तुम मुझे प्रभु कहते हो, गुरु कहते हो, उत्तम कहते हो, मेरी सेवा करना चाहते हो और मेरे लिए सब कुछ बलिदान कर देने को तैयार रहते हो। किन्तु मैं तुम से फिर कहता हूँ, तुम मेरे लिये न तो कुछ करते हो और न करना चाहते हो।
तुम जो कुछ करना चाहते हो मेरे लिये करना चाहते हो जबकि मैं चाहता हूँ तुम औरों के लिये ही सब कुछ करो। औरों के लिये कुछ न करने पर तुम मेरे लिये कुछ न कर सकोगे। मैं तुमसे सच कहता हूँ कि यदि तुमने इन छोटों के लिये कुछ न किया तो मेरे लिये भी कुछ न किया।
मैं फिर कहता हूँ कि मुझे प्रसन्न करने का प्रयत्न मत करो, मेरी प्रसन्नता तो इन छोटे और गरीब आदमियों की प्रसन्नता है। मुझे प्रसन्न करने के स्थान पर इनको प्रसन्न करो, मेरी सेवा की जगह इनकी सेवा और सहायता करो।
तुम सब प्रार्थना करते हो। लेकिन मैं सच कहता हूँ, तुम प्रार्थना नहीं करते। अगर तुम प्रार्थना करते हो तो मुझे ठीक-ठीक बतलाओ, क्या तुम लोग प्रार्थना में खड़े हुए संसार को भूल जाते हो। तुम्हारे मन को सारा द्वन्द्व नष्ट हो जाता है और तुम्हें ऐसा लगता है कि तुम्हारा कोई शत्रु नहीं है और न तुम ही किसी के शत्रु हो।
यदि ऐसा नहीं होता तो तुम प्रार्थना नहीं करते। तुम्हारी प्रार्थना में खड़ा होना ठीक वैसा ही है जैसे ग्वाले के डंडे से घिरी हुई भेड़े बाड़े में खड़ी हो जाती हैं।
मैं तुमसे सच कहता हूँ यदि पिता में विश्वास रखकर प्रार्थना की जाये तो मनुष्य को संसार की बुराइयों का स्मरण ही न आवे। यदि तुझमें राई के दाने भर भी सच्चा विश्वास हो तो तुम इस पहाड़ से अधिकारपूर्वक एक स्थान से दूसरे स्थान पर सरक जाने के लिये कह सकते हो और वह सरक कर चला भी जाये।
--रामकृष्ण परमहंस,
यह भूलना नहीं चाहिये कि प्रगति किसी भी दिशा में क्यों न हो उसका आधार प्रयत्न और पुरुषार्थ द्वारा उत्पन्न शक्ति ही होती है। शक्ति का उपार्जन एवं संचय, यही वह मार्ग है, जिस पर चलते हुए उन्नति के उच्च-शिखर तक पहुँच सकना सम्भव होता है। इस तथ्य, को लोग समझते भी हैं। तद्नुरूप धन-बल शरीर-बल बुद्धि-बल संघ-बल आदि सामर्थ्यों को अपने-अपने ढंग से उपार्जित भी करते हैं। प्रत्यक्ष में यही थोड़े से बल हमारी जानकारी में आते हैं, इसलिये उन्हीं की ओर सर्व-साधारण का ध्यान केन्द्रित रहता है। उन्हीं के उपार्जन में अपनी गतिविधियाँ लगी रहती हैं।
देखते है कि सभी अपने-अपने ढंग से प्रयत्नशील हैं और एक सीमा तक धन, विद्या एवं स्वास्थ्य भी पा लेते हैं। यह उपार्जन दीखता तो है पर उसके द्वारा प्रगति और सुख-शान्ति का जो परिणाम मिलना चाहिये, वह कहीं दृष्टिगोचर नहीं होता। यह उपलब्धियाँ जिनके पास हैं, उन्हें भी दुःखी, शोक-संताप ग्रस्त, उद्विग्न, पतित और हेय स्थिति में पड़ा देखा जाता है। निर्धनों की अपेक्षा धनी, भूखों की अपेक्षा बुद्धिमान्, अस्वस्थ की अपेक्षा बलवान् जब अधिक दुःखी, विक्षुब्ध, पतित और घृणित स्थिति में पड़े दीखते हैं तो शक्ति के तत्व-ज्ञान पर ही सन्देह होने लगता है और शंका उत्पन्न होती है कि कहीं “शक्ति से प्रगति” वाला-सिद्धाँत ही गलत तो नहीं हैं। आज लोगों के पास साधन बहुत हैं, उनके द्वारा विलासिता और विडम्बना का थोड़ा मन बहलाव भी कर लेते हैं पर वह देखा कम ही जाता हे कि उनसे ऐसा समर्थ व्यक्तित्व बना हो जो सुखी, समुन्नत, परिपुष्ट एवं वर्चस्व सम्पन्न, प्रतिभाशाली जीवन जी सकने की परिस्थिति उत्पन्न करे।
इस उलझन का कारण एक ही है कि एक महत्वपूर्ण बल जो उन सब का प्राण है, हमारे पास नहीं होता, फलस्वरूप धन, बुद्धि, स्वास्थ्य, संघ आदि की सामर्थ्य भी क्रमबद्ध जीवन-विकास कर सकने ओर जो उपलब्ध है, उसका समुचित लाभ एवं आनन्द उठा सकने से वंचित रह जाना पड़ता हे। इस सर्वोपरि सर्व-समर्थ बल का नाम है-आत्म-बल आत्म-बल के अभाव से सारी भौतिक सामर्थ्य तथा उपलब्धियाँ केवल भार बनकर रह जाती है। केवल बलवान् होना ही काफी नहीं। बलों का सही दिशा में सदुपयोग होना ही वह कौशल है, जिसके आधार पर समर्थता का लाभ उठाया जा सकता है। अपव्यय अथवा दुरुपयोग से तो बहुमूल्य साधन भी निरर्थक ही नहीं हानिकारक तक बन जाते हे। अतएव धन, बुद्धि, स्वास्थ्य आदि शक्तियों के ऊपर नियन्त्रण करने और उन्हें सही दिशा में प्रयुक्त करने वाली एक केन्द्रीय समर्थता भी होनी चाहिये कहना न होगा कि इस समर्थता का नाम-आत्म-बल है।
आत्म-बल के अभाव में वह विवेक-बुद्धि जागृत नहीं होती, जो वासनात्मक इन्द्रिय असंयम पर- तृष्णात्मक, अनियन्त्रित एवं आलस्य, प्रचारात्मक, मानसिक असंयम पर नियन्त्रण कर सके। अन्तःकरण में विद्यमान् दैवी और आसुरी शक्तियों में से आसुरी शक्तियों का उभार तीव्र होता है, वे निकृष्ट स्वार्थ की पूर्ति के लिये दुष्प्रवृत्तियाँ अपनाने के लिये प्रेरणा देती रहती हैं, उनके ऊपर नियन्त्रण करना भी बिना आत्म-बल के सम्भव नहीं। इन्द्रियाँ, मन और अन्तःकरण में विद्यमान् आसुरी सत्त दुर्बुद्धि का रूप धारण कर हमारे कठोर परिश्रम द्वारा उपार्जित सामर्थ्यों को अपव्यय एवं दुर्व्यय की ओर धकेल देती है, जब दिशा सही नहीं तो सुख-शान्ति एवं प्रगति की प्रबल आकांक्षा को पूरा करने के लिये हम अपनी समझ के अनुसार निरन्तर प्रयत्नशील रहते हैं, फिर भी दुर्भाग्यवश खाली हाथ ही रहना पड़ता है।
इच्छा और प्रयत्न रहते हुए भी लक्ष्य प्राप्त न हो इस पहेली का समाधान करते हुए इस रहस्य को समझना होगा कि भौतिक जीवन के ऊपर एक महान सत्तावादी आध्यात्मिक जीवन भी है और भौतिक बलों के ऊपर एक अति समर्थ आत्म-बल का भी अस्तित्व है। इन दोनों का समन्वय होना आवश्यक हैं। भौतिकता के ऊपर आध्यात्मिकता का दबाव एवं प्रकाश रखा जाना चाहिये। अन्यथा एकाकी भौतिक-बज भौतिक पुरुषार्थ और भौतिक दृष्टिकोण कोई उपयुक्त परिणाम प्रस्तुत न कर सकेगा। रेडियो, पंखा, बल्ब, रेफ्रिजरेटर, हीटर, कूलर आदि विद्युत उपकरणों का अपना मूल्य और महत्व आवश्यक है पर उनसे लाभ तभी मिलेगा, जब बिजली की धारा उनमें प्रवेश करने लगे। बिजली बन्द हो जाने पर यह सभी बहुमूल्य उपकरण बेकार हो जाते हैं। इसी प्रकार आत्मा-बल का नियन्त्रण न रहने पर परिश्रमपूर्वक कमाई गई भौतिक शक्तियाँ एवं सम्पदायें वह सत्परिणाम उत्पन्न कर नहीं पाती जो उन्हें करना चाहिये था।
हमें जानना चाहिये कि मनुष्य केवल शरीर मात्र ही नहीं है। उसमें एक परम तेजस्वी आत्म भी विद्यमान् है। हमें जानना चाहिये कि मनुष्य केवल बल, बुद्धि और स्वास्थ्य के भौतिक बलों से ही साँसारिक सुख, सम्पदा, समृद्धि एवं प्रगति प्राप्त नहीं कर सकता, उसे आत्म-बल के अभाव में उपरोक्त तीनों शरीर -बाल मात्र खिलवाड़ बन कर रह जाते है। वे किसी के पास कितनी ही बड़ी मात्रा में क्यों न हों, उससे सहानुभूति नहीं मिल सकती। वे केवल भार, तनाव, चिन्तन एवं उद्वेग का कारण बनेंगे और यदि कहीं उनका दुरुपयोग होने लगा, तब तो सर्वनाश की भूमिका ही सामने लाकर खड़ी कर देंगे
आत्म-चेतना की विस्मृति भावना-जीवन की एक भयावह भूल है। यों कहने-सुनने को हम आत्मा-आत्मा शब्द बार-बार पढ़ते-सुनते हैं। उनके सम्बन्ध में कौतूहल भरी भावनायें भी बार-बार सामने आती जाती है, पर वस्तुतः यह अनुभव होता कभी भी नहीं है कि हम आत्मा है। अभ्यास और विश्वास यही है कि हम शरीर के रूप में जो कुछ जाने-माने जाते हैं, वही है-उतने ही है। शरीर भावना इतनी एवं परिपक्व हो गई है कि यह अनुभव करना अति कठिन लगता है कि हम शरीर से मित्र एक परम पवित्र एवं परम समर्थ चेतना केन्द्र हैं। यदि ऐसा अनुभव होने लगे तो सोचने का सारा आधार ही बदल जाय।
“मैं आत्मा हूँ, शरीर मेरा उपकरण है। मेरा स्वार्थ, आत्मिक स्वार्थ परमार्थ है। उसे शरीर स्वार्थ की वेदी पर बलिदान न करूँगा यह विद्रोह जब सजग विवेक द्वारा आरम्भ होता है तो अन्तरंग में एक भावनात्मक महाक्रान्ति उठ खड़ी होती है और सोचने तथा करने की पद्धति में महत्वपूर्ण परिवर्तन करने के लिये विवश होना पड़ता है। यही वह मर्मस्थल है। जहाँ आत्म-जागरण आत्म-निर्माण आत्म-विकास की सम्भावनाऐं मूर्तिमान् होती हैं। यही वह प्रवेश द्वार है, जहाँ से आत्म-बल की महान् विभूतियों का रत्न-भण्डार जगमगाता हुआ दीखता है।
जड़ परमाणुओं का बल अब सर्वविदित हो चला है। एक छोटे से अणु का ‘नाभिक जब फट पड़ता है, तब उसकी प्रचण्ड शक्ति का अन्दाज लगता हैं। अणुबम विस्फोट के समय उत्पन्न होने वाली शक्ति को देख कर नगण्य से अणु की महती शक्ति का अनुमान लगाया जा सकता है। फिर आत्मा तो चेतन है, चेतन में जड़ से असंख्य गुनी शक्ति है। आत्मा के एक कण की शक्ति का अनुमान लगा सकना अपनी पंगु-बुद्धि के लिये संभव नहीं। इस शक्ति के बल पर क्या कुछ नहीं हो सकता। एक नई सृष्टि रची जा सकती है। एक प्रलय ताण्डव प्रस्तुत हो सकता है। परमात्मा का पुत्र आत्मा रूप है, यह पूछने की अपेक्षा यह जानना चाहिये कि वह क्या नहीं है। परम-आत्मा में केन्द्रीभूत हैं। जो उनको समझ, संभाल और प्रयोग कर सके, वह एक प्रकार ईश्वर का ही प्रतिनिधित्व कर सकता है।
आत्म-ज्ञान के साथ यह मान्यता जगती है कि हमारा स्वरूप और लक्ष्य क्या है? हम क्या सोचना और क्या करना चाहिये? इन प्रश्नों के उत्तर अन्तःकरण में से अनायास ही, स्वयमेव ही उठते हैं। जीवन की खोई हुई पवित्रता प्राप्त करने के लिये, विचारों को परिष्कृत करने के लिए, गतिविधियों को व्यवस्थित करने के लिये-एक प्रचण्ड साहस, उत्साह एवं उल्लास यदि अन्तरंग में से फूट पड़े तो समझना चाहिये कि आत्म-जागरण एवं आत्म-साक्षात्कार का सौभाग्यशाली शुभ मुहूर्त आ गया। इस विवेक बिन्दु पर खड़ा हुआ व्यक्ति बड़े महत्वपूर्ण आश्चर्यचकित करने वाले एवं दुस्साहसपूर्ण निर्णय करता है।
आत्मा-बल आरम्भिक स्वरूप विवेक के समर्थन में-आत्मा की महत्ता अक्षुण्ण रखने के लिये-वर्तमान गतिविधियों के विरुद्ध उठ खड़े होने के दुस्साहस के रूप में होता हैं। आगे वह बढ़ते-बढ़ते उस स्थिति को पहुँच जाता है, जिस पर पहुँचे हुओं को योगी-यती सिद्ध-ऋद्धि तत्त्वदर्शी आदि नामों से पुकारते है। आत्म-बल की परख आमतौर से कई सिद्धियों और चमत्कारों से की जाती है। जो दूसरों को अचम्भे में डाल देने वाले, अद्भुत, असाधारण काम कर दिखाये, उसे आत्म-बल सम्पन्न कहा जाता हैं। जो अन्तरिक्ष से कोई वस्तुऐं मँगा दे, किन्हीं को गायब कर दे, जो अदृश्य तथ्यों को देख सके, दूरस्थ घटनाओं को जान सके, बिना वाहन सुदूर प्रदेशों में चला जाय, बिना अन्न-जल जी सके, जिस पर शीत, ग्रीष्म आदि का प्रभाव न हो, जो समाधि में मूर्छित रहकर जीवित रहे, जिसके शाप से नाश और आशीर्वाद से उत्कर्ष सम्भव हो सके आदि चमत्कारी विशेषताओं से युक्त व्यक्ति को अध्यात्म-बल सम्पन्न मानते है। यह विशेषताएँ आत्म-शक्ति के साधारण से चमत्कार है, जो सरकस जैसे कुछ अभ्यास साधन करने से सहज ही उपलब्ध हो सकते हैं। मूल प्रश्न आत्म-बल की उत्पत्ति वाले केन्द्र बिन्दु का हैं। वह तब उत्पन्न होता है, जब व्यक्ति भौतिक सुख-सुविधाओं को गौण और आध्यात्मिक परमार्थ साधना को प्रथम स्वीकार कर लेता है। मुख्य के लिये गौण की उपेक्षा कर सकने का आदर्श जो अपना लेगा उसी के लिये यह सम्भव होगा कि तृष्णा और वासना को ठुकरा कर उत्कृष्टता एवं आदर्शवादिता का समर्थन एवं आचरण कर सके। यह साहस कुछ ऐसी घटनाओं के साथ विकसित होता है, जिन्हें साधारण लौकिक दृष्टि में दुस्साहस ही कहा जा सकता है।
तुच्छ स्वार्थों की उपेक्षा करने का दुस्साहस जो कर सके, समझना चाहिये कि उसे आत्म-बल के भण्डार की चाबी मिल गई। हीरा किस जेवर में प्रयुक्त किया जाय? यह पीछे का प्रश्न है। आत्म-बल दूसरों को प्रभावित करने वाली अद्भुत चमत्कारी कला दिखाने में भी प्रयुक्त किया जा सकता हैं। जिसका शरीर समर्थ है, वह कुछ दिन में सरकस जैसे खेल भी सीख सकता है। पर सरकस शिक्षण स्कूल में प्रवेश करने पर दुर्बल, बीमार को कुछ मिलने वाला नहीं हैं। इसी प्रकार जिसमें आत्म-बल का मूल-तत्व न हो उसे विविध विधि योग साधनाओं का अभ्यास करते रहने पर भी खाली हाथ ही रहना पड़ता है। आत्म-बल बढ़ाने के कई प्रयोग, कई साधन, कई अभ्यास भी है पर वे सब तो हीरे पर खराद चढ़ाने के उपकरण मात्र वाली कीमती मशीनें भी उसे असली हीरे का स्थान नहीं दिला सकतीं।
आत्म-बल का प्रधान लाभ जीवन को सर्वोत्तम सदुपयोग के लिये प्रस्तुत करना है। अपने आपकी समीक्षा कर सकना, अपने से लड़ सकना, अपने का बदल सकना, अपनी गतिविधियों को निकृष्टता की कीचड़ में से निकाल कर उत्कृष्टता के सिंहासन पर प्रतिहित सकना मानव-जीवन का सबसे बड़ा पुरुषार्थ और मानवी चेतना की सबसे बड़ी सफल साधना है। जीवन-क्रम देखने में सामान्य भले ही रहे पर अन्तरंग की उत्कृष्टता की जो समुन्नत कर सके वस्तुतः वही महापुरुष है। पुरुष का महापुरुष के रूप में परिणत हो जाना यही जीवन के चरम लक्ष्य की प्राप्ति हे।
यहाँ मनोबल और आत्म-बल का अन्तर हमें समझ लेना चाहिये। मनोबल, इच्छा-शक्ति दृढ़ता, साहस और धैर्य का नाम है। इन गुणों का अपना महत्व है। साँसारिक सफलतायें इन्हीं विशेषताओं के आधार पर मिलती है। मनस्वी लोग कठिनाइयों से डरते नहीं वरन् दूने उत्साह से कष्ट सहते हुए संघर्ष करते हुए आगे बढ़ते है। जबकि दूसरे लोग पग-पग पर निराशा आशा के हर्ष-शोक के झूले में झूलते रहते हैं, तब मनोबल सम्पन्न व्यक्ति अविचल भाव से, निर्धारित दिशा में तत्परतापूर्वक गतिशील रहते हैं। साहस के आधार पर बड़े-बड़े कठिन कार्य पूरे होते हैं।
परिश्रमी, उद्योगी, पुरुषार्थी असम्भव लगने वाली सफलतायें प्राप्त कर लेते है। उत्साह और स्फूर्ति का चुम्बकीय आकर्षण अनेक दिशाओं से सुविधा-साधन तथा सहयोग खींच कर सामने खड़े कर देते है। संसार में छोटे-छोटे मनुष्यों ने अभावों और असुविधाओं को चीरते हुए प्रगति की है, उसमें उनके साहस, श्रम, धैर्य और मनोबल का ही श्रेय है। भौतिक प्रगतियों की कुँजी मनोबल ही तो है।
इन पंक्तियों में मनोबल की नहीं आत्म-बल की चर्चा की जा रही है। मनोबल का अपना महत्व है पर वह है इसी सीमा तक कि किन्हीं कार्या को सिद्ध करने में प्रयुक्त हो सके। आत्म-बल इससे ऊँचे स्तर का। आदर्शों और सिद्धान्तों पर अड़े रहने, किसी भी प्रलोभन और कष्ट के दबाव में कुमार्ग पर पग न बढ़ाने, अपने आत्म-गौरव के अनुरूप सोचने और करने, दूरवर्ती भविष्य कि निर्माण के लिये आज की असुविधाओं को धैर्य और प्रसन्नचित्त से सह सकने की दृढ़ता का नाम आत्म-बल है। जो वासना और तृष्णाओं को-स्वार्थ और सुविधा को कठोर मारकर अपने लिये नहीं लोक-मंगल के लिये संयम और सदाचार से भरा, प्रेम ओर आत्मीयता भरा जीवन जी सकता है, उस महामानव को ही आत्म-बल सम्पन्न कहा जायेगा
आत्म-बल आत्मा की उच्च स्थिति का प्रकाश है। उसके आधार पर किसी की आन्तरिक महानता नापी जा सकती है। जो आत्मिक दृष्टि से जितना महान् है, उसे इस संसार का उतना ही बड़ा सम्पन्न और विभूतिवान मानना चाहिये। ऋषि ओर मनीषियों के पास यही संपदा होती है और वे इसी विभूति के बल पर आत्म-कल्याण का लक्ष्य प्राप्त करते हुए चन्दन वृक्ष की तरह अपने समीपवर्ती लोगों को सुगन्धि सुविधा से लाभान्वित करते रहते हैं।
मनुष्य शरीर में ईश्वर का अंश उसके आत्म-बल के आधार पर आँका और नापा जा सकता है। जिसमें जितना आत्मबल हो समझना चाहिये कि उसके व्यक्तित्व में उतनी ही मात्रा में ईश्वर का निवास हैं। जहाँ ईश्वर है, वहाँ ऐश्वर्य की क्या कमी। दूसरे उसे गरीब एवं अभावग्रस्त समझते हों तो समझे पर वह अपनी विभूतियों का मूल्य-समझते हुए, स्वामी रामतीर्थ की तरह अपने को बादशाह ही समझता है। समझता ही नहीं-उसी स्तर की प्रसन्नता एवं संतुष्टि भी अनुभव करता है।
जिनके प्रकाश से जन-समाज को श्रेय पथ पर चलने का मार्ग-दर्शन मिलता है, जो अपने अनुकरण की प्रेरणा देकर असंख्यों को उठाते, उभारते, बढ़ाते ओर पार करते हैं, वे आत्म-बल सम्पन्न महामानव ही होते हैं। चरित्र के धनी, करुणा, दया, परिपूर्ण हृदय, उदारता और आत्मीयता से ओत-प्रोत व्यक्तित्व आत्म-बल के ही प्रतीक है। ऐसे महाभाग देवदूतों की तरह जीवन मुक्ति की तरह जीते है। संसार उनकी उपस्थिति से सुगन्धित, सुरक्षित, समुन्नत, और व्यवस्थित होता है। वे अपनी सामर्थ्य से दिशायें बदलने और हवायें पलटने में समर्थ होते है। उन्हें धरती के देवता ही कहा जायेगा, भले ही साधारण गृहस्थ व्यवसायी के रूप में जीवन-यापन करते हों अथवा लोक-सेवी परमार्थी सज्जनों की तरह पुण्य परमार्थ के प्रयोजनों में संलग्न हो। उनका आशीर्वाद जिन्हें मिल गया वह कृतकृत्य हो जाता है।
आत्म-बल वह क्षमता है, जिसका जितना अंश मनुष्य के पास होगा, उतना ही वह अपने विवेक को सजग कर सकने में समर्थ होगा। विवेक ही वह सत्ता है जो धन, बुद्धि, स्वास्थ्य आदि की भौतिक शक्तियों को नियन्त्रण में रख कर उन्हें सन्मार्गगामी बनाती हैं। सदुद्देश्य और सत्प्रयोजनों में प्रवृत्त करती है। यह प्रयोग ही हमारी भौतिक उपलब्धियों को सार्थक बनाते हैं।
मनोबल सहित स्वास्थ्य, विद्या और धन सभी का अपना-अपना महत्व है पर यह गाँठ बाँध रखना चाहिये कि संसार की किसी वस्तु का यदि तनिक भी लाभ उठाना हो तो उसे आत्म-बल के नियंत्रण में रख कर ही यह प्रकाशवान और सुखदायक होती है, अन्यथा वे भारभूत बनी हुई मनुष्य के कष्टों को ही बढ़ाती रहती है।
किसी की यह धारणा सर्वदा मिथ्या है कि सुख का निवास किन्हीं पदार्थों में हैं। यदि ऐसा रहा होता तो वे सारे पदार्थ जिन्हें सुखदायक माना जाता है, सबको समान रूप से सुखी और संतुष्ट रखते। अथवा उन पदार्थों के मिल जाने पर मनुष्य सहज ही सुख सम्पन्न हो जाता। किन्तु ऐसा देखा नहीं जाता। संसार में ऐसे लोगों की कमी नहीं है, जिन्हें संसार के वे सारे पदार्थ प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं, जिन्हें सुख का संचालक माना जाता है। किन्तु ऐसे सम्पन्न व्यक्ति भी असन्तोष, अशान्ति, अतृप्ति अथवा शोक-संतापों से जलते देखे जाते हैं। उनके उपलब्ध पदार्थ उनका दुःख मिटाने में जरा भी सहायक नहीं हो पाते।
वास्तविक बात यह है कि संसार के सारे पदार्थ जड़ होते है। जड़ तो जड़ ही है। उसमें अपनी कोई क्षमता नहीं होती। न तो जड़ पदार्थ किसी को स्वयं सुख दे सकते हैं और न दुःखं। क्योंकि उनमें न तो सुखद तत्व है, जिससे वे किसी को अपनी विशेषता से प्रभावित कर सकें। यह मनुष्य का अपना आत्म-तत्व ही होता है, जो उससे सम्बन्ध स्थापित करके उसे सुखद या दुःखद बना लेता है। आत्म-तत्व की उन्मुखता ही किसी पदार्थ को किसी कि लिये सुखद और किसी के लिये दुःखद बना देती है।
जिस समय मनुष्य का आत्म-तत्व सुखोन्मुख होकर पदार्थ से सम्बन्ध स्थापित करता है, वह सुखद बन जाता है और जब आत्म-तत्व दुःखोन्मुख होकर सम्बन्ध स्थापित करता है, तब वही पदार्थ उसके लिये दुःखद बन जाता है। संसार के सारे पदार्थ जड़ हैं, वे अपनी ओर से न तो किसी को सुख दे सकते हैं और न दुःख। यह मनुष्य का अपना आत्म-तत्व ही होता है, जो सम्बन्धित होकर उनको दुःखदायी अथवा सुखदायी बना देता है। यह धारणा कि सुख की उपलब्धि पदार्थों द्वारा होती है, सर्वथा मिथ्या और अज्ञानपूर्ण है।
किन्तु खेद है कि मनुष्य अज्ञानवश सुख-दुःख के इस रहस्य पर विश्वास नहीं करते ओर सत्य की खोज संसार के जड़ पदार्थों में किया करते हैं। पदार्थों को सुख का दाता मानकर उन्हें ही संचय करने में अपना बहुमूल्य जीवन बेकार में गवाँ देते हैं केवल इतना ही नहीं कि वे सुख की खोज आत्मा में नहीं करते बल्कि पदार्थों के चक्कर में फँसकर उनका संचय करने के लिये अकरणीय कार्य तक किया करते है। झूठ, फरेब, मक्कारी, भ्रष्टाचार, बेईमानी आदि के अपराध और पाप तक करने में तत्पर रहते हैं। सुख का निवास पदार्थों में नहीं आत्मा में हे। उसे खोजने और पाने के लिये पदार्थों की और नहीं आत्मा की और उन्मुख होना चाहिये।
पदार्थों का उपभोग इन्द्रियों द्वारा होता हैं। इन्द्रियों के सक्रिय ओर सजीव होने से ही किसी रस, सुख अथवा आनन्द की अनुभूति होती है। जब तब मनुष्य सक्षम अथवा युवा बना रहता है, उसकी इन्द्रियाँ सतेज बनी रहती है। पदार्थ और विषयों का आनन्द मिलता रहता है। पर जब मनुष्य वृद्ध अथवा अशक्त हो जाता है-उन्हीं पदार्थों में जिनमें पहले विभोर कर देने वाला आनन्द मिलता था, एकदम नीरस और स्वाद-हीन लगने लगते है। उनका सारा सुख न जाने कहाँ विलीन हो जाता है। वास्तविक बात यह है कि अशक्तता की दशा अथवा वृद्धावस्था में इन्द्रियाँ निर्बल तथा अनुभवहीनता से शून्य हो जाती हैं। उनमें किसी पदार्थ का रस लेने की शक्ति नहीं रहती। इन्द्रियों का शैथिल्य ही पदार्थों को नीरस, असुखकर तथा निस्सार बना देता है।
वृद्धावस्था है क्यों? बहुत बार यौवनावस्था में भी सुख की अनुभूतियाँ समाप्त हो जाती हैं। इन्द्रियों में कोई रोग लग जाने अथवा उनको चेतनाहीन बना देने वाली कोई घटना घटित हो जाने पर भी उनकी रसानुभूति की शक्ति नष्ट हो जाती है। जैसे रसेन्द्रिय जिव्हा में छाले पड़ जाये तो मनुष्य कितने ही सुस्वाद पदार्थों का सेवन क्यों न करे, उसे उसमें किसी प्रकार का आनन्द न मिलेगा। पाचन क्रिया निर्बल हो जाय जो कोई भी पौष्टिक पदार्थ बेकार हो जायेगा। आँखें विकार युक्त हो जाये तो सुन्दर से सुन्दर दृश्य भी कोई आनन्द नहीं दे पाते। इस प्रकार देख सकते हैं कि सुख पदार्थ में नहीं बल्कि इन्द्रियों की अनुभूति शक्ति में है।
अब देखना यह कि इन्द्रियों की शक्ति क्या है? बहुत बार ऐसे लोग देखने को मिलते हैं जिनकी आँखें देखने में सुन्दर स्वच्छ तथा विकार-हीन होती है, लेकिन उन्हें दिखलाई नहीं पड़ता। परीक्षा करने पर पता चलता है कि आँखों का यन्त्र भी ठीक हैं। उनमें आने-जाने वाली नस-नाड़ियों की व्यवस्था भी ठीक है। तथापि दिखलाई नहीं देता। इसी प्रकार अन्य इन्द्रियाँ हाथ-पाँव नाक-कान आदि की भी दशा हो जाती है। सब तरफ से सब वस्तुऐं ठीक होने पर भी इन्द्रिय निष्क्रिय अथवा निर्दिशति ही रहती है। इसका अर्थ यह हुआ कि रस की अनुभूति इन्द्रियों की स्थूल बनावट से नहीं होती। बल्कि इससे भिन्न कोई दूसरी वस्तु है, जो रस की अनुभूति कराती है। वह वस्तु क्या है? वह वस्तु है चेतना, जो सारे शरीर और मन प्राण में ओत-प्रोत रहकर मनुष्य की इन्द्रियों को रसानुभूति की शक्ति प्रदान करती है। इसी सब ओर से शरीर में ओत-प्रोत चेतना को आत्मा कहते है। आनन्द अथवा सुख का निवास आत्मा में ही है। उसी की शक्ति से उसकी अनुभूति होती है ओर वही जीव रूप में उसका अनुभव भी करती है। सुख न पदार्थों में है और न किसी अन्य वस्तु में। वह आत्मा में ही जीवात्मा द्वारा अनुभव किया जाता है।
मनुष्य की अपनी आत्मा ही सब कुछ है। आत्मा से रहित वह एक मिट्टी का पिण्ड मात्र ही हे। शरीर से जब आत्मा का सम्बन्ध समाप्त हो जाता है तो वह मुर्दा हो जाता है। शीघ्र ही उसे आहर करने ओर जलाने, दफनाने का प्रबन्ध किया जाता है। संसार के सारे संबन्ध आत्मा द्वारा ही सम्बन्धित है। जब तक जिसमें आत्मा-भाव बना रहता है, उसमें प्रेम और सुख आदि की अनुभूति बनी रहती है और जब यह आत्मीयता समाप्त हो जाती है वही वस्तु या व्यक्ति अपने लिये कुछ भी नहीं रह जाता। किसी को अपना मित्र बड़ा प्रिय लगता है। उससे मिलने पर हार्दिक आनन्द की उपलब्धि होती है। न मिलने से बेचैनी होती है। किन्तु जब किन्हीं कारणवश उससे मैत्री-भाव समाप्त हो जाता हे अथवा आत्मीयता नहीं रहती तो वही मित्र अपने लिये, एक सामान्य व्यक्ति बन जाता है। उसके मिलने न मिलने में किसी प्रकार का हर्ष-विवाद नहीं होता। बहुत बार तो उससे इतनी विमुखता हो जाती है। प्रेम, सुख ओर आनन्द की पर सारी अनुभूतियाँ आत्म से ही सम्बन्धित होती हैं, किसी वस्तु, विषय, व्यक्ति अथवा पदार्थ से नहीं। सुख का संसार आत्मा में ही बसा हुआ हैं उसे उसमें ही खोजना चाहिये। साँसारिक विषयों अथवा वस्तुओं में भटकते रहने से सही दशा और वही परिणाम सामने जायेगा, जो गड़बड़ में भूले मृग के सामने आता है।
मनुष्य की अपनी विशेषता ही उसके लिये उपयोगिता तथा स्नेह सौजन्य उपार्जित करती है। विशेषता समाप्त होते ही मनुष्य का मूल्य भी समाप्त हो जाता है और तब वह न तो किसी के लिये आकर्षक रह जाता है और न प्रिय! इस बात की समझने में लिये सबसे अधिक निकट रहने वाले माँ और बच्चे को ले लीजिये। माता से जब तक बच्चा दूध और जीवन-रस पाता रहता है, उसके शरीर से अवश्य की तरह चिपटा रहता है। उसे माँ से असीम प्रेम होता है। जरा देर को भी वह माँ से अलग नहीं हो सकता। माँ उसे छोड़कर कहीं गई नहीं की वह रोने लगता है। किन्तु जब इसी बालक का अपनी सुरक्षा तथा जीवन के लिये माँ की गोद और दूध की आवश्यकता नहीं रहती अथवा रोग आदि के कारण माँ की यह विशेषता समाप्त हो जाती है तो बच्चा उसकी जरा भी परवाह नहीं करता। यह उससे अलग भी रहने लगता है और स्तन के स्थान पर शीशी से ही बदल जाता है। मनुष्य की विशेषताएँ ही किसी के लिये स्नेह, सौजन्य अथवा प्रेम आदि की सुखदायक स्थितियाँ उत्पन्न करती है।
किन्तु मनुष्य की इस विशेषता का स्त्रोत क्या है। इसका स्त्रोत भी आत्मा के सिवाय और कुछ नहीं है। बताया जा चुका है कि आत्मा से असम्बन्धित मनुष्य सब से अधिक कुछ नहीं होता। जो शव है, मुर्दा है अथवा अचेतन या जड़ है, उसमें किसी प्रकार की प्रभावोत्पादक विशेषता के होने का प्रश्न ही नहीं उठता। मनुष्य के मन प्राण और शरीर तीनों का संचालन, नियन्त्रण तथा पोषण आत्मा की सूक्ष्म सत्ता द्वारा ही होता है। आत्मा और इन तीनों के बीच जरा-सा व्यवधान आते ही सारी व्यवस्था बिगड़ जाती है। सुन्दर, सुगठित ओर स्वस्थ शरीर की दुर्दशा हो जाती है। प्राणों का प्रबन्धन तिरोहित होने लगता है और मन मतवाला होकर मनुष्य को उन्मत्त ओर पागल बना देता है।
ऐसी भयावह स्थिति में संसार का कोई व्यक्ति, कोई आत्मीय और कोई स्वजन सम्बन्धी न तो प्रेम कर सकता है और स्नेह सौजन्य के सुखद भाव ही प्रदान कर सकता है। यह केवल मनुष्य की अपनी आशा ही है, जो उसका सच्चा मित्र, सगा-सम्बन्धी और वास्तविक शक्ति है। इसी के कारण मनुष्य गुणों और विशेषताओं का स्वामी बनकर अपना मूल्य बढ़ाता और पाता है। जीवन में सुख, सौख्य के उत्पादन, अतिवृद्धि और रक्षा के लिये मनुष्य को चाहिये कि वह आत्मा की ही शरण रहे। उसे ही अपना माने, उससे ही प्रेम करे ओर उसे ही खोजने पाने में अपने जीवन की सार्थकता समझे।
सुख का निवास किसी व्यक्ति, विषय अथवा पदार्थ में नहीं है। उसका निवास आत्मा में ही हे। संसार के सारे पदार्थ जड़ और प्रभाव-हीन है। किसी को सुख-दुख देने की उनमें अपनी क्षमता नहीं होती। पदार्थों अथवा विषयों में सुख-दुख का आभास उनके प्रति आराम-भाव के कारण ह होता है। आत्म-भाव समाप्त हो जाने पर वह अनुभूति भी समाप्त हो जाती है। हमारी आत्मा ही विभिन्न पदार्थों पर अपना प्रभाव डाल कर उन्हें आकर्षक तथा सुखद बनाती हैं। अन्यथा संसार के सारे विषय, सारी वस्तुऐं, सारे पदार्थ ओर सारे भोग नीरस, निःसार तथा निरुपयोगी है। जड़ होने से सभी कुछ कुरूप तथा अग्राह्य हे।
जिस पदार्थ के साथ जितने अंशों में अपनी आत्मा धुली-मिली रहती है, उतने ही अंशों में वह पदार्थ प्रिय, सुखदायी और ग्रहणशील बना रहता है और आत्मा का सम्बन्ध जिस पदार्थ से जितना कम होता जाता है, वह उतना ही अपने लिये कुरूप और अप्रिय बनता जाता है। आनन्द और प्रियता का सम्बन्ध पदार्थों से नहीं स्वयं आत्मा से ही होता है। अस्तु, आत्मा को ही प्यार करना चाहिये, उसे ही तेजस्वी और प्रभावशाली बनाना चाहिये जिससे हमारा सम्बन्ध उसी से दृढ़ हो और उसके उपलक्ष से ही संसार में प्रेम ओर सुख दे सकें। हमारी अपनी आत्मा ही ज्ञान-विज्ञान का केन्द्र है। सुख-शान्ति का मूल आधार हैं। उन्नति की समृद्धि का बीज उसी में छिपा है, स्वर्ग और मुक्ति का आधार वही है। कल्पवृक्ष बाहर नहीं अपनी आत्मा में ही अवस्थित है, आत्मा में ही सब कुछ है और आत्मा स्वयं ही कुछ है। उसे ही सर्वस्व ओर सारे सुखों का मूल और शान्ति का स्त्रोत मान कर उसकी उपासना करनी चाहिये। जिसने आत्मा को देख लिया, उसने सब कुछ देख लिया और जिसने आत्मा को प्राप्त कर लिया, उसने निश्चय ही सारे सुख, सारे सौख्य और सारे रस, आनन्द एक साथ एक स्थान पर सदा के लिये पा लिये।
बम्बई के ‘सर जे. जे. स्कूल आफ आर्ट’ नामक राजकीय कला विद्यालय के स्व. प्रिंसिपल ग्लैडस्टन सोलोमन बड़े दयालु व्यक्ति थे। सरकारी नौकरी से निवृत्त हो जाने पर भी वे अपने एक बूढ़े चपरासी को (जब तक वह जीवित रहा) अपनी पेंशन में से बस रुपये प्रति मास भेजते रहते थे। प्रति वर्ष वे बड़े दिन के अवसर पर जिस प्रकार अपने मित्र-वर्ग को शुभ कामना तथा नववर्षाभिनन्दन के कार्ड भेजा करते थे, उसी प्रकार अपने बूढ़े चपरासी को भी भेजते थे।
ईश्वर और उसके अस्तित्व पर विश्वास भारतीय धर्म की महत्त्वपूर्ण आधार शिला है। उसके आधार पर लोग भौतिक आकर्षक से बचे और अपना मनुष्य जीवन सार्थक करने में सफल हुए है। किन्तु अब लोग विज्ञान का युग कहकर इन तथ्यों की अवहेलना करने लगे है। जर्मनी के विद्वान् नीत्से ने नास्तिक दर्शन नाम का एक अलग दर्शन ही तैयार कर दिया और लोगों को इस भ्रम में डाल दिया कि संसार ईश्वर की कोई वस्तु नहीं है। प्रत्यक्ष संसार ही सब कुछ है, इसमें ही जो कुछ इन्द्रिय जन्य सुख है, वही स्वर्ग है। उन्हें ही प्राप्त करने का प्रयत्न करना चाहिये
फ्रायड ने तो काम सुख का ही सर्वस्व सिद्ध करने में अपना सारा जीवन लगा दिया। पोथियाँ रचकर तैयार कर दी और काम स्वेच्छाचार का डटकर प्रचार किया। कहना न होगा कि आज सारा परिश्रम उसके पद चिह्नों पर पूरी तरह चल निकला है। भारतवर्ष भी इस लहर से अछूता नहीं रह सका। यहाँ भी अब आस्तिकता का नाम ही रह गया है, मध्यम श्रेणी के पढ़े लिखे लोग तेजी से नास्तिक होते जा रहे है।
नीत्से और फ्रायड के समान ही भारतवर्ष में भी चार्वाक नाम का पण्डित हुआ है, उसने भी ईश्वर के अस्तित्व को इनकार किया और स्वेच्छाचार का प्रतिपादन किया था। फलस्वरूप कुछ दिन के लिए यहाँ ऐसी आध्यात्मिक शाँति और सामाजिक अव्यवस्था फैल गई थी कि उसे दूर करने के लिए जगद्गुरु शंकराचार्य को एक नये सिरे से धार्मिक क्राँति करनी पड़ी थी। यह कार्य कुछ कठिन था पर विश्व व्यवस्था के लिए उन्हें यह तप करना ही पड़ा।
नास्तिक दर्शन का प्रथम सूत्र-यह संसार जड़ मात्र है। भूमि, जल, अग्नि और वायु ये ही चार तत्व प्रमेय के रूप में स्वीकार किये और कहा कि इन्हीं चार भूतों की उचित मात्रा में पारंपरिक संयोग होने पर स्वभावतः चैतन्य की उत्पत्ति हो जाती है। कणादि, गुड़, महुआ आदि के एकत्र होने पर मादकता तैयार हो जाती है, चूना, पान, सुपारी के संयोग से रक्त वर्ण पैदा हो जाता है, इसी तरह इन चार तत्वों का ही संयोग है कि शरीर में एक चेतना अंगड़ाई ले लेती है। चूँकि यह चेतना स्वयंभू है इसलिए उसकी हर इच्छा को पूर्ण करना ही मनुष्य का धर्म है। जो भी खाने की इच्छा हो खाये, कोई दोष नहीं काम सुख सर्वाधिक संतुष्टि प्रदान करता है, इस लिये काम तुष्टि पर कोई प्रतिबन्ध नहीं होना चाहिये। उसकी दृष्टि में व्यभिचार कुछ भी नहीं है।
“इसी प्रकार चूँकि यह प्राकृतिक नियम है कि हर शक्तिशाली वस्तु अशक्त की खा जाती है, इसलिये मनुष्य का ऐसा करना प्राकृतिक है। अर्थात् माँस, मछली खाना कोई दोष नहीं “मैं स्थूल हूँ’, कृश हूँ इत्यादि साधारण उक्तियों और शरीर में केवल स्थूलता और कृशता होने के कारण किसी आत्मा का अस्तित्व सिद्ध नहीं होता। देह ही सब कुछ है। आत्मा कुछ नहीं मृत्यु के समय देह से आत्मा निकलकर परलोक चली जाती है, वह निरा भ्रम है। यदि आत्मा परलोक गमन करती तो स्त्री पुत्रों के प्रेम से आकर्षित होकर कभी लौट भी आती, किन्तु ऐसे कोई उदाहरण नहीं मिलते। सार्थक की एक और मान्यता यह है कि संसार में सत्य कुछ नहीं, सब मिथ्या है, प्रमाण, अनुमान और उपमाओं से किसी वस्तु को सत्य सिद्ध करना उसकी दृष्टि में भ्रम के अतिरिक्त कुछ नहीं था। ता वादी अतीन्द्रिय ईश्वरवादी सत्ता को भी नहीं मानता। जड़वादी होने के कारण स्वेच्छाचारिता और कलाकारिता को अत्यन्त प्रोत्साहन दिया गया हैं। उनके मतानुसार स्वर्ग यही है, प्रत्यक्ष सुखोपभोग ही वह स्वर्ग है, जिसकी अन्यत्र कामना की जाती है। जो वर्तमान सुख का परित्याग करता है, वह मूर्ख है। शरीर को कष्ट देना उससे भी बड़ी मूर्खता है। ऋण लेकर भी घृत पीना चाहिए। माँस, मदिरा मछली, मुद्रा (धन) और मैथुन, यही स्वर्गीय सुख के आधार है। जो इनको प्राप्त करने में जितना सफल रहा, वह उतना ही भाग्यशाली है, चाहे उसके लिये कितना ही पाखण्ड, धूर्तता, चालाकी और चोरी ही क्यों न करनी पड़े। इस प्रकार जड़वाद, भौतिकवाद, नास्तिक दर्शन, स्वेच्छाचार, कामाचारवाद, लोकायतवाद, लोकायतिकवाद का ही सम्मिलित स्वरूप है और वर्तमान विश्व सिद्धान्तकारों का नाम भले ही न जानता हो पर अधिकाँश इन मान्यताओं पर चल रहा है।”
यह दर्शन संसार के लिए कितना उपयोगी ठहरा है, इस पर कुछ लिखने की अपेक्षा यह कहना अधिक युक्ता संगत है कि संसार की परिस्थितियों को देख लो उत्तर मिल जायेगा। आज किसी में विश्वास नहीं अशान्ति उद्विग्नता से लोगों के जीवन बुरी तरह ग्रस्त है, बीसवीं सदी में जितनी जनसंख्या है, उतने ही रोग है। अर्थात् अधिकाँश व्यक्ति न समझ में आने वाली बीमारियों से रुग्ण है। छल, कपट, हिंसा, धोखेबाजी के कारण किसी का भी न तो जीवन सुरक्षित है और न इज्जत। सामाजिक जीवन जीते हुए भी लोग अपने को उस जंगल में भटका हुआ अनुभव करते है, जिसमें चारों और हिंसक ही हिंसक जन्तु झूम रहे हो। यह देन किसी और की नहीं-अनात्मवाद अनीश्वरवाद परायण और जड़वादी दर्शन की ही पूँजी है।
नीत्से, फ्रायड, चार्वाक जैसे प्रतिभाशाली पण्डित यह नहीं सोच सके कि मृतक देह में वह चारों तत्व जिन्हें वह जीवन का आधार मानते थे, चैतन्य क्यों नहीं बनी रही? वे थोड़ा भी गम्भीर चिन्तन करते तो उन्हें पता चल जाता कि तन्मात्राओं की अनुभूति करने वाला कोई और तत्व भी है, वह इन चार तत्वों से भिन्न है। अदृश्य वस्तु के अस्तित्व को कोई इनकार नहीं कर सकता। तार में होकर बिजली चलती है पर वह दिखाई नहीं देती इसका यह तात्पर्य नहीं कि उसके अस्तित्व से इनकार कर दिया जायें विद्युत न होती तो बल्ब कहाँ से जलता प्रकाश कहाँ से आता?
