बसन्त-पंचमी अपने परिवार का सबसे बड़ा पुण्यपर्व है। अपनी सारी गतिविधियों का मूल-स्रोत-जन्म-दिन इसी पर्व को कहना चाहिये। 1. हमें पथ-प्रदर्शक के अनुग्रह की उपलब्धि उसी दिन से हुई और उसी दिन से हमारी गायत्री तप श्रृंखलाओं का शुभारम्भ हुआ। इसलिए हमारे ज्ञान जन्म का यही दिन हैं। जो हमारा जन्म-दिन पूछते हैं, उन्हें बसंत-पंचमी ही बताते हैं। 2. अखंड-ज्योति पत्रिका का आरम्भ इसी पर्व से हुआ। यह हमारे जनसंपर्क, प्रसार तथा संगठन कार्य के श्रीगणेश का शुभ दिन हैं। 3. गायत्री परिवार का जन्म बसन्त-पंचमी को हुआ और वह फला−फूला 24 लाख गायत्री उपासकों तथा 4 हजार देश-विदेश में फैली हुई शाखाओं में फैले हुए संसार भर में आध्यात्मिकता का प्रसार एवं उपासना पथ का मार्ग-दर्शन करने वाले इस महान् संगठन का जन्म दिन भी यही हैं। 4. धर्म और अध्यात्म की अभिनव चेतना प्रवाहित करने वाली ज्ञान गंगोत्री-गायत्री तपोभूमि का शिलान्यास इसी दिन हुआ। 5. 4 लाख नैष्ठिक गायत्री उपासकों के सान्निध्य में सम्पन्न हुए इस युग के महानतम सहस्र कुण्डों गायत्री महायज्ञ का संकल्प इसी दिन लिया गया। 6. वेद उपनिषद्, दर्शन, स्मृति, पुराण, ब्राह्मण आरण्यकों की, आर्ष ग्रन्थ अनुवाद, प्रकाशन एवं प्रसार की योजना तथा गतिविधियों का श्रीगणेश इसी दिन से हुआ। 7. युग-निर्माण आन्दोलन के उद्घोष तथा युग-निर्माण पत्रिका के अवतरण का दिन बसन्त-पंचमी ही हैं। 8. ट्रैक्ट साहित्य के सृजन तथा उनका विश्व की समस्त भाषाओं में अनुवाद तथा प्रसार का-संसार भर में अपने प्रतिनिधि भेजकर नव-निर्माण की चेतना उत्पन्न करने की तैयारी इसी दिन से आरम्भ हुई। 9. हरिद्वार और ऋषियों की तपोभूमि-सरोवर के निकट उपवन माता भगवती देवी की भावी तपश्चर्या का निवास उपवन बसन्त-पंचमी को ही रोपा गया। 10. हिमालय तथा गंगा की गोद में रहकर हमारे जीवन की अन्तिम उग्र तप साधना का श्रीगणेश भी बसन्त-पंचमी से ही होगा। इस प्रकार हमारी व्यक्तिगत एवं मिशन की समस्त महत्वपूर्ण गतिविधियों का बसन्त-पंचमी ही हैं।
अखण्ड-ज्योति परिवार के प्रत्येक सदस्य को वह पर्व अपना सर्वोत्तम एवं मानना चाहिए और उसे मनाने के लिए पहले से ही तैयारी करनी चाहिये। इस बार बसन्त-पंचमी दिनाँक 10 फरवरी सन् 70 मंगलवार की होगी। उस दिन जप, हवन, पूजा-प्रार्थना, संकल्प, पाठ, भजन, प्रवचन आदि के आयोजन रखने चाहिये, पहल ही से यदि सूचना आह्वान, आमन्त्रण एवं अवरोध की व्यवस्था की जाय तो उस दिन विचारशील व्यक्ति अच्छी संस्था में एकत्रित किये जा सकते हैं और उन्हें मिशन का उद्देश्य, स्वरूप एवं कार्यक्रम समझाकर सहयोग के लिये प्रोत्साहित किया जा सकता हैं। रात्रि में दीपदान करना चाहिये। हमें दीपकों का अनुकरण कर स्वयं जमकर निकटवर्ती शेष में प्रकाश उत्पन्न करना है। जिज्ञासुओं का बितरल ज्ञान-दोष की पूर्ति करेगा। जिनने अभी न मँगाई हों, वे प्रकाशित विज्ञातियाँ 50 की संख्या में 10) मूल्य वाली 1000 विज्ञप्तियों का-एक सैट मँगा लें और अपने क्षेत्र में प्रसारित करें।
नव-निर्माण का क्षेत्र अतिव्यापक है पर अपना संपर्क तथा कार्य क्षेत्र बहुत सीमित हैं। उसे दस गुना इसी वर्ष बढ़ा देने का लक्ष्य रखा जाना चाहिये। वह कार्य अखण्ड-ज्योति तथा युग-निर्माण पत्रिकाओं के प्रसार बिना सम्भव नहीं। सो हम लोग अभी से इस कार्य में प्रवृत्त ही और अगले 40 दिनों का एक प्रसार अनुष्ठान करने के लिए दो-दो घन्टे का नित्य समय निकालें अच्छा साप्ताहिक छुट्टी का पूरा दिन इस कार्य के लिए दें। एकाकी या प्रभावशाली मित्र-मंडली के साथ दोनों पत्रिकाओं के एक वर्ष के नमूना अंक साथ लेकर 100 विचारशील लोगों के पास सदस्य बनने का आग्रह लेकर जाना चाहिये। उनमें से 10 सदस्य लक्ष्य सहज ही पूरा हो सकता हैं। यदि यह किया जा सका तो अपना बसन्त-पंचमी पर्व मनाया जाना सब प्रकार सार्थक होगा। जिनके झोला पुस्तकालय में जितनी कभी है- उसे भी शेष ट्रैक्ट मँगाकर इसी बीच पूरा कर लेना चाहिये।
आशा हैं पर अखण्ड-ज्योति परिजन व्यक्तिगत या सामूहिक रूप से मनाने के लिए अभी से तैयारी करने में संलग्न होगा।
“मुझे रोटी न मिले तो मैं व्याकुल नहीं होता पर प्रार्थना के बिना मैं पागल हो जाऊँगा। प्रार्थना भोजन की अपेक्षा करोड़ गुना ज्यादा उपयोगी चीज हैं। खाना भले ही छूट जाये लेकिन प्रार्थना कभी न छूटनी चाहिये। प्रार्थना तो आत्मा का भोजन है। यदि हम पूरे दिन ईश्वर का चिन्तन क्या करें तो बहुत ही अच्छा पर चूँकि यह सबके लिए सम्भव नहीं इसीलिये हमें प्रति दिन कम से कम कुछ घण्टों के लिये ईश्वर स्मरण करना ही चाहिये।”
“स्तुति, उपासना, प्रार्थना अन्ध-विश्वास नहीं, बल्कि उतनी ही अथवा उससे भी अधिक सच्च बातें है, जितना कि हम खाते हैं, पीते हैं, चलते हैं, बैठते हैं ये सच है। बल्कि यों कहने में अत्युक्ति नहीं कि यही एक मात्र सच है, दूसरी सब बातें झूठ हैं, मिथ्या हैं।”
“प्रार्थना करना, याचना करना यही हैं, वह तो आत्मा की सच्ची पुकार हैं। हम जब अपनी असमर्थता खूब समझ लेते हैं और सब कुछ छोड़कर ईश्वर पर भरोसा करते हैं, तब उसी भावना का फल प्रार्थना हैं।” “प्रार्थना या भजन जीभ से नहीं हृदय से होता है। इसी से गूंगे, तुतले, मूढ़ सभी प्रार्थना कर सकते हैं, जीभ पर अमृत हो और हृदय में हलाहल हो तो जीभ का अकृत किस काम का? कागज के गुलाब से सुगन्ध कैसे निकल सकती हैं।”
प्रार्थना करने का उद्देश्य ईश्वर से सम्भाषण करना एवं अन्तर आत्मा की शुद्धि के लिए प्रकाश प्राप्त करना है, ताकि ईश्वर की सहायता से हम अपनी कमजोरियाँ पर विजय प्राप्त कर सकें। प्रार्थना मन से न हो तो सब व्यर्थ हैं। प्रार्थना में जो कुछ बोला जाता है, उसका मनन कर अपने जीवन को वैसे ही बनाने का प्रयत्न करना चाहिये। तभी उसका पूर्ण लाभ हैं।”
“परलोक की बात तो जाने दीजिये, इस लोक के लिये भी प्रार्थना सुख और शाँति देने वाला साधन है। अतएव यदि हमें मनुष्य बनना हैं तो हमें चाहिये कि हम जीवन को प्रार्थना द्वारा रसमय और सार्थक बना डालें। इसीलिये मैं आपको सलाह दूँगा कि आप प्रार्थना से भूत की तरह लिपटे रहें।” “मेरे सामने आने वाले राष्ट्रीय, सामाजिक अथवा राजनैतिक विकट प्रश्नों की गुत्थी का सुलझाव मुझे अपनी बुद्धि की अपेक्षा अधिक स्पष्टता और शीघ्रता से प्रार्थना द्वारा विशुद्ध अन्तःकरण से मिल जाता हैं।” -महात्मा गाँधी
कुछ घुड़सवारों के संरक्षण में आई मगध की साम्राज्ञी महारानी क्षेमा ने तथागत के आश्रम की शाँति भंग कर। पक्षी चहक उठे, रथ के पहियों की गड़गड़ाहट सुनकर मोर कुहुक उठे। सम्पूर्ण बनस्थली एक बार चौकन्नी हो गई। महारानी क्षेमा का पदार्पण कुछ महत्त्वपूर्ण अर्थ रखता था।
वे धीरे-धीरे रथ से उत्तरी। घुड़सवार सैनिकों ने सम्मान से गर्दनें नीचे झुका लीं। शेरनी के समान उन्होंने उन पर दृष्टि डाली और कहा अब तुम लोग जा सकते हों। आई हुई गड़बड़ाहट थोड़ी ही देर में दूर-दूर-बहुत दूर क्षितिज में जाकर विलीन हो गई।
सान्ध्य वेला में क्षेमा ने तथागत के निजी आवास गृह में प्रवेश किया। वैराग्य से आविर्भूत क्षेमा की मुखाकृति बड़ी ही सलोनी लग रही थी। बुद्ध के चरणों पर झुक कर कहा- “भगवन्! मैं अब तक अंधकार में भटकती रही। मुझे पता होता, ईश्वरीय नियमों के सम्मुख राजा और प्रजा दोनों ही समान हैं, मृत्यु और आधि-भौतिक कष्ट, परेशानियों के जाल से कोई भी नहीं बचता तो इतना जीवन व्यर्थ न जाता। अब तक आत्म-कल्याण के कई चरण पूरे कर लिये होते। भगवन्! अब मुझे शिष्या बना कर मेरे आत्म-कल्याण का मार्ग प्रदर्शित करें।”
भगवान् बुद्ध ने गम्भीर दृष्टि से क्षेमा की ओर देखा। एक क्षण कुछ अध्ययन किया। फिर पूछा- “भद्रे! आत्म-कल्याण के लिये साधना करने और गृह-परित्याग से पूर्व यह आवश्यक हैं कि जिन लोगों के प्रति अपने कर्त्तव्य है, उनकी पूर्ण स्वीकृति और सहमति प्राप्त की जाये। जब तक आप महाराज विस्विसार से आज्ञा नहीं प्राप्त कर लेती, आप दीक्षा की अधिकारिणी नहीं।”
क्षेमा पुनः मगध लौटी। वे सीधे बिम्विसार के पास पहुँचा। आकर्षण रहित वेष और खुले हुए केश देखकर महाराज पहल ही समझ गये क्षेमा के अन्तःकरण में तीव्र आन्दोलन है। उन्होंने उठी हुई जिज्ञासा को रोकना उचित न समझा। महारानी के आग्रह पर उन्होंने अपनी स्वीकृति दे दी। क्षेमा पुनः भगवान् बुद्ध के पास लौट आई।
महारानी का धर्म-पन्थ में प्रवेश राज्य की प्रजा के लिये कौतूहल और आस्था का विषय बन गया। हजारों की संस्था में नर-नारी एकत्रित हो-होकर आश्रम पहुँचने और आत्म-कल्याण की दीक्षा का आग्रह करने लगे। जब आश्रम में यह कोलाहल बढ़ता हुआ जा रहा था, तभी महारानी क्षेमा ने वहाँ प्रवेश किया।
भीड़ की ओर इंगित करते हुए भगवान् बुद्ध न कहा- “क्षेमा! देखो कितनी लम्बी भीड़ तुम्हारा अनुकरण कर रही है, जानती हो क्यों? सामान्य प्रजा के पास भी ऐसी ही भक्ति होती है, जैसी तुम्हारे हृदय में उमड़ रही हैं, किन्तु इनके पास न विचार होता है, न विवेक। इसलिये इनका वैराग्य दृढ़ नहीं, प्रबुद्ध व्यक्तियों के पद-चिन्हों का अनुसरण करने का नियम इस संसार में सर्वत्र हैं, आज तक तुम्हारा वैभव-विलास का जीवन रहा, उसका अनुकरण यह लोग करते रहे। जान-पान, रहन-सहन, व्यवहार-बर्ताव में इनने वह सब बुराइयाँ पाल ली हैं, जो राजघरानों में होती है इस स्थिति में क्या इन्हें छोड़कर अकेले तुम्हें दीक्षा दी जा सकती हैं।”
नहीं महाराज! श्रेमा ने संक्षिप्त उत्तर दिया। तो फिर यह भी आवश्यक है कि इन सबमें भी उसी तरह का विचार, विवेक और वैराग्य हुआ है। इसके लिये तुम्हें कुछ दिन इनके बीच रहकर इनके विकास की साधना कर-पड़ेगी। जब तुम यह दूसरा चरण भी पूरा कर लोगों, तब दीक्षा की पात्र बनोगी।
क्षेमा उस दिन से भटकते हुए लोगों की ज्ञान-दान देने में जुट गई। कई वर्षों तक समाज-सेवा से जब उनका वैराग्य दृढ़ हो गया, तब भगवान् बुद्ध ने दीक्षा भी दी और आत्म-कल्याण की साधना में प्रवेश भी कराया।
मुझे शक्ति दो सर्वशक्तिमान्! यह संसार शक्तिशाली को पूजता और प्यार करता हैं, मुझे लोग प्रेम करें इसलिये मैंने शक्ति माँगी। वह सब कुछ मुझे दो जिससे संसार में मेरी महत्ता बनी रहे सर्वेश! यह संसार महत्ता को गले लगाता है, इसीलिये मैंने तुझसे रहता की कामना की।
अब जब न मेरे पास धन है, न बल, सौंदर्य है न प्रभुता तब मुझे कोई अपना नहीं दिखाई देता, सर्वेश्वर! भटकता हुआ आज फिर तुम्हारे ही द्वार आ खड़ा हुआ हैं, अब मुझे धन, बल, पुत्र-कलत्र पद-प्रतिष्ठा कुछ नहीं चाहिये। भक्ति चाहिये, प्रेम चाहिये, मुझे भक्ति दो, प्रेम दो प्रभुवर! मुझे शक्ति दो, शाँति दो, बस और कुछ नहीं नाथ!
तुम तो प्रेम के वश हुये द्वार-द्वार भटकते हो, प्रेमी के हाथों थोड़े से दामों में बिक जाते हो। विशुद्ध प्रेम देखकर तुम्हें अपनी प्रभुता का भी तो ज्ञान नहीं रहता। जैसे बच्चा अपनी माँ के पीछे-पीछे घूमा और दुग्धपान के लिये रोता-बिलखता है, वैसे ही तुम प्रेम के प्यासे होकर भक्त के पीछे-पीछे चल पड़ते हो। कितना निश्छल प्रेम हैं तुम्हारा, तुम प्रेम के अतिरिक्त कुछ भी तो नहीं चाहते।
संसार में जो कुछ भी रस है, वह तुम्हीं हो। रस के उत्पादक तुम्हीं हो, उसका आनन्द लेने वाले रसिक भी तो तुम्हीं हो। संसार में जो कुछ भी रस-सौंदर्य हैं, तुम उसके पूर्ण ज्ञाता हो। किन्तु यह कैसी छलना हैं प्रभु! वही रस जब तुम्हारे लिये मेरे हृदय में जागृत हुआ, तब तुम अपने रस-रस को भूल गये। मुझे नहीं ज्ञात कि तुम मुझमें क्या देखते हो, मैं तो तुम्हारी रसिकता में खो गया हूँ।
तुम गुणों की खान हो। गुणों के ज्ञाता भी तुम्हीं हो। संसार को सद्गुण बाँटने वाले भी तुम्हीं हो। एक क्षण के लिये भी जो तुम्हारे समीप आ जाता है, श्रद्धा और भक्ति के सरोवर में डूब जाता है, ऐसा है। तुम्हारा गुणागार स्वरूप। किन्तु जब तुमने अपने भक्त में सद्गुण की एक छोटी-सी ही रेखा देखी तो ऐसा क्या था, जो तुमने उस एक गुण के लिये अपने आपको न्यौछावर कर दिया। तुम्हारा प्रेम बड़ा रहस्यमय हैं, प्रभुवर!
जब तक मैं संसार में सुख और संतोष ढूँढ़ता रहा, तब तक तुम्हें जानकर भी नहीं जान पाया। वह तो तुम्हारी ही कृपा थी, जो मेरे अन्तःकरण में श्रद्धा लगी। वैराग्य प्रस्फुटित हुआ। भक्ति उमड़ पड़ी। अपना सम्पूर्ण और सर्वस्व तुम्हारे चरणों में समर्पित करता हैं। अब तुम मेरे पास आ गये, तुम्हें पाकर अब कुछ और पाने की इच्छा शेष नहीं रही।
प्रेम के लिये प्यासे दीन-हीन मुझ में कोई रस नहीं है, जो मैं तुम्हें सादर भेंट करता। मुझमें एक गुण दी तो नहीं है, जिससे तुम्हें रिझाने का प्रयत्न करता। मुझमें दोष ही दोष भरे हैं। मुझमें दुर्गुण ही दुर्गुण भरे हैं। साँसारिकता को मैं कहाँ छोड़ पाता हूँ? बार-बार आकर्षणों में भटकता रहता हूँ पर तुमने मुझे कितना प्यार दिया। एक ही बार तो डबडबाई आँखों से श्रद्धापूर्वक तुम्हारी ओर देखा था। एक क्षण के लिये ही भक्ति का प्रकाश अन्तःकरण में प्रस्फुटित हुआ था, तब से तुम अपनी ममता मुझ पर उड़ेलते मेरे पीछे-पीछे फिर रहे हो तुम्हारी इस कृपा का, इस अनन्त अनुग्रह का मूल्य कैसे चुकाऊँ।
बहुत सरल हो तुम, बहुत भोले हो तुम, तुम्हारी उदारता अवर्णनीय हैं। कैसा मधुर स्वभाव है, तुम्हारा कि दोषी में भी गुणों का भाण्डागार देखते हो। मुझे तो तुमसे भाँति-भाँति की याचनायें हैं, पर तुमने बिना किसी इच्छा शेर आकाँक्षा के मुझे इतना प्रेम और ममत्व प्रदान किया है। यह देखकर मेरे अन्तःकरण में कब से अन्तर्द्वन्द जाम पड़ा हैं, अब मुझे संसार नीरस लगता हैं। तुम्हारे प्रेम के लिये मैं दर-दर भटकने के लिये संसार हूँ। मुझे कहीं भी से चलो। चाहे कैसी भी अवस्था में में रखो किन्तु अपने प्रेम से वंचित न करना प्रभुवर! मेरी सास अब तुम्हारे ही हाथ हैं। बड़े तूफान उठ रहे है, बड़ा विषमत्व हैं जीवन में। आधार एक मात्र तुम्हीं हो चाहे पर लगा दो, चाहे डुबा दो और अब मैं जाऊँ भी तो किसके दरवाजे जाऊँ।
जाने यह मेरी ही भावना है कि सत्य-पर मुझे ऐसा दिखाई दे रहा हैं कि तुमने मेरे लिये अपनेपन का विशेष पक्षपात किया हैं। मेरी भूलों पर दण्ड मुझे ही भुगतना चाहिये था पर तुम तो उसे निरन्तर क्षमा ही करते जा रहे हो। सारा संसार ही तो कहता हैं कि मैं दोषी हूँ, मैंने बड़े अपराध किये हैं, तुम तब भी मेरे लिये क्षमा भरा उदार पक्षपात करते ही, तुम्हारी इस ममता के लिये मुझे बार-बार जन्म लेकर तुम्हारे चरणों में पड़ा रहना पड़े तो भी मुझे स्वीकार है, तुम्हारा जैसा निर्बाध और निश्छल प्रेम और कहाँ मिलेगा।
तुमने मुझे अपना मान लिया हैं। अब मैं भी तुम्हें अधिकारपूर्वक देखता हूँ। मुझे दिन-रात तुम्हीं दिखाई देते हो, तुम्हीं मेरे जीवन के सर्वस्व, प्राणाधार और प्रियतम हो, अपने ही प्रेम-स्वरूप से मुझे इतना प्यार देने वाले प्रभु! तुम मुझसे अलग न हो जाना। मैं सदैव तुम्हारे ही प्रेम की आथित तुम्हारे ही गुण गाया कारूं।
तुम्हारे ही विश्वास के सहारे जी रहे हैं, अपने प्राणों की डोर तुम्हारे हाथों सौंपकर निश्चिन्त हो गये हैं। उत्सुक नेत्रों से तेरी लीला देखने में ही मन रम गया है। संसार कितना बड़ा हैं, इस सबमें सर्वत्र तुम्हारा प्यार ही तो छलक रहा है। समुद्र लहराता हैं, वह तुम्हारे प्यार को मस्ती है, पर्वत हरियाली की यदि में छुपे ऊपर उठते जा रहे हैं, वह तुम्हारा ही प्रेम का आकर्षण है, फूलों का सौंदर्य तुम्हारा प्रेम ही है, उनकी सुगन्ध के रूप में तुम्हारा प्रेम ही दिग्-दिगन्त में भी रहा है। सूर्य, चन्द्रमा और तारागण तुम्हारे ही प्रेम की यश गाथा गा रहे हैं। तुम तुझे दिखाई नहीं देते पर तुम्हारी यह छवियाँ मेरे नयनों में सब गई हैं। मेरा रोम-रोम तुम्हारे प्रेम की अनुभूति से पुलकित हो रहा है। कभी तो वह दिन आयेगा, जब मेरे प्रेम की पीड़ा तुम्हें उतनी दूर से खींचकर ले आयेगी। जब मेरे प्राण-पक्षी आशा के पिंजरे से मुक्त हो जायेंगे, तब तुम्हारे प्रेम के सागर में डूबकर संसार की भव-बाधाओं से भी मुक्त हो जाऊंगा।
कभी तो तुम्हारे दर्शन होने ही, इसी आशा से अब तुम्हारा नाम ले लेकर जी रहे हैं। अन्तःकरण में तुम्हारे प्रेम की पीड़ा विरह बरसात बनकर घुमड़ रही हैं अन्न-काट छा गया है। कुछ सूझता नहीं है प्रभु। तुझसे मिलने के लिये टीस, तड़पन और कसक भर गई है। अपनी कृपा की एक किरण का सहारा देते रहना प्रभु। तुम्हारा राही मध्य मार्ग में भटकने न पाये।
कृपा के सिन्धु करुणा के सागर प्रेम-धान तुम्हारी कृपा, करुणा और प्रेम ही मेरे लिये उर्वस्व है। तुम शेषमय हो, अपने अन्तःकरण में मिलाकर मुझे भी प्रेमास्पद बना दो, मुझे भी प्रेम करना सिखा दो, जिससे शुद्र वासनाओं में फिर न भटकूँ, फिर जगत् के मिथ्यात्व में विवरण न कारूं।
एक बार एक साधु ने आकर गाँधी जी से पूछा-”हम ईश्वर को पहचानते नहीं फिर उसकी सेवा किस प्रकार कर सकते हैं।” गाँधी जी ने उत्तर दिया- “ईश्वर को नहीं पहचानते तो क्या हुआ, उसकी सृष्टि को तो जानते हैं। ईश्वर की सृष्टि की सेवा ही ईश्वर की सेवा हैं।”
साधु की शंका का समाधान हुआ वह बोला- “ईश्वर की तो बहुत बड़ी सृष्टि है, इस सबकी सेवा हम एक साथ जैसे कर सकते हैं?” “ईश्वर की सृष्टि के जिस भाग से हम भली-भाँति परिचित हैं और हमारे अधिक निकट हैं, उसकी सेवा तो कर ही सकते हैं। हम सेवा कार्य अपने पड़ौसी से प्रारम्भ करें। अपने आँगन को साफ करते समय यह भी ध्यान रखें कि पड़ौसी का भी आँगन साफ रहे। यदि इतना कर लें तो वहीं बहुत हैं।” गाँधी जी ने गम्भीरतापूर्वक समझाया। साधु उससे बहुत प्रभावित हुये।
“मुझे अच्छी तरह स्मरण है, तब मैं सात वर्ष का बच्चा था। पिताजी किसी काम से बाहर गये थे। थे वे अपने ही शहर में। विचार और भावनायें कहाँ से आती है, मुझे कुछ मालूम नहीं हैं, किन्तु मुझे इनमें मान-जीवन का कुछ यथार्थ, दर्शन और अमरता का रहस्य छिपा हुआ जान पड़ता हैं। ऐसा मैं इस आधार पर कहता हूँ कि मुझे उस दिन योंही एकाएक खेलते-खेलते ऐसा लगा कि पिताजी एक ट्रास से घर आ रहे हैं। ट्राम दुर्घटना ग्रस्त हो गई हैं और उसमें पिताजी बुरी तरह घायल हो गये हैं। बिना किसी दर-दर्शन (टेलीविजन) यन्त्र के इस तरह का आभास क्या था, मुझे कुछ भी पता नहीं हैं।”
रीडर्स डाइजेस्ट नामक विश्व विख्यात मासिक पत्रिका के अप्रैल 1965 के अंक पेज 93 में “सैम बेन्जोन की सूक्ष्म शक्तियाँ” नामक शीर्षक का उल्लेख करते हुये इसमें लेखक ने स्वीकार किया है कि “संसार में कोई एक ऐसा तत्व भी है, जो हाथ-पाँव विहीन होकर भी सब कुछ कर सकता हैं, कान न होकर भी सब कुछ सुन सकता है, आँखें उसके नहीं हैं पर वह अपने आपके प्रकाश में ही सारे विश्व को एक ही दृष्टि में देख सकता हैं। त्रिकाल में क्या संभाव्य है, यह उसको पता हैं। उसका सम्बन्ध विचार और भावनाओं से है, इसलिये यह कहा जा सकता है कि विचार और ज्ञान की शक्ति चिरभूत और सनातन है।”
पैम वेन्सन अपनी माँ के पास गया और कहा-माँ! पिताजी घायल हो गये लगते है, मुझे अभी-अभी ऐसा आभास हुआ है कि वे जिस ट्रास से वापिस आ रहे थे, वह दुर्घटना ग्रस्त हो गई हैं।” माँ ने बच्चे को झिड़की दी- “तुझे योंही खयाल आया करते हैं, चल भाग जा अपना काम कर।”
बच्चा अभी वहाँ से गया ही था कि सचमुच उसके पिता घायल अवस्था में घर जाये गये। पूछते पर ज्ञात हुआ कि सचमुच वे जिस ट्रास से आ रहे थे, वह दुर्घटना ग्रस्त हो गई, उसमें कई व्यक्ति मारे गये। माँ को जितना पति की चोट का दुःख था, उससे अधिक पुत्र के पूर्वाभास का आश्चर्य। हमारे जीवन में ऐसे अनेक बार आत्मा से प्रकाश आता हैं, जिसमें हमें कुछ सत्य अनुभव होते हैं पर साँसारिकता में अतिरिक्त मनुष्य उनसे आत्म-ज्ञान प्राप्त करने की आवश्यकता कहाँ अनुभव करते हैं।
क्रिसमस का त्यौहार आया। घर दावत दी गई। बहुत से मित्र, सम्बन्धी और पड़ौसी आये। दोनों ने अनेक तरह के उपहार दिये। उपहार के सब डिले एक तरफ रख दिये गये। प्रीतिभोज चनता रहा। सबको बड़ी प्रसन्नता रही। हँसी-खुशी के वातावरण में सब कुछ आनन्द सम्पन्न हुआ।
मेहमान घरों को विदा हो गये तब डिब्बों की पड़ताल प्रारम्भ हुई। माँ ने बच्चे से कहा- “बेनसब! तू बड़ा भविष्य-दर्शी बनता है, बोन इस डिब्बे में क्या हैं।” ‘बेसबवा’ माँ! ऐसे जैसे उसने खोलकर देखा हो। यदकि डिब्बा जैसा आया था, वैसे ही बन्द या, किसी को भी देखने तो क्या खोलने का भी अवकाश नहीं मिला था।
डिब्बा खोला गया। माँ बवाक् रह गई। सचमुच डिब्बे में ‘बेसवाल’ ही था।
अब जब एक्सरे जैसे यन्त्र बन गये हैं, जो त्वचा के आवरण को भी पारकर के भीतर के चित्र खींच देते है यह कोई आश्चर्यजनक बात नहीं रह गई है। किन्तु बिना किसी ‘लेन्स’ या मन्त्र के डिब्बे के भीतर की वस्तु का ज्ञान प्राप्त कर लेना यह बताता है कि विचार और भावनाओं की शक्ति इतनी दिव्य और सूक्ष्म है कि बहन अन्तराल में छिपी हुई वस्तुओं का भी ज्ञान बिना किसी माध्यम के प्राप्त कर सकती हैं। इससे उसकी सर्वव्यापकता का पता चलता हैं।
सैम बेन्जोन की घरों में रंग-रोगन करने वाले एक पेन्टर मार्टिन से जान-पहचान थी। एक दिन वह अपने आफिस में बैठे हुये कुछ काम कर रहे थे। जैसे चलचित्र में पर्दे पर कहानी के दृश्य एक पर एक उभरते हुए चले आते है, विचारों को फिल्म में एकाएक ऐसा दृश्य उपस्थित हुआ जैसे मार्टिन किसी दीवार को पेन्टिंग करते समय सीढ़ियों से लुढ़क कर गिर पड़ा है, उसके सारे शरीर में पेन्ट के से धब्बे पड़े दिखाई दिये।
यह तो वैज्ञानिक भी मानते हैं कि मस्तिष्क के कुछ भाग बड़े सूक्ष्म और अविज्ञात हैं। मस्तिष्क में ज्ञान क्षेत्र (सेन्सरी एरिया), दृश्य क्षेत्र (आप्टिक एरिया) जैसे स्थान हैं, जहाँ आँखों की रंटिना से होकर चित्र पहुँचते और मस्तिष्क को उनकी जानकारी देते रहते हैं पर वे यह नहीं जान पाये कि विचारों के द्वारा स्वप्न और जागृत अवस्था में जो चित्र मस्तिष्क में बना करते हैं, उनका सम्बन्ध किन परमाणुओं से है और मस्तिष्क के किन नाभि-केन्द्रों (न्यूक्लिक सेर्न्टस) से हैं। सम्भव है आगे ऐसी खोजें हों, जिनसे विश्व-ब्रह्माँड में फैली आत्म-चेतना के रहस्यों पर प्रकाश पड़े पर अभी इस तरह की अनुभूतियाँ ही क्या कम हैं, हम चाहें तो इनकी ही आत्मा के अस्तित्व का प्रमाण मान सकते हैं।
यदि ऐसा न होता तो यह पूर्वाभास सत्य क्यों होते। बेन्जोने के मस्तिष्क में इस तरह का दिवास्वप्न आये तीन दिन ही हुये थे कि उसे समाचार मिला सचमुच मार्टिन मोहल्ले के ही एक मकान की रंगाई करते समय फिसल कर गिर पड़ा और मृत्यु हो गई हैं।
आत्मा सनातन ही नहीं पूर्ण शक्ति है। भारतीय तत्व दर्शन ने पग-पग पर उसे प्राप्त करके अपने जीवन को परिपूर्ण बनाने की प्रेरणा इसीलिये दी हैं कि मनुष्य शरीर जैसी बहुमूल्य वस्तु पाकर जीव उसे व्यर्थ न जाने दे, यदि इस शरीर से आत्मा को प्राप्त न किया जा सका तो और कोई उपाय और जन्म संसार में नहीं हैं, जो इस उद्देश्य में सहायक हो सके। शास्त्रकार इसीलिये कहते है- “आत्मा बरि दृव्यों, श्रोतव्यों निदिध्या हे मनुष्यों! आत्मा को देखो आत्मा को सुनो और मनन, चिन्तन द्वारा आत्मा को ही प्राप्त करो।”
द्वाविमी पुरुषों लोके क्षरश्चाक्षर एवं च। क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते॥ -गीता 15। 16
हे अर्जुन! इस संसार में माझवान और अविनाशी दो प्रकार के तत्व है, सब प्राणियों में शरीर तो नाशवान् हैं पर जीवात्मा अविनाशी तत्त्व हैं।
पाश्चात्य दार्शनिकों और विज्ञान की प्रयति के कारण हम आत्म-तत्त्व की उपेक्षा करते हैं और इसी कारण अलौकिक सत्यों की प्राप्ति नहीं कर पाते। यह प्रमाण हमें इस बात के लिये विवश करते हैं कि अव्यक्त और अदृश्य को भी जान समझ लेने की क्षमता का रहस्य क्या है।
एक रात सैम बेन्जोन घर पर सो रहे थे। एकाएक उनकी नींद टूटी उन्हें ऐसा क्षमा कि कहीं से किसी के जलने की दुर्गन्ध आ रही हैं। अपनी धर्म-पत्नी को जमाकर उन्होंने पूछा-”देखना चाहिये कहीं कुछ खल तो नहीं रहा।” पति-पत्नी ने सारा घर ढूंढ़ लिया कही कोई आम या जलती हुई वस्तु नहीं, मिली। बेन्जोन ने कहा-”मुझे ऐसा लगता है, दुर्गन्ध तुम्हारी माँ के घर से आ रही है।”
दूर-दर्शन, दूर-माप के यन्त्र बन गये है सो इन प्रसंगों में आपेक्ष हो सकता है पर अभी कोई ऐसी मशीन नहीं बनी जो किसी भी स्थान में फैली हुई दुर्गन्ध या सुगन्ध की दूरानुभूति करा सके। पत्नी ने बिदक कर कहा- ‘‘पागल हुये हो, मेरी माता जी का घर आठ मील दूर है, इतनी दूर से कोई दुर्गन्ध आ सकती हैं।” सैम बेन्जोन ने घोड़ा जोर देकर कहा- “तुम जानती हो मेरा आत्म-विश्वास प्रायः अचूक होता है। देखो टेलीफोन करके ही पूछ लो, सचमुच कोई बात तो नहीं।”
पत्नी ने रिंग‘ बजाई उधर से कोई आवाज नहीं आई किसी ने टेलीफोन नहीं उठाया। लगभग 15 मिनट तक प्रयत्न करने के बाद भी जब उधर से किसी ने टेलीफोन ‘रिसोव’ (उठाया) नहीं किया तो पत्नी ने झिड़ककर कहा- “सब लोग सो रहे होंगे, व्यर्थ ही परेशान किया। पर तभी उधर से ‘हलो’ की आवाज आई-माँ ने बताया घर के पिछले हिस्से में आग लग गई थी, पड़ौसियों की सहायता से उसे बुझाया जा सका। इस घटना का उन पर कुछ ऐसा प्रभाव पड़ा कि फिर उन्होंने आत्मा के अस्तित्व के कभी इनकार नहीं किया। वे रात भर इस विलक्षण तत्व के बार में सोचती रहीं। यह तो योल्प था जहाँ लोगों को जिज्ञासायें उठती है पर उन्हें समाधान नहीं मिलता है और हम भारतीयों का दुर्भाग्य यह है कि योग और आत्म-तत्त्व की शोध से हमारा सारा आर्ष वांगमय भरा पड़ा है पर हमारे मन में कभी इस अविनाशी तत्त्व के प्रति जिज्ञासायें ही जागृत नहीं होतीं।
कोई प्रश्न का सकता हैं कि सैम बेन्जोन कोई योगी नहीं था, उसने कोई साधना नहीं की थी, फिर उसे ऐसी सूक्ष्म अनुभूतियाँ क्यों होती थी, ऐसा प्रायः सबके साथ क्यों नहीं होता। एक ही उत्तर है- आत्मिक पवित्रता और पूर्वजन्मों के संस्कार। यह आवश्यक नहीं कि सूक्ष्म शक्तियाँ इस जीवन की साधना का ही परिणाम हों, वह पूर्वजन्मों की भी हो सकती हैं। इसकी पुष्टि स्वयं सैम के जीवन से होती हैं। उसके परिवार में और किसी भी व्यक्ति में ऐसा गुण नहीं था पर सैम वेन्जोन लिखते हैं कि- मेरे पुत्र में सम्भवतः वंशानुक्रम से यह गुण आ गये थे। उसका नाम टेड था। टेड मेरो आत्मा की आवाज को अच्छी तरह पकड़ लेता था।” इसके उन्होंने कई उदाहरण भी दिये हैं।
एक दिन बेन्जोन जैसे ही घर पहुँचे, उन्हें ऐसा लगा कि ‘टेड’ किसी तालाब में डूब रहा है। उसके हाथ-पाँव, दर्द कर रहे है। उन्होंने तीव्र शक्ति से अपनी भावनाओं से ही सन्देश दिया, पीठ के बल लेट जाओ। इसके बाद उसे ऐसा लगा ‘टेड’ उलटा हो गया और धीरे-धीरे बाहर आ गया। बाहर निकलकर वह साइकिल उठा रहा हैं। यह दृश्य देखते-देखते तक बेन्जोन घबड़ा गया और वह तालाब की ओर भागा। मार्ग में ही टेड मिल गया, उस में बताया कि ‘जब वह स्नान कर रहा था उसके पेट और पाँव में एकाएक मरोड़ उठा। वह डूबने ही वाला था कि किसी ने कहा- “पीठ के बल लेट जाओ।” मैंने वैसा ही किया और इससे मुझे दम मिल गया, मैं धीरे-धीरे किनारे निकल आया।”
प्रत्येक जीव में व्याप्त चेतना एक ही है, जन्म मरण, से रहित इस तत्त्व का न जन्म होता है, न नाश-
न जायते म्रियते वा कदाचि-न्नायं भूतवा भविता वा न भूयः। अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे -गीता, 2। 2
अर्थात्-यह आत्मा किसी काल में भी न जन्म लेता है और न हीं मृत्यु को प्राप्त होता हैं। ऐसा भी नहीं कि वह कभी न रहता ही, क्योंकि यह अजन्मा, नित्य शाश्वत और सनातन है, शरीर के नाश हो जाने पर भी इसका नाश नहीं होता।
गहराई से विचार करें तो ऊपर दी हुई घटनायें इसी सत्य का प्रतिपादन करती प्रतीत होंगी। जागृत अवस्था मिल यों पूर्वाभास का ओर कारण भी क्या हो सकता हैं?
शिष्य अपने गुरु के दर्शन के लिये घर से चल पड़ा। रास्ते में नदी पड़ी। उस अपने गुरु पर अपार श्रद्धा थे। नदी उसके मार्ग में बाधक बनना चाहती थी। पर जब वह नदी के किनारे पहुँचा तो अपने गुरु का नाम लेते हुये पानी पर कदम रखकर उस पार पहुँच गया।
नदी के दूसरे किनारे पर ही तो गुरु की कुटिया थी। गुरु ने अपने शिष्य को बहुत दिनों बाद देखा तो उनकी प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। शिष्य चरण स्पर्श के लिए नीचे भंग हुआ। उन्होंने सोचा- “मेरे नाम मैं यदी इतनी शक्ति हैं तो मैं बहुत ही महान् और शक्तिशाली हूँ।” और अगले दिन नाव का सहारा न ले नदी पार करने के लिये ‘मैं, मैं, मैं’ कहकर जैसे ही वह कदम बढ़ाया कि पाँव रखते ही वह तो नहीं मैं डूबने लगे। और देखते ही देखते उनका प्राणांत हो गया।
कोटिकर्ण शोण का पदार्पण धर्म-मंच के लिये महान् शक्ति बनता। भगवान् बुद्ध के प्रभाव में आकर उन्होंने अनन्त जीवन की प्राप्ति की आवश्यकता समझी थी। लगन कुछ ऐसी लगी, वैराग्य कुछ ऐसा मचला कि कोटिकर्ण शोण अपना सम्पूर्ण वैभव त्यागकर परिव्राजक हो गया। एक समय था जब शोण के कानों में पहनी हुई बालियों का मूल्य ही एक करोड़ स्वर्ण मुद्राओं के बराबर होता था पर आज तो उसका कोपीन भी ग्रामीण बुनकरों द्वारा बुना हुआ मोटा खद्दर मात्र था। आत्मिक ज्ञान की पिपासा में महलों का राजकुमार आज दर-दर का भिखारी बना, भटक रहा था।
पर क्या इससे उनका सम्मान चला गया, शाँति तिरोहित हो गई, आनन्द नहीं रहा जीवन में? नहीं ऐसा नहीं हुआ। शोण जहाँ भी निकल जाते, एक समय वह आया जब लाखों लोगों की पलक पाँवड़े बिछ जातीं। सम्पूर्ण अवंतिका उन दिनों महान् सन्त शोण की चरण धूलि लेने के लिये लालायित रहा करती। यह था त्याग का प्रभाव, आत्मार्चना का वरदान।
कुररधर में विशाल सभा आयोजित की गई थी। भिक्षु कोटिकर्ण का उपदेश सुनने के लिये नगर के सम्पूर्ण नर-नारी खिचे चले आ रहे थे। देखते-देखते सभा भवन विशाल जनसमूह के सागर की भाँति लहराने लगा। धर्म के वास्तविक स्वरूप, आत्म-शोध की आवश्यकता, जन्म ओर मुक्ति के पुण्य-प्रसंगों पर शोण का प्राण पूर्ण शब्द प्रवाह लोगों को ऐसे सम्मोहित कर रहा था, जैसे रमणी कामातुरों को अपनी रूप सज्जा से आकर्षित करती है।
सभा-मण्डल में बौद्ध-श्राविका कात्यायनी भी बैठी हुई थी। धार्मिक ग्रन्थ उन्होंने पड़े थे पर आत्मिक सम्पदा पर जैसा अच्छा उपदेश कोटिकर्ण शोण कर रहे थे, वैसा अभिभाषण उनने पहले कभी नहीं सुना था। वाणी में उनका तप उनकी साधना और अगाध स्वाध्याय बोल रहा था। कात्यायनी ऐसी भाव-विभोर थी, जैसे कीट भृंग की मधुर गुञ्जार से विमोहित होकर अपना अस्तित्व भूल जाता हैं। वेणुनाद सुनकर सर्प लहराने लगता है। आत्मा का रस प्रवाह है ही ऐसा, जहाँ बहता हैं, वहाँ अमृत पेय का सा रसास्वादन कराता हैं। कात्यायती आत्म-विस्मृत बैठी शोण की वाणी का रस से रही थी।
सन्ध्या हो चली। दासी ने कहा- “स्वामित कर चलने का समय हो गया। प्रवचन अभी कुछ समय और चलेगा, रुकने में विलम्ब होगा।” कात्यायनी ने संक्षेप में कहा- “तू चल दीपक जमा दे मैं तो पूरा उपदेश सुनकर के ही उठूँगी?”
