परमात्मा का निराकार स्वरूप

शिवा का प्रश्न- ‘परमात्मा की सबसे उत्तम उपासना कौन सी है, मुझे बहुत प्यारा लगा। यह बात सबके जानने की है। जो दूसरों की भलाई में निरत रहता है,वह भगवान को ही भक्ति करता है। परोपकार से बढ़कर और कोई उपासना नहीं वह सरल भी है,उत्तम भी है और सुखदायक भी। परोपकार करने में आत्मा की प्रसन्नता इतनी बढ़ जाती है कि रोमांच हो आता तो फिर उनका फल तो और भी स्वर्गीय सुखों से भरा हुआ होगा। भलाई साक्षात परमात्मा का निराकार स्वरूप है।

लोग यह मानते है कि शिवाजी मेरी भक्ति करता है, इसलिये वह मुझे बहुत प्रिय है। मुझे सचमुच शिवाजी अच्छा लगता है, किन्तु शरीर से नहीं काम से। उसके गुण और उसका चरित्र बहुत ऊँचे दर्जे के है। उसने लोगों की भलाई के लिये अपने जीवन को सौंपा था, मैंने उसे एक रास्ता बता दिया। अब वह निष्काम भावना से सब काम करता है, उस काम को नहीं करता, जिससे मानवता का अहित होता हो, इसलिये वह भगवान का सच्चा भक्त है। मैं चाहता हूँ कि भारतवर्ष के सब बच्चे मेरे प्रिय शिष्य शिवा की तरह बन जाये। भलाई के रास्ते में प्रिय-अप्रिय जो कुछ भी आये, वीरतापूर्वक सहन करने वाले बन जाये। उससे भगवान की यह दुनिया बहुत अच्छी बनेगी। भगवान का प्यार और आशीर्वाद भी मिलेगा।

कोई कल्प-वृक्ष है तो उसका बीज परोपकार। परोपकारी सबका हृदय जीत लेता है। सभी का सहयोग उसे मिलता है। शिवा ने थोड़ी ताकत से ज्यादा विजय पाई है, क्योंकि उसे भगवान का आशीर्वाद मिला है और मनुष्यों का प्यार व सहयोग। यदि संसार के सारे मनुष्य परोपकार में तत्पर हो जायें, तो संसार कितना सुन्दर और सुखपूर्वक बन जाये।

- समर्थ गुरु रामदास


हम महान् ईश्वर के महान् पुत्र हैं

पुत्र से पिता के स्वरूप का आभास मिल जाता है। पुत्र पिता का प्रतिनिधि माना गया है। प्रतिनिधित्व का आशय है, उसी रीति-नीति का प्रतिपादन करना जो प्रधान की हो। जो प्रतिनिधि ऐसा नहीं करते, वे विद्रोही ही माने जाते है।

मनुष्य का अस्तित्व उसका अपना मूल अस्तित्व नहीं है। वह किसी एक महानतम अस्तित्व का अंश है, उसका प्रतिनिधि है। सर्वोच्च प्रधान है, जिसकी इच्छा से मानव-जीवन अस्तित्व में आया है। उसकी ही इच्छा के फल स्वरूप वह पृथ्वी पर उसका प्रतिनिधि बनकर अवतरित हुआ है।

मनुष्य में परमात्मा के सारे गुण बीज रूप में वर्तमान है। इस बात की साक्षी उसकी वह उन्नति और विकास है, जो अब तक मनुष्य ने किया है और करता जा रहा है।

तथापि एक समान ईश्वर का अंश होने पर भी सारे मनुष्य समान रूप से उन्नति और विकास नहीं कर पाते। कुछ तो उन्नति के उच्चतर सोपान चढ़ते चले जाते है और दूसरे यथा-स्थान पड़े कालचक्र में निर्जीव जैसे घूमते रहते है। इस अन्तर का प्रमुख कारण यही है कि यथास्थान स्थगित रहने वाले व्यक्ति अपने उस अस्तित्व से अनभिज्ञ बने रहते है, जिसका सम्बन्ध ईश्वरीय प्रतिनिधित्व से है। अपने अज्ञान के कारण न तो वह अनुभव करते है और न विश्वास कि वे ईश्वर के पुत्र है और संसार में उसके प्रतिनिधि।

जिनकी अपनी पैतृक महानता का बोध होता है, उसकी शक्ति सामर्थ्य और गरिमा के प्रति आत्मीयता होती है, वह स्वभावतः उसी के अनुसार अपनी गतिविधि निर्धारित करता है। उसे इस बात का आग्रह रहता है कि कहीं ऐसा न हो कि उसका कोई काम उसकी पैतृक महिमा में ऋणात्मक तत्त्व का काम करे। ऐसा शीलवान पुत्र पैतृक मर्यादा के अनुसार व्यवहार करता है ओर उसी के अनुरूप उन्नत होता है।

अपनी पैतृक मर्यादा से अबोध व्यक्ति जीवन की दीन स्थिति से उठने की प्रेरणा कदाचित ही पाते है। साधारण जीवों की तरह सुख-दुःख का भोग भोगते ओर मर कर चले जाते है। अपने इस अज्ञान के कारण वे उस महनीय स्थिति से वंचित रह जाते है, ईश्वर के पुत्र होने के कारण जिसके वे सहज अधिकारी होते है।

ईश्वर का पुत्र और प्रतिनिधि होने के नाते हर मनुष्य सत् चित और आनन्द का सहज अधिकारी है। अपने इस अधिकार को प्राप्त करने के लिये, उसे यह विश्वास जगाना ही होगा कि वह ईश्वर का पुत्र है। उस ईश्वर का पुत्र जिसकी शक्ति अपार है। जो सर्वशक्तिमान और निखिल ब्रह्माण्डों का स्वामी है। जिसके संकेत से सृष्टि की रचना उसका पालन और प्रलय होता है। जो सार्वकालिक और सर्वदर्शी हैं। जो अणु-अणु में आदि, मध्य, और अन्य रूप में ओत-प्रोत है। मेरा जन्म और जीवन उसके ही अधीन उसकी सत्ता का ही एक अंश है। हमारे कर्म और वैचारिक क्रियाओं में उसकी प्रेरणा और चेतना प्रतिबिम्बित होती है।

इस दिव्य विश्वास के स्थिर होते ही मनुष्य में आत्मगौरव की स्फुरण होगी और वह अपने को ईश्वर का उचित प्रतिनिधि प्रकट करने का प्रयत्न करने लगेगा। प्रतिनिधित्व का प्रकट गुणों के सिवाय और किसी उपाय से नहीं हो सकता। गुणों का विकास होते ही मनुष्य का अस्तित्व विस्तृत होगा और वह ईश्वर की सारी सम्पदाओं का स्वामित्व पाने लगेगा। दीनता-हीनता और दरिद्रता का कलुष हटने और हृदय में सुख-शांति और सन्तोष कर सम्पन्नता का समावेश होने लगेगा। जीवन धन्य बन जायेगा।

यदि आप में दैन्य और दरिद्र का अंश शेष है। आप सत्-चित् और आनन्द के अपने अधिकार से वंचित है, तो निश्चय ही आप अज्ञान के कारण अपनी पैतृक गरिमा को भूले हुए है। अपने को एक सामान्य प्राणी समझकर जी रहे है। विश्वास करिये आप सामान्य प्राणी मात्र नहीं है। आप ईश्वर के पुत्र और संसार में उसके प्रतिनिधि है। सोचिये, समझिये, मानिए ओर कहिए कि आप सर्वशक्तिमान ईश्वर के पुत्र है। यह विश्वास, यह स्वीकृति आप में वे सारे गुण और सारी शक्तियाँ जगा देगी, जो ईश्वर में है और जो अंश रूप में आपके भीतर सोई पड़ी है।

जिस प्रकार किसकी वनस्पति की विशेषताएँ, उसका गुण-दोष और खाद, उसकी जड़, तने, शाखा, छाल, माँस यहाँ तक फूल, फल और पत्ती आदि प्रत्येक अंश में ओत-प्रोत होते है, उसी प्रकार निश्चय ही ईश्वर के सारे गुण सारी विशेषताएँ आप में है, उसका अंश उसका पुत्र और उसका प्रतिनिधि होने के नाते ओत-प्रोत है। उनमें विश्वास करिये,उन्हें जगाइए और अपनी प्राकृत पदवी के स्वामी बन जाइये।

उत्तराधिकार का बोध होते ही मनुष्य को अपनी पैतृक सम्पत्ति से आत्मीयता हो जाती है। वह उन्हें अपनी समझने लगता है। अपने में ईश्वरत्व का बोध होते ही आपको सृष्टि का विस्तार, सूर्य का प्रकाश, चन्द्रमा का सौंदर्य और नक्षत्रों की ज्योति अपनी लगेगी। वायु की गति, जल का रस और पृथ्वी की गन्ध आपको अपनी सम्पत्ति लगेगी। आपको अनुभव होगा कि यह सारी सृष्टि आप में और आप उसमें रमे है। इस महान् और महनीय स्थिति में आते ही आप अपने अधिकार सत्-चित्-आनन्द के अधिकारी बन जायेंगे

अधिकार के साथ कर्तव्य का योग स्वाभाविक है। जहाँ अधिकार है,वहाँ कर्तव्य भी है। जिस प्रकार आप ईश्वरीय अधिकार के पात्र है, उसी प्रकार ईश्वरीय कर्तव्य का दायित्व भी आपके कन्धों पर है। अधिकार और कर्तव्यों के क्रम में कर्तव्य का स्थान पहले है। कर्तव्य के आधार पर ही अधिकार की प्राप्ति होती है और उसकी चरितार्थता भी कर्तव्य पर निर्भर है। केवल यह बौद्धिक विश्वास कि हम ईश्वर के पुत्र है, उसके अंश ओर प्रतिनिधि है-ईश्वरीय अधिकार का स्वामी न बना देगा। उसके लिये निश्चय ही ईश्वरीय कर्तव्य का पालन करते हुए अपने विश्वास की वास्तविकता परिमाणित करनी ही होगी। अस्तु अधिकारों की भाँति अपने उस ईश्वरीय कर्तव्य का बोध कर लेना भी आवश्यक है। बोध होने पर ही उसके पालन में सुविधा हो सकेगी।

ईश्वर ने सृष्टि रचना करने तक ही अपने कर्तव्य की सीमित नहीं रखा। उसने अपनी इस सृष्टि का पालन भी अपने कर्तव्यों में सम्मिलित किया हुआ है। इसी कर्तव्य की पूर्ति के लिए उसने विविध प्रकार की वनस्पतियाँ, विविध प्रकार के अन्न, वायु, जल और अग्नि आदि साधन उत्पन्न किए। साथ ही जीवों को जीवन रक्षा ओर उसके साथ आनन्द अनुभूति की चेतना भी अनुग्रह की है। उसकी इस कृपा के आधार पर ही जीव-मात्र संसार में आनन्द पूर्वक जी रहे है।

ईश्वर के इस कर्तव्य के अनुसार उसके प्रतिनिधि मनुष्य पर भी यह कर्तव्य आता है कि वह सृष्टि पालन और उसके संचालन में अपने परमपूज्य, अपने परमपिता के साथ योग करे। इस योगदान करने की विधि इसके सिवाय क्या हो सकती है कि वह ऐसे काम करे,जिनसे संसार की प्रगति हो और उसमें सुख शांति का समावेश हो। यह मन्तव्य तभी पूरा हो सकता है, जब मनुष्य स्वयं अपने को उदात्त और आदर्श चरित्र वाला बनाये। वह मानवीय संयम का पालन ओर ईश्वरीय नियमों का निर्वाह करे। यह नियम और संयम उसके दिये धर्म में पूरी तरह वर्णित है। धर्म का पालन करते रहने से ईश्वरीय कर्तव्य का पालन होता चलेगा।

केवल अपने सुख, अपने मंगल और अपने कल्याण में व्यस्त, उसका ही ध्यान रखने वाले लोग ईश्वरीय कर्तव्य से विमुख रहते है। अपना मंगल और अपना कल्याण भी वाँछनीय है, लेकिन सबके साथ मिलकर, एकाकी नहीं। अपने हित तक बँधे रहने वाले बहुतायत स्वार्थी हो जाते है। स्वार्थ और ईश्वरीय कर्तव्य में विरोध है। जो स्वार्थी होगा, वह कर्तव्य विमुख ही चलता रहेगा। ईश्वर ने सृष्टि उत्पन्न की। एक से एक बढ़कर आनन्ददायक पदार्थों का निर्माण किया। वह निखिल ब्रह्माण्डों के प्रत्येक का स्वामी है। पर क्या वह उनका उपभोग स्वयं करता है? नहीं वह उनका उपयोग स्वयं नहीं करता है। उसने सारी सम्पदायें और साधन अपने बच्चों के लिये ही सुरक्षित कर दिए है। वह अपने आप में महान् त्यागी और परोपकारी है।

इसी प्रकार हम मनुष्यों का भी कर्तव्य है कि हम परोपकारी और परमार्थी बने। हमारे पास जो भी बल-बुद्धि-विधा-धन-सम्पत्ति आदि उस प्रभु के दिए हुये पदार्थ है, उनका एक अंश परोपकार और परमार्थ में लगाये। ऐसा कभी न सोचे कि यह सब तो मेरा है, में ही इसका उपभोग करूँगा। गरीबों, असहायों और आवश्यकता ग्रस्तों की सहायता करना, दुखी और अपाहिजों की सेवा करना ईश्वरीय कर्तव्य है, जो पूरा करना ही चाहिये। ईश्वर अपने विरचित जीव मात्र से प्रेम करता है। उसके पुत्र उसके प्रतिनिधि मनुष्य का भी कर्तव्य है कि वह सृष्टि के सारे जीवों से प्रेम करे

ईश्वरीय कर्तव्य के पालन की प्रेरणा, सामर्थ्य और क्षमता लाने के लिए मनुष्य को चाहिये कि वह संसार कर नश्वर और भ्रामक वासनाओं से दूर रहे। उनसे सुरक्षित रहकर अपनी शक्ति और स्वरूप को पहचाने। निकृष्ट भोग-वासनायें पाशविक प्रवृत्ति की घोतक है, ईश्वरीय कर्तव्य की नहीं। ईश्वरीय कर्तव्य का घोतक तो आत्मसंयम, आत्म-विकास और आत्म-विस्तार से ही होता है। यदि हमारे हृदयों में यह धारणा दृढ़ हो जाये कि हम उस परम पवित्र, महान् और सर्वोपरि सत्ताधारी ईश्वरीय के पुत्र और संसार में उसके प्रतिनिधि है तो संसार की निकृष्ट वासनाओं और तुच्छ भोगों से विरक्ति हो जाना आसान हो जाये। जब तक अपने उच्च-स्वरूप का विश्वास नहीं होता मनुष्य निम्नता की ओर झुकता रहता है।

कितना ही शक्तिशाली और कितना ही उच्च पद वाला क्यों न हो, किन्तु मनुष्य अपने आत्म-स्वरूप को तब तक नहीं पहचान पाता, जब तक वह विषय वासनाओं के अन्धकार से निकल कर अपने स्वरूप का दर्शन आत्मा के प्रकाश में नहीं करता। मनुष्य का कर्तव्य है कि वह विचार करे व उसके फलस्वरूप अनुभव भी कि वह कितना विशाल, कितना महान् और कितना प्रचुर है। उसका स्वरूप ठीक वैसा ही है, जैसा कि उसके परमपिता परमात्मा का। इस प्रकार की ईश्वरीय अनुभूति होते ही मनुष्य अपने को सर्वव्यापक, सर्वशक्तिमान्, सर्वहितकारी और सर्व-सम्पन्न पायेगा। उसकी सारी क्षुद्रताएँ, सारी दीनताएँ और सारी निकृष्टताएँ आपसे आप स्खलित हो जायेंगी और वह अपने को सच्चिदानन्द स्थिति में पाकर शुद्ध और बुद्ध बन जायेगा।

मनुष्य का वास्तविक स्वरूप सच्चिदानन्द ही है। अपनी साँसारिक निकृष्टताओं के कारण ही वह इस स्वरूप को भूले है। अपने में आत्म-श्रद्धा और आस्था का विकास करिये। मिथ्या से निकलकर सत्य में आइए। जीवतत्व से ईश्वरत्व की और बढ़िए। ईश्वर का पुत्र उसका प्रतिनिधि होने में विश्वास करिये। ईश्वरीय कर्तव्यों का पालन करने के लिये धर्म को धारण करिये। उपकारी और परमार्थी बनकर सत्य, सेवा, त्याग, और आत्मीयता के भाव जगाइए। निश्चय ही आप अपना वह अधिकार और स्वत्व पा लेंगे, जो ईश्वर में सन्निहित है और जिसकी सत्ता है-

सत्+चित्+आनन्द=सच्चिदानंद।


सच्ची पूजा

लोकमान्य तिलक काँग्रेस अधिवेशन में भाग लेने के लिये लखनऊ आये। लखनऊ काँग्रेस में कार्यक्रम अत्यन्त व्यस्त था, क्योंकि इसके दौरान विभिन्न दलों और गुटों में एकता स्थापित करने के लिये बातचीत हुई थी। अधिवेशन में एक दिन लोकमान्य बहुत तड़के से व्यस्त रहे और दोपहर तक एक क्षण के लिये भी अवकाश न पा सके। बड़ी कठिनाई से उन्हें भोजन के लिये उठाया जा सका। भोजन के समय परोसने वाले स्वयंसेवक ने कहा-महाराज आज तो आपको बिना पूजा किये ही भोजन करना पड़ा।” लोकमान्य गम्भीर हो गये। बोले-अभी तक जो हम कर रहे थे, क्या वह पूजा नहीं थी? क्या घण्टी-शंख बजाना और चन्दन घिसना ही पूजा है? समाज-सेवा से बढ़कर और कौन सी पूजा हो सकती है?


सर्वोपरि और सर्वशक्तिमान सत्त-परमात्मा

ॐ अणोरणीयानहमेव तद्वन्महानहं,

विश्वमिवं विचित्रम्।

पुरातनोऽहं पृरुषोऽहमीशो,

हिरण्यमयोऽहं शिवरूपमस्मि।

अपाणि पादोऽहमचिन्त्य शक्तिः,

पश्याम्यचक्षुः स श्रृणोम्यकर्णः।

अहं विज्ञानामि विविक्त रूपो,

न चास्ति वेत्ता ममचित्त सदाहम्।

-कैवल्योपनिषद् 20।21

अर्थात् मैं छोटे से छोटा और बड़े से बड़ा हूँ। इस अद्भुत संसार को मेरा ही स्वरूप मानना चाहिये, मैं ही शिव और ब्रह्मा का स्वरूप हूँ, मैं ही परमात्मा और विराट् पुरुष हूँ, वह शक्ति जिसके न हाथ है, वह परब्रह्म मैं ही हूँ, मैं सर्वदा चित्तस्वरूप रहता हूँ, मुझे कोई जान और समझ नहीं सकता। मैं बुद्धि के बिना ही सब कुछ जानने, स्थूल कानों के बिना सब कुछ सुनने और स्थूल आँखों के बिना सब कुछ देखने की सामर्थ्य रखता हूँ।

उपनिषद्कार की इस अनुभूति को साधकों, योगियों और तत्व दर्शियों ने अनेक प्रकार से निरूपित करके परमात्मा की उपस्थिति प्रमाणित करने का प्रयत्न किया है। हमारी भूल यह है कि मनुष्य देह में धारण होने के कारण हमारी बुद्धि भी मानवीय हो गई है, अर्थात् संसार की प्रत्येक वस्तु को मानवीय लाभ, मानवीय स्वार्थ और यहाँ तक कि ईश्वर और सूक्ष्म दैवी शक्तियों को भी मानवीय स्थूलता से जोड़ने का प्रयत्न करते है, इसलिये संसार के रहस्य समझने से रह जाते है।

वस्तुतः हमें अपने आपको एक बौद्धिक सत्ता मानकर विचार चाहिये, जिस दिन इस शरीर को सृष्टि के शेष प्राणियों के साथ बैठा देने की बुद्धि जागृत हो जाती है और अपने अपने को कोई ऐसा प्रकाश कण अनुभव करने की सूक्ष्म दृष्टि आ जाती है, जो केवल इच्छा और संकल्प मात्र से सर्वत्र गमन कर सकता है। सुख-दुःख आदि की अनुभूति कर सकता है और उसी रूप में विश्वदर्शन कर सकता है, उस दिन परमात्मा को समझना सरल हो जाता हैं। अपने आपको, अपने जीवन लक्ष्य को भी समझना सरल हो जाता है।

उपनिषद्कार के उक्त भाष्य को समझने के लिये चलिये, सर्वप्रथम यह मान लें, हम कोई शरीर नहीं वरन् एक कल्पना या विचार-शक्ति मात्र हैं। आइए सर्वप्रथम परमात्मा के अणु स्वरूप का चिन्तन करें। क्या सचमुच कोई सत्ता है, जो अणु प्रतीत हो पर उसमें ब्रह्माण्ड की सी चेतना सन्निहित हो।

‘शक्ति का भंडार परमाणु’ इस शीर्षक से लेखक श्री वेद मित्र ने साप्ताहिक हिन्दुस्तान के 17 नवंबर 1968 अंक में परमाणु संरचना के पांच चित्र बनाकर इस महाशक्ति का परिचय कराया है। वे लिखते हैं-

“किसी तत्व के छोटे से कण को परमाणु कहते है, इसमें उस तत्व के सभी गुण मौजूद होते है, लोहे के गोले में जो गुण है, वे सभी लोहे के नन्हे से परमाणु में तुम्हें मिलेंगे परमाणु पदार्थ की सबसे छोटी इकाई है। वह एक इंच के 20 करोड़ वे भाग के बराबर होता है। दुनिया की सबसे बड़ी दूरबीन भी एक अणु को अकेला नहीं देख सकती। परमाणु को तोल लेने लायक तराजू मनुष्य नहीं बना सका है। फिर भी वैज्ञानिकों ने जो जानकारियाँ उपलब्ध की है, वह असाधारण है।

1 इंच के 20 करोड़वाँ भाग को तुम बहुत छोटा समझ रहे होंगे जरा उसके भीतर झाँक कर देखो। वहाँ तो खाली मैदान पड़ा हुआ। बीच में छोटा सा स्थान घिरा है, इसे ‘नाभिक’ कहते है। यह नाभिक प्रोटान और न्यूट्रान दो तत्त्वों से मिलकर बना है। अब परमाणु के अन्दर ब्रह्माण्ड का पता लगाओ। यह जो खाली स्थान (पोला) है, उसका क्षेत्रफल देखना। नाभिक को यदि एक छोटी सी गेंद मान लें तो उसकी तुलना में खाली स्थान का व्यास 2000 फुट होगा।”

इससे परमाणु के छोटे से छोटे बड़े से बड़े स्वरूप की कल्पना की आकांक्षा अभी विज्ञान पूरी नहीं कर सका, क्योंकि अभी नाभिक का विश्लेषण नहीं हो पाया और लगता है, उसका मशीनी एनालिसिस सम्भव भी नहीं है, क्योंकि वैज्ञानिक कहते है, उसे जानने के लिये तो उतनी ही सूक्ष्म चेतन शक्ति चाहिये, जो अनुभवों को लिखकर या बोल कर बता सके, जबकि भारतीय तत्त्वज्ञ कहते है कि वह अनुभूति इतनी विलक्षण और विशाल है कि जो मनुष्य उसे पा लेता है, वह स्वयं भगवान हो जाता है।

वैज्ञानिक अब उस ताकत को मानने को विवश हो रहे है-सन् 1937 में ‘द मिस्टीरियस यूनिवर्स नामक पुस्तक और दि न्यू बैक ग्राउन्ड आफ साइन्स में सर जेम्स जीन्स ने लिखा है-उन्नीसवीं शताब्दी के साइन्स में पदार्थ और पदार्थ जगत के जो ऊँचे से ऊँचे सिद्धान्त समझे जाते थे, अब हम उनसे दूर होते चले जायेंगे। जो नई बातें हमें पता चली है, उनसे हम विवश हैं कि प्रारम्भ में शीघ्रता में आकर हमने जो धारणा बनायी थी, उसे अब फिर से जाँचे अब मालूम होता है कि जिस जड़ पदार्थ को शाश्वत सत्य मानकर बैठे थे, वह गलत है, पदार्थ मन या आत्मा से पैदा हुआ है और उसी का जहूर (रूप) है।

“मुझे विश्वास है कि आत्मा ही पदार्थ का हस्तान्तरण करती है। यह शब्द हर्बर्ट स्पेन्सर और चार्ल्स डार्विन के साथी एल्फ्रेड रसल वैलेस ने अपनी पुस्तक सोशल इन विरानमेन्टस एण्ड मारल प्रोग्रेस में लिखे है।

विज्ञानाचार्य एलबर्ट आइन्स्टीन लिखते है-मैं परमात्मा को मानता हूँ, सृष्टि की व्यवस्था ओर सौंदर्य में वह स्पष्ट प्रकट है। मैं मानता हूँ कि प्रकृति में एक चेतनता काम कर रही है। विज्ञान के काम का आधार अब इसी विश्वास पर टिक रहा है यह संसार यों ही बन गया वरन इसमें एक क्रम और उद्देश्य है, जो समझ और पहचान में आ सकती है।”

प्रसिद्ध यूरोपियन विज्ञान वेत्ता सर ओलीवर लाज ने “आत्मा और मृत्यु पर भाषण देते हुए सन् 1930 में ब्रिस्टल में कहा था-

“इसमें सन्देह नहीं कि विज्ञान अब एक नये क्षेत्र में प्रवेश करेगा और उसकी वास्तविकता जानने का प्रयत्न करेगा, पर सच यह है कि हम सब चेतन जगत में जी रहे है यह चेतना शक्ति पदार्थ पर हावी है, पदार्थ उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। यदि कोई अत्यन्त शक्तिशाली सत्ता न होती, जो हमें पिता की तरह प्रेम करती है, तो आज की भौतिक उपलब्धियाँ इतनी भयानक होती है कि मनुष्य उसमें जीवित भी न रह पाता।”

सर ए. एस. महोदय कहते है-हम अब इस निष्कर्ष पर पहुँच गये है कि कोई असाधारण शक्ति काम कर रही है, पर हम यह नहीं जानते, वह क्या कर रही है। जे. बी. एस. हैल्डेन ने लिखा है-हम जिस संसार को एक मशीन समझ बैठे थे, वह आत्म चेतना की दुनिया है। हम उसे अभी बहुत कम देख पाये है, जबकि असलियत वही है। पदार्थ और पदार्थ की शक्तियाँ कुछ नहीं है, असली तो मन और आत्मा ही है।”

1934 में प्रकाशित पुस्तक दि ग्रेट डिजाइन में विश्व के 14 प्रख्यात विज्ञानाचार्यों ने एक सम्मिलित सम्मति प्रकट करते हुए लिखा है-इस संसार को एक मशीन कहे, तो यह मानना पड़ेगा कि वह अनायास ही नहीं बन गई वरन् पदार्थ से भी कोई सूक्ष्म मस्तिष्क और चेतना-शक्ति पर्दे से उसका नियन्त्रण कर रही है।”

रावर्ट ए. मिल्लीकान ने लिखा है-” विकासवाद के सिद्धान्त से पता चलता है कि जिस तरह प्रकृति अपने गुणों और नियमों के अनुसार पदार्थ पैदा करती है, उससे विपरीत परमात्मा में वह शक्ति है कि वह अपनी इच्छा से ही सृष्टि-निर्माण में समर्थ है। प्रकृति बीज से सजातीय पौधा पैदा करती है। आम के बीज से इमली पैदा की शक्ति प्रकृति में नहीं है। पर तरह-तरह के प्राणी प्रकट करके परमात्मा ने अपना अस्तित्व और सर्वशक्ति सत्ता सिद्ध कर दी। मनुष्य के रूप में उसने अपने आपको भी प्रकट करके रख दिया।”

आर्थर एच. काम्प्टन ने बताया-मालूम होता है, हम अपने मस्तिष्क से अलग होकर भी सोच सकते है। अभी पूरी तरह तो साबित नहीं है, पर मालूम ऐसा होता है कि मरने के बाद भी चेतनता नष्ट नहीं होती।”

वैज्ञानिकों के इन आशाओं को पुष्ट करने वाले ऐसे आश्चर्यजनक प्रमाण भी है, जिनसे यह सिद्ध होता है कि संसार का नियमन करने वाली सत्ता अत्यन्त सूक्ष्म और सचेतन है, उसकी शक्ति की सीमा से परे कुछ नहीं है।

डा. नार्मन विन्सेन्ट पील ने मरते हुए मनुष्यों की गतिविधियों का बड़ा सूक्ष्म अध्ययन किया। स्टेएलाइव आल योर लाइफ नामक पुस्तक में उन्होंने एक संस्मरण लिखा है कि एक मनुष्य मर रहा था, वह अर्द्ध-चेतनावस्था में था, जब उसकी आत्मा कुछ-कुछ इस संसार से भी संपर्क साध सकती थी और नैसर्गिक आत्मन् को भी देख रही थी, उसने बताया-मैं बहुत आश्चर्यजनक ज्योति देख रहा हूँ, उस ज्योति पुञ्ज से बहुत मधुर संगीत विस्फोिटित हो रहा है।” (स्मरण रहे-ईश्वर को भारतीय तत्व-दर्शन में’ ओंकार की ध्वनि वाला मधुर संगीत भी बताया गया है।)

पदार्थ को विस्फोट कर शक्ति उत्पन्न करने का विज्ञान लोग जान चुके है। एक पदार्थ को कूट कर दूसरे पदार्थ में बदल देने का वैज्ञानिक विधान है, पर एक सूक्ष्म विधान ऐसा भी पाया गया है जिसमें किसी उपकरण के सहयोग के बिना केवल संकल्प या विचार शक्ति के द्वारा वस्तुओं तक की अन्तर्धान करने की सत्यता पाई गई।

टेनेसी राज्य के नीलटिन नामक स्थान में डेविड लैंग नामक एक आदमी रहता था। 23 सितम्बर 1880 की सायंकाल उसने अपने आठ वर्षीय पुत्र जार्ज और ग्यारह वर्षीय सारा को खेलने के लिये खिलौने दिये और स्वयं उस मकान की ओर चल पड़ा जो उसी चरागाह के दूसरे सिरे पर बन रहा था। पत्नी बोली-शीघ्र लौट आना, मुझे वस्तुएँ खरीदनी है, दुकानें बन्द होने से पहले बाज़ार चलना है।”

डेविड लैंग ने कहा-अच्छी बात है, बस पाँच मिनट में वापिस आता हूँ।” इसके बाद वह मुश्किल से पाँच कदम ही चला था कि एकाएक जिस तरह चक्रवातों में फँसकर कोई तिनका अदृश्य हो जाता है, उसी प्रकार लैंग सबके देखते-देखते अन्तर्धान हो गया। आस-पास की चप्पा-चप्पा भूमि बिल तक छान डाले गये, पर वहाँ डेविड की देह का छल्ला तक न दीखा। भूगर्भ विभाग के निरीक्षकों तक ने जाँच कर ली पर डेविड के जीवन के कही भी लक्षण दिखाई न दिये।

इस घटना के छः महीने बाद अप्रैल 1881 में डेविड लैंग के दो बच्चों ने देखा कि जहाँ से उसका पिता अन्तर्धान हुआ था, उस स्थान के चारों ओर 15 फुट के घेरे में घास एकदम पीली पड़ गई है। वे उस घेर के पास चले गये। ग्यारह वर्षीय सारा ने पुकारा-पिता जी! उसे बहुत ही दर्द भरी कमजोर आवाज में डेविड लैंग के यह शब्द कई बार सुनाई पड़े-हाँ बिटिया मुझे बचाओ, मुझे बचाओ। इसके बाद आज तक वहाँ न कुछ सुनाई दिया न दिखाई दिया।

इस घटना से रहस्य का भले ही कुछ पता न चले पर एक ऐसी सत्ता का होना अवश्य प्रमाणित हो जाता है, जो किन्हीं सूक्ष्म शक्तियों द्वारा पदार्थ का लोप कर सकती है।

इसी प्रकार की एक घटना 1 दिसम्बर 1963 के धर्मयुग पृष्ठ 23 पर छपी है, जिसमें श्री दामोदर अग्रवाल ने लिखा है- तालों के अन्दर रखी हुई पूड़िया, मेवे आदि सवेरे देखने पर मिट्टी में परिवर्तित मिलते, जबकि ताला ठीक तरह बन्द मिलता और ताली पूर्ण सुरक्षित।”

बीसवीं शताब्दी के इस युग में जब विज्ञान ने इतनी उन्नति कर ली है, तब भी हाट पीपल्या की लगभग 711 सेर वजन की पत्थर की प्रतिमा डोलग्यारस के पुण्य पर्व पर हजारों की भीड़ के सामने पानी में तैरा दी जाती है और वह मूर्ति पानी में डूबती नहीं। वैज्ञानिकों के लिये यह एक खुली चुनौती है, पुरातत्व वेत्ताओं में उसकी जाँच करली है। वह पत्थर की है और पाण्डव काल की लगभग मानी जाती है। 20.9.61 को इसका सार्वजनिक प्रदर्शन किया गया, जहाँ सैकड़ों पत्रकारों ने भी प्रतिमा को तैरते देखा और उसके फोटो लिये। एक फोटो धर्मयुग में भी छपा था।

यह घटनायें और प्रमाण यह मानने के लिये विवश करते है कि संसार-जितना हमें दिखाई देता है, उतना ही नहीं - वरन् उससे भी सूक्ष्म और विशाल है और उसका नियमन किसी अदृश्य, चेतन, संकल्प स्वरूप, सर्वशक्तिमान् सत्ता के द्वारा हो रहा है।


अध्यात्म से मानव-जीवन का चरमोत्कर्ष

इस संसार में मानव-जीवन से अधिक श्रेष्ठ अन्य कोई उपलब्धि नहीं मानी गई है। एकमात्र मानव-जीवन ही वह अवसर है, जिसमें मनुष्य जो भी चाहे प्राप्त कर सकता है। इसका सदुपयोग मनुष्य को कल्पवृक्ष की भाँति फलीभूत होता है।

जो मनुष्य इस सुरदुर्लभ मानव-जीवन को पाकर उसे सुचारु रूप से संचालित करने की कला नहीं जानता है अथवा उसे जानने में प्रमाद करता है, तो यह उसका एक बड़ा दुर्भाग्य ही कहा जायेगा। मानव-जीवन वह पवित्र क्षेत्र है, जिसमें परमात्मा ने सारी विभूतियाँ बीज रूप में रख दी है, जिनका विकास नर को नारायण बना देता है। किन्तु इन विभूतियों का विकास होता तभी है, जब जीवन का व्यवस्थित रूप से संचालन किया जाय। अन्यथा अव्यवस्थित जीवन, जीवन का ऐसा दुरुपयोग है, जो विभूतियों के स्थान पर दरिद्रता की वृद्धि कर देता है।

जीवन को व्यवस्थित रूप से चलाने की एक वैज्ञानिक पद्धति है। उसे अपनाकर चलने पर ही इसमें वाँछित फलों की उपलब्धि की जा सकती है। अन्यथा इसकी भी वही गति होती है, जो अन्य पशु-प्राणियों की होती है। जीवन को सुचारु रूप से चलाने की वह वैज्ञानिक पद्धति एकमात्र अध्यात्म ही है। जिसे जीवन जीने की कला भी कहा जा सकता है। इस सर्वश्रेष्ठ कला को जाने बिना जो मनुष्य जीवन को अस्त-व्यस्त ढंग से बिताता रहता है। उसे, उनमें से कोई भी ऐश्वर्य उपलब्ध नहीं हो सकता, जो लोक से लेकर परलोक तक फैले पड़े है। धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष जिनके अंतर्गत आदि से लेकर अन्त तक की सारी सफलतायें सन्निहित है, इसी जीवन कला के आधार पर ही तो मिलते है।

सामान्य लोगों के बीच प्रायः यह भ्रम फैला हुआ है कि अध्यात्मवाद का लौकिक जीवन से कोई सम्बन्ध नहीं है। वह तो योगी तपस्वियों का क्षेत्र है, जो जीवन में दैवी वरदान प्राप्त करना चाहते है। जो साँसारिक जीवनयापन करना चाहते है। घर-बार बसाकर रहना चाहते है, उनसे अध्यात्म का सम्बन्ध नहीं। इसी भ्रम के कारण बहुत से गृहस्थ भी, जो दैवी वरदान की लालसा के फेर में पड़ जाते है, अध्यात्म मार्ग पर चलने का प्रयत्न करते है। किन्तु अध्यात्म का सही अर्थ न जानने के कारण थोड़ा -सा पूजा-पाठ कर लेने को ही अध्यात्म मान लेते है।

यह बात सही है कि अध्यात्म मार्ग पर चलने ये उसकी साधना करने से दैवी वरदान भी मिलते है और ऋद्धि-सिद्धि की भी प्राप्ति होती है। किन्तु वह उच्च स्तरीय सूक्ष्म-साधना का फल है। कुछ दिनों पूजा-पाठ करने अथवा जीवन भर यों ही कार्यक्रम के अंतर्गत पूजा करते रहने पर भी ऋषियों वाला ऐश्वर्य प्राप्त नहीं हो सकता। उस स्तर की साधना कुछ भिन्न प्रकार की होती है। वह सर्व सामान्य लोगों के लिये सम्भव नहीं। उन्हें इस तपसाध्य अध्यात्म में न पड़कर अपने आवश्यक कर्तव्यों में ही आध्यात्मिक निष्ठा रखकर जीवन को आगे बढ़ाते रहना चाहिये। उनके साधारण पूजा-पाठ का जो कि जीवन का एक अनिवार्य अंग होना चाहिये, अपनी तरह से लाभ मिलता रहेगा।

थोड़ी सी साधारण पूजा, उपासना करके जो जीवन में अलौकिक ऋद्धि-सिद्धि पाने की लालसा रखते है, वे किसी जुआरी की तरह नगण्य सा धन लगाकर बहुत अधिक लाभ उठाना चाहते है। बिना श्रम के मालामाल होना चाहते हैं। लोभी उपासकों की यह अनुचित आशा कभी भी पूरी नहीं हो सकती और हो वह भी सकता है कि इस लोभ के कारण उनकी अपनी उस सामान्य उपासना का भी कोई फल न मिले। देवताओं का वरदान वस्तुतः इतना सस्ता नहीं होता, जितना कि लोगों ने समझ रखा हे। वे मन्दिर में जाकर हाथ जोड़ जाने या अक्षत-पुष्प जैसी तुच्छ वस्तुएँ चढ़ा देने से प्रसन्न हो जायेंगे और अपने वरदान लुटाने लगेंगे-ऐसा सोचना अज्ञान के सिवाय और कुछ नहीं है। सामान्य पूजा-पाठ का अपना जो पुरस्कार है, मिलेगा वही, उससे अधिक कुछ नहीं।

वरदायी अथवा अलौकिक ऐश्वर्य का आधार अध्यात्म सामान्य उपासना मात्र नहीं है। उसका क्षेत्र आत्मा के सूक्ष्म संस्थानों की साधना है। उन शक्तियों के प्रबोधन की प्रक्रिया है, जो मनुष्य के अन्तःकरण में बीज रूप में सन्निहित रहती है। आत्मिक अध्यात्म के उस क्षेत्र में एक से एक बढ़कर सिद्धियाँ एवं समृद्धियाँ भरी पड़ी है। किन्तु उनकी प्राप्ति तभी सम्भव है, जब मन, बुद्धि, चित, अहंकार से निर्मित अन्तःकरण पंचकोशों, छहों चक्रों, मस्तिष्कीय ब्रह्म-रन्ध्र में अवस्थित कमल, हृदय स्थित सूर्यचक्र, नाभि की ब्रह्म-ग्रन्थि और मूलाधार वासिनी कुण्डलिनी आदि के शक्ति संस्थानों और कोश-केन्द्रों को प्रबुद्ध, प्रयुक्त और अनुकूलता पूर्वक निर्धारित दिशा में सक्रिय बनाया जा सके। यह बड़ी गहन, सूक्ष्म और योग साध्य तपस्या है। जन्म-जन्म से तैयारी किए हुये कोई बिरले ही यह साधना कर पाते है और अलौकिक सिद्धियों को प्राप्त करते है। यह साधना न सामान्य है और न सर्वसाधारण के वश की।

तथापि असम्भव भी नहीं है। एक समय था, जब भारतवर्ष में अध्यात्म की इस साधना पद्धति का पर्याप्त प्रचलन रहा। देश का ऋषि वर्ग उसी समय की देन है। जो-जो पुरुषार्थी इस सूक्ष्म साधना को पूरा करते गये, वे ऋषियों की श्रेणी में आते गये। यद्यपि आज इस साधना के सर्वथा उपयुक्त न तो साधन है और न समय, तथापि वह परम्परा पूरी तरह से उठ नहीं गई है। अब भी यदाकदा, यत्र-तत्र इस साधना के सिद्ध पुरुष देखे सुने जाते है। किन्तु इनकी संख्या बहुत विरल है। वैसे योग का स्वांग दिखा कर और सिद्धों का वेश बनाकर पैसा कमाने वाले रगें सियार तो बहुत देखे जाते है। किन्तु उच्च स्तरीय अध्यात्म विद्या की पूर्वोक्त वैज्ञानिक पद्धति से सिद्धि की दिशा में अग्रसर होने वाले सच्चे योगी नहीं के बराबर ही है। जिन्होंने साहसिक तपस्या के बल पर आत्मा की सूक्ष्म शक्तियों को जागृत कर प्रयोग योग्य बना लिया होता है, वे संसार के मोह जाल से दूर प्रायः अप्रत्यक्ष ही रहा करते है। शीघ्र किसी को प्राप्त नहीं होते और पुण्य अथवा सौभाग्य से जिसको मिल जाते है, उसका जीवन उनके दर्शनमात्र से ही धन्य हो जाता है।