धन्यवाद वैज्ञानिक वोह्वर को जिसने सर्वप्रथम यह बताया कि रसायन का जीव विज्ञान से गठबंधन हुए बिना चैतन्य जगत् स्थिर नहीं रह सकता। 1827 में उसने एल्युमीनियम और 1828 में यूरिया नामक शारीरिक रसायन का विश्लेषण कर उसने यह सिद्ध किया कि शारीरिक रसायन और धातुओं को प्रयोगशाला में उपलब्ध किया जा सकता है, किन्तु जीव कोई स्वतन्त्र सत्ता है, जिसे प्रयोगशाला में नहीं पकड़ा जा सकता। यह घोषणा रसायन और औषधि जगत् में तीव्र हलचल पैदा करने वाली थी। तब से अब तक अकार्बनिक रसायन के ही लगभग 50000 यौगिकों की खोज की जा चुकी है, किन्तु जीवन के सम्बन्ध में कोई युक्ति संगत विश्लेषण वैज्ञानिक प्रस्तुत नहीं कर सके।
किन्तु वैज्ञानिकों ने उसकी खोज का संकल्प अवश्य किया। खोजते खोजते थे कोशिका और उसके द्वारा उत्पादनों और घटकों तक जा पहुँचे। उन्होंने देखा कि कोशिश (सेल्स, जिनसे मिलकर शरीर बना है) के भीतर जो सैकड़ों यौगिक भरे पड़े है, उन्हें निश्चित रूप से प्रयोग शाला में बनाया जा सकता है। उन्होंने इस बहुत ही सूक्ष्म कोशिका के भीतर जीव विज्ञान के भी सूक्ष्मदर्शी यन्त्रों से अध्ययन करना प्रारम्भ किया, जो निष्कर्ष प्राप्त हुए यद्यपि वह अपूर्ण है पर जितने है, जड़वादी मान्यता को काट देने के लिये वही काफी है। वैज्ञानिक दृष्टि में कोशिका व पिण्ड है, जिसमें सम्पूर्ण जगत का सूक्ष्म दर्शन छिपा हुआ है। उसे अध्ययन कर लेने वाला कभी नास्तिक नहीं हो सकता है।
यद्यपि यह अत्यन्त सूक्ष्म संरचना है तथापि बोधगम्य (नोबुल) है। एक बिन्दु में मनुष्य के लाल रक्त की लगभग 5 हजार कोशिकाओं समा सकती है। यह कोशिका झिल्ली पौधों और बैक्टीरियाज में अपेक्षाकृत अधिक मोटी और कड़ी होती है, यह एक प्रकार की निर्जीव चहार दीवारी है। सूक्ष्म जलीय जगत् तो उसके अन्दर बन्द है, आइए उस पर एक दृष्टि डाल कर देखे कि वहाँ कौन से तत्व क्या कर रहे है।
सूक्ष्मदर्शी यंत्रों द्वारा कोशिका झिल्ली के भीतर की इस रचना को बड़े आश्चर्य के साथ देखा जाता है। यह झिल्ली कोशिका के अन्तर समस्त इकाइयों की अपेक्षा अधिक सक्रिय इकाई है, किन्तु उसकी सक्रियता भीतर घुसे हुए नाभिक (न्यूक्लियस)की इच्छा के कारण है। न्यूक्लियस ह वही चेतन और केन्द्रीभूत सत्ता मानी रही है जिस पर कोशिश को सारा क्रिया व्यापार चलता है। यह एक अत्यन्त सूक्ष्म पर विराट जगत का प्रतिनिधि है। उसी को देखकर आइन्स्टीन ने कहा था कि यह क्षितिज भी अण्डाकार (कर्व) स्थिति में है, जब लोगों ने पूछा कि उसके बाद क्या है तो उसने कहा कुछ नहीं यह संसार का सबसे आश्चर्य है कि यह संसार जिसकी सीमा अनन्त है, वह भी घिरा हुआ, मुड़ा अर्थात् ससीम है। सीमा स्थित है।
जो भी हो हमें उस कोशिका झिल्ली का अध्ययन करना है। यह झिल्ली उन तत्वों को छाँटती है, जिनकी न्यूक्लियस अच्छा करता है, जिस प्रकार सिनेमा हाल के गेट पर खड़े ए चौकीदार जिसके पास पैसा टिकट होता है, उसी तरह उन्हें अन्दर जाने देते है, उसी प्रकार कोशिका झिल्ली भीतर केवल उन्हीं तत्वों को जाने देती है, जिसकी न्यूक्लियस इच्छा और प्रेम करता है। इस न्यूक्लियस के अतिरिक्त वहाँ कमजोर रेशों और अपेक्षा कृत मजबूत तंतुओं का जाल सा बिछा हुआ है। इन्हें क्रोमैटिन कहते हैं। क्योंकि वह रंगों को जब्त करते है, जब एक कोशिका दूसरी कोशिका में विभाजित होती है तो यह तंतु ही व्यावर्त्तन, पृथक्करण और पुनर्स्थापन के रूप में एक प्रकार की सामूहिक नृत्य सा करते है। आधुनिक नृत्यकार भी उस नृत्य की गति का मुकाबला नहीं कर सकते।
यह गति बड़ी रहस्यपूर्ण होती है, यह उन चार तत्वों को क्रियाशील करने का वैज्ञानिक तरीका है, जिससे नई सृष्टि की उत्पत्ति होती (नये बालक का जन्म भी इसी विभाजन क्रिया से होता है) है। किन्तु वह सब करने वाला पाँचवाँ आकाश तत्व भी वहाँ विद्यमान् है। न्यूक्लियस उसी आकाश में स्थित है, अर्थात् वह किसी भी तत्व पर टिका हुआ नहीं है, जबकि कोशिश झिल्ली के अन्दर गति करने वाले सभी पदार्थ परस्पर सम्बद्ध होते है।
न्यूक्लियस और कोशिका परिधि के बीच वाले भाग में जिसे साइटोप्लाज्म कहते है, अनेक संरचनाएँ होती है। छोटी सघन पहाड़ियाँ माइटोकोन्ड्रिया और उससे भी छोटे टीले माइक्रोसोक्से मिट्टी के कणों के बने प्रतीत होते है। कहीं कहीं पतले तंतु गोल्जीबाडील टेढ़े टेड़े ढंग से पड़े लहराते है, जिससे हवा का अस्तित्व दर्शन होता है। कुछ कोशिकाओं में दूसरी वस्तुऐं जैसे पिगमेट, स्टार्च कण, चर्बी को गोलियाँ बिखरी पड़ी रहती है। कोश में 70 प्रतिशत जल और इन तत्वों को क्रियाशील रखने वाले तापीय कण भी रहते है। इस बिन्दु जगत में ही चारों तत्वों के साथ आकाश भी छाया हुआ है। वैज्ञानिक इस सूक्ष्म रचना से दंग रह गये और अपने आपसे पूछने लगे, यदि कोशिका ही जीवन संरचना की इकाई है तो क्या उसके कार्य की भी इकाई है? रक्त परिसंचरण के आविष्कर्ता विलियम हार्वे ने उसका उत्तर देते हुए कहा था- हम जो कुछ जानते है। वह उसकी तुलना में जो अब भी अज्ञात है, बहुत कम है। यह वक्तव्य आज भी उतना ही सत्य है। वैज्ञानिक यह मानते है, कोशिका के आकाश में स्थित जगत के सम्पूर्ण अध्ययन के लिए 335 वर्ष की अवधि भी बहुत अल्प है। चार्वाक और नीत्से ने तो न जाने कैसे प्रत्यक्ष देहात्मवाद को ही सर्वस्य कह दिया। आज के वैज्ञानिक उसे एक मूर्खतापूर्ण प्रलाप ही कहते है।
चार तत्वों से देह की परिश्रम यों खण्डित हो गई। जब तक न्यूक्लियस है, तब शरीर का महत्व कुछ नहीं, यह भी सिद्ध हो गया। परलोक में क्या कुछ है। वहाँ जीवन है भी या नहीं, यह भले ही अभी समझ में न आया हो पर चन्द्रमा और शुक्र में अपने जहाज उतार कर अमेरिका और रूस ने परलोक के अस्तित्व को भी सिद्ध कर दिया। क्या परलोकवाद को सिद्ध कर दिया। क्या परलोकवाद की सिद्ध करने के लिए और कोई प्रमाण चाहिये।
स्वेच्छाचार और कामाचार की बुराइयाँ आज सभी देख रह है, यह तो सामाजिक व्यवस्था की दृष्टि से ही अनुचित है, वैज्ञानिक दृष्टि से तो उसे पाप और आत्मा के पतन का कारण गया है। इस तरह नास्तिक दर्शन ने रंगीनी से भरा हुआ ता महल बनाया, विज्ञान ने उसके टुकड़े टुकड़े कर दिये। अब निकट भविष्य में ही उस मान्यता का प्रादुर्भाव हो रहा है। जिसमें नास्तिक दर्शन की माँस तो क्या, भी दिखाई न देगी
आत्म स्वरूप का ज्ञान, जिज्ञासा द्वारा ही संभव है। हम वस्तुतः है क्या-यह बोध तभी हो सकता है, जब हम उसको जानने के लिए उत्सुक और उत्कंठित हो जिस विषय में कोई रुचि, कोई उत्कंठा नहीं होती उसको कदापि नहीं जाना जा सकता।
ज्ञान का जन्म जिज्ञासा द्वारा ही होता है। पूर्वकालीन ऋषियों को जिज्ञासा हुई कि वे यह जाने कि इस अपार और रहस्यमय सृष्टि का आदि उद्गम क्या है? उनकी इस जिज्ञासा ने उन्हें प्रेरित किया और वे साधना मार्ग से शोध में प्रवृत्त हुए, जिसके परिणामस्वरूप उस ईश्वर को खोज ही लाये, जो इस निखिल ब्रह्माण्ड का रचयिता, पालन कर्ता और लय कर्ता है। उनकी जिज्ञासा ने ही उन्हें यह श्रेय प्रदान किया कि वे सृष्टि के रहस्यों, उसके आदि स्त्रोत ईश्वर का पता ही नहीं लगा सके, बल्कि उससे सीधा सम्पर्क भी स्थापित कर सकें।
वैज्ञानिकों को प्रकृति के रहस्यों और उसके उत्पादनों की प्रक्रिया जानने की जिज्ञासा हुई और वे इस खोज में निरत हो गये। उन्होंने पृथ्वी, पवन, जल और अग्नि के भौतिक रहस्य को जाना और उसका उपयोग किया। उन्होंने वनस्पतियों, औषधियों और प्राणियों के आधिभौतिक स्वरूप की जिज्ञासा की, विज्ञाता ने उन्हें शोभा कार्यों में संलग्न किया। जिसके फलस्वरूप आज के विशाल भौतिक विज्ञान, औषधि विज्ञान, वनस्पति विज्ञान और जीव विज्ञान आदि शास्त्रों की रचना हुई।
मानस शास्त्रियों को जिज्ञासा हुई कि यह जान कि मनुष्य के अन्दर चलने वाले द्वन्द्वों का क्या आधार है। जिज्ञासा ने सक्रियता प्रदान की और उन्होंने स्थूल शरीर से भिन्न एक ऐसे निराकार मानसिक संसार का पता लगा डाला, जो बाह्य जीवन का मुख्य आधार है और आज का मानस ज्ञान एक व्यवस्थित शास्त्र के रूप में प्रतिष्ठित है।
अध्यात्म, भौतिक और मानस शास्त्रियों यदि जिज्ञासा न हुई होती तो क्या यह सम्भव था कि यह वैचित्र्यपूर्ण बृहत् ज्ञान मनुष्य जाति के पास होता। जिज्ञासा ही किसी ज्ञान की आधार शिला है, उसकी जननी है। आत्म ज्ञान भी आत्म जिज्ञासा के बिना नहीं हो सकता। यदि अपना, सच्चा और वास्तविक रूप जानना है तो उसे जानने की प्रबल जिज्ञासा करनी होगी, इससे रहित अन्य कोई उपाय नहीं, जिससे मनुष्य आत्मस्वरूप का ज्ञान पा सके। अस्तु, आत्म ज्ञान के लिये जिज्ञासा करिये और उसकी अनुकूल सक्रियता के लिये विचार, भाव और दृष्टिकोण का निर्माण कीजिये आत्मनिरीक्षण करते हुए अनुभवों की लड़ी बनाते चलिये, एक दिन आपकी आत्म ज्ञान हो जायेगा।
निश्चय रखिये कि आप जो कुछ देखते है, वस्तुतः वह ही नहीं है। यदि वास्तव में वही होते तो अपने को पूर्ण और संतुष्ट अनुभव करते, आनन्दित और उल्लसित बातें मनुष्य अपने तन मन और क्रियाओं द्वारा अपने जिस रूप को व्यक्त करता है, वह उसका वह आदिरूप नहीं है जिसकी शोध वाँछनीय है। वह शरीर और उसके उपादान ही होता, तब तो वह अपने को हर समय जाने ही रहता, कुछ और जानने की आवश्यकता ही न होती। किन्तु आवश्यकता है, उसका अनुभव भी होता है और पूर्ति इच्छा थी। यही आवश्यकता इस बात की साक्षी है कि मनुष्य का वास्तविक स्वरूप कुछ और है, जिसको जानना ही चाहिये। क्योंकि उसके बिना न तो पूर्णता प्राप्त हो सकती है और न अक्षय सुख शाँति।
जिस प्रकार एक छोटी सी वस्तु के पीछे एक बृहत् भण्डार, बूँद के पीछे समुद्र, बीज के पीछे वृक्ष और वायु की छोटी सी लहर के पीछे पवनमान अवस्थित है, इसी प्रकार हमारी चेतना के पीछे एक विराट् चेतना छिपी है। जिस प्रकार कोई एक इकाई किसी अनन्तता की साक्षी है, उसी प्रकार हमारी लघु चेतना किसी अखण्ड एवं असीमित चेतना की साक्षी है। जो कुछ वर्तमान अथवा दृश्यमान है, उसका एक आदि स्त्रोत होना ही चाहिये और वह होता भी है। वह प्रच्छन्न आदि स्त्रोत ही किसी वस्तु का सच्चा स्वरूप होती।
बूँद वस्तुतः बूँद नहीं होती है, उसका वास्तविक स्वरूप वह समुद्र है, जिससे वह आई है और जिसमें उसे लय हो जाना ही बीज को उसके उसी रूप में बीज मानना भूल है। बीज वस्तुतः विशाल वनस्पति है, जिससे वह उत्पन्न हुआ है और एक दिन अपना यह माध्यमिक रूप मिटाकर तद्रूप हो जाता है। वायु का लघु प्रवाह एक श्वाँस मात्र नहीं है। वह, वह सर्वव्यापक वायुमण्डल है, जिसमें वह आती और जिसमें जाकर लीन हो जाती है। इसी प्रकार लघु चेतन सागर है, जिसे परमात्मा कहते है और जिससे वह उत्पन्न होता है और अन्ततः जिसमें मिल जाता है। निस्संदेह मनुष्य आत्मा रूप में परमात्मा ही है। वह न शरीर है और न मन, बुद्धि, अहंकार आदि जो कि स्थूल रूप से प्रकट होता रहता है।
यदि सच्ची जिज्ञासा का सहारा लिया जाय तो आये दिन इस सत्य को अनुभव भी किया जा सकता है। यह सत्व तो सर्वथा मान्य ही है कि ईश्वर सच्चिदानन्द स्वरूप है। संसार में जो कुछ सत्य, शिव और सुन्दर है, वह ईश्वर रूप है। जब मनुष्य किसी लहलहाती लता पर हँसते, झूमते किसी फूल को देखता है तो उसे उसके प्रति एक आत्मिक आकर्षण हो उठता है। वह उस सुविकसित एवं सुवासित पुष्प को देखकर केवल प्रसन्न ही नहीं होता बल्कि सोचने लगता है कि कितना अच्छा होता, यदि मैं भी इस पुष्प की तरह सुन्दर सुगंधित और विकसित होता। इसी की तरह संसार को आनन्द देता हुआ, हँसता खेलता और अपने ही आनन्द में मस्त होकर झूमता। हमारा रंग रूप भी इसी की तरह प्यारा प्यारा और आडम्बर रहित होता।
मनुष्य जब वर्षा ऋतु में बादलों की गरज से मत्त होकर नाचते मोर को देखता है तो ठगा सा खड़ा हो जाता है और सोचने लगता है- क्यों न मुझे इस मोर की तरह सुन्दर पंख मिले और क्यों न मैं भी इसकी ही तरह मस्ती पा सका। कितना सुख हो कि इसी की तरह मनमोहक कलेवर पाकर और इसी की तरह विभोरता पाकर मैं भी मदमस्त होकर नृत्य कर सकूँ। इसकी वाणी की तरह मुझे भी लोक रंजन बाह्य मिली होती तो मैं भी बोल बोल कर संसार को अपनी और आकर्षित कर लेता।
मनुष्य जब इतिहास के सत्पात्रों के विषय में बढ़ता अथवा उनकी वीरता, बलिदान और त्याग की कथायें सुनता, किसी सत्पुरुष को जनसेवा और लोक रतन के कार्य करते देखता तो उसके मन में इच्छा होती है कि वह भी जनहित में ऐसे ही साहस और वीरता के काम कर सकता। इसी प्रकार त्याग एवं बलिदान द्वारा आत्मा को सुख दे पाता। इसी स्फूर्ति, दृढ़ता और उत्साह आदि गुणों का अधिकारी बनता तो कितना आनन्द, कितना उल्लास और कितनी सुख शाँति होती।
तात्पर्य यह है कि मनुष्य जिस और जहाँ भी सत्य, शिव और सुंदरम् के साथ सतोगुण का दर्शन करता है, उसकी आत्मा में वैसा बनने की प्यास जाग उठती है। उस उन दृश्यों, उन गुणों और उन महानताओं से तादात्म्य अनुभव होने लगता है। उसकी वह कामना, जिज्ञासा अथवा इच्छा उसकी आत्मीयता की ही द्योतक होती है। वास्तविकता यह है कि वह आकर्षण, वह आत्मीयता उस दृश्य की नहीं होती, जिसे वह बाहर देखता है। उसकी सारी सौन्दर्यानुभूति उसकी अपनी अन्तरात्मा की होती है, जो दृश्य का आत्मबल पाकर स्फुरित ही उठती है और जिसे वह अज्ञानवश बाह्य उपकरणों में मानता है।
मनुष्य का वही सुन्दर स्वरूप जिसे वह बाह्य दृश्यों, पर आरोपित करके देखता है, उसका अपना वास्तविक स्वरूप है, जिसकी उसे जिज्ञासा करनी चाहिये। उसी आन्तरिक सौंदर्य और आनन्दानुभूति को बिना किसी उपादान अथवा आनन्द के देखना और पाना आत्म साक्षात्कार है।
मनुष्य अपने आत्म रूप में बड़ा ही सुन्दर और आनंद मय है। यही कारण है कि जब वह किसी को गदा देखता है तो कामी कामना नहीं करता कि वह भी वैसा ही हो जाता। किसी अपराधी को जेल जाते देखकर उसके मन में यह जिज्ञासा कभी नहीं होती कि वह भी वैसा अपराध करके जेल जा सकता है। किसी शुष्क अथवा निकृष्ट पशु पक्षी को देखकर उसके हृदय में यह उत्सुकता नहीं होती कि वह भी उसी की तरह सूख जाता अथवा उसी की तरह कुरूप बन जाता।
इतिहास में किसी अत्याचारी अथवा आततायी का वर्णन पढ़कर मनुष्य के हृदय में यह भाव नहीं आता कि वह भी उसी की तरह रक्त पात करता, दूसरों को पीड़ा पहुँचता अथवा किसी का धन अथवा समान लूटता तो बड़ा आनन्द रहता। एक ओर जहाँ मनुष्य की सत्य, शिव और सुंदरम् से प्रेम होता है, वहाँ दूसरी ओर दुष्टता, दुराचार और दुराशा से घृणा और विकर्षण भी होता है। यह विवेकपूर्ण अनुभूति बतलाती है कि मनुष्य का स्वरूप वास्तविक स्वरूप सत्य, शिव और सुन्दर का प्रतिरूप है, उसके उस रूप में कुरूपता, असत्य सत्य, शिव और सुन्दर के सिवाय और कुछ नहीं है, अस्तु उसका अंश भी अपने आदि स्त्रोत के समान उसी का स्वरूप है।
निश्चय ही मनुष्य का सत्य रूप ईश्वर रूप ही है। अपने इस स्वरूप के विपरीत कार्य करने वाले या तो पूरे मनुष्य नहीं माने जा सकते अथवा वह मानना होगा कि वे वह सब करके एक मौलिक अपराध कर रहे है, एक पाप कर रहे है, जो उन्हें नहीं करना चाहिये।
यह निश्चय हो जाने पर कि मनुष्य आत्मा रूप में परमात्मा ही है, यदि वह अपने गौरव, अपनी गरिमा और अपने महत्व का प्रतिपादन नहीं कर पाता तो यह उसकी कमी ही कही जायेगी किसी महान पिता का पुत्र होकर भी, किसी शक्तिशाली का अंग होकर भी यदि कोई अपने आपमें निकृष्ट और दीन हीन बना रहना चाहता है तो यह उसका दुर्भाग्य ही माना जायेगा। अन्यथा अपने उच्च से उच्च सर्वोच्च स्वरूप का ज्ञान हो जाने पर निकृष्ट न होगा। ऐसे महान, व्यक्तित्व के पास ईर्ष्या द्वेष, छल कपट, शोषण, क्रूरता आदि आसुरी वृत्तियों का क्या काम रह सकता है।
आइए अपने अन्दर जिज्ञासा जागृत कर अनुभव के आधार पर अपने सत्यस्वरूप का साक्षात्कार करे, उसमें विश्वास और उसी के अनुरूप अपना आचरण बनायें। यदि इस विकास में हमारी निम्न वृत्तियाँ बाधक बनती है तो मान ले कि यही वह अवरोध है, यह वह आवरण है जो हमें अपने वास्तविक स्वरूप की ओर जाते और उसे देखने में बाधा डाल रहा है। सौंदर्यानुभूति और सत्कर्मों की ओर से चलकर और ईर्ष्या द्वेष, मद मत्सर, लोभ, क्रोध आदि दूषणों को छोड़ते हुए आत्मा स्वरूप की ओर सरलतापूर्वक पहुँचा जा सकता है।
हम सब परमपिता परमात्मा, उस सर्वव्यापक और सर्वशक्तिमान तत्व उस आदि एवं अंतिम स्त्रोत से निकली इकाइयाँ है, जिनका वास्तविक स्वरूप वही एक प्रभु एवं विभु है, अपने उस स्वरूप को पहचाने और तद्रूप होकर उसी स्वरूप को प्राप्त करें।
इंग्लैण्ड के लंकाशावर अथर में एक ऐसा गिरजाघर बनाने की बात सोची गई, जो विश्व में अद्वितीय हो। नगरपालिका के मेयर ने उसके लिये यथेष्ट धन दिया और गिरजाघर बनने लगा बहुत सुन्दर गिरजाघर बनकर तैयार हो गया। दर्शक वाह वाह कर उठते थे। दूर दूर से भक्त गण दर्शनार्थ आने लगे। एक दिन नगरपालिका की बैठक बुलाई गई। वह प्रमाणित करना था कि गिरजाघर विश्व के सब गिरजाघरों से भव्य और सुन्दर है। सभा प्रारम्भ हुई, एक सदस्य ने उसे अनावश्यक लम्बा बताया। दूसरे ने चौड़ाई की टीका की। किसी ने कहा गिरजाघर पूर्वी शैली पर होता तो और सुन्दर होता।
बहस बराबर चलती रही पर कोई सर्वसम्मत निष्कर्ष नहीं निकला। एक दिन मेयर वहाँ पहुँचे और बोले-आप लोग इतने महीनों से वाद विवाद में लगे हो, समय बरबाद करते हो। तुमसे अच्छे तो यह भक्त ही है, जो जितना है उतने का ही आनन्द लूट रहे है।
कहते है इस गिरजाघर का यह विवाद अभी तक भी समाप्त नहीं हुआ है।
पुनर्जन्म की सैकड़ों घटनायें आयें दिन आती रहती है। भारतवर्ष में तो उनकी बहुतायत है पर इस्लाम और ईसाई धर्मावलम्बी देशों में भी पुनर्जन्म की अनेक घटनायें घटी तो पाश्चात्य वैज्ञानिकों को यह सोचने के लिए विवश होना पड़ा कि क्या आत्मा का कोई अस्तित्व भी है। भारतवर्ष में ही उसकी व्यापक खोज की जा रही है, किन्तु अभी लोगों की मान्यताएँ स्पष्ट नहीं हुई।
परामनोविज्ञानी पुनर्जन्म की घटनाओं को पदार्थ का रूपान्तर मानता है। उनके अनुसार शरीर में जो जीन्स होते है, उनमें स्मृतियाँ विद्यमान् रहती है। मरने के बाद शरीर नष्ट हो जाता है पर जीन्स नहीं होते। उनका रूपान्तर होता है। राख बन जाते है। राख मिट्टी में मिल जाती है, मिट्टी से वही जीन्स किसी वृक्ष में चले जाते है, वृक्ष के पत्ते फल या दानों में वही जीन्स पहुँच जाते है। फल कोई मनुष्य खा लेता है और जीन्स वीर्य में परिवर्तित हो जाते है फिर उससे किसी बालक का जन्म होता है। बालक के स्मृति पटल (सेरोबोलम) में पहुँचकर वही जीन्स जब जागृत हो उठता है तो संयोग वश यदाकदा उसे वह घटनायें भी याद हो आती है, जो पूर्व जन्म के शरीर में थीं। इस तरह परामनो-विज्ञान की मान्यता यह है कि पुनर्जन्म जीन्स का होता है, आत्मा नामक कोई स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। इस तरह पुनर्जन्म के सिद्धान्त को पाश्चात्य अनुसंधान केन्द्रों ने काट दिया और उसके द्वारा आत्मा के अस्तित्व को मानने के इनकार कर दिया।
भारतीय दर्शन आत्मा के अस्तित्व को स्वीकार करता है। हमारा उपनिषदकार कहता है-
अंगुष्ठ मात्रः पुरुषो मध्य आत्मनि तिष्ठति। ईशानो भूतभव्यस्य न ततो विजुगुप्सते॥
एतर्द्व तत्।
अगुड मात्रः पुरुषो ज्योतिरिवा यूमकः। ईशानो भूतमध्यस्य स एचाद्य स उक्ष्यः॥
-कठोपनिषद् द्वितीय अध्याय
प्रथम बल्ली, 12।13
अर्थात्-यह आत्मा ही वह परमेश्वर है, जिसे जान लेने पर मनुष्य किसी की निन्दा नहीं करता। वह परम पुरुष अंगुष्ठ मात्र देह में स्थित होकर भूत भविष्यत् आदिकाल में सब पर शासन करता है। यही वह परमेश्वर है, जो आज भी है, कल भी रहेगा। वह अमुख प्रमाण परिणाम वाला पुरुष निर्धूम ज्योति (अत्यन्त उज्ज्वल प्रकाश) के समान है एवं भूत, भविष्यत् सब कालों पर शासन करता है।
यदि ऐसी विराट्-शक्ति में स्थित है तो उसकी अनुभूति क्यों नहीं होती? उकसा कारण इसी उपनिषद् के प्रथम अध्याय की तीसरी बल्ली में इस प्रकार बताया गया हैं-
एथ सर्वेसु गूढोत्मा प्रकाशते। दृश्यते त्वग्रया बुद्धया सूक्ष्मया सूक्ष्मदशिनि॥
-तीसरी बल्ली, 12,
ड़ड़डड़ ड़ड़ड़ड़ड़ ड़ड़ड़डत्र
ड़ड़ड़़ड़ ड़डड़ड़ ड़़ड़ड़ड़ डड़ड़ड़
-तीसरी वल्ली,7,
अर्थात्-परमात्मा सभी में आत्मा के रूप में देहधारियों में निवास करता हुआ भी अपनी माया से आच्छादित रहने के कारण प्रकट नहीं होता। केवल सूक्ष्म दर्शियों को ही सूक्ष्म बुद्धि द्वारा दर्शन देता है। अविवेकी बुद्धि और असंयत मन वाला अपवित्र हृदय मनुष्य जन्म मृत्यु के चक्र में घूमता रहता है और परमपद को कभी प्राप्त नहीं कर सकता।
अब इस दृष्टि से जब विचार करते है और पुनर्जन्म की घटनाओं की विवाद-ग्रस्त पाते है तो आत्मा के अस्तित्व के प्रमाण के लिए अन्य सूत्रों की खोज करनी पड़ी। इन सूत्रों को दो भागों में बाँटते है-(1) आत्मा की जानकारी सम्बन्धी वैज्ञानिकों की खोजें और उनके निष्कर्ष, (2) भूत और प्रेत का अस्तित्व। इन दोनों स्थितियों के कुछ ऐसे तथ्य सामने आये है, जिनसे आत्मा के सम्बन्ध में कहे गये, कठोपनिषद् के कथन नितान्त सत्य साबित होते है।
इंग्लैण्ड की राजधानी लन्दन के प्रख्यात सेट जेम्स अस्पताल के डाक्टर डब्ल्यू. जे. किन्नर को एक बार आत्मा के अस्तित्व को जानने की तीव्र जिज्ञासा पैदा हुई। यह जिज्ञासा एक आकस्मिक घटना के कारण हुई। एक दिन जब वे अस्पताल में रोगियों का परीक्षण कर रहे थे तो खुर्दबीन पर एक विशेष प्रकार की रंग जम गया। वह विशेष रासायनिक रंग था, जो इतना दुर्लभ था कि सेंट जेम्स तो दूर शायद इंग्लैण्ड की किसी भी प्रयोग शाला में उसका उपलब्ध होना कठिन था। वह रंग कहाँ से आया इस पर बहुत खोज की पर उस सम्बन्ध में कुछ भी ज्ञात नहीं हो सका।
दूसरे दिन वे अपने एक रोगी के कपड़े उतरवा कर खुर्दबीन से उसके शरीर की जाँच कर रहे थे तो वह यह देखकर स्तब्ध रह गये कि उसी रासायनिक रग की लहरे शीशे के सामने उड़ रही हैं। कपड़े बिलकुल हटा देने पर उन्होंने पाया कि रोगी के छः-सात इंच की परिधि में वही प्रकाश एक मंडल बनाये हुए स्थित है। यह देखकर वे इतना डर गये कि उनकी अंगुलियाँ काँपने लगी। उन्होंने बहुत जाँच की पर उस प्रकाश को शरीर की किसी अवस्था का परिणाम नहीं पाया। तभी एक और विचित्र घटना हुई। उन्होंने देखा जब यह प्रकाश कुछ तीव्र रहा तब तक रोगी चेतना की सी स्थिति में रहा पर जैसे ही प्रकाश मन्द पड़ना प्रारम्भ हुआ कि रोगी का शरीर भी शिथिल पड़ने लगा। डा. किल्नर बराबर रोगी पर दृष्टि रख रहे थे। वह मरणासन्न था, धीरे धीरे वह प्रकाश न जाने कहाँ विलुप्त हो गया और इसके बाद जब उन्होंने उसकी नाड़ी परीक्षा की तो उसे पूर्ण रूप से मृत पाया। सारा शरीर ठण्डा पड़ चुका था और वहाँ किसी भी प्रकार का रासायनिक रंग शेष नहीं रह गया था।
इस घटना की रिपोर्ट छपी तो सैकड़ों लोग आश्चर्य चकित रह गये। डा. किल्नर ने बाद में दि ह्यूमन एटमाल्फियर नामक पुस्तक लिखी। उसमें उन्होंने वर्तमान भौतिक विज्ञान को चुनौती देने वाले तथ्य प्रस्तुत किये है और यह बताया है कि पश्चिम की यह बड़ी भारी भूल है कि वह जीवन जैसी अमूल्य और वास्तविक वस्तु की खोज करने की अपेक्षा जड़ वस्तुओं के चक्कर में पड़ा अपना अहित कर रहा है। अमेरिका के विलियन मैक्डूगल का ध्यान भी इस ओर आकर्षित हुआ और उन्होंने भी आत्मा के अस्तित्व को जानने के लिए प्रयोग प्रारम्भ कर दिये उन्होंने रोगियों का वजन लेने के लिए एक ग्राम से भी सैकड़ों अंश कम भार को भी तौल सके। एक बार एक मरणासन्न रोगी को उसमें लिटाकर वजन लिया। उसके फेफड़ों में कितनी साँस रहती है, उसका तौल पहले ले लिया। कपड़ों सहित पलंग का वजन भी तैयार था। रोगी को जो भी औषधि दी गई, उसका तौल तराजू की सुई बराबर बताती रहती थी।
जब तक रोगी जीवित रहा तब तक वह सुई बराबर एक स्थान पर टिकी रही पर जिस क्षण उसके प्राण निकले सुई पीछे हटकर टिक गयी और जब अंक पड़े गये तो वह यह देखा गया कि 1 ओस (आधी छटाँक) वजन कम हो गया है। बाद में भी उन्होंने जितने भी मरणासन्न रोगियों पर यह प्रयोग किया, चौथाई औसत से लेकर डेढ़ औसत तक वजन कम पाया। उन्होंने इस सिद्धान्त की पुष्टि की कि शरीर में कोई अत्यन्त सूक्ष्म तत्व निश्चित रूप से है, वह जीवन का आधार है, उसकी तौल भी उन्होंने उपरोक्त प्रकार के परीक्षणों से प्राप्त की। लाँस एन्जिल्स के प्रोफेसर टवाहनिंग और कार्नल विश्व विद्यालय के डा. ओटो रान ने भी ऐसे प्रयोग किया 1936 में डा. रान ने अपने प्रयोगों के आधार पर लिखा कि इसमें सन्देह नहीं है कि प्रत्येक जीवित मनुष्य के चारों ओर कुछ रहस्य मय किरणों का आवरण रहता है पर वे मृत्यु के उपरान्त लुप्त हो जाती है। विज्ञान जब तक इन अतिसूक्ष्म प्रकाश कणों को नहीं जान पाता, तब तक वह अधूरा और भ्रामक ही रहेगा, क्योंकि जीवन का आधार इन सूक्ष्म किरणों में सन्निहित है और उसके विकास एवं अनुभूति की प्रणाली भिन्न है।
डा. गेट्स ने एक नई किरणों की खोज की है और उनसे आत्मा के अस्तित्व का पता लगाया है। इन किरणों का रंग कुछ कालापन लिये हुये लाल है, ये कुछ कुछ बनफशई रंग की कही जा सकती है पर इस रंग से इनका रंग कुछ गहरा होता है। ‘एक्स रेज’ जिस रंग की होती है, यह भी उनसे कुछ कुछ मिलती जुलती सी है, किन्तु कई बातों में इनका एक्सरेज से बिलकुल सम्बन्ध नहीं है। इनमें जो देदीप्यमान शक्ति रहती है वह अँधेरे में नहीं दिख पड़ती, उनके प्रकाश को मनुष्य आँख से नहीं देख सकता। किन्तु उन्होंने कमरे की दीवारों में रोडापसिन नामक एक पदार्थ का लेप किया तो देख कि इन किरणों के प्रभाव से उसका रंग बदल जाता है। इन किरणों में इतनी जबर्दस्त पारदर्शिता देखी गई कि वे हड्डी, धातु, लकड़ी और पत्थर को भी पार करके चमकने लगती है, यदि इन किरणों को दीवार में डाला जाय और बीच में कोई मनुष्य आ जायें तो उन्होंने देखा कि उसकी छाया स्पष्ट दिखाई देने लगती है। तात्पर्य यह है कि यह किरणों जीवित प्राणी के शरीर का भेद नहीं कर सकती है। यह प्रकाश किरणों डाक्टर गेट्स ने तुरन्त मरे हुए जानवरों की आँखों से इसे प्राप्त किया है उन्होंने जीवित चूहे को गिलास में डालकर इन किरणों का अध्ययन किया पर सबसे ज्यादा पर उसकी छाया पड़ी। जब तक चूहा जीवित रहा छाया बराबर बनी रही पर जैसे ही चूहे के प्राण निकल गये, उसका शरीर भी इन किरणों के लिए पारदर्शी हो गया। ठीक उसी क्षण एक छाया नली के भीतर जिसमें चूहा रखा गया था निकली और मसाला लगी हुई दीवाल की तरफ जाकर कुछ दूर ऊपर लोप हो गई। परीक्षा के समय यह दृश्य दो और अध्यापक भी देखते रहे, उन्होंने इस छाया को दीवार पर ऊपर नीचे जाते हुए अच्छी तरह देखा। अब गेट्स इस प्रयत्न में है कि यह पता लगाया जाय कि जब यह छाया शरीर से निकलकर कहीं लोप हो जाती है, उस समय वह ज्ञान अवस्था में रहती है या नहीं इस सम्बन्ध में यदि कुछ वैज्ञानिक हल निकल सका तो आत्मा के सूक्ष्म अस्तित्व की और अधिक पुष्टि की जा सकेगी। भूत प्रेतों की लीलाएँ वास्तव में इसी तथ्य की पुष्टि करती है, इसका विवरण आगे देंगे
यहाँ यह प्रश्न उठता है कि चूहा जीवित अवस्था में पारदर्शी क्यों नहीं होता। मृत्यु के उपरान्त ही क्यों होता है। डा. गेट्स ने इसका उत्तर देने के लिए गेल्वेनोमीटर (विद्युत्मापक यंत्र) से किसी व्यक्ति के शरीर में संचालित विद्युत तरंगों की शक्ति का मापा और इसके बाद उन किरणों की शक्ति को। शारीरिक बिजली की शक्ति अधिक थी। अब गेट्स ने बताया कि जिस संयम मनुष्य विचार करता है और उसकी नाड़ी और मज्जा तंतु काम करते रहते है, तब तक शरीर में विद्युत प्रवाह बना रहता है। इस प्रवाह की शक्ति अधिक होने के कारण जब यह किरणों उनके पास पहुँचती है तो पीछे धकेल दी जाती है पर जब प्राण विद्युत निकल जाती है तो उनके लिये कोई बाधा नहीं रह जाती। उन्होंने शरीर की इस विद्युत शक्ति को ही आत्मा की प्रकाश शक्ति माना है इस तथ्य से भी बिलकुल इनकार नहीं किया जा सकता।
आत्मा को तौलने और उसे विकिरण से सिद्ध करने की तरह ही उसके फोटो लेने के लिए भी प्रयत्न किये गये है। फ्राँस के डाक्टर हेनरी बारादुक ने एक विशेष कैमरा बनवाया और मृत्यु की फोटो लेने की तैयार की। संयोग से एक बार उनका लड़का बहुत तेजी से ज्वरग्रस्त हुआ। उसके बचने के कोई लक्षण दिखाई न दिये तो इस वैज्ञानिक ने परीक्षण करने की ही बात ठानी ऐसे ही प्रयोग उसने अपनी मरणासन्न पत्नी पर भी किया और एक प्रकार की प्रकाश किरणों की पुष्टि की पर उसके कठोर स्वभाव के कारण फ्राँसीसी ने उसकी उपेक्षा कर दी और उसका सारा उत्साह वही ठण्डा पड़ गया। कैलीफोर्निया के दूसरे डा. एफ. एम. स्ट्रॉ ने तो इस प्रकार एक सार्वजनिक प्रदर्शन ही किया था, जिसमें अख़बार के प्रतिनिधियों ने साधारण कैमरों से कुछ रहस्यमय किरणों के के चित्र प्राप्त किये। सब वैज्ञानिकों ने यह माना कि मनुष्य शरीर में कोई चैतन्य तत्व, कुछ रहस्यमय किरणें, कोई विलक्षण तत्व और प्रकाश है अवश्य पर उसका रहस्य वे नहीं जान पाये।
सभी का प्रयत्न रहता है कि उनका जीवन सुखी और समृद्ध बने। इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए लोग पुरुषार्थ करते, धन सम्पत्ति कमाते, परिवार बसाते और आध्यात्मिक साधना करते है। किन्तु क्या पुरुषार्थ करने, धन दौलत कमाने, परिवार बसाने और धर्म कर्म करने मात्र से लोग सुख शाँति के पाने उद्देश्य में सफल हो जाने है। सम्भव है इस प्रकार प्रयत्न करने से कई लोग सुख शांति की उपलब्धि कर लेते है, किन्तु बहुतायत में तो यही दिखता है कि धन सम्पत्ति और परिवार परिजन के होते हुए भी लोग दुःखी और त्रस्त दिखते है। धर्म कर्म करते हुए भी असंतुष्ट और अशाँत है।
सुख शाँति के लिए धन दौलत अथवा परिवार परिजन की उतनी आवश्यकता नहीं है जितनी आवश्यकता सुविचारों की होती है। वास्तविक सुख शाँति पाने के लिये विचार साधना की ओर उन्मुख होना होगा। सुख शाँति न तो संसार की किसी वस्तु में है और न व्यक्ति में उसका निवास मनुष्य के अन्तःकरण में है। जो कि विचार रूप से उसमें स्थित रहता है। सुख शाँति और कुछ नहीं, वस्तुतः मनुष्य के अपने विचारों की एक स्थिति है। जो व्यक्ति साधना द्वारा विचारों को उस स्थिति में रख सकता है, वही वास्तविक सुख शाँति का अधिकारी बन सकता है। अन्यथा, विचार साधना से रहित धन दौलत से शिर मारते और मेरा तेरा, इसका उसका करते हुए एक झूठे सुख, मिथ्या शाँति के मायाजाल में लोग यो ही भटकते हुए जीवन बिता रहे है और आगे भी बिताते रहेंगे
वास्तविक सुख शाँति पान के लिए विचारों की साधना करनी होगी। सामान्य लोगों की अपेक्षा दार्शनिक, विचारक, विद्वान्, सन्त और कलाकार लोग अधिक निर्धन और अभाव ग्रस्त होते है तथापि उनकी अपेक्षा कही अधिक संतुष्ट, सुखी और शाँत देखे जाते है। इसका एक मात्र कारण यही है कि सामान्य जन सुख शाँति के लिए जहाँ लौकिक अथवा भौतिक साधना में निरत रहते है, वहाँ वे व्यक्ति विशेष मानसिक साधना अथवा वैचारिक साधना के अभ्यासी होते है। उपरोक्त व्यक्ति विशेष अपनी सफलता के लिए जिस साधना में लग होते है, उसके लिए मनःशक्ति और बौद्धिक संतुलन की बहुत आवश्यकता होती है। वैभव और विभव उपार्जित करने की लिप्सा में वे लोग विचार संतुलन का महत्व नहीं भूलते और निर्धनता के मूल्य पर भी मिलने वाले मानसिक संतुलन का त्याग नहीं करते। यही कारण है कि वे लोग अन्य सामान्य जनों की अपेक्षा अधिक शान्त और संतुष्ट दिखलाई देते है।
विचार साधना का सफल विशेष लोगों के लिए ही अपवाद नहीं उसका सुफल हर वह जनसाधारण भी पा सकता है, जो उचित रूप से विचार साधना में निरत होता है। भारत में जीवन विकास करने और स्थायी सुख शाँति पाने के लिए मंत्र जाप पर बहुत बल दिया जाता था। आज भी आध्यात्मिक लोग पहले की ही तरह आत्म शाँति के लिए मंत्रों का जाप तथा अनुष्ठान करते रहते है। यज्ञ, अनुष्ठान, जप तथा पूजा पाठ और कुछ नहीं विचार साधना का ही एक प्रकार है। यज्ञ और जाप यद्यपि मानव जीवन का एक अनिवार्य नियम है, जिसका प्रायः लोग पालन करते है, जो लोग नहीं करते वे अपने एक मानवीय कर्तव्य से विमुख होते है, तथापि संकट और आपत्ति का शमन करने और उसके स्थान पर सुख शाँति की सामान्य स्थिति लाने के लिए लोग विशेष अनुष्ठानों का आयोजन करते है। यज्ञो और जपो के माध्यम से विचारों की साधना करते है।
