मनुष्य प्रार्थना करते हैं, पशु नहीं। क्योंकि मनुष्य ने पिता को पहचाना है, पशु ने नहीं। जो मनुष्य परमपिता की प्रार्थना नहीं करता वह सभी मनुष्य नहीं है। ऊपर से वह मनुष्य अवश्य है, लेकिन अन्दर से पशुओं की तरह जड़ और अज्ञान ही है, यदि कोई परमात्मा की प्रार्थना नहीं करता वह उसके दिये अनन्त अनुदानों की अवज्ञा करता है। प्रार्थना से हमारे हृदय के कलुष ही दूर नहीं होते हैं, परमात्मा के प्यार का असीम आनन्द मिलता है। वह तो उसके अतिरिक्त है, प्रार्थना उद्देश्य नहीं कर्तव्य है।
और हाँ, यदि प्रार्थना करने के लिये खड़े होते समय मन में किसी के लिये विरोध आये, किसी का अपराध स्मरण हो तो उसे प्रार्थना करने से पूर्व क्षमा कर देना चाहिये। अगर तुम ऐसा नहीं करते तो मन का विरोध और आत्मा का द्वेष, प्रार्थना के शब्द दूषित कर देंगे। संसार के जितने भी प्राणी हैं, वह तुम्हारी तरह ही परमात्मा के पुत्र हैं, तुम जिस तरह अपने दो पुत्रों को लड़ते-झगड़ते और परस्पर ईर्ष्या-द्वेष करते रहते देखकर दुःख पाते हो उसी प्रकार परमात्मा भी तुम्हारी भावना और कर्तव्य रहित प्रार्थना से प्रसन्न नहीं होगा।
सब के दोष-दुर्गुण भूल कर सब की सेवा और उन्नति करना भी प्रार्थना है। यह प्रार्थना उन सब प्रार्थनाओं से अच्छी है, जिसमें भगवान् का नाम तो रहे पर अन्तःकरण की पवित्रता न रहे। प्रार्थना का बीज पवित्रता की ही भूमि पर अच्छी तरह अंकुरित, पुष्पित और पल्लवित होता है। उसी में अच्छे फल लगते है, उसी से मनुष्य को प्रार्थना का आनन्द मिलता है।
-सन्त तिलुवल्लुवर
मनुष्य अपने सामान्य रूप में एक तुच्छ प्राणी है। वह अन्य बहुत से प्राणियों की अपेक्षा कहीं अधिक निर्बल और अपूर्ण है। मछलियाँ पानी में तैर सकती हैं। पक्षी आकाश में उड़ सकते हैं। बहुत से जानवर बिना किसी साधन अथवा अभ्यास के योंहीं पानी में तैर सकते हैं। जल और थल दोनों स्थानों में रह सकते हैं। शक्ति में मनुष्य बहुत से जानवरों की अपेक्षा निर्बल और निस्सहाय हैं वह निश्चय ही अपने सामान्य जीवन में बहुत कुछ अपूर्ण हैं।
इसके साथ ही ऐसे मनुष्यों के भी उदाहरण और प्रमाण मिलते हैं, जो बिना किसी साधन के हवा में उड़ सकते थे, पानी पर चल सकते थे, अग्नि में सुरक्षित रह सकते थे। यदि खोज की जाये तो आज भी ऐसे अनेक व्यक्ति इस संसार में मिल सकते हैं, जो अपने विलक्षण कार्यों द्वारा सिद्ध पुरुष माने जा सकते हैं। भारत के ऋषि मुनि तो सिद्ध पुरुष ही नहीं उसके आगे के स्तर के पुरुष थे। उनके एक आशीष वचन से बहुतों का कल्याण और अभिशाप से विनाश मुहूर्त मात्र में घटित हो जाता था। ऐसे आध्यात्मिक पुरुषों की तो भारत में कमी ही नहीं थी, जो अपनी अलौकिक और चमत्कारी शक्ति से आश्चर्यजनक कार्य कर दिखाते थे।
अपने सामान्य रूप में जो मनुष्य एक तुच्छ प्राणी से अधिक कुछ नहीं होता वही मनुष्य आत्मिक शक्तियों के जाग जाने पर अलौकिक, सिद्ध और चमत्कारी पुरुष बन जाता है। मनुष्य की आत्मिक शक्तियों का जागरण आध्यात्मिक साधना द्वारा होता है। जो लोग उस साधना पथ पर जितनी दूर तक चल पाते हैं, उतनी ही उनकी वे सूक्ष्म शक्तियाँ प्रबुद्ध हो जाती हैं, जो आत्म-प्रदेश में सुप्त पड़ी रहती हैं। ऋषि-मुनि अपने सम्पूर्ण जीवन को आध्यात्मिक साँचे में ढाल कर चलते थे और प्रचण्डतम साधनायें करके अलौकिक शक्तियों के स्वामी बन जाते थे। लोक के साथ अपने परलोक तक को कल्याण-कुसुमों से परिपूर्ण कर लिया करते थे। जिस साधना द्वारा मनुष्य की आत्मिक शक्तियाँ प्रबुद्ध होती हैं, वह है अपने शरीर और मन पर नियन्त्रण करना। शरीर पर नियन्त्रण करने का अर्थ है, इन्द्रियों को स्वाधीन करना और मन पर नियन्त्रण करने का आशय है, उसकी चंचलता पर प्रतिबन्ध लगा देना, उसकी वृत्तियों को अपने अनुकूल बना लेना। उसे एकाग्र, एकनिष्ठ और स्थिर बना लेना। मन अध्यात्म-साधना का बहुत बड़ा साधन है। जब यह नियन्त्रित होकर एक दिशा में प्रवाहित अथवा सक्रिय होता है तो अस दिशा की सूक्ष्म सम्पदाओं को खोज निकालना है। मन की गति बहुत सूक्ष्म है, वह स्वयं भी सूक्ष्म ही होता है। अतएव जब वह भौतिक चंचलता से मुक्त स्थूल से विमुख होकर सूक्ष्म की ओर जाता है, तब अपना सम्बन्ध उस आत्म-प्रदेश से ही स्थापित करता है, जिसमें वे शक्तियाँ सोई रहती हैं, जो अलौकिक कार्य सम्पन्न करने में सक्षम होती हैं। मन का सूक्ष्म शक्तियों से सम्बन्धित होना ही उनका प्रबोधन कहा गया है।
शरीर और मन पर नियन्त्रण हो जाने से एक सीमा तक मनुष्य का अधिकार प्रकृति पर भी हो जाता है प्रकृति ही जड़ और चेतन दोनों प्रकार की सृष्टि की संचालिका होती है। साधना द्वारा उस पर अधिकार हो जाने से मनुष्य अपनी अधिकार रेखा तक उसकी प्रक्रियाओं, नियमों और नियन्त्रण में भी हस्तक्षेप कर सकता है। इस अधिकार के आधार पर ही वह उसके सामान्य नियमों का अतिक्रमण करके ऐसे कार्य सम्पादित कर दिखाता है, जो चमत्कार अथवा सिद्धियों जैसे विदित होते हैं। मनुष्य यह देखने और जानने में समर्थ हो जाता है कि सृष्टि के सूक्ष्म परिवेश में क्या हो रहा है, कैसे हो रहा है और उसे किस प्रकार किया जा सकता है- तथा क्या होने जा रहा है और उसको किस प्रकार अपनी इच्छा के अनुसार परिवर्तित किया जा सकता है। इस प्रकार वह विराट् सृष्टि यन्त्र का एक सहायक संचालक सा बनकर सामान्य लोगों को चमत्कारी, सिद्ध अथवा अलौकिक पुरुष विदित होने लगता है अलौकिकता और कुछ नहीं प्रकृति के साथ उसके विधान में भागीदार हो जाना भर ही है।
आत्मा की शक्तियों की कोई सीमा नहीं। वे असीम और अनन्त है। शक्ति का निवास सूक्ष्मता में होता है। जो पदार्थ, जो वस्तु जितनी अधिक सूक्ष्म होती जाती है, उसकी शक्ति उतनी ही बढ़ती जाती है। किसी स्थूलतम विशाल-ग्रह में सब मिला कर जितनी शक्ति होती है, उतनी शक्ति एक परमाणु में भी होती है। अब तो यह तथ्य विश्वास अथवा अनुमान का विषय न रहकर एक वैज्ञानिक सत्य बन चुका है। परमाणु की खोज और उसका प्रयोग कर वैज्ञानिकों ने उसकी प्रचण्ड शक्ति को प्रमाणित कर दिया है। अणुबमों द्वारा परमाणु की शक्ति अब संपूर्ण संसार पर प्रकट हो चुकी है। वैज्ञानिक अब इस शक्ति को सृजनात्मक कार्यों में प्रयोग करने की सोच रहे हैं। अब यह सद्विचार कार्य रूप में परिणत होने लगेगा तो निश्चय ही इस संसार का चित्र ही बदल जायेगा।
जिस प्रकार एक ग्रह की शक्ति एक अणु में रहती है, उसी प्रकार सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की शक्ति-पिण्ड में विद्यमान् है। यह विराट् ब्रह्माण्ड ईश्वर का प्रकट रूप है और पिण्ड अर्थात् मनुष्य उसका एक अंश है। यहाँ पर मनुष्य का अर्थ भौतिक पिण्ड अथवा शरीर से नहीं है। उसका तात्पर्य आत्मा से है, उस आत्मा से जो शरीर में गुप्त रह कर भी चेतना रूप में भासमान होता है। यही वह परमात्मा का अंश माना है, जिसमें उसके अंशी परमात्मा की सारी शक्तियाँ सन्निहित रहती हैं। आत्मा की शक्तियों का जागरण कर लेना। कहना न होगा कि जिसमें परमात्मा की शक्तियाँ प्रबुद्ध हो जायेंगी, उसके लिये ऐसा कौन-सा कार्य हो सकता है, जो असम्भव अथवा अकरणीय हो। आत्म-शक्ति सम्पन्न व्यक्ति सब कुछ कर सकने में समर्थ होता है। वह प्रकृति के नियमों का अतिक्रमण कर सकता है, सृष्टि-विधान में हस्तक्षेप कर सकता है, असम्भव को सम्भव, भाव को अभाव और अभाव को भाव में बदल सकता है। यह आत्मिक शक्ति आध्यात्मिक साधना द्वारा सहज ही प्रबुद्ध की जा सकती है।
यह मानव जीवन बड़ा ही महान् और महत्त्वपूर्ण है। यही वह अवसर है, जिसका उपयोग कर मनुष्य तुच्छ से विराट् और अणु से विभु बन सकता है। यह वह अवसर है, जिसमें अनन्त शक्तिशालिनी आत्मा का ज्ञान सुलभ हुआ है। आत्मा का विस्तार एवं क्षेत्र अत्यन्त विशाल और महत्त्वपूर्ण है। आत्मा को देख लेने वाले को कुछ देखना शेष नहीं रह जाता और उसको जान लेने पर कुछ जानना नहीं रहता। निदान बुद्धिमान् लोग साधना द्वारा इस आत्मा को ही जानने का प्रयत्न करते हैं। उसे जान लेते हैं और जानकर सर्वदर्शी, सर्वज्ञ और सर्वशक्ति सम्पन्न बन कर जीवन का पूरा-पूरा क्षेत्र प्राप्त कर लेते हैं।
भारतीय ऋषि-मुनि ऐसे ही बुद्धिमान् लोगों में से थे। उन्होंने पंच भौतिक जीवन में बड़ी-बड़ी साधनायें करके, बड़े-बड़े कष्ट उठाकर महान् से महान् त्याग करके आत्म-क्षेत्र में प्रवेश किया था। उन्होंने साधना द्वारा कुण्डलिनी जागरण, ब्रह्म-समाधि आदि योगों को सिद्ध किया। शरीर सीमा से उठकर उच्च भूमिका में और स्थूलता से बढ़कर सूक्ष्म दशा में गये और आत्मा से साक्षात्कार कर उसकी शक्तियों को जगाया और सिद्धि की उस स्थिति के स्वामी बने जिसे ईश्वरीय स्थिति कहा जा सकता है। उन्होंने उस दिव्य-शक्ति का आग्रहण किया, जिसके आधार पर वे सूक्ष्म जगत् में होने वाले क्रिया-कलापों को वैसे ही देख लेने में समर्थ होते थे, जैसे हम अपने चक्षुओं द्वारा भौतिक जगत् के सामान्य दृश्यों को देख लेते हैं। यह आत्मिक शक्ति के आकलन का ही फल होता था कि ऋषि केवल एक दृष्टि अथवा वचन मात्र से ही लोगों का भाग्य और भविष्य अदल-बदल देते थे। धन्य थे वे साधक और उनकी सिद्धियाँ। अपनी उसी आध्यात्मिक साधना के कारण ही वे महानुभाव आज भी मृत्युञ्जय होकर हमारे बीच अजर रूप से जीवित बने हुए हैं।
मानव जीवन पाकर जिसने अपने को आध्यात्मिक साधना से वंचित रखा उसने मानो अपनी ऐसी हानि कर ली, जिसकी क्षतिपूर्ति किसी प्रकार भी नहीं हो सकती। यह बात सही है कि सभी लोग ऋषि-मुनियों जैसी प्रचण्ड साधना करने के न तो योग्य हो सकते है और न उनके पास ऐसा अवसर अथवा अवकाश ही होता है। मिट्टी में बीज की तरह मिलकर तप में समाप्त होकर सिद्धि का वैसा प्रयास सब के लिये सम्भव नहीं जैसा कि महापुरुषों ने किया है। तब भी आत्मा को पाने, उसकी शक्ति का आग्रहण करने के लिये जीवन प्रति-जीवन में थोड़ा-थोड़ा प्रयास करते ही चलना चाहिये। इस जीवन में यदि एक साथ सहसा ही तपश्चर्या कर्तव्यों का पालन करते और भौतिक जीवन गति को अक्षुण्ण रखते हुये भी सामान्य साधना तो की ही जा सकती है। इस सामान्य साधना का रूप भक्ति, पूजा, उपासना अनुष्ठान, जप, ज्ञान, साधना, चिन्तन आदि कुछ भी हो सकता है। हम सब का परम कर्तव्य है कि अपनी योग्यता, स्थिति और परिस्थिति के अनुसार इनमें से किसी भी साधना को ग्रहण कर उसमें नियमित रूप से लगे रहें। धीरे-धीरे साधना संचित होती रहेगी और एक दिन किसी न किसी जन्म में पूर्ण होकर अपना सम्पूर्ण फन प्रदान करेगी।
आध्यात्मिक साधना का स्वरूप कुछ भी हो पर वह सफल तभी होती है, जब श्रद्धा, विश्वास, संयम, साहस, धैर्य और नियमितता आदि तत्त्वों का अवलम्बन लेकर चला जायेगा। इन गुणों से विहीन साधक साधना का वह उच्च फल नहीं पा सकते जिसका सम्बन्ध आत्मा और उसकी शक्तियों द्वारा कतिपय सिद्धियाँ प्राप्त कर लेते हैं। किन्तु यह सिद्धियाँ बहुत ही निम्नकोटि की और अवांछनीय होती हैं। उनको यदि आसुरी सिद्धियाँ भी कह दिया जाय तब भी अनुचित न होगा।
अनाध्यात्मिक मार्ग से प्राप्त की गई सिद्धियों द्वारा न तो किसी का हित साधन किया जा सकता है और न अपने लिये ही आन्तरिक शांति और सन्तोष की ही प्राप्ति हो सकती हैं, जो अज्ञानी और निम्न-स्तर के लोगों के लिये आश्चर्य और आतंक के विषय हों। वह साधना जिसका मार्ग विशुद्ध आध्यात्मिक नहीं होता अशिव साधना ही होती है, उससे शिव परिणामों की आशा नहीं की जा सकती।
साधना का सच्चा उद्देश्य आत्म-लाभ ही है। तथापि अनेक लोग भौतिक लाभों की कामना से पूजा, उपासना अथवा अनुष्ठान किया करते हैं। यद्यपि पूजा, उपासना अथवा अनुष्ठान आदि आध्यात्मिक साधना के स्वरूप हैं। तथापि इनका उद्देश्य भौतिक लाभ बना लेने से वे भी उसी श्रेणी में पहुँच जाती हैं, जिसमें तन्त्र, मन्त्र, यन्त्र आदि की साधना होती है। तन्त्र साधना और सकाम उपासना में स्वरूप भेद होते हुए भी वे परिणाम रूप में एक जैसी ही होती हैं। सकाम उपासना भी आत्मिक उन्नति अथवा आत्म-जागरण कर सकने में सर्वथा असमर्थ ही होती है।
हजरत मोहम्मद को तीव्र ज्वर में बेचैन देखकर उनकी पत्नी रोने लगी। मोहम्मद साहब ने कहा- “जिसे ईश्वर पर विश्वास है वह कभी इस तरह नहीं रो सकता। हमारे कष्ट हमारे पापों का प्रायश्चित है। निस्सन्देह किसी ईश्वर के विश्वासी को एक काँटा भी चुभता है तो ईश्वर उसका रुतबा बढ़ा देता है और उसका एक पाप धुल जाता है। जिसका जितना पक्का विश्वास होता है, उसे उतने ही कष्ट भी दिये जाते हैं, यदि विश्वास कमजोर है तो कष्ट भी वैसे ही होते हैं, किन्तु किसी सूरत में भी कष्टों में उस समय तक कोई माफी न होगी, जब तक कि मनुष्य का एक पाप भूलकर पृथ्वी पर वह निष्कलंक होकर न विचरने लगे।”
मनुष्य की शक्तियाँ अनन्त हैं। किन्तु उनका निवास आत्मा में ही है। अध्यात्म साधना द्वारा उनको प्रबुद्ध और प्राप्त किया जा सकता है। आत्मिक शक्तियों का स्वामी मनुष्य क्षुद्र से महान्, अणु से विभु और जीव से ईश्वर बन जाता है। किन्तु यह सम्भव तभी है, जब साधना के किसी भी स्वरूप का आश्रय लेकर निरन्तर धैर्य और निष्काम-भाव से सुयोग्य पुरुषार्थ में संलग्न रहा जाय।
जीव-विज्ञान के अनुसन्धानों में यद्यपि कोशिका (सेल्स) को सबसे अधिक आश्चर्यजनक रूप में देखा गया है। उसे वैज्ञानिक ब्रह्माण्ड का छोटा-सा नक्शा मानते हैं। उसके अन्दर सूक्ष्म रूप में वह सब कुछ है जो इन स्थूल आँखों से दिखाई देता है। रोम-रोम प्रति लागे कोटि-कोटि ब्रह्माण्ड” वाली तुलसीदास की उक्ति का विज्ञान ने कोशिका के रूप में सत्य मान लिया।
किन्तु हम जो कुछ देखते हैं, उससे भी अधिक आश्चर्यजनक, रहस्यपूर्ण, कौतूहल-वर्धक और महत्त्वपूर्ण वह हैं, जिसकी दूरी और सीमायें इतनी व्यापक और विशाल हैं कि हमारी आँखें उसे देखने में समर्थ नहीं हुई। हमारे शास्त्रों में उस व्यापकता और अनन्तता को परमात्मा कहा है और बताया है कि उसे सूक्ष्म होकर ही जाना जा सकता है-
वालाप्रशत साहस्र तस्य भागस्य भागिनः। तस्य भागस्य भागार्थ तत्क्षये तुनिरंजनम्॥
पुष्प मध्ये यथा मन्धः पयोमध्ये यथा घृतम्। तिलमध्ये यथा तैलं पाषागेष्णिव काज्चनम्॥
एवं सर्वाणि भूतानि मरणौ सूत इवात्मनि। स्थिर बुद्धि रसंभूढ़ो ब्रह्मविद् ब्रह्माण स्थितः॥
ध्यान बिंदूपनिषद् 4-6
अर्थात्-बाल के सबसे छोटे टुकड़े का भी सौवाँ भाग, उसका भी हजारवाँ भाग और उसका भी आधे का आधा भाग सूक्ष्माति-सूक्ष्म क्षय हो जाने पर निरंजन होता है, जिस प्रकार फूलों में गन्ध, दूध में घृत, तिल में तेल, पाषाण में स्वर्ण और माला के दाने सूत में पिरोये रहते है, उसी प्रकार सब भूत निरंजन में व्याप्त हैं, स्थिर बुद्धि वाला ज्ञानी मोह रहित ऐसे ब्रह्म का ज्ञान प्राप्त करके उसमें स्थिर रहता है।
आर्ष वैज्ञानिकों के इस कथन की सत्यता का सर्वप्रथम किंग्स कालेज लन्दन के डा. विल्किंस ने अध्ययन किया। उन्होंने बताया कोशिका अपने आप में उतनी आश्चर्यजनक नहीं है, जितनी उसके अन्दर के दूसरे कण और क्रियायें महत्त्वपूर्ण ह।, इनमें से नाभिक या केन्द्रक (न्यूक्लियस) और उसमें लिपटे हुये क्रोमोसोम, स्पूतनिक की तरह कौशिक के आकाश में स्थित ‘सेन्टोसोम’ जो कोशों के विकास में सहायक होता है, पारदर्शी गुब्बारे जैसा वह भाग जो भोजन की शक्ति में बदलता है, वह भी एक से एक बढ़कर आश्चर्यजनक हैं। न्यूक्लियस कोशिका का वह गुम्बदाकार भाग है, जहाँ से पूरे शरीर का सूत्र संचालन होता है। गुण सूत्र (क्रोमोसोम) की जटिलता और भी अधिक है, क्योंकि उन पर व्यक्ति के गुण, शारीरिक विकास और अनुवांशिकता आधारित है, इसलिये इनकी खोज में वैज्ञानिक तीव्रता से जुट गये।
‘जीन्स’ जिन्हें आज का वैज्ञानिक जीवन की इकाई मानता है, इन्हीं गुण-सूत्रों का ही एक अत्यन्त सूक्ष्म अवयव है। जिस प्रकार एक डोरे में थोड़ी-थोड़ी दूर पर गांठें लगा देते हैं। इन गुण सूत्रों में भी गाँठें लगी हुई हैं, इन गाँठों को ही ‘जीन्स’ कहते हैं। एक कोशिका के जीन्स जो कुण्डली मारे बैठे रहते हैं, उन्हें यदि खींच कर सीधा कर दिया जाय तो 5 फीट तक लम्बे पहुँच सकते हैं। हमारा शरीर चूँकि कोशिकाओं की ईंटों से बना हुआ होता है और एक युवक के शरीर में यह कोशिकाएँ 600 अरब तक होती हैं, इसलिये यदि सम्पूर्ण शरीर के ‘जीन्स’ को खींच कर रस्सी बनाई जाये तो वह इतनी बड़ी होगी, जिससे सारे ब्रह्माण्ड को नाप लिया जाना सम्भव हो जायेगा।
आत्मा समर्पण जगत में व्याप्त है। सम्भवतः यह जीन्स उस भारतीय मत की पुष्टि करें पर जीन्स को ही आत्मा नहीं मान लेना चाहिये। वह चेतन आत्मा का एक अणु हो सकता है पर आत्मा नहीं। सूर्य एक आत्मा है, उसकी एक किरण वहाँ से चलती है और किसी स्थान पर वहाँ की ऊर्जा पहुँचाती रहती है, बहुत सम्भव है उसी तरह उस किरण जाल से सूर्य भी स्थान-स्थान की खोज- खबर लेता रहता हो। यह किरणें भी प्रकाश के छोटे-छोटे अणु (एटम) से बने हैं और प्रत्येक अणु में सूर्य जैसी क्षमताएँ विद्यमान् होती हैं, उतनी ही ऊर्जा (एनर्जी) उतनी ही चमक और वैसी ही आकृति, पर वह सूर्य नहीं हो सकता, वह तो सूर्य का एक अणु मात्र है। अणु को पकड़ा, तोड़ा और मरोड़ा जा सकता है पर सूर्य को तोड़ डालने की शक्ति विज्ञान ने कहाँ पाई है। सूर्य अपने आप में एक स्वतन्त्र सत्ता है।
‘जीन्स’ भी ऐसे ही हैं यद्यपि मनुष्य का कुछ छोटा या बड़ा होना, उसके बाल काले, भूरे, घुँघराले होना, नाक चौड़ी, लम्बी या पतली होना, आँखें नीली, काली या भूरी होना यह सारी बनावट जीन्स की बनावट पर निर्भर है, यदि विस्तृत खोज की जाय तो गर्भस्थ शिशु का एक दिन इच्छानुरूप निर्माण सम्भव हो जायेगा। अनुवांशिक (हेरेडेटरी) रोगों का इलाज भी तब सम्भव है, जीवधारी के पृथ्वी पर आने से पहने ही कर दिया जा सके, बहुत सम्भव है आदम, ईसा, या कर्ण जैसा अमैथुनी मनुष्य भी बनाया जा सके पर सब मनुष्य की इच्छा पर नहीं किसी पर्दे में काम करने वाली शक्ति की इच्छा पर ही होगा। मनुष्य जीवों का विकसित रूप नहीं वरन् वह अमैथुनी क्रिया द्वारा ही पैदा हुआ है, यह भारतीय दर्शन को मान्यता है, जो आज की वैज्ञानिक दृष्टि में सत्य सिद्ध हो रहा है पर वह मनुष्य के लिये नितान्त सम्भव नहीं।
यह बात हम नहीं वह वैज्ञानिक भी जिन्होंने जीन्स का भी रासायनिक विश्लेषण कर लिया है, मानने लगे हैं। डा. विल्किंस ने बताया कि जीन्स सर्पिल आकार के अणुओं में बने होते हैं यह अणु ‘डी आक्सी राइबो न्यूक्लिक एसिड’ (संक्षेप में डी. एन. ए.) के नाम से जाने जाते हैं। इन्हें केवल एक लाख गुना बढ़ा कर दिखाने वाली (मैग्नीफाइन्ग पावर) खुर्दबीन (माइक्रोस्कोप) से ही देखा जाना सम्भव है। इस दिशा में हार्वर्ड यूनिवर्सिटी अमेरिका के डा. जेम्स वाट्सन और कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी की कैकेंडिश लैबोरेटरी के डा. फ्राँसिस क्रिक ने विस्तृत अनुसन्धान किये। उन्होंने चार प्रमुख नाइट्रोजन यौगिकों 1-एडीसन, 2-साइटो साइन, 3- गुएनाइन और थाईमाइन और फास्फेट व एक प्रकार की शर्करा के रासायनिक संयोग से प्रयोगशाला में ही डी० एन॰ ए॰ अणु (मालेक्यूल) का मॉडल बनाकर सारे संसार को आश्चर्य-चकित कर दिया। यह जीवन-जगत् में हलचल पैदा करने वाली खोज थी। उसके आधार पर अमैथुनी कृत्रिम गर्भाधान ही संभव न हुआ वरन् चिकित्सा और शरीर विकास की अनेक अद्भुत सफलताओं का स्रोत खुल गया। डी० एन॰ ए॰ की सफलता एक दिन ऐसे शरीर बना सकेगी, जो बाजारों जो बाजारों में साधारण मनुष्यों की तरह ही घूमा-फिरा करेंगे, फिर भी कोई समझ न पायेगा कि क्या ये कृत्रिम मानव हैं।
इतनी सफलता पा जाने के बाद क्या वैज्ञानिक संतुष्ट हो गये या उन्होंने यह विश्वास कर लिया कि उन्होंने आत्मा पर अधिकार कर लिया है। नहीं, नहीं, नहीं। 1962 में इन तीन वैज्ञानिकों को जब इस सम्बन्ध में नोबुल पुरस्कार दिया गया तो उन्होंने ही कहा-सूत्र हाथ में आ गया है सूत्रधार नहीं, सम्भव है, एक दिन वह भी हाथ लग जायेगा और तब आज जो मनुष्य प्रकृति के इशारे पर नाचता है, तब प्रकृति उसके इंगित पर चलने लगे। पर अभी तो स्थिति यह है कि मनुष्य जीवन को सारी गतिविधियाँ जिनका आदेश जीन्स के द्वारा मिलता है, वह किसी और की है। जीन्स तो उसके आदेश कोशिका तक पहुँचाते रहते हैं। एक कोशिका से दूसरी कोशिका तक सारी शरीर का कार्य संचालन जीन्स के द्वारा दिये गये आदेशों पर चलता है। यह आदेश भी किसी भाषा में नहीं होते वरन् उसकी भी एक रासायनिक पद्धति है।
जीन्स से काई तत्त्व कोशिका में गया तो वह भाग खाली होते ही ऊपर से कोई और तत्त्व की पहुँचाने की आवश्यकता प्यास रूप में प्रकट हुई। किसी ने कहा नहीं पर हम उठें और पानी पिया। पानी पीने की प्रेरणा जीन्स ने कोशिकाओं को दी, हाथ ने उठा कर पी लिया पर जीन्स को वह आदेश किसने दिया। क्या जीन्स ही की इच्छा थी वह। यदि ऐसा होता तो प्रयोगशाला में बनने वाला डी० एन॰ ए॰ भी अपनी इच्छा से विकसित होने लगता।
अभी इस जीन्स से भी कोई अति सूक्ष्म और सर्वव्यापी सत्ता है, इसका प्रमाण उसी की संरचना से मिल जाता है। उदाहरणार्थ डी० एन॰ ए॰ पर ही लगभग एक अरब एमीनो एसिड क्रम में लगे रहते हैं, इन्हें वह अक्षर कह सकते हैं जो मिलकर जीन्स की आकांक्षा को व्यक्त करते हैं। जैसे भूख-प्यास बोलना, उठना-बैठना मिलना-जुलना सोना, स्वप्न देखना आदि। इनका ही क्रम मनुष्य के गुणों को निर्धारण करता है। मरोड़ी हुई सीढ़ी की शक्ल में यह अणु एक जीन्स की शक्ल में दिखाई देते हैं। उन सब की अनुभूतियाँ अलग-अलग हैं, इससे यह पता चलता है कि जीन्स कहाँ कोशिका की आत्मा है, वहाँ वह शरीर गत् सम्पूर्ण चेतना का एक अंग भर है और उससे अधिक कुछ नहीं।
शरीर की सामाजिकता के आधीन रहना पड़ता है, ऐसा न होता, प्रत्येक जीन्स एक स्वतन्त्र अस्तित्व होता तो वह शरीर के प्रत्येक अंग से मनुष्य पैदा करना आरम्भ कर देता। ऐसा वह नहीं कर सकता, मनुष्य भी परमात्मा का एक अंश है, वह अपने दायरे में निर्माण पालन और संहार के कार्य किया करता है पर वह विश्व-इच्छा के आधीन है। उसकी अपनी सत्ता उस सामाजिकता से अलग रही होती तो वह अपनी इच्छा से अन्य और मृत्यु का स्वामी हो जाता। ब्राह्मी स्थिति में भले ही वह वैसा हो जाता है पर मनुष्य जब तक मनुष्य है, तब तक उसे उस इच्छा ही के आधीन रहना पड़ता है, यही स्थिति जीन्स की भी है। वह आत्मा का अणु हो सकते हैं, आत्मा नहीं। आत्मा की खोज के लिये अभी लम्बे प्रयोग की आवश्यकता है।
कोशिका के ऊपरी आवरण को, जिसे प्रोटीन कहते हैं, अब वैज्ञानिक पद्धति से बनाना सम्भव हो गया है। दूध के प्रोटीन से ऊन बना लेने के बाद वैज्ञानिक इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि प्रोटीन बना लेना कोई कठिन बात नहीं है। अभी इस वर्ष डा. खुराना को तो इसी विषय में नोबुल पुरस्कार भी मिला है। एक और प्रोटीन पर दूसरी ओर डी० एन॰ ए॰ पर विस्तृत गवेषणायें चल रहीं हैं। जितनी सफलतायें मिलती जा रही हैं, उतनी ही आत्मा के किसी अति सूक्ष्म तत्त्व और सर्वव्यापी होने की पुष्टि बढ़ती ही जा रही हैं। अभी यह नहीं मान लेना चाहिये कि डी० एन॰ ए॰ का निर्माण करके वैज्ञानिकों ने आत्मा को को जान लिया। भले ही उन्हें वैसी कोई इकाई मिल गई हो।
आत्मवत् सर्वभूतेषुः का सन्देश देने वाले स्थायी रामतीर्थ अमेरिका पहुँचे। जहाज सान फ्राँसिस्को बन्दरगाह पर रुका। जहाज खड़ा होते ही सभी यात्री जल्दी-जल्दी अपना सामान सँभालने लगे। सब में उतरने की जल्दी और उत्सुकता दिखाई देने लगी। जहाज में एक तरफ एक व्यक्ति शान्तभाव से डैक पर खड़ा था। उसके चेहरे पर न कोई घबराहट दिखाई दे रही थी और न उतरने की उतावली। उसे कुछ देर तक एक अमेरिकन व्यक्ति देखता रहा और अन्त में बोला-क्यों महाशय, आपको यहाँ नहीं उतरना है क्या? अपना सामान क्यों नहीं सँभालते?”