इतनी बड़ी तपस्या को छोटी-मोटी साधना अथवा थोड़े से कर्मकाण्ड द्वारा पूरी कर लेने की आशा करने वाले बाल-बुद्धि के व्यक्ति ही माने जायेंगे। यह उच्च स्तरीय आध्यात्मिक साधना शीघ्र पूरी नहीं की जा सकती। स्तर के अनुरूप ही पर्याप्त समय, धैर्य, पुरुषार्थ एवं शक्ति की आवश्यकता होती है। इस आवश्यकता की पूर्ति धीरे धीरे अपने बाह्य जीवन के परिष्कार से प्रारम्भ होती है। बाह्य की उपेक्षा कर सहसा है, जिसमें सफलता की आशा नहीं की जा सकती।

आज हम सब जिस स्थिति में चल रहे है, उसमें जीवन निर्माण की सरल आध्यात्मिक साधना ही सम्भव है। इस स्तर से शुरू किए बिना काम भी तो नहीं चल सकता। बाह्य जीवन को यथास्थिति में छोड़कर आत्मिक स्तर पर पहुँच सकना भी तो सम्भव नहीं है। अस्तु हमें उस अध्यात्म को लेकर ही चलना होगा, जिसे जीवन जीने की कला कहा गया है।

जीवन विषयक अध्यात्म हमारे गुण, कर्म, स्वभाव से सम्बन्धित है। हमें चाहिये कि हम अपने में गुणों की वृद्धि करते रहे। ब्रह्मचर्य, सच्चरित्रता, सदाचार, मर्यादा-पालन और अपनी सीमा में अनुशासित रहना आदि ऐसे गुण हैं, जो जीवन जीने की कला के नियम माने गये हैं। व्यसन, अव्यवस्था, अस्तव्यस्तता व आलस्य अथवा प्रमाद जीवनकाल के विरोधी दुर्गुण है। इनका त्याग करने से जीवनकाल को बल प्राप्त होता है। हमारे कर्म भी गुणों के अनुसार ही होने चाहिये। गुण और कर्म में परस्पर विरोध रहने से जीवन में न शांति का आगमन होता है और न प्रगतिशीलता का समावेश। हममें सत्य-निष्ठा का गुण तो हो पर उसे कर्मों में मूर्तिमान् करने का साहस न हो तो कर्म तो जीवन कला के प्रतिकूल होते ही है, वह गुण भी मिथ्या हो जाता है।

सत्कर्म में हमारी आस्था तो हो पर पुण्य परमार्थ की सक्रियता से दूर ही रहें तो जीवन कला के क्षेत्र में यह एक आत्म प्रवंचना ही होगी। इसी प्रकार हमारा स्वभाव भी इन दोनों के अनुरूप ही होना चाहिये। हममें दानशीलता का गुण भी हो और अवसरानुसार सक्रिय भी होता हो, किन्तु उसके साथ यदि अहंकार भी जुड़ा है तो यह उस गुण कर्म का स्वाभाविक विरोध होगा, जो जीवन कला के अनुरूप नहीं है। हम सदाशयी, परमार्थी और सेवाभावी तो हे और कर्मों में अपनी इन भावनाओं को मूर्तिमान् भी करते है, किन्तु यदि स्वभाव से क्रोधी, कठोर अथवा निर्बल है तो इन सद्गुणों और सत्कर्मों का कोई मूल्य नहीं रह जाता। किसी को यदि परोपकार द्वारा सुखी करते है और किसी को अपने क्रोध का लक्ष्य बनाते है तो एक ओर का पुण्य दूसरे ओर के पाप से ऋण होकर शून्य रह जायेगा। गुण, कर्म, स्वभाव तीनों का सामंजस्य एवं अनुरूपता ही वह विशेषता है, जो जीवन जीने की कला में सहायक होती है।

जीवन यापन की वह विधि ही जीवन जीने की कला है, जिसके द्वारा हम स्वयं अधिकाधिक सुखी, शान्त और संतुष्ट रह सकें, साथ ही दूसरों को भी उसी प्रकार रहने में सहयोगी बना सकें और यही वह प्रारम्भिक अध्यात्म है, जिसके द्वारा जीवन निर्माण होता है और आत्मा की सूक्ष्म अध्यात्म साधना का पथ प्रशस्त होता है। हम सबको इसी सरल एवं साध्य अध्यात्म को लेकर क्रम क्रम से आगे बढ़ना चाहिये। सहसा आदि से अन्त पर कूद जाने का प्रयत्न करना एक ऐसी असफलता को आमन्त्रित करना है, जिससे न तो ठीक से जीवन जिया जा सकता है और न उच्च स्तरीय साधना को सामान्य बनाया जा सकता है।

पूर्वकालीन ऋषि मुनियों ने भी उच्च स्तरीय अध्यात्म में सहसा छलाँग नहीं लगाई। उन्होंने भी अभ्यास द्वारा पहले अपने बाह्य जीवन को ही परिष्कृत किया और तब क्रम क्रम से उस आत्मिक जीवन में उच्च साधना के लिये पहुँचे थे। इस नियम का-कि पहले बाह्य जीवन में व्यावहारिक अध्यात्म का समावेश करके उसे सुख शान्तिमय बनाया जाय। इस प्रसंग में जो भी पुण्य परमार्थ अथवा पूजा उपासना अपेक्षित हो उसे करते रहा जाये। लौकिक जीवन को सुविकसित एवं सुसंस्कृत बना लेने के बाद ही आत्मिक अथवा अलौकिक जीवन में प्रवेश किया जाय-उल्लंघन करने वाले कभी सफलता के अधिकारी नहीं बन सकते। लौकिक जीवन की निकृष्टता आत्मिक जीवन के मार्ग में पर्वत के समान अवरोध सिद्ध होती है।

अध्यात्म मानव जीवन के चरमोत्कर्ष की आधार शिला है, मानवता का मेरुदण्ड है। इसके अभाव में असुखकर अशान्ति एवं असन्तोष की ज्वालाएँ मनुष्य को घेरे रहती है। मनुष्य जाति की अगणित समस्याओं को हल करने और सफल जीवन जीने के लिये अध्यात्म से बढ़कर कोई उपाय नहीं है। पूर्वकाल में, जीवन में सुख समृद्धियों के बहुतायत के कारण जिस युग को सतयुग के नाम से याद किया जाता है, उसमें और कोई विशेषता नहीं थी-यदि विशेषता थी तो यह कि उस युग के मनुष्यों का जीवन अध्यात्म की प्रेरणा से ही अनुशासित रहता था। आज उस तत्व की उपेक्षा होने से जीवन में चारों ओर अभाव, अशान्ति और असन्तोष व्याप्त हो गया है और इन्हीं अभिशापों के कारण ही आज का युग कलियुग के कलंकित नाम से पुकारा जाता है।

अपने युग का यह कलंक आध्यात्मिक जीवन पद्धति अपनाकर जब मिटाया जा सकता है तो क्यों न मिटाया जाना चाहिये? मिटाया जाना चाहिये और अवश्य मिटाया जाना चाहिये। अपने युग को लाँछित अथवा यशस्वी बनाना उस युग के मनुष्यों पर ही निर्भर है, तब क्यों न हम सब जीवन में आध्यात्मिक पद्धति का समावेश कर अपने युग को भी उतना ही सम्मानित एवं स्मरणीय बना दें, जितना कि सतयुग के मनुष्यों ने अपने आचरण द्वारा अपने युग को बनाया था?


लोकोत्तर जीवन श्रद्धाभूत ही नहीं विज्ञान-भूत भी

महर्षि उद्दालक ने अपने पुत्र श्वेतकेतु को महर्षि का यज्ञ सम्पन्न कराने को भेजा। चित्र स्वं महान् विद्वान् थे, उन्होंने श्वेतकेतु से जीवात्मा की गति संबंधित कुछ प्रश्न किये। किन्तु श्वेतकेतु से उन प्रश्नों का उत्तर न बन पड़ा। उन्होंने कहा-हमारे पिताजी, अध्यात्म विद्या के पण्डित है, उनसे पूछकर उत्तर दूँगा।”

श्वेतकेतु पिता उद्दालक के पास आये। सारी बात कह सुनाई। महर्षि चित्र ने जो प्रश्न किये थे, वे भी सुनाये। किन्तु उद्दालक स्वं भी उन बातों को नहीं जानते थे। इसलिये उन्होंने श्वेतकेतु से कहा-तात् स्वं चित्र के पास जाकर इन प्रश्नों का समाधान करो। प्रतिष्ठा का अभिमान नहीं करना चाहिए। विद्या या ज्ञान छोटे बालक से भी सीखना चाहिये।”

श्वेतकेतु को अपने पिता की बात बहुत अच्छी लगी। वे चित्र के पास निरहंकार भाव से गये और विनीत भाव से पूछा-महर्षि हमारे पिताजी भी उन प्रश्नों का उत्तर नहीं दें सकते। उन्होंने आपसे ही वह विद्या जानने को भेजा है।” तब चित्र ने विनीत श्रद्धा से प्रसन्न होकर जीवात्मा की परलोक गति का विस्तृत अध्ययन कराया। कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् में महर्षि चित्र ने जीव की गति और लोकोत्तर जीवन की व्याख्या करते हुए लिखा है-

“तनेतं देवयजनं पन्यानमासाद्याग्नि लोक भागच्छति। स वायुलोकं स वरुणलोकं स आदित्यलोकं स इन्द्रलोक स प्रजापति लोकं स बहालोकमं। तं ब्रह्रा हाभिधावत् मम यशमा विरजाँ पालयत्रदीं प्रापं न वाज्यंजिगीष्य. तीति।”

-कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद्। 3

अर्थात्-जो परमेश्वर की उपासना करता है, वह देवयान मार्ग द्वारा प्रथम अग्निलोक को प्राप्त होता है। फिर वायु-लोक में पहुँचता है, वहाँ से सूर्य-लोक में गमन करता, फिर वरुण-लोक में जाकर इन्द्र -लोक में पहुँचता है। इन्द्र-लोक से प्रजापति-लोक से ब्रह्मलोक को प्राप्त होता है। इस ब्रह्म-लोक में प्रविष्ट होने वाले मार्ग पर ‘आर’ नामक एक बृहद् जलाशय है। उससे पार होने पर काम क्रोध आदि की उत्पत्ति द्वारा ब्रह्म-लोक प्राप्ति की साधना और यज्ञादि पुण्य कर्मों को नष्ट करने वाले ‘येष्टिह’ नामक मुहूर्ताभिमानी देवता निवास करते है, उनसे छुटकारा मिलने पर विरजा नाम की नदी मिलती है, जिसके दर्शन मात्र से वृद्धावस्था नष्ट हो जाती है। इससे आगे इला नाम की पृथिवी का स्वरूप इह्म नामक वृक्ष है, उससे आगे एक नगर है, जिसमें अनेकों देवता निवास करते है। उसमें बाग बगीचे, नदी-सरोवर बावड़ी, कुएँ आदि सब कुछ है.......।

इन व्याख्यानों को आज का प्रबुद्ध समाज मानने को तैयार नहीं होता। उन्हें काल्पनिक होने की बात कही जाती है। सम्भव है उपरोक्त कथन में जो नाम प्रयुक्त हुए हों, वह काल्पनिक हों पर आज का विज्ञान यह तो स्पष्ट मानने को तैयार हो गया कि पृथ्वी के अन्यत्र लोक भी है, वहाँ भी नदियाँ, पर्वत, खर-खड्ग प्रकाश, जल, वायु, ऊष्मा आदि है। चन्द्रमा के एक पर्वत का नाम शैलशिखर रखा गया है। इस तरह के अनेक काल्पनिक नाम रखे गये है। मंगल ग्रह के चित्र में कुछ उभरती हुई रेखायें दिखाई दी है, जिनके नहर या सड़क होने का अनुमान लगाया जाता है। यदि इस तरह का विज्ञान अन्य लोकों में सम्भव है, तो वहाँ भी सभ्य और साँस्कृतिक जीवन हो सकता है। इसमें सन्देह की गुँजाइश नहीं रह जाती।

अब तक जो वैज्ञानिक खोजें हुई है, उनमें बताया गाया है कि हमारी गड़ा में लगभग 100000000000 नक्षत्र है। ग्रह परिवारों से युक्त नक्षत्रों की संख्या 10000000000 नक्षत्र है। जीवों के निवास योग्य 5000000000 नक्षत्र है, जिनमें जीव है उन ग्रहों की संख्या 2500000000 बताई जाती है। ऐसे ग्रह जिनके प्राणी काफी समुन्नत हो चुके है, उनकी संख्या 500000000 है। जिन ग्रहों के जीव संकेत भेजना चाहते है और जिनके संकेत भेज रहे हैं उनकी संख्या क्रमशः 10,0000000 और 1000000 है। यह आँकड़े ब्रिटेन के प्रसिद्ध अन्तरिक्ष शास्त्री ‘डेस्मांड किंग हेली’ द्वारा विस्तृत अध्ययन खोज और अनुमान के आधार पर प्रस्तुत किये गये हैं।

कुछ ग्रह ऐसे ह, जहाँ जल व आक्सीजन की मात्रा इतनी कम है कि वहाँ जीवन की कल्पना ही नहीं की जा सकती। चन्द्रमा का धरातल दिन में इतना गर्म रहता है कि धातुएँ पिघल जायें, इसलिये किसी मानव जैसे देहधारी का वहाँ होना नितान्त असम्भव है। इसी तरह रात में चन्द्रमा का तापमान शून्य से भी बहुत नीचे गिर जाता है इसलिये भी प्राणियों का अस्तित्व सम्भव नहीं दिखाई देता। चन्द्रमा का एक दिन पृथ्वी के सात दिन के बराबर होता हैं, इतने लम्बे समय तक सूर्य की ‘अल्ट्रावायलेट’ किरणों को सहन करना मानव शरीर के वश की बात नहीं। शुक्र ग्रह की स्थिति भी ऐसी ही है कि वहाँ जीवन की सम्भावना नहीं हो सकती।

किन्तु कुछ ऐसे कारण और परिस्थितियाँ भी हैं, जिनसे सौर-मण्डल के कुछ ग्रहों में जीवन होने का स्पष्ट प्रमाण मिल जाता है। यह हम सब जानते हैं कि पदार्थ समान परिस्थिति के अणुओं से मिलकर बनता है। अणु ही शरीर रचना के आधार होते हैं। वैज्ञानिकों को इन बातों के प्रमाण मिले हैं कि जिस तरह के अणु पृथ्वी में पाये जाते हैं, उस तरह के अणु लाखों मील दूर के ग्रहों में भी विद्यमान् हैं। वह शरीर रचना की स्थिति में होते हैं। अलबत्ता चेतनता उन ग्रहों में पहुँचना उन ग्रहों में पहुँच कर उन अणुओं से बने शरीर के कारण ज्ञान, आत्म-सुख सन्तोष, शांति आदि की परिस्थितियाँ पृथक् अनुभव कर सकती है। उनके बोलने और समझने के माध्यम अलग हो सकते हैं। शरीरों की आकृति भी भिन्न हो सकती है। चूँकि प्राकृतिक नियम और रासायनिक तत्व ब्रह्माण्ड के सभी ग्रहों पर अपरिवर्तित रहते है, इसलिये वैज्ञानिकों को यह भी आशा है कि रासायनिक तत्त्वों के मिश्रण से जैसी चेतनता तथा प्रतिक्रिया पृथ्वी पर अनुभव होती है, वैसी कल्पना से परे दूरियों पर बसे अगणित ग्रहों पर भी अवश्य होती होगी।

इटली के ब्रूनो कहते थे- ‘‘असंख्य ग्रहों पर जीवन का अस्तित्व है। विश्व में जीवन की अभिव्यक्ति असंख्य और अलग अलग रूपों में है। किसी ग्रह के निवासियों के हाथ पाँच, सात किसी के पाँव नहीं होते होंगे। कही दाँतों की आवश्यकता न होती होगी, कही पेट की। आकृतियाँ कहीं-कहीं कल्पनातीत भी हो सकती है। पृथ्वी अनन्त विश्व में एक छोटे से कण के बराबर है। यह सोचना हास्यास्पद है कि केवल पृथ्वी पर ही बुद्धि वाले जीव रहते है।”

बाद में इंग्लैण्ड के न्यूटन, जर्मनी के कैप्लेर और लैब्नीत्सा, गैलीलियो रूस के लोमोनासोव फ्राँस के देकार्ते और पास्कल आदि ने भी स्वीकार किया कि ब्रह्माण्ड के ग्रहों में जीवन है। वे वेदों के इस विश्वास को भी मानने को तैयार थे कि पृथ्वी से दूर आकाशीय पिण्डों में जीव की कर्मगति के अनुसार पुनर्जन्म होता है। यह जन्म कुछ समय के बाद भी हो सकते है और लम्बे समय के भी। मनुष्य अपने सारे जीवन के बाद मृत्यु के क्षणों तक जैसी मानसिक स्थिति विकसित कर लेता है, उसका प्राण शरीर और कारण शरीर भी उसी के अनुरूप परिवर्तित हो जाता है, फिर जहाँ उस शरीर के अनुरूप परिस्थितियाँ होती है, वह उसी आकाश पिण्ड की ओर खिच जाता है। और वहाँ सुख-दुःख की वैसी ही अनुभूति करता है, जिस तरह कि इस भौतिक जगत में।

सम्पूर्ण विश्व ब्रह्माण्ड मनुष्य शरीर की तरह ही एक स्वतन्त्र पिण्ड जैसा है, उसमें जीवों की गति उसी प्रकार सम्भव है, जिस तरह शरीर में अन्न-कणों की गति होती है।

अब इस मान्यता का खण्डन करना सम्भव हो गया है कि अन्य ग्रहों की तापमान की स्थिति में प्राणी का हाथ-पाँव-नाक-मुँह-पेट आदि) पृथ्वी पर है, वह अन्यत्र न हो। वातावरण के तापमान और दबाव की स्थिति में भी जीव प्राणी अपने आपको वातावरण के अनुकूल बना लेते है। इस दृष्टि से बृहस्पति, शनि, यूरेनस (उरण), नेपच्यून (वरुण), प्लूटो (यम) आदि ग्रहों को देखें तो जान पड़ता है कि वहाँ जीवन नहीं है, वहाँ मीथेन गैस की अधिकता है। बृहस्पति ग्रह पर बने बादल छाये रहते है।

बादलों का विश्लेषण करने पर वैज्ञानिकों ने पाया, उनमें हाइड्रोजन का सम्मिश्रण रहता है। अमोनिया और मीथेन गैसें भी अधिकता से पाई जाती है। बादलों में सोडियम धातु के कण भी पाये जाते है, इससे बृहस्पति के बादल चमकते है। इन परिस्थितियों में यद्यपि जीवाणुओं की शक्ति नष्ट हो जाती है, पर जिस तरह पृथ्वी पर ही विभिन्न तापमान और जल ऊष्मा की विभिन्न स्थितियों में मछली, साँप, मगर, कीड़े-मकोड़े वनस्पति, फल-पौधे स्तनधारी गोलकृमि और टारड़ीग्राडों जैसे जीव पाये जाते है, तो अन्य ग्रहों पर इस तरह की स्थिति सम्भाव्य है और इस तरह सूर्य, चन्द्रमा आदि पर भी जीवन सम्भव हो सकता है, भले ही शरीर की आकृति और आकार कुछ और ही क्यों न हो।

इस तथ्य की पुष्टि में अमरीकी वैज्ञानिक मिलर का प्रयोग प्रस्तुत किया जाना आवश्यक है। मिलर ने एक विशेष प्रकार के उपकरण में अमोनिया, मीथेन, पानी और हाइड्रोजन भर कर उसमें विद्युत धारा गुजारी फिर उस पात्र को सुरक्षित रख दिया गया। लगभग 10 दिन बाद उन्होंने पाया कि कई विचित्र जीव अणु उसमें उपज पड़े है, कुछ तो ‘एमीनो एसिड’ थे। इससे यह सिद्ध होता है, वातावरण की विभिन्न परिस्थितियों में विभिन्न प्राणियों का जीवन होना सम्भव है। यह भी सम्भव है कि उनमें से कुछ इतने शक्तिशाली हो कि दूर ग्रहों पर बैठे हुए अन्य ग्रहों-जिन में पृथ्वी भी सम्मिलित है- के लोगों पर शासन कर सकते है। उन्हें दण्ड दे सकते हों अथवा उन्हें अच्छी और उच्च स्थिति प्रदान कर सकते हो। लोकोत्तर निवासी पृथ्वी के लोगों को अदृश्य प्रेरणाएँ और सहायताएँ भी दे सकते है।

इस दृष्टि से यदि हम अपने आर्ष ग्रन्थों पर दिये गये सन्दर्भों और अनुसन्धानों को कसौटी पर उतारें, तो यह मानना पड़ेगा कि वे

सत्य है, आधारभूत है। अच्छे बुरे कर्मों के अनुसार जीवात्मा को अन्य लोकों में जाना पड़ता होगा और वहाँ वह अनुभूतियाँ होती होगी, जो कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् में दी गई है।

इन वैज्ञानिक तथ्यों को देखते हुए, यदि कोई कहे कि मनुष्य को शुभ और सत्कर्म करना चाहिये, ताकि वह उच्च लोकों का आनन्द ले सके तो उसे हास्य या उपेक्षा की दृष्टि से नहीं, वैज्ञानिक दृष्टि से तथ्यपूर्ण अनुभव करना चाहिये। शास्त्रकार का यह वचन हम सबके लिये शिरोधार्य होना चाहिये-

सोपानभूतं स्वर्गस्य मानुष्यं प्राप्य दुर्लभम्।

तथात्मानं समावत्स्व भ्रश्यसेन पुनयया।

यह मनुष्य शरीर पाना बड़ा दुर्लभ है। बड़े पुण्यों से यह प्राप्त किया जाता है। यह स्वर्गं की प्राप्ति का साधन है, इसलिये इस मनुष्य शरीर को प्राप्त करके इसे शुभ कर्मों में लगाना चाहिये, जिससे अवनति को प्राप्त न हो। पथ भ्रष्ट न हो।

जीवात्मा की अमरता को स्वीकार कर हमें भी ऊर्ध्व लोकों (स्वर्ग) और ब्रह्मानंद की प्राप्ति के प्रयत्न करने चाहिये। सत्कर्मों द्वारा आत्मा को विकसित करना उसका सर्वोत्तम और सरल उपाय है।


दीर्घ आयु का वरदान

बन्दर की अपेक्षा हाथी बहुत मन्दगति से साँस लेता है, किन्तु बन्दर की आयु से हाथी की आयु अधिक होती है। साँप बहुत दिन जीते है। किन्तु कुत्ते थोड़े ही दिन। जबकि साँप बहुत धीरे धीरे साँस लेते है। हिमालय के रीछ कई बार जाड़े के पूरे मौसम भर गहरी नींद में पड़े रहते है। वहाँ कुछ चमगादड़ ऐसे होते है, जो पहाड़ी गुफाओं में सप्ताहों लटके सोते रहते है। यह नींद ऐसी होती है कि वे एक बार भी साँस नहीं लेते, खाने का प्रश्न तो बाद का है, तो भी वे जीवित रहते है, उसी प्रकार यह भी सम्भव है कि मनुष्य बिना साँस का लम्बा जीवन जी सकता है। प्राणायाम द्वारा यह अवरोध अभ्यास से ला सकना मनुष्य के लिये सम्भव रहा है और आगे भी रह सकता है। (पाल ब्रिन्टन की गुप्त भारत की खोज से)


सामान्य जीवन में महानता का समावेश

यह बात सही है कि महत्त्वाकाँक्षी व्यक्ति ही जीवन में महान् बनते है। जिनकी आकांक्षा रोटी-कपड़ा-वास विलास और बाल बच्चों तक ही सीमित है। वे ‘जन साधारण’ के अतिरिक्त और क्या हो सकते है।

मनुष्य अपनी आकांक्षाओं के अनुरूप ही पुरुषार्थ एवं प्रयत्न करता है। सामान्य इच्छाओं वाले व्यक्ति का कर्तव्य केवल रोटी के लिये और बीबी बच्चों की परवरिश भी को कुछ पैसे कमा लाने तक ही सीमित रहता है। किसी उन्मुक्त क्षेत्र में निकल, किसी उच्च कृत्य के लिये संघर्ष करना उसकी कल्पना के परे की बात होती है। वह इतने को बहुत बड़ी बात समझता है कि किसी प्रकार रोटी खाली जाये, कपड़े पहन लिये जायें ओर जो है उन बच्चों को पाल पोश कर किसी छोटे मोटे काम में लगा दिया जाये और उनके शादी ब्याह कर दिये जायें। अपनी आकांक्षा के अनुसार उनके बहुमूल्य मानव जीवन की इतने में ही इतिश्री हो जाती है। ऐसे अकल्पनाशील और महत्त्वाकाँक्षी व्यक्तियों की परिधि बहुत ही संकुचित होती है। वे कोई ऐसा काम नहीं कर सकते, जिससे कि उनके पीछे संसार कभी कभी उन्हें याद कर लिया करे। संसार तो दूर ऐसे संकुचित आकांक्षी को उसके बच्चे भी शीघ्र भूल जाते है।

यों जीवन यापन तो सभी को ही करना पड़ता है तथापि उस जीवनगति में यदि एक भी छोटा मोटा चिन्ह न छोड़ा गया, तो मानो उसका जन्म लेना, न लेना बराबर ही हुआ। वह आया और संसार को कुछ दिए बिना ही उसका ही हुआ। वह आया और संसार को कुछ दिए बिना ही उसका खा पीकर चला गया बौर पीछे अपनी ही तरह के बिना कुछ दिये, खा पीकर चले जाने वाले बच्चों के रूप में अपने दो चार प्रतिनिधि छोड़ गया। इस प्रकार के मानव जीवन और पशु जीवन में कोई अन्तर नहीं माना जा सकता। पशु भी तो यही सब कुछ करते है। आहार, निद्रा और मैथुन इन तीन प्रवृत्तियों के साथ जीते और चले जाते है। उनके पास भी न कोई महत्त्वाकाँक्षा होती है और न कल्पना।

यह बात गलत नहीं कि मनुष्य का यह सामान्य जीवन ही संसार की स्वभावों एवं सामान्यगति है। सभी को ऊँची कल्पनायें, महान्, आकांक्षाएँ और असाधारण कर्तृत्व प्राप्त नहीं होता। यद्यपि परमात्मा की ओर से ऐसा कोई पक्षपात अथवा प्रतिबन्ध नहीं होता तथापि अपनी प्रवृत्तियों और अपने जीवन के प्रति निजी दृष्टिकोण के कारण ही कोई महानता की और बढ़ता है और कोई सर्वसाधारण की परिधि तक ही रह जाते है और संसार में कोई महनीय अथवा स्मरणीय कार्य नहीं कर पाते है।

मनुष्य कोई यशस्वी काम न कर पाये, यह खेद का विषय नहीं है कि अपनी सामान्य जीवनगति में भी जिन मान्यताओं को समाविष्ट किया जा सकता है। उनको भी नहीं करता। रोटी रोजी एक सामान्य काम है, किन्तु जब इसमें इस जीवित अभिलाषा को जोड़ दिया जाता है कि मुझे रोटी रोजी कमानी है ओर शान, सम्मान के साथ कमानी है और यथासम्भव अच्छी से अच्छी कमानी है। तब यही सामान्य वृति सामान्यता से कुछ ऊपर उठ जाती है।

बच्चे होना एक सामान्य प्रक्रिया है। लोगों को होते ही है। किन्तु इनके विषय में यह भाव कि “जिस भगवान ने पैदा किये है, वही पालेगा अथवा सब अपना अपना भाग्य लेकर आते है, जीना है तो नंगे भूखे रहकर भी जी जायेंगे। ज्यादा क्या करना नमक रोटी मिलती रहे, किसी तरह पल जायें, सब अपना काम धन्धा करके पेट पाल लेंगे। इस प्रकार के मृत भाव मानवता के प्रतिकूल है। यह सामान्य मनोवृत्ति भी नहीं, हीनवृत्ति है। यदि इसी सामान्यता में यह उत्साह जोड़ दिया जाये कि बच्चे भगवान ने दिये है तो उन्हें अपनी शक्ति भर अच्छी प्रकार पालने, पढ़ाने, लिखाने और अपने से आगे बढ़ाने में कोई कसर न रखेंगे। इस बात का पूरा प्रयत्न करेंगे कि यह जीवन में उन्नति कर सकें और समाज के भद्र नागरिक बन सकें, तो बच्चों सम्बन्धी साधारण सामान्यता असामान्यता में बदल जाये। इसमें न तो किसी महान् आकांक्षा का बोझ ही है आर न जीवन में किसी बड़े संघर्ष की सम्भावना।

किन्तु दुःख की बात तो यह है कि लोग सामान्य जीवन ग्रहण करके भी तो उसे उत्साहपूर्वक बिताना नहीं चाहते। अपनी सामान्य परिधि में किसी असामान्य भाव का प्रवेश निषेध रखना चाहते हैं। अपने सीमित जीवन को मन, वचन, कर्म से और अधिक सीमित बना लेने में न जाने कौन-सा त्याग, वैराग्य अथवा साधुता समझते हैं। यदि किन्हीं कारणों से अपनी सीमित परिधि से बाहर नहीं निकला जा सकता तो उसी में रहकर ऊपर तो उठा ही जा सकता है।

यदि अपनी सीमित परिधि में रहकर ही कुछ ऊपर उठने की आकांक्षा ही जगा ली जाय, तब भी तो संतोष लायक बहुत कुछ किया जा सकता है। लोक-रंजन न सही आत्म-रंजन तो हो ही सकता है। आकांक्षा के अनुसार ही मनुष्य का कर्तव्य प्रस्फुटित होता है। उसकी प्रेरणा से मनुष्य के भीतर सोई पड़ी कल्पनायें और शक्तियाँ प्रबुद्ध होने लगती है। उसके मानस का महापुरुष समय के गर्भ में आ जाता है और तब उसी के अनुसार विचार और परिस्थितियाँ बनना आरम्भ हो जाती है। और शीघ्र न सही, जीवन की पूरी अवधि में अथवा जन्म-जन्मान्तर में कहीं न कहीं समय के गर्भ में आया मनुष्य का वह मानस महापुरुष अवतरित होकर भूतकाल के सारे सारे सामान्य जीवनों और संसार के समग्र ऋणों को सूद-दर-सूद के साथ चुका देता है। किन्तु कहाँ, कितने मनुष्य होते हैं, जो अपनी नितान्त सामान्यता में किंचित् उच्चता की आकांक्षा मिला कर इन सम्भावनाओं को भवितव्य बना लें।

छोड़िये, रोटी-रोजी और बाल-बच्चों की सामान्य परिधि में भी, यदि महानताओं की कल्पनाओं से भय लगता हो, वे आपको अपने अनुरूप न लगती हों, उनसे सम्बन्धित आवश्यक पुरुषार्थ एवं संघर्ष का उत्साह अपने में न पाते हों, महत्व का समावेश छोड़िये और इस ओर आ जाइये, जहाँ पर बिना किसी प्रकार का संघर्ष अथवा कष्ट किये, शांति एवं निरापद रूप में महानता की उपलब्धि हो सकती है। वह है जन-सेवा का क्षेत्र। समाज में अग्रसर हो रहने की आकांक्षा तो कुछ संघर्ष एवं कष्ट कर हो सकती है, किन्तु किसी की सेवा करने, सहायता एवं सहयोग करने में तो ऐसा कोई भय नहीं है।दूर न जाइये, अपने पड़ोस में देखिये कि कोई बीमार तो नहीं है-यदि है तो दवा लाने से उसकी श्रुषा करने तक जो भी आप कर सकते हों करिये। यदि आपकी सहायता की उसे आवश्यकता नहीं है, तो उसे देखने तथा शीघ्र स्वास्थ्य लाभ की मंगल कामना देने में न तो आपका कुछ व्यय होगा और उसको भी इस सहानुभूति में सुख अनुभव होगा।

यदि आप पढ़े-लिखे हैं तो पास-पड़ोस में शिक्षा का वातावरण बना सकते है। समय निकालकर बच्चों और इच्छुक प्रौढ़ों को पढ़ा सकते है। किसी नियत स्थान पर नित्य नियम से किसी सद्ग्रन्थ का पाठ करके लोगों को सुना और समझा सकते है। निरक्षर स्त्री पुरुषों के पत्र लिख पढ़ सकते है। पितृहीन बच्चों का माँ की तरफ से पाठशालाओं में प्रतिनिधित्व कर सकते है। गरीब बच्चों की फीस माफी के लिये प्रयत्न करने में तो किसी प्रकार का व्यय अथवा भय नहीं है। अपने सदाचरण, सद्व्यवहार तथा शालीनता से दूसरों के हृदय में अपना स्थान बना सकते है। बड़े बूढ़ों के प्रति आदर तथा आत्मीयता की अभिव्यक्ति से उनकी सद्भावना तथा स्वरित के अधिकारी बन सकते है।

घरों और मोहल्ले की गलियों में यदि गन्दगी रहती है, तो उनकी सफाई की प्रेरणा तथा पहल कदमी द्वारा अपने को दूसरों की दृष्टि में उठा सकते हो। भूले को राह और परदेशी को धर्मशाला बतला आने, जैसे न जाने संसार में कितने साधारण एवं सामान्य कहे जाने वाले काम हो सकते है, जिन्हें यदि पूर्णरूप से प्रेम और सेवाभावना से किया जाये, तो वे काम भले ही अपने में महान् बना जाता है। आवश्यकता पड़ने पर लोग उसे याद करते है, अवसर आने पर चर्चा करते है और न रहने पर उसके लिये रोते भी है। सेवा एक ऐसा वशीकरण मन्त्र है, जो अपना प्रभाव छोड़े बिना नहीं रहता।

यदि इसमें भी कोई भार अथवा स्वाभिमान का अवरोध आता हो तो आइए अपने तक केन्द्रित हो जाइये। देखिये आप में लोभ, मोह, क्रोध अथवा अहंकार आदि दोषों में से कोन सा दोष मौजूद है। जिस दोष को अपने अन्दर पायें। उसे तत्काल दूर करने में जुट जाये। यदि लोभ है तो तुरन्त त्याग वृत्ति को जगाकर उसे सन्मुख में खड़ा की दीजिये। क्रोध है तो क्षमाशीलता का अभ्यास कीजिये। यदि मोह का अन्धकार दिखलाई देता है तो ज्ञान का प्रकाश करने के लिये स्वाध्याय अथवा सत्संग में लग जाइये और यदि अहंकार के चिन्ह दिखाई देते हो, तो बच्चों तक से आदर और विनम्रतापूर्वक व्यवहार करना प्रारम्भ कर दीजिये।

इस प्रकार अपने मनो मन्दिर को, आत्मा के प्रकाश के प्रवेश के योग्य बना डालिये। जिस दिन आप अपने को दोष मुक्त कर आत्म प्रकाश की सम्भावना निश्चित कर लेंगे, उस दिन आप इतने महान् हो जायेंगे, जितना कोई यशस्वी ऐतिहासिक पुरुष भी नहीं होता। हो सकता है कि इतना कर लेने पर भी आपको कोई जान न पाये और आप संसार से गुमनाम विदा हो जाये। अथवा कोई स्मारक या चिन्ह न छोड़ पायें तथापि आपकी महानता में जरा भी बड़ी से बड़ी उन्नति से उच्च एवं महनीय होती है।

किन्तु यह सब हो तभी सकता है, जब आप अपने में उसके लिये आकांक्षा को जनम दें और यह विश्वास कर लें कि जीवन में सर्वमान्य से बढ़कर असामान्यता की ओर बढ़ना ही मनुष्यता की शोभा और ध्येय है। योनियों की चौबीस लाख सीढ़ियों को चढ़कर मानव-जीवन की उच्चता प्राप्त करने वाले हम मनुष्य यदि आलस्य, प्रसाद अथवा दीनता के करण हीन जीवन पद्धति अपनाकर अथवा पतन कर लें यह तो किसी प्रकार भी शोभनीय नहीं है।

सादे एवं सामान्य जीवन में भी यदि विचारों को उच्च रखा जाये, जो कुछ सोचा, समझा और किया जाये, वह उदास एवं आदर्श भावनाओं के अन्तर्गत सोचा तथा किया जाये, तो कोई कारण नहीं कि हम सामान्य जीवन परिधि में रहते हुए भी आत्मा से महान् न हो जाये। आत्मा की महानता ही तो वास्तविक तथा सर्वोपरि महानता है, जिसे ऊँचे-ऊँचे अथवा आश्चर्यजनक काम करके ही नहीं केवल सेवा भाव तथा आत्म परिष्कार के द्वारा भी पाया जा सकता है और यह किसी भी स्थिति अथवा वर्ग के व्यक्ति के लिये असंभव नहीं बशर्ते उसके लिये हृदय में जिज्ञासा तथा आकांक्षा का जागरण भर हो जाये।


सज्जनता बड़ी है या ईश्वर शक्ति

विक्रमादित्य के इस प्रश्न पर सभासदों की विभिन्न राय थी कि ”सज्जनता बड़ी है या ईश्वर शक्ति”। कई दिन तक विचार विमर्श होने पर भी एक निर्णय न निकल सका।

दिन बीते। राजा एक दिन परिभ्रमण के लिये निकले। दुर्भाग्य से मार्ग में किसी आखेट जाति ने उन पर आक्रमण कर दिया। आक्रमण के फलस्वरूप उनका शेष सहयोगियों से सम्बन्ध टूट गया। वे निबिड़ वन में भटक गये जंगल में प्यास के मारे राजा का दम घुटने लगा। कही पानी दिखाई नहीं दे रहा था। किसी तरह एक साधु की पर्णकुटी तक पहुँचें। साधु समाधि मग्न थे। वहाँ पहुँचते पहुँचते महाराज मूर्छित होकर गिर पड़े। गिरते गिरते उन्होंने पानी के लिये पुकार लगाई।

कुछ देर बाद जब मूर्छा दूर हुई तो महाराज विक्रमादित्य ने देखा, वही सन्त उनका मुँह धो रहे, पंखा झल रहे और पानी पिला रहे है। राजा ने विस्मय से पूछा-आपने मेरे लिये समाधि क्यों भंग की, उपासना क्यों बन्द कर दी?” सन्त मधुर वाणी में बोले-वत्स-भगवान की इच्छा है कि उनके संसार में कोई दीन दुःखी न रहे। उनकी इच्छा पूर्ति का महत्व अधिक है, सेवा सज्जनता भी उनकी भक्ति ही है।” इस उत्तर से राजा का पूर्ण समाधान हो गया।


धर्म रहित विज्ञान हमारा सर्वनाश करके छोड़ेगा

विज्ञान ने मनुष्य को बहुत सुख सुविधायें प्रदान की है। इनसे कौन इनकार कर सकता है। यातायात के सुन्दर साधन, चिकित्सा के बढ़िया उपकरण और औषधियाँ कृषि और उद्योग बढ़ाने वाली बढ़िया मशीनें देकर अनन्त उपकार किये है। विज्ञान है मनुष्य जाति के साथ। किन्तु यदि उन आँकड़ों और परिणामों तक भी पहुँचा जा सके, जो सामान्य रूप से सामने नहीं आते तो यही पता चलेगा कि विज्ञान अच्छा है अवश्य पर धार्मिक नियन्त्रण के अभाव में उससे अपराध, उद्दण्डता और भयानकता का ही अधिक विकास हुआ है। जनहित उसके आगे चींटी के बच्चे की तरह रह गया।

जब यह विश्वास कर लिया जाता है कि विश्व रचना की प्रधान भूमिका किसी समर्थ सत्ता के हाथ में है जो हमें दिखाई नहीं देती पर स्वयं सबको देख सकती है। और तद्नुरूप कर्मफल भी प्रदान करती रहती है। तब मनुष्य अपराध नहीं कर सकता। सामाजिक दण्ड से बचने के लिये बुद्धि काम कर जाती है पर जब घट घट में व्याप्त परमात्मा का भय हो जाता है तो मनुष्य एकान्त और निर्जन में भी पाप करने से काँपता है, इसलिये धर्म की महत्ता और आवश्यकता सर्वोपरि है। विज्ञान न ईश्वर को मानता है, न धर्म की ओर न कर्मफल को ऐसी दशा में वह पाप की ओर से हमें उच्छृंखल एवं स्वच्छन्द ही बना सकता है। विज्ञान को धर्म का आश्रित रखा गया होता तो आज की तरह परिस्थितियाँ भयंकर न होतीं।

एक वैज्ञानिक की प्रयोगशाला की ओर आपको ले चलना चाहेंगे, जहाँ आपके लिये दवायें बनती है। जहाँ औषधि, शारीरिक क्रिया, अन्तरिक्ष आदि के प्रभाव को जानने के लिये परीक्षण किए जाते है। वहाँ तरह तरह की पीड़ा और यन्त्रणाएँ पाते हुए,पशु पक्षियों और कीटपतंगों के साथ हो रही निर्दयता को आप देखेंगे तो कहेंगे यह सुविधायें और उपलब्धियों की अपेक्षा हम अभाव ग्रस्त रहे होते तो कही अच्छा था।

हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में एक प्रयोग चल रहा था। कई कुत्तों को जंजीर से बाँध कर आग की लपटों में फेंक दिया गया। 5-7 दिन तक कुत्ते चिनगारियों में तड़प तड़प कर झुलसते रहे। उस अवस्था में भी उनको जान से नहीं मारा गया, क्योंकि वहाँ प्रोफेसरों को उद्वेगों की उत्पत्ति पर परीक्षण करना था। ऐसे ही एक प्रयोग में कोलम्बिया विश्वविद्यालय में कुत्तों के हाथ पैरों को हथौड़ों से इस तरह कूटा और कुचला गया, जिस तरह लोहार लोहे को घन से पीटता है।

अधिकांश कुत्ते उसी दिन मर गये। तीन कुत्ते बचे उन्हें अगले दिन फिर प्रयोगशाला में लाया गया। बेचारों ने घुट घुट कर प्राण् त्यागे। प्रयोगों के दरम्यान इन्हें पीटता, भूखों मारना, जलाना, सर्दी में ठिठुरना, आँखें फोड़ना, जब तक थक कर बेहोश न हो जायें-दौड़ाना पानी में डूबो देना, सोने न देना, चमड़ी उधेड़ लेना, शरीर के किसी अंग को विषाणुओं के इंजेक्शन देकर उस हिस्से को सड़ाकर इंजेक्शन तैयार करना, शरीर को जीवित काटकर अनेक प्रकार की चर्बी और औषधियाँ प्राप्त करना, यह सब अन्धी कोठरियों में होता रहता है, विज्ञान के विकास के लिये।

1928 से जान हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी के अन्वेषक बिल्लियों पर प्रयोग कर रहे है। उनको चमड़ी पकड़कर नोंचा और झकझोरा जाता है, कान और पूँछ खींची जाती है, पिटाई की जाती है। यह सब केवल इसलिये किया जाता है कि ऐसा करते समय जीवाणुओं की हलचल का पता लगाया जा सके। एक बार एक बिल्ली की पूँछ को भींचकर किसी औजार से इतना दबाया गया कि खून छलछला उठा। यह बिल्ली 140 दिन जिन्दा रही। इस बीच उसे लगभग 100 दिन इसी तरह उत्पीड़ित किया गया। एक बार कई कुत्ते 65 दिन बिल्कुल भूखे रखे गये। उनके पहले भी किया जा चुका है। तात्पर्य यह है कि इस तरह के भयंकर प्रयोग इतने छुपा कर किए जाते है कि पड़ोसी अध्यापक भी नहीं जान पाते।

अमेरिका के वाल्टर अस्पताल में बन्दरों को 9-9 घण्टे बेहोश रखा गया। चेतना आने पर उनके मस्तिष्क का कुछ अंश काटकर उनमें बिजली के करेंट दौड़ाया गया। बन्दर बुरी तरह चीखते। कई बार 6-6 घण्टे तक लगातार बिजली का करेंट डालकर तड़पाया गया। बन्दर उछल कूद करते है तो उन्हें ऐसी निर्दयता से बाँधा जाता है कि वे हिलडुल तक न सकें। उस समय उनकी आँख, मुँह और चिल्लाहट से ही उनके भय, कष्ट और पीड़ा को आँका जा सकता है। प्रयोग के बाद न उन्हें कोई भोजन, न पानी, न हवा, न औषधि बेचारे तड़प तड़प कर प्राण देते है और मनुष्य जाति को आशीर्वाद देते विदा होते है-ओरे निर्दय मनुष्य तू किसी का दर्द नहीं जान सकता, तो तेरी भी दुर्गति ही होगी।

चूहे, मेंढक, मछली और छोटे छोटे कीड़ों को काटना तो अब साधारण बात हो गई है, कौन जाने इन प्रयोगों में एक दिन स्वयं मनुष्य को ही न काटा जाने लगे। कही लुक छिप कर होता भी हो तो कुछ आश्चर्य नहीं।

यह मूक आत्माओं के शाप कभी निरर्थक नहीं हो सकते। सबसे धनी देश अमेरिका, आज सबसे अधिक दुःखी है। अपराध और आत्म हत्याएँ वही सर्वाधिक होती है। पागल और विक्षिप्तों की वहाँ कतारें लगी है। पति पत्नी कोई कोई ऐसा होगा, जहाँ परस्पर प्रेम और विश्वास हो, अधिकांश एक दूसरे से सशंकित ही रहते है। यह उन अदृश्य अभिशापों का ही प्रतिफल हो सकता है।

पशु माना कि अपने कर्मों से उन योनियों में आये है पर उन्हें उन असुविधाजनक योनियों में पहुँचाकर विधाता ने जो दण्ड देना था दे दिया। उससे आगे दण्ड देने का मनुष्य को कोई अधिकार नहीं। उच्छृंखलता का बर्ताव जब उनके साथ किया जा सकता है, तो यही स्वभाव एक दिन मनुष्य से भेद करा सकता है, वही इन देशों में हो भी रहा है।

इन प्रयोग और उपलब्धियों से जो उपकरण बनते चले जा रहे है, उनकी भयानकता का चित्रण करते हुए, अमेरिका के सुविख्यात विज्ञान लेखक आइजैक आसिमोव ने सन् 1990 में दुनियाँ का नक्शा प्रस्तुत करते हुए लिखा है कि-कल कारखाने व मोटरें जिस तेजी से बढ़ रही है, उसे देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि 1990 में शुद्ध वायु और जल मिलना असम्भव हो जायेगा। उस समय धूम्रपान रोकने के लिये एक ऐसा घर बनाना पड़ेगा, जहाँ सब बीड़ी पिया करेंगे खुले आम कोई न पी सकेगा, क्योंकि अभी तो बीड़ी सिगरेट पीने वालों को ओठ और फेफड़े के कैंसर हो रहे है, तब धुँआ इतना बढ़ जायेगा कि न पीने वालों को भी तम्बाकू के धुँए से फेफड़े और त्वचा का कैंसर होने लगेगा।”

“शुद्ध पानी केवल समुद्र को साफ करने से ही मिल सकेगा, वह भी बहुत महँगा पड़ेगा। प्रति व्यक्ति शुद्ध पानी का राशन तक किया जा सकेगा। लोग बस्ती वाले क्षेत्रों के शोर गुल से इतना ऊब जायेंगे कि हर कोई जंगल की और भागेगा, कुछ लोग समुद्र में रहना चाहेंगे, पर तब यह समस्या पैदा होगी कि आणविक रद्दी (रेडियो एक्टिव वेस्ट) को कहाँ फेंका जायेगा। क्योंकि उसका जहर भी मनुष्य के लिये घातक होगा। तब उसे सम्भव है शीशे के घनों में भर कर समुद्र में ही डूबोया जाये।”

विज्ञान ने मनुष्य की परिस्थिति को सुधारा नहीं उलझा दिया है। चिकित्सा क्षेत्र में ही अनेक महत्त्वपूर्ण खोजें हुई है, पर यदि मनुष्य का भावनात्मक स्तर विकसित नहीं होता तो वह सुविधायें भी प्राण लेवा बन सकती है। विदेशों में नींद न आने पर नींद की गोली खाने का आम रिवाज है। पर वह स्वयं इतनी खतरनाक है कि आगामी पीढ़ी को शंकर जी की बारात बना सकती है। बेल्जियम के लीज नगर में सैजा वाँदेपुत माइकेल नामक एक सुन्दर तरुणी जिसे प्रायः गोलियाँ लेकर नींद बुलानी पड़ती थी, जब उसे बच्चा हुआ, तो उसके सब ड़ड़ड़ड़ सुन्दर और स्वस्थ थे, किन्तु उसके हाथ ही नहीं थे। माँ ने स्वयं बच्चे को एक दबा की प्राण घातक मात्रा देकर उसे इस कष्ट से छुटकारा दिलाया। बाद में उसे गिरफ्तार भी किया गया। पर न तो गिरफ्तारी कुछ कर सकती है और न दवाओं पर नियन्त्रण। उनकी प्रतिक्रिया तो कही भी किसी न किसी रूप परिलक्षित होती ही है।

एरिजोना (अमेरिका) की श्रीमती फिकवाइन को थैलिडोमाइड की टिकिया दी गई। दवा ने हृदय को प्रभावित किया। वह गर्भवती थीं, डाक्टरों ने बताया कि उन्हें जो संतान होगी, वह लंगड़ी-लूली होगी। फिकबाइन ने बच्चे के भ्रूण को ही मार डालने का निश्चय किया पर एरिजोना में गर्भपात अपराध है, इसलिये उसने स्वीडन जाकर गर्भपात किया। इस नींद लाने वाली दवा के कारण लंगड़ी-लूली सन्तानों की संख्या विदेशों में तेजी से बढ़ रही है। यह सब वर्तमान विज्ञान की दोहरी देन है, एक ओर तो भावनाओं का गिर जाना और दूसरी ओर जहरीले पदार्थों को शरीर में पहुँचाना। इससे अधिक तो वह अल्प-विकसित देश ही सुखी हैं, जिनमें विज्ञान का प्रसार उतना नहीं हुआ।

थैलिडोमाइड ही नहीं, डाइएथिलीन ग्लाइकोज, स्टालिनोत आदि औषधियों ने हजारों की जानें लीं और अनेक अष्टावक्र पैदा किये हैं। स्व० डा राममनोहर लोहिया ने एकबार दाँतों को पुष्ट करने वाली एक दवा के विरुद्ध कुछ प्रमाण प्रस्तुत किये थे। उस के बाद राज्य सरकार को उस दवा पर प्रतिबन्ध लगाना पड़ा था। यहाँ हमारा तात्पर्य यह नहीं कि दवायें सर्वथा बुरी हैं वरन हम विज्ञान के उस पक्ष को व्यक्त करना चाहते हैं, जो मनुष्य को अस्वाभाविक क्रियाओं की प्रेरणा देता है और उससे मानव-जाति का संकट बढ़ता है। यह संकट मानव-जाति पर निरन्तर गहरा होता जा रहा है।

जर्मनी के औचविज स्मारक को अभी युगों तक भूला न जा सकेगा, यह वह स्थान है, जहाँ 40 लाख लोगों को नाजियों ने एक साथ मृत्यु के घाट उतार दिया था। उससे क्रूर अत्याचार मानव-जाति के इतिहास में नहीं है, किन्तु आधुनिक विज्ञान उससे भी बड़े अत्याचारों की तैयारी कर रहा है। फिलहाल संसार 700 अरब रुपये प्रतिवर्ष शस्त्रास्त्रों पर व्यय करता है। एक ब्रिटिश विमान-वाहक जंगी जहाज 8611 करोड़ रुपये में पड़ता है, जबकि 53 करोड़ रुपये से मिश्र के प्रत्येक नागरिक को शुद्ध जल की व्यवस्था की जा सकती है। इतनी रकम से 600 अच्छे देहाती अस्पताल खोले जा सकते हैं। एक एटलस मिसाइल लगभग 40 करोड़ रुपये का पड़ता है, इतनी पूँजी को यदि नाइट्रोजन खाद का कारखाना बनाने में लगा दिया जाये तो उससे 50 से 70 टन वार्षिक उत्पादन वाला कारखाना तैयार हो सकता है। एक पोलारिस मिसाइल ब्रिटेन के चार विश्व-विद्यालय, एक ए.बी. बमवर्षक से सात सौ सेकेंडरी स्कूल, एक टी.एस.आर. 2 से पचास सर्व धन सम्पन्न अस्पतालों का एक वर्ष का खर्चा चल सकता है। एक मिसाइल विध्वंसक की कीमत से एक लाख ट्रैक्टर खरीदे जा सकते है। इतनी भारी शक्ति विज्ञान ने केवल मानवीय सभ्यता के विनाश के लिये तैयार की है और उसके प्रयोग के बाद कैसी भयंकर परिस्थिति उत्पन्न होगी, उसका अभी अनुमान बाकी है। जब यह सब वस्तुएँ बन रही है तो परिणाम भी किसी न किसी दिन निकलना ही है।

आधुनिक भौतिकतावादी विज्ञान ने नैतिक आदर्शों और भावनात्मक उत्कृष्टता पर इतनी गहरी चोट की है कि पशु पक्षियों को ही नहीं मनुष्य को भी अब घास पात की तरह जलती हुई भट्ठियों में झोंक देने वाला मान लिया गया है। व्यक्ति और समाज में बढ़ती हुई उद्विग्नता, रुग्णता, वेदना एवं व्यथा इस बात का प्रमाण है कि विज्ञान के प्रतिफल मानवीय आदर्श और आकांक्षाओं के विपरीत ही गये है। उसने मनुष्य को सामूहिक आत्महत्या के गर्त की ओर ही धकेलने का प्रयास किया और कर रहा है।

प्रेसीडेन्ट ट्रूमैन का वह फरमान युग युगान्तरों तक नहीं भूला जा सकेगा, जिसमें उन्होंने नागाशाकी और हिरोशिमा (जापान) में अणुबम गिराने का आर्डर दिया था। अमरीकी वायुसेना के एक भूतपूर्व विमान चालक क्लाड एथर्ली ने आगे बढ़कर कहा-यह कार्य में करने के लिये तैयार हूँ।” उसके साथ कुछ और लोग भी आगे आये।6 अगस्त 1945 वह अभागा दिन था, जिस दिन क्लाड एथर्ली ने हिरोशिमा पर पहली बार अणुबम गिराया और 78 हजार आदमियों को एक बारगी मौत के घाट उतार दिया। इससे अधिक अपंग और उससे भी अधिक बेघरबार हो गये। उस बम विस्फोट से उत्पन्न विकिरण के दुष्परिणामों को जापान अब भी भोग रहा है। आज भी वहाँ देश के सब भागों में अधिक रोगी और अपाहिज पड़े, विज्ञान को कोस रहे है और भगवान से प्रार्थना कर रहे है, ”है प्रभु!तू ऐसी दुनिया से हमें मुक्ति दे।”

क्या इतने मनुष्यों का सर्वनाश क्लाड एथर्ली को यों ही छोड़ सकता था। बम गिराकर लौटते समय जैसे ही उसने उस भयंकर कृत्य की झाँकी देखी, लोगों को जलते तवे पर पानी की बूँदों की तरह जलते देखा तो उसकी आत्मा कचोटने लगी। उसने तमगा पाया सही-पर यह भावना दिनोंदिन बढ़ती ही गई कि उस भयानक विनाश के लिये मैं ही जिम्मेदार हूँ। 1947 में सेना से छुट्टी लेने के बाद भी वह पाप छाया की तरह उसका पीछा करता रहा। जहाँ भी वह फोटो और फिल्में देखता वही उसके सिर भूत सवार होता। उसके कानों में सैकड़ों जख्मी जापानियों की चीख पुकारें गूँजने लगती। एक दिन तो उसने पश्चाताप से आविर्भूत अपनी एक रक्त वाहिनी नली ही काट डालीं। वहाँ से किसी तरह बचा तो वह विक्षुब्ध हो गया। चोरी और डकैती डालने लगा और अन्त में उसे एक पागलखाने में शरण मिली, जहाँ वह बड़-बड़ा कर मर गया।

पाप और उसकी विभीषिकाएँ कही भी हों मनुष्य समाज को चैन नहीं लेने देती और विज्ञान ने पाप और विभीषिकाएँ को बढ़ाया ही है। अमेरिका आदि देशों में आत्म हत्या की प्रवृत्ति का विश्लेषण करते हुए, अंग्रेजी के विद्वान् ग्रेगरी कार्सो ने लिखा है कि -”आस्ट्रिया, डेनमार्क, जापान आदि में अमेरिका से भी दुगुनी आत्म हत्याएँ होती है। फाँस में कुछ कम है, पर इंग्लैण्ड और वेल्स उस कमी को पूरा कर देते है। कनाडा, आइलैण्ड, इटली, नीदरलैण्ड, नार्वे, पुर्तगाल, स्काटलैंड और स्पेन में भी आत्म हत्याओं का जोर है और उसका कारण युद्ध और उसके प्रभाव से उत्पन्न वायु मण्डल पर भयंकर परिस्थितियों के सूक्ष्म कम्पन और भौतिक विज्ञान के द्वारा उत्पन्न दूषित वातावरण अधिक है। सन् 1952 में अमेरिका में 15400 आत्म हत्याएँ हुई। एक लाख लोगों के पीछे 10 व्यक्ति केवल आत्म हत्या से मरते है। उससे चिन्तित होकर लास एन्जिल्स में आत्म-हत्या निषेध केन्द्र की स्थापना की गई। नेशनल इंस्टीट्यूट आफ मेंटल हेल्थ और अमेरिका की पब्लिक हेल्थ सर्विस दोनों ने मिलकर उन परिस्थितियों का गहन अध्ययन करके यह निष्कर्ष निकाला कि अन्य कारणों की अंश विज्ञान जनित मानवीय अशान्ति आत्म-हत्या का एक प्रमुख कारण है। उस पर युद्ध का और गहरा प्रभाव देखा गया है।”

पशु-पक्षियों के उत्पीड़न से लेकर मानवीय अशान्ति तक की जितनी व्यथायें इस युग में बढ़ रही है, उनका प्रमुख कारण भावनाओं का गिर जाना है। मनुष्य का अन्तःकरण भी यांत्रिक हो गया है, इसलिये अब उसमें प्रेम, विश्वास, त्याग, क्षमा, उदारता, दया, मैत्री और समानता का स्थान स्वार्थ और छल-कपट ने ले लिया है। विज्ञान ने बताया कि कर्मफल कोई वस्तु नहीं, इसलिये कुछ भी करने से डरना नहीं चाहिये, पर तथ्य यह बताते हैं, कि न तो एक व्यक्ति का पाप उसे छोड़ सकता है और न सामूहिक अपराध समाज के बख्श सकते है। पाप और अत्याचार का दण्ड प्रकृति का एक सनातन सत्य और अटल सिद्धान्त है, उससे कोई बच नहीं सकता। उसकी कृपा तो नैतिक आदर्शों और मानवीय भावनाओं से ही मिल सकती है, इसके लिये विज्ञान और तद्जन्य साधन आवश्यक नहीं। एक प्रयोग ऋषि करके दिखा गये हैं कि मनुष्य साधनों के अभाव में त्याग-तपस्या का जीवन जीकर भी अधिक सुखी रह सकता है, यदि वह भावनाओं की दृष्टि से उत्कृष्ट हो, यदि भावनाओं और आकांक्षाएँ निकृष्ट और अधोगामी हों तो स्वर्ग में रहकर भी मनुष्य सुख नहीं रह सकता।

यह परिस्थिति आज शीशे की तरह साफ दिखाई दे रही है। अनेक साधनों और सुविधाओं के होते हुए भी आज का मनुष्य दुखी और अशान्त है। इस स्थिति में परिवर्तन तभी संभव है, जब भौतिक विज्ञान को धर्म के बन्धन और नियंत्रण में रखा जाये। इसके बिना विज्ञान पागल हाथी की तरह ही उत्पाद करता है। वही आज हो भी रहा है। धर्म का अभाव ही आज की अशान्ति और उद्विग्नता का कारण है। उसका निवारण होगा, तभी मानवीय संभवतः चैन की साँस ले सकेगी।


निग्रहाँत मन की सामर्थ्य अपार

एक बार स्वामी विवेकानन्द हैदराबाद गये। वहाँ एक ब्राह्मण रहता था, जिसके सम्बन्ध में उन्होंने सुना था कि “वह मनुष्य न जाने कहाँ से अनेक वस्तुएँ उत्पन्न कर देता है-वह उच्च खानदान का और शहर का नामी व्यापारी था। स्वामी जी उसके पास गये और अपने चमत्कार दिखाने को कहा। उस समय वह बेचारा बीमार था। भारतवर्ष में ऐसा विश्वास है कि अगर कोई पवित्र मनुष्य किसी के सिर पर हाथ रख दे तो उसकी बीमारी ठीक हो जाती है। वह ब्राह्मण स्वामी जी के समीप जाकर बोला-भगवान पहले आप मेरे सिर पर हाथ रख दें तो मेरा बुखार भाग जाय। अनन्तर में अपने चमत्कार दिखाऊँगा।” स्वामी जी ने शर्त स्वीकार करली।

वह मनुष्य अपनी कमर में एक चिथड़ा पहने था। अन्य सब कपड़े उतार कर रख दिये। अब उसे केवल एक कम्बल ओढ़ने को दिया गया। शीत के दिन थे और भी अनेक लोग एकत्रित हो गये। उसने कम्बल ओढ़ा और एक कोने में बैठ गया।

इसके बाद उसने कहा-आप लोगों को जो कुछ चाहिये वह लिखकर दीजिये।” सबने कुछ लिख लिखकर दिया, स्वामी जी ने स्वयं भी उन फलों के नाम लिखकर दिये, जो प्रान्त में पैदा ही नहीं होते थे, किन्तु आश्चर्य कि उसने कम्बल में से अंगूर के गुच्छे तथा सन्तरे इतनी अधिक मात्रा में निकाल कर दिये कि उनका वजन उस मनुष्य के वजन से दोगुना होता। वह फल सबने खाये भी। खाने योग्य थे भी अन्त में स्वामी जी के आग्रह पर उसने सौ डेढ़ सौ गुलाब के फूल निकाल कर दिये। प्रत्येक फूल बढ़िया खिला हुआ पंखुड़ियों पर सवेरे के ओस बिन्दु विद्यमान् थे, न कोई खण्डित फूल था, न मुरझाया और न टूटा।

इस घटना पर अपनी सम्मति व्यक्त करते हुए स्वामी विवेकानन्द जी लिखते है-” लोग इसे जादू मानते है, चमत्कार कहते है। अवांछित है ऐसी मान्यता है, किन्तु मैं ऐसा नहीं मानता। यह सत्य का ही प्रदर्शन था। जो है ही उसकी छाया कहाँ से आ सकती है, इसलिये यह माया नहीं थी।”

‘यह मन की अनन्त शक्तियों का प्रमाण है, हम मन से जो चाहें उत्पन्न कर सकते है। मन के भीतर सारी सृष्टि की समृद्धि और सम्पत्ति है। शर्त यही है कि हम मन से काम ले। अनियन्त्रित मन अपना भी बुरा ब्राह्मण मन से तो काम लेता है, मगर यह नहीं जानता कि मन से काम ले रहा है, वह भी भ्रांत है, इसलिये वह चमत्कार की दुनिया तक ही सीमित रह गया। अपने अन्दर ईश्वर को व्यक्त नहीं कर पाया।”

मानव मन की अद्भुत और अविश्वसनीय शक्तियाँ कई प्रकार से सिद्ध हो चुकी है, उसमें वह क्षमता है कि मात्र कल्पना शक्ति से समय और अन्तरिक्ष पर विजय प्राप्त कर चेतन को अचेतन से पृथक् कर सकता है।

लिथूयानिया निवासी रैबी एलिजा के सम्बन्ध में कहा जाता है कि उस विचित्र मानसिक शक्ति प्राप्त थी पर उस पर उसका नियन्त्रण न होने के कारण वह शक्ति भी जीवन में कुछ काम न आई। उसने अपने जीवन में दो हजार से अधिक पुस्तकों को एक बार पढ़कर याद कर लिया था। कोई भी पुस्तक लेकर किसी भी पन्ने को खोलकर पूछने पर वह उसके एक एक अक्षर को दोहरा देता था। उसका मस्तिष्क सदैव क्रियाशील रहता था, इसलिये पुस्तकालय के बाद भी उसे अपने हाथ में पुस्तक रखनी पड़ती थी, दूसरे कामों से चित्त हटते ही वह पुस्तक पढ़ने लग जाता था।

पिल्सबरी अमेरिका के हैरी नेल्सन को भी ऐसी विलक्षण मानसिक शक्ति प्राप्त थी। उसे शतरंज का जादूगर कहा जाता था। वह एक साथ बीस शतरंज के खिलाड़ियों की चाल को याद रख सकता था। बीस बीस खिलाड़ियों से खेलते समय कई बार उसे मानसिक थकावट होने लगती थी, उस थकावट को उतारने के लिये वह ताश भी खेलने लगता था।

जर्मनी के राजा की एक लाइब्रेरी फाँस में थी। इसके लाइब्रेरियन मैथुरिन बेसिरे को आवाज सम्बन्धी याददाश्त अद्भुत थी। एक बार उसकी परीक्षा के लिये बारह देशों के राजदूत पहुँचें ओर उन्होंने अपनी अपनी भाषा में बारह वाक्य ज्यों के त्यों दोहरा दिये। वह एक बार में ही कई व्यक्तियों की आवाज सुनता रहता था और आश्रय यह था कि सब की बात उसे अक्षरशः याद होती जाती थी ऐसी विलक्षण प्रतिभा फ्राँस के प्रसिद्ध राजनीतिज्ञ लिआन गैम्बाटा और रिचार्ड पोरसन नामक ग्रीक पण्डित को भी उपलब्ध थी।

मन की शक्ति की तीव्रता का अंकन नहीं किया जा सकता। हजारों घोड़ों की क्षमता वाले इंजिन और राकेट भी इतना तेज नहीं दौड़ सकते। यदि मन को वश में किया जा सके तो मनुष्य हजारों कोस दूर बैठे हुए किन्हीं दो व्यक्तियों की बातचीत को ऐसे सुन सकता है, जैसे वह अपनी बगल में बैठे बातचीत कर रहे है। ऐसे दिखाई देने लगते है, जैसे अपनी उनसे एक फुट की भी दूरी नहीं है। यही नहीं हजारों कोस दूर बैठे हुए व्यक्ति के मन की भी बातें जानी जा सकती है। दूर दर्शन, दूर श्रवण आदि कई सिद्धियाँ निग्रहित मन की ही देन होती है। महामुनि पतंजलि ने योग का लक्षण बताते हुए लिखा है- ‘‘योगश्चित्तवृत्ति निरोध” अर्थात्-चित्त की वृत्तियों को रोके रहना योग है। योग सिद्ध पुरुष सब कुछ कर सकता है वह ब्रह्मा प्राप्ति का अनिर्वचनीय सुख प्राप्त कर सकता है। चमत्कार दिखाकर लोगों की दृष्टि में प्रभावशाली बन सकता है। मैस्ममैराइज और हिप्नोटिज्म यह सब मन की तुच्छ कलायें है कहा जाता है, इनसे साधक का कोई आत्म कल्याण नहीं होता, उसके लिये मनोबल आध्यात्मिक शोध में नियोजित किया जाता है।

अन्तर्बोध की स्थिति को यद्यपि इस तरह अभिव्यक्ति नहीं किया जा सकता तो भी विचारशील व्यक्ति मन की इस अद्भुत शक्ति और उसके चमत्कारों का विवरण पढ़ सुन और देखकर इस दैवी शक्ति के विकास का प्रयास अवश्य कर सकते है। भारतवर्ष जैसे योग प्रणेता देश में ऐसे चमत्कारों की कमी नहीं है। इसे विदेशी लोग भी मानते हैं। एक अमेरिकी संवाददाता ने एक घटना का उल्लेख करते हुए लिखा -”भारतवर्ष की एक नदी में जहाज द्वारा यात्रा कर रहा था। जैसे ही जहाज बन्दरगाह पर पहुँच, एक भारतीय एक गठरी लिये, लंगोटी लगाये जहाज पर चढ़ आया। उसने वहाँ पड़ी हुई रस्सी का एक गोला बण्डल उठा लिया, उसका एक सिरा खोल कर गाँठ लगा दी और उसे उसने बड़े जोर से आकाशं की ओर फेंक दिया। गाँठ ऊपर चढ़ती जाती थी ओर नीचे का गोला अपने आप खुलता जाता थी और नीचे का गोला अपने आप खुलता जाता था। थोड़ी देर में सारी रस्सी आकाशं में उड़कर लोप हो गई। पास में एक टूटा नारियल पड़ा था। साधु ने उसे उठाकर पानी भरा, छोटा सा नारियल उसमें थोड़ा ही पानी आया पर उससे उसने एक पूरी बाल्टी भर दी। फिर दूसरा डोल मँगाकर उसे भी भर दिया। इस तरह उसने कोई पन्द्रह डोल भर दिये, इसके बाद उसने नारियल को उठाकर कुछ पढ़ा नारियल तो लोप हो गया और जब हाथ नीचे किया तो उसके स्थान पर एक डोल हाथ में था। हम यह देखकर बहुत आश्चर्यचकित थे कि यह सब क्या हो रहा हैं”

पास ब्रान्टन ने भारतवर्ष में इस तरह के चमत्कारों को ढूँढ़-ढूँढ़कर देखा और बाद में इस गुप्त विद्या के प्रतिपादन में पुस्तक लिखी। पाण्डिचेरी के फ्राँसीसी न्यायाधीश लुई जंकालियट ने भी एक ऐसी ही पुस्तक लिखी है, जिसमें भारतवर्ष की इस पुरातन विद्या की भूरि-भूरि प्रशंसा की है।

जिसे दूसरे लोग चमत्कार, आश्चर्य और गुप्त विद्या मानते हे, उसे भारतीय ऋषियों, योगियों ने मन की शक्ति का छोटा सा चमत्कार माना है, जो आकर्षक तो लगता है, किन्तु आत्म कल्याण में बाधक है। मनोनिग्रह का लक्ष्य आत्मा का वेधन करना है, जिसे प्राप्त कर मनुष्य जीवन मुक्त और स्वर्ग का अधिकारी बनता है।

श्रीरामोत्तरतापनीयोपनिषद् में मनोमय शक्ति का विवेचन करते हुए बताया गया है कि भौहों और नासिका की जहाँ सन्धि है, वही स्वर्ग तथा उससे भी उच्च परम-धाम का सन्धि स्थान है, वही अविमुक्त है। ब्रह्मज्ञानी जन इसी सन्धि की संध्या रूप में साधना करते है। जो साधक इस प्रकार जानने वाला है कि अव्यक्त ब्रह्म की साधना का स्थान अविमुक्त क्षेत्र आधिभौतिक स्थान है और भौहों तथा नासिका का संधि-स्थान (यहीं मन का ध्यान किया जाता है) आध्यात्मिक काशी है, वहीं ज्ञानी यथार्थ ज्ञानोपदेश में समर्थ हो सकता है। यही सबसे बड़ा तीर्थ और देवताओं के लिये भी पवित्र हैं, यही परमात्मा प्राप्ति का स्थल है। यहाँ से जब प्राणी के प्राण निकलते हैं तो अमृतत्व की प्राप्ति होती है।” मनोमय शक्ति की यही साधना सही अर्थों में अभीष्ट भी हे, चमत्कारों से कुछ भला नहीं होता।

योग कुंडल्युपनिषद् में-ब्रह्मा जी ने योग विद्या का प्राकट्य किया है द्वितीय अध्याय की प्रथम पाँच ऋचाओं में उन्होंने मन को ही ब्रह्म प्राप्ति का मुख्य साधन बताते हुए लिखा है-मनुष्य कामनाओं से ग्रसित होकर विषयाकांक्षी होता हे। विषय में पड़कर कामनायें घटती नहीं, बढ़ती ही रहती हैं, मन की शक्ति इस तरह विश्रृंखलित और केवल लौकिक कार्यों में ही नष्ट होती रहती हैं। इसलिये शुद्ध परमात्मा-भाव की प्राप्ति के लिये विषय और कामना दोनों का त्याग करना और आत्मा में ध्यान लगाना आवश्यक है, जो अपने हित की इच्छा रखता है, उसे विषयों में इस शक्ति को नष्ट नहीं करना चाहिये और शक्ति में प्रवेश कर उसी में स्थित रहना चाहिये। मन द्वारा मन को देखकर और समझकर उसका त्याग करना ही परमपद है, उत्पत्ति और स्थिति का प्रधान बिन्दु मन नहीं है।” आगे के मन्त्रों में मन दारा षट्चक्रों के वेधन का विस्तृत विधान भी मिलता है, यह बहुत ही महत्त्वपूर्ण योग विद्या हैं ‘पंचकोशी साधना’ इसे ही कहते हैं, उसके लाभ अनन्त हैं पर पूर्व में मनोविग्रह और उस शक्ति को आत्मा में नियोजित करना अत्यावश्यक है।

मनुष्य का मन उस तलवार की तरह है, जिसमें पुरानी वस्तुएँ भी होती हैं और नई भी। जीवन नित्य नूतन है, किन्तु मन सदैव ही पुरातन बना रहता है, उसमें अतीत की धूल इकट्ठी होती रहती है, यह धूल चेतना के दर्पण को ढक देती है, पदार्थ जन्य मोह ही जागृत रहता है। तब यह मन बन्धन हो जाता है। यह संस्कार जितने जटिल होते हैं, आधिभौतिक दुःख भी उतने ही बढ़ते जाते हैं। आत्मा पर इसलिये बन्धन भी मन नहीं है। जीवन के अनुभव के लिये मन की कारा से मुक्ति आवश्यक है। इस महाशक्ति को आत्मा में ढाल देने से ही सच्चे सुख और स्वर्ग की प्राप्ति होती है।


श्री रामकृष्ण परमहंस

श्री रामकृष्ण परमहंस शिष्यों को उपदेश दे रहे थे। वह समझा रहे थे कि जीवन में आये अवसरों को व्यक्ति साहस तथा ज्ञान की कमी के कारण खो दे रहे थे। अज्ञान के कारण उस अवसर का महत्व नहीं समझने पाते। समझकर भी उसके पूरे लाभों का ज्ञान न होने से उसमें अपने आपको पूरी शक्ति से लगा नहीं पाते। शिष्यों की समझ में यह बात ठीक ढंग से न आ सकी। तब श्रीरामकृष्ण देव बोले-नरेन्द्र कल्पना कर तू एक मक्खी है। सामने एक कटोरे में अमृत भरा रखा है। तुझे यह पता है कि यह अमृत है, बता उसमें एकदम कूद पड़ेगा या किनारे बैठकर उसे स्पर्श करने का प्रयास करेगा।”

उत्तर मिला-किनारे बैठकर स्पर्श का प्रयास करूँगा। बीच में एकदम कूद पड़ने से अपने जीवन अस्तित्व के लिए संकट उपस्थित हो सकते है। साथियों ने नरेन्द्र की विचारशील को सराहा। किन्तु परमहंस जी हंस पड़े। बोले-मूर्ख-जिसके स्पर्श से तू अमरता की कल्पना करता है, उसके बीच में कूदकर, उसमें स्नान करके, सरोवर होकर भी मृत्यु से भयभीत होता है।”

“चाहे भौतिक उन्नति हो या आध्यात्मिक जब तक आत्म शक्ति का पूर्ण समर्पण नहीं होता सफलता नहीं मिलती” यह रहस्य शिष्यों ने उस दिन समझा।


समाज की अभिनव रचना-सद्विचारों से

सामाजिक सुख शांति के लिये केवल राज दण्ड अथवा राज नियमों पर निर्भर रहा जा सकता और न उसकी स्थापना मात्र निन्दा करते रहने से ही सम्भव है। राजदण्ड, राज नियम और सामूहिक निन्दा भी आवश्यक है, उनकी उपयोगिता भी कम नहीं है, तथापि यह समाज में व्याप्त पापों ओर अपराधों का पूर्ण उपचार नहीं है। इसके साथ निरपराध एवं निष्पाप समाज की रचना के लिये मनुष्यों के आन्तरिक स्तर का सद्विचारों से भरापूरा रहना भी आवश्यक है। मनुष्यों का अन्तर जब तक स्वयं ही उज्ज्वल व सदाशयतापूर्ण न होगा,निष्पाप समाज की रचना का स्वप्न अधूरा ही बना रहेगा। राज नियमों के प्रति आदर, निन्दा के प्रति भय और समाज के प्रति निष्ठा भी तो ऐसे व्यक्तियों में होती है, जिनके हृदय उदार और उज्ज्वल होते है। मलीन और कलुषित हृदय वाले अपराधी लोग इस सबकी परवाह कब करते है।

संसार में सारे कष्टों की जड़ कुकर्म ही होते है, इसमें किसी प्रकार का सन्देह नहीं संसार में जिस परिमाण से कुकर्म बढ़ेंगे, दुःख क्लेश भी उसी मात्रा में बढ़ते जायेंगे यदि संसार में सुख शांति की स्थापना वाँछनीय है तो पहले कुकर्मों को हटाना होगा। कुकर्मों को घुटने, हटाने ओर मिटाने का एक ही उपाय है कि मनुष्य की विचार धारा में आदर्शवाद का समावेश किया जाये। मस्तिष्क को घेरे रहने वाली अनैतिक एवं अवांछनीय विचार धारा ही कुकर्मों को जन्म दिया करती है। यदि विचार सही और शुद्ध हों तो मनुष्य से कुकर्म बन पड़ने की सम्भावना नहीं रहती।

विचारों की बुराई ही बुरे कर्मों के रूप में प्रकट होती है। जिस प्रकार हिमपात का कारण हवा में पानी का होना है-यदि हवा में पानी का अंश न हो तो बरफ गिर ही नहीं सकती, पानी ही तो जम कर बरफ बनती है। इसी प्रकार यदि विचारों में बुराई का अंश हो तो अपकर्ष न बन पड़े। मनुष्य के कुकर्म उसके विचारों का ही स्थूल रूप होता है। अस्तु, कुकर्मों को नष्ट करने के लिये विचारों में व्याप्त मलीनता को नष्ट करना ही होगा।

मनुष्य के बिगड़े विचारों का सुधार राज नियमों अथवा राज दण्ड के भय से नहीं हो सकता। उसके लिये तो उसकी विरोधी विचार धारा को ही सामने लाना होगा। असद्विचारों का उपचार सद्विचारों के सिवाय और क्या हो सकता है? आये दिन लोग पाप करते रहते है और उसका दण्ड भी पाते रहते है, लेकिन उससे पार होकर फिर पाप में प्रवृत्त हो जाते है। दूषित विचारधारा के कारण लोगों के सोचने, समझने का ढंग भी अजीब हो जाता है। दण्ड पाने के बाद भी चोर सोचता है-क्या हुआ कुछ दिनों को कष्ट मिल गया-उससे हमारी क्या विशेष हानि हो गई? चलो फिर कही हाथ मारेंगे। यदि गहरा हाथ लग गया, तब तो कचहरी अदालत से निपट ही लेंगे, नहीं तो फँस गए तो फिर कुछ दिनों की काट आयेंगे। अपने काम के लाभ का त्याग क्यों किया जाय? जुआरी सोचता है यदि आज हार गये तो क्या हुआ, कल जीत कर मालामाल हो जायेंगे। हानि लाभ कब निश्चित है। जिस प्रकार पैसे का एक अन्धा खेल है, उसी प्रकार हमारा खेल भी पैसे का अन्धा खेल है। जीते तो पौबारह, नहीं तो कुछ घाटा ही सही।

इसी प्रकार कोई व्यभिचारी भी सोच सकता है। मैं जो कुछ करता हूँ अपने लिये करता हूँ। उसकी हानि होगी तो हमको ही होगी। पैसा हमारा जाता, स्वास्थ्य हमारा बरबाद होता, रोगी होंगे तो हम होंगे, गृह कलह हमारे घर पैदा होगा, इसमें समाज का क्या जाता है। न जाने हमारी व्यक्तिगत बातों की निन्दा करता हुआ, व्यर्थ में क्यों माल बजाया करता है? यह सब सोचना क्या है? दूषित विचार धारा का परिणाम है। समाज से अपने को पृथक मानकर चलना अथवा अपने व्यक्तिगत कर्मों का फल व्यक्तिगत मानना बुद्धि हीनता के सिवाय ओर कुछ नहीं है। मनुष्य जो कुछ सोचता अथवा करता है, उसका सम्बन्ध किन्हीं दूसरों से अवश्य रहता है। यह बात भिन्न है कि वह सम्बन्ध निकट का हो अथवा दूर का, प्रत्यक्ष हो अथवा परोक्ष। समाज से अपने को अथवा समाज को अपने से पृथक मानकर चलना दूषित विचार धारा का प्रमाण है।

कुविचार के कारण प्रायः लोग यह नहीं समझ पाते कि अपकर्मों में जो तात्कालिक लाभ अथवा आनन्द दिखलाई देता है, वह भविष्य के बहुत से सुखों को नष्ट कर देता है। तात्कालिक लाभ के कारण लोग पाप के आकर्षण पर नियंत्रण, नहीं रख पाते ओर उस ओर प्रेरित हो जाते है। सोच लेते है कि अभी जो आनन्द मिल रहा है, उसे तो ले ही ले, भविष्य में जो होगा देखा जायेगा। इस प्रकार से वर्तमान पर भविष्य को बलिदान करने वाले व्यक्ति बुद्धिमान नहीं माने जा सकते। बुद्धिमान वही होता है, जो वर्तमान की आधार शिला पर अपने भविष्य का राजमहल खड़ा करता है। ऐसे ही विचारहीन वर्तमान के लोभी अपने लिए और अपने साथ समाज के लिये कष्ट कर परिस्थितियाँ पैदा किया करते है। यदि ऐसे लोगों की विचारधारा में संशोधन करके समाजमुखी बनाया जा सके तो निष्पाप समाज की रचना बहुत कठिन न रह जाये।

