जीवन की महत्ता समझें और उसका सदुपयोग करें

मनुष्य-जीवन नगण्य सी-या ऐसी तुच्छ वस्तु नहीं है, जिसे हलकी दृष्टि से देखा जाय और हलके कार्यों में खर्च कर दिया जाय। यह निरन्तर प्रगति और निरन्तर तप का परिणाम है। उसके मूल्य और महत्व को समझा जाना चाहिए, यह सोचा जाना चाहिए कि इस सुअवसर का लाभ किस प्रकार उठाया जाय। ऐसे अवसर जो बार-बार हाथ नहीं आते, उपेक्षा और उपहास में गँवाने नहीं चाहिए। वरन् सतर्कतापूर्वक यह चेष्टा करनी चाहिए कि उसका समुचित सदुपयोग हो और परिपूर्ण लाभ मिले।

मनुष्य-जीवन इसलिए है कि उसे पाकर जीवात्मा अपनी महान् उत्कृष्टता को विकसित करे, अलौकिक शान्ति और सन्तोष का आनन्द लाभ प्राप्त करे। आन्तरिक उत्कृष्टता सत्कार्यों के निरन्तर अभ्यास पर निर्भर है। पढ़ते-सुनते या सोचते-विचारते रहने में आत्म-कल्याण की हलकी जानकारी तो प्राप्त होती है, पर उससे जीवन-क्रम में किसी महानता का अवतरण होने की आशा नहीं की जा सकती। श्रेष्ठ कार्यों की श्रृंखला का दिनचर्या में अविच्छिन्न सम्बन्ध होना ही केवल मात्र वह उपाय है, जिससे मनुष्य ऊँचा उठता है और सफल जीवन का लक्ष्य प्राप्त कर सकने में समर्थ होता है। उचित है कि हम इस दृष्टि बिन्दु को विकसित करें और इस सुअवसर का परिपूर्ण लाभ उठावें जो हमें मनुष्य-जीवन के रूप में आज उपलब्ध है।

-सन्त वास्वानी


परमेश्वर के साथ अनन्य एकता का राजमार्ग

मनुष्य उस परम चेतना परमेश्वर का अंश है। जिस प्रकार जल के प्रपात में पानी के अनेक छींटे उत्पन्न और विलय होते हैं उसी प्रकार विभिन्न प्राणी परमात्मा में से उत्पन्न होकर उसी में लय होते रहते हैं। यह उत्पत्ति एवं लय की लीला इसलिये रची गई है कि इस विश्व में जो प्रेम का अमृत भरा हुआ है उसका जीव रसास्वादन करे और उस आनन्द से परितृप्त होकर अपने को धन्य माने।

किन्तु इस संसार में ऐसे बुद्धिमान कितने हैं जो इस ईश्वरीय उद्देश्य को चरितार्थ कर पाते हैं। अधिकाँश में लोग दुर्भाग्य, कष्ट, अभाव, क्लेश एवं उद्वेग की जिन्दगी जीते देखे जाते हैं। इस मानव-जीवन के अनुपम अवसर का सदुपयोग कर लौकिक एवं पारलौकिक भविष्य को उज्ज्वल बनाने की बात विरला ही कोई सोचते देखा जाता है। जो सोचते हैं वे भी यथार्थ रूप से वैसा कर सकने में असमर्थ ही दिख पड़ते हैं। सब ओर अशान्ति, क्षोभ तथा असन्तोष ही फैला दीखता है। यह सुर-दुर्लभ मानव-शरीर मनुष्य की भार स्वरूप बना हुआ है।

ईश्वरीय मन्तव्य से विपरीत मनुष्य की जीवन गति पर विचार करने से यही बात समझ में आती है कि कहीं पर कोई बड़ी भूल हो रही है। नहीं तो शुद्ध, बुद्ध और आनन्द रूप परमात्मा के अंश मनुष्य के पास शोक-संतापों का क्या काम? उसे तो अपने अंशी की तरह शान्त और प्रसन्न होना चाहिये।

मनुष्य की इस दुःख पूर्ण स्थिति की कारणभूत भूल पर विचार करने से यही पता चलता है कि मनुष्य अपने स्वरूप को भूला हुआ है और यही अज्ञान उसको शोक-संतापों के कुश कंटकों में घसीट रहा है। जीवन का मंतव्य, महत्व, मूल्य तथा उपयोग विस्मरण कर देने से उसका मार्ग गलत हो गया है। जिसको यह ही पता न रहे कि मैं क्या हूँ, मेरा कर्त्तव्य और लक्ष्य क्या है, उसका जीवन-पथ ठीक भी कैसे हो सकता है। उसका भटक जाना, पथ-भ्रान्त हो जाना स्वाभाविक ही है। मूल्य एवं महत्व न जानने वाले के पास यदि रत्नों की पोटली रख दी जाये तो वह उसको मिट्टी मोल ही बरबाद कर देगा।

यों ऊपर से देखने में ऐसा लगता है कि मनुष्यों ने बहुत प्रगति की है। वैज्ञानिक विकास और सुख-सुविधा के प्रचुर साधन तथा वैभव पूर्ण रहन-सहन देखकर सहसा विश्वास नहीं होता कि मनुष्य इतना दुःखी और विक्षुब्ध होगा कि उसे जीवन एक असह्य भार-सा अनुभव हो। निःसन्देह भौतिक प्रगति की दृष्टि से यह अभूत पूर्व युग है। किन्तु दुर्भाग्य की बात यह है कि इसने वैयक्तिक एवं सामाजिक सुख-शान्ति को बढ़ाया नहीं घटाया ही है। यह बाह्य जीवन के साथ-साथ आन्तरिक जीवन का विकास न करने का ही परिणाम है। यह विकास एकाँगी एवं अपूर्ण है। अपूर्णता दुःखों की मूल मानी गई है। दो पहियों पर चलने वाली गाड़ी को यदि एक पहिये पर घसीटा जाये तो असुविधा और तकलीफें बढ़ेंगी ही। मनुष्य का जीवन बाह्य एवं आन्तरिक दो भागों से मिलकर बना है। यदि दोनों समानान्तर गति पर न रहेंगे तो वाँछित सुख-शान्ति के लिए निरास ही रहना होगा। विषमता स्पष्ट है। बाह्य, भौतिक अथवा वैज्ञानिक विकास क्षितिज के छोर छूता हुआ आगे बढ़ रहा है और आन्तरिक, आत्मिक अथवा आध्यात्मिक प्रगति पाताल की ओर गिरती जा रही है। अपेक्षित सुख-शान्ति के लिये इन दोनों गतियों में सन्तुलन एवं सामंजस्य स्थापित करना होगा। उसका उपाय यह हैं कि भौतिक प्रगति के साथ हमें, हम सब मनुष्यों को अपना सत्य स्वरूप, जीवन का उद्देश्य तथा उसका मूल्य महत्व फिर समझना होगा और उसकी गरिमा के अनुसार अपनी गतिविधि का निर्धारण करना होगा।

मनुष्य की वर्तमान दीन दशा का उत्तरदायी न तो दुर्दैव है, न युग अथवा काल का प्रभाव और न कोई अन्य परिस्थितियाँ, इसका उत्तरदायी स्वयं मनुष्य ही है। मनुष्य का अपना दृष्टिकोण विकृत हो जाने से जीवन की गतिविधि में अव्यवस्था आ जाना स्वाभाविक ही है। गुण, कर्म, स्वभाव में पतन पूर्ण स्थिति का समावेश हो जाये और परिस्थितियाँ अनुकूल बनी रहें यह सम्भव नहीं। पात्रता के अनुरूप ही प्राप्ति होती है, यह सृष्टि का शाश्वत नियम है। पात्र को पुरस्कार और कुपात्र को दण्ड मिलता ही है। इस संसार में सुख-शान्ति, सन्तोष, प्रेम तथा पवित्रता की सारी दैवी विभूतियाँ सर्वत्र बिखरी पड़ी हैं किन्तु उनका अधिकारी वह मनुष्य ही हो सकता हैं जो अपने को उनके योग्य बना सकता है।

यों मनुष्य मूल रूप से तो पात्र ही है, अपात्र अथवा कुपात्र नहीं। अपने स्वरूप का विस्मरण कर देने से ही उसमें अपात्रता का आरोप हो गया है। जिस दिन वह अपने इस सत्य स्वरूप की प्रतीति कर लेगा कि वह सच्चिदानंद परमात्मा का अंश है, उसी दिन उसके हृदय के बन्द कपाट खुल जायेंगे, विस्मृति का अंधकार दूर हो जायेगा। उसके जीवन में दिव्य प्रकाश की किरणों विकीर्ण होने लगेंगी उसके गुण, कर्म, स्वभाव, पात्रता की दिशा में विकसित होने लगेंगे, जितनी-जितनी आत्म-स्वरूप की अनुभूति बढ़ती जायेगी, परमात्म-तत्त्व के साथ ऐक्य की भावना बढ़ती जायेगी।

मनुष्य की यह प्रतीति कि मैं उस अनन्त चैतन्य-सत्ता का एक अंश हूँ जो प्राणी मात्र में पायी जाती है उसकी, अन्य प्राणियों से आत्मीयता स्थापित कर देगी। उसका विरोध, द्वेष तथा स्वार्थ की सारी भावनायें नष्ट हो जायेंगी जिनका परिणाम अनंत प्रेम के रूप में हृदय में भर जायेगा। हृदय की परिपूर्णता सारे सुखों की मूल है। परमात्मा के प्रति एकता का ज्ञान हो जाने से, जीवन में एक दिव्यता आ जाती है और शरीराभिमान छूट जाता है।

शरीराभिमान मिथ्या है। मनुष्य शरीर नहीं आत्मा है, जो अनन्त आनन्द के आगार परमात्मा का शुद्ध अंश है। आत्म-स्वरूप के अज्ञान तथा अपने को शरीर मात्र मानने से सब प्रकार के पापों, दोषों तथा अनुचित व्यवहारों की स्थिति बनती है, स्वार्थ उत्पन्न होता है। यह सारी भावनायें मानवीय स्वरूप के प्रतिकूल हैं, अस्वाभाविक एवं अप्राकृतिक हैं। अन्य प्राणियों के प्रति अनात्म अथवा विरोधी भावना रखना ईश्वरीय नियम का उल्लंघन करना है। साधारण साँसारिक तथा सामाजिक नियमों का अतिक्रमण करने से जब समाज की व्यवस्था अस्त-व्यस्त हो जाती है, संकट तथा आपत्तियों के बादल घिरने लगते हैं, तब ईश्वरीय नियम का विरोध कितने बड़े संकट उपस्थित कर देगा इसका अनुमान कठिन है। क्रोध, द्वेष, निन्दा, कुत्सा आदि की बुराई प्रस्तुत करते रहने से चारों ओर बुराई का ही प्रसार होगा जिसका हानिकारक प्रभाव क्या व्यक्ति और क्या समाज, क्या मन और क्या शरीर सभी पर पड़ेगा। एक ओर से क्रोध होने पर दूसरी ओर से भी क्रोध ही होगा, एक ओर से तलवार उठने पर दूसरी ओर उसी प्रकार की अनुरूप प्रतिक्रिया न हो यह सम्भव नहीं। जो दूसरों के लिये गड्ढा खोदेगा उसके लिए कुँआ तैयार ही रहेगा। यह क्रिया प्रतिक्रियाओं का सहज नियम है जो बदला नहीं जा सकता।

द्वेष-दुर्भाव की यह अनुरूपता मनुष्य के वास्तविक स्वरूप के अनुरूप नहीं है। उसका स्वरूप तो शुद्ध-बुद्ध तथा निरामय है। वह तो अनन्त-सत्ता का साझीदार है, संसार में उसका प्रतिनिधि है, उसका कृपापात्र है और सृष्टि में भरे प्रेम रस का आस्वादन करने के लिये भेजा गया है। आनन्द तथा शान्ति का अधिकारी बनाया गया है। उसके लिये यही शोभनीय है कि वह अपने सत्य स्वरूप का स्मरण करे और उसी के अनुरूप स्थिति प्राप्त करे। इस प्रकार शोक-संतापों अथवा द्वेष-दुर्भावों के कल्मष में पड़ा रहना उसके लिये लज्जा की बात है।

स्वार्थ ही सारे पाप-संतापों की जड़ है। स्वार्थी को अपने अतिरिक्त कोई दूसरा दीखता ही नहीं। उसका लोभ, उसकी तृष्णा इतनी विकराल होती है कि संसार का सारा सुख, वैभव पाकर भी संतुष्ट नहीं होती। दूसरों की उन्नति और उपलब्धियाँ उससे देखी नहीं जाती। उसकी यही इच्छा और यही प्रयास रहता है कि संसार में जो कुछ है वह सब उसे ही मिल जाये, किसी दूसरे को उसका एक अंश भी न मिले। वह संसार के सारे प्राणियों के प्रति निर्दय तथा अनुदार हो जाता है। उसे सब ओर अपने लोभ के अतिरिक्त और कुछ दिखलाई ही नहीं देता।

मनुष्य अपने सत्य स्वरूप की प्रतीति करे और निश्चय करे कि परमात्म तत्व के साथ उसकी एकता है। वही परमात्म तत्व जिस प्रकार हमारे भीतर से होकर बह रहा है उसी प्रकार प्रत्येक प्राणी के अन्दर से प्रवाहित है। उस अनन्त चैतन्य से ओत-प्रोत सारे चेतन सजातीय हैं, उनके मूल रूप में कोई भेद नहीं है। ऐसा निश्चय हो जाने पर उसका अन्य भेद मिट जायेगा। सबके प्रति बंधुत्व अनुभव होने लगेगा और तब वह दूसरों के लिये अपने स्वार्थ का त्याग करने में सुख मानेगा, और उनकी सेवा करना अपना कर्त्तव्य। दूसरों का सुख-दुख उसका अपना बन जायेगा। ऐसी दशा में वह किसी को कष्ट देकर स्वयं क्यों दुखी होना चाहेगा। स्वार्थ का नाश होते ही उसके जीवन से सूनापन, नीरसता, संकीर्णता आदि कष्टप्रद अनुभव दूर हो जायेंगे और वह अपनी आत्मा में सरसता, व्यापकता तथा एक अनिवर्चनीय आनन्द की अनुभूति पाने लगेगा। उसको संसार के समस्त प्राणियों से अक्षय प्रेम का सम्बन्ध स्थापित करना उचित तथा आवश्यक लगेगा।

ज्यों-ज्यों मनुष्य इस सत्य का साक्षात्कार करता जायेगा कि जो परमात्मा-सत्ता विश्व का मूल है हम सब उसकी ही अंश कलायें हैं और प्रत्येक प्राणी के साथ सबकी एकता है, किसी में किसी प्रकार भेद नहीं है त्यों-त्यों उसका हृदय विश्व से परिपूर्ण होता जायेगा और उसके स्वार्थ की संकीर्ण सीमाएं खण्ड-खण्ड होती जायेंगी। मनुष्य के भीतर रहने वाला सब प्रकार का द्वेष और किसी के प्रति दूषित विचार दूर हो जायेंगे। उसका अन्तःकरण दर्पण की तरह निर्मल होकर प्रसन्न हो उठेगा। जो भी उसके सामने आयेगा उसमें वह अपनी आत्मा का ही दर्शन करेगा। उसे चारों ओर अपनत्व ही अपनत्व दिखाई देगा। ऐसी शुभ-स्थिति में फिर कष्ट, क्लेशों अथवा शोक-संतापों को कोई अवसर ही नहीं रह जाता।

संसार के शोक-संतापों से मुक्ति पाने के लिये मनुष्य को अपनी स्वार्थ तथा संकीर्ण सीमाओं को तोड़ कर अपने विशाल तथा विराट् स्वरूप की ओर अग्रसर होना ही चाहिये। हृदय में छिपे अनन्त प्रेम के भंडार को खोल देना चाहिये और अपने आत्म-भाव का प्रसार करना चाहिये। यह आत्म-भाव जितना-जितना विस्तृत होता जायेगा हम उतना-उतना ईश्वर के निकट पहुँचते जायेंगे और जितना-जितना ईश्वर के समीप बढ़ते जायेंगे आत्म-साक्षात्कार की अनुभूति होती जायेगी, प्रेम ही सारे सुखों का सार है। वही ईश्वर का सच्चा स्वरूप और आत्मा की भौतिक अनुभूति है। जैसे-जैसे हम अपने सत्य स्वरूप की प्रतीति करते जायेंगे वैसे-वैसे वह परमात्म स्वरूप प्रेम हमारे मन, बुद्धि, आत्मा तथा कर्मों में अधिकाधिक प्रकट होता जायेगा। हमारे अन्तःकरण को ओत-प्रोत कर जब वह अमृत संसार में चारों ओर बिखरने लगेगा, सब ओर सुख-शान्ति की परिस्थितियाँ निर्मित होने लगेंगी और यह संसार जो आज कुश-कंटकों से भरा मालूम होता है सुरक्षित वाटिका के समान सुखदायक हो जायेगा। और हमारा यह जीवन जो आज भार स्वरूप अनुभव होता है आनन्दों का केन्द्र बन जायेगा।

मनुष्य आनन्द स्वरूप है, कष्ट-क्लेशों से इसका कोई सम्बन्ध नहीं है। दुःखों का मुख्य कारण आत्म विस्मरण ही है। अपने सत्य स्वरूप का बार-बार स्मरण करिये और इस सत्य का निरन्तर मनन करते रहिये- ‘‘अनन्त चैतन्य, निरामय, तत्व स्वरूप परमात्मा तथा मेरे जीवन में एकता है। वह परमात्मा ही मेरे जीवन का जीवन है। मैं उसी की तरह चैतन्य स्वरूप हूँ, मेरी प्रकृति दिव्य है, उसमें किसी विकार के लिये स्थान नहीं है। जो रोग-शोक तथा कष्ट, क्लेश अनुभव होते हैं वह सब देहाभिमान के कारण ही यह अभिमान किया है जिसे मैं त्याग रहा हूँ और अपने हृदय का द्वार उस अनन्त सत्ता की ओर खोलता हूँ जिससे उसकी प्रेमधारा मेरे जीवन में भरकर छलक उठे। सारे प्राणी, सारे जीव मेरे अपने बन्धु हैं। मेरा प्रेम उन सबको प्राप्त हो और सभी उसी प्रकार सुखी, निःस्वार्थी तथा निरामय बन जायें जिस प्रकार मैं बन रहा हूँ, -आपको आत्म-साक्षात्कार होगा, आपको अपना सत्य स्वरूप स्मरण होगा और तभी आप जीवन में क्षण-क्षण पर उस आनन्द का अनुभव करने लगेंगे जो वाँछनीय है और जीवन का परम लक्ष्य।


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परमात्मदेव को जानने पर सारे बन्धन कट जाते हैं, क्लेशों के क्षीण होने पर जन्म और मृत्यु से छुटकारा मिल जाता है। -श्वेताश्वतर


उपासना- अन्तःकरण की गहराई से

मानव जीवन के लाभों में सबसे बड़ा लाभ यह है कि उसे परमात्मा का ज्ञान प्राप्त हुआ है। वह इस मानव योनि में ही आकर यह जान सका है कि इस निखिल ब्राह्मण को धारण तथा संचालन करने वाली एक सत्ता है, जिसे परमात्मा नाम से अभिज्ञात किया जाता है और हमारा उससे निकट का सम्बन्ध है। सम्बन्ध ही क्यों कहना चाहिये कि हम उसके ही एक रूप हैं। उसी की शक्तियों और उसी की विशेषताएं मानवता के रूप में हममें काम कर रही हैं।

मानव के अतिरिक्त संसार में और भी असंख्यों जीव तथा प्राणी हैं। पर उनमें से किसी को भी परमात्मा का ज्ञान नहीं है। परमात्मा का ज्ञान तो दूर वे अपनी आस-पास की प्रकृति के सम्बन्ध में भी सत्त नहीं होते। विवेक, जिसके आधार पर परमात्मा को जाना गया है और आगे भी जाना जायेगा, मनुष्येत्तर प्राणियों में नहीं होता। यह सौभाग्य एकमात्र मनुष्य को ही प्राप्त हो सका है। क्योंकि यह प्राणियों की सर्वोच्चकोटि है। चौरासी लाख गण्य योनियों के भटकने और ठोकर पाने के बाद हम मनुष्यों को यह सर्वोच्चकोटि प्राप्त हुई है।

इस सर्वोच्चकोटि मिलने का भी एक रहस्य है। वह यह कि यह जीवन एक ऐसा अवसर है जिसका सदुपयोग करके मनुष्य अपने आदि स्त्रोत परमात्मा को पा सकता है, उसमें तद्रूप हो सकता है, उसमें लीन हो सकता है और तब उसके बाद यह जीवन-मरण की यात्रा समाप्त हो जायेगी। यदि हम मनुष्य इसी जन्म में अपनी साधना और सत्कर्मों द्वारा उस परमात्मा को पाने का प्रयत्न प्रारम्भ नहीं कर देते तो निश्चय ही हमको न जाने कौन-सी आदि योनि में चौरासी लाख की यात्रा पूरी करने के लिये जाना होगा और न जाने उसे पूरा करने में कितने युगों तक अधमता की यातना सहना पड़े। हाँ यदि हम अपने इस जीवन में परमात्मा को प्राप्त करने का उपाय शुरू कर दें तो यदि इस जीवन में उसको न भी पा सकें तो भी यह क्रम आगे भी चलता रहेगा और अपना प्रयत्न आगे बढ़ाने के लिये हमें पुनः मनुष्य योनि ही प्राप्त होगी। इस प्रकार एक नहीं अनेक जन्मों के प्रयत्न से हम एक दिन परमपिता परमात्मा को प्राप्त कर ही लेंगे। किन्तु यदि प्रारम्भ न किया गया तो लक्ष्य ही प्राप्ति सर्वदा असम्भव बनी रहेगी।

परमात्मा की प्राप्ति के उपायों में एक सबसे सरल और सुबोध उपाय है- उपासना। यदि नित्य-प्रति मनुष्य थोड़ी बहुत उपासना करता चले तो संसार के सारे काम करते हुये भी लक्ष्य की ओर उसकी यात्रा होती रहे। और जिस प्रकार बूँद-बूँद करके घट भर जाता है, एक-एक गिनकर सौ तक पहुँच जाते हैं और कदम-कदम चल कर कोस पूरा कर लेते हैं उसी प्रकार उपासना द्वारा दिन-दिन रेंगते हुये भी हम जन्म-जन्मान्तरों में से किसी भी चाल से अपने लक्ष्य परमात्मा को प्राप्त कर लेंगे।

उपासना का कोई एक ही प्रकार निश्चित नहीं है। यह बहुत प्रकार से हो सकती है। जैसे विधि-विधान पूर्वक कर्मकाण्ड करना, समस्त आडम्बरों सहित पूजा करना। वेदों, पुराणों तथा शास्त्रों का पारायण करना, भजन-कीर्तन और प्रार्थना करना। योग, ध्यान और जाप करना। संतों, ज्ञानियों तथा महात्माओं का सत्संग करना -इस प्रकार त्याग, तपस्या आदि न जाने उपासना के कितने प्रकार एवं स्वरूप हैं। यदि करना चाहें तो साराँश में यों भी कह सकते हैं कि वे सारी शारीरिक, मानसिक तथा वाचिक क्रियाएं उपासना ही है जिनका विषय अध्यात्म अथवा परमात्मा है। इसी प्रकार सत्कर्म, समाज-सेवा, आत्म-सुधार, सृजन तथा अनुशासन, शिष्टाचार आदि सारे काम तथा भाव उपासना के अंतर्गत आते हैं। स्वार्थ के अतिरिक्त जितना भी पारमार्थिक प्रसंग है वह सब उपासना के अंतर्गत ही आता है। अब इनमें से कोई भी अपनी सुविधा, सामर्थ्य तथा स्थिति के अनुसार चुना जा सकता है।

हम सभी जानते हैं कि परमात्मा एक देशीय न होकर सर्व व्यापक है। कोई भी स्थान उससे रिक्त नहीं है। वह हर समय हर स्थान पर विद्यमान रहता है। इसी प्रकार वह संसार की प्रत्येक वस्तु और प्रत्येक क्रिया में भी वर्तमान है और सदा सर्वदा रहेगा। संसार की गोचर-अगोचर कोई वस्तु, सूक्ष्म अथवा स्थूल, कोई भी व्यक्ति, कोई भी प्राणी ऐसा नहीं है जिसमें परमात्मा का निवास न हो। इसी प्रकार मनुष्य की अथवा प्रकृति की कोई भी गोचर अथवा अगोचर क्रिया ऐसी नहीं है जिसमें उस सर्वव्यापक और उस प्रेरक परमात्मा की साक्षी न होती हो। वह सब कहीं, सब बातों में, सब समय मौजूद रहता है। जिस प्रकार उपासना- क्रियाओं में परमात्मा का भाव और तदनुरूप पवित्रता रक्खी जाती है, यदि उसी प्रकार मनुष्य अपने जीवन की प्रत्येक अन्य क्रिया में भी वहीं भाव एवं पवित्रता रक्खे और जिस प्रकार अपनी पूजन सामग्री परमात्मा को समर्पित करता है उसी प्रकार अपने सर्वस्व में भी समर्पण का भाव रक्खे तो उसकी अणु-अणु क्रिया ही उपासना के रूप में बदल जाये और वह हर समय परमात्मा को सामीप्य अनुभव करता रहे। उसका समग्र जीवन ही उपासना रूप हो जाये। उसे अपना तथ्य पाने के लिये फिर न तो अलग से कोई क्रिया-कलाप करना पड़े और न जन्म-जन्मान्तर की प्रतीक्षा ही करना होगा। वह एक इस ही जीवन में परमात्मा को पाकर मुक्ति, मोक्ष अथवा निर्वाण की स्थिति में पहुँच जाये।

आज जब हमने जन्म-जन्मान्तर की यातना तथा साधना के बाद इस मानव-जीवन में आकर परमात्मा की सत्ता का ज्ञान पा लिया है और यह भी जान लिया है कि हम उसी परमात्मा के एक अंश हैं तो इससे बड़ी मूर्खता और क्या हो सकती है कि हम अपने उस सत्य स्वरूप को पाने का प्रयत्न न कर पुनः असंख्यों अधम योनियों में भटकने के लिये वापस चले जायें। उसे पागल के सिवाय और क्या कहा जा सकता है जो जिन कक्षाओं को उत्तीर्ण कर चुका है उन्हीं में वापस जाने की मति पैदा करे। उच्च पद से निम्न पद पर पतित हो जाने से बढ़कर जीवन की असफलता और क्या हो सकती है? पर यदि हम परमात्मा को पाने के लिये उपासना के उपाय में नहीं लगते तो निश्चय ही जीवन की इस असफलता की आशंका बनी हुई है।