दासी घर मौटी। वहाँ पहुँचते ही वह यह देखकर घबड़ा गई कि भवन की पीठिका पर चोरों ने सेंध लगादी है। चोर घर की सारी सम्पत्ति बटोर रहे हैं, उनका सरदार बाहर खड़ा रखवाली कर रहा हैं। दासी उल्टे, पैरों सभा-भवन को लौटी। पीछे-पीछे सरदार भी- यह देखने चला आया, दासी आती कहाँ है।
दासी श्राविका कात्यायनी के पास पहुँची और कान में कहा- “स्वामिनी! घर में चोर आ गये है, सेंध काटकर सारा सोमान लिये जा रहे हैं। पर कात्यायनी ने जैसे कुछ सुना ही नहीं। वह तन्मय आत्म-विभोर उपदेश सुने चला जा रही थी।
दासी ने कन्धा पकड़ कर झकझोरा-”घर में चार घूमे हैं और आप उसकी कुछ चिंता भी नहीं कर रही। सारा धन ले जायेंगे वे।” से जाने दो, अरी वे आमषण तो नकली हैं, जो सर्वोत्कृष्ट सम्पत्ति है, वह यहाँ मिल रही हैं।
चोरी के सरदार ने यह सुना तो उसका हृदय धड़क गया। गृह-स्वामिनी को अपने आभूषणों से बढ़कर जिस सम्पत्ति से प्यार हो रहा है वह वस्तुतः साधारण सम्पत्ति न होगी। वह भी वहीं बैठ गया और जब सभा विसर्जित हुई तो वहाँ से उठकर जाने वालों में वह आखिरी व्यक्ति था। सेंध लगी थी पर एक क्षण भी घन की इच्छा सरदार को न हुई। वह भी उसी असली धन का पान में लग गया, जिसका रस कात्यायनी पी रही थी।
महर्षि दयानन्द कलकत्ते में थे। सामाजिक बुराइयों और कुरीतियों पर उनके कई स्थानों पर भाषण हुए। उससे वहाँ का प्रदृद्ध वर्ग जाग रहा था। गायत्री उपासना, स्त्रियों के गायत्री अधिकार, जाति पाति के शास्त्रीय विधान एवं माँसाहार के विरुद्ध दिये गये उनके भाषणों ने रूढ़िवादी लोगों में हलचल मचा दी थी। सम्प्रदायवाद और सामाजिक बुराइयों के विरोध में स्वामी जी को समर्थन देने बड़ी संख्या में लोग आते रहते थे।
एक दिन एक सज्जन आये। समाज सुधार के सम्बन्ध में बड़ी देर तक बातें होती रहीं। जान-बूझकर या किसी कारण महर्षि ने उनका पता भी नहीं पूछा। काफी देर बातें करने के बाद उन सज्जन ने कहा-”स्वामी जी! आप श्री केशवचन्द्र सेन को जानते हैं?” स्वामी जी ने हँसकर कहा-”हाँ-हाँ मैं उन्हें जानता भी हूँ और मिला भी हूँ।” वह सज्जन कुछ चौकन्ना हुये, क्या स्वामी जी झूठ भी बोल सकते हैं पर इसी तारतम्य में स्वामी जी ने आगे जो कुछ कहा उससे तो वह सज्जन इतने प्रभावित हुये कि फिर भारतीय संस्कृति के प्रति उनकी निष्ठा कभी भी नहीं टूटी।
स्वामी जी ने आगे कहा-”भेंट कुछ बहुत पहले नहीं हुई, मैं उनसे अभी-अभी मिला हूँ। आप ही तो हैं श्री केशवचन्द्र सेन-प्रसिद्ध समाज सुधारक।”
केशवचन्द्र सेन अचानक स्वामी जी से मिले थे, किसी और को पता भी न था। स्वामी जी उन्हें कैसे जान गये, इस पर उन्हें भारी आश्चर्य हुआ। उन्होंने पूछा भी पर स्वामी जी ने तत्काल कोई उत्तर नहीं दिया। हाँ भारतीय योग-विद्या पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने बताया-”आत्मा शरीर में होते हुये भी सर्वव्यापी तत्त्व है। उसके लिये विराट् विश्व की हलचलों को बहुत सरलता से जाना जा सकता हैं। साधारणतया लोग शरीर और इन्द्रिय- जन्य कामनाओं में ग्रस्त रहने के कारण इस सूक्ष्म सत्ता का तादात्म्य नहीं कर पाते पर यदि योगिक साधनाओं द्वारा अपने संकुचित प्राणों को विश्व प्राण में दिया जाये तो मनुष्य शरीर से वह सभी चमत्कार सम्बन्ध हो संसार की किसी भी अच्छी से अच्छी बार मशीन द्वारा भी सम्भव नहीं हैं।”
महर्षि इस कथन के आप ही प्रमाण थे। वे आडबन ब्रह्मचर्य रहे थे। प्राणायाम और गायत्री उपासना के द्वारा उन्होंने प्राण-शक्ति पर विजव बाई भी दृश्यों को देख लेना इनके लिये सहज बात के भी मन की बात कम्प्यूटर को भाँति खान लिया करते थे, ऐसी घटनायें उनके जीवन काज में कई बार घटों जिनसे इस बात का प्रमाण मिलता था।
स्वामी जी कर्णवास में थे। एक दिन उपाध्याय स्वामी जी के समीप आते समय एक रमास की कुछ फलियाँ तोड़ में गये। यह कवियाँ स्वामी जी को भेंट की। स्वामी जी ने उन्हें करते हुए कहा-’तुम इन्हें चोरी से लाये हो, इसलिए इन्हें ग्रहण करना कठिन हैं।” इस पर उन्होंने कहा-”साधु-यती और साधना रत मनुष्यों के शरीरों का करण होता है, तब अन्न के सूक्ष्म संस्कार तक उन्हें प्रं करते है, इसलिये ईश्वर भक्त और उपासकों को सदैव ईमानदारी और परिश्रम से उपार्जित कमाई ही ग्रहण करने को कहा जाता है, यदि तुमने जिस खेत से फलियाँ तोड़ी थीं, उसके स्वामी से आज्ञा ले लेते तो यह दोष न सकता। अनजान में किसी भी वस्तु उठा सेना चोरी नहीं तो क्या हैं?”
उपाध्याय जी बहुत पछताये और प्रतिज्ञा की ये फिर ऐसा कभी नहीं करेंगे, साथ ही स्वामी जो की दिव्य दृष्टि से वे बहुत प्रभावित भी हुये। साधनाओं द्वारा अपनी उस आन्तरिक शक्ति के विकास का भी उन्होंने निश्चय किया। स्वामी जी ने भी बताया कि जिसकी आत्मा जितनी शुद्ध व पवित्र होगी, वह उतनी ही दूर व भविष्य की बातें जानने लगता हैं। यह बात उपासना के प्रारम्भिक दिन से ही प्रारम्भ हो जाती है, सिद्धावस्था में तो जानने के लिये कुछ शेष रहता ही नहीं। साध दृष्टा-सर्वदर्शी बन जाता हैं।
स्वामी जी के ही जीवन की एक और घटना है, जो यह बताती है कि अपने सर्वदर्शी हो जाने के कारण योगी निर्भय भी हो जाते हैं। निर्भयता प्राप्ति के लिये लोग तरह तरह की सावधानी व सुरक्षायें बरतते हैं, अस्त्र-शस्त्र खरीदते हैं पर योगी के लिये उन सबकी आवश्यकता नहीं होती। वह दुष्टता दिखाने वाले लोगों के बीच में भी वैसे ही जा सकता है, जैसे हजारों हाथियों के झुण्ड में अकेला सिंह निर्भय पहुँचता हैं।
स्वामी जी बम्बई में थे। पण्डाओं की धार्मिक पथ–भ्रष्टता पर उनके कई स्थानों पर भाषण हुये उससे जीवन जी नामक एक गोसाई उनसे बुरी तरह कुपित हुआ। उन दिनों स्वामी जी के पास बलदेवसिंह नामक सज्जन सेवा के लिये रहते थे। गोसाई ने किसी प्रकार बलदेवसिंह को बुलाकर एक हजार रुपये का प्रलोभन देकर कहा-”तुम स्वामी जी की हत्या कर दो।” बात निश्चित हो गई। गोसाई ने बलदेवसिंह को कुछ भेंट भी दी।
बलदेवसिंह जैसे ही स्वामी के पास पहुँचे, उन्होंने उसे एकान्त में बुलाकर कहा- ‘‘क्यों आज तुम गोसाईयों के यहाँ गये पर याद रखो-मुझे राय कणसिंह ने विष दे दिया था, तब भी मैं अपने ब्रह्मचर्य की शक्ति से बच गया, आज भी तुम मेरा कुछ नहीं कर सकते।”
बलदेवसिंह बिखर गये। स्वामी जी की अंतर्दृष्टि ने उसे पराजित कर दिया। उसने सारी बातें सच-सच कह दीं, फिर वह गोसाइयों में कभी गया भी नहीं।
यह घटनायें बताती हैं कि भले ही असामान्य व्यक्तियों में परिलक्षित होती हों पर कोई ऐसी सर्वदर्शी सत्ता हे अवश्य, चाहे उसे आत्मा और शरीर से मुक्त या परमात्मा माना जाये। दोनों ही दृष्टि से व्यक्ति का अन्तर्मुखी होना आवश्यक हैं। स्वामी जी प्रायः अपने पास आने वालों से कहा करते थे-”तुम अपने सब पाप हमें बता दो तो लोग कहते आप जब सब कुछ जानते हैं तो फिर पूछते क्यों है-स्वामी जो उत्तर देते-”ताकि तुम्हारे मन हलके हो जायें और जन्म-जन्मान्तरों से मजबूत हो गई कुसंस्कारों की गाँठें छूट जायें। एक बार मनुष्य पिछले पाप और कुसंस्कारों का परिमार्जन कर देता है तो उसे भी आत्मा-विकास की दिशा में बढ़ते हुए के दर्शन होने लगते हैं। अशुद्ध अन्तःकरण से ही नई साधना इसीलिये सफल नहीं होती कि उससे साधना का प्रकाश भी उसी गन्दगी में घुलकर नष्ट होता चला जाता है, जो बाहर तो निकलती नहीं, भीतर ही घुटती रहती हैं।
आत्मा की सर्वदर्शी शक्ति से मनुष्य अपना ही कल्याण नहीं करता वरन् लोकोपयोगी कार्य करने में भी उसे सहायता मिलती हैं। ऐसे भी अनेक उदाहरण है, जब किन्हीं योगी या महात्माओं द्वारा किसी को व्यक्तिगत लाभ भी हुये हों और सामूहिक रूप से भी लोगों की सुविधायें बढ़ी हों।
कुछ दिन पहले को बात है, दिल्ली के पास फरीदा गई में 40 हजार शरणार्थियों को बसाने के लिये एक औद्योगिक बस्ती बनाने का कार्य प्रारम्भ किया गया। यमुना यहाँ से लगभग 20 मील दूर है। जल की पूर्ति एक समस्या बन गई। भूमिगत जल की ही आशा रह गई थी। इंजीनियरों ने सारी बस्ती की खाक छान मारी और घोषणा कर दी, यहाँ चूँकि पानी है ही नहीं, इसलिये नलकूप भी नहीं लगाये जा सकते?
बस इसी एक समस्या को लेकर लोगों का उत्साह ठण्डा पड़ गया। शरणार्थियों को कहाँ ले जाया जाय, यह समस्या हो गई। उन दिनों पं. जवाहरलाल नेहरू जीवित थे। यह बस्ती उनकी योजना के अंतर्गत ही बन रही थी। अतएव वे बड़े चिन्तित हुये। तभी उन्हें एक प्रसंग याद आया। नवानगर (गुजरात) के जामसाहब ने उन्हें कभी बताया था कि वे एक ऐसे व्यक्ति को जानते हैं, जिनकी अंतर्दृष्टि इतनी पैनी है कि कड़ी सकती है, कहाँ पानी है, कहाँ कौन-सा खनिज उपलब्ध हो सकता हैं। जो ज्ञान इंजीनियर अपनी मशीनों से ही नहीं प्राप्त कर सकते, सिद्ध योगियों के लिये यह चुटकी बजाने जैसा खेल मात्र हैं।
उक्त प्रसंग का स्मरण होते ही प्रधानमन्त्री जवाहरलाल नेहरू ने जाम साहब को पत्र लिखा। जाम साहब ने उस व्यक्ति को फरीदाबाद भेज दिया। निर्माण कार्य सेना के एक कर्नल की देख-रेख में चल रहा था, उसने उस योगी को भारतीय वेषभूषा में देखा तो नाक-भौं सिकोड़ते हुये असहमति व्यक्त की, यह आदमी भला पानी ढूँढ़ सकता हैं। महात्मा के साथ फरीदाबाद बोर्ड के अध्यक्ष श्री सुधीर घोष भी थे। उनका भारतीय धर्म और योग में विश्वास था और सबसे बड़ी बात यह थी कि महात्मा को पं0 जवाहर-लाल नेहरू के आदेश पर भेज गया था।
तीनों व्यक्ति 3500 एकड़ धरती में चूमे। महात्मा कई स्थानों पर रुक जाते और पैरों की ठोकर मार कर कहते-”यहाँ पानी है” जहाँ-जहाँ उन्होंने कहा-उन सब दसों स्थानों की खुदाई की गई कनंल और घोष सब यह देखकर चकित रह गये कि वहाँ पानी ही नहीं, इतना पानी मिला जो सैकड़ों वर्षों तक भी समाप्त नहीं हो सकता। आज भी फरीदाबाद बस्ती इन्हीं नल-कूपों से पानी प्राप्त कर रही हैं। प्रत्येक नल-कूप तीस हजार गैलन पानी दे रहा है।
एक भारतीय योगी ने इंजीनियर और कलन दोनों को फेल कर दिया। पर हम भारतीय है, जो अपने ही योग और तत्त्व-दर्शन से अनभिज्ञ है। यह तो रहीं दूर की बातें अपनी वेषभूषा पहनते हुए भी आत्म-हीनता अनुभव करते और पाश्चात्य वेषभूषा को महत्व देते है, यह सब हमारी अपनी आत्म-हीनता का परिचायक है। अपने तत्त्वदर्शन का हमें स्वाभिमान रहा होता तो हम भी पानी वाले महात्मा की तरह जहाँ भी जाते शान और स्वाभिमान के साथ जाते और अपने धर्म व संस्कृति को नीची दृष्टि से देखने वालों के मुख पर कालिस पोत आते।
यह उदाहरण यह बताते हैं कि मनुष्य शरीर में कोई ऐसा तत्त्व है, अवश्य जो विलक्षण शक्तियों से भरपूर है। वह कहीं की भी कोई वस्तु टेलीविजन की भाँति देख सकता है। आत्मा के विकास की ओर ध्यान वे तो वह शक्ति स्वयं है। यह विशेषतायें हम भी अपने भीतर जागृत कर सकते हैं।
स्वामी रामतीर्थ अमेरिका गये। वहाँ उनके प्रवचनों से काफी लोग प्रभावित हुए। एक दिन शाम को प्रवचन के बाद एक महिला स्वामी जी के निवास पर भेंट के लिए आई और कहने लगी-”स्वामी जी! पिछले दिनों से मेरा चित्त अशान्त रहता हैं। जब से इकलौते पुत्र की मृत्यु हुई है, रात्रि को गहरी नींद भी नहीं आती। जीवन में बड़ी नीरसता आ गई है। क्या आप मुझे कोई ऐसा उपाय बता सकते हैं, जिससे जीवन में पुनः सुख-शान्ति और आनन्द की स्थापना हो सके।
“क्यों नहीं? पर आनन्द की प्राप्ति के लिए उसका मूल्य चुकाना होगा। स्वामी जी ने उस महिला से कहा।
“मूल्य! बस आपके बताने की देर है, और तुरन्त उसका भुगतान कर दिया जायेगा। यदि एक बार मुझे सर्वस्व निछावर करना पड़े फिर भी चिन्ता नहीं।”
स्वामी जी एक अनाथ हब्शी बाल को तलाश कर उसके घर पहुँचे और बोले- माता जी! आनन्द का मूल्य किन्हीं मुद्राओं में नहीं चुकाया जा सकता। यह रहा तुम्हारा पुत्र। तुम इसका पालन पोषण अपना पुत्र मानकर ही करना।”
काले रंग के बालक को अपना पुत्र बनाने की बात सुनकर वह चौंकी- ‘‘मेरे परिवार में यह हब्शी बालक कैसे प्रवेश प्राप्त कर सकता हैं?”
“यदि इस बालक के पालन-पोषण में तुम्हें इतनी कठिनाई का अनुभव होता हैं तो आनन्द प्राप्ति का मार्ग और कठिन हैं।” स्वामी जी का महिला के लिये उत्तर था।
आज भगवती कात्यायनी का मन्दिर इस तरह सजा था, जैसे नव-वधू श्रृंगार करके ससुराल जाती है। युवराज श्रादित्य सेच दर्शनार्थ आने वाले थे, उन्हें के लिये यह साज-सज्जा की गई थी। दूर से आती हुई गज-घण्टा ध्वनि क्रमशः समीप होती आ रही थी। देव-भवन के सभी परिवार सन्नद्ध खड़े हो गये।
आदित्य सेन मन्दिर के सामने आकर रुके। चरण पादुकार्षे उन्होंने द्वारपाल चित्रक के संरक्षण में छोड़ी और स्वयं देवी के दर्शनों के लिये मन्दिर में प्रवेश कर गये। चित्रक ने देखा युवराज की रेशम मढ़ी हुई पादुकाओं ने लोस कणों के साथ कुछ धूल कण भी आ गये हैं, सो उसने उन्हें उठाकर अपने उत्तरीय वस्त्र (भिगोये) से पोंछ देने का यत्न किया। द्वारपाल का वस्त्र मैला था, उससे पादुकायें और नन्दी हो गई।
युवराज दर्शन करके बाहर लौटे। पादुकाओं की और देखा तो भौंहें तन गई। कड़ककर पूछा-”किसने मैली की है यह पादुकायें?” चित्रक भयभीत हो उठा, बोला-”क्षमा करें महाराज यह भूल।” वाक्य जब तक पूरा हो, चित्रक के कपाल पर उसी पादुका का तीव्र प्रहार हुआ। मस्तक फट गया, रक्त बहने लगा। आदित्य सेन को थोड़ी-सी भूल भी सहन न हुई। युवराज राजभवन चले गये और चित्रक-अपमानित चित्रक प्रतिशोध की ज्वाला में जनता हुआ अपने घर पहुँचा।
कई दिन तक उसने न अन्न लिया, न जल। वह किसी प्रकार युवराज आदित्य सेन से प्रतिकार लेना चाहता था। सप्ताहों वह इसी प्रतिशोध की ज्वाला में जलता रहा। चित्रक की पत्नी कुशला ने समझाया-”स्वामी! प्रतिशोध की भावना अग्नि की तरह है, वह जहाँ भी रहती है, जलाती और शक्ति नष्ट करती है। यदि आपको युवराज से बदला ही लेना है तो उसका उपयुक्त मार्ग में बताती है, उठिये और वह मलिनता परित्याग कर स्वस्थ हो गये।”
चित्रक उठे। स्नान किया, भोजन किया। स्वच्छ वस्त्र धारण कर बैठक में आये। कुशला वहाँ पहले से उपस्थित थी। उसने पहले ही प्रबन्ध कर रखा था। चित्रक को विद्याध्ययन के लिये वारणसकी भेज दिया।
भगवान विश्वनाथ के चरणों की छाया में बैठकर चित्रक ने दस वर्ष तक कठोर विद्याध्ययन किया। जड़ तक वह पुनः वाराणसी से लौटें, तब तक उनके पीडित्य की ख्याति सारे देश में फैल गई थी। चित्रक वह आचार्य चित्रक बन गये थे।
युवराज आदित्य सेन भी बड़ महाराज आदित्य सेज हो गये थे। इन दिनों राजमाता अस्वस्थ थीं। आँखों के सारे उपचार निरर्थक हो गये थे, सो उनके उपचार के लिये यज्ञ आयोजित किया गया। उनका ब्रह्मा चित्रक को नियुक्त किया गया।
उन दिनों आचार्य को लोग महाराभावों के अधिक सम्मान देते थे। चित्रक चाहते तो आदित्य सेन से बदला से सकते थे। पर ऐसा करने की अपेक्षा उन्होंने आदित्य सेन की वह पुरानी चरण-पादुकायें माँग लीं और प्रतिदिन उनकी पूजा करने लगे। एक दिन आदित्य सेन ने पूछा-”आचार्य प्रवर! पुरानी पादुकायें भी कोई पूजा की ग्रस्त है, फिर मैं आपका गुड़ भी तो नहीं है, उन पाडुकार्यों से आपका लगाव समझ में नहीं आया।”
चित्रक ने कहा-”महाराज! इनकी कृपा से ही जाज मैं इस पद पर विभूषित हुआ हूँ।” आपने एक दिन यही पादुकायें मेरे सिर पर जारी थीं। मैं प्रतिशोध से जल उठा था। सम्भव था आवेश में मुझसे कोई अपराध हो जाता। मेरी धर्मपत्नी ने प्रतिशोध के लिये मुझे वाराणसी भेजा, उसी का फल है आपका द्वारपाल आज इस यज्ञ का ब्रह्मा है। इस विलक्षण प्रतिशोध से आदित्य सेन पराभूत हो उठे। उन्होंने चित्रक का बड़ा सम्मान किया और उन्हें राजपुरोहित कर पद प्रदान किया।
“आज आप मेरे मेहमान है, लोग यह सुने कि आजीवन साधारण भोजन करके भी 152 वर्ष की आयु तक जिया जा सकता हैं, आपके प्रति ऐसा सम्मान व्यक्त करने के लिये ही राज-भवन के प्रीतिभोज का आयोजन किया है।” यह शब्द कहकर इंग्लैंड के सम्राट् चार्ल्स प्रथम ने दीर्घजीवन प्राप्त थामस को अपने पास बिठा लिया। फोटो खींचे गये, भेंटें दी गई। जितना सम्भव था सम्मान किया गया। उस क्षण थामस अपने आपको बादशाह से कम अनुभव नहीं कर रहा था।
उस बेचारे का व्यापता था कि जिन्हें शान-शौकत का जीवन कहते हैं, जहाँ प्रतिदिन मेवे, मिष्ठान्न, पूड़ी, पकवान पर हाथ साफ किये जाते हैं, उन पर शीघ्र मौत की छाया इसलिये मंडराती रहती है कि अस्वाभाविक, जले-भुने गरिष्ठ आहार के कारण उनके पेट खराब रहते है, मन खराब रहते है, शराब पीना पड़ता है, संयम नष्ट करके अपना आरोग्य नष्ट कर देना पड़ता है। यह पता होता तो बेचारा उस क्षणिक सम्मान की प्रसन्नता के साथ अपने प्राण न गंवा देता।
आश्चर्य नहीं सत्य कि उसने जैसे ही प्रीति-भोज समाप्त किया उसकी मृत्यु हो गई। “152 वर्ष की आयु में उसका शरीर इतना जर्जर हो चुका होगा कि वह अधिक परिश्रम नृत्य-गीत की थकान सहन न कर सका होगा।” सम्भवतः आप यह सोच रहे हों पर नहीं ऐसा नहीं-152 की आयु होने पर भी थामस पूर्ण स्वस्थ थे, कच्चा खाना बाखूबी हजम कर सकते थे, 8 घण्टे की भरपूर मेहनत भी कर सकते थे, शव की जाँच करने वाले डाक्टरों ने बताया- “मृत्यु तो गरिष्ठ भोजन के कारण हुई हैं। वही गरिष्ठ भोजन जिसे पाने में भारतीय अपना गौरव समझते है। अनुमान लगाया जा सकता हैं कि जब एक बार के गरिष्ठ भोजन ने एक व्यक्ति के प्राण ले लिए तो अभ्यास में आये रोजे-रोजे के जले-भुने-तले आहार से अधिकाँश लोगों के पेट, स्वास्थ्य और जीवन की क्या स्थिति होती होगी। कराहते हुए अधिक से अधिक 60 की आयु। वही हम भारतीयों को उपलब्ध भी हैं।
पन्द्रहवीं शताब्दी में ऐसी ही आवृत्ति इंग्लैंड में ही एक किसान के साथ भी हुई थी, वह उस समय 270 वर्ष का था, उसकी इच्छा थी कि दो शतक जीने का आनन्द तो उसे मिले ही इसीलिये यह कुछ न कुछ शारीरिक भय तक भी करता था। 120 वर्ष की आयु तक तो उसने तीन व्यक्तियों के बराबर का श्रम किया था। किसान का कहना था-हम परिश्रम करके अपनी मृत्यु का दूर भगा देते है, यदि मनुष्य भरपूर मेहनत किया करे और स्वाभाविक आहार लिया करे तो हर कोई 100 की आयु तो आनन्द से जी सकता हैं।
लन्दन के सेंट लियोवाई गिरिजाघर में रखे जन्म-मृत्यु तिथि रजिस्टर में एक ऐसे व्यक्ति का नाम भी अंकित है, जिसका जन्म 1588 में हुआ था और मृत्यु 1795 में 207 वर्ष की आयु में, जब उसको मृत्यु हुई तब से पूर्व कई बार लन्दन के सम्भ्रान्त लोग उसके पास स्वार्स्डप और दीर्घ जीवन का रहस्य जानने जाया करते थे। वृद्ध जीने आकाश की ओर देखकर कहता-आप लोगों ने कभी तारे देखे हैं- उनमें किसी प्रकार की कृत्रिमता तो नहीं रहता। बसर्दि ही जीवन मनुष्य जिये तो कोई भी व्यक्ति 100 वर्ष तो आनन्द में जी हो सकता हैं।
हम वेष बनाव का जीवन, महल, मोटरों का जीवन के आकर्षण में प्रति क्षण घुसा करते है, यह जानते कि फाके की मस्ती और प्राकृतिक जीवन में जो आनन्द है, वह उसमें नहीं। थामस कार्न नामक इस व्यक्ति का जीवन अभावों से भरा रहा होगा पर आनन्द से रिक्त नहीं। अपने जीवन के अनुभवों की धाक जमाता हुआ, वह युवकों को डाँट कर कहता मैंने इंग्लैंड के राज-सिहाँसन पर 12 लार्ड बैठाये है, जो मैं जानता हूँ आप उसे क्या जानें।”
सचमुच 207 वर्षों की आयु में उसने प्रकृति के गंभीर रहस्यों को भी देखा और पड़ा होगा। यह लाभ उन्हें कहाँ मिल सकता है, जो आलस्य का वैभव विलास का जीवन जीते है पर अधिकाँश अपनी शारीरिक समस्याओं से ही छुट्टी नहीं पाते। ऐसे जीवों के अध्ययन से जो सदैव प्रकृति के समीप रहते है, पता चलता हैं जितने समय में प्राणियों का शरीर प्रौढ़ होता है, उससे पाँच मुने समय की आयु तो निश्चित होती ही है, प्रसिद्ध वैज्ञानिक जार्ज बफन ने इस सिद्धान्त की पुष्टि में अनेक जीवों के उदाहरण देकर मनुष्य की औसत आयु 125 वर्ष से 168 वर्ष की बीच निकाली है। उन्होंने बताया- “कुत्ता दो वर्ष में प्रौढ़ और प्रजनन योग्य हो जाता है, उसकी आयु दस वर्ष के लगभग होती है। घोड़ा पाँच वर्ष में अपनी पूर्ण ऊँचाई प्राप्त करके 25 से 30 वर्ष की आयु तक जीता है। आठ वर्ष में युवा हो जाने वाले ऊँट की आयु 40 वर्ष, 40 वर्ष की आयु में पूर्ण विकसित होने वाले हाथी का जीवन काल 200 वर्ष होता है। यदि पूर्ण ब्रह्मचर्य रहकर शरीर को शराब, गरिष्ठ भोजन और औषधियों से बचाकर रखा जाय तो मनुष्य का शरीर 25 से 28-30 वर्ष में पूर्ण विकसित होता है। और इस हिसाब से उसे 125 वर्ष से अधिक ही आयु का होना ही चाहिये।
भारतीय धर्म-ग्रन्थों में ‘जीवेम् शरदः शतम्’ ‘हम सौ वर्ष के आयुध्य का उपभोग करें’ की कामना की गई है, वह उस समय के संयमित और प्राकृतिक दिनचर्या को देखते हुए अत्युक्ति नहीं थी। सूत्रस्थान अध्याय 27 में आचार्य चरक ने मनुष्य की आयु में 36000 रात्रियाँ होने का उल्लेख किया है, यदि मनुष्य हँसी-खुशी, परिश्रम और सादगी का आचरण करे तो इतनी आयु का होना कोई कठिन बात नहीं हैं।
ऐसे सैकड़ों उदाहरण है जिनसे इस कथन की पुष्टि होती है। 1750 में हंगरी का बोविन 172 वर्ष की आयु में मरा तब उसकी विधवा पत्नी 164 वर्ष की थी और सबसे बड़े बेटे की उम्र 115 वर्ष थी। वियेना के सोलियन साया 132 वर्ष की आयु के होकर मरे थे, उन्होंने 98 वर्ष की आयु में 7 वीं शादी की। विवाह समारोह के बीच किसी ने चुटकी लेते हुए कहा- “आप अपनी नव-विवाहिता को कब निराश्रित कर देंगे” तो उन्होंने अपनी माँसल भुजाओं की ओर देखकर कहा 40 साच से पहले नहीं। अपने शरीर और स्वास्थ्य पर इतना गहन नियन्त्रण रखने वाले सावा की मृत्यु 40 तो नहीं इस विवाह से 34 वर्ष बाद हुई इस पत्नी से भी तीन पुत्र हुए, जबकि इससे पूर्व वह 69 पुत्र-पुत्रियों के पिता होकर ‘बहु पुत्र लाभम्’ का आशीर्वाद सार्थक कर चुके थे।
रोम की दो मतंकियों की आयु 104 और 112 गथ का उस्लेश करते हुए वहाँ के एक पत्र ने लिखा था कि नृत्य उनके लिये व्यवसाय नहीं, साधना थी। उन्होंने नृत्य की परमात्मा का वरदान मानकर शिरोधार्य किया था, सदैव हँसती-खेलती रहने के कारण उसके स्वास्थ्य में कभी कोई गड़बड़ी नहीं आई। 1767 में फ्राँस में एक ऐसी अभिनेत्री का निधन हुआ, जिसने 111 वर्ष की आयु पार कर ली थी। इस अभिनेत्री का जीवन सारमम्व अभिनेत्रियों से भिन्न था, साधन और सम्पत्ति की प्रचुरता होने पर भी अपने प्राकृतिक जीवन के आनन्द को नहीं छेड़ा, वह अधिकाँश नदियों या झरनों में स्नान करती, जंगलों में चूमने जाती, बाहर के कार्यक्रम न रहने पर भी घर में नृत्य इतना अभ्यास करती, जिससे शरीर का सारा मंज के रूप में निकल जाता। डेमोक्रिट्स 109 वर्ष का जीवन जीकर मरे, उन्होंने अपने जीवन में खराब मसाले और माँस का कभी उपयोग नहीं किया। काँश उबली हुई सब्जियाँ, नींबू, शहद और ककड़ी हरे शाक और फल खाते थे। डबल रोटी एक बार ली हो पर शाकाहार उन्होंने कभी नहीं छोड़ा।
वेलेर-मकरेन आयु 190 वर्ष जोसेफ सूरिमटव 160 वर्ष और नार्वे के ड्रेमन वर्ग ने 146 वर्ष की आयु का आनन्द लिया। रस के ईवान कुस्मिन जामक किसान ने 130 वर्ष की आयु तक आनन्द का जीवन बिताकर यह सिद्ध कर दिया कि जीवन को बढ़ाना मनुष्य के वश की बात हैं। 1. सादा और शाकाहारी भोजन, 2. भरपूर परिश्रम, 3. प्रकृति की घनिष्ठता, इन तीन छोटी-छोटी बातों में ही दीर्घजीवन का रहस्य छुपा हुआ है। इन नियमों का उल्लंघन करने वाला चाहे कोई साधारण व्यक्ति हो, चाहे सम्राट् अपनी मृत्यु ही बुलायेगा।
व्यायाम का थोड़ा-सा भी नियम रखकर हम अपने आयुष्य को बड़ा सकते है, यह स्वीडन के मिलिटरी जाफिसर रेवरेंड का कथन है, जिसने 70 वर्ष तक फौजी संवा की। 17 युद्धों में भाग लेने वाले इस ऑफिसर का नियम था प्रतिदिन कम से कम 5 मील चलना। जिस दिन मृत्यु हुई, उस दिन भी वह दो मील चलकर आया था। ब्रिटेन के ईफिगम से पूछा गया, आप की महत्वाकांक्षा क्या है- क्या आप बड़े आदमी नहीं बनना चाहते? तो उसने हँस-कर कहा- “परिश्रम के जीवन से मुझे इतना मोह हो गया है कि अब कोई, महत्वाकाँक्षा रही हो नहीं। आप देखते नहीं मैं कितना स्वस्थ हूँ, कितना प्रसन्न हूँ, मेरे भीतर से हर घड़ी आनन्द का फव्वारा छूटता रहता हैं।”
सचमुच इस तरह परिश्रम में आनन्द विभोर जीवन जीने वाले बीमार नहीं पड़े। जब कभी बरसात होती थी वे बच्चों की तरह किलकारी मारते हुए जाँघिया पहन कर निकल आया करते थे और घण्टों वर्षा की फुहार का आनन्द लिया करते थे।
प्रकृति माता है उसकी गोद में रहकर मनुष्य को रुपया पैसा भले ही नहीं मिले पर जीवन के लिए अभीष्ट प्रसन्नता, प्रफुल्लता, आनन्द, सुख और सन्तोष का अभाव नहीं होने पाता रोग, शोक और बीमारियाँ तो तब होती हैं, जब हम अपने जीवन की गतिविधियों-आहार-बिहार से लेकर काम करने तक-को अस्वाभाविक, आलस्य और चिन्तापूर्ण बना लेते हैं। 8000 फुट की ऊँचाई पर रहने वाली हिमालय की हुँजा जाति के लोग अभी भी अपना जीवन निर्वाह अधिकाँश शाक और जंगली फल-फूलों पर करते हैं वस्त्र उन्हें साभरण ही मिल पाते हैं, आमोद-प्रमोद लिए उनके पात यदि कुछ है तो वही पहाड़ों पर चढ़ना झरनों में स्नान करना आदि इस पर भी वे संसार के सर्वाधिक दीर्घजीवी माने जाते हैं।
आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के चिकित्सा विभाव के अध्यक्ष श्री गेजर जनरल राबर्ट मैककैरिसन दस हजार हुजाओं के बीच अकेले डाक्टर रहे, जबकि शेष भारर्तवर्ष में प्रति 800 व्यक्ति, एक डाक्टर नियुक्त हैं। इस पर उन्हें दिन भर कोई काम न रहता इससे ऊबकर उन्होंने अपना समय इस जाति के दीर्घ-जीवन के रहस्यों का लगाने में उपयोग किया उन्होंने सैंकड़ों चूहों को पड़कर उन्हें अंग्रेज चूहें- हुँजा चूहे थे दलों में बाँटकर एक को हुजाो द्वारा निबे जाने वाला साधारण भोजन कराया दूसरों को अँग्रेजों द्वारा लिया जाने वाला गरिष्ठ माँसाहार उन्होंने पाया कि हुँजूर दस हयेत्रा स्वस्थ और तन्दुरुस्त रहा पर अंग्रेज चूहों का दल हमेशा बीमारियों में ग्रस्त रहा। उनमें अधिकाँश को गर्भपात हुआ। चूहा मातायें अपने बच्चों को पर्याप्त पोषण भी नहीं दे पाई। उन्हें ऐसी ऐसी बीमारियाँ हुई, जिनका खास्त्र में कोई तक नहीं।
इन दीर्घ जीवियों के अध्ययन से कुछ साथ समय सकें, अपने जीवन के सादा, शाकाहारी शुद्ध और बिक बना सकें तो कोई कारण नहीं भी के जीवन का आनन्द न ले पाये।
अपरिग्रह-शीलता :-
एक बार किसी महिला ने अमेरिकी दार्शनिक थोरो को एक चटाई भेंट की। चटाई को वापिस करते हुये वे बोले-”श्रीमती जी! न तो मेरे घर में इतना स्थान है कि मैं चटाई को बिछा सकूँ और न इतना समय ही है कि उसे झाड़ कर साफ कारूं। फिर घर को अनावश्यक वस्तुओं का संग्रहालय बनाने से लाभ भी क्या हैं? इसी प्रकार उन्होंने अपनी मेज पर रखे सफेद सुन्दर पत्थरों के तीन मनोरम पेपर वेटों को बाहर फेंक दिया। उनके मित्र ने इसका कारण पूछा-तो उन्होंने यही उत्तर दिया-”भाई! अपने मस्तिष्क को साफ करने का कार्य ही क्या कम हैं, जो विकार की वस्तुओं का ढेर लगाकर झंझट पील लूँ।”
“एक नागरिक का ही सही-अपमान तो किसी वेश्या का भी नहीं होना चाहिये। मनुष्य का अधिकार किसी को सुधारने और सही पथ-प्रदर्शन करने में तो है पर अपशब्द और अपमान तो एक बच्चे का भी असह्य है सेनापति! जाओ युद्ध की तैयारी करो। सम्राट् विश्वजित् की आज्ञा टालना किसके लिये सम्भव था। महामन्त्री और आचार्य दसमेध ने भी समझाया-”महाराज! जिस तरह मातायें बच्चों की छोटी-छोटी भूलें क्षमा कर देती हैं, उसी प्रकार केवर्त्त सम्राट् तोमराज की भूल भी साधारण है, नागरिक अनंगपाल के पास वहाँ की स्वर्ण-मुद्रायें न होती तो उसे अपमानित न किया गया होता।
विश्वजित् अपनी प्रजा को प्राणों से भी अधिक प्यार करते थे, इसलिये किसी का भी कहा उनने सुना नहीं। उसी दिन सेना सजा दी गई और कैवर्त पर चढ़ाई कर दी गई।
कई दिन के निरन्तर युद्ध के बाद भी कैवर्त्त को जीता न जा सका। युद्ध की अवधि बढ़ती ही गई। तभी एक दिन एक विचित्र घटना घटी। कैवर्त राज्य के प्रकाण्ड पण्डित ओर सन्त देवलाश्व विश्वजित् के सैनिक खेमों के पास से गुजरे। सैनिकों ने समझा यह कोई गुप्तचर है, सो उन्हें बन्दी बनाकर महाराज के सामने लाया गया। महाराज विश्वजित् ने उन्हें प्राण-दण्ड की सजा सुना दी।
तेज आँधी की तरह यह खबर सारे कैवर्त देश में फैल गई कि सन्त देवलाश्व बन्दी बना लिए गये हैं और उन्हें शीघ्र ही मृत्यु-दण्ड दिया जाने वाला हैं। विश्वजित् के से भी प्रजा को जो कष्ट न हुआ था, वह देवलाश्व के बन्दी बना लिये जाने से हो गया। कैवर्तवासियों ने अपने प्रिय सन्त के लिये अन्न-जल का भी परित्याग कर दिया। सारे राज्य में शोक छा गया।
रात्रि के चतुर्थ प्रहर में जबकि विश्वजित् की सेनायें युद्ध की तैयारी कर रही थी-एक आकृति वहाँ पहुँची और सैनिकों से निवेदन किया में कैवर्त का राजदूत हैं, मुझे विश्वजित् के पास सम्राट् तोमराज का सन्देश पहुँचाना है। इस पर आगन्तुक को नरेश विश्वजित् के पास पहुँचा दिया गया।
“कहो! क्या सन्देश लाये हो सम्राट् तोमराज का। क्या उन्होंने पराजय स्वीकार कर ली।” स्वाभिमान से अपनी मूँछों पर ताज देते हुये विश्वजित् ने प्रश्न किया।
नहीं महाराज, कैवर्त नरेश इनने भीरु नहीं जो युद्ध सम्पन्न हुये बिना पराजय स्वीकार कर लें पर यदि आप बन्दी सन्त देवलाश्व को मुक्त कर दें तो वे उनके बदले आपको दो करोड़ स्वर्ण मुद्रायें भेंट कर सकते हैं।
यस! गुप्तचर का मूल्य कुल दो करोड़ रुपये। बोलो दूत उन्हें इस बन्दी से इतना मोह क्यों हैं? विश्वजित् ने उसी वीर भाव से प्रश्न किया।
आगन्तुक ने उत्तर दिया- “महाराज! वह गुप्तचर नहीं यथार्थ ही एक बड़े अनाथ हो जायेगा, पथ-भ्रष्ट हो जायेगा, हम स्वदेश को पथ-भ्रष्ट होने के बचाने के लिये दो करोड़ स्वर्ण-मुद्रायें तो क्या सम्पूर्ण राज्य आपकी भेंट कर सकते हैं।
इसका प्रमाण? विश्वजित् ने फिर प्रश्न किया। शान और स्वाभिमान वहीं पूर्ववत्। और उत्तर में आगन्तुक ने अपना दाहिना हाथ आगे बढ़ा दिया। अनामिका पर शोभित मुद्रिका में साफलिखा था-”सम्राट् तोमराज!”
और तब विश्वजित् ने अपना राज्यासन छोड़ दिया तो तोमराज को हृदय से लगाते हुए कहा-सम्राट् हम आज आपसे पराजित हुए। आप सम्राट् नहीं हमारे गुरु हैं, मार्ग दर्शक हैं। सचमुच जिस राष्ट्र में सन्त को सम्मान नहीं मिलता, वह पथ-भ्रष्ट कर दिए गये और विश्वजित् की सेनायें भी वापिस लौट पड़ी।
यह गवर्नर जनरल लार्ड आकलैण्ड का कार्यकाल था। सन् 1837-38 की बता है। एक दिन गवर्नर जनरल के मिलिटरी पैक्रेटरी डब्लू जी0 ओसावार्न और उनके अंग-रक्षक कैप्टेन मैकग्रेमर लाहौर आये। इन दिनों पंजाब के महाराजा रणजीतसिंह से सन्धि अंग्रेजों का मिशन प्रायः आया जाया करता था। काम कुछ होता नहीं था, इसलिये यह लोय अधिकाँश आमोद-प्रमोद, शिकार और इधर-उधर के मनोरंजन किया करते थे।
डा0 मैक ग्रेगर ने भारतीयों की योग विद्या के बारे में बड़ी बातें सुनी थी। वे योग का ऐसा कोई चमत्कार देखना चाहते थे, जिससे सुनी हुई बात को पुष्टि मिलती। इसी ख्याल से उन्होंने एक दिन महाराज रणजीतसिंह से कहा-”हमने भारतीय योग की बहुत प्रशंसा सुनी है, क्या आपकी दृष्टि में कोई ऐसा योगी हैं, जो कोई चमत्कार दिखा सकता हों?
