आत्म-त्याग ही सर्वोच्च धर्म

जीवन का एक लक्ष्य है ज्ञान और द्वितीय सुख। ज्ञान और सुख के समन्वय का ही नाम मुक्ति है। आत्म-चिन्तन के द्वारा माया बन्धनों और साँसारिक अज्ञान को काट लेते हैं और विषय विकारता से छूट जाते हैं तो हम मुक्त हो जाते हैं किन्तु ऐसी मुक्ति तब तक नहीं मिल सकती, जब तक सृष्टि के शेष प्राणी बन्धन में पड़े हैं।

जब तुम किसी को क्षति पहुँचाते हो तो तुम अपने आपको क्षति पहुँचाते हो। तुम में और तुम्हारे भाई में कोई अन्तर नहीं है। जिस तरह छोटे-छोटे अवयवों से मिलकर शरीर बना है, उसी प्रकार छोटे-छोटे प्राणियों से मिलकर संसार बना है। कान को दुःख होता है तो आँख रोती है, उसी तरह समाज के किसी भी व्यक्ति का दुःख तुम्हारे पास पहुँचता है, इसलिये केवल अपने सुख से मुक्ति की कल्पना नहीं की जा सकती।

इस कसौटी पर जब लोगों को अपने लिये बढ़-चढ़कर अधिकार माँगते देखता हूँ तो ऐसे आदमी से मुझे बड़ी घृणा होती है। अधिकार व्यक्ति को स्वार्थी और संकीर्ण बनाते हैं। विश्व में जो कुछ अशुभ है, उसका उत्तरदायित्व प्रत्येक व्यक्ति पर है। अपने भाई से अपने को कोई पृथक् नहीं कर सकता। सब अनन्त के अंश हैं। सब एक दूसरे के रक्षक और सहयोगी हैं। वास्तव में वही सच्चा योगी है जो अपने में संपूर्ण विश्व को और सम्पूर्ण विश्व में अपने को देखता है। अपने लिये अधिकारों की माँग करना पुण्य नहीं है, पुण्य तो यह है कि हम छोटे-से-छोटे जीव के प्रति अपने कर्त्तव्य का पालन कर सकते हैं या नहीं। इसके लिये अपने अधिकार छोड़ने पड़ते हैं। इस लोक में यही सबसे बड़ा पुण्य है। आत्म-त्याग ही इस संसार का सर्वोच्च धर्म है। -स्वामी विवेकानन्द,


आस्तिकता मानव-जीवन की अनिवार्य आवश्यकता

केवल राज-दण्ड और राज-नियमों के आधार पर समाज में स्थायी सुख-शाँति की आशा कभी पूरी नहीं हो सकती। यदि ऐसा सम्भव होता तो, संसार के सारे देशों में राज-नियम लागू हैं और राज-दण्ड की भी व्यवस्था है, तब भी संसार का एक भी ऐसा देश नहीं है, जिसमें पूर्ण शाँति के लक्षण दिखलाई दें। सभी देशों और सभी समाजों में अपराध और पाप होते हैं, जिनके कारण लोग अशाँत और दुःखी रहते हैं।

समाजों में स्थायी सुख-शाँति तो कभी सम्भव है, जब जन-जन अपना उत्तरदायित्व समझे, पाप और अपराधों से बिना किसी दबाव के डरे और नैतिकता का मूल्य माने स्वयं आत्म-प्रेरणा से दुष्कर्मों से विमुख रहे। सामाजिक एवं राजकीय नियम तथा प्रतिबन्ध एक अल्प-सीमा तक ही जन-साधारण को कुमार्गगामी होने से रोक सकते हैं। उनकी क्षमता में केवल इतना हो होता है कि जिसने कोई दुष्कर्म किया है, उसकी निन्दा, भर्त्सना करलें या दण्ड दिलवा दें। यह तो कुकर्म का परिणाम है, इससे उसकी प्रवृत्ति कहाँ रुकी।

बहुत बार तो लोग इतने निर्लज्ज हो जाते हैं कि बार-बार दण्ड पाते हैं और बार-बार अपराध करते रहते हैं। उन्हें समाज में निन्दा अथवा लांछना का कोई भय नहीं रहता। इतना ही क्यों बहुत बार तो अपराधी अपनी चतुरता, साधनों अथवा परिस्थितियों का लाभ उठा कर दण्ड व्यवस्था से भी बच निकलते हैं और तब उनकी वह प्रवृत्ति और भी उत्साहित हो उठती है।

पाप प्रवृत्ति का दमन बाह्य प्रतिबन्धों अथवा भयों से नहीं हो सकता। उसका दमन तो मनुष्य की स्वयं की अन्तःप्रेरणा से ही संभव है। इस अन्तःप्रेरणा का आधार पूर्ण आस्तिकता ही हो सकती है। जब मनुष्य को यह निश्चय हो जायेगा कि ईश्वर सर्वव्यापक है, न्यायशील तथा सर्वशक्तिमान है, सबके प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष, अच्छे-बुरे कामों का साक्षी है, देखने और जानने वाला है, तो वह चोरी से भी पाप-कर्म करते डरेगा। उसे विश्वास रहेगा कि वह जो कुछ करेगा, उसको ईश्वर अवश्य देखेगा और उसके अनुसार पूरा-पूरा दण्ड देगा। ईश्वर के अस्तित्व, उसकी सर्वव्यापकता और न्यायशीलता में निश्चय हुए बिना मनुष्य के लिये सहज सम्भव नहीं कि यह अज्ञानवश सुन्दर, सुखकर तथा लाभकर दिखलाई देने वाले पापों के आकर्षण से बचा रह सके। पापों में बड़ा भयानक प्रलोभन होता है। जो मनुष्य को हठात् अपनी ओर खींच ही लेता है। इसकी रक्षा का एकमात्र उपाय सच्ची और संपूर्ण आस्तिकता ही है।

पाप का बीज विचारों में रहता है और उसकी परिणति कर्मों में होती है। अंतःकरण में कुविचार उठते ही मस्तिष्क भी उसके अनुसार योजना रचने लगता है, जिस शरीर को इन्द्रियों की सहायता से अनायास ही कार्यान्वित कर डालता है। यद्यपि इस प्रक्रिया के बीच-बीच में राजदण्ड और समाज का भय भी काम करता रहता है, किन्तु निर्बल नैतिकता के कारण वह कुछ अधिक उपयोगी सिद्ध नहीं हो पाता। कुविचार के सहायक दुःसाहस के बल पर लोग उस कल्याणकारी भय ही उपेक्षा कर देते हैं। निष्पाप नैतिकता के विकास और उसकी प्रबलता के लिये विचारों का निर्विकार होना बहुत आवश्यक है।

ईश्वर की सर्वव्यापकता, सर्वशक्तिमत्ता और निष्पक्ष न्यायशीलता का निश्चय हुए बिना अनैतिक विचारों को नहीं रोका जा सकता। कुविचारों पर अंकुश रखना तभी संभव होगा, जब कर्मफल, स्वर्ग-नरक, लोक-परलोक पुनर्जन्म और अधर्म योनियों में विश्वास पैदा हो। इन सत्यों का विश्वासी निश्चय ही कुमार्ग पर पैर रखते डरेगा। उसका यह विश्वास तुरन्त ही पाप-पथ की ओर बढ़ते हुये उसके पैरों में जंजीर डाल देगा। इस प्रकार का कल्याणकारी भय किसी आस्तिक के हृदय में ही उत्पन्न हो सकता है, नास्तिक के हृदय में नहीं।

आज के घोर भौतिकवादी युग में आध्यात्मिक विचार यदि पूरी तरह मिट नहीं गई है तो कम अवश्य हो गई है। इसी कारण आज आस्तिकता के भाव भी ज्यादा दिखलाई नहीं देते। ईश्वर के प्रति यथार्थ निष्ठा में कमी आज जाने का ही तो यह परिणाम है कि आज संसार में चारों ओर अशाँति, भय और आशंका का वातावरण दिखलाई देता है। संपन्न-से-संपन्न और समुन्नत समाज व राष्ट्र, सुख-शाँति के लिये तरह रहे हैं। आस्तिकता की कमी के कारण कुकर्म बढ़ गये हैं और आज की सर्वव्यापी अशाँति उन्हीं कुकर्मों का ही तो फल है। भौतिकवाद की प्रबलता के कारण जो आज परस्पर राग-द्वेष और छीना-झपटी की अनीतिपूर्ण प्रक्रिया चल रही है, वही आज कष्टों, क्लेशों और शोक-संतापों के रूप में फलीभूत होकर जनसमुदाय को चैन की साँस नहीं दे रही है। राग द्वेष, स्वार्थ और संघर्ष का जन्म-दाता माना गया है। लोगों में स्वयं के प्रति इतना स्वार्थ और राग बढ़ गया है कि वह समष्टि के प्रति एक प्रकार से अंधे हो गये हैं। सब कुछ अपने लिये चाहने वाले और दूसरे के हितों एवं अधिकारों के प्रति द्वेष रखने वाले समाज में अशाँति तथा असुख की परिस्थितियों के लिये विशेष उत्तरदायी हैं। स्वार्थी को यदि सौ नास्तिकों का एक नास्तिक मान लिया जाय तो कुछ अनुचित न होगा।

संसार में व्यक्तिगत अथवा समष्टिगत जितने प्रकार के जो भी कष्ट-क्लेश दिखलाई देते हैं, वह सब तदनुसार कुकर्मों का ही फल है। ऐसा नहीं कि कुकर्म करने वाले को ही केवल अपने किये का फल भोगना होता हो, उसे तो भोगना ही होता है, लेकिन उसका प्रभाव दूसरे लोगों के माध्यम से समाज पर भी पड़ता है। व्यक्ति के साथ समाज को भी दुःख का भाग भोगना पड़ता है। शरीर के अंगों की तरह व्यक्ति भी समाज के एक अंग होते हैं। जिस प्रकार शरीर का कोई भी अंग यदि दूषित हो जाता है तो उसका घोड़ा-बहुत प्रभाव सारे शरीर पर पड़ता है। उसी प्रकार व्यक्ति की बुराई से भी समाज सर्वथा बचा नहीं रह सकता। जिस समाज में जितने ही दूषित, बुरे और कुकर्मी व्यक्ति बढ़ते जाते हैं, उसमें उसी अनुपात से दुःख और कष्टों की वृद्धि होती जाती है।

इसीलिये व्यक्ति की बुराई से समाज को बचाने के लिये पूर्वकाल में पापी के बहिष्कार अथवा सार्वजनिक निन्दा की एक प्रथा प्रचलित थी। राज-दण्ड की तरह यह सामाजिक दण्ड भी अपरिहार्य माना जाता था। समाज द्वारा दिया जाने वाला यह बहिष्कार व सार्वजनिक घृणा का दण्ड, मृत्यु-दण्ड से भी अधिक भयानक होता था। इसके डर से लोग किसी हद तक बुराई से बचे रहने का प्रयत्न करते थे।

अब संसार के लगभग सभी समाज से यह व्यवस्था उठ गई है। जिन समाजों में इसका कुछ अवशेष दिखलाई भी देता है, हुक्का-पानी अथवा रोटी-बेटी तक ही दिखलाई देता है और उसका कारण भी कोई सामाजिक मान्यता अथवा रूढ़ि का उल्लंघन करना ही होता है। असत्य, बेईमानी, शोषण, चोरी, जुआ अथवा अन्य अनीतिपूर्ण कार्यों के लिये, जिनका कि कुप्रभाव सारे समाज की शाँति और व्यवस्था पर पड़ता है, सामाजिक बहिष्कार की प्रथा अब कहीं भी दिखलाई नहीं देती।

अपितु, आज तो इसका उलटा रूप दिखलाई देता है। बहुधा ऐसे कुकर्मियों से लोग डरकर अथवा किसी प्रकार के लाभ के लोभ से उनका समर्थन तक करने लगते हैं। ऐसी विपरीत दशा में समाज की सुख-शाँति को क्षति पहुँचना स्वाभाविक है। प्राचीनकाल में प्रथम से नास्तिक कदाचित् ही होते थे और यदि यदा-कदा किसी में उसके लक्षण दिखाई भी देते थे तो उसका सामाजिक बहिष्कार होते देर नहीं लगती थी। लोग उससे बोलना, बात करना, उसका संग करना अथवा किसी प्रकार का संबंध रखना पसंद नहीं करते थे। नास्तिक व्यक्ति को बड़ा पापी माना जाता था। उसका कारण यही था कि नास्तिक को लोक-परलोक, स्वर्ग-नरक अथवा पुनर्जन्म और कर्मफलों में अनास्थावान माना जाता था। प्रायः नास्तिक होते भी ऐसी ही विचार-धारा के। जिन्हें कर्मफलों का भय ही नहीं वह कोई भी कर्म-कुकर्म करते संकोच भी क्यों करेगा। केवल भोगवादी होने के कारण इन्द्रिय-सुख में ही उसकी लिप्सा बनी रहने से उसका अनैतिक हो जाना कोई असम्भाव्य बात नहीं होती। अनैतिक व्यक्ति का समाज के लिये दुःखदायी होना स्वाभाविक ही है। अस्तु, समाज नास्तिक में इन सब दोषों को मनोनीत मानता था और सार्वजनिक सुख-शाँति की रक्षा के लिये शीघ्र ही उसका बहिष्कार करने का प्रयत्न करता था।

आज ऐसा कोई भय रह नहीं गया है। इसलिये लोग वास्तविक आस्तिकता से विमुख होते संकोच नहीं करते। आज के युग में बहुत से लोग आस्तिकता को ढकोसला तक कहने लगे हैं। ईश्वर को मनुष्य की कल्पना और धर्म अथवा नैतिकता को अप्राकृतिक प्रतिबंध तक मानने लगे हैं। ऐसी ही निरंकुश मनोवृत्ति वाले लोग अपने स्वार्थ के लिये सामाजिक हितों पर ध्यान नहीं देते और मनमाने ढंग से जीवन चलाते हुए असुख एवं अशाँति की परिस्थितियाँ पैदा करते हैं।

आज सामाजिक बहिष्कार की प्रथा है नहीं और राजदण्ड अनैतिकता, अपराधों को रोक सकने में पूर्णतया सफल नहीं हो पा रहा है। सफल हो भी किस प्रकार? पुलिस और गुप्तचरों की इतनी पर्याप्त संख्या हो सकना सम्भव नहीं कि वह इतने विशाल जनसमूह पर पहरा दे सके अथवा हर जगह गुप्त प्रकट स्थानों पर जाकर अपराधों एवं अनैतिकताओं का पता लगा सके, जो अपराधी पकड़े जाते हैं, उन पर आरोप सिद्ध करने के लिये गवाही, शहादत और सबूत पर्याप्त मात्रा में जुट सकना कठिन होता है। फिर बहुत से अपराधी इन सब व्यवस्थाओं के बावजूद भी छूट जाते हैं। साधन संपन्न और धन व्यय कर सकने वालों को तो ऊँचे-से-ऊँचे वकीलों की योग्यताओं के आधार पर बच जाने की और भी सुविधा रहती है। ऐसी दशा में केवल एक ही सफल उपाय रह जाता है, और वह है मनुष्यों की मनोभूमि का सुधार, जिससे कि उसमें न तो कुविचार ही आयें और न अनैतिक भावना का जन्म हो। मनुष्य की अन्तःप्रेरणा सत्कर्मों की ओर अग्रसर हो।

इस पावन स्थिति को चरितार्थ करने के लिये आवश्यकता इस बात की है कि मनुष्यों में अधिक-से-अधिक आस्तिकता का विकास किया जाये। उसकी शिथिल होती होती हुई आस्थाओं का बल प्रदान दिया जाये। जिस दिन मनुष्य में वास्तविक आस्तिकता का विकास हो जायेगा- उनकी अन्तःप्रेरणा सदोन्मुखी हो चलेगी। ज्यों-ज्यों इस दिशा में प्रगति होती जायेगी, त्यों-त्यों समाज में अशाँति एवं असुख की परिस्थितियाँ हम होती जायेंगी। जिस प्रकार नास्तिकता सारे अनैतिक कर्मों की जड़ है, उसी प्रकार आस्तिकता सत्कर्मों की मूल आधार है। अस्तु, हम सबको स्वयं को आस्तिक बनना ही चाहिये, साथ ही इस परमात्म-भाव की आस्था अन्य लोगों में भी उत्पन्न करते रहना चाहिये। इस मार्ग से समाज और संसार में स्थायी सुख-शाँति की स्थापना सम्भव हो सकती है।


भरोसा भगवान् का

भरोसा भगवान् का :-

लन्दन के एक मकान में 16 वर्ष का किशोर बालक बन्दूक साफ कर रहा था। बालक का नाम या रोनल्ड टैकर था। वह प्रारम्भ से ही गजब का साहस और आत्म-विश्वास का धनी था। वह प्रतिदिन थोड़ा समय भगवान के भजन के लिये अवश्य निकाला करता था।

बन्दूक साफ करते समय एकाएक गोली छूट गई और कनपटी में जा घुसी। माँ चिल्लाकर रो पड़ी। घर वाले बहुत दुःखी हुए। डाक्टर के पास ले जाया गया। डाक्टर ने कहा- ‘‘आपरेशन खतरनाक है, गोली निकल सकती है पर मृत्यु किस क्षण हो जाये यह कहा नहीं जा सकता।”

बालक ने कहा- ‘‘डाक्टर कोई दवा लगा दो। खून बन्द हो जायेगा, बाकी सब भगवान देखेगा।” भगवान के विश्वास पर उसने मृत्यु को रोक दिया। मृत्यु खड़ी प्रतीक्षा करने लगी।

33 वर्ष तक न तो उसने कोई काम बन्द किया, न निराश हुआ और नाहीं एक दिन बुखार आया। मृत्यु तो जैसे घबड़ा ही गई कि उसे किस तरह छेड़ा जाये। 49 वर्ष की आयु में उसका निधन हुआ तब लोगों को ज्ञात हुआ कि भगवान के विश्वास में भी इतनी शक्ति हो सकती है।


प्रेम विस्तार से परमात्मा की प्राप्ति

आरम्भ में मनुष्य अपने तक ही सीमित रहता है। वह जो कुछ करता या चाहता है, अधिकाँशतः अपने लिये। उसे अपने इस स्वार्थ में कुछ सुख अनुभव होता है। किंतु यह सुख क्षणिक ही होता है। स्वार्थ की पूर्ति का संतोष समाप्त होता ही सुख की अनुभूति भी समाप्त हो जाती है। फिर दूसरा स्वार्थ सताने लगता है। इस स्वार्थ की यह शृंखला चलती रहती है, लेकिन वह सुख-संतोष नहीं मिल पाता, जिसकी वांछा रहती है। आत्मा रीती की रीती रह जाती है। अशाँति और असंतोष बना रहता है।

स्वार्थ में भी जो, कम, ज्यादा अथवा झूँठी-सच्ची सुखानुभूति होती है, उसका कारण है, अपने प्रति प्रेम। प्रेम ही सुख का हेतु है। किन्हीं कारणों से जिनको अपने से प्रेम नहीं रहता, आत्म-ग्लानि अथवा आत्म-क्षोभ का भाव घेर लेता है, उन्हें स्वार्थ की पूर्ति में भी सुख नहीं मिलता। वह कुछ भी खाये, कुछ भी पहने, कितना ही लोभ क्यों न हो, किन्तु उसे वह क्षणिक संतोष भी नहीं मिलता, जो स्वार्थपूर्ति पर किसी स्वार्थी को ही मिल जाता है। इस प्रवंचन का मुख्य कारण यही होता है कि उसका अपने प्रति प्रेम समाप्त हो गया होता है। सुख तथा संतोष प्रेम में ही निवास करता है, न तो वस्तु में और न व्यक्ति में।

कुछ समय बाद उसका विवाह हो जाता है। संकीर्ण स्वार्थ की सीमा टूटती है। उसका परिचय बढ़ता है। अब वह न केवल अपने लिये ही करता है और न अपने लिये चाहता है। अब उसके करने ओर चाहने में पत्नी सम्मिलित हो जाती है। सम्मिलित ही क्यों प्रथम हो जाती है। वह कुछ खाता है तो उसे पत्नी की याद आती है। खाना अच्छा नहीं लगता। जब तक पत्नी को न खिला ले खाने में रस नहीं आता। कुछ पहनता है तो उसका ध्यान पत्नी की ओर जाता है और जब तक अपने से पहले और अपने से अच्छा उसे न पहना ले जरा भी अच्छा नहीं लगता।

बल्कि सच्ची बात यह है कि जब वह पत्नी के लिये जितने अधिक त्याग का अवसर पाता है और करता है, उसे ही अधिक सुख और संतोष होता है। ऐसा क्यों? इसलिये कि उसे पत्नी से प्रेम होता है। नहीं तो जिसकी सम्पत्ति का उपभोग कोई दूसरा करे तो अच्छा लगना तो दूर, बुरा ही लगना चाहिये। किन्तु प्रेम के कारण जब पुरुष अपनी गाढ़ी कमाई के मूल्य पर पत्नी को सुख-सुविधा में देखता है, उसे खाते, पहनते और व्यय करते देखता है तो प्रसन्न होता है। अब उसे अपना एकाकी स्वार्थ नहीं भाता। उसे उससे ग्लानि होती है, विचार में आते ही हीनता आती है। जो स्वार्थ पहले उसे सुख देता था, वही अब अरुचिकर लगने लगता है। इसका कारण केवल यही होता है कि उसे पत्नी से प्रेम होता है। पत्नी के प्रति प्रेम रंजना से जो सुख प्राप्त होता है, वह स्पष्ट ही स्वार्थपूर्ति से प्राप्त होने वाले सुख से अधिक शीतल, संतोषप्रद तथा स्थायी होता है- यह अनुभव भी अभावित नहीं रहता।

फिर बच्चे होते हैं। प्रेम की परिधि का और अधिक विस्तार होता है। अभी तक पत्नी के साथ कुछ स्वार्थ अपना भी बना रहता था। लेकिन अब वह उतना भी नहीं रहता। अब यदि अपना पेट खाली है और बच्चे तृप्त हैं तो भी संतोष रहता है। अपने कपड़े फटे-पुराने हैं और बच्चे अच्छे वस्त्र पहने हैं तो देखने मात्र से ही आनन्दित हो जाते हैं। इतना ही नहीं सबको खिलाने के बाद बचा हुआ खाने बैठे और बच्चे आते ही लूट मचा देते हैं। सब कुछ छीन-झपटकर खा जाते हैं। इस लूट-खसोट में और भी आनन्द आता है। ऐसा क्यों? इसलिये कि बच्चों से प्रेम होता है। स्वार्थ और भी कई अंशों तक समाप्त हो चुका होता है और त्याग भावना बढ़ने लग जाती है। प्रेम का जितना विस्तार उतनी ही स्वार्थ की हानि, जितनी ही स्वार्थ की हानि- उतनी ही त्याग भावना की वृद्धि- उतना ही सुख, सन्तोष और आनन्द।

प्रेम की परिधि बढ़ती है। समाज, देश अथवा राष्ट्र तक फैल जाती है। राष्ट्र तक विस्तृत प्रेम की परिधि के ही अनुपात से त्याग भावना की वृद्धि होती है। राष्ट्र-हित के लिये, देश प्रेम के लिये व्यक्ति क्या नहीं दे देता। जीविका दे देता, जीवन दे देता, पत्नी, पुत्रों और परिजनों को दे देता, सम्पत्ति दे देता, सर्वस्व दे देता। जितना-जितना देता जाता है, उतना-उतना ही उठता जाता है और आनन्द पाता जाता है। देश-भक्त फाँसी पाते और गोली खाते समय भी आनन्दित होते रहते हैं। किसलिये? इसलिये कि उन्हें देश, राष्ट्र अथवा समाज से प्रेम होता है। आनन्द का निवास प्रेम में है न कि किसी अन्य वस्तु में। प्रेम की पूर्णता की परिणति ही आनन्द की उपलब्धि है। और आनन्द मिश्रित मृत्यु का परिपाक मोक्ष के अतिरिक्त भी नहीं है।

यही प्रेम जब अपनी सारी सीमाओं को तोड़कर अखिल जड़चेतन तक फैल जाता है, तब मनुष्य विभु रूप हो जाता है। मनुष्य का यह असीम विस्तार उसे आनन्द सागर में निमग्न कर देता है। प्रतिक्षण सुख, संतोष, शीतलता और आनन्द अनुभव होता है। सारा मंगल, सारा कल्याण और सारी स्वस्ति अनायास ही सदा-सर्वदा के लिये मिल जाती है। फिर कुछ भी मिलना शेष नहीं रहता।

प्रेम की उपलब्धि परमात्मा की उपलब्धि मानी गई है। प्रेम परमात्मा का भावनात्मक स्वरूप है। जिसे अपने अन्तर में सहज ही अनुभव किया जा सकता है। प्रेम प्राप्ति परमात्मा की प्राप्ति का सबसे सरल मार्ग है। परमात्मा को पाने के अन्य सब साधन कठिन, कठोर, दुःसाध्य तथा दुरूह हैं। एकमात्र प्रेम ही ऐसा साधन है, जिसमें कठिनता, कठोरता अथवा दुःसाध्यता के स्थान पर सरसता, सरलता और सुख का समावेश होता है। प्रेम की आराधना द्वारा परमात्मा को पाना क्या मनुष्य परमात्म रूप ही हो जाता है।

यों तो कोई भी कह सकता है कि उसके हृदय में प्रेम का निवास है। ऐसा अनुभव भी हो सकता है। क्योंकि बिना प्रेम-भावना के मनुष्य जीवित नहीं रह सकता। उसे किसी-न-किसी से, किसी भी स्तर का प्रेम होना अनिवार्य है। प्रेम ही मानव-जीवन की संजीवनी है। प्रेम-भावना के सर्वथा समाप्त हो जाने पर मनुष्य मृत हो जाता है। अपने से लेकर संसार तक जिनका प्रेम सर्वथा समाप्त हो जाता है, उनकी रुचि, आकर्षण, अथवा लगाव किसी से नहीं रहता, तब या तो उनकी जीवन गति रुक जाती है अथवा वे पागल हो जाते हैं। अत्याचार, आततायित्व, रक्तपात, रोष, क्षोभ, कुण्ठा आदि के विकास भी पागलपन के ही लक्षण हैं। प्रेम के समाप्त हो जाने पर मनुष्य मरुभूमि की तरह तप्त तथा निस्सार हो जाता है। जोकि अस्तित्ववान होने पर भी मृत के सदृश ही होते हैं।

हृदय की सरसता तथा सदाशयता प्रेम पर ही निर्भर है। इसके नष्ट हो जाने पर मनुष्य अधिकाँश में आततायी बन जाता है, फिर चाहे वह अपने प्रति अनाचारी हो अथवा औरों के प्रति। आततायित्व भी मृत्यु का ही एक लक्षण है। शरीर से जीते हुए भी ऐसे मनुष्य आत्मा से मर चुके होते हैं। जीवन अनुभूति का कोई भी आनन्द उन्हें नहीं मिलता। करुणा, दया, क्षमा आदि से बहने वाली शीतल वायु का अनुभव उन्हें नहीं होता। इन दोषों के साथ चलने वाला जीवन निष्चेष्ठ मृत्यु से भी बुरा होता है। अस्तु, जीवित मनुष्य में प्रेम का कुछ-न-कुछ भाव होना अनिवार्य है।

तथापि जिस प्रेम को, जिस आकर्षण अथवा रुचि को मनुष्य अपने अन्दर अनुभव करता है, वह वास्तविक प्रेम नहीं होता। वह मात्र स्वार्थ के प्रति मोह की अनुभूति हुआ करती है।

प्रायः लोगों का अनुमान होता है कि उन्हें अपने से, अपने परिवार से, समाज से और राष्ट्र से प्रेम है। किन्तु क्या वे एक क्षण भी यह सोच पाते हैं कि यह प्रेम सज्जा है अथवा मिथ्या? इसकी एक मोटी-सी पहचान यह है कि यदि वे कभी भी किसी दशा में कोई ऐसा व्यवहार नहीं करते, जिससे राष्ट्र, देश, समाज, परिवार अथवा अपने को कोई क्षति नहीं पहुँचती। उनका कोई अहित नहीं होता। यदि ऐसा है तब तो एक बार कहा जा सकता है कि उन्हें उन संबंधों के प्रति प्रेम है अन्यथा नहीं। किन्तु सच्चे प्रेम की कसौटी इससे कुछ ऊपर है। वह यह कि यदि कोई अपने संबंधों तथा अनुबंधों के लिये कुछ त्याग करता है और उसके साथ अपना कोई स्वार्थ नहीं जोड़ता, साथ ही उसे उस उत्सर्ग में आनन्द की अनुभूति होती है तो उसका प्रेम सत्य ही कहा जायेगा।

अनेक बार लोग देश, राष्ट्र अथवा समाज के प्रति बड़ा प्रेम अनुभव करते हैं। उनका यह प्रेम बात-बात में प्रकट होता है। परमात्मा के प्रति भक्ति-भाव में आँखें भर-भर लाते हैं। कीर्तन, भजन अथवा जाप करते समय धाराओं में रो पड़ते हैं। उनकी यह दशा देखकर कहा जा सकता है कि उन्हें समाज अथवा परमात्मा से प्रेम है। किन्तु वे ही लोग अवसर आने पर उसके लिये थोड़ा-सा भी त्याग करने के लिये तैयार नहीं होते। ऐसे प्रेमी अथवा भक्त-जन प्रेम से नहीं भावातिरेक से परिचालित होते हैं। सच्चे प्रेम का प्रमाण है त्याग। जो अपने प्रिय के लिये सब कुछ सुखपूर्वक त्याग कर सकता है और जो उस त्याग के बदले में रत्ती भर भी कोई वस्तु नहीं चाहता, वही सच्चा प्रेमी है, भक्त है।

प्रेम में प्रदान के सिवाय आदान का विनिमय नहीं होता। वह विशुद्ध बलिदान, त्याग और आत्मोत्सर्ग की भावना है। सत्य प्रेम का पोषक प्रेमी अपने प्रियजन के हित और सुख के लिये सब कुछ दे डालता है, और इस देने की भावना में दान अथवा प्राप्ति का कोई भाव नहीं रखता। किसी के लिये कुछ त्याग करते समय जब ऐसा अनुभव हो कि हम अपने लिये ही त्याग कर रहे हैं। अपने त्याग से दूसरे को मिलने वाला सुख जब अपनी आत्मा में अनुभव हो तब समझना चाहिये कि हमारे हृदय में सच्चे प्रेम का शुभारम्भ हो गया है। जिस दिन इस शुभ का आरम्भ हो जायेगा, संसार के सारे दुःख, शरीर, मन और आत्मा के तीनों ताप नष्ट होने लगेंगे। हर समय एक अनिवर्चनीय आनन्द की शीतलता का अनुभव होता रहेगा।

प्रेम ही परमात्मा का अनुभूतिमय स्वरूप है। उसे प्राप्त करना ही मानव-जीवन का ध्येय होना चाहिये। इसकी प्राप्ति के लिये सबसे पहली शर्त है निःस्वार्थ होना। अपने हृदय का प्रेम अणु-अणु में स्थापित कर उसके लिये निःस्वार्थ त्याग का अभ्यास करने वाले ठीक उस मार्ग पर चल पड़ते हैं, जोकि उस परमपिता परमात्मा की ओर जाता है। इस प्रेम-भावना का विकास अपने से बढ़ा आत्मा-प्रेम की परिधि को परमात्मा तक पहुँचा कर सरलता से किया जा सकता है।

अस्तु आत्म-कल्याण के इस क्रम को स्मरण रखते हुए मनुष्य को अपने जीवन का संचालन करना चाहिये- ज्यों-ज्यों प्रेम की परिधि बढ़ती जाती है, त्यों-त्यों स्वार्थ घटता जाता है, ज्यों-ज्यों स्वार्थ घटता जाता है, त्यों-त्यों त्याग भावना की वृद्धि होती जाती है और ज्यों-ज्यों त्याग की वृद्धि होती है, त्यों-त्यों आत्मा में आनन्द का आगमन होता जाता है और एक दिन ऐसा आता है कि मनुष्य परमानन्द स्वरूप परमात्मा को पाकर भव-बंधन से मुक्त हो जाता है।


महात्मा ईसा

महात्मा ईसा अपनी दयालुता के कारण सदा दुःखी और पापी कहे जाने वाले अपराधियों से हर समय घिरे रहते थे। यहाँ तक कि जब वे भोजन किया करते थे, तब भी बहुत से पतित लोग उन्हें घेरे रहते थे।

एकबार वे बहुत से नीच जाति और पापी, पतितों के साथ बैठे भोजन कर रहे थे। ये देखकर उनके एक विरोधी ने उनके शिष्य से कहा- ‘‘तेरे गुरु! जिसे तुम लोग भगवान का बेटा और पवित्र बतलाते हो, इस प्रकार नीचों और पतितों से प्रेम करता है, उनके साथ बैठा भोजन कर रहा है फिर भला तुम लोग किस प्रकार डडडड कर सकते हो कि हम लोग उसका आदर और उसकी बात मानें?”

महात्मा ईसा ने विरोधी की बात सुन ली और विनम्रतापूर्वक उत्तर दिया- ‘‘भाई वैद्य की आवश्यकता रोगियों को होती है, निरोगों को नहीं। धर्म की आवश्यकता पापियों को होती है, उनको नहीं जो पहले से ही अपने को धार्मिक समझते हैं। मैं धर्मात्माओं का नहीं पापियों का हित करना चाहता हूँ। उन्हें मेरी बहुत जरूरत है।”


संसार की सेवा करते हैं

सम्भव है अनेक लोग ऐसा विचार रखते हों कि जो महापुरुष अपने जीवनकाल में संसार की सेवा करते हैं, वे उसके अन्त में किन्हीं दिव्य-लोकों में जाकर निष्क्रिय हो जाते होंगे और अपने सत्कर्मों का फल स्वर्गीय सुख का चैन से भोग करते होंगे।

इसमें तो संदेह ही क्या हो सकता है कि सत्कर्मों का फल सद्गति ही होता है और बहुत बार स्वर्गादि भी। किन्तु सच्चे जनसेवी वहाँ पहुँचकर निष्क्रिय नहीं बैठ जाते वे वहाँ से भी सूक्ष्म शक्तियों द्वारा लोक-कल्याण का कार्य करते रहते हैं।

पहली बात तो यह है कि उन्हें लोक-मंगल की सेवाओं का स्वाद, उसका आनन्द ज्ञात होता है, इसलिये स्वर्ग का निष्क्रिय सुख उनको उस परमार्थ सुख से तुच्छ लगता है और वे जड़तापूर्ण सुख को भोगते रहने के स्थान पर वहाँ से भी अपने सूक्ष्म जीवन द्वारा सेवा के कार्य करते रहते हैं। दूसरे वे सेवा कार्यों- परमार्थ कर्मों का मूल्य जानते हैं। उन्हें पता रहता है कि जब संसार में उन्होंने जनसेवा के लिये तुच्छतम सुखों, नश्वर सुखों का त्याग किया, तब तो उन्हें इन उच्च-लोकों की प्राप्ति हुई, और अब जब इन उच्च-लोकों का चिरन्तन सुख वे परमार्थ के लिये उत्सर्ग कर देंगे, तब उन्हें न जाने किस उच्चपद की प्राप्ति होगी। त्याग, सुख तथा आत्म-संतोष की शाँति का अनुभवी अधिकाधिक त्याग को अपना लक्ष्य बनाता है। ग्रहण और फिर किसी परमार्थ पुण्य के फल ग्रहण को तो वह तुच्छ लोभ ही मानता है।

त्याग का यदि मूल्य ले लिया, सेवा की कीमत चुकाली तो फिर उसकी महत्ता ही क्या रह जाती है। सच्चे परमार्थियों का पुरुषार्थ से उत्पन्न अधिकाधिक पुरुषार्थ की शक्ति ही उसका लाभ-लोभ तथा मूल्य होता है, उससे प्राप्त सुख का भोग फिर चाहे वह अपवर्ग सुख ही क्यों न हो उनके लिये कोई आकर्षण नहीं रखता। वे अपने परलोक की सारी संपदायें संसार में सत् तथा शुभार्थ मुक्त-हस्त से लुटा देते हैं।

स्थूल शरीर के उपराँत सच्चे सेवा-धनी सूक्ष्म विचार जीवन धारण कर लेते हैं और चिरन्तन तरंगों के रूप में मानव मस्तिष्कों में आन्दोलित रहकर उनके द्वारा परमार्थरत रहा करते हैं। जो व्यक्ति प्रयत्नपूर्वक अपने मस्तिष्क को उन सूक्ष्म विचार तरंगों के योग्य बना लेता है, वह उन दिवंगत महात्माओं की शक्तियों का उपयोग करने की पात्रता प्राप्त कर लेता है। मस्तिष्क की यह योग्यता प्राप्त करना कोई विलक्षण अथवा अद्भुत बात नहीं है। इसके लिये केवल उसको मूढ़ताओं, कुविचारों, विकारों, अंधविश्वासों या दुराग्रह अथवा पक्षपात के कलुष से निर्मुक्त भर करना होता है। और यह काम परमार्थ बुद्धि, आध्यात्मिक आस्था, स्वाध्याय, सत्संग अथवा सेवा-कार्यों द्वारा सहज ही में किया जा सकता है।

विचार रूपी सूक्ष्म शरीरधारी महात्मा लोग संसार के वायुमंडल में सात्विक तत्त्वों के रूप में ओत-प्रोत रहते हैं और जिन हृदयों अथवा मस्तिष्कों में अपने योग्य निवास पाते हैं, समाहित हो जाते हैं और उस माध्यम से अपने उन कार्यों को आगे बढ़ाते रहते हैं, जिनको वे एक बार स्थूल अवस्था में प्रारम्भ कर चुके होते हैं। इस प्रकार उनका सेवा कार्य सदा सर्वदा चलता रहता है।

जिस प्रकार असद्कर्मों का फल अत्याग की अनिवार्यता से प्रतिबन्धित है, उस प्रकार सत्कर्मों के फल त्याग पर कोई प्रतिबंध नहीं है, उसे त्याग सकने का किसी को भी अधिकार रहता है। फलों के विषय त्यागात्याग की भिन्नता का कारण यह है कि पापों का फल दण्ड रूप में निर्धारित होता है, जिसके त्याग का कोई प्रश्न ही नहीं उठता, उस पर कुकर्मों का कोई अधिकार नहीं होता, किन्तु पुण्य कर्मों का फल पुरस्कार स्वरूप होता है, उसे त्याग सकने का अधिकार रहता है, क्योंकि वह सुकर्मी की अपनी निजी संपदा अपना व्यक्तिगत उपार्जन होता है। अनेक पुरुषार्थी जो परमार्थ परक सेवा, सुख का सौंदर्य अनुभूत कर चुके होते हैं, स्वर्ग ही नहीं मोक्ष तक का निषेध कर देते हैं और उसके स्थान पर पुनः मानव शरीर स्वीकार कर संसार में, अपनी इस कर्मभूमि में, इस पवित्र धरा-धाम में लोकरंजन और जनमंगल के लिये जन्म धारण कर लेते हैं। अपने पुण्य कर्मों के प्रताप से उन्हें वह मानव शरीर जिसे निष्क्रिय लोग एक भार, रोग-शोक का भण्डार और आत्मा का बंधन मानकर भयभीत होते हैं, सेवा का सर्वोपरि साधन तथा सबसे सरल उपाय मालूम होता है। वे बारम्बार इसे प्रसन्न-प्रसन्न धारण करते हैं और प्रसन्न-प्रसन्न छोड़ते रहते हैं। उन्हें इस विग्रह, अविग्रह में खेद होना तो क्या उल्टे लीला लास्य जैसा आनन्द आता है।

खेद का प्रश्न तो तब उठे न जब वे इस शरीर, इस साधन को कर्मयोग के स्थान पर भोग-संयोग मानकर चलें और इन्द्रियों की शक्ति और उनकी अभिमुखता नश्वर साँसारिक सुखों की ओर प्रेरित करें। जिसका हृदय, पवित्र है, जिसके कर्म धन्य हैं और जिसका पथ परमार्थ और रुचि आध्यात्मिक है, ऐसे जन्म-जन्म के सपूर्व अभ्यासी को संसार में भय कहाँ? लोभ, लालसा, लिप्सा और लोलुपता के कीट-पतंग उस तेजोपूर्ण व्यक्तित्व के पास आ भी कैसे सकते हैं और कैसे उस प्रकाशपूर्ण आत्मा का सामुख्य, ईर्ष्या, द्वेष, काम, क्रोध आदि का अंधकार ही कर सकता है। वह तो आत्मालोकित, आत्म-निर्भर और आत्म-मुक्त एवं आत्म-प्रसन्न पुण्य पुरुष परमात्म-तत्त्व से अविच्छिन्न संबंध किये अभयभाव से संसार की छलनाओं तथा प्रवंचनाओं के बीच अपने निश्चित पथ पर ऐसे चला जाता है जैसे बलशाली वैनतेय वायु के प्रतिकूल झोकों की उपेक्षा किये, अमृत पथ पर सहजगति से उड़ता चला जाता है।

मनुष्य का विचार शरीर स्थूल शरीर से अधिक शक्तिशाली तथा सक्षम होता है। व्यक्तिगत जो मनुष्य के प्रभाव का मुख्य स्रोत है, विचारों द्वारा ही निर्मित होता है। कर्मों का मूल प्रेरणा केन्द्र भी विचार ही होते हैं। कोई मूर्ति, चित्र अथवा रचना स्थूल अभिव्यक्ति पाने के पूर्व शिल्पी के विचार जगत् में ही जन्मती है, उसी में परिष्कृता पूर्ण होती है, तत्पश्चात् स्थूल उपादानों के माध्यम से मूर्तिमान होकर दृष्टिगोचर होती है। जिस रचना को दूसरे लोग बहुत बाद में उसके भौतिक अस्तित्व में आने के बाद ही देख पाते हैं उसे विचारशील शिल्पी अदृश्य रूप में ही पूर्ण रूप से साकार देख लेता है। यह दिव्य-दृष्टि प्रखर तथा उज्ज्वल विचारों द्वारा ही प्राप्त होती है।