हमारा प्रत्येक भाव, विचार, क्रिया और वस्तु उपासना का स्वरूप बन जाये- इस उच्च स्थिति को पाने तक हमारा पावन कर्त्तव्य है कि हम प्रतिदिन सच्चे और गहरे मन से परमात्मा की थोड़ी-थोड़ी उपासना तो करते ही चलें। यह थोड़ी-थोड़ी उपासना भी जब हमारे जीवन की अनिवार्य आवश्यकता बन कर हमें अपने अभाव में सताने लगेगी तब इसी उपासना में एक आनन्द, एक विह्वलता और एक कातरता का समावेश होने लगेगा। इस भाव सघन संक्षिप्त उपासना का प्रभाव तब हमारे दिन के एक लम्बे समय तक बना रहेगा और हम उतनी देर तक परमात्मा का सामीप्य अनुभव करते रहेंगे। इसी प्रकार यह संक्षिप्त उपासना ज्यों-ज्यों परिपक्व तथा आत्मसात् होती जायेगी त्यों-त्यों उसका प्रभाव विलम्बित एवं स्थायी होता जायेगा, और यदि उपासना में अपने हृदय की गहराई और ईमानदारी अधिकाधिक बढ़ाई जाती रहे तो जरा भी अभिभाव्य नहीं कि इसी संक्षिप्त उपासना द्वारा हम जल्दी ही उस कक्षा में जा पहुँचें, जहाँ पहुंच कर स्वयं अपने के साथ सारा संसार परमात्मामय और परमात्मा संसारमय गोचर होने लगता है। और अपनी क्रिया-प्रक्रिया, भाव, विचार और श्वास-श्वाँस तक परमात्मा रूप अनुभव होने लगती है।


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ज्ञान-विज्ञान ही नहीं विवेक भी

ज्ञान भी अच्छा हैं और विज्ञान भी- यदि उनका उपयोग बुद्धि और विवेक के साथ भलाई के लिये किया जाये। ज्ञान और विज्ञान दोनों किसी काम के नहीं हैं यदि उनके ऊपर से बुद्धि और विवेक का नियन्त्रण हटा लिया जाये। मनुष्य जब तक ज्ञान-विज्ञान के साथ विवेक का विकास नहीं करता, सुखी नहीं रह सकता। -बर्ट्रेंड रसेल


आत्म-ज्ञान बिना कल्याण नहीं

प्रायः लोग ज्ञान का तात्पर्य भौतिक शिक्षा समझते हैं। जो जितना पढ़ा-लिखा है, जिसे संसार की जितनी अधिक वस्तुओं और बातों की जानकारी है उसे उतना ही अधिक ज्ञानी मान लेते हैं। भौतिक ज्ञान की आवश्यकता भी कम नहीं है। इसके बिना भी काम रुकता है। खाना, कमाना, रहना-सहना, परिवार का पालन-पोषण, कार-रोजगार, व्यवस्था-प्रबन्ध आदि सारी बातें जीवन में निताँत आवश्यक हैं। इनके लिए साँसारिक ज्ञान की आवश्यकता है। जो जितनी मात्रा में इस दिशा में अनभिज्ञ है वह उतनी मात्रा में उन्नति और प्रगति से वंचित रह जाता है।

किन्तु, वास्तविक ज्ञान इस ज्ञान से भिन्न है। उसका क्षेत्र आत्मा है। उसे आध्यात्मिक अथवा आत्मिक ज्ञान कहते हैं। भौतिक ज्ञान और आध्यात्मिक ज्ञान में मूल अन्तर यह है कि भौतिक ज्ञान लौकिक साधनों का आधार तो बन जाता है किन्तु उन साधनों के उद्देश्य, सुख-शान्ति का संवाहक नहीं बन पाता। सब कुछ होने पर यदि सुख-शान्ति नहीं मिलती तो वह सब कुछ भी कुछ नहीं माना जाएगा। सच्ची सुख-शान्ति की उपलब्धि मात्र लौकिक ज्ञान से नहीं मिल सकती उसके लिये आध्यात्मिक ज्ञान की अपेक्षा है।

सच्ची सुख-शान्ति का स्त्रोत भौतिक साधन नहीं है। उसका स्त्रोत गुण, कर्म, स्वभाव की उच्चता है। सारे संसार का ज्ञान होने पर भी यदि हम अपने गुण, कर्म, स्वभाव को उन्नत और निष्पाप न बना सके तो यही मानना होगा अभी हम ज्ञान के प्रकाश से रहित और अज्ञान के अंधकार से ग्रसित हैं। जिस क्षण से हमें कुविचारों और दुष्कर्मों से घृणा और सन्मार्ग पर चलने की प्रवृत्ति होने लगे, समझना चाहिए हम ज्ञान की किरणों के संपर्क में आने लगे हैं।

इस प्रकार सच्चा ज्ञान आत्म-चिन्तन से ही प्राप्त हो सकता है। आत्म-चिन्तन में तल्लीन व्यक्ति को बुद्धि स्थिर हो जाती है। शुभाशुभ कर्मों से उत्पन्न होने वाला हर्ष-शोक, विक्षोभ, प्रसन्नता आदि असन्तुलन उसे प्रभावित नहीं करने पाते। वह हर्ष-शोक, अनुकूलता-प्रतिकूलता दोनों, स्थितियों में समान बना स्थित रहता है। इस निरपेक्ष समानता में जो आनन्द है वही सच्चा आनन्द है। इसी को आध्यात्मिक आनन्द कहा जाता है।

आत्म-चिन्तन से उत्पन्न यही आनन्ददायक ज्ञान जीवन का सर्वोपरि तत्त्व और सर्वोच्च उपलब्धि है। इसकी प्राप्ति के पश्चात फिर कुछ पाने न पाने का महत्व नहीं रह जाता। मनुष्य संसार में जीवन साधनों के लिये प्रयत्न करता है। वह उन्हें पा भी सकता है और बहुत बार उसे अपने उस प्रयत्न में असफलता भी हो सकती है। अनेक बार पर्याप्त साधनों का अधिकारी बन सकता है तो अनेक बार उस अपर्याप्त साधनों तक ही रह जाना पड़ता है। भौतिक क्षेत्र में यह अनिश्चित स्थिति दुःख का कारण बनने के सिवाय और कुछ नहीं बनती। यदि मनुष्य आत्म-चिन्तन द्वारा ज्ञान को प्राप्त कर लेता है तो, पहले से ही पास में आनन्द की निधि होने से उस पर इस स्थिति का प्रभाव नहीं पड़ता है। भरे पात्र में और भरना अथवा उसमें कुछ न आना एक ही बात है। कुछ डाला जाएगा तो भी अन्तर न आएगा और कुछ न डाला जाए तब भी भरे का भरा ही है। इसी प्रकार आत्म-ज्ञानी जो स्वयं अपनी आत्मा में संतुष्ट है सुख-साधनों की बहुतायत अथवा अल्पता से प्रभावित नहीं होता।

सच्चा ज्ञान मनुष्य को केवल आत्म-लीन ही नहीं बनाता बल्कि उसे व्यवहारिक जीवन में बड़ा ही शुभ और सुन्दर भी बना देता है। अशुभाचरण का दोष तो मनुष्य में तभी आता है जब उसका जीवन विक्षेपों से प्रभावित होता है। जब वह असन्तुष्ट, अशान्त, सद्वेष और संकीर्णता से ग्रसित होता है। काम, क्रोध, मद, लोभ आदि विकारों के वशीभूत होता है तभी उसके व्यवहार के स्तर और सन्तुलन में विकृति आती है। प्रसन्न तथा स्निग्ध मनःस्थिति में विक्षोभ का प्रश्न ही नहीं। अस्तु उसका व्यवहार भी स्निग्ध तथा सौम्य होता है। जो स्वतः प्रसन्न है, आत्मानन्दित है उसका व्यवहार भी प्रसन्नताजनक तथा आनन्ददायक होगा।

मनुष्य की इस स्थिति को यदि स्वर्गीय स्थिति कहा लिया जाए तो अत्युक्ति न होगी। क्योंकि स्वर्ग और नरक कहीं कोई अलग से बसे अथवा बने स्थान नहीं हैं। वह मनुष्य की अपनी आन्तरिक स्थिति ही है जो दुःख दायिनी होकर स्वर्ग-नरक की संज्ञा पाती है। अज्ञानी मनुष्य जहाँ इसी संसार में रहता हुआ नरक भोगता है, वहाँ ज्ञानी मनुष्य इसी संसार में रहता हुआ स्वर्ग में निवास करता है। ज्ञान और अज्ञान के रूप में हर मनुष्य अपने साथ स्वर्ग अथवा नरक लिए फिरता है।

ज्ञान संसार की सर्वश्रेष्ठ संपत्ति है। संसार का समस्त वैभव होने पर भी मनुष्य निर्धन ही है यदि ज्ञान रूपी धन का संचय करने में उसने प्रमाद किया है। क्योंकि संसार की सारी विभूतियाँ, सारी संपत्तियां और सारे वैभव नश्वर हैं। वे आज हैं तो कल नष्ट हो सकते हैं। नित्य प्रति संसार के बड़े-बड़े संपत्तिवान जब तब निर्धन होते देखे जा सकते हैं। किन्तु ज्ञान की संपत्ति अविनश्वर होती है। उसको न तो कोई लूट सकता है, न चुरा सकता है और न वह स्वयं ही क्षरणशील होती है। ज्ञान-धन हर स्थिति में मनुष्य के पास बना रहता है। उसके क्षय होने का प्रश्न ही नहीं बल्कि वह तो दिन-दिन विकास पाने वाला तत्व है। इसके अतिरिक्त सारी सम्पत्तियों में एक शक्ति मानी गई है। लौकिक संपदाओं में भी एक शक्ति होती है। पर होती उसी की तरह क्षयशील। वह बनी ही रहे अथवा काम आती ही रहे यह निश्चित नहीं। संपत्ति के साथ वह नष्ट भी हो जाती है। किन्तु ज्ञान की शक्ति अक्षय, अनन्त और अमोघ होती है। न तो उसमें क्षयमानता का दोष होता है और न क्षरणशीलता का। सर्वश्रेष्ठता के कारण इसकी तुलना में अन्य कोई शक्ति न तो खड़ी हो सकती है और न ठहर सकती है। ज्ञान शक्ति के उदय होने पर अन्य सारी शक्तियाँ निष्प्रभ हो जाती हैं। ज्ञान की शक्ति मनुष्य को सहज ही सारे द्वन्द्वों तथा विघ्नों से पार निकाल देती है। और हर समय, हर स्थिति और हर स्थान में मनुष्य के पास बनी रहती है।

वेद भगवान ने अपने अनुयायियों को प्रेरणा देते हुए कहा है- ‘‘आरोह तमसो ज्योतिः’’ -अन्धकार से निकल कर प्रकाश की ओर बढ़ो।

वेद भगवान ने अन्धकार से निकल कर जिस प्रकाश की ओर बढ़ने की प्रेरणा दी है, वह प्रकाश क्या है? निश्चय ही वह प्रकाश ज्ञान है। जो मनुष्य प्रयत्नपूर्वक ज्ञान की प्राप्ति कर लेता है उसकी आत्मा प्रकाशित हो उठती है, वह अपने को पहचान जाता है उसके सारे दुःख द्वन्द्व और शोक-संताप नष्ट हो जाते हैं। उसे सत्य रूप परमात्मा के दर्शन होते हैं। उसका जीवन सफल तथा सार्थक हो जाता है।

इसी प्रेरणा में जो अन्धकार शब्द प्रयोग किया गया है वह अज्ञान के लिए ही है। अज्ञान सारे दुःखों का मूल है। अज्ञानी को बुद्धि-अन्ध को पग-पग पर ठोकर खानी पड़ती है। उसे अपने कर्त्तव्याकर्त्तव्य का सही ज्ञान नहीं हो पाता और जिस ओर भी पग बढ़ता है उसे असफलता और निराशा का ही सामना करना पड़ता है, जिससे उसके जीवन की सारी सुख-शान्ति नष्ट हो जाती है। अज्ञान मनुष्य जीवन का शत्रु माना गया है। जीवन की समस्त विकृतियों, अनुभव होने वाले दुःखों, उलझनों तथा क्षोभ-विक्षोभों का प्रमुख कारण मनुष्य का अपना अज्ञान ही है। अज्ञान मनुष्य के वास्तविक स्वरूप और उसके सारे जीवन को ही कुरूप तथा कलुषित बना देता है। इसी लिए वेद भगवान ने अन्धकार से प्रकाश की ओर अर्थात् अज्ञान से ज्ञान की ओर बढ़ने की प्रेरणा दी है।

आत्म-ज्ञान ही सच्चा ज्ञान है। अन्य सारे सद्ज्ञान तो उस आत्म-ज्ञान की ओर बढ़ने के साधन मात्र हैं। आत्म-ज्ञान हो जाने पर मनुष्य को अन्य ज्ञानों की आवश्यकता नहीं रहती। ज्ञान की परिसमाप्ति आत्म-ज्ञान में ही है। आत्म-ज्ञान क्या होता है इसके समझने में छान्दोग्य उपनिषद् का यह उपाख्यान बहुत कुछ सहायक हो सकता है।

एक बार इन्द्र और विरोचन को यह जिज्ञासा उत्पन्न हुई कि “मैं क्या हूँ।” उन्होंने अपने इस प्रश्न पर बहुत कुछ सोचा, आपस में विचार विमर्श किया किन्तु वे इसका उत्तर निश्चित रूप से नहीं पा सके। उनकी जिज्ञासा बढ़ती ही गई। अन्त में समाधान के लिए वे प्रजापति ब्रह्म के पास गए और विनीत भाव से बोले- ‘पितामह हम दोनों में सहसा यह जिज्ञासा पैदा हो गई कि आखिर हम हैं क्या? हमने बहुत कुछ विचार किया किन्तु अपनी इस जिज्ञासा का उत्तर न पा सके। कृपापूर्वक बताएं के हम क्या हैं।”

प्रजापति बड़े प्रसन्न हुए। बोले, “बच्चो यह बड़ी कल्याणकारी जिज्ञासा है। सहज ही सब को नहीं होती। जिसमें यह जानने की जिज्ञासा जाग जाए समझना चाहिए कि उसके भाग्य उदय हो रहे हैं। लेकिन इसका उत्तर सहज नहीं है। और यदि उत्तर दिया भी जाए तो उसका समझ सकना कठिन है। यह अनुभव की बात है। इसलिये मैं तुम्हें उत्तर देने से पूर्व एक बात बतलाता हूँ। उसे करो। हो सकता है उससे तुम्हें पता चल जाए कि तुम क्या हो?’’

जिज्ञासुओं ने प्रार्थना की और पितामह ने बतलाया- “एक बड़े से पात्र में साफ पानी भर कर रखो और जब वह स्थिर हो जाए तब उसमें अपना-अपना मुँह देखो। कदाचित् तुम्हें अपने प्रश्न का उत्तर मिल जाए।’’

इन्द्र और विरोचन ने वैसा ही किया। उन्होंने एक साफ थाल में स्वच्छ जल भरा और आप सज-धज कर आए और पानी में झाँक कर अपना प्रतिबिम्ब देखने लगे। पहले विरोचन ने देखा। अपना सुन्दर और संराधित स्वरूप देखकर वह खुशी से उछल पड़ा। बोला, “देवराज! मैं तो जान गया कि में क्या हूँ? मैं एक युवा, तरुण और सुन्दर पुरुष हूँ।” इन्द्र ने कहा- “भाई जब तुम्हें अपना ज्ञान हो गया तो फिर ठीक है, जाओ आनन्द करो।” विरोचन सन्तुष्ट होकर चला गया। उसकी जिज्ञासा सन्तुष्ट नहीं नष्ट हो गई।

इन्द्र ने भी जल में झाँक कर अपना स्वरूप देखा। विरोचन से भी अधिक सुन्दर, स्वस्थ और तेजस्वी। लेकिन उसको अपने प्रतिबिम्ब से जरा भी सन्तोष न हुआ। वह ब्रह्मा के पास गया और बोला- “भगवन मैंने जल में देखा तो उसमें शरीर की प्रतिच्छाया के सिवाय और कुछ भी नहीं दीखा।”

पितामह ने कहा- ‘‘क्यों क्या विरोचन की तरह तुम्हें अपने प्रतिबिम्ब पर आत्म-ज्ञान का सन्तोष नहीं हुआ?” इन्द्र ने निवेदन किया-नहीं भगवन्! मैंने जो कुछ देखा वह तो आँख, नाक, कान और आभूषण-वस्त्रों का प्रतिबिम्ब था। मुझे तो इससे भिन्न कुछ और होना चाहिए। आज मैं स्वस्थ हूँ, सुन्दर दीखता हूँ। अलंकारों के कारण ही जो अवयव आकर्षक दीखते हैं, यदि अलंकार उतार दिए जाएँ तो वे सब कुरूप दीखने लगेंगे। उनकी शोभा जाती रहेगी। जो वस्त्र स्वयं सुन्दर दीखते और शरीर को सुन्दर दीखने में सहायक हो रहे हैं वे आज फट जाएं तो न तो उनकी सुन्दरता है और न उपयोगिता ही। शरीर अस्वस्थ हो जाए, काना, कुबड़ा, लूला-लंगड़ा हो जाए तब तो उसका सुन्दर लगना तो क्या देखा भी न जाए। ऐसे नश्वर और परिवर्तनशील शरीर को मैं अपना सत्य स्वरूप किस प्रकार मान सकता हूँ?”

इस संक्षिप्त उपाख्यान का भाव बतलाता है कि जो व्यक्ति शरीर को अपना स्वरूप मान लेते हैं वे भूल करते हैं। शरीर नित्य-प्रति नष्ट होता रहता है और एक दिन पूर्णतया नष्ट हो जाता है। किंतु इस स्थिति में भी ‘मैं’ का अस्तित्व बना रहता है। मैं अर्थात् आत्मा, अविनश्वर और अपरिवर्तनशील तत्व है। वह शरीर से परे अविनाशी तत्व जब मनुष्य के ज्ञान क्षेत्र में प्रकाशित हो उठता है तभी मनुष्य को अपना ज्ञान होता है। शरीर के सारे धर्म निभाते हुए सबको उस आत्म-तत्व का ज्ञान करने का प्रयास करते ही रहना चाहिए। क्योंकि वही सर्वोपरि और सर्वोत्कृष्ट सच्चा ज्ञान है। उसे पा लेने के बाद न तो कुछ पाने के लिए रह जाता है और न कुछ जानना शेष। उसे जानते ही मनुष्य शुद्ध, बुद्ध और सर्वज्ञ हो जाता है। सारे सुख और सारे आनंद सहज ही उसके वशीभूत हो जाते हैं।


Quotation

नित्य चैतन्य रूप आत्मा न उत्पन्न होता है न मरता है, न यह किसी से हुआ है और न इससे कोई हुआ है- अर्थात् इसका कारण या कार्य नहीं है। यह अजन्मा है, नित्य है, शाश्वत है और पुराण है, शरीर के मारे जाने पर भी यह मरता नहीं है। -कठोपनिषद्


समस्त शक्तियों का भंडार- हमारा मन

हमारा मन एक उपजाऊ खेत है, जिससे जो वस्तु चाहो सीधे रास्ते से पैदा कर सकते हो। जो इसका उचित उपयोग करेगा वह लाभ पायेगा। जैसा बोएगा वैसा काटेगा।

किन्तु मन की यह क्षेत्रता प्राकृतिक नहीं है। इसे बनाना पड़ता है। जिस प्रकार उर्वरता का गुण होने पर भी हर भूमि में खेती नहीं होती, उसे खेत का रूप देने के लिए उपाय करने पड़ते हैं। उसी प्रकार मन में भी क्षेत्रता उत्पन्न करती है। तभी वह मनोवाँछित फल प्रदान करता है। अन्यथा अनिर्मित मन भी वन-भूमि की तरह ही घास-पात, कुश-कंटक और अनुपयोगी वनस्पति ही पैदा करता रहता है।

मन का निर्माण है- उसका परिमार्जन और उसकी उर्वरता है एकाग्रता। मन को एकाग्र-स्थिति में लाए बिना उसकी शक्तियों का लाभ नहीं उठाया जा सकता।

जीवन में किसी भी सफलता का समावेश करने के लिए मानसिक शक्तियों का अपरिहार्य महत्व है। प्राप्तियों, उपलब्धियों और सफलताओं का आधार है मनुष्य की क्रियाशीलता और इस क्रियाशीलता का सारा संचालन मन द्वारा ही होता है। जितना अधिक मानसिक शक्तियों का सहयोग मिलता जाएगा क्रियाशीलता उतनी ही तीव्र, प्रखर होती जाएगी। मन की शक्ति एकाग्रता में सन्निहित है। जीवन-विकास के लिए एकाग्रता की साधना करते ही रहना चाहिए। मनुष्य का एकाग्र मन उसकी उन्नति का एक मात्र आधार माना गया है। जो मनुष्य अपने मन को एकाग्र कर लेता है, वह किसी भी कार्य में उसकी सारी शक्तियों का एक साथ प्रयोग कर सकता है। जिस प्रकार एक आतशी शीशा सूर्य की किरणों को एकाग्र कर किसी को जला देने की शक्ति संपादित कर लेता है उसी प्रकार एकाग्र मन अपनी एकत्र शक्तियों द्वारा कोई भी प्रयोजन सिद्ध कर सकता है।

आज तक संसार में जितने व्यक्ति भी उन्नति के शिखर पर चढ़ सकने में सफल हो चुके हैं, उनमें से कोई भी ऐसा नहीं है जो सहसा ही उस स्थिति पर पहुँच गया हो। उन्नति कोई आकस्मिक घटना नहीं है। वह क्रमिक विकास और प्रगति की अविरल प्रक्रिया का परिणाम है। जिसको एकाग्रता पूर्वक ही पूरा किया जा सकता है। चंचल मन और बिखरी वृत्तियों द्वारा उसका पूरा कर सकना संभव नहीं। मानसिक चंचलता मनुष्य की सारी क्षमताएँ बिखेर कर उन्हें निर्बल एवं निरर्थक बना देती है।

मन को किसी एक निश्चित लक्ष्य पर केन्द्रित करना ही उसकी एकाग्रता है। सूर्य की किरणों में बड़ी भयानक आग होती है। किन्तु सारे संसार पर फैली होकर भी वे किसी चीज को गरम तो कर देती है पर जला नहीं पाती। इसका कारण यही है कि वे सूर्य की अग्नि का थोड़ा-थोड़ा अंश लेकर अलग-अलग छितरी रहती हैं। किंतु जब ये किसी उपाय द्वारा एकाग्र करके प्रयोग की जाती हैं, तो तुरन्त ही भयानक अग्नि का रूप धारण कर लेती हैं। वैज्ञानिकों का कथन है कि यदि किसी उपाय से सूर्य की बिखरी किरणों को किसी साधन द्वारा एक स्थान पर एकत्र कर उनको जिस दिशा में भी संधान कर दिया जाए तो वे उस दिशा की सारी वस्तुओं का खाक बना सकती हैं। किन्हीं शक्तियों का एकत्रीकरण ही उनकी एकाग्रता है जिसके सिवाय कोई भी प्रयोजन सिद्ध किया जा सकता है।

यह बात सही है कि मन स्वभावतः बड़ा ही चंचल और प्रमयनशील होता है। कठिनता से वशीभूत है। तथापि इसको एकाग्र करना असंभव कदापि नहीं। कतिपय उपायों द्वारा इसे वश में करके एकाग्र बनाया जा सकता है। इसका सरल-सा उपाय यह है कि इसको बहुमुखी न रखकर एकमुखी बनाया जाए। मनुष्य अपने मन को संसार की न जाने कितनी छोटी-मोटी बातों में उलझाए रहता है। उनमें से अधिकाँश बातें ऐसी ही होती हैं, जिनसे न तो कोई प्रयोजन होता है और न उनका जीवन के लिए उपयोग। मनुष्य को चाहिए कि वह संसार की तमाम निरर्थक और निरुपयोगी बातों को छोड़ कर अपने मन को किसी एक निश्चित लक्ष्य, प्रयोजन अथवा ध्येय में लगाए। मन एक ही होता है। वह किसी एक ही प्रयोजन में पूरी तरह लगाया जा सकता है। वह एक बार में एक ही काम कर सकता है। जिस एक काम पर मन को संपूर्ण रूप से नियोजित रखा जाएगा, वह कार्य निश्चित रूप से सफल होगा, इसमें जरा भी सन्देह नहीं।

एकाग्रता सिद्ध करने का सबसे अच्छा उपाय यही है कि अपने मन को संसार की ऐसी बातों से दूर रखा जाए जिससे बेकार की उलझन और समस्यायें पैदा हों। उसे केवल ऐसी बातों और विचारों तक ही सीमित रखा जाए जिनसे अपने निश्चित लक्ष्य का सीधा सम्बन्ध हो। प्रायः लोगों का स्वभाव होता है कि वे घर, परिवार, मुहल्ले, समाज, देश, राष्ट्र आदि की उन बातों में अपने को व्यस्त बनाए रहते हैं जिनसे उनके मुख्य प्रयोजन का कोई सरोकार नहीं होता। इस स्वभाव का जन्म निरर्थक उत्सुकता द्वारा ही होता है।

इस निरर्थक उत्सुक-वृत्ति से बचने के लिए मनुष्य को चाहिए कि वह अपनी विचारधारा को विश्रृंखल अथवा विशीर्ण न होने दे। सारी विचार-धारा अपने ध्येय के चिन्तन में ही लगाना चाहिए। जो लोग अपने ध्येय से अलग अपनी विचारधारा को बहनें देते हैं उनका मन अस्त-व्यस्त चंचल ही बना रहता है। वह छिन्न-भिन्न होकर यहाँ-वहाँ भटकता रहता है जिससे उसकी वह शक्ति विकसित नहीं हो पाती जो जीवन की सफलता के लिए आवश्यक होती है।

विचारधारा का प्रकार संगति और साहित्य से निर्मित होता है। आदमी जिस तरह के लोगों के साथ रहता है और जिस प्रकार का साहित्य पढ़ता है उसकी विचारधारा उसी तरह हो जाती है। बातून, वाचाल और गप्पी लोगों का संग करने वाले भी बहुधा उसी प्रकार के हो जाते हैं। जासूसी कहानियाँ, उपन्यास अथवा कामोत्तेजक साहित्य पढ़ने वाले लोगों का मन एकाग्र नहीं हो पाता। बहुत से लोग अखबारों में छपने वाले सनसनीखेज और विचित्र समाचारों को पढ़ने में ही रुचि लेते हैं। ऐसे लोग भी अपना मन एकाग्र करने में सफल नहीं हो सकते। मन की एकाग्रता के लिए गम्भीर, शालीन और उच्च-कोटि के लोगों का ही साथ करना चाहिए और वैसा ही साहित्य पढ़ना चाहिए। सस्ता साहित्य और सस्ती संगति मनुष्य को स्वभावतः चंचल और हल्का बना देती है। जो विचार अथवा कार्य मन में उद्वेग या हलचल पैदा करने वाले होते हैं उनसे एकाग्रता के उद्देश्य को हानि पहुँचती है।