मनुष्यों का कुमार्ग पर भटक जाने का एक कारण और भी है। सत्कर्मों का कोई तात्कालिक लाभ उतना शीघ्र नहीं मिलता, जितना शीघ्र असत्य अथवा बेईमानी आदि कुकर्मों का लाभ। फिर सत्कर्मों में कुछ त्याग भी रहता है, कुछ कष्ट भी। इस सरलता के धोखे में आकर लोग सन्मार्ग पर न चलकर कुमार्ग की ओर बढ़ जाते है। ऐसे लाभ के लोभी जल्दबाजी को सोचना चाहिये कि धीरज का फल मीठा भी होता है और देर तक आनन्द देने वाला भी। पहले कष्ट उठाकर पीछे सुख पाना अधिक आनन्ददायक है, बदले इसके कि पहले तो थोड़ा सा मजा ले लिया जाय और फिर पीछे देर तक कष्ट भोग किया जाय। ऐसे लोभी लोग ही अविवेक के कारण मजा लेने के लिए तमाम चीजें खाते रहते है। वे स्वाद के कारण पथ्य, अपथ्य अथवा भोक्ता भुक्त का विचार नहीं करते और चार दिनों के मजा के लिये महीनों बीमार होकर चारपाई पर पड़े पड़े रोपा करते है। ऐसे रोगियों ओर अदूरदर्शी व्यक्तियों से समाज को कष्ट देने के सिवाय सुख की आशा किस प्रकार की जा सकती है।

पवित्र विचारधारा के लोग अपने कर्मों के दूरगामी और समाज सम्बन्धी हानि लाभ पर विचार कर लेना अपना कर्तव्य समझते है। ऐसे पावन मनुष्य ही संसार में सुख शांति की वृद्धि में सहायक सिद्ध होते है। जो जीवन को कोई महत्व समझते है, जिनके जीने का कोई अदृश्य होता है और जिनके मन मस्तिष्क में पृथकता की संकीर्णता नहीं होती, जो अन्तःकरण में परमात्मा के निवास का विश्वास रखते है, उनसे अपकर्म बन पड़ना सम्भव नहीं होता। उन्हें लोक परलोक, जीवन जन्म के बनने बिगड़ने का विचार रहता है।

ऐसे पवित्रात्मा जन कष्टकर होने पर भी सत्कर्म से विमुख नहीं होते। कुकर्मों द्वारा होने वाले बड़े बड़े लाभों की उपेक्षा करके सत्कर्मों से होने वाले थोड़े लाभ में ही संतुष्ट हो जाते है। उन्हें पुण्य परमार्थ, ईश्वरीय न्याय और समयानुसार सत्कर्मों के मंगलमय परिणाम में विश्वास रहता है। उनका यह विश्वास ही उन्हें कुकर्मों के चक्रों से बचाकर भवसागर से पार उतार ले जाता है। इस पुण्य पूर्ण विश्वास के अभाव में मनुष्य उसी प्रकार अवांछित दिशा में भटक जाता है, जिस प्रकार निराधार नाव कही से कही को चल देती है। जिसका मन मंगल भावनाओं से ओत प्रोत नहीं, जिसका मस्तिष्क ठीक दिशा में सोचने का अभ्यस्त नहीं, उसे कुविचार और कुभावनायें घेरेंगी ही ओर उनके फलस्वरूप वह कुकर्म करके अपने और समाज दोनों के लिये दुःख का कारण बनेगा ही। विचारों के आधार पर मनुष्य सुखी ओर दुःखी होता है। इसलिये उन्हें ही समाज की अभिनव रचना और उसकी निरामयाः का आधार मानकर चलना हमारा सबका कर्तव्य है।

निष्पाप समाज की रचना का आधार सद्विचार है, किन्तु सद्विचारों की रचना का उपाय क्या है, इसको जाने बिना समस्या का पूरा समाधान नहीं होता। सद्विचारों की रचना का उपाय अध्यात्मवाद को माना गया है। ऐसे अध्यात्मवाद को जिसका आधार परमार्थ ओर परहित हो। जो जितना परमार्थवादी होगा, वह उसी गहराई से जन जन में उसी आत्मा का दर्शन करेगा, जिसका निवास उसके स्वं के अस्तित्व में है। परमार्थी व्यक्ति अपने से भिन्न किसी को नहीं देखता और जिस प्रकार वह अपने को कष्ट देना पसन्द नहीं करता उसी प्रकार किसी दूसरे को कष्ट देने का विचार नहीं रखता। वह दूसरों की सेवा और परोपकार के पथिक के पास असद्विचार उसी प्रकार नहीं आते जिस प्रकार विरागी व्यक्ति के पास माया मोह नहीं आने पाते।

दया, करुणा ओर प्रेम परमार्थ प्रधान व्यक्ति के ऐसे गुण है, जिनको संसार का कोई भी प्रलोभन अथवा परिस्थिति उससे नहीं छीन सकती। परमार्थ प्रधान अध्यात्मवाद सद्विचारों की रचना का अमोघ उपाय है। इसी के आधार पर ऋषियों, मुनियों और मनीषी व्यक्तियों ने अमर आत्म सुख का लाभ पाया और उसका प्रसाद संसार को बाँटकर अपना मानव जीवन धन्य बनाया है।

सच्चा आध्यात्मिक व्यक्ति अखण्ड आस्तिक होता है। वह कण कण में व्यापक प्रभु का दर्शन पाता और नमस्कार में अपनी विनम्रता व्यक्त करता रहता है। जिस व्यक्ति को सब ओर, सब जगह, भीतर बाहर अपने में और दूसरे में परमात्मा की उपस्थिति का अविरल विश्वास बना रहेगा, उसके मन में कुविचारों का आना किस प्रकार सम्भव हो सकता है? वह तो सदा सर्वदा ऐसे ही कर्म करने और भावनायें रखने का प्रयत्न करता रहेगा, जो उसके सर्वशक्तिमान प्रभु को पसन्द हो, जिनसे वह प्रसन्न हो सके।

परमात्मा की प्रसन्नता का सम्पादन करना ही सच्ची आस्तिकता भी है। ईश्वर का अस्तित्व मानकर भी दुष्कर्म करने अथवा दुर्भाव रखने वाला यदि अपने को आस्तिक कहता है तो उसका यह कथन उपहास के सिवाय विश्वास का विषय नहीं बन सकता। ईश्वर में विश्वास रखकर भी जो व्यक्ति दुष्कर्म करता अथवा दुर्भावनायें रखता है, जो ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास नहीं रखता। ऐसे आस्तिक बनाम नास्तिक को सौ वर्ष की तपस्या के बाद भी क्षमा नहीं किया जा सकता।

संसार की वास्तविक सुख शांति के लिये निष्पाप समाज की रचना का स्वप्न तभी साकार हो सकता है, अब आस्तिकतापूर्ण अध्यात्मवाद द्वारा विचारों का परिमार्जन कर नित्यप्रति होने वाले कुकर्मों पर प्रतिबन्ध लगा दिया जाये। क्योंकि विचारों से कर्म ओर कर्मों से दुःख सुख का अविच्छिन्न सम्बन्ध है। इससे अन्यथा संसार में स्थायी और वास्तविक सुख शांति का कोई उपाय दृष्टि गोचर नहीं होता।


जिनकी आत्मा मर गई हो, वह मरों से अधिक हैं

बुद्ध आस्वान राज्य के किसी नगर से गुजर रहे थे। यह स्थान उनके विरोधियों का गढ़ था। जब विरोधियों को बुद्ध के नगर में होने का पता चला तो उन्होंने एक चाल चली। एक कुलटा स्त्री के पेट में बहुत-सा कपड़ा बाँधकर भेजा गया। वह स्त्री जहाँ बुद्ध थे वहाँ पहुँची और जोर -जोर से चिल्लाकर कहने लगी-देखो यह पाप इसी महात्मा का है। यहाँ ढोंग रचाये घूमता है और अब मुझे स्वीकार भी नहीं करता।” सभा में खलबली मच गई। उनके शिष्य आनन्द बहुत चिन्तित हो उठे और पूछा-भगवन् अब क्या होगा?”

बुद्ध हँसे और बोले-तुम चिन्ता मत करो कपट देर तक नहीं। चिरस्थायी फलने फूलने की शक्ति केवल सत्य में ही है।” इसी बीच उस स्त्री की करधनी खिसक गई और सारे कपड़े जमीन पर खिसक पड़े। पोल खुल गई। स्त्री अपने कृत्य पर बहुत लज्जित हुई। लोग उसे मारने दौड़े पर बुद्ध ने यह कहकर सुरक्षित लौटा दिया-जिनकी आत्मा मर गई हो, वह मरों से अधिक हैं, उन्हें शारीरिक दण्ड देने से क्या लाभ?”


पूर्व जन्मों के सम्बन्धित संस्कार

प्रसिद्ध मुगल सम्राट अकबर के सम्बन्ध में एक किंवदंती प्रचलित थी कि वह पहले जन्म में ब्राह्मण था। उसका नाम मुकुंद था। उस जीवन में उसने भगवान शिव की घोर तपश्चर्या सम्पन्न की। उसकी इच्छा एक बहुत बड़ा राजा बनने की थी। बहुत काल तक उपासना करने पर भी जब इच्छापूर्ति के कोई लक्षण दिखाई न दिये तो मुकुंद ने निराश होकर आत्म हत्या कर ली। मृत्यु के समय भी उसकी सम्राट बनने वाली इच्छा बनी रही। कहते है उसी के फलस्वरूप उसको दूसरे जन्म में सम्राट होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।

इस घटना को पढ़कर दो प्रश्न मस्तिष्क में उठते है-यह कि क्या पूर्वजन्मों के संस्कारों का इस जन्म से सम्बन्ध हो जाता है, (2)यह कि यदि इस जीवन में न मिले तो अन्यत्र जीवन में वह सम्भव है क्या?

इस सम्बन्ध में सर्वप्रथम शास्त्रीय मान्यताओं को जान लेना आवश्यक है, गीता कहती है-

तत्र तं बुद्धि संयोग लभते पौर्वदेहिकम्। यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन - 6।43

जो पुरुष इस जीवन में साधना करता है और ज्ञान संचय कर लेता है, वह पुनर्जन्म में उन संस्कारों को अनायास ही प्राप्त कर लेता है। यह संस्कार उसे ईश्वर प्राप्ति में सहयोग देते है।

थियोसोफी भी इस बात को को मानती है। इस सिद्धांत के अनुसार जीव का मानसिक पदार्थ बदल कर कारण शरीर बन जाता है और अपने सब अनुभवों को अपने में सोख लेता है, इसलिये कोई अनुभव बेकार नहीं जाता है और वह नया बना हुआ’ आदमी अपने युगों तक के अस्तित्व में उन अनुभवों को साथ रखता है। इस तरह मनः लोक में जीवात्मा का एक व्यक्तित्व बना रहता है। अर्थात् मनुष्य जो कुछ बनाना चाहता है, खाना चाहता है, जहाँ कही भी जाना या कुछ करना चाहता है, उसका सर्वप्रथम मस्तिष्क में ही रेखा चित्र बनता है, कई बार परिस्थितियाँ ऐसी नहीं होती कि इच्छाएँ पूर्ण हो ही जाये तो वह इच्छा मस्तिष्क में ही दबकर रह जाती है। नष्ट नहीं होती और समय समय पर उकसाती रहती है। फिर कोई ऐसा संयोग आता है। इसी तरह कारण शरीर का विकास होते होते मनुष्य एक दिन ईश्वर को भी प्राप्त कर लेता है।

इस सिद्धान्त को प्रमाणित करने वाले अनेक संदर्भ विचित्र ढंग से हमारे सामने आते है। सूरत के एक ज्योतिषी की दस वर्षीया पुत्री ने अभी हाल ही में रतलाम में अपनी अद्भुत ज्ञान शक्ति से हजारों लोगों को चकित कर दिया।

इस बालिका का नाम सरोजबाला है। वह बिल्कुल अनपढ़ है। दिन में वह सामान्य लड़की की भाँति रहती है और रात में जब वह प्रवचन करने के लिये मंच पर आसन ग्रहण करती है तो गीता, रामायण, महाभारत, पुराण, योग, वेदान्त आदि विभिन्न विषयों पर धाराप्रवाह और विद्वतापूर्ण भावना देने लगती है। इस बालिका ने धर्म प्राण जतन में पुनर्जन्म के बारे में प्रचलित विश्वास को दृढ़ किया है, वहाँ यह भी सिद्ध किया है कि हमारे इस जीवन के संस्कार पूर्वजन्मों के साधनों का ही फल होते है, इस बालिका के पिता ने बताया कि जब वह कुल 2 वर्ष की थी, तभी उसने गायत्री मन्त्र का उच्चारण किया था। 5 वर्ष की आयु में भूतपूर्व स्व. राष्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसाद के समक्ष इसका प्रवचन हो चुका है, तीन वर्ष की आयु पूर्वजन्म की अनेक बातें बताई थीं।

मृत्यु यद्यपि अचेतन अवस्था होती है तो भी जागृत आत्माओं की अनुभव शक्ति क्षीण नहीं होती। उनके मानसिक कण क्रियाशील बने रहने से पूर्व स्मृतियाँ बनी रहती हैं, अचेतन अवस्था में भी जीव जहाँ भी होता है, वहाँ की परिस्थितियों का उसे ज्ञान बना रहता है, उदाहरणार्थ निद्रावस्था में दिखाई देने वाले स्वप्न कई बार इतने सत्य होते हैं कि ऐसा लगता है, वह बात स्थूल आँखों से ही देखी गई हों। धुँधले दृश्य समझ में नहीं आते पर जितना अन्तःकरण और मन-पवित्र एवं शुद्ध होता है, स्वप्न के हृदय उतने ही स्पष्ट और साफ दिखाई दे आते हैं, ऐसे कई उदाहरण हमें मिलते रहते हैं। अब यह विश्वास विदेशों में भी दृढ़ होते जा रहे हैं।

सिडनी से प्राप्त एक समाचार ऐसा ही है। यहाँ पुलिस ने एक व्यक्ति को 2 हजार डालर का पुरस्कार दिया है, इस व्यक्ति ने स्वप्न द्वारा एक मृत बालिका के शव का पता लगाया है, 64 वर्षीय विधुर टीम टीचर ऐसे करतब कई बार दिखा चुके है। इस बार उनसे पुलिस ने एक मामले में सहयोग की अपील की थी। सुपर बाज़ार से एक 7 मास की बालिका को उठा ले जाया गया। पुलिस ने शव का पता लगाने की भरसक चेष्टा की पर सफलता न मिली, अन्त में टीम फीचर ने उसका पता बताकर लोगों को आश्रय चकित कर दिया। टीम फीचर रहस्यमय मृत्युओं और पुनर्जन्म आदि पर विशद अध्ययन कर रहे है।

इन मान्यताओं की पुष्टि में प्रो. बी.डी. ऋषि की खोजे और उपलब्धियाँ बड़ा महत्व रखती है। वे शास्त्र की इस मान्यता का अनुमोदन करते है कि मृत्यु के बाद जीवात्मा का अस्तित्व समाप्त नहीं होता वरन वह अपनी पूर्व स्मृतियों और संस्कारों के साथ कही विचरण कर रही होती है ओर विशेष मानसिक संकल्प द्वारा उसे आकर्षित एवं वार्तालाप भी किया जा सकता है।

श्री ऋषि का जन्म अहमदनगर में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ। बी.ए.एल.बी. की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद 1915 में इन्दौर में जब नियुक्त हुये। 4 वर्ष बाद उनकी धर्मपत्नी सुभद्रा देवी का अचानक देहान्त हो गया। उनकी इच्छा मृत पत्नी से वार्ता करने की हुईं। इसलिये वे इस खोज में लग गये। उन्होंने इसमें सफलता भी पाई और अन्त में अपना जीवन परलोक विद्या की जानकारी एवं खोज करने में ही लगा दिया। वे मृत आत्माओं को बुलाने और उनसे वार्तालाप के अनेक आश्चर्यजनक प्रस्तुत कर चुके है।

एक बार श्री देशपाण्डे एवं भूतपूर्व संसद सदस्य पण्डित ब्रजनारायण ‘ब्रजेश’ ने बम्बई जाकर श्री ऋषि से भेंट की ओर अपने घनिष्ठ मित्र प्रसिद्ध उद्योगपति स्व. भागीरथ जी मेहता का आवाहन किया। मृतात्मा के आ जाने पर श्री देशपाण्डे ने प्रश्न किया-मेहता जी (मृतात्मा) आप ब्रजेश जी को कभी कभी हँसी में कुछ कहा करते थे, क्या बतायेंगे-क्या कहा करते थे? उत्तर के लिये एक सफेद कागज सबके सामने छिपाकर रखा गया और जब उसे निकाला गया तो उस पर लिखा था-सफेद साँड’। श्री ब्रजेश ने स्वीकार किया कि एकान्त में मेहता जी सचमुच उन्हें कई बार ‘सफेद साँड’ कह दिया करते थे।

‘सरस्वती’ के सम्पादक श्रीनारायण चतुर्वेदी के पिता स्वर्गीय प. द्वारिकाप्रसाद चतुर्वेदी भी मृतात्माओं को बुलाने का प्रयोग किया करते थे। वे एक मेज़ पर पंचपात्र और उस पर एक चमची रखा करते थे। मृतात्मा आती थी, तो पंचपात्र अपने आप बजने लगता था।

ऐसे प्रयोग अब जर्मनी, अमेरिका, जापान और ब्रिटेन में भी बहुतायत से होने लगे है। लन्दन से प्रकाशित होने वाले ‘दि होल्डस’ पत्र के सम्पादक श्री मौरित बारबानिल का कहना है कि-इस दृश्य जगत के अतिरिक्त भी एक दूसरा विलक्षण लोक है, जहाँ मृत्यु के उपरान्त जीवन है “ब्रिटेन के ही रिटायर्ड एयर मार्शल लार्ड डागिंड ने कई ऐसे प्रयोग कर मृतात्माओं के अस्तित्व में अपना विश्वास प्रगट किया है।

जीवात्मा के अदृश्य लोकों में अस्तित्व का कारण एक मात्र इच्छाएँ और वासनायें होती है। महोपनिषत् में महर्षि ऋभु ने अपने पुत्र को ब्रह्म विद्या का उपदेश दिया है। पाँचवें अध्याय में उन्होंने कहा-

एवं जीवो हि संकल्प वासना रज्जु वेष्टितः। दुःख जालपरीतात्मा क्रमादायाति नोचक्तम्॥

इति शक्तिमयं चेतो धनाहंकारता गतम्। कोशकार्राक्रमिरिव स्वेच्छया यातिबन्धनम्॥

हे वत्स! इस प्रकार संकल्प और वासना रूपी रस्सी से बँधा हुआ प्राणी दुःख पाता रहता है और अन्त में अधोगति को प्राप्त हो जाता हैं जैसे रेशम का कीड़ा अपनी इच्छा से बन्धन में बँधा रहता है, उसी प्रकार चित्त-वृत्तियाँ में फँसे जीव को बन्धन से जकड़े रहती हैं।

आध्यात्मिक साधनाओं का उद्देश्य इसीलिये अन्तःकरण की शुद्धि रखा गया हैं। कामनायें, वासनायें, अहंभाव समाप्त हो जाते हैं तो जीव अपने-आप परमगति को प्राप्त कर लेता है, इस साधना में यदि कहीं पूर्ण सफलता न मिले तो भी उपरोक्त कथन यह बताते हैं कि आत्मा लोकों में रहकर पुनर्जन्म के रूप में प्रकट होती हैं, वहाँ उसे अगले विकास की परिस्थितियाँ अनायास ही मिल जाती है।

जिनकी वासनायें और इच्छाएँ कम नहीं होती, उस मनुष्य का अन्तःकरण दिनों दिन मलिन और पतित होता जाता है, वह अदृश्य लोक में प्रेतात्माओं के रूप में रहकर पुनः इस संसार में जन्म लेता और जिस मनोदशा से मृत्यु को प्राप्त हुआ था, वही से फिर अपनी जीवन लीला प्रारंभ करता है। अब यह उसका अपना अधिकार है, चाहे सत्कर्मों द्वारा ऊर्ध्वलोकों को प्राप्त करे या फिर दुष्कर्म करे और पुनः अधोगति में घूमता रहे।

12 अगस्त के वीर अर्जुन में इस संदर्भ में एक सनसनी खोज समाचार इस तरह छपा है-लुधियाना -एक मुस्लिम पीर ने एक हजार वर्ष तक प्रेत की योनि में रहने के बाद गत 5 अगस्त को लुधियाना जिले के ललितो खुर्द में जन्म लिया है।’

यह रहस्योद्घाटन स्थानीय ग्रेवाल कालेज के प्रिंसिपल ने किया है। आप लिखते हैं कि इस पीर का मजार उत्तर-प्रदेश के एक स्थान पर है। प्रेत-योनि में यह आत्मा एक युवक छात्र मनमोहन सिंह के शरीर में प्रवेश कर गाई। मनमोहन सिंह सहारनपुर जिले के खेड़ा मुगलग्राम के डा. शेरसिंह का पुत्र और नवें कक्षा का छात्र है। इस बच्चे की झाड़-फूँक हापुड़ के सन्त राड़ेवाला ने की। वहाँ बच्चे के मुँह से प्रेत ने कहा-आप वली अल्लाह हैं मुझे मुक्ति दिलाये मैं 1 हजार वर्ष पूर्व मुसलमानों के साथ भारत आया था। इस युवक से मेरी अनबन थी, मृत्यु के समय मुझे इससे बदला लेने का संकल्प बना रहा। प्रेतयोनि में मुझे बदला लेने का अच्छा अवसर मिला। वह लड़का कुछ दिन संत की संगत में रहा। वहीं उसे बताया गया कि वह ललतों के गुरुदेवसिंह के यहाँ जन्म लेगा।”

प्रिंसिपल साहब लिखते हैं-मुझे इन तमाम बातों पर तब विश्वास हुआ, जब मैंने स्वयं मनमोहन सिंह से भेंट की, उसने कई विलक्षण बातें बताई। उसने धर्मराज का सूक्ष्म एवं दिव्य रूप भी बताया।” एक वर्ष बाद इसी आत्मा ने गुरुदेवसिंह के यहाँ जन्म लिया।

प्रिंसिपल साहब लिखते हैं-मुझे इन तमाम बातों पर तब विश्वास हुआ, जब मैंने स्वयं मनमोहन सिंह से भेंट की, उसने कई विलक्षण बातें बताई। उसने धर्मराज का सूक्ष्म एवं दिव्य रूप भी बताया।” एक वर्ष बाद इसी आत्मा ने गुरुदेवसिंह के यहाँ जन्म लिया।

यह तथ्य और घटनायें ऐसी हैं, जिन्हें काल्पनिक नहीं कहा जा सकता। मनुष्य शरीर की सूक्ष्म कोशिकाओं की विज्ञान तेजी से जानकारी प्राप्त कर रहा हैं, जब यह जानकारियां समुन्नत रूप में सामने आयेंगी तो इस संबंध में अनेक आश्चर्यजनक प्रमाण प्रस्तुत किये जा सकेंगे। अभी तो इतना ही कहना पर्याप्त है कि मनुष्य जैसा सर्वोत्तम जीवन पाकर भी जिसने आध्यात्मिक लक्ष्य पूरा न किया- उसका जन्म निरर्थक ही गया। पर जो अब से ही प्रयत्न में जुट गया, साधनायें प्रारंभ कर दीं, उसे उन संस्कारों का लाभ अब नहीं तो कालांतर में मिलेगा अवश्य। साधनायें कभी निष्फल नहीं जाती।


महामना मालवीय

काँग्रेस का अधिवेशन हो रहा था और वर्षा की झड़ी लगी थीं एक-एक करके नेता लोग निकले चले जा रहे थे। एक कोने में खड़े श्री व्यंकटेशनारायण तिवारी वर्षा रुकने की प्रतीक्षा में थे, अनेक नेता छाता लगाये हुए, उनके सामने से गुजरे और सभी ने केवल एक बात पूछी-क्यों व्यंकटेश छाता नहीं लाये” अन्त में आये महामना मालवीय, सिमटे खड़े तिवारी जी को देखते हुए बोले-अरे व्यंकटेश, तुम यहाँ खड़े हो, आओ छाते में हो लो।”

महामना ने उन्हें खींचकर अपने छाते में ले ही लिया और बोले-आखिर यह छाता है, किस काम के लिये?”


हम देवत्व की ओर बढ़ें असुरता की ओर नहीं

किसी अवसर का समुचित लाभ उठा लेना ही उस अवसर की सार्थकता कही गई है। मानव जीवन भी एक अवसर ही नहीं एक अनुपम अवसर है। जो बुद्धिमान इस अवसर की महत्ता समझते हैं, वे इसका लाभ उठाने में कभी नहीं चूकते। जीवन का लाभ उठाने का अर्थ है, इसको सफल एवं सार्थक बना लेना। इसकी श्रेष्ठ रचना ही इसकी सार्थकता मानी गई है और सार्थकता का अभिप्राय है, इसकी चेतना को देवत्व की ओर उठाया जाये। मनुष्य से बढ़कर देवताओं की कक्षा में प्रवेश किया जाये।

मनुष्य जीवन मध्यम श्रेणी है। इसके दायें बायें दो और श्रेणियाँ हैं। देवता और असुर। मनुष्य की क्षमता में है कि वह चाहे तो अपनी गतिविधियों तथा विचार प्रवृत्तियों के आधार पर देवता बन जाये अथवा असुर रूप में पतित हो जाये।इन दोनों श्रेणियों के बीज मनुष्य के अन्दर विद्यमान् हैं। वह जितनी तत्परता से जिन बीजों का विकास कर लेगा उतने अनुपात में ही देवता अथवा असुर बन जायेगा। यद्यपि इन दोनों श्रेणियों की एक पराकाष्ठा भी है। वे हैं परमात्म रूप एवं पिशाचता। देवत्व जब बढ़कर अपनी परिधि पार कर जाता है तब ईश्वर रूप हो जाता है और असुरता उतरते उतरते पिशाचता के रूप में परिणत हो जाती है।

मनुष्यता की पहचान यह है कि वह अपने और दूसरों के प्रति एक संतुलित दृष्टिकोण रखता है। यद्यपि उसे अपने अधिकारों तथा स्वार्थों का ध्यान अवश्य रहता है तथापि दूसरों के अधिकारों का भी उल्लंघन नहीं करता उनके स्वार्थों का हनन नहीं करता। वह जो कुछ उसका है लेना चाहता है और जो कुछ दूसरों का है उसको देने का साहस रखता है। अपनी सुख-सुविधाओं का ध्यान रखते हुए दूसरों की सुख सुविधाओं में व्याघात उत्पन्न नहीं करता।

देवता का लक्षण यह है कि वह अपने स्वार्थ तथा अधिकारों को द्वितीय स्थान पर तो रखते ही हैं बल्कि उनकी हानि करके भी दूसरों की सुख सुविधा बढ़ाने का प्रयत्न किया करते हैं। अपनी उन्नति रोक कर दूसरों को उन्नति पथ पर बढ़ाने में प्रसन्नता अनुभव करते हैं। दूसरों के सुख में अपना सुख और दूसरों के दुःख में अपना दुःख समझकर परमार्थ में तत्पर रहते हैं। जब यह पुण्य प्रवृत्ति आगे बढ़कर अपनी पराकाष्ठा पर पहुँच जाती है, तब उनका अपना कोई स्वार्थ नहीं रह जाता। उनके पास जो कुछ होता है, उसमें निस्पृह हो जाता है। उनकी सारी गतिविधियाँ और सारी चिन्ताएँ दूसरे की सेविका बन जाती हैं।

वह जो कुछ सोचता है, दूसरों के हित के लिये, जो कुछ करता है दूसरों के लाभ के लिये। उसका खाना-पीना सोना-जागना उठना बैठना, हँसना बोलना वहाँ तक कि श्वाँस एवं प्रश्वास की प्रक्रिया तक दूसरों के हित के लिये ही सक्रिय रहती है। उसका सारा व्यक्तिगत एवं अस्तित्व लोक रंजन में विलीन हो जाता है। वह सम्पूर्ण रूप से परमार्थ रूप होकर ईश्वर की श्रेणी में पहुँच जाता है। ईश्वर का जो कुछ है, वह सब संसार के कल्याण के लिये। उसका अपना कोई स्वार्थ हो ही क्या सकता है?

असुर वह कहा जाता है, जिसकी भावनायें स्वार्थी एवं संकीर्ण हों। अपने सुख दुःख के अतिरिक्त दूसरों के सुख दुःख से कोई सम्बन्ध न रखता हो। केवल अपनी बात ही सोचना, दूसरों के विषय में कोई विचार न रखना, दूसरों के अधिकारों की उपेक्षा कर अपने अधिकारों को चाहना। दूसरे की हानि लाभ से निरपेक्ष रहकर अपना हित देखते रहना, स्वार्थपूर्ति के लिये पथ एवं प्रयत्न की कोई मर्यादा न मानना। स्वार्थ के लिये ईर्ष्या, द्वेप और क्रोध आदि वृत्तियों पर संयम न रखना असुरता के लक्षण हैं। जब यह असुरता अपनी परिधि से निरंतर पिशाचता अथवा पामरता की परिधि में प्रवेश कर जाती है, तब वह आततायी, अत्याचारी और असहनीय बन जाता है। अकारण एवं अनावश्यक रूप में दूसरों को सताना, दुःखी करना, हानि पहुँचाना उसका सामान्य मनोरंजन हो जाता है।

दूसरों के सुख में दुःख और दुःख में सुख अनुभव करना उसका विशेष लक्षण होता है। अपना कोई स्वार्थ न होते हुए भी दूसरों की उन्नति एवं विकास में बाधा डालना और प्राणपण से यह प्रयत्न करना कि दूसरा एक कदम आगे न बढ़ जाये, कहीं यह शांति अथवा सुख की एक बूँद न पाले आदि उच्छृंखल, अनर्गल एवं अन्यायपूर्ण कार्य करते रहने वाले पिशाच अथवा राक्षसों की कोटि में आते हैं। झूठ, छल, धूर्तता, कपट, मक्कारी, चोरी, विश्वासघात, प्रवंचना, शोषण आदि पैशाचिक प्रवृत्तियाँ ही तो हैं। ऐसे अभागे मानव पिशाचों को असाध्य ही मानना चाहिये। इनकी अपावन छाया तक जिस जिस स्थान पर पड़ जाती है, उस उस स्थान पर नरक निर्माण हो जाता है।

यह कोटियाँ अथवा श्रेणियाँ-इनमें से मनुष्य जिस कोटि में चाहे प्रवेश कर सकता है। उस पर किसी प्रकार का बाह्य प्रतिबन्ध नहीं है। वह देवता, असुर, राक्षस कुछ भी बन सकता है।

मनुष्य जीवन एक अनुपम अवसर है। इसी बात का कि इस श्रेणियों में से जिस श्रेणी में चाहे अपना उत्थान अथवा पतन कर सकता है। किन्तु जीवन की सफलता एवं सार्थकता इसी बात में है कि मनुष्य अधिकाधिक उन्नति की ओर बढ़ता हुआ ईश्वरत्व प्राप्त कर ले। वह उन्नति करता हुआ मनुष्य से देवता और देवता से ईश्वर रूप होकर सदा सर्वदा के लिये जन्म मरण के चक्र से निवृत्त हो जाये। किसी कार्य की सार्थकता सफलता ही हैं और सफलता का अर्थ है उन्नति एवं विकास। मनुष्यता से देवत्व की ओर पहुँचना ही उसकी सार्थकता है। पतन की ओर प्रगति करना अग्रसर होना नहीं कहा जा सकता है और न मनुष्य से असुर बन जाना सार्थकता ही। सुन्दर से असुन्दर बनना नहीं, सुन्दर, सुन्दरतम बनना ही विकास है। अस्तु हमारी, आप सबके जीवन की सार्थकता इसी में है कि हम सब श्रेष्ठता की ओर बढ़कर देवत्व की कक्षा में प्रवेश करें।

एक कक्षा से दूसरी कक्षा की ओर उछाल मारना ठीक नहीं। इस अभियान की क्रमिक प्रगति ही अधिक समुचित, सरल एवं विशद होगी। पहले हम मनुष्य से पूर्ण मनुष्य बनने के प्रयत्न में लगें और तब मनुष्यता की पूर्णता के बाद देवत्व की ओर बढ़ें।

मानना ही होगा, अभी हम मात्र मनुष्य ही हैं, पूर्ण मनुष्य नहीं। हमें अपने स्वार्थों एवं अधिकारों के प्रति काफी स्पृहा है। कभी कभी जब हमारी आसुरी वृत्तियाँ प्रबल हो जाती हैं, तब उनके प्रभाव में अपना कर्तव्य भूल जाते हैं और दूसरों के अधिकारों का अतिक्रमण भी कर बैठते हैं। यह बात अवश्य है कि बाद में समाधान होने के पश्चाताप भी करते हैं और क्षमा भी माँगते हैं। अच्छा हो कि हमसे यह भूल कभी न हो। इसका एक सरल सा उपाय यह है कि हम अपने अधिकारों की अपेक्षा अपने कर्तव्यों पर अधिक ध्यान दें। अपने कर्तव्यों तक सीमित रहने से स्वाभाविक है कि अधिकारों की जागरूकता कम हो जायेगी और इस प्रकार उनके प्रति हमारा ममत्व घटने लगेगा और निःस्वार्थ बुद्धि का विकास होने लगेगा। कर्तव्यों का अधिक भान ही तो स्वार्थ को प्रबुद्ध किया करता है। इस उपाय में अधिकारों के हनन होने का भय इसलिये नहीं है कि जब कोई नेक आदमी स्वयं अपने अधिकारों की स्पृहा न कर कर्तव्य करता रहता है, तब दूसरे लोग उसके अधिकार रक्षा को अपना कर्तव्य मान लेते हैं। कर्तव्यशील सत्पुरुष अपने अधिकारों से वंचित रह जाये यह सम्भव नहीं।

इस प्रकार स्वार्थ के प्रति ममत्व कम होते ही परमार्थ बुद्धि का विकास प्रारम्भ हो जायेगा और मनुष्य देवत्व की ओर चल पड़ेगा।

मनुष्य के कर्तव्य क्या हैं? इस प्रश्न का उत्तर यह हैं कि जिन कामों, भावों तथा विचारों का प्रभाव दूसरों पर अवांछनीय हो, उनका त्याग और जिनका प्रभाव अनुकूल हो उनका ग्रहण। निषेध की अपेक्षा विधेयक उपाय अधिक समीचीन होते हैं। निषेध की अपेक्षा विधेयक उपाय अधिक समीचीन होते हैं। हम क्या न करें, जिससे किसी पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े, इसी चिन्ता करते रहने की अपेक्षा यह अधिक सरल एवं सुखद है कि हम वह करें, जिसका प्रभाव दूसरों पर प्रतिकूल पड़े। यह काम सेवा, सहयोग, सहायता एवं सहानुभूति परक ही हो सकते हैं।

मानव समाज पारस्परिकता के ही आधार पर बना, विकसित हुआ, बढ़ा और उसी के आधार पर ठहरा हुआ है। यदि हम सब एक दूसरे का सहयोग करना छोड़ दें तो जीवन, अन्न तथा वस्त्र जैसी साधारण समस्यायें भी हल न हो सकें जीवन की सारी सुविधा साधनों का निर्माण, जिनका कि हम सब उपभोग करते है, परोक्ष अथवा प्रत्यक्ष रूप से सबके सहयोग से ही होता है। यदि हम एक दूसरे की सेवा करना छोड़ दें अथवा सहायता से विरत हो जायें तो हमारा समाज किसी भी विपत्ति आपत्ति का सामना करने में असमर्थ हो जाये। जो बीमार पड़ जाये वे बीमार ही पड़े रहे, जो आश्रित है वे निराश्रित होकर नष्ट हो जायें। जो धनपति हैं, वे सारा धन अपने पास ही रखें और सारा समाज दो दिन में ही असुविधा से त्रस्त हो उठे।

यदि विचारक अपने विचार, शक्तिवान अपनी शक्ति और शिल्पी अपना शिल्प अपने तक ही सीमित कर ले और दूसरों को उसका लाभ न दे तो शीघ्र ही पूरा समाज जड़वत् होकर एक स्थान पर रुक कर खड़ा हो जाये। तात्पर्य यह कि सारा मानव समाज ही क्यों संसार ही पारस्परिकता, सहायता, सहयोग और आदान प्रदान पर चल रहा है। जो स्वार्थी एवं संकीर्ण व्यक्ति इस पारस्परिकता का महत्व नहीं समझते अथवा इसके प्रतिपादन में प्रमाद करते हैं वे अविकसित एवं अपूर्ण मनुष्य ही हैं।

मनुष्यता की पूर्णता के लिये हमें संग्रह की नहीं त्याग की नीति अपनानी चाहिये। दूसरों से अपना स्वार्थ कैसे सधे यह सोचने के स्थान पर यह सोचना चाहिये कि ऐसा कुछ क्या किया जा सकता है, जिससे दूसरों का कुछ हित हो। जिस दिन हमारी अन्तःचेतना, सेवा, पुण्य, परोपकार, त्याग, उदारता, पारस्परिकता, सहायता, सहयोग, प्रेम, दया करुणा आदि की उदार भावनाओं से ओत प्रोत हो जाये, उस दिन समझना चाहिये कि हम मनुष्यता की पूर्णता की ओर अग्रसर हो आये हैं।

केवल पारमार्थिक विचार रखने अथवा परोपकार का म नहीं मन चिंतन करने से प्रयोजन पूर्ण न होगा। उसके लिये तदनुकूल सक्रियता की भी आवश्यकता है। भावनाओं को कार्य रूप में परिणित न करने से वे शीघ्र ही निष्क्रिय होकर मर जाती हैं और मनुष्य का मानसिक स्तर पुनः नीचे उतर जाता है। भावनाओं के परिपोषण के लिये उन्हें कार्यरूप में परिणित ही करते रहना चाहिये साथ ही केवल मनोरथ मात्र से ही तो किसी की सेवा सहायता नहीं हो सकती। जब तक किसी रोगी को दवा लाकर न दी जायेगी और यदि आवश्यक हो तो पिलाई न जायेगी, तब तक क्या तो उसकी सेवा होगी और क्या उसे सुख अथवा संतोष मिलेगा।

किसी असहाय को जब तक हाथ देकर नहीं उठाया जायेगा अथवा पदार्थ रूप में उसकी अपेक्षित सहायता न की जायेगी, तब तक उसका क्या दुःख दूर ही सकेगा। भूखे को रोटी, नंगे को वस्त्र, असहाय को हाथ, अज्ञानी को विद्या निरक्षर को अक्षर और रोगी को दवा देकर ही सुखी और शीतल बनाया जा सकता है। हमारी उदार, दयालु अथवा करुण भावनायें मात्र उसका न तो कोई हित कर सकती है और न हम ही परमार्थ पुण्य के अधिकारी बन सकते हैं।

मनुष्य की पूर्णता का चिन्ह यह हैं कि हममें कितनी उत्कृष्ट भावनाओं का विकास हुआ हैं और उन भावनाओं को यथार्थ रूप में परिणित करने की प्रेरणा कितनी प्रबल हुई है और हम परमार्थ कार्यों के लिये अपने कितने स्वार्थों और अधिकारों को त्याग करने में तत्पर होने लगे हैं और उस त्याग में हमें किस सीमा तक प्रसन्नता एवं सन्तोष मिलने लगा है। जिस दिन पूर्णरूप से हमारा स्वार्थ परमार्थ, हमारे अधिकार कर्तव्य और हमारा सुख दूसरों का सुख होकर सन्तुष्ट होने लगे, मानना चाहिये कि हम पूर्णता की परिधि में आ गये और अब उस भूमिका पर खड़े हुए हैं, जहाँ से देवत्व की ओर अभियान प्रारम्भ किया जा सकता है।


देखने वाली आत्मा को आँखें आवश्यक नहीं

कई वर्ष पूर्व में मास्को से टेलीविजन पर एक अत्यन्त आश्चर्यजनक कार्यक्रम प्रसारित किया गया। निजनी की एक 22 वर्षीय तरुणी रोसा कुलेशोवा ने अपने दाहिने हाथ की तीसरी और चौथी उँगलियों से स्पर्श कर के अख़बार का एक लेख पढ़ा और फोटो चित्रों को बिना आँख की मदद से देखकर पहचाना इस कार्यक्रम को हजारों रूसियों और दूसरे देशवासियों ने देखा और बड़ा आश्चर्य व्यक्त किया।

रोसा निजनी के एक अन्ध विद्यालय में अध्यापन का कार्य करती है। एक दिन जब वह पढ़ा रही थी, तब एकाएक उसने अनुभव किया कि वह बिना आँखों की सहायता उँगलियों के पोरों से देख सकती है। उसने धीर धीरे अभ्यास बढ़ाया। स्पर्श से ही वह अंक पहचानने लगी। कुछ दिन में तो वह कागजों पर हुए रंग को भी केवल स्पर्श से जानने लगी। दिसम्बर 62 को उसने सोवियत संघ, मनोवैज्ञानिक संघ की यूराल शाखा के सदस्यों के सामने प्रदर्शन किया। तुरन्त प्रेस से आये अख़बार को उँगलियों की मदद से बढ़कर सुना दिया। यही नहीं अख़बार पर जहाँ चित्र थे, उनके पोज और वह चित्र कैसे कपड़े पहने थे, यह सब अत्यन्त सूक्ष्म विभाजन तक उसने केवल स्पर्श से बता दिये, स्पर्श से वह किस प्रकार अक्षर रंग या चित्रों को पहचान लेती है, इसका कोई निश्चित उत्तर रोसा नहीं दे सकी किन्तु उसने इतना अवश्य बताया कि कोई भी वस्तु छूने से कुछ तरंग जैसी लाइनें मस्तिष्क तक दौड़ने लगती हैं और सब कुछ स्पष्ट होने लगता है।