व्यक्ति स्वाभाविक मुस्कराहट की मुद्रा में प्रत्युत्तर देते हुए बोला-मेरे पास कोई सामान नहीं है।” तो पास में पैसे तो होंगे ही, जिससे खाने-पीने का काम चलता होगा? यह तुरन्त दूसरा प्रश्न हो उठा। “मैं अपने पास पैसे भी नहीं रखता।” तब तो यहाँ कोई आपका मित्र होगा, जिसके यहाँ ठहरना होगा? यह युवक का तीसरा प्रश्न था।
स्वामी रामतीर्थ में प्रचंड आत्म-विश्वास था और सब में अपनी ही आत्मा देखने का आत्म-भाव भी। इसी आधार को लेकर तो वे इतनी लम्बी यात्रा आरम्भ कर रहे थे।
स्वामी जी युवक का प्रत्युत्तर देते हुए बोले-हाँ यहाँ हमारा एक मित्र है, जिसके यहाँ हमें रुकना है और जो हमारी सब सहायता करेगा।” वह व्यक्ति कौन है? सच्चे वेदान्ती रामतीर्थ जी हँसे और उसके कन्धे पर हाथ रखते हुए बोले-आप ही मेरे मित्र हैं।”
प्रेम की पवित्रता से भीगता हुआ वह व्यक्ति सचमुच ही उनका परम मित्र बन गया। जब तक स्वामी जी अमेरिका में रहे, उसी के यहाँ रुके रहे। उन्हें किसी प्रकार कोई अभाव और कष्ट न रहा।
कर्म की कुशलता ही कर्म-योग है और कर्म में कुशलता तब आती है, जब प्रत्येक कर्म नियत समय, क्रम और आवश्यकता के अनुसार उचित परिमाण में किया जाता रहे। अस्त-व्यस्त और अव्यवस्थित में काम करने से कर्म कौशल की उपलब्धि नहीं होती।
दो माली एक साथ दो बाग लगाते हैं। कुछ ही समय में एक माली की वाटिका पल्लवित, पुष्पित और विकसित हो उठती है। सारा बाग इधर से उधर तक समान रूप से हरा-भरा लहराता हुआ अपनी सुन्दरता और सुवास से वातावरण को ओत-प्रोत करता है। जो भी अपना पराया, शत्रु-मित्र और आने-जाने वाला उसके पास से निकलता है, उसका हृदय प्रसन्न हो उठता है, आँखें तृप्त हो जाती हैं, तब मन सुवासित हो उठता हैं, और मुख से अनायास ही निकल पड़ता है-अहा कितनी सुन्दर वाटिका है, कैसा मनमोहक बाग है। इसका माल बड़ा कुशल व्यक्ति मालूम होता है। माली अपनी इस सफलता को देखता, सुनता और आत्मा में एक अनिर्वचनीय आनन्द का, सुख-सन्तोष का अनुभव करता है। उसे अपने श्रम, अपनी साधना और अपनी चिन्ता का श्रेय मिल जाता है। यही कर्म कुशलता है, कर्म-योग है।
दूसरे माली का बाग कहीं हरा-भरा कहीं नीरस और शुष्क कोई डाली फूलों से सजी है तो कोई नमस्कार कर रहा है। कहीं कलियाँ खिलकर फूल बन रही हैं तो कहीं विकसित होने से पहले ही मुरझा गई हैं। किसी ओर तो सुगन्ध आ रही है तो कहीं कूड़े-कर्कट की दुर्गन्ध उठ रही है। न क्यारियाँ ठीक हैं और न पौधों की काट-छाँट है। हर ओर अव्यवस्था और अस्त-व्यस्तता ही दृष्टि गोचर होती है। बाग की यत्र–तात्रिक सुन्दरता भी उस सार्वत्रिक कुरूपता में मिलकर कुरूप बन जाती है, असंगत और अनुपयुक्त लगती है।
ऐसा विकृत बाग न तो किसी को प्रसन्न कर पाता है और न सुवासित, उसे देखकर न तो कोई ठहरता है और न प्रशंसा करता है। बहुत बार तो लोग सहसा देखकर यही निर्णय नहीं कर पाते हैं कि वह कोई वाटिका है या बन स्थली। लोग देखते और योंहीं बने जाते हैं और यदि कोई कुछ टिप्पणी करता भी हैं तो कहता हैं-बड़ा रद्दी बाग है, इसका माली बड़ा अयोग्य और अकुशल मालूम होता है।”
बस, उस माली का सारा श्रेय और कर्म व्यर्थ चना गया। उसकी साधना असफल हो गई और वह अपनी आत्मा में एक ग्लानि, एक क्षोभ, एक लज्जा, एक निराशा और एक असंतोष अनुभव करता है। उसका सुख और संतोष श्रम और श्रेय सभी कुछ नष्ट हो जाता है। यही अकर्म, अकुशलता और अनायोग है।
दोनों माली मनुष्य हैं, दोनों ने एक जैसा ही काम लिया। दोनों के साधन और सुभीते एक जैसे थे और दोनों ने सफलता के लक्ष्य से परिश्रम किया-तप किया कारण है कि एक श्रेय का और दूसरा हेय का अधिकारी बना? कारण है, और वह यह कि उन दोनों में से एक कर्मयोगी है और दूसरा कर्मभोगी।
एक ने अपने कर्तव्य की प्रत्येक शाखा पर ध्यान और मनोयोग दिया है। उसने समय पर बीज बोये, समय पर समुचित पानी दिया। क्यारियों की रचना की, अंकुरों की रक्षा और पौधों की खोज खबर रखी। कहाँ पर विजातीय वनस्पति उग रही है, कहाँ पर विजातीय वनस्पति उग रही है कहाँ पर कीड़ा लग सकता है, कौन-सा पौधा झुक सकता है? हवा का कौन-सा रुख किसी डाल को हानि पहुँचा सकता है और किधर से कौन जन्तु आ सकता है-इनमें से किसी बात से वह गाफिन नहीं रहा। उसने हर पौधे, हर अंकुर, हर पत्ते हर कली और हर फूल की सुरक्षा ओर विकास की चिन्ता की। विजातीय वनस्पति को निराया और जानवरों का मार्ग अवरुद्ध किया। उसकी इस सतर्कता, सावधानी और जागरूकता ने उसे सफलता और श्रेय का अधिकारी बनाया। उसने कर्म योगपूर्वक किया वह कर्म-योगी रहा।
दूसरे ने इनमें से किसी बात पर ध्यान नहीं दिया। बीज सूख रहा है, सूखने दिया। पानी की व्यवस्था नहीं की, अंकुर निकल रहे हैं या नहीं, इस बात को क्यारी-क्यारी के पास जाकर नहीं देखा। पौधा सड़ रहा है, झुक या गिर रहा है, उसने परवाह नहीं की, फूल मुरझा रहे है, कलियाँ सूख रही हैं, पत्ते चरे जा रहे हैं, इस बात से वह निरपेक्ष रहा। क्यारी टूट गई है या धारा फूट निकली है, उसने न देखा और न उसकी व्यवस्था की। वह जोत-बोकर भाग्य के भरोसे बैठ रहा। जो पौधे स्वयं की शक्ति से प्रफुल्ल हो गये, जो फूल स्वयं खिल उठे उसी में वह संतुष्ट हो गया और उस संयोग को ही अपनी सफलता मानकर आलसी बन गया। दो-चार खिले पौधों में उसकी आसक्ति हो गई और वह ऊम–घूम कर उनकी ही हाजिरी बजाने जगा। दूसरे पौधों और उनकी दशा से विमुख हो गया, सफल पौधों के प्रति अपनी आसक्ति की उपासना में लग गया। उसी में अपनत्व और अहंकार को केन्द्रित करके बैठ गया। परिणामस्वरूप शेष बाग वीरान हो गया। माली की निन्दा और उसकी अकर्मण्यता की भर्त्सना हुई और अन्ततः वह अशान्ति, असंतोष और असफलता का भागी बना। यही अकुशलता है, कर्म-भोग है।
इस उदाहरण का सत्य, सिद्ध करता है कि मानव जीवन की सफलता कर्म-योग में है, कर्म-भोग में नहीं। इसलिये मनुष्य को श्रेय अथवा निःश्रेयस् प्राप्त करने के लिये कर्म-भोगी नहीं, कर्म-योगी बनना चाहिये। उसे जीवन की हर छोटी बड़ी शाखा पर समान रूप से सम्पूर्ण योग्यता और मनोयोग से ध्यान देना चाहिये। उस काम को तो जिसमें अधिक लाभ है, जिसका फल अधिक मूल्यवान् है, पूरे तन-मन से करना ओर जो अपेक्षाकृत कम लाभ की सम्भावना वाला है उसकी उपेक्षा करना कर्म-कौशल नहीं है। कार्य कुशलता का प्रमाण इस बात में है कि छोटे से छोटा काम भी इस कौशल से किया जाये कि वह सुन्दर और महत्त्वपूर्ण बनकर कर्ता की ईमानदारी का साक्षी जैसा बोल उठे। कर्म का स्वरूप ही मनुष्य के गुण कर्म स्वभाव की तस्वीर है, उसी के अनुसार गुणी एवं गुणज्ञ लोग किसी कर्म-योगी को अंक दिया करते हैं, उसका ठीक-ठीक मूल्यांकन किया करते हैं।
मनुष्य का सारा जीवन ही कर्मठता से भरा हुआ हैं। किसी समय भी वह-कर्म रहित होकर नहीं रह सकता। सोते-जागते उठते-बैठते यहाँ तक कि श्वाँस लेने में भी वह एक कर्म ही करता रहता है। और तो और, यदि श्वाँस लेने की क्रिया ही ठीक से पूरी न की जाये, उसमें भी अस्त-व्यस्तता व्यवधान अथवा प्रमाद बरता जाये तो स्वास्थ्य के लिये एक बड़ा संकट उपस्थित हो जाये और उसकी यह सामान्य क्रिया भी असफलता की गोद में चली जाये।
आदि से लेकर अन्त तक मनुष्य के जीवन में कर्म ही कर्म भरे पड़े हैं। परिवार के लिये अन्न, वस्त्र आदि की व्यवस्था, बच्चों की पढ़ाई, रोजी-रोजगार बीमारियों का चक्कर, शादी-ब्याह मेल-मिलाप आदि तरह-तरह के कर्म उसे करते ही रहने पड़ते हैं। इतने और इतने से भी और न जाने कितने ज्यादा कर्मों के बीच कर्म कुशलता ही वह सम्बल है, जिसके आधार पर सभी ओर सफलता और सभी ओर सुख-संतोष पाया जा सकता है। अन्यथा, यदि एक कर्म सफल होकर अंजलि भर सुख देगा तो चार असफल होकर पास की भी सुख-शांति छीन ले जायेंगे। कर्म कौशल इसी में है कि कामों की एक ऐसी व्यवस्था, ऐसा विधान बनाया जाये, जिसकी धुरी पर सारे कर्तव्य अपनी-अपनी कक्षा में वाँछित गति से चक्कर लगाते रहें, जिससे हर काम पर दृष्टि रखी जाये और सब पर उचित ध्यान दिया जा सके। किन्हीं एक दो रुचिकर कामों से आसक्ति जोड़कर बैठ रहना सारे कर्म-कलाप को छितरा देगा और तब उनको समेटने और सँभालने में इतना और आवश्यक रूप से श्रम करना पड़ेगा कि जिन्दगी बोझ बनकर रह जायेगी।
सम्पूर्ण कर्म व्यवस्था तभी ठीक रह सकती हैं, जब प्रत्येक कार्य को चतुराई के साथ अपेक्षित मनोयोग से किया जाये। न तो किसी काम को छोड़ा ही जा सकता है और न किसी को पकड़कर बैठाया ही जा सकता है। समय और परिस्थिति के अनुसार सारे कामों को पूरा करना आवश्यक है। जिस ओर ध्यान न दिया जायेगा, उसी ओर अशाँतिदायक अव्यवस्था फैल जायेगी। उदाहरण के लिये मान लीजिये, बच्चों को खूब खिला-पिलाकर स्वस्थ तो बना दिया, किन्तु उनकी शिक्षा की ओर ध्यान नहीं दिया, तो निश्चय ही वे अशिक्षित बच्चे आगे चलकर एक बड़ी अशान्ति एवं अव्यवस्था के कारण बनेंगे। दिन और रात परिश्रम करके धन की प्रचुरता कर ली पर उसकी पुण्य, परमार्थ अथवा अन्य आवश्यक कामों में व्यय करने में कृपणता की तो क्या वह धन चोरों, डाकुओं, ईर्ष्यालुओं और शत्रुओं की दुरभि संधि का केन्द्र बनकर जीवन में भय और शंका उत्पन्न नहीं करेगा? क्या वह परिवार में कलह और संघर्ष का सूत्रपात नहीं करेगा। दिन भर काम तो खूब किया जाये पर आहार की ओर ध्यान न दिया जाये तो क्या स्वास्थ्य सुरक्षित रखा जा सकता हैं। इसकी प्रकार पत्नी को भोजन, वस्त्र तो प्रकाम मात्रा में दिया जाये पर उसकी प्रेम पिपासा की उपेक्षा कर दी जाये। तो क्या यह विश्वास किया जा सकता है कि वह संतुष्ट रहेगी और कलह अथवा क्लेश पैदा नहीं करेगी।
ओर भी, यदि किसी एक ओर आसक्ति जोड़कर बैठ रहा जाये तो भी जीवन में शांति तथा स्थिरता के लिये खतरा पैदा हो जायेगा। पुत्र से आसक्ति है, उसकी पढ़ाई, रहन-सहन और स्वास्थ्य, सुन्दरता पर पूरा ध्यान देते हैं पर पुत्री की उपेक्षा कर देते हैं तो क्या यह आशा की जा सकती है कि उस पर इस पक्षपात की अशाँतिकारक प्रतिक्रिया न होगी। इसी प्रकार यदि शरीर से आसक्ति रख कर आत्मा की और आत्मा को प्रधानता देकर शरीर की सर्वथा उपेक्षा कर दी जाये तो न लोक बनेगा और न परलोक, दोनों बिगड़ जायेंगे।
इन दोनों के अपेक्षित अनुपात ही लोक, परलोक के संराधक हो सकते हैं। कला से आसक्ति रखकर परिश्रम साध्य कर्मों के अनास्थावादी जीवन में कभी सुखी नहीं रह सकते। कला यदि आत्मा को विकसित करती है तो परिश्रम शरीर यात्रा का सहायक है, दोनों आवश्यक हैं, दोनों को अपेक्षित महत्व मिलना ही चाहिये। इसी महत्व के समुचित संतुलन का निर्वाह ही कर्म-कौशल अथवा कर्म-योग माना गया है, इसके विपरीत आसक्ति अथवा उपेक्षा का आरोप अकुशलता अथवा कर्म-भोग कहा गया है। जीवन में यदि ऐसी सात्विक सुख-शांति चाहिये, जो कि लोक से लेकर परलोक तक सहायक बने तो मनुष्य को कुशल तथा सफल माली की तरह कर्म-भोगी नहीं कर्म-योगी बनना चाहिये।
ब्रह्म-मुहूर्त का समय था। जगद्गुरु शंकराचार्य गंगा-स्नान करके लौट रहे थे। वेद-मंत्र बोलते हुए जल्दी-जल्दी अपने आश्रम की तरफ बढ़ रहे थे।
एक भंगी सड़क पर झाड़ू लगा रहा था। वह बाहर से देखने में मैला-कुचैला था। जनता-जनार्दन की सेवा पूरे निष्ठा के साथ करता था, इसे वह भगवान् की सेवा ही मानता था। जो कर्म उसे मिल गया था, उसे करने में न तो उसके मन में घृणा थी और न कोई उदासीनता। वह कर्म में ही भगवान् के दर्शन जो करता था।
सबेरे ही गन्दगी को सामने देखकर जगद्गुरु नाक-भौं सिकोड़ते हुए बोले-अरे दूर हट! मेरा गंगा-स्नान व्यर्थ कर देगा क्या?” अद्वैतवाद के प्रतिपादक जगद्गुरु कहलाने वाले की ऐसी बात सुनकर उस आश्चर्य हो उठा। जीव-जीव में, प्राणि-मात्र में एक ही ईश्वर के प्रतिपादन करने वाले में इतना दृष्टि-दोष भंगी ने भाव भरे नम्र शब्दों में पूछा-भगवन् क्या शरीर से शरीर दूर हटाने को कह रहे हैं अथवा आत्मा से आत्मा को भी। मैं उलझन में हूँ, बात समझ में नहीं आ रही है। देह से देह दूर हो तो क्या? समीप हो क्या? क्योंकि यह तो जड़ है। आत्मा से आत्मा कैसे दूर हटाई जाय, जबकि सबमें एक ही आत्मा का वास है।”
विवेक भरे प्रश्न ने शंकराचार्य को झकझोर डाला। उनसे कुछ कहते न बना। अपने अज्ञान पर लज्जित होकर उन्होंने कहा-देव मुझे विद्वान् समझे जाने वाले अज्ञानी को कृपा कर क्षमा कर दें।”
एक बार ऋषि बृहस्पति के पास जाकर कुछ जिज्ञासु जनों ने पूछा - भगवन्! हमारी प्रजा और भावी संतति यदि आप जैसा ज्ञान, बल, बुद्धि, सिद्धि, स्वर्ग और समृद्धि प्राप्त करना चाहेगी तो वह किस प्रकार प्राप्त करेगी, उत्तर मिला-
यज्ञेन वाचः पदवीयमायन्तामन्वन्दिन्नृषिषु प्रविष्टाम्। तामाभृत्या व्यदधुः पुरुमा तां सप्त रेभा अभि सं नवन्ते॥ -ऋग्वेद 10।71।3,
हे शिष्यों! वह वाणी गायत्री आदि सात छन्दों में विभक्त होती है। अब और किसी भी काल में जो बुद्धिमान लोग उस वाणी के द्वारा यज्ञ करेंगे, उन्हें ऋषियों के अन्तःकरण में स्थापित ज्ञान मिलेगा ऐसे छात्रगण उस ज्ञान को सभी प्रदेशों में विस्तार करेंगे और जब उस विद्या को गायत्री आदि छन्दों में बद्ध कर गीत रूप में फैलाते, कथा और काव्य रूप में उसका गुणगान करेंगे, तभी मनुष्य समाज में कल्याण की वृद्धि, अशान्ति का ह्रास अन्याय का विनाश और यज्ञ–कर्ताओं को सुख, समृद्धि, धन धान्य की प्राप्ति होगी।
आज यज्ञ को शक्तिवर्धक वस्तुएँ जला देने वाला एक अन्धविश्वासी कर्मकाण्ड कहा जाता है, किन्तु ऐसा कहने वाले यह भूल जाते हैं कि वर्तमान विज्ञान उस स्थिति में आ गया है, जब यह बताया जा सके कि यज्ञ के जो भी लाभ वेद, उपनिषद्, शास्त्रों और पुराणों में बताये गये हैं, वह यथार्थ लाभों की तुलना में उतने ही छोटे और थोड़े हैं, जैसे अनन्त ब्रह्माण्ड की तुलना में यह अपनी पृथ्वी। प्रजापति ब्रह्मा के इस कथन को - “यह यज्ञ तुम्हारी हर कामना को संतुष्ट करेगा।” अब विज्ञान की कसौटी पर सत्य उतारा जायेगा।
इस विज्ञान को समझने के लिए पृथ्वी और ब्रह्माण्ड की जिन शक्तियों के अध्ययन की आवश्यकता है, वह है - (1) शब्द सामर्थ्य (मंत्र शक्ति), (2) अग्नि तत्त्व और उसका प्रकीर्णन, (3) पदार्थ परिवर्तन के मौलिक सिद्धांत, (4) सूर्य और उसकी सहस्राँशु शक्ति (गायत्री यज्ञों के परिप्रेक्ष्य में) और अन्तिम, (5) भावना विज्ञान। इनमें से सम्पूर्ण या कुछ की आँशिक जानकारी से भी यज्ञ सम्बन्धी भारतीय दर्शन को अच्छी प्रकार समझा जा सकता है।
शब्द की सामर्थ्य की माप कैलीफोर्निया विश्व–विद्यालय के एक भूगर्भ तत्त्ववेत्ता डा. गैरी लेन ने की। उन्होंने स्फटिक के प्राकृतिक क्रिस्टल और स्फटिक की ही बहुत पतली पट्टिका के माध्यम से एक ऐसा यन्त्र बनाया जो ऐसी ध्वनियों के माध्यम से जो कानों को सुनाई भी नहीं देती ऐसी शक्ति का निर्माण किया जिसके द्वारा शल्य-चिकित्सा कीटाणुओं का विनाश, मोटी–मोटी इस्पात की चादरों को काटना, धुलाई, कटाई आदि भारी से भारी काम और नाजुक से नाजुक कार्य भी सम्पन्न करने में बड़ी सहायता मिली। आज पाश्चात्य देशों में औद्योगिक क्षेत्रों में कर्णातीत ध्वनि के उपयोग ने क्राँति मचा दी है।
शब्द की दूसरी विशेषतः उसकी संवहनीयता है, वह ठोस माध्यम से भी चल सकता है और ईथर में तरंगों के रूप में सारे ब्रह्माण्ड का भ्रमण भी कर आता है, इन सब बातों का अर्थ होता है कि शब्द की शक्ति अपरिमेय होती हैं। पृथ्वी पर अनेक हलचलें शब्द के द्वारा ही होती है फिर भारतीय शब्द शास्त्र तो और भी वैज्ञानिक है। उनसे एक प्रकार की ऐसी ध्वनि उत्पन्न होती है, जो किसी भी स्थान पर व्यापक हलचल उत्पन्न कर सकती है।
गायत्री मंत्र की ध्वनि शक्ति इन सबसे विलक्षण है। गायत्री मंत्रों में जब मंत्रोच्चारण किया जाता है तो वह अपने सामान्य सिद्धान्त के अनुसार कुण्डलाकार गति से ऊपर की ओर ईथर में तरंगें बनाता हुआ बढ़ता है। यज्ञों में प्रज्वलित अग्नि के इलेक्ट्रान्स उन तरंगों को वहन कर लेते हैं और उनकी पहली प्रतिक्रिया तो उस क्षेत्र में ही फैलती है, अर्थात् यज्ञ में प्रयुक्त होने वाले घृत आदि पदार्थ स्थूल से गैस रूप में फैलते हैं। आग की गर्मी से उन औषधियों के इलेक्ट्रान्स अपने-अपने पथों पर इतनी तेजी से दौड़ने लगते हैं कि आपस में लड़खड़ा जाते हैं और छितर कर स्थूल पदार्थों से अलग होकर वायु मण्डल में फैल जाते हैं, यज्ञ के समय फैलने वाली धूम्र-सुवास उसी का एक स्थूल रूप है।
अग्निहोत्र और मंत्रोच्चारण के उससे भी सूक्ष्म-विज्ञान को समझने के लिये अयन-मण्डल (आयनोस्फियर) का अध्ययन आवश्यक है। धरती की सतह से 35 से 45 मील तक की ऊँचाई के ऊपर वायु मण्डली आग को अयन-मण्डल कहते हैं। अपनी पृथ्वी वायु के समुद्र में डूबी हुई है, आयनोस्फियर उसका सबसे अधिक ऊँचा और विशाल क्षेत्र हैं, लेकिन वहाँ हवा की कुल मात्रा वायु-मण्डल की तुलना में दो-सौवें भाग से भी कम है। यथार्थ में पृथ्वी पर प्राकृतिक परिवर्तनों और ब्रह्माण्ड के अदृश्य लोकों से संपर्क का मूल अध्याय यहीं से प्रारम्भ होता है। कुछ दिन तक अयन मण्डल वैज्ञानिकों के लिये एक पहेली थी, किन्तु छानबीन से पता चला है कि बहुत ऊँचाई पर हवा में ऐसे बहुत से गुण हैं जो धरती की हवा में नहीं होते।
उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव प्रकाश, प्रचण्ड चुम्बकीय आँधी, बेतार तरंगों के परावर्तन जैसी घटनायें आयनोस्फियर से ही आरम्भ होती हैं। सूर्य और चन्द्रमा आदि की अनेक नियमित प्रक्रियाओं के फलस्वरूप पृथ्वी के आकर्षण वृत्त में परिवर्तन होते हैं।
यहाँ यह भी जान लेना आवश्यक है कि हवा में मिश्रित गैसें छोटे-छोटे अणुओं से बनी होती हैं। एक घन सेंटीमीटर हवा में नाइट्रोजन, आक्सीजन और दूसरी गैसों के 27000,000,000,000,000,000 कण होते हैं। यह अणु भी छोटे कणों में विभक्त होते हैं इन्हें परमाणु कहते हैं, परमाणु भी विभक्त हो सकते हैं। क्योंकि वे भी इलेक्ट्रान, न्यूट्रान और प्रोटान नामक और भी छोटे कणों से बने हैं, इन्हें शक्ति तरंगें ही कहना चाहिये। परमाणु बहुत स्थायी होता है, क्योंकि इलेक्ट्रान और परमाणु का न्यूक्लियस आपस में आकर्षक विद्युत शक्ति द्वारा एक दूसरे से जुड़े रहते। नाभिक धन विद्युत आवेशकारी और इलेक्ट्रानिक सेल ऋण-विद्युत आवेशकारी होता है। इन्हीं विद्युत आवेशकारी अणु या परमाणुओं का नाम अयन है। इसे एक प्रकार का वैसा ही शक्ति प्रवाह कहना चाहिये, जिस तरह तालाब के पानी में तरंगें उठतीं और पानी में गति पैदा करती हैं। यह सूक्ष्म अयन मण्डल भी उसी प्रकार एक ओर तो पृथ्वी की जलवायु पर गैसीय स्थिति के अनुरूप अच्छे, खराब परिवर्तन करता है, दूसरी ओर पृथ्वी के शब्द प्रवाह को कालातीत बनाकर आकाश की ओर फेंकता रहता है।
अणुओं और परमाणुओं के साथ इतनी मजबूती से जुड़े रहने के बाद भी इलेक्ट्रान कभी-कभी उनसे टूटकर अलग हो जाते हैं, पहले वैज्ञानिक इस पर आश्चर्य-चकित थे पर अब वे जान गये हैं कि आयनोस्फियर में यह किया सूर्य के विकिरण (रेडियेशन) से होती हैं। तात्पर्य यह कि सूर्य इस अयन को चुप नहीं रहने देता कुछ न कुछ परिवर्तन कराता ही रहता है परिवर्तन की स्थिति अच्छी-बुरी गैसों के अनुरूप होती हैं, इसलिये यज्ञ से जो प्राण-प्रवाह उत्पन्न होता है, वह स्थूल दृष्टि से प्रकृति और जन-स्वास्थ्य पर बड़ा अनुकूल प्रभाव डालता है।
आज जो परमाणविक विस्फोट हो रहें हैं, उनसे तो अयन-मण्डल ऐसी खराब गैसों की धूलि रेडियो-एक्टीविटी से भर गया है कि आने वाले समय में अनेकों नई बीमारियाँ पैदा होंगी और अकाल धनावृद्धि के विद्रूप उपस्थित होंगे। इस धूलि की जिन्दगी बड़ी लम्बी होती है। दूसरी ओर हर जीवित पदार्थ में कार्बन की मात्रा अधिक होती है। जिससे किरण-सक्रिय धूलि बड़ी आसानी से उस पर अपना प्रभाव प्रारम्भ कर देती है। हर एक मेगाटन वाले परमाणविक अस्त्र से 20 पौण्ड कार्बन 14 की उपलब्धि होती है।
1961 तक के विस्फोटों का हिसाब लगाकर ही डा. लाइनस पालिंग ने बताया था कि भविष्य में 4 लाख विकलांग या मृत बच्चे जन्म लेंगे। कार्बन-14 के अतिरिक्त स्ट्राटियम 90 आयोडीन 131 और कैसियम 137 जैसी कैन्सर, लूकेमियाँ, रक्त मंदता और पेचिस पैदा करने वाली गैसें पैदा होती हैं, उन्हें केवल प्राण-संयुक्त या अधिक शक्ति वाला यज्ञीय-विकिरण ही रोक सकता है और कोई नहीं। यज्ञ से हुई प्राण-वर्षा में ही वह शक्ति है, जो इन दुष्प्रभावों को रोक सके, इसलिये वर्तमान युग में तो यज्ञों की अनिवार्यता असंदिग्ध ही है।
प्रकृति के रूप में यज्ञ पहुँची गैस और कर्णातीत ध्वनि से अयन और ब्रह्माण्डीय शक्तियों के भीतर भारी हलचल उत्पन्न होती है और उस हलचल के फल-स्वरूप ही पृथ्वी पर अनेक नये तत्त्वों का आकर्षण, वर्षा आदि की व्यवस्था होती है, मौसम में सुहावनापन और वातावरण में शक्तिवर्धक प्राण की बहुलता होती है, यह सब उसके स्थूल प्रभाव और प्रतिक्रियाएँ ही हैं।
यजुर्वेद में कहा है-ब्रह्म सूर्य सम ज्योतिः”-23। 42। वह सूर्य ब्रह्म तत्त्व ही है, उन्हीं की शक्ति और बाहरी महिमा से जीवन का विकास हो रहा है। पृथ्वी में आँधी तक सूर्य की इच्छा से आती है, इसे सूर्य की तापीय व्यवस्था कहें या प्राण-प्रक्रिया पर लिखित है कि यज्ञ और मन्त्र की कर्णातीत शक्ति उन प्राण या ऊष्मा में खलबली मचा कर अधिक मात्रा में जीवन तत्त्वों का विस्फोट अवश्य कर अधिक मात्रा में जीवन तत्त्वों का विस्फोट अवश्य करा लेती है। जहाँ भी यज्ञ होते हैं वहाँ प्रकृति बहुत अनुकूल रहती है इसमें किंचित् मात्र भी सन्देह नहीं। स्मरण रहे पृथ्वी सूर्य से ही सर्वाधिक प्रभावित है।
मन्त्र का भावना विज्ञान उससे भी विलक्षण शक्ति वाला है। गीता में भगवान् कृष्ण ने कहा है कि संसार में किसी भी वस्तु का अभाव नहीं है, भले ही हम उसे न जानते हों। परमात्मा की सृष्टि में वह सब कुछ है, जिसके बारे में हम जानते भी नहीं हैं, उसे जानने और देखने के लिये अणु-आँखें सूक्ष्म-दृष्टि को जागृत करना आवश्यक है। अर्थात् जीव छोटे से छोटा होकर ही विश्व की अनन्तता और उसके भीतर की आणविक हलचलों का ज्ञान प्राप्त कर सकता है। यह ज्ञान इतना संघर्ष है कि संसार के किसी भी भूभाग में विलक्षण हलचल उत्पन्न कर सकता है।
यज्ञों के माध्यम से प्रकट होने वाली भावना-शक्ति सामान्य भावों की अपेक्षा शब्द-शक्ति और अग्नि-तत्त्व से प्रेरित होने के कारण तमाम ब्रह्माण्ड में फैलकर अपने अनुरूप शक्तियों को खींच लाती है। हम समझ नहीं पाते कि अदृश्य सहायता या इच्छा पूर्ति कैसे हुई पर यह नई भावनाओं द्वारा एक प्रकार के तत्त्वों के अणुओं के आकर्षण की ही वैज्ञानिक पद्धति है, उसमें रहस्य जैसी कोई भी बात नहीं है।
भावना वस्तुतः कर्णातीत ध्वनि की और भी सूक्ष्म स्वरूप है, क्योंकि हम जो कुछ सोचते हैं, वह आत्मा या चेतन सत्ता द्वारा एक प्रकार का बोलना ही हैं, इसलिये होना ही चाहिये, यज्ञ तो एक प्रकार से उस यन्त्र की तरह है, जो अभीष्ट इच्छा के गन्तव्य तक उस शक्ति को पहुँचाने और वहाँ से आवश्यक परिस्थितियाँ खींच लाने में मदद करता हैं।
हविष्यान्न का प्रतिफल अन्न आदि के उत्पादन, अयन-मण्डल में शक्ति तत्त्वों के विकास और जलवायु की अनुकूलता के रूप में दिखाई देता है तो यज्ञ कर्ताओं की श्रद्धा भक्ति भावनात्मक स्तर पर मनोवाँछित सफलतायें प्रदान करने वाली होती हैं। स्थूल की प्रतिक्रिया स्थूल तो सूक्ष्म की प्रतिक्रिया सूक्ष्म भी हाथों-हाथ देखने को मिलती है। यद्यपि यह दोनों ही बातें मिली-जुली हैं, इसलिये भावना को विज्ञान और विज्ञान को भावना के माध्यम से जागृत और प्राप्त किया जा सकता है।
एक समय था जब अभीष्ट प्राकृतिक आवश्यकताओं, सामाजिक परिवर्तनों और व्यक्ति की निजी इच्छाओं के लिये प्रयुक्त होने वाले यज्ञों की बहुतायत से लोगों को जानकारी थी पर उस विद्या का ला हो गया लगता है, प्रयोग और परीक्षण के तौर पर ही उन रहस्यों की पुनः जानकारी की जा सकती हैं। सूर्य की अदृश्य किरणों के और अयन-मण्डल के सम्बन्ध में और अधिक जानकारियाँ मिलेंगी तब लोग यज्ञ की सूक्ष्म प्रतिक्रियाओं को और भी अच्छी तरह समझ सकेंगे। अभी प्राकृतिक परिवर्तन में उसे सहायक के रूप में समझा जा सका तो इतना ही काफी होगा।
बेतुकी सृष्टि में मनुष्य-शरीर जैसी विलक्षण कोई दूसरी वस्तु नहीं। नाना प्रकार की इच्छाओं, कामनाओं, भावनाओं, महत्त्वाकाँक्षाओं का जन्म ही इसमें होता रहा हो, उतना ही नहीं संसार में जो कुछ भी अद्भुत और अलभ्य है, उस सब की अनुभूति इस शरीर से सम्भव हैं शरीर ही जीव के आत्म-कल्याण का साधन है, बढ़िया उपयोग हो सके तो स्वर्ग की प्राप्ति भी मनुष्य जीवन से ही सम्भव है। संक्षेप में जो कुछ भी सृष्टि में है, वह सब मनुष्य शरीर में है।
सूर्य, चन्द्रमा जैसे अगणित ब्रह्माण्डों के सूक्ष्म-ब्रह्माण्ड जगत् इस शरीर में हैं, जीवात्मा उनमें विहार कर सकता है। ईश्वरीय आनन्द का उपभोग यदि कहीं प्रत्यक्ष संभव है तो वह मनुष्य शरीर से ही सम्भव है, शर्त यह है कि जीवन-नीति ऐसी हो जो उस शाश्वत लक्ष्य की ओर ले चलने में सहायक होती हो।
रामायण कहती है-
बड़े भाग मानुष तन पाया। सुर दुर्लभ सद्ग्रन्थन गावा॥
साधन-धाम मोक्ष कर द्वारा। पाइ न जेहि परलोक सँवारा॥
सो परम दुःख पावई सिर धुनि-धुनि पछताव। कालहिं कर्महि ईश्वरहिं मिथ्या दोष लगाव॥
मनुष्य शरीर जैसा उपयोगी साधन नहीं जो जीवन लक्ष्य का उद्बोधन करा सके। यही एक ऐसा जीवन है, जिससे नर नारायण बन सकता है, संत एकनाथ जी भाव-विभोर होकर गाया करते थे-
नरदेहा चे नि ज्ञाने, सच्चिदानन्द पदवी होंग। येवढ़ा अधिकार नारायरणें, कुपावलोकने बीधला॥
अर्थात्- परमात्मा ने कृपापूर्वक मनुष्य को यह अधिकार दिया है कि ज्ञान के द्वारा वह इसी नर देह से सच्चिदानन्द को प्राप्त करे।
इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिये शास्त्रकारों ने गहन अनुसन्धान के बाद ऐसे मार्ग निर्धारित किये हैं, जिन पर चलता हुआ मनुष्य पारलौकिक आनन्द का रसास्वादन कर सकता है। (1) ज्ञान-योग (2) भक्ति-योग (3) कर्म-योग यह तीन मार्ग परमात्मा तक पहुँचने के हैं, इनमें भक्ति सर्वसुलभ और सरल साधन हैं। रामायण में तो कलियुग क्या किसी भी युग में केवल भक्ति को ही सर्वोत्तम साधन बताकर केवल इसी पथ की अभिब्यंजना की हैं।
भगति हेतु विधि भवन बिहाई। सुमिरत सारद आवति धाई॥
रामचरित सर बिनु अन्हवाए। सो श्रम जाइ न कोटि उपाए॥
भक्ति में वह रस है कि नारद जैसे ज्ञानी भी उसके लिये इच्छुक हुए, अपने लोक से विष्णुपुरी तक भागते फिरते हैं। भक्ति मार्ग की एक सुव्यवस्थित जीवन-नीति है, उस पर यदि चला जा सके तो बड़े-बड़े साधन और ज्ञान की भी आवश्यकता नहीं, मनुष्य स्वरूप प्रयास से ही सौभाग्य सिद्ध कर सकता है।
भक्ति का जो स्वरूप आज सर्वत्र प्रचलित है, वह सही नहीं है। भक्ति वस्तुतः ईश्वर निष्ठा की कठिन कसौटी है जिस पर बिरले मनस्वी ही पार लगते हैं। सच तो यह है कि कोई भी योग भक्ति के बिना सम्पूर्ण नहीं होता। साधनों की कठिनाई में भी भक्ति-भावना ही अंतर्दर्शनार्थी को सहारा दिये रहती है। भक्ति वह कोमलता है जो माँ की तरह उसके जटिल जीवन को भी सरल और प्रवाहमान रखती है। रामायण में आप भगवान् कहते हैं-
सुलभ सुखद मारम यह भाई। भगति मोरि पुरान श्रुति गाई।
ग्यान अगम प्रत्यूह अनेका। साधन कठिन न मन कहुँ टेका॥
करत कष्ट बहु पावई कोऊ। भक्ति हीन मोहि प्रिय नहिं सोऊ॥
भक्ति को ऐसी महत्ता का प्रतिपादन करते हुए भगवान् ने भक्त की जीवन-नीति भी घोषित की और कहा-
सरल सुभाउ न धन कुटिलाई। जया लाभ संतोष सवाई॥
वह जिसका मन सरल स्वभाव वाला है, जिसे थोड़े लाभ में भी संतोष रहता है, वही सच्चा ईश्वर भक्त है।
बैर न विग्रह आस न त्रासा। सुखमय ताहिसदा सब आसा॥
अनारम्भ अनिकेत अमानी। अनध अरोप दच्छ विज्ञानी॥
प्रीति सदा सज्जन संसर्गा। तृन सम विषय स्वर्ग अपवर्गा॥
वह जो किसी से बैर नहीं करता, किसी से झगड़ा नहीं करता, न सुख की आशा न किसी से भय, जो कुछ मिले उसी में सुखी, स्वयं को कर्त्तापन के अभिमान से जो मुक्त रखता है, जिसे अपने धन की महत्त्वाकाँक्षा नहीं, निष्पाप, अक्रोध अन्तःकरण और जो संसार को एक विज्ञान की तरह निरन्तर मन में स्थिर रखता है, ऐसा भक्त ही मुझे प्रिय है।
भगति पच्छ हठ नहिं सठताई। दुष्ट तर्क सब दूरि बहाई॥
भक्त शठता नहीं करता, किसी वस्तु के लिये हठ नहीं करता, दुष्ट सताता है, बुरा-भला कहता है तो उसे उपेक्षा द्वारा टाल देता है।
मम गुन ग्राम नाम रत मत ममता मद मोह। ताकर सुख सोई जानई परानन्द संदोह॥
इस तरह ममता, मोह और अभिमान से विमुख हुआ जन निरन्तर विराट् परमात्मा मानसिक स्तवन किया करता है, उसका सुख तो बस वही जान सकता है। वह आत्मानन्द की स्थिति ही मनुष्य जीवन का अनादि और अनन्त लक्ष्य है।
भक्तिमय जीवन के इस व्यवहारिक पक्ष को समझने के बाद उन मान्यताओं का खण्डन हो जाता है, जो केवल क्षणिक मूर्ति दर्शन, तीर्थ-यात्रा गंगा-स्नान कथा-कीर्तन व्रत से फलीभूत माना जाता है। श्रद्धा का सुख मिले इसके लिये यह भी सब आवश्यक हैं पर ईश्वर-भक्त होकर भी व्यवहारिक जीवन की शुद्धता, पवित्रता, नियम-बद्धता और सामाजिक मर्यादाओं के पालन की दृढ़ता आवश्यक ही नहीं पूर्ण अनिवार्य है।
ब्रह्म सिन्धु-सदृश गम्भीर और व्यापक है, ज्ञान विराट् ब्रह्म का देवता है, जो जन ईश्वर-स्तवन द्वारा भक्ति को परिपुष्ट करते रहते हैं, अनासक्त रहकर ज्ञान द्वारा मद, मोह, लोभ आदि को मारते रहते हैं, ऐसी सुदृढ़ भक्ति वाले लोग संसार में विजयी होते हैं और मनुष्य जीवन में आने का सौभाग्य सफल बनाते हैं।
इस प्रकार जब अपने जीवन को शुद्ध, सरल, सात्विक सदय, सन्मार्गगामी, सद्ज्ञान संयुक्त बनाता हुआ मनुष्य परमात्मा की भक्ति में तत्पर होता है तो उसके सारे दुःख नष्ट हो जाते हैं और वह क्षिप्रता में परम प्रकाश की ओर गमन करने लगता है। रामायण बताती हैं-
राम भगति चिंतामनि सुन्दर। असछ गरुड़ जाके उर अन्तर॥
परम प्रकाश रूप दिन राती। नहिं कछ चहिऊ दियां धृत आती॥
मोह दरिद्र निकट नहिं आवा। लोभ बात नहिं ताहिं बुझावा।।
प्रबल अविधा तम मिट आई। हीरहिं सकल सलभ समुदाई॥
खल कामादि निकट नहिं आई। बसई भर्गात जाके डर माहीं॥
व्यापहिं मानस रोग न भारी। चिन्ह के बस सब जीव दुखारी॥
राम मगति मनि उर बस जाकें। दुख लवलेस न सपनेहु ताकें॥