मन की एकाग्रता का दूसरा अर्थ है विचारों की एकाग्रता। विचार व्यर्थ की चीज नहीं हैं। बहुत से लोग इस बात की चिंता नहीं करते कि उनके मन-मस्तिष्क में किस प्रकार के विचार आते-जाते रहते हैं। गन्दे और निरुपयोगी विचार आने पर भी वे उनमें तृण की तरह बहते रहते हैं। वे नहीं समझ पाते हैं कि इससे उन्हें क्या और कितनी हानि होती है? विचार एक शक्ति है, अमोघ शक्ति। वे मनुष्य के सम्पूर्ण जीवन पर अपना स्थायी प्रभाव डालते हैं अपने अनुरूप उसे हानि-लाभ की ओर ले जाया करते हैं।

जिनका मन-मस्तिष्क उत्साह और आशा पूर्ण विचारधारा से परिचित रहता है, जिनके विचार ऊँचे और डडडड होते हैं, जो सदैव आगे बढ़ने, ऊंचे उठने और जीवन डडडड कोई बड़ा काम करने की बात ही सोचते रहते हैं निश्चय ही वे एक दिन अपने इस उद्देश्य में सफल हो जाते हैं। जिस प्रकार निरर्थक, निरुद्देश्य और विविधतापूर्ण विचार मनुष्य को चंचल और उसके मन की शक्तियों को छिन्न-भिन्न कर देते हैं उसी प्रकार उसके ऊँचे, उद्देश्यपूर्ण व आदर्शवादी विचार उसमें गम्भीरता और एकाग्रता युक्त कर देते हैं। विद्वान् मनोवेत्ता सोलोमन ने एक स्थान पर लिखा है- मनुष्य चुपचाप मन में जैसे विचार लिए फिरता है वैसा ही वह बन जाता है, परन्तु बड़ी-बड़ी बातें कहते रहने से कुछ नहीं होता। हमारे कथन में हमारे डडडड का सत्य होना चाहिए। जिन विचारों में पूरी सच्चाई, दृढ़ता और आस्था होगी, उन्हीं विचारों के पीछे सृजन शक्ति निवास करती है।

विचारों की उच्चता और गम्भीरता पर डडडड एकाग्रता की साधना का बहुत-सा रहस्य निर्भर है। सारे के सारे महापुरुष उच्च और गम्भीर विचार वाले होते रहे हैं। इसलिये उनमें चंचलता अथवा विश्रृंखला का दोष देखने को नहीं मिलता, गम्भीर विचारों की गहराई स्वयं ही मनुष्य को अपने में डुबाए रहती है। मनुष्य ज्यों-ज्यों विचारों की गहराई में डूबता जाता है स्वभावतः वह अधिकाधिक एकाग्र और एकनिष्ठ बनता जाता है। उसकी सारी बाह्य चंचलता, वाचालता और विविधता नष्ट हो जाती है। वह दिन-दिन गम्भीर, गुरुतापूर्ण और एकाग्र होता जाता है। लोगों से बेकार में मिलना-जुलना, बात करना और घूमना-फिरना उसके स्वभाव से निकल जाता है। वह तो सारे समय अपने लक्ष्य और तत्सम्बन्धी विचारधारा में ही तल्लीन बना रहता है। ऐसे लोगों की मानसिक शक्तियाँ प्रबुद्ध होकर उनका साथ देती चलती हैं। ओछे-हल्के और निरुद्देश्य विचारों वाले लोगों की मानसिक शक्तियाँ क्षय होती रहती हैं और बिना किसी सार्थकता के नष्ट हो जाती हैं।

जीवन में सफलता पाने के लिए मनुष्य का चिन्तक और विचारशील होना नितान्त आवश्यक है। किन्तु इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि चाहे जिस तरह के विचार आ जाएँ, उनका ही चिन्तन-मनन करते रहा जाए। अपने मन और मस्तिष्क में आने वाले विचारों को सम्पादित करते रहना चाहिए। मनुष्य के मस्तिष्क में नित्य ही हजारों विचार आते-जाते रहते हैं, किंतु वे सबके सब ही उपयोगी और सार्थक हों यह आवश्यक नहीं। मस्तिष्क में प्रतिक्षण आने वाले विचारों को देखते-परखते रहना चाहिए और जो विचार अपने उद्देश्य और प्रयोजन के लिए आवश्यक और उपयोगी दिखें उन्हें तो रहने दिया जाए और बाकी के सारे बेकार विचारों को निकाल कर फेंक देना चाहिए।

यद्यपि विचारों को रोकने और निकाल फेंकने में थोड़ी कठिनाई जरूर होती है तथापि थोड़े-से अभ्यास द्वारा यह सरल बनाया जा सकता है। कुछ समय सावधान तथा सक्रिय रहने के बाद मनुष्य का स्वभाव ही ऐसा बन जाएगा कि उसकी चिन्तनधारा में अनावश्यक विचार प्रवेश ही न करने पाएँगे। इस प्रकार जब मन में शुद्ध तथा सुन्दर विचार दृढ़ होने लगेंगे तो वे स्वयं भी अपने से विरोधी विचारों को अपने क्षेत्र में नहीं ठहरने देंगे। विचार विचारों को स्वयं भी बुलाते और भगाते रहते हैं।

जीवन की सफलता के लिए मानसिक एकाग्रता की नितान्त आवश्यकता है। इससे मानसिक शक्तियों का जागरण तथा परिवर्धन होता है। किन्तु इसकी सिद्धि सम्भव तभी है जब मनुष्य की विचारधारा शुद्ध प्रबुद्ध एवं उपयोगी हो। विचारों की यह विशेषता तभी प्राप्त होती है जब मनुष्य सच्चाई के साथ जीवन का कोई लक्ष्य लेकर चलता है। इस प्रकार सबसे पहले अपने जीवन का एक निश्चित लक्ष्य निर्धारित किया जाए। उसी के अनुरूप विचार, चिन्तन और मनन करत रहा जाए। इससे हृदय में एक गम्भीरता का समावेश होगा। बाहर की सारी चंचलताएँ और अन्दर की सारी चंचलताएँ नष्ट होती चलेंगी और तब मन में एकाग्रता का भाव आने लगेगा।

मन की एकाग्रता की उपलब्धि होते ही मनुष्य के अन्दर सोई सारी शक्तियाँ जाग उठेंगी जिनके बल पर वह असम्भव दिखने वाले कामों को भी सम्भव कर सकता है। बिखरे मन और विश्रृंखल शक्ति से संसार में कोई भी बड़ा काम नहीं किया जा सकता। अपनी शक्तियों का नियोजित उपयोग ही वह उपाय है जिससे किसी भी कार्य की सिद्धि प्राप्त की जाती है किन्तु इस उपाय का प्रयोग एकमात्र एकाग्र मन पर ही निर्भर है। अस्तु मनुष्य को अभ्यास अथवा साधना द्वारा मानसिक एकाग्रता प्राप्त करने का प्रयत्न करना चाहिए।


उल्लेखनीय सफलता

नदी में तेज बाढ़ आई। भयंकर शब्द करती हुई चली गई पीछे उसका कोई भी चिन्ह शेष न रहा।

फिर वर्षा ऋतु प्रारम्भ हुई। एक गड्ढे पर बूँदें ध्यान लगा कर गिरने लगीं। हर बूँद के साथ मिट्टी का एक कण टूट कर अलग हो जाता। बरसात समाप्त हुई तब वह गड्ढा एक विशाल तालाब बन चुका था।

जहाँ शक्ति का केन्द्रीकरण होता है, जहाँ मिलजुल कर सम्पन्न किये जाने वाले अनवरत प्रयत्न किए जाते हैं वहीं ऐसी उल्लेखनीय सफलता के दर्शन होते हैं।


उत्कृष्ट जीवन के चार चरण

“वदनं प्रसाद सदनं, सदय हृदयं सुधा मुचो वाचः। करणं परोपकरणं येषां केषां न ते वन्द्याः॥

-जिसका मुख प्रसन्नता का घर है, हृदय दयायुक्त है, वाणी अमृत-सी मधुर है तथा क्रिया परोपकारमयी है, वे किसके वन्दनीय नहीं होते। अर्थात् सबके वन्दनीय होते हैं।

इस नीति पद में चार ऐसे गुणों को बतलाया गया है जिनके आधार पर मनुष्य सबका वंदनीय, वाँछनीय और प्रिय बन जाता है। वे गुण है- प्रसन्नता, दयालुता, मधुर भाषण और परोपकार परायणता। इन गुणों पर गहराई से विचार करने पर पता चल जायेगा कि यह केवल नीति सूक्ति ही नहीं है, बल्कि एक मनोवैज्ञानिक तथ्य एवं सत्य है।

‘वदनं प्रसाद सदनं’- आशय है- मुख मंडल पर हर समय प्रसन्नता विराजमान रहनी चाहिए। खिले हुए फूलों, उदय होते चन्द्रमा और चमकते तारों को सभी ने देखा होगा। जो भी उन्हें देखता है उसका मन प्रसन्नता से भर जाता है। यह सारी सुन्दर वस्तुएँ बड़ी प्यारी और श्लाघ्य अनुभव होती हैं। मनुष्य का इनके प्रति सहज आकर्षण पैदा हो जाता है। इस श्लाघ्यता अथवा आकर्षण का क्या कारण है? चन्द्रमा, फूल और तारे अपनी पुनीत प्रसन्नता से नैसर्गिक रूप से वाँछनीय बन जाते हैं। यह उनका प्रकाश, प्रसाद और प्रसन्नता का गुण ही है जो मनुष्य को आकर्षित कर लेता है।

उसी प्रकार जिस मनुष्य का मुख मंडल प्रसन्नता से दमकता चमकता रहता है। स्मित अथवा हास की छटा बिखरती दिखती है वह सबको स्वभावतः प्यारा लगने लगता है। प्रसन्नता में बड़ा प्रभावशाली सौंदर्य होता है। इसके विपरीत जिनके मुख पर क्रोध, क्षोभ, विषाद अथवा संताप की मलीन छायी रहती है उनको उसी प्रकार पसन्द नहीं करते जिस प्रकार मुरझाए, फूल, अस्त होते चन्द्रमा और प्रभात के धुँधले तारों को पसन्द नहीं करते। तीनों चीजों वही हैं जिनको कुछ समय पूर्व देखकर सुख होता था, किन्तु अब अच्छा नहीं लगता, क्यों? बात यह होती है कि उन्होंने अपनी प्रसन्नता की विशेषता खोदी होती है।

हँसते-खेलते बच्चे के साथ बूढ़े तक घंटों खेलते रहते हैं। जो भी देखता है गोद में ले लेता है और बच्चे की तरफ ही प्रसन्न होकर उसे खिलाने और खेलने लगता है। बच्चा वही है किन्तु जब रोने लगता है तो कोई एक मिनट भी उसे गोद में रखने को तैयार नहीं होता। और यदि रखता भी है तो उसे लुभाने, बहलाने की व्यस्तता का अनुभव करने लगता है। बच्चे की अप्रसन्नता दूसरों को भी अप्रसन्न बना देती है।

और तो और लोग खेलते और प्रसन्न होते पशु-पक्षियों को देखने के लिए राह चलते रुक जाते हैं। जड़ और चेतन प्रकृति की प्रसन्नता का अवलोकन करने के लिए लोग भ्रमण और सैर-सपाटे के कार्यक्रम बनाते हैं। अधिकाधिक प्रसन्न प्रकृति को देखने के लिए लोग दुरूह स्थानों तक जाने में संकोच नहीं करते। प्रसन्न बछड़ों, मेमनों और कुत्तों तक से आदमी अपनी स्थिति भूल कर खेलने लगता है। प्रसन्नता में एक दैवी आनन्द होता है। बल्कि यों कहना चाहिए कि प्रसन्नता स्वयं ही एक दैवी आनन्द होती है। यह जिससे भी प्राप्त होता है मनुष्य उसकी ओर आकर्षित हो उठता है। मनोरंजन, विलास, प्रसायन, कला, कौशल, साहित्य और सृजन की सारी प्रक्रिया एक प्रसन्नता पाने के लिए ही होती है।

लोग खेल-तमाशों को क्यों पसन्द करते हैं? इसलिए कि उनसे प्रसन्नता प्राप्त होती है। प्रसन्नता से प्रसन्नता और विषाद से विषाद की प्रतिक्रिया होती है इसीलिये लोग प्रसन्न वदन व्यक्तियों को पसन्द करते हैं और विषादों लोगों को नापसन्द। उक्त नीति वाक्य में इसीलिये प्रसन्नता का उन गुणों में स्थान दिया गया है जिनसे मनुष्य सबका वन्दनीय अर्थात् आदरणीय, श्लाघ्य, अथवा प्रिय बन जाता है।

‘सदय हृदय’- आशय है- मनुष्य को दयावान होना चाहिए। ‘दया धर्म का मूल’ -अर्थात् दया सारे धर्मों का आधार है। कितनी ही उपासना, साधना और तपस्या क्यों न की जाए यदि हृदय में प्राणिमात्र के लिये दया नहीं है तो उसका कोई लाभ न होगा। उन सारी क्रियाओं से धर्म का उद्देश्य पूरा न होगा। इसके अतिरिक्त यदि हृदय में दया का निवास है, संवेदना, सहानुभूति और पर पीड़ा का अनुभाव है तो वह मनुष्य कोई भी धार्मिक क्रिया न करता हुआ भी पूरा धर्मात्मा है। जो धर्मात्मा है संसार में उसकी पूजा कौन न करेगा?

जिसके हृदय में दया का निवास होगा, जो दयावान होगा, वह किसी का दुख नहीं देख सकता। किसी की दुख-तकलीफ में देखकर उसका हृदय नवनीत की तरह द्रवित हो उठेगा। वह दूसरे की पीड़ा अपनी आत्मा में अनुभव करने लगेगा। दयावान व्यक्ति किसी को कष्ट में देखकर रह ही नहीं सकता। वह अनायास ही उसकी सेवा, सहायता के लिये दौड़ पड़ेगा। अपनी सामर्थ्य भर उसी सेवा, सहायता करेगा नहीं तो सहानुभूति, संवेदना, आत्मीयता, आश्वासन अथवा मोतियों जैसे मूल्यवान आँसुओं से उसके दुख में भागीदार बन जाएगा। ऐसे देवता पुरुष को कौन प्यार न करेगा, कौन उसकी वंदना न करना चाहेगा?

दया में अमृत का वास रहता है। यह जिसे मिलती है अथवा जिसे दी जाती है उन दोनों की आत्मा में आनंद की लहर आन्दोलित कर देती है। दयावान व्यक्ति को संसार में सब अपने स्वजन और आत्मीयजन मालूम होते हैं। सार संसार उसे अपना परिवार जैसा अनुभव होता है। वह न तो किसी का अनिष्ट करता है और न सोचता है। वह जब सोचता है तो सारे संसार का मंगल ही सोचता है। उसका न कोई शत्रु होता है और न विरोधी। ऐसे मित्र और हितैषी पुरुष का आदर, सम्मान होना स्वाभाविक ही है।

“सुधामुचो वाचः” -अर्थात् जिसकी वाणी मीठी हो। वाणी में क्रिया से भी अधिक प्रभाव होता है। ‘वशीकरण एक मन्त्र है परिहरि’ वचन कठोर’ -मीठी वाणी को साक्षात् वशीकरण मन्त्र माना गया है। जो व्यक्ति सबसे मीठी वाणी बोलते हैं, शिष्ट शब्दों का व्यवहार करते हैं, विनम्र शैली अपनाते हैं वे सारे संसार को अपने वश में कर लेते हैं। कहा गया है-

“कोयल का को देत है, कागा का सों लेत। मीठे वचन सुनाय के, जग वश में करि लेत॥”

जिस प्रकार कौआ काला और कुरूप होता है उसी प्रकार कोयल भी काली और कुरूप होती है। किन्तु कर्कश और कठोर वाणी के कारण लोग कौवे को नापसन्द करते हैं। यदि वह मुड़ेर अथवा छज्जे पर आकर काँव-काँव करने लगता है तो उसे ढेला मार कर लोग उड़ा देते हैं। लेकिन कोयल की मीठी कू-कू कान लगा कर सुना करते हैं। बहुत बार तो लोग उसकी बोली से मस्त होकर स्वयं भी उसके स्वर में स्वर मिलाने लगते हैं और उसे देखने के लिये पेड़ों में ताक-झाँक करने लगते हैं। काली और कुरूप होने पर भी बहुत बार लोग उसकी मीठी वाणी के लालच में उसे पाल तक लेते हैं। वाणी की मिठास एक वरदान के समान फलवती होती है।

मधुर भाषण करने वाले लोग जहाँ भी जाते हैं आदर पाते हैं। लोग उन्हें रोककर उनकी बात सुनना चाहते हैं। किसी भी मधुर वाणी और सुन्दर शब्द सुनकर लोगों को बड़ा सुख मिलता है। मधुर वाणी द्वारा शत्रु को वश में किया जा सकता है। बीन का मीठा स्वर सर्प जैसे विषैले और घातक जन्तु को भी विनीत एवं विनम्र बना देता है। संगीत की मिठास द्वारा पागल जानवरों और पागल आदमियों को भी ठीक होते देखा गया है।

वाणी देवी है। वह शारदा का रूप है। जब इसका ठीक-ठीक उपयोग किया जाता है तो हर ओर कल्याण ही कल्याण फैल जाता है। किन्तु अब असव्य, परुषता अथवा कर्कशता के दोष से इसका दुरुपयोग किया जाता है तो वही देवी रुष्ट होकर भयंकर बन जाती है जिससे विवादों, झगड़ों, संघर्षों, लड़ाइयों और अपराधों के रूप में डडडड खड़े होने लगते हैं। वाणी देवी है। जो इसे माधुर्य, शिष्टता और शालीनता द्वारा प्रसन्न कर लेता है उसमें चमत्कारी प्रभाव पैदा हो जाता है। उसको सब प्यार करने लगते हैं और उसके कथन का अनुसरण भी।

किन्तु वाणी का केवल मिष्ट और शिष्ट होना उसका अमृतत्व नहीं है। उसे सत्य, असंदिग्ध, उपयुक्त और सारपूर्ण भी होना चाहिए। मीठा तो ठग भी बोल लेते हैं और आडम्बरी, प्रपंची तथा विश्वासघाती भी। जिसमें सत्य और सार नहीं है वह शरद मिश्री की तरह मीठी और शहद की तरह शालीन होने पर भी अमृत नहीं है। विष ही है और अन्ततः विष का प्रभाव ही उत्पन्न करती है। जिसकी वाणी में सत्य, सौष्ठव और माधुर्य होगा उसकी वाणी ही भक्त के समान होगी और वह स्वयं देवोपम वाग्मी होगा। ऐसे पुरुष की कौन न वंदना करेगा और कौन न उसको पसन्द करेगा? धन्य हैं वे लोग जिनकी वाणी में अमृत होता है वे अपने इस गुण से स्वयं भी सुखी रहते हैं और दूसरों को भी सुखी बनाते हैं।

“करणं परोपकरणं” -जो कुछ किया जाय परोपकार भाव से किया जाए। कितनी सुन्दर नीति है। परोपकार भाव से संसार में व्यवहार करने वाला धरती का देवता ही होता है। पाप उसके निकट नहीं आता और पुण्य उसे छोड़कर जाता नहीं। पापों की प्राप्ति स्वार्थ के कारण होती है। जो सब कुछ अपने लिये ही चाहता है उसका लोभ बढ़ जाता है और तब उसकी तृप्ति करने में जघन्य से जघन्य कर्म करने में भी संकोच नहीं करता। लोभ पिशाच होता है, उसकी तृप्ति होती ही रक्त से है। लोभी व्यक्ति अपनी इस पिशाच वृत्ति को तृप्त करने के लिये न जाने कितने लोगों का शोषण करता है और बाद में भयंकर पतन को प्राप्त होता है।

परोपकार परायण व्यक्ति के जीवन में इस पिशाच को कोई स्थान नहीं होता। उसकी सारी उपलब्धियाँ अपने लिये नहीं दूसरों के लिये होती हैं। परोपकार के पुण्य में विश्वास रखने वाला अनुचित उपायों का प्रयोग कभी नहीं करता। जब उसमें न तो अहं होता है और न लोभ अथवा स्वार्थ, तो उसे क्या जरूरत होगी कि वह किन्हीं चीजों को पाने के लिये पाप पथ का अवलंबन ले?

परोपकारी व्यक्ति का तन-मन-धन दूसरों की सेवा, सहायता में ही नियत रहता है। वह किसी की सहायता करने का अवसर कभी नहीं खोता, उसके द्वार जो भी आता अथवा वह स्वयं किसी आवश्यकता में देखता है तो अपनी सेवाएँ तथा सहायताएँ आगे बढ़ा देता है। परोपकारी व्यक्ति किसी को भूखा देखकर स्वयं भोजन नहीं कर सकता, नंगा देखकर स्वयं वस्त्र नहीं पहन सकता और पीड़ित देखकर बैठा नहीं रह सकता। यदि उसके लिये सम्भव है तो भूखे को भोजन, नंगे को वस्त्र और पीड़ित को सेवा देने के बाद ही अपनी ओर ध्यान देगा। परोपकारी व्यक्ति न केवल साधनों में ही बल्कि अपनी प्रगति, प्रतिष्ठा, तपस्या, पुण्य और आत्मा तक में दूसरों को भागी बना लेता है। परोपकारी धरती के देवता होते हैं। ऐसे ही देव पुरुषों पर श्रद्धा के पुष्प चढ़ते हैं और ऐसे ही देवता समाज के आदरणीय होते हैं।

संसार में सफलता, उन्नति, मान-प्रतिष्ठा तथा सुख चाहने वालों की नीति में निर्देशित इन चार गुणों को सच्चे रूप में अपने में विकसित करने चाहिए। अवश्य ही वे अपने उद्देश्य में सफल होंगे।


Quotation

किसी सदाशयी का विरोध प्रायः जन-साधारण की ओर से नहीं बल्कि समझदारों तथा विद्वानों द्वारा ही होता है। जन-साधारण की अपेक्षा विद्वानों की श्रद्धान्धता अधिक भयंकर होती है। जन-साधारण अधिक से अधिक अपनी अन्ध-श्रद्धा और अन्ध-विश्वास पर आघात होते देखकर एक ओर हट जाते हैं किन्तु विद्वान संघर्ष उत्पन्न करने का प्रयत्न करते हैं।

किसी सुन्दर, सीधी और सही बात को जन-साधारण को सरलता से समझाई जा सकती है क्योंकि उनकी अंध-श्रद्धा पर बुद्धिवाद की यवनि का नहीं पड़ी होती है। यह सत्य है कि नूतन सत्य को समझ कर जितना लाभ जन-साधारण उठा लेते हैं उतना पंडित लोग नहीं।

यह बात भी शत-प्रतिशत सही है कि किसी सत्य के दर्शन और सही मार्ग की जितनी आवश्यकता जन-साधारण को है उतनी पण्डित को नहीं। अस्तु, जन-सेवक को वही कार्य करना चाहिये जहाँ उसकी आवश्यकता है। -भगवान बुद्ध


कहीं से भी आनन्द खोज निकालने की कला

राबर्ट लुई स्टीवेन्स ने एक स्थान पर लिखा है-

“आनन्द किसी गन्तव्य स्थान पर पहुँच जाने में नहीं है। वरन् वह तो चलने की क्रिया में- सतत उद्योग में है। प्रसन्नता और हमारा आनन्द, प्रतिदिन, प्रतिपल, बिखरा पड़ा है यदि हम आज आनन्द प्राप्त नहीं कर सकते, आज जीवन का रसपान नहीं कर सकते, तो चाहे हमारा वेतन दुगना क्यों न हो जाए, चाहे हम बहुमूल्य वस्त्र क्यों न धारण करलें, भविष्य में हमें आनन्द उपलब्ध होने वाला नहीं है।”

आनन्द अथवा प्रसन्नता प्रत्येक व्यक्ति को वाँछनीय है। दुखी अथवा अप्रसन्न कोई भी नहीं रहना चाहता। सभी जीवन में आनन्द प्राप्त करना चाहते हैं।

सामान्यतः लोग अपने आनन्द को भविष्य की किसी उपलब्धि, परिस्थिति अथवा अवसर में निहित देखते हैं। वे कुछ इस प्रकार सोचा करते हैं कि आज यदि कष्ट है- तो कोई बात नहीं, जैसे-तैसे रो-धोकर काट लेंगे। लेकिन जब निकट भविष्य में हमारा वेतन अथवा आय बढ़ जायगी तब तो फिर आनन्द ही आनन्द रहेगा। कभी सोचते हैं- बच्चे पढ़ रहे हैं, अभी तो कुछ कष्ट रहेगा ही। लेकिन जब पढ़-लिखकर वे काम-धन्धे में लग जायेंगे तो फिर आनन्द की कमी न रहेगी। कभी विचारते हैं- लड़के, लड़की की शादी करनी है। चिन्ता ही चिन्ता सिर पर सवार रहती है- सुख कैसे मिल सकता है? हाँ जब उनका विवाह हो जाएगा तब चिन्ता का कोई कारण नहीं रहेगा और जिन्दगी आनन्द से भर जाएगी। इसी प्रकार कोई पेन्शन पा जाने पर, बंगला, मोटर, मकान पा जाने पर अपने आनन्द को निर्भर समझता है। तात्पर्य यह है कि ज्यादातर लोग अपने आनन्द को किसी दूर भविष्य के किसी उद्देश्य, गन्तव्य अथवा कामना पूर्ति में देखा करते हैं।

इस प्रकार दूर भविष्य में आनन्द की सम्भावना देखने वालों को राबर्ट लुई स्टीवेन्स के कथन का सार समझने का प्रयत्न करना चाहिए। उनके कथन का सार यही है कि मनुष्य का अपना आनन्द भविष्य के किसी गन्तव्य अथवा मन्तव्य में नहीं है बल्कि वह तो वर्तमान में ही है और वहीं प्राप्त किया जा सकता है। जो वर्तमान में आनंद नहीं पा सकता वह भविष्य में भी नहीं पा सकता।

