वैज्ञानिक और योगी-दो भाइयों ने सत्य की खोज का निर्णय किया। वैज्ञानिक ने विज्ञान और योगी ने मनोबल के विकास का मार्ग अपनाया। एक का क्षेत्र विराट का अनुसंधान था और दूसरे का अंतर्जगत्। दोनों ही पुरुषार्थ थे, अपने-अपने प्रयत्नों में परिश्रमपूर्वक जुट गये।
वैज्ञानिक ने पदार्थ को कौतूहल की दृष्टि से देखा और यह जानने में तन्मय हो गया कि संसार में फँसे हुये यह पदार्थ कहाँ से निकले है। योगी ने देह को आश्चर्य से देखा और यह विचार, संकल्प और भावनायें कहाँ से आती है? उसकी शोध में दत्तचित्त संलग्न हो गया।
वैज्ञानिक और योगी बढ़ते गये, बढ़ते गये। रुकने का एक ने भी नाम नहीं लिया। पर हुआ यह कि वैज्ञानिक विराट् के वन में भटक गया और योगी शरीर के अंतरजाल में। दोनों को विविधता, बहुलता और विलक्षणता के अतिरिक्त कुछ दिखाई न दिया।
हाँ अब वे एक ऐसे स्थान पर अवश्य जा पहुँचे जहाँ विश्वात्मा अपने प्रकाश रूप में निवास करती थीं। गोद से भटके हुये दोनों बालको को जगत्जननी जगदम्बा ने अपने आँचल में भर लिया। वैज्ञानिक ने कहा-माँ! तुम ज्योतिर्मयी हो और योगी ने उसे दोहराया माँ। तुम दिव्य प्रकाश हो!
माँ ने कहा-’तात्! मैं अन्तिम सत्य नहीं हूँ। मैं भी उन्हीं तत्वों से बनी हूँ, जिनसे तुम दोनों बने हो। मैं प्रकाश धारण करती हूँ, प्रकाश नहीं हूँ। मैं स्वर चक्षु और घ्राण वाहिका हूँ पर स्वर, दृश्य और घ्राण नहीं हूँ। तुम्हारी तरह मैं भी उस चिर प्रकाश की प्रतीक्षा में खड़ी हूँ, जो परम प्रकाश है, परम सत्य हैं पर मैंने उसे प्राप्त करने का प्रयत्न नहीं किया। मैं तो इस प्रयत्न में हूँ कि उस सत्य के जो भी बीज सृष्टि में बिखरे पड़े हैं, वह मुरझाने न पायें। अपने पुत्रों की इसी सेवा सुश्रूषा में अपने सत्य को भूल गई हूँ। मुझे तो एक ही विश्वास है कि वह इन्हीं बीजों में बीज रूप से छुपा हुआ है, इनकी सेवा करते-करते किसी दिन उसे पा लूँगी तो मैं भी अपने को धन्य समझूँगी।” विश्वात्मा को प्राप्त कर वैज्ञानिक और योगी दोनों ही आनन्द मग्न हो गये। और स्वयं भी उसी की सेवा में जुट गये।
-जाबालि,
उन्नमिगी के महाकवि माध को अपने पाँडित्य का बड़ा बुद्धिमान था। कभी-कभी उनके आचरण बड़ी झलक सी मिलती रहती थी पर उनको छेड़ने किसी को साहस न होता।
एक बार माघ राजा भोज के साथ वन-बिहार से बड रहे थे। मार्ग में एक झोपड़ी पड़ती थी। एक वृद्धा इसके पास बैठी चरखा कात रही थी। माघ ने बही अभिमान प्रदर्शित करते हुए पूछा-”यह रास्ता कहाँ जाता है?”
वृद्धा ने माघ को पहचान लिया, हँसकर बोली-वत्स रास्ता कहीं नहीं आता-जाता। उस पर आदमी आया जाया करते है। आप लोग कौन हैं?”
हम यात्री हैं-माघ ने संक्षिप्त उत्तर दिया। वृद्धा ने फिर मुस्कुराते हुए कहा-’तात्! यात्री तो सूर्य और चन्द्रमा दो ही हैं? सच-सच बताओ आप लोग कौन हैं?”
माघ थोड़ा चिन्तित होकर बोले-”माँ! हम क्षण भंगुर मनुष्य हैं।” वृद्धा भी थोड़ा गंभीर होकर बोली-”बेटा! यौवन और धन-क्षण भंगुर तो यही दो हैं, पुराण कहते हैं, इन पर कभी विश्वास नहीं करना चाहिये।”
माघ की चिन्ता थोड़ी और बढ़ी पर तो भी उन्होंने उत्तर दे ही डाला-”हम राजा हैं।” उन्होंने सोचा संभवतः वृद्धा इससे डरेगी पर उसने तत्काल उत्तर दिया-”नहीं भाई, आप राजा कैसे हो सकते हैं, शास्त्र ने तो यम और इन्द्र दो को ही राजा माना है।”
अपनी हेकड़ी छुपाते हुए माघ ने फिर उत्तर दिया “नहीं भाई, हम तो सबको क्षमा करने वाली आत्मा है।” वृद्धा ने बिना रुके उत्तर दिया-”पृथ्वी और नारी की क्षमाशीलता की तुलना आप कहाँ कर सकते हैं, आप तो कोई और ही हैं।”
निरुत्तर माघ ने कहा-”माँ! हम हार नये अब रास्ता बताओ?” पर वृद्धा उन्हें इतना शीघ्र मुक्त करने वाली नहीं थी, फिर बोली-महानुभाव! संसार में हारता कोई नहीं, जो किसी से कर्ज लेता है या अपना चरित्र बल खो देता है, बस हारने वाले इन्हीं दो कोटि के लोग होते है।”
इस बार माघ कुछ न बोले, चुप होकर अपराधी से खड़े रहे। वृद्धा ने कहा-”महापण्डित, मैं जानती हूँ कि आप माघ हैं, आप महाविद्वान है पर विद्वता की शोभा अहंकार नहीं विनम्रता है।”
यह कहकर बुढ़िया चरखा कातने लगी और लज्जित माघ आगे चल पड़े।
अन्धेरी रात में दो युवक यात्रा कर रहे थे। एक लालटेन थी, उन दोनों का ही काम दे रही थी। चलते-चलते वे एक ऐसे स्थान पर आ पहुँचे, जहाँ से दोनों के रास्ते अलग-अलग होते थे। जिसकी लालटेन थी वह प्रसन्नतापूर्वक आगे बढ़ गया, दूसरे ने जो अन्धकार देखा तो आगे बढ़ने का साहब टूट गया।
क्या करे, क्या न करे वह इसी चिन्ता में था कि पास की एक कुटी से साधु निकले-साधु एक भजन गा रहे थे, जिसका अर्थ होता था-”हे प्रभु! मेरे अन्तर का दीपक जला दो जिससे संसार का अन्धेरा पथ सुविधापूर्वक तय कर ले।”
युवक ने बढ़कर साधु के पैर पकड़ लिये और बोला-”भगवन्! क्या कोई ऐसी भी ज्योति हैं जो हर घड़ी पास रहती हो और कभी न बुझती हो?” साधु ने एक शिला पर बैठते हुए कहा-”क्यों नहीं वत्स! आत्मा स्वयं प्रकाश हैं, तू उसे प्रज्ज्वलित कर और बढ़ जाआगे, संसार में भय किस बात का।”
यह सुनकर युवक को कापुरुषता दूर हो गई और वह प्रसन्नतापूर्वक आगे बढ़ गया।
परमपिता परमात्मा से वियुक्त होकर जीव ने अपनी एक निराली सृष्टि बना ली। छोटा बालक जिस तरह घर के आँगन में ही मिट्टी इकट्ठा कर एक छोटा-सा घरौंदा बनाकर उसमें विशाल आकार-प्रकार की साधन सामग्रियाँ चाहता है पर न तो उनके लिये उसके उस छोटे-से घरौंदे में स्थान होते हैं, न पात्रत्व। इसीलिये उसकी इच्छायें पूर्ण नहीं होती या जान-बूझकर पिता उन्हें पूरा नहीं करता। वह तो सब घर की व्यवस्था का स्वामी होता हैं, उसे सबका ही ध्यान रखना पड़ता हैं, इसीलिये जितना उसका घरौंदा था, उसी अनुपात से दो-चार पैसे छटाँक दो छटाँक सामग्री उसे भी दे देता हैं पर उससे बच्चे को न सुख मिलता हैं, न संतोष। छोटी-सी इकाई में पूर्णता की इच्छा रखने वाले छोटे बच्चे की तरह जीव को भी अन्’ततः अपनी लघुता पर असंतोष और पीड़ा ही होती है।
तब वह अपने एकान्त में, अन्तःकरण की गहराई में मुख डालकर झाँककर देखता है तो पाता है कि अब तक वह जिन वस्तुओं की इच्छा कर रहा था वह तो सब बन्धन रूप थी। नित्य, शाश्वत आनन्द के लिये उनसे कुछ काम बनने वाला नहीं था। यह तो सब क्षण-भंगुर वस्तुयें थी। रुपया, पैसा, वस्त्र-आभूषण, मोटर, बंगले, पंखे, रेडियो, नौकरी, पद-प्रतिष्ठा यहाँ तक कि पिता-माता, पुत्र-पत्नी सुहृदय सखा, परिवार भी एक दिन छूट ही जाता हैं, चाहे उससे कितना ही मोह बढ़ा ले, चाहे उससे कितना ही प्रेम कर ले। गीता में कहा हैं- ‘‘संसार में गुण ही गुण में बर्तते हैं, जो सब वस्तुयें जहाँ तक उनकी सीमा, मर्यादा और समय हैं, वहीं तक थोड़ा-सा सुख-संतोष प्रदान कर पाती है। उसके बाद जीव का पुनः वही अकेलापन। फिर वही लघुता, फिर वही भय, फिर वही इच्छायें, फिर वही दौड़-धूप, आपा-धापी, अविश्राम, अविश्राम, अविश्राम। न इच्छायें पिण्ड छोड़ती हैं और न महत्वाकाँक्षायें। मृगमरीचिका की तरह सुख और शाँति की चाह में जीव सारे संसार का परिमंथन किया करता है पर हाथ सिवाय निराशा, कष्ट, अपमान, चिन्ता, द्वेष-ईर्ष्या, असफलता, विकलता के अतिरिक्त कुछ नहीं लगता। नैपोलियन जो अनेक राष्ट्रों का भाग्य-निर्माता या वह भी कैसी दुःखद परिस्थितियों में मरा। महापुरुषार्थी सिकन्दर का अन्त वहाँ हुआ, जहाँ उसे दवा की व्यवस्था भी न हो सकी।
अपनी इस स्थिति पर विचार करते-करते जीव अपने पिता परमात्मा की क्षरण आता है। बहुत दिन के बाद निधि रूप में अपने सर्वस्व, अपने शाश्वत प्राण, अपने लक्ष्य, अपने गन्तव्य अपने प्रकाश को पाकर उसका अन्तःकरण उमड़ने लगता है, वह कभी-कभी अपनी अब तक की गई बीती स्थिति पर दुःख और पश्चाताप करता है तो फिर भगवान् से स्नेहपूर्ण शिकायत करता है, उसे भय रहता है, कहीं पुनः इसी भ्रमजाल में न फँसना पड़े, इसलिये डरता हुआ जीव भगवान् की स्तुति भी करता जाता हैं, हे प्रभु! संभव है संसार के झंझटों में मैं तुम्हें भूल जाऊँ पर तुम मुझे छोड़ना नहीं। मैं तुम्हारा ही प्राण हूँ मैं तुम्हारा ही अंश हूँ, माना की प्रमाद बहुत किया, भूले बहुत की पर अब ऐसा ज्ञान दो प्रभु, ऐसी शक्ति दो नाथ जिससे जर्जर जीवन की नाव पार लग जाये। आकर्षणों से भरे इस संसार सागर से जीवन तारिणी पर उतर जाये।
मुझे मालूम नहीं प्रभु! तुमसे मैं बिछड़ा क्यों। क्या इसमें भी कुछ रहस्य है। मैं अपनी इच्छा से संसार में आया या तुम्हीं मुझे अकेला छोड़कर मेरे अयानेपन पर, मेरी अतुकान्त भूलों पर हँसने और उसका चिर आनन्द लेने के लिये तुम पर्दे में छुपे हो। किन्तु हे प्रभु! अब यह खेल खेलने की शक्ति मुझमें नहीं रही। मैंने संसार के माया रूप को जबसे पहचान लिया है, तब से एक तुम्हारा ही प्रेम उमड़ रहा है। भीतर भी तुम्हारा प्रेम जाग रहा है और सृष्टि के कण-कण में भी तुम्हारा प्रेम प्रतिभासित हो रहा है। हे प्रभु! यह कैसी पीड़ा है जो तुम्हें आँखों से अलग भी होने देना चाहती और तुममें मिलने, समा जाने का अवसर भी नहीं देती। अपनी तृणवान् सत्ता से थके हुए जीव को विश्राम दो, अपनी मधुर गोद म ले लो, अपने प्राणों में छिपा लो, जिससे भय, लज्जा और विवाद के सम्पूर्ण वातावरण धुल जाये। यह सब तुम्हारे से ही सम्भव है। संसार की ममता में वह सब कहाँ। प्रेम के शाश्वत सिन्धु तुम्हीं इतने निर्मल हो कि संसार का सारा मल तुम्हारे अन्दर आकर घुल जाता है। हे प्रभु, तुम्हीं इतने प्रकाशवान् हो कि संसार का सारा अज्ञ-अंधियार तुममें समा जाता है। तुम निर्बल को भी बलवान् करने वाले, घृणित को भी हृदय से लगा लेने वाले हो। तुम्हारी शरण छोड़कर जीव अन्यत्र जा भी तो नहीं सकता।
इस प्रकार जब सब ओर परमात्मा का प्रकाश ही प्रकाश दिखाई देने लगता हैं, जीव अपनी लघुता की पहचान कर लेता है और कातर-भाव से परमात्मा को पुकारता है तो परमात्मा! उसके अन्तःकरण की गहराई भी स्थिर नहीं रह सकती। वह अन्तःकरण को मथ डालती है और उसमें से दिव्य ईश्वरीय प्रेम निखरता हुआ चला आता है। प्रेम में ही सुख हैं, प्रेम ही परमेश्वर हैं, प्रेम की सत्ता ने चर-अचर, स्थावर-जगम सब को क्रियाशील बना रखा है। प्रेम ही सम्पूर्ण पवित्र है। अपवित्रता तो आसक्ति थी, मोह था, ममता थी, वासना थी। जब वही न रहे तो मलिनता कैसी। जीव मात्र के सौंदर्य का सागर अन्तःकरण में फूट पड़ता है। जीवन मात्र की चैतन्यता की शक्ति अन्तःकरण में जाग उठती है। जब सब अपने, जब सब कुछ अपना तो कहाँ अभाव, कहाँ अशक्ति, कहाँ अज्ञान? सब ओर मंगल ही मंगल, आनन्द ही आनन्द बिखरा दिखाई देने लगता है।
प्रतिक्रिया का नियम तो जड़ वस्तुओं तक में है। कुयें और परिवार की ओर मुख करके बोली गई आवाज भी जब प्रतिध्वनित होकर आ जाती है तो नि-ससीम गहराई से लौटी हुई भावनाओं की प्रतिक्रिया का तो कहना ही क्या। जीव जिस भावना से परमात्मा की पुकार लगाता हैं, उसी गहराई से भगवान् का प्रेम, आशीर्वाद और प्रकाश भी उस तक पहुँचने लगता है। उसकी प्रिय वाणी फूटती है और कहती हैं-”वत्स! हम तुम दोनों एक ही हैं, तुम मुझसे विलग कब हो? यह जो तुम खेल खेलते रहे हो वह मेरी ही तो इच्छा थी, उसमें जो कुछ खराब था, उसका दुःख न कर, उसे भी मेरी ही इच्छा मानकर मुझे ही सौंप दें। तूने! यह पाप किये हैं, ऐसा भूलकर अब यह मान कि यह तो मेरा ही अभियान, मेरी ही इच्छा थी। अब तू उन सब बुराइयों को मुझे समर्पित करके निर्द्वंद्व हो जा। जब तू सारे संसार से मोह और ममता के बन्धन हटाकर ‘अहं-विमुक्त’ हो रहा तो अपनी भूलों और गलतियों को ही अपनी मानने की भूल क्यों करता है? अपना सम्पूर्ण अहंभाव छोड़कर तू सम्पूर्ण भाव से मेरी शरण में आ गया हैं तो तेरे पापों को जो डालने का उत्तरदायित्व भी तब मेरा ही है।”
भावनाओं के इस आदान-प्रदान में भी बड़ा रस है। माना कि परमेश्वर दिखाई नहीं देता पर मन की मलीनताओं के प्रति घृणा और विराट् के प्रति प्रेम से निर्मित स्वच्छ जीवन का सुख तो प्रयत्न है ही। जिसके हृदय में सत्य हैं, वह भला किसी से भय क्यों करेगा, जिसके हृदय में सबके लिये प्रेम, दया और करुणा होगी, वह भला किस अभाव से पीड़ित होगा। प्रेम में वह शक्ति हैं, जो हिंसक जीव को भी वश में कर लेती है, फिर जब जीव मात्र में परमात्मा और परमात्मा के प्रति प्रेम का भाव उमड़ने लगेगा तो किसी से छल-कपट, द्वेष-दुर्भाव का दुःख मनुष्य क्यों उठायेगा।
प्रेम साधना से बढ़कर और कोई साधना नहीं, उसमें आदि से लेकर अन्त तक मधुरता ही मधुरता, सौंदर्य ही सौंदर्य हैं, किन्तु वह सौंदर्य और माधुर्य संसार के किसी एक पदार्थ या परिस्थिति में उपलब्ध नहीं हो सकती। जीव स्वयं लघु है, उसकी तरह ही हर कण छोटा और अभाव की स्थिति में है, सबका सम्मिलित भाव परमात्मा हैं, प्रेम उसका निर्विवाद और निर्भय स्वरूप है इसीलिये हम प्रेम को पवित्र बनाकर ही अपनी लघुता को विभुतायें बदल सकते है। परमात्मा के प्रेम में ही वह शक्ति हैं, जो जीव को सामान्य अवस्था में भी असामान्य रस माधुर्य और आनन्द प्रदान करती है।
काष्ट, हेवल, प्लेटो एरिस्टाटल आदि प्रकृति विद्वान् यह स्वीकार करते हैं कि एक ऐसी सत्ता हैं, जो ब्रह्मांड की रचयिता है या स्वयं ब्रह्मांड है किन्तु इनमें से किसी ने भी पूर्ण विचार देने में अपने आपको समर्थ नहीं पाया। संसार में जितने भी धर्म हैं, वह सब ईश्वरीय अस्तित्व को मानते है। प्रत्येक धर्म अपने ब्रह्म के प्रतिपादन में अनेक प्रकार के सिद्धान्त और कथायें प्रस्तुत करते हैं, किन्तु उस सत्ता का सविवेक प्रदर्शन इनमें से कोई नहीं कर सकता, तथापि वे उच्च सत्ता की सर्वशक्तिमत्ता पर अविश्वास नहीं करते।
ईश्वर सम्बन्धी अनुसन्धान की वैज्ञानिक प्रक्रिया डार्विन से प्रारम्भ होती है। डार्विन एक महान् जीव-शास्त्री थे, उन्होंने देश-विदेश के प्राणियों, पशुओं और वनस्पतियों का गहन अध्ययन किया और 1859 एवं 1871 में प्रकाशित अपने दो ग्रन्थों में यह सिद्धान्त स्थापित किया कि संसार के सभी जीव एक ही आदि जीव के विकसित और परिवर्तित रूप हैं। उन्होंने बताया-संसार में जीवों की जितनी भी जातियाँ और उपजातियाँ हैं, उनसे बड़ी विलक्षण समानतायें और असमानतायें हैं। समानता यह कि उन सभी की रचना एक ही प्रकार के तत्व से हुई है और असमानता वह है, उनकी रासायनिक बनावट सबमें अलग-अलग है। आनुवांशिकता का आधार रासायनिक स्थिति है, उसकी प्रतिक्रिया में भाग लेने वाली क्षमता चाहे कितनी सूक्ष्म क्यों न हो।
इसके बाद मेंडल, हालैण्ड के हयू गो द व्री ने भी अनेक प्रकार के प्रयोग किये और यह पाया कि जीव में अनुवाँशिक-विकास माता-पिता के सूक्ष्म गुण सूत्रों (क्रोमोसोम) पर आधारित है। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी (अमेरिका) के डा. फ्रांसिस क्रिक ने भी अनेक प्रयोगों द्वारा शरीर के कोशों (सेल्स) की भीतरी बनावट का विस्तृत अध्ययन किया और गुण सूत्रों (क्रोमोसोम) की खोज की। जीन्स (गुण सूत्रों में, एक प्रकार की गांठें) उसी की विस्तृत खोज का परिणाम है। इन वैज्ञानिकों ने बताया कि मनुष्य शरीर में डोरे की शकल में पाये जाने वाले गुणसूत्रों को यदि खींचकर बढ़ा दिया जाये तो उनसे सम्पूर्ण ब्रह्मांड को नापा जा सकता है। अब हमारे अधिक और मूलस्रोत की जानकारी वैज्ञानिक नहीं लगा पाये जब से उनकी खोजों की दिशा और ही है। उस एक अक्षर, अविनाशी और सर्वव्यापी तत्व के गुणों का पता लगाना उनके लिये सम्भव न हुआ, जो प्रत्येक अणु में सृजन या विनाश की क्रिया में भाग लेता है। हाँ, इतना अवश्य हुआ कि वैज्ञानिकों ने यह सिद्ध कर दिया कि-
सारा जीव जगत एक ही तत्व से विकसित हुआ है, गुणों के आधार पर जीवित शरीरों का विकास होता है।
यद्यपि यह जानकारियाँ अभी नितान्त अपूर्ण हैं तो भी उनसे मनुष्य को सत्य की यथार्थ जानकारी के लिये प्रेरणा अवश्य मिलती है। ‘कंटेम्प्रेरी थट ऑफ ग्रेट ब्रिटेन’ के विद्वान् लेखक ए॰ एन॰ बिडगरी लिखते हैं-”वे तत्व जो जीवन का निर्माण करते हैं और जिनकी वैज्ञानिकों ने जानकारी की हैं, उनमें यथार्थ मूल्याँकन के अनुपात में बहुत कमी हैं, आज आवश्यकता इस बात की है कि साँसारिक अस्तित्व से भी अधिक विशाल मानवीय अस्तित्व क्या है, इसका पता लगाया जायें। विज्ञान से ही नहीं, बौद्धिक दृष्टि से भी उसकी खोज की जानी चाहिए। हमारा भौतिक अस्तित्व अर्थात् हमारे शरीर की रचना और इससे सम्बन्धित संस्कृति का मानव के पूर्ण अस्तित्व से कोई तालमेल नहीं है। इससे हमारी भावनात्मक संतुष्टि नहीं हो सकती, इसीलिये हमें जीवन के मूलस्रोत की खोज करनी पड़ेगी। अपने अतीत और भविष्य के बीच थोड़ा-सा वर्तमान हैं, क्या हमें उतने से ही संतोष मिल सकता हैं, हमें अपने अतीत की स्थिति और भविष्य में हमारी चेतना का क्या होगा, इस संसार में क्यों हैं और क्या कुछ ऐसे आधार है जिनसे बँधे होने के कारण हम संसार में हैं, इनकी खोज होनी चाहिये।” इन पंक्तियों में वही बात प्रतिध्वनित होती है, जो ऊपर कही गई है। विज्ञान ने निष्कर्ष भले ही न दिया हो पर उसने जिज्ञासा देकर मनुष्य का कल्याण ही किया है। ‘अघातो ब्रह्म जिज्ञासा’ ब्रह्म की पहचान के लिये हम तभी तत्पर होते हैं, जब उस मूलस्रोत के प्रति हमारी जिज्ञासा जाग पड़ती है।
इस बिन्दु पर पहुँचकर हम कह सकते हैं कि ब्रह्मविद्या का अर्थ और इति दोनों ही वेदान्त धर्म में बहुत पहले से है। ‘एको ब्रह्म द्वितीयो नास्ति’ एक नूर से सब जग उपजिया’ ‘संकल्पयति यन्नाम प्रथमोऽसौ प्रजापतिः, दत्तवेदाधु महति तस्येंदं कल्पनं जगत्। (योग-घनिष्ठ 6/2/186/6), सृष्टि के आदि में एक ब्रह्मा ही था, उसने जैसे-जैसे संकल्प किया, वैसे-वैसे यह कल्पना जगत् बनता गया। ‘एक मेवाद्वयं ब्रह्म’ (छान्दोग्य 6/2/1) वही एक अद्वितीय और ब्रह्म होकर विराजता है।
‘एकोदेवः सर्वभूतेषु गूडः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा। कर्माध्यक्षः सर्वभूताचिवासः साक्षी चेता वेवलोनिर्गुणश्च।
श्वेताश्व-6/11,
वही एक देव सब भूतों में ओत-प्रोत होकर सबकी अन्तरात्मा के रूप में सर्वत्र व्याप्त हैं, वह इस संकल्प शरीर का अध्यय है। निर्गुण होते हुए भी चेतना शक्तियुत है। पूर्व में क्या किया हैं, अब क्या कर रहा है, जीव की इस संपूर्ण क्रिया का साक्षी वही हैं, वही सब भूतों में प्राण धारण करके जीव रूप से वास करता है।
उपरोक्त व्याख्यानों और पश्चात् वैज्ञानिकों की इस खोज में कि-”संसार के समस्त पदार्थ एक ही तत्व से बने हुये हैं” जबर्दस्त साम्य है। वेदान्त के यह प्रतिपादन आज से लाखों वर्ष पूर्व लिखे गये हैं, इसीलिये जब हम अकेले वेदान्त को कसौटी पर लाते हैं तो उसकी परिपूर्णता और वैज्ञानिकता में कोई सन्देह नहीं रह जाता। जब तक वह एक था, तब तक ‘पूर्ण पर ब्रह्म’ था, जब वही अपनी वासनाओं के कारण जीव रूप में आया तो अद्वैत से द्वैत बना, जीव जब अपने साँसारिक भाव से अपने शाश्वत अंश और मूल ब्रह्म पर विचार करता है तो वही स्थिति ‘त्रैत’ कहलाती है। इसी का विकास और आत्मा को परमात्मा में लीन कर देने पर शरीरधारी की जो स्थिति होती हैं, वही विशिष्टा द्वैत के नाम से कहा गया है, इनमें न कही कोई भ्राँति हैं, न मत अनैक्य। वेदान्त ने यह प्रतिपादन प्रत्येक स्थिति के व्यक्ति की समझ के लिये किये हैं, वैसे सिद्धान्त में वह वैज्ञानिक मान्यताओं पर ही टिका हुआ है। कैवल्योपनिषद् में पाश्चात्य वैज्ञानिक मान्यताओं और अपने पूर्वात्म दर्शन को एक स्थान पर लाकर दोनों में सामंजस्य व्यक्त किया गया है और कहा है-
वत् परं ब्रह्म सर्वात्मा विश्वस्यायतमं महत्। सूक्ष्मात सूक्ष्मतरं नित्यं तस्वमेव स्वमेव तत्॥॥ 16॥
मणोरणीयामहमेव तद्वन्महानं विश्वमित्रं द्विचित्रम्। पुरातनोऽहं पुरुषोहमीशो हिरण्यमोऽहंशिवरुपमस्मि॥ 20॥
अर्थात्-जिस परब्रह्म का कभी नाम नहीं होता, जिसे सूक्ष्म यन्त्रों से भी नहीं देखा जा सकता जो इस संसार के इन समस्त कार्य और कारण का आधारभूत हैं, जो सब भूतो की आत्मा हैं, वही तुम हो, तुम वही हों। और “मैं छोटे से भी छोटा और बड़े से भी बड़ा हूँ, इस अद्भुत संसार को मेरा ही स्वरूप मानना चाहिये। मैं ही शिव और ब्रह्मा स्वरूप हूँ, मैं ही परमात्मा और विराट् पुरुष हूँ।”
उपरोक्त कथन में और वैज्ञानिकों द्वारा जीव-क्रोध से सम्बन्धित जो अब तक की उपलब्धियाँ हैं, उनमें पाव-रत्ती का भी अन्तर नहीं है। प्रत्येक जीव-क्रोध का नाभिक (न्यूक्लियस) अविनाशी तत्व है वह स्वयं नष्ट नहीं होता पर वैसे ही अनेक कोश (सेल्स) बना देने की क्षमता से परिपूर्ण है। इस तरह कोशिका की चेतना को ही ब्रह्म की इकाई कह सकते हैं, चूँकि वह एक आवेश, शक्ति या सत्ता है, चेतन हैं, इसलिये वह अनेकों अणुओं में भी व्याप्त इकाई ही है। इस स्थिति को जीव भाव कह सकते हैं पर तो भी उसमें पूर्ण ब्रह्म की सब क्षमतायें उसी प्रकार विद्यमान् हैं, जैसे समुद्र की एक बूँद में पानी के सब गुण विद्यमान् होते है। वैज्ञानिकों का मत है कि शरीर में 6 अरब कोशिकायें हैं, इन सबको सूक्ष्म चेतना की पूर्ण जानकारी वैज्ञानिकों को नहीं मिली पर हमारा वेदान्त उसे अहंभाव के रूप में देखता है और यह कहता है कि चेतना की अहंभाव की जिस प्रकार की वस्तु में रुचि या वासना बनी रहती हैं, वह वैसे ही पदार्थों द्वारा शरीर का निर्माण किया करता हैं, नष्ट नहीं होता वही इच्छायें, अनुभूति, संवेग, संकल्प और जो भी सचेतन क्रियायें हैं करता या कराता हैं, पदार्थ में वह शक्ति नहीं है। क्योंकि ब्रह्म दृश्य नहीं विचार है उसे ‘प्रज्ञान’ भी कहते है।
राकफेलर इंस्टीट्यूट (अमेरिका) में बेकाफ और स्टेनली ने जीवित और अजीवित पदार्थों का अन्तर बतलाने के लिये अनेक अनुसन्धान किये उन्होंने यह सिद्ध करने का प्रयत्न किया है कि प्रत्येक अणु रासायनिक प्रक्रिया से स्वयं ही उत्पन्न होते हैं और बढ़ते हैं पर इसमें विचारणीय बात है कि अणु तभी उत्पन्न होते हैं, जब तक वे जीवित पदार्थ से सम्बन्धित रहते हैं। इसलिये जीवन की उत्पत्ति सिद्ध करने का प्रयास तो निरर्थक हैं, उससे तो हम इसी निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि चेतना और जड़ दो मिश्रण वस्तुयें होकर भी गति या सक्रियता का मूल कारण चेतन ही है, उसकी क्षमताओं का विज्ञान अध्ययन नहीं कर सका, उसे केवल जड़-शक्ति की उपलब्धि हुई हैं, इसलिये विज्ञान जिन बातों को बताने में असमर्थ हैं, उसकी जानकारी के लिये संसार के सामने सिवाय इसके कि वह वेदान्त की शरण से और कोई दूसरा उपाय शेष नहीं रह जाता। जहाँ से पदार्थ विज्ञान की इति हो जाती हैं, उसके आगे मनोविज्ञान-अर्थात् आस्था और विश्वास का आशय लिये बिना मनुष्य ‘सत्यमेव’ की जानकारी प्राप्त नहीं कर सकता। हमें यह विश्वास करना ही होगा कि चेतना के गुण और स्वभाव पदार्थ से अलग है और उसकी जानकारी भावनात्मक आधार पर ही हो सकती है। भावनाओं को गहरा बनाने के लिये उपाय भले ही कुछ हों।
प्रत्येक जीव में स्वार्थपरायणता का कुछ न कुछ अंश अवश्य रहता है। इसमें स्वयं के प्रति प्रेम और आदर भी सम्मिलित हैं, यदि यह प्रश्न किया जा सकता है कि प्रोटोप्लाज्मा कहाँ से उत्पन्न हुआ तो यह भी पूछा जा सकता है कि वह स्वार्थ भाव कहाँ से आया? मानव की मूढ़ प्रवृत्तियों जैसे प्रेम, काम, अहंभाव की उत्पत्ति कैसे हुई। मनोविज्ञान उन्हें वंशानुगत सम्पत्ति के रूप में लेता हैं। उससे भी सीढ़ी दर सीढ़ी ऊपर चढ़े तो हम इसी निष्कर्ष पर पहुँचेंगे कि विकास की प्रक्रिया किसी एक बिन्दु से प्रारम्भ हुई है और तब यह भी मानना पड़ेगा कि वह चेतना आदि अन्त रहित हैं। जीव उसमें से समर्थ मात्र से पैदा होता रहता है, उससे मूल चेतना के अस्तित्व में न अन्तर आता है और न उसे कोई खतरा पैदा होता है।
वेदान्त उस मूल-स्वरूप की ही अधिक महत्व देता है और उसे प्राप्त करने को ही जीवन का लक्ष्य बतलाता है। वह अविनाशी, अक्षर सर्वव्यापी तत्व हैं, वह बड़ सम्पत्तियाँ हैं, जिसके पास होंगी, वह स्वर्ग से भी अधिक सुखी होगा। इच्छानुसार जहाँ चाहें पहुँच सके, जो भोग चाहे भोग सके उससे बढ़कर सुख क्या हो सकता है। वह स्थिति अन्तिम स्थिति है।
ब्रह्म एक भाव है और उसे भावनात्मक स्तर पर उतर कर ही प्राप्त कर सकते है और जब उसे पा लेते हैं, तब उस स्थिति से आनन्ददायक और प्राप्य कुछ रह नहीं जाता। यह प्रक्रिया हम अपने आपको प्रेम करने से प्रारम्भ करते है। यह प्रेम शरीर के माध्यम से करने लगते है तो वह अज्ञान की स्थिति हो जाती हैं, क्योंकि हमारा अपना स्वरूप चेतन तो है पर अदृश्य है उसे केवल विश्वास और अपने गुणों के अध्ययन और विकास के द्वारा ही प्राप्त कर सकते है। वेदान्त की इस सम्मति को मानने से ही ईश्वर-दर्शन की अगली जानकारियाँ सम्भव होंगी और उसके अतिरिक्त कोई उपाय भी नहीं है।
आप तो ब्रह्म को बड़ा बताते हैं, महात्मन् फिर मनुष्यों की सेवा करने को क्यों कहते हैं? एक जिज्ञासु ने दीर्घतमा से पूछा? महर्षि ने गंभीर भाव से कहा-”इसीलिये कि उसमें परमात्मा का वास है।”
कैलीफोर्निया के राल्फ वाल्डो ट्राई से भेंट करते समय एक बार सज्जन ने बताया-’मेरे पिता जो बैठे दिन रात चिन्ता किया करते हैं-चिन्ता ही नहीं घर वालों से उन्हें न जाने क्यों अप्रसन्नता है कि सबको डाँटते और गाली-गलौज बकते बने रहते है।”
ट्राई ने सारी बात ध्यान से सुनी। थोड़ा ठहर कर बोले-”आपके पिता जी अस्वस्थ हैं, उन्हें प्रायः पेट दर्द बना रहता हैं, उन्हें कोई काम करने में रुचि नहीं आती।” ऐसी और भी कई स्थूल बातें ट्राई महोदय ने बताई। वह सज्जन आश्चर्यचकित होकर बोले-”मैंने तो आपको केवल इतना कह था कि मेरे पिता जी बहुत चिन्ता करते हैं, उनके सम्बन्ध में आपने इतनी बातें कैसे बताई। क्या आप उन्हें पहले से ही जानते हैं?”
