उपासना प्रतिदिन करनी चाहिये। जिसने सूरज, चाँद बनाये, फूल-फल और पौधे उगायें, कई वर्ण, कई जाति के प्राणी बनाये उसके समीप बैठेंगे नहीं तो विश्व की यथार्थता का पता कैसे चलेगा? शुद्ध हृदय से कीर्तन-भजन प्रवचन में भाग लेना प्रभु की स्तुति है उससे अपने देह, मन और बुद्धि के वह सूक्ष्म संस्थान जागृत होते है, जो मनुष्य को सफल, सद्गुणी और दूरदर्शी बनाते हैं, उपासना का जीवन के विकास से अद्वितीय सम्बन्ध है।
किन्तु केवल प्रार्थना ही प्रभु का स्तवन नहीं है। हम कर्म से भी भगवान् की उपासना करते हैं। भगवान् कोई मनुष्य नहीं हैं, वह तो सर्वव्यापक एवं सर्वशक्तिमान् क्रियाशील है, इसलिये उपासना का अभाव रहने पर भी उसके कर्म करने वाला मनुष्य उसे बहुत शीघ्र आत्मज्ञान कर लेता है। लकड़ी काटना, सड़क के पत्थर फोड़ना, मकान की सफाई, सजावट और खलिहान में अन्न निकालना, वर्तन धोना और भोजन पकाना यह भी भगवान् की ही स्तुति हैं यदि हम यह सारे कर्म इस आशय से करें कि उससे विश्वात्मा का कल्याण हो। कर्त्तव्य भावना से किये गये कर्म परोपकार से भगवान् उतना ही प्रसन्न होता है जितना कीर्तन और भजन से। स्वार्थ के लिये नहीं आत्म-सन्तोष के लिये किये गये कर्म से बढ़कर फलदायक ईश्वर की भक्ति और उपासना पद्धति और कोई दूसरी नहीं हो सकती।
पूजा करते समय हम कहते है-हे प्रभु! तू मुझे ऊपर उठा, मेरा कल्याण कर, मेरी शक्तियों को ऊर्ध्वगामी बना दे और कर्म करते समय हमारी भावना यह कहती रहे, हे प्रभु! तूने मुझे इतनी शक्ति दी, इतना ज्ञान दिया, वैभव और वर्चस्व दिया, वह कम विकसित व्यक्तियों की सेवा में काम आये। मैं जो करता हूँ, उसका लाभ सारे संसार को मिले।”
इन भावनाओं में कहीं अधिक शक्ति और आत्म-कल्याण की सुनिश्चितता है। इसलिये भजन की अपेक्षा ईश्वरीय आदेशों का पालन करना ही सच्ची उपासना है।
-मैनली हाप्किन्स,
ईश्वर तथा धर्म पर अविश्वास रखने वाले प्रायः यह प्रश्न उठाया करते हैं कि “जब ईश्वर दयालु और कल्याणकारी है तो संसार में पाप और दुःख की अधिकता क्यों? आस्तिक लोग स्वयं भी कहते हैं कि संसार में धर्मात्मा कम और धर्मविमुख ज्यादा है। ईमानदारी की अपेक्षा बेईमानी की संख्या अधिक हैं।” ऐसी स्थिति में इस बात पर कैसे विश्वास किया जाय कि एक महान् चैतन्य सत्ता इस सृष्टि की रचयिता और संचालक हैं? यदि वास्तव में इसकी रचना किसी बुद्धि-भण्डार शक्ति द्वारा हुई होती तो संसार में सर्वत्र सुख आनन्द और पुण्य-कर्मों का ही प्रसार देखने में आना चाहिये था।
वास्तव में यह एक टेढ़ा प्रश्न है और इसका उत्तर देने में बहुत से आस्तिक लड़खड़ा जाते है। जिन योरोपीय ईश्वरवादियों ने इसका उत्तर दिया है, उन्होंने कहीं-कहीं अपनी असमर्थता भी स्वीकार की है। ‘थीइज्म (आस्तिकवाद) के लेखक श्री फिलण्ट ने सबको उत्तर देते हुये कहा है-यदि हमसे पूछो कि ईश्वर ने सबको धर्मात्मा क्यों नहीं बनाया तो इसका मेरे पास कोई उत्तर नहीं है। यह एक ऐसा प्रश्न है, जिसका उत्तर हो ही नहीं सकता और न उससे कुछ लाभ है। यदि तुम कहो कि ईश्वर ने मनुष्य को देवताओं की तरह क्यों नहीं बनाया तो तुम यह भी प्रश्न कर सकोगे कि उसने देवताओं से भी बहुत ऊँचे दर्जे के प्राणी क्यों नहीं बनाये। इस प्रकार अनास्था-द्वेष उत्पन्न होता है।”
फिलण्ट को इस प्रकार का समाधान इस कारण करना पड़ा है कि उनका ईश्वर पर विश्वास ईसाई धर्मानुकूल हैं, जिसका कहना है कि पहले ईश्वर ही अकेला था, वह एक मात्र अनादि हैं। उसी ने जीव और अन्य समस्त साँसारिक पदार्थों की रचना की है। इस प्रकार की मान्यता के विरुद्ध हो नास्तिकों द्वारा यह आक्षेप किया जाता है कि ईश्वर को ऐसी सृष्टि बनाने की क्या आवश्यकता थी, जिसमें सदैव पाप और वैमनस्य की वृद्धि होती रहे? पर भारतीय धर्म की मान्यता में ऐसी त्रुटियों नहीं है। उनके अनुसार ईश्वर जीवों को बनाता नहीं, वरन् उनका अस्तित्व स्वयमेव है और ईश्वर उनकी भलाई के लिये सृष्टि के पदार्थों की रचना करता है। पर उसने जीव का परतन्त्र अथवा दास की तरह नहीं बनाया है, जैसा अन्य कई धर्मों में विचार किया जाता है। हमारी मान्यता यह है कि ईश्वर जीवों की उन्नति के लिये तरह-तरह के साधन उपस्थित करता है। उनको सत्कर्मों के लिये प्रेरणा भी देता है, पर उसने कर्म करने में उनको स्वतन्त्र ही रखा है। पाप या पुण्य करना उनकी रुचि और मनोवृत्ति पर ही आधारित है। जब वे पुण्य कर्म करते हैं तो उसके बदले में वे शुभ फल-सुख पाते हैं और जब पाप करने पर उतारू हो जाते हैं तब उनको दण्ड मिलता है। पर यह शुभ परिणाम और दण्ड भी स्वयं ईश्वर नहीं देता वरन् उसने ऐसी व्यवस्था बना दी हैं कि प्रकृति स्वयं ही यह कार्य पूरा कर लेती है। भारतीय धर्म के अधिकांश विचारकों ने प्रकृति को ईश्वर की सहचरी या अनुचरी माना है इसलिये वह जो कुछ करती हैं उसका कर्ता ईश्वर ही समझा जाता है।
जिस प्रकार का आक्षेप लोग पाप के विषय में करते हैं वैसा ही भाव दुःख के विषय में भी प्रकट करते है। वे कहते हैं कि जब ईश्वर सर्वशक्तिमान है और जीवों का भला ही चाहता है तो उसने ऐसी व्यवस्था क्यों नहीं की कि संसार में दुःख का नाम ही नहीं रहता? इस शंका का उत्तर देते हुये आलफ्रेड रसेल वालेस ने अपने ग्रन्थ ‘द वर्ल्ड आफ लाइफ’ (जीवन जगत) में लिखा है-
“कुछ आलोचकों ने संसार के दुःख देखकर प्रायः घृणा हो जाती है और वे कहने लगते हैं कि यह सृष्टि सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान और दयालु सत्ता की बनाई नहीं है सकती। पर इन लेखकों (अर्थात् आक्षेप करने वालों) और विकासवादियों ने कभी दुःख की जड़ तक पहुँचने का यत्न नहीं किया। उन्होंने यह नहीं सोचा कि दुःख या कष्ट विकास के लिये बड़ी आवश्यक वस्तु है। स्वयं डार्विन ने इस नियम पर बड़ा बल दिया है कि कोई इन्द्रिय, शक्ति या वेदना किसी प्राणी में उस समय तक नहीं उत्पन्न होती, जब तक उसका जाति के लिये उपयोग न हो। इस नियम पर यदि गम्भीरतापूर्वक विचार किया जाय तो यही निष्कर्ष निकलता है कि ईश्वर प्रत्येक प्राणि-वर्ग में उतना ही दुःख उत्पन्न करता हैं, जितने कि उसके लिये आवश्यकता है।”
फिलण्ट महोदय ने अपनी ‘थीइज्म’ में इसका समाधान कुछ भिन्न शब्दों में किया है-
“दुःख परिश्रम के लिये प्रेरणा करता है और परिश्रम द्वारा ही हमारा जीवन, हमारी शक्तियाँ नियमित और विकसित हो सकती हैं। इच्छा आवश्यकता का अनुभव कराती है और आवश्यकता का अनुभव ही दुःख माना जाता है। परन्तु यदि जीवों में इच्छाएँ न हों और इन इच्छाओं द्वारा उत्पन्न हुये प्रयत्न न हों, तो फिर जीव रहेंगे ही क्या? क्या वह ऐसे ही सुन्दर और विशाल होंगे, जैसे अब हैं? यदि खरगोश को भय न हो तो क्या वह तीव्रगामी होगा जैसा अब है? यदि शेर को भूख न लगे तो क्या वह उतना ही बलिष्ठ होगा, जितना कि अब हैं? यदि मनुष्य को समय-समय पर संघर्ष न करना पड़े तो क्या वह ऐसा प्रयत्नशील, ऐसा बुद्धिमान् ऐसा चतुर, शिक्षित होगा जैसा अब हैं? इस प्रकार आवश्यकता से उत्पन्न दुःख प्राणियों की प्रगति और पूर्णता का साधन है। अर्थात् चाहे आरम्भ में यह बुरा जान पड़े पर इसका परिणाम अच्छा होता है। पूर्णता स्वयं भी एक-एक महत्त्वपूर्ण वस्तु है और उससे हमें आनन्द न भी प्राप्त हो तो वह एक उच्चकोटि का साध्य (प्रयोजन) माना जायेगा। इसलिये जो दुःख इस प्रयोजन की पूर्ति करता हैं, उसे बुरा कैसे कह सकते हैं।”
दूसरी बात यह भी है कि दुःख पूर्णता का ही साधन नहीं है वरन् वही सुख का साधन भी है वरन् वही सुख का साधन भी है। शायद प्राणियों के शरीर ही ऐसे बने है यदि वह दुःख का अनुभव न करते तो सुख का अनुभव भी नहीं कर पाते। चाहे यह बात बिलकुल ठीक हो या न हो परन्तु एक बात तो स्पष्ट ही है कि समस्त जीवन जगत् में वह ‘दुःख’ वास्तव में आनन्द का साधन होता है, जो प्राणियों को परिश्रम के लिये उत्तेजित करता है। दुःख की उपयोगिता का परिचय छोटे प्राणियों में उतना नहीं मिलता जितना विवेकयुक्त मनुष्य में मिलता है। दुःख का महत्व जितना शारीरिक बातों में है उनसे कहीं अधिक मानसिक बातों में मिलता है। यह दुःख आत्मा को शुद्ध बनाने और शिक्षा देने में परम सहायक है। दुःख से हृदय की कठोरता कम हो जाती है, दुःख से अभियान का दमन होता है, दुःख से साहस और धैर्य बढ़ता है, दुःख से सहानुभूति का आधिक्य होता है, दुःख से धर्म के लिये श्रद्धा होती है। ऐसी अवस्था में कोई भी संसार में दुःखों को देखकर उसके लिये परमात्मा को दोषी बनाने के बजाय धन्यवाद ही देगा।”
जो बात फिलण्ट ने आज कही है यह बता हमारे धर्म-ग्रन्थ ‘महाभारत’ में हजारों वर्ष पर्व कह दी गई थी। जब भगवान् कृष्ण ने वनवास के पश्चात् कुन्ती से अभिलाषित वर माँगने को कहा तो उससे अपनी भावना इन शब्दों में प्रकट की कि “हे भगवान्! आप हमको दुःख की अवस्था में रखा करें, क्योंकि उस दशा में तो हमको आपका स्मरण और प्रेम बना रहता है, पर जब हम सुखों में पड़ जाते है तो आपकी भूल जाते है।” इस प्रकार संसार में सच्चा सुख ईश्वर और धर्म पर विश्वास रखते हुये पूर्ण परिश्रम के साथ अपना कर्त्तव्य पालन करने में ही है।
इस प्रकार जब समस्त सृष्टि के निर्माण और विभिन्न परिस्थितियों में होकर प्राणियों के विकास पर विचार करते हैं तो हमें ईश्वरीय योजना में कोई दोष लगाने का कारण प्रतीत नहीं होता। इस प्रकार का दोषारोपण दो ही प्रकार के व्यक्ति करते है। एक तो वे जो विद्या का अहंकार करने वाले है, जिन्होंने अभी वास्तविक ज्ञान के क्षेत्र में पदार्पण नहीं किया है और विश्व रचना और व्यवस्था जैसी विशाल समस्या पर सर्वांगपूर्ण तरीके से विचार कर सकना जिनके लिये असम्भव है।,
ऐसे व्यक्तियों की भर्त्सना करते हुये थियोसोफिकल-समाज की स्थापनकर्ता मैडम ब्लैटस्की ने बहुत जोरदार शब्दों में कहा है-
“ईश्वर भी नहीं? जीव भी नहीं? यह सब विनाशकारी कल्पना है। (नो गॉड, नो सोल? डै्रवफुल प्रनिहिलेशन।) यह एक ऐसे उन्मत्त (नास्तिक) का प्रलाप है, जो अपनी दूषित कल्पना के आधार पर विश्व-रचना की सामग्री की चिनगारियों की एक निरन्तर शृंखला को देखता रहता है और उसका कर्ता किसी को नहीं मानता। वह कहता है कि यह सामग्री स्वयं ही प्रकट हुई है, स्वयं ही स्थित है, स्वयं ही विकसित होती है। वह कहता है, यह समस्त सृष्टि चलती जा रही है पर इसका कोई स्त्रोत नहीं। इसका कोई कारण भी नहीं है। इस प्रकार उसकी दृष्टि में यह अनन्त-चक्र अन्धा, निष्क्रिय और अकारण है।”
वास्तव में इस प्रकार की विचार शून्य नास्तिक-धारा कभी लाभकारी नहीं हो सकती। इसके प्रभाव से मनुष्य के स्वार्थी, प्रमादी और शोषक बनने की ही अधिक संभावना है। जब मनुष्य यह विश्वास करने लगता है कि इस जगत् में कोई चैतन्य न्यायकारी शक्ति नहीं है और इसकी प्रक्रिया स्वयं ही संयोगवश अग्रसर होती जाती है, तो उसके मन में से नैतिक, चारित्रिक, सामाजिक कर्त्तव्य सम्बन्धी सभी नियम और उपदेश गायब होने लग जाते है, और वह किसी भी तरह खाओ-पियो और मौज उड़ाओ (ऋण कृत्वा धृंत पिबेत) के आत्मघाती सिद्धान्त पर चलने लग पड़ता है। यद्यपि इन दिनों विज्ञान ने जो नये करिश्मे दिखलाये है और लोक-लोकान्तर तक पहुँचने की कल्पना को सत्य कर दिखाया है, उससे वह अपने को ‘सर्वज्ञ’ के ही लगभग समझने लगा है, पर चोटी के वैज्ञानिक इस मान्यता के गलत बतलाते है और कहते है कि अभी तक जितना ज्ञान और जानकारी प्राप्त की गई है, वह समस्त ज्ञान-भण्डार का पचासवाँ भाग भी नहीं है। प्राचीन भारतीय इस तथ्य को अच्छी तरह समझते थे और इसी कारण उन्होंने कहा था-
तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यान्ति सूरयः।
विवीब चक्षु राततम्॥
अर्थात्-ज्ञानी पुरुष परमात्मा के उस परम-पद (उसकी महिमा और रचना) को सदा उसी प्रकार देखते और समझते रहते है, जैसे खुली हुई आँख सूर्य के प्रकाश को देखती है।
पद नहीं मनुष्यता का सम्मान-
राजा बाली ने अपने प्रधान सचिव विश्वदर्शन को पदच्युत कर राज्य से निकाल दिया। विश्वदर्शन एक गाँव में रहते थे। पदच्युत होने के बाद वहीं आकर बड़े परिश्रम का जीवन बिताने लगे।
एक दिन बाली को यह देखने की इच्छा हुई कि विश्वदर्शन की कैसी स्थिति है वह वेश बदल कर उसी गाँव की ओर चल पड़ा। गाँव पहुँचकर उसने देखा कि विश्वदर्शन के मकान के सामने पच्चीसों व्यक्ति बैठे बात-चीज कर रहे हैं और हँसी-खुशी मना रहे है। विश्वदर्शन स्वयं बड़े प्रसन्न चित दिखाई दे रहे थे।
छद्म वेशधारी बाली ने विश्वदर्शन से पूछा-महानुभाव! आपको तो राजा ने पदच्युत कर दिया है। फिर भी आप इतने प्रसन्न है, उसका रहस्य क्या है?”
मनुष्यता-विश्वदर्शन से मुस्कराते हुये और राजा को पहचानते हुये कहा-महाराज! पहले तो मुझसे लोग डरते भी थे पर अब वह डर भी नहीं है, इसलिये लोगों से खुलकर बात करने और सेवा, सहानुभूति व्यक्त करने में बड़ा आनन्द आता है।”
महाराज बाली ने अनुभव किया सचमुच पद से लोग डर सकते हैं, सम्मान तो मनुष्यता का अच्छे गुणों का ही होता है। लौटते समय नरेश विश्वदर्शन को पुनः साथ लेते आये और उन्हें उनका पद फिर लौटा दिया।
सौंदर्य और प्रेम मनुष्य जीवन में दो ही आनन्द के मूल स्त्रोत हैं। समर्पण और साक्षात्कार-अपने को देना और अपने को पाना -यही मनुष्य जीवन की दो सर्वश्रेष्ठ साधनायें है। प्रेम की साधना-समर्पण और सौन्दर्य की साक्षात्कार। मनुष्य जीवन में जो इतना-सा दर्शन जान गया उसे ईश्वरीय की प्राप्ति के लिये और कहीं भटकने की आवश्यकता नहीं
सौंदर्य भी अन्ततः प्रेम का ही दूसरा स्वरूप है, उसकी आवश्यकता यों पड़ी कि मनुष्य प्रेम जैसी प्रति सूक्ष्म सत्ता को भूल सकता था। सौंदर्य तो उसकी गुण है ही पर जब वह व्यक्त होता है तब ही प्रेम की अनुभूति होती है, इसलिये सौंदर्य एक अन्य नाम देना पड़ा। सुन्दर वस्तुएँ देखकर अन्तःकरण, हृदय और मन में आकर्षण पैदा होता है। बार-बार उस वस्तु को स्पर्श करने का मन करता है। इसी आकर्षण का नाम ही प्रेम है और जहाँ प्रेम है वहाँ सुख और स्वर्ग विद्यमान् है।
सौंदर्य स्पर्श नहीं किया जा सकता। स्पर्शनीय ही आसक्ति और अज्ञान है सौंदर्य को देखकर जिसके मन में वासना की अग्नि प्रज्वलित हो उसे अपने आपको अपवित्र मानना चाहिये। सौंदर्य का आविर्भाव परमात्मा ने इसलिये किया है कि मनुष्य यह समझे कि दृश्य के भीतर जो चेतन प्राण-तत्त्व भरा हुआ है। वही दुःख, स्वर्ग और आत्म-साक्षात्कार का केन्द्र-बिन्दु है। जिस तरह उसे देखने मात्र से पुलक और प्रसन्नता का उदय होता है, उसी प्रकार यह भी आवश्यक है कि उसे बिगाड़ा या नष्ट न किया जाये इसलिये इस विराट्-विश्व में जो भी अगाध सौंदर्य बिखरा पड़ा है, उसे सच्चे ढंग से प्राप्त करने का एक ही उपाय है और वह है प्रेम।
प्रेम की परिधि बड़ी लघु, बड़ी विशाल है। प्रेम अणु और प्रेम ही विराट् ब्रह्माण्ड एक आदमी दूसरे के प्रति पुरुष, स्त्री के प्रति-स्त्री पुरुष के प्रति-इतर जन्तु-इतर जन्तु के प्रति आकृष्ट होता है। यदि कहें-क्यों? तो यही मानना पड़ेगा कि उनके भीतर कोई चैतन्य आत्मतत्त्व भरा हुआ है, जो सबको अपनी ओर खींचता है। आकर्षण की यह क्रिया छोटे-से-छोटे जीवों में भी हो रही है और बड़े-से-बड़े ग्रह-उपग्रह में भी। क्षुद्रता परमाणु से लेकर उच्चतम प्राणी तक सभी के विकास में संलग्न हैं। यह प्रेम सर्वशक्तिमान् और सर्वव्यापी है। प्रेम की प्रेरणा से ही विश्व में चेतनता गति, प्राण और हलचल दिखाई देती है। प्रेम न होता तो निराकार सृष्टि में रूखापन और उदासीनता ही दिखाई देती होती।
प्रेम व्यक्ति से नहीं आत्मा से किया जाता है। माँ के लिये बच्चे में कौन-सा आकर्षण होता है। वह न तो देखने में ही सुन्दर होता है और न उसकी वाणी में ही मधुरता होती हैं। जन्म से ही मल-मूत्र और कर्ण-अप्रिय रोने के सिवाय बच्चा और क्या देता हैं? कुछ
नहीं तो भी उसे बच्चे के लिये माता का हृदय रो उठता है। जैसे सिवाई गाय परवश जंगल चली तो जाती है पर जहाँ कहीं अवसर मिलता है, वह तृण आहार सब कुछ छोड़कर घर को भागती है भागने और अपने सध प्रसूत बच्चे के समीप तक पहुँचने से उसकी विरह व्यथा देखते ही बनती है। उसके रोमांच, श्वाँस से फूटती हुई प्रेम धारायें और उद्वेलित हृदय की प्यास, बच्चे के पास पहुँचकर उसके गन्दे शरीर को चाटने लगना यह सब देखकर कोई भी हो यही कहेगा-प्रेम ही भीतर की मान्यता है। मनुष्य पदार्थों से नहीं अपनी आत्मा से प्रेम करता है तो इसका एक ही अर्थ है कि उसने अपने आपको अज्ञान और धोखे में डाल रखा है। आत्मतत्त्व की प्राप्ति का मूल उद्रेक प्रेम है। प्रेम से ही आत्मा और प्रेम से ही परमात्मा को प्राप्त किया जाता है।”
मनुष्य अपनी उपस्थित अवस्था से सदैव उदासीन रहता है। वह अपने जीवन में एक ऐसे स्त्रोत को देखना चाहता है, जिसमें निरन्तर संगीत की मधुर-ध्वनि का-सा आनन्द करता हो वह उस स्त्रोत की खोज में रहता है जिसका सुख क्षणिक और आशिक न हो। जिसमें थकावट न हो। उसकी प्राप्ति में ही अनेक लालसाओं और इच्छाओं का जन्म हुआ। यद्यपि इच्छाएँ और लालसायें मनुष्य को भटकाती है, किन्तु उस मनःक्षेत्र में भी शांति, प्रसन्नता, अमरता, पवित्रता और निस्वार्थ प्रेम का अनुभव करना चाहता है, यदि उसकी समझ ने काम न दिया तो वह साँसारिक इच्छाओं और वासनाओं से संसार में निर्बल होता रहता है। मनुष्य आकर्षण का दास है, यदि इन्द्रिय भोगों की ओर आकर्षण पैदा हो गया तो वह अपने जीवन की चेष्टाएँ उसी ओर केन्द्रित कर देता है और अपने भीतर के चैतन्य तत्त्व को नष्ट करता है।,
निर्बल होते हुये प्राणी की भी एक ही इच्छा रहती है। और वह यह कि उसे प्रेम का अभाव न हो। ऐसे लोग न हों जो यह कहें-तुम मुझे अच्छे नहीं लगते।” मनुष्य अपने आप में अगाध सौंदर्य है पर अपनी भूल के कारण वह उस सौंदर्य से वंचित होता है पर आत्मा तो सौंदर्य और प्रेम की ही प्रतिमा है। इसलिये इस स्वाभाविक इच्छा को मनुष्य कभी त्याग नहीं सकता। यह परमात्मा की कृपा ही है कि आकर्षण हीन मनुष्य भी जब अपने भीतर प्रेम और सौंदर्य ढूँढ़ने का प्रयत्न करने लगता है तो उस भटकते हुए प्राणी को एक उजला प्रकाश दिखाई देने लगता हैं, उसे ऐसा लगता है कि अभी भी विश्व में एक ऐसी सर्वोपरि सत्ता विद्यमान् है, जो केवल प्रेम की ही सौदागर है। वह मनुष्य से धन नहीं चाहती, फल, फूल, कन्दमूल कुछ भी नहीं चाहती, उसे एक ही आकांक्षा है, प्रेम, प्रेम प्रेम-प्यार प्यार, प्यार। और उसे जो भी प्रेम देता है, बदले में वह उस पर अनन्त कृपा की जल-वृष्टि करता रहता है। वह शर्त नहीं लगाता, किन्तु प्रेम का बदला वह इतने गहरे प्रेम से चुकाता है, जिसे पाकर मनुष्य को और कुछ पाने की इच्छा भी नहीं रह जाती। अष्ट-सिद्धियाँ उसे हाथ जोड़ती, नव-सिद्धियाँ उसे हाथ जोड़ती, नव-सिद्धियाँ उसके पैर चाटती है।
वह विशुद्ध और निष्काम प्रेम भावना का है, आत्मसाक्षात्कार का हैं। इसका तात्पर्य यह नहीं कि संसार में और किसी का प्रेम तुच्छ और विभाज्य है। सच में तो प्रेम की परीक्षा ही यह है कि मनुष्य कुरूप-से-कुरूप और प्रत्येक समीपवर्ती वस्तु को भी उतना ही प्यार करता है या नहीं जितना वह अपने आपसे करता है। विभिन्न रूपों में अभिव्यक्त चेतनाएँ परमात्मा के ही कण है। सोने की डली से प्रेम करने वाला जानता है कि उसका एक कण भी उतना ही मूल्यवान वस्तु के एक अणु को भी वह फेंकना और गिराना नहीं चाहता। एक-एक को बटोर कर ही तो स्वर्ण-राशि पाई जाती है, इसी तरह प्रेम के उपासक के लिये भी यह कटौती है कि वह कुरूप वस्तु से भी प्रेम कर सकता है या नहीं
हमारे लिये जो वस्तुएँ त्याज्य और बेकार की होती है, उन लकड़ी के डंडों, मिट्टी के खिलौनों को बच्चा इतनी प्यार की दृष्टि से देखता है कि कोई उन्हें छीनना चाहे तो वह इतना दुःखी हो जाता है, मानो उसके लिये अपना कोई अस्तित्व नहीं, मानो वह क्षुद्र
वस्तुएँ ही उसका जीवन है। वस्तुओं के प्रति प्रेम है, वह आत्मा की ही अभिव्यक्ति है उसी से विकसित होकर मनुष्य क्रमशः उपयोगी और आवश्यक वस्तुओं से प्रेम करना सीखता हैं। यदि वासनाओं और इच्छाओं की सीमायें घेरे नहीं तो इसी प्रेम-विकास के द्वारा वह एक दिन पूर्ण प्रेम अर्थात् परमेश्वर की प्राप्ति कर लेता है।
तात्पर्य यह कि हमारे लिये बच्चे का प्रेम, माता-पिता भाई और बहन का प्रेम भी परमात्मा के प्रेम की तरह विशाल और पवित्र हैं। कोई किसी वस्तु को उस वस्तु के लिये प्यार नहीं करता वरन् उसके अभ्यान्तरिक सत्य के लिये प्यार करता है, यहाँ तक कि यह स्वार्थपरता जिसको लोग इतनी निन्दा करते है, वह भी प्रेम का ही रूपान्तर है। यह छोटे-छोटे दृश्य मिलकर ही पूर्ण नाटक का आनन्द देते है। स्व और अहं का विस्तार क्रमशः घटता जाता है तो धीरे-धीरे उसे सम्पूर्ण जगत् ही आत्म-स्वरूप दिखाई देने लगता है। इस विराट् अनुभूति का ही नाम ‘ईश्वर प्राप्ति’ है।
प्रेम अमृत है, मधुर है और परमेश्वर भी। किन्तु वह एक कठिन परीक्षा भी है। क्योंकि उसमें देना ही देना है पाने की आशा प्रेम की परिभाषा के विपरीत है। यदि कोई अति भावुकता में आकर धैर्य की परित्याग करता है तो वह वास्तविक बुद्धि और पवित्रता बनाये
नहीं रख सकता। इन्द्रिय सुखों के आकर्षण बार-बार घेरते हैं, शीघ्र बाजी में कई बार उस साधना से लोग भ्रष्ट है। जाते है और फिर गिरते ही चल जाते है। इस अवस्था से बचने का एक ही उपाय है, प्रेम के ईश्वरीय और दिव्य स्वरूप को अन्तःकरण में मजबूती से धारण कर लेना। जब यह विश्वास हो जाये कि अब मेरे मन से क्षुद्र वासनाओं का, स्वार्थ, मोह माया आसक्ति का, अन्त हो गया तो फिर अपनी प्रेम-परिधि को जितना बढ़ाया जायेगा उतना ही आनन्द मिलेगा। ऐसा करना निष्काम कर्मयोगी और तपस्वी के लिये ही सम्भव है। परिधि बढ़ती है तो अपने जीवन की प्रत्येक सम्पत्ति चाहे वह बौद्धिक हो, आत्मिक या शारीरिक घुलानी पड़ती है प्रेमास्पद के लिये। तिल-तिल गलने में ही प्रेम की वास्तविकता है। वही एक दिन सच्ची तृप्ति और आत्मसाक्षात्कार का मार्ग खोल देती है।
यह जीवन देने के लिये ही है। अपने को उत्सर्ग करने, देने का नाम ही प्रेम हैं। इसे जितना देते हैं, जितना औरों की सेवा में लगाते है, यह उतना ही बढ़ता है। सब कुछ देकर भी वह पूरे का पूरा बच जाता है। देना उत्सर्ग और समर्पण नाम अलग-अलग है, सब एक ही प्रेम के पर्याय है। शाश्वत चेतना से हमारा सम्बन्ध-विच्छेद हो गया है उसे पाने के लिये अपने आपको पूरी तरह घुला देने का नाम ही प्रेम और साक्षात्कार है। उसके बिना जीवन अपूर्ण ही बना रहता है। प्रेम ही मानव का स्वभाव है और उसी से वह अपनी अपूर्णता पूरी करता है, जो उससे इतर सौंदर्य की खोज करता है वह तो भटकता ही है। प्रेम से मधुर और कुछ भी इस संसार में नहीं है।
वह तलवार-
सिकन्दर ने सुना था भारतवर्ष में बड़े प्रतापी साधु और तत्त्वज्ञानी पंडित होते हैं, उनके पास जाकर जीवन कुछ का कुछ हो जाता है। उसकी बड़ी इच्छा थी कि वह किसी ऐसे तत्त्वज्ञानी महात्मा के दर्शन करे।
एक दिन सिकन्दर एक जंगल की ओर चल पड़ा। कुछ दूर जाकर उसने एक महात्मा को ध्यानावस्थित देखा। महात्मा के पास न तो कोई वस्त्र थे, न आभूषण और न ही कोई भोज्य पदार्थ पर वेदीप्य की आभा उनके मुख से ऐसी फूट रही थी जैसे वह कोई राजा हो।
सिकन्दर ने उन्हें प्रणाम कर पूछा-महाराज! साधनहीन होकर भी आप में सम्राटों जैसी तेजस्विता कहाँ से आई?”
साधु ने हँसकर उत्तर दिया-अरे मनुष्य! तुझे पता नहीं मेरा ईश्वर कितना दिव्य, तेजस्वी और महान् है, उसके समीप बैठकर मैंने भी तेजस्विता का एक कण पा लिया तो इसमें रहस्य क्या हो गया।”
सिकन्दर सन्त की उद्दीप्त मुखाकृति से तो प्रभावित था ही शौर्य देखकर तो मुग्ध ही हो गया। उसने ऐसे महात्मा को गुरु बनाने का निर्णय किया। इसी आशय से उसने पूछा-महाराज! आप मेरे साथ चलिये वहाँ सारा राज्य-वैभव धन और सम्पत्ति आपके चरणों में न्यौछावर कर दूँगा।” महात्मा ने हँसकर उत्तर दिया-मणि हो जिसके पास वह तेरे साथ क्यों जायेगा, काँच के लिये।”
सिकन्दर को अपनी उपेक्षा का बड़ा गुस्सा आया। तलवार खींचकर बोला-अभी तुझे काट कर रख दूँगा।” साधु खिलखिलाकर हँस पड़े और बोले-तात्! मैं तो यही चाहता हूँ कि तू मुझे काट डाले पर क्या बतायेगा ऐसी तलवार है कहाँ जो मेरे मैं को काट डाले?”
सिकन्दर यह सुनकर हतप्रभ रह गया। विलक्षण ईश्वरीय शक्ति के आग सिर झुकाया और वहाँ से चुपचाप लौट गया।
दार्शनिक कवि हेमचन्द्र सूरि को भला किसी प्रकार का अभाव क्यों हो सकता था। वैभव विलास तो उनके आँगन में खेलता था। वे सौराष्ट्र राजा के राज्यकवि थे। राजधानी-पाटन कवि की भक्ति, श्रद्धा और विद्वता पर अपना सर्वस्व लुटा सकती थी। उतना सम्मान राज्य में और किसी को नहीं मिला था। स्वयं सौराष्ट्र नरेश आचार्य प्रवर की पद-धूलि अपने माथे पर चढ़ाते और उनको किसी भी इच्छा पूर्ति में अपने जीवन की सार्थकता अनुभव करते।
ऐश्वर्य के बीच पलते हुए भी कवि की भावनाएँ विशुद्ध संन्यासिनी थी। उनके अन्तःकरण में वह करुणा थी कि एक पिल्ले की चोट देखकर भी उनके दृग झरने लगते। वह एक ऐसे विश्व की कल्पना किया करते थे, जिसमें कोई दीन न हो, दुःखी न हो, रोगी और अस्वस्थ न हो। उनके काव्य की एक-एक पंक्ति में प्राणिमात्र के प्रति प्रेम, दया, करुणा और आत्म-जीवन भरी होती थी यही कारण था एक राज्य कवि गाँव के ग्वालों से लेकर सिंहासनाधीश तक परमप्रिय हो गये।
चीनाशुक धारण किये हुये हेमचन्द्र एक दिन ग्राम्यौर्न्दय के दर्शनों के लिये घर से निकल पड़े। कृत्रिम प्रसाधनों से विभूषित राजधानी में जो लालित्य देखने को नहीं मिल सके, वह लावण्य लहलहाते हुए खेत, वृक्षों पर गीत गाते पक्षियों का कलरव, कल-कल झरने और निर्धनता में मौज मस्ती के गीत गाते हुये भोले-भोले ग्राम-वासियों में देखने को मिला। हेमचन्द्र बढ़ते ही गये। बढ़ते ही गये। उन्मुक्त कृति में सौंदर्य देखकर उन्हें जितनी प्रसन्नता हुई, अभावग्रस्त ग्रामीणों का दैन्य देखकर उनकी करुणा भी उससे अधिक उमड़ती गई। कवि आज सारे संसार का दुःख दर्द अपने भीतर आत्मा में रखकर कहीं अन्तर्धान हो जाना चाहता था पर उस बेचारे के पास भावनाओं के अतिरिक्त भी क्या?
ग्रामवासियों ने सुना-आज राज्य-कवि हेमचन्द्र पधारे है। तो लोग उनके दर्शनार्थ उमड़ पड़े। भेंट तो क्या दे सकते थे, किसी ने कन्द लाकर रख दिये, किसी ने फूल और फल। कवि जिसने षट् रस व्यंजनों का रसास्वादन किया था, उसके लिये भला सूखे मेवों का क्या महत्व हो सकता था? पर आत्मा की सरसता हो तो थी, जो वह ग्रामीण भाइयों को इन साधारण वस्तुओं में उतनी तृप्ति अनुभव कर रहे थे, जितनी अन्तःपुर के किसी भोज में भी उन्हें न मिली होगी। सच बात तो यह थी कि वह पदार्थ नहीं प्रेमरस पान कर रहे थे।
कवि लोगों से खड़े प्रिय वार्ता कर रहे थे, तभी एक किसान आया। एक मोटा परिधान-लगता था उसे सूत और सन मिलाकर बनाया गया है-लाकर आचार्य के चरणों में समर्पित करते हुये उसने अभ्यर्थना को-यह वस्त्र मेरी पत्नी ने आपके लिये बुना है, आप इसे स्वीकार करें तो हम अपने जीवन को कृतार्थ हुआ समझें।”
एक दृष्टि उस मोटे परिधान पर और दूसरी दृष्टि अपने वस्त्राभूषणों पर डालते हुये कवि की आंखें छलक उठों। ओह! घोर
वैषम्य? कितना परिश्रम करते है, यह लोग और उनके परिश्रम का आनन्द राज्य के थोड़े से लोग लूटते हैं। इनकी दीनता के कारण हम हैं, जिन्हें अपने बड़प्पन का मिथ्या अभिमान हो गया है। हमने कभी यह नहीं सोचा कि हम भी उसी माटी के बने हैं जिसने इन गरीब किसानों को शरीर दिया हैं। एक ही माँ के बेटों में इतना अन्तर-इससे बड़ा कलंक सत्ताधारियों और लोक-सेवकों के लिये दूसरा
नहीं हो सकता।
आचार्य ने वह परिधान हाथ में ले लिया। माथे से लगाया और शरीर पर धारण कर लिया। राजकीय वस्त्राभूषण उतार कर उस ग्रामीण को दे दिये, स्वयं उस मोटे वस्त्र में राजधानी लौट आये।
राजकवि के वस्त्रों पर दृष्टि जाते ही महाराज द्रवीभूत होकर बोले-आचार्य देव यह क्या देख रहा हूँ? आप ऐसे वस्त्र पहने पारण के लिये यह जीवन-मरण का प्रश्न है, क्या मैं उसका कारण जान सकता हूँ क्या मैं उसका कारण जान सकता हूँ, इन वस्त्रों की क्या आवश्यकता आ पड़ी?”