महाराज रणजीतसिंह सम्भवतः पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने ईस्ट इंडिया कम्पनी की हरकतें देखकर यह ताड़ लिया था भारतवर्ष में अंग्रेजों के इरादे षड़यन्त्रपूर्ण हैं, इसलिये सन्धि की उनकी कोई इच्छा नहीं थी तो भी उन्हें अंग्रेजों की झूठी प्रशंसा ने फाँस लिया और सन्धि हो गई। अंग्रेजों का यह प्रस्ताव कष्टदायक था, एक तरह से भारतीय धर्म और तत्त्व-दर्शन के लिये चुनौती थी, एक बार तो रणजीतसिंह के मन में आया कि जिन अंग्रेजों के आगे योग का मूल्य ओर महत्व चमत्कार भर है, उन्हें जीवन की सच्चाई, आत्म-कल्याण के प्रति न कोई श्रद्धा है, न जिज्ञासा इसलिये इन्हें क्यों न फटकार दिया जाये पर दूसरे ही क्षण दूसरा विचार आया कहीं ऐसा न हो कि इससे इन्हें भारतीयों पर लाँदन लगाने का अवसर मिले, इसलिये उन्होंने अन्यमनस्क ही सही प्रस्ताव स्वीकार कर लिया।
उन्होंने अपने गुरु सन्त हरदास का स्मरण कर उन्हें लाहौर बुलाया और सारी बातें उनसे निवेदन कीं। सन्त हरदास ने 40 दिन तक पृथ्वी में गड़े रहने का एक प्रयोग दिखाना स्वीकार कर लिया।
नियत दिन डा0 मैक ग्रेगर, कैप्टन वार्ड, रणजीसिंह जी व उनके परिवार के सदस्यों के सामने सन्त हरदास उपस्थित हुए उन्होंने कहा-”हम, आप जिन शरीरों से बने हैं, वह तो हवा, मिट्टी, पानी का संयोग मात्र है, त्राण और जीव-चेतना इससे मित्र सूक्ष्म और बड़े सामर्ध्ववान् तत्त्व हैं, जो लोग आत्म-चेतना पर नियन्त्रण कर लेते हैं, वे शरीर न रहने पर भी देश, सुन सकते है, देशाटन कर सकते हैं, बड़े-बड़े कार्य कर सकते हैं, जो कई टन समता वाली मशीनों से भी सम्भव नहीं हैं। इस शक्ति और ज्ञान का प्रयोजन आत्म-कल्याण है पर भौतिक और लौकिक कामनाओं में ग्रस्त नर कीट उसे समझ नहीं पाते। चमत्कार देखकर उनका कुछ भला नहीं होता तथापि भारतीय तत्त्वज्ञान और योग-विद्या को लोग योंही न समझें इसलिये हम एक प्रयोग आपको दिखायेंगे।
पृथ्वी में गड्ढा खोदा गया। सन्त हरदास ने मुख को छोड़कर सारे इन्द्रिय द्वार मोम से बन्द कर लिये जिससे भीतर किसी प्रकार की वायु न जा सके। 40 दिन की सारी क्रिया कागज में लिखाकर उन्होंने जीभ को तान्कण्ठ से लगाकर मुख से जाने वाली श्वाँस का मार्ग भी बन्द कर दिया, ऐसा करते हीं वे समाधि में चले गये। एक काठ से सन्दूक में श्वेत-वस्त्र बिछाकर बसनद समादी गई। उस पर सन्त हरदास को टिकाकर बक्स बन्द कर दिया गया। ताला लगाकर रणजीतसिंह महाराज की व्यक्तिगत मुहर से उसे सील कर दिया गया। वक्स ऐसा लकड़ी का था जिसमें कीड़े लगने की सम्भावना न हो। फिर उसे सावधानी से गड्ढे में रखकर ऊपर से मिट्टी कूट दी गई। एकहरी इटे लगाकर सीमेंट कर दी गई और तब लोग अपने-अपने घरों को चले गये।
40 दिन बाद डा0 मैक ग्रेगर उनके अनेक अँग्रेज मित्र महाराज रणजीतसिंह सभासद और सैंकड़ों प्रतिष्ठित व्यक्ति यह देखने के लिये उपस्थित हुये कि प्राणों पर नियन्त्रण कर लेना सचमुच सम्भव है क्या? अँग्रेजों के लिए तो यह महान् आश्चर्य जैसी घटना थी। प्राणायाम के द्वारा कुछ समय तक श्वाँस साधे रहना और फेफड़ों में भरी हवा से थोड़ी देर काम चला ले जाना तो उनकी समझ में आ गया था पर बिना कुछ खाये-पिये, श्वाँस लिये 40 दिन तक भूमि-समाधि लिये रहना ईश्वरीय चमत्कार से कम न था। इंग्लैंड, अमेरिका में हजारों प्रयत्न हो लिये मरणोन्मुख व्यक्ति को काँच के सन्दूक में रखा गया, शून्य में रखा गया पर चेतना पर नियन्त्रण न पाया गया। प्राण जब निकले तब उन्हें कोई रोक न पाया। जबकि यहाँ ऐसी परिस्थितियों में प्राण रोके रखने का प्रदर्शन था, जो सामान्य व्यक्ति के लिये कभी भी सम्भव नहीं हो सकता।
नियत समय पर गड्ढा खोदकर सन्दूक निकाला गया। सील ज्यों की त्यों, सन्दूक खोला गया। सन्त हरदास उसी शाँत, प्रसन्न मुद्रा में बैठे थे, जिसमें वह 40 दिन पूर्व बैठाये गये थे। उन्हें बाहर निकाला। गया। डा0 मैक ग्रेगी ले शरीर परीक्षा की, नाड़ी बन्द। हृदय-गति बिलकुल नहीं, निस्पन्दित। सारा शरीर ठण्डा। जीवन के कहीं कोई लक्षण नहीं। सिर पर हाथ फिराते हुए जब उनका हाथ चोटी वाले स्थान पर पहुँचा तो उनकी उँगली जल गई। झपटकर हाथ हटाया। यही एक स्थान था, जहाँ अग्नि जैसी ऊष्मा विद्यमान् थी।
शरीर परीक्षण समाप्त कर लेने के बाद जीभ को हाथ से पकड़ कर बलपूर्वक तालु से हटाया गया। कान,नाक से मोम निकाल ली गई। ठण्डा पानी सिर और सारे शरीर पर छिड़का गया। धीरे-धीरे चेतना सारे शरीर में दौड़ने लगी। श्वाँस चलने लगी, नाड़ियाँ चलने लगीं। हृदय धड़कने लगा, फेफड़े काम करने लगे। सन्त हरदास प्रसन्न मुद्रा में उठकर खड़े हो गये।
आश्चर्य चकित डा0 मैक ग्रेगर ने पूछा-”विलक्षण बात हैं महाराज! अपने इतने दिन तक बिलर श्वाँस, अन्न और जल के कैसे जीवित रह गये।” इस पर उन्होंने बताया-”शरीर में भरा हुआ प्राण वायु के द्वारा ही उपलब्ध होता हो सो बात नहीं। शरीर में ऐसे सूक्ष्म संस्थान और शक्ति प्रवाह विद्यमान् हैं, जिन पर नियन्त्रण किया जा सके तो मनुष्य की चेतना विश्व-व्यापी प्राण और महत्व से सम्बन्ध जोड़ लेती है, मस्तिष्क में वहाँ हम भारतीय चोटी रखते हैं, यही वह स्थान है, जो विराट् विश्व में व्याप्त चेतना और देव शक्तियों का सम्बन्ध शरीर से जोड़ देती हैं। समाधि अवस्था में आत्म-चेतना को मस्तिष्क में चढ़ा लेते हैं, उस समय बड़े सुखद स्वप्न और अनुभूतियां होती है। प्रत्यक्ष संसार की सी जानकारियाँ भी मिलती रहती हैं और शरीर को सड़ने-लगने से बचाने वाला प्राण-तत्त्व भी मिलता रहता हैं। मस्तिष्क में चोटी वाला स्थान इतना गर्म होना इसी सूक्ष्म क्रिया-शीलता का प्रमाण हैं।
‘हिस्ट्री आफ दि सिरब्स’ पुस्तक में डा0 मैक ग्रेगर ने इस घटना का उल्लेख करते हुए आश्चर्य प्रकट किया है- “श्वाँस-प्रश्वांसों को बन्द रखकर जीवित रहना विलक्षण बात हैं। दीर्घकालीन उपवास का साधु पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा था। उनके चेहरे की चमक और प्रसन्नता में कोई अन्तर नहीं आया था।”
डा0 मैक ग्रेगर के इस आश्चर्य में और भी कई सत्य छिपे थे। जीवन की अमरता की पुष्टि और इस बात की पुष्टि भी इस घटना से होती है कि अति संसार में लौकिक और स्थूल जगत की अपेक्षा कम प्रसन्नता नहीं। जब सन्त हरदास ने कहा- “समाधि तोड़ी गई, तब मुझे कष्ट हुआ। मेरा मन नहीं करता था कि जिस आनन्दमय संसार में मैं विवरण कर रहा हूँ, उसे छोड़कर फिर शरीर में लौटूँ”। स्थूल जगत् के दुखों में सूक्ष्म जगत के आनन्द से इजारके अंश के बराबर भी सुख नहीं। साधारण व्यक्ति स्थूल सुखों में आसक्त होने के कारण उसे समझ नहीं पाते पर जैसे-जैसे शरीर योग, साधना उपासना, यम-नियम, प्राणायाम, उपवास आदि के द्वारा शुद्ध होकर दिव्य-शक्तियों के संपर्क में आने लगता है, यह अनुभूतियाँ भी स्पष्ट होने लगती हैं।”
सन्त हरदास में इस कथन को हम आज भी उसी सत्यता से ग्रहण करते हैं। देश में ऐसे हजारों- लाखों अनपढ़ उपासक हैं, जो इस तत्त्व-ज्ञान का विश्लेषण नहीं कर सकते पर अपनी शुद्धता के कारण वह साधन सम्पन्न और शिक्षित लोगों से भी बहुत अधिक सुखी, प्रसन्न और संतुष्ट होते हैं, यह ईश्वरीय तत्त्वों को सान्निध्यता का ही फल होता हैं।
अँग्रेज इस बात को समझ नहीं पाये। वे यह समझ रहे थे कि इस समाधि से साधु को कष्ट हुआ होगा। कुछ अँग्रेजों को तो अविश्वास तक था कि कहीं पीछे से गड्ढा खोदकर कोई ऐसी चालाकी न की गई हो, जिससे सन्त को श्वाँस और कोई औषधि मिलती रही हो, जो 40 दिन तक शरीर को जीवित बचाये रख सकने में सहायक हुई हो। सन्त हरदास उनके इस सन्देह को ताड़ गये। अतएव उन्होंने एक और लम्बी समाधि में बैठने का निश्चय किया।
इस बार जनरल बेनदुरा के नेतृत्व में सन्त हरदास ने दूसरी समाधि मई 1638 में अदीना नगर में ली। समाधि का क्रम पहले जैसा ही था। पर जनरल बड़े चतुर थे। गड्ढा खोदने की कोई सम्भावना न रहे, इसके लिए उसने सारे खेत में जिसमें सन्त हरदास से समाधि ली थी, जो की बोवाई करा दी। फसल तैयार होने पर उसे काट लिया गया। फिर उस पर दुबारा हल नहीं चलाने दिया गया ताकि जी की जड़ें इस बात की गवाह बनी रहें कि खेत कहीं खोदा नहीं गया।
सन्त हरदास दस माह तक समाधि में रहे। इस बीच कई बार इस भूमि का निरीक्षण किया गया। दस माह पूरे हुए तब जनरल बेनटुरा, डब्लू एच॰ मैकनाटन, कैप्टन, मैक ग्रेगर डा0 ड्रमण्ड आदि की उपस्थिति में फिर गड्ढा खोदा गया। सन्त हरदास को पहले जैसी ही स्थिति पाई गई। समाधि स्थिति से वापिस लाते ही शरीर फिर काम करने लगा। तोपें दाग कर सन्त का सम्मान किया गया। महाराज रणजीतसिहं सहित अन्य लोगों ने सन्त को बहूमूल्य उपहार भेंट किए पर सन्त के लिए मानों इन लौकिक वस्तुओं की कोई कामना ही न थी। अध्यात्म की शक्ति और प्रसन्नता के आगे यह उपहार फोके थे।
कैप्टेन ओसबर्न ने इस घटना का उल्लेख अपनी पुस्तक ‘रणजीतसिंह’ में बड़े भावपूर्ण शब्दों में करते हुए लिखा है-”भारतीयों के पास ऐसा असभ्य ज्ञान और विलक्षण क्षमतायें हैं, जिन्हें पूर्व तब तक नहीं समझ सकता, जब तक उसे योग विद्या का ज्ञान न हो। निःसन्देह भारतीयों के पास कोई ऐसी वस्तु हैं, जो लौकिकता और भौतिकता से बढ़कर हैं, अन्यथा उसे प्राप्त करने के लिये, वे इतने कठिन तप और योगाभ्यास न करते।”
जिस योग विद्या की पाश्चात्यों ने भूरि-भूरि प्रशंसा की है, खेद है कि हम भारतीय उसे भूलकर पाश्चात्यों की भौतिकतावादी शिक्षा और संस्कृति को अपनाने में गौरव अनुभव करते हैं। भारतीय योग विद्या और तत्व-ज्ञान की शक्ति और सामर्थ्य का पारावार नहीं यह घटना उसका एक छोटा-सा चमत्कार है। योगाभ्यास और ईश्वरीय शक्तियों के अवगाहन से इससे भी महत्वपूर्ण लाभ और सिद्धियाँ प्राप्त की जा सकती हैं।
“असुरों से पराजित देवगण, त्रस्त होकर कन्दराओं में, समुद्र के तल में तथा आकाश के शून्य विस्तार में जा छिपे।” “किन्तु दानवों के मृत्यु दूतों ने उन्हें खोज ही निकाला। परेशान होकर वे प्रजापति के पास गये। और बचने का उपाय पूछा। उन्होंने कहा कि तुम सब, समस्त ब्रह्माण्ड में व्याप्त स्वर में विलीन हो जाओ।”
माँ सरस्वती! की शरण लेकर सब अव्यक्त स्वर जाल में छिप गये। स्वर कभी नष्ट नहीं होता। अमरता प्राप्त सन्निवेश होने के कारण समस्त देवता भी अमर हो गये।”
उपनिषद् में इस अक्षर स्वर (शब्द) को ही ब्रह्म कहा हैं। जिस स्वर ने देवताओं की रक्षा की थी, वही स्वर संगीत मरणधर्मी मनुष्य को भी अमरत्व प्रदान कर सकता है। इस नाद स्वर से श्रेष्ठ कोई शक्ति नहीं। और नादसंधान से श्रेष्ठ कोई पूजा नहीं। समस्त नाद का आदि तथा अन्त प्रणव है। उसी से सबका सृजन हुआ हैं और उसी में सबको विजीन होना हैं।” -जैमिनोय ब्राह्मण,
‘यथा नामो तथा गुणाः’-जैसा नाम वैसा ही गुण। यावज्जीवन श्मशानों में बीता। कभी तान्त्रिक साधनाओं में तो कभी रणभूमि में। अवन्तिका (उज्जैन) की सेना बैताल भट्ट के बिना सूनी थी। बैताल की कोप-चण्डी शत्रुशिविरों को ऐसे सूना कर देती थी, जैसे तीव्र तूफान में कटी हुई फसलें उड़ जाती हैं और खेत सूने हो जाते हैं। आज तक उसकी शक्ति के सामने कोई भी राज्य टिका नहीं था। अवन्तिका यदि अजेय थी तो उसका सारा श्रेय एक मात्र बैताल भट्ट और उसकी सहायिका विषकन्या बसन्तिका को ही था।
पर आज बूढ़ा पेड़ स्वयं ही धराशायी हो गया। जिस बैताल भट्ट को कूटनीति के आगे बड़े-बड़े सम्राट् शीश झुकाते थे, अपनी कूटनीति से आज वह आप ही पराभूत हो उठा था। कई दिन से उसके मस्तिष्क में निरन्तर एक ही विचार उठते आ रहे थे-यह नर-हत्यायें किसके लिये कीं-जीवन भर असत्य और अनादर्शों का भार उठाये घूमा, उससे क्या शरीर अमर हो गया। कितनी विधवायें मेरे नाम को गालियाँ देती हैं। कैसा है, यह मनुष्य जीवन कोई पापी पेट के लिए तो कोई पुत्र कलत्र, धन, पद, यश, वैभव के लिये-स्वार्थ की संकीर्णताओं में डूबा हुआ संसार, अपनी ही चिन्तायें करता तथा औरों को ठगता रहता है। आज पता चला कि दूसरों को पराजित और स्वयं को विजयी मानने वाला सर्वथा भूल में था। मनुष्य से बढ़कर कालपुरुष है, कोई कितना ही ऐठे, अकड़ें दिखाये पर काल-पुरुष जीतना सदैव ही दुःसाध्य रहा। मृत्यु से कोई न बच पाया। जो अपने ही गोरख-धन्धे में लगा रहा वह अन्ततः पछताया और हाथ मलता हुआ ही गया।
बैताल भट्ट की आंखें खुल गई थीं। साँसारिक मोह टूट गया, दम्भ मर गया। जीवन भर का दोष-दूषण उसकी आँखों में आगे नीचे रहा था और उसके लिए पश्चाताप की अग्नि में जल रहा था बैताल भट्टा। उसने वर्तमान् जीवन क्रम को बदल डालने का निर्णय कर लिया।
रालसी परिधान उतार फेंके बैताल भट्ट ने। साधारण वेष-भूषा में, हाथ में लाठी और उत्तरीय वस्त्र कन्धे पर डाले प्रातः पीयूष बेला में वह घर से बाहर निकला। क्षिप्रा के पावन तट पर खड़े होकर उसने अवन्तिका और महाकाल को झुककर प्रणाम किया और पीछे मुड़कर बढ़ चला आगे की ओर।
पर अभी बीस पग ही बड़े होंगे कि महाकवि कालीदास और वासन्तिका उधर से आते हुए दिखाई दिये। बैताल भट्ट को साधारण वेष-भूषा में देखकर कुमार सम्भव चकित तो हुए पर इस महान् इन्द्रजालिक के लिए, उनके मन में असम्भव की कुछ कल्पना न थी। तो भी पूछा अतएव उन्होंने-”आर्य प्रवर! आज किस सम्राट् का ज्योतिष बिगड़ा, किस पर शनि दृष्टि गहरी हुई, किसने साहस किया आपसे प्रतिद्वन्द्विता का? क्या मालवा पुनः रणभेरी बजाने जा रहा है? पर छद्म-नीति में तो बसन्तिका आपके साथ रहती आई है, आज आप अकेले कैसे?”
कहाकवि की ओर उस स्वाभिमानी बैताल ने ऐसे देखा जैसे वास्तविक विजय के लिए वह आज ही निकला है। उसने कहा-”आत्म-प्रदेश का शासक मन बहुत कुटिल हो गया है कविवर! अब तो अन्तिम और निर्णायक युद्ध अपने आपसे ही होगा देखता हूँ, विजय जीवन की कुटिलताओं को मिलती है या आत्म-शोध की आकाँक्षा का? कालिदास ने पूछा-”किन्तु आर्य श्रेष्ठ! आपके बिना-अवन्तिका का क्या होगा।” यह सब मोह है-महाकवि!” मनुष्य अहंकारवश ऐसा सोचता, आसक्ति में पड़ता और भावी पीढ़ी की प्रगति में बाधक बनता है। मनुष्य कर्म का अधिकारी तो है पर मोह और आसक्ति का जीवन में कोई स्थान नहीं, इनसे बँधने वाला अपने व औरों-सबके लिए घातक ही होता हैं।
कालिदास और कुछ नहीं बोल सके। बैताल आगे बढ़ गये। और उधर सारे राज्य में खबर फैल गई, बैताल भट्ट वानप्रस्थ होकर समाज सेवा हेतु समर्पित हो गये।
उपयोगितावाद (यूटिलिटेरियनिज्म) सिद्धान्त के विश्व-विख्यात प्रवर्तक जान स्टुअर्ट मिल के अपने सिद्धान्त को व्याख्या करते हुए लिखा है-”संसार में सबको सुख या आनन्द की खोज है। सुख जीवन का लक्ष्य है। और यह स्वाभाविक है कि मनुष्य आजीवन उसकी खोज करे। कई बार ऐसी परिस्थितियाँ आती है, जब हमें एक सुख दूसरे से अधिक अच्छा लगे तो हमारे लिए वही इष्ट हो जाता है, भले ही उसको प्राप्त करने में अशाँति का सामना करना पड़े। मनुष्य सुख चाहता है, वस्तुयें चूँकि उन सुखों की माध्यम है, इसलिए हम वस्तुओं का संग्रह करते समय भी केवल सुख प्राप्ति का प्रयत्न करते हैं, इससे यह सिद्ध होता है कि आनन्द मनुष्य जीवन में प्रमुख है आचरण अप्रमुख।”
अर्थात् यदि माँस खाने से सुख की वृद्धि हो सकती है तो माँस खाना बुरा नहीं। यदि काम वासना की अधिक तृप्ति के लिए सामाजिक मर्यादायें तोड़ी जा सकती हैं तो वसा करना पाप नहीं। घन अधिक और अधिक सुख देने में सहायक है, इसलिए अधिक से अधिक धन कमाने में यदि प्रत्यक्ष किसी पर दबाव न पड़ता होती वैसा किया जा सकता है, अर्थात् झूठ बोलकर, कम तोलकर, मिलावट आदि जितने भी व्यापार के भ्रष्ट नियम हैं, वह पाप नहीं है, यदि हमारे सुख की मात्रा उससे बढ़ती हो। बड़ी बलवान् शक्तियों द्वारा कमजोर छोटी शक्तियों का शोषण इस सिद्धान्त का ही समर्यित व्यवहार है। जान स्टुअर्ट और उनके सब अनुयायी इसके लिए प्रकृति को प्रत्यक्ष स्वयंभू उदाहरण देते हैं और कहते हैं, बड़ी मछली छोटी को खाकर अपनी शक्ति बढ़ाती है। बड़ा वृक्ष छोटे वृक्ष की भी लुराक हड़प कर लेता है यदि। इन सब बातों को देखकर मनुष्य के लिए भी उपयोगितावाद सिद्धान्त का समर्थन होता हैं।
जहाँ तक सुख की चाह का प्रश्न है, जान स्टुअर्ट के सिद्धांत का कोई भी विचारशील व्यक्ति खण्डन नहीं करेगा। हम दिन रात आनन्द के लिये भटकते हैं पर हमने शुद्ध आनन्द की व्याख्या और उसकी प्राप्ति के प्रयत्न किये कहाँ? दुःख के प्रमुख कारण हैं-1. अशक्ति, 2. अज्ञान और 3. अभाव। यदि सम्पूर्ण जीवन को इकाई मानकर देखें और इन तीनों कारणों की दूर करने के प्रयत्नों पर विचार करे तो संयम, स्वाध्याय आदि के द्वारा ज्ञान वृद्धि और श्रम एवं क्रमिक विकास की वह उपयुक्त साधन दिखाई देते हैं, जिनके अभ्यास से उन्हें दूर किया था सकता हैं और आनन्द प्राप्ति की अपनी क्षमताओं का विकास किया जा सकता हैं।
आनन्द वृद्धि के लिए उपयोगितावादी सिद्धान्त हमें निरन्तर भौतिकता की ओर अग्रसर करते हैं और हमारी आध्यात्मिक आवश्यकताओं को उस तरह बुलावा देते हैं, जैसे रेगिस्तान के शुतुर्मुर्ग शिकारी को देखकर अपना मुख बानू में छिपाकर अपनी सुरक्षा अनुभव करते हैं। आज के संसार में बढ़ रही अशाँति और असुरक्षा इस सिद्धान्त की ही देन है।
प्रकृति में बड़ी शक्तियों द्वारा छोटी शक्तियों के शोषण के सिद्धान्त अपवाद मात्र है। अधिकाँश संसार तो सहयोग और सामूहिकता के सिद्धान्त पर जीवित हैं। उस क्षण की कल्पना करें, जब सारे संसार के लोग बुद्धि-भ्रष्ट हो बायें और परस्पर शोषण पर उतर आये तो सृष्टि का विनाश एक क्षण में हो जाये। हम प्रकृति को सूक्ष्मता से देखे तो पायेंगे कि उसका अंतःजीवन कितना करुणाशील हैं। छोटे-छोटे जीव-जन्तु, वृक्ष, वनस्पतियाँ भी किस प्रकार परस्पर सहयोग और मैत्री का जीवन-यापन कर रहे हैं। मानवीय सभ्यता तो जीवित ही इसलिए है कि इतने भौतिक विकास के बाद भी हम मनुष्य, मनुष्य के प्रति प्रेम, दया, करुणा, उदारता, सहयोग और सामूहिकता के सम्बन्ध को तोड़ नहीं सकते।
गाँवों के किसानों से कोई पूछे कि वे एक खेत में कई फसलें मिलाकर क्यों बोते हैं? तो उपयोगितावाद के सिद्धान्त का खण्डन करने वाले तभ्य ही सामने आयेंगे। ज्वार और अरहर साथ-साथ बोई जाती हैं। मूँग, उड़द और लोबिया आदि दालें भी ज्वार के साथ बोई जाती है। ज्वार का पौधा बड़ा होता है, यदि उपयोगितावाद प्रकृतिगत या ईश्वरीय नियम होता तो वह इन दालों को पनपने न देता। होता यह है कि दालों को उदार के पौधों में बढ़ने और हृष्ट-पुष्ट होने में सहायता हमलती है। उधर उदार को नाइट्रोजन की आवश्यकता होती है, सो वह काम अरहर पूरा करती है। वह वायु-मण्डल से नाइट्रोजन खींच कर कुछ अपने लिये रख लेती है, शेष ज्वार को दे देती हैं, जिससे वह भी बढ़ती और अच्छा दाना पैदा करने की शक्ति ग्रहण करती रहती है। हमारे देश का सामाजिक ढाँचा इसी दृष्टि से बनाया गया था। वर्ग बँटे थे। लुहार अपना काम करता था, बढ़ई अपना, नाई, तेली, मोची, भंगी सब अपना-अपना काम करते थे और अपने जीवन-यापन के साधनों को परस्पर विनियम के द्वारा बाँट लेते थे।
इस तरह परस्पर स्नेह, आत्मीयता और प्रेम-भाव बना रहता था। तब मुद्राओं का ऐसा प्रचलन न था। आज मुद्रा स्वयं ही एक समस्या बन गई है और इस प्रकार का सहयोग न होने से आर्थिक खींचा-तानी पैदा हो रही है। साम्यवाद और पूँजीवाद का संघर्ष-परस्पर सहयोग के सिद्धान्त की अवहेलना के फलस्वरूप ही हैं।
पान की बेल आम के वृक्षों के सहारे ही बड़े अच्छे ढंग से बढ़ती हैं। उन्हें किसी घने वृक्ष की छाया न मिले तो बेचारी का जीवन ही संकट में पड़ जाये। यहाँ बड़ा छोटे के हितों की रक्षा करता हैं। अमर बेल बेचारी जड़ हीन होने से स्वयं सीधे आहार नहीं ले सकती, इसके लिए उसे बड़े वृक्षों का ही संरक्षण मिलता है। जिनके पास भी साधन और संपत्तियाँ हैं, वे उसे अपनी ही न समझकर समस्त वसुधा की समझकर आवश्यकतानुसार उदारतापूर्वक अल्प-विकसितों को बाँटते रहे तो विषमता उत्पन्न ही क्यों हो? आर्थिक साधन ही नहीं, विद्या, बुद्धि, कलाकौशल, स्वास्थ्य, सौंदर्य आदि मानवीय विशेषतायें भी एकस्थ नहीं होनी चाहिये, हमारे पास जो भी योग्यता हो उसे पिछड़े वर्ग के विकास में स्वेच्छापूर्वक दान करना चाहिये।
बड़ी शक्तियाँ छोटी शक्तियों का शोषण करें, यह प्राकृतिक नियम नहीं। प्रकृति आश्रित को जीवन देने और उसके विकास में सहायता करने का कार्य करती है। ‘छोटी पीपल’ महत्त्वपूर्ण औषधि है, वह अपना विकास किसी घने छायादार वृक्ष के नीचे ही कर सकती है। इलाइची नारियल के वृक्ष की छाया में बढ़ती हैं। बड़ा पेड़ अपने नीचे के छोटे पेड़ों को खा हो जाय यह कोई सार्थभीय नियम नहीं हैं।
एक गाँव में एक अन्धा रहता था, दूसरा लंगड़ा। एक दिन अकस्मात गाँव में आग लग गई। समर्थ लोग अपना-अपना सामान लेकर सुरक्षित भाग निकले। लँगड़ा और अन्धा दो व्यक्ति ही ऐसे रहे, जिन बेचारों के लिये बाहर निकलना सम्भव न था। एकाएक अन्धे की एक उपाय सूभघ। उसने लँगड़े से कहा-यदि आप मुझे रास्ता बताते चलें तो मैं आपको कन्धे पर बैठाकर यहाँ से निकल सकता हूँ और इस तरह हम दोनों भी यहाँ से सुरक्षित बच सकते हैं। लँगड़े को योजना पसन्द आ गई। अन्धे ने उसे कन्धों पर बैठाया। लँगड़ा उसे दिखा दिखाता चला और इस तरह दोनों एक रास्ते से आम की लपटों से बचकर बाहर आ गये।
अन्धे और लँगड़े की यह कहानी मनुष्य समाज की सुरक्षा और सबके सिद्धान्त का प्रत्यक्ष प्रभाव है। वहाँ कोई भी व्यक्ति पूर्ण नहीं, सब अपूर्ण है। डाक्टर औषधि शास्त्र का पण्डित हो सकता है, कानून-शास्त्र का नहीं। सब्जी नियर मशीनों का ज्ञाता होकर भी व्यापार शास्त्र की दृष्टि से निरा बालक रहता हैं। वैज्ञानिक के लिए यह आवश्यक नहीं कि वह अपने ही बच्चों का शिक्षण आप कर लें उसके लिये, उसे प्रशिक्षित अध्यापकों वाले कालेज का ही सहयोग सेना पड़ेगा। अपूर्णताओं वाले संसार में यदि उपयोगिता वाद को खुला समर्थन दिया जाने लगे तो सबके सब अपने को उपयोगी मानकर छल-कपट, शोषण और अत्याचार करने लगें, ऐसी स्थिति में अशिक्षित किन्तु स्वस्थ और बलिष्ठ भी अपने शरीर की उपयोगिता सिद्ध करना चाहेगा। वह चोरों, डकैती और दूसरी तरह के अपराध करेगा, क्योंकि उसे न्याय और नियन्त्रण में रखने वाली बौद्धिक शक्ति स्वयं पंगु हो चुकी होती है। यदि सब उदारतापूर्वक एक दूसरे से सहयोग का मार्ग अपना ले तो हर कोई स्वस्थ साधनों में भी आनन्द की उपलब्धि कर ले। आज की स्थिति जो गड़बड़ दोष इस उपयोगितावाद की ही दिया जा सकता हैं।
समुद्र में शंख पाया जाता हैं। उसका कोड़ा विकल जाता है, तब ‘आर्थोपोड़ा वर्ग का हरमिट क्रोध’ नामक जल-जन्तु उसमें जा बैठता हैं। सोचता तो वह यह था कि यहाँ वह सुरक्षित रहेगा, किन्तु यहाँ भी उसे शत्रु का भय बना रहता हैं। मछलियाँ उसे कभी भी पकड़कर खा जाती हैं। यदि उपयोगितावाद का सिद्धान्त ही सत्य और व्यावहारिक रहा होता तो इस कीड़े की वंशावली ही समाप्त हो गई होती हैं।
पर प्रकृति ने उसे सहयोग के लिए प्रेरित। वहीं पर ‘फाइसेलिया’ नामक एक जानवर पड़ा होता है। विचारा अपने आहार के लिये चल फिर नहीं सकता। आर्थोपोड़ा उसे अपने शख की पीठ पर बैठा लेता है और उसे यहाँ से वहाँ घुमाता रहता है। प्रत्युपकार में फाइसेलिया उस आर्थोपोड़ा की रक्षा कर भार स्वयं वहन करता है। फाइसेलिया अपने शरीर से काई की तरह का एक दुर्गन्धित पदार्थ निकालता रहता है, फलस्वरूप वह जहाँ भी रहता है, मछलियाँ भयभीत होकर पास नहीं आती और यही द्रव छोटे-छोटे जन्तुओं के मारने के काम जाता है और इस फाइसेलिया और हरमिट क्रेब दोनों को भोजन भी मिल जाता है। और इस तरह आर्थोपोड़ा का जीवन सुरक्षित बना रहता है। इससे यह मालूम पड़ता है कि प्रकृति ने यदि सहयोग और सद्भाव की प्रेरणा अन्तरंग से न दी होती तो सृष्टि से सम्पूर्ण प्राणियों का अस्तित्व ही समाप्त हो जाता।
एक कोशीय जीवों को प्रोटोजोन्स कहते है। इनके हाथ-पैर मुख आदि कुछ नहीं होते। एक नाभिक (न्यूक्लिस) होता है और उसके आस-पास ‘साइटोप्जाज्म’। अमीबा एक ऐसा ही प्रोटोजोन है। इसी की जाति का ‘पैरामीसियम’ नामक जीव जब थक जाते है और जीवन शक्ति बहुत कम पड़ती जाती है या बुढ़ाया अनुभव करते हैं, तब दो पैरामीसियम मिलकर एक दूसरे से साइटोप्लाज्म (एक प्रकार का द्रव सा होता है जिसमें पानी के अतिरिक्त गैसें, खनिज, धातुयें, लवण, पोटैशियम, फास्फोरस आदि विभिन्न तत्त्व होते हैं) अदल-बदल लेते है, इससे उनमें पुनः एक नई शक्ति आ जाती है। जबकि मनुष्य समाज अपने माता-पिता और बुजुर्गों का केवल इसीलिये तिरस्कार करते रहते हैं, क्योंकि वे शक्ति और आजीविका की दृष्टि से अनुपयोगी हो जाते हैं। प्रकृति हमें रख बुराई के विरुद्ध चेतावनी देती है और यह बताती हैं कि यदि मनुष्य स्वयं औरों से सहयोग सहानुभूति आदि प्राप्त करे तो उसे भी इस मानवीय सदाचरण का परिपूर्ण निष्ठा के साथ पालन करना चाहिये और अपनी प्रगति तथा सुख-शाँति का पच प्रशस्त करना चाहिये।
पढ़ाई के दिनों में गोखले को गुजारे के लिये बहुत कम पैसे मिलते थे। अकेले भाई ही उनकी सहायता करने वाले थे। एक दिन गोखले का धनी मित्र कहीं से नाटक के दो टिकट लें उनकी सहायता करने वाले थे। एक दिन गोखले का धनी मित्र कहीं से नाटक के दो टिकट ले आया और उन्हें भी नाटक दिखाने ले गया। दूसरे दिन शाम को फिर आया तो उनसे उस टिकट के पैसे माँगने लगा। गोखले को अपने मित्र के स्वार्थपूर्ण व्यवहार पर बड़ा खेद हुआ, साथ ही आश्चर्य भी।
गोखले ने मित्र से तो कुछ भी न कहा। जितने पैसे उसने माँग, उन्होंने चुपचाप निकालकर दे दिये। जब आखिर इस आकस्मिक व्यय के लिये अपने अन्य आवश्यक खर्चों में कटौती करनी थी। संकोचवश भाई को पत्र लिखकर और पैसे न मँगा सके। अतः कितने ही दिन तक गली में लगे नगरपालिका के लैम्प के प्रकाश में अपनी पढ़ाई करनी पड़ी और इस प्रकार उन्होंने शाम को लालटेन में जलने वाले तेल की बचत कर ली।
धर्म प्रचार के लिए भगवान् बुद्ध ने अपने प्रिय शिष्य कलम्भन को भेजते समय आशीर्वाद देकर कहा- “वत्स! संसार बड़ा दुःखी है, लोग अज्ञानवश कुरीतियों में जकड़े पड़े है, जाओ उन्हें जागृति का सन्देश दो, इससे बढ़कर और कोई पुण्य नहीं कि तुम उन्हें आत्म-कल्याण का मार्ग दिखाओ।”
कलम्भव ने तथागत की चरण धूलि मस्तक से लगाई और वहाँ से विदा हो लिया। दिन छिपने में अभी देर थी। कलम्भन एक गाँव पहुँचे। उसमें अनेक लोग कृशकाय बीमार पड़े थे। वहाँ की स्त्रियाँ मलिन वेष में पुरुषों के काम कर रही थी। बच्चों के शरीर सूख हुए थे। लगता था, इनको न भरपेट अन्न मिलता है और न बीमारियों से लड़ने को औषधियाँ। शिक्षा की दृष्टि से उनमें कोई चेतना दिखाई नहीं दे रही थी। सब स्लान, मलिन और दुःखी दिखाई दे रहे थे।
कलम्भन को अपनी सेवा का स्थान मिल गया। एक झोंपड़ी के सहारे अपना सामान टिकाकर वह विश्राम की मुद्रा में बैठ गये और सारे गाँव में यह समाचार फैला दिया- “भगवान् बुद्ध के शिष्य कलम्भन तुम लोगों के दुःख दूर करने आये है, तुम लोगों को मुक्ति का मार्ग बताने पधारे हैं।”
बिच्छू का विष शरीर में जिस गति से फैलता है, उसी विषमता से यह बात सारे गाँव में फैले गई। ग्रामीणों के हर्ष का ठिकाना न रहा। सबने कलम्भन के लिये विश्राम के लिए सुन्दर स्थान की व्यवस्था कर दी। रात बड़ी शाँति और प्रसन्नता में बीती।
प्रातःकाल बौद्ध-भिक्षु जब तक ध्यान, पूजन समाप्त करें, तब तक द्वार ग्रामवासियों की भीड़ से भर गया। कलम्भन बाहर निकले, वह रूढ़िग्रस्त, अशिक्षा और दारिद्रय से ग्रसित चेहरे देखते हो उनके मन में घृणा फैल गई पर उन्होंने उसकी कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की। आखिर धर्मोपदेश के लिये आये थे। इतनी सहिष्णुता भाग होती तो कौन उन्हें इस महान् कार्य के लिये भेजता।
सबको सामने बैठाकर कलम्भन ने प्रारम्भ किया- “वही धर्म शरणं गच्छामि, बुद्धं शरणं गच्छामि, संघ शरणं गच्छामि।” ग्रामीण-जनों की समझ में न तो धर्म आया न बुद्ध और न ही संघ। जैसे आये थे, बेचारे वैसे हो घरों को लौट गये।
कलम्भन ने एक नहीं शत-शत सभायें आयोजित की किन्तु ग्रामीण-जनों की निराशा दूर हुई न दारिद्रय बेचारे धर्म को समझने की स्थिति में होते तो अपनी स्थिति आप न समझ लेते।
कलम्भव हताश तथागत के पास लौटकर बोले- “निष्फल भगवन्! हमारा उपदेश कुछ काम नहीं लाया ग्रामीण-जनों ने एक भी बात-तो नहीं सुनी।” भगवान बड़ी देर तक सोचते रहे। फिर उन्होंने आचार्य जीवन और शिष्य सनातन को बुलाकर कहा- “देखो तुम उस ग्राम में जाओ, औषधि और शिक्षा का प्रबन्ध करो।”
तथागत की आज्ञा मानकर शिष्य सनातन और आचार्य जीवन वहाँ से चल पड़े। तब कलम्भन ने प्रश्न किया- भगवन्! आपने इन्हें तो धर्म उपदेश के लिये कहा ही नहीं। तथागत गम्भीर हो गये और बोले-समाज की प्राथमिक आवश्यकताओं और सुधार की भूल प्रक्रिया को अपनाये बिना धर्मोपदेश सम्भव नहीं। आज की आवश्यकता शिक्षा है, स्वास्थ्य है, कुरीतियों के जंजाल से मुक्ति हैं। अभी उन्हें जीवन की आशा चाहिये। आज जियेंगे तो कल सुनेंगे भी।
कलम्भन यह सुनकर बड़ा सन्तुष्ट हुआ और धर्मोपदेश के स्थान पर समाज सेवा के कार्यों में जुट गया।
तूतन खगेन में एक वृद्ध फकीर ने बहुत दिन तक धार्मिक सेवा की। वह जहाँ भी जाता भगवान् की उपासना, आस्तिकता, नेकनीयती, प्राणियों को न सताने, माँस आदि अभक्ष न खाने की शिक्षा दिया करता। सामाजिक जीवन में साधु को बड़ी प्रतिष्ठा प्राप्त थी। उनका सभी लोग हृदय से आदर करते और उनके निर्णयों को स्वीकार करते। मृत्यु के बाद उन्हें भावनापूर्वक एक कब्र में दफना दिया गया पर तब भी लोग उनके नाम पर न्याय और सत्कर्म की प्रेरणा प्राण करते रहते। विशेष अवसरों पर उनके लिए लोग उनकी कब्र के पास जाकर प्रार्थना भी किया करते।
मानते है धार्मिकता के बीच अन्ध-विश्वास के लिये बहुत स्थान है। ऐसे भी लोग हैं, जो लोगों की श्रद्धाओं का दुहा करते और अपनी स्वार्थ पूर्ति किया करते हैं, ऐसी दृंत्तियाँ जहाँ भी पनप रही हो, उनका विरोध करना चाहिये, किन्तु हम यह मानने के लिए विवश नहीं कि ऐसी मान्यतायें सब अन्ध-विश्वास ही होती है, अनेक ऐसी बात है जिनको वैज्ञानिक प्रयोगों द्वारा सिद्ध नहीं किया जा सका तो भी उसका अस्तित्व है, ध्वनि मौन दिखाई देती है, चुम्बक शक्ति को कितनी ही सूक्ष्मदर्शी (इलेक्ट्रानिक माइक्रोस्कोप) यन्त्रों द्वारा भी नहीं देखा जा सकता। हवा में धुली ईथर शब्द तरंगों को सेकेंडों में कहाँ से कहाँ पहुँचा देती है पर उसे कितने देखा हैं। कुछ वस्तुयें ऐसी है जिन्हें उद्भव किया जा सकता, देखा नहीं। भूत, अदृश्य आत्मायें देवता और परमात्मा का अस्तित्व भी इसी तरह एक स्वयं सिद्ध सिद्धान्त है, इनसे प्राणियों को अदृश्य और चमत्कारिक सहायतायें भी मिलती हैं, इसलिये यदि कोई उन पर श्रद्धा रखता है, कोई उन्हें पूजता है तो उसे पाखण्ड नहीं कहना चाहिये। संसार में सब कुछ अन्ध-विश्वास ही नहीं प्रस्तुत घटना उसी संदर्भ में हैं।
सन् 1922 ई॰ में डा0 ब्रेस्टड ने होवर्ड कार्टर, आर्थर बीगल, लार्ड कारन वर्ग आदि सामन्तों को वह कब्र उखाड़ फेंकने के लिए उत्तेजित किया। पूरा हल जब दरगाह पहुँचा तो समाचार-पत्रों के उक्ताओं ने उन्हें मना किया-सर! इस कब्र पर हम साँगोके विश्वास सुरक्षित है, आप इसे न उखाड़े हेवर्ड कार्टर ने उन्हें चमका कर कहा- “सह विज्ञान का युग है, वहाँ भावनायें, विश्वास और आत्मा एवं परमात्मा कुछ नहीं चमते। हमें इसका कुछ डर नहीं है। सिपाहियों तोड़ डालो इस कब्र को।” और आदेश के थोड़ी देर बाद ही सारी दरगाह व्यस्त पड़ी थी।
यह विज्ञान का युग है, इसमें धर्म, विश्वास, ईश्वर आत्मा आदि कुछ नहीं चलते।” यह कहना सरल है, उसे सिद्ध करना सरल नहीं। सापेक्षवाद के सिद्धान्त (ब्योरी आँफ रिलेटिविटी) का प्रतिपादन करते समय आइन्स्टीन जैसा महान् विज्ञान वेत्ता को भी यह मानना-पड़ा था कि सुनार में उच्च सत्ताये (सुपर पावर्स) भी काम करती है और उनका सोचना, करना सहायता पहुँचना या धकम करना सब कुछ विधि-विधान के साथ चमता रहता है। वह शक्तियाँ समय से नहीं हैं, उनके लिये एक एक सेकेंड की तरह है, इसलिये कर्मफल की बात हम नहीं पाते अन्यथा हमारे लिये छोटे से छोटे दुर्भाव नीर अपराध के लिए भी दण्ड निर्धारित है और हम उससे कभी बचकर नहीं निकल सकते। शक्ति प्रदर्शन कर सकते हैं। किसी का उत्पीड़न कर सकते हैं, उपहास है, छल-कपट, धोखा, बेईमानी, चोरी, व्यभिचार कर सकते हैं पर इनके दुष्परिणाम भी उतनी ईमानदारी से भुगतने पड़ते है, न्याय की दृष्टि से ईश्वरीय शक्तियाँ किसी को क्षमा नहीं करतीं। पाप का दण्ड भुगतना ही पड़ता हैं।
कब्र के साथ एक लकड़ी रखी थी, उसमें क्या कुछ कीटाणु है, इस वैज्ञानिक अनुसन्धान के लिये उसे गिलास में डालकर उबाला गया। पर अभी धाय धीमी तेज ही हुई थी गिलास एक धमाके के साथ फट गया और वैज्ञानिक यन्त्र प्रयोगशाला (लैबोरेटरी) में टूट-टूटकर बिखर गया 28 जून 1914 को कार एक शाही रंग-ढंग में अपने मालिकों को लेकर बोस्निया के गवर्नर के महल से निकली। युवराज फडिनेड अपनी धर्म पत्नी के साथ ऐठं और अभिमान के साथ उसमें बैठे थे। सेरोजेवो नगर अभी काफी दूर था कि बीच में ही हवा की तरह सनसनाता हुआ एक बम कार की बगल में आकर फटा। कार के साथ चल रहे चारों घुड़सवार अंग-रक्षक घायल हो गये। सिपाही आगे बढ़ने की स्थिति में नहीं थे पर अभिमानी युवराज ने उनकी मरहम पट्टी कराकर फिर आगे बढ़ने को कहा। सेराजेवों आ गया। का ड्राइवर शहर की एक-एक गली से परिचित था, किन्तु न जाने कैसे उसका हाथ अपने आप एक गलत गली में घूम गया। उधर एक मकान से एक युवक हाथ में में पिस्तौल लेकर लपका और कार का शीशा तोड़कर हाथ भीतर घुसेड़ कर गोलियाँ दागने लगा जब तक अंग-रक्षक उसे सँभाले शाही दंपत्ति के प्राण निकल चुके थे।
इस घटना ने ही आस्ट्रिया के महलों में युद्ध की ज्वाला भड़काई। युवक कोई दक्षिण पन्थी था, इसलिये दक्षिण पन्थी गुट पर सम्राट ने हमला बोल दिया। तब यह कार सेराजेवों के गवर्नर के महल में थी। इसी महल से 5 वीं आस्ट्रियन सेना के सेनापति जनरल पोत्योरेक ने युद्ध का संचालन किया। सेनापति ने वह कार अपने कब्जे में ली ठीक उसके 21 वें दिन वह युद्ध हार गया, उसे पदच्युत कर वापिस बुला लिया गया। इस सेनापति की मृत्यु बियना के एक भिखारी गृह में हुई। उसके बाद कार फाश्चामित्व पाया पोत्योरेक के ही एक कप्तान ने। किन्तु कार में चलते अभी नौ दिन ही हुये थे कि एक दिन उसने दुर्घटना कर दी। दो किपानों के कुचल कर कार एक पुलिया से जा टकराई और उसमें से कप्तान की जिन्दा नहीं मृत लाश निकाली गई। कार को गवर्नर के पास भेज दिया गया इस बीच युद्ध समाप्त हो गया और युगोस्लाविया का गवर्नर इस कार का मालिक बन गया। कार हाथ में आने के एक माह के भीतर उसने पाँच दुर्घटनायें कीं। अन्तिम दुर्घटना ऐसी जबर्दस्त थी कि उसमें गवर्नर का दाहिना हाथ ही जाता रहा। गवर्नर ने उस बदनाम कार को नष्ट-भ्रष्ट कर डालने की आज्ञा दे दी पर इसी बीच डा0 सरकिस नामक एक डाक्टर ने उसे कुल एक हजार रुपये खरीद ली। कार के साथ दुर्भाग्य की अफवाह चारों ओर फैल चुकी थी, इसलिये उसके लिये कोई ड्राइवर नहीं मिला। अन्त में सरकिस स्वयं ही उसे चलाने लगा और मुश्किल से तीन माह उसका प्रयोग कर सका था कि एक रात सड़क पर चलते समय कार न जाने कैसे लुढ़क गई। आज तक डा0 सरकिस लोगों को ताना मारा करता था, देखो कार कैसी अच्छी चल रही है, अन कहाँ गया उसका भूत, पर कल जब उसे कार से औंधा मरा बाहर निकाला गया तो उसकी लाश बिना प्राणों के पाई गई।
इस बार कार उलटी तो थी खराब नहीं हुई थी, इस लिये एक सोने-चाँदी के व्यापारी ने उसे खरीद लिया और खरीदने के कुछ दिन बार ही आत्म-हत्या करके मर गया। इसके बाद उसने एक और डाक्टर का स्वामित्व ग्रहण किया। डाक्टर ने उसे डरते-डरते खरीदा था, एम महीने में उसकी सारी कमाई पट्ट पड़ गई तो बेचारे ने डरकर आधी कीमत पर स्विट्जरलैंड में एक बार दौड़ जातियों गिता आयोजित की गई थी। इस कार वे उसमें हिस्सा लिया। दुर्भाग्य से वही कार ऐसी थी, धो एक दीवार से टकरा गई और अपने ड्राइवर को स्वर्गवासी बचाकर कर अकेली रह गई।
इस बार वह फिर सेरेजेवों लौट बाई। एक पर्ची किसान ने उसे खरीद लिया। अब तक वह रज चुकी थी, इसलिये शायद उसने पहचानने में भून की। एक दिन किसी यात्रा में कार बीच रास्ते में शराब हो गई और ऐसी जाम हुई कि अनेक प्रयत्नों के बाद भी वह इटाट नहीं हुई। आखिर हारकर दो बैलगाड़ियाँ किराये पर की वह जो रस्सों से खींचकर कार घर तक पहुँचा है। मोटे-मोटे रस्सों से कार बैलगाड़ी से बाँध दी गई पर अभी गाड़ी 10 गज की चल पाई थी कि इंजन अपने आप स्टार्ट हो गया। कार बेतहाशा भागी। गाड़ी को कुचल कर वह भी औंधी गिरी और अपने मालिक किसान को भी खा गई।
इस बार मेटर चकनाचूर हो गई थी पर दुर्भाग्य अभी भी उसके साथ बँधा रहा। इस बार उसे टाइवर हर्शफील्ड ने खरीद लिया और उसकी नये सिरे स मरम्मत कराकर स्वयं उसे जीतने लगा। कार ऐसी चलने लगी कि लोग भूल गय उसके साथ कोई दुर्भाग्य भी जुड़ा है। अदृश्य विधान होने के कारण लोग शीघ्र ही ऐसी बातें भूल जाते है पर सूक्ष्म शक्तियाँ भी तो अपने अस्तित्व के लिए विवश हैं। एक दिन हर्शफील्ड अपने 6 मित्रों के साथ एक भोज के लिये रवाना हुआ। सड़क पर कार तेजी से दौड़ी जा रही थी। एक मोड़ से गुजरते समय कार सामने से आती हुई दूसरी कार से टकरा गई। भिड़न्त बराबर की थी पर सामने वाली कार को काई नुकसान नहीं पहुँचा जबकि हर्शफील्ड अपने चार साथियों के साथ अपनी जान से हाथ धो बैठा केवल एक व्यक्ति ही उसमें जीवित बचा था।
अब सरकार चेती। उसने कार को अपने व्यय से ठीक कराकर आस्ट्रिया के एक मुर्दा अजायबघर को वे दिया गया। अब तक द्वितीय विश्व-युद्ध छिड़ चुका था। जिन दिनों कार अजायबघर पहुँची युद्ध के अन्तिम दिन थे। एक दिन दुर्भाग्य से उसी अजायबघर में कई बम गोले एक साथ फूटे जिसमें वह अजायबघर पूरी तरह ध्वस्त हो गया और वह ऐतिहासिक कार भी उसी के साथ गर्द में लीन हो गई। उसके साथ ही द्वितीय विश्व-युद्ध भी समाप्त हो गया।
इस घटना ने सारे योरोप में एक बार तहलका मचा दिया कि आत्मा में बड़ी जबर्दस्त शक्ति है, वह अभिशाप के रूप में किसी पर लग जाये तो कार की तरह ही सैकड़ों का विध्वंस करके ही छोड़ती है। उससे अनेक लोगों ने बुराई,पशुओं हिंसा और क्रूरता आदि बुराइयाँ छोड़ी थीं, और हजारों लोगों ने आत्म-परायणता, सेवा-भाव और सद्गुण अपनाना प्रारम्भ कर दिया था।
‘होप’ नामक हीरा भी इसी तरह यूरोप में अपने अमंगल के लिए बहुत विख्यात हो चुका है। वह जिसके पास भी रहा उसे चैन से नहीं रहने दिया। यह हीरा ब्रह्मा के किसी हिन्दू मन्दिर में भगवान् की मूर्ति में आँख में जड़ा हुआ था। 300 वर्ष पहले की बात हैं, वेपटिस्ट टवर्नियर नामक अँग्रेज उसे चुरा ले गया। उसने उसे एक जौहरी टामस होप को बेच दिया। उसी ने हीरे का नाम होप रखा। हीरे के पहुँचते ही उसका कारोबार बैठ गया। उसने घबड़ा कर उसे कम दामों में बेच दिया। बाद में वही हीरा वाशिंगटन (अमेरिका) की एक नवयुवती ईवसिलन मैकलीन रेनल्ड्लगे खरीदा और उसके कुछ दिन बाद ही उसने निद्रा की गोलियाँ अधिक मात्रा में लेकर आत्म-हत्प्रा कर ली।
इसके बाद हीरा एष्टायनट के पास पहुँचा। उसके पहुँचते हो उसके जीवन में झगड़ों की डाढ़ आ गई। अभी वह हीरे को बेचने की ताक में ही था, उसका सिर काट लिया गया। अब वह हीरा प्रिन्सेस दी लम्बल में पहना और उसकी भी हत्या कर दी गई। उसके पास से फास नामक एक जौहरी ने यह होराँ चुरा लिया उसने कुल सात दिन में आत्म-हत्या कर ली। तब फाँलीज बगर नामक एक ड्रामा करते समय वह हीरा पहना। रंगमंच (स्टेज) पर चढ़ते ही किसी ने उसे गोली मार दी। स्टाक मार्केट के प्रमुख उद्योगपति लाड फ्राँन्सिस होप ने यह हीरा लेकर अपनी सारी सम्पत्ति गंवा दी। तब वह पहुँचा अरब के सुल्तान अब्दुल हमीद के पास। उसे गद्दी से उतार दिया गया। तब उसे श्रीमती वाल्श मैकलीन ने खरीदा और उसी दिन उनका प्रिय पुत्र मोटर से कुचल कर मारा गया। इस तर यह हीरा भी सारे यूरोप में अपने अमहस के लिय सर्वत्र बदनाम हुआ।
उपरोक्त घटनायें यह बतातीं हैं कि मनुष्य अपनी दुष्टता के परिणाम और जीवनों में ही नहीं भुगतता वरन् वह हाथों हाथ भी दण्ड पाता हैं। चोरी, छल-कपट बेईमानी, बेइन्साफी के परिणाम समाज के लिए दुःखद होते हैं, व्यक्ति के लिये पतनकारी। इसलिये दोनों की हो भलाई इस बात पर टिकी है कि हम भावनाओं की शक्ति को मानें और इस संसार में बुरा कार्य करने का साहस न करें, अन्यथा किसी भी क्षण हम ईश्वरीय शक्तियों के कोप-भाजन बन सकते हैं।
आनी सहज सकरुण दृष्टि डालते हुए तथागत भगवान् बुद्ध ने पूछा-”अशोक! स्वस्थ तो है न? प्रजा के कोई कष्ट तो नहीं? पाटलिपुत्र पर भगवती गंगा का प्रकोप बढ़ रहा था, वह रुक गया या नहीं?”