ट्राई ने हँसकर कहा-’नहीं, मैंने तो उन्हें देखा तक नहीं किन्तु मुझे इतना पता अवश्य है कि बुरे विचारों और बुरी भावनाओं के कारण शरीर के किसी न किसी अवयव में पीड़ा अवश्य बढ़ती है और वह अंग रोगी हो जाता हैं, मनुष्य की यह बड़ी भारी भूख है कि वह रोग का कारण ढूंढ़ता हैं, सच बात तो यह है कि वह दुर्भावनाओं की देन है। बुरी भावनायें ही शरीर में बीमारियाँ और रोग पैदा करती है।
विचार और भावनाओं की अदृश्य शक्ति का हमारे भारतीय शास्त्रों में गहन अध्ययन हुआ है और यह निष्कर्ष निकाला गया है कि स्थूल रूप से मनुष्य का जैसा भी कुछ जीवन हैं, वह उसकी भावनाओं का ही परिणाम हैं, भले ही उनका सम्बन्ध इस जीवन से न हो पर कोई भी कष्ट या दुःख, रोग-शोक या बीमारी हमारे पूर्वकृत कर्मों और उसके पूर्व पैदा हुए मन के दुर्भावों का ही प्रतिफल होता है।
बुरे विचार रक्त में विकार उत्पन्न करते हैं और तभी रोगाणुओं की वृद्धि होती है। यह विचार और भावनाओं के आवेश पर है कि उनका प्रभाव धीरे होता है या शीघ्र पर वह निश्चित है कि मन के भीतर अदृश्य रूप से जैसे अच्छे या बुरे विचार उठते रहते हैं, उसी तरह के रक्तकण शरीर को सशक्त या कमजोर बनाते रहते हैं, मनोभावों की तीव्रता की स्थिति में प्रभाव भी तीव्र होता है। यदि कोई विचार हल्के उठते है तो उससे शरीर की स्थूल प्रकृति धीरे-धीरे प्रभावित होती रहती है और उसका कोई दृश्य रूप कुछ समय के बाद देखने में आता है।
इंग्लैंड के डॉक्टर जान हंटर बड़े योग्य चिकित्सा शास्त्री थे। उन्होंने बड़े-बड़े रोगों को ठीक करने में सफलता पाई, किन्तु उनकी धर्मपत्नी कुछ उग्र स्वभाव की थीं, फलस्वरूप उन्हें भी प्रायः क्रोध आ जाया करता था और उसके कारण वे स्वयं ही अस्वस्थ रहा करते थे।
एक बार डॉक्टरों की किसी सभा में भाव लेते समय किसी व्यक्ति से सहमति न होने पर उन्हें जोर का गुस्सा आया, उससे शरीर का रक्त-चाम एकाएक बड़ गया। दिल का दौरा पड़ा और जान हंटर की वही मृत्यु हो नई। डॉक्टरों ने खोज करके बताया कि उस समय उनके रक्त का दबाव 230 था, जबकि सामान्य स्थिति में 130 ही रहता है। इस बड़े हुये दबाव के कारण शरीर की कोई भी शिरा फट सकती है। इसी प्रकार सामान्य अवस्था में किसी की हृदयगति यदि 180 प्रति मिनट होती है तो क्रोध की अवस्था में धड़कन बढ़कर 220 प्रति मिनट तक हो जाती है। रक्त का दबाव और धड़कन में वृद्धि के साथ ही शरीर की दूसरी सब ग्रन्थियाँ जीवन में काम आगे वाले शारीरिक रस निरर्थक मात्रा में पटक देती है। उससे शरीर की व्यवस्था और रचनात्मक शक्ति कमजोर पड़ जाती है और मनुष्य रोगी या बीमार हो जाता है।
भारतीय योगियों ने इस तथ्य का अत्यन्त सूक्ष्म अध्ययन किया है, योगवाशिष्ठ में बताया हैं-
चितं विधुरिते देह संक्षोजयनुयात्वक्तम्।
-6/1/81/30
संक्षो भात्साम्युत्सर्ज्यं वहन्ति प्राणनायवः॥
-6/1/81/32,
अहमं बहति प्राणे नाज्योयान्ति वि स्थितिम्।
-6/1/81/33,
काश्चिन्नाडघः प्रपूणत्वं यान्तिकाश्चिच्चरिक्तताम्।-6/1/81/34,
कुजीर्णत्वमजीर्णत्य मतिजीर्णत्वमेव वा।
द्वोषा यैव प्रपात्यन्नं प्राणसच्चारदुष्क्रमात्॥
-6/1/81/35,
तथान्नानि नयत्यन्तः प्राणवातः स्वमाश्रयम्।
-6/1/81/36,
यान्यभ्रानि निरोथेन तिडन्त्यन्तः शरीर के॥
-6/1/81/37,
तान्येव घ्याधिताँ शन्ति परिणामस्वभावतः।
-6/1/81/37,
एवमाधैर्मवेन्द्याथिस्तस्याभावच्च नश्यति॥
-6/1/81/38,
अर्थात्- चित्त में उत्पन्न हुये विकार से ही शरीर में दोष पैदा होते हैं। शरीर में क्षोभ या दोष उत्पन्न होने से प्राणों के प्रसार में विषमता आती है और प्राणों की गति में विकार होने से नाड़ियों के परस्पर सम्बन्ध में खराबी आ जाती है। कुछ नाड़ियों की शक्ति का तो स्राव हो जाता है कुछ में जमाव हो जाता है।
प्राणों की गति में खराबी से अन्न अच्छी तरह नहीं पचता। कभी कम, कभी अधिक पचता है। प्राणों के सूक्ष्म यन्त्रों में अन्न के स्थूल कण पहुँच जाते और जमा होकर सड़ने लगते हैं, उसी से रोग उत्पन्न होते हैं, इस प्रकार आधि (मानसिक रोग) से ही व्याधि (शारीरिक रोग) उत्पन्न होते हैं। उन्हें ठीक करने के लिये मनुष्य को औषधि की उतनी आवश्यकता नहीं जितनी यह कि मनुष्य अपने बुरे स्वभाव और मनोविकारों को ठीक कर ले।
पाश्चात्य वैज्ञानिक, मनोवैज्ञानिक और डॉक्टर अब उपरोक्त तथ्यों को और भी गहराई तक समझने लगे हैं, दि फील्ड आफ डिसीजेज’ में सर वी0 डबल्यू रिचर्ड सन ने लिखा है कि-”मानसिक उद्वेग एवं चिन्ताओं के कारण प्रायः फुन्सियाँ निकल आती हैं, कैन्सर, मृगी और पागलपन आदि हालत में भी सबसे पहले मानसिक ववत् में ही विकार बढ़े होते हैं।”
वैज्ञानिकों ने दीर्घकाल तक शरीर की थकावट के कारणों की जाँच में जो प्रयोग किये हैं, उनका कहना है कि लोगों की थकावट का कारण शारीरिक परिश्रम नहीं होता वरन् उतावलापन, घबराहट, चिन्ता, विषय मनोस्थिति या अत्यधिक भावुकता होती है। निराशा जनित घबराहट, अधूरी आशायें और शक्ति से अधिक कामनायें, भावुकता को परस्पर विरोधी उलझने भी रोगी में थकान लाती हैं। हीन भावना से भी शरीर टूटता है। थकान लाती है। हीन भावना से भी शरीर टूटता है। थकान से बचने के लिये आवश्यक है कि मन में सदैव प्रसन्नता और आशावादी विचारों का संचार किये रखा जाये।
अमेरिका में हुये मनोवैज्ञानिक बोध में डॉक्टरों के एक चिकित्सा-दल ने अपनी अन्तिम रिपोर्ट इस प्रकार दी है-”शारीरिक थकावट के 100 रोगियों में से 90 को कोई शारीरिक रोग न था वरन् वे मानसिक दृष्टि से दूषित व्यक्ति थे। अपच के 70, गर्दन के पीछे के दर्द के 75, सिरदर्द और चक्कर आने के 80-80, गले में दर्द के 90 और पेट में वायु विकार के 99 प्रतिशत रोगी केवल भावनाओं के दुष्परिणाम से पीड़ित थे। पेट में अल्सर जैसे दर्द और मूत्राशय में सूजन जैसी बीमारियों के रोगी भी 50 प्रतिशत रोगी निर्विवाद रूप से अपने दुर्गुणों के कारण पीड़ित थे, शेष के बारे में कोई निश्चित राय इसलिये नहीं बनाई जा सकी, क्योंकि उनका विस्तृत मानसिक अध्ययन नहीं किया जा सका।”
इसी प्रकार डा. टुडे ने ‘इन्फ्लुएन्स आफ दि ग्राइन्ड अपान दि बाडी’ नामक अपनी पुस्तक में लिखा है कि पागलपन, मूढ़ता, लकवा, अधिक पसीना आना, पाण्डुरोप, बालों का शीघ्र गिरना, रक्त-हीनता, घबराहट, गर्भाशय में बच्चों की शारीरिक विकृति, चर्मरोग, फोड़े-फुन्सियाँ, एग्जिमा आदि अनेक बीमारियाँ केवल मानसिक क्षोभ से ही उत्पन्न होती है।
डॉक्टर भी अब परेशान है कि कई रोगों का कारण वे मरीजों को क्या बतायें। रोगी अपने कष्ट कहता है, किन्तु डॉक्टरी सिद्धान्तों से उसे कोई रोग नहीं होता। डाक्टर उसे ‘एलर्जी’ नाम देकर कुछ औषधि तो दे देते हैं पर दरअसल ऐसे रोगी कहीं भी ठीक नहीं हो सकते, क्योंकि उनके मस्तिष्क में पापा और दुर्वासनाओं की जड़ें बहुत गहरी जम गई होती है। तात्पर्य यह कि अब डॉक्टर भी यौवन को सूक्ष्म संस्कारों का लेखा-जोखा मानते हैं। यद्यपि वे इस सम्बन्ध में इसीलिये चुप्पी साधते है कि इससे औषधि क्षेत्र में एक जबर्दस्त क्राँति आ सकती है पर सच बात यही है कि बुरे संस्कार चाहे इस जन्म के हों चाहे पूर्व जन्मों के शारीरिक व्याधियों का कारण वही होते हैं, भारतीय तत्व-दर्शियों ने बड़ी कठिन शोध साधनाओं के बाद यह देखा था कि मनोमय जगत् की सूक्ष्म वासनाओं का प्राण-शरीर और प्राण-शरीर का अन्नमय शरीर से कितना गहरा संबंध हैं, अन्नमय शरीर का दोष मनोमय जगत को दूषित करता है तो मनोमय जगत अन्नमय शरीर को। स्थूल शरीर जब नहीं रहता हैं, जीव चेतना शरीर को छोड़ देती है तब भी विकृत-संस्कार मस्तिष्क में छाये रहते हैं और वह जब किसी नये शरीर में पदार्पण करते हैं तो दुर्भावनाओं की तीव्र प्रक्रिया उसे अनजान में ही दूषित और अशक्त कर डालती है। हम उस रोग का कारण समझ नहीं पाते, भगवान् को दोष देते हैं पर प्रकृति इतनी कठोर और अनुशासित है कि बुरी भावनाओं का प्रभाव जब तक स्थूल रूप से समाप्त नहीं हो लेता, तब तक वह मनुष्य चाहे कितना ही अपना स्वभाव बदल कर सतोगुणी कर ले, तब तक व्याधियों से छुटकारा नहीं मिलता। सद्गुणों के धारण और मन को रचनात्मक विचारों में डालने के फल से वंचित रहना पड़ता हो ऐसी बात भी नहीं हैं, उसका भी परिपाक एक दिन जीवन में सुख, स्वास्थ्य और प्रसन्नता बनकर आता है, उस अवधि में उससे धैर्य और सन्तोष भी मिलता है पर तुरन्त सतोगुणी या भगवान् का आश्रय लेकर भी कोई उन कुसंस्कारों के प्रभाव से बच नहीं सकता। भोग तो भोगना ही पड़ता है।
यह महत्व भी कम नहीं है कि अच्छी भावनाओं और रचनात्मक विचारों से तत्काल कुछ धैर्य और संतोष मिलता है। पाश्चात्य देशों में भी अब इसीलिये अनुपस्थिति रोग चिकित्सा (एन्सेन्ट ट्रीटमेंट) नामक चिकित्सा पद्धति का प्रसार तेजी से हो रहा है, उसमें रोगी को न दवा लेनी पड़ती हैं, और न कोई यौगिक व्यायाम वरन् उसे अपनी इच्छा शक्ति को इच्छा बनाने और उसे मजबूत बनाने का ध्यान करना पड़ता है। उदाहरणार्थ-रोगी बिल्कुल एकान्त में किसी सुन्दर और स्वच्छ स्थान में बैठता हैं, जहाँ बाहर की प्रकृति भी उसे मानसिक प्रसन्नता प्रदान कर सकती हो। आँख कल्पना चित्र मस्तिष्क में उतारता है और यह भावना करता है कि मुझमें क्रोध की, काम-वासना की, ईर्ष्या आदि की जो दुर्भावनायें, वह दूर हो रही है और मेरे मन में प्रसन्नता बढ़ रही है।
इस तरह के चिकित्सा शास्त्रियों का मत है कि इस प्रयोग से लोगों के मन में बुरे विचार और पाप से घृणा उत्पन्न होती है और प्रसन्नता के प्रति आकर्षण बढ़ता है, मनुष्य उसी की खोज करने लगता है। निःसन्देह यदि कोई प्रसन्नता की खोज करता है तो उसे उस तरह की परिस्थितियां अपने भीतर से ही निकलती हुई सी अनुभव होने लगती है।
भारतीय अध्यात्म सच पूछा जाय तो भावनाओं की इसी गहराई पर टिका हुआ है। अभी पाश्चात्य लोग उसे अच्छी तरह समझ नहीं सके। अभी वे जड़ परमाणुओं की चेतना के ही गुणों का पूरी तरह पता नहीं लगा पाये जब चेतन परमाणुओं (सेल्स) का अच्छी तरह अध्ययन कर लेंगे तो उन्हें पता चलेगा कि दुर्भावनायें किस तरह मनुष्य को नीचे गिराती, पुण्य और उत्तम भावनाओं से उसे किस तरह आनंद मिलता और जीवन सुखी बनता है।
संयमित जीवन बिताकर भी मैं रोगी हूँ, महात्मन्! ऐसा क्यों? एक ग्रामीण ने महात्मा कन्फ्यूशियस से प्रश्न किया। कन्फ्यूशियस से थोड़ा विचार किया और बोले-”भाई, तुम शरीर से संयमित हो पर मन से नहीं। अब बाघ्रो और ईर्ष्या-द्वेष करना बन्द कर दो तो तुम्हें संयम का पूर्ण लाभ मिलेगा।”
19 वीं शताब्दी के योरोपीय वैज्ञानिकों ने यह खोज की कि मनुष्य शरीर भी परमाणुओं से बना हैं, उस परमाणु को जीवित-कोश (सेल) कहा गया। वैज्ञानिकों ने बताया कि सेल का निर्माण निश्चित रूप से उन्हीं रासायनिक एटम से होता हैं, जिससे निर्जीव पदार्थों का निर्माण होता है। उन सब का निर्देश समान प्राकृतिक नियमों द्वारा होता है। किन्तु जब वैज्ञानिकों ने प्रश्न किया गया कि निर्जीव पदार्थों में क्रियाशील शक्ति गया है और वे प्राकृतिक नियम क्या है तो वैज्ञानिक उसका कोई निश्चित उतर नहीं दे सकें।
सर ए॰ एस॰ एडिप्टन ने कहा- ‘‘कुछ अज्ञात शक्ति काम कर रही हैं, हम नहीं जानते वह क्या है? पर मैं चेतना को मुख्य मानता हूँ, भौतिक पदार्थ को गौण। पुराना नास्तिकवाद अब चला जाना चाहिये, अध्यात्म इसी चेतना का विषय है उसे किसी प्रकार डिगाया नहीं जा सकता।”
डा. गाल ने कहा- ‘‘मेरी राय में केवल एक ही मुख्य तत्व है जो देखता हैं, अनुभव करता है, प्रेम करता है, विचारता है, याद करता है आदि। परन्तु इस तत्व को भिन्न-भिन्न कार्य करने के लिये, भिन्न-भिन्न प्रकार के भौतिक साधनों की आवश्यकता पड़ती है।
‘दि ग्रेट डिजाइन’ नामक पुस्तक में अनेक वैज्ञानिकों ने मिलकर सहमति प्रकट की और लिखा कि-”यह संसार बिना चेतना-सत्ता की मशीन नहीं है। यह यों ही नहीं बन गया। जड़ को यदि एक पौध मानें तो यह भी निश्चित है कि उसके पीछे एक मस्तिष्क, चेतन-शक्ति काम कर रही है, उसका नाम चाहे कुछ भी हो पर वह विज्ञान की शक्ति के परे है।”
कुछ वैज्ञानिकों ने उक्त विचारों को सत्य नहीं माना और जीवन को रासायनिक क्रिया मानकर ही आगे की खोजों को जारी रखा। जीवित कोशिका के और अधिक (विश्लेषण) से पता चला कि कोशिका प्रोटोप्लाज्मा नामक तत्व से बनी है। एक प्रोटोप्लाज्म में 12 करोड़ से अधिक मालेक्यूल्स पाये जाते है। वह इतने सूक्ष्म होते हैं कि उन्हें आँखों से देखा जाना संभव नहीं है। प्रोटोप्लाज्म 12 तत्वों से मिलकर बना है। कार्बन, आक्सीजन, नाइट्रोजन, हाइड्रोजन, सल्फर, कैल्शियम, पोटैशियम, मैग्नीशियम, लोहा, फास्फोरस, क्लोरीन और सोडियम। प्रोटोप्लाज्म पर रासायनिक क्रियाओं का प्रभाव पड़ता है। भोजन का उपयोग करने और उससे बढ़ने की क्षमता होती है। वह क्षमता रहस्यमय सृजनात्मक प्रक्रिया द्वारा व्यक्त होती है। एक सेल दो भावों में बँट जाता है। उन दो के भी दो दो = चार हो जाते हैं, फिर चार के दूने 8 हो जाते हैं, इस तरह संख्या अपने आप बढ़ती रहती है प्रत्येक सेल केन्द्रक (न्यूक्लियस) से द्वेषा होता है बाँधने वाले तत्व को क्रोमोटोन कहते हैं, वही सम्पूर्ण जीवन का नियन्त्रण करता है। किन्तु यदि ऊपर के सभी तत्वों को अलग-अलग लेकर मिलाये तो उस रासायनिक प्रोटोप्लाज्म में चेतना नहीं आती, वही वह रहस्यमय प्रक्रिया है जिसे जानने में वैज्ञानिक अब तक असमर्थ रहे है। उस जीवित कोश (सेल) में जो विकास की शक्ति (2) भोज्य पदार्थों को ऊर्जा (हीट) और शक्ति (एनर्जी) में परिवर्तित करने की शक्ति, (3) गति, (4) जन्म देने की शक्ति थी, वह कौन थी, जब तक विज्ञान इस बात का संतोषजनक उत्तर नहीं दे पाता, तब तक उसका सम्पूर्ण याँत्रिक ज्ञान अपूर्ण हैं। यह विज्ञान की पहली सीमितता है कि वह चेतना के गुणों का अध्ययन कर लेने के बाद भी चेतना के मूल अस्तित्व पर कुछ प्रकाश नहीं डाल पाता। निर्जीव पदार्थों में माजेक्युलर गति होती हैं पर जीवित पदार्थों में सम्पूर्ण पिण्ड की गति की क्षमता होती हैं, उस सर्वशक्तिमान् सत्ता का बोध धर्म और विश्वास के द्वारा ही संभव है। यद्यपि विकिरण (रेडियेशन), गुरुत्वाकर्षण (ग्रेविटेशन) आदि को लेकर एटम, मालेक्यूल्स और पदार्थ के इलेक्ट्रान्स की खोज अभी जारी है पर भावनाओं की सूक्ष्मता तक यान्त्रिक शक्ति पहुँच सकती है इस पर सहसा विश्वास नहीं होता?
दूर की क्यों कहें, वैज्ञानिकों से जब यह पूछा जाती है कि इस प्रोटोप्लाज्म की रासायनिक उत्पत्ति कैसे हुई तो उसका भी विज्ञान के पास कोई उत्तर नहीं हैं।
बिल्ली सीधे भाग चली जा रही है, शरीर की किसी रासायनिक इच्छा से प्रेरित होकर माना वह किसी चूहे पर झपट पड़ती है और उसे पकड़ लेती है पर इतना साहस करने के बाद भी उसे वह भय रहता है कि कोई उसे उस कार्य के लिये दण्ड न दे अथवा और कोई दूसरा उसे जुड़ा न ले, वह चूहे को लेकर किसी एकान्त और सुरक्षित स्थान में जाती है। साहस और भय, प्रेम और घृणा, आकाश में उछलना और पानी में डुबकी लगाना, मारना और दुःखी होना यह परस्पर विरोधी क्रियायें क्यों उत्पन्न होती है। कोई प्राणी आगे चलकर दायें घूमेगा या जायें, चलता रहेगा या रुक जायेगा, इस तरह के संवेग और प्रक्रियायें जीवों में कहाँ से उठती है। यदि उन्हें भी रासायनिक प्रभाव कहा जाये तो एक ही माता-पिता से उत्पन्न दो बच्चों में जिन्हें माता-पिता के जीन्स भी समान मिले, परिस्थितियाँ समान मिलीं, आहार समान मिला। फिर यह गुण-क्रम क्यों परिवर्तित हो जाते हैं, इसका कोई निश्चित उत्तर विज्ञान के पास नहीं है और न ही उस सूक्ष्म चेतन सत्ता के इन व्यापक गुणों के अध्ययन का कोई यन्त्र विज्ञान विकसित कर पाया है।
विज्ञान कहता है कि एटम (अणु) पदार्थ की सूक्ष्मातिसूक्ष्म अवस्था है। शक्ति एनर्जी, एटम से ही पैदा होती है। विज्ञान यह भी कहता है कि संसार में किसी वस्तु का नाश नहीं होता। अर्थात् यदि लकड़ी को जलाने से पूर्व तोल लें और मानें कि वह तोल 5 किलो थी। इसके बाद उसे जला दें। जलाते समय (1) धुंआ, (2) भाप, (3) गर्मी, (4) प्रकाश। इन सब की तोल की जाती रहे और अन्त में (5) जो राख बचे उसे, इन सबको तौल ले तो यह वजन 5 किलो ही होगा। तात्पर्य यह कि गर्मी प्रकाश आदि में परिवर्तित हुये कण स्थूल लकड़ी में व्याप्त सूक्ष्म परमाणु ही थे, जो अपने-अपने गुण (नेचर) में बदल गये, यह एक प्राकृतिक सिद्धान्त है और समझ में आ जाता है। किन्तु एटम जिसका कोई न भार हैं, न घनत्व बह इतनी अधिक शक्ति देता है, जिससे हिरोशिमा और नागाशाकी जैसे भू-खण्डों को पल भर में नष्ट कर सकता है। एटम के अन्दर वह शक्ति कहाँ से आई इसका कोई उत्तर विज्ञान के पास नहीं हैं और इसीलिये यह मानना पड़ता है कि कोई अन्य शक्ति है जो रासायनिक सत्ता से कहीं अधिक व्यापक और बलवान् है।
एक और बड़ा भारी प्रश्न है जिसका समाधान प्रस्तुत करने में विज्ञान परिमित रह गया है और वह यह है कि प्रकृति की यंत्रवत् सत्ता (मैकेनिज्म) कहां से और क्यों बना और वह किस ओर जा रहा हैं, उसके पीछे क्या है और उसका भविष्य क्या है?
“विज्ञान की परिमितता (लिमिटेशन आफ साइन्स) के लेखक जे0 डब्लू0 एन॰ सुलीवान ने इस प्रश्न को बड़ा गहराई से देखा और लिखा कि ब्रह्मांड का वैज्ञानिक रूप स्पष्ट तथा पूर्ण विश्वसनीय है। यह हमारी रुचि को विषयों की कार्य-विधियों (फेनामेनन) में लगाये रहता है। उदाहरणार्थ उम्र, स्थिति, साइज, वेग और तारों की रासायनिक रचना के बारे में काफी ज्ञान मिला है। पदार्थ छोटे-छोटे विद्युत कणों से निर्मित होता हैं, जो एक दूसरे से निश्चित तरीके से मिले रहते है। इस जानकारी से पदार्थ के संबंध में हमें बड़ा संतोष हुआ है। किन्तु जब हम उस विज्ञान की ओर जाते हैं, जो जीवन से संबंधित होता है, तब इसका काम कम संतोषजनक होता है। बहुत से मौलिक प्रश्न उभरते हैं और हम उनका हल नहीं जानते। उदाहरण के लिये जीवाणु (लिविंग आगेनिज्म) को हम पूर्ण मानते हैं, फिर भी जीवाणु अपने ही अंश या भाग का योग नहीं लगता और उसका विस्तार चेतन प्राणियों में किस समय से हुआ है, इसका अनुमान लगाना कठिन हो जाता है। यदि जीवाणु को ही निरन्तर बढ़ने वाली प्रक्रिया मानें तो भी यह प्रश्न उठेगा कि उसका स्फुरण किसी एक बिन्दु से हुआ है और वह क्या है, विज्ञान यह बताने में असमर्थ है। उस व्यक्तिगतता (इनडिविजुयलिटी) का कोई निश्चित समाधान विज्ञान के पास नहीं है। कारण परिणाम के सिद्धान्त (प्रिन्सिपुल आफ काजेशन) निर्जीव संसार को नियन्त्रित करता है, ऐसा कुछ लोगों का विचार है। सम्पूर्ण प्राकृतिक नियम भी अंतिम रूप से एक ही यंत्र शास्त्र में सम्मिलित लगते है। अर्थात् पदार्थ का आविर्भाव, उसमें निरन्तर गति ओर रूपांतर होता रहता है, उसी के फलस्वरूप संसार का स्वरूप बद रहता है। यदि यह सब यंत्रवत चलता रहता होता विज्ञान के इस कथन को मानने में कोई आपत्ति न होती कि संसार में रासायनिक परिवर्तनों से ही विश्व बनता-बिगड़ता रहता है पर जब विस्तृत ब्रह्मांड के सूक्ष्म नियमों और गणित के सिद्धान्तों पर दृष्टि डालते हे तो उनमें एक सुनिश्चित नियमितता के साथ-साथ कुछ ऐसी लक्षणतायें भी दिखाई देती हैं, जिससे यह पता चलता कि यह संसार किसी मूल-बिन्दु की इच्छा पर चल रहा है और वह उन नियमों में स्वेच्छा से परिवर्तन कर सकता है। उसका वर्णन हम ब्रह्मांड की खगोलीय स्थिति पर प्रकाश डालते समय करेंगे। उस वृहत् क्रम व्यवस्था को स्थिर रखने वाली सचेतन शक्ति के बारे में विज्ञान का कोई अनुमान नहीं हैं।
विज्ञान की वह जानकारियाँ जो ऊपर प्रदर्शित की है, धार्मिक विज्ञान का एक अत्यन्त लघु अंश है योग पृष्ठ में इस सम्बन्ध में सारी जानकारी इस प्रकार-
प्रत्येकमेव यच्चितं तवेवंरुप्शक्तिमत्।
प्रत्येक भुविताँ राम नूनं संसृति खण्डकः॥
-3/40/29, 4/11/27,
परमाणौ परमाणौ सर्गवर्गा निरगैलम्।
महावितेः स्फुरन्त्यर्कसचीव त्रसरेणवः॥
-3/27 29,
त्गद्गुज्जासहत्राणि यत्रासंख्यान्यणापणौ।
परस्पर लग्नानि काननं ब्रह्म नाम तत्॥
-4/18/6,
अर्थात्-हे राम! प्रत्येक चित्त में इस प्रकार सृजन होता है, जैसे सोते हुये अनेक सैनिकों के मन में अनेक पृथक् पृथक् उदित हो जाते हैं, उसी प्रकार प्रत्येक जीव का संसार उसके भीतर अलग-अलग उदित होता है। जगत्भ्रम सब जीव को अलग-अलग होता वह उस के अतिरिक्त और कुछ नहीं जानता। जिस प्रकार सूर्य की किरणों में अनेक त्रसरेणु दिखाई पड़ते हैं, विश्व के परमाणु-परमाणु के भीतर उसी प्रकार अनन्त सृष्टियाँ दिखाई देता है। जैसे धुँधुची के गुँजाफल एक दूसरे से अलग-अलग लटके रहते हैं, उसी प्रकार ब्रह्म में अणु-अणु के भीतर अनेक सृष्टियाँ हैं।
परमाणु और पदार्थ सम्बन्धी इस जानकारी से ब्रह्म शक्ति या विश्व की सृजनात्मक प्रक्रिया का महत्व बहुत अधिक हैं, किन्तु उसकी जानकारी देना और मनुष्य की वह समस्याओं का समाधान देना विज्ञान के बलबूते की बात नहीं हैं। वह श्रद्धा और भक्ति, आस्था और विश्वास के द्वारा जाना और अनुभव किया जा सकता है, यह धर्म के अंग हैं, इसीलिये विज्ञान जहाँ रुक जाता है, उसके आगे धर्म और भावनायें नियन्त्रण करती हैं। मनुष्य जीवन में इसीलिये विज्ञान की अपेक्षा धर्म अधिक व्यापक और महत्वपूर्ण है, उसके बिना हम न तो अमरत्व की कल्पना कर सकते हैं और न जनम-मरण, रोग-बीमारी, क्रोध, काम, हिंसा आदि कष्टों से मुक्ति की। धर्म ही हमें शाश्वत मुक्ति और चिर-आनन्द प्रदान करने की क्षमता रखता है क्योंकि वह चेतना-मूल का विज्ञान है।
रेगिस्तान में एक काफिला जा रहा था। शाम होते-होते एक स्थान पर कुछ वृक्ष दिखे, वही पड़ाव करने का निश्चय किया गया। स्थान पर पहुँचने पर लोगों ने देखा कि एक पेड़ पर बहुत से अच्छे पके फल लगे हैं। सभी दौड़ पड़े लाने के लालसा से। तभी सरदार ने रोक दिया, उसने कहा-”कार्य करने के पूर्व विवेक का उपयोग करना चाहियें। यदि यह फल उपयोगी होते तो पहले वाले काफिले ही इन्हें समाप्त कर देते। अनायास मिली वस्तु की उपयोगिता-अनुपयोगिता पर विचार कर लेना चाहिये। पहले फलों की परीक्षा कर लें।” और परीक्षण से ज्ञात हुआ कि फल जहरीले थे।
मानव-जीवन परमपिता का दिया हुआ एक बहुमूल्य उपहार है। इसकी तुलना में संसार का जन्म कोई भी साथी खड़ा नहीं हो सकता। मनुष्य वृष्टि का सर्वोपरि प्राणी और सबका शिर–मौर है। यह मानव जीवन चौरासी लाख-दोषियों में भ्रमण एवं भोग करने के बाद मिला है। इसके बाद यह भी निश्चित नहीं कि अब यह दुबारा मिलेगा भी या नहीं। सृष्टि में जल, थल और नभचारी असंख्यों जीभ पाये जाते है। सबको परमात्मा ने बनाया है। लेकिन उनसे जो विशेषतायें मनुष्य को दी है, वे संसार के किसी दूसरे प्राणी को नहीं दीं। उसने मनुष्य को व्यवस्थित रूप से बोलने के लिये जिह्वा और भाषा प्रदान की। सूक्ष्म से सूक्ष्म कलात्मक काम कर सकने के लिये सक्षम हाथ-पैर दिये है। अनन्त शक्तियों से घिरा हुआ खरीद यन्त्र दिया। उसने उसे बुद्धि और विवेक की अनुपम चेतना दी है, जिसके बल पर वह एक से एक विलक्षण काम कर सकता है। यह परमात्मा की कृपा की हुई विशेषतायें ही तो है, जिनके बल पर मनुष्य इतने बड़े-बड़े निर्माण कर सका, वैज्ञानिक और आध्यात्मिक आविष्कार करने में सफल हो सका।
संसार का सुविकसित साहित्य, परिष्कृत कलायें और उच्चकोटि के झिस्य मनुष्य की उस विशेषता के ही प्रतीक है, जो उसे परमात्मा की ओर से मिली है। अन्न का खत्मावन और बच्चों का निर्माण एक मनुष्य को छोड़कर संसार का अन्य कौन प्राणी करता है। खनिजों की सम्पत्ति और पंच-तत्वों का जैसा उपयोग अन्य कौन-सा प्राणी कर सकता है, जैसा कि यह मानव प्राणी कर रहा है। यह लाभकर व्यवसाय और वे कावेरी उधोग सिपाय मनुष्य के ओर किस प्राणी की क्षमता है जो चला सके। जहाँ जन-जीव जल में, स्थल प्राणी स्थल में और नभचारी हवा में ही उड़ सकते है, वहाँ मनुष्य ने अपने विघा-बल से ऐसे सावन उपलब्ध कर लिये है कि उसके लिये जल, थल और नभ तीनों स्थानों गतिगम्य बन गये हैं।
इन बाह्य विशेषताओं के अतिरिक्त ईश्वर ने अपने प्यारे पुत्र मनुष्य को आन्तरिक विशेषतायें भी कुछ कम नहीं थी है। मनुष्य के विकास, प्रेम, हवा, सहानुभूति, अनुभूति, संवेदना, स्नेह और आत्मीयता के शुद्ध किस प्राणी में पाये जाते है ? साहस, वीरता, उत्साह, धैर्य और सहनशीलता की विशेषतायें एक मानव को छोड़कर किसी अन्य प्राणी को नहीं मिली। आत्मा का बोध और परमात्मा के ज्ञान के साथ पारिवारिकता, सामाजिकता और राष्ट्रीयता का भाव केवल एक मनुष्य की ही विशेषता है। अन्य प्राणियों में इस भाव का सर्वथा अभाव है पाया जाता है। मनुष्य सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ प्राणी और परमात्मा का सबसे अधिक प्यारा पुत्र है। मानव-जीवन बड़ा ही दुर्लभ और मूल्यवान् है। इस सत्य को कभी भी न भूलना चाहिये।
किन्तु परमात्मा का यह परम अनुग्रह निरुद्देश्य नहीं है। इस विशेषतापूर्ण मानव-जीवन का महान उद्देश्य भी है। यह वह कि संसार में पुरुषार्थ करे, अपनी वर्तमान स्थिति से ऊँचा उठता और आगे बढ़ता चले। इतना बड़े और चढ़े कि एक दिन उस परमपिता की गोद में पहुंच जाये जिसकी गोद से उतर कर वह संसार की रंक-स्थली में आया है। किन्तु उस उन्नति की परमावधि सहसा प्राप्त नहीं हो सकती। उम्र पर पहुँचने के लिये उसके पूर्व के तीन और सोपानों पर पदार्पण करना होगा। वे है धर्म, अर्थ और काम। इन तीन सोपानों को पार करने के बाद ही मनुष्य मोक्ष नामक परम-पथ पर पहुँच सकता है। जीवन में इन अपवर्गों की सिद्धि ही उनका आरोहण माना गया है।
जीवन में धर्म की सिद्धि का आश्रय है अपने भीतर-बाहर पवित्रता और पुण्य की स्थापना करना। धर्म का वास्तविक रूप केवल पूजा-पाठ रखने करते रहना नहीं है। वह तो धर्म की ओर बढ़ने का एक उपाय है। धर्म का वास्तविक रूप है, परमार्थपूर्ण आध्यात्मिक जीवन। परसेवा, परोपकार, दया, करुणा, उदारता, सत्य आदि गुणों का विकास ही अध्यात्म है और दान-दाक्षिण्य, सहायता, सहयोग, प्रेम और आत्मीयता आदि की सक्रिय अभिव्यक्ति को परमार्थ कहा गया है। धर्म के नाम पर कुछ परमार्थ कर उसके बदले में बड़ा सा लाभ उठाना धर्म नहीं, धर्म के रूप में अधर्म ही है जो कुछ परमार्थ अथवा परोपकार किया जाय, वह निःस्वार्थ एवं निर्लोभ भाव से किया जाय तब ही उसके धर्म की प्राप्ति हो सकती है।
इस प्रकार अपने को धर्मस्थ बनाकर मनुष्य को अर्थ के क्षेत्र में आकर उसका प्रमाण देना चाहिये। अर्थ की सिद्धि का तात्पर्य केवल ढेर सा पैसा कमा लेना नहीं है। पैसा चाहे थोड़ा कमाया जाए अधिक लेकिन वह कमाया सत्य, शुभ और शालिन प्रकार से। इस प्रकार सरलतापूर्वक विधि कमाया हुआ धन ही अपवर्गीय अर्थ परिधि में आता है। तथापि यह उसका एक पक्ष ही है। अर्थ का दूसरा पक्ष है व्यय। धन कमाया तो शुभ विधियों से जाय किन्तु उसका व्यय अशुभ विधि से किया जाय तब भी वह अपवर्गीय पंक्ति से अपदस्थ माना जायगा।
धन का जिस पवित्र प्रकार से कमाया जाय, उसका व्यय भी पवित्रतापूर्वक किया जाय। जो व्यक्ति अपने धर्म को निरर्थक प्रदर्शन, व्यसनों अथवा अनुपयोगी बातों से व्यय करते है, वे उसकी पवित्रता लांछित कर डालते है। विद्या-वृद्धि, परोपकार, परमार्थ और धर्म के साथ-साथ अपने स्वास्थ्य, परिवार के कल्याण और समाज के हित के लिए व्यय किया जाना वाले धन पूरी तरह से पवित्र होकर अपवर्गीय अर्थ बनता है।
कामनायें, इच्छायें और आकांक्षायें मनुष्यता का विशेष लक्षण है। वे मानव प्रगति के लिये आवश्यक भी है। क्योंकि उनकी प्रेरणा से ही मनुष्य उद्योग और पुरुषार्थ में प्रवृत्त होता है। यदि मनुष्य आकांक्षाओं से रहित हो जाय तो उसकी प्रगति ही रुक जाये। किन्तु सभी कामनायें अपवर्गीय काम की सीमा में केवल वही कामनायें आती है, जो आदि, मध्य और अन्त तीनों रूपों में पवित्र हों। धनवान् बनने की कामना बुरी नहीं यदि उनका उदय देखा-देखी, स्पर्धा, लोभ अथवा ईर्ष्या से न होकर स्वयं आत्म-प्रेरणा से हुआ हो। उसकी पूर्ति के मध्यकाल में अनुचित अथवा अनैतिक साधन न अपनाए गए हो और उसकी पूर्ति के बाद अर्थात् धनवान् बन जाने के बाद उसका मद अथवा अहंकार न पैदा हो और उसका यापन अपना, परिवार का, समाज और संसार का हित करने के लिये ही किया जाये।
दाम्पत्य जीवन की कामना पूरी नहीं यदि उसका उद्देश्य काम भोग ही न हो। यदि उसका उद्देश्य काम भोग है। और उसकी प्रेरणा विषय-वासनाओं की इच्छा से मिली है तो वह कामना दूषित है और अपवर्गीय काम के खाते में न लिखी जायगी। इसके विपरीत यदि उसकी प्रेरणा सृष्टि संपादन के कर्त्तव्य से मिली है और उसका उद्देश्य प्रेम का अमृत दाना और संसार को, संतान के रूप में अच्छे नागरिक देना है तो यह काम-कामना निश्चित रूप से अपवर्गीय काम की परिधि में गिनी जायेगी।
इस प्रकार धर्म पाकर, अर्थ कमाकर और कामनाओं की पूर्ति कर जो मनुष्य संसार से उऋण हो जायेगा, वह स्वभावतः परमात्मोन्मुख हो जायेगा, आध्यात्मिक जीवन के साथ पूर्ण काम हो जाने पर, लिप्सा, माथा और मोह से तृप्त हो जाने वाले पुरुषार्थी की अन्तिम गति मोक्ष के सिवाय और कुछ ही ही नहीं सकती। निश्चय ही वह संसार से तृप्त होकर उस परम-पद, परमात्मा की गोद में वापस चला जायेगा जहाँ परमानन्द और चिदानंद के सिवाय और कुछ नहीं है।
यह है मानव जीवन की विशेषता, महत्व और उद्देश्य किन्तु हममें से कितने ऐसे हैं, जो इस महिमा, इस गरिमा ओर इस महत्व को अपने जीवन में चरितार्थ करने का पुण्य प्रयत्न करते है। खेद है कि ऐसा सुरदुर्लभ मानव जीवन पाकर भी मनुष्य पशुओं से भी गया-बीता जीवन चला रहा है। जिसका स्वरूप और उद्देश्य दोनों ही चिदानन्दमय है वह काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या-द्वेष, लड़ाई-झगड़े, अपराध और पापों की आग में जल-जलकर आत्म-हत्या कर रहा है। कभी उसे निराशा घेरती है कभी चिन्ता जलाती है, न कभी निरुत्साह गिरा देता है तो कभी कायरता मार डालती है। उसने अपने विचारों ओर आवरणों से धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष के सारे उद्देश्य नष्ट कर डालते है और इस प्रकार कीट-पतंगों की निकृष्ट योनि में डालने की तैयारी कर ली है। मानव-जीवन में कहाँ कीट-पतंगों की योनि।
जिन चौरासी लाख अधम योनियों की यातना भोग कुछ मनुष्य इस महान् सम्भावनाओं से भरे मानव-जीवन में आया है और जिसके माध्यम से वह मोक्ष पा सकता है उससे ‘लख चौरासी’ में फिर वापस चला जाना कितनी भयानक, कितनी विकट, वीभत्स और निकृष्ट असफलता है। मनुष्य को यह हानि सोचकर सहसा रोमाँच हो जाता है और इच्छा होती है, उसके इस अज्ञान और अभाग्य पर आंसू बहाये जायें।
मनुष्य के इस पतन का एक मात्र कारण यही है कि वह अपने सत्य स्वस्थ पर प्रतीति नहीं कर पा रहा है। वह भी अपने को संसार के अन्य प्राणी और जीवों की भाँति एक साधारण जीवन ही मानता है और उसी के अनुसार कमाना-लाना और निरुद्देश्य बच्चे पैदा करना अपना लक्ष्य मानता है। कितना कल्याण कर होता, यदि मनुष्य एक बार अपने इस सच्चे स्वरूप की प्रतीति कर उसके अनुसार ही अपना जीवन चलाता और अपना लक्ष्य बनाता कि-वह अखण्ड, आनन्द रूप, सर्वज्ञ, सर्वसमर्थ और निर्विकार परमात्मा का अंश और उसका प्रिय पुत्र है। वह शरीर रूप नहीं, बल्कि नित्य, शुद्ध, मुक्त और प्रकाश रूप आत्मा है। सारा दृश्य, अदृश्य, सत्य, शिव और सुन्दर उसका अपना अधिकार है। वह संसार में इस प्रकार विकारों, विकृतियों और दोषों के वशीभूत होकर निकृष्ट जीवन जीने और निम्नकोटि की मौत मरने नहीं आया है। यह आया है धर्म, अर्थ, काम के तीन सोपान चढ़कर अपने परम-पद मोक्ष की प्राप्ति करने के लिये।
भाव वीथियों के मोहमय अन्धकार में भटकने वाले मनुष्य को अभी, आज ही यहीं पर रुक जाना चाहिये और विचार करना चाहिये कि वह गया है, कौन है और किस उद्देश्य से इस संसार में आया है। मानव-जीवन का महत्व क्या है, उसकी विशेषतायें क्या है, उसकी शक्तियाँ कितनी ओर किस सीमा की है। निश्चय ही ऐसा करने पर उसके सत्य-स्वरूप और यथार्थ लक्ष्य का ज्ञान होगा। अपनी वर्तमान स्थिति पर उसे खेद ही नहीं लज्जा भी होगी और वह अपने को सुधारने और सत्पथ पर लाने का प्रयत्न आरम्भ कर देगा।
कोई चिन्ता नहीं यदि अब तक का मार्ग ठीक नहीं रहा है। आज ही उसे बदल दीजिये और अकरणीय के स्थान पर करणीय कर्त्तव्य में प्रवृत्त हो जाइये। अर्थ, धर्म, काम का अपवर्गीय स्वरूप समझें और उसी के अनुसार उनका उपार्जन करते चलें-सारा बिगड़ा काम बन जायेगा। अब भी देर नहीं हुई है, समय है, किन्तु आज अभी से ही यह परिवर्तन आरम्भ कर देना चाहिये, नहीं तो इसके बाद देर हो जायेगी और तब अन्त समय में पछताने की सिवाय और कुछ भी हाथ न आयेगा।
प्यासे कार्तिकेय समुद्र के पास पहुँचे और अंजुलि बाँधकर पानी उठाया। मुख में लगा तो लिया पर उगलते ही बना। महामुनि भगवन् के इस पक्षपात पर बड़े क्षुब्ध हुये। नदियाँ कितनी छोटी होती है पर उनका जल कितना शीतल और कितना मीठा होती है पर अनन्त राशि-समुद्र का जल न शीतल ही और न पीने योग्य।
चिन्ता करते बहुत देर हो गई तब आकाश से आवाज आई-”महात्मन्! तुम इतना भी रहस्य न समझ सके। यह नदियाँ लेती नहीं अपने पास जो कुछ है उसे देती भी रहती है। यह तो अपनी जल-राशि को छिपाये रखने का ही फल है कि समुद्र का जल खारी हो गया है जो अपनी शक्तियों” औरों को नहीं बाँटते मुनि! उनकी यही दशा होती है।”
अमेरिका के विदेश विभाग के एक अफसर की धर्मपत्नी श्रीमती पंगी फोर्नवर्थ के पिता का निधन नहीं क्या। उन्हें अन्त्येष्टि संस्कार में भाग लेने के लिये बुलाया गया। वे गई भी। पिता के आकस्मिक निधन से उनकी मानसिक स्थिति असंतुलित-सी हो गई था। अन्त्येष्टि समाप्त हुई तो फैन्सी से लाल ऐन्बिल्स के लिये वे अपनी कार पर ही लौट पड़ी, किन्तु दुःख और थकावट में वह इतनी शिथिल हो गई थीं कि कार चलाते-चलाते ही उन्हें नीव आ गई। अर्द्धनिद्रित अवस्था में उन्हें गतिवर्द्धक यंत्र (एक्सीलेटर) की स्थिति का ध्यान नहीं दिया, पैर से उसे तेजी से दाब रहीं। कार 40 मील प्रति घंटा की चाल से दौड़ने लगी।
अचानक उन्हें अपने पिता की आवाज सुनाई दी- पेग, पेग। कार रोको, कार रोको। चौंककर पेगी ने आँखें खोल दीं। होश संभाला तो पाया कि कार एक भयंकर मोड़ को पार कर रही थी और दुर्घटना होने में कुछ सेकेंड से अधिक की देरी नहीं थी।
पिता का निधन हो चुका था, फिर वह आवाज कहाँ से आई? ठीक ऐसे समय ही क्यों आई, जय उसकी आवश्यकता हुयी। इस सम्बन्ध में श्रीमती पेगी फोर्नवर्ष ने बहुत विचार किया। मनोविज्ञान जानने वालों ने बताया कि वह तो अंतर्मन में पिता की बार-बार स्मृति के कारण हुआ। चली वह भी मान लिया जाये कि मस्तिष्क में कई दिन से पिता की स्मृति छा रही थी, इसलिये अर्द्धचेतन अवस्था में पिता की ही आवाज का भ्रम हुआ होगा पर वह भ्रम ठीक उस समय होना जबकि मृत्यु की विभीषिका के सन्निकट था, उक्त तर्क को काट देता है। पेगी स्वयं भी संतुष्ट नहीं हुई और उन्होंने निश्चित रूप से माना कि मृत्यु के बाद भी चेतना का सूक्ष्म और उसी मानसिक स्थिति में अस्तित्व बना रहता जिस अवस्था में उसका प्राणान्त होता है।
वह घटना अपरोक्ष कही जा सकती है। आत्मा को शरीर से विलग वस्तु प्रमाणित करने, उसके सर्वज्ञ, संकल्प, सर्वव्यापी एवं शाश्वत होने का एक परोक्ष उदाहरण भी वाशिंगटन (अमेरिका) में काफी दिनों तक चर्चा का विषय बना रहा।
एक उच्च घराने की दो बहनें एक दिन अकेली घर में खेल रही थीं। तभी सिविल हॉस्पीटल के किसी कर्मचारी ने फोन किया ओर बताया कि अस्पताल में एक ऐसा घायल दुर्घटना ग्रस्त मरीज पड़ा है जिसकी शिनाख्त नहीं हो रही है। उस कर्मचारी के पास कुछ ऐसे चिन्ह थे, जो उन दोनों लड़कियों के पिता से सम्बन्धित थे, इसलिये उन्हें तुरन्त अस्पताल जाकर घायल का पहचानने का आग्रह किया गया।
ऐसे समय में स्वभावतः भावनाशील लोगों की यह आशंका होती है कि दुर्घटना किसी अपने कुटुम्बी के साथ तो नहीं हुई? दोनों बहनों-जेनी और दर्जिदाना को अपने दोनों भाइयों के डी और जैक की तीन स्मृति हो आई, कहीं दोनों भाइयों में से तो कोई घायल नहीं हुआ? इस आशंका से दोनों ही आविर्भूत हो उठीं, ऐसे समय जब कोई संकट या विपन्न स्थिति में होता है तो कुछ ऐसी विलक्षण बात है कि मानसिक विकार धूमिल से पड़ जाते है और एक क्षण के लिये आत्मिक प्रकाश सा काँच जाता है। भाइयों की याद दोनों ने इसी स्थिति में, विशुद्ध अन्तःकरण से की थी।
दोनों शीघ्रता से तैयार हुई ओर अस्पताल पहुँचीं। मालूम हुआ कि वापस कोई और था पर वह कुछ समय पहले उनके पिता का नौकर रह चुका था। दोनों बहनों ने घायल के परिवार वालों को सूचना भिजवाई, औषधि इत्यादि का प्रबन्ध किया और तब घर छोड़ी।
अभी घर लौटे कुछ ही क्षण बीते थे कि टेलीफोन की घण्टी खड़खड़ाई। जेबी ने फोन उठाकर पूछा-कौन बोल रहा है तो वह सुनकर स्तम्भ रह वर्ष कि आवाज देने (काल) वाला ओर कोई नहीं उसका भाई फेंकी है और पूछ रहा कि “वे स्वस्थ और सकुशल तो है” इससे आगे उसने विस्तार से बात चीत करते हुए बताया कि मैं टैक्टर चला रहा था तो मुझे कई बार ऐसा लगा जैसे तुम मुझे बुला रही हो और किसी गम्भीर चिन्ता में हो।” मुझे वह आवाज इतनी मार्मिक लगी कि जब तुम दिखाई नहीं दी तो मुझे फोन करना पड़ा।
एक व्यक्ति के अन्तःकरण की भाव तरंगें बिना किसी माध्यम के बेतार के तार के समान दूसरे आदमी तक फंसे पहुँचे गई। क्या इसके पीछे कुछ दार्शनिक तथ्य भी है? जब यन्त्र भी एक निश्चित स्थिति (फ्रीक्वेंसी) पर ही दूसरे शब्द या रेडियो स्टेशनों के ब्राडकास्ट पकड़ते हैं, तब शरीर में ऐसा कौन-सा यंत्र फिट है जो जेनी की आन्तरिक जैसी सूक्ष्म प्रक्रिया की फ्रेडी तक पहुँचा देता है, इसका कोई निश्चित उत्तर विज्ञान के पास नहीं है।
जेनी ने बात समाप्त की ओर दूसरे काम में लग गई पर अभी दो क्षण भी नहीं बीते थे कि एक बार फिर से टेलीफोन की घण्टी चमकना उठी। वर्जियाना थौड़ी-थौड़ी गई और पूछा-”आप कौन बोल रहे है ?” “मैं तुम्हारा आई जैक बोल रहा हूँ।” उधर से आवा आई। “अभी कुछ देर पहले रिचमाँड पर हवाई जहाज चला रहा था, मुझे कई बार ऐसा लगा वर्जियाना जैसे तुम मुझे आवाज दे रही हो। तुम्हारे शब्दों में कुछ भय हो। पहले तो मैंने समझा कि मुझे वैसे ही सूझ रहा है पर बेचैनी इतनी बढ़ो कि मुझे जहाज वाशिंगटन की ओर मोड़ना पड़ा। जहाज से उत्तर कर सीधा तुम्हें फोन कर रहा है। बहन! तुम अच्छी तो हो न, जेनी स्वस्थ है न, सब ठीक है न?