वेद क्या है? कल्याणकारी मंत्रों के भण्डार। मंत्र क्या है? ऋषि मुनियों के अनुभूत तथा परिपक्व विचारों का शब्दशः सार! यज्ञ और जाप, अनुष्ठान क्या है, उन्हीं आप्त पुरुषों के कल्याणकारी विचारों की साधना। यह विचार साधना का ही फल था कि प्राचीन आप्त पुरुष त्रिकालदर्शी और जनसाधारण सुख शाँति के अधिकारी होते थे। सुख शाँति के अन्य उपायों का निषेध न करते हुए भारतीय ऋषि मुनि अपने समाज को धर्म का अवलम्बन लेने के लिए विशेष निर्देशन किया करते थे। जनता की इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए उन्होंने जिन वेदों, पुराणों, शास्त्रों, उपनिषदों आदिक धर्म ग्रन्थों का प्रणयन किया है, उनमें मंत्रों, तर्कों, सूत्रों व शक्तियों द्वारा विचार साधना का ही पथ प्रशस्त किया है।
मंत्रों का निरन्तर जाप करने से साधक के पुराने कुसंस्कार नष्ट होते है और उनका स्थान नये कल्याणकारी संस्कार लेने लगते है। संस्कारों के आधार पर अन्तःकरण का निर्माण होता है। अन्तः करण के उच्च स्थिति में आते ही सुख शाँति के सारे कोष खुल जाते है। जीवन में जिनका प्रत्यक्ष अनुभव होने लगता है। मंत्र वास्तव में अन्तः करण को उच्च स्थिति में लाने के गुप्त मनोवैज्ञानिक प्रयोग है। जैसा कि पूर्व प्रकरण में कहा जा चुका है कि न तो सुख शाँति का निवास किसी वस्तु अथवा व्यक्ति में है और न स्वयं ही उनकी कोई स्थिति है। वह वास्तव में मनुष्य के अपने विचारों को ही एक स्थिति है। सुख दुःख उन्नति, अवनति का आधार मनुष्य की सुख अथवा अशुभ मनः स्थिति ही है। जिसकी रचना तदनुरूप विचार साधना से ही होती है।
शुभ और दृढ़ विचार मन में धारण करने से, उनका चिन्तन और मनन करते रहने से मनोदशा में सात्विक भाव की वृद्धि होती है। मनुष्य का आचरण उदात्त तथा उन्नत होता है। मानसिक शक्ति का विकास होता है, गुणों की प्राप्ति होती है। जिसका आचरण उन्नत है, जिसका मन दृढ़ और बलिष्ठ है, जिसमें गुणों का भण्डार भरा है, उसको सुख शाँति के अधिकार से संसार में कौन वंचित कर सकता है। भारतीय मंत्रों का अभिमत दाता होने का रहस्य वही है कि बार बार जपने से उनमें निवास करने वाला दिव्य विचारों का सार मनुष्य के अन्तःकरण में भरा है, उसको सुख शाँति के अधिकार से संसार में कौन वंचित कर सकता है। भारतीय मंत्रों का अभिमत दाता होने का रहस्य यही है कि बार बार जपने से उतने निवास करने वाला दिव्य विचारों का सार मनुष्य के अन्तःकरण में भर जाता है, जो बीज की तरह वृद्धि पाकर मनोवाँछित फल उत्पन्न कर देते है।
प्राचीन भारतीयों की आयु औसतन सौ वर्ष की होती थी। जो व्यक्ति संयोगवश सामान्य जीवन में सौ वर्ष से कम जीता था, उसे अल्पायु का दोषी माना जाता था, उसकी मृत्यु को अकाल मृत्यु कहा जाता था। इस सतयुग का रहस्य जहाँ उनका सात्विक तथा सौम्य रहन सहन, आचार विचार और आहार विहार होता था, उसे अल्पायु का दोषी माना जाता था, उसकी मृत्यु का रहस्य जहाँ उनका सात्विक तथा सौम्य रहन सहन, आचार विचार और आहार विहार होता था, वहाँ सबसे बड़ा रहस्य उनकी तत्सम्बन्धी विचार साधना रहा है। वे वेदों में दिए-प्रववाम शरद शतम्। अदीन स्याम शरदः शतम्। जैसे अनेक मंत्रों का जाप किया करते थे। यह मंत्र जाप आयु सम्बन्धी विचार साधना के सिवाय और क्या होता था, गायत्री मंत्र की साधना का भी रहस्य है।
इस महामंत्र का जाप करने वालों को बहुधा ही तेजस्वी, समृद्धिशाली तथा ज्ञानवान क्यों देखा जाता है? इसीलिये कि इन मंत्र के माध्यम से सविता देव की उपासना के साथ सुख, समृद्धि तथा ज्ञान परक विचारों की साधना की जाती है। मनुष्य जीवन में जो कुछ पाता या खोता है, उसका हेतु मान भले ही किन्हीं और कारणों को लिया आये, किन्तु उसका वास्तविक कारण मनुष्य के अपने विचार ही होते है, जिन्हें धारण कर वह जान अथवा अनजान दशा में प्रत्यक्ष से लेकर गुप्त मन तक चिन्तन तथा मनन करता रहता है।
विचार साधना मानव-जीवन की सर्वश्रेष्ठ साधना है। इसके समान सरल तथा सच्च फलदायिनी साधना दूसरी नहीं है। मनुष्य जो कुछ पाना अथवा बनाना चाहता है, उसके अनुरूप विचार धारण कर उनकी साधना करते रहने से वह मन्तव्य में निश्चय ही सफल हो जाता है। यदि किसी में स्वावलम्बन की कमी है और वह स्वावलम्बी बनकर आत्म निर्भरता की सुखद स्थिति पाना चाहता है तो उसे चाहिये कि वह तदनुरूप विचारों की साधना करने के लिये, इस प्रकार का चिन्तन तथा मनन करे, मुझे परमात्मा ने अनन्त शक्ति दी है, मुझे किसी दूसरे पर निर्भर रहने की आवश्यकता नहीं है। परमुखापेक्षी रहना मानवीय व्यक्तित्व के अनुरूप नहीं परावलम्बी होना कोई विवशता नहीं है। वह तो मनुष्य की एक दुर्बल वृत्ति ही है। मैं अपनी इस दुर्बल वृत्ति का त्याग कर दूँगा और स्वयं अपने परिश्रम तथा उद्योग द्वारा और स्वयं अपने परिश्रम तथा उद्योग द्वारा अपने मनोरथ सफल करूँगा परावलम्बी व्यक्ति पराधीन रहता है और पराधीन व्यक्ति संसार में कभी सुख और शाँति नहीं पा सकता, मैं साधना द्वारा अपनी आन्तरिक शक्तियों का उद्घाटन करूँगा, शारीरिक शक्ति का उपयोग करूँगा और इस प्रकार स्वावलम्बी बनकर अपने लिये सुख शाँति की स्थिति स्वयं अर्जित करूँगा निश्चय ही इस प्रकार के अनुकूल विचारों की साधना से मनुष्य की परावलम्बन की दुर्बलता दूर होने लगेगी और उसके स्थान पर स्वावलम्बन का सुखदायी भाव बढ़ने और दृढ़ होने लगेगा।
मनोवैज्ञानिकों तथा चिकित्सा शास्त्रियों का कहना है कि आज रोगियों की बड़ी संख्या में ऐसे लोग बहुत कम होते है, जो वास्तव में किसी रोगी से पीड़ित हो। अन्यथा बहुतायत ऐसे ही रोगियों की होती है, जो किसी न किसी काल्पनिक रोग के शिकार होते है। आरोग्य का विचारों से बहुत बड़ा सम्बन्ध होता है। जो व्यक्ति अपने प्रति रोगी होने, निर्बल और असमर्थ होने का भाव रखते है। और सोचते रहते है कि उनका स्वास्थ्य अच्छा नहीं रहता। उन्हें आँख, नाक, कान पेट, पीठ का कोई न कोई रोग लगा ही रहता है। बहुत कुछ उपाय करने पर भी वे पूरी तरह स्वस्थ नहीं रह पाते, ऐसे अशिव विचारों को धारण करने वाले वास्तव में कभी भी स्वस्थ नहीं रह पाते। यदि उनको कोई रोग नहीं भी होता है तो भी उनकी इस अशिव विचार साधन के फलस्वरूप कोई न कोई रोग उत्पन्न हो जाता है और वे वास्तव में रोगी बन जाते है।
इसके विपरीत जो स्वास्थ्य सम्बन्धी सदाचार की साधना करते है, वे रोगी होने पर भी शीघ्र चंगे हो जाया करते है। जो रोगी इस प्रकार सोचने के अभ्यस्त होते है, वे एक बार उपचार के अभाव में भी स्वास्थ्य लाभ कर लेते है-मेरा रोग साधारण है, रोग उपचार लाभ कर लेते है-रोग साधारण है, मेरा उपचार ठीक-ठीक पर्याप्त ढंग से हो रहा है, दिन दिन मेरा रोग घटता जाता है और मैं अपने अन्दर एक स्फूर्ति, चेतना और आरोग्य की तरंग अनुभव करता हूँ। मेरे पूरी तरह स्वस्थ हो जाने म अब ज्यादा देर नहीं है। इसी प्रकार जो निरोग व्यक्ति भूल कर भी रोगों की शंका नहीं करता और अपने स्वास्थ्य से प्रसन्न रहता है। जो कुछ खाने को मिलता है, खाता और ईश्वर को धन्यवाद देता है, वह न केवल आजीवन निरोग ही रहता है, बल्कि दिन दिन उसकी शक्ति और सामर्थ्य भी बढ़ती जाती है।
जीवन की उन्नति और विकास के सम्बन्ध में भी यही बात लागू होती है। जो व्यक्ति दिन रात यही सोचता रहता है कि उसके पास साधनों का अभाव है। सोचता रहता है कि उसके पास साधनों का अभाव है। उसकी शक्ति सामर्थ्य और योग्यता कम है, उसे अपने पर विश्वास नहीं है। संसार में उसका साथ देने वाला कोई नहीं है। विपरीत परिस्थितियाँ सदैव ही उसे घेरे रहती है। वह निराशावादी व्यक्ति जीवन में जरा भी उन्नति नहीं कर सकता, फिर चाहे उसे कुबेर का कोष ही क्यों न दे दिया जाय और संसार के सारे अवसर ही क्यों न उसके लिये सुरक्षित कर दिये जाये।
इसके विपरीत जो आत्म विश्वास, उत्साह, साहस और पुरुषार्थ भावना से भरे विचार रखता है। सोचता है कि उसकी शक्ति सब कुछ कर सकने में समर्थ है। उसकी योग्यता इस योग्य है कि वह अपने लायक हर काम कर सकता है। उसमें परिश्रम और पुरुषार्थ के प्रति लगन है। उसे संसार में किसी की सहायता के लिए बैठे नहीं रहना है। वह स्वं ही अपना मार्ग बनाएगा और स्वयं ही अपने आधार पर उस पर अग्रसर होगा-ऐसा आत्म विश्वासी और आशावादी व्यक्ति अभाव और प्रतिकूलताओं में भी आगे बड़ जाता है।
मुख शाँति का अपना कोई अस्तित्व नहीं यह मनुष्य के विचारों की ही एक स्थिति होती है। यदि अपने अन्तः करण में उल्लास, उत्साह, प्रसन्नता एवं आनन्द अनुभव की अनुभूति की हठात् उपेक्षा दूर की जाय तो कोई कारण नहीं कि मनुष्य सुख शाँति के लिए लालायित बना रहे। मैं आनन्द रूप परमात्मा का अंश हूँ, मेरा सच्चा स्वरूप आनन्दमय ही है, मेरी आत्मा में आनन्द के कोष भरे है, मुझे संसार की किसी वस्तु का आनन्द अपेक्षित नहीं है। जो आनन्दपूर्ण, आनन्दमय और आनन्द का उद्गम आत्मा है, उससे दुःख, शोक अथवा ताप संताप का क्या सम्बन्ध? किन्तु यह सम्भव तभी है, जब तदनुरूप विचारों की साधना में निरत रहा जाय।
रोम के शासक जूलियस सीजर एक बार समुद्री-यात्रा कर रहे थे कुछ समुद्री लुटेरों ने आक्रमण कर दिया और उसे कैद करके होडस द्वीप में बन्दी कर दिया, फिर सीजर के सम्बन्धियों की धन भेजने का सन्देश भेज दिया। प्लूटार्च लिखते हैं कि सीजर यद्यपि डाकुओं का बन्दी था पर वहाँ भी वह एक सम्राट की तरह ही रोबदार में रहता था। जिस किसी डाकू को वह डाट देता था, वह सुन्न रह जाता था। सब उसकी आज्ञा का पालन करते थे वह उन्हें धमकाता भी था और कहता था कि जब यहाँ से चला जाऊँगा तो तुम सबकी फाँसी के तख्त पर लटका दूँगा पर कोई डाकू चूँ तक नहीं करता था। छुट कारा पाकर उसने वैसा किया भी पर यहाँ उसके आत्मतेज की महत्ता थी, जो वह गिरफ्तार होकर भी डाकुओं पर शासन करता रहा।
वशिष्ठ अपने आश्रम में थे तब विश्वामित्र राजा थे। एक बार अपने सैनिकों सहित वे कोई प्रान्त विजय कर लौट रहे थे। कहते है उस समय महर्षि वशिष्ठ ने योगबल से सम्पूर्ण सेना सहित विश्वामित्र का स्वागत और भोज किया। विश्वामित्र बहुत प्रभावित हुए और वशिष्ठ से वह विद्या पूछी पर जब उन्होंने विशिष्ट पर आक्रमण कर दिया पर उतनी सेना और शस्त्र भी वशिष्ठ का बाल बाँका न कर सके। परास्त हुए विश्वामित्र ने स्वीकार किया, जो असंख्य स्वस्थ शरीरों की सम्मिलित शक्ति से भी बढ़कर शक्ति है, वह आत्मतेज है। आत्म शक्ति के आगे शरीर या शस्त्र शक्ति तक निरर्थक और निरुपाय है।
भगवान् बुद्ध के तेज आविर्भूत हुए खूँखार अंगुलिमाल डाकू को जिसको मनुष्य काटने और छोटे छोटे पक्षियों को काट डालने में कोई अन्तर न जान पड़ता था, अपनी तलवार फेंकती पड़ी और तथागत के पैरों में गिरना पड़ा, उसे चमत्कार कहा जा सकता है पर यह सब आत्म तेज का प्रभाव था, जिसकी शक्ति के आगे अजगर चूहा शेर बकरी और भेड़िया भेड़ बन जाता है। उस तेज की शक्ति और सामर्थ्य का कोई पारापार नहीं
विधिवत् आत्म ज्ञाता न होने और उसकी एक स्खलित मात्र प्राप्त कर लेने वाले नैपोलियन की जीवट और साहस को भी वैसे ही चमत्कार की संज्ञा दी जा सकती है। नैपोलियन कैद से छूटकर भागा उस समय बोर्बान सेनाएँ सतर्क कर दी गई। सेनापतियों को आदेश दे दिया गया कि नैपोलियन उधर आये तो उसे गोली मार दी जाये पर हुआ कुछ और ही। नैपोलियन उधर ही गया, जहाँ सन्नद्ध सेना राइफलें ‘लोड’ किये खड़ी थी पर उसके आगे किसी को भी घोड़ा दबाने का साहस नहीं हुआ। सारी सेना फिर नैपोलियन के सेनापतियों में आ गई है।
एथेन्स के वियेडोज ने एक बार शर्त लगाकर नगर के प्रतिष्ठित व्यक्ति हिप्पेनिकोस को सबके सामने थप्पड़ लगा दिया और दूसरे ही दिन उसने उसे इतना प्रसन्न कर लिया कि हिप्पेनिकोस ने अपनी पुत्री का विवाह ही उसके साथ कर दिया। वियेडोज के बारे में कहा जाता है कि उसके पास इतनी प्रबल आत्म शक्ति थी कि दुश्मन को एक मिनट में मित्र बना सकता था।
लिंकोलन के राजा रिचर्ड नारमंडी का युद्ध लड़ रहे थे और सेना भेजने के लिए उसने विशेष ह्यूजो को आदेश भेजा, किन्तु मारकाट से द्रवीभूत राजपुरोहित ने मारकाट की और न बढ़ने के लिए कुमुक भेजने से इनकार कर दिया। रिचर्ड की आज्ञा भंग करना कोई हँसी खेल न था पर राजपुरोहित ह्यगो बिना किसी भय के उसके पास अकेला गया, राजा उस समय भोजन कर रहे थे। उन्होंने मुँह फेर लिया पर विशेष न कड़ककर कहा-मेरा अभिवादन करो। राजा चुप रहा, इस पर उसने राजा को ओर से झकझोर डाला और तब रिचर्ड नर्म पड़ गया। जब उसने अभिवादन कर लिया तभी अगले परामर्श का क्रम चला। लोग हैरान थे कि विशेष ऐसा क्या मंत्र जानता है, जो अपराधी होकर भी सम्राट् की तरह शासन करता है। इसका उत्तर स्वयं रिचर्ड ने इस प्रकार दिया-उसके मुख पर एक अलौकिक तेज टपकता है। उसकी कान्ति कुछ ऐसी चित्ताकर्षक, ऐसी शक्तिशाली है कि आँखों से मिलाने वाला व्यक्ति अपने आप पराभव हो जाता है।
बलटोहा (लाहौर) स्टेशन के पास फतेहसिंह नामक जाट की भी ऐसी घटनायें सुनने में आती है। कहते है, उसके गाँव में एक बलिष्ठ भैंसा बड़ा उत्पाती था। एक दिन वह फतेहसिंह के खेत में भी घुस गया और उसके पिता को पछाड़ कर बाहर फेंक दिया। फतेहसिंह को उसकी खबर लगी तो वह निधड़क भैंसे के पास चला गया। भैंसे ने उस पर, उसने भैंसे पर नजर डाली आँखें चार हुई और भैंसा सिर नीचे किये रह गया। उसने उसकी नाक छेद दी और रस्से से बाँध दिया पर भैंसा हिला-डुला तक नहीं।
इन घटनाओं से उस युग की याद आ जाती है, जब यहाँ ऋषि आश्रम जाकर शेर तक अपनी भयंकरता भूल जाते और गाय की तरह सीधे हो जाते थे सब आत्म-शान्ति का चमत्कार था। पिछले दिनों छत्रपति शिवाजी, गुरुगोविन्दसिंह, फ्रेडरिक, रामकृष्ण परमहंस, दयानन्द आदि अनेक महापुरुष हुए हैं, जिनके चेहरों से आत्म-तेज फूटा करता था। ये लोग वह असाधारण कार्य भी हँसते-खेलते कर सकते थे।
अंग्रेजी में जिसे “औरा’’ कहते हैं, वह पौरुष तेज स्थूल शरीर की शक्ति नहीं वरन् मन का गुण या उसे आत्मा का प्रकाश का प्रकाश कह सकते है और उसका विकास आत्मानुभवी होकर ही हो सकता है। विचार शक्ति से सम्बन्ध रखने वाली यह शक्ति व्यायाम और योगाभ्यास से भी नहीं आती वरन उसके लिए मानसिक साधनायें करनी होती है। ध्यान और जप के माध्यम से आत्मा के आलोक तक पहुँचना पड़ता है, तब वह शक्ति प्रदीप्त हो पाती है। एक जीवन भर अभ्यास करते रहने के उपरान्त प्राप्त हुई यह आत्म शक्ति ही किन्हीं पुरुषों को संयोगवश दूसरे जन्म में जन्म से ही मिल जाती है।
प्रसिद्ध वैज्ञानिक मुलर ने 17 वर्ष तक मक्खियों पर विविध प्रयोग करके देखा कि जीव का प्रत्येक कोश प्रोटीन से बना है और जब इस प्रोटीन का रासायनिक विश्लेषण किया जाता है तो उसमें अनेक प्रकार के एसिड और रासायनिक द्रव्य पाये जाते है। जो बदलते, घटते और बढ़ते है। उसने ऐसे अनेक प्रयोग किए और यह प्रयत्न किया कि रासायनिक स्थिति में परिवर्तन करके क्या शारीरिक रचना में कोई परिवर्तन किया जा सकता है। इसमें उसे कोई सफलता न मिली। क्योंकि इन तत्वों के मूल में जो जीन नामक तत्व था उस पर किसी प्रकार की प्रतिक्रिया नहीं रही थीं अर्थात् उस पर ताप, विष शीत आदि का भी प्रभाव नहीं ही रहा था। ऐसे प्रयोग पहले भी हो चुके थे। इस बार जब मुलर ने एक्स किरणों का प्रयोग किया और वे गुण सूत्रों को भेदकर जीन तक पहुँचो तो उसमें असाधारण हलचल हुई और तब जो नई मक्खियों पैदा हुई उनका आकार प्रकार बिलकुल ही भिन्न निकला और इस तरह इस सिद्धान्त का प्रतिपादन हुआ कि जीन ही जीवन से सम्बन्धित कोई तत्व है और उससे अधिक कोई जानकारी वैज्ञानिक प्राप्त नहीं कर सकें।
हाँ यह अवश्य हुआ कि उन्होंने कोश के मूल को जब सूक्ष्म दर्शन यंत्रों से देखा तो उस परमाणु में ही उन्हें विशाल ब्रह्माण्ड की झाँकी अवश्य मिली। यह देखा गया कि वहाँ कई सूर्यों जितनी ऊर्जा और चमक विद्यमान् है तो भी जीन के उस कारण शरीर की अभी तक कोई जानकारी वैज्ञानिक प्राप्त नहीं कर सकें
तत्त्वदर्शी और योगियों का कथन है कि जिस तरह बाहर एक आकाश है, उसी तरह का एक आकाश शरीर के भीतर भी है वह भी उसी प्रकार सूक्ष्म है, जिस प्रकार बाहर के आकाश को न तो देखा जा सकता है और न छुआ जा सकता है। न्यूक्लियस (नाभिक) के मूल में भी एक ऐसा ही आकाश है, उसमें कोई स्वरूप स्थिर नहीं होता, किन्तु उसकी सामर्थ्य बड़ी विशाल है। वही चेतन तत्व, विचार और ज्ञान शक्ति है, इसलिये उसे संकल्प कहा गया। यहाँ से चेतना का विकास होता है, शरीर के प्रत्येक अणु में व्याप्त इस शक्ति का महत्व ही सर्वाधिक और सर्वोपरि है, उसके ही ध्यान और चिन्तन द्वारा यहाँ शक्ति के स्वामी और आत्म तेज के भण्डार बनने की परम्परा रही है, यजुर्वेद में कहा गया है-
यज्जाग्रतो दूरमुदैति देवन्त दुसुप्तस्य तथैवेति। दूरडगमजज्योतिषाँ ज्योति रकन्तम्मे मनः शिव संकल्प मस्तु।
अब मैं अपने मन की शिव में धारण करता हूँ, (अर्थात् मेरी विचार शक्ति अब उस संकल्प में प्रवाहित हो रही है। जब यह स्थिति होती है तो मनुष्य आत्मस्थित में होता है। जब इस सूक्ष्मातिसूक्ष्म स्थिति में साधक पहुँचता है तो आत्म तेज अपने आप झलकने लगता है।) जो जागृति एवं सुषुप्ति की अवस्था में दूर दूर तक जाया करता है। ज्योति रूप धारण कर सुदूर नक्षत्रों तक पहुँच जाता है।
इस तथ्य का प्रतिपादन श्वान और श्लाइडन वैज्ञानिक ने किया है। उनका कथन है कि जब जीवकोष का विश्लेषण किया जाता है तो उसमें पदार्थ और तत्व दो भाग होते है। एक कोशिका, दूसरा नाभिक। कोशिका को यदि काटकर नाभिक से अलग कर दिया जाता है तो वह नष्ट हो जाता है पर नाभिक में स्वतः निर्माण की क्षमता होती है और वह कभी नष्ट नहीं होता। फिर वह अपनी इच्छानुसार अपने स्वरूप को पुनः विकसित कर लेता है।
उसकी इच्छा कैसे होती है, विकास करते समय वह अन्यान्य रूप कैसे धारण कर लेता है, इसका उत्तर वे भी नहीं दे सकें। उन्होंने इतना ही कहा-वह न जाने कोसी शक्ति है। पर तत्व वेत्ताओं ने उसका उत्तर दिया कि यही से अहंकार या संकल्प का प्रादुर्भाव होता है और संसार जड़ और चेतन स्पष्टतः दो भागों में बँट जाता है। संकल्प और विचार जगत यद्यपि दृश्य नहीं है, बोधगम्य है तो भी उसकी शक्ति और सामर्थ्य इतनी अधिक है कि उस एक ही अणु के गुस्से से सारी सृष्टि में प्रलय हो सकती है। ऊपर जो थोड़े से चमत्कार जैसे विवरण दिये गये है, वह तो उस महाशक्ति के अरबों अंश शक्ति से भी बहुत कम है। उसकी यथार्थ स्थिति को तो शास्त्रकार की समझ पाया है और अब विज्ञान उस पर विश्वास करने लगा है।
अर्य वाव स योअयमन्तः पुरुष आकाशः अयं वावस शोअषमन्तहृर्दय आकाशस्तदेतत् पूर्णमग्रवति पूर्णम प्रव तिनी श्रियं तभन्ते य एवं वेद।
-(छा. प्रपा. 3 खंड 12 छन्द 9)
अर्थात्-पुरुष के हृदय देश में जो आकाश है, यह वही आकाश है जो बाहर है। जैसे बाहर का आकाश शून्यवाद होते हुए भी ब्रह्म से परिपूर्ण है, जैसे ही हृदयाकाश भी शून्य सा लगता हुआ भी आत्म तेज से पूर्ण है, गायत्री इसी ब्रह्म का गान करती है। यह आकाश शून्य नहीं है, ब्रह्म का गान करती है। यह आकाश शून्य नहीं है, ब्रह्म का गान करती है। यह आकाश शून्य नहीं है, ब्रह्म से परिपूर्ण एकरस है, जो उपासक ऐसा साक्षात्कार कर लेता है, वह पूर्ण तथा परिवर्तन रहित श्री (ऐश्वर्य) को पा लेता है।
बाह्य मण्डल की सूक्ष्मता का स्वरूप योगी लोभ इस तरह बताते है- आत्मजा मंडल सृष्टि में लघुता की दृष्टि से परमाणु से भी छोटा और सूक्ष्मता में बाह्य के समान सूक्ष्म है। रंग रूप में अनुपयोग या स्वयं अपना ही स्वरूप है, परन्तु चित्त में वह समीपस्थ प्रकृति के गुण वाला हो जाता है। अर्थात् जैसी प्रकृति होगी वैसा ही चित्त होगा। उसी के अनुरूप शरीर के कोश बनेंगे और तदनुरूप ही स्थूलता और सूक्ष्मता ग्रहण करेंगे डा. खुराना ने यह सिद्ध किया है कि कोश में प्रोटीन को जिस पर रोग के कीटाणुओं का आक्रमण हो जाता है, उसे बदला जा सकता है। औषधि विज्ञान की यह असाधारण खोज है। पर उससे भी शक्तिशाली आत्म तत्व है, जो इच्छा और संकल्प मात्र से रोग मोचन और बड़े बड़े अलौकिक कार्य तक सम्पन्न कर सकता है।
कौषीतकि ब्राह्मणोचित के चतुर्थ अध्याय में अजात शत्रु ने गार्गी को आत्म तेज की विद्या बताई है। जैसे अग्नि, अरणि आदि काष्ठों में वर्तमान रहता है, जैसे ही इस शरीर में आत्मा भी नख पर्यन्त सर्वत्र विद्यमान् है। 19 वा मन्त्र जब तक उस आत्मा की इन्द्र ने नहीं जाना तब तक वह दैत्यगणों से हारते रहे परन्तु जैसे ही उन्होंने आत्मा को जाना वैसे ही उन्होंने दैत्यों को संहार किया। आत्मा को जानने वाला ज्ञानी अपने सब पापों को मिटाकर सब प्राणियों में श्रेष्ठ होकर सबका स्वामी बनता है।
सुख और श्रेय मन वह जीवन की दो महान उपलब्धियाँ मानी गई है। इनको पा लेना ही जीवन की सफलता है।
सुख की परिधि का परिसर तक है। अर्थात् हम संसार के व्यवहार क्षेत्र में जो जीवन जीते है, उसका निर्विघ्न, स्निग्ध और सरलतापूर्वक चलते रहना ही साँसारिक सुख है। श्रेय आध्यात्मिक क्षेत्र की उपलब्धि है। ईश्वरीय बोध, आत्मा का ज्ञान और भव बन्धन से मुक्ति श्रेय कहा गया है।
पार्थिव अथवा अपार्थिव किसी भी पुरुषार्थ के लिए शक्ति की अनिवार्य आवश्यकता है। शक्ति हीनता क्या साधारण और क्या असाधारण दोनों प्रकार की प्रगतियों के लिए बाधा रूप है। शरीर अशक्त हो, मन निराश और कुण्ठित हो, बुद्धि की निर्णायक क्षमता शिथिल हो तो मनुष्य इच्छा रहते हुए भी किसी प्रकार का पुरुषार्थ नहीं कर सकता।
संसार के सारे सुखों का मूलाधार साधनों को माना गया है। साधन यो ही अकस्मात् प्राप्त नहीं हो जाते। उनके लिये उपाय तथा परिश्रम करना होता है। रोटी, कपड़ा, आवास के साथ और भी अनेक प्रकार के साधन जीवन को सरलतापूर्वक चलाने के लिए आवश्यक होते है। इनके लिये कार रोजगार, मेहनत मजदूरी, नौकरी चाकरी कुछ न कुछ काम करना होता है। वह सब काम करने के लिए शक्ति की आवश्यकता है। अशक्तों की दशा में कोई काम नहीं किया जा सकता।
केवल शक्ति ही नहीं आरोग्य तथा स्वास्थ्य भी सुख, शान्तिमय जीवन यापन की एक विशेष शर्त है। साधन हो, कार रोजगार हो, धन तथा आय की भी कमी न हो, तब भी जब तक तन मन स्वस्थ और निरोग नहीं है, जीवन सुख और सरलतापूर्वक नहीं चलाया जा सकता। इस प्रकार शक्ति और स्वास्थ्य जीवन के सुख के आवश्यक हेतु है।
शक्ति जन्मजात प्राप्त होने वाली कोई वस्तु नहीं है। जिस प्रकार धन, सम्पत्ति, जमीन जायदाद उत्तराधिकार में मिल जाते है, उस प्रकार शक्ति के विषय में कोई भी उत्तराधिकार नहीं है। यह मनुष्यों की अपनी व्यक्तिगत वस्तु है, जिसे पाया नहीं, उपजाया जाता है। साँसारिक सुख और पारलौकिक श्रेय के लिए मनुष्य को शक्ति का उपार्जन कर लेना आवश्यक है।
लौकिक विद्वानों से लेकर सिद्ध महात्माओं और मनीषियों-सबने एक स्वर से संयम को शक्ति का स्त्रोत बतलाया है। बहुत लोगों का विचार रहता है कि अधिक खाने पीने से शक्ति प्राप्त होती है। पर उनका यह विचार समीचीन नहीं अधिक अथवा बहुत बार खाने से शरीर को अनावश्यक श्रम करना पड़ता है, जिससे शक्ति बढ़ने के बजाय क्षीण होती है। स्वास्थ्य बिगड़ता है और आरोग्य नष्ट होता है। भोजन में निश्चय ही शक्ति क तत्व रहते है, किन्तु वे प्राप्त तभी होते है, जब भोजन का उपभोग संयमपूर्वक किया जावे। समय पर, नियन्त्रित मात्रा में उपयुक्त भोजन ही सुविधापूर्वक पचता और शक्तिशाली रसों को देता है।
शक्ति संचय के लिए संयम पर, सीमित और उपयुक्त भोजन किया जाये, स्वास्थ्य और आरोग्य के विषय में सावधान रहा जाय, पर ब्रह्मचर्य का पालन न किया जाये, तब भी सारे प्रयत्न बेकार चले जायेंगे और शक्ति के नाम पर शून्य ही हाथ में रहेगा। भोजन के तत्व वीर्य बनकर ही शरीर में संचय होते है और उस संचित और परिपक्व वीर्य का ही स्फुरण शक्ति की अनुभूति है। वीर्यवान शरीरों में न तो अशक्तता आती है और न उसका आरोग्य ही जाता है। इसीलिये वीर्य को शरीर की शक्ति ही नहीं प्राण भी कहा गया है।
इसी महत्व के कारण भारतीय मनीषियों और आचार्यों ने वीर्य रक्षा अर्थात् ब्रह्मचर्य संयम और को सबसे बड़ा माना है और निर्देश किया है कि लौकिक जीवन के सुख और पारलौकिक श्रेय के लिए मनुष्य को अधिकाधिक ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिये।
परशुराम, हनुमान और भीष्म जैसे महान् पुरुषों ने आजीवन ब्रह्मचारी रह कर ब्रह्मचर्य व्रत की महत्ता प्रमाणित की है। इसी व्रत के वल पर वे न केवल अतुलित बलधाम बने बल्कि जरा और मृत्यु आई ही नहीं पर भीष्म ने तो उसे आने पर डाट कर ही भगा दिया और रोम रोम में बिन शिरों की सेज पर तब तक सुख पूर्वक लेटे रहे, जब तक कि सूर्यनारायण उत्तरायण नहीं हो गये। सूर्य के उत्तरायण हो जाने पर ही उन्होंने इच्छा मृत्यु का वरण स्वयं किया। शर शय्या पर लेटे हुए, थे केवल जीवित ही नहीं बने रहे, अपितु पूर्ण स्वस्थ और चैतन्य भी बने रहे। महाभारत युद्ध के पश्चात् उन्होंने पाण्डवों को धर्म तथा ज्ञान का आदर्श उपदेश भी दिया। यह सारा चमत्कार उस ब्रह्मचर्य व्रत का ही था, जिसका कि उन्होंने आजीवन पालन किया था। हनुमान ने उसके बल पर समुद्र पार कर दिखलाया और एक अकेले परशुराम ने इक्कीस बार पृथ्वी से आततायी और अनाचारी राजाओं को नष्ट कर डाला था। ब्रह्मचर्य की महिमा अपार है।
कहा जा सकता है कि यह सब लोग मानवों की महान कोटि के व्यक्ति थे और आजीवन ब्रह्मचर्य का व्रत लेकर अविवाहित रहे थे। आजीवन ब्रह्मचर्य वीर्य संयम से सरल है। अविवाहित अथवा अनुभवी व्यक्ति को काम ज्वर पीड़ित नहीं कर पाता, किन्तु, जन सामान्य के लिये उसका संयम कठिन होता है। विवाहित व्यक्तियों का उद्दीप्त कामदेव उन्हें विवश कर अपने वश में कर ही लेता है।
इस शंका के समाधान में इस प्रकार विचार किया जा सकता है। भीष्म, भार्गव अथवा हनुमान को उच्च कोटी का महापुरुष माने जाने का कारण उनकी स्थिति नहीं है, बल्कि उनके वे कार्य है जो उन्होंने अपने जीवन में कर दिखाये और वे उन शक्ति सम्भव कार्यों को कर ही आत्म संयम के बल पर सकें। कोई भी व्यक्ति सामान्य अथवा असामान्य उन जैसा संयमपूर्वक जीवन जिये, उन जैसे आचार विचार रखे और उन जैसी अदृश्यता से अलंकृत कार्य विधि अपनाये तो निश्चय ही उच्च श्रेणी में पहुँच सकता है।
ब्रह्मचर्य पालन के विषय में आजीवन अविवाहित और अनुभवहीन व्यक्तियों को छोड़ भी दीजिये तो भी भारतीय इतिहास में ऐसे दृढ़व्रती और संयमशील व्यक्तियों के उदाहरणों की कमी नहीं है, जिन्होंने विवाहित और अनुभव प्राप्त होने पर भी अनुकरणीय काम संयम करके दिखला दिये।
दूर जाने की आवश्यकता नहीं। रामायण के ही प्रमुख पात्र राम, लक्ष्मण, भारत तथा सीता, उर्मिला और मांडवी को ही ले लीजिये। सभी विवाहित तथा घर-गृहस्थी थे। जिस समय राम के उपनयन की घटना घटी उस समय इन सबके विवाह हुए, ज्यादा दिन न हुए थे। सभी यौवन की उत्थान तथा हुए उद्दाम आयु में थे। हास विलास तथा सुख सुखपूर्वक जीवन बीत रहा था। तभी एक साथ चौदह वर्ष के लिये राम वनवास की बात हो गई।
राम वनवास के लिए चले तो बहुत कुछ समझाने और निषेध करने पर भी सीता तथा लक्ष्मण उनके साथ प्रेमयुक्त ही हो लिये। चलते समय लक्ष्मण ने अपनी नवविवाहित पत्नी उर्मिला से विदा से लेना आवश्यक समझा। वे गये और अपना विचार प्रकट किया। उर्मिला के हृदय पर एक बार एक आघात हुआ, उसकी आँखें भर आई किन्तु तत्क्षण ही उसने अपने आपके संयम कर कहा-आप प्रभु के साथ वनवास जा रहे है तो उन्हीं की तरह मुझे भी अपने साथ क्यों न लेते चले। किन्तु लक्ष्मण ने अपने कर्तव्य की महत्ता और उसके संग रहने से होने वाली उचित असुविधाओं को बताकर समाधान कर दिया। उर्मिला घर रह गई और लक्ष्मण चौदह वर्ष के लिए राम के साथ बन चले गये।
वन में जाकर कुमार लक्ष्मण ने विवाहित तथा आत्मानुभवी होकर भी चौदह वर्ष तक ब्रह्मचर्य का अखण्ड पालन किया। इस व्रत पालन में न तो उन्हें कोई असुविधा हुई और न कोई कठिनाई। वे सरलतापूर्वक कृतियों का जीवन व्यतीत करते रहे। इधर बहू उर्मिला ने भी पति वियोग के अतिरिक्त किसी प्रकार का शिकार अथवा
काम पीड़ा का अनुभव नहीं किया। वह निर्भयतापूर्वक अपना व्रत पालन करती रही। विवाहित तथा अनुभव प्राप्त व्यक्ति के लिए चौदह वर्ष का ब्रह्मचर्य कोई अर्थ रखता है। किन्तु उन्होंने उसका पालन कर यह सिद्ध कर दिया कि यदि मनुष्य में दृढ़ता है, अपने व्रत के प्रति आस्था और संयम के प्रति आदर है तो वह विवाहित, गृहस्थ, अनुभवी और तरुण होने पर भी ब्रह्मचर्य का पालन सुविधापूर्वक कर सकता है।
यहाँ पर कहा जा सकता है कि लक्ष्मण पत्नी से दूर थे। उनका काम रक्षित रह सकना सम्भव था। कभी कभी वैश्य भी संयम का पालन करा देता है। इसके लिये कहा जा सकता है कि लक्ष्मण तो अप्रतीत थे, किन्तु राम तो नहीं थे उनके साथ तो उनकी पत्नी सीता जी थी। किन्तु राम ने भी पूर्ण काम संयम का प्रमाण दिया और ब्रह्मचर्य व्रत का अखण्ड रूप से पालन किया। फिर कहा जा सकता है कि सीता से आगे चलकर उनका विछोह हो गया था। ठीक है-पर भरत के साथ तो ऐसी कोई बात नहीं थी। वे न तो वनवास में ही गये और न पत्नी से दूर ही रहे। वे अयोध्या में ही रहे और मांडवी उनकी सेवा में हर समय उपस्थित रहती थी। तथापि भरत न स्वयं भी पत्नी सहित चौदह वर्ष तक ब्रह्मचर्य का पालन किया और कभी किसी विकार की दुर्बलता नहीं आने दी।
यह संयम सर्वथा सम्भव है और सबको करना ही चाहिये। इससे शारीरिक, मानसिक तथा बौद्धिक ही नहीं आत्मिक शक्ति भी बढ़ती है। मनुष्य में तेज तथा प्रभाव का प्रादुर्भाव होता है वाणी में तेज तथा नेत्रों में ज्योति आती है। यह सारे गुण सारे गुण और सारी विशेषताएँ प्रेम तथा श्रेय दोनों की उपलब्धि में सहायक होते है। इन सहायकों के अभाव में आध्यात्मिक उन्नति तो दूर, सामान्य सांसारिक जीवन भी सुख और सरलतापूर्वक नहीं जिया जा सकता।
जो व्यक्ति संसार के महान व्यक्तित्व हुए है, जिन्होंने धर्म, समाज तथा देश के लिए उल्लेखनीय कार्य कर प्रेम प्राप्त किया है और जिन्होंने तप, साधना तथा चिन्तन मनन कर श्रेय पाया है, निर्विवाद रूप से उन्होंने ब्रह्मचर्य व्रत द्वारा सबसे पहले शक्ति की ही साधना की है। वासना को जीत और इन्द्रियों पर अधिकार कर सकने पर ही वे जीवन में श्रेयस्कर कार्य कर सकने में सफल हो सके है।
वीर्य रक्षा से शरीर स्वस्थ तथा स्फूर्तिवान् बना रहता है। रोगों का आक्रमण न होने पाता। मन तथा बुद्धि इतने पुष्ट एवं परिपक्व हो जाते है कि बड़ी से बड़ी विपत्ति में भी विचलित नहीं होते। प्रमाद, आलस्य अथवा अवज्ञा का भाव नहीं आने पाता। परिश्रम तथा उपार्जन की स्फुरति बनी रहती है, जिससे उसके चरण दिन दिन उन्नति के सोपानों पर ही चलते जाते है।
हम सबने जिस मनुष्य जीवन को पाया है, वह योंही कष्ट क्लेशों, अभावों तथा आवश्यकताओं में नष्ट कर देने योग्य नहीं है और न इसी योग्य है कि उसे कामनाओं, वासनाओं और न इसी योग्य है कि उसे कामनाओं, वासनाओं और संसार की अन्य विभीषिकाओं में गवाँ दिया जाये। वह है संसार में सत्कर्मों द्वारा पुण्य तथा परमार्थ उपार्जित कर अध्यात्म मार्ग से पारलौकिक श्रेय प्राप्त करने के लिये और यह उपलब्धि शारीरिक, मानसिक तथा आत्मिक शक्ति द्वारा ही सम्भव है, जिसका उपार्जन इन्द्रिय निग्रह द्वारा, ब्रह्मचर्य व्रत द्वारा सहज ही में किया जा सकता है।
देवालय तो सबके लिये पवित्र है।
नारी सम्मान सबका परम कर्तव्य है।
देश और धर्म भिन्न नहीं है।
बुद्धि नहीं, भावना हो जोड़ती है।
संख्या नहीं, शक्ति हो जीतती है।
यदि उसे अन्य विश्वास न बनाया जाये तो भूत और प्रेतों का अस्तित्व यह साबित करेगा कि आत्मा का स्वतंत्र अस्तित्व भी है, एक अवस्था विशेष होती है, जब आत्मा अपनी नितान्त शुद्ध अवस्था प्राप्त कर परमात्मा स्वरूप हो जाती है, किन्तु जब तक पाप, इच्छाएँ, ममता, वासनायें आदि विकारों की परत उस पर चढ़ी रहती है, उसका स्वतन्त्र अस्तित्व बराबर कायम रहता है।
विज्ञान और प्रत्यक्ष दर्शी इन उक्तियों को मानने के लिये तैयार नहीं उनका कहना है कि मृत्यु के बाद जीवात्मा का अस्तित्व समाप्त हो जाता है। शरीर के सभी रासायनिक पदार्थ रूपांतरित होकर शारीरिक सत्ता को बिगाड़ देते है, फिर कुछ नहीं रहता।
