धर्म न तो अवैज्ञानिक है और न अनुपयोगी

धर्म की आधार-शिला अति सुदृढ़ है। उसे नृतत्व विज्ञान की समस्त दिशा को ध्यान में रखकर तत्व-दर्शियों ने इस प्रकार बनाया है कि उसकी उपयोगिता में कहीं त्रुटि न हो जाय। व्यक्तिगत सुख-शाँति, प्रगति और समृद्धि का आधार धर्म है। समाज की सुव्यवस्था भी व्यक्तियों से धर्म-परायण कर्त्तव्य बुद्धि पर निर्भर है। धार्मिकता का अवलम्बन लेकर कोई घाटे में नहीं रहता, वरन् अपनी सर्वांगीण प्रगति का पथ ही प्रशस्त करता है।

धार्मिक मान्यतायें न तो अवैज्ञानिक हैं और न काल्पनिक। किन्हीं साम्प्रदायिक रीति-रिवाजों अथवा कथा किम्वदन्तियों को धर्म का परिवर्तनशील कलेवर कहा जा सकता है। उसमें सुधार और परिष्कार होता रहता है। धर्म की मूल आत्मा-द्वारा उच्च मानवीय सद्गुणों का प्रतिपादन होना-सनातन एवं शाश्वत है। न तो उसकी उपयोगिता से इनकार किया जा सकता है और न उसे अदूरदर्शितापूर्ण ठहराया जा सकता है। सच तो यह है कि मनुष्य की सामाजिकता धर्म सिद्धान्तों पर ही टिकी हुई है।

धर्म का तात्पर्य है- सदाचरण, सज्जनता, संयम, न्याय, करुणा और सेवा। मानव प्रकृति में इन सत् तत्वों को समाविष्ट बनाये रहने के लिये धर्म मान्यताओं को मजबूती से पकड़े रहना पड़ता है। मनुष्य जाति की प्रगति उसकी इसी प्रवृत्ति के कारण सम्भव हो सकी है। यदि व्यक्ति अधार्मिक, अनैतिक एवं उद्धत मान्यतायें अपनाले तो अपना ही नहीं समस्त समाज का अस्तित्व खतरे में पड़ जायेगा। -स्वामी विवेकानन्द,


परमात्मा की प्राप्ति सच्चे प्रेम द्वारा ही सम्भव है

पूजा, पाठ, जप, ध्यान, अनुष्ठान आदि जो भी क्रियायें की जाती हैं, उनका मूल उद्देश्य परमात्मा के प्रति अपनी निष्ठा को गहरा करना होता है। ज्यों-ज्यों निष्ठा गहरी होती जाती है, त्यों-त्यों परमात्मा के प्रति प्रेम भाव बढ़ता जाता है। यही प्रेम भाव धीरे-धीरे परिपक्व होकर भक्ति का रूप धारण कर लेता है। इस प्रकार उपासना का मूल तात्पर्य ईश्वर के प्रति प्रेम का विकास करना ही है।

परमात्मा के प्रति विकसित प्रेम जब अपनी चरमावधि में पहुँचता है, तब वह केवल परमात्मा तक ही सीमित नहीं रहता। वह विश्व रूप परमात्मा तक फैल जाता है। सच्चे भक्त और परमात्मा के सच्चे प्रेमी की पहचान यही है कि उसका प्रेम-भाव संसार के सारे जीवों के प्रति प्रवाहित होता रहता है। कोई व्यक्ति कितनी ही पूजा और ध्यान, जप आदि क्यों न करता हो, पर उसका प्रेम भाव संकुचित हो, उसका प्रसार प्राणि मात्र तक न हुआ हो तो उसे भक्त नहीं माना जा सकता।

भगवान् का भक्त, परमात्मा को प्रेम करने वाला अपनी आत्मा और समाज के नैतिक नियमों को भी प्यार करता है। कारण यह होता है कि नैतिक नियमों में आदर्शवाद का समन्वय होता है और आदर्शवाद का ही एक व्यावहारिक रूप होता है। अध्यात्म का सम्बन्ध आत्मा और आत्मा का परमात्मा से होता है। संसार से परमात्मा की और उन्मुख होने का यह एक क्रम है। भगवान का भक्त इस पावन क्रम से विमुख नहीं हो सकता, जो परमात्मा को प्रेम करेगा वह उससे सम्बन्धित इस क्रम में भी प्रेम-भाव रखेगा।

जिसने आदर्शवाद को प्रेम करना सीख लिया उसने मानो परमात्मा को पाने का सूत्र पकड़ लिया। परमात्मा के मिलन में अपार आनन्द होता है। लेकिन उसकी ओर ले आने वाले इस क्रम में भी कम आनन्द नहीं होता। जो आत्मा द्वारा स्वीकृत समाज के नैतिक नियमों का पालन करता रहता है, आदर्शवाद का व्यवहार करता है, वह समाज की दृष्टि में ऊँचा उठ जाता है। समाज उससे प्रेम करने लगता है। ऐसे भाग्यवान व्यक्ति जहाँ रहते हैं उसके आस पास का वातावरण स्वर्गीय भावों से भरा रहता है। कटुता और कलुष का उसके समीप कोई स्थान नहीं होता। जिस प्रकार का निर्विघ्न और निर्विरोध आनन्द परमात्मा के मिलन से मिलता है, उसी प्रकार का आनंद आदर्शवाद के निर्वाह में प्राप्त होता है।

स्वर्ग की उपलब्धि किसी लोक विशेष की उपलब्धि नहीं है। वह अनुकूल और पावन परिस्थितियों का एक धार्मिक नाम है। जहाँ सुन्दर, सुखदायक और कर्त्तव्यपूर्ण परिस्थितियाँ होंगी, वह स्वर्ग ही माना जायेगा। ईश्वर के सच्चे भक्त में प्रेम की जो पावन धारा बहती रहती है, उसके आधार पर उसके चारों ओर की परिस्थितियाँ भी प्रेमपूर्ण बनी रहती हैं। इसलिये भक्त-जन हर समय स्वर्ग में ही निवास किया करते हैं।

साधना का मन्तव्य ईश्वरीय प्रेम प्राप्त करना ही माना गया है। यदि साधना सच्ची है तो उसका परिणाम प्रेम के रूप में ही मिलना चाहिये। सच्चे साधक का हृदय प्रेम की धारा से परिप्लावित हो जाता है। वह प्राणि-मात्र में अपनी आत्मा के दर्शन करने लगता है। आत्मीयता और उदारता प्रेम का ही तो रूप होता है। आत्मीयता का भाव मिलते ही संसार का दुःख-सुख साधक को अपना दुःख-सुख मालूम होने लगता है।

जिस प्रकार कुयें में मुख डालकर आवाज करने से उसी प्रकार की आवाज कुयें से निकलकर कानों में गूँजने लगती है, उसी प्रकार साधक के हृदय का प्रेम परमात्मा अथवा उसके व्यक्त रूप प्राणियों को प्राप्त होकर पुनः प्रेमी के पास ही वापस आकर उसे आत्म-विभोर कर देता है। इसका यह आशय नहीं कि परमात्मा अथवा प्राणी उसके प्रेम को स्वीकार नहीं करते और वह वैसे ही वापस कर दिया जाता है। बल्कि इसका आशय यह है कि जब साधक परमात्मा अथवा प्राणियों को प्रेम करता है तो उनकी ओर से भी प्रेम पाता है।

उदारता और त्याग सच्चे प्रेम की अनिवार्य विशेषतायें हैं। जिसके प्रति प्रेम का भाव रखा जाता है, उसके प्रति कुछ त्याग करने की इच्छा होती है। प्रेम का स्तर जितना ऊँचा होता है त्याग का भाव भी उसी अनुपात से बढ़ जाता है। भक्त भगवान के लिये, प्रेमी अपने प्रेमास्पद के लिये सर्वस्व त्याग कर देने को तत्पर रहते हैं। प्राणिमात्र से प्रेम होने के कारण साधक सदा ही सबके प्रति त्याग करने और कष्ट उठाने के लिये तैयार रहता है। समय आने पर वह त्याग करता भी है। तथापि सामान्य स्थिति में वह संसार की सेवा तो करता है और अपने उदार भाव का परिचय देता ही रहता है। उदारता और त्याग से रहित व्यक्ति को साधक नहीं माना जा सकता। प्रेम और त्याग का यह जीता जागता उदाहरण भील बालक एकलव्य के चरित्र में पूरी तरह से देखने को मिलता है।

भील बालक एकलव्य धनुर्वेद सीखना चाहता था। उस समय धनुर्वेद के आचार्य द्रोणाचार्य थे। वे कौरवों और पाण्डवों को धनुर्विद्या सिखाने के लिये नित्य ही जंगल में ले जाया करते थे। एक दिन एकलव्य उनसे जंगल में मिला और शिष्य रूप में स्वीकार कर धनुर्विद्या सिखलाने की प्रार्थना की। किन्तु जंगली जाति का होने के कारण द्रोणाचार्य ने उसे धनुर्विद्या की शिक्षा देने से इनकार कर दिया।

किन्तु एकलव्य इससे निराश न हुआ। उसने मिट्टी से द्रोणाचार्य की एक मूर्ति बनाई और उसी में अपनी हार्दिक श्रद्धा स्थापित कर धनुर्वेद का स्वयं अभ्यास करने लगा। उसकी अपनी श्रद्धा और निष्ठा फलीभूत हुई। वह उस समय का अद्वितीय धनुर्धर बन गया। और बाद में गुरु के कहने से अपना अँगूठा काटकर दे दिया।

मिट्टी के गुरु ने उसे कोई सहायता न की। सहायता की, एकलव्य की अपनी गुरु-भक्ति ने जो कि उसके हृदय में निवास कर रही थी। इसके विपरीत यदि द्रोणाचार्य स्वयं भी उसे धनुर्विद्या सिखाते और एकलव्य के हृदय में भक्ति भाव न होता तो वह जरा भी प्रगति न कर पाता। कौरवों के साथ यही घटित हुआ। उनमें गुरु भक्ति की कमी थी, निष्ठा निर्बल थी, इसीलिये वर्णानुपर्यी द्रोण के सिखलाने पर वे अच्छे धनुर्धारी न बन सके। जबकि उन्हीं के साथ अर्जुन के हृदय में गुरु के प्रति सच्ची भक्ति और निष्ठा थी, जिससे वह अपने युग का यशस्वी और अमोघ धनुर्धर बन सका।

यही बात ईश्वर उपासना के सम्बन्ध में है। उसकी उपासना चाहे साकार अथवा निराकार रूप में की जाये, यदि श्रद्धा, भक्ति और निष्ठा आदि की, प्रेम प्रवण भाव की कमी रहेगी तो उपासना का कोई भी प्रकार सफल न होगा। इससे स्पष्ट है कि उपासना में पूजा पाठ, ध्यान, जप, तप आदि की उतनी महत्ता नहीं है जितनी की सच्ची प्रेम भावना की। उपासना के रूप में साधक जो भी जप तप, पूजा-पाठ करता है, उससे वह अपनी निष्ठा और प्रेमभावना को ही परिष्कृत एवं विकसित करता है। इस दिशा में वह जितनी जितनी प्रगति करता जाता है, उतना-उतना ही ईश्वरीय अनुभूति का अधिकारी बनता जाता है। साधना का सार प्रेम अथवा भक्ति को ही माना गया है, बाह्य आडम्बर को नहीं।

साधक यदि इस बात की खबर रखना चाहता है कि उसकी साधना समुचित रूप से विकास की और बढ़ रही है या नहीं, तो उसे यह देखना होगा कि उसके हृदय में प्रेम भावना की वृद्धि हो रही है या नहीं। पूजा पाठ तो वह बहुत करता है, किन्तु उसकी भावना उसी प्रकार नीरस और कठोर बनी हुई है तो उसे समझ लेना चाहिये कि उसकी साधना निष्फल जा रही है। विकास की दिशा में वह एक कदम भी आगे नहीं बढ़ रहा है। और यदि वह यह अनुभव करता है कि उसके हृदय में आत्मीयता, उदारता और प्रेम की भावना जाग रही है, तो उसे विश्वस्त रूप से अपने पथ पर चलते जाना चाहिये। उसकी साधना सफलता की ओर जा रही होगी।

सच्ची तथा समुचित साधना का लक्षण यही है कि साधक के अन्तःकरण में प्रेम की सुधारा प्रवाहित होती चले। उसे दूसरों का दुःख सुख अपना जैसा अनुभव हो और प्राणि मात्र में अपनी आत्मा और अपनी आत्मा में प्राणि मात्र की आत्मा का दर्शन करे। जिस दिन साधक इस सार्वभौमिक प्रेम की अनुभूति करने लगेगा, उसी दिन से वह परमात्म मिलन की परिधि में प्रवेश कर जायेगा।

छल-कपट, ईर्ष्या-द्वेष आदि दोष प्रेम-भाव के बाधक होने के कारण साधक को आगे बढ़ने से रोकते हैं। अपने उद्देश्य की प्राप्ति के लिये साधक को इन पर विजय प्राप्त करना ही होगा। हृदय को परिष्कृत एवं विकसित बनाने के उपाय यही हैं कि या तो अपने हृदय में प्रेम भावना का विकास किया जाय व उक्त दोषों का दमन किया जाय। इन दोनों उपायों का परिणाम एक ही होगा। प्रेम का विकास करने में प्रेम में वृद्धि होगी और दोषों का दमन हो जायेगा। और यदि दोषों का दमन कर दिया जायेगा तो अवरोधों के टूट जाने से हृदय में प्रेम भावना का विकास स्वयं ही होने लगेगा। तात्पर्य यह कि ईश्वर मिलन और आध्यात्मिक सफलता के लिये साधक के हृदय में प्रेम भाव का विकास तथा अभिवृद्धि होनी चाहिये। उसके लिये उपाय कोई भी क्यों न अपनाया जाये।

त्यागपूर्ण सेवा-भाव को प्रेम का प्राण माना गया है। प्रकट और अनुभव कितना हि क्यों न किया जाय, किन्तु यदि उसमें त्याग और सेवा भाव नहीं है तो वह सच्चा प्रेम नहीं है। वह अनुभूति आसक्ति अथवा मोह का ही एक रूप होगी। मोह अथवा आसक्ति आध्यात्मिक अवगुण है। इनके रहते हुये विकास की वाँछित दिशा में नहीं बढ़ा जा सकता। प्रेम आत्मा की शक्ति है और मोह अथवा आसक्ति उसकी निर्बलता, निर्बलता को साथ लेकर ईश्वर मिलन के उच्च पथ पर चढ़ सकना सम्भव नहीं।

प्रेम की वंचना में मोह अथवा आसक्ति का परिपालन न होने लगे, साधक को इस बात की सावधानी रखनी चाहिये। यदि उसे किसी आस्पद से प्रेम तो अनुभव होता है पर उसके लिये त्याग करने की, उसकी सेवा करने की जिज्ञासा नहीं होती तो विश्वास कर लेना चाहिये कि वह अपनी आत्मा में प्रेम नहीं मोह का ही विकास कर रहा है। ऐसी दशा में उसे तुरन्त सावधान होकर अपना सुधार कर लेना चाहिये।

जिसके प्रति सच्चा-प्रेम भाव होगा उसके प्रति त्याग और सेवा का भाव उदय होना स्वाभाविक है। सच्चा प्रेमी अपने को कष्ट देकर, अपने को निर्लोभ और निःस्वार्थ रख अपने प्रेम पात्र को अधिकाधिक सुख पहुंचाने का प्रयत्न करता है। अपने प्रेमास्पद ईश्वर को प्रसन्न करने, उसे सुख पहुँचाने के लिये उसकी भी सेवा करनी होगी, उसके लिये त्याग करना होगा। किन्तु ईश्वर स्थूल रूप में तो प्राप्त नहीं होता और न उसे सीधे-सीधे किसी के त्याग की आवश्यकता होती है। ऐसी दशा में कैसे तो उसे सुख पहुँचाया जा सकता है और कैसे प्रसन्न किया जा सकता है?

इसका एक सरल और सुन्दर-सा उपाय यही है कि हम ईश्वर के प्रति जिस त्याग को करना चाहते है, उसकी जो सेवा करना चाहते है, उसका लाभ उसके अंश संसार के अन्य जीवों को पहुंचायें। संसार के सारे जीवों में परमात्मा का निवास है। उनको दी हुई हर सेवा उस एक ईश्वर को ही प्राप्त होती है। प्राणियों की सेवा ईश्वर की ही सेवा है और उनके लिये किया हुआ हर त्याग उसके प्रति ही किया गया माना जायेगा।

इस प्रकार ईश्वर मिलन के उपाय को इस प्रकार सारांश में समझकर उसकी साधना करनी चाहिये। जप-तप, पूजा-पाठ, योग-अनुष्ठान द्वारा अपनी आत्मा में प्रेम भाव का विकास करते हुए, उसकी सच्चाई के प्रमाण में सेवा पूर्ण त्याग का लाभ प्राणि-मात्र के देते हुए परमात्मा को प्रसन्न करते रहना चाहिये। धीरे-धीरे वह समय आ जायेगा, जब परमात्मा प्रसन्न होगा और साधक को अपनी करुणामयी, आनंदमयी और कल्याणमयी गोद में स्थान देगा। जीवन की सारी साधन सफल हो जायेगी और उसके सारे मूल्य एक साथ मिल जायेंगे।


Quotation

एक दिन मैं बहुत कोमल मखमली गद्दों पर सोया, तब भी वैसे ही स्वप्न आ रहे थे, जैसे सूनी धरती पर आते हैं, तब से मुझे मखमली गद्दों का कोई आकर्षण नहीं रहा, अब मुझे उसे देखने का चाव जाग गया है, जहाँ से यह स्वप्न आते हैं, जहाँ से निरन्तर परावाणी प्रस्फुटित होती है। -जिब्रान


ज्ञान ही मनुष्य की वास्तविक शक्ति

ज्ञान को ही मनुष्य की वास्तविक शक्ति माना गया है। वास्तविक वस्तु वह है जो सदैव रहने वाली हो संसार में हर वस्तु काल पाकर नष्ट हो जाती है। धन नष्ट हो जाता है, तन जर्जर हो जाता है, साथी और सहयोगी छूट जाते हैं। केवल ज्ञान ही एक ऐसा अक्षय तत्व है, जो कहीं भी किसी अवस्था और किसी काल में मनुष्य का साथ नहीं छोड़ता।

धन, जन को भी मनुष्य की एक शक्ति माना गया है। किन्तु यह उसकी वास्तविक शक्तियाँ नहीं है। इनका भी मूल स्रोत ज्ञान ही है। ज्ञान के आधार पर ही धन की उपलब्धि होती है और ज्ञान के बल पर ही समाज में लोगों को अपना सहायक तथा सहयोगी बनाया जाता है। अज्ञानी व्यक्ति के लिये संसार की कोई वस्तु सम्भव नहीं। धन के लिये व्यापार किया जाता है, नौकरी और शिल्पों का अवलंबन किया जाता है, कला-कौशल की सिद्धि की जाती है। किन्तु इनकी उपलब्धि से पूर्व मनुष्य को इनके योग्य ज्ञान का अर्जन करना पड़ता है। यदि वह इन उपायों के विषय में अज्ञानी बना रहे तो किसी भी प्रकार इन विशेषताओं की सिद्धि नहीं कर सकता और तब फलस्वरूप धन से सर्वथा वंचित ही रह जायेगा।

यही बात जन शक्ति के विषय में भी कही जा सकती है। जन-बल को भी अपने पक्ष में करने के लिये ज्ञान की आवश्यकता है। जब किसी को जन-मानस का ज्ञान होगा, उसकी आवश्यकताओं और समस्याओं की जानकारी होगी, उसे सत्पथ दिखला सकने की योग्यता होगी, उसके दुख-दर्द और कष्ट-क्लेशों के निवारण कर सकने की बुद्धि होगी, तभी जन-बल पर अपनी छाप छोड़कर उसे अपने पक्ष में किया जा सकता है। जनता का सहज स्वभाव होता है कि वह अपने सच्चे हितैषी का ही पक्ष धारण किया करती है। जनता का हित किस बात में है और सम्पादन किस प्रकार किया जा सकता है, इसका ज्ञान हुये बिना ऐसा कौन है, जो जन-बल को अपनी शक्ति बना सके। जन-बल का उपार्जन भी ज्ञान द्वारा ही सम्भव हो सकता है।

किसी शक्ति के उपलब्ध हो जाने के बाद भी उसकी रक्षा और उसके उपयोग के लिये भी ज्ञान की आवश्यकता होती है। ज्ञान के अभाव में शक्ति का होना न होना बराबर होता है। उसका कोई लाभ अथवा कोई भी आनन्द नहीं उठाया जा सकता। उदाहरण के लिये मान लिया जाये कि कोई उपार्जन अथवा उत्तराधिकार में बहुत सा धन पा जाता है या किसी संयोगवश उसे अकस्मात मिल जाता है, तो क्या यह माना जा सकता कि वह धन शक्ति वाला हो गया। क्योंकि धन में स्वयं अपनी कोई शक्ति नहीं होती है, वह शक्ति तभी बन पाती है, जब उसके साथ उसके प्रयोग अथवा उपयोग में ज्ञान का समावेश होता है।

यदि मनुष्य यह न जानता हो कि वह उस धन से कौन सा व्यवसाय करे, किस जन-हितैषी संस्था को दान दे, समाज के लाभ के लिये कौन-सी क्या स्थापना करे। वह धन द्वारा किस प्रकार दीन-दुखियों, अपाहिजों अथवा आवश्यकता ग्रस्त लोगों की सहायता करे। उसको व्यय कर किस प्रकार का रहन सहन बनाये, क्या और किस प्रकार के कामों में उसको लगाये, जिससे समाज में उसका आदर हो, आत्मा में प्रकाश हो और परमार्थ में रुचिता बढ़े-तो वह धन उसकी क्या शक्ति बनकर सहायक हो सकेगा।

बल्कि अज्ञान की अवस्था में या तो वह धन को आबद्ध रखकर समाज और राष्ट्र की प्रगति रोकेगा, चोर डाकुओं और ठगों को आकर्षित करेगा अथवा ऊल-जलूल विधि से उसका अपव्यय एवं अनुपयोग करके समाज में विकृतियाँ पैदा करेगा, अपना जीवन बिगाड़ेगा। यह तो मनुष्य की वास्तविक शक्ति का लक्षण नहीं है। धन की शक्ति में वास्तविकता तभी आती है, जब उसके संग्रह एवं उपयोग का ठीक-ठीक ज्ञान होता है। नहीं तो अपमार्गों द्वारा संचित धन मनुष्य की निर्बलता और आशंका का हेतु बनता है। दुरुपयोग द्वारा भी यह समाज में अपवाद ईर्ष्या, द्वेष आदि का लक्ष्य बनकर निर्बलता की ओर बढ़ता है। इसलिये यह मानना ही होगा कि वास्तविक शक्ति धन में होती है और न जन में, वह होती है, उस ज्ञान में जो इन उपलब्धियों के उपार्जन एवं व्यय का नियन्त्रण किया करता है।

शारीरिक शक्ति को तो प्रायः लोग निर्विवाद रूप से शक्ति ही मानते हैं। किन्तु वास्तविकता यही है कि इस शक्ति को भी नियन्त्रित तथा उपयोग करने का ठीक ज्ञान न हो तो इसका कोई लाभ नहीं होता। शारीरिक शक्ति को कहाँ लगाया जाये, उसका उपयोग किस प्रकार किया जाये-यदि इस बात की ठीक जानकारी न हो तो या तो वह शक्ति किसी शोषक के अर्थ लग जायेगी अथवा कोई कुटिल उसका उपयोग कर किसी संकट में उलझा देगा। यदि एक बार ऐसा न भी हो तो भी किसी सृजन में न लगकर या तो वह योंही नष्ट हो जायेगी अथवा किसी ऐसे काम में स्थापित हो जायेगी, जिसका मूल्य नगण्यतम ही होगा।

ज्ञान-हीन शारीरिक शक्ति, पशु शक्ति होती है। वह अपना और दूसरों का बहुत कुछ अनिष्ट कर सकती है। अपना अनिष्ट तो इस तरह कि वह बल के अभिमान में कोई ऐसा प्रदर्शन करने का प्रयत्न कर सकता है, जिसमें अंग-भंग हो जाये, शक्तिमद से प्रेरित होकर किसी से अकारण उलझकर संकट उत्पन्न कर सकता है। अपनी धृष्टता और उद्दण्डता से समाज को विरोधी बना सकता है। सदुपयोग का ज्ञान न होने से चुप न रहने वाली शारीरिक शक्ति गलत रास्तों पर जा सकती है। और इसी अबूझ तथा अनियन्त्रित प्रवाह में पड़कर ही तो बहुत से लोग अपराधी, अत्याचारी तथा दुःसाहसी बन जाया करते हैं और तब उनकी वह शक्ति विविध प्रकार के भयों का कारण बन जाती है। इसलिये तन, मन, धन और जन-शक्ति को वास्तविक शक्ति न मानकर उस ज्ञान को ही मानना चाहिये, जो उसके उपार्जन, नियन्त्रण तथा उपयोग का संचालन किया करता है।

मनुष्य की वास्तविक शक्ति ज्ञान है- पर वास्तविक ज्ञान क्या है? इसको जान लेना भी नितान्त आवश्यक है। ऐसा किये बिना मनुष्य किसी भी जानकारी को ज्ञान समझकर पथ-भ्रान्त हो सकता है। यदि वह भौतिक विभूतियों के उपार्जन के उपायों की जानकारी को ही ज्ञान समझ ले अथवा किन्हीं गलत क्रियाओं की विधि या अपने किसी अंध-विश्वास को ही ज्ञान समझ बैठे तब तो उसका कल्याण ही नष्ट हो जाये और वह अज्ञान के अन्धकार में ही भटकता रह जाये।

शास्त्रकारों और मनीषियों ने जिस वास्तविक ज्ञान का संचय करने का निर्देश किया है, वह स्कूल और कालेजों में मिलने वाली शिक्षा नहीं है। और न इसे संचय करके ज्ञान प्राप्ति का सन्तोष कर लेना चाहिये। स्कूली शिक्षा तो लौकिक जीवन को साधन सम्पन्न बनाने और वास्तविक ज्ञान की ओर अग्रसर होने का एक माध्यम मात्र है, वास्तविक ज्ञान नहीं है।

बहुत से लोग शास्त्र और धार्मिक ग्रन्थों में दिये नियमों की जानकारी ही को ज्ञान मान बैठते हैं और बहुत से लोग महात्माओं अथवा आर्ष-ग्रंथों के वाक्यों को रट लेना भर ही ज्ञान समझ बैठते हैं। किन्तु यह सब बातें भी वास्तविक ज्ञान की प्राप्ति के लिये साधन मात्र हैं। वास्तविक ज्ञान नहीं है। शास्त्रों का स्वाध्याय और महात्माओं का सत्संग वास्तविक ज्ञान प्राप्त करने में सहायक तो हो सकता है, किन्तु इसका उपार्जन तो मनुष्य को स्वयं ही आत्म-चिन्तन एवं मनन द्वारा ही करना पड़ता है। पुस्तक पढ़ लेने अथवा किसी महात्मा का कथन सुन लेने भर से वास्तविक ज्ञान की उपलब्धि नहीं हो सकती। वास्तविक ज्ञात तो आत्मानुभूति के द्वारा ही सम्भव हो सकता है।

आज के वैज्ञानिक काल में ज्ञान के विषय में और भी अधिक भ्रम फैला हुआ है। लोग वैज्ञानिक शोधों, आविष्कारों और अन्वेषणों को ही वास्तविक ज्ञान मानकर मदमत्त हो रहे हैं। प्रकाश, ताप, विद्युत, जल, वायु, गति और चुम्बकत्व के ज्ञान और उसके उपयोग, प्रयोग को ही सच्चा ज्ञान समझकर अज्ञान के घने अंधकार में धँसते चले जा रहे हैं। जबकि वास्तविकता यह है कि आज सारा वैज्ञानिक ज्ञान विशुद्ध भौतिक विभूतियों को प्राप्त करने के लिये साधन भर हैं। और आज के इन वैज्ञानिक साधनों ने मनुष्य को इस सीमा तक सत्य भ्रान्त कर दिया है कि वह आत्मा परमात्मा को भूलकर बुरी तरह नास्तिक बनता जा रहा है। जिसकी परिसमाप्ति, यदि शीघ्र ही अज्ञान और विज्ञान विषयक अन्ध विश्वास का सुधार न किया गया, भयानक ध्वंस में ही होगी। जिस ज्ञान का परिणाम विनाश हो उसे वास्तविक ज्ञान किस प्रकार माना जा सकता है।

वास्तविक ज्ञान का लक्षण तो वह स्थिर बुद्धि और उसका निर्देशन है, जिसे पाकर मनुष्य अन्धकार से प्रकाश की ओर, मृत्यु से अमृत की ओर, असत्य से सत्य की ओर, अशाँति से शाँति की ओर और स्वार्थ से परमार्थ की ओर उन्मुख होता है। सच्चे ज्ञान में न तो असन्तोष होता है और न लिप्साजन्य आवश्यकतायें। उसकी प्राप्ति तो आत्मज्ञता, आत्म-प्रतिष्ठा और आत्म-विश्वास का ही हेतु होती है। जिस ज्ञान से इन दिव्य विभूतियों एवं प्रेरणाओं की प्राप्ति नहीं होती, उसे वास्तविक ज्ञान मान लेना बड़ी भूल होगी, फिर चाहे वह ज्ञान करतलगत ब्राह्मण के समान ही क्यों न हो।

इस प्रकार का वास्तविक ज्ञान किसी प्रकार का भौतिक ज्ञान नहीं शुद्ध आध्यात्मिक ज्ञान ही हो सकता है। और साँसारिक कर्म करते हुए भी उसे प्राप्त करने का उपाय करते ही रहना चाहिये। फिर इसके लिये चाहे स्वाध्याय करना पड़े, सत्संग अथवा चिन्तन मनन करना पड़े, आराधना, उपासना अथवा पूजा-पाठ करना पड़े। वास्तविक ज्ञान के बिना न तो जीवन में सच्ची शान्ति मिलती है और न उसको परकल्याण प्राप्त होता है।

वास्तविक ज्ञान ही जीवन का सार और आत्मा का प्रकाश है। एकमात्र सच्चा ज्ञान ही लोक-परलोक में अक्षय तत्व और सच्चा साथी है, बाकी सब कुछ नश्वर तथा मिथ्या है। तथापि ज्ञानवान् पुरुष के लिये यह मिथ्या जगत् और नश्वर पदार्थ भी आत्म-दर्पण में आत्मस्वरूप के रूप में प्रतिविम्बित होते हुए यथार्थ रूप में प्रतीत होने लगते हैं। ज्ञान का अमृत न केवल मनुष्य को ही बल्कि उसके जीवन जगत् को भी अमरत्व प्रदान कर देता है। ज्ञान की महिमा अपार एवं अकथनीय है।

ज्ञान की प्राप्ति ही मनुष्य का वास्तविक लक्ष्य है। अस्तु, इस सत्य को अच्छी प्रकार हृदयंगम करके सच्चे ज्ञान को प्राप्त करने का हर सम्भव उपाय करते ही रहना चाहिये कि तन, धन, अथवा जन की शक्ति वास्तविक शक्ति नहीं है और उनकी प्राप्ति का उपाय ही ज्ञान है। यह सब भौतिक जीवन में साधनों का समावेश करने के माध्यम मात्र हैं। वास्तविक ज्ञान आध्यात्मिक ज्ञान ही है और वही मनुष्य की सच्ची शक्ति भी है, जिसके सहारे वह आत्मा तक और आत्मा से परमात्मा तक पहुँचकर उस सुख, उस शाँति और उस सन्तोष का अक्षय भण्डार हस्तगत कर सकता है, जिसको वह जन्म-जन्म से खोज रहा है किन्तु पा नहीं रहा है।


ज्ञानी-जन

एक था कुत्ता, सड़ गये थे कान जिसके, कई दरवाजों में घूमा जहाँ भी गया वहाँ दुत्कारा गया। दिन भर घूमा रोटी के लिये कौर मिले दो, मार और फटकार का कोई ठिकाना नहीं था। इन्द्रियों को लिप्सा वें दर दर भटकता, हुआ अज्ञानी व्यक्ति भी इसी प्रकार सर्वत्र तिरस्कार हो पाता है।

एक था हाथी, जंगल में मस्त घूमा करता था, न कोई अभाव था, न दुःख। एक दिन एक हाथिन की आसक्ति में आ गया। वासना-भूत हाथी को हथिनी उधर ले गई जहाँ शिकारी जाल बिछाये बैठे थे। हाथी पकड़ लिया गया। न रही वह मस्ती, न रहा वह मुक्त आनन्द। वासना में फँसा अज्ञानी मनुष्य भी उसी प्रकार अपने शाश्वत आनन्द से भटक कर दुःखों के जाल में जा गिरता है।

एक था कछुआ, कुछ शिकारियों ने उसे दूर से देखा और आक्रमण के लिये दौड़े। कछुआ समझदार था, ज्ञानी था अंग-प्रत्यंगों को समेट कर खाल के भीतर ही छिप रहा। शिकारी इधर-उधर ढूँढ़ते ही रहे। कछुये की तरह जो ज्ञानी-जन बाहरी मोह आकर्षणों से बचकर आत्मा का अनुसरण करते हैं, उनकी सब प्रकार रक्षा होती है।


हमारी जीवन नीति आदर्शवाद से प्रेरित हो

भौतिक वृत्ति और आध्यात्मिक वृत्ति दो अलग-अलग वृत्तियाँ नहीं हैं। वे एक ही वृत्ति के दो दृष्टिकोण हैं। प्रायः लोग धन-दौलत और यश-कीर्ति आदि चाहने वालों को भौतिकवादी मानते हैं और इनसे दूर रहकर उपासना करने वालों को आध्यात्मिक व्यक्ति समझते हैं। इस बात को संक्षेप में इस प्रकार भी कहा जा सकता है कि जो व्यक्ति संसार और उसकी उपलब्धियों, सम्पत्तियों में रमना चाहता है, वह भौतिकवादी है और जो संसार का त्याग कर ईश्वर तक सीमित रहता है, वह अध्यात्मवादी होता है।

यह कितनी अबुद्धिगम्य मान्यता है। सोचने की बात है कि क्या संसार ईश्वर से भिन्न है या ईश्वर संसार से पृथक् है। दोनों ही तो एक दूसरे में रमे हुए हैं। संसार अव्यक्त ईश्वर के व्यक्त अस्तित्व के सिवाय और कुछ भी तो नहीं है। अस्तु भौतिकवाद को साँसारिक और अध्यात्मवाद को ईश्वरीय विषय मानकर अलग-अलग करना ठीक नहीं। वे एक ही विषय के दो पक्ष हैं, एक ही बात के दो दृष्टि बिन्दु हैं। दृष्टिकोण के परिवर्तन से भौतिकवाद के नाम से पुकारा जाने वाला विषय आध्यात्मिक बन सकता है और आध्यात्मिक नाम से पुकारने वाला भौतिक।

खाने-कमाने, भोगने बरतने और जीने-मरने के साधारण क्रम में यदि उत्कृष्ट भाव और श्रेष्ठ मन्तव्य का समावेश कर दिया जाय तो यही भौतिक जीवन आध्यात्मिक जीवन बन जायेगा और यदि उपासना अथवा साधना के क्रम में यश, वैभव, पूजा-प्रतिष्ठा की कामना का सन्निवेश कर दिया जाय तो वह आध्यात्मिक क्रम घोर भौतिकवाद बन जायेगा। भौतिकवाद अथवा अध्यात्मवाद अलग-अलग दो वाद नहीं हैं, बल्कि एक ही जीवन में जोड़े दो दृष्टि अथवा विचार कोणों की संज्ञायें मात्र हैं।

सामान्यतः संसार का त्याग और आत्मा की आराधना एक कठिन कार्य है। सबके लिये सम्भव नहीं आत्म-साधना का सामान्य तथा सरल मार्ग यही है कि अपने साधारण जीवन क्रम में उस उत्कृष्ट दृष्टिकोण को जोड़ लिया जाय जो भौतिकवाद को अध्यात्मवाद बना दे। ऐसा करने से संसार क्रम में न तो बाधा पड़ेगी और अध्यात्म की भी आराधना होती चलेगी।

इस प्रसंग को समझने और अपनाने के लिये जीवन के प्रत्येक चरण पर क्रमपूर्वक विचार करते हुए चला जाये। सबसे पहले मानव जीवन के आधार आजीविका को लिया जाये। आजीविका का आशय है- उन साधनों को संचित करना, जिनके आधार पर जीवन यात्रा सम्भव बनाई जाती है। इसको धनार्जन भी कह सकते हैं। जीवन यापन के लिये धन सब को कमाना पड़ता है। कमाई करने के लिये कोई मजदूरी करता है, कोई नौकरी करता है तो कोई व्यापार का सहारा लेता है। धनार्जन के यह सारे काम भौतिकवाद से सम्बन्ध रखते हैं। किन्तु इन कार्यों में आदर्शवाद का समावेश कर दिया जाय तो यही काम आध्यात्मिक बन जायेंगे। उपार्जन में पहला आदर्श तो होना चाहिये, उत्साह और प्रसन्नता का। बहुधा श्रम-साध्य होने के कारण उपार्जन को अरुचिकर कार्य माना जाता है। प्रायः लोगों की इच्छा रहती है कि कुछ ऐसा हो जाता कि मेहनत तो कम से कम करनी पड़े, लेकिन धन ज्यादा से ज्यादा मिल जाये। यह विचार आदर्श-हीन हैं।

हर काम, चाहे वह बड़ा हो अथवा छोटा, पूरी लगन और पूरी तत्परता से करना चाहिये। उसे करने में प्रसन्नता और उत्साह का अनुभव करना चाहिये। जो लोग मजबूरी समझकर रोते-झींकते हुए आजीविका के कामों को बेगार की तरह करते हैं, वे उसके आध्यात्मिक लाभ से वंचित हो जाते हैं। किन्तु जो उसे जीवन का एक आवश्यक कर्तव्य मानकर उत्साह और प्रसन्नता से करते हैं, वे इस डडडड जाये? विचार का विषय यह नहीं है। विचार का विषय यह है कि वह ही खाया जाये जो शारीरिक, मानसिक बौद्धिक तथा आत्मिक चारों प्रकार के स्वास्थ्यों के लिये हर प्रकार से हितकर हो। संसार में बहुत-सी हितकर वस्तुयें ऐसी हो सकती हैं, जो बहुतों के लिये सुलभ हो सकती हैं और बहुतों के लिये सुलभ नहीं भी हो सकती हैं। इस विषय में यह नियम बनाया जाये कि खाने के लिये वे वस्तुयें ही चुनी जायें, जिनका पा सकना अपनी आय तथा स्थिति के अंतर्गत सम्भव हो अब वह चाहे सूखी रोटी व सूखे चने ही क्यों न हों। अपने उपलब्ध उस भोजन को उतनी ही रुचि, प्रसन्नता, श्रद्धा तथा गौरव के साथ ही खाना चाहिये, जिस प्रकार कोई छप्पन व्यंजनों का भोग लगाता है। स्वाद तथा व्यंजनता भोजन की वस्तु ने नहीं अपनी परिपक्व क्षुधा तथा लोलुप वृत्ति में होती है। अपने साधारणतम भोजन में व्यंजनता उत्पन्न करने का छोटा-सा उपाय है संतोष तथा दूसरे के भोजन के प्रति दृष्टिपात न करना। जो उसे प्राप्त है, उसे मुबारक हो जो मुझे प्राप्त है, मुझे मुबारक रहे। भोजन के प्रति इस प्रकार का तटस्थ भाव रखना उस साधारण सी भौतिक क्रिया में आध्यात्मिकता का समावेश कर लेना है।

वे लोग भी यदि त्याग और संतोष के आधार पर अपने भोजन में समाजानुरूप सामान्य भोजन का व्रत ले लेते और पालन करते हैं, जो संसार की सारी सम्पदाओं के योग्य क्षमता रखते हैं तो उनका यह कार्य एक उन्नत अध्यात्मवाद का सम्पादन होगा। इसके अतिरिक्त भोजन का समय, मात्रा तथा प्रकार क्रमों का निश्चित कर लेना आध्यात्मिक भाव को और भी बढ़ा देगा।

वस्त्रों के विषय में भी यही बात है। अपनी अथवा सामाजिक स्थिति के अनुसार ही वस्त्र पहनने और रखने चाहिये। उनको सरल तथा स्वच्छ ही रक्खा जाय। प्रदर्शन, फैशन अथवा दम्भ के वशीभूत होकर वस्त्रों का उपयोग न कर आवश्यकता के अनुसार उनका उपयोग करके संतोष तथा गौरव अनुभव करना उस सामान्य सी भौतिक क्रिया को आध्यात्मिक बना लेना है।

निवास के विषय में कोठियों, हवेलियों तथा बँगलों की संख्या तथा शान का परित्याग कर यदि सामान्य से घर में रुचि तथा सुन्दरतापूर्ण ढंग से रहा जाये तो वह छोटी-सी भौतिक आवश्यकता अध्यात्म के रंग में रंग जाये। जिन्हें कोठियाँ, हवेलियाँ और बँगले उपलब्ध हों वे भी अपनी व्यक्तिगत आवश्यकता से अधिक स्थान न घेरें। अपने भर का स्थान लेकर शेष का लाभ दूसरों को उठाने का अवसर दें, इस प्रकार का त्याग मनुष्य की भौतिक तृष्णा का परिहास करता है, जिससे मनुष्य जमीन, जायदाद के उन झगड़ों से बच जाता है, जो शाँति और सुख के बाधक होते हैं। अभौतिक भावना के आधार पर मानसिक प्रसन्नता और आत्मिक शाँति की सुरक्षा करना आध्यात्मिक उपक्रम ही है। ऐसा करने वाले निश्चित रूप से आध्यात्मिक व्यक्ति ही माने जायेंगे।

ब्याह-शादी, जन्म आदि काम-काजों के यदि धनाढ्यता का प्रदर्शन न कर अपने को अहंकार अथवा ऋण भार से बचाये रक्खा जाये और सारे कामों को आन्तरिक प्रसन्नता के साथ उस स्तर से किया जाये, जो अपने समग्र समाज का आर्थिक स्तर हो तो वह सामान्य-सा भौतिक कर्तव्य भी आध्यात्मिक भाव में बदल जाये। उत्सवों और समारोहों के अवसर पर सादगी बरतने वाले लोग दूसरों को ईर्ष्या, द्वेष तथा स्पर्धा की हानिकारक वृत्ति से बचाते हैं। जो स्वयं ईर्ष्यालु तथा निर्द्वेष है साथ ही दूसरों को भी इन पापों से बचने में सहायता देता है, निश्चय ही वह आध्यात्मिक साधना में रत है और उसके फल का अधिकारी भी।

मनोरंजन मानव-जीवन की महती आवश्यकता है। इससे जीवन में नव-चेतना, ताजगी और नव-स्फूर्ति आती है। किन्तु अश्लील, अभद्र अथवा भोग प्रधान मनोरंजन पतनकारी होते हैं। यदि इस आवश्यकता की पूर्ति सत् श्रवण, सद् ध्यान सदुद्देश्यों और सत्संग द्वारा की जाये तो निश्चय ही यह भौतिक आवश्यकता एवं आध्यात्मिक साधना बन जायेगी।

इस प्रकार यदि मनुष्य अपने सामान्य भौतिक क्रम में भी उच्च और कल्याणकारी दृष्टिकोण का समावेश कर ईमानदारी से उस पर आचरण करे तो उसके भौतिक जीवन और आध्यात्मिक जीवन में कोई अन्तर ही न रह जाये। दोनों मिल-जुलकर एक रूप ही हो जायें।


विराट्-ब्रह्म का भावनात्मक पार-दर्शन

एक बार देवी कौशल्या ने शिशु राम को स्नान कराया। पलने में बालक को पौढ़ा कर स्वयं स्नान किया। पूजा की, नैवेद्य चढ़ाया। फिर पाकशाला गईं। वहाँ बालक राम को भोजन करते देखा तो वह सशंकित हो उठीं। राम को पलने में छोड़ आई हूँ, वह यहाँ कैसे? तब वह पुनः पलने के पास आईं। वहाँ राम सानन्द सोये थे। दो स्थानों पर एक ही बालक। कौशल्या घबरा गई। तब-

देखराबा मातहिं निज अद्भुत रूप अखंड। रोम रोम प्रति लगो कोटि कोटि ब्रह्माँड॥

अगनित रवि शशि सिव चतुरानन। बहुगिरि सरित सिंधु महिकानन॥

काल कर्म गुन ग्यान सुभाऊ। सोउ देखा जो सुना न काऊ॥

भगवान का यह विराट् स्वरूप देखकर कौशल्या भयभीत हो उठीं। उन्होंने स्तुति की हे प्रभो! वह ज्ञान दो वह प्रकाश दो कि मैं शारीरिक सुख, स्वार्थ, अहंता, मोहमाया की भावनाओं के विरत होकर धर्मपरायण बनूँ और अन्त में आपको प्राप्त करूं।

एक बार कौरवों पाण्डवों में युद्ध का बनौवा बन गया। दोनों सेवायें महाभारत के लिये समुपस्थित हो गईं। अर्जुन ने दोनों सेनाओं के मध्य खड़े होकर देखा कि इस युद्ध में मुझे अपने ही भाई, बन्धु, पिता, साले, श्वसुर से युद्ध करना है तो उसका धैर्य जाता रहा, उसने अन्याय और अनीति के आगे हार मानकर गाँडीव फेंक दिया। न्याय के लिये युद्धरत होने, कर्म करने की दृढ़ता नष्ट हो गई।

अर्जुन का वह नपुँसक रूप देखकर भगवान् कृष्ण ने अपना विराट् स्वरूप दिखाया-

पश्यमे पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहस्त्रशः। नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतानि च॥

पश्यादित्यान्वसून्रुद्रानश्विनौ मरुतस्तथा। बहून्यदृष्टपूर्वाणि पश्याश्चर्याणि भारत॥ -गीता 11। 6,7

अर्थ- हे अर्जुन! मेरे सैकड़ों हजारों नाना प्रकार के और अनेक वर्ण तथा आकृति वाले अलौकिक रूपों को देख, मुझ में ही 12 आदित्य, 8 वसु और 11 रुद्रों को दोनों अश्विनी कुमार और 49 मरुद्गणों को देख। जो पहले कभी नहीं देखा वह भी देख।

अर्जुन ने देखा-

यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतंगा- विशन्ति नाशाय समृऊवेगाः।

तथैव नाशाय विशन्ति लोका- स्तवान्ति वस्त्राणि समृद्धवेगा॥ - 11।29

अर्थात्- जिस तरह पतंगा अज्ञानवश होकर नष्ट होने के लिये प्रज्ज्वलित अग्नि में कूद जाता है, वैसे ही सारा संसार भगवान् के शरीर में नष्ट हो रहा है।

परमात्मा के मुख में अत्यन्त विराट् विश्व का दिग्दर्शन कर अर्जुन की मोह निद्रा टूटी और उसने धर्म के लिये युद्ध करना स्वीकार किया।

एक थे, काकभुसुण्डि जी! उन्हें सर्वज्ञानी होने का दम्भ था। अपनी ही बात उन्हें सत्य लगती, पराई नहीं। ऐसे व्यक्ति को शास्त्र और उपनिषद् क्या ज्ञान दे सकते हैं, जो अपने को आप परिपूर्ण माने बैठा हो?