मनुष्य के व्यक्तित्व का निर्माण विचारों द्वारा ही होता है। प्रत्येक शुभ-विचार व्यक्तित्व को उन्मुक्त और विकसित करने में सहायक होता है। शुभ विचारों से मस्तिष्क का शृंगार करने से अवचेतन मन का, जो दिव्य-शक्तियों का केन्द्र होता है, अनुकूल दिशा में सृजन होने लगता है। व्यक्तित्व का वास्तविक निर्माता यह अवचेतन मन ही होता है, जिसका जागरण विचारों द्वारा ही होता और जो जितने शक्तिशाली ढंग से अपने प्रबोधक विचारों का प्रतिपादन करता है, मनुष्य का व्यक्तित्व उतना ही प्रखर तथा सतेज बन जाता है। व्यक्तित्व की तेजस्विता ही अन्य व्यक्तियों को, अनुरूप निर्माण कर संसार में सत्प्रवृत्तियों का संघ बनाकर क्राँति उपस्थित कर देती है। देवता तथा राक्षस दो भिन्न जीवन नहीं हैं। यह मनुष्य के व्यक्तित्व के उज्ज्वल तथा मलीन दो पक्ष ही हैं। जिसने अपने सद्विचारों द्वारा अपना मानसिक परिष्कार कर डाला है, भ्राँतियों, विडंबनाओं, प्रवंचनाओं, आडम्बर, छल-कपट, स्वार्थ अथवा अहंकार की प्रवृत्तियों पर विजय प्राप्त करली है, कलुष एवं कुत्सा को निकाल डाला है, उसका हृदय सद्भावनाओं, सहानुभूति, संवेदन, सहयोग, सेवा और सामंजस्य की विभूतियों से जगमगा उठता है और यही जगमगाहट, कर्मप्रवाह में प्रवाहित हो प्रमाणित कर देती है कि अमुक व्यक्ति देवता है। इसके विपरीत जिसका हृदय, मत्सर, मलीनता तथा मदांधता के अंधकार से भयावह हो रहा है, उसके कर्म उसी अनुसार प्रतिकूलता का प्रतिपादन करते हुए बतला देते हैं कि यह व्यक्ति राक्षस अथवा असुर है। देवता तथा राक्षस कुछ और नहीं, केवल विचारों की परिणति अथवा परिपाक ही होता है, जो किसी की गतिविधि में कदम-कदम पर प्रकट होता रहता है।

विचारों की शक्ति अपरिमित और अनन्त होती है। एक बार इसकी सिद्धि हो जाने पर फिर जन्म-जन्मान्तरों में इसका तारतम्य नहीं टूटता, यह सदा सर्वदा मनुष्य के साथ बनी रहती है, जिससे हर जीवन में उसकी सफलता की सम्भावना सुरक्षित रहा करती है। स्थूल शरीर की शक्ति से कोई एक व्यक्ति किन्हीं एकाध व्यक्तियों को ही नियन्त्रण में रखकर अनुकूल दिया में चलने के लिये विवश कर सकता है, किंतु विचार शरीर की अपूर्व शक्ति से एक मनुष्य पूरे संसार तथा पूरे युग को ही बदल सकता है अथवा अनुकूल दिशा में अग्रसर कर सकता है। लोक नायकों अथवा संसार के जन नेताओं की मुट्ठी भर हड्डियों में कितनी शक्ति होती है। शायद उतनी भी नहीं जितनी एक श्रमिक में होती है। तथापि वह विशाल लोकमत को प्रभावित कर वशीभूत बना लेता है। उनकी यह शक्ति विचार-शक्ति ही होती है। जिसको वे अपने शुभ संकल्पों, सत्प्रवृत्तियों, सत्य, निष्ठा तथा सद्भावनाओं द्वारा लोकहित के लिये ही सिद्ध करते हैं। वे विचारों द्वारा ही वैचारिक तप करके इस अलौकिक शक्ति का जागरण अपने अन्दर कर लिया करते हैं।

जिस-जिस अनुपात से मनुष्य की विचार-शीलता सूक्ष्म की ओर बढ़ती जाती है, उस-उस अनुपात से वह दिव्य-दृष्टा बनता जाता है। भूत, भविष्यत्, वर्तमान् उसके लिए हथेली पर रक्खी वस्तु की तरह स्पष्ट हो जाते हैं। उसकी विचार-शक्ति बड़े-से-बड़े आवरण को भेदकर किसी भी रहस्य अथवा गुह्य भेद को अच्छी तरह देख आती है। विचारों की गति त्रिलोक तथा त्रिकाल में अबाध होती है। वह मनुष्य के अन्तःकरण में छिपी बातों को, हृदय में बसी भावनाओं से संबंध स्थापित कर विचारशील को अन्तर्यामी बना देती है, तभी तो कोई सूक्ष्मदर्शी, दार्शनिक अथवा मनोवैज्ञानिक मानव प्रवृत्तियों को पुस्तक की तरह पढ़ और समझ लेता है। विचारों की शक्ति संक्रामक तथा सर्वव्यापक होती है।

विचारशील राजनीतिज्ञ अपने देश के, अपने निवास के एक छोटे-से कक्ष में बैठा हुआ दूर देशाँतर में होने वाली घटनाओं अथवा घटना मूलक परिस्थितियों को अपने मस्तिष्क में चलचित्र की तरह देखता रहता है और वहीं से विचारों द्वारा बैठा-बैठा, नियन्त्रित अथवा परिवर्तित करता रहता है। पारस्परिक प्रतिस्पर्धा में राज-नायकों की हार-जीत उनकी विचार-शक्ति पर ही निर्भर रहती है। जिनके विचार जितने अधिक सतेज तथा सूक्ष्म होते हैं, वे संसार-चक्र को उतना ही अपनी मनोवांछित दिशा में घुमा सकने में समर्थ होते हैं।

शारीरिक शक्ति में नगण्य वैज्ञानिक विचार-शक्ति द्वारा ही प्रकृति के तत्त्वों को जीतकर उसके रहस्यों का उद्घाटन कर संसार को विस्मय में डाल दिया करते हैं और विचारों की आध्यात्मिक शक्ति ही परमेश्वर जैसे विराट् तथा सर्वशक्तिमान मुनि मानस में प्रकट कर देती है। इस ढाई-तीन हाथ के शरीर में रहता हुआ भी मनुष्य विचारों के बल पर विराट् तथा विशाल बनकर सृष्टि के अणु-अणु में छा जाता है और यह संपूर्ण ब्रह्माण्ड उसके पिंड प्रदेश में प्रतिबिम्बित हो उठता है। विचारों की शक्ति और उनकी महिमा अपार और अनिवर्चनीय है।

अपने अन्दर सोये विचारों को सदाशयता द्वारा जागृत करिये, उन्हें क्रिया रूप में अभिव्यक्ति दीजिये और वह शक्ति प्राप्त कर लीजिये, जिसके द्वारा साधारण मनुष्य महापुरुष, महात्मा और युग-प्रवर्तक बन जाया करते हैं। स्थूल जीवन से विचार जीवन में प्रवेश कीजिये और जन्म-जन्म संसार की प्रेरक शक्ति बनकर अमरत्व का वरण करिये।

विचार का परिष्कार एवं प्रसार करके आप मनुष्य से महामनुष्य, दिव्य मनुष्य और यहाँ तक ईश्वरत्व तक प्राप्त कर सकते हैं। इस उपलब्धि में आड़े आने के लिये कोई अवरोध संसार में नहीं है। यदि कोई अवरोध हो सकता है तो वह आपका स्वयं आलस्य, प्रमाद, असंयम अथवा आत्म अवज्ञा का भाव। इस अनन्त शक्ति का द्वार सबके लिये समान रूप से खुला है और यह परमार्थ का पुण्य-पथ सबके लिये प्रशस्त है, अब कोई उस पर चले या न चले यह उसकी अपनी इच्छा पर निर्भर है।


‘पूर्वजन्म कृतं पापं व्याधि रूपेण पीड़ति’

“डा. बारमन विन्सेंट पीले” अमेरिका के गिरजों के परामर्शदाता मन्त्री थे और मनोवैज्ञानिक चिकित्सक भी। अपने जीवन में उन्होंने सैंकड़ों पीड़ित व्यक्तियों का मानसोपचार किया। विश्लेषण में उन्होंने यह पाया कि रोग-शोक और कुछ नहीं, पूर्व कृत बुरे कर्मों का ही परिणाम होता है। मस्तिष्क में जड़ जमाये हुये काम, क्रोध, लोभ, चोरी के भाव, व्यभिचार आदि शरीर में अपनी सहायक ग्रन्थियों से एक प्रकार का रस (जिसे विष कहना उपयुक्त होगा) स्रवित करते रहते हैं, बीमारियों और व्याधियों का कारण यह स्रवित रस ही होता है, जिसका मूल व्यक्ति के दुर्भाव, दुर्गुण और दुष्कर्म होते हैं।

न्यूजर्सी के गिरजाघर में एक दिन उनका प्रवचन था। भाषण समाप्त कर वह बाहर आये तो एक स्त्री उनके पास आई और याचक स्वर में बोली- ‘‘मैं जब भी किसी गिरजा में जाती हूँ, मेरी बाहों में बड़े जोर की खुजली उठती है। आश्चर्य है कि गिरजाघर से वापस होते ही खुजली कम हो जाती है।’’ कथन की पुष्टि में उसने वस्त्र हटाकर बाहों के चकत्ते भी दिखाये, उस समय खुजलाई गई बाहों से पानी-सा कुछ हव निकल रहा था।

डा. पीले ने पूछा- ‘‘आप किस कुर्सी में बैठी थीं। संभव है उसमें किसी ने कोई ऐसी वस्तु लगा दी हो जिससे खुजली भड़कती हो।” इस पर उस महिला ने बताया कि “ऐसा इसी गिरजाघर में नहीं हुआ। जब भी, किसी भी गिरजाघर में जाती हूँ तो खुजली के कारण बुरी तरह परेशान हो उठती हूँ।”

डा. पीले ने बहुत विचार करने के बाद उन्हें एक दिन घर मिलने को कहा। घर पहुँचने पर डाक्टर ने उस महिला के साथ ऐसी आत्मीयता व्यक्त की, जैसे उनका, उनके साथ परिवार के सदस्य का संबंध रहा हो। महिला उनकी आत्मीयता से बहुत द्रवित हो उठी। आदर, सत्कार के बाद वे अपनी बैठक में पहुँचे और उस महिला से बहुत स्नेह के साथ पूछा- ‘‘आपके जीवन में कहीं कोई त्रुटि, कोई दोष, कोई पाप कर्म हो रहा हो, जिसे आप भयवश किसी से प्रकट न कर रही हों, ऐसा कुछ हो मुझे बताइये।’’

वह बेचारी पहले तो कुछ झेंपी पर बाद में बताया कि “वह जिस फर्म में काम करती है, वहाँ से कुछ पैसा चुरा लिया करती है।” यद्यपि पैसा चुराते समय उसका यह भाव रहता था कि यह पैसे वह शीघ्र ही उस हिसाब में डाल देगी पर वैसा हुआ नहीं। हजारों रुपये चोरी कर लिये अब तो उनका लौटाना भी कठिन हो गया और चोरी एक स्वभाव बन गई। वे जब भी किसी गिरजाघर जातीं इस पाप का उद्वेग मस्तिष्क में छा जाता, और धीरे-धीरे खुजली उठने लगती।

डाक्टर ने उन्हें समझाया- ‘‘बेटी, तुम अपने स्वामी के पास जाकर अपनी भूल स्वीकार कर लो। फिर भविष्य में ऐसा न करना तो फिर तुम्हें यह कभी नहीं होगा।”

महिला उद्विग्न हो उठी। बोली- ‘‘ऐसा करने से मुझे नौकरी से निकाल दिया जायेगा। और लोगों की दृष्टि में उसका सम्मान खो जायेगा।” पर डाक्टर के समझाने पर वे वैसा करने के लिये राजी हो गई।

उन्होंने अपने फर्म मैनेजर से जाकर सारी घटना ज्यों की त्यों कह दी। स्वामी पहले तो बहुत गुस्सा हुआ पर महिला की निष्कलुषता से वह प्रभावित हुए बिना भी न रह सका। उसने महिला को फिर वैसा न करने की चेतावनी देकर क्षमा कर दिया और नौकरी से भी नहीं हटाया। सह-कर्मचारियों पर भी इसका बहुत अच्छा प्रभाव पड़ा और उनका सम्मान भी कम नहीं हुआ। पर जो आश्चर्यजनक बात हुई वह यह थी कि उस दिन के बाद वे किसी भी गिरजा में गई, कहीं भी उन्हें खुजली नहीं हुई।

इस प्रसंग से उपनिषदकार की वह सूक्ति याद आती है-

ज्ञानोदयात् पुराऽऽरब्धं कर्म ज्ञानान्न नश्यति। अदत्वा स्वफलं लक्ष्यमुद्दिश्योत्सृष्ट वाणवत्॥ -अध्यात्मोपनिषत् ॥53॥

अर्थात्- जिस प्रकार लक्ष्य को उद्देश्य करके छोड़ा हुआ बाण लक्ष्य को बेधे बिना नहीं रहता, वैसे ही ज्ञान के उदय होने से पहले किया गया कर्म, ज्ञान का उदय होने के बाद भी उनका फल दिये बिना नहीं रहता। किये हुये कर्म का फल भोगना ही पड़ता है।

इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि अच्छे फल के लिये मनुष्य को अच्छे कर्म करने चाहिये। पर यदि अब कोई अच्छा कर्म- ईश्वर उपासना, सच बोलना, न्याय और परिश्रम की कमाई खाना, नियम, संयम और ब्रह्मचर्यपूर्वक रहना- करने लगा है तो भी अब तक जो दुष्कर्म हो चुके हैं, उनका प्रतिफल भोगे बिना वह रह नहीं सकता। जब तक असत् कर्मों और संस्कारों का प्रक्षालन नहीं हो जाता- अच्छे कर्म करते हुए भी लोगों को व्याधियाँ निश्चित रूप से आती रहेंगी। अब के लिए हुये सत्कर्मों तक का हिसाब न हो जाने तक वह पीड़ायें पिंड नहीं छोड़ सकतीं।

शास्त्रकार ने इस तथ्य का प्रतिपादन दृढ़ता के साथ करते हुए लिखा है- ‘‘अवश्यमेवभोक्तव्यं यद् यद् कर्म शुभाशुमम्” अच्छे-बुरे कर्मों का फल जीवात्मा को अनिवार्य रूप से भोगना पड़ता है। किस पाप और बुराई के द्वारा कौन-सी योनि और व्याधि भोगनी पड़ती है। इसके विवेचन भी बड़े रहस्यपूर्ण हैं। यद्यपि अभी ऐसा कोई वैज्ञानिक यंत्र नहीं बना, जो जीवात्मा की अन्तिम स्थिति का सही मूल्याँकन कर सके पर मानसिक भावों के द्वारा भावी जीवन का अनुमान लगाया जाने लगा है।

कर्मों की गति यद्यपि विचित्र है मानवीय दृष्टि से यह पता लगाना कठिन हो जाता है कि किस पाप का परिपाक कहाँ जाकर होगा। उसका फल कब मिलेगा। चोरी करने वाले को तत्काल कोई दण्ड नहीं मिलता, व्यभिचार करने वाला उस समय पकड़ में नहीं आता पर इन कर्मों का फल कालान्तर में प्रकृति जन्य रूप में उसी प्रकार मिलता है, जिस तरह मक्का का फल दो महीने, जौ, गेहूँ सात महीने में और अरहर के बीज का फल दस महीने में।

पूर्वजन्म में किये हुये पाप व्यक्ति को रोग बनकर सताते हैं, इसका उल्लेख आयुर्वेद में आता है कि- ‘‘पूर्व-जन्म कृतं पापं व्याधि रूपेण पीड़ति”। आज के भौतिकवादी युग में यह बातें कुछ असम्भाव्य लगती हैं पर अब मनोविज्ञान का एक पक्ष ऐसा भी उभर रहा है, जिसने अनेक तथ्यों की खोज के आधार पर यह मानना प्रारम्भ कर दिया है कि इस जन्म के रोग-शोक पूर्वजन्मों या जीवन के दुष्कर्मों का फल होते हैं। ब्रिटेन के मनोविज्ञानी विद्वान् भी अब इसी धारण की ओर अभिमुख हो रहे हैं। इस तरह के सन्दर्भों में मोदीनगर जिला मेरठ की यह घटना भी उल्लेखनीय है-

मोदीनगर के समीप एक गाँव में एक कुम्हार रहता था। उसने बहुत परिश्रम से सात सौ रुपये जमा किये थे। चोरी के डर से उसने यह रुपये एक महाजन के पास जमा कर दिये। कुम्हार का स्वास्थ्य अच्छा न था। कोई बीमारी हो गई और उसी में उसकी मृत्यु हो गई। मृत्यु से पूर्व उसने अपनी धर्मपत्नी को बुलाकर यह बात बता दी थी। कुम्हार की अन्त्येष्टि के बाद उसकी बहू महाजन के पास गई और अपने रुपये माँगे पर अब कोई प्रमाण न होने के कारण सेठ छल कर गया और रुपये उसके पास रखे थे इससे साफ मुकर गया।

कुम्हारिन ने पंचायत बुलाई। पर महाजन ने वहाँ भी झूँठ ही बोला। अन्त में कुम्हारिन ने कहा- ‘‘यदि सेठ साहब, मंदिर में चलकर भगवान् के सामने गंगाजली उठालें तो मैं एक पैसा भी न माँगूँगी।” लोभी महाजन ने मंदिर में जाकर गंगाजली भी उठा ली। पर जब वह मंदिर से निकला उसका चेहरा काला पड़ रहा था।

आखिर पाप का घड़ा फूटा। महाजन को उसी शाम से ही उदर-शूल रहने लगा। वह छोटी-सी बीमारी धीरे-धीरे कैन्सर बन गई और उसी में उसकी जान चली गई। कुम्हार की ‘परिश्रम की कमाई’ खा गई।

रामायण में कर्मफल के अनेक दृष्टान्त आये हैं। एक कथा बड़ी महत्वपूर्ण है-

एक था कैकय देश। उसका राजा प्रतापभानु बड़ा बलशाली और धर्मात्मा था। राजा का भाई था अरिमर्दन वैसा ही भक्त, तपस्वी और बलवान्। दोनों भाइयों ने मिलकर चक्रवर्ती साम्राज्य स्थापित किया।

धीरे-धीरे उन्हें ऐश्वर्य का मद हो गया। उनकी वासनायें और महत्वाकांक्षाएं बढ़ीं। साधन तो थे पर आयु थोड़ी थी, सो उन्हें अमरता की सूझी, किसी ने उन्हें कहा कि तुम यदि माँस खाओगे तो अजेय हो जाओगे। पर ऐसा करने के लिये तुम्हें ब्राह्मणों से आज्ञा न मिलेगी, इसलिये तुम्हें छलपूर्वक सर्वप्रथम ब्राह्मणों को माँस भक्षण कराना होगा। उन्होंने वैसा ही किया। ब्राह्मणों को यह बात मालूम हुई तो वे बहुत कुपित हुये और शाप दे दिया। इसी पाप के फलस्वरूप प्रतापभानु निश्चर कुल में जन्मा। रामायण में उसकी व्याख्या इस तरह है-

काल पाइ मुनि सुनुसोई राजा, भयउ निसाचर सहित समाजा।

दस सिर ताहि बीस भुजदंडा, रावन नाम बीर बरवंडा।

कामरूप जानहिं सब माया, सपनेहु जिन्हके धरम न दाया।

जेहि विधि होई धम्र निर्मूला, सो सब करहिं वेद प्रतिकूला।

और उनके इस आचरण का दंड उन्हें वंश-नाश के रूप में मिला। छोटे से पाप के कारण आचरण, शील, कुल, बल का वैभव भी काम न आया। रावण को आज भी लोग बुरा कहते हैं, उसे सदैव अपयश ही अपयश मिला।

वेद, उपनिषद्, गीता, रामायण आदि सद्ग्रन्थों की वाणी को अब झुठलाया जाता है पर उन तथ्यों को जो आज के वैज्ञानिक प्रस्तुत कर रहे हैं, उन्हें तो नहीं झुठलाया जा सकता। ऊपर की घटनाओं के अतिरिक्त सैकड़ों घटनायें प्रकाश में आई हैं, उनमें से एक यों है-

अमेरिका में एक बहुत बड़े क्लिनिक डा. सी. डब्लू. लेव हुए हैं। उनके पास एक ऐसा रोगी आया करता था, जो आये दिन नये रोग की शिकायत किया करता था। कभी सिर दर्द, कभी डिसेन्टरी, कभी तनाव, कभी थकावट डाक्टर ने हारकर एक दिन कह दिया- लगता है, तुम कोई ऐसा काम कर रहे हो, जिसके लिये तुम्हें अपनी आत्मा को दबाना पड़ता है। कोई पाप कर रहे हो उसी के कारण तुम्हारे भीतर से रोग फूटते रहते हैं। पहले तो वह इनकार करता रहा पर बाद में उसने स्वीकार किया कि उसका एक भाई किसी दूसरे देश में रहता है। जब पिता जीवित थे तो वह यह व्यवस्था कर गये थे कि उसकी जायदाद का समान भाग दोनों को मिलता रहे पर उक्त सज्जन अपने भाई को थोड़े से डालर भेजते थे शेष स्वयं हड़प कर जाते थे।

जब अपना सारा पाप बयान कर चुके तो उन सज्जन ने बड़ा हल्कापन अनुभव किया, उसी दिन उसने जब तक भाई के हिस्से की जितनी धनराशि थी, वह सब भेज दी साथ में पूर्वकृत पाप के लिये क्षमा भी माँगी। इसके बाद उन्हें किसी शारीरिक पीड़ा ने कष्ट नहीं दिया।

अब मनोविज्ञान यह मानने लगा है कि मनुष्य के शरीर में व्यक्त या अव्यक्त भावनाओं का प्रभाव गहराई तक पड़ता है। यह प्रभाव शरीर में स्नायु-मंडल और नलिकाविहीन ग्रन्थियों के स्राव-हारमोन्स द्वारा फूटता है। बेईमानी, छल, कपट, पर-पीड़न, व्यभिचार, चोरी, क्रोध, साहसहीनता, दुर्भावनायें, निराशा, आदि नलिकाविहीन ग्रन्थियों को दबाती हैं, उनसे जो रस निकलता है, वह शरीर में थकावट, उत्साह-हीनता, कष्ट-पीड़ा, कड़वाहट, घबराहट और मलीनता पैदा करता है। दबाव अधिक होने से असह्य वेदना, ऐंठन, कब्ज आदि बड़े रोग बढ़ते हैं। यह किसी कीटाणुओं के कारण नहीं वरन् दुर्भावनाओं की सूक्ष्म प्रतिक्रिया होती है।

यदि अपने जीवन में सचाई, ईमानदारी, आशा, परोपकार, सेवा, सहिष्णुता, ईश्वर-प्रेम, धैर्य, उत्साह आदि के गुण हों तो अन्तःस्रावी ग्रन्थियों से अमृत-जैसा रस टपकता है, उससे सुखानुभूति, प्रेमाकर्षण, स्नेहपूर्ण भावनाओं का उभार होता है और सामान्य जीवन होने पर भी वह व्यक्ति अपने आप में असीम सुख और तृप्ति अनुभव करता है।


शब्द तत्व की अद्भुत एवं आश्चर्यजनक शक्ति

सामान्यतः मनुष्यों को जल, भाफ, अग्नि, विद्युत, वायु, गैस आदि की शक्ति का तो अनुभव हुआ करता है, परन्तु ‘शब्द’ में भी कोई ऐसी शक्ति होती है, जो स्थूल पदार्थों पर प्रत्यक्ष प्रभाव डाल सके, इस पर उनको शीघ्र विश्वास नहीं होता। वे यह तो मान सकते हैं कि मधुर शब्दों से श्रोता का चित्त प्रसन्न होता है कठोर शब्दों से विषण्णता उत्पन्न होती है, भावयुक्त संगीत-लहरी से हृदय का तार-तार झनझना उठता है, वीरतापूर्ण गीत जब आवेश-युक्त स्वर में गाया जाता है तो सैनिक मरने-कटने को उछलने लगते हैं। पर ये सब ऐसे भावनात्मक प्रभाव हैं, जिनका अनुभव प्रत्येक व्यक्ति समान रूप से नहीं कर सकता। कोई भी करुणोत्पादक गीत कोमल और कठोर हृदय वाले दो भिन्न व्यक्तियों पर एक-सा प्रभाव नहीं डाल सकता। इसी प्रकार कोई शृंगार रसपूर्ण गायन एक सद्य-विवाहित नवयुवक और वृद्ध संन्यासी को एक समान प्रभावित नहीं कर सकता।

पर अब अनेक वैज्ञानिक परीक्षणों द्वारा इस बात को सिद्ध कर रहे हैं कि शब्दों का प्रभाव केवल भावनात्मक ही नहीं होता वरन् उनके द्वारा जो अदृश्य तरंगें वातावरण में उत्पन्न होती हैं, उनसे अनेक पदार्थों को निश्चित रूप से प्रभावित किया जा सकता है। उदाहरण के लिये यदि किसी काँच के गिलास को हल्की चोट द्वारा बजाकर उसके साथ उसी से मिलती ध्वनि ‘पियानो’ या सारंगी आदि किसी वाद्य-यन्त्र द्वारा लगातार बजाई जाय तो कुछ देर में वह गिलास उन शब्द-तरंगों की शक्ति से चूर-चूर हो जायेगा।

जर्मनी के प्रथम महायुद्ध के पश्चात् वहाँ के वैज्ञानिकों ने जो युद्ध संबंधी आविष्कार किये थे, उनमें शब्द-शक्ति द्वारा सेनाओं का संहार करने वाले एक यंत्र का विवरण भी ज्ञात हुआ। उसके आविष्कारक का कहना था कि जब उक्त यंत्र द्वारा प्रति-सेकेंड दस लाख से भी अधिक कम्पनों की ध्वनि उत्पन्न की जायगी तो वह इतनी तीव्र होगी कि मनुष्य के ज्ञानतन्तु उसके कारण तुरन्त नष्ट हो जायेंगे और उसकी मृत्यु में एक सेकेंड भी नहीं लगेगा। वे शब्द-तरंगें जिन व्यक्तियों पर केन्द्रित की जायेगी, वे बिजली से स्पर्श होने वाले प्राणी की तरह तुरन्त प्राणहीन हो जायेंगे। पर युद्ध-संबंधी आविष्कार सदैव अत्यंत गुप्त रखे जाते हैं, इसलिये आगे चलकर यह पता नहीं लगा कि वह वैज्ञानिक अपने यंत्र को कहाँ तक व्यवहारिक रूप दे सका और सैनिक अधिकारियों ने उसके संबंध में क्या निश्चय किया?

पर अब भारत तथा अन्य देशों के अनेक वैज्ञानिक शब्द-शक्ति का कितने ही रचनात्मक कार्यों में प्रयोग करने के परीक्षण कर रहे हैं। अन्नामलाई विश्वविद्यालय (दक्षिण-भारत) के वनस्पति-विज्ञान के विभागाध्यक्ष डा. टी. सी. एन. सिंह और उनकी एक सहयोगी कु. स्टेला पुनैया ने कई वर्ष तक परीक्षण करके यह सिद्ध किया है कि संगीत की ध्वनि से पौधों के स्वास्थ्य और विकास पर बहुत अच्छा प्रभाव पड़ता है। कु. पुनैया जो अच्छी संगीतज्ञ भी हैं, नित्य सुबह वायलिन बजाकर पौधों को सुनाती हैं। डा. सिंह ने परीक्षण के तौर पर बगीचे को दो भागों में बांट दिया। दोनों भागों में एक ही नस्ल के एकसे पौधे रखे गये। इनमें से एक भाग के पौधों को संगीत-ध्वनि के वातावरण में पनपने का अवसर दिया गया। डा. सिंह ने लगातार दस वर्ष तक सूक्ष्मवीक्षण (खुर्दबीन) से पौधों के आन्तरिक परिवर्तन का अध्ययन किया। इससे सिद्ध हुआ कि संगीत से पौधे शीघ्र और अच्छे आते हैं।

इस समय संसार में कई अन्य देशों में भी संगीत की शक्ति के संबंध में इस प्रकार के परीक्षण हो रहे हैं। कनाडा में गेहूँ के एक खेत के चारों ओर दूरभाषी यंत्र (लाउड-स्पीकर) लगे हुये हैं, जो प्रातःकाल सूर्योदय होते वायलिन के संगीत को प्रसारित करते हैं। अमरीका में भी कई किसान संगीत के प्रभाव से अपनी फसलें बढ़ाने के प्रयत्न में लगे हैं। दोवातेसा के श्री आर्थर लाकर की राय है कि संगीत के प्रभाव से उनके बगीचे के फूल-पौधे, सीधे, घने, ज्यादा फल-फूलदार और सुन्दर होने लगे हैं। उनमें फूल काफी अर्से तक लगे रहे और बीज निर्माण भी द्रुतगति से हुआ। अमरीका की कितनी ही गौशालाओं में संगीत के प्रभाव से गायों के दूध की मात्रा बढ़ाई गई है, यह समाचार भी सामयिक पत्रों में प्रकाशित हुआ है।

भारतीय संगीत-शास्त्र में अन्य राग-रागनियों के साथ दीपक-राग और मेघ-मल्लार-राग का नाम भी बढ़ने को मिलते हैं। जानकारों का कथन है कि दीपक-राग के गाने से दीपक स्वयमेव जल जाते थे और मेघ-मल्लार के गाने से वर्षा होने लगती थी। वर्तमान समय में संगीतज्ञ उस विधि को भूल गये हैं और कोई इस क्रिया को प्रत्यक्ष करके नहीं दिखा सकता। इससे कुछ लोग इन्हें मनगढ़न्त कल्पना बताने लगे हैं। पर यदि संगीत की ध्वनि के प्रभाव से पौधों की वृद्धि हो सकती है और गायें अधिक दूध दे सकती हैं तो कोई कारण नहीं कि दीपक-राग और मेघ-मल्लार की बात को गपोड़ा माना जाय। शब्द-शक्ति के सिद्धान्त की दृष्टि से दोनों घटनायें एक-सी हैं।

कुछ समय से संगीत के विविध राग-रागनियों द्वारा अनेक प्रकार के रोगों को मिटाने की चर्चा भी सुनाई देने लगी है। वास्तव में यह भी भारतीय संगीत-शास्त्र की एक प्राचीन उपलब्धि है। कुछ वर्ष पहले बीकानेर के राजकीय पुस्तकालय में एक हस्तलिखित ग्रन्थ मिला जिसमें बतलाया गया था कि किस राग-रागिनी के द्वारा कौन-सा रोग अच्छा किया जा सकता है। अब विदेशों के कितने ही अस्पतालों में इस विधि का प्रयोग किया जाना आरम्भ हो गया है। वहाँ जिस रोग के लिये जिस प्रकार की संगीत-ध्वनि उपयोगी मानी जाती है, उसी का रिकार्ड ग्रामोफोन पर लगाकर रोगी के पास रख दिया जाता है। स्नायु और मस्तिष्क संबंधी रोगों में संगीत का प्रयोग विशेष फलदायक सिद्ध हो रहा है।

शब्द की शक्ति पर विचार करते हुए हमारा ध्यान भारतीय-मंत्रशास्त्र की तरफ जाता है। हमारे प्राचीन धर्म-ग्रन्थ मंत्रों की महिमा से भरे पड़े हैं और आज भी करोड़ों व्यक्ति मंत्रों के जप और प्रयोग द्वारा अपनी तरह-तरह की कामनाओं को पूरा करने का उद्योग करते रहते हैं। यहाँ की साधारण जनता का तो मंत्रों में अटल विश्वास है, पर आधुनिक शिक्षा प्राप्त व्यक्ति मंत्र-शक्ति का कोई तर्क और बुद्धि-युक्त प्रमाण न मिलने से, उनको मानने से इनकार करते हैं। वे कहते हैं कि यह कैसे हो सकता है कि एक व्यक्ति द्वारा कुछ शब्दों के उच्चारण करने से दूसरे व्यक्ति का शिर का दर्द मिट जाय या बिच्छू आदि का विष उतर जाय? मंत्र द्वारा सन्तान होना, शत्रु पर विजय प्राप्त करना या लक्ष्मी की प्राप्ति आदि अनेक ऐसी बातें हैं, जिनके संबंध में लोगों में मतभेद दृष्टिगोचर होता है और प्रायः वाद-विवाद भी होने लगता है। एक मंत्र-शक्ति का पूर्णतः समर्थन करता है और दूसरा उसे कोरा बहम या कल्पना बतलाता है।

मन्त्र-शास्त्र का समर्थन करने से हमारा आशय यह नहीं कि आजकल जो ओझा, स्याने-भोपा आदि ‘मन्त्र’ का व्यवसाय करते हैं, वे सब वास्तव में उसके जानकार हैं और जो कुछ क्रिया वे करते हैं, वह पूर्णतया सच्ची होती है। जिस प्रकार आजकल सभी प्राचीन विद्याओं का लोप हो गया है और उनमें वास्तविकता के बजाय ढोंग और छल का प्रवेश अधिक हो गया है, वही दशा मन्त्र-शास्त्र की भी समझनी चाहिये। लोग न तो उसके तत्त्व को समझते हैं और न परिश्रमपूर्वक पूरा विधि-विधान करते हैं, उन्होंने तो इस केवल पेट भरने का धन्धा बना लिया है। अन्यथा जिस प्रकार विदेशों के विद्वान् पुरुष विज्ञान की विभिन्न शाखाओं की खोज कर रहे हैं और वास्तविकता का पता लगाने के लिये तन, मन, धन सब कुछ अर्पण कर देते हैं, उसी प्रकार यदि हमारे यहाँ भी शब्द-विज्ञान और उसके अंतर्गत मन्त्र-विज्ञान की खोज की जाती तो सैकड़ों ऐसे आश्चर्यजनक तथ्यों का पता लगता, जिससे हमारा व्यक्तिगत कल्याण होने के साथ ही भारतीय-संस्कृति का भी मुख उज्ज्वल होता।

भारतीय-दर्शन के मत से शब्द की शक्ति सबसे अधिक है, क्योंकि वह आकाश-तत्त्व से संबंधित है, जो सर्वाधिक सूक्ष्म होता है और सूक्ष्म-तत्त्व की शक्ति, स्थूल-तत्त्व की शक्ति की अपेक्षा कहीं अधिक होती है। बारूद या किसी अन्य स्फोटक पदार्थ को जब विशाल शक्ति के रूप में परिणित करना होता है, तो उसमें चिनगारी लगाकर उसे स्थूल से सूक्ष्म गैस के रूप में परिवर्तित कर दिया जाता है। आज हम आश्चर्य करते हैं कि प्राचीन ऋषि-मुनि किस प्रकार किसी मन्त्र या कुछ गूढ़ शब्दों का उच्चारण करके विनाश और निर्माण के बड़े-बड़े काम क्षणमात्र में कर दिखाते थे? इसका रहस्य यही था कि आज जिस प्रकार वैज्ञानिकों ने पिछले सौ वर्षों में स्फोट करने वाले स्थूल पदार्थों की खोज करते-करते भयंकर बम और घण्टे में आठ हजार मील दौड़ने वाले राकेट बना डाले, उसी प्रकार भारतीय ऋषि-मुनियों ने स्थूल पदार्थों के बजाय सबसे सूक्ष्म तत्त्व आकाश से उत्पन्न शब्द-शक्ति का अनुसंधान किया था और उसके प्रयोग की ऐसी-ऐसी विधियाँ मालूम की थीं कि जिसके प्रभाव से विश्व-ब्रह्माण्ड में भी हलचल उत्पन्न की जा सकती थी। आज भी जो लोग इस विद्या की एकाध छोटी-मोटी विधि को भली प्रकार सीख लेते हैं, वे आश्चर्यजनक कार्य कर दिखाते हैं।

मन्त्र की क्रिया में केवल उसकी ध्वनि का ही (चाहे वह सुनने में आवे और चाहे भीतर ही उच्चारण किया जाय) प्रभाव नहीं पड़ता वरन् उसकी भावना तथा संकल्प शक्तियाँ भी काम करती रहती हैं। इन दोनों के मिल जाने से मन्त्र की शक्ति बहुत बढ़ जाती है। एक विद्वान् के कथनानुसार “भारतीय लिपि और अक्षर पूर्णतः वैज्ञानिक हैं और उसकी ध्वनियों में एक विशेष रहस्य छिपा है। मन्त्र में ‘आस्था’ भी एक प्रबल तत्त्व होता है, जिसे मानने में कितने ही लोग आना-कानी करते हैं। वैसे बिना ‘आस्था’ या भावना के भी मन्त्र-शक्ति का अनुभव किया जा सकता है, पर उसमें विलम्ब अधिक लगता है। इसीलिये किसी मन्त्र को सिद्ध करने के लिये दस हजार बार या लाख बार जपने का विधान बनाया गया है। इससे उसकी ‘आस्था’ हृदय में बद्धमूल हो जाती है।”

इस सबका निष्कर्ष यही है कि शब्द की शक्ति से अनेक बड़े महत्वपूर्ण कार्य संपन्न किये जा सकते हैं। हमारे पूर्वजों ने तो इस तथ्य को पूर्ण रूप से हृदयंगम करके उसे ‘शब्द-ब्रह्म’ की संज्ञा दी थी और ‘ॐ’ के रूप में उसको सृष्टि का उत्पादक माना था। ऐसी महान् शक्ति से अपरिचित रहना या उसकी उपेक्षा करना अपने हित पर स्वयं कुठाराघात करना है। हमको इस घातक प्रवृत्ति से बच कर शब्द ब्रह्म की उपासना करके उससे अधिकाधिक लाभ उठाना चाहिये।


मंत्र-शक्ति

मलेशिया (दक्षिण-पूर्व एशिया) में वर्षा को रोकने के लिये जादूगरनियों की मंत्र-शक्ति से काम लिया जाता है। वहाँ की भाषा में इनको ‘वमोह’ कहते हैं। और आश्चर्य इस बात का है कि इनसे काम कराने वाले होते हैं, योरोप और अमरीका के आधुनिक नवशिक्षित व्यक्ति। अभी कुछ वर्ष पूर्व राष्ट्र-मंडल की क्रिकेट-टीम जब खेलने के लिये मलाया गई तो उनके ‘मैच’ में वर्षा से बाधा न पड़ने देने के लिये एक ‘वमोह’ को बुलाया गया था।

परिणाम हुआ कि जब ‘कुआलालम्पुर’ (मलाया की राजधानी), में सब जगह मूसलाधार वर्षा होती रही, खेलने का मैदान बिल्कुल सूखा रहा। इसी प्रकार अमरीका की एक फिल्म कम्पनी जो मलाया में ‘शूटिंग’ करने आई थी, उसने भी इन जादूगरनियों की सहायता से ही अपना कार्यक्रम सकुशल पूरा किया। वहाँ के राजा परमेसुरी अगोंग और रानी यांग दि येर्तुआन ने जब भी रहमाह नाम की जादूगरनी को बुलाया गया और शाही बारिश की विघ्न-बाधाओं के बिना अच्छी तरह हो गई। मंत्र में निहित शब्द-शक्ति का यह चमत्कार हजारों व्यक्तियों ने अपनी आँखों से देखा है। चाहे वे शब्द की सूक्ष्म शक्ति को न जानने के कारण जादूगरनियों की शक्ति पर तरह-तरह के सन्देह करते हों, पर उसका प्रत्यक्ष परिणाम देखकर उनकी सचाई को मानना ही पड़ता है।


निकृष्टता को परास्त कर उत्कृष्टता वरण करें

संसार का हर व्यक्ति एक महान् व्यक्ति है, साथ ही निम्न भी। इसी का तात्पर्य यह है कि हर मनुष्य में महानता और निम्नता दोनों प्रकार के तत्त्व छिपे रहते हैं। किसी को महानता ही महानता के गुण देकर और किसी को निकृष्टता ही निकृष्टता के अवगुण देकर भेजती हो- न्यायशील प्रकृति ऐसा अन्याय कभी नहीं करती।

महानता की ओर बढ़ने और निम्नता की ओर गिरने की एक प्रक्रिया है, जिसको अपनाकर लोग ऊँचे उठते हैं और नीचे गिरते हैं। वह प्रक्रिया क्या है? आन्तरिक देवासुर संग्राम। मनुष्य के हृदय में दैवी और आसुरी दोनों प्रकार की प्रवृत्तियाँ विद्यमान् रहती हैं। जो व्यक्ति अपने प्रयत्न एवं पुरुषार्थ द्वारा आसुरी वृत्तियों को शमन कर दैवी वृत्तियों का विकास कर लेता है, उन्हें पुष्ट और प्रबल बना लेता है, वह महानता की ओर उठ जाता है। और जो व्यक्ति प्रमादवश ऐसा नहीं करते उनकी दैवी प्रवृत्तियाँ दब जाती हैं और आसुरी वृत्तियाँ प्रबल हो जाती हैं। इस प्रकार का आसुर्य प्रभावित व्यक्ति पतन के गर्त में गिर जाता है।

देवत्व का उत्थान ही उच्चता अथवा महानता है और असुरत्व की प्रबलता ही पतन है। एक संत अथवा जन-सेवक जिसके पास न धन है, न पद है और न कोई सत्ता, लेकिन अपनी सेवाओं, दया, करुणा, प्रेम, सहानुभूति आदि गुणों के कारण महान है। जबकि बड़ी-बड़ी विजय करने वाला, साम्राज्य स्थापित करने वाला, शासन तन्त्र संचालित करने वाला उच्च पद प्रतिष्ठित, सम्पत्ति, सत्ता और शक्ति संपन्न होते हुये भी अपने अत्याचार, अनीति, अन्याय, शोषण, उत्पीड़न की वृत्ति के कारण पतित है, निम्नकोटि का है। महानता अथवा निम्नता का भाव स्थिति में नहीं बल्कि आन्तरिक गुण, अवगुणों में रहता है।

महानता का शुभारम्भ अंतर से होता है, बाह्य से नहीं। अंतर को महान् बनाये बिना वास्तविक रूप कोई महान् नहीं बन सकता, यदि कोई अधो अंतर डडडड संयोग, चातुर्य अथवा परिस्थितियों द्वारा किसी उच्च डडडड और प्रतिष्ठा पर पहुँच भी जाता है तो बहुत दिन तक वह अपने उस ऐश्वर्य को सुरक्षित नहीं रख सकता। डडडड आन्तरिक विकृतियाँ उसे निकृष्ट कार्य और विचार जाल में फांसकर शीघ्र ही धूल में गिरा देती हैं। संसार में रावण, कुम्भकरण, कंस, दुर्योधन आदि न जाने कितने अधोअंत वाले व्यक्ति उच्च-पद पर पहुँच-पहुँच कर ऐसे पतित हुए कि आज तक घृणापूर्वक कहे जाते हैं। आज भी आये दिन किन्हीं कारणों से पूजा और प्रतिष्ठा के स्तर तक पहुँचकर न जाने कितने तथा कथित साधु-संत, महात्मा, नेता और सत्ताधारी अपनी अधो-मनोवृत्ति की प्रतारणा से अधोगति को प्राप्त होते रहते हैं।