आचार्य जो अब तक सरलता की प्रतिमा लगा करते थे, आज उनमें सूर्य-सी प्रखरता फूट रही थी, उन्होंने कहा-महाराज! अधिकांश प्रजा ऐसे ही कपड़े पहनती है तो फिर मुझे ही बहुमूल्य वस्त्र पहनने का क्या अधिकार? यदि मैं ग्रामीण जनों को कुछ दे
नहीं समता तो उनसे लू भी क्यों? और आप जो देते हैं, वह भी तो उन्हीं का है।”
महाराज ने अपनी भूल अनुभव की और उसके बाद प्रजा की समुन्नति में जूट गये।
“गैसीय स्थिति में जीवन सम्भव है” यद्यपि यह मत अभी कुछ वैज्ञानिक ही स्वीकार करते हैं पर यदि इसी तरह विज्ञान बढ़ता गया तो वह निश्चित ही भावनाओं को तह तक पहुँचेगा और उक्त मान्यता के आधार पर यह अनुभव करना सरल होगा कि सूर्य-चन्द्रमा भी मनुष्य की तरह संवेदनशील शक्तियाँ है। उनके देवता होने की कल्पना तब भी निराधार न होगी, जब लोग चन्द्रमा पर पहुँच जायेंगे। जिस प्रकार मनुष्य शरीर का ही एक भाग दृश्य और स्थूल है पर उसका प्रकाश वाला चेतन स्वत्व देखने में नहीं आता। एक मिला-जुला रूप ही दिखाई देता हैं, उसी प्रकार व्यक्तियों को गैसीय स्थिति को दृश्य के साथ मिला-जुला अनुभव किया जाना नितान्त सम्भव ही जायेगा।
जीव-चेतना की उस खोज का सिलसिला अब आगे बढ़ता है। जीव-विज्ञानवेत्ताओं ने अभी कुछ समय पहले ही अमेरिका की नेशनल एरोनॉटिक्स एण्ड स्पेज एडमिनिस्ट्रेशन’ को बताया-पृथ्वी के अतिरिक्त अन्य ग्रहों पर जिस जीवन की कल्पना हम करते हैं, उसके अंतर्गत उन ग्रहों पर मनुष्य की तरह न तो सामान्य आकृति वाले प्राणी होंगे और न कथाओं वाले दैत्याकार मानव वरन् वहाँ जीवन अणु-जीवों के रूप में होगा, इसलिये अपने अनुसन्धान कार्य में ऐसे यन्त्रों को सम्मिलित किया जाना चाहिये, जो मंगल आदि ग्रहों के सम्भावित जीवन के बारे में सूचनाएँ देंगे यह यन्त्र इलेक्ट्रानिक होंगे, अनुमान है कि इस खोज को व्यापक रूप देने के लिये इलेक्ट्रानिक उपकरणों से सुसज्जित एक प्रयोगशाला मंगल ग्रह पर 1970 तक पहुँचा दी जायेगी।
अभी इन शोधों के लिये कुछ समय है पर धरती में जीवाणु विज्ञान सम्बन्धी जो खोज कार्य हुआ है, वही इतना पर्याप्त है कि उससे संसार में चेतना के अस्तित्व की संगति बैठाई जा सकती है। मुख्य कठिनाई यह है कि अमेरिका, रूस, इंग्लैण्ड या फ्राँस आदि में अनेक विद्वान् वैज्ञानिकों हैं पर उनके ज्ञान और उपलब्धियों का क्षेत्र नितांत एकांगी है। जिसे रसायन-शास्त्र का अध्ययन है वह भौतिक शास्त्र के कुछ पन्ने ही जानता है, सम्पूर्ण नहीं मनोविज्ञान खगोल विद्या और जीव-रचना शास्त्र आदि अनेकों बातें जो जीवन को अहं समस्याओं से उतनी ही घनिष्ठता रखती हैं, जितना रसायन शास्त्र। फल यह होता है कि उससे विद्वता भी भ्रामक ही रह जाती है, सिवाय इसके कि उससे कुछ बौद्धिक जानकारी बढ़ जाये मनुष्य जीवन सम्बन्धी किसी भी तथ्य या निष्कर्ष पर पहुँचना सम्भव नहीं होता। यह बात सभी प्रकार के पाश्चात्य विद्वानों के सम्बन्ध में भी है। यदि सभी वैज्ञानिक उपलब्धियों को एक स्थान पर लाकर उनसे फैसला कराना सम्भव हो जाता तो जीव विज्ञान की अब तक की वैज्ञानिक उपलब्धियाँ ही उक्त संदर्भ में भारतीय तत्त्व-दर्शन की पुष्टि कर देतीं और उससे आत्म-निरीक्षण की पद्धति का एक नया विज्ञान ही चल पड़ा होता। उसके लिये शोध और कठिनाई का सामना
नहीं करना पड़ता, वह सब मसाला भारतीय ग्रन्थों में तैयार रखा हैं, उसके सहारे आत्म-कल्याण और विश्व-शांति का मार्ग खोज निकालना प्रत्येक व्यक्ति के लिये सम्भव हो गया होता।
इस विषय का विज्ञान सम्मत प्रतिपादन करें इससे पूर्व भारतीय उपलब्धियों को जान लेना आवश्यक है। कैवल्योपनिषद् में जीव की व्याख्या इन शब्दों में की है-सूक्ष्मत्वात् सूक्ष्मतरे नित्यं तत्वमेव त्वमेद तत्’ अर्थात् जिसे सूक्ष्म से सूक्ष्म यन्त्रों से भी नहीं देखा जा सकता, जिसका कभी नाश भी नहीं होता वही तुम हो, तुम वही हो।”
इसी उपनिषद् के 20, 21, 22, 23 और 24 मंत्रों में विस्तारपूर्वक बताते हुये लिखा है-
अरणारणीयनहमेव न तद्वन्महानहं विश्वमिंहविचित्रं।
पुरातमोहं पुरुषोडहमीशो हिरणमयोंडहं
शिवरुपमस्मि॥
अपाणि पायाडहमचिन्त्य शक्तिः पश्योम्यचक्षुः
सश्रृणोम्यकर्णः।
अंह विजानामि विविक्त रुपों न चास्ति वेत्ता मम-
चित्तसदाहम्॥
वेदरनेकरहमेव वेद्यो वेदान्त कृद्धेदविवेव चाहम्।
न पुणयपापे ममनास्ति नाशो न जन्मदेहेन्द्रिय
बुद्धिरंस्त॥
न भूमिराया मम वह्निरस्ति न चानिलो मेडस्ति न
चाम्बरं च।
एवं विदित्वा परमात्मरुपं गुहाशयं निष्कल
म्द्वितीयम्।
समस्त साक्षिं सदसद्विहींन प्रयाति शुद्धं परमात्मरुपम्॥
-कैवल्योपनिषद् 20-24
अर्थात्-मैं (जीव) छोटे से भी छोटा और बड़े से भी बड़ा हूँ, इस अद्भुत शरीर को मेरा ही रूप मानना चाहिये। मैं ही शिव और ब्रह्मा स्वरूप हूँ, मैं ही परमात्मा और विराट पुरुष हूँ, मेरे न हाथ है, न पैर कल्पना भी जिस तक नहीं पहुँच सकती, वह परब्रह्म भी मैं ही हूँ, मैं सदैव अपने चेतन स्वरूप में रहता हूँ। मुझे कई स्थूल नेत्रों और बुद्धि से देख और समझ नहीं सकता, किन्तु मैं बुद्धि के बिना ही सब कुछ समझता, नेत्रों के बिना ही सब कुछ देखता, कानों के बिना ही सब कुछ सुनने को सामर्थ्य रखता हूँ। वेद का उपदेश और वेदान्त की रचना मैंने ही की है। वेदों में मेरा ही वर्णन है। मैं जन्म और मरण से परे हूँ, पाप और पुण्य मुझे स्पर्श नहीं कर सकते, क्योंकि शरीर, मन, बुद्धि और इन्द्रियों से मैं रहित हूँ, मेरे लिये भूमि, जल, अग्नि, वायु और आकाश भी कुछ नहीं है जो इस तरह स्थूलता से रहित मुझे जान लेता हे, वही परमात्मा को प्राप्त करता है। भारतीय विद्वानों को तत्त्वदर्शन की अपनी एक शैली रही हैं। उन्होंने विज्ञान की उन सब बातों का प्रतिपादन तो किया है पर उन्हें खींचकर उन प्रेरणाओं तक बार-बार ले गये हैं, जिनसे मनुष्य इस संसार में आने के अपने उद्देश्य को समझ ले और उसे प्राप्त कर जीव-मुक्ति का आनन्द ले। यह ठीक ऐसा ही है जैसा कि जीवाणु को खोज करते हुये पाश्चात्य वैज्ञानिक नई-नई औषधियों की रचना करते जाते हैं, उससे लोग भ्रम में तो पड़ते है पर जिस तरह जीव-अणु की खोज पाश्चात्य दृष्टि में औषधियों का महत्व है उसी प्रकार हमारे पूर्वजों ने जीव का सम्बन्ध भावनाओं से जोड़कर उसे विराट् के साथ तादात्म्य कराने का प्रयत्न किया है, जिससे ज्ञान केवल शब्द सामर्थ्य ही बनकर न रह जाये वरन् उसका आत्म-कल्याण के लिये उपयोग भी हो।
प्रतिपाद्य विषय का ऐसा ही महत्त्वपूर्ण विश्लेषण गर्भोपनिषद् में मिलता है। सूक्ष्मातिसूक्ष्म जीव अपनी सूक्ष्मतम स्थिति तक पहुँचकर स्थिति तक पहुँचकर विराट् के साथ किस प्रकार तादात्म्य को यह कैवल्योपनिषद् में बताया गया। गर्भोपनिषद् में प्राणी के सूक्ष्म से सूक्ष्म में परिवर्तित होने का वर्णन है। रज-वीर्य के संयोग से किस प्रकार जीव गर्भ में प्रवेश करता है, पलता, बढ़ता और जन्म लेता है, इस प्रक्रिया का वर्णन करते हुये उस समय की जीव की भावनाओं का दिग्दर्शन कराया गया है, वह मानव-ज्योति के महान् उपयोग का ज्ञान और उसकी सर्वोच्च आवश्यकता भी है, किन्तु भावनाओं के अस्तित्व से इनकार करते रहने के कारण आज के मनुष्य ने अपना भारी अहित किया। गर्भोपनिषद् में इस बात का बार-बार संकेत करते हुये बताया है कि गर्भाधान होने पर शुक्र और शोणित के एक-एक अणु मिलकर कलल बनाते हैं, शुक्र का स्वरूप तेजस और शोणित को पदार्थ या स्थूल तत्त्व कहा गया है। यहीं वह तेज-बिन्दु शोणित के साथ स्थूल संरचना में आता है। 7 रात्रियों में वह कलल ही बुदबुदलनता, एक पखवार में पिण्ड और फिर इसी तरह विकसित होता, माता के द्वारा सेवन किये हुए अन्न से ज्ञान और कर्मेन्द्रियों का विकास करता हुआ जीव नौवें महीने में गर्भ से बाहर आता है। गर्भ में रहने तक उसे अपनी सूक्ष्म स्थिति का पता रहता है। वह बोलता नहीं संकल्प और विचार कर सकता है। जीव विकास की स्वाभाविक प्रक्रिया कहें या भगवान् का विधान उसी के अनुसार जल, वायु,, पृथ्वी, अग्नि और आकाश इन पाँचों तत्त्वों से उसके शरीर में कपाल, केश, दर्भ, मुख, एक सौ अस्सी संधियाँ, एक सौ सात मर्मस्थान, एक सौ नौ स्नायु, सात सौ शिरायें, पाँच सौ मज्जायें, तीन सौ साठ हड्डियाँ और साढ़े चार करोड़ वाला यह विराट् शरीर विनिर्मित होता है, यह विराट् शरीर उसका लोक है, ब्रह्माण्ड है, उसमें यजमान रूप से वह सूक्ष्मतम-सूक्ष्म आत्मा ही काम कर रही होती है, जो गर्भाधान के दिन नारी के मैथुनी कोष में प्रविष्ट हुआ था।
उस अवस्था में जीव के संकल्प विकल्प आदि के सम्बन्ध में तब तक कोई पुष्टि नहीं दी जा सकती, जब तक कि मनुष्य की स्वयं को बुद्धि उस सूक्ष्म विषय की ग्रहणशीलता की योग्यता न प्राप्त कर लें पर पाश्चात्य वैज्ञानिकों की खोजों ने यह अवश्य निश्चित कर दिया है कि जीव अत्यन्त सूक्ष्म अवस्था में भी चेतना की सभी अभिव्यक्तियाँ प्रदर्शित करता है।
पाश्चात्य विज्ञान के अनुसार जीवित प्राणियों में जीवाणु सबसे छोटा जीव है। इसके शरीर में तरल प्रोटोप्लाज्मा भरा होता है उसके ऊपर सेल्यूलोज की पहली झिल्ली होती है। प्रोटोप्लाज्म के बीच बैठा हुआ जीवाणु 124000 इंच से भी छोटा होता है। इनके आविर्भाव की प्रक्रिया भी बड़ी विचित्र है, ये सर्दी-गर्मी जल-वायु मिट्टी आदि का संयोग पाकर स्वयं ही बढ़ते हैं, कुछ ही सेकेण्डों में वह अपने जैसे हजारों जीवाणु न जाने कहाँ से पैदा कर देता है। एक जीवाणु 10 मिनट के अन्दर में वह 170000000 जीवाणु पैदा कर डालता हैं। जिस प्रकार मनुष्य सर्दी-गर्मी के आवर्तन-परिवर्तन में कमजोर, स्वस्थ, प्रजनन आदि किया करता है, उसी प्रकार गर्मी-सर्दी के निश्चित सह्य ताप में वह भी यह क्रियायें किया करता है। तो भी वह आँखों से दिखाई नहीं देते। इन्हें अणुवीक्षण यन्त्रों द्वारा हो 800 से 2000 गुना अधिक बढ़ाकर देखा जा सकता है। यह जीवाणु भी जीव की सूक्ष्मतम स्थिति नहीं वरन् कोई बीच का रोग उत्पन्न करने और वस्तुओं के गुण बदलने (फारमन टेशन) वाली जाति है। जीवधारी के सूक्ष्मतम जीव द्रव्य की लघुता का तो अभी कोई अनुमान ही नहीं किया जा सका।
सारिकोडिना वर्ग के विख्यात जन्तु अमीबा को भी जीव की सूक्ष्मावस्था के उदाहरणार्थ लिया जा सकता है। पाश्चात्य वैज्ञानिक तो मनुष्य जाति को अमीबा की ही पूर्ण विकसित अवस्था मानते हैं, अमीबा की लम्बाई 1100 इंच होती है, उसे भी स्थूल आँखों से देखा नहीं जा सकता। प्रसिद्ध-वैज्ञानिक मास्ठ ने अमीबा का चार भागों में-(1), प्लाज्मा, (2) बाह्य-द्रव्य (एक्टोप्लाज्मा), (3) प्लाज्मा जेल और (4) प्लेजसोल-विभक्त कर मनुष्य के लिये सूक्ष्म-आत्मा के सम्बन्ध में और भी गूढ़ रहस्य में डाल दिया अर्थात् वह तो पूरे अमीबा से भी सूक्ष्मतम स्थिति है और एक निश्चित शरीर से आबद्ध होने के कारण ठीक मनुष्य की तरह ही संवेदनशील भी है। जब उसे सुई से छेदा जाता है तो वह उत्तेजित हो उठता है और अपने को बचा कर भागने का प्रयत्न करता है, बिजली के करेंट से भी वह दूर भागता है। पर विचित्रता यह कि वह अपने शरीर के किसी के भाग से भोजन कर सकता है, उसको मुख नहीं। थोड़े से जल के साथ वह भोजन ग्रहण करता है और मल विसर्जन भी किसी भी हिस्से से कर देता है। अमीबा का मूल चेतन भाग केन्द्रक या नाभिक स्वयं ही विभक्त होकर नये अमीबा पैदा करता है। विश्व के और प्राणी तो गर्भाधान से बच्चे पैदा करते हैं पर यह सूक्ष्म जीवाणु स्वयं ही नई सृष्टि पैदा करने की स्थिति में होते है, उससे पता चलता है कि केन्द्रक या दिखाई देने वाले नाभिक के भीतर कोई ऐसी विलक्षण शक्ति है, जो या तो अक्षय शक्ति का भण्डार या विश्व-चेतना का मूल है, सृष्टि में जो भी स्पन्दन और स्फुरण है, सब उसी को इच्छानुसार होता रहता है।
अब आनुवांशिकी विज्ञान ने इस रहस्य को और भी सूक्ष्म रूप में ला दिया है। वैज्ञानिकों के अनुसार शरीर 70 खरब कोशिकाओं का एक विराट् जगत् है, प्रत्येक कोष के अन्दर 46-46 गुणसूत्र विद्यमान् है। यहाँ यह जान लेना आवश्यक है कि कोशिका शरीर की अन्तिम दवाई है, जिसमें जड़ और चेतना दोनों समन्वित रहते है। इन गुण सूत्रों के आधार पर ही पीढ़ियाँ चलती है। गुणसूत्र मनुष्य के स्वभाव और संस्कार ही नहीं बनाते शरीर का छोटा-बड़ा लम्बा, कुबड़ा, गोरा, काला या कुरूप होना सब गुण सूत्रों पर निर्भर है। जब बच्चा गर्भ की स्थिति में जाता है तो वह एक कोशिका अर्थात् 64 गुणसूत्रों से अपनी शुरुआत करता है। इनमें से 23 माता और 23 पिता की देन होते है। हमारे शरीर की प्रत्येक कोशिका में चूँकि 46-46 अणुसूत्र (क्रोमोज़ोम) हैं, इसलिये प्रारम्भ 62 गुणसूत्रों से होना चाहिये, किन्तु जनन कोशिकाओं में चाहें वह स्त्री हो या पुरुष 26-26 गुणसूत्र ही होते हैं, दोनों के मिलाप से एक पूर्ण गुणसूत्र सम्पन्न कोशिका का आविर्भाव होता है। इस क्रिया के बिना मनुष्य की उत्पत्ति सम्भव नहीं इसलिये मनुष्य के विकास वाली अमीबा या और सभी सिद्धांत गलत हो जाते है।
यहाँ हम जीव के सूक्ष्मतम-सूक्ष्म और विराट् से विराट् स्वरूप की कल्पना कर रहे है, इसलिये विकास थ्योरी को यहाँ नहीं ले रहे हैं, इसलिये विकास थ्योरी को यहाँ नहीं ले रहे। हमारा ध्यान जीव उत्पत्ति की उस रहस्यपूर्ण स्थिति में, जिसकी सूक्ष्मता को आँखों से नहीं देखा जा सकता। प्रत्येक स्त्री-पुरुष में 2 घात 23 अर्थात् 8388608 जनन कोशिकाएँ बनाने की क्षमता है इनमें से कोई भी शुक्राणु गर्भाधान की क्रिया में भाग ले सकता है। स्त्री के 23 में से कोई या पुरुष के 23 में से कोई अर्थात् प्रत्येक जीवकोष के अन्दर 2 घात 46 तरह के बच्चे पैदा करने की क्षमता है। यह तो केवल 46 गुणसूत्रों का हिसाब है। प्रत्येक गुणसूत्र 10 हजार जीन्स से बने होते हैं, इस तरह 2 घात 46 और उसके गुणनफल से जो संख्या आये उसके 10000 घात इतने प्रकार का प्राणि जगत् एक मनुष्य के भीतर भरा हुआ है। जबकि सारी पृथ्वी की जनसंख्या ही कुल 2 घात 32 और 2 घात 34 के बीच में है। यदि सूक्ष्म का अन्त केवल जीन है तो ही एक मनुष्य के अन्दर सारी सृष्टि विद्यमान् माननी चाहिये, यदि जीन्स की भी कोई इकाई निकल आई तब तो वैज्ञानिक एक यह देखेंगे कि शुक्र, शनि, बुध, मंगल सहित 50 करोड़ प्रकाश वर्षों और 10 करोड़ निहारिकाओं वाला विराट ब्रह्माण्ड मनुष्य के भीतर ही है। आकाश में दौड़ लगाने का यह जो धन कष्ट और समय साध्य परिश्रम किया जा रहा है, वह सब व्यर्थ है, यदि यह परिश्रम मनुष्य अपने आपको खोज में करे तो वह अपने आप में ही द्वितीय आनन्द के स्त्रोत उपलब्ध कर सकता है। यही बात योगवाशिष्ठ में काफी समय पहले ही समझा दी गई थी। श्रुति का कथन है कि-
जगतोन्तरहंरुप महंरुपान्’तरे जगत्।
स्थितमन्योन्यबलितं कवलीवल पीठबत्॥
-6।2।22।26
परमाणु निमेषाणाँ लक्षाँशगलनास्वपि।
जगत्कल्प सहस्त्राणि सत्यानीय विमान्तयक्तम्॥
तेष्श्प्यन्त स्तयैवान्तः परमाणु कणं प्रति।,
भ्रान्तिरेव मनन्ताहो इयमित्यव भासते॥
-3।62।1-2,
ऊणावरुणावसंख्यानि तेन सन्ति जगत्तिखे।
तेषान्तान्व्यबहारौधान्संख्यातु क हव क्षमः॥
-6।2।176।6,
अर्थात्-आकाश में अनन्त द्रव्यों के असंख्य परमाणु बिखरे पड़े है, उन सब में अनोखे जगत् विद्यमान् हैं, जहाँ-जहाँ जीवाणु हैं, वह अपनी अपनी स्थिति के अनुसार सृष्टि का अनुभव करते हैं। प्रत्येक अणु के अन्दर अनन्त सृष्टियाँ विद्यमान् हैं। परमाणु के एक अत्यन्त सूक्ष्म अणु के लाख वें भीतर हजारों जगत् प्रत्यक्ष से दिखाई देते है। अणु-अणु के भीतर जगत् विद्यमान् है, जो इस बात को जानता और समझता है वही सच्चा ज्ञानी है।
आज का विज्ञान भी यही कहता है कि हर परमाणु के भीतर सौर मण्डल विद्यमान् है, किन्तु हमारा कितना दुर्भाग्य है कि हम उस सूक्ष्मतम-सूक्ष्म चेतन सत्ता का अनुभव न कर विराट्-दर्शन से वंचित रह जाते और दीन-हीन जीवन जीते रहते है।
मनुष्य का पूरा जीवन उलझनों, समस्याओं और परेशानियों से जूझते-जूझते ही समाप्त हो जाता है। उसकी यह आकांक्षा अधूरी हो रह जाती है कि एक बार सारी समस्याओं और परेशानियों का समाधान हो जाता और वह पूरी तरह आश्वस्त होकर जीवन का आनन्द पा लेता। वह आनन्द के उपादान भी जुटाता है। धन कमाता है, परिवार बसाता है, बच्चे पैदा करता है और प्रयत्न करता है कि इन सब साधनों के द्वारा उसे, सुख-सन्तोष मिले। लेकिन होता इसका उल्टा। वही साधन जिनको वह सुख की आशा से जुटाता है, दुःख के हेतु बन जाते है। एक के बाद एक समस्याएँ बढ़ती जाती है और वह उनमें गहराई के साथ उलझता जाता है। जीवन का आदि, मध्य अन्त सब इसी गोरखधन्धे में समाप्त हो जाता है। न सुख मिल पाता और न शांति
मनुष्य की समस्यायें न सुलझ सकने का कारण इसके सिवाय और कुछ नहीं है कि वह उसका सही तरीका नहीं जानता। जीवन-यापन में हरियाली लाने के लिये जड़ को न सींच कर पत्तों को सींचता है। जिस प्रकार अलग-अलग पत्तों को सींचने से पेड़ हरा नहीं हो सकता, उसी प्रकार हर समस्या का अलग-अलग समाधान खोजते और भिन्न उपचार करने से उनका सुलझाव नहीं हो सकता। इसके लिये तो कोई एक ऐसा उपाय काम में लाना होगा जो सारी समस्याओं का एक साथ समाधान करता चले। वह उपाय है अध्यात्मवाद का जीवन में समावेश।
प्रायः लोग पूजा-पाठ को ही अध्यात्म मानते हैं। यह अध्यात्म की संकीर्ण परिभाषा है। पूजा-पाठ अध्यात्म का एक अंग आवश्यक है पर केवल पूजा-पाठ ही आध्यात्म है। ऐसा नहीं है। अध्यात्म वस्तुतः एक महान्-विज्ञान है। उसे जीवन-विद्या या संजीवन-विद्या भी कह सकते है। इसको सुचारु रूप से चलाने के लिये जीवन-विद्या का जानना बहुत आवश्यक है। चौरासी लाख योनियों को पार करके जो मानव-जीवन मिला है। वह योंही दुःख भोगने के लिये नहीं मिला है। वह मिला है परमानन्द प्राप्त करने के लिये। मानव-जीवन का वास्तविक लक्ष्य परमानन्द ही है। किन्तु इस लक्ष्य की प्राप्ति सम्भव तभी है, जब जीवन का सही ढंग से उपयोग किया जाय। जीवन के समुचित उपयोग का ज्ञान अध्यात्म-विज्ञान द्वारा हो ही सकता है। जो अध्यात्म विज्ञान से अनभिज्ञ होते हैं, वे जीवन-यापन में अनाड़ी ही होते हैं। इसी कारण इस संख्या को ठीक से नहीं चला पाते। सुख और सन्तोष के स्थान पर ऐसे लोग अपनी समस्याओं और परेशानियों को ही बढ़ाते रहते है।
सीधी-सी बात है कि यदि किसी बड़ी जागीर, मिल, फैक्टरी, फर्म अथवा उद्योग का संचालन एक ऐसे आदमी को दे दिया जाय जो उस विषय में अज्ञानी अथवा अनाड़ी हो तो वह एक-एक सैकड़ों समस्याएँ पैदा कर लेगा। न उनसे स्वयं कोई लाभ उठा पायेगा और न उनसे किसी दूसरे को लाभ को पहुँचा सकेगा। इसी प्रकार जीवन कला से अनभिज्ञ मनुष्य जीवन-संस्था को हितकर रूप में चलाने के लिए उसी प्रकार प्रशिक्षण की आवश्यकता है, जिस प्रकार किसी उद्योग आदि चलाने के लिये। जीवन-सम्बन्धी वह प्रशिक्षण अध्यात्म से ही प्राप्त होता है।
जो व्यक्ति अध्यात्म का शुद्ध स्वरूप जान लेता है और उसका उपयोग जीवन-क्रम में करने लगता है, उसके सामने समस्यायें नहीं आतीं। यदि आ भी जाती है तो उसे उन्हें सुलझाते देर नहीं लगती। अध्यात्म-जीवी का जीवन ऋद्धि-सिद्धियों का भण्डार और सुख-सन्तोष का आगार बन जाता है। अध्यात्म-जीवी ही वह सफल मनुष्य होता है, जिसके लिये न तो सुख-साधनों की कमी रहती है और न वे सुखकर साधन दुःख का हेतु बनते हैं।
अध्यात्मवादी को सुख-साधनों की कमी क्यों नहीं रहती इस तथ्य को समझ लेने की आवश्यकता है। संसार में करोड़ों मनुष्य है, किन्तु सब एक जैसे साधन-सम्पन्न नहीं होते। कुछ सम्पन्न होते हैं और कुछ विपन्न दीखते है। बहुत से लोग इस भिन्नता को ईश्वर की कृपा-अकृपा मान लेते हैं। किन्तु यह मान्यता ठीक नहीं है। ईश्वर सबका पिता है। उसे अपने सभी पुत्र समान रूप से प्यारे हैं। वह सभी का हित और कल्याण चाहता है। वह कदापि अपनी ओर से यह अन्याय नहीं कर सकता कि किन्हीं को सुखी बनाये और किन्हीं को दुःखी। उसके वैभव और ऐश्वर्य का द्वार सबके लिये समान रूप से खुला है। वह स्वयं अपने हाथ से न तो किसी को कुछ देता है और न किसी को स्वयं वंचित करता है। यह मनुष्य की अपनी पात्रता ही है, जिसके आधार पर कोई सम्पन्न और कोई विपन्न बनता है।
वास्तविक बात यह है कि मनुष्य अपनी सम्पन्नता, विपन्नता का उत्तरदायी स्वयं है। किन्हीं बाह्य परिस्थितियों, गृह-नक्षत्रों देवी-देवताओं की अनुकूलता, प्रतिकूलता को जिम्मेदार ठहराना भूल है। मनुष्य की स्थिति उसकी अपनी कृति अपना निर्माण होता हैं। वह अपने भाग्य, अभाग्य का सृष्टा स्वयं ही है। मनुष्य जिस प्रकार के शुभ, अशुभ कर्म होता है, उसी के अनुसार उसका अच्छा या बुरा भाग्य बनता है। भूतकाल में किये शुभ-अशुभ कर्मों का फल ही प्रारब्ध बनकर वर्तमान में सामने आता है। इसका सारा दायित्व मनुष्य के अपने ऊपर होता है, किन्हीं अन्य व्यक्तियों अथवा वस्तुओं को उसका हेतु मानना अज्ञान का लक्षण है।
प्रारब्धदाता शुभ कर्मों की शिक्षा और प्रेरणा अध्यात्म से ही मिलती है। अध्यात्म ही इस संसार का सबसे महत्त्वपूर्ण तत्त्वज्ञान है। इसी के आधार पर सुख-दुःख की, उत्थान-पतन की, संतोष-संताप की रचना होती है। इस तत्त्वज्ञान को जिस सीमा तक जीवन में उतार लिया जायेगा उस सीमा तक मनुष्य संजीवन-विद्या का अधिकारी बन जायेगा। आध्यात्मिक जीवन गति का अभ्यास होते ही मनुष्य की सारी समस्यायें एक साथ सुलझती चलेंगी। उसे अलग-अलग एक-एक समस्या को सुलझाने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। यदि जीवन में समस्याओं और उलझनों से मुक्त रहकर सरल एवं समाधानपरक जीवन-यापन करने की इच्छा है तो अध्यात्म-विज्ञान का अवलम्बन लेना होगा। मनुष्य को यह नहीं भूलना चाहिये कि सुख-सम्पत्ति श्री-समृद्धि और वैभव-ऐश्वर्य का एक मात्र साधन पुण्य ही है, जिसकी प्राप्ति सत्कर्मों द्वारा होती है और सत्कर्मों को शिक्षा और प्रेरणा अध्यात्म-विद्या द्वारा ही मिलती है।
जैसा कि बतलाया जा चुका है कि भजन-पूजन अध्यात्म का एक अंग अवश्य है किन्तु एकमात्र भजन-पूजन तक ही वह सीमित नहीं है। अध्यात्म का क्षेत्र विस्मृत और व्यापक है। वह सामान्य स्थूल जीवन से लेकर सूक्ष्म आत्मा तक फैला हुआ है। आत्मा का सर्वांगीण विकास अध्यात्म विद्या का मुख्य उद्देश्य है। आत्मा के सुधार तथा विकास की उपेक्षा कर केवल भजन-पूजन ही किया जाता रहेगा तो अध्यात्म-विज्ञान का उद्देश्य पूरा नहीं हो सकता। ऐसे एक दो नहीं हजारों व्यक्ति देखे जा सकते हैं जो भजन-पूजन में बहुत-बहुत समय लगाया करते है पर काम, क्रोध, मद, लाभ आदि विकारों के क्रीतदास बने रहते हैं। ऐसे व्यक्तियों को अध्यात्मवादी नहीं माना जा सकता।
अध्यात्म का अर्थ है आत्म-सुधार आत्म-विकास तथा आत्म-निर्माण जिनके आधार पर शुभ कर्मों और शुभ विचारों की प्रेरणा मिल सके। भजन-पूजन के साथ-साथ जब तक आत्म-परिष्कार आत्म-दर्शन एवं आत्म-कल्याण की ओर प्रगति न की जाएगी अध्यात्मवाद का प्रयोजन पूरा नहीं हो सकता।
अध्यात्म साधन द्वारा मन, बुद्धि, आत्मा का परिष्कार कर लेने पर मनुष्य के विचारों एवं वृत्तियों में अनुकूलता या जाती है। वह संसार के सामान्य विकारों, विकृतियों और आवेगों से ऊपर उठ जाता है। परिष्कृत और अनुकूल आचरण वाले व्यक्ति की शक्तियाँ परिस्थितियों से अधिक प्रभावशाली होती है, जिससे उसे उन पर नियन्त्रण कर लेने में कठिनाई नहीं होती।
आरोग्य, धन, स्नेह, सौजन्य, सम्मान और सन्तान आदि को साँसारिक सुखों का आधार माना गया है। निश्चय ही यह जिसे प्राप्त होते रहें और साथ ही आत्मा की अनुकूलता सहायक होती रहे तो वह व्यक्ति सुख और सन्तोष का अनुभव कर ही सकता है। यही उपलब्धियाँ जो एक आध्यात्मिक व्यक्ति के लिये सुख का साधन करती है। वही अनाध्यात्मिक व्यक्ति के लिये उलझनों, समस्याओं तथा दुःख का कारण बन जाती है।
आरोग्य ले लीजिये। अध्यात्म-विकार-धारा का विश्वासी व्यक्ति भूलकर भी खान-पान और रहन-सहन में प्रमाद अथवा असंयम नहीं करेगा। वह खाने योग्य वस्तुएँ खाने के समय ही उतनी ही मात्रा में खायेगा, जितनी उचित होगी। निश्चित है कि ऐसे संयमी व्यक्ति का आरोग्य सुरक्षित रहेगा। अध्यात्म विश्वासी विषयों और व्यसनों के कुप्रभाव से अच्छी तरह अवगत होता है। वह अपने मन और इन्द्रियों पर इतना नियन्त्रण रख सकने का विश्वास रखता है, जिससे कि संसार के निरर्थक विषय और व्यसन उसे पराभूत न कर सकें। उसकी यह दृढ़ता उसके स्वास्थ्य को अमर बनाये अमर बनाये रखती है। अनाध्यात्मिक व्यक्ति इस प्रकार का नियन्त्रण तथा दृढ़ता नहीं रह पाता, अस्तु उसका स्वास्थ्य आजीवन एक समस्या बना रहता है।
अध्यात्मवादी धन की आवश्यकता को भी जानता है और उसके दोषों को भी। वह भूलकर भी धन के साथ लोभ की संधि नहीं होने देता। परिश्रमपूर्वक उतने धन की ही कामना करता है, जिससे उसका निर्वाह सुविधापूर्वक होता रहे। मितव्ययिता और सन्तोष का सम्बल लेकर धन के क्षेत्र में लोभ तथा तृष्णा से टक्कर लेता हुआ आवश्यकता भर ले आता है और आनन्दपूर्वक उससे सेवा लेता है। इस योग से उसका आचरण, चरित्र और संसार शुद्ध तथा तेजस्वी बन रहते है। धन उसके लिये समस्या नहीं बनने पाता, इसके विपरीत अनाध्यात्मिक व्यक्ति धान्य की तरह अन्धाधुन्ध धन की खेती में जुटे रहते है। मार्ग-कुमार्ग पाप-पुण्य धर्म-अधर्म किसी का भी विचार उन्हें नहीं रहता। वे लोभ, स्वार्थ तथा तृष्णा-वितृष्णा से ताड़ित-प्रभावित हुए धन और उसके परिणाम रूप में तमाम समस्याओं को जमा करते रहते है।
अध्यात्म जीवियों का शिष्ट, शालीन, सभ्य और विनम्र होना स्वाभाविक होता है। असत्य और मिथ्यावाद से उनका कोई सम्बन्ध नहीं रहता। ऐसे शिष्ट और शालीन व्यक्ति को स्नेह सौजन्य की कमी रह ही नहीं सकती। वह जहाँ भी जायेगा अपने गुणों तथा आचरण के कारण आदर, सम्मान पायेगा ही। उसकी उदारता और त्याग-वृत्ति उसे परिवार में, परिजनों, सम्बन्धियों तथा बाहर समाज में लोकप्रिय बना ही देगी। वह विचार भी जायेगा हाथों-हाथ स्वागत पाने का स्वर्गीय सुख अनुभव करेगा। अनाध्यात्मिक व्यक्ति स्वभावतः अहंकारी, दम्भी ओर मिथ्यावादी होता है। वह हठपूर्वक स्नेह और सम्मान पाने का प्रयत्न करता है, छल और प्रवंचना का सहारा लेता है। ऐसा मिथ्या-ग्रस्त वृत्ति न तो स्नेह सम्मान पा सकता है और न पाने पर अपनी आत्मा में उसका सुख अनुभव कर सकता है।
इसी प्रकार आध्यात्मिक और अनाध्यात्मिक व्यक्तियों के बीच संतान सुख का अन्तर रहा करता है। आध्यात्मिक व्यक्ति जहाँ दाम्पत्य जीवन की महिमा-गरिमा और पवित्रता को जानता और उसे सुरक्षित रखने का प्रयत्न करता है। वहाँ अनाध्यात्मिक व्यक्ति के लिए दाम्पत्य जीवन
“आपकी सफलता का श्रेय किसको है?” एक पत्रकार ने प्रेसीडेन्ट जानसन से प्रश्न किया। जानसन ने उत्तर दिया-असफल व्यक्ति” को कैसे उसने पुनः प्रश्न किया, जानसन ने बताया-मैं वित्त किसी असफल व्यक्ति को देखता उससे बात-चीत करके यह पता लगाता कि वह असफल किन कारणों से हुआ। पीछे उन अनुभवों का लाभ उठाकर ही मैंने सफलता प्राप्त की।”
पाशविक भोग के सिवाय और कुछ नहीं होता। इस अन्तर से उत्पन्न होने वाली सन्तानों में सत्-असत् का अन्तर होना और उसी के अनुसार सुख-दुःख का मिलना निश्चित ही है।
जीवन को अध्यात्म के साँचे में ढालकर चलने वाले अवश्य ही वर्तमान जीवन में समस्याओं और उलझनों से बचकर सुख पाते ही है और उसी आधार पर सत्कर्मों द्वारा भविष्य के लिये अपनी श्रीमती प्रारब्ध की रचना भी करते चलते हैं। अध्यात्म सारी समस्याओं का एक हल और सारे भव रोगों का एक उपचार है। इसका आधार लेकर चलने वालों को सुख-शांति का प्रभाव नहीं रहता।
चीन में यह अपनी तरह का अनोखा प्रयोग था। अनेक प्रतिष्ठित व्यक्तियों के साथ सेना के उच्च अधिकारी भी डा० चू-फुत सेन का यह प्रदर्शन देखने के लिये एकत्रित हुये। डा० चू-फूत-सेन चीन के उन योग्य वैज्ञानिकों में सं हैं, जिनकी प्रतिभा पर विश्वास करके सरकार ने अनेक बन्दियों पर प्रयोग करने की उन्हें खुली छुट दे दी थी।
6 व्यक्तियों को जिनमें तीन महिलायें भी थीं, एक सजे सजाये कमरे में लाया गया। उनके सिर के पिछले हिस्से के थोड़े
बाल साफ करके उसमें अत्यन्त पतला पेपर क्लिप जैसा तार जोड़ दिया गया। यह साधारण दीखने वाला तार मस्तिष्क की अनेक नाड़ियों से जोड़ा सा सकता था और उसके नियन्त्रण के लिये मस्तिष्क में एक छोटा-सा रेडियो ट्रांजिस्टर रिसीवर लगाकर तार को उससे जोड़ दिया गया था।
इसके बाद उपस्थित लोगों को सम्बोधित करते हुये डा० चू-फूत-सेन ने बताया कि-संसार की जो भी वस्तुएँ हमारे सामने या संपर्क में आती हैं, उनके की जो भी वस्तुएँ हमारे सामने या संपर्क में आती हैं, उनके किसी भी रूप की कल्पना का सम्बन्ध हमारे मस्तिष्क की उन धाराओं से है, जो अपने आम में विलक्षण संवेगों को छिपाये हुये है। मान लीजिये हमारे मस्तिष्क का कोई साहस वाला भाग सक्रिय है तो उस स्थिति में शेर और बाघ तो क्या कोई बम लेकर भी मारने को खड़ा हो तो उसमें भी भय नहीं लगेगा, क्योंकि उस समय भय की कोई कल्पना ही नहीं होगी। उस व्यक्ति के लिये उतने समय के लिये संसार में कहीं भी भय का कोई अस्तित्व ही समझ में नहीं आयेगा। यह जो कुछ दिखाई दे रहा है, वह मन की रेडियो तरंगों के अनुरूप बनता-बिगड़ता दृश्य मात्र है। वस्तुतः जो कुछ भी सामने है, उसमें से सत्य कुछ भी नहीं है।
अपने कथन की पुष्टि के लिये अब उन्होंने प्रयोग दिखाया। एक छोटा-सा 20 दिन का पिल्ला लाकर उन कैदियों के सामने छोड़ दिया गया। जब तक वे सामान्य स्थिति में थे, कुत्ते को उसी तरह देखते और उसके खेल-कूद को देखकर प्रसन्न होते रहे जैसे सभी अन्य दर्शक पर इसी बीच डा० चू-फुत-सेन ने उस तार का सम्बन्ध मस्तिष्क की भय वाली नाड़ी से जोड़कर ट्रांजिस्टर चालू कर दिया। विद्युत प्रवाह (करेंट) का एक निश्चित आवृत्ति (फ्रीक्वेंसी) पर दौड़ना हुआ ही था कि उस छोटे से कमरे में तूफान खड़ा हो गया। छहों कैदी शेर-शेर करते हुये चिंघाड़ कर भागे कई तो इतने भयभीत हो गये कि उन्हें तत्काल मूर्छा आ गई। पर जैसे ही उस रेडियो ट्रांजिस्टर को बन्द कर दिया गया, कैदी फिर शांत हो गये और उन्हें कुत्ते के पिल्ले से कोई डर न रहा।
छोटा-सा पिल्ला पहले भी वैसा ही था और बाद में भी पर मन के एक दृष्टिकोण को उच्च आवृत्ति (हायर फ्रीक्वेंसी) पर विकसित कर देने पर वही पिल्ला शेर जैसा भयंकर दिखाई देने लगा इससे साफ स्पष्ट है कि हम जो कुछ भी देखते सुनते हैं, वह किन्हीं अदृश्य किरणों और मानसिक तरंगों का बनता-बिगड़ता छायांकन मात्र हैं। उनमें से सच कुछ भी नहीं है। जिस प्रकार पर्दे पर विशेष प्रकार की किरणों-मैजिक लैर्न्टन या सिनेमा के सहारे फोटो गिराने से ऐसा लगता है कि सामने जो ड्रामा हो रहा है, वह बिलकुल सच है उसी प्रकार हमें दिखाई देने वाला संसार भी अज्ञात इच्छा-शक्तियों और प्रकाश-आवर्तनों का छाया चित्र मात्र है और वह थोड़ी देर तक रहता है। पर हमारा दृष्टिकोण अल्प-विकसित होने के कारण वही कई वर्षों का-सी जीवन प्रतीत होता है। और उसमें क्रम-बद्धता होने के कारण नाटक-सा दीखता है पर वस्तुतः उसमें सार और कुछ भी नहीं है, यदि कुछ है तो वह ब्रह्म ही है जिसकी प्रेरणा से प्राण झोंकने से इतना सारा क्रियाशील जगत् दृश्य में आता है।