एक दिन उन्हें आशंका हुई मनुष्य शरीर में ब्रह्म का अवतरण कैसे हो सकता है। वे अवध आये। राम की परीक्षा लेने। फिर काकभुसुंडि के ही शब्दों में -

मोहि बिलोकि राम मुसुकाहीं- बिहंसत तुरत गयऊ मुख माहीं॥

उदर माझ सुनु अंडज राया। देखेऊँ बहु ब्रह्मांड निकाया॥

कोटिन्ह चतुरान गौरीसा। अगनित उडगन कवि रजनीसा॥

अगणित लोकपाल जम काला। अगनित भूधर भूमि विसाला॥

सागर सरि सर विपिन अपारा। नाना भाँति सृष्टि विस्तारा॥

जो नहिं देखा नहिं सुना, जो मनहू न समाइ। सो सब अद्भुत देखेऊं बरनिं कवनि विधि जाइ॥

“जो कुछ ब्रह्मांड में है वह सब पिंड (शरीर) में है” यदि शास्त्रकार का यह कथन है सत्य है तो उपरोक्त घटनायें भी सत्य होंगी। पर बुद्धि इन बातों को ग्रहण नहीं करती। पेट में आकाश-पाताल, सूर्य-चन्द्रमा के दर्शन कुछ असम्भव-सा लगता है, यदि भगवान् कृष्ण का यह कथन -

न तु माँ शक्यते द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुषा। दिंव्यं ददामिं वे चक्षुः पश्य में योगमैश्वरम्॥ - 11। 8

अर्थ- हे अर्जुन! तू मुझे (मेरे विराट् स्वरूप को) इन प्राकृत आंखों से नहीं देख सकता, इसलिये मैं तुझे दिव्य चक्षु प्रदान करता हूँ, उससे तू मेरे विस्तार प्रभाव और योग शक्ति को देख।

इस दिव्य चक्षु का दूसरा नाम ज्ञान भी हो सकता है। मनुष्य के अन्तःकरण में यदि दम्भ न हो कुछ जानने लिये उसकी जिज्ञासा मृत न हुई हो तो वह प्रत्येक पदार्थ का विश्लेषण करके देख सकता है और संसार के निर्माण एवं व्यवस्था की विचित्र किन्तु नियमबद्ध परम्परा को जान और समझ सकता है। संसार में भारी हलचल हो रही है, जिसे हमारी आंखें देख नहीं पातीं। लोगों का जीवन बहुत संकीर्ण हो गया। ज्ञान वाली आँख फूट गई, जिससे सर्वत्र अज्ञान ही अज्ञान, मोह ही मोह, भ्रम, माया, कामना-वासना और स्वार्थ की परिस्थिति बढ़ रही है। मनुष्य इस संकीर्णता में कीट-पतंगों का सा गन्दा ओर गलीज लड़ाई-झगड़े वाला संघर्ष और अशाँति वाला जीवन बिताता है। वह दिव्यता नहीं आ पाती, जो जीवन में प्रेम, विश्वास, आत्म-भाव, विश्व-बन्धुत्व, न्याय धर्म, शील, सच्चरित्रता जागृत कर दे। यह आनन्द, सन्तोष एवं शाँतिप्रद स्थित भी उपलब्ध हो सकती है पर हमें पहले विराट परमात्मा का दर्शन करना होगा और अपने आपको उसका एक लघु घटक, अणुमात्र, प्रतिनिधि मानना होगा।

अब इस कार्य को विज्ञान ने बहुत कुछ सरल कर दिया है। भगवान् ने जिस तरह कौशल्या, काकभुसुण्डि और अर्जुन, यशोदा आदि को अपने विराट्स्वरूप के दर्शन कराये उसी तरह के दर्शन आज भी कराये जा सकते हैं।

एक दर्शन रूस के यूरी गैगरिन ने किया। अभी कुछ ही दिन पूर्व मृत्यु से पहले उन्होंने अन्तरिक्ष यात्रा पर अपने संस्मरण लिखे हैं, वह उस विराट् ब्रह्म की कल्पना से कम नहीं हैं। गैगरिन लिखते हैं।

“मैं पृथ्वी से बहुत ऊपर उठ चुका था। मुझे पृथ्वी पीले आकार का एक चन्द्रमा जैसी लग रही थी। कल्पना भी न की थी कि जिस पृथ्वी पर करोड़ों रंग बिरंगे वस्त्राभूषण धारण किये हुए मनुष्य रहते हैं, अरबों, मीलों रहे वृक्ष वन-पर्वत, नदियाँ बह रही हैं, वह ऊपर से एक नन्हा-सा पिण्ड मात्र लगेगी। इसके बाद मैंने एक दिन में ही 17 बार सूर्योदय के दर्शन किये। एक दिन में 17 बार पृथ्वी के चक्कर लगाने के कारण 17 बार सूर्य पृथ्वी के पीठ में गया, तब रात हो जाती थी, जितनी देर सूर्य का प्रकाश यान पर पड़ता रहता था, उतनी देर दिन रहता था। विशाल नील-गगन में खरबों नक्षत्रों के बीच अपनी तुलना करता था तो ऐसा लगता था, इस संसार की तुलना में मेरा अस्तित्व ऐसा ही है, जैसे सारी धरती की तुलना में चींटी के सिर का सौवाँ भाग।”

जोड़ी में अन्तरिक्ष यात्रा करने वाले मिचेल कौंलिंस और जानयंग के संस्मरण पढ़िये-

उड़ते ही गये, उड़ते ही गये, ऊपर और ऊपर दिल धड़कते जा रहे थे, फिर भी हम उस ऊँचाई तक पहुँचे, जहाँ उस दिन तक पृथ्वी का कोई भी जीवित प्राणी नहीं पहुँचा था। 474 मील की ऊँचाई तक हम पहुँचे थे, 71 घन्टे की उड़ान में पृथ्वी के 43 चक्कर लगाये।”

शेपर्डग्रिशम, करपेन्टर, निकोलार्थव पोपोविच, शीरा, कूपर, फियोकिस्तोव, योगोरोव, कोमोरोव, तेरेस्कोवा बोर-मैन, जेम्स स्टेफोर्ड आदि अन्तरिक्ष यात्रियों से कोई पूछे तो वे यही कहेंगे कि इन यात्राओं से सिद्ध हो चुका है कि संसार बड़ा विराट् और विलक्षण है, उसमें मनुष्य क्या सारे धरती-वासियों की स्थिति ऐसी ही है जैसे हिमालय पर्वत पर रहने वाली एक छोटी सी दीमक।

यात्री सरेनान ने ब्रह्मांड को बहुत उन्मुक्त अवस्था में देखा है। ये यान से अलग होकर 128 मिनट तक शून्य अन्तरिक्ष में विचरण करते रहे। उनका कथन है- वहाँ से पृथ्वी इतनी सुन्दर दीखती थी, जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती, उस दर्शन का आनन्द इतना अधिक था कि उसका वर्णन नहीं किया जा सकता उसे तो अंतःचेतना ही अनुभव कर रही है। यंग को भी इसी तरह का अनुभव तब हुआ जब उन्हें अपने यान से निकलकर एगेना से वह डिब्बा उठाकर लाना था, जिसमें चन्द्रमा की खोदी हुई मिट्टी थी।

यह दर्शन तो अभी सूर्य-चन्द्रमा और पृथ्वी या अधिक से अधिक शुक्र मंगल तक ही सीमित हैं, हमारे सौर मंडल में ही कई खरब नक्षत्र हैं, सूर्य उन सबको लेकर कृत्तिका की ओर बढ़ रहा है। कृत्तिका के पास अपना कई सौर मंडलों का अलग परिवार है, वह अपने परिवार सहित अभिजित की ओर बढ़ रहा है। कहते हैं सृष्टि की व्यवस्था के लिये सात सत्ता केन्द्र हैं सृष्टि के अन्दर के सब सितारे जो क्रमोन्नति से बड़े बड़े जंगलों के मध्य बिन्दु है, उनमें से हरएक इन्हीं सात सत्ता केंद्रों में से किसी न किसी के साथ सम्बन्ध रखता है। ये सितारे चैतन्य ईश्वर का कोई न कोई अंश है।

इस परिभ्रमण में बेशुमार सृष्टियाँ हैं। हर सृष्टि में अनेक सूर्य होते हैं। इनका संचालन सूर्य-मंडल का स्वामी (सोलर लॉगस ) करता है। सूर्य मंडल में वह शक्ति हैं, जिसकी ईश्वर में कल्पना की जाती है। वह सम्पूर्ण सूर्य-मंडल में व्यापक है और मंडल भर में कोई ऐसी वस्तु नहीं जिसमें वह न हो। वह हर वस्तु में है और हर वस्तु उसमें है।

लास एन्जिल्स (अमरीका) में एक प्रदर्शनी में काँच के 6 फुट के गोले के रूप में मनुष्य के एक रोम का आकार ब्रह्मांड-सा प्रतीत होता था, इसमें ब्रह्मांड के अणु थे, इसके द्वारा वैज्ञानिकों ने साबित किया था कि मनुष्य पिंड में अगणित जीवित परमाणु निवास करते हैं। उन परमाणुओं के लिये मनुष्य देह एक प्रकार से ब्रह्मांड जैसी ही है।

ब्रह्मांडों की हलचल और भी भीषण और कौतूहलवर्द्धक है। बुध 88 दिन में सूर्य की ओर 88 दिन में ही अपनी परिक्रमा करता है, 3000 मील व्यास का बुध सूर्य से 36 लाख मील दूर है। शुक्र का व्यास 7600 मील और दूरी 67 लाख मील है, वह सूर्य की 225 दिन में और अपनी 30 दिन में परिक्रमा करता है। पृथ्वी मंगल, बृहस्पति, शनि, यूरेनस और प्लूटो क्रमशः 7900, 4200, 87000, 71500, 3600 लाख मील व्यास के हैं और ये क्रमशः सूर्य से 93, 142, 483, 886, 1783 और 3671 मील दूर हैं। सूर्य की परिक्रमा में इन्हें 3561।4 दिन, 687 दिन, 12 वर्ष, साढ़े 29 वर्ष, 84 वर्ष, 165 वर्ष और 248 वर्ष समय लग जाता है। इनमें कई अपनी धुरी पर बहुत तेज घूमते हैं, पृथ्वी 23 घंटा 56 मिनट पर धूमती है, मंगल 24 घन्टा 36 मिनट, बृहस्पति का भारी व्यास होते हुए भी वह कुल 9 घन्टा 50 मिनट में अपना चक्कर पूरा कर लेता है।

किसी शाँत और एकान्त स्थान में बैठने को मिले जहाँ से यह सब दृश्य देखने को मिल सकते हों तो मनुष्य वस्तुतः विराट् ब्रह्म के दर्शन की अनुभूति कर सकता है। यह देखकर, सुनकर, समझकर उसे माया, मद, मोह, अहंकार रह जाता होगा तो उस जैसा क्षुद्र प्राणी इस संसार में दूसरा न होगा।


Quotation

समष्टि से प्रेम किये बिना हम व्यष्टि से कैसे प्रेम कर सकते हैं? सारे विश्व का यदि एक अखंड रूप से चिन्तन किया जाय, तो वही ईश्वर है, और उसे पृथक-पृथक रूप से देखने पर वही यह दृश्यमान संसार है- व्यष्टि है। विराट् ब्रह्म, अखंड चिन्तन वह इकाई है। जिसमें लाखों छोटी-छोटी इकाइयों का योग है। उसी के ध्यान से ही सारे विश्व को प्रेम करना सम्भव है।


भूगोल बदल रहा है तो इतिहास भी बदलेगा

सिडनी विश्व-विद्यालय के प्रोफेसर श्री एस. टी. बटलर ने जुलाई 67 में घोषणा की थी कि इकारस नाम का क्षुद्र ग्रह पृथ्वी की ओर बढ़ रहा है। जून 1968 में उसके पृथ्वी से टकरा जान की सम्भावना थी। अनुमान था कि यदि इकारस किसी ध्रुव प्रदेश से टकरा गया तो सारी पृथ्वी में बर्फीले तूफान आ जायेंगे। समुद्र उफन उठेगा। विनाश लीला खड़ी हो जायेगी। लाखों लोग अकाल मृत्यु के गाल में चले जायेंगे।

समुद्र तल से टकराने में जल प्रलय और किसी विषुवत रेखीय प्रान्त से टकराने पर पृथ्वी फट तक सकती थी। सौभाग्य से इकारस पृथ्वी के समीप होकर गुजर गया। पृथ्वी-वासी एक भयंकर प्रलय से बच गये। इसे परमात्मा का अनुग्रह ही समझना चाहिये।

इस घटना के तुरन्त बाद ही घोषणा की गई कि इकारस पृथ्वी के समीप से गुजर गया है, अभी उसका अंत नहीं हो गया। अभी सौर मंडल में ऐसे कई क्षुद्र ग्रह चक्कर काट रहे हैं, इनमें से कोई भी ग्रह किसी भी समय धरती से टकरा कर यहाँ विचित्र हलचल उत्पन्न कर सकता है।

ऐसे प्राकृतिक परिवर्तन सृष्टि के आरम्भ काल से होते आये हैं। जब जब ऐसे विस्फोट हुये हैं और पृथ्वी के धरातल में हलचल हुई है, तब-तब मानव जाति का इतिहास करवट बदलता रहा है। जब तक प्राकृतिक प्रकोपों से लोग बचते रहते हैं, तब तक लौकिक बुद्धि स्वार्थ, अहंकार, तृष्णा, वासना की वृद्धि होती रहती है पर जब प्रकृति के झटके लगते हैं, मनुष्य को शारीरिक, मानसिक, दैविक दण्ड भुगतना पड़ता है, तब-तब उसकी बुद्धि सही दिशा में न्याय, ईमानदारी, नैतिकता से काम करने को विवश होती रही है। अब जब मनुष्य की स्वेच्छाचारिता, अनैतिकता, अपराध वृत्ति, पाप आदि बहुत अधिक बढ़ गये हैं तो कोई आश्चर्य नहीं यदि प्रकृति उसे अपनी मार-काट, प्रलय-तूफान द्वारा मनुष्य को पीट-पीटकर ठीक करें। यदि मनुष्य पहले ही अपनी गतिविधियाँ दुरुस्त करले तो संभव है प्रकृति अपना कोप कुछ कम कर दे और हल्के झटके से छुटकारा मिल जाये।

धरती का भाग्य उत्तर लोक और ग्रहों से कितना सम्बद्ध है, इस सम्बन्ध में अब पाश्चात्य वैज्ञानिक भी भारतीय दावों की पुष्टि करने लगे हैं। आस्ट्रिया के वैज्ञानिकों ने डा. हैरल्ड स्वाइत्जर के नेतृत्व में यह पता लगाया है कि सूर्य-ग्रहण का मनुष्य मस्तिष्क पर बड़ा प्रभाव पड़ता है, उनका कहना है कि पूर्ण सूर्य-ग्रहण के अवसर पर कीट पतंगे तक अपना विवेक खो बैठते हैं और वैसा ही आचरण करने लगते हैं, जैसे आदिम जाति के अन्ध विश्वासी लोग। सूर्य-ग्रहण के समय देखा गया कि चींटियों ने आधा घंटे पहले ही भोजन की तलाश बन्द कर दी और इधर-उधर निरुद्देश्य धूमती रहीं।

दिन में बाहर न निकलने वाले सैकड़ों वुड लाइस, मिली पीडस और बीटल्स नामक कीट पतंगे बाहर निकल आये। चिड़ियों को दिशा ज्ञान नहीं रहा। गौरैया, नीलकण्ठ और ऐसी ही कुछ चिड़ियाओं को छोड़कर शेष ने चहकना भी बन्द कर दिया। इससे साबित होता है कि प्रकृति के हर परिवर्तन की धरती निवासी प्राणधारियों पर प्रतिक्रिया होती है और उस प्रभाव से मनुष्य भी बच नहीं सकता।

ग्रह स्थिति को उपासना और सात्विक जीवन-क्रम अपनाकर अनुकूल और लाभदायक भी बनाया जा सकता है, इसका प्रमाण अमेरिकी वैज्ञानिक दे रहे हैं। सूर्य मंडल में हो रहे परिवर्तनों की वहाँ तेजी से जाँच हो रही है, देखा गया है कि सूर्य में कुछ किरणें विखण्डित हो रही हैं, उनसे तेज चमक उठती है। उसका प्रभाव अगले वर्षों में पृथ्वी पर उड़ने वाले जहाजों पर पड़ेगा। सन् 1969-70 में सर्वाधिक हवाई दुर्घटनायें होने की संभावना है। आश्चर्यजनक खोज यह है कि सूर्य से एक प्रकार की प्रकाश पूर्ण आँधी पृथ्वी की ओर वेग स चल पड़ी है। अमरीकी वैज्ञानिकों का कहना है कि इस आंधी की दिशा एशिया के किसी देश- सम्भवतः ठीक भारतवर्ष की ओर चल रही है। जब वह पूरी तरह भारतवर्ष से सम्बन्ध स्थापित कर लेगी तो यहाँ तीव्र परिवर्तन होंगे।

इस समाचार पर भारतीय भूगोल विज्ञान वेत्ताओं की टिप्पणी सुनने और समझने योग्य है। उनका विश्वास है कि- ‘‘भारतवर्ष में गायत्री उपासना की वृद्धि हो रही है। गायत्री मन्त्र और उपासना का सीधा सम्बन्ध सूर्य से है। सविता को गायत्री का देवता (फल देने वाला) कहा गया है। आगे लाखों, करोड़ों की संख्या में उपासक बढ़ेंगे तब सूर्य मंडल का और भी तीव्र मंथन होगा और उसकी भारतवर्ष में तीव्र प्रतिक्रिया परिलक्षित होगी। आसुरी स्वभाव वालों के लिये यह प्रतिक्रिया प्रतिकूल बैठेगी, अर्थात् उन्हें रोग-शोक, सामाजिक अपमान और राजदण्ड का भागी बनना पड़ेगा पर शुद्ध और पवित्र आचरण वाले व्यक्ति उससे लाभान्वित होंगे। उन्हें सुख सम्पत्ति धनधान्य की कोई कमी नहीं रहेगी। जलवायु, समुद्र, आकाश पृथ्वी सब यहाँ के लिए शुभ, लाभदायक होंगे।’’

हमारी मान्यतायें इससे भी अधिक हैं, अर्थात् तब यहाँ अनेक तेजस्वी आत्मायें जन्म लेंगी, वह कृषि-विज्ञान, साइन्स, राजनीति, अर्थनीति, वाणिज्य, कला-संस्कृति के क्षेत्र में सम्पूर्ण विश्व का मार्ग-दर्शन और नेतृत्व करेंगी।

यह परिवर्तन अपने अनादि क्रम में चल रहे हैं अर्थात् यदि कोई इन परिवर्तनों को स्वीकार करने की इच्छा न भी करे तो भी यह परिवर्तन बलात् होंगे, क्योंकि वह किसी आद्य शक्ति के सनातन नियम हैं। फिर अतीतकाल में आज की अपेक्षा पृथ्वी कहीं अधिक वेग से घूमती थी। अनुमान है कि तब दिन और रात का चक्र 10 घंटे में ही पूरा हो जाता। पृथ्वी की आयु लगभग 4 अरब वर्ष हो चुकी है, इतनी अवधि में 14 घंटे का अन्तर पड़ गया है। इसका कारण सूर्य और चन्द्रमा के आकर्षण के कारण समुद्र-तल में उठने वाला ज्वार-भाटा है। जब यह समुद्रीय ज्वार-भाटे महाद्वीपों के तट से टकराते हैं, तब घर्षक अवरोध उत्पन्न होता है। इस घर्षण से पृथ्वी के घूमने से उत्पन्न हो रही शक्ति का कुछ अंश गरमी में बदल जाता है। गर्मी कम होती है तो हर वस्तु में आलस्य और शिथिलता आती है। पृथ्वी के वेग में इसी कारण निरंतर ह्रास होता चल रहा है।

अब इस परिवर्तन का आसुरी और शुद्ध आचरण वाले व्यक्तियों पर क्या मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ेगा, यह भी समझा जा सकता है। पृथ्वी के इस आलस्य का प्रभाव उन पर पड़ेगा, जो उसकी ‘तन्मात्रा’ के समीप अर्थात् पार्थिव सुखों का अधिक ध्यान करने वाले होंगे। जिन्हें केवल अपने सुख, स्वाद, इन्द्रिय लिप्सा का ही ध्यान रहता है, वह इस कोटि में आते हैं पर जिन पर आकाश तत्व अर्थात् सबके कल्याण में चिन्तन का भाव, त्याग और उदारता, संयम और आस्तिकता का भाव होगा, वह ऊर्ध्व लोकों की हलचलों से प्रकाश और गर्मी पाते रहेंगे, इसलिये इनकी उन्नति सम्भव होगी और पहली प्रकार के व्यक्तियों की अवनति। इस सिद्धान्त के अन्वेषक श्री ई. आर. आर. होल्मवर्ग का भी ऐसा विश्वास है कि भविष्य में दिन रात के घन्टों की संख्या 24 से बढ़ जायेगी हमारी घड़ियों का मान छोटा हो जायेगा, तब मनुष्य समाज पर कई तरह के परिवर्तन परिलक्षित होंगे।

यह परिवर्तन ऐसे हैं जिनका सम्बन्ध पृथ्वी और सौर मंडल के अन्य शक्तिशाली ग्रहों के परिवर्तनों से है। हमारी धरती में ही अनेक तीव्र परिवर्तन हो रहे हैं। इन भौगोलिक परिवर्तनों का मानवीय सभ्यता के इतिहास में जबर्दस्त परिवर्तन होने वाला है, उसका अनुमान हम लोग नहीं लगा पा रहे।

सन् 1966 में मास्को में द्वितीय अन्तर्राष्ट्रीय सागर वैज्ञानिकों का सम्मेलन बुलाया गया, उसमें प्रायः सभी देशों के वैज्ञानिकों ने समुद्र से सम्बन्ध रखने वाली भविष्यवाणियाँ और अनुसन्धान प्रस्तुत किये। इसी सम्मेलन में लेमंट भूगर्भ अनुसन्धान-शाला के प्रोफेसर डा. ब्रूस सी. हीजेन व डा. नील उपडाइक ने एक रोमांचकारी घोषणा प्रसारित की। उन्होंने कहा- आज से लगभग 2032 वर्ष बाद पृथ्वी के चुम्बकीय बलक्षेत्र अपना स्थान बदल देंगे। इस अवधि में उसकी चुम्बकीय शक्ति नष्ट हो जायेगी और तब मनुष्य की आकृति अब के मनुष्यों की आकृति से बिलकुल भिन्न हो जायेगी। लोगों की लम्बाई अब की अपेक्षा ड्योढ़ी कम या ज्यादा भी हो सकती है। आज से 4000 वर्ष पूर्व मनुष्य की स्थिति के बारे में उन्होंने भारतीय मान्यताओं की पुष्टि की और बताया कि उस समय का पृथ्वी में रहने वाला मनुष्य आज के मानव से बिलकुल भिन्न रहा होगा।

मनुष्य ही नहीं डा. हीजेन और डा. नील उपडाइक ने यह भी बताया कि पृथ्वी की चुम्बकीय शक्ति के ह्रास का वृक्ष-वनस्पति, कीट-पतंगों पर भी प्रभाव पड़ेगा। इनमें भी असाधारण परिवर्तन होंगे। कई जीव-जन्तु मनुष्य की भाषा बोल सकेंगे। कुछ वृक्षों का चौड़ाव बढ़ जायेगा और किन्हीं किन्हीं में कई कई महीनों तक न चुकने वाली फलों की खाद्य सामग्री मिला करेगी। अपने प्रमाण की पुष्टि में उन्होंने प्रशाँत महासागर की तलहटी छेदकर निकाली मिट्टी के कई प्रयोग और रेडियो लारिया नामक एक कोश वाले जन्तु पर हो रहे परिवर्तन दिखाये।

वैज्ञानिकों ने यह भी बताया कि सन् 4000 तक चुम्बकीय क्षेत्र में परिवर्तन के कारण पृथ्वी के ध्रुव अपना स्थान बदल देंगे। लगभग 200 वर्ष का समय ऐसा आयेगा जब पृथ्वी का कोई चुम्बकीय क्षेत्र न रह जायेगा। यह काल खण्ड प्रलय जैसा ही होगा। अर्थात् उस समय बहुत गर्म स्थान बिलकुल ठंडे पड़ जायेंगे। ठंडे स्थानों में बर्फीले तूफान आयेंगे, वहाँ की बर्फ गलकर समाप्त हो जायेगी और वे स्थान बिलकुल खुश्क पड़ जायेंगे। इस अवधि में सौर ग्रहों से पृथ्वी पर होने वाला विकिरण बहुत अधिक ऊर्जावान (गर्मी लिये हुये) होगा। कहीं-कहीं तो अंगारों की वृष्टि के से दृश्य उपस्थित होंगे।

इन परिवर्तनों से बचने के लिये वैज्ञानिकों ने अपनी-अपनी तरह के सुझाव दिये हैं। कुछ ने तो यहाँ तक कहा कि आगे लोगों को गुफायें खोदकर उनके अन्दर रहना प्रारम्भ कर देना चाहिये।

चुम्बकीय क्षेत्र के अभाव की तरह मानवीय जीवन में संकट पैदा करने वाला दूसरा अभाव पानी का है। अभी ही मीठे पानी का बड़ा अभाव है। संसार में जितना जल है, उसका 97 प्रतिशत भाग समुद्र में है, वह तो पीने योग्य है और न कृषि या उद्योगों के योग्य। 2 प्रतिशत जल बर्फ के रूप में जमा रहता है। 1 प्रतिशत से खेती, जंगल, उद्योगों और पीने का काम चलता है। उसमें काफी पानी बेकार चला जाता है। पृथ्वी में पीने का जितना पानी बचता है, उसका सातवाँ भाग केवल आमेजन नदी ही समुद्र में फेंक आती है। औद्योगिक नगरों में 40 प्रतिशत नागरिकों को ही स्वच्छ जल पर्याप्त मात्रा में मिलता है, शेष को बहुत ही अपर्याप्त मात्रा में मिलता है क्योंकि अच्छे पानी की भारी मात्रा औद्योगिक प्रतिष्ठानों में झोंक दी जाती है।

अनुमान करें कि एक लीटर पैट्रोल बनाने के लिये 10 लीटर मीठा पानी फूंकना पड़ता है। 1 किलो सब्जी पर 40 लीटर पानी, 1 किलो कागज के लिये 100 लीटर पानी, 1 टन सीमेंट के लिए 3500 लीटर पानी और 1 टन इस्पात तब बनता है, जब 2000 लीटर पानी जला किया जाता है। मनुष्यों का अप्राकृतिक जीवन के प्रति बढ़ता हुआ अनुराग उद्योगों को और भी बढ़ावा देगा, जिससे जल संकट भीषण रूप से सामने आयेगा। रेगिस्तान बढ़ेंगे तो मनुष्यों में उत्पात होंगे, परस्पर लड़ाई-झगड़े, दंगे-फसाद होंगे। उद्योग और किनारे बसे नगर नदियों, नालों व झीलों को सड़ी हुई नाली बनाये डाल रहे हैं, इनका मनुष्य के स्वास्थ्य पर और भी दूषित प्रभाव पड़ेगा और तब मनुष्य के संकटों का अन्त न रह जायेगा, जब यह संख्या बढ़ती और आंकड़े चौड़े होते चले जायेंगे। इस संकट से बचने का एक ही उपाय है कि मनुष्य अभी से प्राकृतिक और ईश्वर परायण जीवन जीने का अभ्यास करे।

बढ़ती हुई रेलें, यातायात से लोग पैदल चलना भूल रहे हैं, उधर इस्पात बनना बढ़ेगा, इस तरह दूषित वायु, पानी का अभाव और परिश्रम की कमी सब मिलकर स्वास्थ्य कमजोर करेंगे। नये-नये कपड़े विलासिता के साधन भी एक ओर शरीर खोखला करेंगे, दूसरी ओर उद्योग बढ़ायेंगे। तात्पर्य यह है कि आफतों का जाल उलझता ही चला जायेगा, यदि मनुष्य जाति ने अपनी परिस्थितियों पर विचार न किया और अपना जीवन बदलती हुई परिस्थितियों में ढालने का यत्न न किया।

“1975 का दुर्भिक्ष” नामक पुस्तक में दुनिया में खाद्यान्न की स्थिति का अध्ययन करने वाले अनुसन्धान कर्त्ता डा. डब्ल्यू पैडक और पी. पैडक ने दुनिया को चेतावनी दी है कि अब से 15 वर्ष बाद लोगों को एक भयंकर दुर्भिक्ष का सामना करने के लिये तैयार रहना चाहिये। इसका अधिकाँश दुष्प्रभाव एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमरीका पर पड़ने की सम्भावना व्यक्त की जा रही है।

एक बात तो यही स्पष्ट है कि अकाल का अधिकाँश कोप घनी आबादी वाले देशों में होगा। इसलिये भारत वर्ष इस दृष्टि से प्रथम पंक्ति में आयेगा। जनसंख्या बढ़ने की दर वैज्ञानिक पद्धति से भी रुक नहीं सकती। उसे तो संयमित जीवन ही नियन्त्रित कर सकता है, पर लोग उसके लिए तैयार नहीं तो प्रकृति को ही विवश होकर दुर्भिक्ष का वज्र प्रहार करना पड़ेगा। इस सदी के अन्त तक दुनिया की संख्या दुगुनी हो जायेगी और उत्पादन की दर 3। 4 ही रह जायेगी। अर्थात् अकाल पड़ना अवश्यम्भावी है। जब-जब अकाल पड़ा दुनिया में भीषण महामारी फैली और अकाल से अधिक उसने लोगों को पीड़ित प्रताड़ित और उदरस्थ किया। सामाजिक अस्त-व्यस्तता भी इन कारणों से बढ़ेगी और पृथ्वी में रहने वाला मनुष्य बुरी तरह ऊब जायेगा।

कुछ भू-भौतिक शास्त्रियों का तो यह भी अनुमान है कि पृथ्वी अपनी कक्ष बदल रही है, जिससे सूर्य से आने वाली ऊर्जा के कोण बदल जायेंगे और उसका क्षणिक परिवर्तन भी धरती में बेहद गर्मी और बेहद ठंडक पैदा करेगा। लोगों का गिरता स्वास्थ्य उसे बर्दाश्त करने की स्थिति में नहीं होगा। अतएव लोग बेमौत मरेंगे और कष्ट व पीड़ाओं से पीड़ित होंगे। उधर पृथ्वी की बर्फ भी तेजी से गलती जा रही है। समुद्र तल ऊपर उठ रहा है। विगत 20 वर्षों ने न्यूयार्क शहर की समुद्र-तल से 4 इंच ऊँचाई कम हो गई। इन प्राकृतिक परिवर्तनों को मनुष्य जीवन पर क्षिप्र प्रभाव पड़ेगा ही। उनसे कोई बच नहीं सकेगा।

बचाव का एक ही उपाय है और वह यह है कि मनुष्य और बढ़ती हुई लौकिक तृष्णाओं और महत्वाकांक्षाओं को कम करे। अपने मस्तिष्क की दिशा को विशाल ज्ञान, पारलौकिक जिज्ञासाओं की ओर मोड़े। मनुष्य आस्तिक बने और तृष्णा-वासना के क्रिया-कलाप कम करे तब ही यह सम्भव है कि बदलती हुई परिस्थितियों को सहन किया जा सके। अन्यथा मानव-जाति को इस सामूहिक विनाश और उसके बाद एक सर्वथा नये जीवन के लिए तैयार रहना चाहिये।


चन्द्रलोक को प्राप्त होता है

‘श्रेष्ठ कर्मों का अनुष्ठाता इस लोक को त्याग कर चन्द्रलोक को प्राप्त होता है। कृष्ण पक्ष में चन्द्रमा स्वर्ग में निवास करने वाले को तृप्त नहीं कर सकता, तब वह व्यक्ति सोचता है कि मुझे कर्म करने के लिये फिर धरती में जाना है। वह अपनी विचार-शक्ति से अपने कुटुम्बीजनों और उच्च आत्माओं को कुछ सन्देश देने का प्रयत्न करते हैं पर उनकी कोई नहीं सुनता और वह आत्मा दुःखी होती है कि जब मैं फिर संसार में जाऊँगा तो मनोविकार ग्रस्त लोगों की संगति में पड़कर मुझ शाश्वत शुद्ध आत्मा का स्वरूप भी मलिन और गन्दा हो जायेगा।” (कौशीतकि ब्राह्मणोपनिषद्)

अब कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के कुछ रेडियो खगोलज्ञों ने घोषणा की है कि उन्हें बाह्य अंतरिक्ष से कुछ संकेतों का पता लगा है। डा.ए. एम. हेविश ने इन संकेतों को स्पष्ट करते हुए मुलाई वेधशाला में कुछ खगोलज्ञों के सामने बताया- ‘‘अब हमारा विश्वास है कि उक्त संकेत सम्भवतः न्यूड्रान नक्षत्रों से आ रहे हैं, जो सूर्य से अरबों, खरबों मील की दूरी पर स्थित माने जाते हैं।” डा. मुलाई ने इन संकेतों को विलक्षण रहस्यमय और आश्चर्यजनक बताते हुए कहा- ‘‘यह संकेत बहुत व्यवस्थित और नपे तुले समय भेजे गये लगते हैं।”

संकेत तब भी आते थे, अब भी आते हैं। प्रश्न यह है कि उन्हें सुने और समझें कौन?


आत्मा का अस्तित्व-अमान्य न किया जाय

आत्मा अत्यन्त सूक्ष्म, दृष्टा, चेता, विचार रूप, प्रसन्नता स्वरूप है, ऐसी भारतीय दर्शन की मान्यता है। पर स्थूल दृष्टि से दिखाई न देने के कारण आजकल के पढ़े लिखे लोग और भौतिकवादी प्रतिपादनों से प्रभावित व्यक्ति उसके अस्तित्व को नहीं मानते और न उसे प्राप्त करने की, जानने की उत्कंठा उन्हें होती है। अनात्म मान्यता ने इस विश्व का इतना अहित किया है, जितना कई विश्व युद्ध मिलकर भी नहीं कर सकते। क्योंकि उससे तो जीवन की सम्पूर्ण दिशायें ही उलट जाती हैं, स्वार्थ, दम्भ, अहंकार, छल-कपट यह वर्तमान अस्त्र-शस्त्रों की अपेक्षा मनुष्य समाज का अधिक दुःख देकर नाश करते हैं।

एक बार राजा बृहद्रथ को ऐसा अनुभव हुआ कि शरीर नाशवान् है इसलिये उन्हें वैराग्य हो गया। राज्य का सम्पूर्ण उत्तरदायित्व अपने ज्येष्ठ पुत्र को देकर वे वन चले गये। वहाँ उन्होंने उग्र तपश्चर्या की। कई वर्षों तक उन्होंने भगवान् सूर्यदेव की उपासना की। उनके तप से प्रसन्न होकर एक दिन शकामन्य नाम के महामुनि उनके पास आये। उन्होंने बृहद्रथ के तप की प्रशंसा की और कहा- “वत्स! तेरी जो इच्छा हो मुझसे कह।”

बृहद्रथ ने कहा- ‘‘देव! आप आत्म-तत्व ज्ञाता और आत्म-वेत्ता हैं, मुझे आत्मा का बोध कराइये।” महामुनि शकामन्य ने मुस्कराते हुए कह- ‘‘तात! यह बड़ा दुस्तर और कठिनाई से समझ में आने वाला विज्ञान है, इसलिये तुम उसकी अपेक्षा कोई और वर माँग लो।”

बृहद्रथ कहते है- ‘‘हे भगवन् समुद्र सूख जाते हैं, कल तक जहाँ पर्वत खड़े थे, वही आज मैदान हैं, वृक्ष गिर जाते हैं पृथ्वी डूब जाती है ध्रुव जो स्थिर है, उसे भी एक दिन गतिशील होना पड़ता है, ऐसे परिवर्तनशील और नाशवान संसार में विषय-भोगों से क्या लाभ? मैं अमरत्व और शाश्वत शाँति की कामना से प्रार्थना करता हूँ कि आप कृपा कर मुझे आत्म-विद्या का ही उपदेश दीजिये।”

बृहद्रथ की प्रगाढ़ जिज्ञासा देखकर शकामन्य ने उन्हें आत्मा के यथार्थ स्वरूप ज्ञान कराया। मैत्रेय्युपनिषत् में उसकी विस्तृत व्याख्या की गई है। वहाँ पर महामुनि ने एक स्थान पर कहा है, “मैं ज्ञान रूप हूँ, मैं विचार रूप हूँ, परम् और शाश्वत मैं ही हूँ।”

उपरोक्त विशेषणों के माध्यम से आत्मा के अस्तित्व को आसानी से अनुभव किया जा सकता है। अचेतन अवस्था में भी इन्द्रियातीत ज्ञान की अनुभूति और विचार की योग्यता उस सूक्ष्म-सत्ता का प्रमाण नहीं तो और क्या हो सकता है?