मानिए किसी ने सोचा कि जब उसको पेंशन मिल जाएगी और बच्चे अपने काम-धन्धे में लग जाएंगे तब सुख मिलेगा। इसके लिए देखना और सोचना चाहिए कि जिनके बच्चे काम-काज में लग गये हैं और जिन्हें पेन्शन भी मिल गई है क्या वे वास्तव में सुखी और आनन्दित हैं? खोज करने पर शायद एक प्रतिशत लोग भी ऐसे नहीं मिलेंगे जो इस स्थिति में आकर आनन्द पाने लगे हों। किसी स्थिति को अथवा गन्तव्य को पा लेने पर आनन्द मिलने ही लगे यह निश्चित नहीं। एक स्थिति पा लेने के बाद दूसरी स्थिति की कामना, जिज्ञासा अथवा आवश्यकता हो सकती है। तब फिर वही आनन्द की प्रतीक्षा प्रारम्भ हो जाएगी। दूसरी के बाद तीसरी और तीसरी के बाद चौथी स्थिति की आवश्यकता सता सकती है। इस प्रकार किसी एक स्थिति पा लेने से आनन्द मिलने ही लगे ऐसा हो नहीं सकता। मनुष्य की कामनाओं, आवश्यकताओं और जिज्ञासाओं की कमी नहीं, उनका कोई अन्त भी नहीं। आनन्द के लिए किसी गन्तव्य अथवा मन्तव्य की प्रतीक्षा करते रहने वाले कदापि सुखी नहीं रह सकते और न आनंद पा सकते हैं।

आनन्द के लिए भविष्य की प्रतीक्षा करना व्यर्थ है। उसे तो वर्तमान में ही खोजना और पाना होगा। आज की परिस्थितियाँ जब कल बदल जाएँगी तब आनन्द मिलने लगेगा- यह भ्रम है, मृग तृष्णा है। परिस्थितियाँ, परिस्थितियाँ हैं। वे बदलती रहने पर भी बदलने की आवश्यकता लिए रहती हैं। परिस्थितियों में से ही दूसरी परिस्थितियों की शाखा-प्रशाखाएँ फूलती-फैलती रहती हैं। उनके बदलने पर सुख और आनन्द की आशा लिए बैठे रहने वाले जीवन में कभी सुख नहीं पाते। सुख तो वर्तमान और वर्तमान परिस्थितियों में ही खोज निकालना होगा।

जैसा कि राबर्ट लुई ब्रस्वेन्स ने कहा है कि सुख गन्तव्य में नहीं बल्कि उसकी ओर सतत चलते रहने के उद्योग में है। अवश्य ही इस कथन में वास्तविकता है। जब तक मनुष्य गन्तव्य की ओर बढ़ता रहता है उसे सुख की आशा का आनन्द मिलता रहता है। गन्तव्य पर पहुँचने पर एक सामयिक संतोष तो मिलता है किन्तु सतत आशा का आनंद मिट जाता है। जल्दी ही गन्तव्य पर पहुँचने का सन्तोष पुराना हो जाता है और फिर वही आनन्द और सुख का अभाव सताने लगता है। इस प्रकार देखा जा सकता है कि आनन्द का निवास गन्तव्य में नहीं बल्कि उसकी ओर बढ़ते रहने में है। इसलिये सुख का आधार भविष्य में पाए जाने वाले किसी गन्तव्य अथवा उद्देश्य को न मानकर उसकी ओर निरन्तर चलते रहने को मानना चाहिए।

ऐसी मान्यता के लोग जीवन में अविराम सुख का आस्वादन कर सकते हैं। इस प्रकार कि अपनी गति की कोई सीमा अथवा अवधि न बाँधी जाए और एक के बाद एक गन्तव्य पार करते हुए चला जाए, मार्ग में जो भी जैसी परिस्थितियाँ आएँ उन्हीं में आनन्द ढूँढ़ते रहा जाए। सच्ची बात तो यह है कि आनन्द कोई ऐसी वस्तु नहीं है जो किसी निश्चित स्थान अथवा परिस्थिति में पाई जा सके। आनन्द प्राप्त कर लेना एक कला है। जो लोग इस कला को जानते हैं वे हर समय और हर स्थिति में आनन्द पा लेते हैं। जहाँ इस कला से अनभिज्ञ लोग अपार धन-संपत्ति में भी आनन्द नहीं पा-पाते वहाँ इस कला को जानकार अपनी स्वल्प आय में भी आनन्द भोगता रहता है। जहाँ इस कला का जानकार कोठी, बँगला, मोटर आदि साधनों में भी आनन्द नहीं पाता वहाँ इस कला का जानकार एक छोटे मकान और पदयात्रा में भी आनन्द की खोज कर लेता है। आनन्द के लिये परिस्थितियों अथवा साधन सामग्री पर निर्भर रहने वाले अपनी न्यूनता का परिचय देते और आजीवन उसके लिये लालायित ही बने रहते हैं।

आनन्द का रहस्य न जानने वाले बहुत से लोग उसे आरामतलबी में समझते और खोजते हैं। उनका विचार होता है कि अच्छा खाने-पहनने कि लिए मिलता रहे, बिना कुछ काम किये आराम से रहने को मिलता रहे बस सारा आनन्द इसी में है। आलस्य, अकर्मण्यता और प्रमादपूर्ण जीवन में आनन्द देखने वाले वस्तुतः आनन्द का रहस्य जानते ही नहीं। आनन्द आल्य और आराम करने में नहीं काम करने में है। अपनी रुचि का सबसे प्रिय कोई काम खोज लिया जाए और उसको पूरी लगन, तन्मयता और दक्षता के साथ निरन्तर करता रहा जाए आनन्द इसी में है। प्रिय कार्य ही प्रगति पूर्णता और चारुता से आनन्द की तरंगें उठ-उठकर कर्ता के हृदय में हर्ष, उल्लास और प्रसन्नता भरती ही रहती हैं।

आनन्द का अमृत जीवन में पग-पग पर फैला पड़ा है उसे उठाने और पाने की विशेषता मनुष्य में होनी चाहिए। आनन्द एक ईश्वरीय तत्व है। वह उसी की तरह सब जगह व्याप्त है। कोई स्थान और कोई परिस्थिति उससे खाली नहीं है। यदि मनुष्य उसे पाने की पात्रता पैदा कर ले तो कोई कारण नहीं कि वह जीवन के प्रत्येक पग पर आनन्द न पाता चले। आनन्द पाने की पात्रता है सन्तोष, निस्पृहता, निरपेक्षता और निरतिशयता आदिक गुण अपने में उत्पन्न कर लेना।

सन्तोष, सुख का बहुत बड़ा आधार है। कहा भी गया है- ‘सन्तोषी सदा सुखी।’ हृदय में सन्तोष रहने से सामान्य परिस्थितियों और स्वल्प साधनों में भी काम सुचारु रूप से चलता रहता है। सन्तोष के अभाव में धन-सम्पत्ति और साधन-सुविधाओं की प्रचुरता में भी अभाव अनुभव होता रहता है। जो कुछ प्राप्त होता है उससे अधिक और अधिक प्राप्त करने की तृषा बनी रहती है। ऐसी दशा में सुख मिलना सम्भव नहीं। निस्पृहता एक ऐसा गुण है जिसके आधार पर मनुष्य बहुत-सी कष्टदायक बातों से बच जाता है। निस्पृहता मनुष्य को लोभ और ईर्ष्या से बचाती है। निस्पृह व्यक्ति दूसरों की देखा-देखी अपना रहन-सहन बनाने के लिये उत्सुक नहीं होता। वस्तुओं और साधनों में लिप्सा न होने से वह अपनी परिस्थितियों की तुलना दूसरों की परिस्थितियों से नहीं करता। अपनी ही परिस्थितियों में ही सन्तुष्ट और मगन रहता है।

निरपेक्षता वह गुण है जो संकट और प्रतिकूलताओं में भी व्यग्र एवं व्याकुल नहीं होने देता। निरपेक्ष व्यक्ति अरुचिता, बाधा, विरोध, आलोचना आदि द्वेष मूलक बातों पर न ध्यान देता और उनको न कोई महत्व देता है। इस प्रकार जब वह बहुत-सी उलझनों से बचा रहता है तो उसका सुखी और शान्त स्वाभाविक ही है। अतिरेकता मनुष्य के सुख-शान्ति और सन्तोष की बहुत बड़ी शत्रु है। अतिरेकी व्यक्ति जिस वस्तु की इच्छा करता है उसे आवश्यकता से अधिक पाना चाहता है। वह भोजन चाहता है तो उत्तम, वस्त्र चाहता है तो उत्तम और अधिक। बात करता है तो करता ही चला जाता है। किसी से नाराज होता है तो क्रोध की सीमा ही नहीं रहती। अतिरेकी के लिये कोई मात्रा और कोई भी परिणाम कम ही लगता है। किसी बात में उसे पूर्णता का आभास होता ही नहीं। ऐसी दशा में उसका असन्तुष्ट, दुखी और अशान्त रहना स्वाभाविक है। निरतिरेक स्वभाव का विकास हो जाने पर व्यक्ति अपनी वर्तमान उपलब्धियों में ही संतोष करता है। वह वस्तुओं और साधन-सुविधाओं में हठात् कभी नहीं देखता। जो कुछ पाता है उन्हें ही बहुत समझता है और आगे अधिक पाने का प्रयत्न करता है। ऐसा व्यक्ति सामान्यतावादी होता है। उसमें लोभ, लालच, लिप्सा और विवृषणाओं की दुर्बलता नहीं होती। जो इन दुखद पाशों से बचा रहेगा उसका सुखी रहना निश्चित है।

बहुत से लोग विषय-वासनाओं और भोग-विलासों में आनन्द की खोज करना चाहते हैं और प्रयत्न भी करते हैं। किन्तु यह प्रयत्न बालू में तेल खोजने जैसा है। विषयों में आनन्द का निवास नहीं होता। अपितु विषय-वासनाएँ मनुष्य के सारे सुखों को ही नष्ट कर देती हैं। धन, स्वास्थ्य, समय, स्फूर्ति, स्निग्धता, शक्ति, क्षमता आदि सारी विशेषताएँ विषयों और वासनाओं की आग में जलकर भस्म हो जाती हैं। जीवन का हरा-भरा वृक्ष सूखकर ठूंठ जैसा हो जाता है। विषयों, व्यसनों और विलासों में सुख खोजना और पाने की आशा करना भयानक दुराशा है।

सुख है स्वास्थ्य, परिश्रम, सन्तोष, निस्पृहता, निरपेक्षता और निरतिरेकता में। इनको विकसित कर अपने जीवन को कम से कम बोझिल बनाना चाहिए और किसी दूरस्थ उद्देश्य की प्रतीक्षा करते रहने के बजाय अपनी वर्तमान परिस्थितियों में ही सुख की खोज करना चाहिए। सुख अनुभव करने की एक रीति, एक कला है जिसे कोई भी थोड़े नियमों के साथ सरलता पूर्वक सीख सकता है।


सेवा स्वीकार करें

शौर पुच्छ नामक बनिक ने एक बार भगवान् बुद्ध से कहा- भगवन् मेरी सेवा स्वीकार करें। मेरे पास 1 लाख स्वर्ण मुद्रायें हैं वह सब आपके काम आयें। बुद्ध कुछ न बोले चुपचाप चले गये?

कुछ दिन बाद वह पुनः तथागत की सेवा में उपस्थित हुआ और कहने लगा- देव! यह आभूषण और वस्त्र ले लें दुखियों के काम आयेंगे मेरे पास अभी बहुत-सा द्रव्य शेष है। बुद्ध बिना कुछ कहे वहाँ से उठ गये। शौर पुच्छ बड़ा दुखी था कि वह गुरुदेव को किस तरह प्रसन्न करे?

वैशाली में उस दिन महान धर्म-सम्मेलन था हजारों व्यक्ति आये थे। बड़ी व्यवस्था जुटानी थी। सैकड़ों शिष्य और भिक्षु काम में लगे थे। आज शौर पुच्छ ने किसी से कुछ न पूछा- काम में जुट गया। रात बीत गई सब लोग चले गये पर शौर पुच्छ बेसुध कार्य-निमग्न रहा। बुद्ध उसके पास पहुँचे और बोले शौर पुच्छ! तुमने प्रसाद पाया या नहीं? शौर पुच्छ का गला रुँध गया। भाव-विभोर होकर उसने तथागत को साष्टाँग प्रणाम किया। बुद्ध ने कहा- वत्स परमात्मा किसी से धन और संपत्ति नहीं चाहता वह तो निष्ठा का भूखा है लोगों की निष्ठाओं में ही वह रमण किया करता है आज तुमने स्वयं जान लिया।


अनुपयुक्त आकाँक्षाएँ और उनका असन्तोष

असन्तोष जहाँ मानसिक दरिद्रता का चिह्न है वहाँ एक मानसिक सन्ताप भी है जो मनुष्य को निरन्तर गीली लकड़ी की तरह कष्ट के साथ जलाया करता है। असन्तोष की उत्पत्ति अभाव भावना से होती है। जो अभाव अनुभव किया करता है वह स्वाभाविक है कि अपने आपको गरीब समझे। उसे न होते हुये भी दूसरों के पास अपने से अधिक सम्पत्ति तथा सुख-साधन दीखते हैं। जिसके फलस्वरूप उसे ईर्ष्या तथा दीनता का भी भागी बनना पड़ता है। इस विकृति से मनुष्य का मानसिक पतन हो जाता है।

असन्तोष एक मानसिक सन्ताप तो है ही। असन्तुष्ट व्यक्ति कभी प्रसन्न नहीं रह पाता। खिन्न रहना उसका स्वभाव बन जाया करता है। वह हर समय अपने अन्दर रोष, क्षोभ तथा तनाव का अनुभव किया करता है। खिन्नता हर प्रकार के शोक-सन्तापों की जड़ है। इसको आश्रय देते ही सम्पूर्ण जीवन दुःखों का भण्डार बन जाता है। खिन्नता असन्तुष्ट मन की ही अभिव्यक्ति है। असन्तोष रखने से कुढ़न, कुण्ठा एवं विषाद के सिवाय कुछ भी तो हाथ नहीं लगता। मनुष्य का हित इसी में है कि वह असन्तोष को पास न फटकने दे। यह आशा, उत्साह तथा जीवन-तत्व का प्रबल शत्रु है। मन ही मन कुढ़ते-जलते और असन्तुष्ट रहने से काम करने की दक्षता तथा क्षमता दोनों नष्ट हो जाती हैं। किसी काम करने को जो नहीं चाहता और यदि कोई काम किया भी जाता है या करना पड़ता है तो उसकी बेगार ही टलती है। वह कुशलता नहीं आ पाती जो किसी काम को शोभा एवं सफलता कही जाती है। जीवन को सफल एवं शुभ बनाने के लिये असन्तोष का परित्याग बहुत आवश्यक है।

आज के इस संघर्ष पूर्ण जीवन में असन्तोष के बहुत से कारण बढ़ गये हैं। किन्तु मुख्य कारण प्रतियोगिता की प्रवृत्ति है। यों तो प्रतियोगिता की भावना बुरी चीज नहीं है। प्रतियोगिता अथवा प्रतिस्पर्धा मनुष्य को आगे बढ़ने में सहायक होती है, प्रेरणा देती है। मनुष्य यह सोचकर, कि मैं किसी से पीछे न रह जाऊँ, आगे बढ़ने, उन्नति और विकास करने के लिये जी-जान से जुट जाता है। वह किसी से पीछे न रहने के लिये हर सम्भव उपाय करता है।

किन्तु यही प्रेरणाप्रद गुण तब दोष बन जाता है जब अनावश्यक प्रतियोगिता की स्पर्धता पाल ली जाती है। उन वस्तुओं का पाने अथवा वह जीवन पद्धति अपनाने की हिर्स जिनकी न तो आवश्यकता और न अपने अनुकूल ही ऐसी स्पर्धा है, जिससे असन्तोष एवं अशान्ति के सिवाय कुछ लाभ नहीं होता। आज अधिकतर लोग इसी प्रकार फैशन, प्रदर्शन, विलास वस्तुओं तथा खर्चीले जीवन की स्पर्धा में ही लग गये हैं। इस माने में सुख-सुविधा संबंधी आज के वैज्ञानिक आविष्कार चपल बुद्धि वाले लोगों के लिये काफी अहितकर सिद्ध होते हैं।

यदि यही स्पर्धा, मितव्यय तथा सादी जिन्दगी अपनाने, अनावश्यकताओं को पास न आने देने जैसे गुणों के संबंध में रखी जायें तो, जहाँ जीवन में सुख, सन्तोष अथवा शान्ति का अभाव ही अभाव दिखलाई देता है, वहाँ फिर इनकी कमी न रहे। महापुरुषों ने सादा जीवन उच्च विचार का दर्शन जनता के सामने कुछ यों ही नहीं रख दिया है। इसमें कुछ हितकर तत्व भी सन्निहित हैं। और वह तत्व यही तो है कि इस जीवन दर्शन को अपनाने वाला कभी अभाव अथवा असन्तोष की भावना से पीड़ित नहीं होता।

असन्तोष उत्पन्न करने में अनावश्यक, अनुचित अथवा अयोग्य आकाँक्षाओं का बहुत हाथ रहता है। यदि मनुष्य इससे पीछा छुड़ा सके तो असन्तोष स्वयं ही उसे छोड़ कर चला जाये और जीवन में सर्वत्र सुख-शान्ति ही दिखलाई देने लगे। किन्तु खेद है कि मनुष्य इनके माया जाल में पड़ कर पथ भ्रष्ट हो जाता है और वह ही सबकुछ करता रहता है जो नहीं करना चाहिये और जो करना चाहिये उसी ओर ध्यान नहीं देता। सुख-सन्तोष के लिये करना तो यह मुनासिब है कि अयोग्य अथवा अनावश्यक आकांक्षाओं को खोज-खोज कर निकाल फेंके; किन्तु करता वह है कि उनकी तुष्टि के लिये मरता-खपता हुआ उन्हें डडडड बढ़ता रहता है।

आकाँक्षाओं के महत्व से इनकार नहीं किया जा सकता। उनका जीवन में होना जरूरी है और कल्पनाशील डडडड से स्वाभाविक भी है। यदि मनुष्य के हृदय में आकाँक्षाओं का उदय होना सर्वथा स्थगित हो जाये तो जल्दी डडडड संसार की गतिशीलता, उन्नति एवं विकासशीलता डडडड भाव की ही अस्त हो जाये। आज संसार का जो विकसित एवं अग्रसर स्वरूप दिखाई देता है, वह बहुत डडडड व्यक्तियों की आकाँक्षा का ही तो परिणाम है। वैज्ञानिक, कवि, कलाकार, शिल्पी आदि जो भी संसार के आराधक माने जाते हैं, इनकी आकाँक्षा के फलस्वरूप ही डडडड यह सारा, साहित्य, संधान, सृजन एवं सौंदर्य दिखलाई डडडड है, जो इस बात की गवाही देता है कि मनुष्य जाति डडडड दिन अधिकाधिक उज्ज्वल भविष्य की ओर बढ़ती जा रही है। किसी वैज्ञानिक के मस्तिष्क में जब यह प्रश्न उठता है कि यह क्या है, कैसा है और कैसे जल रहा डडडड तब उसे जानने, उसकी खोज करने के लिये उसके डडडड में एक अभिलाषा जाग उठती है, जिसकी प्रेरणा से डडडड जीवन को कर्तव्यों में नियोजित कर संसार की सेवा डडडड रहस्यों तथा आश्चर्यों के द्वार खोल देता है।

इसी प्रकार कवि के हृदय में जब भावनाओं का डडडड होता है तब उन्हें व्यक्त करने के लिये वह आकाँक्षा डडडड हो उठता है जिसका परिपाक काव्य एवं साहित्य डडडड में समाज के सम्मुख आता है। विज्ञान, साहित्य डडडड अर्थ, सृजन, दर्शन, धर्म अथवा राजनीति, किसी डडडड क्षेत्र में जो कुछ अस्तित्व दृष्टि-गोचर होता है वह डडडड मनुष्यों की आकाँक्षाओं का ही परिणाम, उनकी डडडड की ही अभिव्यक्ति है, उसी का मूर्तिमान स्वरूप डडडड डडडड के अभाव में सृजन असम्भव है।

जो आकाँक्षा मनुष्य को महान सृजेता बना देती है डडडड उसे अशान्ति एवं असन्तोष में भी जलने के लिये डडडड देती है। एक ही प्रेरणा के इन विपरीत परिणामों डडडड कारण है- डडडड है आकांक्षाओं का स्वरूप। महत् आकाँक्षायें जहाँ मनुष्य को महान बना कर सुख-सन्तोष के स्वर्ग का स्वामी बना देती हैं, वहां निकृष्ट एवं विकृत आकांक्षायें उसे दुख दारिद्रय, अशाँति एवं असंतोष के नरक में ढकेल देती हैं।

भोग, विलास, शान शौकत, प्रदर्शन-प्रमाद, हिर्स तथा हविस आदि की अयोग्यता से दूषित आकाँक्षायें विकृत तथा निकृष्ट मानी गई हैं, और जिनमें संसार का हित, उच्च कर्तव्य, शिव-संकल्प तथा निस्वार्थ-भावना की प्रेरणा रहती है उनको महत् तथा महनीय कहा गया है।

महत् आकाँक्षाओं की प्रेरणा पर चलने वाले व्यक्ति अपनी जीवन पद्धति में उन चीजों को स्थान नहीं देते जो उनको अपने से बाँधकर रख सकतीं हैं। उसका सारा समय, सारा श्रम तथा जीवन तत्व अपना माँगलिक उद्देश्य पूरा करने में ही लगा रहता है। उनको यह अवकाश कहाँ रहता है कि वे अपने लिये, अपनी इन्द्रियों के लिये भोग-विलास की सामग्री इकट्ठी करते फिरें। उन्हें इतनी छूट कहाँ होती है कि वे जिस शरीर, जिस बुद्धि और जिस शक्ति के बलबूते पर महानता के उन्नत शिखर पर चढ़ने का संकल्प कर चुके हैं उसे प्रमाद की उपासना में नष्ट कर डालें। शारीरिक उपादानों के साथ जो जीवन मनुष्य को मिला है उसको चाहे निःसार मार्गों से नष्ट कर डालिये चाहे तो उसका समुचित दिशा में सदुपयोग करके परमार्थ के शिलाधार पर अपना स्थायित्व स्थापित कर जाये- इस द्विविध गति से सर्वथा परिचित होते हैं। उन्हें जरा भी यह दुर्बुद्धि नहीं होती कि जिस मानवजीवन से लोक एवं परलोक दोनों पर विजय प्राप्त की जा सकती है उसे नारकीय स्थिति में अथवा स्वयं नरक बना कर नष्ट कर डाला जाये इस प्रकार के उच्च-विचार तथा उच्च उद्देश्य रखने वाले महापुरुषों का अशान्ति अथवा असन्तोष सता सकता है- यह सम्भव नहीं। जो संसार से आवश्यकता भर लेकर एवं उसका भंडार भर देने की भावना रखते हों ऐसे उदार एवं उच्चमना व्यक्तियों के समीप दुःख, दारिद्रय अथवा लोभ, लिप्सा की छाया भी तो आने का साहस नहीं करेगी।

जिसके पास इन्द्रियों और अहं की तृप्ति के सिवाय कोई अभिलाषा ही नहीं है, स्वार्थ एवं सुख लिप्सा के डडडड कोई विचार ही नहीं है उसका सुखी तथा सन्तुष्ट डडडड किस प्रकार सम्भव हो सकता है? स्वार्थ पूर्ण एक डडडड की पूर्ति चार नई आकाँक्षाओं को जन्म दे देती डडडड जब तक उनमें से एक-दो पूर्ति का जोड़-तोड़ किया डडडड है कि तब तक अनेक और खड़ी हो जाती हैं। भोग डडडड इच्छाओं का न कभी अन्त होता है और न उनकी डडडड तृप्ति ही। ऐसा कदापि सम्भव नहीं कि आज यदि डडडड देखने अथवा किसी वस्तु के उपयोग की इच्छा डडडड कर दी गई तो वह अब भविष्य में फिर नहीं उठेगी। डडडड का तो यह स्वभाव ही होता है कि ज्यों-ज्यों डडडड पूर्ति की जाती है त्यों-त्यों वे अधिक जल्दी और डडडड उठकर खड़ी होने लगती हैं। इस प्रकार डडडड में फंसा हुआ व्यक्ति कभी भी सुखी अथवा डडडड नहीं हो पाता। इच्छाओं की तृष्णा एवं बाहुल्य डडडड में साधन की सर्वदा कमी ही रहती है।

डडडड एकबार यह भी कल्पना करली जाये कि किसी डडडड पास संसार के सारे साधन, सारी संपत्तियां और डडडड उपभोग, उपकरण आ जाते हैं और उसकी कितनी डडडड भी इच्छाओं की पूर्ति के लिये पर्याप्त होते हैं, तब भी तो भोगों की अधिकता के कारण या तो वह स्वयं शिथिल हो जायेगा अथवा उसे जीवन तथा संसार से इस अतिशयता के कारण अरुचि हो जायेगी। उसके लिये न तो कोई नवीनता रहेगी और न आकर्षण। तब इस प्रकार का निस्सार, निर्जीव तथा निरुद्देश्य जीवन उसके लिये कितनी असह्य बन जायेगा, इसका अनुमान लगा सकना सम्भव नहीं।

आकाँक्षायें, स्वाभाविक हैं- ठीक हैं- तथापि जीवन में सुख-सन्तोष की रक्षा के लिये उन्हीं आकाँक्षाओं को प्रश्रय देना चाहिये जो महान एवं उपकारी हों। स्वार्थपूर्ण निकृष्ट आकांक्षाएं, सुख-सन्तोष की प्रबल शत्रु हैं। यदि परिस्थिति अथवा क्षमताएँ किन्हीं महत्वकाँक्षाओं के योग्य नहीं है, तब भी तो अयोग्य एवं अनावश्यक आकाँक्षाओं से पीछा छुड़ाकर सुख शान्ति पूर्वक सादा एवं सरल जीवनयापन किया जा सकता है। यदि महत्वकाँक्षाओं को धारण नहीं किया जा सकता तो ऐसी आकाँक्षाओं को छोड़ा तो जा ही सकता है जिनकी तुष्टि सम्भव नहीं हो सकती।

सन्त रैदास का जीवन बड़े अभाव में व्यतीत हो रहा था। एक दिन एक धनी व्यक्ति उनके पास आये और आर्थिक सहायता लेने का आग्रह करने लगे।


सन्त-रैदास की परिश्रमशीलता

सन्त-रैदास ने कहा- भाई मनुष्य को उतना लेना चाहिये जितना वह परिश्रम करता है, परिश्रम से अधिक ग्रहण करना अनैतिक है। मुझे इस बात पर विश्वास है इसलिये आपकी सहायता स्वीकार नहीं कर सकता। वह सज्जन सन्त-रैदास की निर्धन स्थिति से बहुत दुःखी थे। इसलिये मना करने पर भी 500 चाँदी के रुपये एक पोटली में बाँधकर रख गये। रैदास ने बहुत कहा भी पर वे नहीं माने और चुपचाप वहाँ से उठकर चले गये।

रैदास उठे और पोटली उठाकर छप्पर से खोंस दी। उन सज्जन ने यह देखा भी तो भी रुके नहीं। काफी समय बीत गया तो वे सज्जन फिर उनके घर पहुँचे तो रैदास को उसी स्थिति में जूता गांठते पाया। वे आश्चर्यपूर्वक बोले महात्मन्! आपकी निर्धनता अभी तक दूर नहीं हुई, उन रुपयों का क्या हुआ?