वर्जियाना ने सब विस्तार से समझा दीं पर तब से अब तक उनमें से कोई भी यह नहीं समझ पाया कि एक दूसरे के दर्द की अभ्यान्तरिक अनुभूति कैसे और क्यों होती है, जबकि दोनों के बीच की दूरी और स्थिति ऐसी होती है कि यान्त्रिक सम्बन्ध भी सहसा स्थापित नहीं किया जा सकता।
यह घटनायें असामान्य व्यक्तियों के जीवन की हैं, इसलिये उन्हें मनगढ़न्त कहकर ठुकराया नहीं जा सकता। हमारे भारतीय योग-शास्त्रों में अणिमा, लधिमा, महिमा, गरिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, वशित्व और ईशित्व आदि अनेक सिद्धियों का वर्णन है, यह सिद्धियाँ ऐसे अलौकिक चमत्कारों को ही कहा गया है। जिनको स्थूल जीवन के आधार पर तो नहीं सिद्ध किया जा सकता, किन्तु उनके पीछे साधना और योग विद्या के सुनिश्चित सिद्धान्त है, जो मूलरूप से आत्मा के सूक्ष्म ‘तत्वदर्शन’ पर आधारित है। पातंजलि योग में बहुत-सी सिद्धियों का वर्णन है, जो केवल मन की स्वच्छता से प्राप्त की जाती है, उनमें से पूर्वजन्म का ज्ञान, दूरस्थ व्यक्ति का ज्ञान, अदृश्य और दूसरे चित्त का ज्ञान आदि भी है। उसके कारण पर योगवाशिष्ठ में इस प्रकार प्रकाश डाला है-
तस्मार्थ वेंद्यबेताये ये वा धर्म परंपिताः। आतिवाहिक लोकाँस्ते प्राप्मुवन्तीह मेतरे॥ -3।54।1,
आतिवाहिकताँ वाँस बुद्धं चितान्तरेर्मनः। सर्ग जम्मान्तरधर्तः सिद्धै मिलति नेतरत्॥ -3।22।10,
आधि भौतिक देहोडयमिति यस्य मतिभ्रमः। तस्यासायगुरन्ध्रेण गन्तुँ शक्नोति मानव॥ -3।40।8,
अर्थात्- जो ज्ञानी-तत्वदर्शी पूर्णतया धार्मिक विचार वाले लोग हैं, उन्हीं का आतिवाहिक (सूक्ष्म) लोकों में प्रवेश हो सकता है। जो प्रबुद्ध होकर सूक्ष्मभाव को प्राप्त हो चुके वे ही दूसरे उन जीवों से मिल सकते हैं, जो सिद्ध होकर दूसरे लोकों में जन्म ले चुके है। जिसके मन में अपने को स्थूल शरीर होने का भ्रम दृढ़ हो यथा है, वह भला सूक्ष्म मार्ग द्वारा दूसरे लोकों में कैसे जा सकता है।
यत्र स्वसंकल्प पुरं स्वदेहेन न सभ्यते। तत्रान्यसंकल्पपुर देहोअम्यो लभते कथम्॥ -3।21।43,
जब कि मनुष्य अपने ही संकल्प जगत् में स्थूल शरीर में प्रवेश नहीं कर सकता तो भला दूसरों के विचार या संकल्प जगत् में उसका प्रवेश स्थूल शरीर द्वारा कैसे हो सकता है।
शास्त्र के इस कथन को अभी तक काल्पनिक ज्ञान कहा जा सकता था घर वह दृष्टान्त यह बताते है कि अशुभ्य स्थूल ही सब कुछ नहीं है, उसकी सूक्ष्म सत्ता उससे कहीं करोड़ों गुना जबर्दस्त है। जो स्थूल रूप से सुनाई देता है, पूर्वाभास जा दूरश्रवण तो उस शक्ति और सामर्थ्य को एक नगण्य चिनगारी मात्र है। इन तथ्यों को पाश्चात्य देशों में अब भारतवर्ष से कहीं अधिक विश्वस्त माना जाने लगा है।
‘सत्य की खोज’ (इन सर्च फार दि ट्रुथ) की लेखिका श्रीमती रूप मौटगुखरी ने ‘भाई साहकिक फ्रेण्डस’ अधिक पाँचवें अध्याय में मिला है-
“हमारे घर के समीप ही तुर्की दूतावास के राजदूत भी वृक्षैण्ड उसाकलीगिस रहते थे। 1938 में वे एक बार रुमानियाँ यात्रा पर गये। उन्हें एक दिन अपने भाई श्री वैदत उदाकलीनिक की बीमारी का समाचार डाक हुआ। उसी रात रेलगाड़ी से वे घर के लिये चल पड़े। गाड़ी में नींद आ गई, निद्रावस्था में उन्हें ऐसा लगा कि किसी ने डिब्बे (कंपार्टमेंट) का दरवाजा खोला और डिब्बे में घुस आया। प्रविष्ट व्यक्ति ने हाथ की घड़ी खोली और उसे देखते हुए कहा-”अब तो तुम्हें छोड़कर जा रहा हूँ, तुम्हें अन्तिम नमस्कार करने की इच्छा से चला आया।”
श्री डुलेण्ड की नींद बेचैनी से टूट गई, उन्हें स्वप्न में ही वह आभास हो गया कि वह शब्द उनके भाई के है और कुछ गड़बड़ अवश्य हो गई। लाइट जलाकर उन्होंने घड़ी की ओर देख रात के पाँव बजने को कुछ ही मिनट शेष थे। सफर बेचैनी में ही कटा। घर पहुँचने पर मालूम हुआ कि उनके भाई का निधन हो चुका है और वे उसी रात ठीक पाँच बजने से पाँच मिनट पूर्व भरे जिस रात उन्हें गाड़ी में उपरोक्त पूर्वाभास हुआ था।
चैकोस्लोवाकिया और थाईलैण्ड के भूतपूर्व अमेरिकी राजदूत, जो बाद में जापान के राजपूत नियुक्त हुए, की धर्मपत्नी श्रीमती यू0 एलेकिसस जानसन भी जापान में ही थीं। वहाँ रहकर उन्होंने जापानी भाषा का अध्ययन किया। इसी बीच द्वितीय महायुद्ध चिड़ गया। श्रीमती जानसन और उनके बच्चों को मुकडेन के बाहर भेज दिया गया। श्री जानसन वहीं रहे। 7 सितम्बर 1941 के दिन जापानियों ने पर्स हारबर पर भीषण बमबारी की, उसी दिन जानसन को भी गिरफ्तार कर लिया गा। श्रीमती जानसन ने इस दोष लगुना बीच (कैलीफोर्निया) में मकान ले लिया था पर पति के अलग रहने से वे सदैव चिन्तित-सी रहा करती थीं। 7 मार्च 1942 को एक पड़ौसी सी ने आकर बताया कि उनका रेडियो ओरियन्ट के सारे कार्यक्रम सुन सकता है। आप चाहें तो जापानी भाषा के समाचार सुन सकती है। श्रीमती जानसन ने उनकी इच्छा भी व्यक्त की पर तीन महीने तक उन्होंने व कोई कार्यक्रम सुना, न उनकी ऐसी कोई इच्छा ही हुई।
8 जून को साँयकाल से ही उन्हें कुछ अजीब-अजीब सा लग रहा था। उन्हें ऐसे अनुभव हो रहा था जैसे उन्हें कोई खुला रहा है। वे 6 बजकर पचास मिनट पर पड़ौसी के घर नई और रेडियो खोलने की प्रार्थना की। उसने शीघ्रता से मुर्कटन स्टेशन आ गया, कोई जापानी ऑफिसर अंग्रेजी में बोल रहा था, अभी थोड़ी देर में आप अमेरिकी राजदूत श्री यू0 जानसन को सुनेंगे। उसके बाद जो आवाज सुनाई दी, वह सचमुच जानसन की थी और वे कह रहे थे, जो भी सज्जन रेडियो सुन रहे हों मेरी पत्नी से सन्देश कहें, मैं स्वस्थ हूँ और आशा है शीघ्र ही युद्धबन्दियों की अदला-बदला में मुझे छोड़ दिया जायेगा।”
इस तरह के पूर्वाभास का आखिर रहस्य क्या है? साइकिक एक्सपीरियेन्सेज मात्र से पूर्वाभास की विदेशों में भी बड़ी चर्चा होती है और कहा जाता है कि ऐसे अनुभव युद्धकाल में अधिक होते है, क्योंकि युद्धभूमि के खतरों की सहन करने वाले और घरों पर उन्हें अनुभव करने वालों के बीच एक प्रकार का भावनात्मक सम्बन्ध बना रहता है। दो संकल्प एक में जुड़कर एक दूसरे के मन की बात कैसे जान लेते है, इसका कोई विज्ञान सम्मत विश्लेषण नहीं है पर यदि ऐसा कुछ हुआ तो निश्चय ही उन सूक्ष्म-तत्वों की जानकारी सम्भव होगी, जो मनुष्य की मूलभूत चेतना से सम्बन्धित है। हमारी बुद्धिमता इसमें है कि पूर्वाभासों के आधार पर ही सोच कि सचमुच मनुष्य जीवन शरीर तक ही सीमित है अथवा चेतना का काई स्वतन्त्र अस्तित्व भी है, यदि है तो उसकी विशेषतायें क्या है और क्या उन्हें अल्पकाल के लिये ही नहीं सदैव के लिये भी परिष्कृत किया जा सकता है?
22 जून 1955 के दिन इण्डोनेशिया में सूर्यग्रहण पड़ रहा था। हिन्दू और बौद्ध दर्शन से प्रभावित होने के कारण इण्डोनेशियाई लोगों में भी धर्म, आत्मा, परमात्मा के सम्बन्ध में लोगों की काफी जिज्ञासा में रहती है। ऐसे अवसरों पर वहाँ भी धार्मिक चर्चायें होती है। ऐसी ही बात–चीतें कुछ लोगों में चल रही थी। ‘साकसुबु’ नामक एक अधेड़ व्यक्ति ने बताया-”यह उसके जीवन के लिये हानिकारक है और ऐसा लगता है, मेरी मृत्यु के दिन जब समीप आ गये है।”
पाकसुबु के स्वास्थ्य में कोई खराबी न थी। उसका आयु भी कोई अधिक न थी, इसलिये लोगों ने उसकी बात को हँसी में उड़ा दिया।
एक सप्ताह बीतने को आया-पाकसुबु सामान्य दिनों की तरह स्वस्थ और भला-चंगा रहा, किन्तु सातवें दिन उसे हल्का-सा ज्वर चढ़ा ओर थोड़ी ही देर में उसका प्राणान्त हो गया। एक सप्ताह पूर्व उसे जिस बात का आभास हुआ था, वह इतना सत्य निकला इस पर उसके मित्रों और परिचित ने बड़ा आश्चर्य किया।
‘लन्दन से हाँयकाय तक’ पुस्तक के विद्वान् लेखक हुसेन रोफे एक बार अपने घनिष्ट मित्र श्री जे0 वी0 से मिलने गये। यह अवसर बहुत दिन बाद आया था, इसलिये हुये नरोफे कल्पनायें, अनेक योजनायें लेकर मित्र महोदय के पास गये थे, किन्तु जैसे-जैसे वह घर के समीप पहुँचते गये न जाने क्यों उनके मस्तिष्क में निराशा बढ़ती गई। अपनी इस अनायास स्थिति पर स्वयं रोफे को भी हैरानी थी। धीरे धीरे उनके मस्तिष्क में न जाने कहाँ से दबे-दबे विचार उठने लगे कि जे0 वी0 आत्महत्या की तैयारी कर रहा है। इस प्रकार का अचानक आभास और वह भी इतना जोरदार कि उन विचारों के जाये कोई और विचार टिक ही न पा रहा था।
रोफे के आश्चर्य का उस समय ठिकाना न रहा जब मित्र के घर पहुँचते ही उसने पाया कि वह जहर खरीद जाया है और आत्म हत्या की बिल्कुल तैयारी में ही है। हुसेन रोफे ठीक समय पर न पहुँच गये होते तो उन सज्जन ने अपना प्राणान्त ही कर लिया होता।
उक्त घटना की टिप्पणी करते हुये स्वयं हुसैन ने लिखा है कि भविष्य में होते वाली घटनाओं के प्रति चाहते हुये या अनचाहे जो अनुभूति होती है उसका मनुष्य जीवन की मूल समस्याओं के प्रति अत्यधिक कार्बनिक महत्व है। पशु-पक्षियों के बारे में भी हम देखते है कि इनको भविष्य की घटनाओं के बारे में अनुभूति हो जाती है। कोई बड़ा-फसाद, हत्या, लूटपाट या भूकम्प जैसी घटना घटित होनी होती है तो कुत्ते पहले ही एक विशेष प्रकार की डरावनी आवाज में रोने लगते है। आन्तरिक दृष्टि न होने के कारण हम उन सूक्ष्म अनुभूतियों और पूर्व ज्ञान की अवस्था को महत्व नहीं देते पर यदि हम थोड़ा-सा भी ध्यान दे तो वह मानना पड़ेगा कि मनुष्य की चेतना किसी विलक्षण और विश्व–व्यापी चेतना से सम्बन्ध रखती है। उसके गुणों में उसका सनातन होना भी सम्भव है। मनुष्य अपनी आन्तरिक शक्तियों को जागृत करके अपने जीवन की ओर अधिक सुविधाजनक और क्षमतावान् बना सकता है।
पूर्व ज्ञान या भविष्य-दर्शन को लेकर हमारी मान्यतायें और भी गहरी है। हिन्दू-दर्शन यह मानता है कि इस सृष्टि में जो कुछ भी चैतन्य है, यह सब आत्मा ही है। आत्मा ही सर्वत्र व्याप्त है, यही कर्ता और दृष्टा भी है। भूत में क्या था और भविष्य में क्या होना है ? वह सब आत्मा को जानकारी से परे नहीं है, क्योंकि वह सब कालों में विद्यमान् और अखण्ड है। तेजोबिंदूपनिषद में स्वामी कार्तिक के प्रश्न करने पर भगवान् शकर बतलाते हैं-
अखंडकरतो ह्यात्मा अंखडकरसौ गुपः। अखडैकरस लक्ष्यमखंडकरर्स अहः॥
अंखडेंकरसोमंत्र अर्थढेकरसा क्रिया। अखडैकरसं ज्ञानमखंद्वेकरसं वियत्॥ -2।3,
अर्थात्-आत्मा अखण्ड एकरस है गुरु भी वही सच्चा है जो अखण्ड और एकरस है। लक्ष्य अखण्ड एकरस है और तेज भी अखण्ड एकरस है। अन्य अखण्ड एकरस है, ज्ञान अखण्ड एकरस है, जल अखण्ड एकरस है।
इसी प्रकार जीव, ब्रह्मांड और परमात्मा को भी अखण्ड एकरस बताया गया है। तात्पर्य वह कि आत्महत्या ब्रह्म की सम्पूर्ण विभूतियों का ज्ञान जो कि एक सनातन सत्य के रूप में प्रस्फुटित होता है, यह भी अखण्ड है और मनुष्य उस अखण्ड ज्ञान से सम्बन्ध स्थापित कर लेने के बाद विषय की सम्पूर्ण हलचलों का ज्ञान, समीपवर्ती और दूरस्थ वस्तुओं का ज्ञान स्वयं ही प्राप्त करता है।
धार्मिक मान्यताओं और उपलब्धियों में कोई विवाद हो सकता है, किन्तु आत्मा की इन अनुभूतियों के सम्बन्ध में यदि वह सत्य है तो किसी भी दश, किसी भी परिस्थिति और काल में विवाद नहीं आना चाहिये और यही एक बिन्दु है, जहाँ विश्व के सम्पूर्ण धर्म एवं दर्शन एकाग्र होते है और यह मानने लगते हे कि संसार में ऐसी कोई चैतन्य सत्ता है अवश्य जो मनुष्य जीवन का मूत्र लक्ष्य है, यही सब ज्ञान, शक्ति और सामर्थ्यों का स्वामी है। वह पदार्थ की तरह निर्जीव नहीं वरन् कोई चैतन्य पदार्थ है और वही सृष्टि का नियमन करता रहता है।
इस मन्तव्य की पुष्टि करने वाली घटनायें केवल भारतवर्ष में ही नहीं संसार के प्रत्येक क्षेत्र में घटती रहती है ऊपर श्री हुसेन रोफे ने यही बात कही है। श्री मेयर्स ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक कि ह्य मल परसनैलिटी एण्ड हट्स सरवाइबल आफ बाडीसी डेग’ में 13 उदाहरण दिये है, जिसमें ऐसी अद्भुत ज्ञान शक्तियों का विवरण देकर यह बताने का प्रयत्न किया गया है कि ज्ञान की चमत्कारिक क्षमतायें पदार्थ की नहीं हो सकतीं। निश्चय ही वह कोई चेतन-शक्ति का खेल है। इन उदाहरणों में प्रसिद्ध गणितज्ञवास और ऐम्पेयर के उदाहरण भी दिये गये है।
भारतवर्ष में मैस्मरेजम, अँगूठे में दृष्टि जमाना, बिल्सौर दर्पण या पालिश किये हुये लोहे पर दृष्टि जमाकर भूत या भविष्य की घटनाओं का देखने और पता लगाने वाले अनेक चमत्कारी व्यक्ति पाये जाते है, ऐसा ही एक प्रयोग मर जोजैफ वार्नवी ने कराया। एक विशेष प्रकार के शीशे में जब उन्होंने दृष्टि जमाई और अपनी पत्नी का हाल जानना चाहा तो उन्होंने एक महिमा का चित्र देखा जो बहुत बड़िया किस्म के वस्त्र और आभूषण पहने हुई थी। महिला की शक्ल-सूरत तो उनकी धर्मपत्नी से मिलती-जुलती थी पर उन्होंने बताया कि मेरी पत्नी ऐसे आभूषण पहनती ही नहीं, इसलिये उन्हें इस विज्ञान पर विश्वास नहीं हुआ किन्तु जब यह घर लौटे तो यह देखकर आश्चर्यचकित रह गये कि उनकी धर्मपत्नी ठीक वही आभूषण पहनें थी, जो उन्होंने दर्पण में देखा था। तब से वार्नवी भारतीय तत्व-दर्शन से इतना प्रभावित हुये कि उन्होंने समाज भारतीय हुसैन का कक्षा एक के विद्यार्थी की भाँति अध्ययन किया। उनके मस्तिष्क में बहुत दिन तक यह विचार उठता रहा कि जो आत्म शक्ति न देखे हुये को भी देख सकती है, न जाने हुये को भी ज्ञान सकती है, वह अपने आपमें सब प्रकार की भौतिक शक्यों से निःसन्देह परिपूर्ण होनी चाहिये। अपनी इन परिपूर्ण चेतन अवस्था को जानना इसलिये भी आवश्यक है, क्योंकि वही जीव की अन्तिम स्थिति है और उसे प्राप्त कर लेने पर संसार में और कुछ प्राप्त करने की आवश्यकता नहीं रह जाती।
आज वैज्ञानिक ने ऐसे-ऐसे कम्प्यूटर तैयार किये हैं, जिनकी इलेक्ट्रानिक शक्ति उन सब बातों को बता सकती है, जो प्रकृति (नेचर) के गणितीय (मेथेमेटिकल) सिद्धान्त से सम्बन्धित है। कम्प्यूटर शरीर के रोगों का पता बता देते है, लाखों प्रकाश वर्ष दूर के सितारों का दूरी, दिशा और कोण तक बता देते है, किन्तु यह मनुष्य कब मर जायेगा, एक वर्ष, एक माह, एक दिन बाद इस मनुष्य की क्या स्थिति होगी-ऐसा संकेतन ज्ञान के पास और न किसी मशीन में ही है। यह तो किसी आत्म-चेतना की ही शक्ति हो सकती है, जो ज्ञात अज्ञात रूप से लोगों को प्रेरित और प्रभावित करती रहती है। और ऐसे उदाहरण संसार के हर देख में देखने की मिलते है-
पूर्वाभास के सत्य अनुभव (ट्रू एक्सपीरियन्सेज इन एकेमी) नामक पुस्तक के विद्वान् लेखक थी मार्टिन ने ऐसी सैकड़ों घटनाओं का वर्णन किया है, जिसमें अध्याय का भी स्वप्न या साधारण अवस्था में विलक्षण आभास ‘संकेत लैण्डेड टू’ (दो व्यक्तियों की जान) शीर्षक से हेरोल्ड ग्लूक एक घटना इस प्रकार हुआ-
“नवम्बर 1950 की एक शनिवार को हमारे घर कोई उत्सव होने वाला था। एक दिन पूर्व शुक्रवार को ही मेरी धर्मपत्नी ने मुझसे कहा-”आज आप बाहर नहीं जायगा। घर की आवश्यक व्यवस्था में आज आपको साथ घटाना पड़ेगा।” किन्तु उस दिन मुझे ऐसी प्रबल प्रेरणा उठ रही थी कि आज तो समुद्र की सैर के लिये जाना ही चाहिये। मैंने अपनी धर्मपत्नी की बात को कमी ठुकराया नहीं पर मैं स्वयं नहीं जानता कि उस दिन मुझे किस अज्ञात शक्ति द्वारा प्रेरित का जा रहा था कि मैंने जानबूझ कर अपने मित्र जैक को कार लेकर अपने साथ चलने को राजी कर लिया। उस दिन समुद्र में तूफान आने की आशंका की घोषणा मौसम-विभाग के द्वारा की जा चुकी थी, इसलिये मेरी धर्मपत्नी ने समुद्र की ओर जाने से तो बिल्कुल ही इनकार कर दिया, किन्तु मेरे मन में न जाने क्यों कोई बात चिपक नहीं रही थी। मेरा कोई मन भी नहीं था पर भीतर से ऐसा लगता था, तुम्हें समुद्र की ओर जाना ही चाहिये।
निश्चित समय पर गाड़ी आ गई हम और जैक दोनों समुद्र की ओर चल पड़े। हमारे वहाँ पहुँचने से पर्व ही समुद्र भयंकर आवाज के साथ गरजने लग गया था। तटवर्ती मल्लाह पीछे हट चुके थे तो भी मेरे मुख से निकल ही गया-ओ भाई मल्लाह, हमें समुद्र की सैर करनी है, एक वोट तो देना।”
मल्लाह बुरी तरह झल्लाया “आपको दिखाई नहीं देता समुद्र किस तरह उबल रहा है, वोट तो डुबोयेंगे ही आप भी जान से हाथ धो बैठेंगे।” यही बात जैक ने भी कही किन्तु मुझे तो कोई अज्ञात शक्ति खींच रही थी, मैंने कहा-”यह लो वोट की कीमत और एक वोट मेरे लिये छोड़ दो।”
“मेरे हठ के सामने सब परास्त हो गये। वोट, हम और जैक देखते देखते समुद्र की लहरों में जा फंसे। मुझे 200 गज की दूरी पर फुटबाल की तरह कोई वस्तु दिखाई दी। मैंने जैक को इशारा किया तो जैक झल्लाया- ‘‘आज आपको क्या हो गया है, एक साधारण-सी फुटबाल के लिये अपने को मौत के मुख में डाल रहे है।”
मुझे यह बातें भी कुछ प्रभावित न कर सकीं। वोट उधर ही बढ़ा दी। पास पहुंचकर देखता हूँ कि दो नाविक जो समुद्र के तूफान में फँस गये थे, डूब रहे हैं, हमने किसी तरह उन्हें अपनी नाव में चढ़ाया और डोलते डगमगाते किनारे आ पहुँचे।
मेरी इस सहृदयता और साहस को जिसने भी सुना, सराहा। मेरी धर्मपत्नी ने उस दिन मुझे हृदय से लगा लिया। तब से बराबर सोचता रहता है, वह कौन-सी शक्ति थी जो मुझे इस तरह प्रेरित करके यहाँ तक ले गई? क्या ऐसा भी कोई तत्व है, जो अपनी इच्छा से विश्व का सृजन और नियमन करता है, यदि हो तो क्या मनुष्य इसकी स्पष्ट अनुभूति कर सकता है ?
इन प्रश्नों का उत्तर आत्म-चेतना की शोध और परिष्कार द्वारा ही सम्भव है। जड़ पदार्थों में न उसकी अनुभूति कर सकता है। न उसका ज्ञान। पूर्व ज्ञान आत्मा के लिये सम्भव है और उसकी प्राप्ति के लिये यह आवश्यक है कि भौतिक जगत् को ही सब कुछ न मानकर जीव चेतना का भी अनुसन्धान किया जाये।
हाथ, पाँव, नाक, मुख, आंखें सब अपने-अपने महत्व के लिये झगड़ने लगे। यह देखकर मनुष्य को बड़ा गुस्सा आया। उसने खाना बन्द कर दिया। अब सब का एक ही ध्यान था, कहीं से खाना मिले तो जिह्वा रहें। मनुष्य बोला-अब समझ गये, तुम्हारा सबका महत्व तो मिलकर रहने में ही है।
संसार के समराँगण में, जीवन के संघर्ष में वही व्यक्ति स्थिर रह सकता है, जिससे अदम्य आत्मविश्वास विद्यमान् है। यह संसार नाना प्रकार की बाधाओं, विपत्तियों और विरोधी से उसी प्रकार भरा है, जिस प्रकार सागर मत्स्यों, मगरों तथा नकों से भरा होता है। इसीलिये तो संसार को भवसागर भी कहते हैं। आज आये दिन लोभ बड़े-बड़े दुर्लभ्य को पार करते रहते है। समुद्र यात्रियों का वह साधन जहाज होता है। जिस प्रकार समुद्र की भीषण यात्रा का साधन जहाज है, उसी प्रकार भवसागर से संतरण का साधन आत्म विश्वास है। आत्म-विश्वास निश्चय ही एक शक्तिशाली जहाज के समान ही है, जिसमें जीवन रूपी यात्री को बिठाकर इस विशाल भवसागर को आसानी से पार किया पा सकता है।
संसार के जो महापुरुष इस संसार-सागर से पार उतरे हैं, वे सब आत्म-विश्वास के बनी रहे हैं। जिसके पास सदस्य और अडिग आत्म-विश्वास की सम्पत्ति होती है उसके पास कोई साधन हों, न हों यह अपने जीवन को सार्थक तथा सफल बना ही जाता है। साधन तो दूसरी आवश्यकता है, जीवन की सफलता के लिये पहली आवश्यकता है आत्म-विश्वास। साधनों का प्रचुर भण्डार होने पर भी यदि मनुष्य के पास आत्म-विश्वास की कमी है तो वह सफलता के बिखर पर उसी प्रकार नहीं जा सकता, जिस प्रकार हाथ में शस्त्र होते हुए भी कायर व्यक्ति कोई जौहर नहीं दिखना सकता। किन्तु आत्म विश्वास का धनी व्यक्ति साधन हीनता की अवस्था में भी अपना मार्ग प्रशस्त कर लेता है। संसार में चारों ओर साधन ही साधन बिखरे पड़े है। कहीं किसी दिशा में भी तो कभी नहीं है। संसार केवल यह हैं कि आत्म-विश्वासी व्यक्ति पुरुषार्थ और परिश्रम के बल पर उन्हें प्राप्त कर लेता है और विश्वास-हीन व्यक्ति ताकता रहता है। सफलता का मुख आधार आत्म-विश्वास ही है, साधन की प्रचुरता नहीं।
अमेरिका के इतिहास पुरुष अब्राहम लिंकन जितने महान हुए है, उससे कही अधिक वे साधन-हीन थे। अब, वस्त्र, निवास, शिक्षा, सुरक्षा और सहयोग सभी साधनों का अभाव था उनके पास। यदि कोई पारस-मणि थी उनके पास तो वह था, उनका असभ्य आत्म-विश्वास। एक अकेले आत्म-विश्वास के बल पर ही उन्होंने अपने इस असम्भव जैसे संकल्प को पूरा कर दिखाया-’मैंने अपने भगवान् को वचन दिया है कि दासों की मुक्ति के कार्य को मैं अवश्य पूरा करूंगा।”
साधनों के अभाव की शिकायत करते रहने वालों को यदि शिकायत ही करनी है तो वह शिकायत करनी चाहिये कि उनके पास आत्म विश्वास की कमी है। यदि उनके पास आत्म-विश्वास रहा तो वे व्यर्थ में बैठे-बैठे साधन-हीनता की शिकायत न करते रहें, बल्कि कमी और अभाव को पूरा करने के लिये पुरुषार्थ करते नजर आयें। फ्राँस के महान् नायक नेपोलियन के पास प्रारम्भ में कौन से साधन थे, जिनके आधार पर यह फ्राँस का इतिहास पुरुष बना। साधनों के नाम पर उसके पास न तो पेट भर रोटी थी और न तन पर कपड़ा। तब भी उसने न केवल फ्राँस के ही बल्कि संसार के इतिहास में अपना नाम अंकित कराया। उसका वह आत्म-विश्वास ही था, जिसके बल पर उसने साधन अर्जित किये और फ्राँस को एक अदम्य राष्ट्र बनाने का श्रेय पाया। वह उसका अदम्य आत्म-विश्वास ही था, उसके ही शब्दों में इस प्रकार व्यक्त होता रहता था- ‘‘यदि हमारा व्यर्थ रोकता है तो आल्पस् पर्वत ही नहीं रहेगा।” यदि उनके स्थान पर आत्म-विश्वास-हीन कोई दूसरा व्यक्ति होता तो अपने सैनिकों की यह बात सुनकर कि- ‘‘आगे आल्पस् पर्वत है, बढ़ा नहीं जा सकता”-निराश तथा हतोत्साह हो जाता। किन्तु उस अदम्य आत्म-विश्वासी थे अपना विश्वास प्रकट किया जिसका फल यह हुआ कि आल्पस् को काटकर रास्ता निकाल लिया गया।
महान् नाविक कोलम्बस ने महासागर के दूसरी ओर एक विशाल देख का अनुमान किया और तत्कालीन अविकसित जहाज लेकर निशान महासागर की छाती पर लहरों और तूफानों से टक्कर लेता हुआ तैर चला। महीनों के महीनों उसका जहाज उस अतल सागर में चलता रहा। लेकिन किसी देख अथवा द्वीप के दर्शन नहीं हुये। उसके साथी निराश होकर विरोध करने लगे, किन्तु उस अदम्य विश्वासी ने साहस तथा आशा का साथ नहीं छोड़ा वह आशा करता ही रहा अन्त में अमेरिका जैसे देश को खोज ही लिया। उसकी वह विशाल सफलता उसके अखण्ड आत्म-विश्वास के परिपाक के सिवाय और कुछ भी तो नहीं थी। आत्म-विश्वास एक बहुत बल, सम्बल और साधन है।
आज भी लोग आये दिन पचासों मील लम्बी-चौड़ी नदियाँ और उपसागरों को तैर कर पार करते रहते है। मनुष्य का स्वाभाविक बल इतना कहाँ कि वह उस कठिन संतरण को केवल तैरने की कला के आधार पर पूरा कर सकें। यह उनका अदम्य आत्म-विश्वास ही होता है, जो उन्हें थक कर भी थकने और हार कर भी हारने नहीं देता। एक महान् नौका की तरह से जाकर पार लगा देता है। आत्म-विश्वास को मानव-जीवन की नौका ही माना गया है। निश्चय ही वह एक सुदृढ़ नौका के समान ही है। यदि मनुष्यों के पास आत्म-विश्वास न हो तो वे संसार की लाखों आपत्तियों, विपत्तियों, उलझनों और समस्याओं से कैसे पार पा पाये। यह उनका आत्म-विश्वास ही होता है, जो संकटों में भी धीर पुरुषों को सक्रिय तथा साहसी बनाये रहता है। आत्म-विश्वास के समाप्त होते ही मनुष्य का पुरुषार्थ मर जाता है। पराक्रम तिरोधान हो जाता है। आशा और उत्साह के दीप बुझ जाते है। जीवन में भय और आशंकाओं का घटाटोप अंधकार छा जाता है।
मनुष्य में एक नहीं अनेक प्रकार की शक्तियों का भण्डार भरा पड़ा है। वह सब समर्थ ईश्वर का अंश जो है। उसमें उसी प्रकार की दिव्य शक्तियों के न होने की कल्पना करना असंगत हो नहीं अध्याय भी है। किंतु इन शक्तियों का लाभ वही उठा पाता है, जो आत्म-विश्वासी होता है। संसार में ईश्वर की सत्ता विद्यमान है। किन्तु उसका सान्निध्य उसी को नसीब हो सकता है, जो आस्तिक भाव का होता है। नास्तिक उस असीम और अनन्त सत्ता से वंचित रहता है। जो परमात्मा को छोड़ देता है, परमात्मा उसे पहले त्याग देता है। इसी प्रकार जो आत्मा में, अपने में विश्वास नहीं करेगा, वह अपनी उन शक्तियों से वंचित ही रह जायेगा। अविश्वास से अविश्वास का जन्म होता है। जो अपनी आत्मा, अपनी शक्तियों और अपनी क्षमताओं में अविश्वास करता है, उसकी शक्तियाँ भी उसमें अविश्वास करने लगती है। अन्दर ही निरपेक्ष भाव से कोई पड़ी रहती है। जाय कर न तो उसकी सहायता के लिये व्यक्त होती है और न संकट-आपत्तियों में उसकी रक्षा करती है। आत्म-विश्वासी की सारी शक्तियाँ कुण्ठित होकर उठ जाती है।
जीवन-समर जीतने, उपयोगी और महान् कार्य करने के लिये अपने आत्म-विश्वास को प्रज्वलित रखना बहुत आवश्यक है। क्योंकि किसी भी महान् ध्येय की पूर्ति तभी होती है, जब मनुष्य के सारे गुण और सारी शक्तियाँ का नियोजन तथा केन्द्रीकरण का कार्य आत्म-विश्वास द्वारा ही पूरा होता है। आत्म-विश्वास के उठते ही सारी शक्तियाँ स्वतः उठ खड़ी होती है और स्वतः ही पंक्तिबद्ध होकर कार्य का सम्पादन करने के लिये तत्पर हो जाती है। ऐसे प्रबुद्ध पुरुषार्थी के लिये कौन-सा ध्येय, कौन-सा उद्देश्य और कौन-सा लक्ष्य दुःसाध्य हो सकता है। वह तो असम्भव को सम्भव और असाध्य को साध्य बना सकने में समर्थ तथा सफल हो जाता है।
वेद भगवान् के कथनानुसार- ‘‘मनुष्य अमृत की लड़ी हैं। उसका प्राण, उसका जीवन नित्य नई आशा लिये आता रहता है। मनुष्य प्रेरणा का केन्द्र है, प्रकाश धारण करने वाला स्तम्भ है, वह साक्षात् प्रकाश रूप है, वह प्रकाश हे, ज्योति है और अमर आलोक हैं।” मनुष्य में यह सब है तो, किन्तु इसका अनुभव वह तब ही कर सकता है जब ज्वसन्त आत्म-विश्वास से ओत-प्रोत हो। अन्यथा वह माँसा का एक पिण्ड और मिट्टी की एक मूर्ति मात्र ही है। अदम्य आत्म-विश्वास ही मनुष्य का साधारण जीव से असाधारण देवपुरुष बनाता है। स्वामी विवेकानन्द ने ठीक ही कहा है-”विश्वास! विश्वास! अपने में विश्वास, ईश्वर में विश्वास, अपने आत्मदेव की अपार शक्तियों में विश्वास ही मानव-जीवन की सफलता और महानता का रहस्य है।”
आत्म-विश्वास का वास्तविक अर्थ है-अपनी आत्मसत्ता में विश्वास करना। अपने को मांस पिण्ड रूप शरीर न मानकर आत्मा मानना ओर उसी के प्रकाश से प्रेरित होना आत्म-विश्वास का ही रूप है। जो अपनी आत्मा की अजेय सत्ता में विश्वास करता है, अपने जीवन की सार्थकता, महता और उपयोगिता को स्वीकार करता है। उसे अनुभव करता है। वही आत्म-विश्वासी होता है। इस प्रकार का सच्चा आत्म-विश्वासी ही किसी बड़े लक्ष्य का लम्बा रास्ता तय कर सकता है और वही उस पर आई आपत्तियों, संकटों तथा विपत्तियों से टक्कर ले सकता है।
शिक्षा, साधन संपन्नता आदि की कोई भी सुविधा मनुष्य को न तो महान् बना सकती है और न उसके व्यक्तित्व में तेज का समावेश कर सकती है। संसार में ऐसे लाखों मनुष्य मौजूद हैं, जिन्हें साधन-सुविधाओं के साथ तुच्छ तथा हेय स्थिति में पड़ जीवन काटा करते हैं। यदि साधन-सुविधाओं ही मनुष्य के व्यक्तित्व के विकास और उसकी महानता का आधार होतीं तो अवश्य ही हर साधन सम्पन्न व्यक्ति को महान् तथा तेजस्वी होना चाहिये। किन्तु ऐसा होता कदापि नहीं। तेजस्विता और महानता का विकास साधनों में नहीं, अपने प्रति महानता, उदारता तथा आत्म-सत्ता का विश्वास रखने में है। आलोकित पदार्थ के संपर्क में आने पर ही कोई दूसरी वस्तु प्रकाशित हुई है। आग से संपर्क होने पर ही उष्मा उत्पन्न होती है। इसी प्रकार जब मनुष्य विश्वासपूर्वक अपने आत्मस्वरूप के निकट आता है, तभी वह प्रकाशित तथा ज्योतिर्मान बनता है। एक मात्र जड़ पदार्थों का संपर्क उसे आलोकित अथवा प्रकाशित नहीं कर सकता।
जिसे अपनी आत्म-सत्ता में विश्वास नहीं होता, वह अपनी सारी विशेषताओं से रहित होकर परावलम्बी बन जाता है। उनका अस्तित्व ओर आधारहीन जीवन समुद्र की लहरों पर पड़ी अनाथ नौका की भाँति इस उत्ताल भवसागर में आपत्तियों और विपत्तियों के थपेड़े खाया करता है। उसे साधारण समस्याओं तथा उलझनों से ही जब अवकाश नहीं मिल पाता तो कोई उपयोगी तथा महान् कार्य करने के लिये किस प्रकार उत्साहित हो सकता है और किस प्रकार साहस पा सकता है। आत्म-विश्वास ही मनुष्य निबल रहकर समय का क्रीड़ा-कडंक बनकर रह जाता है। परिस्थितियाँ कभी उसे इस ओर फेंकती रहती है और कभी उस ओर धकेलती रहती है। आत्म-विश्वासी में हीन व्यक्ति को चिदानन्द की सम्भावना से पूर्ण इस मानव-जीवन में दुःख-कष्ट और शोक संताप के सिवाय और कुछ नहीं मिल पाता। जो आत्म-अविश्वासी हैं, वह नास्तिक है और जो नास्तिक है उसे आनन्द का ऐश्वर्य भी नहीं मिल सकता।
आत्म-विश्वास मनुष्य को सभी प्रकार के भयों, संदेहों, आशंकाओं तथा भीरुताओं से मुक्त बना देता हे। उसमें साहस, उत्साह, आशा और पराक्रम का संचार करता है। उन्नति के शोभनीय शिखर की ओर प्रेरित ही नहीं करता, बल्कि उसका महानतम सम्बल बनता है। आत्म-विश्वास उन्नति, प्रगति, सफलता तथा सार्थकता का मूलमंत्र है। उसे जगाना ही चाहिये, उसकी वृद्धि तथा समृद्धि करते ही रहना चाहिये।
श्रम बड़ा है या बुद्धि ? इस विषय पर दो स्नातकों में विवाद चल पड़ा। दोनों अपने-अपने दावे की पुष्टि में दृष्टान्त होते रहे थे पर अन्तिम निर्णय न कर पा रहे थे। दीर्घतमा ने दोनों को पास बुलाया और कहा-”वत्स! अब और बुद्धि की सार्थकता पास-पास रहने में ही दोनों में से कोई भी न बड़ा है, न छोटा दोनों का महत्व समान है।
भगवान मनु ने कहा है-
मनः सृष्टि विकुरुते खोद्यमानसिसृक्षया।
-मनु0 1।74-75,
सृष्टि के आरंभ में परमात्मा ने अपनी इच्छा शक्ति से मन (जीवों) को उत्पन्न किया।
सृष्टि की हलचल की ओर ध्यान जमाकर देखें तो यह सत्य ही प्रतीत होगा कि इच्छाओं के कारण ही लोग या जीव क्रियाशील है, यह इच्छायें अनेक भागों में बँटी हुई है-(1) दीर्घ-जीवन की इच्छा, (2) कामेच्छा, (3) धन की इच्छा, (4) मान की इच्छा, (5) ज्ञान की इच्छा, (6) न्याय की इच्छा और (7) अमरत्व या आनन्द प्राप्ति की चिर तृप्ति या मोक्ष। इन सात जीवन धाराओं में ही संसार का अविरल प्रवाह चलता चला आ रहा है। इन्हीं की खटपट, दौड़-धूप, ऊहापोह में दुनियाँ घर की हलचल मची हुई है, इच्छायें न हों तो संसार में कुछ भी न रहे।
इन इच्छाओं की शक्ति से ही सूर्य, अग्नि और आकाश की रचना हुई है। देखने और सुनने में यह बात कुछ चटपटी-सी लगती है, किन्तु वस्तुस्थिति यह है कि जब हम शोक, क्रोध, काम या प्रेम आदि किसी भी स्थिति के होते हैं तो शारीरिक परमाणुओं में अपनी-अपनी विशेषता वाली गति उत्पन्न होती है। परमाणु जो एक ही पदार्थ या चेतना की अविभाज्य स्थिति में होते हैं, भिन्न-भिन्न प्रकार से स्पंदित होते रहते हैं इससे स्पष्ट है कि शरीर की हलचल इच्छाओं पर आधारित है।
अभी यह प्रश्न उठ सकता है कि क्या मूल चेतना में अपने आप इच्छायें व्यक्त करने की शक्ति है। इस बात को वर्तमान वैज्ञानिक उपलब्धियों से भली प्रकार सिद्ध किया जा सकता है। जिन्होंने विज्ञान का थोड़ा भी अध्ययन किया होगा, उन्हें ज्ञात होगा कि जड़ पदार्थ (मैटर) को शक्ति (एनर्जी) अथवा विद्युत (इलेक्ट्रिसिटी) में बदल दिया जाता है। इस बात का पता पदार्थ की अति सूक्ष्म अवस्था में पहुँचकर हुआ। हम जानते है कि परार्थ परमाणुओं से बने है। परमाणु भी अन्तिम स्थिति न होकर उनमें भी इलेक्ट्रान तथा ‘प्रोट्रान’ आवेश होते हैं। प्रोटान परमाणु का केन्द्र है और इलेक्ट्रान उस केन्द्र के चारों ओर घूमते रहने है। यह दोनों अंश छोटे-छोटे टुकड़े नहीं है वरन् यह धन और ऋण आवेश (इलेक्ट्रिसिटी) है, दोनों की सम्मिलित प्रक्रिया का नाम ही परमाणु है। इस दृष्टि से देखें तो यह पता चलेगा कि संसार में जड़ कुछ है ही नहीं। जगत् का मूल तत्व विद्युत है और उसी के प्रकम्पन (वाइग्रध्न) द्वारा स्थूल और सूक्ष्म पदार्थों का अनुभव होता हे। छोटे-छोटे पौधों, वृक्ष एवं वनस्पति से लेकर पहाड़, समुद्र, पशु-पक्षी, रंग-रूप और अग्नि-आयु, शीत, ग्रीष्म आदि सब विद्युत चेतना के ही कार्य है। एक ही शक्त सब पदार्थों के मूल में है। सृष्टि के आविर्भाव से पूर्व एवं ही तत्व था, यह बात इतने से ही साबित हो जाती है।
कृषि विज्ञान के बहुत से पण्डितों ने पदार्थों के अन्दर पाये जाने वाले गुण सूत्रों (क्रोमोसोम) में परिवर्तन करके उनकी नस्लों में भारी परिवर्तन करने में सफलता पाई है। दिल्ली के प्रसिद्ध वैज्ञानिक डा. जी.आर. राव ने मकोय के गुण सूत्रों पर ‘कोल्वौसाइन’ क्रिया के द्वारा प्रभाव डालकर उसे टमाटर की सी नस्ल में परिवर्तित कर दिया। शंकर से हीरा बनाया गया है पर वह वास्तविक हीरे से महंगा पड़ता है। इससे भी यही जान पड़ता है कि पदार्थ की मौलिक चेतना विघटित और संगठित होकर नये-नये पदार्थों का निर्माण कर लेती है। यहाँ यह लगेगा कि यह प्रयोग मानव कृत है, फिर मूल-तत्व की अपनी इच्छा का क्या महत्व रहा ?