सर्वप्रथम उन बच्चों का इतिहास लेते हैं, जो सामान्य परिस्थितियों में ही जन्म धारण करते हैं, किन्तु उनकी बौद्धिक प्रतिभा ऐसी विलक्षण होती है, जो इस जीवन का विकास कदापि नहीं मानी जा सकती। मोजार्ते सात वर्ष का था, त वह विद्यालय में मुश्किल से पहली कक्षा के सबक याद कर पाया था, पर संगीत में उसने अनेक नई रचनायें कीं, जिन्हें देखकर लोग कहा करते थे कि मोजार्ते पूर्वजन्म का कोई निपुण संगीत साधक रहा है, वह ज्ञान उसे विस्मृत नहीं हुआ। जन्म के बाद तो उसने उन्हें सीखा नहीं वरन् विकास किया है। हर व्यक्ति के जीवन की एक मुख्य दिशा होती है, वह इस जन्म में भी वेगवान रहती है तो उससे आत्मा की शाश्वत विकास प्रक्रिया की ही बात पुष्ट होती है।

यह बात तो वैज्ञानिक भी मानते हैं कि मनुष्य का शरीर कोशिकाओं से बना है। यह कोशिकायें प्रोटोप्लाज्म नामक जीवित अणुओं से बना होता है, यदि प्रोटोप्लाज्म को भी खण्डित किया जाय, जो जीवन पदार्थ का अन्तिम टुकड़ा होती है और जिसमें चेतना का स्पन्दन होता है, तो उसके भी साइटोप्लाज्म और न्यूक्लियस नामक दो खण्ड हो जाते हैं। साइटोप्लाज्म कोशिका से काट देने पर मृत हो जाता है पर न्यूक्लियस अर्थात् नाभिक अपनी सत्ता को पुनः विकसित कर लेने की क्षमता रखता है। इस नाभिक के बारे में विज्ञान अभी कोई अन्तिम निर्णय नहीं कर सका यहाँ से भारतीय तत्व-ज्ञान प्रारम्भ हो जाता है।

शास्त्र कहता है “अणोरणीयान् महतोमहीयान्” अर्थात् यह आत्मा छोटे से भी छोटा और इतना विराट् है कि उसमें समग्र सृष्टि नप जाती है। अणु के अन्दर समाविष्ट आत्मा की सत्यता का प्रमाण यही है कि जब वह पुनः किसी प्राणधारी के दृश्य रूप में विकसित होता है तो अपने सूक्ष्म (नाभिक शरीर) के ज्ञान की दिशा में बढ़ने लगता है। इसी बात को गीता में भगवान कृष्ण ने इस प्रकार कहा है-

तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभंते पौर्वदेहिकम्। यतते च ततो भूपः संसिद्धौ कुरुनंदन॥

अर्थात्- आत्मा पहले शरीर में संग्रह किये हुए बुद्धि संयोग को अर्थात् समत्व बुद्धि-योग के संस्कारों को अनायास ही प्राप्त हो जाता है और तब हे अर्जुन! उस संस्कार के प्रभाव से वह फिर परमात्मा की प्राप्ति रूप सिद्धि के लिए पहले से भी बढ़कर प्रयत्न करता है।

200 पूर्व जर्मनी में हानरिस हानेन्केन का जन्म हुआ यह बालक तीन वर्ष का था तभी उसने जोड़, बाकी, गुणा भाग लगाना और हजारों लैटिन मुहावरे सीख लिये थे। इसी अवस्था से उसने फ्रेंच भाषा और भूगोल का अच्छा ज्ञान प्राप्त करना प्रारम्भ कर दिया था। इस विलक्षण प्रतिभा का कारण वैज्ञानिक नहीं जान पाये।

इसी तरह साइबरनेटिक्स के रचनाकार वीनर ने पाँच वर्ष की आयु में ही विज्ञान में रुचि लेनी प्रारम्भ कर दी थी, वह अठारह वर्ष के लड़को के साथ विज्ञान पढ़ता था। चौदह वर्ष की अत्यल्प आयु में वीनर ने विज्ञान की उपाधि प्राप्त कर ली। गेटे नौ वर्ष की आयु में कवितायें लिखने लगा था, जो आज बी. ए. और एम. ए. की कक्षाओं में पढ़ाई जाती हैं, वायरन, स्काट और डार्विन ऐसे ही विलक्षण बौद्धिक क्षमता वाले बच्चे थे। पास्काल ने पन्द्रह वर्ष की आयु में ही विज्ञान सम्बन्धी रचना प्रकाशित कर दी थी, जिसमें उसने सौ से भी अधिक नये प्रमेय सिद्ध कर दिये थे।

ऐसी विलक्षण और आध्यात्मिक प्रतिभा सम्पन्न बच्चों के उदाहरण भारतवर्ष में सर्वाधिक विद्यमान है। उन सब में विलक्षण चित्रकूट से दस मील दूर जलालपुर नामक ग्राम में एक धर्म-प्राण ब्राह्मण परिवार में जन्मी बालिका है। उसका नाम है, सरोजबाला। पिता का नाम पं. श्याम सुन्दर जी, इन दिनों सूरत में कार्य करते हैं। इस बालिका के दो व्यक्तित्व हैं- एक तो साधारण बालिका और दूसरा अत्यन्त विद्वान और प्रतिभा सम्पन्न बालिका का। जब तक वह घर में रहती, वह बालकों की सी चपलता, उछल-कूद, आमोद-प्रमोद किन्तु जैसे ही वह सभा-मंच पर पहुँचती है गीता, रामायण, महाभारत, वेदान्त, मनुस्मृति, योग और भक्ति के समन्वय से ऐसे धारा प्रवाह प्रवचन करती है कि सुनने वाले मंत्र-मुग्ध हो जाते हैं। सरोजबाला तीन वर्ष की थी, तभी से अपने को राजस्थान के एक ब्राह्मण परिवार में स्व. डा. राजेन्द्र प्रसाद (उस समय के राष्ट्रपति ) के समक्ष कानपुर में उसने प्रवचन किया था, जिसको सुनकर वे बहुत प्रभावित हुए थे। अगले वर्ष से ही वह नियमित रूप से सार्वजनिक समारोहों में प्रवचन करने लगी थी। उसके असीम ज्ञान, शुद्ध उच्चारण, प्रतिभापूर्ण शैली और भावभंगिमाओं को देखकर कोई यह नहीं कह सकता कि यह ज्ञान इसी जीवन का विकास है।

किन्तु अब तक हुई घटनायें और अन्वेषण भी उस अस्तित्व के कम प्रमाण नहीं हैं। इटली की विश्व प्रसिद्ध नायिका जूलियट की मृत्यु के बाद भी उसके पास आने वाले हजारों पत्रों के उत्तर लोगों के पास पहुंचते रहे। जिनके पास पत्र पहुँचे उनके पत्र पूर्व पत्रों की बिल्कुल संगति में थे। कई में पूर्व पत्रों का उल्लेख भी होता था। यह कहानी भी बड़ी विचित्र है। कहते हैं, जूलियट की जहाँ समाधि थी वहीं पर दो लैटर बक्स टाँगे गये थे, एक में पत्र आते थे, दूसरे में डाले जाते थे, जिन्हें डाकिया नियमित रूप से ले जाता था, पत्र यद्यपि समाधि का रक्षक इटोरे सोलोमिनी लिखता था पर वह जो कुछ लिखता था, स्वयं भी नहीं जानता था। वह सारी बातें उसे निद्रावस्था में मालूम होती थी। वह बताता था कि जूलियट की आत्मा आती है और प्रत्येक पत्र का उत्तर उसे बता देती है। वह तो केवल लेखक मात्र है, बताने वाली जूलियट होती थी। इटोरे की मृत्यु के साथ ही यह क्रम भी टूट गया।

अमरीका के डाक्टर पेनफील्ड ने एक बार एक प्रयोग किया। उन्होंने एक अफ्रीकी युवक के मस्तिष्क के सेल में इलेक्ट्रोड से विद्युत-प्रवाह दिया। वह युवक अचेतन-सा हो गया। जब दुबारा होश आया उसने वहाँ की सब वस्तुयें देखीं और सबसे बात-चीत भी कीं। उसने अपने भाइयों से बात-चीत का ब्योरा भी दिया और जब उसके द्वारा बताये गये व्यक्तियों, स्थानों तथा घटनाओं का पता लगाया गया तो उसके बताये गये तमाम दृश्य और संवाद अक्षरशः सत्य पाये गये।

मैडम डी. माइगोलन हालैण्ड सरकार की ओर से स्वीडन में राजदूत की धर्मपत्नी थीं। उनके पति को अपने देश के एक महाजन को 25 हजार पौंड का ऋण भुगतान करना था, सो उन्होंने कर भी दिया और उसकी रसीद किसी सुरक्षित स्थान में रख दी। यह बात माइगोलन को मालूम थी कि ऋण चुका दिया गया है किन्तु रसीद की उन्होंने कोई परवाह नहीं की। इसी बीच पति की मृत्यु हो गई। उसके कुछ दिन बाद वह महाजन आया और उसने श्रीमती माइगोलन से 25 हजार पौंड का ऋण भुगतान करने को कहा। वह जानती थीं कि ऋण दे दिया गया है किन्तु रसीद न होने के कारण वे कोई पुष्ट प्रमाण न दे सकीं। तब यह लगभग निश्चित-सा हो गया कि भुगतान करना ही पड़ेगा। माइगोलन की बात किसी ने नहीं मानी।

एक सप्ताह बाद माइगोलन सो रही थीं, तब उन्हें ऐसा लगा जैसे पति की आत्मा उनके पास आई हो और बताया हो कि रसीद अमुक स्थान पर रखी है। ठीक उसी समय नींद टूट गई। माइगोलन ने उस स्थान में जाकर देखा तो रसीद सुरक्षित रखी थी। आत्मा के अस्तित्व को प्रमाणित करने के लिए इससे अच्छा उदाहरण और क्या हो सकता है?

यह सब आत्मा की परावाणी के अंतर्गत घटित घटनायें हैं, इसलिये उन पर शंका की जा सकती है। पर अब वैज्ञानिक यन्त्रों से भी आत्मा के अस्तित्व की बात सिद्ध होने लगी है और लोग यह मानने लगे हैं कि वह कोई अत्यन्त सूक्ष्म चेतन तत्व है। भौतिक विज्ञान के जानने वाले लोगों को पता होगा कि मस्तिष्क असंख्य सेल्स की सक्रियता को कहते हैं, प्रत्येक सेल में विशिष्ट प्रकार की विद्युत-शक्ति का प्रवाह होता रहता है, यह विद्युत उत्पत्ति सोडियम और पोटैशियम के आयतों के उलट-पुलट के कारण होती है। देखना, विचार करना आदि इन्हीं विद्युत तरंगों के कारण होता है। लीग फार स्प्रिचुअल डिस्कवरी के अमरीकी वैज्ञानिकों ने इसी आधार पर एक प्लास्टिक की आँख बनाई है, इसमें ऐसी प्रकाश व्यवस्था की गई है कि वह दर्शक को घूरने लगती है। फिर उसके प्रकाश को यन्त्रों के माध्यम से इस क्रम को मन्द या तीव्र किया जाता है कि दर्शक के विचार अस्त-व्यस्त हो जाते हैं और मस्तिष्क के सेल्स शिथिल पड़ जाते हैं और वह सम्मोहित हो जाता है।

इन्होंने कुण्डलिनी को भी ज्योति किरणों का रूप प्रदान करने की चेष्टा की है। इससे भी साधकों को ध्यानावस्था में तुरन्त चले जाने की सुविधा मिली है। इस अवस्था में मन अचेतन हो जाता है पर एक चेतन तत्व तब भी काम करता है। उसकी अनुभूतियाँ और ज्ञान कई बार इतने सत्य पाये गये हैं कि उन्हें विश्वास हो गया है कि आत्मा कोई अदृश्य जीवन सत्ता है, जीव की जब मृत्यु होती है तो वह उसी में परिणत हो जाता है, उसका नाश नहीं होता वरन् यह क्रम अनादिकाल तक चलता रहता है।

इतने उद्धरण और विवेचन से स्पष्ट ही महामुनि शकामन्य का वह आत्म-विश्लेषण सत्य सिद्ध हो जाता है, जिसे पाकर राजा बृहद्रथ धन्य हो गये और उन्होंने इस जीवन का लक्ष्य प्राप्त कर लिया।


सम्पत्तियाँ नहीं, विभूतियाँ श्रेयस्कर हैं

मानव-जीवन का महत्व प्रतिपादित करने की आवश्यकता नहीं। वह संसार की सर्वश्रेष्ठ उपलब्धि तथा सर्वोत्तम अवसर है। इसका सदुपयोग कर मानव से देवता और जीव से ईश्वर बना जा सकता है। किन्तु खेद है, कि लोग इस मूल्यवान मानव-जीवन को बड़ा ही घटिया और सस्ता बनाकर जीते हैं। इस सुरदुर्लभ उपलब्धि को सस्ता बना डालना उस विधायक की कृपा का अपमान करना है, जिसने इसे अनुग्रह किया है। अपने मानव-जीवन को सस्ता नहीं, गौरव और गरिमापूर्ण बनाकर जीना चाहिये। परमात्मा के प्रतिनिधि मनुष्य को यही योग्य है कि वह अपने पद के अनुसार ही अपने जीवन को बनाये और चलाये।

मानव-जीवन शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा तथा आचार-विचार, भावना, आशा, अभिलाषा, विश्वास तथा क्रियाओं का समन्वय है। इन सबसे मिलकर ही यह मानव-जीवन बनता और पूर्ण होता है। इसके अभाव में मानव-जीवन का अस्तित्व या तो अपूर्ण हो जाता है या मिट जाता है। मानव-जीवन के इन तत्वों को जितना महान और गौरवपूर्ण बनाया जायेगा, मनुष्य उतना ही ऊँचा उठता और विशाल बनता जायेगा। किन्तु खेद है कि अज्ञानवश मनुष्य जीवन के इन तत्वों में सस्तापन भर कर मनुष्य होते हुए भी पशुत्व की परिभाषा से सम्बन्ध स्थापित कर लेता है। मनुष्य को निकृष्ट नहीं उत्कृष्ट बनना चाहिए। इतना उत्कृष्ट कि उसे देखते ही उसके रचयिता का सच्चा-स्वरूप उसी तरह मानस-पटल पर झलक उठे, जिस तरह कर्तृत्व देखकर कलाकार का व्यक्तित्व प्रतिविम्बित हो उठता है।

विचार मानव-जीवन की एक विशेष शक्ति है। किन्तु मनुष्य उसमें सस्तापन लाकर उस शक्ति को कुण्ठित अथवा प्रतिगामिनी बना डालते हैं। विचारों का सस्तापन है, असभ्यता, असंस्कृति, अभद्रता तथा अवाँछनीयता। जो लोग स्वार्थ की सीमित परिधि में रहकर अपने लाभ की ही सोचते रहते हैं, वे सस्ते, ओछे और पोच-विचारों वाले होते हैं। मैं व्यापार करूंगा, धन कमाऊँगा, सम्पत्ति और साधन संचय करूंगा और फिर समाज में अपना प्रभाव स्थापित कर लोगों पर शासन करूंगा, उनसे पूजा और प्रतिष्ठा वसूलूँगा। अपने साधनों और सुविधाओं के बल पर मैं अपने लड़कों को उच्च से उच्च शिक्षा दिलाकर और अपने प्रभाव की विरासत देकर इस योग्य बना दूँगा कि वे मेरी तरह ही समाज में अपने प्रतिष्ठापूर्ण स्थान का आनन्द भोग कर सकें। इस प्रकार के विचार, जिनमें पद-पद पर ‘स्व’ और स्वार्थ लगा हो सस्ते, तुच्छ और ओछे होते हैं। ऐसे ‘स्ववादी’ लोग उन्नति और सफलता पाकर भी शाँति और संतोष के लिए तरसते रहते हैं। वे उच्च पद पर पहुँचकर भी निकृष्ट और निम्नकोटि के बने रहते हैं।

उन्नति, विकास और मान-सम्मान पाने का विचार बुरा नहीं। बुरा है, उसमें ‘स्व’ और स्वार्थ को जोड़ लेना। यदि इस उपलब्धि की कामना का विचार इस प्रकार किया जाय कि मैं उद्योग करूंगा, धनवान बनूँगा, समाज की एक इकाई के रूप में उसकी श्रीवृद्धि में सहायता करूंगा। अपने व्यवसाय से समाज की सुविधा बढ़ाऊँगा। यथासम्भव उसकी सहायता करूंगा। बच्चों को योग्य बनाकर अच्छे नागरिकों के रूप में समाज की सेवा के लिये समर्पित कर दूँगा। और तब इस सेवा के उपलक्ष में यही समाज हमें सराहना, सम्मान और पद-प्रतिष्ठा देगा तो उसे सहर्ष शिरोधार्य करूंगा और फलस्वरूप अपनी सफलता का आनन्द भोगूँगा। केवल ‘स्व’ से हटकर ‘सर्व’ और स्व से बढ़कर परमार्थ की ओर विचार-धारा को मोड़ डडडड उन्हीं विचारों का सस्तापन दूर हो जायेगा और डडडड गौरव गरिमा का समावेश हो जायेगा।

भावनाओं को मनुष्य जीवन में दैवी तत्व माना जाता है। जो भावना प्रवण और भावना-प्रधान है, वह मनुष्य होते हुए मनुष्य से आगे का व्यक्ति होता है। कला, काव्य और सन्तत्व भावना के ही पुण्यफल माने गये हैं। ऐसी दिव्य वस्तु को भी लोग सस्तेपन से दूषित कर निकृष्ट तथा निम्नकोटि का बना देते हैं। काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या-द्वेष आदि सारे विकार भावनाओं का ही हल्का और सस्तापन है। जरा-सा विपर्य देखकर क्रोध से भड़क उठना, प्राप्ति योग्य वस्तु देखकर तुरन्त लोभ में आ जाना, जरा-सी उत्तेजना पाकर काम के वशीभूत हो जाना, किसी की तुलना में अपनी स्थिति को छोटा देखकर ईर्ष्या द्वेष करने लगना आदि क्षिप्रतायें भावना का ही सस्तापन है। ऐसी सस्ती भावना वाले लोग मानव से महामानव बनना तो दूर पूरे मनुष्य भी नहीं बन पाते। जब कि विकास क्रम का तकाजा है कि मनुष्य पीछे की ओर लौटकर अल्प-मानव न बने बल्कि आगे बढ़कर पूर्ण और अति-मानव बने। किन्तु खेद है कि लोग सस्तेपन के वशीभूत होकर अपने महत्व का मूल्याँकन नहीं कर पाते।

क्रोध की स्थिति को शाँति, काम की परिस्थिति को गंभीरता, लोभ की स्थिति को निष्प्रहता, मोह की स्थिति को विवेक और ईर्ष्या तथा द्वेष की स्थिति को तटस्थता से उत्तर देना भावनाओं की गरिमा, गंभीरता और गुरुता का प्रमाण देना है। ऐसी गहरी और दृढ़ भावनाओं वाले लोग यदि कोई विशेष उन्नति के लिये न भी लालायित हों तो भी अपने आन्तरिक स्वरूप में वे बड़े ही महान और सुख रहते हैं।

आशा और अभिलाषा को जीवन का प्रेरक तत्व माना गया है। इन्हीं के आधार पर मनुष्य उठता और आगे बढ़ने के लिए प्रयत्न करता है। आशा और अभिलाषायें जीवन की वह हरियाली है, जिसके अभाव में यह महत्वपूर्ण अवसर मरुस्थल की तरह नीरस और निस्सार बन जाता है। जीवन के इन महत्वपूर्ण तत्वों को भी लोग सस्तेपन से घेर कर निकृष्ट बना डालते हैं। जीवन में नश्वर तथा निःसार वैभव तथा भोगों की कामना करते रहना अथवा उनके अनुसार मरते-खपते रहना कामनाओं सस्तापन है। मुझे धन मिल जाये। मेरे बेटा हो जाय। मैं बड़ा आदमी बन जाऊँ। मैं आराम से रहकर सुख-सुविधा भोग सकूं आदि अभिलाषायें और दूसरों से अकारण सहायता, सहयोग तथा थोड़ा देकर बहुत पाने की आशा- आशा और अभिलाषाओं का सस्तापन है। संसार के नश्वर भोगों और अस्थिर वैभव की कामना क्या है? यह तो साधारण-सी प्रक्रिया है। संसार में नित्य ही लोग धन कमाते उसका भोग और अन्त में छोड़कर चले जाते हैं।

जिन वस्तुयें में मनुष्य का सहज अधिकार है उनकी कामना करना अभिलाषाओं के ओछेपन के सिवाय और कुछ नहीं कहा जा सकता। जब परमात्मा ने दूसरों की तरह ही अपने को भी शक्ति सामर्थ्य दी है। हाथ-पाँव, शरीर और बुद्धि दी है, तब अपंगों की तरह दूसरों से सहायता तथा सहयोग की अकारण आशा करना, आशा के सस्तेपन के सिवाय और कहा जायेगा?

अभिलाषा तथा आशा का वह स्वरूप जिसमें आत्म-निर्भरता, कल्याण भाव तथा निर्लोलुपता का गुण विद्यमान् हो, मनुष्य के लिये उचित और योग्य है। अभिलाषा यदि करनी है तो नश्वर साँसारिकता की नहीं बल्कि अनश्वर आत्म-तत्व की ही करनी चाहिये। चाहना चाहिये कि मुझे ऐसी शक्ति और सद्भावना दे, जिससे मैं समाज, संसार ओर राष्ट्र की सेवा कर सकूँ। परमात्मा ऐसी कृपा करे जिससे कि मैं भोगों के बीच रमण करता हुआ भी निष्काम तथा निर्मोह बना रहूँ। ईश्वर मुझे ऐसी बुद्धि दे जिससे मैं ऋषि मुनियों, आदर्श और आप्त-पुरुषों की वाणी, अपने विचार विश्वास तथा आचरण में चरितार्थ कर सकूँ। इस प्रकार की अभिलाषा वास्तव में बड़ी महान् अभिलाषा है। ऐसा महत्वाकाँक्षी व्यक्ति तीनों लोकों और दसों-दिशाओं में अपने लिए त्रयकालिक कुशल क्षेत्र को सुरक्षित करा लेता है। धन्य हैं, वे महत्वाकांक्षी जो इस प्रकार की महान आकाँक्षा रखते हैं।

विश्वास मानव जीवन का बहुत महत्वपूर्ण तत्व है, विश्वास को मानव-जीवन का मेरु-दण्ड कह लिया जाय, तब भी अनुचित न होगा। विश्वास के आधार पर ही जीवन टिका है। सफलता के विश्वास पर ही लोग पुरुषार्थ करते हैं। विश्वास के आधार पर ही आत्मा और परमात्मा की खोज होती है और विश्वास के आधार पर ही मनुष्य मृत्यु तक को जीत लेता है। ऐसे अनुपम तत्व विश्वास को भी मनुष्य सस्तेपन से दूषित तथा निरर्थक बना देता है।

बिना विचार किए किसी विचार अथवा व्यक्ति पर विश्वास कर लेना, भूत-प्रेतों और पिशाचों की ओर विश्वास को ले जाना, मान्यताओं तथा धारणाओं की तथ्यता जाने बिना विश्वास बना लेना, अन्ध-विश्वास, अतिविश्वास अथवा किन्हीं परिस्थितियों में असफलता अथवा अनिष्ट का विश्वास बना लेना विश्वास का सस्तापन ही है। विश्वासों के सस्तेपन से मनुष्य की शक्तियाँ कम हो जाती हैं और वह अनेक प्रकार की शंकाओं, संदेहों तथा भयों से घिर जाता है। ऐसी दशा में उसे जीवन में बड़ी दयनीय असफलता का मुख देखना पड़ता है।

विश्वास करना अथवा रखना एक महान् गुण है। किन्तु जिसके प्रति विश्वास बनाया जाय उसकी प्रामाणिकता को पहले परख लिया जाय। विश्वास बड़ा मूल्यवान् भाव है, इसे न तो किसी अपात्र को शीघ्र देना ही चाहिए और किसी अयोग्य के विश्वास की कामना ही करनी चाहिए। साथ ही जिस विषय में समझ-बूझकर विश्वास बना लिया जाय तो उसका दृढ़तापूर्वक निर्वाह भी किया जाना चाहिए। आज विश्वास बनाया कल तोड़ दिया। विश्वास का यह सस्तापन न तो योग्य है और न वाँछनीय। भूतों-प्रेतों, पिशाचों आदि जैसी अशिव आत्माओं में विश्वास न कर एक पूर्ण तथा अविच्छिन्न परमात्मा और उसके कल्याणकारी स्वरूपों में अखण्ड विश्वास रखा जाना विश्वास की गरिमा, गम्भीरता और महत्व का द्योतक है। सफलता, उन्नति और प्रगति का आत्म-विश्वास ऐसी साधना है, जो जीवन को बड़े से बड़े अंधकार से निकाल कर प्रकाश की ओर ले जाती है। माँगलिक विषयों तथा आत्मा और परमात्मा में अपने विश्वास तत्व को सुस्थिर बनाकर उसकी गरिमा तथा महिमा की वृद्धि करनी चाहिये।

शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा का मानव-जीवन में कितना महत्व है, यह किसी से छिपा हुआ नहीं है। जीवन का अस्तित्व शरीर से है। उसका संचालन मन से होता है। उसकी सुरक्षा बुद्धि से सम्भव होती हैं और उसमें ओत-प्रोत आत्म-तत्व उसे जागृत, चेतन तथा उद्बुद्ध बनाये रखता है। किन्तु मनुष्य अपने अज्ञान के कारण इन उपादानों को भी अमहत्वपूर्ण मानकर सस्ता बना लेता है। विषय-वासनाओं तथा अपकर्मों में शरीर द्वारा इंद्रियों की दासता करना शरीर का सस्तापन है। मन को निर्बल बना लेना, जरा-सी बात पर रो उठना, कतिपय प्रसंग पर हँस उठना। भावुकतावश उदारता, त्याग और दान वीरता की अभिव्यक्ति करना। क्षिप्रतापूर्वक किसी के प्रति सद्भावना अथवा असद्भावना बना लेना मन के सस्तेपन की निशानी है।

विवेक का उपयोग किए बिना, शीघ्रता से निर्णय ले लेना, गहराई से तथ्यों में उतरे बिना किसी का मूल्याँकन कर देना-कुटिलता, छद्म अथवा असत्य के लिये बुद्धि का उपयोग करना उसे सस्तेपन से दूषित कर डालना है। आत्मा की आवाज न सुनना, उसकी उपेक्षा करना, नास्तिकता को प्रश्रय देना, आत्मा की तुलना में शरीर को महत्व देना अथवा उसका चिन्तन न करना, आत्मा के प्रति सस्तापन उपस्थित करना है। शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा को सस्ता बनाकर चलने वाले किसी भी श्रेय के अधिकारी नहीं बन पाते। इस अपराध के कारण वे स्वयं भी अस्तित्व और व्यक्तित्व से सस्ते होकर एक निकृष्ट तथा निम्नकोटि का जीवन भोगा करते हैं।

शरीर को स्वस्थ, नियन्त्रित व संयमित रखना, बुद्धि को स्थिर, निर्णायक तथा चिन्तनशील बनाना, मन को बलिष्ठ, विश्वासी तथा अविचल रखना, आत्मा को जीवन का सर्वोपरि तत्व मानकर उसका सम्मान करना, शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा को महत्वपूर्ण बनाना है। जो महानुभाव जीवन और उसके समग्र तत्व से सस्तेपन को निकालकर उनमें महत्व गरिमा तथा आदर्श का समावेश करते हैं, वे निश्चय ही मानव से महामानव और जीव से ईश्वर बन कर अपना अंतिम लक्ष्य पा लेते हैं। जीवन बड़ा महत्वपूर्ण अवसर है, इसे सस्ता न बनाना चाहिये।


मानव शरीर एक सर्वांगपूर्ण यंत्र है

चेकोस्लोवाकिया की राजधानी प्राग के दो नवयुवकों के बारे में एक बड़ी विचित्र बात सुनने को आई। यह कि जब दोनों जोर जोर से साँस लेते हैं तो उनके शरीर के अन्दर से विचित्र प्रकार की ध्वनियां और संगीत आने लगता है, जो किसी समीपवर्ती रेडियो स्टेशन का ब्राडकास्ट प्रोग्राम भी हो सकता है। दोनों युवक जोर जोर से साँस लेते समय किसी लाउड-स्पीकर के सिरे का स्पर्श करते थे तो आवाज इतनी ऊँची हो जाती थी कि सुनने वालों को ऐसा लगता था, जैसे कोई रेडियो पूरा खोल दिया गया हो।

दोनों युवक एक फैक्टरी में काम करते थे। डाक्टरों ने उनकी पूरी शरीर परीक्षा की पर कोई कारण न बता सके। अनेक पत्रकारों ने विस्तृत छानबीन की पर निराशा ही हाथ लगी। युवकों के शरीर से संगीत ध्वनियों के प्रसारण का कोई कारण नहीं जाना जा सका।

नाद बिन्दु उपनिषद् में कुछ ऐसी साधनाओं का प्रकरण है, जिनके आरम्भिक अभ्यास में कई तरह के नाद सुनाई देने का वर्णन है। पहले यह ध्वनियां तीव्र होती हैं, फिर धीमी होती जाती हैं, यह ध्वनियाँ झींगुर, झरना, भ्रमर, वीणा, वंशी, घुंघरू आदि की तरह सुनाई देती हैं। उपनिषदकार का मत है कि जिस तरह भ्रमर को फूलों में रस मिलता है, नाद-योग के साधक को चित्तवृत्तियाँ उसी प्रकार उस मधुर संगीत का आनन्द लेती और विषय वासनाओं को भूल जाती हैं। जब शब्दों के साथ मिला हुआ नाद अक्षर-ब्रह्म में लीन हो जाता है, तो शब्द नहीं सुनाई देते वरन् एक अनिवर्चनीय आनन्द की अनुभूति होती है।

इस तरह के अंतरंग नाद का इन बाह्य जगत् में घटित होने वाली घटनाओं के साथ कितना सम्बन्ध है, इसके पूर्ण वैज्ञानिक विश्लेषण में तो अभी कुछ विलम्ब है पर वैज्ञानिक ऐसे तत्वों की उपस्थिति शरीर में अनुभव करने लगे हैं, जिनके जागरण से निकटवर्ती और दूरवर्ती प्रसारणों को अपने भीतर ही भीतर इस तरह सुना और जाना जा सकता है, जैसे कोई रेडियो सुन रहे हों।

कुछ दिन पूर्व शिकागो में एक वकील का आश्चर्यजनक समाचार छपा कि जब वह अपने बिस्तर के पास जाता है, तो उसे अजीब तरह की संगीत की आवाजें सुनाई देती हैं। अभी इसी आश्चर्य का विश्लेषण नहीं हो पाया था कि एक ऐसे व्यक्ति का पता चला है, जिसे चलते-फिरते सर्वत्र संगीत ध्वनियाँ सुनाई दिया करती थीं। एक मनोवैज्ञानिक ने उसकी विस्तृत खोज की। उसने बताया कि यह युवक एक ऐसे कारखाने में काम करता है, जहाँ कई प्रकार की वस्तुओं में निकिल की पालिश की जाती है। निकिल के कुछ कण साँस के द्वारा शरीर में चले जाते होंगे, कुछ दांतों में चिपक जाते होंगे और आपस में इस तरह सम्बन्ध स्थापित करते होंगे, जिससे विद्युत तरंगें पैदा होने लगती होंगी और यह तरंगें किसी निकटवर्ती रेडियो स्टेशन के प्रसारणों को पकड़ने लगती होंगी। उसी से यह विचित्र ध्वनि सुनाई देने लगती होगी।

इससे भी विचित्र ध्वनियों की कई घटनायें देश-विदेश में घटित हुई हैं, जिनसे यह रहस्य और भी पेचीदा हो जाता है। विश्व विख्यात पर्यटक बर्ट्रेण्ड टामस ने एक बार अरब रेगिस्तान की यात्रा की तो उन्हें कुछ ऐसे बालू के टीले मिले जो गाते थे और उनके गाने की ध्वनियाँ इतनी स्पष्ट और ऊँची होती थीं कि काफी दूर बैठ कर भी उन्हें मजे से सुना जा सकता था। यात्रा-संस्मरण में टामस ने लिखा है कि यह मधुर-संगीत कई तरह के वाद्ययंत्रों से संयुक्त होता था। कभी ढोलक की आवाज आती थी, कभी वीणा की सी झंकार।

सहारा के रोने वाले टीलों की कथा भी कुछ ऐसी ही है। कैलीफोर्निया में भी बालू के कुछ ऐसे टीले हैं, जो गाते हैं। हवाई द्वीप का एक टीला कुत्ते की सी आवाज में भौंकता है। दक्षिण अफ्रीका में कुछ ऐसी रहस्यमय ड़ड़ड़ड़ भीतें हैं, वह अट्टहास तक करती सुनी गई हैं। योरोप में कुछ ऐसे समुद्र तट हैं, जहाँ यात्री मधुर संगीत ध्वनियों का रसास्वादन करते हैं। लंकाशायर के सेण्ट एनीके समुद्रीतट की बालू को एक विशेष प्रकार से दबाया गया तो उससे विचित्र तरह की ध्वनियां प्रसारित हुईं। वैज्ञानिकों ने इन सब रहस्यों का पता लगाने की चेष्टा की पर अभी तक वे इतना ही जान पाये हैं कि प्रकृति में बालू की तरह के कुछ ऐसे कण हैं, जो परस्पर संघात से प्राकृतिक ध्वनियाँ निकालते हैं।

एक बार कैलीफोर्निया की एक स्त्री भोजन पकाने जा रही थी, अभी वह उसकी तैयारी कर ही रही थी, चूल्हे से विचित्र प्रकार के गाने की ध्वनि निकलने लगी। गाना पूरा हो गया, उसके साथ ही ध्वनि आनी भी बन्द हो गई। न्यूयार्क में एक बार बहुत से लोग रेडियो प्रोग्राम सुन रहे थे, एकाएक संगीत ध्वनि तो बन्द हो गई और दो महिलाओं की ऊँची-ऊँची आवाज में बातें आने लगीं। रेडियो स्टेशन से पूछा गया तो पता चला कि वहाँ से केवल नियम-बद्ध संगीत ही प्रसारित हुआ है। बीच की आवाज कहाँ से आई यह किसी को पता नहीं है।

चेकोस्लोवाकिया की एक नदी में कुछ लोग स्नान कर रहे थे। तभी सामने से कुछ मधुर संगीत सुनाई देने लगा। लोगों ने छान मारा पर पता न चला कि कौन और कहाँ से गा रहा है, जबकि आवाज उनके पास ही हो रही थी। उस स्थान पर कुछ समय पूर्व कुछ सिपाही दिया गया कि उन सिपाहियों की मृतात्मायें गा रही होंगी।

अहमदनगर जिले में प्रवरा नदी के तट पर सतराता सोनगाँव में बने एक शिव-मन्दिर से आने वाली संस्कृत आवाज को बहुत से लोगों ने जा जाकर सुना। यह संगीत-मय ध्वनि शिवलिंग पर डाले जाने वाले जल की निकासी के लिये बनाई गई नाली से आती थी। पूना के 80 वर्षीय इतिहासज्ञ श्री डी. पी. पोद्दार ने भी इस विचित्र ध्वनि की पुष्टि की है और आगे अन्वेषण कराये जाने का सुझाव दिया है।

जैसलमेर में भी कुछ बालू के टीले पाये जाते हैं, जहाँ से कराहने आदि की कई तरह की ध्वनियाँ सुनी गई हैं। वहाँ के निवासियों का कहना है कि यह आवाजें इन टीलों में दबी प्रेतात्माओं की आवाजें हैं।

इस तरह की अनेक खबरें पढ़, सुनकर हर्वर्ड यूनिवर्सिटी के मनो-वैज्ञानिक प्रयोगशाला के प्रोफेसर स्मिथ ने इस सम्बन्ध में विस्तृत अन्वेषण करने का निश्चय किया। उन्होंने मानवीय शरीर के बारे में यह निष्कर्ष निकाला कि सामान्य मनुष्य विद्युत और विभिन्न प्रकार के रासायनिक पदार्थों के मिश्रण से बना है। किन्हीं ऐसे क्रिस्टल का उनसे संयोग होता होगा, जो रेडियो स्टेशनों के प्रसारणों को पकड़ने लगते होंगे। उन्होंने एक प्रयोग किया। अपने कान में नमक का घोल डाला और उसमें एक तार चिपका दिया। तार का दूसरा सिरा दूसरे कान में डाला। उससे उन्हें निकटवर्ती रेडियो स्टेशन के प्रोग्राम सुनाई देने लगे। यह तो एक प्रयोग था, पर उससे इस समस्या का कोई समाधान नहीं हुआ कि आखिर पदार्थों के संगीत ध्वनियां क्यों आती हैं?

कुछ वैज्ञानिकों ने इन रहस्यपूर्ण संगीत ध्वनियों का कारण रेडियो के शार्टवेव ट्रान्समीटरों को बताया है। उनका विश्वास है कि इस तरह के रहस्य भविष्य में और भी बढ़ सकते हैं। कुछ हद तक बात ठीक भी है। पाश्चात्य देशों में जहाँ यान्त्रिक जीवन की बहुतायत है, इस तरह की घटनायें बहुत बढ़ गई हैं। शिकागो में एक महिला ने पुलिस को रिपोर्ट दी है कि वह जैसे ही अपने रसोई घर का दरवाजा खोलती है, उसके विद्युत चालित चूल्हे से एक विशेष प्रकार की संगीत ध्वनि आने लगती है। दरवाजा बन्द करते ही संगीत भी बन्द हो जाता है। इसकी इंजीनियरों ने जाँच की तो पाया कि न तो पास में कोई शार्टवेव ट्रान्समीटर है और न ही बगल के किसी रेडियो से ध्वनि पकड़ी जा रही है, क्योंकि जाँच करते समय पास-पड़ोस के तमाम सेट बन्द करा दिये गये थे।

बिजली के यन्त्रों से इस तरह की ध्वनियाँ अधिक आती हैं, इसलिये यह रहस्य तात्विक है, ऐसा तो समझा जा रहा है पर अभी यथार्थ तथ्य पकड़ में नहीं आ रहे।

सेण्ट लुईस में एक बार एक रात्रि भोज का आयोजन किया गया। जैसे ही संगीतकारों ने वाद्य-यन्त्र उठाये कि उनसे ताजा खबरें प्रसारित होने लगीं। इससे आयोजन के सारे कार्यक्रम ही फेल हो गये। नाइरियाल की एक स्त्री ने बताया कि उसके स्नान करने के टब से गाने की ध्वनियां आती हैं। एलवर्टा के एक किसान का कहना है कि जब वह अपने कुएँ के ऊपर पड़ी हुई लोहे की चादर को हटाता है तो कुएँ के तल से संगीत सुनाई देने लगता है। पुलिस को सन्देह हुआ कि किसान ने कहीं रेडियो छुपाया होगा। इसलिये इंच इंच जमीन की जाँच कर ली। पड़ोसियों के रेडियो भी बरामद कर लिये पर जैसे ही उस लोहे की चादर को हटाया गया, आवाज बार-बार सुनाई दी। और अन्ततः उस समस्या का कोई हल निकाला नहीं जा सका।

कुओं बालू के टीलों, समुद्र तट, बिजली के पंखों, चुल्हों और वाद्य-यन्त्रों से संगीत क्यों और कहाँ से फूट पड़ता है? यह अब तक भी वैज्ञानिकों के लिये एक पहेली बना हुआ है। अब तक इस सम्बन्ध में जितनी जाँच और पड़तालें हुईं, वह सब की सब अधूरी रह गई। किसी एक मत पर नहीं पहुँचा जा सका हि इस तरह की संगीत ध्वनियों का अमुक कारण है।

दृश्य जगत् बड़ा विलक्षण है पर उससे भी विलक्षण है, अदृश्य जगत् और उस पर नियन्त्रण करने वाली सत्तायें। वह आये दिन ऐसे चमत्कार दिखाकर चुप रह जाती है और मनुष्य सिर धुनता, बुद्धि खपाता रह जाता है। इन रहस्यों का कोई अर्थ नहीं निकाल पाता। संभवतः इसका कुछ हल अध्यात्म विज्ञान दे सके। सूक्ष्म शक्तियों और सूक्ष्म-जगत् के अध्ययन से सम्भव है, इस समस्याओं का कुछ समाधान हो सके पर उसके लिये मनुष्य को फिर से विज्ञानपरक ही नहीं श्रद्धा-भूत जीवन की और लौटना पड़ेगा। हमारे वेदों और उपनिषदों के आधार पर भी कुछ खोज करना होगा। योगिक साधनायें और तात्विक ज्ञान से आशा है, इन रहस्यों का बहुत कुछ यथार्थ जानकारी मनुष्य को मिल सकेगी।


मैं किसे प्यार करूं

मैंने पूछा- “मैं किसे प्यार करूं” तो अन्तरतम से एक आवाज आई- “उन्हें, जिन्हें लो दलित और गर्हित समझते हैं, जो निन्दा और भर्त्सना के पात्र हो चुके हैं, उनके मित्र बनकर उन्हें प्यार और प्रकाश दो। तुम्हारा गौरव इस पर नहीं कि तुम्हें संसार में बहुत से लोग प्यार करते हैं, वरन् तुम संसार को प्यार करके गौरवान्वित होंगे।”

मैंने कहा- “लोग कहते हैं कि जो त्वचा, वर्ण और शरीर से सुन्दर नहीं हैं, उन्हें देखने से सुख और शान्ति नहीं मिलती।” मेरी प्यारी आत्मा ने कहा- “तुम असुन्दर के माध्यम से उस शाश्वत सौंदर्य की खोज करो जो त्वचा, वर्ण और शरीर के धुँधले बादलों में आकाश की नीलिमा के सदृश प्रच्छन्न शाँति लिये बैठा है। जब बाह्य आवरणों का धुँधला बादल छंट जायेगा तो सौंदर्य के अतिरिक्त कुछ रह ही न जायेगा।”

मैंने कहा- “माँ! संसार कोलाहल से परिपूर्ण है। सर्वत्र करुण और कठोर क्रन्दन गूंजते रहे हैं, तुम बताओ मैं सुनूँगा क्या?”