किन्तु उनके लिये भूत एक चुनौती है, भूत को लेकर माना अन्ध विश्वास भी खूब फैला है तो भी वह सब इसी चिर सत्य की नकल भर है। ऐसे प्रामाणिक उदाहरण भी है, जिन्होंने भूत पर कभी विश्वास नहीं किया तो भी उन्हें उस सम्पर्क में आना पड़ा। कुछ घटनायें ऐसी भी घटित हुई, जिनमें न कोई अन्य मान्यता थी न भ्रम, उन घटनाओं ने पाश्चात्य जीवन में भी भूत की मान्यता को जीवित कर दिया।
इंग्लैंड के डा. मौर्टन प्रिन्स ने मिस बोचैन्य नामक लड़की की परीक्षा करने के बाद अपना यह मत व्यक्त किया कि भूत जैसी कोई वस्तु सम्भव है, जो गतिशील हो सकती है। इस लड़की की दशा कभी कभी बड़ी विचित्र हो जाती थी। कई बार उसे दर्द होता था और कुछ देर उसकी विचित्र स्थिति रहती, फिर वह भली सी हो जाती थी, किन्तु उसके सब क्रिया कलाप बदल जाते थे। उस समय वह अपना नाम बोचैम्प न कहकर सैली बताती थी। और परिवार वालों को बहुत तंग करती थी। कई ऐसे पत्र लिख देती थी जिसके विषय बोचैम्प से सम्बन्धित होते ही नहीं थे, बाद में उस लड़की की परेशानी बढ़ जाती थी। इसके बाद जब सैली चली जाती थी तो बौचैम्प का व्यवहार फिर पूर्व चल ही जाता था।
इसी प्रकार रेवरेन्ड एन्सिल बोर्न नामक एक ईसाई प्रचारक ने एक हलवाई के यहाँ नौकरी करके एकाएक लोगों को हैरत में डाल दिया कई सम्बन्धी उसके पास गये और कहा आप पादरी होकर यह काम करते है-चलिये अपने निवास स्थान में अपना काम करिये तो वह बिगड़ बोला-मेरा नाम एन्सिल बोर्न नहीं, ए. जे. ब्रोन है, मैं तो हमेशा से नौकरी करता है। कुछ दिन बाद ब्रोन फिर ईसाई प्रचारक का काम करने के लिए आ गया पर उसने बताया कि इस बीच उसने क्या किया, इसका बिलकुल स्मरण नहीं है, क्योंकि मेरा अस्तित्व ही न जाने कहाँ खो गया था। यह तो बाद में पता चला कि ए. वे. ब्रोन नामक एक व्यक्ति पहले किसी हलवाई की दुकान पर काम करता था पर उसकी कुछ दिन पूर्व मृत्यु हो गई थी।
पादरी महोदय उस अवधि में जो कुछ बोलते, खाते पीते रहे वह पूर्व ब्रोन के स्वभाव से बिलकुल मिलते जुलते थे, जिसका कि उन्हें बिलकुल भी ज्ञान नहीं था। समझा जाता है कि इस अवधि में उनके शरीर पर उसकी प्रेतात्मा ने अधिकार कर लिया था। दोनों अवस्थाओं में वे पूर्ण स्वस्थ थे, मस्तिष्क भी ठीक था, वे एक विश्वसनीय व्यक्ति थे तो भी इस तरह के असामान्य परिवर्तन का कारण क्या था, इसका कोई उत्तर विज्ञान देने में असमर्थ है। वह स्थूल वस्तुओं को जान सकता है सूक्ष्म तत्त्वों को नहीं
कविवर गजानन मुक्ति बोध के सम्बन्ध में उनके अनेक मित्रो का और धर्म पत्नी का ही यह ख्याल नहीं था कि वे प्रेत बाधा के शिकार हो गये है वरन् दिल्ली के सर्वश्रेष्ठ चिकित्सक डा. विग ने भी यह स्वीकार किया कि उन पर तीव्र से तीव्र औषधियों का कोई प्रभाव ही नहीं परिलक्षित होता, यह सर्वथा समझ से परे बात है। काशी निवासी शव साधक तान्त्रिक श्री अरुणकुमार शर्मा, जिन्होंने कठिन प्रेत साधनायें सिद्ध की, तिब्बत में रहकर लामाओं से गुह्यतत्त्व सीखे, श्रीलंका से बौद्धदर्शन में एम॰ ए॰ तथा जब सिद्धि उपलब्ध किया-श्री गजानन माधव मुक्ति-बोध के सम्बन्ध में पहले ही बता दिया था कि-उन पर भूत व्याधि है और सन् 1964 उनके जीवन का अन्तिम वर्ष है।
वही हुआ भी, हमीदिया अस्पताल भोपाल में उनकी अच्छी से अच्छी चिकित्सा की गई, किन्तु वे अच्छे न हुए मरणासन्न स्थिति में वे राम राम और आई, गई (ओ माँ) ऐसे शब्द बोलते थे, जबकि उन्होंने जीवन में कभी उपासना न की थी। उनकी स्थिति देखने वाले सभी समीपवर्ती लोगों ने जो अधिकाँश सभी शिक्षित और प्रतिष्ठित व्यक्ति रहे है, यह माना कि उनकी मृत्यु प्रेत बाधा से ही हुई। उनके निधन और दाह कर्म की सूचना रेडियो से बड़े दुःख के साथ दी गई थी।
अमेरिका के कैलीफोर्निया शहर की एक घटना इस प्रकार है-
इण्डावरी नामक मुहल्ले में एक भुतहा मकान था। कोई भी उसमें रहने के लिए तैयार नहीं होता था। एक बार चार विद्यार्थी आये और उन्होंने भूत की मान्यता को मिथ्या भ्रम कहकर मकान किराये पर ले लिया। एक दिन जब चारों आँगन में कुर्सियों पर बैठे थे तो अचानक चारों कुर्सियाँ ऊपर उठने लगी। सात आठ फुट ऊपर जाकर चारों हवा में स्थिर हो गई। वे चारों बहुत घबड़ा गये और यह न समझ पाये कि ऐसा क्यों हुआ फिर भी उन्होंने मकान छोड़ा नहीं एक रात जब वे सो रहे थे तो उन पर अचानक पत्थरों की वर्षा होने लगी। पत्थरों से भरा एक टूटा सन्दूक बिस्तर पर आ गिरा। इससे घबरा कर चारों मकान छोड़ कर भाग गये। खोज करने पर पता लगा कि उस मकान में चार पाँच वर्ष पहले एक डाक्टर ने आत्म हत्या कर ली थी। उसी की आत्मा वहाँ मँडराया करती थीं।
भारतीय दर्शन की यही मान्यता है कि अकाल मृत्यु या आत्म हत्या द्वारा जब किसी की मृत्यु होती है तो आत्मा के अणु हलचल में बने रहते है, उनकी वासनायें और अहंकार मनोमय कोश में चले जाते है, अणुओं की सक्रियता जब तक स्थिर रहती है, तब तक आत्मा भूत या प्रेत अवस्था में बनी रहती है। इस तरह की आत्मायें जीवित प्राणियों पर अपना प्रभाव डाल सकती है पर केवल उन्हीं पर जिनकी इच्छा शक्ति और मनोबल उससे कमजोर हो। वस्तुओं का स्थानान्तरण भी वे कर सकती है, क्योंकि प्राणमय शरीर के अणु भी रहते है, जो स्थूल परमाणुओं को आसानी से हिलाडुला सकते हैं।
1 दिसम्बर 7963 के धर्मयुग में श्री दामोदर अग्रवाल ने स्वबीती घटना का उल्लेख इस प्रकार किया है- उस दिन घर की खूब सफाई की गई थी पर दिन भर दुर्गन्ध आती रही। रात की बची पूरियाँ अलमारी में रख दी गई। सुबह ताला ज्यों का त्यों बन्द मिला लेकिन पूरियाँ गायब थी। रात को बर्तन धोकर रखे जाते थे, सबेरे जूठे मिलते थे बड़े भाई का विवाह हुआ, आँगन में तिलक के लड्डू रख दिये गये। सुबह लड्डुओं की जगह गन्दी गोली मिट्टी मिली। अच्छी से अच्छी मिठाइयाँ रात भर में सड़ जाती थी। रसोईघर में अजनबी पंजों के चिह्न मिलते और दीवारों शीशों पर उँगलियों के धब्बे। बिस्तर ऐसे दिखते जैसे उन पर अभी अभी कोई सोकर उठा हो। जरा-सा हटे नहीं कि गिलास का दूध गायब। मुश्किल यह थी कि हमारे लाख प्रयत्न करने पर भी अपराधी का पता न चलता। रात भर बन्दूकें लिये पहरा देते पर जैसे ही झपकी लगती पूरा घर नरक हो जाता।
‘फेट’ नामक पत्रिका के अगस्त 1962 अंक में पेज नं. 43 में श्रीमती सेना सरंजेस्की का संस्मरण सिसकते भूत का सन्देश छपा है। वे लिखती है कि वे जिस मकान में रहती थी, उसमें कभी कभी सीढ़ियों पर और कमरों में किसी के टहलने की आवाज आया करती थी। एक दिन उन्हें लगा कि पास ही छाया खड़ी है। उन्हें स्मरण हो आया कि इस मकान में टेड अलिशन नामक व्यक्ति ने आत्म हत्या की थी। यही सबको मालूम भी था। वे लिखती है-मैंने साहस करके पूछा-आप टेड तो नहीं है तो मेरे आश्चर्य का ठिकाना न रहा, जब मैंने यह स्पष्ट सुना-यह मैंने पूछा आप कुछ बताना चाहते है? पर इससे पूर्व कि कोई उत्तर सुनें, वह छाया गायब हो गई और फिर कई दिन बाद आई। मुझे लगा कि वह कुर्सी पर बैठ गया है। मैंने फिर साहस करके पूछा- “आप सिसकते क्यों हैं, क्या आप कुछ कहना चाहते।”
इस बार उसने बताया- “मैंने आत्म-हत्या नहीं की थी, किसी जहरीली औषधि के भूल से सेवन से यह दुर्घटना हुई। आप मेरी धर्म-पत्नी को कहना, में अपनी, बच्चियों को बहुत प्यार करता हूँ। इसके साथ ही वह आत्मा वहाँ से चली गई। बाद में मैंने श्रीमती टेड से बातचीत की तो उन्होंने बताया कि निःसन्देह वे अपने साथ इन्सुलिन की शीशी रखते थे और उसी के द्वारा उनकी मृत्यु हुई थी। उस दिन के बाद वहाँ कोई आत्मा नहीं आई।
अमेरिका, जर्मनी, ब्रिटेन, जापान और भारत में ऐसे अनेक प्रयोगकर्ता हैं, जो इस तरह मृतात्माओं से संपर्क साधते हैं और उन अज्ञात बातों का पता सही- सही लगा लेते हैं। सर ओलिवर लाज, डा. पील, सर आर्थर कानन डायल, डा. अल्काट और भारत में प्रो. वी.डी. ऋषि जो इन्दौर के भूतपूर्व रिटायर्ड सेशन बज थे, ऐसे प्रयोग करते रहें हैं। इन सारी घटनाओं को अप्रामाणिक नहीं कहा जा सकता। उनसे आत्मा के अस्तित्व की ही पुष्टि होती है।
खराब आत्मायें जिस प्रकार भूत और प्रेत-योनियों में जाती हैं, भारतीय दर्शन की यह मान्यता है, उसी प्रकार उत्कृष्ट कोटि की आत्मायें अपना अधूरा काम पूरा करने के लिये पुनर्जन्म ग्रहण करती हैं। एक से कार्यों का संचालन और एक सी परिस्थितियों में जीवन का प्रादुर्भाव उक्त मान्यता की पुष्टि करता है, इस सम्बन्ध में अमेरिका के जिम विशप द्वारा प्रस्तुत अमेरिका के प्रेसीडेन्ट अब्राहम लिंकन और जान एफ॰ कैनेडी के जीवन का तुलनात्मक अध्ययन बड़े मार्के का है। उनकी मान्यता है कि अब्राहम लिंकन ही जान एफ. कैनेडी थे।
चालीस वर्ष की अवस्था में ही लिंकन को भी राष्ट्रपति बनने की इच्छा हुई और कैनेडी को भी। दानों की इच्छा थी कि अमेरिका और विश्व में शाँति स्थापना के लिये प्रयत्न करें।लिंकन दक्षिण को बहुत चाहतें थे और कैनेडी भी। नीग्रो स्वतन्त्रता के लिये लिंकन ने भी प्रयत्न किये पर दक्षिणा उसके लिये तैयार नहीं हुआ, यही स्थिति कैनेडी की भी रही। लिंकन के चार बच्चे थे, दो मर गये थे, दो उनके साथ रहने थे। लिंकन उनसे हमेशा हँसी मजाक करते लिंकन की पहली धर्मपत्नी फैशनेबुल स्त्री थी, कविता और पेंटिंग उन्हें पसन्द थीं, उन्हें राजनीति की अपेक्षा अपना घर अच्छा लगता था। कैनेडी की पहली धर्मपत्नी भी ठीक वैसे ही स्वागत की थीं,। लिंकन की धार्मिक मान्यतायें बहुत गहरी थीं, वे हमेशा बाइबिल पढ़ते रहते। कैनेडी भी धर्म पर अडिग विश्वास रखते थे और बाइबिल पढ़ते थे। दोनों ही लिबरल पार्टी से सम्बन्धित थे। लिंकन भी स्टार्च खाते थे और थे और कैनेडी भी। लिंकन 1861 में राष्ट्रपति हुए, कैनेडी 1961 में। लिंकन की सुरक्षा के लिये जो सर्वाधिक चिन्तित रहता था, उसका नाम कैनेडी था और कैनेडी की सबसे अधिक चिन्ता करने वाले उनके प्राइवेट बेक़रारी का नाम लिंकन था। दोनों की मृत्यु भी शुक्रवार के दिन हुई, दोनों गोली के शिकार हुये। लिंकन का पद उनकी मृत्यु के उपरान्त दक्षिणी पद सम्भाला। (मिरर, मार्च 1964 में प्रकाशित )
यह संयोग नितान्त आकस्मिक नहीं कहें जा सकते। निस्सन्देह उनमें आत्मा का कोई सूक्ष्म विधान सन्निहित हैं, उससे इनकार नहीं किया जा सकता।
किसी से कटु वचन न बोलो। यदि बोलोगे, तो वह भी तुमसे वैसा ही कटु वचन बोलेंगे झगड़े में दुःख बढ़ता ही है। कटु वचन बोलने से, बदले में, तुम्हें दंड मिलेगा। टूटा हुआ काँसा जैसा निःसहाय रहता है, उसी तरह अगर तुम स्वयं चुप रहोगे, तो तुम निवाड़ प्राप्त कर लोगों, तुम्हें कलह नहीं सताएगी
“लक्ष्मी उद्योगी पुरुष सिंहों को प्राप्त होती है”- वह केवल सूक्ति नहीं, बल्कि एक सिद्धान्त है। ऐसा सिद्धान्त जो युग-युग के अनुभव के बाद स्थिर किया गया है। उन्नति, प्रगति, सफलता और सम्पन्नता का एक मात्र आधार उद्योग अथवा पुरुषार्थ नहीं करेगा, परिश्रम में अपना पसीना नहीं बहाएगा तब तक किसी प्रकार के श्रेय का अधिकारी नहीं बन सका। लक्ष्मी श्रम और उद्योग की ही अनुगामिनी होती है।
कहा जाता है कि लक्ष्मी, श्रेय, सफलता और सम्पन्नता आदि उपलब्धियाँ भगवान् की कृपा से ही मिलती है। ऐसी मान्यता आस्तिकता की द्योतक है, अच्छी है। इस धारणा को बनाकर चलने में कोई हानि नहीं। किन्तु इसका रहस्य समझ लेना भी आवश्यक है।
संसार में चारों ओर जो सुख-सम्पन्नता के साधन और कारण बिखरे पड़े हैं, वह सब एकमात्र उस परमात्मा की ही कृपा है। सुख-दुःख और साधन सुविधा भी उसकी रचना के उसी प्रकार अंग है, जिस प्रकार मनुष्य स्वयं। किसी को मिलने वाली सम्पत्ति उसे तभी ही मिल सकती है, जब उसमें मूल स्वामी की सहमति तथा स्वीकृति सम्मिलित हो इस प्रकार निश्चय ही संसार के सुख-साधन और सम्पत्ति सम्पन्नता परमात्मा की कृपा से ही प्राप्त होती है।
किन्तु, इस विश्वास के साथ वह न भूल जाना चाहिये कि उसकी कृपा यों ही अनायास मिल जाती है। अथवा वह मनमौजी परमात्मा योंही बैठा-बैठा जिसे चाहता है सम्पन्नता अथवा सफलता वितरित करता रहता है और किसी को असफलता एवं विपन्नता, ऐसा नहीं है। उसके विधान में एक नियम और न्यायशीलता रहती है। वह किसी पर न तो अनायास नर अकारण कृपा करता है। और न कोप। सफलता और सम्पन्नता के लिये उस न्यायपरायणता की कृपा अर्जित करनी पड़ती है। जो व्यक्ति नियमपूर्वक उसकी पूजा नियमपूर्वक उसकी कृपा अर्जित कर लेते हैं, संसार में सब कुछ पा जाते हैं और जो इस विषय में प्रभारी अथवा अन्ध-विश्वासी बने रहते हैं, उन्हें खाली हाथ ही रहना पड़ता है।
सम्पन्नता के सम्बन्ध में परमात्मा की कृपा पाने का केवल एक ही आधार है और वह है पुरुषार्थ अथवा परिश्रम। जो व्यक्ति प्रमाद त्याग कर उद्योग परिश्रम अथवा पुरुषार्थ करते हैं, उन पर परमात्मा कृपा करता ही नहीं उसे करनी पड़ती है। वह अपने इस नियम को इस विषय में भंग करने के लिये सक्षम नहीं है। यह अक्षमता उसकी असमानता नहीं, महिमा है। जो व्यक्ति अपने बनाये नियमों के प्रति जितना भीरु और भावुक रहता है, वह उतना ही दृढ़ और महान माना जाता है। उसी व्यक्ति के बनाये विधान का मान तथा पालन होता है।
“पुरुषार्थ का पुरस्कार सम्पन्नता है-यह ए ईश्वरीय नियम ह। परमात्मा का बनाया हुआ, उसी का प्रेरित किया हुआ नियम है। यदि वह स्वयं ही इस विषय में स्वेच्छाचारिता बरतें और उसका अपवाद करने लगे तो उसके विश्व-विधान का क्या महत्व रह जाये। एक नियम का भावुकता विधान के सारे नियमों को महत्व और भावहीन बना देता है। सृष्टि-चक्र नियम की धुरी पर ही घूम रही है। यदि ईश्वर स्वयं ही उसको भंग कर दे तो उसकी यह सृष्टि, उसकी यह लीला और उसका यह निर्माण ही न नष्ट हो जाय। जो पुरुषार्थी है-परिश्रमी है, उद्योग है, उस पर अपने नियमानुसार परमात्मा कृपा करता ही है, वह ऐसा करने को विवश है। सम्पन्नता और सफलता जो पुरुषार्थ का पुरस्कार है, मनुष्य का अपरिहार्य अधिकार है, कोई शक्ति अथवा कोई भी सत्ता उसे इससे वंचित नहीं कर सकेगी।
कोई जेठ परिश्रम का सहज फल है-यह एक निर्विवाद सत्य है। तथापि उसको परमात्मा की कृपा मानना पुरुषार्थी का एक विनम्र आस्तिक भाव है, जो बढ़ा शुभ है। इसलिये कि अपने पुरुषार्थ का श्रेय परमात्मा को दे देने से मनुष्य अहंकार के दोष से सुरक्षित रहता है। यह सब मैंने किया, यह सब मेरे बल-बूते का चमत्कार है-ऐसा अहंभाव लाने अथवा रखने से एक तो उपलब्धियों की सात्विकता नष्ट होती है, दूसरे विवेक भ्रष्ट होता है। इस विषय में आत्म-विश्वास तो ठीक है, किन्तु आत्म-अहंकार ठीक नहीं है। क्योंकि जहाँ आत्म-विश्वास का सृजनात्मक भाव है, वहाँ आत्म-अहंकार ध्वंसक वृति है।
अपने पुरुषार्थ का श्रेय परमात्मा को सौंप देने से और भी अनेक लाभ होते हैं। जैसे उदारता, त्याग और निस्पृहता का भाव विकसित होता है। स्वार्थ, लोभ और लिप्सा से रक्षा होती है। निष्काम कर्मभाव का विकास होता है और सफलता, असफलता में समभाव रहने से कर्मों में अखण्डता बनी रहती है। इसीलिये लाखों में अपने सब कर्म उनके फलों सहित परमात्मा को समर्पित कर देने का निर्देश किया गया है। निश्चय ही यह आस्तिक भाव बड़ा शुभ तथा सात्विक है। तथापि यह कभी न भूलना चाहिये कि श्रेय और सफलता मनुष्य को अपने पुरुषार्थ के बल पर ही प्राप्त होती है। इससे परमात्मा की अनायास कृपा का कोई सम्बन्ध नहीं है।
बहुत बार लोगों को उत्तराधिकार में बहुत बड़ी सम्पत्ति मिल जाती है। इसे परमात्मा की अनायास कृपा कहा जा सकता है। बहुत बार लोग लाटरी आदि के आधार पर भी बिना किसी पुरुषार्थ के धनवान् बन जाते हैं और बहुत बार गुप्त धन मिल जाने से भी धनात्मक प्राप्त हो जाती है। स्थूलता यह परमात्मा की अनायास कृपा ही मालूम होती है। किन्तु यदि सूक्ष्म दृष्टि से देखा जाय तो पता चलेगा कि उस धन के पीछे किसी न किसी का पुरुषार्थ छिपा रहता है। जो धन अनायास मिला होता है, वह उसके वर्तमान अधिकारी के पुरुषार्थ का न सही किसी न किसी विगत अधिकारी के पुरुषार्थ का फल तो होता ही है। बिना किसी के पुरुषार्थ अथवा परिश्रम के उस धन का आपसे आप अस्तित्व में आ जाना सम्भव हो ही नहीं सकता है। कोई भी धन, कोई भी सम्पत्ति और कोई भी साधन आत्मोत्कर्ष नहीं होते। उनके लिये किसी न किसी को उद्योग करना ही होता है।
सत्य बात तो यह है कि वह सम्पत्ति हो तो उसी की है, जिसने उसके लिये उद्योग किया होता है। अब यह उसको चाहे दे जाये, दे दे अथवा किसी को पाने के लिये धरती में रख जाये। किन्तु पाने वाला उसका अधिकारी होने पर भी यथार्थ अधिकारी नहीं होता। ऐसी आकस्मिक सम्पत्ति बहुधा लोगों के पास ठहरी नहीं। वह किसी न किसी बहाने से वह ही जाती है। इस प्रकार बहुत-सा धन पाकर यदि कोई आदमी उसका ढेर सामने रखकर बैठ जाये और बिना कुछ किये उसे व्यय करता रहे तो वह कितने दिन चल सकेगी? शीघ्र ही जल-तपकर समाप्त हो जायेगी।
इस प्रकार अकस्मात् मिली सम्पत्ति भी तभी उपयोगी होती है और तभी ठहरती है, जब मनुष्य अपना भी कुछ पुरुषार्थ करता चलता है और उस उपार्जन के अनुपात से व्यय करता है। इस प्रकार उसकी बनावटता की स्थिरता का आधार उसका अपना पुरुषार्थ ही होगा न कि वह आकस्मिक सम्पत्ति जो उसे उत्तराधिकार, लाटरी अथवा धरती आदि से अनायास मिल गई होती है। सफलता, श्रेय और सम्पन्नता का आधार मनुष्य का अपना पुरुषार्थ ही होता है। इस सत्य को कभी न भूलना चाहिये।
ईश्वर की अनायास कृपा की प्रतीक्षा करने वाले अकर्मण्य लोग संसार में कोई श्रेय प्राप्त नहीं कर सकते। क्योंकि उसकी ऐसी कृपा का कोई अस्तित्व नहीं है। वह न लोक में है और न परलोक में तो कर्मठ लोग अपने-अपने पुरुषार्थ के अनुसार उत्पन्न करते हैं। अपनी इस विशाल सृष्टि में जब परमात्मा ने अनन्त वैभव, अनन्त ऐश्वर्य और अनन्त साधन भर देने की पहले से ही अनन्त कृपा कर दी है, तो उनको पाने, उठाने और चूमने के लिये उसकी कृपा आशा करने का क्या अर्थ है। इसका अर्थ तो यह है कि जो राह बतलाये वह साथ चले, जो भोजन दे वह हाथ से खिलाये भी। कैसी विचित्र विलक्षण और आलोकित बात है। विभूतियों का भण्डार भरा पड़ा है। सफलताओं के सागर लहरा रहे हैं और श्रेय संसार में सब और दीख रहे है। कोई भी पुरुषार्थ तथा परिश्रम द्वारा पात्रता प्रमाणित करके उनको प्राप्त कर सकता है। इस सुविधा, सरलता और अवसर के होते हुए भी यदि कोई हाथ पर हाथ रखे हुए उन्हें योंही या सेना चाहता है तो सिवाय इसके कि बहते बैठा-बैठा मुँह ताकें और हर आकांक्षा के लिये तरसे, उसके भाग्य में कुछ न होगा।
“लक्ष्मी उद्योगी पुरुष सिंहों को प्राप्त होती हैं।” “सफलता और श्रेय पुरुषार्थी का भाग होता है।” सम्पन्नता तथा सम्पत्तिशाली परिश्रमी क अधिकार होना है-इन सत्यों में किसी प्रकार भी अपवाद घटित नहीं किया जा सकता। संसार में एक नहीं असंख्यों प्रकार की विभूतियाँ भरी पड़ी हैं। ये सब मनुष्य के सिवाय और किसी के लिये नहीं है। नित्य ही लोग पात्रता प्रमाणित करके उन्हें पाते और प्रसन्न होते रहते हैं कोई दूसरे लोग उन्हें क्यों नहीं प्राप्त कर सकते। उन्हें प्राप्त करने का सभी को समान अधिकार है। किन्तु इस अधिकार के साथ कर्तव्य भी जुड़ा हुआ है। यह कर्तव्य यह है कि उसके पाने के लिये परिश्रम किया जाय, पसीना बहाया जया, पुरुषार्थ और उद्योग किया जाये। कर्तव्य का पालन किए बिना कोई भी अधिकार साकार नहीं होता।
संसार परमात्मा की लीला-भूमि और मनुष्य की कर्म भूमि है। यहाँ पर पग-पग पर प्रतियोगिता में, परीक्षा में अपने को डालकर पात्रता प्रमाणित करनी होती है। उसमें विजय प्राप्त करने पर ही पुरस्कार मिलता है। परीक्षा प्रतियोगिता उत्तीर्ण किए बिना न तो आज तक किसी को सफलता तथा श्रेय मिला है और न आगे ही मिलेगा। जिसे श्रेय एवं सफलता की आकांक्षा है, वह अपने को प्रतियोगी मानकर इस कर्मभूमि में अपनी कर्म तथा कर्तव्यशील का प्रमाण दे और तब देखे कि उसे मनोवाँछित फल मिलता है या नहीं।
परिश्रम, परिश्रम और केवल उचित परिश्रम ही सफलता का आभार। इसके लिये परमात्मा की अनायास कृपा पर निर्भर करना अनाधिकार चेष्टा है, जो अपनी सहायता आप करते हैं। उस परमपिता ने मनुष्य को पहले से ही बल, बुद्धि और विशेषताओं से भरा शरीर देकर महती कृपा कर दी है, साथ ही उसने सारी विभूतियाँ और समस्त ऐश्वर्य इस विराट विश्व में बिखेर दी हैं। अपनी योग्यता और पात्रता बढ़ाइये अपना हो जाइये। आपको सफलता अवश्य मिलेगी तदापि यदि एक-दो चार -छः दस-बीस बार भी असफलता मिले तो भी निरास अथवा हतोत्साह न होइए और न पुरुषार्थ की महिमा में विश्वास खोकर परमार्थवादी बनिये प्रयत्न करते जाइये, अधिकाधिक पसीना बहाते चलिये आप जीतेंगे। क्योंकि संसार में सभी को सफलता के शिखर पर पहुँचने के लिये न जाने कितनी असफलताओं का सामना करना पड़ता है। परिश्रम, पुरुषार्थ तथा श्रेय एक सफलता के अमोल बीज है, जो न कभी व्यर्थ हुए है और न आगे होंगे। वह दूसरी बात है कि भूमि के अनुसार उन्हें फलीभूत होने में थोड़ा विलम्ब लग जाये। सो इसके लिये मनुष्य को धैर्य तथा स्थिरता की सँभाल रखनी चाहिये।
महर्षि रमण के आश्रम के समीपवर्ती गाँव में एक अध्यापक रहते थे। एक बार अपने कौटुम्बिक जीवन से वे अत्यधिक क्षुब्ध होकर आत्मा-हत्या करने की बात सोचने लगे। किसी निर्णय पर पहुँचने से पहले उन्होंने महर्षि की सम्मति जाननी चाही। अतः एक दिन वे आश्रम पहुँचे। स्वामी जी आश्रम वासियों के भोजन के लिये पत्तलें बना रहें थे। स्वामी जी अध्यापक के आने का अभिप्राय समझ गये। अध्यापक महोदय उन्हें प्रणाम करते हुए बोले-भगवान!आप इन-पत्तलों को इतने परिश्रम के साथ बना रहे हो और आश्रम वासी इनमें खाना खाकर फेंक देंगे “ महर्षि मुस्कराते हुए बोले- “सो तो ठीक है, वस्तु का पूर्ण उपयोग हो जाने पर उसे फेंक देना बुरा नहीं, तो तब है, जब उसे अच्छी अवस्था में ही खराब करके फेंक दिया जाये।” अध्यापक स्वामी जी के अभिप्राय को समझ गये और आत्मा-हत्या का इरादा छोड़ दिया।
समाज भावना और में मनुष्य का व्यक्तिगत स्वार्थ बहुत घातक तत्व है। यह बात गलत नहीं है कि जीवन रक्षा के लिए मनुष्य की कुछ अपनी व्यक्तिगत आवश्यकतायें भी होती है। उनकी पूर्ति करना अनुचित नहीं कहा जा सकता। किन्तु जब यह अनुचित स्वार्थ केवल स्वार्थपरता में बदल कर मर्यादाओं का उल्लंघन करने लगता है, तब मनुष्य को मनुष्य न रखकर पिशाच बना देता है।
एक मात्र स्वार्थ परायण व्यक्ति अपनी आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए ऐसे ऐसे अनुचित मार्गों का अवलम्बन लेने लगता है, जिसे देख, सुनकर मनुष्यता का सिर लज्जा से नीचा हो जाता है। जब उचित, अनुचित का विचार छोड़कर कोई मनुष्य जैसे भी बने अपना स्वार्थ सिद्ध करने की नीति अपनाने लगता है। किसी एक व्यक्ति की देखा देखी दूसरे व्यक्ति भी स्वार्थ परायण होकर उसकी अनुचित नीति का अनुसरण करने लगते है। धीरे धीरे ऐसे स्वार्थी व्यक्तियों की संख्या बढ़ने लगती है और कोई सभ्य समाज असभ्यता की ओर बढ़ने लगता है। समाज में छीना झपटी, आपाधापी, छल कपट, शोषण, संघर्ष की परिस्थितियाँ उत्पन्न होने लगती है। जिसके परिणामस्वरूप समाज, विश्रृंखल निर्बल और अरक्षित हो जाता है। दूसरे समाज ऐसे अवसर का लाभ उठाते है और प्रयत्न करते है कि उस मूर्ख समाज को अपने अधीन कर ले, उस पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर लें।
इतिहास साक्षी है कि हमारे अपने समाज में जब जब स्वार्थपरता का घातक विष फैला तब तब उसी प्रकार दुर्दिन देखने पड़े। स्वार्थी और दम्भी लोगों ने अपने ने अपनी भयंकर नीति से समाज में संघर्ष उत्पन्न किया, उसकी एकता और संगठन शक्ति को नष्ट किया, समाज निर्बल बना और उस पर आपत्तियों के पहाड़ टूटने लगे। विदेशियों ने समाज की इस निर्बलता से लाभ उठाकर ही हमारे देश को लूटा और उस पर अपनी सत्ता स्थापित की।
इस दीर्घजीवी आपत्ति का कारण समाज के वे थोड़े से स्वार्थी व्यक्ति ही तो थे, जिन्हें अपने व्यक्तिगत लाभ की अन्धता में न तो देश का भविष्य दिखलाई दिया और न समाज का अमंगल स्वार्थपरता का विष इतना भयानक होता है कि किसी भी क्षेत्र में उनका अस्तित्व सम्पूर्ण समाज को विषाक्त बनाकर जर्जर कर देता है।
पता नहीं स्वार्थान्ध व्यक्ति यह क्यों नहीं सोच पाते कि जब वे अपनी अनुचित नीति से समाज को निर्बल, विश्रृंखल और अव्यवस्थित बना देंगे तो उसकी सुरक्षा खतरे में पड़ जायेगी और तब उसके साथ ही उनका अस्तित्व भी सुरक्षित न रह पायेगा। कमजोर और असमर्थ समाज न अपनी ही सामूहिक रक्षा कर पात है और न व्यक्ति की। अपने निम्न स्वार्थता के लिए समाज की इतनी बड़ी हानि करने वाले व्यक्ति को और कुछ भी कहा जाये, मनुष्य नहीं कहा जा सकता।
स्वार्थ से प्रेरित जब किसी एक दिशा में शोषण का चक्र चलता है, तब उसके कुत्सित प्रभाव से कोई भी दिशा नहीं बच पाती। बुराई एक संक्रमण रोग की तरह होती है, अंकुर पाते ह वह बरसाती वनस्पति की तरह फैलकर शीघ्र ही पूरे समाज को ग्रास कर लिया करती है। सामूहिक भावना अथवा सामाजिक चेतना से शून्य होकर जब कोई स्वार्थी व्यक्ति उसके बदले में किसी और का शोषण करने लगता है और इस प्रकार फल यह होता है कि समाज के सदस्यों के बीच से परस्पर विश्वास तथा सहयोग की भावना उठ जाती है।
उन्नति के इन स्तम्भों के टूटते ही समाज खण्डहर की तरह भर भर कर गिर पड़ता है। उसकी बहुमूल्य विचार धारायें, सुन्दर संस्कृति और उज्ज्वल सभ्यता या तो नष्ट हो जाती है अथवा संसार में उपहास का विषय बन जाती है। सामाजिक जीवन में स्वार्थ बड़ा घातक विष है। इससे सदैव ही समाज की रक्षा करते रहना चाहिये। अन्यथा यह स्वार्थी को तो मिटा ही देता है, समाज को भी कहीं का नहीं रखता।
स्वार्थ के दोष से बड़े बड़े बलवानों और शक्तिमानों को में मिलते देर न लगी। कंस, जरासन्ध, हिरण्यकश्यप, हिरण्याक्ष, नहुष, बेन आदि न जाने कितने प्रतापी राजा बात की बात में नष्ट हो गये। यही तक नहीं, स्वार्थ न इस सीमा तक उनका पतन कर दिया दिये वे मनुष्य शरीर में भी असुर और राक्षस बन गये। स्वार्थ सिद्धि के लिए ऐसे ऐसे जघन्य काम किए कि जिसके लिये आज तक थूके जाते है। लोभ और स्वार्थ सभी पापों की जड़ मानी गई है। इसका कुचक्र जिस पर चल जाता है, वह सदा के लिए मिट जाता है, फिर चाहे वह व्यक्ति हो, वह सदा के लिए मिट जाता है, फिर चाहे वह व्यक्ति हो, समाज हो अथवा राष्ट्र।
जिस परमात्मा ने मनुष्य को पैदा किया उसी ने उसके जीवन के साधन भी संसार में उत्पन्न किये। उसका इस निर्माण में कभी भी वह अन्यायपूर्ण मन्तव्य नहीं रहा है कि कुछ व्यक्ति तो साधनों में कर ले और बाकी का बहुमत जीवन यापन की आवश्यक पूर्ति के लिए भी अभाव ग्रस्त रहे। परमात्मा को तो अपनी सारी प्रजा समान रूप से प्यारी है। वह क्यों न चाहेगा कि जगत न समान रूप से उसके दिए साधनों को उपयोग करे। किन्तु खेद है कि समाज के स्वार्थी व्यक्ति प्रभु की इस मंगल इच्छा में भी विघ्न डालते है। यद्यपि वे अपने वे अपने इस अपराध के लिए रोगों, दोषों, शोक संतापों निन्दा, भर्त्सना और राज नियमों द्वारा दण्डित होते रहते है, तथापि अपनी करती से बाज नहीं आते।
स्वार्थी व्यक्ति मनोविकार में शुद्ध पशु होता है। उसका न तो कोई आदर्श होता है और न सिद्धान्तवाद गुणों से भी उसका जीवन शून्य होता है। जिस शक्ति से उसका स्वार्थ सिद्ध होने की आशा होती है, उसकी पदधूलि भी वह अपने सिर पर चढ़ा लेने में संकोच ही करता, फिर चाहे वह व्यक्ति कितना ही निकृष्ट तथा विचारी क्यों न हो। कोई भी बुरे से बुरा मार्ग स्वार्थी व्यक्ति अपने लाभ के लिए अपना सकता है, चाहे वह विशुद्ध पापमय ही क्यों न हो। स्वार्थी में न केवल दीनता का दोष ही होता है, उसमें छल कपट, झूठ फरेब, मक्कारी और विश्वासघात जैसे और भी न जाने कितने दोष होते हैं। स्वार्थी व्यक्ति अपने धर्म, देश, राष्ट्र और समाज तक को बेच लेने में नहीं लजाता।
स्वार्थी व्यक्ति न केवल स्वयं भ्रष्टाचारी होता है, बल्कि समाज में इस दोष को प्रोत्साहन भी देता है। स्वार्थी व्यक्ति स्वभाव से ही असहयोगी होता है। एक बार शत्रु और विरोधी से तो सहायता और सहयोग की आशा को जा सकती है, किन्तु स्वार्थी व्यक्ति से नहीं स्वार्थी व्यक्ति जितना किसी से अपना काम निकाल लेने में मक्कार होता है, उतना ही किसी दूसरे के काम के लिए जीवाश्म भी होता है। उसका संकीर्ण और ईर्ष्यालु स्वभाव उसे सामाजिक सहयोग से सर्वदा विरत रखा करता है। दूसरे की उन्नति और प्रगति में सहायक होना तो दूर किसी को बढ़ता देखकर उसकी छाती फटने लगती है। किसी की सुख सुविधा और मान प्रतिष्ठा उसे फूटी आँख नहीं सुहाती। वह तो संसार का सारा वैभव, सारी सम्पदा और सारा मान सम्मान केवल अपने लिये ही सुरक्षित कर लेना चाहता है। ऐसे संकीर्ण और अधीर व्यक्ति समाज की प्रगति और उन्नति के बड़े भारी शत्रु होते है।
स्वार्थ वृत्ति एक जहरीले साँप की तरह होती है। यह जब अपना फन फैलाती है तो शत्रु मित्र का विचार किए बिना समान रूप से सबको डस लेती है। एक स्वार्थ वृत्ति से ही मनुष्य में न खाने और कितनी दूषित वृत्तियाँ आ जाती है। ईर्ष्या द्वेष काम क्रोध लोभ ओर मोह आदि के अनर्थकारी विकार एक स्वार्थ की ही सन्तति समझनी चाहिये। लौकिक और पारलौकिक, भौतिक तथा आध्यात्मिक, वैयक्तिक अथवा सामाजिक किसी भी कल्याण के लिए मनुष्य की स्वार्थ वृत्ति बड़ी भयानक पिशाचिनी है। अपने प्रभाव में लेकर यह मनुष्य को अपने अनुरूप पिशाच ही बना लेती है।
इसको प्रश्रय देने वाला व्यक्ति माता पिता भाई बहन आदि के सारे सम्बन्ध भूल जाता है। कंस ने अपनी बहन देवकी की आठ सन्तानों को मार डाला, बालि ने स्वार्थ के वशीभूत होकर सुग्रीव पर क्या क्या अत्याचार नहीं किये कैकेयी ने राम जैसे योग्य पुत्र को चौदह वर्ष के लिए वनवास दिलाया और कौरवों ने अपने भाई पाँडवों को मिटा डालने में कोई करार नहीं रखी। इन आततायियों की यह सब करनियाँ पैशाचिक लक्षण के सिवाय और क्या कही जा सकती है।
मनुष्य और मनुष्य समाज का मंगल स्वार्थ जैसी अनावृत्तिं में नहीं बल्कि त्यागपूर्ण भावना के अंतर्गत निवास करता है। आदि से लेकर आज तक मानवता के सम्मुख जब जब संकट और अनर्थ का समय आया तब तब उसका कारण मनुष्यों की यह स्वार्थपरता रही है। इसके विपरीत जब-जब सुख-शाँति और सुकाल के दर्शन हुए है तब तब समाज के सदस्यों के बीच त्याग और पारस्परिकता की भावना का बाहुल्य रहा है। सुख शाँति, सुकाल और सम्पन्नता सबको वाँछित है। किन्तु यह प्राप्त तभी हो सकती है, जब व्यक्ति मिलकर समाज में स्वार्थ का बहिष्कार करे और त्याग भावना की प्रतिष्ठा।
गुरु नानक भ्रमण करते हुए हरिद्वार पहुँचे। कोई धार्मिक पर्व था। गंगातट पर भारी भीड़ थी। श्रद्धालु लोग आते और गंगा स्नान करते। प्रातःकाल का समय था, गुरु ने सोचा स्नान और भवन के लिए इतना उपयुक्त स्थान कहाँ मिलेगा। वे भी गंगातट की ओर स्नान के लिए चल पड़े।
वहाँ जाकर देखते क्या है, एक व्यक्ति पूर्व की ओर जल उलीच रहा है। उसे देख कर दूसरे साथी ने भी अर्घ्य देना प्रारम्भ कर दिया तात्पर्य यह है कि जो भी स्नान के लिए आता वह तर्पण की बात न भूलता। गुरु नानक ने यह देखकर एक व्यक्ति से पूछा-आप अभी वह क्या कर रहे थे? उस व्यक्ति ने कुछ रुखाई और कुछ दुष्टभाव से कहा-कर क्या रहे थे-पितरों को तर्पण कर रहे थे।
गुरु ने कपड़े उतारे, स्नान किया और पीछे आकाशाभिमुख खड़े होकर गंगा जी से बाहर पानी उलीचने लगे। पास ही खड़े लोगों को अटपटा सा लगा। उन्होंने पूछा-महाशय आप यह क्या कर रहे है, तर्पण पूर्वाभिमुख होकर किया जाता है या पश्चिम की ओर मुख करके फिर ऐसे तो नहीं किया जाता है, जैसे आप कर रहे है। यह दृश्य देखने कि लिए तब तक काफी भीड़ इकट्ठी हो गई थी।
नानक ने मुस्कराकर उत्तर दिया-भाइयों हमारे खेत पंजाब में है, उन्हें पानी दे रहा हूँ। खेते सूख रहे होंगे।
पास खड़े आदमी हँस पड़े, एक वृद्ध आदमी ने कहा-गुरु जी, इतनी दूर यहाँ से पंजाब और वहाँ आपके खेत भला पानी वह कैसे पहुँच जायेगा।
अब गुरु की बारी थी। उनने कहा-भाइयों पिता लोक से दूर नहीं है, यदि आपका दिया पानी पितर लोक पहुँच कर पूर्वजों को संतोष दे सकता है तो मेरा तर्पण पंजाब के खेतों में क्यों नहीं पहुँच सकता?