मनुष्य अपनी प्रकृति जिस दिशा में विकसित कर लेता है, उसे वही भाग सत्य दिखाई देने गलता है और शेष सब उससे निस्सार प्रतीत होने लगता है। उदाहरणार्थ चींटी को संसार में केवल मीठे पदार्थों का ही सबसे बड़ा सुख है और वह उसी खोज में लगी रहती है पर सुअर को मल की बहुत अधिक चाह होती है उसे मीठे व्यंजन भी नीरस दीखते हैं। एक बार अमेरिका के कुछ वैज्ञानिकों ने इच्छा शक्ति पर नियन्त्रण करने का बहुत दिनों तक प्रयोग करने के बाद यह पाया कि किसी एक इच्छा को ही बहुत अधिक बढ़ाकर मनुष्य को ही नहीं उसे मारा तक जा सकता है। उन्होंने चूहों के मस्तिष्क के ‘प्यास वाले भाग को विद्युत शक्ति से बढ़ा दिया फलस्वरूप वे चूहे प्यासे ने होने पर भी इतना पानी पीते गये कि उनका शरीर फूलकर मोटा हो गया। इस स्थिति से उन्हें हटाया नहीं जाता तो चूहे फिर भी पानी बन्द नहीं करते भले ही उनका शरीर फट जाता है। यद्यपि यह स्थिति आने नहीं दी गई। पर वैज्ञानिक विशुद्ध रूप से इस मान्यता पर उतर आये कि मस्तिष्कीय चेतना में होती है, उसके लिये वही अच्छा लगता है वस्तुतः प्रिय-अप्रिय संसार में कुछ है ही नहीं सब अपनी-अपनी इच्छा और वासना का खेल है उसी से संसार का स्वरूप बनता-बिगड़ता और परिवर्तित होता रहता है। चेतनाएँ भी उनके शरीर धारण करने के लिये इसी सिद्धान्त पर काम करती है।
भारतीय दर्शन का आधार ही चेतना की यह सूक्ष्म स्थिति है, उसी पर इतना बड़ आध्यात्मिक इतिहास खड़ा है। एक बार महर्षि वशिष्ठ ने भगवान् राम को इसी तत्त्व का उपदेश देते हुए बताया था-
स्वप्न संकल्प पुरयोनस्प्यिनुभवस्थयोः।
मनागपि यथा रुपं सर्गादो जगस्तथा।
-6।2146।22,
जगत्संविदि जातायामपि जातं न किच्चन।
-3।13।48,
परमाकाशमाशुन्य मच्छमेव व्यवस्थितम्
-3।13।46,
पिंडग्रहो जगत्यस्मिन्विज्ञानाकाशरुपिणि।
मरुनद्याँ जलमिव न सम्भंवति कुत्रचित्॥
-3।15।7,
जाग्रत्स्वप्नसुधु प्सदि परमार्थविदाँ विदाम्।
न विद्यते किचिदपि यथास्थितमवस्थितम्॥
-3।2।146।21,
तस्माद्राम जगत्रासीत्र चास्ति न भविष्यति।
चेतनाकाशमेवाशु कचतीत्थमिवात्मानि॥
-4।2।8,
हे राम! स्वप्न देखते समय और विचार संकल्प करते समय जो चित्र बनते हैं, थोड़ी देर में वह असत्य सिद्ध हो जाते है, उसी प्रकार यह दृश्य जगत् भी असत्य है। जगत् का दृश्य दिखाई देने पर भी कुछ भी उत्पन्न नहीं हुआ है। परम आकाश ही शुद्ध रूप से स्थिति है। स्वप्न और संकल्प में अनुभव होने पर भी पृथ्वी आदि पिण्ड नहीं होते, वैसे ही अनुभव में आने वाला संसार भी शून्य ही है। स्थूलता उसमें कहीं नहीं है केवल मरुस्थल में जल का-सा भ्रम हो रहा है। राम! जगत् न उत्पन्न हुआ है और न होगा चेतना का प्रकाश अपने आप में ही प्रकाशित हो रहा है।
प्रकाश तत्त्व के ज्ञाता वैज्ञानिक भी अब यही बात मानने लगे है। इंग्लैण्ड के प्रसिद्ध वैज्ञानिक जान डाल्टन एक बार एक सार्वजनिक उत्सव में सम्मिलित हुए। अपने लिये उन्होंने गहरे नीले रंग का सूट चुना और उसे ही पहनकर वे उत्सव में सम्मिलित हुये पर वहाँ जब लोगों ने बताया कि आज तो आप गहरे लाल रंग का सूट पहने है तो वे बड़े हैरान हुये। आखिर इतने आदमी झूठ नहीं बोल सकते थे, इसलिये उन्होंने अपनी आँखों की डाक्टरी जाँच कराई। डाक्टरों ने बताया कि दृष्टि-दोष के कारण उनकी रंग पहचानने की क्षमता भी दोषपूर्ण हो गई हैं, अर्थात् उन्हें रंग कुछ के कुछ दिखाई देते है।
बाद में वैज्ञानिकों ने और भी खोजें की ओर बताया कि पशु-पक्षी वस्तुओं को उसी रंग रूप का नहीं देखते जैसे कि मनुष्य देखते हैं, उदाहरणार्थ कुत्ते और बिल्ली की आंखें संसार का रंगहीन देखती है। उन्हें संसार को सभी वस्तुएँ काली, भूरी या सफेद लगती है, भले ही उन्हें लाल, पीले या गहरे हरे रंग के सामने ले जाकर खड़ा कर दो। बन्दर केवल गहरे लाल, हरे और आसमानी रंग को पहचान सकता है। मेंढक किसी भी रंग को नहीं पहचान सकता। मधु-मक्खियों को संसार के सभी रंग एक से ही दिखाई देते हैं। यह सब मस्तिष्क की बनावट का परिणाम है, वस्तुतः इस संसार में जो कुछ है वह सब भ्रम है, माया है-संसार स्वप्न त्यज मोहनिद्रा’ संसार स्वप्न हैं, मोह निद्रा का परित्याग करने वाली रात अक्षरशः सत्य है।
हम दिन में कुल एक सूर्योदय और सूर्यास्त देखते है पर यूरी गागरिन ने अन्तरिक्ष यात्रा से लौटकर बताया कि उन्होंने एक दिन में अठारह सूर्योदय और सूर्यास्त देखे। पृथ्वी को हम किसी भी रंग का नहीं पाते पर बोरमैन एर्ण्डस और लावेल जब पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण से आगे बढ़े तो उन्होंने बताया पृथ्वी हरी-भरी नखलिस्तान-सी लगती है। वहीं अन्तरिक्ष यात्री जब चन्द्रमा के समीप पहुँच गये तो यही पृथ्वी उनके लिये पीले प्रकाश की एक ऐसी चमकदार वस्तु जैसा पृथ्वीवासियों को चन्द्रमा दिखाई देता हैं। रात के अन्धकार में पृथ्वी का निवासी कुछ देख नहीं सकता पर अंतरिक्षवासी को पृथ्वी में इतना प्रकाश दिखाई देता है, जिससे वह सबसे छोटा टाइप अक्षर को मजे से पढ़ सकता है। यह सब दृष्टि-दोष और अनेक स्थितियों का अलग-अलग अन्तर है। उसमें से सत्य कुछ भी नहीं है। सत्य की पहचान तो ब्राह्मी स्थिति पर पहुँचकर ही यथार्थ रूप में हो सकती है। उस अन्तिम सत्य को प्राप्त किये बिना मनुष्य मिथ्यात्व में ही परिभ्रमण किया करता है।
सूर्य-प्रकाश सफेद रंग का है, किन्तु उसे जब वर्णक्रम (स्पेक्ट्रम) में देखते हैं तो वह सात विभिन्न रंगों से बना प्रतीत होती है। यह सभी रंग ही दृश्य प्रकृति को आच्छादित किये हैं, पृथ्वी भी सूर्य की ही एक स्थूल दृश्य प्रकृति है, ऋतु परिवर्तन की क्रिया को हम पृथ्वीवासी बहुत धीरे-धीरे देखते हैं, ज्यादा कड़े पदार्थ जैसे भूमि-खण्ड लोहा, सोना आदि धातुओं के परमाणुओं की हलचल तो दिखाई भी नहीं देती पर यदि हम पृथ्वी में न होकर सूर्य में हो तो पृथ्वी सूर्य से या सूर्य पृथ्वी से अलग नहीं दिखाई देंगे यहाँ को प्रत्येक वस्तु का एक-एक पल का बनता-बिगड़ता स्वरूप सूर्य से बड़े मजे से देखा जा सकता हैं। पृथ्वी में हमारा मस्तिष्क काम करता है और सूर्य में हमारी चेतना इसीलिये यह भारी अन्तर दिखाई देता है। इस सम्बन्ध में हेल्स हाल्टस और मैक्सवेल के अनुसन्धान बड़े उपयोगी और उल्लेखनीय है। इनके अनुसार नेत्र व मस्तिष्क तीन प्रकार के शिरातन्तुओं से जुड़े है, यह शिरातन्तु क्रमशः लाल, हरे और बैगनी रंग की अनुभूति पैदा करते है, इन शिरातन्तुओं की स्थूलता समाप्त करके एक शुभ ज्योति मस्तिष्क से आने दी जाये तो अब जो वस्तु सामने दिखाई पड़ रही है, वह न केवल रंग से अपितु आकृति से भी कुछ और ही दिखाई पड़ रही है, वह न केवल रंग से अपितु आकृति से भी कुछ और ही दिखाई देने लगे। उन्होंने लाल, हरे और बैगनी रंग को प्रक्षेपित लालटेन (मैजिक लैनटर्प) की मदद से सफेद पर्दे पर घटा-बढ़ाकर डालकर दिखाया कि उनको कम या ज्यादा करने से पर्दे की आकृतियाँ कैसी विचित्र-विचित्र बनती-बिगड़ती है।
स्वाद और गन्ध सम्बन्धी पूर्णपेक्षायें भी नितान्त भ्रामक है। 1918 में ए॰ एफ॰ ब्लैक सली नामक एक वैज्ञानिक ने एक प्रयोग किया उसने वरवीना जाति के कुछ खुशबूदार और गंधहीन गुलाबी फूल रखे। 42 व्यक्तियों को उन्हें सुँघाया गया। इनमें से 6 पुरुष और 4 स्त्रियाँ ही एकमत से फूलों की गन्ध बता सकें, शेष ने कुछ और ही बताया। ब्लैकसली ने बताया दरअसल किसी वस्तु में गन्ध है ही नहीं यह सब उस वस्तु और मनुष्य की शारीरिक स्थिति का तालमेल मात्र हैं, वह कभी एक जैसा ही हो नहीं सकता।
मनुष्य के अनेक योनियाँ में भ्रमण और विकास की मान्यता ऐसी विचित्रताएँ ही करेंगी भले ही उसमें कुछ और समय लगे।,
स्वाद के बारे में भी ठीक यही बात है। 1931 में डा० एल॰ एच॰ स्नेडर ने 100 व्यक्तियों को एक वस्तु चखाई 68 व्यक्तियों ने उसे कछुआ बताया देख उसका कुछ भी स्वाद नहीं बता सके। प्राणि-विज्ञान शास्त्रियों का यहाँ भी वही कथन है कि स्वाद शक्ति नस्ल लक्षण है। उनका कहना है आदिवासियों में स्वाद शक्ति के प्रबलता होती है पर गोरी जातियों में बहुत कम होती है। उन्होंने एक ऐसे आदमी का भी उदाहरण दिया, जिसकी किसी दुर्घटना में घ्राण शक्ति नष्ट हो गई थी, इस पर उसकी स्वाद शक्ति ने भी काम करना बन्द कर दिया था। बिना खाये केवल देखकर ही स्वाद और गंध लेने के भी उन्होंने प्रयोग करके बताये। यह सब बातें यह बताती हैं कि आत्मा अपनी-अपनी अलग-अलग स्थिति में भिन्नताएँ अनुभव करती हैं, वस्तुतः भिन्नता नाम की कोई वस्तु संसार में है ही नहीं सब एक तार में जुड़े माला में समान हैं।
जीवन के प्रति हमारा दृष्टिकोण अत्यन्त स्थूल हैं, इसलिये मोटी वस्तुएँ ही हमें दिखाई देती हैं और हम उन सूक्ष्म शक्तियों को परखने से वंचित रह जाते हैं, वस्तुतः जिससे यह सारा संसार बनता बिगड़ता है यही हमारा सबसे बड़ा अज्ञान, माया और भ्रम हैं, यदि हम अपना दृष्टिकोण व्यापक, विशाल और अत्यन्त सूक्ष्म बना पाये तो देखें कि सागर कितना सुन्दर, अभाव रहित, शाश्वत और अनश्वर हैं, परिवर्तनशील और नाशवान् तो यह दृश्य और स्थूल जगत् है उससे लिपटे और आसक्त होने के कारण ही संसार भ्रम में हैं, उस भ्रम का निवारण किये बिना मनुष्य जाति का कल्याण नहीं।
यह संसार मनुष्यों तथा मनुष्येत्तर प्राणियों से परिपूर्ण है। इसमें भूमि पर चलने वाले सरकने, रेंगने और घिसटने वाले प्राणी हैं। आकाश में दूर तक उड़ने वालों से लेकर पृथ्वी से थोड़ी ऊँचाई पर हवा में विचरने वाले और मगर, मत्स्य आदि भीमकाय जल जीवों के साथ-साथ नन्हे-नन्हे कीड़े-मकोड़े तक इस संसार में वर्तमान हैं। इन सभी प्राणियों को एक ही परमपिता परमात्मा ने उत्पन्न किया है। उसका सब पर प्रेम हैं। सबके जीवनयापन की सुविधा का प्रबन्ध उसने किया है। साथ ही वह सब का अधिष्ठाता एवं नियन्ता भी है।
सही है कि संसार के सारे प्राणियों का उत्पन्न कर्ता एक परमपिता ही है। किन्तु उस एक ही पिता की असंख्य सन्तानों के बीच बड़ा भारी अन्तर भी पाया जाता है। उस पिता ने किन्हीं एक प्राणियों को अन्य प्राणियों की उपेक्षा श्रेष्ठ स्थिति का अनुग्रह किया है। मानवेत्तर प्राणियों के बीच ही यदि तुलना की जाये तो कीटाणुओं से कीट-पतंग और कीट-पतंगों से वन-पशु वन-पशुओं से गृह पशु और गृह-पशुओं से पक्षी अच्छी स्थिति में दिखलाई पड़ेंगे। उनमें भी कोई पशु अधिक बलवान्, रूपवान्, स्वच्छ एवं सौम्य है, कुछ गंदे और बर्बर। पक्षियों में कुछ पक्षी तो सुन्दर रंगों वाले, सुडौल और नीलकंठ वाले मिलेंगे। दूसरे कुरूप, भौंड़े और कर्कश कण्ठ वाले गंदे और गलोज दृष्टिगोचर होंगे।
प्राणियों का यह अन्तर काफी बड़ा, स्वाभाविक और समीचीन है। यों तो देखने में यह परमात्मा का पक्षपात पूर्ण अन्याय-सा लगता है कि उसने कुछ को सुन्दर, पवित्र और आकर्षक बनाया और कुछ को ठीक इसके विपरीत। किन्तु इसमें परमात्मा के पक्षपात का रंच-मात्र भी नहीं परमपवित्र और सबके पिता परमात्मा में इस प्रकार के दोष की कल्पना भी नहीं कर सकते। वह तो सर्वकाल और देश में सम्मान रूप से पक्षपात रहित एवं न्यायपूर्ण है। यह श्रेष्ठ एवं निकृष्ट योनियों और स्थितियों का बटवारा हर प्रकार सही तथा निश्चित ही है।
सत्य यह है कि इस सृष्टि में नीचे से लेकर ऊपर तक, निकृष्ट से लेकर श्रेष्ठ तक योनियों में एक स्तर क्रम चला आया है। यह वस्तुतः जीवों की निम्नोत्तर कक्षाओं की एक सम्बद्ध शृंखला चली गई है। जीव अपने कर्मानुसार नीचे से उच्चतर योनियों अथवा कक्षाओं को उत्तीर्ण करता हुआ उच्चतम स्थिति में पहुँचता रहता है। इन श्रेष्ठ से श्रेष्ठतर योनियों का क्या क्रम है, इनमें सबसे निकृष्ट कौन सी योनि है, अथवा किस शरीर की यात्रा समाप्त करने के बाद कौन-सा शरीर, कौन-सी योनि मिलती हैं? इसका स्पष्ट ज्ञान अभी मनुष्य को प्राप्त नहीं हो सका है। इतना तो स्पष्ट है ही कि मानवीय कर्मयोनि को छोड़कर अन्य सारी भोग-योनियों में जीवों को एक के बाद एक उच्चतर योनि ही मिलती जाती है, जिसकी परिसमाप्ति मानव योनि में आकर हो जाती है, और तब पुनः यही से कर्मानुसार या तो मनुष्य और ऊपर बढ़कर देवयोनि प्राप्त करता है अथवा अपने पुरुषार्थ एवं कर्म के अनुसार ऊँची-नीची भोग-योनियों में लौट जाता है। कीट से लेकर मोक्ष तक की स्थिति मनुष्य का कर्मानुसार अपना स्वयं का उपार्जन है। इसमें न तो परमात्मा का हस्तक्षेप होता है और न उसका पक्षपात
भोग-योनि में पड़े प्राणियों के बीच किसको, किसमें अधिक क्या सुविधा मिली हैं? इस विषय में विचार किया जाये कि मानवों और मानवेत्तर प्राणियों के बीच सुविधाओं एवं साधनों के सम्बन्ध में क्या अन्तर है और उसका क्या उद्देश्य है। क्योंकि हम सब मानव है और दूसरों के विषय में विचार करने से पूर्व अपनी दशा पर, अपने कर्तव्यों और उद्देश्यों पर विचार करना अधिक उचित है।
मनुष्य शरीर ईश्वर का सर्वश्रेष्ठ उपहार है। इन्द्रियों, वाणी, बुद्धि, विद्या, ज्ञान और कल्पना-शक्ति के रूप में जो सुविधाओं मनुष्य को प्राप्त है, जो आनन्द एवं उल्लास की सम्भावनायें मनुष्यों के लिये सुरक्षित हैं, वे सृष्टि के अन्य प्राणियों के लिये अप्राप्य हैं, आहार, निवास, सुरक्षा, सामाजिकता, सहयोग, पारस्परिकता, चिकित्सा, यातायात, मनोरंजन, कला-कौशल साहित्य, धर्म, अध्यात्म आदि की उपलब्धियाँ एवं कलायें जिनको कि हम मानव-जीवन में देखते सुनते तथा उपभोग करते है, संसार के अन्य प्राणी उन उपहारों से सर्वथा वंचित है। वे न तो इसके लिये प्रयत्न ही कर सकते हैं और न प्रयत्न करने पर पा ही सकते है। मनुष्य की तरह उनको वर्तमान स्थिति से आगे बढ़ सकने का कोई अधिकार नहीं है। क्योंकि वह भोग-योनि है, उसमें कर्म द्वारा उन्नति करने का अवसर नहीं है। यह अवसर केवल मनुष्य मात्र को ही उपलब्ध है कि वह अपने कर्मों द्वारा अपना वर्तमान स्थिति का बदल सकता है। इस प्रकार अन्य प्राणियों की तुलना में मनुष्य कितना सुखी, सम्पन्न, समृद्ध एवं भाग्यवान् है, इसका अनुमान नहीं लगाया जा सकता। अब यदि इस अलभ्य अवसर को मनुष्य योंही प्रमाद में व्यसन एवं वासनाओं में नष्ट-भ्रष्ट कर देता है तो यह उसके लिये भयानक दुर्भाग्य की ही बात होगी।
हम मनुष्य मात्र संसार के सभी प्राणियों की अपेक्षा अधिक बुद्धिमान् तथा शक्ति सम्पन्न है। जो शक्तियाँ परमात्मा में बतलाई जाती है, वे सब हममें बीज रूप में निहित है। मनुष्य संसार में ईश्वर का अंश, उसका प्रतिनिधि ही माना गया है। उसे संसार के अन्य प्राणियों पर विद्या, बुद्धि एवं विवेक द्वारा शासन करने का अधिकार मिला हुआ है। इस प्रकार हम जीव सृष्टि में प्राणि मात्र में प्राणियों के सर्वोच्च स्तर पर विद्यमान् है।
अब विचार यह करना है कि हम मनुष्यों को क्या यह सत्ता, यह शक्ति, यह शासन, यह सुविधा और यह साधन पूर्ण गुण-गौरव योंही व्यर्थ में निरुद्देश्य ही दे दिया गया हैं? अथवा इसके पीछे कोई उद्देश्य भी निहित है।
सृष्टि का एक साधारण नियम है कि किसी भी ऊँचे अनुदान के पीछे कोई ऊँचा उद्देश्य भी निहित रहता है। अधिकारों की पूर्ति कर्त्तव्यों में ही होती है। जैसे 2 जिसका अधिकार बढ़ता जाता है, पदोन्नति होती जाती है। वैसे वैसे उसी अनुपात से उसका कर्त्तव्य तथा उत्तरदायित्व भी गुरुतर होता जाता है। एक सिपाही जब तक सिपाही है, तब तक उसका अधिकार क्षेत्र भी सीमित है और उत्तरदायित्व भी न्यून है। पर ज्यों ही वह उन्नति करके कप्तान हो जाता हैं, त्यों-ही उसकी सुविधाओं तथा अधिकारों के साथ अधिकार भी बढ़ जाता है। सिपाही रहने तक उसका उत्तरदायित्व केवल उस क्षेत्र की व्यवस्था तक ही सीमित था, जिस स्थान पर वह नियुक्त था। किन्तु कप्तान का उच्च पद पाते ही उस सारे नगर का ही नहीं, पूरे जिले की व्यवस्था का उत्तरदायित्व आ जाता है। वास्तविक बात यह है कि अधिकार अपने में कोई अस्तित्व नहीं रखते। पद, पदवी, अधिकार एवं सत्ता, कर्तव्यों तथा उत्तरदायित्व की ही परिचायक स्थितियाँ हैं। जो व्यक्ति भी अधिकारों को केवल अधिकार मानकर उनका दुरुपयोग करने लगता है, शीघ्र ही उसका अधिकार छीन लिया जाता है और उस पर मुकदमा चलाकर समुचित दण्ड भी दिया जाता है।
मनुष्य प्राणि जगत् में सबसे बड़ा पदवी पति है। निदान उसका उत्तरदायित्व भी अन्य प्राणियों से कही अधिक बड़ा और विशाल है। उसे यह सब साधन, सत्ता तथा अधिकार मिलने का उद्देश्य यही है कि वह अपनी उपलब्धियों को अपनी सारी विशेषताओं को, धन-वैभव और ऐश्वर्य को, विद्या एवं विभूति को भगवान् की इस अखिल सृष्टि की अधिक सुन्दर, अधिक सुखी, अधिक समृद्ध, विकसित, उन्नत तथा सम्पन्न बनाने में उपयोग करे। उसे समझना चाहिये कि उसके विशाल अधिकार इस बात के सूचक हैं कि वह संसार के सारे प्राणियों को उनका हित सम्पादित करने के अपने कर्त्तव्य का पालन करें। उसे यह सब प्रसाद एवं प्रभुता इसलिये नहीं दी गई है कि वह इन सब का उपयोग मात्र अपनी अथवा अपने परिवार की उन्नति, विकास एवं सुविधा के लिए ही करे। यदि इस पुरस्कार का केवल यही उद्देश्य रहा होता, तब तो इस अनुमान का कोई अर्थ ही न रहता। अपना स्वार्थ तो कीड़े-मकोड़े योंही बिना किसी विशेष अधिकार एवं सुविधा के ही पूरा कर लेते हैं। यदि केवल अपना पेट भरते रहना ही मनुष्य जीवन का उद्देश्य रहा होता तो निश्चय ही परमात्मा ने इस मनुष्य को एक स्वरूप, एक आकार भर देने के अति-
रिक्त अन्य कोई भी विशेषता न दी होती और तब यह मनुष्य केवल आकार-प्रकार में भिन्न अन्य प्राणियों की भाँति ही स्तरीय दृष्टिकोण से भोग-योनि वाला ही रहता और अपनी जन्मसिद्ध अवस्था से एक इंच भी इधर-उधर न हट पाता। पशु-पक्षियों की तरह नंग-धड़ंग शौचालय के विचार से रहित नाली, कूड़े में अपना आहार खोजता और पेट भरता घूमता है।
मानव जीवन का सारा उद्देश्य उपकार तथा आत्मोद्धार इन दो शब्दों में अन्तर्हित माना जा सकता है। न्याय, सत्य, शौच, साधना तथा संयम आदि भी धारणा कर मनुष्य को अध्यात्म अथवा धर्म मार्ग से अपनी आत्मा का उद्धार तो करते ही रहना चाहिये, साथ ही उसे दूसरों का दुःख-दर्द भी समझना और उसे दूर करने में यथायोग्य सहयोग भी देते रहना चाहिये। उसे चाहिये कि वह अपनी उपलब्धियों, उपार्जनों तथा प्राप्तियों का वह सारा अंश परोपकार में लगा ही देना चाहिये, जो उसके अपने-अपने आत्मउद्धार के लिये प्रयुक्त होने के बाद शेष रहे। लोग बड़ी-बड़ी विद्याएँ प्राप्त कर लेते हैं, असंख्य धन पैदा कर लेते हैं। किन्तु उसमें से थोड़ा बहुत अपने स्वार्थ में लगा कर शेष को योंही व्यर्थ में छिपाये रखते हैं और अन्त में धरती अथवा कुपात्रों के हाथ में सौंपकर चले जाते है। यह संकीर्णता, यह स्वार्थ परम्परा मानव-जीवन के उद्देश्य के सर्वथा प्रतिकूल है। ऐसा आचरण करने वाले को उसका दण्ड अवश्य ही मिलता है।
मानव-जीवन एक अलभ्य अवसर हैं, जो कि चौरासी लाख निकृष्ट योनियों की यातनापूर्ण यात्रा पूरी करने के बाद मिला है। यदि इस अवसर को योंही स्वार्थ अथवा प्रमाद में गवाँ दिया गया तो निव्य ही अनन्तकाल में हम जिस नीच कारा को काट पाये हैं, उसी में पुनः अनन्तकाल के लिये भेज दिये जायें। इस अवसर को परमार्थ एवं परोपकार के रूप में सदुपयोग कर हम न केवल अपने उज्ज्वल भविष्य का निर्माण कर सकते है, बल्कि मनुष्य जीवन से आगे देव योनि के अधिकारी बन सकते हैं और यदि सतर्क सावधान तथा पग-पग पर विचार पूर्वक जीवन को ठीक मार्ग से चलाये तो परमपद भी इस ही जीवन में पा सकते हैं।
मनुष्य जीवन पाने के बाद यदि हम उसके महान् उद्देश्य को विस्मृत कर देते हैं, इस सुकर्म योनि को अपने स्वार्थ में लिप्त होकर, विषय और वासना में डूबकर भोग−योग का रूप दे डालते हैं तो हम न केवल अपनी हानि करते हैं, बल्कि उस परमपिता परमात्मा का अपराध भी करता हैं, जितने हमें यह सब विभूतियाँ अनुग्रह की हैं और इसके लिये निश्चय ही हमें कठोर दण्ड का भागी बनना पड़ेगा।
अस्तु मानव-जीवन का सच्चा उद्देश्य समझें और अपने सुकर्मों द्वारा अपने लिये, उज्ज्वल भविष्य, समृद्ध परिस्थितियाँ, अक्षय शांति, संपूर्ण सन्तोष सुनिश्चित करने के साथ-साथ दूसरों के लिये प्रेरणा एवं प्रकाश के स्त्रोत बनकर अपने विशाल उत्तरदायित्व का निर्वाह करें, जिससे कि आगे भी परमात्मा के इस पुरस्कार के अधिकारी बने रह सकें और निकृष्ट योगियों को अपरिमित यातना से बच जायें।
“देखिये, आप झूठ बोल रहे हैं, आपकी जबान लड़खड़ा रही है, आप सत्य को छुपाना चाहते हैं, मुझे विश्वास है कि यदि आप सच-सच बताकर अपने मन की गाँठ साफ कर लें तो आप निश्चित रूप से रोग मुक्त हो सकते हैं, आप जब स्वप्न की स्थिति में होते हैं और अपने आपको बहते हुये देखते हैं, तभी एकाएक चिल्ला पड़ते हैं और तुरन्त दमा को दौरा पड़ता हैं, इससे भी साबित होता है कि आपके अन्तरमन में किसी पाप की गाँठ जमी बैठी है, आप सच-सच बता दे तो मुझे आशा है आप शीघ्र ही रोग से छुटकारा पा सकते हैं, मन की गाँठ बनी रहने तक शरीर से आप स्वस्थ नहीं रह सकते।”
प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक चिकित्सक डा0 स्टैकिल के उतना जोर देकर पूछने पर रोगी एकाएक रो पड़ा। लगभग 1 घण्टे की अविरल अश्रु-धारा के बाद उसका जी कुछ हल्का हुआ और उसने अपराध स्वीकार करते हुये बताया-मैं जिस मकान में रहता हूँ, उसमें मेरे एक घनिष्ठ मित्र भी रहते थे। हमारी दोनों की धर्म और भगवान् में आस्था थी। दोनों समान विचार के थे। इसलिये हमारी मित्रता भी दिनों-दिन प्रगाढ़ होती गई। कुछ दिनों बाद संयोगवश एक ही घर की दो बहनों से हम दोनों का विवाह हो गया। हम मकान के निचले भाग में रहते थे और मेरे मित्र दुमंजिले पर विवाह के बाद भी हमारी मित्रता बराबर चलती रही। हम दोनों के बीच कोई विक्षेप नहीं आया।”
इसके बाद मन में विकार कैसे उत्पन्न हुआ उसकी कहानी सुनाते हुये रोगी ने आगे बताया कि-वह जब भी अपने मित्र की धर्मपत्नी (अपनी साली) से मिलता तो उसके प्रति कुछ आकर्षण अनुभव होता। यह आकर्षण धीरे-धीरे प्रेम और फिर काम-वासना में बदल गया। इससे मेरे मन में दबाव-सा पड़ने लगा, जब भी अपने मित्र की उदारता और स्नेह याद आता मेरी आत्मा भर्त्सना करने लगती। तो भी अपने आपको रोकने का प्रयत्न नहीं किया मित्र की धर्मपत्नी को कई बार नीचे आना पड़ता, मैं प्रायः उसकी राह देखता। इस तरह से मन में कुछ भय की सी गांठें भी पड़ती गई। जो भी हो शरीर संबंध के ठीक 1 वर्ष मुझे दमा का दौरा पड़ा और तब से जब भी उस तरह का स्वप्न देखता हूँ लगता है कोई मेरे ऊपर चढ़ बैठा है और मुझे जोर का दमा उखड़ पड़ता है।”
डा0 स्टैकिल महोदय ने सारी बातें ध्यान से सुनी यह भी संयोग ही है कि डा0 स्टैकिल भी वियना के ही निवासी थे। डा0 फ्रायड के अनेक सिद्धान्तों को मानते थे पर उनका कहना था कि दमित काम-वासना से रोगी की ग्रन्थियाँ जड़ नहीं पकड़ती वरन् मनुष्य जब नैतिकता का दमन करके पाप करता है, तभी उसके मन में विक्षेप उत्पन्न होता हैं, यह विक्षेप शरीर के किसी भी अंग में, किसी भी रोग के रूप में फूट सकता हैं, इसलिये ही उन्होंने मन को हल्का करके चित्त शुद्धि द्वारा चिकित्सा की पद्धति का विस्तार किया था। उससे उन्होंने अनेकों रोगियों को ठीक किया जो डाक्टरी हिसाब से असाध्य घोषित किये जा चुके थे उनके संस्कारों में परिवर्तन लाकर उन्होंने रोग-निवारण में असाधारण सफलता और यश अर्जित किया।
डा0 स्टैकिल का यह मरीज एक सम्पन्न व्यक्ति था। उसे किसी प्रकार का अभाव न था। एक बार उसे किसी ने जलवायु परिवर्तन की सलाह दी तो वह आस्ट्रिया के मेजारिका द्वीप में चला गया। मेजारिका अपनी सुन्दरता और मनमोहकता के लिये विश्व-विख्यात टापू है। आराम मिलने पर रोगी ने वहाँ स्थायी रूप से बसने का निश्चय किया और उसकी तैयारी के लिये वह घर आया और जब दुबारा फिर वहाँ पहुँचा तो उसकी पूर्व धारणा निर्मल सिद्ध हुई। स्थान परिवर्तन से मन में कुछ दिन स्वस्थ चैतन्यता और प्रसन्नता के कारण रोग दब गया पर स्थायी निवास के कारण जैसे ही पूर्व आकर्षण कम हुआ कि पिछला स्वप्न फिर उभरा और उसे दमा की बीमारी फिर पूरे जोर से उखड़ पड़ी। विवश होकर उसे इस बार मनोवैज्ञानिक चिकित्सक डा0 स्टैकिल की शरण लेनी पड़ी। स्टैकिल महोदय के बहुत बार पूछने पर भी वह अपने मन का पाप छिपाता। तब तक वह अच्छा भी नहीं हुआ पर जैसे ही उसने अपना अपराध स्वीकार कर लिया उसका चित्त हल्का होने लगा। कुछ दिन में उसने अपनी साली से बिलकुल संबंध-विच्छेद कर लिया और अपनी धर्मपत्नी के साथ फिर धार्मिक भावना से रहने लगा। तब से उसका स्वास्थ्य और बीमारी भी ठीक हो गई।
डा0 ब्राउन डा0 पीले मैगड्रगल हेडफील्ड और डा0 चार्ल्स जंग आदि प्रसिद्ध मनोविज्ञान शास्त्रियों ने यह माना है कि फोड़े-फुंसी से लेकर टी0 बी0 और कैन्सर तक की बीमारियों के पीछे कोई न कोई दूषित संस्कार की कारण होते हैं। मनुष्य बाहर से ईश्वर परायण सत्य-भाषी मधुर व्यवहार करने वाला दिखाई देता है पर सच बात यह होती है उसके अंतर्मन में नैतिकता को जब दबाकर केवल दिखावे के लिये कुछ किया जाता है तो उसका मन भीतर ही भीतर अन्तर्द्वन्द्व करता है। उसे अन्तर्द्वन्द्व के फलस्वरूप ही उसमें रोग पैदा होते हैं। कई बार यह संस्कार बहुत पुराने हो जाते हैं, तब बीमारी फूटती है पर यह निश्चित है कि बीमारियों का पदार्पण बाहर से नहीं, व्यक्ति के मन से ही होता है।
इस कथन की पुष्टि में मैमडों नल्ड अमेरिका का उदाहरण देते हुये कहते हैं-अमेरिका के बीमारी में आधे ऐसे होते हैं जिनमें ईर्ष्या द्वेष, स्पर्द्धा-क्रोध धोखे-बाजी आदि भाव प्रसुप्त जमाये होते हैं जो इस प्रकार मानसिक रोगी होते हैं, वे अपनी भावनाओं का नियन्त्रण नहीं कर सकते, उनका व्यक्तित्व अस्त व्यस्त हो जाता है, उसी से वे उल्टे काम करते और बीमारियों की बढ़ते हैं। आगे दुश्चिन्ता की व्याख्या करते हुये मैकडोनल्ड लिखते हैं-मानसिक चिन्ताओं द्वारा रक्त के अन्दर ‘एड्रेनैलीन’ नामक हारमोन की अधिकता हो जाती है, उसी से श्वाँस फूलना, कम्पन, चक्कर आना, बेचैनी, दिल धड़कना, पसीना आना और दुःस्वप्न बनते हैं। दौर और बड़ी बीमारियाँ भी किसी न किसी मानसिक ग्रन्थि के ही परिणाम होते हैं, जिसे डाक्टर नहीं जानता कई बार मनुष्य भी नहीं जानता पर व्याधियाँ होती मन का ही कुचक्र हैं।”
इस संबंध में भारतीय मत बहुत स्पष्ट है। यह जीवन को इतनी गहराई से देखा गया है कि आधि-व्याधियों के मानसिक कारण पाप-ताप के संस्कार रूप में स्पष्ट झलकने लगती है। योग-वशिष्ठ कहते हैं-
चित्ते विधुरते देहः संक्षोभमयुपात्यलम्।
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चित में गड़बड़ होने से शरीर में गड़बड़ होती हैं
इदं प्राप्तनिदं जाड्पाद्वा धनमोहवाः।
आधयः सम्प्रवर्तन्ते वर्षासु मिहिका इवं
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अन्तर्द्वन्द्व और अज्ञान से मोह में डालने वाले मानसिक रोग पैदा होते हैं, उनसे फिर शारीरिक रोग इस तरह पैदा हो जाते हैं, जैसे बरसात के दिनों में मेढक अनायास दिखाई देने लगते हैं।
यूनानी दार्शनिक जेनो के पास एरिट्रायस नामक एक नवयुवक दर्शनशास्त्र सीखने के लिए आया करता था। एक दिन घर लौटने पर एरिट्रायस के पिता ने उससे पूछा-आज तू क्या सीखकर आया?”
एरिट्रायस ने शान्त भाव से जवाब दिया-पिताजी यह बात तो आपको बाद में ज्ञात होगी।” पुत्र के इस जवाब को सुनकर पिता बहुत क्रोधित हुए। उन्होंने एरिट्रायस ने शान्ति से उत्तर दिया, “पिताजी, मैं जो कुछ सीखकर आया हूँ वह यही है कि मैं आपके क्रोध को शान्ति से सहन करूँ
दुष्काल व्यवहारेण दुष्क्रिया स्फुरणंन च।
दुर्जना सगदोषेण दुर्भावोद्भावनेन च।
क्षीणत्वाद्वा प्रयूणंत्वन्नाडीनाँ रन्प्ध्रसंततौ।
प्राणे विधुरताँ याते काये तु विकलीकृते।
/-/-/
दौस्तित्यकारणं दोषाद्व गविदें हे प्रवतते।
अनुचित समय पर अनुचित काम करने से, बुरे लोगों के पास बैठने से मनुष्य मन में पाप और बुरी भावनाओं को स्थान देने लगता है। ऐसा होने पर नाड़ियाँ अपनी सामान्य कार्य-प्रणाली बन्द कर देती है। कुछ नाड़ियों की शक्ति नष्ट हो जाती हैं, कुछ अधिक शक्तिशाली हो जाती हैं, जिससे प्राण का बहाव उल्टा-पुल्टा हो जाता है। प्राण संचार में गतिरोध उत्पन्न होने पर ही शरीर की स्थिति बिगड़ती और उसमें तरह-तरह के रोग पैदा हो जाते हैं।
प्राण मृत्यु के बाद भी चेतना की गतिविधियाँ अभ्यास में रखता है, इसीलिये जन्मजात बीमारियाँ भी पूर्वकृत दुष्कर्मों का ही फल होती है। जिस प्रकार बीमारियाँ मन की कुटिलता और पाप से बढ़ती है उसी तरह मन की पवित्रता, स्नेह, करुणा, दया और निष्काम प्रेम से उनको मिटाया और हटाया भी जा सकता है। इसका एक बहुत सुन्दर उदाहरण फिनलैण्ड में देखने को मिला।
फिनलैण्ड को एक अविवाहित युवती कैंसर जैसे भयंकर रोग से पीड़ित थी। डाक्टरों ने उसकी विस्तृत परीक्षा की और यह देखा कि उसके गर्भाशय में कैंसर है और वह असाध्य है उसका किसी प्रकार का उपचार या आपरेशन नहीं किया जा सकता।
निराश युवती ने आत्महत्या का प्रयत्न किया। गौनर मैंटन नामक प्रसिद्ध साहित्यकार ने उसे देख लिया और दौड़कर उसे बचा लिया। गौनर मैंटन उसी मुहल्ले में रहते थे। उन्होंने युवती को बड़ी करुणा और स्नेह से देखा। उन्होंने उसके निराश जीवन में आशा का संचार किया पर युवती को अपना भावी जीवन बड़ा अन्धकारमय दीख रहा था इसलिये उसने तीन-चार बार आत्महत्या का प्रयास किया, हर बार गौनर ने उसकी रक्षा की और हर बार उसे पहले से अपेक्षा अधिक प्रेम और दया की वृष्टि की। अन्त में उसने युवती से विवाह का भी प्रस्ताव किया। युवती अब तक उसे एक रक्षक के रूप में ही देखती थी पर जब उसे उसके निश्छल प्रेम पर विश्वास हो गया तो एकाएक उसकी निराशा प्रसन्नता में बदल गई। विवाह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। दोनों का विवाह हो गया।
विवाह के कुछ दिन बाद युवती गर्भवती हुई। अपने पति के निश्छल प्रेम के आगे वह यह भी भूल गई कि उसके गर्भाशय में ही कैंसर है। अभी दो वर्ष ही बीते हैं। समाचार मिला है कि युवती के बच्चा हुआ वह बहुत सुन्दर और स्वस्थ है। डाक्टरों ने उसकी पूरी जाँच की किन्तु कही भी रोग का एक धब्बा न मिला। आश्चर्य तो इस बात का है कि युवती स्वयं भी पूर्ण स्वस्थ और उसका पति भी। डाक्टर हैरान है कि वह जो असाध्य कैंसर था वह कहाँ चला गया। फिनलैण्ड में इस घटना से “प्रेम की सृजन शक्ति” पर लोग बहुत विश्वास करने लगे हैं पर सच बात यह है कि वह सभी भावनायें जो आत्मा को प्रसन्नता और शक्ति प्रदान करती हैं, यदि मनुष्य उनका अभ्यास शुरू कर दे तो न केवल अपने आपका स्वस्थ और प्रसन्न रख सकता है वरन् पिछले जीवन में हुई भूलों से जो रोग और दुश्चिन्तायें मन में भर गई हैं उनसे भी मुक्ति अर्जित कर सकता है।
देवदास बड़ा हैरान था कि गुरु शृणोति, प्रत्येक स्थिति में प्रसन्न कैसे रह लेते हैं। उसका अध्ययन करने के लिये वह कई दिन तक निरन्तर शृणोति के साथ बना रहा।
मध्याह्न का भोजन कर चुकने के पश्चात् मुनि शृणोति ने अपनी धर्मपत्नी शोभा से कहा-धर में गुड़ हो तो एक डली देना। गुड़ में छार होता है उससे पेट साफ हो जाता है। शोभा ने इधर-उधर ढूँढ़ा, घर में गुड़ था नहीं वापस लौटकर बताया-गुड़ रहा नहीं, कहें तो मँगा दूँ। शृणोति ने मुस्कराते हुए कहा, नहीं, नहीं, प्रिये! उसकी आवश्यकता नहीं। गुड़ तो गरम करता हैं?