अविचल और उसी शान्त-भाव से मेरे हृदय में शीतलता जगाती हुई आत्मा की एक और स्वर झंकृति सुनाई दी- “वत्स उन शब्दों को सुना करो जिनका उच्चारण न जिव्हा करती है न ओंठ और न कंठ। निविड़ अन्तराल से जो मौन प्रेरणायें और परागान प्रस्फुटित होता रहता है, उसे सुनकर तेरा मानव-जीवन धन्य हो जायेगा।”

तब से मैं किसी भी वर्ण, त्वचा और शरीर वाले दीन दुःखी को प्यार करने में लगा हूँ। तब से मैं हृदय गुहा में आसीत सौंदर्य के ध्यान में निमग्न हूँ, तभी से मौन की शरण होकर उस स्तोत्र को सुनकर आनन्द पूरित हो रहा हूँ, जिसे युगों से नभोमंडल का कोई अदृश्य गायक गाता और प्राणियों का मन बहलाता रहता है।

खलील जिब्रान,


अदृश्य लोक के निवासी-हमारे अदृश्य सहायक

आइन्स्टाइन कहते हैं- ‘‘पदार्थ की सूक्ष्मतर सत्ता तक जब मेरी कल्पना और अनुभव शक्ति पहुँच जाती है तो मुझे यह विश्वास-सा होने लगता है कि वहाँ पहले से ही कोई विचार और परिवर्तन करने वाली चेतन सत्ता विद्यमान् है। मैंने तो केवल उसके साथ एकाकार किया है। अब मुझे विश्वास होने लगा है कि यह कोई अदृश्य जगत् की सूक्ष्म किन्तु महान् शक्तिशाली सत्ता है।”

भारतीय वेद-शास्त्रों में यह लक्षण परमात्मा के बताये गये हैं। सृष्टि का संचालन उसकी दिव्य शक्तियाँ करती हैं, ऐसा हमारा विश्वास है। ईश्वर उपासना, मुक्ति के सारे प्रयत्न और क्रिया-कलाप उसी विश्वास पर आधारित हैं। यद्यपि उस अदृश्य शक्ति का कोई प्रत्यक्ष दिग्दर्शन या भौतिक प्रमाण नहीं है, तो भी उस पर विश्वास करने के अनेक प्रमाण हैं।

आध्यात्मिकता का उद्देश्य भी परमात्मा अथवा विश्व की किसी महान् रक्षा करने वाली शक्ति के साथ जोड़ना है। ब्रह्मांड का अस्तित्व और इसका सत्य जिसके अंतर्गत सम्भवतः लाखों विश्व हैं- जिनका कोई अंत नहीं है, हमारी इन्द्रियों और बुद्धि के अनुभव की वस्तु है। ऊपर से देखने पर तो यह पता चलता है कि ब्रह्मांड अव्यस्थित है पर जब सूर्य, चन्द्रमा, मंगल, बुध, हर्शल प्लूटो और अन्य ग्रह-नक्षत्रों की गतिविधियों पर दृष्टि दौड़ाते हैं तो लगता है, सब कुछ व्यवस्था और नियम के अंतर्गत चल रहा है। जिससे स्पष्ट पता चलता है कि सब को जोड़ने वाली एक शक्ति है, जो प्रकृति अथवा बुद्धि का कोई अंश नहीं है वरन् वह नितान्त स्वतन्त्र, निर्लेप, बन्धनमुक्त है।

विज्ञान कहता है कि “एमीनो एसिड प्रोटीन” नामक पदार्थ ने एकाएक अपने पड़ौसी तत्वों को अपनी और आकर्षित करना और पचाना प्रारम्भ कर दिया जिससे जीवन की सृजनात्मक प्रक्रिया प्रारम्भ हुई पर जब यह पूछा गया कि ऐसा क्यों और कब हुआ तो विज्ञान कोई उत्तर न दे पाया।

प्रोटोन, न्यूट्रोन, इलेक्ट्रोन अथवा इनसे भी सूक्ष्म प्रकृति का कोई तत्व जिसके साथ उसे गतिशील करने वाली शक्ति अदृश्य रूप से घुली हुई है, प्रत्येक ब्रह्मांड में दूसरे प्रोटोन के साथ भी सम्बद्ध और एक दूसरे में अंतर्निविष्ट है। इस प्रकार अस्तित्व चाहे वह ईश्वर का हो, प्रकृति अथवा बुद्धि का पूर्णतया अविभाज्य है, इसका प्रत्येक अंश सूक्ष्म है, अदृश्य है और इन्द्रियों की अनुभूति से परे है। यह प्रत्येक दूसरे अंश को प्रभावित कर रहा है और प्रत्येक दूसरे अंश से प्रभावित हो रहा है।

रामायण का यह तात्विक विश्लेषण-

“गिरा अरथ जल बीचि सम कहियत भिन्न न भिन्न। वन्दहु सीता राम पद जिनहिं परम प्रिय खिन्न॥”

अर्थात्- ब्रह्म और प्रकृति दोनों वाणी और उसके भाव, जल और तरंग की भाँति अविभाज्य हैं, ऐसे परमात्मा को उसकी शक्ति समेत प्रणाम है, उन्हें दुःखी से प्यार है।” उपरोक्त वैज्ञानिक विश्लेषण से मेल खा जाता है।

रह गई बात यह जानने की कि अविभाज्य होकर भी निर्लेप अथवा परम स्वतन्त्र किस प्रकार है, उसकी पुष्टि के लिये उन घटनाओं की ओर चलना चाहिये, जो पदार्थों की शक्ति को भी तुच्छ और अपवाद बनाकर रख देती हैं।

होलिका प्रहलाद को लेकर अग्नि-कुण्ड में कूद गई। उसे आग में न जलने का वरदान था किन्तु वह जल गई और प्रहलाद अग्नि जैसी शक्ति और महान् ऊर्जा वाले पदार्थ से नितान्त अप्रभावित बच गये, यह घटना बताती है कि पदार्थ से भी परे की कोई सत्ता अवश्य है। ऐसी घटनायें इतिहास के प्रामाणिक पृष्ठों पर भी विद्यमान है।

कहने वाले कहेंगे यह पौराणिक गल्प हैं, इन पर कोई विश्वास नहीं किया जा सकता है। आज के विज्ञानवादी युग में ऐसा पूछा जाना स्वाभाविक है। पर ईश्वरीय सत्ता को तो काल की सीमा भी नहीं बाँध सकती। इसका एक सुन्दर उदाहरण श्री सी. डब्लू लेडी बीटर ने अपनी पुस्तक “अनविजिबिल हेल्पर्स” में इस प्रकार दिया है-

“एक बार लन्दन की हालबर्न सड़क में भयंकर आग लग गई है। उसमें दो मकान जलकर राख हो गये। उस घर में एक बुढ़िया को जो धुयें के कारण दम घुट जाने से पहले ही मर गई थी छोड़कर शेष सब को बचा लिया गया। आग इतनी भयंकर लगी थी कोई भी सामान नहीं निकाला जा सका।”

“जिस समय दोनों मकान लगभग पूरे जल चुके थे, तब धर की मालकिन को याद आया कि उसकी एक मित्र अपने बच्चे को एक रात के लिये उसके पास छोड़कर किसी कार्यवश कालचेस्टर चली गई थी। वह बच्चा अटारी पर सुलाया गया था और वह स्थान इस समय पूरी तरह आग की लपटों से घिरा हुआ था, आग की गर्मी से उस समय पत्थर भी मोम की तरह पिघलकर टपक रहे थे।”

“ऐसी स्थिति में बच्चे के जीवन की आशा करना ही व्यर्थ था फिर उसकी खोज करने कौन जाता है। पर एक आग बुझाने वाले ने साहस साधा, उपकरण बाँधे और उस कमरे में जा पहुँचा, जहाँ बच्चा लिटाया गया था। अस समय तक फर्श का बहुत भाग जल कर गिर गया था किन्तु आग कमरे में गोलाई खाकर अस्वाभाविक और समझ में न आने वाले ढंग से खिड़की की तरफ निकल गई थी। उस गोल सुरक्षित स्थान में बच्चा ऐसे लेटा था, जैसे कोई अपनी माँ की गोद में लेटा हो। बाहर का दृश्य देखकर वह भयभीत अवश्य था पर उसकी तरफ एक भी आग की चिनगारी बढ़ने का साहस न कर रही थी। जिस कोने पर बच्चा सोया था, वह बिल्कुल बच गया था। जिस पटिये पर खाट थी, वह आधे-आधे जल गये थे पर चारपाई के आस पास कोई आग न थी वरन् एक प्रकार का दिव्य तेज वहाँ भर रहा था। जब तक आग बुझाने वाले ने बच्चे को सकुशल उठा नहीं लिया, वह प्रकाश अपनी दिव्य प्रभा बिखराता रहा पर जैसे ही वह बच्चे को लेकर पीछे मुड़ा कि आग वहाँ भी फैल गई और दिव्य तेज अदृश्य हो गया।”

बंकिंघम शायर में बर्नहालबीयो के निकट हुई एक घटना में इस तरह का दैवी हस्तक्षेप लगभग एक घंटे तक दृश्यमान रहा। एक किसान अपने खेत पर काम कर रहा था। उसके दो छोटे-छोटे बच्चे भी थे, जो पेड़ के नीचे छाया में खेल रहे थे। किसान को ध्यान रहा नहीं दोनों बालक खेलते-खेलते जंगल में दूर तक चले गये और रात्रि के अंधेरे में भटक गये।

इधर किसान जब घर पहुँचा और वहाँ बच्चे न दिखाई दिये तो चारों तरफ खोज हुई। परिवार और पड़ौस के अनेक लोग उस खेत के पास गये, जहाँ से बच्चे खोये थे। वहाँ जाकर सब देखते हैं कि दीप-शिखा के आकार का एक अत्यंत दिव्य नीला प्रकाश बिना किसी माध्यम के जल रहा है, फिर वह प्रकाश सड़क की और बढ़ा यह लोग उसके पीछे अनुसरण करते चले गये। प्रकाश मन्दगति से चलता हुआ, उस जंगल में प्रविष्ट हुआ जहाँ एक वृक्ष के नीचे दोनों बच्चे सकुशल सोये हुये थे। माँ-बाप ने जैसे ही बच्चों को गोदी से उठाया कि प्रकाश अदृश्य हो गया।

26 जून सन् 1954 के देहली से निकलने वाले दैनिक ‘हिन्दुस्तान’ में छपी एक घटना इस प्रकार है- “जबलपुर भक्त प्रहलाद के काल में घटी उस घटना की पुनरावृत्ति इस कलियुग में हुई, जिसमें कुम्हार के जलते हुये भट्टे में ईश्वर ने बिल्ली और उसके बच्चों की रक्षा की थी। अंतर केवल यह था कि वे बिल्ली के बच्चे थे और इस बार चिड़िया के अण्डे। पन्ना जिले के धर्मपुर स्थान में कच्ची ईंटों को पकाने के लिये एक बड़ा भट्टा लगाया गया। भट्टे को जिस समय बन्द किया गया और आग लगाई गई, किसी को पता नहीं चला कि ईंटों के बीच एक चिड़िया ने घोंसला बनाया है और उसमें अपने अण्डे सेये हैं। एक सप्ताह तक भट्टा जलता रहा और ईंटें आँच में पकती रहीं, आठवें दिन जैसे ही भट्टा खोला गया एक चिड़िया उड़कर बाहर निकल भागी। बाद में पाया कि उस स्थान पर जहाँ घोंसला था, आग पहुंची ही नहीं। वहाँ की ईंटें कच्ची थीं। यह घटना देखकर वहाँ के प्रत्यक्ष-दर्शियों को विश्वास करना पड़ा कि ईश्वर का अस्तित्व है।”

अथर्ववेद में ईश्वर उपासना के लाभों का वर्णन करते हुए बताया है कि परमात्मा अपने उपासक की स्वयं रक्षा करता है, उसकी कृपा वर्षा क जल की तरह आवाज करती है। ऋग्वेद में भगवान् को वीर कहा गया है, वे भक्तों पर तुरन्त कृपा करने वाले और कर्मठ हैं, क्योंकि सोम याग में पाषाण हाथ में लेकर अध्वर्य आदि के रूप में सोम निष्पीड़ित करते हैं। यही देवताओं की रचना करने की कामना किया करते हैं।

“नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषद्” की एक आख्यायिका में देवता ब्रह्म जी से पूछते हैं- “हे प्रजापति! भगवान् को नृसिंह क्यो कहते हैं?” ब्रह्म जी बोले- सब प्राणियों में मानव का पराक्रम प्रसिद्ध है, सिंह भी उसी प्रकार बड़ा पराक्रमी होता है। नर और सिंह दोनों से संयुक्त रूप से पराक्रम और प्रबल हो उठता है, इसीलिये भगवान ने यह रूप धारण किया है, वे अपने इस रूप से भक्त की रक्षा और विश्व का कल्याण करते हैं।”

प्रकाश और दृश्य रूप में निर्बलों और दुःख पीड़ितों की सहायता करने वाले भगवान् की वह शक्ति ही नृसिंह कहलाती है। नृसिंह कोई साकार देवता नहीं। नामकरण एक अलंकार मात्र है। पर उनका रूप बड़ा प्रभावशाली है, वह किसी भी पूर्णग्रह में बंधे बिना अपने भक्त की सच्चे सज्जन और साधु व्यक्ति की सहायता करते रहते हैं। यह उनका न्याय है, भगवान् का उपासक कभी किसी का अहित नहीं करता, किसी के अनिष्ट, राग-द्वेष, ईर्ष्या, मद, मत्सर, पाखण्ड, छल-कपट की बात भी मन में नहीं लाता, अपने को सबसे छोटा मानता है, इसलिये भगवान् ऐसे दीन-जनों की सदैव रक्षा करते हैं।

लोरेंको मार्क्वोस (मोजाम्बिक) की एक घटना है कि पंगु अफ्रीकी जिसे लकवा मार गया था और पैर मुड़ जाने के कारण घिसटकर चलता था, बपूतिस्मा (दीक्षा का एक विशेष त्यौहार) पर एकाएक खड़ा हो गया और अच्छी प्रकार चलने फिरने लगा। यह समाचार ए. एफ. पी. ने दिया। समाचार में बताया है कि अर्नेस्टो टिटोस मुल्होब’ नामक उक्त अफ्रीकी यहाँ के लोगों और पर्यटकों से खूब परिचित है, वह जब प्रोटेस्ट चर्च की और बढ़ा तो उसके हृदय से अचानक ईश्वर भक्ति का उद्गार फूट पड़ा। कोई अलौकिक प्राण-शक्ति भर रही है। वह उठकर खड़ा हो गया, लोग देखकर विस्मित रह गये कि कल तक जिसे डाक्टर भी ठीक न कर सके वह अपने आप कितना स्वस्थ और चंगा हो गया है।

वेल्स की मुख्य सड़क से 22 वर्षीया युवती पैपिटा हैरिसन अपने पिता के जन्म-दिवस समारोह में भाग लेने लन्दन जा रही थी। अचानक कार एक बर्फ की चट्टान से टकरा गई, फिर एक दीवार तोड़कर एक खेत में घुस गई। दुर्भाग्य से खेत ढलान पर था, कार वहाँ से लुढ़की और 80 फुट नीचे नदी में जा गिरी। दुर्भाग्य ने वहाँ भी पीछा न छोड़ा, नदी में पास ही 20 फुट गहरा जल प्रपात था कार उसमें जा गिरी, इस बीच वह डूबने से बचने के लिये प्रयत्न करने लगी तो ऐसा जान पड़ा किसी ने हाथ पकड़ कर ऊपर उठा लिया हो। वह बाहर निकल आई।

ऐसे हजारों उदाहरण आये दिन आंखों से गुजरा करते हैं, जब ईश्वरीय शक्ति के अस्तित्व का बोध हो जाता है, हम भले ही स्वीकार न करें पर विचारशील लोग आइन्स्टाइन की तरह ही अदृश्य होने पर भी उस सत्ता के प्रति श्रद्धा रखते हैं। गाँधी जी ने लिखा है- ‘‘ईश्वर प्रार्थना ने सदैव मेरी रक्षा की। मेरे जीवन में परमात्मा का विश्वास न होता तो मैं पागल हो गया होता। ईश्वर में मेरा विश्वास ज्यों-ज्यों बढ़ता गया प्रार्थना के लिये मेरी व्याकुलता भी उतनी ही दुर्दमनीय होती गई। ईश्वर उपासना के बिना मुझे जीवन नीरस और शून्य प्रतीत होने लगता है।”

आध्यात्मिकता का प्रथम चरण आस्तिकता है। उसके बिना विज्ञान और टेक्नोलॉजी दोनों स्वार्थ भौतिक पदार्थों से संग्रह और अधिकार भावना के प्रदर्शन में जो बाधायें आती हैं, उन्हीं के निवाश में लग जाते हैं, इस स्थिति में मनुष्य घोर अहंकारी, दुष्ट-दुराचारी जो जाता है। आज की अनैतिकता, दुर्वासनायें और भ्रष्टाचार उसी का परिणाम है। इन कारणों से समाज कितना संघर्षग्रस्त और अशाँत है, यह कोई कहने की बात नहीं। यदि आध्यात्मिकता अर्थात् आस्तिकता द्वारा विज्ञान और टेक्नोलॉजी का नियंत्रण हो जाय तो यह दोनों ही वस्तुयें जीवन की शुभ्र-शक्तियों और श्रेष्ठता का साधन बन जायें।


मनुष्य शरीर की एक रहस्यमय शक्ति- कुण्डलिनी

भारतीय योग-साधन का मुख्य उद्देश्य जीवनमुक्त स्थिति का प्राप्त करना है। अभी तक प्राणियों के विकास को देखते हुए सबसे ऊँची श्रेणी मनुष्य की है, क्योंकि उसको विवेक और ज्ञान के रूप में ऐसी शक्तियाँ प्रदान की गई है, जिनसे वह जितना चाहे, ऊँचा उठ सकता है और कैसा भी कठिन कार्य हो उसे अपनी अंतरंग शक्ति से पूरा कर सकता है। संसार के अधिकाँश मनुष्य बाह्य जीवन में ही रहते हैं और प्रत्येक कार्य के लिये धन-बल शरीर-बल और बुद्धि-बल का प्रयोग करने के मार्ग को ही आवश्यक मानते हैं। इन तीन बलों के अतिरिक्त संसार के महान कार्यों को सिद्ध करने के लिये जिस चौथे ‘आत्म-बल’ की आवश्यकता होती है, उसके विषय में शायद ही कोई कुछ जानता है। पर वास्तविकता यही है कि संसार में आत्म-बल ही सर्वोपरि है और उसके सामने और कोई बल नहीं टिक सकता।

यह ‘आत्म-बल’ या ‘आत्म-शक्ति’ प्रत्येक व्यक्ति में न्यूनाधिक परिणाम में उपस्थित रहती है, उसके बिना मनुष्य का अस्तित्व ही नहीं रह सकता। पर जिन मनुष्यों में किसी प्रकार उसका विशेष रूप से प्रादुर्भाव हो जाता है, वे ही संसार में महान् अथवा प्रमुख पद को प्राप्त कर सकते हैं। यह शक्ति कुछ लोगों में जन्मजात रूप से ही होती है और वे बिना किसी विशेष साधन के, अभाव और कठिनाइयों की परिस्थितियों में रहते हुए भी, अंतरंग शक्ति के प्रभाव से ही अपने आस-पास के लोगों से ऊपर पहुंच जाते हैं। कुछ व्यक्तियों में यह धीरे-धीरे विद्या, बुद्धि संयम, नियम पूर्ण जीवन के साथ साथ बढ़ती जाती है। इस प्रकार वे बहुत ऊँचा चढ़ जाते हैं, पर यह वृद्धि क्रमशः होने के कारण उनको इसका अनुभव नहीं होता, और न लोग इसके कारण पर पूरी तरह ध्यान देते हैं।

हमारे शास्त्रों में कहा गया है ‘निर्बल-आत्मा’ कोई महान् कार्य नहीं कर सकती वरन् अनिश्चय, अनुत्साह और अविश्वास के कारण वह अपना जीवन नगण्य अथवा पदावनत स्थिति में ही बिता कर अपनी जीवन-लीला समाप्त कर लेता है। पर जो लोग अपनी निर्बलता अथवा त्रुटियों को समझ कर उनको दूर करने के लिये योग-मार्ग का आश्रय ग्रहण करते हैं, वे धीरे-धीरे अपनी निर्बलता को सबलता में बदल देते हैं और साँसारिक नियमों में ही सफल मनोरथ नहीं होते वरन् आध्यात्मिक क्षेत्र में भी वे ऊँचे उठते हैं। वे स्वयं अपना कल्याण साध नहीं नहीं करते वरन् अन्य सैकड़ों व्यक्तियों को हीनावस्था से छुटकारा पाकर उद्धार का मार्ग प्राप्त करने के योग्य बना देते हैं।

यों तो योग-साधन द्वारा क्रमशः आत्मोत्कर्ष का सरल और अनुभव गम्य विधान वही है, जो पातंजलि के ‘योग दर्शन’ में बतलाया गया है, अर्थात् मन, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, ध्यान, धारणा और समाधि। इसको जो कोई भी सामान्य रीति से करता रहेगा, वह शारीरिक, मानसिक और आत्मिक दृष्टि से अवश्य उन्नति करता जायेगा। यह ठीक है कि प्रत्येक व्यक्ति की प्रगति एक समान नहीं हो सकती, कुछ लोग थोड़े ही प्रयत्न और समय में महत्वपूर्ण शक्तियाँ प्राप्त कर लेते हैं और अन्य वर्षों तक लगे रहकर शारीरिक निरोगिता, मानसिक एकाग्रता, आत्मिक प्रसन्नता की दृष्टि से थोड़ा ही अग्रसर हो पाते हैं। इस अन्तर का एक कारण जहाँ वर्तमान जीवन में साधनों की श्रेष्ठता और संकल्प की दृढ़ता होता है, वहाँ दूसरा कारण पूर्व जन्म के संस्कारों का इस महान् उद्देश्य के अनुकूल होना भी होता है। इस तथ्य को स्पष्ट करते हुए गीता में कहा गया है-

तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम्। यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरु नन्दन॥

पूर्वाभ्यासे न तेनैव ह्रियते ह्मवशोऽपि सः। जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्माति वर्तते॥

प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्विषः। अनेक जन्म संसिद्धस्ततो याति परांगतिम्॥ - (गीता 06- 43-44-45)

“जो व्यक्ति किसी एक जन्म में योग-भ्रष्ट हो जाता है, वह अन्य जन्म में उस पहिले शरीर में साधन किये हुये योग-संस्कारों को प्राप्त हो जाता है और उसके प्रभाव से फिर भगवत्प्राप्ति के लिये प्रयत्न करता है। यद्यपि पिछले जन्म में वह विषयों से आकर्षित हो जाने के कारण योग-सिद्धि के लक्ष्य में असफल हो जाता है, पर पूर्व संस्कारों के प्रभाव से इस जन्म में फिर बहुत ऊँचा उठ सकता है। जब ऐसे मन्द प्रयत्न करने वाले योगी भी उच्च-गति को प्राप्त हो सकते हैं तो जो अनेक जन्मों से योग मार्ग पर चलते आये हैं, उनके सम्बन्ध में क्या कहना? वे तो संपूर्ण पापों से छुटकारा पाकर अवश्य ही ब्रह्म को प्राप्त कर लेते हैं।”

योग-शास्त्र में साधना के जो सर्वमान्य नियम दिये गये हैं, उनके सिवाय अध्यात्म-विद्या के ज्ञाताओं ने, इस मार्ग में शीघ्र प्रगति करके कुछ बहुत महत्वपूर्ण शक्तियाँ प्राप्त कर लेने की जो विधियाँ अथवा योग-शाखायें निकाली हैं, उनमें ‘कुण्डलिनी-योग’ का विशेष स्थान है। इससे शरीर में एक ऐसी शक्ति का आविर्भाव होता है, जिससे मनुष्य की चैतन्यता बहुत अधिक बढ़ जाती है और वह जब चाहे तब स्थूल-संसार के बजाय सूक्ष्म-जगत की स्थिति का अनुभव कर सकता है और एक संकीर्ण क्षेत्र में रहने के बजाय विशाल-विश्व की गतिविधि को देखने लगता है। ‘हठ-योग प्रदीपिका’ में कुण्डलिनी शक्ति’ के महत्व का वर्णन करते हुए कहा है-

सशैलवनधात्रीणां यथाधारोऽहिनायकः। सर्वेषां योगतंत्रणां तथाधारो हि कुंडली॥

सुप्ता गुरुप्रसादेन यदा जांगति कुंडली। तदा सर्वाणि पद्यानि भिद्यंते प्रंययोऽपि च॥

प्राणस्य शून्यपदवी तथा राजपथापते। तदा चित्तं निरालंबं तदा कालस्य वंचनस्॥

(हठयोग पु. 3-1, 2, 3,)

“जिस प्रकार सम्पूर्ण वनों सहित जितनी भूमि है, उसका आधार सर्पों का नायक (शेषनाग) है, उसी प्रकार समस्त योग साधनाओं का आधार भी कुण्डली ही है, जब गुरु की कृपा से सोयी हुई कुण्डली जागती है, तब सम्पूर्ण पद्य (षट्चक्र) और ग्रन्थियाँ खुल जाते हैं। और उसी समय प्राण की शून्य पदवी (सुषुम्ना), राजपथ (सड़क) के समान हो जाती है, चित्त विषयों से रहित हो जाता है और मृत्यु का भय मिट जाता है।”

अन्य शास्त्रों तथा विशेषकर तन्त्र ग्रन्थों में कुण्डलिनी के स्वरूप तथा उसके उत्थान का विवेचन करते हुए कहा है कि “कुण्डलिनी शक्ति मूलाधार में शक्ति रूप में स्थित होकर मनुष्य को सब प्रकार की शक्तियाँ, विद्या और अन्त में मुक्ति प्राप्त कराने का साधन होती हैं।” गुदा स्थान से दो अँगुल ऊपर और लिंग मूल से दो अँगुल नीचे की तरफ बहुत छोटे आकार वाला मूलाधार पद्य है। उसके बीच में तेजोमय लाल वर्ण का ‘क्लीं’ बीज रूप से स्थित है। उसके ठीक बीच में ब्रह्म-नाड़ी के मुख पर स्वयम्भूलिंग है। उसके दाहिने और साढ़े तीन फेरा खाकर कुण्डलिनी शक्ति सोई हुई है। इस कुण्डलिनी को ‘परमा-प्रकृति’ कहा गया है। देव, दानव, मानव, पशु-पक्षी, कीट-पतंग सभी प्राणियों के शरीर में कुण्डलिनी शक्ति विराजमान रहती है।

कमल-पुष्प में जिस प्रकार भ्रमर अवस्थित होता है, उसी प्रकार यह भी देह में रहती है। इसी कुण्डलिनी में चित्-शक्ति (चैतन्यता) निहित रहती है। इतनी महत्वपूर्ण होने पर भी लोग उसकी तरफ ध्यान नहीं देते, यह आश्चर्य का विषय है। यह अत्यन्त सूक्ष्म शक्ति है। इसकी सूक्ष्मता की कल्पना करके योग-शास्त्र में कहा है-

योगिनां हृदयाम्बुजे नृत्यन्ती नृत्यमंजसा। आधारे सर्वभूतानां स्फुरन्ती विद्युताकृति॥

अर्थात्- ‘‘योगियों के हृदय देश में वह नृत्य करती रहती है। यही सर्वदा प्रस्फुटित होने वाली विद्युत रूप महाशक्ति सब प्राणियों का आधार है।” इसका आशय यही है कि कुण्डलिनी शक्ति के न्यूनाधिक परिणाम में चैतन्य हुये बिना मनुष्य की प्रतिभा का विकास नहीं होता।

पिछले पचास-साठ वर्षों से अनेक विदेशी विद्वान भी इस तरफ ध्यान देने लगे हैं और उन्होंने स्वयम् कुण्डलिनी साधन करके उसकी शक्ति का अनुभव किया है। उनकी सम्मति में कुण्डलिनी शक्ति विश्व-व्यापी है। एक दृष्टि से हम अपने शरीरों में स्थित कुण्डलिनी को चैतन्य-शक्ति का आधार कह सकते हैं। इस शक्ति की एक धारा समस्त विश्व में सूर्य, चन्द्र आदि प्राकृतिक पिंडों में भी बहती रहती है। इस प्रकार उसे सर्व-शक्तिमान कह सकते हैं। अगर साधक कुण्डलिनी-योग में पूर्ण सफलता प्राप्त करके उस पर पूरा अधिकार और नियन्त्रण कर सके तो फिर संसार में उसके लिये कोई असम्भव नहीं है। वह सृष्टि का संचालन अपनी इच्छानुसार कर सकता है।

पर यह कार्य सामान्य नहीं है। इस कार्य में वे व्यक्ति ही हाथ डाल सकते हैं, जिन्होंने अपना रहन-सहन आरम्भ से ही पूर्ण संयम-युक्त और सात्विक रखा है और अपने शरीर तथा मन को नियमित अभ्यास द्वारा सुदृढ़ और सहनशील बनाया है। क्योंकि यह महाशक्ति जो कि सूर्य की शक्ति मानी जाती है, जब जागृत की जाती है, तब समस्त शरीर, विशेषकर स्नायु-संस्थान में बहुत उष्णता उत्पन्न करती है, जिससे साधक को कष्ट प्रतीत होने लगता है। कभी-कभी ऐसा भी होता है कि उत्तम श्रेणी के साधकों में ध्यान और उपासना करते-करते यह स्वयम् ही जागृत हो जाती है।

श्री रामकृष्ण परमहंस के जीवन-चरित्र से विदित होता है कि जिस समय दक्षिणेश्वर के मन्दिर में महीनों तक काली का ध्यान करते हुए उनकी कुण्डलिनी शक्ति जागृत हो गई थी तब उनको भी ऐसा ही कष्ट सहन करना पड़ा था। उस अवस्था का वर्णन करते हुए उन्होंने बतलाया था-

“कुछ झुनझुनी-सी उठकर पाँव से सर तक जाती है। सिर में पहुंचने के पूर्व तक तो चेतना रहती है, पर सिर में उसके पहुंचने पर सुध-बुध जाती रहती है, आँख, कान अपना कार्य नहीं करते, बोली भी रुक जाती है। बोले कौन? उस समय ‘मैं’ और ‘तू’ का भेद ही मिट जाता है। जो शक्ति झन-झन करती ऊपर उठती है, वह एक ही प्रकार की गति से नहीं चढ़ती। शास्त्रों में उसके पाँच प्रकार कहे हैं-

(1) चींटी के समान धीरे-धीरे ऊपर चढ़ना (2) मेंढक के समान दो-तीन छलाँग जल्दी जल्दी कूद कर फिर ठहर जाना, (3) सर्प के समान टेढ़ी गति से चलना (4) पक्षी के समान उड़कर चढ़ना (5) बन्दर के समान दो-तीन छलाँग लगाकर सिर में पहुँच जाना। किसी भी गति से इसके सिर में पहुँचने पर समाधि हो जाती है।

जीवन को उन्नत, शक्तिशाली और महान् बनाने के लिये कुण्डलिनी-जागरण निस्संदेह एक अत्यन्त प्रभाव शाली मार्ग है। पर यह तभी सम्भव है, जब इस साधना को किसी अनुभवी शिक्षक की देख-रेख में किया जाय। इससे भी अधिक आवश्यकता यह है कि साधक के आचार-विचार और उद्देश्य पूर्णतः शुद्ध हों।


क्षणिक सुख

वाजिश्रवा ने अपने पुत्र नचिकेता के लिये यज्ञ फल की कामना से विश्व जित यज्ञ आयोजित किया। इस यज्ञ में नचिकेता ने अपना सारा धन दे डाला। दक्षिणा देने के लिये जब वाजिश्रवा ने गौयें मँगाई तो नचिकेता ने देखा वे सब वृद्ध और दूध न देने वाली थी तो उसने निरहंकार भाव से कहा- “पिता जी निरर्थक दान देने वाले को स्वर्ग की प्राप्ति नहीं होती।” इस पर वाजिश्रवा क्रुद्ध हो गये और उन्होंने अपने पुत्र नचिकेता को ही यमाचार्य को दान कर दिया।

यम ने कहा- ‘वत्स! मैं तुम्हें सौंदर्य यौवन, अक्षय धन और अनेक भोग प्रदान करता हूँ किन्तु नचिकेता ने कहा जो सुख क्षणिक और शरीर को जीर्ण करने वाले हों उन्हें लेकर क्या करूंगा, मुझे आत्मा के दर्शन कराइये। जब तक स्वयं को न जान लूँ वैभव विलास व्यर्थ है।

साधना के लिये आवश्यक प्रबल जिज्ञासा, सत्यनिष्ठा और तपश्चर्या का भाव देखकर यम ने नचिकेता को पंचाग्नि विद्या (कुंडलिनी जागरण) सिखाई, जिससे नचिकेता ने अमरत्व की शक्ति पाई।


प्रेम साधना द्वारा आन्तरिक उल्लास का विकास

महात्मा ईसा ने एक स्थान पर कहा है-

“परमेश्वर की इच्छा पर मैं अपना सर्वस्व सौंपने को तैयार हूँ। इस दुनिया की कोई वस्तु मैं उससे नहीं चाहता। मैं उसे इसलिये प्यार करता हूँ क्योंकि वह प्यार के ही योग्य है। परमेश्वर में क्या-क्या शक्ति और विशेषतायें हैं, इसे जानने की मुझे तनिक भी इच्छा नहीं है, क्योंकि मैं उससे कोई सिद्धि या अधिकार नहीं चाहता। मेरे लिये इतना ही जानना पर्याप्त है कि वह प्रेममय है। प्रेम उसे प्रिय है।”

महात्मा ईसा के उपर्युक्त कथन में प्रेम की महिमा स्पष्ट होती है। उस प्रेम की महिमा, जिसने असंख्य विरोधों और अपवादों के होते हुए भी ईसा को एक महान् पुरुष तथा संसार का पूजा-पात्र बना दिया। ईसा ने अपने हृदय का वह प्रेम परमात्मा को समर्पित कर दिया। परमात्मा के प्रति मन, वचन और आत्मा से सम्पूर्ण प्रेम समर्पित कर देने से ईसा की आत्मा का अनिवर्चनीय विकास तथा विस्तार हुआ। उनका ईश्वरपरक प्रेम फैलकर जन-जन पर छा गया, जिससे वे स्वयं सबके प्यारे बन गये। निश्छल तथा निर्विकार प्रेम करने वाला निश्चय ही बदले में प्रेम का प्रतिदान पाता है।

यह सत्य है कि प्रेम प्रतिदान प्रेम से मिलता है। किन्तु फिर भी प्रतिदान के लोभ से किया हुआ प्रेम निश्छल तथा निर्विकार नहीं मान जा सकता। उसमें कोई भौतिक स्वार्थ न होने पर भी एक प्रच्छन्न आत्मिक स्वार्थ तो रहता ही है। इतना मात्र स्वार्थ भी प्रेम की निश्छलता, निर्विकारता और गरिमा से साथ उसके प्रभाव को भी नष्ट कर देता है। वास्तविक प्रेम तो वही होता है, जिसमें दान ही दान की भावना होती है, प्रतिदान का कोई भाव नहीं होता। सच्चा-प्रेमी अपने प्रेमास्पद से किसी प्रकार की आशा, आकाँक्षा नहीं रखता। वह तो केवल देना ही चाहता है, लेना नहीं। सच्चा प्रेमी दान में ही प्रतिदान का आनन्द और संतोष प्राप्त कर लेता है। वह स्वयं आत्म-तुष्ट और परिपूर्ण होता है। उसको अपने प्रेमास्पद का हित ही अपना हित, उसका हर्ष अपना हर्ष और उसका सुख अपना सुख अनुभव होता है। जिसे दान में सुख प्राप्त होगा, वह प्रतिदान के लिये लालायित ही क्यों होगा?