इसके विपरीत संसार में ऐसे महानुभावों की कमी भी नहीं है और न रही है, जो पतित अवस्था से, आन्तरिक सुधार के आधार पर पूजा और प्रतिष्ठा के पद तक पहुँचे हैं। ऐसे महान् व्यक्तियों में वाल्मीकि, अंगुलिमाल, डडडड तुलसी आदि न जाने कितने महात्मा और अशोक आदि राजा गिनाये जा सकते हैं। महानता का आधार डडडड है, बाह्य परिस्थितियाँ नहीं। महानता वास्तव में ऐसे डडडड हैं, जो अन्तर की डाली पर लगा करते हैं। यदि आन्तरिक डाली मजबूत और उपयुक्त नहीं है तो निश्चय ही डडडड पर लग जाने वाले महानता के फल स्वयं तो नष्ट हो ही जायेंगे, व्यक्ति का अस्तित्व भी उसी प्रकार नष्ट कर देंगे जैसे फलों के भार से वृक्ष की कमजोर डाली फट पड़ती है और शीघ्र ही ईधन बनकर स्वाहा हो जाती है।

संसार में सभी को महानता वाँछनीय है। उसे डडडड करने का प्रयत्न भी करना चाहिये। क्योंकि मानव-जीवन की सार्थकता इसी में है। तथापि धन, सम्पत्ति और पद प्रतिष्ठा के लिये यों ही सहसा दौड़ पड़ने से पूर्व आवश्यक डडडड कि उसका विकास पहले अपने हृदय में, अपने चरित्र में कर लिया जाय।

अच्छे विचार, अच्छी आदतें और उपयुक्त व्यवहार के डडडड-गुण ही हृदय और चरित्र की महानता हैं। प्रेम, डडडड, सहानुभूति, सेवा और विनय के भाव मनुष्य का उच्च आदर्श है। हमें कोई और प्रयत्न करने से पूर्व अपने में यह विशेषतायें विकसित कर ही लेनी चाहिये। इस विकास कार्य में जो भी समय और श्रम लगे, लगाने में संकोच नहीं करना चाहिये। यदि हम अन्तर से महान् बन गये और दैवयोग से संसार में कोई पूजा, प्रतिष्ठा का पद न भी पा सके, तब भी कोई खेद अथवा हानि की बात नहीं है। यथार्थ बात तो यह है कि जो अपने हृदय और आत्मा से महान् होता है, उसे साँसारिक पूजा, प्रतिष्ठा की लिप्सा नहीं होती। अधिकाँश लोग अपने अन्तर और आत्मा का खोखलापन ही उनके द्वारा भरने का असफल प्रयत्न किया करते हैं। ऐसे रिक्तात्मा व्यक्ति यदि साँसारिक पूजा, प्रतिष्ठा पा भी नहीं जाते हैं तो भी उन्हें किसी प्रकार की शाँति, संतोष, सुख अथवा आत्म-गौरव प्राप्त नहीं होता। वे सिवाय दम्भ की तुष्टि और आत्मा-प्रवंचना के और कुछ भी नहीं पा पाते। दृश्य उद्यान में भी जीवन भर मरीचिका की प्यास से पीड़ित रहकर उससे भी निकृष्ट मृत्यु मरते हैं, जितना कोई आत्महन्ता।

आन्तरिक औदात्य और चारित्रिक महानता पा लेने वाला धन-दौलत, पूजा-प्रतिष्ठा के अभाव में भी अपने में एक आध्यात्मिक शाँति, नैसर्गिक संतोष और आनन्ददायक पूर्णता का अनुभव किया करता है। अस्तु, बाहर की किसी महानता के लिये दौड़ पड़ने से पूर्व आन्तरिक और चारित्रिक पूर्णता प्राप्त करने का प्रयत्न करना चाहिये। महानता की ओर बढ़ने का यही साधु मार्ग है और यही उपयुक्त नीति है।

उच्च और निम्न बनने के दोनों अवसर होते हुए ऐसा कौन होगा, जो महान् न बनकर निम्न बनना चाहेगा? महान् बनने के लिये आँतरिक द्वन्द्व, देवासुर संग्राम लड़ना ही पड़ेगा। इस संग्राम में देव तत्त्वों की विजय के आधार पर ही महानता प्राप्त हो सकेगी। इस संग्राम को प्रारम्भ करने की रीति यही है कि पहले यह देखा जाय कि मेरे भीतर कौन-कौन से आसुरी तत्त्व अधिक प्रबल हैं। जो आसुरी तत्त्व अधिक प्रबल हों उन पर निरन्तर कठोर प्रहार करते रहना चाहिये और अन्यों के साथ असहयोग। किन्तु केवल इतना अपूर्ण मोर्चा होगा। मोर्चा पूरा करने के लिये साथ ही दैवी वृत्तियों को पोषित और प्रोत्साहित करना होगा।

इस विधि से युद्ध चलाने पर आसुरी तत्त्व निर्बल और देव तत्त्व प्रबल हो उठेंगे। एक बार पूर्णतया प्रबल हो जाने पर देव तत्त्व असुर तत्त्वों को पूरी तरह दबाकर उन्हें नष्ट कर देंगे। मन, बुद्धि और शरीर को अपने अधीन कर लेंगे और तब उस संग्राम में आपकी पूर्ण विजय हो जायेगी। इस विजय के साथ ही आप स्वभावतः महानता की ओर अग्रसर हो चलेंगे।

आसुरी तत्त्वों की निर्बलता और सुरतत्त्वों की प्रबलता और पालन प्रोत्साहन का अमोघ उपाय है, श्रेष्ठता का आग्रहन। संसार की सारी श्रेष्ठतायें ईश्वरीय तत्त्व हैं उनको आश्रित करते ही शरीर में, मन में, और मस्तिष्क में शक्ति के रूप में ईश्वरी अनुकम्पा का प्रवेश होने लगेगा। जिसको यह अनुकम्पा मिल जाये, उसकी विजय को कौन रोक सकता है? हाथ में जो भी कर्त्तव्य लिया जाय उसे सम्पूर्ण श्रेष्ठता के साथ किया जाय। जिस विचार को भी स्थान दिया जाय, वह श्रेष्ठ हो। जिस आकाँक्षा एवं कल्पना को जन्म दिया जाये, वह शुद्ध और सार्थक हो। इस प्रकार सब ओर सब प्रकार श्रेष्ठता को आश्रित करने से असुरता को परास्त और देवत्व को प्रबल होते देर न लगेगी।

श्रेष्ठता की आवश्यकता कर्त्तव्यों और विचारों तक ही सीमित नहीं है। उसका सन्निवेश जीवन की छोटी-से-छोटी क्रिया में होना चाहिये। भोजन किया जाये तो शुद्ध और सात्विक, रहन-सहन, सुन्दर और सादगी से भरा हो। बच्चों, पत्नी और परिवार के लोगों के साथ उत्तम व्यवहार और मित्रों तथा समाज-साथियों के साथ किया जाने वाला बर्ताव भी उत्तम हो। यहाँ तक कि वाणी, शब्दों और भाव-भंगियों में भी शिष्टता, मधुरता और सत्यता हो। यह जीवन क्रम की छोटी-छोटी क्रियायें भी श्रेष्ठता से सज्जित कर संग्राम में उसी प्रकार लगानी होंगी, जैसे संक्रातिकाल में किसी प्रबुद्ध देश का बच्चा-बच्चा विजय के लिये अपने स्थान पर अपनी तरह काम में लग जाता है।

इस देव-अभियान के साथ कभी-कभी असुरता का भी प्रबल आक्रमण होगा। क्यों न होगा? असुरतत्व योंही शीघ्रता से अपनी पराजय मान भी कैसे लेंगे। वे भी अपनी करनी में कसर नहीं छोड़ेंगे। जब भी अवसर पायेंगे, निराशा, निरुत्साह, आलस्य, प्रमाद, प्रशभन, स्वार्थ, लोभ, काम, क्रोध, अहंकार आदि के रूप में आक्रमण करेंगे। आसुरी तत्त्वों का यह आक्रमण बड़ा प्रबल होता है। इसे रोकने और विफल करने में ही पुरुष का पुरुषार्थ पता चलता है। यह आक्रमण ऐसे प्रबल सम्मोहन से आवृत होता है कि अच्छे-अच्छे बुद्धिमान् भ्रम में फँस जाते हैं।

इस मायावी आक्रमण से बचने के लिये मनुष्य के पास एक बड़ा भारी संबल भी होता है। वह है आत्म-विश्वास और आत्म-निष्ठा। तुरन्त उसका आश्रय लेकर घोषणा कर देनी चाहिये कि मैं हाड़-माँस का बना जड़ शरीर नहीं हूँ। मैं शुद्ध-बुद्ध चेतन आत्मा हूँ। परमात्मा का अंश शुद्ध अंश। इस संकल्पपूर्ण उद्घोष के साथ मनुष्य को अपनी ईश्वरता का बोध होने लगता है। जहाँ इस परमात्म-बोध का प्रकाश विद्यमान् हो वहाँ माया का अंधकार किस प्रकार ठहर सकता है।

असुर संग्राम जीतने के लिये आत्म-निष्ठा एक प्रबल संबल है और आत्म-विश्वास एक अमोघ अस्त्र। आत्मा के रूप में मनुष्य के भीतर ऐसी चमत्कारी शक्तियों का भण्डार भरा है, जिसको जाने बिना, कल्पना तक नहीं की जा सकती। आत्म-निष्ठा में उतरते ही मनुष्य में एक दिव्य तेज का समावेश हो जाता है। उसका विवेक शक्तिशाली होकर प्रधान सेनापति की भूमिका प्रदान करता है।

इस प्रकार अंतर के देवासुर संग्राम में विजय पाकर मनुष्य को बाह्य महानताओं के लिये अग्रसर होना चाहिये डडडड ऐसे समर्थ पुरुष को संसार का कोई भी इष्ट दुर्लभ नहीं डडडड असुरजयी देव-पुरुष स्वयं ही अपने कल्पतरु हुआ करते हैं डडडड वे जिस समय जो सिद्धि चाहते हैं, उन्हें मिल जाती है आन्तरिक आभा से दीप्त मुख मंडल और विश्वसत व्यवहार को लेकर वे जिस ओर निकल जायेंगे समाज उनके अभ्यर्थना में खड़ा हो जायेगा और चाहेगा कि वह उनका नेतृत्व करे, पथ प्रकाशन करे। जिससे कि वे भी भौतिक और आध्यात्मिक उपलब्धियों के योग्य बन सकें।

हर मनुष्य में एक जन्मजात महापुरुष छिपा होता है लेकिन वह आसुरी तत्त्वों के कारागार में बन्द होता है। मनुष्य का कर्त्तव्य है कि वह उसे देव तत्त्वों की सहायता से मुक्त कर उठाये और महान् कृत्यों द्वारा महानता की ओर बढ़े। यह उसका कर्त्तव्य है और यही अधिकार भी है।


यूनेज सैन्डो

बालक यूनेज सैन्डो अत्यंत दुर्बल और रोगी था। अपनी बुरी आदतों के कारण उसने बचपन में ही अपना स्वास्थ्य खराब कर लिया। एक दिन सैन्डो अपने पिता के साथ अजायब घर देखने गया। रोम की गैलरी में उसने प्राचीनकाल के बलिष्ठ पुरुषों की मूर्तियाँ देखीं। उसे विश्वास न हुआ कि ऐसे माँसल भुजाओं वाले स्वस्थ और बलवान् लोग भी इस संसार में हो सकते हैं। सैन्डो इन प्रतिमाओं को देखकर बहुत प्रभावित हुआ।

उसने पिता से पूछा- ‘‘पिताजी! यह प्रतिमायें काल्पनिक हैं अथवा ऐसा स्वास्थ्य कभी सम्भव हो सकता है?” पिता ने बड़े आत्म-विश्वास से कहा- ‘‘हाँ, हाँ, संसार में सम्भव क्या नहीं हैं, यदि तुम भी नियमित व्यायाम और परिश्रम करो, संयमी और निरालस्य बन सको तो ऐसा ही स्वास्थ्य क्यों नहीं प्राप्त कर सकते।”

बात सैन्डो के मन में बैठ गई। पिछली खराब जिन्दगी का चोला उसने उतार फेंका और नियमपूर्वक व्यायाम और कठोर श्रम करना प्रारम्भ कर दिया। फलस्वरूप वह एक प्रख्यात वह एक प्रख्यात पहलवान बना। उसने व्यायाम की अनेक विधियाँ भी निकालीं जिन्हें सैन्डो की कलायें कहा जाता है।


अनेकों झील, पर्वत एवं सैकड़ों नदी-नद शरीर के हर कण में

मनुष्य-शरीर बड़ी विलक्षण मशीन है यह मान्यता है डडड आधुनिक वैज्ञानिकों की। पूर्वात्य मान्यता यह है कि जो कुछ इस ब्रह्माण्ड में है, वह सब पिण्ड (मनुष्य देह में) में विद्यमान है। आकाश पाताल, सात लोक, अनेक झीलें, सैकड़ों पर्वत, प्रशान्त महासागर और बड़े बड़े विसूसियस ज्वालामुखी। नदियाँ, नद, मेघ, जल, चन्द्रमा, सूर्य और जीवन के पाप-पुण्य का लेखा-जोखा, करने वाली शक्तियाँ और अन्त में ब्रह्म-पुरुष को भी दृश्य रूप में इसी शरीर में प्रविष्ट होना पड़ा। अर्थात् जो कुछ भी बाहर दिखाई देता है वह सब भीतर है।

अनन्त शक्तियों का कोष और मुद्राओं का स्वामी एवं अधिपति होते हुए भी मनुष्य दुःखी क्यों है? इस पर भारतीय तत्त्ववेत्ताओं ने विशद् प्रकाश डालते हुये बताया कि अज्ञान ही दुःख का कारण है। हम समझते हैं कि दृश्य प्रकृति ही सुख का साधन है तो उसी के लिये आपा-धापी करने लगते हैं, फलतः जीवन में वासनायें, तृष्णायें, कलह, क्रोध, अनैतिकताऐं, आलस्य, द्वेष, छल, छद्म प्रवेश करते चले जाते हैं। मनुष्य अशान्त और दुःखी बना रहता है। वह कभी यह नहीं सोचता कि मनुष्य ने शरीर रूप का यह जो एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण वाहन दिया है, क्या उसे यथार्थ सुख, आत्म-कल्याण, अनन्त आनन्द और मोक्ष प्राप्ति में नियोजित किया जा सकता है?

जो इसके लिये प्रयत्न करते हैं, उन्हें अपने समीप ज्ञान और सुख की कैसी अनुभूतियाँ होती हैं, उसका विस्तृत विवरण ध्यान बिन्दूपनिषद में दिया है। दृष्टा का कथन- जिस प्रकार तेल का आश्रय तिल है और गन्ध का आश्रय पुष्प है, इसी प्रकार ब्रह्म-पुरुष शरीर के भीतर और बाहर स्थित है। गमागम में स्थित और गमनादि से शून्य डडडड करोड़ों सूर्य की दीप्त वाले भगवान ओंकार सबके हृदय में निवास करते हैं, उनका ध्यान करने वाले निष्पाप हो जाते हैं।

इसी संदर्भ में षट्-चक्रों, सहस्रार, कमल। दस प्रधान नाड़ियाँ, पाँच प्राण, पाँच नाग और बहत्तर हजार नदियों का विशद् वर्णन है। शरीरगत यह सूक्ष्म किन्तु विशाल प्रतिष्ठान अनेक शक्तियों, सामर्थ्यों एवं विचित्रताओं से ओत-प्रोत है। जिस चक्र या मर्म का बेधन या ध्यान करते हैं, उसकी शक्तियाँ विकसित होने लगती हैं। मनुष्य जो कुछ बनना चाहता है, उसके लिये विशेष शक्ति भी इसी शरीर से मिलती है। इस शरीर में संक्षेप में वह सब कुछ है, जिसकी हम इच्छा करते हैं और जिसे जानते भी नहीं।

इन शक्ति संस्थानों में जो स्थूल हैं, उनकी अब तक जो जानकारी वैज्ञानिकों को मिली है, वह सब उपरोक्त तथ्यों का ही समर्थन करती है। सर्वप्रथम राबर्ट हुक नामक वैज्ञानिक ने अपने सूक्ष्म-दर्शक यन्त्र की सहायता से यह दिखाया कि दुनिया की कोई छोटी से छोटी ऐसी वस्तु नहीं जिसे इस यंत्र से न देखा जा सके। उन्होंने प्रत्येक पदार्थ में आधारभूत इकाई का नाम सेल (कोशिका) दिया। बाद में वैज्ञानिकों ने यह निश्चित किया, संसार के सभी जीव-जन्तु, वृक्ष, वनस्पति और प्राणी कोशिकाओं से बने हैं। अभी तक कोशिकाओं की ही जानकारी थी पर 1831 में ब्रिटिश जीव-शास्त्री राबर्ट ब्राउन ने एरियोला या न्यूक्लियस (नाभिक) नामक एक नये तत्त्व की खोज की। यहीं से शरीर के अस्तित्व के साथ एक नये जीवन के अस्तित्व का प्रारम्भ हुआ।

अब तक कोशिकाओं के सम्बन्ध में विस्तृत जानकारी प्राप्त की जा चुकी हैं और ‘नाभिक’ के सम्बन्ध में जानकारियों का अथाह समुद्र अभी छिपा पड़ा है।

यह कोशिकायें ही शरीर में विलक्षण स्थूल-लोकों का निर्माण करती हैं। जर्मनी के दो वैज्ञानिकों श्वान और श्लाइडन ने यह सिद्ध कर दिखाया कि सभी प्राणियों के शरीर कोशिकाओं से बने हैं। कोशिका पदार्थ के सबसे छोटे किन्तु दृश्य कण को कहते हैं। यह कोशिकायें पहले से विद्यमान् कोशिकाओं के ही विभाजन से बनती हैं अर्थात् कोशिका शरीर का कभी अंत नहीं होता, उसका विभाजन होता रहता है। यही नहीं बुद्धि विकास, वंशक्रम, रक्त और गुणों की एकरूपता, बीमारी, वृद्धावस्था, मृत्यु और नये जन्म की व्यवस्था में भी इन कोशिकाओं का आचरण मुख्य रहता है।

कुछ प्राणियों को छोड़कर शेष सभी प्राणियों की कोशिकायें अनेक तत्त्वों की बनी होती हैं, जो तत्त्व विकृत होते हैं, वहाँ उस तरह के विषाणु पैदा होते रहते हैं। उसका फल बीमारियाँ होती हैं। अपने आप में शुद्ध और समुन्नत कोशिकाओं से जीवन, आयु और प्राण की वृद्धि भी होती रहती है। अब यह विश्वास किया जा रहा है कि प्रत्येक प्राणी की कोशिकाओं का विश्लेषण कर लिया जाय और मानव शरीर में उनकी समीक्षा की जाये तो जिस जाति की कोशिकायें बहुतायत से पाई जा रही होंगी, पूर्व जन्म उसे से संबंधित रहा होगा। कोशिकायें प्रोटोप्लाज्म नामक जीवित पदार्थ से बनी होती हैं। इसके भी साइटोप्लाज्म और नाभिक (न्यूक्लियस) दो भाग होते हैं। साइटोप्लाज्म अर्क्षपार दर्शक जल मिश्रित जेली की तरह का होता है, जिसमें अनेक प्रकार के प्रोटीन, लवण, शर्करा और वस्तुयें होती हैं पर नाभिक के बारे में अभी मिश्रित तथ्य नहीं प्राप्त किये जा सके। इसका संबंध प्राण विद्या से है। जब उसे वैज्ञानिक अनेक जानकारियाँ प्राप्त करेंगे तो पूर्व अध्यात्म की और भी विलक्षण पुष्टि होगी। पर एक बात तो यहाँ अभी सिद्ध हो गई कि आहार क्रम को बदलकर कोशिकाओं को बदला जा सकता है। भले ही यह क्रम मंदगामी हो पर यदि एक ही प्रकार के पदार्थ खाने के लिये जायें तो उसी प्रकार की कोशिकाओं को विकसित और सतेज कर विषाणुओं और दुर्बल एवं अधोगामी योनियों में पाई जाने वाली कोशिकाओं को हटाया और कम किया जा सकता है। इसका प्रभाव यह होता है कि मनुष्य में जो पाशविक वृत्तियाँ होती हैं, वह इन कोशिकाओं की मंद, अशुद्ध और जटिल स्थिति के कारण होती हैं, उन्हें बदलकर शुद्ध, सात्विक बनाया जा सकता है। अस्वाद व्रत और उपवास का महत्व इस जानकारी के आधार पर और भी बहुत अधिक बढ़ जायेगी।

यदि कोशिका को काटकर नाभिक से अलग कर दिया जाय तो कोशिका की मृत्यु हो जायेगी पर नाभिक में स्वतः निर्माण की क्षमता होती है, हमारा आध्यात्मिक दर्शन यह कहता है कि उस नाभिक में इच्छा, आशा, संकल्प और वासना का अंश रहता है, उसी के अनुरूप वह दूसरा जन्म ग्रहण करता है। अभी पाश्चात्य विज्ञान इस संबंध में तो खोज नहीं कर पाया पर कोशिकाओं से निकलने वाली एक तरह की किरणें जिन्हें क्रोमोसोम कहते हैं की जानकारी मिली है। प्रत्येक पदार्थ में क्रोमोसोम की संख्या अलग-अलग होती है। गेहूँ में 42, मनुष्य शरीर की कोशिकाओं में 46 और किन्हीं-किन्हीं जीवों की कोशिकाओं में 100-100 तक क्रोमोसोम पाये जाते हैं। यह क्रोमोसोम भी जीन नामक परमाणुओं से बने होते हैं। इनके अलग-अलग रंग भी होते हैं, उन कणों को एलील कहा जाता है।

जब इन सब की विस्तृत खोज होगी तो अनुमान है मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार आदि सूक्ष्म-तत्त्वों की और भी विशद् जानकारी होगी। इनमें नाभिक हर घड़ी क्रियाशील रहता है और वह इन क्रोमोसोम के माध्यम से साइटोप्लाज्म को भी गतिशील रखता है। इच्छानुवर्ती शरीर क्रिया को बदलने का सम्भव है बड़ा विज्ञान इसमें सन्निहित हो और उसकी जानकारी बाद में वैज्ञानिकों को मिले।

यद्यपि कोशिकाओं के अन्दर निर्माण और क्रियाशील रखने वाली शक्ति न्यूक्लियस या नाभिक ही है। पर साइटोप्लाज्म का कार्य उससे कम महत्वपूर्ण नहीं दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। सच पूछा जाये तो साइटोप्लाज्म भी उतना ही शक्तिशाली, व्यापक और विशाल है।

जब इनकी वैज्ञानिकों ने विस्तृत खोज की तो पता चला एक साइटोप्लाज्म के अन्दर एक बड़ी भारी झील है, उसमें कई इतने बड़े महानगर हैं, जितने न्यूयार्क, वाशिंगटन, लन्दन, पेरिस, वारसा या दिल्ली आदि। उसमें छाये हुये कुहरे को हटाकर देखा गया तो वहाँ तो एक भयंकर हलचल दिखाई दी। उसी में अनेकों प्रकार के विद्युत संस्थान जैसे शक्ति केन्द्र और कार्य प्रणालियाँ दिखाई दीं। उसे देखकर वैज्ञानिक विस्मित रहेगी। सबसे छोटे वाले अणु के अन्दर इतना व्यापक और विशाल क्षेत्र विद्यमान् है, जितना बड़ा और विराट् यह ब्रह्माण्ड है।

देखा गया है कि यह संरचनायें जब परस्पर जुड़ती हैं या संबंध स्थापित करती हैं तो एक बड़ी भारी सड़क बनती है। लाखों मील लंबी नहरें दिखाई देती हैं। कोशिकाओं के कुछ अंश उतने उठे हुए दिखाई देते हैं, जैसे वह हिमालय अथवा आल्पस पर्वत हों, उन पर प्रकृति के वह पदार्थ भी झलकते और चमकते दिखाई देते हैं, जो पर्वतों और नदियों के किनारे दिखाई देते हैं। नेत्र विस्फारित हो उठते हैं कि आखिर एक परमाणु के अन्दर यह सब कैसी हलचल है। मनुष्य जो भी खाता है वह शरीर में स्थापित विद्युत केन्द्रों को पहुँचता है, वहाँ से हर स्थान की आवश्यकता के अनुरूप ऊर्जा की सप्लाई होती है, उसे देखकर लगता है, इन सब कामों को कोई इंजीनियर बड़े ही कुशलतापूर्वक चला रहा है।

कोशिकाओं के संबंध में अभी तक स्थूल जानकारियाँ ही मिलती हैं, उसके आधार पर ही चिकित्सा जगत् में हलचल पैदा हो गई है, ऐसे-ऐसे इन्जेक्शन्स और औषधियाँ बनाली गई हैं, जिनसे अब मनुष्य का केवल कायाकल्प करना शेष रह जायेगा, बाकी रोगों को नष्ट करना, दीर्घजीवन प्राप्त करना सब वैज्ञानिकों को मुट्ठी में ही जायेगा।

यह कोशिकायें शरीर के विभिन्न अंगों में, विभिन्न गुणों वाली होती हैं, उनकी जानकारी करने पर शरीर द्वारा शरीर की ही चिकित्सा कर लेना भी संभव हो जायेगा। और अधिक भीतरी मर्मस्थलों की खोज हुई तो मनुष्य यन्त्रों के द्वारा अनेक ऐसी शक्तियाँ प्राप्त कर लिया करेगा, जिनकी सम्भावनायें तन्त्र-विज्ञान से संबंध रखती हैं। इनमें अणिमा, गरिमा, लधिमा आदि सिद्धियाँ भी सम्मिलित होंगी।

कोशिकाओं के भाग- कोशिकावरण प्लास्टिक, वैकुओल एण्डोप्लाज्मिक, रेंटिकुलभ, सेन्ट्रियोल ओर माइटोकोन्ड्रिया आदि की विस्तृत जानकारी होगी तो ब्रह्माण्ड के अनेक रहस्यों का पता शरीर में ही लग जाया करेगा। इन सब ने शरीर में नहरों और नदियों का सा जाल बिछा रखा है। जितनों की ऊर्जा सूर्य, चन्द्रमा जैसी चमकदार है। इन्हीं की जब सूक्ष्म नेत्रों से अनुभूति होती है तो ऐसा लगता है कि शरीर में ही संपूर्ण लोक, दिग्पाल, यमराज, चित्रगुप्त आदि बैठे हैं, अभी उन महाशक्तियों से लाभ दिखाने वाला विज्ञान तो बाकी ही है पर लगता है, वह ज्ञान यान्त्रिक न होकर भावनात्मक होगा। और उसकी विस्तृत जानकारी के लिये मनुष्य को हमारी शैली पर ही उतरना पड़ेगा। उन प्रक्रियाओं को ग्रहण करना पड़ेगा, जिनका विकास हमारे ऋषियों, दार्शनिकों एवं योगियों ने किया है।


विश्वास

उत्तरी ब्राजील में वाइका जाति के आदिवासी पाये जाते हैं। वाइका बहुत असभ्य और जंगली माने हैं पर उनके कुछ प्रयोगों में शिक्षित ब्राजीलवासियों ने भी विलक्षणता और सत्यता अनुभव की।

दो वाइका एपेना नामक एक वृत्त की छाल लेकर उसे एक नली में रखते हैं। नली का एक सिरा एक अपनी नाम में रखता है। दूसरा अपने मुँह में, मुँह वाला उस पर फूँक मारता है, जिससे एपेना दूसरे वाइका की नाक में घुस जाती है। पहले तो उसे चक्कर आते हैं, परंतु बाद में वह स्थिर हो जाता है। इसके बाद उसे ऐसा लगता है, जैसे उसके शरीर में विचित्र शक्ति आ गई हो और वह चिड़ियों की तरह आकाश (अतीन्द्रिय लोक) में उड़ रहा हो। हजारों फुट लंबा और करोड़ों हाथियों की शक्ति वाला अनुभव करता है। जब तन्द्रा टूटती है तो वह हाकुल (महान् आत्माओं) से हुई बातचीत का विवरण सुनाता है। कई बार कई बातें बड़ी विलक्षण और सत्य पाई जाती हैं। ऐसे प्रयोग अब वहाँ के शिक्षित भी करते हैं। उनका विश्वास है कि इस औषधि से मन, शरीर, कोशिका-शक्ति संस्थान से संबंध जोड़ लेता है, उसी से यह विचित्र अनुभूतियाँ होती हैं।


शक्ति एवं सन्देश सञ्चार की प्राण-विद्या

राजा दिवोदास के पुत्र प्रतर्दन को एक बार स्वर्ग डडडड देखने की इच्छा हुई। पिता की आज्ञा लेकर वे स्वर्ग गये। प्रतर्दन के पुरुषार्थ और रण-चातुर्य से- इन्द्र अत्यन्त प्रभावित थे। उन्होंने प्रतर्दन का आदर-सत्कार किया और कहा- ‘‘मैं आपको क्या वर दूँ?” प्रतर्दन ने कहा- ‘‘भगवन्! मैं धन-धान्य, प्रजा-पुत्र, यश-वैभव-सब प्रकार से परिपूर्ण हूँ। आपसे क्या माँगू मुझे कुछ नहीं चाहिये।”

इन्द्र विहँस कर बोले- ‘‘वत्स, यह मैं जानता हूँ कि पुरुषार्थी व्यक्ति को संसार में कोई अभाव नहीं रहता। अपने सुख-समृद्धि के साधन वह आप जुटा लेता है तो भी उसे विश्व-हित की कामना करनी चाहिये। लोक-सेवा के पुण्य से बढ़कर पृथ्वी में और कोई सुयश नहीं तुम उससे ब्रह्म को प्राप्त होंगे। इसलिये मैं तुम्हें लोक का कल्याण करने वाली प्राण विद्या सिखाता हूँ।”

इसके बाद इन्द्र ने प्रतर्दन को प्राण तत्व का उपदेश दिया। उन्होंने कहा- ‘‘प्राण की ब्रह्म है। साधनाओं द्वारा योगी, ऋषि-मुनि अपनी आत्मा में प्राण धारण करते और उससे विश्व का कल्याण करते हैं।”

‘कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद्’ के दूसरे अध्याय में भगवान् इन्द्र ने प्रतर्दन को यह प्राण विद्या सिखाई है, उसका बड़ा ही मार्मिक एवं महत्त्वपूर्ण उल्लेख है। इसी संदर्भ में इन्द्र ने, एक व्यक्ति अपनी असीम प्राण-शक्ति को दूसरों तक कैसे पहुँचाता है, प्राण-शक्ति के माध्यम से दूसरों तक अंतःप्रेरणायें और विचार किस तरह पहुँचाता है, इस रहस्य का उद्घाटन करते हुए बताया है-

अथ खलु तस्मा देतमेदोक्य मुपासीत। यो वै प्राणः सा प्रज्ञा या वा प्रज्ञा स प्राणः- स यदा प्रतिबुध्यते यथ ऽग्नेर्विस्फुलिंग। विप्रतिष्ठन्ते प्राणेभ्यो देवा देवेभ्यो लोका।

अर्थात्- जब मन विचार करता है, तब अन्य सभी प्राण उसके सहयोगी होकर विचारवान् हो जाते हैं, नेत्र किसी वस्तु को देखने लगते हैं तो अन्य प्राण उनका अनुसरण करते हैं। वाणी जब कुछ कहती है, तब अन्य प्राण उसके सहायक होते हैं। मुख्य प्राण के कार्य में अन्य प्राणों का पूर्ण सहयोग होता है।

अन्यत्र श्लोक में बताया है कि मन सहित सभी इन्द्रियों को निष्क्रिय करके आत्म-शक्ति (संकल्प-शक्ति) को प्राणों में मिला देते हैं। ऐसा पुरुष ‘दैवी परिमर’ का ज्ञाता होता है। वह अपनी प्राण-शक्ति से किसी को भी प्रभावित और प्रेरित कर सकता है। उसके संदेश को कहीं भी सुना और हृदयंगम किया जा सकता है। उसके प्राणों में अपने प्राण जागृत कर सकते हैं। जिस पुरुष को दैवी परिमर का ज्ञान होता है। उसकी आज्ञा को पर्वत भी अमान्य नहीं कर सकते। उससे द्वेष रखने वाले सर्वथा नष्ट हो जाते हैं।

इसी उपनिषद् में यह भी निर्देश है कि जब पिता को अपने अन्तकाल का निश्चय हो जाय तो पुत्र (अथवा गुरु, शिष्य या शिष्यों) में अपनी प्राण-शक्ति को प्रतिष्ठित कर दे। वह वाक् प्राण, धारण, चक्षु, क्षोभ, गतिशक्ति, बुद्धि आदि प्रदान करें और पुत्र उसे ग्रहण करे। इसके बाद पिता या गुरु संन्यासी होकर चला जाये और पुत्र या शिष्य उसका उत्तराधिकारी हो जाये।

प्राचीनकाल में यह परम्परा आधुनिक सशक्त यन्त्रों की बेतार-के-तार की भाँति प्रचलित थी। प्राण विद्या के ज्ञाता गुरु अपने प्राण देकर शिष्यों के व्यक्तित्व और उनकी क्षमतायें बढ़ाया करते थे। इसी कारण श्रद्धा विनत होकर लोग ऋषि आश्रमों में जाया करते थे। ऋषि अपने प्राण देकर उन्हें तेजस्वी, मेधावान् और पुरुषार्थी बनाया करते थे। महर्षि धौम्य ने आरुणी को, गौतम ने जाबालि को, इन्द्र ने अर्जुन को, यम ने नचिकेता को, शुक्राचार्य ने कच का इसी तरह उच्च स्थिति में पहुँचाया था। योग्य गुरुओं द्वारा यह परम्परायें, अब भी चलती रहती हैं। परमहंस स्वामी रामकृष्ण ने विवेकानन्द को शक्तिपात किया था। स्वामी विवेकानन्द ने सिस्टर निवेदित में प्राण प्रत्यार्पित किये थे। महर्षि अरविन्द ने प्राण शक्ति द्वारा ही सन्देश भेजकर पाँडिचेरी आश्रम की संचालिका मदिति-सह भारत-माता की सम्पादिका ‘श्री यज्ञ शिखा पां’ को पेरिस से बुलाया था और उन्हें योग विद्या देकर भारतीय दर्शन का निष्णात बनाया था।

कहते हैं जब राम वनवास में थे, तब लक्ष्मण अपने तेजस्वी प्राणों का संचालन करके प्रत्येक दिन की स्थिति के समाचार अपना धर्मपत्नी उर्मिला तक पहुँचा देते थे। उर्मिला उन सन्देशों को चित्रबद्ध करके रघुवंश परिवार में प्रसारित कर दिया करती थी और बेतार-के-तार की तरह के सन्देश सबको मिल जाया करते थे।

अनुसुइया आश्रम में अकेली थीं। भगवान् ब्रह्मा, विष्णु और महेश वेष बदलकर परीक्षार्थ आश्रम में पहुँचे। अत्रि मुनि बाहर थे। उन्होंने ही भगवान् के त्रिकाल रूप को पहचाना था और वह गुप्त सन्देश अनुसुइया को प्राण-शक्ति द्वारा ही प्रेषित किया था। ऐसी कथा-गाथाओं से सारा हिन्दू-शास्त्र भरा पड़ा है।

आज का विज्ञान सुखी समाज इन उपाख्यानों की तर्क की दृष्टि से देखता है। लोग शक और सन्देह करते हैं, कहते हैं, ऐसा भी कहीं सम्भव है कि एक मनुष्य दूसरे मनुष्य को बिना किसी उपकरण या माध्यम के सन्देश पहुँचा सके।

यदि विचारपूर्वक देखें तो विज्ञान भी इसकी पुष्टि ही करेगा। बेतार-के-तार के सिद्धान्त को कौन नहीं जानता? शब्द को विद्युत तरंगों में बदल देते हैं। यह विद्युत तरंगें ईथर तत्त्व में धारायें बनकर प्रवाहित होती हैं। ट्रान्समीटर जितना शक्तिशाली होता है, विद्युत तरंगें उतनी ही दूर तक दरदराती चली जाती हैं। उसी फ्रीक्वेंसी में लगे हुये दूसरे वायरलेस या रेडियो उन ध्वनि तरंगों को पकड़ते हैं और पुनः शब्दों में बदल देते हैं, जिससे वे पास बैठे हुए लोगों को सुनाई देने लगती हैं। अब इस बात में तो कोई अविश्वास कर ही नहीं सकता।

जो बात बोली जाती है, वह पहले विचार रूप में आती है, अर्थात् विचारों का अस्तित्व संसार में विद्यमान है। ऊपर के श्लोक में बताया गया है कि मन या विचार शक्ति प्राण में मिल जाती है तो सभी प्राण उसके सहायक हो जाते हैं, अर्थात् प्राणों के माध्यम से अपने शरीर की संपूर्ण चेतना को जिसमें हाव-भाव, क्रिया-कलाप, विचार भावनायें सम्मिलित होती हैं, किसी भी दूरस्थ व्यक्ति तक पहुँचाया जा सकता है।

19 जुलाई 1964 धर्मयुग के पेज 20 में श्री अजीतकृष्ण वसु ने अपने जीवन की एक घटना का उल्लेख किया है। वे लिखते हैं- ‘‘हमारे एक मित्र के घर पार्टी थी। उसमें हमारे अनेक मित्र सम्मिलित थे। हमारे साथ एक जादूगर भी थे। संयोगवश टेलीपैथी पर बात चल पड़ी। गृहस्वामी ने बताया कि उनका टेलीपैथी में कोई विश्वास नहीं। एक साथी ने कहा कि भाई दूर बैठे व्यक्ति को केवल मानसिक शक्ति द्वारा ही संदेश दिया जा सकता है, उन्होंने ईथर में तरंगों वाली बात भी बताई तो भी कोई उसे मानने को तैयार न हुआ।

इसी बची जादूगर मित्र ने कहा- क्यों न प्रत्यक्ष देख लिया जाये कि विचार संचालन और प्रेषण संभव है क्या? उसके लिये सब लोग तैयार हो गये।

पहला प्रयोग गृहस्वामी और उक्त मित्र ने किया जो काफी दिनों से विचार प्रेषण का अभ्यास कर रहे थे। उन्होंने अपने प्रयोग के लिये अपना एक साथी भी चुना था पर वे उस समय उपस्थित न थे। जादूगर ने कहा- ‘‘मैं अपने मन में एक रंग निश्चित करूंगा, फिर संकल्प द्वारा उसे मन-ही-मन में तुम्हें बताऊँगा। मेरा प्रसारण इतना तीव्र होगा कि तुम्हारे मन में भी उसी रंग का नाम और छाया-चित्र आयेगा।” इसके बाद उन्होंने एक चिट में कुछ लिखा और उसे एक मित्र की जेब में डाल दिया। दोनों व्यक्ति 50 गज के फासले पर बैठे। जादूगर ने ध्यान-मग्न होकर सन्देश भेजा। इसके बाद गृहस्वामी से पूछा गया तुम्हारे मन में कौन-सा रंग आया तो उन्होंने कहा- ‘‘हरा” इसके बाद वह चिट निकालकर देखी गई तो लोग आश्चर्य चकित रह गये कि उसमें भी ‘हरा’ ही लिखा है।

इतने पर भी गृहस्वामी सन्तुष्ट न हुये उन्होंने कहा- ‘‘संयोग से ही ऐसा हुआ।” इस पर जादूगर ने कहा- ‘‘अब आप लोग मुझे कोई भी गिनती दीजिये। मैं उसे अपने ‘प्रयोग वाले मित्र’ को प्रेषित करूंगा, आप फोन पर पता लगाइये, वह घर हैं या नहीं।” संयोग से वह घर पर ही थे। 9 की संख्या दी गई। इधर जादूगर ने ध्यान मग्न होकर अपने मित्र को वह संख्या विचार संचालन द्वारा मन-ही-मन सुनाई। जब वे उठ बैठे तो फोन से पूछा गया, आपने कौन-सी संख्या सुनी तो उधर से उत्तर आया- ऐसा लगता है 9 की संख्या भेजी गई है। इस पर सभी लोग दंग रह गये और उपस्थित सभी व्यक्तियों ने यह मान लिया कि विचार संचालन विद्या गलत नहीं है।

एक ही समय में परस्पर उन्मुख या याद करते हुए व्यक्ति को चलते-फिरते कितनी ही दूरी पर प्राण प्रेषित करने का एक उदाहरण मालवीय जी के परिवार में घटित हुआ। “एक दिन स्वर्गीय मदनमोहन मालवीय जी के पुत्र श्री गोविन्द मालवीय एकाएक बेचैन हो उठे। सर्दी के दिन थे पर उनका शरीर एकाएक आग की तरह गर्म हो उठा। बहुत जाँच की गई पर पता न चला ऐसा क्यों हो रहा है? रात के नौ बजे तक उनकी बेचैनी बढ़ती ही गई।”

मालवीय जी की धर्मपत्नी इलाहाबाद में थीं। रात नौ बजे यहाँ से टेलीफोन गया और तब पता चला कि वे (श्री गोविंद मालवीय की माताजी) आग सेंकते हुये बुरी तरह जल गई हैं। दादी जी उन्हें बहुत प्यार करती थीं। इसलिये जलने के बाद से ही वे बराबर इन्हीं का ध्यान करती रहीं। उनकी मृत्यु भी तभी हुई जब श्री गोविन्द मालवीय प्रयाग आ गये। जैसे ही उनकी मृत्यु हुई उनकी जलन और बुखार एकदम समाप्त हो गया। इस घटना से यह पुष्टि होती है कि तीव्र स्मृति किंवा ध्यान के माध्यम से अपने समीपवर्ती वातावरण तक चित्रण किया जा सकता है।

अंग्रेज आविष्कारक चार्ल्स बैवेज ने इसी सिद्धान्त के आधार पर एक यन्त्र बनाने का भी प्रयत्न किया, जिसमें कोई ऐसा ‘क्रिस्टल’ फिट किया जा सके, जिससे स्वेच्छा से मनुष्य के मस्तिष्क की तरह ही काम लिया जा सके। उन्होंने एक यंत्र बनाया भी उसका नाम ‘इलेक्ट्रानिक’ या यान्त्रिक मस्तिष्क रखा गया। यद्यपि वह स्मरण शक्ति वाला प्रयोग तो सफल नहीं कर सके पर विचारों की मस्तिष्क में सूक्ष्म कार्य-विधि को अच्छी प्रकार समझा सके। यह यंत्र जोड़ बाकी के छोटे-छोटे प्रश्नों का उत्तर तत्काल गणना करके दे देता था, उससे यह सिद्ध होता था कि यदि मस्तिष्क के तमाम यंत्रों का पूर्ण विश्लेषण प्राप्त किया जा सके तो ऐसी मशीन भी बनाना सम्भव हो सकता है, जिससे दूरवर्ती प्रसारणों को ही नहीं पूर्व जन्मों एवं अतीतकाल की स्मृतियों को भी रिकार्ड किया जा सकता है।

