सेवा करना इनसे सीखो

क्या तुम सच्चे सेवक बनना चाहते हो? सच्ची समाज सेवा करने की इच्छा मन में है? तो आओ, आज हम कुछ ऐसे सच्चे सेवकों का परिचय आपसे करायें, जो हमारे लिए मार्ग दर्शक हो सकते है। संध्या समय पश्चिम आकाश में अस्त होने वाले सूर्य को देखो। बारह बारह घंटों तक पृथ्वी को प्रकाश देने के पश्चात् भी वह निश्चित होकर विश्राम लेने जाना नहीं चाहते हैं। मैं चला जाऊँगा फिर सृष्टि को प्रकाश कौन देगा? उसे अन्धकार से कौन उबारेगा? इस चिन्ता में देखो उनका मुख मंडल म्लान हो गया है। सच्चे सेवक की सेवा की भूख कभी शांत नहीं होती।

चन्द्र के पास स्वयं का प्रकाश नहीं है। फिर भी वह दूसरे का तेज उधार लेकर अपने को आलोकित करता है। सच्चे सेवक को साधन का अभाव कभी नहीं खटकता।

हमारी शक्ति बहुत थोड़ी है, इसलिए हमसे क्या सेवा हो सकेगी। क्या तुम ऐसा सोचते हो? नहीं, नहीं, ऐसा कभी मत सोचो। आकाश के तारों की ओर देखो। ब्रह्माण्ड की तुलना में कितने अल्प हैं, फिर भी यथाशक्ति सेवा करने- भूमण्डल को प्रकाशित करने - लाखों की संख्या में प्रकट होते है और अमावस्या की अँधेरी रात में अनेकों का पथ -प्रदर्शन करते हैं।

थक कर, ऊब कर सेवा क्षेत्र का त्याग करने का विचार कर रहे हो? तुम्हारे सामने बहने वाली इस सरिता को देखो। उद्गम से सागर तक संगम होने तक कभी मार्ग में वह रुकती है? ‘सतत कार्यशीलता’ यही उसका मूल मंत्र है। मार्ग में आने वाले विघ्नों से वह डरती नहीं तो तुम क्यों साधारण संकटों एवं अवरोधों से घबराते हो? वह नदी कभी ऊँच-नीच का भाव जानती ही नहीं। मनुष्य मात्र ही नहीं, पशु-पक्षी या वनस्पति सबकी निरपेक्ष सेवा करना ही वह अपना धर्म समझती है। सेवक के लिए कौन ऊँच और कौन नीच?

‘इन अज्ञानी लोगों की क्या सेवा करें? इनका सुधरना असम्भव है’ ऐसा मत सोचो। देखो कीचड़ में यह कैसा सुन्दर कमल खिला है? तुम भी अज्ञान के कीचड़ में कमल के समान खिलकर कीचड़ की सुरभि पैदा करो, सच्चे सेवक की यही कसौटी है।

-स्वामी विवेकानन्द,


आत्म-बल हमारी सबसे बड़ी वैभव विभूति

ईश्वर की कृपा स्वरूप- उनके कृपा और अनुग्रह के रूप में एक ही पुरस्कार मिलता है- आत्म-बल यह वह कल्पवृक्ष है, जिसके नीचे बैठकर हर कामना के समाधान का मार्ग मिल सकता है। यह, वह पारस है, जिसको छूकर छोटी परिस्थिति में पड़ा हुआ लोहे जैसा लगने वाला व्यक्ति भी स्वर्ण जैसा शोभायमान और बहुमूल्य बन सकता है। जिसके पास आत्म बल है, उसके पास कभी किसी वस्तु की कमी नहीं रह सकती।

गायत्री महामंत्र में सविता देवता के वरेण्य वर्ग की याचना अथवा उपासना की जाती है। तेजस्वी परमात्मा हमें ब्रह्म तेज प्रदान करेंगे तो फिर और कमी किस बात की रह जायेगी स्वर्ण मुद्रा के बदले संसार भर में कहीं भी, कोई भी, वस्तु खरीदी जा सकती है। आत्म तेज के बदले में भी हर क्षेत्र में प्रगति का पथ प्रशस्त किया जा सकता है। जिसे यह दैवीय वरदान मिल गया, वह धन्य हो गया और जिसे इससे वंचित रहना पड़ा उसके लिए प्रचुर सुविधा सामग्री होते हुए भी पग पग पर भय, चिन्ता, निराशा, आशंका, बेचैनी के दृश्य ही दृष्टिगोचर होते रहेंगे। कभी चैन की नींद सोने का अवसर ना मिलेगा।

अपना स्वरूप, अपना वर्चस्व, अपना महत्व न समझने का नाम ही अज्ञान है। बहुत पढ़ा होने पर भी कोई व्यक्ति अज्ञानी ही रहेगा, यदि उसे आत्म-बोध नहीं हुआ। ऐसा अज्ञानी अन्धकार में भटकता है और उपनिषद् की भाषा में ‘असुर्या’ नामक तमसाछन्न नरक में दुःख दैन्य की यातना सहता हुआ-रोते कलपते- जीवन भार वहन करता है।

यदि हममें आत्मा है- अपने अन्दर आत्म-तत्त्व विद्यमान् है तो फिर उसका स्वाभाविक गुण आत्म-बल भी अपने अन्दर ही होना चाहिए, उसे कहीं बाहर ढूँढ़ना नहीं पड़ता और न कहीं बाहर से लाना पड़ता है वह तो अजस्र मात्रा में अपने ही भीतर विद्यमान् है। केवल उसे उभारना, निखारना, सँभालना भर है। इतने भर प्रयत्न को यदि साधना कहा जाता हो तो उसे कहने, मानने में भी कोई हर्ज नहीं है। इस साधना का यही स्वरूप है कि हम अपने परम शक्तिशाली स्वरूप की अनुभूति करें और यह समझें कि अपने चारों और जो वातावरण घिरा हुआ है, वह मकड़ी के जाले की तरह अपना ही कर्तव्य है। हमारी भीतरी स्थिति ही बाहरी क्षेत्र में सुख-दुःख अथवा सुविधा-असुविधा का रूप धारण कर घूमती रहती है। हम कारण है परिस्थितियाँ कारण। अपनी मान्यतायें और गतिविधियाँ ही है, जो आरोह अवरोह बनकर हमें हँसाने रुलाने के लिए छाया चित्र की तरह आती जाती रहती है।

हम आज जैसे भी कुछ है अपनी ही मान्यताओं के कारण बने है। अपना आन्तरिक ढाँचा बदल दें तो बाह्य परिस्थितियों का स्वरूप बदलने में तनिक भी देर न लगेगी। भवसागर के बन्धन, जंजीरें किसी और ने नहीं बाँधी है, उन्हें हमने स्वयं ही बनाया और धारण किया है। माया नाम की भवबन्धन में बाँधने वाली सत्ता का अस्तित्व संसार में अन्यत्र कहीं नहीं है, उसे अपनी प्रतिगामी मान्यताओं की प्रतिक्रिया मात्र समझना चाहिये।

गुण, कर्म, स्वभाव की दुर्बलताएँ ही हमारी प्रगति में मुख्य बाधाएँ हैं। यदि अपने में सद्गुणों का- सत्कर्मों का- सत्प्रवृत्तियों का- सद्भाव का बाहुल्य हो तो निश्चित रूप से सम्पदायें और विभूतियाँ चारों और से खींचकर हमारे आस-पास जमा होने लगेगी। पुष्प खिलता है तो उस पर भ्रमर, मधुमक्खी, तितली अनायास ही मँडराने लगते हैं। मनुष्य का अन्तःकरण परिष्कृत हो- व्यक्तित्व उत्कृष्ट बने तो कोई कारण नहीं की उसे प्रगति पथ पर अग्रसर होने के लिए प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष- व्यक्तियों और सूक्ष्म चेतनाओं का सहयोग न मिले। विभिन्न क्षेत्रों में आश्चर्यजनक प्रगति कर सकने वाले व्यक्तियों की सफलताओं का मूल कारण यदि बारीकी से तलाश किया जाय तो एक ही निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि उन्होंने अपने सद्गुणों को बढ़ाया, उनसे गतिविधियाँ सुव्यवस्थित बनी, इनसे दूसरे लोग प्रभावित हुए, उन्हें प्रामाणिक माना। प्रामाणिकता का सहयोग मिलता है। जिसे जन श्रद्धा एवं सहयोग उपलब्ध है, उसके लिए प्रगति पथ पर आगे बढ़ने के मार्ग में आने वाले अवरोध तृषा के समान हैं। वे दिखते भर हैं, सामने आते ही चूर-चूर हो जाते हैं। आत्मा की शक्ति इतनी प्रचण्ड है कि उसके सामने किसी संकट का ठहर सकना सम्भव नहीं।

आत्म-बल का प्रकाश ही नगण्य से मानव जीवन को विभूतिवान बनाता है। जीवन की तलाश ढोने वाले करोड़ों नर-पशुओं के बीच जो भी अपना अनुकरणीय प्रकरण इतिहास के पृष्ठों पर छोड़ सकने वाले थोड़े से नर-रत्न होते हैं, उनमें दूसरों की अपेक्षा एक ही विशेषता- आत्म बल की अधिकता होती है। इसके बिना तन कर कोई खड़ा नहीं हो सकता, न कोई महत्त्वपूर्ण निर्माण करता है और न उन महत्त्वपूर्ण कार्यं का सम्पादन करने का साहस कर सकता है, जो मानव जीवन को आनन्द और उल्लास से परिपूर्ण प्रकाशवान एवं धन्य बनाते हैं। आत्म बल ही वह जीवन तत्त्व है, जो साँस लेते हुए जीवित मृत के टिड्डी दल में से किसी सजीव को सूर्य-चन्द्र की तरह चमकने में समर्थ बना सकता है।

आत्म-बल का रत्न-भण्डार आत्म-चेतना की भूमिका में जागृत होने पर ही उपलब्ध होता है। ‘मैं आत्मा हूँ’ यह मान्यता यदि अन्तरात्मा के गहन अन्तरंग तक प्रवेश कर जाय तो व्यक्ति सचमुच यह अनुभव करने लगे कि वह शरीर एवं मन से ऊपर उठी हुई ईश्वरीय पवित्रता एवं महानता से सुसम्पन्न आत्मा है। उसे अपनी गतिविधियाँ आत्मा के कर्तव्य और गौरव से बनानी है तो इस भावना की प्रतिध्वनि उसके रोम-रोम में गूँज उठेगी और नये सिरे से उसे विचार करना होगा कि उसका जीवन लक्ष्य, कर्तव्य एवं गन्तव्य मार्ग कहाँ है। इन प्रश्नों का उत्तर कठिन नहीं है। हर अन्तःकरण में इन प्रश्नों का उत्तर मौजूद है। उसे किसी गुरु या शास्त्र से पूछने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।

आत्म-चेतना की भूमिका में अन्तःकरण जाग पड़े तो इसे महानतम सौभाग्य कहना चाहिये। ईश्वर का यही सबसे बड़ा अनुग्रह, देवताओं का सबसे बड़ा वरदान और गुरुजनों का यही सबसे बड़ा आशीर्वाद है। नर-तन की सार्थकता इस महान् जागरण पर ही अवलम्बित है। जो इस भूमिका में जगा उसी ने अपने अन्तरंग और बहिरंग जीवन को उत्कृष्टता के ढाँचे में ढाला और उसी की गतिविधियाँ आदर्शवादिता का महान् प्रकाश बनकर इतिहास के पृष्ठों पर चमकी। स्वाति बूँद पड़ने से सीप में मोती, केले में कपूर, बाँस में वंशलोचन, सर्प में मणि उत्पन्न होने की बात सुनी गई है।

यह बातें प्रामाणिक हो चाहें अप्रमाणिक, पर यह नितान्त सत्य है कि आत्म-चेतना की भूमिका में जगा हुआ मनुष्य नर से नारायण बन जाता है। पपीहे की प्यास स्वाति नक्षत्र का जल पीने से शान्त होती सुनी गई है, कह नहीं सकते कि यह कहाँ तक ठीक है पर यह नितान्त सत्य है कि आत्मा की प्यास तभी बुझती है, जब अन्तःकरण आत्म चेतना की भूमिका में जाग जाता है और यह अनुभव करता है कि मैं शरीर और मन नहीं वरन् अविनाशी आत्मा हूँ। मुझे शरीर और मन की लपक बुझाते रहने के लिये नहीं वरन् आत्मा के गौरव की कथा करने के लिये इस बहुमूल्य मानव-जीवन के एक-एक क्षण का सदुपयोग करना है।

इस धर्म संकट की घड़ी में आत्मा को महाभारत के अर्जुन की स्थिति में खड़ा होना होता है। चिर परिचित चिर अभ्यस्त पुरानी मान्यतायें एवं गतिविधियों के प्रति मोह, ममता का होना स्वाभाविक है। अर्जुन अपने चारों ओर स्वजन, सम्बन्धियों से घिरा हुआ और खड़ा हुआ देखता है। वे सभी विरोधी बने हुए हैं। इनसे कैसे लड़ा जाय? यह मोह अर्जुन को आ घेरता है और वह गाण्डीव को नीचे रखकर बैठ जाता है। आत्म- भूमिका में जागृत हुआ व्यक्ति अपनी वर्तमान गतिविधियों पर दृष्टि डालता है तो वे निरर्थक बाल-क्रीड़ा मात्र दीखती हैं। जरा-सा पेट- थोड़े से परिश्रम से गुजर की सम्भावना-फिर अधिकाधिक धन कमाने के पीछे जीवन-लक्ष्य के लिये आवश्यक कर्तव्यों की उपेक्षा क्यों? कुत्ते द्वारा सूखी हड्डी चबाये जाने पर अपने ही जबड़ों का रक्त पाकर उसे जो प्रसन्नता होती है, वैसा ही अनुकरण इन्द्रिय-वासना के लिये जीवन-तत्त्व को निचोड़ते हुए करते रहने में क्या बुद्धिमतां?

अनेकों दोष दुर्गुणों और अवांछनीय क्रिया-कलापों में संलग्न जीवन क्रम से इतना मोह किस लिये? यह प्रश्न उत्पन्न होते हैं। कर्तव्य कहता है कि पुराने ढर्रे को तोड़े, इससे लड़ों और अवांछनीय को हटाओ। पर अर्जुन का मोह उस पुराने, चिर अभ्यास, चिर परिचित ढर्रे को छोड़ने, तोड़ने का साहस नहीं कर पाता और सोचता है जैसा चल रहा है, वैसा ही चलने दिया जाय। कर्तव्य पालन यदि इतना झंझट भरा है- आत्म जागरण का यदि इतना महँगा मूल्य चुकाना पड़ता तो उसे छोड़ ही क्यों न दिया जाय?

गीता ग्रन्थ आत्मा की इसी समस्या को सुलझाने के लिये लिखा गया है। भगवान् ने अनेक तर्कों और तथ्यों के आधार पर अर्जुन को समझाया कि यह चिर परिचित गतिविधियों कुटुम्बी, सम्बन्धियों की तरह अति निकटवर्ती और प्रिय बन गई है, फिर भी इन्हें हटाया जाना आवश्यक है। यदि इन्हें जहाँ के तहाँ यथावत् रहने दिया गया तो अनीति और पाप का ही दौर-दौरा बना रहेगा। साधना समर में अपने ही अज्ञान असुर से तो लड़ना पड़ता है, यदि इस संघर्ष संग्राम से इनकार किया गया तो वीर क्षत्रियों को मिलने वाले श्रेय और स्वर्ग से वंचित रहना पड़ेगा। कर्तव्य धर्म के साथ संघर्ष जुड़ा हुआ है। यदि संघर्ष से मुख मोड़ना है तो कर्तव्य धर्म भी छोड़ना पड़ेगा। अतएव अर्जुन चिर-परिचितों का चिर-सहचरों का मोह छोड़ और वह कर जिससे श्रेयस् की साधना सम्पन्न होती है।

आत्म-बल उपलब्ध करने की साधना करने वाले हर साधक को अर्जुन का अनुसरण करते हुए अग्नि परीक्षा में होकर गुजरना होता है। उसे सबसे पहला काम आत्म-निरीक्षण द्वारा अपनी दुष्प्रवृत्तियों और मूर्खताओं का निराकरण करना होता है। जो गतिविधियाँ शरीर और मन को प्रसन्नता दे पर आत्मा को भूखा मारे, उन्हें मूर्खता नहीं तो और क्या कहा जाय? जो प्रवृत्तियाँ नश्वर संसार की विनोदात्मक हलचलों में रस लेने के लिये प्रेरित करती रहे- उसके लिए कुकर्म करने तक के लिये फुसलाते रहे आत्मा को नारकीय यातनाएँ सहने को विवश करे, उन्हें मूर्खता नहीं तो और क्या कहें? विवेक भूमिका में जागृत आत्मा यदि अपनी मूर्खताओं को भी न हटा सका तो उसके जागरण का आखिर प्रयोजन ही क्या रहा?

आत्म-बल वे उपार्जित करते हैं जो आत्म समीक्षा और आत्म-सुधार के लिये अपनी चिर अभ्यस्त गतिविधियों को उलट-पुलट डालने का साहस कर सकें और इस मार्ग में जो उपहास, विरोध, कष्ट एवं अवरोध सहना पड़े, उसे

न्यायाधीशों ने महात्मा सुकरात को मौत की सजा सुनाई। उपस्थित जनता यह देखने को उत्सुक थी कि मौत की सजा का सुकरात पर क्या असर होता है। सरकारी कर्मचारियों ने सुकरात से पूछा- “महात्मा! आपकी कौन सी इच्छा है, जिसे आप मरने से पहले पूरा करना चाहते हैं।”

सुकरात मुसकराये और बोले- “ अब मैं मरकर उलझनों से छुटकारा पाना चाहता हूँ। मैं उन लोगों से बहुत प्रसन्न हूँ, जिन्होंने मुझे मौत की सजा दी। मेरी इच्छा है कि जब मेरे बच्चे बड़े हो जाएँ तब यदि वे सत्य के बजाय वैभव या अन्य कोई वस्तु खोजें तो उन्हें कड़े से कड़ा दंड देने की व्यवस्था की जाय।”

धैर्यपूर्वक सहन कर लें। भौतिक एवं आत्मिक प्रगति के लिए- सम्पत्तियों और विभूतियों से सुसम्पन्न बनने के लिये आत्म बल आवश्यक है। उसकी उपयोगिता हमें जाननी ही चाहिये और इस संसार के इस एकमात्र सार तत्त्व को प्राप्त करने के लिये कुछ उठा न रखना चाहिये। संसार के सारे वैभव आत्म-बल की तुलना में तुच्छ हैं। जिसके पास आत्म बल है वही आत्म-भूमिका में जागृत हुआ जीवन युक्त नर नारायण है। जो आत्म-बल सम्पन्न है, उसके लिये इस संसार में कुछ ऐसा कुछ नहीं जिसे असम्भव कहा जा सके।


आत्मा के रहस्य के खुलते पन्ने

‘दि ह्यूमन परसनैलिटी एण्ड आर्टस सरबाइवल आफ बाडीली डेथ के लेखक सुप्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक श्री एफ॰ डब्लू॰ एच॰ मेयर्स ने एक घटना दी है-यह घटना अमरीका के वर्जीनिया प्रान्त में प्रकाशित होने वाली मेडिको लीगल पत्रिका के जून 1896 अंक में छपी थी और श्री ड्यूरी उसके लेखक थे। घटना इस प्रकार है-

“एक हृष्ट-पुष्ट व्यापारी जिसकी आयु लगभग 50 वर्ष रही होगी, व्यापार के लिये सामान लेने की दृष्टि से एक दूसरे शहर गया। उसे श्री के. कहते थे। बड़ा ही नेक ईमानदार सच्चरित्र आर शान्ति प्रिय। काफी दिन शहर में रहकर उसने तिजारत की, मित्रों से मिला और सामान इकट्ठा किया। अन्त में सामान जहाज की एक कोठरी में बन्द कराया। टिकट भी बुक करा ली, किन्तु जब जहाज चलने लगा तो बहुत खोज-बीन करने पर भी उस व्यापारी का कोई पता न चला।”

“6 माह बाद वह घर आया तो अत्यन्त दुर्बल और अशान्त-सा हो गया था। वस्त्र वही पहले वाले थे। जेब में जहाज की कोठरी की चाभी भी पड़ी थी। जब उसे होश आया तो उसने अपने आपको एक फलों वाली गाड़ी हाँकते हुए पाया। उसे यह जरा भी याद न था कि वह वहाँ कब, क्यों और कैसे आया उसे जहाज के कमरे में प्रवेश तक स्मरण था, उसके बाद 6 माह तक उसने क्या किया, कहाँ रहा, इसका उसे कुछ भी याद नहीं रहा।”

इसी पुस्तक के पैरा 225 में मेयर्स ने एक और घटना दी है- एल्या जेड नाम की कन्या बड़ी सुशील और बुद्धिमान थी। काफी परिश्रम करने के कारण उसका स्वास्थ्य कुछ बिगड़ गया। इस अवस्था में 2 वर्ष रहने के बाद एकाएक बालिका का व्यक्तित्व बदल गया। उसने कहा-मेरा नाम ‘टुआई’ है वह अमरीका के आदिवासियों की भाषा बोलने लगी, जिसका पहले उसे जरा भी ज्ञान नहीं था। इस अवस्था में उसकी फुर्ती और प्रसन्नता देखते बनती थी। वह अनोखी और मनोरंजक बातें करती थी। जब उस शरीर में फिर एल्या जेड आ जाती थी तो वही पहले की सी रुग्ण हो जाती थी।”

यह दो उदाहरण लिखने के बाद मेयर्स ने लिखा है-भौतिक मस्तिष्क से एक ही परिस्थिति में दो भिन्न-भिन्न व्यक्ति कैसे उत्पन्न हो सकते हैं, शरीर की बनावट में कोई अन्तर आये बिना स्मृति का बदल जाना और कोई नया व्यक्तित्व व्यक्त होना आत्मा के अस्तित्व का ही प्रमाण है। यह अनुसन्धान बताते हैं कि मनुष्य में आत्मा है और यह आत्मा मृत्यु के पश्चात् भी जीवित रहती है। यह बात चाहे साइन्स पढ़े-लिखे हों, चाहे साइन्स को मानने वाले हों स्वीकार किये बिना कल्याण नहीं।

आत्मा की हमारे शास्त्रों में त्रिकालदर्शी कहा गया है। यों भविष्य की कुछ बातें यंत्रों की सहायता से भी मालूम हो जाती हैं पर वे बहुत मोटी है। मौसम सम्बन्धी थोड़ी जानकारी के अतिरिक्त विज्ञान कुछ नहीं जान पाता पर कई बार ऐसी विलक्षण घटनायें घटती हैं, जिन्हें देख कर यह मानना पड़ता है कि भौतिक मन से भी बहुत प्रचण्ड क्षमता वाली कोई शक्ति मनुष्य शरीर में है और वह अतीत की ही नहीं अनागत भविष्य की भी अनेक बातें काफी पहले जान लेती हैं, ऐसा क्यों होता है, यह कभी बाद में लिखेंगे, यहाँ एक घटना का उल्लेख करेंगे, जिससे समदर्शी आत्मा के अस्तित्व का प्रमाण मिलेगा। यह घटना हिन्दुस्तान टाइम्स के 19 मई 1981 के अंक में प्रकाशित हुई थी और स्टाक होम के ‘डेजन्स नेहटर’ पत्र से उद्धृत की गई थी-

“स्वीडन देश के स्टाक होम की जुलाई 1940 की की बात है। हन्स क्रेजर नामक एक क्लर्क अपनी चौथी मंजिल वाले कमरे में बैठा हुआ, दूर तक फैले हुए बल्कि सागर को छूकर आ रही शीतल वायु का सेवन कर रहा था। एकाएक उसकी दृष्टि सामने वाले मकान के चौथी मंजिल वाले कमरे में दौड़ गई। उसने देखा एक युवती कमरे में बैठी कोई पुस्तक पढ़ रही है। अपनी और आकृष्ट करने के लिये हम क्रेजर काफी देर तक उधर ताकता रहा। सहसा उसने एक अल्पवयस्क व्यक्ति को कमरे में प्रवेश करते देखा। उसके हाथ में एक लम्बा खुला हुआ चाकू था और उसकी मुद्रा बहुत डरावनी हो रही थी। उस मनुष्य ने वहाँ पहुँचते ही उस युवती के पेट में चाकू भोंक कर हत्या कर दी, वह महिला चिल्लाकर धराशायी हो गई। यह सब इतनी शीघ्र हुआ की क्रेजर सहायता के लिये भी नहीं पहुँच सका। वह खड़ा होकर चिल्लाया भी पर नीचे उसकी आवाज नहीं पहुँच सकी। वह काफी घबरा गया था।

क्रेजर शीघ्रता से नीचे उतरा और उस मकान के स्वामी के पास जाकर उक्त घटना का विवरण घबराते हुए सुनाया और शीघ्रता से ऊपर के कमरे में चलने का आग्रह किया। मकान का स्वामी हँसा और बोला-क्रेजर तुम्हारा मस्तिष्क शराब हो गया है, चौथी मंजिल पर तो कोई किरायेदार रहता ही नहीं, वह कमरे खाली पड़े हैं, वहाँ किसकी हत्या होगी।” पर क्रेजर माना नहीं उसने पुलिस को सूचना दी। पुलिस आई और क्रेजर के बताये कमरे में गई पर वहाँ न कोई आदमी, न कोई लाश। फिर भी क्रेजर बराबर हठ करता रहा कि उसने सच-सच हत्या होते देखा है। अन्त में उसे पागल समझ कर पागल खाने भेज दिया गया।

एक सप्ताह बाद एक स्त्री और एक पुरुष उस मकान के स्वामी के पास किराये के मकान के लिये आये। पहले तो मकान का स्वामी चौंका, क्योंकि वह स्त्री और वह पुरुष ठीक जैसे ही कपड़े पहने थे, जैसा कि क्रेजर बता रहा था, किन्तु फिर वह सँभल गया, क्योंकि हत्या की घटना से इसकी कोई संगति नहीं बैठती थी। उस दम्पत्ति ने वह कमरा किराये पर ले लिया। तीन महीने बाद ऊपर के किरायेदार नीचे भागे आये और उन्होंने बताया कि उस कमरे में जोर की चीखने की आवाज आई है। पुलिस बुलाई गई और सब लोग ऊपर पहुँचे लोग यह देख कर आश्चर्यचकित रह गये कि हत्या की जो परिस्थितियाँ क्रेजर ने तीन महीने पहले बताई थी, ठीक उसी अवस्था में यह हत्या की गई थी। पति ने स्वीकार किया कि उसने ईर्ष्यावश यह हत्या की है। बाद में डाक्टरों की एक समिति ने क्रेजर को पागलखाने से छुड़ाया ताकि उसके इस भविष्य-दर्शन का अध्ययन किया जा सके।

तीन महीने बाद की घटना का हूबहू चित्रण-क्या विज्ञान इस सम्बन्ध में कोई निश्चित निराकरण प्रस्तुत कर सकता है। अमेरिका जो विज्ञान में इतना बढ़ा-चढ़ा है कि चन्द्रमा और मंगल की यात्रा की तैयारी कर रहा है, वह अपने ही तीन यात्रियों की मृत्यु का पूर्वाभास न कर सका। बेचारे चन्द्रयान में ही सबके देखते-देखते घुटकर जल मरे। यांत्रिक मस्तिष्क और कम्प्यूटर गणित के थोड़े समीकरण हल कर सकते हैं, भविष्य-दर्शन जैसी विलक्षण बातें आत्मा के गुण हैं, आत्मा के अस्तित्व का प्रमाण है, उसकी अपेक्षा नहीं की जा सकती।

स्वप्न में विचार, ज्ञान और स्मृति भी आत्मा के अस्तित्व को ही प्रमाणित करते हैं। फ्रायड लिखते हैं कि स्वप्न ‘इच्छा पूरक’ होते हैं और भूतकालीन समस्याओं के लिये नाटक की तरह है, अर्थात् मनुष्य दिन में जो कुछ सोचता और कहता है, उनमें से कई बातें ऐसी होती हैं, जिन्हें वह बहुत चाहता है पर कर नहीं पाता पर चूँकि वह उन पर विचार कर चुका होता है। इसलिये उस दमित विचार की फोटो अचेतन मस्तिष्क में जम जाती है और रात में जब मनुष्य सोता है, तब वही दृश्य उसे स्वप्न की तरह दिखाई देने लगते हैं।

आज स्वप्नों के बारे में लोगों की ऐसी ही या इसी से मिलती-जुलती मान्यतायें हैं पर आत्म-विज्ञान की दृष्टि में स्वप्न मनुष्य जीवन की महत्त्वपूर्ण प्रक्रिया है। उसका सम्बन्ध भले ही अचेतन मन से हो पर वह होता सनातन अर्थात् जब से जीव का प्रादुर्भाव हुआ है, तब से और आगे होने वाली घटनाओं से भी सम्बन्ध रखता है। इसलिये स्वप्न को भी आत्मा के अस्तित्व के प्रमाण के रूप में लिया जा सकता है। ऐसे स्वप्न जो उपरोक्त घटना की तरह काफी समय बाद होने वाली घटनाओं का भी पूर्वाभास करा देते हैं, उसके प्रमाण माने जा सकते हैं।

ब्वायल शिमला में अफसर थे। उन्होंने एक रात स्वप्न में देखा कि उनके श्वसुर की मृत्यु इंग्लैंड के ब्राइटन नगर में अमुक मकान में इस समय हुई। जबकि कुछ दिन पूर्व ही उनके स्वास्थ्य की कुशल-मंगल आई थी, इसलिये उन्हें इस तरह की कोई आशंका या चिन्ता भी नहीं थी, किन्तु बाद में उन्हें पत्र मिला जिसमें उनका स्वप्न बिलकुल सत्य निकला।

अमेरिका के पेनसिलबेनिया के प्रोफेसर लेम्बरटन की एक समस्या का हल मौखिक रूप से करना चाहते थे पर बहुत प्रयत्न करने पर भी वैसा न कर सके। एक सप्ताह बाद उन्होंने दीवाल पर हल लिखा हुआ पढ़ा। स्वप्न टूटने पर उन्होंने उसको पेन्सिल से लिख लिया और बाद में पाया कि समस्या का ठीक वही हल था, जो स्वप्न में दीवाल पर लिखा देखा था।

इन तथ्यों का विज्ञान के पास कोई समाधान नहीं है। यदि होता तो उसे प्रस्तुत किया जाता। विज्ञान का क्षेत्र सीमित है, आत्मा का अनन्त। विज्ञान मनुष्य की समस्यायें जितना सुलझाता है उससे अधिक उलझा देता है, जबकि आत्मा का ज्ञान हमारी मूल समस्या और प्रश्न है। उसका समाधान आत्मानुभूति होने पर ही हो सकता है। आत्मा के तथ्यों की खोज और उसे प्राप्त किये बिना चैन नहीं, सुख और शान्ति नहीं।


लज्जा ही नारी का सच्चा आभूषण है

मगध की सौंदर्य साम्राज्ञी वासवदत्ता उपवन विहार के लिये निकली। आज का साज-शृंगार उस राज-वधू की तरह था जो पहली बार ससुराल जाती हैं।

एकाएक दृष्टि उपवन-ताल के किनारे स्फटिक शिला पर बैठे तरुण संन्यासी उपगुप्त पर गई। दीवारी ने बाह्य सौन्दर्य को अनिर्दिष्ट कर लिया था और उस आनन्द में कुछ ऐसा निमग्न हो गया कि उसे बाह्य जगत् की कोई सुध न रही थी।

हवा में पायल की स्वर झंकृति और सुगन्ध की लहरें पैदा करती वासवदत्ता समीप जा खड़ी हुई। भिक्षु के नेत्र खोले। वासवदत्ता ने चपल-भाव से पूछा-महामहिम बतायेंगे नारी का सर्वश्रेष्ठ आभूषण क्या है?”

“जो उसके सौंदर्य को सहज रूप से बड़ा दे-तपस्वी ने उत्तर दिया।

सहज का क्या अर्थ है? चंचल नेत्रों को उपगुप्त पर डालती वासवदत्ता ने फिर प्रश्न दोहराया।

उपगुप्त ने सौम्य मुस्कान के साथ कहा-देवि आत्मा जिन गुणों को बिना किसी बाह्य इच्छा, आकर्षण, भय, या छल के अभिव्यक्त करे, उसे ही सहज भाव कहते हैं, सौंदर्य को जो बिना किसी कृत्रिम साधन के बढ़ाता हो, नारी का वह भाव ही सच्चा आभूषण है।”

किन्तु वह भी वासवदत्ता समझ न सकी। उसने कहा-मैं स्पष्ट जानना चाहती हूँ, यों पहेलियों में आप मुझे न उलझायें।”

उपगुप्त अब कुछ गम्भीर हो गये और बोले-भद्रे यदि आप और स्पष्ट जानना चाहती हैं तो इन कृत्रिम सौंदर्य परिधान और आभूषणों को उतार फैकिये।”

पैरों की थिरकन के साथ वासव ने एक-एक आभूषण उतार दिये। संन्यासी निर्निमेष वह क्रीड़ा देख रहा था, निश्छल, मौन, विचार-मग्न वासवदत्ता ने अब परिधान उतारने भी प्रारम्भ कर दिये। साड़ी, चुनरी, लहंगा और कंचुकी सब उत्तर गये। शुभ्र निर्वसन देह के अतिरिक्त शरीर पर कोई पट-परिधान शेष नहीं रहा। तपस्वी ने कहा-देवि किंचित् मेरी ओर तो देखिये।” किन्तु इस बार वासवदत्ता लज्जा से आविर्भूत ऊपर को सिर न उठा सकी। तपस्वी ने कहा-देवि यही, लज्जा ही नारी का सच्चा आभूषण है।” और जब तक उसने वस्त्राभूषण पुनः धारण किये, उपगुप्त वहाँ से जा चुके थे।


पढ़े सो पंडित होय-ढाई अक्षर प्रेम के

संसार में दो प्रकार के मनुष्य होते हैं, एक वह जो शक्तिशाली होते हैं, जिनमें अहंकार की प्रबलता होती है। शक्ति के बल पर वे किसी को भी डरा-धमका कर वश में कर लेते हैं, कम साहस के लोग अनायास भी उनकी खुशामद करते रहते हैं किन्तु भीतर-भीतर उस पर सभी आक्रोश और घृणा ही रखते हैं। थोड़ी-सी साँस दिखाई देने पर लोग उससे दूर भागते हैं, यही नहीं कई बार अहंभावना वाले व्यक्ति पर घातक प्रहार भी होता है और वह अन्त में बुरे परिणाम भुगत कर नष्ट हो जाता है। इसलिये शक्ति का अहंकार करने वाला व्यक्ति अन्ततः बड़ा ही दीन और दुर्बल सिद्ध होता है।

एक दूसरा व्यक्ति भी होता है-भावुक और करुणा शील। दूसरों के कष्ट, दुःख, पीड़ायें देखकर उसके नेत्र पहले छलक उठते है। वह जहाँ भी पीड़ा, स्नेह का अभाव देखता है वहीं जा पहुँचता है और कहता है लो मैं आ गया-और कोई हो न हो तुम्हारा मैं जो हूँ, मैं तुम्हारी सहायता करूँगा, तुम्हारे पास जो कुछ नहीं है, वह मैं दूँगा-उस प्रेमी अन्तःकरण वाले मनुष्य के चरणों में संसार अपना सब कुछ न्यौछावर कर देता है, इसलिये वह कमजोर दिखाई देने पर भी बड़ा शक्तिशाली होता है। प्रेम वह रचनात्मक भाव है, जो आत्मा की अनन्त शक्तियों को जागृत कर उसे पूर्णता के लक्ष्य तक पहुँचा देता है, इसीलिये विश्व प्रेम को ही भगवान की सर्वश्रेष्ठ उपासना के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है।

जीवन के सुन्दरतम रूप की यदि कुछ अभिव्यक्ति हो सकती है तो वह प्रेम में ही है पर उसे पाने और जागृत करने का यह अर्थ नहीं होता कि मनुष्य सुख और मधुरता में ही विचरण करता रहे। वरन उसे कष्ट, सहिष्णुता और उन वीरोचित् प्रयत्नों का जागरण करना भी अनिवार्य हो जाता है, जो प्रेम की रक्षा और मर्यादा के पाल के लिये अनिवार्य होते हैं। प्रेम का वास्तविक आनन्द तभी मिलता है।

प्रेम संसार की ज्योति है और सब उसी के लिये संघर्ष करते रहते हैं, सच्चा समर्पण भी प्रेम के लिये ही होता है, इसलिये यह जान पड़ता है कि विश्व की मूल रचनात्मक शक्ति यदि कुछ होगी तो वह प्रेम ही होगी और जो प्रेम करना नहीं सीखता उसे ईश्वर की अनुभूति कभी नहीं हो सकती। तुलनात्मक अध्ययन करके देखें तो भी यही लगता है कि परमेश्वर के सब गुण प्रेम में ही समाये हैं, इसलिये परमेश्वर की सच्ची अभिव्यक्ति ही प्रेम है और प्रेम भावनाओं का विकास कर मनुष्य परमात्मा को प्राप्त कर सकता है। प्रेम से बढ़कर जोड़ने वाली (योग) शक्ति संसार में और कुछ भी नहीं है।

पर यह भ्रांति नहीं होनी चाहिये कि हमें जो वस्तु परत-प्रिय लगती है, उस पर हमारा अधिकार हो गया और यदि उसे सुविधापूर्वक नहीं प्राप्त कर सकते तो अनाधिकार चेष्टाओं द्वारा उसे प्राप्त करें। प्रेम-प्रेम की इच्छा तो करता है किन्तु उसकी रति आत्मा है कोई ओर माध्यम या साधन नहीं। आत्म-जगत् अपने-आप में इतना परिपूर्ण है कि उसका रमण करने पर हमें वह सुख अपने-आप मिलने लगता है, जिसकी हम प्रेमास्पद से अपेक्षा रखते हैं इसलिये पदार्थों के प्रेम को क्षण-भंगुर और ईश्वरीय प्रेम को दिव्य और शाश्वत मान लिया गया।

वह निस्वार्थ होता है और उसके लिये होता है, जो न कही दिखाई देता है और न सुनाई। मालूम नहीं पड़ता कि अपनी आवाज और भावनायें उस तक पहुँचती भी हैं अथवा नहीं पर हमारी हर कातर पुकार के साथ अन्तःकरण में एक संतोष और सान्त्वना की अन्तर्दृष्टि होती है वह बताती है कि तुम्हारा विश्वास और तुम्हारी प्रार्थना निरर्थक नहीं जा रही। मूल में बैठी हुई आत्म-प्रतिभा स्वयं विकसित होकर मार्ग-दर्शन कर रही है। विकास की यह प्रक्रिया ईश्वर प्रेमी की अनेक प्रसुप्त प्रतिमाओं और बौद्धिक क्षमताओं का जागरण ही करती है। मेलों में उड़ाए जाने वाले गुब्बारों के नीचे एक प्रकार का ऐसा पदार्थ जलाया जाता है, जिससे गैस बनती है और वह गैस ही उस गुब्बारे को उड़ाकर दूर क्षितिज के पार तक पहुँचा देती है।

प्रेम की अन्तःकरण में उठने वाली लपटें भी ऐसी हैं, जो शरीर की, मन की, बुद्धि की और आत्म-चेतना की शक्तियों का उद्दीपन कर उन्हें ऊपर उठाती रहती हैं और विकास की इस हलचल पूर्ण अवस्था में भी वह सुख और स्वर्गीय सौंदर्य की रसानुभूति करता रहता है, भले ही माध्यम कुछ न हो। भले ही वह विश्वास के साथ ही रमण कर रहा हो, उसे अपना प्रेमी परमेश्वर दिखाई भी नहीं देता तो भी प्रकृति के अन्तराल से उसकी दिव्य-वाणी और उसका दिव्य-आश्वासन भरा प्रकाश छूटता ही रहता है।