वैज्ञानिक बहुत हैरान हुए, खारकोव विश्व-विद्यालय के एक मनोविज्ञान शास्त्री ने कहा-सम्भव है वस्तुओं से इन्फ्रारेड किरणें निकलती हों और उनके स्पन्दन से पता चलता हो, इसलिये रोसा पर कुछ प्रयोग किये गये। पालिश किये हुये काँच के पार से वस्तुएँ दिखाई गईं। अब इन्फ्रारेड किरणों की सम्भावना को रोक दिया गया था तो भी रोसा ने पहले की तरह ही सब कुछ बता दिया। यही नहीं उसे एक लम्बी नली के पार से रंग दिखाये गये, तब उसने नली के मुँह पर उगली रखकर सब कुछ सही सही बता दिया। वैज्ञानिक कोई कारण समझ न सके, अन्त में रूसी अख़बार ‘इजवेस्तिया’ ने स्वीकार किया, वह किसी दिव्य दृष्टि का चमत्कार है।

टेलीविजन पर हुए कार्यक्रम को देखने के बाद खार्कोष के डाक्टर ओल्गा ब्लिजनोव ने अपनी पुत्री पर भी इस तरह का प्रयोग किया और देखा कि रौसा कुलेशोवा की तरह नीले, काले, हरे, लाल सब रंगों को केवल स्पर्श से जान लेती है। उसका भी परीक्षण किया गया। लेता ब्लिजनोव के सामने चौकोर कागजों का पूरा बण्डल रखा गया और उसके नीचे एक कागज में कुछ लिखकर छुपा दिया गया। आश्चर्य कि उसने बण्डल के ऊपर वाले कागज को छूकर यह बता दिया कि सबसे नीचे वाले कागज में क्या लिखा हुआ है। इतना ही नहीं वह दो ढाई इंच दूर उँगलियाँ रखकर भी फोटो, चित्र, रंग और अक्षर पहचान लेती है, जबकि उसकी आँखों में मजबूत पट्टी बंधी होती है।

प्रोफेसर अलेक्जाँदेर स्मिर्नोव ने इस विद्या का गहन अध्ययन किया। उन्होंने ऐसी क्षमता के कुछ लड़के भी खोज निकाले पर इस रहस्य का सही पता न लगा सके। इन चर्चाओं को न्यूयार्क में बारनार्ड कालेज के प्रोफेसर डा. रिचर्ड पी. यूज ने भी सुना तो उन्होंने बताया कि 1939 में कैण्टकी के हाईस्कूल में पैट्रीशिया आइन्सवर्य नाम की एक लड़की भी इस तरह की दिव्य दृष्टि रखती है। अब तक वह स्त्री कई बच्चों की माँ हो चुकी थी, इसलिये श्री डा. यूज ने कालेज के लड़कों पर प्रयोग दोहराया और बाद में उन्होंने बताया कि 135 विद्यार्थियों में से 15 प्रतिशत छात्रों में इस तरह की क्षमता पाई गई, जो अभ्यास के द्वारा अपनी दिव्य दृष्टि बढ़ा सकते है। उनकी इस घोषणा से वैज्ञानिकों में हलचल उत्पन्न हो गई कि क्या सृष्टि का प्रत्येक प्रत्येक सचमुच आदिकाल से ही ऐसी क्षमता अपने भीतर छिपाये है। इतना स्पष्ट ज्ञान होते हुए भी वह सर्वथा अज्ञानी बना हुआ है। उसे भविष्य और दूरस्थ वस्तुओं का तो दूर कई बार तो पास की वस्तुएँ भी पहचानना कठिन हो जाता है। अपने माता पिता और बच्चों के मन की भी बात न जान सकने वाले मनुष्य में कोई विलक्षण दिव्य दृष्टि का होना सचमुच आश्चर्यजनक है, पर योग विद्या और आत्मा का रहस्य जानने वाले भारतीय आचार्यों के लिये यह कोई कठिन बात नहीं रही। यहाँ आदि काल से सूक्ष्म तत्त्वों का ही परीक्षण, विश्लेषण शोध और अभ्यास किया जाता रहा है।

ध्यान बिंदूपनिषद के 94 वें शोध मन्त्र में बताया है-

अथात्म निणयं ध्याख्यास्ये हदि स्थाने अष्टवल पंद्य वर्तते तन्मध्ये रेखा वलयं कृत्वा जीवात्म रुपं ज्योतीरुप-मणु मात्रं वर्तते, तस्मिन सर्व प्रतिष्ठितं भवति सर्व जानाति।

अर्थात्- अब आत्मा के विषय में विचार करते हैं। हृदय स्थान में अष्टदल कमल है, उसमें रेखाओं का आश्रय लेकर जीवात्मा ज्योतिरूप अणुमात्र रूप में रहता है। उसी में सब कुछ प्रतिष्ठित है, वही सब कुछ जानता है (बिना इन्द्रियों की मदद से अपनी सूक्ष्म इन्द्रियों के माध्यम से )।

गणपत्युपनिषत् की छः वीं ऋचा का एक अंश-

त्वं चत्वारि वाक्यरिमिता पदानि। त्वं गुणमयातीतः त्वं मूलाधारे स्थितोअसि नित्यम्। त्वं शक्तिन्नयात्मकः।

वाणी के चार रूप परा, पश्यंति, बैखरी और मध्यमा भी तुम हो, गुणातीत हो मूलाधार में स्थित, इच्छा-शक्ति क्रिया शक्ति और ज्ञान शक्ति, यह तीनों रूप तुम्हारे ही हैं।

योग उपनिषदों में आत्मानुभूति और आत्म साक्षात्कार के साधनों का विस्तृत विवरण दिया गया है और यह बताया गया है, आत्मा को जान लेने पर मनुष्य की सम्पूर्ण चेष्टाएँ आत्मा बन जाती हैं, तब वह न केवल छिपी से छिपी वस्तु के रहस्य को समझ सकती हैं, वरन् लाखों मील दूर की वस्तु को देख, सुन-समझ और कोई सन्देश भी भेज सकती हैं। इन उपनिषदों में यह भी बताया गया है कि आत्मा शुद्ध-बुद्ध और निर्विकार है, इसलिए ये आवश्यक नहीं कि उसकी अनुभूति के लिये कठिन योग क्रियायें ही की जायें, मनुष्य अभ्यास द्वारा अपने मन के मैल और आत्मा पर चढ़ी बुराइयाँ काम,क्रोध, लोभ,मोह, मद, मत्सर आदि को त्याग डाले तो ही उन अनुभूतियों और शक्तियों का सहज स्वामी बन सकता है। योग का मार्ग वैसे कठिन है पर वह पूर्ण विज्ञान समस्त तरीका है, इसलिये उसकी उपयोगिता भी कम नहीं है।

मेरुस्तम्भ के शिखर के सीधे ऊपर खोपड़ी के बीजों-बीच से थोड़ा हटकर लालिमा लिये हुए भूरे रंग की कोण की शकल की एक वस्तु मस्तिष्क की पिछले कोठरी के आगे तीसरी कोठरी की तह से मिली हुई पाई जाती है। यह गुद्दी का पुञ्ज है, जिसमें छोटे छोटे खुरदुरे दानेदार अणु होते हैं, इन्हें ‘मस्तिष्क बालुका’ कहा जाता है। इसे पाश्चात्य वैज्ञानिक ‘पाइनल ग्लैण्ड’ या ‘पाइनल बाड़ी’ कहते हैं, पर वे अभी उसके कार्य अभिप्राय और उपयोग से बिल्कुल अनभिज्ञ हैं। मोटी जानकारियाँ ही इस सम्बन्ध में मिलती हैं।

दूरवर्ती वस्तुओं और सूक्ष्म से सूक्ष्म मन तक के लगाव का कारण योगी लोग इसी स्थान को मानते हैं। यह आत्मा की ज्ञान शक्ति का कोष कहा जा सकता है। इस अवयव के लिये यह आवश्यक नहीं कि इसमें कोई बाह्य द्वार हो जैसा कि, कान, नाक, मुँह में होता है। इसमें से उठने वाले विचार कम्पन स्थूल पदार्थों का भेदन भी उसी तरह कर जाते हैं, जिस तरह ‘एक्सरेज’। वह सूक्ष्म विचार कम्पन पहाड़ों की चट्टानों, लोहे आदि का भी भेदन कर उसके भीतर की आणविक संरचना का ज्ञान प्रभाव कर सकते हैं।

उल्लेखनीय है कि जमशेद जी टाटा को खनिज और इस्पात का कारखाना खड़ा करने का स्थान स्वामी विवेकानन्द ने लन्दन में तब बताया था, जब श्री टाटा जी वहाँ उसकी स्वीकृति लेने गये थे। खनिज पदार्थ, पानी और तेल के कुओं तक का पता धरती के भीतर हजारों फीट निचाई में हों तो वहाँ भी यह विचार कम्पन पहुँचकर वहाँ की स्थिति का रहस्य आत्मा को बता सकते हैं।

मस्तिष्क का ‘कोनीला अणु’ बेतार के तार की तरह अदृश्य जगत् के सूक्ष्म से सूक्ष्म कम्पन को भी पकड़ लेता हैं, इसीलिये जो बात मन में तो न हो पर अवचेतन मन में हो, उसे भी जाना जा सकता है। उदाहरण के लिये कौड़ी वाले बैल देखे होंगे, जो अपनी स्वामी के संकेत पर बता देते हैं कि 5 ) का नोट किसकी जेब में है-बैल चलता है और उस आदमी के पास जा पहुँचता है। वह आदमी पूछता है-इनमें ‘रामशंकर’ कौन है, उस समय भीड़ में खड़ा रामशंकर अपने मन में अपना नाम भी नहीं लेता, उस समय तो उसे केवल कौतूहल होता है पर चूँकि उसके अवचेतन मस्तिष्क में यह बात रहती है कि मैं रामशंकर हूँ, उसी का बैल का वह अवयव पकड़ लेता है और उस व्यक्ति के पास जाकर बता देता है।

ऐसे खेल प्रायः सभी ने देखे होंगे। अभी तक इनको चमत्कार माना जाता है पर मनुष्य और जीव दोनों में इस तरह की ज्ञान शक्ति के आधार पर कुछ दिन में यह भी पता चल जायेगा कि आत्मा का अस्तित्व मनुष्य में ही नहीं अन्य प्राणियों में भी है। जिस दिन यह मान्यता लोगों के मस्तिष्क में उतर जायेगी, उस दिन पुनर्जन्म और कर्मफल के अनेक रहस्य भी मालूम होने लगेंगे और तब अब की तरह चोरी, छल कपट, धोखा, अपराध, अत्याचार करने वाले लोगों को मालूम होगा कि इनके कारण उन्हें दूसरी योनियों में रहकर किस तरह कष्ट उठाना पड़ा और देहासक्ति से अब किस तरह बचा जा सकता है। तब लोग बिना समझाए हुए भी शुभ्र और पवित्र जीवन के अभ्यास के लिये समुद्यत होंगे।

आत्मा की यह गुप्त इन्द्रियाँ सब के होती हैं, जैसा कि अमेरिका के डाक्टर मूज ने माना। अभी उसे जीवन के क्रिय-कलापों से संगति देना शेष है। थोड़े से मनुष्यों ने ही इनका ऐसा विकास किया है कि वे इनका सचेतन उपयोग कर सके। रूस की यह घटनायें उसी का उदाहरण हैं, भारतवर्ष में ऐसी घटनायें तो आये दिन स्थान स्थान पर घटित होती रहती हैं।

पाण्डिचेरी के चीफ जस्टिस श्री जंकालियट अन्ध-विश्वासी व्यक्ति नहीं थे, उनकी समालोचना शक्ति बहुत बढ़ी चढ़ी थी, जब पाल ब्रन्टन भारतवर्ष आये और यहाँ की गुप्त अध्यात्म विद्या पर एक पुस्तक लिखी तो उसकी भूमिका उन्होंने जंकालियट से लिखाई, उन्होंने लिखा है-

“मैं ऐसे कई साधुओं से मिला हूँ, जो मन की बात ऐसे बता देते हैं, जैसे वह उनकी ही बात हो। एक बार एक साधु ने मुझसे कुछ लिखकर अपने पास रखने को कहा, मैंने कुछ लिखा और उसे थैली में बन्द कर लिया, साधु ने ध्यान लगाया और एक कागज पर लिखकर दिया। उस पर लिखा था-एलबेन बूनियर, बोर्ग इन ब्रेस्सी (एन) में 3 जनवरी सन् 1856 में मरा था।” मैं यह देखकर आश्चर्यचकित रह गया कि मेरे प्रश्न का ठीक यही उत्तर था। नाम स्थान और तिथि इतने सही ढंग से बताया जायेगा, उसकी मैंने कल्पना ही न की थीं। अब मुझे ऐसा लगता है कि सचमुच कोई ऐसी नैसर्गिक शक्ति है, जिसने मेरे और साधु के बीच बातचीत का मार्ग स्थापित किया।”

कुछ दिन पूर्व अणुव्रत संघ के तत्त्वावधान में एक योग प्रदर्शन कार्यक्रम रखा गया था, उसमें अणुव्रत आन्दोलन के एक मुनि ने ऐसे चमत्कार दिखाये थे। तमाम देशों के राजदूत उसमें सम्मिलित थे। योगी ने अरब के राजदूत की धर्मपत्नी के बटुये में कितने नोट है, बताये थे।

मास्को न्यूज के 22 अगस्त अंक में ऐ बोल्दया देन्शिक नामक आठ वर्षीय बालिका का विवरण छपा हैं। यह बालिका अँधेरे में भी अपने ओठों से देख लेती है। अत्यन्त सूक्ष्म लिखे कागज के ऊपर पच्चीसों कागज ढक देने पर भी वह सब कुछ बता देती है कि नीचे वाले कागज में क्या लिखा है।

यह सब आश्चर्य सी दिखने वाली बातें आत्म विद्या की एक अरबों अंश सी छोटी किरण हैं। आत्मा की ज्ञान शक्ति अनन्त और अपार है, अपने शुद्ध और सनातन रूप में उसे जान लेने पर मनुष्य उसी तरह त्रिकालदर्शी हो जाता है, जैसे हमारे ऋषि थे।


अन्य जीवों को तुच्छ न समझें

जीव जन्तुओं और मानव में क्या सम्बन्ध है, यह एक बड़ा गम्भीर प्रश्न है। जिन लोगों ने आत्म तत्व को नहीं समझा है और सृष्टि रचना की प्रक्रिया से अनजान हैं, वे तो मनुष्य के सिवाय अन्य समस्त प्राणियों को अनात्म अथवा जड़ पदार्थों के तुल्य मानते है। यहूदी, ईसाई, मुसलमान आदि धर्मानुयायियों की विचार धारा ऐसी ही होती है और इसलिये वे पशु पक्षियों को मारने में कोई पाप कहाँ समझते। संसार के अधिकांश अन्य धर्मों की भी ऐसी हानि स्थित है। यह श्रेय केवल भारतीय धर्म को ही प्राप्त हैं कि उसने प्राचीनकाल से ही समस्त प्राणियों में एक ही आत्मा की स्थिति तथा एक छोटे से कीड़े को भी एक बराबर स्वीकार किया है। इसी तथ्य को हृदयंगम कराने के लिये गीताकार ने यहाँ तक कह दिया है कि ‘ज्ञानी व्यक्ति के लिये हाथी ओर चींटी तथा ब्राह्मण और चाँडाल एक समान हैं।’ आशय यही है कि यह समस्त विश्व एक ही आत्म तत्व का खेल है, इसमें किसी को छोटा बड़ा समझना भूल है।

यह ठीक है कि समस्त प्राणियों में मनुष्य ने ही बौद्धिक क्षेत्र में सर्वाधिक प्रगति की है और ज्ञान राज्य में प्रवेश करके वह सृष्टि के मूलतत्त्व को जान सकने में समर्थ हो गया है। इसी ज्ञान के बल पर उसने इस सिद्धान्त को भी खोज निकाला है कि यद्यपि एक आत्म तत्त्वदर्शी मनुष्य और हिरन, कुत्ता जैसे पशु अथवा मेंढक, चूहे जैसे छोटे जन्तु में बहुत अधिक अन्तर है पर आत्म तत्व दोनों में मौजूद है और इस समय मेढ़क में स्थित आत्मा किसी समय मनुष्य की योनि में भी पहुँच सकती है। इस प्रकार एक भारतीय शास्त्रों का ज्ञाता और उन पर आचरण करने वाला ही ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ के महान् सिद्धान्त की वास्तविकता को अनुभव कर सकता है।

जैसा हमने ऊपर कहा है निस्सन्देह बुद्धि और ज्ञान-शक्ति की दृष्टि से मनुष्य की अन्य जीव-जन्तुओं से कोई तुलना नहीं की जा सकती, फिर भी अनेक जीव जन्तुओं में ऐसी विशेषताएँ मिलती है, जिनकी समता कोई सामान्य दर्जे का मनुष्य नहीं कर सकता। उदाहरण के लिये कुत्ते की सूँघने की, गिद्ध की देखने की, शेर की उछलने की, मधु मक्खियों की सामूहिकता की शक्तियों का उदाहरण मनुष्य कभी उपस्थित नहीं कर सका। और भी अनेक जीवन आहार प्राप्त करने या आत्म रक्षा के लिये ऐसी ऐसी विधियों से काम लेते हैं, जो आश्चर्यजनक जान पड़ती हैं। साथ ही अनेक पशु समय समय पर ऐसी सूझबूझ का परिचय देते हैं, जिसे देखकर उनको कभी ‘जड़ पदार्थ’ की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। अनेक अन्वेषण करने वालों का तो यह कथन हैं कि मनुष्य ने कितनी ही बातों का ज्ञान जीव जन्तुओं से ही प्राप्त किया है।

बुनने वाली चिड़ियाँ -

बुनने के कार्य में कई तरह की चिड़ियों ने बड़ी उन्नति की है। हमारे देश में इसके लिये ‘दया’ पक्षी का घोंसला प्रसिद्ध है। वह घास के तिनकों को ऐसी कारीगरी से बुनती है कि उसका घोंसला एक दर्शनीय वस्तु बन जाता है। उसके भीतर न तो पानी जाता है और न कोई शत्रु साँप, बन्दर, कौआ आदि भीतर घुस कर अण्डों या बच्चों को कुछ हानि पहुँचा सकता है।

इससे मिलती जुलती एक चिड़िया अमेरिका में भी होती है, जो अपना घोंसला बड़ा सुन्दर बनाती है। कितने ही लोग इनकी कारीगरी देखने के लिये रंग तिरंगा ऊन उनके निवास स्थान के पास रख देते हैं। चिड़ियाँ इसी का प्रयोग अपने घोंसले पेड़ों में लटकते हुए दिखाई पड़ते हैं तो उनकी शोभा विचित्र दिखाई देती है। उनमें अनायास ही ऐसे अद्भुत और आकर्षक डिजाइन बन जाते है कि फिर स्त्रियाँ और पुरुष उनकी नकल करने लगते है। भारतवर्ष में एक ‘दर्जी चिड़िया’ भी पाई जाती है। यह अपने घोंसले को केवल बुनती ही नहीं वरन् लटकती हुई पत्तियों को घास का प्रयोग करके इस प्रकार सी देती है, जैसे ही फीतों के बीच कोई झूला (हिंडोला) लटक रहा हो। इसी लटकते हुए ‘कटोरे’ के बीच उसका घोंसला टिका रहता है।

बिजली उत्पन्न करने वाली मछलियाँ-

कई प्रकार की मछलियों ने अपने शरीर में बिजली के बैटरीनुमा अंग विकसित करके उनके द्वारा आत्म रक्षा और आहार संग्रह की विधि निकाली है। अमेरिका की अमेजन नदी में पाई जाने वाली ‘एल’ मछली की पूँछ बहुत बड़ी होती है। उसमें बिजली की बैटरी के तीन समूह होते हैं। इसके द्वारा यह मछली कई सौ वोल्टेज की ताकत का धक्का मार सकती है, जिससे कभी कभी घोड़े और मनुष्य भी गिर कर पानी में डूब जाते हैं। इस बिजली का प्रयोग वह सम्वाद प्रेषक तार के रूप में भी करती है। क्योंकि जैसे ही एक मछली किसी शिकार पर आघात करती है, वैसे ही उसके सभी दूरवर्ती साथियों को उसका पता लग जाता है और दौड़ कर उसी स्थान पर आ जाती हैं।

अरब समुद्र और नील नदी में ‘कैट फिश’ बिल्ली-मछली नाम की एक भारी और दो फीट के लगभग लम्बी मछली होती है, जिसका रंग पीला होता है और उस पर भूरे धब्बे पड़े होते हैं। इसका सारा शरीर एक लिफाफे की तरह बिजली के अंग से ढका रहता है। इसमें भी काफी शक्ति होती है और प्रायः आपस में लड़कर एक दूसरे पर विद्युत-शक्ति द्वारा आघात पहुँचाया करती है।

एक और मछली ‘टारपेडो’ नाम की होती है, जिसमें हल्की विद्युत शक्ति होती है और जो काफी संख्या में सारे गरम समुद्रों में पाई जाती हैं। यह कोमल मछलियों को बिजली का धक्का देकर पकड़ लेती है। पुराने जमाने में हकीम लोग इससे गठिया रोग का इलाज करने का काम लेते थे। इसके लिये रोगी को मछली के ऊपर तब तक खड़ा रहना पड़ता था, जब तक के लिये चिकित्सक आज्ञा देता था या रोगी बिजली के झटके को सहन कर सकता था।

सुरंग खोदने वाले जीवः-

मानव इतिहास में सुरंगों का भी बड़ा महत्व है। शत्रुओं से बचने अथवा बहुमूल्य वस्तुओं के भण्डार आदि को गुप्त रखने के लिये पुराने जमाने में सुरंगें खोदी जाती थीं। भारत के कितने ही प्राचीन किलों में सुरंगें देखने में आती हैं, जिनके भीतर अब भय के कारण कोई नहीं घुसता। इससे उनके विषय में तरह तरह के किस्से सुनने में आते रहते हैं। पर इनमें से अधिकांश किसी घेरे या आक्रमण के समय बाहर निकलने के गुप्त मार्ग के रूप में ही प्रयुक्त होती थीं।

इन सुरंगों को बनाने का विचार सम्भवतः मनुष्यों ने जीव जन्तुओं से ही ग्रहण किया है, क्योंकि वे आत्मरक्षा अथवा आहार की खोज में सुरंगें बनाया करते हैं।

सुरंग बनाने वाले कीड़ों में केंचुआ बहुत प्रसिद्ध है। वह अपने एक सिरे से भूमि में प्रवेश करता हैं और जो कुछ मिलता है, उसे निगल कर दूसरे सिरे से मिट्टी के रूप में ही बाहर फेंकता जाता है। इस प्रकार के अपना निर्वाह करते हैं और साथ ही नीचे की मिट्टी को ऊपर लाकर छोटे पेड़-पौधों की वृद्धि में भी सहायक होते हैं। कहते हैं कि इस प्रकार केंचुए किसी बगीचे की एक एकड़ भूमि की 400 मन मिट्टी को एक वर्ष के भीतर नीचे से ऊपर ले आते हैं। और भी कितने ही छोटे कीड़े इसी प्रकार धरती में छेद करके नीचे की मिट्टी को ऊपर लाया करते हैं।

इन कीड़ों के अतिरिक्त नेवला, चूहे, छछूँदर, झींगुर और स्याही, स्यार आदि जंगली पशु भी सुरंग खोदते रहते हैं। इन सब प्राणियों का शरीर लम्बाई में अधिक होता है, जिससे उन्हें खोदने के काम में सहायता मिलती हैं। अफ्रीका का चींटी खाने वाला रीछ तो अपने पैरों से सुरंग बनाने में इतनी तेजी से मिट्टी काटता है, जितना कि दो मजदूर फावड़ा या गैंती लेकर भी नहीं काट सकते।

जानवरों का स्वभाव और स्मरण शक्तिः-

जीव जन्तु एक प्रकार के जड़ पदार्थ हैं, इस मान्यता का खण्डन उन अनेक पशुओं की बुद्धिमानी से होता है, जो वे समय-समय पर प्रकट करते हैं। कुत्तों की स्वामीभक्ति और चोरों का पीछा करके गाढ़े हुए धन का पता लगा आना और फिर स्वामी को वहाँ ले जाना आदि घटनाओं के सच्चे किस्से आमतौर से प्रसिद्ध हैं। बन्दर भी अपने किसी साथी को बचाने के लिये बहुत समझदारी का परिचय दिया करते हैं। कहते हैं कि एक बन्दर का बच्चा कुएँ में गिर गया तो कई बन्दर एक दूसरे के पैर पकड़ कर कुएँ में लटक गये और बच्चा उन पर चढ़ कर बाहर आ गया। घोड़ों की बुद्धिमानी और स्वामि-भक्ति की कथाएँ भी प्रसिद्ध है। जब एक सेनाध्यक्ष बहुत घायल होकर रणक्षेत्र में गिर गया तो उसका घोड़ा उसके कमरबन्द को मुँह में पकड़कर घर तक उठा लाया जो दस पन्द्रह मील दूर था।

भिन्न-भिन्न जाति के पशुओं में पारस्परिक प्रेम के समाचार प्रायः सामयिक पत्रों में छपा करते हैं, जिनसे सिद्ध होता है कि उनमें प्रेम की भावना और एक दूसरे के प्रति सहानुभूति भी होती है। एक विलायती अख़बार में एक मेमना तथा नर बतख की दोस्ती का वर्णन छपा था, जो कभी अलग नहीं होते थे। इसी तरह एक बिल्ली तथा डौमकौवे में घनिष्ठता मित्रता हो गई थी कौआ अपनी शरारती आदत के अनुसार सोने की इच्छुक बिल्ली की पूँछ मोड़कर जगा देता था। तब थोड़ी देर के लिये दोनों में खट- पट भी हो जाती थी।

स्मरण शक्ति और बदला लेने की घटनाओं से भी पशुओं के मानसिक विकास का कुछ पता चलता है। कुछ वर्ष पहले अखबारों में एक हाथी की घटना इस प्रकार छपी थी-

“धुवरी राज्य में एक हाथी को खीला सूत्रधार नामक महावत ने पीटा था। इसके कुछ समय बाद खीला ने अन्यत्र नौकरी कर ली और वह एक नये हाथी का महावत बनाया गया। कई वर्ष बाद संयोग से लीला का नया हाथी और वह हाथी जिसे उसने पीटा था, काम पर से साथ साथ वापिस आ रहे थे। दोनों महावत परस्पर परिचित थे और मार्ग में उनमें से एक ने हाथी को दी। उसी समय मौका देखकर पीटे गये हाथी ने एकाएक सूंड उठाकर खीला को नीचे खींच लिया और महावत द्वारा बहुत रोके जाने पर भी तुरन्त ही उसे कुचल कर मार डाला।”

कानपुर में चैतू नामक गड़रिया ने किसी बात पर एक गाय को बहुत मारा। गाय ने इस घटना को स्मरण रखा और कई महीने बाद जब उसे अवसर मिला उसने चैतू को गिराकर सींगों से खूब मारा।

इन सब बातों से सिद्ध होता है कि चाहे पशुओं का मानसिक और बौद्धिक विकास बहुत ही कम हुआ हो, पर फिर भी उनमें प्रेम, सहानुभूति, कृतज्ञता, स्वामि-भक्ति आदि गुण पाये जाते हैं और कितने ही पशु समय-समय पर बुद्धिमानी का प्रमाण भी देते हैं। ये सब बातें किसी चैतन्य-तत्व के अभाव में सम्भव नहीं हो सकतीं। इसलिये पशुओं को जड़ अथवा मनुष्यों का भक्ष्य समझ लेना एक बड़ी भूल है। वरन् एक मनुष्य को चौंका देने वाला सच्चा दृष्टिकोण तो वह हैं कि मानसिक विकास में पिछड़े होने के कारण ये जीव जन्तु मानव के ‘छोटे भाई’ हैं, जिनके साथ उसे सहृदयता और सहानुभूति का व्यवहार करना चाहिये। इस प्रकार के व्यवहार का अन्तर ही भौतिक-विज्ञान और अध्यात्मवादी दृष्टिकोण के भेद को सही रूप में प्रकट कर सकता है।


बंदरिया की ममता

इटावा- कुछ दिन पूर्व ही एक बंदरिया ने एक बच्चे को जन्म दिया था, किन्तु दैवयोग से वह थोड़ी देर बाद ही मर गया। इससे बंदरिया बहुत दुःखी थी। वह कातर स्वर से बच्चे को पुकारती हुई छत पर घूमती रहती थी। एक दिन स्थानीय सावितगंज मुहल्ले में उसकी नजर एक नवजात पिल्ले पर पड़ी। उसने चार दिवसीय पिल्ले को अपना बच्चा समझ कर उठा लिया। कुतिया के भयंकर प्रतिरोध के बावजूद भी बंदरिया पिल्ले को छत पर ले गई और दुलार करने लगी। सहस्रों व्यक्तियों ने इस दृश्य को देखा। बंदरिया पिल्ले को लेकर अन्यत्र चली गई।


नये युग के तीन आधार-सत्य साम्य और ऐक्य

नये युग के नये निर्माण का जो दैवी प्रयास चल रहा है, उसके तीन आधार हैं। प्रथम सत्य, द्वितीय साम्य, तृतीय ऐक्य। इन तीन आधारों को लेकर ही उस नई दुनियाँ का सृजन होगा, जिसमें हर व्यक्ति को-हर प्राणी को-ईश्वर प्रदत्त सुविधाओं और अधिकारों का निर्बाध उपयोग करने का अवसर मिलेगा। यह विश्व परमात्मा की पवित्र प्रतिकृति है। यहाँ आनन्द, सौंदर्य और उल्लास के असीम साधन विद्यमान् हैं। स्वर्ग की कल्पना उन्हीं परिस्थितियों पर लागू होती हैं, जिनमें समाज का निर्माण उपरोक्त तीन आधारों पर- सत्य, साम्य और ऐक्य के आदर्शों पर किया गया होता है। चिर अतीत में ऐसी परिस्थितियों लाखों करोड़ों वर्षों तक रही हैं, जब इस संसार में स्वर्गीय वातावरण बना रहा, हर किसी ने संतोष और आनन्द का परिपूर्ण अनुभव किया। ऐसा काल ‘सत युग’ कहलाता है।

सतयुग और कुछ नहीं मानवीय आस्थाओं में, मान्यताओं में, गतिविधियों में, आदर्शवादिता और उत्कृष्टता के समुचित समावेश की प्रतिक्रिया मात्र है। समाज का निर्माण उच्च आदर्शों पर आधारित होगा और व्यक्ति अपनी मानवीय उत्कृष्टता का गौरव अनुभव करते हुए तद्नुरूप सदाचरण करेगा तो इस संसार में सुख-शान्ति की अजस्र धारा बहती ही रहेगी। अभाव, कष्ट, क्लेश, संघर्ष, द्वेष, दुर्भाव और शोक संताप का तब कोई कारण ही शेष न रहेगा।

वर्तमान की समस्त विकृतियाँ मानवीय आदर्शों का स्तर गिर जाने से उत्पन्न हुई है। असत्य, वैषम्य और संकीर्ण स्वार्थ परता की अभिवृद्धि ने संसार में अगणित प्रकार की उलझनें एवं समस्यायें उत्पन्न की हैं। अपने चारों ओर जिन कुत्साओं और कुण्ठाओं का घटाटोप छाया हुआ हम देखते हैं, उनके पीछे मानवीय दुर्बुद्धियों और दुष्प्रवृत्तियों का ही खेल है। आधार जब तक विद्यमान् है, तब तक सुधार की आशा किस प्रकार की जाय? शरीर में विष भरा रहे तो रोगों से छुटकारा कैसे मिले? आग को हाथ में लेकर जलने से बचाव कैसे हो?

असत्य, असंयम, अन्याय, अविवेक और असंतोष के पाँच असुरों ने इस संसार में विविध विधि कष्ट क्लेशों से भरी अवांछनीय परिस्थितियों का सृजन किया है। लोग कष्टों को देखते हैं, उनके कारणों को नहीं। कष्ट दूर करना चाहते हैं पर कारणों को बनाये रखना चाहते हैं। इसलिये बहुत माथा पच्ची करने पर भी कुछ आशाजनक परिणाम नहीं निकलता, व्यक्ति व समाज को सुखी बनाने के लिये विभिन्न क्षेत्रों से, विभिन्न स्तरों पर विभिन्न आकार प्रकार के प्रयत्न चल रहे हैं। समझा जाता है कि शिक्षा एवं सम्पत्ति की कमी में हमें कष्ट सहने पड़ रहे हैं, इसलिये ऐसे उपाय करने चाहिये, जिनसे अधिक शिक्षा और अधिक आजीविका मिले। यह दो लाभ मिलते ही समस्याओं का समाधान हो जायेगा। यह मान्यता एक छोटी सीमा तक ही सही है। शिक्षा और आजीविका की उपयोगिता से इनकार नहीं किया जा सकता पर थोड़ा गम्भीरता से सोचने पर यह भी सहज ही प्रतीत हो जाता हैं कि इन साधनों के अभाव ने संसार में फैली हुई अगणित समस्याओं को जन्म नहीं दिया वरन् वास्तविक कारण कुछ दूसरे ही हैं।

गरीबी का असर स्वस्थ पर और शिक्षा का असर व्यवहार पर हो सकता है। दुष्टताओं का जन्म तो अन्तः करण में जमी हुई दुर्बुद्धि ही करती है। अनेकों व्यक्ति गरीबी में रहते ईमानदार रहे हैं। साधु और ब्राह्मण तो जानबूझ कर गरीबी का व्रत लेते थे और सिद्ध करते थे कि आर्थिक अभावों ने उनके चरित्र एवं भाव-स्तर पर कोई बुरा प्रभाव नहीं डाला। इसी प्रकार साक्षरता का अभाव रहने पर भी पर्वतीय प्रदेशों में व्यक्ति अभी भी अधिक नैतिक और संतुलित पाये जाते हैं। इसके विपरीत उच्च शिक्षितों में और सम्पन्न लोगों में चरित्र का अधिक अभाव पाया जाता है। लोग अपनी शिक्षा और सम्पन्नता का दुरुपयोग करके समाज का इतनी अधिक क्षति पहुँचाते देखे लगे हैं, जितनी बेचारे निर्धन और अशिक्षित लाख प्रयत्न करने पर भी नहीं पहुँचा सकते हैं।

उद्धत, असंतुष्ट, पथ-भ्रष्ट रुग्ण और असंतुलित लोगों की गणना की जाय तो उसमें भी शिक्षितों और सम्पन्नों की ही संख्या अधिक होगी। इन तथ्यों पर विचार करने से उसी निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि अशिक्षा और निर्धनता कष्ट-कारक और निवारणीय तो हैं पर उन्हें समाज और व्यक्ति की अत्यधिक समस्या, ग्रस्त बना देने का दोषी नहीं माना जा सकता है। पैर में जूता न होना ठीक नहीं, जूते की आवश्यकता है ओर उस आवश्यकता को पूरा करना चाहिये पर यह कहना ठीक नहीं, हमारे शत्रु अधिक हैं उसका कारण जूते का न होना है। शत्रु अधिक होने का कारण हमारे व्यवहार एवं स्वभाव की त्रुटियाँ ही हो सकती हैं। जूता न होने से पैर में काँटा लग जाने, सर्दी-जुकाम हो जाने जैसी कठिनाई उत्पन्न होती तो समझ में आती है, पर शत्रुओं का बढ़ना नहीं। इसी प्रकार शिक्षा और गरीबी की कमी से उत्पन्न कठिनाइयों को समझा जा सकता है और उनके दूर करने में समान रूप से सहमत रहा जा सकता है। पर यह कहना ठीक नहीं कि इन्हीं दो कारणों से वातावरण को क्षुब्ध बनाये हुए, जो अगणित समस्यायें हानिकारक परिस्थितियाँ उत्पन्न किए सामने खड़ी हैं- वें उत्पन्न हुई। वस्तुतः मानव समाज का भावनात्मक स्तर, चरित्र बल गिर जाना ही इन उलझनों का कारण है, जो दिन दिन बढ़ती हुई, सुविधाओं के बावजूद संसार को नरक बनाती चली जा रही है।

नव युग निर्माण का आधार भौतिक नहीं आध्यात्मिक ही हो सकता है। भौतिक उन्नति की जाय सो ठीक है। उसकी आवश्यकता है और उपयोगिता भी। समृद्धि बढ़े इसमें किसी को क्या ऐतराज हो सकता है। पर यह आशा करना अनुचित है कि शिक्षा समृद्धि एवं अन्यान्य सुविधा साधनों की बढ़ोत्तरी उन समस्याओं को हल कर देगी, जिनका मूल उद्गम हमारी चारित्रिक और भावनात्मक दुर्बलता ही है। नवयुग के सृजन का आधार आध्यात्मिक ही होगा। भावनात्मक नव निर्माण द्वारा ही बाह्य परिस्थितियों में सुधार एवं संतुलन उत्पन्न हो सकता है।

सत्य, साम्य और ऐक्य यही तीन अध्यात्म के आधार हैं। सारा तत्व ज्ञान और उपासनात्मक क्रिया कलाप उन तीन महा-सत्यों के प्रतिपादन के लिये विनिर्मित हुआ है। धर्म ग्रन्थों का समस्त कलेवर विभिन्न आधार लेकर इन्हीं तथ्यों के इर्द गिर्द परिक्रमा करता है। आस्तिकता और उपासना का चरम लक्ष्य किसी मनुष्य आकृति या प्रकृति के देवता विशेष भगवान के साथ रिश्तेदारी या आदान प्रदान की प्रक्रिया जोड़ना नहीं वरन् अन्तःकरण के गहन मर्म स्थलों में सत्य, साम्य और ऐक्य के महान् सत्यों में प्रगाढ़ निष्ठा उत्पन्न करना है। शास्त्र विवेचन का यही निष्कर्ष है।

ऋषियों की गतिविधियों और विचारणाओं की समीक्षा करने पर भी इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है। अस्तु युग निर्माण योजना के उद्देश्यों एवं प्रयोजनों को देखते हुए उसे धर्म एवं अध्यात्म के पुनरुत्थान का एक अभिनव सत्प्रयत्न भी कहा जा सकता है।

ऋषियों की गतिविधियों और विचारणाओं की समीक्षा करने पर भी इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है। अस्तु युग निर्माण योजना के उद्देश्यों एवं प्रयोजनों को देखते हुए उसे धर्म एवं अध्यात्म के पुनरुत्थान का एक अभिनव सत्प्रयत्न भी कहा जा सकता है।


Quotation

दूसरे को उपदेश देने के बजाय अगर कोई उस समय ईश्वर की आराधना करे तो यही पर्याप्त उपदेश है। जो अपने को स्वतन्त्र करने का प्रयास करता है वही सच्चा उपदेशक है।

-रामकृष्ण,


अपनी मानसिक शांति इस तरह बर्बाद न करें

अपने को दीन-हीन और दुःखी मानकर रोते रहना, दिन रात चिन्ता करते रहना अनाध्यात्मिक वृक्षि है। मानवता का अपमान और आत्मा का तिरस्कार है। जिस मनुष्य को आत्मा जैसा प्रसाद मिला हो, बुद्धि और विवेक जैसा पुरस्कार मिला हो, क्षमताओं और विशेषताओं से भरा सुन्दर सुगढ़ शरीर मिला हो वह मनुष्य दीन-हीन कैसे हो सकता हैं। दीनता हीनता का अनुभव करना मनुष्य की अपनी मानसिक न्यूनता के सिवाय और कुछ नहीं है।

अपने को दीन हीन मानकर चलने वाले प्रायः जान या अनजान में नास्तिकता के अन्धकार की ओर बढ़ जाते हैं। निराश, चिन्तित, और अप्रसन्न रहना स्वयं ही एक नास्तिकता है। आस्तिक व्यक्ति हर दशा और हर स्थिति में प्रसन्न, संतुष्ट और उल्लसित रहते हैं। वे जानते हैं कि दीन हीन और मलीन रहने से आत्मा का तेज नष्ट होता है। उसका विश्वास उठ जाता है, जो एक प्रकार से आत्महत्या की है। आत्महत्या जैसा निकृष्ट तथा पापपूर्ण कार्य सिवाय और कौन करेगा। अपनी स्थिति में संतुष्ट और प्रसन्न रहने का आस्तिक -भाव रखने वाले सोचते हैं कि परमात्मा जो कुछ करता हैं, अच्छा ही करता उसके दिए दुःख-सुख में मनुष्य का कल्याण ही निहित रहता हैं। उसका कोई भी कार्य प्रयोजन अथवा मन्तव्य से रहित नहीं होता। प्रसन्न चेता व्यक्ति की परिष्कृत विचार -धारा इसी प्रकार चलती है।