लोग स्तम्भित थे, कुछ ठीक समझ नहीं पाये। पास ही एक बालक खड़ा था, उसने समझाया ठीक ही तो है-हम पितरों के प्रति श्रद्धा रखें पर जो जीवित पितर माता पिता, पड़ोसी और समाज के दूसरे पीड़ित लोग है, उनके प्रति भी तो अपनी श्रद्धा बनाये रहे। यदि इनके प्रति श्रद्धा और परोपकार का भाव नहीं रख सकते तो उस तर्पण से ही क्या लाभ?
25 अगस्त 1966 को नार्थ डेकोटा में एक वायुसेना के अधिकारी को रेडियो तरंगों के द्वारा सन्देश भेजने में एकाएक बाधा अनुभव हुई। अधिकारी उसका कारण समझ नहीं पा रहा था, तभी एक दूसरे ऑफिसर ने आकर बताया कि उसने एक उड़न तश्तरी यू0 एफ॰ ओ॰ (अन आइडेन्टीफाइड आब्जेक्ट) देखी है। उससे गहरे लाल रंग का प्रकाश निकल रहा था। वह कभी ऊपर, कभी नीचे उड़ रही थी। इसी समय एक रैडार ने भी 100000 फीट ऊपर उड़ते हुए, एक गोल तश्तरी पर्दे पर (फ्लैश) देखी। उड़ान तश्तरी जब तक दिखाई देती रही, तब तक संचार व्यवस्था सिगनल-सिस्टम बिलकुल ठप्प रही, इसके बाद सन्देशों का आवागमन फिर प्रारम्भ हो गया।
अब तक यह उड़न तश्तरी दक्षिण की ओर मुड़ चुकी थी और यह अनुमान था कि कोई 15 मील की दूरी पर वह पृथ्वी पर उतर गई है, इसलिये अस्त शस्त्रों से सुसज्जित वायुसेना का एक कुशल दस्ता (स्क्वेड्रेन) उधर दौड़ाया गया। किन्तु उनके वहाँ पहुँचने तक 8 मिनट में ही वह गोला न जाने कहाँ अदृश्य हो गया। इसी बीच दूसरी तश्तरी उत्तर की ओर दिखाई दी, उसे भी रैडार ने देखा पर जब तक दस्ता उधर दौड़े वह भी गायब हो गई।
3 अगस्त 1965 की बात है, सीता आना (कैलीफोर्निया) के पास एक उड़न तश्तरी बाई ओर से आई और सड़क पर देर तक इस तरह चक्कर लगाती रही, मानो वह किसी वस्तु का ढूँढ़ रही हो, फिर दायें मुड़ी और खेतों का चक्कर लगाया। सड़क निरीक्षक रेक्स हेफ्लिन उड़न तश्तरी की इन दृश्यों को अपने कैमरे में खींच लिया। उसका एक चित्र धर्मयुग के 1 दिसम्बर 1968 के अंक में प्रकाशित भी हुआ है। उसमें सड़क के बाई ओर ऊपर उड़न तश्तरी साफ दिखाई देती है।
5 अगस्त 1953 में एक और आश्चर्यजनक घटना ब्लैकहाक, साउथ डेकोटा में घटी। चालकों ने रात में आकाश की ओर अद्भुत वस्तुएँ देखी। वायु सेना के एक अड्डे पर रैडार ने भी इन उड़ान तन्त्रियों को देखा। वायुयान चालक ने बताया कि वह सबसे अधिक चमकने वाले तारे से भी अधिक चमकदार कोई वस्तु देख रहा है। वह वायुयान से दुगुनी गति (स्पीड) से दौड़ रही थी। वायुयान के पीछे करते ही वह कही अदृश्य हो गई।
इसी तरह 6 नवम्बर 1957 के दिन ओटावा से 100 मील दूर वास्काटाँग झील के पास एक उड़ान तश्तरी रात के कोई 9 बजे आई, उसके कारण रेडियो की शार्ट और मीडियम दोनों लहरे बन्द हो गई थी। इस उड़न तश्तरी के दर्शकों में एक इलेक्ट्रानिक्स इंजीनियर भी था, उसने अपने रिसीवर को चालू करना चाहा पर उसे तीव्र कीट कीट की आवाज के अतिरिक्त कुछ सुनाई न पड़ा वह आवाज उड़न तश्तरी के माध्यम से किसी अन्य लोक के नियन्त्रण केन्द्र का संकेत थी या और कुछ, उसकी कुछ भी जानकारी नहीं है।
4 अक्टूबर 1967 को एक शाम को कनाडा के समुद्रीतट पर शागहार्बर के सैकड़ों निवासियों ने एक विचित्र वस्तु आकाश से निकल आते देखी। उसकी चमकदार किरणें पीछे एक कतार-सी छोड़ती आ रही थी। इसके बाद उसे लोगों ने समुद्र की सतह पर उतरते देखा। किरणों की कतार समुद्र में जाकर विलीन हो गई। 20 मिनट के भीतर ही पुलिस कर्मचारी घटना स्थल पर पहुँचे और उड़न तश्तरी के धँसने वाले स्थान की खोज करने लगे।
एक जहाज और आठ नावें भी उस खोज में सम्मिलित हुई। सेटेलाइट के नेत्र प्रकाश में केवल समुद्र के एक स्थान से पीले रंग का भाग निकलता दिखाई दिया। बहुत से बुलबुले भी निकल रहे थे। ऐसा वहाँ पहले कभी नहीं देखा गया था। फिर भी उड़ान तश्तरी का कोई प्रकाश नहीं दिखाई दिया दो दिन तक नौ सैनिक गोता खोर गोता लगाते रहे पर वहाँ किसी वस्तु या उड़न तश्तरी का कोई प्रमाण नहीं मिला।
हैसलबेक जर्मनी का वह जंगली हिस्सा जहाँ अमेरिका और रूस की सीमायें मिलती है, 11 जुलाई 1952 में एक विचित्र घटना घटित हुई। एक उड़न तश्तरी, जिसका व्यास कोई 8 मीटर होगा, के पास दो चमकीले लबादे पहने, छोटे छोटे मनुष्य खड़े थे। वहाँ का एक निवासी अपनी 11 वर्षीय पुत्री के साथ जा रहा था। उसे देखते ही वह लबादाधारी उड़न तश्तरी में समा गये और देखते देखते अन्तरिक्ष में विलीन हो गये।
एनिड ओकलाहोमा के पुलिस स्टेशन में 29 जुलाई 1952 को एक आदमी ने प्रवेश किया। वह डर के मारे थर थर काँप रहा था। उसने अपना नाम सिड यूवैक बताया। वह हमारी बुरी तरह भयग्रस्त था कि कोई स्वप्न में भी उसके अभिनय करने की बात नहीं सोच सकता था। उसने बताया कि एक उड़न तश्तरी उसका अपहरण करना चाहती थी वाइसा और दाकोमिस के मध्य 81 हाइवे पर वह अपनी कार से जा रहा था कि एक जबर्दस्त उड़न तश्तरी बड़े वेग से कार के ऊपर के कारण हवा का इतना तीव्र झकझोरा आया कि कार थपेड़ा खाकर सड़क से बाहर जा गिरा। तश्तरी घड़ी के पेण्डुलम की तरह कार के ऊपर थोड़ी देर तक झूलती रही और फिर एकाएक गायब हो गई।
काल्पनिक-सी लगने वाली उड़न तश्तरियों की यह घटनायें अब तथ्यों के इतने समीप आ गई है कि उन्हें ‘झूंठ’ कहकर टाला नहीं जा सकता, यदि हमारी धरती में विज्ञान का इस तरह विकास हो सकता है कि यहाँ के लोग समुद्र में कूद कर कई दिन तक उसके भीतर रह सकते हैं, खेतों, खलिहानों, सड़कों, शैलाबग्रस्त क्षेत्रों का निरीक्षण कर सकते हैं। आकाश में दूर-दूर तक मंगल, शुक्र और चन्द्रमा की सतह तक अपने स्पूतनिक (राकेट) पहुँचा सकते हैं तो इसमें आश्चर्य ही क्या है कि ब्रह्माण्ड के किसी और नक्षत्र में भी इस तरह का वैज्ञानिक विकास हो चुका हो और वहाँ के निवासी भी पृथ्वी वासियों से संपर्क या सम्बन्ध स्थापित करना चाहतें हो। या फिर यहाँ की परिस्थितियों का अध्ययन कर रहे हो, ताकि एक दिन यहाँ के लोगों उसे छीन कर अपने यहाँ के निवासियों को लाकर बसा सकें।
उन्नीसवीं शताब्दी में यह सारी बातें यों ही झुठला देने की हो सकती थीं बीसवीं सदी में नहीं भगवान् राम को विरथ देखकर आकाश से इन्द्र ने विमान भेजा, मातुतिन उसका चालक था। लंका से अयोध्या पहुँचाने के लिए भी पुष्पक विमान आया था। बेबीलोन के हिब्रू भविष्यवक्ता इजकिल ने भी इस तरह का एक विवरण ईसा से 1130 वर्ष पूर्व लिखा था और बताया कि एक दिन उसने देखा कि एक तूफान सा उठ रहा है, उसमें एक प्रचण्ड बादल फँस गया है। धीर-धीरे बादल से एक गोला निकला, उसे देखकर आँखें चौंधिया जाती थी। उसमें से चार जीवित प्राणी निकले। मुझे पृथ्वी से एक चक्का ऊपर उठता भी दिखाई दिया। वह चारों जीवित प्राणी भी नहीं दिखाई दिये। उसके इस कथन को तब भ्रान्त प्रलाप कहा गया था पर आज का वैज्ञानिक यह मानने को विवश है कि पृथ्वी का सम्बन्ध यदि करोड़ों वर्ष पूर्व से ही लोकान्तर वासियों से रहा हो तो इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है।
शक्तिशाली दूरवीक्षण यन्त्रों और गणों द्वारा अनेक वैज्ञानिक अथाह अन्तरिक्ष में तैरते हुए ग्रहों के सम्बन्ध में सही जानकारी प्राप्त करने के लिए दिन रात जुटे रहते है, अव वे भी मानने लगे है कि ब्रह्माण्ड के करोड़ों ग्रहों में से किसी न किसी में बुद्धिमान् प्राणियों का आविर्भाव अवश्य है और वे भी हमारी तरह दूसरे जगतों से संपर्क स्थापित करने के प्रयत्न में संलग्न है। मनुष्य ने स्वयं ऐसे रैडार स्टेशन बना लिये है, जो दस प्रकाश वर्षों की दूरी तक आपस में संचार सम्बन्ध बनाये रख सकते है। यहाँ यह समझ लेना आवश्यक है कि ग्रह नक्षत्रों की दूरी इतनी अधिक है कि उस गज, फिट, इंच या मीलों, मीटर में नहीं नापा जा सकता, वह प्रकाश की गति से नापा जाता है। प्रकाश की एक सेकेण्ड में एक लाख छियासी होगा कि उस नक्षत्र तक हमारी पृथ्वी से 1 लाख 83 हजार मील प्रति सेकेंड की गति से चलने में 1 वर्ष लगेगा।
खगोल शास्त्रियों का मत है कि 10 प्रकाश वर्ष की दूरी में कुल 10 नक्षत्र ही ऐसे हैं, जिनमें थोड़ा बहुत बुद्धिमान प्राणियों के अस्तित्व की सम्भावना है पर यदि हजार या करोड़ प्रकाश वर्ष की सीमा से ऊपर उठ जायें तो सम्भव है, वहाँ अधिक बुद्धिमान प्राणी मिलें किन्तु पृथ्वीवासी की आयु हजार वर्ष की हो नहीं सकती, इसलिये 1 हजार वर्ष की प्रतीक्षा में न ही वहाँ जाने का
क्योंकि यदि किसी वैज्ञानिक यंत्र के माध्यम से वहाँ जाने का प्रयत्न किया भी जाय तो मनुष्य बीच में ही कहीं मर जायेगा।
यही बात दूसरे लोकों से आने वाले प्राणियों के लिये भी है, इसलिये वैज्ञानिक सन्देह करते है कि उड़न तस्करों के उतरने की बात कुछ बुद्धि संगत है भी या नहीं। पर उन्हीं के कुछ अनुसंधान इस असम्भावना को भी भगा देते है। जीव-जन्तुओं पर किये गये अनुसन्धानों से पता चला है कि यदि किसी प्राणी को जीवित अवस्था में बहुत अधिक ठण्डा कर दिया जाये तो वह एक प्रकार की सुषुप्तावस्था (हाइबरनेशन) में चला जाता है। उस समय इतनी गहरी नींद आ जाती है कि कोई पास से गुजरे तो यही समझेगा कि यह किसी की लाश हे, किन्तु सौ वर्ष या उससे भी अधिक समय बाद वह नींद टूटने पर प्राणी बिलकुल वैसा ही स्वरूप और थकावट रहित अनुभव कर सकता है, जैसा कि सौ कर जागने के पश्चात् यदि इस सिद्धान्त को व्यवहारिक बनाया जा सके तो सम्भव है कि हजार प्रकाश वर्ष की दूरी मनुष्य सुषुप्तावस्था में पार कर ले और किसी नक्षत्र में पहुँचने पर फिर जाग उठे। वहाँ के अध्ययन के पश्चात् फिर उसी स्थिति में एक हजार वर्ष बाद पृथ्वी पर लौट आये। तब अधिक से अधिक यही होगा कि यहाँ के लोग कई सभ्यताओं बदल चुके होंगे और अंतरिक्षवासी का अपना ही परिचय देना कठिन हो जाये।
यह समस्या दूसरी तरह से सुलझ सकती है। हमारे शास्त्रों में मनुष्यों की आयु कई-कई हजार वर्ष बताया गया है शंकर की द्वितीय पत्नी उमा ने तो कई हजार वर्ष केवल तपस्या ही की थी। लोग उसे गप्प कहते हैं पर आज का वैज्ञानिक वह मूल नहीं करना चाहता। वह मानता है कि वृद्धावस्था एक रोग है और उसे दूर किया जा सकता है। जीव कोशिका पर चल रहे अनुसन्धान एक दिन मनुष्य की आयु की इच्छानुरूप बना सकते हैं, अब इसमें सन्देह नहीं रह गया, श्रम और समय ही अपेक्षित रहा है।
अन्तरिक्ष यानों से रेडियो सन्देह प्राप्त करने में जो समय लगता है, उसे बहुत कम करने के लिये वैज्ञानिक किसी ऐसे ‘क्रिस्टल’ की खोज में है, जो ‘मन’ की गति से काम कर सकता हो। उस अवस्था में यह देरी सिकुड़ कर इतनी रह जायेगी, जितनी परस्पर बातचीत में होगी। किसी ऐसे तत्व की सम्भावना से वैज्ञानिक इनकार नहीं करते। वैज्ञानिकों ने उसकी पुष्टि में अपेक्षित तीव्र गति (रिलेटिव वेलौसिटी) का एक सिद्धान्त भी खोज लिया है, उसके अनुसार जो रेडियो सन्देह किसी स्थान को पहुँचाने में या कोई वस्तु अन्य ग्रह में पहुँचाने में दस हजार वर्ष लेती हो वह केवल 20 वर्ष में ही पहुँचाई जा सके। यद्यपि ब्रह्माण्ड की अनंता और असीमितता के आये वह अपेक्षित तीव्र गति भी बहुत न्यून है। पर उससे इस सम्भावना की पुष्टि तो हो ही जाती है कि ऊपर ब्रह्माण्ड के किसी नक्षत्र में पहुँचने के लिये समय और गति को नियन्त्रित और अपेक्षित बनाया जा सकता है।
इस प्रयास में बहुत कुछ सहयोग ब्रह्माण्ड भी दंगा। हमें यह पता है कि पृथ्वी एक भयंकर गति से घूमती है और सूर्य का भी चक्कर लगाती है। सूर्य स्वयं भी भ्रमण करता है और अपने सौर-मण्डल के दूसरे नक्षत्रों को भी चक्कर लगाने के लिये विवश करता है। सौर मण्डल में चक्कर काटते हुए नक्षत्र सामूहिक रूप से किसी अन्य नक्षत्र का चक्कर काटता है। ऐसे-ऐसे अनेक सौर मण्डल परिक्रमा करने में लगे हुए हैं। परिक्रमाशील की ओर उड़ने वाला पृथ्वी के यान को गणित के ऐसे सिद्धान्त के सहारे भेजा जाना सम्भव है, जिससे आधी दूरी तो वह चले और आधा भाग वह नक्षत्र चलकर पास आ जावे जिसमें उसे जाना है।
इन सब सम्भावनाओं के व्यक्त करने का एक ही कारण है और वह यह है कि यदि इन सब सम्भावनाओं का विकास किसी अन्य नक्षत्र ने कर लिया होगा और वे पृथ्वी से संपर्क साधना चाहते होंगे तो वे निश्चय ही उड़न तश्तरियों में बैठ कर पृथ्वी में आते होंगे। इसलिये उड़न तश्तरियों के इन प्रसंगों को मिथ्या नहीं कहा जा सकता।
अपनी-अपनी जानकारी गुप्त रखने की भी एक परम्परा वैज्ञानिक देशों में है। इसलिये विज्ञान के जो आविष्कार और तथ्य सामने आ चुके हैं, उससे वैज्ञानिकों और राजनीतिज्ञों की डायरियों में गुप्त हैं, वह जैसे-जैसे सामने आती जायेंगी, यह सिद्ध होता जायेगा कि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के ग्रह-नक्षत्र एक ही कुटुम्ब के सदस्य है, उनमें उसी तरह सम्बन्ध स्थापित किया जा सकता है, जैसे एक गाँव से रखते हैं।
अर्जेन्टीना के शोष-विद्वान् डा. पेड्रो रोमनुक ने व्यूनस एरस में लगभग इसी तथ्य को प्रमाणित करते हुए बताया है कि रूस ओर अमेरिका दोनों के पास दूसरे ग्रहों से आई हुई टूटी-फूटी उड़न तश्तरियाँ है। वह कैनेडी विश्वविद्यालय के अंतर्गत- ‘बायोसाइको सिंयेसिस’ भाषण-माला के उद्घाटन समारोह में बोल रहें थे। उन्होंने रहस्योद्घाटन करते हुए कहा- ‘‘रूस को एक ‘नर्स-शिप’ मिला है, जिसका अध्ययन वहाँ के विद्वानों ने किया है पर उन्होंने उस सम्बन्ध में कोई बात नहीं बताई। इसी प्रकार अमेरिका को अलामों गोर्डों, न्यूमैक्सिको क्षेत्र में एक उड़न तश्तरी मिली।
उत्तर पश्चिमी अमेरिका वेधशाला के निर्देशक श्री सिलास न्यूटन ने अमेरिका वायु गुप्त बरी केन्द्र को इसकी सूचना दी। उन्होंने यह भी बताया कि इस उड़न तश्तरी में दरवाजों की जगह बाहर निकलने के छोटे-छोटे छेद बने हुए हैं इनमें से केवल छोटे आकार के प्राणी गुजर सकते है। स्वच्छ और कड़ी धातु की इस उड़न तश्तरी में छोटे आकार के 6 शब भी पाये गये। इनमें पाये गये प्राणियों का आकार-प्रकार मनुष्यों से मिलता-जुलता है। ऐसा लगता है, उड़न तश्तरी का द्वार खराब हो गया तो वायु मंडलीय प्रभाव से उनकी मृत्यु हो गई। यह अन्तरिक्ष यान सौर-शक्ति से चलता है। इन प्राणियों ने किसी धातु का पारदर्शी नीला वस्त्र सा धारण किया हुआ था, इस धातु पर किसी कैंची या ज्वलनशील टार्च का भी कोई प्रभाव नहीं पड़ता।”
डा. रोमनिक ने उस सौर-शक्ति के बारे में विस्तार से कुछ नहीं बताया पर अब यह निश्चित हो चुका है कि कभी यहाँ जीवित प्राणी दूसरे नक्षत्रों से अवश्य आते रहें होंगे ओर उनका पृथ्वीवासियों से घनिष्ठ सम्बन्ध भी रहा होगा इस सम्बन्ध में कुछ अत्यन्त महत्वपूर्ण प्राचीन अवशेषों का विवरण किसी अगले अंक में देखें
ईरान के बादशाह ने एक नगर पर चढ़ाई कर दी और उसे चारों ओर से घेर लिया और आज्ञा प्रसारित कर दी- प्रातःकाल सब स्त्रियाँ अपने कीमती आभूषण लेकर अमुक स्थान पर पहुँच जायें। मनुष्य एक भी नहीं निकलना चाहिये।”
नगर में हलचल मच गई। प्रातःकाल सब स्त्रियाँ कुछ छोटे, कुछ बड़े गट्ठर लिये उस स्थान पर एकत्रित हुई। बादशाह को सन्देह हुआ गठरियों में और कुछ है। उसने सबके गट्ठर खुलवाये तो उनमें आदमी निकलें। बादशाह ने कड़ककर पूछा क्या, यही तुम्हारे आभूषण हैं? एक वृद्धा ने कहा-महाराज हमारे लिये पति ओर पुत्रों से बढ़कर कोई और सम्पत्ति नहीं-सोना-चाँदी तो मिट्टी है।”
बादशाह ने विचार किया जहाँ महिलायें इतनी कर्तव्य परायण हों, उन्हें वहाँ अधिकार नहीं जमाया जा सकता, वह चुपचाप सेना लेकर लौट गया।
ऐसा माना जाता है कि आत्मा स्वयं परिपूर्ण होने के कारण जो कुछ भी उसके सम्पर्क में आता है, उसे भी वह परिवर्तित कर देती है, बहुत उच्च आध्यात्मिक क्षमता वाले महापुरुष, योगी, महात्मा अपने आध्यात्मिक तेज या प्रभाव को रोगी मनुष्य पर इस प्रकार डाल देते है कि उसका सारा शरीर उससे थोड़े काल के लिये भरकर पूर्ण हो जाता है। प्राचीनकाल में गुरुकुलों में छोटे-छोटे विद्यार्थी ही नहीं वयस्क जिज्ञासु, साधक और वानप्रस्थ भी इसी आकांक्षा से जाया और साधन किया करते थे कि उन्हें वहाँ के गुरु तपोनिष्ठ आचार्य की प्राण-शक्ति का एक अंश मिल जायेगा ओर उससे आत्म-विकास की साधना काफी सुविधाजनक ओर सरल हो जायेगी।
कुछ लोगों को, जिन्हें पात्र समझा जाता था ओर यह विश्वास कर लिया जाता था कि यह शिष्य मेरी पात की हुई शक्ति को अपने स्वार्थ ओर इन्द्रिय सुखों में ही व्यय नहीं करेगा, उसे गुरुजन अपनी ओर से भी शक्ति दिया करते थे, शक्ति देने का यह क्रम समीपवर्ती पर ही नहीं होता था, दूरस्थ व्यक्ति को भी मनश्चेतना के माध्यम से प्राण-शक्ति भेजने का भी विधान था। इस पद्धति से विचार व सन्देश भी उसी प्रकार प्रेषित किये जाने का प्रचलन था, जिस तरह अब वायरलेस के माध्यम से एक स्थान के सन्देश लाखों मील दूर तक पहुँचा दिये जाते थे। अभी भी यह विद्या विलुप्त नहीं हुई। हमारा निजी जीवन भी इस तरह की सम्भावनाओं से ओत-प्रोत रहा है।
अपने प्रिय-परिजनों को किन्हीं अवश्यम्भावी कष्टों से बचाने, किसी ऐसे कार्य को न करने देने, जिसमें उसकी हानि हो, हमें कई बार अपनी प्राण-शक्ति का विपुल भंडार व्यय करना पड़ा है। बदले में हमें वह कष्ट मिले है। चाहते तो उस प्राण-शक्ति को बचाकर अपनी आयु दुगुनी तिगुनी कर सकते थे पर पूज्य गुरुदेव के विश्वास ओर अपनी आर्ष परम्परा को हमने निराश न होने देने का सदैव प्रयत्न किया है।
आज चिकित्सा के इतने अच्छे साधन ओर प्रशिक्षित डाक्टर हैं तो भी रोगी अच्छे नहीं होते फिर किसी दवा, दारु के बिना कोई रोगी कैसे अच्छा किया जा सकता है, दूरस्थ व्यक्ति पर अपने मनोबल को किस प्रकार चरितार्थ किया जा सकता है, यह बातें लोगों को अटपटी लगती है। प्रत्यक्षवादी लोग इन बातों पर विश्वास नहीं करते। उससे ऐसी कोई हानि नहीं कि इस मान्यता का अन्त ही हो जायेगा। तर्क-बुद्धि होना कोई बुरी बात नहीं उससे अन्धविश्वास की पोल ही खुलती है, दुःखद बात यह है कि एक अत्यन्त आवश्यक ओर लोकोपयोगी पहलू उपेक्षित ओर अधूरी पड़ा है। जिस विद्या से हजारों लोग चिकित्सा का लाभ पाते, सैकड़ों आत्म-कल्याण की दिशा में अग्रसर होते, वह केवल अविश्वास के कारण ही निरर्थक हो रही हैं
यह संयोग ही है कि विज्ञान भी उस स्थिति में आ गया है, जिसने इन मान्यताओं की विज्ञान सम्मत पुष्टि की जा सके। आध्यात्मिक चिकित्सा और प्राण-संचालन की प्रक्रिया को समझने के लिये शरीर के अन्तर्गत रहने वाली मन-शक्ति को समझ लेना आवश्यक है। क्योंकि जिस प्रकार ध्वनि तरंगों को पकड़ने के लिये रेडियो में एक विशेष प्रकार का क्रिस्टल फिट किया जाता है, शरीर अध्यात्म का भी एक क्रिस्टल है और वह मन हैं। विज्ञान जानने वालों को पता है कि ईथर
नमक तत्व सारे ब्रह्माण्ड में व्याप्त है, हम जो भी बोलते है, उनका भी एक प्रवाह है पर वह बहुत हल्का होता है, किन्तु जब अपने शब्दों को विद्युत परमाणुओं में बदल देते हैं तो वह शब्द तरंगें भी विद्युत-शक्ति के अनुरूप ही प्रचण्ड रूप धारण कर लती है ओर बड़े वेग से चारों तरफ फैलने लगती हैं। वह शब्द तरंगें सम्पूर्ण आकाश में भरी रहती है, रेडियो उन लहरों को पकड़ती है और विद्युत परमाणुओं को रोक कर केवल शब्द तरंगों को लाउडस्पीकर तक जाने देता है, जिससे दूर बैठे व्यक्ति की ध्वनि यहाँ भी सुनाई देने लगती है। शब्द को तरंग ओर तरंगों को फिर शब्द में बदलने का काम विद्युत करती है उसी प्रकार आध्यात्मिक चिकित्सा और विचार प्रकरण (टेलीपैथी) का काम मन करता हैं।
यों मन शरीर में एक प्रथम सत्ता की भाँति दिखाई देता है पर वैज्ञानिक जानते हैं कि शरीर के प्रत्येक कोष में एक प्रथम मन होता है। कोषों के मनों का समुदाय ही अवयव स्थित मन का निर्माण करता हैं प्रत्येक अवयव का क्रिया क्षेत्र अलग-अलग है पर वह सब मत अवयव के अधीन है। मान लीजिये गुदा के समीपवर्ती जीवकोष (सेल्स) अपनी तरह के रासायनिक पदार्थ ढूँढ़ते ओर ग्रहण करते हैं। उनकी उत्तेजना काम-वासना को भड़काने का काम करती है, किन्तु अवयव मन नहीं चाहता कि इन गुदावस्थित जीव-कोषों की इच्छा को पूरा किया जाये तो वह काम-वासना पर नियन्त्रण कर लेगा। इसी प्रकार शरीर के हर अंग के मन अपनी-अपनी इच्छायें प्रकट करते है पर अवयव मन उन सबको काटता, छाँटता रहता है, जो इच्छा पूर्ण नहीं होने को होती, उसे दबाता रहता है और दूसरे को सहयोग देकर वैसा काम करने लगता है।
इस बात को ओर ठीक तरह से समझने के लिये शरीर रचना का थोड़ा ज्ञान होना आवश्यक है। यह भौतिक शरीर सूक्ष्म जीव-कोषों से बना है, प्रत्येक जीव-कोष प्रोटीन की एक अण्डाकार दीवार में घिरा रहता है। उस कोष के अन्दर सैकड़ों प्रकार के यौगिक और मिश्रण पाये जाते हैं। नाइट्रोजन ओर न्यूक्लिक अम्लों का सब से बड़ा समूह इस सेल के अन्दर होता है। फास्फोरस चर्बियाँ (वसायें) और शर्करायें भी उसमें मिलती हैं, साथ ही बीसियों अन्य कार्बनिक पदार्थ सूक्ष्म मात्राओं में पाये जाते है, जैसे विटामिन और हार्मोन, उसमें बहुत से अकार्बनिक लक्षण भी होते हैं। यानी प्रोटीन न्यूक्लिक अम्ल, वसायें शर्करायें ओर लवण, ये साँसारिक पदार्थ जिन्हें रसायनज्ञ एक जीवित कोशिका में पाता है, निश्चय ही ऐसे पदार्थ नहीं है, जिनसे विचारों का निर्माण होता है, फिर भी ऐसे ही पदार्थों के ऊपर उस असम्भव विचार का भवन निर्मित होता है, जिसे हम जीवन कहते है, अतः उस जीवन की विचित्रता और बढ़ जाती है, यह मान्यता आधुनिक विज्ञान वेताओं की है।
इस कथन की “जैसा आहार वैसा ही मन बनता है” वैज्ञानिक पुष्टि किसी अगले लेख में करेंगे, अभी यह समझ लेना चाहिये कि शरीर के प्रत्येक अवयव के जीवकोषों से विचार उठा करते हैं, इन्हें इन्द्रियों की इच्छा भी कह सकते हैं, वह यद्यपि न कि क्षमता के अन्दर होती है, तो भी यदि उनकी अपनी शक्ति प्रचण्ड हुई तो यह पूर्ण मन को भी झकझोर कर रख देती है। कई बार काम-वासना या कुछ अच्छी वस्तु खाने की इच्छा इतनी बलवान् हो उठती है कि साधन न होते हुए भी लोग अनुचित तरीके से उन्हें प्राप्त करने की चेष्टा करते है, यह उन अवयवों के जीव-कोषों की क्षमता का ही प्रभाव होता है।
यह जीव-कोषों के मन ही मिलकर अवयव मन का निर्माण करते हैं, इसलिये मन को एक वस्तु न मानकर अध्यात्म-शास्त्र में उसे ‘मनोमय कोश’ कहा गया है। एक अवस्था ऐसी होती है, जब शरीर के सब मन उसके आधीन काम करते हैं, जब यह अनुशासन स्थापित हो जाता है तो मन की क्षमता बड़ी प्रचण्ड हो जाती है और उसे जिस तरफ लगा दिया जाये उसी और वह तूफान की सी तीव्र हलचल पैदा कर देता है।
इन सूक्ष्म जीवों के मन निःसन्देह प्रत्युत्पन्न मति पटल (संस्कार जन्य मन) के आधीन हैं ओर बुद्धि की आज्ञाओं को भी मानते है। इन जीवों के मन में अपने विशेष कार्य के लिये विचित्र योग्यता रहती है। रक्त से आवश्यक सार का शोषण, अनावश्यक का स्याम इनकी बुद्धि का प्रमाण है। यह क्रिया शरीर के हर अंग में होती है, जो जीव-कोष संस्थान ज्यादा सक्रिय होता है, वह ज्यादा बलवान रहता है और अपने पास-पड़ोस वाले जीव-कोषों की शक्ति को मन्द कर देता है। जैसे गुदा वाले जीव-कोष जो काम-वासना में रुचि रखते है, वह सक्रिय होते है तो आमाशय के जीव-कोषों की शक्ति का भी अपहरण कर लेते हैं और इस तरह काम-वासना की प्रत्येक पूर्ति के साथ आमाशय की शक्ति घटती जाती है और वह शक्ति पेट का मरीज हो जाता है। जीव-कोषों का अनुशासित न होना ही शरीर की इन चोरियों का कारण बनता है। जो भी हो यह सत्य है कि पचन का आसात्वत, घावों का भरना, आवश्यकतानुसार दूसरे स्थानों पर दौड़ जाना, अन्य बहुत से कार्य कोषगत जीवन के ही मानसिक कार्य हैं। उन्हें विश्रृंखलित रहने देने से उनका सम्राट मस्तिष्क में रहने वाला मन भी कमजोर और अस्त-व्यस्त हो जाता है, किन्तु जब सम्पूर्ण शरीर के मन उसके अनुशासन में आ जाते है तो शक्ति बहुत अधिक बढ़ जाती है।
केवल कोमल स्नायु, पेशियाँ, झिल्लियाँ आदि ही नहीं हड्डियाँ, दाँत, नाखून आदि कठोर पदार्थ भी सूक्ष्म जीवों के योग से बने होते हैं, पर इनमें भी स्वतंत्र और प्रत्युत्पन्न मन के आधीन काम करने की दोहरी क्षमता होती है। अर्थात् सब जीव-कोश स्थानीय कार्य भी करते रहते हैं और संगठित कार्य भी। जिस प्रकार एक गाँव के सब लोग अपना अलग- अलग काम करते रहते है, अपना खेत जोतना, अपना काटना, अपने लिये अलग पकाना, अपने ही परिवार के साथ बसना, अपनी बनाई कुटिया में रहना आदि केवल अपने तक ही सीमित रहते है पर आवश्यकता आ जाती है तो सब लोग इकट्ठे होकर कोई सार्वजनिक कुआँ-तालाब आदि भी खोदते हैं, एक आदमी दूसरे की सहायता करता है। ठीक वैसे ही जीव-कोषों के मन और प्रत्युत्पन्न मन में भी दो क्षेत्र है ओर दोनों अत्यन्त महत्वपूर्ण है। कुछ कोष ऐसे भी होते हैं, जिन्हें शरीर में केवल सुरक्षा की दृष्टि से तैनात किया है, वे गंदगी को दूर करने, कचरा न जमा होने देने की चौकीदारी भी करते हैं और कोई रोग का कीटाणु ( वायरस ) शरीर में आ जाये तो उससे युद्ध करने का काम भी वे कोष करते है। इस तरह शरीर के मन तो अपनी-अपनी व्यक्तिगत ड्यूटी पूरी करते हैं, दूसरे बाह्य जगत से संपर्क बनाते है, दोनों अलग-अलग अपने काम करते रहते है।
शरीर के अन्दर इस तरह जीव-कोषों का मेला लगा हुआ है। अनुमानतः केवल लाल रंग के कोषों की संख्या कम से कम 75000, 000, 000 है, इनका काम फेफड़ों से आक्सीजन चूसना, धमनियों ओर वाहिनियों के द्वारा सारे शरीर में बाँटना होता है। यह जीव-कोष अपेक्षाकृत अधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह बाह्य जगत से भी शक्ति चूसने के वैज्ञानिक कार्य को पूरा करते हैं। इसलिये मनुष्य शारीरिक शक्ति की कमी के बावजूद भी दिन तक जिन्दा रहता है, क्योंकि यह विश्व-व्यापी प्राण सत्ता से शरीर का सम्बन्ध बनाये रहते है।
प्रत्युत्पन्न मन जब एकाग्र और संकल्पशील होता है तो सभी कोष स्थित मन जो विभिन्न गुणों और स्थानों की सुरक्षा वाले होते है, उसी के आधीन होकर काम करने में लग जाते हैं, फिर उस संग्रहित शक्ति से किसी भी स्थान के जीव-कोषों को किसी दूसरे के शरीर में पहुँचकर उस व्यक्ति की किसी रोग से रक्षा की जा सकती हे, सुनने, समझने वाले मनों में हलचल पैदा करके उन्हें सन्देह दिया जा सकता है, किसी को पीड़ित या परेशान भी किया जा सकता है।
जीव-विज्ञान के प्रसिद्ध विद्वान् रिचीकाल्डर ने इस तथ्य का प्रतिपादन इस तरह किया है-इलेक्ट्रान हमारा दास है, क्योंकि वे मानवीय प्रतिक्रियाओं में अधिक तेजी से चलते हैं, ये मानवीय नेत्र से भी अधिक देख सकते हैं, मानवीय स्पर्श से अधिक हर्ष अनुभव कर सकते हैं। मानवीय कान से अधिक सुन सकते हैं, मस्तिष्क की अपेक्षा शीघ्र और ठीक गिनती कर सकते है। हमारे सामने दूर आस्वादन (टेलेगस्टेशन) दूर श्रवण (टेलेआडीशन) दूर घ्राण ग्रहण (टेले आल्फेक्शन) सुगन्धि पदार्थ तथा बोलते चित्र भी हैं, वह इन्हीं दास इलेक्ट्रोनों का काम है। नियन्त्रण मोटरों (सर्वोमोटर) के द्वारा इलेक्ट्रान किसी रोलिंग मिल के हजारों टन इस्पात को ड़ड़ड़ भर वजन की तरह उठा देता है, जबकि वह पदार्थपरक मन है इसके सहारे यदि मानव के जीव-कोषों में अवस्थित मन (इलेक्ट्रान्स) की शक्ति का अनुमान करें तो वहाँ तक सम्भवतः हमारी बुद्धि न पहुँचे पर अब इस तथ्य से कोई इंकार नहीं कर सकता कि ऐसे कोई विद्या हो सकती है। जब एक शरीर अपनी विशेष शक्ति या सन्देश किसी और शरीरधारी को दे सकें।
सिद्धि का आधार शक्ति माना गया हैं। संसार का कोई उद्योग, कोई भी पुरुषार्थ और कोई भी कार्य शक्ति के बिना नहीं किया जा सकता। कोई बड़ा ही नहीं एक साधारण और सामान्य काम में भी शक्ति की आवश्यकता पड़ती है। अशक्त मनुष्य संसार में कुछ भी नहीं कर सकता।
संसार में प्रधानतः दो शक्तियाँ काम करती हैं। एक शारीरिक-बल दूसरा मानसिक-बल आगे की अन्य शक्तियाँ-जैसे बौद्धिक-बल आध्यात्मिक अथवा आत्मिक-बल भी पूर्वोक्त दो बलों के आधार पर ही पाये ओर विकसित किये जाते हैं।
शारीरिक-बल और मानसिक-बल में भी मानसिक-बल की प्रधानता हैं। शारीरिक-बल का अपने-आपमें कोई अधिक महत्व नहीं है। मनोबल का सहयोग पाये बिना शारीरिक-बल निकम्मा बना रहता है। बहुत बार देखा जा सकता है कि शारीरिक-बल कम होने पर भी लोग मनोबल के आधार पर बहुत से काम कर जाते हैं। शरीर-बल प्रधान सैनिक जिनका मानसिक-बल निर्बल होता है। मनोबल प्रधान और इम्यून शारीरिक-बल वाले सैनिकों से परास्त हो जाते है। जंगल में शेर की तुलना में हाथी, गैंडे, सुअर आदि बहुत से जानवर शरीर-बल में बहुत अधिक होते हैं, किन्तु मनोबल की कमी के कारण शेर से डरते ओर उसका आतंक मानते रहते हैं। वास्तविक बल मनोबल ही होता है-शारीरिक-बल तो मात्र यांत्रिक बल ही होता हैं
शरीर में क्षमता होते हुए भी जब मनुष्य का मन असहयोगी हो जाता है तो वह जरा देर भी काम नहीं कर सकता। मन में उत्साह ओर सहयोग होने पर यदि एक बार शरीर थका भी हो तो भी मनुष्य बहुत देर तक काम करता रहता है। शरीर की सारी क्रियायें मन की सहायता से ही सम्पादित होती है।
बौद्धिक-बल उत्पन्न करने के लिये भी मानसिक अभ्यास की आवश्यकता होती है। मनुष्य की बुद्धि का विकास अध्ययन, अनुभव और विषय में गहरे पैठने से होता है। जिसका मन निर्बल है, असहयोगी या उत्साह हीन है, वह न तो अध्ययन का परिश्रम कर सकता है, न सजग रहकर अनुभव संचय कर सकता है। और न उत्साहपूर्वक किसी विषय में गहरे पैठ सकता है। यदि वह यह सब करेगा भी तो मानसिक सहयोग के अभाव में कुछ लाभ नहीं उठा सकता।
न जाने कितने उत्साह अथवा अभिरुचि से रहित मन वाले लोग वर्षों पड़ते रहते हैं, नौकरी ओर व्यापार करते हैं, किन्तु प्रगति के नाम पर एक कदम भी आगे नहीं बड़ पाते पूरी सिद्धि तो उनके लिए असम्भव होती है। मन का असहयोग, विद्रोही, निरुत्साही, चंचल आदि होना उसकी निर्बलता के ही लक्षण होते हैं।
जिन मनुष्यों के मन बलवान और सतेज होते हैं, वे कम समय में ही पर्याप्त विकास कर लेते हैं। जो काम हाथ में लेते हैं, उत्साह और अभिरुचि से करते है। इस गुण के कारण उनकी ग्रहणशीलता भी बड़ी-बड़ी रहती है। कम-कम से ज्ञान ओर गुणों को हृदयंगम करते चले जाते हैं। मनोबली लोगों का आत्म-विश्वास बड़ा प्रबल होता है। उनकी संसार का काम कठिन ओर दुस्सह मालूम ही नहीं होता। आत्म-विश्वास के कारण वे अपने को हर काम के योग्य समझा करते है। जो भी काम उन्हें सौंप दिया जाता है, उसे पूरा करके दिखलाते हैं।
आध्यात्मिक विकास तो मनोबल के अभाव के में असंभव है। आध्यात्मिक विकास के लिये वृत्तियों ओर इन्द्रियों पर नियन्त्रण करना होता है। यदि मन बलवान ओर स्वरूप है तो उसकी सहायता से वृत्तियों और इन्द्रियों की वश में किया जा सकता है। यदि मन कमजोर और अस्वस्थ है तो मनुष्य की वृत्तियाँ शासन-हीन हो जायेंगी। वे अपनी सत्ता स्वतन्त्र कर लेंगी। तब किसी दशा में भी उन्हें वशवर्ती नहीं किया जा सकता।