और अशोक तब तक मौन थे, जब तक उन्होंने तथागत को प्रणिपात नहीं कर लिया। चरण धूलि मस्तक पर लगाकर वे भगवान् बुद्ध के समीप ही एक और बैठ गये। बैठते हुए तथागत के प्रश्नों का उत्तर भी दे डाला-”भगवत्! आपकी चरण रज जिस मस्तक पर कृपा बरसाँये उसके अनुगल की कामना तो भगवान् इन्द्र भी नहीं कर सकते। हम स्वस्थ है, प्रजा सुखी है, बाढ़ का जल राजधानी की सीमा रेखाओं का साश छोड़कर पीछे लौट गया है। सब ठीक है किन्तु। उससे आगे कुछ कहते-कहते वे एकाएक रुक गये। सम्भवतः उन्हें अपनी बात सर्वसाधारण के समक्ष व्यक्त करने में संकोच हो रहा था।
कहो, कहो अशोक तुम्हारी व्यग्रता का कारण क्या हैं? कौन-सी समस्या है, जिसने पाटलि-नरेश को विस्मय में डाला है। कहो! कुछ संकोच हो रहा हो तो एकाँत की व्यवस्था की जाये?
उपस्थित भिक्षु-भिक्षुणियों एवं सुदूर गणराज्यों से पधारे धर्म-तत्व जिज्ञासुओं पर अपनी दृष्टि दौड़ाते हुए पाटलि नरेश महाराज अशोक ने अपनी सम्पूर्ण दृष्टि भगवान् बुद्ध पर डालो और विनीत भाव से कहने लगे-”नहीं, देव। ऐसी तो कोई बात नहीं पर जो कुछ हुआ वह ऐसा भी नहीं जिस पर विचार न किया जाये। भगवन्। पाटलि पुत्र! अपने नागरिकों की चरित्र निष्ठा के लिये दूर-दूर तक विख्यात है। यहाँ की कुल वधुयें अपने शील वैभव की सब प्रकार से रक्षा करती हैं। इस देश में उच्छृंखलता का कहीं भी नाम-निशान तक नहीं है, त्यागी और तपस्वियों विद्वानों और तत्त्व-दर्शी सिद्ध पुरुषों का अभाव भी नहीं है पर जो कार्य किसी महान् धर्मनिष्ठ को पूरा करना चाहिये था, उसे शोल, सदाचार से सर्वथा रहित कोई नगर वधू करे इस विस्मय का समाधान नहीं हो पाता। इसी कारण आज आपकी सेवा में उपस्थित हुए हैं।
अभी तुम्हारी पूरी बात समझ में नहीं जाइ अंश के हुआ क्या हैं वह विस्तार से कहो-भगवान् बुद्ध ने उन्हें आश्वस्त करते हुये पूछा।
अशोक कहने लगे-”भगवन्! तीन दिन पूर्व भगवती भागीरथी ने अपना प्रचण्ड रूप धारण किया, नगरकोट की रक्षण दीवारें ही नहीं प्रधान दुर्ग का अस्तित्व भी संकट में पड़ गया। ऐसा लगता था वे इस बार सम्पूर्ण पाण्लि पुत्र को अपने जल आक्रोश में डुबो कर ही छोड़ेंगी। चरों मैं पानी भरने लगा। गायों, बछड़ों के लिए सूखा स्थान नहीं रहा, विकट परिस्थिति की आशंका से सभी लोग काँप गये।
तब राष्ट्राध्यक्ष के नाते मेरा यह कर्त्तव्य था कि उसे संकट से बचाने का कुछ उपाय कारूं। मैंने सभा-सचिवों से विचार विमर्श किया। पाटलिपुत्र में जो भी धर्मनिष्ठ एवं विचारशील लोग थे, सब की गोष्ठी बुलाई। लोगों ने बाढ़ के प्रकोप से बचने के लिये अपनी-अपनी तरह के सुझावे दिव यज्ञ,जप, तप साधन, व्रत और उपवास भी किया गये पर जल-राशि सुरसा के शरीर की तरह बढ़ती ही गई। कोई उपाय कारगर न हुआ।
महान् आश्चर्य-महाभाग कि उस संकट की घड़ी से जब कोई उपाय पाटलि पुत्र की रक्षा करने में समर्थ न हुये तो एक अनिश सुन्दरी नगर-वधू वहाँ आ पहुँची। सुन्दर सा नाम है उसका, मोग बिन्दुमती के नाम से पुकारते हैं। नगर के धन सम्पन्न काम चोलुप व्यक्तियों की वासना तृष्णा की पूर्ति ही उसकी आजीविका का आध्यम हैं। उसने जीवन में कभी तप नहीं किया। माल नहीं वेरी यहा तक कि उसने चरित्र निष्ठा, शील और सदाचार का महत्व भी नहीं समझा पर उसने तो धर्म-तत्त्व वेत्ताओं के सम्पूर्ण ऐश्वर्य पर पानी फेर दिया। भगवती गंगा के सम्मुख खड़ी होकर उसने अनन्त जल-राशि की आरती, मैंने उसे एक क्षण के लिये हो ध्यान-मुद्रा में देखा, इसके बाद जो कुछ हुआ, मुख पर लाते हुए भी लज्जा, आती है, देव।
हजार लोगों को भीड़ के सामने उसने भगवान् सूर्यदेव और आकाश को साक्षी बनाया और अश्रुपूरित गद्-गद् गिरा में मोली-”भगवती गगे! यदि मैंने सम्पूर्ण जीवन अपने कर्त्तव्य का पालन निष्ठा-भाव से किया हो तो अब अपनी जल-राशि समेट लो और मेरे देशवासियों को चैन की साँस लेने दो।”
एक बूँद, दो बूँद, तीन बूँद-बूँदों की अविरल झड़ी लग गई। उसकी आँखें बरसती रहीं, उस खारे जल ने मन्दाकिनी की पवित्र जसधार का स्पर्श मात्र किया था कि इनका प्रकोप अपने आप घट चला। देखते हो देखते भगवती गंगा ने अनधिकृत प्रदेश से अपना अम्बु-आलोड़ खींय लिया और अपनी चिर-धारा में वेगवती हो उठीं। योगी-सिद्धों और धर्म-तत्त्व वेत्ताओं की यह असमर्थता और शील रहित नगरबबू की विजय-ऐसा लगता है देय! कहीं प्रजा भ्रम में न पड़ जाये। लोग धार्मिक मर्यादाओं की अवहेलना न करने लगें। यही मेरी चिन्ता का कारण हैं।
भगवान् बुद्ध मुस्कराये, उन्होंने कोई उत्तर या समाधान नहीं किया। प्रिय शिष्य आनन्द को समीप बुलाकर कान में कुछ कहा और उस दिन की धर्म-सभी विसर्जित कर दीं। महाराज अशोक के आतिथ्य को सम्पूर्ण व्यवस्था करने के उपरान्त आनन्द कुछ भिक्षुओं के साथ पाटलिपुत्र की ओर जाते दिखाई दिये।
भगवान् बुद्ध इस समस्या का दया उत्तर देते हैं, यह जानने की सभी में प्रबल जिज्ञासा थी। इसलिये रात सब ने बेचैनी और प्रतीक्षा में व्यतीत की। प्रातःकाल हुआ, देवी ऊषा के आगमन होते ही कई चीवरधारी भिक्षु आश्रम की व्यवस्था में जुट गये। ऐसा लगता था, जैसे आज कोई बड़े धर्मोत्सव की तैयारी की जा रही हो। सभी अपनी दैनिक उपासनायें कर सभा-कक्ष में जुड़ने लगे। थोड़ी देर में सभा-भवन पूरी तरह भर गया। सम्राट् अशोक भगवान् बुद्ध के समीप बैठे।
एक भिक्षु ने सूचना दी भगवान् आनन्द पाटलिपुत्र से जा गये हैं, नगर वधू बिंदुमती उनके साथ ही हैं। अशोक चौके पर इससे पूर्व वे कुछ पूछें, भिक्षु भगवान् बुद्ध का सकेत पाकर बाहर निकल गया। थोड़ी ही देर में शिष्य आनन्द के साथ बिन्दुमती ने उस सभा-मण्डप में प्रवेश किया। उसका सौंदर्य उतना आकर्षक नहीं था, जितना स्वाभिमान। जीवन भर लोगों की वासना की पूर्ति करने वाली नासे के मुख-मण्डल पर भी इस प्रकार का सन्तोष और बरवन आकृष्ट कर लेने वाली गम्भीरता भिक्षुओं और अन्य सभासदों की गम्भीरता से कम न थी। भगवान् बुद्ध ने उसका स्वागत ठीक उसी तरह किया, जिस तरह स्वसुरालय से लौटी हुई पुत्री का स्वागत एक पिता भरे हुए हृदय से करता है। तथागत की आज्ञा से बिन्दुमती उनके पास ही बैठीं। सारी सभा में सन्नाटा छाया हुआ था।
भगवान् बुद्ध ने एक बार सारे सभासदों की ओर अध्ययन दृष्टि से देखा और फिर अत्यन्त करुण भरी दृष्टि से बिन्दुमती की ओर देखते हुए कहा-”पुत्री। पाटलिपुत्र के नागरिक और स्वयं सम्राट अशोक को विस्मय है कि तू भ्रष्ट, वासनालोलुप और दूसरों का बन हरण करने वाली वेश्या है। तुझमें वह कौन-सी शक्ति थी, जिसने भगवती गंगा को भी अपनी बाढ़ समेटने को विवश कर दिया।”
बिन्दुमती ने एक बार तथागत के चरणों पर दृष्टिपात किया और एक शक्ति-सी अनुभव करती हुई बोल-”वह मेरी नहीं’ कर्त्तव्य निष्ठा की शक्ति थी।”
अशोक ने पूछा-”कर्त्तव्य-निष्ठा की शक्ति तुझमें कैसे सम्भव है?”
बिन्दुमती बोली-”महाराज! मैंने आजीविका के लिये अपने शरीर का व्यापार किया है, वासना के लिये नहीं और अपने कर्त्तव्य का पालन पूर्ण निष्ठा के साथ किया। धनी, निर्धन, ब्राह्मण, शूद्र का भेदभाव किये बिना मैंने प्रत्येक ग्राहक को सन्तुष्ट किया है। जिसका धन लिया उसके साथ विश्वासघात नहीं किया, वरन् उसकी इच्छा से कुछ अधिक ही सन्तोष उसे प्रदान किया। यही मेरी सत्य निष्ठा है। जिसने गंगा जी को भी प्रभावित किया।”
और इससे पूर्व कि भगवान् बुद्ध कुछ कहें नृपति अशोक स्वयं उसके चरणों पर जा गिरे और बोले-”भद्रे! तुम्हारा कथन सत्य है। निश्चय हो अपने कर्तव्य का निष्ठा पूर्वक पालन करने से बड़ा और कोई धर्म नहीं है।
पिछले वर्ष अमेरिका के साय कोजाली जनरल (मनोविज्ञान सम्बन्धी पत्रिका) में एक घटना छपी वह इस प्रकार है-
किसी कालेज की एक स्नातिका अपनी माँ के साथ किसी परिचित के घर मिलने गई। माँ जब समवयस्क महिला मित्र से बातचीत करने में लग गई। उसमें लड़की की रुचि न लगी तो वह दूसरी ओर निकल गई। एक कमरे में बहुत सी पुस्तकों की लाइब्रेरी थी। उनमें से वह पुस्तक देखने लगी। तभी गृहस्वामी के वयस्क लड़के ने कमरे में प्रवेश किया और दरवाजा बन्द करके उसके साथ बलात्कार किया। सामाजिक अप्रतिष्ठा के भय से उस लड़की ने अपनी माँ को भी यह बात नहीं बताई, किन्तु मन में इस घटना का बुरा प्रभाव पड़ा। लड़की आत्म-हीनता अनुभव करने लगी।
जो लड़की पहले इती स्वस्थ और सुन्दर थी, उस पर इस घटना का मानसिक दबाव कुछ ऐसा पड़ा कि वह सब भी अकेली होती, यह घटना उसे बार-बार तंग करती, फलतः उसका स्वास्थ्य गिरने लगा और थोड़े ही दिनों में आँखों की ज्योति गिर जाने से चश्मा लेना पड़ा।
एक दिन कालेज में किसी लड़के के जन्म दिन की पार्टी थी। लड़के ने अपनी कक्षा के सब छात्रों को आमंत्रित किया था। समय हो रहा था, इसलिये लड़के-लड़के में वहाँ चलने की बात चल पड़ी। एक लड़की ने उस लड़की से चलने को कहा तो उसने कुछ तीखे स्वर में कहा-”मैं नहीं जाऊँगी, मैं पुरुषों से घृणा करती हूँ।”
पास खड़े एक लड़के ने यह बात सुन ली। लड़का योग्य और समझदार था, उसने अनुभव किया, बिना किसी कारण इस लड़की के अन्तःकरण में पुरुषों के प्रति घृणा नहीं आ सकती थी, सो उसने एकान्त में ले जाकर उसे सब कुछ सच-सच बता देने का आग्रह किया। लड़की ने संयोग वश कहें या साहस करके आत्माभिमान के साथ सब कुछ सब-सच बता दिया। लड़के ने इस दुर्घटना पर सहानुभूति व्यक्त करते हुए, प्रस्ताव किया कि यदि आपको आपत्ति न हो तो मैं आपके साथ विवाह करने के लिये तैयार है।
इससे लड़की का मानो सारा बोझ ही उत्तर दिया। वह अब तक जिस भय से भयभीत थी, उसे निराधार पाकर उसकी प्रसन्नता सहसा फिर जागृत हो उठी, उसने उस लड़के से सहर्ष विवाह कर लिया। थोड़े ही दिनों में न केवल उसका स्वास्थ्य पूर्ववत हो गया वरन् डाक्टरों ने यह भी कह दिया कि अब आपको चश्मा लगाने की आवश्यकता नहीं हैं।
उपरोक्त घटना की तरह आज के समाज में ऐसी सैकड़ों-हजारों घटनायें घटित रहती हैं, जिसमें युवक-युवतियाँ अपने नैतिक गुणों से निर जाते हैं और सारे जीवन भर के लिये आत्म-हीनता की गाँठें अपने मन में भर लेते हैं। आत्म-हीनता का बोझ किसी भी बोझ से अधिक कष्टदायक और विनाशकारी होता हैं। वह शारीरिक और मानसिक शक्तियों को तो नष्ट करता ही हैं, अनेक नई बुराइयों को भी चुपचाप करते रहने के लिये भी विवश करता हैं।
आत्म-हीनता के घातक दुष्परिणामों पर प्रकाश डालते हुए, प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक मैगडूगल ने उन्हें पाँच भागों में विभक्त किया है-1. सामाजिक, 2. शारीरिक 3. बौद्धिक, 4. नैतिक और 5. आत्मिक।
सामाजिक दृष्टि से आत्म-हीनता से प्रभावित व्यक्ति अपनी ही तरह से दूसरों को प्रभावित करता और दूसरों को भी बुरा बनाता हैं। एक चोर कई चोर तैयार करके मरता है। वेश्या-वृत्ति के कहीं शिक्षणालय नहीं है, खराब औरतें ही औरतों को दुष्चलन शिक्षा देती हैं। तस्कर व्यापार, मिलावट और रिश्वत-खोरी सिखाने के कोई संस्थान या विद्यालय नहीं हैं, यह पेशेवर बुरे व्यक्तियों द्वारा इसलिये सिखा दिये गये होते हैं, ताकि उनकी आत्म-हीनता डकी-छुपी रहे, पीछे वहीं परम्परायें बन जाती हैं।
आत्म-हीन व्यक्ति को दूसरी योग्यताओं का समाज के लिये कोई उपयोग नहीं हो पाता। उधर उनकी संख्या वृद्धि से अनेक समस्यायें और बढ़ती चली जाती हैं।
शारीरिक हानियाँ कई बार दिखाई नहीं देतीं पर क्योंकि कई बुरे स्वभाव के लोगों का मनोबल ऊँचा होता हैं और वे पाप को पाप मानते ही नहीं। ऐसे व्यक्ति कभी-कभी बीमार पड़ते हैं तो उन्हें मरणान्तक पीड़ा होती हैं पर जिन्हें अपनी भूल का इसी जीवन में असंभव हो जाना है, उनके शरीर में रक्त विकार, चर्म रोग खुजली दाद आदि बीमारियाँ हो जाती हैं। अधिक मानसिक दबाव पड़ने पर वही तपेदिक और राजयक्ष्मा का रूप ले लेते हैं। एक लड़के को चोरी करने के लिये विवश किया गया, साथ हो उसे यह भी बता दिया गया कि वह जहाँ रहता हैं, वहाँ के सब लोगों को पता चल गया है कि वह चोरी करता है, इससे लड़के के शरीर में बुरा प्रभाव पड़ा उसमें अस्थाई अन्धापन आ गया कि मेरी भूल लोगों ने उदारतापूर्वक क्षमा कर दी तो उसकी आँखों की बीमारी फिर ठीक हो गई।
बौद्धिक दृष्टि से आत्म-हीनता का पाप मनुष्य के विकास की बन्द कर देता है, क्योंकि उसे नई दिशायें प्राप्त करने के लिये मस्तिष्क ही काम नहीं करता। उसकी सारी बौद्धिक शक्ति पूर्वकृत बुराइयों को छुपाये रखने की चौकीदारी में ही लगी रहती हैं। उस व्यक्ति में अपने ही प्रति अविश्वास बना रहता हैं। वह क्रोधी और चिड़चिड़ा हो जाता हैं। मैलिनके लिप नाम की दिमागी बीमारी के कारणों का भी राँची और आगरे के अस्पतालों में पता लगा कर बताया गया कि उनका 90 प्रतिशत कारण कोई ऐसी घटनायें ही होती हैं, जिनसे उसकी आत्म-हीनता बढ़ती गई हो।
नैतिक दृष्टि से आत्म-हीनता ग्रस्त व्यक्ति चोरी, बदमाशी-व्यभिचार भी कर सकता हैं। वह दीन-दरिद्र भी हो सकता है और ऐसा उग्र भी कि कभी भी किसी का उत्पीड़न करने से न घबड़ाये। संसार की जितनी भी बुराइयाँ है, वह सब आत्म-हीनता का ही परिणाम हैं, इसलिये आत्म-हीनता स्वयं बुराई न होकर विज्ञान या आध्यात्मिक विषय बन जाता है और उसे धार्मिक महत्व देकर ही सुलझाया जा सकता है। सदन कसाई, अजामिल, अंगुलिमाल और फाजिल बिन कयाम जैसे दुर्द्धष व्यक्ति केवल धार्मिक महापुरुषों द्वारा ही सुधारे जा सके। शक्ति और दण्ड के सारे विधान उनके लिये असफल साबित हुये हैं।
आत्मिक दृष्टि के पाप और बुराइयों से ग्रस्त आत्म हीन व्यक्ति जीवन में कभी उल्लास और उन्मुक्त प्रसन्नता का आनन्द नहीं ले सकता, वह सद्गुण बरतते और अच्छा काम करते हुये भी शंका करता रहता है। आत्मालोचन की प्रवृत्ति से वह आप ही दुःखी रहता हैं। वह निराश रहता है और सारे संसार की प्रसन्नता दुःख और कष्ट का घर मानता है।
शारीरिक दबाव की अपेक्षा मानसिक तनाव कहीं अधिक भयंकर होते हैं। ऐसा व्यक्ति जिसकी आत्म-हीनता ने मत और मस्तिष्क को पूरी तरह जकड़ लिया, प्रायः आत्म-हत्या का अपराध वहीं करते हैं, शरीर रोग पर मन स्वस्थ हो तो भी मनुष्य बहुत सुखी रह सकता हैं। बीमारियाँ होते हुए भी मनुष्य शक्तिशाली और प्रसन्नता अनुभव करता हैं। उत्साह, प्रसन्नता आदि सभी संवेदनायें मिःस्रोत ग्रन्थियों (डक्टलेस ग्लैण्ड) से निकलने वाले हारमोन्स का फल होते हैं, उनका सम्बन्ध शरीर की रासायनिक रचना से न होना इस बातें का प्रमाण है कि मनुष्य के सुख-दुःख का कारण शरीर नहीं, मन होता है, यदि वह दबा हुआ रहे तो व्यक्ति प्रसन्नता कहाँ और कैसे अनुभव कर सकता हैं। इसके विपरीत मातायें कई-कई दिन कुछ खाती-पीती नहीं, सोती भी नहीं पर अपने बीमार बच्चे की देख-रेख करती रहती हैं, उस समय उनके से फूटने वाला प्रेम का प्रकाश शक्ति देता है, भावनाओं शुद्धता और पवित्रता ही सुख और प्रसन्नता और उन विकृत होना ही आत्म-हीनता और दुःख का कारण है।
इस दबाव को औषधि द्वारा दूर नहीं किया सकता। उनका शारीरिक और मानसिक दंड भुगत लेने बाद भी आत्म-हीनता की गांठें बनी रहती हैं, उनका ही तरह से निवारण हो सकता है, वह है “निष्कासन पश्चाताप की प्रक्रिया।
हम अपनी बुराई किसी भी विश्वास-पात्र व्यक्ति सामने सच्चे मनसे स्वीकार करें और उनके लिये निर्धारित किया जाये, उसे स्वेच्छा से ग्रहण करें तो जन्मान्तरों से जमी आत्म-हीनता की गाँठें उसी प्रकार साफ हो सकती हैं, उसे ऊपर की घटना में दिया गया है। हमारे धर्म में आत्म-शुद्धि के लिये निष्कासन को तप माना गया जो यह तप कर लेता है, उसके ईश्वर दर्शन और सहानुभूति के सब अवरुद्ध द्वारा खुल जाते हैं।
आचार्य बाराह मिहिर के शब्दों में “अपनी बुराइयां कार कर लेने वाला असाधारण व्यक्ति हो जाता हैं।” गौतम के अनुसार-”सत्य को स्वीकार कर ले वही प्राप्ति का अधिकारी होता हैं।”
निरुत्साहित पागलों का मनोविश्लेषण (साइको सिस) बड़ा उपयोगी सिद्ध हुआ है, उससे कई भयं- पागल भी ठीक हो गये हैं। ईसाई धर्म में भी यह प्रथा रविवार के दिन को प्रत्येक चर्च के पादरी ‘स्वीक्वरोक्त दिवस’ (कान्फेशनडे) के रूप में मनाते हैं, उस दिन चर्च में आने वाले सब ईसाई पादरी के सामने अपने मन के गुप्त सब अपराध स्वीकार करते हैं। चित्त हलका करने और भविष्य में शुद्ध सम्मान और सफलतादायक जीवन जीने को यह महत्त्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया हैं। जो अपने पाप प्रकट कर सकते हैं और स्वेच्छा से उनका दण्ड भुगतने के लिये तैयार हो सकते है, वहीं सन्त, वही महात्मा और महापुरुष भी बन सकते हैं। न बनें तो भी एक सफल और प्रसन्न जीवन तो वे जी ही सकते हैं। मनोवैज्ञानिक भी उसके लिये कुछ प्रयोग (प्रोजेक्टिव टेक्नोक्स) का व्यवहार करते हैं पर उसमें शत-प्रतिशत सफलता नहीं मिलती। आत्मा की पूर्ण शुद्धि और आत्म-हीनता के भार से बचने के लिये यह आवश्यक है कि अपने किये हुये पाप, बुराई, अपराध या गुप्त मनोभाव को आप प्रकट करें और उसका पश्चाताप भी बहादुरी के साथ आप ही करें।
बुखारा नगर के सहृदय राजकुमार को उसकी प्रजा जी-जान से चाहती थी, पर वहाँ एक ऐसा व्यक्ति भी था, जो राजकुमार की सदैव बुराई ही करता रहता था। दोष दर्शन की दृष्टि वाले व्यक्तियों को अच्छाई में भी बुराई नजर आती हैं। राजकुमार को सेवकों द्वारा सब कुछ पता लग गया था, फिर भी वह शाँत रहा और एक दिन मन ही मन काफी देर तक सोचता रहा।
अगले ही दिन शाम के समय राज्य का एक नौकर उस व्यक्ति के द्वार पर पहुँच कर बोला-”भाई! तुम राजकुमार की बहुत याद करते रहते हो, उन्होंने प्रसन्न होकर एक बोरी आटा, एक थैली साबुन और थोड़ी-सी शकर उपहार में भेजी हैं।”
उसकी प्रसन्नता का क्या ठिकाना! गर्व से फूला न समाया। वह अब अच्छी तरह समझ गया कि यह वस्तुयें राजकुमार द्वारा उसे सम्मानित करने के लिए भेजी गई है। वह दौड़ा-दौड़ा पादरी के पास गया और बोला-”अब तो राजकुमार भी मेरी सद्भावनायें प्राप्त करने के इच्छुक हैं, तभी तो उन्होंने यह सब कुछ मेरे लिए भेजा हैं।”
पादरी ने कहा-”सचमुच राजकुमार बहुत ही चतुर है, उसने तुम्हें सारी बातें इशारे। से समझाने का प्रयत्न किया है पर तुम तो बुद्धि का प्रयोग ही नहीं करना चाहते। जरा विवेक-शीलता से काम लो, आटा तुम्हारे खाली पेट के लिये हैं, साबुन तुम्हारे दुर्गन्ध युक्त गन्दे शरीर के लिए है और शकर तुम्हारी जवान को मीठा बनाने के लिए हैं।”
अमेरिका के एक वैज्ञानिक श्री मार्सटन बेट्स ने भविष्य वाणी को हैं, “यदि अगली शताब्दियों में विश्व की जन-संख्या वर्तमान गति से ही बढ़ती रही तो विश्व के कुल जन-समूह का वजन उतना हो जायेगा, जितना कि पृथ्वी का वजन है। अर्थात् पृथ्वी का भार दूना हो जायेगा।”
यह-नक्षत्र जिस गुरुत्वाकर्षण बल के सहारे आकाश में स्थिर हैं उसका कम या अधिक होना उनके भार से भी सम्बन्ध रखता है। भार बढ़ने के साथ गुरुत्वाकर्षण बल ढीला पड़े और पृथ्वी अपने कक्ष से खिसक कर कहीं और जा लगे तो कोई आश्चर्य नहीं।
डा0 वेट्स के अनुसार 1960 में विश्व की जनसंख्या तीन अरब तीस करोड़ थी, अमेरिकी जनसंख्या अध्ययन ब्यूरो द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट में कहा गया है कि विश्व की जनसंख्या प्रतिवर्ष 6 करोड़ पचास लाख बढ़ रही हैं। 1950 तक 4 अरब 30 करोड़ और सन् 2000 तक वह 6 अरब अर्थात् 1960 से दूनी हो जायेगी। अकेले चीन को संख्या तक एक अरब 50 करोड़ होगी और यदि महामारी युद्ध जैसी विभीषिका न आई और भरण-पोषण के साधन-उपलब्ध होते रहे तो भारतवर्ष की ही जनसंख्या 1 अरब हो जायेगी।
ईसा से आठ हजार वर्ष पूर्व सारे संसार में कुल लगभग 25 लाख लोग थे। उस समय न कोई अकाल का भय था, न महामारी का। पृथ्वी का वातावरण शुद्ध था, खाने को प्रकृति ही इतना दे देती थी कि कृषि आदि में व्यर्थ परिश्रम न करना पड़ता था। लोग देशाटन और ज्ञानार्जन का आनन्द लेते थे। जैसे-जैसे जनसंख्या बढ़ी जटिलता बढ़ती गई और उसी अनुपात से स्वास्थ्य, आरोग्य, आजीविका, संरक्षण, खाद्य पदार्थ, निवास-स्थान, शिक्षा, सामाजिकता, अपराध आदि समस्यायें भी बढ़ती गई। आज तो जनसंख्या वृद्धि के कारण सारा संसार ही एक समस्या बन गया है।
ईसा जन्मे तब लगभग 30 करोड़ जनसंख्या थी। 1750 में दुगुनी से भी अधिक 75 करोड़ के लगभग हो गई। 1850 में 110 करोड़ लोग इस पृथ्वी पर आ चुके थे, 1900 ई॰ में 160 करोड़ की जनसंख्या थी। 1920 में 181 करोड़, 90 लाख और 1940 में 224 करो 60 लाख। 1961 में यह संख्या बढ़ कर 306 करोड़, 90 लाख हो गई। जनसंख्या की यह बढ़ोत्तरी कम होने का नाम नहीं लेती, पृथ्वी में अधिक से अधिक 1600 करोड़ जनसंख्या का भार उठाने की क्षमता हैं। इससे एक छटाँक वजन भी बढ़ा तो पृथ्वी रसातल को चली जायेगी। अर्थात् प्रलय हो जायेगी।
संयम न बरता गया तो यह स्थिति अधिक दूर नहीं। ‘1.9’ यह संख्या लिखने में जितना समय लगा, उतनी देर में 1.9 नये बच्चों ने जन्म ले लिया। अब अनुमान करें यह पूरा लेख लिखने तक ऊपर के दिये सब आँकड़े बदल जायेंगे। एक मिनट में 225 बच्चे जन्म लेते हैं, एक घंटे में उनकी संख्या 225*60=13500 हो जाती हैं। इस हिसाब से एक दिन में 13500*24=324000 होनी चाहिये पर बढ़ोत्तरी इससे भी अधिक होगी, क्योंकि अधिक से अधिक 20 वर्ष में यह बच्चे भी बच्चे पैदा करने लगते है, अर्थात् वृद्धि का क्रय चक्रवृद्धि ब्याज की दर से बढ़ती हैं। पहले प्रतिदिन वृद्धि का औसत 1 लाख 36 हजार 986 था। 1 घन्टे में 5 जहार 708 और 1 मिनट में 95 आदमी बढ़ते थे, उस हिसाब से 1975 में 382 करोड़, 80 लाख, सन् 2000 में 680 करोड़, 2050 ई॰ में 1300 करोड़ एवं 2034 में 1600 करोड़ हो जाने को थी पर अब 225 बच्चे प्रति मिनट पैदा होते हैं, यह पहले औसत से दो गुने से भी अधिक हैं, अर्थात् जनसंख्या से जो विस्फोट 100 वर्ष बाद होने वाला था, वह अब इसी शताब्दी के अन्त में हो जाये तो कोई आश्चर्य नहीं।
ब्राजील में एक ऐसी चींटी पाई जाती है, जो कृषि पर निर्भर रहती हैं। सामान्य चींटियों की तरह यह दूसरों की कसाई पर निर्भर नहीं रहती। यह कुछ पेड़ों से गिरी पर टूटी हुई पत्तियाँ ले आती है और उन्हें अपने बिल में रखती हैं। किसान जिस तरह अपने खेतों को अच्छी तरह जोतता, घास-फूस निकाल कर बीज बोता है, उसी प्रकार वह चींटियां भी इन पत्तों का भली प्रकार निरीक्षण करती हैं, कहीं कोई कीड़ा या रोगाणु तो नहीं हैं। यदि पत्ता अच्छा हुआ तो वे इसमें एक विशेष प्रकार की फफँद बोती हैं। वेदा की हुई इस फफूँद से ही इनका आहार चलता हैं। चींटी में स्वावलम्बन के साथ गुण-दोष विवेचन की क्षमता आश्चर्यजनक है।
यदि कोई चींटी बँटवारा करना चाहे तो जिम्मेदार चींटियाँ उसके लिये नया बिल ढूँढ़ देती हैं। उसे विदा करते समय उन्हें यह ध्यान रहता है कि कहीं इसे आहार के अभाव में भूखों न मरना पड़े इसलिये ये फफूँद का एक कण भी उसे देती हैं। इस कण को लेकर चींटी दूसरे बिल में जाती हैं और वहाँ अपनी कृषि जमार सुखपूर्वक रहने लगती है। तुच्छ जीव में मनुष्य से बढ़क विवेक भी कम विस्मय बोध नहीं।
प्रसिद्ध वैज्ञानिक फ्रिश के शिष्य डा0 लिंडावर ने मधु-मक्खियों का बहुत दिन तक अध्ययन किया और बताया कि उनकी प्रवृत्तियाँ मानव-जीवन की गतिविधियों से विलक्षण साम्य रखती हैं। जिस प्रकार घर के मुखिया के आदेश पर घर के सब काम व्यवस्थापूर्वक चलते हैं, उसी प्रकार मधु-मक्खियों में एक रानी मक्खी होती है, छत्ते की सारी व्यवस्था का भार उस पर ही होता है। छत्ते के सब निवासी उसके निर्देशों का अच्छी प्रकार पालन करते हैं। इन मक्खियों में विभाग बँटे हुए होते हैं, कुछ मजदूर होती हैं, जिनका काम छत्ते को बनाना, टूट-फूट जोड़ना, छत्ते में कोई मर जाये, उसे वहाँ से ले जाकर श्मशान तक पहुँचाना यह सब काम मजदूर करते हैं। कुछ सैनिक मक्खियाँ होती हैं, इनका काम है रानी मक्खी और छत्ते की बाहरी आक्रमणकारियों से सुरक्षा। मनुष्यों की फौज में कुछ सिपाही कायर और डरपोक हो सकते हैं, किन्तु यह दुश्मन के संघर्ष में अपने प्राणों की भी परवाह नहीं करतीं। ये उनसे मृत्यु पर्यन्त लड़ती हैं। कुछ मक्खियों का काम फूलों से पराग लाना और उससे शहद बनाना होता हैं। इस तरह जिसको जो काम मिला होता है, वह वही काम दत्त-चित्त करती रहती हैं।
छत्ते में दूसरी रानी मक्खी पैदा हो जाती हैं तो उसके लिये परिवार न्यारा कर दिया जाता है। रानी मक्खी अपने लिये उपयुक्त स्थान की खोज में चलती है पर वह एक दिन में नहीं मिल जाता। रानी मूर्ख नहीं होती, वह यद्यपि नन्हा-सा कोट ही हैं। कुछ समय के लिये वह किसी पेड़ पर बसेरा डाल लेती है और अपने सभासदों को आदेश देती है कि वे ऐसा स्थान ढूँढ़े जहाँ ज की समुचित मात्रा उपलब्ध हो, पराग के लिये फूल और घना जंगल हो तथा स्थान ऐसा हो जहाँ छत्ते की नींव जमाने में दिक्कत न हो। आमतौर पर यह जहाँ पहले छत्ते लगे होते हैं, उन स्थानों पर ही नया छत्ता बनाते हैं, उससे मोम की दीवार वृक्ष से चिपकाने में सुविधा रहती हैं।
स्थान के चुनाव में कई बार इनमें मतभेद हो जाता हैं। यदि दो-चार मक्खियों में ही विरोध रहे तब तो वे स्वयं अपनी भूल मानकर छत्ते में मिल जाती हैं पर यदि मतभेद इतना हो कि दो दलों में विभक्त होने की स्थिति आ जाये तो रानी मक्खी अपनी समझदारी से काम लेती है, वह जिस पक्ष को उचित मानती है, उसे लेकर नये स्थान में चली जाती हैं और बात में अपने विशेष दूत भेजकर अपने बिछुड़े साथियों को भी वहाँ बुला लेती हैं। इस स्थिति में विरोधी पक्ष चुपचाप चला आता है और अपने दल में सम्मिलित होकर काम करने लगता है। डाक्टर लिण्ड्वर के अनुसार मक्खियों में इससे भी विलक्षण मानसिक गतिविधियाँ चलती हों तो कोई आश्चर्य नहीं।