निष्काम प्रेम में यह शक्ति है, जो प्रवाह बनकर फूटती है और न केवल दो-चार व्यक्तियों में वरन हजारों लाखों लोगों के जीवन में आनन्द का स्रोत बनकर उमड़ पड़ती है, वह हजारों कलुषित अन्तःकरणों को धोकर उन्हें निर्मल बना देती है। तुलसीदास जी ने भगवान से प्रेम किया था, प्रत्यक्ष में वह प्रेम किसी व्यक्ति के लिये नहीं था, किन्तु उनका प्रेम जब बहुजन हिताय रामायण के रूप में फूटा तो न केवल परमात्मा के प्रति भक्ति, श्रद्धा और विश्वास की लहरें फूटी वरन सेवा, सहिष्णुता, दाम्पत्य-प्रेम पारिवारिक मर्यादा, संतोष, दया, करुणा, उदारता आदि ऊर्ध्वमुखी चेतनाओं की लहरें समाज में फूट निकलीं।

तुलसीदास जी नहीं रहे पर उनकी आत्मा आज भी हजारों लोगों को अपनी आत्मा से मिलाकर ईश्वरीय आभा में परिणत करती रहती है। ईश्वर के प्रति प्रेम का अर्थ स्वार्थ या संकीर्णता नहीं वरन अपने आपको उस मूल-बिन्दु के साथ जोड़ देना है, जो अपने आपको जन-जन के जीवन में विकीर्ण करता रहता है। तात्पर्य यह कि जब हम ईश्वर से प्रेम करते हैं, तब संसार में व्यक्त चेतना के प्रत्येक कण से प्रेम करते हैं, ईश्वर की वही परिभाषा भी तो है।

इसी छोटी-सी बात को न समझ पाने के कारण या तो लोग ईश्वर प्रेम के नाम पर कर्तव्य-परायणता से विमुख होते हैं अथवा पदार्थ या शारीरिक प्रेम (वासना) में इतने आसक्त हो जाते है कि प्रेम की व्यापकता और अक्षुण्ण सौन्दर्य के सुख का उन्हें पता ही नहीं चल पाता। ईश्वर से प्रेम करने का अर्थ विश्व-सौंदर्य के प्रति अपने आपको समर्पित करना होता है, उसमें कहीं न तो आसक्ति का भाव आ सकता है और न विकार। यह दोष तो उसी प्रेम में होंगे, जिसे केवल स्वार्थ और वासना के लिये किया जाता है।

जीवन भर हम जिन व्यक्तियों के सम्पर्क में आते हैं, ईश्वर-प्रेम का प्रकाश उन सबके प्रति प्रेम के रूप में भी प्रस्फुटित होता है। इसलिये ईश्वर-प्रेम और समाज-सेवा में कोई अन्तर नहीं है। दोनों ही स्थितियों में आत्म-सुख आत्म-विकास और आत्म-कल्याण का उद्देश्य पूरा हो जाता है। किसी के साथ भी प्रेम क्यों न करें, उसका उद्देश्य भगवान की प्रसन्नता होनी चाहिये। भगवान की प्रसन्नता का अर्थ ही है-कि उस प्रेम में भय, कायरता, क्षणिक सुख का आभास न होकर शाश्वत प्रफुल्लता और प्रमोद होना चाहिये। ऐसा प्रेम कभी बन्धन कारक या रुकने वाला नहीं होता। उसकी धारायें निरन्तर जीवन को प्राणवान बनाती रहती हैं, वह मनुष्य ऊपर से चाहे कितना ही कठोर क्यों न दिखाई देता हो।

प्रेम योग का साधक उद्दाम भी होता है। इन्द्रियों के आकर्षण फुसलाये नहीं, कठोरता से दमन किये जाते हैं और इसके लिये साहस की ही आवश्यकता होती है। जो आत्म-दमन कर सकता है, वही सच्चा विजेता है। सच्चा विजेता ही सच्चा प्रेमी और ईश्वर का भक्त होता है। यह बात कुछ अटपटी-सी लगती है। प्रेम की भावुकता और कर्तव्य की कठोरता दोनों विपरीत वस्तुएँ-सी लगती हैं, किन्तु कर्मयोग के सच्चे साधक को कठोरता से भी भावनाशीलता का सम्पूर्ण आनन्द मिलता है। इसलिये उसे मोह की आवश्यकता नहीं होती वरन वह मोह के बीच में भी एक दिव्य प्रकाश की अनुभूति का आनन्द लिया करता है।

मर्यादाओं के पालन में जो कठोरता है, उससे प्रेम का, आत्मीयता का अभाव नहीं होता। अपनत्व तो संसार के कण-कण में विद्यमान् है। ऐसा कौन-सा प्राणी है, ऐसा कौन-सा पदार्थ है जहाँ मैं नहीं हूँ। प्राणी, पशु, कीट-पतंग सभी के अन्दर तो ‘अहंभाव’ से परमात्मा बैठा हुआ है पर तो भी किसी के लिये वह बन्धन तो नहीं है। वह बन्धन मुक्त आनन्द की स्थिति है, इसलिये वह किसी को आनन्द से गिरायेगा स्थिति है, इसलिये वह किसी को आनन्द से गिरायेगा क्यों। वह दया और करुणा का सागर है, लोगों को उससे वंचित रखेगा क्यों? लेकिन वह यह भी न चाहेगा कि एक जीव दूसरे जीव की आकांक्षाओं और मर्यादाओं पर छा जाये। संसार उसी का है पर तो भी वह इतना दयालु है कि किसी पर अपनी उपस्थिति भी प्रकट नहीं करता, किन्तु मर्यादाओं के मामले में वह बड़ा कठोर और निपुण है, किसी भी दुष्कर्म को प्राणी उससे छिपाकर नहीं ले जा सकता। उसका प्रेम निष्काम है, इसीलिये जीवन-लक्ष्य की प्राप्ति और अपने जीव-भाव को ब्रह्मभाव में परिणित करने के लिये मनुष्य का भी उन्हीं नियमों को पालन करना अनिवार्य हो जाता है अर्थात् प्रेम करना तो आवश्यक है पर उसमें कामनाओं का समावेश न होने देने के लिये उसे उतना ही कठोर भी होना आवश्यक है। उसके बिना प्रेम कसौटी पर खरा नहीं उतर सकता।

प्रेम पृथ्वी की मिट्टी, सूर्य के प्राण और विश्व के कण-कण में व्याप्त परमाणुओं में छिपा हुआ स्पन्दन है। वह स्वर्गीय है, वह मृत्युभाव में भी अमृतत्व का संचार किया करता है, जड़ में भी चेतनता की अनुभूति कराया करता है। इतिहास की प्रसिद्ध घटना है कि अपनी साधना के अन्तिम दिनों में महर्षि विश्वामित्र ने नदियों से बातचीत की थी। ऋग्वेद में ऐसे सूक्त हैं, जिनके देवता नदी है और दृष्टा ने उनसे बातचीत की है। उस वार्तालाप में और कुछ आधार भले ही न हो पर उसमें समस्त जड़-चेतन जगत के प्रति आत्मार्पण का अनोखा उदाहरण प्रस्तुत किया गया है।

उस विज्ञान को समझने में भले ही किसी को देर लगे, किन्तु भावनाओं में जड़-पदार्थों को भी चेतन कर देने की शक्ति है और प्रेम इन समस्त भावनाओं का मूल है, इसलिये यह कहना अत्युक्ति नहीं कि प्रेमी के लिये संसार में चेतन ही नहीं जड़ भी उतने ही दुःखदायक होते हैं। जड़ भी प्रेम के आधीन होकर नृत्य करते हैं। प्रेम के लिये सारा संसार तड़पता रहता है, जो उस तड़पन को समझकर लेने की नहीं देने और निरन्तर देने की ही बात सोचता रहता है सारा संसार उसके चरणों पर निवेदित हो जाता है।


मान्यता अपनी-अपनी

किसी अरब व्यापारी को पता चला कि इथियोपिया के लोगों के पास चाँदी बहुत अधिक है। उसे वहाँ जाकर व्यापार करने की सूझी और एक दिन सैकड़ों ऊँट प्याज लादकर वह इथियोपिया के लिये चल भी पड़ा।

इथियोपिया-वासियों ने पहले कभी प्याज नहीं खाया था। प्याज खाकर वे बहुत प्रसन्न हुये। उन्होंने सब प्याज खरीद लिया और उसके बराबर सोना, चाँदी तौल दिया। व्यापारी बहुत प्रसन्न हुआ। धनवान् बनकर देश लौटा।

एक दूसरे व्यापारी को इसका पता चला तो उसने भी इथियोपिया जाने की ठानी। उसने प्यास से भी अच्छी वस्तु लहसुन लादी और इथियोपिया जा पहुँचा। वहाँ के लोगों ने लहसुन चखा तो प्रसन्नता से नाच उठे। सारा लहसुन उन्होंने ले लिया पर बदले में दें क्या, यह प्रश्न उठा। उनने देखा चाँदी तो बहुत है पर सोने से भी अच्छी वस्तु उनके पास प्याज है, इसलिये प्याज से दूसरे व्यापारी की बोरिया लाद दीं।

व्यापारी खीझ उठा पर बेचारा करता क्या, चुपचाप प्याज लेकर घर लौट आया। बेचारा व्यापारी समझ नहीं पा रहा था कि अमूल्यता की कसौटी क्या है? उसे लगा यह सब अपने-अपने मन की मान्यताओं और प्रसन्नता के खेल हैं। सत्य तो कुछ और ही है, जिसे मनुष्य नहीं समझ पा रहा।


देवता-तथ्य और विज्ञान की कसौटी पर

भारतीय संस्कृति सदैव से ही देवोपासक रही है। ऐसी मान्यता है कि निखिल आकाश में कोई ऐसे स्थान हैं, जहाँ देवता रहते हैं, उन्हें मंत्र जप ध्यान आदि के माध्यम से प्रसन्न और प्रभावित किया जा सकता है, उनसे शक्ति और वरदान प्राप्त किया जा सकता है। शिव, वरुण, अग्नि, इन्द्र, गणेश, सरस्वती, सोम, ऊषा, सूर्य, धन्वन्तरि, बृहस्पति आदि अनेक देवता अपनी-अपनी तरह के शक्ति और क्षमता वाले है और अपने उपासक को वैसी ही शक्ति से आविर्भूत कर देते हैं, इसलिए न केवल लौकिक दृष्टि से समर्थ और बलवान् बनने के लिए देवताओं की शरण ली जाती थी वरन् आत्म-कल्याण और ईश्वर प्राप्ति के लिए भी देवाश्रय ग्रहण करते थे। सभी देवता परमात्मा की विभिन्न अलौकिक शक्तियाँ हैं, किसी के भी आश्रय से उस परम प्रभु को प्राप्त करने का विज्ञान था, उसे अब केवल कल्पना ही समझा जाता है।

कठोपनिषद् में नचिकेता यम से प्रश्न करता है-

स त्वमग्निं स्वर्ग्यमध्येषि मृत्योः प्रबूहिं तं श्रद्दद्यानाय मह्ममे। स्वर्गलोक अमृतत्वं भजतं एतद्द्वितीयेन वृणे वरेण्य॥

-1।1।13,

हे यमराज! आप स्वर्ग के साधनभूत अग्नि को जानते हैं। मैं श्रद्धा प्लावित होकर आपसे पूछता हूँ कि जिनके द्वारा स्वर्गीय पुरुष अमरत्व प्राप्त करते हैं, उन अग्नि को मुझसे वर्णन कीजिये।” यह प्रश्न सुनकर आचार्य यम कहते हैं -

प्रते व्रवीनि तदुमे निबोध स्वर्ग्यमग्निं नचिकेतः प्रजानन्। अनंत लोकप्तिमयी प्रतिष्ठों, विद्धि त्वमेतं निहितंगुहायाम्॥ -कठो. 1।1।14,

हे नचिकेता! मैं तुझसे अच्छी प्रकार अग्नि का उपदेश करता हूँ। वह अग्नि स्वर्ग को प्रदान करने वाली है, अनन्त लोक की प्राप्ति कराने वाली है, उसका आधार बुद्धि रूपी गुहा में निहित है, तू उसे अच्छी प्रकार समझ ले।

इस मन्त्र में निःसन्देह अग्नि के प्रामाणिक स्वरूप को स्थिर करने का प्रयास किया गया है। मैत्रायणी उपनिषद् में उसे और अच्छी प्रकार स्पष्ट करते हुए शास्त्रकार ने बताया कि अग्नि हृदय कमल में स्थित है, वह जो अन्न खाता है, वह जो मोक्ष धाम द्यौः में स्थित कालाग्नि नामक परमेश्वर रुपं अग्नि है, जो प्रलय काल में समस्त भूतों को खा जाता है, अपने आप में लीन कर लेता है।

उपरोक्त कथन में अग्नि का तात्त्विक विश्लेषण है। सचमुच शरीर में अग्नि न हो तो अन्न न पचे। मन्दाग्नि पुरुष को सदैव अपच और अवसाद की बीमारी बनी रहती है, इसलिए वैद्य वह औषधियाँ देते हैं, जिससे जठराग्नि प्रदीप्त हो। अन्न से भी शरीर में गर्मी पैदा होती है, अर्थात् अग्नि एक व्यापक तत्त्व है, जो दृश्य भी है और अदृश्य भी है। अदृश्य अवस्था वाले अग्नि के परमाणु ही ईश्वरीय सत्ता को बोध कराते हैं, इसलिए अग्नि को देवता और भगवान् कहा गया है। शरीर मन और वाणी की तेजस्विता अग्नि तत्त्व की प्रधानता से ही विकसित होती है।

ऋग्वेद के 7।87।2 मंत्र में वरुण देवता की स्तुति करते हुए मंत्र दृष्टा कहते हैं-समस्त नदियाँ वरुण के आदेश से ही बहती हैं, यह आकाश देव हैं, अन्य देव इनके अनुयायी हैं। इनका आदेश सर्वोपरि है, यह देव जिस व्यवस्था का संरक्षक है, उसे ‘ऋत’ कहते हैं, विश्व सृजन के पूर्व भी ‘ऋत’ था इसके रहस्य को जानने वाला ऋताचारी होता है।’’

वरुण ‘वर’ धातु से बना है, जिसका अर्थ आच्छादन करना होता है-एक तत्त्व जो समस्त देवताओं में अवस्थानुसार परिवर्तित होकर ऋतु-नियमन करता है। यदि ऋतुयें न हों तो संसार शून्य हो जाये यह बात प्लेटो के यूनिवर्सल सिद्धान्त से बहुत मिलती-जुलती है। रूस तो अब विस्तृत रूप से ऋतु-विज्ञान की खोज कर रहा है। अमेरिका इस बात से भयभीत है कि यदि रूस ने जलवायु पर नियन्त्रण कर लिया तो वह बिना युद्ध लड़े हुए अमेरिका को रेगिस्तान में बदल देगा। रूस परमाणु शक्ति से परिचालित सैकड़ों मशीन पम्पों के द्वारा प्रशान्त महासागर के जल को स्थानान्तरित करने की योजना बना रहा है, उससे साइबेरिया तो हरा-भरा हो जायेगा पर अमेरिका की जलवायु एकदम बदल जायेगी। ऐसी आशंका अमेरिका के डा. एडवर्ड टाड और डा० हेनरी वेक्स्लर भी कर चुके हैं, इस सम्बन्ध में कभी अन्यत्र विस्तृत प्रकाश डालेंगे, यहाँ तो हमें अपने इस कथन की पुष्टि करनी थी कि ऋतु का नियमन करने वाली ऐसी कोई अदृश्य सत्ता है, जिसे हम वरुण देवता के नाम से जानते हैं।

सन्देह नहीं कि उसको जानने वाला व्यक्ति ऋताचारी या मौसम विज्ञान का पंडित हो सकता है। क्रेमलिन वैज्ञानिकों को इच्छानुसार कहीं भी वर्षा करा देने का सिद्धान्त ढूँढ़ निकालने की सफलता मिल गई है, वह इस वरुण विज्ञान की एक छोटी-सी स्फुल्लिंग मात्र है, विस्तृत खजाना तो भारतीय धर्म के अंचल में छिपा पड़ा है। सूत्र मिल रहा है, आगे की जानकारी की आवश्यकता है।

सोम, उषा, अदिति आदि के बारे में भी विस्तृत विवेचन शास्त्रों में मिलते हैं, किन्तु खेद है कि आज के पढ़े-लिखे भारतीय भी देवताओं की इन शक्तियों और स्वरूपों को मात्र बाल-कल्पना मान कर उपेक्षित कर देते हैं। फ्लीडरट और ब्लूम नामक पाश्चात्य वैज्ञानिकों ने देवताओं के सम्बन्ध में भारतीय तत्त्व दर्शन का जो मजाक बनाया था, पाश्चात्य सभ्यता से प्रभावित व्यक्ति उसी को ठीक माने चले आ रहे हैं, प्रसन्नता की बात है कि आज का विज्ञान ही उनकी इस भ्रान्त धारणा को खण्डित कर देता है।

देवता किसी की प्रतिकृति नहीं वरन् विशिष्ट गुण या शक्ति के प्रतीक मात्र हैं और वह शक्तियाँ सूक्ष्म जगत् में सचमुच क्रियाशील हैं, उनसे सम्पर्क या यांत्रिक संबन्ध स्थापित करने में जो सफलता मिली है, वह वेद और उपनिषदों की मान्यता को ही पुष्ट करती है। इस विज्ञान को आज संगणक विज्ञान (कम्प्यूटर) के नाम से जाना जाता है। वेद के जिन देवताओं की शक्तियों पर लोग उपहास करते थे, वही अब लोहे के यन्त्रों में आकर सुनती हैं, गिनती हैं, अपने विवेक से निर्णय और सुझाव ही नहीं देती, बोलती भी हैं। चन्द्रमा की यात्रा से लेकर गणित के प्रश्न हल करने तक में कम्प्यूटर एक चमत्कार की तरह काम कर रहा है। वह इन अदृश्य सत्ताओं के सूक्ष्म परमाणुओं के इच्छानुवर्ती संचालन के फलस्वरूप ही है।

जिस तरह अध्यात्म विद्या के जानकारों के लिये देव शक्तियाँ सामान्य-सी लगती हैं, उसी प्रकार विज्ञान की दृष्टि में कम्प्यूटर भी कोई बड़ा भारी आश्चर्य नहीं रह गया। यह सब सृष्टि में विभिन्न प्रकार के इलेक्ट्रान अन्न को पचाते हैं, शरीर में शक्ति संतुलन बनाये रखते और जीवन के अस्तित्व रूप में प्रकट होते हैं। उसी प्रकार वरुण शक्ति के इलेक्ट्रान सारी सृष्टि में फैलकर ऋतु नियमन करते हों तो उसमें आश्चर्य क्या? इलेक्ट्रान की विविध स्थिति के रूप में ही तो कम्प्यूटर भी बोलता, सुनता, उत्तर देता और अगली पंक्तियों में दिये गये आश्चर्यजनक कार्य करता रहता है। यह बात किसी स्थान विशेष के लिए अपवाद नहीं सार्वभौमिक नियम है। कैलीफोर्निया विश्व-विद्यालय के डा. हावेर महोदय का भी कहना है ठोस और तरल पदार्थों की तरह गैस पदार्थों में भी जीव का निर्माण हो सकता है।

अर्थात् गैस जैसा किसी स्थिति में भी जीवन का अस्तित्व यदि हो सकता है तो वह यह देव शक्तियाँ ही हो सकती हैं, जिनका वेद, उपनिषदों में ब्रह्माण्ड व्यापी शक्तियों के रूप में वर्णन मिलता है। उन्हें केवल चेतन समझने भर की कठिनाई थी, उसे यह कम्प्यूटर विज्ञान दूर कर देता है। लीजिये अब इलेक्ट्रान के स्मृति पुञ्जों के उन करिश्मों का भी वर्णन पढ़ लीजिये, जो आज संगणक (कम्प्यूटरों) के अन्दर विभिन्न प्रकार का ज्ञान और शक्ति संयोजित किये पड़े हैं।

गणेश को असाधारण स्मृति और लेखन सामर्थ्य वाला देवता मानते हैं, पौराणिक कथा है कि व्यास जी द्वारा बोले गये 18 पुराणों को सुनकर उन्हें शब्द-बद्ध कर सकने को गुरुतर कार्य गणेश जी ही सम्पन्न कर सके थे। इस असाधारण मानवीय स्मृति शक्ति पर अर्धदग्ध मनुष्य शंका और सन्देह कर सकते हैं वैज्ञानिक नहीं। जर्मनी में ऐसे ही कम्प्यूटर का निर्माण हुआ है, जिससे दफ्तरों, बैंकों आदि के काम में 10 हजार गुना तीव्रता आई है। 1680 फाइलें रखने में ही कई अलमारियाँ लग सकती है पर यह कम्प्यूटर (संगणक) कुल 3 घन फुट में इतनी फाइलों की जानकारी को जज्ब (आब्जर्व) कर लेता है, जब भी आप चाहें किसी पन्ने को खोलकर सारा ब्यौरा प्राप्त कर सकते हैं।

मनुष्य हाथ से जब तक एक अंक लिखता है, यह कम्प्यूटर तब तक 16 बड़े-बड़े अंकों का गुणनफल, लघुतम या महत्तम समापवर्तक निकाल कर दे सकता है। मनुष्य अधिक से अधिक 5000 शब्द याद रख सकता है तो उसकी स्मरण क्षमता 60 हजार शब्दों से भी अधिक है। मनुष्य कठिनाई से चार-छः भाषाएँ सीख सकता है पर यह 15-15 भाषाओं का वेत्ता हो सकता है। एक भाषण का एक ही समय में 15 भाषाओं में अनुवाद कर देने की क्षमता उसमें मिलेगी। मनुष्य एक बार यदि 240 शब्द टाइप करेगा तो वह 60 हजार एकांश प्रति सेकेंड टाइप करके रख देगा। टेलीफोन, टेलीविजन पर आने वाले संवादों को यह संगणक 15 भाषाओं में अनुवाद कर देता है, जिससे सभी भाषाओं के अख़बार एक भाषा में खबर प्रचारित होने के बावजूद भी साथ-साथ छप जाते हैं और दूसरी भाषाएँ पढ़ने वालों की कोई दिक्कत नहीं आती।

स्मरण शक्ति का यह छोटा-सा चमत्कार है, इससे भी अनन्त गुणा स्मरण शक्ति वाली कोई गणेश सत्ता है, मनुष्य उससे संपर्क साधकर इस से भी अधिक बौद्धिक क्षमता वाला ही हो सकता है। अनेक शतावधानी व्यक्ति अब भी है, उनका वर्णन कभी अन्यत्र करेंगे।

ब्रिटेन के वैज्ञानिकों ने एक संगणक (कम्प्यूटर) ऐसा बनाया है, जो बिना जन्म समय कुण्डली, राशिचक्र, सूर्यास्त, सूर्योदय अथवा सहयोग की जानकारी के बिना भी युवक-युवतियों को यह बता देता है कि उनका विवाह सफल रहेगा या असफल। ज्योतिष झूठ नहीं हो सकता। यही नहीं कुछ कम्प्यूटर ऐसे भी बने हैं, जो वायु कम्पनों के आधार पर नये शब्द भी गढ़ते हैं, जो व्याकरण की दृष्टि से अशुद्ध नहीं होते। जर्मनी में ही एक ऐसा कम्प्यूटर बना है, जो गीत बनाकर सुनाता भी है, उसकी मधुरिमा मानव कण्ठ और भावनाओं की उड़ान को भी परास्त कर देती है। यह संगणक (कम्प्यूटर) आज के सैकड़ों हजारों वर्षों पूर्व गाये गये गीत उन्हीं भाषाओं में सुनाने की क्षमता रखते हैं, उसका विकास किया जा रहा है। एक दिन वह आयेगा जब भगवान् कृष्ण ने अर्जुन से क्या कहा था, यह सब उनके मुख से ही सुन लेंगे तब महाभारत की कथा सुनने के लिए किसी पण्डित की आवश्यकता न होगी। वैशम्पायन महाराज स्वयं अपने मुख से वह कथा सुनाया करेंगे।

यह सब सृष्टि में फैले विभिन्न सम्वेदनाओं के सूक्ष्म कणों का खेल है, वैज्ञानिकों ने उन्हें पकड़ने की कला जान ली है। इसलिए वे इस तरह के अचम्भे जैसे करतब दिखा रहे हैं, दरअसल मनुष्य की आध्यात्मिक क्षमताएँ इनसे भी लाख गुना अधिक परिपूर्ण हैं। देव-शक्तियों का यह विधान अपने आप में वैज्ञानिक सिद्धान्तों से अलग नहीं, उस विज्ञान को आध्यात्मिक दृष्टि से विकसित किया जा सके तो मनुष्य की सुख-सुविधाओं में अनन्त गुनी वृद्धि की जा सकती है।

यह देव-शक्तियाँ अन्तरिक्ष में अनन्तकाल से विद्यमान् है और उनका सूक्ष्म प्रतिनिधित्व मानव शरीर में भी भरा पड़ा है। भारतीय तत्त्व-वेत्ता इन शक्तियों के साथ संपर्क बनाने में आध्यात्मिक स्तर पर प्रयत्न करते रहे हैं। उपासना और तपस्या वस्तुतः एक ऐसे उच्चस्तरीय विज्ञान का ही प्रतिपादन करती है, जिसके लिये मशीनों की नहीं वरन् पवित्रता और सात्विकता के निर्मल बने व्यक्तित्वों की आवश्यकता होती है। देव-शक्तियों को भौतिक विज्ञान धीरे-धीरे यन्त्र-बद्ध करता चला जा रहा है। अध्यात्म विद्या के आचार्यों ने इन्हें मन्त्र-बद्ध किया था, जो अपेक्षाकृत अधिक सरल और अधिक उपादेय है।


उपासना के साथ कामनायें न जोड़ें

ईश्वर की उपासना का वास्तविक प्रतिफल अन्तर में स्थायी सुख, शांति और संतोष की वृद्धि होना माना गया है। यदि ऐसा नहीं होता तो मानना होगा कि उपासना के स्वरूप में कोई कमी चल रही है।

यहाँ पर उपासना के स्वरूप से उपासना की विधि, उसकी सामग्री अथवा उसके स्थान आदि से नहीं है। उसका तारतम्य उस मनोभाव से है, जो उपासना के आगे-पीछे उपस्थित रहता है। उपासना में महत्व क्रिया-विधि उसकी सामग्री अथवा उसके स्थान आदि से नहीं है। उसका तात्पर्य उस मनोभाव से है, जो उपासना के आगे-पीछे उपस्थित रहता है। उपासना में महत्व क्रिया-विधि अथवा साधन सामग्री का नहीं है। महत्व है-भावना का। यदि उपासक की भावना ठीक उपासना के अनुरूप है तो निश्चय ही वह फलवती होगी। फल भावना के अधीन है, उपक्रम अथवा उपकरण के अधीन नहीं मन्दिर का एक पुजारी दोनों समय जीवन भर आरती-पूजा करता रहता है पर उसका उसे कोई प्रतिफल नहीं मिलता। उसके जीवन का स्तर वही बना रहता है। उसके मानसिक विकास में कोई प्रगति नहीं होती। उसकी अशान्ति, असंतोष और आत्मिक अभाव ज्यों-का-त्यों बना रहता है, जैसा कि वह पूजन-क्रिया में आने से पूर्व था।

एक पुजारी दस-बीस वर्ष और कभी-कभी आजीवन तक मन्दिर में पूजा आरती करता रहता है। किन्तु उसे उसका वह फल नहीं मिलता, जो उपासना के परिणाम स्वरूप मिलना चाहिये। इसका एक ही कारण है, वह यह कि उसकी उस क्रिया में वास्तविक उपासना की भावना नहीं होती। उसकी भावना मन्दिर के अधिकारियों की नौकरी करने की होती है। अस्तु वह नौकर मात्र ही रह जाता है। उपासक नहीं हो पाता।

इस बात को एक श्रमिक और एक पहलवान के उदाहरण से भी समझा जा सकता है। दोनों शारीरिक श्रम करते हैं। पसीना बहाते हैं, शारीरिक श्रम का प्रतिफल शारीरिक विकास ही होता है। पर मजदूर मेहनत करता-करता घिस जाता है। उसका शरीर क्षीण होता जाता है पर पहलवान उसी शारीरिक श्रम से शारीरिक विकास की ओर बढ़ता है। इसका एक मात्र कारण भावना के अंतर्गत निहित है। मजदूर जब मेहनत करता है, तब उसकी भावना आजीविका के लिये किसी की मजदूरी करने की रहती है और मल्ल जब व्यायाम के रूप में शारीरिक श्रम करता है वा उसकी भावना शारीरिक विकास की ओर प्रगति करने की रहती है। इसी भावना के कारण मजदूर का शरीर क्षीण होता है और पहलवान का विकसित।

इसी प्रकार न जाने कितने लोग अलस सुबह उठकर अपने काम-काज के लिये जाया करते हैं और अनेक उसी समय प्रातः भ्रमण अथवा वायु-सेवन के लिये जाते है। प्रातः काल का भ्रमण और वायु दोनों ही स्वास्थ्यप्रद होते हैं पर अपनी भावना के अनुसार पूर्व पक्ष के लोगों के मुख पर लाली और शरीर में स्फूर्ति बढ़ जाती है। इस प्रकार पता चलता है कि किसी क्रिया के फल का आधार उसमें निहित भावना ही है न कि वह क्रिया अथवा उससे सम्बन्धित उपकरण।

उपासना की जाये और आन्तरिक विकास न हो, आत्म-सुख आत्म-शांति और आत्म-संतोष में वृद्धि न हो यह सम्भव नहीं यदि ऐसा नहीं होता तो मानना होगा कि उसमें निहित भावना अनुरूपिनी नहीं, विरूपिनी है। अवश्य ही ऐसा असफल उपासक ईश्वर के सामीप्य अथवा उसके निहित फल की भावना नहीं रखता। उसके हृदय में कोई अन्यथा भावना ही चलती रहती है।

अधिकांश लोग जो उपासना के फल से वंचित रहा करते है, अपने मन में धन-सम्पत्ति आदि भौतिक लाभों की ही भावना रखते हैं। जिन उपलब्धियों का आधार बन्द प्रकार के भौतिक पुरुषार्थ हैं, उनको आध्यात्मिक आधार पर पाने की आशा उसी प्रकार से उपहासास्पद है, जिस प्रकार कोई आम के बीज बो कर संतरे की कामना करता है अथवा बम्बई की दशा में चलकर कलकत्ते पहुँचना चाहता है। भौतिक साधना का फल भौतिक और आध्यात्मिक साधना का फल आध्यात्मिक होगा, यह तो एक बड़ा ही स्थूल और निर्विवाद सत्य है।

भौतिक विभूतियों की कामना है तो उसके लिये भौतिक श्रम, पुरुषार्थ और अध्यवसाय किया जाना चाहिये। कार-रोजगार और शिल्प-साधना की जानी चाहिये और यदि आत्म-सुख आत्म-विकास आत्म-संतोष आत्म-विस्तार आत्म-दर्शन आदि आध्यात्मिक सम्पदाओं की कामना है तो आध्यात्मिक उपासना, आध्यात्मिक पुरुषार्थ चाहिये। इन दोनों भिन्न क्षेत्रों को एक दूसरे से मिलाना नहीं चाहिये। हाँ! इन दोनों को एक दूसरे का सहायक अवश्य बनाया जा सकता है।

आध्यात्मिक उपासना में यह भाव रखने में कोई हर्ज नहीं कि-हमें इस उपासना द्वारा वह शक्ति, बड़ा आत्मविश्वास और वह बुद्धि मिले, जिसके बल पर हम न्याय नीति और सदाचार द्वारा अपने भौतिक उद्योगों में सफल हो सकें। उपासना के फलस्वरूप भौतिक सम्पदाओं की स्थूल उपलब्धि की कामना करना असंगत है, उसके लिये शक्ति और क्षमता की याचना ही उचित है। ईश्वर की कृपा सूक्ष्म शक्तियों के ही रूप में होती है। स्थूल पदार्थों के रूप में नहीं।

तथापि भौतिक विभूतियों के लिये शक्ति याचना भी तभी उचित, संगत और अध्यात्मोचित होगी, जब साथ में यह भी भावना रहे कि आप उस उपलब्ध सम्पदा का उपयोग भी परमार्थ मार्ग में ही करेंगे। यदि आपकी सम्पदाओं का उद्देश्य स्वार्थ, भोग-विलास अथवा विषय-वासनाओं के साथ अहंकार तुष्टि की भावना से दूषित है तो भी उपासना द्वारा भौतिक सफलताओं के लिये शक्ति सम्बल के रूप में ईश्वरीय अनुकम्पा की याचना करना असंगत ही उठेगी और आपकी यह उपासना असफल चली जायेगी। अस्तु, उपासना की सफलता को मूर्तिमान् रूप में देखने में लिये भावनाओं के सम्बन्ध में बहुत ही सतर्क, सावधान तथा यथार्थपूर्ण रहना ही होगा।

फिर भी उपासना के साथ इन सब बातों को जोड़ना, घटना, उलझन और असमंजस से भरी मानसिक क्रियायें हैं। यदि उपासना जैसे पवित्र तथा पुनीत बात को इन सब बातों से सर्वथा पृथक ही रखा जाये तो अधिक मांगलिक होगा। उपासना का प्रयोजन तो मात्र आत्मा को परमात्मा के सान्निध्य में लाना ही है। जिस बात का लक्ष्य परमात्मा के सान्निध्य जैसी ऊँची वस्तुएँ हो उसके बीच में साँसारिक कामनाओं जैसी निम्न स्तर की बात को लाना अपनी अनधिकारिक पात्रता को सिद्ध करना ही है। यदि हम अपनी साँसारिक वितृष्णाओं, इन्द्रिय लिप्साओं और भौतिक कामनाओं को अमहत्व नहीं दे सकते और इन भवपाशों को धारण किये हुये ही परमात्मा का सान्निध्य प्राप्त करना चाहेंगे तो यह किसी प्रकार समृद्ध हो सकता है, यह तो बड़े ही साधारण विचार की बात है।

ईश्वर का सान्निध्य प्राप्त करना है, आत्मा को परमात्मा से योजित करना अभीष्ट है तो उपासना जैसे साधन और परमात्मा जैसे साध्य के बीच में किसी प्रकार की कामना जैसे व्यवधान को नहीं ही लाना होगा। यदि हमें सूर्य के दर्शन अपेक्षित है, दीपक का प्रकाश देखना है तो बीच के आवरण को हटाना ही होगा। यदि हम चाहते है कि परमात्मतत्त्व की आनन्दमयी धारा हमारी आत्मा में निर्झरित हो तो सारी कामनाओं का व्यवधान हटाना होगा अन्यथा उपासना से आकर्षित होकर आई हुई वह पावन धार बीच में अवस्थित कामनाओं के व्यवधान से टकरा कर इधर-उधर वह जायेगी और आत्मा उससे वंचित ही रह जायेगी।

सच्ची, उन्नत और आदर्श उपासना तो तभी होगी, जब हम सर्वथा निष्काम और निष्प्रयोजन ही रहें यहाँ तक कि परमात्मा की कृपा की भी कामना करें, इतनी उन्नत निष्काम उपासना से आत्मा न केवल परमात्मा तत्त्व के आनन्द की अधिकारी बनती है, बल्कि परमात्म रूप ही हो जाती है। आत्मा तो यों भी परमात्मा का ही रूप है। केवल जीव ने अपनी भौतिक वितृष्णाओं का आवरण डालकर उसे अपना स्वरूप भुला दिया है। वह असंगत आवरण हटाइये, आत्मा परमात्मा रूप हो जायेगी जो स्वयं आनन्द रूप परमात्म स्वरूप है, उस आत्मा के लिये परमात्मा की अनुकम्पा की याचना भी क्या। उपासना द्वारा आत्मा को उसका सत्य स्मरण कराइए, परमात्मा के समीप जाइये अर्थात् आत्मा में उस तत्त्व की अनुभूति कीजिये और देखिये कि आत्मा अपना स्वरूप पहचानने लगती है या नहीं।

इस स्मरण के लक्षण यह है कि जब कामनाओं की कमी, वासनाओं का तिरोधान, स्वार्थ का शमन और परमार्थ का विकास होने लगे, तब समझना चाहिये कि आत्मा में स्मरण के क्षण आने लगे हैं और जब उसको संसार के सारे प्राणी, संसार के सारे पदार्थ और संसार के सारे सुख-दुःख अपने और अपनी अनुभूतियाँ विदित होने लगे, तब जानना चाहिये कि आत्मा ने अपने सत्य स्वरूप की ओर यात्रा प्रारम्भ कर दी है और जब यही अनुभव विशाल से विशालतम होकर विराटता में विकसित हो जाये और यह निखिल, ब्रह्माण्ड अपने में और आत्मवत् इस निखिल ब्रह्माण्ड में अनुभूत होने लगे, शरीर, मन, चित्त, अहंकार, बुद्धि, विवेक के साथ इनकी सारी वृत्तियाँ विस्मृत होकर केवल आत्म ज्ञान-आत्म-ज्ञान ही शेष रह जाये, तब समझना चाहिये कि आत्मा अपने सत्य स्वरूप में आ गया है और अब शीघ्र ही मुक्त होकर वह परमात्मा में मिल कर उसी का रूप बन जायेगा।

यह उन्नत स्थिति, यह सत्य स्वरूप और यह साम्राज्य उपासना द्वारा सर्वथा सम्भव है। किन्तु इसके लिये समय और धैर्य के साथ सतत साधना की आवश्यकता है। थोड़ी-थोड़ी उपासना करते चलिये। एक-एक करके अपनी कामनाओं को गिराते और वासनाओं को छोड़ते चलिये। साधना पूरी होगी और सिद्धि स्वयं आ उपस्थित होगी। इस जन्म में नहीं अगले में और अगले में नहीं तो उसके बाद में। साधना की न तो कोई अवधि है और इतनी बड़ी उपलब्धि के लिये कोई भी कालावधि अधिक नहीं है।

मनुष्य जीवन अक्षय और अनन्त है। जल-बुलबुले की तरह यह शरीर न जाने कितनी बार बनता और बिगड़ता रहेगा पर अनादि जीवन का प्रवाह अनन्त रूप से योंहीं बहता चला जायेगा। महत्व शरीर का नहीं, महत्व है उसमें बन्दी आत्मा का जिसे उपासना, द्वारा मुक्त करना ही है और जो प्रयत्न द्वारा एक दिन मुक्त की भी जा सकती है।


भगवान् बुद्ध

भगवान् बुद्ध अपने ज्ञान का प्रकाश संसार को दे रहे थे। अनेक लोगों का आत्मिक कायाकल्प हो चुका था।

एक दिन तथागत घूमते हुए एक सेठ के यहाँ पहुँचे। भिक्षा हेतु अपना कमंडल उसके सामने रख दिया। वह तथागत के ज्ञान और प्रभाव की प्रशंसा सुन चुका था। उसे आशा थी कि उनका आशीर्वाद पाकर मेरी मुक्ति हो जायेगी। बड़े प्रेम से खीर बनवाई और लाकर कमंडल में देने लगे। उसने आश्चर्य-पूर्वक देखा कि कमंडल में गोबर भरा हुआ है। इतनी सुन्दर खीर उस कमंडल में फँसे रखी जाय, जिसमें कि गन्दगी भरी हुई है।

उसने कमंडल उठाया, उसको अच्छी तरह साफ किया। तत्पश्चात् उसमें खीर रखी और तथागत से बोला-भगवान्! कहीं भिक्षा हेतु पधारा करें अपना पात्र साफ करके ही लाया करें। गन्दगी भरे पात्र से तो आहार की पवित्रता नष्ट हो जायेगी।”

तथागत शांत-भाव से बोले-वत्स! भविष्य में जब कभी भी आऊँगा, कमंडल साफ करके ही लाया करूँगा पर तुम भी तो अपना कमंडल साफ रखा करो।” सेठ ने आश्चर्य भरे शब्दों में पूछा- “भगवन्! कौन-सा कमंडल!” तथागत बोले-यह तन रूपी कमंडल। मन में मलीनता भरी रहने से यह जीवन भी कलुषित हो जाता है और भगवान् की कृपा उसमें ठीक प्रभाव नहीं करती।” बात समझ में आ गई। उस दिन से सेठ अपनी आन्तरिक सफाई में लग गया।