आध्यात्मिक विकास के लिये अनेक तरह के नियम, संयम और व्रतों का निर्वाह करना पड़ता है। बहुत-सी साधनाओं में उतरना पड़ता हैं साधना ओर संयत का यह कार्यक्रम केवल शारीरिक-बल के आधार पर नहीं किया जा सकता। इसके लिये मनोबल की आवश्यकता होती है। जिसका मन शक्तिशाली और अनुकूल होता है, वह किसी भी विकार, वेग अथवा उद्वेग पर आसानी से नियंत्रण ला सकता है। जिसका शरीर शक्तिशाली हो पर मन निर्बल हो तो ऐसे आदमी की आसुरी प्रवृत्तियाँ बड़ी प्रबल रहती है। वह तो अपने आवेशों और विकारों को जरा देर भी नहीं रोक सकता। संसार के सारे शासन, अनुशासन, नियम और संयम मनोबल के आधार पर सफल बनाये जा सकते है, शारीरिक-बल के आधार पर नहीं। किसी भी क्षेत्र की सफलता के लिये मानसिक-बल की अनिवार्य आवश्यकता है। उसे जागृत और विकसित करते ही रहना चाहिये।
निर्बल मन वाले कोई बड़ा काम तो दूर सामान्यतम कामों में भी घबरा जाते है। कोई भी प्रसंग उपस्थित होते ही वे भय, आशंका ओर सन्देह के वशीभूत हो जाते हैं, फिर चाहे उसे उस प्रसंग में भय, आशंका अथवा सन्देह का कारण हो या न हो। वास्तविकता यह है कि भय का कारण प्रसंग अथवा परिस्थितियों में नहीं होता, उसकी जड़ मनुष्य के अपने निर्बल मन में ही होती हैं। हृदय से ही होता है। इनका हेतु वह मानसिक कमजोरी ही होती है, जो किन्हीं भूलों अथवा भ्रमों से पैदा हो जाती है।
यदि भय और आशंकाओं का सम्बन्ध मनुष्य की हृदय-स्थिति से न होता और उनका निवास प्रसंग अथवा परिस्थितियों में होता तो वह उस स्थिति में सभी मनुष्यों पर समान रूप से प्रतिक्रियाएँ होना चाहिये। जब ऐसा होता नहीं, किसी भयानक परिस्थिति को देखकर कहाँ कोई एक बुरी तरह डर कर घबरा कर भागने का रास्ता खोजने लगता है, वहाँ कोई दूसरा उसी परिस्थिति में अपने संतुलन ओर साहस के आधार पर वीरतापूर्वक उसका सामना करने के लिये उत्साहित हो उठता है। यह अन्तर परिस्थिति का नहीं केवल मनःस्थिति का होता है। जिसका मन निर्बल और कायर होगा, उसका घबरा जाना स्वाभाविक है। जिसका मनोबल बढ़ा-चढ़ा होगा, उसके मन में भय अथवा पलायन का भाव ही न आयेगा। वह तो ताल ठोक कर टक्कर लेने को उद्यत हो उठेगा।
मनुष्य की सारी बाह्य क्रियाओं की जड़ उसके मन में ही होती है। मनुष्य की शारीरिक क्रियाओं का संचालक मन ही होता है। मन स्वस्थ, बलवान, ओर संतुलित होगा, क्रियायें भी सुन्दर, सतेज ओर व्यवस्थित होंगी। मन निर्बल और अस्थिर होगा, क्रिया-कलाप भी सारहीन और अस्त-व्यस्त होगा।
कारण कोई भी रहे हों, किन्तु जिनके मन क्षीण, निर्बल ओर निस्तेज हो जाते हैं, उनका सारा जीवन भय, आशंकाओं, कट्टरता और संदेहों से भरा रहता है। मनोहीन मनुष्य हर बात में भयानक घटनाओं, सम्भावनाओं और परिणामों की कल्पना किया करते है। उन्हें सब ओर सब जगह अमंगल और अकल्याण ही दिखाई देता है। जिस प्रकार कायर और भीरु सिपाही को मोर्चे पर सिवाय मौत के और कुछ दिखाई नहीं देता, जबकि वहाँ पर विजय, यश और प्रतिष्ठा की भी सम्भावना होती है, उसी प्रकार निर्बल मन वाले को सब जगह असफलता और आशंका ही दीखती रहती है, जबकि सभी क्षेत्रों और कार्यों में दूसरे लोग सफल और कृतकृत्य होते रहते हैं।
निर्बल मन वालों की विचार-धारा प्रतिगामिनी हो जाती है। ऐसा मनुष्य यदि एक सफल और एक असफल आदमी को एक साथ देखता है तो भी वह असफल व्यक्ति की स्थिति से प्रभावित होता। वह सोचता है यदि में भी इस काम को करूँ तो असफल हो जाऊँगा। उसका विश्वास उस सफल व्यक्ति पर नहीं जाता ओर न अपने लिये उसे उदाहरण ही बना पाता है। कायर व्यक्ति जिस प्रकार मैदान छोड़कर भागने वालों को अपना आदर्श बनाता है, मोर्चे पर डटने वालों को नहीं, उसी प्रकार मनोहीन व्यक्ति भी असफल, अकर्मण्य और अग्राह्य उदाहरणों को अपना आदर्श बनाता है।
निर्बल मन वाला व्यक्ति स्वभावतः निराशावादी होता है। उसे पग-पग पर अनर्थ ही दिखाई देता हैं। साधारण सी बीमारी-जैसे सर्दी-जुकाम खाँसी या बुखार आ जाने पर बुरी तरह घबरा उठता है। सोचने लगता हैं कहीं सर्दी बढ़कर निमोनिया न बन जाये। कहीं ऐसा न हो कि खाँसी बुखार मिलकर हमें यक्ष्मा कर दें। जरा-सी चोट लग जाने पर उसे ऐसा लगता है मानो उसकी हड्डी टूट गई है। किसी ऐसी रंग में जरा-सी भूल हो जाने पर ऐसा घबरा जाता हैं। जैसे उसकी बरखास्तगी का फरमान आने वाला हो। व्यापार में जरा-सा घाटा आते ही उसे अपनी घर-मकान नीलाम होता दिखाई देता है। निराशा के दोष के कारण उसे अनर्थ के सिवाय वह विचार कदाचित ही आता है कि मनुष्य की जीवनी शक्ति बड़ी बलवती होती हैं यह जरा-सी बीमारी मेरा क्या बिगाड़ सकती है, मैं इसे उपचार, आहार-बिहार और नियम, संयम पर जड़मूल से नष्ट कर दूँगा।
नौकरी में भूल हो जाने पर वह यह नहीं सोच पाता कि धोखे से गलती हो गई, आगे के लिये सावधान रहूँगा। सारी स्थिति सुधार लूँगा। व्यापारिक घाटे के प्रसंग में वह इस प्रकार सोच सकने से बाधित रहता है-कि व्यापार में हानि लाभ तो चलता ही रहता हैं। आज यदि हानि हो गई तो आगे लाभ भी होगा। मैं परिश्रम, पुरुषार्थ, सावधानी और साख के बल पर सारी कमी पूरी कर लूँगा। इस प्रकार अपनी निराश भावना के कारण मनो-हीन व्यक्ति प्रकाश के स्थान पर अन्धकार ही देखा करता है।
मानसिक दौर्बल्य अथवा मनोहीनता मानव-जीवन के लिये भयानक अभिशाप है। अदम्य शारीरिक शक्ति और प्रचुर साधन होने पर भी मनोहीन व्यक्ति जीवन में असफल ही रह जाता हैं। जबकि मनोबली व्यक्ति सामान्य शारीरिक क्षमता और साधनों की कमी में भी अपने साहस, उत्साह और संलग्नता के बल पर क्षमता और साधनों की वृद्धि कर लेते हैं और संसार के सफल व्यक्तियों की पंक्ति में अपना स्थान बना लेते है।
यदि किन्हीं कारणों से कोई मानसिक दौर्बल्य का बन्दी बन गया है तो ऐसा नहीं कि उसका यह अभिशाप दूर नहीं हो सकता। अवश्य ही दूर हो सकता है। प्रयत्न द्वारा संसार का हर काम सम्भव हो जाता है। यदि कोई अपने में मनोबल की कमी पाता है तो उसे चाहिये कि वह धीरे-धीरे उन कामों में पड़ना आरम्भ करें, जिनसे उसे भय लगता है ओर अपनी सारी प्राप्त एवं प्रबुद्ध शक्ति को लगाकर पुरुषार्थ करें। असफल होने पर जरा भी निराश न हों और बार-बार प्रयत्न करते चलें। इस प्रकार धीरे-धीरे अभ्यास द्वारा उसका मनोबल बढ़ने लगेगा और एक दिन वह सुयोग्य बन जायेगा।
मीटर, रेल, और हवाई-जहाज चलाना सीखने वाले आरम्भ में डरते हैं किन्तु तब भी वे लगनपूर्वक उस काम में लगे ही रहते हैं। धीरे-धीरे उनका मनोबल बढ़ता जाता है और एक दिन वे इतने आत्म-विश्वासी हो जाते हैं कि बिना किसी शंका के दुरूह स्थानों पर भी अपना यान चलाते चले जाते हैं।
मनोबल मनुष्य का प्रधान बल है। इसकी वृद्धि किए बिना जीवन के क्या सामाजिक, क्या आर्थिक और क्या आध्यात्मिक किसी भी क्षेत्र में सफलता नहीं मिल सकी। अस्तु इस प्रधान बल को निरन्तर बढ़ाते ही रहना चाहिये।
लुई चौदहवें ने अपने साम्राज्य का खूब विस्तार किया। उसकी इच्छा इंग्लैण्ड को हड़पने की थी। उसने उसे जीतने की कई बार योजना बनाई पर कोई सफलता न मिली। एक दिन उसने अपने मंत्री कालवर्ट से कहा-अभी तक छोटे से हालैण्ड को नहीं जीता जा सका, यह हमारे लिये लज्जा की बात है।” कालवर्ट ने नम्रतापूर्वक उत्तर दिया-श्रीमान! चरित्रवान और संगठित नागरिकों के देश कठिनाई से जीते जाते है, भले ही उनकी संस्था चौड़ी हो।”
फ्रायड ने अपना तमाम जीवन और बुद्धि कौशल इस बात को सिद्ध करने में लगाया कि काम वासना (सेक्स) ही आत्मा को नैसर्गिक आकांक्षा है। अपने मत की पुष्टि में उसने सर्वाधिक प्रमाण स्वप्नों के लिये है और यह कहा है कि स्वप्न कुचली हुई वासनाओं की प्रतिच्छाया मात्र है। मन की जो मुरादें पूरी नहीं होती, अवचेतन अवस्था में वह उनकी काल्पनिक उड़ाने लगता है, उसी का नाम स्वप्न है और उसमें कोई बड़ा भारी मनुष्य जीवन का रहस्य नहीं छिपा हुआ।
अनेक उदाहरण ही नहीं हर प्रकार की वासनाओं के चार्ट बनाकर और स्वप्नों के उदाहरण देकर उसने संमति बैठाने का भी पूरा पूरा प्रयत्न किया है, किन्तु कुछ स्वप्नों का अध्ययन करके स्वयं फ्रायड भी चौक गया। ऐसे स्वप्नों में वह मुख्य रूप से थे, जिनमें किन्हीं लोगों के भविष्य में घटित होने वाली अनेक घटनाओं के पूर्व सन्देश इतने सच्चे निकले मानों वह सब कुछ पहले हो चुका हो और मन में केवल उसकी स्मृति को दोहराया हो।
उदाहरणार्थ अति प्राचीन प्राच्य भाषाओं के पण्डित सर ई॰ ए॰ बालिस बज का वह स्वप्न लेते है, जिसकी कृपा से ही ब्रालिस बज एक कठिन परीक्षा में उत्तीर्ण हो सका। बज एक निर्धन परिवार में जन्मे थे, माध्यमिक शिक्षा काल में ही उनके मन में यह इच्छा हुई कि प्राचीन भाषाओं का विशेषज्ञ बनूँ। युवक की इस आकांक्षा से प्रभावित होकर ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधान मन्त्री श्री ग्लेडस्टन ने 1878 में बालिस बज को कैम्ब्रिज में भरती करा दिया। यहाँ बज ने एमीरियन भाषा सीखी किन्तु उससे भी प्राचीन एक्केडियन भाषा बहुत कठिन पड़ती थी। सारे यूरोप में उसे जानने वाले कोई तीन चार व्यक्ति ही थे। एक दिन क्राइस्ट कालेज के प्रधानाचार्य ने बज को बुलाकर बताया था कि कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में प्राच्य भाषाओं की एक प्रतियोगिता हो रही है, यदि तुम उसमें प्रथम श्रेणी ला सके तो तुम्हें अपना अध्ययन जारी रखने के लिए आर्थिक सहायता भी मिल जायेगी और अपनी महत्वकाँक्षाओं को सफल करने का रास्ता भी। इससे अच्छा कोई दूसरा अवसर तुम्हें नहीं मिलेगा।
प्रतियोगिता के परीक्षक प्रोफेसर सेइस प्राच्य विद्याओं के धुरन्धर विद्वान थे पर बालिस बज का उनसे कोई परिचय न था। परीक्षा भी बड़ी कड़ी थी। बज किसी तरह तैयार तो हो गया पर उसकी घबराहट और बेचैनी बढ़ती ही गई, एक दिन तो वह बुरी कड़ी थी। बज किसी तरह तैयार तो हो गया पर उसकी बुरी घबराहट और बेचैनी बढ़ती ही गई, एक दिन तो वह बुरी तरह निराश हुआ और प्रतियोगिता में सम्मिलित होने का इरादा ही छोड़ दिया।
दूसरे दिन परीक्षा होने वाली थी। बज उस रात जब पलंग पर सोया तो उसने एक बड़ा विचित्र स्वप्न देखा। वह देखता है कि परीक्षा हाल में बैठा हूँ पर यह स्थान कुछ विचित्र सा है। ऊपर एक ही रोशनदान है इस कमरे में। थोड़ी देर में एक अध्यापक ने कमरे में प्रवेश किया। कोट की भीतरी जेब से उसने एक लिफाफा निकाला, उसकी सील तोड़ी, उसमें से हरे रंग के कुछ पर्चे निकाले और एक पर्चा बज को देते हुए कहा-लो इन प्रश्नों का उत्तर देना है। एसीरियन और एक्केडियन भाषाओं के जो अंक दिये है, उनका अंग्रेजी में अनुवाद करना है। इतना कहकर अध्यापक बाहर चला गया। और बाहर से कमरे में ताला लगा दिया।
रात के स्वप्न में बज ने पर्चे को ध्यान से पढ़ा एक बार नींद टूट गई फिर सोने पर जहाँ से स्वप्न समाप्त हुआ था, वहीं से फिर प्रारम्भ हुआ पहली बार एसीरियन और एक्केडियन भाषाओं के जो टेक्स्ट देखे थे, ठीक वही प्रश्न अब भी दिखाई दिये। फिर नींद टूटी और लगी तीसरी बार के प्रश्न पत्र में भी कोई अन्तर न था। बज की ठीक 2 बजे आँख खुल गई। बही प्रश्न पत्र अब भी उसकी आँखों के आगे झूम रहा था।
हेनरी एलिसन की विख्यात पुस्तक निकालकर उसने ‘‘क्यूनीफार्म इंस्क्रिप्शन्स आफ वेर्स्टन एशिया’’ खोज कर वह सपने में देखे हुए अंश को प्रातः काल होने तक दोहराता रहा। ने जाने कैसे यह विश्वास सा हों गया था कि यही प्रश्न पत्र आएगा। ठीक समय पर बज परीक्षा भवन पहुँचा पर उसे बताया गया कि वह हाल किन्हीं और परीक्षार्थियों से भर गया है इसलिए उसे दूसरे कमरे में ले जाया गया। बज उस स्थान को देखते ही चौक गया। यह एक रसोई घर था और ठीक वैसा ही चौक गया। यह एक रसोई घर था और ठीक वैसा ही जैसा उसने रात स्वप्न में देखा था। फिर था। फिर एक अध्यापक आया। उसने जेब से लिफाफा निकाला और उसमें से हरे रंग के पर्चे निकालें। हरे रंग का चुनाव परीक्षक की आँख दुखने के कारण किया गया था। इसके बाद अध्यापक बाहर गया और दरवाजा बन्द करके ताला लगा कर चला गया।
बज ने पर्चे को देखा-अक्षर व अक्षर बड़ी पर्चा जो रात स्वप्न में तीन बार उसने देखा। बड़ी प्रसन्नतापूर्वक प्रश्न पत्र हल किया। परीक्षा में उसे प्रथम स्थान भी मिल गया। फेलोशिप और आर्थिक सहायता भी मिल गई। वह 1924 तक ब्रिटिश म्यूजियम के मिस्त्रों और असीरियाई विभाग के प्रधान के रूप में काम करते रहे पर वह उस को कभी नहीं भूले जिसके द्वारा ही वह अपनी महत्वाकाँक्षा की पूर्ति कर सके।
क्या यह ‘सेक्स’ की प्रतिच्छाया थी? क्या यह स्वप्न मस्तिष्क की काल्पनिक उड़ान या शरीर की किसी रासायनिक क्रिया का चित्रण थी। वैज्ञानिकों के पास उसका कोई उत्तर नहीं। मनुष्य जीवन की उस गहराई को पाना उनके वश की बात नहीं, उसे जानने और समझने के लिए तो आत्मा के अन्तराल में उतरना आवश्यक हो जाता है, अपने आपकी खोज बीन करना अनिवार्य हो जाता है। उसे जाने बिना मनुष्य जीवन की सारी जानकारियाँ व्यर्थ है। उपनिषद्कार ने कहा है-
स्वप्नन्तं आगरितान्सं ड़ड़ड़ड़ येनान्पश्यति। महान्तं निभुमात्मान मत्वा धीरो न शोचति॥
कठोपनिषद्, 2 अध्याय, प्रथम सरुली,4
अर्थात्- जागृत अवस्था के समान स्वप्न में भी दृश्य देखने वाला ‘अह’ ही सर्वव्यापी आत्मा है, उसे भली प्रकार जानने वाले मेधावी जनों को किसी प्रकार का शोक नहीं होता।
भारतीय आचार्यों ने स्वप्न का जीवात्मा की चार अवस्थाओं में से एक बताया है। जागृत अवस्था में स्थूल ज्ञानेंद्रियों के द्वारा जो ज्ञान प्राप्त होता है, हव सीमित होता है। हमारे कान थोड़ी दूर की आवाज सुन सकते है, आँखें थोड़ी दूर तक देख सकती है, किन्तु स्वप्न अवस्था में जीवात्मा मनोमयकोश (सूक्ष्म शरीर) में चला जाता है। मन भी आत्मा की एक सूक्ष्म ज्ञानेन्द्रिय ही है। स्वप्न अवस्था में उसके द्वारा पाया हुआ ज्ञान एक विस्तृत और विशाल सीमा का होता है। मन अधिक सूक्ष्म है, वह आत्मा को उसके भूत और भविष्य की अनेक देखी अन देखी बातों को भी प्रकट करता है पर उसे होना चाहिये स्वच्छ, मन जितना और साफ होगा उतने ही स्वप्नों में सकी और सार्थक दृश्य उभरेंगे। दूषित शरीर का मन भी दूषित और स्थूल होता है। इसलिए उसके स्वप्न भी गन्दे, कामुक (सेम्सुअल) और भद्दे होते है। सामान्य लोगों की यही अवस्था होती है, इसलिए उन्हें स्वप्न का कोई निश्चित अर्थ समझ में नहीं आता।90 प्रतिशत लोग तो स्वप्न भूल भी जाते है पर श्रद्धालु, स्वच्छ मन, पवित्र हृदय, उपासक और आत्मा की गहराई का जो जितना अधिक चिन्तन करता है, वह उतने ही साफ और सार्थक स्वप्न देखता है और भविष्य की या प्रियजनों की खबरें भी देते रहते है।
इंग्लैण्ड की एक 12 वर्षीय जेनी कन्या की स्वप्नावस्था में ऐसी विलक्षण अनुभूतियाँ हुआ करती थी। कन्या का कहना था कि जब वह सोती है, तब भी वह एक विचित्र प्रकार के शरीर से चारों तरफ धूप आती है। उसे तरह तरह की सत्य घटनाओं का पता चल जाता है। किन्तु बालिका के इस कथन पर किसी ने विश्वास न किया।
29 जनवरी 1898 में बालिका के पिता कप्तान स्प्रूइट अताकाम्बा जहाज पर कोयला लादकर विद्वेष के लिये रवाना हुए। एक दिन वह बालिका रात में सोते सोते एकाएक चौंक पड़ी। माता ने उसे सँभाला और पूछा क्या हुआ? बालिका ने बताया कि पिताजी जिस जहाज में यात्रा कर रहे थे, वह डूब गया है, लेकिन पिताजी को किसी और जहाज ने बचा लिया है। माँ ने इस बात पर तब कोई विश्वास नहीं किया पर जब 25 फरवरी को स्प्रूइट लौटकर घर आया तो उसने सारी घटना सुनाई। वह घटना लड़की के बतायें स्वप्न से हूबहू मिलती जुलती पाई गई।
प्रसिद्ध फिल्म अभिनेता रोमान नोवारो ने अपने एक स्वप्न एक दुःखी लड़के का बड़ा हित किया था, उस घटना की चर्चा उसने इस प्रकार की है-मैं जिस सराय में ठहरा था उसका स्वामी मर चुका था। उसके दो लड़कों में उत्तराधिकार को लेकर लड़ाई चल रही थी। सराय का स्वामी वसीयत लिखकर कहीं छोड़ गया, उसके न मिलने से एक भाई तो सारी सम्पत्ति पर अपना अधिकार बताता है और दूसरा छोटा, सीधा और भोला होने के कारण सताया जा रहा था। उसने रोमान नोवारो को सब बातें बताई यह भी कहा कि मेरा बड़ा भाई मेरे साथ बहुत अत्याचार करता है। नोवारों बहुत दुःखी हुआ पर उस समय कोई सहायता न कर सकता।
रात जब वह सोया तो उसने एक स्वप्न देखा कि एक आदमी उस कमरे के एक आले की ओर इशारा कर रहा है और किसी लकड़ी से उस स्थान पर ठक्क ठक्क कर रहा है। नोवारो की नींद टूट गई पर उसने समझा चूहों ने खड़–बड़ मचाई होगी, इसलिए वह फिर सो गया पर इस बार फिर वही दृश्य दिखाई दिया। फिर नींद टूटी तो वह उठ खड़ा हुआ और उस आले में रखे कागज हटाकर देखने लगा। सब कागज हटाने के बाद एक कपड़े में लिपटी कोई वस्तु दिखाई दी। उसे निकाल कर देखा तो वह वसीयत रखी थी, जिसके न होने के कारण छोटा भाई सताया जा रहा। उसे बड़ी प्रसन्नता हुई, उसने तुरन्त उस बच्चे की बुलाकर वसीयत सौंप दी। फलस्वरूप उसे अपने पिता की जायदाद का आधा हिस्सा मिल गया।
नोवारो जो उन लड़कों के पिता को जानता तक न था और न ही उसे किसी वसीयत की बात मालूम थी, उसे यह सब स्वप्न में कैसे जानकारी मिली? क्या उसे भी सेक्स कहा जा सकता है।
‘पुरुषार्थ’ नामक मराठी पत्र के एक अंक में छपी यह घटना स्वप्न और जीवात्मा की गहराई को और भी स्पष्ट कर देती है। घटना इस प्रकार है।
बम्बई के प्रसिद्ध नेत्र चिकित्सक डा. श्री एस॰ अजगाँवकर की धर्मपत्नी ललिताबाई की 1952 में मृत्यु हो गई। ललिताबाई वट पूर्णिमा का व्रत रखा करती थी। उनकी मृत्यु भी वट पूर्णिमा के दिन ही हुई, इसलिये वे व्रत भी नहीं कर सकी, उनके भाई श्री आर॰ जी0 सामन्त बम्बई में एडवोकेट थे। मृत्यु के दूसरे दिन उन्होंने एकाएक दरवाजे पर अपनी बहन को खड़े देखा तो वे घबड़ा गये। मृतक शरीर का यों आना बहुत कौतूहल वर्धक लगा पर इसे उन्होंने कोई मानसिक भ्रान्ति कहकर टाल दिया। श्री सामन्त कोई सन्तान न थी और न ही होने की कोई आशा थी, क्योंकि उनकी धर्मपत्नी को डाक्टरों को दिखाया गया था और उन्होंने सन्तान होने की सम्भावना से इनकार कर दिया था। इनकी जननेन्द्रिय की बनावट इस योग्य थी ही नहीं। उनकी पत्नी आयु की भी अब चालीस की थी। एक दिन रात में उन्होंने देखा कि स्वप्न में उनकी ननद ललिताबाई उनके पास आई हैं और कह रही है-भाभी जी मैं तुम्हारे उदर से जन्म लूँगी। मेरा नाम ललिताबाई रखना और अपने को डाक्टर को दिखाने जाना।
सवेरे उन्होंने यह स्वप्न अपने पति को सुनाया और डाक्टर के पास चलने का आग्रह किया। डाक्टर ने उनकी जाँच की तो आश्चर्यचकित रह गया कि अब उनकी जननेन्द्रिय विकसित ही नहीं हो गई वरन् गर्भाधान भी हो चुका है। यथासमय उनके पेट से बालिका का ही जन्म हुआ। उन्होंने उसका नाम ललिताबाई ही रखा।
यह स्वप्न मात्र कौतूहल वर्धक नहीं कुछ तथ्य भी रखते है, लगता है उनकी सत्यता अनिवार्य मान लेने पर ही फ्रायड को अन्तिम दिनों अपनी मान्यता बदलनी पड़ी थी। उसने अन्त में लिख ही दिया-स्वप्न की समस्या को पूर्णतया समाधान करना सम्भव नहीं। उनमें कई तथ्य ऐसे भी हैं, जिनकी उत्पत्ति के मूल सूत्र की पकड़ सहज नहीं। सपनों की भविष्य सूचना सम्भावना की भी हम उपेक्षा नहीं कर सकते।”
अपने को समाज का अभिन्न अंग मानने वाला कोई भी व्यक्ति, जो कि समाज को अपने लिये और अपने को समाज के लिये महत्वपूर्ण समझता है, कोई भी ऐसा काम करने में संकोच करेगा, जिसका प्रभाव प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप में सामाजिक हित के लिये अशुभ सिद्ध होता हो, फिर चाहे वह वैसा काम करने में स्वतन्त्र ही क्यों न हो, समाज से आत्मीयता की अनुभूति करने वाले अपने तक सीमित व्यक्तिगत क्रियाओं तथा विचारों को भी संयत एवं समुचित रखने में सावधान रहते हैं, क्योंकि वे अपनी विकृतियों से होने वाली व्यक्तिगत हानि को भी समाज की हानि मानते हैं।
अपने समाज में नैतिक तथा धार्मिक प्रतिबन्ध तो है, किन्तु माँस-भोजन पर कोई कानूनी रोक नहीं है। कोई कानूनी प्रतिबन्ध न होने से माँस-भोजन में रुचि रखने वाले व्यक्ति उससे होने वाली सामाजिक तथा राष्ट्रीय हानियों पर रंचमात्र भी ध्यान देने को तैयार नहीं। कानून के भय से किसी विषय के औचित्य अथवा अनौचित्य पर विचार किया और उससे बचे तो कोई विशेषता नहीं है। मनुष्यता की शोभा तो इस बात में है कि राज-दण्ड के दबाव के बिना ही नैतिकता तथा राष्ट्रीयता के नाते ऐसा कोई काम न करे, जो राष्ट्र अथवा समाज के लिये किसी प्रकार भी हानिकर हो। किंतु इस सहज सभ्यता का मूल्य मानने वाले कितने होंगे। सहज सभ्यता का मूल्याँकन करने वाले सत्पुरुष जिस समाज में जितने अधिक होंगे वह समाज उसी अनुपात में वास्तविक सुख समृद्धि का अधिकारी बनेगा।
आज भारतीय समाज में माँसाहार की प्रवृत्ति बहुत बढ़ गई है। इस सम्बन्ध में भारतीय-जन शारीरिक, मानसिक अथवा आध्यात्मिक हानियों पर तो विचार नहीं ही करते हैं, उसे होने वाली सामाजिक एवं राष्ट्रीय हानियों पर विचार करने की भावना रखते दृष्टिगोचर नहीं होते, जबकि उन हानियों से सीधे-सीधे उनकी व्यक्तिगत एवं समष्टिगत भौतिक प्रगति भी प्रभावित होती है।
मनुष्य सामाजिक प्राणी है। सामाजिक जीवन का अर्थ है मिल-जुल कर स्नेह सौहार्दपूर्वक रहना। स्वार्थ एवं संघर्ष सामाजिक जीवन के प्रतिकूल भाव है। सफल सामाजिक जीवन तभी सम्भव है, जब उसका प्रत्येक सदस्य सौम्य, सहनशील और शाँत स्वभाव वाला हो। इसी स्थिति में जब मिल-जुल कर रह सकते है और पारस्परिक सद्भावना सहयोग के बल पर व्यष्टि एवं समष्टिगत उन्नति भी कर सकते हैं। इसके विपरीत जिस समाज के सदस्य स्वार्थी, क्रोधी, असहिष्णु और असहयोगी होते हैं, वे समाज के पारस्परिकता के अभाव में यथा स्थान पड़े-पड़े कष्ट-क्लेशों के बीच एड़ियाँ रगड़ा करते हैं।
मनुष्य की प्रवृत्तियों पर भोजन का प्रभाव बहुत दूर तक पड़ता है। जो शुद्ध सात्विक भोजन किया करता है। उसका स्वभाव प्रायः शाँत, संतुलित और सहिष्णु रहता है। उस पर क्रोध अशाँति अथवा संघर्ष की प्रति क्रिया अपेक्षाकृत कम हुआ करती है। जो अशुद्ध और तामसी भोजन का अभ्यासी है, उसका स्वभाव बहुधा पुरुष ही होता है। स्वभाव की पुरुषता किसी भी अनर्थ अथवा संघर्ष की संवाहिका हो सकती है। माँस शत-प्रतिशत तामसी भोजन है।
वैज्ञानिकों एवं चिकित्सा शास्त्रियों का मत है कि माँसाहार करने से स्वभाव क्रोधी बनता है, बुद्धि मन्द होती है और मानसिक स्थिरता पर अशुभ प्रभाव पड़ता है। क्रोध की अतिरेकता में मनुष्य उचित, अनुचित का ध्यान नहीं रख पाता, मन्द बुद्धिमता के कारण उसके निर्माण ही उल्टे नहीं होने लगते, बल्कि दृष्टिकोण ही विपरीत हो जाता है। मानसिक अनस्थिरता के कारण किसी का किसी छोटी-सी बात पर उत्तेजित हो उठना सहज सम्भव है। मनुष्य की यह स्वभावगत न्यूनतायें सामाजिक भावना को शिथिल कर देती है। ऐसी दशा में विघटन, विसंगति और विस्फोट की परिस्थितियाँ उत्पन्न होती हैं, जो सामाजिक सहजता तथा प्रगति को धक्का पहुँचाती है। समाज में अशाँति अथवा संघर्ष का जन्म मनुष्यों के दो विपरीत स्वभावों के कारण ही होता है।
इस भिन्नता के कारण कभी-कभी शाँति प्रिय लोगों को भी संघर्ष में उलझ जाना पड़ता है। जो असामाजिक स्वभाव के होते हैं, उनमें उसकी शाँति तथा प्रगति की चिन्ता होती ही नहीं। किन्तु इससे भी दुःखदायी बात यह होती है कि समाज के प्रति सद्भावना रखने वालों को भी कभी-कभी आत्म-सम्मान अथवा मर्यादा की रक्षा करने के लिये अन्यथा व्यक्तियों से प्रेरित संघर्ष में उलझना पड़ता है, जिससे उनके द्वारा होने वाले सामाजिक हित को हानि पहुँचती है।
माँस भोजियों के कारण ही मनुष्यों का एक बड़ा वर्ग पशु-हत्या के क्रूर कर्म में नियुक्त रहता है। इस वर्ग का बधिक, व्याध अथवा कसाई कहा जाता है। इस वर्ग पर प्रायः क्रूर निर्दयी तथा अविचारी होने का दोष लगाया जाता है। बहुत सीमा तक यह लाँछन सही भी होता है। हत्या कर्म करते-करते इस वर्ग के स्वभाव से करूँगा, दया, क्षमा, संवेदना, सहानुभूति, सौहार्द्र की कोमल भावनायें नष्ट हो जाती हैं और उनका स्थान निर्दयता, क्रूरता, पुरुषता, असहनशीलता और कठोरता की वृत्तियाँ ले लेती हैं। जिससे वह ऐसे अनुचित काम करने में संकोच नहीं करते जो समाज के लिये अहितकर होते हैं ओर किसी भी सामाजिक व्यक्ति को नहीं करने चाहिये।
शिकागो, जो कि अमेरिका का एक बड़ा शहर है, अपने बड़े-बड़े कसाईखानों के लिये संसार में सबसे बढ़ा-चढ़ा माना जाता है। यहाँ के बूचड़ खानों में प्रतिदिन लगभग पच्चीस-तीस हजार पशुओं का वध किया जाता है। और काटने से लेकर खाल उतारने, माँस पहुँचाने, पशुओं को पकड़कर लाने, खत्ते पर लगाने, रक्त समेटने, ढोने और सफाई करने के साथ माँस काटने, बाँटने और उसका हिसाब-किताब रखने के विभिन्न कामों में लाखों आदमी नियुक्त रहते हैं। यह सबके सब समान रूप से अकरुण स्वभाव के हो जाते हैं। पशु-वध का वह नृशंस हत्या-काँड करते, देखते और उसकी जीविका खाते-खाते उनका निर्दयी हो जाना कोई विलक्षण बात नहीं।
शिकागो के एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने अनेक वर्षों अपराधों एवं अपराधियों की जाँच करने के बाद अपनी रिपोर्ट में लिखा है-अधिकतर अपराध कसाई घरों के कार्य में लगे व्यक्तियों द्वारा ही किये जाते हैं। इस घृणित पेशे को करते-करते इन लोगों की समस्त सद्-वृत्तियाँ कुण्ठित हो जाती है और तब वे अक्सर अवसर आने पर मनुष्यों पर छुरी फेरने में नहीं हिचकिचाते।” इस प्रकार माँसाहार के कारण समाज का बड़ा वर्ग हृदयहीन होकर नृशंस बन जाता है, जिससे वह समाज का अहित ही किया करता है। जिसकी सद्वृत्तियाँ नष्ट हो गई हों, जो हृदयहीन होकर दारुण स्वभाव का हो गया हो, वह अशाँति, अपराध अथवा अपकार करने वाला न हो ऐसी आशा करना मरु-मरीचिका के समान एक विडम्बना होगी।
एक अपराध केवल एक अपराध तक ही सीमित नहीं रहता। वह शाखा, प्रशाखा में फूट फैलकर अनेक हो जाते हैं। इस प्रकार एक के द्वारा अन्य अनेक प्रकार के अपराधों की वृद्धि होते रहने से समाज की शाँति और व्यवस्था को हानि पहुँचना स्वाभाविक ही है। अशाँत एवं अव्यवस्थित समाज न कभी प्रगति कर पाया है और न कभी कर पायेगा। कहना न होगा कि समाज की इस अशाँति अव्यवस्था का दोष उन माँस भोजियों पर ही जाता है, जिनके लिये पशु काटे जाते हैं और मनुष्य कसाई का काम करके क्रूर एवं असामाजिक बनाता है।
माँसाहार अमानवीय भोजन है। उसके खाने से मनुष्य शरीर में पाशविक विकार आ जाते हैं, विभिन्न प्रकारों रोगों की वृद्धि होती है। वीर्य दूषित हो जाता है, जिसका प्रभाव भावी सन्तान पर पड़े बिना नहीं रहता। रोगी, निर्बल एवं निर्दयी संतानों से राष्ट्र की आगामी पीढ़ियाँ खराब हो सकती हैं। माँस भोजियों के बच्चे प्रारम्भ से ही माँस खाना सीख जाते है। जिससे उनमें वे सब विकार बहुतायत से संचय हो जाते हैं, जो माँसाहार से उत्पन्न होते हैं।
जिन बच्चों को बाल्यकाल से ही दया, प्रेम, सहृदयता, सहानुभूति व सदाचार की शिक्षा दी जाती है, वे आगे चलकर समाज के हितकारी सदस्य और राष्ट्र के योग्य नागरिक बनते हैं। किन्तु जिनमें माँसाहार जैसे क्रूरतापूर्ण कृत्य के द्वारा अकरुण एवं हृदय-हीनता की भावना जगा दी जायेगी, उनका समाज के लिये हितकारी सदस्य बन सकना शत-प्रतिशत सम्भव नहीं। माँसाहार में निरत रखते हुये यदि बच्चों को सुशील नागरिकता की शिक्षा दी भी जाये तो वह उन पर अधिक प्रभाव नहीं डालेगी। उपदेश अथवा शिक्षा के अनुरूप आचार-व्यवहार का निर्माण करने से ही किसी सद्शिक्षा का वाँछित प्रभाव हो सकता है। विद्वानों का मत है कि संसार में फैले दुराचार दुर्भाव, स्वार्थ और संघर्ष का अस्सी प्रतिशत उत्तरदायित्व माँसाहार पर ही है, जिसे मनुष्य चाय से ग्रहण कर अपनी नैतिक, सामाजिक और राष्ट्रीय हानि कर रहा है।
माँस-भोजी बहुधा शराब और तम्बाकू भी पीने लगते है, जिससे माँस भोजन का विकार और भी बढ़ जाता है। माँस भोजन, शराब और तम्बाकू तीनों मिलकर मनुष्य की प्रवृत्तियाँ किस सीमा तक बिगाड़ सकते हैं, इसके लिये समाज शास्त्रियों का यह कथन ही अनुमान कर सकने के लिये पर्याप्त है-चोरी डकैती, बलात्कार, व्यभिचार एवं हत्या करने वालों में अधिकतर वे ही लोग होते हैं, जो माँस, शराब और तम्बाकू का सेवन किया करते हैं। संसार के समस्त अपराधियों की नब्बे प्रतिशत संख्या बहुधा इन्हीं व्यसनों की आदी होती है।
सामाजिक सुख-शाँति और मानवता के मण्डल के लिये आवश्यक है कि संसार से माँस भोजन की प्रथा को उठा दिया जाये। इसकी विकृति के कारण मनुष्य क्रूर एवं क्रोधी बनकर असामाजिक बन जाता है। समाज एवं राष्ट्र के उत्थान क लिये जिन सुन्दर गुणों, सुकुमार भावनाओं और सद्प्रवृत्तियों की आवश्यकता होती है, माँसाहार के कारण उनका स्निग्ध विकास नहीं हो पाता। माँसाहार से मनुष्य में हिंसा की भावना बढ़ती है, जिससे समाज में अशाँति और अमंगल की परिस्थितियाँ उत्पन्न होती हैं। माँसाहार के कारण समाज में बढ़ने वाली विकृतियों को देखकर अमेरिका के प्रसिद्ध प्रचारक श्री ऐजल ने जो भाव किया है, वह ध्यान देने योग्य है। उन्होंने कहा-
“गरीब और अनबोल प्राणियों के वकील की हैसियत से मैं आपको बतलाना चाहता हूँ कि जितनी शीघ्र बच्चों को माँस भोजन से विरत कर उनमें जीव दया और समस्त प्राणियों के प्रति सहानुभूति की भावना जगाने के लिये शिक्षण संस्थाओं में माँगलिक साहित्य का प्रचार किया जायेगा, उतनी शीघ्र नाशकारी हिंसा-भावना की जड़ कटेगी। इतना ही नहीं बल्कि सब प्रकार के अपराधों का मूल नष्ट हो जायेगा। कुकृत्य के बदले दण्ड देने और जेल में बन्द करने से जहाँ एक अपराध को रोका जा सकता है, वहाँ बच्चों को निरामिष भोजी एवं अहिंसक बनाकर आगामी समाज से सारे दुष्ट कार्यों को मिटाया जा सकता है।
दार्शनिक तथा मानव-मण्डल के आकांक्षी महात्मा पैथागोरस ने एक स्थान पर कहा है-
‘‘ऐ मौत के आड़े में उलझे हुये इंसान। अपनी तश्तरियों को माँस से सजाने के लिये जीवों की हत्या न कर। जो पशुओं की गरदन पर छुरी चलवाता है, उनका करुण कुन्दन सुनता है, जो पाले हुए पशु-पक्षियों की हत्या में मौज मनाता है, उसे अत्यन्त तुच्छ स्तर का व्यक्ति ही समझा जाना चाहिये। जो आज पशुओं का माँस खा सकता है, वह किसी दिन मनुष्य का रक्त भी पी सकता है। ऐसी सम्भावना को असम्भव नहीं माना जा सकता।’’
माँस भोजन से होने वाली सामाजिक एवं राष्ट्रीय हानि पर विचार करना और उसे छोड़ देना मनुष्यता का सबसे बड़ा सम्मान है। इस दृष्टि से याज्ञवल्क्य स्मृति का यह वाक्य हृदयंगम करने योग्य है-
“सदन्कामान वाप्नोति तपमेध फलं तथा। गृहेपि निवासत्यिन्दो मुनि माँस विवर्जनात्॥