जब कोई व्यक्ति यह कहता है कि वह अमुक व्यक्ति को प्रेम करता है तो सुनकर बड़ी प्रसन्नता होती है। विचार आता है कि यह व्यक्ति प्रेम की अनुभूति से ओत-प्रोत कितना भाग्यवान् है। यह प्रेमी है किसी को प्रेम करता है। इस प्रकार इसने अपने जीवन में दुर्लभ आत्म-शाँति तथा आत्म-संतोष की व्यवस्था कर ली है। किन्तु वही व्यक्ति जब यह कहता सुना जाता है कि उसे उसके प्रेम का प्रतिदान नहीं मिला, इसका उसे दुख है, तो सहसा ही उस पर तरस आने लगता है और ऐसा भान होता है कि यह तो बड़ा अभागा है। प्रेम का व्यवसाय करना चाहता है। प्रेम का प्रतिदान चाहने वाले प्रेम के व्यवसायी ही तो होते हैं। जहाँ जिस स्थान पर, जिस विषय में लेने और देने की भावना होती है, वहाँ वह उस विषय का व्यवसाय ही माना जायेगा।

व्यवसायी भावना रखने वालों का प्रेम व्यापार में असफल होना अनिवार्य है। उनकी असफलता को स्वयं परमात्मा भी नहीं रोक सकता। जुए की बाजी की तरह प्रेम का दाँव लगाने वाले उस अमृत से उसी प्रकार वंचित रहते हैं, जैसे जुआरी सम्पन्नता से। यह आवश्यक नहीं कि जुआरी जो दाँव लगाये, वह उसके पक्ष में ही सामने आये। और यदि कभी वह पक्ष में आ भी जाता है तो फिर किसी दाँव पर विपक्ष में चला जाता है और इस प्रकार उसकी स्थिति असफल तथा अभावपूर्ण ही बनी रहती है।

जो प्रतिदान की लालसा और व्यावसायिक भावना से प्रेम करता है, वह वास्तव में किसी पर मायाजाल फेंकता है। यह आवश्यक नहीं कि कोई उसके माया-जाल में फँस ही जाये। और यदि कोई फँस भी जाता है तो शीघ्र ही वास्तविकता खुल जाती है और तब जीवन में कसक और कांटों के सिवाय कुछ शेष नहीं रह जाता। प्रतिदान की भावना से दूषित व्यावसायिक प्रेम जीवन के लिये विष से भी अधिक भयानक होता है।

प्रेम के अमृत से संतुष्ट प्रेमी संसार के सारे दुःख-द्वन्द्वों से मुक्त हो जाता है। उसका मन सम्पूर्ण रूप से अपने प्रेमास्पद में तल्लीन रहने से उसे संसार के दुख-द्वन्द्व अनुभव ही नहीं होते और अपने प्रेमास्पद के लिये तो वह विपत्ति के पहाड़ भी अपने ऊपर ले सकता है। परमात्मा के सच्चे भक्त उसके प्रेमी, उसके प्रेम के सम्मुख मोक्ष, सुख को तुच्छ समझते हैं। वह प्रवंचना करता है, ‘हे प्रभु! इस संसार में जो भी दुःख दर्द मौजूद है, जो भी कष्ट और विपत्तियाँ वर्तमान हैं, मैं उनसे जरा भी नहीं डरता, इस दुनिया के सारे पाप, अभिशाप, जो मेरे भाग्य में लिखे हैं, मैं उनका प्रसन्नता से भोग करने को तैयार हूँ। उनका पूरा दण्ड पाने को प्रस्तुत हूँ और तुझसे उनमें जरा भी रियायत नहीं चाहता। मैं तुझसे किसी प्रकार की सिद्धि, समृद्धि भी नहीं चाहता और न तुझ से धन, स्वास्थ्य, सौंदर्य, बुद्धि आदि सम्पदायें ही माँगता हूँ, न मैं मुक्ति अथवा स्वर्ग के लिये तेरे प्रति याचना करता हूँ, मुझे जन्म-मरण का चक्र भी सहर्ष स्वीकार है, मैं तुमसे क्षमा का भी आकाँक्षी नहीं हूँ, मैंने जो कर्म बोये हैं, उनका फल काटने में जरा भी संकोच नहीं है, मैं जो कुछ अच्छा-बुरा हूँ, मुझे रहने दे। मैं तुझसे कुछ भी नहीं चाहता। हाँ, यदि मुझको आकाँक्षा है तो यह कि तू मुझको अपने से प्रेम करने दे। प्रेम के लिये प्रेम और केवल निष्काम प्रेम। इसमें ही मेरे जीवन की सार्थकता है और सफलता भी। हे प्रभु! तू मुझे अपने से जी भर प्रेम करने दे। बस।”

जो सच्चे प्रेम का अमृत पाकर संतुष्ट हो जाता है, उसे संसार के मिथ्या भोगों की कामना भी नहीं रहती। जो लोग वासना से प्रेरित आकर्षण को प्रेम कहते हैं, वे प्रेम का वास्तविक अर्थ ही नहीं समझते। वासनाजन्य आसक्ति को प्रेम मानना एक प्रकार से आत्म-प्रवंचना ही है। प्रेम का स्तर आत्मा है और वासना का सम्बन्ध शरीर से है। शरीर नश्वर है, इसलिये उससे सम्बन्धित सारे विषय भी नश्वर हैं। प्रेम अमर तत्व है, वह नश्वरता से दूर एक रस रहने वाली भावना है। शरीर नष्ट हो जाने पर भी प्रेम-भावना का विनाश नहीं होता। आगामी जन्म में प्रेमी अपने प्रेमास्पद को पुनः पा लेता है और फिर उसी चिरन्तन आनन्द में निमग्न रहने लगता है। किन्हीं भी लोगों में इस जन्म में प्रेम अथवा भक्ति की तीव्रता देखी जाती है, वह उनकी इसी जन्म की उपलब्धि हो यह आवश्यक नहीं। प्रेम की परम्परा जन्म-जन्मान्तर तक चलती रहती है। उसकी पूर्णता की प्राप्ति तभी होती है, जब प्रेम और प्रेमास्पद की आत्मायें परस्पर मिलकर एक हो जाती हैं।

प्रेम आत्मा का विषय है, शरीर का नहीं। इसलिये भोग-वासना के आकर्षण को प्रेम मान बैठना उचित नहीं। भोग-वासना के दोष से भी प्रेम को मुक्त ही मानना चाहिये। आत्मा का विषय होने से प्रेम आत्मा की तरह ही अभोग्य है। भोग शरीर का विषय है, शरीर भोग्य होने से वासनाओं का भोग सम्भव होता है। जिस आकर्षण में भोग वाँछा अनुभव हो वहाँ समझ लेना चाहिये कि वास्तविक प्रेम नहीं है। सच्चे और आत्मिक प्रेम में वासना भोग, आसक्ति, मोह, संयोग-वियोग, पीड़ा-कसक अथवा दुःख-शोक आदि विकार नहीं होते। वह तो सर्वथा आत्मा की ही तरह विकार रहित और परिवर्तन से परे होता है। आत्मिक प्रेम का धनी व्यक्ति अपने प्रेमास्पद को निरन्तर अपनी आत्मा में ही पाता रहता है।

शारीरिक संयोग-वियोग उसके लिये कोई महत्व नहीं रखते। सच्चा प्रेमी अपने प्रेमास्पद को संयोग की अवस्था में भी अपने भीतर ही देखता और सुखी होता है और वियोग की अवस्था में भी अपने अन्दर देखता और सुख पाता है। शरीर से दूर हो जाने पर भी सच्चे प्रेमी को प्रेमास्पद का वियोग अनुभव नहीं होता। जो प्रेमी अपने प्रेमास्पद के शारीरिक संयोग-वियोग में सुखी अथवा दुःखी होता है, उसे समझ लेना चाहिये कि उसका प्रेम आत्मिक नहीं है। वह अपने प्रेमी से शारीरिक स्तर पर ही सम्बन्धित है।

किसी के प्रति सच्चे होने का एक लक्षण यह भी है कि प्रेमी को अपने प्रेमास्पद के दोष भी दोष रूप में नहीं दीखते। उसकी त्रुटियाँ भी अप्रिय नहीं लगतीं। ऐसा इसलिये नहीं होता कि अमुक से अमुक का गहरा सम्बन्ध होता है अथवा किसी को अपने को प्रेमास्पद हीन होना सह्य नहीं होता। यह इसलिये होता है कि प्रेम प्राण मनुष्य योगी के समान होता है। वह बहुधा गुण-दोषों से मुक्त होता है। प्रेम जब अपनी चरमावधि पर पहुँच जाता है, तब केवल प्रेमास्पद ही किसी की सम-दृष्टि अथवा गुण-दृष्टि का विषय नहीं बन जाता बल्कि संसार के जीव मात्र ही उसकी गुण-दृष्टि के विषय बन जाते हैं। सच्चा प्रेम संसार में जीव-मात्र के लिये एक समान दृष्टि का विकास कर देता है। इसके भी दो कारण हैं। एक तो यह कि प्रेम स्वभावतः ही मनुष्य की आत्मा का विकास सार्वभौम आत्मीयता में कर देता है। दूसरे सच्चे प्रेमी को संसार के अणु-अणु में अपने प्रेमास्पद के ही दर्शन होते रहते हैं। इसलिये उसको किसी भी व्यक्ति अथवा वस्तु में दोष, दुर्गुण नहीं दीखते।

प्रेम एक महान योग है। इसे धर्मशास्त्रों तथा आध्यात्मिक क्षेत्र में प्रेम-योग के नाम से कहा भी गया है। जिसने सत्य-प्रेम का अमृत प्राप्त कर लिया अथवा जिसने उपाय, अभ्यास अथवा साधना द्वारा अपनी आत्मा में प्रेम का स्फुरण कर लिया है, वह योगी है। उसका प्रेम योग न केवल संसार के दुख-दर्दों से ही अपने साधक को मुक्त रखेगा बल्कि उसे उस गति का भी अधिकारी बना देगा जो योगियों की निश्चित एवं नैसर्गिक उपलब्धि है।

जो संसार में किसी एक को सच्चे रूप में प्रेम करेगा, स्वभावतः उसे संसार के सारे व्यक्तियों से प्रेम की अनुभूति होने लगेगी। बहुत बार लोग समझते हैं, कि उन्हें अपनी पत्नी तथा बच्चों से बड़ा गहरा प्रेम है। लोगों का ऐसा समझना गलत भी नहीं होता। उन्हें अपनी पत्नी तथा बच्चों से प्रेम होता भी है। वे उनकी बुराइयों की ओर से निरपेक्ष हो जाते हैं। उनके लिये बड़े से बड़ा त्याग करते हैं और बड़े से बड़ा बलिदान देने में भी संकोच नहीं करते। उनकी सुख-सुविधा का ध्यान रखते हैं। अपने आप कष्ट उठाकर उनको आराम पहुँचाते हैं। यह सब लक्षण देखकर आभास हो सकता है कि अमुक व्यक्ति को अपनी पत्नी तथा पुत्रों से बड़ा प्रेम है। किन्तु वास्तव में ऐसा होता नहीं।

पत्नी तथा बच्चों के प्रति लोग जिस अनुभूति का अनुभव करते हैं, वह प्रेम न होकर मोह होता है। मोह में भी आत्मीयता का अंश कम नहीं होता। किन्तु उनकी वह आत्मीयता, स्वार्थ अथवा अपनेपन की संकीर्णता से आध्यात्मिक स्तर की न होकर साँसारिक स्तर की होती है। अपने बच्चों के प्रति प्रेम में उन पर जान देने वाले, उनके दोषों को अदृष्टिगोचर करने वाले बहुधा दूसरों के बच्चों को जरा भी नहीं चाहते। उनका एक साधारण-सा दोष भी वे क्षमा नहीं कर पाते। यदि उनको अपने बच्चों से सच्चा और आत्मिक प्रेम होता तो निश्चय ही उन्हें अन्य बच्चे भी अपने बच्चों के समान ही प्रिय होते। वे उनके लिये भी त्याग और बलिदान कर सकते और उसमें वही संतोष पाते, जो अपने बच्चों के प्रति करने में। प्रेम आत्मा का विषय है।

आत्मिक क्षेत्र में अपना-पराया, अच्छा-बुरा अथवा मेरा-तेरा आदि की संकीर्णता नहीं होती। मनुष्य की आत्मा, संकीर्णता, स्वार्थ तथा निकृष्टता से सर्वथा परे है। वह आत्मा का अंश है, उसका स्वरूप है। निदान उसी की तरह सारे संसार को अपना आत्मीय ही समझता है। सच्चे प्रेमी में परमात्मा की तरह ही व्यापकता, विस्तार तथा निःस्वार्थता आ जाती है और वह सम्पूर्ण जड़-चेतन में एकात्म-भाव का अनुभव करने लगता है। निःसन्देह जिसने प्रेम के उस पावन तत्व को प्राप्त कर लिया है, वह बहुत बड़ा भाग्यवान और जीवन में ही जीवन-मुक्त योगी के समान है।


आदर

एक लड़की ने पूछा- ‘‘पिताजी! कौवा और कोयल दोनों काले हैं पर लोग कौवे को मारते और कोयल को प्यार करते हैं, यह क्यों? बालिका पर एक सकरुण दृष्टि डालकर पिता ने उत्तर दिया- ‘‘कोयल सबको प्यार करती है, इसलिये मीठा बोलती है। वाणी और भावनाओं की मधुरता के कारण ही वह सर्वप्रिय बन गई, कौवा तो अपने स्वार्थ और धूर्तता के कारण ही उस आदर से वंचित रह गया।


‘उपयोगितावाद’ हमें हिप्पी बनाकर छोड़ेगा

आज का पाश्चात्य जगत् जान स्टुअर्ट मिल के “उपयोगितावाद सिद्धान्त” पर चल रहा है। उपयोगितावाद केवल ऐन्द्रिक सुख को प्रधानता देता है और कहता है कि यही सुख प्रत्यक्ष और तर्क-संगत है, चूँकि सुख मनुष्य का अन्तिम लक्ष्य है, इसलिये ऐसा कोई भी साधन जो सुख की प्राप्ति में सहायक हो उसे प्राप्त करने के लिये व्यक्ति स्वच्छन्द है।

उपयोगितावाद प्राणि-मात्र के प्रति कर्त्तव्य और सहानुभूति भाव को नहीं मानता। उनका कहना है कि “किसी भी नियम का प्रतिपादन प्रकृति के गुण और स्वभाव के अनुसार होना चाहिये। प्रकृति का सिद्धान्त यह है कि बड़ी मछली छोटी मछली को खा जाती है। बड़े वृक्ष छोटे पौधों को पनपने नहीं देते। बड़े जीव छोटे जीवों की सत्ता और स्वतन्त्रता का अपहरण करते रहते हैं, उन्हें मार कर खाते रहते हैं। यही सिद्धांत सभी पर लागू होता है अर्थात् सुख की पूर्ति के लिये स्वच्छन्दता ही नहीं शक्तिवाद भी सही है।”

वास्तविकता यह है कि- प्रकृति का यह नियम सनातन नहीं अपवाद है। अधिकाँश प्रकृति परोपकार के नियम का अनुसरण करती है। वृक्ष अपने फल आप सेवन नहीं करते, नदियाँ औरों के लिये बहती हैं, सूर्य भ्रमण करता है, जिससे सर्वत्र शक्ति, चेतनता विकसित होती रहे। “जियो और जीने दो-प्रयत्न करो और शाश्वत सुख की प्राप्ति करो -उसके लिये यदि भौतिक जीवन को तपोमय बनाना पड़े तो बनाना चाहिये।” यह विश्व का नैसर्गिक नियम है और सम्पूर्ण भारतीय संस्कृति उसी पर आधारित है। इसी कारण भारतीय जीवन में आज भी अपेक्षाकृत अधिक शाँति और सौहार्द्र बना हुआ है।

उपयोगितावाद सिद्धान्त के मन्त्रदृष्टा स्टुअर्ट मिल लिखते हैं- ‘‘जो काम जितना आनन्द की ओर ले जाता है, उतना ही अच्छा है तथा जो आनन्द से जितनी विपरीत दिशा में ले जाता है, उतना ही बुरा है। आनन्द से मतलब है, सुख तथा कष्ट का न होना। सार्वजनिक प्रसन्नता या सुख बढ़ाने के लिये हम बाधित नहीं।”

उपयोगितावाद का कहना है कि “पुण्य की कामना ही नहीं करनी चाहिये।” इस मान्यता ने मनुष्य-जीवन के आदर्श को ही उलट-पुलट कर दिया है। जबकि जीवन का वास्तविक लक्ष्य है- प्रेम, दया, भ्रातृ-भाव व आध्यात्मिकता पर तथाकथित उपयोगितावाद में इनका कोई उल्लेख नहीं भौतिकतावादी सुख की ही प्रधानता रह गई है।

परिणाम- मशीन और वासना की भीड़ का अस्तित्व समाप्त हो गया। चारों ओर भयंकर प्रतिद्वन्द्विता- सुखों में औरों को पछाड़ने की अन्धी दौड़ चल रही है। धन की अदम्य लालसा ही जीवन का प्रधान लक्ष्य बन गया है, उसके नीचे सेवा, सद्भावना, त्याग और भलमनसाहत का जीवन दबा पड़ा है।

कहीं भी शाँति दृष्टिगोचर नहीं हो रही। ब्रिटेन, फ्राँस, जर्मनी आदि योरोपीय समृद्ध देशों में ही नहीं संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे धनी देश में भी 2 सेकेंड पर एक अपराध अर्थात् प्रतिदिन 10800 अपराध होते हैं। भारतवर्ष में जहाँ पाश्चात्य जीवन की हल्की लहर-सी अभी आई है, उसका कुप्रभाव स्वराष्ट्र-मंत्रालय के यह आंकड़े बताने लगे हैं। सन् 1959 में हस्तक्षेप योग्य 6 लाख 20 हजार 326 अपराध भारतवर्ष में हुए, यह संख्या सन् 1964 में 7 लाख 59 हजार 13 तक पहुँची। 1965 में जुलाई, अगस्त, सितंबर कुल तीन महीनों में 1 लाख 58 हजार अपराध हुए। बड़े आश्चर्य की बात यह है कि उत्तर-प्रदेश में शिक्षा प्रसार के साथ-साथ युवक युवतियाँ नये नये अपराधों की ओर प्रेरित हो रहे हैं। 1962 में उत्तर-प्रदेश में प्रति एक लाख व्यक्ति के पीछे पुलिस के ध्यान देने योग्य 173.3 अपराध सुशिक्षितों द्वारा किए गये। शिक्षितों में अपराधी मनोवृत्ति का बढ़ना मानवीय सभ्यता पर कलंक तो है पर उसे उपयोगितावाद और भौतिक सिद्धांतों की ही देन मानना पड़ेगा।

इसका प्रत्यक्ष प्रमाण ‘हिप्पी-दर्शन’ है, जो अब से कुल 35 ही वर्ष पूर्व अमेरिका में आविर्भूत हुआ। 15 से 20 वर्ष तक की कच्ची आयु के युवकों और युवतियों ने आज के जटिल और भौतिकवादी जीवन से ऊब कर एक नये दर्शन को जन्म दिया। जिसे न तो पुरातन संस्कृति कह सकते है, न अधुनातन। दोनों के बीच की एक दिग्भ्राँत दिशा है, यह हिप्पी-दर्शन। जिसका तात्पर्य है समाज की वर्तमान सभी मान्यताओं को तोड़-मरोड़ कर चकनाचूर कर देना।

यह अमेरिका के लिये ही नहीं, सारे सभ्य-जगत के लिये एक चेतावनी है कि यदि भौतिक दिशा में इसी तरह कदम बढ़ते रहे और आध्यात्मिकता के सच्चे स्वरूप को- जो अन्तःकरण से प्रस्फुटित होता है- न पहचाना, माना और जाना गया तो ऐसे-ऐसे अनेक दर्शन उठ पड़ेंगे और तब मानवीय सभ्यता का दृश्य ही कुछ और होगा।

हिप्पी दर्शन में किसी सामाजिक मान्यता या विधि-व्यवस्था को मानना आवश्यक नहीं। वे अपने आचरण एवं विचारों पर किसी प्रकार का प्रतिबन्ध स्वीकार नहीं करते और स्वेच्छाचारी जीवन-यापन करने में गर्व अनुभव करते हैं। उनके अनुयायी और प्रशंसक तेजी से बढ़ रहे हैं। प्रसिद्ध इतिहासज्ञ जनरल टायनबी के शब्दों में- हिप्पी अमरीकी जीवन-पद्धति के लिये लाल खतरे का चिन्ह है। वे न तो कोई पारिवारिक बन्धन मानते हैं, न सामाजिक मर्यादायें। कहीं भी युवक युवतियाँ स्वच्छन्द घूमते, कहीं भी सो जाते, जो चाहते हैं वही करते हैं। उनके शब्दों में- “व्यक्ति की स्वतन्त्रता याँत्रिक जीवन में बँध गई है, इसलिये हम ऐसे स्वतन्त्र जीवन की खोज में हैं, जिसमें सुख ही सुख और प्रेम ही प्रेम हो।”

धन को वे तुच्छ मानते हैं, इसलिये नोट जला देने में उन्हें बिल्कुल दर्द नहीं होता। नंगे पैर, दाढ़ी के बाल बढ़ाये यह हिप्पी भारत की ओर भी बढ़ते आ रहे हैं। उनकी लोक-प्रियता जिस तेजी से बढ़ रही है, उसे देखते हुए यह आशंका होती है कि शिक्षित समाज का एक बड़ा वर्ग धीरे-धीरे स्वेच्छाचार की ओर आकर्षित हो रहा है, वैयक्तिक एवं सामाजिक जीवन की मर्यादाओं को तोड़कर स्वेच्छाचारी ऐसी गतिविधियाँ अपनाने जा रहा है, जिसमें सदाचरण के लिये कोई स्थान नहीं।

सर्वमान्य व परम्परागत सिद्धान्तों और मर्यादाओं को तिलांजलि देकर हिप्पी गाँजा और लेसरजिक एसिड डाइकियेलेमाइड का प्रयोग करते हैं। गाँजा तो हिप्पी आंदोलन का एक विशिष्ट अंग ही बन गया है। इसे चाय या सिगरेट के साथ पीने से थोड़ी देर के लिये शारीरिक और मानसिक तनाव दूर हो जाता है और मन उन्माद की स्थिति में पहुँच जाता है। उसका कहना है कि नशा पीने से कल्पना शक्ति तीव्रता से बढ़ती है, उस समय विलक्षण अनुभूतियाँ होती हैं, शरीर में सिरहन अनुभव होती है और थोड़ी देर के लिये पीने वाला मस्ती अनुभव करने लगता है। यदि नशा पीने से ऐसा आनन्द भरा अनुभव उठाया जा सकता है, तो क्यों न उठाना चाहिये?

मन को अचेतन स्थिति का आनन्द देने के लिये हिप्पी एल. एस. डी. प्रयोग करते हैं, यह अत्यन्त नशीला पदार्थ है, इसकी एक बूँद से 12 घंटे की मदहोशी आ जाती है। एस. टी. पी. या बी. जेड. नाम के पदार्थ भी यह लोग सेवन करते हैं, उससे 72-72 घंटे की बेहोशी आ जाती है।

इस तरह यह नई पीढ़ी मानसिक मूर्छा का प्रयोग कर रही है, उपयोगितावाद जैसे भौतिक दर्शन इसकी प्रेरणा भरते हैं। यह मान्यतायें विचारशीलों की दृष्टि से- इस युग का कलंक ही मानी जा रही है। यह प्रवाह इसी दिशा में चलता रहा तो भावी प्रजा ऐसे कितने दर्शनों को जन्म दे सकती है और न कितना अपराधी जीवन विनिर्मित कर सकती है, इसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता।

सामाजिक जीवन में अपराधों की भारी अभिवृद्धि से समाज की प्रतिद्वन्द्विता और दुर्दशा तेज ही हो रही है। भौतिक सभ्यता और उपयोगितावाद से शाँति मिल सकती है न सुख। सुख अभीष्ट हो तो एक बार फिर से भारतीय धर्म, दर्शन और संस्कृति का व्यापक शोध और प्रसार करना पड़ेगा।

पहले ही उपयोगितावाद की जड़ें यहाँ काफी गहराई तक धँस चुकी हैं, उसकी प्रतिक्रिया स्वरूप उत्पन्न हिप्पी संस्कृति जैसी विचार-धाराओं एवं आचरण पद्धतियों से एक और नया खतरा पैदा हो गया है। स्वेच्छाचार हमारा भावी आदर्श बन गया तो उसके फलस्वरूप सारा समाज जंगली युग की तरफ लौट जायेगा और सभ्यता का आरंभ फिर वहीं से करना पड़ेगा, जहाँ से कि आदिम इंसान पत्थरों के हथियारों द्वारा छोटे जानवरों के शिकार पर निर्भर पाशविक जीवन जीते हुए दिन गुजारता था।

इस खतरे से बचने के लिए हमें सतर्कता बरतनी होगी और उन उपयोगितावाद जैसे दर्शनों को चुनौती देकर उन्हें अमान्य ठहराने का बुद्धिसम्मत आधार तैयार करना पड़ेगा, अन्यथा मानव-समाज के स्वेच्छाचारी प्रवाह को- और उसके फलस्वरूप होने वाली साँस्कृतिक आत्म-हत्या को रोका न जा सकेगा।


विवेक की विजय

प्राचीन पंचनद का एक लकड़हारा एक दिन जंगल गया। जैसे ही वह लकड़ी काटने को हुआ उसने देखा एक जौहड़ में सुअर का बच्चा फँस गया है। लकड़हारे ने असहाय सुअर को कीचड़ से बाहर निकाला और उसे अपने साथ घर ले आया।

उसने घर में भी कई सुअर पाल रखे थे उन्हीं में इसे भी छोड़ दिया। घर के सुअरों में भी एक छोटा बच्चा था, इन दोनों में गहरी दोस्ती हो गई।

एक दिन घर वाले सुअर के बच्चे ने पूछा- ‘‘भाई! तुम जिस प्रदेश में रहते थे, वहाँ तो किसी प्रकार के साधनों का अभाव नहीं है, फिर भी तुम इतने दुबले-पतले क्यों हो।”

जंगल का सुअर दुबला था पर था समझदार। उसने कहा- ‘‘भाई! किसी के पास बहुत साधन होना ही सुख का प्रतीक नहीं है, मूलवस्तु है निर्भयता- जो शारीरिक, मानसिक, सामाजिक और दैविक सभी प्रकार के भय से मुक्त हो जाता है, वही सुखी होता है, भय चाहे किसी व्यक्ति का हो या मृत्यु का सदैव ही दुख देता है, उसके रहते न कोई ज्ञान काम देता है, न दर्शन। मेरी स्थिति भी यही थी। वन में स्वतन्त्रता अवश्य है, पर वहाँ भी शक्तिशाली द्वारा निर्बल को सताये जाने का भय सदैव बना रहता है। मैं जहाँ रहता हूँ, वहाँ एक सिंह रहता था, वह छोटे-छोटे जीवों को खा जाता था, उसी के भय ने मुझे पनपने नहीं दिया। स्वतन्त्र रहकर भी उद्वेग और चिन्ता खाये जाती थी।”

दूसरे सुअर के बच्चे ने कहा- मित्र! स्वच्छन्दतावाद की सर्वत्र ऐसी ही दुर्गति होती है। देखो हम यहाँ कम साधनों में भी अनुशासन और सामाजिक मर्यादाओं में रहकर भी हम कितने स्वस्थ और प्रसन्न हैं।”

लेकिन, उसने कुछ सोचकर- अपनी बात फिर जारी कर दी- ‘‘तुम तो बुद्धिमान हो सिंह का संगठित मुकाबला करते तो सम्भवतः वहाँ भी भय-मुक्त हो सकते थे।”

दूसरे दिन उस बच्चे के सेनाधिपत्य में सुअरों के एक दल ने शेर पर आक्रमण कर दिया। शेर बहुत से सुअरों को देखकर घबरा गया और वहाँ से अन्यत्र भाग गया। शेर की माँद के पास एक बूढ़ा सियार रहता था, उसने यह दृश्य देखा तो अपनी सियारनी से बोला किसी ने सच ही कहा है, बुद्धि और विवेक से काम लेने वाले छोटे लोग ही संसार में सदैव निर्भय और विजयी होते हैं।


लोकान्तर आवागमन- एक तथ्य, एक सत्य

अप्रैल सन् 1966 के एक दिन रूसी रेडियो खगोल शास्त्री एन. कर्दाशेव और जी. शोलोमित्स्की ने एक समाचार प्रस्तुत कर सर्वत्र सनसनी पैदा करदी। उन्होंने दावा किया सी. टी. ए. 102 नामक एक सुदूर रेडियो स्रोत एक विशेष गति से अपनी फ्रीक्वेंसी बदल रहा है, जो इस बात का प्रमाण है कि वहाँ कोई सभ्य, समुन्नत और सुशिक्षित जाति का अस्तित्व है। यद्यपि इस समाचार का बाद में खंडन कर दिया गया किन्तु तो भी वैज्ञानिक इस बात को मानने के लिये तैयार नहीं कि अन्य ग्रहों में समुन्नत जीवन नहीं है।

दिसम्बर 1900 की एक दोपहर को इसी तरह का एक सनसनीखेज समाचार कई प्रमुख पत्रों में छपा था- ‘‘पिछली रात को मंगलवासियों ने पृथ्वीवासियों को एक महत्वपूर्ण सन्देश भेजा था।” कुछ खगोल शास्त्रियों ने इसकी पुष्टि भी की और बताया कि मंगल ग्रह से एक विलक्षण ज्योति-पुँज पृथ्वी की और फेंका गया, जो सम्भवतः पृथ्वीवासियों के लिये कोई सन्देश रहा होगा।

तब से अमेरिका इस सम्बन्ध में सतर्क रहने लगा। आखिर 1924 में एक बार फिर से मंगल-ग्रह से इस तरह का एक सन्देश आया। न्यूयार्क के कुछ रेडियो इंजीनियरों ने इस सन्देश का उत्तर भेजने का प्रयत्न भी किया, किन्तु अन्य ग्रहों के संकेत और भाषा न समझ सकने के कारण कोई महत्वपूर्ण उपलब्धि प्राप्त न हो सकी। हाँ एक बात जो अत्यन्त महत्वपूर्ण हुई वह यह थी कि वैज्ञानिक यह अनुभव करने लगे कि शरीरों की आकृति में भले ही भिन्नता हो पर लोक लोकांतरों में निवसित जीवों में कोई सूक्ष्म एवं अदृश्य एकता अवश्य है। यदि उस सम्बन्ध में विधिवत् जानकारी प्राप्त की जा सके तो अन्य ग्रह वासियों से संपर्क स्थापित करना सरल हो सकता है। यही नहीं उनसे परस्पर बातचीत, भेंट, मुलाकात भी हो सकती हैं। इस तरह पहली बार पाश्चात्य देशों में आवागमन की सत्यता की बात लोगों के मस्तिष्क में पैदा हुई।

अब थोड़ा भारतीय दर्शन की ओर आना चाहिये। हमारे शास्त्रों में मनुष्यों के तीन शरीर माने गये हैं। (1) स्थूल (2) सूक्ष्म और (3) कारण शरीर। स्थूल शरीर वह है, जो हमें दिखाई देता है। जो पार्थिव अणु संकलन से बना है, जिसे स्पर्श कर अनुभव करते हैं।

दूसरा सूक्ष्म शरीर- हल्का एवं सूक्ष्म परमाणुओं से बना होता है। यह परमाणु-विज्ञान में माने गये परमाणुओं से भिन्न होते हैं, सजीव एवं चेतन होते हैं। इसे प्राण शरीर भी कहा जाता है। इस शरीर में भी वर्षा, शीत, उष्णता, सुख-दुःख का अनुभव उसी तरह होता है, जिस तरह स्थूल शरीर में। किन्तु सूक्ष्म शरीर के पोषण के लिये अन्न की आवश्यकता नहीं होती। विचार और भाव उसका पोषण करते हैं, इसलिये सूक्ष्म शरीर के आने-जाने में समय नहीं लगता। वह क्षण मात्र में न्यूयार्क, जर्मनी, इटली या स्विट्जरलैंड पहुँच सकता है। सधी हुई विचार-शक्ति (मनोयोग) से बन्द अलमारियों की पुस्तकें तक पढ़ी जा सकती हैं।

अन्याय चमत्कारपूर्ण जानकारियाँ हासिल की जा सकती हैं, सूक्ष्म शरीर की सत्ता और महत्ता पर कहीं अन्यत्र विस्तृत प्रकाश डाला जायेगा। अभी इतना ही जानना चाहिये कि सूक्ष्म शरीर सभी जड़-वस्तुओं के लिये भी पारदर्शक होता है। प्रेत आत्माओं का शरीर सूक्ष्म शरीर का बना होता है। इस शरीर के आस पास हल्के रंग का प्रकाश भी चारों और फैला रहता है। जो आत्मा जितनी अधिक पवित्र होती है, उसका प्रकाश भी अधिक फैला और चमकदार होता है। महापुरुषों के मुख-मण्डल पर प्रदर्शित तेजोवलय इसी पवित्रता और तेजस्विता का प्रतीक होता है।

हिंदू-दर्शन की मान्यता यह है कि जब जीवात्मा स्थूल शरीर छोड़ देता है, तभी मृत्यु हो जाती है। अन्तःकरण चतुष्टय (मन, बुद्धि, चित और अहंकार) तथा कारण शरीर सहित जीवात्मा सूक्ष्म शरीर में ही होता है। इसलिये उसका वह व्यक्तित्व वहीं बना रहता है। यथासमय यही सूक्ष्म शरीर पुनर्जन्म ग्रहण करता है। यह भी कहा जाता है कि स्वाधीनावस्था में सूक्ष्म शरीर ही अलग होकर लोक-लोकान्तरों की अनुभूतियाँ ग्रहण करता है।

कुछ जीवात्मायें महान तेजस्वी, विकार-रहित, निष्काम तथा इतनी संकल्पवान होती हैं कि वे मृत्यु के उपरान्त किन्हीं लोकों में जा सकतीं हैं। स्थूल शरीर भी धारण कर सकते हैं, अपने सगे सम्बन्धियों को अथवा करुणावश किन्हीं भी मनुष्यों को सन्देश और प्रेरणायें भी दे सकते हैं। भगवान कृष्ण ने शोक-ग्रस्त अर्जुन से कहा था- ‘‘इस संसार में कौन किसका? किसका पिता कौन पुत्र? सब जीव-कर्मवश शरीर धारण करते और फिर अपने लोक को लौट जाते हैं।”

‘‘गौकर्ण की मुक्ति’’ की पौराणिक कथा ऐसी ही है। जगद्गुरु शंकराचार्य ने उनने सूक्ष्म-शरीर से ही माहिष्मती के मृत राजा के शरीर में प्रवेश किया था और काम कला का ज्ञान प्राप्त किया था। सन्त एकनाथ के यहाँ श्राद्ध के दिन ब्राह्मणों ने भोजन करने से इनकार कर दिया। तब उन्होंने अपने पितरों का आह्वान कर उन्हें साक्षात् भोजन कराया। इस घटना ने सन्त एकनाथ को चमत्कारी व्यक्ति सिद्ध कर दिया था। सूक्ष्म शरीर के चमत्कार और भी आश्चर्यजनक हैं। वह लोकान्तरों में भी प्रसन्नतापूर्वक गमन कर सकता है।

वैज्ञानिकों को भी विश्वास हो गया है कि हमारे तारक पुंजों के अतिरिक्त ब्रह्मांड में जो अन्यान्य अदृश्य तारागण हैं, उनमें से अनेकों में जीवंतता अवश्य होनी चाहिये। और इस जीवन में स्थान-परिवर्तन का भाव और ज्ञान भी होना चाहिये। आजकल उड़न-तश्तरियों के अनेकों प्रमाण सामने आ रहे हैं, वह काल्पनिक नहीं हैं। भले ही समाचारों में कुछ अफवाहें हों पर अधिकाँश तथ्यपूर्ण भी हैं, उनसे यह प्रकट होता है कि अन्य ग्रहों में जीवन है और वे बौद्धिक क्षमता वाले भी हैं, उन्हें पृथ्वी का ज्ञान हैं, वे पृथ्वी से संपर्क भी स्थापित करते रहते हैं। कठिनाई यह है कि स्थूल शरीर से उन संदेशों को पकड़ा नहीं जा सकता, क्योंकि भाषा और ज्ञान की स्थिति एक जैसी नहीं है।

दूरी और समय का मेल भी एक कठिनाई है। उदाहरणार्थ ‘एप्सीलान एरीडानी’ पृथ्वी के निकटस्थ तारों में से एक हैं और हमसे केवल 10 प्रकाश वर्ष की दूरी पर है। यदि वहाँ से कोई सन्देश सन् 1958 में भेजा गया हो तो वह पृथ्वी पर इस वर्ष आयेगा और यदि उसका उत्तर तत्काल प्रेषित कर दिया जाये तो वह वहाँ सन् 1978 तक पहुंचेगा।

1908 में साइबेरिया में एक उल्का गिरी थी। उसकी जाँच करने से पता चला था कि यह सिग्नी 61 नामक नक्षत्र से सम्बद्ध किसी ग्रह से आने वाली सूचना-पिण्ड थी, अनुमान था कि ‘क्रामातोआ’ ज्वालामुखी फटने से पृथ्वी में जो प्रकाश पुँज जला था, वह उसका ही प्रत्युत्तर होगा।

जीव-विज्ञान के डा. अल्पातोव की कल्पना भारतीय कल्पना से स्पष्ट मेल खा जाती है। उन्होंने जीवन को दो रूपों में बाँटा है- (1) सक्रिय स्वरूप (2) निष्क्रिय स्वरूप। सक्रिय स्वरूप के अंतर्गत ऐसे जीवित प्राणी आते हैं, जो वातावरण में रहकर उसके संपर्क से अपने आपकी वृद्धि करते रहते हैं। जीवन के निष्क्रिय स्वरूप क्षेत्र उससे अधिक व्यापक विस्तृत एवं अनन्त है। निष्क्रिय स्वरूप बीजों या बीजाणुओं के रूप में जीवित होने की शक्तियुक्त अवस्था में पाये जाते हैं।

यहाँ एक बात स्पष्ट कर देना आवश्यक होगा कि शरीर की बीज अवस्था बिल्कुल सूक्ष्म और अदृश्य है, उसे प्रकाशस्वरूप कह सकते हैं, उसकी ऊर्ध्वगति या अधोगति अच्छे और बुरे भावों, विचारों, संकल्पों एवं क्रिया-कलापों से होती है। इसलिये जीव के अन्यान्य ग्रहों में आवागमन का कारण भी सूक्ष्म रूप में विचार और भावनायें तथा स्थूल रूप में क्रिया-कलाप, रहन-सहन और खान-पान होता है। अर्थात् स्वर्ग और नर्क की प्राप्ति या उनसे छूटना एक ओर स्थूल शरीर की शुद्धि पर भी आश्रित है और सूक्ष्म शरीर की शुद्धता पर भी।

यहाँ तक दो बातें निर्विवाद सत्य सिद्ध होती है- (1)पारलौकिक जीवन (2) आवागमन की स्थिति में सुख और दुःख की अनुभूति। तब फिर हमें उपनिषदों की इस मान्यता की ओर लौटना ही पड़ता।

“न ह्यन्तातरतो रूपं किंचन सिध्येत्। नो एतन्नाना। तद्यथा रथस्यारेषु नेमिरर्पिता नाभावरा अर्पिता एवमेवैता भूत मात्राः प्रज्ञामात्रास्वर्पिताः प्रज्ञामात्रा प्राणे अर्पिताः। एष लोकपाल एष लोकधिर्पा रेष सर्वेश्वरः स म आत्मेति विद्यात् स म आत्मेति विद्यात्।” -कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् 9,

अर्थात्- प्रज्ञामात्रा और भूतमात्रा के स्वरूप में कोई विभिन्नता नहीं है। जैसे रथ की नेमि अरों में और अरे रथ नाभि के आश्रित रहते हैं, वैसे ही भूत-मात्रायें प्राण में स्थित हैं। यह प्राण ही अजर-अमर सुखमय और प्रज्ञामात्रा है। यद्यपि वह श्रेष्ठ कर्मों से न तो बढ़ता और न बुरे कर्मों से घटता है, किन्तु जो शुभ कर्म करते हैं, प्रज्ञा और प्राण रूप परमेश्वर उन्हें ऊपर के लोकों (स्वर्ग) में पहुँचाता है तथा जो बुरे कर्म करते हैं, उन्हें नीचे के लोकों (नर्क) में धकेल देता है। यह आत्मा सब लोकों का अधीश्वर लोकपाल एवं सब का स्वामी, गुणों वाला प्राण ही आत्मा है।


अन्तरिक्ष अपने अन्दर भी है

8000 मील व्यास वाली यह पृथ्वी पदार्थ जगत् की एक छोटी-सी गेंद है। असीम अन्तरिक्ष की तुलना में वह गेंद से भी छोटी है। पृथ्वी से भिन्न सबसे पास का पिंड चन्द्रमा ढाई लाख मील दूर है। सबसे निकट का नक्षत्र भी तीन प्रकाश वर्षों से दूर हैं। प्रकाश को सूर्य से पृथ्वी तक आने में आठ मिनट लगते हैं, फिर ब्रह्मांड की अन्तर्वरीयता को तो नापना ही कहाँ सम्भव है?

इस अपरिमित पार्थक्य को मनुष्य जानबूझ कर अवगाहित करने जा रहा है। यदि एक बार अन्तरिक्ष यान दो मील प्रति सेकेंड की रफ्तार से दुर्घटनाग्रस्त हो जाये तो अन्तरिक्ष यात्री की हड्डियाँ भी धरती माता तक लाखों वर्ष बाद भी नहीं पहुँच पायेंगी। इस जोखिम भरे काम से क्या लाभ?