वृक्ष-वनस्पतियों में फैली हुई विश्वात्मा

आत्मा वृक्षों और वनस्पतियों में भी है, इसलिये अध्यात्मवादी दृष्टिकोण के अनुसार उनके साथ भी सद्व्यवहार करना चाहिये वृक्षों का लगाना उनका पोषण करना एक पुण्य माना गया है, उसी प्रकार उन्हें काटना और बढ़ने न देना पाप कहा गया है। वृक्ष हमें प्राण -वायु जीवन-तत्त्व हरीतिमा, छाया, लकड़ी, पुष्प-फल आदि बहुत कुछ देते हैं, ऐसे उपकारी प्राणियों से, वृक्षों से हमें बहुत कुछ सीखना है और उनके जैसा उपकारी बनना है।

यह प्रश्न हो सकता है कि वृक्ष जड़ है, उनमें किसी तरह की चेतन संवेदनशीलता नहीं है, इसलिये उनके साथ जड़ जैसा बर्ताव करना पाप या अनुचित कर्म नहीं। इस सम्बन्ध में वैदिक मान्यतायें स्पष्ट ही इस पक्ष में हैं कि वृक्षों में जीवन हैं, अब उक्त ज्ञान को वैज्ञानिक अनुसंधानों के द्वारा भी सिद्ध करना सम्भव हो गया है। सर जगदीशचंद्र बोस का तो जीवन ही इसी बात में लग गया उन्होंने वृक्षों की संवेदनशीलता के अनेक प्रयोग किये थे। साँस और स्पन्दन की गति की नाप और जहरीले पदार्थों का प्रयोग करके यहाँ तक सिद्ध कर दिखाया था कि जिस तरह और प्राणियों के शरीर में विष का प्रभाव होता है, वृक्षों में भी वैसा ही प्रभाव पड़ता है। हरे-भरे होना, वृक्षों का जीवन है तो उनका सूख जाना ही मृत्यु। मनुष्यों की तरह आहार पर जीवित रहने, साँस लेने, सूर्य-रश्मियों से जीवन ग्रहण करने, काम क्रीड़ायें आदि विभिन्न क्रियायें वृक्ष-वनस्पति भी करते हैं, इसलिये उन्हें प्राणि-जगत् का ही एक अंग मानने से इनकार नहीं किया जा सकता।

अथर्व के प्रथम काण्ड, अनुवाद 5 सूक्त 32 की प्रथम ऋचा में येन प्राणन्ति वीरुषः ऐसा प्रयुक्त हुआ है। उसका अर्थ ही है- “जिससे बेलें जीव धारण करती है” उसके अतिरिक्त भी कहा है-

जीवला न धारिषाँ जीवन्तीमोषधीमहम्। -अथर्व 8।4।6,

उक्त मन्त्र में भी औषधियों (वनस्पति) में जीवन होता है, प्रमाणित किया गया है।

छान्दोग्य उपनिषद् में भी कहा है-

अस्य सोम्य! महतो वृक्षस्य यो मूलेस्भ्याळन्याज्जीवन् स्वेधो मूलेस्भ्याळन्याज्जीवन् स्वेत स एवं जीनात्मनानुप्रभूतः पेपीय मानो मादमान स्तिहति॥1॥-॥2॥

अर्थात्- हे सौम्य! यदि इस बड़े वृक्ष को मल से काटे तो मनुष्य के रक्त की तरह जीता हुआ श्रवण करता है, मध्य और अग्रभाग (टहनी आदिं) काटने से भी वैसा ही जीवन-रस टपकता है, इससे प्रतीत होता है कि वृक्ष जीवात्मा से अधिष्ठित हुआ है। एक स्थान से जीवन रक्त निकल जाने से रोगी अंग की तरह वृक्षों की भी अनेक टहनियाँ सूखती रहती है, जब वृक्ष से जीवात्मा का अन्त हो जाता है तो वह सूख जाता है और उसमें किसी प्रकार का प्राण-स्पन्दन नहीं रह जाता।

मनुस्मृति में योनियों का वर्णन करते हुए मनु भगवान् करते हैं-

उद्भिजाः स्थावराः सर्वे बीजकाण्ड पुरोहिणः। औषध्यः फलपाकान्ता वह पुष्प फलोपणाः॥॥47॥

कर्मानुसार जीव उद्भिज और स्थावर योनियों औषधि फल-फूल वाले वृक्षों-पौधों में भी जन्म ग्रहण करता है। अनेक मन्त्रों में यह भी बताया है कि उन्हें भी मनुष्य की तरह सुख-दुःख की अनुभूति होती है। पौधे वृक्षों द्वारा साँस भी लेते और जड़ों द्वारा खाते भी है। चल फिर नहीं सकते बस इसी से उन्हें स्थावर कहाँ गया है पर यह कोटि जड़ता से भिन्न ही है।

आज लोगों को इस पर अविश्वास है, शंका है। वस्तुतः सारी कठिनाई आत्मा के तत्त्व स्वरूप में परिचय न पाने की है। मनुष्य एक इकाई है, इसलिये वह आत्मा को भी इकाई के रूप में ही देखना चाहता है, जबकि आत्मा एक चैतन्य तत्त्व है, जो मनुष्य की तरह ही सु-ख-दुःख आदि की अनुभूति करता है, भले ही वह कहीं भी किसी भी स्थिति में रहे। अंग्रेज अपनी अनुभूति को भिन्न शब्दों में कहता है-भारतीय रूसी और चीनी भिन्न भाषा में पर अनुभूति की परिभाषा सर्वत्र एक-सी है, भले ही उसे शब्दों से व्यक्त न किया जा सके, इसलिये यह नहीं मानना चाहिये कि शब्द रहित पदार्थों में आत्मा का अस्तित्व नहीं रहता।

कभी किसी उपवन में जाने का अवसर मिले तो देखना कि फूलों पर मंडराती मधुमक्खियाँ, भँवरे आदि अपने पैरों में एक प्रकार का पीला पाउडर लपेटे रहते हैं, यद्यपि वे नहीं जानते पर इस पराग के द्वारा वे वृक्षों, वनस्पतियों में रतिक्रिया की वैसी ही आवश्यकता पूर्ण करते हैं जैसी स्त्री और पुरुषों के संयोग से ही जिस प्रकार जीव की उत्पत्ति सम्भव है, वृक्ष, वनस्पतियों में भी वैसी ही क्रिया सम्पन्न होती है, उसके बिना उनकी वंशावली भी बढ़ नहीं सकती।

वनस्पति-विज्ञान के विद्यार्थी जानते होंगे कि फूल दो प्रकार के होते है। (1) पुंकेसर (पुरुष योनि वाले), (2) स्त्रीकेशर (स्त्रियों योनि वाले)। स्त्रीकेशरों के निचले हिस्से के भीतर बीजाण्ड होते हैं, जब तक इस किस्से में किसी पुंकेसर के पराग कण नहीं पहुँचते तब तक प्रजनन का कार्य हो नहीं सकता। फूल सूख जायेगा पर जब तक उसके वर्तिकाग्र पर पराग न झड़ेगा (पोलीनेट) तब तक बीच पैदा नहीं होगा। परागण की क्रिया गर्भधारण जैसी ही है और उसी से फूल से फल की उत्पत्ति होती है।

इस सम्बन्ध में प्रसिद्ध जर्मन वनस्पतिज्ञ कैमरियिस ने भी माना है कि वृक्षों का प्रजनन विज्ञान मनुष्य के प्रजनन की भाँति ही बड़ा आश्चर्यजनक है और वर्णसंकर पैतृक बीमारियाँ या गुणों की सारी बातें उनमें भी मनुष्यों की तरह ही होती है। अच्छी नस्ल की सल उगाने के लिये अच्छे फूलों वाले पुंकेसरों और स्त्रीकेशरों को मिलाया जाता है अरब, सीरिया, बेबीलोन ओर मिश्र के निवासी अच्छी किस्म के खजूर पैदा करने के लिये अच्छे खजूर के नर पुष्पों को मादा पुष्पों में झाड़ा (पोलीनेट) किया जा करते है।

‘केतकीयम’ भारतीय शब्द भी इसी मान्यता का प्रतिपादक है कि प्रत्येक वृक्ष के फूलों में नर और मादा किस्में होती है और उन दोनों के संयोग से ही उनकी वंशावली का विकास होता है। कई बार यह माध्यम पशु-पक्षियों और हवा आदि के द्वारा भी बनता है। पर यह संयोग प्रत्येक दशा में आवश्यक हैं। बीजाण्ड में फल का विकास गर्भ-कोष में पड़े वीर्य से बच्चे के विकास जैसा ही होता है।

वृक्षों में जीवन के अस्तित्व का सबसे बड़ा प्रमाण उसका विश्लेषण है। जिस प्रकार जीवित प्राणी प्रोटो-प्लाज्मा नामक तत्त्व से बना होता है और उसका सबसे सूक्ष्म कण सेल कहलाता है, उसी प्रकार वनस्पति के सबसे छोटे अणु का नाम जीवाणु (बैक्टीरिया) है। इन्हें एक कोशिका वाले पौधे कहा जा सकता है और वह इतने सूक्ष्म होते है कि माइक्रोस्कोप की सहायता के बिना देख नहीं सकते। यही जीवाणु ही मनुष्य और पशुओं की आहार नली में रहते हैं और सैल्यूलौज वाले भाग को पचाने का काम करते है। जीवाणु कोशिका की लम्बाई 0.5 माइक्रोन तक होती है। यह तीन प्रकार के होते है, गोलाणु (कोकस) दण्डाणु,(वैसिलख) और सर्पिआणु (स्पिरिलस)।

कोशिका जिस तरह प्रोटीन के आवरण में बन्द होती है और उसके भीतर केन्द्रक (म्युक्लियस) काम किया करता है, उसी प्रकार जीवाणु कोशिका एक लिसलिसी इलैष्मपरत (कैप्सूल) में बन्द (रेजिस्ट) होती है। कोशिका भित्ति की सुरक्षा के लिये प्लाज़्मा झिल्ली (प्लाज्मा मैम्बरैन) होती है। किन्तु किन्हीं जीवाणु कोशिकाओं में केन्द्रक नहीं भी होते है तो भी उनमें केन्द्रीय पदार्थ (क्रीमिटिन) अवश्य होता है। यह जीवाणु भी अनैतिक रीति से स्वयं ही बढ़ने की जैसी ही क्षमता रखते हैं, जैसे कि प्रोटोप्लाज्मा केन्द्रक।

एक कोशिका से विभाजन प्रारम्भ होता है तो 15 घण्टे बाद उसी तरह की एक अरब संतति कोशिकाएँ (डाटर सेल्स) जन्म ले लेती है। 36 घण्टे बाद इनकी तादाद इतनी हो जाती है कि उससे सौ ट्रक भरे जा सकते है यह गति यदि निर्बाध चलती रहे तो 48 घण्टे बाद एक कोशिका से बने अन्य कोशिकाओं का भर पृथ्वी के र से चौगुना अधिक हो जायेगा, किन्तु उनकी ही देह से निकले विषैले पदार्थ इस वृद्धि को रोक देते हैं और यह गति रुक जाती है। वस्तुतः यह बाढ़ मानव जाति के हित में ही है।

यह जीवाणु सर्वत्र विद्यमान् रहकर मनुष्य जाति की बड़ी सेवा करते है, एक प्रतिशत जीवाणु ही मनुष्य के लिये हानिकारक है। अन्यथा पौधों और जन्तुओं के हानिकारक तत्त्वों और मृत अवशेषों का विघटन यह जीवाणु ही करते है। प्रतिवर्ष पौधा 200 अरब टन कार्बन, कार्बन डाई आक्साइड गैस लेकर प्रकाश-किरणों द्वारा उसे जैव पदार्थ में बदल देता है। यह कार्बन जीवों द्वारा पैदा की जाती है, यदि जीवाणु यह क्रिया सम्पन्न न करें तो सारा वायु-मण्डल कार्बन डाई आक्साइड से आच्छादित हो जाये और मनुष्य का धरती पर रहना कठिन हो जाये।

जीवाणु की क्रिया और प्रोटोप्लाज्मा की कोशिका (सेल) की क्रिया का तुलनात्मक अध्ययन करें तो दोनों में एक जैसी चेतना ही दिखाई देती है, जैसा कि ऊपर बताया जा चुका है, आकृति और कार्य प्रणाली में थोड़ा अन्तर है, जो मनुष्य के हित में पूरक ही हैं। यदि यह पूरक क्रिया सम्पन्न न हो तो मनुष्य का जीवन खतरे में पड़ जाये। विश्व-चेतना का यह अंश मनुष्य के उपयोग में आता है पर उसका यह अर्थ नहीं लगा लेना चाहिए कि उनमें आत्मा नहीं है। यदि मनुष्य की प्रजनन प्रणाली, खाद्य प्रणाली, मल विसर्जन आदि की क्रियायें और उसकी परमाणविक रचना में वृक्ष वनस्पतियों की क्रिया प्रणाली से साम्य पाया जाता है तो उसे विश्व-व्यापी चेतना का स्वरूप ही मानना चाहिये। यदि विज्ञान की इन उपलब्धियों से भी मनुष्य यह मानने को तैयार नहीं होता तो उसे हठधर्मी ही कहा जायेगा।

यह भी ध्यान रखना है कि यदि मनुष्य मानवोचित कर्तव्यों का पालन नहीं करते तो वृक्ष आदि योनियों में अपने को भी जाना और उन सुख सुविधाओं से वंचित होना पड़ सकता है जो मनुष्य योनि में उपलब्ध हैं।

वृक्ष दिखते और समझे भर जड़ जाते हैं, वस्तुतः वे चेतन हैं। एक ही चेतन आत्मा सर्वत्र सबमें विद्यमान् है। यह अनुभव करते हुए हमें विराट ब्रह्म की असीम चेतना अपने चारों ओर फैली हुई देखनी चाहिये और सबके साथ सहृदयतापूर्ण व्यवहार करना चाहिये। वृक्षों को भी अकारण क्षति न पहुँचेंगे, यही उचित है।


वृक्षों के इन्द्र और दधीचि

वृक्षों के इन्द्र और दधीचि--

सुममा द्वीप में एक ऐसा वृक्ष पाया जाता है जो जल बरसाता है। दोपहर के समय यह हवा से भाप सोख लेता है, थोड़ी देर बाद वह बूँदों के रूप में बरसने लगता है। जिससे नीचे खोदकर रखा गया कुण्ड भर जाता है, जहाँ जल का अभाव होता है वहाँ यही पानी पीने के काम आता है।

अफ्रीका का ‘रोटी का पेड़ ‘ भी प्रसिद्ध है। इस पेड़ की छाल से रोटियाँ बनाई जाती है जो आटे की रोटियों की तरह ही स्वादिष्ट और शक्तिवर्धक होती है। दक्षिणी प्रशान्त महासागर में एक रजाई का वृक्ष पाया जाता है, इसकी छाल निकाल कर कोमल गद्दे और रजाइयाँ बनती है। ब्राजील और पेरू के जंगलों में ‘मिल्क ट्री’ मिलता है, इसे छेद कर दूध निकाला जाता है। यह दूध गाय के दूध की तरह पतला स्वादिष्ट और शक्ति वर्धक होता है।

वृक्षों के इन उपकारों के देखकर लगता है मनुष्य जाति भले ही रीत गई हो, वृक्षों में कर्ण, दधीचि और इन्द्र की तरह उपकार करने वालों का अभाव नहीं हुआ।


मनुष्य से श्रेष्ठ और कुछ नहीं

जब किसी के मन में यह विचार आता है कि मनुष्य-जीवन नश्वर है, निरर्थक है-वह शरीर हाड़-माँस रुधिर और चर्म का बना हुआ है, मल-मूत्र आदि के रूप में इसमें नरक भरा हुआ है, तब निश्चय जानिए उसके मन पर अज्ञान का, मोह का घना अन्धकार छाया हुआ है। इस प्रकार का निकृष्ट विचार अवास्तविक है, आध्यात्मिक है।

वास्तविकता यह है कि मनुष्य का जीवन एक सार्थक प्रक्रिया है। उसका शरीर एक पवित्र मन्दिर है। यह मानव-तन ही तो वह साधन, वह उपादान है, जिसकी सहायता से ईश्वर को पाया जाता है। इसे नरक का निवास कहना, इसका अपमान करना है।

भूल कर भी मन में यह विचार मत आने दीजिये कि मनुष्य हाड़-माँस का एक पुतला है। पाप से उत्पन्न हुआ है और पाप में ही प्रवृत्त रहता है।” यह विचार स्वयं ही एक बड़ा पाप है। अपने प्रति निकृष्ट दृष्टिकोण रखने वाला कभी भी उन्नतिशील नहीं हो सकता। उन्नति का आधार है अपने प्रति ऊँचा और पवित्र विचार रखना। मनुष्य की वास्तविकता यह है कि यह अखण्ड, अगणित चेतन अणु-परमाणुओं का सजीव तेज-पुञ्ज है। असीम और अक्षय शक्तियों से भरा हुआ है। उसके आन्तरिक कोशों और चक्रों में सारी सिद्धियाँ सोई हुई हैं। वह ईश्वर का पुत्र और उसका प्रतिनिधि है। संसार का सर्वश्रेष्ठ प्राणी है-मनुष्य के विषय में महाभारत का यह वाक्य अक्षरशः सत्य और यथार्थ है-यह रहस्य मैं तुम को बतलाता हूँ कि मनुष्य से श्रेष्ठ और कुछ नहीं है।”

बुद्धि और विवेक को मनुष्य में अवस्थित परमात्मा की पावन प्रेरणा ही माना गया है और उसकी चेतन आत्मा तो परमात्मा का ही अंश है। इस स्थिति में मनुष्य-जीवन को नश्वर, निरर्थक कहना और शरीर को एक पवित्र मन्दिर न मानकर नरक का निवास कहना मोह के सिवाय और क्या कहा जा सकता है। अपने दिव्य रूप में विश्वास करिये और मानिए कि मनुष्य संसार में पूर्णता का प्रतीक है। वह संसार में सर्वशक्तिमान का मानवीय रूप है। उसकी आत्मा, मन और बुद्धि में विलक्षण चमत्कार छिपे हैं। जिनको सजग और विकसित कर मनुष्य ऐसे-ऐसे काम कर दिखाता है, जिन्हें देखकर विस्मित रह जाना पड़ता है। यह मानव शरीर हाड़-माँस का पुतला नहीं, दैवी भावनाओं, दैवी सम्पदाओं और देवत्व का आवास है। इसके भीतर उल्लास और आनन्द के रूप में ईश्वर की अनिर्वचनीय ज्योति जगमगाती रहती है। इसके प्रति निकृष्ट और तुच्छ विचार रखना अपराध है। इससे बचना ही चाहिये।

रोग, दोष और पाप आदि मानव जीवन की सहज प्रवृत्तियाँ नहीं हैं। उसका स्वभाव तो शुद्ध, बुद्ध और आनन्दमय है। हीनताओं का आरोपण उस पर तब आ जाता है, जब मनुष्य मानवीय नियमों का उल्लंघन करता है और ऐसे कार्यों में प्रवृत्त हो चलता हैं, जो कदापि उसके योग्य नहीं होते। ईश्वर द्वारा मनुष्य के निर्माण का एक विशेष और विशिष्ट उद्देश्य है। वह यह कि मनुष्य उसका प्रतिनिधि बनकर संसार में ईश्वरीय नियमों, भावनाओं, ज्ञान और गरिमाओं का सम्पादन करे। सत्य, न्याय, प्रेम और त्याग का आदर्श उपस्थित करे। स्वयं ऊँचा उठे ओर दूसरों को ऊँचा उठने में सहायक बने। छल, कपट, झूठ निष्ठुरता, पाखण्ड, स्वार्थ, शोषण आदि विरोधी प्रवृत्तियों का विरोध करे।

यह संसार अपने आदिम स्वरूप में जड़ता की, क्रीड़ा-स्थली के सिवाय और कुछ नहीं था। न कहीं ज्ञान या और न सौंदर्य ईश्वर को अपनी रचना की यह विडम्बना अच्छी न लगी। उसने अपने निर्माणों के बीच से एक प्राणी चुना और उसे शक्ति से ओत-प्रोत कर संसार के परिमार्जन और उसकी व्यवस्था के लिये प्रेरणा दी। उसे बुद्धि विवेक और दिव्य चेतना देकर जागृत किया। उस प्राणी ने अपने निर्माता और स्वामी ईश्वर का उद्देश्य समझा और संसार को जड़ता की ओर से प्रकाश एवं विकास की ओर बढ़ाया पाशविक वृत्तियों पर विजय प्राप्त कर सात्विक प्रवृत्तियों का प्रचलन किया। ईश्वरीय कृपा का दुरुपयोग करने वाले प्राणियों का दमन कर उन्हें एक अनुशासन में रहने पर विवश किया। स्थायी और कल्याणकारी शांति के लिये धर्म की ध्वजा ऊँची की और इस प्रकार संसार को आनन्द, उत्साह और कल्याण का आवास बनाया। ईश्वर द्वारा इस मंगल कार्य के लिये निर्वाचित प्राणी और कोई नहीं - मनुष्य ही था। और आज भी उसी ईश्वरीय उद्देश्य को आगे बढ़ाने में लगा हुआ है।

किन्तु ये मनुष्य वे मनुष्य नहीं हैं, जो मानव -शरीर और मानव-जीवन के प्रति निकृष्ट और निम्नकोटि के विचार रखते है। पुरुषार्थ के धनी ये मनुष्य वे मनुष्य ही रहे, जिन्होंने अपने को ईश्वर का पुत्र माना और उस और उसकी सिद्धियों को विवेक द्वारा समझने का प्रयत्न किया उन्होंने अन्त;करण में ओत -प्रोत आत्मा से सम्बन्ध स्थापित किया। उसके सन्देश आदेशों पर अमल किया साधना और संयम द्वारा अपने श्रेष्ठ कर्तव्य के योग्य क्षमता उत्पादित की। सद्गुण बढ़ाये और उनको अपने व्यावहारिक जीवन में मूर्तिमान् किया।

ईश्वर ने मनुष्य को और मनुष्य ने मनुष्य समाज को जन्म दिया। मनुष्यों की संख्या बढ़ी और उसमें निबल, निकृष्ट और अयोग्य लोग भी आने लगे। अपनी अयोग्यता की प्रेरणा से उन्होंने संसार में अशान्ति और अमुख का वातावरण पैदा करना प्रारम्भ कर दिया। जिसके सुन्दर संसार असुन्दरता की ओर लौटने लगा। प्रकृति की ओर से उसके अवरोध की प्रेरणा आने लगी। पात्रता के अनुयोग्य तथा अवांछित के विरुद्ध योग्य और वाँछनीय का संघर्ष प्रारम्भ हो गया। सत्य की जीत हुई और संसार की एक प्रकृति परम्परा है। जो युगों से चलती आ रही है, चल रही है और असुन्दर पर योग्य और सुन्दर की सदा विजय होती रहेगी।

संसार में अयोग्य और असुन्दर के लिए कोई स्थान नहीं है। यह सौन्दर्य, सुयोग्यता और शिवत्व की मातृभूमि है। किसी प्रकार की असुन्दरताएँ यहाँ ठहरने नहीं दी जा सकती। उससे ईश्वरीय उद्देश्य और आदेश में बाधा पड़ती है। जो शिव है वही सत्य है और जो सत्य है वही सुन्दर है। इसकी स्थापना और स्थिरता में प्रकृति स्वयं भी सहायक होती है। प्रकृति विज्ञान के अप्रतिम विद्वान् और उसकी प्रक्रियाओं के दृष्टा डाक्टर ई. बी. जेम्स ने प्रकृति की सहायता का वर्णन करते हुए लिखा है- “योग्यतम का चुनाव ही प्रकृति का नियम है। अनुकूलता के प्रति प्रकृति जहाँ दयालु, करुणामयी माता और धात्री है, वहाँ प्रतिकूलताओं के प्रति वह बड़ी क्रूर और अकारुणिका है। अपनी इस सृष्टि में वह अयोग्यताओं को एक क्षण को भी सहन नहीं करती। संसार से झाड़-झंखाड़ हटाने के लिए किसी न किसी रूप में उसकी बुहारी चलती ही रहती है।”

विश्व-विधात्री प्रकृति प्रतिक्षण अच्छे-बुरे बलवान निर्बल, अयोग्य और योग्य को देखती, पहचानती रहती है। वह अपने प्रकोपों अथवा प्रेरित संघर्षों के द्वारा शीघ्र ही निर्बलों और अयोग्यों को अपने आँगन से हटा देती है। उसके नियमों के पालन से परिपुष्ट बने जीव ही उसकी इस सृष्टि में निश्चिन्ततापूर्वक रह सकते हैं। निर्बल और असंयमी उसके एक झटके में ही जीवन की परिधि पार कर जाते हैं। योग्य और अयोग्य की निर्वाचक यह प्रकृति एक योग्य के लिए असंख्यों अयोग्यों को नष्ट कर देने में संकोच नहीं करती। ऐसी न्यायशीलता के राज्य में अयोग्यताओं के लिए जरा भी स्थान नहीं है।”

संसार-आनन्द और अमर चेतनाओं का आधार है। यहाँ दुःख शोक और अशान्ति आदि अपकारी तत्त्वों का कोई स्थान नहीं है। तथापि जो इन संतापों में जलते दिखलाई देते हैं, वे स्वयं अपन विचारों और कार्यों के कारण ही उस स्थिति के भागी बने हुए हैं। आनन्द उन मनुष्यों का अधिकार है, जो अपने को यथार्थ रूप में मनुष्य मानते, उसी के अनुसार आचरण करते हैं। सच्चे मनुष्य ही अपनी शक्तियों का उद्भव करते और उस ईश्वरीय उद्देश्य का पूरा करने का प्रयत्न करते हैं, जिसके लिए उनका सृजन किया गया है। विपरीत आदमियों के भाग्य में सुख-शांति का अंश नहीं होता। स्वयं सुन्दर बनने और संसार को सुन्दर बनाने में हाथ बटाने वाले महाभाग ही वे मानव होते हैं, जिनको परमात्मा का प्रतिनिधि कहा जाता है। हम सब अपने स्वरूप को पहचानें, मोहमयी निद्रा से जागें और उस अमर प्रकाश की ओर बढ़ जो ब्रह्माण्ड मण्डल में भरा हुआ हमारी प्रतीक्षा कर रहा है। वेद भगवान का भी तो यही आदेश है-

इच्छन्ति देवाः सुत्वन्तं।

न स्वप्नाय स्पृहयन्ति।

यन्ति प्रभादमतन्द्राः।

देवता सत्कर्म करने वालों को ही चाहते हैं। वे सोये लोगों को प्यार नहीं करते। इसलिए प्रमाद त्याग कर जाग उठो।

देवता सत्कर्म करने वालों को ही चाहते हैं- इसका स्पष्ट आशय यही है कि जो मानवोचित कार्य करता है, ईश्वरीय उद्देश्य के लिए जीवन-यापन करता है, देवताओं की कृपा उसी पर होती है। देवता सोते हुओं को प्यार नहीं करते अर्थात् उनसे घृणा करते हैं। देवताओं की घृणा का अर्थ है जीवन की सारी दिव्यताओं से वंचित हो जाना। संसार देवत्व से वंचित व्यक्तियों के लिए नहीं है। ऐसे असुर प्रवृत्ति वाले लोग किसी न किसी मिष से इस धरती की गोद से शीघ्र ही उठा दिये जाते हैं। उस समय तक भी जब तक उन्हें प्रकृति द्वारा बुहार नहीं दिया जाता, उनके लिये शोक संतापों में जलने के सिवाय और कोई अधिकार नहीं रहता। प्रमाद, आलस्य और अज्ञान त्याग कर जागरण का वरण करो, प्रकाश पावनता की ओर बढ़ो, जिससे कि मनुष्यता की सिद्धि हो और आत्मा का कल्याण।

किन्तु यह दिव्य जागरण हो किस प्रकार? इसका सरल सा उपाय यही है कि अपने वास्तविक स्वरूप में विश्वास किया जाय। अपने को उस परमपिता परमात्मा का पुत्र और प्रतिनिधि अनुभव किया जाय। अपने प्रति हीन, क्षुद्रता और निकृष्टता की सारी भावनायें निकाल फेंकी जाय ऐसा करते ही आत्मा में सन्निहित प्रकाश का निर्झर फूट उठेगा सारा जीवन दिव्य-चेतना से भर कर जाग उठेगा। अपनी विशालता, व्यापकता और सुन्दरता का बोध होगा। चारों ओर से आनन्द और अमरता का आभास होने लगेगा। जीवत्व से ईश्वरत्व की ओर प्रगति होने लगेगी।

मनुष्य जब तक अपने को मात्र हाड़-माँस का पुतला समझता और मानव-जीवन को पाप द्वारा उत्पन्न और पाप में प्रवृत्त मानता रहता है। वह अपने ही वैचारिक नरक में पड़ा रहता है। विश्वास के अनुसार ही उसे अन्तः प्रेरणा प्राप्त होती है और वह अकर्तव्य कार्यों से चाहता हुआ भी नहीं बच पाता। इसके विपरीत जब उसे अपने ईश्वरीय वंश परम्परा का बोध हो जाता है। उसका जीवन, उसका व्यवहार, उसका आचरण और उसकी प्रवृत्तियाँ स्वयं ही उसके अनुसार परिचालित हो उठती हैं। अखण्ड ब्रह्माण्ड में उसे अपना ही विस्तार, अपनी ही व्यापकता और अपनी ही चेतना अनुशासित होने लगती है। इस उच्च स्थिति में अवस्थित मनुष्य कोई भी ऐसा काम करने के लिए प्रेरित नहीं हो सकता, जो ईश्वरीय उद्देश्य के प्रतिकूल अथवा उसका प्रतिबाधक हो। वह जो कुछ करेगा, सत्य-शिव और सुन्दर ही करेगा, जो कुछ सोचेगा कल्याणकारी ही सोचेगा। अस्तु अपने को यथार्थ रूप में देखिये और उसी स्वरूप के अनुसार आचरण कर ईश्वरीय उद्देश्य में सहायक बनकर ईश्वरता के उत्तराधिकारी बनिये। यह जीवन और यह मान्यता इसलिए ही मिली है। इसका और कोई उद्देश्य नहीं है।

पेड़ की एक डाल पर बाज़ बैठा था, दूसरे पर एक तोता। तोते को देखकर बाज़ बोला-अरे तोते! देखता नहीं मैं तेरा काल- सामने खड़ा हूँ, चाहूँ तो एक क्षण में तेरे टुकड़े-टुकड़े कर दूँ फिर भी तू मुझसे न डरता है, न विनती करता है।”

तोते ने कहा - “आप ठीक कहते हैं बन्धु पर शक्ति की शोभा किसी को मारने में नहीं, रक्षा करने में होती है। बलवान होकर जो निर्बलों की रक्षा न कर सके वह भी कोई सामर्थ्यवान है?


अन्य लोकों में बुद्धि विकास के प्रमाण

आकाश अब वैज्ञानिकों की दृष्टि में सबसे अधिक आश्चर्यजनक वस्तु है। ऐसा समझा जाता है कि जो स्थान इन स्थूल आँखों से भी नहीं दिखाई देते, वहाँ भी मानवीय सभ्यता विद्यमान् है। पार्थिव जीव का यदि उन ग्रहों-उपग्रहों और नक्षत्रों में आदान-प्रदान होता हो तो कुछ आश्चर्य नहीं।

परलोक दर्शन का आधार भी यही है कि ऊपर के कुछ लोक अत्यन्त सुखदायक और प्रत्येक इच्छा की पूर्ति करने वाले हैं। यदि आत्म-चेतना का विस्तार उन परिस्थितियों के अनुरूप किया जा सके तो मरणोपरान्त भी मनुष्य स्वर्गीय सुखों का आस्वादन कर सकता है। पहले इन शास्त्रीय मान्यताओं को अतिरंजित कहा जाता था पर अब इन तथ्यों के लिए पर्याप्त प्रमाण मिल रहे हैं कि आकाश के गर्भ में अति विकसित सभ्यताएँ सचमुच विद्यमान् हैं और उनसे यांत्रिक रूप से भी सम्पर्क स्थापित किया जा सकता है।

लगता है पहले भी पृथ्वी के निवासी अन्य लोकों में जाने का अभ्यास करते रहे हैं। योग दर्शन में बताया

काया काशयोस्सम्बन्ध संयमाल्लघुतूलसामापत्तेश्चाकाश नमनम्।॥42॥

शरीर व आकाश के मध्य सम्बन्ध स्थापित कर और ड़ड़ड़ड़ से लेकर परमाणु तक में समाधि सिद्ध करने से योगी लघु और हल्का हो जाता है। लघु होने और हल्कापन प्रथम तो वह जल पर चलता है, फिर सूर्य की किरणों में विहार करता है, इसके पश्चात् इच्छापूर्वक आकाश में रहता है।

योग की यह सिद्धियाँ पूर्णकाल में आकाश यात्रा में ही सहायक रही होंगी उन्हें आज की स्थिति में तापीय (एयर टेम्परेचर) और दबाव (एयर प्रेशर) की वह कठिनाइयाँ न होती होंगी, जो आज वैज्ञानिक अनुभव कर रहे हैं। योग क्या ‘आकाश की खोज’ में सहायक हो सकता है, इस सम्बन्ध में रूस व्यापक खोज भी कर रहा है।

अन्य ग्रहों में जीवन की सम्भावना और उनसे संपर्क स्थापित करने की पुष्टि आज उन उड़ती हुई वस्तुओं से हो रही हैं, जिन्हें उड़न-तश्तरी (फ्लाइंग साइसर्स) या अनजान उड़ती वस्तु (अनआइडेंटीफाइड आब्जेक्ट) के नाम से जाना जाता है और 1954 के बाद से जिन पर व्यापक छानबीन हो रही है। यह समझ में न आने वाली अन्तरिक्ष से प्रेषित अनुसंधानिकायें अण्डाकार, सिगार की तरह लम्बी, बिलकुल गोल और तिकोनी भी होती हैं। वह ऊपर से उड़ती हुई सी भी आती हैं, हैलिकाप्टर की तरह कहीं भी ठहर जाती हैं, उनसे कैप्सूल की तरह उपखण्ड भी बाहर निकलती हैं, विभिन्न प्रकार की किरणें और रंग भी दिखाई देते हैं, समुद्र में वे गोता भी लगाती देखी गई हैं और कई बार तो उनकी गतिविधियाँ और भी विचित्र और कौतूहल वर्धक पाई गई हैं।

23 अगस्त, 1954 में पेरिस से कोई 50 मील दूर वरनान में एक विचित्र घटना हुई। पुलिस स्टेशन में एक साथ कई नागरिक पहुँचे और उन सबने एक ऐसी घटना की रिपोर्ट लिखाई जो कई लोगों के द्वारा लिखाये जाने पर भी एक थी केवल दिशाओं आदि में थोड़ा अन्तर था, जैसे कि शहर के पूर्व भाग वाले ने तो यह बताया कि वह वस्तु पश्चिम को झपटी और पश्चिम वाले ने कहा हमारी ओर आई बस यही सामान्य अन्तर था, बाकी सबकी रिपोर्ट बिलकुल एक थीं।

वर्नार्ड माइसरे नामक एक व्यापारी का बयान सबसे दिलचस्प था। उसने बताया कि - “आधी रात जब वह अपनी गैरेज से कार निकालने गया तो वहाँ पूरी तरह अँधेरा था। कार लेकर बाहर आया तब सारा शहर एक विचित्र हरे रंग की किरणों के प्रकाश से छा रहा था। ऊपर आँख उठाकर देखा तो कोई डेढ़ फलाँग दूर नदी के ऊपर एक 100 गज लम्बी कोई वस्तु लटक रही थी, उसी में से एक प्रकाश निकलकर फैल रहा था। वर्नार्ड बड़े असमंजस में उसे देख ही रहा था कि उसके पेंदे से एक गोल तश्तरी की तरह की कोई वस्तु जो किसी धातु की बनी मालूम पड़ती थी, निकली हवा में झूलती हुई थोड़ी देर ठहरी रही, फिर बर्नार्ड की ओर झपटी और तब तक बर्नार्ड अपने को सम्भाले तब तक वह कहीं अदृश्य हो गई। अब उस गोलाकार नक्षत्र यान से दूसरी तश्तरी निकली वह पानी के ऊपर इस तरह हिलती-डोलती रही, जैसे पानी में उसे कोई वस्तु ढूँढ़नी हो। फिर तीसरी, चौथी और पाँचवीं तश्तरी- इस तरह पाँच तश्तरियाँ उसमें से निकलीं और विभिन्न दिशाओं में जा-जाकर लौटती हुई उसी पेन्सिलाकार ट्यूब में समाती गईं। इसके बाद उस वस्तु का प्रकाश धूमिल पड़ने लगा और वह अदृश्य हो गई।”

इस प्रकार की रिपोर्ट लिखाने वाला बर्नार्ड माइसरे अकेला ही नहीं था, मिलिटरी का एक इंजीनियर, दो सिपाही, स्त्रियाँ और कुछ और लोग भी थे, उन सबका एक ही कहना था कि उन्होंने जो कुछ देखा वह केवल दृष्टि भ्रम न था।

एक और घटना 1 मई 1917 में फातिमा नगर (लिस्बन (पुर्तगाल) से कोई 62 मील दूर) में घटित हुई, जिसमें अन्तरिक्ष-वासियों ने पृथ्वी में उतर कर बाकायदा बच्चों को अपने विचार भी दिये। यह सब कुछ ऐसा हुआ कि वैज्ञानिकों को भी उसकी सम्भावना से सहमत होना पड़ा। लूसिया, फ्रैंकिस्कोमार्तो और जेसिन्तो मार्तो नामक उक्त तीन बच्चे ‘कारवा द इरिया’ नामक झरने के समीप अपने जानवर चरा रहे थे। 13 मई का दिन था एक यान उतरा और उसमें से एक सफेद वस्त्र-सी धारण किये हुये अत्यन्त सुन्दर युवती उतरी बच्चों पर उसने कुछ सम्मोहन किरणें सी फेंकी उससे वे बहुत प्रसन्न हुए। उनका डर जाता रहा। बच्चों ने बताया कि उस समय उन्हें ऐसा लग रहा था, जैसे उसने हमसे कहा हो- “तुम हमें बहुत अच्छे लगते हो।” पर बच्चों की इस बात पर किसी ने विश्वास न किया।

ठीक वैसी ही घटना 13 जून को हुई फिर 13 जुलाई को भी बच्चों ने उस युवती के दर्शन किये तब तक बच्चों की बात सारे नगर में फैल चुकी थी, किन्तु कोई भी उस बात को मानने के लिए तैयार न हुआ। पुलिस ने भ्रामक अफवाह फैलाने के आरोप में बच्चों को गिरफ्तार कर लिया पर जब उनके बयान लिये गये और भेंट की प्रत्येक तारीख 13 ही बताई गई तो लोगों ने कहा कि क्या अगली 13 अक्टूबर को भी वह वस्तु आयेगी। बच्चों ने कहा हो सकता है आये। इसी बात पर उन्हें छोड़ दिया गया।

13 अक्टूबर 1917 को उस आकाश यान और अज्ञात यात्रियों के दर्शनों के लिए झरने के पास 70000 हजार नगरवासियों की भीड़ जमा हुई। रेबरेन्ड जनरल भी ‘विर्कर आफ लीरिया’ भी उन दर्शकों में से एक थे। अनेक नास्तिक पत्रकार साहित्यकार और पदाधिकारी भी घटनास्थल पर पहुँचे कोइम्ब्रा विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक प्रो. अलमीदा गैरेन भी उन विशिष्ट व्यक्तियों में से एक थे