जो गृहस्थ माँस का त्याग कर देता है, वह मुनि के समान है, उसे अश्वमेध यज्ञ का फल अनायास ही प्राप्त हो जाता है और उसकी मनोकामनायें पूर्ण हो जाती हैं।
एक समय था जब दुनियाँ की जनसंख्या बहुत थोड़ी थी। शहर तब नाम मात्र को थे, अधिकाँश लोग किसी जलाशय के किनारे कोई पर्णकुटी बना लेते थे। उसी के आस-पास एक दो खेत तैयार कर लेते थे। बस उतने से ही मस्ती का जीवन बीतता था। तब के जीवन में बड़ी शाँति और सरलता थी।
आबादी बढ़ी और छोटे-छोटे घर गाँव बन गये। शहरों की तो गरजना में ही काफी दिन लग सकते हैं, फिर कई शहरों की जनसंख्या तो किसी-किसी जिले के बराबर होती है। सघन आबादी का जनस्वास्थ्य और शाँति व्यवस्था पर अच्छा प्रभाव नहीं पड़ता।
प्रारम्भिक और विकासशील बाल्यावस्था को इन बुराइयों से जो बहुल-जन क्षेत्र में सम्भव हैं, बचाने के लिये ही प्राचीनकाल में गुरुकुलों की स्थापना हुई थी। लेकिन तब लोगों के जीवन लक्ष्य महान आध्यात्मिक हुआ करते थे, इसलिये भी लोग एकान्त की व्यवस्था बनाया करते थे। एकान्त में न केवल आत्म-शाँति मिलती है, वरन सात्विक विचार उठते हैं, आत्म-चिन्तन होता है। वाणी संयम के कारण चित्तवृत्ति अन्तर्मुखी हो जाती है और आध्यात्मिक लक्ष्य और सरल हो जाता है। इसलिये तब एक समय निश्चित रूप से लोग एकान्तवास किया करते थे, गृहस्थ आश्रम के बाद थोड़ा-थोड़ा एकान्त का अभ्यास किया जाता था। पर चौथे चरण में तो नितान्त अन्तर्वासी हो जाया जाता था।
यह व्यवस्था प्राचीनकाल में जितनी उपयोगी थी, आज उससे दो गुना अधिक आवश्यक हो गई है, क्योंकि अब न तो ग्रामीण न शहरी क्षेत्र इस योग्य रहे कि मनुष्य शाँति से रह सके। साधारण ध्वनि तरंगें जो दिन भर लोग बोलते रहते हैं, वह अपने सूक्ष्म प्रभाव सहित तरंगित होती हुई हमारे मस्तिष्क को प्रभावित करती है और कोई कारण न होते हुए भी व्यग्रता, चिंता, व्यथा और परेशानी बढ़ती है पर उससे भी अधिक विस्फोटक अब शोर की समस्या हो गई है। शोर ध्वनि तरंगों से विलग वह वस्तु है, जो स्पष्ट प्रतिस्वन की सृष्टि करती हैं, उससे तत्काल मस्तिष्क में अप्रियता बढ़ती है। वैज्ञानिकों के अनुसार इन दिनों पृथ्वी प जनसंख्या शहर और सबसे अधिक यंत्रीकरण के कारण शोर की मात्रा इतनी अधिक बढ़ गई है कि प्रति व्यक्ति कई टन वजन इसी का बोझ डाले रहता है, उससे कोई शाँत और शीतल प्रकृति का व्यक्ति भी प्रसन्न नहीं रह सकता।
डा. फेचनर ने 40 वर्ष तक ध्वनियों का गहन अध्ययन किया और यह पाया कि अब जो शोर बढ़ रहा है, उससे उत्तेजना बढ़ती है ओर शरीर के कोमलतम तन्तुओं पर तीक्ष्ण प्रभाव पड़ता है। ध्वनि के उत्तेजना को उन्होंने डेसीबिल नाम की इकाई बनाकर नापा भी और यह बताया कि शाँत सड़कों में 50 डेसीबिल उत्तेजत्व रहता है, जबकि शोर-युक्त सड़कों में 70-80 डेसीबिल। मोटरगाड़ियों में ब्रेक लगाने की ध्वनि से 76 ध्वनि निरोधक यंत्र से सज्जित मोटर-साइकिलों से 60 और ऐसी ही मोटरें से 120 डेसीबिल शोर का प्रभाव श्रवण प्रणाली पर पड़ता है। उससे मस्तिष्क का विभ्रान्त और अशाँत रहना तो आवश्यक है ही, यह भी सिद्ध हो चुका है कि 160 डेसीबिल वाले शोर के कारण कान का पर्दा तक फट जाता है। 120-130 डेसीबिल शोर से आँशिक और यदि कुछ दिन तक यह क्रम बराबर बना रहे तो व्यक्ति स्थायी रूप से भी बधिर हो सकता है। प्रत्येक अवस्था में 80-100 डेसीबिल से अधिक मात्रा का शोर श्रवण प्रणाली और मानसिक संवेदना के लिये घातक हो सकता है।
प्रसिद्ध मनोविज्ञान शास्त्री पास्कल का कथन है कि शोर श्रवण प्रणाली को ही नहीं प्रभावित करता वरन् वह मस्तिष्क में भी कुप्रभाव छोड़ता है। जिससे सारे शरीर पर दूषित तत्व सक्रिय हो उठते हैं। हमारी चिन्तन-धारा में मुख्य बाधा भी यह शहरी शोर हैं, जिसके कारण मनुष्य अपने कल्याण की भी बात अच्छी तरह सोच नहीं पाता।
यंत्रीकरण के कारण आज जनजीवन में शोर का जो दबाव पड़ रहा है, उसकी सियेमा विश्वविद्यालय इटली के इंस्टीट्यूट आफ हाइजिनके प्रोफेसर टिजानों ने विस्तृत व्याख्या की है। शोर के प्राणि-शास्त्रीय प्रभाव का उन्होंने बहुत आवश्यक विवेचन और लोगों को सावधान किया है कि यदि आज के याँत्रिक मनुष्य ने एकान्त-शाँति की व्यवस्था न की तो उसका भावी प्रजा पर बुरा प्रभाव पड़ेगा। बड़ी चिड़चिड़ी, क्रोधी, अशिष्ट, फूहड़ और दुराचारी आत्मायें जन्म लेंगी या यों कह सकते हैं कि इस दुष्प्रभाव के कारण आने वाली पीढ़ी में इन दुर्गुणों का स्वयमेव विकास होता जायेगा।
उनका कहना है-यही नहीं कि शोर केवल श्रवण यंत्रों को ही राब करते हैं, वरन मस्तिष्क जिससे सारा शरीर का क्रिया-व्यापार चलता है, प्रभावित होता है। उसका ही परिणाम है कि लोगों की कार्य क्षमता तेजी से घट रही है। स्नायविक तनाव और रक्तचाप बढ़ रहा है।
उन्होंने कई औद्यौगिक प्रतिष्ठानों के श्रमिकों का मानसिक अध्ययन किया और यह निष्कर्ष पाया कि मिल कारखानों में काम करने वाला प्रत्येक मजदूर जब प्रातःकाल सोकर उठता है तो काम में कठिनाई अनुभव करता है। उसके कानों में 20 मिनट तक भनभनाहट गूँजती रहती है। मानसिक और शारीरिक थकान अनुभव होती है। उसे लगता है मस्तिष्क में कुछ भर गया है। कुछ दिन में यद्यपि वह अभ्यास में आ जाता है किन्तु श्रवण प्रणाली को क्रमिक क्षति पहुँचती रहती है। मानसिक उद्वेग के कारण पारिवारिक झंझट, क्लेश, चिन्ता और वासनायें भड़कती है। फिर वह शाँति की खोज के लिये भटकता है पर जो साधन हाथ लगते हैं, जैसे सिनेमा, शराब, सम्भोग, वह और भी उसकी दुर्दशा करने वाले सिद्ध होते है।
जिन शहरों में याँत्रिक शोर की अधिकता होती है, वहाँ श्रवण-शक्ति की कमजोरी और इस तरह से व्यग्र व्यक्तियों की अधिकता होती है। वहाँ अपराध भी बहुत अधिक होते हैं। क्योंकि आत्म-शाँति के लिये जिसे कोलाहल से उन्मुक्त वातावरण की आवश्यकता होती है, वह उन्हें बिलकुल नहीं मिल पाता। कुछ बड़े आदमियों के बंगले और बगीचे ऐसे होते हैं कि वे कुछ समय एकान्त का लाभ पा लेते हैं और अपनी कार्य-क्षमता और स्नायविक तेजस्विता को बनाये रखते हैं पर मानसिक प्रभाव से वे भी मुक्त नहीं रह सकते, क्योंकि ध्वनि तरंगों की तरह यह शोरगुल भी महापुरुषों के मुख-मण्डल पर व्याप्त औरों की तरह उस शहर के बाहरी क्षेत्र तक को भी कई-कई मील तक प्रभावित किये रहता है।
ऐसी अवस्था में उस युग की याद आती हैं, जब लोगों की जीवन व्यवस्था ऐसी रहती थी कि कुछ समय एकान्त सेवन के लिये निकल आता था। ऐसे पीठ संस्थान तथा क्षेत्र होते थे, जहाँ जाकर लोग कम से कम जीवन के अन्तिम चरण में तो मुक्त चिंतन और आत्म-शाँति पाते थे। आज उसकी सर्वाधिक आवश्यकता अनुभव हो रही है। विद्यालय और शिक्षण संस्थानों को तो शहर से हटा कर अन्य प्रदेशों में रखना ही चाहिये साथ ही कुछ क्षण निकालकर ऐसे स्थानों की यात्रा भी करनी चाहिये, जहाँ कुछ समय मानसिक शाँति पाई जा सके। तीर्थ यात्रा का यह महत्व अब पहले की अपेक्षा बहुत अधिक है, यदि ऐसे सुरम्य और सुरक्षित एकान्त स्थान उपलब्ध हो सकें।
ऐसे स्थानों में हिमालय के उत्तराखण्ड भाग का महत्व सर्वाधिक है। यह आदिकाल से भारतवर्ष की साधना स्थली रही है। ऋषि-महर्षियों से लेकर अनेक साधु वानप्रस्थों ने यहाँ आकर तपस्याएं कीं और साधना के तेजस्वी कण बिखेरे। उनका लाभ वहाँ पहुँचने वाले को अनायास ही मिल जाता है।
प्राकृतिक दृष्टि से यह स्थान अत्यन्त शीतल, सुरम्य और मनोहर दृष्टाओं से परिपूर्ण है। यहीं एक स्थान ऐसा शेष बचा है, जो अभी तक जन कोलाहल से पर्याप्त अंश में बचा हुआ है। दूसरे वहाँ पर उठने वाली युग युगान्तरों की प्रबल आध्यात्मिक विचार तरंगें, इतनी शक्तिशाली हैं कि वे बाहर से पहुँचने वाले शोर और ध्वनि तरंगों को दबा देती है और अपने प्रभाव को निरन्तर बनाये रखती हैं।
हरिद्वार से आरम्भ हिमालय हृदय का यह सौ कोस लम्बा और तीस कोस चौड़ा स्थान तमसा नहीं के बौद्धांचल तक फैला है, पच-केदार पंच-बदरी यमुनोत्री और गंगोत्री आदि प्रमुख तीर्थ स्थल हैं, अनेकों हिम स्रोत, तप्तकुण्ड और गरम जल-धाराओं से युक्त यह स्थान मन को अत्यन्त शीतलता और शरीर को ताजगी प्रदान करने वाला है। पर्वतों-शिखरों नदियों, घाटियों, प्रपातों-स्रोतों वामकों से आच्छादित बद्री क्षेत्र को पुष्पों की घाटी कहते हैं। उसकी प्राकृतिक सुषमा की तुलना विश्व का कोई भी पुष्प उद्यान नहीं कर सकता। जो भी उस सुरम्य तपोभूमि के एक बार दर्शन कर लेता है, उस पर जादू का सा प्रभाव पड़ता है। वहाँ से लौटने का मन नहीं करता।
स्वास्थ्य की दृष्टि से इस स्थान का महत्व बहुत अधिक है। यहाँ की प्रत्येक लता वनस्पति मानों प्राण और शक्तिदायक औषधियाँ हैं। गंगा तो अमृत ही है। महर्षि चरक ने-हिमवत्प्रभवा पथ्या हिम से आया हुआ जल पथ्य है, कहकर उसकी प्रशंसा की है। महाभारत अनुशासन पर्व में गंगा माता को पयस्विनी घृतिनीं मृत्युदारां- 26।82 कहा। अर्थात्-गंगा दुग्ध के समान उज्ज्वल घृत के समान उज्ज्वल घृत के समान स्निग्न जल से भरी है। गंगा का जल स्वाद-युक्त स्वच्छ, पथ्य, भोजन पचाने योग्य पाचक, प्यास, शमक, क्षुधा और बुद्धि वर्धक माना गया है।
शीतं स्वादु स्वच्छमत्यन्तश्च्यं
पथ्यं पाम्यं पचनं पापहारी।
तृष्णामोहवंसनं दीपनं च प्रज्ञां
धते वारि भागीरथीयम्।
इसके अतिरिक्त-
शरीर जर्जरीमूते ध्याधिग्रस्तेकलेवरे।
औषधं जाहवीतोयं वैद्यो नारायणेहरिः॥
अर्थात्-गंगा का उक्त गुणों वाला जल तारुण्य को बनाये रखने वाला है, वृद्धावस्था के रोगों का विनाश करने वाला साक्षात् औषधि की तरह है।
ऋषियों की तपोभूमि यह गंगा तटवर्ती क्षेत्र हिमालय की मर्मस्थली ही रही है। यहाँ रहकर आत्मिक तत्वज्ञान और वर्चस्व का अनुसंधान उन्होंने किया है। आज भी उस भूमि का अपना महत्व है। आज के इस कोलाहल और अशाँति भरे वातावरण में शाँत एकान्त स्थलों का महत्व है। शहरी शोर से बचकर इस दिव्य वातावरण में रहकर शारीरिक उत्साह, मानसिक उल्लास और आध्यात्मिक विकास के मार्ग पर अधिक सुविधापूर्वक चला जा सकता है।
वाजिश्रवा के शिष्यों-धर्मद और विराध में विवाद छिड़ गया। दोनों अपने-अपने को अधिक श्रद्धावान सिद्ध करना चाहते थे।
दोनों गुरु के समीप गये और निर्णय देने का आग्रह किया। गुरु ने कहा- अपनी-अपनी श्रद्धा व्याख्या करो तब निर्णय देंगे।
धर्मद बोला-देव आश्रम जीवन में मैंने आपकी प्रत्येक बात मानी। उचित अनुचित का भी ध्यान नहीं दिया। आपकी किसी भी आज्ञा को तर्क या विवेक से परखने का प्रयत्न नहीं किया। क्या इससे भी बढ़कर कोई श्रद्धा हो सकती है?
गुरुदेव मुस्कराये, अब उनने विरोध को संकेत किया। विराध बोला- भगवन मुझे ज्ञान की प्रबल आकांक्षा है। अतएव आप पर श्रद्धा भी अगाध है पर साथ ही यह भी परखना आवश्यक समझता हूँ कि जो कुछ कहा या बताया जाता है, वह सत्य से परे तो नहीं है। सत्य का मूल्य अधिक है इसलिये मैं सत्य को पाने के लिये सर्वस्व छोड़ने के लिये तैयार रहता हूँ।
गुरु ने कहा- ‘‘धर्मद सत्य को परख कर धारण की जाने वाली श्रद्धा ही श्रेष्ठ है।’’
चेतन स्वरूप आत्मा ही सर्वभूत प्राणियों में विद्यमान है। अपने-अपने कर्मानुसार जीव विभिन्न शरीरों में प्रगट होता है, किन्तु जीव-मात्र की आत्मिक स्थिति एक जैसी है इसके लिये कभी किसी जीव को न मारना चाहिये, न सताना चाहिये। उनसे आत्म-विकास की शिक्षा लेनी चाहिये।
विश्व में दो प्रकार के पदार्थ पाये जाते हैं-जड़ और चेतन। वृक्ष, वनस्पति, पौधों, गुल्म-लताओं तक में चैतन्य के चिह्न प्रकट हो रहे हैं। किन्तु तमोगुण की अधिकता के कारण वे सब अविकसित प्राणी हैं, कीट-पतंग वृक्षों की अपेक्षा थोड़ा अधिक विकसित हैं, पशु-पक्षियों का स्वाभाविक ज्ञान कीट-पतंगों से भी अधिक विकसित पाया जाता है। कई बार तो पशु-पक्षियों की विशेषतायें मनुष्य की बुद्धि ओर उसके चातुर्य को शर्मिन्दा करने लगाते हैं। आहार, निद्रा, भय, मैथून तक में ही नहीं, ज्ञान-विज्ञान धर्म,, बुद्धि-विवेक में भी वे मनुष्य से बड़े-बड़े जाये जाते हैं। यद्यपि उनमें आत्म कल्याण के लिये साधनायें करने वाला नैमित्तिक ज्ञान नहीं होता। वह लाभ केवल मनुष्य को ही प्राप्त है। पर यदि सामान्य जीवों की गतिविधियों का देखकर हम यह मान लें, कि आत्म-चेतनता कर्मानुसार अन्य योनियों में भी जाती हैं ओर यदि मनुष्य में धार्मिकता, सच्चाई, ईमानदारी उत्कृष्टता आदि नहीं है तो उसकी स्थिति पशुओं से भी निम्नतर हैं, तो अवश्य ही आत्मा को पहचानने और जीवन लक्ष्य को प्राप्त करने का भाव जागृत हो सकता है।
यहाँ कुछ ऐसे उदाहरण हैं, जिन से जीव-मात्र में आत्मा के गुणों की अवस्थिति देखी जा सकती है। 12 जून 1955 के नव-भारत टाइम्स में छपी एक मछली का विचित्र वर्णन दे रहे हैं-
“न्यूजीलैण्ड द्वीप के पास कुक जलडमरूमध्य में कोई 5 मील ऐसा समुद्र हैं, जिसमें बड़ी बड़ी मूँगों और पत्थरों वाली टेढ़ी-मेढ़ी चट्टानें हैं। यहीं डालफिन जाति की एक दस फुट लम्बी और तीन फूट चौड़ी मछली रहती। वह मछली इस खतरनाक स्थान में नाविकों को सही रास्ता बताती थीं, जिससे वे दुर्घटनाओं से बच जाते थे। जहाजी इसी कारण प्यार से उसे ‘पेलोरस जैक’ कहा करते थे।”
“जब तक खतरा रहता मछली आगे-आगे चलती और जहाज पीछे-पीछे जैसे ही साफ समुद्र आ जाता वह एक बार ऊपर उछलती और गोता लगाकर भाग जाती। नाविक समझ जाते थे, अब कोई खतरा नहीं है। एक बार एक जहाज के किसी अजनबी व्यक्ति ने उस विलक्षण मछली पर गोली दाग दी। गोली लगते ही मछली डुबकी लगाकर भाग गई और कई वर्ष तक नहीं दिखाई दी। इस बीच कई जहाज वहाँ दुर्घटना ग्रस्त हो गये।”
“कुछ दिन तक विश्राम करने के पश्चात् मछली का घाव ठीक हो गया। इसी बीच न्यूजीलैण्ड सरकार ने निषेधता अधिकारी होगा। इसके कुछ दिन बाद ही वह मछली फिर दिखाई देने लगी। उसने मनुष्य की कृतघ्नता का बिलकुल ध्यान न दिया और फिर से परोपकार के व्रत का पालन करने लगी। आश्चर्य यह है कि जैसे ही वह रोटूरा नामक उक्त जहाज को देखती वैसे ही डुबकी लगा कर भाग जाती। जब इस मछली की मृत्यु हुई तो उसकी असाधारण सेवा के लिये न्यूजीलैण्ड वासियों ने उसका एक भव्य स्मारक बनाया। उसकी एक प्रतिमूर्ति प्रतिष्ठित की गई जो अब भी विद्यमान है।”
कैप्टन पी. जे. प्रसाद का लद्दाख सीमान्त का एक वर्णन भी नव-भारत टाइम्स में छपा है, उसमें बताया गया है कि दो-तीन दिन तक सीमा रक्षकों की बर्फीले तूफान से कुछ जवानों की रक्षा ‘याकों’ ने की। जैसे ही तेज अंधड़ आता-बताते हैं, याक पंक्तिबद्ध होकर खड़े हो जाते और गश्ती-दल उनकी ओट में छुप जाता इस तरह भयंकर बर्फीले तूफान से बचकर गश्ती-दल अपने खेमे तक पहुँच जाता।
आक्रमण और मृत्यु के भय से जिस तरह मनुष्य कई बार किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाते है, वैसी ही घबराहट कई जीवों और पक्षियों को भी होती हैं, उससे पता चलता है कि वे भी जीवन और मृत्यु की श्रृंखला में जुड़े होते हैं और मोह, आसक्ति अज्ञान के कारण उन्हें भी मृत्यु से ठीक उसी तरह डर लगता है, जिस तरह मनुष्य को।
अरब, सीरिया, मेसोपोटामिया और अफ्रीका आदि में शुतुरमुर्ग नाम का एक सात आठ फुट लम्बा पक्षी पाया जाता है। शुतुरमुर्ग की मूर्खता प्रसिद्ध है। कोई खतरा दिखाई देने पर वह अपना सिर बालू में छिपा लेता है और समझ लेता है कि खतरा दूर हो गया। उसका गुस्सा भी उतना ही प्रबल होता है, गुस्से में वह भयंकर आक्रमण करता है। कहते है उसकी चोंच का प्रहार इतना तीक्ष्ण होता है कि लोहे की चादर में भी छेद हो सकता है।
शुतुरमुर्ग में सहकारिता का भी विलक्षण भाव पाया जाता है। पक्षी होने पर भी वह जेबरा और हिरनों के साथ रहता है।
कुछ समय पूर्व सारस पक्षियों के सम्बन्ध में कहा जाता कि सर्दियों में वह उड़कर देशान्तर को चला जाता है। यात्रा के समय वह कई छोटे छोटे पक्षियों को भी अपनी पीठ पर बैठा कर उड़ जाता है। प्रवासी पक्षियों के सम्बन्ध में बड़ौदा के गायकवाड़ विश्वविद्यालय के प्राणि शास्त्र विभाग में खोजबीन करने वाले प्राणिविद् प्रो. जे.सी. जार्ज ने इस विश्वास का उल्लेख किया है। यह न भी हो तो भी सारस का दाम्पत्य प्रेम विलक्षण माना गया है। नर या मादा को मारकर कोई उसे तब तक नहीं ले जा सकता, जब तक उसी तरह साथी को भी न मार दिया जाये।
अनेक भक्त और परोपकारी जीवों की घटनायें “मनुष्य क्या पशु पक्षियों से भी गिरा रहेगा” नामक ट्रैक्ट में छपी है, वह इस विश्वास को पुष्ट करती है कि आत्मा चेतनता के अनेक लक्षण मानवीय चेतना के समान ही अन्य जीव जन्तुओं में भी पाये जाते है।
पंजाब में करनाल जिले के थानेश्वर नामक स्थान के पास कुछ तालाब है। वहाँ सारसों के अनेक जोड़े निवास करते है। एक बार एक सारसी पर एक गीदड़ ने आक्रमण कर दिया। सारसी के पैर में जख्म हो गया, जिससे वह पीछे हट गई पर अब गीदड़ ने उसके छोटे बच्चे पर हमला कर दिया। इस बार सारसी की ममता ने प्रचण्ड रूप धारण किया। घायल होते हुए भी उसने साहस और बुद्धि से काम लिया। उसने चोंच से गीदड़ की आँखों में तीखे प्रहार किये जिससे भयभीत होकर गीदड़ भाग गया। उधर मादा की आवाज सुनकर नर सारस भी आ पहुँचा उसने भी गीदड़ पर हमला कर दिया, जिससे गीदड़ को भागते ही बना।
साहसी ही नहीं मनुष्येत्तर जीवों में दया और करुणा भी कम नहीं होती। बुन्देलखण्ड की एक घटना है, एक गाँव का कोई 5 वर्ष का बालक खेलते खेलते गाँव के किनारे पर पहुँच गया। वहाँ से खेत प्रारम्भ होते थे। उधर से एक विषधर सर्प दौड़ा आ रहा था, सर्प उत्तेजित था इसलिये उसने उस बच्चे को ही घेर लिया। यह दृश्य वृक्ष की शाखा पर बैठा एक बन्दर देख रहा था। उसे बच्चे पर दया हो आई, वह चटपट नीचे उतरा और पीछे से जाकर सर्प को एक तमाचा जड़ा। साँप ने बच्चे को छोड़ दिया और बन्दर पर झपट पड़ा। बन्दर ने साहस और बुद्धि से काम लिया। वह वार भी करता था और प्रतिघात से भी बचता था। यह द्वंद्व युद्ध एक घण्टे चला और अन्त में विजय बन्दर की ही रही, उसने साँप को कूँच कूँच कर जानसे मार डाला।
गाय बहुत सीधा जानवर है, गायें बहुत कम लड़ती भिड़ती है पर अपने बच्चे, कुनबे और साथियों के प्रति उसमें सामूहिकता और सहकारिता का कितना अच्छा भाव होता है, उसकी एक विचित्र घटना ओरछा में घटित हुई। उसे सुनकर मनुष्य की शक्ति और ज्ञान का दंभ मिथ्या प्रतीत होने लगता है। मनुष्य जो करता है, उसमें अपना स्वार्थ प्रधान रहता है पर गायों ने सबके स्वार्थ में अपना स्वार्थ प्रधान रहता है पर गायों ने सबके स्वार्थ में अपना स्वार्थ सन्निहित सिद्ध कर दिखाया।
बातें यो हुई कि एक दिन गायों का एक झुण्ड जंगल में चर रहा था। चरवाहे उन्हें जंगल में छोड़कर घर लौट जाते है। अब गायें आई ही थी कि अचानक एक बाघ ने आक्रमण कर दिया। पहले तो गाय भागी पर जैसे ही उन्होंने देखा कि भागने पर भी किसी न किसी की मृत्यु अवश्यम्भावी है तो सब गायें रुक गई। उन्होंने मिलकर एक घेरा बनाया। छोटे-छोटे बछड़ों की बीच में खड़ा कर आक्रमण की राह देखने लगी। बाघ पहले तो सकपकाया पर उसने गायों को भोला समझ कर फिर आक्रमण कर दिया पर इस बार का आक्रमण महँगा पड़ा। 15-20 गायें सींगों से बाघ पर टूट पड़ी। बाघ का शरीर क्षत विक्षत हो गया और उसे भागते ही बन पड़ा।
मनुष्य ने अपनी सुरक्षा के लिए जिस प्रकार अनेक ऐसे यंत्रों का निर्माण किया है, जिससे वह वर्षा, भूकम्प, युद्ध आदि की पूर्व जानकारी प्राप्त कर लेता है, उसी प्रकार प्रकृति ने प्राणियों की रक्षा के लिए भी उन्हें अद्भुत ज्ञान और चेतना दी है। चमगादड़ में इस तरह के ज्ञान की विचित्र क्षमता पाई जाती है। एक बार स्पेलन जानी नामक एक इटालियन ने चमगादड़ की उड़ान का परीक्षण किया। उसने एक कमरे की छत से बहुत से धागे लटकाये और उनमें घंटियाँ बांध दी कि जिससे धागों से टकराने पर वे घंटियाँ बजे। उसके बाद उसमें बाद उसमें एक चमगादड़ को दौड़ाया। चमगादड़ बड़ी देर तक बन्द कमरे में दौड़ता रहा पर एक भी घंटी न बजी। चमगादड़ की दृष्टि बहुत कमजोर होती है, उसने किस तरह अपने आपको उन धागों से बचाया यह बड़ा आश्चर्य है। कहते है, चमगादड़ प्रति सेकेंड 30 बार ध्वनि तरंगें भेजता है और जितने समय में उसे उनकी प्रतिध्वनि आती है, वह सामने वाली बाधाओं का पता लगा लेता है और उनसे बचकर निकल जाता है।
यह चमत्कार वस्तुतः जीवों के नहीं आत्म-चेतना के चमत्कार है। जीवात्मा की गतिविधियाँ विस्तीर्ण न होकर किसी एक दिशा में संकीर्ण होती रहती है और वह उस प्रकार की योनि में चला जाता है। हमारे धर्म शास्त्रों में चौरासी लाख योनियाँ है और प्राणी उन चौरासी लाख योनियों में भटक चुकने के बाद मनुष्य शरीर में आता है। इस तरह उसमें उन जीवों की विशेषतायें भी हो सकती है, संस्कार भी। कुछ विशेषतायें मन्द होती है, कुछ विशेषतायें मन्द होती है, कुछ तीव्र कुछ संस्कार भी दबे रहते है, कुछ प्रखर होती है जो मनुष्य अपनी बुद्धि विवेक से बुरे संस्कारों को काट डालता है, उसमें मनुष्येत्तर प्राणियों की तरह अनेक प्राकृतिक चमत्कारों, शक्तियों, योग्यताओं और सामर्थ्यों का विकास होने लगता है।
जीवन अखण्ड है। इसी को आत्मा की अमरता कहते है। मृत्यु से जीवन खंडित नहीं होता पर यह तर्क और बुद्धि का विषय नहीं श्रद्धा और आत्म चिन्तन का विषय है। हमें उस अखंडित जीवन की कल्पना करते समय मनुष्येत्तर प्राणियों की गतिविधियों को भी देखना पड़ेगा। हमें यह अनुभव करना पड़ेगा कि जीवन जन्तु पशु पक्षी भी आत्म विकास और अखण्ड जीवन के खण्ड है। मनुष्य की विशेषता उसका ज्ञान और जीवन के प्रति श्रद्धा है। यह श्रद्धा और ज्ञान प्राणिमात्र के हित में रहना चाहिये। इसी से जीवन लक्ष्य की सिद्धि हो सकती है। पशुओं जैसे अधार्मिक कृत्य करने से तो वह पशु योनि में ह जा सकता है। उसे ज्ञान के, धार्मिकता के सहारे ऊपर उठना चाहिये और परम लक्ष्य की प्राप्ति करनी चाहिये।
गरहुल (उत्तराकाशी ) में एक बिल्ली का बच्चे अपनी माता से भटक गया। दो तीन कुत्तों ने उसे घेर लिया। अभी वह इस बच्चे को दबोचना ही चाहते थे कि गाँव के जमींदार रामसिंह का कुत्ता झपट पड़ा और उसने सभी कुत्तों को मार भगाया। बच्चा अपने संरक्षक के प्रति पूँछ उठाकर कृतज्ञता प्रकट करने लगा। कुत्ते को दया आ गई वह असहाय बच्चे को उठाकर ले आया और मालिक की कोठी के पिछवाड़े उसे सुरक्षित रख दिया। जब तक बच्चा बड़ा नहीं हो गया, कुत्ता उसकी बराबर देख रेख करता रहा और भोजन की व्यवस्था भी करता रहा। बड़ा हो जाने पर भी दोनों साथ साथ घूमते हैं। शाम को तो दोनों इकट्ठे ही रहते हैं। दोनों एक दूसरे का बहुत ध्यान रखते हैं।
गायत्री उपासना के सत्परिणामों की चर्चा सदा सर्वदा सुनाई पड़ती रहती है। जिनने भी इस महामंत्र का आश्रय लिया है, उसी ने आशाजनक और उत्साह वर्धक फल पाया है।
‘गायत्री के प्रत्यक्ष चमत्कार’ पुस्तक इन दिनों तो नहीं छपती पर जिन दिनों वह छपी थी, उसमें सहस्रों ऐसे व्यक्तियों के व्यक्तिगत अनुभव प्रकाशित हुए थे, जिनसे स्पष्ट है कि अनेक विपत्तियों में फँसे हुए- संकटों में पड़े हुए व्यक्ति किस प्रकार गायत्री माता की शरण में जाकर उन असाधारण कठिनाइयों से छुटकारा पा सकें। इसी प्रकार उन घटनाओं का भी पुस्तक में वर्णन था, जिनमें अनेक अभाव ग्रस्तों ने अभावों से और निराशाजनक स्थिति में पड़े हुओं ने निराशा से छुटकारा पाया। ऐसी घटनायें सामान्य जीवन में अनादि काल से होती रही हैं और होती रहेगी।
प्राचीनकाल में भी ऐसी अनेक महत्वपूर्ण घटनायें घटित होती रही है, जिनसे यह प्रमाणित होता है कि गायत्री उपासना साधारण से साधारण और असाधारण से असाधारण समस्याओं को सुलझाने में एक चमत्कारी उपाय को तरह सत्परिणाम उत्पन्न करती रही है।
देवी भागवत् में ऐसे कतिपय प्रसंगों की कथायें मिलती है, जिनमें इस तथ्य का प्रतिपादन है कि देव, दानव, ऋषि-मुनि पुरुष और स्त्रियाँ समय समय पर माता का आश्रय ग्रहण करके दुःखों सके सुखों की ओर, अशाँति से शाँति की ओर अग्रसर होने में समर्थ होते रहे है।
अनेक देवताओं ने तथा महापुरुषों ने भी अपने अनुभवों की चर्चा इसी प्रकार की है, जिससे महामहिमामयी माता की महत्ता का प्रतिपादन होता है और इस तथ्य का समर्थन होता है कि इस कल्पवृक्ष के नीचे बैठने वाले की कामनायें पूर्ण ही होती रही है। इस कामधेनु का पायपान करने वाला सदैव अतृप्तियों की क्षुधाओं से छुटकारा पाकर पूर्ण रूप ही बना है। यह उद्धरण हमारी श्रद्धा को जागृत करते है और प्रेरणा करते है कि उपासना में तथा जीवन साधना में उन तत्वों का समावेश करे, जिनका प्रतिपादन गायत्री तत्व ज्ञान के अंतर्गत किया गया है।
ध्रुव कुमार अपना अनुभव सुनाते हुए राजाओं से महामहिमामयी सावित्री (गायत्री) का प्रभाव बताते हुए निर्देश करते है कि यही उपासना सर्वश्रेष्ठ तथा सर्वोपरि है-
कि ब्रवीमि महीपालास्तस्यश्ररितमुत्तथा। ब्रह्मादयो न जानन्ति सेशाः सुरगणास्तथा॥
ध्रुव कुमार से सब गायत्री का महात्म्य पूछा गया तो उसने राजाओं से कहा-हे नृपगण! मैं उस सावित्री देवी के अत्युत्तम चरित के विषय में क्या वर्णन करूं। उसका चरित ऐसा अप्रमेय है कि ब्रह्मादिक बड़े बड़े देवगण भी उसे नहीं जानते हैं।
सर्वस्याद्य महालक्ष्मी वेरण्या शक्ति उत्तमा। सात्त्वकीयं महीपाला। जगत्पालन तत्परा॥
हे नृपगण! यह देवी परम सात्त्विकी, सबसे आद्य, महालक्ष्मी, वरेण्या और उत्तम शक्ति स्वरूपा है तथा इस जगत के पालन, रक्षण करने में सर्वदा तत्पर रहा करती है।
सृजते या रजोरुपा सत्वरुपा च पालंन। संहारे च तमों रुपा त्रिगुणा सा सदा मता॥
निर्गुणा परमा शक्तिः सर्वकाम फल प्रहा। सर्वेषां कारणं साहि ब्रह्मादीनं नृपोत्तमाः।
निर्गुण सर्वथा ज्ञातुमराक्या योगिमिनृप्तः।
वह सावित्री देवी रजो गुण के स्वरूप वाली इस जगत का सृजन किया करती है। और सत्व गुण का स्वरूप धारण करके इसका पालन करती है। जब इस प्रपंचात्मक विश्व का वह संहार करके लय करना चाहती है तो तमोगुण के रूप को धारण कर लेती है। इसके सर्वदा त्रिगुण सम्पन्न स्वरूप है उसमें परमशक्ति है ओर वह समस्त कामनाओं के फलों का प्रदान करने वाली है। हे नृपोत्तमगण! ब्रह्मा आदि सबका यह कारण स्वरूप है। हे नृपगण! इसका निर्गुण स्वरूप तो बड़े-बड़े योगियों के द्वारा भी नहीं जाना जा सकता है।
यस्येच्छया सृजति विवमिदं प्रजोी नानावतार कलनं कुरुते हरिश्च। नुनं करोति जगतः किल भस्म श्म्भु स्ताँ शर्मदां न भजतेनु कथं मनुष्यः॥
जिसकी इच्छा से प्रजा का स्वामी ब्रह्मा इस सम्पूर्ण विश्व का सृजन किया करते हैं तथा भगवान् हरि अनेक अवतार धारण करते हैं एवं भगवान् शम्भु इस जगत् को संहार करके भस्म कर देते हैं, यह मनुष्य कैसा हैं जो ऐसी कल्याणकारिणी सावित्री देवी का भजन नहीं किया करता है।
नारद जी की जिज्ञासाओं का समाधान करते हुए भगवान् विष्णु ने देवर्षि को कहा था कि सर्वोपरि उपास्यतत्व भगवती ही है। उसका आश्रय लेने वाला समस्त अशान्तियों से छुटकारा पा सकता है और अपनी आत्मिक तथा भौतिक प्राप्ति का पथ प्रशस्त कर सकता है। प्राचीन काल के महामानवों की भाँति इस समय भी सर्व साधारण के लिये इसी महान् आश्रय का अवलम्बन करना उचित है।
देव देव! महादेव! प्राण पुरुषोत्तम! जगदाधार! सर्वज्ञ! श्लाघनीयोसु संगुण।
जगतस्तत्व माद्यंयत्तन्से वद यथेप्सितम्। जायंते कुल एवेदं कुतश्चेदं प्रतिष्ठितम्॥
कुतोऽन्तं प्राप्नुमात्काले कुत्र सर्व्वं फलोदयः। केन ज्ञातेन मायैषा मोहभुनशि माप्नुयात्॥
कयार्चया कि जपेन किध्यानेमात्य हृदब्ज के। प्रकाशो जायते देव तमस्येर्कोदयो यथा॥
एतत्प्रश्नोत्तरं देव ब्रुहि सर्व्व मशेष तः। यथा लोक स्तरेदन्धतमसं त्वन्जसैव हि॥
अर्थ-एक समय देवर्षि नारद जी ने भगवान् नारायण के समीप में उपस्थित होकर उनसे पूछा था-हे परम देवों के भी देव!आप तो श्रेष्ठतम एवं परम पुराण पुरुष हैं तथा इस समस्त जगत् के आधार और सभी कुछ के ज्ञान है। आप इस जगत् का जो आद्य तत्व हो वह मुझे बताइये। इसकी उत्पत्ति कहाँ से होती है, किसमें यह प्रतिष्ठित है तथा कैसे इसका अन्त होता है। समस्त फलों का उदय कहाँ से होता है? किसका ज्ञान प्राप्त कर लेने पर मोह की भूमि इस माया का नाश होता है। किस जप, ध्यान, अर्चना से अन्धकार में सूर्योदय की भाँति हृदय में प्रकाश होता है? हे भगवान्! टाप कृपाकर इन मेरे प्रश्नों का उत्तर प्रदान कीजिये जिससे यह लोक इस अन्धकार से आसानी से तर जावे।
एवं देवर्षिणा पृष्टः प्राचीनो मुनि सत्तमः। नरायणो महायोगी प्रतिनन्द्य वचोऽब्रवीत्॥
श्रृणु देवर्षि वयत्रि जगतस्तस्वसुत्तमम्। येन ज्ञातेन मन्त्योहि जापते न जगह भ्रमे॥
जगत स्तस्वमित्येव देवी तयाच प्रति पाल्यते। तथा च नाश्यते सर्वमिति प्रोक्तं गुणबयात्॥
तस्याः स्वरुपं यक्ष्मामि देव्याः सिद्धर्वि पूतिजतम्। स्मरताँ सर्व यापध्नं कामदं मोर्क्षव तथा॥
अर्थ- महर्षि व्यास जी ने कहा-इस प्रकार से देवर्षि नारद जी ने जब पुराण पुरुष महायोगी भगवान् नारायण से पूछा तो नारायण ने नारद की इस जिज्ञासा का अभिनन्दन करते हुए कहा-हे देवर्षि! इस जगत् का जो उत्तम तत्व हैं, उसे मैं बतलाता हूँ। तुम श्रवण करो। इस तत्व का ज्ञान प्राप्त कर लेने पर मनुष्य को जगत् का भ्रम नहीं रहता है। मैंने बतलाया है कि इस जगत् का तत्व देवी है ओर यही अन्य देव, ऋषि, गन्धर्व और मनीषियों ने भी बतलाया है। वह देवी ही इस जगत् का सृजन करती है और उसी के द्वारा इसका पालन होता है तथा अन्त में नाश भी वही किया करती है। उसका वह स्वरूप मैं बतलाता हूँ, जो सिद्ध ऋषियों के द्वारा समर्पित होता है। इस स्वरूप का स्मरण करने वालों के समस्त पापों का क्षय हो जाता है, सारे मनोरथ सफल होकर इससे मोक्ष की प्राप्ति होती है।
स्वयंभू मनु ने जब यह कामना की कि उन्हें अपनी गोदी में भगवान कर्त्ता एवं नियम व्यवस्था बनाने का श्रेय प्राप्त हो तो उनकी यह कामना भी माता के सहारे ही पूरा हुई। कामना पूर्ति का उपाय जब मनु ने ब्रह्मा जी के समक्ष प्रस्तुत दिया और उसका पालन करने पर उन्होंने अभीष्ट फल भी प्राप्त किया -
मनुः स्वायम्भुव स्खाद्यः पअ पुत्रः प्रतापवान। शतरुपा पतिः श्रीमान सर्व मन्वन्तापियः॥
स मनुः पितारं देख प्रजापति मकल्मषय। तक्ता पर्मचरत्पूर्व तमुवाचात्मम सुलम॥
पुत्र,पुत्र त्वया कार्य देम्वाराधन मुत्तमम॥ तत्प्रसारेन ते तात। प्रजा सर्म प्रसिद्धयति॥
अर्थ- समस्त मनुजों का स्वामी, शतरूपा के पति स्वायम्भुव मनु ने अपने पिता की परिचर्या की थी। उस समय ब्रह्मा जी ने उससे कहा -हे पुत्र!तुमको देवी की आराधना करनी चाहिये। उसी के प्रसाद से प्रजा का सर्ग करने का तुम्हारा कार्य सफल होगा।
एव्मुक्तः प्रजाखण्डा मनुःस्वाश्यम्भुयो बिरड़। जगद्योनि तहा देवी तपसातर्वगड़ विमः॥
सुष्टाव देवी सर्ध्वप्रतितं सर्ध्व कारण कारणम।। नमो नमस्तें देवेशि! अनस्कारण कारणे!