यह दो उदाहरण इसलिये दिये गये है, कि मनुष्य यह बुद्धिमान ले कि न्याय, नीति, ईमानदारी, विकास आदि की बौद्धिक क्षमतायें केवल उसे ही मिली हैं, जीवों में जीव अति सभ्य संसार में रहने का दावा कर बैठें तो उनकी बात को असत्य सिद्ध करना कठिन हो सकता हैं। यह उदाहरण इस बात के प्रतीक है कि संसार के सम्पूर्ण जीवों में व्याप्त आत्म-चेतना एक ही हैं। सबमें एक ही प्रकार की न्यूनाधिक नई-नई प्रवृत्तियाँ पाई जाती हैं। मनुष्य केवल इसलिये अपवाद है कि उसमें प्रत्येक जीवन की सम्भावनायें विलक्षण रूप से भरी गई है। वह अपने आप में एक स्वतंत्र सत्ता है, इसलिये उसे यह सोचने, समझने का अवसर मिलता है कि हमारे जन्म का उद्देश्य क्या हैं और उस उद्देश्य को कैसे सार्थक किया जा सकता हैं।
प्रो0 जे0 बी0 एस॰ हास्डेन का कथन है-”एक लाख वर्ष पूर्व कोई ऐसा एकाकी मनुष्य का जोड़ा था, जो अकेला एक ही था, उसी के आज के सम्पूर्ण मनुष्यों का आविर्भाव हुआ हैं। हम सब मनुष्य दूर के रिश्ते में सगे भाई हैं और सगे भाइयों जैसा व्यवहार ही हमें करना चाहिये।” और आगे तत्त्व-दर्शन की ओर बढ़ें तो डा0 हाल्डेने के ही मतानुसार आज से लगभग 7000 लाख वर्ष पूर्व पृथ्वी में कोई एक प्राणी था, चाहे तो वह प्रोटोजोआ (एक कोशीय जंतु) था या फिर कोई आत्म-चेतना सम्पन्न प्राणी, उसी से सृष्टि के सम्पूर्ण प्राणियों का आविर्भाव हुआ। इस तरह में मात्र मनुष्यों में ही भाई चारे का सम्बन्ध नहीं देखना चाहिये वरन् सम्पूर्ण प्राणियों में एक ही आत्म-चेतना का परिष्कार देखना चाहिये। सम्पूर्ण प्राणियों के प्रति मैत्री, करुणा और आत्म-भाव तत्त्व-दर्शन का वह सिद्धान्त है, जो हमें शीघ्र ही ईश्वर से मिला देता है, जब सब अपने ही भाई-बन्धु, नाती-पोते, पिता-बाबा, माँ-बहन, बुआ-भतीजे है तो किसके साथ छल-कपट, अनीति और अन्याय किया जाये।
अपने परिवार के लिये हम अपनी आजीविका का 99 प्रतिशत भाग लगाते हैं और थोड़ा-सा अपने लिये रखते हैं, क्योंकि हमें अपने प्रियजनों की सेवा से सुख सन्तोष मिलता है। यदि इस दायरे को बढ़ाकर हम प्राणिमात्र के प्रति आत्म-भावना और समता का विस्तार कर ले और उसे समष्टि भाव से निष्ठापूर्वक पूरा करते रहें तो यह निश्चय है, कि हमारे सुख-सन्तोष और आनन्द की सीमा भी बड़ी हुई होगी। प्रेम का पूरा आनन्द एक दो के साथ प्रेम-भाव से ही नहीं मिल सकता, उसका जितना अधिक विस्तार कर सकते हैं, अर्थात् घृणास्पद से भी यदि प्रेम करने का स्वभाव विकसित कर पायें तो अपने जीवन में बहुत अधिक आनन्द और आल्हाद की अनुभूति कर सकते हैं।
इस विचारणा का आधार यह है कि सम्पूर्ण जीव जगत् एक ब्रह्म से स्फुरित हुआ है। इसी का नाम तत्त्वदर्शन हैं। सनातन धर्म और संस्कृति का विकास इस तत्त्वदर्शन से विकसित होने के कारण ही वह अकाट्य हैं। हमारे भारतीय धर्म ग्रन्थ कहते हैं-”प्रारम्भ में एक हूँ बहुत हो जाऊँ। उसकी इस इच्छा शक्ति ही का विस्तार आप-नेक ब्रह्मांड और अनेक जीव-जन्तुओं में दिखाई देता हैं। सम्पूर्ण विविधता में भी वह एक ही अविनाशी अक्षर तत्त्व समाया हुआ है- ‘बहुनामह एक मैव संसार में जो कुछ दिखाई देता है, उस सबमें एक मैं हीं चेतन रूप से स्यात हूँ। जब हम इस बात को समझ लेते हैं, तब हमें प्राणियों के साथ व्यवहार के लिये ही एक नया दृष्टिकोण नहीं मिलता वरन् मनुष्य जीवन की वर्तमान गति-विधियों को भी हम दोष पूर्ण देखने लगते हैं और यह मानने को विवश होते हैं कि हमारे जीवन में जो अभाव, अशक्ति और अज्ञान है, उसे भौतिक पदार्थों से नहीं दूर किया जा सकता वरन् आत्मा को विराट्-परमात्मा बना कर ही हम कष्टों से मुक्ति और सच्चे आनन्द की उपलब्धि कर सकते हैं।
योगवाशिष्ठ, गीता आदि ग्रन्थों में सम्पूर्ण जीवों में एक ही शक्ति और चेतन सत्ता के विद्यमान होने के वैज्ञानिक रहस्यों पर विस्तार से प्रकाश डाला हैं। पैंगलोपनिषत् में ब्रह्म के द्वारा सृष्टि रचना पर बड़ा सूक्ष्म प्रकाश डाला गया है और बताया गया है कि एक ही तत्त्व किस प्रकार विभिन्न जीव और पदार्थों का अस्तित्व धारण करता चला गया। पैंगल ऋषि महर्षि याज्ञवल्क्य के पास जाते हैं और तप करते हैं। 12 वर्ष तक तप करने से जब उनकी आत्मा शुद्ध हो जाती हैं, तब वे महर्षि से कहते हैं-’परम रहस्य कैवल्य मनुब्रूहीति पप्रच्छ भगवन् आप मुझे परम रहस्यकारी ‘कैवल्य’ का उपदेश करें। महर्षि याज्ञवल्क्य ने उन्हें बताया सृष्टि के आदि में केवल सत् ही था। वहीं नित्य, मुक्त, अविकारी, सत्य, ज्ञान, आनन्द से पूर्ण सनातन एक मात्र अद्वितीय ब्रह्म है, उसी से लाल, द्वयेत कृष्णा, गुण वाली प्रकृति उत्पन्न हुई और यह चराचर जगत् बन गया।
शेर बहुत हिंसक जन्तु हैं, किन्तु समझ, सौंदर्य और वात्सल्य जैसे गुण उसमें भी विद्यमान हैं। वे अपने पारिवारिक जीवन में बहुत निष्ठावान होते हैं। आजन्म गृहस्थ जीवन की मर्यादाओं का पालन करते हैं और सभी पत्नियाँ एक बार प्रणय सूत्र में आबद्ध होने के पश्चात् अपने पति के साथ सम्बद्ध बनी रहती हैं। शेर और शेरनी का कदाचित ही कभी तलाक होता हैं। बच्चों को वे दोनों मिल-जुलकर बड़े लाड़-चाव से पालते हैं। प्रसिद्ध जीव शास्त्री श्री सलीम आलिम ने अनेक जीवों के अध्ययन के बाद बताया कि ब्रिटेन में पाये जाने वाले अधिकाँश छोटी पक्षी एक पत्नी व्रत जीवन-यापन करते हैं। यूरोप में पाया जाने वाला स्टारलिंग जो एक प्रकार से मैना ही आकृति का पक्षी है, दिसम्बर से महीने में इसके विनाश के दिन होते हैं, कई बार तो आधे स्टारलिंग तक मर जाते हैं, उनमें से कईयों के जोड़े चुके होते हैं। इस आघात हो सहन करना और प्रेम विहीन जीवन-यापन करना स्टारलिंग के लिये कठिन पड़ता हैं, इन दिनों उनका विलखना देखकर भावुक मनुष्यों से भी ऊँची इनकी मनःस्थिति प्रतीत होती हैं।
हमारे देश में पाये जाने वाला बनया पक्षी दाम्पत्य-जीवन में निष्ठावान् नहीं रहता और इस भूल का दण्ड भुगतता है। वह कई-कई विवाह करके अपने घोंसले में बहुधा कई-कई धर्म-पत्नियाँ ले आता हैं और फिर उसकी पत्नियों में परस्पर द्वेष-भाव, मार-पीट, काट-कलह होती हैं, उस मार-घाड् में उसकी भी काफी मरम्मत होती रहती हैं और क्या अपनी भूल पर पछताता रहता हैं।
यह उदाहरण जहाँ यह बताते हैं कि मनुष्य जैसी बुद्धि शीलता, चतुरता संसार के सब प्राणियों में होने से ये सब एक ही जाति के जीव हैं, सब आत्मा के अंश है और उन्हें एक ही सार्वभौम नियम का पालन कर सुखी रहने और तोड़ने पर दुःख पाने को बाध्य होना पड़ता हैं।
डा0 जे0 बी0 हक्सले चिड़ियों के जीवन के अध्ययन में बड़ी रुचि रखते थे। एक विलायती पक्षी कमटी का विवरण देते हुए उन्होंने लिखा-”यह चिड़िया असन्त आगमन पर विवाह की तैयारी करती हैं। नर एक स्थान पर बैठकर गाना गाता हैं। वह पेड़ों की टहनियाँ आदि एकत्रित करके रखता हैं और यह दिखाने का प्रयत्न करता हैं, मानो उसे उपार्जन, संरक्षण एवं गृहस्थ-निर्माण की कला की समुचित उपलब्ध हैं। मनुष्य को भी तो विवाह से पूर्व अपनी क्षमता की ऐसी ही परीक्षा कर लेनी चाहिये, यदि उसमें उतनी योग्यता न हो तो विवाह की जिम्मेदारी बहन करने का दुस्साहस नहीं ही करना चाहिये।
मनुष्य मादा कीमटो नर के पास के गुजरती है और उसकी योग्यता परख लेती है, तभी उसका प्रणय स्वीकार करती हैं। कई दिन मादा परखती रहती है, कहीं उसे झूठे प्रलोभन तो नहीं जा रहे हैं। जब पूरा विश्वास हो जाता हैं, तभी नर-मादा दोनों मिलकर घोंसला बनाते की तैयारी करते हैं। अण्डे सेने का काम भी दोनों मिल-जुल कर बारी-बारी करते हैं।
ऐसे सैकड़ों उदाहरण हैं, जो यह बताते हैं कि संसार में भी विविधता है शरीर और प्रकृति की हैं। चेतना सबमें एक है मनुष्य की यदि कुछ विशेषता है तो यही कि वह उसमें विवेक भी है और वह अपनी चेतना को समझने और उसे सम्पूर्ण प्राणियों की आत्म-चेतना के साथ जोड़ते हैं, यदि वह इस उद्देश्य को पूरा कर लेता है तो इसी नर शरीर से नारायण जैसी पूर्णता में परिणत सकता हैं।
दिन ढला और उसके साथ ही कवष की सम्पूर्ण आशायें भी ढल गई। प्रातःकाल जब वह धूत-क्रीड़ा के लिये बैठा था तब उसकी उमंगों का कोई ठिकाना न था। दिन भर जन्म और मृत्यु की तरह हार और जीत के ज्वार भाटे आते रहे और कवष उनमें कागज को नाव की तरह तिरता-उतराता रहा, अन्ततः पासे ऐसे पलटे कि नाव झकझोरे पर झकझोरे खाती चली गईं। सूर्यदेव के अस्त होने की तरह वह भी पराजय के अनन्त सागर में डूब गई।
हारे हुये जुआरी की दैन्य दशा भी उपमा दी जाती है, फिर जो सचमुच अपना सब कुछ जुये में ही हार गया हो उसकी दीनता का तो कहना ही क्या? कवष के लिये आज का दिन और दिनों की तरह न था। पहले भी वह कई बार हारा था पर तब तक उसके पास साधनों का अभाव नहीं हुआ था। आज तो उसने अपनी सम्पत्ति के नाम का एक तिनका तक न छोड़ा था। जुआरी की क्या दुर्दशा होती है, यह उस दिन कोई कवष से पूछता तो वह सम्भवतः सबसे अच्छा और प्रभावोत्पादक आस्थान प्रस्तुत करता पर स घड़ी तो उसके लिये यह संसार उस श्मशान की तरह लग रहा था, जिसमें पच्चीसों शव एक साथ दाह किये गये हों और अब वहाँ श्रृंगाल, भेड़ियों के अतिरिक्त और कोई भी शेष न रहा हो।
कवष ऐसी व्यक्ति मनःस्थिति में चर की ओर चला तो मार्ग में ही उसे अपना पुत्र पड़ा मिल गया। ज्वर से पीड़ित किशोर बालक को औषधि मिलना तो दूर आज लगातार पांचवें दिन आध पाव दूध के भी दर्शन न हुये थे। इस आशा से वह वन की और चला था कि वहाँ आमला और गूलरें मिल जायेंगी, उनसे वह अपना पेट भी भर लेगा। भूखी बहन और पीड़िता माँ के लिये भी कुछ फल लेता आयेगा, किन्तु टूटी काया ने साथ ही नहीं ही नहीं दिया। गाँव से बाहर आते ही बालक मूर्छित भूमि पर गिर पड़ा।
कवष को पुत्र की करुणाजनक स्थिति का उतना दुःख नहीं हुआ, जितना अपने अधःपतित जीवन का पश्चाताप। पंतप्त हृदय से बच्चे को गोद में उठाकर कवष घर पहुँचा तो वह घर जो आज से दम वर्ष पूर्व सावन के खेतों की तरह लहलहाता दृष्टिगोचर होता था, ज्येष्ठ की तपती नहीं रह जाती। ज्वाला ही ज्वाला, तपन ही तपन। पत्नी हाहाकार से भर गया।
उसने एक मिट्टी के फूटे बर्तन से थोड़ा जल लिया। चुल्लू भरी, आँख मूँदी ऐसा लगा उसने कुछ कहा और वह जब धरती में छिड़क दिया। धरती माता के पाँव स्पर्श कर कवष ने अपनी भूखी पत्नी-पुत्र और पुत्री को जल पिलाया उन्हें लिटाकर एक ओर चुपचाप निकल गया।
कवष बदल गया। दूसरे दिन सारे गाँव में चर्चा फैल गई- ‘‘कवष का हृदय परिवर्तन हो गया हैं।” इसके बाद उसे कभी किसी ने जुआ खेलते, माँस खाते न देखा।
ईलूष का पुत्र कवष शूद्र योनि में जन्मा था। उसमें वह सभी दुर्गुण थे, जिनके कारण उस युग में ब्राह्मण कुल में उत्पन्न व्यक्ति को भी शूद्र ठहरा कर उसे बहिष्कृत कर दिया जाता था। यह भी था कि जो इस प्रकार अन्त्यज श्रेणी से अपने आपको उठाकर श्रेष्ठ आचरण करने लगते थे, वह शूद्र भी उच्च वर्ण में ले लिये जाते थे।
कवष ने निश्चय कर लिया, अब वह सारे बुरे कर्म धो डालेगा और अपनी आत्मा को निर्मल बनाकर एक सद्गृहस्थ का जीवन जियेगा। उसके इस संकल्प में इतनी शक्ति थी कि वेदव्यास को उसके इस निर्णय को ऋग्वेद की ऋचा के रूप में स्थान देना पड़ा। अच्छाई का अनुकरण करने वाले हजारों लोग होते हैं। कवष के इस आदर्श ने सैकड़ों लोगों के हृदय बदल डाले। उसके इस आदर्श का सर्वत्र सम्मान किया गया।
अप्रतिम सामाजिक सम्मान और ऋग्वेद के ऋषिमण्डल में अपना स्थान बनाकर कवष को वैसे ही अहंकार हो गया, जिस प्रकार वर्षा ऋतु में छोटे-छोटे नाले-नदों का रूप धारण कर इतराते हुए, वह निकलते हैं। ऋषियों ने एक परम्परा बनाई थी कि जो अपनी निष्ठा को अधिकतम बलवान् सिद्ध कर सकता हैं और अन्तिम सिद्धि प्राप्ति तक साधना करने का साहस व्यक्ति कर सकता हैं, सन्त और ऋषि बनने का अधिकारी भी वही बन सकता हैं। उत्तराधिकार में पाया हुआ धन और बिना परिश्रम पाया हुआ सम्मान व्यक्ति के अहंकार को बढ़ाकर उसके पतन का ही कारण बनता हैं, इसलिये दूरदर्शी ऋषि भला ऐसी झूठी सिद्धि और सम्मान का क्यों महत्व देते? कवष ने नेको का मार्ग अपनाया था, उसके लिये सराहा जाना उचित ही नहीं अनिवार्य भी था, सामाजिक जीवन में अच्छाइयों की बेल सम्मान और सराहना के जल से ही बढ़ती और फलती फूलती है, सो उसे सम्मान दिया जाना ठीक ही था पर इतना नहीं कि वह आत्म-कल्याण और लोक-हित सम्पादन के लिये अपनी अब तक की योग्यता को पर्याप्त मानकर पाँडित्य का झूठा प्रदर्शन करने लगता।
कवष के साथ कुछ ऐसा ही हुआ। उन दिनों कुरुक्षेत्र में भगवती सरस्वती के पावन तट पर विशाल यज्ञ का आयोजन हुआ। कवष बिना किसी प्रकार का निमन्त्रण पाये, उसमें सम्मिलित हुआ। ऋषिगण इस व्यवहार से बहुत क्षुब्ध हुये। उन्होंने कवष को बाहर निकलवा दिया। और रेतीली मरु-भूमि में छोड़ देने का दण्ड भी दिया।
इतना करने के बाद भी ऋषियों ने कवष का संरक्षण नहीं छोड़ा। वे जानते थे, कवष में साधना के बीच अंकुरित हो उठे हैं, यदि उसे तप करने का अवसर मिले तो वह बीज बढ़कर वृक्ष का रूप ले सकते हैं। यह दंड जान-बूझ कर इसी उद्देश्य से दिया गया था। तप कराने के पीछे ऋषियों का उद्देश्य आत्म-प्रतिभा का विकास कराना ही होता था।
कवष अन्त्यज जीवन के कष्ट पहले ही भुगत चुका था, उस पर उसे जुये ने और पीड़ित एवं प्रताड़ित किया था। किसी तरह साहस करके उसने उससे मुक्ति ली और सभ्य एवं सुसंस्कृत जीवन-यापन करना प्रारम्भ किया। इस तरह उसने वर्षों से खोये हुये पारिवारिक, सामाजिक एवं राष्ट्रीय सम्मान को अर्जित किया था पर अब पुनः उसकी स्थिति राजगद्दी पर बैठाकर राज्य से निकाल दिये गये राजा की सी थी, जो न तो अपने आप पर गर्व कर सकता था, न भविष्य के प्रति आशावान्। कवष की आँखों के आगे एक बार फिर उस दिन का सा अन्धकार छा गया, जिस दिन वह अपना सर्वस्व जुये के दाँव पर हार कर एक-एक कौड़ी का भिखारी बन गया था।
अर्न्तदहित कवष के आगे अब इसके अतिरिक्त कोई चारा न रह गया कि वह अपनी व्यथा परमपिता परमात्मा के समक्ष खोलकर रख दे। आज कई दिनों से उसे तृषा व्याकुल कर रही थी। पूर्ण निष्कलुष हृदय के कवष ने भगवान् वरुण देव की प्रार्थना की, इन्द्र और मरुद्गणों से सहायता की याचना की। भौतिक दृष्टि से वहाँ कोई न साधन था न कोई सहायक ऐसे समय ईश्वरीय शक्तियों के अतिरिक्त उसकी आवाज को सुनता भी कौन?
आज उसकी आत्मा पूर्ण निष्कलुष थी। मन का मन घुल चुका था। अभिमान निकल कर जा चुका था अपनी भावनायें और ईश्वरीय सत्ता के अतिरिक्त उस मरुस्थल में कवष को कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। भावनायें उमड़ती ही नई, आत्म-शक्ति का प्रकाश विस्तार लेता ही गया और वरुण देव, मरुद्गण एवं भगवान् इन्द्र को तब झुकना ही पड़ा। वे अपने प्रिय उपासक की सहायतार्थ मेघ लेकर दौड़े। देखते ही देखते मरुस्थल में सघन बादल छा गये। वर्षा होने लगी। कवष की तृषा के साथ उसका ब्रह्म-दर्शन का भाव भी परितृप्त हो गया।
ऋषि जो अब तक यह दृश्य दूर से देख रहे थे, पास आये। कवष अपने देह-भाव को त्याग कर आत्म-जगत् में प्रवेश कर गया वह अब तक भावावेश में ही था। ऋषियों ने उसे “उठो महर्षि कवष” कहकर हृदय से लगा लिया। और एक बार फिर एक शूद्र के ऋषि बन जाने की बात सारे देश में गूँज गई।
पकाये माँस की पहली कटोरी जैसे ही बच्चे के सामने रखी गई, उसने भोजन करने का वह स्थान ही छोड़ दिया। फिर माँ के लाख प्रयत्न करने पर भी बच्चे ने उस दिन भोजन नहीं किया। उसने दृढ़तापूर्वक बताया-”माँस वैसे हो घृणित खाद्य है पर वह जिस तरह जीवों का उत्पीड़न करके निकाला जाता। उससे दुर्गुण बढ़ते हैं। मेरे लिये दूध और फल ही काफी हैं। फिर मेरे आगे माँस लाया गया तो मैं तुम लोगों के साथ नहीं रहूँगा।
अमेरिका जहाँ छोटी आयु से ही बच्चों को माँस खाना और शराब पिलाना सिखाकर उन को गर्म प्रकृति का उत्तेजनशील प्राणी बना देते हैं, वहाँ बिना किसी पूर्व शिक्षा और ज्ञान के एक छोटे बच्चे का माँस के दुर्गुण के प्रति यह व्याख्यान आश्चर्यजनक ही था। माँ ने यह बात लड़के के पिता से भी कही पर पिता ठहरे वैज्ञानिक-सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक उन्होंने कोई ध्यान नहीं दिया। सोचा लड़के जिद्दी प्रकृति के होते हैं, कोई बात हो गई होगी। बच्चा अपने आप पारिवारिक साँचे में ढल जायगा। इस आत्म-आश्वासन के साथ ही वे अपने काम में जुट गये।
जिस घटना क्रम का विकास इन पंक्तियों में हो रहा है, वह कोई कहानी नहीं वरन् एक ऐसी घटना हैं, जिसने अमेरिका के लब्ध-प्रतिष्ठ जीव शास्त्री डा. ह्यूम वाँल एरिच जैसे वैज्ञानिक को भी चक्कर में डाल दिया। प्रथम अवसर था, जब उन्हें यह विश्वास करना पड़ा कि “भारतीयों का पुनर्जन्म सिद्धान्त कोरी कल्पना नहीं वरन् सुनिश्चित तथ्य हैं और सम्भवतः पाश्चात्य वैज्ञानिकों की आनुवांशिकता सम्बन्धी शोधों का स्रोत भी वहीं जा कर टूटे।”
डा0 ह्यूम के पहले कई वैज्ञानिकों ने यह खोज लिया था कि संसार के जितने जीवित प्राणी हैं, वे ‘प्रोटोप्लाज्मा’ नामक तत्त्व से बने हैं। प्रोटोप्लाज्मा का एक कोष (सेल) दो भागों में विभक्त होता हैं-1. नाभिक (न्यूक्लिस), 2. साइटोप्लाज्मा। साइटोप्लाज्मा प्रकृति पदार्थों के सम्मिश्रण से बनता हैं, जिसमें जल प्रोटीन कार्बोहाइड्रेट, लवण तथा धातुयें आदि होते हैं, नाभिक विशुद्ध प्रकाशीय अवयव है। पर यही चेतना का बीज हैं।
डा0 ह्यूम सृष्टि के रहस्य जानने के लिये शोध कर रहे थे। वे नाभिकों के घेरे में रहने वाले गुण सूत्रों (क्रोमोसोम) का अध्ययन कर चुके थे। उन्होंने देखा इन गुण सूत्रों में ऐंठी हुई रस्सी में पड़े बल, या गाँठों के आकार के एक कोशिका में अरबों की संस्था में संस्कार कोष विद्यमान है, यह संस्कार कोष ही गर्भाशय में पहुँचकर आने वाले बच्चे का रंग-रूप सिर से पैर तक की आकृति गाँठ, बाल, हड्डी, हाथ सब को बनावट निश्चित करते हैं। बालक के स्वभाव के लिये भी यह संस्कार कोष ही उत्तरदायी हैं।
डा0 ह्यूम प्रकृति के इस विधान पर अधिकार प्राप्त करना चाहते थे। इसलिये संस्कार कोषों का वे दीर्घकाल से अध्ययन कर रहे थे। जीवन संसार की एक जटिल प्राणी हैं। और वैज्ञानिक उसे अभी नहीं जान सके, यह वह मानते थे पर उसे ढूँढ़ा नहीं जा सकता, यह उनकी मान्यता के विपरीत था, इसलिये उन्होंने अपनी शोध का क्रम बन्द नहीं किया।
डा0 ह्यूम वाँन एरिच का संस्कार कोषों (जीन्स) अध्ययन में और भी प्रगति हुई होती पर एक अप्रत्याशित घटना ने उन्हें ऐसा करने से रोक दिया। अब तक की शोध के आधार पर उनका विकास था कि शरीर रचना की तरह गुण और संस्कार भी अनुवाँशिक होते हैं अर्थात् उनमें कोई अतिवाहिकता नहीं होती, ये भी जीन्स के द्वारा माता-पिता अथवा ऊपर की ही किसी पीढ़ी से आये हुये होते है, जो सक्रिय कोष हैं, वह तुरन्त दिखाई देन लगते हैं पर अकर्मण्य पड़े संस्कार कई पीढ़ियों बाद जमाकर फलितार्थ होते हैं। लेकिन यहाँ जो हुआ उसने तो इस सिद्धान्त को ही काट कर रख दिया। यही लड़का जिसने एक दिन माँस को घृणित और पशु-प्रवृत्ति कहकर ठुकरा दिया था, आज पिता ह्यूम के सामने एक विचित्र भाषा में भाषण करने लगा। पहले तो पिता ने समझा कि लड़का अनर्गल प्रलाप कर रहा है पर जब लड़का कई दिन तक उसी प्रकार की टेढ़ी भाषा बोलता रहा तो उन्होंने भाषाविदों की सहायता ली। एक भाषाविद ने बताया कि लड़का शुद्ध संस्कृत में बोलता हैं। लड़के द्वारा बोले गये वाक्यांशों का टेप-रिकार्ड कराकर उनका भाषान्तर कराया गया तो पता चला कि लड़के ने जो कुछ कहा वह अनर्गल प्रलाप न होकर प्रवाहमान भावाभिव्यक्ति थी। ऐसी अभिव्यञ्जना जो किसी बहुत ही शिक्षित और समझदार द्वारा की गई हो। ह्यूम एक बार तो चक्कर खा गये, बच्चे में यह प्रतिभा कहाँ से आ गई, यह विचार क्षमता कहाँ से उत्पन्न हो गई।
उन्होंने अपनी पत्नी और पत्नी के सब सम्बन्धियों से पत्र डालकर पूछा, कोई भी ऐसा न निकला जो संस्कृत भाषा जानता रहा हो। जिन गई पीढ़ियों तक उन्होंने पता लगाया, संस्कृत तो क्या हिन्दी जानने वाला भी कोई नहीं हुआ था। ह्यूम स्वयं इटेलियन थे। उनकी धर्मपत्नी भी इटेलियन थीं, आजीविका की दृष्टि से वे अमेरिका में आकर बस गये थे। संस्कृत तो उनके वंशजों में कोई जानता ही नहीं था, फिर इस बालक में यह संस्कार कहाँ से आ गये? क्या सचमुच पुनर्जन्म होता हैं। क्या सचमुच चेतना कोई स्वतन्त्र अस्तित्व भी है? जो मृत्यु के बाद भी अमर रहता हो, इस तरह के अनेक प्रश्नों ने उनके मस्तिष्क में तूफान अड़ा कर दिया।
समाधान उनके लड़के ने कर दिया। उसने बताया-मैं पूर्व जन्म का एक भारतीय योगी हूँ। मेरा सम्बन्ध ‘नाथ नामक एक सम्प्रदाय से था, जो उत्तरी पर्वतीय अंचल में पाया जाता हैं।” अपने निवास के बारे में बच्चे एकान्त साधना किया करता था।”
“योग साधना करते हुए भी मैं इच्छाओं के प्रवाह में बहता रहता। कभी भावनायें निष्काम हो जातीं तो भक्ति का आनन्द मिलता पर दूसरे ही क्षण धूप-छाँह की तरह परिस्थिति बदलती और कोई इच्छा आ खड़ी होती। एक दिन की बात है, दो अमेरिकन यात्री उस पहाड़ी पर चढ़ते हुए मेरी कुटी के पास एक आ गये, पूछने पर उन्होंने अमेरिका को रंगीनी के बढ़-चढ़कर समाचार बताये। मैं बड़ा प्रभावित हुआ। मुझे लगा वहाँ जीवित स्वर्ग हैं। एकाएक इच्छा हुई कि अमेरिका जाऊँ और वहाँ का आनंद लूँ। पर थोड़ी ही देर में बहक का पता चल गया। उसके बाद बहुत प्रयत्न किया पर जिस तरह अन्ध-विश्वास में जकड़े लोग किसी बुद्धिमान का कहना नहीं मानते, बार-बार ठगते रहते हैं, उसी प्रकार मेरी यह इच्छा भी मुझे बनात अमेरिका के रंगीन जीवन की ओर खींचती रही। जब मेरी मृत्यु हुई, तब भी वह इच्छा मन में बनी रही। आप तो वैज्ञानिक हैं, यह जानते हैं कि तीव्र इच्छाशक्ति कई अनुवाँशिक गुणों को दबा नहीं नहीं सकती-उसी तरह नष्ट कर सकती हैं, जिस तरह परमाणु-विकिरण और विषाणु से उन्हें नष्ट या परिवर्तित किया जा सकता हैं। ईश्वरीय व्यवस्था और गीता के कथन के अनुसार मुझे योग-भ्रष्ट योगी का जन्म आप जैसे सम्पन्न परिवार में हुआ सही पर मेरी आत्मिक विशेषताओं को आपका वंशानुगत संस्कार दवा नहीं पाया चाहे तो आप इसे ही पुनर्जन्म का सबसे बड़ा प्रमाण मान सकते हैं।”
डा0 ह्यूम अपने पुत्र की बातें सुनकर स्तब्ध और अवाक् रह गये। पर वे इतनी शीघ्र इन बातों पर विश्वास करने वाले न थे। लड़के के बताये कागड़ा, नाथ सम्प्रदाय, पहाड़ियों के नाम, उस क्षेत्र के रीति-रिवाज आदि के सम्बन्ध में उन्होंने विस्तृत खोज की तो उन्हें अक्षरशः सत्य पाया। लड़का कभी भारत गया नहीं। पुस्तकों में उसने भारतवर्ष का नाम भी नहीं पड़ा, रीति-रिवाजों का तो कहना ही क्या, फिर यह बातें, उसके मस्तिष्क में कहाँ से आई, वे यह कुछ न समझ सके।
बड़े-बड़े मनोवैज्ञानिक, डाक्टर, मस्तिष्क-विशारद आये। सबने लड़के की बात-चीत टेप की, अलग-अलग अध्ययन किया पर निष्कर्ष निकालते समय वे सब के सब माथे पर हाथ धरे सिर खुजलाते रह गये।
एक दिन लड़के ने कहा-”पिता जी! अमेरिका दर्शन की मेरी आकाँक्षा पूर्ण हो गई हैं। अंश मुझे मेरी शतृ- भूमि पहुँचा दीजिये। मेरा सूक्ष्म शरीर भारतीय संस्कारों से बना है, मैं अमेरिका में नहीं रह सकती।” पर पिता ने कुछ न सुना। वे बेचारे अध्यात्म के महत्व को क्या समझते, समझने की उन्हें फुरसत ही कहाँ थी, उन्हें तो जीवशास्त्र पर कोई अनोखी बात ढूँढ़ निकालने और प्रसिद्धि पाने की घुन थी। कठिन साधना जन्य उपलब्धियों के लिये न उनके पास समय था, न रुचि।
किसी तरह माँ उसे लेकर भारत जाने को तैयार हुई। विदेश-यात्रा के लिए उन्होंने आवेदन-पत्र भी पर दिया। किन्तु एक दिन प्रातःकाल उठकर जब वे अपने पुत्र के निजी कक्ष में कई तो देखा कि मीन-मुद्रा में उस लड़के का पार्थिव शरीर पद्मासन लगाये बैठा है। उसके प्राण तो कहीं और जा चुके है।
बच्चे की मृत्यु, दुःखद उतनी न थी, जितनी आश्चर्य-जनक थी। एक घटना जिसने डा0 ह्यूम जैसे भौतिक शास्त्री का हृदय हिला दिया, उन्हें भो विश्वास करना पड़ा, भारतीय तत्त्व-दर्शन अगाध ही नहीं चिर सत्य भी है पर इतनी बड़ी दुर्घटना के बाद भी कितने लोग थे, जिन्होंने मानवीय जीवन के इन रहस्यों में रुचि दिखाई? न जाने किस अज्ञान में ग्रस्त रहकर जीवन लक्ष्य प्राप्त करने का प्रयत्न नहीं करते?
धर्म मर्यादा का ज्ञानः-
बोधिसत्व एक दिन, सुन्दर कमल के तालाब के पास बैठे वायु सेवन कर रहे थे। नवविकसित पंकजों की मनोहारी छटा ने उन्हें अत्यधिक आकर्षित किया तो वे चुप बैठे न रह सके उठे और सरोवर में उतर कर निकट से जलजगंध का पान कर तृप्ति लाभ करने लगे।
तभी किसी देव कन्या का स्वर सुनाई पड़ा- “तुम बिना कुछ दिए ही इन पुष्पों की सुरभि का सेवन कर रहे हो। यह चौर कर्म हैं। तुम गंध चोर हो।”
तथागत उसकी बात सुनकर स्तम्भित रह गये। तभी एक व्यक्ति आया और सरोवर में घुसकर निर्दयतापूर्वक कमल-पुष्प तोड़ने लगा, बड़ी देर तक उस व्यक्ति ने पुष्पों को तोड़ा-मरोड़ा पर रोकना तो दूर किसी ने उसे मना तक भी न किया।
तब युद्धदेव ने उस कन्या ने कहा- “देवि! मैंने तो केवल गन्धपान ही किया था। पुष्पों का अपहरण तो नहीं किया था, तोड़े भी नहीं, फिर भी तुमने मुझे चोर कहा। और यह मनुष्य कितनी निर्दयता के साथ पुष्पों को तोड़कर तालाब को अस्वच्छ तथा असुन्दर बना रहा है, तुम इसे कुछ नहीं करतीं?”