इसके बाद जो हुआ उसका वर्णन स्वयं प्रोफेसर अलमीदा गैरेन ने इस प्रकार किया है- ‘‘थोड़ी ही देर में घने बादलों के बीच से चमकते हुए सूर्य की तरह कोई वस्तु आकाश से पृथ्वी की ओर आती दिखाई दी उसे देख कर आंखें चौंधिया जाती थी। वेग से घूमने में उसका रंग बदल रहा था। पृथ्वी के समीप आकर तश्तरी रुक गई। उसमें से सफेद सी कोई वस्तु निकल कर उसकी छत पर दिखाई दी पर आज वह ठहरी नहीं, थोड़ी ही देर में वह सूर्य की ओर कुछ दूर जाकर विलुप्त हो गई। उसकी गति प्रकाश की गति से भी तेज थी।”

यह दो घटनायें यह सोचने को विवश करती हैं कि हमें केवल ‘पृथ्वी में ही जीवन’ के संकुचित दृष्टिकोण को परित्याग कर देना चाहिये और यह देखना चाहिये कि ब्रह्माण्ड से दूर भी कुछ है और उससे पार्थिव जीवन का घनिष्ठ सम्बन्ध भी है।

काल्पनिक गाथायें जान पड़ने वाली इन घटनाओं की पुष्टि अब पुरातत्व-संग्रह (आकोलॉजिकल्स) से भी होने लगी हैं। दुनियाँ के कुछ संग्रहालयों में ऐसी अनेक वस्तुएँ हैं जो यह प्रमाणित करती हैं कि अब की अपेक्षा प्राचीनकाल में लोगों में ब्रह्माण्ड का कहीं अधिक स्पष्ट अध्ययन किया था। उस समय अन्य लोकों से निःसन्देह प्राणी आते रहे हैं।

सात्यवर्ग म्यूजियम (आस्ट्रिया) में 785 ग्राम और 7.75 आपेक्षिक घनत्व का एक अवशेष 1877 में लोअर आस्ट्रिया की एक कोयला खान में खुदाई करते हुए मिला था। रेडियो सक्रियता से सम्बन्धित परीक्षण करने के बाद वैज्ञानिकों ने बताया कि इस कठोर टुकड़े का निर्माण तीन लाख वर्ष पूर्व हुआ था जबकि पाश्चात्य वैज्ञानिक आधुनिक सभ्यता का सर्वाधिक ऋग्वेदीय काल कुल सात हजार वर्ष मानते हैं। इतने वर्ष पूर्व यदि पृथ्वी पर मानवीय सभ्यता न रही होगी तो यह टुकड़ा निःसन्देह किसी अन्तरिक्ष से आये हुए यान का ही होगा और इससे बनाने वाले कुशल कलाकार ही नहीं बौद्धिक कारीगर भी रहे होंगे, क्योंकि उसकी लम्बाई, चौड़ाई में एक सूत का भी अन्तर नहीं है। गहराई की दोनों करवटें उन्नतोतर (कानवेक्स) हैं और उभारो में इतनी समानता है, मानों उसे किसी मशीन से खरादकर बनाया गया हो। बीच में छोटा सा छेद भी है, जो आमने सामने की समतल दीवारों से पार निकल गया है, वह छेद भी किसी यन्त्र से ही बनाया गया है।

वैज्ञानिक अब उसे किसी ग्रह द्वारा निक्षेपित (सूटेड) किसी यन्त्र का ही टुकड़ा मानते हैं। कारनेल विश्वविद्यालय में खगोल शास्त्र के प्राध्यापक डा. थामस गोल्ड की तो यहाँ तक मान्यता है कि - “ऊपर से आने वाले अज्ञात यात्री पृथ्वी के ही प्राणी होंगे और दूर नक्षत्रों से यह देखने आते होंगे कि हम जिस पृथ्वी पर रहते थे, अब उसकी क्या स्थिति है। भाषा और ध्वनि में अन्तर होने के कारण भले ही हम उनके सन्देश ग्रहण करने की स्थिति में न हों पर वहाँ भी तिथि, नक्षत्र, काल-विभाजन आदि नियमों की जानकारी और व्यवस्था है, क्योंकि उनका आना, सन्देश भेजना आदि सब निश्चित समय और अन्तर (इन्टरवल) में होता है।”

22 जून 1844 में इसी प्रकार आठ फुट गहराई में रदरफोर्ड मिल्स (लन्दन) में एक तार निकला था, वह भी ऐसी सभ्यता की पुष्टि करता है। 1908 में साइबेरिया में जो विस्फोट हुआ था, उसकी शक्ति तीन करोड़ टन टी० एन॰ टी० थी, वैज्ञानिकों का अनुमान है कि वह किसी उल्कापात के कारण नहीं वरन् किसी नियमित रूप से प्रेषित अज्ञात यान में रखे किसी अणु-अस्त्र का विस्फोट थी।

इन प्रमाणों के बावजूद भी पृथ्वी में किसी के आने या यहाँ से किसी के जाने की बात प्रमाणित करने की सबसे बड़ी कठिनाई गुरुत्वाकर्षण का सिद्धान्त है। उसके रहते प्रकाश की गति से भी अधिक तीव्र गति देना किसी यान के लिए सम्भव नहीं और जब तक यह स्थिति न बने दूरवर्ती नक्षत्रों में पहुँचना और समय की सीमा में ही लौट आना कठिन है पर अब वैज्ञानिक यह मानने लगे हैं कि किसी वस्तु और उसके अन्दर के वायुमण्डल को गुरुत्वाकर्षण से मुक्त किया जा सकता है।

हमारी मान्यता उससे भिन्न और यह है कि शून्य अन्तरिक्ष में शक्तियों के कुछ ऐसे सूक्ष्म प्रवाह हैं, जहाँ यदि कोई वस्तु पहुँच जाये तो फिर वह किसी नक्षत्र में स्वयं खींचकर जा सकती है, ऐसी विचित्र शक्ति गंगाओं का पृथ्वी के समीप ही पता भी चला है, उसका वर्णन किसी अगले लेख में करेंगे


अनन्तता में लीन हो जाने का वरदान

घड़ा जब तक घड़ा था उसे अपने स्वास्थ्य और सौंदर्य पर बड़ा अभिमान था, किन्तु एक दीवाल से चोट लगी और उसका सारा दर्प चूर-चूर हो गया। घड़ा टुकड़े-टुकड़े होकर जमीन पर बिखर गया।

अपनी इस स्थिति के लिए वह विधाता को कोसने लगा-तू कितना निष्ठुर है, तुझे मेरी प्रसन्नता भी न देखी गई। तू सदैव हँसते-खेलते चेहरों को योंहीं मिट्टी में मिलाया करता है।” धरती ने यह आवाज सुनी, फूटे घड़े को शांत करती हुई बोली-वत्स! ऐसा न कहो, तुम्हें पता नहीं टुकड़े-टुकड़े होकर किस अनन्तता में लीन हो जाने का वरदान पा रहे हो।”


सद्विचार अपनाये बिना कल्याण नहीं

विचार शक्ति मानव जीवन की निर्मात्री शक्ति है। मानव शरीर जिससे आचरण और क्रियायें प्रतिपादित होती है विचारों द्वारा ही संचालित होता है। मनुष्य जितना जितना उपयोगी, स्वस्थ ओर उत्पादक विचार बनाता, संजोता और सक्रिय करता चलता है, उतना उतना ही वह सदाचारी, पुरुषार्थी और परमार्थी बनता जाता है। इसी पुण्य के आधार पर उसका सुख, उसकी शांति अक्षुण्ण बनती और बनती जाती है। ईर्ष्या द्वेष, काम क्रोध, लोभ मोह आदि के ध्वंसक विचारों से मनुष्य का आचरण विकृत हो जाता है। उसकी क्रियायें दूषित हो जाती है। ओर फलस्वरूप वह पतन के गर्त में गिरकर अशान्ति और संतोष का अधिकारी बनता है।

पागलपन, अपराध और पाप असद्विचारों का चिंतन करने का ही फल है। किसी विषय अथवा प्रसन्न से सम्बन्धित भयानक विचार लेकर चिन्तन करते रहने से मस्तिष्क निर्बल और मानसिक धरातल हल्का हो जाता है। ऐसी दशा में आवेशों, आवेगों ओर उत्तेजनाओं को रोक सकना कठिन हो जाता है। यह विचार सफलतापूर्वक मनुष्य को संचालित कर अपराध अथवा पाप घटित कर डालने पर विवश कर देते है और यदि वह पाप अथवा अपराध करने को साहस परिस्थिति अथवा अवकाश नहीं पा पाता-अर्थात् उसका आवेश क्रिया द्वारा निकल पड़ने का अवसर नहीं पाता तो वह सीधा मस्तिष्क पर आघात करता है, जिससे उसमें विकार पैदा हो जाते है और मनुष्य सनकी, पागल अथवा उन्मादी बन जाता है। दोनों स्थितियों में चाहे वह अपराध अथवा पाप कर बैठे या बौद्धिक विकार से ग्रस्त हो जाये, उसका जीवन बिगड़ जाता है, जिन्दगी बरबाद हो जाती है। विचारों में बड़ी प्रचण्ड शक्ति होती है। अस्तु जिन विचारों के चिन्तन में प्रवृत्ति होती हो उनकी अच्छाई बुराई को अच्छी तरह परख लेने की आवश्यकता है।

वे सारे विचार असद्विचार ही है जिनके पीछे किसी को हानि पहुँचाने का भाव छिपा हो। इस किसी शब्द में दूसरे लोग भी शामिल है और स्वयं अपनी आत्मा भी। समाज में प्रतिष्ठापूर्ण स्थान पाने का विचार आता है। बड़ा सुन्दर विचार है, सम्मान आत्मा की आवश्यकता है। सबको ही सम्मानित होकर अपनी आत्मा की इस आवश्यकता की पूर्ति करने का विचार करना ही चाहिए। किन्तु यह विचार तभी तक सुन्दर और सद्विचार है, जब तक इसके अंतर्गत स्पर्धा, ईर्ष्या, द्वेष लोभ अथवा अहंकार का हानिकारक भाव शामिल नहीं है।

इस प्रकार का कोई भाव शामिल हो जाने पर इस विचार की सदाशयता समाप्त हो जायेगी और इसका स्थान दूषित विचारों के बीच जा पहुँचेगा। प्रतिष्ठा का एक हेतु धन है। धन के लिए भीषण, दोहन अथवा अनीतिपूर्ण उपाय अपना कर किसी को हानि पहुँचाना अथवा अपनी आत्मा को कलुषित करना असद् उपाय है, जिसके कारण प्रतिष्ठा का सद्विचार हो जाता है। पद अथवा स्थान भी प्रतिष्ठा का हेतु है। अपने आपके प्रयत्न और योग्यता के आधार पर पद पाना उचित है। किन्तु जब इस उद्योग को पर हित घात वंचकता, धूर्तता, कपट अथवा मलीन क्रियाओं से संयोजित कर दिया जायेगा तो प्रतिष्ठा पाने के विचार की सदाशयता सुरक्षित न रह सकेगी।

कोई सद्विचार तभी तक सद्विचार है जब तक उसका आधार सदाशयता है। अन्यथा वह असद्विचारों के साथ ही गिना जायेगा। चूँकि वे मनुष्य के जीवन और उसकी आत्मा को नष्ट करने वाले होते है, इसलिये हर प्रकार और हर कोटि के असद्विचार विष की तरह ही त्याज्य है। उन्हें त्याग देने में ही कुशल, क्षेम, कल्याण तथा मंगल है। असद्शयतापूर्वक, सम्मान ही अपनी आवश्यकता की पूर्ति आत्मा को किसी प्रकार भी स्वीकार नहीं हैं।

वे सारे विचार जिनके पीछे दूसरों और अपनी आत्मा का हित सन्निहित हो सद्विचार ही होते है। सेवा एक सद्विचार है। जीवन मात्र की निःस्वार्थ सेवा करने से किसी को कोई प्रत्यक्ष लाभ तो होता दीखता नहीं। दीखता है उस व्रत की पूर्ति में किया जाने वाला त्याग और बलिदान। जब मनुष्य अपने स्वार्थ का त्याग कर दूसरे की सेवा करता है, तभी उसका कुछ हित साधन कर पाता है। स्वार्थी और साँसारिक लोग सोच सकते है कि अमुक व्यक्ति में कितनी समझ है, जो अपनी हित हानि करके अकारण ही दूसरा का हित साधन करता रहता है। निश्चय ही मोटी आँखों और छोटी बुद्धि से देखने पर किसी का सेवा व्रत उसकी मूर्खता ही लगेगी किन्तु यदि उस व्रती से पता लगाया जाय तो विदित होगा कि दूसरों की सेवा करने में यह जो जितना त्याग करता है वह उस सुख उस शांति की तुलना में एक तृष्णा से भी अधिक नगण्य है, जो उसकी आत्मा अनुभव करती है।

एक छोटे से त्याग का सुख आत्मा के एक बन्धन को तोड़ देता है। देखने में हानिकर लगने पर भी अपना ही वह विचार सद्विचार ही है,जिसके पीछे परहित अथवा आत्महित का भाव अन्तर्हित हो। मनुष्य का अन्तिम लक्ष्य लोक नहीं परलोक ही है। इसकी प्राप्ति एक मात्र सद्विचारों की साधना द्वारा ही हो सकती है। अस्तु आत्म कल्याण और आत्म शांति के चरम ‘लक्ष्य’ की सिद्धि के लिए सद्विचारों की साधना करते ही रहना चाहिए।

असद्विचारों के जाल में फँस जाना कोई आश्चर्यजनक बात नहीं है। अज्ञान, अबोध अथवा असावधानी से ऐसा हो सकता है। यदि यह पता चले कि हम किसी प्रकार सद्विचारों के पाश में फँस गये है तो इसमें चिन्तित अथवा घबराने की कोई बात नहीं है। यह बात सही है कि असद्विचारों में फँस जाना बड़ी घातक घटना है। किन्तु ऐसी बात नहीं कि इसका कोई उपचार अथवा उपाय न हो सके। संसार में ऐसा एक भी भवरोग नहीं है, जिसका निदान अथवा उपाय न हो। असद्विचारों से मुक्त होने के भी अनेक उपाय है। पहला उपाय हो यही है कि उन कारणों का तुरन्त निवारण कर देना चाहिए जो कि असद्विचारों में फँसती रहे है। यह कारण हो सकते है-कुसंग अनुचित साहित्य का अध्ययन, अवांछनीय वातावरण।

खराब मित्रों और संगी साथियों के संपर्क में रहने से मनुष्य के विचार दूषित हो जाते है। अस्तु, ऐसे अवांछनीय संग का तुरन्त त्याग कर देना चाहिए। इस त्याग में संपर्क अन्य संस्कार अथवा मोह का भाव आड़े आ सकता है। कुसंग त्याग में दुःख अथवा कठिनाई अनुभव हो सकती। है। लेकिन नहीं आत्म कल्याण की रक्षा के लिए उस भ्रामक कष्ट को सहना ही होगा और मोह का वह अशिव बंधन तोड़कर फेंक ही देना होगा। कुसंग त्याग के इस कर्तव्य में किन्हीं साधु पुरुषों के सत्संग की सहायता ली जा सकती है। बुरे और अविचारी मित्रो के स्थान पर अच्छे, भले और सदाचारी मित्र, सखा और सहचर खोजे और अपने साथ किये जा सकते है अन्यथा अपनी आत्मा सबसे सच्ची और अच्छी मित्र है। एकमात्र उसी के संपर्क में चले जाना चाहिए।

असद्विचारों के अन्य और विस्तार का एक बड़ा कारण असद्साहित्य का पठन पाठन भी है। जासूसी, आपराधिक और अश्लील भण्डार से भरे जा सस्ते साहित्य को पढ़ने से भी विचार दूषित हो जाते है। गन्दी पुस्तकें पढ़ने से जो छाप मस्तिष्क पर पड़ती है, वह ऐसी रेखाएँ बना देती है कि जिनके द्वारा असद्विचारों का आवागमन होने लगता है। विचार, विचारों को भी उत्तेजित करते है। एक विचार अपने समान ही दूसरे विचारों को उत्तेजित करता और बढ़ाता है।

इसलिए गन्दा साहित्य पढ़ने वाले लोगों का अश्लील चिन्तन करने का व्यसन हो जाता है। बहुत से ऐसे विचार जो मनुष्य के जाने हुए नहीं होते यदि उनका परिचय न कराया जाय तो न तो उनकी याद आवे और न उनके समान दूसरे विचारों का ही जन्म ही। गन्दे साहित्य में दूसरों द्वारा लिखे अवांछनीय विचारों से अनायास ही परिचय हो जाता है और मस्तिष्क में गन्दे विचारों की वृद्धि हो जाती है। अस्तु, गन्दे विचारों से बचने के लिए अश्लील और असद्साहित्य का पठन पाठन वर्जित रखना चाहिए।

असद्विचारों से बचने के लिए अवांछनीय साहित्य का पढ़ना बन्द कर देना अधूरा उपचार है। उपचार पूरा तब होता है, जब उसके स्थान पर सत्साहित्य का अध्ययन किया जाय। मानव मस्तिष्क कभी खाली नहीं रह सकता। उसमें किसी न किसी प्रकार के विचार आते जाते ही रहते है। बार-बार निषेध करते रहने से किन्हीं गन्दे विचारों का तारतम्य तो टूट सकता है किन्तु उनसे सर्वथा मुक्ति नहीं मिल सकती। संघर्ष की स्थिति में वे कभी चले भी जायेंगे और कभी आ भी जायेंगे। अवांछनीय विचारों से पूरी तरह बचने का सबसे सफल उपाय है कि मस्तिष्क में असद्विचारों को स्थान दिया जाय। असद्विचारों के रहने से उसमें असद्विचारों को प्रवेश पाने का अवसर ही न मिलेगा।

मस्तिष्क में हर समय असद्विचारों ही छाये रहे इसका उपाय यही है कि नियमित रूप से नित्य सत्साहित्य का अध्ययन करते रहा जाय। वेद पुराण गीता उपनिषद् रामायण महाभारत आदि धार्मिक साहित्य के अतिरिक्त अच्छे और ऊँचे विचारों वाले साहित्यकारों को पुस्तकें सत्साहित्य की आवश्यकता पूरी कर सकती है। यह पुस्तकें स्वयं अपने आप खरीदी भी जा सकती है और जन और व्यक्तिगत पुस्तकालयों से भी प्राप्त की जा सकती है। आज कल न तो अच्छे और सस्ते साहित्य की कमी रह गई है और न पुस्तकालयों और वाचनालयों की कमी। आत्म कल्याण के लिए इन आधुनिक सुविधाओं का लाभ उठाना ही चाहिए।

मानवीय शक्तियों में विचार शक्ति का बहुत महत्व है। एक विचारवान शक्ति हजारों लाखों का नेतृत्व कर सकता है। विचार शक्ति सम्पन्न व्यक्ति साधन हीन होने पर भी अपनी उन्नति और प्रगति का मार्ग निकाल सकता है। विचार शक्ति से ही महापुरुष अपने समाज और राष्ट्र का निर्माण किया करते है। विचार शक्ति के आधार पर ही आध्यात्मिक व्यक्ति कठिन से कठिन भव बंधनों को भेद कर आत्मा का साक्षात्कार कर लिया करते है। विचार शक्ति ही विचारों के बीच चिन्तक लोग परमात्मा सत्त की प्रतीति प्राप्त किया करते है।

विचार मनुष्य जीवन के बनाने अथवा बिगड़ने में बहुत बड़ा योगदान किया करते है। मानव जीवन और उसकी क्रियाओं पर विचारों का आधिपत्य रहने से उन्हीं से अनुसार जीवन का निर्माण होता है। सद्विचार रख कर यदि कोई चाहे कि वह अपने जीवन को आत्मोन्नति की ओर ले जायेगा तो वह अपने इस मन्तव्य में कदापि सफल नहीं ही होता है। निदान असद्विचारों उसे पतन की ओर ही ले जायेंगे। यह एक ध्रुव सत्य है। किसी प्रकार भी इसमें अपवाद का समावेश नहीं किया जा सकता।

अपने विचारों का विचार करिये और खोज खोजकर ओछे व निकृष्ट विचार निकालकर उपरोक्त उपायों द्वारा असद्विचारों को जन्म दीजिए, बढ़ाइये और उन्हीं के अनुसार कार्य कीजिये। आप लोक में सफलता के फूल चुनते हुए, सुख और शान्ति के साथ आत्म कल्याण के ध्येय तक पहुँच जायेंगे।


स्वामी विवेकानन्द

स्वामी विवेकानन्द एक बार अमेरिका की एक सड़क से गुजर रहे थे। स्वामी जी गेरुआ वस्त्र धारण किये हुए थे। उनकी विचित्र वेष भूषा देखकर लोगों ने समझा यह कोई मूर्ख है। उनके पीछे हँसी मजाक बनाती, करती हुई काफी भीड़ चल पड़ी। स्वामी जी थोड़ा चलकर रुके और भीड़ की आरे देखते हुए बोले -”सज्जनों, आपके देश में सभ्यता की कसौटी पोशाक है पर मैं जिस देश में आया हूँ, वहाँ कपड़ों से नहीं, मनुष्य की पहचान उसके चरित्र से होती है।” स्वामी जी के तेजस्वी वचन सुनकर सारी भीड़ स्तब्ध रह गई। स्वामी जी सहज भाव से आगे बढ़ गये।


आत्मज्ञान की प्राप्ति

महेन्द्र पर्वत पर गंगा के सुरम्य तट पर दीर्घतपस् नाम के एक ब्राह्मण अपनी धर्म-पत्नी सहित निवास करते थे। दीर्घतपस स्वाध्याय शील धार्मिक और ईश्वर परायण महात्मा थे, उनकी धर्मपत्नी भी सुशील स्त्री थी। समय पाकर उनके उन्हीं गुणों वाले दो पुत्र जन्मे बड़े का नाम पुण्रु और छोटे का नाम पावन रखा गया।

पुण्य बड़ा तपस्वी था। थोड़े ही समय में उसने आत्मज्ञान प्राप्त कर लिया। अब उसे संसार से किसी प्रकार का न राग था न द्वेष, मोह न आशक्ति। वह निष्काम भावना से साँसारिक कर्तव्यों का पालन करता।

पावन शिक्षित था सुशील था, किन्तु उसे आत्मबोध न हुआ। एक दिन दीर्घतपस् का देहान्त हो गया, उससे पुण्य को तो दुःख न हुआ पर पावन ने कई दिन पिता की स्मृति में रो-रोकर बिताए समय का संयोग कुछ दिन में ही माता का भी देहावसान हो गया तब तो पावन पर एक तरह से वज्रपात ही हो गया। मारे दुःख के उसने कई दिन तक अन्न भी ग्रहण नहीं किया। पुण्य ही ऐसा था जिसे न तो पिता की मृत्यु का दुःख हुआ और न माता के निधन का, उसने दोनों का मृतक संस्कार और श्राद्ध तर्पण शास्त्रीय विधान से सम्पन्न किया।

काफी समय बीत जाने पर भी पावन का शोक जब समाप्त न हुआ तो एक दिन पुण्य ने उसे समीप बुलाकर समझाया- तात्! हमारे माता-पिता ने इस लोक में धर्म और पुण्य का पर्याप्त अर्जन किया सो वे जीवन मुक्त हो गये। शरीर तो वस्त्र की नाई है आत्मा अनेक शरीर बदलती रहती है, उसके लिए दुःख किस बात का। इतना समझाने पर भी पावन को बोध न हुआ तो पुण्य ने योग-दृष्टि से उसे उसके कई जन्मों का हाल दिखाया। वही पावन दशाणव देश में वानर, तुषार में राजपुत्र, त्रिवर्ग देश में गधा और शाल में वन पक्षी के रूप में जन्मा था सौ जन्मों में अनेक योनियों का विवरण देखकर पावन का मोह छूटा और तब उसे आत्मज्ञान की प्राप्ति हुई।


दुखी संसार में भी सुखी रहा जा सकता है

गुरुनानक ने कहा है- “नानक दुखिया सब संसार।” इसी प्रकार एक विचारक ने सुख की परिभाषा करते हुए कहा है- “इस सृष्टि में दुःख ही व्याप्त है। दुःख के अभाव को सुख कहना उचित होगा।”

इन दोनों कथनों से स्पष्ट है कि संसार में दुखों की प्रधानता है। संसार का मूल भाव दुःख ही है। सुख स्वाभाविक नहीं है। यह बात बहुत अंशों तक सत्य होते हुए भी अक्षरशः सत्य नहीं है। क्योंकि यदि यह इसी प्रकार अक्षरशः सत्य होती तो संसार में किसी का जीना असम्भव हो जाता। संसार में लोग जीते हैं, जीना चाहते हैं। लोगों में उत्साहपूर्वक जीने की इच्छा है। इसका अर्थ है कि संसार में सुख का तत्त्व मौजूद है। यहाँ केवल दुःख ही दुःख होता तो कोई भी इस प्रकार जीने की इच्छा नहीं रखते।

तथापि नानक जैसी महान् आत्माओं का कथन झूठा नहीं माना जा सकता। उसमें सत्य का एक बड़ा अंश है। संसार में दुखी लोगों की ही बहुतायत है। सुख, स्वास्थ्य, धन-दौलत यश-मान सभी कुछ होते हुए भी अधिकांश व्यक्ति दुखी ही देखे जाते हैं। कोई विरले व्यक्ति ही अपनी परिस्थितियों में सुखी अथवा संतुष्ट दृष्टि गोचर होते हैं। ऐसे व्यक्तियों को देखकर ही नानक ने यह भाव व्यक्त किया है कि - नानक दुखिया सब संसार।”

साँसारिक दृष्टि से यह बात सर्वथा सत्य है कि यहाँ दुःख का भाव अधिक स्वाभाविक है, वह सहज रूप से प्राप्त होता रहता है। किन्तु सुख पाने के लिए उपाय करना होता है। वह योंहीं अनायास प्राप्त नहीं हो सकता। धन को सुख का प्रधान साधन माना जाता है। इस साधन की उपलब्धि के लिए लोग कठोर परिश्रम करते हैं। उद्योग-धन्धे कार-रोजगार खेती-बाड़ी दुकान? हाट? नौकरी-चाकरी आदि न जाने कितने काम किया करते हैं। बहुत बार तो अनेक लोग इसके लिए अनैतिक और अनुचित कर्म करने की भूल भी कर बैठते हैं। इन साधनों एवं उपायों में भिन्नता भले ही है पर मूल उद्देश्य सबका एक ही है- सुख के लिए धन प्राप्त करना।

पर क्या धन प्राप्त करके लोग सुखी हो जाते हैं? यदि ऐसा होता तो हर धनवान् को निर्विवाद रूप से सुखी होना चाहिये और हर निर्धन को दुखी। किन्तु ऐसा होता नहीं। बहुत से धनवान् दुखी दिखलाई देते हैं और अनेक निर्धन सुखी देखे जा सकते हैं। क्या धन और क्या स्वास्थ्य, स्त्री-बच्चे मान-प्रतिष्ठा सुख के जो भी साधन माने जाते हैं, सुख पाने के उपाय नहीं हैं। सुख पाने का उपाय कुछ और ही है। वह है जीवन जीने की एक पद्धति।

संसार में सुखी जीवन व्यतीत करने के लिए कुछ बातों को ग्रहण करना होगा। त्याज्य बातों में सबसे पहली बात है फलासक्ति। अपने कर्म के फलों में आसक्ति रखने से सफलता, असफलता, हानि-लाभ आशा-निराशा के द्वन्द्वं भाव में पड़ना होगा, जिसका परिणाम असुख ही होता है। भगवान कृष्ण ने गीता में कहा है- “कर्म करो पर फल की आशा मत करो। सुख पाने में नहीं त्याग में है। सुख, कर्म-फल के लिए दीवाने रहने, लालायित रहने में नहीं है, बल्कि कर्मशील होकर सफलता, असफलता की ओर उदासीन रहकर कर्तव्य करने में है। आसक्ति को त्याग कर दूसरों के लिए जिये। जो लोग संकीर्ण स्वार्थ और लोभ को छोड़कर दूसरों के लिए जीते हैं, वही लोग जीवन का सच्चा आनन्द उठाते हैं। स्वार्थी, संकीर्ण और लोभी व्यक्ति कभी सुखी नहीं रह सकता।”

निःसन्देह फलासक्ति का त्याग और अनासक्ति का ग्रहण सुखी जीवन व्यतीत करने का बहुत बड़ा उपाय है। इसीलिए अनासक्त व्यक्ति को योगी कहकर सम्बोधित किया जाता है। अनासक्ति भाव के कारण कर्मों में आई दुखदाई असफलता मनुष्य को प्रभावित नहीं कर पाती और न सफलता के लिए उसमें दुःखद स्पृहा का समावेश होता है। वह तो असफलता-सफलता में तटस्थ भाव से स्थित समत्व का आनन्द लिया करते हैं।

लालसायें जीवन में दुःख का बहुत बड़ा कारण बनती हैं। लालसाओं की पूर्ति सम्भव नहीं और न उनका कोई अन्त ही होता है। एक के बाद एक नित्य नई लालसायें बढ़ती ही जाती हैं। जिन लालसाओं की पूर्ति मनुष्य अपने जीवन में नहीं कर पाता उनकी पूर्ति वह अपनी सन्तान के जीवन में देखना चाहता है। इसके कारण वह सन्तान की कामना से व्यग्र हो उठता है। जिनके संतान नहीं होती, वे बड़े ही दुखी और मलिन रहा करते हैं। एक इसी एषणा के कारण उनके अन्य सारे सुख, सारे साधन, यहाँ तक कि सारा जीवन ही निस्सार हो जाता है। ऐसे एषणातप्य व्यक्ति का सारा जीवन शोक-संताप से भरा रहता है। अस्तु, सुखी जीवन जीने के लिए लालसाओं और तद्जन्य एषणाओं को त्याग ही देना चाहिये।

निष्कामता सुखी जीवन का एक उत्तम उपाय है। जितना-जितना मनुष्य लालसाओं के चक्र से बचता जायेगा उतना-उतना ही उसका सुख बढ़ता जायेगा। निःसंतान व्यक्ति को इस सत्य पर विचार करना ही चाहिये कि कुल का नाम सन्तान से चलेगा ही यह निश्चय नहीं। सन्तान कुल का नाम डुबोने वाली भी होती है। मनुष्य का अपना नाम सन्तान से नहीं अपने सत्कर्मों से चलता है। सन्तान गृहस्थियों के लिए अनेक चिन्ताओं का कारण बनती है। बच्चों के पालन-पोषण और उनके जीवन विकास के लिए न जाने कितने प्रलोभनों और दुर्बलताओं के जाल में फँसना पड़ता है। इतना ही क्यों उद्दण्ड, दुष्ट और धृष्ट सन्तान माता-पिता का जीवन बरबाद कर देते हैं। तब उनसे अपनी लालसाओं की पूर्ति की आशा कैसे की जा सकती।

निःसन्तान गृहस्थों को चाहिये कि वे अपनी इस एषणा को परास्त करने लिए किन्हीं दूसरों के बच्चे पाला करें, पढ़ाया-लिखाया करें, उन्हें लाड़-दुलार देकर अपना सन्तोष प्राप्त करें। अपने पराये का भाव वास्तविक भाव नहीं है। यह मनुष्य का अहंकार जन्य भ्रम मात्र ही है। जिसे प्यार दिया जायेगा, जिसको अपना समझकर पालन किया जायेगा, वह निश्चय ही अपना बन जायेगा। किसी गरीब का प्यारा-सा बच्चा पाल लेने से जीवन का एक अभाव तो दूर हो ही जायेगा, साथ ही पुण्य-परमार्थ का भी फल मिलेगा।

अपनी परिस्थितियों की अपेक्षा करना अथवा उन्हें भुला देना भी दुःख का एक बड़ा कारण है। बहुत से लोग अपनी यथार्थ स्थिति से आँख मूँदकर कल्पना के स्वप्न संसार में विचरण करते रहते हैं। दूसरों के कहने अथवा अपने ही भ्रम से अपने को क्या से क्या मान बैठते हैं। इसका विचार किये बिना कि हमारी परिस्थितियाँ क्या हैं, हम किस धरातल पर खड़े हैं, बड़ी महत्त्वाकाँक्षाओं को पाल लेते हैं और उनके पीछे पागल बने रहते हैं। अपनी सहज स्वाभाविक स्थिति से हटकर अस्वाभाविक मार्ग अपना लेने से अधिकांश लोग जीवन भर दुखी बने रहते हैं। अपनी सीमा और अपनी शक्ति से परे की आकांक्षाएँ बना लेना बड़ी भारी भूल है। ऐसे लोगों की आकांक्षाएँ कभी पूरी नहीं होती, जिससे वे सदा व्यग्र, दीन और दुखी बने रहते हैं।

बहुत से भावुक व्यक्ति जब किसी बड़े आदमी को देखते हैं अथवा किन्हीं महापुरुषों का जीवन-चरित्र पढ़ते हैं तो तत्काल ही अपने को वैसा देखने की कामना करने लगते हैं। किन्तु अपनी स्थिति, योग्यता और क्षमता पर जरा भी विचार नहीं करते। विशेष व्यक्ति बनने की कामना बुरी नहीं। किन्तु इसकी पूर्ति केवल कल्पना के बल पर नहीं हो सकती। इसके लिए स्थिति, योग्यता और क्षमताओं का होना बहुत आवश्यक है। इनका विकास किये बिना केवल महत्त्वाकाँक्षा पाल लेना जीवन में दुखों को आमन्त्रित करना होता है। जिन व्यक्तियों का सामंजस्य उनकी परिस्थितियों से नहीं होता वह बहुधा दुखी ही रहा करते हैं।

मनुष्य यदि सामान्य रूप से सुखी रहना चाहता है तो उसे अपनी परिस्थिति से परे की महत्त्वाकाँक्षाओं का त्याग करना होगा। उसे अपनी सीमा में रहकर आगे के लिए प्रयास करना होगा। उन्हें प्रकृति के इस नियम में आस्था करनी ही होगी कि मनुष्य-विकास क्रमपूर्वक होता है। सहसा ही कोई कामनाओं के बल पर ऊँचा नहीं उठ जाता। प्रत्येक व्यक्ति की अपनी एक बनावट होती है। उसी की सीमा में धीरे-धीरे बढ़ते रहने पर ही वह बहुत कुछ कर सकता है। अपने प्राकृतिक स्वत्व का विस्मरण कर महत्त्वाकाँक्षाओं के पीछे पागल रहने वाले जीवन में कभी सुखी नहीं हो पाते। जीवन में सुख-शांति के लिए आवश्यक है कि अपनी सीमाओं के अनुरूप ही कामना की जाये, उसी में रहकर धीरे-धीरे विकास की ओर बढ़ा जाये। सहसा उछाल मार कर तारे तोड़ लेने का दुःसाहस करने का अर्थ है असफलता जन्य दुःख को अपना साथी बनाना।

मान-मर्यादाओं का उल्लंघन करने से भी मनुष्य को दुखों का भागीदार बनना होता है। सुख के साधन पाकर यदि उनका भोग अनियन्त्रित रूप से किया जायेगा तो वे भी दुःख का कारण बन बैठेंगे धन मिल गया, पद मिल गया, प्रतिष्ठा मिल गई, संतान भी हो गई, तब भी यदि संतोष नहीं होता, और-और की ही रट लगी हुई है तो अवश्य ही दुखों के लिए तैयार रहना चाहिये। सुख-साधनों की अति तृष्णा भी दुःख का बड़ा कारण है। मान-मर्यादाओं का व्यतिक्रम न कर जो बुद्धिमान लोग संसार में जो कुछ भोगने योग्य हैं उसका भोग करते हैं, वे कभी दुखी नहीं होते। गृहस्थ को सुख का आधार बताया गया है। वह है भी। गृहस्थी जैसा सुख कहीं भी नहीं मिलता। तथापि यदि इसका भोग भी मर्यादा का त्याग करके किया जायेगा तो यह भी अस्वास्थ्य, रोग, शोक और बहु-संतान के साथ दुःख का हेतु बन जायेगा।

मनुष्य को चाहिये कि वह परमात्मा ने जो कुछ सुख भोग बनाये हैं, मर्यादा में रहकर उनका आनन्द उठाये। जो कुछ हमारी उपलब्धियाँ और परिस्थितियाँ हैं उनमें संतोष करके आगे के लिए प्रयत्न किया जाये। अनुचित अथवा अयोग्य महत्त्वाकाँक्षाओं से बचा जाये और फलासक्ति को छोड़कर अपना पावन कर्तव्य करते रहा जाये तो कोई कारण नहीं कि वह दुःख से निकल कर सुख की ओर न अग्रसर होने लगे। जो अपने जीवन पथ में इन नियमों का पालन करते हैं, वे सदा सुखी रहते हैं और जो इनकी उपेक्षा करते हैं उनका दुखी रहना स्वाभाविक ही है।


आत्मज्ञान

मुनि शरलोमा ने बहुत तप किया तब उन्हें सन्तान की प्राप्ति हुई। अपने एकमात्र दाशूर को उन्होंने बहुत अच्छी तरह पढ़ाया-लिखाया दाशूर भी अपने पिता का बड़ा सम्मान करता और सदैव उनके साथ ही यज्ञादि शुभ कर्मों में सम्मिलित होता, इसलिए पिता-पुत्र का प्रेम और भी घनिष्ठ होता गया।

समयानुसार शरलोम का निधन हो गया। दाशूर को उससे इतना कष्ट पहुँचा कि उसने कई दिन तक कुछ खाया-पिया भी नहीं। दिन-रात पिता की याद कर-करके रोता रहता। यह देखकर भगवान अग्निदेव ने उसे समझाया- “वत्स ( जीवन और मरण संसार के अटल नियम हैं, तू उनसे दुखी होगा तो यह संसार नीरसता के अतिरिक्त कुछ न रह जायेगा।” दाशूर को अग्निदेव के प्रबोध से बहुत शांति मिली। उसने पूछा - भगवन् ( दुःख से निवृत्ति का उपाय क्या है” - अग्निदेव ने समझाया - “आत्मज्ञान और आत्मज्ञान तप से होता है, इसलिए वत्स तू तप कर। दाशूर ने बहुत प्रयत्न किया किन्तु तप के योग्य पवित्र स्थान न मिल सका इस पर उन्होंने फिर अग्नि की शरण ली- अग्निदेव प्रकट हुये और बोले वृक्ष की कोपलों से पवित्र और कोई स्थान न मिलेगा, इतना कहकर वे अदृश्य हो गये। दाशूर ने विचार किया कोंपल में तो स्थूल शरीर बैठ ही नहीं सकता। इसलिए अपना मन कोंपल में रमाना प्रारम्भ कर दिया। कुछ दिन के अभ्यास से उनका मन पवित्र हो गया। मानसिक पवित्रता के द्वारा ही अन्त में उन्होंने सिद्धि प्राप्त की।


आत्मा की अनंत गहराई का प्राकट्य-स्वप्न

दो प्रश्नों का सन्तोषजनक उत्तर प्राप्त करने के उपरान्त मुनि गार्ग्य सौययिणी ने महर्षि पिप्पलाद से तीसरा प्रश्न पूछा- “कौन देवता स्वप्नों को देखता है।” मुनिवर के इस प्रश्न का उत्तर देते हुये महर्षि ने बताया-

“अत्रैष देवः स्वप्ने महिमानमनु भवति।

यद् दृष्टं दृष्टमनुपश्यत श्रुत श्रुतमेवार्थ मनुश्रणोति।

देश विगन्तरैश्च प्रत्यनुभूतं पुनः पुनः प्रत्यनुभवति दृष्टं चादृष्टं च श्रुत चाश्रुतं चानुभूतं चाननुभूतं च सच्चासच्च सर्व पश्यति सर्वः पश्यति।