वैज्ञानिक यह बताते हैं कि परमाणु में इलेक्ट्रान चक्कर लगाते-लगाते एकाएक अपना स्थान बदल देता है, जिसका कोई कारण नहीं होता उसका यह स्थान परित्याग कार्यकरण सिद्धान्त (ला खाफ कांजेशन) से परे होता है। अर्थात् विद्युत जहाँ एक बद्ध-तत्व हैं, वहाँ उसकी अपनी इच्छा और चेतनता भी है, भले ही वह विद्युत तत्व से कोई सूक्ष्मतर स्थिति हो और अभी उसका अध्ययन एवं जानकारी वैज्ञानिकों को नहीं हो पाई हो। इस मौलिक स्वाधीनता को ला आफ इनडिटरमिलेसी’ के नाम से पुकारा जाता है और उसी के आधार पर अब वैज्ञानिक भी कहने लगे है कि विश्व की सभी वस्तुयें एक दूसरे से सम्बद्ध परस्पर अवलम्बित और एक ही संगठन में पिरोई हुई है। सारा संसार अर्थात् पृथ्वी से लाखों दूर नक्षत्र तक गणित के सिद्धान्तों से बंधे हुए है, वैज्ञानिक सब यह मानने को विवश हुये कि सम्पूर्ण जगत् एक ही भौतिक संस्थान (राशनल सिस्टम) के द्वारा संचालित है। प्रकृति में पूर्ण व्यवस्था और नियम-बद्धता है और वह सब किसी विश्व-व्यापी, स्वेच्छाचारी शक्ति के ही अधीन है।
हम उसका स्वरूप भले ही समझ न पाते हों पर उस सत्ता के अस्तित्व को इनकार नहीं कर सकते। उसी ने अपनी इच्छा से धरती में पुरुष तत्व को पैदा किया। जब अनेक इच्छायें जीवधारियों के रूप में उत्पन्न हुई तो उनमें शक्ति और इच्छा बल के कारण परस्पर संघर्ष हुआ। एक जीव दूसरे को लाने ओर सताने लगा। उससे थोड़े ही दिन में सृष्टि का अन्त दिखलाई देने पर ईश्वरीय सत्ता की किसी सर्वशक्ति सम्पन्न जीवधारी के उत्पन्न करने की कल्पना सूझी होगी। मनुष्य में ही वही क्षमता है जो उपरोक्त सातों इच्छाओं में क्रम ओर अनुशासन, न्याय एवं व्यवस्था बनाये रख सकता है, क्योंकि उसके लिये प्रत्येक उचित शक्ति भगवान् ने उसे दी है, क्योंकि उसके लिये प्रत्येक उचित भगवान् ने उसे दी है, जो और किसी भी प्राणी को नहीं दी। यदि मनुष्य इस बात को भावनाओं की गम्भीरता में उतर कर समझता नहीं और स्वयं भी वास्तविक आचरण करता है, उसे उस योनि में जाने का भगवान् का दण्ड-विधान अनुचित नहीं है। उत्तराधिकार में पाये हुये साम्राज्य और शक्तियों को मनुष्य जैसा विवेकशील प्राणी अपने स्वार्थ में लगाये और विश्व-व्यवस्था या ईश्वरीय आदेश का परिपालन न करे तो यह दण्ड मिलना उचित ही है।
अमीबा से मनुष्य जाति के विकास की पाश्चात्य थ्योरी को समूचे ज्ञान का एक वंश कहा जा सकता है, सम्पूर्ण नहीं। जो शक्ति सूर्य, चन्द्रमा जैसे प्रकाशवान् नक्षत्र शीत, ग्रीष्म, वर्षा जैसी जटिल और व्यापक प्रकृति उत्पन्न कर सकती है, उसे अमीबा से हाइड्रा, जोड़वाला, मछली, मण्डूक, सर्पणशील पक्षी और फिर स्तनधारी जीव के क्रमिक विकास की क्यों आवश्यकता हुई होगी।
विकास की थ्योरी को सत्य मान लें तो वह सोचना पड़ेगा कि अमीबा के एक कोष्ठ से ही स्त्री और पुरुष दो भेद कैसे पैदा हो गये। यदि ‘अमीबा’ के बाद दो कोष्ठ का हाइड्रा’ हुआ तो क्रम से सभी योनियाँ दुगुने परिणाम से क्यों नहीं बढ़ती ? यदि सर्पणशील जीवों से पर-धारी जीव विकसित हुये तो वह कृमि जो पर-धरी होते है और उड़ लेते है वह किस विकास प्रक्रिया पर आधारित हैं ? पक्षी, जीव−जंतु और कीड़े सभी माँस ओर बकरी आदि माँस क्यों नहीं लाते? एक सी स्थिति में उत्पन्न हुये हाथी और हथिनियों में, मुर्गी और मुर्गे में तथा मोर और मोरनी में शारीरिक विकास में अन्तर क्यों पाया जाता है। स्मरण रहे कि हथिनी के बड़े दाँत नहीं होते, मोरनी के लम्बे पंख और मुर्गी के शिर में कलगी नहीं होती। प्राणियों में दाँतों की संख्या और आकृति, प्रकृति में अन्तर पाया जाता है। घोड़े के स्तन नहीं होते, जैसे के अण्डकोष के पास स्तन होते है। यदि याँत्रिक सिद्धान्त पर प्राणियों का विकास हुआ तो पक्षियों की अपेक्षा कछुये और सर्प ने अधिक जीवन क्यों पाया? आदि ऐसी आशंकायें है, जिनसे यह पता चलता है कि मनुष्य अन्य जीवों की विकसित अवस्था न होकर ईश्वरीय इच्छा से प्रकट अपने आप में एक पूर्ण चमत्कार है और वह किसी प्रयोजन के लिये ईश्वरीय इच्छा से ही हुआ है। मनुष्य शरीर की जटिल प्रक्रियायें, चक्रों और ग्रन्थियों की संरचना ऐसी है, जिसे देखकर भी ऐसा लगता है कि मनुष्य का निर्माण किसी बहुत सूझ, समझ और योग्यता के साथ हुआ है, उसमें अन्य जीवों की विकसित स्थिति के लक्षणों का पूर्णतया अपवाद है।
जब तक एक स्थान के वृक्ष वनस्पतियां या जीव अन्य स्थानों में नहीं ले जाये जाते वहाँ उनका अभाव रहता है, इससे भी विकासवाद का सिद्धान्त कट जाता है। भारत के बाघ, सिंह और हाथी होते है, इंग्लैंड में नहीं, साँप, बिच्छू और अन्य गर्मी में पैदा होने वाले प्राणी शीत प्रधान योरोपीय देशों में नहीं होते। अंग्रेज और भारतीय जलवायु के प्रभाव में अपने-अपने वर्ण के होते हैं, रंग−रूप सभी भिन्न होते हैं, यूरोपवासी जब तक नहीं गये थे, आस्ट्रेलिया में खरगोश नहीं थे। जब तक प्राणी कहीं पहुँच कर अपनी संतति का स्वयं विस्तार न कर कोई जीव हो नहीं सकता, मनुष्य के सम्बन्ध में भी यही बात है, उसने अपना विकास तो किया है पर वह भिन्न भिन्न देशों में किसी एक स्थान से विकसित होकर गया है।
इस विकास की थ्योरी को बुद्धि संगत नहीं ताना जा सकता वह हम ऊपर लिख चुके हैं। मनुष्य की आदिम स्थिति और आज की स्थिति की तुलना करें तो लगता हे कि शरीर, स्वास्थ्य, आयु और ज्ञान सब दृष्टि से आज का मनुष्य बहुत छोटा है, विकास की स्थिति में तो मनुष्य को अब तक कुछ से कुछ हो जाना चाहिये या पा प्रकृति में अपने आप विस्तार की क्षमता नहीं है।
इतने वर्ष पूर्व जो भी जीव सृष्टि में पहले आया होगा, उसे लेकर ही चले तो भी यही मानना पड़ेगा कि वह चाहें प्रकृति कहें या परमेश्वर उनमें से किसी की इच्छा या चेतन-क्रियाशीलता के द्वारा ही हुआ होगा। मेन्टल रेडियो क लेखक अप्टन सिक्लेयर के इस कथन से भी वही बात पुष्ट होती है, वे लिखते हैं-हम स्पष्ट रूप से आकस्मिक या ऐच्छिक चेतना का चिन्ह पा रहे हैं-कुछ ऐसे मानसिक पदार्थ (मेन्टल स्टफ) हम सब में समान होता है, हम उसे वैयक्तिक चेतना में ला सकते हैं। हमें यह भी मालूम है कि एक सर्वमान्य (यूनिवर्सल) मानसिक पदार्थ भी उसी प्रकार होता है, जिस प्रकार सर्वमान्य खरीद पदार्थ (यूनिवर्सल वाड़ी स्टाफ) जिससे हमारा निर्माण होता है। हम सब उसी इच्छा से जन्मे हैं।
वैज्ञानिकों के यह सूत्र आगे और भी भारतीय दाबे की स्पष्ट पुष्टि करेंगे और यह बतायेंगे कि मनुष्य का जन्म किसी अज्ञात शक्ति की उद्देश्यपूर्ण इच्छा से हुआ है, उसे वन्य-जीवन के बीच शाँति व्यवस्था, मर्यादा, पुण्य और आनन्द की उपलब्धि के लिये भेजा गया है, ताकि भटकती हुई इच्छायें फिर आनन्द में परिणत हो सके। जो मनुष्य इस ईश्वरीय प्रयोजन को पूरा नहीं करता वह बार-बार उसी वन्य जीवन में कष्ट भोगने का ही दण्ड पाता है।
बगदाद के शासक ने जितना कर सकता था धन-सम्पत्ति जमा की। उसके लिये वह प्रजा पर तरह-तरह के अन्याय और अत्याचार भी करता था। उससे प्रजा बड़ी दुःखी थी। एक दिन गुरु नानक घूमते- घूमते बगदाद जा पहुँचे। खलीफा के महल के सामने ही वह कंकड़ों का छोटा- सा ढेर जमा करके उन्हीं के पास बैठ गये। किसी ने खफीफा को नानक के आने की सूचना दी। खलीफा स्वयं वहाँ पहुँचा। कंकड़ों का ढेर देखते ही उसने पूछा- ‘‘महाराज! आपने यह कंकड़ किस लिये इकट्ठे किये हैं।” गुरु नानक ने मुस्करा कर उत्तर दिया- ”अरे नानक! मैंने तो सुना था तू बड़ा ज्ञानी है पर तुम्हें इतना भी पता नहीं कि कयामत के दिन कोई अपने साथ कंकड़ तो क्या सुई- धागा भी नहीं जा सकतीं।” गुरु नानक ने चुटकी ली- ”मालूम नहीं महोदय, पर मैं आया इसी उद्देश्य से हूँ, कि ओर तो नहीं पर शायद आप प्रजा को लूटकर जो धन इकट्ठा कर रहे हैं, उसे अपने साथ ले जायेंगे तो उनके साथ ही यह कंकड़ भी चलें जायेंगे?” खलीफा समझ गया, इसके आगे प्रजा का उत्पीड़न बन्द कर उनकी सेवा में जुट गया।
जहाँ बाग की तुलना में पूर्वकाल में साधनाओं का इतना बाहुल्य नहीं था वहाँ तब इस संसार में इतने दुखों, दोषों, द्वंद्वों तथा द्वेषों के साथ रोग-शोक तथा सन्तापों का भी बाहुल्य नहीं था। आज जैसे अभाव असन्तोष, अल्पता, असहनीयता, अहंकार, अबोधता, असत्य अथवा शोषण छल-कपट, छीना-झपटी, स्वार्थ एवं संकीर्णता का बोल बाला पूर्वकाल में रहा है-इसके भी प्रमाण उपलब्ध नहीं होते। जीवन साधनों की प्रचुरता के बीच भी मनुष्य का जीवन आज जितना अशान्त एवं अभाव ग्रस्त है, उतना पहले कभी नहीं रहा। साधनों की न्यूनता एवं अल्पता में भी अपेक्षा नहीं अधिक प्रसन्न, पुष्ट तथा सुखी थे।
इस विषय अथवा विरोधाभास का क्या कारण हो सकता है? इसका कारण यही है कि मनुष्य ज्योँ-ज्यों भौतिकता को प्रमुखता देकर बाहों साधनों की दासता स्वीकार करता गया है, त्यों-त्यों उसका मानसिक पतन होता चला गया है, वह सहज मानवीय गुणों से रिक्त होकर मशीन बनता चला गय है। यह प्रेम सौंदर्य तथा मानसिक पुनीतताओं के प्रति निरपेक्ष होकर संकीर्ण एवं स्वार्थी, लोभी तथा लोलुप बन गया है। इस प्रकार को दूषित मनःस्थिति में सुख, संतोष तथा हँसी खुशी की सम्भावना हो भी किस प्रकार सकती है? आज जहाँ एक ओर राजनीतिक, सामाजिक, शैक्षणिक सांसारिक तथा औद्योगिक प्रगति की ओर शक्तियों तथा साधनों को केन्द्रित किया जा रहा है, यहाँ मानसिक क्षेत्र की सर्वथा उपेक्षा की जा रही है। मानसिक विकास, मनोवृत्ति अथवा हार्दिक पवित्रता की ओर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है। आधिभौतिक तथा औद्योगिक अथवा आर्थिक योजनाओं को जितना महत्व दिया जा रहा है, यदि कारण नहीं कि रोग भोग और शोक संतापों की समस्या दूर तक हल न हो जाये।
जीवन की वास्तविक प्रसन्नता तथा हंसी-खुशी के लिये किये जाने वाले बाह्य उद्योगों के साथ साथ यदि मानसिक विकास की योजना का गठबन्धन कर दिया जाये तो आज के सारे साधन मनुष्य की प्रसन्नता बढ़ाने में चार चाँद की भूमिका प्रस्तुत करने लगे। अन्यथा यह बढ़े हुये भौतिक साधन लोभ, लालच, तृष्णा और आवश्यकताओं की वृद्धि करने के अतिरिक्त मनुष्य को कोई भी पुरस्कार न सकेंगे। मनुष्य जिस प्रकार आज, उसी प्रकार आये भी इनकी चमक-दमक में प्रसन्नता पाने के लिये इनके पीछे उसी प्रकार पागल होकर भागता रहेगा जिस प्रकार कस्तूरी मृग-नाभि में ही तत्व होने पर भी बन के वृक्ष, सता, वृम तथा तृणों को सूंघता फिरता है और अपने इसी भ्रम में व्यस्त रहकर जीवन को यातना के रूप में बदल लेता है। भौतिक विकास के साथ-साथ जब तक मानसिक विकास की योजना नियोजित नहीं की जायेगी, मनुष्य के लिये वास्तविक प्रसन्नता पा सकना सम्भव नहीं। साधनों की एकांगी बढ़ोत्तरी मनुष्य को अधिकाधिक आलसी, प्रमादी, अकर्मण्य, ईर्ष्यालु तथा स्वार्थी बनाने के साथ-साथ अतृप्त एवं तृष्णाकुल बना देगी। साधनों के साथ-साथ मनुष्य की कामनायें तथा आवश्यकतायें बढ़ेगी, जिनकी पूर्ति सम्भव नहीं और तब ऐसी दशा में उसका क्षुब्ध एवं असंतुष्ट रहना स्वाभाविक नहीं है। मानसिक आरोग्य नष्ट हो जाने पर भूमि से लेकर स्वर्ग तक के साधन मनुष्य को हंसी खुशी देने में कृतकृत्य न हो सकने। साधनों से आवश्यकताओं की संतुष्टि नहीं, वृद्धि होती, संतुष्टि हृदय का गुण है, मनोभूमि की उपज है, इसे वही जमाना और उगाना है, तभी मनुष्य को वह प्रसन्नता, वह हंसी-खुशी नसीब हो सकती है, जिसकी उसे खोज है और जिसे पाने के लिये उसने इतने साधन इकट्ठे कर रखे है।
जिसने अपने अभ्यास एवं प्रवास से मानसिक स्वास्थ्य एवं विकास की ओर प्रगति कर ली है, उसकी स्थिति में साधनों का होना न होना कोई भी महत्वपूर्ण भूमिका प्रस्तुत नहीं कर सकते। मानो स्वास्थ्य सम्पन्न व्यक्ति के लिये साधनों अथवा सहारों की अपेक्षा नहीं होती। उसकी मनोजन्य हंसी खुशी उसके जीवन में चाँदनी की तरह प्रकाल एवं शीतलता बिछाये हो रहती है। जीवन की अनिवार्य आवश्यकताओं और रहन-सहन के कतिपय साधन ही उसकी स्वर्गीय सुख देने के लिये पर्याप्त होते है। बड़ी-बड़ी बिल्डिंगें, ऊंची-ऊंची कोठियाँ, मोटर, जहाज और हवाई जहाज उसके लिये कोई महत्व नहीं रखते। यह बैंक की ओर तृष्णा भरी आंखों से नहीं देखता, उस आत्मतुष्ट योगी और मानसिक महारथी की न तो अभाव सताता है और न साधन ललचाते है। उसका अपेक्षित वैभव उसके स्वस्थ मानव में प्रसन्नता बनकर योंही बिना किसी हेतु के जगमगाते रहते है। जो वस्तु, जो सम्पदा और जो वैभव हमारी एक मनोवृत्ति पर निर्भर है, जिसका निवास हमारे भीतर है और जिसको हम बिना साधनों के अनायास ही पा सकते है, उसके लिये आकाश-पाताल के कुलावे मिलाने रहना, साधनों और सुविधाओं के लिये रिरियाते रहना अथवा उनके लिये जीवन का दांव हार बैठना बुद्धिमानी की बात नहीं कही जा सकती। अपनी समस्याओं का समाधान साधनों में नहीं, अपने अन्दर खोजिये, अपने मानसिक स्वास्थ्य में अन्वेषण कीजिये। वह वही है और आप अवश्य प्राप्त कर लेंगे।
अनेक ऐसे लोग भी होते हैं, जो वास्तविक प्रसन्नता का निवास साँसारिक साधनों में तो नहीं मानते किंतु यह अवश्य मानते है कि इस संसार से अलग कोई एक ऐसा स्थान अवश्य है, जहाँ पर मनुष्य जीवन की सफलता एवं प्रसन्नता के भण्डार भरे पड़े है- और यह स्थान है ‘स्वर्ग’ किसी प्रकार यदि स्वर्ग को प्राप्त कर लिया जाये तो वास्तविक प्रसन्नता, सुख एवं सौख्य अनायास ही सदा-सर्वदा को मिल जायेगा। तब न तो कुछ करना होगा और संघर्ष की आवश्यकता पड़ेगी, नितांत निष्क्रिय रूप से ये योंही बैठे-बैठे सब प्रकार के आनन्दों का भोग करते रहेंगे। अपनी इस धारणा के आधार पर वे संसार में ही एठ बैठते है और अंधेरे में तीर चलाने की तरह एक अनदेखे तथा अनजाने स्वयं का अन्वेषण किया करते है। मनुष्य की यह धारणा की बुद्धिमत्ता पूर्ण यही कही जा सकती। उनका सारा जीवन और सारी शक्तियां यों ही किसी काल्पनिक स्वर्ग की खोज में नष्ट हो जाती है, किन्तु हाथ कुछ भी नहीं लगता। तब अन्त में उन्हें पश्चाताप के साथ अपनी भूल पर खेद करते हुए महाप्रयाण करना पड़ता है।
अच्छा हो यदि मनुष्य अपने मस्तिष्क से इस धारणा को निर्वासित कर दें कि संसार के आहर स्वर्ग मात्र का कोई ऐसा स्थान, लोक अथवा क्षेत्र है, जिसको प्राप्त कर लेने पर उसकी स्थायी प्रसन्नता की समस्या सदा सर्वदा के लिए हम हो जायेगी। स्वर्ग इस संसार से बाहर अन्यत्र कही नहीं है, वह यही इसी प्रकार में आप के मनोमन्दिर में विराजमान है, उसे कभी भी अपने वाँछित प्रयत्नों से बाहर प्रतिबिम्बित किया जा सकता है। जहाँ प्रेम, पवित्रता, सहृदयता, सहयोग, त्याग एवं उदारता का वातावरण मौजूद है, यहाँ स्वर्ग नहीं तो और क्या हे? जिसका हृदय वासनाओं, तृष्णाओं कामनाओं तथा आवेग उद्वेगों से मुक्त है वह स्वर्ग में ही तो निवास करता है। स्वर्ग हमारे अन्दर बाहर सर्वत्र बिखरा पड़ा है। किन्तु यदि हमारे हृदय में असन्तोष, ईर्ष्या द्वेष पाप एवं पश्चाताप की चितायें जग रही है, वासनाओं तथा वितृष्णाओं का धुंआधार हो रहा है, आँखों पर भौतिकता की चमक चडी हुई, साधनों का लोभ भरा हुआ है और किस प्रकार देख सकते है। अपने मानसिक मत्रों को दूर करिए, दृष्टि पथ से लोभ एवं स्वार्थ के अवरोधों को दूर करिए, अपने मस्तिष्क में दैवी भावनाओं की कृषि कीजिए, अपने चारित्रिक विकास से देवों की स्थिति प्राप्त करिए और तब देखिए कि स्वर्ग आप में और आप स्वर्ग में ही निवास कर रहे है। वही इसी संसार में आपकी समस्या का समाधान आपको हस्तगत हो गया है। न कही दूर खाने की आवश्यकता पड़ेंगी और न संसार से रूठ कर विमुख होकर अपने को लगाने-सताने की आवश्यकता। निश्चय मानिये कि आप स्वर्ग में ही निवास कर रहे है। किन्तु आपके मनोविकारों, वासनाओं, अनियन्त्रित कामनाओं, स्वार्थों और संकीर्णता ने उनके सुख सौंदर्य को उसी प्रकार निष्प्रभाव का दिया है। जिस प्रकार किसी भी सर्व सुन्दर कमरे को जूते की लगी हुई थोड़ी सी गन्दगी अपावन एवं नारकीय बन लेती हे। शुद्धि एवं सात्विकता का विकास कीजिए और यथास्थान एवं स्थिति में स्वर्गीय सुख-शाँति का प्रसाद पाइये।
यह भूल जाइये कि वास्तविक सुख शाँति का निवास नैतिक साधनों की प्रचुरता में है, किन्तु यह याद रखिए कि उसका निवास मानसिक उत्कर्ष में ही है। जिसका साधारण सा अर्थ है कि अपनी मनोभूमि को अतिशयताओं के घास-फूँस व कुश कंटक से आवृत न होने दीजिए। जो कुछ आपको प्राप्त है, उसमें संतुष्ट रहिए और आर्थिक पाने की चेष्टा करते रहिए, अति कामनाओं अथवा अतिशयता के अभिशाप से अपनी रक्षा कीजिए जीवन के प्रति रुचि, संतोष और आस्था की भावना रखिये और अभाव के घाव को अपने निकट मत फटकने दीजिये। सगी के साथ प्रेम एवं एवं सहानुभूति का व्यवहार कीजिए और श्रद्धापूर्वक अपने कर्तव्यों काक पालन करते हुए जीवन यापन करिए और देखिए कि आपकी प्रसन्नता आपके पास विराजमान है।
गुरुकुल का प्रवेशोत्सव समाप्त हो चुका था, कक्षायें नियमित रूप से चलने लगी थी और अध्यात्म पर कुलपति स्कन्ध देव के प्रवचन सुनकर विद्यार्थी बड़ा संतोष और उल्लास अनुभव करते है।
एक दिन प्रश्नोत्तर काल में शिष्य कौस्तुभ ने प्रश्न किया- “गुरुदेव! क्या ईश्वर इसी जीवन में प्राप्त किया जा सकता है?”
स्कन्ध देव! एक क्षण चुप रहे। कुछ विचार किया और बोले- “इस प्रश्न का उत्तर तुम्हें कल मिलेगा और हाँ आज साँयकाल तुम सब लोग निद्रादेवी की गोर में जाने से पूर्व 108 बार वासुदेव मंत्र का जप करना और प्रातःकाल उसकी सूचना मुझे देना।”
प्रातःकाल के प्रवचन का समय आया। सब विद्यार्थी अनुशासन बद्ध होकर आ बैठे। कुलपति ने अपना प्रवचन प्रारम्भ करने से पूर्व पूछा-” तुममें से किस किस ने कल साँयकाल सोने से पूर्व कितने कितने मंत्रों का उच्चारण किया।” सब विद्यार्थियों ने अपने अपने हाथ उठा दिये। किसी ने भी भूल नहीं की थी। सबने 108-108 मंत्रों का जप और भगवान का ध्यान कर लिया था।
किन्तु ऐसा जान पड़ा- स्कन्ध देव का हृदय क्षुब्ध है, वे संतुष्ट नहीं हुए। उन्होंने चारों ओर दृष्टि दौड़ाई। कौस्तुभ नहीं था, उसे बुलाया गया। स्कन्ध देव ने अस्त व्यस्त कौस्तुभ के आते ही प्रश्न किया- “कौस्तुभ! क्या तुमने भी 108 मंत्रो का उच्चारण सोने से पूर्व किया था।”
कौस्तुभ ने नेत्र झुका लिये विनीत वाणी और सौम्य मुद्रा। उसने बताया- “गुरुदेव! अपराध क्षमा करें- मैंने बहुत प्रयत्न किया किन्तु जब जप की संख्या गिनने में चित्त चला जाता तो भगवान का ध्यान नहीं रहता था और जब भगवान का ध्यान करता तो गिनती भूल जाता। रात ऐसे हो गई और व्रत पूर्ण न कर सका।”
स्कन्ध देव मुस्कराये और बोले- बालको! कल के प्रश्न का यही उत्तर है। जब संसार के सुख सम्पत्ति भोग की गिनती में गल जाते है तो भगवान का प्रेम भूल जाता है, उसे तो कोई भी पा सकता है, बाह्य कर्मकाँड से चित्त हटाकर उसे कोई भी प्राप्त कर सकता है।
वाशिंगटन के किसी वर्ष में श्रीयुत रेगरेन्ड आर्थर फोर्ड का भाषण था। मृतात्माओं को बुलाने और उनका जीवित मनुष्यों के साथ सम्बन्ध स्थापित करने में फोर्ड की उन दिनों अमेरिका में वैसी ही ख्याति थी, जिस तरह आज कल भारतवर्ष में अहमदनगर के श्री. बी.डी. ऋषि और उनकी धर्मपत्नी की चर्चा है। श्रीमती रूथ मांटगुमरी ने फोर्ड के बारे में अनेक बातें सुनी थी। वह स्वयं भी अमेरिका की प्रख्यात महिला थी और जीन डिक्सन के संपर्क में आने के बाद में आत्मा, मृत्यु, परलोक पुनर्जन्म आदि पर विस्तृत खोज कर रही थी। एक दिन एक लाइब्रेरी में उन्हें श्री शेरवुड एडी की प्रसिद्ध पुस्तक ‘आप मृत्यु के बाद भी जीवित रहेंगे, (यू बिल सरवाइब आफ्टर डेव) पढ़ी। उसमें फोर्ड की उपलब्धियों की विस्तृत चर्चा थी। श्री एडी विश्व के विख्यात लेखक थे। पूर्व में बाड॰ एम॰ सी0 के संस्थापक भी वही थे, इसलिये श्रीमती रूथ मांटगुमरी ने निश्चय दिया कि जब एडी ने भी फोर्ड की उपलब्धियों को सत्य और प्रामाणिक माना है तो उनसे मिलकर निःसंदेह अनेक तथ्यों का पता लगाया जा सकता है। तभी से वे इस प्रयत्न में थी कि कहीं फोर्ड से भेंट की जाये। सौभाग्य ही था कि आज फोर्ड स्वयं किसी आध्यात्मिक भाषण के सम्बन्ध में वाशिंगटन पधारे थे। श्रीमती रूथ मांटगुमरी ने अवसर खोना ठीक नहीं समझा। वे फोर्ड से मिली और विस्तृत विचार-विमर्श के लिये और समय की माँग की। फोर्ड ने दो दिन याद आने की स्वीकृति दे दी।
दो दिन बाद श्रीमती रूथ मांटगुमरी फोर्ड से नियत स्थान पर फिर मिली और उनसे पूछा - क्या यह निश्चित है कि मृत्यु के बाद जीवन का अन्त नहीं हो जाता वरन् आत्मायें अपनी गतिविधियाँ और क्रिया-कलाप उसी प्रकार जारी रखती है, जिस तरह जीवित मनुष्य?
फोर्ड ने उत्तर दिया- “मृत्यु के पश्चात् भी आत्मायें दूसरे लोकों में जाकर बराबर आध्यात्मिक उन्नति के प्रयत्न में रहती है, जब तक लोक की प्राप्ति नहीं होगी तब तक उनका यह प्रयत्न बराबर बनता रहता है। आध्यात्मिक उन्नति के लिये यह आत्मायें दूसरे लोगों, विशेष कर अपने प्रियजनों को संदेश भी पहुँचाना चाहती है पर उन सूक्ष्म संकेतों को जब लोग नहीं पकड़ पाते, इसलिये उनके संदेश निरर्थक जाते रहते है पर कई आत्मायें इतनी बलवान् होती है कि वे अपनी बात किसी माध्यम से व्यक्त कर सकती है और लिख भी सकती है, वह बातें वर्तमान् से सम्बन्ध रखने वाली हो सकती है, यही मृतात्माओं के अस्तित्व का सबसे बड़ा प्रमाण है।
श्रीमती रूथ इतनी आसानी से यह बातें मान लेने वाली नहीं थी। प्रत्येक मनुष्य के जीवन में ऐसी जिज्ञासायें उठती है, किंतु चिन्तन के अभाव में, विश्लेषण अथवा प्रमाणों के अभाव में वह रहस्य मुंदे के मुंदे रहे जाते है। एक बार बालक नचिकेता को भी ऐसी ही प्रबल जिज्ञासा उठी थी, उसने भी यमाचार्य से ऐसा ही प्रश्न किया था-
ये यंप्रेते विचिकित्सा मनुष्यें अस्तीत्येके मत्यमस्तीति जान्ये।
एतद्विबामनुन्निष्ट स्वयाहं वराणःमेव वरस्तृतीयः॥
-करु. उप. 1-20,
“आचार्य देव! मरे हुये मनुष्य के विषय में बड़ा भ्रम है। कुछ लोग कहते है, मृत्यु हो जाने पर भी बीज बना रहता है। कुछ कहले है, उसका नाश हो जाता है। सो आप मुझे उसका निश्चित निर्णय करके बताइये सत्य क्या है ?”
यमाचार्य ने नचिकेता को तब योगाभ्यास कराया और उसके द्वारा उसने यह जाना कि जीव किस प्रकार मृत्यु के उपरान्त यमलोक, प्रेतलोक, वृक्ष, वनस्पति आदि योनियों, भुवर्लोक आदि में जाता है और यहाँ की परिस्थितियों का वर्तमान जीवन की तरह उपयोग करता है। योग द्वारा सूक्ष्म शरीर के अदृश्य ज्ञान को स्थूल रूप में प्राप्त कर लेते है, शर्षी की विद्या किसी समय भारतवर्ष में बहुत अधिक प्रचलित थी। लोग पितरों से जीवित मनुष्यों की तरह सम्बन्ध स्थापित कर लेते थे, अब भी उस विद्या के जानकार छिट-पुट योगी है अवश्य, पर उनका दृष्टिकोण भी नितांत स्वार्थपूर्ण और व्यवसायिक है। संसार के कल्याण अथवा एक नये विज्ञान की खोज का भाव उनमें नहीं पाया जाता, यह विद्या धीरे-धीरे पश्चिम को जा रही है। पिछले 100 वर्षों में वहाँ इस संबंध में विस्तृत खोजे हुई है। बड़े-बड़े पदार्थ वेत्ताओं ने यह माना है कि मृत्यु के बाद चेतना दूसरे कोषों में बना रहता है, प्रोफेसर कुक्स, ब्रंटन और सर ओलिवर लाज ने इन विषयों पर बहुत अधिक लिखा है। श्रीमती रूथ मांटगुमरी ने तो अपना जीवन ही इस कार्य में लगाया और संसार को एक नये विज्ञान की प्रेरणा दी, यह घटना उनकी विस्तृत शोभा का ही एक अंग है।
अपनी बात फोर्ड ने समाप्त की तो श्रीमती रूथ मांटगुमरी ने उनसे पूछा- क्या आप ऐसी किसी आत्मा को बुलाकर मुझसे परिचय करा सकते है, जिसे में पहले से जानती होऊँ, जिससे मैं सत्य और असत्य का पता लगा सकूँ?