रैदास ने छप्पर की ओर संकेत किया। रुपयों की पोटली ज्यों की त्यों खोंसी देखकर दंग रह गये। उन्होंने कहा- आश्चर्य है कि आपने इतना धन पाकर भी अपनी गरीबी दूर नहीं की। इस पर रैदास हँसकर बोले- भाई असली धन- ईश्वर-भक्ति- ईमानदारी और परिश्रम की कमाई से संतुष्टि मेरे मन में है। फिर बिना परिश्रम किये दूसरों के श्रम के लाभ उठाकर अपनी आदत क्यों बिगाड़ूं?


हमें संकटों का भी सामना करना होगा

जो इस भय से प्रगति के पथ पर पैर नहीं बढ़ाता कि ऐसा करने पर किसी संकट का सामना करना पड़ सकता है तो उस मनुष्य और साधारण जीव-जन्तु में क्या अन्तर है? उनके बीच का अन्तर केवल प्रगति-भावना है। मनुष्य में इच्छा, आकाँक्षा और उन्नति करने की भावना होनी ही चाहिए। प्रगति-भावना से रहित होना मानवेत्तर प्राणियों का लक्षण है। हम सब मनुष्य हैं। अप्रगति की भावना से निकल कर हमें उस उत्साह, उस जिज्ञासा और उस आकाँक्षा का वरण करना ही चाहिए जो उन्नति और प्रगति की संराधिका होती है।

जो व्यक्ति संकट के भय से प्रगति करने का साहस नहीं करते उन्हें सोचना चाहिए कि क्या इस जड़ता से वे सर्वथा बच जायेंगे? माना किसी महत्वपूर्ण कार्य में हाथ डालने पर तत्सम्बन्धी कठिनाइयाँ और प्रतिकूलताएं आ सकती हैं। निश्चय ही वे आएँगी। क्योंकि संसार का कोई भी महत्वपूर्ण कार्य संकट और विघ्न से रहित नहीं होता। उसकी महत्ता ही इसलिए होती है कि वह संकट और विघ्नों की सम्भावनाओं से भरा होता है। जिस कार्य में संकट का सामना न करना पड़े और वह आसानी से पूरा हो जाए तो उसका महत्व कम ही रहेगा फिर वह काम देखने में कितना ही बड़ा क्यों न हो। तो क्या इस सहज सम्भावना के भय से संसार में महत्वपूर्ण कार्य न किए जाएँ? यदि संसार के सारे लोग संकट की सम्भावना से डर कर कोई महत्वपूर्ण कार्य करना छोड़ दें, तो इस संसार की क्या दशा हो जायेगी? इसकी कल्पना नहीं की जा सकती।

संसार का सारा विकास, सारी उन्नति, जिसे देखकर आज हम खुश हो रहे हैं और जिसका लाभ उठाकर अधिकाधिक आनन्द अनुभव कर रहे हैं सब उन्हीं पुरुषार्थियों की कृपा और उनके साहस का ही फल है जिन्होंने संकट की सम्भावना का भय तक में रख कर अपना जीवन महान और उपयोगी कामों को समर्पित कर दिया। प्रगति की ओर बढ़ना केवल अपना व्यक्तिगत नियम नहीं है उसका सम्बन्ध संसार और समाज के विकास से भी है। जो अप्रगतिशील है वह परोक्ष रूप से समाज का विरोधी है।

वैज्ञानिकों, अन्वेषकों और समाज-सुधारकों को ले लीजिये। यद्यपि संसार के लिए उपयोगी महान कार्यों के क्षेत्र और भी होते हैं तथापि यह तीन क्षेत्र ऐसे हैं जिनके कार्य समाज के लिए बहुत उपयोगी होते हैं। इन तीन वर्गों के संसार-सेवियों ने संसार के विकास और उसकी प्रगति में, सदा से सराहनीय योगदान किया है। संसार की सेवा के यह तीनों क्षेत्र अन्य क्षेत्रों से अपेक्षाकृत अधिक संकट से भरे हैं। विघ्न, असफलताएँ और विरोध इन क्षेत्रों में सबसे ज्यादा सामने आते हैं। इन क्षेत्रों में साधारण संकटों के साथ प्राणों का संकट तक बना रहता है। तब भी संसार का उपकार करने वाले वैज्ञानिकों, अन्वेषकों और सुधारकों की कभी कमी न रही है। बड़े-बड़े भयंकर संकट उठाकर इन लोगों ने संसार की सेवा की है। यदि यह लोग संकटों की सम्भावना से भयभीत होकर अपना कर्तव्य न करते तो क्या यह संसार आज जैसा उन्नत और विकसित दिखलाई देता। और यदि आज डडडड यह लोग संकटों के भय से अपने महान कर्तव्यों से विरत हो जाएँ तो क्या कल से ही संसार अधोगति की ओर तेजी से न चल पड़े? अपनी और समाज की प्रगति के लिए पुरुषार्थ करना हर मनुष्य का कर्तव्य है। संकटों से डरकर अगति में पड़ा रहना अशोभनीय वृत्ति है।

संसार में संकट कहाँ और किस स्थिति में नहीं है? संसार संकटों का आगार कहा गया है। यहाँ संकट उसके लिए भी है जो एक स्थान पर पड़ा रहता है। यह संसार संपत्ति-विपत्ति और सुख-दुःख के दो सूत्रों से निर्मित हुआ है। जिसने इस संसार में जन्म लिया है वह केवल अनुकूलता की ही अपेक्षा नहीं कर सकता उसे प्रतिकूलता का भी अपना भाग ग्रहण करना होगा। संसार में केवल सुख-सुविधा पूर्ण आसान जिन्दगी जीते रहने का कोई अवसर नहीं है। हर शरीरधारी दुःख-सुख की द्वन्द्वमयी जिन्दगी स्वीकार करने के लिये बाध्य हैं। इस प्रतिबन्ध के रहते हुए इस बात में कोई बुद्धिमानी नजर नहीं आती कि संकट के भय से प्रगति के पथ पर न बढ़ा जाए। जब प्रगति के पथ पर बढ़ने पर भी संकट की सम्भावना है और प्रगति की दशा में भी संकटों से बचा नहीं जा सकता, तो कौन ऐसा नासमझ होगा जो प्रगति पथ के संकटों को तरजीह न दे, यदि वह पूरी तरह से मनोमृत होकर जड़ नहीं हो गया है?

मानिए कि आदमी के पास प्रगति करने के साधन हैं और वह व्यापार द्वारा उन्नति की ओर बढ़ सकता है। लेकिन घाटे के भय से व्यापार नहीं करता। यह सोचता है कि यदि मैं व्यापार करूं और उसमें घाटा हो जाए तो उसे गहरी आर्थिक विपत्ति में पड़ जाना पड़ेगा। चुपचाप बैठे रहने से उस पर आर्थिक संकट आने की सम्भावना नहीं रहेगी। किन्तु उसका यह विचार सही नहीं है। प्रगति के उद्योग में यदि उस पर घाटे का संकट आ सकता है तो अगति की दशा में भी लूट, चोरी अथवा आग द्वारा भी उस पर संकट आ सकता है। यदि इससे बच सकता है तो बीमारी अथवा नालायक सन्तानों के द्वारा भी उस पर आर्थिक संकट आ सकता है। संकट के लिए न तो कोई क्षेत्र निश्चित है और न कार्य। वह किसी पर किसी भी स्थिति में आ सकता है। उससे भयभीत होना अथवा उसकी संभावना से प्रगति पथ का त्याग कर देना किसी प्रकार भी उचित नहीं है।

मनुष्य जीवन उन्नति और प्रगति के लिए ही मिला है। यदि इसका यह उद्देश्य न होता तो इस शरीर के साथ विद्या, बुद्धि, विवेक और चिन्तन-मनन आदि की विशेषताओं की सुविधा न होती, मनुष्य भी सीधा-सादा अन्य प्राणियों की तरह ही एक निकृष्ट प्राणी होता। मनुष्य को अपने जीवन-लक्ष्य के लिये एक लम्बी प्रगति परम्परा पूरी करनी है। उसका जीवन लक्ष्य मोक्ष है। जो अगति पूर्ण स्थिति में पड़े रहने से कभी नहीं पाया जा सकता। मनुष्य को अपना वह लक्ष्य पाने के लिये प्रगति-प्रति-प्रगति करते हुए ही बढ़ना होगा। यदि वह साधारण जीवन ही प्रगति से मुख मोड़ बैठेगा तो उस आत्मिक उन्नति का प्रयत्न किस प्रकार कर सकता है जो जीवन-लक्ष्य के लिये आवश्यक है? छोटी-छोटी प्रगतियों के अभ्यास द्वारा ही बड़ी प्रगति की क्षमता प्राप्त की जा सकती है।

अपना वास्तविक जीवन-लक्ष्य पाने के लिये मनुष्य को सामान्य जीवन से ही प्रगति का उद्योग प्रारम्भ कर देना चाहिए। जो स्थूल उन्नति के क्षेत्र में अपना पुरुषार्थ और पराक्रम नहीं दिखला सकता वह अध्यात्म के सूक्ष्म क्षेत्र में तो और भी कुछ नहीं कर सकता है। उन्नति और प्रगति की दिशा में सफलता अर्जित करना मनुष्य का शोभनीय कर्तव्य संकटों के भय से उसे अपने इस कर्तव्य से विरत होकर न बैठ रहना चाहिए। संकटों अथवा विघ्न-बाधाओं के भय से मुक्त होकर उठिए और आज ही प्रगति की ओर पग बढ़ाने का उपक्रम प्रारम्भ कर दीजिए। दुःख उठाकर ही सुख और संकट उठाकर ही सफलता मिलती है। इसी में उसका महत्व भी है। जो सफलता जितना अधिक संघर्ष और संकट सहन करने के बाद मिलती है उसका आनन्द उतना ही अधिक, यथार्थ और स्थायी होता है। यह बात इस छोटे-से उदाहरण से इस प्रकार समझी जा सकती है। एक सम्पन्न व्यक्ति को विविध प्रकार के व्यंजनों की प्रचुर सुविधा है। जरा-जरा-सी देर में उसके सामने खाने-पीने की विविध वस्तुएँ बिना कुछ किए आती रहती हैं लेकिन उसमें उसे उतना आनन्द कभी नहीं मिलता जितना आनन्द एक श्रमजीवी को दिनभर कड़ी मेहनत करने के बाद मिली सूखी रोटी में मिलता है। इसी प्रकार उस आलसी और विलासी धनवान को आराम अथवा नींद का वह स्वर्गिक सुख नहीं मिलता, जो दिनभर आराम ही करता रहता है, जो उस मेहनतकश इंसान को मिलता है जो दिन में दस घंटे मेहनत करता और थकान से चूर होकर सोता है। आनन्द की पूरी और सच्ची अनुभूति उसी उपलब्धि में होती है जो कठिनाइयों और कष्टों के बीच से अर्जित की गई है। ऐसी उपलब्धि में सन्तोष भी होता है और आत्म-गौरव भी।

सफलता एक उपलब्धि है और उसमें आनन्द भी होता है। इसलिए कि उसको पाने में दुःख, तकलीफ और संकटों का सामना करना पड़ता है। आनन्द वास्तव में उस सिद्धि में नहीं होता बल्कि उस कष्ट का मूल्य होता है जो पुरुषार्थी हंसता-खेलता उठाया करता है। कोई सफलता श्रेय अथवा सराहना का विषय इसीलिये बनती है कि उसे पाने में उद्योगी को कष्ट और संकट उठाकर अपने पुरुषार्थ का परिचय देना होता है। पुरुषार्थ नाम सिद्धि का नहीं बल्कि उसके मार्ग में आने वाले संकटों की सहनशीलता का है। जीवन की सफलता और महत्वपूर्ण कार्यों के मार्ग में यदि संकट और कष्ट न आएँ और उनकी पूर्ति आसानी से हो जाया करे तो उनका कोई महत्व ही न रह जाए? सर्व सुलभ सफलताएँ यदि आसानी से मिलने लगें तो उनमें और सामान्य दैनिक कार्यों में क्या अन्तर रह जाए और क्या अन्तर रह जाए एक सामान्य और महापुरुष में। सफलताओं का श्रेय संकटों के कारण ही है और विशेष पुरुषार्थ के कारण ही आकार-प्रकार में कोई अन्तर न होने पर भी एक साधारण मनुष्य असाधारण पुरुष माना जाता है। दुर्लभता तथा दुःसाध्यता के कारण ही सफलता में एक अनिवर्चनीय आनन्द प्राप्त होता है। सोना स्पृहणीय क्यों है? इसीलिये कि वह कठिनता से मिलता है और दुर्लभ होता है। यदि वह भी अन्य खनिज पदार्थों की तरह आसानी से प्रचुर मात्रा में सबको मिलने लगे तो उसका क्या मूल्य महत्व रह जाए? मनुष्य को कष्ट और संकटों की सम्भावना से निरपेक्ष रहकर जीवन में उन्नति और विकास में सफल होने का प्रयत्न करना ही चाहिए।

उन लोगों को पुरुष नहीं कापुरुष ही माना जाएगा जो संकटों के भय से प्रगति पथ पर अग्रसर होने का प्रयत्न नहीं करते। सच्चे पुरुषार्थी तो सत्पथ पर आने वाली विपत्तियों का अपने धैर्य, सहिष्णुता और पुरुषार्थ की परीक्षा से अधिक कुछ नहीं मानते। वे तो हँस-हँसकर उनका स्वागत करते हैं, खेल-खेल की तरह सहन करते और विश्वासपूर्वक उन पर विजय प्राप्त करके श्रेय के अधिकारी बनते हैं। संकट और आपत्तियों का अस्तित्व जितना बाहर नहीं होता उससे कहीं अधिक कायर मनुष्य के हृदय में होता है। कष्ट और संकट मनुष्य जीवन की सामान्य घटनाएँ हैं। यदि कष्टों, संकटों तथा दुःखों का सर्वथा अभाव हो जाए तो मनुष्य की बुद्धि, विवेक और कार्य-क्षमता का कोई महत्व ही न रह जाए और एक रसता के कारण संसार के सारे सुख, सारे आनंद और सारे कार्य नीरस होकर बोझिल बन जाएँ। तब उस दशा में मनुष्य का जीना तक कठिन हो जाए। कठिनाइयाँ और संकट ही मनुष्य जीवन का सक्रिय तथा सरस बनाए रखने में सहायक होती हैं। एक रस सुख मृत्यु की तरह जड़ और शीतल होता है। उसमें रुचि तथा आनन्द की ऊष्मा का संचार संकटों तथा कठिनाइयों का राही होता है। संकट के भय से प्रगति पथ पर न बढ़ना, केवल जीवन को जड़ता की ओर ले जाना है बल्कि उसे नीरस, शीतल और निरुपयोगी बनाना भी है। अस्तु संकट की भावना का त्याग कर अपनी-अपनी स्थिति-परिस्थिति के अनुसार सबको प्रगति तथा उन्नति का प्रयत्न करना चाहिए, श्रेय पथ पर संकट का भय हृदय क्षुद्र दुर्बलता के सिवाय और कुछ नहीं। वह तो मानव-जीवन की सामान्य घटनाएँ ही होती हैं। जिनका कोई मूल्य महत्व नहीं होता।


Quotation

तुम सब यही कहते हो कि तुम सब मेरे हो। किन्तु मैं कहता हूँ कि मेरा और कोई नहीं केवल वही मेरा है जो मेरे पिता की इच्छा पूरी करे। उसके संदेशों का प्रसार करे और उसके भटके हुये पुत्रों को ठीक रास्ते पर लाये। जो मुझे प्रेम करता है वह मुझे सच्चा प्रेम नहीं करता पर जो मेरे उद्देश्यों को प्रेम करता है वही मेरा है।

पिता के मार्ग में आने वाले संकटों से जो अपने प्राण बचाना चाहता है वह मेरे योग्य नहीं है क्योंकि वह उन्हें खोयेगा और जो मेरे कारण, मेरे पिता के कारण उन्हें खोयेगा वहीं उन्हें बचायेगा। उससे मत डरो जो शरीर पर घात करता है आत्मा पर नहीं। डरो उससे, जो शरीर पर घात करे या न करे किंतु आत्मा का घात कर सकता है। क्योंकि शरीर घाती हमें स्वर्ग राज्य में भेजता है और आत्मा का घात करने वाले हमें नरक की आग में जलाते हैं। इसलिये मनुष्य से मत डरो चाहे वह क्रूर ही क्यों न हो।


सबकी उन्नति में अपनी उन्नति

समाज के विकास के साथ ही व्यक्ति के विकास की सम्भावना जुड़ी है। समाज से पृथक रहकर अथवा उसके हित की ओर से विमुख होकर कोई व्यक्ति उन्नति नहीं कर सकता। जब-जब मनुष्यों के बीच सामाजिक भावना का ह्रास हो जाता है जब-जब समाज में कलह और संघर्ष की परिस्थितियाँ बढ़ने लगती हैं। चारों ओर अशांति और अरक्षा का वातावरण व्याप्त रहने लगता है। समाज की प्रगति रुक जाती है और उसी के साथ व्यक्ति की प्रगति भी। इसी हानि को बचाने के लिए हमारे समाज के निर्माता ऋषियों ने वेदों में स्थान-स्थान पर पारस्परिक सहयोग और सद्भावना का उपदेश दिया है- बताया गया है-

‘‘अज्येष्ठासोऽकनिष्ठासः सं भ्रातरो वावृधु सौभगाय”

-इस वेद वाक्य का आशय यही है कि हम सब प्रभु की सन्तान एक दूसरे के भाई-भाई हैं। हममें न कोई छोटा है और न बड़ा। यह एक उत्कृष्ट सामाजिक भावना है। इसी भावना के बल पर ही तो भारतीय समाज संसार में सबसे पहले विकसित और समुन्नत हुआ। इसी भावना के प्रसाद से उसके व्यक्तियों ने संसार में सभ्यता का प्रकाश फैलाने का श्रेय पाया है और इसी बंधुत्व की भावना के आधार पर वह जगद्गुरु की पदवी पर पहुँचा है।

इसके विपरीत जब से भारतीय समाज की यह वैदिक भावना क्षीण हो गई वह पतन की ओर फिसलने लगा और यहाँ तक फिसलता गया कि आर्थिक, राजनीतिक और धार्मिक गुलामी तक भोगनी पड़ी है। किन्तु अब वह समय फिर आ गया है कि भारतीय समाज अपनी प्राचीन बन्धु-भावना का समझे, उसे पुनः अपनाये और आज के अशान्त संसार में अपने वैदिक आदर्श की प्रतिष्ठा द्वारा शान्ति की स्थापना का पावन प्रयत्न करे।

शाश्वत सिद्धान्त है कि दूसरों को उपदेश देने और मार्ग दिखलाने का वही सच्चा अधिकारी होता है जिसका आचरण स्वयं उसके आदर्श के अनुरूप हो। इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि पहले हम अपनी भावनाओं और व्यवहार में सुधार करें, उसमें पारस्परिक भाईचारे का समावेश करें और तब संसार के सामने वसुधैव-कुटुम्बकम् का आदर्श उपस्थित करें। इस सुधार को सरल बनाने के लिए सबसे पहले व्यक्ति और समाज का सम्बन्ध समझ लेना होगा। एक के विचारों और कार्यों का दूसरे पर क्या प्रभाव पड़ता है यह जान लेना होगा।

समाज की उन्नति पर ही व्यक्ति की भी उन्नति निर्भर है। समाज से परे अथवा पृथक रहकर व्यक्तिगत उन्नति किसी के लिए भी सम्भव नहीं। जीवन में निवास करने के लिए कुछ साधन, कुछ परिस्थितियाँ और कुछ सहयोग अपेक्षित होता है। यह सब सुविधाएँ समाज में समाज द्वारा ही प्राप्त होती हैं। एक अकेला व्यक्ति न तो इन्हें उत्पन्न कर सकता है और न इनका उपयोग। इनके लिये उसे समाज पर ही निर्भर होना होगा। विभिन्न शिक्षण संस्थाएँ, उनमें कार्य करने वाले व्यक्ति, जीवन-निर्वाह के साधन, ज्ञान-विज्ञान की सुविधाएं, अन्वेषण, आविष्कार, व्यापार, व्यवसाय, अनुभव और अनुभूतियाँ आदि मानव-विकास के जो भी साधन माने गये हैं उनकी उत्पत्ति समाज के सामूहिक प्रयत्नों द्वारा ही होती है। किसी का मस्तिष्क काम करता है तो किसी के हाथ-पाँव, किसी का धन सहयोग करता है तो किसी का साहस। इस प्रकार जब पूरा समाज एक गति और एक मति होकर अभियान करता है तभी व्यक्ति और समूह दोनों के लिए कल्याण के द्वार खुलते चले जाते हैं। एक अकेला व्यक्ति संसार में कभी कुछ नहीं कर सकता।

समाज से पृथक रहकर अथवा समाज के सहयोग के बिना व्यक्ति एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकता। कोई विशेष प्रगति कर सकना तो दूर इस पारस्परिकता के अभाव में जीवन ही संदिग्ध हो हो जाए। जीवन की सुरक्षा और उसका अस्तित्व समाज के साथ ही सम्भव है। समाज की शक्ति का सहारा पाकर ही हमारी व्यक्तिगत क्षमताएँ एवं योग्यताएँ प्रस्फुटित होकर उपयोगी बन पाती हैं। यदि हमारे गुणों और शक्तियों को समाज का सहारा न मिले तो वे निष्क्रिय रहकर बेकार चली जाएं। उनका लाभ तो तब स्वयं हमको ही हो और न समाज को। सच्ची बात तो यह है कि व्यक्तिगत जीवन नाम की कोई वस्तु ही संसार में नहीं है। हम सब व्यक्ति रूप में दीखते हुए भी समष्टि रूप में जीते हैं। व्यक्तिवाद को त्याग कर समष्टिगत जीवन को महत्व देना ही हम सबके लिये हितकर तथा कल्याणकारी है। समष्टिगत जीवन और समूहगत उन्नति ही हमारा ध्येय होना चाहिए। उसी को विकसित एवं शक्तिशाली बनाने में अपनी शक्ति प्रतिभा, योग्यता एवं सम्पदा लगाएँ हमारे भोग द्वारा हमारा समाज जितना-जितना उन्नत, विकसित और शक्तिशाली बनता जाएगा उसी अनुपात से हमारा व्यक्तिगत जीवन भी बढ़ता और चढ़ता जाएगा।

समाज की शक्ति ही व्यक्ति की वास्तविक शक्ति मानी गई है। व्यक्ति का एक अकेला शक्तिशाली होना कोई अर्थ नहीं रखता। समाज जब समग्र रूप से निर्बल हो जाता है तो उस पर सामूहिक संकटों का सूत्रपात होने लगता है। उस सामूहिक संकट से व्यक्तिगत रक्षा कर सकना सम्भव नहीं होता। निर्बल समाज पर जब बाहरी आक्रमण होता है अथवा कोई संक्रामक रोग फैलता है तब व्यक्ति उससे अपनी रक्षा करने में सफल नहीं हो पाता फिर वह अपने आप में कितना ही शक्ति एवं स्वास्थ्यशाली क्यों न हो। ऐसी समूहगत संक्रान्ति से सामूहिक रूप से ही रक्षा संभव हो पाती है। समाज की शक्ति ही व्यक्ति की वास्तविक शक्ति है। इस सत्य को कभी भी न भूलना चाहिए। अपनी शक्ति का उपयोग एवं प्रयोग भी इसी दृष्टि से करना चाहिए जिससे हमारी व्यक्तिगत शक्ति भी समाज की शक्ति बने और उलट कर वह व्यापक शक्ति हमारे लिए हितकारी बन सके।

समाज को शक्तिशाली बनाने के लिए हमें चाहिए कि हम अपने समग्र व्यक्तित्व को उसमें ही समाहित कर दें। जो कुछ सोचें समाज को सामने रखकर सोचें, जो कुछ करें समाज के हित के लिए करें। यदि हम ऐसी समष्टि प्रधान चेतना को स्थान नहीं देते और अपने व्यक्तित्व की सत्ता को अलग कल्पना कर उसी तक सीमित रहते हैं तो इस प्रकार से समाज को निर्बल बनाने की गलती करते हैं। हमारी यह अहंकार पूर्ण भावना समाज विरोधी कार्य होगा। इसका कुप्रभाव समाज पर पड़ेगा वह तो पड़ेगा ही हम स्वयं भी इस असहयोग से अछूत न रह सकेंगे। हमारा यह सामाजिक पाप प्रकाश में आ जायेगा और तब हमको पूरे समाज के आक्रोश तथा असहयोग का लक्ष्य बनना पड़ेगा। हम जैसा करेंगे वैसा भरना होगा। इस न्याय से बच सकना सम्भव नहीं।

इस संकीर्ण मनोवृत्ति का कुप्रभाव मनुष्य के व्यक्तित्व पर एक प्रकार से और भी पड़ता है। वह है उसका मानसिक पतन। ऐसे असामाजिक वृत्ति के लोगों का अन्तर आलोकहीन होकर दरिद्री बन जाता है। उसके सोचने और समझने की शक्ति नष्ट हो जाती है। उसकी क्षमताओं, योग्यताओं और विशेषताओं का कोई मूल्य नहीं रहता। असामाजिक भाव वाले व्यक्तियों की शक्ति को समाज अपने लिए एक खतरा समझने लगता है और कोशिश करता है कि वे जहाँ की तहाँ निष्क्रिय एवं कुंठित होकर पड़ी रहें। उन्हें विकसित अथवा सक्रिय होने का अवसर न मिले। ऐसे प्रतिबन्धों के बीच कोई असहयोगी व्यक्ति अपना कोई विकास कर सकता है- यह सर्वथा असम्भव है। समाज के निषेध से जहाँ व्यक्ति की असाधारण शक्ति भी सीमित और वृथा बन जाती है वहाँ समाज में समाहित होकर किसी की न्यून एवं साधारण शक्ति भी व्यापक और असाधारण बन जाती है। अपनी एक शक्ति समाज के साथ संयोजित कर व्यक्ति असंख्य शक्तियों का स्वामी बन सकता है।