वैसा तो तभी सम्भव है, जब कोई बिल्कुल मनुष्य शरीर के कलेवर जैसा ही शरीर बन सके पर अध्यात्म विज्ञान में ऐसी सम्भावनायें बहुत अधिक हैं, जिनसे यंत्रों की क्षमता को और भी अधिक सूक्ष्म और प्रभावशाली ढंग से अन्तरंग शरीर द्वारा किया जा सके। जो ऐसी विद्यायें जानते हैं, वह दूर के सन्देश प्राप्त भी कर सकते हैं और लोगों को दे भी सकते हैं।

यह तब ध्यान और प्राण विद्या के छोटे-छोटे चमत्कार हैं। उसकी संपूर्ण और अगाध जानकारी तो किन्हीं योग और साधना-निष्ठ व्यक्तियों को होती है। ऐसे महापुरुष का सान्निध्य उनके समीप्य और ध्यान का लाभ उठाव कोई प्राणवान बन सकता है।


महाप्रभु ईसामसीह

महाप्रभु ईसामसीह यरूशलम की पद-यात्रा कर रहे थे। वे बहुत थक गये, इसलिये शिष्यों ने कहा- ‘‘भगवन्! आज तो विश्राम यहीं करें।”

वे बोले- ‘‘भाई, समय पर पहुँचना आवश्यक है।” “तुम इस गाँव में जाओ वहाँ एक गधी बँधी हुई मिलेगी। पास ही में उसका बच्चा भी होगा। गधी को ले आना। कोई रोके तो कहना प्रभु ईसा को आवश्यकता पड़ गई है।”

जहाँ दृष्टि नहीं जा सकती थी वहाँ की बात ईसामसीह कैसे जान गये, यह बड़ा आश्चर्य है पर प्राण-विद्या के ज्ञाता आचार्यों के लिये यह सब बहुत सरल बातें हैं।


इन्द्रियातीत ज्ञान- मनुष्य के लिए नितान्त सम्भव

ड्यूक विश्वविद्यालय में परामनोविज्ञान से संबंधित एक स्त्री से संबंधित घटना इस प्रकार है-

“दूसरा महायुद्ध प्रारम्भ हो चुका था। तब मेरे पति को स्नायु सन्निपात (नर्वस ब्रेक डाउन) हो गया। वे घर से लगभग 50 मील दूर एक चिकित्सालय में चिकित्सा करा रहे थे। हम दोनों प्रतिदिन एक दूसरे को पत्र लिखते। एक दिन शाम को मैं अपने ड्राइंगरूम में अकेली बैठी थी। आठ बजने को थे कि एकाएक मुझे बेचैनी होने लगी। बहुत प्रयत्न करने पर भी व्यग्रता बढ़ती ही गई। इस अनायास परिताप का कारण समझ नहीं पा रही थी। मुझे ऐसा लगा, जैसे मुझे कोई टेलीफोन की ओर आकर्षित कर रहा है। मुझे ऐसा लगा कि अपने पति को टेलीफोन करूं, इसी गरज से टेलीफोन के पास तक चली गई। मुझे अनावश्यक फोन करने की मनाही करदी गई थी, इसलिये आस-पास चक्कर तो काटती रही पर फोन न कर सकी और फिर चुपचाप लौट आई।

दूसरे दिन पति के दो पत्र आये। एक तो प्रतिदिन लिखा जाने वाला पत्र था, जो नियमित रूप से आता था। दूसरा उससे पहले लिखा गया था और उसमें पतिदेव ने मुझसे ठीक आठ बजे फोन पर बातचीत करने को लिखा था। इसके दूसरे दिन एक और पत्र आया, जिसमें लिखा था- ‘‘मैं आठ बजे टेलीफोन पर तुम्हारी व्यग्रता से प्रतीक्षा करता रहा। मुझे बहुत बेचैनी रही।”

इस घटना से सिद्ध होता है कि हमारे अन्तःकरण और मन में उठा कोई भी भाव या विचार नष्ट नहीं होता वरन् वह संबन्धित व्यक्ति तक पहुँचता है और भावनायें जितनी हार्दिक और प्रखर होती हैं, उतनी ही तेजी से प्रभावित और प्रेरित भी करती हैं। देव उपासनाओं से मिलने वाला अनुग्रह और प्रार्थना से मिलने वाला आशीर्वाद भी इसी तरह होता है। उससे अधिक अतीन्द्रिय ज्ञान से जीवन की अमरता सिद्ध होती है।

वह इस तरह कि जब तक स्वप्नावस्था में होते हैं तो भी इन्द्रियातीत ज्ञान की अनुभूति होती रहती है। ऐसा लगता है, जैसे हम प्रत्यक्ष शरीर से चल-फिर, उठ-बैठ और क्रियायें कर रहे हों। उस समय की कितनी ही अनुभूतियाँ इतनी सच्ची निकलती हैं कि आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है। अपने पति की हत्या से पूर्व ही राष्ट्रपति अब्राहमलिंकन की पत्नी ने एक सुस्पष्ट स्वप्न में अपने पति की मृत्यु का दृश्य देखा था।

पौराणिक कथा है कि “भरत ने कई दिन पूर्व ही अयोध्या में होने वाले विग्रह और दशरथ की मृत्यु का भविष्य-दर्शन स्वप्न में किया था।” प्राचीन टेस्टामेंट की एक घटना से यह भी सिद्ध होता है कि इस तरह का इन्द्रियातीत ज्ञान जागृत अवस्था में भी हो सकता है और किसी को विचार-संचार भी किया जा सकता है। एक बार राजा बेलसज्जार अपने मेहमानों के साथ भोजन के लिये बैठे, तभी उन्हें किसी के हाथ ऊपर उठते और अँगुली से दीवाल पर कुछ शब्द लिखे दिखे। भविष्य वक्ता डेनिपल ने उक्त सारी घटना की व्याख्या करते हुये बताया कि “राजा का राज्य और अस्तित्व खतरे में है।” वैसा ही हुआ भी। प्रातःकाल होने से पूर्व ही सम्राट् की हत्या कर दी गई और डोरिस नाम के एक उच्च-पदाधिकारी ने राज्य सत्ता पर अपना अधिकार कर लिया।

अपने भावों को व्यक्त करने के लिये जब आत्मा को बोलने की इच्छा होती है तो वह बुद्धि द्वारा अर्थों को संग्रहित कर मन को इस कार्य के लिये प्रेरित करती है। मन शरीरस्थ अग्नि द्वारा प्राण-वायु को गरम करके उसे अपने प्रयोजन के लिये गतिमान करता है। नाभि प्रदेश से उठता हुआ, यह वायु छाती (उरस) आदि स्थानों में से अतिक्रमण कर कण्ठ प्रदेश में पहुँचता है। उपरोक्त प्रक्रिया वायु और आकाश तत्त्वों से मिलकर कम्पन करती है, इस ध्वनि कम्पनों का अभ्यान्तर प्रयत्नों से किसी के भी पास पहुँचाया जा सकता है।

दूरस्थ व्यक्तियों को इसी विद्या से प्राण और विचार देकर उन्हें प्राणवान् बनाया जा सकता है अथवा कोई विशेष सन्देश भेजा जा सकता है। इस क्रिया को आध्यात्मिक भाषा में आत्मा की विवशता कहते हैं। प्राणवान् आत्मायें मृत्यु के उपरान्त भी इस तरह के विचार-क्रम में संलग्न रहती हैं। उन्मुक्त हुई आत्मायें लोक-लोकान्तरों में विचरण करती रहती और वहाँ की परिस्थितियों का आनन्द लूटती रहतीं, उपासना काल में साधकों को दिखाई देने वाले नृत्य-गायन और संगीतों की मधुर-ध्वनियाँ भी इसी प्रकार सुनी जाती हैं, वह प्रसारण किसी विशेष लोक या स्थान से सुनिश्चित रूप से संचारित होते हैं, अब यह आत्मा की पवित्रता और मलिनता पर निर्भर है कि वह किसी सन्देश या दृश्य को कितनी स्पष्टता से देखे। पवित्र आत्माओं को दृश्य और सन्देश बिल्कुल साफ और स्पष्ट मिलते हैं, जबकि अपवित्र आत्मायें देख-सुनकर भी सही अर्थ नहीं समझ सकतीं।

‘छायापुरुष’ की सिद्धि और ‘प्रकाश-शरीर’ के द्वारा एक स्थान से दूसरे स्थान पहुँच किसी को कोई मार्ग-दर्शन करना भी सम्भव है। और मन की बातों को जान लेना भी। इस संबंध में योगी श्री श्यामाचरण लाहिड़ी के जीवन की एक महत्त्वपूर्ण घटना इस प्रकार है-

श्री लाहिड़ी दानापुर में सेना विभाग के आंकिक थे। उनका रानीखेत से दानापुर के लिये स्थानान्तर हुआ। रानीखेत में उनका संबंध एक योगी से था, जिसे वे अपना गुरु मानते थे। दानापुर जाते हुये वे मुरादाबाद अपने एक मित्र के यहाँ रुके। बात-बात में उन्होंने अपने गुरु की चर्चा छेड़ दी और उनकी अलौकिक शक्तियों का वर्णन करना प्रारम्भ कर दिया। मित्रों के सामने जो बात थी नहीं उसे उनने स्वीकार करने से मना कर दिया। और कहा कि तुम यह सब प्रत्यक्ष दिखाओ तो मानें- श्री लाहिड़ी ने अपने आपको एक कमरे में बन्द करके गुरु का आह्वान किया। बताते हैं एक प्रकाश वहाँ आया। उसमें से एक छाया हिलती-डुलती दिखाई दी। उसने उपस्थित लोगों से बातचीत भी की पर तब तक उन्होंने इस घटना को सम्मोहन (मैस्मरेजम) जैसी क्रिया समझी अंत में योगिराज ने अपने हाथों के माँस का स्पर्श भी कराया। चलते समय वे श्री लाहिड़ी से भविष्य में फिर कभी वैसा न करने का आदेश भी दे गये।

मनोगतिशीलता वस्तुतः शरीर या किसी शारीरिक ऊर्जा से संबंध नहीं रखता। उसका संबंध प्राण और संकल्प (सूक्ष्म शरीर) से रहता है पर उसकी शक्ति अपरिमित होती है, शाप और वरदान तक उससे सफल होते देखे जाते हैं। एक बार दक्षिणेश्वर के काली मन्दिर में भक्तों के एक मेले में रानी रासमणि भी सम्मिलित हुई। रानी से दक्षिणेश्वर मन्दिर को बहुत धन मिलता था। स्वामी रामकृष्ण परमहंस ने सहसा उन्हें जोर का तमाचा मार दिया। तो उनके अंग-रक्षक बहुत नाराज हुये पर रानी ने उन्हें शाँत करते हुये स्वीकार किया कि उन्हें ऐसे पवित्र स्थान में जो बात नहीं सोचनी थी, वह सोच रही थीं। उसे रामकृष्ण परमहंस किस प्रकार जान गये इसे तब बड़ी आश्चर्य की दृष्टि से देखा गया पर अब परामनोविज्ञान इसे मन की संकल्प-सिद्धि का छोटा-सा चमत्कार मानता है। स्वामी विवेकानन्द ने सिस्टर निवेदिता को इसी तरह अपनी मृत्यु का पूर्व-ज्ञान करा दिया था।

स्वामी शिवानन्द ने एक बार एक ग्रामीण की डडडड उन्हें दूध पहुँचाने जाता था, एक साँप से रक्षा की। जब वह स्वामी जी के पास पहुँचा तो उन्होंने जाते ही पूछा- ‘‘साँप ने कहाँ काटा?” वह व्यक्ति यह सुनकर आश्चर्यचकित रह गया। रास्ते में साँप ने जहाँ काटा था, स्थान दिखाया और स्वामी जी ने मन्त्र बल से उसे डडडड कर दिया।

स्थूल इन्द्रियों की ज्ञान-शक्ति बहुत सीमित हैं। जो थोड़ी दूर तक देख सकती हैं, कान थोड़ी दूर का सुन सकते हैं, मुख से निकाली हुई आवाज को दो-तीन डडडड से अधिक दूर तक नहीं पहुँचाया जा सकता। पर डडडड आत्म-चेतना स्थूल शारीरिक ऊर्जा से हटकर सूक्ष्म डडडड स्थिति में केन्द्रित होने लगती है तो उसकी ज्ञान की डडडड बढ़ने लगती हैं। मन की शक्तियों को जितना डडडड नियन्त्रण किया जा सके, उतनी ही विलक्षण डडडड प्राप्त की जा सकती हैं। मन से सूक्ष्म आत्मा है, डडडड की उपासना करते हैं और उसके समीप पहुँचने डडडड तो दूर प्रदेशों के दृश्य, श्रव्य आदि ऐसे दिखाई व सुनाई देने लगते हैं, जैसे वह बिल्कुल पास का दृश्य हो। आत्मा जब ‘परमात्मा’ की स्थिति में पहुँचने लगती है, तब त्रिकाल-दर्शन, सर्वात्मभूति की विलक्षण क्षमतायें मिलने लगती हैं। अन्तिम भूमिका सर्व-शक्तिमान भूमिका होती है।

यह अपार क्षमतायें अदृश्य होने पर भी सूक्ष्म रूप से शरीर में विद्यमान् हैं किन्तु साधारण मनुष्य, काम, क्रोध, लोभ, मोह, वासना, धन-संचय, ईर्ष्या-द्वेष, छल, झूँठ, दम्भ, पाखण्ड आदि मनोविकारों से अपनी आत्मा को मलिन बनाये रहता है, फलतः उसमें ऐसे चित्रों और अनुभूतियों का अंकन नहीं हो पाता। इसीलिये दूसरों की ऐसी क्षमताओं पर विश्वास भी नहीं करते।

आत्मा शरीर से विलग रहने पर भी जब ज्ञान की स्थिति (अर्थात् सुख-दुःख, हानि-लाभ, जीवन-मरण) में रहती है तो निश्चित ही उसका शरीर से बहुत बड़ा संबंध नहीं। यद्यपि आत्मा और शारीरिक ऊर्जा के सम्मिलन से उन चमत्कारों को दिखाया जा सकता है पर इस समन्वय का मूल उद्देश्य जीवन-लक्ष्य की अनुभूति और प्राप्ति है, यदि हम ऐसा सुन्दर शरीर पाकर भी उसे क्षणिक सुखों की लिप्सा में व्यर्थ नष्ट करते हैं तो उसे पाने का कोई अर्थ सिद्ध न हुआ मानना चाहिये।

परातत्त्व-ज्ञान इस संबंध में विस्तृत खोज कर रहा है और वह यह मानने लगा है कि विश्व में कई ऐसी सत्तायें काम कर रही हैं, जिनसे मिलाप हो जाने से मनुष्य लौकिकता से उठकर अपने अविनश्वर जीवन की सुखानुभूति कर सकता है। प्रमाण के लिये वे ऐसे इन्द्रियातीत ज्ञान को प्रस्तुत करते हैं और कहते हैं कि जब आत्म-चेतना शरीर का संबंध बना रहने पर भी इन्द्रियों से परे का ज्ञान संग्रहित कर सकता है तो मुक्त अवस्था में तो वह और भी आश्चर्यजनक उपलब्धियों का स्वामी होता होगा। उदाहरणार्थ ईसा के समकालीन योगी एपोलिनियस ने भारत में योग विद्या सीखी और भूत-भविष्य को देखने की क्षमता प्राप्त की। उसने कई मृतकों को भी जिला दिया था।

लुम्मा के फ्रीडियन नामक एक पाश्चात्य योगी ने ओसर नदी की धारा को ही बदलकर देश को नष्ट होने से बचाया। श्री एडवर्ड निनेसमैन ने लिखा है कि- ‘‘एक-बार महात्मा इसीडोर के घर कुछ अतिथि आये। उन्होंने योग विद्या से तुरन्त ही एक व्यक्ति को प्रभावित कर भोजन के उतने थाल मँगवा लिये। यह देखकर सभी आगन्तुक आश्चर्यचकित रह गये।”

यह चमत्कार और कुछ नहीं आत्म-चेतना की अमर अनुभूतियाँ हैं, उन्हें कोई भी व्यक्ति प्राप्त कर सकता है, शर्त यही है कि आत्मा मनोविकारों, द्वेष, दुर्भावों से मुक्त रहनी चाहिये। स्वच्छ दर्पण में जैसे सूर्य की किरणें साफ चमकती हैं, उसी प्रकार निष्कलुष आत्मा में भूत और भविष्य का ज्ञान चमकता है। इस ज्ञान को पाकर मनुष्य अमरत्व पर विश्वास करने लगता है और उसकी प्राप्त के प्रयत्न भी।


स्वामी विवेकानन्द

स्वामी विवेकानन्द हैदराबाद की यात्रा कर रहे थे। एक व्यक्ति ने आकर स्वामी जी को प्रणाम किया और विनीत याचना की- ‘‘स्वामी जी मेरे बच्चे को तीव्र ज्वर है, यदि उसके शिर पर हाथ रख दें तो उसका ज्वर शाँत हो जावें। मैंने सुना है कि तेजस्वी महात्माओं द्वारा ऐसा करने से रोग तक दूर हो सकते हैं।”

स्वामी जी से लोगों ने कहा- ‘‘वह बड़ा चमत्कारी व्यक्ति है सब के मन को बात तक जान लेता है।”

स्वामी जी ने कहा- ‘‘यदि तुम अपना चमत्कार दिखाओ तो मैं भी तुम्हारे बच्चे कि सिर पर हाथ रख सकता हूँ?” उस व्यक्ति ने यह शर्त स्वीकार करली। स्वामी जी के आशीर्वाद से बच्चा ठीक हो गया। तब उसका नंबर आया। स्वामी जी ने गुलाब के फूल, सेब और कुछ वस्तुयें माँगी लोग यह देखकर आश्चर्यचकित रह गये कि जोड़ा गुलाब का फूल जिसमें ओंस के कण विद्यमान् थे, सेब आदि सभी वस्तुयें एक कंबल से निकाल दीं।

वह व्यक्ति संस्कृत न जानता था स्वामी जी ने संस्कृत का एक वाक्य मन में लिया। जब उससे पूछा गया तो उसने कहा- ‘‘अपनी जेब में पड़ा कागज निकालिये।” ऐसा करने पर लोग आश्चर्यचकित रह गये क्योंकि वह संस्कृत का श्लोक उसी कागज पर अंकित हो गया था।


शक्ति कोषों का यह उत्कर्ष साधनाओं से सम्भव

श्रीराव नामक योगी के संबंध में देश-विदेश में अनेक चमत्कारिक वर्णन प्रचलित हैं। दहकते अंगारों पर चलना, नाइट्रिक एसिड खा लेना, काँच और कीलें खा जाना उनके लिये सामान्य बात थी। वे जल पर चलने के भी कई प्रदर्शन कर चुके हैं।

श्री बल्लभदास बिन्नानी नामक एक व्यक्ति ने एक बार ऐसे चमत्कारों की खोज के उद्देश्य से विन्ध्याचल की यात्रा की। यात्रा के दौरान उन्हें जो अनुभव हुए उनका विवरण देते हुए बिन्नानी जी लिखते हैं कि- ‘‘मैंने एक योगी महात्मा के दर्शन किये वह पानी में नंगे पाँव चलने की दिव्य क्षमता रखते थे। वह हवा में भी उड़ते थे। मैंने उनको पानी में प्रत्यक्ष चलते हुए देखा और फोटो भी उतारी।”

यह कहने पर कि योगीजी आप इस तरह की सिद्धियों का सार्वजनिक प्रदर्शन क्यों नहीं करते तो उन्होंने भर्तृहरि का निर्देश सुनाते हुए बताया कि चमत्कारों का प्रदर्शन अहंकार बढ़ाता है और योगी को पथ-भ्रष्ट करता है। सिद्धियाँ आत्म-कल्याण के लिये हैं न कि प्रदर्शन के लिये? तो भी अनेक सिद्ध-महात्माओं द्वारा ऐसे चमत्कार यदा-कदा देखने को मिल ही जाते हैं।

लुंका में जबर्दस्त बाढ़ आई हुई थी। सारा नगर कुछ ही क्षणों में जलमग्न हो जाने वाला था। इंजीनियरों की सारी शक्ति निष्क्रिय हो गई, सब पाताल समाधि की प्रतीक्षा कर रहे थे। उसी समय कुछ व्यक्तियों ने फ्रीडियन नामक साधु से जाकर प्रार्थना की- महात्मन्! इस दैवी प्रकोप से बचाव का कुछ उपाय आप ही कीजिये। कहते हैं, महात्मा फ्रीडियन ने ओसर नदी की धारा योग बल से मोड़ दी और नगर को डूबने से बचा लिया।

एग्निस नाम की एक ईसाई महिला हुई हैं। उन्होंने अपने जीवन का अधिकाँश भाग योगाभ्यास में लगाया। उनके आश्रम में 20 और साधिकायें रहती थीं, एक बार उन्हें तीन दिन तक कुछ भी खाने को न मिला। एक साधिका भूख से अति व्याकुल होकर बोली- ‘‘मैडम हमें रोटी दो नहीं तो हम मर जायेंगी।” एग्निस ने कहा- ‘‘अच्छा बगल वाले कमरे में रोटियाँ रखी हे, उठा लाओ।” उस बिहार में अन्न का एक दाना भी न था पर उन्होंने इतने विश्वासपूर्वक कहा जैसे वह स्वयं पकाकर रोटियाँ रख आई हों। साधिका वहाँ गई तो सचमुच एक पात्र में रोटियाँ थीं। उन्हें खाकर सबने भूख मिठाई।

स्वामी ब्रह्मानन्द का एक भाषण काशी में हुआ। उसमें कई रूढ़िवादी उनसे बहुत रुष्ट हो गये। एक दिन स्वामी जी गंगातट पर बैठे ध्यान कर रहे थे, तभी उधर कुछ विरोधी आ पहुँचे। उन्होंने बदला निकालने का यह अच्छा अवसर समझा। इसलिये दो हृष्ट-पुष्ट युवक आगे बढ़े और पद्मासन बैठे स्वामी जी को जबर्दस्ती उठाकर पानी में फेंक दिया। स्वामी जी उन दोनों युवकों को भी हाथ में कसे लेते चले गये पर जब वे डूबने लगे तो उन्हें छोड़ दिया और आपने स्वयं नदी की सतह पर पद्मासन समाधि लेली। बाहर मुसलमान बड़ी देर तक हाथों में पत्थर लिये खड़े रहे कि स्वामी जी बाहर निकलें तो उन पर पत्थर दे मारें। पर वह स्थिति ही नहीं आई। स्वामी जी शाम तक जल के अन्दर ही बैठे रहे। जब वे वहाँ से चले गये तो वे शाँति-भाव से बाहर निकल आये।

अनेक लोगों का विचार है कि अब मानव शरीर की क्षमतायें क्षीण होती जा रही हैं पर आधुनिक विज्ञान भी अब शास्त्रों की ही बात बोलने लगा है। सोवियत वैज्ञानिकों ने अभी पता लगाया है कि मानव शरीर की क्षमतायें अब तक हुई जानकारी से हजारों गुनी अधिक हैं। भयानक सर्प या कुत्ते से बचने के लिये कई व्यक्ति जो कभी 1 फुट भी नहीं उछल सकते थे, भयावेश में तीन-तीन मीटर ऊँची दीवार कूद जाते हैं। जेल से भागते हुये कैदी लोहे की सलाखें मोड़ सकते हैं, यह सब क्रियायें यह बताती हैं कि मनुष्य शरीर की सामर्थ्य बहुत अधिक है। शरीर में कुछ तत्त्व और सूक्ष्म एवं अत्यंत मर्म-स्थान हैं, उनमें भरी हुई शक्तियों को जागृत कर मनुष्य भीम की तरह बलवान्, नागार्जुन की तरह रासायनज्ञ, संजय की तरह दूरदृष्टि वाला, अर्जुन की तरह अन्य लोकों में गमन करने वाला, रामकृष्ण की तरह परमहंस और गुरु गोरखनाथ की सी चमत्कारिक सिद्धियाँ पा सकता है। शारीरिक शक्ति में इस तरह की वृद्धि का उद्गम मस्तिष्क है। विशेष परिस्थितियों में मस्तिष्क माँस-पेशियों को उद्भट कार्य करने का आदेश देता है और उनमें से कुछ सूक्ष्म तत्त्व निकलकर अपना प्रभाव दिखाते हैं। वैज्ञानिकों ने हाल में ऐसी विधियाँ ढूँढ़ी हैं, जिनसे कृत्रिम रूप से शारीरिक शक्ति बढ़ाई जा सकती है।

मस्तिष्क के आदेशों को बीच में रोक लिया जाता है और मानव शरीर को एक विशेष प्रकार का ट्रांजिस्टर बनाकर उन आदेशों की शक्ति बढ़ा दी जाती है। इससे मनुष्य अति मानवीय शक्ति संपन्न हो जाता है। शरीरस्थ जीवाणुओं को प्राण और संकल्प शक्ति के द्वारा हल्का और भारी करके, सम्मोहन क्रिया द्वारा थोड़ी देर में बहुत भारी प्राण की मात्रा खींच करके ऐसे असामान्य कार्य दिखलाये जा सकते हैं, जिन्हें चमत्कार कहा जा सकता है।

इन सिद्धियों, सामर्थ्यों को पाकर मनुष्य उन स्थितियों में भी आनन्दपूर्वक रह सकता है, जिनमें साधारण लोग जाकर जीवित नहीं रह सकते। उदाहरणार्थ त्रिशिख-ब्राह्मणोपनिषद् में कुछ ऐसे प्राणायामों का वर्णन है, जिनका तीन वर्ष तक अभ्यास से मनुष्य जितेन्द्रिय और अल्पाहारी हो जाता है, यह एक-दो घण्टे की नींद से ही पर्याप्त विश्राम लेकर दीर्घजीवी हो सकता है। नाभिकन्द में प्राण धारण करने से कुक्षि रोग नष्ट होते हैं। योग कुंडल्युपनिषद् में उज्जायी क्रिया का वर्णन है, उससे नाड़ी संबंधी जलोदर और धातु संबंधी रोग दूर होते हैं, कुण्डलिनी जागरण किया हुआ योगी भयंकर विष भी पचा सकता है। दूसरे की मन की बात ऐसे जान सकता है, जैसे उससे स्वयं ही बता दी हो।

अष्ट सिद्धियाँ- अणिमा, महिमा, गरिमा, लधिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशत्व और वाशित्व को प्राप्तकर मनुष्य इसी देह में ईश्वर तुल्य शक्ति का अनुभव कर सकता है और संसार में होने वाले घटना-चक्रों को परास्त कर सकता हे, विस्फोट कर सकता है, शाप, वरदान, प्राण संचार या संदेश प्रसारण कर दूसरों का भला भी कर सकता है और लोगों के जीवन की दिशायें भी मोड़ सकता है।

श्री श्यामाचरण भी लाहिड़ी एक-बार हिमालय गये। वहाँ एक युवा संन्यासी से उनकी भेंट हुई। साधु उन्हें एक गुफा में ले गया और एकान्त में ले जाकर उनके सिर पर हाथ रखा। श्री लाहिड़ी जी लिखते हैं- ‘‘मुझे ऐसा लगा कि यह हाथ नहीं कोई प्रचण्ड विद्युत शक्ति वाला दंड था, उससे मेरे शरीर में प्रकाश भरना प्रारम्भ हुआ मुझे पूर्व जीवन की स्मृतियाँ उभरने लगीं। यहाँ तक कि मैंने अनेक वस्तुयें ऐसी भी पहचानी, जिनका मेरे पिछले जन्मों से संबंध था, मैं अनुभव करता हूँ कि गुरुओं का प्राण योग्य शिष्य इसी तरह पाकर स्वल्पकाल में ही दीर्घ प्राणवान बनते होंगे।

योग सिद्धियों का विवेचन करते हुये भर्तृहरि ने लिखा है- कि जब चित्त से रजोगुण (अर्थात् सुख की इच्छायें) और तमोगुण (अर्थात् पाप की इच्छायें) नष्ट हो जाती हैं और ईश्वरीय प्रकाश की स्थिरता आ जाती है, उस समय भूत और भविष्य की बातें चित्रपट की भाँति स्पष्ट दिखाई सुनाई देने लगती हैं।

योग साधना की शक्ति विवेचन करते हुए शास्त्र कार ने स्पष्ट कहा है-

विश्व रूपस्य देवस्य रूपं यत्किचिदेव हि। स्यवीय! सूक्ष्म श्रद्धा पश्यन्हृदय पंकजे॥ - त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषद्। 15

जो लोग इस स्थूल सूक्ष्म और अन्य प्रकार से डडडड संसार को ही भगवान का रूप मानते हैं और उसकी डडडड कमल में आराधना करते हैं, वह साक्षात् उन्हीं के रूप डडडड हो जाता है और अणिमादि सिद्धियों के फल को अनायास ही पा लेता है।


अनवरत श्रम- एक तपश्चर्या

इस संसार को कर्म-भूमि बतलाया गया है और मनुष्य जीवन को कर्म-योनि। इसका तात्पर्य यही है कि संसार भोग-विलास का स्थान नहीं है और न विषय-वासनाओं के लिये मानव-जन्म दिया गया है। इस मनुष्य जीवन को इस भूमि पर इसीलिये अवतरित किया गया है कि वह संसार में कर्म-योग-पूर्वक रहे। पूरा जीवन कर्मों को समर्पित कर दे। जो लोग इसके विपरीत आचरण करते हैं, वे ईश्वरीय उद्देश्य का हनन करते हैं। यह एक अपराध है, पाप है, जो किसी प्रकार अपेक्षित अथवा शोभनीय नहीं है।

यों तो संसार में प्रायः सभी मनुष्य कुछ न कुछ काम करते रहते हैं। क्योंकि बिना काम किये गुजारा ही नहीं हो सकता। लोगों को भोजन-वस्त्र और निवास आवास की व्यवस्था के लिये काम करना ही पड़ता है। यह एक सामान्य प्रक्रिया है। कर्म-योग से इसका अधिक संबंध नहीं है। इन सामान्य कर्मियों के अतिरिक्त कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जो विद्या-बुद्धि और ऐश्वर्य बुद्धि के लिये भी प्रयत्न करते हैं। यद्यपि उनकी यह क्रिया कुछ-कुछ कर्म-योग की ओर उन्मुख होती है तथापि कर्म-योग नहीं होती।

कर्म-योग वास्तव में काम करने का एक विशिष्ट प्रकार होता है। वह प्रकार जिस काम में भी समन्वित कर दिया जायेगा, वही काम कर्म-योग की श्रेणी में आ जायेगा, फिर चाहे वह मात्र आजीविका संबंधी काम ही क्यों न हो। वह इस प्रकार है, किसी भी काम को निष्ठा तथा श्रद्धापूर्वक करना। उसे जीवन का पवित्र कर्त्तव्य समझकर करना चाहिये। इस प्रकार कर्म-योग के दृष्टिकोण से किया हुआ, प्रत्येक काम मनुष्य की उन्नति का हेतु बनता है। जिस कार्य द्वारा मनुष्य उन्नति की ओर प्रगति नहीं करता वह काम देखने में कितना ही बड़ा और विस्तृत क्यों न हो कर्म-योग की कोटि में नहीं आता। उन्नति करना मानव-जीवन का लक्ष्य और उसकी पूर्ति कर्म-योग का प्रमाण है।

प्रत्येक विवेकशील व्यक्ति को जीवन को अनुदिन उन्नति की ओर बढ़ाते ही रहना चाहिये। उन्नति और प्रगति से रहित जीवन मानव-जीवन नहीं है। केवल मानवाकार में जीवन का प्रवाहित होते रहना मानवता नहीं है। मानवता का लक्षण हे प्रतिदिन उन्नति की ओर बढ़ते जाना। संसार में उन्नति और प्रगति करके लोग जीव संज्ञा से मानव, महामानव, महापुरुष, देवपुरुष और अति मानव तक बनते हैं। लोग उन्हें भगवान मानकर पूजते हैं। समाज उन्हें प्रतिष्ठा देकर सर आँखों चढ़ाता है। ऐसे ही मानव वास्तव में मानव कहलाने योग्य होते हैं। इन्हीं से संसार की शोभा और समाज की मान्यता होती है और बढ़ती है।

मनुष्य-जीवन पाकर आखिर उन्नति क्यों न की जाये, उससे विमुख क्यों रहा जाय? परमात्मा ने जब एक-से-एक बढ़कर साधन, अवसर और योग्यताओं की व्यवस्था मनुष्य के लिये कर दी है, तब उनका उपयोग कर उन्नति की दिशा में क्यों न बढ़ा जाये? इसी संसार में, जिसमें हम सब रह रहे हैं, अनेकों लोग तेजी से उन्नति की ओर बढ़ रहे हैं, शिखरों पर पहुँच रहे हैं, आदर और सम्मान संचय कर रहे हैं तो और दूसरे लोग भी उस सम्मान और सुख के लिये क्यों प्रयत्न न करें? परमात्मा ने सबको समान रूप से चेतना और क्षमतायें दे रक्खी हैं। तब इस कर्म-भूमि में कर्मों के आधार पर किसी से पीछे क्यों रहा जाय? यह बात किसी प्रकार समझ में नहीं आती।

संसार में ऐश्वर्य और विभूतियों की उपस्थिति जब इसीलिये है कि मनुष्य उनको प्राप्त करे तब दीन-हीन अवस्था में पड़े रहने का कोई प्रयोजन समझ में नहीं आता। जब कोई एक ऐश्वर्यवान, वैभववान और उन्नतिशील बन सकता है, तब दूसरे वैसे क्यों नहीं बन सकते? यदि सभी मनुष्य उन्नति और प्रगति की महत्ता और आवश्यकता समझ पाते और उस ओर बढ़ने का पुण्य प्रयास करते तो क्या हमारी यह धरती, हमारा यह संसार स्वर्ग नहीं बन जाये? मनुष्य तन और मन से देवताओं की तरह समुन्नत होने लगे तो इस मृत्युलोक को देवलोक बनते क्या देर लग सकती है?

मनुष्य में यह सामर्थ्य है कि यदि वह चाहे और प्रयत्न करे तो देवता की कोटि में जा सकता है किन्तु यदि देवता अपनी भोग-योनि का त्याग कर मनुष्य की कर्मयोनि में आना चाहें तो वे वैसा नहीं कर सकते। मनुष्य को अपनी इस विशेषता को सत्य तथा सार्थक करना ही चाहिये। उसे नित्य प्रति उन्नति और प्रगति का प्रयत्न करते ही रहना चाहिये। यही उसकी शोभा है और यही अधिकार भी। उन्नति करते जाना ही कर्म-योग है और जीवन लक्ष्य भी।

मानव-जीवन के विकास की सम्भावनायें असीमित हैं। मनुष्य जिस सीमा तक चाहे विकास करता जा सकता है। पूर्वकालीन ऋषि-मुनियों ने तो अपना विकास यहाँ तक कर लिया था कि त्रिकालदर्शी तक हो गये थे। अतीत में क्या हो चुका है, वर्तमान में कहाँ, क्या हो रहा है और भविष्य में कहाँ, क्या होने वाला है, इसका ज्ञान वे एक स्थान पर बैठे-बैठे प्राप्त कर लेते थे। उन्होंने जीवन और मृत्यु दोनों को जीतकर अपने वश में कर लिया था। वे जब तब चाहते थे, जीवित रह सकते थे और जब चाहते थे, शरीर छोड़ देते थे। उन्होंने जीवन-मृत्यु के साथ संपूर्ण काल को ही जीत लिया था। यह बात सही है कि सर्व-सामान्य सहसा ऋषि-मुनि नहीं हो सकते तथापि इसमें सन्देह नहीं कि जीवन-प्रति-जीवन-थोड़ा विकास करते रहने पर कोई भी मनुष्य किसी-न-किसी जीवन में आकर ऋषि-मुनि की कोटि में पहुँच सकता है। आज जो मनुष्य अपने आस-पास की बात भी नहीं जान पाता वह जब त्रिकालदर्शी हो जायेगा, इसलिये इस मानव-जीवन का उपयोग उन्नति और विकास करने में ही करते रहना चाहिये।

मानव-जीवन के विकास की सीमा केवल ऋषि-मुनियों की कोटि तक जाकर ही समाप्त नहीं हो जाती। वह वहाँ से बढ़कर और भी आगे जाती है। वह कोटि है मोक्ष। अर्थात् परमात्मा को पाना और उसमें मिल जाना। इस विशाल सम्भावना से भरे मानव-जीवन को संसार के मिथ्या भोग-विलास और विषय-वासनाओं अथवा निरर्थक की अस्त-व्यस्तता में डालकर नष्टकर डालना जरा भी बुद्धिमानी नहीं है। मनुष्य जीव से परमात्मा के पद तक जा सकता है। उसे जाना भी चाहिये। आज मानव-जीवन जो किन्हीं भी कारणों से मिल गया है, दुबारा मिलेगा या नहीं यह संदिग्ध है। हाँ, दुबारा मानव-जीवन मिलने की आशा उसी दशा में की जा सकती हैं, जब मनुष्य अपना समुचित कर्त्तव्य करता हुआ, निरन्तर उन्नति की ओर बढ़ता जाये। दिन-प्रतिदिन अपने विकास में तत्पर रहे।

उन्नति करना मानव-जीवन का उद्देश्य है और उसका अमोघ उपाय है पुरुषार्थ। पुरुषार्थ द्वारा संसार का कोई भी उद्देश्य पूरा किया जा सकता है, चाहे वह कितना ही कठिन और दुर्लभ क्यों न हो? धार्मिक शब्दावली में जिस साधना को तपश्चर्या कहा जाता है, वह वास्तव में पुरुषार्थ का ही पर्यायवाची शब्द है। भौतिक क्षेत्र में कर्म-योग-पूर्वक किया हुआ पुरुषार्थ निश्चित रूप से तपश्चर्या ही होती है। तपश्चर्या द्वारा, ऐसी कोई भी सिद्धि नहीं है जो प्राप्त नहीं की जा सकती।

पुरुषार्थ एक साधना है, तपस्या है। किन्तु यह सफल तभी होती है, जब विधिपूर्वक की जाय। वे पुरुषार्थ सफल नहीं हो पाते, तो निर्लक्ष्य, अव्यवस्थित, अनियमित और अस्त-व्यस्त ढंग से किये जाते हैं। अव्यवस्थित पुरुषार्थ में उत्पादन क्षमता नहीं होती। यदि कोई व्यक्ति किसी काम को बिना किसी काम अथवा व्यवस्था के करने लगता है तो उस काम में शक्ति की मात्रा तो बहुत लग जाती है किन्तु फल नगण्य ही रहता है। पुरुषार्थ वास्तव में उसी श्रम को कहा जा सकता है, जो किसी काम को करने में क्रमपूर्वक अखण्ड रूप से अपेक्षित समय तक लगाया जाये। बहुत से लोग कभी तो किसी काम में बहुत अधिक श्रम और समय लगाते हैं और कभी बहुत ही थोड़ा। किसी एक काम को जो एक निश्चित समय में पूरा किया जा सकता है, टुकड़े-टुकड़े करके करना परिश्रम नहीं है। थोड़ा काम अभी कर लिया, और थोड़ा फिर के लिये छोड़ दिया, फिर उसमें से भी एक हिस्सा कर लिया और बाकी कल पर टाल दिया। इस प्रकार से खण्ड-खण्ड करके किया हुआ काम परिश्रम की सीमा में नहीं आता। परिश्रम वास्तव में वही होता है, जो व्यवस्थित रूप से किसी काम को अपेक्षित समय तक पूरा करने में अविराम गति से किया जाये।

इस प्रकार खण्ड-खण्ड करके किये हुये परिश्रम से कोई काम तो कृतकार्य नहीं ही होता, मनुष्य की शक्तियों का भी बड़ा ह्रास होता है। किसी एक काम को खण्ड-खण्ड करके करना मानसिक न्यूनता का द्योतक है। निश्चय ही ऐसे अस्त-व्यस्त कार्यकर्त्ताओं को काम करने में रुचि नहीं होती। उनका मन न तो काम में रमता है और न रस लेता है। काम उनके लिये नीरस भार जैसा होता है। वे मन से काम करने वाले लोग काम का नाम सुनते ही काँप जाते हैं। यदि उनके समान मजबूरी न हो तो शायद काम के नाम पर वे तिनका टालना भी पसन्द न करें। काम का नाम जिनमें उत्साह, प्रसन्नता और उत्सुकता पैदा नहीं करता, वे संसार में किसी प्रकार की उन्नति नहीं कर सकते।

जीवन में यदि उन्नति और विकास करना है तो मन को काम में रस लेने का अभ्यस्त बनाना होगा। आलसी, प्रमादी और निकम्मा मन परिश्रम के लिये वश में कठिनता से भले ही आये, किन्तु प्रयत्न करने पर वश में आ अवश्य जाता है। मन का स्वभाव होता है कि वह परिश्रम एवं पुरुषार्थ के संबंध में एक सीमा तक विद्रोह अवश्य करता है किन्तु प्रयत्न करने से वश में आ अवश्य जाता है। अभ्यास एक बड़ी साधना है। जब रगड़ करते रहने पर चन्दन जैसे नीरस और शीतल काष्ट में आग उत्पन्न हो जाती है, बार-बार रस्सी को रगड़ लगने से कुएँ पर पड़े पत्थर पर रेखायें बन जाती हैं और पानी के निरन्तर प्रवाह से जब पहाड़ कट जाते हैं, तब कोई कारण नहीं कि अभ्यास करने से मन काम में रस लेने न लगे।

इसके अतिरिक्त काम में रस पैदा करने का एक तरीका यह भी है कि हर काम व्यवस्थित रूप से नियमपूर्वक किया जाये। उसे बेगार समझकर कभी न टाला जाये। पूरी दक्षता, योग्यता और शक्ति से किया जाय। योग का अर्थ है सम्मिलित अर्थात् मन को तन्मय कर देना। जो काम मन की पूरी तन्मयता के साथ किया जाता है, वह कर्म-योग की कोटि का होता है। इस प्रकार योगपूर्वक किये जाने वाले काम में कर्त्ता को पूरा आनन्द आता है। उसकी कठिनाइयाँ आपसे-आप हल होती जाती हैं। और यदि एक बार कोई बड़ी कठिनाई भी आ जाती है तो भी कर्त्ता का मन उससे घबराता नहीं। उसका हृदय अपने काम की पूर्ति में लगा होने से उसे उसका अनुभव ही नहीं होता। कर्म-योगी को अपनी कर्त संबंधी कठिनाइयों तक में भी आनन्द मिलने लगता है। वह अधिकारपूर्वक अपने काम की कठिनाइयों के विषय में सोचता और उनका हल निकालता है।