देवदास ने पूछा-महात्मन् पहले तो आपने उसी गुड़ को उपयोगी ठहराया बाद में हानिकारक! आप भी दोहरी बातें करते हैं।” शृणोति ने कहा-वत्स यह विनोदप्रियता ही सदैव प्रसन्नता का रहस्य है और संसार में कुछ है नहीं। यहाँ न कुछ उपयोगी-अनुपयोगी मान्यताओं के अनुपम वस्तुओं की उपयोगिता-अनुपयोगिता बदलती रहती है।
पुरन्ध्री पुण्य और पुरुषार्थ के प्रतीक माने जाते थे। वे ब्राह्मण थे केवल इसीलिए उन्हें सम्मान मिला हो सो बात नहीं थी, पुरन्ध्री ज्ञान और गुणों की दृष्टि से भी महान् थे। देदीप्यमान मुख-मण्डल पर खेलती हुई प्रसन्नता के साथ सन्तोष और शान्ति ने भी उनका कभी साथ नहीं छोड़ा। धर्मशील पुरन्ध्री के जीवन में किसी तरह का अभाव नहीं था।
पुरन्ध्री थे ब्राह्मण पर वे उतना परिश्रम करते थे जितना एक किसान। इसलिये उनके साथ सौभाग्य-लक्ष्मी निवास करती थीं। चरित्र उनके जीवन का आधार था इसलिये यश-लक्ष्मी भी उनके कुटुम्ब में आ गई थीं। वह अपनी धर्मपत्नी पुत्र, कन्या और पुत्र-वधू सबको भगवान् के प्रतिबिम्ब मानकर उनका यथोचित आदर-सत्कार और सेवा करते थे। फलस्वरूप घर के सभी लोग नेक, ईमानदार और गुणग्राही थे। सद्भाव के इस वातावरण से आकर्षित होकर ही कुल-लक्ष्मी ने भी उनके साथ वास किया। पुरन्ध्री का जीवन सुखपूर्वक बीतने लगा।
पाप बहुत दिनों तक इस सुखी परिवार के आस-पास चक्कर काटता रहा पर उसे गृह-प्रवेश के लिये कोई द्वार न मिला। एक-एक परिजन के मस्तिष्क, इन्द्रियाँ और इच्छाओं को उसने उकसाया और भ्रमित करने का प्रयत्न किया पर पाप के प्रहार ऐसे नष्ट हुए जैसे ज्वलित अग्नि में सुखा काठ गिर कर जल जाता है। पाप सिर धुनता-पछताता घर लौटा।
उसे दुःखी देखकर एक दिन उसकी भार्या अलक्ष्मी ने पूछा-स्वामी कई दिन से कुछ दुःखी दिखाई दे रहे हैं। क्या आपकी सहचरी आपका दुःख बँटा सकती हैं? श्रुति कहती है जो स्त्री केवल सुख में ही पति का साथ दे और दुःख में दूर रहे उसके पुण्य क्षीण होते और नरक को जाती है। आप मुझे उस दुर्गति से बचाये और अपने दुःख का कारण बतायें ताकि आपका कुछ साथ दे सकूँ।
पाप और अलक्ष्मी (दरिद्रता) दोनों रात भर कूट मंत्रणा करते रहे। पाप ने अपने दुःख का कारण बताया और अलक्ष्मी ने वह योजना जिसके द्वारा पुरन्ध्री को जीता जा सकता था। प्रातःकाल दोनों बड़े प्रसन्न थे। बड़ी-चढ़ी सफलताओं के स्वप्न देखकर प्रसन्न होने वाले कुटिल और कुविचारी लोगों की तरह पाप और अलक्ष्मी भी उस दिन फूले नहीं समा रहे थे।
शाम होने तक दोनों पुरन्ध्री के पास जा पहुँचे। पाप वृद्ध ब्राह्मण के वेश में और अलक्ष्मी सौंदर्य विभूषित कन्या के रूप में। जो उन्हें पहचानते थे वे हँस रहे थे कि देखें पाप कितना चतुर हैं, लोगों को फँसाने के लिये वह कैसे-कैसे आकर्षक रूप रचता हैं। पुरन्ध्री पाप के माया जाल से भला कैसे बचता है यह देखने के लिये वे सब लोग चुप रहे,
ब्राह्मण वेशधारी पाप ने पुरन्ध्री को पुकार कर कहा-महाभाग मुझे आज रात ही एक गाँव पहुँचना हैं, रात होने को है ऐसे में मैं अपनी युवती कन्या को साथ नहीं ले जा सकता। मार्ग में चोर-डाकुओं का भय, नदी-नालों और हिंसक जानवरों का भी भय हैं। आप इसे लौटने तक अपने घर में रख लें। मुझे मालूम है आप महान् धर्मपरायण है।
द्वार पर आये हुए अतिथि की बात न मानना भी धार्मिक मर्यादा के प्रतिकूल होगा इस विचार से पुरन्ध्री ने ब्राह्मण कन्या के रूप में आई हुई अलक्ष्मी को अपने घर में आश्रय दे दिया। पाप वहाँ से विदा हो गया। उसे प्रसन्नता थी अब मुझे इस घर में प्रवेश का द्वार मिल जायेगा।
ब्राह्मण कन्या के रूप में आई हुई अलक्ष्मी ने पुरन्ध्री को अपने साथ अटकाये रखना प्रारम्भ किया। वह सबसे पहले उठती। पुरन्ध्री के लिये शौच के लिये जल से लेकर स्नान-पूजन तक सब सामान वह अपने हाथों जुटाती। इनसे निवृत्त होते ही वह मीठी-मीठी बातें करने लग जाती। पुरन्ध्री का बहुत-सा समय यों ही बातों में बीतने लगा। अब वे पहले की तरह श्रम नहीं कर पाते थे उन्हें आलस्य घेरने लगा। स्वाभाविक था कि आय के स्त्रोत टूटते। सम्पन्नता निर्धनता में बदलने लगी।
एक दिन पुरन्ध्री सो रहे थे तभी किसी दिव्य ज्योति-युक्त स्त्री ने उन्हें जगाया और कहा-पुरन्ध्री अब मैं तुम्हारे घर से जा रही हूँ। लेकिन तुम हो कौन और क्यों जा रही हो? पुरन्ध्री ने करुणाजनक शब्दों से पूछा। देवी ने उसी गंभीर भाव से बताया-मैं तुम्हारी सौभाग्य लक्ष्मी हूँ, तुमने अलक्ष्मी को आश्रय दिया है सो तुम्हें छोड़कर जा रही हूँ। अब मैं यहाँ नहीं रह सकती। यह कहकर सौभाग्य लक्ष्मी चल दीं। पुरन्ध्री बोले कुछ नहीं, केवल उनका जाना देखते रहे।
सौभाग्य छिन जाने से पास-पड़ोस में तरह-तरह की बातें चल पड़ी। कोई कहता पुरन्ध्री ने ब्राह्मण-कन्या से अवैध संबंध जोड़ लिया है। कोई कहता पुरन्ध्री अब पापी हो गया है। जितने मुँह उतनी बात। पर पुरन्ध्री को मानो इन सबसे कोई प्रयोजन ही न था। वह अब भी संध्या और नैमित्तिक कर्म उसी प्रकार करते थे जैसे पहले। अलक्ष्मी के कूट-जाल को वह समझते थे पर वह उनकी कन्या की तरह धरोहर थी। उनके नेत्रों में एक क्षण भी दूषण उदय नहीं हुआ पर लोगों को समझाया तो नहीं जा सकता था क्योंकि अलक्ष्मी अब और भी अधिक समीप रहने लगी थी पुरन्ध्री की पत्नी को भी उतना समय न मिलता जितना अलक्ष्मी अपने आप हठात् उनके पास बनी रहती। पिता-पुत्री के समान पुरन्ध्री और अलक्ष्मी वाद-विनोद करते रहते।
एक रात उन्हें फिर एक स्त्री ने दर्शन दिया और कहा-पुरन्ध्री मैं हूँ तुम्हारी यश-लक्ष्मी तुम्हें छोड़कर जा रही हूँ।” यश-लक्ष्मी चली गई। पुरन्ध्री के नेत्र-नीर उमड़ पड़े, पर उनका खारा जल भीतर ही भीतर बहकर रह गया।
यश छिन गया तो घर में बेटे-बेटियाँ और पत्नी ने भी साथ छोड़ दिया। अपने-अपने घर बनाकर वे लोग अलग-अलग रहने लगे। पुरन्ध्री के साथ अलक्ष्मी के अतिरिक्त अब कोई नहीं रह गया। कुल-लक्ष्मी भी रूठकर चली गई। पुरन्ध्री ब्राह्मण की बाट जोहते रहे पर वह नहीं आया। चलो अलक्ष्मी की भी नहीं, वह पुरन्ध्री की पुत्रों हो बनी रही। पर किसी के अन्तःकरण की सच्चाई को कौन देखता। सब लोग पुरन्ध्री और अलक्ष्मी को दिन-रात कोसते उन्हें अपने पास तक नहीं बैठने देते।
उस रात घना अन्धकार छाया हुआ था। हाथ को हाथ नहीं सूझता था। कभी-कभी बादलों की चमक में हो कुछ दिखाई दे जाता था और फिर उसके बाद डरा देने वाली बादलों की गर्जना उस वातावरण को और भी वीभत्स बना रही थी। अलक्ष्मी पास ही सोई हुई थी। पुरन्ध्री को नींद नहीं आ रही थी। एकाएक उन्होंने देखा, एक दिव्य-ज्योति फूटी और कोई देव पुरुष सम्मुख आ खड़ा हुआ।
पुरन्ध्री उठ बैठे। उन्हें प्रणाम करते हुए पूछा-भगवन् आप कौन है? क्या आपके आगमन का कारण जान सकता हूँ?
पुरन्ध्री के इस प्रकार प्रश्न करने पर उस दिव्यधारी पुरुष ने बताया-मैं धर्म हूँ, तुम्हारे घर सौभाग्य, यश और कुल सब चले गये, अब मैं ही यहाँ रहकर क्या करूँगा? मैं भी जा रहा हूँ।
यह कहकर धर्म ने जैसे ही पीठ फेरी पुरन्ध्री ने उनका हाथ पकड़ लिया और पूछा-देव बुरा न मानें, मैंने आज तक जो कुछ भी किया वह आपकी ही मर्यादा के लिये। अपनी रक्षा के लिये मैंने अलक्ष्मी को अपने पास रखा फिर क्या आप मुझे पापी ठहरायेंगे। मैंने भावनाओं को पाला हैं, वासनाओं को नहीं। फिर क्या आपका यों ठुकरा कर जाना अधर्म न होगा?
धर्मराज कुछ उत्तर दें उनमें इतनी भी हिम्मत न थी। चुपचाप पीछे लौटे और पुरन्ध्री को देह में अन्तर्लीन हो गये। धर्म को लोटता न देखकर सौभाग्य, यश और कुल-लक्ष्मी सब नई-नई प्रसन्नता लेकर लौट आयें। अलक्ष्मी को उस हलचल में नींद टूट गई। उसने सोचा जहाँ धर्म में इतनी आस्था है वहाँ मेरा रहना निरर्थक है। अपने कुचल को निष्फल हुआ देख पाप और अलक्ष्मी ने पलायन किया। दृढ़व्रती पुरन्ध्री पुनः पहले की तरह लक्ष्मी, कीर्ति तथा विभूतियों से परिपूर्ण हो गये।
हमें सेवा को जीवन के एक आवश्यक व्रत के रूप में ग्रहण करना चाहिये। सेवा की साधना कोई भी किसी भी परिस्थिति में कर सकता है। सेवा के लिये किसी बड़े धन की आवश्यकता नहीं है। संकीर्णता का त्याग कर उत्कट भावना के साथ जन-जीवन में घुल-मिल कर एक रूप हो जाना ही सेवा व्रत का पालन करने के लिए पर्याप्त होता है।
वे लोग गलती पर माने जायेंगे जो सेवा के लिए असाधारण आकांक्षा रखते हैं, ठीक विख्यात महापुरुषों की तरह सेवा के क्षेत्र में उतरना चाहते हैं, उन्हीं जैसी नकल करना चाहते हैं और यदि उनसे किसी महत् कार्य बनने का कोई अवसर नहीं आता तो कुछ भी नहीं करते, यों ही सोच-विचार और इच्छा-आकांक्षाओं में समय बिता देते है। इसकी यदि गहराई के साथ विवेचना की जाये तो उनकी वह इच्छा सेवाभाव से प्रेरित सिद्ध न होगी। उनकी वह आकांक्षा स्वार्थपूर्ण भाव ही होगा। उनके मन में महापुरुषों जैसी प्रसिद्धि और प्रतिष्ठा की साध होगी। सेवा की भावना नहीं।
सच्ची सेवा भावना रखने वाला व्यक्ति बड़े-बड़े अवसरों की प्रतीक्षा नहीं करता और न वह विख्यात महापुरुषों की नकल करने की स्पृहा करता है। वह तो सेवा के लिये उपर्युक्त किसी भी छोटे से छोटे अवसर का उपयोग करता रहता है। बड़े-बड़े अवसरों की प्रतीक्षा में बैठा रहना ठीक नहीं। इससे तो अच्छा यही है कि जब यहाँ पर जिस सेवा का छोटा-मोटा अवसर आ जाये उसका लाभ उठाया जाये।
मनुष्य की विस्तृत जीवन परिधि में सेवा के छोटे-छोटे सैकड़ों अवसर नित्य हो आया करते हैं। उनका पूरा-पूरा ध्यान रखकर सेवा-व्रत का निर्वाह करते रहना बड़ी-बड़ी लोक-सेवाओं का प्रारम्भिक पाठ है। ऐसे कर्तव्यशील लोक-सेवियों का प्रकाशित होते देर नहीं लगती और तब तो बड़ी-बड़ी सेवाओं के लिये उनकी आवश्यकता स्वतः पैदा हो जाती है। सच्चा और बड़ा लोक-सेवक नहीं बन सकता है जो अपने सेवा-व्रत का प्रारम्भ छोटे और नीचे स्तर से करता है। बड़े-बड़े भार उठा लेने वाली अपनी शक्ति और अपना अभ्यास छोटे-छोटे बोझों को उठाकर ही करते हैं।
किसी भी सच्चे सेवा भावों के लिये संसार में सेवा के अवसरों की कमी नहीं है। सड़कों पर घूमने वाले भूखे-प्यासे अन्धे-अपाहिजों कोढ़ी-कंगालों की दशा हमारी सेवाओं के लिये निरन्तर संकेत करती रहती है। चिकित्सालयों के अभाव में किन्हीं झोपड़ियों और खण्डहरों में पड़े असहाय रोगियों की कराह लोक-सेवी के लिये एक अवसर नहीं तो और क्या है। बहुत बार इस व्यस्त संसार में दुर्घटनाएँ हो जाती हैं। घायल अथवा चपेट-चोट में पड़ जाने वाले का कोई वहाँ पर नहीं होता। उस समय वह ही सदाशयी व्यक्ति उसका सगा है जो अपने हृदय में सेवा की भावना संजोए रहता है। बहुत बार बच्चे खो जाते हैं और उसके माँ-बाप उसे खोजते फिरते हैं। ऐसे अवसरों पर यदि रोता हुआ बच्चा मिल जाए तो उसे घर पहुँचा देना और यदि व्याकुल माता-पिता मिल जाये तो उनके साथ बच्चे की खोज में सहायता करना एक लोक-सेवा ही तो है। इस प्रकार के एक नहीं संसार में सैकड़ों सेवा के अवसर आते रहते हैं। उनका उपयोग कर कोई भी सेवा-व्रती पुण्य-परमार्थ का लाभ उठा सकता है। इसके लिये न तो किसी बड़े धन की आवश्यकता है और न किसी बड़ी योजना की और न प्रतीक्षा की।
अनुभवी लोक-सेवक जानते हैं कि सेवा-धर्म का निर्वाह करने से उसका पुण्य फल केवल परलोक के लिए ही सुरक्षित नहीं होता रहता अपितु उसका तत्काल लाभ मिलता हैं। सेवा करते समय अन्तरात्मा में जिस शान्ति और संतोष का आविर्भाव होता है उसका आनन्द असाधारण होता है। उसकी तुलना में संसार के सारे सुख, भोग हेय ठहरते हैं। अन्तःकरण में सद्भावनाओं की प्रतिष्ठा और उनका विकास श्रेष्ठ कार्यों द्वारा ही होता है और वह श्रेष्ठ कार्य लोक-सेवा के सिवाय और कुछ नहीं माना गया है। दूसरों के लिये परमार्थ भाव के साथ कुछ कष्ट उठाना, त्याग करना एक ऐसा माननीय श्रेय है जिससे मनुष्यता की सच्ची मनुष्यता की प्राप्ति होती है। पूर्ण और सफल मनुष्य बनने के लिये सेवा से बढ़कर कोई उपाय नहीं। परोपकार अथवा पर सेवा ही परमार्थ का सच्चा एवं सक्रिय स्वरूप है। योग, साधना, ध्यान धारणा की अपेक्षा पूर्ण और पारमार्थिक मनुष्य बनने के लिये सेवा सबसे सरल उपाय माना गया है।
मानव जीवन का यथार्थ लक्ष्य निरन्तर आत्म-विकास करते रहना ही है। इतना आत्म-विकास कि एक दिन वह व्यापक होकर परमात्म में मिलकर मोक्ष पद प्राप्त कर ले। किन्तु इसका सीधा और सरल मार्ग सेवाओं के बीच से ही होकर जाता है। आध्यात्मिक और धार्मिक जीवन बिताने पर भी अन्ततः मनुष्य को जन-सेवा की प्रेरणा ही मिलती है। जिसका जितना आत्म-विकास होता जायेगा उसमें सेवा-भावना उतनी ही प्रबल होती जाएगी। जीवन लक्ष्य की मंजिल का मार्ग सेवा के बीच से ही होकर जाता है। सुकरात, ईसा, मोहम्मद, गाँधी, दयानन्द तथा पूर्वकालीन ऋषि-मुनियों का जीवन व्रत सेवा ही रहा है। एक दिन संसार छोड़कर तपश्चर्या करने के लिये जाने वाले बुद्ध देव को उसकी सिद्धि बाद में जन-सेवा में ही हुई और तभी उन्हें सच्ची शान्ति और सच्ची प्रकाश मिला जब वे एकान्त तप का त्याग कर लोकरंजन के कार्यों में लग गये।
आत्मा के कल्याण और मानव-समाज का एक अंग होने के नाते किसी को सेवा कार्यों से विमुख नहीं होना चाहिये। जन-जन को जन-सेवा को अपने जीवन का महत्त्वपूर्ण अंग बना लेना चाहिये। यदि निश्चय दृढ़ और उसके पालन का महत्व हृदयंगम कर लिया गया है तो न तो इसमें व्यस्तता आड़े आ सकती है और न कोई अभाव। यदि निःस्वार्थ भाव से प्राणी मात्र के हित, उपकार की भावना से लोक मंडल का चिन्तन भी करते रह जाये तो यह भी एक जन-सेवा ही होगी जो परमार्थ पुण्य से रहित नहीं हो सकती। विश्व-कल्याण की भावना ही सेवा कार्यों की वास्तविकता और उसका प्राण मानी गई हैं। विश्वकल्याण से रहित बड़ी से बड़ी लोक-सेवा भी निर्जीव और निस्सार ही मानी जायेगी। स्वार्थ का अंशमात्र भी बड़े से बड़े परमार्थ को व्यर्थ कर देती है।
मनोवाँछित परिस्थितियाँ और सांसारिक भोग-विलास के साधन जुटा होने पर इन्द्रिय जन्य शारीरिक सुख ही मिल सकता है। इस नश्वर सुख के आवागमन से आनन्द प्राप्ति का मानवीय लक्ष्य पूरा नहीं होता। सच्चा सुख शारीरिक नहीं आत्मिक होता है-उसकी उपलब्धि परोपकार एवं जन-सेवा की भावना और तदनुसार कार्यों से ही होती है। नश्वर स्वार्थ सुख की अपेक्षा स्थायी एवं कल्याणकारी सुख-परमार्थ सुख को महत्व देना ही बुद्धिमानी मानी गई है। शारीरिक और आत्मिक सुख में अर्थ और परमार्थ का अन्तर है। दिन-रात शारीरिक सुख में क्यों न रहा जाये-तथापि-जब तक आत्मा को संतुष्ट न किया जाएगा, मनुष्य सम्पन्नता के बीच भी एक भयानक अभाव अनुभव करता रहेगा। जब सुख ही पाना है तब झूठे और मिथ्या सुख में क्यों बहला जायें, क्यों न सेवा द्वारा सच्चा और यथार्थ आत्मिक पाने का प्रयत्न किया जाये।
लोक-सेवा की बड़ी-बड़ी आकांक्षाएँ और योजनाएँ बनाने से ही पहले कहीं अधिक उत्तम है कि हमारी जितनी परिधि है उसी में सेवा कार्यों का प्रारम्भ कर दिया जाये। जिस प्रकार एक माली संसार भर के उद्यानों की सेवा करने की योजना न बनाकर अपने जिम्मे के थोड़े से पौधों की सेवा करता और उनके फलने-फूलने के लिये त्याग करता और कष्ट उठाता है उसी प्रकार हर व्यक्ति को अपनी परिधि के उत्तरदायित्वों की ठीक प्रकार से पालन करते रहना चाहिये। यदि हम एक मनुष्य की, अपने पास-पड़ोस की सेवा ठीक प्रकार से कर सके तो वह भी सम्पूर्ण विश्वात्मा की ही सेवा होगी।
संसार की सेवा का एक रूप अपनी सेवा भी माना गया है। अपनी सेवा से तात्पर्य अपने शरीर मात्र की सेवा से नहीं है। न भोग-विलास और सुख-साधनों में लगा रहना ही अपनी सेवा है। अपने गुण, कर्म, स्वभाव का परिष्कार ही अपनी सच्ची सेवा है। अपने सुधार द्वारा हम जितना-जितना अपने को सुधारते चलेंगे, उतनी-उतनी ही समस्त संसार की सेवा होती चलेगी। हम सब इस विराट् विश्व की एक इकाई हैं। इसलिये अपनी सेवा भी संसार की सेवा ही कही जाएगी।
“प्रजा के कार्यों में संसार ने मेरा लोहा माना। मेरा नाम सुनकर लोग दहल जाते थे। मुझे यह भी मालूम हैं कि मेरा नाम सदा-सर्वदा के इतिहास में जुड़ दिया गया है किन्तु मेरे दुर्भाग्य का किसी को पता नहीं। मेरे पास जो शक्ति और सामर्थ्य थी उसका कैसा अच्छा उपयोग कर सकता था किन्तु मैंने जीवन के स्थायी महत्व को जानने का कभी प्रयत्न नहीं किया। मेरी मानसिक स्थिति बड़ी कष्टदायक है और मैं समझ नहीं पाता कि जीवित अवस्था की हुई भूलों से छुटकारा किस प्रकार मिलेगा। मेरे जीवन की तख्ती (स्लेट) में जो धब्बे पड़े हुए हैं मुझे परलोक में भी कुछ हैं, कुछ नहीं, मैं संपूर्ण रूप से स्थित हूँ इसका पता पहले चल गया होता तो जीवन को बड़े परिश्रम और ईमानदारी से बिताकर सन्तोष की नींद ले रहा होता।”
आप कल्पना भी नहीं कर सकते होंगे कि यह शब्द विश्व-विजयी नैपोलियन बोनापार्ट के हैं और उसकी मृत्यु के बाद के है। मृत्यु के बाद जीवन का अस्तित्व भी हैं? ऐसी आशंका उन लोगों को भी है जिनकी बौद्धिक क्षमताएँ रेत में से तेल निकाल लाने जैसे चमत्कार दिखा रही है किन्तु इतना विशाल ब्रह्माण्ड और गणित के सिद्धान्त पर चल रहे अरब-खरब नक्षत्र, सारे जीवन की विविध प्रकार की हलचलों, प्राणियों की चेतना के समान स्तर, जन्म-मृत्यु स्वप्न सुषुप्ति जागृत अवस्थाओं को देखकर भी आज का भौतिकवादी मनुष्य यह नहीं समझ पा रहा है कि मनुष्य देह में हमारा आविर्भाव किसलिए हुआ है और क्या हम इसका बहुत अच्छा उपयोग जीवन को दिव्य शक्तियों से ओत-प्रोत बनाने, पारलौकिक सुख प्राप्त करने में कर सकते हैं? मनुष्य की सबसे बड़ी भूल है। उसे न सुधार पाने के फलस्वरूप ही वह इस जीवन की सीढ़ी को पार करके भी अशान्ति और असन्तोष ही अनुभव करता है। ऐसी ही अशान्ति एक दिन नैपोलियन ने अनुभव की।
आप विश्वास नहीं करेंगे और कहेंगे कि यह कथन नैपोलियन का कैसे हो सकता है। उसकी प्रामाणिकता क्या है? यदि आप मि0 नार्थ क्लिफ नामक इटेलियन परलोकवादी से भेंट कर सके होते तो यह प्रमाण जुटाने की आवश्यकता न पड़ती। प्रेतात्माओं को बुलाकर उनसे अनेक गुप्त से गुप्त जानकारियाँ प्राप्त कर लेने वाले भारतीय परलोकवादी डा0 बी0 डी0 ऋषि (अहमदनगर) की तरह क्लिफ भी मृतात्माओं को एक विशेष ढंग से बुलाते थे उनमें से कई घटनायें ऐसी प्रकाश में आई जिन्हें इटली के कुछ बड़े लोग ही मानते थे बाद में उनके उन सत्यों को स्वीकार भी किया था और उसके फलस्वरूप इटली को राजनीति में व्यापक परिवर्तन हुए थे। उन्होंने ही नैपोलियन बोनापार्ट की आत्मा का आवाहन किया था। वह शब्द, उपरोक्त समय के ही है।
जीव-चेतना का गंभीर अध्ययन करने वाले भारतीय मनीष इसीलिये बार-बार यही चेतावनी देते रहे कि मनुष्य को यह देह और संयोग बड़े पुण्य से मिला है उसका उपयोग न करने वाला चाहे कितना ही शिक्षित क्यों न हो अज्ञान ही है और जो इस जीवन के रहस्य को मन में भली भाँति बैठा लेता है वह अशिक्षित होकर भी सौभाग्यवान् ही है क्योंकि वह शाश्वत जीवन के लक्ष्य और ईश्वरीय आनन्द को प्राप्त कर लेता है।
योगवाशिष्ठ में शास्त्रकार ने स्पष्ट चेतावनी देते हुए लिखा है-
मरणाविमयीमूर्च्छा प्रत्येकेनानुसूपते।
यैषो ताँ विद्धि सुमते महाप्रलययामिनीम्॥
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तवन्ते तनुते सर्ग वर्ग एव पृथक् पृथक्।
सहजस्वप्नसंकल्पार्न्सभ्रमाचलनुत्यवत्॥
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म्हाप्रलयराम्यन्ते चिरावात्ममनोवयुः।
यवेयं तनुते तद्वत्प्रत्येक मृत्यनन्तरम्॥
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अन्ये स्वमिव ये जीवास्तेषाँ मरणवन्मसु।
स्मृतिः कारणतामेति मोक्षाभाव वशाविह॥
/-/
अर्थात् जिस तरह महाप्रलय की रात्रि में सब कुछ सुषुप्त सा लगता है उसी तरह मृत्यु के बाद जीव मूर्च्छा को स्थिति में चला जाता है और स्वप्न एवं संकल्प की तरह अपनी एक विलक्षण पारलौकिक सृष्टि रचता है। महाकाल की रात्रि समाप्त होने पर जिस प्रकार परमात्मा नई सृष्टि प्रारम्भ करता है उसी प्रकार जीव भी उस स्थिति को पार करने के बाद ही नया जीवन धारण करता है जब तक मोक्ष प्राप्त नहीं हो जाता अपनी स्मृति के कारण जीव जन्म और मरण का अनुभव करता रहता है।
योगवाशिष्ठ के इसी अध्याय में अगले श्लोकों में महर्षि वशिष्ठ ने यह भी बताया है कि पुण्यात्मायें मोक्ष प्राप्त न होने पर भी परलोक में उस अवस्था को प्राप्त होती है जिनमें उन्हें सुख और प्रसन्नता की अनुभूति होती है किन्तु हिंसा, जड़ता, पाप, कुटिलता और दुष्प्रवृत्तियों से घिरे लोग उस स्थिति में बड़ी बेचैनी अनुभव करते है। उस समय तो उन्हें यह संकल्प उठता है कि अब नये जन्म में वे इस प्रकार जीवन बितायेंगें कि आत्मा सद्गति अनुभव करे पर शरीरगत चेतना में आते ही वे उसे भूल जाते हैं और वासनाओं में पड़े रहकर फिर-फिर कर दुर्गति का कष्ट भोगते रहते हैं।
जीव-चेतना के वैज्ञानिकों को भी इस तरह की आशंका अवश्य है यद्यपि वे उसे स्पष्ट स्वीकार नहीं करते हैं। अपने शरीर की सूक्ष्मतम स्थिति में विज्ञान के माध्यम से ही चलें तो पता चलेगा कि सूक्ष्म से सूक्ष्म अणु में भी व्याप्त होकर चेतना एक प्रकार का विस्तार या अवस्था है उसका कभी अन्त नहीं होता। हमारे शरीर का प्रत्येक भाग कोशिकाओं (सेल्स) से बना है। यह एक छोटा सा परमाणु है जिसका आकार इतना छोटा है कि एक इंच में 6000 कोशिकाएँ बैठ जायेंगी। यह कोशिका भी अपने आप में एक ईश्वरीय चमत्कार है। प्रत्येक कोशिका के चारों ओर अत्यन्त पतली झिल्ली का खोल होता है उसके भीतर पतला चिकना पदार्थ भरा रहता है जिसे प्रोटोप्लाज्म कहते हैं। इस प्रोटोप्लाज्म में भी हलचल हैं। यह हवा खींचता है और कार्बन (दूषित वायु) बाहर निकालता है। तात्पर्य यह है कि हम अकेले साँस नहीं लेते हमारे शरीर का प्रत्येक अवयव साँस लेता है तब तक ही हम जीवित है। प्रोटोप्लाज्म के भीतर एक केन्द्र पिण्ड (न्यूक्लियस) होता हे उसे वैज्ञानिक जीवन का आधार मानते हैं वही नई कोशिकाएँ बनाने की विचित्र क्षमता रखता है जब न्यूक्लियस की शक्ति निर्बल पड़ने लगती है तब प्रोटोप्लाज्म भी सूखने लगता है। एक दिन केवल सूखा पदार्थ रह जाता है मूल चेतना कहीं और गायब हो जाती है। डायटम जो दुनियाँ का सबसे छोटा जीव है जिसे पौधों की इकाई भी कहते हैं और चेतन जीव की भी अभी वैज्ञानिकों में इस संबंध में मतैक्य नहीं है पर यह निश्चित है कि उसके प्रोटोप्लाज्म में से भी चेतना का अन्त हो जाता है उस स्थिति में चेतन की स्थिति और क्रियाशीलता का स्वरूप क्या होगा इसे वैज्ञानिक नहीं केवल तत्त्वदर्शी ऋषि ही समझ सके हैं फिर गुणों की धारायें गुणों में बरतती है और उसी अनुरूप दुःख या सुख का अनुभव करती हैं। अपनी पाप-वासना के कारण अधोगामी योनियाँ अधोलोकों का संताप करती हों और ऊर्ध्वलोकों वाली पुण्य आत्मायें सुख और शान्ति तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं मानना चाहिये।
परलोक न कोई स्थान है न दृश्य पदार्थ, वह तो चेतना की विभिन्न अवस्थायें है जिसकी अनुभूति की जा सकती है स्वरूप का विश्लेषण नहीं किया जा सकता। उसकी प्रामाणिकता उन दृष्टान्तों से जो प्रेत आत्माओं या मृत आत्माओं के आह्वान से संबंध रखते हैं उसी से साबित की जा सकती है। सामान्य स्तर के लोगों के साथ घटित ऐसी घटनाओं को अन्ध-विश्वास कहा जा सकता है ऐसे बनावटी अध्यात्म की तो निन्दा को जानी चाहिये किन्तु अध्यात्म एक विज्ञान भी है वह बुद्धि और जीवन का प्रधान लक्ष्य है उसकी अपेक्षा भी नहीं की जा सकती। इसलिये वह ऐतिहासिक और असामान्य घटनायें दी जा रही है जिनकी सत्यता को अन्ध श्रद्धा न कहा जा सकेगा।
द्वितीय महायुद्ध में “मोन्स” की लड़ाई का दस्तावेज बड़ा आश्चर्य जनक और वस्तुस्थिति को प्रमाणित करने वाला है। इस युद्ध में ब्रिटिश सेना बुरी तरह मारी-काटी गई। कुल 500 सैनिक शेष रहे थे। जर्मन सेनाएँ उन्हें भी काट डालने की तैयारी में थी। उनकी संख्या उस समय दस हजार थी। ब्रिटिश सैनिकों में से एक सिपाही ने कभी सेंट जार्ज की तस्वीर एक होटल में देखी थी। यह तस्वीर एक प्लेट में कढ़ी थी और उसके नीचे लिखा था “सेंट जार्ज इंग्लैण्ड की सहायता करने को उपस्थित हों” वह कभी इंग्लैण्ड के प्रख्यात सेनापति थे और अपने कई हजार सैनिकों के साथ युद्ध में मारे गये थे। उनकी याद आते ही सैनिकों ने अपनी सम्पूर्ण भावना और आत्म-शक्ति से सेंट जार्ज का स्मरण किया और दूसरे क्षण स्थिति कुछ और ही थी। बिजली सी कौंधी और 500 सैनिकों के पीछे कई हजार श्वेत वस्त्रधारी सैनिकों की सी आभा दिखाई देने लगी। दूसरे ही क्षण दस हजार जर्मनी सेना मैदान में मरी पड़ी थी। रहस्य तो यह था कि किसी भी सैनिक के शरीर में किसी भी अस्त्र को कोई चोट या घाव तक नहीं था। इस घटना ने इंग्लैण्ड में एक बार तहलका मचा दिया कि सचमुच मृत्यु के उपरान्त आत्मा का अस्तित्व नष्ट नहीं होता वरन् रूपान्तर होता हे और यह आत्मायें अदृश्य होते हुए भी स्थूल सहायताएँ पहुँचा सकती हैं।
बम्बई में एक पारसी श्री पोस्टन जी. डी. महालक्ष्मी वाला ने अपनी पुस्तक “परलोकवाद" में साहसपूर्ण घटनायें” (एडवेर्न्चस आफ स्प्रिचुअलिज्म) में एक अमरीकी डा0 पी0 बल्स का वर्णन किया है। पो0 बल्स ने परलोक विद्या की बड़ी खोज की थी। श्री पेस्टनजी की उपस्थिति में 3 सितम्बर 1925 को एक प्रयोग किया गया। एक कोरा कागज रखकर डा0 पी0द बल्स की आत्मा का आवाहन किया गया। श्री पोस्टनजी उनसे लास एजेल्स (अमरीका) में मिल चुके थे। जब उनकी आत्मा का आवाहन किया गया तो मृतात्मा ने उन कागज पर हस्ताक्षर किये जब उसे पलटकर देखा गया तो सचमुच डा0 पी0 बल्स के हस्ताक्षर थे। उन्हें उनके पिछले हस्ताक्षरों से मिलाया गया तो उनमें जरा भी अन्तर नहीं था।
“स्प्रिचुअल हीलिंग” नामक पुस्तक में लेडबीटर ने भी यह स्वीकार किया है कि मृत्यु के उपरान्त जीव विचारों के लोक में जीवित रहता है। भौतिक जगत में हम पदार्थ को बहुत महत्व देते हैं किन्तु यह तो उस जीवन की प्रतिछाया मात्र है।
परलोक को प्रमाणित करने में आध्यात्मिक फोटोग्राफी अब एक महत्त्वपूर्ण विज्ञान बन रही है। क्रू0 के डा0 विलियम होप और श्रीमती बम्सरन तथा लन्दन की श्रीमती डीन ने प्रसिद्ध वैज्ञानिक विलियम क्रुक्स होप और कूस्कल का वर्णन करते हुए लिखा है। उन्होंने मृतात्माओं के कुछ ऐसे दुर्लभ चित्र छापे जिन्हें कुछ ही लोगों ने देखा था और बाद में उन्होंने पहचाना भी कि उस समय मृतात्मा की ठीक वैसी ही स्थिति थी जैसी फोटो में आई। ऐसे प्रयोग भारतवर्ष में बहुत होते हैं उनमें मृतात्माओं से बातचीत भी की जाती है। उस गहराई में न जाये तो भी हमें यह मानना पड़ेगा कि इसी देह से मनुष्य जीवन की इतिश्री नहीं हो जाती। वरन् अपने अच्छे-बुरे कर्मों के अनुसार जीव को दूसरी अवस्थाओं में भी अनिवार्य रूप से जाना ही पड़ता है। मनुष्य जीवन उस गहन सत्य की अनुभूति और आत्मकल्याण के लिये परमात्मा के वरदान स्वरूप मिला है जो उसका उपयोग नहीं कर पाते वह नैपोलियन के समान ऐश्वर्यशाली होते हुए भी पछताते हुए जाते हैं।
स्वामी रामतीर्थ तब छात्र थे। पैसे की तंगी के कारण उन्हें कई बार रात में पड़ने के लिए तेल की कमी पड़ जाती थी इसलिये उन्होंने कम कपड़ों से काम चलाना शुरू कर दिया शेष पैसों का उपयोग वे पढ़ाई के खर्चों में करते यह बात कालेज के प्रिंसिपल के कानों तक पहुँची। प्रधानाचार्य जी उनकी प्रखर बुद्धि से पहले ही प्रभावित थे। उनके इस अध्यवसाय और ज्ञान-संचय की प्रवृत्ति पर वे मुग्ध हो उठे। इसलिये उन्होंने रामतीर्थ को सिविल सर्विस में भेजने का प्रस्ताव किया।
अभाव प्रकट करते हुए रामतीर्थ ने उत्तर दिया-श्रीमान जी अपने परिश्रम का उपयोग स्वार्थ में करूँ इससे मेरा आत्म-विश्वास रुकेगा। मुझे पदाधिकार नहीं चाहिये। कृपा कर सकते हों तो मुझे अध्यापक बना दीजिये जिससे प्राप्त ज्ञान औरों को भी बाँट सकूँ।
बुद्धिमान का एक लक्षण यह बतलाया गया है कि वह अपने विचार जगत में किसी ऐसे कारण को प्रवेश नहीं करने देता है जिसके साथ असन्तोष के अग्निकण आने की सम्भावना होती है। मानसिक शांति मानव जीवन की बहुमूल्य निधि है, सन्तोष ही मनुष्य का सच्चा धन है।
सर्व सुख सम्पदाओं से भण्डार भरा हो, किन्तु मन में शान्ति की शीतलता न हो, हृदय हर समय अभाव जैसे सन्ताप से जलता रहे तो उस सारी सुख सम्पदा का क्या महत्व तब तो वह मिट्टी माल की भी नहीं रहो। घर की स्थिति सामान्य है, मजे से रोटी दाल चल रही है, कोई आवश्यकता रुकने नहीं पाती, थोड़े से प्रयत्न से समस्या हल होती जा रही है और साथ ही मन में प्रसन्नता, शान्ति तथा अखेद की शीतल छाया विद्यमान् है तो वह सामान्य गृहस्थ सौ धन कुबेरों से भी अधिक सम्पन्न माना जायेगा। निर्धन होने पर भी धनवान् और अनाधिक्य में भी प्राचुर्यवान ही कहा जायेगा। धन, वैभव, साधन, सम्पदायें अपने में कोई मूल्य नहीं रखती, प्रमुख वस्तु तो मानसिक शान्ति तथा सन्तोष ही है।
मनुष्य मन में असन्तोष की आसुरी आग तब भयानक रूप से प्रचण्ड हो उठती है, जब वह किन्हीं एषणाओं से घिर जाता है। एषणायें बड़ी ही दुष्ट एवं दुःखदायिनी होती है, जिसके पीछे लग जाती है प्रेत की तरह उसके सुख सन्तोष का हरण कर लेती है। मनुष्य की कोई भी कामनायें जब तृष्णा के रूप में बदलकर अनियन्त्रित अथवा अमर्यादित हो जाती है तब एषणाओं की संज्ञा पाती हैं। संसार की तीन एषणायें बड़ी प्रबल बतलाई गई हैं। वित्तैषणा, पुत्रैषणा तथा लोकैषणा
मनुष्य की यह तीनों तृष्णायें कभी तृप्त नहीं होती। आवश्यकता भर ही नहीं, आवश्यकता से हजार लाख गुना अधिक क्यों न हो तिजोरी, बैंक, डाकखाने धन से भरे पड़े हों तब भी पेट नहीं भरता और और की रट लगी ही रहती है। सारे समय, सारे श्रम तथा प्रयत्न के साथ धन बटोरने में लगे रहते है। नोटों की गड़रियों पर गड्डियाँ संभालते है आय का विस्तार संभाल तथा गणना के परे है तब भी और और की प्यास नहीं बुझती। पहले आवश्यकता पूरी हो जाये, फिर कुछ बचे भी, अनन्तर बचत ही नहीं, आय भी बढ़े हजार हो जाय, लाख हो जाये, करोड़ों अरब हो जाये इस तरह यह पूर्ण होती रहने पर भी यह पिशाचिनी वित्तैषणा बराबर बढ़ती और असन्तोष बढ़ाती ही चली जाती है। जिसके जीवन के साथ इस प्रकार की ‘और’ की हाय लगी हो उसका जीवन दो क्षण की सुख सन्तोष की शीतल छाँह अनुभव कर लें, ऐसा उसके भाग्य में नहीं होता। वह तो इसी आवश्यक ‘और’ की हाय-हाय में जलता-गलता हुआ अपना सारा जीवन समाप्त करेगा।
जिसको पुत्र न हो उसकी बात छोड़ दीजिए- हालाँकि पुत्र अथवा पुत्री में कोई अन्तर नहीं होता, तथापि कुछ सामाजिक मान्यताओं की न्यूनता और कुछ विचार दोष के कारण भारतीय समाजों में पुत्र को पुत्री से अधिक महत्व दिया जाता है। जिसके पुत्रियाँ ही पुत्रियाँ हों पुत्र न हो वह अपने को अभागा अथवा सन्तान हीन सा ही अनुभव करता है। उसके सोचने का ढंग यह होता है कि कुछ दिन बाद बेटियाँ अपनी ससुराल चली जायेंगी और तब हमारा घर सन्तान हीनता जैसी स्थिति में हो जायेगा। पुत्र होने पर ऐसा नहीं होता। यद्यपि, यदि पुत्र होने पर उनकी शिक्षा दीक्षा ठीक न हुई और वे निकम्मे, आवारा हो गये तो वह त्रास, वह शोक सन्ताप पुत्र न होने से भी गुना बढ़कर होता है तथापि लोग ऐसी दशा में भी पुत्रों के लिए रोते कलपते रहते है। बेटियाँ यदि एक बार न भी पढ़ लिख जायें तब भी उनकी अशिक्षा उन्हें लड़कों जैसा दृष्ट तथा उद्दण्ड नहीं बना पाती। वे कुशल एवं कलापूर्ण गृहिणी भले न हों पायें किंतु नालायक लड़कों जैसी दुःखदायिनी नहीं होती।
लड़कियाँ हों और लड़का न हों तो इसमें किसी प्रकार का असन्तोष नहीं होना चाहिए। लड़कियों में ही लड़कों का भाव रखा जा सकता है। उन्हें ही लड़का मानकर सारा लाड़-प्यार दिया जा सकता है। लड़कों की तरह उनकी शिक्षा-दीक्षा को भी उन्नत से उन्नतोतर स्थिति में उठाया जा सकता है और यह भी सत्य है कि वे इस उपकार का लड़कों से कही बढ़कर तथा सन्तोषप्रद उत्तर देती है। लड़कियाँ स्वभावतः लड़कों से अधिक कृतज्ञ भावना वाली होती है। लेकिन पुत्रैषणा का प्रेत मनुष्य को पुत्रियों पर ही सन्तुष्ट नहीं होने देता।
पुत्रैषणा पुत्र पाकर भी तो सन्तुष्ट नहीं होती एक-दो चार-छः-दस क्यों न हो तब भी ग्यारहवाँ पाने की इच्छा बनी रहती है और होने पर खुशी ही रहती है। यह जानते हुए भी कि पुत्रों की यह परम्परा जी की जंजाल बन जायेगी। इन सबको पढ़ा-लिखाकर योग्य तथा सुसभ्य नहीं बनाया जा सकता। इनमें से अनेक निकम्मे बनकर जीवन भर सर पर चढ़े रहेंगे तब भी लोगों का पुत्रों से पेट नहीं भरता। भरे भी कैसे पुत्रों की कामना उनके पीछे ‘एषणा’ बनकर पीछे जो लग गई है।
फटे हाल, नंगे, रोगी और निकम्मे क्यों न फिरें, किन्तु पुत्रैषणा पिता पुत्रों की परम्परा से कभी तृप्त नहीं होता। उसे अनेक के बाद और की कामना सताया ही करती है। ऐषणाओं में अतृप्ति का दोष होता ही है।
लोकैषणा भी कुछ कम दुःखदायी नहीं होती। साधारण नागरिक है। सभ्यतापूर्ण ढंग से पास-पड़ोस में सहयोग तथा सौजन्य से रह रहे है। चार आदमियों से भले कहे जाते है। जीवन निरुपद्रव तथा शांतिपूर्ण ढंग से चल रहा है कि इतने से संतोष नहीं सारा नगर क्यों नहीं जानता। जुबान-जुबान पर चर्चा क्यों नहीं है, कही भी कोई सभा-समिति क्यों न हो, उन्हें पहले बुलाया और स्थान दिया जाना चाहिये। अधिकारियों में पूछ होना चाहिये, जनता में प्रतिष्ठा की योजना बनी रहे।
किन्तु यह कामना यही तक कहाँ रुकती है? एषणा बनते ही आगे बढ़ चलती है। पूरा प्रान्त, पूरा देश नाम ले, संसार में प्रतिष्ठा तथा कीर्ति फैले- इस तरह संसार की ऊँची-ऊँची कल्पनाएँ लोकैषणा व्यक्ति को सताया ही करती है। उकसा जितना मान-सम्मान होता है उतना वह उसको अधिक पाने के लिये लालायित रहा करता है। अपने हर सम्मान को वह कम ही अनुभव करता है। लोग सिर आँखों पर ही क्यों न बिठा ले तब भी लोकैषणा का पिशाच हृदय में संतोष की शीतलता नहीं आने देता।
लोकैषणा में एक दोष लोक भीरुता का भी होता है। जो जितना लोकप्रिय बनने का प्रयत्न करता और बनता है वह उतना ही इस बात से भयभीत रहता है कि कही उसकी प्रतिष्ठा कम न हो जाये। लोकप्रियता में व्यवधान न आ जाये कही ऐसा न हो कि लोग उसकी निन्दा करने लगे। जिसका फल यह होता है कि उसे न रात चैन आता है और न दिन में निश्चिन्तता मिलती है। उसे हर समय लोगों की गतिविधि देखने तथा मनो-भाव पढ़ने-जानने के लिये कौवे की तरह सतर्क तथा सचेष्ट रहना पड़ता है। लोकेष्णु व्यक्ति अपनी निन्दा तो दूर स्वस्थ आलोचना भी नहीं सहन कर पाता। वह आलोचना करने वाले का मन ही मन विद्वेषी बन जाता है और उसका बुरा ही नहीं चाहने लगता, नुकसान पहुँचाने, अहित करने की भी चेष्टा किया करता है।
दूसरों से ईर्ष्या करना, किसी को आगे न बढ़ने देना, बढ़े हुए को पीछे खीचना लोकेष्णु का सहज स्वभाव होता है। वह न तो किसी की उन्नति सहन कर सकता है और न किसी को आगे बढ़ा हुआ देख सकता है। दूसरों की लोकप्रियता की मृत्यु मालूम होती है। इसी कारण वह छुपी-छुरी की भाँति भीतर ही भीतर लोगों का काट करता रहता है। अपनी लोकप्रियता बनाये रखने और दूसरों की मिटाने के लिये दुरभिसंधियों, षड्यंत्रों तथा पूर्णता का आश्रय होता रहता है। हर समय लोक भय से भयभीत हो उसे कुचेष्टा के अंतर्गत अपना जीवन चलाना पड़ता है। मनुष्य के लिये ऐसी असंदिग्ध तथा अविश्वासपूर्ण जिन्दगी एक जीते-जागते नरक के समान ही होती है जो किसी प्रकार भी वाँछनीय नहीं कही जा सकती।
सामान्य कामनाएँ, फिर वह किसी विषय में क्यों न हो, स्वाभाविक अधिकार है। किन्तु एषणा का दोष उसे उसके जीवन को एक बन्दी जीवन में बदल देता है। बुद्धिमानी इसी में है कि एषणाओं के ‘मायावी’ जाल से बचते हुये और अपनी सहज सामान्य कामनाओं की पूर्ति का प्रयत्न करते हुये जीवन को अधिक से अधिक सन्तोष, शांति तथा सुख से बिताया जाये। एषणायें कितनी ही ऊँची क्यों न हो उनकी पूर्ति किसी सीमा तक क्यों न हो जाये किन्तु मनुष्य की तृप्ति नहीं होती।
पुत्रैषणा का दूसरा नाम कामवासना है। जिसमें पड़कर लोग व्यभिचारी, काम पशु तथा मर्यादाहीन बन जाते है। उसी प्रकार वित्तैषणा की पिशाचिनी मनुष्य को चोर भ्रष्टाचारी, काला बाजारी और बेईमान बना देती है। लोकैषणा से मनुष्य को आचरण मिथ्यात्व से दूषित हो जाता है। अपनी लोकप्रियता के लिये वह ऐसे-ऐसे काम तक कर बैठता है जिन्हें देख कर घृणा होती है।
मानव-जीवन एक अनुपम अवसर है। यह बार-बार नहीं मिलता। इसे इस प्रकार एषणाओं की आग में जलाकर नष्ट कर डालना किसी प्रकार भी उचित नहीं ईश्वर ने इसका अनुग्रह किया ही इसलिये है कि जीव इस शाश्वत सुख-शांति को पाने और स्थिर बनाने का उद्योग करे जो उसकी आत्मा के बन्धन काटने में सहायक होती है। आकांक्षाएँ बुरी नहीं यदि वे उचित तथा अनुकूल है। किन्तु एषणाएं तो हर प्रकार से दुष्ट तथा दुःखदायिनी ही है। यह लोक का सुख तथा परलोक की गति भ्रष्ट कर डालती है। अपनी आकांक्षाओं एवं महत्त्वाकाँक्षाओं का दोष तो नहीं है और यदि ऐसा हो तो तुरन्त ही उसे निकाल फेंकने के प्रयत्न में लग जाइये।
बम्बई नगर की एक छः वर्षीय कुमारी ज्योत्सना वेन पटेल ने तीन व्यक्तियों को मरणोपरान्त नेत्र दान किया। इस लड़की की मृत्यु 7 सितम्बर को शहर में अस्पताल में हुई। लड़की के माता-पिता ने लड़की की अन्तिम इच्छा के अनुसार तुरन्त ही सरकारी बैंक को उसकी नेत्र दान में दे दिये। इसके फलस्वरूप दो अन्धे लड़कों की पुतलियाँ बदल दी गई तथा एक अन्य व्यक्ति की विट्यिस ट्राँस प्लाटेशन के लिये शस्य क्रिया की गई। बच्ची का यह परोपकार अमर है।
कानपुर में रामबाग मूक बधिर विद्यालय के गूँगे-बहरे छात्रों ने जीवनोपयोगी वस्तुओं के बढ़ते हुए मूल्यों को कम कराने के लिये एक सर्वथा नवीन उपाय का अवलम्बन किया है। उन्होंने अपनी एक सभा में निश्चय किया है कि उनके द्वारा बनाई गई वस्तुएँ तीन वर्ष पुराने भावों पर बेची जाये, जिससे समाज में बढ़ती हुई महँगाई की प्रवृत्ति को पनपाने वालों को एक शिक्षा प्राप्त हो सके। उन्होंने अपने इस निश्चय का मैनेजर से भी अनुरोध किया है कि वे अपने भोजन में भी स्वेच्छा से कमी करेंगे, जब तक महँगाई जारी रहेगी। इन बालकों ने अपने द्वारा बनाई गई वस्तुओं में 5 प्रतिशत तक की छूट देने का निश्चय किया है। धर्म का व्यवहारिक रूप है समाज की जितनी बने सेवा करना। धर्मात्मा बनने के लिये समाज की सेवा को कर्त्तव्य बनाना होगा।
सूर्योदय को अभी थोड़ा विलम्ब था पर अन्तरिक्ष में भगवती ऊषा का आगमन हो चुका था। ऋषियों के आश्रमों में रहने वाले स्नातक एवं वानप्रस्थी सब अपने-अपने साधना गृहों में आसीन भगवती गायत्री के ध्यान, स्मरण, स्तोत्र और जप में तल्लीन हो चुके थे। ऐसी पुण्य बेला में भी महर्षि व्यास के आश्रम का एक तरुण साधक- साधक ही क्यों उनके ही यशस्वी पुत्र स्वयं शुकदेव ने शैया का परित्याग नहीं किया था। यद्यपि वे जग चुके थे पर उनकी मुखाकृति देखने से पता चलता था उसके अन्तस्तल में अन्तर्द्वन्द्व चल रहा है। मन कुछ खोजने का प्रयत्न कर रहा है किन्तु बुद्धि उचित समाधान कर पाने में असमर्थ है।
शयन -शैया का परित्याग किया पर शुक का अवसाद यथावत। शौच, मुख मार्जन और देह प्रक्षालन करने के बाद भी आज वह अपने उपासना स्थल में नहीं गये। एक वृक्ष की चौपालिका पर तने का आश्रय लिए शुक तब तक एक सी स्थिति में बैठे रहे जब तक पिता श्री अपने साधना भवन से बाहर नहीं निकले। शुक ने उन्हें सादर प्रणाम किया। विवर्ण मुख मुद्रा देखते ही भगवान् व्यास ने पूछा- शुक तुमने उपासना कर ली? यज्ञ की समिधाएँ और हविव्पात्र यज्ञ स्थल पर पहुँचा दिया? कहो-कहो आज कुछ बेचैन से दिखाई दे रहे हो कोई बात हुई है क्या?