समाज को अपनी शक्ति सौंपकर उसकी विशाल शक्ति को अपनाने के लिए हमें चाहिए कि हम अपने भीतर सामूहिक भावना का विकास करें। हमारा दृष्टिकोण जीवन के क्षेत्र में अपनेपन से प्रेरित न होकर समाज की मंगल भावना से प्रेरित हो। हम अपना कदम उठाने से पूर्व अच्छी तरह यह सोचलें कि इस प्रभाव समाज पर क्या पड़ेगा। यदि हमें अपने उस कदम में समाज का जरा भी अहित दिखलाई दे तो तुरन्त ही उसे स्थगित कर देना चाहिए। हमारे लिए वे सारे प्रयत्न त्याज्य ही होने चाहिए जिनमें व्यक्तिगत लाभ भले ही दीखता हो पर उनसे समाज का कोई अहित होने की सम्भावना हो।

संचय, संग्रह, मुनाफाखोरी, शोषण, झूठ और प्रपंच आदि ऐसे निकृष्ट प्रयत्न हैं जिनमें लोभी तथा स्वार्थी व्यक्ति को अपना लाभ दिखलाई दे सकता है, किन्तु इनसे समाज को बड़ी क्षति पहुँचती है। इसीलिए इन सब कार्यों को भ्रष्टाचार की संज्ञा दी गई है। ऐसे भ्रष्टाचार पूर्ण कार्य किसी भी सामाजिक एवं सज्जन व्यक्ति को शोभा नहीं देते वे सर्वथा त्याज्य अग्राह्य ही हैं। समाज में जहाँ अन्य लोगों को पेट भरने के लिए रोटी न मिले वहाँ हम अपने भण्डारों में अन्न संग्रह करते रहें। जहाँ लोग नंगे और निराश्रय होकर फुटपाथों पर रात व्यतीत करें वहाँ हम यदि हीटरों से गर्म कोटियों में बैठकर आमोद-प्रमोद का आनन्द लेते हैं तो हम एक असामाजिक व्यक्ति हैं, समाज के अपराधी और उसके दण्ड के भागीदार हैं। यह न केवल सामाजिक अपराध ही है बल्कि आध्यात्मिक पाप भी है। ऐसे असामाजिक स्वार्थी और कठोर व्यक्तियों को ही असुर और अमानव कहकर पुकारा गया है।

समाज की शक्ति, उसकी रक्षा और उसकी उन्नति ही व्यक्ति की शक्ति, रक्षा और उन्नति है। समाज से भिन्न व्यक्ति का कोई अस्तित्व नहीं है। यदि व्यक्तिवाद से प्रभावित कोई व्यक्ति स्वार्थ और लोभ को पूरा करने के लिये आज समाज को शोषण कर सम्पन्न बन जाता है तो निश्चय ही कल उसकी यह कुसम्पन्नता उसके लिये संकट का कारण बन जायेगी। समाज उसका असहयोग करेगा, दुष्ट लोग उसे सताएँगे और तब वह एकाकी अपनी रक्षा न कर सकेगा। व्यक्ति की वास्तविक शक्ति समाज की शक्ति है, समाज के हित में ही उसका हित है इसलिये आवश्यक है कि व्यक्ति को पीछे रखकर जीवन के हर क्षेत्र में सामाजिक दृष्टि को ही आगे रखा जाए।


मिस शारलोट

सन् 1874 की बात है। आयरलैंड की राजधानी डब्लिन नगर में मिस्टर पिम नामक सज्जन रहते थे। उनकी मिस शारलोट नामक एक कन्या थी। एक दिन उसे खबर मिली कि मिस्टर बेली नामक एक पादरी भारत से लौटे हैं। शारलोट ने उक्त पादरी महाशय को अपने घर बुलाकर उनसे भारत के बारे में उनके अनुभव पूछे। मि. बेली अम्बाला में ईसाई चर्च के संचालक थे और छुट्टियों में घर लौटे थे। उन्होंने अपने कार्य सम्बन्धी बात-चीत के दौरान बतलाया कि अम्बाला में उनके बँगले में कुछ ही दूरी पर कोढ़ी लोगों की झोपड़ियां हैं। जिनकी दशा अत्यंत दयनीय है। मिस शारलोट का हृदय भारतीय कोढ़ियों की दुर्दशा का हाल सुनकर अत्यंत द्रवित हुआ और उसने कहा- अधिक तो नहीं पर मैं हर साल 30 पौण्ड (450 रु.) इकट्ठा कर कुष्ठ रोगियों की सेवा के लिये आपको भेजती रहूँगी। मिस शारलोट पिम अत्यंत संकोचशील स्वभाव की लड़की थी और उसे लगता था 30 पौण्ड जमा करना भी उसके लिए मुश्किल काम होगा पर वह तन-मन से अपने कार्य में जुट गई और वर्ष के अन्त में उसने 500 पौण्ड (7500 रु.) इकट्ठा कर भारत भेजे और बाद में प्रति वर्ष हजारों पौण्ड लगातार भेजती रही।

आज से 93 वर्ष पहले जो सेवा रूपी बीज इस बहन ने बोया था, वह आज हरे-भरे उपवनों के रूप में लहलहा रहा है। भारत में कुष्ठाश्रम के आरम्भ का यही इतिहास है। आज भारत में ईसाई मिशन के लगभग 50 कुष्ठाश्रम जिनमें हजारों कुष्ठ रोगी चिकित्सा का लाभ प्राप्त कर निरोगी हो रहे हैं।


सद्-गृहस्थ और असद्-गृहस्थ का अन्तर

अधिकाँश लोग गृहस्थ होते हैं। साधु, संन्यासी तथा त्यागी-विरागी तो विरले ही हो पाते हैं। गृहस्थ होना जहाँ अपने लिये एक सुख-सुविधा की बात है वहाँ सृष्टि का यह चक्र भी गृहस्थ जीवन पर चलता है। समाज की रचना और सभ्यताओं का उदय भी गृहस्थ जीवन पर निर्भर है। भारतीय संस्कृति में जिन चार आश्रमों की व्यवस्था की गई है उनमें गृहस्थ जीवन को न केवल सर्वोपरि बतलाया है बल्कि अन्य तीन आश्रमों का आधार भी घोषित किया गया है। सदाचारी गृहस्थ को तपस्वी के समान आदरणीय माना जाता रहा है।

इसका कारण भी कोई बड़ा रहस्य नहीं हैं। सीधी-सी बात है कि गृही व्यक्ति परिवार बसाता है। विवाह करता और सन्तानों की सृष्टि कर प्रजा की वृद्धि करता, और साथ ही उनके विकास तथा भरण-पोषण के लिये कठोर श्रम रूपी तपस्या किया करता है। सच्चा गृही, कर्तव्य निष्ठा से एक नारी को शिरोधार्य करता उसे फलवती बनाता और जीवन यात्रा में सहयोग करता है। यदि कोई बुद्धिमान गृहस्थ इस दायित्व की निस्पृह भाव से ग्रहण कर ईश्वरीय आज्ञा की तरह पालन करता है तो निश्चय ही वह गृहवासी होते हुए भी संन्यासी और भोगी होते हुये भी योगी है। गृही और गृहस्थाश्रम की बड़ी महिमा है।

जीवन-यापन की विशेष पद्धति, जिसे सभ्यता, संस्कृति भी कह सकते हैं, कि आवश्यकता भी गृहस्थ को अधिक होती है। वह ही इसको स्थिर भी करता है और रक्षा भी। गृहस्थों की दशा से ही किसी देश अथवा समाज की दशा का अनुमान लगता है। यह अधिकतर गृहस्थ ही होते हैं जो व्यापार, व्यवसाय एवं उद्योग को प्रश्रय देकर समाज का आर्थिक ढाँचा तैयार करते हैं। गृहस्थ ही अपने तथा अपने परिवार के रहने के बहाने आवासीय व्यवस्था का विकास अग्रसर करते हैं। संसार का शिल्प, साहित्य, कला तथा कौशल आदि सारा वैभव गृहस्थ के कारण और अधिकतर उन्हीं के लिये होता है। समाज का विकास और संसार की शोभा गृहस्थ पर ही अवलंबित है। हम में से अधिकतर गृहस्थ हैं और उसकी गरिमा, गौरव के अधिकारी भी।

‘‘गृहस्थ्येव हि धर्माणांसर्वेषांमूलमुच्यते’’ तथा ‘‘धन्यों गृहस्थाश्रमः’’ -कह कर ऋषियों ने गृहस्थ जीवन की गरिमा स्थापित की है। किन्तु उन्होंने यह व्यवस्था दी उन्हीं गृहस्थों के लिये जो सदाचार पूर्वक इसे धर्म, कर्तव्य समझ कर पालन किया करते हैं। असद्गृहस्थों के लिये इस प्रकार व्यवस्था दी भी कैसे जा सकती है। असद्गृही तो समाज का शत्रु माना गया है। समाज में जो भी अशान्ति, असन्तोष तथा संघर्ष दिखाई देता है उसका मूल कारण असद्गृहस्थ ही हुआ करते हैं।

विवाह सद्गृहस्थ भी करता है और असद्गृहस्थ भी। अन्तर यह है कि जहाँ सद्गृहस्थ के दाम्पत्य सूत्र का उद्देश्य सृष्टि-संचालन तथा प्रजा-पालन होता है, वहाँ असद्गृहस्थ का उद्देश्य इन्द्रिय भोग रहता है। जहाँ सद्गृहस्थ अपने परिवार की सहायता से परमार्थरत होकर अर्थ, काम, मोक्ष के लिये प्रयत्नशील होता है वहाँ असद्गृहस्थ परिवार और बाल-बच्चों के बहाने स्वार्थरत होकर लोक-परलोक का पतन किया करता है। सद्गृहस्थ की सन्तानें स्वभावतः शिष्ट एवं शालीन होकर समाज में सुख-शान्ति की वृद्धि का कारण सिद्ध होती हैं। इसका कारण है। यह यों ही निसर्ग-भाव से नहीं हो जाता। सद्गृहस्थ संतानोत्पत्ति का प्रयोजन जानता है। वह नैतिक एवं आध्यात्मिक उद्देश्य से प्रेरित होकर समाज को एक सुन्दर तथा हितकारी सन्तान रूप में उपहार देने के विचार से गृहस्थ जीवन में प्रवृत्त होता है। विवाह उसके लिये काम-क्रीड़ा अथवा इन्द्रिय भोग का साधन न होकर एक धार्मिक कर्तव्य होता है। वह उसकी पवित्रता तथा गरिमा को काम-कौतुक की प्रणालियों में यों ही व्यर्थ नहीं बहा देता।

गृहस्थ जीवन का पुण्य उसकी महिमा तभी है जब सद्गृहस्थ बनकर अपने कर्तव्य का सर्वतोमुखी पालन किया जाये। अन्यथा गृहस्थ जीवन से अधिक कष्टदायक, लोक-परलोक को नष्ट करने वाली अन्य कोई स्थिति नहीं होती है। सद्-गृहस्थ ही वास्तव में गृहस्थ और समाज का हितैषी होता है, बाकी के सारे पारिवारिक अपने नरक के शिल्पी हुआ करते हैं, जो परिजनों की सहायता से उसका निर्माण करने में लगे रहते हैं। इसलिये हर गृही का कर्तव्य है कि वह सद्गृहस्थ बने, उसके सारे सात्विक सुख भोगे और परिणाम स्वरूप परलोक एवं परमगति का अधिकारी बने। वह अपना जीवन इस प्रकार पवित्रता पूर्वक यापन करे जिससे कि वह अपने गृहस्थ और गृहस्थ उसके लिए वरदान रूप सिद्ध होकर सार्थक बने।

सद्-गृहस्थ का पहला कर्तव्य तो यह है कि अपने परिवार में कलह का प्रवेश न होने दे। इस बुराई का प्रवेश तब ही होता है जब घर के सारे सदस्यों के बीच पारिवारिकता तथा परस्परता का अभाव रहता है। हर व्यक्ति निरंकुश रूप से, मनमाने ढंग से रहता और मनमाने ढंग से बर्ताव करना चाहता है। यह अप्रिय स्थिति तब उत्पन्न होती है जब परिजनों के बीच स्वार्थ भाव की प्रधानता हो जाती है। स्वार्थपरता के दो-तीन मुख्य कारण होते हैं। एक तो स्पष्ट अभाव, दूसरा अधिक सम्पन्नता और तीसरा विषम व्यवहार। जो गृहस्थ, आलसी, अकर्मण्य तथा कामचोर होते हैं, वे निश्चय ही उतना उपार्जन नहीं कर पाते जितने की आवश्यकता होती है। फल यह होता है कि जो कुछ थोड़ा बहुत घर में आ पाता है उसमें से अपनी आवश्यकता पूर्ति करने के लिये हर सदस्य अधिक से अधिक चाहने और पाने का प्रयत्न किया करता है। इस छीना-झपटी में स्वार्थ-परता को प्रश्रय मिलना स्वाभाविक ही है। इसको किसी प्रकार भी नहीं रोका जा सकता।

अधिक सम्पन्नता होने अथवा आवश्यकता से अधिक आय की स्थिति में भी सदस्य स्वार्थ-परायण हो जाते हैं। अधिकता के कारण हर सदस्य अपने लिये मनमाना भाग चाहने लगता है। विलासिता, व्यसन तथा फैशन परस्ती बढ़ जाती है, आलस्य, अहंकार तथा अकर्मण्यता घर बना लेती है। सब कोई एक-दूसरे पर हुक्म चलाने और अपनी प्रधानता के लिये प्रयत्नशील हो उठता है। एक-दूसरे की हिर्स तथा स्पर्धा उनका स्वभाव बन जाता है। ऐसी अस्त-व्यस्त तथा अव्यवस्थित दशा में स्वार्थ-परता तथा कलह-परायणता की वृद्धि हो जानी स्वाभाविक ही है।

परिवार में एक-दूसरे सदस्यों द्वारा और विशेषतया परिवार प्रमुख द्वारा किसी एक सदस्य को मुख्यता देना उस पर अधिक व्यय करना अथवा अधिक स्नेह रखना और दूसरों के प्रति उदासीनता अथवा उपेक्षा का भाव रखना, उनमें ईर्ष्या द्वेष की वृद्धि करने लगता है। ऊपर से भले ही सारे सदस्य एक सूत्र में आबद्ध दीखते रहें किन्तु अन्दर ही अन्दर वे विश्रृंखल होकर एक-दूसरे से फूट जाते हैं इस प्रकार की विश्रृंखल स्थिति में पारिवारिक शान्ति तथा प्रसन्नता का रह सकना कठिन है।

इस सत्य को दृष्टिगत रखते हुये सद्-गृहस्थ आलस अथवा अकर्मण्यता को कभी प्रश्रय नहीं देते। वे परिवार को अभाव के प्रभाव से बचाये रखने के लिये अधिक से अधिक परिश्रम करते और पसीना बहाते हैं। वे परिवार का अभाव दूर करने के लिये अपनी सीमा में कोई भी प्रयत्न उठा नहीं रखते।

परिश्रमी गृहस्थों के पास आवश्यकता से कुछ अधिक पैसा हो जाना कोई आश्चर्य नहीं। ऐसी स्थिति में वे सबके सब सदस्यों के सम्मुख लूटने-उड़ाने के लिये ढेर नहीं लगने देते। वे उनको उतना ही देते हैं जिससे उनकी आवश्यकता सरलतापूर्वक पूरी हो सके और वे अनुभाव की अनुभूति कर सकें। शेष आय उनके आगे के लिये, भविष्य के लिये सुरक्षित रखते अथवा ऐसे उद्योगों में लगा देते हैं जिस पूँजी सुरक्षित भी रहे और कुछ लोगों को आजीविका का भी साधन भी बन जाये साथ ही वे अपनी बचत का कुछ भाग धार्मिक तथा सामाजिक सेवा में भी व्यय करते जिससे परिवार के सदस्यों पर शुभ संस्कार पड़ें, लोगों की डडडड में उनका सम्मान बढ़े और इस प्रकार परिवार के सदस्य की गरिमा के भाव से बुराइयों तथा अनुत्तरदायित्व पूर्ण कामों से बचे रहें।

सद्-गृहस्थ अपने परिवार के सदस्यों के बीच असमानता का व्यवहार नहीं करते। एक तो गुणी होने से उनमें समभाव यों भी बना रहता है दूसरे पारिवारिक शान्ति के लिये वे वैसा करने से यों भी बचते रहते हैं। वे पहनाने, खिलाने तथा अन्य सुविधा-साधन देने में न्यायनिष्ठ ही रहा करते हैं। जिसकी जो आवश्यकता तथा स्थिति होती है उसी के अनुसार उस पर खर्च करते और ध्यान देते हैं। किन्तु भोजन एवं वस्त्र के विषय में वे सब को एक बराबर ही रखते हैं। वे वस्त्रों तथा भोजन का ऐसा माध्यमिक स्तर स्थिर कर देते हैं जो उपयोगी, भद्र तथा सदा निभ सकने वाला हो। इसके लिये न तो वे स्वयं फैशनेबुल बनते हैं और न किसी दूसरे सदस्य को इसकी छुट देते हैं। वे अपने एम. ए. में पढ़ने वाले लड़के के लिये उसके डडडड व्यय के अनुसार दूसरों की अपेक्षा अधिक खर्च तो कर सकते हैं किन्तु खाने-पीने के सम्बन्ध में उसका स्तर अनावश्यक रूप से बढ़ने नहीं देते। इस प्रकार वे समभाव तथा नियमन के आधार पर अपने परिवार को कलह क्लेश के नारकीय वातावरण से सुरक्षित किये रहते हैं।

सद्-गृहस्थ शिष्टाचार को बहुत महत्व देते हैं। वे न तो स्वयं घर में अथवा बाहर किसी से अशिष्ट व्यवहार करते हैं और न अपने परिजनों को ऐसा करने देते हैं। वे स्वयं अनुशासित रहकर दूसरों को भी मर्यादित रहने के लिये विवश करते हैं। शिष्टाचार को सभ्यता का लक्षण मानने वाले सद्-गृहस्थ बच्चों तक से मधुर तथा आदरपूर्ण भंगिमा तथा भाषा में बोलते, बात करते हैं तब दाम्पत्य मर्यादा का उनसे उल्लंघन हो ही किस प्रकार सकता है? शील, संकोच, शालीनता तथा शीलता उनके स्वभाव के अलंकार हुआ करते हैं।

सद्-गृहस्थ शिक्षा को जीवन में सर्वोपरि स्थान देते हैं। वे अच्छी तरह जानते हैं कि यदि उनका परिवार अशिक्षा के अंधकार में पड़ा रहा तो लाख प्रयत्न करने पर भी सदस्यों में सद्गुणों का विकास नहीं किया जा सकता। अशिक्षित तथा अपढ़ व्यक्तियों पर सदाशयता के सारे प्रयत्न विफल चले जाते हैं। इसलिए वे हर मूल्य पर बच्चों तथा यथा सम्भव प्रौढ़ सदस्यों को शिक्षित एवं साक्षर बनाने के प्रयत्न से कभी विरत नहीं होते। यदि वे सबके लिये पाठशाला का प्रबन्ध नहीं कर सकते तो शेष सदस्यों को नित्य की पारिवारिक गोष्ठी में सद्शिक्षा एवं सद्ग्रन्थों द्वारा बौद्धिक शिक्षण दिया करते हैं। यदि वे उन्हें साक्षर नहीं बना पाते तो विचारवान् तो बना ही देते हैं।

सद्-गृहस्थ नियोजित परिवार में अखण्ड विश्वास रखते हैं। वे अपनी, समाज की तथा राष्ट्र की स्थिति के अनुसार उतने बच्चों में ही संतुष्ट हो जाते हैं जिनको शिक्षित, दीक्षित करके सभ्य तथा सफल नागरिक बना सकें। वे आवारा, निकम्मे, अपढ़ तथा अपराधी बच्चों की श्रृंखला बढ़ा कर अपराध नहीं करते। स्थिति के अनुसार दो या तीन बच्चों के बाद विराम लगाकर शेष जीवन संयम तथा ब्रह्मचर्य पूर्वक बच्चों का समुचित विकास करने तथा आत्मोद्धार के लिये लगाकर सदा सर्वदा के लिये सुखी तथा सन्तुष्ट हो जाया करते हैं। वे अच्छी तरह जानते हैं कि अधिक सन्तानों में अधिकाँश अविकसित, अशिक्षित तथा असभ्य ही रह जाती हैं। ऐसी सन्तानें जीवन के लिये कितना बड़ा अभिशाप सिद्ध होती हैं इसका प्रमाण अनियन्त्रित एवं असद्-गृहस्थों की दशा देखकर पाया जा सकता है।

गृहस्थ जीवन सर्वोपरि जीवन है, किन्तु कब तक? जब तक सद्-गृहस्थ बन कर पारिवारिक शान्ति, शिष्टाचार, शिक्षित परिवार नियोजन तथा बाल-विकास की शर्तों को पूरा करते हुये पारमार्थिक जीवन-यापन किया जाये और दाम्पत्य जीवन को भोग का माध्यम नहीं एक धार्मिक तथा आध्यात्मिक कर्तव्य समझकर निभाया जाये।


Quotation

(जैसे पक्षीगण वृक्ष का आश्रय लेते हैं, नदियाँ समुद्र का आश्रय लेती हैं और युवतियाँ पति का आश्रय लेती हैं, उसी तरह सभी गुण काँचन का आश्रय लेते हैं।)


भारतीय वेषभूषा और वस्त्र धारण

मनुष्य के स्वास्थ्य का सम्बंध भोजन से तो है ही वस्त्रों से भी कम नहीं है। मानव का शरीर जिन पाँच तत्वों से बना है उनमें वायु तथा प्रकाश बहुत महत्व है। यह दानों चीजें जीवन के लिये नितान्त आवश्यक हैं। यदि मनुष्य को कुछ दिन सूर्य का प्रकाश मिलना बन्द हो जाये तो वह शीघ्र विविध प्रकार के रोगों से आक्रान्त हो जाये, और वायु के अभाव में तो वह एक क्षण भी जीवित नहीं रह सकता। वायु को मनुष्य का प्राण बतलाया गया है। संसार से उत्तरी तथा दक्षिणी ध्रुव पर बसने वाले क्षेत्रों में, सही है कि छः छः महीने सूर्य के दर्शन नहीं होते। तब भी वहाँ पर प्रकृति की ओर से एक अद्भुत आलोक किसी कोने से चमका करता है। साथ ही मनुष्य अनेक उपलब्ध वस्तुओं का जलाकर रोशनी और गर्मी पैदा करके सूर्य के अभाव को पूरा कर लेते हैं। तब भी उन ध्रुवीय क्षेत्रों में प्राणी तथा वनस्पति बहुत कम मात्रा में पाये जाते हैं। अधिक ऊँचाइयों पर, जहाँ हवा विरल अथवा बिल्कुल नहीं होती, जाते समय मनुष्यों को श्वास लेकर वायु की पूर्ति करने के लिये वैज्ञानिक ढंग से बने हवा के थैले ले जाने होते हैं। अस्तु, वायु और प्रकाश मानव-जीवन के लिये आवश्यक पदार्थ हैं।

एक तो आज यों ही मनुष्य घरों में बन्द होकर इन दोनों प्राकृतिक तत्वों से दूर हो गया है। दूसरे उसे बाहर आने-जाने पर जो थोड़ा बहुत संसर्ग प्राप्त जो सकता है उसकी संभावना शरीर पर धारण किये जाने वो वस्त्रों ने क्षीण कर दी है। आज की सभ्यता तथा सामाजिक व्यवस्था में वस्त्र आवश्यक हैं। किन्तु इसका यह अर्थ तो नहीं है कि शरीर को वस्त्रों से इस बुरी तरह जकड़े रहा जाये कि वह वायु तथा प्रकाश के स्पर्श तक के लिये तरस जाये।

यों तो निसर्ग ने मनुष्य को नंगा, वस्त्रहीन पैदा किया है और उस दृष्टिकोण से वस्त्रावरण उसके लिये कृत्रिम तथा अस्वाभाविक आवश्यकता है। अब चूँकि हजारों वर्ष से मनुष्य वस्त्रों को पहनता चला आया है, उसका शरीर सर्वथा, सब ऋतुओं तथा कालों में नंगा रह सकने में अक्षम हो गया है। साथ ही लोक-लज्जा तथा सामाजिक व्यवस्था और मानवीय मान्यताओं के कारण वस्त्र अनिवार्य आवश्यकता बन गया है। सभ्यता का एक अंग मान लिया गया, शिष्टता तथा शालीनता का चिन्ह बन गया है। आज के युग में, यदि कोई नंगा रहने लगे तो लोग उसे असभ्य, जंगली, असामाजिक अथवा सनकी मानेंगे। यद्यपि साधुओं का वह सम्प्रदाय जो नग्न अथवा दिगम्बर रहा करता है कुछ कम हो गया है और जो हैं भी वे बस्तियों से दूर रहते हैं, जब कभी बस्ती में आते हैं तो सम्पूर्ण नग्नता में कुछ कमी कर लेते हैं, तथापि वे समाज से अलग वर्ग के अपवाद स्वीकार किये जाते हैं। उनकी इस दिगम्बरता के साथ धार्मिकता का सम्बन्ध जुड़ा हुआ है अन्यथा लोग उन्हें भी निर्लज्ज, लफंगा आदि न जाने क्या-क्या कहकर लाँछित तथा अस्वीकार कर देते। तब भी जो अधिक शिक्षित, अधिक शिष्ट, साहसी तथा खुले दिमाग के हैं उन दिगम्बर साधुओं की नग्न दशा को मान्यता नहीं देते। तात्पर्य यह कि वस्त्र आज सभ्यता, शिष्टता तथा मानवता का चिन्ह बनकर अनिवार्य आवश्यकता बन गये हैं।

लज्जा निवारण तथा ऋतु के प्रभाव से बचने के लिये मतलब भर के वस्त्र पहनना तो समझ में आता है, किन्तु शौक, फैशन अथवा दिखाये के लिये वस्त्र पर वस्त्र लादे रहना किसी प्रकार भी समझ में नहीं आता। शरीर को इस प्रकार अनावश्यक वस्त्रों से जकड़े रहने का परिणाम यह होता है कि लोग सूर्य के स्वास्थ्यदायक प्रकाश और वायु की जीवनी शक्ति से वंचित रह जाते हैं। प्रकाश और वायु स्वास्थ्य के लिये ही नहीं जीवन के लिये भी आवश्यक हैं। हमारा यह वस्त्रों सम्बन्धी शौक उन्हें प्राप्त होने देने में बाधक होता है। आजकल अधिकाँश लोग जिस प्रकार दिखावे के लिये कई-कई वस्त्र कसे रहते हैं वह निश्चय ही स्वास्थ्य के लिये घातक है। किसी बीमारी अथवा खास अवसर को छोड़ कर सदा वस्त्रों से घिरे रहने को सभ्यता का लक्षण मानना भूल है।

यह बात जरूर है कि आज के समय में किसी को दिगम्बर अथवा एक लँगोटी लगा कर घूमने की राय जरूर नहीं दी जा सकती, तथापि वस्त्रों की इस अनावश्यक बहुतायत का भी समर्थन नहीं किया जा सकता। गर्म देशों अथवा गरमी की ऋतु में सूती वस्त्र और ठंड में ऊनी वस्त्र पहनना बुरा नहीं और न अधिक ठंड पड़ने पर शारीरिक स्थिति के अनुसार एक से अधिक वस्त्रों पर आपत्ति की जा सकती, किन्तु शरीर रक्षा के दृष्टिकोण से न पहनकर शान-शौकत के लिये वस्त्र पर वस्त्र पहनना अवश्य आपत्तिजनक है। इससे व्यक्ति के स्वास्थ्य तथा व्यय पर कुप्रभाव पड़ता है और उसके माध्यम से पूरा समाज तथा राष्ट्र प्रभावित होता है।

यह व्यक्ति ही नहीं पूरे राष्ट्र के लिए दुर्भाग्य की बात है कि वस्त्रों को एक अनिवार्य आवश्यकता मान लिया गया है और उसे इतना महत्व दे दिया गया है कि भोजन के समकक्ष हो गई है। किन्तु कोई कोई लोग तो उसे भोजन से भी अधिक महत्व देते हैं और वस्त्रों की शान-शौकत के लिये भोजन का स्तर गिरा देते हैं। उनका सिद्धांत होता है कि- खाया-पिया कौन देखता है? इज्जत कपड़ों से बनती है। भोजन के नाम पर सूखी भले खालें किन्तु समाज में अच्छे कपड़े ही शोभा देते हैं। रौब खाने-पीने का नहीं कपड़ों का ही पड़ता है- कहना न होगा कि इज्जत की यह कितनी गलत मान्यता है। जो वस्त्र अस्वाभाविक हैं, अस्वास्थ्यकर हैं, उन्हें तो इतना महत्व दिया जाये और भोजन जो कि शरीर से लेकर आध्यात्मिक उन्नति का मूल आधार है वह गौण माना जाये। इसे विपरीत बुद्धि के सिवाय और क्या कहा जा सकता है?