रुचि और पूरी तन्मयता से करने पर काम का भार मन, मस्तिष्क और शरीर पर नहीं पड़ता। उसकी थकान तभी अनुभव होती है, जब काम पूरा हो जाता है। उस अवस्था में अनुभव होने वाली थकान में एक बड़ा ही संतोष और गौरव का भाव रहता है। वह परिश्रम जिसके करने में आनन्द आता रहा हो, जो उन्नति और विकास हेतु रहा हो, सात्विक श्रम होता है। इसके विपरीत वह श्रम जिसको करते समय थकान, हीनता और दण्ड-सा अनुभव होता है और जिसके साथ विवशता का भाव चलता रहा हो, वह असात्विक श्रम होता है।

मानव-जीवन उन्नति और प्रगति का अवसर है। इसका उपयोग कर मनुष्य किसी भी दिशा में कितनी उन्नति कर सकता है। किन्तु इस उन्नति का आधार एक मात्र श्रम और पुरुषार्थ ही है। ऐसा पुरुषार्थ जो क्रमयोग के भाव से प्रेरित और तपश्चर्या की गरिमा से किया जाय। ऐसा श्रम, आनन्ददायक, सफलतादायक और पुष्पदायक भी होता है। श्रम मानव-जीवन की तपस्या माना गया है। तपस्या में मनोरथ दायिनी शक्ति होती है। सच्चा और सात्विक श्रमिक एक तपस्वी ही होता है। तपस्वी के लिये संसार में कुछ भी दुर्लभ नहीं होता। वह भौतिक ऐश्वर्यों से लेकर पारलौकिक मोक्ष तक अपनी साधना द्वारा सरलतापूर्वक पा सकता है।


दीर्घकाल तक जी सकना सम्भव है।

यहाँ पर सदा से यह विश्वास किया जाता है कि ‘अमृत’ का अस्तित्व एक सचाई है और जो उसे प्राप्त कर सकता हे, वह अमर हो जाता है। दूसरी विधि किसी बड़े देवी-देवता से अमरत्व का वरदान प्राप्त करना है। लोगों का कहना है कि हनुमान, अश्वत्थामा, जामवन्त, काकभुसुंडि आदि इसी प्रकार अमर-जीवन व्यतीत कर रहे हैं। इसी प्रकार प्राचीन वैद्यक ग्रन्थों में भी आँवला, हर्र पारे की भस्म आदि अनेक प्रकार की औषधियों से हजार वर्ष या इससे भी अधिक आयु प्राप्त करने की बात लिखी है। ‘सत्य हरिश्चंद्र’ नाटक में पारद के ‘गुटिका’ का प्रभाव कथन करते हुये लिखा है-

याही के परभाव सों अमर देव सम होइ। योगीजन बिहरें सवा, मेरु शिखर मच खोइ॥

कायाकल्प की विधि के विषय में तो अब भी अनेक वैद्यों और जड़ी-बूटी वालों का कहना है कि उसके द्वारा निश्चय ही वृद्ध को युवा बनाया जा सकता है। इस विधि का प्रयोग लगभग 25 वर्ष पूर्व मालवीय जी पर गया था और कहा गया था कि इससे उनके शरीर में एक बार तरुणाई के कुछ चिन्ह दिखलाई भी दिये थे, पर बाद में बहुत अधिक बुढ़ापे के कारण उनकी प्रतिक्रिया हानिकारक जान पड़ी, जिससे फिर यह चर्चा दब गई।

आधुनिक डाक्टरों का दावा :-

पर अब इस क्षेत्र में पश्चिमीय वैज्ञानिकों और चिकित्सकों ने कदम रखा है और वे अपने ‘इन्जेक्शनों’ द्वारा अनेक बार वृद्धों को युवक बनाकर दिखा चुके हैं। अब से 50 वर्ष पहले इसके लिये बन्दर की गाँठों को लगाने इलाज चला था और हमारे देश के एक धनकुबेर ने भी उसी समय फ्राँस से एक चिकित्सक को बुलाकर अपने शरीर में बन्दर की ग्रन्थियाँ लगवाई थीं, जिससे वे पुनः युवावस्था का सुख प्राप्त कर सकें। पर अब विज्ञान इससे बहुत अधिक उन्नति कर गया है। रूस के वैज्ञानिकों ने दीर्घजीवन की समस्या पर बहुत विचार किया है और इसके परिणामस्वरूप वहाँ के निवासियों की औसत आयु जो सन् 1923 में 44 वर्ष थी, 1963 में 70 वर्ष तक पहुँच गई। वहाँ पर यह परिवर्तन अपने आप अथवा सहज में नहीं हो गया है, वरन् इसके लिये वहाँ की सरकार और जनता दोनों में सम्मिलित रूप से बहुत अधिक प्रयत्न किया है। इसका विवेचन करते हुए वहाँ के प्रो. उरलानिस ने लिखा है-

“सोवियत संघ में लोगों की जीवनावधि बढ़ाने के लिये हुए सम्भव प्रयास किया जा रहा है। मनुष्य के हित में उसके जन्म से ही इस सम्बन्ध में कार्य आरम्भ हो जाता है। देश के समस्त डडडड महिलाओं के ऐसे हजारों स्वास्थ्य केन्द्र हैं, जो गर्भवती महिलाओं के स्वास्थ्य का ध्यान रखते हैं। प्रायः सभी बच्चों का जन्म प्रसूति-अस्पतालों में होता है। सोवियत-संघ में 5 लाख से अधिक डाक्टर जनता के स्वास्थ्य की रक्षा करते हैं। रूस की जनसंख्या समस्त संसार की आबादी का 1।14 है, पर डाक्टरों की संख्या वहाँ पर 1। 4 है। इसको यों भी समझा जा सकता है कि रूस में जहाँ दस हजार व्यक्तियों पर 23 डाक्टर हैं, वहाँ पश्चिमी जर्मनी और अमरीका जैसे प्रसिद्ध और विकसित देशों में इतनी ही संख्या पर केवल 20 डाक्टर हैं। अन्य देशों में तो उनकी तादाद 10 या 5 प्रति दस हजार ही है।

जन-जीवन में वृद्धि होने का एक कारण संक्रामक रोगों में रोक लगाना भी है। पहले जहाँ हैजा, प्लेग, इन्फ्ल्यूऐन्जा, मलेरिया आदि फैलने पर हजारों व्यक्ति उनके शिकार हो जाते थे और गाँव तथा कस्बे खाली हो जाते थे, वहाँ अब इनकी रोक-थाम पहले से ही टीका लगाकर की जाती है और बीमारों को विशेष इलाज द्वारा बचा लिया जाता है। सोवियत संघ में इस संबंध में काफी ध्यान दिया गया है। इसके सिवाय वहाँ लोगों के रहन-सहन की परिस्थितियों को ऊँचा उठाने का भी बहुत प्रयत्न किया जाता है। वहाँ हर वर्ष लाखों नये घर बनाये जाते हैं, जिनमें मनुष्य अधिक सुविधा और स्वच्छता के साथ रह सकते हैं।

इन प्रवृत्तियों का परिणाम यह हुआ है कि अब रूस वृद्धावस्था की धारणा ही बदल गई है। अब वहाँ 60 वर्ष की आयु को अधिक नहीं समझा जाता और 60 से 70 वर्ष के बीच की आयु अनेक व्यक्तियों के लिये बहुत अधिक क्रियाशीलता और सफलता भी सिद्ध होती है। सौ वर्ष पूर्व वहाँ अधिकाँश लोग 40-50 के बीच में मरते थे, पर अब अधिकाँश मौतें 70 और 80 के बीच में होती हैं।

स्नायुओं का इलाज-

पर रूस के वैज्ञानिक इतनी प्रगति से संतुष्ट नहीं हैं और वे अनेक विधियों से वृद्धावस्था और जीवन के क्षय होने के कारणों की खोज करके उनको दूर करने के उपाय सोच रहे हैं। ‘बाइलो विज्ञान अकादमी’ के अध्यक्ष बी. कुप्रेविच ने लिखा है कि औषधियों के द्वारा हम रोगों को अवश्य मिटा सकते हैं और हमें आशा है कि इस शताब्दी के अन्त तक अर्थात् आगामी तीस-बत्तीस वर्षों में हम समस्त बीमारियों पर विजय प्राप्त कर लेंगे, तो भी इससे दीर्घायु की समस्या हल नहीं हो सकती। अगर हम केवल दवाओं के ही भरोसे रहे तो एक समय ऐसा आयेगा, जब सब दवायें बेकार हो जायेंगी। हम दवाओं के द्वारा मनुष्य को 100 या 120 वर्ष तक जीवित रख सकते हैं, पर फिर वे दवायें उसके शरीर के साथ ऐसी एकात्म हो जायेंगी कि उनका उस व्यक्ति पर जरा भी प्रभाव न पड़ेगा।

इस संबंध में बहुत कुछ खोज-बीन करके वैज्ञानिकों ने निर्णय किया है कि मनुष्य की इच्छानुसार जब तक चाहे तब तक जीवित रहने में मुख्य कठिनाई स्नायु-व्यवस्था के कारण पड़ती है। शरीर के और सब अंगों के कोष्टों (सेलों) और जन्तुओं का तो नवीनीकरण होता रहता है, पर मस्तिष्क जैसा का तैसा रहता है और बुढ़ापे में वह बिल्कुल थक जाता है। चिकित्सा-शास्त्र के अनुसार मनुष्य के सभी अंगों में अपनी निर्माण-सामग्री की वृद्धि करने की क्षमता होती है और सात वर्ष के भीतर प्रत्येक पुराना कोष्ठ नया हो जाता है। पर यह नियम स्नायु-कोष्ठों पर लागू नहीं होता। श्री कुप्रेविच का कहना है कि हाल की खोजों से आगे चलकर ऐसा भी समय आ सकता है, जब हम स्नायु कोष्ठों को भी नया कर सकें। ऐसा हो जाने पर मनुष्य हजार वर्ष तक भी जीवित रह सकेगा। उस स्थिति को हम ‘अमरता’ के नाम से पुकार सकते हैं।

आधुनिक विज्ञान की इन खोजों को अनेक चिकित्सकों ने व्यवहारिक रूप देना आरम्भ भी कर दिया है। ज्यूरिख (स्विट्जरलैंड) के डा. फ्रैंकलिन ई. बर्चर ने गाँठों द्वारा वृद्धावस्था को रोकने वाले इलाज में सुधार करके मानव-देह में जीवित ‘हारमोन्स’ का इन्जेक्शन देने की विधि निकाली है, जिससे अभी तक कितने वृद्ध तरुणाई प्राप्त कर चुके हैं। इस इलाज के लिये रोगी को कई दिन तक एक कमरे में बिस्तर पर लिटाकर रखा जाता है। इस अवधि में उसे चिकित्सा द्वारा निर्धारित विशेष हल्के खाद्य पर रहना पड़ता है। डा. बर्चर अपनी देख-रेख में भोजन स्वयं बनवाकर रोगी के पास भिजवाते हैं। इसके पश्चात डाक्टर एक रासायनिक इन्जेक्शन लगाता है। ऐसा इन्जेक्शन प्रायः तीन दिन लगाया जाता है। इसके बाद रोगों को एक-दो दिन बिस्तर पर ही लेटे रहकर पूर्ण विश्राम करना पड़ता है। इस बीच में उसे विटामिन युक्त भारी खुराक दी जाती है। यद्यपि इस चिकित्सा का नतीजा दो-चार दिन में ही दिखलाई नहीं पड़ सकता, पर दो-चार सप्ताह में बुढ़ापे के कितने ही लक्षण मिटकर काफी शक्ति और फुर्ती आ जाती है, जो काफी समय तक स्थायी रहती है।

इस प्रकार पश्चिमी जीव-विज्ञान और चिकित्सा-विज्ञान के ज्ञाताओं ने सम्मिलित रूप से ‘चिरायु’ की समस्या को बहुत कुछ सुलझाया है। वे चाहें तो किसी भी ऐसे व्यक्ति को लेकर जिसकी आयु 60-70 वर्ष की निर्धारित मानली गई है, अपने अभी तक जाने जा सके उपायों द्वारा सौ, दो-सौ या इससे भी अधिक वर्षों तक जीवित रख सकते हैं। पर साथ ही हम यह कहने के लिये भी बाध्य हैं कि उनके समस्त उपाय पूर्णतः कृत्रिम हैं और इनके कारण वह व्यक्ति डाक्टरों पर इतना आश्रित हो जायेगा कि उनकी स्वतन्त्र-सत्ता एक प्रकार से समाप्त ही समझनी चाहिये। दूसरी बात यह भी है कि ये सब उपाय और इलाज इतने व्यय साध्य है कि वर्तमान परिस्थितियों में सामान्य, आर्थिक साधनों वाला व्यक्ति उनका ख्याल भी नहीं कर सकता।

हमारे लिये ये बातें कोई अद्भुत और अनहोनी नहीं हैं। हमारे देश के चिकित्सकों तथा योगों ने बहुत प्राचीनकाल में ही सैंकड़ों वर्ष की आयु प्राप्त करने की विधियाँ ढूँढ़ निकाली थीं और उनकी विशेषता यह थी कि उनमें बाह्य साधनों की कम-से-कम आवश्यकता पड़ती थी। यह तो सच है कि प्रत्येक व्यक्ति उनको पूरा नहीं कर सकता था और न आज-कल की तरह कुछ हजार रुपया व्यय करके ही उस लाभ को प्राप्त किया जा सकता था। उस समय संयम, नियम, तपस्या ही इसके प्रधान साधन थे। जो लोग औषधि का प्रयोग करते थे, उनको भी न्यूनाधिक परिणाम में इनका पालन करना पड़ता था। इसलिये एक प्रकार से अपनी पात्रता सिद्ध करने पर ही ‘प्रकृति देवी’ और ‘आत्म-देव’ से चिरायु का वरदान प्राप्त होता था। आज-कल की खरीदी हुई ‘दीर्घायु प्रायः भोग-विलास में ही प्रयुक्त होती है।

अमृतत्व के संबंध में भारतीय साधकों का दृष्टिकोण बहुत स्पष्ट है। उनकी दृढ़ धारणा है कि ‘हम शरीर नहीं वरन् आत्मा हैं’ और आत्मा अमर है। शरीर आत्मा का आज्ञाकारी वाहन है। यदि हमारी आत्मा जागृत है, अपनी शक्तियों को पहचानती है और उनका प्रयोग करने की सामर्थ्य रखती है तो हम शरीर को जब तक जिस अवस्था में चाहें रख सकते हैं। निस्संदेह इस प्रकार शरीर पर स्वामित्व और नियंत्रण प्राप्त करना उच्चकोटि के मनस्वी और विवेकशील व्यक्तियों के लिये ही संभव है और यही उचित भी है। यदि ऐरे-गैरे, विषय-भोगों के कीड़े धन के बल पर दीर्घायु प्राप्त कर भी लें तो वह व्यर्थ ही है। वे जब तक जीवित रहेंगे, पृथ्वी के भार ही रहेंगे। चिरायु तो उसी की सार्थक है, जिसका जीवन स्वार्थ के लिये नहीं परमार्थ के लिये हो।


समुद्री वनस्पतियों से दीर्घायु

समुद्री वनस्पतियों से दीर्घायु

अमरीका और योरोप के वैज्ञानिक आजकल समुद्र से ऐसी वनस्पतियाँ तथा पदार्थ ढूँढ़कर निकाल रहे हैं, जो वास्तविक अर्थों में जीवन दाता हैं। गत वर्षों से चिकित्सा जगत में ‘पेंसिलीन’ की धूम रही है और आरम्भ में उससे हजारों ही मरते हुये व्यक्ति बचाये गये थे और अब भी करोड़ों मरणासन व्यक्तियों पर उसका प्रयोग किया जाता है, जिनमें से बहुसंख्यक बच जाते हैं। पर अब वैज्ञानिकों ने ‘पफर’ नामक मछली से जो जहर निकाला है, वह शोषित और नियन्त्रित होने पर अमृत का ही काम करता है। इसी प्रकार वैज्ञानिकों ने पता लगाया है कि मृत शरीरों के सड़ने से समुद्र का जल साधारणतः दूषित हो जाता है, पर यदि स्पञ्ज के पास कोई मृत शरीर सड़ता है तो भी वहाँ का जल गन्दा नहीं होता।

इससे यह अनुमान किया गया है कि स्पञ्ज में कोई रोगाणु नाशक तत्त्व है, जिसकी यदि औषधि रूप में प्रस्तुत किया जायेगा तो कीटाणुओं के कारण उत्पन्न रोगों के लिये वह अत्यंत प्रभावकारी सिद्ध होगा। इस प्रकार मनुष्य ने पृथ्वी पर यदि जाने वाली जड़ी-बूटियों और जीवों को उपयोग में लाकर अब समुद्र की तरफ ध्यान दिया है। संसार में जितने प्रकार के जीवधारी पाये जाते हैं उनमें से 80 प्रति सैकड़ा समुद्र में ही मिलते हैं। यही बात वनस्पतियों के संबंध में भी कही जा सकती है। इसलिये जब खोज करने वाले वैज्ञानिक पूरे उद्योग के साथ समुद्र का मंथन आरम्भ कर देंगे तो न मालूम कैसी-कैसी आश्चर्यजनक औषधियाँ उसमें से मिलने लगेंगी?


अणु-शक्ति अभिशाप अथवा वरदान?

जिस दिन 6 अगस्त 1945 को जापान के हिरोशिमा टापू में पहला बम फटा उसी दिन संसार के ऊपर एक ऐसी काली-छाया पड़ गई, जो सदैव उसके अस्तित्व को संकटापन्न बनाती रहती है। तब से अब तक लगभग 28 वर्ष का लंबा समय बीत गया और संसार जीता-जागता दिखाई पड़ रहा है, पर समाचार-पत्रों के नियमित पाठक जानते हैं कि इस बीच में न मालूम कितनी बार सर्वनाश की सम्भावना उत्पन्न हो चुकी है और दो-तीन बार तो अणु-बमों से लदे विमानों को ‘शत्रु’ पर आक्रमण करने का आदेश दिया जा चुका है। वह तो भला हो कैनेडी, खुरश्चैव और पं. जवाहरलाल नेहरू जैसे महामानवों का, जिन्होंने अपनी पूरी शक्ति लगाकर ऐसी ‘दुर्घटनाओं’ को रोका और संसार की रक्षा की।

यह नई ‘अणु महाशक्ति’ निश्चय ही संसार की कायापलट करके रखेगी, इस तथ्य को सभी जानकार लोगों ने उसी समय जान लिया था। अमेरिका में ‘अणु-वैज्ञानिकों’ के संघ ने, जिनकी खोजों के आधार पर अणु-बम बनाया जा सका था, एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी जिसका शीर्षक था- ‘‘अणु-बम के सच्चे अर्थ के संबंध में जनता के सामने एक वक्तव्य।” इसके मुख पृष्ठ पर मोटे अक्षरों में लिखा था- ‘वन वर्ल्ड और न न।’ इसका आशय था कि “अणु-शक्ति सामान्य रासायनिक शक्ति से लाखों गुना अधिक जोरदार है। इसने एक क्षण में हिरोशिमा की सभ्यता को आसमान में पहुँचा दिया। अगर इसको नियन्त्रण में रखा जा सके तो यह मानव-जाति के जीवन यापन-स्तर को इतना अधिक ऊँचा उठा सकती है, जिसकी आज हम कल्पना भी नहीं कर सकते।”

इतना ही नहीं उसी समय ‘राष्ट्र संघ’ (यूनाइटेड नेशंस) की जनरल असेम्बली ने एक ‘ऐटोमिक एनर्जी कमीशन’ नियुक्त किया, जिसे निम्न विषयों पर विचार करने का आदेश दिया गया-

विभिन्न राष्ट्रों के बीच अणु-शक्ति सम्बन्धी वैज्ञानिक जानकारी का शाँतिपूर्ण कार्यों के लिये आदान-प्रदान किया जाय।

अणु शक्ति के नियंत्रण की ऐसी व्यवस्था की जाय, जिससे उसका उपयोग शाँतिपूर्ण उद्देश्यों के निर्मित ही किया जाय।

राष्ट्रीय सैनिक अस्त्र-शस्त्रों में से सर्व-सहायक अणु-शस्त्रों तथा अन्य ऐसे ही शस्त्रों को त्याग दिया जाय।

इसमें सम्मिलित होने वाले राष्ट्रों की दृढ़ सुरक्षा के लिये निरीक्षण तथा अन्य उपायों द्वारा इस निषेध के विरुद्धाचरण करने वालों की जाँच-पड़ताल की जाती रहे।

ये सभी उद्देश्य बहुत स्पष्ट और विश्व-हितकारी थे और सभी प्रमुख देशों ने इनकी युक्ति-युक्तता स्वीकार की थी, पर खेद है कि आज सत्ताईस वर्ष व्यतीत हो जाने पर भी यह निर्माण जवानी बहस में ही पड़ा है। अणु-शस्त्रों का निर्माण और प्रसार रोकने की चेष्टा करते रहने पर भी उनका निर्माण और उनकी शक्ति सन् 1946 की अपेक्षा सौगुनी हो चुकी है। उस समय अकेले अमरीका के पास शायद दस-पाँच साधारण श्रेणी के एटम बम थे, तो आज अमरीका और रूस के पास कुल मिलाकर पाँच हजार से भी अधिक बम होंगे, जिनमें से हर एक पुराने बमों से दस से सौ-गुना तक शक्तिशाली है।

यह नई प्रलयकारिणी शक्ति, जो विधि के विधानवश स्वार्थी मनुष्य के हाथों में आ गई है कितनी भयंकर है, उसका कुछ अनुमान उन विवरणों से किया जा सकता है, जो समय-समय पर अमरीका और योरोप के पत्रों में प्रकाशित होते रहते हैं। उससे विदित होता है कि दो करोड़ टी. एन. टी. (विस्फोटक) में जितनी शक्ति होती उतनी ही शक्ति ‘यू 235’ (एटम बम में काम आने वाला ‘यूरेनियम’ नाम का पदार्थ) के एक किलोग्राम में पाई जाती है। एक किलोग्राम यूरेनियम में ‘थर्मोन्यूक्लियर’ 5 करोड़ 70 लाख टी. एन. टी. के समान स्फोट करने की प्रचण्ड शक्ति होती है। आप इसका अनुमान इससे कर सकते हैं कि इसका प्रभाव उतना ही होगा जितना एक लाख तोप के भयंकर गोलों का हो सकता है।

यह शक्ति कितनी प्रचण्ड है इसका अनुमान इससे हो सकता है कि जहाँ कोयला और पेट्रोल के एक किलोग्राम से, 8 से 12 तक किलोवाट शक्ति का उत्पादन होता है वहां यूरेनियम और थोरियम धातुओं के एक किलोग्राम से 2 करोड़ 30 लाख किलोवाट शक्ति पैदा होती है और हाइड्रोजन के रूप में वह प्रति किलोग्राम 17 करोड़ 70 लाख तक पहुँच सकती है।

इस प्रकार पुराने तरह के ईंधन (कोयला, तेल आदि) और अणु-ईंधन में पृथ्वी-आकाश का अंतर है। जैसे तीस−चालीस वर्ष पहले किसी भी राष्ट्र के छोटे-बड़े होने की कसौटी जल और आकाश के जहाज माने जाते थे, उसी प्रकार आधुनिक युग में छोटे-बड़े राष्ट्रों की पहिचान ‘अणु-शक्ति’ के आधार पर होने लगी है। इसलिये चाहे साधन कम भी हों तो भी इस समय सभी समर्थ राष्ट्र अणु-शस्त्र तैयार करने में संलग्न हैं। चीन ने देखा कि वह अमरीका का विरोध तो कर रहा है, पर यदि वह अणु-शस्त्रों का प्रयोग करने लगे तो उसका मुकाबला करने की शक्ति उसमें नहीं है। यह देखकर वह अनेक प्रकार की आन्तरिक कठिनाइयाँ होते हुए भी उस उद्देश्य की पूर्ति के लिए प्राणपण से प्रयत्न करने लग गया और पिछले सात-आठ वर्षों में उसने इतनी प्रगति करली है कि अमरीका उसकी तरफ से चिन्तित रहने लगा है। यद्यपि अब भी अमरीका की अणु-शक्ति चीन की अपेक्षा सौ-गुनी होगी, तो भी अणु-शस्त्रों की नाशकारी शक्ति को देखते हुए थोड़े से ही बम किसी देश का नाश करने के लिये काफी होते हैं। यही कारण कि अब अमरीका नये अणु-बम बनाने के बजाय अपने प्रधान नगरों के चारों तरफ ऐसे संयत्र लगा रहा है, जिनसे शत्रु द्वारा किसी भी अणु-बल का निवारण किया जा सके।

जैसे-जैसे हाइड्रोजन बमों की भयंकरता बढ़ती जाती है, वैसे-वैसे ही उनकी दूरवर्ती लक्ष्य पर कम-से-कम समय में फेंकने की विधि ढूँढ़ने में लोग अधिकाधिक प्रयत्नशील हो रहे हैं। अब से कुछ वर्ष पहले तक इस कार्य के मुख्य साधन जेट विमान थे, जो 400 से 1500 मील प्रति घंटा तक चल सकते थे। यह गति आक्रमणकारियों को बहुत कम जान पड़ी। इस गति से अमरीका से रूस पहुँचने में कम-से-कम तीन घण्टा और चीन तक छः घण्टे का समय लग जायेगा। इसलिये बम ले जाने वाले ‘राकेट’ बनाये गये, जिनमें बहुत शक्तिशाली रासायनिक द्रव्य भरे गये। इनकी गति घण्टे से 15 से 25 हजार मील के लगभग है। पर इस अणु-युग में लोगों को इससे भी संतोष नहीं हुआ और अणु-शक्ति की सामग्री द्वारा राकेट को चलाने की विधि सोची गई।

अब ‘प्लाज्मा’ और ‘प्रोटोन’ (अणु-शक्ति संपन्न पदार्थों) के प्रयोग से यह गति एक घण्टे में 50 लाख मील तक बढ़ाली गई है। यह गति बिजली की गति से कुछ ही कम है। यह नहीं कहा जा सकता कि अभी यह सिद्धान्त की बात है अथवा व्यवहार में भी आ चुकी है, तो भी यह निश्चय है कि अमरीका और रूस ऐसे राकेट बना चुके हैं जो एक घण्टे से कम समय में संसार के किसी भी भाग में पहुँच सकते हैं।

दूसरे महायुद्ध में हिटलर ने एक प्रकार के बी-1 और बी-2 नामक स्थायी ‘राकेट’ बनाकर उनके द्वारा अपने देश से ही इंग्लैंड पर बम वर्षा की थी। उससे 13 हजार व्यक्ति मरे और 40 हजार घायल हुये थे। इन अस्त्रों का निर्माता ‘डा. बर्जर’ आज-कल अमरीका चला गया है। वहाँ वह अमरीका विरोधी साम्यवादी देशों को अणु-शक्ति द्वारा नष्ट करने की विधि परिपक्व करता रहता है। सन् 1961 में उसने परामर्श दिया था कि अन्तरिक्ष में उड़ने वाले यानों से सैकड़ों अणु-बम एक साथ छोड़ने की तैयारी करनी चाहिये।

ऐसे लोगों का मस्तिष्क मानव सभ्यता को मटियामेट करने के लिये कैसे-कैसे दानवी उपायों को सोच सकता है, यह देखकर आश्चर्य में डूब जाना पड़ता है। अमरीका के ही एक अस्त्र आविष्कारक की योजना है कि 50 हजार टन भार का और 5 किलोमीटर व्यास का एक ग्रह अन्तरिक्ष में पहुंचाया जाय और अन्तरिक्षयान के धक्के से उसका विस्फोट किया जाय, इससे जो विस्फोट होगा उससे 20-25 करोड़ की आबादी वाला समूचा देश कुछ क्षण में भस्म के रूप में परिवर्तित हो जायेगा।

अणु-शस्त्रों के निर्माता संसार के लिए एक ऐसा ठोस खतरा पैदा कर रहे हैं, जिससे किसी भी दिन मानव-जाति क्या पृथ्वी पर के समस्त प्राणधारियों की प्रलय हो सकती है। फिर भी वे इसे अपने बनाये कानूनों के अनुसार ‘उचित’ और ‘वैध’ बतलाते हैं। ऐसी घटना केवल भौतिकवाद के अनुयायी पूँजीवाद के अंतर्गत ही हो सकती है, जहाँ प्रत्येक पदार्थ का, यहाँ तक कि मनुष्य की जान का भी मूल्य रुपयों में आँका जाता है। पर कोई सच्ची अध्यात्मवादी धातु, पत्थर अथवा कागज के टुकड़ों को कभी अधिक महत्व न देगा। वह इन सामयिक मूल्य के जड़-पदार्थों को मानवता और आत्मोत्कर्ष की तुलना में कदापि ऊँचा स्थान नहीं होगा। अणु-शक्ति जैसी विश्वसंहारक प्रक्रिया के प्रयोग करने का अधिकार ‘महाकाल’ को हो ही सकता है। जो स्वार्थी व्यक्ति या राष्ट्र इस दैवी शक्ति को किसी जघन्य उद्देश्य के निमित्त काम में लायेगा, सबसे पहले उसी का सर्वनाश निश्चित है।

अणु-शक्ति अस्त्रों के रूप में नहीं रचनात्मक शक्ति के रूप में भी विकसित होती जाती है। इस संदर्भ में चोटी के राजनीतिज्ञों, विचारकों तथा लोक नेताओं को यह विचारने के लिये विवश होना पड़ रहा है कि इस शक्ति के दबाव में हमें पृथकतावादी विचारधारा से विरत होकर एक समाज विश्व परिवार की रचना एवं व्यवस्था करनी पड़ेगी। अणु-शक्ति को किसी राष्ट्र या वर्ग सम्पत्ति न रहने देकर उसे विश्व-परिवार के हाथों सीमित सुरक्षित करना पड़ेगा। अन्यथा इसका संहारक प्रयोग मानव सभ्यता की ही नहीं उसके अस्तित्व को भी समाप्त कर देगा।

विश्वास किया जाता है कि बुद्धिमान समझा जाने वाला मनुष्य, प्राणी आत्मघात की मूर्खता न करेगा। तब उसके लिये विश्व-परिवार का- विश्व-राष्ट्र का- विश्व-धर्म का- विश्व-संस्कृति का निर्माण करना ही एक मात्र विश्व-शान्ति का मार्ग दिखाई देगा।

यदि विश्व एकता की दिशा में अणु-शक्ति मानव-जाति को कुछ ठोस प्रेरणा दे सकी तो उसे अभिशाप के स्थान पर वरदान भी माना जाने लगेगा।


विज्ञान अभी तक आदि-मूल के विष में अनजान है

विज्ञान अभी तक आदि-मूल के विष में अनजान है-

विज्ञान (साइंस) जानने वालों की हैसियत से हमको यह स्वीकार कर लेना चाहिये कि सरल से सरल वस्तु, यहाँ तक कि कंकड़ के भी आदि मूल का हमें कुछ ज्ञान नहीं। चट्टानों के टूटने-फूटने से रेत बनता है और उसी रेत के इकट्ठा हो जाने से फिर चट्टानें बन सकती हैं। परंतु इससे आदि मूल का पता नहीं चल सकता। कोई वैज्ञानिक यह नहीं बता सकता कि पहले मुर्गी थी या उसका अंडा? यह सृष्टि की जटिल समस्या का एक साधारण रूप है। यह सत्य है कि इस पृथ्वी का, जो मिट्टी का बना हुआ एक लोथड़ा है, आरंभ अवश्य था और इतिहास भी अवश्य था। साइंस को इसका अवश्य कुछ-कुछ ज्ञान है। उस समय का भी पता लग सकता है, जब यह पिछली हुई वस्तु थी। चन्द्रमा कैसे और किसके द्वारा उत्पन्न हुआ, इसकी भी अटकल लगाली गई है। इस प्रकार एक अर्थ में पृथ्वी और चंद्रमा दोनों की उत्पत्ति अवश्य हुई। पर ये सब बातें सृष्टि के आदि मूल के सामने कुछ भी नहीं। पृथ्वी का पूरा इतिहास भी सृष्टि के अनन्त परिमाण और काल की अपेक्षा में एक क्षण-मात्र की तरह है। इन बातों का निर्णय और हमारा संतोष तभी हो सकता है, जब हम उस तत्त्व को और उसके संचालन कर्त्ता को जान ले जो ‘नित्य’है।


आत्मायें धरती पर उतरीं और ...।

ब्राजील के दो टेलीविजन इंजीनियर मिगेल वायना जिसकी आयु कोई 35 वर्ष होगी। मैनुअल क्रूज जो 32 वर्ष का था- दोनों की अन्तरिक्ष के रहस्य जानने की उत्कट अभिलाषा रहती थी। दोनों ने मिलकर एक प्रयोगशाला बनाई थी और उसमें विभिन्न प्रकार के प्रयोग किया करते थे। कुछ लोगों का कहना है कि उन्होंने अन्तरिक्ष-वासियों को सन्देश प्रेषित करने के कुछ सूत्र ढूँढ़ लिये थे। वे कितने सत्य थे, इस संबंध में कुछ कहा नहीं जा सकता।

किन्तु उनकी मृत्यु ऐसे रहस्यमय ढंग से हुई, जिसका वर्णन सुनकर महर्षि वेदव्यास के वेदान्त दर्शन में अध्याय 3 पाद 3 के 53-54 सूत्रों में जीवात्मा की स्थिति सत्य प्रमाणित होने लगती है कहा है-

व्यतिरेकस्तद्भावाभावित्वान्न तूपलब्धिवत्। उत्तर मीमाँसा 3। 3। 54

अर्थात्- शरीर से आत्मा भिन्न है, क्योंकि शरीर के विद्यमान होते हुये भी उसमें आत्मा नहीं रहती।”

तात्पर्य यह कि शरीर एक प्रकार का क्षेत्र है। उसे आत्मा का वाहन भी कह सकते हैं। आत्मा अति सूक्ष्म और क्षेत्र है वह अपने संकल्प और कर्मानुसार शरीर बदल सकती और लोकान्तरों में भी जा सकती है। जर्मन वैज्ञानिक हेकल ने अपने ग्रन्थ “दि रिडल आफ दि यूनिवर्स” में यह सिद्धान्त प्रतिपादित करते हुये बताया है कि परमाणुओं में चेतनता निहित है। जब तक आत्मा शरीर में रहता है, तब तक वह चेतनवत् प्रतीत होता है। आधुनिक विज्ञान ने यह सिद्ध कर दिया है कि इन्द्रियों की सहायता के बिना भी बाह्य जगत का ज्ञान प्राप्त हो सकता है, आत्मा किसी भी लोक और प्रदेश में विचरण कर वहाँ की तन्मात्राओं की अनुभूति कर सकती है।

अगस्त 1966 की बात है। उक्त दोनों वैज्ञानिक कैम्पोस से रियो-डि-जानेरियो के लिये निकले। इसी वर्ष साओ पोलो से कोई 100 मील उत्तर पश्चिम की ओर आकाश में कोई गोलाकार वस्तु तेजी से चक्कर काट रही थी। बाद में उससे कोई हव्य निकला, जिससे कम्पिनास कस्बे की सारी सड़कें गीली हो गई। वैज्ञानिकों ने उक्त हव्य का विश्लेषण किया तो यह पाया कि वह पिघला हुआ शुद्ध टिन था। अनुमान है कि वह गोलाकार वस्तु कोई उड़न तस्तरी थी, जो किसी अन्य ग्रह से आई थी। उसमें बैठी हुई आत्माओं ने या तो प्रयोग के लिये या फिर संकेत देने की दृष्टि से ही वह द्रव पृथ्वी में डाला होगा।

दोनों इंजीनियर घर से 9 बजकर 30 मिनट पर निकले। क्रूज की धर्मपत्नी नेली ने एक हजार पाउण्ड के नोट एक कागज में बाँधकर क्रूज को दिये, जिससे वह आवश्यक वस्तुयें खरीद सके। उन्हें टेलीविजन के कुछ पुर्जे और कार खरीदनी थी। दोपहर के बाद दोनों नितराय शहर पहुँचे। वहाँ उन्होंने बरसाती कोट खरीदे। दुकानदार हैरान था कि इतनी भयंकर गर्मी में बरसाती कोट खरीदने का क्या कारण हो सकता है?

वहाँ से चलकर दोनों एक होटल में आये और “मिनरल वाटर” की कुछ बोतलें खरीदीं। यह होटल विन्टेम पहाड़ी की तलहटी में है। वहाँ से निकलकर क्रूज और वायना दोनों विन्टेम पहाड़ी पर चढ़ने लगे। उन्हें ऊपर चढ़ते हुए बहुत लोगों ने देखा। होटल की नौकरानी मारिया सिल्वा ने उन्हें 1000 फुट ऊँची पहाड़ी पर पहुँचते देखा और उसके बाद जो कुछ हुआ, वह अब तक भी लोगों के लिये महान् आश्चर्य एवं रहस्य का कारण बना हुआ है।

जैसे ही दोनों पहाड़ पर चढ़े कोई उड़न तस्तरी के आकार की वस्तु पहाड़ी पर उतरती दिखाई दी। उस समाचार की पुष्टि नगर के प्रमुख दलाल की पत्नी श्रीमती ग्रासिन्दा सूजा ने भी की है। उन्होंने लोगों को बताया कि कोई विचित्र वस्तु आकाश से विन्टेम पहाड़ी पर उतर रही थी। उसका रंग हरा, पीला और किनारे आग की तरह लाल रंग के थे।

विन्टेम पहाड़ी घने जंगलों वाला स्थान है और पिछले 25 वर्षों से वहाँ अक्सर उड़न तश्तरियां देखी जाती रही हैं। कुछ लोगों की तो निश्चित धारणा ही हो गई है कि जिस तरह पृथ्वीवासी मंगल, शुक्र आदि ग्रहों में जाने के लिये चन्द्रमा को स्टेशन बना रहे हैं, इसी प्रकार अन्तरिक्ष वासियों ने ब्राजील के विन्टेम पहाड़ को यहाँ की परिस्थितियों के अध्ययन का स्टेशन बनाया है। वहाँ प्रायः प्रतिदिन कोई विचित्र वस्तु आकाश से उतरती और कुछ देर ठहरकर चली जाती है।

क्रूज और वायना के वहाँ पहुँचने के बाद लोगों ने उड़न-तश्तरी तो देखी किन्तु रात तक क्या हुआ, इस संबंध में कुछ पता नहीं चल पाया। प्रातःकाल कुछ लड़के शिकार खेलने के लिये पहाड़ी पर चढ़े। वहाँ उन्होंने दोनों युवकों को मरा हुआ पड़ा देखा। बाद में यह खबर सारे शहर में फैल गई। पुलिस ने जाकर देखा तो आश्चर्य चकित रह गई। उनकी मृत्यु बड़े ही रहस्यमय ढंग से हुई।

दोनों बरसाती कोट पहने थे। पर कोट के नीचे कपड़ों में जरा-भी कहीं सलवट न थी जिससे स्पष्ट है कि किसी से हाथा-पाई नहीं हुई। दोनों के शरीर में कोई घाव नहीं थे। उनके पास एक पर्चा पड़ा पाया गया, उसमें कई दिन के प्रयोग के लिये कुछ गोलियों के नाम लिखे थे, उससे यह आशंका हुई कि सम्भवतः उन्होंने जहरीली औषधि खाई होगी पर अन्त्यपरीक्षा में उनके शरीर में किसी प्रकार के विष का कोई प्रभाव नहीं पाया गया।

लाश के पास दो मुखौटे भी थे, उनमें साँस लेने के छेद तो थे पर आँखों के लिये कोई स्थान न था। कुछ रंगीन कागज भी बिखरे थे, उनमें कोई ऐसा सूत्र लिखा था, जिसका कोई भी वैज्ञानिक अर्थ नहीं निकाल पाया। दूसरे दो पर्चों में कुछ संकेत इस तरह थे- ‘‘बुधवार-एक गोली, दवा तब लो जब नीचे लेट जाओ। दूसरे पर लिखा था शाम को 6 बजकर 30 मिनट पर गोली खाकर चेहरा मुखौटों से ढकलो और संकेत की रहा देखो।”

तिलस्म सी दिखने वाली इन तमाम बातों से अनुमान लगाया कि क्रूज और वायना अन्तरिक्ष से आने वाले उस यान पर चढ़कर किसी अन्य ग्रह को चले गये। उनका सूक्ष्म शरीर ही गया। सम्भवतः वे शरीर को इस तरह सुरक्षित इसलिये छोड़ गये होंगे कि बाद में वे अन्तरिक्ष से लौटकर आयेंगे और अपने शरीर में पुनः प्रवेश कर लेंगे।

सूक्ष्म शरीर को बाहर निकालकर पुनः मृत शरीर में प्रवेश के उदाहरण अनेक पौराणिक गाथाओं में मिलते हैं। 1959 में 17 मई को हिन्दुस्तान में भारतीय सेना के अंग्रेज अफसर श्री एल. पी. फेरल का प्रत्यक्ष प्रमाण प्राप्त अत्यंत रोचक वर्णन छपा था। उन्होंने उसमें बताया था- ‘‘मैंने एक वृद्ध योगी को एक मृत युवक के शरीर में प्रवेश करते देखा और उससे संपर्क स्थापित कर सारा रहस्य ज्ञात किया।” उन्होंने इस लेख में स्वीकार किया है कि आत्मा की सत्ता शरीर से पृथक और स्वतंत्र है। और वह अपने अच्छे-बुरे कर्मानुसार पुनर्जन्म और अन्य लोकों का भी आवागमन करता है।

प्रो. जे. बी. राइन ने भी विचार संक्रमण (टेलीपैथी) और दिव्य-दृष्टि (क्लेयर वायेन्स) के कई प्रयोगात्मक अनुसंधानों के द्वारा यह सिद्धकर दिखाया कि भौतिक उपकरण न हों तो भी दूसरों के विचार और अति दूरस्थ या भविष्य की घटनाओं का ज्ञान हो सकता है। यह भी प्रमाणित किया कि संसार के भिन्न-भिन्न भागों में जीव एक देह का परित्याग कर नया जन्म ग्रहण करते हैं। उनमें से कई को तो पूर्वजन्मों की स्मृति ऐसे ही बनी रहती है, जैसे सोकर जागने के बाद भी पिछले दिन की सारी घटनायें याद रहती हैं।

क्रूज और वायना की लाशों को सुरक्षित रखा जाता तो सम्भव था, उक्त तथ्यों की आश्चर्यजनक खोज होतीं, किन्तु पुलिस इन सब बातों को मानने के लिये तैयार न थी पुलिस इन्सपैक्टर जोंस ब्रिटेन-कोर्ट ने दोनों मुखौटे परीक्षण के लिये भेजे पर उनमें किसी प्रकार की रेडियो धर्मी तरंगों की बात पुष्ट नहीं हुई। ब्रिटेन-कोर्ट का दावा था कि जब वे लोग पहाड़ी पर आकर खड़े हुए होंगे, तब उनसे कोई वस्तु टकराई होगी। पर इस स्थिति में भी उनके शरीर में कहीं चोट के निशान तो होते। जिन परिस्थितियों में उनकी मृत्यु हुई, उन्हें देखकर तो यही लगता है कि उनके साथ सुनियोजित प्रयोग किया जा रहा था।

वायना के पिता ने उनके प्रयोग की कई विचित्र बातें बताईं और यह आशंका व्यक्त की कि इन दोनों का अन्तरिक्षवासियों से कोई रेडियो संबंध था और उनकी हत्या अन्तरिक्ष-वासियों ने ही की।

जो सबसे आश्चर्य की बात है वह है उस पर्चे का खो जाना जो पुलिस ने मृतकों के पास से प्राप्त किया। उस पर्चे को पुलिस ने तिजोरियों के अन्दर पहरे में रखा था पर उस कागज को कोई बड़े ही रहस्यपूर्ण ढंग से निकाल ले गया। उसका आजतक पता नहीं चल पाया।

यद्यपि यह सब अनुमान ही हे कि हत्या अन्तरिक्ष वासियों ने की। सम्भवतः मृत-आत्मायें वापस आतीं पर उनके शव सुरक्षित नहीं रखे गये। और यह कि उस डडडड में कुछ ऐसे सूत्र थे, जिनके सहारे उड़न तश्तरियों का रहस्य पकड़ा जा सकता था। यदि भौतिक उपकरणों के माध्यम से पृथ्वीवासी दूसरे ग्रहों में जा सकते हैं तो अन्तरिक्षवासी भी यहाँ आ सकते हैं। हमें तो यह देखना चाहिये कि क्या हम आत्मा का समीप से अध्ययन कर इस तरह की मान्यताओं के द्वारा कल्याण का कोई उपयुक्त हल निकाल सकते हैं और कोई ऐसा ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं, जो जन्म-मृत्यु, लोक-परलोक पुनर्जन्म के संबंध में हमारी जिज्ञासाओं का समाधान कर सकता है?