प्रश्नोपनिषद् चतुर्थ।5,

हे महामुनि ( स्वप्नावस्था में जीवात्मा ही मन और सूक्ष्म इन्द्रियों द्वारा अपनी विभूति का अनुभव करता है। इसने पिछले अनेक जन्मों में जहाँ कहीं भी जो कुछ बार-बार देखा सुना और अनुभव किया हुआ है उसी को स्वप्न में बार-बार देखता-सुनता और अनुभव करता है। परन्तु यह नियम नहीं है कि जागृत अवस्था में इसने जिस प्रकार जिस ढंग से जिस जगह जो घटना देखी सुनी और अनुभव की है, उसी प्रकार यह स्वप्न में भी अनुभव करता है, अपितु स्वप्न में जागृत की किसी घटना का कोई अंश किसी दूसरी घटना के किसी अंश के साथ मिलकर एक नये ही रूप में इसके अनुभव में आता है। अतः यह स्वप्न में देखे और न देखे हुये को भी देखता है, सुने और न सुने हुये को भी सुनता है, अनुभव किये और अनुभव में न आये हुये को भी अनुभव करता है। जो वस्तु हो गई है और जो वस्तु आगे होती है, उसे भी देख लेता है। इस प्रकार स्वप्न में यह विचित्र ढंग से सब घटनाओं का बार-बार अनुभव करता है और स्वयं भी सब कुछ बनकर देखता है, उस समय जीवात्मा के अतिरिक्त कोई दूसरी वस्तु नहीं रहती।

अगले प्रश्न के उत्तर में महर्षि पिप्पलाद ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि स्वप्नावस्था में मन उदान वायु के आधीन हो जाता है, उदान वायु द्वारा मन जब हृदय गुहा में पहुँच जाता है तो मन की शक्ति समाप्त होकर वह आत्मा में परिणित हो जाती है। उस मोहित अवस्था का नाम ही स्वप्न है और उस समय जो कुछ सुख-दुःख की अनुभूति होती है वह मन को नहीं आत्मा को ही होती है।

उपरोक्त तथ्यों के प्रमाण में उन स्वप्नों को रखा जा सकता है, जिनसे भविष्य में घटने वाली घटनाओं का पूर्वाभास स्वप्न में हुआ। अन्य व्यक्ति के साथ दूरस्थ स्थान में हो रही घटनाओं का आभास किसी और को और स्थान में हुआ और बाद में उन्हें पूर्णतया सत्य पाया गया। कुछ स्वप्न ऐसे भी हुए हैं, जिनमें किसी महत्त्वपूर्ण कार्य का ज्ञान या अनुभूति स्वप्न में हुई और उसके द्वारा कुछ विशिष्ट कार्य या आविष्कार तक सम्भव हुये।

यदि स्वप्न मन का ताना-बाना होता, जैसा कि फ्रायड और उसके अनुयाइयों का मत है तो इस प्रकार के पूर्वाभास और इन्द्रियातीत ज्ञान जागृत अवस्था में ही मिल जाया करते, क्योंकि उस समय मन अधिक सक्षम और क्रियाशील रहता एवं सुनियोजित ढंग से सोच सकता है पर जागृत अवस्था में ऐसे किसी पूर्वाभास की अनुभूति न होना यह बताता है कि स्वप्न सुख या दृश्यों की अनुभूति वस्तुतः मन से भी परे किसी विश्व-व्यापी और सूक्ष्म सता द्वारा हो सकता है, यह गुण आत्मा के गुणों से मेल खाते हैं, इसलिए यह मानने में कोई हिचक नहीं होनी चाहिये कि मनुष्य शरीर में ‘आत्मा’ नामक कोई त्रिकालदर्शी तत्त्व विद्यमान् है और उसका पूर्ण ज्ञान प्राप्त किये बिना मनुष्य की समस्यायें सुलझ नहीं पातीं।

यों पूर्व-जन्मों की घटनाओं और अनुभवों की सत्यता के स्पष्ट प्रमाण नहीं जुटाये जा सकते पर वर्तमान और भविष्य में घटने वाली घटनाओं के पूर्वाभास यह बताते हैं कि स्वप्न निःसंदेह आत्मा के विज्ञान का वह पहलू हैं, जिससे उसके अनेक रहस्यों का प्रकट प्रमाण पाया जा सकता है। स्वप्नों से रेखा चित्र और अपनी तरह के निर्मित स्वप्न देखने के यन्त्र वैज्ञानिकों ने बनाये हैं यदि इस दिशा में और प्रगति हुई और उन स्वप्न रेखाओं के विस्तृत अध्ययन का कोई सूत्र वैज्ञानिक निकाल पाये तो जीव पूर्वजन्मों में किस योनि में था और उसके साथ कैसी कैसी घटनायें घटीं, यह सब जान लेना सम्भव हो जायेगा। अभी जो जानकारियाँ मिली हैं उनके अनुसार स्वप्नावस्था में लिए गये चित्रों की रेखाएँ इलेक्ट्रानिक स्मृति कणों के फलस्वरूप ही होती हैं, यद्यपि अभी उनका विश्लेषण (एनालिसिस) किया जाना सम्भव नहीं हो पाया तो भी भविष्यदर्शी स्वप्नों के अनेक प्रामाणिक दृष्टान्त अवश्य हैं जो आत्मा की गहराई की ओर स्पष्ट संकेत करते हैं।

‘ट्रू एक्सपीरियन्सेज इन प्रोफेसी’ (भविष्यवाणी के सत्य अनुभव) नामक पुस्तक की लेखिका मार्टिन एबान ने ‘चार काले घोड़े’ नामक शीर्षक से अपने जीवन के उन चार स्वप्नों का वर्णन बड़े ही मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया है। वह इस तरह हैं-

मुझे अनेक बार अपने परिवार और परिचित मित्रों की मृत्यु का पूर्वाभास एक ही ढंग से हुआ है। पहला स्वप्न मुझे तब आया जब में छोटी बच्ची थी। मैंने देखा मैं एक ऐसी घोड़ा गाड़ी में सवार हूँ, जिसमें चार काले घोड़े जुते हुए हैं। जैसे ही मैं गाड़ी में बैठी किसी अदृश्य शक्ति ने मुझे कुछ आदेश दिये। गाड़ी एक मकान के किनारे रुक गई मैं उसके पिछले भाग में गई। दो कमरों के बीच एक शयन कक्ष (बैडरूम) पड़ता था वहाँ पहुँचकर मुझे ऐसा लगा कोई अधेड़ आयु (मिडिल एज्डमैन) लेटा है, उसकी साँस से दुर्गन्ध निकल रही है मैं चिल्लाई पर उस व्यक्ति पर उसका कोई असर नहीं हुआ। इसी बीच मुझे अनेक स्त्रियाँ दिखाई दीं। उन्होंने एक कम उम्र की पौढ़ा (शार्ट मिडिल एज्ड वूमन) को घेर रखा था और उसे धीरज बँधा रही थीं। इसके बाद नींद टूट गई और में समझ नहीं पाई कि यह सब क्या था पर उस स्वप्न का कुछ विशेष प्रभाव मेरे मन में था, क्योंकि नींद टूट जाने के बाद भी उसे मैं एकाएक भुला न सकी वह दृश्य बार-बार मस्तिष्क में उठता रहा और मैं उपेक्षा करती रही- अब सोचती हूँ ऐसी उपेक्षाओं ने ही मनुष्य जीवन के अनेक आवश्यक आध्यात्मिक पहलुओं को गौण बना दिया है और उसी के फलस्वरूप मनुष्य जीवन सत्य से दूर हटता चला जा रहा है।

उन दिनों मैं टोरोण्टो की एक मीटिंग में भाग लेने गई थी। दूसरे ही दिन मेरे कमरे की साथी (रुममेट) आलेन्दा जो कि क्यूबेक की निवासिनी थी ने मुझे बुलाया और बताया कि उसके पिता बीमार हैं, उसके कुछ दिन बाद ही पिता की मृत्यु का समाचार भी आ गया। बस इस घटना का पहला पटाक्षेप यहीं हो गया।

उसी वर्ष जुलाई में मैं क्यूबेक शहर गई। अचानक मेरी दृष्टि एक मकान पर स्थिर हो गई। मैंने देखा हूबहू वही मकान जिसे मैंने स्वप्न में देखा था। दो कमरे बीच में शयन-कक्ष उसी कमरे में एक चित्र टँगा था वो बिलकुल उसी आकृति का था, जैसा मैंने स्वप्न में देखा था, यह मकान ओलेन्दा का था और उसने ही बताया कि यह चित्र उसके पिता का है तो मैं स्तब्ध रह गई और सोचने लगी क्या वह स्वप्न मुझे इसी घटना के पूर्वाभास के रूप में देखने को मिला था। यदि ऐसा ही था तो वह स्वप्न ओलेन्दा को क्यों नहीं दिखा? क्या मेरी मानसिक स्थिति धर्म-मुखी और पवित्र होने के कारण स्वप्न मुझे स्पष्ट दिखा और ओलेन्दा को न दिखा। यह प्रश्न सोचते सोचते मैं एक गहराई में डूब जाती हूँ और यह मानने लगती हूँ कि इस संसार में सचमुच ही कोई सर्वव्यापी, सर्वदृष्टा शक्ति है, जब मनुष्य उसमें खो जाता है तो स्वयं भी वैसा ही अनुभव करने लगता हैं।

सिलाई की मशीन के आविष्कारक एलियस होवे ने भी एक ऐसा ही विचित्र स्वप्न देखा जिसने उसकी बड़ी भारी गुत्थी को ही सुलझा दिया। एलियस होवे ने जब अपनी सारी मशीन तैयार करके उसे फिट कर लिया, तब उसकी समझ में आया कि सुई में ऊपर छेद रखने से मशीन सिलाई नहीं कर सकती तो फिर छेद कहाँ रखा जाये, इसी बात पर सारा आविष्कार अटक गया। उसका मस्तिष्क चकरा गया, क्योंकि उसका इतने दिन का परिश्रम व्यर्थ गया ऐसी स्थिति में सिवाय भगवान का नाम लेने के अतिरिक्त उसे और कुछ न सूझ पड़ा।

होवे ने एक रात स्वप्न देखा। उसने देखा कुछ दस्युओं ने उसे पकड़ लिया है और जंगली जाति के राजा के यहाँ पकड़कर ले गये। राजा की वेशभूषा और आकृति भी भयंकर थी। राजा ने कड़ककर कहा- “शाम तक सिलाई की मशीन तुम मुझे सौंप दोगे या नहीं।” कुछ न बोलने पर एक सिपाही एक नुकीला भाला लेकर सामने आया और बार बार छाती की ओर भाला ले जाता पीछे हटाता और फिर वही प्रश्न पूछता बोला - “मशीन शाम तक देगा या नहीं।” आविष्कारक .......... की दृष्टि भाले पर ही थी और वह बहुत डर गया था, साँस तेज हो जाने से नींद टूट गई पर घबड़ाहट अभी ज्यों की त्यों थी। नींद टूटने के बाद भी भाले का आने-जाने वाला दृश्य मस्तिष्क में बराबर झूल रहा था और इसी दृश्य ने उसकी समस्या हल कर दी, उसने मशीन में एक ऐसा पेंच फिट कर दिया जिससे सुई भाले की तरह नीचे-ऊपर जाने लगी और दुस्तर समस्या भी मिनटों में सुलझ गई। मशीनें कई तरह की बन चुकी हैं पर सभी जानते हैं सिलाई करने वाली सुई हर मशीन में उसी तरह आगे-पीछे जाकर मिलती है।

28 फरवरी 1844 को वाशिंगटन (अमेरिका) में एक बड़ा भारी राष्ट्रीय उत्सव होने वाला था। उसमें दो तोपों का प्रदर्शन भी किया जाने वाला था। विशिष्ट मेहमानों में तीनों सेनाओं के सेनाध्यक्ष और उच्च-सैनिक अधिकारी कर्नल डेविड गार्डिनर उनकी पुत्री जूलिया (प्रेसीडेन्ट टेलर की पत्नी) तथा जलसेना के नव-निर्वाचित सेक्रेटरी श्री थामस डब्ल्यू गिलमर व उनकी पत्नी ऐनी प्रमुख था।

27 फरवरी की रात ऐनी और जूलिया दोनों ने स्वप्न में अपने पतियों की मृत्यु देखी। जूलिया ने अपने पिता को बताया कि आज ऐसा होने वाला है आप लोगों को इस उत्सव में सम्मिलित नहीं होना चाहिये। किन्तु गार्डिनर ने वह बात अनसुनी कर दी। इसी तरह ऐनी गिलमर ने भी अपने पति को वहाँ जाने से रोका किन्तु उन्होंने भी नहीं माना। इतिहास प्रसिद्ध घटना है कि उस दिन दोनों तोपों के गोले बैरेल में ही फट जाने (परमिचर) के कारण उक्त दोनों व्यक्तियों की ठाँव मृत्यु हो गई। बाद में जूलिया ने प्रेसीडेन्ट टेलर से विवाह कर लिया।

जूलिया ने एक स्थान पर लिखा है कि - “वह पति के सौ मील दूर रहने पर भी वह किस अवस्था में हैं, यह स्वप्न द्वारा जान लेती है।” एक रात उसने अपने पति प्रेसीडेन्ट टेलर को पीले चेहरे में देखा। उसे लगा कि अपने हाथ से कमीज और टाई पकड़े प्रेसीडेन्ट कह रहे हैं, “मेरा सिर थाम लो।” इस स्वप्न से जूलिया बहुत घबराई। प्रेसीडेन्ट टेलर तब रिचमोन्ड में थे। जूलिया ने प्रातःकाल वहाँ के लिए प्रस्थान किया। वह सकुशल थे। किन्तु जिस होटल में वे ठहरे थे, उसी दिन दुर्घटना हो गई और मृत्यु का ठीक वही दृश्य उपस्थित हुआ जो जूलिया ने रात स्वप्न में देखा था।


जो किसी ने आज तक नही दिया वो सब दे दिया

एक वृद्ध सड़क के सहारे पड़ा था। वृद्धावस्था के कारण कुछ काम नहीं कर सकता था और खाने को उसके पास कुछ था नहीं। कोई कुछ डाल जाता वही खा लेता था। एक बच्चा उधर से आया करता था। वह प्रतिदिन बुड्ढे को अपने खाने में से कुछ अंश दिया करता था पर उस दिन वह स्वयं भी भूखा था क्योंकि घर में कुछ न था।

बच्चे को देखते ही बुड्ढे ने हाथ उठाये- बच्चे ने दोनों हाथ पकड़ लिये और बोला -”बाबा, आज तो मेरे पास भी देने को कुछ नहीं।” वृद्ध की आंखें भर आईं। उसने कहा -”बच्चे तूने आज वह सब दे दिया जो अब तक किसी ने नहीं दिया था।

यह घटनायें बताती हैं कि कितने ही स्वप्न आत्मा की गहराइयों को समझने वाले चित्रपट होते हैं, उनसे मनुष्य जीवन की अनन्तता और नश्वरता पर विश्वास कर सकता है। यही नहीं अपने जीवन को स्वच्छ और पवित्र बनाकर भगवान से सम्बन्ध जोड़कर स्वप्नों को जीवन विकास के सहयोगी रूप में भी विकसित कर सकता है।


क्षमा, बुद्धिमत्ता और विचारशीलता

उत्तरदायित्व पूर्ण व्यक्ति को चाहे वह किसी भी उम्र का हो अपना दृष्टिकोण, अपनी बात, अपनी मान्यता किसी पर बलपूर्वक आरोपित नहीं करनी चाहिये क्योंकि दूसरे लोगों को भी अपना मत व्यक्त करने का अधिकार है। कई बार यह मत अपनी भावना के अनुकूल नहीं बैठते। कई बार तो वे अहितकर भी होते हैं पर हमें यह मानना चाहिये कि परिस्थिति के अनुरूप हर व्यक्ति की विचार-धारायें भिन्न होती हैं। ऐसे अवसर पर हठधर्मी से अड़े रहना या अपने अपमान की बात समझना कोई बुद्धिमतां नहीं है।

सबके मस्तिष्क अलग-अलग हैं सोचने विचारने के भी सबके अलग अलग हैं। स्वतन्त्र दृष्टिकोण पर अप्राकृतिक दबाव नहीं होना चाहिये। मनुष्य का हृदय इतना उदार होना चाहिये कि वह ऐसे अवसरों की उपेक्षा कर दिया करें। हँसकर टाल दिया करें और उस व्यक्ति को क्षमा कर दिया करें जो अल्प-बुद्धि के कारण कोई ऐसा काम कर रहा है जो आपकी दृष्टि में अनुचित अनपेक्षित है।

संसार के अन्य प्राणियों के साथ हमारा कोई रिश्ता नहीं। यदि कुछ है तो प्रेम और सहयोग का ही रिश्ता है। प्रेम न हो, अल्प-विकसित को ऊपर उठाने की सहयोग भावना न हो तो फिर अपने कुटुम्ब का ही व्यक्ति अपरिचित सा लगता है। इस रिश्तेदारी को चिरस्थापित प्रदान कैसे करोगे? आपके समीपवर्ती सभी आपकी इच्छाओं के अनुगामी तो नहीं बन सकते। तब फिर प्रेम और सहयोग की भावना कैसे बनी रहेगी। उसका एक उपाय है - क्षमा। उदारतापूर्वक मानवीय भूलों को क्षमा करते रहने से साँसारिक सम्बन्धों में मधुरता बनी रहती है। जिस व्यक्ति के द्वारा बार-बार गलतियाँ हो रही हैं, आपकी क्षमा उसे भी सही रास्ते पर ला सकती है।

जेम्स एलेन एक स्थान पर लिखते हैं- “क्षमा न करना और प्रतिशोध लेने की इच्छा रखना, दुःख और कष्टों के आधार हैं। जो व्यक्ति इन बुराइयों से बचने की अपेक्षा उन्हें अपने हृदय में पालते और बढ़ाते रहते हैं, वे जीवन के सुख और आनन्द से वंचित रह जाते हैं। वे आध्यात्मिक प्रकाश का लाभ नहीं ले पाते जिसके हृदय में क्षमा नहीं उसका हृदय कठोर हो जाता है। उसे दूसरों के प्रेम, मेल-जोल प्रतिष्ठा एवं आत्मसन्तोष से वंचित रहना पड़ता है। बुद्धिमतां और विचारशीलता का यह तकाजा है कि मनुष्य छोटी-मोटी गलतियों पर क्षमा करने की आदत बना लें।

क्रोध का कारण ढूंढ़िये- आपको जिस पर क्रोध आ रहा है उससे कुछ भूल हुई है? कोई गलती की होगी उसने? अवश्य कोई ऐसा काम कर डाला होगा, जो आपको न रुचा हो और नाराजगी प्रकट हुई हो। असल में जो कुछ हुआ वह उचित था या अनुचित यदि उचित था तो फिर क्रोध का प्रश्न ही नहीं उठता। अनुचित हुआ तो भूल अनिच्छापूर्वक या बलात् हो गई होगी ऐसी भूलें हर मनुष्य से हो जाती हैं। आपने भी कई बार की हैं और जब कोई आपको झल्लाया हे तो आपने भावना बनाई कि - गलती से कुछ हो गया तो ये उसे क्षमा भी नहीं कर सकते? जिस कारण वह गलती हुई, वस्तुतः दोष भी उसे ही देना चाहिये। परिस्थितियों को हुँकारो, व्यक्तियों को नहीं। गलती करने वाले को क्षमा करने से हृदय साफ रहेगा और परिस्थिति को समझने का अवसर आयेगा, इस तरह जागरूकता और सावधानी बरतने का स्वभाव विकसित होगा।

क्षमा विशाल अन्तःकरण की भावाभिव्यक्ति है। स्वयं बुरा न मानना और दूसरों का हृदय न दुखाना ये दोनों बातें साथ-साथ चलती हैं। जब एक व्यक्ति दूसरों की बातों और कामों से बुरा नहीं मानता और दुखी भी नहीं हो इससे स्पष्ट है कि उसके हृदय में दया की भावना है, करुणा जीवित है, स्नेह जागृत है, वह दूसरे का पूरा-पूरा ख्याल रखता है, इसीलिये दूसरे लोग भी उससे प्रेम करते हैं और सहानुभूति का व्यवहार करते हैं। ऐसे वातावरण में किसी को न भय होता है, न अविश्वास। आत्मीयता को जीवित रखने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि गलतियों को हम उदारतापूर्वक क्षमा करना सीखें। ऐसे वातावरण में पलने वाले अविकसित बच्चे बड़े निडर आत्मविश्वासी होते हैं यह कहना गलत है कि उनमें अनुशासन हीनता पनप सकती है। प्रेम न मिलने का डर उसे अनुशासन हीन न होने देगा, जबकि उसकी कायरता और मानसिक कमजोरियों का भी अन्त हो जायेगा।

क्षमा आध्यात्मिक स्वभाव है। क्रोध के आवेश में जब कभी सहनशीलता का अन्त होने लगे तो विचारों क्या क्रोध से तुम्हें स्वतः खीझ और दुःख न होगा? अपना थोड़ा सा जीवन है यदि गुस्सा करें तो सारा जीवन लोगों की गलती ढूँढ़ने नुक्ताचीनी करने में ही समाप्त हो जाये। आनन्द प्राप्त करने का अवसर ही न रहे। क्रोध वीरता का लक्षण नहीं। वीरता का लक्षण हैं- धैर्य, सहनशक्ति। जो जितना सहन कर सकता, पचा सकता है, वह उतना ही बहादुर है उतने ही अंश में आनन्द का उपभोक्ता है। हम मधुरता बरतें, सहनशील बनें तो फिर क्रोध के कारण खिन्नता का अवसर ही न आयेगा।

क्रोध को क्रोध से जीतने का प्रयास करना बड़ा भारी बिगाड़ पैदा करना है। छोटे छोटे उलाहने, शब्दों की मार, नुक्ताचीनी ताने मारना, व्यंग करना, प्रतिशोध या घृणावश बुरे नहीं जान पड़ते पर मन, मस्तिष्क और आत्मा पर इनका विषवत् दुष्प्रभाव पड़ता है। यह दोष शरीर को कमजोर बनाते हैं, मस्तिष्क को खोखला और आत्मा को अपवित्र। क्षमा एक ऐसी मुस्कान पैदा करती हैं, हृदय में ऐसी थिरकन पैदा करती हैं, जिससे बड़ी-बड़ी परिस्थितियाँ भी ऐसे ढेर हो जाती हैं, जैसे अग्नि की तीक्ष्णता में ऊबड़-खाबड़ मोटे गीले लक्कड़ जलकर राख हो जाते हैं। आत्मा की निष्कलुषता का जिसे आनन्द पाना हो उसे क्षमाशील बनना चाहिये।

इसका यह अर्थ नहीं कि जो गलती कर रहा है, उसे समझाया न जाये। समझाओ और आवश्यकता पड़े तो धमका भी दें, किन्तु जब अवसर हो। उपयुक्त समय पर ही कड़वी बात भी मीठी लगती है। प्रातःकाल सूरज की किरणें और मधुर लगती हैं, आरोग्यवर्धक होती हैं, दोपहर में वही प्रचण्ड हो उठती हैं और लोगों को बीमार तक कर देती हैं। आवेशपूर्ण स्थिति को टाल दो और फिर जब उग्रता का वातावरण समाप्त हो जाये या एकान्त में प्रिय व्यक्ति से मिला तो उनसे अपनी बात नम्रतापूर्वक समझाओ, समझाने में परिहास या कटुता न हो तो आपकी बात को बिलकुल समर्थन और सफलता न मिले यह बिलकुल असम्भव नहीं।

बार-बार सताये जाने, तंग करने या कटु बोलने से अच्छे लोगों के मन में भी बुरे भाव उत्पन्न हो जाते हैं। संकुचित दृष्टिकोण के कारण कई बार ऐसी गलतफहमी होती हैं जो दोनों व्यक्तियों के जीवन में कटुता और निराशा की आग पैदा कर देती है, ऐसी हानिकारक परिस्थितियों से बचने का एकमात्र उपाय यह है कि हमारे जीवन में व्यवहारिक मधुरता का समावेश रहे। नम्रता, मीठी बोली का अभ्यास तो हो ही क्षमा करने की उदारता भी कम न हो।

महात्मनः! स्वर्ग का अधिकार किसे मिलता है? एक ग्रामीण ने महाप्रभु ईसा से प्रश्न किया। पास ही एक बालक खेल रहा था, ईसामसीह ने उसे उठाकर संकेत किया - इसे।

आपका आशय नहीं समझा महात्मन्, ग्रामीण ने फिर कहा। ईसा हँसे और बोले- “जो बच्चे की तरह भोला और निरहंकार है, वही स्वर्ग का अधिकारी है।

मनुष्य की सारी बुद्धिमतां और विचारशीलता परिस्थितियों और झगड़ों को प्रयत्नपूर्वक सुलझाने में होती है। कलह और कटुता से तो समस्यायें और भी उलझकर विद्रूपता धारण कर सकती हैं। क्षमा उन परिस्थितियों से बचने का प्रकाश है। सारा व्यक्तित्व ही एक तरह से इस कसौटी का परीक्षण है, जो जितना विचारशील ओर बुद्धिमान है, उसे उतना ही उदार और क्षमा करने वाला होना चाहिये। जो क्षमाशील है उसके लिए संसार में कोई शत्रु नहीं, कोई भय नहीं, कोई अन्तर्द्वन्द्व नहीं।


संगीत-मानव-जीवन का प्रकाश और प्राण

ध्वनि (साउण्ड) एक निश्चित भौतिक प्रक्रिया है और जिस प्रकार प्रकृति और प्राणि जगत में प्रकाश और गर्मी का प्रभाव होता है। उससे उनके शरीर बढ़ते, पुष्ट और स्वस्थ होते हैं। उसी प्रकार ध्वनि में भी तापीय और प्रकाशीय ऊर्जा होती है और वह प्राणियों के विकास में इतना महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है, जितना अन्न और जल। पीड़ित व्यक्ति के लिए तो संगीत उस रामबाण औषधि की तरह है, जिसका श्रवण पान करते ही तात्कालिक शांति मिलती है।

लोग कहेंगे यह भावुक अभिव्यक्ति मात्र है, किन्तु वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं ने संगीत की उन विलक्षण बातों का पता लगाया है, जो मनुष्य शरीर में शाश्वत चेतना को और भी स्पष्ट प्रमाणित करती है।

इस सम्बन्ध में अन्नामलाई विश्वविद्यालय में वनस्पति शास्त्र के विभागाध्यक्ष डा. टी० सी० एन॰ सिंह और उनकी सहयोगिनी कुमारी स्टेला पुनैया के वनस्पति और प्राणियों पर किये गये संगीत के परीक्षण बहुत उल्लेखनीय है। सच बात तो यह है कि ईश्वर, आत्मा, जीवन व्यवस्था, समाज व्यवस्था पर अनेक लोग अनेक जातियों के अनेक मत हो सकते हैं, किन्तु संगीत की उपयोगिता और सम्मोहिनी शक्ति पर किसी भी देश के किसी भी व्यक्ति को विरोध नहीं। शायद ही कोई ऐसा अपवाद हो, जिसे संगीत, वाद्य और नृत्य अच्छे न लगते हों। मानव का संगीत के प्रति स्वाभाविक प्रेम ही इस बात का प्रमाण है कि वह कोई नैसर्गिक तत्त्व और प्रक्रिया है।

उपनिषद् कहते हैं-

ब्रह्म प्रणव संधानं नादो ज्यातिर्भयः शिवः स्वयमाविर्भ वेदात्मा मेधापायेंऽशुमानिव सिद्धासने स्थितो योगी मुद्राँ संधाम वैष्णवीम् शृणुयाद्दक्षिणे कर्णे नादभर्न्तगतं तदा अभ्यस्यमानो नादोऽयं ब्रह्यमाबृगुते ध्वनिम् पक्षाद्धिपक्षखिलं जित्वा तर्यपदं ब्रजेत।

- नाद्बिंदूपनिषद् 30। 31।32,

वत्स! आत्मा और ब्रह्म की एकता का जब चिन्तन करते हैं तब कल्याणकारी ज्योति स्वरूप परमात्मा का नाद रूप में साक्षात्कार होता है। (यह संगीत ध्वनि बहुत मधुर होती है।) योगी को सिद्धासन से बैठकर वैष्णवी मुद्राधारण कर अनाहत ध्वनि को सुनना चाहिये। इस अभ्यास से बाहरी कोलाहल शून्य होकर अन्तरंग तुर्य पद प्राप्त होता है।

उपरोक्त कथन में संगीत और ब्रह्म का सायुज्य प्रतिपादित किया गया है, इसलिए उसके अभ्यास से निःसन्देह मानव आत्मा में उन शक्तियों और गुणों का विकास संभव है जो परमात्मा में है। “जीवन भर जीवित बने रहिये” (स्टे अलाइव आल योर लाइफ) के लेखक नार्मन बिन्सेन्ट पील नामक विद्वान् ने इस पुस्तक में मृत्यु के उपरान्त जीवन की शास्त्रीय पुष्टि के अनेक महत्त्वपूर्ण उद्धरण दिये हैं- उन्होंने लिखा है कि “मुझे एक नर्स ने जिसने अनेकों व्यक्तियों को मरते देखा था, बताया कि मृत्यु के क्षणों में जीवन को कुछ अलौकिक दर्शन और श्रवण होता है। कुछ मरने वालों ने बताया कि उन्हें आश्चर्यजनक ज्योति और संगीत सुनाई दे रहा है।

यह दो उद्धरण संगीत को जीवन का शाश्वत उपदानं ही प्रमाणित करते हैं पर प्रश्न यह हो सकता है साधारण गायक और श्रोता, नृत्य या अभिनय द्वारा अपनी चेतना को लय में बाँधने वाला उस असीम सुख को प्राप्त क्यों नहीं करता। दरअसल यह विषय मन की तन्मयता से सम्बन्धित है पर उतनी तन्मयता न हो तो भी संगीत का मनुष्य के मस्तिष्क, हृदय और शरीर पर विलक्षण प्रभाव अवश्य होता है और उससे मूल चेतना के प्रति आकर्षण और अनुराग ही बढ़ता है। नास्तिक स्वभाव से जितने रूखे और कटु होते हैं, यह एक विलक्षण सत्य है कि उन्हें संगीत से उतना ही कम प्रेम होता है। कला के प्रति अनुराग ही अध्यात्म की प्रथम सीढ़ी है। ऐसे व्यक्ति में भावनायें होना स्वाभाविक ही है।

देखा गया है कि शरीर में प्रातः काल और सायंकाल ही अधिक शिथिलता रहती है उसका कारण प्रोटोप्लाज्मा की शक्ति का ह्रास है। यों प्रातः काल शरीर थकावट रहित होता है पर पिछले दिन की थकावट का प्रभाव आलस्य के रूप में उभरा हुआ रहता है। प्रोटोप्लाज्मा जिससे जीवित शरीर की रचना होती है, इन दोनों समयों में अस्त-व्यस्त हो जाता है, उस समय यदि भारी काम करें तो शिथिलता के कारण शरीर पर भारी दबाव पड़ता है और मानसिक खीझ और उद्विग्नता बढ़ती है। थकावट में ऐसा हर किसी को होता है। यदि कोई गर्म-गर्म पदार्थ खाये जो कुछ क्षण के लिये प्रोटोप्लाज्मा के अणु तरंगायित तो होते हैं पर वह तरंग उस तूफान की तरह तेज होती है, जो थोड़ी देर के लिये सारे पेड़-पौधों को झकझोर कर रख देती है। उसके बाद चारों ओर सुनसान भयानकता-सी छा जाती है, उत्तेजक पदार्थों के सेवन से ड़ड़ड़ड़ में बुद्धि विनम्र और रात में दुःस्वप्न शारीरिक प्रोटोप्लाज्मा प्रकृति में इसी तरह के तूफान का प्रभाव होता है, इसलिये इस समय नशापान स्वास्थ्य को बुरी तरह चौपट करने वाला होता है।

संगीत की लहरियाँ शिथिल हुए प्रोटोप्लाज्मा की उस तरह की हल्की मालिश करती है, जिस तरह किसी बहुत प्रियजन के समीप आने पर हृदय में मस्ती और सुहावना पन छलकता है, इसलिये प्रातः काल का संगीत जहाँ शरीर को स्फूर्ति और बल प्रदान करता है, हृदय, स्नायुओं, मन और भावनाओं को भी स्निग्धता से आप्लावित कर देता है। इसलिये प्रातः काल और सायंकाल दो समय तो प्रत्येक व्यक्ति को गाना, प्रार्थना पुकारना अवश्य चाहिये। सामूहिक कीर्तन और भजन बन पड़े तो और अच्छा अन्यथा किसी भी माध्यम से सरस और भाव प्रधान गीत तो इस समय अवश्य ही सुनना चाहिये।

डा. सिंह ने दस वर्ष तक एक बाग को दो हिस्सों में बाँटकर एक परीक्षण किया। एक हिस्से के पौधों को कु. स्टैला पुनैया वायलिन बजाकर गीत सुनाती दूसरे को खाद, पानी, धूप की सुविधायें तो समान रूप से दी गई किन्तु उन्हें स्वर-माधुर्य से वंचित रखकर दोनों का तुलनात्मक अध्ययन किया। जिस भाग को संगीत सुनने को मिला उनके फूल पौधें सीधे, बने, अधिक फूल, फलदार सुन्दर हुए। उनके फूल अधिक दिन तक रहे और बीज निर्माण द्रुतगति से हुआ। डा. सिंह ने बताया कि वृक्षों में प्रोटोप्लाज्मा गड्ढे भरे द्रव की तरह उथल-पुथल की स्थिति में रहता है, संगीत की लहरियाँ उसे उस तरह लहरा देती है, जिस तरह वेणुनाद सुनकर सर्प प्रसन्नता से झूमने और लहराने लगता है। मनुष्य शरीर में भी ठीक जैसी ही प्रति का होती है। गन्ना, चावल, शक्कर जैसे मोटे अनाजों पर जब संगीत अपना चिरस्थायी प्रभाव छोड़ सकता है तो मनुष्य के मन पर उसके प्रभाव का तो कहना ही क्या?

कनाडा के किसान अपने खेतों के चारों ओर लाउड स्पीकर लगाकर रखते हैं, उनका सम्बन्ध रेडियो से जोड़ दिया जाता है और संगीत कार्यक्रम प्रसारण प्रारम्भ कर दिया जाता है। देवातोसा (विस्कानिसन) के संगीत शक्ति के व्यापक शोधकर्ता श्री आर्थरलाकर का कहना है कि संगीत से जिस तरह पौधों को रोगाणुओं की रोग-निरोधक-शक्ति का विकास भी किया जा सकता है।

गाना-नाचना गीत-संगीत निश्चित रूप से प्रसन्नता की वृद्धि करते हैं, यह शरीर की स्थूल प्रक्रिया है। संगीत को हृदय और भावनाओं में उतार लेने से तो मनुष्य का आत्मिक काया-कल्प ही हो सकता है। संगीत एक प्रकार की स्वर साधना और प्राणायाम है जिससे शरीर के भीतरी अवयवों का व्यायाम भी होता है और आक्सीजन की वृद्धि भी, फलस्वरूप पाचन-शक्ति गहरी नींद, चौड़ी छाती और हड्डियों की मजबूती का स्थूल लाभ तो मिलता ही है। दया, प्रेम, करुणा, उदारता, क्षमा, आत्मीयता सेवा और सौजन्यता के भावों का तेजी से विकास होता है यह सद्गुण अपनी प्रसन्नता और आनन्द का कारण आप है, वैसे ऐसे व्यक्ति के लिये साँसारिक प्रेम और सहयोग का भी अभाव नहीं रहता।

संगीत का अब सम्मोहिनी विद्या के रूप में विदेशों में विकास किया जा रहा है। अनेक डाक्टर सर्जरी जैसी डाक्टरी आवश्यकताओं में संगीत की ध्वनि-तरंगों का उपयोग करते हैं, अमेरिका में बड़े स्तर पर संगीत की सृजनात्मक शक्ति की खोज की जा रही है। वहाँ के वैज्ञानिक ध्वनि-तरंगों के माध्यम से न केवल विश्व-संसार प्रणाली को सरल और सर्वसुलभ बना रहे हैं वरन् उसके माध्यम से अनेक रहस्यों का पता लगा रहे हैं, अन्तरिक्ष यात्रा से लौटे सभी यात्रियों ने बताया कि ऊपर पृथ्वी के घूमने की आवाज बहुत मधुर सुनाई देती है। कदाचित कण-शक्ति या आत्मिक स्थित का ऐसा विकास किया जा सके, जबकि प्रत्येक ग्रह की गति-ध्वनि उसमें निवास करने वाले प्राणियों का कोलाहल उस प्रकार सुना जा सके, जिस तरह किसी मेले के बाहर खड़े होकर वहाँ की ध्वनि सुनी जाती है तो वह स्थिति जीव के लिये कितनी सुखद और तन्मयता की होगी, उस सम्बन्ध में मनुष्यता की साधारण बुद्धि कल्पना भी नहीं कर सकती, उस शक्ति का परिचय पाना तो और भी कठिन है।

संगीत-स्वरों की मंत्र शक्ति उसके लिये सुलभ है न समय साध्य है पर उसके सहज रूप का हृदयंगम और उसका लाभ तो हर कोई ले सकता है। अच्छे गीतों का चुनाव करना, उन्हें कण्ठस्थ करना और कोई न हो तो एकान्त में काम करते हुए या बैठकर अकेले ही गाना लोगों को सुनाना, कीर्तन करना यह ऐसी सुलभ संगीत साधनायें हैं, जिनसे शारीरिक, मानसिक और आत्मिक प्रगति की जा सकी है। नृत्य और अभिनव का संगीत कर उसे और भी सरस बनाया जा सकता है। नाचना गाना और बजाना मनुष्य समाज की सुखद कलायें हैं, यदि यह न हों तो मनुष्य जीवन जैसा नीरस और कुछ न रह जाये।


सच्चा आत्म-ज्ञान

काकभुसुण्डि जी के मन में एक बार यह जानने की इच्छा हुई कि क्या संसार में ऐसा भी कोई दीर्घजीवी व्यक्ति है, जो विद्वान् भी हो पर उसे आत्म-ज्ञान न हुआ हो? इस बात का पता लगाने के लिये वे महर्षि वशिष्ठ से आज्ञा लेकर निकल पड़े।

ग्राम ढूँढ़ा, नगर ढूँढ़े, बन और कन्दराओं की खाक छानी तक कहीं जाकर विद्याधर नामक ब्राह्मण से भेंट हुई, पूछने पर मालूम हुआ कि उनकी आयु चार कल्प की हो चुकी है और उन्होंने वेद शास्त्र का परिपूर्ण अध्ययन किया है। शास्त्रों के श्लोक उन्हें ऐसे कंठस्थ थे, जैसे तोते को राम नाम। किसी भी शंका का समाधान वे मजे से कर देते थे।

काकभुसुण्डि जी को उनसे मिलकर बड़ी प्रसन्नता हुई, किन्तु उन्हें बड़ा आश्चर्य यह था कि इतने विद्वान् होने पर भी विद्याधर को लोग आत्म-ज्ञानी क्यों नहीं कहते।

यह जानने के लिये काकभुसुण्डि जी चुपचाप विद्याधर के पीछे घूमने लगे। विद्याधर एक दिन नीलगिरी पर्वत पर वन-विहार का आनन्द ले रहे थे, तभी उन्हें कन्दर्पः की राजकन्या आती दिखाई दी, नारी के सौंदर्य से विमोहित विद्याधर प्रकृति के उन्मुक्त आनन्द को भूल गये, कामावेश ने उन्हें इस तरह दीन कर दिया, जैसे मणिहीन सर्प। वे राजकन्या के पीछे इस तरह चल पड़े जैसे मृत पशु की हड्डियाँ चाटने के लिये कुत्ता। उस समय उन्हें न शास्त्र का ज्ञान रहा, न पुराण का। राजकन्या की उपेक्षा से भी उन्हें बोध नहीं हुआ। वे उसके पीछे लगे चले गये, सिपाहियों ने समझा यह कोई विक्षिप्त व्यक्ति है, इसलिये उन्हें पकड़ कर बंदीगृह में डाल दिया।

कारागृह में पड़े विद्याधर से काकभुसुण्डि ने पूछा-मुनिवर आप इतने विद्वान् होकर भी यह नहीं समझ सके कि आशक्ति ही आत्म-ज्ञान का बन्धन है। यदि आप कामासक्त न होते तो आज यह दुर्दशा क्यों होती।