तब वह देव कन्या गम्भीर होकर कहने लगी- “तपस्वी! लोग तथा तृष्णाओं में डूबे संसारी मनुष्य, धर्म तथा अधर्म में भेद नहीं कर पाते। अतः उन पर धर्म रक्षा का भार नहीं हैं। किन्तु जो धर्मरत है, सद्-असद् का ज्ञाता है, नित्य अधिक से अधिक पवित्रता तथा महानता के लिए सतत् प्रयत्नशील है। उसका तनिक-सा भी पथ-भ्रष्ट होना एक बड़ा पातक बन जाता है।”
बोधिसत्व ने मर्म को समझ लिया। और उनका सिर पश्चाताप से झक गया।
बहुत समय तक राज्य-सुखों का उपभोग करते रहने के बाद रघुवंश-शिरोमणि राजा इक्ष्वाकु का मन संसार से हटने लगा। उन्हें लगा कि सुख पदार्थों में नहीं वरन् वह मन की एक शक्ति है, जब मन और इन्द्रियाँ अशक्त हो जाती है तो वही वस्तुयें जो पहले सुखद लगती थी, बोझ बन जाती है, उनमें कुछ रस शेष नहीं रहना। मृत्यु की चिन्ता ने उन्हें और भी आहत किया। इसलिये एक दिन वे गुरु वशिष्ठ के पास जाकर बोले- “भगवन्! अब तक अनात्म कर्मों से घिरा मैं इक्ष्वाकु आत्म-कल्याण की इच्छा से समित्पाणि उपस्थित हुआ हैं, मुझे उपदेश दीजिये, क्या करना चाहिये।”
इक्ष्वाँकु की श्रद्धा से प्रसन्न गुरु वशिष्ठ ने समझाया- “तप से ही आत्मोत्कर्ष और मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।”
इक्ष्वाकु ने तप प्रारम्भ किया। उन्होंने भगवान् मनु की उपासना की। मनु इक्ष्वाकु की श्रद्धा से द्रवीभूत होकर उनके पास आये और पूछा- “राजन्! कहो मैं तुम्हारी क्या सहायता कर सकता हूँ?” इक्ष्वाकु ने भगवान् मनु को सादर प्रणाम करते हुए निवेदन किया-”प्रभु! आत्म-कल्याण की इच्छा से मैंने गुरु वशिष्ठ से दीक्षा ली, उन्होंने मुझे तप करने की प्रेरणा दी। मैंने उपासना तो प्रारम्भ कर दी पर तप का स्वरूप अभी तक मेरी समझ में नहीं आया।”
मनु बोले- “स्वाध्याय-सत्संग।” और यह कहकर के अन्तर्धान हो गये। इक्ष्वाकु घर लौटे और शास्त्रों, उपनिषदों से लेकर महापुरुषों के उपसानों का संकलन किया और उनके स्वाध्याय में जुट गये। स्वाध्याय से उनको विश्व-प्रपंच और विश्व के अनेक सूक्ष्म रहस्यों का पता चला। कई बार ऐसे विलक्षण प्रश्न के अनेक सूक्ष्म रहस्यों का पता चला। कई बार ऐसे विलक्षण प्रश्न उठते जिनका समाधान स्वाध्याय से नहीं हो पाता था, फलस्वरूप इक्ष्वाकु ने धर्म समाये आयोजित करनी प्रारम्भ की। उन सभाओं में विद्वान-पुरुषों को आमन्त्रित किया जाता। राजा स्वयं श्रद्धा-भाव से उनकी सेवा करते और उनके सत्संग का लाभ प्राप्त करते, उससे उनके मन की पवित्रता बढ़ अवश्य पर भीतर ही भीतर से क्षुब्ध भी कम न थे, क्योंकि उससे उनको मुक्ति का मार्ग न मिला। इस तरह एक वर्ष पूरा हो गया।
नवरात्र उन्होंने फिर बन में बिताये। भगवती का अनुष्ठान इक्ष्वाकु पीछे करते सर्वप्रथम भगवान् मनु का आवाहन अवश्य करते। अन्तिम दिन भगवान् मनु पुनः प्रकट हुए और बोले-”विचारणा।” बम इतना कहकर वे पुनः अदृश्य हो गये। इक्ष्वाकु फिर पर लौटे और विचार करना प्रारम्भ कर दिया। अभी तक उन्होंने स्वाध्याय और सत्संग से सीखा और ज्ञान तो बहुत प्राप्त किया था पर वह ऐसा ही था, जैसे कोई रोटी के सम्बन्ध में ज्ञान तो बहुत रखे पर उसे खाये बिना ही शक्ति प्राप्त करने की बात सोवे। इक्ष्वाकु उस ज्ञान को विचार और व्यावहारिक जीवन में स्थान नहीं दे पावे थे, इसलिये उससे अब तक उन्हें कोई लाभ न मिला था। पर जब उस प्राप्त ज्ञान का विचार और आचरण में अभ्यास करना प्रारम्भ किया तो उनकी मानसिक प्रसन्नता भी बढ़ी और शक्तियों का विकास भी। आचरण की कसौटी पर इक्ष्वाकु का जीवन धीरे-धीरे निखरने लगा। इस तरह एक वर्ष और बीत गया पर मुक्ति का आनन्द इक्ष्वाकु तब भी न से सके।
इक्ष्वाकु ने पुनः भगवान् मनु की शरण ली। भगवान मनु प्रकट तो हुए पर एक क्षण रुके बिना केवल ‘असंभव’ कहकर पुनः विलीन हो गये। इक्ष्वाकु घर लौटे घर की व्यवस्था से राज्य-काज तक पहले भी निबटाते थे, उसमें कुछ भूलें होती थीं, कई आकर्थन आते थे। उन सभी विषयों में ‘मैं कर्त्ता हूँ’ ऐसा भाव होने के कारण उसके अच्छे-बुरे परिणाम से भी वे जुड़ जाते थे। इसलिये दुःख, चिन्ता और उद्विग्नतायें घेरे रहती थीं पर अब उन्होंने देखा-अपना किया कुछ नहीं, मन में विचार और प्रेरणायें भी कोई और ही भरता है। इक्ष्वाकु अब भी सब काम करते थे पर असंग भाव के समावेश से पूर्ण अनासक्त भाव से करते थे। किसी कर्म में उन्होंने कामनाओं को नहीं थोड़ा। न्याय, विवेक, सत्य की प्रतिष्ठा के लिए वह सभी काम करते थे, इससे पहले वाला, विषयों में आसक्त रहने वाला मन अनेक चिन्ताओं और उद्विग्नताओं आदि से मुक्त हो चला। कठोर से कठोर दंड देते हुए भी वे उतने ही निस्पृह रहते जितना बड़े से बड़ा धार्मिक आयोजन करते समय।
इतना करते हुए भी मन की वासनायें शान्त नहीं की था सकीं। अपनी इच्छायें प्रायः जुड़ जाने से इक्ष्वाकु दीनता और आत्म-दौर्बल्य अनुभव करते। जब तक अशक्तिही मनुष्य परमानन्द की प्राप्ति भी कैसे कर सकता है। सो वह पुनः योग-पीठ पहुंचे और भगवान् को कातर स्वरों से जा पुकारा।
साधना मार्ग पर उत्तरोत्तर अग्रसर होते हुए इक्ष्वाकु के मन की बात जानने वाले मनु ने शिष्य के शीश पर हाथ फेरा और कहा- ‘विलापिनी’ अर्थात्- “वासनाओं का परित्याग कर।” इक्ष्वाकु ने अब अपनी इन्द्रियों पर कठोर प्रतिबन्ध लगाकर उन्हें वशवर्ती बनाना प्रारम्भ कर दिया। अस्वाद व्रत से जिह्वा पर विजय प्राप्त ही, उससे कामेन्द्रिय पर सहज ही नियन्त्रण हो गया। यह दो हो इन्द्रियाँ सशक्त थीं, उनके नियन्त्रण में आते ही इक्ष्वाकु का मन ईश्वरीयभूत होने लगा। वे घण्टों तन्मयतापूर्वक ब्राह्मी स्थिति में बैठे विचार-समाधि’ में विचरण करने लगे। उस अवस्था में कई बार गतिरोध उत्पन्न होता। इक्ष्वाकु आनन्द के स्वरूप को समझने लगे तो एक दिन भगवान् मनु स्वयं प्रकट हुए। इक्ष्वाकु ने उन्हें प्रणाम कर पूछा- “भगवान्! शिष्य के द्वार आपका आना मंगलकारक है, सेवा का निर्देश दें?”
मनु बोले-’तात्! मोक्ष की इच्छा वाले प्रत्येक साधक को लक्ष्य तक पहुँचाना मेरा धर्म हैं, तूने भगवान् की शरण ली है ता मेरा कुशन क्षेम भी उन्हें ही वहन करना था, मैं उन्हीं की प्रेरणा से तुझे यह बताने आया हूँ कि तू केवल प्रेम का अभ्यास कर उससे तेरी आनन्द रूपा स्थिति परिपक्व होगा।” यह कहकर मनु अपने लोक को चले गये।
इक्ष्वाकु ने सृष्टि के सम्पूर्ण प्राणियों को एक ही चेतना के विभिन्न रूप मानकर उनसे प्रेम भावनाओं का विकास प्रारम्भ किया। सारे संसार को वे अपना स्वरूप देखने और सबसे प्रेम करने लगे, उससे उन्हें शुष्क और नीरस, अनुपयोगी और तुच्छ वस्तुओं में भी आनन्द की झलक मिलने लगी। पाँचवीं भूमिका इक्ष्वाकु ने प्रेम भावनाओं के विकास द्वारा पार की। अब वे जीवनमुक्त अवस्था में सर्वत्र विचरण करने लगे।
घूमते हुये इक्ष्वाकु की आत्मा मनु लोक में जा पहुँची। लोग उनके जागृत शरीर को पृथ्वी में देखते वे पर इक्ष्वाकु की आत्मा स्वप्नावस्था के समान कहीं और थी। भगवान् मनु ने उनका स्वागत करते हुए, छठी भूमिका- “स्वयं-संवेदन रूपा” स्थिति पर पदार्पण कर आदेश दिया। तब इक्ष्वाकुने अनुभव किया, यह जो संसार है, यह सब ब्रह्म तत्त्व से ही प्रकट हुआ। ब्रह्म ही अपने भीतर से अनेक प्रकार की
निश्चयहीन मनुष्य के लिये यह कभी नहीं कहा जा सकता कि वह खुद अपना स्वामी है। वह समुद्र की एक लहर की तरह है या उड़ते हुए पंख की तरह जिसे हर झोंका इधर से उधर उड़ा देता हैं। -जोने फास्टर,
सृष्टि पैदा करता हैं। उन्होंने अपने ‘अहं’ भाव को सच्चिदानन्द स्थिति में विकसित कर छटवों भूमिका भी पार कर ली। अब उनकी चिर-जागृत अवस्था थी। स्वप्न और जागृत अवस्था में कोई अन्तर न था। वे आत्मा में आत्मा की अनेक सृष्टियों को बनाने, बिगाड़ने का आनन्द लेने लगे।
अब तक शरीर में रहते हुए उन्होंने सब अनुभव किया था पर ब्रह्म तो अशरीरी, अजन्मा, अव्यक्त, अनाम, अरूप है, उसे उसी रूप में ही पाया जा सकता हैं। इसलिये एक दिन इक्ष्वाकु ने अपने जर्जर तन का परित्याग किया और ‘परिप्रौढ़ा’ अवस्था को प्राप्त कर ब्रह्म-लोक को चले गये।
[पं. श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा लिखित और युग-निर्माण योजना मथुरा द्वारा प्रकाशित ‘संस्कारों की पुण्य परम्परा’ एवं ‘पर्व और त्यौहारों से प्रेरणा ग्रहण करें’ पुस्तिकाओं का एक अंश]
पर्व, त्यौहारों का प्रचलन मात्र हर्षोत्सव मनाने के लिए विनिर्मित नहीं हुआ है, इनके पीछे समाज-निर्माण की एक अति महत्वपूर्ण प्रेरक प्रक्रिया सन्निहित हैं। चिन्हीं पौराणिक कथानकों की स्कृत मात्र के लिए अथवा किसी देवता की पूजा मात्र के लिए पर्वों को समय तथा धन खर्च कराने वाली पद्धति प्रचलित नहीं है। वरन् इनके पीछे मुख्य प्रयोजन यह है कि सामाजिक जीवन की हर समस्या को सुलझाने के लिए वर्ष में कई-कई दिन ऐसे रखे जायँ, जिन पर इकट्ठे होकर जनता को अपनी वर्तमान परिस्थितियों पर विचार करने और उनका हल खोजने का अवसर मिले।
हमारा प्रत्येक पर्व समाज की कुछ समस्याओं पर विचार करने और यदि वर्तमान में कुछ विकृतियाँ उत्पन्न हो गई हो तो उनका हल ढूँढ़ने की प्रेरणा देने आता हैं। प्राचीनकाल में हमारे त्यौहारों का यही स्वरूप था। पर्वों का हर्षोत्सव मनाने के लिए स्थानीय जनता एक स्थान पर एकत्रित होती थी। पूजा-प्रार्थना के धार्मिक कर्मचारी के साथ प्रत्येक वैयक्तिक एवं सामाजिक कार्य सम्पन्न हो यह अपनी प्राचीन परम्परा है, पर्वोत्सवों के सभ्य पर भी वैसा होता था। धर्मकृत्यों के बाद मनीषी विद्वान् उपस्थिति जनता का उद्बोधन करके सामाजिक सत्प्रवृत्तियों को अक्षुण्य बनाये रहने का उद्बोधन करते थे। तत्कालीन कोई उलझन इस संदर्भ से उत्पन्न हुई दिखाई पड़ती थी तो उसका हल बताते थे। इस प्रकार तत्कालीन सामाजिक गतिविधियों के सम्बन्ध में आत्म-निरीक्षण और परिष्कार परिमार्जन करने का सहज ही अवसर मिल जाता था। कोई विकृति आँक्ष से ओभस नहीं हो पाती थी। उठते हुए विकारों का तत्काल समाधान निकाल लिया जाता था और सामाजिक प्रखरता में कोई त्रुटि न जाने पाती थी। इस प्रकार पर्वोत्सवों का मनाया जाना एक वरदान सिद्ध होता था और उस माध्यम से राष्ट्रीय एवं सामाजिक सुदृढ़ता निरन्तर परिपुष्ट बनी रहती थी।
यों पर्व-त्यौहार अनेक हैं पर उनमें दस ऐसे हैं, जिन्हें प्रमुखता दी जानी चाहिये। इनमें से हर पर्व के पीछे कुछ महत्त्वपूर्ण सन्देश एवं प्रयोजन जुड़े हुए है। यथा-1. गुरु-पूर्णिमा-अनुशासन, मर्यादाओं का पालन। 2. श्रावणी-वृक्षारोपण, आत्म-निरीक्षण, भूलों का प्रायश्चित्त और सुधार, नैतिकता का व्रत धारण। 3. पितृ अमावस्या-बड़ों के प्रति श्रद्धा, सद्व्यवहार, कृतज्ञता, सत्पुरुषों और सत्प्रेरणाओं का अनुसरण। 4. विजयादशमी-स्वास्थ्य रक्षा, संगठन, मनोबल, शक्ति संचय, अनीति के विरुद्ध संघर्ष। 5. दीपावली-ईमानदारी और परिश्रमपूर्वक उपार्जन, मितव्ययतापूर्वक धन का सदुपयोग। 6.गीता जयंती-धर्मनिष्ठा, कर्त्तव्य परायणता, मानसिक संतुलन, दूर-दर्शिता। 7. बसन्त-पंचमी-शिक्षा, सद्ज्ञान, संगीत, साहित्य, कला, सुसज्जा। 8. शिवरात्रि-व्यापक सहयोग समन्वय, नशा निवारण। 9. होली-देश-भक्ति, स्वच्छता, समता विस्तार। 10. गायत्री जयन्ती (गंगा-दशहरा)-विवेकशीलता, सद्भावना, आस्तिकता, सत्प्रवृत्तियों का अभिवर्धन।
प्रस्तुत त्यौहारों के पीछे जो इतिहास जुड़े हुए हैं तथा जिन क्रिया-कृत्यों के साथ उन्हें मनाया जाता हैं, उन पर पैनी दृष्टि डालने से यह सहज ही स्पष्ट हो जाता है कि उन्हें मनाये जाते के पीछे, किस प्रेरणा एवं प्रशिक्षण की भूमिका सन्निहित है। उस मूल प्रयोजन की रक्षा की जानी चाहिए, जिसके कारण इनका प्रचलन किया गया था। लकीर पीटने से काम न चलेगा। हमें उस प्राचीन परम्परा को पुनर्जीवित करना चाहिए और पर्वों को उसी प्रकार पुनः मनाना आरम्भ करना चाहिए, जैसे कि वे पूर्वकाल में मनाये जाते थे। हर पर्व को मनाने की विधि और व्यवस्था यों छोटी पुस्तिकाओं के रूप में छापी जा चुकी हैं। पर संक्षिप्त में यह जान लेना आवश्यक हैं कि पर्व वाले ‘दन व्यक्तिगत रूप से परों में जो भी क्रिया-कृत्य किया जाता हो, उसके अतिरिक्त सामूहिक रूप से ऐसी व्यवस्था की जानो चाहिए जिससे अधिकाधिक जनता भाग ले, मिलजुल कर धार्मिक कर्मकाँड सम्पन्न किया जाय और इसी सुसज्जित धर्म मंच से पूर्व के साथ जुड़ी हुई प्रेरणा पर समझे हुए विचारों द्वारा प्रकाश डाला जाय। यदि इस संदर्भ में इन दिनों कुछ चल पड़ी हीं तो उन्हें सुधारने के लिए लोगों से कहा जाय और उस सुधार का व्यावहारिक मार्ग बताया जाय। इस प्रकार प्रेरक पद्धति से मनाये गये, वह पर्व-त्यौहार लोक-शिक्षण की अति महत्वपूर्ण भूमिका संपादित कर सकते हैं। सामाजिक उत्कर्ष के लिए ऐसे लोक-शिक्षण की आज जितनी आवश्यकता हैं, उतनी पहने कजी नहीं रही। इसलिये प्रवृद्ध व्यक्तियों की धर्म मन्त्र के माध्यम से भारतीय जनता का अभीष्ट मार्ग-दर्शन करने के लिए उन पुत्र्य परम्परा जी को पुनर्जी अंत करने के लिए प्रश्न प्रयत्न करना चाहिये।
समाज शिक्षण की जी आवश्यकता पर्वोत्सवों द्वारा पूरी हो सकती है, वही परिवार प्रशिक्षण के लिए संस्कारों द्वारा सम्पन्न की जा सकती हैं। जन्म से लेकर मृत्युपर्यंत भारतीय धर्मानुयायी अपने संस्कार कराते रहते हैं। ताकि उनकी संस्कारवान् परम्परा एवं सुसंस्कृत मनोभूमि को निरन्तर अक्षुब्ध रखा जा सके। प्राचीनकाल में सोलह संस्कार हंसे हैं। अब उनमें से कितने ही असामयिक ही गये। ‘गर्भाधाय’ व संपन्न नहीं रहा। इसी प्रकार ‘कर्णभेध’ अनुपयोगी समझा जाने लगा। आज की स्थिति के अनुरूप बस संस्कार पर्याप्त हैं। - पर कँचे उन्हें ठीक तरह अनाया जाके लगे तो उस व्यक्ति को तो सुसंस्कारी बनने का अवसर मिलेगा ही घर परिवार के सदस्यों तथा समारोह में उपस्थित लोगों को जी अपने कौटुंबिक कर्त्तव्यों की जानकारी एवं प्रेरणा मिलेगी, वह प्रशिक्षण पारिवारिक समस्याओं को सम्भालने तथा संयुक्त प्रणाली को उपयोगी बनाये रखने में बहुत सहायक सिद्ध होगा।
संस्कारों में से प्रत्येक में बहुत कुछ शिक्षा एवं प्रेरणा भरी पड़ी हैं, यथा-1. पुँलवन-गर्भवती स्त्री को उन दिनों की शारीरिक मानसिक स्थिति ठीक रखने सम्बन्धी शिक्षा तथा पर वाली को तत्सम्बन्धी वातावरण उत्पन्न करने की प्रेरणा। 2. नामकरण-परिवार के बालक को सुसंस्कृत बनाने की विधि व्यवस्था का शिक्षण 3. अन्न प्राशन-बालक के आहार सम्बन्धी सतर्कताओं की जानकारी। 4. मुण्डन-बालक के बौद्धिक एवं सिद्धान्तों की विवेचना और बालक के लिए उपयुक्त शिक्षा योजना बनाकर देना। 6. यज्ञोपवीत-मानवता के मूल-भूत आदर्शों, कर्त्तव्यों एवं आधारों को समझना और पशुता की दुष्प्रवृत्तियों से बचने की शिक्षा। 7. विवाह-विवाह के उद्देश्य, कर्त्तव्य एवं सफलता के सिद्धांतों से पति-पत्नी को परिचित कराना। गृहस्थ के दायित्वों को निबाहने की परिस्थितियां उत्पन्न करने की दोनों परिवारों को शिक्षा देना। 8. वानप्रस्थ-बच्चों के समर्थ होने पर डालती आयु लोक-सेवा के लिए समर्पित करने की प्रतिज्ञा, उपार्जन का दायित्व पर के समर्थ नये सदस्यों पर छोड़कर स्वयं परमार्थ कार्यों में लगाना। 9. अन्त्येष्टि-मृत शरीर का यज्ञ संस्कार। मानव-जीवन के अमूल्य अवसर का सदुपयोग करने की उपस्थित लोगों को शिक्षा। 10. मरणोत्तर संस्कार-मृत्यु के उपरान्त घर, परिवार की यज्ञ आदि से शुद्धि, दिवंगत आत्मा के सद्गुणों की शिक्षा, उसके छोड़े हुए उत्तरदायित्वों को पूरा करने की योजना एवं व्यवस्था।
इन संस्कारों का भी पर्वों की भाँति ही विस्तृत कर्मकाँड ओर विधान हैं। जिनकी छोटी पुस्तिकायें, युग-निर्माण योजना द्वारा प्रस्तुत की गई हैं। उन्हें स्थानीय लोकाचार के अनुरूप बनाया जा सकता हैं। प्रमुखता कर्मकाँड की नहीं लोक शिक्षण की है। यह उद्देश्य ध्यान में रखा जाय और उपस्थिति लोगों को उस अग्रसर से सम्बन्धित समस्या को हल करने के लिए प्रशिक्षित किया जाय।
सारे मुहल्ले गाँव को इकट्ठा करे सामूहिक रूप से यदि पर्व मनावें जाने लगे और उसमें धर्म श्रद्धा के आधार पर लोग इकट्ठे होने लगे तो उस एकत्रीकरण में त्यौहार के छिपे हुए समाज निर्माण के रहस्यों को चतुरवक्ता भली प्रकार समझा सकता हैं। और सामाजिक कुरीतियों एवं विकृतियों के उन्मूलन तथा स्वस्थ परम्पराओं की स्थापना के लिए महत्त्वपूर्ण पृष्ठभूमि बना सकता हैं।
इसी प्रकार पारिवारिक धर्म गोष्ठियों का सिलसिला संस्कार मनाने की परम्परा पुनर्जीवित करके बड़ी आसानी से प्रचलित किया जा सकता है। घर परिवार एवं पड़ौस के थोड़े लोग इकट्ठे हो तो भी उन्हें व्यक्ति निर्माण एवं परिवार निर्माण की रीति-नीति में परिणत किया जा सकता हैं।
(पं. श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा लिखित और युग-निर्माण योजना मथुरा द्वारा प्रकाशित ‘सौभाग्य का द्वार सम्मिलित परिवार’ पुस्तिका का एक अंश)
कुछ दिन पहले अनुभव हीनता के जोश और आवेश में यह प्रतिपादन शुरू किया था कि संयुक्त परिवार प्रणाली को तोड़ा जाय और उसके स्थान पर पति-पत्नी मात्र के छोटे परिवार बसाये जायं। जब तक बच्चे समर्थ न हों, तब तक माँ-बाप उनका संरक्षण करें और जैसे ही वे विवाह और आजीविका की दृष्टि से समर्थ हो जाये, वैसे ही उन्हें अलग परिवार बसाने के लिए स्वतन्त्र कर दिया जाय। पाश्चात्य देशों में यह प्रयोग पिछले दिनों बड़े उत्साह के साथ हुआ हैं। यूरोप अमेरिका में अब संयुक्त कुटुम्बी प्रथा जहाँ-तहाँ ही दीखती हैं। अधिकांश व्यक्ति अपना छोटा परिवार ही बसाते हैं। अपने देश में भी उसका अनुकरण सुशिक्षित वर्ग में धीरे-धीरे जोर पकड़ता जाता है। ज्यादा पढ़ी लिखी लड़कियां और नई रोशनी के लड़के सम्मिलित रहना नापसंद करते। वे घर वालों से अलग घर बसाने की चेष्टा करते हैं, ताकि सम्मिलित कुटुम्ब के बोझ, उत्तरदायित्व और नियन्त्रण से छुट्टी पाकर उन्हें अधिक सुविधा से दिन काटने का अवसर मिल जाये।
इस बढ़ती हुई अलगाव की प्रवृत्ति के बारे में हमें कई पहलुओं से उसके गुण-दोषों पर विचार करना होगा। प्रथम पाश्चात्य देश जहाँ से यह प्रवृत्ति आरम्भ हुई, उनके सामने प्रस्तुत हुए प्रतिफलों को देखना पड़ेगा। आरम्भ में पति-पत्नी की अधिक खर्च करने और कम काम करने की सुविधा जरूर मिल जाती हैं और नये लड़के इसमें अपना लाभ देखकर प्रसन्न होते हैं पर कुछ ही दिनों में उन्हें अपनी मूल प्रतीत होने लगती हैं। पत्नी गर्भवती होती हैं, शरीर में कितने ही तरह के विकार उठ खड़े होते हैं, काम कम और आराम अधिक करने की इच्छा होती है। उस समय किसी सहायक की जरूरत पड़ती है पर एकाकी गृहस्थ में तो सब कुछ स्वयं ही करना पड़ेगा। प्रसव काल में कष्ट बहुत होता है। उस समय भी गहरी सहानुभूति वाला कुटुम्बी आवश्यक लगता है। प्रसूति काल में लवण के रागी की तरह चारपाई पकड़ लेनी पड़ती है और हर घड़ी सहायता की इच्छा रहती है। बच्चा एक पूरे गृहस्थ के बराबर काम लेकर आता है। हर घड़ी निगरानी, सफाई, सेवा की जरूरत पड़ती है। अस्वस्थ होने पर वह रोता-चिल्लाता बहुत है। कई बार तो नींद हराम कर देता है। उसे सँभालते हुए घर के दूसरे भोजन बनाने आदि के काम जो समय पर पूरा होना चाहते हैं-मुश्किल पड़ते है। बच्चे बढ़ते जाते हैं, समस्या भी बढ़ती जाती है। संयुक्त कुटुम्ब में यह सब पता भी नहीं चलता। कोई कुछ कर जाता हैं, कोई कुछ सँभाल लेता है। अकेली बेचारी क्या-क्या करे। पति अपने ही गोरखधन्धे में लगे रहते हैं। सहायता करना तो दूर-अपनी ही फरमाइशें पूरी न होने और गृह-व्यवस्था में कमी आने से उलटे झल्लाये रहने लगते हैं। उस समय नव-वधू को समझ आती है कि सुविधा की दृष्टि से संयुक्त परिवार प्रथा ही अच्छी थी।
हारी-बीमारी, असमर्थता, दुर्घटना, लड़ाई-झगड़ा आदि अवसरों पर संयुक्त कुटुम्ब का लाभ प्रतीत होता है, जब एक की विपत्ति में दूसरे सब उठ खड़े होते है और अपने-अपने ढंग से सहायता करके बोझ हलका करते हैं। विवाह-शादियों में एक बारगी बहुत खर्च करना पड़ता है। एक व्यक्ति के लिए उतनी बचत कठिन पड़ती है पर कुटुम्ब की मिली-जुली पूँजी और आर्थिक स्थिति में वह पहिया भी लुढ़कता रहता है और खर्चीली शादियाँ भी उसी ढर्रे में होती चली जाती हैं। विधवा को आर्थिक संकट और विधुरों को गृह-व्यवस्था की कठिनाई नहीं पड़तीं, वे भी उसी खाँचे में समा जाते हैं और निर्वाह क्रम किसी प्रकार चलता ही रहता है। परित्यक्यें और पति विमुक्त महिलायें अपने बच्चों समेत मैके चली जाती हैं और उस परिवार का भी गुजारा उसी श्रृंखला में बँधकर होने लगता है। ऐसी महिलायें एकाकी अपना भार स्वयं नहीं उठा पाती और यदि एकाकी भाई हैं, तो इतना बोझ उठाना उसके लिए भी कठिन पड़ता है। संयुक्त परिवार प्रणाली ही है, जिसमें अयोग्य, असमर्थ, पागल, दुर्गुणी भी खप जाते हैं। एकाकी होते तो उन्हें भीख मिलना और जीवित-रहना भी कठिन पड़ता।
संयुक्त परिवार प्रथा में सब सदस्यों का उपार्जन एक जगह इकट्ठा होता है और उस सम्मिलित पूँजी से बड़े व्यवसाय आसानी से आरम्भ हो जाते हैं। नौकर महंगे पड़ते हैं, ईमानदार भी नहीं होते, दिन रात जुटे भी नहीं रहते, अधिक लाभ में उतनी दिलचस्पी भी नहीं होती, इसलिए नौकरों की अपेक्षा घर के आदमी सदा अधिक लाभदायक सिद्ध होते हैं। घर की पूँजी और घर का थम जुट जय तो किसी भी व्यवसाय में लाभ होगा। किसान के लिए तो यह जीवन-मरण का प्रश्न है। उसके पास घर, खेत और पशुओं के इतने अधिक काम रहते हैं कि उनके छोटे बच्चे और बूढ़े असमर्थ भी बहुत सहायता कर सकते हैं। सबके मिले हुए श्रम से ही कृषि और पशु पालन लाभदायक रहता है अन्यथा नौकर रखकर मामूली किसान रोटी भी नहीं पा सकता।
वृद्धावस्था का जीवन शान और शाँति से संयुक्त कुटुम्ब में ही सम्भव है। जरा-जीर्ण शरीर जब अपना बोझ आप नहीं ढो पाता और रुग्णता साथी बन जाती हैं, तब कुटुम्बियों की सेवा, सहायता अपेक्षित रहती है। अपनी निज की कमाई या बचत न होने पर आवश्यक खर्च भी बेटे-पोते ही उठाते हैं। हारी-बीमारी में उन्हीं की सहायता मिलती है। शारीरिक और मानसिक दृष्टि से दुर्बल बने व्यक्ति की आमतौर से उपेक्षा ही होती है पर संयुक्त परिवार में मान, इज्जत ज्यों की त्यों बनी रहती है वरन् और अधिक बढ़ जाती है। बिना पूछे कोई बड़ा काम नहीं होता, इससे वृद्ध का गर्व-गौरव एवं सम्मान भी अक्षुण्य बना रहता है।
अपने गरीब और कृषि प्रधान देश के लिए संयुक्त परिवार प्रणाली एक वरदान है। उसके अनेक लाभ है। आध्यात्मिक और भावनात्मक विकास की दृष्टि से भी उसका महत्व है। पिता-माता की सेवा, भाई-बहिनों की सहायता, कुटुम्बियों की समस्यायें अपनी समझने और उन्हें सुलझाने में संलग्न रहकर व्यक्ति अपनी स्वार्थपरता को घटाता और उदारता को बढ़ाता ही है। जिसकी ममता का दायरा जितना बड़ा है, उसे उतना ही श्रेष्ठ कहा जायेगा। स्वार्थ को शरीर से बढ़ा कर कुटुम्बियों तक विस्तृत कराना-’वसुधैव कुटुंबकम्’ की महानता अपनाने का एक प्रारम्भिक ही सही पर महत्वपूर्ण कदम हैं। अपनी देह और बीबी तक की बात सोचने वाला व्यक्ति कृपा ही कहा जायेगा और उसे चढ़ती उम्र में कुछ सुविधायें पा लेने के अतिरिक्त शेष जीवन में इस संकीर्णता का दण्ड ही भोगना पड़ेगा।
आज संयुक्त कुटुम्ब इसलिए अनुपयोगी और मनोमालिन्य के केन्द्र बनते और बिखरते चले जाते हैं कि उनके कर्तव्यों और अधिकारों का विभाजन ठीक तरह नहीं हो पाता। कुछ लोग बड़प्पन के नाम पर मौज करते हैं, कुछ को छोटे पद के कारण कोल्हू के बैल की तरह पिसना पड़ता है। जिनके हाथ में पूँजी या सता है, वे मनमाना उपयोग करते है, और शेष को जरा-जरा-सी बात के कलए मुख ताकना और विवश रहना पड़ता हैं। परस्पर सौजन्य, शिष्टाचार, स्नेह, सद्भाव, सम्मान और सहयोग की भावनायें कम पड़ने से भी असंतोष, रोप और मनोमालिन्य रहने लगता है। इन कारणों को दूर करने के लिए परिवार के हर सदस्य का प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। एक आचार संहिता रहनी चाहिए, जिसके आधार पर हर छोटे-बड़े को अपने कर्तव्यों का पूरा ध्यान हो और हर कोई अधिक पाने की उपेक्षा करके कर्तव्य पालन के लिए अधिक तत्परता पूर्वक संलग्न रहे।
परिवार को एक सहकारी समिति मानकर इस प्रकार गठित किया जाना चाहिये कि हर किसी को अपना कर्तव्य पालन करने के लिए स्वेच्छापूर्वक विवश होना पड़े। एक दूसरे के लिए असीम प्यार रखें और अपनी अपेक्षा अन्यों की सुविधा को प्राथमिकता देते रहें। आवेश और कटुता का, दुर्भाव और तिरस्कार का, आलस्य और अकर्मण्यता का, अहंकार और दबाव की क्षुद्रतायें यदि निरस्त की जा सकें तो बिखरते परिवारों को पुनः संयुक्त रहने के लिये सहमत किया जा सकता है। सुव्यवस्थित आचार संहिता पर निर्धारित हमारी संयुक्त परिवार प्रणाली अपने देश के लिए तो उपयोगी सिद्ध होगी ही साथ ही समस्त संसार को भी इस परम्परा को अपनाने के लिए आकर्षित करेगी।
भारतीय अध्यात्म-शास्त्र में अनेक देवी देवताओं की चर्चा हैँ। कई स्वरूप और आकार-प्रकार के देवताओं का उल्लेख हैं। कई स्वरूप और आकार-प्रकार के देवताओं का उल्लेख हैं। उनके पृथक-पृथक पूजा विधान, स्वभाव और प्रतिफल भी बताये गये हैं। इस संदर्भ में यह जान लेना आवश्यक हैं कि वे सभी एकांकी एवं अपूर्ण हैं। शरीर में अनेक अवयव होते हैं। उनके स्वरूप एवं कार्य विधान भी अलग-अलग हैं। पर वे अन्नतः हैं एक ही शरीर के अंतर्गत। उन सब पर नियन्त्रण एक मस्तिष्क ही करता है एक हृदय ही उन सब का पोषण करता है। यों देखने पर को उनकी स्वतन्त्र सता दृष्टिगोचर होती है, पर वस्तुतः उनका स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं है। समग्र शरीर के स्वस्थ, अस्वस्थ, सबल-निर्बल, जीवित अथवा मृत होने पर उन अवयवों की भी वही गति होती है। समस्त देवता एक ही महत्व के अंतर्गत हैं।
परब्रह्म की एक-एक शक्ति को एक-एक देवता के नाम से सम्बोधित किया गया है। जिस प्रकार जिह्वा में वाणी, नेत्रों में दृष्टि, मस्तिष्क में बुद्धि, भुजाओं में बल, पैरों में गति होती है, उसी प्रकार परब्रह्म की अगणित शक्तियाँ प्रथम-प्रथम देवताओं के नाम से कही गई है। यों उन्हें सशक्त बनाने के लिए, इन पृथक अवयवों की भी तेल-मालिश आदि पृथक-प्रथम क्रियायें भी की जा सकती है, पर वास्तविकता को समझने वाले शरीर की मूल जीवनी शक्ति, अधन-क्रिया, रक्त-शुद्धता आदि पर ही ध्यान केन्द्रित करते हैं। क्योंकि जड़ को सींचे से सभी पत्तियां, डालियाँ स्वयं-में हरी रह सकती हैं।
देवताओं का पृथक-पृथक पूजन भी उपयोगी हैं, उसमें कुछ हानि नहीं, पर दूरदर्शी जड़ सींचने की तरह परब्रह्म की मूल शक्ति पर ही ध्यान केन्द्रित करते हैं और पृथक दीखने वाले सभी अवयवों को सशक्त परिपुष्ट बनाते हुए, उनके द्वारा प्राप्त हो सकने वाले लाभों से लाभान्वित होते हैं।
गायत्री परब्रह्म की मूलभूत एवं अविच्छिन्न शक्ति हैं।
ब्रह्म तत्व में गतिशीलता उसकी ब्राह्मी-शक्ति गायत्री ही उत्पन्न करती हैं। उसी से अन्य सब अंश-अवयवों को देवताओं को पोषण मिलता है। इसलिए तत्वदर्शी जगह-जगह भटकने की अपेक्षा एक ही प्रमुख आश्रय का अवलम्बन करते हैं और जो दर-दर भटकने पर मिल सकता है, उसे ही एक स्थान पर प्राप्त कर लेते हैं। अन्यान्य देवताओं की पूजा-अर्चा से जो आंशिक लाभ मिल सकते हैं, उनकी अपेक्षा अनेक गुना लाभ मूल शक्ति की उपासना का है। गायत्री मूल है। देव शक्तियाँ उसकी शाखा-उपशाखा मात्र है। वे शक्तियाँ भी अपनी समर्थता मूल-केन्द्र से ही उपलब्ध करके इस योग्य बनती है कि अपना क्रिया-कलाप विधिवत जारी रख सकें, किसी साधक को अभीष्ट वरदान दे सकें।
इस तथ्य को पुराणों तथा साधना शास्त्रों में इस प्रकार वर्णन किया गया है कि सब देवता गायत्री की उपासना एवं स्तुति करते हैं और उसी महाभण्डार से जो उपलब्ध करते हैं, उसका अनुदान अपने क्षेत्र में वितरित करते रहते हैं। इस संदर्भ में उपलब्ध अनेक विवरणों में से कुछ नीचे प्रस्तुत किये जाते हैं-
पर्ववेद सारभूता गायत्रयास्तु समर्थना। ब्रह्मदयोऽपि संध्यायाँ ताँ ध्यायन्ति जपन्ति च॥
-देवी भागवत 16।19। 25,
गायत्री उपासना वेदों का सारभूत तत्व हैं, ब्रह्म, विष्णु महेश आदि सभी देव सन्ध्या सहित गायत्री की आराधना करते हैं।
मा भयार्ता महेशाँन ब्रह्म विष्णु महेश्वराः। तिष्ठामि सततं देवा भित्याहरहमव्यया॥
सच्चिदानन्द रुपाहं ब्रहावाहं स्फुरन्प्रभम। मम नास्ति कदा निस्सदेहास्तु तिष्ठत॥
यदूपं दष्टमस्माकं युष्माभिः परमं मतम। ध्यात्वा यद्रू पममलम जपं कुरुत में मनुम॥
तदेव मंक्तलं लाभं भविष्यति महाप्रभम। इदानी ब्रह्मणो देहे विश विष्णो स्थिरो भव॥
अहो महेश दवेश ब्रहादेहे प्रवरय तु। यावत्सृष्टि कुरुष्वेशच्चेमाँ ज्ञानक्रियामयीम॥
अर्थ-देवगण। जब माता गायत्री के वियोग में करुणकन्दन करके प्रार्थना करने लगे तो माता ने उनसे कहा-’हे ब्राह्मण। हे विष्णु। हे महेश्वर। तुम लोग मुझे न देख पाकर भ्रम से पीड़ित मत होना। मैं सदा ही तुम्हारे समीप में ही संस्थित रहा करती हैं। मैं कहीं भी तुमको छोड़कर अन्यत्र नहीं जाया करती, क्योंकि मेरा स्वरूप नित्य एवं अविनाशी हैं। आप लोगों को भली-भाँति समझ लेना चाहिए कि मैं ही सच्चिदानन्द स्वरूप प्रकाशयुक्त क्रांति से समन्वित ब्रह्म हूँ। मेरा नाश कभी भी नहीं होता हैं। मैं सर्वदा स्थित रहा करती हूँ- इसमें लेशमात्र भी संशय नहीं हैं। आप लोगों ने जो मेरा परम निर्मल स्वरूप देखा हैं, उसी सुन्दर मेरे स्वरूप का ध्यान करके मेरे मन्त्र का भक्ति भाव से जाप किया करो। मन्त्र साक्षात मेरा ही स्वरूप तो है ही - मन्त्र (गायत्री) के जापी के पास मैं सदा विद्यमान रहती हूँ। इसी से गायत्री मन्त्र के जप से आपका परम संक्तल होगा। अब हे विष्णु। तुम ब्रह्म के देह में प्रवेश करके स्थिर रहो। हे महेश। तुम भी ब्रह्म की देह में प्रवेश करो। जब तक ईश्वर ज्ञान और क्रियामयी सृष्टि का आरम्भ नहीं करते हैं, तब तक आप लोग इनके ही देह में अपना निवास करके रहा। उस समय समस्त देवगणों को वेद जननी माता गायत्री देवी ने इस प्रकार से सान्त्वना प्रदान कर आदेश दिया तभी देवों को शान्ति हुई।
आवयोर्जगतौंच मंक्तलाय पदाम्बुजम। महामुक्ति प्रदं चैव त्वदीयमति निर्मलम॥
अदृश्यमपि योप्यं हि मातुराकार वर्जितम। कथन्तत्पूजयिष्यार्वः सर्वमंक्तलदायकम॥
भूमौ स्नानं, कल्पयस्त्र यजितुँ तत्पदाम्बुजम सर्वदा पूजयिष्यावो महामंक्तल कारणम॥
आवयोश्रौव सर्वेषाँ महामुक्ति फलाय च। तदावयो दनिवाद्याः किं करिष्यन्ति चाशुभम॥
अवश्य वै तरिष्या वो दुस्तरं त्वत्पदार्चनात।
अर्थ-एक बार ब्रह्म और विष्णु दोनों महान देवों ने सावित्री देवी का स्तवन किया था। इन दोनों देवेशों ने गायत्री देवी से कहा-’हे माता। हमारे और समस्त जगत के कल्याण के निर्मित आपके महामुक्ति प्रद, अत्यत निर्मल-अदृश्य और आकारहीन एवं गैप्य तथा परम मंक्तलदायक महान आपके चरणों की चर्चा हम किस प्रकार से करें। आप अपने चरण कमलों को पूजन के लिए पृथ्वी पर किसी स्थल की कल्पना करें। हम उसी स्थान पर एकत्रित होकर महान मंक्तल के कारणस्वरुप एवं महायुक्तिपद आपके चरण कमलों की अर्चना करेंगे। इससे हमारा, समस्त देवगणों का तथा सभी जीवों का महान मंक्तल होगा। आपके चरणों का वचन करने पर दानवादि हमारा कुछ भी अनिष्ट नहीं कर सकेंगे। हम आपके चरणों की पूजा परम दुस्तर दुःखों से भी निस्तार प्राप्त कर सकेंगे। इसमें तनिक भी सन्देह नहीं हैं।’