जिस प्रकार एक देश या एक ही द्वीप के निवासी दूसरे देश या द्वीपों के साथ संबंध जोड़कर प्रगति, समृद्धि, सुविधा और प्रसन्नता के अनेक साधन उपलब्ध करते हैं, निस्सन्देह उसी प्रकार अन्य लोकों के प्रबुद्ध प्राण-धारियों के साथ संपर्क साधकर हम अधिकाधिक समर्थ एवं लाभान्वित हो सकते हैं।


घोड़े की हत्या

अलामोसा (क्लोराडी) के हेरीकिंग अस्तबल से एक घोड़ा गायब हुआ। उसकी खोज-बीन की गई। घोड़ा वहाँ से 2 फर्लांग की दूरी पर ढूँढ़ तो लिया गया पर उसके गर्दन और सिर का सारा माँस खा लिया गया था, केवल हड्डियाँ रह गई थीं। माँस इतनी सफाई से निकाला गया था कि चाकू या किसी अन्य उपकरण से उसे नहीं छीला जा सकता था।

मृत घोड़े के पास श्रीमती लीविसे ने एक ऐसा अंग पाया जिससे घोड़े के बाल चिपके थे। उन्होंने उसे हटाने का प्रयत्न किया तो उनका हाथ जलने लगा। यह यंत्र पृथ्वी का सा यन्त्र नहीं लगता।

घोड़े से 100 गज की दूरी पर कुछ वृत्ताकार निशान पाये गये जिनकी संख्या छः थी, दो इंच चौड़े और चार इंच गहरे विमान के पैरों के चित्र हैं। सबसे बड़ा वृत्त 75 फुट व्यास का था। वैज्ञानिकों ने अनेक परीक्षण किये पर यह सिद्ध नहीं हो सका कि घोड़े की हत्या किसी पार्थिव प्राणी ने की। बिजली गिरने से भी घोड़े की मृत्यु नहीं हुई। इस घोड़े के पेट, मस्तिष्क और रीढ़ के स्थान बिल्कुल रिक्त पाये गये।

अनुमान है कि घोड़े की हत्या किन्हीं अज्ञात ग्रह के लोगों ने यहाँ आकर अपना आहार प्राप्त करने के लिये की। वह चिन्ह किसी उड़न-तश्तरी या अन्तरिक्षीय विमान के से लगते बताये गये हैं।


मनुष्य से तो चींटी में ही ज्यादा अकल है।

जब पृथ्वी के अन्य जीव-जन्तुओं से ही हम मनुष्यों की तुलना करते हैं तो स्पष्ट जान पड़ता है कि ज्ञान-विज्ञान का अहंकार रखने वाला मनुष्य अभी अपने सामाजिक संगठन और व्यवहार में उस स्तर तक भी नहीं पहुँचा है, जहाँ तक कि कितने ही छोटे जीव-जन्तु- कीड़े-मकोड़े लाखों वर्ष पहले पहुँच चुके हैं। चींटियों, मधुमक्खियों, दीमकों, बर्रों का आन्तरिक संगठन, अनुशासन प्रियता और नागरिकता की भावना मनुष्यों की अपेक्षा बहुत उच्चकोटि की होती है और उसी के आधार पर वे इतने लंबे काल से अपनी रक्षा करते आये हैं।

अभी तक प्राणि-शास्त्र की खोजों से जहाँ तक जाना जा सका है, मनुष्य की उत्पत्ति को दस लाख वर्ष से अधिक समय नहीं हुआ। जैसी स्थिति में आजकल घोर जंगली मनुष्य रहते हैं, उसको प्राप्त किये हुये तो लाख-दो-लाख वर्ष का समय ही गुजरा होगा।

इसके विपरीत चींटी और मधुमक्खी आदि के विषय में बहुत जाँच-पड़ताल करके जगत् प्रसिद्ध वैज्ञानिक जूलियन हक्सले और ह्वीलर आदि ने यह निर्णय किया है कि उनका विकास 25 लाख वर्ष पूर्व हो चुका था और तब से उनमें कोई खास परिवर्तन नहीं हुआ है। इनके संगठन का वर्णन करते हुए एक विद्वान् डा. स्टाकर्ड हेथम ने लिखा है-

“समस्त सामाजिक कीड़ों में चींटियां सबसे अधिक सफल और कदाचित सबसे ज्यादा विचित्र हैं। उनकी समस्त जातियों की संख्या लगभग तीन हजार है। कुछ जातियां ऐसी होती हैं, जिनके बिलों में रहने वाले कुल जीवों की संख्या एक-सौ के आस-पास ही होती है और किसी-किसी जाति के बिल में पाँच लाख तक प्राणी रहते हैं। अण्डा देने वाली थोड़ी-सी ‘रानियों’ को छोड़कर सभी कोई चींटी बहुत बड़ी नहीं होती। सबसे बड़ी ‘नपुंसक चींटी की तोल भी कभी एक ग्राम (तीस रत्ती) से अधिक नहीं होती। दूसरे शब्दों में एक मामूली आदमी के वजन के बराबर होने के लिये एक लाख से अधिक चींटियाँ तराजू के पल्ले में चढ़ानी पड़ेंगी। यह तो सबसे बड़ी चींटी की बात हुई। जिनको आहार ढोने और शत्रुओं से युद्ध करने के लिये अपने शरीर को विशेष रूप से बड़ा और मजबूत बनाना पड़ता है। छोटी चींटियाँ तो इससे बहुत हल्की होती हैं।

इन चींटियों में जो अनेक रहस्यपूर्ण प्रवृत्तियाँ देखने में आती हैं, उनमें सर्वाधिक महत्व की बात उनकी योजना व्यवस्था है। भोजन इकट्ठा करने का काम प्रायः श्रमिक-चींटियाँ करती हैं। पर प्रत्येक समुदाय में अथवा एक ‘बस्ती’ में रहने वाली समस्त चींटियों का ‘पेट’ एक ही माना जाता है। इसलिये श्रमिक चींटियां जितनी आहर सामग्री पाती हैं, उसे अपने गले के नीचे के थैले में भर लेती हैं। उसमें से वे अपने हिस्से का थोड़ा-सा अंश अपनी पाकस्थली में पहुँचा देती हैं और शेष में से एक-एक बूँद अन्य सबको बाँट देती हैं। इसकी जाँच करने के लिये वैज्ञानिकों ने आहार ढूँढ़ने वाली चींटियों के मार्ग में चीनी का गाढ़ा शर्बत रख दिया। और उसमें कोई रासायनिक नीले रंग का पदार्थ मिला दिया। श्रमजीवी चींटियों ने शर्बत को खा लिया और बिल में पहुँचकर उसके समस्त निवासियों, बच्चों तक को वही खाया हुआ शर्बत बाँट दिया। फल यह हुआ कि ‘बस्ती’ में रहने वाले समस्त प्राणियों के पेट में से थोड़ी नीलिमा झलकने लगी। इस प्रकार समस्त समुदाय का पेट पालन हो जाता है। यदि मनुष्य समाज ने इस सिद्धान्त को समझकर व्यवहार रूप से पालन करना आरम्भ कर दिया होता तो आज कहीं भी इतने चोर, डाकू, उठाइगीर, ठग, लुटेरे आदि नहीं मिलते।

यह तो स्पष्ट ही है कि व्यक्ति जब तक जीवित रहेगा, अपनी भूख-प्यास की पूर्ति करने की समस्या तो उसे सुलझानी ही पड़ेगी। यदि उसका पेट सीधी तरह नहीं भरेगा तो असदाचरण का आश्रय लेगा। समाज के भले-बुरे का ख्याल छोड़कर जैसे बनेगा, वैसे अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये प्रयत्न करेगा। इससे समाज का और उसका- दोनों का ही अकल्याण होगा। समाज के सब सज्जन, परिश्रमी और साधन-संपन्न लोगों को शंकाकुल रहना पड़ेगा। और उन कुमार्गगामी अपराधियों को सदैव शारीरिक और मानसिक कष्ट सहन करना पड़ेगा। समाज उनको चाहे बाहर रखकर खिलाये और चाहे जेल में रखकर, बिना खाये तो वे कभी रहेंगे नहीं। इसलिये यदि मनुष्य चींटी और मधु-मक्खियों के समतुल्य भी समझदारी से काम लेता तो आज उसकी अवस्था कहीं अधिक सुरक्षित होती।

चींटी की कुछ इन्द्रिय जन्य शक्तियाँ भी मनुष्य से कहीं उच्च-कोटि की होती हैं। वे अपने मुख के सामने के बालों से स्पर्श और घृणा का काम लेती हैं। हमको जो गन्ध आती है, उसके द्वारा किसी वस्तु के रूप का ज्ञान कदापि नहीं हो सकता, पर चींटियाँ गन्ध से पदार्थ के रूप को भी समझ लेती हैं। जब चींटियों की विभिन्न ‘बस्तियों’ के बीच लड़ाई हो जाती है, तो भी वे गंध के सहारे ही मित्र और शत्रु की पहिचान कर लेती हैं, अन्यथा न तो उनकी वेषभूषा भिन्न प्रकार की होती है और न वे अपने दल का कोई विशेष ‘रण-घोष’ ही करती हैं। इसलिये वही मालूम पड़ता है कि इस मसले को वे अपने मुँह के बालों द्वारा स्पर्श करके ही हल करती हैं। वे जिस रास्ते पर होकर एक बार निकल जाती हैं, उसे अपने पैरों की गन्ध के द्वारा ही फिर पहिचान लेती हैं और इसी उपाय से दूर तक इधर-उधर घूमकर फिर अपने घर को वापस आ सकती हैं।

कई प्रकार की चींटियों में ‘समझ’ के भी कुछ लक्षण दिख पड़ते हैं। ‘ड्राइवर’ श्रेणी की चींटी रास्ते में कोई छोटा नाला-नाली आ जाने पर उसका पुल बाँधकर शेष समस्त दल को पार पहुँचा देती हैं। वह इस प्रकार कि प्रत्येक श्रमिक चींटी एक छोटा तिनका मुँह में पकड़ लेती हैं और तब वे एक दूसरे के तिनके को पकड़ती हुई नाले के आर-पार एक जीवित लड़ी बन्द पुल बना लेती हैं। बेट नामक वैज्ञानिक ने अपने निरीक्षण के आधार पर लिखा है कि ‘दक्षिण अमरीका के एक नगर में चींटियों ने ट्राम की पटरी को पार करने के लिये ऐसा ही पुल बनाया था। पर जब उनमें से बहुत-सी ट्राम से कुचल गई तो उन्होंने बजाय पुल बनाने के पटरी नीचे से खोदकर सुरंग बनाई। जब श्री वेट ने इन सुरंगों को बन्द कर दिया तो उन्होंने पटरी के पार जाना बन्द कर दिया और नई सुरंगें खोदकर ही उस पार गईं। इसी प्रकार एक वृक्ष पर चींटियों का चढ़ना रोकने के लिये उसमें तने के चारों तरफ दो-चार इंच चौड़ा चिपकाने वाला ‘लासा’ लगा दिया गया। चींटियों ने इधर-उधर से मिट्टी, पत्थर के छोटे कण लाकर लासे पर डालकर उसे पाट दिया और उस पार पहुँच गईं।

चींटियों की स्वच्छता-भावना भी बहुत ऊंचे दर्जे की होती है। वे अपने शरीर की बहुत अधिक सफाई करती हैं। श्री मेककुक ने चींटियों के एक जोड़े का निरीक्षण करके बतलाया कि उनमें से एक तो पृथ्वी पर लेट गई और दूसरे ने उसे चाटकर साफ करना आरम्भ किया। पहले उसने चेहरे को साफ किया, फिर छाती को खूब चाटा। इसी प्रकार कूल्हा, उदर और टाँगों को भी चाट कर पूरी तरह साफ किया, इस तमाम समय में सफाई कराने वाली चींटी ऐसी शाँति और संतोष के साथ पड़ी रही, जिससे विदित होता था कि वह अपने साथी के काम से बहुत संतुष्ट और प्रसन्न है।

चींटियाँ अपने भरण-पोषण के लिये अनेक प्रकार की विधियों से काम लिया करती हैं। दक्षिण अमरीका की ‘अट्टा’ जाति की चींटी पेड़ों से पत्तियाँ तोड़कर उनके छोटे-छोटे टुकड़े करती हैं और फिर उनको अपने बिल के भीतर क्यारियों में फैला देती हैं। कुछ ही समय में उनसे कुकुरमुत्ता के तुल्य वनस्पति पैदा हो जाती है। बिल के भीतर रहने वाली सभी चींटियां मुख्य रूप से इन्हीं को खाकर गुजारा करती हैं। इनको ‘बागवान-चींटियाँ कहा जाता है।

दूसरी ‘फसल जमा करने वाली चींटियाँ’ होती हैं, जो अपने बिलों में खेती से अनाज या घास आदि के बीज इकट्ठा करती हैं। ये अक्सर शुष्क अथवा मरुभूमि के प्रदेशों में रहती हैं। इन प्रदेशों में अक्सर बहुत समय तक सूखा पड़ जाता है और खाद्य सामग्री का अभाव हो जाता है। इसलिये ये चींटियाँ अपने बिलों के भीतर अधिक से अधिक तरह-तरह के बीज जमा कर लेती हैं और अभाव के दिनों में उन्हीं को खाकर गुजर करती हैं। हमारे देश में पुराने समय में अकाल के दिनों में अनेक बार लोगों ने इन चींटियों के बिलों को खोदकर एक-एक, दो-दो मन अनाज निकाला था।

‘लेमियन्स’ नाम की अमरीका की चींटी एक अन्य छोटे-कीड़ों को पालती है और उन्हें अनाज तथा पौधों की जड़ों के पास ले जाकर छोड़ देती है, जहाँ वे उसके रस को चूस लेते हैं। कुछ समय बाद चींटी उस कीड़े को अपने बालों से थपथपाती है, जिससे वे रस को उगल देते हैं और चींटियाँ उसे चाट लेती हैं। इस प्रकार वे इन जीवों से वही काम लेती हैं, जैसा मनुष्य गायों और भैंसों को पाल कर उनका दूध दुहकर लेते हैं।

इस प्रकार चींटियाँ, मधुमक्खियाँ और दीमक आदि जीव बहुत छोटे और नगण्य जान पड़ने पर भी सामूहिक शक्ति का इतना अधिक विकास कर चुके हैं कि बड़े-बड़े जीव भी उन पर विजय प्राप्त नहीं कर सकते, वरन् जैसा मशहूर वे साँप और हाथी जैसे जोरदार जीवों को भी अपनी सामूहिकता के बल पर भगा देते हैं या मार देते हैं।’ वे सदा अपने सामुदायिक नियमों का पूरी तरह पालन करते हैं और फलस्वरूप किसी को भूखा-नंगा नहीं रहना पड़ता। यदि मनुष्य इन जीवों से इस विषय में प्रेरणा ले सका होता तो आज उसकी बहुत-सी समस्यायें हल हो गई होतीं।


उपकारी रैकून

उपकारी रैकून :-

अमेरिका के जन्तु संग्रहालय में एक बिज्जू की तरह का छोटा-सा जंतु रैकून भी पाला जाता है। यह अत्यंत आह्लाद प्रिय होता है। अप्रसन्न होना उसके स्वभाव में नहीं। बड़ा स्नेही और आल्हाद प्रिय प्रकृति का होता है, साथ ही किसी वस्तु को गहराई तक जानने की उसमें इतनी प्रबल जिज्ञासा होती है कि कई बार प्राण तक संकट में डाल देता है।

एक बार एक बल संग्रहालय अवलोकनार्थ आया। उसमें छोटे-छोटे बच्चे भी थे। एक बालिका ने रैकून को मिठाई की टिकिया खिलाईं। रैकून को वह बहुत पसन्द आईं। उस बालिका के साथ खेलता भी रहा और मिठाई भी खाता रहा। थोड़ी देर में दल के लोग विश्राम के लिये तंबुओं में चले गये।

सब लोग तो सो गये पर रैकून को अपने मित्र बालिका की याद आ रही थी। जब बेचैनी उससे सम्भाली न गई तो चुपचाप कठघरे में निकलकर तंबुओं में जा पहुँचा। बालिका सो रही थी, इसलिये रैकून उसकी गोद में लोट-पोटकर जगाने का प्रयत्न करता किंतु जब वह न जागी तो उसे मिठाई याद आ गई। सिरहाने पर रखे डब्बे से मिठाई ढूंढ़ने लगी।

इसी बीच उसने देखा कि छः बुन्दों वाला एक जहरीला कीड़ा उस लड़की की ओर बढ़ रहा है। अपने अपरिचित मित्र को बचाने के लिये उसने अपने शरीर से ही कीड़े को भगाया। कीड़े ने उसे काट लिया पर रैकून ने उसे आगे न बढ़ने दिया। तब तक और लोग जाग पड़े और कीड़े को मार दिया गया।

संग्रहालय के अधिकारी ने रैकून को स्नेह से थपथपाते हुये कहा- ‘‘हम मनुष्य चाहें तो इन जन्तुओं से हँसना, प्रसन्न रहना ही नहीं प्राणि-मात्र के प्रति उपकार का पाठ भी सीख सकते हैं।


कभी-कभी स्वप्न भी सच होते हैं।

भारतीय दर्शन-शास्त्रों में स्वप्न को जीवन की तीन अवस्थाओं- जागृत, स्वप्न, सुषुप्ति में एक माना गया है। उसके प्रतिपादन के अनुसार सभी स्वप्न कोई काल्पनिक विचार या पेट की खराबी के मस्तिष्क के गर्म हो जाने के फलस्वरूप दिखाई पड़ने वाले ऊल-जलूल दृश्य मात्र नहीं हैं, वरन् उनका संबंध मानसिक और आध्यात्मिक जगत से है। उनकी मान्यता है कि स्वप्न पूर्व और वर्तमान जन्मों के संस्कारों और कर्मों के फलस्वरूप दिखाई देते हैं और उनका कुछ न कुछ आशय और परिणाम भी अवश्य होता है। हमारे देश के अधिकाँश व्यक्ति तो उनको शुभाशुभ घटनाओं का सूचक मानते हैं और उनकी यथार्थता में बहुत विश्वास रखते हैं।

आधुनिक वैज्ञानिक स्वप्न का संबंध अंतर्मन में जमे हुए प्राचीन और नवीन संस्कारों और प्रतिदिन होने वाली नई और पुरानी घटनाओं से बतलाते हैं जिनके संपर्क में हम किसी कारणवश आ जाते हैं। फ्रायड आदि वैज्ञानिकों ने उनका संबंध मन में बैठी हुई तरह तरह की भावनाओं और कामनाओं से जोड़ा है। वे ही भिन्न-भिन्न रूपों में स्वप्न में प्रकट होती रहती हैं।

कुछ विद्वानों ने इस संबंध में बहुत कुछ विवेचना करके यह निष्कर्ष निकाला है कि स्वप्न के विषय में ये दोनों दृष्टिकोण परिस्थिति के अनुसार सत्य होते हैं। जो लोग बहुत अधिक स्वप्न देखते रहते हैं, उनका कारण प्रायः शारीरिक और मानसिक अस्वस्थता होती है। कितनी ही बार हमने स्वयं देखा है कि कोई बाजा बज रहा है और उसी समय हम स्वप्न में किसी प्रकार का बाजा सुन रहे हैं। वास्तव में बाजे की आवाज निद्रित अवस्था में हमारे कानों में जाती है और उसी समय हमारे मस्तिष्क में बाजे से संबंधित कोई दृश्य उत्पन्न कर देती है। पर यह अवस्था दो-एक क्षण ही रहती है कि उसी समय आँख खुल जाती हैं। पर दस-पाँच सेकेंड में ही ऐसा जान पड़ता है कि हमने घंटे दो घण्टे तक चलने वाली घटना देखी हो।

यह सब होने पर भी यह मानना पड़ेगा कि इस प्रकार के सामान्य स्वप्नों के अतिरिक्त कुछ विशेष स्वप्न भी होते हैं, जिनमें किसी दैवी प्रेरणा से कोई रहस्यपूर्ण तथ्य दिखलाई पड़ जाता है। प्राचीन कथाओं में और पौराणिक वर्णनों में ऐसे पचासों स्वप्नों का वर्णन पाया जाता है, पर आधुनिक पाठक उनको शिक्षा देने के उद्देश्य कल्पना प्रसूत ही समझते हैं। तो भी वर्तमान समय में हम कुछ प्रसिद्ध पुरुषों के संबंध इस प्रकार के सच्चे स्वप्नों का वर्णन सुनते हैं, जिनको गलत कहने का कोई साहस नहीं करता। और जिनसे सिद्ध होता है कि उन स्वप्नों का संबंध भारतीय विचारकों के सिद्धान्तानुसार मनुष्य में निहित आत्मिक और दैवी शक्तियों से था।

इनमें से सबसे प्रसिद्ध स्वप्न अमरीका के प्रेसीडेन्ट अब्राहम लिंकन के विषय में है, जिसका उल्लेख उस विज्ञान प्रधान देश के इतिहासकारों ने किया है। गुलाम हबशियों का पक्ष समर्थन करने के कारण वहाँ के गुलामी के समर्थक क्रूरकर्मा गौरों ने षड़यंत्र करके लिंकन की हत्या करादी। पर जिस दिन नाटक-भवन में यह हत्या की गई उससे दो दिन पहले लिंकन की पत्नी को यह स्वप्न आया कि कोई व्यक्ति नाटक-भवन में उसके पति को मारकर भागा जा रहा है। उसने यह घटना उसी दिन कह सुनाई और अपने पति का नाटक में जाने का निषेध किया। पर वह स्वप्न की बात को महत्व न देकर अपने परिवार सहित नाटक देखने गये और वहीं हत्यारे की गोली से मारे गये।

स्वप्न की प्रेरणा से कैसे भयंकर काण्ड हो जाते हैं, इसका उदाहरण अमरीका के सुप्रसिद्ध प्रेसीडेन्ट रूजवेल्ट पर आक्रमण की घटना से मिलता है। सन् 1901 में अमरीका के प्रेसीडेन्ट मैकिन्ले को एक हत्याकारी ने मार दिया। उसे स्वप्न में ऐसा ही कुछ आदेश हुआ था।

एक और अद्भुत स्वप्न का हाल इंग्लैण्ड की पुरानी अदालती रिपोर्टों में मिलता है। यह सन् 1800 के कुछ वर्ष बाद की बात है। आयरलैंड के पोर्टिलो नामक कस्बे में राजर्स नामक व्यक्ति ने एक छोटा-सा होटल खोल रखा था। उसमें प्रायः आस-पास के ग्रामीणों को भीड़ लगी रहती थी। एक दिन एजर्स की स्त्री ने स्वप्न में देखा कि जहाजी मल्लाहों की सी पोशाक पहने हुये दो व्यक्ति उनके होटल में आये और खा-पीकर कैरिक गाँव की सड़क पर चले गये। कुछ दूर जाकर एक सुनसान स्थान में एक व्यक्ति ने दूसरे को छुरा मारकर हत्या करदी और उसके शव को झाड़ियों के भीतर गड्ढा खोदकर दबा दिया।

एजर्स ने उस समय उसकी बातों पर ध्यान न दिया, पर जब दोपहर को स्त्री ने वैसे ही दो व्यक्तियों को होटल में आते देखा तो वह चौंक पड़ी और उसने अपने पति को उन दोनों को दिखाकर फिर अपने स्वप्न की बात कही। थोड़ी देर बाद वे लोग चले गये और होटल वाला भी अपने धन्धे में पड़कर इस बात को भूल गया। दो महीना बाद एकाएक उन्होंने किसी के मुख से सुना कि अमुक नाम का व्यक्ति कहीं गायब हो गया है, जिससे उसके घर वालों को बड़ी चिन्ता हो रही है। यह बात सुनकर एजर्स की स्त्री सन्न रह गई और बहुत कुछ सोच-विचारकर उसने अपने पति के स्थानीय मजिस्ट्रेट के पास जाकर सब घटना बतला दी और अन्त में सब भेद खुलकर हत्यारे को फाँसी का दण्ड दिया गया।

ये तो बड़ी घटनायें है, जिनका जिक्र बड़े ग्रन्थों में पाया जाता है, पर अपने देश के समाचार पत्रों में भी हम अनेक बार ऐसे स्वप्नों का वर्णन पढ़ते रहते हैं, जिनसे उनकी सत्यता की पुष्टि होती है। उदाहरण के लिये अवोहर (पंजाब) से प्रकाशित होने वाले ‘दीपक’ पत्र के 7 अगस्त 1939 के अंक में एक समाचार छपा था कि- ‘‘लुधियाना के पुराना बाजार में एक ब्राह्मण के यहाँ एक झीवर नौकर था। वह नित्य प्रातः काल पूजा के लिये पेड़ पर चढ़कर बिल्व-पत्र तोड़ लाया करता था। एक रात झीवर ने स्वप्न देखा कि मैं बिल्व-पत्र तोड़ रहा हूँ और नीचे खड़ा एक भैंसा कह रहा है कि उतरते ही मैं तुमको मार डालूँगा। प्रातः सचमुच उसे पेड़ के नीचे एक क्रोधित भैंसा दिखाई पड़ा और वह नौकर भयभीत होकर गिरा और मर गया।”

अभी दो वर्ष पूर्व मई सन् 1966 में बरूआसागर (झाँसी) के ‘पार्श्वनाथ दिगंबर जैन विद्यालय’ के प्रचारक श्री हुकुमचन्द मथुरा आये थे। गाँधी-पार्क में घूमते हुए, उनको एक साँप ने काट लिया। कुछ व्यक्तियों ने उनको रामकृष्ण मिशन अस्पताल (वृन्दावन) में दाखिल करा दिया। किसी प्रकार उनकी प्राण रक्षा हो गई। जब वे अस्पताल में पड़ थे तो उन्होंने स्वप्न में देखा कि कोई सफेद दाढ़ी वाला व्यक्ति उनको साथ ले गया और एक स्थान को बतलाकर वहाँ से भगवान् पार्श्वनाथ की मूर्ति खोदकर निकालने का संकेत किया। अस्पताल से छुट्टी पाने पर वे उस स्थान पर गये और तीन दिन तक खुदाई होने पर वहाँ से उक्त मूर्ति प्राप्त हो गई जो बाद में स्थानीय कलक्टर की आज्ञा से स्थानीय जैन-मन्दिर को दे दी गई।

साधारण ही नहीं अनेक असाधारण व्यक्तियों के भाग्य का निर्माण स्वप्नों के आधार पर ही हो गया। पाठक जानते होंगे कि महान बुद्धदेव के जीवन का मोड़ एक स्वप्न द्वारा ही हुआ। जब उनके पिता उनको राजमहलों के विलासितापूर्ण जीवन में फँसाये रखने का प्रयत्न कर रहे थे, एक रात को उन्होंने एक वृद्ध पुरुष को देखा जो कह रहा था- ‘‘जो यह शव श्मशान को ले जाया जा रहा है, एक दिन तुम्हारी यही गति होगी।” इन शब्दों से सिद्धार्थ (बुद्ध का पहला नाम) की आँखें खुल गईं और वे राजपाट त्याग मानव-जाति लिये कल्याण मार्ग की खोज करने निकल पड़े।

रोम के महान् सम्राट् सीजर को मारने के लिये जब उनके मित्रों ने षड्यंत्र रचा था और वे उसे बुलाकर ले जा रहे थे तो उसकी पत्नी ने उससे प्रार्थना की कि आज वह सीनेट भवन में न जायें। जब उसने इसका कारण पूछा तो पत्नी ने कहा कि आज रात को मैंने एक भयंकर स्वप्न देखा था कि मेरे सर के बाल खुले हैं और मैं तुम्हारा रक्त रंजित शरीर गोद में लिये हूँ। पर सीजर चला गया और भवन में पहुँचते ही एक तंग स्थान अपने ‘मित्र’ ब्रूटस द्वारा कत्ल कर दिया गया।

फ्राँस की राज्य-क्राँति में तहलका मचा देने वाली जोन-आप-आर्म ने भी एक दिन स्वप्न में सुना कि- ‘‘जोन उठो! अपनी आत्मा को पहचानो। अपने को पहचानो।” इस स्वप्न का अर्थ उसने यही निकाला कि स्वाधीनता देवी उसे क्राँति के संचालन का आदेश दे रही है, और वह निर्भय होकर स्वाधीनता संग्राम में कूद पड़ी और अपना जौहर दिखाने लग गई।

ऐसी कितनी ही घटनायें समाचार-पत्रों में प्रायः छपती रहती हैं। वैसे तो भारतीय जनता का स्वप्नों में इतना अधिक विश्वास है कि जो सर्वथा अशिक्षित स्त्री-पुरुष अन्य धार्मिक तत्त्वों का कुछ भी ज्ञान नहीं रखते, वे भी स्वप्नों का फलादेश बड़े ‘आत्म-विश्वास’ के साथ सुनाने में लगते हैं। अमुक स्वप्न के फल से धन की प्राप्ति होगी, अमुक से मुकदमे में विजय होगी, अमुक से पुत्र का जन्म होगा, आदि बातें सर्वत्र सुनने में आती रहती हैं। अनेक स्त्रियों को गर्भाधान के अवसर पर नारियल, चन्द्रमा, सर्प, सिंह, कोई देवी-देवता दिखाई पड़ते हैं और उसी के आधार पर लोग भावी सन्तान की विशेषताओं का अनुमान लगा लेते थे। एक महिला को प्रत्येक गर्भ-स्थापन के अवसर पर सर्प के दर्शन होते थे और सन्तान कुछ सप्ताह के भीतर ही मर जाती थी। इसका अर्थ यह लगाया गया कि कोई सर्पयोनि का जीव ही उसके गर्भ से बार-बार जन्म ले रहा है। इस तथ्य को समझकर चौथी या पाँचवीं दफे जब ऐसा स्वप्न आया तो उसने हाथ जोड़कर सर्प को नमस्कार कर दिया कि “सर्प देवता! अब आप कृपा करके यहाँ न आना।” तब वे उस व्याधि से उसका पीछा छूट गया।

इसमें सन्देह नहीं कि नित्यप्रति दिखाई पड़ने वाले स्वप्नों में से बहुसंख्यक शारीरिक और मानसिक विकारों के कारण दिखाई पड़ते हैं, तो भी विशेष अवसरों पर जो अर्थपूर्ण स्वप्न आते हैं, उनका संबंध हमारे आत्मिक क्षेत्र से होता है और चूँकि जीवात्मा विराट् आत्म-सत्ता का ही एक अंश है, इसलिये इस प्रकार के स्वप्न हमारे सच्चे और हितकारी मार्ग-दर्शक हो सकते हैं।


स्वप्न और अदृश्य प्रेरणा

स्वप्नों और अदृश्य प्रेरणाओं द्वारा जिन व्यक्तियों को किन्हीं महत्वपूर्ण विषयों की प्रेरणा प्राप्त होती है, उन सबकी यही सम्मति है कि जिन व्यक्तियों में पारस्परिक हार्दिक प्रेम, स्नेह होता है, वे दूर रहते हुए भी एक-दूसरे के सुख-दुःख की जानकारी प्राप्त कर लेते हैं। युद्ध में जो व्यक्ति मारे जाते हैं, उनमें से अनेकों के देहान्त की सूचना किसी अदृश्य और अज्ञात शक्ति द्वारा उनके प्रिय-जनों को मिल सकती है। इस तरह के उदाहरण योरोप में भी बहुत से मिल चुके हैं, यद्यपि वहाँ कि निवासी ईसाई धर्म के सिद्धाँतों के कारण मृत व्यक्तियों की आत्मा के स्वतंत्र रूप से कहीं आने-जाने में विश्वास नहीं रखते। तो भी जिन लोगों के साथ ऐसी घटनायें होती हैं, वे उसका कारण किसी अलौकिक शक्ति को ही मानते हैं।

हाल ही में अमरीका की ‘चमत्कारी और गूढ़ घटनाओं’ की जाँच करने वाली संस्था ने इस प्रकार की जिन बहुसंख्यक घटनाओं का वर्णन एकत्रित किया है, उससे भी इस मान्यता की सचाई सिद्ध होती है। उन्होंने एक स्कूल मास्टर का हाल बतलाया है, जो अपनी माँ के घर से 30 मील के फासले पर एक कस्बे में नौकरी करता था। एक दिन सुबह ही उसके मन में यह विचार आया कि उसकी माँ बीमार है और उसकी याद कर रही है। उसने माँ के गाँव जाने का निश्चयकर लिया। पर उस समय वहां के लिये कोई सवारी नहीं मिल सकती थी। इसलिये उसने अपने दामाद को टेलीफोन करके अपनी मोटर लाने को कहा। दामाद ने कहा कि “इस समय मौसम बड़ा खराब है और तूफान आने वाला है” पर मास्टर को अपनी माँ के विषय में ऐसी प्रेरणा हो रही थी कि उसने अत्यंत आग्रह करके दामाद को बुला ही लिया। रास्ते में उनको भयंकर तूफान का सामना करना पड़ा। जब वे घर पहुँचे तो माँ वास्तव में बहुत बीमार थी और इन लोगों के प्रयत्न से बड़ी कठिनाई से उसकी प्राण रक्षा हो सकी।


जीवन से भागो नहीं समझदारी से जियो

हमारे सामने विस्तृत संसार फैला है। उसमें फूल हैं, काँटे भी हैं। पहाड़ हैं, गहरे समुद्र भी। मैदान हैं और ऊबड़-खाबड़ घाटियाँ भी। विविधतापूर्ण संसार में हर वस्तु का विरोधी भाव विद्यमान् है। गुण हैं तो दुर्गुण भी, अच्छाइयाँ हैं तो बुराइयाँ भी हैं, उनके बिना भलाई की कल्पना की ही नहीं जा सकती थी।

माना बुराइयाँ अधिक हैं पर क्या उनसे भागकर संसार की शेष बहुत-सी शानदार, संतोषप्रद और श्रेयष्कर परिस्थितियों से मुँह मोड़ लेना चाहिये? मनुष्य जीवन जैसी पुरुषार्थी विभूति को कलंकित करना चाहिये?

सन्त कन्फ्यूशस बड़े सवेरे एकबार पद-यात्रा कर रहे थे। यात्रा करते-करते वे निर्जन स्थान में पहुँचे जहाँ एक दूसरे महात्मा पेड़ की छाया में लेटे विश्राम कर रहे थे। कन्फ्यूशस ने पूछा- ‘महात्मन्! हरी भरी बस्ती को छोड़कर आप यहाँ निर्जन एकान्त में क्यों पड़े हैं?’

संन्यासी ने उत्तर दिया- भद्र, इस राज्य का राजा बड़ा दुष्ट है, वह स्वयं तो अकर्मण्य और अत्याचारी है ही उसके राज्य में बहुत से लोग स्वेच्छाचारी, अनुशासन विहीन, कुटिल कलह करने वाले, अत्याचारी और बुरे हो गये हैं। ऐसी स्थिति में मेरी तरह हर शाँति-प्रेमी, सद्गुणों और आत्मा की शाँति पर विश्वास रखने वाले के लिये समाज में रहना मुश्किल हो गया है। आप भी क्यों नहीं यहीं आकर शाँत और एकान्त प्रकृति का आनन्द लूटते। अत्याचारों के कारण पैदा हुई निराशा से बचने का क्या यह सर्वोत्तम उपाय नहीं?

कन्फ्यूशस मुस्कराये और कहने लगे- ‘‘क्या आपका मतलब यह है कि थोड़े से बुरे आदमियों के कारण अच्छाइयों की रक्षा करना मनुष्य का कर्त्तव्य नहीं है? थोड़े व्यक्तियों के कर्तव्य च्युत हो जाने से क्या भावनाशील व्यक्तियों को भी अपने कर्त्तव्य से मुँह मोड़ लेना चाहिये? यदि बुराई आगे बढ़ने से हार नहीं मान सकती तो क्या भलाई की शक्ति को प्रयत्न किये बिना ही आत्म-घात कर लेना चाहिये?”

संन्यासी ने कहा- ‘‘सो तो ठीक है, मगर इतने झंझटों की अपेक्षा बुराई से स्वयं हट जाना बेहतर है। हम यहाँ उसी का रसास्वादन कर रहे हैं।’’

कन्फ्यूशस ने कहा- ‘‘भगवन्! आप भूल रहे हैं कि झंझटों से भरा जीवन का आधार है। यहाँ रहकर भी आप समाज की कमाई पर जीवित हैं, उसी की कृपा से पल रहे हैं। आप भूल रहे हैं कि जिन्हें आप झंझट, कष्ट और कठिनाइयां मान रहे हैं, वह तो नावें हैं, असम्भव को पार करने में सहायता देती हैं। रही बात बुराइयों की। हम उनसे भागें क्यों? खुद बुराई ही क्यों न भागें? हमारे भागने का मतलब तो यह है कि सद्गुण और सज्जन, दुर्गुण और दुर्जनों से दुर्बल हैं। सत्य, असत्य की अपेक्षा निर्बल है, जीवन ने नहीं मृत्यु ने जीवन पर अधिकार किया हुआ है।”

महात्मा जी हार मानने वाले न थे- अपनी बात को पुष्ट करते हुये कहने लगे- ‘‘हम यहाँ सद्गुणों की ही रक्षा तो कर रहे हैं- बुराइयों की ओर आँख न कर, क्या मैं भलाई को जिसके ग्रास से नहीं बचा रहा?”

‘असम्भव महात्मा जी!’ -कन्फ्यूशस ने पुकारा -‘‘हर वस्तु एकान्त में नष्ट होती है और समूह में बहुगुणित होती है। सद्गुणों के बारे में भी ठीक यही बात है, यदि आप समाज में रहकर अपने सद्गुणों का प्रकाश करते और उनमें अपनी निष्ठा व्यक्त करते तो उसका प्रतिफल भी देखने को अवश्य मिलता। लोग तो बुद्धिमानों की निष्ठा का अनुकरण करते हैं, आपमें वह प्रकाश स्पष्ट हुआ होता तो निश्चय ही बुराई की मात्रा घटती और अच्छाई का विकास होता।”

आज की स्थिति भी ठीक ऐसी ही है। यदि लोग जंगलों की ओर नहीं भाग रहे तो भी बुराइयों से उसी तरह दुबक रहे हैं, जैसे कोई माया-मोह से डरकर जंगल में भागा जाय। आज वस्तुतः डरने और छिपने का समय नहीं- सद्गुणों के प्रकाश और विकास की बेला आई है, यह समझने-सोचने का अवसर सच्चे अर्थों में आज ही सामने आया है कि दुःखों, झंझटों और बुराइयों का कारण क्या है, सुख-संतोष और भलाई को सम्मानित और सुपूजित किस तरह किया जा सकता है?

