे वाले ट्रेक्टों का मूल्य 25 पैसे तथा 32 पैसे वाले कविता, कहानी तथा जीवन चरित्र के ट्रेक्टों का 40 पैसा कर दिया गया है।


आत्म-स्मरण

(बलराम सिंह परिहार)


आत्म-स्मरण (Kavita)

ऋषियों के तप, त्याग, तेज, गुण मानव धर्म महान् की। भूली हुई कहानी फिर से याद करो बलिदान की॥

जिस धरती को धर्म का सूरज देता सदा प्रकाश है, जिस धरती को कर्म और कौशल में ही विश्वास है, जिस धरती में ज्ञान और गुण का ही रहा निवास है, जिस धरती ने मानवता की फैलाई मृदु हास है,

वह है भारतवर्ष कि जिसने ज्योति जलाई ज्ञान की। भूली हुई कहानी फिर से याद करो बलिदान की॥

इसी भूमि में हरिश्चन्द्र से सत्यव्रती ने जन्म लिया, अपने व्रत की रक्षा के हित अपना सब उत्सर्ग किया, घर छोड़ा, सुख-वैभव छोड़ा राज-पाट तक छोड़ दिया, सत से डिगे न राव रंच भी जग से नाता तोड़ लिया,

बच दिया परिवार अन्त तक रखी शान निज बान की। भूली हुई कहानी फिर से याद करो बलिदान की॥

शिवि, दधीचि, मोरध्वज की यश गाथाओं की पुण्य मही, राष्ट्र हेतु वैभव सब त्यागा नचिकेता वह हुये यहीं, दानी कर्ण सदृश इस जग में हुआ न कोई और कहीं, दान किया सर्वस्व न मुख से कभी भूलकर किया ‘नहीं’,

निष्ठाओं के लिए कभी परवाह नहीं की प्रान की। भूली हुई कहानी फिर से याद करो बलिदान की॥

जब भी हुई जरूरत जैसी इस धरती ने लाल दिये, राम, कृष्ण, गौतम, गांधी राणा से मनुज-मराल दिये, तत्वज्ञान भाषा संस्कृति के इसने अमित कमाल किये, मरे धर्म के लिये विहंसकर, जिये धर्म के लिये जिये,

पौरुष से रेखायें मेटीं विधि के लिखे विधान की। भूली हुई कहानी फिर से याद करो बलिदान की॥

सुत शावको, उसी जननी के आज तुम्हारी है बारी, करना है निर्माण देश का आज करो वह तैयारी, यह जौहर का युग है अब तक पूर्ण व्यवस्था है सारी, हाथ तुम्हारे ही लगनी है नये सृजन की चिनगारी,

फिर से तुमको ही लिखनी है विमल कथा निर्माण की। भूली हुई कहानी फिर से याद करो बलिदान की॥

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*समाप्त*