फोर्ड एक सोफे पर आराम से बैठ गये। दोनों आंखें एक काले रूमाल से बाँध ली। रूथ ने पूछा गया बत्ती बुझा देनी चाहिये पर फोर्ड ने कहा- उसकी कोई आवश्यकता नहीं है। थोड़ी देर बाद एक आवाज आने लगी, यह आवाज यद्यपि फोर्ड के मुख से ही आ रही थी पर उनकी आवाज से बिल्कुल भिन्न। उसने बताया यह लो श्रीमती रूथ तुम्हारे चाचा तुम से भेंट करना चाहते है। इनका नाम फ्रेन्ड बैंनेट है। यह बहुत समय पहले अफ्रीका में पादरी (प्रीचर) थे।”
श्रीमती रूथ तुरन्त बोली- “नहीं, नहीं यह गलत है मेरे इस नाम के कोई चाचा नहीं थे, न ही इस नाम के किसी व्यक्ति को जानती हूँ।” इसके बाद माध्यम (फोर्ड) देखकर बोलना आरम्भ किया- वह भी तुम्हें नहीं जानते उनका कहना है कि तुम्हारे पति उन्हें खूब अच्छी तरह जानते हैं, तुम्हारे पति का नाम ‘बाब’ है, तुम उनसे घर आकर पूछना और हाँ, अब तो यह तुम्हारे पिताजी उपस्थित है। वे अपना नाम ‘ट्रा’ बता रहे है। श्रीमती रूथ यह सुनते ही चौंकी- वस्तुतः उनके पिता का यही नाम था।
माध्यम ने आगे बोलना आरम्भ किया- “श्रीमती रूथ - आपके पिता आपको और आपकी माता जी को प्यार कहते हैं, ये बताते हैं कि जब उनकी मृत्यु हुई थी, तब तुम उनके पास नहीं थी। ये काफी बीमार थे और उनकी एकाएक मृत्यु हो गई थी। मर कर थोड़ी देर में उन्हें अपने रोग का भी पता नहीं रहा। ये स्वस्थ अनुभव कर रहे है, वे कह रहे है- ‘यहाँ किसी प्रकार की बीमारी नहीं है, मनुष्य हमेशा एक-सी अवस्था में रहता है, न वह बूढ़ा होता है, न बालक और न युवक। और हाँ देखो तुम्हारी माता जी यहाँ नहीं है, ये तुमसे काफी दूर है अभी कुछ दिन तक आयेंगी भी नहीं, उन्हें मैं देख रहा हूँ, उनकी टाँग में कई दिन से दर्द हो रहा है।”
उक्त दोनों व्यक्तियों के अतिरिक्त कई और जानी, अनजानी आत्माओं का परिचय श्रीमती रूथ से कराया गया। अपनी पुस्तक ‘सत्य की खोज में’ (इन सर्च आफ ट्रुथ) में वे स्वयं लिखती है- “कई पहचानी हुई आत्माओं की बातें इतनी सत्य थी कि’ मैं आश्चर्य - चकित रह गई। मेरे पिताजी ने जो-जो बातें बताई सब सच थी। सचमुच ही जब वे बीमार थे तब मैं अखबार के काम से इजिप्ट गई थी, मुझे इजिप्ट में ही तार द्वारा उनके निधन की सूचना दी गई थी। जब मैं लौट कर आई तब दो दिन बीत चुके थे, पिताजी किसी बीमारी से ही मरे थे, यह भी मुझे अच्छी तरह मालूम है।”
“सायंकाल मैंने एकाएक माताजी को टेलीफोन किया तो उन्होंने बताया कि सचमुच उनके एक पैर में कई दिन से बुरी तरह से कष्ट है और उन्हें लौटने में काफी समय लगेगा। इसी प्रकार बाब ने मुझे बताया कि मेरी मौसी फ्रेंड बैगेट नाम के एक पादरी को व्याही थी। वे काँपों (अफ्रीका) में ही रहते थे।”
इन दोनों घटनाओं में श्रीमती रूथ ने जहाँ वर्तमान् के सत्यों को स्वीकार किया है, यहाँ यह भी लिखा है कि यदि मृतात्माओं द्वारा बताई हुई भूत व वर्तमान की बातें सच होती है तो वे मृत्यु के अनन्तर अपने अस्तित्व के बारे में भी वो कुछ कहते है, उसे सत्य मानने से इनकार करना दुराग्रह ही होगा। उसे सत्य मानकर मानव समाज अपना अहित ही करता है क्योंकि उससे एक अत्यन्त आवश्यक और उपयोगी वास्तविकता पर पर्दा पड़ जाता है।”
माध्यम के द्वारा मेरे पिता ने कहा था- मैं तुम्हें एक ऐसे रहस्य का उद्घाटन करता हूँ, जो विश्व की सबसे बड़ी आवश्यकता है, वह यह कि हम एक ऐसे संसार में रह रहे है, जिसमें स्थूल की तरह सब कुछ दृश्य है, सब कुछ अनुभव गम्य है, जहाँ बराबर उन्नति होती रहती है। हम शून्य (बैकुबम) में नहीं रह रहे पर यहाँ सबको मनोरंजन से रहना पड़ता है यहाँ बेकार बैठकर कोई प्रसन्न नहीं रह सकता, जितना शरीर से काम कर सकता था उससे अधिक काम में अब भी कर सकता हूँ। तुम जानती होगी मुझे गाने का शोक था, मैं अभी भी संगीत का अभ्यास करता हूँ।”
“यह बातें सुनने वाले को अटपटी अवश्य लगती है, किंतु देर तक अध्ययन और खोज करने के पश्चात् मुझे इनकी सत्यता में अविश्वास नहीं रह जाता।” यह शब्द स्वयं श्रीमती रूथ मांटगुमरी ने स्वीकार किया है और उसके साथ अमेरिका की उस जबर्दस्त घटना को जोड़ा है जिसके बारे में वहाँ बहुत दिन तक व्यापक हलचल मची रही।
यह घटना भी फोर्ड ने माध्यम के द्वारा बताई- जिस समय श्रीमती रूथ को मृतात्माओं से परिचय कराया जा रहा था, माध्यम (फोर्ड जो मृतात्माओं को बुलाकर उनसे संकेत प्राप्त करके रूथ को बताता था) ने बताया - आपसे कोई जज बात करना चाहते है वह सैफ्टे शहर में आपके घर के समीप ही रहते थे, एक दिन अचानक कही गायब हो गये बाद में डूब जाने से उनकी मृत्यु हुई थी, शव का सड़ा हुआ ढाँचा अब भी वहाँ पड़ा देखा जा सकता है।
श्रीमती रूथ ने वहाँ तो यही कहा कि मुझे ऐसे किसी पड़ौसी का पता नहीं है, किंतु घर आकर उन्होंने सैफ्टे कूरियर जनरल के सम्पादक से टेलीफोन पर पूछा तो उसने बताया- “हाँ, हाँ आपके मकान के पास पार्किन्सन नामक एक सज्जन अवश्य रहते थे। ये ‘युणाड्रेड होर्ड आफर अपील्स’ में जज थे। ये एक बार एकाएक गायब हो गये। सात राज्यों के सम्मिलित प्रयत्नों के बाद भी उनका कही पता न चला। बेक शोर होटल के समीप मिलगन झीलके किनारे उनका एक हैट और खाता अवश्य मिला था पर उनके डूबकर मर जाने का कोई प्रमाण न मिलने के कारण उनके स्थान पर कोई परमानेन्ट जज की नियुक्ति नहीं की गई थी। उनका वेतन उनके बैंक खाते में जमा किया जाता रहा है।”
सबसे आश्चर्यजनक बात यह थी कि थोड़े दिन बाद ही उनका सड़ा हुआ ढाँचा पानी में तैरता हुआ पाया गया। इन घटनाओं से इस बात की पुष्टि होती है कि जीवात्मा नहीं, शरीर मरता जीता है और मृत्यु के बाद भी जीवन का विकास-क्रम बन्द नहीं होता। गीता में, भगवान् कृष्ण ने भी यही बात कही है-
न छायते भ्रियते या कदाचित्रय मूत्या भविता या न भूयः।
अजों नित्यः आश्चतोऽयं पुराणों न हम्वते हन्यमागे शरीरे॥
-गीता 2 अध्याय।20,
अर्थात् यह आत्मा न तो कभी जन्म लेता है और न मरता है, यह तो अजन्मा, नित्य शाश्वत और पुरातन है, मरना-जीना तो शरीर का धर्म है, शरीर का नाश हो जाने पर भी आत्मा का नाश नहीं होता।
योगवाशिष्ठ में लिखा है-
न जायते भ्रियते चेतनः पुरुषः क्वचित्। स्वप्नं संध्रमवड् भ्राँतमेंतत्पश्यनि केवलम्॥ 3।55।67,
पुरुश्चेतना माजं स कवा क्लेव तश्चति। चेतन व्यतिरिक्तत्ये वदाम्पक्तिं पुभान्यवेत्॥ 3।54।68,
आत्मा न कभी जन्म लेता है और न मरता है। भ्रमवश स्वप्न की-सी स्थिति का अनुभव किया करता है। पुरुष तो चेतन मान है वह नष्ट नहीं होता। लाखों शरीरों का नाश हो जाने पर भी चेतन आत्मा अक्षय स्थित रहता है।
इस घटना के पश्चात् श्रीमती रूथ ने यह विद्या कैसे सीखी और किस प्रकार स्वयं लेखन का उन्होंने अभ्यास किया। एक पेन्सिल किस तरह अदृश्य बातें लिखती है, वह पाठक अगले अंक में पड़ेंगे।
महानता की प्राप्ति महत्वाकांक्षाओं की प्रेरणा से ही होती है। इसमें किसी प्रकार भी संदेह नहीं है। प्रथम तो महत्वाकाँक्षा महान् मानस की साली है। इसके महत्वाकाँक्षा महाकर्तृत्व का उद्बोधन करती है। जिसमें जिस प्रकार की आकांक्षा होती है, वह उसी प्रकार का मार्ग तथा उसी प्रकार की गतिविधि को अपनाता है और उसे पूरा करने के लिये उसके अनुरूप ही साहस तथा कष्ट सहिष्णुता का अनुसरण किया करता है। यदि उसकी आकाँक्षा प्राणवती तथा सच्ची है तो वह उसके लिये उतना ही त्याग एवं बलिदान करने को तत्पर रहता है।
जिसकी इच्छायें छोटी-छोटी तथा सामान्य शारीरिक आवश्यकताओं तक ही सीमित रहती है, वह उसी परिधि तक अपनी गतिविधियों को बढ़ाता है। उसके आगे बढ़ने की न तो उसे प्रेरणा होती है और न साहस। उस सीमा से आगे उसकी कल्पना की गति भी नहीं होती।
इच्छा से ही मनुष्य प्रेरणा प्राप्त करता है और प्रेरणा के अनुसार ही गतिविधि अपनाता है। मनुष्य की क्रियायें उसकी इच्छाओं का ही तो खेल है। जो महान् आकाँक्षायें रखता है, वह उसी के अनुसार कार्य कर महान् बन जाता है और जो छोटी और ओछी आकाँक्षायें रखता है, वह क्षुद्र तथा नगण्य बना रहता है।
महत्वाकाँक्षा का अर्थ है सामान्यता से बढ़कर इच्छा करना और उसकी पूर्ति से उस क्षेत्र में अन्यों से बढ़कर स्थिति तथा स्थान पाना।
धन का क्षेत्र ले लीजिये, गुजारे के लायक कमा लेने की कामना आकाँक्षा के रूप में कोई महत्व नहीं रखती, यह तो आवश्यकताओं की पूर्ति की मजबूरी है। उससे आगे बढ़कर ऊँचे स्तर से रहने और सम्पत्ति जमा करने की इच्छा सामान्य कामना से कुछ आगे की बात है, किंतु जब यही कामना मिल मालिक बनने, संसार के धन-कुबेरों में गणना कराने और बड़े-बड़े उद्योगपतियों में नाम सिखाने की इच्छायें बन जाती है, तब यह महत्वाकाँक्षा बन जाती है। सामान्यता से विरलता की स्थिति में पहुँचने की कामना ही महत्वाकाँक्षा है।
महत्वाकाँक्षा के एक दूसरे से विपरीत दो रूप होते है। एक शुभ और दूसरा अशुभ। उसी प्रकार उनकी पूर्ति असम्भव होने पर भी शुभ महत्वाकाँक्षी चरित्र नायक की तरह उज्ज्वल पृष्ठ में और अशुभ महत्वाकाँक्षी इतिहास के मलीन पृष्ठ पर अंकित होते है। इस प्रकार ऐतिहासिक होने पर भी एक विरल पुरुष महान् एवं यशस्वी माने जाने है और दूसरे विरल व्यक्ति पतित और कलंकी एक श्रद्धा और सम्मान के साथ देखे-सुने और याद किये जाते है, दूसरे घृणा एवं तिरस्कार के साथ। दोनों ने अपनी लक्ष्य प्राप्ति में चाहे समान ही त्याग बलिदान अथवा कष्ट सहन क्यों न किया हो, कितना ही परिश्रम, प्रयत्न एवं उद्योग क्यों न किया हो, किंतु शुभ अथवा अशुभ के साथ संसार का यह भिन्न दृष्टिकोण अवश्य बना रहेगा।
संसार को विजय करने की इच्छा रखने वाला सिकन्दर निःसंदेह महत्वाकाँक्षा व्यक्ति था। उसकी आकाँक्षा बहुत ही बड़ी और विरल थी। इसे मूर्तिमान् करने के लिये उसने बहुत बड़ा त्याग किया, अपार कष्ट उठाये और अनन्त उद्योग किया और उसने अनेक देशों पर अपनी विजय वैजयन्ती भी फहराई तथापि विरल व्यक्ति होने पर भी वह इतिहास के उज्ज्वल पृष्ठ पर लिये जाने का गौरव प्राप्त न कर सका, इसका एक मात्र कारण यही था कि उसकी महत्वाकाँक्षा अशुभ थी। उसकी विजय के पीछे कोई भी माँगलिक उद्देश्य न था। उसकी महत्वाकाँक्षा उसके व्यक्तिगत दम्भ और शक्ति प्रदर्शन की उद्धतता से दूषित थी। उसने अपने व्यक्तिगत अहंकार को तुष्ट करने के लिये न जाने कितने देशों को रौंद डाला, हजारों - लाखों निरपराधों को मौत के घाट उतारा और अपनी सेना के असंख्यों सैनिकों को निरुद्देश्य समराग्नि में आहुति बना डाला। निरर्थक अशाँति, अराजकता, युद्ध और रक्तपात का दोषी होने के कारण ऐतिहासिक होकर भी सिकन्दर महान् न बन सका। यद्यपि अनेक लोग उसे सिकन्दर महान् की पदवी देते है, किंतु उसको महान् मानने वाले व्यक्ति उस जैसी ही आततायी वृत्ति के हो सकते है। प्रत्युत कोई भी निष्पक्ष और बुद्धिमान् व्यक्ति सिकन्दर को उसकी उस विजय के लिए महान् मानने को तैयार न होगा। यह तो उसे रणलिप्सु तथा रक्त-रंजक ही कहेगा। एक अशुभता के कारण ही सिकन्दर का सारा बलिदान, व्याय तथा उद्योग असफल होकर रह गया, जिसका फल उसके लिए ऐतिहासिक अपकीर्ति के सिवाय और कुछ न जा सका।
चाणक्य राजनीति क्षेत्र का महान् व्यक्ति है। यद्यपि उसने अन्य तथा आम्भीक जैसे राजाओं को आमूल नष्ट कर डाला। अनेक युद्ध कराये ही नहीं उनका नेतृत्व भी किया। जहाँ तक रक्तपात का प्रश्न है, चाणक्य के जिम्मे भी यह बात आती है। तथापि राजनीति क्षेत्र का वह एक विरल व्यक्तित्व है और इतिहास के उज्ज्वल पृष्ठ में अंकित है और लोक में श्रद्धा तथा सुयश का भागी है।
सिकन्दर तथा चाणक्य दोनों युद्ध के हेतु रहे। किंतु सिकन्दर कलंकित और चाणक्य यशस्वी। इसका एक मात्र कारण यही है कि चाणक्य का उद्देश्य उसकी महत्वाकाँक्षा का ध्येय और उसके सारे युद्धों का लक्ष्य शुभ था। जहाँ विजय के पीछे सिकन्दर की यह महत्वाकाँक्षा थी कि वह सारे संसार का एक छत्र शासक बने, संसार उसकी अपराजेय शक्ति के सम्मुख नमन करे, उसका साम्राज्य विस्तार हो और मानव-जाति उसकी दास बने। वहाँ चाणक्य की महत्वाकाँक्षा यह थी कि देश की राजनीतिक अव्यवस्था तथा अस्तव्यस्तता दूर हो। शासन में स्थिरता जाये। छोटे-छोटे राज्यों के रूप में खण्ड-खण्ड देश एक ओर एक राष्ट्र बने। राजाओं की अनीति और अत्याचार का दमन हो, नन्द जैसे राजाओं का उन्मूलन हो, जनता का बास दूर हो, सब और सुख-शाँति और व्यवस्था की परिस्थितियाँ दिखाई देने लगे। राष्ट्र एक संगठन और एक राजनीति सूत्र में बद्ध हो। इसकी शक्ति बढ़े, आचरण उज्ज्वल हो और देश से विदेशियों का भय दूर हो।
जहाँ सिकन्दर की महत्वाकाँक्षा उसके शक्ति-दर्प और व्यक्तिगत अहंकार से प्रेरित थी वहाँ चाणक्य की महत्वाकांक्षा का आधार देश-शक्ति, राष्ट्र-शक्ति, समाज के हित और लोक रंजन ही था। उसका उसमें यत्किंचित भी अहंकार अथवा स्वार्थ न था। यही शुभ और अशुभ का अन्तर था, जिससे दोनों की महत्वाकाँक्षाओं ने दोनों की ऐतिहासिक स्थिति में आकाश पाताल का अन्तर कर दिया।
मनुष्य को महत्वाकाँक्षी होना चाहिये महत्वाकाँक्षा से ही मनुष्य महान् बनता है। बिना ऊंची कल्पना और आकाँक्षा के वह योंही सामान्यतर स्थिति में पड़ा रहता है। किंतु अपनी महत्वाकाँक्षा में शुभ-अशुभ का ध्यान अवश्य रखना चाहिये। नहीं तो साधारण व्यक्ति जहाँ कुछ समय के लिये सीमित क्षेत्र में ही अपवाद कलंक अथवा धिक्कार के पात्र बनते है, वहाँ असाधारण व्यक्ति अशुभ आकाँक्षाओं के कारण इतिहास में स्थायी रूप से युग-युग धिक्कारे जाते है। यह जीवन की बड़ी व्यापक विराट् और दूरगामी असफलता है। इस परिणाममूलक महत्वाकाँक्षा से कही अच्छा एवं कल्याण है कि मनुष्य साधारण जीवन-परिधि में सज्जनतापूर्वक चुपचाप जीवन पूरा कर ले। इससे यह महान् भले न बन पाये, किंतु लोक से लेकर परलोक तक युग-युगान्तर के लिये उसकी आत्मा तो कलंक, ग्लानि और पश्चाताप की आग में न जलेगी।
यदि आपकी महत्वाकाँक्षा धनवान्, यशवान् अथवा बलवान् बनने की है- बड़ा अच्छा है। आपको उसे मूर्ति मान करने के लिये यथासाध्य पुरुषार्थ और प्रयत्न भी करना चाहिये, फिर भी इससे पहले कि आप अपनी महत्वाकाँक्षाओं से प्रेरित एवं परिचालित हो यह देख लीजिए। पूरी तरह विवेचन कर लीजिए कि आपकी महत्वाकाँक्षा अशुभता के दोष से तो दूषित नहीं है। उसमें लोक-रंजन, सामाजिक हित अथवा आत्मोद्धार की भावना के स्थान पर शोषण प्रतिशोध प्रतिहिंसा, भोग, विस्तार आदि के विषैले बीज तो सन्निहित नहीं है। यदि ऐसा हो तो तत्काल ही अपनी उन महत्वाकांक्षाओं को तिलाँजलि दे दीजिए अथवा उनका सुधार संशोधन कर डालिए, क्योंकि इससे तो लोक से लेकर परलोक तक के बनने-बिगड़ने की सम्भावना होती है। अवयन्त्र और अशाँति मूलक महानता से शाँति-संतोष और सुखदायक सामान्यता हजारों लाखों गुना अच्छी है।
इस सम्बन्ध में आत्म-विवेचना करते समय निष्पक्ष और निःस्वार्थ रहने की आवश्यकता है। यदि आँख पर से इन आवरणों को उतार कर दिग्दर्शन न किया गया तो अपने दोष दिखाई न देंगे। स्वार्थ और पक्षपात के दोष दृष्टि को ऐसा कोण दे दिया करते है, जिससे असत्य, सत्य और अहित, हित दिखलाई देने लगता है और मनुष्य अपने ही दृष्टिकोण से स्वयं प्रवंचित हो जाता है। इसलिए महत्वाकाँक्षाओं के विषय में उनके रूप और उनका विवेचन करने में बहुत ही सतर्क और सावधान रहना चाहिये।
महत्वाकांक्षी बनिए, उनमें शुभ संकल्प का समारोपण करिये, उनको मूर्तिमान करने के लिए सत्पथ का अवलंबन करिये और संसार में महान् उन्नतिशील और यशस्वी होकर इस महत्वपूर्ण मानव जीवन को सफल एवं सार्थक बनाइये। परमेश्वर आपकी सहायता करे।
हवा, अग्नि, समुद्र और सूर्य चारों जंगल में खड़े एक वृक्ष के पास जाकर धमकाने लगे। हवा ने कहा हम तुम्हें उखाड़ फेंकेंगे, अग्नि ने कहा जला डालेंगे, समुद्र ने कहा डुबो देंगे और सूर्य ने कहा सुखा डालेंगे। वृक्ष यह सब सुनकर बहुत घबराया। तभी धरती माता बोली- “लाल! जब तक मैं हूँ तुम चिन्ता न करों तुम्हारा कोई बाल भी बांका न कर सकेगा।” और सचमुच चारों के रहते हुये भी वृक्ष बराबर बढ़ता रहा। वह था साहस न हारने का परिणाम।
शिष्य के असहिष्णु स्वभाव से दुःखी होकर गुरु ने निश्चय किया उसे सही प्रकाश दिखाया ही जाना चाहिये। उन्होंने शिष्य को बुलाया और बोले- “वत्स! अष्टाध्यायी की प्रतिलिपि तैयार करना है, आओ मैं बोलता जाता हूँ तुम उसे लिखते चलो।”
शिष्य ने लेखनी पकड़ी, गुरु ने अष्टाध्यायी की पुस्तक। प्रतिलिपि लिखना प्रारम्भ हो गया। गुरु ने जान-बूझकर एक श्लोक गलत पढ़कर लिखाया और लिख जाने के बाद शिष्य को डाँटते हुए बोले- “तूने यह श्लोक अशुद्ध लिख दिया न। इतना कागज व्यर्थ गया और परिश्रम भी।” शिष्य विचारा गुस्सा पीकर रह गया।
गुरु ने पुनः आगे बोलना प्रारम्भ किया। एक-दो श्लोक शुद्ध लिखाने के बाद पुनः अशुद्ध बोल कर श्लोक अशुद्ध लिखा दिया। और फिर उसे उल्टा डाँटा भी मूर्ख देखता नहीं अष्टाध्यायी में क्या लिखा है और तूने क्या लिख दिया।” शिष्य के ओंठ कुछ कह डालने के लिये तड़पकर रह गये। श्रद्धा थोड़ी बलवान न होती तो गुरु जी को न जाने क्या कह जाता।
आगे का क्रम फिर चल पड़ा। इस बार तो गुरु ने अगला ही श्लोक गलत बोलकर सिखाया। और डाँटने के लिये उनके सुख से आये शब्द भी नहीं निकले थे कि शिष्य जी भड़क उठे। क्रोध में भरकर बोले- “वाह जी गुरु जी! अशुद्ध बोलते है और मुझे ही उल्टा डाँटते हैं, यह रही आपकी गुरुआई और यह रहे पोथी-पन्ने मुझे आपसे कुछ नहीं सीखना।”
गुरु जी मुस्कराये और बोले- “वत्स! भगवान तो मनुष्य की सैकड़ों भूलें क्षमा करता है। तुम तो दो बार में ही खीझ उठे।”
शिष्य ने वस्तुस्थिति समझी और गुरुदेव के पैर पकड़ते हुये प्रतिज्ञा की कि गुरु भी फिर कभी क्रोध नहीं किया करेंगे।
24 दिसम्बर सन् 68 को भारतीय समय के अनुसार रात दो बजे पहली बार मनुष्य में विशाल ब्रह्माण्ड के किसी दूसरे उपग्रह के गुरुत्वाकर्षण में प्रवेश किया। प्रातःकाल 6 बजने तक अमेरिका के तीन अन्तरित यात्री फ्रेंक दोरबैग, विलियम एर्न्डस और जैम्स लावेल में चन्द्रमा से कुल 25560 मील दूर थे। अब ये पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण से पूर्णतया मुक्त थे, इस अवस्था में यदि अंतरिक्ष-यान में कोई खराबी आती तो वह पृथ्वी में न लौटकर चन्द्रमा की सतह में जा गिरता। यह यात्रा जितनी भयानक भरी मानवीय इतिहास में क्राँति आने वाली था, उतनी ही खतरनाक भी थी।
अनेक कीर्तिमानों के साथ ही इस अनोखी उपलब्धि में मनुष्य के उस मिथ्या अभिमान को भी तोड़ा हे कि वही सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ प्राणी और मुखिया है। माना उसे बुद्धि कौशल प्राप्त है, किंतु तीन यात्रियों ने ऊपर पहुँच कर ब्रह्माण्ड के, सूर्योदय ओर चन्द्रमा आदि उपग्रहों के जिस रूप दर्शन किये उससे उन्हें भी सर्वप्रथम यही सूझा कि इतने बड़े व्यवस्थित संसार को मढ़कर तैयार करने वाला, उसका नियमन और संरक्षण करने वाला विराट् पुरुष तो कोई और ही है। शेष संसार केवल इसके दृश्य की कठपुतली है, इसलिये इन अन्तरिक्ष यात्रियों को भी वहाँ परमात्मा नहीं भूले- उन्होंने प्रार्थना की- हे प्रभु! तू मनुष्य को ज्ञान और सद्बुद्धि दे जिससे पृथ्वी पर सुख-शाँति बड़े राग-द्वेष और बुद्ध की विभीषिकायें मिटें।”
अन्तरिक्ष उड़ान का क्रम पिछले कई वर्षों से चल रहा है। सबसे पहले एलेग शेपर्ड अंतरिक्ष में 15 मिनट 22 सेकेंड रहे इसके बाद 1965 में 4 दिसम्बर से 18 दिसम्बर तक की उड़ान का सबसे बड़ा रिकार्ड भी अमेरिका का ही था। इस अवसर पर जैमिनी-10 सावेल और वार्मन को लेकर उड़ा था। इस उड़ान में 330 घण्टे का समय अंतरिक्ष में रहने का मिला था। तब यह घोषणा की गई थी कि तब यह दिन अधिक दूर नहीं, जब मनुष्य चन्द्रमा पर कदम रख देगा, यही वही एक दिन ऐडा आ जायेगा, जब सौर्य-कूल के दूसरे ग्रह थी मनुष्य के लिये पास-पास बसे गाँवों की तरह हो जायेंगे। अन्य सौर्य-मण्डलों और अनेक प्रकाश वर्षों की दूरी वाले ग्रह नक्षत्र भी पृथ्वी के विभिन्न महाद्वीपों, देशों, प्रान्त और जिलों की तरह हो जायेंगे।
सचमुच विज्ञान की यह बड़ी भारी उपलब्धि होगी। किन्तु उस दिन तक मनुष्य जीवन के संबंध में अब तक का सारा दृष्टिकोण उसी तरह बदल जायेगा, जिस तरह जब यह वह सोचने लगा है कि मनुष्य अनंत अन्तरिक्ष की तुलना में चींटी, मक्खी, मच्छर जैसा ही है। तब अंतरिक्ष में अनेक शक्ति स्त्रोतों में विकसित जीवन और ऐसी क्षमताओं से संयुक्त लोक-लोकान्तरों का भी परिचय मिल सकेगा, जो स्वर्गीय गुणों से परिपूरित होंगे और इस भारतीय दर्शन की प्रामाणिकता ही बडेगी। अन्तरिक्षीय विभाव विज्ञान तो उसके लिये सदैव से ही सामान्य बातें रही है। महाभारत युग तक ऐसी यात्रायें बिना रोक-टोक होती थी, महाभारत युद्ध के दौरान स्वयं अर्जुन और भगवान् श्रीकृष्ण के चन्द्रारोहण का वर्णन पौराणिक ग्रन्थों में मिलता है।
अपोलो 8 की यात्रा पुरातन इतिहास की आधुनिक आवृत्ति आज है और वह जितना अधिक वैज्ञानिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, उससे कही अधि आत्मिक दृष्टि से भी क्योंकि तब मनुष्य अमरत्न की कल्पना के और भी बडीय पहुँचेगा। चन्द्रमा में पहुँच कर भी यदि मनुष्य की मृत्यु हो सकती है, शुक्र पहुँच कर बुद्धि मनुष्य धरती पर लौट कर न आया तो उस हंसती-खेलती, चलती-फिरती श्रेष्ठता का अगला इतिहास क्या होगा, यह सोचने का अवसर मिलेगा। अध्यात्म की यह पहली सीढ़ियां है और इसी लिये इस यात्रा को हम अध्यात्म के दुलर्भठंग की पहली सीढ़ी मानते है। अपोलो-8, एक 36 मंजिला दानवाकार चन्द्राबाग 21 दिसम्बर 1968 को विशाल क्षमता वाले सैटर्ग .5 बस्टर राकेट के द्वारा आकाश की ओर उछाला गया। 363 फुट ऊँचा और 3100 टन वजन का विशालकाय भाग अपोलो .8-75 लाख पौंड़ शक्ति से 6000 मील प्रति घण्टा की रफ्तार से आकाश की ओर उड़ चला। इस वान में 50 लाख लाख छोटे-बड़े पुर्जे लगे थे। कोई भी पुर्जा अलग हो जाता तो चन्द्रयान या तो कही बीच में ही व्यस्त हो जाता, आग लग जाती या फिर वह पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण से भटक कर सूर्य में चला जाता और जलकर व्यस्त हो जाता या फिर किसी और ग्रह में लिखा चला जाता। भगवान् जाने यह स्थिति कैसी होता, पर तो भी मनुष्य की वीरता की सराहना ही की जायेगी जो वह अपने जीवन की परवाह न करके सत्य और तथ्य की खोज में निकल पड़ता है। माया-मोह, आसक्ति, राग-द्वेष के बन्धनों से मुक्त ऐसे ही साहसी विज्ञानियों के लिये भगवान् ने ज्ञानी से कोहि प्रिय विज्ञानी’ कहकर स्नेह किया है।
एक निश्चित ऊँचाई पर पहुँचकर अपोलो 8 की शक्ति ने ह्रास अनुभव किया तब द्वितीय चरण के 5 इंजनों का विस्फोट हुआ, जिससे 11 लाख 25 हजार पाउण्ड की नई शक्ति मिली, यान की आकृति कुछ छोटी हो गई पर अब वह 14000 मील प्रति घण्टा की उड़ान से उड़ रहा था, 4 मील की दूरी तय करने में उसे 1 सेकेंड के लगभग समय लग रहा था। इस गति से वह 119 मील की ऊँचाई पार करने में समर्थ हुआ। अब तीसरे चरण के ईधन का विस्फोट हुआ और उससे 2 लाख 25 पाउण्ड की नई शक्ति पाकर वह 17400 मील प्रति घण्टा की गति से आगे बढ़ने लगा। बीच निर्धारित यात्रा पथ के एक डिग्री से हमारवें हिस्से के लगभग अन्तर पड़ा होगा, यदि पृथ्वी का नियंत्रण केन्द्र (कन्ट्रोल) उसे नियंत्रित नहीं करता, तो इतनी विषमता ही चन्द्रयान को कहीं और पहुँचा देती। जब सब कुछ ठीक हो गया तो पृथ्वी से संदेश दिया गया- तुम लोग ठीक यात्रा कर रहे हो’ उत्तर में नियंत्रण अधिकारियों को धन्यवाद भी मिला। अन्तरिक्ष यात्रियों और नियंत्रण अधिकारियों के बीच संसार व्यवस्था ठीक काम कर रही थी,
तीसरा चरण समाप्त होने के साथ यान पृथ्वी के परिक्रमा पथ पर पहुँच चुका था। एक बार फिर में चंद्रयान की याँत्रिक परीक्षा की गई। इस बीच वह पृथ्वी की परिक्रमा करता रहा। जब सब ठीक पाया जाय तो चौथे चरण के इंजिन चालू किये गये। यह सबसे माजुक समय था, जब चन्द्रयान ने झटका खाया और 24200 मील प्रति घण्टा की गति से पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति से बाहर शून्य गुरुत्वाकर्षण (न्यूट्रल पाइन्ट) में पहुँच गया।
23 दिसम्बर को 120000 मील से भी अधिक दूर पहुँचे हुये चन्द्रयान के टेलीविजन दृश्य दिखाये गये। चन्द्र यात्री पृथ्वी पर उल्टे खड़े दिखाई दे रहे थे। यात्रा-वार्ता (रनिंग कवेन्ट्री) में बौरर्मग ने बताया- “वे ओजन तैयारी में है, देखिये वह चाकलेट का पैकेट निकाल रहा और आप देख ही रहे होंगे कि वहाँ कैसी भारहीनता है, यह जो चाकलेट का टुकड़ा हवा में तैर रहा है। वैसे इसमें बिल्कुल वजन नहीं है। तभी ‘एण्डंर्स’ में अपना टुथ ब्रुश उछाला- “आप यह खेल देख रहे है।” इसी बीच सावेन कैमरे के सामने आया और उसने अपनी माँ को उनके 75 में जन्म दिन के उपलक्ष में शुभ कामनायें भंड की।”
जोखिम के क्षणों में भी हास-परिहास का यह क्रम भी मनुष्य की एक अहं-समस्या का संकेत है। हम कुछ भी करे, कहीं भी रहे पर आनन्द और सुख की इच्छा से वंचित नहीं हो पाते। अन्तरिक्ष में भी जब उसकी खोज हुई तो ऐसा लगा कि मनुष्य की तमाम समस्याओं का कारण उसकी सुखी और आनन्दित रहने की इच्छा ही है, इसे सब जानते है पर सुख का स्त्रोत कहाँ है, वह बहुत कम लोग ढूंढ़ते और ढूंढ़ने वालों में बहुत कम उसे पाते है, अधिकाँश तो बाह्य-विज्ञान में ही भटकते है। दरअसल जब तक मनुष्य अपने आपको नहीं जानता शरीर के स्थूल इण्यों से ध्यान हटाकर चेतन-आत्मा की शोष और विकास नहीं करता, तब तक यह इच्छा अधूरी ओर भटकाने वाली ही रहती है। सम्भव है, यह अन्तरिक्ष यात्रा कुछ लोगों को यह आत्म-प्रबोध भी कराये।
पर यहाँ तो अब चन्द्रयान अपनी यात्रा के सर्वाधिक जटिल मुहाने पर जा चुका था। चौथे चरण का विस्फोट हुआ, इस इंजन से यान 50 फुट आगे जाकर उलट गया और दोनों आमने-सामने आ गये, इंजन के बचाने वाले यन्त्र (पेन से) अलग हो गये और उसके आगे रखा हुआ ‘डमी स्थूनर माड्यूक’ सामने आ गया। अन्तरिक्ष यात्रियों ने उसका अध्ययन किया। संसार बड़ा विचित्र लग रहा था। सूर्योदय का दृश्य कुछ और ही था किसी ने पूछा तो उन्होंने बताया- ‘अभी नहीं पृथ्वी पर लौटेंगे तो एक निबन्ध लिखेंगे।” तात्पर्य यह कि जो कुछ अन्तरिक्ष यात्रियों के मस्तिष्क में है, यह सबका सब यहाँ लिखा और बताया न जा सकेगा, क्योंकि वहाँ सब कुछ स्थूल और शाब्दिक ही नहीं भावनात्मक भी होगा, जिसे चाह कर भी अन्तरिक्ष यात्री शब्दों में व्यक्त न कर सकेंगे।
8000 फीट आगे बढ़ने पर अपोलो उसी से अलग हो गयी, तब चौथे इंजन का शेष ईधन भी काम आ गया और वह इंजन सूर्य का ही उपग्रह बनकर चक्कर काटने लगा और अपोलो-8 अकेले ही चन्द्रमा की ओर आगे बड़ा। उसके कई खण्ड अलग हो जाने से अब वह काफी हल्का भी हो गया था। चन्द्रमा के गुरुत्वाकर्षण में उससे 30000 मील दूरी पर पहुँच जाने पर मान गति कल 2170 मील प्रति घण्टा रह गई थी, पर गुरुत्वाकर्षण के भीतर पहुँच जाने के कारण यह फिर बड़ी और पश्चिम छोर तक पहुँचने पर 5720 मील प्रति घण्टा हो गईं पृथ्वी अभी भी दिखाई दे रही थी, यह हरे-भरे नखलिस्तान सी दिखाई दे रही थी। यहाँ क्या हो रहा है, उसकी कल्पना भी न की जा सकती थी, क्योंकि हजारों मील व्यास वाली पृथ्वी अब एक छोटी-सी गेंद भर लग रही थी। तीनों अंतरिक्ष यात्री अनुभव कर रहे थे कि मनुष्य का ज्ञान भी कितना सीमित है कि अब तक हम जहाँ रह रहे थे, अब यही ऐसी दिखाई दे रही है, जैसे वहाँ कुछ हो ही नहीं। न जाने ऐसे कितने विलक्षण जगत् इस ब्रह्माँड में विद्यमान होंगे।
यान के इंजन फिर चाल हुए और उसने चन्द्रमा की परिक्रमा करनी प्रारम्भ कर दी, पहली बार जब यान चन्द्रमा के पृष्ठ भाग पर पहुँचा तो एक बार पृथ्वी की उत्सुक निगाहों से स्तब्धता छा गई। क्योंकि अच्छे से अच्छे संचार-प्रबन्ध के बावजूद भी अब कुछ न दिखाई दे रहा था, न कुछ दूर संचार (टेली पैथी) का ही क्रम बन रहा था। सारा संसार स्तब्ध था। चन्द्रमा के पृष्ठ भाग में यान की पता नहीं क्या स्थिति है घण्टे भर की व्याकुल प्रतीक्षा के बाद जैसे ही यान के दृश्य भाग पर आया रेडियो सम्बन्ध फिर स्थापित हुये। अमेरिकन ही क्या सारी मानव-जाति इस प्रसन्नता पर प्रसन्नता से नाच उठी। यान ने 20 घण्टे में ऐसे 10 चक्कर चन्द्रमा के लगाये और उसे निकटतम 61 मील की दूरी से देखा।
25 दिसम्बर को प्रातःकाल 11-40 पर चन्द्रयान ने पुनः दूसरा इंजन चालू कर पृथ्वी की ओर यात्रा की। 60-60 मील प्रति घण्टा की रफ्तार से यान पृथ्वी की ओर चल पड़ा 57 घण्टे बाद यान ने 24765 मील प्रति घण्टे की रफ्तार से पृथ्वी के वायु-मण्डल में प्रवेश किया। यह वेग ऐसा था कि मान से चिनगारियाँ उठती जान पड़ती थी। वायु घर्षण से इतनी ताप पैदा हो गई थी, जो प्लास्टिक की मोटी बाहर को जलाकर पानी कर सकती थी। 10000 फुट की ऊँचाई पर मान के मुख्य पैराशूट खुल गये और तीनों अन्तरिक्ष यात्री प्रशान्त महासागर पर सकुशल उतर आये। 6 दिन में यह महाअभियान पूरा हुआ।
जिस समय यह पंक्तियाँ लिखी जा रही है, रूस अपने सोयूज-5 के करतब दिखाकर अन्तरिक्ष में प्रयोगशाला स्थापित करने में सफल हो गया है। शीघ्र ही चन्द्रमा में उतर कर एक घण्टे में वहाँ की मिट्टी और कंकड़-पत्थर उठाकर लाने की उनकी योजना है। अमेरिका अपोलो-9 के द्वारा अप्रैल 69 में ही चन्द्रमा में उतरने की योजना बना रहा है। अपोलो-8 की 7 बीं चन्द्र-परिक्रमा के दौरान उसने सम्भावित स्थानों (वहाँ चन्द्रयान उतरेंगे) की खोज कर सी है। यहाँ के बहुत स्पष्ट फोटो भी ये साथ लाये है। तात्पर्य यह कि भय चन्द्रमा और पृथ्वी दोनों दो पड़ौसी रियासतों की तरह पास-पास आ गये है। पता नहीं किसी दिन यह आवागमन और भी सुविधाजनक और सरल हो जाये, जिससे सामान्य लोग भी वहाँ जाने लगे।
चन्द्रमा की इन चर्चाओं के साथ भारतीय मान्यताओं की चर्चायें और जुड़ रही है, लोग उपहास में कहते है यह जो हिन्दुओं के देवताओं के सिर मनुष्य जा चढ़ा है। यों बात कोई भी कुछ करे पर इस यात्रा से भारतीय दर्शन और उसके विराट् तत्वज्ञान की ही पुष्टि हुई।
देवता- (जो निरन्तर कुछ देता रहे) के रूप में सृष्टि व्यात जिगर ने भी चन्द्रमा को जीवन का स्त्रोत मानते हुये किया है कि “यह जल हर आधिपत्य रखता है और आक्रधारियों का पोषण करता है। ‘मिथ्स एण्ड सिम्बिल्स एकाधिपन आर्ट एण्ड सिबिलिजेशन पृठ 60 में लिखा है- धरती में ओस-कण चन्द्रमा के प्रकाश को ही देन है, उससे वनस्पतियों को पोषण मिलता, वनस्पति दूध का और दूध मनुष्य के शरीर में रक्त का निर्माण करता है। जीवन दान की इसी कल्पना के रूप में चन्द्रमा को देवता माना गया है, स्थूल रूप में तो पंच-भौतिक प्रकृति के अतिरिक्त वहाँ कुछ भी नहीं है।
अपोलो-8 के कमाण्डर फ्रेंक बोरमैन ने इस यात्रा के दौरान चन्द्रमा को बहुत निकट से देखकर बताया-” यह चन्द्रमा वहन स्तब्ध सन्नाटे से भरा बीहड़ मात्र है। इसमें कुछ नहीं है, भद्दी चट्टानों से बना बादलों का पुंज लगता है।” सहयोगी बालक लाबेस ने भी उसकी पुष्टि करते हुए बताया - “ चन्द्रमा पास से बड़ा भयोत्पादक है।” एर्ण्डस- “चन्द्रमा बड़ा वीभत्स है, मीलों गहरे अन्ध क्रेटर, वनस्पति जहाँ कुछ भी नहीं घूसर मरु विस्तार, डरावनी ऊबड़ खाबड़ पहाड़ियों का अस्तित्व जहाँ से दिखने वाले तारे और सूर्य और भी भयंकर लगते है।” इन कथनों में जहाँ यह बात सिद्ध होती है कि चन्द्रमा पंच-महा-भौतिक प्रकृति का घनीभूत स्थल है, यहाँ उसकी महता केवल प्रकाश की है, जो कही और स्थान से आता है और जिसके सम्बन्ध में मांडूक्य उपनिषद् (2।1।4) तथा गीता में क्रमशः ‘पक्ष पी चन्द्र सूर्यों- चन्द्रमा विराट पुरुष परमात्मा का वाहिना नेत्र और ‘अनन्त वाहुँ शशि सूर्य नेत्र’- अनन्त बाहुओं वाले मुझ परमात्मा के सूर्य और चन्द्रमा नेत्र है- कहा है। संयोग से विराट दर्शन श्रीगणेश भी चन्द्रमा से ही होता है। प्रकाश के सम्बन्ध में व्यापक खोजें हुई तो चन्द्रमा के भारतीय स्वरूप की और भी पुष्टि होगी तथा विराट्-पुरुष की खोज में विलक्षण जानकारियाँ भी मिलेंगी। अभी वैज्ञानिकों का ध्यान केवल स्थूल चन्द्र की ओर है।
ईरानी शासक डार यबहुत से हुये युद्ध में भी सिकन्दर विजयी हुआ। इस विजय के साथ-साथ सिकन्दर को बहुत-सा धन स्वर्ण मुद्रायें और हीरे जवाहरात भी मिले।
अभी वह बहुमूल्य वस्तुयें सम्राट् सिकन्दर को भेंट दी ही आ रही थी कि एक सैनिक अधिकारी ने आकर लूट में मिली एक पेटी उपहार में दी। यह स्वर्ण जड़ित पेटी उन सब वस्तुओं से सुन्दर और आकर्षक थी। सिकन्दर में उसे अपने पास रख लिया।
प्रश्न उठा इसमें रखा क्या जाये? ‘हीरा’- किसी ने कहा। दूसरे ने सुझाया- सम्राट् के वस्त्राभूषण। तीसरे ने कहाँ इसमें राज्य-कोष की चाबियां रखी जाये? सिकन्दर सब की सुनता हुआ भी चुप था। लोक कौतूहल में थे इसमें क्या रखा जाता है।