अति संगुप्तभावेन ईप्सितं प्राप्यते फलम। देव दानव गन्वर्वेरन्यैरपि महामते॥
यथा न शायते कैश्वियथार्चा त्वं कुरुष्व मे। पर्वायदभयः परित्राणं कारष्यामि चते सदा॥
अर्थ- भगवती वेद जननी ने कहा-’अत्यन्त गुप्तभाव से पूजा करने पर अभीष्ट फल की प्राप्ति होती हैं। देवदानवादि अन्य सभी को पूजा करने पर फल की प्राप्ति होती है-इसमें सन्देह नहीं है। जिसको दूसरा मनुष्य न जादू सके, उसी भाँति मेरी पूजा करो। ऐसा करने पर सभी आपदाओं से मैं रक्षा करूंगी।
इत्युक्त्वा वै सुरान्वेधा निगमानादि देश है। देहयुक्तान स्थितानग्रे सुरकार्याथँ सिद्वये॥
स्तुवतु परमाँ देवी ब्रह्मविद्याँ सनातनीम। गूढांक्ती च महामायाँ सर्व कार्याथ् साधनीम॥
इस प्रकार से ब्रह्मा जी ने देवगणों को भगवती की आराधना करने का उपदेश प्रदान कर फिर वेदों को आदेश दिया था, जो उनके सामने देह धारण करके देवगण के कार्य करने की सिद्धि के लिये उपस्थित थे। ब्रह्म ने कहा-’हे निगमो। आप सब परात्परा, सनातनी, मूढ अंक्तों वाली सम्पूर्ण कार्यों को सिद्ध करने वाली महामाया ब्रह्मविद्या देवी का स्तवन करो।
नमो देवि महामाये विश्वोत्पतिकरे शिवे। निर्गुणे सर्वभूतेशि मातः शंकर कामदे॥
त्व भूमि सर्वभूतानाँ प्राणः प्राणवताँ तथा। घीः श्रीः कान्तिः क्षमा शान्तिः श्रद्धा मेधा
धृतिः स्मृतिः॥
त्वभुत्गीथेऽर्धमात्रासि गायत्री व्याहतिस्तथा। जया च विजयाधात्री लज्जा कीर्तिः स्पृहा दया॥
त्वाँसंस्तुम्वोऽम्य भुवनत्रय संविधानदक्षाँ दयारस युताँ जननी जनानाम। डवद्याँ शिवा सकललोकहिताँ वरेण्याँ वाग्वीज वासनिपुणाँ भवनाश कर्त्रीम॥
ब्रह्म हरः शौरि सहस्र नेत्र वाग्याह्रि सूर्याभुवनाधिनाथा। ते त्वत्कृताः सन्धि ततो न मुख्या माता यतस्त्वंस्थिरजंक्तमानाम॥
अर्थ-सम्पूर्ण मूर्तिमान वेदों ने ब्रह्म का आदेश पाकर देवी का स्तवन किया था। उन्होंने कहा-’हे देवि। हम सब आपको प्रणाम करते हैं। आप महामाया हैं और हे शिवे। आप इस समस्त विश्व की उत्पत्ति को करने वाली हैं। आप गुणों के विकार से रहित और समस्त भूतों की स्वामिन हैं। हे माता। आप शंकर की कामनाओं को पूर्ण करने वाली हैं। सब भूतों की आप भूमि अर्थात् आधार हैं तथा प्राणधारियों को प्राण-स्वरूपा हैं। आप ही बुद्धि, घी, कान्ति, क्षमा, शान्ति, श्रद्धा, मेधा, धृति, स्मृति हैं और आप उदगोथ अर्धमात्रा हैं। आप गायत्री हैं तथा आप ही व्याहते हैँ। आपका स्वरूप ही जया-विजया, घात्री, लज्ला, कीर्ति, स्पृडा और दया के रूप में होता हैं। हे अंबे। तीनों सुवनों के विद्या में कुशल-दयासे परिपूर्ण और समस्त प्राणियों की जननी आपकी हम सब स्तुति करते हैं। आप ही विद्या है-शिवा और सम्पूर्ण लोकों का उपकार करने वाली हैं। आप वरेण्य-वाग्वीज में निवास करने में दक्ष इस संसार के नाश करने वाली हैं। ब्रह्म, शिव, विष्णु, इन्द्र, वाणी, अग्नि और सूर्य ये सब भुवनों के अधिनाथ हैं, किन्तु इन सबको बनाने वाली आप ही हैं और इनकी मुख्यता कुछ भी नहीं हैं, क्योंकि आप इस विश्व के स्थावर और जंक्तम अर्थात् जड़-चेतन माता उत्पन्न करने वाली हैं।
एक बार देव गुरु गृहस्थातिजी ने देवसमझामें अपने शिष्य देव पुरुषों को गायत्री का महात्म्य बताते हुए कहा कि देव लोक पहुँचाने और देवत्व को स्थिर रखने का श्रेय गायत्री माता को ही प्राप्त हैं। उसी का आश्रय लेकर आत्मा को अन्धकार भरे नरकों से छूटकर सुरलोक का आनन्द प्राप्त होता हैं। पर और अपरा विद्या के रूप में भगवती के सुविस्तृत आवरण की उन्होंने चर्चा की और कहा कि आप लोगों की तरह ही जो अन्य लोग इस अवलम्बन को ग्रहण करेंगे, वे उच्च लोगों को भूमिका प्राप्त करेंगे और आत्मानन्द का सुख भोगेंगे।
दुःखस्यान्तोऽद्य युष्माँक दृश्यते नात्र संशक्तः तस्मिन शैले सदा देवी तिष्ठतीति मयाश्रुतम॥
स्तुता सम्पूजिता सद्यो वाँच्छितार्थान्प्रदास्यति। निश्चयं परमं कृत्वा गच्छध्वं वै हिमालयम॥
सुराः सर्वाणि कार्याणि सावः कामं विद्यास्यति।
अर्थ-सुरगुरु ने देवताओं से कहा-’आज मुझे तुम्हारे दुःखों का अन्त दिखलाई देता हैँ। इसमें लेख मात्र भी कोई संशय नहीं हैं। मैंने ऐसा सुना हैं कि उस परम पावन पर्वत पर वह देवी सदा निवास किया करती हैं। जब वहाँ आपके द्वारा संस्तत एवं भली-भाँति समर्चित होगी तो वह आपको अभीष्ट अवश्य ही प्रदान कर देगी। इसलिए पूर्ण और पक्का निश्चय करके आप लोग हिमालय पर देवी की समाराधना के लिये चले जाइये।
देवताओं ने सुर गुरु बृहस्पति जी के आदेशानुसार हिमालय पर जाकर भगवती की उपासना की और उसके फलस्वरूप प्राप्त अनुभवों के आधार पर अपने भाव व्यक्त करते हुए स्तवन किया-
इति तस्य वचः श्रुत्वा देवास्ते प्रययुगिंरिम। हिमालयं महाराज। देवी ध्यान परायणाः॥
माया बीजं ह्रदा नित्यं जपन्तः सर्व एवं हि। नमश्चक्रु महामायाँ भक्तानामभय प्रदाम॥
तुष्टुकुः स्तोत्रमंत्रैश्च भक्तया परमयायुताः।
अर्थ-इस प्रकार का उनका वचन सुन कर वे समस्त देवगण गिरिराज हिमालय पर चले गये। हे
महाराज। वहाँ पर सब देवता देवी के ध्यान में तत्पर हो गये और माया बीज का हृदय में ध्यान करके मन्त्र का जाप करने लगे। अपने परम भक्तों को अभय प्रदान करने वाली महामाया को नमस्कार किया तथा अत्यन्त भक्ति की भावना से संयुक्त होकर स्तोत्रों और मन्त्रों के द्वारा उसका स्तवन किया।
ते किं न मन्दमतयो यतयो विमूढास्त्वाँ ये न विश्व-जननीं समुपाश्रयन्ति। विद्याँपरा सकल काम फलप्रदाँ ताँ मुक्ति प्रदाँ विबुधवृन्द सुविन्द लाडिध्रम।
अर्थ-देवों ने स्तुति की-’ हे देवि। ये यतिगण मन्द बुद्धि वाले ही हैं और महामूढ़ हैं, जो समस्त विश्व की जननकी आपका आश्य नहीं लेते हैं। आप तो परा विद्या हैं, सब कामनाओं को पूर्ण करने वाली-मोक्ष प्रदान करने वाली हैं। सब देवगण आपके चरणों की वन्दना करते हैं।’
देवि। त्वदंिक्तभजने न जवा रताये संसार कूप पलिताः पतिताः किलामी। ते कुष्ठ गुल्म शिर आधियुक्ता भवंति दारिद्रय दैन्य सहिता रहिता सुखौद्यैः॥ ये काष्ठभार बहने यवसावहारे कार्थ्ये भवन्ति निपुणा धनदारहीनाः जानीमहेऽपमतिभिभेवदधि सेवा पूर्वे भवे जननि। तैने कृता कदापि॥ किमत्रास्ति चित्रं यदम्बासुतें स्वं मुदा पालयेत्पोषयेत्स्तप्यगेव। यतस्त्वं जनित्री सुराणाँसहाया कुरुष्वैक चिन्तेन कार्य समग्रम। ननाते गुणानामियताँ स्वरुपं वयं देवि। जानीमहे विश्ववन्धे। कृपामा त्रमित्येव मत्वा तथास्माँन् भेयभ्यः सदा पाहिपाँतु समर्थे॥
अर्थ- देवगण ने प्रार्थना की हे देवि। जो मनुष्य इस संसार में आकर आपके चरणों का सेवन करने में रति नहीं रखते हैं, वे निश्चय ही इस संसार रूपी कूप में गिरे हुए महान् पतित हैं। ऐसे पुरुष सदा कुष्ठ-गुल्म और मस्तक की आधि से युक्त रहा करते हैं और सर्वदा दरिद्रता-दीनता आदि से घिरे हुए रहकर सुखों के सागर से वंचित ही रहा करते हैँ। जो काष्ठ के भार बहन करने और भवसागर के कार्य में निपुण होते हैं, वे धन और दारा से हीन हुआ करते हैं। हम ऐसा समझते हैं, उन अल्पमति वालों ने है जननि। अपने जन्म में आपके चरणों का आश्रय नहीं लिया हैं। इसमें कुछ भी आश्चर्य की बात नहीं हैं कि माता अपने पुत्र पर प्रेम कर उसका पोषण एवं पालन करती हैं। आप तो देवों की जननी हैं और सदा सहायता करने वाली रही हैं। देवगणों का सभी कार्य आप एक चितता के साथ किया करती हैं। हे देवि। आपके इतने अनन्य शुभ गुण हैं कि उनकी गणना नहीं की जा सकती हैं और हे विश्व के द्वारा वन्दना करने के योग्य माँ। हम लोग आपके पूर्ण स्वरूप का भी ज्ञान नहीं रखते हैं। हम तो केवल अपने आपको आपकी कृपा का पात्र ही समझते हैं। आप रक्षा करने में पूर्ण समर्थ हैं। अतएव सब प्रकार के भागों से सर्वदा हमारा धारण करती रहें-यही हम समस्त देवगणों का आपके श्री चरणों की सेवा में एकमात्र विनम्र निवेदन हैं।
जलादि सकलं तत्वं ब्रह्मण्डादिक विस्तरम। देवादि सकलं पूर्ण दिग्विदिक च चराचरम॥
कार्थ्य च कारणं सर्व तथो विष्णोंः समुदभवः। सर्प जानाति हि ब्रह्म मत्कृत मायया पुनः।
किन्तु सर्व हि मिथ्यैव मातुर्माया हि केवलम। ताँ मायाँ कि भजन्ति ये तत्पंर यान्ति ते नराः॥ तुष्टा सा परमा माया मुक्ति मात्रं प्रयच्छति॥ रुष्टा सा परमा माया भूमियोगं प्रयच्छति॥
तस्याः पदास्तु जे नूनं वश्या मुक्तिः समाग्रिता। यस्य तुष्टा महादेवी मम माता महेश्वरी॥ ददौ तस्मै च त्वं मुक्ति महामाया देवेश्वरी॥
अर्थ-सर्व जल प्रभूति तत्व और ब्रह्मांड आदि समस्त विस्तार-सम्पूर्ण देवगण आदि एवं चराचर तथा कार्य कारण तथा विष्णु की उत्पत्ति यह सभी कौशल ब्रह्म को माता गायत्री कहती हैं कि मेरी माया से ही अब गत हुआ हैं। किन्तु यह सभी मिथ्या हैं, केवल गायत्री माता की माया का ज्ञान ही प्राप्त करना चाहिये। जो मनुष्य उसकी माया महिमा को भजता हैं, वह साँसारिक माया को पार कर लेता है अर्थात् उसका सर्वतोभाव से परम कल्याण होता हैं। यदि वह मातेश्वरी परम तुष्ट हो जाती है तो निस्सन्देह मुक्ति प्रदान किया करती हैं। यदि वह रुष्ट होती है तो फिर योनि योग प्रदान करती हैं। उसके चरण कमलों में मुक्ति वश्या होकर आश्रय किया करती हैं। वह माता गायत्री देवी जिस पर सन्तुष्ट होती है। उसी को प्राप्त होती हैं।
कुण्डलिनी महाशक्ति को तन्त्र-शास्त्रों में द्विमुखी मर्णिणी कहा गया हैं। उसका एक मुख मल-मूत्र इन्द्रियों के मध्य मूलाधार चक्र में हैं। दूसरा मुख मस्तिष्क के मध्य ब्रह्म रन्ध्र हैं। पृथ्वी के उतरी दक्षिणी ध्रुवों में सन्निहित महान शक्तियों का परस्पर आदान-प्रदान निरन्तर होता रहता हैं, इसी में इस पृथ्वी का सारा क्रिया-कलाप यथ क्रम चल रहा हैं। इसी प्रकार कुण्डलिनी शक्ति के ऊपर और नीचे के-जननेन्द्रिय और मस्तिष्क अद्यःऊर्ध्व केंद्रों की शक्तियों का निरन्तर आदान-प्रदान होता रहता हैं। यह सवार किया मेरु-दण्ड के माध्यम से होती हैं। रीड़ की हड्डी इन दोनों केन्द्रों को परस्पर मिलाने का काम करती हैं। वस्तुतः स्थूल कुण्डलिनी का महासर्पिणी स्वरूप मूलाधार से लेकर मेरु-दण्ड समेत ब्रह्म-रन्ध्र तक फले हुए सर्पाकृति कलेवर में ही पूरी तरह देखी जा सकती है। ऊपर नीचे मुड़े हुए दो महान शक्तिशाली केन्द्र चक्र ही उसके आगे-पीछे वाले दो मुख हैं।
मेरु-दंड पीला हैं, उसके भीतर जो कुछ हैं, उसकी चर्चा शरीर शास्त्र के स्थूल प्रत्यक्ष दर्शन के आधार पर दूसरे दंक्त से की जा सकती हैं। शल्य-क्रिया द्वारा जो देखा जा सकता हैं, वह रचना क्रम दूसरा हैं। हमें सूक्ष्म प्रक्रिया के अंतर्गत योग-शास्त्र की दृष्टि से इस परिधि में सन्निहित दिव्य शक्तियों की चर्चा करनी हैं। योग-शास्त्र के अनुसार मेरु-दंड में एक ब्रह्म-नाड़ी हैं और उसके अंतर्गत पड़ा और मिला दो अंतर्गत शिरायें गतिशील हैं। यह नाड़ियां रक्त वाहिनी शिरायें नहीं समझी जानी चाहियें। वस्तुतः वे विद्युत धारायें हैं। जैसे बिजली के तार में ऊपर एक रबड़ का खोल चढ़ा होता हैं और उसके भीतर जस्ते तथा ताँबे का ठंडा-गरम तार रहता हैं, उसी प्रकार इन नाडियों की समझा जाना चाहिये। ब्रह्म-नाड़ी रबड़ का खोल हुआ, उसके भीतर पड़ा और पिंगला ठंडे-गरम तारों की तरह हैं। इनका स्थूल कलेवर या अस्तित्व नहीं हैं। शल्य-क्रिया द्वारा वह नाड़ियां नहीं देखी जा सकतीं। इस रचना क्रम के सूक्ष्म विद्युत धाराओं की दिव्य रचना ही कहना चाहिये।
मस्तिष्क के भीतरी भाग यों अतिशय ‘कोष्ठकों’ के अंतर्गत भरा हुआ सजा भाग ही देखन को मिलेगा। दुर्बीन से और कुछ देखा नहीं जा सकता पर सभी जानते हैं, उस दिव्य संस्थान के नगण्य से दीखने वाले घटकों के अंतर्गत विलक्षण शक्तियों भरी पड़ी हैं। मनुष्य का सारा व्यक्तित्व, सारा चिन्तन, सारा क्रिया-कलाप और सारा शारीरिक, मानसिक अस्तित्व इन घटकों के ऊपर ही अवलम्बित रहता हैं। देखने में सभी का मस्तिष्क लगभग एक जैसा दीखेगा पर उसकी सूक्ष्म स्थिति में पृथ्वी, आकाश जैसा कि अन्तर दीखता हैं, उसके आधार पर व्यक्तियों का घटिया-बढ़िया होना सहज ही आँका जा सकता हैं। यही सूक्ष्मता कुण्डलिनी के सम्बन्ध में व्यक्त की जा सकती हैं। मूलाधार, सहस्रार, ब्रह्म-नाड़ी, इड़ा, मिला इन्हें शल्य क्रिया द्वारा नहीं देखा जा सकता। यह सारी विश्वरचना ऐसी सूक्ष्म हैं, जो देखी तो नहीं जा सकती पर उसका अस्तित्व प्रत्यक्ष अनुभव किया जा सकता हैं।
मूलाधार में अवस्थित कुण्डलिनी शक्ति के अधो मणि की कुछ चर्चा पिछले अंक में की जा चुकी हैं। मल द्वारा और जननेन्द्रिय के बीच जो लगभग चार अंगुल जगह खाली पड़ी हैं, उसी के गहर में एक त्रिकोण परमाणु पाया जाता हैं। सारे शरीर में गोल कण हैं, वह एक ही तिकोना हैं। यहाँ एक प्रकार का शक्ति-भ्रमर हैँ। शरीर में प्रवाहित होने वाली तथा मशीनों में संचारित बिजली की गति का क्रम यह हैं कि वह आगे बहती हैं, फिर तनिक पीछे हटती है और फिर उसी क्रम से आगे बढ़ती, पीछे हटती हुई अपनी अभीष्ट दिशा में दौड़ती चली जाती हैं। किन्तु मूलाधार स्थित त्रिकोण कण के शक्ति मेबर में सन्निहित बिजली गोल घेरे में पेड़ से लिपटी हुई बेल की तरह जूमती हुई संचारित होती हैं। यह संचार क्रम प्रायः 3॥ लपेटों का हैं। आगे चलकर यह विद्युत धारा इस विलक्षण गति को छोड़कर सामान्य रीति से प्रवाहित होने लगती हैं।
यह प्रवाह निरन्तर मेरु दंड में होकर मस्तिष्क के उस मध्य-बिन्दु तक दौड़ता रहता हैं, जिसे ब्रह्म-रन्ध्र सा सहस्रार कमल कहते हैं। इस शक्ति-केन्द्र का मध्य अणु भी शरीर के अन्य अणुओं से भिन्न रचना का हैं। वह गल न होकर चपटा हैं। उसके किनारे चिकने न होकर खुरदरे हैं-भारी के दाँतों से उस खुरदरेपन की तुलना की जा सकती हैं, योगियों का कहना हैं कि उन दांतों की संख्या एक हजार हैं। अलंकारिक दृष्टि से इसे एक ऐसे कमल पुष्प की तरह चित्रित किया जाता हैं, जिसमें हजार पंखुड़ियां खिली हुई हों। इस अलंकार के आधार पर ही इस अणु का नामकरण ‘सहस्रार कमल’ किया गया हैं।
सहस्रार कमल का पौराणिक वरदान बहुत ही मनोरम एवं सारगन्ति हैं। कहा गया है कि क्षीरसागर में विष्णु भगवान सहस्त्र फन वाले शेषनाग पर शयन कर रहे हैं। उनके हाथ में शंख, चक्र, गंदा, पद्य हैं। लक्ष्मी उनके पैर दाबती हैं। कुछ पार्षद उनके पास खड़े हैं। क्षीरसागर मस्तिष्क में भरा हुआ, भूरा चिकना पदार्थ पैमेटर हैं। हजार फन वाला सर्प यह चपटा खुरदरा ब्रह्म-रन्ध्र स्थित विशेष परमाणु हैं। मनुष्य शरीर में अवस्थित ब्रह्म-सता का केन्द्र यही हैं। इसी से यहाँ विष्णु भगवान का निवास बताया गया हैं। यह विष्णु सोते रहते हैं। अर्थात् सर्वसाधारण में होता तो ईश्वर का अंश समान रूप से हैं पर वह जागृत स्थित में नहीं देखा जाता। आमतौर से लोग धृरिगत, हेय, पशु-प्रवृत्तियों जैसा निम्न-स्तर का जीवन यापन करते हैं। उसे देखते हुए लगता हैं कि इनके भीतर या तो ईश्वर हैं ही नहीं-अथवा यदि हैं तो वह प्रसुप्त स्थित में पड़ा हैं। जिसका ईश्वर जागृत होगा उसकी विचारणा, क्रियाशीलता, आकाँक्षा एवं स्थित उत्कृष्ट स्तर की दिखाई देगी। यह प्रबुद्ध और प्रकाशवान् जीवन जी रहा हैं, अपने प्रकाश में स्वयं ही प्रकाशवान् न हो रहा होगा वरन् दूसरों को भी मार्ग-दर्शन कर सकने में समर्थ हो रहा होगा। मानव तत्व की विभूतियाँ जिसमें परिलक्षित न हो रही हैं, जो शोक-संताप, दैन्य दारिद्र और चिन्ता-निराशा का नारकीय जीवन जी रहा हो, उसके बारे में यह कैसे कहा जाय कि उसमें भगवान् विराजमान हैं। फिर यह भी तो नहीं कहा जा सकता कि उसमें ईश्वर नहीं हैं। हर जीव ईश्वर का अंश है और उसके भीतर ब्रह्म-सता का अस्तित्व विद्यमान भी हैं।
इस विसंगति की संगति मिलाने के लिए यही कहा जा सकता है कि उसमें भगवान है तो पर सीधा पड़ा है। क्षीर जैसे उज्ज्वल विचारणाओं के सागर में भगवान निवास करते हैं। क्षीरसागर हो उनका लोक हैं। जिस मस्तिष्क में क्षीर जैसे धवल स्वच्छ, उज्ज्वल प्रवृत्तियां, मनोवृत्तियां भरी पड़ी हो समझना चाहिए कि उसका अंतरंग क्षीर-सागर हैं और उसे भगवान का लोक ही माना जायेगा। क्षीरसागर में सहस्र फन वाले शेषनाग पर विष्णु भगवान के शयन करते रहने का यही पौराणिक रहस्य हैं।
विष्णु के हाथ चार आयुध। शंख अर्थात् ध्वनि, वाक शक्ति, दूसरों को जगाने-उठाने एवं प्रभावित करने की क्षमता। चक्र अर्थात् गतिशीलता, क्रिया, स्थिति के अनुरूप परिवर्तन कर सकने की शक्ति। गदा अर्थात् प्रताड़ना, अवाँछनीय, अनुपयुक्त परिस्थितियों को दबाने-मिटाने एवं सुधारने की सामर्थ्य। पद्य अर्थात् सौंदर्य, शोभा, सुगन्ध, मधुरता, सौम्यता, सज्जनता सहृदयता, उदारता, संयमशीलता आदि सद्गुणों का बाहुल्य। विष्णु भगवान् के चार हाथों में यह चार आयुध हैं। भगवान् अपने साथ यह विशेषतायें धारण किये हैं। जिनका भगवान् जागृत, सक्रिय होगा, उनमें उपरोक्त चारों विशेषतायें भी प्रत्यक्ष परिलक्षित होंगी। लक्ष्मी विष्णु की पत्नी हैं। जहाँ भगवान् रहेगा, वहाँ विभूतियाँ, सिद्धियां, विशेषतायें, सफलतायें, सद्भावनायें प्रचुर परिमात्र में दृष्टिगोचर होंगी। लक्ष्मी अर्थात् विभूति। वह विष्णु की पत्नी हैं। महापुरुषों के पास महान् विभूतियाँ भी प्रस्तुत रहती हैं। दरिद्रता तो दुर्जनों के हिस्से आई हैं, सज्जन अपरिग्रही हो सकते हैं, यह उनकी स्वेच्छा, सुविधा एवं अमीरी हैं। वैसे कोई अभाव उनके ऊपर थोपा हुआ नहीं होता।
नारद हयग्रीव आदि दूसरे पार्षदों की उपस्थिति का आधार यह है कि विष्णु और लक्ष्मी के साथ-साथ अनेक दैवी शक्तियाँ भी सहायता के लिए उपस्थित रहती हैं। सात्विक शक्तियों के ज्ञान-विज्ञान और वर्चस्व के प्रतीक नारद माने जाते हैं। और बल, पराक्रम, पुरुषार्थ, वैभव, साहस एवं सकाम महता के प्रतिनिधि हयग्रीव हैं। सतोगुण का बाहुल्य और रजोगुण का मात्रिध्य सदा विध्रणु और लक्ष्मी की उपस्थिति के साथ जुड़ा रहेगा। जो ईश्वर भक्त, आस्तिक एवं आत्म-दर्शी हैं, उसे विष्णु लक्ष्मी, पार्षद, क्षीर -सागर शेषनाग जैसी दिव्य सत्ताओं को अपने अंतरंग में प्रतिष्ठित देखने का अवसर मिलेगा। उसके प्रबुद्ध मस्तिष्क में उपरोक्त सारी विशेषतायें विद्यमान रहेगी। उसका व्यक्तित्व प्रकाशमान अनुकरणीय एवं ऐतिहासिक चिर-स्मरणीय बनकर रहेगा। उसकी उत्कृष्ट विचारधारणा एवं आदर्श क्रियाशीलता उसे नर-पशु के स्तर से निकालकर नर-नारायण की तरह पूजा बनाकर रहेगी।
कुण्डलिनी के ऊर्ध्व मुख ब्रह्म-रंध्र स्थित सहस्रार कमल के आधार पर शेषशायी विष्णु को अलंकारिक गाथा का रहस्य बहुत गम्भीर हैं, उसमें बताया गया हैं कि ऊर्ध्व मुख सहस्रार कमल यदि जागृत हो सके तो व्यक्ति अपने भीतर विष्णु और उसके समस्त वैभव कलेवर को अपने साथ जुड़ा, गुँथा देख सकता हैं और सिद्ध-पुरुषों की तरह महामहिम जीवन-यापन कर सकता हैं।
कुण्डलिनी के अधोमुख मूलाधार चक्र के साथ समुद्र-मन्थन की पौराणिक गाथा जुड़ी हुई हैं। सुर और असुरों ने मिलकर समुद्र मथा था और एक से एक बढ़कर महत्वपूर्ण चौदह समुद्र मथा था और एक से एक बढ़कर महत्वपूर्ण चौदह रत्न प्राप्त किये थे। इस गाथा में पौराणिक उपाख्यानकार ने कुण्डलिनी की गरिमा ही प्रकट की हैं।
सुर और असुर दो वर्ग माने गये हैं। इनकी प्रकृति भिन्न हैं। दिति-त्रदिति दो माताओं के पुत्र होने के कारण इनमें कुछ भेद भी हैं पर पिता तक होने के कारण वे एक ही अंश-वंश के तथा परस्पर पूरक हैं। सुरु-गुरु बृहस्पति और असुर गुरु शुक्राचार्य दोनों ही देव थे। दोनों की योग्यता, तपस्या एवं दूरदर्शिता असाधारण थी। प्रक्रिया में थोड़ा अन्तर अवश्य था पर थे दोनों ही अपने स्थान पर महत्वपूर्ण सुरु गुरु बृहस्पति ज्ञान मार्गी थे, उनका सम्प्रदाय योग को प्रधानता देता था और उनके अनुयायी दक्षिण मार्गी कहलाते थे। असुर गुरु, शुक्राचार्य कर्ममार्गी थे, उनका सम्प्रदाय तन्त्र को प्रधानता देता था और उनके अनुयायी बाम-मार्गी कहलाते थे। आगम और निगम, वेद और तंत्र दोनों की अपनी महता हैं। ज्ञान और कर्म एक दूसरे के पूरक हैं। सुर और असुरों को सता एक दूसरे को पूरक हैं। पर समन्वय का पथ छोड़ने वाले एक ही पम्प परिवार के लोग दुराग्रह के कारण टकराते रहते हैं, सो अतिवा देना और उग्र दुराग्रह का दौर जब चला तो सुर, असुर भी टकराने लगे। देवासुर संग्राम के बहुत कथानक पुराणों में पाये जाते हैं पर उनके सहयोग पूर्ण क्रिया-कलापों का भी सर्वथा अथाव नहीं हैं। समुद्र-मन्थन दोनों ने मिलकर किया था। प्रजापति ने परस्पर कलह से उन्हें दिन-दिन दुर्बल होते जाते, देखकर परामर्श दिया कि वे सहयोग का महत्व समझें और मिल-जुलकर काम करें। उन्होंने परामर्श माना और समुद्र-मन्थन का पुरुष से करने के लिए तैयार हो गये। ज्ञान और कर्म का समन्वय ही सुर-असुर संबंधित हैं। विष्णु को ज्ञान का और शिव को कर्म का प्रतीक माना गया हैं। सुरों का उपास्य विष्णु और असुरों का उपास्य शिव माना जाता रहा हैं। यह तथ्य कुण्डलिनी महाशक्ति के सुविस्तृत विज्ञान में बहुत ही स्पष्ट हैं।
मस्तिष्क के मध्य भाग में अवस्थित सहस्रार कमल में शेषशायी विष्णु भगवान अवस्थित हैं और अवःउवस्थित मूलाधार चद्रा के अधिपति शिव है। शिव चरित्र में कामदेव द्वारा शिव की उद्दीप्त करने और उनके द्वारा तीसरा नेत्र खोलकर कामदेव को जला डालने वाली कथा प्रख्यात हैं। कुण्डलिनी जननेन्द्रिय केन्द्र से समीप होने से अपने निकटवर्ती क्षेत्र को प्रभावित करती हैं, तत्वदर्शी उस अपव्यय को ज्ञान नेत्र खोलकर नियन्त्रित कर लेते हैं। एक पौराणिक कथा इसी संदर्भ में यह भी हैं कि शिव के काम पीड़ित होने पर उनकी जननेन्द्रिय के 28 टुकड़े विष्णु ने कर डाले और वे जहाँ भी गिरे वहाँ ज्योतिर्लिंगों की स्थापना हुई। द्वादश ज्योतिर्लिंगों का उद्भव इसी प्रकार हुआ। वासना को ज्योति में बदला जा सकता हैं। इस कथानक का यही मर्म हैं।
शिवजी का प्रधान आभूषण सर्प हैं और उनके चित्रों में हर सर्प प्रायः 3॥ फेरे लगाकर लिपटा हुआ दिखाई पड़ता हैं। शिवलिंग की मूर्ति पूजा में नर-नारी की जननेन्द्रियों की ही स्थापना हैं। शिव मन्दिरों की प्रतिमायें नर-नारी की जननेन्द्रियों को सम्मिलित करके प्रतिष्ठापित किया किया जाता हैं। और उस पर जल पढ़ाने की-शीतल करने की प्रक्रिया जारी रहती हैं। अर्थात् इन अवयवों को यों अश्लील और गुहा माना जाता हैं पर वे घृणित नहीं हैं। उनमें ऐश्वर्य के असाधारण रहस्य बीज विद्यमान हैं। प्रतीक रूप से सर्प जलहली और शिवलिंग की पाधारण प्रतिमा के बीच भी व्यवस्थित रहता है। इस स्थापना में इसी तथ्य का प्रतिपादन हैं कि कुण्डलिनी का अधिपति शिव प्रत्यक्ष एवं समर्थ परमेश्वर हैं। उनके निवास स्थान कैलाश पर्वत और मानसरोवर की तरह समण् जायँ उन्हें नर-नारी की घुरिगत जननेन्द्रिय मात्र न मान लिया जाय। वरन उनकी पवित्रता और महता के प्रति अति उच्च भाव देखते हुए, सदुपयोग की आराधना में तत्पर रहा जाय। साहस और कलाकारिता के-पुरुषार्थ और लालित्य के-कर्म और भावना के इन केन्द्रों को प्रजनन मात्र से निरस्त न बना दिया जाय वरन नर-नारी की जननेन्द्रियों के निकट मूलाधार चक्र की शिव शक्ति को उच्च आदर्शों के लिए प्रयुक्त किया जाय। भारतीय अध्यात्म-शास्त्र का यह संदेश हर किसी के लिए अति महत्वपूर्ण हैं। शिवलिंग की प्रतिमात्राओं में इसी तथ्य का संकेत रूप में प्रकटीकरण हैं।
कुरण की रासलीला में गोपियों के साथ बेरगुनाद और अनहद नृत्य में अलंकारिक रूप से अंतरंग की समस्त भाग
तरंगों की सरसता से ओत-प्रोत, शंका एवं उल्लसित करने का संकेत हैं। स्नान करती गोपियों के वस्त्र से भागने और उन्हें नग्न करने में भी अलंकार हैं कि उस गृह शक्ति को तिरस्कृत, उपेक्षित एवं विस्मृत न रखकर उस पर पड़ा पर्दा हटाकर तथ्य को तात्विक दृष्टि से गम्भीरतापूर्वक देखना चाहिये। ताँत्रिक साधनाओं में ‘भैरवी-चक्र’ की साधना असामाजिक एवं अश्लील होने के कारण उसकी चर्चा नहीं की जाती और उसे अति युग रखा जाता हैं। रामकृष्ण परमहंस में अद्भुत शक्तियों का जागरण करने के लिए उनकी ताँत्रिक गुरु महायोगिनी ने ‘कुमारी पूजा’ की साधना कराई थी। उसके अश्लील क्रिया-कलापों में सहयोग देने के लिए परमहंस जी की धर्मपत्नी शारदामणि जी बड़ी कठिनाई से ही जनन सहज संकोचशीलता छोड़कर तैयार हुई थीं। आध्यात्मिकता का एक काम शास्त्र भी है। जिसके अनुसार कुन्ती द्वारा सर्वथा कुमारी होते हुए भी देव शक्यों का आह्वान कर सूर्य का प्रसाद करण, इन्द्र का प्रसाद अर्जुन, धर्मराज का प्रसाद युधिष्ठिर भौर वरुण का प्रसाद भीम उत्पन्न किया था। अंजनि पुत्र पवनसुत हनुमान के पिता महत थे, इसलिए उन्हें मारुत भी कहा जाता हैं। इस शास्त्र का एक सुविस्तृत विज्ञान हैं पर उसकी चर्चा केवल अधिकारी वर्ग तक ही सीमित रहने योग्य होने से उसका सार्वजनिक उल्लेख अवाँछनीय समझा गया हैं। अस्तु तत्र की ऐसी ही अनेक प्रक्रियाओं को गुहा घोषित करके उसे अधिकारी वर्ग के लिए ही सीमित और सुरक्षित कर दिया गया हैं।
कृपा चरित्र में कालिया मास का मान मर्दन करने और उसकी दोनों पत्नियों द्वारा भगवान को अनेक उपहारों सहित अभ्यर्थना करती हुई प्रस्तुत होने की कृपा प्रसिद्ध हैं। कृण, विषगुई के अवतार हैं। उद्धत महासर्प को वे ही नियन्त्रित करते हैँ। हमारा मनःसंस्थान महामा हैं, यदि वह उद्धत हो जाय तो विष उगलती हैं और सर्वनाश का सरंजाम जुटाना हैं। पर यदि उसे नियन्त्रित कर लिया जाय तो उसकी दोनों पत्नी ऋद्धि और सिद्धि अमरिगत विभूतियों का उपहार साथ लेकर अभ्यर्थना के लिए उपस्थित होती हैं। कथा प्रसिद्ध हैं कि पृथ्वी का भार शेषनाग के शिर पर रखा हैं। उपरोक्त महासर्प ही जीवन धारण किये रहने का आधार हैं। प्राण के समस्त स्फुल्लिंग उसी के गह्वर में छिपे पड़े हैं। महाप्राण का अधिपति वही हैं।
समुद्र-मन्थन के प्रसंग में सुर-असुर का विवेचन ऊपर हो चुका हैँ। ज्ञान कर्म का समन्वय देवासुर सहयोग हैं। सुमेरु पर्वत यह तिकोना परमाणु हैं, जिसके कारण मूलाधार चक्र की रचना हो सकी। प्रसिद्ध हैं कि सुमेरु पर्वत पर देखना रहते हैं और स्वर्ग का बना हैं। निस्सन्देह इस त्रिकोण में एक से एक अद्भुत दिव्य शक्तियों और स्वर्ग सम्पदाओं का समावेश हैं। सुमेरु की रई, शेषनाग की रस्सी बनाकर समुद्र मया गया। यह सर्प रज्जु-ब्रह्म नाड़ी के अंतर्गत इड़ा, पिंगला को विद्युत धाराओं से ओत-प्रोत हैं। शिव और विष्णु के प्रतीक-ज्ञान और कर्म सुर और असुर जब समुद्र-मन्थन की-कुण्डलिनी जागरण की महासाधना में संलग्न हुए तो उसे सफल बनाने में प्रजापति ब्रह्म ने कूर्म बनकर उसका बोझ अपने ऊपर उठा लिया। प्रयत्न असफल न हो जाय-सुमेरु भी ने न धंसक जाय- इस आशंका को निरस्त करने के लिए कूर्म भगवान ने अवतार लिया और अपनी पीठ पर पर्वत जैसा भार उठा लिया साधन पथ के पथिकों का उत्तरदायित्व भगवान बहन करते हैं और सफलता का पथ पुरुषार्थ एवं निष्ठा क अनुरूप निरन्तर प्रशस्त होता चला जाता हैं। प्रथम चरण में ही चौदह रत्न नहीं निकल आये वरन् उसके लिए देर तक निष्ठापूर्वक मन्थन की प्रक्रिया जारी रखनी पड़ी। आध्यात्मिक साधनाओं में उतावली करने वाले अधीर व्यक्ति सफल नहीं होते, उसका लाभ तो धैर्यवान और श्रद्धा को मजबूती के साथ पकड़े रहकर विश्वासपूर्वक निर्दिष्ट मार्ग पर अग्रसर होते रहने वाले साधन नैष्ठिक साधक ही उठा पाते हैं।
समुद्र-मथन की साधना के फलस्वरूप चौदह रत्न उपलब्ध हुए थे- (1) लक्ष्मी, (2) कौस्तुभ मणि, (3) पारिजात पुष्प, (4) वारुणी, (5) धन्वन्तरि, (6) चन्द्रमा, (7) कामधेनु, (8) ऐरावत हाथी, (9) रम्भा-नर्तकी, (10) उच्चेश्रवा अश्व, (11) अमृत, (12) धनुष, (13) शंख, (14) विष। पौराणिक उपाख्यान के अनुसार उनमें से अधिकाँश रत्न देवताओं को उपलब्ध हुए। दैवी प्रकृति के व्यक्ति ही अपनी सत्पात्रता के आधार पर दिव्य विभूतियों का सदुपयोग करके लाभान्वित हो पाते हैं। दुष्प्रवृत्तियों वाले व्यक्ति उपलब्धियों को गँवा ही देते हैं और उन्हें प्रकृति के नियमानुसार खाली हाथ ही रहना पड़ता हैं।
लक्ष्मी अर्थात् सम्पन्नता। कौस्तुभ मणि (पारस) अर्थात् जो भी संपर्क में आये उसका महत्वपूर्ण बन जाना। पारिजात पुष्प-सी कोमलता, शोभा, सुगन्ध और प्रसन्नता। वारुणी अर्थात् आदर्शों के प्रति उत्साह भरा उल्लास। धन्वंतरि अर्थात् आरोग्य दीर्घजीवन। चन्द्रमा अर्थात् शाँति, शीलता। कामधेनु अर्थात् अवाँछनीय, कामनाओं की समाप्ति और उचित कामनाओं की पूर्ति के लिए आवश्यक श्रमशीलता का उद्भव। ऐरावत हाथी अर्थात् धैर्य विवेक सहित बलिष्ठता। रम्भा अर्थात् कलात्मक सरसता, भावुकता एवं सौंदर्य दृष्टि। उच्चेभव अश्व अर्थात् वह पम्प साहस और अथक पुरुषार्थ। अमृत अर्थात् आत्म-जोड़ आत्मा के स्वरूप और जीवनोद्देश्य की अनुभूति। धनुष अर्थात् अभीष्ट साधनों की उपलब्धि। शंख अर्थात् दूसरों को सजाना और प्रभावित कर सकने वाली प्रखर वाणी। इन तेरह विभूतियों के साथ-साथ एक जोखिम भी साथ ही जुड़ी हुई हैं कि यदि इन विभूतियों को पाकर व्यक्ति यथोम्भत हो जाय और उनका दुरुपयोग करने लगे तो वे ही विष तुल्य अपने और दूसरों के लिए घातक परिणाम भी उत्पन्न कर सकती हैं।
रावण, कुंभकरण, मेघनाद, हिरण्यकश्यप, भस्मासुर वृत्तासुर आदि असुरों ने तपश्चर्या की कड़ी परीक्षा में उत्तीर्ण होकर अनेकों वरदान और वैभव प्राप्त किए थे, किन्तु उद्धत मनोभूमि एवं निकृष्ट अंतःस्थल होने के कारण उनने जो पाया वह खो ही न गया वरन् विष तुल्य सिद्ध होकर सर्वनाश का कारण बना। समुद्र मन्थन का चौदहवाँ रत्न विष भी हैं। जिसे कोई शिव साधक ही पचा सकता हैं। भगवान शंकर ने संसार की क्षति न होने देने के उद्देश्य से समुद्र-मन्थन से निकले हुए विष को अपने कंठ में धारण कर लिया था। संसार में दोष दूवर्ण का अंश भी बहुत हैं, उसे न तो पेट में भरना चाहिए और न मुख से कटु, कर्कश बोलना चाहिए। जहाँ सुधार सम्भव हैं, वहाँ प्रयत्न किया जाय असभ्यता दुरित को न तो आना ही उचित हैं, न उगलना ही उसे कण्ठ में धारण किये रहना चाहिए। शिव ने यही किया। अध्यात्म साधना के साधकों को यही करना चाहिए। इस मार्ग पर चलते हुए विभूतियों की जो अमृत मयी उपलब्धि होती हैं, वह विषाक्त न होने वाले इसका ध्यान रखना चाहिए।
कुण्डलिनी साधना समुद्र-मन्थन की तरह हैं। उससे उपरोक्त चौदह रत्न हर साधक को मिल सकते हैं। अध और ऊर्ध्व ध्रुव केन्द्रों में वह सब कुछ भरा पड़ा हैं, जो संसार में कहीं भी विद्यमान हैं। सहस्रार और मूलाधार के रत्न भण्डारों की तिजोरी खोल सकने की चाबी का नाम ही कुण्डलिनी साधना हैं, जो उसे कर सकें, उन दुस्साहसियों को इस संसार का अति सौभाग्यशाली व्यक्ति बनने का अवसर मिलता हैं।
पंचनद के एक छोटे से राज्य का राजा देवदर्शन सिकन्दर से युद्ध के लिये तैयार न हुआ। उसने आक्रमण से पूर्व ही उपहार सहित सन्धि-प्रस्ताव सिकन्दर के पास भेज दिया।
प्रस्ताव-वाहक सेनाधिपति की भेंट एक चार साधुओं की साधु-मण्डली से हो गई। साधुओं ने पूछा-’आप कहाँ जा रहें हैं, पंचनद के यह बहुमूल्य घोड़े-हाथी और खजाना किसकी भेंट के लिये जा रहा हैं?’