चतुर सिरोमनि तेई जय माहीं। जे मन लागि सुखतन कराहीं॥
भाव सहित खोजई को प्रानी। पाव भगति मनि सब सुख खानी॥
इन पंक्तियों में स्पष्ट है कि भक्ति मनुष्य का उसके लक्ष्य तक पहुँचाने में सभी सहायक है पर वह भी एक योग है। योग सरल नहीं कठिन हुआ करते हैं। भक्ति-योग की कठिनता यही है कि व्यवहारिक जीवन भी शुद्ध, खरा और पूर्ण अध्यात्मवादी होना चाहिये। इस शर्त के साथ की गई शक्ति ही फलदायक होती है, अन्य नहीं।
आत्मा एक अखण्ड, अदृश्य पदार्थ है, जो हृदय या मस्तिष्क में कहीं निवास करता है। उसका आकार उस स्थान के आकार जैसा है। अणुमात्र होने पर भी वह सम्पूर्ण शरीर पर आधिपत्य रखता है।
आत्मा अविनाशी तत्त्व हैं, वह कभी निष्क्रिय नहीं रहता। यहाँ तक कि शारीरिक तत्त्व तब शिथिल पड़ जाते हैं और मनुष्य सो जाता है, तब भी वह जागृत रहता है। वह सनातन जागृत और चेतन तत्त्व है, जो खाता-पीता बात करता, दुःख-सुख की अनुभूति आदि विभिन्न क्रियाओं का स्वामी है।
जिस प्रकार शरीर बढ़ता और विकसित होता है। उसी प्रकार आत्मा बढ़ती और विकसित होती है। अच्छी तरह नियम और संयम पूर्वक रखने से जिस तरह शरीर की शक्ति, सौंदर्य और बल बढ़ता है, उसी प्रकार भावनाओं के परिष्कार के द्वारा आत्मा भी बलवान बनती है, अपने वास्तविक स्वरूप को जान लेने वाली जीव रूपी आत्मा ही परमात्मा बन जाती है।
आत्मा एक अखण्ड अमूर्तिक पदार्थ है, जो शरीर में भी व्याप्त है और शरीर के बाहर निखिल ब्रह्माण्ड में भी। इसलिए वह शरीर की ही नहीं जानता शाश्वत जगत में जो कुछ हो रहा है, जो कुछ होने वाला है, वह सब जानता है, यदि उस पर पाप और मलिनता का पर्दा, इच्छा और आसक्ति की चादर न पड़ी हो।
यह मान्यतायें भारतीय दर्शन की आत्मा के प्रति आदिकाल से चली आ रही हैं। भारतीय संस्कृति और हमारे जीवन का सम्पूर्ण क्रिया-कलाप इसी अन्तर्दर्शन पर आधारित रहा है। इसलिए हम शेष जगत से भिन्न प्रतीत हुये। हमारा जीवन-दर्शन दूसरों से विलगकोटि का रहा।
यद्यपि अब सारा संसार ही उन सूक्ष्म मान्यताओं पर उतर रहा है पर बीच में भौतिक विज्ञान के विकास ने हमारी मान्यता का खण्डन भी किया और उपहास भी। किन्तु आज वही विज्ञान गहराइयों में धँसता-धँसता अब यह भूल रहा है कि भौतिक पदार्थ ही सब कुछ नहीं है। अब वह भारतीय मान्यता की ओर झुकने को विवश है।
पृष्ठ 142 में ‘इन्ट्रोडक्सन टू साइन्स” में प्रसिद्ध वैज्ञानिक जे. ए. थामसन ने लिखा है - “पृथ्वी पर जीवन का प्रारम्भ कैसे हुआ, इसका कोई उत्तर विज्ञान के पास नहीं है।” ‘मिस्टीरियस यूनिवर्स’ के लेखक सर जेम्स जोन्स को भी कहना पड़ा - “आजकल इस बात में बहुत अधिक लोग सहमत हैं कि ज्ञान की सरिता अयांत्रिक वास्तविक तत्त्व की ओर बह चली है। अब विश्व यन्त्र की अपेक्षा विचार के अधिक समीप लगता है। मन ऐसी वस्तु दिखाई नहीं पड़ता, जो जड़ की दुनियाँ में अकस्मात् टपक पड़ा हो।” ठीक इसी से मिलते-जुलते विचार डा. टेंडल ने भी व्यक्त किये हैं।
दिन माडर्न रिव्यू कलकत्ता के जुलाई 1936 अंक में सर ए. एस. एडिगृन ने लिखा है- “हम नहीं जानते वह क्या है पर कुछ अज्ञात शक्ति काम कर रही है। मैं चेतना को मुख्य मानता हूँ, भौतिक पदार्थ को गौण। पुराना (नास्तिकवाद चला गया। धर्म, आत्मा और मन का विषय है, वह किसी प्रकार हिलाया नहीं जा सकता।”
इन सब उक्तियों के बाद भी आज का अर्द्धराध और पाश्चात्य सभ्यता से प्रभावित समाज चेतना को मानने के लिए तैयार नहीं। क्योंकि वह वस्तुस्थिति से अपरिचित है। आइन्स्टाइन जी विज्ञान का पारंगत पण्डित था मानता है कि सृष्टि में कोई चेतना काम कर रही है पर तो भी विज्ञानवादी उसे मानने के लिए तैयार नहीं होते, तब यह कहना पड़ता है कि क्या यह घटनायें भी आत्मा की उन मान्यताओं को पुष्ट नहीं करती जिनका विवरण ऊपर दिया गया है।
लन्दन के एक निवासी के सम्बन्ध में कुछ वर्ष पूर्व समाचार आया था कि 76 वर्षीय एक व्यक्ति की निद्रा 18 वर्ष की आयु में किसी रोग के कारण भंग हो गई थी और उसके बाद सारे जीवन अर्थात् 58 वर्षों तक उसे निद्रा नहीं आई। उस व्यक्ति के शरीर या मस्तिष्क में कोई रोग या असाधारण जैसा कोई चिह्न भी परिलक्षित नहीं हुआ अर्थात् वह इतने वर्ष लगातार न सोने पर भी पूर्ण स्वस्थ था।
स्पेन के बैलेन्टिन मेडिना नामक एक और सज्जन हैं, जिन्होंने पिछले 62 वर्ष से सोना तो क्या झपकी भी नहीं ली। उन्हें यह भी याद नहीं है कि उन्होंने कभी जम्हाई ली भी थी या नहीं। वे चौबीसों घण्टे काम करते हैं। अर्नेस्टो मेडार्ज के कृषि फार्म में वे पहले 16 घण्टे हल चलाते, निराई करते हैं। शेष 8 घण्टे चौकीदारी करते हैं। जहाँ एक मजदूर कुल आठ घण्टे की मजदूरी कमाता है, वहाँ श्री वैलेन्टिन तीन पाली काम की मजदूरी प्राप्त करते हैं। वे प्रतिदिन दो-बार नाश्ता और चार बार भोजन करते हैं। थक जाते हैं तो उनके लिये बैठकर थोड़ा आराम करना काफी है, सोते तो वे हैं ही नहीं। उनके पास आज तक सोने का कोई बिस्तर भी नहीं है। इस असाधारण स्थिति की जाँच दुनियाँ भर के डाक्टर कर चुके। गोलियाँ, इंजेक्शन और औषधियाँ भी दी गईं पर कोई अन्तर न पड़ा। डाक्टरों ने उनकी मृत्यु के बाद की परीक्षा के लिए अनुमति भी माँगी है और स्पेन के मेडिकल स्कूल को यह अधिकार दे दिया गया है। किन्तु मस्तिष्क की अहर्निश इस जागृत अवस्था का कोई निश्चित निष्कर्ष वैज्ञानिक और डाक्टर न निकाल पाये।
यह दोनों घटनायें आत्मा के एक चिर जागृत तत्त्व होने का ही प्रमाण हैं। जिसका न कोई डाक्टर खण्डन कर सका है और न वैज्ञानिक। न ही उनके पास इसका कोई निश्चित उत्तर है।
पूर्व ज्ञान भी उसी प्रकार शारीरिक और यांत्रिक प्रक्रियाओं की सीमा में नहीं आया और न ही विज्ञान इस बात का कोई उत्तर दे सका कि हृदय में आई हुई कई बातें भविष्य में सच सच घटित हो जाती हैं, उसका रहस्य क्या है। सुकरात कहा करते थे- ‘मेरे अन्दर एक ‘डेमन’ (आत्मा) का वास है, वह मुझे होने वाली घटनाओं का पूर्वाभास करा देती हैं” यह सच था कि सुकरात अनेक रहस्यपूर्ण बातों की जानकारी पहले ही दे दिया करते थे। एक बार सुकरात अपने अनुयायियों के साथ एक सड़क पर जा रहे थे। वे अचानक एक स्थान पर रुके और कहा- “मेरा डेमन कहता है कि इस सड़क से नहीं चलना चाहिये। गन्तव्य तक पहुँचने के लिए दूसरे रास्ते से चलेंगे। रास्ते में कोई खतरा है।”
‘दे जेनियो सोक्रेटीज’ में लिखा है कि - इस बात पर जिन्होंने विश्वास कर लिया वे सुकरात के साथ दूसरे रास्ते से चले गये पर चेरिलस और कुछ दूसरे लोगों ने कहा - यह सब बेकार की कल्पना है और वे उसी रास्ते गये। थोड़ी ही दूर पहुँचे होंगे कि जंगली सुअरों के एक झुण्ड ने उन पर आक्रमण कर दिया। कई कोई चोटें आई, कई को सुअरों ने रौंद डाला, बड़ी मुश्किल से सुकरात के पास पहुँच पाये।
प्लेटो ने भी अपनी एक थीसिस में ऐसी ही एक घटना का उल्लेख किया है। सुकरात भोजन कर रहे थे। तिमार्कस नामक युवक भी उनके पास था। वह उठकर कहीं जाने को हुआ तो सुकरात ने फिर वही बात दुहराई - मेरा डेमन कहता है कि तुम्हारा यहाँ से जाना खतरे से खाली नहीं है। पर तिमार्कस ने अनसुनी कर दी। उसके कुछ मित्रों ने कोई षड्यन्त्र रचा था, तिमार्कस गया तो उन्हीं के साथ हो गया और एक व्यक्ति की हत्या कर दी, उसी अपराध में उसे भी प्राणदण्ड दे दिया गया।
आत्मा का एक गुण यह है कि वह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त है, यह बात थोड़ी कम समझ में आती है पर तात्त्विक दृष्टि से चिन्तन करने पर यह बात भी स्पष्ट हो जाती है। पदार्थ की तीन अवस्थायें साधारणतया सबको ज्ञात हैं - (1) घन (पत्थर की तरह कड़ी), (2), द्रव, (3) गैस। लोहा घन है पर उसे तेज आँच दें तो वह पिघल कर द्रव में परिणत हो जाता है। ज्यादा गर्मी दी जाये तो वही भाप बन जायेगा। यही अवस्था दूसरे पदार्थों की भी है। मूलतः जड़ और चेतन दो ही अणु काम करते हैं, जहाँ अणु ढेर हो जाती है वहीं घनत्व दिखाई देने लगता है। जहाँ चेतन अणु जितने पदार्थ रहित (इच्छा रहित) होंगे, वहाँ उतनी ही सूक्ष्म दृष्टि होगी। भले ही हम उस तत्त्व को इन आँखों से न देख पायें।
अब इन तीन अवस्थाओं के आगे की चौथी अवस्था भी जानी गई है, वह है ईश्वर तत्त्व सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में फैला है और रेडियो सन्देशों को तार की तरह एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचा देता है। आपका चित्र इस पृथ्वी के नीचे वाले आसमान में भी विद्यमान् हैं, यदि यह कहा जाये तो चौंके नहीं, क्योंकि ईश्वर के परमाणु आपको घेरे हैं। इस तरह जहाँ तक भी ईथर फैला हुआ है, वहाँ तक आपका फोटो उन परमाणुओं के माध्यम से बह रहा है, जिसे आवश्यकता होती है वह आपको कहीं भी देख लेता है। वैसे सामान्य स्थिति में सबके चेहरे उपेक्षित लहर लेते रहते हैं।
अब ईथर के भी 7 खण्ड किये गये हैं। अर्थात् पदार्थ की सात अवस्थायें ईश्वर से आगे भी हैं। अंग्रेजी में उन्हें एस्ट्रल कहते हैं और हम भारतीय उन्हें लोक कहते हैं और यह मानते हैं कि इन सात अवस्थाओं में जिसे जिस तरह की अवस्था प्राप्त हो जाती है, वह उसी लोक की अनुभूति करने लगता है। इन अवस्थाओं से संपर्क का लाभ ईथर में प्रवाह की तरह होता है, अर्थात् वह मनुष्य कहीं भी दूर की सुन सकता है और देख भी सकता है। वहाँ की परिस्थितियों का रसास्वादन भी कर सकता है।
सेनेवा कोलम्बस से 1500 वर्ष पूर्व जन्मा था, किन्तु उसने तभी यह भविष्यवाणी कर दी थी कि एक दिन पृथ्वी में कभी ऐसे आयुधों का आविष्कार होगा, जिसके बारे में कल्पना करना भी कठिन है। प्रसिद्ध चित्रकार लियोनार्दो द विंची ने आज से 400 वर्ष पूर्व ही यह बता दिया था- आगे लोग आकाश में उड़ा करेंगे। इनसे भी महत्त्वपूर्ण भविष्यवाणी जानेथन स्विफ्ट की है। जानेथन ने ‘गुलिवर की भ्रमण कथा’ में एक लापुटा नाम द्वीप का चित्रण किया है। उसी में बताया है कि मंगल ग्रह के चारों और दो चन्द्रमा चक्कर लगाया करते हैं, उनमें से एक चन्द्रमा दूसरे से दुगुनी तेज गति से चक्कर लगता है। उस समय उस बात को गप्प कहा जाता था, किन्तु 1877 में अमेरिका की नावल आब्जरबेटरी ने एक शक्तिशाली दूरबीन के द्वारा यह पता लगाया कि यथार्थ ही मंगल ग्रह में दो चन्द्रमा हैं, उनमें एक की गति दूसरे से दुगुनी है। स्विफ्ट ने बिना किसी यन्त्र के यह कैसे जान लिया इसका उत्तर माँगा जाय तो विज्ञान के पास सिवाय चुप्पी के और कोई उत्तर न होगा।
ऐसी घटनाओं की कमी नहीं है जिनसे आत्मा के एक विचित्र ‘क्रिस्टल’ होने की बात सत्य सिद्ध होती है, हिप्नोटिज्म, विचार, प्रेषण, दूरदर्शन, दूर श्रवण और स्वप्नावस्था में भी जागृत अनुभूतियाँ इस बात की प्रमाण हैं कि शरीर में किसी अणु आत्मा का निवास अवश्य है, उसी का संकेत करते हुए मैत्रायण्युपनिषद् के पंचम प्रपाठक में बताया गया है -
द्विषा या एष आत्मानं विभर्त्ययं यः प्राणी यश्चासावा दित्योथ द्वौ या एतावास्तां पन्जघा नामर्न्तवहिश्चाहोरात्रे तौ व्यावर्तते असौ वा आदित्यो बहिरातमन्तरामा
- एवाश्रितोन्नमत्ति॥1॥
स्वामी रामकृष्ण परमहंस के दो शिष्यों में विवाद छिड़ गया कि उनमें बड़ा कौन है? अन्त में दोनों स्वामी जी के सम्मुख गये। स्वामी जी ने उत्तर दिया - “बड़ा सरल हल है, तुममें से जो दूसरे को बड़ा समझे वही बड़ा है।” अब तो विवाद का स्वरूप ही बदल गया। दोनों एक दूसरे को ‘तू बड़ा, तू बड़ा’ कहने लगे।
अर्थात् - “वह परमात्मा दो प्रकार की आत्माओं (स्वरूपों) को धारण करता है, यह जो प्राण है और सूर्य है, ये दोनों प्रथम हुये थे। वे भीतर और बाहर दिन रात फिरा करते हैं, वह सूर्य बाहर का अन्तरात्मा है और प्राण अन्तरात्मा है। इसकी गति को देखकर यह अनुमान किया जा सकता है कि यह आत्मा है। वेद कहते हैं कि यह गति रूप ही है, जिस विद्वान् के पाप नष्ट हो चुके हैं। वह सब का अध्यक्ष होता है, उसका मन शुद्ध होता है, उसकी निष्ठा परमात्मा में ही होती है। उसका ज्ञान-चक्षु खुल जाता है और अन्तरात्मा में ही स्थित रहता है। वह गति द्वारा बाहर भी चला जाता है, आत्मा की गति का अनुमान किया जा सकता है, ऐसा वेद कहते हैं।
इस प्रकार संसार के अतिरिक्त मनुष्य का एक मानसिक संसार भी होता है। इसका संचालक मनुष्य का गुप्त मन होता है। मनुष्य का यह मानसिक संसार बड़ा ही व्यस्त और विचित्र होता है। प्रतिक्षण इसमें नई-नई कल्पनायें और कामनायें जन्म लेती रहती हैं। जिनमें से बहुत सी मर भी जाया करती हैं और बहुत सी पलती पनपती रहती हैं और किसी दिन अवसर पाकर बाह्य संसार के बीच प्रकट होने लगती हैं।
मनुष्य का यह मानसिक संसार बड़ा गुप्त होता है। इसका दर्शन संसार में किसी को नहीं हो पाता। हाँ अपने मनोराज्य का स्वामी मनुष्य अवश्य इसे देखा करता है। सो भी तब ठीक से देख पाता है, जब उसका विवेक प्रखर और प्रबुद्ध हो। अन्यथा देखता हुआ भी वह इसे नहीं देख पाता इसका तात्पर्य यह है कि जिस व्यक्ति ने अपने विवेक को प्रखर और प्रकाशित नहीं किया होता है, वह मानसिक संसार की क्रियायें देखता तो है, किन्तु न ता उनका तात्पर्य समझ पाता है और न उनसे होने हानि-लाभ को ही विदित कर पाता है। ऐसी दशा में उसका देखना न देखना बराबर ही होता है।
यह मनोराज्य बड़ा ही सूक्ष्म होता है, अस्तु स्थूलताओं की गति इसमें नहीं हो पाती। यह स्वयं भी निराकार होता है और निराकार शून्य में ही स्थित रहता है। सूक्ष्म होने से इसमें बड़ी प्रबल शक्तियों का निवास रहता है। जो मनीषी व्यक्ति इस मानसिक संसार पर पूरा-पूरा आधिपत्य और शासन स्थापित कर लेता है, वह त्रिलोक और त्रिकाल का ज्ञाता हो जाता है, आत्मा में निवास करने वाले अमृत का भोगी बन जाता है। पूर्वकालीन भारतीय ऋषि-मुनियों ने, जिन्होंने देशकाल को जीत लिया था और आत्मा के अमृत पर अधिकार स्थापित कर लिया था, अपनी साधना, उपासना और तपश्चर्या द्वारा पहले इस मनोराज्य पर ही विजय प्राप्त की थी। मनोजयी, सर्वजयी होता है, इसमें कोई सन्देह नहीं।
इस मनोविस्तार के पीछे आत्मा का क्षेत्र रहता है। उसमें प्रवेश करने के लिए पहले इसे ही भेदन करना पड़ता है। जब तक इस लोहावरण का भेदन नहीं होता, आत्म लोक का मार्ग प्रशस्त नहीं होता। आध्यात्मिक समर का यह दूसरा मोर्चा है। पहला मोर्चा शारीरिक अर्थात् स्थूल संसार का होता है। आध्यात्म योद्धा को पहले इन्द्रियों, उनकी तृष्णाओं और वासनाओं पर विजय करनी होती है, अनन्तर वह इस विजय का शंख फूँकता हुआ मानसिक मोर्चे की ओर बढ़ता है और इसको जीतने के बाद आत्मिक क्षेत्र में प्रवेश कर पाता है।
मनुष्य इस स्थूल जगत में जिस क्रिया को भी व्यक्त करता है, उसका जन्म पहले पहल मानसिक लोक में ही होता है। अपनी जन्मभूमि के अनुसार वह क्रिया भी निराकार रूप में ही जन्म लेती है - जिसे विचार कह सकते हैं। क्रियाओं का जन्म पहले विचारों के रूप में ही होता है। उसके बाद वे मन से प्रेरित होकर स्थूल जगत में आती और इन्द्रियों द्वारा अपनी अभिव्यक्ति पाती हैं।
स्पष्ट है कि भूमि के अनुसार ही फसल पैदा होती है। भूमि अच्छी और स्वस्थ होगी फसल भी सुन्दर और स्वस्थ होगी। भूमि विकृत और मलीन होगी फसल भी उसी के अनुसार रद्दी और निम्नकोटि की होगी। इतना ही क्यों यदि भूमि में विषैले तत्त्वों का समावेश होगा तो उसकी उपज भी विषाक्त ही होगी। इसी प्रकार मनोभूमि के अनुसार मनुष्य के विचारों का जन्म होता है। मनोभूमि सुन्दर स्वस्थ और अनुकूल होगी, सुन्दर, स्वस्थ और अनुकूल विचारों का जन्म होगा। विचारों के अनुसार क्रियायें होंगी और क्रियाओं के अनुसार परिणाम। विकृत एवं विषाक्त मनोभूमि की गर्भ से विकृत और विषैले विचार जन्मेंगे, अपकर्मों में व्यक्त होंगे और तदनुसार दुर्भाग्यपूर्ण परिणाम सम्पादित करेंगे। कर्मों का परिणाम मनुष्य के सम्पूर्ण जीवन, उसके जन्म-जन्मान्तरों और लोक-परलोक से सम्बन्धित होते हैं। इस प्रकार मनुष्य की सुगति और अवगति का सारा निर्माण उसकी मनोभूमि के ही अधीन है।
मनुष्य जीवन में मनोराज्य का बहुत महत्व है। इसकी अनुकूलता, प्रतिकूलता पर ही मनुष्य का उत्थान, पतन निर्भर है। मनुष्य के मनोराज्य में सद् और असद् दोनों तरह की वृत्तियों का निवास रहता है। किन्तु प्रायः सद्वृत्तियों पर असद् वृत्तियाँ हावी रहती हैं। इसका मुख्य कारण यह है कि असद् वृत्तियाँ आपसे-आप चैतन्य और सक्रिय रहती हैं किन्तु सद्वृत्तियाँ नहीं। जहाँ दुष्ट स्वभावतः चंचल और क्षिप्र रहते हैं, वहाँ सज्जन, शांत, गम्भीर और स्थिर रहने के अभ्यस्त रहते हैं। इसका भी एक विशेष कारण है। वह यह कि दुष्ट ध्वंस-प्रवर्तक होते हैं और सज्जन, सृजन-प्रवर्तक ध्वंस के लिए किसी प्रकार के सोच-विचार अथवा भोजन नियोजन की आवश्यकता नहीं होती, वह तो उनका स्वाभाविक खेल होता है। किन्तु सृजन की प्रक्रिया तो विचार, चिन्तन और व्यवस्थित योजना के अधीन होती है। फिर सद्वृत्तियाँ तो उन्नति, सफलता और अमृत तक की प्रदायिका होती हैं, उन्हें आत्म-गौरव और आत्म-श्लाघा होना ही चाहिये। अब तक कोई उनका आह्वान नहीं करेगा, उनसे संपर्क स्थापित नहीं करेगा, जब तक वे किसी की सेवा सहायता के लिए अपने-आप क्यों दौड़ने लगेंगी।
अस्तु जीवन में अभ्युदय चाहने वाले व्यक्ति को मनोनुकूलता के लिए उसकी सद्वृत्तियों को प्रबल बनाना होगा और उनके द्वारा असद्वृत्तियों को पराजित कराकर मनोराज्य से बाहर खदेड़ देना होगा। मनोभूमि पर सोई हुई सद्वृत्तियाँ जब एक बार प्रबुद्ध कर दी जाती हैं तो वे फिर तो अपनी विरोधी वृत्तियों से आपसे-आप संग्राम छेड़ देती हैं। ज्यों-ज्यों असद्वृत्तियाँ परास्त होती जाती हैं, मनुष्य की उन्नति का भव्य मार्ग प्रशस्त होता जाता है। किन्तु सद्वृत्तियों की सहायता के लिए मनुष्य को भी कुछ न कुछ करते रहना होगा। वह यह कि अपने उद्देश्य के शुभ संकल्पों को निरन्तर बढ़ाता रहा जाय। मनुष्य के एक शुभ संकल्प में पूरी एक सेना की भाँति शक्ति होती है। इस कुमुक को पाकर सद्वृत्तियों का उत्साह बढ़ेगा, उनमें विश्वास आयेगा और वे उत्तरोत्तर प्रबल होती चली जायेंगी।
किसी शुभ कल्पना अथवा कामना मात्र को शुभ संकल्प नहीं कहते। शुभ संकल्प वास्तव में वह निष्ठा, वह लगन और वह तीव्रता होती है, जो किसी लक्ष्यपूर्ण शुभ कामना अथवा कल्पना के साथ जुड़ी रहती हैं। एकान्त निष्ठा और अखण्ड लगन से रहित कोई भी शुभ विचार, संकल्प नहीं बनता। किसी विचार में यह निष्ठा और यह लगन तभी आती है, जब वह मनुष्य के सम्पूर्ण चेतन द्वारा स्वीकृत और विवेक द्वारा प्रमाणित कर दिया जाता है। जिस विचार की शुभता में जितना ही संशय अथवा संदेह रहेगा, वह उतना ही संकल्पता से दूर रहेगा। अस्तु इस विषय में मनुष्य को अपने विवेक से पूरा-पूरा काम लेते रहना चाहिये।
मानव-मन में एक से एक चमत्कारी शक्तियों का भण्डार भरा हुआ है। सद्वृत्तियों की सहायता से मन पर अधिकार होते ही मनुष्य उसकी सारी शक्तियों का स्वामी बन जाता है। किन्तु शक्तियों का स्वामी भर हो जाने से महानता का प्रयोजन नहीं हो सकता। उसके लिए शक्तियों के सतत उपयोग की आवश्यकता है। जिन शक्तियों का उपयोग नहीं होता, वे कुण्ठित होकर नष्ट हो जाती हैं।
प्रयत्नपूर्वक मानसिक शक्तियाँ पा जाने के बाद एक बार पुनः असद्शयता का खतरा खड़ा हो जाता है। कोई भी शक्ति अपने में कोई विश्वस्त वस्तु नहीं होती। उससे जहाँ लाभ हो सकता है, वहाँ हानि भी। शक्ति के सदुपयोग से जहाँ मनुष्य ऊँचा चढ़ सकता है, बड़ी से बड़ी सफलता पा सकता है। वहाँ उसके गलत प्रयोग से वह अपनी शक्ति मनुष्य की दुश्मन बन जाती है और वह अपने शस्त्र से ही आहत हो जाता है।
मनुष्य के मनोराज्य का बहुत महत्व है। उसे सदाशयों द्वारा वशीभूत करके सिद्धि की ओर बढ़ाया जाना चाहिये, किन्तु पश्चात् विकारों से सावधान रहने की आवश्यकता है। उसका एक ही उपाय है और वह यह कि शुभ संकल्पों को त्यागा न जाये।
पृथ्वी से अनेक उपग्रह आकाश स्थित ग्रहों के वातावरण और वहाँ की प्राकृतिक परिस्थितियों के अध्ययन के लिए भेजे जाते हैं। यह उपग्रह वहाँ जो कुछ देखते और अनुभव करते हैं, उन्हें रेडीय टेलीमेट्रो से पृथ्वी पर भेजते हैं। सन्देश सवार की क्रिया दो प्रकार से होती है, एक तो यह कि उपग्रह कोई संकेत ग्रहण करने के साथ ही उसे पृथ्वी की ओर प्रेषित कर देता है। पृथ्वी के रिसीविंग स्टेशन ग्रहण-केन्द्र उन्हें ग्रहण कर लेते हैं। दूसरी स्थिति में जानकारी संकेत में (कोड) भेजना प्रारम्भ कर देते हैं। पहली प्रणाली में उपग्रहों से भेजे गये फोटो और सन्देश दुनियाँ के तमाम ग्रहण केन्द्र प्राप्त कर लेते हैं, जबकि दूसरी स्थिति में कई बातें केवल उन्हीं लोगों को मालूम हो पाती है, जिन्होंने उपग्रह भेजा होता है।
इसलिये अन्तरिक्ष यात्रा की अनेक कौतूहल और आश्चर्यजनक तथ्य तो अन्तरिक्ष टेक्नोलॉजी के अग्रणी देश अमेरिका और रूस के ही पास हैं जो संदेश सामान्य रूप से पकड़े जा चुके हैं, वही इतने काफी हैं कि वे पाश्चात्य देशों की’ अनात्मावादी और परलोक कुछ नहीं, मान्यता को नष्ट कर देते हैं। रूस और अमेरिका भी अब यह बेचैनी से अनुभव करने लगे है कि पार्थिक जीवन ही सब कुछ नहीं उसका परलोक से ही कुछ सम्बन्ध अवश्य है।
चन्द्रमा के बारे में पहले लोगों की कल्पना थी कि वहाँ धूल है पर वहाँ से प्राप्त चित्रों से यह पता चलता है कि उसकी सतह ज्वालामुखी चट्टानों की तरह है और पत्थरों के ढेलों और ढोकों से छितरी हुई है। वह इतनी कड़ी है कि 220 पौण्ड भार के अन्तरिक्ष यान को सम्भाल सकती है। लूना-9 से यह जानकारियाँ मिली। सर्वेयर जो तूफान सागर (ओशन आफ स्टार्म, चन्द्रमा में कल्पित नाम) से उतरा था, वहाँ की स्थिति भी ऐसी ही थी। रूसी अन्तरिक्ष यान लूना-2 और जौण्ड-3 के द्वारा चन्द्रमा के उस हिस्से के चित्र लिये गये, जो पृथ्वीवासियों को दिखाई नहीं देता, अनुमान है कि यहाँ पहाड़ियों से घिरे हुए दो समुद्र हैं। ज्वालामुखी के गर्त और पहाड़ियां भी बहुतायत से होने का अनुमान है।
चन्द्रमा के अतिरिक्त सर्वाधिक जानकारी वाले ग्रह-मंगल और शुक्र हैं। शुक्र की सतह को चमकीले और घने बादल स्थायी रूप से ढके रहते हैं। शुक्र जब पृथ्वी और सूर्य के बीच से बीच से गुजरता है तो इसका वायु-मण्डल जगमगाते हुए प्रकाश वलय की तरह लगता है। इसमें कम मात्रा में कार्बन डाइआक्साइड है। मैरीनर-2 जो 27 अगस्त 1962 को आकाश में छोड़ा गया था, तीन महीने बाद शुक्र की कक्षा को बेध कर शुक्र के क्षेत्र में पहुँचा। उसमें लगे यन्त्रों ने जो जानकारी प्रेषित की उनसे पता चलता है कि शुक्र की सतह गर्म है और सर्वत्र तापमान लगभग समान ही है। वायु-मण्डल (एटमॉस्फेयर) के सबसे ऊपरी भाग में थोड़ी कार्बन डाइआक्साइड भी है। अभी शुक्र ग्रह के विस्तृत अध्ययन के लिए चन्द्रमा में एक उपकेन्द्र तैयार करने की बात चल रही है, उससे कुछ और नये तथ्य सामने आने की सम्भावना है।
अब तक जहाँ मानव-विज्ञान पहुँचा, उन ग्रहों में तीसरा मंगल है। उसकी जानकारी के लिए सर्वप्रथम मेरीनर 4 छोड़ा गया। इस उपग्रह ने 228 दिन बाद 20 हजार मील की दूसरी मंगल के चित्र भेजने प्रारम्भ किये। पहला चित्र एक चौड़े रेगिस्तान का था उसके किनारों में कुछ पहाड़ियां थी। ज्वालामुखी ग्रहों का प्रमाण देने वाले चित्र भी आये। अनुमान है कि मंगल की सतह 5 अरब वर्ष के लगभग पुरानी है। यहाँ के ज्वालामुखी लगभग 100 मीटर ऊँचे हैं। कहीं-कहीं बर्फ जमने के भी चित्र आये। यद्यपि वहाँ जीवन होने के कोई प्रामाणिक तथ्य प्राप्त नहीं हुये, किन्तु यह निश्चित हो चुका है कि इस ग्रह का भी हमारी पृथ्वी की तरह ही अयन मंडल (होरिजन) है और 125 किलोमीटर की ऊँचाई पर इलेक्ट्रान्स का अधिकतम घनत्व 1 लाख प्रति घन सेन्टीमीटर है। अभी सबसे रहस्यमय सूर्यलोक के क्रिया -कलाप तो हुये ही है, उसकी जानकारी तो सम्भव है अन्तरिक्ष गवेषणा के सारे इतिहास को उलट कर रख दे।
अब तक के यह सन्देश जो उपग्रहों ने भेजे हैं, उनसे एक बात निश्चित हो गई है कि सभी ग्रह प्रकारान्तर से पाँच महाभूतों (आकाश, पृथ्वी, जल, वायु और अग्नि) ये बने हुये हैं। इनकी न्यूनाधिक मात्रा के अनुसार वहाँ वनस्पति भी होगी। बादल तो हैं ही, तापमान और वायुभार भी है पर इनका अपनी पृथ्वी के तापमान और वायुभार से सामंजस्य नहीं है। इसलिये यह तो नहीं कहा जा सकता कि वहाँ के प्राणधारियों की मानसिक और शारीरिक स्थिति कैसी है, किन्तु जीवन के अस्तित्व के बारे में बिलकुल इनकार नहीं किया जा सकता।
हर्वर्ड वेधशाला (न्यूयार्क) के अवकाश प्राप्त ज्योतिषी डा. हारलो शेपले के अनुसार तो 10 करोड़ से भी अधिक ग्रहों में घास, वृक्ष और जीव रहते हैं। यह विचार उन्होंने एक टेलीविजन कार्यक्रम में व्यक्त किया। तीन अन्य अमेरिकी वैज्ञानिकों ने भी इस विश्वास की पुष्टि की कि केवल पृथ्वी पर ही जीव नहीं रहते अन्य लोकों में भी जीवन का अस्तित्व विद्यमान् है।
73 वर्षीय रूसी वैज्ञानिक श्री ए॰ आई॰ ओपारिन की राय में अन्य ग्रहों पर जीवन है। अकादमीशियन, ओपारिन 50 वर्ष से जीवन के उद्भव पर अनुसन्धान कर रहे हैं, उन्होंने एक प्रश्न के उत्तर में बताया कि अन्य ग्रहों पर किसी तरह का जीवन होना चाहिए, किन्तु यह जरूरी नहीं कि वे मानक जैसे प्राणी हों। ज्यों-ज्यों मनुष्य प्रगति करेगा, उसे अन्य ग्रहों के प्राणियों के बारे में जानकारी, रासायनिक व खनिज विज्ञान की विधियों के प्रयोग और उल्का-पिण्डों के द्वारा मिलती रहेगी। श्री ओपारिन जो सोवियत विज्ञान अकादमी की जीव विज्ञान इंस्टीट्यूट के डायरेक्टर और जीव शास्त्रियों की अन्तर्राष्ट्रीय सोसायटी के उपाध्यक्ष भी हैं, का कहना है कि कार्बन यौगिकों की विकास की प्रक्रिया ही पृथ्वी पर जीवन का आधार है तो अन्य ग्रहों पर जहाँ भी कार्बन यौगिक है, जीवन का होना बिलकुल निश्चित है-(1) आदिमकालीन आर्गनिक पदार्थ हाइड्रोकार्बन, (2) विभिन्न प्रकार के जटिल आर्गनिक पदार्थों के जलीय घोल में प्राइमरी सूप का निर्माण और (3) जटिल बहु आणविक खुली प्रणाली, यह तीन प्रक्रियायें ही प्राणियों के उद्भव के स्रोत हैं और यह विकास क्रम अन्तरिक्ष में व्यापक रूप से विद्यमान् है।
अब यदि अन्तरिक्ष में जीवन है तो उनमें बौद्धिक विकास और शब्द ध्वनि की स्थिति भी होनी चाहिये। अन्तरिक्ष वैज्ञानिक काफी समय से यह कहते आ रहे हैं कि आकाश से बहुत ही व्यवस्थित सन्देश आ रहे हैं किन्तु हमारी ग्रहणशीलता भिन्न प्रकार की होने से हम उन्हें समझ नहीं पा रहे पर यह निश्चित है कि किसी ग्रह में अत्यन्त बुद्धिमान् प्राणियों का निवास है अवश्य। प्रसिद्ध वैज्ञानिक कार्दाशेव ने उन विशेषताओं पर प्रकाश डाला है जिनके द्वारा अन्तरिक्ष से स्थायी तौर पर आने वाली ध्वनियों में से उन ध्वनियों का पहचाना जा सकता है, जो किसी कृत्रिम स्रोत से आ रही हैं। उन्होंने विभिन्न स्रोतों से आने वाली ध्वनि तरंगों के वर्ण छटाओं के अलग-अलग चार्ट तैयार किये हैं, एक चार्ट में उन्होंने दिखलाया है कि पृथ्वी से हजारों लाखों प्रकाश वर्षों की दूरी पर स्थित सभ्यताओं के रेडियो संकेतों की वर्ण छटा (रेडियो फोटो) किस प्रकार होगी। यह वर्ण छटा प्राकृतिक स्रोतों से निकलने वाली वर्ग छटा से बिलकुल भिन्न होगी।
1965 में प्रसिद्ध ज्योतिर्विद् गेन्नादी शोलो मित्स्की ने अश्विनी के नक्षत्र मण्डल में एस०टी०ए॰ 102 के रेडियो ध्वनि विक्षेपण का अध्ययन करते हुये यह पता लगाया कि उसका प्रवाह निर्धारित समय पर बदलता रहता है यह अवधि 100 दिन की होती है। इंग्लैण्ड की जोड्रेल अन्तरिक्ष वेधशाला (एस्ट्रो लैबोरेटरी) द्वारा भी ऐसी सूचनाएँ प्राप्त की गई हैं, जिससे निकोलाई कार्दाशेव के मत की पुष्टि होती है। इन सभी वैज्ञानिकों का विश्वास है कि अश्विनी के नक्षत्र मण्डल में अवश्य ही पृथ्वी वासियों से कहीं अधिक मानसिक शक्ति और वैज्ञानिक प्रगति से सम्पन्न बुद्धिमान् प्राणी निवास करते हैं और वे सैकड़ों वर्षों से पृथ्वी के साथ संपर्क साधने के प्रयत्न में हैं।
इन संकेतों को पकड़ने के अनेक अनुसन्धान हो भी रहें, आश्चर्य नहीं कि अगले पचास वर्षों में अंतरिक्षवासी प्राणियों के सन्देश समझने में सफलता मिल जाये, तब यह भी सम्भव है कि जिस तरह अर्जुन इन्द्र के पास जाकर धनुर्विद्या के गूढ़ रहस्य सीख कर आया था, उसी प्रकार यहाँ के लोग अन्य ग्रहों के संपर्क साधकर वहाँ की अनेक विद्याएँ सीखना आरम्भ कर दें।
अभी हाल में ही कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के कुछ रेडियो खगोलज्ञों ने भी घोषणा की है कि बाह्य अन्तरिक्ष से कुछ संकेत आ रहे हैं। यह घोषणा डा. ए॰ ए॰ हेविश ने की है। मुलाई वेधशाला के रेडियो खगोलज्ञों के बीच भाषण करते हुए उन्होंने बताया कि-उक्त संकेत संभवतः न्यूट्रान नक्षत्रों से आ रहें हैं, जो सूर्य के दूसरी और करोड़ों अरबों मील की दूरी पर स्थित माने जाते हैं।
गणित के प्राध्यापक और खगोलविद् डा. फ्योदोरोव ने सोवियत रूस के रक्षा मंत्रालय की पत्रिका ‘रेड स्टार’ से उद्धरित किया है-” प्राचीनकाल में अन्य ग्रहों से अन्तरिक्ष यात्रियों के पृथ्वी में आने की गाथायें गलत नहीं हैं। उन्होंने कहा कि उड़न तश्तरियों का आना भी, उसका एक प्रमाण है, किन्तु क्या सोडोम व गोमोरा के नगरों की विनाश लीला परमाणु विस्फोटों से होने वाले विनाश की याद नहीं दिलातीं। (ऐसा समझा जाता है कि यह अन्तरिक्ष लोक के किसी भाग का नियोजित हमला था) ब्रह्माण्ड के अन्तरिक्ष यात्रियों ने अपनी यात्राओं के चिह्न जानबूझ कर उन दो क्षुद्रग्रहों पर छोड़े होंगे जो सूर्य और शनि ग्रह के बीच चक्कर काट रहे हैं।” इन बातों को खगोल शास्त्री बहुत गम्भीर मान रहे हैं।
पृथ्वी का अन्य लोकों से यांत्रिक संपर्क तो अब बिल्कुल सत्य सिद्ध हो चुका है, किन्तु सिद्ध हो चुका है, किन्तु अभी वह पक्ष अधूरा है, जिसमें हमारे यहाँ मृत्योपरान्त उपस्थिति का अधिक विस्तार से सुखोपभोग किया जा सके। और लोकोत्तर दुर्गति से बचा जा सकें।
बहुत बार हम से अनेक लोग किसी की धारा-प्रवाह बोलते एवं भाषण देते देखकर मंत्र कीलित जैसे हो जाते हैं और वक्ता के ज्ञान एवं उसकी प्रतिभा की भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगते हैं और कभी-कभी यह भी मान लेते हैं कि इस व्यक्ति पर माता सरस्वती भी प्रत्यक्ष कृपा है। इसके अंतर्पट खुल गये हैं, तभी तो ज्ञान का अविरल स्रोत इसके शब्दों में मुख के द्वारा बाहर बहता चला रहा है।