मानवता को अन्तरिक्ष युग के योग्य होने की इच्छा है तो उसे आत्मिक क्राँति करनी होगी। विचार और आचरण की लघुता जिससे आज सारा समाज ग्रस्त है, उससे मुक्ति पाकर अपने मानस को स्वयं अन्तरिक्ष की तरह विस्तृत और सब की अनुभूति में अपना सुख अनुभव करना होगा।

एक समय था जब देवी-देवता यहाँ आया करते थे। इन कथानकों में कितना सत्य है, पता नहीं। किंतु उनके साथ जो घटनायें जुड़ी है, वह बताती हैं कि अन्तरिक्ष का उपयोग भी धरती के लोगों के स्वास्थ्य, सुख, सद्प्रवृत्तियां और चरित्र को ऊपर उठाना ही रहा है। अन्तरिक्षवासी देवता पार्थिव असुरों से जीतते रहे हैं, तात्पर्य यह है कि अन्तरिक्ष के अपरिचित रूप वाले जीवन का उपयोग मानवीय आत्मा के उत्थान के लिये होना चाहिये। उसमें विज्ञान भी आ जाता है, उसके छूट जाने की बात सोचना सही नहीं है।

आज की अन्तरिक्ष यात्रा का रूप सही नहीं है। उससे मनुष्य के साधन सीमित हो जायेंगे, समस्यायें बढ़ जायेंगी। चन्द्रमा तक पहुँचने, वहाँ उपनिवेश बनाने और खनिज की खुदाई करना ही बड़ा कठिन काम है। फिर असीम अन्तरिक्ष को नापना और वहाँ पर मानवीय विकास की समस्या पर विचार करना तो और भी टेढ़ी खीर है। जो सरल और शुचितम है, वह यही कि मनुष्य पहले अपने आपको खोजने का यत्न करे, सम्भव है, उसे अपने ही भीतर एक विशाल गुण और संतोषदायक अन्तरिक्ष उपलब्ध हो जाये। -सम्पूर्णानन्द


भविष्य-दर्शन का विज्ञान

प्राचीन और नवीन इतिहास तथा अनेक जीवन-वृत्तों से यह प्रकट होता है कि भविष्य-दर्शन की घटनायें सदा से, सब देशों में और सब श्रेणियों के व्यक्तियों के साथ होती आई हैं। इनमें से कुछ प्रसिद्ध हो चुकी हैं और बहुसंख्यक अप्रकट ही रह जाती हैं।

इस प्रकार की रहस्यमय घटनाओं और स्वप्न आदि का कोई उचित समाधान कारक उत्तर न पाने से मनोविज्ञान और ‘पैरा साइकोलॉजी’ आदि के ज्ञाता इस विषय इस विषय की गम्भीरतापूर्वक जाँच करने लगे हैं। अमरीका और इंग्लैण्ड के मनोविज्ञान शास्त्रियों ने सन् 1955 में न्यूयार्क और लन्दन में ‘मनोवैज्ञानिक घटनाओं की खोज’ करने वाली दो संस्थायें स्थापित की हैं। इनमें अभी तक 14000 ऐसी रहस्यमय घटनाओं का विवरण इकट्ठा किया जा चुका है। यह विवरण अमरीका तथा अन्य कितने ही देशों के स्त्री पुरुषो ने स्वयं लिखकर भेजा है और इसकी सचाई के प्रति अपना पूरा विश्वास प्रकट किया है।

इन घटनाओं में अधिकांश दूरवर्ती समाचारों का ज्ञान, दिव्य दर्शन, पूर्वज्ञान से सम्बन्धित हैं। वे जागृत,अर्द्धजागृत और निद्रित दशा में अनुभव की गई हैं। पर प्रायः सभी घटनायें आकस्मिक रूप से अनुभव में आकर चन्द मिनट में समाप्त हो गईं। इसलिये वैज्ञानिक प्रयोगशाला के नियमानुसार उनकी जाँच करना सम्भव नहीं। ऐसी भविष्य-सूचक घटनाओं में सबसे अधिक संख्या स्वप्नों की ही है। उन्हीं के द्वारा मनुष्यों को दूरवर्ती स्थानों के समाचार या भविष्य में होने वाली घटनाओं का आभास मिला है।

इस प्रकार की भविष्य दर्शन (प्रीकोगनिशन) की घटना प्रायः तब होती हैं, जब कोई बड़ी दुर्घटना या मृत्यु संकट शीघ्र ही आने वाला होता है। अधिकांश लोगों के लिये ऐसा अवसर जीवन में एकाध बार ही आता है और वह भी ऐसे आकस्मिक और निराले ढंग से कि व्यक्ति उसके कारण के सम्बन्ध में कुछ अनुमान ही नहीं कर सकता। किसी प्रिय व्यक्ति की मृत्यु की सूचना इस रीति से अनेक व्यक्तियों ने हफ्तों या महीनों पहले भी मिल जाती है। यद्यपि ये घटनायें प्रायः ऐसे सामान्य व्यक्तियों द्वारा देखी जाती हैं, जिनको कोई महत्व नहीं दिया जाता। तो भी यह समस्या बनी ही रहती है कि उनकी किसी घटना का पूर्वज्ञान किस प्रकार हो जाता है? इस सम्बन्ध में इस क्षेत्र में खोज बीन करने वाली एक अमरीकन महिला डा. लुइसा ई. राइन ने अपनी पुस्तक ‘ट्रेसिंग हिडन चैनल्स’ (गुप्त स्रोतों की खोज) में लिखा है कि “पूर्व दर्शन की घटनायें यद्यपि संख्या में बहुत अधिक होती हैं, पर आश्चर्य यह है कि वे कैसे घट जाती हैं?” फिर लेखिका स्वयं ही उत्तर देती है कि “ये घटनायें किसी व्यक्ति के दैनिक जीवन के किसी बहुत छोटे अंश से सम्बन्धित होती हैं, चाहे वह देर से सिर के ऊपर मँडराती हुई हों और चाहे रास्ता चलते-चलते किसी सवारी गाड़ी से टकरा जाने जैसी सर्वथा आकस्मिक। इस प्रकार की घटनायें सर्वांगपूर्ण नहीं होती और न उनका जीवन से पूरी तरह सम्बन्ध होता है। कुछ ही लोग अपनी देखी घटनाओं पर ऐसा विश्वास रखते हैं कि उनका सम्बन्ध उनके समग्र जीवन से है।”

श्रीमती राइन ने आगे चलकर कहा है- ‘‘इस प्रकार की ‘पूर्व दर्शन’ (प्रीकोगनिशन) में एक मिलती जुलती विशेषता यह होती है कि वे प्रायः सब की सब व्यक्ति सम्बन्धी ही होती हैं। राष्ट्रीय या अन्तर्राष्ट्रीय पैमाने की घटनाओं का पूर्व दर्शन शायद ही कभी किसी को होता है। अधिकाँश में लोगों को अपने निकट सम्बन्धियों के सम्बन्ध में ही होनहार घटनाओं का अनुभव होता है।”

पर फिर भी अनेक घटनायें ऐसी होती हैं और अनेक बार इस विद्या के अभ्यासी ऐसा अकाट्य प्रमाण देते हैं कि वैज्ञानिकों को भी चुप रह जाना पड़ता है। अमरीका की ‘मनोविज्ञान की खोज करने वाली संस्था’ ने जो चौदह हजार उदाहरण इकट्ठे किये हैं, उनमें से कई ऐसे हैं जिनमें घोर अविश्वासियों को भी ‘पूर्व-दर्शन’ की सत्यता को स्वीकार करनी पड़ी। उनमें से ‘चाय के प्याले में तूफान’ शीर्षक घटना में कहा गया है-

“सेन डियागो (कैलीफोर्निया-अमेरिका) का पुलिस सुपरिंटेंडेंट वाल्टर जे. मेसी जब एक दिन अपने दफ्तर से लौटकर घर जा रहा था तो रास्ते में अपनी पत्नी की सहेली श्रीमती हाफमैन के यहाँ ठहर गया। उस समय वाल्टर की पत्नी भी वहाँ आई हुई थी और उसी को लेने के लिये वह गाड़ी से उतर पड़ा था। श्रीमती हाफमैन ने उससे चाय पीने के लिये कहा। बातों ही बातों में श्रीमती हाफमैन कह बैठी- वाल्टर! अगर तुम पसन्द करे तो मैं तुम्हारे चाय के प्याले को देखकर किसी होनहार घटना की सूचना दे सकती हूँ।”

वाल्टर सोलह वर्ष से पुलिस के महकमे में काम कर रहा था और उसे रात-दिन बड़े-बड़े चालाक ठग और जालसाज लोगों के अँगूठे और उंगलियों के निशान देखकर उनका पता लगाना पड़ता था। इसलिये वह ऐसी ‘दैवज्ञता’ की बातों पर जरा भी विश्वास नहीं करता था। तो भी मनोरंजन की दृष्टि से उसने अपना प्याला मिसेज हाफमैन को दे दिया। उसे देखते-देखते उसका चेहरा पीला पड़ गया और उसने बड़े भयभीत स्वर में कहा मैं इस प्याले में मृत्यु को देख रही हूँ। “दो मौतें होंगी- उनमें से एक नागरिक है, जोकि गोली से इस तरह मारा गया है कि उसका बदन छलनी हो गया है। दूसरा आदमी व्यापारी है, उसने वर्दी और काले जूते भी पहन रखे हैं।”

यद्यपि वाल्टर घोर अविश्वासी था पर श्रीमती हाफमैन की मुखाकृति को देखकर वह प्रभावित हो गया और दूसरे दिन उसने इसका जिक्र अपने अफसर ‘जो डोरन’ से किया, वह उससे भी बढ़कर अविश्वासी था और उसने वाल्टर की खूब हँसी उड़ाई। पर जैसा श्रीमती हाफमैन ने कहा था, आगामी रविवार को जब एक लुटेरे ने ‘कैलीफोर्निया थियेटर’ में घुसकर उसके मैनेजर की हत्या कर डाली और पीछा करने एक पुलिस सारजैण्ट को घायल कर दिया तो, वे सब चकित रह गये। पुलिस वाले बराबर लुटेरों का पीछा करते रहे और उनमें से एक को तहखाने में छुपा पाकर गोलियों से छेद डाला। उसका बदन छर्रों के मारे वास्तव में छलनी हो गया था।”

दो घटनायें अमरीकन इतिहास से संग्रह की गई हैं। वहाँ 28 फरवरी 1844 को एक बहुत महत्वपूर्ण कार्यक्रम होने को था। ‘यू.एस.एस. प्रिन्सटन’ नाम का एक नया और सबसे बढ़िया युद्धपोत बनकर तैयार हुआ था और उसके उद्घाटन के अवसर पर उसके कप्तान राबर्ट स्टाक्टन ने अनेक गण्यमान व्यक्तियों को समारोह में निमन्त्रित किया था। इनमें कर्नल डेविड गार्डिनर, उनकी पुत्री जूलिया, जलसेना के सेक्रेटरी थामस गेलमर व उनकी पत्नी एनी भी सम्मिलित थे।

इन दोनों महिलाओं ने 27 दिनाँक की रात्रि को ऐसे स्वप्न देखे जिनमें जूलिया के पिता और एनी के पति की मृत्यु का स्पष्ट संकेत था। इससे भयभीत होकर जूलिया ने अपने पिता से इस समारोह में सम्मिलित न होने का अनुरोध किया। इसी प्रकार एनी ने भी अपने पति को बहुत रोका। पर उन दोनों ने स्वप्न की बातों को अधिक महत्व देना ठीक नहीं समझा और वे जहाज पर चले गये। वहाँ जब एक तोप को समुद्र की ओर चलाया गया तो वह अकस्मात् फट गई और कर्नल गार्डिनर तथा थामस गेलमर, जो पास खड़े थे तुरन्त मर गये।

एनी भी वहीं थी, पर वह बच गई। शोक से अभिभूत होकर उसने कहा- “मेरी बात किसी ने क्यों नहीं मानी?” दुर्घटना के समय जूलिया डेक के नीचे थी और जब उसने अपने पिता की मृत्यु के बारे में सुना तो वह चिल्ला उठी- ‘‘मेरा सपना आखिर सच हो ही गया।”

बाद में यही जूलिया अमरीका के प्रेसीडेन्ट की पत्नी बन गई। उसे कुछ ऐसी शक्ति प्राप्त थी कि पति से सौ मील दूर रहने पर भी वह उसके सम्बन्ध में सब बातें जानती रहती थी। उनके मन इस प्रकार जुड़े थे कि एक की अनुभूति दूसरे को सहज में हो जाती थी। जनवरी 1862 में जब प्रेसीडेन्ट टेलर रिचमाण्ड में एक सरकारी जलसे में गये थे, एक रात को जूलिया ने स्वप्न में देखा कि उनका चेहरा मुर्दे की तरह पीला पड़ गया है, उनके हाथ में कमीज और टाई है तथा वे कह रहे है कि ‘मेरा सर थाम लो।’ सुबह होते ही जूलिया स्वयं रिचमाण्ड को रवाना हो गई और वहाँ प्रेसीडेन्ट को सकुशल देखकर उसे प्रसन्नता हुई। पर दूसरे दिन सुबह नाश्ता करते हुये उनकी हालत एकदम खराब हो गई और बेमौत के समय की-सी आकृति में जूलिया के कमर में घुसे। उनका कोट और टाई उनके हाथ में थी, जैसा स्वप्न में दिखाई पड़ा था। उन्होंने जूलिया से कुछ कहा भी पर वह स्पष्ट सुनाई नहीं दिया। कुछ घण्टों में उनकी जीवन लीला समाप्त हो गई।

विज्ञानवादी आलोचक ऐसी घटनाओं का कोई कारण नहीं बतला सकते। वे तो बराबर यही कहते रहते हैं कि जो घटना अभी हुई नहीं उसका प्रभाव किसी पर कैसे पड़ सकता है? पर एक अध्यात्मवादी जानता है कि मानव-जीवन का निर्णय करने वाली मुख्य घटनायें सूक्ष्मजगत में पहले से ही घटती रहती हैं, बाद में वे स्थूल जगत में प्रकट होती हैं। इसलिये जिन लोगों को पूर्व-दर्शन की शक्ति किसी दैवी कारण से कुछ क्षणों के लिये प्राप्त हो जाती है, वे ऐसी घटनाओं अर्द्ध-जगत् अथवा स्वप्न की अवस्था में देख लेते हैं। इसके अतिरिक्त योगी और अभ्यास करने वाले भी अन्तरंग शक्ति से अन्तरिक्ष में मौजूद भविष्य के चिन्हों को देखकर समझ जाते हैं। यही भविष्य-दर्शन अथवा पूर्व-दर्शन का वास्तविक रहस्य है।


आत्म-विश्वास से अदृश्य दर्शन

न्यूयार्क में एडवर्ड ऐनिस नामक एक व्यक्ति रहता था। वह धर्म-कर्म और ईश्वर में बहुत विश्वास रखता था पर अपने अनेक संबंधियों में सब से अधिक निर्धन वही था। तो भी वह इतना आत्म-विश्वासी था कि इसी एक गुण के कारण उसका सभी सम्मान करते थे।

निर्धनता की अवस्था में काफी समय बीत गया। एक दिन वह किसी स्थान के पास से गुजर रहा था तो उसे ऐसा आभास हुआ, इस स्थान पर द्रव मात्रा में काफी सोना विद्यमान है। उसने एक ज्योतिषि से भी पूछा, उसने भी पुष्टि कर दी पर उसने प्रमुखता अपने विश्वास को ही दी। वह प्रायः कहा करता था- ‘‘मेरा हृदय, मन और मेरी आत्मा इतने निष्कलुष और विकार रहित हैं कि उनमें भविष्य के संदर्भ भी ऐसे प्रकट हो जाते हैं, जैसे उन्हें मैं सचमुच देख रहा हूँ। जब मेरा विश्वास दृढ़ हो जाता है तो फिर उस कार्य की सफलता में कुछ सन्देह भी नहीं रह जाता।

ऐनिस के पास धन नहीं था तो भी उसने अपने तमाम साधन एकत्रित करके कुछ मित्रो से सहायता प्राप्त करके वह जमीन खरीद ली और वहाँ खुदाई प्रारम्भ कर दी। दुर्भाग्य कि हाइलैण्ड मेरी में कुछ चाँदी के टुकड़े ही उपलब्ध हुये और उसके बाद ही उसकी मृत्यु हो गयी। मरने से पूर्व अपने एक संदेश में एनिस ने कहा- ‘‘जो बात आत्मा से निकलती है, वह कभी झूठ नहीं होती। मुझे नहीं मिला तो क्या, अभी उस स्थान पर सोना है अवश्य।”

मृत्यु के 16 वर्ष बाद श्रीमती मार्या मारले ने, जिन्हें एनिस के आत्म-विश्वास पर भारी भरोसा था, फिर से खुदाई का काम जारी करवाया। 600 फीट तक खुदाई करने के बाद वहाँ सोने, चाँदी, तांबे और जिंक के भंडार मिले। इससे उस महिला को कई लाख डालर का लाभ हुआ।

अपनी सफलता पर उन्होंने केवल इतनी ही टिप्पणी की- ‘‘आत्म-विश्वास अपने आप एक ज्योतिष है, ऐसा मनुष्य भले ही अपने लिये कुछ न करे पर उसकी विकसित अन्तर-शक्ति अनेकों दूसरों का भी कल्याण कर सकती है।”


हम धैर्य और साहस के साथ ही आगे बढ़ें

जीवन का कोई क्षेत्र भी क्यों न हो, उसमें सफलता प्राप्त करने के लिये क्रमिक प्रयत्न करना होता है। एक साथ सहसा छलाँग लगाकर कोई भी सफलता के उच्च शिखर पर नहीं पहुँच सकता। न पहुँचा ही जा सकता। प्रत्येक बात की एक विधि और एक क्रम होता है। उसी के अनुसार चलने से सफलता संभव हो सकती है। क्रम का उल्लंघन करने से लाभ के स्थान पर हानि ही होती है। शक्ति का अपव्यय होता है, निराशा की वेदना सहन करनी पड़ती है और उत्साहों में प्रशमन आता है, जीवन गति अस्त-व्यस्त होकर बोझिल बन जाती है।

उदाहरण के लिये शिक्षा को ले लीजिये, विद्यार्थी पढ़ता है, मानिये एम. ए. की ऊँची उपाधि पाने के लिये। उसका लक्ष्य एम.ए. पास करना होता है। उसको वर्णमाला से शुभारम्भ कराया जाता है। धीरे-धीरे वह क्रमपूर्वक आगे बढ़ता है। चतुर अध्यापक उसके उस क्रम विकास पर बड़ी पारखी दृष्टि रखते हैं और यह देखते हैं कि विद्यार्थी पाठों का नियमित क्रम छोड़कर अक्रमिक तो नहीं होता जा रहा है। कहीं वह पहले पाठ में कच्चा होने पर भी अगले पाठ पर तो नहीं जा रहा है। यदि ऐसा होता है तो वह उसको रोक देता है। पिछला पाठ पक्का करने को विवश करता है। विकास की यही पद्धति है। पिछले पाठों के आधारों पर ही अगले पाठ स्थित होते हैं।

यदि पहले पत्थर कमजोर होंगे तो सारा निर्माण निर्बल होता चला जायेगा। पिछला पाठ तो कच्चा छूट ही जायेगा, अगला पाठ भी, आधार-भूमि न होने से हृदयंगम नहीं किया जा सकता। निदान विद्यार्थी न इधर का रह जायेगा और न उधर का। देखने में शिक्षा पाता हुआ भी अशिक्षित जैसा ही रह जायेगा। जो ज्ञान पूरा और पक्का नहीं होता, वह न होने के समान ही है। बल्कि अधूरे और कच्चे ज्ञान से लाभ के स्थान पर हानि ही अधिक होती है।

इसी क्रमिकता का महत्व जानने वाले अध्यापक ही नहीं बहुत से बुद्धिमान भी विद्यालय में पता लगाकर और शिफारिस करके अपने बच्चे को अगली कक्षा में चढ़ाने के लिए रुकवाकर पिछली कक्षा का ज्ञान पूरा करने के लिये उसी में रहने देते हैं। वे जानते हैं कि यदि बच्चा पिछली कक्षा का ज्ञान पूरा किये बिना अगली श्रेणी में जायेगा तो उसका आधार निर्बल होता चला जायेगा और इस प्रकार उसकी शिक्षा असफल हो जायेगी। क्रमिक विकास ही जीवन का सच्चा एवं सार्थक विकास होता है। इसकी उपेक्षा करने वालों को सफलता के नाम पर शून्य ही हाथ आता है।

बात को और अधिक सरलता से समझने के लिये एक आध और उदाहरण ले लीजिये। व्यापार का क्षेत्र ले लीजिये। यह जो बड़े-बड़े उद्योग धन्धे दिखलाई देते हैं, यह सहसा यों ही इसी विशाल रूप में स्थापित नहीं हो गये। प्रारम्भ में इनका आकार बहुत छोटा रहा है और काम भी थोड़ा रहा है। इनके संचालकों ने धैर्यपूर्वक छोटी-छोटी मशीनों, साधनों और आदमियों से इन्हें शुरू किया था। थोड़ा-थोड़ा माल बनाया था और क्रम-क्रम से बाजार बनाया था।

यदि इनको सहसा ही यों ही विशाल रूप में खड़ा करके चलाने का प्रयत्न किया जाता तो न तो इनका सुचारु संचालन हो पाता और न नियन्त्रण। एक भयानक फैलाव और अस्त-व्यस्तता फैल जाती और तब उसको व्यवस्थित रूप दे सकना असम्भव हो जाता। उद्योग के क्षेत्र में बहुत से उतावले लोग आज भी इसी अक्रमिकता के कारण नित्य असफल होते देखे जाते हैं।

ऊपर छत पर चढ़ने का इच्छुक ऐसा कौन-सा व्यक्ति होगा, जो नसेनी के डंडों पर क्रम-क्रम से पाँव रखकर न चढ़ता हुआ, उनका उल्लंघन करके एक साथ ऊपर चढ़ जाने का प्रयत्न करेगा। वह जानता है ऊपर चढ़ने का नियम ही एक-एक डंडे पर पैर रखकर चढ़ने का है। जो ऐसा न करके इस नियम का व्यतिक्रम करता है और सहसा छलांग लगाने का उपक्रम करता है, वह निश्चय ही नीचे गिरकर अपने हाथ-पैर तोड़ लेने की तैयारी करता है। विकास के क्रम-बद्ध प्रगति का नियम अनिवार्य है। उसका व्यतिक्रम करके लक्ष्य की प्राप्ति कर सकना संभव नहीं।

यह नियम जब साधारण भौतिक उपलब्धियों में अनिवार्य हैं तो आध्यात्मिक प्रगति तो और भी कठिन तथा नियम साध्य है। इस क्षेत्र में प्रगति करने के लिये तो और भी धैर्य, सावधानी तथा क्रमबद्धता का विचार रखना होगा। उच्च-कोटि की आध्यात्मिक कक्षाओं में क्रमिक विकास करते हुये ही आगे बढ़ा जा सकता है। उतावली करने से जरा भी काम न चलेगा। अध्यात्म की आत्मिक कक्षा का तीसरा नंबर है। पहली दो कक्षायें शरीर और मन की हैं।

इन दोनों को पहले क्रमपूर्वक उत्तीर्ण करना होगा, उसके बाद आत्मा की आध्यात्मिक कक्षा में प्रवेश संभव होगा। जो यह चाहता है कि शरीर और मन के क्षेत्रों की उपेक्षा करके आत्मा की आध्यात्मिक क्षेत्र में शीघ्र से पहुंच जाय तो वह अनहोनी बात चाहता है। उसकी यह असंगत इच्छा पूरी नहीं हो सकती। उच्च-कोटी की अध्यात्मिक कक्षा में पहुंचने के लिये की जाने वाली साधना का प्रारंभ शरीर क्षेत्र में ही करना होगा।

शरीर और मन का क्षेत्र जब तक आध्यात्मिक साधना के अनुरूप न सुधारा जायेगा, तब तक ईश्वर दर्शन, आत्म-साक्षात्कार, समाधि, कुंडलिनी-जागरण आदि की सिद्धि मूलक बात सोचना व्यर्थ होगा। योग-क्षेम के अध्येता अच्छी तरह जानते हैं कि योग का प्रतिपादन करने वाले आचार्यों ने योग के जो सिद्धांत प्रतिपादित किये हैं, उनमें क्रमिक विकास के नियमों को प्रधानता दी है। उदाहरण के लिये पातंजलि और हठयोग ले लीजिये। यह दोनों योग बड़े शक्तिशाली और उच्च-कोटि के हैं। महर्षि पातंजलि ने योग के जो आठ अंग प्रतिपादित किये हैं, उनका क्रम इस प्रकार रखा है- यम, नियम, आसन, प्राणायाम और फिर प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि। इनमें यम आदि पहले चार अंग शरीर- शोधन से संबंधित हैं और बाद के प्रत्याहार आदि मन के शोधन से संबंधित हैं।

इसी प्रकार हठ-योग में भी साधना का जो क्रम रखा गया है, वह इस प्रकार है- नेति, धौति, वस्ति, न्यौली, बज्रोली, कपाल-भाति प्रथम षट्-कर्म और तदुपरांत षट्-चक्र वेधन और कुंडलिनी जागरण आदि का क्रम आता है। स्पष्टतया पूर्व के षट्-कर्म बाह्य-जीवन के परिशोधन के लिये हैं और बाद की साधना मानसिक श्रेणी की है। योग साधना में इस अनिवार्य क्रम का व्यतिक्रम करने वाले साधकों को न केवल असफल ही होना पड़ता है, बल्कि बहुत बार तो वे अस्त-व्यस्त मनोदशा वाले हो जाते हैं।

यह बात मान लेने में जरा भी संकोच नहीं होना चाहिये कि आज हम सब का बाह्य जीवन बड़ा ही अस्त-व्यस्त, अव्यवस्थित एवं अवांछनीय दशा में चल रहा है। यही कारण है कि जीवन क्षेत्रों में बहुधा असफलता का ही सामना करना पड़ रहा है। उन्नति और प्रगति के नाम पर हम कुछ कदम भी आगे नहीं बढ़ा पा रहे हैं। व्यावहारिक जीवन की अव्यस्था एवं अस्त-व्यस्तता हमारी हर साधना को निष्फल बनाती चली जा रही है। हम आध्यात्मिक साधना करते, पूरे समय प्रयत्न भी करते, परिश्रम एवं प्रसार से भी मुंह नहीं मोड़ते, तब भी देखते यही हैं जहां के तहां पड़े हुये हैं, जरा भी आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं।

इस असफलता का क्या कारण है? यही कि हम अपना बाह्य जीवन ठीक न करके अक्रमिक रूप से साधना में जुट पड़ते हैं। ‘‘साधना द्वारा आत्म-बल प्राप्त कर जीवन लक्ष की ओर अग्रसर हो सकने की स्थिति में पहुंच सकना भी संभव है, जब प्रारंभिक भूमिका के रूप में बाह्य-जीवन को संतुलित, व्यवस्थित एवं शुद्ध बनाया जाय।’’ इस नियम की ओर जरा भी ध्यान नहीं देते।

जो विद्यार्थी चतुर होते हैं और चाहते हैं कि निश्चित रूप से अच्छी श्रेणी में उत्तीर्ण हों, वे परीक्षा का प्रश्न-पत्र पाते ही सबसे पहले उन्हीं प्रश्नों को उठाते हैं जो उपेक्षाकृत अधिक सरल और उनके अधिकार के होते हैं और हल भी पहले उन्हीं को करते हैं। परीक्षा में पास होने का यही उचित और सरल नियम है। इसके विपरीत जो विद्यार्थी उतावले अथवा अचतुर होते हैं, वे ऐसी खोज-बीन नहीं करते। प्रश्न-पत्र पाते ही सहसा पहले प्रश्न से ही उत्तर लिखने में लग जाते हैं। निदान कठिन-कठिन प्रश्नों में लगे-लगे सारा समय खो देते हैं और तब वे सरल प्रश्न भी नहीं कर पाते, जिनको वे अधिकार पूर्वक आसानी से कर सकते थे। फल यह होता है कि वे उत्तीर्ण होने लायक अंकों से भी वंचित रह जाते हैं। यही बात उतावले साधकों के विषय में भी होती है। वे तन, मन की सरल साधना छोड़कर कठिनतर आत्मिक साधना में प्रवृत्त हो जाते हैं और सोचते हैं कि आत्म-विकास हो जाने पर शरीर और मन का सुधार तो आप ही आप हो जायेगा। यह विश्वास गलता तथा भ्रमपूर्ण है। आत्म-विकास का क्रम शरीर, मन और तत्पश्चात आत्मा है। न कि आत्मा, मन और तन। उल्टे मार्ग चलकर आज तक क्या कोई लक्ष्य पर पहुंच सका है?

साहस आत्म-परिष्कार में लगने से पूर्व शरीर और मन को सुसंतुलित एवं परिष्कृत करना चाहिये, क्योंकि सूक्ष्म आध्यात्मिक शक्तियों को जागृत करके अलौकिक सिद्धि पाने की अपेक्षा, यह अधिक सरल एवं सुकर है। यही ठीक भी है और नियमानुकूल भी। जो तन, मन ही वश में न कर पाया, वह आत्मा पर क्या अधिकार कर पायेगा? सरल कार्यों में सफलता प्राप्त करने के उपरांत ही कठिन कार्यों का भार उठा सकना संभव होता है। पहले सरल प्रश्न करिये और तब कठिन प्रश्न हाथ में लीजिये, तभी उत्तीर्ण होने लायक अंक पा सकेंगे, अन्यथा नहीं।

यदि अध्यात्म की उच्च-कक्षा में पहुंचने की सच्ची जिज्ञासा है, यों ही खिलवाड़ के रूप में साधना का आश्रय नहीं ले रहे हैं तो उसका शुभारंभ शरीर क्षेत्र से करिये। अपना आहार-विहार, रहन-सहन, शयन-जागरण, श्रम, संयम, ब्रह्मचर्य आ‍दि का पूरा-पूरा ध्यान रखिये। अपनी दिनचर्या तथा जीवन-गति अधिकाधिक प्रकृति के अनुकूल बनाइये। आरोग्य और जीवन अवधि को दीर्घ तथा सुनिश्चित करिये। रोगों और व्याधियों की संभावना से मुक्त एवं निश्चिंत बनिये और तब इस प्रकार, शरीर गति पर पूरा नियंत्रण करने के बाद मन का परिष्कार करिये। उसे अधिकाधिक प्रसन्न स्वभाव वाला बनाइये, प्रयत्नपूर्वक उसके मल, विक्षेप आदि विकार निकाल डालिये। उसमें सद्विचारों, सद्भावनाओं एवं सदाशयता का समावेश कीजिये और इन तन, मन के दोनों साधनों को आपस में अनुकूलतापूर्वक जोड़कर सत्कर्मों के साथ आत्मा की आध्यात्मिक साधना की ओर अग्रसर होइये। तभी सफलता की आशा की जा सकती है, अन्यथा नहीं। जो निश्चित क्रम व्यवस्था को बिगाड़ कर छलांग लगाने का प्रयत्न किया करते हैं, वे बहुधा असफल ही होते हैं। ऐसे उतावले अथवा अक्रमिक व्यक्ति अव्यस्थित साधना के फलस्वरूप बहुत बार अपना व्यावहारिक जीवन भी बिगाड़ लेते हैं, अध्यात्मिक उन्नति की तो बात ही क्या? अस्तु क्रमपूर्वक सावधानी से आत्मा की ओर बढ़िये। आप अवश्य सफल होंगे, सिद्धि प्राप्त करेंगे।


निर्भीकता

निर्भीकता :-

‘‘मूसा किसी गांव की यात्रा कर रहे थे। एक स्थान पर उन्हें झोपड़ी में कुछ आवाज-सी सुनाई दी। रुककर देखा तो एक सांप फुंकार कर रहा था। मूसा भय से कांपने लगे। हृदय धड़कने लगा, सांस जोर-जोर से चलने लगी, दम फूलने लगा, बुद्धि ने जवाब दे दिया, अब क्या करना चाहिये।’’

तभी एक आवाज आई, मूसा! डरो मत उठो, साहस करो और सांप को जकड़कर पकड़ लो, मूसा ने थोड़ा साहस बांधा, पांव आगे बढ़ाया और सांप को पकड़ लिया। जब मूसा ने सांप को पकड़ा तो वह सांप सोने का डंडा बन गया। निष्कर्ष यह है कि भय का, साहस से, धैर्य से सामना करना ही सफलता है।


जीवन-शक्ति का अजस्र स्रोत- संगीत

संगीत को अब तक उस कला के रूप में देखा जाता रहा है, जिससे मनोरंजन होता है और मन को स्फूर्ति मिलती है पर अब विज्ञान धीरे-धीरे इस विश्वास पर उतर रहा है कि संगीत एक बड़ा महत्वपूर्ण शक्ति-केन्द्र है। यदि उस शक्ति का यथेष्ट अनुसंधान एवं उपयोग किया जा सका तो अनेक आश्चर्यजनक रहस्य सामने आयेंगे और उनका मानव-जाति के कल्याण में भारी उपयोग किया जा सकेगा।

आज का संगीत एक प्रकार का सम्मोहन है जिससे मनुष्य असंयम की ओर दिग्भ्रान्त हो रहा है, परन्तु प्राचीनकाल में हमारे पुरखों ने तत्त्वान्वेषण के आधार पर उसकी प्रबल शक्ति और सामर्थ्य को परखने के साथ यह भी जाना था कि संगीत शक्ति के दुरुपयोग से मानव-जाति का अहित भी हो सकता है, इसलिये उसे भी धर्म का एक अंग माना। और ऐसे प्रतिबन्ध लगाये जिससे स्वर साधना का निष्कलंक रूप बना रहे और उससे मानव-जाति की भलाई होती रहे।

बीच में एक समय ऐसा आया जब शास्त्रीय संगीत में विदेशी जातियों का भी हस्तक्षेप हुआ और उन्होंने धीरे-धीरे उसे आज की स्थिति में घसीटना प्रारम्भ कर दिया। आज चारित्रिक दुर्बलता का एक कारण संगीत की सम्मोहक-शक्ति भी है। मीठे स्वर से किसी भी भावुक व्यक्ति को प्रभावित कर उसे अधोगामी बनाने का कुचक्र इन दिनों बहुतायत से फैलता जा रहा है।

अन्यथा संगीत एक महान साधना है और ब्रह्म प्राप्ति उसकी सिद्धि। नाद्-बिन्दूपनिषद के 42 से 45 मंत्रों में बताया गया है कि भ्रमर जिस प्रकार फूलों का रस ग्रहण करता हुआ, फूलों की गन्ध की अपेक्षा नहीं करता, उसी तरह नाद में रुचि लेने वाला चित्त विषय-वासना में दुर्गन्ध की इच्छा नहीं करता। सर्प नाद को सुनकर मस्त हो जाता है, उसी प्रकार नाद में आसक्त हुआ चित्त सभी तरह की चपलतायें भूल जाता है। संसार की चपलताओं से वियुक्त मन की एकाग्रता बढ़ती है और विषय-वासनाओं से अरुचि होने लगती है। यदि मन को हिरन और तरंग की संज्ञा दें तो यह नाद उस हिरन को बाँधने और पकड़ने वाला जाला और तरंग को साधने वाला तट ही माना जायेगा।

इसी उपनिषद् में ब्रह्म की अनुभूति-शक्तियों में नाद को भी शक्ति माना है और यह बताया है कि उसका अभ्यास करते हुये साधक एक ऐसे मधुर स्वर-संगीत में निबद्ध हो जाता है, जिससे सारा संसार ही उसे एक प्राण और परमात्मा का प्रतीक अनुभव होने लगता है।

वैज्ञानिक खोजों से यह पता चला है कि शून्य सृष्टि की निराकार स्थिति जहाँ है, वहाँ से एक प्रकार का शब्द उत्पन्न होता है, जैसे कि काँसे की थाली में चोट करें तो एक प्रकार का कंपन पैदा होता है, वह देर तक झन-झनाती रहती है। ऐसी झंकृतियाँ प्रकृति के अदृश्य अन्तराल से पानी में लहरों की भाँति निरन्तर उठती रहती हैं, इन झंकृतियों के आघात से इलेक्ट्रान परमाणु (विद्युत-घटकों) में गति उत्पन्न होती हैं और वे अपनी धुरी पर उसी प्रकार घूमने लगते हैं, जिस तरह सृष्टि के अन्यान्य बड़े-बड़े ग्रह, उपग्रह, पृथ्वी, नक्षत्र आदि अपनी धुरी पर घूमते हैं।

इलेक्ट्रान परमाणुओं में एक विशेष गति उत्पन्न होने से सृष्टि का काम उसी तरह चलने लगता है, जिस तरह चाभी भर देने से घड़ी चलने लगती है। सृष्टि का संचालन इन अदृश्य कम्पनों से ही चल रहा है, उनमें इतनी मधुरता दिव्यता शांति है, जिसे अमृत कहा जा सकता है। स्वर जितना सूक्ष्म और अन्तराल से प्रस्फुटित हुआ होगा, वह विश्व-नाद को उतना ही स्पर्श कर रहा होगा, अर्थात् उससे उसी अंश में मधुरता, आत्म-सुख, दिव्यता, पुलक और शांति की अनुभूति हो रही होगी।

भौतिक सृष्टि का सारा खेल संगीत की शक्तिशाली झंकृतियों के आधार पर चल रहा है। चैतन्य सृष्टि की साकारता भी संगीत के आधार पर है। मस्तिष्क के विद्युत कोषों से प्रति सेकेंड लगभग 31 विचार-तरंगें निकलती हैं। सिनेमा के पर्दे पर एक सेकेंड में सोलह चित्र सामने से गुजर जाते हैं। इतनी तेजी से चित्र घूमने के कारण दृष्टि भ्रम होता है और ऐसा लगता है कि चित्र न होकर वह कोई जीवित प्राणी काम कर रहा है। उसी प्रकार विद्युत कोषों में 31 कम्पन एक सेकेंड में निकलते हैं, तो उस मूल प्रेरक प्रक्रिया (नाद-ब्रह्म) का आभास नहीं हो पाता वरन् वह क्रियाशीलता एक निरन्तर चलने वाले ‘विचार’ के रूप में प्रकट हो जाती है। मनुष्य कुछ न कुछ सोचता ही रहता है, यह विचार तरंगें ईश्वरीय कम्पन की मनोजन्य झंकृति ही होती है, वह जितनी स्थूल होगी, विचार भी उतने ही स्थूल होंगे किन्तु यदि मन को एकाग्र कर लिया जाय और अधिक सूक्ष्म कंपनों तक पहुँचने का प्रयास किया जाये तो बड़े निर्मल, दिव्य आनन्द और शांति एवं संतोषदायक विचारों का सान्निध्य मिलने लगता है। संगीत साधना का यह एक बड़ा भारी आध्यात्मिक लाभ है।

विचार की सूक्ष्मतम स्थिति में पहुंचने पर शब्द-विद्या के पण्डितों का कहना है कि- प्राण वायु जब सहस्रार कमल (मस्तिष्क स्थिति) से टकराती है तो ‘ॐ’ की झंकृति से मिलता-जुलता शब्द उत्पन्न होता है। यही अजपा जप है, उसे शास्त्रीय भाषा में ‘सोऽहं’ ध्वनि कहा गया है। ब्रह्मांड स्थित सहस्रार से जाकर प्राण वायु न टकराये और यह ‘सोऽहम्’ की ध्वनि न हो तो मस्तिष्क की चेतना का- स्नायविक विद्युत-शक्ति का अन्त हो जायेगा और क्षण भर के अन्दर मृत्यु हो जायेगी।

योगी लोग बताते हैं कि शरीर का सूक्ष्म ढाँचा बिलकुल सितार जैसे है। मेरुदण्ड में इड़ा और पिंगला और सुषुम्ना के तार लगे हैं, यह तार मूलाधार स्थित कुण्डलिनी से बँध गये हैं। आज्ञा चक्र से लेकर मूलाधार तक के 6 चक्र इसके वाद्य स्थान हैं। इनमें लँ, बँ, रँ, षँ, हँ और ॐ की ध्वनियाँ प्रतिध्वनित होती रहती हैं। अब स्थूल-जगत में सा, रे, ग, म, प, ध, नी यह स्वर जब वाद्य यन्त्र से ध्वनियाँ निकालते हैं, और शरीरस्थ ध्वनियों से, टकराते हैं तो इस संघर्षण और सम्मिलन से मनुष्य का अंतर्जगत संगीतमय हो जाता है। इन तरंगों में असाधारण शक्ति भरी पड़ी है।

इन तरंगों के प्रवाह से शारीरिक और मानसिक जगत के सूक्ष्म प्राण गतिशील होते हैं, तदनुसार विभिन्न प्रकार की योग्यता, रुचि, इच्छा, चेष्टा, निष्ठा, भावना, कल्पना, उत्कण्ठा, श्रद्धा आदि का आविर्भाव होता है। इनके आधार पर गुण-कर्म और स्वभाव का सृजन होता है और उसी प्रकार जीवन की गतिविधियों से सुख-संतोष भी मिलता रहता है। तात्पर्य यह है कि शास्त्रीय संगीत की रचना एक ऐसी वैज्ञानिक प्रक्रिया पर आधारित है कि उसका लाभ मिले बिना रहता नहीं। इसी कारण संगीत को पिछले युग में धार्मिक और सार्वजनिक समारोहों का अविच्छिन्न अंग माना जाता था। आज भी विवाह-शादियों और मंगल पर्वों पर उसकी व्यवस्था करते और उसके लाभ प्राप्त करते हैं। हम देखते नहीं पर अदृश्य रूप से ऐसे अवसरों पर प्रस्फुटित स्वर-संगीत से लोगों को आह्लाद, शांति और प्रसन्नता मिलती है, लोग अनुशासन में बने रहते हैं।

मिलिटरी की कुछ विशेष परेडों में भी वाद्य यन्त्र प्रयुक्त होते हैं। उससे नौजवानों को कदम तोलने और मिलाकर चलने में बड़ी सहायता मिलती है। कारण उस समय सबके अंतर्जगत एक-सी विचार-तरंगों में आविर्भूत हो उठते हैं। ऐसे लाभों को देखकर विवाह-शादियों, व्रत, त्यौहारों, मंदिरों में पूजन आदि के समय कथा-कीर्तन की व्यवस्था की गई थी। अब भी उनका लाभ उठाया जाना चाहिये। जहाँ यह व्यवस्था प्रतिदिन हो सके, वहाँ दैनिक व्यवस्था रहे तो उससे स्थानीय लोगों की अदृश्य रूप से आत्मिक और आध्यात्मिक सेवा की जा सकती है। संयोजन कर्ताओं को तो दुहरा लाभ मिलता ही है।

शास्त्रीय-संगीत की इस विज्ञानभूत प्रक्रिया को अब पाश्चात्य देश भी अच्छी तरह समझने लगे हैं। अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन और रूस आदि सुविकसित देशों में वर्तमान पीढ़ी के युवक तेजी से भारतीय संगीत सीख रहे और उसके अन्य कारणों में इसी संगीत से उत्पन्न होने वाली शारीरिक एवं मानसिक प्रतिक्रियाओं का प्रभाव मुख्य है। उससे लोगों को बड़ी शाँति मिली है, फलस्वरूप भारतीय संगीत का अधिक लाभ प्राप्त कने के लिये, वे लोग भारतीय भाषायें सीखना चाहते हैं।

अमेरिका के प्रसिद्ध मानस चिकित्सक डा. जार्ज स्टीवेन्सन और डा विन्सेन्ट पील ने स्नायविक तनाव दूर करने के लिये जो उपाय बतायें हैं, उनमें चौथा इस प्रकार है- ‘‘इन तीन उपायों (1. क्रोध आये तो शारीरिक श्रम में लग जाना, 2. विपरीत परिणाम या असफलता के समय स्वाध्याय, 3 व्यायाम) की सार्थकता संगीत से सम्पन्न होती हैं, इसलिये संगीत साधना को हम सभी मानसिक तनावों के निराकरण की अचूक औषधि भी कहते हैं। संगीत के अभ्यास और श्रवणकाल दोनों में मन को विश्रान्ति ही नहीं, आत्म-प्रसाद भी प्राप्त होता है।

प्राचीनकाल के कुछ कथानक ऐसे मिलते हैं, जिनमें संगीत की अद्भुत शक्ति का पता चलता है राग, मल्हार गाने से वर्षा होने लगती है। दीपक राग से बुझे हुये दीपक जल उठते हैं। संगीत सम्राट तानसेन के सधे स्वरों से आकर्षित होकर वनमृग प्राणों का भय त्याग कर भागे चले आते थे। वेणुनाद सुनकर सर्प लहराने लगता है वीर रस शंकरा युद्धस्थ जवानों की वीर भावनायें उत्तेजित करने के लिये प्रयुक्त होता था। योद्धा-गण मारू संगीत सुनकर मृत्यु का भय भूल जाते थे। आनन्द के अवसर पर श्रृंगार और प्रातःकाल भगवान के चरणों में भक्ति की प्रगाढ़ता के लिये भैरवी गाया जाता है। क्षयरोग के निवारण के लिये श्रीराम का प्रयोग प्राचीनकाल से प्रयोग किया जाता रहा है।

यद्यपि यह विद्यायें अब लुप्त प्रायः हैं, तो भी अभी इस दिशा में सब कुछ नहीं खो गया। उत्तर-प्रदेश के पूर्वी इलाकों में एक विशेष प्रकार के वाद्य से सर्प का विष दूर किया जाता है। कुछ प्रान्तों में थाली बजाकर विशेष रोगों का उपचार करने की प्रथा अभी भी है। पाँच तत्वों से बने शरीर में वात, पित्त, कफ को स्वरों और रसों के घटाने-बढ़ाने से आशाजनक स्वास्थ्य लाभ मिलता है। बसन्त-ऋतु में बसन्त राग खून में एक नई जागृति, उमंग तथा प्रसन्नता उत्पन्न करता है। वर्षा ऋतु में राग मल्हार से आनन्द के भाव उत्पन्न होते हैं। यह प्रभाव कई बार बड़ी तीव्रता से भी होते हैं।

प्रातःकाल राग भारती और राग भैरवी आदि से भक्ति-रस का प्रादुर्भाव होता है, जिससे स्वास्थ्य और मानसिक शुद्धता की प्राप्ति होती है। संगीत सुनकर कई व्यक्तियों को वैराग्य हो जाता है। दीपक-राग गाते समय भावावेश आ जाने के कारण अथवा गतिभंग के कारण तानसेन का सारा शरीर काला पड़ गया था। बाद में कुछ महिलाओं के संगीत से ही वह रोग ठीक हुआ और उसे पहले जैसी त्वचा मिल सकी थी।