पिता के स्नेह पूर्ण शब्दों से आश्वस्त होते हुए शुक ने अपनी अंतर्व्यथा व्यक्त करते हुए बताया-भगवन् दो दिन से मैं समाधि के लिये निरन्तर प्रयत्न करता हूँ, किन्तु जब भी उसके लिये चित्त एकाग्र करता हूँ तभी मेरे मन में - यह संसार कहाँ से बना, इस की निवृत्ति क्या है, मैंने अपना संसार क्यों बनाया, मुझे पूर्ण आनन्द क्यों नहीं प्राप्त- ऐसे प्रश्न उठने लगते है उनसे चित्त की एकाग्रता भंग हो जाती है और मैं हर बार समाधि में प्रविष्ट होने से वंचित रह जाता हूँ?
भगवान् व्यास ने कुछ क्षण रुककर विचार किया और बोले- तात्! तुम्हारे प्रश्नों को समाधान करने को स्थिति मुझ में नहीं है। पर मुझे मालूम है महाराज शौरध्वज सर्वत्र ज्ञाता है उन्होंने वेद-तत्त्व का अध्ययन भी किया है अवगाहन भी निःसंदेह तुम्हारे सभी प्रश्नों का उचित समाधान वही कर सकते है। तुम वही चले जाओ
शुक ने उसी दिन मिथिला के लिये प्रस्थान किया। और सायंकाल होने से पूर्व ही वहाँ पहुँच गये। द्वारपाल से उन्होंने महाराज जनक तक अपना संदेश पहुँचाया। द्वारपाल ने भीतर जाकर महाराज को बताया-विद्वान् शिरोमणि व्यास के पुत्र कुमार शुकदेव पधारे है आपसे भेंट करना चाहते है।
व्यास के पुत्र शुकदेव का मेरे पास आना साधारण बात है। व्यासदेव धर्म-तत्त्व ज्ञाता है विद्वानों की उलझी हुई गुत्थियाँ उन्हीं से सुलझती है अवश्य ही उन्होंने शुक को पात्रता की परीक्षा के लिये भेजा है- ऐसा विचार करके जनक ने प्रहरी से कहा-तुम जाओ-शुक से कुछ मत कहना केवल उनकी गतिविधियों पर दृष्टि रखना।
प्रतीक्षा करते हुए बहुत समय बीत गया। कोई उत्तर न मिलने से शुकदेव अपने स्थान पर निश्चल खड़े रहे। रात्रि भी उन्होंने प्रतीक्षा में ही काटी। दूसरे दिन किसी ने उन्हें जल और भोजन के लिये भी नहीं पूछा पर शुकदेव अपने स्थान पर यथावत् खड़े रहे। “यदि मेरे पिता ने मुझे महाराज जनक के पास भेजा है तो अवश्य ही उन्होंने किसी विश्वास पर ही भेजा होगा। मुझे अपने प्रश्नों का निर्णय लेकर ही लौटना चाहिये” शुक के मस्तिष्क में ऐसे ही भाव उठते रहे। इसी स्थिति में उन्होंने सात दिन व्यतीत किये।
सातवें दिन महाराज जनक ने द्वारपाल को आज्ञा दी- उन्हें भीतर भेज दो। अन्तःपुर के एक अत्यन्त सुसज्जित भवन में राज-बंधुओं और सुन्दर बाराँगताओं ने शुक का स्वागत किया। महाराज की आज्ञा ही कुछ ऐसी थी। संसार के जो भी सुखोपभोग सम्भव थे वह सब जुटाये गये। मणि-विभूषित भवन और उसके चंदन चर्चित प्रकोष्ठ उस पर मुक्तकों और लता-बल्लियों की झालरे ही मन को विमोहित करने के लिये बहुत थी पर वहाँ की तो प्रत्येक वस्तु से सौंदर्य और विलास टपक रहा था। सौंदर्य राशि का मिनियों से लेकर वस्त्राभूषण और षट्रस व्यंजन तक किसी भी वस्तु का न कोई अभाव था और नहीं प्रतिबन्ध। शुक उन सबके स्वामी थे। वह किसी भी वस्तु का मनचाहा उपभोग कर सकते थे यह उन्हें अतिथि भव में प्रदेश कराते समय ही बता दिया गया था।
शुक कौमार्य की सीमा पार कर तारुण्य के प्रथम आरोह पर पदार्पण कर रह थे। यह वह समय होता है जब मन सुखोपभोग और वासना की तृप्ति के लिये मचलता है। फिर आज तो वह सब साधन शुकदेव को अनायास ही मिल गये थे उनके सौभाग्य का आज कोई अन्त न था।
पर तो भी शुक इस व्यवस्था से सन्तुष्ट नहीं दिखाई दे रहे थे। देखते तो वह सभी वस्तुएँ रहे पर पूर्णतया शोध-दृष्टि से उनके मस्तिष्क में जो प्रश्न अपने लिये चल रहा था, सृष्टि के प्रत्येक परमाणु के लिये भी वही कल्पना थी। नारियों का यह अक्षय सौंदर्य कहाँ से बना? इन लताओं और झालरों का उद्गम क्या है? क्या यह सब वस्तुएँ जरावस्था प्राप्त हुए बिना यों ही बनी रहेगी? नष्ट होकर यह सौंदर्य कहाँ चला जाता है? क्या ऐसा कोई उपाय नहीं जिससे उस सौंदर्य की राशि को अपने भीतर इस तरह उठाकर रख लिया जाये कि फिर कभी सुख और आनन्द के लिये कही भटकना ही न पड़े? शुक के मन में इन प्रश्नों में मोह-माया आकर्षण क्या वासना को बुझाकर रख दिया। जो सुन्दरियाँ शुक के तारुण्य का सुख लूटने के लिये एकत्रित हुई थी वह मध्याह्न के तपते तरणि से मुरझा गई लताओं की तरह आकर्षण-विहीन हो चली। शुक ने इसी अवस्था से सात दिन व्यतीत किये। न तो उन्हें वासना विचलित कर पाई और न साँसारिक सौंदर्य ही आकर्षण में बाँध सका।
महाराज जनक के चतुर संवाहक उन्हें शुक की एक-एक गतिविधि की खबर देते रहते। सात दिन तक इस अवस्था में भी बिता देने के पश्चात् शुक को सभा में आमन्त्रित किया। शुकदेव जिन्होंने सम्पूर्ण शास्त्रों का स्वाध्याय और अनुशीलन किया था जिनके पिता इतने प्रकाण्ड विद्वान् थे कि सारा संसार उन्हें मस्तक टेकता था वही शुक निरहंकार भाव से सभा मण्डप में गये और महाराज का गुरुभाव से प्रणाम कर एक ओर आसन पर बैठ गये। महापण्डित के इस विनम्र आचरण पर सम्पूर्ण सभा गद्-गद् हो गई।
आमात्यों, सचिवों और सभासदों के सामने बालक शुकदेव से जनक ने अपने प्रश्न पूछने को कहा- शुकदेव ने कहा-महाराज मैंने शास्त्रों का गहन अध्ययन किया है तो भी मुझे परमानन्द की प्राप्ति नहीं हुई। मैं उसका रहस्य जानने के लिये आपकी सेवा में उपस्थित हुआ हूँ।
स्व0 श्री विमनलाल सीतलबाड उन दिनों बम्बई विश्व-विद्यालय के उपकुलपति नियुक्त नहीं हुए थे किसी और उच्च पद पर थे। एक मामले में बचने के लिए एक व्यक्ति उनके पास आया और एक लाख रुपये बतौर रिश्वत देने लगा। किन्तु सर सीतलबाड ने उसे अस्वीकार कर दिया। तब वह व्यक्ति बोला- समझ लीजिये साहब। आपको एक लाख रुपया देने वाला और कोई दूसरा नहीं मिलेगा। सर सीतलबाड हँसे और बोले- नहीं भाई देने वाले तो बहुत मिलेंगे पर इतनी बड़ी रकम मुफ्त में लेने से इनकार करने वाला आपको कोई नहीं मिलेगा।
इससे पूर्व कि जनक उन्हें कुछ तत्त्व-ज्ञान का उपदेश दे उन्होंने सभासदों को सम्बोधित करते हुए बताया- संसार में ज्ञान और सिद्धियों का अक्षय भण्डार भरा हुआ है पर उसे वही प्राप्त कर सकते है जिनमें शुकदेव जैसी अटूट निष्ठा, अडिग श्रद्धा और अटल विश्वास हो। श्रद्धा में ही वह शक्ति है जो आकर्षणों में भी कठिनाइयों में भी मनुष्य की रक्षा करती है। शुकदेव की श्रद्धा प्रगाढ़ है इसलिये वह सब प्रकार के ज्ञान के अधिकारी है।
इसके बाद महाराज जनक ने शुकदेव को पास रखकर ब्रह्म विद्या सिखाई। उन साधनाओं को ही सुमेरु पर्वत पर पूरा करने के पश्चात् शुक ने निर्विकल्प समाधि का सुख प्राप्त किया।
मनुष्य-जाति अपने को सर्वश्रेष्ठ प्राणी माने तो यह भी देखना आवश्यक होगा कि उसमें ऐसी कौन-सी विशेषताएँ है जिनके आधार पर उसे बड़ा माना जा सकता है। गृहस्थी बसा लेना, बच्चे पैदा करना, बड़े-बड़े उद्योग खड़े करके धन कमाना और हास-विलास की जिन्दगी बिताना ही उसकी सर्वश्रेष्ठता का आधार रहा होता तो पशु-पक्षी भी उसी को कोटी के श्रेष्ठ कहलाने का अधिकार रखते। आहार-विहार ही क्यों बौद्धिक क्षमता, शिल्प और स्थापत्य में तो कई बार मानवेत्तर जीवों की कल्पना ही मनुष्य को सीख देती है। कहने को मनुष्य बड़ा है पर यदि साँसारिक लोकाचार ही श्रेष्ठता की इकाई होते तो पशु-पक्षी मनुष्य की अपेक्षा अधिक सम्माननीय और पूज्यास्पद होते। यह तो कोई और ही बातें है जिनके विकास से ही मनुष्य वस्तुतः प्राणि जगत का सिरमौर हो सकता है।
पक्षियों और कीट-पतंगों की दुनियाँ तो बहुत समय पहले ही मनुष्य के लिये कौतूहल पूर्ण रही है। अनेक बार तो उसे यह भ्रम हुआ है कि मनुष्य अन्य जीवों का ही विकसित रूप है। चिम्पाजी नामक बन्दर पर कई प्रयोग करके देखा गया कि उसके रक्त-कणों और मनुष्य के रक्त-कणों में जबर्दस्त समानता है यदि मनुष्य का रक्त किसी चिम्पाजी के शरीर में पहुँचा दिया जाता है तो उससे किसी प्रकार की हानि नहीं होती। चिम्पाजी का गर्भाधान और गर्भ-विकास मनुष्य के समान ही होता है। “सिमियन” जाति के इन बंदरों में और मनुष्य के क्रिया-कलाप में तो इतना अधिक साम्य है कि पाश्चात्य वैज्ञानिक मनुष्य को उसी का एक विकसित रूप मानने लगे। यदि पाश्चात्यों के सिद्धान्त को मान लिया जाये तो मनुष्य भी एक बन्दर है ऐसा कहने में उसे थोड़ा बुरा भले ही लगे।
कीवी, कैसोबरी, रही, मौआ, एमू, शुतुरमुर्ग और पेन्गुइन आदि पक्षियों के जीवन का विस्तृत अध्ययन करने के बाद चार्ल्स डारविन ने लिखा है- इन पक्षियों का गृहस्थ और पारिवारिक जीवन बड़ा सन्तुलित, समर्पित और चुस्त होता है। नर-मादा आपस में ही नहीं बच्चों के लालन-पालन में भी बड़ी सतर्कता, स्नेह और बुद्धि-कौशल से काम लेते है। मनुष्य-जाति की तरह इनमें भी परिवार के पालन-पोषण का अधिकांश उत्तरदायित्व नर पर रहता है। मादा से शरीर में छोटा होने पर भी वह घोंसला बनाना, अण्डे सेहना और जिन दिनों मादा अण्डे सेह रही हो उन दिनों उसके आहार की व्यवस्था करना, सब प्रसूत बच्चों को संभालने से लेकर उन्हें उड़ना सिखा कर एक स्वतन्त्र कुटुम्ब बसा कर रहने की प्रेरणा देने तक का अधिकांश कार्य नर ही करता है। वह इनकी दुश्मनों में रक्षा भी करता है।
गृहस्थी बसाने में स्वभावतः मनुष्य को इतनी आपाधापी नहीं करनी पड़ती होगी जितना बेचारे पेंगुइन पक्षी को। उसके लिये पेंगुइन दो महीने सितम्बर और फरवरी में दक्षिणी ध्रुव की यात्रा करता है। पेन्गुइन जानते है अपने अभिभावक अपने मार्गदर्शक के अनुशासन में रहना कितना लाभदायक होता है। उसके अनुभवों का पूरा-पूरा लाभ उठाने के लिये ही पेंगुइन अपने मुखिया के चरण चिह्नों पर ही चलता है।
ध्रुवों पर पहुँचने के बाद पुराने पेंगुइन तो अपने पहले वर्षों के छोड़े हुए घरों में आकर रहने लगते है किन्तु नव-युवक पेंगुइन अपने माता-पिता की आज्ञा लेकर नया परिवार बसाने के लिये चल देता है। उसकी सबसे पहली आवश्यकता एक योग्य पत्नी की होती है। वह ऐसी किसी मादा को ढूँढ़ता है जिसका विवाह न हुआ हो। अपनी विचित्र भाव-भंगिमा और भाषा में वह मादा से सम्बन्ध माँगता है। मनुष्य ही है जो जीवन साथी चुनाव करते समय गुणों का ध्यान न देकर केवल धन और रूप-लावण्य को अधिक
महत्व देता है। पर पेंगुइन यह देखता है कि उसका जीवन साथी क्या उसे सुदृढ़ साहचर्य प्रदान कर सकता है।
सम्बन्ध की याचना वह स्वयं करता है। ऐसे नहीं, उसे मालूम है जीवन में धर्मपत्नी का क्या महत्व है इसलिये पत्नी को खुश करके। पत्नी की प्रसन्नता भी सुन्दर चिकने पत्थर होते है। नर चोंच में दबा कर एक सुंदर-सा कंकड़ लेकर मादा के पास जाता है। मादा कंकड़ देखकर उसके गुणी, पुरुषार्थी एवं श्रमजीवी होने का पता लगाती है। यदि उसे नर पसंद आ गया तो वह अपनी स्वीकृति दे देगी अन्यथा चोंच मारकर उसे भगा देगी। चोट खाया हुआ नर एक बार पुनः प्रयत्न करता है। थोड़ी दूर पर उदास-सा बैठकर इस बात की प्रतीक्षा करता है कि मादा सम्भव है तरस खाये और स्वीकृति दे दे। यदि मादा ने ठीक न समझा तो नर बेचारा कही और जाकर सम्बन्ध ढूँढ़ने लगता है।
मादा की स्वीकृति मिल जाये तो पेंगुइन की प्रसन्नता देखते ही बनती है। नाच-नाच कर आसमान सिर पर उठा लेता है। पर मादा को पता होता है। गृहस्थ परिश्रम से चलते है इसलिये वह नर को संकेत देकर घर बनाने में जुट जाती है। नर तब दूर-दूर तक जाकर कंकड़ ढूँढ़कर लाता है। मादा महल बनाती है। इस समय बेचारा नर डाँट-फटकार भी पाता है पर उसे यह पता है कि पत्नी के स्नेह और सद्भाव के सुख के आगे मीठी फटकार का कोई मूल्य नहीं दोनों मकान बना लेते है तब फिर स्नान के लिये निकलते है और जल को निर्मल लहरों में देर तक स्नान करते है। स्नान करके लौटने पर कई बार उनके बने-बनाये मकान पर कोई अन्य पेंगुइन अधिकार जमा लेता है। दोनों पक्षों में युद्ध होता है जो विजयी होता है वही उस मकान में रहता है। पर युद्ध के बाद भी स्नान करने जाना आवश्यक है इस बार वे पहले जैसी भूल नहीं करते। बारी-बारी से स्नान करने जाते है और लौट कर फिर गृहस्थ कार्य में संलग्न होते है। मादा अण्डे देती है पर बच्चों की पालन प्रक्रिया नर ही पूर्ण करते है। पेंगुइन की इस तरह की घटनायें देख कर मनुष्य को उससे तुलना करने को जी करता है। मनुष्य भी उनकी तरह लूट-पाट और स्वार्थ पूर्ण प्रवंचना में कितना अशान्त और संघर्ष रहता है। पर वह सुखी गृहस्थी के सब लक्षण भी इन पक्षियों से नहीं सीख सकता और परस्पर घर में ही लड़ता-झगड़ता रहता है। पेंगुइन-सी सहिष्णुता भी उसमें नहीं है।
कछुए को नृत्य करते देखने की बात तो दूर की है किसी ने उसे तेज चाल से चलते हुये भी नहीं देखा होगा पर दाम्पत्य जीवन में आबद्ध होते समय उसकी प्रसन्नता और थिरकन देखते ही बनती है। कछुआ जल में तेजी से नृत्य भी करता है और तरह-तरह के ऐसे हाव-भाव भी जिन्हें देख कर मादा भी भाव विभोर हो उठती है। यही स्थिति है मगरमच्छ की। मगर भी प्रणय बेला में विलक्षण नृत्य करता है।
मछलियों में सील मछली की दुनियाँ और भी विचित्र है। नर अच्छा महल बनाकर रहता है। और उसमें कई-कई मादाएँ रखता है। नर अन्य नरों की मादाओं को हड़पने का भी प्रयत्न करते रहते है और इसी कारण उनमें कई बार तेज संघर्ष भी करना पड़ता है। कामुकता और बहु विवाह की यह दुष्प्रवृत्ति मछलियों में ही नहीं शुतुरमुर्ग और रही नामक पक्षियों में भी होती है। यह 7-8 मादाएँ तक रखते है फिर भी नर इतना धैर्यवान् और परिश्रमी होता है कि एक-एक मादा आठ-आठ दस-दस अण्डे देती है और नर उन सबको भली प्रकार सँभाल लेता है। लगता है इनकी दुनियाँ ही पत्नी जुटानी और बच्चे पैदा करने के लिये होती है इस दृष्टि से मनुष्य की कामुकता और दोष-दृष्टि को तोला जा सकता है। यदि मनुष्य भी इन दो प्रवृत्तियों तक ही अपने जीवन क्रम को सीमित रखता है तो इसका यह अर्थ हुआ कि वह रही और सील मछलियों की ही जाति का कोई जीव है।
कई बार तो अश्लीलता में मनुष्य सामाजिक मर्यादाओं का भी उल्लंघन कर जाता है किन्तु इन पक्षियों और प्राणियों ने अपने लिये जो विधान बिना लिया होता है उससे जरा भी विचलित नहीं होते। चींटी राजवंशी जन्तु है। उसमें रानी सर्व प्रभुता सम्पन्न होती है वही अण्डे देती है और बच्चे पैदा करती है। अपने लिये मधुमक्खी की तरह वह एक ही नर का चुनाव करती है शेष चींटियाँ मजदूरी, चौकीदारी और मेहतर आदि का काम करती है। अपनी-जिम्मेदारी प्रत्येक चींटी इस ईमानदारी से पूरी करती है कि किसी दूसरी को रत्ती भर भी शिकायत करने का अवसर न मिले जब कि उन बेचारियों को अपने हिस्से से एक कण भी अधिक नहीं मिलता। लगता है सामाजिक व्यवस्था में ईमानदारी को भी श्रम और निष्ठा यह आदर्श मनुष्य ने चींटी से सीख लिया होता तो वह आज की अपेक्षा कहीं अधिक सुखी और सन्तुष्ट रहा होता पर यहाँ तो अपने स्वार्थ अपनी गरज के लिए मनुष्य अपने भाई-भतीजों को भी नहीं छोड़ता। कम तौलकर, मिलावट करके कम परिश्रम में अधिक सुख की इच्छा करने वाला मनुष्य इन चींटियों से भी गया गुजरा लगता है।
एक बार अफ्रीका में वन्य पशु खोजियों का एक दल हाथियों की सामाजिकता का अध्ययन करने आया। संयोग से उन्हें एक ऐसा सुरक्षित स्थान मिल गया जहाँ से वे बड़ी आसानी से हाथियों के करतब देख सकते थे। एक दिन उन्होंने देखा हाथियों का एक झुण्ड सबेरे से ही विलक्षण व्यूह रचना कर रहा है। कई मस्त हाथियों ने घेरा डाल रखा है। झुण्ड में जो सबसे मोटा और बलवान हाथी वही चारों तरफ आ जा सकता था शेष सब अपने-अपने पहरे में तैनात। लगता था वह बड़ा हाथी उन सबका पितामह या मुखिया था उसी के इशारे पर सब व्यवस्था चल रही थी और एक मनुष्य है जो थोड़ा ज्ञान पा जाने या प्रभुता सम्पन्न हो जाने पर भाई-भतीजों की कौन कहे परिवार के अत्यन्त संवेदनशील और उपयोगी अंग बाबा, माता-पिता को भी अकेला या दीन-हीन स्थिति में छोड़कर चल देता है।
मुखिया के आदेश से 5-6 हथिनियाँ उस घेरे में दाखिल हुई। बीच में गर्भवती हथिनी लेटी थी। सम्भवतः उसकी प्रसव पीड़ा देख कर ही हमलावरों से रक्षा के लिए हाथियों ने यह व्यूह रचना की थी। परस्पर प्रेम, आत्मीयता और निष्ठा का यह दृश्य सचमुच मनुष्य को लाभदायक प्रेरणाएँ दे सकता है यदि मनुष्य स्वयं भी उनका परिपालन कर सकता होता।
बच्चा हुआ, कुछ हथिनियों ने जच्चा को संभाला कुछ ने बच्चे को। ढाई-तीन घण्टे तक जब तक प्रसव होने के बाद से बच्चा धीरे धीरे चलने न लगा हाथी उसी सुरक्षा स्थिति में खड़े रहे। हथिनियाँ दाई का काम करती रही। बच्चे और मादा के शरीर की सफाई से लेकर उन्हें खाना खिलाने तक का सारा काम कितने सहयोग और संकुचित ढंग से हाथी करते है वह मनुष्य को देखने, सोचने, समझने और अपने जीवन में भी धारणा करने के लिए अनुकरणीय है।
पेंगुइन पक्षी बच्चों पर कठोर नियन्त्रण रखते है। बड़े बूढ़ों के नियन्त्रण के कारण बच्चे थोड़ा भी इधर-उधर नहीं जा सकते। जब शरीर और दुनियादारी में वे चुस्त और योग्य हो जाते है तो फिर स्वच्छन्द विचरण की आज्ञा भी मिल जाती है जब कि मनुष्य ने बच्चे पैदा करना तो सीखा पर उनमें से आधे भी ऐसे नहीं होते जो सन्तान के प्रति अपने उत्तरदायित्वों का निर्वाह इतनी कड़ाई से करते हों। अधिकांश तो यह समझना भी नहीं चाहते कि बच्चों को किस तरह योग्य नागरिक बनाया जाता है।
थोड़ी भी परेशानी आये तो मनुष्य अपने उत्तरदायित्वों से कतराने लगता है किन्तु अन्य जीव अपने गृहस्थ कर्तव्यों का पालन कितनी निष्ठा के साथ करते हैं यह देखना हो तो अफ्रीका चलना चाहिए। यहाँ कीवी नाम का एक पक्षी पाया जाता है। कामाचार को वह अत्यन्त सावधानी से बरतता है ताकि उसे कोई देख न लें। काम सम्बन्धी मर्यादाओं को ढीला छोड़ने का ही प्रतिफल है कि आज सामाजिक जीवन में अश्लीलता और फूहड़पन का सर्वत्र जोर है। कीवी को यह बात ज्ञात है और वह अपने वंश को सदैव सदाचारी देखना चाहता है इसलिए सहवास भी वह बिलकुल एकान्त में और उस विश्वास के साथ करता है कि वहाँ उसे कोई देखेगा नहीं मादा जब अण्डे देने लगती हे तो नर उनकी रक्षा करता है और सेहता भी है। उसे लगातार 80 दिन तक अंडे की देख−भाल करनी होती है। बच्चा पैदा होने के बाद वह जहाँ पुत्रवान् होने पर गर्व अनुभव करता है वहाँ यह प्रसन्नता भी कि अब उसे विश्वास मिलेगा पर होता यह है कि इसी बीच मादा ने दूसरा अण्डा रख दिया होता है बेचारे नर को फिर 80 दिन का अनुष्ठान करना पड़ जाता है। इस तरह वह कई-कई पुरश्चरण एक ही क्रम में पूरे करके अपनी निष्ठा का परिचय देता है। मनुष्य क्या उतना नैतिक हो सकता है? इस पर विचार करें तो उत्तर निराशा जनक ही होगा।
़ऋताचार की दृष्टि से मेंढक बड़ा संयमी होता है। बसंत ऋतु के कामोद्दीपक से उसके रक्त में गर्मी आती है। किन्तु वर्षा ऋतु न आने तक वह अपना संयम भंग नहीं करता। वर्षा ऋतु में वह एक विचित्र ध्वनि से अपनी मादा को बुलाकर प्रणय निवेदन करता है। मादा की स्वीकृति से ही वह एकान्त क्रिया करता है।
शतं जीव शरबो वर्धमानः शर्त
हेमन्ताच्छतमु वसत्तान्
शतं तइन्द्रों अग्निः सविता वृहस्पतिः
शतायुषः हविषाहार्व में तम्।
-ऋग्
-हे रोगी तू शत शरद् शत हेमन्त और शत बसन्तों तक दिन-दिन वृद्धि पाता हुआ जीवित रह। इन्द्र, अग्नि, सूर्य और बृहस्पति आदि सारे देव तेरे इस शरीर को सौ वर्षों तक जीवन धारण करने के लिए आहुतियों के बल पर मृत्यु-मुख से वापस ले आवें।
ऋग्वेद की इस ऋचा पर ऋषि ने सूक्ति द्वारा रोगी को यज्ञ के आधार पर निरोग अघायु होने का निर्देश किया है।
यह निर्देश केवल यज्ञ की महिमा स्थापित करने अथवा यज्ञ धर्म को प्रोत्साहित करने के लिए यों ही नहीं कर दिया गया है, बल्कि इसके पीछे एक आयुर्वेदिक तथ्य निहित हैं जो कि आधुनिक प्रयोगों पर खरा उत्तर कर विज्ञान सम्मत सिद्ध हो चुका है।
शरीर रोगों पर यज्ञीय वातावरण का क्या प्रभाव हो सकता है और यह रोगों को रोकने अथवा उनका निराकरण करने में कहाँ तक सफल हो सकता है। इसे देखने के लिए एक प्रयोग किया गया-
काँच की बारह शीशियों को वैज्ञानिक ढंग से शुद्ध एवं स्वच्छ करके दो-दो शीशियों में दूध, माँस, फलों का रस आदि छः प्रकार की वस्तुएँ भरकर छः शीशियाँ उद्यान के उन्मुक्त वायु मण्डल में और छः शीशियाँ यज्ञीय वातावरण में रख दी गई। कुछ समय बाद उद्यान के वायु मण्डल में रखी शीशियों की चीजों में सड़न पैदा होने लगी जब कि यज्ञीय वातावरण की शीशियों की वस्तुएँ शुद्ध बनी रहीं। उनमें सड़न तब प्रारम्भ हुई जब उद्यानीय वातावरण में रखी शीशियों की सारी चीजें सड़ गई। इस प्रयोग का परिणाम प्रकट करता है कि शुद्ध आक्सीजन युक्त वायु की अपेक्षा यज्ञीय वायु में रोग रोधक शक्ति अधिक होती है।
प्रायः देखा जा सकता है कि जो व्यक्ति नियम पूर्वक नित्य प्रति हवन किया करते है। वे दूसरों की अपेक्षा अधिक निरोग रहा करते है। इसका एक कारण जहाँ जीवन की नियमितता एवं भावना की पवित्रता है वहाँ एक वैज्ञानिक कारण यह भी है कि हवनकर्ता को नियमित रूप से यज्ञ-पूत वायु भी मिलती रहती है। जो अपनी शक्ति से शरीरस्थं रोगाणुओं को नष्ट कर और नये जीवाणुओं को प्रवेश करने से रोकती रहती है। इन प्रयोगों तथा अनुभवों के आधार पर विश्वास किया जा सकता है कि अन्य उपचारों के साथ साथ यदि यक्ष्मा आदि असहाय अथवा किसी अन्य प्रकार के जीर्ण रोगों से ग्रस्त व्यक्ति उपयुक्त औषधियों द्वारा नित्य प्रति हवन भी करते रहें तो निश्चय ही वे रोग मुक्त होकर आरोग्य लाभ कर सकते है।
प्रायः जीर्ण रोगों से ग्रस्त लोग जल्दी ठीक नहीं होते। बहुत कुछ उपचार करने के बाद भी काई लाभ नहीं होता। डाक्टर लोग जवाब दे देते है। और कोई उपाय न देखकर रोगी जीवन से निराश हो जाते है। पुराने रोगों के ठीक न होने का एक विशेष कारण है कि रोग के सूक्ष्म कीटाणु शरीर के किसी अंग की भीतरी पर्त में स्थायी रूप से बस जाते है और धीरे धीरे रोगी की जीवनी शक्ति नष्ट करते रहते है। इन रोगाणुओं की सूक्ष्मता का इससे ही अनुमान लगाया जा सकता है कि एक खस-खस के दाने पर बीस अरब कृमि चढ़ जाते है। ऐसे सूक्ष्म कीटाणु शरीर की किसी भीतरी पर्त में निर्लिप्त घर बनाये अपना काम किया करते है। शरीर के उन भीतरी भागों में रक्त के भी बहुत ही सूक्ष्म कण कठिनता से पहुँच पाते है। किन्तु दवा दी जाती है स्थूल रूप में। इससे उनका उन भीतरी भागों में सूक्ष्म कीटाणुओं तक पहुँच पाना सम्भव नहीं होता। रोगी दवा पीता -खाता रहता है। कोई लाभ नहीं होता। निदान उसे विवश होकर जीवन से निराश हो जाना पड़ता है। यह निश्चित है कि किसी स्थूल वस्तु की अपेक्षा उसके सूक्ष्म रूप का प्रभाव सैकड़ों गुना बढ़ जाता है। इंजेक्शन औषधि का सूक्ष्म रूप है। यही कारण है कि पुराने और असाध्य रोगों में डाक्टर अधिकतर इंजेक्शनों की ही व्यवस्था किया करते है। इंजेक्शन स्थूल औषधि की अपेक्षा अधिक प्रभाव उत्पन्न करता है। वैध लोग औषधि की शक्ति बढ़ाने के लिए उसे महीनों खरल में घुटवाते अथवा उसको भस्म रूप में परिणित करवाया करते है। आयुर्वेद में इसी उद्देश्य से औषधियों को फूँक कर भस्म बनाने का नियम है। होम्योपैथी के आविष्कर्ताओं ने औषधि की शक्ति बढ़ाने के लिए ही उनकी “पोटेन्सी” तैयार करने का नियम बनाया है। उनका कहना है कि ‘सुगर आफ मिल्क’ अथवा स्पिरिट में घोटने अथवा झटका देने से किसी औषधि का जितना सूक्ष्म भाग किया जायेगा उसकी शक्ति उतनी ही बढ़ जायेगी। कारण यह है कि इस विधि से औषधि की गुप्त औषधियाँ उभर आती है। सभी जानते है कि ऊँची पोटेन्सी की होम्योपैथी दवा की एक मात्रा कई कई महीने अपना प्रभाव करती रहती है, जब कि कम पोटेन्सी की दवा की कई मात्राएँ एक दिन में दी जाती है। जीर्ण अथवा असाध्य रोगों में होम्योपैथी की दवा ऊँची पोटेन्सी में ही दी जाने का विधान है। यह तो रही औषधियों को घोटने आदि की बात। हम सब नित्य प्रति के व्यवहार में देख सकते है कि जिस भोजन को खूब चबा कर खाया जाता है वह अधिक लाभकर होता हैं डाक्टरों का कहना है कि अच्छी तरह चबाने से जहाँ भोजन अन्य अनेक प्रकार के लाभ करता है वहाँ उसकी गुप्त प्राण शक्ति उभर आती है जिससे थोड़ी मात्रा में किया हुआ भोजन भी अधिक बलदायक होता है। उसका अधिकांश भाग तत्त्व रूप में परिणित हो जाने से मल कम बनता है जिसके कारण शरीर स्वस्थ तथा निरोग रहता है। इस प्रकार जिस वस्तु को जितना ही सूक्ष्म किया जाता है उसकी शक्ति भी उतनी ही बढ़ जाती है। अणुओं की शक्ति इसी सूक्ष्मता के सिद्धांत पर अमोघ एवं अपरिमित हो जाया करती है।
कोई भी औषधि कितनी ही खरल में क्यों न घोटी-पीसी जाये या कितनी देर ही क्यों न उबाली जायें उसके परमाणु उतने सूक्ष्म नहीं हो सकते जितने कि हवन द्वारा अग्नि में जलाने से। उदाहरण के लिए एक मिर्च को ले लीजिए। एक पूरी मिर्च एक आदमी आसानी से खा सकता है। उसका प्रभाव जो कुछ थोड़ा बहुत होगा वह उस एक खाने वाले पर ही होगा। किन्तु जब उसी मिर्च को किसी चीज में कूटकर मीन किया जाता है तक उसका प्रभाव बढ़ जाता है और आस पास के चार छः आदमी प्रभावित हो उठते है। पर जब उसी मिर्च को आग में जलाया जाता है तो उसका प्रभाव इतना बढ़ जाता है कि आस पास के घरों तक के लोग प्रभावित हो जाते है। इसी प्रकार जो औषधि अग्नि में हवन की जाती है उसके तत्त्व सूक्ष्म से सूक्ष्मतम होकर बहुत अधिक प्रभावशाली हो जाते है। अग्नि में जलाये जाने से औषधि के सूक्ष्म परमाणु न केवल रोगों के सूक्ष्म जीवाणुओं को ही नष्ट कर सकते है बल्कि वे हर उस स्थान पर पहुँच कर अपना प्रभाव डाल सकते है जहाँ पर रोगाणु शरीर के गुप्त से गुप्त भागों में अपना स्थान बनाकर मनुष्य को असाध्य रोगी बना दिया करते है। रोगों के कृमि कितने ही सूक्ष्म क्यों न हों पर वे वायु से सूक्ष्म कदापि नहीं हो सकते। शरीर के जिस भीतरी भाग में रोग के कीटाणु पहुँच सकते हैं। उसमें वायु तो बिना किसी बाधा के जा ही सकती है। हवन की हुई औषधियों के सूक्ष्म तत्त्व उसी की तरह सूक्ष्म होकर वायु में मिल जाते है। जो श्वाँस द्वारा शरीर में पहुँच कर रोगों का नाश करते है। यज्ञ से उत्पन्न औषधियों का लाभकारी तत्त्व प्रभाव रूप में ही वायु के साथ शरीर में जाते और लाभ करते है। यही कारण है कि नित्य नियमित यज्ञ करने वाले लोग अन्यों की अपेक्षा अधिक स्वस्थ एवं निरोग रहते हैं
क्षय रोग का रोगी जब असाध्य हो जाता है, उस पर कोई भी औषधि किसी रूप में लाभ नहीं करती तो डाक्टर उसे पहाड़ पर जाने का परामर्श दिया करते है। इसका कारण यही होता है कि औषधियों के प्रभाव से भरी हुई पहाड़ों की आक्सीजन वायु इतनी सूक्ष्म होती है कि वह शरीर के किसी भी सूक्ष्म से सूक्ष्म भाग में जाकर रोगी को लाभ करती है। उद्यानों अथवा पहाड़ों की उन्मुक्त वायु को इसी लिए स्वास्थ्यदायक माना जाता है कि उसमें वनस्पतियों तथा औषधियों का सूक्ष्म प्रभाव विद्यमान् रहता है।
आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के आधार पर सिद्ध हो चुकी है कि क्षय जैसे अनेक घातक रोगों की सर्वोत्तम औषधि आक्सीजन युक्त युद्ध वायु ही है। आक्सीजन वायु में जहाँ अन्य अनेक स्वास्थ्य दायक गुण होते है वहाँ उसमें एक सुखाने का भी गुण होता है। यह वायु रोगी के शरीर में जाकर जहाँ रोगाणुओं का नाश करती है वहाँ फेफड़ों आदि में पड़ गए घावों को सुखाती भी है।
किन्तु प्रकृति की उन्मुक्त वायु में दिशाओं की गति के अनुसार भिन्नता भी होती है। पूर्व से आने वाली वायु जहाँ क्षत को सुखाती है वहाँ पश्चिमीय वायु उसे हरा कर देती है। बरसाती वायु तो हर प्रकार के क्षत के लिए हानिकारक मानी जाती है। इस भिन्नता तथा ऋतु वैविध्य के कारण प्रकृति की आक्सीजन युक्त वायु भी हर समय हर प्रकार से लाभकारी नहीं हो सकती। उसके लाभ के लिए उसकी गति तथा ऋतुओं पर निर्भर रहना पड़ता है। एक यज्ञीय वातावरण ऐसा होता है जिस पर ऋतु अथवा दिशा का कोई प्रतिबन्ध नहीं रहता। वह हर समय हर प्रवार से लाभकारी ही होता है।
साथ ही एक विशेषता और भी होती है- वह यह कि यज्ञ में हवन की हुई एक ही औषधि अनेक रोगों पर लाभकारी सिद्ध होती है। ईश्वर ने एक औषधि में एक ही गुण नहीं रखा उसमें अनेक गुण होते है। होम्योपैथी के जानकार जानते है कि उसकी एक ही औषधि अनेक रोगों की अवस्था विशेष में दी जाती है और वह लाभ करती है। पीसने कूटने अथवा उबालने से औषधि का एक स्थूल तत्त्व ही प्राप्त होता है बाकी सब फोकस अथवा छिलकों के रूप में बेकार चला जाता है। हवन की हुई किसी औषधि का कोई भी तत्त्व किसी प्रकार भी नष्ट नहीं होता। वे सारे के सारे अपनी पूरी शक्ति के साथ विस्तारित होकर वायु मण्डल में मिल जाते हैं।
इस प्रकार किसी भी रोग के रोगी यदि नित्य प्रति विशुद्ध औषधियों के साथ यज्ञ करे तो कोई कारण नहीं कि वे शीघ्र ही स्वस्थ न हो जायें। कैंसर, तपेदिक अथवा कारवंकल जैसे रोगों के रोगियों को चाहिए कि वे अन्य हवन सामग्री के साथ इन रोगों की औषधि विशेष के साथ नित्य प्रति यज्ञ किया करें। इससे उनके रोग के सदा सर्वदा के लिए अच्छे हो जाने की सम्भावना रह सकती है। इसलिए ऋषि ने निरोग होने स्वस्थ रहने तथा सौ साल तक जीवित रहने के लिए यज्ञ करने का निर्देश किया है।
आत्म कल्याण की इच्छा से महाराज अजातशत्रु ने तप करने का निश्चय किया। लोगों ने बताया इससे पूर्व कि आप कोई साधना प्रारम्भ करें एक मार्गदर्शक गुरु वरण करना आवश्यक है। बिना गुरु के साधनाएँ सफल नहीं होती। अजातशत्रु ने यह बात मान ली पर अब एक नई समस्या उठ खड़ी हुई कि गुरु किसे बनाया जाये? लोगों ने यह बताया था कि गुरु बनने का अधिकारी वही होता है जो परमार्थी और तत्त्वदर्शी हो। किस कसौटी पर कसकर उक्त गुण संयत गुरु का पता लगाया जाये यह बात उनकी समझ में नहीं आई।