शंख चक्र गदा हस्ते! भागवतों देवी नारायणी परा। प्रसन्ना प्राह,देवर्षे! ब्रहापुत्र मिदं नखः॥
अर्थ- प्रजा के सृजन करने वाले पितामह के द्वारा इस प्रकार से आदेश दिये जाने पर विराट स्वायम्भुव मनु ने इस जगत की समुत्पत्ति करने वाली देवी को उस समय अपनी उत्कृष्ट तपश्चर्या के द्वारा संतृप्त कर दिया था। समाहित बुद्धि वाले मनु ने समस्त देवों की स्वामिनी देवी कर स्तवन किया- हे देवेशि! आप सम्पूर्ण शक्ति से सम्पन्न हैं और सबके कारणों के भी कारण स्वरूप वाली हैं, अर्थात् जो इस जगत के कारण है। उनको भी आपने समुत्पन्न किया है। हे जगत्कारण कारणे! आद्य माये! आपके चरणों में मेरा प्रणाम है। शंख, चक्र और गदा हो हाथों में धारण करने वाली और भगवान नारायण के हृदय में आश्रय ग्रहण करने वाली हैं। इस प्रकार से मनु के द्वारा संस्तुत नारायणी देवी बहुत प्रसन्न हुई और ब्रह्मा के पुत्र स्वायम्भुव मनु से यह वचन बोली-
वरं वरय राजेन्द्र!ब्रह्म!यदिच्छसि। प्रसन्नहं स्तवेनात्र भक्त्या कासुणिकोत्तमे।
तवा निर्विध्नता सृष्टिः प्रजायाः स्वात्तबाज या॥ प्रजा सर्गः प्रभवतु ममानुग्रहतः किल।
निर्विघ्नेन च राजेन्द्र! वृद्धिष्चप्युत्तरोत्तरम्॥ यः काष्चित्पठते स्तोत्र मद्भक्ता त्वकृतं सवा।
तेषाँ विद्या प्रजा सिद्धिः कीर्तिः कान्त्पुदयः खलु॥
अर्थ- देवी ने कहा-हे राजेन्द्र! हे ब्रह्मा के पुत्र! जो भी तुम चाहते हो वरदान माँग लो। तुम्हारे इस स्तवन और आराधन से मैं प्रसन्न हूँ। मनु ने कहा-यदि आप मुझ पर करुणा कर प्रसन्न है तो मैं यहीं चाहता हूँ प्रजा की सृष्टि की उत्तरोत्तर वृद्धि होगी। मेरा यह स्तवन जो भी कोई पड़ेगा उसको भी विद्या और प्रजा की तथा कीर्ति की सिद्धि होगी।
वेद ज्ञान और विज्ञान के उद्गम है। उनमें विश्व के सुख-शाँति और प्रगति के महान् रहस्य छिपे हैं। ब्रह्मा जी ने वेदों का निर्माण किया और उनसे कहा-तुम पग-पग पर भगवती महाशक्ति का प्रतिपादन करना। गायत्री के शीर्ष भाग तथा तीन चरण को मिलाकर इस महामंत्र के चार खण्ड किये गये हैं और प्रत्येक खण्ड से एक-एक वेद बनाया गया है। वेद गायत्री की व्याख्या है और वे अपनी आदि जननी वेद माता के गुणानुवाद निरन्तर गाते रहते है। वेदों को समस्त ऋचाओं को गायत्री की व्याख्या मात्र कहा जाय तो कुछ अत्युक्ति नहीं। गायत्री सम्पूर्ण विद्याओं, सुख और समृद्धि का बीज है, उसे जानकर और कुछ जानना, उसे पाकर और कुछ पाना शेष नहीं रह जाता।
विदाई के दिन जितने समीप आते जा रहें हैं, उतनी ही गति से हमारी भावनाओं में उफान आता जा रहा है। लोगों को मौत का डर लगता हैं, सो अपने को न कभी था और न अब है। व्यक्तिगत स्वामित्व और अहंकार के कारण उत्पन्न होने वाला मोह भी कब विदा हो गया। अवधूत की तरह मरघट में रहना पड़े तो भी अपने को कष्ट होने वाला नहीं है। सन् 60 का अज्ञात-वास ‘सुनसान के सहचरों’ के साथ हँसते-खेलते काट लिया था। जिन्दगी के शेष दिनों को शरीर किन्हीं भी परिस्थितियों में पूरा कर लेता। विदाई के बाद उत्पन्न होने वाली अन्य सभी विषम परिस्थितियों को सहन करने योग्य विवेक, धैर्य, साहस ओर अभ्यास अपने को है। बार-बार जो हूक और इठन कलेजे में उठती है उसका कारण यदि कोई दुर्बलता हो सकती है तो एक ही हो सकती है कि जिनको प्यार किया, उनको समीप पाने की भी अभिलाषा सदा बनी रही। एक कुटुम्ब बनाया, घरौंदा खड़ा किया, उसे बड़े प्यार से सजाया, बड़ी-बड़ी आशायें बाँधी, बड़े अरमान सँजोये। अब जबकि वे सपने कुछ-कुछ सजीव होने लगे थे, तभी नींद खुलने का समय आ गया। ऐसा मीठा सपना अधूरा ही छोड़ना पड़ेगा यह कभी सोचा भी न था। प्यार के धागों को इस तरह तोड़ना पड़ेगा, इसकी कभी कल्पना भी न की थी। जाने-जाने की बात बहुत दिन से कही, सुनी जा रही थी। उसकी जानकारी भी थी पर यह पता न था कि प्रियजनों के बिछुड़ने की व्यथा कितना अधिक कचोटने वाली-ऐंठने मरोड़ने वाली होती है। अब विदाई के क्षण जितने समीप आते-जाते हैं, वह व्यथा घटती नहीं बढ़ती ही जाती है।
यों यह एक विडम्बना ही है कि जो माया मोह का खण्डन करता रहा हो, ज्ञान-वैराग्य का उपदेश करता रहा हो, वह अवसर आने पर-अपने ऊपर बीतने पर इतनी व्यथा-वेदना अनुभव करे।
अपनों से छिपाया जाय? अब हम अपने अन्तर की हर घुटन, व्यथा और अनुभूति को अपनों के आगे उगलेंगे ताकि हमारे अन्तर का भार हल्का हो जाय। और परिजनों को भी वास्तविकता का पता चल जाय। आत्म-कथा तो कैसे लिखी जा सकेगी पर जो अंतर्द्वन्द्व घुमड़ते हैं, उन्हें तो बाहर लाया ही जा सकता है। इसे सुनने से सुनने वालों को मानव तत्व के एक पहलू को समझने का अवसर ही मिलेगा।
लोग अपनी आंख से हमें कुछ भी देखते रहे हों, अपनी समझ से कुछ भी समझते रहे हों। किसी ने विद्वान, किसी ने तपस्वी, किसी ने तत्व-दर्शी किसी ने मात्रिक, किसी ने लोक-सेवी किसी ने प्रतिभा-पुंज आदि कुछ भी समझा हो। हम अपनी आँखों और अपनी समझ में केवल मात्र एक अति सहृदय, अति भावुक और अतिशय स्नेही प्रकृति के एक नगण्य से मनुष्य मात्र रहें है। प्यार करना सीखने और सिखाने में सारी जिन्दगी चली गई। यदि कोई धन्धा किया है तो एक कि महँगी कीमत देकर प्यार खरीदना और सस्ते दाम पर उसे बेच देना। इस व्यापार में लाभ हुआ या घाटा इसका हिसाब कौन लगाये? खाली हाथ नग-धड़ंग आठ पौण्ड वजन लेकर आये थे, अब कपड़ों में लिपटा एक सौ सोलह पौण्ड वजन लेकर जा रहें हैं- खोया क्या, पाया ही तो हैं। तब एक माँ और एक कुटुम्ब हमें अपना समझता था, अब कितनों ही अहैतु की अनुकम्पा अपने ऊपर बरसती हैं कितनों के ही अनुग्रह से अपने शरीर, मन आर अन्तःकरण विकसित हुए, खोया क्या-पाया ही। प्रेम के व्यापार में घाटा किसी को भी नहीं रहता फिर हमें ही नुकसान क्यों उठाना पड़ता?
नुकसान एक ही रहा कि यह सोचने में न आया कि स्नेह का तन्तु जितना मधुर है, वियोग की घड़ियों में वह उतना ही तीखा बन जाता है। यदि यह मालूम होता कि आत्मीयता जितनी घनिष्ठ होती है, उतना उसका वियोग असह्य होता है तो कुछ दिन पहले से ही मन को समेटना, स्नेह तंतुओं को शिथिल करना और उदासीन बनने का अभ्यास करते पर प्रकृति को क्या किया जाय। मन तो ऐसा भौंड़ा मिला है, आदतें तो ऐसी विचित्र हैं, जो ज्ञान विज्ञान के सारे बन्धन तोड़कर आगे निकल जाता हैं।
“आत्मा एक है, हम सभी एक सूत्र में माला के दानों का तरह जुड़े हुए है। शरीर से दूर रहने पर आत्मा की एकता बनी रहती है। स्नेह में दूरी बाधक नहीं होती। आत्मीयता शरीर से नहीं आत्मा से होती है-आदि आदि तत्व दर्शन हमने पढ़े तो बहुत हैं, दूसरों को सुनाये भी हैं पर उनका प्रयोग सफलतापूर्वक कर सकना कितनी ऊँची स्थिति पर पहुँचे व्यक्ति के लिए सम्भव है, यह कभी सोचा न था। लगता है अभी अपनी आत्मिक प्रगति नगण्य ही है। यदि ऐसा न होता तो अपने स्वजन स्नेह और उनकी असंख्य उप-कृतियाँ मस्तिष्क में सिनेमा के चित्रपट की तरह उभर उभर कर क्यों आतीं? असीम प्यार पाया पर उसका प्रतिदान क्या दिया? अनेकों के अनेकों अहसान-पदार्थों के न सही भावनाओं के सही-अपने ऊपर लदे पड़े है। उनको कुछ प्रतिदान दिये बिना ही चलना पड़ रहा है
स्नेहीजनों के स्नेह और अनुग्रहियों के अनुग्रहों का कितना ऋण भार लेकर विदा होना पड़ रहा है, यह सोच कर कभी कभी बहुत कष्ट होता है। अच्छा होता जन्म से ही कहीं एकान्त में चले गये होते। लोमड़ी खरगोशों की तरह किसी का अहसान, उपकार, स्नेह और सहकार लिये बिना जिन्दगी के दिन पूरे कर लेते पर यदि लोगों के बीच रहना ही पड़ा और उनका सौजन्य लेना ही पड़ा तो संतोष तब रहता, जब उस प्रेम का प्रतिदान भी कुछ बन पड़ा होता। सोचते तो बहुत रहे, स्वप्न बड़े बड़े देखते रहे, अमुक के लिए यह करेंगे, अमुक को यह देंगे। पर किया जा सका और दिया जा सका, वह इतना कम हैं कि आत्म ग्लानि होती है और लज्जा शिर नीचा हो जाता है।
कदाचित कुछ दिन और ठहरने का अवसर बन जाता तो और कुछ आशा शेष न थी एक इच्छा अवश्य थी कि असीम स्नेह बरसाने वाले स्वजनों के लिये प्रतिदान में जो कुछ अपने भीतर बाहर और कुछ शेष बच रहा है, उसे राई रत्ती देकर जाते और सबके चरणों की धूलि शिर पर रखकर कहते-इस नगण्य से प्राणी से अभी इतना ही बन पड़ा। 84 लाख योनियों में यदि विचरण करना पड़ा तो हर शरीर को लेकर आप लोगों की सेवा में उपलब्ध प्रेम और सहकार का कुछ न कुछ ऋण भार चुकाने के लिए अति श्रद्धा के साथ उपस्थित होते रहेंगे और जिस शरीर से जितनी सेवा, सहायता बन पड़ेगी, जितनी कृतज्ञता और श्रद्धा व्यक्त कर सकने की क्षमता रहेगी उसका पूरा पूरा उपयोग आपके समक्ष करते रहेंगे।”
पर अब यह सब कहने से लाभ क्या? समय आ पहुँचा। यों मरना अभी देर में है पर जब परस्पर मिलने जुलने और हँसने खेलने, सुनने और समझने की सुविधा न रही, एक दूसरे से दूर-समीप के आनन्द से वंचित रह कर जीवित भी रहें तो यह आनन्द उल्लास जिसे पाने का आदि यह मन बन चुका है, कहाँ मिल सकेगा? जिस शक्ति के साथ हम बँधे और जुड़े हैं, उसकी अवज्ञा नहीं की जा सकती। इन्कार, उपेक्षा और बहाना करने की बात भी नहीं सोचते। हम अज्ञान ग्रस्त मोह बन्धन में बँधे प्राणी अपना दूरवर्ती हित नहीं, समझते-वह शक्ति समझती है और जिसमें हमारा, हमारे परिवार और हमारे समाज धर्म, एवं विश्व का कल्याण है, उसी को करने जा रहे हैं।
जिनके प्रति हमारी असीम श्रद्धा और अगाध भक्ति है-जिसके संकेतों पर पूरा जीवन निकल गया, अब इस जराजीर्ण शरीर को उससे अलग करने की, अपना रास्ता अलग बनाने की बात कैसे सोची जाय? करना तो वही होगा जो नियति की आज्ञा है और इच्छा है पर अपनी दुर्बलता को क्या करे? जिनके असीम स्नेह जलाशय में स्वच्छन्द मछली की तरह क्रीड़ा कल्लोल करते हुए लम्बा जीवन बिता चुके, अब इस जलाशय से विलग होने की घड़ी भारी तड़पन उत्पन्न करती है। लगता है हम भी शायद ही इस स्थिति से कुछ ऊपर उठ पायें है।
अपना मन कितना ही इधर उधर क्यों न होता हो, यह निश्चित हैं कि हमें ढाई वर्ष बाद निर्धारित तपश्चर्या के लिए जाना होगा और शेष जीवन इस प्रकार बिताना होगा, जिसमें जन संपर्क के लिए स्थान न रहें। यों यह एक प्रकार से मृत्यु जैसी स्थिति है। पर सन्तोष इतना ही हैं कि वस्तुतः ऐसी बात होगी नहीं। हमें अभी कितने ही दिन और जीना है। जन संपर्क के स्थूल आवरण में शक्तियाँ बहुत व्यय होती रहती है। उन्हें बचा लेने पर हमारी सामर्थ्य अधिक बढ़ जायगी। सूक्ष्म शरीर तपसाधना से परिपुष्ट होने पर और भी अधिक समर्थ बन सकेगा। तब आज की अपेक्षा अपने लिये और दूसरों के लिये अधिक उपयोगी सिद्ध हो सकेंगे। यदि ऐसा न होता तो हमारी मार्ग दर्शक शक्ति हमें वर्तमान् उपयोगी कार्य क्रम और सरल जीवन प्रवाह से विरत न करती।
वियोग की घड़ियों में भी संतोष केवल इस बात का है कि दूसरे लोग भले ही शरीर समेत हमसे मिल न सकें पर जिन्हें अभीष्ट है, उनके साथ भावनात्मक सम्बन्ध यथावत बना रहेगा वरन् सच पूछा जाय तो और भी अधिक बढ़ जाएगा अति व्यस्तता और अल्प सामर्थ्य के कारण परिजनों के लिए जो सोच और कर सकना अभी सम्भव नहीं हो पा रहा हैं, वह तब बहुत सरल हो जाएगा शरीर की समीपता ही सान्निध्य का आधार नहीं होती। परदेश में रहने वाले भी अपने स्त्री पुत्रों के लिए बहुत कुछ सोचते करते हैं। वियोग कई बार तो प्रेम को और भी अधिक प्रखर एवं प्रगाढ़ बनाता देखा गया है। ईश्वर भक्ति का आनन्द उसके अदृश्य रहने से सम्भव होता है, यदि वह अपने साथ भाई भतीजे की तरह रहने लगें तो शायद उसकी भी उपेक्षा अवज्ञा होने लगे।
जो हो, हमारा अपना आन्तरिक ढाँचा एक विचित्र स्तर का बन चुका है और उसे आग्रहपूर्वक वैसा ही बनायें रहेंगे। सहृदय, ममता, स्नेह, आत्मीयता की प्रवृत्ति हमारे रोम रोम में कूट कूट कर भरी है। यह इतनी सरल व सुखद है कि किसी भी मूल्य पर इसे छोड़ने की बात तो दूर, घटाना भी सम्भव न हो सकेगा। तृष्णा और वासना से छुटकारा पाने के नाम हम मुक्ति मानते रहे है। सो उसे प्राप्त कर चुके। उच्च आदर्शों के अनुरूप जीवन पद्धति बनाये रहने, दूसरों में केवल अच्छाई देखने और सबमें अपनी ही आत्मा देखकर असीम प्रेम करने की तीन धाराओं का संयुक्त स्वरूप हम स्वर्ग मानते रहे है। सो उसका रसास्वादन चिरकाल से हो रहा है। अब न स्वर्ग जाने की इच्छा है, न मुक्ति पाने की।
ईश्वर दर्शन, आत्म साक्षात्कार, बुद्धि सिद्धि के लिए उनके अभाव में जो आकर्षण रहता है, वह भी लगभग समाप्त हो चुका। अपनी कुछ कामना नहीं। भावी तपश्चर्या क प्रयोजन उपरोक्त कारणों में से एक भी नहीं हैं। ऐसा वैराग्य जिसमें स्नेह सौजन्य से-अनन्त आत्मीयता से-वंचित होना पड़े, हमें तनिक भी अभीष्ट नहीं। हमारी ईश्वर भक्ति, पूजा उपासना से आरम्भ होती है और प्राणी मात्र को अपनी ही आत्मा के समान अनुभव करने और अपने ही शरीर के अंग अवयवों की तरह अपने पन की भावना रखते हुए अनन्य श्रद्धा चरितार्थ करने तक व्यापक होती चली जाती है। ऐसी दशा में कहीं दूर चले जाने पर भी हमारे लिये यह संभव न हो सकेगा कि जिनके साथ इसी जीवन में घनिष्ठता रहीं है, जिनका स्नेह, सद्भाव, सहयोग अनुग्रह अपने ऊपर रहा है, उनकी ओर से तनिक भी मुख मोड़ा जाय, उनके प्रति उदासीनता और उपेक्षा अपनाई जाय। कोई कृतघ्न ही ऐसा सोच सकता है।
यों शरीर साधन और श्रम के द्वारा हमारी विभिन्न कार्यों में सहायता करने और वाले भी कम नहीं रहे है पर उनकी संख्या और भी अधिक है, जो भाव भरी आत्मीयता के साथ अपनी श्रद्धा, ममता और सद्भावना हमारे ऊपर उड़ेलते रहे है। सच पूछा जाय जो यही वह शक्ति स्त्रोत रहा है, जिसे पीकर हम इतना कठिन जीवन जी सके है। रोटी ने नहीं-भाव भरी आत्मीयता के अनुदान जहाँ तहाँ से हमें मिल सके है, उन्हीं ने हमारी नस-नाड़ियों में जीवन भरा है और उसी के सहारे हम इस विशाल संघर्ष से भरे जीवन में जीवित रह सकने और कुछ कर सकने लायक कार्य कर सकने में समर्थ रह हैं। इन उपकारों को कोई पाषाण हृदय, अति निष्ठुर और नर पशु ही भुला सकता है। हमें ऐसी कृतघ्नता का अभिशाप मिला नहीं हैं। कृतज्ञता से अपनी नस नस भरी पड़ी है। जिसका एक रत्ती भी उपकार रहा है, वह हमें एक मन लगा है। और सोचा यही गया है कि उसके लिये अनेक गुनी सेवा, सहायता करके अपनी कृतज्ञता का परिचय दिया जाय। बन तो कुछ नहीं पड़ा पर अरमान अभी भी बड़े बड़े हैं। स्वप्न अभी यही है कि ढाई वर्ष बाद कहीं अन्यत्र चले जाने पर यदि कुछ उपलब्धियाँ मिलीं और उन पर अपना अधिकार रहा तो उन्हें अपने ऋण दाताओं से उऋण होने में लगावेंगे।
लोगों की आँखों से हम दूर हो सकते हैं पर हमारी आँखों से कोई दूर न होगा। जिनकी आँखों में हमारे प्रति स्नेह और हृदय में भावनायें है, उन सब की तस्वीरें हम अपने कलेजे में छिपाकर ले जायेंगे और उन देव प्रतिमाओं पर निरन्तर आँसुओं का अर्घ्य चढ़ाया करेंगे। कह नहीं सकते उऋण होने के लिए प्रत्युपकार का कुछ अवसर मिलेगा यही नहीं। पर यदि मिला तो अपनी इस देव प्रतिमाओं को अलंकृत और सुसज्जित करने में कुछ उठा न रखेंगे। लोग हमें भूल सकते है पर हम अपने किसी स्नेही को नहीं भूलेंगे।
पत्थर से बनी निष्ठुर देव प्रतिमाओं के साथ आजीवन एकाँगी प्रेम करने की कला भारतीय अध्यात्म सिखाता रहा है। सो हमने भली भाँति सीख लिया है। पीठ फेरने पर लोग हमें भूल जायेंगे, सो ठीक है, इससे अपना क्या बनता बिगड़ता है। जिसने कोई प्रत्यक्ष अनुदान नहीं दिया उन पाषाण प्रतिमाओं के चरणों में आजीवन मस्तक झुकाते रहे हैं तो क्या उन देवियों और देवताओं की प्रतिमायें हमारी आराध्य नहीं रह सकती, जिनकी ममता हमारे ऊपर समय समय पर बरसी और प्राणों में सजीवता उत्पन्न करती रही।
दिन कम बचे हैं, पूरे एक हजार भी तो नहीं बचे। रोज एक घट जाता है। इन दिनों में क्या करें, क्या न करें सोचते रहते हैं। इस सोचे विचार में एक बात स्पष्ट रूप से सामने आती है कि अपने छोटे परिवार को इस बीच भरपूर प्यार कर लें। कोई माता विवशता में कहीं अकेली जाती है तो चलते समय अपने बच्चों को बार बार दुलार करती, बार बार चूमती, लौट लौट कर देखती और ममता से भरी गीली आँखें आँचल से पोछती आगे बढ़ती है। ऐसा ही कुछ उपक्रम अपना भी बन रहा है। सोचते हैं जिन्हें अधूरा प्यार किया अब उन्हें भरपूर प्यार कर लें। जिन्हें छाती से नहीं लगाया, जिन्हें गोदी में नहीं खिलाया, जिन्हें पुचकारा दुलारा नहीं, उस कमी को अब पूरी कर लें। किसी को कुछ अनुदान, आशीर्वाद देना अपने हाथ में न हो तो दुलार देना तो अपने हाथ में है। प्रत्युपकार के लिए आतुर और कातर अपनी आत्मा इस तरह कुछ तो हल्कापन अनुभव करेगी और शायद उससे स्नेह पात्र स्वजनों को भी कुछ तो उत्साह उल्लास मिल ही सके।
एक सुखान्त कहानी का दुखान्त अन्त हमें अभीष्ट नहीं। हमारा समस्त जीवन क्रम आरम्भ से ही सुखान्त बना है। आदर्शों की कल्पना उनके प्रति अनन्य निष्ठा और तदनुकूल कार्य पद्धति में निर्धारण और निर्धारित पथ पर कदम कदम बढ़ते चलने का अविचल धैर्य एवं साहस, यही तो हमारी जीवन पद्धति है। इस पथ पर चलते हुए दूसरों की दृष्टि में हमें बहुत कष्ट कहने और बहुत त्याग करने पड़े है और अब अन्त भी ऐसे ही रोते रुलाते हो रहा है। इसलिये देखने वालों की समझ से यह गाथा दुःखान्त मानी जाने लगी है पर अपनी दृष्टि अलग है। आदर्शों की कल्पनायें मन में एक सिहरन और पुलकन उत्पन्न करती है। आदर्शों के प्रति अनन्य निष्ठा रखकर दूसरों के विरोध उपहास की चिन्ता न करते हुए, अभाव कष्टों से भरी जिन्दगी काटने में एक शूरवीर योद्धा जैसी अनुभूति होती है। निरन्तर उत्कृष्टता की गतिविधियों से भरा पूरा जीवन बाह्य दृष्टि से दयनीय ही क्यों न लगे पर अन्तर में अपार सन्तोष रहता है।
अब तक इन्हीं अनुभूतियों के साथ सुखपूर्वक हँसते खेलते दिन काटते आयें है आये है और मानते रहे है कि हम संसार के गिने चुने लोगों की तरह सुखी है। अब अंत की विषम घड़ियाँ यों एक बारगी कलेजे को कपड़ा निचोड़ने की तरह ऐंठती है और अनायास ही रुलाई से कण्ठ भर देती है, फिर भी इसके पीछे कोई विवशता नहीं है। महान् उद्देश्य के लिये-लोक मंगल के लिए-नव निर्माण के लिए तिल तिल करके अपने को गला देने में हमें असीम सन्तोष, अपार आनन्द और उच्चकोटि का गर्व है। इस प्रकार यह एक उल्लास भरी आकर्षक कथा गाथा का सुखान्त अन्त ही है। इसे दुःखान्त न माना जाय।
पुरुष की तरह हमारी आकृति ही बनाई है, कोई चमड़ी उघाड़ कर देख सके तो भीतर माता का हृदय लगा मिलेगा, जो करुणा, ममता, स्नेह और आत्मीयता से हिमालय की तरह निरन्तर गलते रहकर गंगा यमुना बहाता रहता है। इस दुर्बलता को मोह, ममता कहा तो जा सकता हैं पर निश्चय ही यह भीरुता या विवशता नहीं हैं। सहेलियों से बिछुड़ते हुए और पति के घर जाते हुए, जिस तरह किसी नव वधू की द्विधा मनः स्थिति होती है, लगभग वैसी ही अपनी ही और रुंधा कण्ठ एवं भावनाओं के उफान से उफनता अन्तः करण लगभग उसी स्तर का है। रात को बिना कहे चुपचाप पत्थर की तरह चल खड़े होने का साहस अपने में नहीं, इस स्तर का वैराग्य अपने को मिला नहीं। इसे सौभाग्य, दुर्भाग्य जो भी कहा जाय कहना चाहिये।
अपनी सभी सहेलियों से एक बार छाती से छाती जुड़ाकर मिल लेने और अपने अब तक के साथ साथ हँस खेल कर बड़े होने की स्मृतियों की ताजा कर फफक फफक कर रो लेने में लोक उपहास भले ही होता है पर अपना चित्त हल्का हो जाएगा, सो ही हम से बन पड़ रहा है। मनुष्य आखिर दुर्बलताओं से ही तो भरा है। अपने को हम एक नगण्य सा अति दुर्बल मानव प्राणी मात्र मानते रहे है। सो इन परिस्थितियाँ में हमारी दुर्बलतायें और भी अधिक स्पष्टतापूर्वक प्रकट हो रही है तो अच्छा ही ड़ड़ड़ड़। सन्त, ज्ञानी, वैरागी, ब्रह्मवेत्ता के लिए इस प्रकार ड़ड़ड़ड़ विरह वेदना अशोभनीय हो सकती है, पर हम उस ड़ड़़ड़ड़ के हैं कहाँ? हमारी तुच्छता को समझा जाय और दुर्बल की विवशता को सहानुभूति भरी उदारता से देखा जाय तो हमारे लिये इतना ही बहुत है।
हमारा इतना जीवन परिवार की वृद्धि और विकास में लग गया। छोटे छोटे बच्चों को उंगली पकड़कर चलना सिखाने से लेकर उनकी शिक्षा दीक्षा और सुव्यवस्थित जीवन श्रृंखला में पहुँचाने तक का जितना परिश्रम एक सद् गृहस्थ को करना पड़ता है, उसी परिश्रम और भावना के साथ बड़े यत्नपूर्वक हम इस परिवार के विकास में लगे रहे है। पाल पोस कर बड़े किया हुये प्रिय परिजनों को यों छोड़कर चलना पड़ेगा। इसकी कभी कल्पना भी न की थी। यदि ऐसा पहले मालूम होता तो अपने बच्चों की समझाने बुझाने में जो सख्ती बरतनी पड़ी उसे पहले से ही कम करते और बदले में उन्हीं अधिक स्नेह और प्यार देते चले आये होते, अब तो विदा के क्षण समीप देखकर केवल रुलाई ही आती है कि अपने इस प्रिय परिवार को छोड़कर कैसे जायें?
मन है कि अपने छोटे परिवार को अब जितना अधिक स्नेह, सद्भाव दे सकना सम्भव हो सके दे लें। हँसने खेलने-अपनी कहने, दूसरे की सुनने, सहानुभूति और सेवा के अधिकाधिक अवसर खोज निकालने में शेष दो वर्षों को निकाल दें। इसी तरह यह थोड़ी सी अनमोल घड़ियाँ बीत सकें तो अच्छा है। महान् मानवता की सेवा करने के लिए तो दो वर्ष बाद का सारा बचा खुचा ही जीवन पड़ा है। यह दिन तो अपने छोटे परिवार के लिए व्यय करने का मन है।
प्यार, प्यार, प्यार यही हमारा मन्त्र है। आत्मीयता, ममता, स्नेह और श्रद्धा यही हमारी उपासना है। सो बाकी दिनों अब अपनों में अपनी बातें ही नहीं कहेंगे-अपनी सारी ममता भी उन पर उड़ेलते रहेंगे। शायद इससे परिजन को भी यत्किंचित् सुखद अनुभूति मिलें प्रतिफल और प्रतिदान की आशा किये बिना हमारा भावना प्रवाह तो अविरल जारी ही रहेगा। परिजनों से परिपूर्ण स्नेह-यही इन पिछले दिनों का हमारा उपहार है, जिसे कोई भुला सके तो भुला दे। हम तो जब तक मस्तिष्क में स्मृति और हृदय में भावना का स्पंदन विद्यमान् है आजीवन उसे याद ही रखेंगे।
कैसा है वह सुख मय जीवन तथा सुयोग्य सुशिक्षा है। कार्य सभी स्वतन्त्र है जिसके, न परवश पर इच्छा है॥ सद्विचार का कवच पहन, जो सत्मार्ग अपनाता है। निपट सत्व आदर्श मान जो, जीवन क्षेत्र चलाता है॥
जिसकी इच्छा दुर्व्यसनों पर, कभी नहीं डिग सकती है। जिसकी आत्मा सम्मुख लख निज मृत्यु नहीं टूट सकती है॥ लोक प्रशंसा की आशा से जिसका हृदय न फलता है। गुप्त विषय की चिन्ताओं से जिसका हृदय न जलता है।
निज सम्पत्ति की छटा देख कर, जो अभिमान न करता है। पर उन्नति की दशा देखकर, जो दुःख आह न भरता है॥ वृथा वाद अपवाद मात्र में, जिसका समय न कटता है। केवल धन के योग भोग में, जो दिन रात न मरता है॥
लोक वादियों ने भी जिसका, जीवन शुद्ध बताया है। जिसने अपने तीव्र ज्ञान को शरण-स्थान बनाया है॥ जिसकी सम्पत्ति चापलूस खल कभी नहीं खा सकते है। जिसके सुख, दुःख को भी निन्दक व्यर्थ नहीं गा सकते है॥
सुबह शाम ईश्वर चिन्तन जो नित्य नेम से करता है। उसकी भक्ति मात्र पाने को, नर इच्छा नहिं रखता है॥ धर्म, कर्म या संत संगति में मग्न सदा जो रहता है। अपने पैरों आप खड़ा हो जो संसार विचरता है॥
उन्नति आशा अवनति भय से, मुक्ति उसे मिल जाती है। मृत्यु बाद भी उसकी आत्मा पूर्ण शान्ति को पाती है॥ चाहे वह स्वामी न भूमि का, निज स्वामी तो पक्का है। चाहे वह निर्धन हो फिर भी, जीवन वह ही सच्चा है॥
-लाल महाबली सिंह,
*समाप्त*