यह सुनते ही विद्याधर के ज्ञान नेत्र खुल गये और उन्हें आत्म-ज्ञान हो गया।


हम स्वास्थ्य और शक्ति की उपेक्षा न करें

जीवन को सुखी और संतुष्ट बनाने के लिये जिन वस्तुओं की अनिवार्य आवश्यकता मानी गई है स्वास्थ्य और शक्ति उनमें प्रमुख हैं, इनके अभाव में सुखी और संतुष्ट रहना सम्भव नहीं।

घर में धन-दौलत की कमी न हो, स्त्री-बच्चे नाते-रिश्तेदार सब कोई हों, किन्तु आरोग्य न हो तो इन सब सुखदायक वस्तुओं से क्या कोई सच्चा हर्ष या उल्लास मिल सकता है? घर में उत्सव का अवसर हो, लड़के-लड़की का विवाह हो, सब ओर चहल-पहल दिखाई दे रही हो, किन्तु आप स्वयं अस्वस्थ पड़े हों तो क्या उस उत्सव का कोई आनन्द पा सकते हैं। उस अवस्था में एक नैतिकता जन्य बौद्धिक संतोष के सिवाय वह आनन्द-पुलक जिसे मन और शरीर तक में अनुभव की जाती है, नहीं मिल सकती। सारा उत्सव नीरस और फीका-फीका ही अनुभव होगा।

भोजन-वस्त्र सुविधा-साधन सभी कुछ हों, किन्तु आरोग्य के अभाव में उनका कोई आनन्द नहीं रहता। पथ्य के अतिरिक्त किसी अन्य भोजन का तो अधिकार ही नहीं रहता। आराम के साधनों का उपयोग किया जा सकता है, किन्तु बीमार के लिये उनका क्या सुख हो सकता है? स्वास्थ्य सही हो, शरीर में पूर्ण आरोग्य हो तो साधारण भोजन-वस्त्र और सामान्य सुविधा-साधनों के साथ भी सुखी और उल्लासपूर्ण जीवन बिताया जा सकता है। स्वास्थ्य स्वयं एक सुख है, उसे बाह्य साधनों पर जीवित रहने की अपेक्षा नहीं होती। युग के धनकुबेर कहे जाने वाले रॉकफेलर जैसे न जाने कितने व्यक्ति सर्व सम्पन्न होने पर भी दो रोटी खा सकने और जीवन में खुलकर हँसने के लिये तरसते रहते हैं। स्वास्थ्य सम्पदा से रहित वे करोड़ों-अरबों के स्वामी होते हुए भी दीन-हीन और मलीन बने रहते हैं। उन्हें स्वयं की तुलना में अपने मिल के मजदूर भाग्यशाली लगते हैं, जो दिन भर पसीना बहाते, डटकर काम करते और शाम को जो कुछ मिल जाता है, डटकर खाते और चैन की नींद सोते हैं। स्वास्थ्य सम्पदा के धनी होने से वे फटे वस्त्रों और टूटे मकानों में भी यह आनन्द पा लेते हैं, जो स्वास्थ्य-हीन पूँजीपति अपनी सजी-धजी कोठियों में नहीं पा पाते स्वास्थ्य संसार में सुख का बहुत साधनों का संपर्क पाकर अधिक उद्दीप्त हो उठती है। स्वास्थ्य के अभाव में सुख-साधनों का मूल्य नहीं। इस सम्पदा की रक्षा हर उपाय से करनी ही चाहिये।

संसार शक्ति के आधार पर चलता है। यदि शक्ति का सर्वथा ह्रास हो जाये तो संसार का चलता हुआ चक्र जैसे ही रुक जाये, जैसे बिजली फेल हो जाने से चलती हुई मशीन रुक जाती है। शरीर में जब तक शक्ति है इसका मूल्य, महत्व अपरिमित है। शक्ति समाप्त हो जाने पर योग बन जाता है। किसी काम का नहीं रहता। फिर इससे न स्वयं प्रेम रहता है और न दूसरों की सहानुभूति। निरुपयोगी होकर अवहेलना की वस्तु बन जाता है। उपयोगिता समाप्त हो जाने पर संसार में हर वस्तु मूल्यहीन एवं तिरस्कार के योग्य हो जाती है। अनुपयोगी का महत्व, इस कर्मभूमि संसार में ही भी कैसे सकता है। शक्ति शून्य किसी वस्तु, फिर चाहे वह शरीर हो अथवा अन्य वस्तु, की कोई कदर नहीं रहती।

शक्ति हीनता और भय का समा सम्बन्ध है। जहाँ अशक्तता होगी वहाँ भय का रहना स्वाभाविक है। शक्ति हीन शरीर को रोगों का, अशक्त मनुष्यों को, दुष्टों और शत्रुओं का भय रहता है। निर्बल धनवान् को चोर लुटेरों का भय सताता रहता है। शक्ति-हीन न जीवन संघर्ष में ठहर सकता है और प्रतिकूलताओं से टक्कर ले सकता है। अपमान, तिरस्कार, उपेक्षा और अवहेलना शक्ति हीनता के अनिवार्य दण्ड है। यह विरोधियों का अवरोध तो कर ही नहीं सकता साथ ही भय और विरोध के कारण किसी सत्य बात को भी सामने प्रकट नहीं कर सकता।

साहस-हीनता और कायरता के कारण, शक्ति-हीन को दब्बू जीवन बिताने के लिये विवश होना पड़ता है। ऐसी दशा में सुख शान्ति की आशा कैसे की जा सकती है। शक्ति-हीन को लोग जरा-जरा-सी बात पर ही दबाने सताने का प्रयत्न किया करते हैं, शक्ति-हीन की स्वत्व सम्पत्ति और अधिकार छिनते देर नहीं लगती। कमजोर का कोई साथी बनने को तैयार नहीं होता। यहाँ तक कि निर्बलता से अभिशप्त मनुष्य को परमात्मा तक भुला देता है। शक्ति-हीनता संसार में बहुत बड़ा दुःखदायक पाप है, फिर चाहें वह शारीरिक, मानसिक अथवा बौद्धिक, किसी प्रकार की भी क्यों न हो।

इस प्रकार देख सकते हैं कि स्वास्थ्य और शक्ति ही सुख-शान्ति के आधार एवं स्तम्भ है। इनका अभाव न जाने कितनी तरह की अकुलाहटें और कुण्ठाएँ जीवन में पैदा कर देता है। जीवन का समुचित विकास शरीर हृष्ट-पुष्ट हो, हृदय उदार हो, मन प्रसन्न और बुद्धि निर्विकार हो, तभी सम्भव हो सकता है। अस्त-व्यस्त शारीरिक अवस्था, खोखली मन बुद्धि और अस्वस्थ जीवन गति से कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं हो सकता।

जिस वृक्ष को, जब वह छोटा रहता है, एक सुकुमार पौधे की स्थिति में होता हैं, तक खाद और पानी की ज्यादा आवश्यकता होती है। जिस पौधे को यह सब उचित समय पर मिलता रहता है वह आगे चलकर एक विशाल वृक्ष के रूप में विकसित होता है। उसके जीवन में पल्लव-पुष्प और फलों की कोई कमी नहीं रहती। उसकी जड़े पृथ्वी में दूर-दूर तक फैली रहती है। उसके तने और डालियां मोटी और जीवन्त रहती है। वह हर ऋतु में समुचित रूप से प्रसन्न और पुष्ट रहता है। अक्षय हरियाली का वह अधिकारी बना रहता है। हवा के झोंके और वनस्पति के रोग उसे शीघ्र आक्रान्त नहीं कर पाते। वह दीर्घजीवी और दीर्घ उन्नति वाला होता है। उसको साधारण अनावृत्तिं प्रभावित नहीं कर पाता, उसमें स्वयं सरलता का गुण आ जाता है। ठीक इसी प्रकार मनुष्य भी जब बाल्यकाल में समुचित जीवन तत्त्व पाता रहता है तो वह भी विकसित समुदित और ससत्त्व बनकर जीवन की हर सम्पन्नता का आनन्द उठाया करता है।

मनुष्य जीवन का उर्वरक तत्त्व वीर्य माना गया है। मानव जीवन की सारी शक्तियाँ उसी के अधीन रहती है। उसे मनुष्य का जीवन ही कह दिया जाये तो कुछ अत्युक्ति न होगी। उस रक्षा से ही शरीर के अवयव पुष्ट होते हैं, मेद एवं मज्जा का निर्माण होता है। ओज एवं तेज का आविर्भाव होता है। बुद्धि का विकास और विवेक का स्फुरण होता है। जो वीर्यवान् है, मेद एवं मज्जा से परिपूर्ण है, वही संसार के सुखों का उपयोग कर सकता है। इसकी रक्षा स्वास्थ्य की गारण्टी है। स्वास्थ्य के शक्ति और शक्ति से सम्पन्नता सम्भाव्य होती है। स्वस्थ शक्ति ही भोजन का स्वाद पा सकता है, उसे पचा कर आत्मसात् कर सकता है। अस्वस्थ व्यक्ति नहीं।

वीर्य रक्षा का उपाय ब्रह्मचर्य का अभ्यास हो जाता है, वह उसके गुण से सर्वथा परिचित हो जाता है और फिर जीवन भर उसके पालन का प्रयास किया करता हे। ऐसा संयमी व्यक्ति, संसार का ऐसा कौन-सा सुख है, जो नहीं पाता। जीवन के समुचित विकास और उसके आधार पर सुख शान्ति के विधान को ही दृष्टि में रखकर भारत की आर्य संस्कृति में चार आश्रमों का व्यवस्था की गई थी। उसमें सबसे प्रथम ओर महत्त्वपूर्ण आश्रम, ब्रह्मचर्याश्रम को ही माना गया है। पच्चीस वर्ष तक पूर्ण ब्रह्मचारी रहकर तरुण जब संसार में प्रवेश करता था, तब उसके पास शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक सारी शक्तियों का संग्रह रहता था, जिससे न तो वह आगे चलकर असफल होता था और न दुःख पाता था। उसका स्वास्थ्य तो कभी दुर्बल होता ही न था। बाल्यकाल से किया हुआ उसका संयम का अभ्यास जीवन भर सहायक बना रहता था। ब्रह्मचर्य की महत्ता जानने वाले संयमी पुरुष इन्द्रिय भोग के लोलुप नहीं होते। वे अपने तेज का अपव्यय करने में बड़े ही कृपया और अनुदार रहते है। उनकी यह संयमित अनुदारता उनके सम्पूर्ण जीवन को उदार और प्रसन्न बना देती है।

वेदों, शास्त्रों और आरोग्य शास्त्रों में जिस ब्रह्मचर्य की भूरि-भूरि प्रशंसा की गई और आवश्यकता बताई गई है। महापुरुषों ने जिसे जीवन विकास का आधार और मनीषी जनों ने जिसको सारे सुखों का सार घोषित किया है उसी ब्रह्मचर्य की आज सबसे अधिक उपेक्षा की जा रही है। इसे अनावश्यक ही नहीं अप्राकृतिक तक बतलाया जा रहा है। यह खेद का विषय है। इसी विचार विपरीतता के कारण ही तो आत समाज की यह दशा देखने में आती है।

असंयम के मारे वृद्धों की तो बात ही छोड़ दीजिये, आज के तरुण-किशोर और बालक तक, क्षीण शरीर, मरे मन, कान्ति-हीन मुख और निर्जीव दशा लिये हुये चारों ओर फिरते दिखलाई देते हैं। न उनमें कोई उत्साह दृष्टि गोचर होता है और न आशा का प्रकाश ही उनकी आँखों में दिखाई देता है। बनाव-शृंगार और फैशन, प्रदर्शन से वे अपने को बहुत कुछ सजाने और प्रभावशाली बनाने का प्रयत्न करते है, किन्तु उनका असली खोखलापन उनकी हर भाव भंगिमा से स्पष्ट प्रकट होता रहता है। जिस भारत में संयम की सबसे अधिक महत्ता थी, वहीं असंयम की अति होती देखी जा रही है। ब्रह्मचर्य की अमहत्ता के कारण ही पीढ़ियों में बल, बुद्धि, विद्या और तेज का अभाव आता जा रहा है। ऐसी दशा में क्या व्यक्तिगत और क्या समाजगत किसी प्रकार की सुख-शांति स्वास्थ्य, शक्ति अथवा सम्पदा की आशा नहीं की जा सकती है।

इस दशा में सुधार होना ही चाहिये। बच्चों को प्रारम्भ से ही ऐसे वातावरण में रखा जाना चाहिये, जिससे उनमें विकास न उत्पन्न हों। इसके लिये परिवारों में दाम्पत्य ओर युगल-संयम को स्थान दिया ही जाना चाहिये। नासमझ परिजनों की असावधानी में बच्चों में शीघ्र ही काम चेतना उत्पन्न हो जाती है। बच्चों के किशोर होने पर उनकी गतिविधियों, संगतियों और खान-पान पर ध्यान रखना चाहिये, जिससे वे ऐसी संगति में न पड़ जायें जो उनकी चेतना के लिये हानिकारक हो ओर ऐसे तत्त्व उनके शरीर में न पहुँच जायें, जो उद्दीपन और संयम-अश्लील साहित्य से बचाना चाहिये साथ ही उनका विवाह तो अपरिपक्व आयु में कदाचित करना ही नहीं चाहिये।

बच्चों के साथ उन प्रौढ़ों को भी अब से ही संयम का पालन करना प्रारम्भ कर देना चाहिये, जो न तो बाल्य-काल में कर सके हैं और न अब कर पा रहे हैं। उन्हें निराश अथवा उदासीन होने की आवश्यकता नहीं। संयम जब से भी किया जायेगा, तब से लाभकर सिद्ध होता है। वर्तमान जीवन में जो यह व्रत लाभकर होगा ही बुढ़ापे में तो और भी अधिक काम आयेगा बीच जीवन से ब्रह्मचर्य का व्रत लेने और पालने वाले आज के युग में महात्मा गाँधी जैसे व्यक्तियों के उदाहरण मौजूद है। उन्होंने सपत्नीक रहते हुये भी ब्रह्मचर्य व्रत का पालन कर दिखाया। यह कठिन नहीं केवल लगन की आवश्यकता है।

धर्म शास्त्र और लोकानुभव के आधार पर यह असंदिग्ध सत्य है कि जीवन की सुख-शांति का मूलाधार ब्रह्मचर्य है। जब से जितने दिन इस व्रत का पालन किया जायेगा, तब से उतनी अवधि तक मनुष्य स्वस्थ, सशक्त, सम्पन्न और सुखी जीवन-यापन कर सकता है।


समर्थ गुरु रामदास

समर्थ गुरु रामदास दो-तीन घर माँग लिया करते थे, उनमें जो कुछ मिल जाता था, उससे दिन भर का भोजन बना लेते थे। एक दिन प्रातः काल वे ऐसे ही एक दरवाजे पर खड़े हुए। भिक्षा के लिये आवाज लगाई। उस घर की स्त्री उस दिन किसी कारणवश क्रोध में भरी हुई थी। समर्थ की आवाज ने आग में आहुति का काम किया। स्त्री उबल पड़ी और जिस पोतने से चौका धो रही थी वही समर्थ के मुख पर दे मारा।

समर्थ न रुष्ट हुये, न उन्हें कष्ट हुआ। मुसकराये और पोतना लेकर ही चल पड़े। नदी पर पहुँचे वहाँ स्नान किया। उस पोतने को भी अच्छी तरह धोखा और सुखाया। शाम को आरती के लिये बत्तियाँ उसी कपड़े की बनायी और भगवान से प्रार्थना की -हे प्रभु! जिस तरह यह बत्तियाँ काम दे रही है, उसी तरह उस माता का भी हृदय प्रकाशवान् हो।


अन्तरिक्ष के सूक्ष्म शक्ति-प्रवाह

एक बार महात्मा चित्र ने यज्ञ करने की इच्छा की। उन्होंने अरुण के पुत्र महर्षि उद्दालक को प्रमुख ऋत्विक् बनाया। परन्तु उद्दालक मुनि ने स्वयं उपस्थित न होकर अपने पुत्र श्वेतकेतु को भेज दिया। श्वेतकेतु यज्ञाचार्य के उच्च पद जा बैठे। इससे महात्मा चित्र को आश्चर्य हुआ। उन्होंने पांडित्य की परीक्षा के तौर पर प्रश्न किया-

संवृत लोक यस्श्राधास्यस्यहो योचदहवा लोके

यास्यसीति। स होषाच नाहमेद्वेद हन्ताचार्य पृच्छानीति।

- कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद्॥1॥

हे श्वेतकेतु! क्या इस लोक में कोई आवरण वाला ऐसा स्थान है, जहाँ मुझे स्थित करोगे अथवा उससे भिन्न किसी आचरण रहित अद्भुत स्थान में मुझे रखोगे।

श्वेतकेतु उस प्रश्न का उत्तर न दे सके। महर्षि उद्दालक को भी उसका पता न था। तब वे स्वयं महर्षि चित्र के सम्मुख उपस्थित हुए और उक्त प्रश्न का रहस्य जानना चाहा। महर्षि चित्र ने बताया कि-चन्द्रमा के नाम से जो प्रसिद्ध है वही स्वर्ग-लोक का द्वार है। निष्काम भावना वाला पुरुष वहाँ पहुँचकर लोक-सेवा की इच्छा से पृथ्वी पर भी लौट सकता है और ब्रह्मलोक को भी जा सकता है।” जो परमेश्वर की उपासना करता है, वह देव यान मार्ग द्वारा प्रथम अग्नि-लोक में पहुँचता है फिर वायु-लोक में, वहाँ से सूर्य-लोक वरुण और इन्द्र-लोक को गमन करता है। इन्द्र-लोक से प्रजापति लोक और वहाँ से ब्रह्म-लोक को पहुँचता है। इस यात्रा-पथ पर अनेक आश्चर्यजनक संस्थान हैं, वहाँ पहुँचकर जीवात्मा को विचित्र अनुभूतियाँ होती हैं।

महाभारत में भी इसी प्रकार का एक कथन-पितामह भीष्म का है, उन्होंने दुर्योधन को बुलाकर कहा था- “दक्षिणायन हुए सूर्य के समय यदि मैं प्राण त्याग करता हूँ तो निश्चय ही, मेरी दुर्गति होगी इसलिये तब तक मैं अपने प्राणों का त्याग नहीं करूँगा

इन दोनों उपाख्यानों से एक बात निश्चित रूप से मालूम होती है कि पृथ्वी और अन्य लोकों को मिलाने वाली कुछ अदृश्य शक्तियों की सूक्ष्म धारायें हैं, जो जीव की ऊर्ध्व या अधोगामी लोकों तक पहुँचाने में समर्थ हैं। वरुण, इन्द्र, अग्नि आदि तत्त्वों की विशिष्टता और बहुलता वाली यह शक्ति धारायें पृथ्वी के समीप भी हो सकती हैं और किसी ऐसे स्थान पर भी जहाँ पृथ्वी निर्धारित समय पर घूमते-घूमते पहुँचती हो और उन शक्ति धाराओं के समीप हो जाती हो पर एक बात यह निश्चित है कि वह शक्ति धाराओं भू-गुरुत्वाकर्षण (ग्रैविटेशन) नहीं हो सकती, क्योंकि यदि एक सा होता तो जिन घटनाओं द्वारा उक्त-पथों की निश्चिन्तता अगली पंक्तियों में प्रमाणित कर रहे हैं, वैसी घटनायें कहीं भी किसी भी स्थान में हो सकती थीं।

विज्ञान यह मानने लगा है कि आकाश में कुछ विशिष्ट प्रकार के नक्षत्र ऐसे हैं, जो कुछ एक ही प्रकार की किरणें या ऊर्जा प्रवाहित करते है और उनकी शक्ति एवं प्रचंडता इतनी तीव्र होती है कि वे सृष्टि के किसी भी स्थान में व्यापक हलचल उत्पन्न करती रहती है। 1962 में राकेट अभ्यास के समय यह पाया गया कि सूर्य से बहुत दूर हमारी आकाश गंगा में ही एक ऐसा तारा है जो वर्तमान सौर एक्स विकिरण की अपेक्षा दस लाख गुनी तीव्र रफ्तार से एक्स-विकिरण कर रहा है। यह तारा पृथ्वी से 1000 प्रकाश वर्ष दूर है और इसका नाम ‘स्को एक्स वन’ रखा गया है।

तात्पर्य यह कि अब तक की यह मान्यता कि पृथ्वी के जलवायु में केवल सूर्य का ही हस्तक्षेप है, गलत है। एक्स-विकिरण के ही तीस तारे छः वर्षों में ढूँढ़े गये हैं, अभी अन्य महत्त्वपूर्ण किरणों के तारे जो अपना विशिष्ट प्रभाव रखते हैं, अनन्त आकाश में हैं और उनकी जानकारी वैज्ञानिकों को नहीं है पर कुछ ऐसी घटनायें अवश्य सामने आई हैं, जिनसे भारतीय दर्शन की उक्त मान्यता सत्य सिद्ध होती है कि आकाश में सूक्ष्म प्रवाह हैं अवश्य जो लौकिक जीवन में ही नहीं पारलौकिक जीवन को भी प्रभावित करते है।

5 दिसम्बर 1945 को 5 टी वी एम॰ बम वर्षक हवाई जहाज हवाई अड्डे से प्रशिक्षण उड़ान पर रवाना हुये। उन्हें पहले पूर्व की ओर जाना था, फिर उत्तर को ओर अन्त में दक्षिण-पूर्व होकर लोटना था। सब वायुयान पेट्रोल, ईधन, दिशा निर्देशक यन्त्रों और ‘संचार साधनों से पूरी तरह सुसज्जित था उड़ाकों में कोई नया नहीं था, सब पुराने योग्य ओर अनुभवी उड़ाके किसी प्रकार की घटना की रत्ती भर भी सम्भावना नहीं थी।

कण्ट्रोल टावर के निर्देश पर पहला जहाज जिसे स्क्वाड्रन लीडर चला रहे थे, उड़ा उनके 5 मिनट के अन्तर के अन्तर से शेष चार आकाश में गड़गड़ाने लग। प्रथम वायुयान में दो व्यक्ति शेष चारों में तीन-तीन व्यक्ति थे। सब जहाज में मजे में उड़ते गये। रेडियो संदेश मिला हम 200 मील प्रति घण्टा की रफ्तार से ठीक तरह उड़ रहे हैं। अब हम अटलांटिक महासागर के पूर्वी किनारे की ओर बढ़ रहे हैं।

दोपहर ढल चुकी थी। तीन बजकर पैंतालीस मिनट हुये थे कि एकाएक खतरे का संकेत मिला। जहाजों को उतरने का सन्देश देने की तैयारी की जाने लगी पर तभी स्क्वाड्रन लीडर की आवाज सुनाई दी-हम लोग एकाएक कहाँ आ गये, कुछ पता नहीं चल रहा, यन्त्र ठीक हैं पर जब नीचे की ओर देखते हैं तो न समुद्र है न कहीं जमीन। पूछा गया-नक्शा देखकर अपना ग्रिड रिफरेन्स (स्थान का पता) दो-तो उत्तर मिला-यहाँ भौगोलिक स्थिति के बारे में निश्चित रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता।”

यह आखिरी शब्द थे। इसके बाद जहाज कहाँ गये आज तक किसी को पता नहीं चल पाया। चलते-चलते अनुमानित सन्देश मिला था, उत्तर-पूर्वी किनारे से कोई 225 मील दूर। उसी के आधार पर 13 कर्मचारियों और अच्छे से अच्छे यन्त्रों से सुसज्जित मार्टिन हवाई जहाज को खोज के लिये भेजा गया। 5 मिनट तक उसने अपने उड़ने की खबर दी पर उसके बाद ही उधर से भी कोई आवाज आना बन्द हो गई। रात भर समुद्र के रक्षक जहाजों ने उधर निगाह रखी। प्रातः काल होते ही 21 जहाज समुद्र में दौड़ाये गये। 300 जहाज आकाश का चप्पा-चप्पा छानने लगे। 12 खोजी दल जमीन में खोज करते रहे। दिन भर खोज चलती रही पर न तो समुद्र तल पर एक बूँद तेज का निशान मिला न जमीन पर जहाज का एक इंच टुकड़ा। किसी के शव मिले न कोई पुर्जे। मार्टिन जहाज तो समुद्र तल पर भी आराम से उतर सकता था। उनका सन्देश प्रसारक यन्त्र इतना जबर्दस्त था कि उससे दूसरे देशों को भी सन्देश भेजे जा सकते थे पर उसका भी कही कोई सुराग न मिला।

नौ सैनिक अधिकारियों ने बहुत खोज की पर वे किसी कारण का पता न लगा सके। उन्होंने रिपोर्ट प्रकाशित करते हुए कहा-यह सब क्या हुआ हम इसकी कल्पना तक नहीं कर सकते।” इस स्थान का नाम प्वाइंट आफ नो रिटर्न’ रखा गया। वहाँ जो भी गया आज तक नहीं लौट पाया।

हमने विज्ञान में इतनी उन्नति की है कि चन्द्र और मंगल ग्रहों तक पहुँच रहे हैं। हमारा भूगोल इतना समृद्ध हो चुका है कि ध्रुवों तक के बारे में अच्छी तरह जानने लगे हैं। ऐसी योजना बनाई जा रही है कि समुद्र के भीतर घूमकर धरती को छेद किया जाये ताकि उत्तर और दक्षिण की दूरी न्यूनतम रह जाये पर उन पारलौकिक तथ्यों का पता लगाने में हमारी बुद्धि बिलकुल काम नहीं करती जो इस तरह की अविज्ञात घटनायें घटित किया करते है।

हमारी पृथ्वी संसार के शून्य-कालचक्र में कहाँ घूम रही है, कहाँ से कैसा विकिरण किसी समय हो रहा है, यह रहस्य सुलझने को नहीं आ रहे हैं। बड़े-बड़े भौतिक उपकरण और मानवीय बुद्धि कौशल भी इस तरह के अज्ञात कारणों का पता लगाने में असफल हैं, घटनायें ज्यों की त्यों होती रहती हैं।

इस घटना के ठीक तीन वर्ष बाद ही 28 जनवरी 1948 को एक चार इंजिन वाला ब्रिटिश जहाज ‘स्टार टाइगर’ किंगस्टन जा रहा था। उसका सम्बन्ध बरम्पुड़ा हवाई अड्डे से था। हवाई जहाज में कर्मचारियों सहित 26 यात्री सवार थे। जहाज से खबर मिली मौसम साफ है, हम ठीक तरह से उड़ रहे हैं, इसके बाद जैसे ही वायुयान उस प्वाइंट के स्पर्श में आया, न जाने कहाँ लुप्त हो गया। समुद्र में कोई निशान नहीं, धरती का कही मुख चौड़ा न हुआ। क्या उसे फिर आकाश निगल गया इसका आज तक कुछ पता नहीं चल पाया।

स्टार-टाइगर की तरह एक दिन ‘एरियल’ ने उड़ान भरी। कैप्टन जै०सी० मैंक्फी चालक थे, उन्हें बारम्पुड़ा से जमैका जाना था। फोर्टसेकरले (फ्लोरिडा) के निकट वह स्थान आता है, जहाँ की उड़ान काफी विचित्र होती है। वहाँ एक छोटा तिकोना चक्कर काटकर बढ़ना होता है। एरियल की तेल टंकियों में दस घण्टे तक उड़ने के लिये पर्याप्त तेल था, हवाई अड्डा छोड़ने के पौन घण्टा बाद कैप्टन मैक्फी ने खबर दी जमैका ठीक समय पर पहुँच रहे हैं। इसके बाद न कोई आवाज ही आई और कही पता चला कि एरियल कहाँ स्वाहा हो गया।

यह तीनों घटनायें एक से एक भयंकर घटित हुई पर आज तक इस बारे में सही तथ्यों का पता नहीं लगाया जा सका। न वहाँ से कोई संकेत मिले ओर न ही उस रहस्य का पता लगाया जा सका कि उस स्थान पर पहुँच कर वायुयानों का क्या हो जाता है। वैज्ञानिकों का अनुमान हैं कि सम्भवतः उस स्थान पर किसी ग्रह का इतना तेज विकिरण होता हो कि जहाज गैस बन जाते हैं। उस स्थान पर यदि मनुष्य सकुशल रह सके तो अनुमान है कि पृथ्वी और आकाश के अनेक रहस्यों का पता चले।

पृथ्वी के अक्ष के सम्बन्ध में नई जानकारियाँ मिल सकती हैं क्योंकि उस बिन्दु पर पहुँचते ही जमीन दिखाई देना बन्द हो जाती है, एक अनन्त गहराई रह जाती है। यह भी सम्भावना है कि वहाँ किसी ग्रह का अधिक गुरुत्वाकर्षण हो जो वायुयानों की अपनी ओर खींच लेता हो। ऐसा भी सम्भव है कि किसी ग्रह से वहाँ विद्युत धारायें प्रवाहित होती हाँ, जो जहाजों को चुम्बक बनाकर किसी शक्तिशाली ग्रह या क्षुद्र ग्रह की और ढकेल देती हों।

अनुमानों में कहाँ कितनी सत्यता है, कहा नहीं जा सकता पर यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि मानवीय विधान की अपेक्षा ईश्वरीय विधान अधिक शक्तिशाली है। यहाँ न मनुष्य की भौतिक सामग्री साथ देती है, न बुद्धि-कौशल न तकनीक काम देती है न माइन्ड। उसे जानने के लिए तो अपने जीवन के दृष्टिकोण को ही बदलना पड़ता है। अपनी तुच्छता स्वीकार करनी पड़ती है और महाकाल की महाशक्तियों पर विश्वास करना पड़ता है, जब इस तरह की ज्ञान-बुद्धि जागृत होती है तो मनुष्य (जीवात्मा) के कल्याण का मार्ग भी निकलने लगता है।


यक्ष प्रश्न

पाण्डव वन में थे। एक दिन उन्हें बहुत जोरों की प्यास लगी। सहदेव पानी की तलाश में भेजे गये। शीघ्र ही उन्होंने एक सरोवर खोज लिया पर अभी पानी पीने को ही थे, किसी यक्ष की आवाज आई-मेरे प्रश्नों का उत्तर दिये बिना पानी पिया तो अच्छा न होगा?”

सहदेव प्यासे थे। आवाज की ओर ध्यान न देकर पानी पी लिया और वहीं मूर्छित होकर गिर पड़े। भीम और अर्जुन भी आये और मूर्छित होकर गिर गये। अन्त में धर्मराज युधिष्ठिर पहुँचे। यक्ष ने उनसे भी यही बात कही।

युधिष्ठिर ने कहा-देव! बिना विचारे काम करने वाले अपने भाइयों की स्थिती मैं देख रहा हूँ। आपके प्रश्न का उत्तर दिये बिना पानी ग्रहण न करूँगा प्रश्न पूछिए

यक्ष ने पूछा-किमार्श्चयमू संसार में सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है?”

युधिष्ठिर ने उत्तर दिया-देव! एक-एक व्यक्ति करके सारा संसार मृत्यु के मुख में समाता जा रहा है, फिर भी जो जीवित हैं, वे सोचते हैं, वे कभी न मरेंगे, इससे बढ़कर आश्चर्य और क्या हो सकता है।” यज्ञ बहुत प्रसन्न हुए और पानी पीने की आज्ञा दे दी। चारों भाइयों को भी जिला दिया।


अपने आप बढ़ो, विकसो, बड़े बनो

लाल बहादुर शास्त्री ने अपने 9 माह के प्रधानमंत्रित्व काल में वह यश-श्रेय प्राप्त कर लिया जो संसार का कोई भी नेता नहीं पा सका। शास्त्री जी एक साधारण परिवार के थे। वह स्वयं बढ़े, विकसे और बड़े बने। आत्मावलम्बन की शक्ति ही उनके जीवन में दृढ़ता बनकर विकसित हुई थी।

यही गुरुमन्त्र उन्होंने अपनी सन्तान को भी दिया। एक बार उनसे किसी मित्र ने प्रश्न किया-आप अपने बच्चों को थोड़ा सहारा दे देते तो वे भी आज अच्छे स्थानों पर होते?” शास्त्री जी हँसकर बोले-अवश्य होते पर उनमें योग्यता न होती। जो स्वावलम्बन और आत्म-विश्वास के साथ बढ़ता है, उसकी योग्यता, दृढ़ता, कर्मठता, साहस और कर्तव्य भावना अदम्य होती है।”

उन्होंने कहा- फूल कहीं भी हो वह खिलेंगे ही-बगीचे में हो, जंगल में हो या कमरे में, बिना खिले उसे मुक्ति नहीं। बगीचे का फूल पालतू फूल है, उसकी चिन्ता स्वयं उसे नहीं रहती। जंगल का फूल इतना चिन्ता मुक्त नहीं, उसे अपना पोषण आप जुटाना पड़ता है, अपना निखार आप करना पड़ता है। कहते हैं कि इसीलिये खिलता भी वह मन्दगति से है। सौरभ भी धीरे-धीरे बिखेरता है। किन्तु सुगन्ध उसकी बड़ी तीखी होती है। काफी दूर तक वह अपनी मंजिल तय करती है। जंगल का फूल यद्यपि अपने आकार में छोटा होता है और कई बार वह पूरा खिल भी नहीं पाता है तो भी अपनी सुगन्ध में वह दूसरे फूलों से हल्का नहीं पड़ता वजनी ही होता है।

यह सिद्धान्त मनुष्य के विकास में भी लागू है। दूसरों का सहारा लेकर बहुत ऊँचे पहुँचे हुए लोगों में न तो साहस दृढ़ता होती है और न वे ‘गड्न’ होते हैं, जो अपने आप विकसित हुये व्यक्तियों में स्थायी रूप से होती हैं। सफलता की मंजिल भले ही देर से मिले पर अपने पैरों का गई यात्रा, विकास-यात्रा अधिक विश्वस्त होती है। मोटर, रेल का सहारा लेकर बढ़ने में जहाँ शीघ्र पहुँचना सम्भव है वहाँ अनियमित होना, रास्ते में टूट-फूट लेट होना और बिगड़ जाना भी सम्भव है। पद-यात्रा से अधिक विश्वस्तता सहारे की यात्राओं में नहीं, भले ही उसमें कुछ अधिक सुविधा हो।

संसार में कार्य करने के लिये स्वयं का विश्वास-पात्र बनना आवश्यक है। आत्म-शक्तियों पर जो जितना अधिक विश्वास करता है, वह उतना ही सफल और बड़ा आदमी बनता है। वाशिंगटन एक मामूली सिपाही से अमेरिका की स्वतन्त्रता का प्रतिस्थापक बना। अमेरिका के प्रायः सभी राष्ट्रपति अत्यन्त छोटी अवस्था से स्वयं विकसित हुये। नैपोलियन फ्राँस का एक छोटा-सा सिपाही था, वह स्वयं बढ़कर सेनापति बना। एक अस्पताल में साधारण पियून से बढ़ते-बढ़ते राष्ट्रपति बनने वाले सनयात सेन को कोई नहीं भू सकता। इन महापुरुषों ने ‘यस्य यावाँश्च विश्वासस्तस्य सिद्धिश्च तावती।’ जिसने अपने आप पर विश्वास किया उसने सिद्धि सफलता पाई” कहावत को चरितार्थ किया है।

कारडिनल लिखते हैं- हर व्यक्ति के जीवन में ऐसे अवसर आते हैं, जिनका बुद्धिमानी से उपयोग करके मनुष्य बिना भाग्य की प्रतीक्षा किये बड़ी सफलतायें प्राप्त कर सकता है।”

नेलसन की कहानियाँ अँगरेज बड़े प्रेम से पढ़ते हैं और आत्म-विश्वास की शक्ति की व्याख्या करते समय उसके उदाहरण देते हैं। नेलसन कहा करता था-यदि के लिये मेरे जीवन में कोई स्थान नहीं है। मैं जहाँ जुट जाता हूँ, वहाँ सफलता निश्चित रहती है। जिसके पास दृढ़ और अडिग आत्म-विश्वास और साहस है, वह निश्चय ही अपना भाग्य निर्माण करता है।”

श्रीयुत् नानाभाई थोपटे, व्यापार के क्षेत्र में बम्बई के अब्दुल भाई करीम, शिक्षा के क्षेत्र में सुबोधचन्द्रराय, ईश्वरचन्द्र विद्यासागर, व्यावसायिक प्रगति के लिये सैमुअल एंड्रूज आदि के नाम उल्लेखनीय हैं, इन्होंने कठिनाइयों और अगर-मगर की परवाह किये बिना आत्म-शक्तियों को जीवन-क्षेत्र में उतारा और मनुष्य शक्ति को सार्थक सिद्ध कर दिखाया।

बहुत से लोग कहा करते हैं-यदि मैं स्वतन्त्र होता और मेरे पीछे बाल-बच्चों का झगड़ा न होता, मेरी शिक्षा इतनी होती, मुझे इतनी पूँजी मिल गई होती तो मैं बहुत काम कर सकता था। परन्तु यह उनकी निर्बलता है। बड़ा काम करने के लिये न बाल-बच्चे रुकावट हैं और न धनाभाव। परिस्थितियाँ संसार में न्यूनाधिक एक जैसी ही हैं। जिन्हें रुकावट समझा जाता है, वह समस्यायें ही सफल व्यक्तियों को प्रेरक बनी हैं, वह समस्यायें ही सफल व्यक्तियों को प्रेरक बनी हैं। कई महात्माओं ने तो जेल में भी बड़े-बड़े ग्रन्थ लिखे हैं। सोच-समझ के साथ जीवन के प्रत्येक दिन को अमूल्य मानकर अपने मन को ऊँची अवस्था में ले जाने को जो अपने आप प्रयत्न करते हैं, उनकी थोड़ी-सी सफलता भी चिरस्थायी, संतोषदायक और व्यवहारिक होती है।

अपने आप बढ़ने में सच्चाई और ईमानदारी रहती है, मनुष्य की वह बड़ी शक्ति है, इससे उसका हृदय खुला रहता है, वह किसी भी समय आपको व्यक्त कर सकता है। वह घबराता नहीं, परेशान भी नहीं होता। यह कष्ट तो परावलम्बियों को ही होते हैं। जो दूसरों के सहारे उठता है, उसे बात-बात पर गिर जाने का भी भय बना रहता है। सच्चे लोग अपने गुण, अपनी प्रतिभा और अपने सौन्दर्य के बारे में नहीं सोचते। अपनी इस सरल अबोधता के कारण वे लोगों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं, उनके हृदय में विश्वास, प्रेम और प्रतिष्ठा का स्थान पाते हैं, यह सफलता ही किसी बड़ी से बड़ी सम्पन्नता जैसी सुखदायक होती हैं।

अपने भाग्य को स्वयं बन जाने की राह देखना भूल ही नहीं, मूर्खता भी है। यह संसार इतना व्यस्त है कि लोगों को अपनी परवाह से ही फुरसत नहीं यदि कोई थोड़ा-सा सहारा देकर आगे बढ़ा भी दें और उतनी योग्यता न हो तो फिर फिर पश्चाताप, अपमान और अवनति का ही मुख देखना पड़ता है। स्वयं ही मौलिक सूझ-बूझ और परिश्रम से बनाये हुये भाग्य में इस तरह की कोई आशंका नहीं रहती, क्योंकि वैसी स्थिति में अयोग्य सिद्ध होने का कोई कारण नहीं होता। जितनी योग्यता बढ़ती चले सफलता को मंजिल उतनी प्राप्त करता चले। रास्ता सबके लिये खुला है, उस पर चलकर कितना पार कर सकता है, यह व्यक्ति की अपनी लगन, साहस और विश्वास पर निर्भर रहता है।

शास्त्रकारों ने पुरुषार्थियों की स्थान-स्थान पर वन्दना की है। कोई महाभाग लिखते हैं-

षीमन्तो वन्द्यचरिता मन्यन्ते पौरुषं महत्। अशक्ता पौरुषं कन्तु श्लावा दैवसुपासते॥

अर्थात्-बुद्धिमान व्यक्तियों ने सदैव व्यक्ति के उत्थान के लिये पुरुषार्थ को प्रधान माना है। भाग्य और देवों के सहारे उन्नति का मार्ग खोजने वाले नपुंसक पुरुषार्थ-विहीन व्यक्तियों की विद्वज्जन निन्दा करते हैं।