युवकों के चरित्र निर्माण में संगीत को एक अत्यन्त प्रभावशाली साधन के रूप में प्रयुक्त किया जा सकता है। अरस्तू कहा करते थे- ‘‘स्वर और लय के योग से कैसी भी भावनायें उत्पन्न की जा सकती हैं।” महाराष्ट्र राज्य के भूतपूर्व राज्यपाल श्री प्रकाश जी ने एक बार कहा- ‘‘संगीत की शिक्षा स्कूलों में अनिवार्य कर दी जानी चाहिये। इससे युवक विद्यार्थी में मानसिक एकाग्रता और जागरूकता का विकास स्वभावतः होगा। यह दो गुण स्वयं उसके व्यक्तित्व में अन्य गुणों की वृद्धि करने में सहायक बन सकते हैं।

हमारे प्रत्येक देवता के साथ संगीत का अविच्छिन्न सम्बन्ध होना यह बताता है कि विश्व की सृजन प्रक्रिया में संगीत का चमत्कारिक प्रभाव है। हृषीकेश का पांचजन्य, शंकर का डमरू, भगवान कृष्ण की मुरली, भगवती वीणापाणि सरस्वती की वीणा का रहस्य एक दृष्टि से यह भी है कि सृष्टि का प्रत्येक अणु संगीत शक्ति से गतिशील हो सकता है।

विश्व संगीतमय है, संगीत ही इसकी प्रेरणा और प्राण शक्ति है। यह तत्व इतना महत्वपूर्ण और शक्ति सम्पन्न है कि इसके उपयोग से हम मृत्युमुख जीवन को अमरत्व की ओर, निराश जीवन को आशा और संतोष तथा व्यथित और परिक्लान्त जीवन को शाश्वत शाँति और आनन्द की ओर अग्रसर कर सकते हैं।


दैवी-शक्ति द्वारा गुप्त रहस्यों का उद्घाटन

मनुष्य का स्वभाव है कि जिस बान को वह प्रत्यक्ष ज्ञान द्वारा नहीं जान सकता, उसके लिये वह किसी ऐसे व्यक्ति की सहायता माँगता है, जिसे गुप्त या अप्रकट बातों को जानने की शक्ति प्राप्त हो। कुछ लोगों को यह शक्ति स्वभावतः ही प्राप्त होती है और कुछ अभ्यास और साधन द्वारा भी इसमें निपुणता पा सकते हैं।

ऐसी गुप्त-ज्ञान की प्रक्रियाओं में एक विधि ‘डिवाइविंग’ कहलाती है, जिसका योरोपीय देशों में कहीं-कहीं प्रचार पाया जाता है। यह एक ऐसी विधि है, जिसमें किसी विशेष साधन या अभ्यास की आवश्यकता नहीं होती, अवसर पड़ने पर कोई भी शुद्ध विचारों का और पवित्रता से रहने वाला व्यक्ति इसको प्रयोग में ला सकता है। जो लोग इस विधि में दक्षता प्राप्त कर लेते हैं, वे जमीन के भीतर पानी के सोते, तेल के सोते, धातुओं की खानें आदि का पता निश्चित रूप से बता देते हैं और इससे बहुत अधिक परिश्रम और धन की बचत होती है।

मिश्र के रेगिस्तान में पानी-

यह प्रसिद्ध है कि अँग्रेजी सेना के प्रसिद्ध सेनापति और बाद में इंग्लैंड के युद्ध मन्त्री लार्ड किचनर इस विद्या के विशेष ज्ञाता थे। जब वे मिश्र में स्थित अँग्रेजी सेना में लेफ्टीनेन्ट के पद पर काम करते थे तो सरकार ने ‘कोरोस्को’ के रेगिस्तान में 250 मील लम्बी रेल बनाने की आज्ञा दी। पर उस रेगिस्तान में पानी का सर्वथा अभाव होने से इस कार्य में बड़ी कठिनाई पड़ने लगी और ऐसा जान पड़ा कि रेल नहीं बन पायेगी। जब यह समाचार लार्ड किचनर को मिला तो वे स्वयं उस प्रदेश में पहुँचे और इसी विधि का प्रयोग करके दो जगह कुएँ खोदने का आदेश दिया। उन कुओं से बहुत साफ और मीठा पानी निकला जिससे रेलवे लाइन शीघ्र ही बनकर तैयार हो गई। इसी मार्ग से अंग्रेजी फौजें शीघ्रता से मिश्र भेजी जा सकीं, जहाँ उन्होंने विद्रोहियों को दबा कर सरकारी प्रभाव फिर से जमाया।

इस घटना के फल से उस प्रदेश के प्राचीन निवासी लार्ड किचनर को ‘जादूगर’ मानने लगे। इसके बाद और भी कितने ही लोगों ने उसी रेलवे लाइन के पास कुआँ खोदने का प्रयत्न किया, पर किसी को सफलता न मिल सकी।

श्री लायड जार्ज का कृषि फार्म-

प्रथम महायुद्ध के अवसर पर इंग्लैंड के प्रधान-मन्त्री श्री लायड जार्ज थे। महायुद्ध के कुछ वर्ष पश्चात उन्होंने एक बड़ी जमीन खेती और फलों का बगीचा लगाने के लिये खरीदी थी। उसका तमाम इन्तजाम बहुत ठीक था, पर पानी की अक्सर कमी हो जाती थी। इससे यह आशंका पैदा हो गई कि अगर किसी वर्ष बरसात कम हुई तो ‘फार्म’ को अवश्य हानि उठानी पड़ेगी।

इस कमी को पूरा करने के लिये श्री लायड जार्ज ने कई युक्तियाँ सोचीं, पर कोई कारगर न जान पड़ी। अन्त में एक दिन वे अपने एक पड़ोसी किसान के पास पहुँचे। उन्होंने देखा था कि उनके आस-पास के सब खेत जब सूखे से रहते हैं, तब भी किसान की जमीन सदा हरी-भरी और तरोताजा बनी रहती है। उन्होंने उसके पास जाकर पूछा कि उसको पानी कहाँ से मिलता है। किसान ने कहा कि मेरी स्त्री दैवी विधि से ‘डिवाइनिंग’ से पानी का पता लगाना जानती है। उसके बतलाने से जो कुआँ खोदा गया उससे काफी पानी निकलता है।

श्री लायड जार्ज ने तुरन्त ही उस महिला को अपने यहाँ बुलाया और जब उसने पानी के स्त्रोत का ठीक पता बता दिया तो वहीं पर कुआँ खुदवाया गया, जिससे हर रोज 3 लाख गैलन पानी निकलने लगा। तब से फार्म की उपज काफी बढ़ गई और वह सदा हरा-भरा रहने लगा।

वास्तव में दैवी-विधि से जमीन के भीतर पानी के स्रोत का पता लगाना बड़ी उपयोगी और प्राचीन विद्या है। पुराने समय में पानी के लिये संसार भर में कुआँ खोदने के सिवा और कोई उपाय था ही नहीं। नल तो अभी थोड़े ही समय से लगने लगे हैं। ऐसी दशा में अनेक व्यक्ति इस विद्या का अभ्यास करते थे। फिर विशेष आत्म-शक्ति वाले तो जहाँ बतलाते थे, वहाँ पानी अवश्य निकलता था। ‘बाइबिल’ में लिखा है कि एक पहाड़ी स्थान में जब मूसा के अनुयायी प्यासे मरने लगे तो उसने एक चट्टान को तुड़वाया, जिसके नीचे से मीठे पानी का स्त्रोत निकला और सबने अपनी प्यास बुझाई। इस तरह की घटनायें हमारे देश में भी नानक, तुकाराम और अनेक अत्य सच्चे सन्तों के सम्बन्ध में सुनने में आती हैं। वे सब कार्य उनकी दैवी-शक्ति से ही पूरे हो सके थे।

डिवाइनिंग द्वारा रोग-निदान-

स्विट्जरलैंड का एक दैवज्ञ इसी तरह की एक पेड़ की डाली द्वारा, जिसे ‘डिवाइनिंग राड’ कहते हैं, रोगों का भी पता लगा सकता है। इंग्लैंड की ‘रॉयल इंजीनियरिंग सेना’ के कप्तान ए. जे. एडेनी उसके पास गाये थे। उसने दैवी-विधि द्वारा उनको बतला दिया कि उनके दाहिने कूल्हे में गठिया की बीमारी है। इसी विधि से उसने एक अन्य व्यक्ति के पेट का कैंसर बता दिया था, यद्यपि डाक्टर बहुत प्रयत्न करने और ‘एक्सरे’ से जाँच करने पर भी उसका निर्णय न कर सके थे।

युद्ध में दैवज्ञों का महत्व-

युद्ध-काल में प्रायः ऐसे अनेक समस्यायें उठ खड़ी होती हैं, जिनको वैज्ञानिक तरीकों के बजाय ऐसी दैवी-विधि से ही शीघ्र हल किया जा सकता है। गत युद्ध के समय तो कुछ लोगों ने यह प्रस्ताव किया था कि प्रत्येक सेना के साथ एकाध दैवज्ञ भी रहना चाहिये। अब भी कभी-कभी ऐसा किया जाता है, पर वह निजी तौर पर ही होता है। उन्हीं दिनों अँग्रेजी सेना सेल्सबरी के मैदान में नकली युद्ध का अभ्यास करने के लिये एकत्रित हुई थी। जहाँ इस सेना का कैम्प लगाया गया था, वहां आस-पास में पानी निकालने की इंजीनियरों ने बहुत चेष्टा की, पर उनको बार-बार असफल होना पड़ा।

इससे अधिकारियों को बड़ी चिन्ता हुई, क्योंकि यदि वहाँ से कैम्प को हटाकर अन्यत्र लगाया जाता तो लाखों रुपये की बर्बादी होती। इसलिये लाचार होकर एक दैवज्ञ महिला मिस पेनरोज को बुलाया गया। यह पहिले ब्रिटिश कोलम्बिया में दैवी-विधि से पानी ढूँढ़ने का कार्य करती थी। उसने आते ही पानी के स्त्रोत का पता लगा लिया और सेना की सारी कठिनाई दूर हो गई।

दैवज्ञों का कहना है कि वे पानी की तरह जमीन के भीतर की अन्य वस्तुओं, जैसे धातु आदि का भी पता लगा सकते हैं। ऐसी हालत में वे अपनी लड़ने वाली सेना, जल और वायु के जहाजों को यह बतला सकते हैं कि शत्रु का गोला-बारूद का भण्डार कहाँ छिपा है अथवा गोताखोर नाव समुद्र के भीतर कहाँ छिपी है।

सामयिक पत्रों में छपा था कि जर्मनी का हिटलर दैवी-विधि विद्याओं पर बहुत विश्वास रखता था और बिना दैवज्ञों की सम्मति के युद्ध का कोई नया कार्य नहीं करता था। उसी समय इंग्लैंड में एक दैव-विद्या का ज्ञाता आ गया था, जिसका नाम लुई डी व्होल था। वह दरअसल हँगरी का रहने वाला था और पहिले उसने कुछ समय तक जर्मनी में रहकर हिटलर के प्रधान सलाहकार विलियम क्राफ्ट के साथ काम भी किया था। वह क्राफ्ट के आध्यात्मिक सिद्धान्तों और गणना-प्रणाली को अच्छी तरह जानता था और इसलिये इस बात का शीघ्र पता, लगा लेता था कि युद्ध में हिटलर द्वारा कौन-सा नया कदम उठाया जाने वाला है।

एक दिन किसी दावत में उसकी भेंट ब्रिटेन के विदेश-मन्त्री लार्ड हैलिफैक्स (भारत के भूतपूर्व गवर्नर जनरल) से हो गई। बातचीत में उसने हिटलर की अत्यन्त गुप्त महत्त्वपूर्ण बातें लार्ड हैलिफैक्स को बतलाई, जो उनको मनोरंजक जान पड़ी और उन्होंने हँसते हुये डी. व्होल से कह दिया कि “अगर तुम्हारी भविष्यवाणी सत्य निकली तो मैं तुम्हें एक खास काम सौपूँगा।”

डी. व्होल की भविष्यवाणी ठीक साबित हुई और लार्ड हैलिफैक्स ने उसे सेना में सम्मिलित करके कप्तान का पद दिया और वह दैवी-विधि द्वारा हिटलर की चालों के बारे में पता लगाने लगा। उसकी भविष्यवाणियाँ अधिकाँश में ठीक साबित हुई और उनसे सेना अधिकारियों ने काफी लाभ भी उठाया।

योरोप, अमेरिका में छोटे-बड़े सभी कार्य संगठन और सहयोगपूर्वक होते हैं और इसी से उनकी उचित प्रगति भी होती रहती है। इंग्लैंड के दैवज्ञों ने भी बहुत वर्ष पूर्व अपनी एक संस्था स्थापित करली थी, जिसके संचालक कर्नल ए. एच. बैल थे। इसकी तरफ से कई पुस्तकें भी इस सम्बन्ध में प्रकाशित की गई थीं। फ्राँस में भी इस विद्या के कई अच्छे जानकर पाये जाते हैं।

‘डिवाइनिंग’ की विधि का विवेचन करने से हम इसी निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि वह एक शुद्ध आध्यात्मिक विद्या है। उसमें किसी प्रकार के वैज्ञानिक यन्त्र अथवा रासायनिक द्रव्य आदि का कोई प्रयोजन नहीं होता। केवल उसके करने वाले व्यक्ति की आत्म-शक्ति और समग्र विश्व मैं व्याप्त चैतन्य सत्ता (ईश्वरीय शक्ति) पर उसका दृढ़ विश्वास हो सकता है और उसी के आधार पर उसे सत्य-संकेत प्राप्त हो सकता है।

अध्यात्मवादियों के अनुसार आत्मा की शक्ति अनंत है और यदि वह सत्य का ध्यान रखकर किसी विषय पर विचार करेगा, तो चैतन्य-सत्ता उसका सत्य मार्ग-दर्शन ही करेगी। इसी सिद्धान्त के आधार पर तरह-तरह की प्रश्नावलियाँ तैयार की गई हैं, जिनमें सामान्य व्यक्ति भी अपनी समस्याओं का हल ढूंढ़ा करते हैं। पर जब लोग इसे पेशा बना लेते हैं और लालच में पड़कर धूर्तता से काम लेने पर उतारू हो जाते हैं, तो यही विद्या अन्ध-विश्वास और अविश्वास की जननी बन जाती है। इसलिये दैवी-विद्याओं में सत्यनिष्ठा रखना ही हमारा परम कर्तव्य है।


निश्छल आत्मा स्वयमेव देव-शक्ति

निश्छल आत्मा स्वयमेव देव-शक्ति :-

अमेरिकी राष्ट्रपति वाशिंगटन के कुटुम्ब में दो बहनें, जिनका नाम जान और वर्जिना था, अपने दोनों भाइयों फ्रेड और जैक से बहुत स्नेह रखती थीं। भाई-बहनों के इस प्रेम में कहीं कोई स्वार्थ या मोह की भावना न थी। विशुद्ध प्रेम कल्याण का भाव था।

एक दिन की बात है, दोनों बहनें घर पर थीं। भाई वहाँ से बहुत दूर अपने काम पर किसी दूसरे शहर में थे। अचानक अस्पताल से फोन आया- ‘‘वहाँ कोई ऐसा जख्मी आदमी पड़ा है, उसका मुख इस तरह कुचल गया है कि पहचानना कठिन हो रहा है। किन्तु वह तुम्हारे पिता का नाम लेता है, इसलिये अस्पताल आकर फौरन उसकी पहचान कर लो।”

दोनों बहनें किसी अज्ञात भय से काँप उठीं। मन में भय समा गया, कहीं जैक या फ्रेड में से तो कोई नहीं है। जाने से पूर्व दोनों बहनों ने भगवान से प्रार्थना की- ‘‘हे प्रभु! ऐसा न हो कि वह हमारा भाई हो।” इसके बाद भरे आँसुओं से वह अस्पताल पहुँचीं। वहाँ जाकर पता चला कि वह उनके घर का नौकर था। और वह किसी वाहन दुर्घटना में कुचल गया था। उनके पहुँचते-पहुंचते उसकी मृत्यु हो गई, पर दोनों बहनों का तब भी अपने भाइयों की बड़ी याद आती रही।

कहते हैं सच्चे हृदय की याद में इतनी शक्ति होती है कि वह एक हृदय का संदेश दूसरे हृदय तक बेतार के तार पहुँचा देती है। घर पहुँचे अभी दो क्षण मुश्किल से बीते होंगे कि जैक का फोन आया। उसने बताया- ‘‘मुझे ऐसा लग रहा है कि तुम दोनों मुझे बुला रही हो, बताना तुम दोनों कुशलमंगल से तो हो।”

दोनों बहने आश्चर्यचकित थीं कि उनकी अन्तर-वाणी जैक तक कैसे पहुँच गई। उसकी तरफ से आश्वस्त बहनों का ध्यान अब फ्रेड का भी पत्र आया उसने भी लिखा था- ‘‘मुझे कई दिन से ऐसा लग रहा है कि तुम दोनों मेरी याद कर रही हो- लिखना अच्छी तो हो।”


गर्भस्थ शिशु का इच्छानुवर्ती निर्माण

महाभारत में एक कथा आती है कि “एक बार कुपित होकर अश्वत्थामा न द्रौपदी के गर्भस्थ शिशु (परीक्षित) पर आग्नेयास्त्र प्रयोग किया। परीक्षित मां के उदर में ही असह्य पीड़ा से जलने लगने लगा। माँ ने भी उसे जाना। उन्होंने सम्पूर्ण समर्पण भाव से परमात्मा का स्मरण किया तब उस बच्चे की रक्षा हो पाई।”

गर्भस्थ शिशु को कोई अस्त्र तब तक नहीं छेद सकता जब तक माँ का शरीर न छिदे। दरअसल आग्नेयास्त्र मन्त्र शक्ति थी, जो संकल्प-शक्ति के द्वारा चलाई गई थी। बाहरी व्यक्ति द्वारा दूर से संकल्प-प्रहार से यदि गर्भस्थ बच्चा जल और मर सकता है, और फिर परमेश्वर के प्रति अटल विश्वास और रक्षा की भावना से उस बच्चे को बचाया जा सकता है तो उसके शरीर और मनोभूमि में भी इच्छानुवर्ती परिवर्तन लाया जा सकता है।

सती मदालसा के बारे में कहा जाता है कि “वह अपने बच्चे के गुण, कर्म और स्वभाव की पूर्व घोषणा कर देती थीं फिर उसी प्रकार निरन्तर चिन्तन, क्रिया-कलाप, रहन-सहन, आहार-विहार और व्यवहार-बर्ताव अपनाती थीं, जिससे बच्चा उसी मनोभूमि में ढल जाता था, जिसमें वह चाहती थीं। इतिहास प्रसिद्ध घटना है कि उनके पहले सभी बच्चे ज्ञानी, सन्त और ब्रह्मनिष्ठ होते गये। अजात-शत्रु की प्रार्थना पर उन्होंने अन्तिम गर्भस्थ बच्चे को राज-नेता के अनुरूप ढाला। उसी ने पिता का राज्य-सिंहासन सम्भाला और कुशल राजनीतिज्ञ हुआ।

आयुर्वेद के विशेष ग्रन्थ सुश्रुत संहिता में भी आया है- ‘‘पूर्व पश्ये ऋतुस्नाना या दशं नर मंगला। तादृष्य जनयेत्पुत्र भर्त्तारं दर्शये तत।” अर्थात्- ऋतु स्नान के पश्चात स्त्री जिस प्रथम पुरुष को देखती है, बच्चे का रूप-रंग और मुखाकृति उसी जैसा होता है, इसलिये वह सर्वप्रथम अपने पति का दर्शन करे।

यह सभी तथ्य भावना विज्ञान से सम्बन्धित हैं, इसलिये प्रत्यक्ष न दिखाई देने पर उनकी सत्यता में कोई सन्देह नहीं है। यह बात अब पाश्चात्य देशों के वैज्ञानिक, डाक्टर और दूसरे प्रबुद्ध व्यक्ति भी मानने लगे हैं। डा. फाउलर ने इस सम्बन्ध में काफी खोज की है, गर्भावस्था में भी गर्भिणी के हाव-भाव का बच्चे के शरीर और मन पर कैसा प्रभाव पड़ता है, इस सम्बन्ध में उनके कई प्रमाण हैं।

प्रत्यक्षदर्शी घटना का वर्णन करते हुए फाउलर लिखते हैं- ‘‘एक स्त्री अपने बच्चे को नींद लाने वाली गोली देकर किसी आवश्यक कार्य से बाहर चली गई। लौटने पर वह बच्चा मरा पाया। स्त्री को इससे बहुत दुःख हुआ और वह शोक-मग्न रहने लगी। उसी अवस्था में उसने दूसरी बार गर्भ धारण किया। पहले बच्चे के प्रति उसका शोक ज्यों का त्यों बना रहा, इसलिये दूसरा लड़का रोगी हुआ। दूसरे वर्ष ही उसकी मस्तिष्क रोग से मृत्यु हो गई। अब वह और दुःखी रहने लगी। इस अवस्था में तीसरा पुत्र हुआ, वह हठी, सुस्त और कमजोर हुआ। दाँत निकालते समय उसकी भी मृत्यु हो गई। चौथा पुत्र भी ऐसे ही गया। किन्तु पांचवीं बार उसकी परिस्थितियों में सुखद परिवर्तन आये, जिससे उस स्त्री की मानसिक प्रसन्नता बढ़ी। वह पहले की तरह हँसने-खेलने लगी। इस बार जो बच्चा हुआ वह पूर्ण स्वस्थ, निरोग और कुशाग्र बुद्धि का हुआ।

डा. फाउलर का मत है कि क्रोध, आश्चर्य, घृणा, अहंकार, गम्भीरता आदि के अवसर पर माता की नासिका, मुख और आकृति में जैसे परिवर्तन उठाव गिराव होते हैं, वैसे ही बच्चे की नाक, मुँह, माथे आदि अवयवों की शक्ल भी बनती है। गर्भाधान के बाद स्त्री प्रसन्न नहीं रहती, शोक या चिन्ता-ग्रस्त रहती है तो बालक के मस्तिष्क में पानी की मात्रा बढ़ जाती है। यदि 4 वर्ष के बच्चे के सिर का व्यास बीस इंच से अधिक हो तो मानना चाहिये कि वह जल-संचय का शिकार हुआ है। उसकी माँ गर्भावस्था में दुःखी रही है।

भय, विक्षेप, अशुभ चिंतन, उत्तेजना से जिस तरह अंगों में भद्दापन, बेडौल और खराब मुखाकृति बनती है, उसी तरह शुभ-संकल्प और प्रसन्नतापूर्ण विचारों से बच्चा स्वस्थ, सुँदर और चरित्रवान् बनता है। इसीलिये कहा जाता है- गर्भावस्था में माँ को सत्य भाषण, उत्साह, प्रेम, दया, सुशीलता, सौजन्यता, धर्माचरण और ईश-भक्ति का अनुगमन करना चाहिये। यह बच्चे होनहार और प्रतापी होते हैं, जबकि क्रोध, ईर्ष्या, भय, उद्विग्नता आदि अधम वृत्तियों के बच्चे भी अधम, उत्पाती और स्वेच्छाचारी होते हैं। गलत खान-पान भी उसमें सम्मिलित हैं।

इसके अतिरिक्त जो महत्वपूर्ण बातें गर्भस्थ शिशु को को प्रभावित करती हैं, उनमें से वातावरण मुख्य है। ध्रुव ऋषि-आश्रम में जन्मे थे। उनकी माँ सुनीति बड़ी नेक स्वभाव और ईश्वर भक्त थीं। ध्रुव के महान तेजस्वी होने में वातावरण भी मुख्य सहायक था, जबकि उत्तानपाद दूसरे बेटे में वैसी तेजस्विता न उभर सकी।

एक पाश्चात्य डा. ने वातावरण के प्रभाव का अध्ययन इस प्रकार किया- ‘‘एक बार एक कमरे का फर्श और दीवार सबको नील-पोत कर नीला कर दिया। उस कमरे में श्वेत रंग का खरगोश का एक जोड़ा रखा गया। कुछ समय बाद खरगोश के दो बच्चे हुए, दोनों के बालों में नीले रंग की झलक थी। इससे पता चलता है कि बच्चे के मस्तिष्क में ही नहीं, वातावरण का सूक्ष्म प्रभाव स्थूल अंगों पर भी पड़ता है। गर्भवती का निवास ऐसे स्थान पर होना चाहिये, जहाँ चारुता हो, मोहकता और आकर्षण हो। हरे बगीचों, केले, फलों आदि से घिरे स्थान, देव-स्थान और विशेष रूप से सजे-सजाये, साफ-सुथरा स्थान गर्भस्थ बच्चों पर सुन्दर प्रभाव डालते हैं।

स्पेन के किसी अंग्रेज परिवार में एक बार एक स्त्री गर्भवती हुई। गर्भवती जिस कमरे में रहती थी, उसमें अन्य चित्रों के साथ एक इथोपियन जाति के बहादुर का चित्र लगा हुआ था। वह चित्र उस स्त्री को अति प्रिय था। कमरे में वह उस चित्र को बहुत भावनापूर्वक देखा करती थी। दूसरे काम करते समय भी उसे उस चित्र का स्मरण बना रहता था। अन्त में जब उसे बालक जन्मा तो उसके माता-पिता अंग्रेज होते हुये भी लड़के की आकृति और वर्ण इथोपियनों जैसा ही था। उस चित्र की मुखाकृति से बिल्कुल मिलता-जुलता, उसी के अनुरूप था। घरों में भगवान के, महापुरुषों के चित्र लगाये भी इसीलिये जाते हैं कि उनकी आकृतियों से निकलने वाले सूक्ष्म भावना-प्रवाह का लाभ मिलता रहे।

वातावरण के साथ-साथ गर्भिणी के साथ व्यवहार, बर्ताव और बातचीत भी बहुत सौम्य, शिष्ट और उदार होना चाहिये। क्रोध, मारपीट, धमकाना, डाँटना, दबाकर रखना आदि कुटिलताओं का बच्चे पर बुरा प्रभाव पड़ता है। कई बार इस प्रकार के आचरण बहुत ही दुःखदायी और स्पष्ट परिलक्षित होते हैं। एक बार एक व्यक्ति ने समुद्री-यात्रा के दौरान किसी बात से अप्रसन्न होकर, अपनी गर्भवती को जोर का धक्का मारा। गिरते-गिरते जहाज की जंजीर हाथ में पड़ गई। उससे वह गिरने से सम्भल गई किन्तु वह व्यक्ति बड़ा क्रूर निकला। उसने छुरे का वार किया, जिससे उस स्त्री की जंजीर पकड़े हुये हाथ की तीन उंगलियाँ कट गईं, वह स्त्री समुद्र में चली गई।

जहाज के चले जाने पर कुछ मल्लाहों ने उसकी रक्षा की। बाद में उस स्त्री की जो सन्तान हुई यह देखकर सब आश्चर्यचकित रह गये कि उसकी तीन उंगलियाँ ही नहीं थीं। और वह बालक मानसिक दृष्टि से अपूर्ण, क्रोधी तथा शंकाशील स्वभाव का था।

धमाका पैदा करने वाला ऐसा कोई व्यवहार गर्भवती से नहीं करना चाहिये, जिससे मस्तिष्क में तीव्र आघात लगे। इससे बच्चे के शरीर पर बुरा प्रभाव पड़ सकता है।

बच्चों के मानसिक निर्माण में मात-पिता की घनिष्टता, प्रगाढ़ प्रेम, परस्पर विश्राम का सबसे सुन्दर प्रभाव पड़ता है। सच बात तो यह है कि माता-पिता का संकल्प बच्चे को उसी प्रकार पकाता है, जिस प्रकार मादा कछुआ पानी में रहकर रेत में रखे अपने अंडों को पकाती है। दिव्य गुणों का बच्चे में आविर्भाव ही प्रेमपूर्ण भावनाओं से होता है, इसलिये गर्भावस्था में स्त्री-पुरुष को अधिकांश समय साथ-साथ बिताना चाहिये। पवित्र आचरण और प्रगाढ़ मैत्री रखनी चाहिये, ऐसे बच्चे शरीर से ही नहीं मिजाज से भी पूर्ण स्वस्थ होते हैं।

इस उदाहरण से यह बात और भी स्पष्ट होगी। एक अँग्रेज ने किसी ब्राजील की लड़की से विवाह किया। लड़की का रंग साँवला था पर उसमें मोहकता अधिक थी। पति-पत्नी में घनिष्ठ प्रेम था। पर उन्हें कोई संतान नहीं हुई।

कुछ समय पश्चात वह स्त्री मर गई। पति को बड़ा दुःख हुआ। कुछ दिन बाद उसने दूसरा विवाह अँग्रेज स्त्री से किया। वह गौरवर्ण की थी पर इस अँग्रेज को अपनी पूर्व पत्नी की याद बनी रहती थी इसलिये वह अपनी नई पत्नी को भी उसी भाव से देखा करता था। इस स्त्री से एक कन्या उत्पन्न हुई, जो ब्राजीलियन लड़की की तरह साँवली ही नहीं मुखाकृति से भी मिलती-जुलती थी। यह गर्भावस्था में पिता के मस्तिष्क में जमा हुआ पत्नी-प्रेम का संस्कार ही था, जिसके कारण बालिका ने उसका रंग और आकार ग्रहण किया।

इन समस्त उदाहरणों से स्पष्ट है कि गर्भस्थ शिशुओं का इच्छानुवर्ती निर्माण सम्भव है। अपने रहन-सहन, स्वभाव और संकल्पों को स्वस्थ और सुन्दर बनाकर भावी बच्चों में भी स्वास्थ्य सौंदर्य सद्गुण, तेजस्विता और मनस्विता का विकार किया जा सकता है। यह बात माता-पिता दोनों को मालूम होनी चाहिये।


Quotation

भव्य और दिव्य समाज :-

“कामना करती हूँ ऐसे स्वस्थ समाज की, जिसकी संपत्ति हँसी और किलकारी भरते बच्चे प्रसन्न और उल्लसित नर-नारियाँ हों। जिसके हर युवक में अदम्य साहस, स्वाभिमान, तारुण्य और पुरुषार्थ हो लोक-मंगल के लिये। उस समाज में श्री, सौंदर्य और शाँति हो।

ऐसा सुन्दर समाज किसी के आदेश और आज्ञा से नहीं बनाया जा सकता, वह सृजनात्मक कार्यों से निर्मित हों। वह स्वयं अपने हाथों से गढ़े गये हों।

यह कार्य थोड़ा कठिन है, यह जानती हूँ। ध्वंस के लिये दो मिनट बहुत हैं, पर निर्माण में समय लम्बा लगता है, किन्तु यदि प्रति प्रतीक्षा के लिये अवधि न होती, उल्लंघा के लिये रेखायें, जीतने के लिये बाधायें और पार करने की सीमायें न होतीं, तो ऐसा लगता है कि परमात्मा ने मनुष्य को जो आनन्द का पुरस्कार प्रदान किया है, उसमें कुछ कमी आ जाती। इसलिये प्रयत्न और पुरुषार्थ के मार्ग कभी बन्द नहीं किये जाते। सृजन की शक्तियों को निरन्तर क्रियाशील रहना चाहिये।

मानती हूँ कई बार निराशा आयेगी और अपने आवास बनायेगी, किन्तु आशा का द्वार बन्द मत होने देना। भगवान दिन का सृजन कर रहे थे, तो संध्या आ गई और वे महापुरुष निराश नहीं हुये अनेक उज्ज्वल नक्षत्र गढ़कर उन्होंने रात के सौंदर्य को दिन से द्विगुणित कर दिया। परिश्रम करते-करते जब थकावट ने आ घेरा तो उन्होंने शीतल पवन का आह्वान किया, जिससे जीवन में पुनश्च एक नूतन प्रेरणा खेलने लगी। आशा का द्वार ऐसा ही है, जब तक वह खुला रहता है, तब तक सृजन और निर्माण के सुन्दर जखीरों की कमी नहीं होने पाती। न होना निराश, न बन्द करना द्वार गति के, तो एक दिन अपनी कल्याण का दिव्य और भव्य समाज मूर्तिमान होगा निश्चय ही।

आओ हम सब उस दिव्य संतति और संस्कृति के निर्माण में लग जायें, जिसमें बस तेजस्विता ही तेजस्विता हो। जहाँ मूर्धन्य और आत्म-शक्ति सम्पन्नता की कोई कमी न हो।” -कुमारी हेलन केलर,


गायत्री का देवता सविता पर एक वैज्ञानिक दृष्टि

विश्व रचना के दो प्रधान तत्व हैं- एक प्राण (इसे आध्यात्मिक भाषा में ‘देव’ भी कहते हैं) दूसरा ‘भूत’। इन दोनों तत्वों का जहाँ भी मिलन हो जाता है, वहीं दृश्य प्रकृति, गतिमान या क्रियाशील जीवन के दर्शन होने लगते हैं। केवल ‘भूत’ पदार्थ प्राण के बिना स्पन्दन नहीं कर सकता। इसलिये भौतिक जगत में जहाँ भी जीवन-तत्व है, वह प्राण ही है, इसे ही ‘गायत्री’ कहते हैं।

मनुष्य शरीर में यह दोनों शक्तियाँ स्पष्ट रूप से प्रकट होती हैं। बाल्यावस्था में छोटा-सा पंच भौतिक पदार्थों का पिंड छोटा-सा प्राण धारण किये हुये था, तब उसकी शक्ति और तेजस्विता कम थी पर जैसे-जैसे शरीर का विकास होता है और शरीर में प्राण की मात्रा बढ़ती है, शक्ति और क्रियाशीलता भी बढ़ती है, अवस्था के इस क्रम से बाल्यावस्था, यौवन और वृद्धावस्था को “गायत्री की समिधा” कहा गया है, क्योंकि प्राण तत्व इन्हीं में जलता है।

उसके बाद दोनों तत्व फिर अलग-अलग हो जाते हैं प्राण निकल जाता है और पंचभूतों से बना हुआ नितान्त प्राकृत शरीर पड़ा रह जाता है। इस छूटे हुए शरीर को ऋग्वेद में-

यद् गायत्रे अधि गायत्र माहितम्।

अर्थात् पंचभूतों से बना शरीर मर्त्यगायत्री है। इसमें सोचने, समझने, सुख-दुःख अनुभव करने, क्षोभ और विकलता व्यक्त करने वाली शक्ति प्राण थी। शरीर निस्पन्द और अनुभव-हीन होता है। इसलिये सुख-दुःख ही नहीं मनुष्य जीवन की सारी हलचल, परिवर्तन गति उन्नति, अवनति का कारण भी प्राण ही हैं।

यदि सूक्ष्म रूप से विचार करें तो ऐसा मालूम पड़ेगा कि जो प्राण शरीर के विभिन्न क्षेत्रों में क्रियाशील रहता है, वह भी भौतिक है। किरणें, ज्योति या अग्नि जैसा कोई स्थूल तत्व कह सकते हैं, उसे नियन्त्रित और प्रेरित करने वाली एक तीसरी मनोमय शक्ति है। इसी की इच्छा और संकल्प शक्ति से शरीरगत व्यापार चलते हैं। इसलिये गायत्री -इस एक शब्द में ही पंच-भौतिक, प्राण और मन-त्रिक शक्ति का समग्ररूप आ जाता है। शास्त्रों में इसे भौतिक क्लेश और प्रपंच से मुक्ति दिलाने वाली विद्या कहा गया है। अर्थात् जो विचारपूर्वक इन तीनोँ शक्तियों को अलग-अलग अनुभव करते हैं, फिर उनकी अधोगति नहीं होती “तुमहिं जानि कछु रहे न शेषा, तुमहिं पाय कछु रहे न क्लेशा।” इसी गायत्री शक्ति की स्तुति है, जो अब विज्ञान सम्मत भी है।

गायत्री का आविर्भाव कहाँ से होता है। यह प्रश्न उठता है तो उपनिषदकार कहते हैं-

“देवात्म शक्तिम् स्वगुणे निगूढः”

देव माया या इन्द्र शक्ति ही वह सत्ता है, जो विश्व-गायत्री अर्थात् अनेक रूपों में विकसित होता है। यह देव-शक्ति या इन्द्र कौन है-

“तस्य दृश्यः शतादश”

सूर्य ही वह इन्द्र है, जिसकी हजारों किरणें हैं। एक-एक किरण, एक-एक रूप है। इन किरणों में प्राण-शक्ति भरी होती है। सूर्य को त्रयी विद्या भी कहा गया है अर्थात् सूर्य स्वयं भी एक वैसी ही गायत्री है, जिस तरह कि एक गायत्री शरीर प्राण और मनोमय रूप में धरती में विद्यमान रहती है। इस तरह यदि सूर्य को एक विराट पुरुष की संज्ञा प्रदान करें- जो एक व्यापक क्षेत्र में बिल्कुल मनुष्य की तरह क्रियाशील रहता है। सोच-विचार भी कर सकता है, विकल और क्षुब्ध हो सकता है। दंड और पुरस्कार दे सकता है। हर्ष और शोक, सन्तोष और असन्तोष व्यक्त कर सकता है, तो उसमें कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिये।

अब तक यह विषय हमारी श्रद्धा का रहा है, अर्थात् जिसके हृदय में वैराग्य और श्रद्धा उत्पन्न होती थी, वह यह मान लेता था कि- ‘‘निखिल आकाश या किसी लोक स्थान से गायत्री नाम की कोई देवी बैठी होगी, जो हमारे आन्तरिक भावों को सुन और समझ कर अपने वरदान दे सकती होगी।” पर अब उनके विराट पुरुष रूप को विज्ञान ने इस तरह सिद्ध कर दिया है कि जिनके हृदयों में श्रद्धा नहीं वह भी इन प्राण-पुरुष से अपना संपर्क स्थापित कर उसी प्रकार लाभान्वित हो सकते हैं, जिस तरह बड़े बिजली घर से संपर्क स्थापित करके छोटा बिजलीघर भी प्रकाशमान हो उठता है।

मनुष्य एक छोटी गायत्री है, सूर्य एक विराट गायत्री। छोटी गायत्री को जब विराट गायत्री के साथ जोड़ देते हैं तो वह भी वैसी ही शक्ति और सम्पन्नता अनुभव करने लगती है, जैसे धनवान पिता का पुत्र पास में कुछ न होने पर भी अपने पिता की तरह ही धन का अभिमान और कुछ भी क्रय कर सकने का विश्वास कर सकता है। अर्थात् गायत्री के विराट स्वरूप को पा जाने पर मनुष्य भी उतनी ही क्षमता वाला हो जाता है, जितनी सुर्य भगवान की, इसे ही शक्ति अथवा सिद्धि कहते हैं।

यह जानना आवश्यक है कि क्या सचमुच सूर्य मनुष्य की तह त्रिक शक्ति वाला विराट पुरुष- जिसमें मनुष्य की तरह सम्वेदनशील हो- हो सकता है?