वह सोचता है कि हो सकता है, हमें गरीबी देकर परमात्मा हमारे धैर्य और संतोष की परीक्षा ले रहा हो। सकता है वह हमारे पूर्व फलों को शीघ्रता से भुगता रहा हो। हो सकता है कि हमारे लिये वह धन-सम्पत्ति की प्रचुरता को अहितकर समझता हो। हो सकता है कि मैं निरभिमान और निरहंकार रहूँ भुक्त-भोगी होकर गरीबों की पीड़ा जानने का ज्ञान प्राप्त कर सकूँ और उनकी सेवा सहायता और संवेदना का पावन भाव प्राप्त कर सकूँ। हो सकता है, उसने अधिकाधिक परिश्रमी, पुरुषार्थी, कर्मठ और सहनशील बनने के लिये यह गरीबी और यह अभाव दिया हो।

अपनी स्थिति के विषय में इस प्रकार की आस्तिकता एवं आध्यात्मिक विचार-धारा रखने वाले कभी दुःखी नहीं होते। उनका आत्म-विश्वास बढ़ता ही जाता है। वे अधिकाधिक परिश्रमी, दयालु और उदार बन जाते है। प्रतिकूल अथवा विषम परिस्थितियाँ निश्चय ही उन्हें दीन-हीन नहीं बना पाती। ऐसे दृढ़ आत्म एवं परमात्म-विश्वासी जीवन की कठिन से कठिन परीक्षा में उत्तीर्ण होकर एक दिन अवश्य ही सुख-सौख्य के अधिकारी बनते हैं। परमात्मा की कृपा पाते और आत्मा के प्रकाश से चमत्कृत होते हैं।

नास्तिक भाव से अपनी परिस्थितियों का रोना रोते रहने वालों का कभी उद्धार नहीं होता। उसके अनेक मोटे-मोटे कारण हैं। एक तो यह कि अपने मन, मस्तिष्क को परिस्थितियों की प्रतिकूलता को समर्पित कर उसकी चिन्ता करते रहने से सारी मानसिक क्षमताओं का क्षय हो जायेगा। मनुष्य निर्बल और निकम्मा बन जायेगा। चिन्ता से निराशा का जन्म होगा। निराशा तो अन्धकार होती ही है। अँधेरे में अटकते-भटकते रहने वाले व्यक्ति आज तक न उठ पाये हैं और न आगे उठ पायेंगे॥

मनोवैज्ञानिक तथ्य हैं कि मनुष्य के अपने भावों और विचारों के अनुसार ही उसके आस-पास का वातावरण निर्मित होता है। अप्रसन्न भावों वाला व्यक्ति जहाँ जायेगा अपने लिये अप्रसन्नता ही पायेगा। निराश विचारों के साथ विचरण करने वाले निराशा के सिवाय कुछ भी संचय नहीं कर सकते। अन्तर के भाव मनुष्य के मुख, वाणी और क्रियाओं में प्रकट होते रहते हैं। चिन्तित और निराश रहने वाले लोगों के मुख पर उदासी, वाणी में अनाकर्षण और क्रियाओं में अस्तव्यस्तता समाई रहती है। ऐसे मलीन और अर्धविक्षिप्त व्यक्ति से न तो कोई संपर्क करना पसन्द करता है और न सहयोग। उसके किये सभी ओर नापसन्दगी का वातावरण बना रहता है। ऐसे बहिष्कृत व्यक्ति को अपने उद्धार की ओर से निराश ही रहना पड़ेगा।

अपने अभावों और विषमताओं पर रोते रहने के अभ्यासी लोगों का अपने पर से ही नहीं परमात्मा पर से भी विश्वास उठ जाता है। वह सोचता है कि परमात्मा बड़ा अन्यायी और क्रूर है। उसने हमें यह परिस्थिति देकर अन्याय किया है। उसने हमारे भाग्य में दरिद्रता और दैन्य लिखकर अपनी क्रूरता का परिचय दिया है। ऐसे निर्दयी और अन्यायी परमात्मा पर विश्वास करना उसकी पूजा, उपासना करना व्यर्थ है। ऐसे अन्यायी और क्रूर परमात्मा का तो बहिष्कार हो जाना चाहिये। हीन-मना व्यक्ति इस प्रकार निराश होकर जीवन का एक बहुत बड़ा सम्बल और धैर्य का एक बहुत बड़ा आधार खो देता है। वह नास्तिक बनकर परमात्मा का विरोधी बन जाता है। ऐसा करके वह उस सर्वशक्तिमान का तो कुछ बिगाड़ नहीं पाता, केवल अपना ही आत्मिक विनाश कर लेता है। ऐसे परमात्मा के विरोधी नास्तिक व्यक्ति की आत्मा उसे छोड़ देती है और फिर किसी भी आपत्ति अथवा अंधकार में उसे प्रकाश की एक किरण भी नहीं देती।

यही क्यों, इस प्रकार का निराश नास्तिक अपनी और भी बहुत सी हानियाँ कर लेता है। एक तो अपनी स्थिति का दोष परमात्मा पर मढ़ने से उसकी प्रवृत्ति पुरुषार्थ की ओर नहीं होती। वह पड़ा-पड़ा भाग्य अथवा भाग्य-निर्माता को कोसता रहता है और यदि कुछ करता भी है तो असफलता और निराशा के भाव से। निदान उसके कर्तव्य में न तो दक्षता आ पाती है और न सार्थकता। सारा किया कराया व्यर्थ चला जाता है। इस प्रकार या तो ऐसा निराश नास्तिक निकम्मा बन जाता है अथवा प्रतिक्रिया से प्रेरित होकर भयानक रूप से, धन के लिये अनुचित एवं अनैतिक मार्गों का अवलम्बन कर लेता है। निर्धनता से आघातित होकर धन के लिये नर से नर-पिशाच बन जाता है। ठगी, मक्कारी, शोषण ही नहीं उसे चोरी, लूट और हत्याएँ करने में भी संकोच नहीं रहता। आत्मा और परमात्मा से बहिष्कृत व्यक्ति की यह दशा हो जाना निश्चय ही मानना चाहिये।

संसार में धन आवश्यक तो है किन्तु स्पृहणीय कदापि नहीं। धन में स्पृहा उत्पन्न होने के दो कारण है। एक लोभ और दूसरा ईर्ष्या, लोभ की तो कोई सीमा होती ही नहीं। सौ बढ़कर वह हजार पर पहुँच जाता है, हजार से लाख पर और लाख से करोड़ों पर जा पहुँचता है। इस वृत्ति में न तो विराम होता है और न पर्याप्तता। लोभ ग्रसित व्यक्ति को यदि संसार का सारा धन वैभव दे दिया जाय तो भी वह सन्तुष्ट नहीं होगा। उसे कमी ही दिखती रहेगी। लोभ में प्रसार का एक और भी बड़ा दोष होता है। इसको जितना सन्तुष्ट किया जाता हैं, यह उतना ही बढ़ता जाता है और अन्त में लोभी को आमूल नष्ट करके ही ठंडा पड़ता है।

ईर्ष्यालु व्यक्ति भी जीवन में संतोष से वंचित रहता है। ईर्ष्यालु व्यक्ति के पास यदि पर्याप्त साधन होते भी है, तब भी दूसरों के प्रति ईर्ष्या और स्पर्धा के कारण उसे वे कम ही मालूम होते है। वह जब भी किसी दूसरे की स्थिति अपने से अच्छी देखता है, तभी अपने को गरीब, दीन-हीन अनुभव करने लगता है। यही नहीं यदि वह किसी को नीचे से ऊपर उठते देखता हैं, तब भी जलने लगता है और सोच उठता है कि यदि वह अवसर जो अमुक व्यक्ति को मिल रहे हैं, मुझे मिल जाते तो बड़ा अच्छा होता। ऐसे अभागे व्यक्ति जीवन में स्थायी शोक-संतापों के सिवाय और क्या पा सकते है? यदि धन की तृष्णा और उसके दोषों से बचना हो तो लोभ और ईर्ष्या के पिशाच से अपने को मुक्त करना ही होगा।

अपने को दीन-हीन मानकर असन्तुष्ट, निराश और चिन्तित रहने का कोई कारण मनुष्य के पास नहीं है, सिवाय इसके कि यह उसकी अपनी मनो हीनता ही होती है। मनुष्य परमात्मा का अंश आत्मवान् प्राणी है। उसके भीतर शक्तियों, क्षमताओं और आनन्दों का भण्डार भरा हुआ है। आनन्द, सुख, सन्तोष और सम्पन्नता, धन, वैभव, सम्पत्ति और सम्पदा जैसे बाह्य उपादानों में नहीं है। वे तो मनुष्य की आत्मा में निवास करने वाले दैवी-भाव है। यदि इनका निवास बाह्य साधनों में होता तो संसार के हर धनवान् और सम्पत्तिशाली व्यक्ति को सुखी संतुष्ट और आनन्दित होना चाहिये। जबकि ऐसा होता कदापि नहीं। वे भी गरीबों और अभाव ग्रस्तों की तरह ही दुःखी और निरानन्द देखे जाते हैं।

सुख, संतोष और सम्पन्नता का निवास आत्मा में है। इनके लिये मनुष्य को आत्मविमुख ही होना चाहिये। जो अपने अन्दर जाकर आत्मा में खोजेगा, वह आनन्द अवश्य पायेगा, इसमें सन्देह नहीं। संसार में सबसे अधिक सुखी सन्तुष्ट और आनन्दित रहने वाले ऋषि-मुनि शायद साधनों के नाम पर सबसे ज्यादा गरीब रहते थे। वृक्ष की सूखी डालों और पत्तों से बनी कुटी, पत्तों और छालों के चीवर और कन्द मूल, फल फूलों का भोजन बस इसके सिवाय उनके पास कौन से रत्न, रेशम अथवा व्यंजन होते थे। तब भी वे कितने तुष्ट, सुखी और सम्पन्न रहते थे। इसका एकमात्र कारण यही था कि वे बाह्य वैभव में उसकी स्पृहा नहीं करते थे, वे अपने आनन्द को उसी आत्मा में खोजते और पाते थे, जिसमें उसका वास्तविक निवास होता है।

जो मनुष्य आज मनुष्य रूप में स्थित है, उसने पहले चौरासी लाख निकृष्ट योनियों की दयनीयता का भोग किया है। तरह-तरह के ऐसे त्रास पाते हैं, जिनको दूर करने का न तो उसके पास उपाय था और न अधिकार। उन चौरासी लाख भोग योनियों का बंदीगृह काटकर इस कर्म-योनि में, जिसमें वह अपना भाग्य ही आप नहीं बना सकता, बल्कि आनन्द कंद सच्चिदानन्द परमात्मा को पा सकता है, आकर अपने को दीन-हीन माने तो इसे आश्चर्य ही माना जायेगा।

इतना ही क्यों, यदि इस आध्यात्मिक तथ्य को छोड़ दे तब भी तो मनुष्य के लिये अपनी स्थिति से दुःखी और असन्तुष्ट होने का कोई कारण नहीं है। जो अपनी स्थिति में दुःखी हो रहा है, उसे सोचना चाहिये कि क्या उसकी स्थिति संसार में सबसे गई-गुजरी है? क्या उस जैसी अथवा उससे खराब स्थिति में और कोई नहीं है? यदि ऐसा हो तब तो एक बार माना जा सकता है कि उसका खेद करना ठीक है। किन्तु ऐसा होता कदापि नहीं। यह असम्भव है।

संसार में एक से एक बढ़कर धनवान् और एक से एक बढ़कर गरीब और अभाव ग्रस्त पड़े है। अपनी स्थिति पर असंतुष्ट रहकर रोने से पहले मनुष्य को अपने से गये बीते और गरीब लोगों की ओर देखना चाहिये। उसे संतोष करना चाहिये और उस परमपिता परमात्मा को शतशः धन्यवाद देना चाहिये कि यदि उसने सौ से गिरी स्थिति मुझे दी है तो हजारों से अच्छा भी बनाया। संसार में एक से एक भयानक स्थितियाँ हो सकती हैं, जिनमें मनुष्य का एक क्षण जीवित रहना कठिन हो जाय, परमात्मा का आभार मानना चाहिये कि उसने आपको उस भयावह, असहनीय और घातक स्थिति में न रखकर ऐसी स्थिति में रखा हैं, जिसमें आप अपने पर विचार कर पा रहे है, गलत सही किन्तु परमात्मा को कोस पा रहे है। यह कम नहीं है कि आप अभी उस स्थिति में हैं, जिसमें आपकी चेतना, आपके विचार और आपकी अनुभव शक्ति सुरक्षित है अन्यथा संसार में ऐसी स्थितियाँ भी है, जो पागल, विक्षिप्त, पंगु, गूँगे, अपाहिज और शून्य कही जाती है। अपनी स्थिति पर सन्तोष करिये, आगे बढ़ने के लिये पुरुषार्थ करिये और परमात्मा को धन्यवाद दीजिये कि उसने आपको मनुष्य बनाकर बड़ा भारी अनुग्रह किया है।


शील का अभ्यास

एक बार भगवान् बुद्ध के दर्शन के लिए अनेक भिक्षु अपने गुरु के साथ आये। वे आते समय बड़ा शोर-गुल कर रहे थे। भगवान् बुद्ध ने उनके गुरु को खबर भेजी कि वे उन्हें शील का अभ्यास ठीक से करायें, फिर उन्हें लायें। इनके गुरु वर्ष भर इनसे शील का अभ्यास कराया। जब ये भिक्षु भगवान बुद्ध के पास आये तब भगवान् चुपचाप शांत भाव से बैठ गये। भिक्षु लोग उनके सामने नियमानुसार बैठते गये। वे रात्रि भर बैठे रहे। आनन्द भगवान् बुद्ध को बार-बार उन भिक्षुओं के बैठे रहने की खबर देता परन्तु भगवान् कुछ न बोलते। सवेरा होने पर देखा गया कि सभी भिक्षु भगवान् बुद्ध के समान ही समाधिस्थ है।


उपवास-शरीर शोधन की महत्त्वपूर्ण प्रणाली

संसार में अनेकों प्रकार की चिकित्सा पद्धतियाँ हैं। दो सौ वर्ष पूर्व हमारे देशवासी वैद्यक और हकीमी-दो चिकित्सा प्रणालियों का ही नाम सुनते थे। अंग्रेजी का शासन स्थापित हो जाने पर डाक्टरी (एलोपैथी) का नाम भी प्रसिद्ध हो गया। उसके पश्चात् होम्योपैथी, बायोकैमी, क्रोमोपैथी (रंग चिकित्सा), विद्युत चिकित्सा, जल चिकित्सा, मूत्र चिकित्सा आदि एक के बाद एक नई चिकित्सा पद्धतियाँ सामने आने लगीं। यद्यपि अभी तक उल्लेखनीय सफलता आरम्भिक तीन को छोड़कर और किसी को मिली हो ऐसा नहीं जान पड़ता।

पर इन पचासों पद्धतियों के निकल आने और विज्ञान की सहायता से शल्य-चिकित्सा (सर्जरी) और इञ्जेक्शन (सूची चिकित्सा) में क्रान्ति हो जाने पर भी रोगों की वृद्धि नहीं रुक रही है। सम्भवतः पिछले पचास-साठ वर्षों में डाक्टरों की संख्या दस गुनी बढ़ चुकी है और औषधियों की बिक्री सौगुनी हो गई है तो भी डाक्टरों की दुकानें और सार्वजनिक अस्पताल रोगियों से भरे रहते हैं और उनकी संख्या दिन पर दिन बढ़ती ही जाती है। अन्त में किसी कवि की यही उक्ति याद आती है कि ‘मर्ज बढ़ता ही गया ज्यों-ज्यों दवा की।’

इस परिस्थिति पर विचार करने से हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते है कि वर्तमान प्रणाली में ही कोई दोष है। आज-कल के डाक्टरों का उद्देश्य यह नहीं होता कि जनता को बीमार होने से बचाया जाय और उनको स्वयं अपने स्वास्थ्य की रक्षा करते हुए निरोग-जीवन व्यतीत करने की शिक्षा और प्रेरणा दी जाय। वरन् वे तो अपना कौशल इस बात में समझते हैं कि लोग नई-नई और कठिन बीमारियाँ लेकर उनके पास आवें और वे उनको सुई गढ़ा कर काट-छाँट करके, तरह-तरह के यन्त्र लगाकर फिर से काम चलाऊ बना दें। वे अपनी इस कला पर गर्व कर सकते हैं, पर हमको तो यह स्थिति मानवता की प्रगति की दृष्टि से दयनीय ही जान पड़ती है।

इसलिये कुछ मानवता-हितैषी सज्जनों ने गत सौ वर्षों से लोगों को यह शिक्षा देनी आरम्भ की है कि आरोग्यता की कुँजी कहीं बाहर नहीं हैं, वह बोतलों और शीशियों में बन्द नहीं मिल सकती हैं, वरन् हमारे शरीर के भीतर ही है। प्रकृति ने हमारे शरीर की रचना करते समय ही उसमें वह ज्ञान और शक्ति समाविष्ट कर दी है, जिससे वह सौ वर्ष तक पूर्ण स्वस्थ और कार्यक्षम बना रह सके। यह आदमी का अज्ञान अथवा लोलुपता ही है कि अनुचित आहार-विहार और रहन-सहन को अपनाकर अपने स्वास्थ्य को निर्बल बना लेता है और फिर इसके परिणामस्वरूप जरा-सी प्रतिकूल परिस्थिति आते ही बीमारी का शिकार बन जाता है।

अस्तु, वर्तमान सभ्यता के वातावरण को देखते हुए अब यह आशा तो नहीं की जा सकती कि मनुष्य शीघ्र ही हर तरह की कृत्रिमता को त्यागकर पूर्णरूप से प्राकृतिक जीवन बिता सकेगा। परिस्थितियों और जन्म से ही पड़ी हुई आदतों के कारण उससे न्यूनाधिक असंयम होगा ही और मौजूदा सामाजिक परिस्थिति में रहते हुए खान-पान में कुछ हानिकारक पदार्थ काम में आते ही रहेंगे। उदाहरण के लिये आजकल जो बिजली की चक्कियों का पिसा हुआ आटा और मैदा आदि काम में लाई जाती है, वह काफी हानिकारक होती हैं, पर अब शहरों में रहने वाले हजार में से एक व्यक्ति के लिये भी यह सम्भव नहीं हैं कि अपना अनाज हाथ की चक्की से पीस कर बिना छने चोकर-युक्त आटे की रोटी बनाकर खा सके। देखने में तो यह बिल्कुल सीधी-सादी सी बात है, पर जब इस पर अमल करने को तैयार हुआ जाय तो बीसों कठिनाइयाँ सामने आती है। यही हाल पैदल यात्रा करने तथा और भी रहन-सहन सम्बन्धी बातों का है।

इसलिये शरीर-रचना पर ध्यान देकर उसकी बनावट को ध्यान में रखकर उपरोक्त विद्वानों ने यह निर्णय किया है कि गलत रहन-सहन के कारण मनुष्य के शरीर में जो दूषित पदार्थ जमा होते हैं, उनको किसी प्राकृतिक विधि से ही निकाल दिया जाय। इनमें सबसे पहला नम्बर पेट का है, क्योंकि अनुचित स्वाद-वश या उपयुक्त पदार्थ न मिलने की अवस्था में लोग जो गलती करते हैं उसका प्रत्यक्ष फल उन्हीं को सहन करना पड़ता है। जब भोजन की अधिकता या खाद्य पदार्थों की दुष्पच्यिता के कारण आहार का परिपाक ठीक-ठीक नहीं होता और वह छोटी और बड़ी आँतों में सड़ने लगता है तो उसी का विषाक्त प्रभाव शरीर के सब अंगों पर पड़ता है और वे रोगी होने लगते है। इस सम्बन्ध में एक प्राकृतिक चिकित्सक डा. ह्यूम ने लिखा है-

“आप जो भोजन नित्य खाते हैं, उसके पाचन अथवा अर्धपाचन से पैदा होने वाला सारा ही कचरा प्रतिदिन शौच, मूत्र या पसीना आदि बनकर साफ नहीं हो पाता। उसका कुछ न कुछ भाग भीतर रह ही जाता है और शरीर की मशीनरी में अवरोध पैदा करता हैं, जिससे शरीर में ‘टाक्सिन’ उत्पन्न होकर उनसे भारीपन, सुस्ती, स्नायविक रोग, प्रक्रिया की गड़बड़ी होकर नाना तरह के रोग और वे समय का बुढ़ापा पैदा होता है। मतलब यह है कि पाचन-क्रिया की कमी से शरीर में कचरे की निरन्तर वृद्धि होती रहती है। इसी प्रकार जीवन रूपी मशीन के निरन्तर चलते रहने से भी शरीर में सूक्ष्म कचरा पैदा होता है। क्या दवायें इस सूक्ष्म कचरे की सफाई कर सकती है?”

“एक उदाहरण लीजिये। घरों, गाँवों और नगरों में कूड़ा डालने के डब्बे रखे जाते है। डब्बे में से यदि कचरा साफ न किया जाय, तो उसमें मच्छर, कीड़े वगैरह पैदा होने लगते है। अब बताइये यदि डब्बे में कचरा पूरी तरह न निकाला जाय और एक ओर तो उस पर डी. डी. टी. वगैरह का स्प्रे मारा जाय और दूसरी ओर प्रतिदिन नया-नया कचरा भी डाला जाये, तो क्या मच्छर-कीड़े नष्ट हो जायेंगे? हरगिज नहीं। मच्छरों और कीड़ों से छुटकारा पाने का सही उपाय तो यही है कि कचरे को निकालकर डब्बे की सफाई की जाय। बस यही हाल शरीर का है। शरीर की सफाई के लिये उसके भीतर का सब मल बाहर फेंकना ही पड़ेगा और उस मल को बाहर निकाल देने का एक ही तरीका है और वह है-उपवास

उपवास द्वारा शरीर की सफाई करने में एक विशेषता यह है कि यह शरीर के उन गूढ़ और अत्यन्त सूक्ष्म अंग-प्रत्यंगों का मल भी बाहर निकाल देता है, जहाँ तक दवा का असर कभी नहीं पहुँच सकता। किसी भी बीमारी के कीटाणु अगर शरीर में उत्पन्न हो गये हो तो उपवास उनको भी खत्म कर देता है। साथ ही उन सब मुर्दा वस्तुओं को बाहर भी निकाल देता है। उपवास मानव शरीर पर किस प्रकार प्रभाव डालकर रोग को नष्ट करता है इस सम्बन्ध में उक्त चिकित्सक ने बतलाया है-

(1) भोजन को हजम करना, उसमें से फीक को बाहर फेंकना, काम की वस्तुओं को खून के प्रवाह में पहुँचाना और फिर ‘सेलों’ (कोशिकाओं) द्वारा उनका आत्मसात् किया जाना, यह सब एक बड़ी पेचीदी, मुश्किल और भारी अक्रिया है। शरीर जितनी शक्ति पैदा करता है, उसमें से आधी शक्ति भोजन को सम्हालने में ही व्यय हो जाती है। जब भोजन लेना बन्द कर दिया जाता है तो यह शक्ति भीतरी सफाई के काम में लग जाती है। बीमार होने पर मनुष्य की भूख जो कम पड़ जाती है या ‘मर जाती’ है, उसमें भी प्रकृति का यही उद्देश्य रहता है कि पाचन क्रिया से बची हुई शक्ति रोग का प्रतिकार करने के काम में लग सके।

(2) फिर ‘पाचन के अंगों’ को भी कुछ न कुछ काम करने को चाहिये ही। उपवास की हालत में ये अंग मल को बाहर निकालने में सहायता पहुँचाने लगते हैं, इससे सफाई का काम तेजी से होने लगता है।

(3) उपवास करने से शरीर के पाचक अंगों को विश्राम मिलता है और इससे उनमें ताजगी, फुर्ती आ जाती है।

उपवास शारीरिक स्वास्थ्य को किस प्रकार सुधारता है और नव-जीवन प्रदान करता है, इसका वैज्ञानिक कारण रूस के प्रसिद्ध जीव-विज्ञान वेत्ता ‘ब्लाडिमिर निमितिन’ ने प्रकट किया है। उनका कहना है कि मनुष्य के शरीर में दो प्रकार के ‘हार्मोन’ स्वास्थ्य-रक्षा में सहायता होते हैं। पक्वाशय एक प्रकार के ‘हार्मोन’ पैदा करता है, जो पोषक-तत्त्वों से सम्बन्धित ‘टिशुओं’ (तंतुओं) की सहायता करते हैं। उम्र बढ़ने पर इनके उत्पादन में कमी होने लगती है। पर ‘अधिवृक्क ग्रन्थियाँ’ जो ‘हार्मोन’ पैदा करती हैं, उन पर उम्र की वृद्धि का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। पर स्वास्थ्य-रक्षा की दृष्टि से दोनों प्रकार के ‘हार्मोन’ का संतुलन इस प्रकार बिगड़ना बहुत हानिकारक है। इस संतुलन को फिर से ठीक करने का सबसे सरल और स्वाभाविक उपाय उपवास है। जब शरीर में भोजन नहीं पहुँचता तो अधिवृक्क ग्रन्थियों द्वारा उत्पन्न किये गये ‘हार्मोन’ भोजन न होने के कारण खपने लग जाते हैं। इस प्रकार दोनों में संतुलन होकर स्वास्थ्य-रक्षा की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। प्राचीन मनीषी अपने अनुभव से उपवास की उपयोगिता को समझते थे और आज से ढाई-तीन हजार वर्ष पूर्व रोमन सम्राट् ‘वेस्वासियन’ ने प्रत्येक महीने में दो दिन उपवास करने का नियम बना दिया था।

हमारे देश के महापुरुषों ने तो बहुत पहले से प्रत्येक एकादशी की व्रत का नियम बनाकर और उसे धार्मिक रूप देकर शारीरिक और मानसिक दोनों प्रकार के स्वास्थ्य की रक्षा और प्रगति का मार्ग प्रशस्त कर दिया था। आयुर्वेद के ज्ञाताओं के अनुसार चन्द्रमा के आकर्षण का प्रभाव जिस प्रकार समुद्र के जल पर पड़ता है और उसमें ज्वार-भाटों के रूप में अधिक गतिशीलता आ जाती है, उसी प्रकार उसका प्रभाव मानव शरीर स्थित रसों पर भी पड़ता है। एकादशी से अमावस्या अथवा पूर्णिमा तक इसी कारण शारीरिक दोषों की उग्रता बढ़ जाती है और उपवास द्वारा उसके शमन होने में सहायता मिलती है।

इतना ही नहीं उन मनीषियों ने स्वानुभव द्वारा यह भी पता लगाया था कि प्रत्येक तिथि और बार का हमारे शारीरिक अंगों से विशेष सम्बन्ध होता है। इसलिये यदि अंग विशेष के रोग अथवा निर्बलता के दूर करने के लिये निर्दिष्ट दिन उपवास किया जाय तो उससे विशेष लाभ हो सकेगा। इस विधि को स्पष्ट करते हुए एक चिकित्सक ने लिखा है कि “हमारे शरीर में मुख्य 24 तत्व होते हैं और उनमें से प्रत्येक के तीन आश्रम होते हैं- (1) अध्यात्म, (2) अधिभूत, (3) अधिदेव। ये ही तीन आश्रम व्रत से भी सम्बन्धित होते हैं। मनुष्य में जिस ‘अधिभूत’ की कमी होती है, उसी ‘अधिदेव’ की प्रगति के लिये उसी अधिदेव के दिन या तिथि को उपवास करना चाहिये, जिससे उसे उसी ‘अध्यात्म’ की प्राप्ति हो सके।”

उदाहरण के लिये “मन अध्यात्म है, संकल्प विकल्प करना अधिभूत है और चन्द्रमा अधिदेव है। अतः सोमवार को उपवास करने से मानसिक शक्ति प्रबल होती है।” इसी प्रकार “घ्राण (नासिका) अध्यात्म है, सूँघना अधिभूत है और पृथ्वी अधिदेव है। अतः नासिका के रोगों में, सूँघने की शक्ति की कमी में पंचमी तिथि अथवा मंगलवार का उपवास विशेष लाभदायक होता है।”

इस सिद्धान्त के अनुसार त्वचा रोगों के लिये पूर्णिमा अथवा सोमवार को, नेत्र रोगों में रविवार को, जीभ के रोगों में तृतीया अथवा शनिवार को, हाथों की दुर्बलता में पंचमी, दशमी, पूर्णिमा तिथियों और शुक्रवार को, पैरों की त्रुटि के लिये एकादशी को, गुदा सम्बन्धी रोगों में द्वितीया अथवा गुरुवार को, बुद्धि के विकास के लिये प्रदोष के दिन उपवास विशेष हितकारी और प्रभाव डालने वाला होता है।

वैसे भोजन की अनियमितता के फलस्वरूप पेट में गड़बड़ी जान पड़ें अथवा ज्वर, जुकाम, सिर-दर्द आदि की शिकायत पैदा हो तो उपवास से तुरन्त लाभ होता है। वस्तुतः जो व्यक्ति शरीर की भीतरी स्वच्छता की दृष्टि से नियमित रूप से उपवास करते रहते हैं, उनको कोई बड़ी बीमारी हो ही नहीं सकती। उपवास रोग निवारण की अचूक विधि है।


राजेन्द्र बाबू

राजेन्द्र बाबू अपने गाँव जीराबाई जा रहे थे। नौका में एक मुसाफिर ने सिगरेट सुलगाई। सिगरेट के धुँए से देश रत्न की खाँसी उभर आई। जब गंध असह्य हो उठी, तो उन्होंने मुसाफिर से पूछा- “यह सिगरेट आपकी ही है न?” उत्तर मिला- मेरी नहीं तो क्या आपकी है। देश रत्न ने कहा- तो यह धुँआ भी आपका ही हुआ। इसे अपने पास न रखकर दूसरों पर क्यों फेंकते हो? मुसाफिर ने जलाकर सिगरेट फेंक दी।


पुस्तकालयों का जाल बिछा दिया जाये

स्वाध्याय की महिमा अतुल है अनन्त है, जिसने पढ़ने का महत्व जान लिया, उसने सौभाग्य का द्वार पा लिया। जिसने विचार की आवश्यकता अनुभव कर ली, उसने विकास का आधा पथ पार कर लिया, यह जानना चाहिये। “स्वाध्याय से बढ़कर आनन्द कुछ नहीं (गाँधी जी) और ‘मुझे नरक में भेज दो वहाँ भी स्वर्ग बना दूँगा, यदि मेरे पास पुस्तकें हों” (लोकमान्य तिलक)- इन दोनों मूर्धन्य महापुरुषों ने ज्ञान की महत्ता उपरोक्त शब्दों में गा दी।

डनफर्मलाइन (स्काटलैंड) में एक बालक जन्म। उसकी माँ केक बनाती थीं और एक छोटी सी कोठरी में बैठकर उन्हें बेचा करती थी। पिता फेरा लगाता था, शाम को उतने पैसे मिल जाते थे, पिता फेरा लगाता था, शाम को उतने पैसे मिल जाते थे, जितने से तीनों प्राणी पेट भर लेते थे और आधे फटे कपड़े पहन लेते थे। गरीबी से दुःखी लड़का एक दिन घर से भाग गया और अमेरिका पहुँच कर एक इस्पात कम्पनी में चपरासी हो गया। काम उतना था नहीं, इसलिये अपने साहब की अलमारी से कोई किताब निकाल लेता और पढ़ने लगता और कर्मचारी आते और उसे बातचीत में लगाना चाहते पर वह उन्हें किसी न किसी बहाने से टरका देता और फिर अपने पढ़ने में लग जाता। वह इतनी तल्लीनता से पढ़ता कि पुस्तक की अधिकांश बातें एक पाठन में ही याद हो जातीं।

एक दिन एक मीटिंग थी। कोई प्रश्न आ पड़ा उसे मैंनेजिंग डायरेक्टर भी सुलझाने में असमर्थता अनुभव कर रहे थे। वह लड़का पास ही खड़ा था, उसने एक किताब उठाई बीच में से शीघ्रता से एक पृष्ठ खोलकर डायरेक्टर के आगे बढ़ा दिया। यही वह उत्तर था, जिसकी खोज हो रही थी। बालक की इस असाधारण प्रतिभा से सब हक्के बक्के रह गये। वह बालक अपनी बुद्धि से उद्योग के तमाम तकनीक सीख गया और एक दिन करोड़पति होकर एन्ड्रयू कार्नेगी के नाम से विख्यात हुआ। यह श्रेय-जिसने उसे जमीन से उठाकर आसमान पर पहुँचा दिया- उसकी स्वाध्याय बुद्धि को ही दिया जा सकता है।

एक और वैसा ही निर्धन बालक दक्षिण भारत में भी हुआ है, जिसे अपने स्वाध्याय की आकांक्षा को तृप्त करने के लिये सड़कों में जलने वाली बत्तियों के नीचे पढ़ना पड़ता था। किताबें खरीदने के लिये पैसे नहीं होते थे, इसलिये वह भी पुस्तकालय की शरण लेता था। इस तरह उसने ज्ञान वृद्धि की साधना सतत जारी रखी और एक दिन उसकी बौद्धिक प्रतिभा इस योग्य हुई कि ब्रिटिश सरकार ने उसे मद्रास हाईकोर्ट का न्यायाधीश नियुक्त किया। वह बालक- सर टी. एस. मुत्तुस्वामी अय्यर पहले भारतीय थे, जिनको इस तरह का कोई महत्त्वपूर्ण पद प्रदान किया गया।

ज्ञान अर्जन के इस लाभ को जिसने भी समझा, वह गई गुजरी स्थिति से निकल कर कुछ से कुछ हो गया। ऐसे सैकड़ों उदाहरण हैं, जिनसे पुस्तकालयों की उपयोगिता का पता चलता है। सम्पन्न घरों के लोगों को तो पुस्तकों की कोई कमी नहीं रहती पर एक साधारण नागरिक को जिसे ज्ञान वृद्धि और व्यक्तित्व के विकास की इच्छा होती है, उनके लिये पुस्तकालय ही उपयोगी माध्यम हैं। उनसे हजारों व्यक्ति सम्पन्न परिवार की तरह अपनी ज्ञान अर्जन पिपासा शान्त कर लेते हैं और इस तरह समाज के सैकड़ों लोग- जो विचार और बौद्धिक क्षमता के अभाव में आगे बढ़ने से रह जाते हैं- अपनी उन्नति के लिए भी मार्ग खोल लेते हैं।

इस तथ्य को कनाडा ने अनुभव किया। कनाडा तब निर्धन देश था, जिन दिनों की बात कर रहे हैं। अभी पौने दो सौ वर्ष ही हुए होंगे, वहाँ शिक्षा की बड़ी कमी थी। सरकार ने बच्चों के लिये शिक्षा अनिवार्य कर दी पर जो शेष नागरिक थे, क्या उन्हें इसी स्थिति पर पड़ा रहने दिया जाये, यह एक गम्भीर समस्या थी। उधर उद्योगों के लिये भी कुछ शिक्षित लोगों की आवश्यकता अनुभव की गई। वहाँ के नेताओं ने परस्पर विचार किया और सारे देश में पुस्तकालयों का जाल बिछा दिया। जो बालक पढ़ रहे थे, उन्हें बीच में पढ़ाई छुड़ाकर धन्धों में लगा दिया जाता था, इस बीच वे पुस्तकालयों में जाकर ज्ञानार्जन करते रहते थे, क्रम न टूटने पाता था। कुछ वर्ष बाद उन्हें फिर से फोक-हाईस्कूल में शिक्षा दी जाती थी। वयस्क हो जाने पर फिर उन्हें पुस्तकालयों में पढ़ने के लिये पुस्तकें दी जाती थीं। अधिक से अधिक सेवा के लिये वहाँ लाइब्रेरियनों को परीक्षण देने की व्यवस्था बनाई गई। कुशल पुस्तकालयाध्यक्षों के मार्ग दर्शन में लोगों को अपने व्यक्तित्व के विकास का समुचित अवसर मिला और कनाडा देखते ही देखते दुनियाँ के समृद्ध और विकसित देशों की पंक्ति में जा खड़ा हुआ।

प्रसिद्ध विद्वान् डा. एस. आर. रंगनाथन ने एक बार जापान की यात्रा की। ओसाका में उन्होंने एक स्थान पर बाहर कतार में खड़े लोगों को पुस्तकें पढ़ते देखा। पढ़ने वालों की अधिक संख्या देखकर उन्हें कुछ आश्चर्य हुआ, उन्होंने वहाँ जाकर पता लगाया तो मालूम हुआ कि यह एक पुस्तकालय है, जहाँ प्रतिदिन लोग भारी संख्या में पुस्तकें पढ़ने आते हैं। पूछने पर पुस्तकालय के अध्यक्ष ने बताया कि यह पुस्तकालय 30 वर्ष पहले बना था। तब थोड़े से आदमियों के आने का अनुमान था, इसलिये उतने ही स्थान की व्यवस्था की गई थी। अब लोग बहुत अधिक आते हैं, इसलिये सीटें रिजर्व कर दी गई हैं। जिनका नम्बर नहीं आता वे लोग अपनी अध्ययन की आकांक्षा को तृप्त करने के लिये बाहर खड़े होकर पढ़ते हैं। हम इस कमी को दूर करने के प्रयत्न में हैं।

जापानी लोगों की इस स्वाध्याय वृत्ति से वहाँ के जीवन में क्या कोई क्राँति हुई है? इस प्रश्न पर विचार करें तो मालूम होगा कि जापान ने इतनी अधिक उन्नति कर ली है कि वह एशिया के विकसित देशों में अपना प्रथम स्थान रखता है।

धन कमाना कोई बड़ी बात नहीं है। पढ़े लिखे और विचारवान व्यक्तियों के लिये तो वह सबसे छोटी समस्या है। ज्ञान का उद्देश्य व्यक्तिगत जीवन में शांति और सामाजिक जीवन में सभ्यता और व्यवस्था लाता है, वह भी शिक्षा और ज्ञान के अभाव में पूरा नहीं हो सकता। इसलिये पढ़ना सब दृष्टि से आवश्यक हैं। पुस्तकालय एक ऐसी व्यवस्था है, जहाँ औसत नागरिक भी अधिकतम ज्ञान और विचार अर्जित कर सकता है।

पुस्तकालय समाज की अनिवार्य आवश्यकता है। मनुष्य को भोजन कपड़े और आवास की व्यवस्था हो जाती है तो वह जिन्दा रह जाता है, शेष उन्नति तो वह उसके बाद सोचता है। समाज यदि विचारशील है तो वह शांति और सुव्यवस्था की अन्य आवश्यकतायें बाद में भी पूरी कर सकता है, इसलिये पुस्तकालय समाज की पहली आवश्यकता है, क्योंकि उससे ज्ञान और विचारशीलता की सर्वोपरि आवश्यकता की पूर्ति होती है, किन्तु इतना ही काफी नहीं है कि एक स्थान पर पुस्तकें जमा कर दी जायें, उनके विषय चाहे जो कुछ हों।

गन्दे और दूषित विचार देने वाली पुस्तकों से तो अनपढ़ अच्छा जो बुराई करता है पर बढ़ाता नहीं। जितनी बुराइयाँ बन चुकी हैं, उन्हीं तक सीमित रह जाता है। यथार्थ की आवश्यकता की पूर्ति उन पुस्तकों से होती है, जो प्रगतिशील विचार दे सकती हैं। जो समस्यायें हल कर सकती हैं, जो नैतिक और साँस्कृतिक, धार्मिक एवं आध्यात्मिक, सामाजिक और विश्व बन्धुत्व की प्रेरणाएँ और शिक्षाएँ भी दे सकती हैं।

एक बार इंग्लैण्ड में भी ऐसी ही क्राँति उठी थी। वहाँ भी जनता के लिये स्थान स्थान पर पुस्तकालय स्थापित किये गये। काफी समय तक इससे अधिक कोई दिलचस्पी न ली गई पर द्वितीय विश्वयुद्ध के समय शासनाध्यक्षों ने पाया कि चारित्रिक और नैतिक दृष्टि से इंग्लैण्ड का स्तर बहुत नीचे गिर गया है। उसके कारणों की विस्तृत खोजबीन की गई तो यह पाया कि वे पुस्तकालय ही इसके कारण हैं, जिन्हें जनता के बौद्धिक विकास के लिये स्थापित किया गया था। हुआ यह कि वहाँ के अधिकांश युवकों ने उपन्यास और कामोत्तेजक साहित्य में ही ज्यादा रुचि ली। सृजनात्मक साहित्य उपेक्षित पड़ा रहा। जैसे विचार लोगों ने पढ़े वैसी ही मनोवृत्ति बनती गई।

अब वहाँ एक योजना बनाई गई। पुस्तकालयाध्यक्ष प्रशिक्षित किये गये और उन्हें बताया गया कि यदि कोई स्त्री पुस्तक लेने आती है तो पहले यह पूछो कि उसकी समस्यायें क्या हैं? उदाहरणार्थ यदि वह कम शिक्षित है तो उसे हल्की फुल्की साहस और नैतिकता की पुस्तकें पढ़ने को दो और यह भी कहो कि वह यह कहानियाँ बच्चों को भी सुनाया करे। इसी प्रकार यदि कोई शिक्षित स्त्री है तो उसे बाल-समस्या बाल-कल्याण परिवार मनोविज्ञान की पुस्तकें दी। इस योजनाबद्ध तरीके से वहाँ जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में नये नये अनुसंधान प्रारम्भ हुए। अंग्रेजी साहित्य ही आज एक मात्र ऐसा साहित्य है, जिसमें मनुष्य जीवन के किसी भी पहलू पर विचार और शोध जानकारियाँ मिल सकती हैं, यह उसी योजना बद्ध ‘पुस्तकें पढ़ाओ’ अभियान का चमत्कार है। वहाँ 80 प्रतिशत से भी अधिक लोग पुस्तकालयों का लाभ उठाते हैं। जहाँ पुस्तकें नहीं हैं, वहाँ भी चल-पुस्तकालयों द्वारा पुस्तकें पहुँचाई जाती हैं।

इससे लोगों की सुख समृद्धि का द्वार खुल गया। बैकवेल नामक एक गाँव के एक युवक ने पुस्तकालय में उपलब्ध इलेक्ट्रानिक्स की तमाम पुस्तकें पढ़ी, वह बेरोजगार था पर इन पुस्तकों के सहारे वह रेडियो बनाना सीख गया, यही नहीं रेडियो इञ्जीनियरिंग की भी बहुत सी तकनीकें उसने सीखी। इंग्लैण्ड का औसत नागरिक विश्व समस्याओं, परिस्थितियों और ज्ञान विज्ञान से लेकर छोटे छोटे उद्योगों तक की इतनी जानकारी रखता है, जितनी भारतवर्ष का एम. ए. उत्तीर्ण छात्र भी नहीं जानता होगा, यह सब उनकी स्वाध्याय वृत्ति का ही प्रतिफल है।

यह छोटे उदाहरण इस बात के प्रमाण हैं कि मस्तिष्क को संस्कारवान् और ज्ञान से परिपूर्ण कर लेने पर मनुष्य व्यक्तिगत उन्नति ही नहीं, सामाजिक और राष्ट्रीय समृद्धि का भी द्वार खोल लेता है। इन लाभों को देखते हुए भारतवर्ष में भी पुस्तकालयों का जाल बिछाने की आवश्यकता अनुभव हो रही है। यदि कुछ विचारवाद व्यक्ति अथवा राजनैतिक नेता इसे एक अभियान का स्वरूप प्रदान कर दें तो देश देखते देखते धरती से आकाश में पहुँच सकता है।


सेनापति सर सिड़ने

रेगिस्तान युद्ध में सेनापति सरसिड़ने गम्भीर रूप से घायल हुये। मैदानी क्षेत्रों के युद्ध बड़े भयंकर होते हैं, फिर रेगिस्तान का तो कहना ही क्या। दिन भयंकर युद्ध और सूर्य ताप से त्रस्त सर सिड़ने व्याकुल पड़े थे, तभी एक अफसर उन्हें खोजता हुआ, उधर आ पहुँचा। उसने सेनापति को पहचाना दौड़कर उनके पास पहुँचा। कोई सन्देश दे, इससे पूर्व ही सिड़ने में पानी माँगा। प्यास के मारे दम करूँ को आ रहा था। उस समय जल ही सबसे सुखद सन्देश हो सकता था।

अफसर के पास एक ही केतली पानी था। उसने तुरन्त केतली खोली और सर सिड़ने की ओर बढ़ाई। हाथ में केतली थाम तो ली पर पानी मुँह की ओर नहीं बढ़ा। उनकी आत्मा से आवाज आई-तेरे जैसे सैकड़ों सिपाही रणांगन में आहत पड़े है, उनमें से कितने ही तुझसे भी अधिक प्यासे होंगे। उन्हें प्यासा छोड़कर तेरा पानी पी लेना कहाँ तक ठीक है?”