और अब सिकन्दर के निर्णय का समय आया तो उसने उसमें ‘हलिबड’ ब्रण्ड रखा जिससे सिकन्दर ने पौश्व, पराक्रम और जीवनोत्कर्ष की प्रेरणायें पाई थी। उस दिन से सिकन्दर के अधिकारी भी ज्ञान को अधिक महत्व देने लगे।
आज संसार में पशुओं पर जो नृशंस अत्याचार किये जा रहे है, उन्हें देख - सुनकर किसी भी सहृदय व्यक्ति की छाता करुणा से भरे बिना नहीं रह सकती। यदि एक बार हिंस्र अथवा दुष्ट जन्तुओं पर यह अत्याचार किये जाते तो किसी हद तक सहन भी हो सकते थे। किन्तु यह नृशंसता उन पशुओं के साथ की जा रही है, जो शिशुओं को तरह अबोध और भोले होते है और जो कभी भी किसी प्रकार का अहित नहीं करते।
भेड़-बकरी से लेकर गाय-बैल, भैंस-भैंसा, घोड़ा, गधा आदि किसी भी ऐसे जानवर को ले लीजिये जो मनुष्य के संपर्क में रह कर अत्याचारों का लक्ष्य बना हुआ है। कितना अच्छा होता कि ये अभागे पशु आदमी के संपर्क में न आयें होते अथवा मनुष्य को किसी प्रकार उपयोगी सिद्ध न हुये सोते, अथवा इतने सीधे आज्ञाकारी और विश्वासी न होते। ऐसा होने से कम से कम बंधकर तो अत्याचार न सहते। हिरन, बन्दरों की तरह कही जंगलों से स्वच्छन्द बिहार करते और जैसे भी होता शत्रु-जीवों से भाग, छिपकर अपनी रक्षा करते और यदि किसी हिंस्र-जन्तु को चपेट में आ जाते तो एक बार ही मृत्यु का आलिंगन करके सदा के लिये छुट्टी पाते।
इस प्रकार दिन-रात परिश्रम करके, आधा पेट घास-फूँस खाकर दिन-रात मनुष्य का अत्याचार तो न सहते। एक तो बन्धन, दूसरे परिश्रम, तीसरे आधा पेट और चौथे अत्याचार। यह चार-चार दंड एक साथ सहने वाले पशुओं की आत्मा, परमात्मा के प्रतिनिधि कहे जाने वाले मनुष्य को क्या कहती होगी ? अन्दर ही अन्दर रोती हुई मनुष्य के संपर्क में आने के अपने दुर्भाग्य को कोसती होगी।
भेड़-बकरी को ले लीजिये। लोग इन्हें पालते है। कभी कुछ विशेष खाने-पीने को नहीं देते। योंही छोड़े रहते है। बेचारी दिन भर जहाँ-जहाँ ऐसी-वैसी वस्तुऐं बीन-चुन कर लाया करती है। शाम को घर आने पर यदि कुछ खाने-पीने को मिल गया तो खा लेती है, नहीं तो योंही बाँधकर दुहली जाती है। उनका दूध मौलिक के बच्चे पीते और अधिक होने पर बेचकर पैसे कमाये जाते है। इस प्रकार लोग बिना कुछ विशेष व्यय किये अधिक से अधिक लाभ उठाया करते है।
जो लोग अधिक भेड़-बकरी पाला करते है तो जंगल में बिना पैसों की वनस्पति चुगा लाते है और उनके ऊन व दूध से मन-माना लाभ कमाते है। दूध बेचने वाले पालक उनके बच्चों को माँ का दूध नहीं पीने देते। दूध बचाने को थनों की थैली चढ़ा दिया करते है। यदि यही भेड़-बकरी मनुष्य के संपर्क में न आकर जंगलों में स्वच्छन्द रहती तो बिना किसी बन्धन अथवा प्रतिबन्ध के परमात्मा की पैदा की हुई वनस्पति को मन-माना खाती और अपने प्यारे मेमनों को जी भर कर दूध पिलाती। अपने बच्चों के प्रति यह अत्याचार उन्हें मनुष्य के संपर्क में आने के कारण ही सहना पड़ता है।
भेड़-बकरियों के सारे बच्चे समय-समय पर कसाइयों के हाथ बेच दिये जाते है। रोज शाम को अपना पेट भर कर आने के बाद जो बकरी या भेड़ मिमियाती हुई अपने बच्चों को पुकारती और चाटा करती थी, एक दिन बह उन्हें खोजे से भी नहीं पाते। तब उसके पास रात भर बिना कुछ खाये-पीये उदास आँसू बहाने के सिवाय और कोई चारा नहीं रह जाता और जिस समय इधर यों बच्चों की आशा में फिर परेशान होकर मिमियाती है तब उसका मेमना कही पर कट चुका होता है। यह इसीलिये कि बकरी बेवश होती है, इस अत्याचार कर न तो बदला ले सकती है और न विरोध कर सकती है, क्योंकि निर्दयों मनुष्य के बन्धन में होती है। मनुष्य के साथ रहने के बजाय यदि वह जंगल में रह रही होती तो क्यों तो वह अपने देशों को छोड़कर जाती और क्यों उसके बच्चे उसकी गैर-हाजिरी में अथवा आंखों के सामने ही कसाई के हाथ बेच दिये जाते? इसके अतिरिक्त जब बकरी बूढ़ी हो जाती है अथवा उसके माँस से दूध की अपेक्षा अधिक लाभ होता है तो उसके भी एक दिन इसी प्रकार कसाई के हाथ बेच दिया जाता है। कितना अच्छा होता कि मनुष्य या तो इन जानवरों को पालता ही नहीं अथवा स्वार्थवश उनके साथ इस प्रकार का अत्याचार न करता। लोग भेड़-बकरियों को पालते ही अधिकतर कसाइयों के हाथ उनके बच्चे बेचने के लिये है।
मनुष्य यही हाल गाय-भैंस और बैलों आदि के साथ किया करते है। जब तक गाय-भैंस दूध दिया करती है अथवा बैल काम योग्य रहा करते है, तब तक तो उनके साथी बने रहते है, किन्तु ज्योंही उनकी उपयोगिता समाप्त हो जाती है अथवा कम लाभकारी हो जाते है कि उन्हें या तो कसाइयों के हाथ बेच देते है अथवा दर-दर ठोकरें खाने के लिये डंडे मारकर भगा देते है। यद्यपि बहुत से दयावान् व्यक्तियों और संस्थाओं ने गायों की रक्षा के लिये अनेक गौशालायें खोल रखी है, तब भी धन क लोभ के कारण अधिकतर गाये कसाइयों के हवाले ही होती है। गौशालाओं से उंगलियों पर गिनने लायक संख्या में गायों को तो कुछ राहत मिल गई है किन्तु बेचारे बूढ़े बैल और कमजोर भैंसे, भेड़-बकरी आदि तो छुरी के घाट ही उतरा करते है।
मनुष्य का स्वार्थ उसे यह नहीं सोचने देता कि जिन बैल अथवा भैंसों से उसने जीवन भर तो परिश्रम लिया है, उनको इस प्रकार कसाईखानों के हवाले करना कितना बड़ा जुल्म है। जो जानवर उसकी सेवा करते-करते अपनी सारी शक्ति अपना सारा पौरुष बलिदान कर चुके है, वे अब कमजोर होने पर अथवा बूढ़े होने पर यदि कसाई के हाथ न बेचकर छोड़ भी दिये गये तो वे कहाँ जायेंगे? कौन उन्हें आश्रय देगा अथवा कौन एक मुठ्ठी भूसा? सिवाय इसके कि वे भूखे मारे-मारे फिरें और यदि किसी की कोई वस्तु खाले तो बुरी तरह मार खाये, उनके पास क्या उपाय रह जाता है? मनुष्य का यह स्वार्थ कितना जघन्य है, यह सोचकर किसी भी दयावान् का हृदय दुःख से भरे बिना नहीं रह सकता। यदि ये जानवर मनुष्य के संपर्क में न आये होते है, जंगल में प्रकृति माता की गोद में आनंद से जीते और वक्त आने पर सुख की मौत मरते। इस प्रकार के अत्याचार देखकर इनके लिये मनुष्य का संपर्क एक दुर्भाग्य ही कहा जायेगा।
इनके अतिरिक्त गुजरों की बात सोचने और उनकी चरबी निकालने के लिए पाले हुए गुजरों पर जो अत्याचार किये जाते है, उसे लेकर तो रोंगटे खड़े हो जाते है। ठीक तरह से दुबारा जमने और पूरा लाभ प्राप्त करने के लिए उनके बाल काटे नहीं जाते बल्कि चिमटी अथवा हाथ से उखाड़े जाते हैं। सुअर के बाल बड़े कड़े और गहरी जड़ वाले होते है उन्हें जड़ से उखाड़ने में उस गिरोह पशु की कितनी पीड़ा होती होगी या तो इसे अन्तर्यामी ही जान सकता है अथवा कोई भावुक सहृदय अनुभव कर सकता है। इसका थोड़ा बहुत अनुमान इस बात से भी लगाया जा सकता है कि पीड़ा के कारण छटपटाने अथवा उछलने कूदने से रोकने के लिए उसके चारों पाँव बाँध दिये जाते है।
चरबी प्राप्त करने के लिए तो इन गरीबों को आग में सेंक सेंक कर मारा जाता है। चारों पाँव बाँधकर वो आदमी उसे लाठी डण्डे पर उल्टा कर नीचे जलती हुई आग पर सेका करते है। साथ ही उसका चीत्कार रोकने के लिए उसका मुख भी पूरी तरह बाँध दिया जाता है।
अपने स्वार्थ के वशीभूत होकर मनुष्य यह नहीं सोच पाता कि वह यह क्या कर रहा है? बेचारे निरुपद्रवी सुअर के बाल काटकर भी प्राप्त किये जा सकते है और चरबी मरने पर निकाली जा सकती है। किन्तु नहीं मनुष्य को तो उसका जड़ तक पूरा बाल चाहिए और मरे सुअर की चरबी उसके ज्यादा काम नहीं आती। कितना अच्छा होता कि मनुष्य उसके कटे वालों से ही काम निकाल लेता और मरने के बाद चरबी की उपयोगिता पर सन्तोष कर लेता। किन्तु स्वार्थ से मनुष्य इतना मजबूर हो चुका है कि पशुओं की किसी वस्तु का अधिक मूल्य पाने के लिए उन पर नृशंस से नृशंस अत्याचार करने में संकोच नहीं करता। आज संसार में पशुओं पर किये गये अत्याचारी का मूल्य दिया जा रहा है।
सवारी में चलने वाले और बोझा ढोने वाले जानवरों पर इतना जोर अत्याचार किया जाता है कि जब तब ये रास्तों में ही गिरकर मरते देखे जाते हैं। तांगों, इक्की में चार-चार गुनी सवारी बिठाना, ठेलों में आवश्यकता से अधिक बोझ लादना तो एक मामूली बात हो गई है। इस पर भी जब थका हुआ जानवर रुक रुककर अथवा धीरे धीरे चलता है तो उसको डंडों से मारा जाता है। डंडों की मार से हर वाहक पशु को कही न कही जख्म हो जाते है और तब उसे अधिक उत्तेजित करने के लिए घावों पर भी प्रहार किया जाता है। बैल-भैंसों के कन्धे और घोड़ों की छाती पकी -सड़ी हुई आमतौर से देखी जाती है। अधिक सवारियाँ भरने और अधिक समय तक जोतने के कारण बेचारे वाहक पशु आधी आयु तक भी नहीं जो पाते। बेतहाशा परिश्रम के कारण या तो वे शीघ्र मर जाते है अथवा निकम्मे होने पर खाल के ग्राहकों के हाथ बेच दिये जाते हैं। बोझ लादने वाले और सवार होने वाले मनुष्य यह नहीं सोचते कि इस प्रकार से इतना अधिक भार वहन करने में इस गरीब जानवर की क्या दशा होगी? वह मरे या जिये सवारियों की लदने और वाहक को पैसे से मतलब।
इस प्रकार किसी भी क्षेत्र में क्यों न देखा जाये मनुष्य के संपर्क का हर काम वाला जानवर मनुष्य के स्वार्थ पूर्ण अत्याचार से पिसा ओर मरा जा रहा है। इसे देखकर तो यही कहना पड़ता है कि यह इन पशुओं का दुर्भाग्य है जो यह मनुष्य के संपर्क में आये। होना तो यह चाहिए कि मनुष्य के संपर्क में जाने पर पशुओं को अधिक सुख सुविधा मिलती, इसके विपरीत उसके संपर्क में बेचारे बेमौत मारे जा रहे है।
कितना अच्छा होता कि या तो मनुष्य इनके साथ दया का बर्ताव करता अथवा वे मनुष्य के संपर्क में न आये होते। इस प्रकार पशु उत्पीड़न और मनुष्य पाप से बच जाते।
वीरता इनकी सराही जायेगी :-
पिछले वर्ष नई दिल्ली में असाधारण वीरता के लिए जिन वीर पुरुषों को तृतीय श्रेणी के अशोक चक्र मिले है, उनमें श्री अमृतलाल नामक एक 16 वर्षीय एन.सी.सी. का छात्र भी है। गत वर्ष मार्च में उक्त बालक ने अपने प्राणों पर खेलकर एक कुख्यात डाकू को पकड़ लिया। संघर्ष करते समय डाकू की मृत्यु हो गई। उक्त घटना पंचमड़ी की है। वीरता का भाव बड़ों की तरह बालकों में भी हो सकता है। बालकों का गौरव उनके साहस में है, शौर्य में है। कायर ओर डरपोक मनुष्य आत्म रक्षा तक नहीं कर सकता, फिर उससे अपने वेश और धर्म की तो रक्षा ही क्या बन पड़ेंगी?
जबलपुर का समाचार है। ग्यारह वर्षीय आदिवासी गडेरिया बालक शिवदीन ने छिगडवाडा गाँव में एक तेंदुए को साहस से पत्थरों के प्रहार से मार डाला। वह तेंदुआ सदैव मवेशियों को उठा ले जाता था। कहा जाता है कि जब शिवदीन छिन्दवाडा जिले में पीपलपानी गाँव के जंगल में कुछ मवेशियों को चराने गया, तो अचानक घनी झाड़ियों में से एक तेंदुआ निकलकर मवेशियों पर झपट पड़ा। मवेशियों को बचाने के लिए उस गड़रिये बालक ने अपनी लाठी से साहस कर उस हिंसक का सामना किया। जब वह दूर हटा तो शिवदीन भारी भारी पत्थर मारता रहा। यहाँ तक कि एक बड़े पत्थर से वह मर गया। साहस हारने वाले सब कुछ हार जाते है, पर जो पुरुषार्थ करने खड़े हो जाते है और साहस से काम लेते हैं, उसकी ईश्वर भी सहायता करता है।
बिल्ली सिम्बी कालोनी के कुएं में एक छः वर्षीय बालक एकाएक गिर पड़ा। जब बालक बचाओ! बचाओ!! चिल्लाया, तब हायर सेकेन्डरी के चौदह वर्षीय परमानन्द नामक छात्र ने उक्त बालक को कुएं में कूद कर उसे मरने से बचा लिया। उक्त छात्र को इस साहस के काम के लिए कालोनी के लोगों ने पुरस्कार दिया और बड़ी प्रशंसा की। जीवन में पथ- पथ पर साहस और शक्ति की आवश्यकता है। आने वाली कठिनाइयों का आप उत्साह से स्वागत करें।
3 फरवरी 1969 को अहमदाबाद में तीसरी अंतर्राष्ट्रीय विद्युतीय वायु विज्ञान गोष्ठी का उद्घाटन हुआ, उस समय अहमदाबाद भौतिक अनुसंधानशाला के दो वैज्ञानिकों प्रो. के.आर. रामनाथन और डा0 एस. अनन्ति कृष्णन की एक महत्वपूर्ण खोज की घोषणा की गई। घोषणा यह थी कि धरती पर आकाशीय पिंडों का व्यापक प्रभाव पड़ता है। इन वैज्ञानिकों ने कुछ सप्ताह पूर्व वायु मण्डल के डी क्षेत्र में विस्तृत अयनकरण (आयनोस्फियर) की खोज की थी और यह पाया था कि शक्तिशाली एक्स किरणों के स्त्रोत स्कोपिओ-11 के गुजरने से वनस्पति और जीवन जगत में व्यापक हलचल उत्पन्न होती है।
परमाणु शक्ति आयोग के अध्यक्ष डा. सारा भाई ने, विभिन्न देशों से आये 85 वैज्ञानिकों, जिनमें 35 भारतीय भी थे, सम्बोधित करते हुए बताया कि सूर्य के अतिरिक्त अन्य किसी आकाशीय पिण्ड से भी प्रेक्षीय प्रभाव धरती पर आता है और यदि उसकी विस्तृत खोजें की गई तो धरती में जीवन और जीवन में आकाशीय पिंडों के प्रभाव की अनेक महत्वपूर्ण जानकारियाँ मिल सकेंगी।
इस सम्बन्ध में पाश्चात्य वैज्ञानिक काफी अर्से से जागरूक है। चन्द्रमा की यात्रा का नियंत्रण करने वाले रूसी वैज्ञानिकों ने पाया कि जिस प्रकार का चुम्बकीय क्षेत्र (मैगनेटिक फील्ड) धरती पर है, उस तरह का चन्द्रमा और दूसरे ग्रहों पर नहीं है। धरती के समस्त जीवित पदार्थ चूँकि इस चुम्बकीय क्षेत्र में विकसित हुए है, इस लिए यह प्रश्न उठा कि अन्य नक्षत्रों में चुम्बकीय क्षेत्र का अभाव यात्रियों के मस्तिष्क में प्रभाव डालेगा और इसी बात को लेकर एक नये विज्ञान चुम्बकीय जीव शास्त्र (मैगनेटिक एनाटामी) का जन्म हुआ।
सन् 1954 से लेकर 64 तक रूसी वैज्ञानिक ब्लादीमीर देस्यातोव ने इस सम्बन्ध में व्यापक शोधकार्य किया और आंकड़े एकत्रित कर यह बताया कि जब चुम्बकीय तूफान (मैगनेटिकस्टार्म्स) आते है तो धरती के निवासियों में स्नायविक बेचैनी (नर्बसनेस) और मनोरोगों की संख्या बढ़ जाती है। इस तरह के रोगियों की मृत्यु दर भी बढ़ती पाई गई। उल्लेखनीय है कि धरती के चुम्बकीय क्षेत्र की तीव्रता या उसकी फ्रीक्वेंसी बदलना आकाशीय पिण्डों की किसी ऊर्जा प्रवाह का परिणाम होते है। इस सम्बन्ध में यदि खोजों का सिलसिला जारी रखा गया तो भारतीय तत्व विज्ञान के उसी सिद्धान्त की पुष्टि होगी, जिसमें यह बताया गय है, कि मनुष्य आकाश की अदृश्य शक्तियों से प्रभावित है, यही नहीं वह मन की चुम्बकीय शक्ति के द्वारा अज्ञान नक्षत्रों से वह शक्ति प्रवाह भी अपने अन्दर आकर्षित और धारण कर सकता है जिसके अभाव में शारीरिक शक्तियाँ अविकसित पड़ी रहती है। आशा है आगे की हेय उपलब्धियाँ भारतीय तत्वज्ञान और उपासना क्षेत्र को क्राँतिकारी ढंग से प्रभावित करेंगे।
प्रारम्भिक शोधों में थ्री ब्लादीमीर ने यह पाया कि जब सूर्य में एक विशेष प्रकार के ज्वाला प्रकोप (फलेयर) फूटते है तो धरती पर प्रचण्ड चुम्बकीय तूफान आते है और उससे मानसिक दृष्टि से दुर्बल व्यक्तियों के जीवन अस्तव्यस्त हो जाते है, आत्म हत्यायें और सड़क दुर्घटनायें भी उसी के फलस्वरूप बढ़ती है। शराबी, क्रोधी, चिड़चिड़े, कामुक, अनैतिक और दुर्बल स्नायु संस्थान वाले व्यक्ति इन फ्लेयर्स के बाद बहुत ही कमजोर और परेशान हो जाते हैं, इसी कारण उक्त घटनाओं में चार पाँच गुनी तक वृद्धि हो जाती है। इसी के आधार पर वैज्ञानिकों ने यह कहा है कि मस्तिष्क की क्रिया क्षमता की बुनियादी ताप (अल्फा एनर्जी) धरती के चुम्बकीय क्षेत्र से जुड़ा है और धरती का चुम्बकीय क्षेत्र चूँकि आकाशीय पिण्डों से जुड़ा है, इसलिए हमारा जीवन आकाशीय पिंडों की शक्तियों से विलक्षण रूप से जुड़ा हुआ है।
इस जानकारी के आधार पर ही भारतीय शास्त्रकारों ने मनुष्य जीवन को स्थूल और सूक्ष्म शक्ति परंपराओं के साथ जोड़ा था, जिससे यहाँ के लोगों का भौतिक जीवन भी सामर्थ्यवान हुआ करता था और योग पद्धति से वे अपनी लघु क्षमता का इतना विकास कर लेते थे कि पिण्ड में हो ब्रह्माण्ड का दर्शन और आनन्द लिया करते थे। इसी विशालता को वेद में यों कहा है-
सूर्यो में बक्षुयतिः प्राणोऽम्तरिक्षमात्मा-
पृथ्वी शरीरम्।
अस्तृती नामाहमयमस्मि म आत्मानं
निबधे द्यादापृथिव्याँ गोपीथाय॥
अथर्व 5। 8। 7,
अर्थात्- सूर्य मेरा नेत्र है, वायु मेरा प्राण है, अन्तरिक्ष मेरी आत्मा (हृदय) और धरती मेरा शरीर है। मैं अपने आपके अपराजित समझकर द्यावा और धरती के मध्य सुरक्षित रखता हूँ।
इसी प्रकार यजुर्वेद में कहा है-
“शीर्ष्णो द्यौः समवर्ततः यस्य बातः प्राणाप्राणौ; नाभ्याऽसीदन्तरिक्ष दिशः ओत्रं पदभ्याँ भूमिः।
अर्थात्- द्यौ मेरा शिर, वायु, प्राण, अन्तरिक्ष, नाभि, दिशा कान और भूमि मेरे पैर हैं।
इन ऋचाओं में यहाँ पिण्ड की विशाल ब्रह्मांडीय शक्ति का परिचय मिलता है, वहाँ उनमें एक महत्वपूर्ण विज्ञान का भी पता चलता है। वह यह कि आकाश में सूक्ष्म और ग्रह नक्षत्रों की ऊर्जा, अयन, विकिरण आदि सब बीज रूप से शरीर में विद्यमान हैं, उन्होंने यह भी पता लगाया कि यह शरीरस्थ सूक्ष्म संस्थान परस्पर नाडियों द्वारा सम्बन्धित है और जब अन्तरिक्ष में कोई हलचल पैदा होती है तो उस हलचल के फलस्वरूप मानवीय प्रकृति भी हलचल करती और मन, बुद्धि एवं चेतना को प्रभावित करती है। विस्तृत ‘विज्ञान ध्यान बिन्दु उपनिषद्’ में इस प्रकार मिलता है-
प्रधानाप्राण बाहिन्यों भूग्रस्तमवश स्मृताः। हडा़ च प्रियमा चैत्र सुषुम्ना च तृतीयका बाग्धारी हस्तिविगाँ च पूजा चैव यशस्विनी अलम्बुला कुहुरत्र शखिनी दशमी स्मृता एवं नाडी़मय चक्रं विशेश्ं योगिनाँ सदा सततं प्राण वाहिम्यः सोमसूडामिन देवता।
-52, 53, 52,
अर्थात्- बहत्तर हजार नाडियों में से दश प्रधान नाड़ियां प्राण को चलाती है, उनके नाम इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना गंगाधारी हस्तिजिह्रा, पूवा, यशस्विनी, अलम्बुसा, कुहू और शंखिनी है। योगियों को (आत्म चेतना को विश्व चेतना में परिणत करने की इच्छा रखने वाले) इस नाड़ी चक्र का ज्ञान होना आवश्यक है। इनमें से इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना ये तीन नाडियों में सूर्य, चन्द्र और अग्नि देवता प्रतिष्ठित हैं, प्राण सदैव इन्हीं में चला करता हैं।
इनमें से भी सुषुम्ना विश्व व्यापी प्राण से सम्बन्ध स्थापित करने वाली मुख्य नाड़ी है, जो मस्तिष्क में ब्रह्मरंध्र से निकलकर गुदा के पास तक रीढ़ की हड्डी के भीतर गई है। यह नाड़ी स्थूल आंखों से नहीं देखी जा सकती, जिस तरह छत के अत्यन्त बारीक छिद्र से प्रकाश की एक किरण प्रवाहित होती दिखाई देती है, उसी तरह का एक शक्ति प्रवाह ही सुषुम्ना कहलाता है, इड़ा और पिंगला (धन और ऋण विद्युत) उसी की दो धाराऐं हैं। सुषुम्ना का प्रवाह जिन 6 चक्रों को पार करता हुआ बढ़ता है, योगियों ने देखा कि उनमें से एक में आकाश के महत्वपूर्ण लोक अपने बीज रूप में विद्यमान हैं- (1) मूलाधार चक्र गुदा से दो अंगुल ऊपर है। यह भूलोक का प्रतिनिधि है, धरती पर होने वाली कोई भी हलचल मूलाधार को प्रभावित करती है और उससे हमारा हृदय और मन प्रभावित होता है। (2) स्वाधिष्ठान चक्र पेड़ के पास है। यह भुवःलोकस्य बीज है। (3) मणिपूरक नाभि में लोक ‘स्वः’। (4) अनहत चक्र, हृदय के पास महःलोक। (5) विशुद्ध चक्र कण्ठ प्रदेश में जनःलोक (6) आज्ञा चक्र दोनों भौंहों के बीच तपःलोक। एक सातवाँ चक्र सहस्रार भी है, जो मस्तिष्क में है और जो ब्रह्मलोक का प्रतिनिधित्व करता है, इन सबसे सर्वोपरि है। वह इन सब पर नियंत्रण की शक्ति रखता है, इसलिए इन शक्तियों को प्राप्त कर लेने वाले के सम्बन्ध में कहा जाता है कि वह अपने इन सूक्ष्म शक्ति संस्थानों के माध्यम से सूर्य चन्द्रमा, अग्नि, वायु, वर्षा आदि पर भी नियन्त्रण कर सकता है, उस शक्ति का क्या पारावार हो सकता है?
उस व्यक्ति का थोड़ा सा परिचय और विश्वव्यापी नक्षत्र शक्तियों से क्या सम्बन्ध और सामंजस्य हो सकता है, उसकी एक क्षीण कल्पना 1899 में प्रसिद्ध वैज्ञानिक जोसेफ जैन को हुई थी। उन्होंने बताया कि एटम में इलेक्ट्रान्स होते है, उतने ही प्रोटान्स भी होते है, जो एक दूसरे को आपसी आकर्षण द्वारा बाँधे हुए है और न्यूक्लियस से सौर मण्डल के क्रम के समान बँधे हुए है। एटम ऊर्जा के समान है और समस्त शक्तियाँ जैसे विद्युत, गर्मी, ध्वनि, प्रकाश और चुम्बकीय आदि एक दूसरे में परिवर्तित होते हैं। पदार्थ में ऊर्जा कम्पन के रूप में होती है। कम्पन जब तीव्र होता है, तब यह वस्तु ऊर्जा हो जाती है, मध्यम अवस्था में उसे पदार्थ कहते है। इससे मापित होता है कि जड़ पदार्थों को सक्रिय रखने की क्रिया इलेक्ट्रानिक शक्तियाँ, जिन्हें सौर मण्डल की शक्तियाँ कह सकते है, हो करती है। शक्ति (एनर्जी) सम्बन्धी वर्तमान परिभाषायें भी इसी बात को पुष्ट करती हे और यह बताती है कि मनुष्य जीवन अज्ञात नक्षत्रीय शक्तियों से निरन्तर प्रभावित होता रहता है।
ज्योतिष विद्या का प्रादुर्भाव भी इसी सिद्धान्त पर हुआ है। मिश्र के लोगों ने देखा कि जब कुछ तारे प्रकट होते है तभी नील नदी में बाढ़ आती है, इसलिए उन्होंने अनुभव किया कि अन्तरिक्ष के पिण्ड हमारे जीवन को निश्चित विधान के अनुसार प्रभावित करते रहते हे। यदि प्रकृति प्रभावित होती है तो मनुष्य का शरीर और मन भी उससे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता। इस जानकारी से एक लाभ तो अन्तरिक्षीय ज्ञान के विकास के रूप में मिला और दूसरा मनुष्य शरीर को प्राकृतिक सामंजस्य में रखकर उससे विश्व व्यापी शक्तियों की अनुभूति और प्राप्ति का लाभ मिला।
पिछले दिनों सूर्य के अध्ययन से भी उपरोक्त सिद्धान्त प्रमाणित हुए है। सूर्य में अधिकतम सक्रियता सन 1928, 1937, 1947 और 1959 में दिखाई दी थी, इन वर्षों में धरती में उल्लेखनीय हलचलें हुई। भारतवर्ष की स्वतन्त्रता भी इसी में सम्मिलित है। सूर्य की सक्रियता उसके शब्दों से फूटती दिखाई देती है। उनके बारे में तो कोई निश्चित जानकारी तभी वैज्ञानिक नहीं पा सकें पर यह पता लगाया गया है कि इन शब्दों से ही पति बैंगनी किरणों की शक्तिशाली धारा और सौर कणों की विपुल संख्या का उद्गम होता है दृश्य प्रकाश की बैंगनी किरणों 186000 मील प्रति सेकेंड की रफ्तार से चलती है, पर सौरकण धीमी रफ्तार से चलते है। उनकी गति (बेलास्टी) मण्डल अलग होती है, इसलिए प्रकाश को जहाँ पहुँचने में आठ मिनट लगते है। वह कण 20 से 60 घण्टे तक का समय ले लेते है। जब ये किरणें और कण धरातल में पहुँचते हैं तो वायु मण्डल के विद्युत जलवायु में परिवर्तन हो जाता है। ऐसे स्वाभाविक परिवर्तनों में सन 1972 तक तीव्रता आयेगी और उसने विश्वव्यापी परिवर्तन भी होंगे। वैज्ञानिक उसे बाँधने की अभी से तैयारी कर रहे हैं, पर यह सब किसका खेल है, यह वह नहीं समझ पा रहें।
22 फरवरी 1956 की रात को सूर्य में अत्यन्त शक्तिशाली विस्फोट हुआ था। विश्व की अनेक वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं ने उस घटना को अंकित किया था। विस्फोट की तेजी के अनुरूप सौर कण धरती की ओर दौड़ पड़े थे और उसके कारण एशियाई देशों और आस्ट्रेलिया में भयंकर तूफान और आँधी आई जिससे रेडियो संचार तक गड़बड़ में पड़ गया।
यह विस्फोट जहाँ भावी परिवर्तनों के संकेत है, यहाँ यह भी है कि मनुष्य अपने शरीर में स्थित उन बीज शक्तियोँ को, जो नाड़ी जाल में संसार के ग्रह नक्षत्रों की शक्तियों को बाँधे हुए है, जागृत कर इन परिवर्तनों में लाझेदार हो सकता है। अर्थात् वह उन्हें रोकने को सामर्थ्य भी रखता है और विस्फोट की भी। सम्भव है आगामी परिवर्तन किसी ऐसी ही अदृश्य सत्ता को इच्छा और योग शक्ति का परिणाम हों।
एक शिष्य को अपने धर्म निष्ठ होने का अभिमान हो गया। गुरुजी उसे ताड़ गये। धर्म का सही अर्थ समझाने के लिए वे एक दिन एक सद्गृहस्थ के घर ठहरे। कृषक एक आम लाया था, उसे उसने अपनी धर्मपत्नी को दे दिया। बेचारी, धर्मपत्नी ने भी उसे खाया नहीं, छोटे बच्चे को दे दिया। बच्चों ने आम गुरु चरणों में समर्पित किया तो गुरु ने शिष्य को बताया- “वत्स! धर्म का यह है सही अर्थ।”
प्रतिदिन राम आती है। चारों ओर अन्धकार छा जाता है। मानव जीवन के सारे काम बन्द हो जाते है। रात और रात का अन्धकार किसी को अच्छा नहीं लगता। तब भी सभी लोग उसे सहन करते है, काटते है। रात आने पर न तो कोई घबराता है, न हाय-हाय करता है और न रोता-चिल्लाता है। क्यों? इसलिये कि हर काली रात के पीछे एक प्रकाशमान दिन तैयार रहता है। सभी को विश्वास रहता है कि रात बीतेगी और शीघ्र ही प्रभात आयेगा। चिन्ता और दुःख की बात तो तब हो, जब रात का अन्त सम्भव न हो और प्रभात की सम्भावना न रहे।
निराशा भी एक प्रकार का काला अन्धकार होता है। किन्तु रात की तरह इसका अस्तित्व भी स्थायी नहीं होता। शीघ्र ही इसका समाप्त हो जाना निश्चित होता है। इसका अस्तित्व कुछ समय के लिये घिर आये काले अन्धेरे बादलों की तरह ही होता है, जो शीघ्र ही अपने आप कट जाते है। निराशा मिटती है और उसके साथ ही अहादकारी आशा अपना नव-प्रकाश लेकर आती है। यह प्रकृति का एक अटल नियम है।
तब न जाने लोग निराशा का वातावरण आने पर बेतरह घबरा क्यों उठते है? शीघ्र ही साहस हार जाते है और जीवन से ऊबने लगते है। एक ही रट लगाये रहते है मैं जीवन से ऊब गया हूँ, मुझे अब कुछ भी अच्छा नहीं लगता। संसार मेरे लिये भय और अन्धकार की जगह बन गया है। मेरे चारों ओर मुसीबत ही मुसीबत घिरी खड़ी है। मैं बड़ा दुःखी हूँ, मेरा जैसा दुःख संसार में किसी पर न आया होगा।
निराशा से इस प्रकार बेतरह घबरा उठने वाले लोगों को देखकर मानना पड़ता हैं कि किसी विद्वान् की कही हुई यह बात ठीक है कि निराशा को अपने ऊपर छाने देना एक प्रकार की कायरता है। जो आदमी कायर है और कमजोर होता है, वह जरा-सी प्रतिकूलता आने पर घबराकर निराश हो जाता है। उसमें कठिनाइयों का सामना करने का साहस नहीं होता और शीघ्र ही निराशा का शिकार बन कर संसार और जीवन को निस्सार और बेकार मान बैठता है।
ऐसे कायर व्यक्ति न तो मानव-जीवन का कोई लाभ उठा सकते है और न कोई उल्लेखनीय काम ही कर सकते है। निराशा की परिस्थितियाँ आ जाना कोई असंभाव्य बात नहीं है। यह संसार सफलता असफलतायें की क्रीड़ा-स्थली है। लोग सफल भी होते है और असफल भी। तब भी लोग संघर्ष करते, परिस्थितियों में लड़ते और साहसपूर्वक आगे बढ़ते है। संसार में ऐसा कौन बड़ा आदमी हुआ है, जिसे कठिनाइयों, प्रतिकूलताओं और असफलताओं का सामना नहीं करना पड़ा। दुःख की काली छाया संसार में सब पर आती है, संसार के सारे महत्वपूर्ण व्यक्तियों पर भी आई। इस संसार के सारे मार्ग कठिनाइयों और कठोरताओं से भरे हुये है। यहाँ किसी के लिये भी फूल-पाँवडे बिछे नहीं रहते। यहाँ कदम-कदम पर अवरोधों से टकराना होता है। घर, परिवार सम्बन्धी, मित्र, व्यापार, समाज, आजीविका, पद, प्रतिष्ठा आदि की कोई न कोई समस्या हर आदमी के सामने खड़ी ही रहती है। तब भी लोग इन सब अवरोधों और कठिनाइयों को जीतकर आगे बढ़ते है और सदा बढ़ते रहे है। यदि इस प्रकार सारे लोग निराशा से परास्त होकर संसार और जीवन का निस्सार समझ बैठे होते तो आज इतिहास में महापुरुषों का नाम न होता। निराशा कायरता का लक्षण है, पुरुषत्व का नहीं।
संसार के सारे व्यक्ति समान होते है, सबसे एक जैसी शक्ति विद्यमान रहती है। सभी को संसार की विषमताओं से टक्कर लेते हुए चलना पड़ता है। तथापि सारे लोग महान् व्यक्ति नहीं बन जाते। इसका रहस्य यही है कि सामान्यतः लोग संसार को विषमताओं और कठिनाइयों से हारकर हताश हो बैठते है। उनके जीवन का सारा उत्साह नष्ट हो जाता है और वे असफलताओं से निराश होकर मैदान छोड़ जाते हैं। किन्तु जो आदमी हर परिस्थिति का साहस के साथ सामना करते हैं। दुख तकलीफ और विफलताओं से निराश नहीं होते, अपनी पूरी शक्ति और उत्साह से सेवार्थ करते हुए आगे बढ़ने का प्रयत्न करते रहते हैं, वे अन्त में विजयी होते हैं और इतिहास में अपने को अमर कर जाते है। निराशा पराजय तथा पलायन का भाव है। जो भी इस दुर्भाव को अपने जीवन में स्थान दे देता है, वह नित्य ही जीवन की बाजी हार जाता है। किसी भी स्थिति अथवा परिस्थिति में निराशा को पास न आने देना चाहिए। यह जीवन प्रगति की बड़ी भारी शत्रु है।
यह बात सही है कि सफलता संसार में सबको बाँदनीय है। सभी सुल और समुन्नत होना चाहते हैं। इसी के लिए ही जीवन संग्राम अंगीकार किया जाता हैं तब भी असफलता का सफलता के मार्ग में कुछ कम महत्व नहीं है। असफलता से टक्कर लेते हुए सफलता के लक्ष्य पर पहुँचने में जो सुख और सन्तोष है, वह बिना किसी संघर्ष अथवा बलिदान के सहा अथवा संयोग वशं मिल गई सफलता में नहीं मिलता। मनुष्य पौरुष और पुरुषार्थ का तभी प्रामाणिक अधिकारी होता है, जब वह असफलताओं के बीच से मार्ग बनाता हुआ सफलता का वरण करता है। यदि मनुष्य के जीवन में सुख हो सुख भर जाये तो उस सुख में न तो कोई आकर्षण रहता है और न उसका कोई महत्व। सुख दुख से मिलकर चलने वाले जीवन में जो सरसता और स्वाद है, वह एक रम सुखी जीवन में नहीं। जीवन में एक मात्र सुख ही सुख होने से वह दुखी जीवन के समान की भारपूर्ण बन जाता है। इसलिए जीवन में दुख, कष्ट, अभाव, असफलता जो भी आये उसको भी सुख संतोष के साथ स्वीकार करते रहना चाहिए। प्रतिकूलताओं में निराशा होकर बैठे रहना कायरता है, जो पुरुष संज्ञक मनुष्य के लिए लज्जा की बात है।
निराशा जीवन पर छा जाने वाली मृत्यु की काली छाया के समान है। यह धनु की तरह मनुष्य की सारी शक्तियों को नष्ट कर डालती है। निराशा का बन्दी मनुष्य जीवित दीखता हुआ मृततुल्य होता है। उसे लोगों से मिलने जुलने, हँसने बोलने और सामान्य व्यवहार तक करने में संकोच होता है। मनोरंजन, उत्सव समारोह उसे काँटे की तरह कष्टदायक लगता हे। वह तो एक मात्र नैराश्य मुद्रा में विषाद और मलीनता के वातावरण में डूबा रहता है। बहुत बार तो निराशा के स्थायी हो जाने पर मनुष्य ‘मलन कौलिया’ जैसे मानसिक रोगों का आखेट बन जाता है।
जीवन में निराशा को प्रश्रय देना असफलता के लिए मार्ग प्रशस्त करना है। सफलता का आधार पुरुषार्थ तथा आत्म विश्वास माना गया है। किन्तु निराशा ग्रस्त मनुष्य को यह दोनों गुण छोड़कर चले जाते हैं। निराश व्यक्ति जिस काम में हाथ डालता है, अपनी इस दुर्बलता के कारण उसे वह काम असाध्य और दुष्कर अनुभव होता है। उसके मन में उस काम के लिए प्रतिगामी तथा निषेधात्मक विचार ही चक्कर मारते है।
निराश व्यक्ति की इच्छाशक्ति नष्ट हो जाती है। इच्छाशक्ति के नष्ट हो जाने में जीवन प्रगति की सारी सम्भावनायें ही नष्ट हो जाती है। इच्छा शक्ति का मनुष्य की कार्य क्षमता से अटूट सम्बन्ध है। शरीर और उसकी इन्द्रियाँ जिसके निर्देश और प्रेरणा से काम करती है, उस शक्ति का नाम इच्छा है। एक बार इच्छा शक्ति की प्रबलता से निर्बल व्यक्ति भी मैदान मार सकता हैं। किन्तु जिसने निराशा द्वारा अपनी इच्छाशक्ति को पराभूत कर डाला हे, वह जीवन में दो कदम भी आगे नहीं बढ़ सकता। अपने अभीष्ट लक्ष्य के पाने के लिए मनुष्य को साहसी उत्साही और आशावादी होना पड़ेगा। आशा का प्रकाश लेकर चलने वालों के मार्ग को अन्धकार हट हटकर रास्ता देता चलता हे। जो मन बुद्धि और विचारों में निराशा का अन्धेरा लेकर चलेगा, उसे पथ पर ठोकरें लगेंगी और असफलता का मुख देखना ही होगा।
प्रायः लोग किसी असफलता के आघात या संकट से घबराकर निराश हो जाते हैं इस प्रकार एक बार निराशा हो जाने पर मनुष्य के जीवन क्षितिज पर संकट और आपदाओं के ही काले बादल मंडराते दिखलाई देते हैं। निराशा संकटों से छूटने का उपचार नहीं वह तो संकटों में बुद्धि करने वाला विषैला तत्व है। जहाँ आशावादी और उत्साही के लिए जीवन एक सुन्दर और सुखद बाढ़ के समान होता है, वहाँ निराश और निरुत्साही व्यक्ति के लिए कष्ट और क्लेशों के अतिरिक्त कुछ नहीं होता। निराश व्यक्ति के सारे स्वप्न, सारी महत्वाकांक्षायें और रुचियाँ पाले के मारे फूलों के समान मुरझा जाती है। उसके जीवन का सारा उल्लास सारा सुख और सारा संतोष सदा सर्वदा के लिए स्वप्न बनकर रह जाते हैं।
संसार में जो मनुष्य अपने को अकेला और असहाय अनुभव करता है, निश्चित रूप से वह निराशा का रोगी होता है। निराश मनुष्य के हृदय में यह एक मिथ्या धारणा घर कर लेती है कि संसार में उसका अपना कोई नहीं है। उसके बारे साथी मित्र और हितैषीजन उसे छोड़कर चले गए है। ऐसा हो चाहे न हो पर निराशा ग्रस्त व्यक्ति को अपने मलीन मनोभावों के कारण ऐसा ही अनुभव होता है। ऐसा ही नहीं उसकी भावना के अनुसार एक दिन उसके संगी साथी और मित्र हितैषी उसे छोड़ भी देते है। निराश और निरुत्साही मनुष्य का साथ किसी को पसन्द नहीं होता। अन्तर में उसी निराशा मनुष्य का मुख उसी प्रकार मलीन बना देती है। जिस प्रकार आग का धुंआ करके वातायनों को काला कर देता है। मलीन मुख उदास वृत्ति और विषादी स्वभाव वाले का साथ करना किसे पसन्द आ सकता है? जहाँ अन्य प्रसन्न प्रवृत्ति वाले व्यक्ति एक दूसरे से मिलने पर उत्साहपूर्वक और सरस बातें करते हैं। जीव की सफलता के चित्र खींचते हैं, यहाँ निराश व्यक्ति मिलने पर आहोँ कराहों और विषादपूर्ण बातों से लोगों का सिर भारी कर देता हैं। ऐसे कष्टदायक व्यक्ति से मिलना भला कौन पसन्द कर सकता है?