बात भी सही है, श्रोताओं का इस प्रकार आश्चर्य विभोर हो जाना अस्वाभाविक भी नहीं है। सफल वक्ता अथवा समर्थ प्राध्यापक जिस विषय को ले लेते हैं, उस पर घण्टों एक बार बोलते चले जाते हैं, और यह प्रमाणित कर देते हैं कि उनकी उस विषय का साँगोपाँग ज्ञान है और उनकी सारी विद्या जिह्वा के अग्रभाग पर रखी हुई है। जबकि वह कोई मांत्रिक सिद्धि नहीं होती है। वह सारा चमत्कार उनके उस स्वाध्याय का सुफल होता है, जिसे वे किसी दिन भी, जिसे वे किसी दिन भी, किसी अवस्था में नहीं छोड़ते। उनके जीवन का कदाचित ही कोई ऐसा अभागा दिन जाता हो, जिसमें वे मनोयोगपूर्वक घण्टे दो घण्टे स्वाध्याय न करते हों। स्वाध्याय उनके जीवन का एक अंग और प्रतिदिन की अनिवार्य आवश्यकता बन जाता है। जिस दिन वे अपनी इस आवश्यकता की पूर्ति नहीं कर पाते, उस दिन वे अपने तन-मन और आत्मा में एक भूख, एक रिक्तता का कष्ट अनुभव किया करते हैं। उस दिन का वे जीवन का एक मनहूस दिन मानते और उस मनहूस दिन को कभी भी अपने जीवन में आने का अवसर नहीं देते।
यही तो वह अबाध तप है जिसका फल ज्ञान एवं मुखरता के रूप में वक्ताओं एवं विद्वानों की जिह्वा पर सरस्वती के वास का विश्वास उत्पन्न करा देता है। चौबीसों घण्टों सरस्वती की उपासना में लगे रहिये, जीवन भर ब्राह्मी मंत्र एवं ब्राह्मी बूटी का सेवन करते रहिये, किन्तु स्वाध्याय किसी दिन भी न करिये और देखिये कि सरस्वती सिद्धि तो दूर पास की पढ़ी हुई विद्या भी विलुप्त हो जायेगी। सरस्वती स्वाध्याय का अनुगमन करती है, इस सत्य का सम्मान करता हुआ जो साधक उसकी उपासना किया करता है, वह अवश्य उसकी कृपा का भागी बन जाता है।
नित्य ही तो न्यायालयों में देखा जा सकता है कि कोई एक वकील तो धारावाहिक रूप में बोलता और नियमों की व्याख्या करता जाता है और कोई टटोलकर भूलता याद करता हुआ सा कुछ थोड़ा-बहुत बोल पाता है। दोनों वकीलों ने एक समान ही कानून की परीक्षा पास की, उनके अध्ययन का समय भी बराबर रहा, पैसा और परिश्रम भी परीक्षा पास करने में लगभग एक सा ही लगाया और न्यायालयों में पक्ष प्रतिपादन का अधिकार भी समान रूप से ही मिला है- तब यह ध्यानाकर्षण अन्तर क्यों? इस अन्तर का अन्य कोई कारण नहीं एक ही अन्तर है और वह है स्वाध्याय। जो वकील धारावाहिक रूप में बोल कर न्यायालय का वायु-मण्डल प्रभावित कर अपने पक्ष का समर्थन जीत लेता है -वह निश्चय ही बिलाना। घंटों स्वाध्याय का व्रती होगा। इसके विपरीत जो वकील अविश्वासपूर्ण विश्रृंखल प्रतिपादन करता हुआ दिखलाई दे, विश्वास कर लेना चाहिए कि वह स्वाध्याय शील नहीं है।
योंहीं अपनी पिछली योग्यता, स्मृति शक्ति के आधार पर पक्ष प्रतिपादन का असफल प्रयत्न कर रहा है। इस प्रकार के स्वाध्याय हीन वकील अथवा प्रोफेसर अपने काम में सफल नहीं हो पाते और प्रगति की दौड़ में पीछे पड़े हुये घिसटते रहते हैं। उनको अपने पेशे में कोई अभिरुचि नहीं रहती और शीघ्र ही वे उसे छोड़कर भाग जाने की सोचने लगते है।
ऐसे असफल न जाने कितने वकील एवं प्रोफेसर देखने को मिल सकते हैं, जो स्वाध्याय-हीनता के दोष के कारण अपना-अपना स्थान छोड़कर छोटी-मोटी नौकरी में चले गये है। ऐसे विशाल एवं सम्मानित क्षेत्र को अपने अवांछनीय दोष के कारण भाग खड़ा होना मनुष्य के लिए बड़ी लज्जाप्रद असफलता है।
इतना ही नहीं वर्षों पुराने, अनुभवी और मजबूती से जमे हुए अनेक वकील प्रमाद के कारण नये-नये आये हुए वकीलों द्वारा उखाड़ फेंके जाते देखे जा सकते हैं। पुराने लोग अपने विगत स्वाध्याय, जमी प्रेक्टिस, प्रमाणित प्रतिभा और लम्बे अनुभव के अभिमान में आकर यह सोच कर दैनिक स्वाध्याय में प्रमाद करने लगते हैं कि हम तो इस क्षेत्र में महारथी हैं, इस विषय के सर्वज्ञ है, कोई दूसरा हमारे सामने खड़े होने का साहस ही नहीं कर सकता। किन्तु नया आया हुआ वकील नियमपूर्वक अपने विषय का अनुदैनिक स्वाध्याय करता और ज्ञान को व्यापक बनाता और माँजता रहता है। प्रमाद एवं परिश्रम का जो परिणाम होना है, वह दोनों के सामने उसी रूप में आता है। निदान वकील पीछे पड़ जाता है और नया आगे निकल जाता है।
एक वकालत में ही नहीं, किसी भी विषय अथवा क्षेत्र में अध्ययन-शीलता एवं अध्ययन-हीनता का परिणाम एक जैसा ही होता है। इसमें चिर, नवीन अवस्था का कोई आपेक्ष नहीं होता। यह एक वैज्ञानिक सत्य है जिसमें अपवाद के लिए कोई गुँजाइश नहीं है।
धार्मिक अथवा आध्यात्मिक क्षेत्र ले लीजिये कोई अमुक नित्य चार-चार बार पूजा करता, तीन-तीन घण्टे आसन लगाता, जाप करता अथवा कीर्तन में मग्न रहता। व्रत-उपवास रखता, दान-दक्षिणा देता है, किन्तु शास्त्रों अथवा सद्ग्रन्थों का स्वाध्याय, उनके विचारों का चिन्तन-मनन नहीं करता। सोच लेता है जब मैं इतना क्रिया-काण्ड करता हूँ तो इसके बाद अध्ययन की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती। आत्म-ज्ञान अथवा परमात्म अनुभूति करा देने के लिए इतना ही पर्याप्त है तो निश्चय ही वह भ्रम में है। आत्मा का क्षेत्र वैचारिक क्षेत्र है, सूक्ष्म भावनाओं एवं मनन-चिन्तन का क्षेत्र हैं।
अध्ययन के अभाव में इस आत्म-जगत् में गति कठिन है। आत्मा के स्वरूप का ज्ञान अथवा परमात्मा के अस्तित्व का परिचय प्राप्त हुए बिना उनसे संपर्क किस प्रकार स्थापित किया जा सकता है? इस अविगत का ज्ञान तो उन महान् मनीषियों का अनुभव अध्ययन करने से ही प्राप्त हो सकना सम्भव है, जो अवतार रूप में संसार को वेदों का ज्ञान देने के लिए परमात्मा का प्रतिनिधित्व करते रहते हैं। आसन ध्यान, पूजा-पाठ तो प्रधान रूप से बुद्धि को परिष्कृत और आचरण को उज्ज्वल बनाने के लिये, इस हेतु करना आवश्यक है कि अध्यात्म के दैविक तत्त्व को समझने और ग्रहण करने की क्षमता प्राप्त हो सके। इसके विपरीत यदि एक बार पूजा-पाठ को स्थगित भी रखा जाये और एकाग्रता एवं आस्थापूर्वक स्वाध्याय और उसका चिन्तन मनन भी किया जाये तो बहुत कुछ उस दिशा में बढ़ा जा सकता है। स्वाध्याय स्वयं ही एक तप, आसन और निदिप्यास के समान है। इसका नियम निर्वाह से आप ही आप अनेक नियम, संयमों का अभ्यास हो जाता है।
स्वाध्याय से मनुष्य का अन्तःकरण निर्मल कर देने और उसके अंतर्पट खोलने की सहज क्षमता विद्यमान् है। आन्तरिक उद्घाटन हो जाने से मनुष्य स्वयं ही आत्मा अथवा परमात्मा के प्रति जिज्ञासु हो उठता है। उसकी चेतना ऊर्ध्वमुखी होकर उसी ओर को उड़ने के लिए पर तोलने लगती है। उच्च आध्यात्मिक अनुभूतियों का प्रस्फुटन स्वाध्याय के द्वारा ही हुआ करता है। स्वाध्याय निःसन्देह एक ऐसा अमृत है, जो मानस में प्रवेश कर मनुष्य की पाशविक प्रवृत्तियों को नष्ट कर देता है।
चारित्रिक उज्ज्वलता स्वाध्याय का एक साधारण और मनोवैज्ञानिक फल है। सद्ग्रन्थों में सन्निहित साधु वाणियों का निरन्तर अध्ययन एवं मनन करते रहने से मन पर शिव संस्कारों की स्थापना होती हैं, जिससे चित्त अपने आप दुष्कृत्यों की ओर से फिर जाता है। स्वाध्यायी व्यक्ति पर कुसंग का भी प्रभाव नहीं पड़ने पाता, इसका भी एक वैज्ञानिक कारण है। जिसकी स्वाध्याय में रुचि है ओर जो उसको जीवन का एक ध्येय मानता है, वह आवश्यकताओं से निवृत्त होकर अपना सारा समय स्वाध्याय में तो लगाता है। इसलिये उसके पास कोई फालतू समय ही नहीं रहता, जिसमें वह जाकर इधर-उधर यायावरी करेगा और दूषित वातावरण से अवांछनीय तत्त्व ग्रहण कर लायेगा।
उसी प्रकार रुचि-साम्य-संपर्क के सिद्धान्त के अनुसार भी यदि उसके पास कोई आयेगा तो प्रायः उसी रुचि का होगा और उन दोनों को एक सामयिक सत्संग का लाभ होगा। रुचि वैषम्य रखने वाला स्वाध्यायशील के पास जाने का कोई प्रयोजन अथवा साहस ही न रखेगा और यदि संयोगवश ऐसे कोई व्यक्ति आ भी जाते हैं तो उसके पास का वातावरण अपने अनुकूल न पाकर, देर तक ठहर ही न पायेंगे। निदान संगत-असभ्य आचरण दोषों का स्वाध्यायशील के पास कोई प्रश्न ही नहीं उठता।
आत्मोन्नति के सम्बन्ध में विपरीत वृत्तियाँ आलस्य, प्रमाद अथवा असंयम आदि स्वाध्यायशील व्यक्ति के निकट नहीं जाने पातीं। इसका भी एक वैज्ञानिक हेतु ही है कोई सुरक्षा कवच का प्रभाव नहीं हैं। जिसे पढ़ना है और नित्य नियम से जीवन का ध्येय समझ का पढ़ना है, वह तो हर अवस्था में अपने उस व्रत का पालन करेगा ही। अव्यवस्था अथवा अनियमितता, वह जानता है उसके इस रुचिपूर्ण व्रत में बाधक होगी, वह जानता है उसके इस रुचिपूर्ण व्रत में बाधक होगी, अस्तु वह जीवन की एक सुनिश्चित दिनचर्या बनाकर चलता है। उसका सोना, जागना, खाना-पीना टहलना-घूमना और कार्य करने के साथ-साथ पढ़ने-लिखने का कार्यक्रम एक व्यवस्थित रूप में बड़े अच्छे ढंग से चला करता है। जिसने जीवन के क्षणों को इस प्रकार उपयोगिता पूर्वक नियम-बद्ध कर दिया है, उसका तो एक-एक क्षण तपस्या का ही समय माना जायेगा। जिसने जीवन में व्यवस्था एवं नियम बद्धता का अभ्यास कर लिया, उसने मानो अपने आत्म लक्ष्य के लिये एक सुन्दर नसेनी तैयार कर ली है, जिसके द्वारा वह सहज ही में ध्येय तक जा पहुँचेगा।
अनुभव सिद्ध विद्वानों ने स्वाध्याय को मनुष्य का पथ प्रदर्शक नेता और मित्र जैसा हितैषी बताया है। उनका कहना है कि जो व्यक्ति सत्पथ-प्रदर्शक बताया है, उसका नाड़ी आदि इन्द्रियों पर अधिकार नहीं रहता। उसका मन चंचल विवेकानंद और बुद्धि कुण्ठित रहती है। इन ड़ड़ड़ड़ के कारण उसे दुःखों का भागी बनना पड़ता है। इसलिये बुद्धिमान् व्यक्ति वही है, जो अपने सच्चे मित्र स्वाध्याय को कभी नहीं छोड़ता। इसीलिये तो गुरुकुल से अध्ययन पूरा करने के बाद विद्या लेते समय गुरु, शिष्य को यही अन्तिम उपदेश दिया करता था--
“स्वाध्यायात् मा प्रमद।”
अर्थात्- हे प्यारे शिष्य! अपने भावी जीवन में स्वाध्याय द्वारा योग्यता बढ़ाने में प्रमाद मत करना।
स्वाध्याय से जहाँ संचित ज्ञान सुरक्षित तो रहता ही है, साथ ही उस न कोष में नवीनता और वृद्धि भी होती रहती है। वहाँ स्वाध्याय से विरत हो जाने वाला नई पूँजी पाना तो क्या गाँठ की विद्या भी खो देता है।
स्वाध्याय जीवन विकास के लिये एक अनिवार्य आवश्यकता है, जिसे हर व्यक्ति को पूरी करना चाहिये। अनेक लोग परिस्थितिवश अथवा प्रारम्भिक प्रमादवश पढ़-लिख नहीं पाते और जब आगे चल कर उन्हें शिक्षा और स्वाध्याय के महत्व का ज्ञान होता है, तब हाथ मल-मल कर पछताते रहते है।
किन्तु इसमें पछताने की बात होते हुए भी अधिक चिन्ता की बात नहीं है। ऐसे लोग जो स्वयं पढ़-लिख नहीं सकते, उन्हें विद्वानों का सत्संग करके और दूसरों द्वारा सद्ग्रन्थों को पढ़वाकर सुनने अथवा उनके प्रवचन का लाभ उठाकर अपनी इस कमी की पूर्ति करते रहना चाहिये। जिनके घर पढ़े-लिखे बेटी-बेटे अथवा नाती-पोते हों, उन्हें चाहिये कि वे सन्ध्या समय उनको अपने पास बिठा कर सद्ग्रन्थों का अध्ययन करने का अभ्यास हो जायेगा। जहाँ चाह, वहाँ राह-के सिद्धान्त के अनुसार यदि स्वाध्याय में रुचि है और उसके महत्व का हृदयंगम कर लिया गया है तो शिक्षा अथवा अशिक्षा का कोई व्यवधान नहीं आता, स्वाध्याय के ध्येय को अनेक तरह पूरा किया जा ही सकता है।
माण्डूक्योपनिषद् में परमात्मा के समग्र रूप का तत्त्व समझाने के लिये उनके चार पादों की कल्पना की गई है। नाम और नाभी की एकता प्रतिपादन करने के लिये भी और नाद शक्ति के परिचय रूप में अ, ड और म इन तीन मात्राओं के साथ और मात्रा रहित उसके अव्यक्त रूप के साथ परब्रह्म परमात्मा के एक-एक पाद की समता दिखलाई गई है और ओंकार को ही परमात्मा का अभिन्न स्वरूप मान कर यह बताया गया है-
ओमित्येतदक्षरभिद सर्व तस्योप व्याख्यानं भूतं भवद्भविष्यदिति सर्वमोडकार एव।
यच्चान्यत् त्रिकालतीतं तदप्योडकार एव।
मांडूक्योपनिषद् ।1,
‘ओम’ यह अक्षर ही पूर्ण अविनाशी परमात्मा है। यह प्रत्यक्ष दिखाई देने वाला जड़-चेतन का समुदाय रूप जगत् उन्हीं का उपाख्यान अर्थात् उन्हीं की निकटतम महिमा का निदर्शक है, जो स्थूल ओर सूक्ष्म जगत् पहले उत्पन्न होकर उसमें विलीन हो चुका है, वह सब का सब ओंकार (ब्रह्म का नाद-स्वरूप ही है। तीनों कालों से अतीत इससे भिन्न है, वह भी ओंकार ही है। अर्थात् स्थूल सूक्ष्म और कारण जो कुछ भी दृश्य, अदृश्य है, उसका संचालन ‘ओंकार’ की स्फुरणा से ही हो रहा है। यह जो उनका अभिव्यक्त अंश और उससे अतीत भी जो कुछ है, वह सब मिलकर ही परब्रह्म परमात्मा का समग्र रूप है। पूर्ण ब्रह्म की प्राप्ति के लिये अतएव उनकी नाद शक्ति का परिचय प्राप्त करना आवश्यक है।
परमात्मा के नाद रूप के साक्षात्कार के लिये किये गये ध्यान के सम्बन्ध में नाद-बिंदूपनिषद् के 33 से 49 वें मंत्रों में बड़ी सूक्ष्म अनुभूतियों का भी विवरण मिलता है। इन मंत्रों में बताया गया है, जब पहले पहल अभ्यास किया जाता है। तो ‘नाद’ कई तरह का और बड़े जोर-जोर से सुनाई देता है। आरम्भ में इस नाद की ध्वनि नागरी, झरना, भेरी, मेष और समुद्र की हहराहट की तरह होती है, बाद में भ्रमर, वीणा, वंशी और किंकिणी की तरह गुँजन पूर्ण और बड़ी मधुर होती है। ध्यान को धीरे-धीरे बढ़ाया जाता है और उससे मानसिक ताप का शमन होना भी बताया गया है। तैत्तरीयोपनिषद् के तृतीय अनुवाद में ऋषि ने लिखा है -”वाणी में शारीरिक और आत्म-विषयक दोनों तरह की उन्नति करने की सामर्थ्य भरी हुई है, जो इस रहस्य को जानता है, वह वाक्-शक्ति पाकर उसके द्वारा अभीष्ट फल प्राप्त करने में समर्थ होता है।
ओंकार ध्वनि से प्रस्फुटित होने वाला ब्रह्म इतना सशक्त और सर्वशक्तिमान् है कि वह सृष्टि के किसी भी कण को स्थिर नहीं होने देता। समुद्रों को मथ डालने से लेकर भयंकर आँधी-तूफान और ज्वालामुखी पैदा करने तक- परस्पर विचार -विनिमय की व्यवस्था से लेकर ग्रह-नक्षत्रों के सूक्ष्म कम्पनों को पकड़ने तक एक सुविस्तृत विज्ञान किसी समय भारतवर्ष में प्रचलित था। नाद-ब्रह्मा की उपासना के फलस्वरूप यहाँ के साधक इन्द्रियातीत असीम सुख का रसास्वादन करते थे, यही नहीं उस शक्ति को पाकर वे जहाँ चाहते थे, वहीं मनोवाँछित वस्तुएँ पैदा करते थे।
नदियों के प्रवाह रोक देने से लेकर सूर्य की परिक्रमा बदल देने तक के जितने भी चमत्कार सम्भव है, वह परमात्मा की नाद-शक्ति से होता था। उसे परिचालन विद्या भी कह सकते हैं, इसका उद्रेक जितना ही प्रखर और एकाग्र होता, इसका उद्रेक जितना ही प्रखर और प्रगाढ़ होता था, उतनी ही चमत्कारिक सफलतायें प्राप्त की जाती थीं। अपने आशीर्वाद से किसी रोगी को अच्छा कर देना,किसी निर्धन को धनवान् अपंग को शारीरिक क्षमता प्रदान कर देना इसी विज्ञान का अंग था। इन सबमें निश्चित विचार प्रणाली द्वारा निखिल ब्रह्माण्ड की वैसी शक्तियों के सूक्ष्माणु आकर्षित कर उपेक्षित स्थान पर प्रतिरोपित करने से चमत्कार दिखाई देने वाले कार्य संभव हो जाते हैं। यह चर्चा करने में भी सन्देह है कि लोग अत्युक्ति न समझे किन्तु अब विज्ञान ही इन मान्यताओं को प्रमाणित करने लगा है तो कोई उस पूर्णत्य विज्ञान को कैसे इनकार कर सकता है।
बहुत कम लोग जानते होंगे कि ऐसी ध्वनि-तरंगें (साउण्ड-वेब्स) जिनको हम सुन नहीं सकते, आज वैज्ञानिक शोध कार्यों एवं व्यवसायिक जगत् में क्राँति मचायी हुईं है। कर्णातीत ध्वनि (साउण्ड व्हिच कैन नाट बी हर्ड बाई इयर) पर नियंत्रण करके अब चिकित्सा, शल्य, कीट और कीटाणुओं का संहार, धुँआ और कोहरा दूर करना, कपड़े, कम्बल और बहुमूल्य गलीचों को धोकर साफ करना, घड़ी आदि के पुर्जे चमकाना, साफ करना जैसे छोटे-मोटे काम ही नहीं धातुओं को क्षण भर में काट डालना, छेद डालना, गला देना, एक दूसरे में जोड़ देना आदि से ऐसे काम होने लगे हैं, जिनको बड़ी-बड़ी मशीनें कम समय में कर सकती है।
ध्वनि की इस करामात पर आज सारा संसार आश्चर्य चकित है, लोग समझ नहीं पा रहे कि इतनी सूक्ष्म गतिविधि से इतने भारी कार्य कैसे सम्पन्न हो जाते है। विद्युत से भी अधिक तीक्ष्ण और सर्वव्यापी कर्णातीत नाद-शक्ति की वैज्ञानिक बड़ी तत्परतापूर्वक शोध कर रहे हैं।
कर्णातीत ध्वनि जो साधारणतया कानों से सुनाई नहीं देती है- वह क्या है, थोड़ा इस पर विचार करना आवश्यक है। शब्द या ध्वनि तरंग वस्तुओं के कम्पन (वाइब्रेशन्स) से पैदा होती है। यह तरंगें क्रम से और विचारों की चुम्बकीय शक्ति के रूप में गमन करती है। उदाहरणार्थ सितार के तार छेड़ने पर उनमें कम्पन पैदा होता है, यह कम्पन लहरों के रूप में हवा में पैदा होते और आगे बढ़ते हैं, जहाँ तक ध्वनि तरंगें प्रखर होती है, वहाँ तक वह कानों से सुन ली जाती है, पर कम्पन की शक्ति जितनी घटती जाती है, उतना ही सुनाई नहीं पड़ती और कई बार तो वह दूसरे शक्तिशाली कम्पनों में खो जाती हैं कम्पित वस्तु से ध्वनि-तरंगें सब दिशाओं में चलती और फैलती है, यही कारण है कि जो भी बोला जाता है, उसे उत्तर, पूर्व दक्षिण या पश्चिम किसी भी कोने में बैठा हुआ आदमी सुन लेता है। सुनने की क्रिया कान की झिल्ली से ध्वनि-तरंगें टकराने के कारण होती है। जो वस्तुएँ नियत समय में जितना अधिक कम्पन करती हैं, उनकी ध्वनि उतनी ही पैनी-पतली और सीटी की आवाज की तरह होती है।
विद्युत तरंगों में उभारा जाय तो हर ध्वनि की फोटो अलग बनेगी, आज इस आधार पर पुलिस को अपराधियों को पकड़ने में 97 प्रतिशत सफलता मिली है, न्यूयार्क के वैज्ञानिक लारेन्स केर्स्टा ने यह खोज की थी और यह पाया कि मनुष्य चाहे कितना ही बदल कर, छिपकर या आवाज को हल्का और भारी करके बोले ध्वनि तरंगें हर बार एक सी होंगी। वैसे हर व्यक्ति की तरंगों के फोटो अलग-अलग होंगे। वैज्ञानिक इन ध्वनि-तरंगों के आधार पर व्यक्ति के गुणों का भी पता लगाने के प्रयास में हैं, यह सफल हो गया तो किसी की आवाज सुनकर ही उसके अच्छे-बुरे चरित्र का पता लगा लिया जाया करेगा।
कानों की ग्रहण शक्ति बहुत स्थूल और थोड़ी हैं जो ध्वनियाँ एक सेकेण्ड में कुल 20 कम्पन से अधिक अधिक और 20 हजार कम्पनों से कम में पैदा होती है, हमारे कान केवल उन्हें ही सुन सकते हैं, यदि कम्पन गति (वेलासिटी ऑफ वाइब्रेशन) 20 हजार प्रति सेकेण्ड से अधिक होगी तो हम उसे नहीं सुन सकेंगे। ऐसी ध्वनियाँ ही कर्णातीत कहलाती हैं कुत्ते और चमगादड़ इतने से भी अधिक कम्पनों वाली ध्वनियाँ सुन लेते हैं। कुत्ते कई बार कान उठाकर चौकन्ने से होकर कुछ जानने का प्रयास करते दीखते हैं, वह इन सूक्ष्म कम्पनों को पकड़ने का ही प्रयास होता है। वह इससे भी अधिक सूक्ष्म ध्वनि तरंगों को सुन सकता है।
इसीलिये जब कुछ लोगों के मन में कोई वीभत्स कार्य (हत्या, कत्ल, चोरी, डकैती आदि) के विचार और योजनाएँ बनती हैं, कुत्तों की कर्णातीत ध्वनि पहचानने की क्षमता उसे उसी समय से सुनने लगती है, इसलिये वे पहले ही रोकर या भौंक कर सावधान करने का प्रयत्न करते हैं। चमगादड़ 40000 प्रति सेकेण्ड कम्पन वाली ध्वनियाँ भी आसानी से सुन लेता है। जो जितनी अधिक सूक्ष्म ध्वनियाँ सुन सकता है, वह दूसरों के मन की बातें भविष्य ज्ञान उतनी ही शीघ्र और स्पष्टता से पकड़ लेता
आज के विज्ञान की दृष्टि में भी स्थूल ध्वनि कोई महत्व नहीं रखती, क्योंकि सुन ली जाने वाली ध्वनि (औडिबल साउण्ड) की शक्ति बहुत थोड़ी होती है। यदि डेढ़ सौ वर्ष तक निरन्तर ऐसी ध्वनि उत्पन्न की जाय तो उससे केवल एक कप चाय गरम करा लेने जितनी ही शक्ति पैदा होगी। किन्तु श्वाँस या विचार तरंगों के रूप में शब्द का जो मानसिक स्फोट होता है, वह बड़ा शक्तिशाली होता है, यद्यपि वह ध्वनि सुनाई नहीं देती पर वह इतनी प्रखर होती है कि अपनी एक ही तन्मात्रा से वह परमाणुओं का विखण्डन कर सकती है और उससे उतनी ऊर्जा पैदा कर सकती है, जिससे विश्व के किसी भी भूभाग यहाँ तक कि चन्द्रमा और सूर्य तक में भी क्राँति पैदा कर दी जा सकती है। इस शक्ति को मन्त्र-विज्ञान से जाना जाता है और उसकी ब्रह्मा शक्ति या कुण्डलिनी शक्ति के रूप में प्रतिष्ठा की गई है।
एक बार कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय के भूगर्भ तत्त्ववेत्ता डा. गैरी लेन को लाखों वर्ष पूर्व की एक ऐसी हड्डी मिली, जो बहुत खस्ता हालत में थी, उस पर मिट्टी जमी थी। विस्तृत अध्ययन के लिये मिट्टी साफ करना जरूरी था किन्तु ऐसा करने के लिये यदि कोई चाकू से सहायता ली जाती तो हड्डी टूट-फूट जाती ऐसी स्थिति में उनका ध्यान ‘कर्णातीत ध्वनि’ शक्ति की ओर गया। तब से इस दिशा में अब तक आश्चर्यजनक उपलब्धियाँ हुई है।
कर्णातीत ध्वनि का उत्पादन षट्कोणीय (हैम्सागनल) स्फटिक कणों द्वारा किया जाता है। रुपये की आकार के स्फटिक के टुकड़े को काटकर यंत्रों की सहायता से विद्युत आवेश (इलेक्ट्रिक शाक) देकर कम्पन की स्थिति उत्पन्न की जाती है। उससे 10 लाख से लेकर एक हजार करोड़ कम्पन प्रति सेकेण्ड की कर्णातीत ध्वनि तक तैयार कर ली गई है और उससे दूर–दूर तक सन्देश भेजने धातुओं को काटने–छीलने आदि का महत्त्वपूर्ण कार्य लिया जाता है। फोटो के अत्यन्त सूक्ष्मकारी फिल्मों के ‘इमल्शन’ विभिन्न प्रकार के रंग (पेन्ट) बनाने की रासायनिक औषधियों का निर्माण और सर्जरी तक का काम इस ध्वनि शक्ति से लिया जाता है। अनेक एण्टी बायोटिक औषधियों और इञ्जेक्शन भी इस ध्वनि शक्ति से निर्माण किये जाते है। रूस में अनेक व्यवसायिक प्रयोजन पूरा करने में उसका उपयोग होता है।
अभी इस विज्ञान को विकसित हुए कुल 27-28 वर्ष हुये हैं तो भी अनेक अद्भुत सफलतायें मिली हैं, वैज्ञानिक विचार कर रहें हैं कि प्रकृति में जो कुछ हलचल दिखाई दे रहीं है, क्या वह भी किसी कर्णातीत ध्वनि का ही चमत्कार हैं, यदि हाँ तो ऐसा ध्वनि प्रसारण एक नियत व्यवस्था के साथ ब्रह्माण्ड के किसी कोने से हो रहा होगा वैज्ञानिक उसे जानने और समझने के प्रयत्न में है, सम्भव है एक दिन हम जिस नाद- ब्रह्म को ‘ओंकार’ या ॐ या सोऽहं के नाम से जानते और ध्यान करते हैं, उसकी अनुभूति के लिये कोई यंत्र निर्माण हो जाये ओर सृष्टि के अनेक गूढ़ रहस्यों का पता मनुष्य को चले। ऐसा युग वही होगा जहाँ से भारतीय धर्म और तत्त्व दर्शन की उत्पत्ति हुई है।
तालाब में कमल और तट पर गुलाब- दो फूल लिख रहे थे। दोनों भले प्रतीत हो रहे थे।
गुलाब के फूल ने अकड़ कर कहा-कमल जी! तुम भी हो तो इतने बड़े पर सुगन्ध इतनी कम क्यों देते हो, देखो मेरी महक मीलों तक दौड़ी जा रही है।”
कमल ने हँसकर कहा-भाई गुलाब! बुरा मत मानों हम दोनों का एक ही उद्देश्य है, आप सुगन्ध बिखेरते है और हम सौंदर्य दोनों मिलकर जो काम कर रहे हैं, वह एक नहीं कर सकता था।”
गुलाब अपने दोष-दर्शन पर लज्जित हो गया और कमल दुगुने उत्साह से सौंदर्य बिखेरने लगा।
राज दण्डों में एक दण्ड काल-कोठरी भी है। यह दण्ड बड़ा कष्टदायक माना जाता है। अपराधी को एक छोटी -सी कोठरी में बन्द कर दिया जाता है। बस, इस के सिवाय न तो उसे कोई कष्ट दिया जाता है और न यातना। यहाँ तक कि उससे कोई काम भी नहीं लिया जाता है। खाना-पीना आदि सब उसे सामान्य रूप से मिलता रहता है। यदि स्थूल दृष्टि से उसकी तुलना दूसरे कैदियों से की जाये, तो ऐसा लगता है कि एकान्तवास का बन्दी उनकी अपेक्षा अधिक आराम में है। न कोई काम और न कोई कष्ट, किन्तु यदि उससे पूछा जाये कि वह उस काल-कोठरी के दण्ड को कितना अधिक कष्ट कारक मानता है तो वह बता देगा और सी अन्य सजा में बदलने के लिए खुशी-खुशी तैयार हो जायेगा।
ऐसा क्यों? उस एकान्त-वास में उसे ऐसा कौन-सा कष्ट मिलता है, जो वह अपने उस दण्ड से बदलने को तैयार हो सकता है?
काल-कोठरी का दण्ड और कुछ नहीं केवल संकीर्णता का दण्ड होता है। उसकी जीवन परिधि इतनी संकीर्ण हो जाती है कि उसके प्राण, उसकी आत्मा उसमें घुटने लगती है। उस संकीर्णता में उसे विविध प्रकार की दुष्कल्पनाएँ सताने लगती है। चारों ओर की तंग चहार-दीवारी उसे काट खाने को दौड़ती हैं कुछ ही दीनों में वह उस संकीर्णता में इतना घबरा उठता है कि अपने तक से डरने लगता है। उसकी आसुरी वृत्तियाँ जाग कर प्रबल हो उठती है। कभी उसे ईर्ष्या सताती है, कभी क्रोध जलाता है, कभी घृणा उभर उठती है तो कभी ग्लानि अनुभव होने लगती है।
हर्ष, उल्लास और अभिरुचि जैसी आनन्ददायक वृत्तियाँ मर जाती है। उसका जीवन भार बनकर हर जाता है। खाना-पीना यहाँ तक कि सोना-जागना तक अच्छा नहीं लगता। अधिकांश एकान्त बन्दी खाना-पीना तक छोड़ देते हैं और यदि बेमन खाते-पीते भी रहते हैं तो वह उनके काम नहीं आता। सारा स्वास्थ्य चौपट हो जाता है। बन्दी शीघ्र बीमार हो जाते हैं और बहुत बार तो उस संकीर्णता में घुट-घुट कर मर भी जाते हैं। संकीर्णता का दण्ड सबसे भयानक दण्ड होता है।
मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति व्योमबिहारी पक्षी जैसी ही होती है। उसका वास्तविक सुख स्वच्छन्दता, स्वतन्त्रता और उन्मुक्तता में ही निवास करता है। जिस मनुष्य का दायरा जितना ही तंग-जीवन परिधि जितनी सीमित और संकीर्ण होगी, वह उतना ही दुःखी और त्रस्त रहेगा। इसके विपरीत जो जितना ही विस्तृत और विशाल वृत्ति वाला होगा, जिसकी जीवन-परिधि जितनी ही प्रसारपूर्ण होगी, वह उतना ही सुखी और प्रसन्न रहेगा।
जो मनुष्य अज्ञानवश स्वार्थों से घिरे और शारीरिक भोगों से बँधे रहते हैं, अहंकार से प्रभावित ओर तृष्णाओं से सम्बन्धित रहते है वे कितने ही धनवान्, बलवान् और जनवान् क्यों न हों, जीवन का सच्चा सुख-संतोष नहीं पा सकते। वे भोग-विलासों साधन, सम्पन्नता के बीच भी काल-कोठरी के बन्दी की तरह घुटते और दुःखी होते रहेंगे। मनुष्य जीवन का वास्तविक सुख उन्मुक्तता एवं विशालता में है, स्वार्थ एवं संकीर्णता को शारीरिक परिधि से निकल कर आत्मिक परिसर में आने का उपदेश किया है और जो बुद्धिमान् उनके उपदेशों पर चलकर भोगवाद से विरत होते हैं, उनकी आत्मा शारीरिक संकीर्णता से बढ़कर अनन्त आनन्द रूप परमात्मा में मिलकर भव-बन्धन से सदा-सर्वदा के लिये मुक्त हो जाती जाती है। मनुष्य जीवन का लक्ष्य भव-बन्धन से छूटने के सिवाय और कुछ भी नहीं है। आत्मा का अपनी संकीर्ण परिधि से निकल कर अपने उद्गम परमात्मा में तादात्म्य पाना ही भव-बन्धन से मुक्ति कही गई है।
किन्तु खेद है कि अधिकांश लोग अपने इस जीवन लक्ष्य से अपरिचित रहते हैं और जो परिचित भी है, वे अपनी सकी वृत्तियों के कारण न तो उसको महत्व दे पाते हैं और न उसको पाने के लिए प्रयत्नशील हो पाते है। भोग-विलास और वासना, तृष्णा से लिपटे इसी भव-सागर में पड़े गोते खाते रहते हैं।
जीवन का वास्तविक लक्ष्य देखने, ठीक से पहचानने और पाने के लिए अपनेपन के संकीर्ण दायरे से निकल कर विस्तारपूर्ण परिसर में आना होगा निम्न स्तर से उठकर उच्चतर स्थिति में जाना होगा। गीध और चील जैसे बड़े-बड़े पक्षी अनन्त आकाश में एक बड़ी ऊँचाई पर उठते और तैरते देखे जाते है। उनको देखकर केवल यही न समझ लेना चाहिये कि वे अपने उड्डयन स्वभाव की पूर्ति कर मनोरंजन कर रहे होते हैं। उनकी उस ऊँची उड़ान में एक लक्ष्य भी निहित रहता है और वह होता है अपने भोजन का पता लगाना। उस ऊँचाई पर पहुँचकर वे संसार को दूर-दूर तक गहराई से साफ-साफ देख पाते हैं और अन्य सहस्रों वस्तुओं के बीच पड़े अपने भोजन को पहचान लेते हैं। यदि वे घोंसलों, वृक्षों और कोटरों के संकीर्ण दायरे में ही पड़े ओर जमीन से मिली ऊँचाई तक ही सीमित रहें तो दूर-दूर तक नहीं देख सकते, जिसके फलस्वरूप अपने भोजन के उस लक्ष्य को नहीं पा सकते जिसकी उन्हें अपेक्षा और आवश्यकता होती है।
मनुष्य की स्थिति भी इससे कुछ अधिक भिन्न नहीं होती। वह जब तक अपने शरीर के दायरे तक ही सीमित रहता और वासना-तृष्णा की नीचाइयों में पड़ा रहता है, तब तक अपना जीवन लक्ष्य ठीक से नहीं पहचान पाता। स्थूल-दृष्टि और मोटी बुद्धि का उपयोग करने से वह अपने आस-पास के संसार का सच्चा स्वरूप नहीं देख समझ पाता। निदान उन्हीं में भटक कर अपने उच्च लक्ष्य को भूल जाता है। यदि वह उन पक्षियों की तरह अनन्त में ऊँचे उठकर अपनी दूर और स्थूल-दृष्टि से संसार को देखे तो उसके वास्तविक स्वरूप और उसी में निहित अपने लक्ष्य को भी परख-पहचान सकता है। लक्ष्य की ना जानकारी के कारण ही तो उसकी क्रियायें और व्यवहार भी उसके अनुरूप नहीं हो पाते। वह अनजान की तरह संसार सागर में हाथ-पैर मारता हुआ जीवन बिता देता है ओर उसी में डूब कर रह जाता है। विशाल दृष्टि पाये बिना लक्ष्य नहीं देखा जा सकता और जब तक लक्ष्य का पता न हो, तब तक उसके अनुरूप जीवन पद्धति को नहीं निश्चित किया जा सकता। योंहीं अज्ञान के अंधेरे में भटकते रहना होगा।
जीवन लक्ष्य को देखने, परखने और पाने के लिए पक्षियों की तरह ऊँचा उठना होगा। किन्तु पक्षी तो ऊपर शून्य में उड़ते और भोजन की तलाश करते हैं पर मनुष्य का जीवन लक्ष्य उनकी तरह भोजन की तलाश नहीं है। उसका जीवन लक्ष्य- आत्मा की मुक्ति, अस्तु उसकी उड़ान उसके अनुरूप दिशा में ही होनी आवश्यक है और वह ऊँचाई है परमात्मा। आत्मा को मुक्ति के लिए परमात्मा की ओर उड़ान भरना होगा। क्योंकि उसका लक्ष्य ही अथवा उसका गंतव्य ही वह अनन्त आनन्द, अक्षय शान्ति और शाश्वत तृप्ति रूप वह आत्मा की मुक्ति अथवा भव -बंधन से छुटकारा एक ही स्थिति के अनेक नाम है।
मनुष्य ज्यों-ज्यों परमात्मा की ओर बढ़ता जाता है, त्यों-त्यों उसमें सूक्ष्मदर्शिता, निरहंकार और विवेक का उज्ज्वल आलोक बढ़ता जाता है। जिसके प्रकाश में बह अपना, अपने आस-पास की वस्तुओं और इस संसार का वास्तविक रूप पूरी तरह से देख लेता है। सत्य का अन्वेषण हो जाने पर फिर अज्ञान का अन्धकार नहीं रहने पाता। मनुष्य के सारे भ्रम, सारी भ्रांतियाँ और सारे संशय नष्ट हो जाते हैं। वह संकीर्णता की परिधि से बाहर आकर विशाल एवं निरन्तर प्रसार में बिहार करने लगता है। यही स्थिति तो वह स्थिति है, जिसे मुक्तावस्था कहा जाता है।
अपनी अभीष्ट ऊँचाई की ओर बढ़ने के लिए आस्तिकता का होना तो आवश्यक है ही पर केवल इतने से ही काम चल सकना कठिन होगा। उसके लिए परमात्मा के एक ऐसे स्वरूप का दर्शन भी करना होगा, जो साध्य और ग्रहणीय भी हो। परमात्मा का ग्रहण अनुभूति द्वारा ही सम्भव है और उस अनुभूति का जागरण भी इस संसार के सहारे ही करना होगा, क्योंकि इसके अतिरिक्त हमारे पास अन्य साधन भी क्या हो सकते हैं?