बुराइयों का कारण है इच्छाओं का विद्रूप। नासमझदारी की इच्छा जहाँ भी पैदा होगी वहीं बुराई पैदा होगी। इसलिये संसार में सुव्यवस्था और सद्गुणों को बनाये रखने के लिये समझदारी का जीवन जीना आवश्यक है। इच्छाओं की विकृति निराशा और अत्याचार के रूप में किसी काम का नहीं रहता। मस्तिष्क लंगड़ा हो जाता है। जीवन में सिवाय चिन्ता, क्षोभ और उद्विग्नता के कुछ भी नहीं रहता। व्यक्ति का हृदय दग्ध हो जाता है, उसमें हीनता की भावना उत्पन्न हो जाती है। आत्म-विश्वास कुण्ठित हो जाता है। कायरता आ जाती है। वही व्यक्ति चारों तरफ से अपने वातावरण को विषैला बना लेता है। वह समझता है कि जीवित रहना निष्प्रयोजन है। संसार से भागने की समस्या निराश-जनों को ही मापती है। कर्त्तव्य क्षेत्र से ऐसे ही व्यक्ति दुम दबाकर भागते हैं। यह बात सद्गुणी व्यक्ति में निराशा और दुर्गुणी में अत्याचार के कारण बनती है, दोनों ही स्थितियों में अपनी सुख-शाँति और समाज की व्यवस्था का एक ही मार्ग रह जाता है और वह यही है कि संसार में समझदारी से जिया जाय। करने से पहले उसके दूरवर्ती परिणाम पर विचार कर लिया जाय।

शोधा हुआ विष उपयोगी हो जाता है, फिर शोधी हुई जिन्दगी के आनन्द का कहना ही क्या? सुख का एक द्वार बन्द हो जाने पर दूसरा खोला जा सकता है। बन्द दरवाजे की ओर ही दृष्टि किये निराश अवस्था में क्यों पड़ा रहा जाय। जीतने के लिये बाधायें न होतीं, पार करने के लिये सीमाएं और रास्ते न होते तो मनुष्य जीवन में क्रियाशीलता का आनन्द ही क्या रह जाता? मील के पत्थर की तरह एक ही स्थिति में गढ़े रहने में भी कहीं मनुष्य जीवन की शोभा है। उसकी शान खराब हुये को निरन्तर सुधारने, अस्वच्छ हुये को बराबर स्वच्छ और सुथरा बनाने, टूटे को जोड़ने और बुरे को भलाई में परिवर्तित करने में है। यही एक विशेषता तो मनुष्य को भगवान की श्रेणी में पहुँचाती है। उसका निरन्तर अभ्यास कर सामाजिक जीवन में ईश्वरीय शक्ति के विकास का क्रम क्यों न हम निरन्तर चलते रहने दें।

एक स्त्री एकान्त में शीशे में अपना मुँह देखती है, उसमें जो बुराई दिखाई देती है, उसके कारण न वह शीश तोड़ती है और न मुँह को ही खरोंच डालती है। वह बड़े यत्न से उस खराबी को साफ करती है और फिर दूसरे साधनों से अपने मुख को सुन्दर और आकर्षक बनाती है। हमारे समाज की स्थिति भी ऐसी ही है। आवश्यकता पैदा और बढ़ी हुई बुराई से खीझने ओर असन्तुष्ट होने की नहीं इस बात की चतुराई बरतने की है कि हम उस बुराई को किस तरह साफ कर लेते हैं और समाज में उज्ज्वल चरित्र की, नैतिकता और सत्यता की प्रतिष्ठा कर लेते हैं।

प्रत्येक देश और जाति का अपना निहितार्थ होता है। अपनी समस्यायें होती हैं। हर समाज में उसे तरह कुछ बुराइयाँ होती हैं अड़चने और बाधायें होती हैं। उस अर्थ को पूर्ण करना पड़ता है, निरन्तर प्रयास द्वारा। प्रयास से ही देश के चरित्र की सृष्टि होती है। रचनात्मक शक्तियों को बल मिलता है। कठिन बाधाओं और बुराइयों को दूर करने का पथ ही स्वास्थ्य और संपदा का पथ है। मनुष्य दुर्गम को सुगम और बुरे को भला बनाने आया है। उसके समाधान में ही देश और समाज का हित सन्निहित है। जिन्होंने समाधान करने में भूल की उनका विनाश हुआ और जिन्होंने उन समस्याओं से मुँह मोड़ा उनकी दुर्गति हुई।

जब तक जीवन है, शरीर में प्राण है, साँस चलती है, बाधाओं और बुराइयों से संघर्ष करने में ही सच्ची जीवन क्रिया है। जहाँ, जिस समाज में यह उत्कंठा, यह प्रयास और बुराई से भलाई की ओर अग्रसर होने की अभिभावना रहती है, वहीं विश्व के सिरमौर सिद्ध होते हैं। औरों के लिये प्रकाश बनते हैं, उनकी सन्तुष्टि तो अपने इसी प्रयत्न में ही हो जाती है।


भूतकाल की घटनायें भी देखी जा सकती हैं।

जब आइन्स्टीन ने विश्व के रूप और उसकी क्रियाओं को गणित के आधार पर सत्य सिद्ध किया और सापेक्षवाद के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया, तब से वैज्ञानिकों में यह चर्चा उठ खड़ी हुई है कि क्या हम भूतकाल की घटनाओं को फिर से असली रूप में देख सकते हैं? आइन्स्टीन ने सापेक्षवाद द्वारा सिद्ध किया था कि भूतकाल की घटनायें यद्यपि हमारे लिये समाप्त हो चुकीं, पर विश्व-ब्रह्माँड में उनकी तरंगें अब भी वर्तमान हैं, और किसी अन्य लोक के निवासी यदि उनके पास उपयुक्त साधन हों, तो उनको इस तरह देख सकते हैं, जैसे वे उनके सामने ही हो रही हैं। इस सिद्धान्त को सही मानकर किसी तेज मस्तिष्क आविष्कारक ने रेडियो के समान एक ऐसा यन्त्र बना सकने की कल्पना भी की थी कि जिसकी सुई को यदि 500 वर्ष पीछे हटा दिया जाय तो शीशे पर सन् 1450 की घटना दीखने लगे और पाँच हजार वर्ष पीछे कर दिया जाय तो कौरव-पाण्डवों का महाभारत-संग्राम और भगवान् कृष्ण का अर्जुन को गीतोपदेश करना सुनाई पड़ने लगे।

रेडियो, जो सौ वर्ष पहले ही बुद्धिमान- से- बुद्धिमान व्यक्ति को असम्भव जान पड़ता था, आज दस-बारह वर्ष के लड़कों के बगल में लटका हुआ खेल की तरह लन्दन डडडड की आवाज सुना रहा है। आज-कल भी अनेक व्यक्तियों को जो भूतकाल की घटनायें आकस्मिक रूप से दिखलाई पड़ जाती हैं, उसका क्या कारण और क्या रहस्य है? और क्या हम वैज्ञानिक-यन्त्र नहीं तो और किसी उपाय से उनको देख सकते हैं? पर इस समस्या पर सिद्धान्त रूप से विचार करने के पहले हम इस संबंध की कुछ घटनाओं का वर्णन यहाँ करना चाहते हैं। इनमें से प्रथम घटना को श्री ए. एम. फिलिप्स नामक विद्वान् ने एक अंग्रेजी पत्रिका में प्रकाशित कराया था, तत्पश्चात एक हिन्दी सामयिक पत्र में वह प्रकाशित हुई थी-

कुमारी सी. एन. ई. मोबर्ले और कुमारी एलेनोर एफ. जोर्डन आक्सफोर्ड के सेन्ट ह्यूम कालेज में पढ़ाती थीं। उन्होंने 10 अगस्त 1901 को बर्साई (फ्राँस) की यात्रा की थी और उनका मुख्य उद्देश्य ऐतिहासिक इमारतों को देखना था। वे एक बड़े उद्यान में बने प्राचीन राजमहल को देखने गई। महल को देखने के बाद वे इसके पीछे बनी विशाल फुलवाड़ी में पहुँचीं। उसी समय उनको अलौकिक घटनायें दिखाई पड़ीं।

उनको ऐसा जान पड़ा कि सामने ही एक अन्य महल बना है और उसके पास दो पहरेदार हरे रंग की वर्दी और तिकोने हैट पहिने खड़े हैं। उन्होंने दोनों महिलाओं को आगे चले आने को कहा। उन्होंने देखा कि वह एक छोटा-सा सुन्दर और सजा हुआ महल है। महल के दरवाजे पर भी एक पहरेदार खड़ा था और उसके पीछे एक नवयुवक था, जो हाव-भाव से बहुत आतंकित जान पड़ता था। वह उत्तेजना के मारे हाँफ रहा था। उसने घबराये हुये स्वर में उन महिलाओं से कुछ बातचीत की पर उसकी भाषा बदली हुई थी, जिससे वे दो-चार शब्द ही समझ पाई।

उद्यान में एक छोटा-सा झरना बह रहा था और उस पर सुन्दर पुल बना था। जब महिलायें उस पुल पर पहुँचीं तो उनकी निगाह समीप ही बैठी एक सम्भ्रान्त रमणी पर पड़ी जो सामने के वृक्षों का चित्र बना रही थी। जब वे और आगे बढ़ीं तो गिरजे में से एक व्यक्ति ने निकल कर कहा कि अगर आप महल देखना चाहती हैं तो सामने के दरवाजे से आइये। महल दिखाकर वह उनको उद्यान के बाहर छोड़ गयी। पर कुछ सेकेंड बाद उन्होंने मुड़कर देखा तो वहाँ उस महल और पहरेदारों आदि का कोई चिन्ह न था, केवल फुलवाड़ी दिखाई पड़ रही थी। सन् 1902 में वे पुनः बर्साई गईं और बगीचे में पहुँचने पर फिर उन्हीं दृश्यों और व्यक्तियों को देखा। इसी प्रकार एक फ्राँसीसी परिवार ने भी सन् 1907-08 में उक्त बगीचे में ठीक इसी प्रकार के दृश्य देखे थे।

जब इन घटनाओं की ऐतिहासिक दृष्टि से खोज की गई तो सिद्ध हुआ कि इन लोगों ने जो दृश्य देखे थे वे सन् 1789 के आस-पास के थे, जबकि वहाँ कोई राजवंशीय व्यक्ति रहते थे। फिर किसी घटनावश उनका अन्त हो गया पर उनकी स्मृतियाँ उस स्थान को ऐसी लिपटी रह गईं कि समय-समय पर कुछ व्यक्तियों को छाया रूप में उनका अनुभव होता रहा। कुछ अन्वेषकों ने इस संबंध में यह भी सम्मति प्रकट की कि सन् 1901 में सम्पूर्ण योरोप में एक विद्युत-धारा प्रवाहित हुई थी और उसी विद्युत-चुंबकीय शक्ति ने इन दृश्यों को उपयुक्त मानसिक अवस्था वाले व्यक्तियों के लिये साकार कर दिया। अथवा इन व्यक्तियों की मनोभूमि में ही कोई ऐसी विशेषता थी, जिससे उन्हें इन छाया-लोक की घटनाओं को देख सकना सम्भव हो सका, ठीक उसी प्रकार जैसे भूत आदि को कोई एक व्यक्ति देखता है, पर पास ही उपस्थित अन्य लोगों को कुछ दिखाई नहीं पड़ता।

इसी प्रकार की एक घटना इंग्लैंड के गैमर्सी टावर नामक गाँव के ले. कर्नल डेविड स्मिथ ने सामयिक पत्रों में प्रकाशित कराई थी। उन्होंने लिखा था-

मेरे लड़के का डेवन में एक बहुत बड़ा कृषि-फार्म है। यह बिल्कुल सुनसान जगह में है और दूसरा घर वहाँ से करीब एक मील पर है। एक दिन प्रातः काल मेरा लड़का मकान के पिछले भाग में गोशाला में था। करीब साढ़े सात बजे थे। वह घोड़ों की टापों की आवाज सुनकर आश्चर्यचकित रह गया। यह आवाज मकान के पीछे से आ रही थी, मानो कोई फौज मकान के बगल में जा रही हो। घोड़ों की टापों के अलावा हथियारों की झन-झनाहट भी साफ सुनाई देती थी। रास्ते के बहुत तंग होने के कारण सड़क साफ-साफ नहीं दिखाई पड़ती थी। इससे वह दौड़कर आँगन में पहुँचा जहाँ से सड़क दिखाई पड़ती थी। वहाँ कुछ न दिखाई दिया पर आवाज अब भी सुनाई पड़ रही थी। जब वह फार्म में गया तो उसे दो अन्य नौकर मिले, जो उससे भी अधिक आश्चर्य में थे। उन्होंने भी देखा तो कुछ न था, पर आवाज साफ तौर पर सुनी थी। उनमें से एक उस समय घोड़ों को मल रहा था और दूसरा दूध दुह रहा था। मेरे लड़के ने यह सोचकर कि ये नौकर बड़े अन्ध-विश्वासी होते हैं, उनसे कुछ न कहा और बात को टालकर चला आया, पर वह स्वयं इस घटना का कारण जानने को उत्सुक था।

ले. कर्नल स्मिथ के पत्र को पढ़कर एडिनब्रिजकेंट की श्रीमती सी. ई. फाक्स ने लिखा है कि ऐसी घटना उनके चाचा ने सन् 1900 या 1901 में देखी थी। इसके पश्चात् कुछ लोगों ने खोज-बीन करके पता लगाया कि वह स्थान किसी जमाने में रोमन सैनिकों का निवास-स्थान रहा था और अब भी कभी-कभी वे आस-पास घूमते दिखाई पड़ जाते हैं। वहाँ के दो-एक खेतों के विषय में जानकारों का कहना है कि उनमें सौ वर्ष पहले तक रोमन कब्रिस्तान था। अब वहाँ कभी-कभी भूतकाल की घटना अदृश्य रूप से दुहराई जाती है। विशेषतः किसी बड़े युद्ध के अवसर पर प्रायः ऐसा होता है।

इंग्लैंड की एकाध ऐतिहासिक घटना भी लोगों ने इसी तरह देखी है, और वहाँ के बादशाह चार्ल्स प्रथम ने ‘जस्टिस आफ पीस’ विलियन उड द्वारा जब उसकी जाँच कराई तो उसे सत्य पाया गया। जहाँ यह घटना देखने में आई थी, वहाँ के ग्राम निवासियों ने बतलाया-

“दिन के 12 और 1 बजे के बीच गड़रियों, देहातियों और अन्य यात्रियों ने पहले ढोल की आवाज सुनी और इसके बाद सैनिकों के कराहने की आवाज सुनाई पड़ी। इससे वे डर गये और भाग जाना चाहते थे। इसी तरह प्रेम-सेनायें दिखाई पड़ीं, जो ढोल बजा रही थीं। बन्दूकें छूटने लगीं, घोड़े हिन-हिनाने लगे। एक सेना शाही झंडा लिये थी और दूसरी पार्लियामेंट का झंडा। यह युद्ध दो या तीन बजे तक होता रहा। बेचारे गरीब दर्शक इतने घबड़ा गये थे कि उन्हें अपनी आँखों पर विश्वास न हो रहा था।”

हमारे यहाँ मद्रास प्रान्त में एक रणक्षेत्र के विषय में भी यही बात कही जाती है। वर्ष में एक दिन वहाँ घोड़ों की टाप, रणभेरी की आवाज सुनाई पड़ती है और संध्या के धूमिल प्रकाश में तंबू, हाथी और सैनिक दिखाई देते हैं।

यह सब कैसे होता है इसके संबंध में अधकचरे वैज्ञानिकों को शंका, अश्रद्धा और बहकावे का सन्देह हो सकता है, पर जिन लोगों की अध्यात्म-विद्या की तरफ रुचि है और जो सूक्ष्म शरीर और कर्मों की सूक्ष्म गति को कुछ समझते हैं, उनको इसमें कोई आश्चर्य प्रतीत नहीं होता। हमारे यहाँ तो भूतकाल की बातों को जानना और देखना भी योग-विद्या का एक बहुत छोटा कार्य माना जाता था। हमारी पौराणिक कथाओं के तो प्रत्येक पृष्ठ पर यही बात पर यही बात पढ़ने में आती है कि अमुक व्यक्ति ने किसी ऋषि या मनीषी से अपनी कठिनाइयों के विषय में पूछा तो उन्होंने तुरन्त उसके एक नहीं अनेक जन्मों का वृतान्त इस प्रकार सुना दिया, मानो वे उसके गत जीवनों का फिल्म देख रहे हों। और वास्तव में बात ऐसी ही होती भी है। भारतीय कर्म फिलासफी के अनुसार मनुष्य का कोई कर्म तब तक नष्ट नहीं होता, जब तक वह उसका फल भोग नहीं लेता। मनुष्य के कर्म आकाश में उसी प्रकार अंकित रहते, जैसे कुछ फुट लम्बे फिल्म-रील पर लाखों छोटे-छोटे चित्र बने रहते हैं। इसी को पौराणिक-भाषा में चित्रगुप्त द्वारा मनुष्य के समस्त कर्मों का ‘हिसाब-किताब’ रखना कहा जाता है।

जिन लोगों को योग दृष्टि प्राप्त हो गई और जो अपनी चेतना को सूक्ष्म-जगत् में पहुँचाने में समर्थ हैं, उनके लिये भूतकाल को देख सकना कुछ भी कठिन नहीं है अध्यात्म सिद्धान्त के अनुसार आत्म-तत्त्व और प्राण-तत्त्व समस्त संसार में व्याप्त हैं और उनमें कहीं भी ऐसा व्यवधान नहीं पाया जाता जैसा कि हमको स्थूल जगत में अनुभव होता है। प्राणमय जगत् में प्रविष्ट होने वाला एक ही स्थान पर बैठकर सब कुछ देख और जान सकता है। इसी प्रकार जो व्यक्ति स्थूल देह में अपनी सूक्ष्म देह को पृथक कर सकते हैं, वे भी अनेक अदृश्य और अज्ञात तत्त्व को जान सकते हैं और कितने ही चमत्कार जान पड़ने वाले कार्य कर सकते हैं।

भारतीय अध्यात्म-विद्या के पतन और लुप्त होने का मुख्य कारण यही है कि अन्य कार्यों की तरह इसमें भी अनेक ढोंगी तथा स्वार्थियों का प्रवेश हो गया और उन्होंने वास्तविक योग्यता प्राप्त करने के बजाय कुछ चालें निकाल कर सीधे लोगों को ठगना आरम्भ कर दिया। इसलिये अनेक बार धोखा खाने से बहुसंख्यक लोगों की श्रद्धा, इस शक्ति की सचाई, पर से हट गई। तो भी तर्क और बुद्धि की कसौटी पर जाँच करने से हम कह सकते हैं कि भूतकाल को जान सकने का सिद्धान्त गलत नहीं है।


परीक्षा-ज्ञान योग की एक विभूति है

परीक्षा-ज्ञान योग की एक विभूति है। पश्चिमी अध्यात्मवाद की परिभाषा में इस विद्या को परोक्ष-दर्शन (क्लेयर वोयेंस या सेकेंड साइट) कहते हैं। प्रत्यक्ष का ज्ञान तो हमको चक्षु आदि इन्द्रियों द्वारा हुआ करता है। परन्तु लोगों का ऐसा ख्याल है कि परोक्ष का ज्ञान इन्द्रियों के द्वारा नहीं हो सकता। यह विचार एक दर्जे तक ठीक है। परन्तु शक्तियों के विकसित हो जाने पर मस्तिष्क की कुछ विशेष-शक्तियाँ भी विकसित हो जाती हैं और उनसे परोक्ष-ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। हम जो ‘देखना’, ‘सुनना’ कहा करते हैं, उनकी असलियत पर विचार करने से पता चलता है कि तरकीब के साथ नियत संख्या में आकाश में उठे कम्पनों के प्रभाव के सिवा और कुछ नहीं है। उदाहरण के लिये श्रोतेन्द्रि पर विचार कीजिये।

इस इन्द्रिय के द्वारा हम वायु के उठी हुई तंरगों की एक लड़ी को ग्रहण किया करते हैं, जो मस्तिष्क में पहुँचकर क्षोभ उत्पन्न करती है और उसी क्षोभ को हम शब्द या ध्वनि कहते हैं। इसी प्रकार चक्षु-इन्द्रिय पर विचार कीजिये। इस इन्द्रिय द्वारा हम आकाश (ईथर) में वेगपूर्वक उठी हुई नियमित तरंगों को ग्रहण करते हैं। और उन्हीं तरंगों को ग्रहण करने से हम प्रकाश का अनुभव करते हैं। यही बात स्पर्श, स्वाद और सूँघना आदि के सम्बन्ध में भी कही जा सकती है। इसमें निकटवर्ती तंरगों का ग्रहण करना प्रत्यक्ष और दूरवर्ती तंरगों का ग्रहण करना परोक्ष कहलाता है। जब मनुष्य किसी प्रकार के अभ्यास द्वारा दूर की तंरगों का भी अनुभव करने लगता है तो उसको दूर-दर्शन का परोक्ष दर्शन-शक्ति प्राप्त हो जाती है। -नारायण स्वामी


गायत्री शक्ति-तत्व विवेचन :-

गायत्री उपासना सनातन और सर्वोपरि

देवी भागवत पुराण में एक बड़े महत्त्वपूर्ण उपाख्यान का उल्लेख है, जिसमें गायत्री उपासना की महत्ता को सर्वोपरि बताया है। इस उपाख्यान में इस शंका का समाधान किया गया है कि गायत्री के रहते अन्य देवताओं अथवा मन्त्रों का महत्व क्यों दिया जाता है? उपाख्यान में अनादि मन्त्र गायत्री को ही बताया गया है और उसे सर्वोपरि प्रतिपादित किया गया है।

अन्य देवताओं अथवा देव-मन्त्रों की भले ही उपासना की जाय पर ध्यान यही रहना चाहिये कि भारतीय धर्मानुयायियों का प्रधान उपास्य गायत्री ही है।

ब्रह्मा, विष्णु, महेश यह तीन देवता प्रधान माने गये हैं। मन्त्र भी प्रायः इन्हीं के हैं। अन्य देवता-देवियाँ इन्हीं के पुत्र, परिजन और देवियाँ इन्हीं की पत्नियाँ हैं। उन्होंने समय-समय पर अनेक रूप- अनेक प्रयोजनों के लिये धारण किये हैं। इसलिये वे सभी इन तीन देवों के अंतर्गत आ जाते हैं। इन प्रधान तीनों देवों का उपासना तत्त्व गायत्री ही रहा है। वे सभी इस महाशक्ति की आराधना करके अपनी शक्ति और महिमा की अक्षुण्ण बनाये रखने में समर्थ रहे हैं। इसलिये सर्व-साधारण के लिये भी यही उचित है कि भले ही अन्य देवी-देवता की वे उपासना करते हों, पर गायत्री महामन्त्र की उपेक्षा न करें। प्रधानता गायत्री को दें। अनिवार्य उसी को रखें और फिर जिस भी देवता या उसके मन्त्र की आराधना करनी हो, करते रहें।

गायत्री का तिरस्कार अथवा उपेक्षा करके न तो किसी देवता को प्रसन्न किया जा सकता है और न कोई मन्त्र सिद्ध हो सकता है। फाटक का बड़ा द्वार खुले बिना किसी महल में प्रवेश करना सम्भव नहीं होता। फाटक खुल जाने पर जब भीतर प्रवेश कर सकना सम्भव हो जाय, तभी उस महल के भीतरी छोटे कमरों के दरवाजे खोलने की बात सोची जा सकती है। गायत्री, उपासना क्षेत्र का प्रवेश-द्वार है। नित्य-कर्म, संध्या-वन्दन उसी की प्रमुखता में सम्पन्न होता है और यह विदित तथ्य है कि बिना संध्या किये किसी भी देवता की उपासना का न तो अधिकार मिलता है और न सफलता ही मिलती है।

इस तथ्य पर प्रकाश डालते हुए ‘देवी भागवत’ के एक महत्त्वपूर्ण प्रकरण का उदाहरण प्रस्तुत है-

भगवन्सर्वधर्मज्ञ सर्व शास्त्रधतां वरः। द्विजातीनां तु सर्वेषां शक्त्युपास्तिः श्रुतीरिता॥ सन्ध्याकाल त्रयेऽन्यस्मिन् काले नित्य तयाविभो। तां विहाय द्विजाः कस्माद् गृह्णीयुश्चान्य देवताः॥

अर्थ- राजा जनमेजय ने व्यास जी से पूछा था- ‘‘हे भगवन्! आप तो समस्त धर्मों के ज्ञाता हैं और संपूर्ण शास्त्रों के ज्ञाताओं में परमश्रेष्ठ हैं। सब द्विजातियों के लिये शक्ति की उपासना ही वेद ने बतलाई है। है विभो! फिर क्या कारण है कि तीनों संध्याकाल की वन्दना में तथा अन्य समय में भी नित्य ही उस शक्ति का त्याग करके द्विजगण अन्य देवों की उपासना को क्यों ग्रहण किया करते हैं।”

सर्वसाधारण की भाँति राजा जनमेजय के मन में भी यह जिज्ञासा उत्पन्न होनी स्वाभाविक थी कि जब इतना शक्तिशाली एक सनातन उपास्य मौजूद है, तब गंगा का सहारा छोड़ छोटे नदी-नालों का आसरा तकते फिरने में क्या लाभ?

इस शंका के समाधान में महर्षि व्यास ने बताया कि प्राचीनकाल में सभी कोई केवल गायत्री उपासना करते थे। अब समय की विपरीतता और अदूरदर्शिता के कारण लोग इधर-उधर भटक रहे हैं। इतने पर भी सुनिश्चित तथ्य जहाँ का तहाँ है। इसकी महिमा एवं महत्ता कम नहीं होती। इस अनादि उपासना का इतिहास बताते हुए महर्षि व्यास कहते हैं-

नूनं सत्ययुगे राजन् ब्राह्मण वेदपारागाः। परा शवत्यर्चनरता देवी दर्शन लालसाः॥

गायत्री प्रणवासक्ता गायत्री ध्यान कारिणः। गायत्री जप संसक्ता माया धीजैक जापिनः॥

ग्रामे ग्रामे पराम्बायाः प्रासाद करणोत्सुकाः। स्वकर्म निरताः सर्वे सत्यशौचदयान्विताः॥

अर्थ- व्यास जी, ने राजा जनमेजय से कहा- ‘‘हे राजन्! निश्चय ही सत्ययुग में सभी ब्राह्मण वेदों के पार गामी महान् विद्वान् होते थे और सब पराशक्ति गायत्री की अर्चना करने में रुचि रखने वाले थे। सभी देवी के दर्शन करने की परम लालसा रखा करते थे। सब लोग गायत्री और प्रणव के जाप में आसक्ति रखते थे तथा निरन्तर गायत्री के ध्यान करने वाले होते थे। माया बीज के जपने वाले गायत्री का जप करने में संलग्न रहते थे। हर एक ग्राम में परात्परा अंबा के प्रासाद की रचना कराने की उत्कण्ठा रखा करते थे। सब लोक अपने-अपने कर्मों में निरत और सत्य, पवित्रता तथा दया से युक्त होते थे।”

ब्रह्मा, विष्णु और महेश द्वारा वेद-माता गायत्री की महिमा और शक्ति का जो अनुभव कहा है और उस महान् उपासना के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त की है, उसका संदर्भ इस प्रकार है-

ध्यायन्ति या सुनिगण निश्चतं त्रिकालं, सन्ध्येति नाम परिकल्प्य गुणान् भवानि। बुद्धिहिं बोध करण कगताँ सदा त्वं, श्रीश्चासि देवि! सततं सुखना नाराणाम्॥

कस्ते चरित्रर्माखलं मूदिं वेदधौमान् नाहं हरिर्नचाभवो न शुरास्तयान्ये। ज्ञातुँ क्षमाश्च सुनयो न ममामनाश्च, दुर्वाच्य एव महिमा तज सर्व लोके॥

अर्थ- ‘पितामह ब्रह्मा, देवी की स्तुति करते हुए कहते हैं- ‘‘मुनिगण नियम रूप से तीनों कालों में जिसका ध्यान किया करते हैं। हे देवि! उस आपको ‘सन्ध्या’- यह नाम से पुकार कर आपके गुणों का गान किया करते हैं। उनने आपका ही सन्ध्या ऐसा नाम परिकल्पित कर लिया है। आप सदा जगत् का ज्ञान कराने वाली बुद्धि हैं, और हे देवि! निरन्तर सुख प्रदान करने वाली मनुष्यों की आप ही श्री हैं। इस संसार में कौन ऐसा बुद्धिमान् है, जो आपके संपूर्ण चरित्र को जानता हो? अर्थात् कोई भी नहीं है। न मैं ही जानता हूँ और न हरि-शिव तथा अन्य देवगण ही जानते हैं। मेरे पुत्र एवं मुनिगण भी आपके चरित्र का ज्ञान रखने की क्षमता नहीं रखते हैं। समस्त लोक में आपकी ऐसी महिमा है कि उसे कोई भी कह ही नहीं सकता है।”

आराध्या परमाशक्तिः सर्वेरपि सुरासुरैः। नातः परतरं किञ्चियधिफं भुवने त्रये। सत्यं सत्यं पुनः सत्यं वेदशास्त्रार्थ निर्णयः पुञ्नीया परशक्तिनिर्गुण सगुणयवा॥

अर्थ- समस्त सुरासुरों के द्वारा आराधना के योग्य उस परमशक्ति का पूजन करना चाहिये। इससे बड़ा त्रिभुवन में अन्य कोई नहीं है, पर वेद-शास्त्रों का परमसत्य निर्णय है, वह सर्वोपरि है, चाहे निर्गुण हो या सगुण हो।

अद्याहं तब पाद्षंकच एरागादान गर्वेण वै, धन्योऽस्मि-इति यथार्थवाद निपुणों जात, प्रसादाच्चते।

याचे त्वाँ भवभीति नाश चतुराँ मुक्तिप्रदाँचेश्वरीं हित्वा मोह कृतं महाति निगर्ड त्वद्भक्ति युक्तं कुरु॥

न जानन्ति ये मानदस्ति वदन्ति प्रभुँ मौ तवाद्यं चरित्रं पवित्रम्। उस्तीह ये याजकाः र्स्वगकामा नते ते प्रभाव दिदन्त्येन कामस्॥

अर्थ- पितामह ब्रह्मा जी देवी का स्तवन करते हुए पुनः उनकी महिमा इस प्रकार बताते हैं- ‘हे देवि! मैं आपके चरणारविन्द के पराग को प्राप्त कर बड़े ही गर्व के साथ कहता हूँ कि आज में परमधन्य हुआ हूँ और आपके ही प्रसाद से मुझे यथार्थवाद में निपुणता प्राप्त हुई है। अब तो मेरी यही याचना आपकी सेवा में है, क्योंकि आप इस भव के भय के नाश करने में बड़ी दक्ष हैं, मुक्ति प्रदान करने वाली हैं और समस्त विश्व की स्वामिनी हैं। यह जो मोह-जाल का बहुत अधिक निगड़ बंधन है, उसका नाश कर अर्थात् उससे छुड़ाकर आपनी भक्ति की भावना से मुझे युक्त कर देवें। जो मनुष्य मुझ को ही प्रभु समझकर मेरा समादर किया करते हैं, उनको आपके सर्वोत्तम एवं पवित्र चरित्र का ज्ञान सर्वथा नहीं है। स्वर्ग की कामना से याजकगण मेरा भजन किया करते हैं। हे देवि! वे आपके वास्तविक प्रभाव को बिल्कुल नहीं जानते हैं।”

विद्या त्वमेव ननु बुद्धिमतां नराणां शक्तिस्वमेव किल शक्तिम नां सदैव। त्वं कीर्ति कान्ति कमलामल तुष्टि रूपा मुक्तिप्रदा विरतिरेव मनुष्य लोके। गायत्र्यसि प्रथम वेद कला त्वमेव स्वाहा स्वधा भगवती सगुणार्धा मात्रा। आम्नाय एव विदितो निगमो भवत्या सञ्जीवनाय सततं सुर पूर्व जानाम्॥

अर्थ- भगवान विष्णु ने देवी का स्तवन करते हुए प्रार्थना की है- ‘‘हे भगवती! बुद्धिमान् मनुष्यों में जो ज्ञान है, वह आपका ही स्वरूप है। जो परम शक्तिशाली पुरुष हैं, उसमें जो शक्ति विद्यमान है, वह भी आप ही उस रूप में विराजती हैं। बिना आपकी कृपा कण के ज्ञान और शक्ति हो ही नहीं सकती है। कीर्ति, कान्ति, कमल और अमल तुष्टि भी आप ही का स्वरूप है। इस मनुष्य लोक में मुक्ति के प्रदान करने वाली विरति भी आप ही हैं। वेद की प्रथम कला स्वरूपिणी आप गायत्री हैं और सगुणार्ध मात्र स्वाहा तथा स्वधा भी आप ही हैं। आपने ही सुरों के पूर्वजों के संजीवन के लिये आम्नाय निगम की रचना की है।

तपसि ये निरताः मुनयोऽमलास्तवः विहाय पदाम्बुजपूजनम्। जननी! ते विधिना किलवञ्चिता परिभवो विभवे परिकल्पजः॥

न तपसां नदमेम समाधिना न च तथा विहितैः क्रतुभिर्यथा। तब पदाब्ज पराग निषेवणाद्भवति मुक्तिरजे भवसागरात्॥

अर्थ- भगवान् शंकर स्वयं भगवती की स्तुति करते हुए प्रार्थना करते हैं- ‘‘हे देवि! आपके चरणकमलों का समाश्रय त्याग कर जो मुनिगण परम अमल होते हुये भी सर्वदा तपश्चर्या में निरत रहा करते हैं, हे जननी! वे विधाता के द्वारा वञ्चित किये हुये हैं, अर्थात् उनका दुर्भाग्य ही है कि विभव में उनका परिभव निर्मित कर दिया है। इस संसार रूपी अगाध सागर से मुक्ति की प्राप्ति आपके चरणकमल के पराग का सेवन करने ही से हो सकती है, अन्य इसका कोई भी उपाय नहीं है। तपस्या के द्वारा भी मोक्ष नहीं हो सकता है तथा ध्यान और योग के द्वारा समाधिस्थ होने से एवं विधिपूर्वक किये हुए यज्ञों से भी भवसागर का बंधन नहीं छूटता है। इसे तो आपके ही चरणों का समाश्रय प्रदान कर करता है।

तस्यात् ब्रह्मादयो राजन् सन्ति यद्यअधीश्वराः। तथापि माया कल्लोल योग संक्षुभितान्तराः॥

तदधीनाः स्थिताः सर्वे काष्ठ पुतलिकोपमाः। यद्यायथा पूर्वभवं कर्म तेषां तथा तथा॥

प्रेरयत्यनिशं माया परब्रह्म स्वरूपिणी। न वैषम्यं न नैर्धृण्यं भगवत्यां कदाचन॥

अर्थ- राजा ने व्यास जी से बहुत-सी शंकायें की थीं। जिनमें राम, कृष्ण, विष्णु, ब्रह्मा आदि सभी को उनकी लीलाओं में मोह आदि का उल्लेख किया था। ऐसे महान् देवों में और भगवदावतारों को ऐसा समय-समय पर व्यामोह कैसे हुआ? इसके समाधान में व्यास जी ने कहा- ‘‘हे राजन्! यद्यपि ब्रह्मादिक सब ही निस्सन्देह अधीश्वर तो हैं, किन्तु ये सभी माया की तरंगों के योग से संक्षुभित अन्तःकरण वाले हैं। उस महामाया के ही ये सब अधीन हैं, जैसे काठ की पुतली नचाने वाले के हाथ में रहा करती है, ठीक वैसी ही इन सबकी स्थिति है। जैसे इनका पहिले होने वाला कर्म होता है, वैसे ही यह परब्रह्म स्वरूप वाली माया उनको सर्वदा प्रेरित किया करती है। महामाया भगवती में न तो कोई विषम भावना है और न कभी घृणा ही है। यह भुवनों की अधीश्वरी तो केवल जीवों के कल्याण के लिये ही सदा किया करती है।

तस्मात्सर्वात्मना राजन् संसेव्या परमेश्वरी। नित्या चेग्त्यनसना शक्तेर्यां बिना तु पतत्यधः॥

अतएव हे राजन्! सर्वात्मभाव से परमेश्वरी गायत्री का सेवन करना ही चाहिये। शक्ति की उपासना ही नित्या है। जिसके बिना द्विज का निश्चय ही अधःपतन हो जाता है।


देवी निवेदिता-उसकी शताब्दी-और हम

कुमारी निवेदिता की जन्म-शताब्दी 28 अक्टूबर को मनाई जा रही है। यों इसे एक वर्ष पूर्व भी मनाया जा सकता था, पर देर से ही सही- उचित कार्य के लिए उचित कदम उठाया जाना ठीक ही माना जायेगा।

भारत सरकार इसी 28 अक्टूबर को 2 पैसे वाला कुमारी निवेदिता के चित्र समेत डाक टिकट निकाल रही है। इस प्रकार एक विस्मृत आत्मा का दिव्य-दर्शन भले ही छोटे टिकटों के रूप में सही, लाखों व्यक्तियों को मिल सकेगा। विभिन्न संस्थायें और सार्वजनिक क्षेत्र उस जयन्ती को समारोहपूर्वक मनायेंगे।

युग-निर्माण-योजना के अंतर्गत भी इस समारोह को प्रमुखता दी गई है। हर शाखा में दिनाँक 28 की रात्रि को एक समारोह किया जायेगा। शताब्दी के उपलक्ष में सौ दीपक जलाने का- बीच में एक बड़ा दीपक रखने की व्यवस्था की जायेगी। एकत्रित सभी व्यक्ति उन दीपकों के समीप पुष्पाँजलि चढ़ाते हुए अपनी श्रद्धा एवं कृतज्ञता व्यक्त करेंगे और भगवान् से प्रार्थना करेंगे कि ऐसी दिव्य आत्मा पुनः इस संसार में अवतरित कर अंधकार में भटकते हुए समाज को नया प्रकाश प्रदान करें।” इसी अवसर पर उस दिव्य-आत्मा के जीवन वृत्तान्त, क्रिया-कलाप और महान् आदर्श की चर्चा प्रवचनों में की जायगी।

जहाँ सामूहिक समारोह न हो सकें वहाँ व्यक्तिगत रूप से भी एक दीपक अपने घर पर जलाया जाय। पुष्पाँजलि अर्पित करें और श्रद्धा, कृतज्ञता व्यक्त करते हुए उस प्रकार के अवरतणों की शृंखला उत्पन्न करने के लिये भगवान् से प्रार्थना की जाय। उनके जीवन से प्रकाश ग्रहण किया जाय।

हम स्पष्ट देखते हैं कि संसार का भावी नेतृत्व नारी के हाथ में जा रहा है। पुरुष ने लंबी अवधि से सत्ता अपने हाथ में रखी और अपनी बुद्धि को आगे लेकर चला। उसकी प्रकृति में जो कठोरता एवं अहमन्यता का अंश है, उसे दबाया नहीं बढ़ाया गया। फलतः वह समाज की रचना और उसके विकास में भावनात्मक योगदान न दे सका- भले ही उसने नैतिक सुविधा, साधनों के बढ़ाने में अधिक प्रयत्न किया हो। कहने की आवश्यकता नहीं कि सुख-शाँति का आधार सुविधा सामग्री नहीं- भावना का उच्च-स्तर ही है। यदि आनन्द और उल्लास से भरा जीवन यापन अभीष्ट हो तो करुणा, क्षमता, स्नेह, सौजन्य, सेवा और सहानुभूति का ही प्राधान्य एवं बाहुल्य होना चाहिये। इस दृष्टि से पुरुष की उपलब्धियाँ नगण्य हैं। इसमें थोड़ा दोष उसके विवेक का और थोड़ा उसकी प्रकृति का है। कठोरता और अहंकार पर कठोरतापूर्वक नियन्त्रण करता और अन्तरंग के गहन-स्तर में किसी करुणा को जगाता तो सहृदय संतों-पुरुषों की तरह अपनी सर्व-व्यापी परंपरा प्रचलित कर सकता था। पर कुछ अपवादों को छोड़कर पुरुष वर्ग दूसरे ही मार्ग पर चलता रहा। उसके प्रयत्नों ने वहाँ अनेक उपलब्धियाँ प्रस्तुत कीं, जहाँ और बातें बढ़ाईं वहाँ क्रूरता को भी कम बढ़ावा नहीं दिया। माँसाहार से लेकर युद्धों तक, दुर्व्यवहार से लेकर दुष्टता तक हर दिशा में उसका आचरण स्पष्ट है।

प्रकृति लंबे परीक्षण के बाद अब इस निष्कर्ष पर पहुँची है कि सत्ता और नेतृत्व नर के हाथ से छीनकर नारी के हाथ जाना चाहिये। अगले दिनों उसी के कन्धों पर संगीत, साहित्य-कला, परिवार, समाज, अर्थ-धर्म से लेकर राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय गतिविधियों को नियंत्रित रखने और आगे बढ़ाने का उत्तरदायित्व उसी के कंधे पर आने वाला है। नारी की अंतरात्मा में जो स्वाभाविकता, स्नेह, सौजन्य, उदारता और आत्म-भाव है, उस अमृत को थोड़ा-सा उभार देने पर सचमुच ‘देवी’ शब्द को पूरी तरह सार्थक कर सकती है। उसके हाथ से जो कुछ होगा उसमें करुणा, ममता, सेवा और सहानुभूति ही भरी होगी, इस संमिश्रण से संसार के हर क्रिया-कलाप को एक नई दिशा मिलेगी और दृष्टता का स्थान सौजन्य ग्रहण कर लेगा।

हम कुमारी निवेदिता को दूसरों की तरह सामान्य सामाजिक कार्यकर्त्री नहीं मानते। वरन् बहुत ऊँची एक युग-प्रेरणा मानते हैं। जन्मी वे आयरलैंड में- भारत से बहुत दूर थीं- पर वे वहाँ रह नहीं सकीं। सुविधायें उन्हें बहुत थीं। वे उच्च स्तर की शिक्षा शास्त्री थीं। जो प्रयोग वे कर रही थीं, उसके कारण वहाँ उनकी बहुत प्रतिष्ठा थी और आजीविका भी इतनी थी कि सुख-सुविधा की दृष्टि से सब कुछ उन्हें उपलब्ध था। ऐसी परिस्थितियों को छोड़कर आमतौर से कोई तप-त्याग के झंझट में नहीं पड़ता। कष्ट, अभाव, अपमान और उपहास का जीवन जीने के लिये प्रसन्नता से कौन साधन-संपन्न तैयार होता है? पर वह देवी किसी अलग ही धातु की बनी थी। ईश्वर ने किसी विशेष प्रयोजन के लिए ही भेजा था।

स्वामी विवेकानन्द के एक ही प्रवचन और एक ही दृष्टिपात से उसकी धारा बदल गई। जिधर उसका जीवन प्रवाह बह रहा था, उससे बिल्कुल उल्टी दिशा में बहने लगा। उसकी अंतरात्मा में ऐसा ज्वार आया कि सुविधाओं को लात मारकर तपस्वी जीवन के लिए दुस्साहसियों की तरह कटिबद्ध हो गई। स्वामी विवेकानन्द या दूसरों के प्रवचन अनेक लोग सुनते थे, पर ऐसी तीव्र हलचलें औरों में कहाँ हुईं? निश्चय ही वह असाधारण आत्मा थी। असाधारण प्रयोजन के लिये ही आत्मा-जागरण की घड़ी आई, वह तिल-मिलाकर उठ खड़ी हुई। सारा विलास वैभव छूटा और एक ही धुन चढ़ी कि- विश्व का भावी नेतृत्व करने के लिए जिस नारी को महान् उत्तरदायित्व ग्रहण करने हैं, उसे जगाया जाय और कुछ कर गुजरने के लिये कटिबद्ध किया जाय।

जागृत आत्मायें जानती हैं कि आध्यात्मिक प्रकाश का केन्द्र-बिन्दु भारत है। सूर्य सदा पूरब से निकलता है। संसार में विज्ञान, राजनीति, शिल्प आदि का प्रकाश कहीं से भी- किसी भी अन्य भूखण्ड से भी मिल सकता है पर अध्यात्म का सुस्थिर प्रकाश सदा भारत में ही मिलता रहा है। धरती की धुरी, उत्तरी ध्रुव में है उसी प्रकार संसार के अध्यात्म प्रकाश का केन्द्र-बिंदु भारत है। भगवान् के अवतार यहीं होते रहे हैं। ज्ञान, विवेक, नीति और सदाचार का सार्वभौम शिक्षण यहीं के ऋषियों ने किया है। ईसा यहीं तक्षशिला से शिक्षा लेकर गये और सत्य अहिंसा के भारतीय तत्त्व ज्ञान को फैलाते रहे। ईसाई धर्म आज अलग दिखे इससे क्या? अलग तो बौद्ध, सिख, द्रविण आदि भी कहते हैं। कहने भर से सचाई थोड़े हो बदल जाती है।