यह संसार जिसमें हम रह रहे है कष्ट और कठिनाइयों का आलय कहा गया है। यहाँ प्रतिकूलतायें और विषमतायें तो आती ही रहती हैं। इनसे टक्कर लेते हुए आगे बढ़ना ही जीवन है। इसलिए निराश कभी न होना चाहिए। भला और उत्साह की वृत्ति मानव शक्तियों के लिए संगी बना के समान गुणकारी होती है। बड़े से बड़ा संकट आ जाने और कठिन से कठिन परिस्थिति खड़ी हो जाने पर भी आशा का साथ न छोड़ने वाले अन्ततः विजयी होते हैं। यदि आपमें किन्हीं कारणों से निराशा का भाव आ गया हैं। तो तुरन्त ही उसे निकाल डालिये। अपने साहस और उत्साह का सम्बल सम्भालकर उठ खड़े होइये। आशा की मशाल हाथ में लेकर आगे बढ़िए। आप देखेंगे कि आपका आत्म विश्वास, आपकी शक्तियों और क्षमतायें जो निराशा की दशा में आपसे दूर हो गई थी। दौड़कर फिर चली आयेगी। संसार में ऐसा कोई नहीं हैं, जिसके जीवन में केवल हास, उल्लास और आनन्द के ही क्षण बनें रहें। कष्ट, संकट अथवा विफलता के कारण न आते हों। तब भी सभी लोग हँसते खेलते और बाधा व्याधियों से टक्कर लेते हुए आगे बढ़ते चले आ रहे हैं। आप भी उठिए और अपनी शक्तियों के साथ आगे बढ़िए। विजय आपके साथ आयेगी। केवल निराशा बनकर पड़े रहने से आप प्रगति तो नहीं कर पायेंगे, साथ ही जिस स्थिति में पड़े पड़े कष्ट भोग रहे हैं, वह भी दूर न होगी। आपके जीवन में वाँछित परिवर्तन तभी आ सकेगा, जब आप निराशा से पल्लू छुड़ा कर आशावादी बनेंगे।
मगध के एक धनी व्यापारी ने बहुत धन कमाया। उसे अपनी सम्पन्नता पर इतना खर्च हुआ कि वह अपने घर के लोगों पर ऐंठा करता। फल यह हुआ कि उसके लड़के भी उद्दंड और अहंकारी हो गये। पिता पुत्रों में ही ठनने लगी। घर नरक बन गया।
उद्विग्न व्यापारी ने महात्मा बुद्ध की शरण ली और कहा- “भगवन! मुझे यह नरक से मुक्ति दिलाइये, मैं भिक्षु होना चाहता हूँ।”
तथागत ने कुछ सोचकर उत्तर दिया- “भिक्षु बनने का अभी समय नहीं है तात्। तुम जैसा संसार चाहते हो वैसा आचरण करो तो घर में ही स्वर्ग के दर्शन कर सकोगे।”
व्यापारी घर लौट आया और विनम्रता बरतने लगा। उससे सारे घर के हृदय परिवर्तित हुए और सुख-शान्ति के दर्शन होने लगे।
मोटर या रेलगाड़ियां आगे की भागती है, उनका धुंआ पीछे छूटता जाता है, इसलिए उनमें बैठी हुई सवारियाँ धुएं के विषैले प्रभाव से बच जाती है, किन्तु सामूहिक रूप से धरती में विषैली गैसों का प्रभाव यहाँ के प्राणियों में घुटन ही पैदा करता है। भूगोल जानने वालों को पता है कि धरती सूर्य की परिक्रमा करती है, साथ ही वह अपनी धुरी प भी चक्कर काटती रहती हैं गोला कार चक्कर के कारण एक स्थान की विषैली गैसों से सारी धरती भी प्रभावित होती है और आकाश भी, इस बात को इनकार करने का कोई कारण नहीं हैं।
अब हम अपने पाठकों का ध्यान अमेरिका के प्रसिद्ध परमाणु- शास्त्री श्री एडवर्ड टेलर और अलबर्ट एल. लेटर द्वारा लिखित पुस्तक हमारा परमाणु केन्द्रिक भविष्य ‘अवर क्यूक्लिय फ्यूचर’ नामक पुस्तक के उन अंशों की ओर ले जाना चाहेंगे, जिन में इन दोनों वैज्ञानिकों ने यह बताने का प्रयास किया है कि परमाणु-बमों (ऐटमबम) के विस्फोट से जो विषैली गैसों की तत्व वर्षा (फाल-आउट) होती है, उससे जीव जगत और आकाश किस प्रकार प्रभावित होते है। यद्यपि दोनों वैज्ञानिकों ने यह प्रयत्न किया है कि परमाणु विभीषिका का कम से कम आतंक लोगों पर पड़े इसलिए उन्होंने बहुत हाथ साधकर लिखा है, पर जितना कुछ लिखा है, उतने से ही यह निश्चित हो गया है कि भले ही परीक्षण के तौर पर यिद परमाणु विस्फोटों का सिलसिला जारी रहा तो मानव का अस्तित्व रहेगा भी या नहीं, इस सम्बन्ध में कोई निश्चित राय दे सकना असम्भव होगा। उस स्थिति की पूर्व सुरक्षा के यदि कोई समर्थ साधन है तो वह यज्ञ ही होंगे, इसलिए यज्ञ परंपरा का जितना अधिक विस्तार होगा, विश्व संस्कृति की सुरक्षा को सम्भावनायें उतनी ही तीव्र होंगी।
पुस्तक के 11 वें अध्याय- ‘मिट्टी से मनुष्य तक’ फाम अर्थ टु मेन में उन्होंने बताया है कि बम विस्फोट के बाद रेडियो सक्रिय उत्पादनों में प्रकार के परिवर्तन बड़े आश्चर्यजनक होते हैं। इसमें मेसन के इलेक्ट्रान तो ब्रह्राहीय विकिरण में भाग लेते है, इसलिए उनका विवरण न कर केवल धरती और मनुष्य समाज को प्रभावित करने वाली विषैली तत्व वर्षा का ही वर्णन करेंगे। सर्वप्रथम गामा किरणों (गामा-रेंज) की सक्रियता है, जिसका प्रभाव विस्फोट के बाद 1 वर्ष तक बना रहता है। विषैली सक्रियता स्थूल आँखों से नहीं देखी जा सकती, पर इससे विशेष सुरक्षा के द्वारा ही बचाव सम्भव है, कपड़े और मकान भी उससे शरीर की रक्षा नहीं कर सकते। किरणों एवं गैसों से बचाने वाले परिधान जन साधारण को उपलब्ध नहीं हो सकते, इसलिए उसके प्रभाव से तो कोई नहीं बच सकता।
इसके बाद गैसों का नम्बर आता हे। सबसे विषैली गैस स्ट्रानटियम 90 है, वह बोटा किरणें छोड़ती है और उसकी नैष्ठिक सक्रियता का समय 56 वर्ष का होता है, इसी तरह का दूसरा तत्व है सेसियम 137 जो 60 वर्ष तक मनुष्य जीवन को विषैले प्रभाव में रखती है। स्ट्रानटियम कैल्शियम की तरह होता है और उससे खाद्य पदार्थ विषैले हो जाते है। यह तस्व शरीर में आसानी से प्रविष्ट हो जाता है और काफी समय हड्डियों में जमा रहता है यह क्षय रोग पैदा करता है। विघटन-प्रक्रिया में आयोडीन 131 सबसे अधिक मात्रा में भाग लेता है पर उसका आइसोटोप केवल 16 दिन तक रहता है, इसलिए वह शीघ्रता से चरागाहों को और वनस्पति को दूषित बनाकर समाप्त हो जाता है। वह मनुष्य शरीर में टेंटुये (एडम्स एपिल) के पास की बायरायड ग्रन्थि (थायरायड ग्लैण्ड) को विषैला बना देती है। इसी ग्रन्थि से भोजन पचाने और चित्तवृत्तियों को नियन्त्रित करने वाले रासायनिक द्रव पैदा होते है, इसलिए आयोडीन 131 थोड़े समय में ही जहाँ स्तनधारी पशुओं के शरीर विषैला बनता है, वहाँ वह मनुष्य की पाचन क्षमता को भी कमजोर कर देता है और चित्तवृत्तियों में चिड़ चिड़ापन क्रोध, और अप्रसन्नता जैसी दुर्भावनायें पैदा कर देता है। वर्तमान युग ऐसी परेशानियों से ग्रस्त होता जा रहा है, हम समझ नहीं पाते कि कारण क्या है, पर यह सब अब तक जो बम विस्फोट हो चुके य हो रहे है, उनके कारण ही हो रहा है।
कुछ रेडियो सक्रिय आइसोटोप वे होते है, जो बमों में प्रयुक्त ईधन से बनते हैं, जैसे यूरेनियम 235, प्लूटोनियम 239। यूरेनियम 235 का प्रभाव 142 करोड़ वर्ष और प्लूटोनियम का 42 हजार वर्ष पर उससे अल्फा किरणों पैदा होती है, इसलिए उससे जीवन को अधिक खतरा रहता है। अल्फा किरणें यद्यपि त्वचा का भेदन नहीं कर सकती जैसा कि बीटा और गामा किरणें, पर यदि इनकी थोड़ी सी मात्रा शरीरी में पहुँच जाये तो उससे मनुष्य के शरीर में विषैला प्रभाव तेजी से बढ़ जाता है। अल्फा किरणों की और सूक्ष्म भेदन जानकारी वैज्ञानिक नहीं पा सकें, इसलिए उसके दीर्घकालीन दुष्प्रभाव से चिन्तित होना स्वाभाविक ही है।
शरीर में कुल वजन का दस प्रतिशत भाग हड्डियों का होता है, इसलिए इन विषैले तत्वों को दश प्रतिशत मात्रा तो स्थायी रूप से शरीरों में बनी रहती है और उसके कारण शरीर के आनुवाँशिक विकास में बाँधा पड़ती है, अर्थात् आने वाली सन्तानें उत्तरोत्तर कमजोर और बीमार होती चली जायेंगी। हड्डियाँ शरीर की रासायनिक क्रिया में कम भाग लेती हैं, इसलिए उनका विषैला प्रभाव शीघ्र नहीं धुल पाता। यह विष प्रजनन कोशों और समीपवर्ती मज्जा को भी क्षतिग्रस्त करते हैं। अब तक जो परीक्षण हो चुके हैं, उनसे ही 100 पौण्ड से भी अधिक स्ट्रानटियम 90 का उत्पादन हो चुका है जो अब भी धरती पर व्याप्त है और 100 पौण्ड भाग लगभग मेघ के रूप में विघटित होकर धरती की सतह पर वापस आ गया है। यह अंश अमेरिका में सबसे अधिक है और यदि सचमुच कहे तो आज मानसिक और शारीरिक दृष्टि से सर्वाधिक रोगी कोई देश है तो वह अमेरिका ही है। यह दूषित पदार्थ जब मिट्टी में मिल जाते हैं, तो अनन और वनस्पति की जड़ों से घुसकर शरीर में पहुँच जाते हैं, इस तरह अब जो हम अन्न खा रहे हैं, वह भी रेडियो धर्मी विष के प्रभाव से मुक्त नहीं है।
इससे पूर्व किसी लेख में हम जा चुके हैं कि बम-विस्फोटों के विषैले दबाव में ‘रोएन्टजन’ इकाई से माप की जाती है। ऐसे 40 रोएन्टजन की मात्रा मनुष्य शरीर को लगभग अर्द्धमृत कर देती है, तात्पर्य यह है कि यह मात्रा जितनी बढ़ती जायेगी, स्पष्टवादी वैज्ञानिकों का कहना है कि अब तक जो परीक्षण हो चुके हैं, उनसे ही विश्व भर में 50 हजार व्यक्ति अकाल मृत्यु के शिकार होंगे। यदि एक हजार रोएन्टजनों के संपर्क में मनुष्य शरीर की रक्षा जायें तो उससे उस मनुष्य की तीव्र बुखार की सी स्थिति बनी रहेगी और 30 वें दिन उसकी निश्चित मृत्यु हों जायेंगी अब जितनी मात्रा से वर्तमान जीवन प्रभावित है, उससे कुछ न कुछ बुखार की सी स्थिति तों सब की बना रहेगी और उस स्थिति में बीमार की जो मानसिक स्थिति होती है, वैसी ही लोगों में विकसित होती चली जायेगी, तात्पर्य यह कि लोगों के सब और शरीर दोनों में ही चिंता परेशानी, रंग और बीमारियाँ अकारण पैदा होती रहेंगी।
इन वैज्ञानिकों ने हिरेशिमा और नागाशाकी में गिराये बमों के बाद जीवित लोगों पर जाँच के आंकड़े देते समय यह बताने में संकोच नहीं किया कि उसका अध्ययन करने वाले रेडियोलाजिस्ट भी विषैली तत्व वर्षा के प्रभाव से बच नहीं सके। उनमें से भी अनेक को गले की गिल्टियाँ हुई। ऐन्किलोजिग स्पाडिलिटिस जो रीढ़ के जोड़ों को बड़ी कष्ट साध्य बीमारी है। कुछ उससे भी पीड़ित हुये। इस तत्व वर्षा से धरती के किसी भी कोने में रहने वाले व्यक्ति स्ट्रानटियम 90 के प्रति वर्ष 0.002 रेएन्टजम से प्रभावित होते रहते है। इससे निःसन्देह लोगों में हड्डी के कैंसर ल्यूकोमिया एवं क्षय रोगों को वृद्धि होगी। डा. हाडिन जोन्स ने आयु ह्रास सम्बन्धी आंकड़ों में यद्यपि सिगरेट आदि के धुयें से 9 वर्ष की आयु कम होना बताया है, वहाँ इस विषैले तत्व से कुल 5 या 12 दिन बताया है, पर वायु मण्डल को दूषित करने और शरीरों की रोग क्षमता बढ़ाने में तो यह दोनों ही एक-सा काम करते हैं। सिगरेट बीड़ियों, से जो धुंआ फूँका जा रहा है, वह भी इसी कोटि का है और उससे वह लोग भी निश्चित रूप से प्रभावित हो रहे है, जिनका न तो बम विस्फोट से कोई मतलब है और न ही वो धूम्रपान करते है।
रेडियोधर्मी धूल का सबसे बुरा प्रभाव आने वाली संतानो पर पड़ेगा, यह स्वयं टेलर और लेटर दोनों ने स्वीकार किया है और यह कहा है कि उसका यथार्थ प्रभाव हमारे बच्चो के भी बच्चों में देखने में आयेगा वे लिखते है कि ऐसा इसलिए होगा कि नवजात प्राणी माता पिता के क्रोमोसोम (गुण सूत्रों) से अपने शरीर का विकास करता है। बच्चे पिता माता से 24-24 या 23-23 क्रोमोसोम प्राप्त करते हैं इनमें जो जीन्स होते है वह तत्व वाहक होते हैं और उनमें मनुष्य के आचरण सम्बन्धी रासायनिक संकेत होते है। यह वह बिन्दु हैं, जहाँ स्थूल और भाव दोनों मिलते है, रेडियोधर्मी धूल में बीटा और गामा किरणों की सक्रियता उन्हें ढेढा कूबरा भेंडा और विषैला बनाती है, जिससे सम्भव है, आगे आने वाली पीढ़ी ऐसे में अष्टावक्र और मानसिक दृष्टि से प्रचण्ड दुर्द्वय, उद्वण्ड और अमानुधिक स्वभाव वाले हों, जिन्हें पूर्ण असुर ही कहा जा सके। यद्यपि वैज्ञानिक दबी जवान से ही स्वीकार करते हैं कि कोई भी ‘जीन’ परिवर्तन हो सकता है, पर यह निश्चित है कि वर्तमान अणु विस्फोटों की प्रतिक्रिया से भावी पीढ़ी को बचाया नहीं जा सकता। तात्पर्य यह है कि हमने जानबूझ कर अपनी संतान के शरीर और मन दुर्भाग्यपूर्ण बनाने का कुचक्र रच डाला है, उससे छुटकारा नहीं मिल सकता, हम धरती में पूर्ण असुरत्व के विकास के मददगार है, भले ही वह धीरे-धीर देखने में आ रहा हो।
‘जीन’ एक अत्यधिक सुचारु और सार रूप में गठित पदार्थ है और इतना आश्चर्यजनक है कि अपने आप में सभी जातिगत गुणों को वहन कर ले जाता है। इसमें बाहरी रेडियो हस्तक्षेप हर बार इस व्यवस्था को नष्ट करेगा, जो हानिकारक भी होगा और प्राकृघातक भी। क्योंकि रेडियो परीक्षणों से मालूम हुआ है कि प्रजनन कोशों में 0.001 या 0.002 रोएन्टजन वर्ष भर में प्रवेश होता है अर्थात् एक पीढ़ी 0.05 रोएन्टजन विष सोख (आब्जार्व) लेगी। यह अधिकाँश सैसियम 137 होगा, जो गामा किरणों से पैदा होता है और जो धरती में तथा शरीरों में मिल चुकी है। यह विवरण देते समय दोनों वैज्ञानिकों ने स्वीकार किया है कि हम यह अध्ययन करते समय यह निश्चित नहीं कर सकते कि अपनी भावी प्रजा को शरीर रचना और मनीगत सम्बन्ध के बीच इस दुष्प्रभाव से किस प्रकार बचा सकते है। यह गम्भीर कठिनाइयाँ है, जिनका हमारे पास कोई उत्तर नहीं है।
इसका उत्तर पाना है तो भारतीय संस्कृति की भी वैसी ही खोज करनी पड़ेंगी जैसी वैज्ञानिकों ने रेडियो सक्रियता की (रेडियो एक्टिविटीज) की है। यंत्रों से पैदा होने वाले अग्नि प्रवाह और ध्वनि संतरण से होने वाले भावनात्मक परिवर्तन, दैवी शक्तियों से सम्बन्ध और प्राकृतिक परिवर्तनों की बात हम यज्ञों की चर्चा करते हुए पहले कर चुके है, आज यहाँ उस वैज्ञानिक तथ्य का प्रतिपादन करना चाहेंगे, जो यज्ञों के माध्यम से मानवीय शरीर को और मन को स्वस्थ एवं बलवान बनाता है, अब हम इस स्थिति में है कि यज्ञों द्वारा होने वाली सूक्ष्म प्राण वर्षा का वैज्ञानिक विश्लेषण कर सकें और लोगों से यह कह सकें कि यज्ञों में जलाई जाने वाली वनस्पतियाँ, अन्न और धृत निरर्थक नहीं जाते वरन उनकी भी उतनी ही रक्षा करते है, जो उनकी आलोचना करते है। जिस तरह रेडियो धर्मिता हर अनिच्छुक का भी अपकार करती है, उसी प्रकार यज्ञों की ही शक्ति होगी, जो मानव संस्कृति की रक्षा करेगी। यज्ञों के वैज्ञानिक आधार को भी छोड़ा नहीं जा सकता क्योंकि उससे आने वाली प्रजा की सुरक्षा है। उन्हें वैज्ञानिक अभिशाप से बचाने के लिए इसके अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं है कि सारी धरती को रेडियो धर्मिता से उन्मुक्त करने के लिए यज्ञो की धूम मचा दी जाये।
इस कथन की पुष्टि के लिए हम अपने पाठको को होम्योपैथिक चिकित्सा के आविष्कारक डा. हैनोमन के पास से चलना चाहेंगे। ‘अर्गेनन आफ मेडीसिन’ नामक अपनी पुस्तक की 190 वी धारा में उन्होंने लिखा है कि - “मेदे जिह्वा और मुख में ऐसे भाग है, जो औषधि के प्रभाव को शीघ्र ग्रहण कर लेते है, किन्तु उससे भी तीव्र प्रभाव नाक से सूँघने से होता है। औषधि को जलाने से धुयें का एक भाग अत्यन्त सूक्ष्म जिसे हम सुगन्ध के रूप में जानते है आस पास के वातावरण में व्याप्त हो जाता है, श्वाँस के द्वारा भीतर फेफड़ों में पहुँचाते है, उससे स्थूल रासायनिक तत्वों में भी चेतनता आती है और उसके सूक्ष्म आवेशों पर भी इसका स्पष्ट प्रमाण यही है कि फूलकी या कोई अच्छे सुगन्धित तेल की खुशबू पाते ही हम प्रसन्न हो उठे है। डा. किंग आर0एम0एस॰ ने मद्रास में एक बार यह तथ्य स्वीकार किया था कि घी, चावल, केसर मिलाकर जलाने से कितनेक रोगों के कीटाणु नष्ट होते है और उससे श्वांस नली से सम्बन्धित कुछ ग्रन्थियों से उन रसों का स्राव होता है, जो हमारे मन और चित्त वृत्तियों को प्रभावित करते है और उन्हें प्रसन्नता से भर देते हैं।
‘कैमिकल प्रापरटीज’ संस्था ने उस पर विस्तृत अध्ययन किया। जायफल, जावित्री, बड़ी इलायची, सूखा चन्दन, जलाकर पाया कि उनका तेल गैस बनकर हवा में फैलता है, आग उन्हें जलाकर गैस कर देती है, उसके परमाणु बहुत सूक्ष्म होते है। सूक्ष्म दर्शक यन्त्र से नाप की गई तो यह परमाणु 1/10000 से 1/100000000 सेंटीमीटर व्यास कर सकते है, जो इतने सूक्ष्म हों या बात हम अणु विस्फोट की ऊपर की चर्चा में कर चुके है, इसलिए यहां यह बात स्वीकार कर लेनी चाहिए कि यज्ञ मनुष्य की तत्काल प्रसन्नता ही नहीं बढ़ाते वरन जीन्स के होने वाले विषैले दबाव को वही रोक सकते हे। ऐलोपैथ भी क्रियोजूट और इकोलिप्टस आदि को मिलाकर (इनहौलेशन) उनमें कुछ औषधियाँ डालते है। और उसे आग में चढ़ाकर उसकी भाप से कमरे को भर देते है, फिर उसमें रोगी को बैठा देते हैं, इससे सूक्ष्म परमाणु सीधे रोगी के फेफड़ों में जाकर अपना प्रभाव करते है। अथर्ववेद में इसी तथ्य को प्रकट करते हुए ऋषियों ने कहा था-
मुच्चामि स्वा हथषा जीवनाय बमज्ञात यरुमा दुत
राजयरुमात।
ग्राहिर्जग्राह यद्यतेदेन तस्या इन्द्रानिग्नप्रभु मुक्तमेनम।
-अथर्व 3। 11। 1,
हे प्राणी तुझ को सुख के साथ चिरकाल तक जीने के लिए मैं युक्ति बताता हूँ, तू आहुतियों के द्वारा राज्यक्ष्मा के सभी प्रकट लक्षणों और गुप्त राजरोगों से छुटकारा प्राप्त कर। तुझे पीड़ा है और पुराने रोग है, उन्हें वायु तथा अग्नि देवता अवश्य छुड़ायें। इस वर्णन में अग्नि (किरणें) वायु (गैसें) मिलकर वही रेडियोधर्मी गति (रेडियो एक्टीविटी) पैदा करती है, जो वर्षों से होती है पर उसमें प्रयुक्त पदार्थों के सभी आइसोटोप विषैले और दूषित होते है, जब कि यज्ञो में प्रयुक्त होने वाले हविष्यान्न का प्रत्येक भाग पुष्टिकारक रोग निरोधक और प्राणबंधक होता है। यह वायु और गन्ध भी इतनी सूक्ष्म और प्रतिक्रियावादी होती है कि कुछ ही समय में सारे वायु मण्डल में फैलकर जीव मनुष्य और वनस्पति सबको प्रभावित करते हैं। इस विज्ञान को अब समण् बिना भावी संस्कृति को बचाया नहीं जा सकता।
डा. हेफकिन, जिन्होंने चेचक के टीके का आविष्कार किया परीक्षण के बाद बताया कि घी जलाने से उसको गैस अति सूक्ष्म अवस्था में दूर तक फैलती और रोग के कीटाणुओं को नष्ट करती हैं। प्रो. टिलबर्ट, फ्राँस के उच्चकोटि के विज्ञानवेत्ता, का कथन है कि जलती हुई शक्कर या खाँड के धुएं में वायु शुद्ध करने की बड़ी शक्ति है, उसने हैजा, तपेदिक, चेचक के कीटाणु और विषैले तत्व नष्ट होते हैं।
यज्ञ का सूक्ष्म विज्ञान इन सब से महत्वपूर्ण है। वेद मन्त्रों में प्रयुक्त ‘अग्ने नये सुपथा राये’ अर्थात् जिस पथ से अग्नि गमन करते है इससे यह पता चलता है कि अग्नि तत्व अपने सूक्ष्म रूप से पृथ्वी से उठकर सुदूर अन्तरिक्ष की देव शक्तियों को प्रभावित करता है, जिस तरह सूर्य के विक्षोभ (फिलामेंट) पृथ्वी को प्रभावित करते है, उसी प्रकार अग्नि तत्व की यह धारायें शब्द तरंगों के द्वारा आकाश की शक्तियों को प्रभावित कर उनकी उल्टी प्रतिक्रिया जो पृथ्वीवासियों के लिए बड़ी लाभदायक होती है, खींच लाती है, अग्नि को देवमन्त्रों का दूत कहा गया है, उसका अर्थ ही है कि उस माध्यम से हमारी वाणी, हमारे भावों के कम्पन वैज्ञानिक तरीके से ऊपर पहुँचते है। यज्ञो से केवल पृथ्वी तल ही प्रभावित होते है ऐसा नहीं सुदूर ब्रह्मांड में भी यह शक्तियाँ विद्यमान है। 12 मार्च को साइन्स पत्रिका ने एक रिपोर्ट दी है कि अमेरिकी वैज्ञानिकों के एक दल ने जिनमें नोबुल पुरस्कार विजो चार्ल्स टाउन्स भी सम्मिलित है, तारों के बीच में विक्षुब्ध जलवाष्प बादलों के विशाल हड्डो का पता लगाया है। इस प्रकार पहल बार सौर मण्डल के अत्यन्त दूरवर्ती ग्रहों में जल का अस्तित्व देखा गया है, इसका पता भी तीव्र रेडियो
ध्वनियों से चला है। जिन आठ बादलों का पता चला है, वे प्रत्येक हमारे सौर मण्डल से बड़े है और उनकी पृथ्वी से दूरी 10 हजार से 50 हजार वर्ष आँकी गई है। स्मरण रहे कि 1 वर्ष में प्रकाश जितनी दूरी तरय कर लेता है, उसे प्रकाश वर्ष कहते है जबकि प्रकाश की गति 1 सेकेंड में लगभग 1 लाख 87 हजार मील है। कैलीफोर्निया विश्व विद्यालय के डा. डैविड रंक ने लिखा है कि इन जलवाष्पों में धूल और गैस भी है।
इन वैज्ञानिक खोजों से यज्ञों की महत्ता पर और भी प्रकाश पड़ा है यदि यज्ञो से अन्तरिक्ष को जोड़कर इस दिशा में भी शोवें सम्भव हुई तो लोगों को पता चलेगा कि यज्ञ को भारतीय संस्कृति में जो सर्वोच्च स्थान दिया गया है, वह भ्रान्त कल्पना या भावुकता नहीं वरन एक महत्वपूर्ण विज्ञान है, जिससे अतीत के ज्ञान की भी रक्षा होती है, वर्तमान को सुख शाँति और भावी संस्कृति की भी रक्षा होती है।
तथागत से एक बार सैन्याधिकारीने प्रश्न किया-”महात्मन्! धार्मिक ग्रन्थों में कही तो लिखा है, भगवान बड़े करुणाशील है जीव को कष्ट में देखते ही पिघल उठते हैं, कही लिखा है कि भगवान बड़े कठोर है, वह कठोर से कठोर दंड पाते लोगों को भी मुस्कराते हुए देखते रहते हैं। समझ में नहीं आता यह विरोधाभास क्यों है?”
तथागत ने मुस्कराते हुए उत्तर दिया- ‘‘इसलिए कि लोग उन परिस्थितियों को समझने में अपनी बुद्धि का उपयोग भी करें कि किस स्थिति में वह दयालु है- किसमें कठोर।”
अषाढ़ आया। बादल छा गये। एक दिन वर्षा प्रारंभ हुई। कई दिन तक झड़ी लगी रही। धरती जल मग्न हो गई तब बादल साफ हुये।
भरपूर जल पीकर धरती की गोद से अनेक तरह के पौधे गृहस्थ की कामनाओं की तरह फूट पड़े। एक स्थान पर हजारों पौधे खड़े अपनी हरीतिमा से सबको मुग्ध करने लगे अनेक जाति के अनेक पौधे-कोई आम, कोई नीम, इमली पाकर और जामुन तो केले, महुए और सहतूत के भी पेड़ उनमें थे। विवशता में ही हरियाली का एकपन बड़ा सुन्दर लग रहा था।
पर दूसरों को सुन्दर लगने वाले वह पौधे अपने आप में ही लड़ पड़े कोई कहता है मैं अधिक हूं कोई कहता मेरी छाया ज्यादा घनी है। शाम तक विवाद तेज ही होता गया। हाथापाई की नौबत आ गई रात उन्होंने अशान्ति में गुजारी ?
छः महीने ऐसे ही ईर्ष्या-द्वेष में बीते और उधर फिर ज्येष्ठ तपने लगा। सूर्य भगवान की प्रचंडता में सारे पौधे सूखकर पीले पड़ गये। अन्तकाल निकट आ गया। साथियों से बिछुड़ने की घड़ी आई तब पौधों को पता चला कि इतनी उम्र व्यर्थ ही लड़ने झगड़ने में गुजारी। पौधे मर तो गये पर एक संकल्प लेकर अगला जन्म होगा तो वे इस तरह परस्पर लड़ेंगे झगड़ेंगे नहीं।
तब से पौधे उगते है पर परस्पर प्रेमपूर्वक बढ़ते और जीवन भर हँसते खेलते, सौरभ फूल और फल बिखेरते रहते है, अब उनका अभिनन्दन शाप मनुष्य पर उतर आया है। यह जीवन भर लड़ता झगड़ता है और मरते समय पछताता हुआ जाता है।
दर्पण जल और र्स्फाटक में प्रकाशित सूर्य का प्रतिबिम्ब सभी ने देखा है। इस सत्य से भी कोई अनभिज्ञ नहीं है कि सूर्य के प्रतिबिम्ब का अस्तित्व सूर्य का कारण ही दिखलाई देता है। वस्तुतः प्रतिबिम्ब का अपना कोई अस्तित्व नहीं है अब ऐसी दशा में प्रतिबिम्ब अपने को सूर्य मान बैठे तो यह उसकी भूल ही होगी।
जीवात्मा का भी अपना अस्तित्व कुछ नहीं है। वह भी शरीर रूपी दर्पण में परमात्मा का प्रतिबिम्ब मात्र है। यदि मनुष्य स्वतः अपने अस्तित्व को अपनी विशेषता मान बैठे तो यह उसकी भी मूल होगी। किन्तु खेद है कि अज्ञान के कारण मनुष्य यह भूल करता है। उसे समझना तो यह चाहिए कि उसके अंतःकरण में जो परमात्म नाम का तत्व विराजमान है, उसी की विद्यमानता शरीर में चेतना उत्पन्न करती है, जिसके बल पर मनुष्य सारे विचार और व्यवहार करता है। परमात्म जब अपनी इस चेतना को अंतर्हित कर लेता है
तब यह चलता फिरता चेतन शरीर जड़ होकर मिट्टी बन जाता है। किन्तु मनुष्य सोचता यह है कि उसका शरीर अपना है, उसको चेतना अपनी है, अपनी सत्ता से ही वह सारे कार्य व्यवहार करता है। यह मनुष्य का मिथ्या अहंकार है।
जीवन प्रगति में मनुष्य का अहंकार बहुत बड़ा बाधक है। इसके वशीभूत होकर चलने वाला मनुष्य प्रायः पतन की ओर ही जाता है। श्रेय पथ की यात्रा उसके लिये दुरूह एवं दुर्गम हो जाती है। अहंकार से भेद बुद्धि उत्पन्न होती है जो मनुष्य को मनुष्य से ही दूर नहीं कर देती, अपितु अपने मूलस्रोत परमात्मा से भी भिन्न कर देती है। परमात्मा से भिन्न होते ही मनुष्य में पाप प्रवृत्तियाँ प्रबल हो उठती है। वह न करने योग्य कार्य करने लगता है। अहंकार के दोष से मति विपरीत हो जाती है और मनुष्य को गलत कार्यों में ही सही का मान होने लगता है।
रावण की विद्वता संसार प्रसिद्ध है। उसके बल की कोई सीमा नहीं थी। ऐसा नहीं सोचा जा सकता कि उसमें इतनी भी बुद्धि नहीं थी कि वह अपना हित अहित न समझ पाता। वह एक महान बुद्धिमान तथा विचारक व्यक्ति था। उसने जो कुछ सोचा और किया, वह सब अपने हित के लिए ही किया। किन्तु उसका परिणाम उसके सर्वनाम के रूप में सामने आया। इसका कारण क्या था? इसका एकमात्र कारण उसका अहंकार ही था। अहंकार के दोष ने उसकी बुद्धि उल्टी कर दी। इसी कारण उसे अहित से हित दिखलाई देने लगा। इसी दोष के कारण उसके सोचने समझने की दिशा गलत हो गई थी और वह उसी विपरीत विचार धारा से प्रेरित होकर विनाश की ओर बढ़ता चला गया।
ऐसा कौन सा अकल्याण है, जो अहंकार से उत्पन्न न होता हो। काम, क्रोध, लोभ आदि विकारों का जनक अहंकार ही को तो माना गया है। बात भी गलत नहीं है, अहंकारी को अपने सिवाय और किसी का ध्यान नहीं रहता, उसकी कामनायें अपनी सीमा से परे-परे ही चला करती है। संसार का सारा भोग विलास और धन वैभव वह केवल अपने लिए ही चाहता है। अहंकार की असुर वृत्ति के कारण वह बड़ा विलासी और विषयी बना रहता है। उसकी विषय-वासनाओं की तृष्णा कभी पूरी नहीं होती।
कितना ही क्यों न भोगा जाय, विषयों की तृप्ति नहीं हो सकती। इसी अतृप्ति एवं असंतोष के कारण मनुष्य के स्वभाव में क्रोध का समावेश हो जाता है। वह संसार और समाज को अपने अराँतोपका हेतु समझने लगता है और बुद्धि विषय के कारण उनसे शत्रुता मान बैठता है। वैसा ही व्यवहार करने लगता है। जिसके फलस्वरूप उसकी स्वयं की अशाँति तो स्थायी बन ही जाती है, संसार में भी अशाँति के कारण उत्पन्न करता रहता है।
अहंकार और लोभ एक दूसरे के अभिन्न साथी है। जहाँ एक होगा, वहाँ दूसरे का होना अनिवार्य है। अह के दोष से मनुष्य का लोभ इस सीमा तक बढ़ जाता है कि वह संसार की प्रत्येक वस्तु पर एकाधिकार चाहने लगता है। उसकी अधिकार लिप्सा असीमित हो जाती है। वह संसार के सूक्ष्म साधनोँ का लाभ केवल स्वयं ही उठाना चाहता है, किसी को उसमें भागीदार होते नहीं देख सकता। यदि कोई अपने गुणों, परिश्रम और पुरुषार्थ से उन्नति, विकास करता भी है तो अहंकारी को ऐसा आभास होता है, जैसे वह उन्नति शील व्यक्ति उसके अधिकार में हस्तक्षेप कर रहा है। उसकी सम्पत्ति और साधनों का भागीदार बन रहा है। और इस मति दोष के कारण वह बड़ा असहनशील हो उठता है। यदि शक्ति होती है तो वह उस बढ़ते हुए व्यक्ति को गिराने मिटाने का प्रयत्न करता है, नहीं तो जल भुनकर मन ही मन कुढ़ता रहता है।
इन दोनों अवस्थाओं में अहंकारी व्यक्ति अपनी ही हानि किया करता है। दूसरे को पीछे खींचने और धकेलने वाला कब तक क्षमा किया जा सकता है। एक दिन लोग उसके इस अपराध के विरोध में खड़े हो जाते है और उसके अहंकार को चूर चूर करके ही दम लेते है। जैसा कि दुर्योधन, कंस, शिशुपाल, हिटलर, नैपोलियन आदि आततायियों के विषय में लोगों ने किया। इन अनुचित लोगों को अहंकार बढ़ता गया, अधिकार, विस्तार और आधिपत्य की भावना बलवती हो गई। समाज पहले तो सद्भावनापूर्ण सहन करता रहा, किन्तु जब सहनशीलता की सीमा खत्म हो गई, समाज उठा और उन शक्तिमत अहंकारियों को शीघ्र ही धूल में मिलाकर सदा सर्वदा के लिए मिटा डाला।
निर्बल अहंकारी जो समाज का कुछ बिगाड़ नहीं पाता अपने मन में ही जलता भुनता और क्षोभ करता रहता है। अपना हृदय जलाता, शक्ति नष्ट करता और आत्मा के बंधन दृढ़ करता हुआ लोक परलोक नष्ट करता रहता है। जीवन में शाँति तो उसके लिए दुर्लभ हो ही जाती है, परलोक में भी लोक के अनुरूप नरक भोगा करता है और पुनर्जन्म में अन्य योनियों का अधिकारी बनकर युग युग तक दण्ड भोगा करता है। एक अहंकार दोष के कारण मनुष्य को ऐसी कौन सी यातना है जो भोगनी नहीं पड़ती। अहंकार में अकल्याण ही अकल्याण है उससे किसी प्रकार के श्रेय की आशा नहीं की जा सकती। इस विषधर से जितना बचा जा सकें उतना ही मंगल है।
अकारण अहंकार करने वाले व्यक्ति तो एक प्रकार से अभागे ही होते है। वे अपनी इस अहैतुक विषाग्नि में यों ही जलते रहते है। कोई शक्ति नहीं, कोई सम्पत्ति नहीं, कोई पुरुषार्थ नहीं तब भी शिर पर दम्भ का भार लिए फिरते है। बात बात में ऐंठते रहते है, बात बात में जान बधारते है- ऐसे निरर्थक अहंकारी पग-पग पर असहनीय और तिरस्कार पाते रहते है। अपनी सीमित परिधि में ही जिस पिटकर नष्ट हो जाते हैं न शाँति पा पाते है, और न सन्तोष योग्य कोई स्थिति। विस्तार व्यक्तियों का अहंकार न केवल विकार ही होता है, बल्कि वह एक रोग भी होता है, जो जीवन के विकास पर धरना देकर बैठ जाता है सारी प्रगतियों के द्वार बन्द कर देता है।
इसी प्रकार के निस्तार अहंकारी प्रायः अपराधी बन जाया करते है। प्रगति तो उनकी अपने इस रोग के कारण नहीं होती है और दोश ये समाज के मत्थे मड़ा करते हैं। बुद्धि भ्रम के कारण क्रोध करते हैं और संघर्ष उत्पन्न कर उसमें फँस जाते है। ऐसे अहंकारियों की कामनायें बड़ी चढ़ी होती हैँ, उनकी पूर्ति की क्षमता होती नहीं, वही निदान अपराध पथ पर बढ़ जाया करते है। अकारण अहंकार करने वाला व्यक्ति अपनी जितनी हानि किया करता है, उतनी शायद एक पागल व्यक्ति भी नहीं करता।
किन्तु साधन-सम्पन्न व्यक्ति भी अहंकार की आग में भस्म हुए बिना नहीं रहते। साधनहीन व्यक्ति यदि अहंकार को प्रश्रय देता है तो उसकी हानि उसकी भावी उन्नति की सम्भावना तक ही सीमित रहती है। पर साधन सम्पन्न व्यक्ति जब अहंकार को ग्रहण करता है, तब उसका भविष्य तो भयानक बनता ही है, वर्तमान भी ध्वस्त हो जाता है। इस दोष के कारण समाज का असहयोग होते ही सारे रास्ते बन्द हो जाते है। सम्पत्ति निकम्मी होकर पड़ी रहती है, किसी काम नहीं आती। सम्पत्ति की सक्रियता भी तो समाज के सहयोग पर ही निर्भर रहती है। जब समाज का सहयोग ही उठ जायेगा तो सम्पत्ति ही क्या काम बना सकती है? जीवन में आयात का मार्ग बन्द होते ही निर्यात आरम्भ हो जाता है, ऐसा नियम है। निदान धीरे धीरे सारी सम्पत्ति निकल जाती है। इस प्रकार वर्षों का संचय किया हुआ, अतीत का फल भी नष्ट हो जाता है। साधन सम्पन्न का पतन होते ही समाज में उसकी असहनीय अप्रतिष्ठा होने लगती है। लोग पहले जितना उसका मान सम्मान और आदर सत्कार किया करते थे, उसी अनुपात से अवमानना करने लगते है। आदर पाकर अपमान मिलने पर कितनी पीड़ा कितना दुख और कितना आत्म संताप मिलता होगा, इसको तो कोई भुक्त भोगी ही जान सकता है। अहंकार भयानक शत्रु के समान होता है। इससे क्या रिक्त और क्या सम्पन्न सभी व्यक्तियों को सावधान रहना चाहिए। यह जिसको अपने वश में कर लेता है, उसे सदा के लिए नष्ट कर डालता है।
प्रकट अहंकार की हानियाँ तो प्रकट ही है। गुप्त अहंकार भी कम भयानक नहीं होता। बहुत लोग चतुरता के बली पर समाज में अपने अहंकार को छिपाये रहते हैं। ऊपर से बड़े विनम्र और उदार बने रहते है, किन्तु अन्दर ही अन्दर उससे पीड़ित रहा करते है। ऐसे मिथ्या लोग उदारता दिखलाने के लिए कभी कभी परोपकार और परमार्थ भी किया करते है। दान देते समय अथवा किसी की सहायता करते समय बडीद्य निस्पृहता प्रदर्शित करते हैं, किन्तु अन्दर ही अन्दर लोकप्रियता, प्रशंसा और प्रकाशन के लिए लाभान्वित बने रहते है। कई बार तो जब उनकी यह कामना, आकांक्षा अपूर्ण रह जाती है, उतनी लोकप्रियता अथवा प्रशंसा नहीं पाते, जितनी कि वे चाहते है, तो वे अपने परोपकार परमार्थ अथवा दानपुण्य पर पश्चाताप भी करने लगते है और बहुधा आगे के लिए अपनी उदारता का द्वार ही बन्द कर देते हैं। ऐसे मानसिक चोर अहंकारियों को अपने परमार्थ का भी कोई फल नहीं मिलता, बल्कि ऐसे मिथ्या दानी प्रायः पाप के ही भागी बनते है। परमार्थ कार्यों में अहंकार का समावेश अमृत में विष और पुण्य में पाप का समावेश करने के समान होता है।
वैसे तो अहंकारी कदाचित ही उदार अथवा पुण्य परमार्थी हुआ करते है। पाप का गट्ठर सिर पर रखे कोई पुण्य में प्रवृत्त हो सकेगा- यह सन्देहजनक है। पुण्य में प्रवृत्त होने के लिए पहले पाप का परित्याग करना होगा। स्वास्थ्य प्राप्त करने के लिए रोगी को पहले रोग से मुक्त होना होगा। रोग से छूटने से पहले ही यदि वह स्वास्थ्यवर्धक व्यायाम में प्रवृत्त हो जाता है तो उसका मन्तव्य पूरा न होगा।
लोक-परलोक का कोई भी श्रेय प्राप्त करने में अहंकार मनुष्य का सबसे विरोधी तत्व है। लौकिक उन्नति अथवा आत्मिक प्रगति पाने के लिए किये जाने वाले प्रयत्नों में अहंकार का त्याग सबसे प्रथम एवं प्रमुख प्रयत्न है। इसमें मनुष्य को यथाशीघ्र तत्पर हो जाना चाहिए। अहंकार के त्याग से उन्नति का मार्ग तो प्रशस्त होता ही है साथ ही निरहंकार स्थिति स्वयं में भी बड़ी सन्तोष एवं शाँतिदायक होती है।
मराठा सरदार राघोबा पेशवा पर अपने भतीजे की हत्या का अभियोग था। जिस न्यायालय में उसका निर्णय होने वाला था, उसके न्यायाधीश श्री रामशास्त्री थे। श्री शास्त्री सत्यनिष्ठा के लिए दूर दूर तक विख्यात थे, इसलिए राघोबा को भय था कही उसे सजा न मिल जाये।
राघोबा की धर्मपत्नी को एक उपाय सूक्षा। उन्होंने श्री रामशास्त्री को भोज दिया और इस विचार से उनकी खूब आवभगत की कि उससे प्रभावित होकर श्री शास्त्री उनके पक्ष में ही निर्णय लेंगे। बात बात में उन्होंने इस बात की चर्चा ही छेड़ दी तो न्यायनिष्ठ श्री रामशास्त्री ने कहा - “न्याय की दृष्टि से जो सदार को प्राणदण्ड मिलना ही चाहिए।” राघोबा की पत्नी उनकी इन निर्भयता से प्रभावित तो हुई।” पर उन्होंने कहा- “इस तरह का निर्णय देने का परिणाम जानते आप, क्या होगा, हम आपके जिन्दा ही आपकी जीभ कटवा लेंगे और किसी गड्डे में गड्वा देंगे।”
बिना उत्तेजित हुए श्री शास्त्री ने उत्तर दिया-” यह आप कर सकती है पर उससे मुझे कोई दुख नहीं होगा, गलत निर्णय देने की अपेक्षा तो जीभ क्या सिर काट लिया जाना ही अच्छा है। “
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा आई और भक्तगण भगवती नवरात्रि की उपासना, पूजा, पुरश्चरण में लग गये। भक्त कूरेश पुत्र पाराशर भट्ट ने भी सदा की भाँति गृह मन्दिर को खूब सजाया और उस दिन नवरात्रि की विशेष उपासना का श्री गणेश अपने ही हाथों सम्पन्न किया, ज्योति स्वरूपा भगवती गायत्री की प्रतिमा, ज्योति कलश की स्थापना, पंचोपचार और जप में कोई अधिक समय नहीं लगाया। उन्होंने स्तोत्र पाठ भी नहीं किया थोड़े ही समय में प्रसन्न मुद्रा में पूजा गृह से बाहर निकल आये।
दूसरे दिन की पूजा फिर उनके ब्राह्मण ने ही की। बड़े भाव से उसने जप ध्यान और स्तवन किया। श्लोक खूब जोर-जोर से पढ़े और जितना समय उपासना में लगना चाहिए उतना ही लगाया, किन्तु अभी वह पूजागृह से बाहर निकले ही थे कि पाराशर भट्ट ने टोका- पण्डित जी आज भी आपने यथेष्ट पूजा नहीं की?