सूर्य रश्मियों के वर्णन में वैज्ञानिक यह कहते हैं कि यह तीन रगों का (सात रंग इन तीन रंगों के मिश्रण से बनते हैं, मूल रंग तीन ही हैं ) सम्मिश्रण है। स्पेक्ट्रोमीटर के द्वारा इन रंगों को- अलग-अलग भी कर दिखाया जा सकता है। यदि मनुष्य और सूर्य में ऐसा कुछ साम्य है तो मनुष्य शरीर में भी इन रंगों को परिलक्षित होना चाहिये पर यहाँ तो रक्त का रंग भी लाल है। फिर साम्य कहाँ हुआ।

विज्ञान के विद्यार्थी जानते होंगे कि रक्त का रंग लाल नहीं है, कई तत्वों के सम्मिश्रण से वह लाल दिखाई देता है। अन्यथा रक्त के जीवाणु विशुद्ध पीले रंग के होते हैं। आजकल पूर्ण मृत्यु का पता लगाने के लिये त्वचा में ‘यूरेनाइन’ नाम का इन्जेक्शन दिया जाता है, यदि मनुष्य की मृत्यु नहीं हुई और रक्त संचार हो रहा होता है तो त्वचा का रंग पीला और हरा हो जाता है, नीला रंग, लाल रंग की गहराई के कारण दृश्य नहीं हो पाता अन्यथा इस विधि से शरीर की इस त्रिक शक्ति का स्पष्ट विश्लेषण हो जाता है। मृत देह में इन्जेक्शन का कोई प्रभाव नहीं होता।

प्रत्यक्ष में निर्विकार दिखाई देने वाले सूर्य के सम्बन्ध में सर्वप्रथम इन्गोस्स्टाड के पादरी क्रिस्टॉफ शाइनर ने एक संदेश अपने अध्यक्ष पादरी को दिया था कि उसमें काले-काले धब्बे विद्यमान हैं। लेकिन अरस्तू के ग्रन्थ में ऐसा कुछ नहीं था, इसलिये बेचारे शाइनर को कड़ी डाँट-फटकार सुननी पड़ी किन्तु सौभाग्य से उन्हीं दिनों गैलीलियो ने दूरदर्शक यन्त्र की सहायता से इस बात की पुष्टि कर दी कि सूर्य में सचमुच धब्बे हैं और यह धब्बे हलचल करते रहते हैं। कभी फूटकर फेल जाते हैं, कभी एक धब्बा लुप्त हो जाता है और उसके पास का धब्बा कोंधने लगता है। कई बार वे कई भागों में बँट जाते हैं और फिर कई-कई मिलकर एक हो जाते हैं। पहले ही इन हलचलों का कारण वैज्ञानिक नहीं जान सके थे, पर धीरे-धीरे पता चला कि यह सब तपी हुई गैसों के वृहत् बवण्डर हैं। और वे बिल्कुल मनुष्य की सी इच्छा शक्ति से मेल खाते हैं।

सूर्य की इस दमक के साथ जो प्रकाश फूटता है, उसे ‘फ्लेयर’ कहा जाता है और उस समय जो प्रकाश के सर्प से लहर लेते हुए दौड़ते हैं, वह ‘फिलामेन्ट ’ कहलाते हैं। अब इनके सम्बन्ध में कई आश्चर्यजनक तथ्य सामने आने से वैज्ञानिक यह मानने को सहमत हो रहे हैं कि सूर्य के अन्दर सम्वेदना व्याप्त है, अर्थात् यह हलचल, विकलता, क्षोभ, प्रसन्नता और क्रोध जैसी भावनाओं के स्थूल स्पन्दन हैं और जिस तरह विचारों का प्रभाव मनुष्य के शरीर पर पड़ता है, उसी प्रकार यह विकलतायें भी प्रकृति में भारी हलचल उत्पन्न करती रहती हैं। विकलता की स्थिति में सूर्य विशेष प्रकार के सूक्ष्म कण और किरणों के अम्बरक छोड़ता है, जो बड़े वेग से चलकर करोड़ों मील तक अपना प्रभाव डालते हैं, यहाँ तक कि चुम्बकीय क्षेत्र को भी मथ डालते हैं। ऐसे समय कुतुबनुमा की सुई तक काँपने लगती है।

इनका प्रभाव पृथ्वी पर पड़ता है तो उससे हिमपात, ओले, अनावृष्टि, वृक्षों की वृद्धि, बाढ़, वर्षा, झंझावात, ताप और शीत की मात्रा में तीव्रता से परिवर्तन आदि दृश्य उपस्थित होते हैं, अमेरिका के अनेक अर्थ-शास्त्रियों ने तो यहाँ तक माना है कि अर्थ जगत जैसे मोटर, शराब आदि के कारखाने, नये भवनों के निर्माण में भी इनकी प्रतिक्रिया पड़ती है। यह हलचल 11 वर्ष की एक सीमा में बँधी पाई गई है। पिछले कुछ वर्षों में सन 1928, 1936, 1947, 1959 में इनकी प्रबलता के कारण पृथ्वी पर व्यापक परिवर्तन सन 1938 में अत्यन्त तेज ध्रुव प्रकाश चमका। वह अफ्रीका और क्रीमिया में दिखाई दिया था, इसके कुछ दिन बाद ही वहाँ भयंकर चुम्बकीय आँधी आई, जिससे सारी संचार व्यवस्था गड़बड़ पड़ गई। 22 फरवरी 1956 को हुये सौर-विस्फोट के कारण एशिया, आस्ट्रेलिया और इंग्लैंड का रेडियो सम्बन्ध टूट गया था। 28 जून 1957 को मास्को की क्रास्नाया पाखा वेधशाला ने भी ऐसा विस्फोट देखा और उसकी सूचना “विश्व सूचना ऐजेन्सी’’ को भेजी। उसके ठीक 33 घंटे बाद योरोप में तेज आँधी आई। रूस के जल विज्ञान सम्बन्धी इंजीनियर प्रो. बी. आपालोव तथा ए. फ्रोलावा के अनुसार 1966 में आई, सभी प्राकृतिक विपदाओं का कारण भी सूर्य ही था। इसी वर्ष भारत, अमेरिका, चीन, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, इटली, पूर्व जर्मनी, चेकोस्लोवाकिया, बुल्गारिया, मिश्र, आदि अनेक देशों में बाढ़ें आईं। बुल्गारिया में तो 20-30 सेंटीमीटर तक ओले पड़े।

1947 में भारत की स्वतन्त्रता का कारण भी अब ज्योतिर्विद् सूर्य को ही मानते हैं। कुछ महीनों पूर्व वैज्ञानिकों ने फिर से घोषणा की है कि सूर्य से एक प्रकार की आँधी चल पड़ी है और वहाँ इस समय तेजी से विकलतायें परिलक्षित हो रही हैं। उनका पृथ्वी पर तेज प्रभाव पड़ेगा। प्राकृतिक हलचलें तीव्र होंगी। वायु-दुर्घटनाओं की संख्या बढ़ेगी मानवीय संकट बढ़ेंगे। अमेरिका का उड्डयन और अन्तरिक्ष प्रशासन इन सम्भावनाओं की तेजी से खोज कर रहा है और उससे बड़ी महत्त्वपूर्ण जानकारियाँ मिलने की संभावना है।

हम भारतीय सूर्यदेव की इन हलचलों को उनकी मनोमय क्राँति मानते हैं। और हमारा यह विश्वास है कि उससे विश्व के भूगोल में कितने ही बड़े और भयंकर परिवर्तन हों, पर भारतीय संस्कृति को उससे संरक्षण मिलेगा। भारतीय संस्कृति के अभ्युत्थान के मूल में उन विराट पुरुष की ही इच्छा काम कर रही है, चाहे इसे कोई वैज्ञानिक ढंग से मानले, चाहे श्रद्धापूर्वक स्वीकार करले।

सूर्यदेव का यह मनोमय विश्लेषण ज्यादा वजनदार है, वैसे उनके विराट पुरुष होने के शेष दो प्राण-शक्ति और उनकी पंच-भौतिक प्रकृति का गायत्री स्वरूप अभी और शेष है।

शरीर में जितनी धातुयें रासायनिक तत्व आदि हैं, वह सब सूर्य में भी हैं। आपको पता होगा, गन्ना जिस खेत में खड़ा होता है, उसके आस-पास के क्षेत्र में भी शक्कर की अधिक से अधिक 5-10 सेर से अधिक मात्रा नहीं होती, किन्तु उसी खेत के गन्नों से मनों शक्कर प्राप्त हो जाती है। इतनी सारी शक्कर गन्ने का पौधा सूर्य की धूप से ग्रहण करता है, अर्थात् शरीर के जितने भी निर्माणकारी तत्व हैं, वह सब सूर्य में हैं। सूर्य चिकित्सा और प्राण-चिकित्सा नामक दो पुस्तकें ‘अखंड ज्योति संस्थान’ से पहले छपी थीं, स्वास्थ्य और शरीर साधना के यह दोनों लाभ गायत्री उपासना से मिलते हैं, यह निश्चित हैं यहाँ तो केवल यह बताना था कि मनुष्य की तरह भी प्राण, पंच-भौतिक प्रकृति और मनोमय क्रियाशीलता तीनों ही अंग सूर्यदेव में विद्यमान हैं, हम उनको आत्मा के रूप में ‘गायत्री’ के रूप में ध्यान और धारण करते हैं, चाहें तो उनकी कल्पना एक विराट पुरुष के रूप में भी कर सकते हैं, पर निश्चित है कि जिस तरह मनुष्य का एक छोटा-सा ‘अहंभाव’ है, सूर्य का भी वैसा अहंभाव सम्भव है। और जस तरह हम किसी तेजस्वी महात्मा के वरदान द्वारा प्राण प्राप्त कर आरोग्य-लाभ, पुत्र-लाभ, धन-लाभ, बुद्धिलाभ आदि प्राप्त कर सकते हैं, इन प्राण पुरुष गायत्री के तत्व देवता- सविता से और अधिक विश्वासपूर्वक ऐसे आशीर्वाद और स्नेह प्राप्त कर सकते हैं, शर्त इतनी भर है कि यदि हम उनको अपनी प्रगाढ़ श्रद्धा और निष्ठा से उसी तरह प्रभावित कर सकें, जिस तरह पुत्र अपने पिता को प्रसन्न करके स्नेह के साथ उनकी अन्य भौतिक वस्तुओं का भी अधिकार पा लेता है।

अभी यह रहस्य और विस्तृत होने वाले हैं। अभी वैज्ञानिकों को ध्यान प्रणाली का पूरा-पूरा ज्ञान नहीं है, जिस दिन इस विद्या की वैज्ञानिक जानकारी देनी सम्भव हो जायेगी, उस दिन उपासना, श्रद्धा और भक्ति आदि रहस्य का भी प्रकट हो जायेगा और सिद्धियों, सामर्थ्यों की बात भी सत्य साबित हो जायेगी।

“चमत्कारिक अनुभूतियाँ’’ नामक पुस्तक में सन्तराम बी. ए. ने अध्यात्म जगत के अनेक चमत्कारों का वर्णन किया है, पहले अध्याय में एक साधु के मानसिक चमत्कारों का वर्णन है, जो रस्सी को फेंकता है और वह ऊपर आकाश तक जाती दिखाई देती है, वह किसी के भी मन की बात जान लेता है, इसमें यह बताने का प्रयत्न किया गया कि एक व्यक्ति के मन में अपने मन की शक्ति को घोलकर उसकी तमाम आन्तरिक बातें तक जानी जा सकती हैं।

सूर्य भगवान का दृश्य और क्रिया क्षेत्र बहुत व्यापक पृथ्वी ही नहीं अनेक ग्रह-नक्षत्रों तक व्याप्त है। मनुष्य की शक्ति उसकी आँखें ऐसी नहीं हैं कि वह उतने व्यापक क्षेत्र को देख सके किन्तु जब वह अपना सम्बन्ध सूर्यदेव के साथ जोड़ लेता है (ध्यान-विज्ञान के द्वारा यह स्थिति काफी दिन में आ पाती हैं) तो वह भी उसी तरह न केवल पृथ्वी की हलचलों और परिवर्तनों का जानकार हो जाता है वरन् उसे ब्रह्मांडों के भी रहस्य ज्ञात होने लगते हैं, यही नहीं वह एक अंश तक उन परिवर्तनों के साथ अपनी सम्मति भी जोड़कर उन्हें कुछ कम या ज्यादा कर सकता है। अर्थात् इस तरह के कोई आध्यात्मिक पुरुष बड़ी-बड़ी दैवी हलचलों का ज्ञान ही नहीं प्राप्त करते, उन्हें कम या बिल्कुल ही समाप्त भी कर सकते हैं।

हजारों वर्ष पूर्व प्राण विद्या के आचार्यों ने कहा था-

तेजसा वै गायत्री प्रथमं त्रिरात्रं दाधार पदैद्वितीय- मक्षरैरतृतीयम्। तां. 10।5।3

तेजो वै गायत्री। गो. उ. 5।3

ज्योतिर्वै गायत्री छन्दसाम्। तां.13।7।12

अर्थात् गायत्री एक प्रकार का तेज है, जो प्रकाश और ऊष्मा के रूप में विश्व का मूल है। सूर्य गायत्री तेज का सबसे बड़ा भण्डार है और विश्व के निर्माण में सबसे बड़ा कारण भी।

किसी प्रकार गायत्री के मनुष्य जीवन में प्रादुर्भाव के स्वरूप को व्यक्त करते हुए शास्त्रकार ने बताया कि “मनः एव सविता’’ अर्थात् मन ही सविता है। तात्पर्य यह है कि जब मन और “सूर्यदेव’’ का तादात्म्य करते हैं (जप और सूर्य तेजमध्यस्था गायत्री का ध्यान करते हैं) तो प्राणायतन होता है अर्थात् सूर्यदेव की भर्गशक्ति मनुष्य के अन्तःकरण में प्रवेश करती है और प्रकृति से सामंजस्य स्थापित करती है, अर्थात् यदि प्रकृति कहीं दूषित हो रही है (कोई रोग के रूप में ) तो उसे ठीक करती है। इसी का नाम असत् संस्कारों का निष्कासन और सत्संस्कारों का विकास होता है। जब तादात्म्य की स्थिति ऐसी हो जाये कि मन का ध्यान करते हुए मन की अग्नि और सूर्य रूप दोनों एक हो जायें। कोई और विलम की कल्पना हो ही नहीं तो उसे ‘गायत्री सिद्धि’ कहेंगे। तब गायत्री की सम्पूर्ण अनुभूति और शक्ति का स्वामी वह मनुष्य होगा और उन क्षमताओं से प्रकृति में परिवर्तनों की शक्ति से विभूषित होगा, जिनकी ऊपर व्याख्या की गई है।

शास्त्रकार ने जो कहा था कि एक गायत्री मनुष्य है और दूसरी त्रिधा शक्ति सूर्य। दोनों में विलक्षण साम्य है। यह विषय अब विज्ञान भी सिद्ध करने लगा है, इसका थोड़ा-सा अनुमान इन पंक्तियों में होगा। विस्तृत ज्ञान तो तब हो, जब लोग गायत्री तत्व का भी विस्तृत साधन और अवगाहन करें। यह वह विद्या है, जो शरीर बुद्धि और अन्तःकरण तीनों में हस्तक्षेप रखने के कारण शरीर-बल, साँसारिक-बल और आत्म-बल देकर अपने उपासक का भारी हित सम्पादित कर सकती है, करती भी है।


अपनों से अपनी बात-

हम अपना स्वरूप समझें और कर्तव्य सम्भालें

अखण्ड-ज्योति परिवार के हर सदस्य को अपना स्वरूप और स्थान जानना चाहिये और तदनुसार अपनी विचार शैली एवं कार्य पद्धति का निर्माण करना चाहिये।

जिन घड़ियों में हम लोग जीवन-यापन कर रहे हैं, वे इतिहास की असाधारण घड़ियां हैं। इन दिनों एक ऐसे नये युग के सृजन का सूत्रपात हो रहा है- जो मानव समाज को सामूहिक आत्म-हत्या करने से बचाकर चिर-स्थायी सुख-शांति की सम्भावनायें उत्पन्न कर सकेगा और इस धरती पर स्वर्गीय वातावरण का निर्माण हो सकेगा।

प्रसव पीड़ा के समान यह घड़ियां बड़े उद्वेग तथा आवेश से भरी हुई भी है। इन्हीं दिनों अनाचार अपने पूरे जोर पर है। जिस तरह बुझता हुआ दीपक पूरे जोर से जलता है- प्रभात उगने से पूर्व की घड़ियों में रात भर में सबसे अधिक घना अँधेरा होता है- मरते समय लम्बी हिचकी आती है, उसी तरह दुर्बुद्धि और दुष्कर्मों का दौर भी अपने अन्तिम चरण पर इन्हीं दिनों है। अतएव साज-सम्भाल की आवश्यकता भी सबसे अधिक इन्हीं घड़ियों में है। महत्वपूर्ण उत्तरदायित्वों से भरे क्षणों में पूरी सतर्कता रखनी पड़ती है। ऐसे समय की चूक का प्रतिफल चिर-कालीन पश्चाताप के रूप में भुगतना पड़ता है। ऐसे ऐतिहासिक अवसर हजारों वर्षों बाद कभी-कभी ही आते हैं। जो उनका ठीक उपयोग कर लेता है, वह अपना जीवन धन्य बनाता है और संसार की महती सेवा, सहृदयता करने का पुण्य-लाभ करते हुए यशस्वी बनाता है।

वर्तमानकाल की विषम विभीषिकायें ऐसी हैं कि यदि उनसे सतर्क न राह जाय, उनका प्रतिरोध न किया जाय तो ऐसे दुष्परिणाम हो सकते हैं, जिनके कारण मानव-सभ्यता एवं अस्तित्व खतरे में पड़ सकते हैं।

आधुनिक भौतिकवादी विज्ञान ने मानवीय उत्कृष्टता की आस्थाओं पर करारी चोट की है। नव-विकसित बुद्धिवाद ने नैतिक मान्यताओं की जड़े हिलादीं हैं। “मनुष्य को बोलने-सोचने की विशेषताओं से युक्त एक ऐसा नाशवान जड़पदार्थ मात्र प्रतिपादित किया गया है, जिसकी न आत्मा है न हस्ती। और जिसे न कर्मफल भोगना है और न ईश्वर को उत्तर देना है। वह स्वच्छन्द आचरण करने में स्वतन्त्र है। यदि राज-दण्ड से बचा जा सके तो फिर और किसी प्रकार का दण्ड किसी को अपने दुष्कर्मों का भुगतान नहीं है, स्वच्छंद कामुकता को रोकने से शारीरिक मानसिक हानि होती है। मनुष्य स्वभावतः पाशविक वृत्तियों से बना है, उसे प्रकृति की प्रेरणा के आधार पर स्वच्छंद आचरण करने चाहिये। सामाजिक एवं धार्मिक मान्यतायें व्यक्ति के लिये बन्धन मात्र हैं। उन्हें तोड़कर स्वच्छंद जीवन बिताना चाहिये।” यह प्रतिपादन हैं, भौतिकवादी तत्वज्ञान के। लोग इन्हीं आस्थाओं को तेजी से अपना रहे हैं फलस्वरूप पशुता की प्रबलता होती जा रही है, मानव आचरणों में जिस कदर अनैतिकता और छलछद्म का समावेश होता जा रहा है और उसकी प्रतिक्रिया बढ़ते हुए अपराधों, क्लेश, कलहों और शोक-संतापों के रूप में सब ओर दिख रहे हैं। व्यक्ति और समाज में बढ़ती हुई उद्विग्नता, रुग्णता, निराशा, वेदना एवं व्यथा इस तथ्य के प्रत्यक्ष प्रमाण बनी हुई है।

विज्ञान के आविष्कार हमें अन्ध, अपंग बनाये दे रहे हैं। मशीनों पर हम इतने निर्भर होते चले जा रहे हैं कि एक दिन के लिये यदि बिजली उत्पादन की व्यवस्था नष्ट हो जाय तो बड़े शहर की आधी जनता भूख-प्यास और गन्दगी से पीड़ित होकर मर जायेगी। वाहनों की निर्भरता ने पैरों को अपंग कर दिया। मनुष्य जीवन अब स्वयं एक मशीनी प्रक्रिया बनता जा रहा है। संहारक आविष्कारों ने- मृत्युकिरण, अणुशक्ति, उद्जन बम, राकेट, विष-वायु आदि अगणित ऐसे साधन मनुष्य के हाथ में दे दिये हैं, जिनके द्वारा एक पागल आदमी इस धरती के तथा इसके समस्त निर्माणों को क्षण भर में भस्मसात् कर सकता है। युद्धों की चिनगारियाँ हर महाद्वीप में उड़ रही हैं, सर्वत्र बिछी हुई बारूद कभी भी ऐसा विस्फोट कर है, जिसका प्रतिफल सामूहिक आत्म-हत्या एवं समग्र सर्वनाश के रूप में देखा जा सके।

नई भौतिकवादी सभ्यता ने बुद्धिवाद एवं विज्ञान के आधार पर यों अनेक सुख-सुविधायें हमें प्रदान की हैं, पर इन दो विभीषिकाओं द्वारा दिया हुआ उसका अभिशाप भी कम नहीं है। इससे मानवता त्राहि-त्राहि कर उठी है। इस युग के इन दो महासंकटों का सामना उन लोगों के लिये ही सम्भव है, जिनके पास बुद्धि और विज्ञान दोनों की तुलना में अधिक सामर्थ्य, महाबल, अध्यात्म मौजूद है। अखण्ड-ज्योति परिवार थोड़ी-थोड़ी आत्म-बल, सम्पन्न, प्रबुद्ध, सजग एवं संस्कारवान आत्माओं का संगठन है। छोटे-छोटे बिन्दु-कण मिलकर एक बड़ा जलाशय बन जाता है। छोटे-छोटे सिक्के बड़ी संख्या में एकत्रित हो जाँय तो विपुल धन-राशि के रूप में परिणत हो सकते हैं। अखण्ड-ज्योति परिवार के सुसंस्कारों, परिजनों की संगठित शक्ति एक महान सामर्थ्य-सत्ता बन गई है। प्राचीनकाल में ऋषियों के बूंद-बूंद एकत्रित रक्त घट द्वारा रावण-राज्य समाप्त करने वाली सीता का जन्म और देवताओं की एकत्रित थोड़ी-थोड़ी शक्ति द्वारा विनिर्मित असुर निकन्दिनी महाकाली का अवतरण यही बताता है कि दैवी तत्व के छुट-पुट बिखरे अंश मिलकर एक बड़ी सत्ता रूप धारण कर सकते हैं।

अखण्ड-ज्योति परिवार एक ऐसा ही प्रयास है। बड़े प्रयत्नपूर्वक इस माला में हमने ढूँढ़-ढूँढ़कर मूल्यवान रत्नों को इकट्ठा किया और पिरोया है। इस सर्व-शक्ति द्वारा बुद्धि और विज्ञान के दुरुपयोग द्वारा उत्पन्न विकृतियों का सामना करने के लिये एक मजबूत मोर्चा लगाया जा सकता था, सो लगाया भी गया है।

दूसरा बड़ा काम अखण्ड-ज्योति परिवार की संगठित शक्ति के द्वारा विश्व के नव-निर्माण की संभावनाओं को मूर्तिमान स्वरूप प्रदान करना है। अगला समय मंगलमयी सम्भावनायें लेकर अवतरित होने जा रहा है। उसमें एक विश्व, एक राष्ट्र, एक धर्म, एक संस्कृति, एक नीति, एक परम्परा, एक अर्थतन्त्र एवं सर्वांगीण एकता के आधार पर व्यक्ति का मन-स्तर और समाज का ढाँचा नये सिरे से खड़ा किया जायेगा। आज की सड़ी-गली संकीर्णतायें अपनी अनुपयोगिता के कारण अपनी मौत मर जायेंगी। जिस वैयक्तिक अनाचार और सामाजिक भ्रष्टाचार का सर्वत्र बोल-बाला है, कल उनके लिये कोई आधार शेष न रह जायेगा।

मनुष्य और मनुष्य के बीच असमानता के जितने भी आर्थिक, धार्मिक, सामाजिक एवं बौद्धिक कारण हैं, उनकी जड़ें कट जायेंगी और परिस्थितियाँ ऐसी बन जायेंगी, जिसमें किसी को अन्याय की शिकायत न करनी पड़े। तब अपराध करने, परस्पर टकराने और असामाजिक बनने की कोई गुंजाइश न रहेगी। जो मर्यादायें तोड़ेगा, वह संघशक्ति द्वारा इस तरह कुचल दिया जायेगा कि उसका अस्तित्व ही दुबारा दृष्टिगोचर नहीं हो सकेगा।

यह स्वप्न नहीं एक सुनिश्चित सचाई है। आगामी कल बहुत ही शानदार, सुनहरा और स्वर्गीय सुख-शांति से भरा-पूरा आ रहा है, उसे पाकर मानवता धन्य हो उठेगी।

पर यह महान परिवर्तन अनायास ही न हो जायेगा। इसके लिये समुद्र-मंथन जैसा, देवासुर संग्राम जैसा, गंगावतरण जैसा, लंका विजय जैसा, महाभारत जैसा, गोवर्धन उठाने जैसा- महान प्रयत्न एवं पुरुषार्थ करना होगा। सृष्टि के महान परिवर्तन अनायास ही नहीं हो जाते। उनकी एक अति विस्तृत भूमिका होती है। और उस भूमिका का अपना अमर इतिहास होता है, जिसकी चर्चा कहते-सुनते रहकर लोग युग−युग तक आदर्शवादिता की दिशा में बढ़ते चलने का प्रकाश प्राप्त करते रहते हैं। अगली घड़िया ऐसी ही आने वाली हैं, जिनमें प्रबुद्ध, सजग एवं सुसंस्कारी आत्माओं को महत्वपूर्ण भूमिकायें प्रस्तुत करनी होंगी। लेखनी, वाणी मात्र से नहीं, अपने उज्ज्वल चरित्र एवं त्याग, बलिदान द्वारा ऊँची आत्मायें ऐसा वातावरण प्रस्तुत करेंगी, जिससे प्रभावित होकर सामान्य स्तर के लोग भी कुछ करने का प्रोत्साहन प्राप्त कर सकें और इस नव-निर्माण की विशाल सेना में सम्मिलित कर उस महान प्रक्रिया को सरल बनाने में योगदान दे सकें।

अखण्ड-ज्योति परिवार का संगठन हमारे आजीवन प्रयत्न का फल है। सूक्ष्म दृष्टि से ढूँढ़-ढूँढ़कर हमने देश भर में से संस्कारवान् जागृत आत्माओं को प्रयत्नपूर्वक एकत्रित किया है। इसमें बहुत समय लगा है और बहुत श्रम। परिवार के अधिकांश सदस्य पूर्वजन्मों की भारी आध्यात्मिक सम्पदा से सम्पन्न हैं। उनका वर्तमान स्वरूप सामान्य भले ही दिखता हो पर उनके अंतरंग में वे तत्व विद्यमान हैं कि थोड़े से प्रयत्न से उन्हें जगाया, बढ़ाया और समुन्नत स्थिति तक पहुँचाया जा सकता है। वाल्मीकि, अजामिल, अंगुलिमाल, सूरदास, तुलसीदास जैसे हेय जीवन बिताने वाले थोड़ा-सा अवसर मिलने पर देखते-देखते उच्च भूमिका में इसलिये जागृत हो उठे थे, कि उनके पास पूर्वजन्मों की संचित सम्पत्ति बहुत थी। फिर जिनके हेय जीवन नहीं है- केवल मूर्छित मात्र है, उन्हें सजग और समुन्नत बनाया जा सकना कुछ अधिक कठिन नहीं है।

जिस दिन व्यक्ति की अन्तःभूमिका यह स्वीकार करले कि- मानव जीवन का उद्देश्य पेट पालने और बच्चे उगाने से कुछ आगे बढ़कर भी है- यह अलभ्य अवसर किन्हीं महान प्रयोजन के लिये भगवान ने दिया है- और थोड़ा दुस्साहस कर अपने स्वतन्त्र विवेक का सहारा लेकर कोई भी व्यक्ति अपनी विचारणा और प्रक्रिया को बदलने में वैसा ही समर्थ हो सकता है, जैसे कि ऐतिहासिक महापुरुष समर्थ हुए हैं। इतनी-सी बात यदि गले उतर जाय तो आज बिल्कुल ही गया-गुजरा दीखने वाला व्यक्ति कल अपनी रीति-नीति में आमूल-चूल परिवर्तन कर सकता है और जमीन पर रेंगने वाला, आकाश में उड़ने लग सकता है। संस्कारवान व्यक्तियों के लिये यह आत्म-परिवर्तन अति सरल होता है, कोई छोटी-सी चोट उनकी दिशा में आश्चर्यजनक मोड़ प्रस्तुत कर सकता है।

हमें विश्वास है कि अखण्ड-ज्योति परिवार के अधिकांश सदस्यों में ऐसा मोड़ आकर रहेगा। उन्हें सामान्य से असामान्य बनने का अवसर मिलेगा। जानवरों की तरह निरुद्देश्य जीवन काट डालना किसी प्रबुद्ध व्यक्ति के लिये लज्जा एवं कलंक भरी बात है। जागृत व्यक्ति ऐसा जीवन नहीं जी सकता। वे प्रकाश पाने और प्रकाश देने के लिये अवतरित होते हैं। उनकी आत्मा निरन्तर उसके लिये नोंचती, खोंसती, पुकारती और दबाती रहती है। आखिर वे कब तक उस ईश्वरीय वाणी की- आत्मिक पुकार की अवहेलना कर सकते हैं। उन्हें एक दिन सजग होना पड़ता है और अज्ञान एवं दारिद्रय भरी परिस्थिति को साँप की केंचुली की तरह उतार फेंकना पड़ता है।

शरीर निर्वाह के साधन, पशु-पक्षियों और कीट-पतंगों को भी उपलब्ध हैं, फिर मनुष्य को उनके लिये आशंका एवं चिंता क्यों करनी चाहिये? यह अनिवार्य निर्वाह साधन महंगे वाले न सही, सस्ते वाले सही, हरएक को निश्चित रूप से मिलते हैं। फिर निकृष्ट जीवन किसलिये जिया जाय? माया, मोह से ग्रसित घृणित रीति-नीति को अपनाकर अनन्त पश्चाताप का भागी क्यों बना जाय?

उपरोक्त स्तर की विचारणा जिसके भी अंतरंग में उठेगी उसे अपना जीवन क्रम उत्कृष्ट आदर्शों पर आधारित बनाने के लिये तत्परता प्रकट करनी पड़ेगी। अपने परिवार को अब इसी स्थिति में होकर गुजरना है। स्पष्टतः अखण्ड-ज्योती कोई अखबार या मनोरंजन सामग्री नहीं जिसे वक्त काटने या मन बहलाने के लिये कोई मँगाता पढ़ता हो। किसी दूसरी मासिक पत्रिका से उसकी तुलना भी नहीं की जा सकती, क्योंकि अखबारों का जो ढर्रा और ढाँचा होता है, वह इसका है ही नहीं। हम अपनी अन्तःप्रेरणा और आन्तरिक पुकार उन परिजनों तक पहुँचाने के लिये प्रयत्नशील रहते हैं, जिनके साथ हमारा अनेक जन्मों से घनिष्ठ सम्बन्ध, संपर्क रहा है, और अब जिन्हें इस समय की महान जिम्मेदारी उठाने के लिये अवतरण लेना पड़ा है।

इन्हें शिश्नोदर परायण पेट और प्रजनन के जाल-जंजाल तक सीमित नहीं रहने दिया जा सकता, इन प्रबुद्ध आत्माओं को जगाया ही जाना था, ताकि वे इस महत्वपूर्ण पर्व पर अपने आध्यात्मिक कर्त्तव्य को ठीक तरह पूरा करने के लिये तत्पर हों, जागरण वेला की प्रभात-कालीन शंख ध्वनि का नाम अखण्ड-ज्योति है। उसका हर एक अंक अपने पाठकों के लिये एक प्रेरणा, प्रकाश एवं उद्बोधन लेकर पहुँचता है। जिनकी जान निकल गई- जो अपना वर्चस्व खो बैठे- उनकी बात जाने दीजिये अन्यथा अधिकांश परिजन भावनापूर्वक इस प्रकाश को ग्रहण करते हैं और उनींदी आँखें मलने और खुमारी उतारने का प्रयत्न भी करते हैं। जो जग पड़े और शैया त्याग कर कर्म क्षेत्र में आ गये, वे एक से एक बढ़कर उत्कृष्टता एवं आदर्शवादिता से भरे क्रिया-कलापों का परिचय दे रहे हैं।

अब शिथिलता, उपेक्षा, आलस्य और अवसाद का दौर समाप्त कर देना चाहिये। जिन्हें जगना है, उन्हें जग ही जाना चाहिये। जिन्हें आत्म विस्मरण ने आ घेरा है, उन्हें अपना स्वरूप, लक्ष्य एवं कर्त्तव्य समझने के लिये अपने को झकझोरना चाहिये और दर्पण में देखना चाहिये कि आखिर हम हैं क्या? और आये किसलिये? इन प्रश्नों का उत्तर वह मनोभूमि एवं परिस्थिति नहीं ही हो सकती, जिसमें पड़े रहकर इन दिनों समय गुजारा जा रहा है। यह मोहभ्रांत-अज्ञानांधकार में भटकता हुआ जीवन क्रम भी कोई हर्षोल्लास भरा थोड़े ही है, जिसके आकर्षण से इसी स्थिति को बनाये रहा जाय। उत्कृष्टता और जागृति से भरे जीवन में मोह-जंजाल की भ्राँत माया का विस्तार भले ही न हो पर उनमें अपेक्षाकृत अधिक सुविधा है और अधिक शांति, अधिक संतोष है और अधिक उल्लास। फिर अपने को बदल डालने में जिस साहस और विवेक की कमी है, उसे एकत्रित करके एक प्रभावी परिवर्तन क्यों न किया जाय?

अपना भावनात्मक परिवर्तन लक्ष्य, उत्तरदायित्व और कर्तव्य का स्मरण दिलायेगा और कुछ ऐसा करने की प्रेरणा देगा जो अब तक नहीं किया गया है। इस परिवर्तन की वेला आ पहुँची। युग परिवर्तन का महान प्रयोजन प्रबुद्ध आत्माओं के आत्म-परिवर्तन से आरम्भ होगा। हम बदलेंगे तो जमाना बदलेगा। प्रकाश अपने भीतर पैदा होगा और फिर वह सर्वत्र फैल जायेगा। अज्ञानान्धकार की विभीषिका इसी क्रम से समाप्त होगी।

जिस मशाल को हम पिछले 45 वर्ष से जला रहे हैं, अब उसे दूसरे उत्तरदायी- उत्तराधिकारियों के हाथ में सौंपना होगा। इसलिये उनका आह्वान किया जा रहा है, जिनमें जीवन है। उन्हें जानना चाहिये कि यह सामान्य समय नहीं है- इसमें प्रबुद्ध आत्माओं को सामान्य स्तर का जीवन नहीं जीना है। कुछ अतिरिक्त कर्त्तव्य और उत्तरदायित्व उनके कन्धे पर हैं, जिनकी यदि उपेक्षा की जाती रही तो आत्म-प्रताड़ना की इतनी बड़ी वेदना उनके अंतरंग में उठती रहेगी कि वह आत्म-ग्लानि का कष्ट शारीरिक विषम वेदनाओं से भी अधिक भारी पड़ेगा और उसे सहन करना कठिन हो जायेगा। धन, स्वास्थ्य, यश, पद आदि की क्षति आसानी से पूरी हो सकती है पर कर्त्तव्य की उपेक्षा करते हुए, जीवन का अमूल्य अवसर गँवा बैठने पर- जब समय निकल जाता है, तब अपनी चूक पर ऐसा पश्चाताप होता है, जिसकी व्यथा सहन कर सकना कठिन हो जाता है।

अपने परिवार में किसी को वेदना सहन नहीं करनी पड़े यही उत्तम है। हम जागृत, संस्कारों और विशेष लक्ष्य के लिये भेजे हुए- अवतरित हुए- नये युग के अग्रदूत हैं। हमें अपना स्वरूप समझना चाहिये, मार्ग समझना चाहिये और समय रहते वह करना चाहिये, जो करना उचित और आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य भी है।

इस संध्या बेला में हमें आलस्य और प्रमाद में अपनी चेतना को मूर्छित नहीं पड़े रहने देना चाहिये। शरीर, परिवार, अर्थ-उपार्जन आदि के उत्तरदायित्वों का निर्वाह जिस प्रकार करते हैं- उनके लिये जिस प्रकार सोचते और करते हैं, उसी प्रकार हमें अपने चिरस्थायी और सामयिक आध्यात्मिक कर्त्तव्यों की पूर्ति के लिये भी कुछ करते और सोचते रहना चाहिये। उस ओर से सर्वथा मुख मोड़ लेना, नितान्त उपेक्षा बरतना उचित नहीं। जिस प्रकार तीन बच्चे होने के बाद चौथा बच्चा और उत्पन्न हो जाय तो उसके लिये पिछले तीन बच्चो की तरह ही चिन्ता, देख-भाल एवं भाग-दौड़ करनी पड़ती है। उसी तरह हमें अपने शारीरिक, साँसारिक कर्त्तव्यों की तरह ही आध्यात्मिक कर्त्तव्यों के लिये सजग रहना चाहिये। उनके भी समक्ष, श्रम, मनोयोग, धन आदि का एक उचित अंश निकालना चाहिये। अन्यथा साँसारिक कर्त्तव्य न करने की तुलना में- इन आत्मिक जिम्मेदारियों की उपेक्षा और भी अधिक कष्टकर एवं हानिप्रद सिद्ध होगी।

अखण्ड-ज्योति परिवार के परिजनों को युग-निर्माण की पुण्य प्रक्रिया में अग्रिम मोर्चा सम्भालना है। उन्हें अपने को- अपने साथी सहचरों को सजग, तत्पर, संगठित एवं विस्तृत करना है। कल तक हम निरुत्साहित थे, आज हमें उत्साहित, स्फूर्तिवान और और प्रयत्नशील बनना है। सबसे पहला काम अपने को, अपने परिवार को, संगठित, सक्रिय एवं विस्तृत बनाना है। यों हम समय-समय पर उद्बोधन करते रहे हैं, पर अब उतने से ही काम न चलेगा।

हर प्रबुद्ध परिजन को अपने दूसरे साथियों में उल्लास और उत्साह पैदा करना है। इसलिये जहाँ जितने अखण्ड-ज्योति परिजन हैं, वहाँ उन्हें परस्पर, संपर्क, सहयोग एवं घनिष्ठ भाव पैदा करना चाहिये। ताकि एक मजबूत श्रृंखला में आबद्ध होकर एक दूसरे से प्रेरणा प्राप्त करने की प्रक्रिया ठीक तरह चलने लगे। अपने में से एक को भी बिछुड़ने नहीं देना चाहिये वरन् प्रयत्न यह करना चाहिये कि विशालता की अभिवृद्धि हो और संख्या की दृष्टि से हम अब की अपेक्षा दूने चौगुने हो जायें। बड़ी सेना अपनी उत्कृष्टता एवं विशालता के आधार पर बड़े मोर्चे फतह करती है। अपना मोर्चा बहुत बड़ा है। अति व्यापक है। समस्त संसार अपना कार्य-क्षेत्र है। जीवन की हर दिशा को प्रकाश देना और संसार की हर समस्या को सुलझाना है। इसलिये शक्ति में वृद्धि भी आवश्यक है। कहना न होगा कि संघ शक्ति इस युग की सबसे बड़ी शक्ति है। हम जितने हैं, उतने पर ही सीमित एवं संतुष्ट नहीं रह सकते हैं। मोर्चे को विशालता को देखते हुए परिवार का विस्तार होना भी अपेक्षित है।

इन दिनों हमारा ध्यान इस बात पर केन्द्रित होना चाहिये कि अपने परिवार को विशाल एवं सुदृढ़ बनायें। लोक-मंगल के विशाल कार्यक्रमों की श्रृंखला में यह पहली कड़ी है। यह पहला कदम आज ही उठाया और आज ही आगे बढ़ाया जाना चाहिये। नव-निर्माण के मिशन का समारम्भ, शुभारम्भ, संचालन एवं अभिवर्धन का मूल तन्त्र ‘अखण्ड ज्योति’ और ‘युग निर्माण’ पत्रिकायें हैं। उन्हीं के माध्यम से इतने विशाल परिमाण में प्रबुद्ध परिजनो का एक अति प्रभावी और अति समर्थ संगठन उत्पन्न हो सका है और इन्हीं की प्रेरणा से शतसूची कार्यक्रमों को अपनाकर हजारों, लाखों कर्मवीर नव-निर्माण की पुण्य प्रक्रिया में प्रवृत्त हुए हैं। अब अपना क्षेत्र बढ़ाना है, तो इन दोनों पत्रिकाओं को अधिक समर्थ एवं व्यापक बनाना होगा। इसके बिना हमारी सारी प्रगति रुकी रह जायगी और जो करना है, उसको सफलतापूर्वक कर सकना कठिन हो जायेगा।

कर्त्तव्य पालन के प्रथम चरण में हमें अपना परिवार संगठित, मजबूत एवं विस्तृत बनाना है। इसके लिये पत्रिकाओं का कार्य-क्षेत्र बढ़ाना चाहिये। कलेवर उनके बढ़ा दिए गये हैं। मूल्य भी उनका बढ़ाना पड़ा है। अधिक गोला बारूद से अधिक कार्य हो सकना निश्चित है। पर आवश्यकता इस बात की भी है कि वर्तमान सदस्य बने रहें, इतना ही काफी नहीं उन्हें बढ़ाया जाना भी आवश्यक है। अगले तीन महीनों में हमें इतना लक्ष्य तो बना ही लेना चाहिये कि हर परिजन दो नये साथी बढ़ा देगा और नव-निर्माण का कार्य-क्षेत्र दूना व्यापक बनाने में शक्ति भर प्रयत्न करेगा।

यह कार्य अति सरल है। थोड़ा उत्साह और थोड़ा प्रयत्न इस सरलता को सफलता में तुरन्त परिणत कर सकता है। हमें यह करना ही होगा। इस वर्ष अखण्ड-ज्योति और युग-निर्माण पत्रिकाओं के सदस्य दूने कर लेने हैं ताकि उसी अनुपात से नव-निर्माण का-युग परिवर्तन का कार्य सरलता और सफलतापूर्वक अग्रसर किया जा सके।


मुझे यह कभी नहीं स्वीकार

(बलराम सिंह परिहार)


मुझे यह कभी नहीं स्वीकार (Kavita)

पथ पर बिछे देखकर काँटे कभी मान लूँ हार। मुझे यह कभी नहीं स्वीकार॥

झरना चला एक पर्वत से, इठलाता गाता मुसकाता। चट्टानें भी राह रोकतीं लेकिन झरना चलता जाता॥ ऊँचे-नीचे पथ कँकरीले टीलों पर भी चढ़ता जाता। ऊपर से गिर जाता, नीचे फिर-फिर आगे बढ़ता जाता॥

देख हँसी पर्वत उपत्यिका बोली सुन रे निर्झर भ्राता! गिर-गिरकर उठ-उठ चलने में, क्या तू कुछ भी कष्ट न पाता॥ ऐसा भी जीना क्या जीना जिसमें बस कष्टों से नाता। हँसकर कहा पथिक निर्झर ने सुनरी भगिनी बात हमारी॥ रुक जाऊँ तो बढ़े मैल दल अपवित्रता अपार। मुझे यह0॥

सूर्यलोक से देवि-किरण ने धरती माँ की ओर निहारा। देख अज्ञ-अंधियारा धरा पर उमड़ उठा उनका उर प्यारा॥ निकल पड़ीं घर छोड़ मिटाने धरती माता का अंधियारा। लेकिन रोका बलाहकों ने पथ रश्मिनिका सिर कजरारा॥

तिमिर सघन हो उठा मरुत ने दिया मेघ को और सहारा। अट्टहास कर मेघराज ने शत योजन शरीर विस्तार॥ दुःखी हुआ आकाश देख यह उसने दबा-वचन उच्चारा। देवि-किरण लौटो अपने गृह, किन्तु किरण बोली यों हँसकर॥ घर लौटूँ तो प्रिय धरती पर और बढ़े अंधियारा। मुझे यह0॥

नाविक ने मस्तूल खोल दी नाव बढ़ी लहरों की रानी। छप-छप करती सिंधुराज के वक्षस्थल पर बढ़ी सयानी॥ हँसती गाती शोर मचाती इठलाती जाती दीवानी। कितनी राह नापला अब तक बात नहीं नाविक ने जानी॥

तभी अचानक रौद्र रूप धर आ दौड़ी झंझा तूफानी। टूट गई पतवार नाव में भर आया घुटनों तक पानी॥ गरज उठा सागर बोला रे नाविक! मेरी बात न मानी। हँस मांझी ने कहा सिन्धु से जीवन-मरण लगा ही रहता॥ पर मेरे रुकने से रुक जाता जीवन-व्यापार। मुझे यह0॥

झरना, किरण और नाविक-सा जीवन ही सच्चा जीवन है। जो न रुके झंझावातों में वही सदा सच्चा यौवन है॥ रुकने वाले नहीं किसी से कर सकते हैं प्यार। रुक जाने वाले का जीवन हो जाता बेकार॥ मुझे यह कभी नहीं स्वीकार॥

*समाप्त*