इस संसार साधन में परमात्मा की अनुभूति करने के लिये अपना स्थूल अथवा सामान्य दृष्टिकोण बदल कर दार्शनिक बनाना होगा और अपनी निष्ठा को इतना उदार कि वह एक आध्यात्मिक भाव से सब पर स्थिर की जा सके। संसार का कोई भी भाग अथवा अंश ले लीजिये। सूर्य, चन्द्र, तारा, नक्षत्र, पर्वत, सरिताएँ, सागर, वन, वृक्ष, फूल-पौधे कुछ भी सही- जो कुछ भी देखिये एक गहरी और सूक्ष्म दृष्टि से देखिये और विचार करिये कि जब इन सब वस्तुओं का अस्तित्व है, तब अवश्य ही इनका निर्माता और नियामक भी होगा। यदि ऐसा न होता तो न तो ये वस्तुएँ बन पातीं और न इनका अस्तित्व दृष्टि गोचर होता।
लक्ष्य परायण व्यक्ति का दृष्टिकोण संसार के पदार्थों के प्रति औरों से भिन्न रहता है। जहाँ एक सामान्य व्यक्ति किसी वृक्ष को देखकर केवल इतना सोच पाता है कि यह वृक्ष अमुक जाति का है। इसमें इस प्रकार और इस रस के फल लगते और इस रंग के फूल खिलते हैं और यदि उसका ज्ञान कुछ अधिक हुआ तो यह सोच लेगा कि यह इस ऋतु में फलता-फूलता और इसके फल-फूल का उपयोग करने से अमुक हानि या लाभ होता है। बस इससे अधिक आगे बढ़कर वह नहीं सोच पाता। जबकि लक्ष्य परायण आस्तिक का सोचना इससे भिन्न होता है। वह केवल किसी पदार्थ के ऊपरी रूप तक ही सीमित नहीं रहता। वह यदि वृक्ष के विषय में सोचेगा तो इस प्रकार सोचेगा-
“ यह विशाल वृक्ष एक छोटे से बीज से उत्पन्न हुआ है। उस छोटे से बीज में अवश्य ही कोई ऐसी महान् शक्ति सन्निहित रहती है, जो बीज को वृक्ष रूप में बदल देती है। वह शक्ति क्या हो सकती है? उसका निवास कहाँ हो सकता है। निश्चय ही इतने बड़े ब्रह्माण्ड में चमत्कार करने वाली शक्ति विशाल विस्तृत और महान् है तो वह किसी एक परिधि में सीमित रहकर एक देशीय नहीं हो सकती। निश्चय ही वह व्यापक है, अणु-अणु में परिव्याप्त है, चींटी से लेकर हाथी तक में और जड़ से लेकर चेतन तक में। वह नदी, पहाड़, वृक्ष, आदि सबमें है, मुझमें भी है ओर दूसरों में भी।
कहना न होगा कि लक्ष्य परायण व्यक्ति का यह सूक्ष्म और विशाल दृष्टिकोण उसमें एक विराट् भावना का उदय कर देता है और वह कुछ ही समय में शक्ति के रूप में सूक्ष्म और ब्रह्माण्ड के रूप में विराट परमात्मा की अनुभूति पाने लगता है। ऐसे हर वस्तु और हर पदार्थ के बाह्य और आन्तरिक रूप में उस एक परमात्मा के ही दर्शन होने लगते हैं। उसे संसार से लेकर अपने तक की हर क्रिया में उसकी प्रेरणा और उसी की इच्छा सक्रिय होती दृष्टिगोचर होने लगती है। परमात्मा के इस विराट् रूप के बीच व्यापक चिन्तन करे रहने से मनुष्य स्वयं ही विराट रूप होकर संसार और शरीर की संकीर्णता से मुक्त होकर भव-भावना से छूट जाया करता है। उसको अपना जीवन लक्ष्य मिल जाता है, उसकी आत्मा परमात्मा के तादात्म्य प्राप्त कर लेती है।
अस्तु अपना जीवन लक्ष्य पहचानने के लिए परमात्मा की ओर ऊपर उठिये, परमात्मा की अनुभूति के लिये उसमें विराट् रूप की उपासना करिये, स्वयं विराट् बन कर जीवन की संकीर्ण काल कोठरी से छूटकर मुक्त हो जाइये।
पूना में उन दिनों भयंकर प्लेग फैला था। लोकमान्य तिलक का बड़ा पुत्र प्लेग से पीड़ित हो गया था। पुत्र की दशा चिन्ताजनक होने के बावजूद तिलक ‘केसरी’ के अंग का अधूरा काम पूरा करने के लिए कार्यालय जाने लगे। किसी ने उन्हें टोका-लड़का मौत से जूझ रहा है अगर आप कार्यालय न जायें तो क्या न चलेगा”।
गम्भीर एवं संयत स्वर में तिलक ने उत्तर दिया -” सारा महाराष्ट्र ‘केसरी’ की प्रतीक्षा में बैठा है, तब कार्यालय न जाने से भला कैसे चलेगा?”
प्राणी को संसार में सबसे बड़ा दुःख मृत्यु का है। निकृष्ट स्थिति के जीव कुत्ते, बिल्ली कौवे, सर्प गिलहरी, गधे तक भी मरना नहीं चाहते तो साधन सम्पन्न और अनेक विभूतियों के स्वामी मनुष्य को भला अमरता की इच्छा क्यों न होगी। मृत्यु से बड़ा शत्रु और भयास्पद वस्तु संसार में और दूसरी नहीं इसलिए उससे बचने की इच्छा होना स्वाभाविक ही है।
प्रकारान्तर से प्राचीनकाल से आज तक इस बात के लिए विभिन्न प्रकार के यौगिक और वैज्ञानिक अनुसंधान करके मृत्यु पर विजय पाने के प्रयत्न किये गये हैं, उसमें पूर्ण सफलता भले ही उपलब्ध न हो पाई हो, किन्तु यह निश्चित हो चुका है कि अमरत्व असम्भव नहीं, निकट भविष्य में ही उतना नहीं तो यह सम्भव हो जायेगा कि मनुष्य अपनी आयु बढ़ाकर कई हजार वर्ष कर ले। ऐसा पहले होता था, हमारे यहाँ न्यूनतम आयु की सीमा सौ वर्ष मानी गई है और अधिकतम कोई रेखा नहीं मानी गई। पहले जो यौगिक उपलब्धियाँ की जा सकीं, उसके आधार पर यह भविष्यवाणी की गई थी कि मनुष्य मृत्यु पर विजय पा सकता है। इच्छानुसार अपनी आयु घटा बढ़ा सकता है। आत्मिक चेतना को यथावत रखकर शरीर के स्थूल (जलीय,पार्थिक, अग्नि आकाश और क्षितिजीय) परमाणुओं को बदल कर काया-कल्प शरीर में ही कल्पान्तों तक बना रह सकता है।
योग चूड़ामण्युपनिषद्, त्रिशिख ब्राह्मण उपनिषद् योग कुंडल्युपनिषद् में ऐसे अभ्यासों का वर्णन मिलता है, जिनसे अकाल मृत्यु का भय मिटकर दीर्घायु प्राप्त होती है। इस साधनों के अभ्यास से भारतीय लोग सदैव से मृत्यु ओर दीर्घ जीवन प्राप्त करते रहे हैं। यह अभ्यास उस सामान्य स्वच्छ ओर पवित्र जीवन से अलग हुआ करते थे, जिनका अभ्यास करके भी मनुष्य शतायु तो हो ही सकता है। वह सामान्य नियम शुद्ध और सात्विक आहार, काम-वासना, चिन्ता और उद्विग्नता से रहित जीवन, शुद्ध वायु और मादक वस्तुओं से बचना आदि है। इनसे आयु बढ़ती तो है पर उस सीमा तक नहीं, जिसके आश्चर्यजनक वर्णन योग-ग्रन्थों और पुराणों में मिलते हैं। उन्हें अत्युक्ति माना जाता है और अविश्वास किया जाता है, यदि आज के वैज्ञानिक उन बातों की सम्भावना स्वीकार न करते तो सम्भवतः आज का ड़ड़डड़ समाज भारतीय दर्शन को कोरी गप्प मानकर ही तिलाञ्जलि दे देता।
विज्ञान यह मानता है कि वृद्धावस्था कोई सनातन नियम नहीं तो वह तो एक रोग है और मनुष्य किसी भी रोग से बच सकता है। तात्पर्य यह कि वह वृद्धावस्था को निरन्तर दूर रखकर अमरत्व का सुखोपभोग कर सकता है। कुछ दिन पूर्व स्तालिन की जन्मभूमि जार्जिया के दीर्घजीवियों का वर्णन छपा था। इस छोटे से क्षेत्र में सौ और सौ से अधिक के 2100 व्यक्ति थे। ड़ड़डड़ बामीर बोगली इयाजोब उत्तरपूर्वी काकेशस के एक किसान की मृत्यु 11 अगस्त 1959 को हुई तब उसकी आयु 150 वर्ष थी। उनके सब मिलाकर 23 पुत्र-पुत्रियाँ ओर 150 नाती-नातिनें थी। सबसे बड़ी लड़की की उम्र 120 वर्ष थी।
उसी प्रकार दक्षिण पश्चिमी काकेशस में अबरवजिया प्रदेश में माक्सीर नूर नाम का पर्वतारोह 158 का होकर मरा उसका मित्र खापर नूर 155 वर्ष की आयु में उसकी शव यात्रर में सम्मिलित हुआ। जार्जिया के समीप आसेटिका शहर की टेल्से एवजिये नामक महिला 150 वर्ष और दाधेस्तान पहाड़ियों का सिउबोव पुझाक की आयु 1959 में 156 वर्ष थी, यूक्रेन और लूका दोनों भाइयों की आयु क्रमशः 123 और 120 वर्ष थी, उनकी बहन जीनिया की आयु 114 वर्ष थी।
इस तरह के आश्चर्यजनक समाचार सुनकर प्रसिद्ध जरा विज्ञानी डा० ईवान वेसीलेवीज ने इस प्रान्त का भ्रमण किया और वहाँ के रहन-सहन का विस्तृत अध्ययन करने के बाद यह पता लगाया कि गहरी साँस लेने से शरीर में प्राण शक्ति की मात्रा बढ़ती है, वही दीर्घ और सशक्त जीवन का कारण है। तात्पर्य यह कि दीर्घायु के अनेक साधनों में आक्सीजन का पर्याप्त मात्रा में शरीर में सहयोग देना प्रथम साधन है। उसके लिये गहरी साँस लेना चाहिए।
पर इतने से अमरत्व की सम्भावना की पुष्ट नहीं किया जा सकता था। वैज्ञानिकों ने उसके लिए निरन्तर प्रयत्न जारी रखे और एक दूसरा कारण भी उनकी समझ में आया। हिमालय क्षेत्र में कुछ ऐसे भालू पाये जाते हैं जो ड़ड़डड़ शीत ऋतु सोकर काट देते हैं, उनका शरीर बर्फ में दबा पड़ा रहता है। जब गर्मी आती है, बर्फ पिघल कर हट जाती है और उनके ऊपर धूप पड़ती है तो रक्त संचार की गति फिर से तेज हो जाती है और रीछ उठ बैठता है। इस तरह वह सोया हुआ समय एक तरह से उनकी आयु में जुड़ता रहता है।
वैज्ञानिकों ने उसकी खोज करने के पश्चात् यह पाया कि शरीर को शून्य तापमान से भी यदि अधिक शीत अवस्था में रखा जाता है तो मनुष्य चेतना शून्य हो जाता ड़ड़डड़ पर भीतरी शारीरिक गतिविधियों मन्द गति से चलती रहती हैं, ऐसी अवस्था में यदि उसके किसी हाथ-पाँव के हिस्से को काटा भी जाये तो रक्त की तेज धार निकलने की अपेक्षा 1-1 बूँद कठिनाई से निकलेगी अर्थात् शरीर ड़ड़डड़ सब तन्तु पूर्ण विश्राम कर रहे होंगे ओर उतना विश्राम मिलने से उनके शरीर का जीवन क्षमता यदि बढ़ेगी नहीं तो घटेगी भी नहीं, अर्थात् उस अवस्था का लाभ यह होगा कि मनुष्य की उतनी आयु बढ़ जायेगी। लेकिन इससे भी अमरत्व की साध पूरी नहीं हुई।
अब वैज्ञानिकों ने औषधियों की खोज प्रारम्भ की। ड़ड़डड़ जैसी अनेक दवाओं की खोज की, उनसे बीमारियों पर विजय भी मिली और आयु भी बढ़ी पर औषधिशास्त्रियों ने पाया कि औषधियों में जीवन क्षमता बढ़ाने की क्षमता तो है पर उसकी भी एक सीमा है। दवायें ड़ड़डड़ (मेच्योर्डनेस) को रोक नहीं पातीं, इसलिए शरीर में वृद्धावस्था गतिशील रहती है और भले ही 200 तक खींच लिया जाय पर मृत्यु तो एक दिन आ ही जाती है।
इन तमाम खोजों का निष्कर्ष यह निकला कि वाह्य उपकरणों और साधनों से अमरत्व की कल्पना नितान्त असम्भव है, क्योंकि शरीर के भीतर अपने आप स्वतः सम्पन्न होने वाली हलचलों पर इनके द्वारा नियन्त्रण नहीं प्राप्त किया जा सकता है तो भी इस तरह की शोधों से वैज्ञानिक शरीर विज्ञान की गहराइयों में अवश्य जा पहुँचे। भारतीय मत की पुष्टि के लिए यह महत्त्वपूर्ण अध्याय का श्रीगणेश था।
वैज्ञानिकों ने बड़ी सावधानी देखा कि जब बच्चा पैदा होता है, तब उसके शरीर में लगभग 1400 करोड़ शिराकोष्टक होते हैं। मृत्यु के समय भी शिरा कोष्ठकों की संख्या इतनी ही रहती है पर वे जीर्ण -शीर्ण हो जाते हैं, इससे इस सिद्धान्त की पुष्टि हुई कि यदि शिराकोष्ठकों को सशक्त और बलवान रखा जा सके तो मनुष्य अपनी इच्छानुसार आयु का उपयोग कर सकता है।
शिरा (नर्व्स) कोष्टक (सेल्स) सारे शरीर में फैलता है, वैज्ञानिकों का अनुमान है कि शिरा अवस्था पर नियंत्रण न रहने के कारण कोष्टक अपनी शक्ति स्थिर नहीं रख पाते, उसी के फलस्वरूप कैंसर और दूसरी बीमारियाँ होती है। सामान्य आहार की अवस्था में भी जब कोई रोग नहीं होता, तब भी कोष्ठकों की शक्ति मन्द होती जाती है। आहार की विभिन्न स्थितियों का अध्ययन करने के बाद वैज्ञानिक इस पर पहुँचे कि यदि कोष्ठकों को पूर्ण प्राकृतिक अवस्था में रखना है तो जो यौगिक और तत्त्व प्रकृति में हैं, वही आहार रूप में शरीर में पहुँचने चाहिये।
निष्कर्ष
जब मनुष्य अप्राकृतिक अर्थात् पक्का, भुना, तला, मिर्च-मसाले नमक, चीनी वाला आहार लेता है तो उन यौगिकों में घट-बढ़ होने से कोष्टक अपनी आकृति और क्षमता बदलने लगते हैं, उनमें गन्दगी का अंश बढ़ने से कई रोग हो जाते हैं। वैज्ञानिक लैण्डस्टोमर ने रक्त प्रणाली का विस्तृत अध्ययन करके यह बताया कि एक शरीर का रक्त दूसरे शरीर के रक्त से इसलिये मेल नहीं खाता कि लाल रक्ताणुओं में कुछ तत्त्व ऐसे होते हैं जो सीरस (केमिकल आफ सेल) के कुछ तत्त्वों के प्रतिघाती (उलटी) समानता रखते हैं, उसने ऐसे रक्ताणुओं को ‘एग्ल्यु टिनोजीन्स और सीरम को’ ‘एग्ल्यु टिनिन्स’ कहा और बताया कि इन दोनों के मिलने से शरीर को नुकसान की विकृति दूर करने के प्रत्यन्न में दवाओं का अनुसंधान करते रहे।
जब तक जो अनुसन्धान हो चुके हैं, उनमें सेल्स के प्रोटीन को बदलकर पुनः उसे स्वस्थ कोष्टक में बदल देने पर विजय प्राप्त की जा चुकी है, उससे न केवल रोगों पर पूर्ण विजय की सम्भावना सुनिश्चित हो गई है, वरन् अमरता की आधी मंजिल पार कर ली गई, ऐसा विश्वास विज्ञान के मूर्धन्य क्षेत्र में किया जाने लगा है।
अभी शिरा व्यवस्था के विस्तृत अध्ययन की बात अधूरी है, उसे जान लेने पर क्या मृत्यु पर विजय सम्भव हो जायेगी? इसका सही उत्तर देने की स्थिति में पाश्चात्य विज्ञान अभी नहीं है, चाहें तो वे इस सम्बन्ध में भारतीय योग्य आचार्यों की सहायता ले सकते हैं, उसके बिना पूर्ण सफलता संदिग्ध ही रहेगी।
एक बार भारतीय योग-विद्या के प्रसिद्ध खोजी डा. पाल ब्रंटन ने मनुष्य की अमरता के प्रश्न को लेकर योगी ‘ब्रह्म सुगन्ध’ से विस्तृत चर्चा की। योगी ब्रह्म सुगन्ध ने उन्हें शारीरिक प्रतिक्रियाओं का विस्तृत विज्ञान सम्मत परिचय कराते हुए बताया कि मनुष्य के मस्तिष्क के अन्दर एक क्षुद्र छिद्र (ब्रह्मरंध्र) होता है, इसे हम आत्मा का (शरीर की मूल चेतना) का निवास स्थान मानते हैं। इस छिद्र के चारों ओर एक खोल होता है, जिससे उसकी रक्षा होती है।
रीढ़ के नीचे चिक स्थान के अत्यन्त निकट अदृश्य जीवन प्रवाह बहता है, इस प्रवाह के सतत् क्षय होने से ही मनुष्य बूढ़ा होता है। यदि इस पर नियन्त्रण किया जा सके तो मनुष्य की आयु पर पूर्ण नियंत्रण कर सकता है। यह जीवन प्रवाह शरीर के विभिन्न अंगों में बहता हुआ व्यय होता है। यौगिक क्रियाओं द्वारा उसे रोककर रीढ़ के ऊपरी भागों में चढ़ाया और मस्तिष्क के अन्दर उस छोटे छिद्र में केन्द्रीभूत किया जा सके तो जीवन दीर्घायु और अमरत्व में बदल सकता है।
ब्रंटन श्रद्धावादी नहीं थे, वे भी आज की तरह विशुद्ध विज्ञान की दृष्टि से तथ्यों को परखना चाहते थे इसलिए उन्होंने कहा ऐसी स्थिति में भी यदि शरीर पर नियंत्रण रखा जा सकता है तो क्या आप उसे करके नहीं दिखा सकते। आप अपने रक्त पर अपने अधिकार की क्रिया दिखाये तो मैं मानूं कि आपकी बात सच है।
ब्रह्म सुगन्ध हँसे और अपनी कलाई की घड़ी उतार कर ब्रंटन को दे दी और कहा-” अब आप मेरी कलाई पर हाथ रखकर देखिये।” ब्रंटन के हाथ से उनकी नाड़ी पकड़ी तब वह ठीक चली रही थी। धीरे-धीरे वह मन्द पड़ने लगी, तीन मिनट बाद नाड़ी की गति बिल्कुल बन्द हो गई तो भी योगी पहले की तरह ही जीवित थे। 4-5 मिनट तक इस स्थिति में रहने के बाद फिर धीरे-धीरे नाड़ी में गति आ गई।
इसके बाद ब्रह्म सुगन्ध ने एक विशेष आसन किया और चुपचाप सीधे बैठ गये। थोड़ी देर में हृदय की गति धीमी होते -होते बिलकुल रुक गई। ब्रंटन महाशय आश्चर्य चकित रह गये।
इसके बाद तीसरा प्रयोग उन्होंने ने किया। ब्रंटन का हाथ अपनी नासिका के छिद्रों के पास लगवाया। धीरे-धीरे भीतर की सारी साँस निकाल दी, सारा शरीर पत्थर की तरह कड़ा हो गया। शरीर में से न साँस आ रही थी, न जा रही थी। ब्रंटन यह देखकर आश्चर्यचकित रह गये। इसके बाद ब्रह्म सुगन्ध फिर अपनी सामान्य स्थिति में आ गये। उन्होंने बताया-” यदि मनुष्य अपनी मूल चेतना पर नियंत्रण कर ले तो शरीर की सारी अशक्ति पैदा करने वाली प्रणाली को शुद्ध रखा जा सकता है। उस स्थिति में समाधिस्थ होकर ध्यानावस्था में ही विश्व ब्रह्माण्ड में भ्रमण और अलौकिक दर्शन किया जा सकता है, यदि शरीर को किसी बर्फीले स्थान में सुरक्षित रखा जा सके, हिमालय जैसे शीतल एवं दिव्य तत्त्वों से परिपूर्ण वातावरण में रहा जा सके तो मनुष्य अपनी आयु कई हजार वर्ष तक बनाये रख सकता है। यह सब विज्ञान और योग दोनों के सामंजस्य से हो सकता है। इसमें अब सन्देह नहीं रहा।
साँसारिक भोगों में एक विचित्र आकर्षण होता है। यही कारण है वे मनुष्य को सहज ही अपनी ओर खींच लेते हैं। किन्तु इससे भी अद्भुत बात यह है कि यह जितनी ही अधिक मात्रा में प्राप्त होते जाते हैं, मनुष्य का आकर्षण उतना ही उनकी ओर बढ़ता जाता है और शीघ्र ही वह दिन आ जाता है, जब मनुष्य आकण्ठ डूबकर नष्ट हो जाता है। साँसारिक भोगों की और अशक्त की भाँति विवश होकर खिंचते रहना ठीक नहीं। मनुष्य को अपना स्वामी होना चाहिये, इस प्रकार यंत्रवत प्रवृत्तियों से संकेत पर परिचालित होते रहना चाहिए। संयम मनुष्य की शोभा ही नहीं शक्ति भी है। अपनी इस शक्ति को काम में लाकर, विनाशकारी भोगों के चंगुल से उसे अपनी रक्षा करनी ही चाहिये। मनुष्य जीवन अनुपम उपलब्धि है। इस प्रकार सस्ते रूप में उसका ह्रास कर डालना न उचित है और न कल्याणकारी।
मानव -जीवन का यदि ठीक-ठीक उपयोग किया जाये तो आशातीत उन्नति की जा सकती है। इसके सदुपयोग से ही तो मनुष्य देवकोटि में पहुँच जाता है, आत्म-साक्षात्कार कर लेता और ईश्वर तक को प्राप्त कर लेता है। संयम पूर्वक मानवीय मूल्यों के साथ जीवन-यापन करते रहना ही उसका सदुपयोग है। जो सबके लिए साध्य भी और उचित भी।
किन्तु खेद का विषय है कि आज लोग संयम की महत्ता भूलते जा रहे हैं। यही नहीं कि यह गलती अशिक्षित अथवा अल्पबुद्धि वाले लोग ही करते हो, शिक्षित समाज भी इस गलती का अभ्यस्त बनता जा रहा है। वह संयम के प्रति उदासीन ही हो ऐसा नहीं, वरन् उनकी ऐसी धारणा बन गई है कि संयम अथवा ब्रह्मचर्य जैसे आदर्शों की शिक्षा निरर्थक बात है। इसकी जीवन में कोई विशेषता अथवा उपयोगिता नहीं है। यह सब कहने सुनने की बातें हैं। जीवन में इस व्रत का पालन कर सकना कठिन ही नहीं असम्भव है। खाने-पीने मल-मूत्र त्याग करने की तरह संभोग वृत्ति भी स्वाभाविक है। इस पर हठपूर्वक अंकुश लगाना अप्राकृतिक क्रिया है, इससे लाभ के स्थान पर हानि की ही अधिक सम्भावना रहती है।
कहना न होगा कि यह एक भयानक धारणा है। किसी बुराई को, किन्हीं विवशताओं के वश करते रहने पर भी जब तक वह बुराई ही मानी जाती है, तब तक देर-सबेर उसके सुधार की आशा की जा सकती है। किन्तु जब किसी विकृति अथवा दुर्बलता को स्वाभाविक मान लिया जाता है, तब उसके सुधार की आशा धूमिल हो जाती है, लोग उसे निरंकुश तथा निर्द्वन्द्व होकर करने लगते हैं ओर दुर्बुद्धिता के कारण उसमें उसके कुफल भागी बनते हैं।
यह निर्विवाद सत्य है कि भोगों की अधिकता मनुष्य की शारीरिक, मानसिक और आत्मिक तीनों प्रकार की शक्तियों का ह्रास कर देती है। भोग, जिनमें विष रूपी ही होते हैं। यह रोग युवावस्था में ही अधिक लगता है। यद्यपि उठती आयु में शारीरिक शक्तियों का बाहुल्य होता है, साथ ही कुछ न कुछ जीवन तत्त्व का नव निर्माता होता रहता है, इसलिये उस समय उसका कुप्रभाव शीघ्र दृष्टिगोचर नहीं होता। किन्तु अवस्था का उत्थान रुकते ही इसके कुपरिणाम सामने आने लगते हैं। लोग अकाल में वृद्ध हो जाते हैं। नाना प्रकार की कमजोरियों और व्याधियों के शिकार बन जाते हैं। चालीस तक पहुँचते-पहुँचते सहारा खोजने लगते हैं, इन्द्रियाँ शिथिल हो जाती है और जीवन का भार बन जाता है। शरीर का तत्त्व वीर्य, जोकि मनुष्य की शक्ति और वास्तविक जीवन कहा गया है, अपव्यय हो जाता है। जिससे सारा शरीर एकदम खोखला हो जाता है।
जवानी का उन्माद मनुष्य को भोगों के प्रति मदान्ध बना देता है। जबकि यही वह आयु होती, जिसमें शुद्ध और स्वस्थ वीर्य प्रचुर मात्रा में बनता ओर अंगों को आवश्यक एवं पुष्टि प्रदान करता है। इस आयु का संचय ही, आगे चलकर जब वीर्य का निर्माण बन्द हो जाता है, उसी प्रकार आजीवन काम आता है, जिस प्रकार आय कालिक बचत निवृत्ति स्थिति में सहायक होती है। ठीक है कि युवावस्था ही गृहस्थाश्रम और सृष्टि सम्पादन की आयु होती है, किन्तु उसे भी अधिकाधिक ब्रह्मचर्यपूर्वक ही पालन करने का परामर्श दिया गया है। गृहस्थ भार के समय तो मनुष्य की और भी अतिरिक्त शक्ति की आवश्यकता होती है, अस्तु गृहस्थ के लिए संयम और भी आवश्यक हो जाता है। गृहस्थ पालन अथवा सृष्टि संचालन का अर्थ भोग-जीवन अथवा वीर्य का अपव्यय तो नहीं होता।
भारतीय शिक्षित समाज की यह धारणा कि ब्रह्मचर्य का व्रत अस्वाभाविक अथवा अप्राकृतिक प्रक्रिया है, भारतीय जीवन दर्शन, पद्धति विचारधारा अथवा संस्कृति की भावना के सर्वथा प्रतिकूल है। उनकी यह धारणा निश्चित रूप से पाश्चात्य विचार पद्धति की देन है, जिससे कि आज वे अधिकाधिक प्रभावित भारतीयों को अपनी इस भ्रान्त धारणा पर गहराई से विचार करना चाहिये और उसकी हानियों को खुली दृष्टि से देखना और स्वीकार कर लेना चाहिये।
इस प्रकार अविचारपूर्ण विपरीत प्रवाह में बह जाना उचित नहीं, संयम भारतीयों का वास्तविक धन है, भोगवादी जीवन दर्शन से उसकी कोई संगति नहीं। जहाँ पाश्चात्यों का वास्तविक रूप भौतिकता में मूर्तिमान है, वहाँ भारतीयों का सच्चा स्वरूप आध्यात्मिकता में सन्निहित है। अपना धर्म, अपनी संस्कृति अथवा अपनी सभ्यता छोड़कर दूसरों की नकल करने में कल्याण की सम्भावनायें समाप्त हो जाती है।
मनुष्य का अपना जीवन मौलिक अस्तित्व नष्ट हो जाता है। उसी प्रकार अपना निश्चित पथ छोड़कर दूसरों के रास्ते चल पड़ना भी निरापद नहीं होता। क्योंकि उस पथ पर उसका लक्ष्य स्थित नहीं होता। अपना लक्ष्य से भटक कर इधर-उधर भागे फिरने से जीवन की सारी वाँछित सुख-सुविधायें नष्ट हो जाती है।
फिर, वह बात भी नहीं कि भोगवादी पाश्चात्यों का संयम सम्बन्धी कोई दृष्टिकोण ही न हो। इस संस्कृति में ब्रह्मचर्य जैसा कोई शब्द आवश्यक नहीं है। किन्तु इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि उनमें कोई संयमी होता ही नहीं अथवा संयम के प्रति उनकी कोई आस्था ही नहीं होती है। ईसामसीह जीवन भर ब्रह्मचारी रहे। साथ ही वहाँ भी अच्छे-अच्छे तथा बुद्धिजीवी लोग अधिकतर संयमी जीवन ही बिताने की चेष्टा किया करते हैं। वैज्ञानिक, दार्शनिक, विचारक, सुधारक तथा ऐसी ही उच्च चेतना वाले लोग संयम का ही जीवन जीते दृष्टिगोचर होते हैं। यदि वे लोग पशुओं की तरह असंयमी अथवा अविचारी जीवन में लिप्त रहते रहे तो इस प्रकार की क्राँतिकारी परिवर्तन किस प्रकार प्रस्तुत कर सकते हैं। इस प्रकार की अपरिमेय शक्ति संयमित जीवन के अतिरिक्त भोग प्रधान जीवन में सम्भव ही नहीं। उधर भी खाओ-पियो और ऐश करो को जीवन-दर्शन मानने वाले लोगों को ऊँची दृष्टि से नहीं देखा जाता। ऐसे सर्व-सामान्य लोगों के साथ विचारशील व्यक्तियों की सहमति नहीं रहती। संयमित जीवन में ही जीवन जीवन का सच्चा उत्कर्ष तथा सच्ची शांति सन्निहित हे यह शाश्वत एवं सार्वभौम सिद्धान्त है। इसमें अपवाद की कोई गुँजाइश नहीं है।
गृहस्थ आश्रम में सन्तानोत्पादन का बहाना लेकर भोगपूर्ण जीवन बिताने वाले गृहस्थाश्रम का सही मन्तव्य नहीं समझते। सृष्टि क्रम को स्थिर रखने के लिए दाम्पत्य जीवन की अनिवार्यता स्वीकार अवश्य की गई है तथापि उसमें भी संयम का महत्व कम नहीं किया गया है। धर्म कर्तव्य के रूप में सन्तान सृजन और बात है और कामुकता के वशीभूत होकर दाम्पत्य जीवन को भोग के आचरण को संसार के सभी विद्वान् तथा विवेकशील व्यक्तियों के अनुचित तथा मानव-जीवन को नष्ट करने वाला बतलाया है। वेद भगवान् ने तो यहाँ तक कहा है कि- ‘‘ब्रह्मवर्येण तपसा देवा मृत्युमुपाहनत” ब्रह्मचर्य के प्रभाव से मनुष्य स्वस्थ तथा शक्तिवान ही नहीं बनता वरन मृत्यु तक को जीत सकता है।
ब्रह्मचर्य की महिमा बतलाते हुए छांदोग्योपनिषद् में तो यहाँ तक कहा गया है -” एक तरफ वेदों का उपदेश और दूसरी तरफ ब्रह्मचर्य - यदि दोनों को तौला जाय तो ब्रह्मचर्य का पलड़ा वेदों के उपदेश के पलड़े के बराबर रहता है।”
विषयों का निषेध करते हुये भगवान ने गीता में स्पष्ट कहा है-
“ये हि संर्स्पशजा भोगा दुःखमानयः एव ते। आद्यनतवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः॥”
जो इन्द्रिय तथा विषयों के संयोग से उत्पन्न होने वाले सब सुख हैं, यद्यपि वे विषयी पुरुष को सुख रूप प्रतीत होते हैं, किन्तु, वास्तव में होते वे दुःख के ही हेतु हैं और नाशवान् भी। इसलिए हे कुन्ती पुत्र अर्जुन! बुद्धिमान् व्यक्ति उनमें आसक्त और लिप्त नहीं होते।
न केवल धर्म शास्त्रों में ही, अपितु लौकिक शास्त्रों में भी ब्रह्मचर्य की महिमा का बखान किया गया है। आयुर्वेद सम्बन्धी ग्रन्थ चरक संहिता में कहा गया है-
“सतामुपासनं सम्यगसतां परिवर्जनम्। ब्रह्मचर्योपवासश्च नियमाश्च पृथग्विधा॥
सज्जनों की सेवा, दुर्जनों का त्याग ब्रह्मचर्य, उपवास, धर्मशास्त्र के नियमों का ज्ञान और अभ्यास के नियमों का ज्ञान और अभ्यास आत्म कल्याण का मार्ग है-
यहीं नहीं कि भारतीय मनीषियों ने ही जीवन में ब्रह्मचर्य संयम का गुण गाया हो, विदेशी विचारकों ने भी इसकी कम प्रशंसा नहीं की है- प्रसिद्ध जीवशास्त्री डा. क्राउन एम०डी० ने लिखा-
ब्रह्मचारी यह नहीं जानता कि व्याधि ग्रस्त दिन कैसा होता है। उसकी पाचन शक्ति सदा नियंत्रित रहती है और उसको वृद्धावस्था में भी बाल्यावस्था जैसा आनन्द आता है।”
अमेरिका के प्रसिद्ध प्राकृतिक चिकित्सक डा. बेनीडिक्ट लुस्टा का कथन है-” जितने अंशों तक जो मनुष्य ब्रह्मचर्य की विशेष रूप से रक्षा करता है, उतने अंशों तक वह विशेष महत्व का कार्य कर सकता है।”
सिद्ध सन्त स्वामी रामतीर्थ और योगी अरविन्द ने वीर्य का वैज्ञानिक महत्व प्रकट करते हुए, अपने अनुभव इस प्रकार व्यक्त किये है- जैसे दीपक का तेल बत्ती के द्वारा ऊपर चढ़कर प्रकाश के रूप में परिणित होता है, वैसे ही ब्रह्मचारी के अन्दर का वीर्य सुषुम्ना नाड़ी द्वारा प्राण बनकर ऊपर चढ़ता हुआ ज्ञान दीप्ति में परिणत हो जाता है।” “रेतस (वीर्य) का जो तत्त्व रति करने के समय काम में लगता है, जितेन्द्रिय होने से वह तत्त्व, प्राण, मन और शरीर की शक्तियों को पोषण देने वाले एक महत्व के दूसरे तत्त्व में बदल जाता है। इस प्रकार आर्यों का आदर्श रेतस का ओजस में रूपान्तर होने के फलस्वरूप उसकी ऊर्ध्व गति करने का करने का आदर्श सर्वोच्च है”।
इस प्रकार क्या भारतीय और क्या पाश्चात्य सभी विचारकों और धर्म ग्रन्थों से लेकर लौकिक शास्त्रों तक में ब्रह्मचर्य व्रत, वीर्य रक्षा को लौकिक और पारलौकिक सभी उच्चताओं के लिए महत्त्वपूर्ण बतलाया गया है। संसार में आरोग्यप्रद दीर्घजीवन जीना एक प्रशंसनीय उपलब्धि है। और कदाचित ही कोई ऐसा व्यक्ति हो जा इसकी कामना न करता हो। इस उपलब्धि का आधार शास्त्रों तथा मनीषियों ने आहार, श्रम तथा संयम ही बतलाया है। आहार द्वारा प्राणियों की देह का निर्माण तथा पोषण होता है। श्रम के बिना न तो भोजन की प्राप्ति होती है और न वह पचाकर आत्मसात् ही किया जा सकता है। किन्तु शक्ति के अभाव में न तो श्रम किया जा सकता है और न भोजन की उपलब्धि अथवा पाचन। इसलिये इनमें भी इन्द्रिय संयम ही सबसे महत्त्वपूर्ण आधार है।
ब्रह्मचर्य का पालन किये बिना न तो स्वस्थ रहा जा सकता है और न काई महत्त्वपूर्ण कार्य। इसलिये जीवन की सार्थकता के लिए इस व्रत का पालन किया जाना चाहिये। आलस्य, प्रमाद, शृंगार-प्रियता अप्राकृतिक जीवन, कामुक-चिन्तन तथा वासनापूर्ण वार्तालाप आदि ब्रह्मचर्य में बाधक होते हैं। सदाचार एवं आहार स्वाध्याय, सत्संग, श्रम, ईश्वर -चिन्तन तथा दृढ़ संकल्प आदि के साधन अभ्यास करते रहने से कठिन कहा जाने वाला ब्रह्मचर्य का व्रत सरल तथा सुखदायक बन जाता है। जीवन की सफलता तथा स्वास्थ्य के लिए ब्रह्मचारी होकर रहना ही श्रेयस्कर तथा कल्याणकारी है।
हम जिस सौर मण्डल में निवास करते हैं, वह -स्पाइरल’ नामक आकाशगंगा से प्रकाश पाता है। उसे एक निहारिका कहते हैं और उसमें कई करोड़ तारे है। सूर्य उन करोड़ों तारों में से एक बहुत ही सामान्य तारा हैं। विशाल ब्रह्माण्ड में अकेले निहारिकाओं की संख्या अरबों की संख्या में है। वैज्ञानिक कहते हैं अपना सौर मण्डल ब्रह्माण्ड की कोई अनोखी घटना नहीं है। अनन्त ब्रह्माण्ड की तुलना में वह पृथ्वी की तुलना में चींटी के हजारवें अंश से भी छोटा है। इतने बड़े विशाल ब्रह्माण्ड का संचालन कितनी विधि व्यवस्था से चल रहा है, उस पर थोड़ा चिन्तन करें तो ऐसा स्वयं ही जान पड़ता कि कोई महामना शक्ति ही उसका संचालन कर रही है। उसका यह चमत्कार शक्ति ही अद्भुत है, मनुष्य तो इस सृष्टि की तुलना में कुछ भी नहीं के बराबर है।
रामायण कहती है-
गिरा अरथ, जल बीचि सम कहियत भिन्न न भिन्न। बन्दउँ सीता राम पद जिनहिं परम प्रिय खिन्न।
वह परम पिता परमात्मा सृष्टि के कण-कण में कुछ इस प्रकार समा गया है कि वह प्रकृति से कोई विलग सत्ता नहीं समझ पड़ती पर उस नियामक ने अपने आपको स्वतन्त्र भी रखा हैं, जिससे वह सृष्टि के किसी भी क्षेत्र में दुःखी आत्माओं की रक्षा के लिये इच्छानुसार प्रकट होता रहता है। ऐसे चमत्कारों का भी अभी 20 वीं शताब्दी में अभाव हुआ, भले ही अब नृसिंह भगवान् के खम्भे से प्रकट होना ड़ड़ड़ड़ के विष को मधुर रस में बदल देना, प्रह्लाद को अग्नि में से जीवित निकाल लेना, लोगों को अनहोनी बात लगती है। उस सर्वशक्तिमान् सत्ता की महत्ता इस युग में भी प्रगट हुये बिना रहती नहीं।
29 अगस्त 1953 को अभी बहुत दिन नहीं हुये, जबकि सराक्यूज अमेरिका में एक पत्थर की मूर्ति (प्लास्टर आफ पेरिस) की आँखों से आँसू निकल पड़े और कई दिन तक आँसुओं का प्रवाह रुका नहीं। वैज्ञानिक आधार पर इन आँसुओं का विश्लेषण किया गया तो यह पाया गया कि मूर्ति की आँखों से स्रवित आँसुओं और मनुष्य के आँसुओं में कोई अन्तर नहीं है, इस घटना का आँखों देखा सत्य विवरण और उसके अद्भुत प्रभावों का प्रमाण सहित वर्णन डच विद्वान् फादर ए॰ सोमर्स एम॰ एम॰ एम॰ ने अच्छी प्रकार स्वयं मूर्ति का परीक्षण करके लिखा। फादर एच जोंगेन ने उसका अनुवाद कर विश्व के शेष भागों तक पहुँचाया पर इस घटना से एक बार सारे अमेरिका में हलचल मच गई। सैकड़ों आदमियों ने मूर्ति के आँसुओं का परीक्षण किया। हजारों ने उसके दर्शन किये लाखों नास्तिकों को भी अपना विश्वास परिवर्तित करने को विवश होना पड़ा।
घटना का पूर्वारम्भ 21 मार्च 1953 को हुआ। उस दिन सराक्यूज में कुमारी एण्टोनियेटा और श्री एंग्लोजेन्यूसो का पाणिग्रहण संस्कार था। उस पुण्य तिथि पर मित्रों, अभ्यागतों ने अनेक उपहार दिये। उन सामग्रियों में जो एण्टोनियेटा को उपहार में मिली, मीरा के गिरधर गोपाल की मूर्ति की तरह, एक छोटी सी प्रतिमा भी थी जिसे जेन्यूसो के भाई और भाभी ने भेंट दी थी। 2 इंच की यह छोटी सी मूर्ति प्लास्टर की बनी हुई थी। एण्टोनियेटा को वह मूर्ति बड़ी प्यारी लगी। भावना ही तो है, जिस वस्तु पर आरोपित हो जाती है, खराब से खराब मिट्टी की वस्तु भी हीरे जैसी बन जाती है। भावनाओं की शक्ति का कोई वारापार नहीं। भावनायें ही खींचकर लाती थीं और निर्जन एकान्त में मीरा का भगवान साकार रूप में उनके साथ नृत्य करने लगता था। एन्टोनियेटा की भावनाओं के कारण वह मूर्ति साधारण प्रतिमा न होकर उसकी इष्टदेव (मेडेना) बन गई। उसने उसे पलंग के सिरहाने लगा लिया। जिस तरह बालक कभी कष्ट या पीड़ा में माँ को भावनाओं का बल देखकर पुकारता है और माँ हजार काम छोड़कर भागी हुई चली आती है। उसी प्रकार एण्टोनियेटा जब भी कभी दुःखी होती, अपनी साथिन मूर्ति से भावनात्मक वार्तालाप करती उससे उसे बड़ा सन्तोष मिलता।
धीरे-धीरे एण्टोनियेटा गर्भवती हुई। गर्भ जैसे-जैसे बढ़ता गया वैसे-वैसे एण्टोनियेटा का शारीरिक कष्ट न जाने क्यों बढ़ने लगा। वह सूख कर काँटा हो गई, आँख धँस गई और एक दिन दिखाई देना भी बंद हो गया। जुबान ने बोलने से भी इनकार कर दिया। मिरगी के से दौरे आते और वह एण्टोनियेटा मृत्यु तुल्य हो जाती।
डाक्टरी जाँच की गई। डाक्टरों ने बताया भ्रूण में जहर फैल गया है, उसके फलस्वरूप ही शरीर में जहर बढ़ रहा है। डाक्टर कोई निदान न ढूँढ़ पा रहे थे। एण्टोनियेटा पीड़ित दशा में अपलक उसी मैडेना की मूर्ति को निहारें जा रही थी, मानों उसे कोई शिकायत हो- हे प्रभु! यदि तेरी सृष्टि मंगलमय है, तूने प्यार से मनुष्य को बनाया है तो क्या तेरे लिये यह उचित है कि अपने ही बन्दों को इतना कष्ट दे?