सजावट, सुन्दरता अथवा आकर्षण के लिये मान-सम्मान के लिए वस्त्रों का सहारा लेना अथवा उन्हें महत्व देना भी सर्वथा निरर्थक है। सुन्दरता का आधार कपड़े नहीं स्वास्थ्य है, जो कि सर्वदा स्वाभाविक रहन-सहन से ही प्राप्त होता है। जो शोभा स्वस्थ शरीर में होती है वह कपड़ों से सजे अस्वस्थ शरीर में कहाँ? सीधी सच्ची बात तो यह है कि जिनका शरीर स्वाभाविक रूप से स्वस्थ तथा सुडौल होता है उन्हें न तो ज्यादा वस्त्र पहनने की आवश्यकता होती है और न वे पहनते ही हैं।

वस्त्रों का देश-काल के अनुसार ही पहनना ठीक है। हम भारतीयों के लिए भारतीय पहनावा उचित तथा लाभकारी है। किन्तु खेद का विषय है कि हमारे बीच से अपना स्वाभाविक तथा अनुकूल पहनावा तो उठता जा रहा है और उसके स्थान पर कोट, पतलून का विदेशी तथा अस्वाभाविक वेशभूषा बढ़ती जा रही है। अंग्रेजी राज्य के समय कभी इस प्रकार के पहनावे की विवशता रही होगी। किंतु अब तो हम सब उस विवशता से मुक्त हो गये हैं, तब समझ में नहीं आता कि भारतीय इन पहनावों को क्यों महत्व दिये जा रहे हैं। आज शिक्षित तथा कर्मचारी वर्ग ही नहीं साधारण मजदूर पेशा और अनपढ़ लोग भी पतलून से कम बात नहीं करते। इसे मानसिक गुलामी के सिवाय और क्या कहा जा सकता है? जबकि घोर दासता के समय देशी पोशाक का महत्व रखने वालों के प्रेरक उदाहरण मौजूद हैं।

पण्डित ईश्वरचन्द्र विद्यासागर अँग्रेजी राज्य में शिक्षा विभाग के एक ऊँचे पद पर थे। उन्हें बड़े-बड़े ऊँचे अफसरों से तो सम्बन्ध रहता ही था सप्ताह में दो-तीन बार बंगाल के गवर्नर से भी मिलना पड़ता था। किन्तु वे उनसे कभी भी कोट, पतलून पहनकर मिलने नहीं जाते थे। उनका पहनावा तनीदार कुरता तथा धोती रहता था। गवर्नर से मिलने के लिए ‘प्रापर ड्रेस’ का कानून बन जाने पर जब कोट, पतलून पहनने की विवशता आ पड़ी तो वे स्वदेश धनी एक दिन गवर्नर के पास गये और त्याग-पत्र दे देने का प्रस्ताव किया। गवर्नर ने कारण पूछा तो उन्होंने साफ कह दिया कि मुझे कर्तव्यवश आपसे मिलने आना ही होगा अब जिसके लिए कोट, पतलून का पहनना आवश्यक हो गया है। मैं अपनी देशी पोशाक का त्याग नहीं कर सकता इसलिये मजबूरी है कि पद से त्याग पत्र दे दूँ। बंगाल का अंग्रेज गवर्नर विद्यासागर के इस स्वाभिमान से बहुत प्रभावित हुआ और उसने उनके लिए ‘प्रापर ड्रेस’ का नियम अपवाद कर दिया।

लोकमान्य तिलक और पण्डित मदनमोहन मालवीय अदालतों, कौंसिलों तथा इंग्लैंड की पार्लियामेंटों तथा कौंसिलों में अपनी देशी पोशाक कुरता-धोती और पगड़ी पहनकर ही जाया करते थे। उन्होंने किसी दबाव अथवा प्रभाव से अपनी देशी वेशभूषा नहीं छोड़ी। जगत बंध बापू तो इसके आदर्श उदाहरण हैं। वे भारत सम्राट जार्ज पंचम से मिलने गये। नियमानुसार उन्हें बादशाह से मिलने के लिये विशेष पोशाक पहनने के लिये कहा गया। उन्होंने स्वाभिमान पूर्वक उसके पालन से इनकार करते हुये स्पष्ट कह दिया कि वे सम्राट् से अपनी इसी भारतीय भूषा कोपीन तथा उत्तरीय पहने ही मिलेंगे यदि उन्हें स्वीकार हो तो धन्यवाद अन्यथा मैं अपने देश बिना मिले ही वापस चला जाऊँगा। सम्राट् जार्ज पंचम बापू की इस देशभक्ति से बड़ा प्रसन्न हुआ और लँगोट धारी महात्मा से शाही पोशाक में बादशाह की हैसियत से मिले और खड़े होकर हाथ मिलाया। ऐसे-ऐसे ज्वलन्त उदाहरण होने पर भी हम भारतीयों को यदि आज स्वाधीनता के युग में भी अपने राष्ट्र वेश विन्यास के प्रति आस्था नहीं है और भूतपूर्व गुलामी के अवशेष विदेशी वेश अपने शरीर पर धारण किये रहते हैं तो कहना होगा कि हम तन से तो स्वतंत्र हो गये किन्तु मन से अभी भी अँग्रेजों के गुलाम बने हैं जो निश्चय ही एक धिक्कारपूर्ण मनःस्थिति है।

यदि प्रकृति, स्वास्थ्य तथा आवश्यकता के अनुसार देखा जाये तो पहनावे के विषय में भारतीय मनीषियों की मान्यता बहुत प्रशंसनीय तथा हितकर है। वे प्रकृति के इस नियम को जानते थे कि शारीरिक तथा मानसिक स्वास्थ्य रक्षा की दृष्टि से वायु तथा सूर्य के प्रकाश का हमारी देह से जितना संपर्क रहेगा उतना ही लाभदायक होगा। इसलिये उनका उद्देश्य, लज्जा निवारण के लिये वस्त्र-धारण करना रहता था। प्राचीन काल में वे एक अधोवस्त्र टखनों तक और ऊपर एक उतना बड़ा ही उत्तरीय डाले रहते थे। बस इससे अधिक वे कुछ न पहनते थे और न ओढ़ते थे। जन-साधारण भी अधिक से अधिक अँगरखा, धोती और पगड़ी पहनते थे जो काफी ढीले-ढाले और आराम देह रहते थे। यह वस्त्र न केवल स्वास्थ्यदायक ही होते थे वरन् सस्ता, सुलभ और जल्दी-जल्दी धोये जा सकने के योग्य भी होते थे। जाड़ों में वे अपेक्षाकृत कुछ मोटे ऊनी वस्त्र पहन लेते थे। यही पहनावा भारतीय जलवायु तथा देश की आर्थिक स्थिति के अनुकूल है, और यही सर्व साधारण को पहनना भी चाहिए। अधिक से अधिक अँगरखा के स्थापना पर कुरता, पगड़ी के स्थान पर टोपी बदली जा सकती है। धोती-कुरता और टोपी वास्तविक भारतीय पहनावा है। इन्हें ही पहना जाना उचित है अन्य अवसरों तथा देशकाल के अनुसार और तरह का भी पहनावा अनुचित नहीं किन्तु वह होना देशी ही चाहिए विदेशी अथवा विजातीय नहीं। इसी में ध्येय है, गौरव है और स्वास्थ्य की सुरक्षा।


सधन्यवाद वापस

भगवान बुद्ध परिव्राजन करते हुये एक ब्राह्मण के घर ठहरे। जब ब्राह्मण को मालूम हुआ कि वह बुद्ध हैं तो उसने जी भरकर गालियाँ दीं, अपशब्द कहे और तुरन्त निकल जाने को कहा।

बुद्ध देर तक सुनते रहे। जब उन सज्जन ने बोलना बन्द किया तो उन्होंने पूछा- द्विजवर! आपके यहाँ कोई अतिथि आते होंगे तो आप उनका सुन्दर भोजन और मिष्ठान से स्वागत करते होंगे? इसमें क्या शक। उनने उत्तर दिया। और यदि किसी कारणवश मेहमान उसे स्वीकार न करें तो आप उन पकवानों को फेंक देते होंगे?

फेंक क्यों देते हैं, हम स्वयं ग्रहण कर लेते हैं- उन्होंने विश्वासपूर्वक उत्तर दिया।

“तो हम आपकी यह गालियों की भेंट स्वीकार नहीं करते, अपनी वस्तु आप ग्रहण करिये।” यह कहकर बुद्ध मुस्कराते हुये वहाँ से चल पड़े।


सौंदर्य की स्वाभाविकता और उसका आधार

संसार में सभी लोग सुन्दर होना और बने रहना चाहते हैं। असुन्दरता अथवा कुरूपता सभी को अप्रिय है। कोई नहीं चाहता कि वह कुरुप हो अथवा कुरुप दिखलाई दे। अपनी इस इच्छा को पूरा करने के लिए लोग तरह-तरह के कृत्रिम साधनों का सहारा लेते हैं। आज संसार में प्रसाधन सामग्री बनाने वाले सैकड़ों कारखाने चल रहे हैं। बाजारों में सैंकड़ों दुकानें प्रसाधन सामग्री बेचती देखी जा सकती हैं। लोग अपनी आय का एक बड़ा अंश इस प्रसाधनों पर खर्च करते रहते हैं। लेकिन तब भी वे संतोषजनक ढंग से सुन्दर नहीं बन पाते।

इस असफलता का कारण केवल यही है कि जिन साधनों, प्रसाधनों और उपकरणों में सुन्दरता की खोज की जा रही है वह उनमें होती ही नहीं है। वास्तविक सुन्दरता साधनों की अनुगामिनी नहीं होती उसका आधार तो स्वस्थ शरीर, निर्विकार मन और पवित्र आचरण होता है। सुन्दरता की लिप्सा में जो लोग प्रसाधनों का सहारा लेते हैं वे अपने स्वाभाविक शरीर और धन का दुरुपयोग ही किया करते हैं। क्रीम से लिपा और पाउडर से पुता मुख पता नहीं किन लोगों को अच्छा लगता होगा। जब तक कोई व्यक्ति शरीर के आरोग्य, उसकी सुचारु कार्य क्षमता और मन की महानता का प्रमाण नहीं देता उसका सौंदर्य प्रकट नहीं हो पाता।

हाथी-सा शरीर लेकर भी जो मनुष्य कुछ सराहनीय कार्य नहीं कर पाता, अपनी शक्ति का सदुपयोग कर किसी का भला नहीं करता तब तक उसका शरीर कितना ही हृष्ट-पुष्ट और बलवान क्यों न हो असुन्दर ही माना जाएगा। मन का सौंदर्य सद्विचारों और वृत्तियों की पवित्रता से प्रकट होता है। मन मलीन होने, वृत्तियों आसुरी होने पर किसी का नाक-नक्शा कितना ही मनोहर क्यों न हो, सुन्दर नहीं कहा जा सकता। उसे सुन्दरता का हर पारखी कुरूप ही मानेगा और कहेगा।

सुन्दरता की तरह कुरूपता भी कोई एक तत्व नहीं है। उसके लक्षण असुन्दर मुख, काला रंग अथवा शरीर का दुबला-पतला होना नहीं है। बहुत से काले रंग और साधारण शरीर वाले बड़े ही सुन्दर और आकर्षक होते हैं। कुरूपता मनुष्य के चारित्रिक कलुष के सिवाय और कुछ नहीं है। इसे एक मानसिक रोग भी माना जा सकता है। जिनका हृदय तरह-तरह की कलुषित भावनाओं, ईर्ष्या, द्वेष और काम, क्रोध से जलता रहता है उनके मुख पर उसकी काली छाया कुरूपता बनकर छाई रहती है।

ऐसे एक नहीं हजारों लोग संसार में देखे जा सकते हैं जिनका रंग गोरा चिट्टा और नाक-नक्शा भी अच्छा होता है लेकिन सुन्दरता के स्थान पर कुरूपता ही उनके मुख पर छाई दिखती है। यह और कुछ नहीं उनके मलीन हृदय की छाया ही होती है। शारीरिक स्वास्थ्य का भी सुन्दरता से कम सम्बन्ध नहीं होता। प्रायः देखा जाता है कोई व्यक्ति काफी सुन्दर होते हैं, लेकिन कुछ दिनों में वे ही व्यक्ति यदि किसी रोग से ग्रसित हो जाते हैं तो देखने में बड़े कुरूप और दयनीय लगते हैं। स्थायी अस्वास्थ्य की तो बात छोड़ दीजिये। साधारण अस्वास्थ्य तक मनुष्य को कुरूप बना देता है। जैसे कल तक एक व्यक्ति देखने में सुन्दर और आकर्षक था, किन्तु आज उसे ज्वर आ गया तब भी आकार-प्रकार में कोई अंतर न आने पर भी उसके मुख की आभा मलीन हो जाती है। वह औरों को ही नहीं अपने को स्वयं कुरूप लगने लगता है। शारीरिक स्वास्थ्य का सुन्दरता से बड़ा घनिष्ठ सम्बन्ध है।

संयम का जहाँ स्वास्थ्य से सम्बन्ध है वहाँ सुन्दरता से भी सीधा सम्बन्ध होता है। जो व्यक्ति असंयमी और व्यसनी अथवा विषयी होते हैं, यदि वे स्वस्थ रहे हैं तो स्वास्थ्य तो क्रमशः गिरता है लेकिन सौंदर्य जल्दी ही जाता रहता है। असंयमी व्यक्ति जहाँ जवानी में कुरूप और अनाकर्षक दिखने लगता है वहाँ संयमी व्यक्ति वृद्धावस्था में भी सुन्दर और आकर्षक बने रहते हैं। असंयम और व्यसन वासनाएँ सुन्दरता की स्वाभाविक शत्रु होती हैं।

जो स्वस्थ, संयमी और निष्कलुष मन वाला होता है वह निश्चय ही सुन्दर दिखता है फिर चाहे वह रंग से काला और शरीर से साधारण स्वास्थ्य वाला ही क्यों न हो। पशु-पक्षी और पेड़-पौधे भी जब तक निरोग और प्रसन्न रहते हैं, बड़े सुन्दर लगते हैं। किन्तु इसके विपरीत स्थिति में आते ही अनाकर्षक हो जाते हैं। जिन हिरनों और पक्षियों की सुन्दरता उनकी स्वतन्त्र जंगली स्थिति में छलकती रहती है, पाल या पकड़ लिए जाने पर वह बात नहीं रहती। जंगल के शेर, चीते, भालू आदि जानवर जितने सुन्दर और आकर्षक दिखते हैं उतने सरकस और चिड़ियाघरों के नहीं। जबकि उन्हें किसी प्रकार का कष्ट नहीं दिया जाता और बड़े प्यार और परवाह से पाले जाते हैं।

इसका कारण यही होता है कि पराधीनता के कारण वे अपनी मौज से खेल-कूद और भाग-दौड़ नहीं सकते। बन्धन के कारण उनका स्वास्थ्य और मन उद्विग्न रहा करता है। इसी अस्वास्थ्य और निषाद की छाया उन पर मँडराती हुई उनका आकर्षण हरण कर लेती है। कुत्ते, बिल्ली, बकरी, भेड़ यहाँ तक कि गधे और सुअरों आदि पालतू जानवरों के बच्चे तक, जब तक वे अपनी मौज में खेलते और खुश होते हुए स्वस्थ रहा करते हैं बड़े प्यारे और सुन्दर लगते हैं। किन्तु ज्योंही किन्हीं कारणों से उनकी यह विशेषता नष्ट हो जाती है लोग उन्हें नापसन्द करने लगते हैं। सुन्दरता का रहस्य उत्तम स्वास्थ्य, निश्चिन्त जीवन, हर्ष और उल्लास में छिपा हुआ है। जो इन गुणों से रहित है वह कितनी ही सुगढ़ शरीरयष्टि और साफ नाक-नक्शे वाला क्यों न हो सुन्दर दिखलाई नहीं दे सकता।

एक दंपत्ति जब वे नए-नए ब्याह कर आते हैं एक-दूसरे को बड़े ही सुन्दर, आकर्षक और प्यारे लगते हैं। किन्तु जब कुछ दिनों बाद उनमें आपस में कलह और कुढ़न रहने लगती है तब उनका सारा सौंदर्य और आकर्षण समाप्त हो जाता है और पारस्परिक प्रेम भी कम होने लगता है। ऐसा इसलिए होता है कि वाद-विवाद, कलह-क्लेश और आपसी कुढ़न उनके तन-मन को अस्वस्थ कर देती है, उनकी प्रसन्नता को छीन लेती है। इस प्रकार सुन्दरता का आधार समाप्त हो जाने से वह भी समाप्त हो जाती है।

इनसे भिन्न कुछ दंपत्ति ऐसे भी होते हैं जो आजीवन एक-दूसरे के लिए सौंदर्य, आकर्षण और प्रेम के पात्र बने रहते हैं। बुढ़ापे तक में वे एक दूसरे को नवीन जैसे लगते हैं। इसका कारण यही होता है कि वे कभी भूलकर भी परस्पर न तो लड़ते-झगड़ते हैं और न कलह-क्लेश ही करते हैं। उनका मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य सुरक्षित रहता है। इस प्रकार वे आजीवन सुन्दर और आकर्षक बने रहते हैं।

जो व्यक्ति आकार प्रकार और रंग-रोगन से अच्छे होते हुए भी अनाकर्षक दिखें तो समझ लेना चाहिए कि वे निश्चय ही अस्वस्थ हैं। यदि उनका शरीर किसी रोग से ग्रसित नहीं है तो अवश्य ही उनका मन, चिन्ता, उद्वेग, उत्तेजना, तनाव, ईर्ष्या-द्वेष आदि किसी न किसी मानसिक व्याधि से ग्रसित है। यदि वे इसको अपने चेतन मन में अनुभव नहीं कर पाते तो भी यह व्याधि उनके मनःचेतना में लगी होती है। जब भी कोई व्याधि मन या तन में लगी होगी मनुष्य की सुन्दरता नष्ट हो जाती है। सुन्दरता का रहस्य स्वस्थ तन और प्रसन्न में निवास करता है।

सौंदर्य वर्धन अथवा उसे उत्पन्न करने के लिए कृत्रिम साधनों पर निर्भर होना पैसे की बरबादी के साथ अपने में एक मिथ्या सन्तोष पाल लेना है। प्रसाधनों से लिपे-पुते और उपकरणों से सजे लोग अपने मन में यह झूठा संतोष भले रखे रहें कि वे सुन्दर दिख रहे हैं। वस्तुतः वे दिखते हैं असुन्दर ही। कृत्रिम प्रसाधन वास्तविक सुन्दरता की प्राप्ति नहीं करा सकते। बहुत बार तो वे व्यक्ति की अपनी सुन्दरता भी नष्ट कर देते हैं। ऐसे बहुत से स्त्री-पुरुष देखे जा सकते हैं, जो कामोवेश सुन्दर होते हैं, लेकिन सुन्दरता बढ़ाने या फैशन दिखलाने के लिए प्रसाधनों और उपकरणों का प्रयोग करते रहते हैं। इस निरर्थक बात से उनकी अपनी सुन्दरता भी मारी जाती है। जब वे प्रसाधन मुक्त होते हैं तो उसकी अपेक्षा कहीं ज्यादा सुन्दर लगते हैं जबकि वे प्रसाधन भुक्त होते हैं।

अभिनेताओं जैसी साज-सज्जा बनाये रहने से सौंदर्य में वृद्धि नहीं होती बल्कि गाँठ की सुन्दरता भी कम हो जाती है। बहुत बार देखा जा सकता है कि जो स्त्री-पुरुष सुन्दर होने पर भी और अधिक सुन्दर दिखने के लिए प्रसाधन प्रयोग करते हैं फिर वे उनके बिना भद्दे और कुरूप लगने लगते हैं। पाउडर और क्रीम, लाली और नाखूनी प्रयोग करने वाली स्त्रियाँ जब किसी कारण से उसका उपयोग नहीं कर पातीं तो उनका चेहरा और हाथ-पैर बड़े भद्दे लगने लगते हैं। बात यह होती है कि क्रीम और पाउडर से चेहरे का स्वाभाविक रंग और उसकी स्निग्धता नष्ट हो जाती है। नाखूनों और आंखों का रंग मारा जाता है। वे चितकबरे और विवर्ण हो जाते हैं। किसी कारणवश जब वे क्रीम पाउडर और लाली का प्रयोग नहीं कर पातीं तो उनके वे भाग शेष शरीर से भिन्न तथा मंद रंग वाले होने से असंगति उत्पन्न कर देते हैं और तब उनका चेहरा बड़ा भद्दा, उजड़ा-उजड़ा-सा दिखने लगता है। कृत्रिम प्रसाधनों का प्रयोग लोगों की अपनी सुन्दरता भी नष्ट कर देते हैं। इनका कीतदास बन जाना अपने सौंदर्य और आकर्षण से शत्रुता करना है।

यदि आप चाहते हैं कि आप सुन्दर दिखें और आपका सौंदर्य स्थायी बने तो कृत्रिम साधनों को छोड़कर प्राकृतिक उपायों पर आ जाइये। परिश्रम अथवा न्याय द्वारा अपने शरीर को हृष्ट-पुष्ट, सुडौल और स्वस्थ बनाइये। सारे विकार और विजातीय तत्त्व निकाल कर फेंक दीजिए। साधारण स्वास्थ्यदायक भोजन करिए। दैनिक-चर्या में नियमों का पालन करिए। आपको सौंदर्य का पहला आधार आरोग्य प्राप्त होगा। संयम और ब्रह्मचर्य व्रत का निर्वाह करिए, विषयों और व्यसनों से अपना पीछा छुड़ाइए। आप में ओज नामक तत्त्व का उदय होगा। जो स्वयं ही एक सौंदर्य का प्रकार है।

तन के साथ मन का भी सुधार करिए। काम, क्रोध, ईर्ष्या, द्वेष, चिन्ता, उद्वेग, कलह-क्लेश, क्षेम आदि मानसिक रोगों को निकाल डालिए और उनके स्थान पर प्रसन्नता, प्रसाद, हर्ष, उल्लास तथा निश्चिन्तता की वृत्तियाँ प्रबल बनाइए। संसार की सारी कुरूपताओं से सम्बन्ध तोड़कर, फिर चाहें वे चरित्र सम्बन्धी हों अथवा संपर्क सम्बन्धी हों, सुन्दरताओं से संपर्क स्थापित करिए। निश्चय ही आप में सौंदर्य की वृद्धि होगी और वह स्थायी भी बन जाएगा।


आत्मा से आवाज फूटी

माहिष्मती के प्रतापी सम्राट नृपेन्द्र का यश पूर्णिमा के चन्द्रमा की भाँति सर्वत्र फैल रहा था। राजकोष, सेना, स्वर्ण, सौंदर्य, शक्ति किसी वस्तु का कोई अभाव न था। महाराज नृपेन्द्र प्रजावत्सल और न्यायकारी थे। सम्पूर्ण प्रजा भी उन्हें बहुत श्रद्धा की दृष्टि से देखती थी।

समय बीता। शक्तियाँ घटीं। शरीर टूटा। वृद्धावस्था बढ़ने लगी और उसके साथ ही नृपति के अन्तर में उद्वेग और क्षोभ छाने लगा। उन्होंने बोलना-चालना बन्द कर दिया। किसी से मिलते भी नहीं थे। उदास, बेचैन राजा न जाने किस चिन्ता में डूबे रहते।

एक दिन बड़े सवेरे सम्राट राज-उद्यान की ओर निकल गये। एक स्फटिक शिला पर पूर्वाभिमुख अवस्थित नृप अब भी कोई वस्तु खोज रहे थे। धीरे-धीरे प्रातः रवि उदित हुआ। राजसरोवर में उनकी बालकिरणें पड़ीं और सहस्त्र दल-कमल खिलने लगा। धीरे-धीरे कमल पूर्ण रूप से खिल गया और अपना सौरभ सर्वत्र बिखेरने लगा।