महारानी विद्यावती ने देखा, नरेश कुछ चिन्तित है। अजातशत्रु ने अपना मन्तव्य प्रकट किया तो वे हँसकर बोली- आप उसकी चिन्ता न करें। आप सारे देश के सन्त महात्माओं को आमन्त्रित करें गुरु का चुनाव हम करेंगे। दूसरे दिन महाराज ने देश भर के विद्वान् ब्राह्मण, तपस्वी, योगी, सन्त एकत्रित किये। महारानी विद्यावती ने उन्हें सम्बोधित करते हुए बताया- महाराज गुरु वरण करना चाहते है उनकी यह प्रतिज्ञा है कि सामने वाले मैदान में जो जितने कम समय में बड़े से बड़ा महल तैयार करा देगा वही उनका गुरु बनने का अधिकारी होगा। फिर क्या था सभा में होड़ मच गई। कोई भूमि नाप करने में जुट गया, कोई उसके लिए सामान और कारीगर जुटाने में। जल्दी से जल्दी काम पूरा करने की सब में बेचैनी झलक रही थी। एक ही सन्त ऐसे थे जो एक पेड़ के सहारे बैठ कर मुस्करा रहे थे।
महारानी ने उन महात्मा के पास जाकर पूछा- महात्मन्! आप महल नहीं बनायेंगे क्या? आपकी भी कितनी जमीन चाहिए नाप लीजिए। साधु ने हँसकर उत्तर दिया- बेटी! इतना बड़ा महल भगवान ने बनाकर रख दिया जिसकी सीमाएँ विराट ब्रह्माण्ड में फैली हुई है। यह मेरा ही तो है, उसी में तो हम सब रहते है। रानी बहुत प्रसन्न हुई और महाराज को संकेत किया, यही आपके गुरु बनने के अधिकारी है।
बच गये हम आप अन्यथा जून 1968 में ही अन्तरिक्ष से दौड़ता हुआ आने वाला इकारस सारे पृथ्वी वासियों को एक क्षण में ही कुचल कर रख देता। पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण से थोड़ा दूर रह जाने के कारण वह क्षुद्र ग्रह अन्तरिक्ष में ही कही विलीन हो गया पर यदि वह पृथ्वी से टकरा जाता तो सैकड़ों हाइड्रोजन बमों की क्षमता वाली ऊर्जा पैदा करता। उससे पृथ्वी में भूचाल आ जाता, समुद्र उफन कर पहाड़ों तक को डुबोकर रख देता, हजारों उद्योगों को प्रश्रय देने वाले नगरों के अस्तित्व का भी पता न चलता। सन्देह है कि तब तक मानव प्राणी पृथ्वी पर शेष रहता भी अथवा उसका भी अन्त हो जाता।
बत्तीस वर्ष पूर्व 1937 में एक बार ऐसा ही तहलका मचा था। तब इकारस का ही एक दूसरा भाई हर्मेस अपनी आंखें लाल करके दौड़ा था। खगोलशास्त्रियों ने निश्चित आशंका व्यक्त की थी वह भी पृथ्वी से टकरा सकता है यदि तब वह घटना घटित हो गई होती तो आज पृथ्वी को कुल आबादी एक और दस हजार के बीच होती। एक नये इतिहास की प्रस्तावना इन दिनों चल रही होती। पर बेचारा हर्मेस पृथ्वी से पाँच लाख मील पास तक ही आया और जब उसने देखा पृथ्वी वासी बहुत डर गये तो उसे भी दया आ गई और उसने अपना मार्ग बदल दिया। पृथ्वी वासियों ने सन्तोष की साँस ली।
जो वैज्ञानिक गणित के लम्बे लम्बे सूत्र हल कर यह जान लेते है कि अन्तरिक्ष यान को इस गति से अमुक दिशा की ओर इतने डिग्री कोष (बियरिंग) पर प्रक्षेपित किया जाये तो वह उतने समय में चन्द्र, शुक्र या मंगल पहुँच जायेगा। गणित के नियन्त्रण से वह स्थान (ग्रिड रिफरेन्स) तक जान लेते है जहाँ चन्द्रमा को उतारा जा सकता है। वही वैज्ञानिक इकारस और हर्मेस जैसे ग्रहों की पृथ्वी से टकराने की भी भविष्य वाणी करते है पर वह गलत हो जाती है तो लगता है कि विराट् जगत में गणित ही सब कुछ नहीं कई सर्व शक्तिमान सत्ता भी काम कर रही है जो गणित को फेल करके अपनी इच्छानुसार कर्म कर सकती है। उसका इस प्रकार क्षुद्र ग्रह भेजकर लोगों को डराना तो उसका मनोविनोद मात्र लगता है। जिस प्रकार माता-पिता बच्चे को किसी असह्य स्थिति में छोड़कर उसकी दीनता का आनन्द लिया करते है उसी प्रकार भगवान भी अपने मनोविनोद और लोक वासियों को सीख देने का एक मिला जुला कार्यक्रम इन क्षुद्र ग्रहों के द्वारा रखता रहता है।
उसकी यह मनोरंजक दुनियाँ भी बड़ी विलक्षण है। 1932 में भी एक नन्हा सा ग्रह भटक कर पृथ्वी से 65 लाख मील की दूरी तक चला आया था तब तक खगोलशास्त्रियों को यह अनुमान था कि इस तरह के क्षुद्र ग्रह अन्तरिक्ष में दो चार हो होंगे। अनुमान था कि कोई ग्रह चटक गया होगा और उसके उपखण्ड ठीक उसी प्रकार अन्तरिक्ष में संचरण करने लगे होंगे जिस प्रकार प्लूटो एक दिन नेपच्यून से अलग होकर एक स्वतन्त्र ग्रह ही बन गया। प्लूटो का व्यास तो पृथ्वी के व्यास से लगभग तीन गुना पर अन्तरिक्ष के यह क्षुद्र ग्रह, जिन्हें वर्तमान वैज्ञानिक भाषा में ‘अन्तरिक्ष कीट’ कहा जाता है बहुत ही छोटे आकार के होते है।
प्रसिद्ध ब्रिटिश खगोल शास्त्री पैट्रिक भूर के अनुसार इन क्षुद्र में “सीरीस” 480 मील व्यास, “पालास” 306 मील, 241 मील व्यास का वेल्टा और 121 मील व्यास का “जूनो” वह सबसे बड़े क्षुद्र ग्रह हैं। लगभग 200 ग्रह कुल 25 से 60 मील व्यास वाले और कोई 190 क्षुद्र ग्रह तो 10 से 25 मील व्यास वाले ही होंगे। एक ऐसा ग्रह भी मिला है। जिसका व्यास कुल 3 मील का ही है। इसमें मनुष्यों को बसाया जाना सम्भव हो तो अधिक से अधिक 50 हजार आदमी ही उसमें समा सकेंगे उनके लिए खेती या उद्योगों की समस्या तब भी बनी रहेगी कि उसके लिए स्थान कहाँ से लायें। मंगल और बृहस्पति के बीच पाये जाने वाले इन समस्त ग्रहों को जोड़ा जा सके तो भी वह पृथ्वी से काफी छोटे रहेंगे। किन्तु उनकी स्थिति न केवल अन्तरिक्ष यानों के लिए खतरनाक है वरन उनसे किसी भी ग्रह से टकरा जाने का भय हर घड़ी विद्यमान् रहता है। यह आवश्यक नहीं कि वे केवल पृथ्वी से टकरायें तभी हमारी हानि हो। सच बात यह है कि यदि इनमें से कोई भी क्षुद्र ग्रह किसी भी ग्रह से टक्कर खा जायेगा अन्तरिक्ष से लेकर पृथ्वी तक में प्रलयंकारी दृश्य उपस्थिति हो सकते है। ऐसा लगता है प्रलय की शुरुआत इन ‘कीट ग्रहों से ही होती होगी।
यह अनुमान निराधार नहीं है क्यों कि इनकी कोई स्वतन्त्र कक्षाएँ नहीं है। यह तो सूर्य की कृपा है जो इन्हें अपने आकर्षण में बाँधे हुए है। वेस्टा जो इनमें सबसे चमकीला है और जो पृथ्वी से लगभग 22 करोड़ मील दूर है वह सूर्य की परिक्रमा करता है और 3ण्6 वर्ष में उसकी परिक्रमा पूरी कर लेता है। अपनी धुरी पर भी वह 10 घण्टे 45 मिनट की परिक्रमा पूरी कर लेता है पर इनकी इस नियमितता का कोई दबाव नहीं है। अधिकांश क्षुद्र ग्रह स्वच्छन्द शैलानी है कही के कही घूमते रहते हैं। उदाहरणार्थ ‘इकारस’ ही सूर्य और बुध के भयंकर गर्मी वाले क्षेत्र में आनन्द पूर्वक घूमता रहता है। अभी कुछ समय पूर्व तो उसने यहाँ के लोगों की नींद ही हराम कर दी थी। ईरोस भी पृथ्वी के निकट तक आ जाता है और 944 नम्बर वाले हाडडाल्गों तो कभी-कभी शनि के ग्रह पथ को भी पार कर दूसरे क्षेत्र में निकल जाता है। अब 50 हजार के लगभग ऐसे छोटे-छोटे ग्रह ढूँढ़े गये है जिनकी बनावट चाल ढाल में बड़ी विलक्षणतायें हैं।
छोटे और सूर्य के समीप होने के कारण इनकी तमाम हाइड्रोजन गैसें और पानी आदि उड़ कर कही जाकर सूख गया होगा इनका यदि कुछ उपयोग हो सकता है तो इतना ही कि अन्तरिक्ष जाने वाले यात्री कभी इनसे स्टेशन का काम ले सकें। सम्भव है इन्हें ग्रहों की नियमित कक्षाओं में प्रस्थापित करने का भी प्रयत्न किया जायें अनुमान है कि इनमें धातुएँ प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हो सकती है इसलिए कुछ दिन में ही अन्तरिक्ष क्रेन भेजी जा सकती है और उनसे इन्हें पकड़ कर पृथ्वी में लाने का प्रयत्न किया जा सकता है पर ऐसा करने में राक्षसी शक्ति की आवश्यकता होंगी। गुरुत्वाकर्षण के अभाव के कारण वहाँ जहाजों को सुविधा पूर्वक उतारा जाना और वहाँ से ताजा उड़ानें भरना भी सम्भव हो सकता है पर यह सब खिलवाड़ यदि गणितीय व्यवस्था की भी भंग कर देगा तो वर्तमान अन्तरिक्ष यात्रा सुविधाएँ बढ़ाने के स्थान पर विश्व विनाश का भी कारण बन सकती है।
भगवान ने इन अनियमित क्षुद्र ग्रहों को लगता है बेकार नहीं बनाया। उन्हें वह अपनी नाराजी प्रकट करने के अस्त्र के रूप में भी प्रयुक्त कर सकता है यह कल्पना विवादास्पद नहीं है। सन 62 के ‘अष्ट ग्रह योग’ से संभव है बचाव के कुछ साधन हों भगवान इतने बड़े अनिष्ट को अच्छा न समझ कर उसे टाल देता हो पर सबक देने के लिए उसने कई बार पृथ्वी को ऐसे दण्ड दिये है जो ग्रह योग ही कहे जा सकते है। उदाहरणार्थ अभी कुछ समय पहली कनाडा के म्यूषेक प्रान्त में एक ऐसा ही क्षुद्र ग्रह पृथ्वी से आ टकराया था उससे वहाँ 11500 फुट लम्बा और 1300 फुट गहरा गड्ढा बन गया था। डा0 फ्रेड चब ने उसका विस्तृत अध्ययन करने के बाद बताया- यह उल्का लगभग 1 मील व्यास की थी और जब वह पृथ्वी से टकराई थी तब उसकी गति (बेलासिटी) 30000 से लेकर 150000 मील प्रति घण्टा के लगभग रही होगी। उसकी यह प्रचण्ड भिड़ंत के कारण ही इतना बड़ा गड्ढा बन गया। यह तो खतरे का एक छोटा सा संकेत मात्र था। ग्रीनलैण्ड में गिरा एक ही क्षुद्र ग्रह पिण्ड न्यूयार्क में अब भी प्रदर्शनार्थ रखी हुई है।
आस्ट्रेलिया 20 लाख मील का एक ऐसा क्षेत्र है जिसमें काँच के टुकड़े बिखरे पड़े है। इस क्षेत्र में कोई ज्वालामुखी नहीं है फिर यह काँच कहाँ से आया उसके बारे में वैज्ञानिकों का अनुमान है कि किसी समय यहाँ कोई भयंकर उल्का टूट कर गिरी होगी उसकी सतह पर जल नहीं रहा होगा दूसरी धातुओं के साथ काँच बहुतायत से पाया जाता होगा। वह जब पृथ्वी से आ टकराया होगा तो उससे उस क्षेत्र में जीवन के लक्षण भी समाप्त हो गये होंगे। यह काँच के टुकड़े उसी से छितर गये होंगे। कई लोग यद्यपि उसे अन्तरिक्ष लोक की किसी बुद्धिमान जाति द्वारा प्रक्षेपित शस्त्र भी मानते है पर अब यह सिद्ध हो गया है कि वह कोई उल्का ही थी।
61 वर्ष पूर्व 30 जून 1908 की प्रातःकाल साइबेरिया सुगूस बनखण्ड (साइबेरिया) में एक उल्का पिण्ड प्रबल वेग से आ टकराया। 25 वर्ग मील क्षेत्र में सर्वत्र आग की लपटें फैल गई। 30 वर्ग मील क्षेत्र के भीतर जो भी मनुष्य जीव जन्तु और वृक्ष थे उनका नाम विधान तक नहीं बचा था। अनुमान है कि वह एक हजार टन से भी वजनदार उल्का रही होगी। 39 वर्ष बाद उसकी घटना की पुनरावृत्ति तायगा क्षेत्र में हुई 12 फरवरी को सबेरे के 10 बज कर 40 मिनट हो रहे थे तभी एक क्षुद्र ग्रह सुहाते आलिन की पहाड़ी पर आ टकराया। उस आघात के फलस्वरूप ढाई वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में एक भी वृक्ष खड़ा दिखाई नहीं देता था ऐसी विनाश लीला देखने को मिली। यहाँ से प्राप्त उल्का खण्ड 1745 किलोग्राम घी, वैज्ञानिकों ने अनुमान लगाया कि वह 2500 मन से भी अधिक की उल्का थी। अधिकांश क्षुद्र ग्रह छोटे होते है इसलिए ये पृथ्वी पर आते आते या तो जल कर राख हो जाते है या फिर वह इकट्ठा किया जाना भी सम्भव नहीं होता। कुछ बड़े आकार के ही पिण्डों के अवशेष बच पाते है और उन्हीं से आकाश के ही पिण्डों के अवशेष बच पाते है और उन्हीं से आकाश की स्थिति के बारे में कोई अनुमान करना संभव होता है। इस दृष्टि से 36॥ टन वजन की टूटी एक उल्का ग्रीनलैण्ड के अजायब घर में सुरक्षित है उसका आयतन 11फुट 7फुट 5 फुट है। यह उल्कायें अधिकांश वह क्षुद्र ग्रह ही होते है जो अपनी कक्षा से विचलित हो- होकर समीपवर्ती ग्रह नक्षत्रों को उत्पीड़ित किया करते हैं।
अभी भी जब कभी आकाश में धूमकेतु तारे उदित होते है तो मनुष्य जाति किसी भयंकर विस्फोट की आशंका से भयभीत हो उठती है। पर हम यह नहीं जानते कि सूर्य के भण्डार में ऐसे क्षुद्र ग्रह जिन्हें “एस्टरायड” कहते हैं असंख्य मात्रा में भरे हैं वे भले ही छोटी-छोटी आँखों से दिखाई न देते हों पर दूरबीनों ने उनकी उपस्थिति को असंदिग्ध सिद्ध कर दिया है और इस तरह एक प्रलय का खतरा हर क्षण हमारे मस्तिष्क पर मंडराया करता है और मनुष्य है कि ऊपरी दुनियाँ की इस भयानक हलचल की बात सोचता तक नहीं केवल अपने पार्थिव सुखों की मृगतृष्णा में ही भटकता रहता है। अनियमित ग्रह कीटों की रचना भगवान ने लगता है मनोविनोद में पृथ्वी वासियों को समय-समय पर डराने के लिए और यह समझाने के लिए की है कि हमारा दृष्टि कोण अपनी क्षुद्र वासनाओं तक ही सीमित न रहे। बड़े ग्रह तो अपनी नियमितताओं और मर्यादाओं में बँधे है इसलिए मनुष्य उनसे आँख मूँद सकता है पर इन स्वेच्छाचारी विदूषकों से तो उसे डरना ही पड़ेगा ये कभी भी हमला बोल सकते है और पृथ्वी को समूची नष्ट-भ्रष्ट कर सकते है।
इन क्षुद्र ग्रहों की उत्पत्ति और जीवन काल के सम्बन्ध में वैज्ञानिकों में उतना ही मतभेद है जितना मनुष्य की उत्पत्ति और जीवन काल के सम्बन्ध में विद्वानों में मतभेद है। कुछ का अनुमान है कि दो ग्रहों की झड़प हुए टूट-फूट के कारण यह क्षुद्र ग्रह बने है क्योंकि यह गोलाकार ही नहीं। पेंदेनुमा और पहाड़ों की तरह के ऊबड़ खाबड़ किस्म के भाग है। इनमें आकार-प्रकार की तरह आयु और कक्षा का भी कोई नियमित स्वरूप नहीं है। कुछ खगोल शास्त्रियों का मत है कि मंगल और बृहस्पति के बीच कोई ग्रह रहा होगा उसके विघटन से यह सब बने होंगे। उनमें पाये गये तत्त्वों से अनुमान लगाया गया है कि अरबों वर्ष पूर्व भी आकाश में यह क्षुद्र ग्रह थे। अभी यह निश्चित नहीं हो सका कि उनकी संख्या केवल घटती है या बढ़ती भी है पर वैज्ञानिक उस लालच में अवश्य है कि जिस तरह मंगल ने फ्रोबोस और डेइमोस नामक दो क्षुद्र ग्रहों को, जो कुल 10 या 20 मील व्यास वाले ही होंगे अपनी अधीनता में रखकर शोभा बढ़ाई है। उसी प्रकार कुछ क्षुद्र ग्रहों को लाकर पृथ्वी में “पार्ट टाइम” सूर्य या चन्द्र प्रकाश की व्यवस्था की जाये। ऐसे अधीनस्थ ग्रह शनि के पास भी है, बृहस्पति के पास तो उनकी संख्या सात है।
अन्तरिक्ष की विलक्षण दुनियाँ में इन अन्तरिक्ष कीटों की विलक्षणता और भी रहस्यमय है जब उनके अस्तित्व के बारे में कोई तुक नहीं बैठती तो यही मानना पढ़ता है यह सब भगवान का मनोरंजन है और इस मनोरंजन में ही वह लोगों को दुष्कर्म न करने के लिए डराता भी रहता है दण्ड भी देता रहता है।
योगवाशिष्ठ का वचन है-
आयघो व्याधयश्चैव
द्वय दुःखस्य कारणम।
तन्निवृत्तिः सुखं विद्यात्
तत्क्षयों मोक्ष उच्यते॥
- आधि, व्याधि- अर्थात् मानसिक और शारीरिक यह दो ही प्रकार के दुःख इस संसार में है। इनकी निवृत्ति विद्या अर्थात् ज्ञान द्वारा ही होती है। इस दुःख निवृत्ति का नाम ही मोक्ष है।
इस प्रकार इस न्याय से विदित होता है कि यदि मनुष्य जीवन से दुःखों का तिरोधान हो जाय तो वह मोक्ष की स्थिति में अवस्थित हो जाये। दुःखों को अत्यन्त अभाव ही आनन्द भी है। अर्थात् मोक्ष और आनन्द एक दूसरे के पर्याय है। इस प्रकार यदि जीवन के दुःखों को नष्ट किया जा सकें तो आनन्ददायी मोक्ष को प्राप्त किया जा सकता है।
बहुत बार देखा जाता है कि लोग जीवन में अनेक बार आनन्द प्राप्त करते रहते है। वे हँसते, बोलते, खाते, खेलते, मनोरंजन करते, नृत्य- संगीत और काव्य कलाओं का आनन्द लेते, उत्सव- समारोह और पर्व मनाते, प्रेम पाते और प्रदान करते, गोष्ठी और सत्संगों में मोद विनोद करते और न जाने इसी प्रकार से कितना आमोद प्रमोद पाते और प्रसन्न बना करते है- तो क्या उनकी इस स्थिति को मोक्ष कहा जा सकता है?
नहीं, मनुष्य की इस स्थिति को मोक्ष नहीं कहा जा सकता। मोक्ष का आनन्द स्थायी, स्थिर, अक्षय, समान अहैतुकी और निष्पक्ष हुआ करता है। वह न कही से आता और न कही जाता है। न किसी कारण से उत्पन्न होता है। और न किसी कारण से नष्ट होता है। वह आत्म-भूत और अहैतुकं होता है। वह संपूर्ण रूप में मिलता है संपूर्ण रूप में अनुभूत होता है संपूर्ण रूप में सदा सर्वदा ही बना रहता है। वह सार्वकालिक, सर्वव्यापक और सर्वस्व सहित ही होता है। मोक्ष का आनन्द पाने पर न तो कोई अंश शेष रह जाता है और न उसके आगे किसी प्रकार के आनन्द की इच्छा शेष रह जाती है। वह प्रकाश पूर्ण और परमार्थिक ही होता है।
पूर्वोक्त लौकिक आनन्दों में यह विशेषताएँ नहीं होती। उनकी प्राप्ति के लिए कारण और साधन की आवश्यकता होती है। वह किसी हेतु से उत्पन्न होता है और हेतु के मिट जाने पर नष्ट हो जाता है। इतना ही क्यों- यदि एक बार उसका आधार बना भी रहे तो भी उस आनन्द में जीर्णता, क्षीणता, प्राचीनता और अरुचि आ जाती है। लौकिक आनन्दों की परिसमाप्ति दुःख में ही होती है। आज जो किसी कारण से प्रसन्न है, आनन्दित है वह कल किसी कारण से दुखी होने लगता है। लौकिक आनन्द की कितनी ही मात्रा क्यों न मिलती जाये, तथापि और अधिक पाने की प्यास बनी रहती है। उससे न तृप्ति मिलती है और न सन्तोष। जिस अनुभूति में अतृप्ति, असन्तोष और तृष्णा बनी रहे वह आनन्द कैसा? लौकिक आनन्द के कितने ही सघन वातावरण में क्यों न बैठे हों एक छोटा सा अप्रिय समाचार या छोटी सी दुःखद उसे समूल नष्ट कर देती है। तब न किसी ने मुख पर हँसी रह जाती है और न हृदय में पुलक! लौकिक आनन्द और मोक्षानन्द की परस्पर तुलना ही नहीं की जा सकती।
लौकिक आनन्दों में इस असफलता का कारण यह होता है कि वे असत्य एवं भ्रामक होते है। उनकी अनुभूति प्रवंचना अथवा मृगतृष्णा के समान ही होती है। इस असत्यता का दोष ही लौकिक आनन्द को निकृष्ट एवं अब्राह्रा बना देते है। आनन्द केवल आत्मिक आनन्द ही होता है। मोक्ष का आनन्द की वास्तविक तथा अन्वेषित आनन्द है। लौकिक आनन्दों की अग्राहाता का प्रतिपादन इसलिए कहा गया है कि जो व्यक्ति उसके झूठे प्रवचनों में फँस जाता है, उन्हें पकड़ने, पाने के लिए दौड़ता रहता है, उनकी स्थिर और स्थायी बनाने में लगता है, वह अपना सारा जीवन इसी मायाजाल में उलझकर खो देता है। भ्रम में पड़े रहने के कारण उसे वास्तविकता का ध्यान ही नहीं आता। लौकिक आनन्दों के फेर में पड़कर जिसे वास्तविक आनन्द का ध्यान ही न आयेगा वह उसको पाने के लिए प्रयत्नशील भी क्यों होगा। जिस हिरन को मृगमरीचिका जल के भ्रम में भुला लेती है तन-मन से उसी को पकड़ने के पीछे पड़ा रहता है। अब पाया अब पाया करता हुआ वह निःसार दुराशा का यन्त्र बना भटकता रहता है और इस प्रकार वास्तविक जल की खोज से वंचित हो जाता है। परिणाम यह होता है कि भटक-भटक कर प्यासा ही मर जाता है। जिस जीवन में वह पानी और परितृप्ति दोनों को पाकर कृतार्थ हो सकता था वह जीवन यों ही चला जाता है, नष्ट हो जाता है। यही हाल लौकिक आनन्दवादियों का होता है। जिस जीवन में वे मोक्ष और उकसा वास्तविक सुख प्राप्त कर सकते है वे उसे माया छाया और भ्रामक सुख की मरीचिका में नष्ट कर अपनी आनन्द हानि कर लेते है। इसीलिए लौकिक सुखों की प्रबलता के साथ अग्राह्य एवं गर्हित बताया गया है। वास्तविक आनन्द लौकिक लिप्साओं और साँसारिक भोग-विलासों में नहीं है वह मोक्ष और मोक्ष की स्थिति में है। उसी को पाने का प्रयत्न करना चाहिए, वही मानव जीवन का लक्ष्य है, उसी में शांति और तृप्ति मिलेगी।
इस प्रकार स्पष्ट है कि दुःख तो दुःख ही है साँसारिक सुख भी दुःख का एक स्वरूप है। इनकी निवृत्ति से ही सच्चे सुख की प्राप्ति सम्भव है। किन्तु इनकी निवृत्ति का उपाय क्या है? इसके लिए पुनः योगवाशिष्ठ में कहा गया है-
“ज्ञानान्निर्दुः खतामेति
ज्ञानावज्ञान संक्षयः।
ज्ञानादेव परासिद्धि
नन्यिस्याद्राम वस्तुतः॥”
-हे राम! ज्ञान से ही दुःख दूर होते हैं, ज्ञान से अज्ञान का निवारण होता है, ज्ञान से ही परम सिद्धि होती है और किसी उपाय से नहीं
और भी आगे बताया गया है-
“प्रज्ञाँ विज्ञात विज्ञेयं
सम्यग् दर्शन माधयः।
न बहन्ति वनं वर्षा
सिक्तमग्निशिखा इव।”
-जिसने जानने योग्य को जान लिया है और विवेक दृष्टि प्राप्त कर ली है, उस ज्ञानी को दुःख उसी प्रकार त्रासक नहीं होते जिस प्रकार वर्षा से भीगे जंगल को अग्नि शिखा नहीं जला पाती।
अब यहाँ पर ज्ञान पर स्वरूप जानने से पूर्व यह जान लेना आवश्यक है कि आखिर दुःख की उत्पत्ति होती किन कारणों से? वैसे तो जीवात्मा अपने मूल रूप में आनन्दमय है। तब अवश्य ही कोई कारण ऐसा होना चाहिये जो उसके लिये दुःख की सृष्टि करता है। उसको भी योगवाशिष्ठ में इस प्रकार बताया गया है -
“देह दुःख विदुर्व्याधि
माध्याख्यं मानसामयम्।
मौख्यं मूले हते विद्या
तत्त्वज्ञाने परीक्षयः।”
-शारीरिक दुखों को व्याधि और मानसिक दुःखों को आधि कहते है। यह दोनों मौर्ख्य अर्थात् अज्ञान से ही उत्पन्न होती है और ज्ञान से नष्ट होती है।
संसार के सारे दुःखों का एकमात्र हेतु अविद्या अथवा अज्ञान की है। जिस प्रकार प्रकाश का अभाव अन्धकार है और अन्धकार का अभाव प्रकट होता है, उसी प्रकार ज्ञान का अभाव अज्ञान और अज्ञान का अभाव ज्ञान होना स्वाभाविक ही है और जिस प्रकार ज्ञान का परिणाम सुख-शांति और आनन्द है उसी प्रकार अज्ञान का फल दुःख, अशान्ति और शोक-सन्ताप होना ही चाहिये।
यह युग-युग का अनुभूत तथा अन्वेषित सत्य है कि दुःखों की उत्पत्ति अज्ञान से ही होती है और संसार के सारे विद्वान्, चिन्तक एवं मनीषी जन इस बात पर एकमत पाये जाते है। इस प्रकार सार्वभौमिक और सार्वजनिक रूप से प्रतिपादित तथ्य में संदेह की गुँजाइश रह ही नहीं जाती- इस प्रकार अपना-अपना मत देते हुये विद्वानों ने कहा है- चाणक्य ने लिखा- “अज्ञान के समान मनुष्य का और कोई दूसरा शत्रु नहीं है।” विश्वविख्यात दार्शनिक प्लेटो ने कहा है- “अज्ञानी रहने से जन्म न लेना ही अच्छा है, क्यों कि अज्ञान ही समस्त विपत्तियों का मूल है।” शेक्सपियर ने लिखा है- “अज्ञान ही अन्धकार है।”
जीवन की समस्त विकृतियों, अनुभव होने वाले दुःखों, उलझनों और अशान्ति आदि का मूल कारण मनुष्य का अपना अज्ञान ही होता है। यही मनुष्य का परम शत्रु है। अज्ञान के कारण ही मनुष्य भी अन्य जीव-जन्तुओं की तरह अनेक दृष्टियों से हीन अवस्था में ही पड़ा रहता है। ज्ञान के अभाव में जिनका विवेक मंद ही बना रहता है उनके जीवन के अन्धकार में भटकते हुये तरह-तरह के त्रास आते रहते है। अज्ञान के कारण ही मनुष्य को वास्तविक कर्त्तव्यों की जानकारी नहीं हो पाती इसलिए वह गलत मार्गों पर भटक जाता है और अनुचित कर्म करता हुआ दुःख का भागी बनता है। इसलिये दुःखों से निवृत्ति पाने के लिये यदि उनका कारण अज्ञान को मिटा दिया जाये तो निश्चय ही मनुष्य सुख का वास्तविक अधिकारी बन सकता है।
अज्ञान का निवारण ज्ञान द्वारा ही हो सकता है। शीत उसकी विपरीत बस्त आग द्वारा ही दूर होता है। अन्धकार की परिसमाप्ति प्रकाश द्वारा ही सम्भव है। इसलिये ज्ञान प्राप्ति का जो भी उपाय सम्भव हो उसे करते ही रहना चाहिये।
ज्ञान का सच्चा स्वरूप क्या है? केवल कतिपय जानकारियाँ ही ज्ञान नहीं माना जा सकता। सच्चा ज्ञान वह है जिसको पाकर मनुष्य आत्मा परमात्मा का साक्षात्कार कर सके। अपने साथ अपने इस संसार को पहचान सके। उसे सत् और असत् कर्मों की ठीक-ठीक जानकारी रहे और वह जिसकी प्रेरणा असत् मार्ग को त्याग कर सन्मार्ग पर असंदिग्ध रूप से चल सके। कुछ शिक्षा और दो-चार शिल्पों को ही सीख लेना भर अथवा किन्हीं उलझनों को सुलझा लेने भर की बुद्धि ही ज्ञान नहीं है। ज्ञान वह है जिससे जीवन-मरण बन्धन-मुक्ति कर्म-अकर्म और सत्य-असत्य का न केवल निर्णय ही किया जा सके बल्कि गृहणीय को पकड़ा और अग्राह्य हो छोड़ा जा सके, वह ज्ञान आध्यात्मिक ज्ञान ही है।
अज्ञान की स्थिति में कर्मों का क्रम बिगड़ जाता है। संसार में जितने भी सुख-दुःख आदि द्वन्द्व है वे सब कर्मों का फल होता है। अज्ञान द्वारा अपकर्म होना स्वाभाविक ही है और तब उनका दण्ड मनुष्य को भोगना ही पड़ता है। इतना ही क्यों सकाम भाव से किये हुये सत्कर्म में सुख के फल रूप में परिपक्व होते है और असत्य होने से कुछ हो समय में दुःख रूप में परिवर्तित हो जाते है। इसलिये कर्म ही अधिकतम बन्धनों अथवा दुःख को मनुष्य पर आरोपित कराते है।
कर्मों का न तो त्याग ही सम्भव है और न इनके परिपाक को बदला जा सकता है। इनकी स्थिति भी बड़ी दृढ़ होती है। इन पर यदि विजय पाई जा सकती है तो केवल ज्ञान द्वारा। इसीलिये तो भगवान् तो भगवान् ने अर्जुन को कर्मों का रहस्य और ज्ञान की शक्ति प्रकट करते हुये गीता में कहा है-
“यर्थवासि समिद्धोग्नि
र्भस्मसात्कुरुतेऽर्कुम।
ज्ञानाग्नि सर्व क्रर्माणि
भस्मसात् कुरुते तथा।”
क्या आप बतायेंगे मूर्ख कौन है और बुद्धिमान् कौन? एक बार एक मित्र ने प्रेसीडेन्ट जानसन से यह प्रश्न किया। जानसन ने सहज भाव से उत्तर दिया- जो केवल अपने अनुभवों को प्राथमिकता देता है उन्हें ही सब कुछ मानता है वह मूर्ख है। जो दूसरों के अनुभवों से भी लाभ उठाये वह बुद्धिमान्। जानसन ने इसी तारतम्य में मुस्कराते हुये कहा- और जो अपने, पराये किसी के अनुभव से लाभ न उठाये वह तो निरा पशु ही कहा जायेगा।
-हे अर्जुन! जैसे प्रज्वलित अग्नि ईंधन को भस्म कर देती है वैसे ही ज्ञानरूपी अग्नि सम्पूर्ण शुभाशुभ कर्मों को जलाकर भस्म कर देती है।
कर्म ही मनुष्य के बन्धनों का हेतु है, बन्धन दुःखों का। अस्तु ज्ञान द्वारा कर्मों को नष्ट कर दुःख से निवृत्त होकर मोक्ष रूप अक्षय आनन्द की प्राप्ति कर जीवन को सार्थक बनाना ही मनुष्य की सबसे बड़ी बुद्धिमानी है।
राजा अरिष्टनेमि तीसरे वय में प्रविष्ट हुए। जीवनभर उन्होंने अपने कर्त्तव्यों का पालन भली प्रकार किया था। बाल्यकाल में विद्यार्जन-शरीर साधना आदि से लेकर- अधेड़ अवस्था के पारिवारिक एवं राजनैतिक उत्तरदायित्वों के निर्वाह में उन्होंने पूरे मनोयोग से कार्य किया था। किन्तु न जाने क्यों उन्हें अन्तःकरण में कुछ हलचल-सी अनुभव होने लगी थी। कर्त्तव्य पालन के सन्तोष की शीतलता के अतिरिक्त कुछ आकुलता की अनुभूति भी उन्हें होने लगी। राजा कारण न समझ सके और उन्होंने अपने कुल गुरु के सम्मुख अपनी समस्या रखी।
विचारशीलता तथा क्रियाशीलता दोनों जीवन के दो महत्त्वपूर्ण पहलू है। सुविचार प्रेरित क्रिया कल्याणप्रद होती है- जब कि केवल क्रिया अर्थ का अनर्थ भी कर डालती है। इसी प्रकार क्रिया के पूरक के रूप में विचार उपयोगी है- स्तुत्य है- अन्यथा केवल विचार भ्रामक हो जाता है। हवाई महलों तक ही उसकी सीमा सीमित रह जाती है। इसी कारण प्राचीन राज्य परम्परा में राजा की शक्ति तथा क्रियाशीलता को विचारों के प्रकाश में अधिक उपयोगी बनाने के लिये विचार को तथा आत्म-बल सम्पन्न व्यक्तित्वों को भी रखा जाता था। मंत्रियों से लेकर ‘राजगुरु’ तक इसी स्तर के व्यक्ति रहा करते थे।
राजा की समस्या सुन कर राजगुरु मुसकराये,- बोले “राजन्! आपका कथन सत्य है। मनुष्य के जीवन में कई बार ऐसे अवसर आते है जब कि वर्तमान कर्त्तव्यों को भली प्रकार पूरा करते हुए भी उसके मन में हलचल व कौतूहल सा अनुभव होता है। ऐसा होना स्वाभाविक है। शरीर की बदलती हुई अवस्था के साथ जीवन के अगले चरण में प्रवेश के लिए सन्नद्ध होने के लिए आत्मा के संकेत की यह प्रतिक्रिया है।”
राजा को बात भली प्रकार स्पष्ट न हो सकी उन्होंने पूछा “ यह संकेत क्या है- आत्मा इन्हें स्पष्ट क्यों नहीं करती? कुलगुरु पुनः स्निग्ध हास के साथ बोले वत्स! स्वयं के उदाहरण से ही समझने का प्रयास करें। आपके जीवन में कभी पहले भी ऐसा अनुभव हुआ था। थोड़ा भूतकाल की गहराई में उतर कर सोचें।” और राजा को ध्यान आया कि किशोर अवस्था पार करने पर कुछ ऐसा ही अनुभव हुआ था। तब राजगुरु ने उन्हें ब्रह्मचर्य आश्रम में अर्जित ज्ञान तथा सामर्थ्य का उपयोग लौकिक कर्तव्यों के पालन करने का निर्देश किया था। उसके बाद से अब तक उन्हें शान्ति व सन्तोष का अनुभव होता रहा।
राजा ने अपना निष्कर्ष सुनाया। पुरोहित ने साधुवाद दिया “धन्य है राजन्! आपने ठीक-ठीक विश्लेषण किया। बस, उस समय जैसे शारीरिक तथा मानसिक शक्ति विकसित होकर लौकिक कर्तव्यों में प्रवृत्त होना चाहती थी उसी प्रकार जब आत्मिक शक्तियों के विकास का समय आया है नरश्रेष्ठ! आपको अब अन्तःकरण अगली उच्च स्तरीय भूमिका में प्रवेश के संकेत दे रहा है। आपको लोकोत्तर भूमिका में प्रवेश का -आत्म विकास की तपोमय साधना का निमन्त्रण मिल रहा है। वत्स! अपने सुसंस्कारों के कारण अन्तःकरण के संकेत आप अनुभव कर सकें हैं। अब इनको समझकर आचरण में लाने में विलम्ब न करना श्रेयस्कर है।
राजा अमृतोपम निर्देश पाकर तृप्त हो गये। उन्होंने अविलम्ब युवराज को राज्यभार सौंपने की व्यवस्था की। अपने जीवन के अनुभवों का सार समझकर एवं उपयुक्त सलाहकारों की व्यवस्था करके उन्होंने होनहार पुत्र को राज्य व्यवस्था सौंप दी। स्वयं विधिवत् वानप्रस्थ ग्रहण कर, गंद्यमादन पर्वत पर तपस्या करने चले गये।
राजा अरिष्टनेमि तपस्या में लीन थे। मन अपनी उछल कूद करके थक गया, प्रकृति परीक्षा लेकर सन्तुष्ट हो गयी। मन अनुगामी बन गया प्रकृति सहयोगिनी। राजा को आत्म शान्ति की शीतलता का अनुभव होने लगा। तभी एक दिन एक देव दूत उनके सामने आ उपस्थित हुआ। बोला “ देवराज इन्द्र ने आपको ससम्मान भेंट करने के लिए बुलाया है।” “देवराज इन्द्र ने बुलाया? राजा को कारण समझ में न आया। अपनी साधना को छोड़कर जाने की इच्छा भी नहीं थी। किन्तु कोई प्रेम से बुलाये तो तिरस्कार भी उचित नहीं राजा शान्त भाव से साथ ही लिए।
स्वर्ग के स्वामी देवराज इन्द्र ने राजा का आगे बढ़ कर स्वागत किया। प्रेम से अपने निकट बिठाया तथा चर्चा प्रारम्भ की। वे बोले-राजा आपकी तपस्या तथा सत्कर्मों ने आपको उच्च स्वर्ग का अधिकारी बना दिया है। आप चाहें तो उसका दीर्घकाल तक उपभोग कर सकते है।”
मैंने तो स्वर्ग के निमित्त कोई धर्म या तप किया नहीं है, फिर उस पर मेरा अधिकार कैसे सिद्ध हुआ?” राजा ने विनम्र शब्दों में शंका व्यक्त कर दी। देवराज ने प्रशंसात्मक दृष्टि से उनकी ओर देखा और समाधान किया- “राजन्! आपने इस निमित्त नहीं किया यह सही है- किन्तु जो किया है उससे आपको उच्च स्वर्ग प्राप्त हो सकता है।
राजा विचार करने लगे फिर बोले -”देवराज! यह स्वर्ग आपके कथन के अनुसार मुझे अपनी संचित पूँजी के मूल्य पर खरीदना होगा। अस्तु कृपया स्वर्ग के विषय में मुझे अधिक जानकारी दें-ताकि मैं निश्चय कर सकूँ कि वह स्वीकार करने योग्य है अथवा नहीं इन्द्र द्वारा उत्तर देने की स्वीकृति पाकर राजा ने प्रश्न किया “उच्च और निम्न स्वर्ग क्या है? क्या दोनों प्रकार के स्वर्ग वासियों के बीच प्रेम सद्भावना का व्यवहार रहता है? क्या स्वर्ग में अधिकांश व्यक्ति मेरी ही तरह के हैं जिन्हें स्वर्ग की प्राप्ति अनायास हुई है अथवा स्वर्ग सुख की लालसा से एकत्र हुए व्यक्ति ही वहाँ है? क्या अपने अधिकार के स्वर्ग सुख की किसी अन्य व्यक्ति को - जिसे उसकी इच्छा तथा आवश्यकता है, दिया जा सकता है? तथा स्वर्ग निवास की सीमा क्या है?”