पामन्त के कातर स्वर से कहा- ‘भगवन्। महाराज देवदर्शन की आज्ञा से हम सिकन्दर के लिए सन्धि-प्रस्ताव लेकर जा रहे हैं। सैनिकों की इच्छा के विरुद्ध महाराज का असामयिक निर्णय जँचा नहीं पर हम विवश हैं क्या करें।’
साधुजन तड़प उठे, बोल- ‘यह तुम आर्यावर्त के एक सेनाधिपति बोल रहे हों। विवशता कायरों का शब्द हैं, उसे मुख पर लाने से पूर्व तुमने राज्यद्रोह कर दिया होता तो तुम यशस्वी होते सैनिक। संख्या नहीं समर्थता विजय पाती हैं। तुम यह न भूलो कि हमारे देश का प्रत्येक नागरिक संयमित और सदाचारी जीवन-यापन करता हैं, इसलिये उसकी शक्ति का लोहा लेना सिकन्दर के लिये भी कठिन हैं। पराधीन जीवन जीने से पूर्व तुम शहीद हो गये होते तो देश के मस्तक पर कलंक का टीका लगने का अवसर तो न आता जाओ-जब तक इस देश का ब्राह्मण जीवित हैं, तब तक राज्य पराजय स्वीकार नहीं कर सकता। तुम यह उपहार लेकर लौट जाओ। सिकन्दर से सन्धि नहीं, युद्ध होगा। और यह निमन्त्रण हम लेकर जायेंगे।’
सेनाधिपति लौट गये। एक साधु सिकन्दर को युद्ध का निमंत्रण देने चला शेष तीन ने प्रजा-शक्ति की जागृत करना प्रारम्भ किया। देखते देखते प्रजा हथियार बाँधकर खड़ी हो गई। देवदर्शन को भी तब युद्ध के अतिरिक्त कोई चारा न रहा। सारे राज्य में युद्ध की दुन्दुभि बजने लगी।
अन्य साधु सिकन्दर को सन्धि के स्थान पर युद्ध का निमंत्रण दें इससे पूर्व ही गुप्तचर ने सारी बात सिकन्दर तक पहुँचा दी। सिकन्दर क्रोधित हो उठा। उसने साधु को वहाँ पहुँचने से पूर्व हो बन्दी बनाकर कारागृह में डलवा दिया। उसके बाद अन्य तीन साधुओं को भी सिकन्दर ने छलपूर्वक पकड़वा मँगाया।
अगले दिन सिकन्दर का दरबार सजाया गया। सेवा पति, सामन्तों के अतिरिक्त सम्पूर्ण यूनानी सेना अदालत देखने के लिए एकत्रित की गई। सर्वप्रथम बन्दी बनाये गये साधु की प्रशंसा करते हुए, सिकन्दर ने कूटनीतिक दाँव फस कर कहा-’ आचार्या। आप इन सबमें और और विद्वान हैं- आप हमारे निर्णायक नियुक्त हुए। शेष तीन साधुजनों से हम तीन प्रश्न करेंगे, इनके उतर आप सुनें।’
एक साधु की ओर संकेत करते हुये सिकन्दर ने प्रश्न किया-’तुमने देवदर्शन की प्रजा को विद्रोह के लिये क्यों भड़काया? ‘ इसलिये कि हमारा धर्म, हमारी संस्कृति की सुरक्षा, हमारे स्वाभिमान से अनुबद्ध हैं, इस देश के नामरिक स्वाभिमान का परित्याग करने की अपेक्षा मर जला अच्छा समझते हैं। देश की रक्षा करना हमारा धर्म हैं।
सिकन्दर ने दूसरा प्रश्न किया- ‘जीवन और मृत्यु में अधिक शक्तिशाली कौन हैं? ‘ दोनों’- साधुओं ने उतर दिया, जब तक कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी न व्याप्त हो, जीवन श्रेष्ठ। किन्तु दुष्कर्म करने से पहले मृत्यु हो जाये तो वह जीवन से अच्छी।
‘संसार में जीवित मनुष्य अधिक हैं या मृतक। ‘ सिकन्दर ने तीसरा प्रश्न किया। ‘जीवित’ तीसरे साधु ने उतर दिया। मृत्यु तो क्षणिक दुर्घटना मात्र हैं, जिसके बाद या तो जीवन रहता ही नहीं या रहता हैं तो भी जीवित आत्माओं की संख्या में ही आता हैं।
इससे पूर्व कि सिकन्दर कोई अपना निर्णय हैं। साधुजनों की यह अपराजेय निर्भीकता देखकर सिकन्दर के सैनिकों ने युद्ध करने से ही इनकार कर दिया।
आज से लगभग 44 वर्ष पूर्व हमारी गायत्री महापुरुषों की श्रृंखला-तपश्चर्या प्रारम्भ हुई और वह एक रस से लगातार 24 वर्ष तक यथा क्रम चलती रही। इनका प्रयोजन व्यक्तित्व को ऐसा निर्मस, प्रखर एवं सशक्त बनाना था- जिसके आधार पर कुछ महत्वपूर्ण कार्य अभीष्ट उद्देश्य की पूर्ति के लिए कर सकना सम्भव हो सके। आन्तरिक मलीनता और दुर्बलता ही जीवन को निस्तेज, निष्क्रिय और निरर्थक बनाती हैं। उसका निराकरण उपश्यर्चा से होता है। बलवान बनने के इच्छुक व्यायामशाला में, विद्वान बनने के इच्छुक पाठशाला में उपार्जन के इच्छुक कृषि, उद्योग, व्यवसाय, कला-कौशल आदि में मनोयोगपूर्वक कठोर श्रम साधना करते हैं।
हर दिशा में सफलता और प्रगति की उपलब्धि कठोर साधना पर निर्भर रही हैं, आध्यात्मिक प्रगति के लिए भी कर आत्म-बल सम्पादित करने के पथ पर चल पड़ने का क्रम बन गया। और वह यथावत् 24 वर्ष तक चलता रहा।
यों उपासना का सामान्य क्रम अभी भी जारी हैं पर उस 24 वर्ष की विशिष्ट तपश्चर्या का ही प्रभाव था कि लोक-यंक्तल के, नव-निर्माण के महान प्रयोजन में अपना कुछ महत्वपूर्ण योगदान सम्भव हो सका। पिछले बीस वर्षों में जितना रचनात्मक कार्य आध्यात्मिकता के आधार पर जनजागरण की दिशा में सम्भव हो सका, उसे अद्भुत और अनुपम ही कहा जा सकता हैं। आज उसका मूल्यांकन कठिन हैं। कुछ दिन रात जब अपने मिशन के कार्य और परिणाम का लेखा-जोखा तैयार किया जायेगा तो यह एक चमत्कार ही लगेगा कि एक साधन-हीन व्यक्ति के प्रयास इतने स्वल्पकाल में इतने व्यापक और इतने विशाल
वही सिद्धांत लागू होता हैं। सृष्टि के आदि के लेकर अद्यावधि प्रत्येक आत्म-बल सम्पन्न को तपश्चर्या का ही अबल-स्वन लेना पड़ा हैं। देश-शक्तियों के वरदान अनुनय, विनय अथवा यत्किंचित कर्मकाण्ड मात्र से नहीं मिल जाते। साधन को अपनी पात्रता सिद्ध करनी होती हैं। उपासना के साथ साधना का समन्वय करना पड़ता हैं। तपश्चर्या हर प्रगतिशील और महत्वाकाँक्षी के लिए अनिवार्यतः आवश्यक हैं। इससे बचकर सरलतापूर्वक किसी के वरदान, आदर्शवाद स्वयं से कुछ महत्वपूर्ण कहीं जा सकने वाली उपलब्धि मिल सकना असम्भव हैं। यह तथ्य हमें किशोरावस्था के आरम्भ में ही समझा दिया गया था और बिना भटके- बिना समय गँवायें- अपने पथ प्रदर्शक के संरक्षण में गायत्री महामन्त्र के साथ अभीष्ट तपश्चर्या को सम्मिलित परिणाम उत्पन्न कर सकते हैं। कार्यों की गणना और उनकी व्यापकता एवं सफलता का उल्लेख करना यहाँ निरर्थक हैं। एक शब्द में इतना ही कहा जा सकता हैं कि अपने दन्ंक्त की यह अनोखी एवं अद्भुत प्रक्रिया चिरकाल तक अविस्मरणीय बनी रहेगी, नव-निर्माण के बहुमुखी कार्यक्रम को एक ऐतिहासिक और सफल अभियान गिना जाता रहेगा।
इस प्रगति में आदि से अन्त तक सारा श्रेय उस तप-साधना को हैं, जिसे हमने अति निष्ठापूर्वक सम्पन्न किया और अपने मार्ग-दर्शक की पूँजी का अनुदान मिलाकर उसे एक महतम सामर्थ्य के रूप में उपलब्ध एवं प्रयुक्त किया। तप की महता बहुत हैं। इस संसार में जो कुछ महत्वपूर्ण हो रहा हैं, वस्तुतः उसके पीछे तपश्चर्या की शक्ति ही उन्नति रहती हैं। हमारे-हमारे मिशन के साफल्य का किसी को मूल्याँकन करना हो तो इस तथ्य को स्मरण रखना चाहिये कि हमारे व्यक्तिगत प्रयास और जनसहयोग के पीछे एक मात्र श्रेय उस तपश्चर्या को है, जो एक महती शक्ति के रूप में प्रस्फुटित एवं परिलक्षित होती रही।
लोग-मंगल, भावनात्मक नव-निर्माण अभियान नैतिक एवं साँस्कृतिक पुनरुत्थान आन्दोलन के अतिरिक्त अपने विशाल परिवार की छुट-पुट समस्याओं की कठिनाई को सरल बनाने और उन्हें अभीष्ट आवश्यकताओं की पूर्ति में जो सहायता कर सके वे यदि सिद्धि या चमत्कार के नाम से पुकारी जायें तो भी यही कहना चाहिए कि वे उपलब्धियां प्रस्तुत तपश्चर्या का ही प्रतिफल थीं। कुछ दिन बाद जब अध्यात्म-बल के आधार पर दिये जा सकने वाले अनुदानों का विवरण प्रकाश में आया तो लोगों को यह विश्वास करने में सरलता हो जायगी कि तपश्चर्या न केवल साधक का व्यक्तित्व ही निर्मल, प्रखर एवं सशक्त बनाती हैं वरन् उसके द्वारा दूसरों को भौतिक एवं आध्यात्मिक सहायताओं की एक महत्वपूर्ण श्रृंखला भी चल सकती हैं।
हमारे जीवन-कम के दो अध्यात्म लगभग पूरे होने को आये और तीसरे अध्याय का आरम्भ 18 महीने बाद आरम्भ होने की तैयारी हो चली। बालकपन के चौदह वर्षों की अबोध स्थिति के सामान्य क्रिया-कलापों को छोड़ कर 24 वर्ष की तपश्चर्या और 22 वर्ष की लोक-साधना को मिलाकर 60 वर्ष का वर्तमान कार्यकाल पूरा हो चला। यह अवधि ऐसी बीती, जिस पर गर्व नहीं तो संतोष अवश्य किया जा सकता हैं। आध्यात्मिकता निरर्थक नहीं है, इसे जो कसौटी पर कसना चाहतें हों और प्रत्यक्ष प्रमाण देखना चाहते हों, वे हमारी उपलब्धियों को गम्भीरतापूर्वक खोजें, समझें और परखें। भौतिक साधनों से जो सम्भव न था, वह आत्म-बल से सम्भव हो सका। इस तथ्य को समझकर यह विश्वास किया ही जाना चाहिए कि साधना को-तत्व ज्ञान को-विडम्बना मात्र नहीं कहा जा सकता। अविश्वासियों को विश्वास करने के लिए हमारा प्रमाण प्रस्तुत किया जा सकता हैं। साहित्य सृजन, जन-जागृति, संगठन, परिवर्तन की प्रक्रिया, व्यक्तित्व की प्रखरता एवं दूसरों की अद्भुत सहायतायें कर सकने की अद्भुत गतिविधियाँ हमारे द्वारा सम्भव हो सकीं तो उसका एक मात्र कारण आध्यात्मिकता एवं तपश्चर्या की शक्ति ही हैं। इस शक्ति को उपलब्ध करने के लिए अविश्वासियों में भी विश्वास और उत्साह का संचार हो सकता हैं। यदि ध्यान पूर्वक, गम्भीरता के साथ हमारे छोटे से जीवन की उपलब्धियों को आँका जा सकें।
हमारे जीवन का तीसरा अध्याय और भी अधिक महत्वपूर्ण हैं। यह प्रयोग का अन्तिम चरण हैं। इसके तीन प्रयोजन हैं और सभी एक से एक अधिक महत्वपूर्ण एवं आवश्यक कहे जा सकते हैं। इनकी चर्चा नीचे कर रहे हैं।
जनमानस का जागरण और समर्थ नेतृत्व का उदय
भारतीय अध्यात्मवाद का ज्ञान पक्ष तो देखने, सुनने को मिलता हैं, पर विज्ञान पक्ष एक प्रकार से लुप्त ही हो गया। कथा-प्रवचनों, आयोजन, सम्मेलनों अथवा धर्म साहित्य के माध्यम से हमें ज्ञान-पक्ष की यत्किंचित जानकारी मिलती रहती हैं। यह विचार संशोधन की दृष्टि से उत्तम हैं। इससे दोष दुर्गुणों को छोड़ने और सज्जनोचित गतिविधियाँ अपनाने में सहायता मिलती हैं। इस पक्ष का भी अपना स्थान हैं। पर कोई महत्वपूर्ण प्रयोजन केवल विचार मात्र से सम्भव नहीं हो सकते, उनके लिए आवश्यक शक्ति चाहिए। साँसारिक प्रयोजनों में धन-बल, तन-बल, बुद्धि-बल, जन-बल एवं अभीष्ट परिस्थितियों तथा उपकरणों की आवश्यकता पड़ती हैं। केवल सोचने या जानने भर से कोई प्रगति या उपलब्धि सम्भव नहीं होती।
सूक्ष्म-जगत को, जन-मानस को प्रभावित करने एवं आपत्तियों में प्रतिकूलताओं का सुविधाओं तथा अनुकूलता में बदलने के लिए प्रचण्ड आत्म-बल चाहिए। और उसे तपश्चर्या के अखाड़े में पाया, बढ़ाया जा सकता हैं। अभी बहुत काम करना बाकी हैं। ज्ञान-यज्ञ व नव-निर्माण आन्दोलन की मशाल जलाकर दूसरे मजबूत हाथों में थमाते हुए हम पूरा और पक्का विश्वास करते हैं कि अगले 30 वर्षों में वर्तमान परिस्थितियों में आमूल-धूल नहीं तो आकाश-पाताल जैसा अन्तर हो जायेगा। अनैतिकता और असामाजिकता और दूरदर्शिता से भरी वर्तमान परिस्थितियाँ देर डडडडडडड टिक सकेंगी। युग-निर्माण का महान आँदोलन प्रत्यक्ष डडडडडडड रूप से संसार के हर व्यक्ति को प्रभावित करेगा, डडडडडडड उठाकर खड़ा करेगा और जो उचित, डडडडडडड तथा विवेकपूर्ण हैं, उसे ही अपनाने को बाध्य करेगा।
सन् 2000 तक वह सब कुछ दीखने लगेगा, जिसके अनुसार युग परिवर्तन का प्रत्यक्ष अनुभव किया जा सके। जिस बीच महती घटनायें घटेंगी, भारी संघर्ष होंगे, पाप बढ़ेगा और उसकी प्रतिक्रिया नये सिर से सोचने और नई रीति-नीति अपनाने के लिए जन-साधारण को विवश करेगी। बदलाव के अतिरिक्त और कोई मार्ग न रहेगा। मनुष्य को अपने तौर-तरीके बदलने होंगे। युग-निर्माण की वर्तमान चिनगारियां विश्व-व्यापी दावानल की तरह प्रचण्ड होंगी और उसमें आज की अनीति एवं अवाँछनीयता जल-जलकर होलिका दहन की तरह नष्ट हो जायगी। नया युग प्रातः काल के उदीयमान सूर्य की तरह अपनी अरुणिमा अब कुछ ही समय में प्रकट करने जा रहा हैं। एक अभिनव आन्दोलन को जन्म देकर, उसमें गति भर कर, उस मोर्चे की कमान मजबूत योद्धाओं के हाथ सौंपकर हम जा रहें हैं। नये-नये शूर-वीर इस मुहीम पर आते चले जायेंगे। और युग-निर्माण की प्रगति अपनी निर्धारित गति से- सुव्यवस्थित क्रम-बद्धता के साथ-अग्रगामी होती रहेगी।
जिन हाथों में नव-निर्माण की मशाल थमा दी गई हैं तथा इस प्रयोजन की पूर्ति के लिए लोक-नायकों की जो एक विशाल सेना उमड़ती चली आ रही हैं, उसे आवश्यक बल, साहस और साधन उपलब्ध कराने का काम शेष हैं। अभीष्ट शक्ति के बिना वे भी क्या कर सकेंगे। उनके लिए अभीष्ट शक्ति जुटाना आवश्यक था, सो इसका साधन जुटाना अधिक महत्वपूर्ण समझकर हमें उसके लिए नयना पड़ेगा। आज का लोक नेतृत्व बहुत दुर्बल हैं। राजनीति, समाज तथा धर्म के सभी क्षेत्रों में ऐसा नेतृत्व दीख नहीं पड़ता, जो जन-मानस को हिलाकर रखने और अपनी प्रखरता के बल पर लोगों को अपनी गतिविधियाँ बदलने के लिए प्रभावित तथा विवश कर सकें। वाचालता लोकेषणा और छल-छल का आधार लेकर चलने वाले स्वार्थी और संकीर्ण डडडडडडड के लोग अवाँछनीयता को बदल सकने में समर्थ नहीं हो सकते। वे अपने लिए धन, यश तथा पद कमा सके हैं, पर आन्तरिकता प्रखरता के बिना युग परिवर्तन की आवश्यकता पूर्ण नहीं की जा सकती। परिस्थितियों की माँग हैं कि हर क्षेत्र में प्रखर नेतृत्व का उदय हो। यह आत्म-बल की प्रचुरता से ही सम्भव हो सकता है। इस अभाव की पूर्ति करना भी हमारे अगली तपश्चर्या का एक प्रयोजन हैं।
डेढ़ वर्ष बाद हम एक अति प्रचण्ड तपश्चर्या के लिए अविज्ञात दिशा में प्रयाण करने वाले हैं। उसका एक उद्देश्य एक ऐसे लोक-सेवी वर्ग का उद्भव करना है, जो अपने चरित्र, व्यक्तित्व, आदर्श, प्रभाव से ऐसे लोक नेतृत्व की अभाव पूर्ति कर सके, इन दिनों महापुरुषों की एक बड़ी श्रृंखला अवतरित होनी चाहिए, जो युग परिवर्तन की महान सम्भावना को साकार कर सकें। गंगा का अवतरण कठिन न था, कठिनाई भागीरथ के उत्पन्न होने में थी। मनुष्य महान हैं। यदि उसमें महानता की अभीष्ट मात्रा प्रकट हो सके तो वह सच्चे अर्थों में भगवान् का पुत्र और प्रतिनिधि सिद्ध हो सकता हैं। अगल दिनों ऐसे भागीरथों की आवश्यकता पड़ेगी, जो संसार का काया-कल्प करने और शाँति की सुरसरी का अवतरण सम्भव बना सकने में समर्थ तथा सफल हो सकें।
हमारी आगामी तपश्चर्या का प्रयोजन संसार के हर देश में जन-जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में भागीरथों का सृजन करना हैं। उनके लिए अभीष्ट शक्ति, सामर्थ्य का साधन जुटाना हैं। रसद और हथियारों के बिना सेना नहीं लड़ सकती। नव-निर्माण के लिए उदीयमान नेतृत्व के लिए पर्दे के पीछे रहकर हम आवश्यक शक्ति तथा परिस्थितियाँ उत्पन्न करेंगे। अपनी भावी प्रचण्ड तपश्चर्या द्वारा यह सम्भव हो सकेगा और कुछ ही दिनों में हर क्षेत्र में, हर दिशा में, सुयोग्य लोक-सेवक अपना कार्य आश्चर्यजनक कुशलता तथा सफलता के साथ करते दिखाई पड़ेंगे। श्रेय उन्हीं को मिलेगा और मिलना चाहिए। नव-निर्माण आन्दोलन संस्था नहीं एक दिशा हैं। सो अनेक काम लेकर इस प्रयोजन के लिए अनेक संगठनों तथा प्रक्रियाओं का उदय होगा। भावी परिवर्तन का श्रेय युग-निर्माण आन्दोलन लग को मिले यह आवश्यक नहीं। अनेक नाम रूप हो सके हैं और होंगे। उससे कुछ बनता बिगड़ता नहीं। मूल अयोन विवेकशीलता की प्रतिष्ठापना और सद्वृत्तियों का अभिवर्धन से हैं। सो हर देश, हर समाज, हर धर्म हर क्षेत्र में इन तत्वों का समावेश करने के लिए अभिनव नेतृत्व का उदय होना आवश्यक हैं। हम इस महती आवश्यकता की पूर्ति के लिए अपने शेष जीवन में उग्र लग्न तपश्चर्या का सहारा लेंगे। उसका स्थान और स्वरूप क्या होगा यह तो हमारे पथ-प्रदर्शक को बताना है पर दो प्रयोजनों में से एक उपरोक्त हैं, जिसके लिए हमें सघन जन-संपर्क छोड़कर नीरवता की और कदम बढ़ाने पड़ रहें हैं।
अध्यात्मवाद के विज्ञान पक्ष का प्रत्यक्षीकरण
हमारी भावी तपश्चर्या का दूसरा प्रयोजन आध्यात्मिकता के विज्ञान पक्ष को मृत, लुप्त तथा विस्मृत दुःख परिस्थितियों में से निकाल कर इस स्थिति में लाना हैं कि उसके प्रभाव और उपयोग का लाभ जनसाधारण को मिल सकना सम्भव हो सके। भौतिक विज्ञान का लाभ जनसाधारण को मिल सका और उनसे अपनी महता जनमानस पर स्थापित कर सका, बाज विज्ञान सम्मत बातों को ही सच माना जाता है, जो उस कसौटी पर खरी नहीं उतरतीं, उन्हें मिथ्या घोषित कर दिया जाता हैं। आस्तिकता, धार्मिकता तथा आध्यात्मिकता की मान्यताओं को हमें विज्ञान के आधार पर सही सिद्ध करने का प्रयत्न करना पड़ रहा हैं। वैज्ञानिक अध्यात्मवाद की एक नई दिशा का निर्माण करना पड़ रहा हैं। इस विवशता का कारण यही हैं कि लोग विज्ञान सम्मत बातों को ही सच मानते हैं।
पिछले दिनों विज्ञान ने ईश्वर और आत्मा का अस्तित्व मानने से इनकार कर दिया तो देखते-देखते नास्तिकता की लहर सारे विश्व में फल गई और प्रबुद्ध मस्तिष्कों को उसने कसकर जकड़ लिया। यदि विज्ञान के आधार पर ही अध्यात्म तथ्यों का प्रतिपादन, परीक्षण और प्रत्यक्षीकरण सम्भव हो सके तो निश्चित रूप से आज के मस्तिष्क और अविश्वासी, फल ही आस्तिक और धर्म विश्वासी हो सकते हैं। उस युग ने बुद्धिवाद और प्रत्यक्ष बाद की कसौटियाँ स्वीकार की हैं, अतएव धर्म धर्म और अध्यात्म को-ईश्वर और आत्मा के अस्तित्व को उसी आधार पर सिद्ध करना होगा। और यह किया जा सकना सर्वथा सम्भव हैं। सत्य को किसी भी कसौटी पर कसा जा सकता हैं। वास्तविकता हर जगह खरी जहर सकती हैं। आवश्यकता प्रयत्न करने भर की हैं। वैज्ञानिक अध्यात्मवाद की परिपुष्टि का जो क्रम अखण्ड-ज्योति व्रत एक वर्ष से आरम्भ किया हैं, उसे आगे भी जारी रखा जायेगा और पूर्णता के उस स्तर तक पहुँचाया जायेगा, जहाँ हर, परख और हर कसौटी पर सचाई को कसे जाने के लिए प्रस्तुत किया जा सकें।
सिद्धांतों को बौद्धिक स्तर पर प्रतिपादन की साहित्यिक प्रक्रिया अखण्ड-ज्योति ने चलाई हैं और यह आगे भी चलती रहेगी। हम जहाँ भी रहेंगे, उसके लिए आवश्यक विचार सामग्री, प्रस्तुत करते रहेंगे। अध्ययन से ही नहीं, यह सामग्री चिन्तन, मनन और दिव्य दृष्टि से भी उपलब्ध की जा सकती हैं। तप साधा इस प्रयोजन को भी बड़े सुंदरता के साथ पूरा कर सकती है और करेगी। हम इस प्रसंक्त को इस स्तर तक पहुंचा देंगे कि संसार भर कि विचारशील लोगों को अध्यात्मवा को ‘गरिमा’ सचाई और उपयोगिता को स्वीकार करके उसकी शरण में आने के लिए विवश होना पड़े।
गायत्री उपासना का सर्वसाधारण के लिए जितना प्रयोग सरल और उपयुक्त था, उसे हम गत 20 वर्षों कसे सिखाते, समझाते चले आ रहे हैं। जिन विद्या की उच्च स्तरीय साधना के दो पक्ष हैं-(1) योग, (2) तन्त्र योग-मार्ग में उच्च-स्तरीय गायत्री साधना पंच-कोशों के अनावरण की हैं, जिसकी ‘घोड़ी’ चर्चा गायत्री महाविज्ञान के तृतीय खंड में हैं और थोड़ा-सा मिश्रण अखण्ड-ज्योति के माध्यम से तीन वर्ष तक कर चुके हैं। अभी इस विद्या को सांक्तोपांक्त बताया जाना शेष हैं। उसी प्रकार तन्त्र मार्ग की गायत्री कुण्डलिनी कहलाती हैं। इसकी छुट-पुट चर्चा इन दिनों हम कर रहें हैं। अगले दिनों नैतिक साधकों को योग मार्ग की पंचकोश अनावरण साधना और तन्त्र मार्ग को कुण्डलिनी जागरण की समग्र शिक्षा भी अखण्ड-ज्योति के पूजा पर ही मिलेगी। अनुभव के आधार पर प्रस्तुत किया जा वह शिक्षण सर्वथा सार्थक होगा और उससे अनेक प्रतिष्ठान भारी लाभ उठा सकेंगे।
अध्यात्म विज्ञान की प्राचीन काल में असंख्य धारायें के और वे लगभग सभी लुप्त हो गई। बढ़िया मशीनें ही बढ़िया काम करती हैं, उसी प्रकार बढ़िया व्यक्तित्वों पर ही आध्यात्मिक विद्या का ‘प्रयोग उद्भव’ एवं प्रकटीकरण हो सकता हैं। प्राचीनकाल में योग-मार्ग के साधक अपने अपने मन एवं अन्तःकरण को ‘जीवन’ साधना द्वारा उत्कृष्ट बनाते थे, तब उस भली प्रकार जीती हुई भूमि में चमत्कारी अध्यात्म विद्याओं की कृषि उगाई जाती थी। लोग धीरे-धीरे आलसी, असंयमी, स्वार्थी और संकीर्ण होते हैं। मात्र साधना सिद्धांत के आधार पर कोई व्यक्ति आत्म-बल से सम्पन्न नहीं हो सकता। जन्त्र–मन्त्र में घटिया स्तर के लोग कुछ सिद्धि, चमत्कार प्राप्त भी कर लें तो उनके द्वारा घटिया प्रयोजनों की ही पूर्ति हो सकती हैं और उनकी स्थिरता एवं सफलता भी स्वल्प कालीन एवं संदिग्ध बनी रहती हैं। यही कारण है कि प्रयोग करने पर भी लोगों को अध्यात्म विज्ञान के चमत्कारी लाभों से वंचित रहना पड़ता हैं। धूर्तता के आधार पर सिद्धि दिखावे और चमत्कार बताने की प्रवंचना कितने ही लोग करते रहते हैं और भोले लोगों को बहकाते रहते हैं पर वस्तुतः जा आत्म बल प्रकट करने और उसका उपयोग सिद्ध करने की चुनौती स्वीकार कर सकें, ऐसे लोग नहीं के बराबर हैं। भारत में समाधि लगाने और गडे में बैठने की बाजीगरी बहुत से लोग दिखाते हैं पर सचाई परखने की चुनौती जब वैज्ञानिकों ने दी ता कोई भी परख की आग पर खड़ा होने की तैयारी न हुआ। नकलीपन जादूगरी, मनोरंजन कर सकता है पर वस्तुस्थिति सिद्ध करने के लिए, उसको सचाई हर परीक्षा से कसे जाने की तैयारी घोषित करनी पड़ेगी।
योग की अनेक चमत्कारिक शक्तियाँ और सिद्धियां हमारे पूर्वपुरुषों को प्राप्त थीं। वे उनके द्वारा जहाँ अपनी महानता का अभिवर्धन करते थे, वहाँ पर विद्या द्वारा विश्व मानव की महती सेवा भी करते थे। भौतिक विज्ञान के अन्वेषणों और यन्त्रों ने मनुष्य जाति की सेवा की हैं और अपना वर्चस्व समर्पित किया हैं। अध्यात्म विज्ञान की मान्यता तब तक सिद्ध नहीं हो सकती, जब तक वह अपने अरितत्व की वास्तविकता को प्रत्यक्ष एवं प्रमाणित न करें। भौतिक विज्ञान से अध्यात्म विज्ञान के चमत्कार हजारों लाखों गुने अधिक हैं। उसकी शक्ति से मानव जाति को सुख-सुविधाओं में भौतिक विज्ञान की अपेक्षा लाखों गुनी वृद्धि हो सकती हैं। पर यह सम्भव तभी हैं, जब वे विद्यायें जादूगरी की धूर्तता की तरह नहीं, एक सचाई और वास्तविकता की तरह प्रस्तुत हों। पार्श्चय सभ्यता भौतिक विज्ञान के साथ बढ़ी हैं। आध्यात्मिक सभ्यता की प्रतिष्ठापना एवं अभिवृद्धि के लिए हमें योग विद्या के विज्ञान पक्ष को भी प्रस्तुत करना पड़ेगा। आध्यात्मिकता का ज्ञान पक्ष प्रस्तुत करके ही हमें संतुष्ट नहीं हो जाना चाहिये वरन उसका विज्ञान-पक्ष भी प्रस्तुत करना चाहिए। आज की यह महती आवश्यकता हैं। यदि इसे पूरा किया जा सका तो निस्संदेह हम फिर सतयुग की तरह आध्यात्मिकता की शरण में समस्त मानव-जाति को ला सकने में सफल हो सकते हैं। हमारी भावी तपश्चर्या का दूसरा प्रयोजन यही हैं। हमने लम्बी अवधि में अपने शरीर, मन और अन्तःकरण को इस योग्य बना लिया हैं कि उसमें दिव्य शक्तियों का अवतरण और लुप्त विद्याओं का प्रयोग, परीक्षण एवं उद्भव संभव हो सकें। अस्तु हम समाज सेवा के मनोरंजक कार्यों को छोड़कर ऐसी नीरवता और कष्ट साध्य प्रशालीकावरण करने जा रहें हैं, जा दुष्कर तो हैं पर मानव जाति के उज्ज्वल भविष्य के निर्माण में उसकी आवश्यकता एवं उपयोगिता असाधारण हैं। हम जीवन भर असाधारण और दुस्साहसपूर्ण कार्य ही करते रहें हैं। जीवन के अन्तिम अध्याय में यदि ऐसा उत्तरदायित्व नियति ने सौंपा हैं, तो उसे हँसी-खुशी से ही वहन करेंगे। अपने पथ-प्रदर्शक के हाथी हम अपने को बेच चुके हैं। उसकी इच्छा और प्रसन्नता ही हमारी इच्छा एवं प्रसन्नता हैं। सो अठारह महीने बाद अपने प्रिय परिजनों से बिछुड़ने के कठिन प्रसंक्त को सहन कर सकने लायक अपनी छाती मजबूत करने का एक विलक्षण प्रयोग हम इन दिनों कर रहें हैं।
परिजनों से ऋण मुक्ति
सदा से से हमारी प्रवृत्ति अति कोमल रही हैं। प्यार ही जीवन भर हमने बांटा और समेटा हैं। इसी बाँटने-समेटने के क्रिया-कलाप ने एक विशाल परिवार बनाकर खड़ा कर दिया। मोह-ममता ग्रसित दुर्बल मानव प्राणियों की तरह हमें भी अपने इन स्वजन, सम्बन्धियों से बहुत ममता हैं। उन्हें सदा के लिए छोड़ते समय अपना मन भारी होना स्वाभाविक हैं। पिछले दिनों वह व्यथा बहुत बेचैन करती रही पर काम उससे भी चलने वाला न था सो मन को कड़ा और कठोर बनने के लिए कितने ही दिन से समझते चले आ रहे हैं। सफलता तो आँशिक हो मिल सकी हैं और पूरी मिलने की आशा भी नहीं हैं। इस व्यथा को सहते सुलझाते हमारा ध्यान पूरी तरह इस बात पर केन्द्रीभूत हैं कि जिनसे जितना स्नेह, सद्भाव पाया हैं, उनका पूरा नहीं तो अधूरा ऋण चुकाकर अपनी कृतज्ञ भावना को व्यक्त करने एवं किसी कदर उस ऋण से उऋण होने का प्रयत्न करें।
अपने स्वजनों को-बालकों को आते और जाते समय बड़े लोग कुछ देकर जाते हैं। हम भी कुछ वैसा ही करना चाहते हैं। स्वजनों की कठिनाई को सरल बनाने और सुख-सुविधाओं का अभिवर्धन करने के लिए हमारी बहुत आकाँक्षा हैं। यों अब तक भी हर परिजन का भार हल्का करने में कुछ सहारा निरन्तर देते रहें हैं और जिनका बोझ कम था, उन्हें तो राहत मिली पर अधिक बोझ वालों को कुछ पता भी न चला। अधिक देने को तप साधना की पूँजी भी उतनी मात्रा में शेष नहीं बची थी। अस्तु हर एक के हिस्से में थोड़ा-थोड़ा ही आया। इससे न उन्हें सन्तोष हो सका न हमें।
अगली तपश्चर्या का एक प्रयोजन यह भी हैं कि अपने प्राण-प्रिय परिजनों को कुछ ऐसे अनुदान देकर जायं, जिन्हें वे चिरकाल तक स्मरण करते रहें। इससे उन्हें हमारी स्मृति बनी रहेगी और हम भी उपलब्ध श्रद्धा सौजन्य पाकर जितने ऋणी हुए हैं, उससे एक सीमा तक उऋण हो जायेंगे। हमारे शेष साधनात्मक जीवन का एक तीसरा प्रयोजन यह भी है कि जिन्हें पिछले दिनों से सुख-शान्ति, अगति और उज्ज्वल भविष्य के आश्वासन देते रहें हैं, उन अभिवचनों को पूरा कर सकने योग्य सामर्थ्य इकट्ठे करते। निश्चित रूप में हमें अपने लिए किसी उपलब्धि की अपेक्षा नहीं हैं। यहाँ तक कि स्वर्ग मुक्ति भी हमें नहीं चाहिए। जो अन्तःभूमि उपलब्ध हैं, वह अपने आप भी अमृत जैसी मधुर और प्रकाश जैसी निर्मल हैं, उसे पाकर और कुछ पाने को इस पंच-तत्वों से बने संसार में पानी शेष भी क्या रह जाता हैं? कल्पना के नाप पर यदि कुछ शेष हैं तो उसमें देश, धर्म समाज, संस्कृति के उत्कर्ष के अतिरिक्त व्यक्तिगत आकाँक्षा एक ही हो कि अपने प्रिय परिजनों के लिए कुछ ऐसे उपहार दे सकने में समर्थ हों, जो उनके आँसू पोंछने और मुसकान बढ़ाने के लिए कारगर सिद्ध हों।
भावी तपश्चर्या का एक अंश अपने परिवार को सुखी समुन्नत बनाने के लिए निश्चित रूप से देंगे। हमें धरती, आकाश पर कहीं भी रहना पड़े, अपनी कोमलता और ममता को अक्षुण्य बनाये रहेंगे। जिनकी आत्मीयता हमारे साथ, जितने परिमाण में जुड़ी हुई हैं,वे उसी अनुपात से हमें अपने समीप रखते और सहकार करते और स्नेह बरसाते हुए, अनुभव करते रहेंगे। हमारा सूक्ष्म शरीर अपने परिवार की शाँति और सुरक्षा की चौकीदारी अपनी सामर्थ्य के अनुरूप निरन्तर करता रहेगा।
हमारे शेष जीवन के अन्त तक चलने वाली साधना का प्रयोजन और स्वरूप संक्षेप में बता दिया गया। वो हम सदा ही अपने मार्ग-दर्शक की कठपुतली रहे हैं और उन्हीं के इशारे पर नाचते रहे हैं, सो शेष, जीवन की रूपरेखा बनाने तथा निभाने में भी हमारा कोई वश नहीं है जो उनसे अब तक कहा और कराया सो हम करते रहे और बिना अपनी व्यक्तिगत इच्छा का समावेश किये, आगे भी करते रहेंगे। अभी जो संकेत प्राप्त हुए हैं और जो निश्चय किया गया हैं, उसकी रूप-रेखा उपरोक्त पंक्तियों में व्यक्त कर दी गई।
परिवार को इतना पूछना और जानना उचित था, सो उनकी जिज्ञासा का समाधान करने के लिए वर्तमान स्थिति को स्पष्ट कर दिया गया। आगे जो होता है, उसे हर कोई देखता रह सकेगा। ही कदम आप भी बढ़ायें-
दुख विदाई की बेला में हम दो उत्तरदायित्व प्रिय परिजनों को साँकर जा रहे हैं। (1) ज्ञान-यज्ञ में निरन्तर आहति देते रहने से कोई जी न चुराये। (2) युग परिवर्तन के लिए अनिवार्य संघर्ष में अपना भाग पूरा करने से सुख न छिपायें। जो हमें प्यार करते हों-हमारे प्रति उगता और आत्मीयता सचमुच ही रखते हों। वे यह दोनों ही बातें नोट कर लें। हम हर परिजन की वास्तविकता इसी कसौटी पर कसकर परखते रहें।
नव-निर्माण के लिए आवश्यक विचार-धार हमने अपने अंतरंग का निशर खोद कर प्रवाहित की हैं, उससे जन-जन के मन को खींचने का कार्य हमारे उत्तराधिकारी करेंगे। विचार-क्राँति की मशाल हम उन्हें दे रहे हैं, जो अपनी अपनी बात ध्यानपूर्वक पढ़ते हैं। यह मशाल जलती रहनी चाहिये, यह प्रकाश दूर-दूर तक फलता रहना चाहिए। ऐसा न हो कि सहयोग का स्नेह न पाकर हमारी यह अमानत अपना अस्तित्व खो बैठे। छोटे ट्रैक्टों और विज्ञप्तियों में हमने अपना दर्द भर दिया हैं, उसे हर हृदय और मस्तिष्क में बोया, उगाया जाना चाहिए। जिसकी जहाँ तक पहुँच हो-अपने घर, परिवार से लेकर मित्र-परिचितों तक उस विचार-धारा को पहुँचाया, फलाया जाना चाहिए। झोला पुस्तकालय हर कर्मल व्यक्ति को पूरी लगन और तत्परता के साथ चलाना चाहिए। अखंड-ज्योति हमारी वाणी हैं। हमारी आवाज अधिक लोगों तक पहुँच सकें। इसके लिए अपने प्रभाव और दबाव का उपयोग छाया जाना चाहिए। अखंड-ज्योति अभी बहुत सीमित संख्या में छाती हैं। उसका क्षेत्र बढ़ाना चाहिए। यदि सचमुच हम उसे प्यार करते हो तो फिर बढ़ने और सींचने के लिए कुछ परिश्रम भी करें।
इस अंक के साथ प्रायः सभी का चन्दा समाप्त होता हैं। नया वर्ष अगले अंक से आरम्भ होता हैं, यदि हम ठान-ठान लें तो चुनाव प्रचार को तरह मित्रों की मण्डलियाँ बनाकर समझदार लोगों के पास पहुँचे और एक वर्ष के अंक दिखाकर उनमें से बहुतों को नया ग्राहक बना लें। यदि सचमुच हम लोग सच्चे मन से इस नव-निर्माण की विचार धारा और हमारी वाणी को व्यापक बनाना चाहें तो इन्हीं दिनों कुछ नये सदस्य भी बना सकते हैं और अखंड-ज्योति का कार्य क्षेत्र देखते-देखते दूना-चौगुना हो सकता हैं। ज्ञान-यज्ञ में यदि हमारी निष्ठा हो-उससे जी न चुराये तो कोई कारण नहीं कि हममें से प्रत्येक अपने प्रभाव और परिचय क्षेत्र के कुछ नये व्यक्तियों को इस विचार-धारा के संपर्क में ला सकने में सफल न हो सकें।
संघर्ष के लिए आत्म-शोधन तो प्रथम हैं ही। अपनी दुर्बलताओं को दूर किया ही जाना चाहिए। साथ ही सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध ही लड़ने को हमें कटिबद्ध हो जाना चाहिए। विवाहोन्माद विरोधी अभियान में हमें में से हर एक अपने बैठ से योगदान करे। अपने बच्चों के विवाह बिना दहेज और बिना जेवर के अति मादगी और मितव्ययिता के साथ कने का निश्चय करे और दूसरों को भी उसकी प्रेरणा दें। जहाँ भी अपनी सलाह की पहुँच हों सके, वहाँ ऐसी ही प्रेरणा देनी चाहिए। विवाह योग्य लड़की-लड़के तथा उनके अभिभावकों को अपनी विचारधारा से परिचित और प्रभावित करने के लिए एकाकी और मजबूत रूप से निरन्तर प्रयत्न करना चाहिए। अपने समाज को दरिद्र और बेईमान बनाने में खर्चीले विवाह ही प्रधान कारण है। यदि विवाहोन्माद का असुर मर जाय तो अपना समाज देखते-देखते सुखी-समृद्ध और सद्भावना सम्पन्न हो सकता हैं। उस मोर्चे से हम युग परिवर्तन की विचार-क्राँति आरंभ करें और उसे क्रमशः इतना व्यापक बना दें कि एक भी नैतिक, सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक एवं राजनैतिक दुष्टता को जीवित रहना और साँस लेना असम्भव हो जाय।
हम अपनी तपश्चर्या की तैयारी सजाने और भावी जीवन की रूप-रेखा बनाने में संलग्न हैं। प्रिय परिजनों को अपने उपरोक्त दो उत्तरदायित्व सँभालने के लिए तत्पर होना चाहिए। जब तक हम जीवित हैं, यह बताते रहेंगे कि क्या कर रहें हैं, साथ ही आप सबसे भी यह पूछने रहेंगे कि सौंपे हुए दो उत्तरदायित्वों का किस हद तक पालन किया जाय?
डडडडडडडडडडडडडड ध्वजायें उड़ाओ नहीं, कर्म में धर्म का ध्यान देते चलो। डडडडडडडडड जिन्दा नहीं, धर्म का ज्ञान हैं, ध्यान जिन्दा नहीं
लाश अपनी स्वयं ढो रहा आदमी, साँस चलती हैं, इंसान जिन्दा नहीं उठ रहा हैं धुंआ बढ़ रहा हैं घुटन, साँस रोके खड़े साधना के चरण
उक्त वातावरण के लिए कौन-सा, मुक्ति वरदान लाये हो देते चलो।
शान्ति के गीत गाना बढ़ा ही सरल, क्रान्ति के स्वर जगाना बड़ा ही सरल। कर्म कुरुक्षेत्र के कूदना ही कठिन, वाक जौहर दिखाना बड़ा ही सरल॥
कर उठे व्यंजना शुचि-गिरा कर्म की, शान्ति के मर्म की, क्रान्ति के धर्म को। चित डोले नहीं, शब्द बोले नहीं, कर्म में वेद व्याख्यान देते चलो॥
धर्म धारा गया है हृदय में सदा, वह उतारा गया हैं, क्रिया में सदा। सिर्फ व्याख्यान से धर्म फला नहीं, धर्म पीकर जिया, जिन्दगी की सुधा॥
धर्म कहता है- तुम धैर्य धारण करो, शान्ति से विघ्न सारे निवारण करो। धर्म देता नहीं भीरुता को जग, शौर्य का, शक्ति का दान देते चला॥
मंच से क्रान्ति की घोषणायें हुई, शब्द से शान्ति की व्यंजनायें हुई। क्रान्ति आई नहीं, शान्ति ठहरी नहीं, मन्दिरों में बहुत प्रार्थनायें हुई॥
जिन्दगी से जगें, क्रान्ति चिनगारियाँ, आत्मा से खिलें शान्ति-फलवारियाँ। पूर्वजों के चरित्र की दुहाई न दो, प्रज्ज्वलित एक पहचान देते चला॥
क्या हुआ साथ कोई तुम्हारे नहीं, आत्म विश्वास की शक्ति हारे नहीं। चाँद-सूरज अकेले चले जा रहे-रोशनी दे सके हैं सितारे नहीं॥
एक आगे चला, भीड़ पीछे चली, एक दीपक जलाता दीपावली। तुम घना देखकर थरथराओं नहीं, नव किरण के धनुष-धारण लेते चलो॥
जो कि सूने क्षणों में सहारा बनें, डूबते के लिए जो किनारा बनें। हर भटकती नजर को मिले रास्ता-घोर अंधियार में ज्योति धारा बनें॥
हारती सांस को दे सकें चेतना, जो उठे पाँव को दे सकें प्रेरणा। मंजिलों को छुपें गीत को गुनगुना-हर अधर को मधुर गान देते चलो॥
तुम जहाँ पर जियो, धर्म जीने लगे, तुम सुधा बाँट दो, विश्व पीने लगे। साथियों की यहाँ बाट जोहो नहीं, प्यार दो, हर दुखी को कि सीने लगे॥
अश्रु पोंछो किसी के तनिक आह भर, धर्म उतरे धरा पर नया रूप धर। वेद की ये ऋषायें भुलाओ नहीं, टूटती साँस को प्राण देते चलो॥
-लाखनसिंह भदौरिया,
*समाप्त*