निवेदिता जानती थी कि भगवान् एक नये संसार की रचना करने जा रहे हैं। अब का युग सड़ी-गली विकृतियों का अवशेष मात्र रह गया है। यह बदला जाने वाला है। इसके स्थान पर नया नेतृत्व नारी ग्रहण करेगी। और इसका शुभारम्भ भारत से होगा। यह तथ्य यों हर किसी के गले नहीं उतरता, कोई बिरला ही इस बात को स्वीकार करेगा। पर सामान्य और असामान्य लोगों को दृष्टि में भारी अंतर होता है। दूर को- अदृश्य को- भावना को- सम्भावनाओं को जो देख समझ सकते हों उन्हें ही तत्वदर्शी कहते हैं। निवेदिता की आत्मा इसी स्तर की थी। जैसे ही उसे अपने स्वरूप का- अपने कार्य प्रयोजन का- भान हुआ, वैसे ही वह भारत चल पड़ने के लिये आतुर हो उठीं।

स्वामी विवेकानन्द एक युग पुरुष थे। वे सोते हुए संसार को जगाने आये थे। आँखों से दीखने वाले काम यों उनके भी बहुत नहीं हैं पर प्राची में उदय होने वाले शंखचूड़ की तरह उन्होंने विश्व-व्यापी प्रकाश उत्पन्न किया। यह उनके अवतरण का उद्देश्य भी था। भारतीय स्वतंत्रता के हीरो कोई भी गिने जाते रहें। रामकृष्ण परमहंस, विवेकानन्द, अरविन्द और रमण को पर्दे के पीछे बैठे हुए सूत्रधार ही कहा जायेगा। इन आत्माओं ने भारत ही नहीं समस्त संसार को नव-जागरण के उपयुक्त प्रकाश और बल प्रदान किया है। उन्होंने सोती निवेदिता को जगाया था। जाग तो गई पर आवश्यक यह भी था कि उसकी निष्ठा को परखा जाय। सो स्वामी जी उसे बार-बार यही कहते रहे- घर रहो, नौकरी करो और जो थोड़ा-बहुत बन पड़े, दूसरों की तरह तुम भी कुछ करती धरती रहा करो।

बहुत बार तो कइयों को क्षणिक भावावेश आ जाता है। किसी प्रभाव से वे बह निकलते हैं। जब आवेश उतरा तो फिर चुप हो बैठते हैं और निराशाजनक बुरा उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। स्वामी जी नहीं चाहते थे कि लोक-मंगल के मार्ग में आने वाले कठिन तप-त्याग, आत्मोत्सर्ग और भौतिक महत्वाकाँक्षाओं को पूरी तरह पालन किये बिना कोई व्यक्ति पूरी तरह सार्वजनिक क्षेत्र में उतरे। थोड़ा काम तो कोई भी किसी भी परिस्थिति में रहकर करता है, कर सकता है पर आत्म-समर्पण तो बहुत बड़ी बात है। परखे हुए व्यक्तियों को ही इस मार्ग पर चलना चाहिये। इस दृष्टि से निवेदिता को घर रहकर ही कुछ काम करते रहने की बात उचित भी थी। उन्होंने बार-बार मना किया और कहा- ‘‘आज के रुग्ण भारत की मनोदशा विचित्र है, यहाँ युवती-नारी चरित्र पर अकारण सन्देह करने का रिवाज है। इस रिवाज को वे शीघ्र ही बदलने वाले नहीं हैं। जो कदम तुम उठाना चाहती हो उसे पग-पग पर कठिनाइयाँ भरी पड़ी हैं। फिर एक बड़ा कष्ट यह भी है कि तुम्हें भारत के संकीर्णतावादी लोग लाँछित और तिरस्कृत करेंगे।”

स्वामी जी परखने के लिये ऐसा कहते थे। जरूरत तो उन्हें भी ऐसी आत्माओं की बहुत थी। जिस दिन इंग्लैंड में नोबुल (निवेदिता का पूर्व नाम) ने अपनी शिक्षा संस्था दिखाई, उसमें उसकी प्रतिभा को देखकर स्वामी जी भावविभोर हो उठे। उन्हें जब स्मरण आया कि भारत में भी यदि इस तरह लोक-मंगल के लिये अपन को खपा देने वाली महिलायें होतीं तो स्थिति कुछ से कुछ हो जाती। इस अभाव का स्मरण करके विवेकानन्द की आँखें बरस पड़ीं, नोबुल विद्यालय का निरीक्षण करते समय स्वामी जी अपने आँसू चुपचाप रूमाल में पोंछते जाते- ताकि कोई देख न ले। आँखों से छिपाया जा सकता है। जीभ को बन्द रखा जा सकता है पर आत्मा को आत्मा की स्थिति देखने से कौन बन्धन रोक सकता है। नोबुल ने कुछ पूछा नहीं- सब कुछ जान लिया। और समझ लिया कि उनके जीवन की सार्थकता कहाँ है। वही क्षण थे, जिसमें उसने अपना कठोर कर्त्तव्य निश्चय कर लिया। और फिर उस फैसले पर अंत तक चट्टान की तरह दृढ़ बनी रही। स्वामीजी उसकी दृढ़ता से अति संतुष्ट हुए और भारत आकर काम करने की स्वीकृति ही नहीं दी वरन् उसे हिन्दू-धर्म की दीक्षा देकर ‘निवेदिता’ नाम दिया और एक संत-तपस्वी की तरह भारतीयों की अन्तरात्मा जगाने के लिए घर-घर, गली-कूँचे घूमते फिरने के लिए स्वच्छन्द छोड़ दिया।

चमड़े की आँख वालों में से कोई बिरले ही यह जानते हैं कि भारत आकर तपस्विनी निवेदिता ने क्या किया? दीखने वाले कामों का लेखा-जोखा रखने वाले लोगों को लंबी तीर्थ-यात्रा, लड़कियों का विद्यालय, प्लेग-पीड़ितों की सहायता, लेख, भाषण, स्वतंत्रता संग्राम में भागीदारी जैसे छोटे-मोटे कार्यों की गणना करने का ही अवसर मिलता है। पर वस्तुतः उनका कार्यक्षेत्र ऐसा था जिसे अप्रत्यक्ष ही कहना चाहिये। उनका मूल उद्देश्य था भारत की नारी-शक्ति को आत्म-गौरव की स्मृति दिखाना और उन्हें उस उत्तरदायित्व के लिये तैयार करना जो नये युग में उनके कंधों पर ईश्वरीय अदृश्य सत्ता द्वारा सौंपा जाने वाला है। इसके लिये उनका व्यक्तित्व एवं कर्तृत्व एक मूर्तिमान प्रचार साधन था।

इतना सुखी जीवन छोड़कर इतनी दूर देश से भारत की आत्मा को जगाने के लिये विदेशी नारियाँ तो आईं पर भारतीय नारी परम्परागत ढर्रे का जीवन जीने में ही संतोष करले- यह तथ्य एक तीखी चुनौती थी, जिसने इस देश की शिक्षित नारी को झकझोरकर रख दिया। इस प्रेरणा से प्रभावित होकर कितनी ही सुशिक्षित नारियों ने अविवाहित रहकर लोक-मंगल के लिये अपने को समर्पित किया, इसका विवरण तैयार किया जाय तो एक स्वर्णाक्षरों से लिखा हुआ ऐसा अविज्ञात इतिहास सामने आवेगा, जिसने देश को बहुत आगे बढ़ाया और बहुत बल दिया। इस जागरण में निवेदिता की अदृश्य भूमिका को देखते हुए उन्हें इस युग के नारी-जागरण का सूत्रधार कहा जाय तो कुछ अत्युक्ति नहीं होगी।

निवेदिता ने इतना किया जिसका उल्लेख किया जा सकना संभव नहीं। यदि कुछ भी न किया होता तो भी उनका लक्ष्य, साहस, त्याग, बलिदान अपने आप में उतने महान हैं कि उतने भर से भी कोई व्यक्ति परम श्रद्धास्पद, अभिवन्दनीय और प्रातः स्मरणीय माना जा सकता है। उसने अन्तिम साँस तक अपने लक्ष्य की पूर्ति में अथक प्रयास किया और अनेकों कष्ट, अभाव, लाँछन, उपहास एवं तिरस्कार सहे। महान् उद्देश्य की बलिवेदी पर इस प्रकार आत्म-समर्पण करने वाली इस मूर्तिमान् देवी के लिये भारत की कोटि-कोटि जनता अनन्तकाल तक अपनी कृतज्ञतापूर्ण श्रद्धाँजलि अर्पित करती रहेगी।

उस दिव्य आत्मा की जयन्ती मनाने में अधिक उत्साह प्रदर्शित करने में हमारा प्रयोजन भारतीय नारी को यह स्मरण दिलाने का है कि उसे उस उत्तरदायित्व को पुनः स्मरण करना है, जिसका पूर्व सन्देश देने के लिये निवेदिता आयरलैण्ड से भारत दौड़ी आई थीं। भगवान परिस्थिति को बदलना चाहते हैं। वे नेतृत्व एवं संचालन का भार अब नारी जाति को सौंपेंगे। अगले दिनों हर क्षेत्र में यह आगे बढ़ेगी और संसार की समस्त गतिविधियों को प्रभावित करेगी। इस गंगा अवतार का केन्द्र-बिन्दु भारतीय नारी होगी। इस देश का ही नहीं समस्त विश्व की परिस्थितियों का सुधार एवं परिवर्तन करना है। उसमें करुणा, सेवा, स्नेह, सहानुभूति का जो प्रकृति प्रदत्त अमृत-तत्त्व भरा पड़ा है, उसके द्वारा सिंचित होने पर ही यह श्मशान की चिता जैसा जलता हुआ मानव समाज संतोष भरी शाँति पा सकने का अधिकारी बनेगा। युग परिवर्तन का यही प्रधान लक्ष्य है।

निवेदिता एक अति उच्च-आत्मा थी। वे नवयुग की सन्देश-वाहिनी के रूप में अवतरित हुई। भारतीय नारी को उन्होंने अपने व्यक्तित्व और कर्तृत्व से झकझोरा और अपना आदर्श उपस्थित करते हुये यह बताया कि उनकी महानता इसी मार्ग पर चलने में सार्थक हो सकती है, जिस पर चलकर वे एक आदर्श प्रस्तुत कर रही हैं।

कहने को वे स्वर्ग सिधार गईं। उनका नश्वर शरीर समाप्त हो गया। पर सही बात यह है कि वे फिर इसी भूमि पर अनेक कलेवरों, अनेक आवरणों के साथ- जन्मी हैं और फिर दूने-चौगुने साहस के साथ उसी प्रयोजन में लगी हैं। भगवती दुर्गा ने आवश्यकता पड़ने पर अपनी एक सत्ता को नौ भागों में विभक्त करके नव-दुर्गा का रूप धारण किया था। पीछे वे शतचण्डी के रूप में आवश्यकतानुसार अपने सौ कलेवर धारण करके सक्रिय हुईं। वह नवयुग के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका प्रस्तुत करेंगी।

नारी तत्त्व का उत्कर्ष एक सुनिश्चित तथ्य है। आज उनकी स्थिति संसार में विशेषतया भारतवर्ष में खेदजनक हैं। संसार में वे एक मनोरंजन की सामग्री और भारत में पद-दलित पराधीन बनाकर रखी जा रही हैं। पर अगले दिन नया संदेश और नया प्रकाश लेकर आ रहे हैं। उसमें नारी को उसकी स्वाभाविक महानता के अनुरूप स्थान, सम्मान और उत्तरदायित्व मिलने वाला है। नये युग में हर क्षेत्र का नेतृत्व नारी करेगी। इसलिये उसके जागरण की भी आज अतीव आवश्यकता है। निवेदिता इसी सन्देश और प्रकाश को लेकर अवतीर्ण हुई थीं। उनकी आत्मा आज अपनी शताब्दी के अवसर अति सुविस्तृत और व्यापक तैयारी के साथ नये निर्माण की महान् भूमिका संपादित करती हुई, हमें अत्यंत स्पष्ट रूप में दिखाई पड़ रही है।

निवेदिता शताब्दी का पुण्य पर्व उसी शुभ-संदेश का शंखनाद है। हम उसे इसलिये भी अधिक उत्साह के साथ मनाने जा रहे हैं कि यह पर्व उस चेतना को बल देगा, जिसके लिये वह दिव्यात्मा तब अवतरित हुई और अब फिर अपने अनेक कलेवरों के साथ कार्य क्षेत्र में अवतीर्ण हो रही हैं। इस मंगलमयी बेला में हमारा शताब्दी समारोह उत्साह और उल्लासपूर्वक मनाना उचित भी है और आवश्यक भी।


अपनों से अपनी बात-

अखण्ड-ज्योति के कलेवर, स्तर एवं मूल्य में वृद्धि

अखंड-ज्योति में इस अंक से कुछ महत्वपूर्ण परिवर्तन आरम्भ हो रहे हैं। एक परिवर्तन है उसके विषयों संबंधी। दूसरा है उसके कलेवर संबंधी। तीसरा है उसके मूल्य संबंधी। इन तीनों बातों पर नीचे की पंक्तियों में प्रकाश डाला जा सकता है ताकि इन परिवर्तनों के भावी प्रभावों, प्रतिक्रियाओं की अधिक स्पष्ट वस्तुस्थिति जानी जा सके।

‘वैज्ञानिक अध्यात्म’ के प्रतिपादन की आवश्यकता पर पिछले तीन अंकों से चर्चा की जा रही है। यह इस युग की सबसे बड़ी माँग एवं आवश्यकता है। विज्ञान एक सचाई है। उसने मानव-जीवन की स्थिति एवं दिशा को पिछले दो-सौ वर्षों के अन्दर इतना अधिक प्रभावित एवं परिवर्तित किया है कि आश्चर्य से दांतों तले उँगली दबानी पड़ती है। पाँच सौ वर्ष पूर्व का मनुष्य यदि आज की दुनिया में जीवित होकर आ जाय और उन दिनों की परिस्थितियों से आज की तुलना करे तो उसे लगो कि यह धरती नहीं कोई अन्य लोक है। जिनने रेल, मोटर, जलयान, वायुयान, टेंक, ट्रैक्टर, डाक-मोटर, मशीन, बिजली, तार, रेडियो, टेलीविजन, एक्सरे, प्रेस, मिल-कारखाने, अणुशक्ति, राकेट आदि आविष्कारों और उनके प्रभावों को पहले कभी देखा न हो, वह निश्चय ही भूतकाल की तुलना में इस युग को जादूगरों की दुनिया ही कहेंगे। इन वैज्ञानिक उपलब्धियों ने मनुष्य के रहन-सहन, आहार-विहार, क्रिया-कलाप, रुचि, आकाँक्षा को ही नहीं विचार-पद्धति को भी प्रभावित किया है। पुरानी अगणित मान्यताओं को विज्ञान ने चुनौती दी है और उन्हें झुठलाया है। पृथ्वी स्थिर है, सूर्य चलता है, इस ज्योतिर्विदों की प्राचीन मान्यता पर अब कौन विश्वास करेगा? नवग्रहों में से विज्ञान ने चन्द्रमा को पृथ्वी का उपग्रह ठहराकर बहिष्कृत कर दिया है और हर्षिल, प्लेटो, आदि नये खोजे गये ग्रहों को और परिवार में सम्मिलित कर लिया है। शरीर विज्ञान और रोग विज्ञान के संबंध में चरक के प्राचीन प्रतिपादन अब यथावत् स्वीकार नहीं किये जा रहे।

यही बात दर्शन एवं तत्त्व-ज्ञान के क्षेत्र में भी हुई है। विज्ञान ने पदार्थ एवं जीवन का जो स्वरूप प्रतिपादित किया है, उसमें ईश्वर, आत्मा, धर्म एवं सदाचरण के लिये कोई स्थान नहीं। दर्शन के नये मूल्य स्थापित हो रहे हैं। श्रद्धा का स्थान तर्क को मिलता चला जा रहा है। वेद, कुरान, बाइबिल आदि धर्म ग्रन्थों में जो लिखा है, उसे अब प्राचीन काल जैसी श्रद्धा से स्वीकार नहीं किया जाता। इसी प्रकार ऋषियों, अवतारों, देवदूतों के कथनों, को आप्त वचनों को भी बिना ननुनच के स्वीकार नहीं किया जाता। विज्ञान ने मानवीय बुद्धि को प्रभावित किया है और उस आधार पर वह, केवल श्रद्धा के आधार पर, किन्हीं पूर्व प्रतिपादनों अथवा कथनों को प्रामाणिक मानने के लिये तैयार नहीं। अब विचार विज्ञान का आधार श्रद्धा न रहकर तर्क, प्रमाण, उदाहरण एवं प्रत्यक्षवाद बनता चला जा रहा है। इन नई कसौटियों पर कसने से उन्हें धर्म एवं अध्यात्म प्रामाणिक प्रतीत नहीं होता, अब यह नई पीढ़ी उनकी उपयोगिता एवं यथार्थता स्वीकार करने से इनकार करती चली जा रही है। अनास्था एवं नास्तिकता इन दिनों तेजी से बढ़ रही है। दुनिया की तीन अरब आबादी में अब आधे से अधिक कम्युनिज्म एवं भौतिकवादी प्रतिपादनों से प्रभावित लोग हैं। शिक्षित वर्ग का रुझान उसी ओर है। विज्ञान ने मानवीय बुद्धि को जो दिशा दी है, उससे यह परिवर्तन होना स्वाभाविक भी था।

विज्ञान ने विभिन्न क्षेत्रों में जो परिवर्तन प्रस्तुत किये हैं उनमें से सभी उपयोगी प्रतीत होने वाले तत्त्वों को सहर्ष स्वीकार कर लिया जाना चाहिये। पुरानेपन को ही सर्वत्र बनाये रहने से किसी को कोई आग्रह नहीं होना चाहिये। अब पुस्तकें प्रेस की छपी लेकर हाथ की लिखी पोथियों का उपयोग करने के लिये किसी को हठ नहीं करना चाहिये। पर धर्म और अध्यात्म के संबंध में जिन मान्यताओं का प्रतिपादन विज्ञान के नाम पर किया जा रहा है, वे गम्भीरतापूर्वक विचार करने से बहुत ही भयावह सिद्ध होती हैं, अतएव उन्हें ज्यों का त्यों स्वीकार नहीं किया जा सकता। उन प्रतिपादनों की प्रतिक्रियाओं पर हमें गम्भीरतापूर्वक उन प्रतिपादनों की प्रतिक्रियाओं पर हमें गम्भीरतापूर्वक विचार करना होगा।

पशु प्रवृत्ति में चोरी, व्यभिचार, छल, आक्रमण, हिंसा, निकृष्ट-स्वार्थ, निष्ठुरता, प्रतिशोध आदि उन आचरणों पर कोई प्रतिबन्ध नहीं है, जो मानव समाज की प्रगति को एक पग भी आगे नहीं बढ़ने दे सकती। विज्ञान ने पशु, मनुष्य और वनस्पति को एक ही वर्गमूल की चेतना कहा है। फलतः उनकी स्वाभाविक प्रकृति, दिशा, इच्छा एवं क्रिया एक ही जैसी मानी जायगी। प्रकृति अन्तःप्रेरणा को ही जब प्राणियों का धर्म अथवा औचित्य मान लिया गया- उसी के अनुसरण में स्वाभाविकता स्वीकार करली गई- तो मनुष्य के लिये भी वे प्रवृत्तियाँ सबके लिये स्वीकार्य, सहज, स्वाभाविक हो जाती हैं। भौतिकवादी दर्शन हमें इसी आधार पर सोचने और करने के लिये प्रोत्साहित करता है।

बोलने, चलने, सोचने की दृष्टि से मनुष्य पशु से भिन्न भले ही हो पर उसके भीतर पशु-संस्कारों और पाशविक प्रवृत्तियों की कमी नहीं। अनैतिकता और दृष्टता के लिये उसका मन हमेशा ललचाता रहता है। जब भी अवसर मिलता है, वह ऐसे आचरण करने लगता है, जो मानव-समाज की श्रेष्ठता, स्वस्थता एवं स्थिरता को भारी आघात पहुँचाते हैं। कानून, पुलिस एवं राज-दण्ड के द्वारा इन पशु प्रवृत्तियों पर नियंत्रण होता तो है पर मनुष्य की धूर्तता बहुत बड़ी-चढ़ी होने के कारण वह इस चंगुल से अधिकतर बच ही निकलता है। अपराध करने वालों में से एक प्रतिशत को भी ऐसा दण्ड नहीं मिल पाता, जो उसे अपनी जन्म-जन्मांतरों की अभ्यस्त दुष्प्रवृत्ति छोड़ने के लिये विवश करे। अपराधी मनोवृत्ति के लिए इन प्रजातन्त्री कानूनों का अस्तित्व एक मनोरंजक खिलवाड़ जितना ही है।

इतने पर भी जब फ्रायडवाद का मनोविज्ञान यह प्रतिपादित करता है कि ‘हर इच्छा को पूरा करना चाहिए, उसे रोकना या छिपाना नहीं चाहिए, तब तो व्यक्ति उन दुष्प्रवृत्तियों को चरितार्थ करना आवश्यक भी मानता है।’ ऐसी दशा में धर्म एवं अध्यात्म का दर्शन ही एक मात्र वह आधार रह जाता है, जो अन्तःप्रेरणा के उच्च-स्तर को जागृत कर उसे संयमी सदाचारी, कर्त्तव्य-निष्ठ, अनुशासित, मर्यादित, उदार एवं परोपकारी बनने के लिये भी प्रेरित करता है।

धर्म, अध्यात्म, ईश्वर, परलोक, पुनर्जन्म, कर्मफल की मान्यतायें एवं श्रद्धायें ही एक मात्र व अवलंबन हैं, जिन पर व्यक्ति एवं समाज की उत्कृष्टता स्थिर रह सकती है। विज्ञान से प्रभावित बदली हुई विचार-पद्धति इस आत्मदर्शन को चुनौती देती हुई उसकी जड़ खोखली करती चली जा रही है। प्रगति जिस ढंग से हो रही है, उसे देखते हुये लगता है कि आगामी पचास वर्षों में भौतिकवादी मान्यताओं का एकछत्र राज्य होगा। उस दशा में मानवीय मूल्यों का- आदर्शों का- क्या होगा? यह चिन्ता का विषय है। यदि मनुष्य अपनी आन्तरिक उत्कृष्टता खो बैठा तो वह हिंस्र पशुओं से भी दुष्टता में आगे बढ़ जायेगा। और उसी विकसित बुद्धि पैशाचिक कुत्साओं का ताण्डवनृत्य प्रस्तुत करके मानव- अस्तित्व एवं सभ्यता को सामूहिक आत्म-हत्या के लिए विवश करेगी। मनुष्य की श्रेष्ठता आत्मवादी दर्शन पर अवलंबित है। यदि वह आधार नष्ट होता है तो व्यक्ति एवं समाज जिस पतित-स्तर पर जा पहुँचेगा, उसकी कल्पना मात्र से अन्तरात्मा सिहर उठती है। अनात्मवादी व्यक्ति कर्मफल न मिलने की ओर से जब निश्चित हो गया तो वह कुछ भी कर गुजर सकता है। उसकी दुष्टता समस्त मर्यादाओं का उल्लंघन करती हुई किसी भी स्तर तक पहुँच सकती है। पहुँच भी रही है। बढ़ती हुई माँसाहार की प्रवृत्ति, औषधियों में जीव-तत्वों का बाहुल्य, पशुओं के प्रति मनुष्य का दुर्व्यवहार अति राजसी हो उठा है। अगले दिनों वही व्यवहार अपने से दुर्बल मानव प्राणियों के प्रति न करेगा, इसकी कोई गारंटी नहीं। जब दूसरों के कष्टों की उपेक्षा कर अपना सुख बढ़ाना सिद्धान्त रूप से उचित स्वीकार कर लिया गया तो एक कदम आगे बढ़कर वह प्रयोग अपने से दुर्बल मनुष्यों पर क्यों न किया जायेगा?

इन विभीषिकाओं का हमें सामना करना चाहिये। इस दिशा में सबसे आवश्यक कदम यह है कि बुद्धिवाद के जिस स्तर को इन बदली हुई परिस्थितियों में मान्यता मिली है, उसी स्तर पर खड़ा होकर हमें धर्म एवं अध्यात्म के सिद्धान्तों का प्रतिपादन करना चाहिये। शास्त्र, अवतार, ऋषि यदि अप्रामाणिक कहे जाते हैं और तर्क, प्रमाण, उदाहरण एवं प्रत्यक्ष को सही माना जाना है तो अब इन नये आधारों पर भी हमें आस्तिकता का प्रतिपादन करने के लिये तैयार होना चाहिये। यदि ऐसा सफलतापूर्वक किया जा सकता हो तो हम विज्ञान प्रभावित दर्शन की अनास्थावान् चुनौती को स्वीकार कर सकते हैं और नई पीढ़ी की डगमगाती हुई अध्यात्म श्रद्धा को पुनः सुदृढ़ बना सकने में समर्थ हो सकते हैं। यह कार्य पानी की बाढ़ से सुरक्षा के लिये मजबूत बाँध बनाने की तरह ही उपयोगी एवं आवश्यक है।

कार्य अति कठिन, अति श्रम-साध्य एवं अति व्यापक है। पर इस स्तर के कार्य भी आखिर मनुष्य ही करते हैं। हमें इसे हाथ में लेना ही चाहिये, क्योंकि यह प्रतिपादन अपने बस की बात है, अपने बूते से बाहर की नहीं। अध्यात्म-तत्त्व-ज्ञान को तर्क, प्रमाण, उदाहरण एवं प्रत्यक्ष के आधुनिक मान्यता प्राप्त आधारों पर भी प्रतिपादित किया जा सकता है। और आँधी-तूफान की तरह उमड़ती हुई अनास्था को सफलतापूर्वक रोका जा सकता है। युग की यही माँग है। मानवीय आत्मा की यही पुकार है। इसे पूरा करने के लिये हमें आगे बढ़ना ही चाहिये था सो बढ़ भी रहे हैं।

पिछले तीस वर्ष हमने आध्यात्मिक मान्यताओं को श्रद्धापरक प्राचीन आधार पर प्रतिपादन में लगाये हैं, अब अगले तीन वर्ष महान तत्त्व-ज्ञान को युग की माँग के अनुरूप तर्क, प्रमाण, उदाहरण, विज्ञान एवं प्रत्यक्ष को आधार मानकर प्रतिपादन करेंगे।

‘अखण्ड-ज्योति’ का प्रस्तुत परिवर्तन इसी दिशा में आरम्भ किये गये, प्रयास का एक महत्वपूर्ण कदम है। इस अंक में लगभग आधे लेख ऐसे हैं, जो नवीन आधार पर अध्यात्म तत्त्व-ज्ञान को समझने की दिशा में प्रकाश देंगे। आगे के अंकों में इस दिशा में चिन्तन, मनन, शोध, अध्ययन का बहुत प्रयत्न किया जाना है और उन उपलब्धियों के फलस्वरूप अखण्ड-ज्योति के पृष्ठों पर वैज्ञानिक अध्यात्मवाद के प्रतिपादन की अधिक स्पष्ट और अधिक उपयोगी झाँकी भी मिलने लगेगी। प्रयत्न यह किया जायेगा कि पाश्चात्य वैज्ञानिकों, अन्वेषकों, तार्किकों, अनुसंधानकर्ताओं, प्रत्यक्षदर्शियों एवं अनुभवकर्ताओं के अनुभव एवं प्रतिपादनों को प्रधानता देते हुए, यह सिद्ध किया जाय कि इनकी क्रमिक प्रगति भी तत्त्व-ज्ञान, धर्म एवं अध्यात्म की ओर किस प्रकार बढ़ रही हैं। नास्तिकता का बुखार अब किस प्रकार घटते हुए स्वाभाविक तापमान पर पहुँच रहा है।

विश्वास किया जाना चाहिये कि यह प्रतिपादन मानव समाज की तर्क बुद्धि को एक नया प्रकाश प्रदान करेगा, उसे अपनी इस धारणा पर पुनर्विचार करने के लिये विवश करेगा कि सृष्टि के आदि से चली आ रही आदर्शवादी उत्कृष्टता से ओत-प्रोत आध्यात्मिक एवं धार्मिक मान्यतायें न तो काल्पनिक हैं और न भ्रान्त। उनके पीछे ठोस आधार हैं। वे उतने ही सत्य हैं, जितना कि स्वयं विज्ञान एवं उससे प्रभावित बुद्धिवाद। अनास्थावान विचार-धारा को गाली देने अथवा उसे कोसने से कुछ काम चलने वाला नहीं। काम बुद्धि का उत्तर बुद्धि से और प्रमाण का उत्तर प्रमाण से देने पर चलेगा। हमें पूर्ण शाँत-चित्त से इसी आधार पर काम करना है।

अखण्ड-ज्योति में अब तक जिस स्तर के लेख निकलते रहे हैं, उनके अभ्यस्त पाठकों को नया विषय बदलते देख-कर कुछ अटपटा अवश्य लगेगा। पर मजबूरी में और कोई रास्ता नहीं। नई पीढ़ी को स्थिति के अनुरूप विचार देने के लिये हमारे पास और कोई साधन नहीं। इसलिये थोड़े पूर्व शैली के भावनात्मक और थोड़े नई शैली के अध्यात्म विज्ञान सम्मत लेख देना आरम्भ कर रहे हैं। इसका आरम्भ इस अंक से हुआ है।

अध्यात्मवाद को पुरानी भावनात्मक और नई विज्ञान सम्मत शैली से प्रतिपादन करने के लिये निश्चित रूप से पृष्ठ संख्या अधिक चाहिये। विषय बहुत व्यापक है, उसे थोड़े में, संक्षेप में प्रतिपादित नहीं किया जा सकता। पत्रिका के पृष्ठ बढ़ाये जाने आवश्यक थे, सो इस अंक से बढ़ा भी दिये गये हैं। अब तक 40 पृष्ठ रहा करते थे। इस अंक में 64 पृष्ठ हैं। उतने पृष्ठ तो कम-से-कम बढ़ने ही चाहिये थे, सो उतने बढ़ा भी दिये गये हैं। अब भविष्य में उतने ही पृष्ठ रहा करेंगे।

कवर पृष्ठ पहले की अपेक्षा दूने मोटे कागज पर कर दिया गया है। दुरंगे की अपेक्षा उसे तिरंगा बनाया है।

इस परिवर्तन में पत्रिका की लागत बहुत अधिक बढ़ेगी। पिछले चार मास पूर्व ही सरकार ने अखबारों पर ढाई गुना पोस्टेज बढ़ाया है। इतना टैक्स इतिहास में किसी व्यवसाय पर एक साथ नहीं बढ़ा। दो पैसे के स्थान पर अब पाँच पैसे का टिकट लगाना पड़ता है। हर ग्राहक पीछे 15 पैसा हर वर्ष घाटा बना रहने के स्थान पर अब वह घाटा 51 पैसा हो गया। इसी वर्ष का कागज के दामों में भारी उथल-पुथल हुई है। उस महंगाई से भी कई सौ रुपये मासिक का घाटा बढ़ा दिया है। इतना सब तो पिछले तीन-चार महीनों से चल ही रहा था अब पृष्ठ संख्या आगे से भी अधिक- कवर पेज दूने वजन से भी अधिक- पैकिंग पेपर ढाई गुने से भी अधिक- बढ़ा देने से पुरानी और नई बढ़ी हुई लागत मिलाकर दूने के करीब जा पहुँचती है।

इस दृष्टि से पत्रिका का मूल्य दूना बढ़ाया जाना चाहिये था। पर पाठकों की सुविधा का ध्यान रखते हुए मूल्य वृद्धि केवल ड्योढ़ी की गई है। अब अखण्ड-ज्योति का चन्दा 4) के स्थान पर 6) वार्षिक करना पड़ रहा है। अपना बस चलता तो पृष्ठ बढ़ाने पर भी मूल्य न बढ़ाते, पर और कोई मार्ग शेष न रहने पर सब करने के लिये विवश ही होना पड़ा है।

हम जानते हैं कि इन दिनों महंगाई आकाश को छू रही है। जीवन निर्वाह जितनी अर्थव्यवस्था जुटा सकना भी सर्वसाधारण के लिये अति कठिन हो रहा है। ऐसी दशा में 2) अधिक देना अखरना ही चाहिये। इतने पर भी हमें विश्वास है, कि जो सद्-ज्ञान का मूल्य, महत्व एवं उपयोग समझते हैं, वे आत्मा की भूख बुझाने के लिये पेट को थोड़ा भूखा रख कर भी यह बढ़ा हुआ भार प्रसन्नतापूर्वक बहन कर लेंगे। अनेक वस्तुओं के दाम बढ़े हैं, लोगों ने उन्हें आवश्यक वस्तुयें माना है और उस बढ़े खर्चों को सहन किया है। फिर अखण्ड-ज्योति का भाव तो बढ़ा नहीं केवल वजन और आवरण की बढ़ोत्तरी मात्र बढ़ी है। एक सेर दूध के स्थान पर पौने दो सेर दूध के दाम ड्योढ़े देने पड़ें और उसमें मलाई भी अधिक मोटी पड़ी हो तो ड्योढ़े पैसे देने में किसी को यह शिकायत नहीं हो सकती कि कीमत बढ़ी या महंगाई बढ़ी है। अधिक मात्रा में अधिक उपयोगी वस्तुओं का मूल्य कुछ अधिक देना पड़ता है तो उसे भाव-वृद्धि की महंगाई नहीं कहा जायेगा।

जो हो अब अखण्ड-ज्योति का मूल्य बढ़ाया ही जा रहा है, उसे प्रसन्नतापूर्वक वहन करना ही है। उदार परिजन इसे बिना अनखनाये स्वीकार कर लेंगे, क्योंकि युग की एक महान् आवश्यकता की पूर्ति के लिये बड़े कदम उठाने का प्रयत्न किया जा रहा है, उसमें हममें से प्रत्येक का योगदान रहना ही चाहिये। थोड़ा-थोड़ा अतिरिक्त बोझ हरएक को वहन करना चाहिये।

हर प्रबुद्ध परिजन को यह ध्यान रखना है कि 2) मूल्य बढ़ा देने पर भी पत्रिका में पिछले वर्षों की अपेक्षा घाटा अधिक बढ़ेगा। इसके समाधान का केवल एक ही उपाय है कि सदस्य संख्या घटने न पावे। हो सके तो उसे बढ़ाने का प्रयत्न किया जाय। मूल्य बढ़ने से ग्राहक टूटने की आशंका है। उस आशंका को निर्मूल बनाने के लिये इन दो-तीन महीनों में आवश्यक तैयारी हममें से हरएक को कर लेनी चाहिये। पुराने ग्राहक टूटने न पावें और नये ग्राहक बढ़ाने का प्रयत्न तीव्र किया जाय, इन दो बातों का ध्यान रखा जा सके तो परिजन अपनी प्रिय पत्रिका को एक महान् लक्ष्य की ओर तीव्र गति एवं संतोषजनक परिणाम के साथ आगे बढ़ता पावेंगे।

इसी प्रकार युग-निर्माण-योजना का स्वरूप भी आगे से अधिक- अखण्ड-ज्योति की तरह ही बढ़ाया जा रहा है। अखण्ड-ज्योति तालाब और युग-निर्माण उसका कमल है। एक को कृष्ण, एक को अर्जुन कहते हैं। दोनों का साथ-साथ चलना, साथ-साथ आगे बढ़ना स्वाभाविक है। उसके पृग अब युग-निर्माण आन्दोलन को तीव्र करने में, रचनात्मक प्रवृत्तियों के अभिवर्धन का प्रत्यक्ष मार्ग-दर्शन करने में लगेंगे।

दोनों पत्रिकाओं का मूल्य 6 + 6 + = 12) हो जाने से 1) रु. मासिक बनता है। हर परिजन को 1) मासिक की बचत अपने आवश्यक कार्यों में भी कमी करके करनी चाहिये और इन पत्रिकाओं का प्रकाश अपने लिये- अपने परिवार के लिये- अपने स्वजनों, संबंधियों, के लिये उपलब्ध करना चाहिये।

अखण्ड-ज्योति परिवार के परिजनों का स्तर मामूली अखबारों को मनोरंजन के लिये पढ़ते रहने वाले बाजारू पाठकों जैसा नहीं है। ये गन्दी तस्वीरों तथा भौंड़ी मन बहलाने वाली उन सस्ती पत्रिकाओं को खरीदने वालों से भिन्न हैं, जो अनैतिक विज्ञापनों से भरे पृष्ठों को भी कलेवर में जोड़ देते हैं और मोटी पत्रिका सस्ते मूल्य में खरीदने की अपनी बुद्धिमानी पर प्रसन्न होते हैं। अखण्ड-ज्योति का स्तर सर्वथा भिन्न है। वह उत्कृष्ट स्तर की ऐसी पाठ्य सामग्री जुटाती है, जो पाठक के जीवन को सद्गुणों और सत्प्रवृत्तियों से भर कर उसे सुखी समुन्नत जीने की सम्भावनायें प्रशस्त करे।

इसलिये उसमें ओछे लोगों की रुचि के अनुरूप कलेवर चित्र तथा ओछा मैटर नहीं भरा जाता। यदि अन्य मासिक पत्रों जैसी रीति-नीति अपनाई गई होती तो औरों की तरह अखण्ड-ज्योति भी मोटी प्रकाश रूपा रही होती। पर अपना तो लक्ष्य एवं दृष्टिकोण ही सर्वथा भिन्न है। हम एक मिशन लेकर चल रहे हैं। और उसके लिये गत 30 वर्षों से भारी आर्थिक तथा दूसरी तरह की कुर्बानी करते चले आ रहे हैं।

हमारे पाठक परिजन भी इसी स्तर के हैं। वे अपने को एक ऐसे महान् मिशन के अंग-प्रत्यंग अनुभव करते हैं जिसने व्यक्ति एवं समाज के नये निर्माण का व्रत ही धारण नहीं किया है वरन् उसे पूरा करने का दुस्साहस पूर्ण कदम भी उठाया है, इतना ही नहीं, बढ़ते हुए कदमों ने इतनी मंजिल पार करली है कि अब युग-निर्माण की बात हवाई कल्पना नहीं एक सुनिश्चित सचाई समझी जाने लगी है।

अखण्ड-ज्योति और उसके परिजनों द्वारा किये हुए संयुक्त प्रयास आश्चर्यजनक प्रगति कर चुके हैं। उस सफलता का श्रेय परिजनों को है, जिन्होंने निर्धारित कार्यक्रमों और निर्देशों को सदा पूरी सचाई और तत्परता के साथ पूरा करने के लिये भरसक प्रयास किया है। परिजनों की इसी मनोभूमि को देखते हुए हमें पूरा और पक्का विश्वास है कि अब जबकि विशेष परिस्थितियों में पत्रिका का कलेवर-स्तर तथा मूल्य बढ़ाया जा रहा है, वे उस परिवर्तन के कारण पड़ने वाले थोड़े से दबाव को भी प्रसन्नतापूर्वक सहन कर लेंगे और अपनी सदस्यता सदा की भाँति यथावत् बनाये रहेंगे। केवल 2) रु. वार्षिक अतिरिक्त आर्थिक भार बढ़ जाने के कारण कोई अपनी सदस्यता तोड़ने की बात सोचेगा, ऐसे अपने परिवार में किसी के भी होने की सम्भावना हम सोच भी नहीं सकते।


VigyapanSuchana

श्री मगनलाल प्राणजीवनदास गाँधी नवसारी वाले और श्री नटवरलाल नाथालाल जानी (राजकोट) को गुजरात-महाराष्ट्र के लिये हमारा प्रतिनिधि नियुक्त किया गया है। दोनों प्रतिनिधियों ने अपना शेष जीवन तपोभूमि में रहकर युग-निर्माण योजना में अर्पण किया है।

युग-निर्माण योजना के व्यापक प्रसार और उक्त साहित्य के गुजराती भाषा में प्रकाशन व्यवस्था के लिये अपने प्रदेश में गायत्री तपोभूमि की ओर से आयेंगे। तब हमारी सभी शाखायें उनको पूरा पूरा सहयोग देंगी ऐसी आशा है। - श्रीराम शर्मा आचार्य,


मुझे यह कभी नहीं स्वीकार

(बलराम सिंह परिहार)


मुझे यह कभी नहीं स्वीकार (Kavita)

पथ पर बिछे देखकर काँटे कभी मान लूँ हार। मुझे यह कभी नहीं स्वीकार॥

झरना चला एक पर्वत से, इठलाता गाता मुसकाता। चट्टानें भी राह रोकतीं लेकिन झरना चलता जाता॥ ऊँचे-नीचे पथ कँकरीले टीलों पर भी चढ़ता जाता। ऊपर से गिर जाता, नीचे फिर-फिर आगे बढ़ता जाता॥

देख हँसी पर्वत उपत्यिका बोली सुन रे निर्झर भ्राता! गिर-गिरकर उठ-उठ चलने में, क्या तू कुछ भी कष्ट न पाता॥ ऐसा भी जीना क्या जीना जिसमें बस कष्टों से नाता। हँसकर कहा पथिक निर्झर ने सुनरी भगिनी बात हमारी॥ रुक जाऊँ तो बढ़े मैल दल अपवित्रता अपार। मुझे यह0॥

सूर्यलोक से देवि-किरण ने धरती माँ की ओर निहारा। देख अज्ञ-अंधियारा धरा पर उमड़ उठा उनका उर प्यारा॥ निकल पड़ीं घर छोड़ मिटाने धरती माता का अंधियारा। लेकिन रोका बलाहकों ने पथ रश्मिनिका सिर कजरारा॥

तिमिर सघन हो उठा मरुत ने दिया मेघ को और सहारा। अट्टहास कर मेघराज ने शत योजन शरीर विस्तार॥ दुःखी हुआ आकाश देख यह उसने दबा-वचन उच्चारा। देवि-किरण लौटो अपने गृह, किन्तु किरण बोली यों हँसकर॥ घर लौटूँ तो प्रिय धरती पर और बढ़े अंधियारा। मुझे यह0॥

नाविक ने मस्तूल खोल दी नाव बढ़ी लहरों की रानी। छप-छप करती सिंधुराज के वक्षस्थल पर बढ़ी सयानी॥ हँसती गाती शोर मचाती इठलाती जाती दीवानी। कितनी राह नापला अब तक बात नहीं नाविक ने जानी॥

तभी अचानक रौद्र रूप धर आ दौड़ी झंझा तूफानी। टूट गई पतवार नाव में भर आया घुटनों तक पानी॥ गरज उठा सागर बोला रे नाविक! मेरी बात न मानी। हँस मांझी ने कहा सिन्धु से जीवन-मरण लगा ही रहता॥ पर मेरे रुकने से रुक जाता जीवन-व्यापार। मुझे यह0॥

झरना, किरण और नाविक-सा जीवन ही सच्चा जीवन है। जो न रुके झंझावातों में वही सदा सच्चा यौवन है॥ रुकने वाले नहीं किसी से कर सकते हैं प्यार। रुक जाने वाले का जीवन हो जाता बेकार॥ मुझे यह कभी नहीं स्वीकार॥

*समाप्त*