डूबते हुए सूरज से एक व्यक्ति प्रार्थना कर रहा था-भगवान्! हमें शक्ति दो ताकि हम संसार की कुछ सेवा कर सकें।” पास से एक यात्री गुजर रहा था, हँसते हुए पूछा-भाई सूर्य तो स्वयं ही डूब रहा है, आप उससे शक्ति माँगते हैं?” भक्त ने उत्तर दिया-डूब नहीं रहे मित्र, नई शक्ति लेकर लौटने की तैयारी कर रहे हैं।

हर मनुष्य को परमात्मा ने अपार शारीरिक शक्तियाँ दी हैं। बुद्धि भी सबमें कुछ न कुछ होती है, संसार इतना बड़ा है कि ढूँढ़ने से इच्छित परिस्थितियों का अम्बार मिल सकता हैं, यहाँ अभाव किसी वस्तु का नहीं, यदि कुछ सच्ची बात है तो यह कि सब कुछ ढूँढ़ने वाले को मिलता है। जो स्वयं कुछ करता है, वह पाता है। जो चलता है, वही लक्ष्य तक पहुँचता है। सोना-सोना चिल्लाने से पास रखा हुआ सोना भी, हाथों में नहीं आ जाता। उसे उठाने के लिये भी आप प्रयत्न करना पड़ता है। सफलता के हर क्षेत्र में यह सिद्धान्त अटल है, अचल है। दूसरा बड़ा नहीं बनाता। मनुष्य अपने प्रयत्नों के अनुरूप ही परिणाम उपलब्ध करता है। यह सृष्टि का अकाट नियम है।


अन्धविश्वासों की उलझन अहित ही करेगी

समाचार है कि मेरठ के एक युवक ने अपनी नवविवाहित पत्नी को रात में सोते समय चारपाई पर बाँधा और मिट्टी का तेल डालकर आग लगा दी, जिससे वह बेचारी जलकर मर गई। मरने से पूर्व उसने अपने पास देखने के लिये आने वाले लोगों को बतलाया कि उसके पति ने उसे जलाया है, लेकिन ऐसा क्यों किया यह नहीं बता सकती।

बाद में पता चला कि वह युवक बहुत दिनों से बीमार रह रहा था। उसने अपनी इस बीमारी से परेशान होकर एक ज्योतिषी से उसका कारण पूछा-विवेक का तकाजा था कि वह बीमारी के विषय में किसी अच्छे डाक्टर या वैद्य से बात करता। एक से फायदा न होता तो दूसरे से पूछता अच्छे से अच्छा इलाज करता। अपने आहार-विहार का संयम करता। पथ्य पालन करता और आरोग्य सम्बन्धी दिनचर्या बनाता। अब चूँकि उसने एक ज्योतिषी की शरण ली। ज्योतिषी डाक्टर तो होता नहीं जो युवक की नब्ज़ देखता उसके खान-पान और रहन-सहन की पूछ-ताछ करता, दवा देता और पथ्य बतलाता। निदान उसने पोथी उठाई, कुण्डली मिलाई और कह दिया कि उसकी पत्नी ‘मंगली’ है, इसी कारण वह हमेशा बीमार बना रहता है। युवक अविवेकशील था, अन्धविश्वासी था, ऐसा न होता तो वह किसी अच्छे डाक्टर के पास न जाकर ज्योतिषी के पास क्यों दौड़ता, जिसका कि रोग निदान अथवा उपचार से कोई सम्बन्ध नहीं होता, उसने ज्योतिषी की बात सोलह आना ठीक मान ली। पत्नी को अपने कष्ट का मूल कारण मान लिया और उससे छुटकारा पाने के लिये जलाकर मार डाला।

अन्धविश्वास के कारण ऐसी न जाने कितनी दुःखद घटनायें समाज में होती रहती है। जो प्रकाश में आ जाती है, उन्हें लोग जान लेते हैं, जो प्रकाश में नहीं आ पाती उन्हें भुक्तभोगी ही जान पाते हैं, किन्तु अप्रकाशित घटनायें प्रकाशित घटनाओं से कम नहीं अधिक ही होती है।

इस प्रकार ‘मंगली’ होने के अमांगलिक लाँछन से न जाने कितनी निरपराध स्त्रियों की जान ली जाती रही है। कितनी ही यदि जीवित भी रह जाती है तो मृत्यु से भी बुरा तिरस्कारपूर्ण जीवन बिताती हैं। घरों में उनसे कोई सीधे मुख बात नहीं करता। हर छोटी-छोटी अप्रिय घटना का कारण उसे ही माना जाता है। किसी बच्चे को जुकाम तक हो जाये तो उसका अशुभ कारण माना माना जाता है। घर में कोई बूढ़ा मर जाय तब तो उस बेचारी को ही डायन कहकर दोष दिया जाता है, फिर चाहे वह मरने वाला सौ बरस की आयु पाकर ही अपनी मौत क्यों न मरा हो। वास्तव में कितनी दयनीय दशा होती है, एक उस अबला की जिसे ज्योतिष की गणना से किसी ऐसी घड़ी में जन्मा बताया जाता है, जो अशुभ होती है और उसे मंगली कहा जाता है।

विवाहिताएं तो इस फलित ज्योतिष के फैलाये अन्धविश्वास का कुपरिणाम भोगती ही है, कुमारियों की दशा तो और भी खराब होती है। जिस लड़की को ‘मंगली’ होने का दोष लग गया मानो वह कोई डायन या चुड़ैल हो गई। कोई भी उससे विवाह करने को तैयार नहीं होता। हर एक यही सोचता है कि यदि यह विवाह कर घर आ गई तो घर का अनिष्ट हो जायेगा। ‘मंगली’ लड़की के अभिभावक जन-जन की खुशामद करते फिरते हैं पर कोई बात नहीं करता। लड़की सयानी होती जाती है। माता-पिता की चिन्ता बढ़ती जाती है। तब या तो कोई मंगली वर मिल जाय तो बेड़ा पार होता हैं, सो भी एक मात्र वर होने के कारण लड़की वाले को लड़के के पिता को मुँह माँगा देना होता है, सो भी सदैव हैसियत के बाहर क्योंकि पूरी हैसियत की माँग तो सामान्य वर के अभिभावक किया करते हैं।

इस प्रकार यदि ‘मंगल’ लड़का मिल जाता है तो लड़की के हाथ पीले हो जाते हैं, नहीं तो जीवन भर का अवांछित कौमार्य उनके मत्थे मढ़ा रहता है, जिससे वह माता-पिता की छाती पर उगे पीपल की तरह सालती रहती है। माता-पिता भाई बहन सबकी दृष्टि से उतरी अपमान, अवहेलना और उपेक्षापूर्वक जीवन काटती है। ‘मंगली’ होने पर जो अशुभ मानी जाती हो, कोई विवाह करने को तैयार न होता हो, घर में कोई सीधी आँख न देखता हो, उस लड़की की मानसिक दशा का कोई हृदयवान् भावुक ही अनुमान कर सकता है।

‘मंगली’ लड़कों की भी दशा अच्छी नहीं होती, उनसे भी कोई अपनी बेटी ब्याहने को तैयार नहीं होता। देर तक अविवाहित रहने से समाज में उन्हें नीची दृष्टि से देखा जाता है। चार दोस्त बात-बात पर मजाक बनाते हैं। संयोगवश यदि कोई ‘मंगली’ लड़की मिल गई, विवाह हो गया, नहीं तो उतरती उम्र में उल्टा-सीधा पूरा-अधूरा काना-कुबड़ा विवाह करके अपना कुँआरापन उतारते हैं।

इस अड़ंगे के कारण अधिकतर अनुपयुक्त जोड़े ही मिल जाया करते हैं, ऐसी दशा में उनका विवाहित जीवन एक दुखान्त नाटक जैसा बन जाता है। ज्योतिष के अनुसार यदि किसी विशेष ग्रह-नक्षत्र के योग में जन्म लेने से कोई शुभ, अशुभ हो जाता होता और उसका इष्ट अनिष्ट निश्चित होता तो अवश्य ही उस योग में जन्म लेने वाला संसार का हर व्यक्ति सुखी या दुःखी रहता। किन्तु ऐसा कहाँ देखा जाता है? शुभ कहे जाने वाले योग में जन्म लेने वाले हजारों, लाखों व्यक्ति सुखी या दुःखी रहता। किन्तु ऐसा कहाँ देखा जाता है? शुभ कहे जाने वाले योग में जन्म लेने वाले हजारों, लाखों व्यक्ति दुःखी और अशुभ कहे जाने वाले योग में जन्म लेने वाले न जाने कितने लोग सुखी पाये जाते हैं।

संसार के अन्य देशों की बात यदि छोड़ भी दी जाये तो भारत में ही ऐसी अनेक जातियाँ और वर्ग मौजूद हैं, जो ‘मंगली’, ‘अमंगली’ पर विचार नहीं करते, किन्तु उनके विवाह भी इस मान्यता को मानने वालों की तरह ही सफल, असफल होते रहते हैं और यदि विचार पूर्वक देखा और खोज की जाये तो पता चलेगा कि अन्धविश्वासों से प्रेरित ग्रह-नक्षत्रों विधि, कुण्डली आदि के चक्कर में पड़ने वालों का दाम्पत्य जीवन, उस चक्कर में न पड़ने वालों की अपेक्षा अधिक असफल एवं दुखान्त होता रहता है। इस प्रकार की मान्यताओं एवं तर्कहीन बातों में आस्था रखना बौद्धिक हीनता का घोतक है। जिस जीवन के लिये विवेक और समझदारी की आवश्यकता है, उसको इसका अभाव असुन्दर बना ही देगा।

अट्ठाइस नक्षत्रों में छः नक्षत्र ‘मूल’ माने गये हैं। मूलों में जन्म लेने वाला बच्चा फलित ज्योतिष के अनुसार माता-पिता भाई-बहन मामा, चाचा आदि के लिये अशुभ माना जाता है। उसके जन्म से जहाँ घर पर खुशी होनी चाहिये, वही उदासी छा जाती है। यदि मूल में उत्पन्न बच्चा लड़का है तो उसे उपेक्षा, तिरस्कार और अस्नेह का भाजन बनना पड़ता है और यदि वह लड़की हुई तो उसके मरने की मनौती मनाई जाने लगती है।

मूलों में जन्म पाये न जाने कितने बच्चों को उनके माता-पिता घर के बाहर डाल आते हैं। तब वे बेचारे या तो सुरक्षा के अभाव में मर जाते हैं अथवा किसी सहृदय द्वारा पल कर अज्ञात माता-पिता और वंश कुल के लाँछन के साथ एक तिरस्कृत जीवन बिताते हैं। गोस्वामी तुलसीदास और महात्मा कबीरदास ऐसे ही बच्चों में से थे, जिन्होंने मूलों में जन्म लिया था और जो अपने अन्धविश्वासी माता-पिता द्वारा अनिष्ट की आशंका से धूरे पर डाल दिये गये थे। इनमें से तुलसीदास को धीवरी ने और कबीरदास को एक मुसलमान जुलाहिन ने पड़ा पाया था और उठाकर पाल लिया था। यदि यह संयोग न हो गया होता और उन दोनों को अमुक स्त्रियों ने न पाल लिया होता तो नब्बे प्रतिशत इस बात की ही आशंका थी कि भारतवर्ष के दो उज्ज्वल नक्षत्र या तो शीत, धाम, असुरक्षा के कारण शैशवकाल में ही मर जाते अथवा किसी भूखे स्यार, कुत्ते आदि जानवर के पेट में चले जाते।

ऐसी दशा में भारतीय समाज की कितनी बड़ी हानि होती इसका आज अच्छी प्रकार से अनुमान लगाया जा सकता है। फिर भी इस मूलवाद के चक्कर में न जाने ऐसी कितनी प्रतिभायें माता-पिता द्वारा त्यक्त होकर नष्ट हो गई होंगी और कौन कह सकता है कि आज भी नष्ट हो रही होंगी।

एक समाचार छपा था कि कानपुर की सब्जी मण्डी निवासिनी एक उन्नीस वर्षीया महिला ने अपनी एक वर्ष की लड़की को सरसैय्याघाट पर गंगाजी में फेंक दिया, जिसे मल्लाहों ने डूबने से बचा लिया। बाद में पूछने पर पता चला कि उस लड़की का जन्म मूलों में हुआ था, जो कि माता-पिता के लिये अनिष्ट था। अपने को और अपने पति को अनिष्ट से बचाने के लिये ही उसने लड़की को गंगाजी में फेंका था। पुलिस ने प्रसंग अपने हाथ में लिया और उस स्त्री को बच्ची के साथ जेल भेज दिया गया।

इसी प्रकार के अनेक अन्धविश्वास हिन्दू समाज में विवाहों के सम्बन्ध में चलते रहते है, जिनसे न केवल असुविधा ही होती है, बल्कि हानि भी होती है। उनमें से एक मुहूर्त और एक विधि वर्ग भी है। मुहूर्त का अड़ंगा बहुत बार ऐसे विवाहों को काट दिया करता है, जो हर प्रकार से सुविधाजनक होते हैं। बात पक्की हो चुकी होती है, दोनों पक्ष तैयार होते हैं और उन्हें सुविधा भी रहती है, किन्तु मुहूर्त न होने से विवाह टल जाता है और किसी ऐसे असुविधाजनक समय पर बनता है कि लोगों को विवाह-शादी एक मुसीबत बन जाती है। हिन्दू समाज में विवाहों के लिये कुछ चुने हुए मास, दिन और तिथियाँ चलती हैं। उन पर सैकड़ों हजारों बरातें आती जाती हैं। रेलों में स्थान नहीं मिलता, बसें बुरी तरह भरी चलती हैं, वस्तुएँ ढूँढ़े नहीं मिलती हलवाई, नौकरों और पंडितों का अभाव-सा हो जाता है और ऋतुयें तो इतनी प्रतिकूल होती है कि विवाह की साज, सँभाल करना कठिन हो जाता है। पैसे का नुकसान होता, परेशानी सिर पर सवार रहती, लोगों के खाने-पीने का क्रम बिगड़ जाता है और और ऋतु और व्यवस्था के अनुकूल न होने से लोग बीमार तक पड़ जाते हैं। यदि भगवान् का बनाया हर दिन शुभ मानकर किसी सुविधाजनक समय में शादी-ब्याह किये जायें और यह मुहूर्तवाद का चक्कर छोड़ दिया जाये तो किसी को किसी प्रकार की असुविधा न हो। सभी काम बड़ी सरलता एवं आनन्दपूर्वक हों।

विधि-वर्ग का अड़ंगा बहुत बार हर प्रकार से उपयुक्त जोड़ों की शादी नहीं होने देता। दोनों और के लोग परस्पर संतुष्ट होते हैं। विवाह करना चाहते हैं, शादी ठीक भी हो जाती है, किन्तु विधि-वर्ग ठीक से न मिलने पर सम्बन्ध हटाने पड़ते हैं और तब उपयुक्त जोड़ों के बजाय अनुपयुक्त जोड़े मिल जाते हैं, जिससे जीवन भर रोना पड़ता है।

यह मुहूर्त और विधि-वर्ग की बातें कितनी निरर्थक और अविवेकपूर्ण हैं, इसका पता इसी बात से चल सकता है कि भारत में ही रहने वाले पंजाब के सिक्ख ही नहीं सनातनी हिन्दू तक उन महीनों में शादी करते हैं जिनमें हर प्रकार की सुविधा रहती है, वे मुहूर्तवाद के चक्कर में नहीं पड़ते। उत्तर भारत जैसी मुहूर्त मान्यता पंजाब और दक्षिण भारत में नहीं मानी जाती, जबकि विवाहों की अनेक बातें एक जैसी होती है। इसका कारण यह है कि वहाँ के हिन्दुओं ने इस मुहूर्तवाद के अन्धविश्वास की पोल समझ ली है और उसे निरर्थक समझकर त्यागने का साहस किया है, जिससे वे उत्तर भारत के लोगों की अपेक्षा विवाहों को अधिक सुविधाजनक ढंग से कर लेते हैं।

निःसन्देह इन सब बातों में न तो कोई सत्य है और न तथ्य, केवल मान्यता एवं अन्धविश्वास भर ही है, जिसे अनेक अविवेकी लोगों ने समय-समय पर प्रचलित कर दिया है। प्रचलन के कारण इनको अब पढ़े-लिखे लोग भी मानने लगे। मनुष्य को अपने विवेक से काम लेकर सत्य, असत्य को अपनाना और छोड़ना ही चाहिये। साधारण सी बात है कि जो तथ्य वास्तविक होते हैं, वे किसी एक प्रदेश अथवा सम्प्रदाय पर लागू नहीं होते, बल्कि सभी प्रदेशों, देशों और वर्ग-जातियों पर समान लागू होते हैं। यदि इस योग, मुहूर्त, शुभ-अशुभ और वर्ग-विधि आदि में कोई तथ्य रहा होता तो इनके अनुसार विवाह करने वाले सदा सुखी रहते और इनका कोई भी विचार न रखकर विवाह करने वालों का दाम्पत्य-जीवन असफल होता। किन्तु ऐसा होता नहीं। ईश्वर के बनाये सब दिन समान रूप से शुभ हैं, सबका जन्म शुभ ही होता है। यह अशुभता की भावना मानसिक दुर्बलता मात्र है, जो कि अन्धविश्वास के कारण उत्पन्न हुई है। इसे त्याग देना चाहिये और विवेकपूर्वक हर काम उसके उपयुक्त अवसर पर मंगल भावना से ही करना चाहिये।


गायत्री-साधना - गायत्री उपासना से लौकिक और आत्मिक सफलतायें

पुरुषार्थ द्वारा उपार्जन होता है और उपार्जन से अभावों एवं आवश्यकताओं की पूर्ति होती है। पुरुषार्थों की भौतिक विधि व्यवस्था, शक्ति एवं मर्यादा से हर कोई परिचित है। किन्तु आध्यात्मिक पुरुषार्थों की जानकार सर्वसाधारण को नहीं होतीं, उसी से वे उससे विरत रहते हैं। आत्मिक पुरुषार्थों में सबसे बड़ा गायत्री महाशक्ति के साथ अपना सम्बन्ध, संपर्क बना लेना है। उपासना एवं साधना के द्वारा यह प्रयोजन सिद्ध किया जाता है। शारीरिक ओर मानसिक तपस्या मनुष्य को इस योग्य बनाती है कि वह आत्मिक विभूतियों के क्षेत्र में प्रवेश करके वह सामर्थ्य प्राप्त कर सके, जिसके आधार पर कि आत्म-बल एवं अनुग्रह उपलब्ध हो सके।

प्राचीनकाल में ऐसे अनेक विषय, अवसर आते रहे, जिनमें माननीय पुरुषार्थ थकित एवं असफल हो गया। तब देव अनुग्रह के आधार पर उन संकटों के टालने की आवश्यकता अनुभव की गई। ऐसे पुरुषार्थ कभी असफल नहीं होते।

एक बार पन्द्रह वर्ष की लम्बी अवधि का घोर दुर्भिक्ष पड़ा। अन्न, वनस्पति और जल के बिना अगणित प्राणी मर गये, जो जीवित रहे उनकी प्राण-रक्षा देर तक हो सकती कठिन थी। ऐसी दशा में इस संकट को टालने के लिये महर्षि गौतम ने प्रचण्ड साधन तपस्या द्वारा गायत्री महाशक्ति से संपर्क बनाकर उस व्यापक संकट का निवारण किया। वर्षा हुई और शेष प्राणियों की जीवन रक्षा सम्भव हो सकी। इस प्रसंग का देवी भागवत् में इस प्रकार वर्णन है।

कदाचिदथ काले तु दशपज्ज समा विभा। प्राणिमाँ कर्मवद्यती न वघर्ष शत ऋतुः॥

अनानृष्टचाडति दुर्भिल ममवत्सय कारकम्। गृहे-गृहे शवानाँतु सडरुपा कत्तु न शइबते॥

केचिदश्वान्दराहान्वो मलयन्ति क्षुभार्दिताः। शवानि च मनुष्याणाँ भक्ष्यन्त्येपरेजनाः॥

बालक बाल जननी स्त्रियं पुरुष एवं चं। भलितुँ चलिताः सर्वे क्षुधपा पीड़िता नष्टः॥

बाह्मणा बहूच स्तत्र विचार चक्रु सुत्तमम्। तपोवनो मौतमोडस्ति स नः खेदं हरिर्ज्यात॥

ते सर्वे स्व-स्व वृतान्तं कथयानासु सुत्समयाः। दृष्ट्वा तान्दुःखिताम् विप्रानभयं दत्तवान् धुनिः॥

अति सर्मान्समाश्वास्य गौतमो मुनिराट ततः। गायत्रीं प्रार्थमामास भक्ति सन्नत कन्वेदः॥

नमो देवि!माहिवद्ये! वेदमातः! परास्परे। सर्वभू सारणे देवि! क्षमस्य परमैश्वरि!

इतिस्तुता जगत्माँता प्रत्यज्ञं दर्शनं हही। पूर्ण पात्र हही तस्मैं येन स्यार्त्सवपोशणभँ।

उदाच मुनिमज्जा सा यह कामं त्वमिच्छति। तस्य पूत्तिकर पात्रं मया इत्तं भविष्यति॥

इत्युक्त्वाडर्न्तदथे देवी गायत्री परमाकला।

अर्थ-महर्षि व्यास जी ने कहा-हे राजन्! एक बार ऐसा हुआ था कि पन्द्रह वर्ष तक प्राणियों के कर्म विपाक के कारण इन्द्रदेव ने संसार में वर्षा बिलकुल ही नहीं की थी। उस अनावृष्टि से जगत् में बड़ा भीषण अकाल हो गया था, जिससे सभी का नाश हो गया। घर-घर में मृतकों की इतनी अधिक संख्या हो गई थी कि उसे गिना नहीं जा सकता था। मनुष्य भूख से पीड़ित होकर अश्व और वराहों को खाने लगे थे। कुछ मनुष्य तो मृतक मनुष्यों के शवों को ही खा जाया करते थे। माता अपने ही पुत्र को और पुरुष अपनी स्त्री की भूख से पीड़ित होकर खाने लगे थे। ऐसा महान् भीषण समय उपस्थित हुआ देखकर बहुत से ब्राह्मणों ने विचार किया किया कि हम सबमें परम तपस्वी गौतम महर्षि हैं। उन्हीं के समीप में चलना चाहिये। वही एक ऐसे सामर्थ्य सम्पन्न महापुरुष है कि हमारे इस खेद का हरण कर देंगे उन समस्त ब्राह्मणों ने गौतम के समीप में उपस्थित होकर अपना वह दुःखप्रद वृतान्त कह दिया था। उन समस्त विप्रों को परम पीड़ित देखकर गौतम मुनि ने अभय का दान दिया था। इस प्रकार से सबको आश्वासन देकर मुनिराज महर्षि गौतम भक्तिभाव से अपनी गर्दन झुकाकर गायत्री देवी की प्रार्थना की थी। गौतम ने प्रार्थना की-हे महान् विद्या सम्पन्न, देवि! आप वेदों की जननी और परसेवी ड़ड़ड़ड़ है। अब समस्त प्राणियों के उद्धार करने के लिये क्षमा कीजिये। आप सबकी स्वामिनी हैं।” इस परोपकार से गौतम मुनि के द्वारा स्तुति की जाने पर जगत् की माता गायत्री देवी ने प्रत्यक्ष होकर दर्शन प्रदान किया था और देवी ने एक पूर्ण पात्र भी प्रदान किया था, जिससे सबका पोषण हो जाये। जगन्माता गायत्री देवी ने मुनि से कहा-यह मैं एक ऐसा पात्र प्रदान कर रही हूँ कि इसके सामने तुम जो भी कुछ चाहोगे उस सबकी पूर्ति यह कर देगा।” इतना कहकर गायत्री देवी अन्तर्ध्यान हो गई।”

अन्मानां राशय स्तस्माश्रिर्गताः पर्वतोपमाः। षडसा विविधा राजन् तृष्णानि विविधानि च॥

भूषरणानि च दिव्यानि क्षौमानि वसनानि च। यज्ञामाँ च समारम्भाः पात्रारणी विविधानि च॥

यद्यदिष्टमभू द्राजन् मुनेस्तल्य महात्मनः। तर्त्सव निर्गतं तस्माद गायत्री-पर्णपात्र तः॥

नित्मोत्सवः प्रववृते मुनेरोश्रम मराडले। न रोगादि भय फिज्चिन्न च दैत्य भयं कचित्॥

स मुनेराश्रमो जातः समबन्ताच्छत योजना। अन्ये च प्राणिनों येडषि सेडषि तत्र सन्तगताः॥

संतोषं परमं प्रायु मुर्गिश्चैष अपुर्यशः। सभामाँ वृत्रहो भूपो जगौ लौकं महामशाः॥

अहो अय नः किल कल्पपावयोमनोरथान्पूरपति प्रतिष्ठितः। नो चेदकाणु क्वहविर्णया यां सुदुर्लभा यज्ञ तु जीव नाझा॥

कल्पपाश्योमनोचान्चरपति प्रतिष्ठितः। नो चेदकाणु क्चहरिर्षया माँ सुदुर्लभा यत्र तु जीव नाशा॥

अर्थ- हे राजन्। महान् आत्मा वाले मुनि को जो भी कुछ इष्ट होता था, वह सभी कुछ गायत्री देवी के उस पूर्ण पात्र से निकल आता था। उस मुनि के आश्रम में नित्य ही उत्सव हुआ करता था और वहाँ रोग आदि का और दैत्यों से होने वाला किसी भी प्रकार का भय नहीं था। वह मुनि का आश्रम चारों ओर से सौ योजन के विस्तार वाला हो गया था। वहाँ पर अन्य प्राणी भी आ गये थे। सभी को परम संतोष प्राप्त हुआ था और सभी लोग मुनि के यश का गान किया करते थे। सभा में इन्द्र ने भी पुनः लोक में यशगान किया था कि यह एक प्रकार का कल्प-वृक्ष जैसा ही हमारे लिये प्रतिष्ठित हो गया है, जो सभी मनोरथों को पूर्ण कर देता है। अन्यथा यज्ञादि के सत्कर्म करने के लिये हवि कहाँ से प्राप्त हो सकता था, क्योंकि यहाँ तो जीवन रहने की आशा ही समाप्त प्रायः हो चुकी थी। वहाँ पर मुनियों में सर्वश्रेष्ठ ने एक गायत्री देवी के स्थान का निर्माण कराया था, जहाँ पर सभी मुनि-गण जगदम्बिका की पूजा करते थे।

अपने पति सत्यवान के प्राण अब अपने तप-बल द्वारा सावित्री ने यमराज से वापिस ले लिये और अपनी आत्मिक महत्ता द्वारा उन्हें प्रसन्न भी कर लिया, तब सावित्री सुअवसर का लाभ उठाकर धर्मराज से कुछ आध्यात्मिक प्रश्न पूछने लगी। उसने पूछा “भगवन्! कौन व्यक्ति आपके पुर-अर्थात् नरक को नहीं जाते?नरक की यातना से कैसे बचा जा सकता है?” इसका उत्तर देते हुए यमराज ने भगवती महाशक्ति की महिमा बताई और कहा-जो निष्ठा पूर्वक उसकी उपासना करते हैं और तपस्या द्वारा अपने जीवन को आत्म-शक्ति सम्पन्न बनाते हैं, उन्हें नरक की पीड़ा सहन करने की आवश्यकता नहीं पड़ती।

कुन्डनि यमदूर्तश्च रक्षितानि सदा शुभे। नहि पश्मन्ति स्वप्ने च पज्च देवार्थका मराः॥

देवी शक्ति विहीना में से पश्यन्ति ममालयम्। यान्ति ये हरितीर्यम्वाश्रयन्ति हरि बासरम्॥

प्रणमन्ति हरि नित्यं हर्यर्चा कलयन्ति च। न यान्ति तेअपि घोराँ च मम संयमिनी पुरीम्॥

त्रिसन्षिपूता विप्राश्च शुद्धाचार समन्विता;। निवृति नैम लप्स्यन्ति देवी सेवा बिना नरा;।

अर्थ- सती सावित्री ने जब धर्मराज से कर्म- बन्ध-निकृन्तन के सम्बन्ध में प्रश्ण किये तो धर्मराज ने सावित्री को उतर देते हुए कहा- ‘हे शुभे! मेरे दूतों के द्वारा कुण्ड सुरक्षित रहा करते है किन्तु जो पंच देवों में किसी में भी उन कुण्डों को अर्थात् नरक को कभी भी नहीं देखते है। जो पुरुष देवी की भक्ति से हीन होते है वे ही मेरे पुर को देखते है। जो मनु हरि के तीर्थों का अटन करते है या हरि का आश्रय लेते है एवं हरि को नित्य प्रणाम करते है तथा हरि का अर्चन किया करते है, वे मनुष्य भी मेरी महा घोर संयमनीपुरी में नहीं जाया करते है। त्रिकाल में संध्या-वन्दना करने से पवित्र एवं शुद्ध से युक्त रहने वाले भी प्रिय देवी की सेवा के बिना निवृत्ति की प्राप्ति नहीं किया करते है।

देवी मन्त्रो पासकाना नाम्नाअचैव निकृन्तनस्। करोति नख लेभन्या चित्रगुप्तश्च भीतवत्॥

मवुयर्कादिक तेषां कुरुसुतै च पुनः पुनः। विलंघड्य ब्रह्म लोक च लोक गच्छन्ति ते सति॥

दुरितानि च नश्यन्ति येषाँ संर्स्पश मात्रतः। ते महाभाग्य वन्तो हि सहस्त कुल पावनाः॥

अर्थ- धर्मराज ने कहा -हे सति! जो पुरुष देवी के मन्त्र की उपासना करने वाले है, उनके तो नाम से उन के कर्म-बन्ध को काट दिया करता है। अब वे ब्रह्मलोक का लंघन कर लोक को जाते है तो चित्रगुप्त उनके लिये बारम्बार मधुपर्क आदि का उपचार किया करता है। उनके स्पर्शमात्र से ही पापों का नाश हो जाता है। ऐसे पुरुष महान् भाग्यशाली है और सहस्र कुल का उद्धार करने वाले होते है।

देवी -भक्ति देहि मह” स;राण चैय सारकम्। पुसा मुक्ंित द्वार दीर्ज नरकर्णव तारकम्॥

कारण मुक्ति साराण सर्वशुभ बिनाशनम्। दारकं कर्म्म वृक्षाणा कृत पाघै गुहारणम॥

तत्त्व ज्ञान विहीना च स्त्री जातिर्विधि-निर्मिता किच्चिज्ज्ञान सारभुत वद वेदविदावर!

सर्व दान च यज्ञश्च तीर्थस्नान व्रत तप;। अज्ञानि ज्ञान दानस्त्र कलाँ नार्वन्ति वोश्चितम्

पितुः शतगुणा माता गौरवे चेति निश्चितम्। मातु; शत गुण; पूज्यो ज्ञान वाता गुरु;प्रभो!

अर्थ- सती सावित्री ने धर्मराज से कहा - मुझे आप कृपा करके देवी की भक्ति प्रदान कीजिये, जो समस्त सार वस्तुओं का भी सार स्वरूप है। देवी की भक्ति मनुष्यों के लिये मुक्ति प्राप्त करने का द्वारा एवं बीज और इसके द्वारा नरकों के घोर सागर से मनुष्य पार हो जाया करता है। यह मुक्ति प्रद सारों का भी कारण है और इस देवी की भक्ति से सभी प्रकार के अशुभ का नाश हो जाता है। यह कर्मों के वृक्षों का निवारण करने वाला है तथा किये हुये पापों के समूह का नाशक है। सावित्री ने धर्मराज से कहा - विधाता ने हमारी सती जाति को तत्त्व- ज्ञान से विहीन बनाया है। अतः; हे वेदों के वेताओं में परम श्रेष्ठ देव! जो कुछ सारभूत ज्ञान हो उसे ही बतलाए! सत्र प्रकार के दान, यज्ञ तीर्थस्थान, व्रत और तप ये सब अज्ञानी को ज्ञान का दान करने की सोलहवीं कला को भी प्राप्त नहीं हो सकते है। पिता से माता का सौ गुना के प्रदान करने वाले गुरु का गौरव होता है।

श्रोत मिच्छति कल्याणकारी! श्री तृणा कुल तारणम्। नतणा पृच्छ कानाच्च श्र तृणा कुल तारणम्॥

न यद्वक्तुं क्षमाः सिद्धा मुनीन्द्रा योगिन स्तया। के चान्ये च खयं केवा श्रीदेव्या गुणा वर्णने॥

के चान्ये च वयं केवा श्रीदेव्या गुण वर्णने। ध्यामन्ते यत्दाम्भो ब्रह्म, विष्णु शिवादयः।

अर्थ- धर्मराज ने सती सावित्री से कहा-है कल्याणकारिणी! श्री देवी के गुणों को तारने वाला है। देवी के गुणों का कीर्तन सिद्ध- मुनीन्द्र और योगी भी कहने में समर्थ नहीं है। दूसरे और हम तो क्या है। ब्रह्म, विष्णु और शिवा भी उसके चरण कमल का ध्यान करते है।

एक बार नागाधिराज हिमिवान ने भगवती से उनके स्वरूप वैभव एवं उपास्य साधन के बारे में प्रश्न किया तो भगवती ने उन्हें स्वयं बताया कि उनकी शक्ति सामर्थ्य का क्षेत्र कितना व्यापक है और भक्ति - भावपूर्ण अन्त;करण की आवश्यकता विशेष रूप से बताई है। जप, ध्यान, स्तवन और पूजा विधान के कर्मकाण्ड तो आसनी से किये जाते है पर इतने से ही नहीं चलता। साधक का अन्त;’करण जितना निर्मल और चरित्र जितना उज्ज्वल होगा, उसी अनुपात से उसे दिव्य अनुग्रह भी उपलब्ध होगा।

स्वीय भक्ति बदस्याम्दा येन शाम सुखेन हि। आयेत अनुजस्यास्य मघ्यमस्याविरागिण;॥

भार्गासजयो में विख्याता मोक्ष पाँप्तो ननाधिय। कर्म्म योगो ज्ञान योगो भाक्ति योगश्च सतय॥

गुणभेदान्नतुष्याण सा भक्ति स्त्रिविधामता। पर पौडा समुद्दिश्य दम्भं कृश्वा पुर; सरम्॥

मार्त्सय क्रोंध युक्तो यस्तस्य भाक्ति स्तुतमसी। पर पीडादि रहित; स्वकत्याणार्थ मेव च॥

नित्य सकामो हृदय यशोअर्थी भोग लोलुप। ततत्फलसमावाप्ल्यै मामुपास्तेअपि भक्तित;॥

भेद बुद्धचर तु माँ एवस्मादन्याजामाति यामर;। तस्य भक्ति; समाख्याता नगाधिप तु राजसी॥

परमेशार्यण कर्म्म पाप संक्षाल नाय च। वेदोक्तत्वाध्वश्य तर्त्कतव्य तु मया निशम्॥

इति निश्चित बुद्धिस्ंतु भेद बुद्धि मुपाश्रित;। करोति प्रतिये कर्म भक्ति सा नग सात्विक॥

अर्थ- नागराज ने एक बार जगत्जननी देवी से पूछा-हे समस्त संसार की माता! आप कृपा कर मुझे अपनी भक्ति के विषय में बताइये जिसके करने से विराग रहित मध्यम श्रेणी के मनुष्य को सुखपूर्वक ज्ञान की उत्पत्ति हो जावे। नागाधिराज हिमवान् के इस जिज्ञासापूर्ण प्रश्न को सुनकर भगवती ने कहा- मेरी उपासना करने के तीन मार्ग सुविख्यात है। हे नगाधिप! इन तीनों मार्गों से मेरी आराधनोपासना करने पर मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। हे सत्तम! वे तीन मार्ग कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग इन तीन नामों से प्रसिद्ध है। गुणों के भेद होने से वह मनुष्य के द्वारा की हुई भक्ति भी तीन प्रकार की होती है। दूसरे को पीड़ा पहुँचाने के उद्देश्य से दम्भपूर्वक मात्सर्य और क्रोध से युक्त होकर जो कोई मनुष्य मेरी भक्ति किया करता है, वह उसकी भक्ति तामसी कही जाती है, क्योंकि उसमें तमोगुण की प्रधानता रहती है। दूसरों को पीड़ा देने की भावना से रहित होकर केवल अपने ही कल्याण करने की कामना वाला, यश प्राप्त करने का इच्छुक एवं भोगो के लालसी मनुष्य अपने समुद्दिष्ट फलों की प्राप्ति के लिये जो भक्तिपूर्वक मेरी उपासना किया करता है और भेद की बुद्धि से मुझे वह पामर अपने से अन्य ही समझता है। हे नागाधिराज! उसकी भक्ति और आराधना में रजोगुण की प्रधानता विद्यमान् रहा करती है। क्योंकि सर्वदा अपने सुखोपभोग प्राप्त करने की ही भावना इस उपासना का एक मात्र लक्ष्य होता है। जो कर्म परात्पर के निर्मित किया जाता है, अर्थात् उसका कोई भी फल अपने लिये न चाहकर जो कुछ भी हो वह सब अपने आराध्य के ही चरणों में समर्पित कर दिया जाये और केवल पापों के प्रक्षालन होने से अपनी आत्मशुद्धि की भावना रहे और उपासना करने वाले के हृदय में ऐसी निष्ठा बनी रहे कि यह वेदोक्त विधान का करना मेरा परम कर्तव्य है, अतएव मुझे यह अनवरत करना ही चाहिए - ऐसी बुद्धि के द्वारा भेद बुद्धि का उपाश्रय करके देव भक्ति को सात्विक कहा जाता है, क्योंकि इसमें सतोगुण की प्रधानता रहती है और केवल अपने समाराध्य की प्रीति के लिए ही यह कर्तव्य कर्म समझ कर की जाती है और इसके द्वारा अपनी आत्म-शुद्धि इष्ट देव की कृपा से हो जाने की भावना सुदृढ़ रहती है।

राजा जनमेजय के प्रश्न और भगवान् व्यास के उतर के रूप में प्रस्तुत एक संवाद यह प्रतिपादन करता है कि कलियुग के प्रभाव और उसके दुष्परिणामों से बचे रहने के लिये भगवती महाशक्ति का आश्रम लेना सर्वोत्तम है। उनकी शरण में जाने वाले की अन्त;प्रेरणा उसे दुष्कर्मों से और दुष्ट भावनाओं से बचाती है, फलतः; वह उन बाह्य एवं आन्तरिक यातनाओं से भी बच जाता है, जो कलियुग के कुपथगामी मनुष्यों को निरन्तर मिलती रहती है।

भगवन! सर्वधर्मश!सर्वशास्त्र विशारदा। कलाव धर्मबहुले नराण का गतिर्भथेत्?॥

सद्यस्ति तदुपामश्चेद्दयया तं तदस्व में एक-एक महाराज तत्रोपाद्दयया नायर;॥

सर्व दोष निरासार्थ ध्ययेद्देश्यी पदाम्बुजम्। म सन्स्यधामि तावन्ति माक्ती शक्तिरस्ति हि॥

अर्थ- महर्षि वेद व्यास जी से राजा जनमेजय युग-धर्म के कराल समय में सद्गति का उपाय पूछते हुए कहते है- हे सम्पूर्ण धर्म के तत्त्व के ज्ञाता और समस्त शाखों के महामनीषी। इस अधर्म से परिपूर्ण इस घोर कलियुग में मनुष्यों की मति कैसे होगी, यदि इसका कोई उपाय हो तो आप कृपा करके बतलाए। व्यास महर्षि ने कहा-इसका केवल एक ही उपाय है दूसरा कोई नहीं है, जितनी देवी की शक्ति होती है।

स्मृता सम्पूजिता भक्त ध्याता चोच्च्रिता स्तुता। ददाति वाच्चिछतानर्चान्कानद तेन कीर्त्यते॥

समाराचिता च तथा नूमिरेभि; सदाअम्विका। यतोअतमी सुखिन; सर्वं संसारेअस्मि र्सशय;॥3

इति राजच्चछ्तं तत्रमया मुनिसमायऐ। लोमशस्य मुखात्कानं देवी माहाँत्म्य मुतमम्॥

इति सच्चिन्त्ये राजेन्द्र कर्तव्यं च सवार्थनम्। भक्तया परमया देव्या; प्रीत्या च पुरुवर्षम॥