देवराज कुछ संकोच में पड़ गये। किन्तु उत्तर देना आवश्यक था। बोले- “ राजन् स्वर्ग के विभिन्न स्तर सुकर्मों की पूँजी से प्राप्त होते हैं। अधिकांश स्वर्गवासी स्वर्ग सुख की लालसा से आने वाले ही है। उच्च वर्ग के प्रति ईर्ष्या, हेय के प्रति स्पर्धा का भाव स्वर्ग में भी है। अपने हिस्से का भोग भोगने की ही स्वतन्त्रता है उसे किसी को देने ही सुविधा नहीं है। सत्कर्मों का प्रभाव समाप्त होने पर पुनः संसार चक्र में वापस लौटना अनिवार्य है।”
राजा अरिष्टनेमि का हृदय दहल गया। ऐसा स्वर्ग किस काम का? जिन साँसारिक हीन वृत्तियों से मुक्ति पाने के लिए वह प्रयत्नशील थे- उन्हीं में सड़ने वाला स्वर्ग का जीवन किस बुद्धिमान को ग्राह्य होगा? वह तो जेल से भी बुरा है। इन्द्र राजा के मनोभाव पढ़ रहे थे। उन्हें लग रहा था पृथ्वी के इस राजा के सामने इन्द्रासन हेय सिद्ध हो रहा है। किन्तु कुछ कहने की स्थिति में अपने आपको वह नहीं पा रहे थे। तब तक राजा बोले - “देवराज! मैं आपके स्नेह का आभारी हूँ... आपका स्वर्ग उन्हें प्राप्त हो जो उसके लिए प्रयास करते है...। मुझे तो उसी गंद्यमादन पर्वत पर भेजने की कृपा करें। जहाँ शान्त वातावरण में साधना की शीतलता से आत्मा तृप्त होती है।”
इन्द्र ने उठकर राजा को हृदय से लगा लिया। बोले, “राजन् आपके आगमन से मेरा स्थान पवित्र हो गया। आपने मानव शरीर की वह गरिमा जान ली है जिसके कारण देवता भी नर देह धारण करने के लिए आतुर रहते है। आप वस्तुतः तत्त्वज्ञान के अधिकारी है तथा इस दिशा में आपका सहयोग करके हम भी कृतकृत्य होंगे।
नदी को रोककर टीले ने कहा- बहन, विश्राम कर लो, लोगों ने तुम्हें लूटा ही लूटा किसी ने विश्राम के लिए भी नहीं पूछा।- ‘धन्यवाद बन्धु’ इतना ही कहा नदी ने और फिर आगे बढ़ चली। उन्हें तो विश्वास था लक्ष्य चलने से ही मिलता है।
देवराज ने राजा अरिष्टनेमि को महर्षि बाल्मीकि के पास भेज दिया। उनके मार्ग दर्शन एवं अनुभव से राजा को शीघ्र ही अभीष्ट लक्ष्य की प्राप्ति हो गई। प्रलोभनों को चीरते हुए राजा अरिष्टनेमि संसार की विकृतियों से मुक्त रहकर मानव देह की सार्थकता का महत्व जान सकें।
द्वितीय महायुद्ध के दौरान रंगों के संबंध में कई विचित्र बातें प्रकाश में आई इसलिये कई देशों में “रंगों के जीवन पर प्रभाव” विषय पर व्यापक खोजें प्रारम्भ हुईं। विभिन्न प्रकार के रंग, विभिन्न प्रकार के मनोभाव जागृत करने की चमत्कारिक क्षमता रखते हैं। विवाह शादियों और ऐसे किन्हीं धर्मोत्सवों में हरी, पीली, लाल, नीली झण्डियों से द्वार सजाते हैं तो संबंधित व्यक्ति ही नहीं सभी वहाँ से गुजरने वाले दर्शक भी प्रसन्न हो उठते हैं यह रंगों का अज्ञात मनोवैज्ञानिक प्रभाव ही है।
जर्मनी की एक कैमरा बनाने वाली फैक्टरी में एक प्रयोग किया गया। उसकी दीवारें, दरवाजे सब गहरे नीले रंग से रंग दिये गये। श्रमिकों पर उसका यह प्रभाव हुआ कि वे अधिक फुर्ती और परिश्रम से काम करने लगे। उत्पादन बढ़ने लगा आय भी बढ़ने लगा। आय भी बढ़ने लगी। किन्तु बाद में उस रंग के ऊपर काला जैसा कोई रंग पोतकर बिगाड़ दिया गया उसका फल कुछ और ही हुआ। मजदूरों में निराशा, आलस, उद्वेग की भावनायें भड़कने लगीं। उससे उत्पादन बहुत अधिक गिर गया।
यह विषय इसलिये प्रस्तुत किया जा रहा है कि रंगों का सौंदर्य और साज-सजावट से सीधा संबंध है। सौंदर्य आत्मा का एक गुण है यदि उसकी उपयुक्त जानकारी न हो तो लाभ उठाने के स्थान पर हानि हो सकती हैं घर, दरवाजे, खिड़कियाँ, दीवालों के बेल-बूटों वस्त्रों का चयन इस संबंध में कौन सा रंग कैसी मनोभूमि उत्पन्न करता है इसकी जानकारी हो जाये तो जीवन में प्रसन्नता का अभिवर्द्धन किया जा सकता हैं, उसे सुधारा और सँवारा जा सकता है।
बुद्धिशाली लोगों को गहरा लाल रंग पसन्द नहीं होता। एक अस्पताल में एक मानस चिकित्सक के पास एक प्रोफेसर आये उन्होंने बताया कि उनके मस्तिष्क में न जाने क्यों क्षोभ और उद्विग्नता बनी रहती है उन्हें प्रसन्नता नहीं रहती। चिकित्सक महोदय ने परिस्थितियों का सूक्ष्म अध्ययन किया पर कोई विशेष कारण जब समझ में न आया तो वे एक दिन उनके घर पहुँचे। घर जाकर देखा कि उनकी बैठक में खिड़कियों, दरवाजों के अधिकांश पर्दे लाल हैं। पूछने पर मालूम हुआ कि उनकी धर्मपत्नी भी अधिकांश लाल रंग की साड़ी और ब्लाउज पहनती हैं। उन्हें घर के सब फर्श पर्दे बदल कर हरे और नीले रंग के कर देने की सलाह दी गई उसी प्रकार उनकी धर्मपत्नी ने भी अपनी वेशभूषा बदल डाली उसका तात्कालिक प्रभाव परिलक्षित हुआ। प्रोफेसर की सारी उद्विग्नता और परेशानी जाती रही।
भगवती सरस्वती ज्ञान और मधुरता की देवी है उनकी कल्पना में रंग का विशेष महत्व है। ऋषि ने उनको-
या कुन्देन्दु तुषार हार धवला-
या शुभ वस्त्रावता॥
वह श्वेत वर्ण के वस्त्र धारण किये हुए हैं। यहाँ श्वेत रंग ज्ञान, मधुरता, गंभीरता एवं पवित्रता का उद्बोधक है। इसलिये कुँआरी कन्याओं और उन महिलाओं को जिनके पतियों का निधन हो गया होता है श्वेत वस्त्र धारण कराने की भारतीय परम्परा है। श्वेत वस्त्र से दूसरों के मन में भी द्वेष दुर्भाव नहीं आते इसलिये विद्यालयों में जाने वाली कन्याओं को श्वेत अथवा हल्की एक रंग की ही साड़ी पहननी चाहिये।
नीले रंग के संबंध में यह माना जाता है कि उसे देखकर उदारता और सौंदर्य की प्रेरणा मिलती है। माध्यमिक कक्षाओं के विद्यार्थियों के चरित्र-निर्माण में नीले रंग का विशेष प्रभाव देखा गया है। इस आयु के बच्चे-बच्चियों को नीले रंग के वस्त्रों का संपर्क मिले तो अति लाभदायक होता है। अमेरिका में एक प्रयोग करके देखा गया कि यदि बिजली का प्रकाश उसके ट्यूब नीले कर दिये जाते हैं तो मच्छर दूर भागते हैं। नीला रंग मच्छरों को कष्ट दायक होता है। वहाँ धूल के रंग का प्रयोग करके अन्य कीटाणुओं से रक्षा करने में सफलता मिली है।
लाल रंग आक्रामकता, हिंसा और स्फूर्ति का प्रतीक हैं। साँड़ को यदि लाल रंग दिया जाये तो वह तुरन्त भड़क उठता है। इसी तरह केसरिया रंग वीरता और बलिदान का प्रेरक है यह दोनों ही रंग इसीलिये युद्ध में प्रयुक्त होते हैं। मिलिटरी के बड़े अफसरों के कन्धे पर भी-कैम्पों पर लाल पट्टे इसीलिये बाँधे जाते हैं। उन्हें देखकर जवानों में रोष और जोश पैदा होते हैं यह रंग व्यक्तिगत और पारिवारिक जीवन के उपयोग का नहीं होता। इसी कारण काले और भूरे रंग भी शक्ति के प्रतीक तो हैं किन्तु उनका आँशिक उपयोग साज-सज्जा में ही हो सकता हैं।
जीवित प्राणियों को प्रभावित करने में गुलाबी रंग के महत्व को बहुत पहले से ही लोग जानते रहे हैं। गुलाबी प्रकाश से पौधे अच्छी तरह उगते हैं, पक्षियों की संख्या में वृद्धि होती हैं, ज्वर, छोटी चेचक, जलकेन्सर जैसी बीमारियों पर भी गुलाबी रंग के प्रकाश से आशातीत लाभ होता पाया गया हैं। आत्माअता के प्रसिद्ध जीव शास्त्री विक्टर इन्यूशियन ने मालेक्युलर बायोलॉजी के नये प्रयोगों के दौरान यह सिद्ध किया है कि गुलाबी रोशनी के जैविक कार्य-कलाप उसकी आत्मिक प्रकृति के साथ सम्बद्ध है उन्होंने अल्वर्ट जेन्ट जोजी (नोबुल पुरस्कार विजेता बायोकेमिस्ट) के जैविक ऊर्जा सिद्धान्त को विकसित करते हुये बताया कि गुलाबी रंग के प्रकाश के प्रति जीवधारियों की अत्यधिक संवेदनशीलता उसके अस्तित्व के लिए बहुत अनुकूल पड़ती है। हमारे देश में भी पूजा स्थल में गुलाबी रंग के वस्त्र और लघु सर्वतो भद्र चक्र आदि में लाल रंग का बहुत प्रयोग होता रहा है। स्त्रियाँ गुलाबी रंग महावर के रूप में पैरों में लगाती और सिन्दूर के रूप में मस्तक में धारण करती है उससे सौंदर्य वृद्धि के साथ ही देखने वालों की अन्तर्भावनाओं में शक्ति और पवित्रता का विकास होता है।
इन्यूशियन ने सूर्य किरणों के विश्लेषण के समय पाया कि जैविक क्रियाकलापों में खर्च हुई शक्ति का 660 से 680 मिली-माइक्रोन तक अंश मनुष्य किस प्रकार फिर से ग्रहण कर लेता है उसे और वर्णक्रम (स्पेक्ट्रम) नारंगी रंग के हिस्से के अध्ययन द्वारा ठीक-ठीक जा सकता है। इन्यूशियन ने इन खोजों में 5 वर्ष से अधिक समय लगाया। एक्सरे उपकरणों द्वारा, प्रकीर्ण द्वारा जानवरों के शरीरों में घातक रेडियेशन द्वारा बीमारियाँ उत्पन्न की और फिर गुलाबी प्रकाश से उसका इलाज कर यह पाया गया कि 25 प्रतिशत रोगग्रस्त जानवर 20 दिन में पूर्ण स्वस्थ हो गये। उनका रक्तचाप सामान्य हो गया तथा वे पूर्ण स्वस्थ हो गये। उनका कहना है कि गुलाबी रंग के प्रकाश में अत्यधिक प्रवेशनीयता (ट्रान्सपेरेन्टल) के कारण इलेक्ट्रान तेजी से विस्फुटित होते हैं किसी भी अवयव की संवेदनशीलता की गति बड़ा देते हैं साथ ही विषाणुओं को मार कर उन्हें बाहर निकाल देते हैं। इसमें जीव की प्रकृति भी एक अंश तक हिस्सा लेते हैं किन्तु रंगों के मेल-जोल का समान प्रभाव सभी से होता है। अर्थात् बहुरंगी सजावट से प्रायः सभी लोगों को प्रसन्नता होती है। विवाह, उत्सवों में या सभा में पर अनेक तरह के रंगों की झंडियों में काले, भूरे रंग की झण्डियाँ भी लगा दी जाये तो उनसे भी अप्रसन्नता नहीं होती।
हिन्दुओं में यह प्रथा बहुत पहले से ही विकसित थी। अभी भी राजस्थान और उत्तर प्रदेश के कई भाग में दीवारों पर रंगीन चित्र बनाने की प्रथा है उससे जान-अनजान में मानव प्रकृति प्रभावित होने का बड़ा रहस्य छिपा हुआ है। आजकल फोटोइन रंगों थैरेपी में क्वान्टम इलेक्ट्रानिक्स का तेजी से विकास हो रहा है उससे इन विषय में और भी रहस्यपूर्ण जानकारी बढ़ेगी और सम्भवतः अधिक लोग रंगों की शक्ति का लाभ उठा सकेंगे विद्यालयों और सार्वजनिक स्थानों में रंगी डिज़ाइन, कलाकृतियाँ खींचने, खिड़कियों, दरवाजों में रंगीन परदे टाँगने, कई रंगों और बेलबूटों से सजे सद्वाक्य लिख कर अभी भी अधिक तत्परता पूर्वक रंगों के इस प्रभाव का लाभ लोग ले सकेंगे
पीले रंग का प्रेम-भावनाओं से संबंध है इस बात को भारतीयों ने बहुत पहले जाना था प्रकृति के अनुरूप बासंती परिधान पहनने की परम्परा अति प्राचीन हैं उपासना अनुष्ठानों में तो उसका महत्व और भी अधिक है वह बौद्धिक क्षमताओं को विकसित करने वाला और आरोग्यवर्धक भी माना गया है। प्रातःकाल उगते हुए पीतवर्ण सूर्य का दर्शन और ध्यान करने से बुद्धि और मेधा विकसित होती है। विवाह-शादियों ओर उपासना पुरश्चरणों पर पीत वस्त्र धारण करने की भारतीय परम्परा भी इसीलिये विकसित हुई कि इस रंग के प्रभाव से प्रेम और विवेक का उदय हो यह दोनों भाव मनुष्य-जीवन के कल्याण में बड़े सहायक होते हे इसीलिये पीले रंग का भी अपना विशिष्ट महत्व है।
हरा रंग आनन्द और प्रसन्नता प्रदान करता है। अधिक बौद्धिक श्रम करने वाले और अस्वस्थ लोगों को यदि उपलब्ध न हो तो हरे रंग का प्राकृतिक उपयोग करना चाहिये। जंगलों या पहाड़ों पर जाकर प्रकृति की हरियाली देखकर मन को बड़ी शान्ति और प्रसन्नता होती है। प्राकृतिक स्थानों के दर्शन और यात्रा का लाभ जिसे भी मिल सके अवश्य उठाना चाहिए उससे जीवन की थकावट दूर होती है पर जिसके लिये वह सुलभ न हो यह अपने घर के आस-पास हरे वृक्ष, साग-भाजी के पौधे और बेलें उगाकर भी उस आवश्यकता की पूर्ति कर सकते हैं।
हरे रंग से कार्य क्षमता भी बढ़ती है। बरसात के दिनों में किसान जितना काम अकेला कर लेता है ज्येष्ठ में उतना कई आदमी मिलकर नहीं कर पाते। एक बार एक हवाईजहाज बनाने वाले कारखाने में घास के रंग का प्रयोग किया गया। उस पर कृत्रिम रीति से सूर्य का प्रकाश डाला गया तो मजदूरों की कार्य क्षमता में व्यापक वृद्धि हुई।
जीवन को प्रभावित करने वाले मुख्य रंग यही हैं पर अन्य रंगों का भी महत्व किसी प्रकार कम नहीं हैं। सभी रंगों का मैल कई बार बहुत आकर्षक होता है। इन्द्रधनुष की सतरंगी छवि बड़ी प्यारी लगती है। धार्मिक दृष्टि से गेरुआ रंग का महत्व हिन्दू एवं बौद्ध मतावलम्बी दोनों ने स्वीकार किया है। यह रंग पवित्र और सात्विक जीवन के प्रति प्रेम और श्रद्धा भाव जगाता है।
यह रंग सूर्य की किरणों से बने बताये जाते हैं। सूर्य के प्रकाश को “स्पेक्ट्रो मीटर” यन्त्र से तोड़ा जाता है तो वह सात रंगों में विभक्त हो जाता है। प्राकृतिक जगत् में जो भी रंग-बिरंगापन है वह इन किरणों का ही खेल है। अपने जीवन में भी स्थिति, अवस्था और उपयोग की दृष्टि से रंगों का समावेश रहना चाहिये। यह भी एक कला है। इस कला का विकास भी धार्मिक महत्व रखता है। वेषभूषा के अतिरिक्त अपने घरों को रंग-बिरंगे रंगीन-चित्रों से, डिजायनों से सजाने की परम्परा पहले चलती थी अब भी चलनी चाहिए। विद्यालयों, वाचनालयों, देवालयों को तो रंगों की आभा देकर फूल-बेलों से अवश्य ही सजाना चाहिए। उत्सवों और मांगलिक कृत्यों के समय तो उस स्थान को रंग-बिरंगा बनाने का पूरा प्रयत्न करना ही चाहिए क्योंकि उससे शोभा ही नहीं शक्ति और आन्तरिक गुणों का विकास भी होता है।
मदन मोहन मालवीय किसी अंग्रेजी अफसर से मिलने जा रहे थे। अभी थोड़ी ही दूर पहुँचे थे कि रास्ते में पड़ी हुई एक निर्धन स्त्री दिखाई दी। उसके पाँव में घाव हो गये थे। मक्खियाँ काट रही थीं इससे उसे असहाय वेदना हो रही थी।
मालवीय जी ने अपनी घोड़ा गाड़ी रुकवाई। स्वयं उतरे और उस स्त्री का उठाकर गाड़ी में बैठा कर अस्पताल की ओर चल पड़े। एक युवक ने यह देखा तो दौड़ा-दौड़ा आया और बोला पण्डित जी इस स्त्री को लाइये मैं अस्पताल पहुँचा देता हूँ आप किसी आवश्यक कार्य में जा रहे है वहाँ जाइये। आपका समय ज्यादा मूल्यवान हैं।
“मालवीय जी ने कहाँ यह कार्य ज्यादा आवश्यक है मैं उसी के लिये जिन्दा हूँ” यह कहकर उन्होंने गाड़ी आगे बढ़वाई और उस स्त्री को स्वयं अस्पताल पहुँचा कर आये।
संसार में ऐसे लोगों की संख्या कम नहीं है जो अपने लिये विरोध की मात्रा बढ़ा लिया करते हैं और फिर यह शिकायत किया करते हैं कि लोग न जाने उनका विरोध क्यों किया करते हैं जब कि वह खुद किसी का विरोध नहीं करते।
विरोध का जन्म प्रतिकूलता से ही होता है। जब तक मनुष्य प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष, शारीरिक अथवा मानसिक, मौन अथवा मुखर रूप से प्रतिकूलता की अभिव्यक्ति नहीं करता तब तक विरोध उत्पन्न ही नहीं हो सकता। यह बात दूसरी है कि मनुष्य अपनी उस भूल, कमी अथवा दोष को देख समझ न पाये।
दोष-दर्शन संकीर्ण-दृष्टिकोण अदूरदर्शिता अथवा अति दर्शन आदि दृष्टि-दोष के सामान्य रूप हैं।
दोष-दर्शी व्यक्ति सामान्यतः दूसरों की कमियों दुर्बलताओं, रहस्यों तथा छिद्रों को ही देखता और खोजता रहता है। अपनी इस वृत्ति के वशीभूत रह कर वह यह नहीं सोच पाता कि यदि मैं किसी दुराव अथवा दुर्बलताओं की खोज करने के लिये तत्पर रहूँगा तो स्वभावतः अन्य पक्ष मुझको अहित-चिन्तक मान लेगा। वह यह विश्वास किये बिना रह ही नहीं सकता कि यह हमारी कमजोरियों को जानकर या तो अनुचित लाभ उठाना चाहता हैं, दबाये रहना चाहता है अथवा कोई हानि पहुँचाने के लिये भूमिका तैयार कर रहा है। ऐसी अवस्था में उसका विरोध हो जाना स्वाभाविक ही है। फिर चाहे दोष-दर्शी उसका कोई अहित भी न करना चाहता हो, अपनी वृत्ति से मजबूर होकर किसी व्यसन विवश-व्यक्ति की तरह ही वैसा कर रहा हो तब भी यह कारण उसके विरोध को रोक नहीं सकता। थोड़े-बहुत दोष सभी में होते हैं। कोई भी सर्वथा दोषों से रहित नहीं होता। उसी प्रकार कुछ न कुछ गुण भी सब में मौजूद होते हैं। बुद्धिमान् मनुष्य, जो कि समाज में स्निग्ध तथा सरल जीवन का सुख लेना चाहते हैं, वे किसी के दोष नहीं गुण ही खोजा और देखा करते हैं।
संकीर्ण दृष्टिकोण एक पाश के समान दुःखदायी होता है। इसको लेकर जो व्यक्ति जहाँ भी जाता है वहाँ अपने लिये, नापसन्दगी तथा असहयोग उत्पन्न कर लेता है। संकीर्ण दृष्टिकोण वाला व्यक्ति हर वस्तु तथा हर व्यक्ति का अवमूल्यन ही करता रहता है। वह किसी की विशेषता अथवा गुण देखकर सराहना करना तो जानता ही नहीं। किसी की महत्ता अथवा मान्यता स्वीकार कर सकना उसके वंश की बात नहीं होती। किसी की रचना, कृति, सुन्दरता अथवा सफलता से प्रभावित होने पर भी वह उसकी अभिव्यक्ति में चोरी करता है और यदि प्रभाव को प्रकट भी करता है तो किसी कमी अथवा तुलनात्मक दृष्टि से मूल्य एवं
महत्व कम करके। किसी के विश्वासों, आस्थाओं, धारणाओं, निर्णयों अथवा मान्यताओं को सम्मान देना तो दूर उनको मार्ग तक देने को तैयार नहीं होता। उसमें यह देख सकने की शक्ति उसकी तरह सफल होकर आगे बढ़ जाये। ऐसे संकीर्ण व्यक्ति के प्रति लोगों को अहितैषी, अनुदार अथवा ईर्ष्यालु होने की धारणा बना लेते हैं और उसे संपर्क में लाने अथवा उसके संपर्क में जाने की पारस्परिकता को निरुत्साहित करने लगते हैं और यह एक प्रकार का विरोध ही हैं बुद्धिमान् व्यक्ति विशाल दृष्टिकोण को आश्रय देकर दूसरों को रास्ता देते और बदलने में रास्ता पाकर निर्भय एवं निर्द्वन्द्व जीवन का सुख उपभोग करते हैं।
अदूरदर्शी व्यक्ति कदम-कदम पर गलती करता रहता हैं। वह जो कुछ कह रहा है उसका कहाँ पर, किस पर किस समय और क्या प्रभाव पड़ सकता है इसका अनुमान कर सकना अदूरदर्शी के लिये संभव नहीं। वह ऐसे अनेक काम कर बैठता है जो उस समय तो बड़े समीचीन विदित होते हैं किन्तु समयान्तर में बड़ा ही प्रतिकूल प्रभाव उत्पन्न करते हैं। अदूरदर्शी में एक दोष उतावली का भी होता है। जिसके कारण उसके बहुत से काम अहितकर सिद्ध होते हैं। जैसे किसी की आलोचना का अवसर आ पड़ा है तो दूरदर्शी व्यक्ति तो उस अवसर से उत्पन्न उत्सुकता अथवा प्रेरणा को दबा लेगा, किन्तु अदूरदर्शी इसकी आवश्यकता को नहीं समझ पाता और अपनी बुद्धिमत्ता प्रकट करने अथवा स्पष्टवक्ता होने का श्रेय लेने के लोभ से आलोचना अथवा निन्दा में प्रवृत्त हो जायेगा। जिसके फलस्वरूप सही होने पर भी आलोच्य व्यक्ति के साथ-साथ उस वर्ग अथवा समुदाय के सारे व्यक्ति उसके विरोधी बन जायेंगे ऐसे ही अदूरदर्शी कर्मचारी, विद्यार्थी, नेता अथवा सुधारक अधिकारियों, अध्यापकों तथा लोक भावना को अपने विरुद्ध बना लिया करते हैं। बुद्धिमान् व्यक्ति कहने अथवा करने से पहले उसके प्रत्यक्ष, परोक्ष निकट अथवा दूर पड़ने वाले प्रभाव पर अच्छी तरह विचार कर लेने पर ही कोई काम करते हैं।
अतिदर्शी व्यक्ति किसी भी बात को बहुत बड़ा-चढ़ा कर देखता है। किसी का तिल जैसा दोष उसे ताड़ जैसा और चुल्लू भर गुण समुद्र जैसे दीखते हैं और उसी के अनुसार वह उनकी निन्दा-स्तुति भी किया करता है। जिससे निन्दा का शिकार व्यक्ति उसे शत्रु मानकर और स्तुति का केन्द्र व्यक्ति उसे शत्रु मानकर और स्तुति का केन्द्र व्यक्ति उसे प्रलापी अथवा मिथ्यावादी समझ कर नापसन्द कर देते हैं। अतिदर्शी को किसी का छोटा सा व्यवसाय लाखों करोड़ों का तथा थोड़ा साधन ने जाने कितना मालूम होता है और तदनुसार ही वह उसका प्रचार भी करता है जिससे उस वर्ग के लोग उसे समाज में बदनाम करने वाला मानकर उसके विरोधी बन जाते हैं। बुद्धिमान् व्यक्ति अतिरेकता से बचकर हर बात तथा व्यक्ति का उचित मूल्यांकन ही किया करते हैं। गलत मूल्यांकन से अथवा अनुचित प्रशंसा से यदि कोई एक आध हल्की मनोभूमि वाले प्रसन्न भी हो सकते हैं तो अन्य न जाने कितने उपयुक्तवादी होकर उसके मिथ्या प्रचार के विरोधी बन जायेंगे।
दुर्भाव, स्वार्थभाव तथा अहंभाव, भावदोष के ही रूप माने गये हैं। जिन व्यक्तियों का हृदय दुर्भाव से दूषित रहता है, वे सबका अहित चिन्तन ही किया करते हैं। वाक्पटुता, व्यवहार कुशलता, दया, करुणा, प्रेम अथवा उदारता के कितने ही कृत्रिम आवरण क्यों न डाले जायें किन्तु दुर्भाव छिपाये नहीं छिप सकता। जिस प्रकार शत्रुता मुख में मिश्री घोल लेने पर भी छिप सकती उसी प्रकार दुर्भाव भी सौ आवरणों के भीतर से भी समझ जाता है। मनुष्य का मुख हृदय का दर्पण कहा गया है। दुर्भावना पूर्ण शक्ति कितनी ही अनुकूलता क्यों नहीं प्रकट करे किन्तु उसका अन्तर्भाव मुख के भावों से, आँखों तथा मुद्राओं से प्रकट ही होता रहता है। बधिक के दाना दिखलाने, पुचकारने, प्यार करने और सहलाने, खुजलाने पर भी पशु उससे सामंजस्य नहीं कर पाता किन्तु सद्भावनापूर्वक व्यक्ति के पास जाकर खड़ा हो जाता है और गर्दन ऊँची करके खुजलाने अथवा सहलाने का संकेत करने लगता है।
दुर्भावनापूर्ण व्यक्ति किसी का हितैषी अथवा मित्र हो सकता है यह असंभव है। वह तो कारण अथवा अकारण रहने पर केवल दूसरों को नीचा दिखाने, उनको आपत्ति में देखने, समय आने पर अहित करने में ही संतोष मानता है। किसी की उन्नति, विकास अथवा हँसी-खुशी देखकर वह मन ही मन जलकर खाक हो जाता है। एक की दूसरे से बुराई करना, किन्हीं दो का विरोध भाव बढ़ाना, गिरते हुए की टाँग खींच लेना, किसी के परिवार अथवा बच्चों को बिगाड़ना, पारस्परिक कलह को प्रोत्साहन देना आदि दुर्भावना पूर्ण व्यक्ति के स्वाभाविक कम तथा कौतुक हैं। समाज का ऐसा कलंक और मूर्खता का पुतला यदि समाज में सहयोग अथवा सहायता का सुख पाना चाहे तो यह उसकी अनधिकार चेष्टा ही होगी। उसका अधिकार तो विरोध एवं भर्त्सना ही है जो पाता है और उसे मिलना ही चाहिए। अच्छे तथा बुद्धिमान् व्यक्ति संसार से किसी के प्रति दुर्भावना नहीं रखते वे तो सद्भावना के धनी बन कर समाज में दूसरों को सुख देकर सुख पाना ही मनुष्यता की पहिचान मानते हैं।
सब कुछ अपने तथा अपनों के लिये ही चाहने वाला स्वार्थी व्यक्ति समाज का चोर माना गया है। स्वार्थ भावना से दूषित व्यक्ति का संसार बस अपने तक ही सीमित रहता है। उसके गुणों, विशेषताओं, सम्पत्तियों तथा प्रभावों का लाभ किसी दूसरे के काम न आ जाये इस बात से वह बड़ा सतर्क रहता है। यदि किसी विवशतापूर्वक कुछ भी किसी के काम में आ गया तो वह उसे अपना दुर्भाग्य ही मानता है। किसी भी प्रकार की आवश्यकता में काम आ जाने को वह अपनी चतुरता तथा व्यावहारिक बुद्धि की हार समझता है। स्वार्थी व्यक्ति संसार के सारे सुख-साधनों पर केवल अपना ही अधिकार चाहता है। अपने स्वार्थ के समक्ष उसे किसी दूसरे के दुःख, दर्द, कष्ट, पीड़ा, विपत्ति, आपत्ति कुछ भी तो नहीं दीखते। वह “अपने जीते जग जिया-वाली कहावत का अक्षरशः समर्थक एवं प्रतिपालक होता है।
स्वार्थ भावना ही तो वह भावना है जो मनुष्य को शोषण, सञ्चय, चोरी, ठगी तथा भ्रष्टाचार के पापों के लिए प्रेरित करती है। यही तो वह पाप है जिसके वशीभूत होकर मनुष्य अत्याचारी, आक्रमणकारी तथा अनाचारी बन जाता है।
एक ओर जहाँ स्वार्थी समाज में हर किसी से उनकी सद्भावना तथा सज्जनता का लाभ उठा कर अपना मतलब बनाता रहता है और दूसरी ओर धन्धों की आवश्यकता तथा सहायता के लिये बमली काटता रहता है। स्वार्थियों की यह कपट-हौड़ी कुछ ही समय तक चढ़ पाती है। शीघ्र ही उनका स्वरूप प्रकट हो जाता है और तब उन्हें समाज की तीव्र घृणा तथा विरोध का संताप सहन करते हुए एक बहिष्कृत-सी जिन्दगी बितानी पड़ती है। बुद्धिमान व्यक्ति सीमित स्वार्थ तथा असीम परमार्थ में विश्वास रख कर और तदनुसार जीवन अपनाकर मनुष्यता के उन सुखों को उपलब्ध करते रहने हैं जिनके लिए स्वर्ग में देवता भी लालायित रहा करते है।
अहंभाव तो माना विरोधों का बटबीज ही है। जो व्यक्ति इस दोष से दूषित हो गया मानो उसके लिए विरोध ही नहीं पतन की भूमिका बन कर तैयार हो गई। किसी का कहना न मानना, अनुशासन तथा नम्रता में अविश्वास करना, सहयोग तथा पारस्परिकता को अनावश्यक मानना अहंकारी व्यक्ति के सहज दुर्गुण होते है। किसी की बात मानना, अधिकारों को मान्यता देना अथवा समझदारी के आधार पर निर्णय लेना उसका आत्म-प्रतिष्ठा का प्रश्न बन जाता है। जल्दी ही क्रुद्ध हो जाना आवेश से उद्दीप्त हो जाना उसकी वे दुर्बलताएँ है जो विरोध का विस्तार कर दिया करती हैं अपनी गलती पर अड़े रहना, किसी की गलती को क्षमा न करना, समाज में आतंक एवं भय का वातावरण उत्पन्न करना उसका सहज स्वभाव होता हैं। असहनशील एवं अवज्ञाकारी प्रवृत्तियों का अहंकारी व्यक्ति समाज में संकट माना जाता है। हो सकता है कि किसी शक्तिशाली अंहप्रधान व्यक्ति का लोग खुले तौर पर विरोध न करें, किन्तु सभी लोग उससे मन ही मन घृणा करते हुये दूर ही रहना चाहते हैं। किन्तु मिथ्याभिमानी, दम्भी व्यक्ति तो चार दिन भी समाज में टिकने नहीं पाता। शीघ्र ही समाज की असहयोगी भावना उस अवांछित व्यक्ति को या तो उखाड़ फेंकती है अथवा होश भी ला देती है। सत्ता, शक्ति, सम्पत्ति तथा विद्या-बुद्धि होने पर भी बुद्धिमान व्यक्ति इस दोष से बचकर समाज में समानता तथा स्नेह का व्यवहार करते हुये पूजा एवं प्रतिष्ठा के पात्र बन कर जीवन में जिस सुख-सन्तोष का अनुभव करते हैं उसकी तुलना में स्वर्ग का सुख भी खड़ा नहीं हो सकता।
कटु, असत्य, अश्लील तथा अनुपयुक्त भाषण करना, भाषा दोष माना गया है। कटुभाषी व्यक्ति एक साधारण बात को भी तीखा करके बोलता है। लोगों को उसकी बात चुभे इसमें उसे बड़ा मजा आता है। जहाँ शास्त्रकारों ने कटु सत्य बोलने तक का अर्जन कर दिया है वहाँ साधारण रूप से कटु भाषण कितना अवांछनीय हो सकता है यह सहज में ही समझा जा सकता है। वन-प्राण विषविशिखों से भी कष्टदायक होते है तब तो ऐसे कटुभाषी को समाज में सहयोग की आशा किसी प्रकार भी नहीं करनी चाहिए।
अब देखिए, यदि आप विरोध से परेशान हों तो कहीं इन दोषों में से किसी दोष से तो आप आक्रान्त नहीं है। और यदि ऐसा हो तो शीघ्र ही शमन होने लगेगा।
नन्हा-मुन्ना-सा कोमल वालों एक छोटा-सा खरगोश जिसकी आँखों से करुणा-करुणा टपक रही थी, रस्सी से बँधा बैठा था एक महाशय ने कन्सन्ट्रेटेड नाइट्रिक एसिड या कन्सन्ट्रेटेड सलफयूरिक एसिड जैसा कोई तेज रसायन उसके कानों में डाल दिया। निरीह खरगोश बुरी तरह तड़फड़ा उठा पर भागने और प्राण बचाने के लिये स्थान वहाँ कहाँ था वह भावना विहीन असुरत्व को काल-कोठरी में जकड़ा हुआ खरगोश केवल तड़पता रहा
रसायन के प्रयोग से कान के पास की सब नसें उभर आई। उन महाशय ने एक चाकू निकाला और उस उभरे हुए हिस्से में घुसेड़ दिया। रक्त तेजी से बह निकला। उससे बोतलें भरी जाने लगीं। खरगोश की देह का सब रक्त निकल आया तो उसे चीमटे में दाब कर इस तरह फेंक दिया गया जिस तरह नीबू का रस निचोड़ लेने के बाद छिलके को फेंक देते हैं।
एक और सज्जन का परिचय पाने के लिए आपको अमेरिका चलना पड़ेगा। लीजिये एक और दरवाजा खोलिये। यहाँ एक महत्त्वपूर्ण प्रयोग चल रहा है। यह देखना है कि शरीर से अलग रहकर भी क्या मस्तिष्क काम कर सकता है? इसी का अध्ययन करने के लिये लिब्बी बन्दर को मेज़ पर जकड़ कर बाँध दिया गया है। किसी मनुष्य का आपरेशन करना हो तो उसे बेहोश किया जाता है पर यहाँ तो परीक्षण चल रहा है। बेहोश किये बिना बन्दर का आपरेशन किया गया। इस कदर चीखा-चिल्लाया और छटपटाया कि सारा कमरा वीभत्सता से भर गया। किन्तु जंजीरें टस से मस न हुई। मस्तिष्क काटकर शरीर के एक हिस्से में सी दिया गया। मस्तिष्क काट देने के बाद 5 घंटे तक चेतनशील रहा उतने समय कोंचने, चुभाने, नोंचने, काटने के अनेक प्रयोग चलते रहे तब कहीं जाकर बन्दर को मुक्ति मिली। अर्थात्, वह मर गया और लाश बिजली की भट्टी में झोंक दी गई।
ऐसा ही एक प्रयोग रूस के एक शल्य-वैज्ञानिक ने किया। एक कुत्ते का गर्दन कलम एक दूसरे एर्ल्सशियन कुत्ते की गर्दन में जोड़ दी गई। दोनों कुत्ते एक ही शरीर में जी रहे है। प्रयोग-परीक्षण और मानव-सेवा के नाम पर जीवों की जो हत्या की जाती हैं उससे आज का ‘सभ्य’ कहलाने वाला युग आँख मूँद सकता है पर आत्मचेतना चुप होकर बैठ नहीं सकती। आज का विज्ञानवादी मस्तिष्क इस बात पर गौरव अनुभव कर सकता है कि उसने अनेक महत्त्वपूर्ण उपलब्धियाँ प्राप्त की हैं किन्तु उसे अपने आत्मिक पतन की खबर नहीं है। किस प्रकार कुरूपता और भयंकरता बढ़ रही है। इसका उन्हें अनुमान भी नहीं है। बुद्धि में पाशविकता चेतनता से दूर लिये जा रही है। दवाइयाँ 10 प्रतिशत-रोग 25 प्रतिशत। बुद्धि सवा हुई तो पागलपन ड्यौढ़ा बढ़ रहा है। आत्म-हत्याओं की संख्या तेजी से बढ़ रही है। हत्याएँ, लूट-पाट विश्वासघात, शोषण, उत्पीड़न आदि छल की बाढ़ आ गई और भ्रष्टाचार, चोरी, बेईमानी और ठगी द्वारा एक मनुष्य ने दूसरे मनुष्य से इतनी दूरी पैदा कर ली है कि पास-पास रहते हुये भी उनमें न प्रेम है सहानुभूति न विश्वास। सब अपनी-अपनी घात में रहते हैं। अविश्वास-अविश्वास पति-पत्नी पिता-पुत्र बहन-भाई सौदागर-खरीदार नेता, प्रजा सब एक दूसरे से खिंचे हुये है। यह सब आत्म-चेतना में पाशविक दुर्बुद्धि छा जाने का ही परिणाम है।
चेतन सृष्टि परमात्मा की समीपी मित्र और सखा है। उसको जितना ही सताया जाता है उतना ही उसमें क्षोभ उत्पन्न होता है और जितना क्षोभ उत्पन्न होता है उतना ही वह सताने वालों का अपकार करता है। आज संसार में जो अशान्ति हो रही है कलह, लड़ाई, बीमारी और दुष्कर्म हो रहे हैं उस सबका कारण चेतन क्षोभ ही। इन विभीषिकाओं को देख कर ही प्रसिद्ध जर्मन दार्शनिक एडल्फ जस्ट ने अपनी “रिटर्न टु नेचर” पुस्तक में यह उद्धृत किया है कि मनुष्य यदि परपीड़न की दुष्प्रवृत्ति से अपने को रोकता नहीं तो एक दिन भयंकर विस्फोट होगा और मनुष्य जाति परस्पर एक दूसरे को मारकर खा जायेगी।
ईश्वर, आत्मा, देवता, उपासना, यज्ञ आदि भारतीय दर्शन की मान्यताओं को अब अन्ध-विश्वास कहा जाता है किन्तु यदि बुरा न लगे तो विज्ञान को भी अन्ध-विश्वास मानना और उसके पद-चिह्नों पर चलने वालों को वैज्ञानिक अन्ध-विश्वासी कहना अनुपयुक्त नहीं होगा। आज फैशन के नाम पर तरह-तरह के प्रयोग हो रहे हैं। महिलायें बाल साफ करने के लिये शैम्पू का प्रयोग करती हैं किन्तु उन्हें यह पता नहीं होता कि यही शैम्पू जिन कारखानों में तैयार किया जाता है वहाँ छोटे-छोटे खरगोश, गिलहरी आदि जीव पाले गये होते है। शैम्पू तैयार होता है तो यह देखने के लिये कि वह ठीक है या नहीं उसे खरगोश की आँखों में डाला जाता है यदि खरगोश की आँख फूट जाये तो यह माना जाता है कि वह तेज है। जब तक उसके अच्छे होने का उत्पादकों को विश्वास नहीं हो जाता ऐसे प्रयोग होते हैं और उनमें बेचारे निरीह जीवों की हत्या और उत्पीड़न होता रहता है। जब कोई क्रीम तैयार की जाती है तो उसे भी बिल्ली की खाल छील कर उस पर लगाई जाती है। इन परीक्षणों में बिल्लियों की चमड़ी में फफोले और घाव हो जाते हैं। उस उत्पीड़न को वे रो-रोकर झेलती है और बाद में उसे ही सुन्दरता बढ़ाने के लिये चेहरों पर चुपड़ा जाता है। जीव उत्पीड़न और हिंसा का साथ देने वाले इन फैशनपरस्तों को, उत्पीड़ित शरीरों से प्राप्त औषधियों को सेवन करने वालों को वैज्ञानिक अन्धविश्वासी कहा जाये तो उसमें बुरा क्या है। धार्मिक अन्ध-विश्वास जितना बुरा है वैज्ञानिक अन्ध-विश्वास उससे बढ़कर क्योंकि उसमें सामूहिक विनाश की परिस्थितियों का तेजी से विकास होता चला जा रहा है।