कहते हैं परमात्मा बड़ा न्यायकारी है, अपने न्याय के के लिये वह जीवात्मा को बार-बार तपाता, कष्ट देता है और विभिन्न योनियों में पहुँचाते हुए भी वह जरा भी विचलित नहीं होता, किन्तु उसके हृदय की करुणा भी उस सिन्धु के समान है, जिसका जल प्रलय हो जाने पर भी समाप्त नहीं होता। ऐसा लगता है भगवान प्रारब्ध कर्मों को भोगने में कुछ भी हस्तक्षेप न करने को विवश थे पर उनकी अनन्त करुणा उस दिन रुक न सकी और वह पत्थर की आँखें फोड़कर निकल ही पड़ी।
29 अगस्त 1953 को तीव्र दौरा आया तब एण्टोनियेटा का कष्ट असहाय हो उठा। 7 बजे जेन्यूसो को अपनी ड्यूटी पर विवश होकर जाना पड़ा पलंग पर पड़ी एण्टोनियेटा अकेले तड़पकर उसी मूर्ति से अपनी भावना भरी वही प्रश्न मूलक दृष्टि डाले थी, उसी क्षण मूर्ति की आँखों से आँसू ढुलके, एण्टोनियेटा को विश्वास नहीं हुआ- क्या यह सचमुच आँसू हैं या कोई स्वप्न देख रही है। कोई स्वप्नावस्था में नहीं देख रही वरन् सचमुच ही मूर्ति की आँखों से आँसू ढुलक रहे थे।
कई दिन बाद आज पहली चीख सुनी गई। एण्टोनियेटा चिल्लाई-मेडेना रो रही है। तब पड़ोस की दो और स्त्रियाँ आई और उनने भी सचमुच मेडेना को रोते हुए पाया। दोनों महिलाओं ने मूर्ति के सामने घुटने टेक कर प्रार्थना की और फिर बाहर निकल गई। देखते-देखते सारे मुहल्ले में खबर दौड़ गई। जिसने सुना वही भागा, मूर्ति उपहार में देने वाली जेन्यूसो की भाभी ने भी आकर देखा, तब तक मूर्ति के इतने आँसू निकल चुके थे, जिससे सिरहाने का बिस्तर काफी भीग चुका था।
प्रारम्भ में लड़कियाँ और स्त्रियाँ ही यह दृश्य देखने दौड़ी। कुछ लड़के भी आये, पड़ोस में एक सिपाही की धर्मपत्नी ने यह दृश्य देखा और अपने पति को बताया कि वाया डेगली ओरटी में एण्टोनियेटा की मेडेना की आँखों में आँसू भर रहे हैं। सिपाही ने जाकर सारी घटना पुलिस को सुनाई, इस बीच घर स्त्रियों से भर गया था। कई स्त्रियाँ प्रार्थनाएँ कर रही थी और मूर्ति थी कि उसकी आँखों से बरसने वाले अश्रु-कण कम न होते थे।
उसी दिन दोपहर को डा. मारियो मेसीना, जो वाइआ कारसो में रहते थे, स्वयं घटना का निरीक्षण करने पहुँचे। उन्होंने जाकर मूर्ति को उठा लिया। दीवार जहाँ वह टंगी थी, उसे अच्छी तरह देखा कहीं कुछ भी गीला या पानी की बूँदें वहाँ नहीं थी, उसे भी हटाकर साफ कर दिया। अच्छी तरह झाड़-पोंछ कर मूर्ति को पुनः रखा गया तो आँसुओं का वही प्रवाह अविरल गति से पुनः वह निकला।
डा. मारिओ उस समय भावातिरेक से चिल्ला उठे मेडेना सचमुच रो रही है। उन्होंने बाहर आकर सैकड़ों लोगों को बताया-” यह एक अलौकिक प्रसंग है, जबकि न तो आँखें धोखा दे रही हैं और न बुद्धि साथ। विज्ञान उसका कोई उत्तर नहीं दे सकता है, हम इसकी कल्पना भी नहीं कर सकते। यही कह सकते है कि भगवान की माया सचमुच विलक्षण है।”
अब तक जेन्यूसो भी घर आ गया था, मूर्ति के रुदन को देखकर अपनी पत्नी के प्रति दर्द की सहानुभूति कुछ ऐसी उमड़ी कि वह भी दहाड़ मार कर रो पड़ा। उस दिन सैकड़ों, हजारों आँखें मूर्ति के साथ रोई और भगवान की प्रतिभा मानों इसलिये और रोये जा रही थी कि मुझ पर विश्वास करने से अच्छा होता, आप लोग संसार के दुःख और दुःखों के कारण ढूँढ़ते और उन्हें मिटाते।
अब तक पुलिस स्टेशन में भी इस घटना पर क्रम से विचार हो चुका था। उच्च-पदाधिकारियों की मीटिंग में यह निश्चित किया गया कि लगता है यह बहुत सुनियोजित प्रपंच है, इसलिये मूर्ति को यहीं थाने लाया जाये और उसका डाक्टरी और वैज्ञानिक परीक्षण भी यहीं किया जाये।
रात 10 बजे पुलिस जेन्यूसो के मकान पर पहुँची। जेन्यूसी सहित उसने मूर्ति को अपने अधिकार में ले लिया और थाने के लिये चल पड़ी। रास्ते में मूर्ति के आँसुओं का प्रवाह इतना बढ़ा कि सिपाही जिसके हाथ में मूर्ति थी उसकी सारी वर्दी ही भीग गई। थाने पर मूर्ति का पक्का निरीक्षण किया गया। जहाँ से भी सम्भव था खोलकर उसे देखा और साफ किया पर आँखों से मनुष्य जैसे आँसू कहाँ से आ रहे हैं, इस बात का कोई अन्तिम निर्णय न निकल सका। पुलिस अधिकारियों की भी आँखें गीली हो चलीं, उन्होंने भी प्रार्थनाएँ की और मूर्ति जहाँ लगी थी सादर वहीं पहुँचा दिया। “यह ऐसी विलक्षण घटना है, जिसका कोई उत्तर पुलिस के पास नहीं है।” ऐसा कहकर पुलिस ने जेन्यूमो को भी मुक्त कर दिया।
30 अगस्त को सारे प्रान्त में यह खबर तेजी से फैल गई। लोग अखबारों और पत्रकारों से पूँछ-ताछ करने लगे ‘ला सिसीलिया’ दैनिक पत्र के सम्पादक ने भी इस घटना का विस्तृत निरीक्षण किया और अपने रविवारसीय अंग में बड़े विश्वास के साथ लिखा-हम स्वयं मेडेना के बहते आँसू देख चुके हैं। सायरेक्यूस स्टेशन आगन्तुक दर्शनार्थियों के लिये छोटा पड़ रहा है। इस घटना ने सर्वत्र तहलका मचा दिया है, लगता है परमात्मा अपने विश्वास को प्रकट करने के लिए स्वयं ही आँसुओं को अभिव्यक्त कर रहा है। यह वह क्षण है, जब हम सब विचारशील लोग यह सोचने को विवश होते हैं कि सचमुच विज्ञान से भी बड़ी कोई ताकत संसार में है जो दिखाई न देने पर भी मानवीय शक्ति से प्रबल है। तब उसके हस्तक्षेप से परे कुछ भी न होना चाहिये।”
इसी प्रकार का एक बयान मिस्टर मासूमेकी ने भी प्रकाशित कराया बाद में उन्हें इस मूर्ति के दर्शनार्थ आने वाले यात्रियों की सुविधा और सुरक्षा के लिये जो एक कमेटी बनाई गई, वह उसके अध्यक्ष भी नियुक्त किये गये। इस तरह सैकड़ों प्रामाणिक व्यक्तियों ने रोती हुई मूर्ति का आँखों देखा हाल छापा। इसी दिन ‘ला सिसीलिया डेल लुनेडी’ अख़बार के एक रिपोर्टर ने अख़बार को टेलीफोन में बताया कि-मेडेना के आँसू बन्द नहीं हो रहे। यह एक महान् आश्चर्य है जिसके रहस्य का पता लगाया ही जाना चाहिये। यदि यह सच है कि मूर्ति के आँसुओं का कोई वैज्ञानिक कारण नहीं है तो हमें उस सत्ता की खोज के लिये भी प्रयत्न करना चाहिये, जो पदार्थ विज्ञान को भी नियन्त्रण में रख सकती हैं, उस पर स्वतन्त्र आधिपत्य स्थिर कर सकती है।” इसी तरह के अनेक सुझाव और परामर्श भिन्न-भिन्न पेशों के अनेक लोगों ने व्यक्त किये। इधर मूर्ति के दर्शनों के लिये हजारों लोग खिंचे चले आ रहे थे।
मूर्ति-रुदन के चौथे और अन्तिम दिन ‘ला सिसीलिया’ के इस कथन-मेडेना के दर्शनार्थियों की भीड़ जिस तेजी से बढ़ रही है, यह रहस्य उतना ही उलझता जा रहा है। यह निर्विवाद है कि वहाँ कोई मनगढ़न्त कहानी हिप्नोटिज्म अथवा जादूगरी की कोई सम्भावना नहीं है तो फिर आँसुओं के बहने का वैज्ञानिक कारण क्या है, उसका पता लगाया ही जाना चाहिये-पर सरकारी तौर पर तीव्र प्रतिक्रिया अभिव्यक्त की गई।
उसी दिन 10 पुरोहितों (प्रीस्ट्स) के एक दल (डेलीगेशन) ने भी यह घटना देखी। फादर र्वेसेन्जों ने रोती हुई प्रतिमा के कैमरा फोटो लिये। बाद में और भी बहुत से लोगों ने फोटो लिये। बाद में और भी बहुत से लोगों ने फोटो लिये। उसी दिन इटालियन क्रिश्चियन लेबर यूनियन के अध्यक्ष प्रो० पावली अलबानी ने भी यह घटना अपनी आँखों से देखी। उसी दिन पुलिस अधिकारियों ने सारी घटना की दुबारा ब्योरेवार जाँच की पर फिर भी उन्होंने यही पाया कि यह आँसू किसी कृत्रिम उपकरण की देन नहीं, वास्तविक मूर्ति के ही आँसू हैं। आँखों के अतिरिक्त मूर्ति का कोई अंग गीला नहीं मिला। उसी दिन सरकारी तौर पर एक न्यायाधिकरण (ट्रिब्यूनल) का संगठन किया गया। उसमें पुलिस के अधिकारी, विशेषज्ञ और वैज्ञानिक भी थे और उनसे घटना का निश्चित उत्तर देने को पूछा गया।
1 सितम्बर 1953 का दिन था। फादर ब्रूनो, जाँच विशेषज्ञ और पुलिस अधिकारी उस मकान में पहुँचे, जहाँ वह आँसू बहाने वाली प्रतिमा रखी थी। बड़ी मुश्किल से पुलिस की सहायता से सब लोग मूर्ति तक पहुँच सके। भीड़ का कोई आदि था न अन्त। जिन चार व्यक्तियों की देख-रेख में परीक्षण प्रारम्भ हुआ वह-(1) जोसेफ ब्रूनो पी. पी. (2) डा. माइकेल केसैला डायरेक्टर आफ माइक्राग्रेफिक डिपार्टमेन्ट, (3) डा. फ्रैंक कोटजिया असि. डायरेक्टर, (4) डा. लूड डी. उर्सो थे। इनके अतिरिक्त निस सैम्परिसी, चिफ कांस्टेबल प्रो. जी० पास्क्विलीनो डी० फ्लोरिडा, डा. ब्रिटनी (कैमिस्ट) फैरिगो उम्बर्टो (स्टेट पुलिस के ब्रिगेडियर) तथा प्रेसीडेन्ट आफिस के प्रथम लेफ्टिनेन्ट कारमेलो रमार्नो भी थे।
जब चारों वैज्ञानिक और विशेषज्ञों ने आवश्यक जाँच के कागज तैयार कर लिये, तब उन्होंने मूर्ति देने के लिये एण्टोनियेटा से प्रार्थना की। मूर्ति अलमारी में एक कागज में लिपटी हुई बन्द थी। एण्टोनियेटा के शारीरिक लक्षण तेजी से बदल रहे थे। डाक्टर का उपचार भी काम कर रहा था, अब तक उसकी आँखों में प्रकाश भी आ चुका था और जुबान का लड़खड़ाना भी बन्द हो चुका था। डाक्टर उसे भगवान् की कृपा ही मान रहे थे, क्योंकि चार दिन पूर्व तक उस पर किसी दवा का प्रभाव नहीं हो रहा था।
उसने मूर्ति का द्वार खोल दिया। उक्त विशेषज्ञों ने दाई और बाई दोनों आँखों से पिपेट की सहायता से एक-एक सी०सी० आँसू इकट्ठा किये। उन्होंने सब तरफ से परीक्षण किया पर आँसू कहाँ से आ रहे हैं, यह कुछ न जान सके पर अब इधर एण्टोनियेटा भी चंगी हो चुकी थी और आँसुओं की भी वह अन्तिम किश्त थी जिसे जाँच कमेटी एकत्रित कर सकी थी, बस तभी अचानक मूर्ति की आँखों से आँसू आने बन्द हो गये।
अगले दिन आँसुओं का विश्लेषण (एनालिसिस) किया गया। प्रो. ला रोजा ने लिखा-
श्री पूज्य एम॰ डी० कास्ट्रो,
प्रीस्ट आफ सेन्टिगो डी० सुडाड निकाल स्पेन,
आपकी प्रार्थना पर वह सब कुछ लिख रहा हूँ- कमीशन ने आँसू इकट्ठे किये हैं, मूर्ति दो पेंचों के द्वारा जुड़ी हुई थी। मूर्ति का प्लास्टर बिल्कुल सूखा हुआ था, आँसुओं का निरीक्षण आर्कविशप क्यूरियो द्वारा नियुक्त कमीशन ने किया है माइक्रो किरणों से देखने पर इन आँसुओं में वह सभी तत्त्व पाये गये हैं, जो तीन वर्ष के बच्चे के आँसुओं में होते हैं, यहाँ तक कि क्लोरेटियम के पानी का घोल, प्रोटीन व क्वाटरनरी साफ झलक दे रहा था। मेरी पूर्ण जानकारी में मेरे हस्ताक्षर साक्षी हैं-
हस्ताक्षर, प्रो० एल॰ रोजा,
बाद में मूर्ति बनाने वाला कारीगर भी आया, उसने अपने हाथ से बनाई हुई ऐसी अनेक मूर्तियों के बारे में बताया, जो बाज़ार में बिकी पर उनमें से किसी के हाथ भी ऐसी कोई घटना नहीं हुई।
अन्ततः वैज्ञानिक हैरान ही रहे कि जब तक एंटोनियेटा को अत्यधिक पीड़ा रही, मूर्ति क्यों रोती रही और डाक्टरी सहायता के बावजूद भी जो अच्छी न हुई थी वह कैसे अच्छी हुई और उस असहाय का कष्ट दूर होते ही मूर्ति के आँसू क्यों बन्द हो गये, इसका कोई निश्चित निष्कर्ष वे न निकाल सके पर उन्होंने यह अवश्य स्वीकार किया कि इस विज्ञान से भी बढ़कर कोई भावनाओं का विज्ञान अवश्य है, जिसका मनुष्य जीवन से सीधा और गहरा सम्बन्ध हैं, जब तक मनुष्य उस पर विश्वास नहीं करता, उसे जानता नहीं, तब तक उसकी मूल समस्यायें हल नहीं हो सकतीं।
शरीर धारी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उसे सुख और दुःख दोनों को भीगने के लिये मिलता है। जीव ने पूर्व जन्म में जिस प्रकार के कर्म किये होते हैं, उसी के अनुसार उसे शरीर मिलता है और उसी के अनुसार सुख-दुःख देने वाली परिस्थितियाँ। शरीर पूर्व प्रारम्भ पूरा करने का एक संयोग है। इसलिये मनुष्य को चाहिये कि वह सुख-दुःख की परिस्थितियों में समभाव बनाये रखे।
इस बोध के पाते ही कि हम शरीर धारी हैं, मनुष्य को निश्चय कर लेना चाहिये कि उसे सुख-दुःख दोनों का भोग कना है और अपने इस बोध-जन्म निश्चय के अनुसार हर समय उद्यत भी रहना चाहिये। जब शरीर धारण किया है तो दुःख-सुख दोनों का ही भोग करना होगा। शरीरधारियों में से किसी के लिये भी केवल सुख अथवा दुःख भोगने का कोई विधान नहीं हैं। इस अटल नियम के होते हुए भी और जानते हुए भी यदि मनुष्य दुःख के अवसरों पर अधिक व्याकुल अथवा उद्विग्न हो उठता है तो इसे उसका दुर्भाग्य ही कहा जायेगा। दुःख और सुख शरीर के साथ लगी रहने वाली दो छायायें हैं। उन्हें अपने पास से दूर नहीं किया जा सकता। ऐसी दशा में उत्तम यही है कि सुख और दुःख दोनों योगों में तटस्थ रहकर अपना यथायोग्य कर्तव्य करते रहा जाय। जो इस धर्म के अनुयायी रहकर संसार में बर्तते हैं, वे प्रायः सुखी ही रहते हैं।
इस दार्शनिक विवेचन से हट कर यदि व्यवहार क्षेत्र में भी जाकर विचार किया जाये तो पता चलेगा कि दुःख, कष्ट अथवा आपत्ति के समय व्याकुल होना अथवा धीरज खो देना व्यर्थ है। रोने, चिल्लाने अथवा व्याकुल होने से आज तक किसका दुःख दूर हुआ है? अधैर्य दुःख-कष्ट का उपचार नहीं बल्कि उसका बढ़ाने वाला सिद्ध होता है। एक तो दुःख का कारण स्वयं ही उपस्थित है उस पर यदि धैर्य, साहस, आशा, सहनशीलता और सक्रियता को छोड़कर व्याकुलता, व्यग्रता और कातरता का आश्रय लिया जाय तो परिस्थिति और भी गम्भीर हो जायेगी।
काली रात में घटा घिर जाने के समान अंधकार और भी सघन तथा गम्भीर हो जायेगा। इसके विपरीत धैर्य और साहस को बनाये रहने से बुद्धि और विवेक का द्वीप जलता रहता है। जिसके प्रकाश में उपाय और उपचार दृष्टिगोचर होते रहते हैं। यही कारण है जो किसी आपत्ति के समय कोई अधैर्यवान् तो बुरी तरह हानि की चपेट में आ जाता है और धैर्यवान् आपत्ति का आक्रमण विफल कर साफ निकल जाता है। जहाँ अधैर्यवान् आपत्ति को अपना बहुत कुछ दे देता है, वहाँ वीर, गम्भीर पुरुष कुछ देना तो दूर उल्टे उससे न जाने कितने अनुभव लूट ले जाता है।
यदि दुःख, संकट और आपत्ति के संयोग की प्रतिक्रिया अधैर्य ही होती तो संसार में सबको ही उस स्थिति में घबराना और व्याकुल होना चाहिये। किन्तु ऐसा होता कदापि नहीं। जहाँ बहुत से लोग दुःख का कारण आने पर बुरी तरह व्याकुल और उद्विग्न हो उठते हैं, वहाँ बहुत से लोग अपने समभाव में स्थित रहते हैं। उनकी शांति और संतुलन अक्षुण्ण बना रहता है। इस अन्तर का कारण और कुछ नहीं, केवल यह होता है कि एक का हृदय तो निर्बल होता है और दूसरा नहीं। एक विनाश का विश्वासी होने से सोचता है कि अब मैं नष्ट हो जाऊँगा, मेरा सब कुछ बरबाद हो जायेगा। यह संकट अथवा विपत्ति हमें मिटा देगी। कैसे क्या करें जो इस भयंकर परिस्थिति से बचें।
दूसरा जीवन और सृजन में विश्वास रखने वाला होने से सोचता है कि आपत्तियाँ अस्थायी होती हैं, दुःख अधिक होते हैं। परमात्मा को अंश होने से मनुष्य आनन्द स्वरूप हैं। दुःख अथवा संकट के कारण मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकते। मैं एक जीवन्त पुरुष हूँ, मुझे प्रभु ने बुद्धि और विवेक दिया है, धैर्य और साहस दिया है, मैं उसके बल पर मुझे परास्त करने का संकट अथवा आपत्ति के इरादे को चूर-चूर कर दूँगा। अपनी इन्हीं मनो-नीतियों के अनुसार निषेध अथवा संबल पाकर एक दुःख में डूब जाता है और दूसरा उससे पार उतर जाता है।
संसार में संकट और आपत्ति सभी पर आती हैं। इससे कोई भी नहीं बचता। संसार में जिसे भी देखिये सुख-दुःख से द्वन्द्व करता हुआ यात्रा पर बढ़ा चला जा रहा है। तब हम ही क्यों दुःख का रोना लेकर बैठे रहें। सुख-दुःख मय इस संसार में सामान्य पुरुष तो क्या बड़े-बड़े सम्राटों, श्रीमन्तों और महान् पुरुषों को भी संकटों का सामना करना पड़ा है। शिवि, हरिश्चन्द्र, मोरध्वज, नल, पाण्डव, प्रभृति न जाने कितने इतिहास पुरुषों को अपार संकट उठाने पड़े। हजारों साल बाद आज भी जो उनका नाम अमर है, इसका कारण यही है कि उन लोगों ने सारे संकटों को सहर्ष, स्वीकार किया, अपने धैर्य और विवेक की परीक्षा दी, पूरी तरह उत्तीर्ण हुए और समय की शिला पर अपना नाम खोद कर अमर हो गये। ऐसे धैर्यवान् पुरुष सिंह ही वास्तविक सुख, यश, कीर्ति और पूजा-प्रतिष्ठा के अधिकारी होते हैं, और ऐसे पुरुष ही संसार पथ पर अपने उन आदर्श पद-चिह्नों को छोड़कर जाते हैं, जिनका अनुसरण कर लाखों लोग भवसागर से पार हो जाते हैं।
अपने ऊपर आपत्ति व संकट को आया देखकर धैर्य खोना कायरता है। जब संसार के कोई दूसरे लोग दुःख में धैर्य रख सकते हैं, हँसते-खेलते हुए आपत्तियों को पार कर सकते हैं तो हम ही क्यों उन्हें देखकर रोने-चिल्लाने लगें। जबकि परमपिता परमात्मा ने हमें भी साहस, आशा और धैर्य के साथ बुद्धि एवं विवेक का सम्बल उनकी तरह दे रखा है। अन्तर केवल यह है कि जहाँ संसार के सिंह पुरुष अन्धकार आते ही अपने गुणों के प्रदीप प्रज्वलित कर लेते हैं, वहाँ कायर पुरुष घबरा कर उनको प्रदीप्त करना ही भूल जाते हैं।
शरीरधारियों के लिये सुख-दुःख को भोग अनिवार्य है। यह रोकर भोगा जाये अथवा हँसकर जब यह भोग भोगना ही है तो बुद्धिमानी इसी बात में है कि हर परिस्थिति को हँसी-खुशी से भोगा जाये। हँस-हँसकर भोगने वाले धीर पुरुषों के लिये दुःख एक शोभा बन जाता है। लोग उन्हें प्रतिकूलता में अविचलित देखकर उनकी सराहना करते हैं। उनके ज्ञान तथा विश्वास में निष्ठा लाते हैं। अपने जीवन में उनके उस चरित्र को आदर्श के समान अंगीकार करते हैं। अपने दुःख में अविचलित रहने वाला श्रेष्ठ पुरुष दूसरों का दुःख भी कम कर देता है। यदि हँस-हँसकर अपने दुःख को साहसपूर्वक भोगने वाला उसे अपनी शोभा बना लेता है तो रोने-चिल्लाने वाला कापुरुष उससे अपनी कुरूपता बढ़ा लेता है। किसी अभाव अथवा व्याधि से घिरा धीर-पुरुष अपना और अपने भगवान् का भरोसा लिए उन काली घड़ियों को स्थिर भाव से काटता है तो काई कापुरुष बुरी तरह रोता-चिल्लाता और निराश होकर दूसरों से सहायता के लिये रिरियाते, अपने भाग्य और भगवान् को कोसता है, गाली देता है। इन दोनों की तस्वीर देखने से स्पष्ट विदित हो जाता है कि उनमें से एक मनोधनी है और दूसरा दरिद्री। दुःख में स्थिर और गम्भीर रहने वालों के प्रति जहाँ लोगों की श्रद्धा जाग उठती है, वहाँ रोने-चिल्लाने और प्रलाप करने वालों के प्रति सहानुभूति की अपेक्षा दयनीय भाव ही उत्पन्न होता है।
बहुत बार तो अतिशयता होने पर घृणा तक होने लगती है। इस प्रकार दूसरों का घृणापात्र होकर रहना मनुष्य जैसे प्राणी को जरा भी शोभा नहीं देता। उसकी शोभा तो इसी में है कि प्रतिकूल परिस्थितियों के अवसर पर शांत, धीर और गम्भीर रहकर उसको बदलने का प्रयत्न किया जाये। रोने-चिल्लाने अथवा कलपते रहने से दुःख का भोग क्षमा तो किया नहीं जा सकता तो इस प्रकार की दीनता से लाभ क्या है। शरीर की नियुक्ति ही अब प्रारम्भ भोग करने के लिये हुई है, तब उसे उचित रूप से भोगने में ही सुन्दरता भी है और कल्याण भी।
विवेक की बात तो यह है कि संकट, आपत्ति अथवा दुःख पाने पर प्रसन्न होना चाहिये। इसलिये कि यही वह विधान है, जिसके द्वारा मनुष्य का प्रारब्ध भोग पूरा होता है। उसके पूर्व कर्मों का परिपाक मोक्ष होता है। एक-एक संकट, एक-एक प्रारब्ध को व्यर्थ करता जाता है, जिसके अनुसार भव-बन्धन की लम्बी शृंखला की एक-एक कड़ी टूटती जाती है। दुःख का संयोग आते ही मनुष्य को उसका उपचार तो करना चाहिये पर साथ ही यह सोचकर प्रसन्न भी कम नहीं होना चाहिये कि उसके प्रारब्ध भोग की एक किश्त उतर गई।
आत्मा का भार, भविष्य का अन्धकार कुछ कम हो गया और प्रकाश का लक्ष्य कुछ समीप आ गया है। ऐसे उपकारी संकटों को देखकर रोना-चिल्लाना वैसी ही मूर्खता है, जैसी कि किसी विषाक्त फोड़े का आपरेशन करने के लिये आये डाक्टर को देखकर भयभीत होने के मूर्खता। दुःख के बाद सुख और संकट के बाद सुविधा-प्रकृति का यह अटल नियम है। इस आधार पर भी तो दुःख देखकर प्रसन्न ही होना चाहिये। दुःख और संकट उस सुख संपत्ति की पूर्व भूमिका होते हैं, जो निकट भविष्य में मिलनी होती है। बादल और बिजली को देखकर भयभीत होने वाले बाल-बौद्धिक लोग कुछ ही देर में होने वाली प्राणदायक और धन-धान्य की विधायक वर्षा को नहीं देख पाते। संकट सुख और कल्याण के अग्रदूत होते हैं। उनको देखकर भयभीत न होना चाहिये बल्कि सहर्ष उनका स्वागत करना चाहिये।
विश्वास रखिये दुःख का अपना कोई मूल अस्तित्व नहीं होता। इसका अस्तित्व मनुष्य का मानसिक स्तर ही होता है। यदि मानसिक स्तर योग्य और अनुकूल है तो दुःख की अनुभूति या तो होगी ही नहीं और यदि होगी भी तो बहुत क्षीण। तथापि यदि आपको दुःख की अनुभूति सत्य प्रतीत होती हैं, तब भी उसका अमोघ उपाय यह है कि उसके विरुद्ध अपनी आशा, साहस और उत्साह के प्रदीप जलाये रखा जाय। अन्धकार का तिरोधान और प्रकाश का अस्तित्व बहुत से अकारण भयों को दूर कर देता हैं।
आशा, विश्वास और परिवर्तन के अटल विधान में आस्था रखने के साथ ही साथ समय रूपी महान् चिकित्सक में विश्वास रखिये। समय बड़ा बलवान् और उपचारक होता है। वह, धैर्य रखने पर मनुष्य के बड़े-बड़े संकटों को ऐसे टाल देता है, जैसे वह आया ही न था। संकट तथा दुःख देखकर भयभीत होना कापुरुषता है। आप ईश्वर के अंश हैं, आनन्द स्वरूप हैं। आपको तो धैर्य, साहस, आशा-विश्वास और पुरुषार्थ के आधार पर संकट और और विपत्तियों की अवहेलना करते हुए सिंह पुरुषों की तरह ही जीवन व्यतीत करना चाहिये।
हकीम लुकमान तब एक उमराव के दास थे। लुकमान बहुत नेक, आज्ञाकारी और ईश्वर पारायण थे पर स्वामी कभी-कभी ईश्वर को भी भला-बुरा कह बैठता था, फिर भी वह लुकमान की कर्तव्य-परायणता के लिये वह भी उससे स्नेह रखता था।
एक दिन अमीर ने ककड़ी खानी चाही। उसने वैसे ही मुख में ककड़ी लगाई ऐसा जान पड़ा ककड़ी कड़वी है। उसने तुरन्त ककड़ी लुकमान को दे दी और कहा-ले इसे तू खा ले।” हकीम लुकमान ने ककड़ी ले ली और बिना कुछ ना-नू किये उसे चुपचाप इस तरह खा लिया जैसे वह कोई मीठी ककड़ी ही हो।
अमीर को बड़ा आश्चर्य हुआ, उसने पूछा-लुकमान इतनी कड़वी ककड़ी तुमने किस तरह खा ली?” लुकमान बोले-स्वामी आप प्रतिदिन मुझे स्वादिष्ट भोजन देते हो, एक दिन कड़वा दे दिया तो क्या उसे फेंक दूँ या उसके लिये आपको दोष दूँ। अपने प्यारे लोगों की चार मिठास में एक कड़ुवाहट भी हो तो क्या उसके लिये उसे दोषी ठहराना चाहिये।”
अमीर ने समझ लिया कि जो परमात्मा अनेक सुख देता है, यदि वह थोड़े से दुःख देता है तो उन्हें भी प्रसन्नतापूर्वक सहन करना चाहिये।
कोलाहल और समस्याओं से घनीभूत संसार में यदि परमात्मा का कोई उत्तम वरदान मनुष्य को मिला है तो वह संगीत ही है। संगीत से पीड़ित हृदय को शान्ति और सन्तोष मिलता है। संगीत से मनुष्य को सृजन-शक्ति का विकास और आत्मिक प्रफुल्लता मिलती है। जन्म से लेकर मृत्यु तक, शादी-विवाहोत्सव से लेकर धार्मिक समारोह तक के लिये उपयुक्त संगीत-निधि देकर परमात्मा ने मनुष्य की पीड़ा को कम किया, मानवीय गुणों से प्रेम और प्रसन्नता को बढ़ाया।
शास्त्रकार कहते हैं-
“स्यरेल सल्लयेत योगी”
“स्वर साधना द्वारा योगी अपने को तल्लीन करते है” और एकाग्र की हुई, मनःशक्ति को विचाराधीन से लेकर किसी भी व्यवसाय में लगाकर चमत्कारिक सफलतायें प्राप्त की जा सकती हैं, इसलिये यह मानना पड़ेगा कि संगीत दो वर्ष के बच्चे से लेकर विद्यार्थी, व्यवसायी किसान मजदूर स्त्री-पुरुष सबको उपयोगी ही नहीं आवश्यक भी है। उससे मनुष्य की क्रिया शक्ति बढ़ती और आत्मिक आनन्द की अनुभूति होती है। यह बात ऋषि-मनीषियों ने बहुत पहले अनुभव की थी और कहा था-
“अभि स्वरन्ति बहवो मनीवियो राजा नमस्य भुवनस्य निंसते” -ऋग्वेद 9।85।3
अर्थात्- अनेक मनीषी विश्व के महाराजाधिराज भगवान् की ओर संगीतमय स्वर लगाते है और उसी के द्वारा उसे प्राप्त करते हैं।
एक अन्य मन्त्र में बताया है कि ईश्वर प्राप्ति के लिये ज्ञान और कर्मयोग मनुष्य के लिये कठिन है। भक्ति भावनाओं से हृदय में उत्पन्न हुई अखिल-करुणा ही वह सर्व सरल मार्ग है, जिससे मनुष्य बहुत शीघ्र परमात्मा की अनुभूति कर सकता है। और उस प्रयोजन में-भक्ति भावनाओं के विकास में संगीत का योगदान असाधारण है-
स्वरन्ति त्वा सुते नरो वसो निरेक उकिथनः।
(ऋग्वेद 8।33।2)
हे शिष्य! तुम अपने आत्मिक उत्थान की इच्छा से मेरे पास आये हो। मैं तुम्हें ईश्वर का उपदेश करता हूँ तुम उसे प्राप्त करने के लिये संगीत के साथ उसे पुकारोगे तो वह तुम्हारी हृदय गुहा में प्रकट होकर अपना प्यार प्रदान करेगा।
पौराणिक उपाख्यान है कि ब्रह्मा जी के हृदय में उल्लास जागृत हुआ तो वह गाने लगे। उसी अवस्था में उनके मुख से गायत्री छन्द प्रादुर्भूत हुआ-
गायत्रीमुखादुदपत दिति च ब्राह्मणम्।
(निसक्त)
मान करते समय ब्रह्मा जी के मुख से निकलने के कारण गायत्री नाम पड़ा है।
संगीत के अदृश्य प्रभाव को खोजते हुए भारतीय योगियों को वह सिद्धियाँ और अध्यात्म का विशाल क्षेत्र उपलब्ध हुआ, जिसे वर्णन करने के लिये एक प्रण वेद की ही रचना करनी पड़ी। सामवेद में भगवान् की संगीत शक्ति के ऐसे रहस्य प्रतिपादित और पिरोये हुये हैं, जिनका अवगाहन कर मनुष्य अपनी आत्मिक शक्तियों को-कितनी ही तुच्छ हों-भगवान् से मिला सकता है। अब इस सम्बन्ध में पाश्चात्य विद्वानों की मान्यतायें भी भारतीय दर्शन की पुष्टि करने लगी हैं।
विदेशों में विज्ञान की तरह ही एक शाखा विधिवत् संगीत का अनुसन्धान कर रही है और अब तक जो निष्कर्ष निकले हैं, वह मनुष्य को इस बात की प्रबल प्रेरणा देते हैं कि यदि मानवीय गुणों और आत्मिक आनंद को जीवित रखना है तो मनुष्य अपने आपको संगीत से जोड़े रहे। संगीत की तुलना प्रेम से की है दोनों ही समान उत्पादक शक्तियाँ हैं, इन दोनों का ही प्रकृति जड़-तत्त्व ओर जीवन चेतन-तत्त्व दोनों पर ही चमत्कारिक प्रभाव पड़ता है।
लन्दन के कुछ अनुभवी डाक्टर गर्भस्थ शिशु के लिए संगीत की धुनें बजाकर यह पता लगाने की चेष्टा कर रहे है कि गर्भस्थ शिशु की श्रवण शक्ति का विकास किस प्रकार होता है और मधुर ध्वनियों से स्नायविक प्रणाली पर क्या प्रभाव होता है।
अनेक गर्भवती स्त्रियों को संगीत की ध्वनियाँ सुना कर परीक्षण किये गये। 290 में से 284 बच्चे ऐसे निकले जो सामान्य बच्चों से अधिक स्वस्थ, वजनदार और प्रसन्न मुख थे। जन्म लेने से 14 सप्ताह पूर्व गर्भस्थ शिशु की श्रवण शक्ति का विकास हो जाता है और तब वह संगीत ध्वनियों से अधिक तेजी से प्रभावित होता है। इसलिये वहाँ के डाक्टरों का यह कथन है कि गर्भवती स्त्रियों को संगीत का अभ्यास अथवा रसास्वादन अवश्य करना चाहिये। जो गा-बजा नहीं सकती उन्हें अच्छे भजन-कीर्तन भक्ति, करुणा, प्रेम, दया और सेवा के प्रेरक गीत सुनने के लिए कोई साधन अवश्य बनाना चाहिये।
आजकल प्रातःकाल प्रायः सभी भारतीय रेडियो स्टेशनों से भक्ति-भावना से ओत-प्रोत भजन प्रसारित किये जाते हैं, जिन घरों में रेडियो, ट्रांजिस्टर हों, उन घरों में प्रातःकाल यह भजन अवश्य सुने जाने चाहिये। उससे कार्य क्षमता भी घटती नहीं एकाग्रचित्त होने के कारण दूसरे काम भी तेजी से होते हैं और कानों से स्वर लहरियों का आनन्द भी मिलता रहता है।
पूर्वी जर्मनी के गोटिंगन नगर के संगीत से इलाज करने वाले प्रो. डा० जोहोंस एन॰ शूमिलिन ने यह सिद्ध कर दिया है कि बीमार पशु भी मानव की भाँति संगीत से लाभ ही नहीं उठा सकते वरन् उन्हें रोग-मुक्त भी किया जा सकता है। उन पर संगीत का अनुकूल प्रभाव पड़ता है। गोटिंगन से प्रकाशित एक पत्रिका में उन्होंने लिखा है-दुखती आँखों में संगीत प्रसन्नता की चमक पैदा कर देता है। मैंने ऐसे कुत्ते और बिल्ली देखे हैं, जो लोग-वाद्यों के साथ थिरकने लगे हैं, यदि मनुष्येत्तर प्राणियों के जीवन-स्पन्दन को संगीत की सामर्थ्य से मोड़ा जा सकता है तब तो मनुष्य जैसे भावनाशील प्राणी पर उसके प्रभाव का कहना ही क्या?”