ब्राह्मण को बड़ा गुस्सा आया पर वह तो मात्र रसोइया थे। गृहस्वामी की आज्ञा से पूजा भी कर दिया करते थे। उन्हें अपने वेतन से मतलब था, इसलिए गृहस्वामी की डाँट डपट भी सुन लेते थे। उन्हें दुख इस बात का होता था कि पाराशर आप तो स्वयं कभी 10 मिनट, कभी 1 घण्टा अस्त व्यस्त पूजा करते है और मैं जो हिसाब से पूजा करता हूँ, उसे सदैव ही कम बताते रहते हैं? इस आशय की शिकायत वे कई बार उनकी माता जी से भी कर चुके थे। माता जी ने पुत्र को कई बार समझाया भी था कि बेटे! पण्डित जी की आलोचना न किया कर आलोचना करना तो वैसे भी अच्छा नहीं होता पर न जाने पाराशर को क्या अभाव दिखाई देता कि वह जब भी पण्डित जी को पूजागृह से बाहर निकलते देखते टोकते अवश्य- पण्डित जी आज भी अपने यथेष्ट पूजा नहीं की। आज पण्डित जी अधिक क्रोध में आ अये, सो उन्होंने माता जी से भी स्पष्ट कह दिया- पाराशर जी को स्वयं तो पूजा आती नहीं फिर उन्हें इस तरह बार बार आलोचना करने का क्या अधिकार?
माता जी ने आज भी पण्डित जी को ध्यान से ही सुना पर बोली कुछ नहीं। पण्डित जी ने समझा आज पाराशर को अच्छी डाट फटकार लगेगी सो वह प्रसन्न होकर अपने दैनिक कार्यों में लग गये।
कूरेश भगवान की भक्ति में अपनी सारी सुध-बुध जो बैठे थे, इसलिए पुत्र पाराशर के पालन पोषण का सारा उत्तरदायित्व उनकी माता ने ही निभाया था। ये अपने पुत्र की गम्भीरता और उसकी ईश्वर भक्ति को अच्छी तरह समझती थी, तो भी वह यह चाहती थी कि बच्चे में यह दोष भी क्यों रहे, इसलिए वे आज तकत सदैव ही पाराशर को डाँट देती थी। किन्तु आज उन्होंने यह निश्चय कर लिया कि ब्राह्मण की आँशकार का निराकरण होना ही चाहिए अन्यथा उसे उपासना के प्रति भ्रान्ति बनी रहेगी।
इससे पूर्व कि वह पण्डित जी से प्रति कुछ कहें उन्होंने पाराशर को बुलाया और बोली- “तात्! मुझे पता है कि पंडित जी जब भगवती गायत्री का स्तवन और देवी भागवत का पाठ कर रहे होते हैं, तब तू उसमें इतना लीन हो जाता है कि पण्डित जी को यथेष्ट पूजा का समय भी तुझे कम लगता है पर अपनी रसानुभूति के लिए किसी और का तो जी नहीं दुखाना चाहिए। क्या हय भागवत धर्म नहीं कि आत्म कल्याण की जितनी साधना सम्भव हो स्वयं पूरी की जाये, यदि और कोई इच्छानुकूल साथ न दे तो उसे दोषी क्यों ठहराया जायें?”
पाराशर ने अम्बिका के चरण स्पर्श कर क्षमा याचना की और वचन दिया आगे वह कभी ऐसा नहीं करेंगे।
दूसरे, तीसरे, चौथे दिन भी ब्राह्मण ने ही पूजा की पाराशर भट्ट पास ही बैठे सब सुनते, पर पहले की तरह अब उन्होंने एक दिन भी नहीं टोका। ब्राह्मण को अपनी इस विजय का बड़ा अभिमान था। वह जब पूजा गृह से निकलते तो अकड़कर यह जताते हुए कि पाराशर जी पूजा तो हमारी है। कितनी देर पूजा करते हैं, एक तुम हो जो आधा घन्टे भी मन्दिर में नहीं बैठा जाता? पाराशर उन्हें देखकर थोड़ा मुस्करा देते और फिर दोनों ही अपने अपने काम से लग जाते।
आज पूर्णाहुति थी। निर्धारित परम्परा के अनुसार आज कुटुंबी और मित्रजनों का प्रीतिभोज भी सम्पन्न होना था, उसके लिए दिन भर तैयारी होती रही। ब्राह्मण ने तरह-तरह के पकवान बनाये, पहले भोजन परोसते भी वही थे, किन्तु आज न जाने किस आशय से भोज के समय माता जी ने ब्राह्मण को छुट्टी दे दी और सब के साथ उन्हें भी भोजन में बैठ जाने को कहा। परोसने का कार्य आज उन्होंने स्वयं ही सम्भाल लिया था।
सब लोग बैठ गये, पण्डित जी और पाराशर जी पास पास बैठाये गये। माता जी ने परोसना प्रारम्भ किया। सब कुछ परोसा जाने के बाद खीर परोसने की बारी आई। माता जी कटोरा लिए परोसती हुई, जब पाराशर के पास पहुँची तो यह कहती हुई लौट गई खीर कम हो गई अभी आती हूँ। दुबारा आई तो उनके हाथ में दूसरा ही कटोरा था। उसमें से पाराशर और ब्राह्मण दोनों को खीर परोसी गई। सब लोगों ने भोजन करना प्रारम्भ कर दिया।
पर यह क्या? ब्राह्मण ने खीर मुख से लगाई तो वह कठिनाई से ही निगली जा सकी। खीर में इतना नमक उनसे सहसा विश्वास नहीं हुआ। पंगत में बैठे सभी लोग कितने प्रेम से खीर का स्वाद ले रहे हैं, फिर पाराशर जी को भी अपने हाथ ही खीर परोसी गई थी, वह भी तो उसी तरह खा रहे है, जिस तरह और सब उन्हें समझ में नहीं आया बात क्या है।
बेचारे खीर खा भी नहीं सकते थे, क्योंकि उसमें नमक की मात्रा बहुत अधिक थी, इसलिए उन्होंने माता जी को पास बुलाकर पूछ ही लिया। माता जी आपने नमकीन खीर बनवाई थी, वह लगता है भूल से हमें और पाराशर जी को परोस दी। माता जी ने विस्मय की मुद्रा बनाते हुए कहा- “नमकीन खीर आ गई, पर पाराशर ने तो कुछ नहीं कहा।” फिर पाराशर की ओर देखते हुए उन्होंने पूछा- “वत्स क्या सचमुच खीर नमक वाली हैं?” पाराशर जी अब तक आधी खीर खा चुके थे, ने उंगली से उठाकर चखा और बोले- ‘अरे हाँ माँ! खीर तो सचमुच नमकीन है?”
ब्राह्मण को बड़ा कौतूहल था, इन्होंने आधी खीर खा ली- तक भी उसके नमकीन होने का पता नहीं चला और मुझसे एक कौर भी नहीं खाया गया उनके विस्मय को उभारते हुए माता जी ने पूछा- “अरे पाराशर तूने आधी खीर खाली और तब भी तुझे पता नहीं चला।”
विनीत भाव से पाराशर ने कहा- “अम्बे! आज पण्डित जी ने भगवती गायत्री की एक ऐसी स्तुति गाई थी, जिसमें उनकी मनोहर छवि का वर्णन था। नील आकाश में सूर्य तेज मध्यस्थ प्रकट होकर उन्होंने अपने भक्त पुत्र शुम्भ निशुम्भ को किस तरह वरदान दिया कुछ ऐसा ही वर्णन था, जब से वह सुना मन में वही चित्र रम गया है मैं उसी विचार में डूब गया था, क्या जगत जननी वैसी भक्ति, वैसा अनुग्रह मुझे प्रदान नहीं करेंगी। माँ उन तल्लीनता में ही यह ध्यान नहीं रहा कि खीर में नमक है या मीठा।”
इससे पूर्व कि माता जी ब्राह्मण से कुछ कहें उसने स्वयं उठकर पाराशर के पैर पकड़ लिए और कहा- “तात्! मैंने सारी बात आज समझी। पूजा के इस मर्म को समझ गया होता तो मेरा भी कल्याण हो गया होता। भावनाओं से की गई 5 मिनट की पूजा सचमुच एक घन्टे की उपासना से अधिक फलदायक होती है, जो केवल समय पूरा करने के लिए की जाती है।
पण्डित जी भी आज इतने भाव विभोर थे कि उन्हें पता भी न चला कि उनकी बात सुनने के लिए माता जी वहाँ है भी नहीं, जब उन्होंने दृष्टि उठाई तो देखा माता जी मीठी खीर से भरा कटोरा लिए आ रही है।
नवयुग का अवतरण होने ही वाला है। भगवान उसके लिए सौम्य परिस्थितियाँ उत्पन्न कर रहे है। हम लोग ईश्वर की इसी इच्छा को पूर्ण करने में प्राण पग से लगे हुए है। भूतकाल का हमारा सारा क्रिया कलाप इसी की पृष्ठभूमि बनाने में बीता है और अगला जितना समय शेष हैं, वह भी इस प्रयोजन में समर्पित है। दो वर्ष बाद जिस विशिष्टतम साधना के लिए हमें अविज्ञात आवरण में जाना है, उसका उद्देश्य नवनिर्माण के अनुरूप व्यक्तियों एवं परिस्थितियों का सृजन करना ही है। तप प्रचण्ड शक्ति उत्पन्न होती है, जो जन मानस की किया भीड़ सकें। अज्ञानांधकार की तमिस्रा में डूबी हुई दिग्भ्रान्त लोक चेतना को प्रगति के राजमार्ग पर अग्रसर करने हेतु जिस प्रकाश ओर जिस बल की आवश्यकता होती है उस तप साधना से ही उत्पन्न किया जाता रहा है। हम अपनी विशेष तपश्चर्या आरम्भ करने जा रहे है। दोनों ही पक्ष मिलकर एक ऐसा अभिनव सूक्ष्म वातावरण उत्पन्न करेंगे, जिससे युग परिवर्तन के उपयुक्त परिस्थितियाँ विश्व चेतना के अन्तराल में उद्भूत हों सकें। जन आन्दोलन की स्थूल प्रक्रिया का सूत्र संचालन मथुरा से हो रहा है और शतसूत्री कार्यक्रमों के आधार पर हजारों शाखाओं में संगठित एवं संबद्धता 50 लाख व्यक्ति उस प्रयोजन की पूर्ति में अपने अपने ढंग से संलग्न है। नवनिर्माण का महान प्रयोजन ईश्वरीय निर्देशोँ और संकेतों के आधार पर चल रहा है। हमारी गतिविधियों का सूत्र संचालन भी वही से हो रहा है।
नवनिर्माण का स्वरूप और तन्त्र ‘वसुदेव कुटुंबकम्’ के आदर्श को व्यावहारिक रूप देने की आधार शिला पर खड़ा किया जा रहा है। मनुष्य को मनुष्य से पृथक करने
सगर पुत्रों को शोक सन्ताप की आग में जलते रहने से उबारने के लिए भगवती गंगा का अवतरण आवश्यक था। भागीरथी तपस्या ने उस कठिन कार्य को असम्भव से सम्भव बनाया, इतिहास की पुनरावृत्ति अब फिर होने जा रही है। गंगा का अवतरण आज की परिस्थितियों में आवश्यक है। विचार क्राँति की धारा इसी प्रयोजन को पूरा करेगी। अन्य युगों में भगवान ने अवतार किसी भी कलेवर में किया है।- इस युग में उन्हें व्यापक विवेक के रूप में अवतरित होगा। हमारे व्यक्तिगत और सामूहिक प्रयत्नों का विवरण और प्रक्रिया का अस्तित्व और व्यक्तित्व का उद्देश्य भी यही है। जन आन्दोलन और तप संधान दोनों ही गतिविधियाँ साथ लेकर दोनों कदम आगे बढ़ रहे हैं। हमारा परिवार दैनिक 24 लक्ष गायत्री पुरश्चरण में संलग्न वाला समस्त दीवारें गिराई जा रही है। समस्त मानव समाज को एकता एवं आत्मीयता के मुख्य बन्धनों में आबद्ध किया जाना हैं।
नया युग कुछ आदर्शों को लेकर आ रहा है। - (1) एकता, (2) समता, (3) शुचिता (4) ममता। यह सत्प्रवृत्तियाँ जब उमंगने और छलकने लगेंगी तो आज प्रत्येक क्षेत्र में संव्याप्त विकृतियों अव्यवस्थाओं, उलझनों कुंठाओं एवं समस्याओँ का कोई कारण न रह जायेगा और सर्वत्र सुख शाँति प्रगति एवं समृद्धि भरी स्वर्गीय परिस्थितियाँ परिलक्षित होने लगेंगी।
लगता है यह बहुत कठिन है। विकृतियों से भरे अन्धकार युग की लंबे पाँच हजार वर्षों की अवधि में जो अनाचार मानव स्वभाव में सम्मिलित कर दिया है, उसने एक परम्परा जैसा रूप धारण कर लिया है। ऐसे व्यामोह ग्रस्त लोक मानस को बदल कर न्याय एवं औचित्य के अनुरूप विवेक सम्मत बनाना निस्सन्देह कठिन है पर कठिन काम भी मनुष्यों ने ही किये हैं। ईश्वर की इच्छा ओर मनुष्यों के प्रबल पुरुषार्थ का सम्मिलित स्वयं बड़े बड़े आश्चर्यजनक परिवर्तन उत्पन्न करता रहा है। आगे भी उसकी पुनरावृत्ति होनी कठिन भले ही लगे असंभाव्य नहीं है।
नये विश्व का नया निर्माण एकता, समता, शुचिता और ममता की चार आधार शिलाओं पर निर्भर है। इन चारों को संसार के कोने कोने में विभिन्न देशों और विचारों के व्यक्तियों में अलग अलग ढंग से प्रतिष्ठापित, परिपुष्ट एवं फलित किया जा रहा है। भारत में शतसूत्री योजना के आधार पर यही की परिस्थितियों के अनुरूप उपरोक्त चार प्रक्रियाओं का संचालन किया जा रहा है।
चार आधारों में प्रथम है एकता। जड़ पदार्थ एक और एक मिलकर दो होते है। पर जीवित व्यक्ति ‘एक और एक मिलकर ग्यारह’ होने की उक्ति चरितार्थ करते है। एकता की सुदृढ़ श्रृंखला में पिरोये हुए मनुष्य हार में गुथे हुए मोतियों की तरह सुन्दर लगेंगे और उनकी शोभा से सारा वातावरण सुरक्षित हो उठेगा।
मनुष्य की शक्ति एकता से ही बढ़ेंगी। समाज की उन्नति एकता पर निर्भर है। विश्व से शाँति की स्थापना के लिए एकता नितान्त आवश्यक है। यह एकता हमारे चतुर्विधि नवनिर्माण प्रयोजनों में सर्वप्रथम है। एकता क्षमता, शुचिता और ममता का लक्ष्य प्राप्त करना ही नव निर्माण है। वर्तमान अव्यवस्थाओं के स्थान चतुर्विधि सुव्यवस्थाओं की स्थापना ही युग परिवर्तन है। इस पुण्य प्रयोजन के लिए अग्रसर होते हुए हमें विश्वव्यापी एकता के लिए कठोर प्रयत्न करना होगा। कहा जा चुका है कि एकता के भी चार स्तम्भ है- धर्म, संस्कृति, भाषा और शासन इनके बीच जो खाइयाँ बन गई है,उन्हें पाटना है। विभिन्नताओं के निराकरण का अनेकता का एक रूपता के लिए प्रयत्न करना है। यही हमारी युग निर्माण योजना का साराँश है। इस प्रयोजन की पूर्ति के लिए भारत में हिन्दू धर्मानुयायी जनता को जो करना है उसका एक शतसूत्री कार्यक्रम हम लोगों के जिम्मे आया है। इससे मिलती जुलती, विभिन्न देशों ओर समाजों की स्थिति के अनुरूप संसार भर में अन्यत्र भी योजनायें बनी हैं और नव निर्माण के अग्रदूत उन्हें अपने अपने ढंग से कार्यान्वित कर रहे हैं। योजना के स्वरूपों में अन्तर है। पर आधार सबका एक है। एकता समता, शुचिता और मस्ता का व्यापक विचार करने के लिए हमारे कदम आगे बढ़ रहे है।
(1) धर्मो की अनेकता क्यों? जब ईश्वर एक है- उसका संसार एक है- उसके पुत्र एक है- ईश्वर का संदेश एक है- उद्देश्य एक है तो फिर धर्म भी एक ही होना चाहिए। अनेक धर्म- जो परस्पर टकराते है- एक दूसरे का खण्डन करते है- एक दूसरे से विपरीत दिशायें दिखाते है- ईश्वर प्रेरित नहीं हो सकते। हो सकता है सभी के मूल में धर्म की अनादि आस्थाओं का समावेश रहा हो पर पीछे चलकर उनमें इतने अधिक जंजाल जुड़े कि सत्य से बढ़कर असत्य और विवेक से बढ़कर अविवेक उनमें जुड़ गया। यदि ऐसा न होता तो धार्मिक कहे जाने वाले लोगों का चरित्र एवं स्वभाव तो आदर्श रहा होता। देखने में ऐसा कहाँ आता है? आज तो हर धर्म, सम्प्रदाय वाला यह माने बैठा है कि अपने वर्ग की क्रिया प्रक्रियाओं को अपनाकर उसने धर्म आस्तिकता और स्वर्ग भक्ति का ठेका उसने ले लिया। अपने वर्ग की मान्यताओं को सत्य और दूसरों की असत्य सिद्ध करने के लिए धर्म ध्वजों सारा बुद्धि कौशल व्यय करते रहते हैं। शास्त्राओं के अखाड़ों में आये दिन कुश्तियाँ होती देखी जा सकती है। वाक् वाण और कागजी गोले चलते रहते तो भी सहन किया जाता पर इस वेदी पर कितने निरीह प्राणियों का रक्त निर्दयता के साथ बहता रहा है। इसका स्मरण करके रोमांच खड़े हो जाते हैं। दूसरे धर्म वालों पर अपने धम्र की गरिमा थोपने के लिए इतना नर संहार अब तक इस दुनियाँ में हुआ है, जितना समस्त युद्धों में भी नहीं हुआ। क्या यही स्थिति उपयुक्त है? क्या इसे ही बने रहने देना चाहिए। विभिन्नताओं की उलझनें सत्य तक पहुँचने के लिए भारी बाधा है। आज का धर्म जंजाल इतना उलझा हुआ है कि वह वास्तविक धर्म तक आत्मा को पहुँचने देने में सहायक नहीं बाधक ही सिद्ध हो रहा है।
विवेक का तकाजा है कि धर्म की एकरूपता होनी चाहिए। समस्त विश्व का एक ही धर्म होना चाहिए। उसमें सत्य, न्याय, नीति, सदाचार, शिष्टाचार आदर्श, औचित्य उदारता, स्नेह सद्भावना संतोष संयम जैसी मान्यताओं को प्रश्रय मिलना चाहिए। माननीय आस्थाओं और प्रक्रियाओं को जो पशुता के स्तर से ऊँचा उठाकर देवत्व की दिशा में विकसित कर सके वही विश्व धर्म हो सकता है। अगले दिनों ऐसे ही विश्व धर्म का विकास होना है। संसार के कोने-कोने में रहने वाले एक ही प्रकार के धर्म को मानेंगे। एक ही प्रकार की पूजा पद्धति से सब का काम चल जायगा। एक ही धर्म मंच पर सब लोग इकट्ठे हुआ करेंगे। धर्म के नाम पर व्यय होने वाले समय श्रम तथा धन इन्हीं प्रयोजनों में लगेगा। ऐसा विवेकपूर्ण धर्म, मनुष्य मनुष्य के बीच प्रेम और आत्मीयता उत्पन्न करने तथा अन्तःकरण के दिव्य तत्वों के उत्कर्ष में सहायक होगा। धर्म के नाम पर विराजमान मूढ़ मान्यताओं और व्यर्थ आडम्बरों में लगी हुई आज की ज्ञानवान शक्ति जब विश्व कर्म की विवेकसम्मत आदर्शवादी प्रतिष्ठापनाओं में नियोजित होगी, तब उसके रचनात्मक परिणाम इतने शानदार होंगे कि यह संसार स्वर्ग जैसा दिखाई देने लगेगा।
(2) विश्व संस्कृति की एकता भी वैसी ही आवश्यक है जैसी विश्व धर्म की। आज संस्कृति भी धर्म में जुड़ गई है। वस्तुतः वे दोनों अलग है। रीति- रिवाज, आचरण, शिष्टाचार, आचार-व्यवहार, रहन सहन, तर्ज तरीका यही संस्कृति के अंग है। इनमें पृथकता से रहने से मनुष्य मनुष्य के बीच पृथकता और परायेपन के भाव उठते हैं। अब किन्हीं आधारों पर जातियाँ बनती चली जा रही है। जो लोग अपनी भाषा बोलते हैं, अपने जैसी पोशाक पहनते है, वेश विन्यास रखते है, आहार विहार करते है।, रीति रिवाज मानते है, उनके साथ सहज स्नेह हो जाता है और भिन्न प्रक्रियाओं वाले पराये लगते है। यह अपने पराये की प्रक्रिया संसार में भारी विद्वेष एवं विश्रृंखला पैदा कर रही है। भारतवर्ष जाति-पाँति और धर्म, संप्रदायों के नाम पर इतना अधिक विभक्त है कि सर्व? उसकी हँसी उड़ाई जाती है ओर आत्मिक दुर्बलता में ग्रसित पिछड़ा हुआ देश माना जाता है। वहाँ तथा कि राजनैतिक पद पर जाति पाति हाथी है। चुनावों में जीतना अब बहुत करके इसी आधार पर होता है। भले ही कोई बाहर से इसका खण्डन करें पर जानते सब है कि वस्तुस्थिति यही है।
सुस्थिर मानवीय एकता के लिए साँस्कृतिक एकता आवश्यक है। जीवन यापन की विभिन्न दिशाओं में हमें सर्वभौम एकता स्थापित करनी ही पड़ेंगी। पोशाकें इतनी अधिक तरह की न हों, एक ही तरह के वस्त्र सब लोग पहनें तो कपड़े की सिलाई का तीन चौथाई व्यय बच सकता है और वह बचत शिक्षा, स्वास्थ्य आदि के संवर्धन में लगाई जा सकती है। त्यौहार की एकता हो तो सारे समाज में एक ही समय एक सा उल्लास जगता दिखाई पड़े। विवाह शादियों के रीति रिवाज एक जैसे सरल और सस्ते हो तो इन व्यर्थ आडम्बरों में शक्ति बच जाय ओर उनका उपयोग परिवारों का स्तर ऊंचा उठाने में किया जा सकें। साँस्कृतिक एकता के बिना विश्व मानव की एकता सुस्थिर न बन सकेंगी। विज्ञान और शिक्षा की प्रगति ने संसार को बहुत छोटा बना दिया है सुदूर द्वीप महाद्वीप अब गली मुहल्ले की तरह समीप आ गये हैं, द्रुतगामी वाहनों ने दूरी जब यह परिस्थितियाँ न थी, सुदूर देशों के निवासी परस्पर परिचय के अभाव में अलग अलग ढंग ढर्रे को अलग अलग रीति रिवाजों को अपनाये रहने के लिए विवश थे। पर अब वैसी परिस्थिति नहीं रही। संसार समीप आ रहा है तो हमारी संस्कृति भी समीपवादी ही होनी चाहिए। अब पृथकताओं पर अड़े रहने का, अपनी को श्रेष्ठ दूसरे की को निकृष्ट बताते रहने का कोई कारण नहीं। संसार भर में फैली हुई विभिन्न संस्कृतियों में से चुने हुए सर्वश्रेष्ठ सर्वोपयोगी अंश लेकर एक सर्वांगपूर्ण सार्वभौम संस्कृति का निर्माण अब होने ही वाला है। युग की माँग ऐसी ही है।
संसार में किसी भी कोने में रहने वाले व्यक्ति की यह अनुभव करना होगा कि यह विश्व परिवार का एक घटक है। विश्व संस्कृति की एक इकाई के रूप में ही उसे अपना रहन-सहन एवं प्रथा, परम्पराओं को अपनाना है। जिस प्रकार छोटे-छोटे वर्गों में एक ही प्रकार के रिवाज चलते हैं, उसी प्रकार जब समस्त विश्व का एक सम्मिलित वर्ग होगा, एक ही समाज बनेगा, एक ही कुटुम्ब का आचरण होगा तो प्रथा-परम्पराओं में भी एकरूपता उत्पन्न करनी होगी। रुचि भिन्नतायें रह सकती है- कोई वालों में कंघी कैसे करें, कोई साबुन कौन-सा लगाये जैसी छुट-पुट वैयक्तिक अभिरुचियों में विभिन्नता रह सकती है। आचार विचार, व्यवहार और शिष्टाचार की सामान्य रीति-नीति और प्राि परम्परा समस्त विश्व में एक जैसी होनी चाहिए।
कहना न होगा कि इस दृष्टि से भारतीय धर्म, अध्यात्म तथा संस्कृति विश्व मानव का सार्वभौम आवश्यकताऐं पूरी करने में भली प्रकार समर्थ है। पिछले पाँच हजार वर्षों में जो विकृतियाँ उत्पन्न हुई है, यदि उन्हें निकाल दिया जाय तो विशुद्ध भारतीय मान्यतायें इसी स्तर की है, मानों किसी ने समस्त मानव जाति के लिए वास्तविकता उपयोगिता और औचित्य का ध्यान कर ही विनिर्मित किया हो। निकट भविष्य में जिस नवयुग को लाने की साधना चल रही हैं, वही प्राचीनकाल में चिरकाल तक यहाँ विद्यमान रहा है और एकता समता और ममता की गंगा यमुना, सरस्वती यहाँ बहती रही है। अस्तु भारतीयता में विश्व धर्म एवं विश्व संस्कृति के बीज विद्यमान परिलक्षित हैं तो इसमें आश्चर्य की कुछ बात नहीं है।
(3) विश्व धारा की आवश्यकता वसुधैव कुटुंबकम् की स्थिति उत्पन्न करने के लिए अनिवार्य है। वह कैसा कुटुम्ब जिसके सदस्य एक दूसरे की बोली न समझें, परस्पर बातचीत तक न कर सकें, विचारों के आदान प्रदान के लिए भाषा ही माध्यम है। भाषाओं की भिन्नता मनुष्य को एक सीमित समाज एवं क्षेत्र में संकुचित करती है। विश्व के विशाल ज्ञान भण्डार को सरलतापूर्वक उपलब्ध करने, हर विश्व नागरिक को निर्बाध गति से विचार विनियम करने के लिए एक विश्व भाषा की आवश्यकता है। अन्यथा मानवता टुकड़ों में क्षेत्र और प्रान्तों में विभक्त बनी सड़ती चलती रहेगी। हम भारतवासी एक राष्ट्रवासी एक राष्ट्रभाषा की आवश्यकता अनुभव करते हैं, इसी प्रकार यदि विश्व नागरिकता का - वसुधैव कुटुंबकम् का विस्तार होता है तो उसके आधार भी तैयार करने होंगे। इन आधारों में एक विश्व भाषा का महत्वपूर्ण स्थान होगा।
समस्त विश्व के लिए एक ही भाषा में साहित्य छपने लगे तो यह कितना सस्ता और कितना उच्चकोटि का होगा, इसकी कल्पना मात्र से भारी उत्साह पैदा होता है। मनुष्य ने अब तक जो ज्ञान विभिन्न दिशाओं में संचित किया है, वह इतना अधिक है कि उसका उपयोग हमें सहज ही महत्वपूर्ण उपलब्धियों से लाभान्वित कर सकता है। पर खेद इसी बात का है कि वह ज्ञान भाषाओं की भिन्नताओं के कारण सीमित क्षेत्रों में बन्दी बना पड़ा है। यदि एक विश्व भाषा होती तो पुस्तकालयों के माध्यम से ऊँचे से ऊँचा ज्ञान सर्व साधारण तक सहज हो पहुँच सका होता। संसार भर के लोग परस्पर पत्र व्यवहार और विचारों का आदान प्रदान कर सके होते। तब विश्व समस्याओं का हल ढूंढ़ सकना और एक देश के नागरिकों का अन्य देशवासियों के अति निकट पहुँच सकना सम्भव हो गया होता। विश्व की वह ज्वलन्त आवश्यकता हमें पूरी करनी ही होगी। संस्कृत भाषा में यह सारी विशेषतायें विद्यमान है, वस्तुतः किसी समय वह विश्व भाषा ही थी और अगले दिनों अपने महान गुणों के कारण यदि वह पुनः अपना स्थान प्राप्त कर लें तो यह तनिक भी आश्चर्य की बात न होगी।
(4) विश्व शासन ही समस्त राजनैतिक तथा सामाजिक समस्याओं का हल कर सकेगा। यातायात साधनों के अभाव में छोटे-छोटे सामन्ती राज्य शासनों की आवश्यकता रही होगी पर अब राष्ट्रवाद भी, प्रान्तवाद जाति वाद जैसी ही संकीर्णता का प्रतीक बनता जा रहा है। अपने देश का लाभ करने के लिए दूसरे देश का शोषण उत्पीड़न करना भी अब देश भक्ति का एक अंग बन चला है। दूसरे देश के साथ अन्याय करके भी अपने देश का लाभ करने वाले आज की अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति इसी आधार को अपनायें हुए है कि अपने देश का लाभ जैसे भी बनें, वैसे किया जाय। युद्धों का मूल कारण यह राष्ट्रवाद के नाम पर पनप रही क्षेत्रीय संकीर्णता ही हैं तस्कर व्यापार पनपने का कारण यही है। एक देश के पास उपयोग के पर्याप्त साधन हों और दूसरे देश वाले उससे वंचित रहे। एक क्षेत्र में विपुल सम्पन्नता और पड़ौस के क्षेत्र में विपुल विपन्नता रहे, इसका कारण विश्व वसुधा एवं विश्व वसुंधरा की राष्ट्रवाद के आधार पर कृत्रिम रूप में खण्ड खण्ड कर देना ही है।
यदि यह रेखायें मिटा दी जायें और समस्त संसार एक राष्ट्र बन जाय, एक शासन के असंगत शामिल हो तो फिर युद्धों महायुद्धों की विभीषिका सदा के लिए समाप्त हो जाय। एक प्रांत में छोटे-छोटे अनेक जिले जोते हैं, उनकी शासन व्यवस्था अलग अलग रहते हुए भी एक केन्द्र से संसार के समस्त राष्ट्र शासित हों तो उनके झगड़े विश्व न्यायालय से तय होते रहेंगे। परस्पर लड़ने की कोई सम्भावना न रहेंगी आशंका भय और अविश्वास से ग्रसित राष्ट्र आजकल सुरक्षा के नाम पर जो विपुल धन व्यय कर रहा है, उसकी कोई आवश्यकता न रह जायगी। आजकल प्रायः एक चौथाई आय युद्ध कार्यों की शिक्षा व्यवस्था में लगती है। वह बच जाय तो उतने साधन मानवीय भ्रातृत्व एवं सुख सुविधा के साधन जुटाने में लगाये जा सकते हैं और देखते देखते यह संसार स्वर्गीय सुख शाँति से ओत प्रोत हो सकता है।
विश्व शासन के अंतर्गत एक ही समाज का सहज विकास हो सकता है। आचार संहिता, न्याय, नैतिकता, के कानून एक से हो सकते है। व्यापार को निर्वाधता से गरीबी और अमीरी का -उत्पादन और अभाव का समान रूप से वितरण हो सकता है और प्रकृति के अनुदानों का समान लाभ उठाते हुए धरती के समस्त निवासी जीवनोपयोगी आवश्यकताओं की पूत्रि सहज ही कर सकते हैं। उन परिस्थितियों से आज की अगणित समस्याओं का हल जादू की तरह निकल सकता है और जिन शोक संतापों से आज मानवता पीड़ित है, उनका नाम निशान मिट सकता है।
विश्व व्यापी एकता और मानव भ्रातृत्व को एक मधुर कल्पना के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ के आदर्श को एक सरस स्वप्न मात्र माना जाता है। सम आ गया कि इन कल्पनाओं और स्वप्नों को साकार बनाया जाय। एकता की उपयोगिता एवं आवश्यकता को यदि हम समझते स्वीकार करते है तो उनके आधारों को भी ढूंढ़ना होगा। पलंग के चार पायों की तरह एकता के भी चार स्तम्भ है- (1) धर्म (2) संस्कृति (3) भाषा (4) शासन। विश्व को एकता के सूत्र में आबद्ध करना हो तो इन चार आधारों में भी सार्वभौम स्तर पर एकता और एक रूपता भी उत्पन्न करनी ही होगी।
युग निर्माण योजना के विविध कार्यक्रमों के पीछे यही मूल भावना एवं प्रक्रिया काम कर रही हैं। शतसूत्री रचनात्मक कार्यक्रमों का महत्व इसलिए है कि ये व्यक्ति को वर्तमान संकीर्णता की परिधि से ऊपर उठकर सत्य और तथ्य को समझने स्वीकार करने की प्रेरणा उत्पन्न करते है। इसी प्रेरणा के आधार पर उन कुसंस्कारों और मूढ़ताओं से छुटकारा पाया जा सकेगा। यह कार्यक्रम एक प्रकार के कर्मकाण्ड है। कर्मकाण्डों का उद्देश्य भावनाओं को प्रदीप्त करना है। आत्मिक प्रगति का सारा आधार भावनाओं पर निर्भर है। नव निर्माण के कार्यक्रम तो करते रहे पर उनके पीछे सन्निहित तत्व ज्ञान और प्रयोजन से विलग रहे तो भी काम चलने वाला नहीं है। हममें से प्रत्येक को यह जानना चाहिए कि हम विश्व का नव निर्माण जनमानस में एकता, समता, शुचिता और ममता की उत्कृष्ट आदर्शवादिता स्थापित करने जा रहे है। भावनात्मक परिवर्तन पर ही व्यक्ति महानता, समाज की सुदृढ़ता और विश्व की समग्र शाँति आधारित है।
हमारा छोटा सा जीवन इसी प्रयोजन के लिए जिया गया। लगभग 60 वर्षों की लम्बी अवधि इसी साधना में लग गई, अब जो दिन शेष है उनकी गतिविधियाँ भले ही भिन्न प्रकार की दीखें पर उनकी दिशा यही है। जीवन के प्रथम चरण 24 पुरश्चरणों की साधना में 20 वर्ष लोक मंगल के आन्दोलनात्मक अभियान में बीते अब एकांत तपश्चर्या में उस शक्ति का उद्भव सन्निहित है, जो सजग संस्कारवान आत्माओं में से व्यामोह भरे कषाय कल्मषों को हटाकर उन्हें ईश्वरीय प्रयोजन की पूर्ति में नव निर्माण की साधना में संलग्न कर सकें।
संकल्पों के बने खण्डहर, संस्कृतियों के राजमहल में। सूरज के घर घिरी अमावस, रश्मि रचीतम के दल-दल में॥
कालजयी चमकायें जाते, मर-पिपीलिका की फौजों से। नीककण्ठ कतराते दिखते, उठो हलाहल की मौंजों से॥
‘सवर्गादपिगरीयशी’ धरती पर होती अभाव का नर्तन। देवों की क्रीड़ा का आँगन, दैत्यों के कृत्यों का साधन॥
मन्त्रों गुँजित अन्तरिक्ष में, फँसा कल-युग का कोलाहल। श्वाँस-श्वाँस अवरुद्ध घुटन से, माँग रही मानवता सम्बल।
आह-कराह विवशताओं से डसी हुई जीवन की तानें। चेहरों पर उदासियाँ उभरी, राहें भूल गई मुस्कानें॥
एक अनिश्चित भाग दौड़ के बीच फँसा मानव का जीवन। अपना खाया सुख तलाशते, भरे भरे हम है सूनापन॥
चहल पहल की चकाचौंध में, हम अपनी क्षमतायें भूले। उसी डाल को काट रहे हैं, उसी डाल पर डाले भूले॥
युद्धों के बादल ऋषियों की कुटियों पर गड़गड़ा रहे हैं। अस्थि-दान की इस बेला में, युग दधीचि, बरबरा रहे हैं॥
कल्पवृक्ष का देश क्षुआ की महा ज्वाल में धधक रहा है। कामधेनु के घर में कान्हा, बुदं-बुदं को सिसक रहा है॥
तमसा- तट से चीत्कार का कोई छन्द नहीं जगता है। अमृत घट सावें संस्कृति को, हृदय लगाने की क्षमता दी॥
विश्वासों को अभय दान दो, प्राणों में जी उठें ऋचाऐं। आता सतयुग लौट न जाये, लेकर चन्दन की समिधाऐं॥
युग का विश्वामित्र कह रहा, राम उठो, सन्ताप मिटाओं। युग पिनाक तोड़ना ठहर कर, पहले शिव का चाप चढाओं॥
- लाखनसिंह भदौरिया ‘शैलेन्द्र’ साहित्यकार
*समाप्त*