आत्मा से आवाज फूटी- क्या तुम अब भी रहस्य नहीं जान पाये कि सूर्य का प्रकाश कहाँ से आता है? प्रकाश उनकी अन्तर स्फुरणा नहीं है क्या? कमल का सौरभ उसके भीतर से ही फूटता है। यह जो सर्वत्र जीवन दिखाई देता है वह सब विश्व-आत्मा के भीतर से ही फूटता है। आनन्द का स्रोत तुम्हारे भीतर है उसे तुम्हें ही जगाना पड़ेगा। उसके लिए आत्मोन्मुख बनना पड़ेगा और साधना करनी पड़ेगी।


अपनों से अपनी बात-

वैज्ञानिक अध्यात्मवाद और प्रबुद्ध परिजनों का सहयोग

विगत दो अंकों में, जुलाई, अगस्त की अखण्ड-ज्योति के इसी स्तम्भ के अंतर्गत यह बताया जा चुका है कि अध्यात्म को आज की लोक-मनोभूमि के अनुसार प्रतिपादित एवं प्रस्तुत करने की कितनी बड़ी आवश्यकता है। आज के जन-साधारण की मनोभूमि किसी भी विषय को, बुद्धि-संगत ढंग से समझने की है। अब तर्क, प्रमाण, उदाहरण, विज्ञान को आधार माना जाता है। शास्त्र-पुराणों की बात अब गले नहीं उतरती। इन बदली हुई परिस्थितियों में अध्यात्म को उसी पृष्ठ-भूमि में प्रतिपादित करना पड़ेगा, अन्यथा नई पीढ़ी उसे कल्पना, भावुकता, अंधविश्वास, परम्परागत आग्रह आदि कहकर इस महान तत्त्व-ज्ञान का तिरस्कार, उपहास एवं उपेक्षा, अवज्ञा करती चली जायेगी। फलतः व्यक्ति और समाज की उस बढ़ती अनास्था के कारण भारी हानि सहन करनी पड़ेगी।

आध्यात्मिक आस्थाओं के बिना आदर्शवादिता, उत्कृष्टता, संयम, सदाचार, न्याय, सौहार्द, स्नेह, सद्भाव, पुण्य, परमार्थ, तप, त्याग जैसी एक भी सत्प्रवृत्ति को जीवित नहीं रखा जा सकता। जब मानवीय चेतना पेड़-पौधों की तरह शरीर के साथ ही समाप्त हो जाने वाली मान ली गई तो फिर किसी भी कीमत पर मौज उड़ाने का लक्ष्य ही बाकी बच रहेगा। मानवीय संस्कृति की चिर उपलब्ध उत्कृष्टता और आदर्शवादिता को अपनाने के कष्ट साध्य मार्ग पर चलने का कोई आधार ही शेष न रहेगा। भौतिकवादी तत्त्व-ज्ञान मानवीय सभ्यता के लिए एक भयावह विभीषिका है, उससे समय रहते सावधान होने की आवश्यकता है। यदि इस दिशा में उपेक्षा बढ़ती गई और प्रवाह तीव्र होता चला गया तो उसे रोकना कठिन हो जायेगा। अतएव युग की यह महती आवश्यकता हर विचारशील को अनुभव करनी चाहिए और जिससे जितना सम्भव हो उसे इस दिशा में प्रयत्न करना चाहिए कि अध्यात्म के तत्त्व-ज्ञान को नई पीढ़ी की बुद्धिवादी पृष्ठभूमि के अनुरूप प्रतिपादन कर सकना सम्भव हो सके।

‘अखण्ड-ज्योति परिवार’ के प्रबुद्ध परिजन इस दिशा में क्या कर सकते हैं, इसकी संक्षिप्त जानकारी गत दो अंकों में छापी जा चुकी है। तदनुसार कितने ग्रेजुएट स्तर के परिजनों ने भावनापूर्ण पत्र भेजे हैं। हम जानते हैं कि कई पत्र क्षणिक उत्साह में कौतूहल मात्र समझ कर लिखे गये हैं और भावुकता के उफान में 20 पैसा का लिफाफा खर्च कर गये हैं। वे समझ नहीं पाये कि उन्हें इसके लिये प्रतिदिन कुछ घण्टे का समय लगाते रहने की कई वर्ष निरन्तर आवश्यकता पड़ेगी और जीवन के अत्यन्त आवश्यक कामों में एक अति महत्त्वपूर्ण कार्य इसे भी मानकर निरन्तर सोचने, पूछताछ करने और भागने-दौड़ने की आवश्यकता पड़ेगी। क्षणिक आवेश को स्थिर प्रयत्न के रूप में परिणत करना पड़ेगा। ऐसी उथली तबियत में लिखे गये, क्षणिक आवेश वाले प्रस्ताव कुछ ही दिन में अपने आप निरस्त हो जायेंगे। उनकी छटनी एकाध महीने में ही हो जायेगी। तब तक पता चल जायेगा कि इनमें से कौन काम के और कौन बेकाम के हैं।

हम जानते हैं कि परिवार में काम के- लगनशील, कर्मठ और दृढ़ प्रतिज्ञा भी हैं और वे एक बार किसी बात की उपयोगिता एवं महत्ता को स्वीकार कर लें तो उसके लिए देर तक-निरन्तर-यहाँ तक कि जीवन भर भी काम करते रह सकते हैं। ऐसे साहसी, सन्तुलित और स्थिर-मति व्यक्ति ही अपना उत्साह और प्रयत्न सुदृढ़ बनाये रख सकते हैं और उसी आधार पर कुछ ठोस काम हो सकता है। विश्वास है कि कुछ ठोस व्यक्ति भी जरूर निकलेंगे, उनकी संख्या थोड़ी-सी भी हो, किन्तु विचारों में दृढ़ता एवं लक्ष्य के प्रति आस्था के आधार पर वे बहुत काम कर सकेंगे। ऐसे व्यक्तियों की परीक्षा भी जल्दी ही हो जायेगी तब उन्हें कुछ ठोस काम भी सौंपा जा सकेगा।

पिछले अंक में सहयोग के इच्छुक स्वजनों के लिए कुछ काम सौंपा है जिनमें प्रमुख यह हैं-

(1) जो विषय उनने ग्रेजुएट स्तर तक पढ़े हों उनकी सामान्य जानकारी के नोट्स आरम्भ से लेकर इण्टर अथवा हायर सेकेण्डरी स्तर के बनाकर भेजने चाहिए। इतना हजम कर लेने और पढ़ लेने के उपरान्त आगे के ग्रेजुएट स्तर के नोट्स मागेंगे। दो किश्तों में हमें अपनी पढ़ाई पूरी करनी है। पहली किश्त में हायर सेकेण्डरी (इण्टर) स्तर, दूसरे में एम. ए. स्तर। इतना अध्ययन- आधुनिक सभी विचार पद्धतियों की जानकारी- होने के उपरान्त ही इतने महान् विषय का सम्पादन सम्भव हो सकता है।

यह नोट ऐसे हों जिन्हें उस विषय का अनजान व्यक्ति भी समझ सके। उदाहरण, प्रमाण, हवाले, समर्थन का संदर्भ जितना अधिक होगा उतनी ही प्रामाणिकता एवं उपयोगिता रहेगी।

कौन किस विषय के नोट तैयार कर रहे हैं इसकी पूर्ण जानकारी हमें दे देनी चाहिए ताकि अन्य लोगों से उस विषय में श्रम न कराया जाय। जानकारी दिये बिना कई व्यक्ति एक ही विषय पर नोट लिखने लगे तो अन्य का श्रम पुनरावृत्ति होने के कारण व्यर्थ हो जायेगा।

इन नोटों की जरूरत इसलिए है कि हमें बुद्धिवादी आधार पर वैज्ञानिक अध्यात्म का प्रतिपादन करने से पूर्व आधुनिक विचार-विज्ञान तथा पदार्थ-विज्ञान की समस्त धाराओं एवं शाखाओं का सामान्य ज्ञान प्राप्त जाय। इसके बिना इतना विशाल प्रतिपादन सम्भव नहीं हो सकता। अब तक हम कतिपय विषयों को अपने पाठक-परिजनों की पढ़ाते-लिखते रहे हैं। अब हमें भी कुछ सीखना है। अनुमान तो न था कि बुढ़ापे में स्कूली पढ़ाई पढ़नी पड़ेगी, सो भी तब जबकि जीवन का अन्तिम अध्याय अति समीप आ गया। फिर भी किया क्या जाय? कठपुतली को अपने मालिक के इशारे पर नाचने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं, सो हमें भी वह अप्रत्याशित करना पड़ रहा है। अपने परिजनों से इन नोटों के आधार हमें इस वर्ष वह समस्त शिक्षण प्राप्त कर लेना है जिससे विचार-विज्ञान (फिलासफी) एवं पदार्थ-विज्ञान (साइन्स) की लगभग 600 शाखाओं की आवश्यक जानकारी प्राप्त हो सके।

ग्रेजुएट स्तर के पाठक हमें इतना पढ़ा सकते हैं और हम उनके भेजे नोटों के आधार पर काम चला सकते हैं। इसलिये विश्वास है यह एक बहुत बड़ी आवश्यकता इस वर्ष आसानी से पूरी कर ली जायेगी। कौन हमें कब पढ़ायेगा यह बात जल्दी ही बतायी जाय तो एक निश्चिन्तता अनुभव की जायेगी।

(2) दूसरा कार्य यह सौंपा गया है कि अपने नगर की प्रायः सभी अच्छी लायब्रेरियों को तलाश कर लिया जाय। और उनमें यह ढूँढ़ा जाय कि अध्यात्मवाद को बुद्धिसंगत ढंग में प्रतिपादन करने वाली पुस्तकें वहाँ कौन-कौन हैं? पुस्तकों के नाम, उनके लेखक, मूल्य और प्राप्ति के पूरे पते यह सभी बातें नोट करके एक लिस्ट बना लेनी चाहिए और उनकी एक-एक प्रति हमारे पास भेज देनी चाहिए।

इस प्रकार की लिस्टें तैयार हो जाने पर पता चल जायेगा कि कहाँ-कहाँ कौन-कौन उपयोगी पुस्तकें हैं। पीछे उन्हें पढ़ने और उपयोगी सारांश नोट करते रहने के लिए विभिन्न व्यक्तियों को कहा जायेगा। इस दिशा में पुनरावृत्ति न होने पाये, एक ही पुस्तक को अन्य ग्रामों के भी अन्य व्यक्ति हाथ में न ले लें, यह कार्य पर्व सूचना और परामर्श के आधार पर ही सम्भव हो सकेगा। यह आवश्यक है कि सारी जानकारियाँ एकत्रित हो और पुनरावृत्ति की आशंका न रहे।

किन विषयों की पुस्तक ढूंढ़नी हैं, इस सम्बन्ध में निम्न बातें ध्यान में रखनी चाहिए-

अलौकिकता

सूक्ष्म-जगत, सूक्ष्म-शरीर, किन्हीं भविष्य कथनों की प्रामाणिकता, उड़न-तश्तरियाँ, लोक-लोकान्तरों के प्राचीन व्यक्तियों की चमत्कारी विशेषताएँ, प्रेतात्माओं का आस्तित्व, योग की सिद्धियाँ, देव शक्तियों के वरदान, अभिशाप, अति मानव-स्तर, दिव्य-दृष्टि, दूरस्थ-व्यक्तियों से विचार विनिमय, मानवीय-विद्युत, संकल्प-शक्ति, मनोबल आदि।

ईश्वर-आत्मा-

ईश्वर के अस्तित्व की सिद्धि, आत्मा का स्वतन्त्र अस्तित्व, कर्मफल की सचाई, स्वर्ग-नरक आत्मा और जीव का संपर्क एवं प्रतिफल, द्वैत-अद्वैत-त्रैत की विभिन्न मान्यतायें। आस्तिकवादी और नास्तिकवादी दार्शनिकों के तर्क और प्रतिपादन भारतीय तथा पाश्चात्य ढंग से।

साधना-

योग-साधना के विभिन्न प्रकार परिचय, और स्वरूप, ध्यान, तप, तितीक्षा, विचारातीत स्थिति, समाधि, कुंडलिनी, इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना, नाड़ी-संस्थान, षट्चक्र, राज-योग, हठ-योग, लय-योग, मन्त्र योग, प्राण-योग आदि योगों का विवरण एवं संकेत आदि।

धर्म-

कर्त्तव्य-शास्त्र, अपराध-शास्त्र, प्रायश्चित्त, सदाचार-समर्थन, शारीरिक और मानसिक संयम, साहस, श्रम और पुरुषार्थ, सेवा-परोपकार, दान-पुण्य, मृदुलता, शिष्टाचार, सौहार्द, सहयोग, स्नेह, संगठन, ईमानदारी, सच्चाई, त्याग, सच्चरित्रता, समता, कर्त्तव्य-परायणता आदि का पक्ष प्रतिपादन।

नास्तिकवादी सिद्धान्तों का परिचय-

आत्मा, ईश्वर, धर्म, संयम, दवा, कर्मफल की दैवी व्यवस्था। पुनर्जन्म आदि अध्यात्मवादी सिद्धान्तों के विरुद्ध जो तर्क एवं प्रतिपादन किया गया है उनका पूरा परिचय।

अपनी दिशा में चलने वाले साथी-

ऐसे भारतीय अथवा विदेशी सज्जनों के नाम-पते तथा परिचय, जिन्होंने इस दिशा में कुछ सीखा, पढ़ा, लिखा हो अथवा ढूँढ़-खोज की हो। ऐसे पुस्तक प्रकाशकों, पुस्तक विक्रेताओं, पुस्तकालयों के पते जहाँ अपनी आवश्यकता का साहित्य अधिक मात्रा में मिलने की संभावना हो। किसी भी भाषा में छपने वाली ऐसी पत्रिकाओं के पते जो अपने विषय पर प्रकाश डालती हों।

अभी फिलहाल इन चार प्रकार की जानकारियों के संग्रह करने का काम हमें आरम्भ कर देना चाहिये। इसके उपराँत अन्यान्य कार्य हाथ में लिये जा सकते हैं। जिनकी व्यक्तिगत योग्यता, रुचि, एवं स्थिति जिस प्रकार की होगी, उन्हें वैसा कार्य सौंपा जा सकेगा। पर अभी तो प्रारम्भिक कार्य ही हाथ में लेना चाहिये और प्रयत्न यह करना चाहिए कि उपरोक्त चार आधारों की जितनी ज्यादा जानकारी अभी एकत्रित की जा सके वह करली जाय। हमें उस आरम्भिक कार्य को पूरा करने में जुटना चाहिए।

इस कार्य में जिन्होंने रुचि दिखाई है और सहयोग देने का उत्साह प्रकट किया है उन्हें अपना कार्य वस्तुतः कुछ अधिक कर सकने की दिशा में सफलता प्राप्त कर सकने के लिए यह प्रयत्न करना चाहिए कि अपने कुछ साथी सहयोगी अपनी ही जैसी रुचि, प्रकृति और शिक्षा के ढूँढ़ लेने चाहिये और उनकी एक छोटी समिति बना लेनी चाहिये जो अवकाश के समय इकट्ठे होकर परस्पर विचार विनिमय एवं ढूँढ़-खोज में सहयोग दिया करें। ढूँढ़-खोज में कई सदस्यों का मस्तिष्क जब मिल-जुल कर काम करता है और थोड़ा-थोड़ा समय सभी का मिलता है तो कार्य में सरलता हो जाती है और थोड़ा-थोड़ा करने पर भी कुछ अधिक काम हो सकना सम्भव हो जाता है। जो नये साथी ढूंढ़े जाँय उन्हें जुलाई, अगस्त और सितम्बर के तीनों ‘अखण्ड-ज्योति’ अंकों में छपी ‘अपनों से अपनी बात’ स्तंभ वाली यह विज्ञप्तियाँ पढ़ा देनी चाहिये और स्वयं भी उन्हें विस्तारपूर्वक सारी पृष्ठ-भूमि समझा देनी चाहिये। जिन्हें पूरी जानकारी मिल सकेगी वे ही बात को ठीक तरह समझ सकते हैं और कुछ काम के सिद्ध हो सकते हैं। अधूरी जानकारी वालों से कुछ काम होगा भी तो वह बेतुका और अप्रासंगिक होने से निरर्थक ही चला जाता है।

अपना विषय, उद्देश्य और कार्यक्रम यथा सम्भव इन तीन अंकों में समझाने का प्रयत्न किया गया है, फिर भी बात बिल्कुल नई और कार्य-पद्धति अपरिचित होने के कारण यह सम्भव है कि उसे पूरी तरह समझने में और कार्य रूप में परिणत करने का आधार बनाने में कठिनाई तथा भूल हो सकती है। इसलिए अधिक अच्छा यही है कि एक बार मथुरा आकर इस संदर्भ में विस्तार से परामर्श एवं विचार-विनिमय कर लिया जाय एवं अपनी परिस्थिति तथा मनोभूमि के उपयुक्त कार्य-पद्धति निर्धारण करली जाय। अभी दिवाली तक हमारा रहना मथुरा ही है, इसके बाद जाड़े के दिनों में कतिपय प्रोग्रामों पर भी जाना पड़ेगा। इसलिए अच्छा यही है कि दशहरा और दिवाली के बीच जो छुट्टियाँ पड़ेंगी उन्हीं में मथुरा आकर मिल लिया जाय। जो आयें वे पूर्व सूचना देकर उत्तर अवश्य प्राप्त कर लें ताकि पूर्व निर्धारित समय निश्चित रहने से किसी को कोई असुविधा न हो।

प्रसन्नता की बात है कि कुछ प्रबुद्ध परिजनों ने इस दिशा में सहयोग देने का उत्साह दिखाया है। पर कार्य की विशालता को देखते हुये अभी सहयोग की मात्रा कम है। अधिक व्यक्तियों का अधिक समय, श्रम एवं सहयोग अभीप्सित है। इन पंक्तियों द्वारा इस सहयोग को सादर आमंत्रित करते हैं। यह सभी सहयोग बिना किसी अर्थ अथवा यश की कामना से ही किया जाना है, सो ध्यान रखा जाय।

वैज्ञानिक अध्यात्मवाद सम्बन्धी विवरण जुलाई, अगस्त, सितम्बर अंकों में छपा है। किसी अपरिचित को इस संदर्भ में पूरी बात जाननी, बतानी हो तो उन्हें यह तीनों अंक साथ-साथ पढ़ने चाहिए। जिन ग्रेजुएट स्तर के सज्जनों ने सहयोग देने का वचन दिया है उन्हें अपने कुछ और साथी भी ढूंढ़ने-बनाने चाहिए। जिनसे कुछ आशा हो उन्हें पूरी जानकारी देने के लिए इन तीनों अंकों का साराँश इकट्ठा छापा जा रहा है। इसकी प्रतियाँ आवश्यकतानुसार बिना मूल्य मँगाई जा सकती है।


VigyapanSuchana

अन्य भाषा-क्षेत्रों में भी कदम बढ़ेंगे

भारत की तथा संसार की अन्यान्य भाषाओं में युग-निर्माण विचारधारा का अनुवाद तथा प्रकाशन किया जाना आवश्यक है। यह न किया जा सकता तो हिन्दी भाषी क्षेत्र तक ही यह प्रयत्न एवं प्रकाशन सीमित रह जायेगा। नव-निर्माण हिन्दी भाषी क्षेत्र का ही हो यह पर्याप्त न होगा। अस्तु हमें उन भाषाओं को भी अपना कार्यक्षेत्र बनाना होगा जिनके साहित्य से भारत ही नहीं समस्त विश्व की जनता के साथ- संपर्क बनाया जा सकता है।

साधन न होते हुए भी यह दुस्साहस तो आखिर करना ही पड़ेगा और उसे किया भी जाता है। सस्ते ट्रैक्टों का अनुवाद कार्य अभी गुजराती, मराठी, बंगला और अँग्रेजी भाषाओं में करने का काम हाथ में लिया गया है। इस संदर्भ में एक विज्ञप्ति भी गत अंक में छापी गई है। इस सम्बन्ध में पुनः ध्यान दिलाया जाता है। जो अनुवाद कार्य कर सकने में अपने को उपयुक्त मानते हों वे पत्र व्यवहार कर लें। साथ ही अखण्ड-ज्योति का एक लेख अपनी अभ्यस्त भाषा में अनुवाद करके भेजें ताकि कार्य के सम्बन्ध में अधिक परिचय प्राप्त हो सके।

सोचा यह भी जा रहा है कि ‘युग-निर्माण’ पत्रिका को इन भाषाओं में अनुवादित करके प्रकाशित किया जाने लगे ताकि उन क्षेत्रों में भी विचारधारा फैले। वर्तमान पाठकों में से जो अपनी भाषा में पत्रिका पढ़ने के इच्छुक तथा उत्साही हों वे भी अपना नाम नोट करा दें ताकि समुचित संख्या होने पर उपयुक्त कदम उठाया जा सके।


नवनिर्माण का प्रेरणाप्रद साहित्य

1- ईश्वर और उसकी प्राप्ति-1)

2- वेदों का दिव्य सन्देश-1)

3- पन्थ अनेक लक्ष्य एक-1)

4- आप सर्व शक्तिमान हैं-1)

5- आत्म-कल्याण का राज मार्ग-1)

6- जिन्दगी कैसे जियें-1)

7- सद्गुणों की सच्ची सम्पत्ति-1)

8- अपना उद्धार आप करें-1)

9- आशा को जीवन-ज्योति-1)

10- विचारों की अलौकिक शक्ति-1)

11- संकल्प शक्ति के अद्भुत चमत्कार-1)

12- प्रगति के पथ पर-1)

13- मनुष्य का मूल्यांकन-1)

14- चिन्ता छोड़िये-प्रसन्न रहिए -1)

15- इन दुर्गुणों को छोड़िए-1)

नवनिर्माण का दर्शन एवं मार्ग

1- हम बदलें तो दुनियाँ बदले-1)

2- समाज की अभिनव रचना-1)

3- समस्त समस्याओं का एक ही हल-1)

4- नए युग की नई प्रेरणा-1)

5- हमारी युग-निर्माण योजना-1)

6- नए युग का सूत्रपात-1)

7- विष से अमृत की ओर-1)

8- शिखा और यज्ञोपवीत का रहस्य -1)

9- मनुष्य में ईश्वर की झाँकी-1)

10- जीवन संग्राम में कैसे जीतें?-1)

11- आप लेखक कैसे बनें?-1)

12- प्रभावशाली वक्ता बनने की कला?-1)

आरोग्य-रक्षा और प्राकृतिक चिकित्सा

1- आरोग्य रक्षा के रहस्य -1)

2- क्या खाएं? कैसे खायें? -1)

3- बलवर्धक व्यायाम-1)

4- शक्ति का स्रोत प्राणायाम-1)

5- कब्ज कैसे दूर हो? -1)

6- प्राकृतिक चिकित्सा विज्ञान-1)

7- कल्प चिकित्सा-1)

8- तम्बाकू घातक विष है-1)

9- तुलसी के चमत्कारी गुण-1)

बाल-निर्माण साहित्य

1- शिशु जन्म से पूर्व-1)

2- शिशु और अभिभावक-1)

3- हमारे महान् उत्तराधिकारी-1)

4- बच्चे और उनका मनोविज्ञान-1)

5- बालकों का नवनिर्माण-1)

6- बाल विकास की समस्याऐं-1)

7- बच्चों को कैसे सुधारा जाय?-1)

8- बच्चों की शिक्षा-दीक्षा-1)

9- बालकों को इन दुर्गुणों से बचाइए -1)

10- बच्चे सद्गुणी कैसे बनें?-1)

11- बालकों को इस तरह सुधारिए -1)

पारिवारिक समस्याओं का हल

1- परिवार और उसका निर्माण-1)

2- सुख-शान्तिमय गृहस्थ-1)

3- सुसंतुलित परिवार-1)

4- मितव्ययी बनिए-सुखी रहिए -1)

कथा इतिहास और जीवन-चरित्र

1- धर्म पुराणों की सत् कथाएँ -1)

2- चरित्र-निर्माण की कथाएँ -1)

3- भारत की महान् विभूतियाँ -1)

4- संसार के महापुरुष-1)

5- बड़ों की बड़ी बातें-1)

6- व्रत और त्यौहार-1)

कविता और गायन

1- युग सन्देश-1)

2- युग गायन-1)

3- युग वीणा-1)

4- उद्बोधन-1)

5- दोहा अंताक्षरी-1)

डाक खर्च सब हर हालत में पुस्तकें मँगाने वालों को ही देना पड़ता है। हाँ, 10 रुपये से अधिक की पुस्तकें मँगाने पर 15 प्रतिशत कमीशन मिलता है।


ऐसी बात नहीं

(लाखन सिंह भदौरिया “शैलेन्द्र”)


ऐसी बात नहीं (Kavita)

आँधी टिकती नहीं, विटप तो फिर भी रहते हैं, लिये फलों की भेंट थपेड़े अनगिन सहते हैं। जन-हित का हो भार, साधना रत मेरे साधक, धरो न उस पर ध्यान कि जो निष्क्रिय जन कहते हैं। सहो वार पर वार मगर तन्मयता भंग न हो, उड़ जायेंगे बात-बवण्डर, सुख सौगात नहीं! झंझावात रहेंगे हरदम ऐसी बात नहीं!

निर्माणों की नींव पड़ रही गहरी गहरी है, कृत्य कर रहा नृत्य, लग रहा गति ही ठहरी है। जन मन की व्यग्रता मधुर फल पाने को आकुल, जब कि प्रात की किरण उगी है, नहीं दुपहरी है। गढ़ो सलोनी मूर्ति शिल्पियो पियो नहीं पानी, छैनी चलती रहे, करें विचलित आघात नहीं। झंझावात रहेंगे हरदम ऐसी बात नहीं!

कार्य माँगता समय, कथन में क्या लगता बोलो! वाणी को कृत्तित्व-तुला पर रख कर तो तोलो। निज सपने साकार देखने के चिर अभिलाषी, लिखो स्वप्न का रूप क्रिया की आँखों को खोलो। खिलो प्राण जलजात, किरण किन्नरियाँ नाच रही, भरा तुम्हारा कोष कौन कहता अब प्रात नहीं? झंझावात रहेंगे हरदम ऐसी बात नहीं!

धीमी गति को देख धैर्य का साथ नहीं छोड़ो। लेकर क्रान्ति मशाल शान्ति का हाथ नहीं छोड़ो। कुरुक्षेत्र में खड़ा राष्ट्र के अर्जुन का रथ है- तुम सारथी सुजान, जिधर चाहो रथ को मोड़ो। जिससे मिटे कुहासा उन्मन अर्जुन के मन का, वह विराट् झाँकी दिखलाओ काँपे गात नहीं। झंझावात रहेंगे हरदम ऐसी बात नहीं।

*समाप्त*