हाथ वहीं का वहीं रुक गया। आँखें पास पड़े घायल सैनिकों की ओर उठीं। एक सिपाही प्यास से व्याकुल हाथ उठाये पानी के लिये संकेत कर रहा था। प्यास के मारे उसके कंठ से बोल भी नहीं निकल रहे थे। सिड़ने की आँखें भर आई और उन्होंने कहा-मेरा सिपाही मुझसे अधिक प्यासा है, जो अफसर लो यह पानी उस तक पहुँचा दो।”

अफसर ने केतली लेकर सिपाही को थमा दी। पानी पीकर सिपाही के प्राण लौट आये पर जब अफसर दुबारा लौट कर सिड़ने के पास आया तो देखा अब उनका शरीर शेष है, प्राण तो कहीं उड़ गये हैं।


संगीत जो तन मन को जीवन देता है

विश्व के यशस्वी गायक एनरिको कारूसो लिखते हैं-जब कभी संगीत की स्वर लहरियाँ मेरे कानों में गूँजती, मुझे ऐसा लगता मेरी आत्म चेतना किसी अदृश्य जीवनदायिनी सत्ता से सम्बद्ध हो गई है। मैं शरीर की पीड़ा भूल जाता, भूख प्यास और निद्रा टूट जाती, मन को विश्राम और शरीर को हल्कापन मिलता। मैं तभी से सोचा करता था कि सृष्टि में संगीत से बढ़कर मानव-जाति के लिये और कोई दूसरा वरदान नहीं है।”

कारूसो ने सारे जीवन भर संगीत की साधना की। जब एक बार एक शिक्षक ने यहाँ तक कह दिया कि तुम्हारा स्वर संगीत के योग्य है ही नहीं। तुम्हारा स्वर लड़खड़ाता है। पर निरन्तर अभ्यास और साधना से कारूसो ने संगीत साधना में अभूतपूर्व सिद्धियाँ पाई और यह प्रमाणित कर दिया कि संगीत का सम्बन्ध स्वर से नहीं हृदय और भावनाओं से है। कोई भी मनुष्य अपने हृदय को जागृत कर परमात्मा के इस वरदान से विभूषित हो सकता है।

संगीत से मनुष्य का आध्यात्मिक विकास होता है और वह सूक्ष्म सत्ता के भाव-संस्पर्श और अनुभूति की स्थिति पाता है, यह परिणाम अंतर्जगत से सम्बन्ध रखते हैं, इसलिये उस सम्बन्ध में विस्तृत अन्वेषण का क्षेत्र पाश्चात्य जगत् के लिये अभी नितान्त खाली है, मस्तिष्क, शरीर और वन्य वनस्पतियों तक में संगीत के जीवनदायी प्रभाव को आज पाश्चात्य विद्वान् और वैज्ञानिक भी मानने लगे हैं।

क बार इंग्लैण्ड के एक अस्पताल में आपरेशन के लिये एक रोगी को ले जाया जा रहा था। उस समय बाहर कि किसी मकान से संगीत की मधुर ध्वनि आ रही थी। रोगी के मन में संगीत का कुछ ऐसा प्रभव पड़ा कि वह उठ बैठा और निकलकर अस्पताल के बाहर आकर भौचक्का सा देखने लगा कि वह स्वर झंकार कहाँ से आ रही है। डाक्टरों ने देखा संगीत के प्रभाव ने उसके रोग को ही दवा दिया है।

अमेरिका के कई दन्त चिकित्सक एक विशिष्ट संगीत लहरी, विद्युत वाद्य यन्त्र से बजाकर दाँत उखाड़ते हैं। रोगियों से पूछने पर वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि संगीत की मधुर ध्वनि का असर जादू जैसा होता है और वे लोग अपना कष्ट भूल जाते हैं। महिलाओं के प्रसव के समय भी इस प्रकार के प्रयोग किए गये और यह देखा गया कि जिन स्त्रियों को प्रजनन के समय बहुत पीड़ा होती थी, उन्होंने बिना कष्ट के प्रसव किया। ‘अमिला लौमलिटा’ नामक एक महिला का वृतान्त कुछ दिन पहले एक लेख में छपा था, उसकी स्थित अष्टावक्र जैसी थी पर उसने संगीतोपचार द्वारा नया जीवन, नई तरुणाई पाई, उसका सब शारीरिक दोष जाता रहा। इटली में ‘टोरेन्टेला’ नामक नृत्य होता है, तब अनेक मधुर वाद्य बजते हैं, उनसे अनेक पागलपन के रोगी अच्छे होते देखे गये हैं।

भारतवर्ष में शास्त्रीय संगीत की शक्ति और महत्ता के सम्बन्ध में पहले बताया जा चुका है। अब उस दिशा में नई खोजें की जाने की आवश्यकता है, पर सामान्य व्यक्तियों को कथा, कीर्तन, भजन, रेडियो-संगीत छोटे-छोटे बाह्य यन्त्रों के वादन और गायन के द्वारा उसके स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव का लाभ अवश्य उठाना चाहिये। संगीत स्पन्दन शरीर पर बड़ा अनुकूल प्रभाव डालते हैं।

गायन को यौगिक स्वास्थ्य साधन’ भी कहते हैं। गाते समय मुँह, जीभ और होंठ ही काम नहीं करते वरन् आवाज नाभि से खिंचती है और ब्रह्म-रंध्र तक पहुँचती है, फिर तालु से खींचकर गले से उसे निकालते हैं, इस तरह कमर से नीचे के हिस्से को छोड़कर शेष सम्पूर्ण शरीर का भीतरी व्यायाम हो जाता है, उससे बाहरी व्यायाम से भी अधिक प्रभावी परिणाम दिखाई देते हैं।

गायन से शरीर और मस्तिष्क की नाड़ियों का शोधन होता है। ज्ञान तन्तु सजग होते हैं। द्रुत, विलम्बित और मध्यम लय में गाये जाने वाले गीतों के अभ्यास से जीभ, वक्षस्थल, हृदय, श्वाँस और स्वर वाहिनी नलिकाओं, स्नायु मण्डल और नाड़ी संस्थान और हृदय की रक्त वाहिनी धमनियों में प्रभाव पड़ता है। यह अंग स्वस्थ निरोग और बलवान् बनते हैं।

गाने से नाड़ी संस्थान में लहरें उठती हैं, उससे प्रभावित होकर मन भी लहराने लगता है। इस प्रकार की तरंगें शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिये बहुत लाभदायक होती है। गाने से फेफड़े और स्वर यंत्र मजबूत होते हैं। तपेदिक आदि बीमारियों का भय नहीं रहता। जबड़े और आमाशय का भी अच्छा व्यायाम हो जाता है और यह सभी संस्थान निरोग हो जाते हैं। वाद्य संगीत के साथ गायन अथवा नृत्य का भी अभ्यास किया जाता है तो उससे सिर, गर्दन, कन्धा, छाती, पेट और पैर का भी व्यायाम हो जाता है और सारे शरीर में खून का संचार ठीक प्रकार से होने लगता है और शरीर में स्फूर्ति रहती हैं। बाँसुरी, शहनाई, बीन आदि मुँह से बजाये जाने वाले वाद्यों से जीभ, श्वाँस नली और फेफड़े स्वस्थ और मजबूत होते हैं।

संगीत का अभ्यास करना ही लाभदायक नहीं, श्रवण करना भी उतना ही प्राणप्रद होता है। सुनने से और भी स्फूर्ति, चैतन्यता और रोमांच होता है। गायन और वादन की श्रोताओं पर जो प्रतिक्रिया होती है, उसके फलस्वरूप अधिक प्यास लगना, शरीर की जलन, नशे के प्रभाव, दुर्बलता, विष के प्रभाव, मूर्छा, नींद न आना, मानसिक विक्षिप्तता, आलस्य, पीड़ा, बुखार, बार-बार दस्त और पेशाब होना, आन्तरिक दाह, रक्त-चाप खाँसी, पाण्डुरोग, कान के दर्द, हृदय की धड़कन, श्वाँस रोग आदि को आराम मिलता है। कई बार कुछ रोग असाध्य हो जाते हैं और उन पर संगीत का प्रभाव धीरे धीरे पड़ता है। धीरे धीरे विष का शमन होता है पर यह निश्चित है कि नियमित रूप से गायन का अभ्यास करने से इनसे छुटकारा अवश्य मिलता है।

गायन में स्तुति, मंगलाचरण, भगवान् का ध्यान, माता का ध्यान, छोटे बच्चों को पास बैठाकर गाना, सजावट और सौंदर्यपूर्ण स्थान जैसे देव मन्दिर, तीर्थ अथवा जलाशयों के किनारे सामूहिक रूप से गाने का प्रयोग और भी प्रभावोत्पादक होता है। प्राचीनकाल में ऐसे अवसरों-पर्व त्यौहार, पूजन, तीर्थ यात्रा, मन्दिरों आदि में संगीत अभ्यास और गायन की व्यवस्था इसलिये की जाती थी कि उन पर्वों और स्थानों के सूक्ष्म प्रभाव को तरंगित कर उसका भी लाभ उठाया जा सके।

संगीत का प्रभाव मनुष्यों पर ही नहीं पशु-पक्षियों पर भी पड़ता है। वेणुनाद सुनकर सर्प अपनी कुटिलता भूलकर लहराने लगता है। कई प्रान्तों में बहेलिये बीन बजाते हैं, उससे मुग्ध हुए हिरन, मृग निर्भय हो कर पास चले आते हैं। हालैण्ड में गायें दुहते समय मधुर संगीत सुनाया जाता है। वहाँ की सरकार ने ऐसा प्रबन्ध किया है कि जब गायें दुहने का समय हो तब मधुर संगीत ब्राडकास्ट किया जाय, ग्वाले लोग रेडियो सेट दुहने के स्थानों पर रख देते हैं। संगीत को गायें बड़ी मुग्ध होकर सुनती हैं, और उनके स्नायु संस्थान पर कुछ ऐसा प्रभाव पड़ता है कि वे 15 से लेकर 20 प्रतिशत तक अधिक दूध दे देती हैं।

अभी शक्ति तत्व के अनुसंधान का क्षेत्र बहुत विस्तृत और अव्यक्त है और जानकारी बढ़ेगी तो यह भी सम्भव हो जायेगा कि रीछ, भालू व शेर, बाघ जैसे खूँख्वार जानवरों को भी संगीत के प्रभाव से सात्विक और कोमल मनोवृत्ति का बनाया जाना सम्भव होगा। कहते है साम संगीत को सुनकर चर अचर सभी निर्विकार और अचेतन स्थिति को पहुँच जाते हैं, उसका लाभ भी तब मिल सकेगा।

संगीत का प्रभाव जीवित जगत् तक ही नहीं, वृक्ष और वनस्पति भी उससे प्रभावित होते हैं। अन्नमलय विश्व विद्यालय के वनस्पति शास्त्र के प्रधान डा. टी. सी. एन. सिंह ने ध्वनि तरंगों के द्वारा पौधों को उत्तेजित व वर्धित किये जाने की बात स्वीकार की।

केले और धान की खेती में संगीत की स्वर लहरियाँ डाली जाय तो उनके वजन और उत्पादन क्षमता में वृद्धि होती देखी गई है।

संगीत एक शक्ति है इसलिये जहाँ उसका उपयोग हैं, वहाँ दुरुपयोग भी सम्भव है। आज कल संगीत के नाम पर अश्लीलता और भौंड़ापन बढ़ा है, उसे अच्छे सुमधुर और शास्त्रीय संगीत से स्थानापन्न करना और उसका लाभ उठाना बहुत आवश्यक हो गया है।

ध्वनि एक वैज्ञानिक शक्ति है। एक पौराणिक कथा है कि “त्वष्टा ऋषि से मन्त्रोच्चारण में एक स्वर की गलती हुई थी और उसका परिणाम विपरीत हो गया था। त्वष्टा इन्द्र को मारने वाला पुत्र उत्पन्न करता चाहते थे, किन्तु स्वर सम्बन्धी उच्चारण की त्रुटि से जिसे इन्द्र ने ही मार डाला, ऐसा वृत्त नामक महाअसुर उत्पन्न हो गया। स्वर लहरियों की शक्तियाँ असाधारण हैं उनका दुरुपयोग करके जनमानस और समाज को दिग्भ्रान्त किया जा सकता है और लोगों को कल्याण की दिशा में भी अग्रसर किया जा सकता है। हमें चाहिये कि स्वयं भी संगीत शक्ति का लाभ प्राप्त करें और समाज को भी उस पुण्य धारा में स्नान का सुख प्रदान करें।


नैपोलियन बोनापार्ट

अपनी बहन इलाइजा के साथ एक किशोर बालक घूमने निकला। रास्ते में एक किसान की लड़की मिली। वह सिर पर अमरूदों का टोकरा रखे हुए उन्हें बेचने बाज़ार जा रही थी। इलाइजा ने भूल से टक्कर मार दी, जिससे सब अमरूद वहीं गिरकर गन्दे हो गये। कुछ फूट गये, कुछ में कीचड़ लग गई।

गरीब लड़की रो पड़ी। “अब मैं अपने माता पिता को क्या खिलाऊंगी जाकर, उन्हें कई दिन तक भूखा रहना पड़ेगा।” इस तरह अपनी दीनता व्यक्त करती हुई वह अमरूद वाली लड़की खड़ी रो रही थी। इलाइजा ने कहा- “भैया चलो भाग चलें, कोई आयेगा तो हम पर मार पड़ेगी और दण्ड भी देना पड़ेगा। अभी तो यहाँ कोई देखता भी नहीं।”

बहन देख ऐसा मत कह, जब लोग ऐसा मान लेते हैं कि यहाँ कोई नहीं देख रहा, तभी तो पाप होते हैं। जहाँ मनुष्य स्वयं उपस्थित है वहाँ एकान्त कैसा? उसके अन्दर बैठी हुई आत्मा ही गिर गई तो फिर ईश्वर भले ही दण्ड न दे वह आप ही मर जाता है। गिरी हुई आत्मायें ही संसार में कष्ट भोगती हैं, इसे तू नहीं जानती, मैं जानता हूँ।”

इतना कहकर उस बालक ने अपनी जेब में रखे सभी तीन आने पैसे उस ग्रामीण कन्या को दिये और उससे कहा-बहन तू मेरे साथ चल। हमने गलती की है तो उसका दण्ड भी हमें सहर्ष स्वीकार करना चाहिये, तुम्हारे फलों का मूल्य घर चल कर चुका दूँगा।”

तीनों घर पहुँचे, बालक ने सारी बात माँ को सुनाई। माँ ने एक तमाचा इलाइजा को जड़ा दूसरा उस लड़के को और गुस्से से बोली- “तुम लोग नाहक घूमने क्यों गये? घर खर्च के लिये पैसे नहीं, अब यह दण्ड कौन भुगते?”

बच्चे ने कहा- “माता जी! देख मेरे जेब खर्च के पैसे तू इस लड़की को दे दे। मेरा दोपहर का विद्यालय का नाश्ता बन्द रहेगा, मुझे उसमें रत्ती भर भी आपत्ति नहीं है। अपनी गलती के लिये प्रायश्चित भी तो मुझे ही करना चाहिये।”

माँ ने उसके डेढ़ महीने के जेब खर्च के पैसे उस लड़की को दे दिये। लड़की प्रसन्न होकर घर चली गई। डेढ़ महीने तक विद्यालय में उस लड़के को कुछ भी नाश्ता नहीं मिला, इसमें उसने जरा भी अप्रसन्नता प्रकट नहीं की। अपनी मानसिक त्रुटियाँ पर इतनी गम्भीरता से विजय पाने वाला यही बालक आगे चलकर विश्व विजेता नैपोलियन बोनापार्ट के नाम से विश्व विख्यात हुआ।


सूर्य शक्ति से आरोग्य प्राप्ति

हे प्रातः काल के उगते हुए सूर्य देव! आप सम्पूर्ण शक्ति के प्राण हैं। आप हर प्रकाश भर जाते हैं, जिससे प्रजा को चेतना, आरोग्य और स्वास्थ्य मिलता है।

सूर्यदेव की स्तुति में वेद भगवान- स नो भूड़ाति तन्वेत्र जुगो सजन। भाइयों, मित्रों जाओ देखो यह जो प्राची में प्रकाश पिण्ड के रूप में सूर्यदेव उग रहे है, वह हमारे शरीरों के दोष दूर करते हैं और आरोग्य प्रदान करते हैं।

एक बार एक अत्यन्त कृशवदन बालिका चिकित्सा के लिये लाई गई। उसकी त्वचा ने काम करना बन्द कर दिया था। सारी देह में खुजली उठती रहती थी। वह बिल्कुल दुबली पतली हो गई थी, स्वास्थ्य वर्धक आहार और टानिक देने पर भी न रक्त बनता था, न रक्त संचार होता था, चिकित्सक महोदय काफी परेशान हुए, उनका मस्तिष्क काम न दिया- बालिका का उपचार कैसे किया जाये।

अन्त में एक प्राकृतिक चिकित्सक की सलाह पर बालिका को कई दिन धूप में रखा गया। खाना बन्द कर दिया गया, उससे भीतर की गन्दगी समाप्त हुई और इधर धूप के कारण त्वचा में हलचल आरम्भ हुई। रोम छिद्रों से प्रकाश और आकाश तत्व का शरीर में प्रवेश होने से बालिका के शरीर में स्फूर्ति और चेतनता बढ़ने लगी। कुछ ही दिन में बालिका घर भर में सबसे ज्यादा पुष्ट हो गई। तब से उक्त परिवार के सदस्यों ने नियमित धूप सेवन का क्रम बना लिया।

धूप से प्राकृतिक अवस्था में शरीर को आरोग्य शक्ति उपलब्ध होती है, यह प्रकृति की अमूल्य देन है। जो मनुष्य ऐसे स्थान में रहते या काम करते हैं, जहाँ धूप नहीं पहुँचती वे लोग निश्चय ही निस्तेज, निष्प्रभ और पीले पड़ जाते हैं। धूप किरणों से मिलने वाली विटामिन-डी शरीर के विकास में बड़ी सहायक होती है, इसलिये गर्भावस्था से ही बालक को धूप के संस्पर्श में रखना चाहिये। अर्थात् गर्भवती स्त्रियों को प्रतिदिन प्रातःकाल भगवान् सूर्यदेव कि किरणों में रहकर काम करना चाहिये। काम न हो तो सारे शरीर को धूप से सेंकना चाहिये। यदि स्त्री धूप सेवन नहीं करती तो उसके चलने फिरने में कष्ट हो सकता है।

हड्डियों और दाँतों के विकास के लिये भी विटामिन-डी आवश्यक है। भोजन से उसकी पूर्ति संभव नहीं। बच्चों में सूखा रोग इसी के अभाव में होता है, हड्डियाँ, पाँव, और कमर लचीली और कमजोर हो जाती हैं। माँसपेशियों और हड्डियों की संधियाँ कमजोर पड़ जाती है। इसलिये आवश्यक हैं कि छोटे बच्चों को निश्चित रूप से हल्की धूप में घूमने हँसने और खेलने दिया जाये। चतुर माताएँ बच्चों को धूप में बैठकर मालिश करती हैं और थोड़ी देर के लिये, जब तक धूप बच्चे की कोमल त्वचा को सह्य हो धूप में ही लिटा देती हैं। इससे बच्चे को एक प्रकार का प्राण ही मिलता है।

स्त्रियों को अस्टोमलेशिया (हड्डी का कमजोर होना) होना इस बात का प्रतीक है कि उसने धूप से अपने आपको वंचित रखा।

सूर्य के प्रकाश में रोगियों को कुछ समय तक बैठाने से त्वचा की निष्क्रियता समाप्त हो जाती है, जिससे पाण्डुरोग ठीक हो जाता है। और भी कहा है-

अनुसूर्यभुदायतां हृदद्योतो हारमा च ते।

प्रातःकालीन नारंगी रंग वाले सूर्य के द्वारा तेरे हृदय रोग तथा पाण्डु रोग दूर हो जायें।

अब इस बात को डाक्टर भी मानते हैं कि कुछ कीटाणु ऐसे होते हैं, जो खौलते पानी में भी नष्ट नहीं होते ऐसे कीटाणु भी धूप से नष्ट हो जाते हैं। इसलिये कहना न होगा कि सूर्य हमारा जीवन रक्षक, हमारा प्रत्यक्ष देवता है।

सूर्य किरणों की अनेक जातियाँ मनुष्य के लिये वरदान ही होती हैं, उसकी अदृश्य किरणों में अवरक्त (इन फरेड रेंज) शरीर को ताप प्रदान करती हैं, यह किरणें आवरण भेद करके भी अन्दर पहुँच जाती हैं, धूप से हमें जो गर्मी मिलती है, वह उसी से प्राप्त होती है। डाक्टर लोग इन किरणों का प्रयोग कुछ विशेष बीमारियों में करते हैं।

इसी प्रकार अल्ट्रावायलेट (पराबैगनी किरणें,) किरणों का भी कोई बीमारियों में उपयोग किया जाता है। यह किरणें सबसे छोटी होती हैं, वे पृथ्वी में बहुत थोड़ी पहुँच पाती हैं, इसलिये सूर्य लैम्प की मदद से इनसे चिकित्सा का काम लिया जाता है।

सूर्य किरणें शरीर को गन्दगी से बचाती हैं, इनमें कुछ विलक्षण शक्ति होती है, जिससे वह गन्दगी को अपान मार्गों से बाहर धकेल देती है। पसीने के द्वारा भी भारी मात्रा में गन्दगी निकल जाती है। इसलिये धूप सेवन के बाद शीतल जल से स्नान अवश्य कर डालना चाहिये उससे रोम छिद्र साफ हो जाते हैं।

बौद्धिक काम करने वालों को धूप स्नान करते समय या धूप में टहलते समय सिर में तौलिया अवश्य बाँधे रहना चाहिये अन्यथा मस्तिष्क की गर्मी बढ़ सकती है पर शरीर के शेष भाग को लाभ ही होता है। हाँ, तेज धूप से बचना आवश्यक है। अभ्यास के दिनों में धूप में रहने का समय धीरे धीरे बढ़ाना चाहिये।

नियमित धूप सेवन से रोग पीड़ा दूर होती है। सिर के रोग, हृदय शूल दूर होता है। सिर-दर्द खाँसी और शरीर के जोड़ों में घुसे हुये रोगों को भी धूप की किरणों ढूँढ़ निकालती और मार भगाती है। तपेदिक रोग में भी हल्की धूप लाभदायक होती हैं। बात, पित्त और कफ को भी दूर करती हैं, ये सूर्य किरणें।

यत्री उपासना से जिन स्थूल लाभों की चर्चा की जाती है, वह सूर्यदेव की प्रकाश शक्ति का ही चमत्कार है। जिसे तरह मन में जब काम वासना के विचार उठते हैं, उसकी शारीरिक इन्द्रियों पर उत्तेजना परिलक्षित होती है, उसी प्रकार मन का ध्यान जब सूर्य लोक में करते हैं तो सूर्य की सबसे समीप वाली किरणों में मन का स्नान होता है और उसकी वह शक्तियाँ भी निश्चित रूप से शरीर में परिलक्षित होती हैं। भयंकर रोग, गायत्री उपासना से ठीक होते देखे गये हैं, वह इस वैज्ञानिक पद्धति के आधार पर ही हैं। सूर्य भगवान् का ध्यान करते हुए, धूप लेने में मानसिक शुद्धि और आत्मिक पवित्रता भी बढ़ती है, इसलिये ही सूर्य को लोक एवं परलोक दोनों प्रकार के सुखों का दाता कहा गया है।

इन लाभों को देखकर हमें सूर्य की आरोग्य दायिनी शक्ति से वंचित नहीं रहना चाहिये। शरीर ही नहीं हमारे आस-पास का वातावरण और कमरे, घर ऐसे खुले हुए होने चाहिये, जहाँ सूर्य का प्रकाश अबाध रूप से प्रवेश कर सके। जिन घरों में सूर्य की रोशनी नहीं पहुँचती, वहाँ सीलन एवं रोग के कीटाणु जन्म लेते और आक्रमण करते रहते है, इसके बावजूद धूप वाले स्थानों की वायु शुद्ध रहती है, विषैले तत्व दूर भग जाते हैं। ऑफिसों और कारखानों में काम करने वाले स्थानों में जहाँ अधिक गन्दगी फैलने की सम्भावना रहती है, वहाँ का वातावरण तो और भी खुला हुआ रहना चाहिये, जिससे सूर्य की किरणों का कार्य बन्द न हो। बन्द मिलों में काम करने वाले श्रमिक पीले पड़ जाते हैं, बीमार हो जाते हैं और उनकी कार्य क्षमता बहुत घट जाती है।

धूप मनुष्यों का जीवन है। सूर्य दृष्टि का प्राण है, प्राणों की उपेक्षा कर जीवन के अस्तित्व की रक्षा नहीं की जा सकती, इसलिये स्वस्थ, बलिष्ठ, और रोग-मुक्त रहने के लिये हमें सूर्य किरणों, सूर्य के प्राण की सब विधि उपासना करनी ही चाहिये।


तू मनुष्य नहीं है

मृत्यु के समय बेबीलोन की रानी नोटीक्रिस ने अपनी कब्र पर निम्न पंक्तियाँ लिखने को संकेत किया “यहाँ पर अपार धन गढ़ा हुआ है, कोई भी निर्धन और अशक्त मनुष्य कब्र खोदकर धन प्राप्त कर सकता है।”

बहुत लम्बे समय के पश्चात् ईरान के बादशाह डेरियस ने जब बेबीलोन को जीत लिया तो उसने कब्र खोदने का कार्य आरम्भ किया। पर उसे एक भी पैसा नहीं मिला, केवल एक पत्थर मिला, जिस पर लिखा हुआ था- “तू मनुष्य नहीं है, नहीं तो मरे हुए को नहीं सताता।”


गायत्री साधना- - संकट और कष्टों के निवारण में गायत्री शक्ति का प्रयोग

आपत्तियों और संकटों के समय लोग भौतिक उपायों से निवारण का उपाय तो करते हैं पर उन उपायों की सामर्थ्य अतिस्वल्प एवं अस्थायी है। इसलिये निश्चयपूर्वक यही नहीं कहा जा सकता कि इन उपायों से वे संकट टल ही जायेंगे। अस्वस्थता के लिये औषधियों का, शत्रु प्रतिरोध के लिए अस्त्र शस्त्रों का, दरिद्र निवारण के लिये व्यवसाय का, उलझनों को सुलझाने के लिये विद्या बुद्धि का और प्रयत्न पुरुषार्थ का हर कोई आश्रय लेता है। किन्तु इन उपायों का परिणाम अमोघ नहीं। भौतिक पदार्थ और उपाय सभी स्वल्प सामर्थ्यवान् एवं अनिश्चित हैं। इसलिये उनके परिणाम के बारे में भी कोई निश्चय नहीं कि अभीष्ट प्रतिफल मिल ही जाएगा एवं प्रस्तुत संकट टल की जाएगा

आत्म बल की शक्ति अमोघ है। उसकी क्षमता भौतिक माध्यमों की तुलना में असंख्य गुनी बढ़ी चढ़ी है। इसलिये जब कोई ऐसा संकट सामने आ खड़ा हो, जिसका निवारण सामान्य उपायों से सम्भव न दिखता हो, तब आत्म शक्ति का सहारा लिया जाता है। देखा गया है कि यह प्रयोग असफल नहीं होता।

आत्म-बल उत्पन्न करने और बढ़ाने के उपायों में गायत्री उपासना सर्वोपरि है। अन्यान्य उपासनाओं की तुलना में यह प्रयोग निस्सन्देह अति सामर्थ्यवान् है। आपत्तियों के निवारण में लोक व्यवहार में प्रचलित उपाय करते हुए, यदि आत्म शक्ति को उत्पन्न एवं प्रयुक्त किया जा सके तो उसके आश्चर्यचकित करने वाले परिणाम होते देखे गये हैं।

इतिहास, पुराणों में ऐसे कथानक भरे पड़े हैं, जिनमें बताया गया है कि देव शक्तियों ने संकट एवं निराशा की घड़ियों में आत्म शक्ति की मूर्तिमान् देवी-गायत्री-का आश्रय लिया और उसकी सहायता से आपत्तियों के निवारण में सफल हुए। दैवी, आसुरी शक्तियों के युद्ध संघर्ष का क्रम चिरकाल से चला आ रहा है। असुर अपने प्रबल पुरुषार्थ के आधार पर पहले दौर में विजयी होते रहे हैं। देवताओं की एकांकी धार्मिक रुचि से सम्बन्धित रही है, वे बल, पुरुषार्थ एवं संगठन से उदासीन रहते है, इस भूल का दण्ड उन्हें अनेक बार भुगतान पड़ा है। देव दानव युद्ध के प्रथम दौर में दानवों को विजय देवताओं की एकाकी प्रगति के कारण उपलब्ध होती रही है। पराजित देवों को अन्ततः आत्म शक्ति का सहारा लेना पड़ा है और तब वे नई सामर्थ्य से सुसज्जित होकर संघर्ष क्षेत्र में उतरते और विजयी होते रहे हैं।

देवाधिराज इन्द्र को पराजित स्थिति से उतार कर विजयी बनाने में समय समय पर आदि शक्ति भगवती गायत्री का योगदान रहा है। ऋषियों, महापुरुषों एवं सामान्य मनुष्यों ने इस शक्ति के आधार पर कैसे पराजित स्थिति से छुटकारा पाकर विजयी बनने में सफलता पाई है, इसके कुछ प्रसंग नीचे देखिये-

मातः प्रसीद सुमुखी भव दीनसत्वाँ स्त्रायस्य, नो जननि दैत्य पराजितान्वै। त्वं देवि नः शरणदा भुवने प्रमाणा शक्तासि दुःख शमनेअखिल दीर्ययुक्ते। ध्यायन्ति येअपि सुखिनो नितराँ भवन्ति। दुःखान्विला विगत शोक-भयास्तयान्ये रुह्मार्थिनो विगतमानविमुक्त संगाः संसार वारिधजलं प्रतरन्ति संतः। त्वं देवि विश्व जननि प्रथित प्रभावा संरक्षणार्थ मुदिताअअर्ति हर प्रतापा।

इन्द्रादि देवगण सावित्री देवी का स्तवन करते हुए कहते हैं- “हे माता! आप प्रसन्न होइए और सुमुखि अर्थात् प्रसन्न मुख वाली होकर कृपा कीजिये। हे जननी! हम हीन सत्व वालों को आप रक्षा कीजिये, जिन हम लोगों को दुष्ट दैत्य गण अहर्निश पराजित करने की चेष्टा किया करते हैं। हे देवि! आप लोक में शरण में आये हुओं की सुरक्षा करने वाली प्रसिद्ध हैं और आप समस्त प्रकार के दुःखों के शमन करने में पूर्ण समर्थ हैं। आप परिपूर्ण पराक्रम से युक्त हैं। जो भी कोई आपका ध्यान किया करते हैं, वे अत्यन्त सुखी हो जाते हैं। जो भी कोई दुःखों से युक्त होते है, वे आपकी कृपा से शोक और भय से छुटकारा पा जाया करते हैं। जो मोक्ष की इच्छा रखने वाले हैं, वे मान और संग से रहित होकर सन्त पुरुष आपके प्रसाद से इस संसार रूपी समुद्र के जल को पार कर जाते हैं। हे देवि! आप इस सम्पूर्ण विश्व की माता हैं। आपका यह प्रभाव सर्वत्र प्रसिद्ध है कि आप दुःखियों के संरक्षण करने के लिये ही प्रकट हुई हैं और आपका प्रताप समस्त दुःखों को मिटा देने वाला है।

त्वतः सर्वमिदं विश्वं स्थावरं जगमं तथा। अन्ये निमित्त मात्रा स्ते कर्तारस्तव निर्मिताः।

अर्थ-हे देवि! यह सम्पूर्ण चराचर विश्व आपसे ही समुत्पन्न हुआ है। अन्य ब्रह्मादि जो इसके कर्ता हैं, वे तो केवल इसके निमित्त मात्र ही हैं, क्योंकि उनको भी आपने ही बनाया है।

संहर्त्त् मेतदह्मिलं किल काल रूपा कोवेत्ति तेअम्ब चरि त्वं तेनु मन्द बुद्धिः। ब्रह्मा हरश्च हरिश्च रचो हरिश्च इन्द्रो यमोअथ वरुणोअग्नि समीरणौच। सातुँ क्षमान् मुन योअपि महानुभावा यस्याः प्रभावमतुलं निगमागमाश्च। धन्यास्त एवं तव मक्तिपरा महान्तः संसार दुः,ख रहिता सुख सिन्धु माताः॥

हे देवि! इस सम्पूर्ण विश्व का जब आप संहार करना चाहती हैं तो आप ही का स्वरूप वाला बन जाया करता है। हे अम्बा! मन्द बुद्धि वाला कौन आपके चरित्र को समझ सकता है, जबकि ब्रह्मा, हर, हरिदश्च रथ, हरि, इन्द्र, यम, वरुण, अग्नि, वायु ये सब भी आपके इस परम अद्भुत चरित्र के जानने में समर्थ नहीं होते हैं। महानुभाव मुनिगण और निगम और सागम भी जिस आपके अतुल प्रभाव को नहीं समझते हैं और महान् हैं। आपके भक्तजन इस संसार के दुःख से रहित होकर सदा सुख के सागर में मग्न रहा करते हैं। आपकी भक्ति का ऐसा अद्भुत प्रभाव है।

देवोघाने पराशपतेः प्रासादमकरोद्धरिः। पह्मरागमयी मूर्ति स्थापयामास वासवः॥

त्रिकालं महतीं पूजाँ चक्रुः सर्वेअपि निर्जराः। तदा प्रभृति देवानाँ श्री देवी कुल दैवतम्॥

विष्णु च त्रिभुवन श्रेष्ठ पूजया मास वासवः। ततो हते महावीयें वृत्रे देव भयकंरे॥

अर्थ- इसके अनन्तर इन्द्र ने देवोद्यान में परमशक्ति देवी का एक परम सुन्दर प्रसाद का निर्माण कराया था और उसमें एक पद्मरांग मणि की प्रतिभा को निर्मित करा कर संस्थापित किया था। वहाँ पर उस देवी की समस्त देवगण तीनों काल में महती अर्चना किया करते थे। उसी समय से देवताओं की श्री देवी कुल देवता मानी जाने लगी थी। उस महान् भयंकर शत्रु देवगण को त्रास देने वाले अत्यन्त पराक्रमी वृत्रासुर के वध हो जाने पर इन्द्र ने त्रिभुवन में श्रेष्ठ भगवान् विष्णु का भी पूजन किया था।

पूर्व मदोद्धता वैस्या देवैर्युद्धं तु चकिरे। शतवर्ष महाराज महाविस्मय कारकम्॥

पराशक्ति कृपानेशात् देवैर्दैत्या जितायुधि। त्तः प्रहर्षिता देवाः स्वपराक्रम वर्णनम्॥

चक्रूः परस्परं मोहात्साभि माताः समन्ततः। परोशक्ति प्रभावं ते स्वत्वा मोहभाग ताः॥

तेषा मनुग्रहं कतु तदैव जगदम्बिका। प्रादुरासीत् कृपा पूर्णा यज्ञ रूपेण भूमिय।

कोटि सूर्य प्रतीकाशं चन्द्र कोदि सुशीतलम्। विद्युत्कोटि समानाभं हस्त पादादि वर्जितम्॥

अदृष्ट पूर्व तद दृष्ट्वा तेजः परम सुन्दरम्। सविस्मया स्तरा प्रोचः किमिदं किमिदं विति॥

प्राचीन काल में मद से उद्धत दैत्यों ने देवताओं के साथ युद्ध किया था। वह महाघोर युद्ध सौ वर्ष एक महान् विस्मय उत्पन्न करने वाला हुआ था। उस समय परमशक्ति की कृपा के आवेश से ही देवगण ने युद्ध में दैत्यों को पराजित किया था। विजय होने पर देवगण अत्यन्त प्रसन्न हुए और परस्पर में अपने बल-पराक्रम की प्रशंसा का वर्णन करने लगे। परमशक्ति के प्रभाव का ज्ञान प्राप्त न कर मोह से अभिमानपूर्वक सभी ओर अपने बल की शेखी बघारते थे। उन देवताओं पर कृपा करने के लिये जगत्-जननी ने उसी समय में अपना प्रादुर्भाव किया था। भगवती कृपा से परिपूर्ण स्वरूप वाली थीं। हे राजन्! उसने एक यक्ष के रूप में देवों को दर्शन दिया था। उस समय करोड़ों सूर्यों के तुल्य उसका तेज था, किन्तु करोड़ों चन्द्रों के सदृश वह तेज शीतल भी था। करोड़ों विद्युत के समान देदीप्यमान वह तेज हस्त पाद आदि से रहित था। ऐसे दिव्यातिदिव्य तेज को देवों ने पहले कभी भी नहीं देखा था, जो कि बहुत ही अधिक सुन्दर भी था। तब तो देवता आश्चर्य से भर गये और कहने लगे कि यह क्या वस्तु है?