मनुष्य जाति की इस क्रूरता और बर्बरता का इसी से अनुमान लगाया जा सकता है कि अकेले ब्रिटेन में चिकित्सा सम्बन्धी खोजों में एक वर्ष में 50 लाख पशुओं और जीव-जन्तुओं का जीवन नष्ट किया जाता है इनमें से 87 प्रतिशत वे जीव होते हैं जिनकी चीरफाड़ सीधे बिना बेहोश किये होती है। उसे हत्या नहीं क्रन्दन, तड़पन और घोर उत्पीड़न ही कहना चाहिये। निरीह प्राणियों का यह मूक व्यथा क्या आकाश को शुद्ध और शान्त रख सकेगी। उससे प्राकृतिक परमाणुओं में ऐसी हलचल होगी जो पृथ्वी को उद्देश्य और उच्छृंखल मानवों से पाट देगी। विषाणुओं की मात्र इतनी बढ़ जायेगी कि हत्या उत्पात से जो बचेंगे उन्हें बीमारियाँ खा जायेंगी और इस तरह वर्तमान विज्ञान सामूहिक आत्महत्या के दुःखद अन्त में बदल जायेगा।
मानवीय भावनाओं और जीव दया का अन्त किस तेजी से हो रहा है उसका अनुमान करना हो तो चौधरी युद्धवीर सिंह द्वारा दिये गये 10 सितम्बर 1963 के लोक-सभा वे वक्तव्य को ढूँढ़ना पड़ेगा। उन्होंने बताया था कि पशुओं का जिस तेजी से वध किया जा रहा है वह न केवल मानवता पर कलंक है वरन् कृषि व्यवस्था में भारी संकट आने की सम्भावना है। उनके एक पत्र के उत्तर में कृषि-मन्त्री सरदार र्स्वर्णसिंह ने 1960-61 के 1314 सरकारों और 770 गैर सरकारी बूचड़खानों में बँधे हुये पशुओं की संख्या बताई वह इस प्रकार है-15649 सुअर, 277977 भैंस और 315512 अन्य पशु 4234888 भेड़े और 4502578 बकरियाँ थीं। तब से बूचड़खानों की संख्या में भी बढ़ोत्तरी ही हुई है। विज्ञान की यह पाशविक बुद्धि तो मनुष्य को अपने स्वार्थ के लिये किसी भी जीव का उत्पीड़न करने की सहमति प्रदान करती रहतीं है। मानवीय गुणों, दया, करुणा, प्रेम, उदारता, सहयोग, सौजन्य, सद्भाव का अन्त करके ही छोड़ेगी और उसके परिणाम निःसन्देह मानव जाति के लिये बहुत घातक होंगे
सर्वसाधारण की बुद्धि में इस तरह की कुरूपता इतनी चिन्ताजनक नहीं है जितनी उन वैज्ञानिकों की दुर्बुद्धि जिनको श्रेष्ठ मान कर आज का शिक्षित वर्ग अपने जीवन की मान्यतायें और धारणायें जमाता है। आज औषधि जगत में सल्फानोमाइड और एण्टीबायोटिक दवाओं की प्रसिद्धि से सब परिचित हैं किन्तु उनके घातक प्रभाव को कम ही लोग जानते होंगे। आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस से प्रकाशित एक पुस्तक में इन औषधियों के विषाक्त प्रभाव की चर्चा की गई है। मई 1959 के मेडिकल वर्ल्ड में ए॰ मेलविन रेमजे, एम़ ए एम डी रॉयल फ्री हॉस्पीटल लन्दन के कीटाणु जन्य रोग विभाग के चिकित्सक ने भी इनके प्रयोग को बंद करने की चेतावनी दी है। “लाँसेट” के सम्पादक ने अंक दो वर्ष 1955 में लिखा है कि इन दवाओं के प्रयोग से अस्पतालों में अनेक रोग फैल रहे है जैसे न्यूमोनिया और आँतों की सूजन। 1 सितम्बर 1956 के पृष्ठ 440 पर पेन्सलीन के घातक प्रभावों का वर्णन है। अमेरिका में 1954-1955 और 1956 की जाँच की गई और यह पाया गया कि देश भर में एण्टीबायोटिक दवाओं से 1665 लोगों पर घातक प्रतिक्रिया हुई, 1070 व्यक्ति तो बुरी तरह पीड़ित हुए 601 कर अन्त हो गया। जर्नल आफ अमेरिकन मेडिकल ऐसोसिएशन में डा0 डब्ल्यू हेरता ने लिखा है “इन दवाओं से अनेक नई बीमारियाँ पैदा होंगी” (1955 अंक 198 1815)। वैज्ञानिकों की चेतावनियों के बावजूद भी विज्ञान लोगों के जीवन में किस तरह हावी है इसे अन्ध-विश्वास न कहें तो और क्या कहें? उसे मानवीय संस्कृति के लिये लाल रोशनी या खतरे की घण्टी ही कहना चाहिये।
गाँधीजी की अहिंसावादी नीति के समर्थक डा0 हाल्डेन उन व्यक्तियों में से थे जिन्होंने प्रयोगशालाओं और बूचड़खानों में होती हुई निर्दयता को देखा था और उनका हृदय करुणा से भर गया था। तभी उन्होंने कहा था-प्राणियों पर प्रयोग करने की अपेक्षा मनुष्य स्वयं पर या अपने मित्रों पर प्रयोग करके कही अधिक सही परिणाम उपलब्ध कर सकते हैं।” प्रसिद्ध जीवशास्त्री डा0 जे0 बी0 एस॰ डाल्टेन ने अनुरोध किया था-मनुष्य स्वपीड़न का अनुभव करके पर-पीड़न का अनुभव करते उसे पता चले कि वह कितना बड़ा पाप प्रयोगशालाओं में विज्ञान के नाम पर कर रहा है। लोगों को और विशेष रूप से भारतीयों को अहिंसा की पद्धति से विज्ञान का विकास करना चाहिये, कट्टरता, नृशंसता और हत्या की पद्धति पर नहीं क्योंकि उससे मानवीय गुणों का अन्त होता है। जिस दिन ये गुण नहीं रहेंगे उस दिन मनुष्य स्वयं हो अपना शत्रु हो जायेगा।
हमारे ऋषि महान् वैज्ञानिक थे। उन्होंने गणित और सूक्ष्म बुद्धि से ब्रह्माण्ड की उन शक्तियों का पता लगाया था जिनके आगे चन्द्रमा की यात्रा बहुत छोटी है। औषधियों के जितने सात्विक प्रयोग और परिणाम एवं नाम हमारे सुश्रुत चरक और माधव निदान आदि ग्रन्थों में है उनका एक अंश भी एलोपैथी चिकित्सा में नहीं। सर्जरी का विकास भी भारतवर्ष में हुआ था। उसके लिये लोग अपने शरीर दे देते थे पर कभी किसी जीव को मारा या बचाया नहीं जाता था क्योंकि वे जानते थे कि उत्पीड़न और परपीड़न एक ऐसी सत्ता है जो चैतन्य विद्युत की तरह हैं जो अंततः मानव-जाति को ही नष्ट कर डालती हैं। मनुष्य को यह खतरा मोल न लेकर भावनाओं की अभिवृद्धि द्वारा अपनी सुख-शान्ति बढ़ानी चाहिये, वही सनातन नियम और मनुष्य का शाश्वत धर्म है।
कुत्ते और बिल्ली की दोस्ती सुनी न होगी पर हुआ ऐसा ही। एक स्त्री ने एक कुत्ता पाला और एक बिजली। दोनों में गहरी मित्रता हो गई।
स्त्री पड़ोस में गई हुई थी। उबला हुआ दूध अलमारी में रखा था, गृहस्वामिनी उसे बन्द करना भूल गई थी। बिल्ली ने दूध देखा तो मुँह में पानी भर आया। मित्रता प्रदर्शित करते हुए कुत्ते से बोली, “भाई साहब! आइये दूध पिया जाये। घर में कोई है नहीं, क्यों न आज मनमाना दूध पिये
कुत्ते ने मना करते हुए कहा-नहीं बहन! जी मैं इस घर का रक्षक हूँ। मैं दूध पीने की अनुमति नहीं दे सकता। यह मेरा नैतिक कर्त्तव्य है।
धन्यवाद! भाई साहब-बिल्ली मखौल करती हुई बोली-किन्तु क्या आप मित्र की भावनाओं पर आघात करने का पाप नहीं कर रहे।’
नहीं बहन! कुत्ते ने गम्भीर होकर उत्तर दिया-मित्र को दण्ड से बचाने का पुण्य उस पाप की तुलना में बड़ा हैं। कुत्ते की दृढ़ता और सच्ची मंगल कामना से बिल्ली बहुत प्रभावित हुई। और उस दिन से चोरी करना छोड़ दिया।
एकता ही शक्ति अपार है। तिनके मिलकर जब रस्सा बनता है तो उससे मदमस्त हाथी भी कसे जा सकते है। बूँद-बूँद मिलकर समुद्र बनने की उक्ति प्रसिद्ध है। एकाकी तुच्छ इकाइयों का मूल्य नगण्य हैं पर जब वे मिलकर एकात्म हो जाती है तो उनका स्वरूप और प्रभाव देखते ही बनता है। बिखरी पड़ी ईंटों का कोई महत्व नहीं, पर जब वे एकत्रित होकर विशाल भवन का रूप धारण करती हैं तो उनका महत्व और उपयोगिता कुछ और हो होती है। एक सैनिक की शक्ति नगण्य है पर उनका समूह विशाल सेना का रूप धारण करके कुछ और ही चमत्कार दिखाता है। एकता की शक्ति अविदित नहीं है पर खेद इसी बात का है कि मानव-जाति ने छुट-पुट संगठन बनाने के अस्त-व्यस्त प्रयत्न तो किये पर जन समाज की एकात्मकता एवं संघबद्धता पर ध्यान नहीं दिया। आधार और स्वार्थ अलग-अधिकारों का परित्याग करते हुए प्रसन्नता, सन्तोष एवं गर्व अनुभव करें। इस प्रकार की एकता से ही विश्व में सच्ची शांति स्थापित होगी। आज जो श्रम, चिन्तन, साधन, धन, पुरुषार्थ एवं उत्साह जैसे साधन एक दूसरे को नीचा दिखाने में, आक्रमणों से सुरक्षा रखने में खर्च होते हैं वे कल सामूहिक, समृद्धि, शान्ति का सृजन कर रहे होंगे।
भिन्नता, पृथकता और द्वेष उत्पन्न करने वाली चार कारणों की चर्चा पिछले अंक में की जा चुकी है, उन कारणों का प्रभाव क्रमशः क्षीण करते चलने की अपनी योजना है। विश्वास करना चाहिये कि मनुष्य की अन्तः चेतना अगले दिनों विकसित होगी और ऋतम्भरा प्रज्ञा का
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अलग होने से वे वर्ग, वर्ण, भाषा, देश, सम्प्रदाय आदि के आधार पर बने छुट-पुट संगठन परस्पर टकराते रहे और विभीषिकाएँ उत्पन्न करते रहे। सच्चा और स्थिर लाभ तो तभी हो सकता था जब वे समग्र रूप से एक आधार पर संगठित होते। समय आ गया कि अब उस भूल का परिमार्जन परिष्कार किया जाय।
युग-निर्माण योजना के अंतर्गत प्रबल प्रयास यह किया जा रहा है कि समस्त मानव-जाति का प्रेम, सौजन्य, सद्भाव, आत्मीयता, समता, ममता आदि उच्च अध्यात्म आदर्शों की आधार शिला पर एकत्रित और संबद्ध किया जाय। सारा विश्व एक कुटुम्ब बने। मनुष्य मात्र में आत्मीयता और उदारता की प्रवृत्ति जगे और लोग एक दूसरे को सुख-सम्पन्न बनाने के लिये अपने स्वार्थों, सुविधाओं एवं विकास उन संकीर्णताओं का नष्ट करेगा जिसके कारण मानवीय शक्तियों का पिछले दिनों घोर दुरुपयोग होता रहा है। गायत्री महामंत्र के तत्त्व-ज्ञान को विकसित कर हम सार्वभौम विवेक को जागृत करने चले हैं। विश्वास करना चाहिये कि विवेकशीलता जैसे-जैसे विकसित होगी, भिन्नताओं की भाषा में सोचने की अपेक्षा मानव मस्तिष्क एकता के आधार ढूंढ़ेगा और अपने प्रसुप्त साहस को जमा कर विश्व-बन्धुत्व के-वसुधैव कुटुम्बकम् के लक्ष्य को प्राप्त करके रहेगा।
युग-निर्माण के चार आधारों में प्रथम था एकता। जिसका उपरोक्त पंक्तियों में और पिछले अंक में कुछ चर्चा की जा चुकी है। दूसरा आधार है-समता एकता की भाँति ही हमें सार्वभौम समता के लिये प्रयत्न करना है। मनुष्य-मनुष्य के बीच जो आकाश-पाताल जैसा अन्तर आज दिखलाई पड़ रहा है उसे मिटाने और घटाने के लिए हमें साहसपूर्ण कदम बढ़ाने होंगे। असमानता, ईर्ष्या और द्वेष उत्पन्न करती है। उससे गिरे हुये वर्ग में हीनता, दीनता एवं पतनोन्मुख प्रवृत्तियाँ बढ़ती है और उठे हुए वर्ग में विलासिता, अहंकार, लोभ एवं अनुदारता जैसे दोष-दुर्गुण बढ़ते चले जाते है। असमानता इतनी ही सह्य और क्षम्य है जितनों हाथ की पाँच उँगलियों में होती हे। परिस्थिति और आवश्यकता में अन्तर होने से मनुष्यों का स्तर थोड़ा नीचा-ऊँचा भी रखा जा सकता है पर उसकी वैसी अति नहीं होनी चाहिये जैसी आज है। असमानता ने मनुष्य जाति के बीच भारी खाई उत्पन्न की है और एकता की जड़ पर भयानक कुठाराघात किया है। ईर्ष्या और द्वेष की आग भड़काने का युद्ध और संघर्षों की विभीषिकाएँ उत्पन्न करने का-अपराध और पाप बढ़ाने का कारण यह असमानता ही है, जिसने एक ही समाज को असंख्य गुटों में विभक्त किया और अगणित प्रकार की विकृतियाँ उत्पन्न करके सरल-सौजन्य को बेहतर कुचल-मसल डाला। सभी मनुष्य, भगवान् के समान प्रिय पुत्र है। सभी के कर्तव्य और अधिकार एक से है। सभी की प्रकृति प्रदत्त अनुदानों का समान रूप से लाभ उठाने का अधिकार है। असमानता प्राकृतिक नहीं हैं, ईश्वर प्रदत्त नहीं है। उसका सृजन मानवीय दुष्टता और दुर्बुद्धि ने किया है। समय आ गया कि उस भूल को सुधार कर हम खाई पाटें और पुल बाँधें।
इन दिनों मनुष्य-मनुष्य के बीच असमानता जिन आधारों पर उपस्थित है उनमें प्रमुख यह हैं (1) जाति, (2) लिंग, (3) धन, (4) पद। हमें विचारना होगा कि क्या प्रचलित मान्यतायें सही है? यदि वे अनुपयुक्त, अनावश्यक, असत्य सिद्ध होती है तो विवेक का तकाजा यही है कि बिना पूर्ण मान्यताओं का मोह किये उन्हें हटाने के लिये तत्पर हों और समता की वह प्रक्रिया कार्यान्वित करे जिससे प्रेम और प्रसन्नता की, सुख और सन्तोष की धारा वह चले।
जिस युग-निर्माण आन्दोलन के लिए हमारी जीवन साधना रही है-जिसके लिये हम जलते और तपते रहे हैं-जिसके लिये अपने समस्त साधनों को प्रयुक्त कर रहे हैं और जिसके लिये जीवित हैं उसका दूसरा चरण समता ही हैं। असमानता निस्सन्देह अस्वाभाविक और अवांछनीय हैं। जब तक वह विद्यमान् है संसार में अशान्ति ही रहेगी। अज्ञान और अन्याय का सम्मिश्रित स्वरूप असमानता के रूप में प्रकट होता है। इस दो जीभ वाली विश्व विभीषिका को आस्तीन में छिपी सर्पिणी की तरह साथ रख कर हम चैन से नहीं बैठ सकते।
गाय, घोड़ा, बन्दर, तीतर, कबूतर, मोर आदि पशु-पक्षियों की तरह मनुष्य की भी एक जाति है। ऋतु और परिस्थिति के कारण उनके रंग-रूप में आकृति-प्रकृति में थोड़ा अन्तर हो सकता है पर उससे उसके स्तर में कोई अन्तर नहीं आता। भेड़ों की आकृति रंग-रूप में थोड़ा अन्तर हो सकता है, पहचानने के लिये उनके नाम भी काली भेड़, सफेद भेड़ आदि हो सकते हैं पर इससे उनके दर्जे में कोई अन्तर नहीं आता। मनुष्य भी एक प्राणी है और उस प्रकार के समस्त जीवों की एक ही जाति एवं स्थिति हैं। काले, गोरे और पीले रंगों के कारण आज संसार में बड़ी असमानता फैली है। गरम देशों में जन्मे लोग काली चमड़ी के होते हैं। ठण्डे देशों में जो पैदा होते हैं वे गोरे होते हैं। मध्य एशिया के मंगोल नस्ल के पीले रंग तिरछी आँखों और चपटी नाक वाले पाये जाते हैं। यह रंग-भेद केवल उत्पत्ति स्थान की जलवायु का अन्तर मात्र बताता है। किन्तु इस आधार पर उनके स्तर को नीचा-ऊँचा नहीं माना जा सकता। गोरे लोग, काली चमड़ी वालों को अपने से केवल रंग के आधार पर नीचा समझे, उनसे घृणा करें, दूर रखें और सार्वभौम मानवीय अधिकारों से उन्हें वंचित करें यह अन्याय हैं। संसार में गोरे-काले और पीले के रंग भेद को लेकर नीच-ऊँच की मान्यता बुरी तरह फैली हुई हैं। दक्षिण अफ्रीका के मूल निवासियों तथा भारतीयों के साथ वहाँ के निवासी गोरे जो नीच-ऊँच की असमानता फैलाये हुये थे उसके विरुद्ध महात्मा गाँधी ने सत्याग्रह चलाया था। अमेरिका में अभी भी चोर संघर्ष हो रहा है। राष्ट्र-संघ ने तथा विश्व के सभी विचारशील लोगों ने इस वर्ण भेद को अन्यायमूलक और अवांछनीय घोषित किया हैं। अब्राहम लिंकन, केनेडी, लूथर किंग आदि गोरे विचारकों ने आगे बढ़कर अपने वर्ग की इस संदर्भ में घोर निन्दा की ओर प्रतिरोध में भारी त्याग भी किये। फिर भी गोरों का आग्रह अपनी सफेद चमड़ी के आधार पर उच्चता सिद्ध करने की ही है और यह दुराग्रह अभी भी संसार के अनेक भागों में द्वेष और अशान्ति फैलाये चले जा रहे हैं। आशा करनी चाहिये कि इस अन्याय और दुराग्रह का एक दिन अन्त हो होकर रहेगा। विवेकवान् मनुष्य निकट भविष्य में ही यह अनुभव करने लगेगा कि चमड़ी के रंग पर आधारित नीच-ऊँच की मान्यता अनुचित थी। और न्याय एवं सचाई का यह दबाव अन्ततः पड़ेगा ही कि जो अनुचित है उसे इच्छा या अनिच्छा से छेड़ देने के लिये विवश किया जाय।
संसार में अन्यत्र तो गोरी-काली चमड़ी के आधार पर यह वर्ण भेद की निन्दनीय असमानता चल रही है पर भारतवासियों ने तो इस दिशा में गज़ब ही कर दिया है। एक ही परम्परा, एक ही रक्त, एक ही वशं, एक ही रंग के लोग कल्पित जाति-पाँति के आधार पर एक दूसरे की नीच-ऊँच मानने लगे हैं। और इस विषमता की अति इस सीमा तक पहुँच गई है कि तथाकथित नीची जाति वालों को छूते, पास बिठाने तक में इनकार करते हैं और मानवीय सामाजिकता के सामान्य शिष्टाचार एवं अधिकार तक से इनकार करते हैं। संसार का विचारशील वर्ग इस प्रकार के व्यवहार की अनीति एवं दुष्टतापूर्ण ही मानता है। आदर्शवादी, धार्मिक और आध्यात्मिक कहे जाने वाले हिन्दू समाज के माथे पर एक अति व्यंग और उपहास भरा ऐसा लाँछन हे जिसने उसकी गरिमा का मूल्य बुरी तरह गिरा दिया है।
किसी समय चार वर्णों का सृजन गुण, कर्म, स्वभाव के आधार पर व्यवसायों के विभाजन की दृष्टि से किया गया था, उस व्यवस्था के निर्माताओं ने यह कल्पना तक नहीं को थी कि कोई ऐसा भी समय आ सकता है जब लोग इस विभाजन की जन्म, वंश के आधार पर मानने लगेंगे और इन वर्णों के बीच ऊँच-नीच की मान्यता चल पड़ेगी वह कल्पनातीत अनहोनी आज हो रही है। सवर्ण और हरिजनों के बीच हो यह खाइयाँ नहीं है। स्वयं सवर्ण, सवर्ण के बीच और छूत-अछूत के बीच जातियों और उपजातियों के आधार पर यह ऊँच नीच की मान्यता बुरी तरह पनप रही हे। एक ही जाति के लोग अपनी उपजातियों को ऊँचा-नीचा मानते है। एक ही उपजाती के लोग अपने में ‘विश्वा’ आदि का निराधार मान्यतायें सोच कर नीच-ऊँच बन बैठे है। एक अछूत दूसरी जाति के अछूत के साथ ऊँच-नीच अपनाये बैठा है। इस प्रकार जातियों और उपजातियों में बटा हुआ भारतवर्ष-हिन्दू समाज-बुरी तरह से विलगाव के रोग से ग्रसित हर दृष्टि से दीन-दुर्बल होता चला जा रहा है। देखने भर के लिए हम एक है पर नारंगी के भीतर जिस प्रकार टुकड़े-टुकड़े के भीतर छोटे टुकड़े उभरे रहते है उसी प्रकार हम जातियों-उपजातियों और नीच-ऊँच की मूढ़ मान्यताओं में बुरी तरह चिपके हुए है। उसका दुष्परिणाम जातीय जीवन की अस्त-व्यस्तता फूट और पृथकता के रूप में तो देखा ही जाता है। सबसे बड़ी कठिनाई विवाह-शादी में होती है। अपनी ही उपजाती को संकीर्ण परिधि में अच्छे लड़की-लड़के मिलते नहीं तो दहेज और कन्या-विक्रय जैसी दुष्टताएँ पनपती है। आर्थिक स्थिति नष्ट होती है और उपयुक्त जोड़े न मिलने से दाम्पत्य जीवन विषम बनते हैं। ढूँढ़-खोज में अनावश्यक समय और शक्ति खर्च होती है, अकारण परेशानी बढ़ती है सो अलग। यह विष राजनीति तक में प्रवेश कर चुका है और अब चुनावों में जीतने के लिये जाति-पाँति के आधार पर वोटरों का समर्थन प्राप्त करना एक प्रमुख तथ्य बन गया है। यह परिपाटी प्रजातन्त्र के मूल आधार को ही नष्ट करने आ रही है। भीतर ही भीतर जो दुर्बुद्धि पनप रही है उससे देश के टुकड़े-टुकड़े हो जाने-गृह-युद्ध खड़ा हो जाने-तथा जातीय जीवन की एकता नष्ट हो जाने का पूरा खतरा मौजूद है।
इस प्रकार की असमानताओं का अन्त करके ही उस नये युग का सूत्रपात किया जा सकेगा जिसके चार चरणों में ‘समता’ का महत्त्वपूर्ण स्थान है। वसुधैव कुटुम्बकम् के आदर्श से इस प्रकार की पृथकताओं और असमानताओं का कोई तालमेल नहीं। दोनों ही साथ-साथ नहीं चल सकती। अन्धकार और प्रकाश साथ-साथ नहीं रह सकते। विश्वबन्धुत्व और विश्व-कुटुम्ब कर परिपाटी अपनाने के सत्परिणामों से लाभान्वित होना है तो वर्ण भेद की अनीति और अज्ञान मूलक कड़ियों से चिपका नहीं रहा जा सकता। रंग-भेद वर्ण-भेद जाति भेद, ऊँच-नीच की मूढ़तायें क्रमशः हमें घटानी और हटानी ही पड़ेगी। मनुष्य जाति एक है। इन एकता में जाति-पाँति की-वर्ण भेद की असमानता बुरी तरह अवरोध उत्पन्न कर रही है। आज नहीं तो कल इसे छोड़ना ही होगा। परिस्थितियाँ इसके लिये विवश करेंगी। समझदारी कस तकाजा उदारता और व्यापकता और व्यापकता बनाने का हैं। संकीर्णता की परिधि में आगे बढ़ना ही होगा। आज भले ही यह बात गले न उतरे पर कल तो यह एक अनिवार्य आवश्यकता अनुभव होगी। जातीय जीवन में मनुष्य मात्र के नैसर्गिक और नागरिक अधिकारों को सम्मान के स्तर पर मान्यता देनी होगी। अच्छा हो कि विवशता आने से पूर्व उसे हम विवेकशीलता के आधार पर ही स्वीकृति और सहमति प्रदान करें।
असमानताओं में दूसरी असमानता लिंग भेद की है। नर-नारी के बीच पिछले सामन्तवादी अन्धकार युग में आकाश-पाताल जैसी खाई उत्पन्न हो गई थी। वह धीरे-धीरे कम तो हो रही है पर अभी वह मूढ़ता अवांछनीय रूप में विद्यमान् है। पिछले दिनों तो नारी का मूल्य भेड़-बकरी जितना रह गया था। उन्हें दान कर या बेच देने में कुछ भी अनुचित नहीं माना जाता था, पति कभी भी पत्नी का परित्याग कर सकता था। पशुओं के मुँह पर नकाब नहीं चढ़ाये जाते पर स्त्रियाँ मुँह पर नकाब चढ़ाकर पुरुषों के आगे निकल सकती थीं। पति के मर जाने पर स्त्रियों के आजीवन वैधव्य या सती बनकर जल जाना ही मार्ग था पर पुरुष पत्नी के मरने के बाद ही नहीं, उसके जीवित रहते हुए भी अनेकों पत्नियाँ रख सकते थे। पत्नी के दुराचारिणी होने पर उसको हत्या तक कर दी जाती थी पर पति खुले आम वैसा ही दुराचरण करने के लिये स्वतन्त्र थे। उत्तराधिकार से पत्नियाँ वंचित थीं। कन्या का जन्म दुर्भाग्य और पुत्र का जन्म सौभाग्य माना जाता था, वधू तब स्वीकार की जाती थी जब वह अपने पिता की सारी सम्पत्ति भी दहेज में लेकर आवे। कम दहेज मिलने पर मर्मान्तक प्रताड़नायें अभी वधुओं को सहनी पड़ती हैं। शिक्षा से, स्वावलम्बन से उन्हें वंचित रहना पड़ता था। एक तरह से अपाहिज एवं घर के पिंजड़े में बन्द पंछी जैसी स्थिति उनकी थी। यद्यपि समय ने थोड़ा सुधार किया है। बड़े नगरों में अपेक्षाकृत स्थिति कुछ अधिक सुधरी है पर पिछड़े हुए देहातों में तो अभी भी वही दुर्दशा हैं।
नर और नारी-दो घटकों से मिलकर समाज बना है। दोनों की ही स्थिति समान है। गाड़ी के दो पहियों की तरह दोनों की स्थिति-उपयोगिता-कर्तव्य एवं अधिकार समान हैं। इनमें से न कोई महत्त्वहीन है और न महत्त्वपूर्ण न्याय की पुकार है कि दोनों को अपने व्यक्तित्व समान रूप से विकसित करने का अवसर मिले। दोनों के लिये नियम, कर्तव्य, कानून एवं अधिकार एक हैं। यदि घूँघट मारना, पर्दा करना अच्छी बात है तो वह पुरुषों और स्त्रियों पर समान रूप से प्रयुक्त कराया जाय। पतिव्रत धर्म की तरह पत्नीव्रत भी आवश्यक है। पर्दा करके स्त्रियाँ पतिव्रत धर्म बचा सकती हैं तो पुरुषों के लिए भी वैसी ही व्यवस्था कर के पत्नीव्रत धर्म का पालन कराया जाना चाहिये। स्त्रियाँ पति के साथ सती होती हों तो पतियों को भी ठीक वैसा ही अनुकरण उपस्थित करना चाहिये। एकांगी, पक्षपातपूर्ण कानून, प्रतिबंध न्याय की कसौटी पर खरे सिद्ध न होंगे और उनका समर्थन देर तक नहीं हो सकता। अगला समय अनीति सहन नहीं करेगा भले ही वह किसी वर्ग की क्यों न हो। राजतन्त्र समाप्त हो गये अब वर्ग तन्त्र भी समाप्त होने जा रहा है। नये युग में किसी को इस आधार पर ऊँच-नीच न माना जायेगा कि उसका अमुक वंश में जन्म हुआ है। बड़प्पन के आधार केवल गुण, कर्म, स्वभाव रह जायेंगे रंग-जाति या वंश के आधार पर किसी को न तो अहंकार करने का अवसर रहेगा और न इस कारण किसी को हीनता-दीनता अनुभव करनी पड़ेगी।
तीसरी असमानता धन के आधार पर हैं धनी और निर्धन की समानता के कारण एक व्यक्ति देवताओं जैसी सुख-सुविधायें भोगता है और अप्रत्याशित सम्मान पाता है। दूसरी ओर निर्धन व्यक्ति उच्च वस्त्र, घर, चिकित्सा, शिक्षा जैसी सुविधाओं से वंचित रह जाता है। यह विषमता न ईश्वर प्रदत्त है न भाग्य का खेल, और न पुरुषार्थ को न्यूनाधिकता पर अवलम्बित। यह समाज में प्रचलित अर्थ प्रणाली के दोषपूर्ण होने का परिणाम है। पूँजी पर व्यक्ति का अधिकार न होकर समाज का स्वामित्व हो। हर व्यक्ति को अपनी क्षमता के अनुरूप श्रम करने को बाध्य होना पड़े और आवश्यकताओं के अनुरूप साधन मिलें तो गरीब-अमीर का वर्तमान भेद देखते-देखते नष्ट हो सकता हैं और हर व्यक्ति सुख-शान्ति पूर्वक जीवनयापन की सुविधायें सहज ही पा सकता है। संग्रह पर उत्तराधिकार नियन्त्रण रहे तो एक जगह पहाड़ जैसी अमीरी-दूसरी खाई जैसी गरीबी के विक्षोभ उत्पन्न करने वाले दृश्य देखने को न मिलें। न किसी को अहंकार में उद्धत होना पड़े, न व्यसन-व्यभिचार में डूबना पड़े-न कोई दाने-दाने को मोहताज रहे और न किसी को कष्टसाध्य जिन्दगी जीने को विवश होना पड़े। निस्सन्देह प्रचलित अर्थतन्त्र आदि दोषपूर्ण हैं। उसी के कारण ठगी, चोरी, जुआ, शोषण, विलासिता आदि अगणित प्रकार के अपराध और ईर्ष्या-द्वेष के मनोविकार उत्पन्न होते हैं। इसे बदला ही जाना चाहिये।
जिन देशों ने पूँजीवाद व्यवस्था को बदल कर उसके स्थान पर समाजवादी व्यवस्था प्रचलित की है वहाँ से उपरोक्त दोष प्रायः समाप्त हो गये हैं। वहाँ हर व्यक्ति को उपलब्ध उपभोग सामग्री एवं सुविधाओं का लाभ समान रूप से मिलता है और किसी को अनिश्चित भविष्य की आशंका से संग्रह करने के लिए चिन्तित नहीं रहना पड़ता। यही प्रणाली, प्राचीन काल में प्रचलित थी। तब इसे दान पद्धति कहते थे। जो अधिक उपार्जन कर सकते थे उसका आन्तरिक उपभोग या संग्रह नहीं करते थे। वरन् सामान्य अतिरिक्तों की तरह सादा जीवन जीते हुए अतिरिक्त उपार्जन को दान रूप में लौटा देते थे। अब मनुष्य अधिक स्वार्थी, विलासी और लालची हो गया है। दान अब कर्तव्य नहीं रहा। वरन् स्वार्थ के प्रलोभन पर-यश-सम्मान के लालच पर-ही उसका लंगड़ा-लूला स्वरूप प्रचलित है। जहाँ थोड़ा-बहुत प्रचलित है भी वहाँ उसका लाभ पात्रों को नहीं कुपात्रों को मिलता है। समाज की असमानता दूर करने में उससे सहायता नहीं मिलती। वरन् एक ओर अहंकार दूसरी ओर दीनता की दुष्प्रवृत्तियाँ पनपती हैं। प्राचीन काल में ऐसा न था। तब अध्यात्मिक साम्यवाद प्रचलित था। परिग्रह के-संग्रह को-अतिरिक्त उपभोग को, विलासिता को पाप माना जाता था। अब वे परम्परायें न रहीं तो राज-सत्ता के नियन्त्रण में धन के ऊपर समाज का स्वामित्व एवं वितरण व्यवस्था रहने की आवश्यकता अनुभव की जा रही है। अगले दिनों यही प्रणाली प्रचलित होगी। अर्थतन्त्र पर व्यक्ति का नहीं समाज को नियन्त्रण होना न्यायोचित हैं। मनुष्य के स्वाभाविक आदर्शों की रक्षा इसी से होगी। धरती की पीठ पर जो भी जन्मे हैं उन्हें प्रकृति प्रदत्त सुविधाओं का समान लाभ मिलना ही चाहिये। व्यक्ति की आवश्यकता और उपयोगिता को दृष्टि से अन्तर रह भी सकता है वह हाथ की पाँच उँगलियों के अनुपात की तरह इतना न्यून होना चाहिये कि उससे विकृतियाँ उत्पन्न न हों।
जिस नव युग की आराधना में हम संलग्न हैं उसकी अर्थ प्रणाली में समानता को ही आधार माना जायेगा। गरीब और अमीर दोनों का ही अस्तित्व न रहेगा। प्रस्तुत परिस्थितियों के अनुरूप साधनों के काम चलाकर हर किसी को सन्तोष करना पड़ेगा। तब लालच से प्रेरित असंख्य अपराधों की तथा ईर्ष्या-द्वेष के कारण उत्पन्न होने वाली आत्मिक अशान्ति की कोई गुँजाइश न रहेगी। न कोई निठल्ला रहेगा न किसी को बेतरह पिसना पड़ेगा। आवश्यकता इस बात की है कि हम जनसाधारण को इस अवश्यम्भावी परिवर्तन से परिचित करायें। सम्पन्न लोगों में अभी से उस व्याख्या के अनुरूप ढलने की-अनावश्यक संग्रह को उत्तराधिकारियों के लिये जोड़ने-गाँठने की ममता छोड़कर उसे उपयोगों कार्यों में खर्च कर देने की प्रवृत्ति आ जाये और राजतन्त्र का स्वरूप ऐसा बदलें जिससे आर्थिक समानता का लक्ष्य पूरा किया जाना सम्भव हो सकें।
चौथी असमानता ‘पद’ को है। प्रतिभाशाली एवं सुयोग्य व्यक्तियों को उनकी अतिरिक्त क्षमता के अनुरूप काम सौंपें जायें यह ठीक है। उन्हें अपनी ईश्वर प्रदत्त विशेषताओं और विभूतियों का लाभ जन साधारण को देते हुए अपना भाग्य सराहना चाहिये एवं महत्त्वपूर्ण कार्य करने का अवसर पाने का सन्तोष करना चाहिये। इतना ही उनके लिये काफी है। पद के कारण अत्यधिक सुविधा एवं सम्मान का मिलना गलत है। इस प्रलोभन में पद प्राप्त करने के लिये अयोग्य लोगों में भी उसके लिये लिप्सा एवं प्रतिद्वंद्विता पैदा होती है और अनेक अव्यवस्थाओं का जन्म होता है।
आज बड़े सरकारी अफसरों को जो ठाट-बाट वेतन एवं असाधारण, अस्वाभाविक, अनावश्यक सम्मान उपलब्ध होता है इससे उनका जन संपर्क एवं सेवा क्षेत्र कुण्ठित होता हैं तथा राजा-रंक जैसी खाई बढ़ती चली जाती हैं। चुनावों में खड़े होने वाले अयोग्य व्यक्तियों में उपहासास्पद प्रतिद्वंद्विता देखते ही बनती है। महन्त और मठाधीशों को अकारण जो धन-सम्मान मिलता है उससे अवांछनीय व्यक्ति ही उन पदों पर जा दीखते है। यदि उच्च पदों पर शान्त, सन्तोष एवं सेवा के अनुपात से उपलब्ध लोक-श्रद्धा मात्र क्षण ही लाभ मिले और आज जो आर्थिक लाभ, अहंकार पूर्ति के अवसर एवं यश-सम्मान पद अकारण मिलते हैं वे न मिलें तो अवांछनीय व्यक्तियों को उसके लिए धमाचौकड़ी मचाने का आकर्षण न रह जाय और केवल उदात्त व्यक्ति ही उत्कृष्ट आदर्श लेकर उन महान् उत्तरदायित्वों को अपने कंधों पर उठाने के लिये तैयार हो।
धन के द्वारा यदि सुख, साधन, सम्मान आदि न मिले तो फिर कोई धनी बनने के लिये अवांछनीय मार्ग न अपनाये। इसी प्रकार पद के कारण यदि भौतिक लाभ न मिले तो उसके लिए अवांछनीय प्रतिस्पर्धा की गुँजाइश न रहे। सुयोग्य, सेवाभावी सज्जनों के कन्धे पर ही वे उत्तरदायित्व और वे पद को गौरवान्वित करने वाले अनुकरणीय आदर्शों की स्थापना करने में समर्थ हो सकें। प्राचीन प्रणाली यही है। राजा जनक-राज्य प्रमुख तो थे पर अपनी आजीविका हल चला कर थोड़ी-सी कृषि द्वारा उपार्जित करते थे। महर्षि चाणक्य गुप्त साम्राज्य के महामंत्री थे पर वे भूतों जैसी सादगी का ही जीवनयापन करते थे पर उन्होंने अतिरिक्त सुविधायें नहीं ली थी। ईश्वरचंद्र विद्यासागर 500) मासिक वेतन पाते थे पर अपना गुजारा 50) मासिक में करके शेष धन असमर्थ छात्रों की शिक्षा व्यवस्था में करते थे। उच्च पदों के महान् उत्तरदायित्व का ठीक तरह सहन कर सकने को क्षमता इस प्रकार के उदार उच्च चरित्र व्यक्तियों में हो ही सकती है। जो लोभी, विलासी और अहंकारी बनेंगे तो उससे अन्ततः समाज का अहित ही होगा। प्राचीन काल की ब्राह्मण परम्परा की विशेषता यही है कि मूर्धन्य व्यक्तियों को-वर्चस्व सम्पन्न पदाधिकारियों का साधारण जनता के स्तर का ही नहीं वरन् उससे भी कुछ हल्का भौतिक लाभ लेकर सन्तुष्ट होना चाहिये। पदों के कारण आज जन साधारण में जो असमता, विषमता उत्पन्न हो रही है यदि वह समाप्त न की जाएगी तो हमारा नेतृत्व हर क्षेत्र में केवल अवांछनीय व्यक्ति ही करेंगे और उसका दुष्परिणाम अनन्त काल तक जनता को भोगना पड़ेगा। धार्मिक, आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक हर क्षेत्र में पद का गौरव तभी रहेगा जब उसका भार सुयोग्य व्यक्ति वहन करें। और नैतिक सुयोग्यता की एक महत्त्वपूर्ण कसौटी यह है कि पदाधिकारी जन-साधारण को उपलब्ध होने वाली-अथवा अपने लोक कार्यों के लिए अनिवार्य सुविधाओं के अतिरिक्त व्यक्तिगत लाभ देने वाली सभी सुविधाओं से इनकार कर दे। आज पदों का वर्तमान स्वरूप असमानता फैलाने और नेतृत्व को सुयोग्य हाथों से छीन कर अयोग्य हाथों में दे देना का निर्मित बना हुआ है। वर्ण, लिंग, धन की ही तरह ही पदों का भी स्वरूप बदलना पड़ेगा अन्यथा किसी भी संस्था का स्वरूप निर्मल न रह सकेगा। अपनों से अपनी बात कहते हुये हमें इन पंक्तियों द्वारा यह स्पष्ट कर देना है कि नया युग तेजी से बढ़ता चला आ रहा है। उसे कोई रोक न सकेगा। प्राचीन काल की महान् परम्पराओं को अब पुनः प्रतिष्ठित किया जाना है और मध्यकालीन अन्धकार युग की दुष्ट विषमताओं का तिरोधान होना है। महाकाल उसके लिये आवश्यक व्यवस्था बना रहे हैं और तदनुकूल आधार उत्पन्न कर रहे है। युग का परिवर्तन अवश्यम्भावी है। हमारा छोटा-सा जीवन इसी की घोषणा करने-सूचना देने के लिये है। परिस्थिति के अनुरूप जो समय रहते बदल सकेंगे वे सन्तोष और प्राप्त करेंगे और जो बदलेंगे नहीं, मूढ़ता के लिये दुराग्रह करेंगे वे बुरी तरह कुचले जायेंगे। उनके हाथ अपयश, असन्तोष एवं पश्चाताप के अतिरिक्त और कुछ न लगेगा।
हमने अपना जीवन नव युग की पूर्व सूचना देने-महाकाल के इस महान् प्रयोजन में सम्मिलित होने के लिये प्रबुद्ध आत्माओं को निमन्त्रण देने में लगा दिया। जिस काम के लिये हम आये थे पूरा होने को है। अगले दिन उनकी प्रेरणा से एक से एक बढ़कर प्रतिभाशाली और प्रबुद्ध आत्मायें सामने आयेंगी। ये ऐसा एक व्यापक संघर्ष विश्वव्यापी परिमाण में प्रस्तुत करेगी जो असमानता के सारे कारणों को तोड़-मरोड़ कर फेंक दे और समता की मंगलमयी परिस्थितियों का शुभारम्भ करके इसी धरती पर
स्वर्ग का वातावरण सम्भव कर दिखावें।
*समाप्त*