कोई 15 वर्ष पूर्व लखनऊ के एक वैज्ञानिक डाक्टर सी० टी० एम॰ सिंह ने स्लाइडों के द्वारा यह प्रमाणित करने का प्रयत्न किया था कि गायें, भैंसें संगीत सुनकर अधिक दूध देने लगती हैं। कटक और दिल्ली के कृषि अनुसन्धान केन्द्रों में भी ऐसे प्रयोग और परीक्षण हुये हैं और यह देखा गया कि संगीत का प्रभाव पेड़-पौधों तक में उत्पादक शक्ति के रूप में होता है। कोयम्बटूर के सरकारी कालेज में भी इस प्रकार की परीक्षण चल रहे हैं। विदेशों से ऐसे समाचार मिल रहे, जिनमें दावा किया जाता है कि राग-रागनियों का प्रभाव गन्ने, धान, शकरकन्द, नारियल आदि पर भी पड़ता है। उत्तर भारत में अभी भी धान को रोपाई के लिये विशेष रूप से गाँव की उन स्त्रियों को ले जाया जाता है, जो अच्छे और मधुर-स्वरों में गीत गा सकती हों और फिर सामूहिक स्वरों में गीत गाते हुए, धान की रोपाई की जाती है। ऐसे खेतों में और खेतों की अपेक्षा फसल अच्छी तैयार होती है।
प्राचीनकाल में समीपवर्ती तीर्थ यात्राओं देव-दर्शनों और मेलों पर गाते हुये जाने की प्रथा थी। अभी भी गीत गाते हुए परिक्रमा आदि देने की प्रथा है, मथुरा यात्रा पर जाने वाले कुछ बुन्देलखण्डी तीर्थ-यात्री बिरहे गाते हुए और कुछ शिव उपासक ‘भोला तेरी बम’ गाते हुये निकलते हैं, उनका कहना है कि गीतों के माध्यम से वे यहाँ की धार्मिक भावनायें खींच ले जाते हैं। तीर्थ यात्राओं और पर्व-त्योहारों पर गाँव-गाँव संगीत और भजनों का प्रचलन था, उससे एक बार तमाम भारतवर्ष संगीत से मुखरित हो उठता था, उसी का फल था कि वृक्ष वनस्पति अधिक और मीठे फल देते थे। दूषित तत्त्वों का संहार होता था और उससे बीमारियाँ आदि कम फैलती थी।
गीत से जो उल्लास पैदा होता था, वह गन्दे स्थानों से गुजरने पर भी वहाँ की प्रतिक्रिया रोक देता था और संगीत के प्रणव से यात्री स्वस्थ और प्रसन्नचित्त लौट आता था, उस पर किसी प्रकार की बीमारी का असर नहीं होता था। आज गाने का शोक कम होता जा रहा है, उसी कारण लोग तरह-तरह के दुर्गुणों में ग्रस्त होते, स्वास्थ्य सोते चले जा रहे हैं। संगीत जैसी उत्पादक सत्ता से सम्बन्ध-विच्छेद कर मनुष्य जाति ने अपनी ही हानि की है।
सामूहिक संगीत का महत्व और भी अधिक है, इस पर डाक्टरों का मत है कि जब कई व्यक्ति एक साथ गाते हैं, तो सब लोगों का स्वर प्रवाह एवं आन्तरिक उल्लास मिलकर एक ऐसी तरंग शृंखला उत्पन्न करता है, जो वातावरण में मिलकर सबको उल्लसित कर देता है, फाल्गुन के महीने में फाग की धूम होती है, तब बच्चे-बूढ़ों में भी उल्लास फूट पड़ता है और वे युवकों की तरह उत्फुल्ल दिखाई देने लगते हैं। सामूहिक गायनों में सभी को अपने प्रयत्न से अधिक ही लाभ मिलता है और वह लाभ इतने व्यापक क्षेत्र को प्रभावित करता है कि प्रत्येक श्रोता चाहे वह गाने में भाग न भी ले रहा हो, उस आनंद सरोवर में डूब जाता है।
गाने की धुनों के साथ हाथ-पाँव अनायास ही गति करने लगते हैं, इसका तात्पर्य ही यह है कि संगीत का मनुष्य जीवन और आत्मा से सीधा सम्बन्ध है। आत्मा उसके बिना कुण्ठित हो जाती है, इसलिये आत्मिक प्रगति के प्रत्येक इच्छुक को गाने और संगीत सुनने का लाभ आवश्यक लेना चाहिये।
योग-शास्त्रों में संगीत की बड़ी चर्चा है। तत्त्ववेत्ताओं का कथन है कि अदृश्य जगत् की सूक्ष्म कार्य प्रणाली पर जिधर भी दृष्टि डालते हैं, उधर ही वह प्रतीत होता है कि एक दिव्य संगीत से सभी दिशायें और विश्व भुवन झंकृत हो रहा है। यह स्वर लहरियाँ वीणा, भ्रमर, झरना, नागरी भेरी, वंशी आदि की तरह सुनाई देती हैं। जिस तरह सर्प नाद को सुनकर मस्त हो जाता है, उसी तरह चित उन स्वर लहरियों में आसक्त होकर सभी प्रकार की चपलतायें भूल जाता है। नाद से संलग्न होने पर मन ज्योतिर्मय हो जाता है और जो स्थिति कठिन साधनाओं से भी कठिनाई से मिलती है, वह स्वर योग के साधक को अनायास ही मिल जाती है।
गीत परमात्मा के आशीर्वाद रूप में मनुष्य को मिला हैं, उस आशीर्वाद की वर्षा अपने ऊपर आप की जा सकती है। धन-सम्पत्ति न मिले न सही पर संगीत का आनन्द तो वायु, जल, सूर्य की ऊष्मा की तरह उन्मुक्त रूप से हर कोई प्राप्त कर सकता है। इस महाशक्ति से सम्बन्ध जोड़कर प्रत्येक व्यक्ति को अपने गुणों और आत्मिक सम्पदा का विकास और दूषित तत्त्वों से देह, मन और आत्मा की रक्षा करनी चाहिये। साथ ही वह भी ध्यान रखना चाहिये कि इस महाशक्ति का दुरुपयोग कामुकता जैसी दुष्प्रवृत्तियों में न किया जाय, जैसा कि आजकल सिनेमा वाले कर रहे हैं। शृंगार-रस को कामुकता के सर्वभक्षी गर्त में गिराकर आज ऐसे ही संगीत का सृजन किया जा रहा है, जो हित के स्थान पर अहित ही अर्जित कर सकता है। संगीत का प्रवाह भावनाओं को उत्कृष्टता की दिशा में मोड़ने के लिये ही किया जाना चाहिये। इसी में उसकी सार्थकता है।
फार्म 4
1-प्रकाशन का स्थान- मथुरा
2-प्रकाशन का अवधि क्रम- मासिक
3-मुद्रक का नाम- श्रीराम शर्मा आचार्य
राष्ट्रीयता- भारतीय
पता- जन-जागरण प्रेस, मथुरा
4-प्रकाशक का नाम-श्रीराम शर्मा आचार्य
राष्ट्रीयता- भारतीय
पता- अखंड-ज्योति संस्थान मथुरा
5-सम्पादक का नाम- श्रीराम शर्मा आचार्य
राष्ट्रीयता- भारतीय
पता- अखंड-ज्योति संस्थान मथुरा
6-स्वत्वाधिकारी- श्रीराम शर्मा आचार्य
अखंड-ज्योति संस्थान मथुरा
मैं, श्रीराम शर्मा आचार्य यह घोषित करता हूँ कि ऊपर दिए सब विवरण मेरी अधिकतम जानकारी और विश्वास के अनुसार सत्य है।
(हस्ता.) श्रीराम शर्मा आचार्य,
सभी धर्मों में जीव-हिंसा को पाप माना गया है। जो धर्म प्राणियों की हिंसा का आदेश देता है, वह कल्याणकारी हो सकता हैं, इसमें किसी प्रकार भी विश्वास नहीं किया जा सकता। धर्म की रचना ही संसार में शांति और सद्भाव बढ़ाने के लिये हुई है। यदि धर्म का उद्देश्य यह न होता तो उसकी इस संसार में आवश्यकता न रहती। संसार के आदिकाल में पशुओं के समान ही मनुष्य वन्य जीव-जन्तुओं का वध किया करता था। उसकी सारी प्रवृत्तियाँ भी पशुओं के समान ही थीं। वह उन्हीं के समान हो-हो खो-खो करके बोला करता था, नंगा फिरता और मांद गुफाओं में रहा करता था, धीरे-धीरे मनुष्य ईश्वरीय तत्त्व का विकास हुआ। उसकी बुद्धि जागी और वह बहुत-सी पाशविक प्रवृत्तियों को अनुचित समझकर उन्हें बदलने लगा। उसने आखेट जीविका का त्याग कर कृषि और पशुपालन अपनाया वल्कल से प्रारम्भ कर कपास निर्मित वस्त्र पहनने प्रारम्भ किये। हिंसा वृत्ति के शमन से सामाजिकता का विकास किया, समाज व परिवार बनाया और दया, करुणा, सहायता, सहयोग का मूल्य समझकर निरन्तर विकास करता हुआ, इस सभ्य अवस्था तक पहुँचा।
ज्यों-ज्यों मनुष्य का विकास होता गया, त्यों-त्यों वह स्थूल से सूक्ष्म की ओर-शरीर से आत्मा की ओर-- और लोक से परलोक की ओर विचारधारा को अग्रसर करता गया और अन्त में परमात्मा तत्त्व के दर्शन कर लिये। स्थूल से जो जितना सूक्ष्म की ओर बढ़ा है, वह उतना ही सभ्य तथा सुसंस्कृत माना जायेगा और जिसमें जितनी अधिक पाशविक अथवा आदि प्रवृत्तियाँ शेष हैं, वह उतना ही असभ्य एवं असंस्कृत माना जायेगा।
पाशविक प्रवृत्तियों में जीव-हिंसा सबसे जघन्य प्रवृत्ति है। जिसमें इस प्रवृत्ति की जितनी अधिकता पाई जाये, उसे बाहर से सभ्य परिधानों को धारण किये होने पर भी भीतर से उतना ही अधिक आदिम असभ्य मानना चाहिये।
यों खाने के लिये कोई माँस खाकर व्यक्तिगत निन्दा का पात्र बने तो बना करे किन्तु धर्म के नाम पर पशुवध करने का उसको या किसी को कोई अधिकार नहीं है। जिस कल्याणकारी धर्म का निर्माण अहिंसा, सत्य, प्रेम, करुणा और दयामूलक सिद्धान्तों पर किया गया है, उसके नाम पर अथवा उसकी आड़ लेकर पशुओं का वध करना धर्म के उज्ज्वल स्वरूप पर कालिख पोतने के समान ही है। ऐसा करने का अधिकार किसी को भी नहीं है। जो ऐसा करता है, वह वस्तुतः धर्म-द्रोही है और लोक-निन्दा और अपयश का भागी है।
अपने को हिन्दू कहने और मानने वाले अभी अनेक धर्म ऐसे हैं, जिनमें पशु-बलि की प्रथा समर्थन पाये हुए हैं। ऐसे लोग यह क्यों नहीं सोचते कि हमारे देवताओं एवं ऋषियों ने जिस विश्व-कल्याणकारी धर्म का ढाँचा इतने उच्च-कोटि के आदर्शों द्वारा निर्मित का है, जिनके पालन करने से मनुष्य देवता बन सकता है, समाज एवं संसार में स्वर्गीय वातावरण का अवतरण हो सकता है, उस धर्म के नाम पर हम पशुओं का वध करके उसे और उसके निर्माता अपने पूज्य पूर्वजों को कितना बदनाम कर रहे हैं।
धर्म के मूलभूत तत्त्व-ज्ञान को न देखकर अन्य लोग धर्म के नाम पर चली आ रही अनुचित प्रथाओं को धर्म का आधार मान कर उसी के अनुसार उसे हीन अथवा उच्च मान लेते हैं, अश्रद्धा अथवा घृणा करने लगते हैं। इस प्रकार धर्म को कलंकित ओर अपने को पाप का भागी बनाना कहाँ तक न्याय-संगत और उचित है। इस बात समझे और पशु-बलि जैसी अधार्मिक प्रथा का त्याग करें।
पशु-बलि करने वाले लोग बहुधा देवी-देवताओं को प्रसन्न करने के लिये ही उनके सामने अथवा उनके नाम पर जानवरों और पक्षियों आदि निरीह जीवों का वध किया करते हैं। इस अनुचित कुकर्म देवी- देवता प्रसन्न हों सकते है, ऐसा मानना अन्ध-विश्वास की पराकाष्ठा है। उनकी महिमा को समाप्त करना और हत्यारा सिद्ध करना है। अपने प्रति ऐसा अन्याय करने वालों से देवी देवता प्रसन्न हो सकते है, यह सर्वथा असम्भव है। जब समाज में किसी साधारण मनुष्य को यो ही बदनाम किया जाता है, उसके नाम पर गन्दगी उछाली जाती है, तब वह भी जो कुछ बन पड़ता हैं, विरोध करता है और क्रोध में आकर अपयशकर्ता का बुरा चाहने लगता है। तब क्या सर्व समर्थ देवी देवता अपने अपयश करने वाले को क्षमा कर देते होंगे। वे अवश्य ही ऐसे पापियों पर अप्रसन्न होकर उन्हें शाप देते है। इसका परिणाम पशु-बलि की कुप्रथा को चलाने वालों पर विविध कष्ट-क्लेशों के रूप में फलीभूत होता है। देव - बलि के नाम पर पशु-बलि करने वाले सदा ही मलीन, दरिद्रता और तेजहीन देखे जाते है। वे फलते-फूलते और सुख - शांति सम्पन्न नहीं पाये जाते।निर्दोष जीवों की हत्या के पाप स्वरूप उनकी मनोवाँछायें अपूर्ण और उनके परिवार अधिकतर रोग, शोक और दुःख-दारिद्रय से घिरे रहते है।
अधिकतर लोग काली के मन्दिरों में अथवा भैरव के मठों पर पशु-बलि देने का विशेष आयोजन किया करते है। उन्हें विश्वास होता है कि माता काली पशुओं का माँस खाकर अथवा खून पीकर प्रसन्न होती है। उस जग जननी जगदम्बा के प्रति ऐसा क्रूर एवं कुत्सित विश्वास रखना उसके विश्व -मातृत्व पर बहुत बड़ा आघात है। परमात्मा की जो आधार शक्ति संसार के जीवों को उत्पन्न और पालन करने वाली है, वह अपनी सन्तानों का रक्त माँस पी-खा सकती है, ऐसा किस प्रकार माना जा सकता है? साधारण मानवी माता भी जब बच्चे के जरा सी चोट लग जाने पर पीड़ा से छटपटा उठती है, उसकी सारी करुणा उमड़कर अपने प्यारे बच्चे को आच्छादित कर लेती हैं, तब उस दिव्य माता, उस करुणा, दया और प्रेम की मूर्ति जगत-जननी के प्रति यह विश्वास किस प्रकार किया जा सकता है कि वह अपने उन निरीह बच्चों का खून पीकर प्रसन्न हो सकती है?
उसको इस प्रकार क्रूर, करुण दारुण और पिशाचिनी के रूप में मानकर उसके सम्मुख जीवों की बलि देना उसके कोमल मर्म को बेधना ही है। तब उसके सम्मुख ही उसकी निरीह सन्तानों को काटकर उनका रक्त-माँस उस माता के मुँह में देना कितना क्रूर और भयंकर कर्म हैं, इसका विचार आते ही किसी भी विचारशील के रोंगटे खड़े हो जाते हैं।
हिन्दू -धर्म में सर्वत्र निर्दोषों के प्रति अहिंसा बरतने का ही प्रतिपादन किया गया है और सर्वत्र हिंसा का निषेध। वेदों से लेकर पुराणों तक में पशु-बलि का कहीं भी समर्थन नहीं मिलता। उदाहरणार्थ पशु-बलि अथवा वध निषेध में कुछ आर्ष वाक्य नीचे दिये जाते हैं, जो इस अन्ध-विश्वास का निवारण करने में काफी सहायक हो सकते हैं :-
“देवापहार व्याजेन यज्ञाणयाजेन येथवच। हनन्ति जन्तून गत घृणा घोरों ते यान्तिदुर्गतिम्॥”
जो लोग देवता पर चढ़ाने अथवा यज्ञ के बहाने पशुओं का वध करते हैं, वे निर्दयी घोर दुर्गति को प्राप्त होते हैं।
“यूपं छित्वा पशून हत्वा कृत्वा रुधिर कर्दमम्। यद्येव गम्यते स्वर्गे नरके केन गम्यते।”
यूप को काट कर, पशुओं को मार कर और रक्त की कीचड़ फैलाकर यदि कोई स्वर्ग जाता है तो नरक कौन जायेगा।
“प्राणी घातान् तुयो धर्म मोहनं मूढ़ मानसाः। स वांछन्ति सुपावृष्टि कृष्णाहि मुख कोटरात्॥”
जो मूढ़ मति वाले व्यक्ति अन्य प्राणियों की हत्या करके धर्म की आकांक्षा करते हैं, वे मानो काले सर्प के मुख से अमृत की वर्षा की इच्छा करते हैं।
देव यज्ञे पितृ श्राद्धे तथा माँगल्य कर्मणि। तस्यैव नरके वासो यः कुचजिब घातनम्॥
मद्व्याजेन पषून हत्वा, यो यज्ञेन सह बंषुमिः। तग्गाँन्न लोम संख्या दैरक्षिपत्र बने बसेत॥
आत्म पुत्र कलमादि सुसम्पति कुलेच्छया। यो दुरात्मा पशून हन्यात् आत्माहीन घातयेत्॥
देव यज्ञ, पितृ श्राद्ध और अन्य कल्याणकारी कार्यों में जो व्यक्ति जीव हिंसा करता है, वह नरक में जाता है। मेरे बहाने से जो मनुष्य पशु का वध करके अपने सम्बन्धियों सहित माँस खाता है, वह पशु के शरीर में जितने रोम होते हैं, उतने वर्षों तक असिपत्र नामक नरक में रहता है। इसी तरह जो मनुष्य आत्मा, स्त्री, पुत्र, लक्ष्मी और कुल की इच्छा से पशुओं की हिंसा करता है, वह स्वयं अपना नाश करता है।
वेद भगवान ने अपने न जाने कितने मन्त्रों में हिंसा एवं पशु वध का निषेध करते हुए स्थान-स्थान पर कहा है-
“मानो गोषु मानो अश्वेषु रीरिषः।”- ऋग्.
हमारी गायों और घोड़ों को मत मार।
“दूममुर्णायं वरुणास्य नाभिं त्वयं पशुनाँ द्विपदाँ तुष्पदाम्।
त्वष्टुः प्रजानाँ प्रथम जनिन्न मग्ने माँ हिंसी परमेव्योमन्।”- यजु.
ऊन जैसे बालों वाले बकरी, ऊँट आदि चौपायों और पक्षियों आदि दो पगों वालों को मत मार।
इसी प्रकार महाभारत पुराण के शांति पर्व में यज्ञादिक शुभ कर्मों में पशु हिंसा का निषेध करते हुए बलि देने वालों की निन्दा की गई है-
अव्यवस्थित मर्यादैविमूढ़ैर्नास्ति कै नरैः। संशयात्मभिरुप में हिंसा समउवर्णिता॥
सर्व कर्म स्वहिंसा हि धर्मात्मा मनुव्रवीत। काम कारा द्विहिंसन्ति बढ़िवद्यान पशुयन्न॥
तस्मात प्रमाणतः कार्यो धर्मः सूक्ष्मो विज्ञानंता। अहिंसा सर्व भूतेभयो, धर्मेभ्योज्यासीमता॥
यदि यज्ञाश्च वृक्षाश्चं, भयाँश्चोछिद्य मानव। वृथा माँस न खादन्ति, नैष धर्मः प्रशस्थते॥
उच्छृंखल, मर्यादाहीन, नास्तिक, मूढ़ और संशयात्मक लोगों ने यज्ञ में हिंसा का विधान वर्णित किया है। वस्तुतः यज्ञ में हिंसा नहीं करनी चाहिये। धर्म में आस्था रखने वाले मनुष्यों ने अहिंसा की प्रशंसा की है। पंडितों का यही कर्तव्य है कि उसके अनुसार सूक्ष्म धर्मानुष्ठान करें। सभी धर्मों को ही श्रेष्ठ धर्म माना गया है। जो मनुष्य यज्ञ, वृक्ष, भूमि के उद्देश्य से पशु छेदन करके अवृथा माँस खाते हैं, उनका धर्म किसी प्रकार प्रशंसनीय नहीं है।
इस प्रकार क्या धर्म और क्या मानवीय दृष्टिकोण से जीव-हिंसा करना वण्य ही है। इस पाप से जितना शीघ्र मुक्त हुआ जायेगा उतना ही कल्याण होगा।
पाताल नरेश शम्भर बड़ा संयमी असुर था। उसने देवलोक के सभी राजाओं को जीत कर अपने साम्राज्य का दूर तक विस्तार किया। देवता चिन्तित होकर प्रजापति ब्रह्मा के पास गये और उनसे मुक्ति का उपाय पूछा। ब्रह्मा जी बोले- देवों ( असुरों का एक ही अस्त्र है हिंसा। वे प्राणियों का वध करके अपनी शक्ति बढ़ाते हैं, यही पाप एक दिन उनके विनाश का कारण बनेगा।”
सचमुच वही हुआ। शम्भर के तीन प्रधान सेनापति दाम, व्याल और कट ने सारे राज्य में माँसाहार का प्रचार किया। एक दिन नागरिक वमहिन ने व्याल से पूछा- “जब आप भी माँस खाते हैं तो स्वयं पशुओं का वध भी अपने ही हाथ से किया करें” तीनों ने यह बात स्वीकार कर ली।
दूसरे दिन दाम, तीरे दिन व्याल और चौथे दिन कट एक-एक पशु का वध किया। मारते समय पशु की छटपटाहट देखकर तीनों के मन में मृत्यु का भय समा गया। भय के उत्पन्न होते ही उनकी शक्ति घट चली और एक दिन देवताओं ने उन पर फिर से धावा बोल दिया। इस बार वे भय वश वीरतापूर्वक न लड़ सके और युद्ध में मार डाले गये।
वैज्ञानिक अब इस निष्कर्ष पर निकल आये हैं कि शरीर में विभिन्न ज्ञानेन्द्रियों के केन्द्र स्थूल इन्द्रियाँ नहीं वरन् उनसे भी सूक्ष्म और संवेदनशील कोई स्थान शरीर में हैं, जिन्हें न तो यन्त्रों के द्वारा पकड़ा जा सकता है और न स्थूल आँखों से देखा जा सकता है तो भी अत्यन्त शक्तिशाली, महत्त्वपूर्ण और अनेक रहस्यों से परिपूर्ण हैं।
विज्ञान जगत् में परमाणु शब्द आज बहुत प्रचलित हो रहा है और उसे अत्यन्त गूढ़ रहस्य की दृष्टि से देखा जा रहा है। परमाणु को अँगरेजी में एटम कहते हैं, यह ग्रीक भाषा से आया है, उसका अर्थ होता है, ऐसी वस्तु जिसका विभाजन न हो सके। कोई 50 वर्ष पूर्व तक परमाणु को पदार्थ की लघुतम इकाई माना जाता था, किन्तु जब वैज्ञानिकों ने परमाणु का भी विखंडन किया तो उन्हें 30 अन्य अत्यन्त सूक्ष्म इकाइयाँ समझ में आईं, यह प्रत्येक ईकाई बड़े ही रहस्यपूर्ण संस्थान माने गये हैं, उनमें किसी में तो सूर्य जैसी चमक है, किसी में पृथ्वी जैसी विशालता, जिसमें हजारों नदी, नद-झील और पर्वत हैं। उस अणु का आकाश ही इतना विस्तृत है कि वैज्ञानिक चकित रह गये, पदार्थ का न्यूक्लियस प्रोटोन और न्यूट्रान से बना है, शेष स्थान खाली है, जिसमें इलेक्ट्रान चक्कर लगाते हैं, इस चक्कर वाले स्थान का समानुपाती व्यास 2000 फुट है। यथार्थ व्यास तो अनन्त है, अर्थात् एक अणु में विराट् जगत् समाया हुआ है।
जो अणु में, विराट जगत में है, वही शरीर में है। ऊपर जिन सूक्ष्म संस्थानों की चर्चा कर आये हैं, वह एक एक लोक है, जो मेरुदण्ड के पोले भाग में अवस्थित हैं, इन्हें अँगरेजी में ‘एस्ट्रल” कहते हैं, यह सुषुम्ना नाड़ी से सम्बन्धित है। इस सुषुम्ना के ही पृष्ठ भाग से अनेक रेशे निकल कर शरीर और मस्तिष्क में फैल जाते हैं और स्पृश्, ताप, झनझनाहट आदि समाचार ले जाते हैं, उसी प्रकार काम करने की आज्ञा भी लाते हैं। इससे अधिक की जानकारी वैज्ञानिकों को नहीं हो पाई।
शरीर में कुछ स्थान ऐसे भी हैं, जिनकी जानकारी हो जाने पर विराट् जगत के सन्देश और शक्तियों को उसी प्रकार खींचकर शरीर के विभिन्न अंकों तक पहुँचाया जा सकेगा, जिस प्रकार मस्तिष्क के सन्देश रेशों के माध्यम से शरीर के विभिन्न अवयवों तक पहुँचा देते हैं। इस क्रिया में मेरुदण्ड के पोले भाग में अवस्थित यह चक्र सहायता करते हैं, जिस तरह दूर-दूर रखे हुए दो वायरलैस सैट जब एक फ्रीक्वेंसी में जोड़ दिये जाते हैं तो सैकड़ों मील दूर बैठे हुए दो आदमी ऐसे बातचीत कर लेते हैं, जैसे कोई आमने-सामने बैठकर बातचीत कर रहा हो। कोई जान-पहचान का आदमी हो तो उसकी आवाज से ही जाना जा सकता है कि अमुक व्यक्ति बोल रहा है। इतनी सुन्दर और साफ पकड़ तो अब वैज्ञानिकों ने ही कर ली है।
परमाणु के इन लोकों को भगवान ने मनुष्य शरीर में बड़ी खूबसूरती के साथ स्थापित किया है, उनका अध्ययन करने के लिए यद्यपि साधनायें करनी पड़ती हैं पर भारतीय योगियों ने जो उपलब्धि की है, उससे यह पता चलता है कि इन साधनाओं से विराट जगत की हलचलों को वायरलैस से भी अधिक स्पष्ट सुना और टेलीविजन से भी अधिक अच्छी तरह देखा जा सकता है। यह लोक ब्रह्माण्ड स्थित लोकों की फ्रीक्वेंसियाँ है और उन्हें जोड़ने वाली या साधने वाली शक्ति का नाम ‘शेषनाग’ है, पौराणिक कथाओं में यह बताया जाता है कि शेष नाग पर पृथ्वी अवस्थित है या पृथ्वी को शेषनाग ने साध रखा है और शेषनाग की शैया में ही भगवान लेटे हुए हैं, विश्राम कर रहे हैं।
भगवान और पृथ्वी दोनों एक ही आधार पर होने का अर्थ वह जोड़ने वाली शक्ति या क्रिया ही है, जो पृथ्वीवासी निवासी को विराट ब्रह्माण्ड के साथ जोड़ती है। आगे जब शरीर की रचना और शेषनाग के रहस्य पर प्रकाश डालेंगे तो यह बात साफ समझ में आ जायेगी। अभी तक जो कहा गया है, उनमें से ध्यान रखने वाली बातें यह हैं कि मनुष्य शरीर को भगवान ने विराट ब्रह्माण्ड की एक परमाणु शक्ति के रूप में विकसित किया है, अर्थात् जिस प्रकार पदार्थ की सारी शक्तियाँ परमाणु में सन्निहित होती हैं, उसी प्रकार संसार में जो कुछ है, उसे शरीर में परमाणु रूप में स्थापित कर दिया गया है।
सात लोक (भूः भुवः स्वः महः जनः तपः सत्यम्) प्रसिद्ध हैं, यह ऊर्ध्वगामी लोक हैं, सात अधोगामी लोक भी हैं। इसके बाद आकाश गंगा में घूमने वाले जो भी नक्षत्र हैं, वह सब इस शरीर में बीज रूप से आ बैठे हैं, उनका चिन्तन, अध्ययन और स्मरण करने से इन लोकों की हलचलों का ही पता नहीं लगाया जा सकता वरन् उनसे पृथ्वी पर अब से हजारों वर्ष बाद तक पड़ने वाले प्रभाव को भी देखा जा सकता है। चार युग बाँटकर उनमें होने वाले क्रिया-कलापों को योगियों ने पहले ही लिखकर रख दिया था, वह आज अक्षरशः सत्य उतर रही हैं। अब तो हम भविष्य के सम्बन्ध में कहा करते हैं उनकी सत्यता को संसार शीघ्र ही स्वीकार करेगा।
इन सूक्ष्म लोकों के अवस्थान को चक्र कहते हैं। सात लोकों के सात चक्र हैं, इनका विवरण गायत्री महाविज्ञान प्रथम भाग में विस्तृत रूप से दिया गया है। पाठक जिन्हें जिज्ञासा हो उसे पढ़ सकते हैं। उन चक्रों में अंतिम चक्र मूलाधार है, जो मूत्रेन्द्रिय से दो अंगुल नीचे गुदा के समीप सीवन भाग में स्थित है। इसे पृथ्वी-लोक का प्रतिनिधि मानते हैं, मूलाधार में पहुँचा हुआ साधक पृथ्वी की सारी गतिविधियों का न केवल दर्शन और ज्ञान कर सकता है, वरन् वह पृथ्वी का स्वामी हो जाता है। सारी पृथ्वी उसके लिए गेंद की तरह हो जाती है, वह किसी भी स्थान, किसी भी स्थान के निवासी की सूक्ष्म से सूक्ष्म चित्त वृत्तियाँ इच्छाओं तक का पता कहीं भी बैठा हुआ लगा सकता है।
इसी तरह मस्तिष्क में शून्य चक्र हैं, इसे सहस्रार भी कहते हैं। यह शिर के ऊपर अवस्थित हैं। यह जगने पर बहुत प्रकाशमय रंगों की अति सुन्दरता युक्त अति वेग वाली गति का हो जाता है। इसमें गिनने पर 960 दल पाये गये हैं, इसके केन्द्र में 12 दलों का एक छोटा सा कमल है, उसमें चमकता हुआ श्वेत रंग है, जिसके भीतर सुनहला रंग समाया है। यह सत्य-लोक का प्रतिनिधि स्थान है और यह प्रकाश सत्य-लोक स्थिति भगवान का परमाणु बीज है। अर्थात् सहस्रार को जान लेने का अर्थ भगवान के दर्शन कर लेना है। यहाँ आकर आदमी की इच्छाएँ और वासनायें सब शांत हो जाती हैं, वह आनन्द स्वरूप हो जाता है। उसके लिए संसार में सब कुछ सत्य, शिव, और सुन्दर प्रतीत होने लगता है।
इन दो स्थानों के बीच में अन्य चक्रों का वर्णन नहीं कर रहे उनका यह कोई प्रयोजन नहीं है। इन दोनों चक्रों को लेने का तात्पर्य यही है कि मनुष्य यह जान ले कि पृथ्वी निवासी के लिए अन्तिम पृथ्वी तत्त्व का प्रतिनिधि मूलाधार और सत्य-लोक का सहस्रार दोनों को इसलिए जोड़ दिया गया है कि मनुष्य पृथ्वी को ही सब कुछ न समझें वरन् अपने मूल ब्रह्म को जानने की चेष्टा करें।
शेष भगवान उस कार्य में सहायता करते हैं, उनका ध्यान करने से विज्ञान बुद्धि जागृत होती हैं और भगवान के दर्शन होते हैं ऐसा कहा जाता है। आईये इस रहस्य को भी जान लें।
मेरुदण्ड के शीर्ष सत्य-लोक और मूलाधार दोनों को मेरुदण्ड के क्रमशः सबसे ऊपर और नीचे रखा गया है। मूलाधार से दो नाड़ियाँ-इड़ा और पिंगला - ऊपर की ओर उठती हैं, इनके मिलने से एक तीसरी नाड़ी सुषुम्ना बनती है। सुषुम्ना के भीतर भी एक त्रिवर्ग है। बज्रा और चित्रणी नाम की दो अत्यन्त सूक्ष्म धारायें बहती हैं। उनके योग से एक तीसरी ब्रह्म नाड़ी का प्रादुर्भाव होता है, यह सबसे सूक्ष्म प्रकाश पथ है। जो आकाश से पृथ्वी तक बहता रहता है। इसे ही जीवन कह सकते हैं, ब्रह्म नाड़ी मेरुदण्ड के अन्तिम भाग के समीप एक काले वर्ण के षट्कोण वाले परमाणु से लिपट कर बंध जाती है, इस परमाणु को कूर्म कहा गया है, उसकी आकृति कछुए जैसी है। इस कूर्म में ही आकर ब्रह्म नाड़ी तीन फेरे लगाकर लिपट गई है। इसलिये यह स्थान ऐसा लगता है जैसे कुण्डली मारे हुये कोई सर्प हो और उस पर कूर्म अर्थात् कछुआ और उसके ऊपर मूलाधार अर्थात् पृथ्वी टिकी हुई हो।
इसलिये पहली बात तो यह सिद्ध हुई कि शेषनाग पृथ्वी को साधे हुए हैं, यदि यह आधार कूर्म से अलग हो जाये तो मूलाधार चक्र अर्थात् मनुष्य के जीवन क्रम के नष्ट हो जाने में क्षण भर की भी देर न लगे, इसलिए यह कहा गया है कि शेष भगवान् पृथ्वी को साधे हुए हैं, यह कोई अत्युक्ति वर्णन नहीं है वरन् इस रचना का अलंकारिक वर्णन मात्र है।
यह हो गया पृथ्वी के शेषनाग पर टिके होने का रहस्य। अब शेष भगवान के हजार फनों का रहस्य समझने के लिए ऊपर चलिए और वहाँ पहुँचिये जहाँ ब्रह्म नाड़ी श्वेत दल कमल पर बैठे हुए प्रकाश ब्रह्म-मूल से मिलती है। ब्रह्मरंध्र में पहुँचकर यह ब्रह्मनाड़ी हजारों भागों में फैल जाता है। हर नाड़ी एक-एक दल में प्रविष्ट होकर सूक्ष्म लोकों के उन संस्थानों के सम्पर्क में आता है। यहाँ उनके रहस्यों को स्पष्ट करना हमारा प्रयोजन नहीं। केवल उस आकृति का बोध कराना चाहेंगे, जो नाड़ियों के फैलने से हजारों फनों की तरह लगती है। विष्णु भगवान की शैया शेष के सहस्र फनों पर होने का अलंकार इसी सहस्र दल कमल से लिया गया है।
यह चित्र अब डाक्टरों ने भी प्राप्त कर लिये हैं। मस्तिष्क को आड़ा दो भागों में विभाग करने पर उसके भीतरी सतह पर मस्तिष्क के एक केन्द्र से दूसरे केन्द्र पर जाने वाले रेशों को देखा गया तो उनकी संख्या असंख्य दिखाई दी। यद्यपि उसके भीतरी प्रवाह को डाक्टर समझ नहीं सके पर अब वे भी यह विश्वास करने लगे हैं कि कई बार अज्ञात ढंग से स्वप्न या जागृत अवस्था में लोगों को जो सच्ची घटनायें दिखती या अनुभूति में आ जाती हैं, उनको ग्रहण करने वाली इन्हीं नाड़ियों में से कोई नाड़ी होती है। मस्तिष्क का वह भाग जहाँ से फनों की तरह हजारों नाड़ियाँ फैलती हैं, सेरीबेलम कहलाता है यहाँ एक पुरकुन्जी नामक कोश का पता डाक्टरों ने लगाया है। सम्भवतः यह वही स्थान है, जिसके भीतर बारह दलों वाले चक्र में भगवान विष्णु का प्रकाश स्वरूप अवस्थित है। ऊपरी जानकारी डाक्टरों को मिली है, भीतरी रहस्य केवल योगियों को ही प्राप्त है।
यदि इन कोषों का विस्तृत अध्ययन किया जा सका तो जीव के पूर्व जन्मों के सम्बन्ध की अनेक बातें मालूम की जा सकेंगी, साथ ही आरोग्य शास्त्र में भी एक क्राँतिकारी परिवर्तन लाया जा सकेगा। तब सम्भव है अज्ञात शक्तियों और तत्त्वों को खींचकर रोग ठीक करने का वह क्रम चल पड़े जिस तरह किन्हीं सिद्ध पुरुषों के द्वारा आशीर्वाद मात्र से लोग अच्छे हो जाते हैं।
शेषनाग के इस अलंकारिक चित्रण को केवल शरीर की ही एक प्रणाली नहीं माननी चाहिये वरन् यह एक विश्वव्यापी चेतना का भी अलंकारिक चित्रण है। ऊपर कह चुके हैं कि मनुष्य शरीर की सारी रचना विराट ब्रह्माण्ड की ही नकल है। तब फिर पृथ्वी को घेर कर कोई ऐसी गुरुत्वाकर्षण शक्ति या वह पथ भी हो सकता है जो अनेक दूरवर्ती लोकों को मिलता हुआ ब्रह्मलोक तक पहुँचता हो, (ऐसे एक विराट लोक की जानकारी वैज्ञानिकों को हुई है, उनकी यह मान्यता है कि यह तारा बिलकुल काला है। यदि यह सत्य है तो उससे भी भुजंग शेषनाग के फनों में भगवान का शयन होना सत्य माना जायेगा।)
यदि अब किसी अन्य लोक से बैठ कर देखें जैसा कि योगियों ने सूक्ष्म दृष्टि से देखा तो सम्भव है, यह रचना ठीक ऐसी ही समझ में आये जैसा पुराणों में वर्णन मिलता है। यह निश्चित है कि आगे जो वैज्ञानिक खोजें होगी और जब दूसरे लोकों में पृथ्वीवासी पहुँचेंगे तो इन रहस्यों पर और भी विस्तृत प्रकाश पड़ेगा।
शेषनाग का तीसरा रहस्य सर्पाकार गति में जीवन का भ्रमण भी है। सर्प एक चैतन्य जीव है उस पर पृथ्वी के टिके होने और भगवान के शयन करने, दो रहस्यों का वर्णन ऊपर किया जा चुका है। मनुष्य शरीर से विलग सर्प शरीर में जीवन की संज्ञा कुछ अटपटी सी लगती है पर हमें यह मालूम होना चाहिये कि जीवन के प्रत्येक हावभाव और गतिविधियाँ मानसिक स्थिति पर निर्भर करती हैं। मानसिक स्थिति इड़ा और पिंगला नाड़ियों की गति पर निर्भर है, जिस समय इड़ा अर्थात् चन्द्र नाड़ी चलती है, उस समय शांति, प्रेम, करुणा आदि उद्गार उठते हैं, इसलिए उस समय मनुष्य वैसे ही काम करने लगता है। पिंगला नाड़ी को गर्म नाड़ी भी कहते हैं, जिस समय साहस, शक्ति-प्रदर्शन क्रोध जैसे गर्म विचार उठते हैं, उस समय पिंगला का उत्तेजन होता है। इसलिए वैसे ही क्रिया-कलाप भी बन पड़ते हैं पर जब दोनों नाड़ियाँ समवेत चलती हैं और चेतना का प्रवाह ऊर्ध्वमुखी हो जाता है, तब ईश्वर प्रेम, भक्ति, श्रद्धा भाव-विभोरता ऐसे भाव उमड़ते हैं।