अर्थ- सत्यव्रत के आख्यान में देवी की महिमा का वर्णन करते हुये कहा गया है - भगवती के स्मरण से वह स्वपूजित,भक्तिभाव से ध्यान की हुई, मुख से उच्चारण किये जाने पर स्तुत होती हुई मानवो के सभी इच्छित मनोरथों का प्रदान कर देती है। मनुष्यों के द्वारा सदा समाराधित वह देवी होती है, इसीलिये इस संसार में सब सुखी है, इसमें संशय नहीं है। व्यास ने कहा -हे राजन्!मैंने लोमश के मुख से देवी का महात्म्य सुना है अतः; प्रेम -भक्ति से देगी का सदा अर्चन करना चाहिए।

पिछला जीवन कुमार्गगामी भी रहा हो तो इस महाशक्ति का आश्रय लेने वाला एक दिव्य प्रकाश से अपने अन्त;करण को भरा-पूरा अनुभव करने लगता है और पिछली दुष्टता को त्याग कर धर्मपन्थ का अनुगामी बनकर अपना लोक-परलोक सुधारता है।

महर्षि वाल्मीकि का प्रसंग ऐसा ही है वे जीवन के प्रथम चरण में डाकू थे पर वे आत्मा -कल्याण की उपासना में प्रवृत्त हुए तो सारे दोष - दुर्गुणों से छुटकारा पाकर ऋषि जीवन बिताने लगे और जीवन की पूर्णता का लक्ष्य प्राप्त कर सकने में समर्थ हुये।

बीजोच्चारण तो देव्या विद्या प्रस्फुरिताऽखिला। वाल्मीकेश्च यथा पूर्व तथा स द्युभवत्कविः॥

अर्थः-सावित्री भगवती के केवल बीज मात्र के उच्चारण करने से बाल्मीकि की समस्त विद्याएँ प्रस्फुटित हो गई थीं और सर्वप्रथम महान् कवि हो गये थे।

भगवती महाशक्ति गायत्री यह नहीं देखती कि साधक का पिछला जीवन कैसा रहा है, इस आधार पर वे किसी से घृणा भी नहीं करती। शरण में आने वाले को वे दिव्य प्रकाश देती हैं और उसे सन्मार्गगामी प्रेरणा देकर सच्ची सुख-शांति का अधिकारी बना देती है-

न वैषम्यं न नैघृणयं भगवत्याँ कवाचन। केवलं जीव मोक्षार्थ यतते भुवनेश्वरी॥

अर्थ- भगवती गायत्री में कोई भी विषमता का भाव नहीं रहता है अर्थात् वह सबको समान भाव से ही देखती हैं और उसमें किसी से भी घृणा नहीं होती है। वह इस सम्पूर्ण भुवन की स्वामिनी केवल जीवों के कल्याण के लिए ही सदा यत्न करती हैं।

भौतिक जीवन की सुख समृद्धि और आध्यात्मिक जीवन की शांति सद्गति का उन्हें अधिकार मिलता है, जो सच्चे मन से, वचन और कर्म से माता की शरण में जाते हैं और उनके निर्देश अनुरूप जीवन क्रम का निर्धारण करते हैं।

यदज्ञानाद्भवोत्पति यज्ज्ञानाद्भव नाशनम्। सं विदू्रपाँ च ताँ देवीं स्मरामः साप्रचोदयात्॥

अर्थ- जिस गायत्री देवी के ज्ञान न होने से इस संसार में उत्पत्ति हुआ करती है अर्थात् यह मानव संसार के जन्म-मरण रूपी बन्धन का दुःख निरन्तर भोगता रहा करता है और जब भगवती गायत्री देवी का ज्ञान हो जाता है तो फिर इस संसार के आवागमन रूपी दुःख का नाश हो जाता है। हम उस संवित्वरूपिणी देवी का सदा-सर्वदा स्मरण करते हैं। वह भगवती हमको सत्प्रेरणा प्रदान करे।


अपनों से अपनी बात- - हमारी प्रेम साधना और उसकी परिणिति

शरीर में जब प्राण रहता है तो आँखों में देखने की, कानों में सुनने की, जीभ में चखने की, हाथों में करने की, पैरों में चलने की शक्ति बनी रहती है। भीतर के कल-पुर्जे दिल-दिमाग आँत, दाँत सभी अपना काम करते रहते हैं। किन्तु जब शरीर को छोड़कर प्राण चला जाता है, तब समस्त इन्द्रियाँ और कल-पुर्जों की शक्ति समाप्त हो जाती है और वे कुछ ही समय में सड़-गलकर विद्रूप बन जाते है। जिस प्रकार शरीर के क्रिया-कलाप में प्राण-तत्त्व की महत्ता है, उसी प्रकार आत्मिक क्षेत्र में प्रेम-तत्त्व का आधिपत्य है। अन्तरंग क्षेत्र में प्रेम भावना का जितना प्रकाश और विकास हुआ होगा, उसी अनुपात से अन्य सद्गुण जिन्हें विभूतियाँ कहा जाता है, उगने और बढ़ने लगती है।

अपनी आत्मिक प्रगति का रहस्य बताते जाना आवश्यक था, सो इस लेखमाला में उसके पर्त क्रमशः खोलते चले जायेंगे और इन दो-ढाई वर्षों में जो कुछ कहना आवश्यक था, उसका अधिकांश भाग कह लेंगे। बहुत से अनुभव और निष्कर्ष हमने अपनी साठ वर्ष की जीवन साधना में एकत्रित किये है, यह उचित ही था कि उन्हें साथ ले जाने की अपेक्षा परिजनों के सामने खोलकर रख दिया जाये। हमने अपना भरा हुआ मन खाली करना आरम्भ कर दिया है, ताकि संचय का यह अन्तरंग भार भी हल्का हो जाय। ब्रह्मा जीवन के भार तो समय-समय पर हल्के करते रहे हैं। जो शेष है वे अगले दिनों हल्के कर देंगे हमारी ब्रह्मा उपासना पद्धति में गायत्री पुरश्चरणों

(1) हमारी प्रेम साधना और उसकी परिणति

आत्म बल जो कि व्यक्ति की महानता और सुख शांति का आधार है, आन्तरिक सद्गुणों पर अवलम्बित है और वे गुण किसी अभ्यास, प्रयोग से पाये, बढ़ाये नहीं जाते वरन् प्रेम -तत्त्व की स्थिति के जुड़े होने के कारण उसी अनुपात से घटते-बढ़ते हैं, जैसे कि प्रेम भावनाओं का उत्कर्ष, अपकर्ष होता है। तालाब में पानी जिस हिसाब से बढ़ता है, उसी अनुपात में कमल बेल का डंठल भी बढ़ जाता है और कमल के पत्र-पुष्प हर स्थिति में पानी से ऊपर ही बने रहते हैं। प्रेम-तत्त्व अन्तःकरण में जितना होगा, उसी अनुपात से सद्गुणों का विकास होगा और इसी विकास से आत्म-बल ही मनुष्य की गरिमा का सार है और उसी के बल पर ब्रह्म और आन्तरिक ऋद्धि-सिद्धियाँ उपलब्ध की जाती है।

की लम्बी शृंखला का प्राधान्य रहा है। कितने वर्षों तक, कितनी संख्या में, किस विधान में, किन नियम-संयमों के साथ उस उपासना क्रम को चलाया जाता रहा, समयानुसार इसकी भी चर्चा करेंगे। इस समय तो तथ्य की उस आधार शिला पर ही प्रकाश डाल रहे हैं, जिसके बिना कोई पूजा पद्धति सफल नहीं होती। अन्तःकरण की मूल स्थिति वह पृष्ठभूमि है, जिसको सहज बनाकर ही कोई उपासना लंबी हो सकती है। उपासना बीज बोना और अन्तःभूमि की परिष्कृत जमीन ठीक करना है। बीज बोने से फसल उगती है, यह बात सही है पर यह और भी सही है कि अच्छी जमीन जिसमें खाद, पानी, जुताई, गुड़ाई, निराई, रखवाली आदि की समुचित व्यवस्था की गई हो, किसी बीज को अंकुरित और फलित करने में समर्थ हो सकती है। इन दिनों लोग यह भूल करते है, वे उपासना विधानों और कर्मकाण्डों को ही सब कुछ समझ लेते है और अपनी मनोभूमि परिष्कृत करने की ओर ध्यान नहीं देते।

पथरीली, सूखी, खारी, ऊसर धरती में अच्छे बीज भी नहीं उगते। फिर विकृत मनोभूमि में कोई उपासना क्यों कर फलवती होगी? यह सही नहीं कि केवल भजन मात्र से मनोभूमि शुद्ध हो जाती है। यदि यह मान्यता सही रही होती तो भारत 56 लाख सन्त-महन्त आज प्राचीनकाल के सात ऋषियों की तुलना में 8 लाख गुना प्रकाश उत्पन्न कर सकते में समर्थ हो गये होते। देखा यह जाता है कि बहुत भजन करने पर भी वे सामान्य किसान मंजूर की तुलना में भी आत्मिक दृष्टि से पिछड़े हुए है। इन उदाहरणों को देखते हुए यह तथ्य स्पष्ट हो जाता है कि उपासना का प्रतिफल तभी मिल सकता है, जब मनोभूमि का विकास तदनुरूप हो। रामकृष्ण परमहंस को काली की प्रतिमा अपने अस्तित्व का पग-पग पर परिचय देती थी पर उसी मन्दिर के अन्य पुजारी जो दिन रात सेवा-पूजा में लगे रहते हैं, कुछ भी अनुभव नहीं पाते। मीरा के ‘गिरधर गोपाल उनके साथ नाचते थे पर वह प्रतिमा आज भी उसी तरह विद्यमान् होने पर भी कोई अलौकिकता प्रकट नहीं करती। उसमें महत्व प्रतिमा या उपासना का नहीं, गरिमा साधक की मनोभूमि की है। सो लोग उसी की उपेक्षा कर बैठे, फिर शास्त्रोक्त परिणाम कैसे मिले?

हमारी गायत्री उपासना जिस सीमा तक सुलभ हो सकी, उसमें प्रधान कारण यह था कि अपने मार्ग दर्शक ने गायत्री पुरश्चरणों का विधान बताने ओर आरम्भ कराने से पूर्व मनोभूमि के परिष्कार की बात बहुत जोर देकर समझाई और कहा उपासना विधान में रही त्रुटियों से कुछ बहुत बिगड़ने वाला नहीं है पर यदि भावनात्मक स्तर को ऊँचा न उठाया गया तो सारा श्रम निष्फल चला जायेगा गन्दी और संकीर्ण मनोभूमि वाले साधक बहुत हाथ-पैर पीटते रहने पर भी खाली हाथ रहते है और असफलता ही पाते है, किन्तु जो अन्तःकरण को परिष्कृत करते चलते है, उनकी साधना लहलहाती फसल की तरह उगती, बढ़ती और फलवती होती है, इसलिये हमें उस ओर पूरी सतर्कता और अभिरुचि के साथ प्रयत्नशील रहना होगा वैसा ही हमने किया भी।

मनोभूमि के परिष्कार में जो सबसे महत्त्वपूर्ण पहलू है, वह है अन्तःकरण में प्रेम-तत्त्व का अभिवर्धन उपनिषदकार ने ईश्वर के भावनात्मक स्वरूप की व्याख्या करते हुए कहा है-रसो वै स’ अर्थात्-- ‘प्रेम हो परमात्म है।’ किसी व्यक्ति के कलेवर में परमात्मा ने कितने अंश में प्रवेश किया, उसकी परख करनी हो तो यह देखना होगी कि उसके अन्तःकरण में प्रेम भावनाओं की उपस्थिति कितनी मात्रा में है। थर्मामीटर से बुखार नापा जाता है और आत्मा का विकास प्रेम तत्त्व की मात्रा के अनुरूप समझा जाता है। जिसमें प्रेम भावना नहीं वह न तो आस्तिक है और न ईश्वर भक्त, न भजन जानता है, न पूजन। निष्ठुर, नीरस, सूखे, तीखे, स्वार्थी संकीर्ण, कड़ुए, कर्कश, निन्दक, निर्दय प्रकृति के मनुष्यों को आत्मिक दृष्टि से नास्तिक एवं अनात्मवाद ही कहा जायेगा भले ही वे घण्टों पूजा-पाठ करते हों अथवा व्रत-उपासना स्नान-ध्यान तीर्थ-पूजन कथा-कीर्तन करने में घण्टों लगाते रहे हों।

अपने हाथ सही सिद्धान्त, सही मार्ग और सही प्रकाश आरम्भ से ही लग गया। मार्ग दर्शक ने पहले ही दिन सब कुछ बता दिया। उन्होंने अहैतुकी कृपा करके सूक्ष्म शरीर में पधार कर अनुग्रह किया और 15 वर्ष की आयु में ही उस मार्ग पर लगा दिया, जिस पर चलने से ही आत्म-बल बढ़ता है और उस उपलब्धि के आधार पर ही जीवन लक्ष्य की पूर्ति के लिये आवश्यक प्रकाश मिलता है। बताया और सिखाया यह गया है कि प्रेम भावना के जितने बीजांकुर अन्तःकरण में विद्यमान् है, उन्हें यत्न-पूर्वक संभालना, सींचना चाहिये। साँसारिक दृष्टि से घाटा दिखता हो तो भी इस भाव-सम्पदा को बढ़ाते चलना चाहिये।

किसान बीज बोते समय खोता है पर अन्त में उसका यह विवेकपूर्ण त्याग और साहस उस घाटे में नहीं रहने देता। बीज की तुलना में बहुत गुनी उपलब्धि उसे बढ़िया सल के रूप में समयानुसार मिल जाती है। अध्यात्म के इस मूलतत्त्व को हमने समझा और अपनाया।

अपनी जीवन साधना की सफलता का जो आधार है, उनमें यह सर्वप्रथम और सर्वप्रधान है। प्रेम को हम परमेश्वर मानते है और उसकी उपासना साधना में सतत मग्न रहने का प्रयत्न करते है। पूजा तो हमारी कुछ घण्टे की ही होती है पर लगन सोते-जागते यही लगी रहती है कि प्रेम का अमृत चखाने और चलने का कोई अवसर हाथ से जाने न पाये। यह वह उपक्रम है जो क्रमशः हमें प्रगति पथ पर एक सीमा तक बढ़ाते चलने से सफलता प्रदान कर सका।

जनवरी और फरवरी की अखण्ड-ज्योती के इसी स्तम्भ में ‘विदाई की घड़ियाँ' और हमारी विरह वेदना’ की जिस अभिव्यक्ति की चर्चा हुई है उसका कारण और आधार समझा सकना उनके लिये कठिन है, जिनकी मनोभूमि सूखी और रूखी पड़ी है। उनके लिये यह एक मोहग्रस्त का प्रलाप-विलाप भी हो सकता है पर वस्तुतः वैसी बात है नहीं। जब हम भौतिक दृष्टि से शरीर को भी अपना नहीं मानते, अपना ब्रह्म और अन्तरंग सर्वस्व उस समग्र सत्ता को सौंप चुके तो लोभ और मोह किसका? जीवन को जब मृत्यु के साथ विवाह दिया तो विदाई और बिना विदाई में अन्तर क्या? भौतिक और लौकिक पैमाने के ओछे गज से नापा जाय तो हमारी इन दिनों की व्यथा-वेदना अज्ञानी मोह-ग्रस्तों जैसी लगेगी पर उस सब भूमिका का अनुमान लगा सकता किसी के लिये सम्भव हो तो वह यही अनुभव करेगा कि अपशब्द का तनिक-सा विछोह प्रेम-तत्त्व के उपासक के लिये कितना तड़पन भरा होता है। इस रहस्य को समझने के लिये हमें मीरा का अध्ययन करना पड़ेगा

प्रेम के साथ अनन्य आत्मीयता की जो तड़पन जुड़ी होती है, वह देखने में घायल दर्द जैसी लगती है पर उसमें भी उसे एक ऐसा रस आता है, जो और भी अधिक निखार लाता चला जाता है। ‘घायल की गति घायल जाने जो कोई घायल होइ पदर विधानी मीरा डोले म्हारो दरद न जाने कोई।’ यह हर प्रेमी की मनोदशा होती है। लगती तो यह बेचैनी ओर अशान्ति है पर वस्तुतः उसी प्रसव पीड़ा में उदात्त अन्तःकरण का प्रजनन होता है। सारा भक्ति साहित्य इसी रहस्य और मर्म से भरा पड़ा है।,

यदि हमारी गायत्री उपासना के ब्रह्म कलेवर को उखाड़ कर उसके अन्तरंग को देखा जाना जाय तो उसके गहन में प्रेम तत्त्व की साधना का विशाल विस्तार परिलक्षित होगा। मातृत्व की साकार प्रतिमूर्ति को हमने गायत्री माता के रूप में देखा और उसे वैसे ही प्यार किया जैसा एक छोटा बालक अपनी सगी माता को कर सकता हैं लोग सिर फोड़ी करते रहते है कि गायत्री साकार नहीं निराकार है। हम इस बहस में नहीं पड़ते कि वह क्या है? वस्तुतः वह सब कुछ है-- जो सब कुछ है वह क्या नहीं है? वस्तुतः वह सब कुछ है उसे किसी आकृति में देखने से क्या गर्ज? निराकार नहीं है हम यह कब कहने है, पर उसे साकार मानना भी अनुपयुक्त नहीं है। बिजली निराकार है पर वह बल्ब के भीतर साकार भी देखी जा सकती है? माता की साकार छवि को हमने अपनी प्रेम भावना के विकास में एक महत्त्वपूर्ण माध्यम माना और उसकी प्रतिक्रिया एवं प्रतिध्वनि के रूप में अविरल वात्सल्य का दैवी अनुदान निरन्तर पाया।

परमात्मा का प्रेम अपने विकसित स्वरूप में एक कदम आगे बढ़ते हुए गुरु-भक्ति के रूप में फलित हो सका। भगवान् की साकार-निराकार प्रतिमा तो हमें कल्पना-स्तर में अपनी बनानी पड़ती है, पर सतोगुण आत्म-बल और दैवी तत्त्व से भरे-पूरे महामानव की प्रतिमा तो हमें बढ़ी, बनी, हँसती-बोलती चलती-फिरती साक्षात् मिल गई। प्रेम साधना के लिये यह और भी सरल माध्यम दीखा। सो हमने अपने मार्ग-दर्शक पर उतनी ही निष्ठा आरोपित की जितनी परमेश्वर पर की जा सकती है। एक बार जाँच, परख लेना और सोच समझ लेना भी आवश्यक था, सो यथा मति कर लिया। पूरी परख तो हो भी नहीं सकती, पूर्णता प्राप्त तो कोई शरीरधारी है भी नहीं, फिर सतर्क, चतुर और अविश्वासी भी तो आये दिन धोखा खाते रहते है।

यदि एक महान् प्रयोग में कहीं कुछ गड़बड़ी भी मिली तो अपना सहज विश्वास और निर्मल प्रेम अपने लिये तो उज्ज्वल परिणाम ही उत्पन्न करेगा। जिस पर प्रेम बोया गया, यदि वह गड़बड़ होगी तो उसकी गड़बड़ी उसी के वापिस चली जाएगी अपनी श्रद्धा अपने साथ सत्परिणाम लेकर लौटेगी, इसलिये यह मान लिया गया कि अपने को कोई जोखिम नहीं है। जीविका साँसारिक घाटे की रहती है तो अध्यात्म मार्ग क पथिक को उसे आरम्भ में ही शिरोधार्य करना पड़ता है। निश्चय ही यह मुनाफ़ा कमाने का व्यापार नहीं ह।। साँसारिक दृष्टि से हर अध्यात्मवादी को घाटे के बजट बनाने पड़ते है, तभी उसकी आत्मिक प्रगति के साधन सरंजाम जुड़ते है। जो साँसारिक लाभ के लिये आध्यात्म मार्ग में प्रवेश करता है, उसे निराश ही होना पड़ता है। दोनों परस्पर विरोधी दिशायें है, एक को खोकर दूसरी पाई जा सकती है। यह न पहले से रहने के कारण कभी मन में यह आशंका नहीं उठी कि गुरुदेव का बताया कोई मार्ग अपने लिये भौतिक हानि का तो नहीं होगा। जहाँ विश्वास वहाँ प्रेम, जहां प्रेम वहाँ विश्वास। बाजीगर के हाथ में अपने तार बाँधकर मुरली बहुत कुछ करते हुए भी कुछ नहीं करने का आनन्द लेती रहती है गुरुदेव की आत्म-समर्पण करके हमने खोया क्या? केवल पान ही था सो पाया जी। पाते चले ही आ रहे है और आगे तो और अधिक पाना है।

अपने मार्ग-दर्शक के प्रति हमारी प्रेम साधना का वाद साँसारिक रिश्तों से तौला जाय तो उसकी उपमा पतिव्रता स्त्री के अगण्य पति प्रेम से दी जा सकती है। उनकी प्रसन्नता अपनी प्रसन्नता है, उनकी इच्छा अपनी इच्छा। अपने व्यक्तित्व के लिये भी कुछ चाहने -माँगने की कल्पना तक नहीं उठी। केवल इतना ही सोचते रहे अपने पास जो कुछ है, अपने से जो भी सम्पदायें विभूतियाँ जुड़ी हुई है, वे सभी इस आराध्य के चरणों पर समर्पित हो जाएँ उनके व्यक्तित्व में धुल जाएँ, उनके प्रयोजनों में खप जाय, ऐसे अवसर जब भी, जितने भी आये हमारे संतोष ओर उल्लास की मात्रा उतनी ही बढ़ी यह गुरु-भक्ति हमारे लिये कितने बड़े वरदान ओर उपहार लेकर वापिस लौटती रही है, इसकी चर्चा इस समय अप्रासंगिक ही रहेगी। दूसरे क्षुद्र लोगों की तरह हमने भी गुरु-शिष्य का ढोंग बनाकर अपनी कामना पूर्ति की माँग पर माँग रखी होती और प्रेम की लाभदायक धन्धे के रूप में मछली पकड़ने का जाल बनाया होता तो निराश और शिकायतों भरा मस्तिष्क लेकर ही खाली ही लौटना पड़ता। दिव्य तत्त्व में आखिर इतनी अकल तो होती है कि मनुष्य की स्वार्थपरता और प्रेम भावना की वस्तुस्थिति का अन्तर समझ सके। दण्डवत, प्रणाम और आरती स्तवन से नहीं वहाँ तो केवल वस्तुस्थिति ही प्रभावी सिद्ध होती है। गुरुदेव पर आरोपित हमारी प्रेम साधना प्रकारान्तर से चमत्कारी वरदान बनकर ही वापिस लौटी है, लौटती रहेगी।

हमारी प्रेम साधना की तीसरी धारा-प्रवाह ‘परिवार’ की ओर है। यों कहने सुनने में परिवार एक संकीर्णता ही लगता है। परिवार से- गायत्री परिवार या युग-निर्माण परिवार से ही मोह क्यों? सारे संसार से क्यों नहीं? इस सन्देह का समाधान जानने के लिये हमें व्यवहारिकता की भूमिका में उतरना होगा। समस्त विश्व ब्रह्माण्ड को सिद्धांतत भगवान् का विराट् रूप मान जाता हैं। विश्व की, प्राणि-मात्र की, जड़-चेतन की सेवा ही भगवान् की सेवा है। इसे सिद्धान्त के रूप में ही सही माना जा सकता है, व्यवहार में उसकी कोई प्रतिक्रिया बनती नहीं। समस्त ब्रह्माण्ड में भगवान् व्याप्त है। पर उसके साथ संपर्क नहीं बन सकता। सम्पर्क हम केवल पृथ्वी भर तक रख सकते है। हमारी पहुँच इससे आगे नहीं है।

समस्त जड़-चेतन में भगवान् है पर समुद्र तल या भूगर्भ में हमारी पहुँच से बाहर पदार्थों के साथ हमारा व्यवहारिक सम्पर्क कैसे जुड़े? इसी प्रकार समस्त प्राणियों को भगवान् का स्वरूप मानकर भी हम उन प्राणियों के समीप नहीं जा सकते, जो हमारी पहुँच से बहुत दूर जल थल या आकाश में विचरण करते रहते है। मछलियों की, मच्छर-मक्खियों की, कीट-पतंगों की सेवा करना भी सिद्धांतत ठीक है पर व्यवहार में मनुष्य ही उस क्षेत्र में आता है, क्योंकि उसकी स्थिति से अपनी स्थिति मिलती है। मनुष्यों में भी हम बहुत दूर के निवासी, अन्य भाषा बोलने वाले या मनोभूमि के लोगों के साथ सम्पर्क बनाने में असमर्थ है। समीपवर्ती, समान स्थिति के लोगों से सम्बन्ध साथ कर ही हम विश्व मानव की "वसुधैव कुटुम्बकम्” की भावना को चरितार्थ कर सकते हैं। व्यवहार में इतना ही वह महान् सिद्धान्त प्रयुक्त हो सकता है। इसलिए विश्व भक्ति का ही व्यवहारिक स्वस्थ देश-भक्ति मानी गई है। प्राणि-मात्र की सेवा का आदर्श मानव सेवा में ही चरितार्थ होता है। जिस प्रकार भगवत् प्रेम को इष्टदेव के एक सीमित विग्रह में सीमाबद्ध कर ध्यान करना पड़ता है, उसी प्रकार विराट ब्रह्म की सेवा साधना भी मानव समाज के उस वर्ग में करनी पड़ती हे। जिस तक कि अपनी पहुँच हो।

हमारी पहुँच जितने व्यापक क्षेत्र में होती चली जा रही है, उसी अनुपात से हमारी “वसुधैव कुटुम्बकम्” की तृप्ति को चरितार्थ करने का विस्तार बढ़ता जाता है। इस सम्पर्क क्षेत्र को हम अपना परिवार कहते हैं और उन्हीं की सेवा, सहायता, ममता, आत्मीयता का ध्यान रखते हैं। जो हमें नहीं जानते, जिन्हें हम नहीं जानते, जिनकी पहुँच हम तक नहीं, जिन तक हम नहीं पहुँच सकते, उनके साथ प्रबल इच्छा होते हुये भी हम सम्पर्क नहीं साध सकते और उनकी प्रत्येक सेवा करने का मार्ग नहीं निकाल सकते, परोक्ष सेवा की बात अलग है वह तो अपनी सेवा करने से भी विश्व की सेवा हो जाती हे और भावना से सबके कल्याण का चिन्तन किया जा सकता है। सो हम भी करते हैं पर व्यवहारिक सेवा के लिए हर किसी का एक सीमित क्षेत्र ही है, सो ही हमारा भी है।

अपने परिवार की बात जब हम कहते हैं तो उनका आदर्श वसुधैव कुटुम्बकम् होते हुए भी व्यवहार उन तक सीमित रह जाता है, जिन तक हमारा सम्पर्क क्षेत्र है। प्रेम के लिए परिचय आवश्यक है। अपरिचित से प्रीति कैसे हो? हमारे विश्व-प्रेम एवं भगवत् प्रेम का विस्तार भी इसी क्रम से चल रहा है। गायत्री परिवार और युग-निर्माण परिवार के सदस्य चूँकि हमारे परिचय क्षेत्र की परिधि में आते हैं, अतएव हम अपनी सीमा के अनुरूप उन्हें माध्यम मानकर प्रेम साधना का क्षेत्र जैसे-जैसे बढ़ेगा हमारी प्रेम साधना का, विश्व मानव की, विराट् ब्रह्म की आराधना का व्यवहारिक अवसर ही अधिक व्यापकता के साथ उपलब्ध होने लगेगा।

अन्तःकरण में से उद्भूत प्रेम-तत्त्व जिन तीन दिशा में- धाराओं में प्रवाहित हुआ है, वह विधि शोक संतापों को धो डालती है। परमात्मा से प्रेम करना अपनी आत्मा को प्यार करना है। अपने को प्यार करना अर्थात् जीवन लक्ष्य की, आत्म-कल्याण को सर्वोपरि महत्व देना। इस स्तर की निष्ठा निरन्तर यही प्रेरणा करती है कि शरीर सुख और मन की ललक के लिए कोई ऐसा काम न किया जाय, जो आत्म-लक्ष्य की प्रगति में अवरोध उत्पन्न करे। वासना और तृष्णा की तुच्छता समझ में आ जाने से आत्मा को प्रेम करने वाला संयम सदाचरण का समुचित ध्यान रखे रहता है और उन कषाय कल्मषों के भार से बच जाता है, जो प्राणी को पतन के गर्त में निरन्तर घसीटती रहती है।

मन उन तथ्यों को सोचने और उन कामों को करने में लगता है, जो उत्कर्ष की भूमिका बना सकें। शरीर एवं मन को गौण और आत्मा को प्रमुख स्थान जब मिलने लगा तो उत्कृष्टता और आदर्शवादिता की नीति ही कार्यान्वित होती है और भौतिक प्रलोभनों का आकर्षण अत्यन्त ही तुच्छ, हेय एवं छिछोरा प्रतीत होता है। आत्मा से प्रेम करना ही परमात्म प्रेम का आधार है इस श्रेय पथ पर जब कदम बढ़ चले तब वे लक्ष्य पूर्ति की मंजिल पर पहुँचकर ही रुकते हैं।

विश्व की समस्त शक्तियों और परम्पराओं का भण्डारगृह परमात्मा है, उसके साथ आत्मा को जोड़ देने का अर्थ परमात्मा के शक्ति प्रवाह को आत्मा में भरने लगने का आधार विनिर्मित कर देना। बिजली घर में विनिर्मित शक्ति-पुण्य के साथ जब हमारे घर की बत्तियों का संबन्ध एक पतले तार के माध्यम से जुड़ जाता है तो बटन दबाते ही सारी बत्तियाँ जगमगाने लगती हैं। एक खाली नीचे गड्ढे को ऊँचाई पर अवस्थित भरे-पूरे तालाब के साथ पतली नाली के द्वारा सम्बन्धित करते हैं तो तालाब का पानी गड्ढे में चलने लगता है और कुछ ही समय में गड्ढा उतनी ही ऊँचाई तक पानी से भर जाता है, जितना कि तालाब था। यही उदाहरण तब चरितार्थ होता है, जब आत्मा का सम्बन्ध समागम परमात्मा के साथ जुड़ जाता है। कहना न होगा कि इस सम्बन्ध सूत्र को प्रेम तत्त्व द्वारा ही जोड़ा जा सकता है।

उपासनाओं की सफलता तभी सम्भव है, जब इष्टदेव के साथ प्रेम भाव की भी चरम परिणित होती हो। केवल शारीरिक क्रिया की तरह मशीन जैसे कर्मकाण्ड कुछ बहुत फल दे सकते हैं। परमात्मा प्रेममय है और वह प्रेम से ही प्रभावित होता है। कर्मकाण्ड तो उस प्रेम को बढ़ाने, उगाने के साधन भर का काम करते हैं। हमने उपासना के नियमोपनियम और विधि-विधानों पर समुचित ध्यान दिया है, साथ ही अन्तःचेतना को भाव भरी बनाये रखा है और निरन्तर यही भावना बनाये रहे हैं कि प्राणप्रिय इष्टदेव के साथ भाव भरी तन्मयता अनवरत रूप में बनी रहे। उनका प्रकाश अपने रोम-रोम में प्रवेश कर वह प्रेरणा दे जिससे मानव लक्ष्य की पूर्ति सम्भव हो सके।

आत्मा और परमात्मा से सच्चे प्रेम की प्रथम धारा सदाचरण, संयम, उत्कृष्टता, आदर्शवादिता, उदारता, सहृदयता, सज्जनता जैसी सत्प्रवृत्तियों को उगाने और बढ़ाने में जादू जैसा कार्य करती है और कितनी आध्यात्मिक विशेषताओं का उदय एवं अभिवर्धन सहज ही दृष्टि-गोचर होता चला जाता है। यह सत्प्रवृत्तियाँ ही है, जो आवश्यकता से समन ऋद्धि-सिद्धियों के रूप में प्रयुक्त की जा सकती है। दुष्ट दुर्बुद्धि और दुष्प्रवृत्तियों से घिरे-भरे मनुष्य में कोई दिव्य एवं अलौकिक विभूतियाँ न कभी रही हैं, न आगे हो सकती है।

हमारे प्रेम की दूसरी धारा अपने मार्ग-दर्शक गुरुदेव के चरणों में निरन्तर प्रवाहित रही। श्रद्धा और विश्वास का विकास करने के लिए आरम्भ में किसी सजीव देहधारी ऐसे महामानव की सहायता अपेक्षित होती है, जिससे देवत्व की समुचित मात्रा विद्यमान् हो। मनोभूमि के परिपुष्ट करने वाले श्रद्धा, विश्वास के दोनों तत्त्वों को गुरु भाव ही विकसित करता है। एकलव्य को द्रोणाचार्य की मिट्टी की प्रतिमा बनाकर अपनी श्रद्धा की परिपक्व करते हुए शक्ति उपलब्ध करने का साधन बनाना पड़ा था। हमें संयोगवश एक दिव्य तेज पुँज सता का सहारा मिल गया तो उससे लाभ उठाने का लोभ संवरण कैसे किया जाता? उनकी अहैतुकी कृपा से हमारा रोम-रोम कृतज्ञता से भर गया और अपने को एक अधिकारी शिष्य सिद्ध करने की तीव्र उत्कण्ठा जग पड़ी। अपना मन उनके मन के साथ जोड़ दिया और अपना शरीर उनके आदेशों के अनुरूप गति-विधियों अपनाने के लिए प्रस्तुत कर दिया। साँसारिक सम्पदायें नगण्य थी। जो थी उनकी राई-पत्ती उसी प्रयोजन में होम दी, जो उन्हें प्रिय था। सच्चे शिष्य अपनी पात्रता उसी प्रकार के समर्पण से सिद्ध करते रहे हैं। गुरु तत्त्व को द्रवीभूत और वशीभूत कर लेने की शक्ति किसी शिष्य को ऐसे ही समर्पण से मिलती है। अध्यात्म मार्ग के पथिकों की इस सनातन परम्परा को हमने अपनाया। फलतः वह सब कुछ मिलता रहा जो हमारे पात्रता के अनुरूप था। गुरुदेव की असीम और अलौकिक कृपा हमने पाई है पर इसे कोई संयोग न माना जाय। उस अनुग्रह को हमने ‘अपनापन’ देकर खरीदा है। दूसरे धूर्तों की तरह अपने भौतिक सुखों की रट लगाकर दण्डवत प्रारम्भ करते रहते तो हमारी तुच्छता उन्हें कहाँ द्रवीभूत कर पाती और जैसा वात्सल्य और आकाश जैसा अनुदान कदापि उपलब्ध न हो सका होता।

रामकृष्ण परमहंस ने जिस प्रकार विवेकानन्द और समर्थ गुरु रामदास ने जैसी अपनी शक्ति शिवाजी को हस्तान्तरित की थी, वैसी ही कृपा किरण अपने को भी मिली। यह कृपा किसी वस्तु या सुविधा के रूप में नहीं धैर्य, साहस, शौर्य, पुरुषार्थ, श्रद्धा, विश्वास, ब्रह्म वर्चस्व, तप-प्रवृत्ति उदार, सहृदयता के रूप में उपलब्ध हुई। उन विभूतियों ने व्यक्तित्व को निखारा, निखरा व्यक्ति अनायास ही आवश्यक साधन, सुविधा एवं सहायता दबोच लेता है। वैसे ही अवसर हमें भी मिलते रहे। अपार जन-सहयोग सम्मान का अधिकारी कोई व्यक्ति तब तक नहीं हो सकता, जब तक उसमें उपरोक्त सत्प्रवृत्तियाँ न हों। गुरु अनुग्रह से अन्तरंग में जिन सद्भावनाओं का उदय हुआ, वे ही हमारे द्वारा सम्पन्न हो सकने वाले कार्यों की अदृश्य आधार शिलाएँ हैं। प्रेम की दूसरी धारा-गुरुचरणों पर बहाई और उसकी प्रतिकृति ने हमें धन्य बना दिया।

प्रेम की तीसरी धारा परिवार क्षेत्र में प्रवाहित होती रही। पत्नी को उसने अपने रंग में रंग दिया और वह अनन्य अनुचरी की तरह हमारी छाया बनी फिरती है। घर, परिवार में जो सौजन्य सौमनस्य का वातावरण है, उससे हमें परम संतोष है। इससे बढ़कर अपना गायत्री परिवार और युग-निर्माण परिवार है, जिसमें 50 लाख से ऊपर जनसमूह एक सूत्र शृंखला में आबद्ध है। इस विशाल जनसमूह को जिस सूत्र में मजबूती से जकड़कर बाँध रखा गया है, वह है हमारी गहन आत्मीयता, अजस्र ममता, प्रगाढ़ सद्भावना और कौटुम्बिक घनिष्ठता इसी

शिविरार्थी ध्यान दें और नोट करें

(1) एक से अधिक शिविर की किसी को अनुमति नहीं है। जिस शिविर की स्वीकृति दी जाये, उसी में आयें, एक दिन पूर्व यहाँ आ जायें।

(2) भोजन के लिए होटल की व्यवस्था की गई है, यदि स्वयं पकाना चाहें तो आवश्यक बर्तन, स्टोव, बाल्टी अपने साथ लायें।

(3) शिविर या सदस्य संख्या में परिवर्तन की सूचना समय से पहले भेजनी चाहिये।

(4) 5 वर्ष से कम आयु के बच्चों वाली महिलायें, रोगी और शरीर से बहुत दुर्बल व्यक्ति न आयें।

(5) तपोभूमि पहुँचने पर सर्वप्रथम शिविर व्यवस्थापक से मिलें, नामांकन करायें और आवश्यक जानकारी प्राप्त करें।

(6) कीमती सामान और जेवर न लायें।

आधार पर इतने लोगों की शुभेच्छायें सम्पादित की हैं। उनके जीवनक्रम में ऐसे परिवर्तन किये हैं, जिसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था। परिवार के आधे से अधिक सदस्य अपना आन्तरिक कायाकल्प हुआ अनुभव करते हैं।

उपासना एवं साधना के शुष्क एवं नव-निर्माण के कठिन कष्टकर कार्यों में इतना विशाल जनसमूह लगा हुआ है, उसके पीछे शिक्षा, उपदेश या लेख, प्रवचन ही काम नहीं कर रहें, असली प्रेम सम्बन्धों की है, जिसके दबाव से अनिच्छा और असुविधा के होते हुए, लोगों का उस दिशा में चेतना पड़ता है, जो हमें अभीष्ट है। इस प्रयोग में लोगों का जीवन सुधरे है, समाज का हित हुआ है और हमें सम्मान, सद्भाव मिला है। परिवार को प्रेम देकर-उनके दुःख-दर्द में हिस्सा बंटाकर जितना दिया है, उससे असंख्य गुना पाया है। नये युग का नया निर्माण कर सकने जैसा साहस और विश्वास जिस आधार पर किया जा सका वे केवल लक्ष-लक्ष परिजनों की अनन्य आत्मीयता, श्रद्धा और सद्भावना ही है। इसे हम अपने जीवन की अनमोल उपलब्धि मानते हैं।

प्रेम-भावना के त्रिविधि अपरिच्छेद में हमें पग-पग पर सद्गुणों और सद्भावनाओं की वे विभूतियाँ मिलती चली गई हैं, जिनसे जीवन की हर उपलब्धि और सफलता को सम्भव कर दिखाया। हमारी उपासना पद्धति के अन्तराल में सन्निहित यह प्रेम साधना ही थी, जो सामान्य की असामान्य में-तुच्छता को महानता में-परिणित करने का चमत्कार दिखा सकी।

विदा होते समय जो ऐंठन अन्तरंग में होती है, वह मोह-ममता कायरता या विवशता जन्य नहीं चिरसंचित उच्च प्रेम साधना की सहज परिणित है, जिसे हमने अपने परिवार के लिये कलेजे की गहराई में उगा और बढ़ाया है। प्रेम का उपहार कसक ही है, उससे हमें ही वंचित क्यों रहना पड़ता।

*समाप्त*