इत्यं निश्चित्य तत्रैव गर्व हित्वा सुरेश्वरः। चरित्र मीदृशं यस्य तमेव शरणंगतः॥

तस्मिन्मेव क्षणे जाता व्योम वाणी नमस्तले। मायाबीजं सहस्त्राक्ष जप तेन सुखी भव॥

ततो जजाय परमं माया बीजं परात्परम्। तदेवायिरभूत्तेज स्तस्मिन्नेव स्थले पुनः॥

प्रेमाश्र पूर्ण नयनो रोमांचित तनुस्ततः। दण्डवत्प्रणनामाय पादयोर्जगदीशि तुः॥

तुष्टाव विविधैः स्तोत्रैर्यक्ति सम्मत कन्धरः। उवाच परम प्रीतः किमिहं यक्षमित्यणि॥

प्रादुर्भूत च कस्मात्तहद सर्व सुशोभने। इति तस्य वचः श्रृत्वा प्रोवाच करुणार्णथा।

मत्प्रसाद्भवभिस्तु जलोलब्धोअस्ति सर्वथा। अनुग्रहं ततः कर्तयुश्मदंहायनुशमम्॥

निःसुतं सहसा तेजो मदीपं यक्षमित्यपि।

अर्थ- देवेश्वर ने मन में विचार किया कि मुझे अब इसकी ही शरण में जाना चाहिये, अन्य कोई भी चारा नहीं है। ऐसा निश्चय करके वहाँ पर ही अपने गर्व का परित्याग करके देवेश्वर इन्द्र न जिसका ऐसा अद्भुत चरित्र है, उसी की शरणागति प्राप्त हो गया था। उसी क्षण में आकाश में,प्रकाशवान उत्पन्न हुई थी-हे इन्द्र! तुम माया बीज का जाप करो। इसी से तुमको सुख प्राप्त होगा। इसके अनन्तर इन्द्र ने परात्पर जो माया बीज है, उसका जप किया था। अचानक ही उसी स्थल में वही तेज पुनः आविर्भूत हुआ था। उस परम दिव्यतम-दिव्य तेज को देखकर इन्द्र के नेत्रों से प्रेमाश्रुओं का पात होने लगा और उसकी सम्पूर्ण देह पुलकित हो गई थी। उस जगदीश्वरी के चरणों में इन्द्र ने दण्डवत् प्रणाम किया था भक्तिभाव से अपनी कन्धरा को नत करके अनेक स्रोतों के द्वारा उसका स्तवन किया था। इन्द्र ने प्रार्थना की कि हे सुशोभने! कृपा कर यह बताइये यह यक्ष स्वरूप क्या है, जो कि प्रादुर्भूत हुआ है और इसका क्या कारण है? इन्द्र के इस वचन का श्रवण कर अतिशय करुणा से पूर्ण भगवती ने कहा-तुम्हारा जो दैत्यों से युद्ध हो रहा था, उसमें विजय मेरी ही कृपा से तुमको प्राप्त हुई है। मैं तुम्हारे ऊपर अनुग्रह करते हुए, तुम्हारे देह से ही यह मेरा तेज सहारा यक्ष स्वरूप वाला निकला है।

अतः परं सर्वभावै हित्वा गर्वतु देहअम्। मामेव शरणं यात सच्चिनान्न्द कपिणीम्॥

इत्युपत्वा च महादेवी मूल प्रकृति रीश्वरी। अन्तर्धानं गता सच्चो भक्तया देवै रभिष्टुता॥

ततः सर्वे स्वगर्वतु विहाय षडपंकअम्॥ सम्यगाराषप्राप्ततु र्भगवत्याः परात्परम्॥

त्रिसन्ध्यं सर्वदा सर्वे गायत्री अप तत्पराः। यज्ञ भागादिभिः सर्वे देवीं नित्यं सिपेविरै॥

अर्थ- भगवती ने इन्द्र से कहा-इसलिये सर्वभावों से देह में उत्पन्न होने वाले अभियान का त्याग करके परम सच्चिदानन्द स्वरूप वाली मेरी ही शरण ग्रहण करो। अर्थात् केवल मेरी उपासना करो।” इतना कह कर मूल प्रकृति ईश्वरी महादेवी अन्तर्ध्यान ही गई। देवगण के द्वारा भक्तिभाव से उसकी स्तुति की थी। इसके अनन्तर समस्त देवों ने अपने गर्व का त्याग करके परस्पर भगवती के चरण कमल की आराधना की थी। सब लोग सर्वदा तीनों कालों में गायत्री के जप करने में तत्पर हो गये थे। सभी यज्ञ के भागों आदि के द्वारा नित्य देवी की सेवासाधना करने लगे थे।

इस संसार में अगणित भौतिक और आध्यात्मिक कष्ट संकट एवं विघ्न है। जिनके कारण सत्यासत्य स्तर का विघ्न रहित जीवन यापन कठिन हो जाता है। प्रयत्न करते हुए भी सफलता हाथ नहीं लगती। ऐसी दशा में करते हुए भी सफलता हाथ नहीं लगती। ऐसी दशा में हमें हताश न होकर भगवती आदि-शक्ति-अध्यात्म सामर्थ्य-गायत्री माता का सहारा लेना चाहिये।


जागृत कुण्डलिनी और कुण्डलिनी जागरण-

ब्रह्म को जहाँ सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापी और निर्विकार कहा जाता है वहाँ उसे मूढ़ भी कहा जाता है। मूढ़ का अर्थ है अज्ञानी गुम-सुम बैठा रहने वाला। उसकी न कोई इच्छा है न आकांक्षा ऐसा ब्रह्म विश्व के सृजन और पालन का उत्तरदायित्व भला कैसे पूरा कर सकता था। इसलिये उस जागृत करने की आवश्यकता पड़ी। इस आवश्यकता की पूर्ति उसकी शक्ति (शिव) ने की। यह शक्ति या शिव तत्व और कुछ नहीं कुण्डलिनी ही है, वहीं ब्रह्म को क्रियाशील बनाती है। इस शास्त्रीय विवेचन की पुष्टि के लिये शरीरगत कुण्डलिनी तत्व का अध्ययन करना चाहिए।

मेरुदण्ड के अन्तिम भाग की स्थूल रचना और गतिविधि की चर्चा पिछले पृष्ठों में की जा चुकी है यहाँ तक डाक्टरों और वैज्ञानिकों की भी पहुँच हो चुकी है किन्तु मेरुदण्ड के भीतर सूक्ष्म प्रवाह और चैतन्य लोकों के निर्माण और उनके क्रिया कलाप का अध्ययन केवल भारतीय योगी ही कर सके हैं। इन सूक्ष्म लोकों का महत्व सर्वाधिक है। उनकी जानकारी से ही विश्व रहस्यों का उद्घाटन होता है। अलौकिक शक्तियाँ प्राप्त होती है, मनुष्य जीवन का वास्तविक अर्थ समझ में आता है और स्वर्ग, मुक्ति या परम पद प्राप्ति का द्वार खुलता है।

गुदा क्षेत्र में सोई हुई कुण्डलिनी दो धाराओं इड़ा और पिंगला (यह नाड़ियाँ ऋण विद्युत् और धन विद्युत् गत विद्युत् के आणविक स्वरूप में अन्तर है) में होकर ऊपर को उठती है और मस्तिष्क में जाकर मूढ़ ब्रह्म की चेतना को झकझोरती है। कुण्डलिनी यदि जागृत नहीं है तो इड़ा और पिंगला अपने सामान्य परिवेश में ही काम करती है, उसी प्रकार मस्तिष्क भी सामान्य ढीले-पोले काम करता रहता है पर जागृत कुण्डलिनी के आवेश को संभालना तो मस्तिष्क के लिये भी कठिन हो जाता है। फिर वह बैठा नहीं रह सकता। कुछ न कुछ उछल-कूद तोड़-फोड़ बनाव शृंगार उसे करना ही पड़ता हैं। जिस व्यक्ति की कुण्डलिनी जाग जाती है वह जागृत अवस्था की तहत गम्भीर निद्रावस्था में भी उतना ही सचेतन रहता है। उसकी स्वप्न और जागृति में कोई अन्तर नहीं आता। जिस तरह जागृत अवस्था में वह किसी से बातचीत करता, सुनता, सोचता, विचारता, प्रेरणा देता, सहायता, सहयोग देता रहता है उसी प्रकार स्वप्नावस्था में भी उसकी गतिविधियाँ चला करती हैं। उस अवस्था में वह किसी का भला भी कर सकता है और नई-नई जानकारियों के लिये अन्य ब्रह्माण्डों में सैर के लिये भी जा सकता है। अन्य ब्रह्माण्डों का अर्थ विद्धि रूप से सूर्य, चन्द्र, बृहस्पति, शुक्र, हर्शल, प्लूटो आदि से है। यह आश्चर्य लगने वाली बात उसके लिये बिल्कुल साधारण और सामान्य होती है। साधना में तीन व्यक्तियों को कभी कभी रात में ऐसे कुछ स्वप्न हो जाते हैं जिसमें उन्हें किसी भविष्य की घटना का पूर्वाभास मिल जाता है या किसी गोपनीय रहस्य का पता चल जाता है। वह कुण्डलिनी की ही शक्ति होती है।

हमारी धरती गोलाकार है उसके केन्द्र में अति गर्मी है जिससे वहाँ की सब वस्तुएँ और धातुएँ गली हुई तरल स्थिति में होती हैं। मूलाधार की वह गाँठ, जहाँ मेरुदण्ड समाप्त होता है और जिसे अनेक नाड़ी गुच्छकों ने बाँध रखा है, का भेदन किया जाय तो वहाँ अत्यन्त तेजस्वी और उष्ण शक्ति मिलती है, यही कुण्डलिनी है। वह स्फुरणा वाली शक्ति है इसलिये यहाँ नाड़ी गुच्छक भी स्फुरित से है चारों ओर को उत्तेजित से बने रहते हैं। यहाँ की अग्नि पृथ्वी में पाई जाने वाली अग्नि से बहुत कुछ मिलती जुलती होती है।

विज्ञान का एक नियम है कि एक पदार्थ के सभी अणुओं की चेष्टाएँ मूल पदार्थ जैसी ही होती हैं। उदाहरणार्थ लोहे में जो गुण और चेष्टा होगी वही उसके परमाणु में भी होगी। नमक में जो गुण और तत्व होंगे उसके परमाणु में भी वही होंगे। गुदा पार्थिव पदार्थों से बना हुआ होने के कारण उसके गुण, अहंकार और वासनायें भी पार्थिव होती हैं इसलिये शक्ति की दृष्टि से भी वह कुण्डलिनी की तरह ही महत्त्वपूर्ण होता है अर्थात् कुण्डलिनी का एक उपयोग केवल पार्थिव काम वासना-जन्य सुखों के लिये भी किया जा सकता है पर उस स्थिति में शक्ति अधोगामी होने से उसका पतन शीघ्र हो जाता है और ऐसे मनुष्य की वासनायें मृत्यु तक भी शान्त नहीं होती इसलिये उसे उनकी पूर्ति के लिये पुनः जीवन धारण करना पड़ता है।

लेकिन जब कुण्डलिनी जागृत हो जाती है और इड़ा, पिंगला समान गति से ऊर्ध्वगामी हो जाती हैं तो एक तीसरी धारा सुषुम्ना का आविर्भाव होता है। उससे ऊर्ध्वमुखी लोकों की अनुभूति और गमन का सुख मिलता है यह सुख संभोग सुख जैसा होता है पर संभोग का सुख क्षणिक होता है और ऊर्ध्वमुखी आध्यात्मिक सुख का रसास्वादन निरन्तर किया जा सकता है। पर उसके लिये कुण्डलिनी को जगाना आवश्यक हो जाता है।

कुण्डलिनी जगाने का अर्थ भीतर गोलों की कुण्डलिनी को क्रियावान् करना है। पवित्रता के बिना इस कार्य में बड़ा जोखिम है। इसलिये उसे गुप्त रखा गया।

कुण्डलिनी के दो उत्पत्ति स्थान माने गये हैं, एक सूर्य केन्द्र में निवास करने वाली पुरुषरूपी और दूसरी स्त्री रूप में पृथ्वी केन्द्र में। पृथ्वी केन्द्र में कुण्डलिनी को प्राणधारियों की जीवन सत्ता का केन्द्र कह सकते हैं। यह दरअसल सूर्य कुण्डलिनी का ही बीज है। कहा जाता है कि संसार जो कुछ भी है वह सब बीज रूप से देह में विद्यमान् है सूर्य भी कुण्डलिनी के रूप में शरीर में बैठा हुआ है। शारीरिक मूलाधार में ग्रन्थि का जब विकास होता है तब उसमें सूर्य जैसी होती है। अर्थात् उसमें मनुष्य की शक्ति सूर्य की जितनी शक्ति वाली, सर्वव्यापी, सर्व-समर्थ हो जाती है फिर उस शक्ति का नियन्त्रण करना कठिन हो जाता है। कमजोर मन और शरीर वाले उस शक्ति को धारण नहीं कर सकते।

गायत्री का देवता “सविता” है और कुण्डलिनी की प्रतिनिधि शक्ति भी सूर्य ही है इसलिये गायत्री उपासना का सीधा प्रभाव मेरुदण्ड से होकर इस गुदा क्षेत्र में ही होता है। ऊपर से उतरने वाला प्राण प्रवाह पहले यहीं पहुँचता है और फिर गुच्छकों के द्वारा सारे शरीर में संचित होता रहता है। जितना अधिक साधन का विकास होता है उतना ही प्राणशक्ति का अभिवर्द्धन और उसी अनुपात से कुण्डलिनी जागृत होती चलती है। यह प्रकाश धीरे-धीरे नेत्र, वाणी, मुख और ललाट आदि सम्पूर्ण शरीर में चमकने लगता है। त्वचा में यही कोमलता और बुद्धि में सात्विकता एवं पवित्रता की अभिवृद्धि करता है। यह क्रिया धीरे-धीरे होती है इसलिये हानि की भी आशंका नहीं रहती उपासक अपने आत्म-कल्याण भर के संकेत प्राप्त करता हुआ जो वास्तविक लक्ष्य है वह जीवन -मुक्ति भी प्राप्त कर लेता हैं।

सविता लोक से आने वाले प्राणकण यद्यपि बहुत छोटे होते हैं किन्तु इतने प्रकाशमय होते है कि बिना दिव्य-दृष्टि के भी उन्हें देखा जा सकता है। आसमान की ओर देखने पर वायु में छोटे-छोटे प्रकाश के कण अति शीघ्रता से चारों ओर उछलते हुए दिख पड़ते हैं ये प्राणकण ही हैं। यह कण सात ईश्वर कणों से विनिर्मित होता है। यह प्राण कण सफेद होता है पर ईश्वर के सातों अणु सात रंगों के बने होते हैं। सूर्य भी सात रंगों का प्रकाश है। नाभि चक्र में घुसने पर यह रंग अलग-अलग होकर अपने क्रिया क्षेत्रों में बँट जाते हैं नीला और लाल रंग मिली हुई हल्की बैगनी (वायलेट) और नीली किरणें कंठ में चली जाती हैं और हल्की नीली कण्ठ चक्र में। यह दोनों गले को शुद्ध रखती हैं और वाणी को मधुर बनाती हैं। कासनी और गहरा नीला मस्तिष्क में चले जाते हैं उससे विचार, भक्ति और वैराग्य के गुणों का आविर्भाव होता है। गहरा नीला मगज के निचले और मध्य भाग तथा नीला रंग सहस्रार का पोषण करता है।

पीली किरणें हृदय में प्रवेश करती है उससे रक्तकणों की शक्ति और स्निग्धता बढ़ती है। शरीर सुन्दर बनता है। यही किरणें बाद में मस्तिष्क को चली जाती हैं जिससे विचार और भावनाओं का समन्वय होता है।

हरी किरणें पेट की अन्तड़ियों में कार्य करती हैं इससे पाचन क्रिया सशक्त बनती है। गुलाबी किरणें ज्ञान तन्तुओं के साथ सारे शरीर में फैलती है आरोग्य की दृष्टि से इन किरणों का बड़ा भारी महत्व है ऐसी की बहुतायत वाला व्यक्ति किसी को भी हाथ रखकर स्वस्थ कर सकता है। देवदारु और यूकेलिप्टस वृक्षों में इन किरणों की ही बहुतायत होती है जिससे उनकी छाया भी बहुत आरोग्यवर्धक होती हैं। नारंगी लाल किरणें जननेन्द्रियों तक पहुँचकर गुदा वाले रोग ठीक कर देती हैं और शरीर की गर्मी में सन्तुलन रखती हैं। हलकी बैंगनी किरणें भी यहाँ आकर इस क्रिया में हाथ बँटाती हैं यदि कामवासना पर नियन्त्रण रखा जा सके तो इन किरणों को ही मस्तिष्क में भेजकर भविष्य ज्ञान, दूर दर्शन, दर श्रवण आदि चमत्कार, प्राप्त किये जा सकते हैं। शुद्ध पीले रंग से बुद्धि का विकास होता है। गहरा लाल किरमिजी (क्रिमसन) से सर्वात्म भाव और प्रेमभाव का विकास होता है। इन रंगों की सम्मिलित शक्ति से आध्यात्मिकता का विकास होता हैं। इस तरह यह देखने में आता है कि कुण्डलिनी जागरण से आन्तरिक कलेवर का आमूल-चूल परिवर्तन हो जाता है। इस क्रान्ति का माध्यम शरीरस्थ कुण्डलिनी को सूर्य कुण्डलिनी से जोड़ देना ही होता है। यह क्रिया वैसे ही है जैसे किसी बड़े तालाब से छोटी सी नाली लगाकर खेतों तक पानी पहुँचा देते हैं। कुण्डलिनी जागरण की यह साधना समय साध्य तो है पर जोखिम नहीं है।


VigyapanSuchana

बसन्त पंचमी हमारा प्रधान पर्व-

बसन्त पंचमी अपने परिवार के लिये सबसे बड़ा और सबसे महत्व का पुण्य पर्व है। इसलिये हम सभी इसे बड़े उत्साह और चाव के साथ कई वर्ष से मानते चले आ रहे हैं। व्यक्तिगत रूप से तो यह हमारा प्रधान हर्षोत्सव था ही, अब वह समस्त परिवार के लिये भी प्रेरणा पर्व बन गया है।

इस पुण्य पर्व के दिन आरम्भ में हमें प्रकाश मिला और साधना पथ पर कदम बढ़ा। शरीर किसी भी दिन पैदा हुआ हो हमारा आध्यात्मिक जन्मदिन यही है। जैसे संन्यासी होने के बाद पिता का नाम विसर्जित और गुरु नाम अपने नाम के आगे जोड़ा जाना आरम्भ हो जाता है। उसी प्रकार हमारा जन्म-दिन बसन्त पंचमी है। उसी दिन जहाँ कहीं हर्षोत्सव मनाये जाते वाले होते हैं, मनाये जाते हैं।

अखण्ड ज्योति पत्रिका इसी दिन से निकाली गई, गायत्री तपोभूमि का शिलान्यास इसी दिन हुआ। शत कुण्डी और सहस्र कुण्डी यज्ञों के संकल्प इसी दिन हुए। वेद, उपनिषद्, दर्शन, स्मृति, पुराण आदि महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ इसी पर्व से आरम्भ किये जाते रहे। गायत्री परिवार इसी दिन बना। युग निर्माण योजना का शुभारम्भ इसी पर्व से किया गया। अपनी भावी तपश्चर्या से लेकर महाप्रयाण भी इसी पर्व को करने का मन है इस प्रकार हमारे व्यक्तिगत और सामूहिक सभी कार्य इसी दिन से आरम्भ होते रहे हैं। अब से तीस वर्ष बाद युग परिवर्तन का स्पष्ट स्वरूप इसी दिन एक चमत्कारी घटना के साथ आरंभ होगा। अखण्ड ज्योति परिवार के सदस्य यह पर्व गत कई वर्षों से बड़े उत्साह और समारोह के साथ मनाते रहे हैं। इस वर्ष वह भी अधिक उल्लास के साथ मनाया जाना चाहिए। इस वर्ष 22 जनवरी 1969 बुधवार को बसन्त पंचमी है। उस दिन सामूहिक जप, हवन, भजन कीर्तन, प्रवचन दीप-दान जैसे आयोजन तो होने ही चाहिए। साथ ही यह भी मिशन की प्रगति के लिये हम क्या कुछ कर सकते हैं उस पर भी विचार करना चाहिए। एक घण्टा समय, दस पैसा रोज ज्ञान यज्ञ के लिये निकालने वाली बात जिनने आरम्भ न की हो वे इस पर्व में आरम्भ कर सकें जिनका यह क्रम चल रहा है वे दूसरे नये साथी उत्पन्न करने का प्रयास करें तो यह पर्व सार्थक हो जाय। हमारे जन्म दिन पर शुभ कामना प्रकट करने, बधाई भेजने का शाब्दिक लोकाचार व्यर्थ हैं। किसी को कुछ वस्तुतः श्रद्धा हो तो हमारे मिशन को आगे बढ़ाने के प्रधान साधन दोनों पत्रिकाओं के सदस्य बढ़ाने का परिश्रम सच्ची श्रद्धा के रूप में प्रस्तुत करें।


अपनों से अपनी बात - विदाई की घड़ियाँ, हमारी व्यथा-वेदना

आयु की दृष्टि में लगभग 60 वर्ष पूरे करने जा रहे हैं। हमारे साँसारिक जीवन में एक बड़ा विराम यहीं लग जाना है। एक छोटे नाटक का यहीं पटाक्षेप है। दो वर्ष में कुछ ही अधिक दिन शेष हैं कि हमें अपनी वे सभी हलचलें बन्द कर देनी पड़ेगी जिनकी सर्वसाधारण को जानकारी बनी रहती हैं। इसके उपरान्त क्या करना होगा, इसकी सही रूपरेखा तो हमें भी मालूम नहीं है पर इतना सुनिश्चित है कि यदि आगे भी जीना पड़ा तो उससे सर्वसाधारण का कोई प्रत्यक्ष सम्बन्ध न होगा। कहना चाहिए जो ऐसा प्रकाश पाकर भी अन्धकार में भटके। यदि हमारी कोई विशेषता और बहादुरी है तो वह इतनी भर कि प्रलोभनों और आकर्षणों को चीरते हुए दैवी निर्देशों का पालन करने में हमने अपना सारा साहस और मनोबल झोंक दिया। जो सुझाया गया वही सोचा और जो कहा गया वही करने लगे। इसी प्रक्रिया में एक नगण्य सी जिन्दगी का एक छोटा-सा नाटक समाप्त हो चला, यही हमारी नन्हीं-सी आत्म-कथा है। अब जीवन के अन्तिम चरण में जो निर्देश मिला है उससे ऐसा विचित्र और कष्टकर निर्णय हमें स्वेच्छा से नहीं करना पड़ा है वरना इसके पीछे एक विवशता है। अब तक का सारा जीवन हमने एक ऐसी सत्ता के इशारे पर गुजारा है जो हर घड़ी हमारे साथ है। हमारी हर विचारणा और गति विधि पर उसका नियन्त्रण है। बाजीगर की उँगलियों से बंधी हुए धागों के साथ जुड़ी हुई कठपुतली तरह-तरह के अभिनय करती हैं। देखने वाले इसे कठपुतली की करतूत मानते हैं पर असल में वह बेजान लकड़ी का एक तुच्छ-सा उपकरण मात्र है। खेल तो बाजीगर की उँगलियाँ करती हैं। हमें पता नहीं कभी कोई इच्छा निज के मन में प्रेरणा से उठी है क्या? कोई क्रिया अपने मन से ही है क्या? जहाँ तक स्मृति साथ देती है एक ही अपना क्रम-एक ही ढर्रे पर लुढ़कता चला आ रहा है कि हमारी मार्ग-दर्शक शक्ति जिसे हम गुरुदेव के नाम से स्मरण करते हैं, जब भी जो निर्देश देती रही है बिना अनुनय किये कठपुतली की तरह सोचने और करने की हलचलें करते रहे हैं।

सौभाग्य ही कहना चाहिए कि आरम्भिक जीवन से ही हमें ऐसा मार्ग-दर्शन मिल गया। उसे अभागा ही इनकार कौन करे? कैसे करे? अपने बस की यह बात नहीं। जब सारी जिन्दगी के हँसते मुस्कराते दिन एक इशारे पर गुजार दिया तो अब इस जरा जीर्ण काया कि सुविधा-असुविधा का, परिजनों की मोह ममता का विचार कौन करे? दो ढाई वर्ष हमें अपना वर्तमान क्रिया कलाप समाप्त करना ही है और एक ऐसी तपश्चर्या में संलग्न होना ही है जिसमें जन संपर्क की न तो छूट है और न सुविधा।

पिछले और अगले दिनों की कभी तुलना करने लगते हैं तो लगता है छाती फट जाएगी और एक हूक पसलियों को चीर कर बाहर निकल पड़ेगी। कोई अपनी चमड़ी उखाड़कर भीतर का अन्तरंग परखने लगे तो उसे माँस और हड्डियों में एक तत्व उफनता दृष्टिगोचर होगा वह है असीम प्रेम। हमने जीवन में एक ही उपार्जन किया है-प्रेम एक ही सम्पदा कमाई है-प्रेम एक ही रस हमने चखा है और वह है प्रेम का। यों सभी में हमें अपनापन और आत्मभाव प्रतिबिंबित दिखाई पड़ता है पर उनके प्रति तो असीम ममता है जो एक लम्बी अवधि में भावनात्मक दृष्टि से हमारे अति समीप रहते रहे हैं। इनसे विलग होते हुए हमें कम व्यथा नहीं है।

प्रिय प्रेमी जन अपनी विरह वेदना व्यक्त करते हुए, यह बिछोह का अवसर टाल दो और अब तक की तरह आगे भी ऐसे ही बने रहो की बात कहते हैं तो उनकी आत्मीयता और व्यथा भली प्रकार समझ में आ जाती है। हर किसी को विश्वास रखना चाहिए कि और कुछ हमारे पास हो चाहे न हो असीम प्यार भरी ममता से हमारा अन्तःकरण भरा पूरा अवश्य है। जिसने हमें तिल-भर प्यार किया है उसके लिये अपने मन में से ताड़ बराबर ममता उमड़ी है। लम्बी अवधि से जिनके साथ हँसते, खेलते और प्यार करते चले आ रहे हैं उनसे विलग होने की बात सोचकर हमारा मन भी गाय बछड़े के वियोग की तरह कातर हो उठता है। कई बार लगता है कोई छाती में कुछ हूक रहा है। यह वियोग कैसे सहा जाएगा। जिसकी कल्पना मात्र से दिल बैठ जाता है, उसी असह्य को सहन करने में कितना बोझ पड़ेगा? और कहीं उस बोझ से यह टूट ढवड़ा चरमरा कर बैठ तो नहीं जायेगा ऐसी आशंका होती है।

ज्ञान और वैराग्य की पुस्तकें हमने बहुत पढ़ी है। माया, मोह की निरर्थकता पर बहुत प्रवचन सुने हैं। संसार मिथ्या है, कोई किसी का नहीं- सब स्वार्थ के हैं आदि आदि ब्रह्मचर्य में भी सम्मिलित होने का अवसर मिला है। यदा कदा उन शब्दों को दूसरों के सामने दुहराया भी हैं। पर अपनी दुर्बलता को प्रकट कर देना ही भला है कि हमारी मनोभूमि में अभी तक भी वह तत्व ज्ञान प्रवेश नहीं करता है। न कोई पराया दिखता है और न कहीं माया का आभास होता है जिससे विलग विरत हुआ जाय। जब अपनी ही आत्मा दूसरों में जगमगा रही है तो किससे मुँह मोड़ा जाय? किससे नाता तोड़ा जाय? जो हमें नहीं भुला पा रहे हैं, उन्हें हम कैसे भूल जायेंगे? जो साथ घुले और जुड़े हैं उनसे नाता कैसे तोड़ लें? कुछ भी सूझ नहीं पड़ता। पढ़ा हुआ ब्रह्मज्ञान रत्ती भर भी सहायता नहीं करता। इन दिनों, बहुत करके रात में जब आँख खुल जाती हैं तब यही प्रसंग मस्तिष्क में घूम जाता है। स्मृति पटल कर स्वजनों की हँसती बोलती मोह ममता से भरी एक कतार बढ़ती उमड़ती चली आती है। सभी एक से एक बढ़कर प्रेमी-सभी एक से एक बढ़कर आत्मीय-सभी की एक से एक बढ़कर ममता। इस स्वर्ग में से घसीट कर हमें कोई कहाँ लिये जो रहा है? क्यों लिये जा रहा है? इन्हें छोड़कर हम कहाँ रहेंगे? कैसे रहेंगे? कुछ भी तो सूझ नहीं पड़ता। आँखें बरसती रहती हैं और सिरहाने रखे वस्त्र गीले होते रहते हैं।

यह सोचने की गुँजाइश नहीं कि जिस कठोर कर्तव्य में हमें नियोजित किया जा रहा है वह अनुपयुक्त है। हमें कोई सता रहा है या बलात् विवश कर रहा है। हमें दूसरों से जितना प्यार है, हमारे मार्ग दर्शक को हमारे प्रति उसकी अपेक्षा कहीं अधिक प्यार है। स्वजनों की व्यथा हमें जैसे विचलित कर देती है हमारी व्यथा उन्हें कुछ भी प्रभावित न करती हो सो बात नहीं। पर वे दूरदर्शी हैं हम अज्ञानी। हमारे शरीर, मन और आत्मा का श्रम एवं सदुपयोग अधिक अच्छी तरह समझते हैं इससे उनके निर्णय और निर्देश अनुपयुक्त नहीं हो सकते। उसके पीछे हमारी आत्मा का और विश्व मानव का अविच्छिन्न हित साधन जुड़ा हुआ है यह सुनिश्चित है। यदि ऐसा न होता तो वे न तो हमारे परिवार को रुलाते और न हमें इधर उधर मुँह छिपाकर चुप-चुप सिसकते रहने की व्यथा-वेदना सहने का भार डालते।

गुरुदेव की विवशता है। आज की उबलती हुई दुनियाँ को शीतलता प्रदान कर सकने वाली परिस्थितियों की आवश्यकता है। वे परिस्थितियाँ समुद्र मंथन जैसे एक महान् संघर्ष से उत्पन्न होंगी। उस संघर्ष अभियान का सूत्र संचालन करने के लिये तेजस्वी आत्माओं का आगे आना आवश्यक है। ऐसी आत्मायें हैं तो पर उनकी नसों का ओज जम गया है। वे अकड़े और जकड़े बैठे हैं। जरूरत उस गर्मी की है जो इस अकड़न और जकड़न की स्थिति को बदले और जो जम गया है उसे पिघलाकर गतिशील बना दे। ऐसी गर्मी किसी प्रचण्ड तपस्या से ही उत्पन्न हो सकती है। पिछले स्वतन्त्रता संग्राम से ऐसी गर्मी श्री रामकृष्ण परमहंस, महर्षि रमण और योगी अरविन्द जैसे तपस्वी उत्पन्न करते रहे हैं, अब उससे भी बड़ा मनुष्य के भावनात्मक नवनिर्माण का लक्ष सामने है। इसके लिये प्रबुद्ध आत्माओं का अवतरण और जागरण एक अनिवार्य आवश्यकता है। इसकी पूर्ति अनादि की उस सूक्ष्म ऊष्मा से भर देने पर ही सम्भव है जो समर्थ और सजग आत्माओं को तुच्छता के बन्धनों से मुक्त करके महानता की भूमिका में जागृत कर सके। ऐसी आत्मायें आज भी विद्यमान् है परा उनकी अज्ञात मूर्छा उठने ही नहीं देती। इनको जगाने के लिये जिस प्रखर ऊष्मा और प्रबल कोलाहल की जरूरत है वही किसी बड़े प्रयत्न से ही संभव है। लगता है ऐसा प्रयत्न उन्हें यह सूझा है जिसके आधार पर हमें कुछ ही दिन बाद एक अद्भुत तपश्चर्या में संलग्न होना है।

इतने महान् प्रयोजन की पूर्ति के लिये यदि अपने को पात्र समझ गया है तो यह बड़ी बात है। ऐसे सौभाग्य के लिये कुछ भी निछावर किया जा सकता है। भगवान् साहस दे तो जीवित दधीचि की तरह अपना माँस पशुओं को खिलाकर अस्थियों को उपहार देव प्रयोजन के लिये समर्पित कर देना एक अनुपम सौभाग्य ही माना जाएगा। छुट पुट त्याग, बलिदान तो इन साठ वर्षों में आये दिन करते रहने पड़े हैं पर अब अन्तिम पटाक्षेप के समय इतनी बड़ी परीक्षा में उत्तीर्ण होने का श्रेय मिलता है तो इससे कोई आत्मवेत्ता, सुखी, सन्तुष्ट, प्रसन्न और प्रमुदित ही हो सकता है। इसमें हमारे लिये रोने कलपने की क्यों आवश्यकता पड़े?

इन दिनों हमारी आन्तरिक स्थिति कुछ ऐसी है जिसका विश्लेषण कर सकना हमारे लिये कठिन है। हमारी व्यथा, वेदना के कष्ट से डरने की, परीक्षा में काँपने की अथवा मोह ममता न छोड़ सकने वाली अज्ञानी जैसी लगती भर है वस्तुतः वैसी है नहीं। डर या कायरता की मंजिल पार हो चुकी। सुख सुविधा की इच्छा के लिये अब मरने के दिनों गुँजाइश भी कहाँ रही? शौक मौज की आयु ढल गई। अब तो और कोई न सही अपना जराजीर्ण शरीर भी पग- पग पर असुविधाओं उत्पन्न करेगा ऐसी दशा में सुविधाओं की कामना, असुविधाओं की अनिच्छा भी रोने-कलपने का कारण नहीं हैं। कारण एक ही है हमारी भावुकता और छलछलाते प्यार से भरी मनोभूमि। जिनका रत्तीभर भी स्नेह हमने पाया है उनका बदला पहाड़ जैसा प्रतिदिन देने के लिये मन मचलता रहता है। अपनों के साथ अपनेपन भरा भावनात्मक आदान प्रदान अन्तः- करण में जो उल्लास उमगता रहता है उसका रस छोड़ते नहीं बनता। प्रियजनों के बिछोह की कल्पना न जाने क्या कलेजे को मरोड़ डालती हैं। ब्रह्मज्ञान की दृष्टि में यदि इसे मानवीय दुर्बलता कहा जाय तो हमें अपनी यह त्रुटि स्वीकार है। आखिर एक नगण्य से तुच्छ मानव ही तो हम हैं। कब हमने दावा किया है योगी यती होने का। हमारी दुर्बलता, ममता, बुद्धि यदि हमें आज बेतरह कचोटती हैं तो उसे हम छिपायेंगे भी नहीं। एक दुर्बल मानव प्राणी की भाव भरी दुर्बलता से उसके प्रियजनों को परिचित होना ही चाहिए।

यह एक तथ्य है कि हमारा हर कदम अपने छोटे से भाव भरे परिवार से विलुप्त होने की दशा में बढ़ रहा है। जब साठ वर्ष एक एक करके देखते देखते सामने बैठे पखेरुओं की तरह उड़ गये तो अब इन बेचारे दो वर्षों की क्या चलेगी। आजकल करते देखते देखते वह दिन भी आ रही रहा है जब हमें अपनी झोला और कम्बल पीठ पर लादे किसी अज्ञात दिशा में पदार्पण करते हुए देखा जाएगा और अन्तिम अभिवादन की एक कसक भर स्मृति लेकर हम सब अपने-अपने बन्धक क्षेत्रों की ओर लौट जायेंगे और एक सुखान्त कथानक का दुखान्त पटाक्षेप हो जाएगा। अब उस स्थिति को न तो टाला जा सकता है और न बदला। यह दर्द भरा दुखान्त पटाक्षेप हमारे लिये कितना असह्य होगा और छाती पर कितना बड़ा पत्थर बाँध कर हम अपना मानसिक सन्तुलन फिर स्थिर कर सकेंगे? इस सम्बन्ध में अभी कुछ कह सकना कठिन है। समय ही बतायेगा कि उस समय कैसी बीतेगी और उसका समाधान कैसे सम्भव होगा?

अभी तो इतना ही आवश्यकता प्रतीत होता हैं कि एक बार अपनी जी की दबी हुई व्यथायें अपने स्वजन परिजनों के सामने बैठकर खोलते। कहते हैं कि मन खोलकर कह लेने में चित्त हलका हो जाता है। परिजनों को अनावश्यक भी लगे पर हमारे लिये यह सुखद ही होगा। जो हमें थोड़ी राहत दे सके ऐसा कुछ निरर्थक हो तो भी उदारता पूर्वक उसे सुन भी लिया जाना चाहिए। यह पँक्तियाँ लिखते हुए सोचा यही गया है कि पाठक इसे बिना ऊँचा पढ़ते, सुनते रहेंगे, जो काफी लम्बी है और कई अंकों तक चलेगी।

सबसे बड़ा भार हमारे ऊपर उन भाव भरी सद्भावनाओं का है जिन्हें ज्ञात और अज्ञात व्यक्तियों न हमारे ऊपर समय-समय पर बरसाया है। सोच नहीं पाते कि इनका बदला कैसे चुकाया जाय। ऋण हमारे ऊपर बहुत है। जितना असीम प्यार, जितनी आत्माओं का, कितनी आत्मीयता और सौजन्यता से हमने पाया है उसकी स्मृति से जहाँ एक बार रोम-रोम पुलकित हो जाता है वहाँ दूसरे ही क्षण यह सोचते हैं कि उनका बदला कैसे चुकाया जाय। प्रेम का प्रतिदान भी तो दिया जाता है, लेकर के ही तो नहीं चला जाना चाहिए, जिससे पाया हैं उसे देना भी तो चाहिए। अपना नन्हा-सा कलेवर, नन्हा-सा दिल, नन्हा-सा प्यार, किस किस का कितना प्रतिदान चुका सकना इससे सम्भव होगा, यह विचार आते ही चित्त बहुत भारी और बहुत उदास हो जाता है।

जिसने हमारी कुछ सेवा सहायता की है, उनकी पाई-पाई चुका देंगे। न हमें स्वर्ग जाना है और न मुक्ति लेनी है। चौरासी लाख योनियों के चक्र में एक बार भगवान से प्रार्थना करके इसलिये प्रवेश करेंगे कि इस जन्म में जिस-जिस न जितना-जितना उपकार हमारा किया हो, जितनी सहायता की हो उसका एक-एक कण ब्याज सहित हमारे उस चौरासी चक्र में भुगतान करा दिया जाये। घास, फूल, पेड़, लकड़ी, बैल, गाय, गधा, भेड़ आदि बन कर हम किसी न किसी के कुछ काम आते रह सकते हैं और इससे अपने उपकारियों के अनुदान का बदला पूरे अधूरे रूप में चुकाते रह सकते हैं। सद्भावना का भार ही क्या कम है जो किसी की सहायता का भार और ओढ़ा जाय? यह सुविधा भगवान् से लड़ झगड़कर प्राप्त कर लेंगे पर जितने समय-समय पर ममता भरा प्यार हमें दिया है, हमारी तुच्छता को भुलाकर जो आदर, सम्मान, श्रद्धा, सद्भाव, स्नेह एवं अपनत्व प्रदान किया है उनके लिये क्या कुछ किया जाय समझ में नहीं आता। इच्छा प्रबल है कि अपना हृदय कोई बादल जैसा बना दे और उसमें प्यार का इतना जल भर दे कि जहाँ से एक बूँद स्नेह की मिली हो वहाँ एक प्रहर की वर्षा कर सकने का सुअवसर मिल जाय मालूम नहीं ऐसा सम्भव होगा कि नहीं, यदि सम्भव न हो सके तो हमारी अभिव्यंजना उन सभी तक पहुँचे जिनकी सद्भावना किसी रूप में हमें प्राप्त हुई हो। वे उदार सज्जन अनुभव करें कि उनके प्यार को भुलाया नहीं गया वरन् उसे पूरी तरह स्मरण रखा गया। बदला न चुकाया जा सका तो भी अपरिमित कृतज्ञता की भावना लेकर विदा हो रहे हैं। यह कृतज्ञता का ऋण भार तब तक सिर पर उठाये रहेंगे जब तक हमारी सत्ता कहीं बनी रहेगी। प्रत्युपकार प्रतिदान न बन सका हो तो प्रेमी परिजन समझें कि उनकी उदारता को कृतघ्नतापूर्वक भुलाया नहीं गया। हमारा कृतज्ञ मस्तक उनके चरणों में सदा विनम्र और विनयावत बना रहेगा जिन्होंने हमारे दोष दुर्गुणों के प्रति घृणा न करके केवल हमारे सद्गुण देखे और सद्भावनापूर्ण स्नेह और सम्मान प्रदान किया।

मन की दूसरी व्यथा जो खोलकर रखनी है यह है कि यह शरीर साठ वर्ष की लम्बी अवधि तक अगणित मनुष्यों और जीव जन्तुओं की सेवा सहायता से लाभ उठाता रहा है। जीवन धारण करने की क्रिया में असंख्यों की ज्ञात-अज्ञात सहायता का लाभ मिला है। अन्त में ऐसे शरीर का क्या किया जाय? सोचते हैं यह मरते-मरते नष्ट होते-होते किसी के कुछ काम आ सके तो इसकी कुछ सार्थक बन जाय। मौत सबको आती है-जरा जीर्ण शरीर के तो वह और भी अधिक निकट होती है। आज नहीं तो कल हमें भी मरना है। कही अज्ञात स्थिति में यह जल जाय तो बात दूसरी है अन्यथा मनुष्यों की पहुँच के भीतर स्थिति में प्राण निकले तो उस विकृत कलेवर का धूम धाम से संस्कार प्रदर्शन बिल्कुल न किया जाय हमने वसीयत कर दी है और इस घोषणा को ही वसीयत मान लिया जाय कि मरने से, पूरी मौत से पहले ही जब तक जीवन विद्यमान् रहे सारा रक्त निकाल लिया जाय और उसे किसी आवश्यकता वाले रोगी को दे दिया जाय। अब आँखें, फेफड़े, गुर्दे, दिल आदि अंग दूसरों के काम आने लगे हैं, तब तक शायद चमड़ी, माँस हड्डी आदि का भी कुछ उपयोग दूसरे रोगियों को यह अंग लगाने में होने लगे। जो भी अंग किसी के काम आ सकता हो तो उसे सरकारी संरक्षण

*समाप्त*