इस स्थिति में यदि भावनायें निम्नगामी हो जाती हैं और कोई सम्भोग के लिए उतावला हो जाता है तो चेतना अधोमुखी हो जाती है पर आनन्द वैसे ही मिलता है, जिस तरह ईश्वर भक्ति में। अधः प्रवाह में शक्तियों का ह्रास होता है, इसलिए उसे अनावश्यक बताया गया है पर यहाँ यह निर्विवाद है कि जीवन की गतिविधियों का मूल इन्हीं नाड़ियों में स्थित है। यह नाड़ियाँ सर्प के समान लहराती हुई जाती हैं, सुषुम्ना नाड़ी बीच में गहरे नीले रंग की होती है, जैसी कि रेखा सर्प के पेट में बीच में होती है और ऊपर मगज में (मेडुला आवलांगेटा) में जाकर समाप्त हो जाती है, जहाँ से फन की आकृति बनती है। इसलिए बीच के भाग भी सर्प के शरीर से तुलना में फिट बैठ जाते हैं।
नाड़ियों के इस प्रवाह के साथ जीवन के सम्बन्ध को ‘जाबाल दर्शनोपनिषद् ’ में विस्तृत रूप से समझाया गया है और यह बताया गया है कि किस नाड़ी में कौन -सा देवता निवास करता है। उसका अर्थ यही है कि उस समय जो नाड़ी चल रही है उस देवता के गुणों का भी संचार हो रहा होगा। (नाड़ियों की इस रचना पर कभी विस्तृत प्रकाश डालेंगे) इसी उपनिषद् में 39 से लेकर 47 लोकों के प्रवाह की संगति बैठाते हुए शास्त्रकार ने बताया है कि-
विश्वोदराभिघायास्तु भगवान्यावकः पतिः इडायां चन्द्रमा नित्यं चरत्येव महापुने। 36-47,
इड़ा नाड़ी में चन्द्रमा और पिंगला में सूर्य नित्य प्रति संचरण करते हैं, पिंगला से इड़ा में जो संवत्सर से सम्बन्धित प्राणायाम सूर्य का संक्रमण होता है, उसे ही वेदान्त वेत्तागण उत्तरायण कहते हैं, इसी प्रकार इड़ा से पिंगला में सूर्य का संक्रमण होना दक्षिणायन कहा गया है। हे पुरुष श्रेष्ठ ( जब प्राण इड़ा और पिंगला की संधि में पहुँचता है। उस समय देह में ही अमावस्या कहते हैं। प्राण मूलाधार में प्रविष्ट होता है, तब तत्त्व-ज्ञानी महर्षियों ने अन्तिम विषुव योग में स्थित होना बताया है। सभी उद्वास और निःश्वास मास संक्राति माने गये हैं। इड़ा द्वारा जब प्राण कुण्डलिनी स्थान पर आ जाता है, तब चन्द्र ग्रहण का समय कहा जाता है, परन्तु जब पिंगला नाड़ी से प्राण कुण्डलिनी पर आता है, तब सूर्य ग्रहण का समय होता है।
यह गणित इतना सच्चा है कि प्राचीन समय में लोग बिना किसी गुणा-भाग के सूर्य और चन्द्रमा के ग्रहण की घोषणा कर दिया करते थे। यह सब इस जीवन तत्त्व के संचरण की गति के ज्ञान के कारण ही था।
शेषनाग भगवान का फणि, पृथ्वी का धारण और जीवन के मूल होने का रहस्य इन पंक्तियों में बताया गया है। सर्प में जिह्वा और होती है, जिह्वा का काम रसास्वादन करना होता है। शेषनाग की हजार फणि में हजारों जीभें हैं, जो बाहर और भीतर लपलपाती रहती हैं। सहस्रार के हजार दलों पर फैली हजारों नाड़ियों से चेतना भी, विश्व सौंदर्य का रसास्वादन करती है, अर्थात् जब मानसिक चेतना को ध्यानावस्थित कर (जैसा कि भगवान बुद्ध के चित्रों में दिखाया गया है।) बाह्य जगत से सम्बन्ध जोड़ते हैं तो संसार के सौंदर्य का आनन्द मिलता है पर उसे अन्तर्मुखी कर लेते हैं तो साधक यह देखकर आश्चर्यचकित रह जाता है कि भीतर भी वही आनन्द भरा हुआ है। सहस्रार शक्तियों से विश्व-व्यापी हलचलों का भी पता चलता है और शरीर व्यापी शक्तियों का भी। सर्प के जीभ लपलपाने की यह क्रिया भी सर्प की गति से मेल खा जाती है।
इन्हीं सब तात्त्विक रहस्यों के लिए एक नाम चुना जाना था, वह ‘शेषनाग’ चुना गया जो पूर्ण वैज्ञानिक और सत्य है।
लन्दन के म्यूजियम में एक ऐसे कीड़े का शव सुरक्षित है, जिसने सैंकड़ों यात्रियों से भरी एक एक्सप्रेस ट्रेन की एक भयंकर दुर्घटना से रक्षा की। यद्यपि यह घटना एक संयोग मात्र सी लगेगी पर विचार की गहराई में उतर कर देखें तो उसमें परमात्मा की करुणा ही सन्निहित जान पड़ेगी।
हुआ यह कि एक एक्सप्रेस गाड़ी सैंकड़ों यात्रियों को लेकर तेजी से जा रही थी। इस गाड़ी में महारानी विक्टोरिया भी यात्रा कर रही थीं। घना कोहरा छाया हुआ था। 500 गज दूर की वस्तु भी दिखाई नहीं देती थी।
तभी ड्राइवर को कोई भीमकाय पशु जैसी कोई वस्तु सामने खड़ी दिखाई दी। ऐसा जान पड़ा कि यदि ब्रेक न लगाया जायेगा तो दुर्घटना हुए बिना न रहेगी।
सारी शक्ति लगातार ड्राइवर ने ब्रेक लगाया। गाड़ी रुकने लगी, अब तक वह दैत्याकार वस्तु साफ चमक रही थी। गाड़ी रुक गई तो ड्राइवर उतर कर नीचे आया पर ऊपर से दिखाई देने वाली वह आकृति दूर तक ढूँढ़ने पर भी न मिली, हाँ यह पता अवश्य चल गया कि थोड़ी दूर पर नदी का पुल है, वह टूटा हुआ है।
यह खबर महारानी विक्टोरिया को दी गई। उन्होंने आज्ञा दी, उस भयंकर दुर्घटना रोकने वाले वीर व्यक्ति की अविलम्ब खोज की जाये पर उसका कहीं कोई पता न चला।
अब ड्राइवर फिर से रेलगाड़ी पर चढ़ा तब पता चला कि वह तो एक छोटा सा कीड़ा था, जो सर्चलाइट में फँस गया था। बिजली कि किरणें और शीशे के संयोग से उसी की छाया पहाड़ जैसी भारी दिखाई दे रही थी। महारानी के आदेश से इस कीड़े को अजायबघर में प्रतिष्ठित किया गया।
अपनों से अपनी बात का क्रम बारी रखते हुए आत्मकथा तो नहीं कहेंगे पर अपनी अनुभूतियों की चर्चा इसलिए करेंगे कि वे जहाँ हमारा मन हल्का करती हैं वहाँ सुनने वालों के लिए भी प्रेरणाप्रद है। आत्मकथा कहने के लिए कई परिजन आग्रह करते रहते हैं पर उसे पूर्णरूपेण बता सकना तब तक लोकहित की दृष्टि से उचित न होगा, जब तक हमारा शरीर जीवित है। छिपाना हमें किसी से कुछ नहीं पर यह तो ध्यान रखना ही है कि हमारी कोई विशिष्ट परिस्थितियों की उपलब्ध हुई अनुभूति दूसरों के लिए उचित मार्ग-दर्शन करेगी या अनुचित।
छिपाव वाले हमारे जीवन पक्ष की अगणित घटनायें इस स्तर की हैं, जिन्हें चमत्कारपूर्ण कहा जा सकता है। कुछ उच्च भूमिका में विकसित तपस्वी सिद्ध पुरुषों की अलौकिकताएँ हमने देखी हैं। उनका वर्णन करना तभी उचित है, जब उन घटनाओं की प्रामाणिकता सिद्ध की जा सके अन्यथा लोग उस वर्णन को असत्य कहेंगे और व्यर्थ का वितन्डावाद बढ़ेगा। समय आ रहा है, जब मनुष्य में छिपी अगणित शक्तियों का प्रकटीकरण सम्भव होगा, उस स्थिति के न आने तक उन वर्णनों का न करना ही ठीक है ताकि तर्क बुद्धि वालों को असत्य किम्वदन्तियाँ फैलाने का आक्षेप न लगाना पड़े और कुछ धूर्त जो बाजीगरी की तरह चमत्कार सुना, दिखाकर उल्लू सीधा करते रहते हैं- अपने समर्थन में हमारे कथन को प्रस्तुत करने का अवसर न मिले।
छिपाव का दूसरा पक्ष वह है, जिसमें हमने किन्हीं के लिए अपनी तपश्चर्या के छोटे-बड़े अंश दिये और उनसे उन्हें आश्चर्यजनक भौतिक एवं आध्यात्मिक लाभ हुए। इनका वर्णन हमें अपने मुँह से नहीं करना है। विज्ञापन से दान का महत्व नष्ट हो जाता है। फिर जो लोग उन महानताओं को भुला बैठे हैं, उन पर अहसान थोपना और याद दिलाना भी उचित नहीं। दूसरे अपना अहंकार बढ़ सकता है। तीसरे वे लोग हमें और भी अधिक घूरने लग सकते हैं, जो आशीर्वाद को जबानी जमा-खर्च मानते हैं और सोचते हैं कि उनकी जुबान हिलाने भर का बोझ पड़ेगा और हमारा काम बन जायेगा। वस्तुतः होता यह है कि जीभ हिलाकर कोई आशीर्वाद न तो दिया जा सकता है और न वह सफल होता है।
इस प्रकार के प्रत्येक अनुदान के पीछे बहुत अधिक शक्ति व्यय करनी पड़ती है और कई बार तो वह कितने ही वर्षों की अति कष्टपूर्वक उपलब्ध की हुई कमाई होती हैं। लोग तो लोग हैं, उन्हें न तो दूसरे के त्याग का मूल्य समझना है और न कम से कम कृतज्ञ मनोभूमि तक बनाये रखना है। मुफ्त की चीज का कोई आखिर कुछ मूल्य समझे भी क्यों? जब मुफ्त में ही - दर्शन करने, पैर छूने माला पहना देने मात्र से बहुमूल्य अनुदान मिल सकते हैं तो उन्हें पाने का लोभ कोई क्यों संवरण करे? भीड़ ऐसे ही लोगों की जमा अभी भी होती है। पीछे तो उसकी ऐसी बाढ़ आयेगी कि उससे पिण्ड छुड़ाना कठिन हो जायेगा व अपने जीवनोद्देश्य की बात कहने तक का अवसर न मिलेगा। यों सुनता तो कोई अभी भी नहीं है पर यदि हमारे द्वारा सम्भव दिव्य सहायताओं का अधिक निश्चित हो जाये तब तो हर सम्बन्धी उसी की रट लगाएगा। हमारी बात सुनने, समझने का तो उसका उतावला मन तैयार ही न होगा। इस झंझट से बचने के लिए जितना प्रकट हो चुका है, उतना ही पर्याप्त मान लिया है, उससे अधिक जो अधिक आश्चर्यजनक एवं अलौकिक है छिपाये ही रखा है। पूरी आत्मकथा न बताने में कोई ऐसे दुराचरण कारण नहीं हैं, जिनकी चर्चा करते हमें लज्जा और ग्लानि का अनुभव हो सफेद कपड़ा पहनकर आये और बिना दाग-धब्बे की चादर लेकर विदा हो रहे हैं। सज्जन ओर सहृदय व्यक्ति की जिन्दगी हमने जी ली। कर्तव्यों की अवहेलना और नैतिक मर्यादाओं के उल्लंघन का कोई ऐसा अवसर अब तक नहीं आया जिसे छिपाने की आवश्यकता पड़े।
कुछ ऐसे कारण एवं अनुभव भी छिपाव के कारण हैं जो अभी परिपुष्ट नहीं हुए और जिन्हें चुनौती देकर सिद्ध करने की स्थिति परिपक्व नहीं हुई। जैसे यह एक तथ्य है कि हमने अपनी चेतना के पाँच स्तरों- अन्नमय, मनोमय, प्राणमय, विज्ञानमय, आनन्दमय इन पाँच कोशों को गायत्री की उच्चस्तरीय उपासना के आधार पर एक सीमा तक विकसित किया है और उनसे पाँच स्वतन्त्र व्यक्तियों की तरह काम लिया है। फिर भी यह स्थिति उतनी पक्की नहीं कि उसका सदा सार्वजनिक परीक्षण कराके एक अभिनव सिद्धान्त की पुष्टि का आधार प्रस्तुत किया जा सके। सम्भव है कुछ समय में- शायद इसी जीवन में वह स्थिति आ जाय कि हम अपने को संसार के सामने परीक्षण के लिए प्रस्तुत करें कि एक ही शरीर के भीतर पाँच सत्तायें एक ही समय में पाँच व्यक्तियों का काम कैसे निपटा सकता है।
परिजनों में से हर कोई जानता है कि 16 से 40 तक की आयु हमने प्रतिदिन 6 घण्टे रोज गायत्री उपासना में बिताई। यह 18 वर्ष ही ऐसे रहे हैं, जिनमें सार्वजनिक क्षेत्र में प्रवेश कर कुछ काम किया है। इस थोड़ी अवधि में हमारे पाँच प्रमुख कार्य हुए हैं- (1) भारतीय धर्म के आर्ष साहित्य का आदि से अन्त तक सरलीकरण एवं संसार भर में प्रसार, (2) गायत्री महाविद्या का अन्वेषण उसका विश्वव्यापी विस्तार, 50 लाख व्यक्तियों को नैष्ठिक उपासना की शिक्षा-दीक्षा चार हजार शाखाओं वाले गायत्री परिवार संगठन का सृजन, गायत्री तपोभूमि जैसी अनुपम संस्था का निर्माण, (3) गायत्री यज्ञ के माध्यम से धर्म भावनाओं का व्यापक उभार, देशभर में हजारों विशालकाय सम्मेलन, मथुरा का वह सहस्र कुण्ड गायत्री यज्ञ जिसमें 4 लाख व्यक्ति एकत्रित हुए थे। उस शृंखला का अभी भी अति उत्साह के साथ प्रचलन। (4) युग-निर्माण योजना का जन-मानस परिवर्तन एवं विचार-क्राँति का विश्व-व्यापी अभियान, इस सन्दर्भ में लगभग 500 पुस्तकों का लेखन, दो पत्रिकाओं का मथुरा से प्रकाशन, 7 हजार झोला पुस्तकालयों का प्रचलन, नव-निर्माण के विशाल साहित्य का संसार की प्रमुख भाषाओं में अनुवाद प्रकाशन। इस प्रयोजन में हजारों कार्यकर्ताओं का समावेश। (5) सतत तप-साधना द्वारा उपार्जित शक्ति का सत्पात्रों की भौतिक एवं आध्यात्मिक प्रगति के लिए अनुदान की व्यवस्था।
यह पाँचों ही कार्य इतने बड़े परिणाम में हुए हैं और उनकी शाखा, प्रशाखाएँ इतनी अधिक फूटी हैं कि उनमें से प्रत्येक की कम से कम एक शरीर द्वारा करने पर कम से कम साठ-साठ वर्ष का एक पूरा जीवन लगना चाहिये। पाँच अति परिष्कृत व्यक्ति सारे जीवन उस कार्य में पूरी तरह लगें और उनके पास विपुल साधन हों तभी यह कार्य सम्भव हो सकते हैं। एक व्यक्ति मात्र 18 वर्षों में उन्हें किसी भी प्रकार नहीं कर सकता। इतने पर भी यह कार्य जिस सफलता से हुए उनका रहस्य यही है कि दिखने में एक शरीर द्वारा यह कार्य होते रहते हैं, वस्तुतः एक ही घोंसले में बैठे रहने वाले पाँच पक्षी पाँच दिशाओं में उड़ कर पाँच प्रयोजन पूरे करते रहे थे। इस अचम्भे से भरी सचाई के अनेक प्रमाण ऐसे हे जो अगले ही दिनों इस वस्तुस्थिति को प्रकट कर देंगे पर अभी इस स्थिति में परिपक्वता नहीं आई और प्रकटीकरण की आज्ञा नहीं मिली। इसलिए उस तथ्य को सार्वजनिक रूप से उद्घोषित नहीं किया गया और न उसकी प्रामाणिकता के लिए चुनौती दी गई है।
ऐसे ही कुछ कारण हैं जिनको समग्र आत्मकथा कह सकना सम्भव न होगा पर जो लोकहित में है, उस सभी को परिजनों से कह कर जायेंगे, उससे भले ही किसी का लाभ न भी होता पर हमें अपना चित्त हल्का कर लेने और दूसरों की जानकारी में एक कड़ी जोड़ देने का अवसर तो मिल ही जायेगा। हमारे जीवन के रहस्यमय भाग बाद में प्रकट हों यह दूसरी बात है पर अभी तो इतना ही पर्याप्त होगा कि हमारे अनुभवों, निष्कर्षों और अभिव्यंजना का जान लिया जाय।
पिछले दिनों की भाँति ही अगले पाँच कार्य हमारे सामने हैं। ये पिछलों की तुलना में कम महत्त्वपूर्ण नहीं है। इनकी थोड़ी चर्चा इन पंक्त्तियों में कर देना कुछ अनुपयुक्त न होगा।
(1) हमारी एक ही प्रमुख सम्पदा है-प्यार इसी के बल पर तप, संतोष, विवेक, सेवा, स्वाध्याय, श्रम आदि अन्य सद् प्रवृत्तियों को स्थिर रूप से प्राप्त करने का अवसर मिला है। आत्म-विश्लेषण चिन्तन, मनन और अन्तःमन्थन के आधार पर यह सुनिश्चित रूप से कह सकते हैं कि हमें यदि अन्तरंग विभूतियाँ प्राप्त हुई हैं और उनके आधार पर बाह्य जगत में कुछ हलचलें उत्पन्न करने का अवसर मिला है तो इसका एक मात्र कारण हमारे अन्तःकरण में आदि से अन्त तक लबालब भरा हुआ प्यार ही है। ईश्वर को माध्यम बनाकर उसकी कृषि की गई और जब वह उगा और फला तो उसका प्रकाश निकटवर्तियों से लेकर दूरवर्तियों तक व्यापक क्षेत्र में फैला। दूसरों ने उससे लाभ उठाया और हम स्वयं स्वर्गीय उल्लास की अनुभूति हर घड़ी करते रहे। उसी आवेश में लोक-सेवा और आत्मबल संवर्धन के वे कार्य बन पड़े जो वस्तुतः तुच्छ हैं पर दूसरे उन्हें बहुत बढ़ा-चढ़ा देखते हैं।
गायत्री-उपासना जीवन-साधना नव-निर्माण आदि की कई शिक्षायें परिजनों को देते चले आ रहे हैं, अब विचार है अगले दो-ढाई वर्षों में प्रेम को अन्तरंग में उगाने और उसे विकसित करने की अपनी अनुभूतियाँ भी लोगों को बतायें और इस अमृत को उपलब्ध करने की शिक्षा देते चलें। यह साहित्य का नहीं समीपता का विषय है, सो सोचते हैं कि जितने अधिक परिजनों से, जितने अधिक समय तक सान्निध्य और सामीप्य सम्भव हो प्राप्त करें और अपनी छूत दूसरों को भी लगाते चलें। लोग प्यार करना सीखें। हममें, अपने आपमें, अपनी आत्मा और जीवन में, परिवार में, समाज में, कर्तव्य में और ईश्वर में - दसों-दिशाओं में प्रेम बिखेरना और उसकी लौटती हुई प्रतिध्वनि का भाव भरा अमृत पीकर धन्य हो जाना, यही जीवन की सफलता है।
इच्छा है जिस प्रकार भी सम्भव हो, अपने परिवार को अपनी इस मूल प्रवृत्ति से परिचित करें और जहाँ जितनी मात्रा में सम्भव हो, इस अमृत उद्भव के क्रिया-कलाप को आगे बढ़ाने में पूरा-पूरा सहयोग करें। प्रेम की विभूति के यदि थोड़े-थोड़े कण भी लोग उपलब्ध कर सकें तो निश्चय है कि देवत्व उनके चरणों में दौड़ता चला आयेगा। उपाय सोचेंगे और ढूँढ़ेंगे कि किस प्रकार अपने परिवार में प्रेम की प्रवृत्ति का अधिकाधिक उद्भव और अभिवर्धन सम्भव है। जो सूझेगा उसे पूरी तत्परता से कार्यान्वित करेंगे, नये मानव का - नये विश्व का तत्त्व-दर्शन यह प्रेम धर्म ही तो होगा।
(2) अगले ढाई वर्षों में युग-निर्माण योजना की मजबूत आधारशिला रख जाने का अपना मन है। यह निश्चित है कि निकट भविष्य में ही एक अभिनव संसार का सृजन होने जा रहा है। उसकी प्रसव पीड़ा में अगले दस वर्ष अत्यधिक अनाचार उत्पीड़न, दैवकोप, विनाश और क्लेश, कलह से भरे बीतने हैं। दुष्प्रवृत्तियों का परिपाक क्या होता है, इसका दण्ड जब भरपूर मिले लेगा, तब आदमी बदलेगा यह कार्य महाकाल करने जा रहा है। हमारे हिस्से में नवयुग की आस्थाओं और प्रक्रियाओं को अपना सकने योग्य जन-मानस तैयार करना है। लोगों को यह बताना है कि अगले दिनों संसार का एक राज्य, एक धर्म, एक अध्यात्म, एक समाज, एक संस्कृति, एक कानून, एक आचरण, एक भाषा और एक दृष्टिकोण बनने जा रहा है, इसलिए जाति, भाषा, देश, सम्प्रदाय आदि की संकीर्णताएँ छोड़ें और विश्व-मानव की एकता की, वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना स्वीकार करने के लिए अपनी मनोभूमि बनायें।
लोगों को समझाना है कि पुराने में सार भाग लेकर विकृतियों को तिलाञ्जलि दे दें। लोक-मानस में विवेक जागृत करना है और समझाना है कि पूर्व मान्यताओं का मोह छोड़कर जो उचित उपयुक्त है केवल उसे ही स्वीकार शिरोधार्य करने का साहस करें। सर्वसाधारण को यह विश्वास करना है कि धन की महत्ता का युग अब समाप्त हो चला, अगले दिनों व्यक्तिगत सम्पदायें न रहेंगी, धन पर समाज का स्वामित्व होगा। लोग अपने श्रम एवं अधिकार के अनुरूप सीमित साधन ले सकेंगे। दौलत और अमीर दोनों ही संसार से विदा हो जायेंगी। इसलिए धन के लालची बेटे-पोतों के लिए जोड़ने-जाड़ने वाले कंजूस अपनी मूर्खता को समझें और समय रहते स्वल्प संतोषी बनने एवं शक्तियों को संचय उपयोग से बचाकर लोकमंगल की दिशाओं में लगाने की आदत डालें। ऐसी-ऐसी बहुत बातें लोगों के गले उतारनी हैं, जो आज अनर्गल जैसी लगती हैं।
संसार बहुत बड़ा है, कार्य अति व्यापक है, हमारे साधन सीमित हैं। सोचते हैं एक मजबूत प्रक्रिया ऐसी चल पड़े जो अपने पहिये पर लुढ़कती हुई - उपरोक्त महान् लक्ष्य को सीमित समय में ठीक तरह पूरा कर सके। युग-निर्माण योजना का केन्द्र-बिन्दु अभी गायत्री तपोभूमि में बनाया है। इसे अगले दिनों समस्त विश्व में, अगणित योजनाओं और प्रक्रियाओं के रूप में विकसित होना है, सो विचार यह है कि अगले ढाई वर्षों में इतने व्यक्ति, इतने साधन और इतने सूत्र उपलब्ध हो जाएँ, जिससे जिससे हमारी सन् 2000 तक चलने वाली तीस वर्षीय योजन का क्रम विस्तार नियत निर्धारित गति से यथावत होता रहे। इन ढाई वर्षों में ऐसा साधन तन्त्र खड़ा कर देंगे, जो नव-निर्माण की - विचार-क्रिया की-असम्भव को सम्भव बनाने की-विश्व के कायाकल्प की भूमिका सफलतापूर्वक सम्पादित कर सके।
(3) उपरोक्त दो कार्य ऐसे हैं, जो ढाई वर्षों में संतोषजनक स्थिति पकड़ लें। तीन काम ऐसे हैं, जो यहाँ से चले जाने के बाद आरम्भ करेंगे और तब तक उसी प्रकार चलाते रहेंगे, जब तक यह शरीर जीवित रहेगा। ऐसे कार्यों में पहला उग्र तपश्चर्या, दूसरा लुप्त प्रायः अध्यात्म की शक्ति, विद्या की शोध-साधना तीसरा है, परिजनों की अभीष्ट सहायता। हम जहाँ कहीं भी रहेंगे, वहीं से उपरोक्त तीन कार्य अनवरत रूप से करते रहेंगे।
यह एक सुनिश्चित तथ्य है कि पिछले दिन, रामकृष्ण परमहंस, योगी अरविन्द और महर्षि रमण की अनुपम साधनायें भारत के भाग्य परिवर्तन के लिए हुई। उनमें सूक्ष्म वातावरण को ऐसा गरम किया कि कितने ही आश्चर्यजनक चक्रवात अनायास ही प्रकट हो गये। पिछले थोड़े ही दिनों में भारत ने उच्चकोटि के नेता दिये जिनकी तुलना अन्यत्र नहीं मिलती। इन महामानवों ने जनता को आश्चर्यजनक उत्साह दिया और असम्भव लगने वाली राजनैतिक स्वतन्त्रता सम्भव करके दिखा दी। अभी भाग्य निर्माण का अधिकार मात्र मिला है। अभी करना तो सब कुछ बाकी पड़ा है।
भारत को अपना घर ही नहीं सम्भालना है। हर क्षेत्र में विश्व का नेतृत्व भी करना है। इसके लिए उपयुक्त स्थिति उत्पन्न कर सकने वाले ऐसे महामानवों की आवश्यकता है, जो स्वतन्त्रता संग्राम वालों से भी अधिक भारी हों। लड़ने से निर्माण का कार्य अधिक कुशलता और क्षमता का है, सो हमें अगले दिनों ऐसे मूर्धन्य महामानवों की आवश्यकता पड़ेगी, जो अपने उज्ज्वल प्रकाश से सारा वातावरण प्रकाशवान कर दें।
इसके लिए उपरोक्त तीन तपस्वियों की बुझी पड़ी परम्परा को फिर सजीव करना है और सूक्ष्म लोक को फिर इतना गरम करना है कि उसमें से उत्कृष्ट स्तर के महामानव पुनः अवतरित हो सकें। गंगावतरण के लिए भागीरथ का तप आवश्यकता था, नये युग की सुधा-सरिता का अवतरण भी ऐसे ही तप की अपेक्षा करता है। देवत्व को निगल जाने वाले वृत्तासुर का वध दधीचि के अस्थि-पिंजर से बने वज्र की अपेक्षा करता था। दुर्भावनाओं और दुष्प्रवृत्तियों का अनाचार पिछले रावण, कंस, हिरण्यकश्यप आदि से भी बड़ा-चढ़ा हैं, उसका निराकरण भी पूर्वकाल जैसे अस्थि वज्र की अपेक्षा करता है, हमें इसके लिए आगे बढ़ना होगा, जो बढ़ भी रहे हैं। अगले दिन जिन महान् प्रयोजन के लिए समर्पित होने जा रहे हैं उसे देखते हुए-वर्तमान विरह वेदना के बावजूद-हमें और हमारे परिवार को गर्व ही होगा कि हमारे कदम जिधर बढ़े वे उचित और आवश्यक थे।
(4) वर्तमान भौतिकवादी मनोवृत्तियों का विकास भौतिक विज्ञान क साथ-साथ हुआ है। विज्ञान सदा मनुष्य के भौतिक और आत्मिक जीवन को प्रभावित करता है। आधुनिक विज्ञान का आधार भौतिक है, ‘फलतः उसका भावनात्मक प्रभाव भी वैसा ही होना चाहिये। आज लोग भौतिक दृष्टि से सोचते हैं और इन्हीं आकांक्षाओं से प्रभावित होकर अपनी गतिविधियों निर्धारित करते हैं। यही है आज की विपन्न परिस्थितियों का विश्लेषण। प्राचीनकाल में अध्यात्मवाद का प्रचलन था। आत्मा की अनन्त शक्ति का प्रयोग करक लोग अपनी आन्तरिक और भौतिक प्रगति का पथ प्रशस्त करते थे, तब लोक मानस भी वैसा ही था और रीति-नीति में आध्यात्मिक आदर्शों का समावेश रहने से सर्वत्र स्वर्गीय सुख-शान्ति विराजती थी।
हमारे प्राचीन अध्यात्म की केवल ज्ञान शाखा जीवित है। विज्ञान शाखा लुप्त हो गई। धर्म, नीति, सदाचरण आदि की शिक्षा देने वाले ग्रन्थ एवं प्रवक्ता तो मौजूद है पर उस विज्ञान की उपलब्धियाँ हाथ से चली गयी जो शरीर में विद्यमान् अन्नमय,मनोमय, प्राणमय, विज्ञानमय और आनन्दमय शक्ति-कोशों की क्षमता का उपयोग करके व्यक्ति और समाज की कठिनाइयों को हल कर सकें। पातंजलि योग दर्शन, मंत्र महार्णव, कुलार्णव तंत्र आदि शक्ति विज्ञान के ग्रन्थ तो कई है पर उनमें वर्णित सिद्धियों को जो प्रत्यक्ष कर दिखा सके, ऐसा मिश्रित साधन नहीं के बराबर शेष गये हैं।
आवश्यकता इस बात की है कि उन लुप्त विद्याओं को फिर खोज निकाला जाय और उसे सार्वजनिक ज्ञान के रूप में इस प्रकार प्रस्तुत किया जाय कि प्राचीनकाल की तरह उसका उपयोग सुलभ हो सके। ऐसा सम्भव हुआ तो भौतिक विज्ञान को परास्त कर पुनः अध्यात्म विज्ञान की महत्ता प्रतिष्ठापित की जा सकेगी और लोकमानस को उस सतयुगी प्रवाह की ओर मोड़ा जा सकेगा जिसकी हम अपेक्षा करते हैं।
हिमालय गंगातट, एकांत, जन-सम्पर्क पर प्रतिबन्ध जैसी कष्ट साध्य गतिविधियाँ अपनाने के पीछे एक रहस्य यह भी है कि वह प्रदेश एवं वह वातावरण ही उच्च आध्यात्मिक स्तर की शोधों के लिये उपयुक्त हो सकता है। स्थान की दृष्टि से वह स्थान अध्यात्म शक्ति तत्त्वों का ध्रुव केन्द्र या हृदय ही कहा जा सकता है, जहाँ हमें अगले दिनों जाना, रहना हैं वहाँ ऐसी विभूतियाँ अभी जीवित है, जो इस महान् कार्य में हमारा मार्ग-दर्शन कर सकें। इस प्रकार की शोध-साधना अपने व्यक्तिगत वर्चस्व के लिये नहीं, विशुद्ध रूप से लोक-मण्डल के लिये करने जा रहे हैं और जो कुछ हमें मिलेगा, उसको राई-रत्ती सार्वजनिक ज्ञान के रूप में प्रस्तुत करते रहेंगे। जब तक यही करना है। जीवन का अन्त होने से पूर्व शरीर को वैज्ञानिक विश्लेषण के लिये इसलिये वसीयत किया है कि शरीर शास्त्री यह जान सकें कि अध्यात्म साधना से देह के किन रहस्यमय शक्ति संस्थानों को कितना विकसित किया जा सकता है और इस प्रकार के विकास से मनुष्य जाति क्या लाभ उठा सकती है?
(5) हमारी अन्त स्थिति कुछ ऐसी है कि जिनका रत्ती भर भी स्नेह हमें मिला है, उनके प्रति पर्वत जितनी ममता सहज ही उमड़ती है। गत 18 वर्षा में हमने एक विशाल भव्य परिवार बना लिया है। गायत्री परिवार और युग-निर्माण परिवार के माध्यम से तथा व्यक्तिगत स्नेह सम्पर्क से अनेक परिजन हमारे आस-पास इकट्ठे हो गये है और सहज स्वभाव इनमें इतना मोह जुड़ गया है कि उसमें तनिक सी शिथिलता आने की घड़ी में हमारी मनोभूमि चरमरा उठी है। अखण्ड-ज्योति के गत दो अंक में अपना उफान व्यक्त करके थोड़ा चित्त हल्का कर लिया गया है, अन्यथा कुछ दिनों लगता रहा, विकलता से हमारे शिर की कोई नस फुट जाएगी। पढ़ने वालों ने व्यर्थ भले ही समझा हो पर हमारे लिये यह एक तत्काल उपचार था। अब चित्त थोड़ा हल्का हुआ है। फिर भी प्रकृति तो बदल नहीं गई। जो हमें श्रद्धा,सद्भावना, आत्मीयता एवं क्षमता की दृष्टि से देखते है, देखेंगे, प्यार करते हैं, प्यार करेंगे, उनसे विमुख नहीं हो सकते। उनके साथ भी सम्पर्क किसी न किसी रूप से बनाये रहना है।
विशेषतया हमारा मोह उनके प्रति है, जो आयु की दृष्टि से बड़े हो जाने पर मनःस्थिति के अनुसार बालक मात्र हैं। जो जरा-जरा-सी कठिनाइयों को बढ़ा-चढ़ा कर देखते हैं, तनिक-सी आपत्ति आने पर कातर हो उठते है। प्रगति के लिये जिन्हें अपनी शक्ति अपवित्र दीखती है, जिन्हें भीति और निराशा घेरे रहती है। ऐसे बालक हमारे पास सहायता के लिये सदा दौड़ते रहे हैं, उन्हें धमकाते, समझाते तो रहे है पर साथ ही यदि कुछ पास में रहा है तो देने में भी कंजूसी नहीं की है। यह सहारा तकने वाले कमजोर और छोटे बालक हमारी अपेक्षा के नहीं, वात्सल्य के ही अधिकारी रहे है। भले ही हम उनकी भीरुता और परावलम्बी वृत्ति को जीवन अभियान में झिड़कते भी रहे हों।
हमारे जाने का सबसे अधिक आघात इन बालकों को ही लगा है। उनकी कठिनाई वास्तविक है, इसकी उपेक्षा हमसे भी नहीं बन पड़ेंगी। सो एक मार्ग निकाल लिया गया है। माताजी-हमारी धर्मपत्नी भगवतीदेवी - उन्हें वही दुलार और सहायता देती रहेंगी, जो अब तक हम देते रहे हैं। पहले माताजी का मथुरा छोड़ने का विचार था पर अब वे हिमालय और गंगातट पर एक ऐसे स्थान पर रहेंगी, जहाँ लोग उनसे संपर्क स्थापित कर सकें और हमारा सम्बन्ध भी उनसे बना रहे। हरिद्वार और ऋषिकेश बीच गंगातट पर जहाँ सात ऋषि तप करते थे और गंगा की वह सात धारायें हैं, उस एकान्त भूभाग में डेढ़ एकड़ एक छोटी-सी जमीन प्राप्त कर ली गई है और उसमें फलों के पेड़ इसी वर्ष लगा दिये गये हैं। खाने को फल, शाक, पहनने को दो क्यारी कपास जिसका सूत कात कर तन ढक ले, एक गाय जिससे अखण्ड दीपक को घी मिल जाय और छाछ आहार में प्रयुक्त होती रहें एक कर्मचारी जो पेड़ पौधे और गाय संभालता रहे, रहने को चार कुटियाँ।
इस प्रकार की व्यवस्था वहीं बनाई जा रही है जो धीरे-धीरे ढाई वर्ष में पूरी हो जायेगी। माताजी वहीं रहा करेंगी। जिस प्रकार हमारे 24 वर्षों तक पुरश्चरण चले उनके भी चलते रहेंगे और जो शक्ति उन्हें प्राप्त होगी, उसे अभाव ग्रस्त और राह पीड़ित बालकों को बाँटते हुए अपना मातृत्व सफल करती रहेंगी। इस प्रकार जो हमारे जैसे अपने को असहाय अनुभव करते है, उन्हें वैसी कठिनाई का सामना न करना पड़ेगा।
इस प्रयोजन के लिये माताजी की शक्ति कम पड़ेगी तो हम उसकी पूर्ति करेंगे। शोध-साधन से जो ज्ञान मिलेगा, उसे भी सर्वसाधारण के लिये माताजी के माध्यम से ही प्रस्तुत करते रहेंगे। इस प्रकार प्रकारान्तर से हमारा सम्पर्क भी अपने विशाल परिवार से बना रहेगा और माताजी दोनों को जोड़ने वाली एक कड़ी के रूप में अपना कार्य पूरा करती रहेगी। सारे जीवन भरे हम देते ही रहें है अच्छा नहीं लगता कि इस प्रवाह को अब बन्द कर दें। देने की अच्छी परम्परा को जारी रखें, उसके लिये यह माध्यम ढूँढ़ लिया गया है। हमारे मार्ग दर्शक ने माताजी को यह परामर्श दिया तो उन्होंने उस हर्ष के आँसू भर कर शिरोधार्य ही किया। यद्यपि उन्हें अपने निज के बच्चे छोड़ते हुए हमारी तरह व्यथा होती है पर वे उसे हमारी तरह दूसरों के आगे प्रकट करने की आवश्यकता नहीं समझती। शरीर की ही तरह वे मन से भी निस्सन्देह हमसे अधिक भारी है।
अगले दिनों के लिये हमारे पाँच कार्यक्रम है, जिनका उल्लेख ऊपर की पंक्तियों में कर दिया गया। अब तक जिन पाँच कार्यों में हमें 18 वर्ष लगाने पड़ें वे अपने स्थान पर महत्त्वपूर्ण थे पर आगे जो करने है, वे भी कम मूल्यवान नहीं है। उनकी अपनी उपयोगिता और महत्ता है। इस जीवन का ऐसा सदुपयोग होते देखकर हमें जो सन्तोष है, उससे स्वजनों से प्रत्यक्ष सम्बन्ध छोड़ने की जो तीव्र तड़पन, बिरह-वेदना उठती है उसका एक हद तक समाधान किसी प्रकार हो ही जाता है। यद्यपि वह कसक बार-बार हमें बुरी तरह व्यथित और विचलित कर देती है।
पिछले दिनों जिन पाँच कार्यों को करते रहे हैं, उसके लिए एक यही शरीर काफी नहीं था, जो सबको दिखता है। इन प्रयोजनों के लिए हमें अपने पाँच कोशों में से पाँच ऐसे व्यक्तित्व उगाने पड़े हैं, जो दिखते तो इसी घोंसले में रहते हुए हैं पर काम अलग-अलग मोर्चों पर लड़ने वाले पाँच योद्धाओं जैसा करते हैं। आगे के काम चूँकि अधिक बड़े, अधिक भारी और अधिक श्रम साध्य हैं। अस्तु उनके लिये समर्थता भी अधिक चाहिये। प्रयत्न यही करेंगे कि अन्नमय कोश, मनोमय कोश, प्राणमय कोश, विज्ञानमय कोश और आनन्दमय कोश इन पाँचों के अन्तराल में छिपी सामर्थ्य की और अधिक विकसित किया जाय, ताकि अधिक तीव्र शक्ति का उद्भव हो सके और उसके आधार पर सामने पड़े उत्तरदायित्वों का पर्वत उठाया जा सकना सम्भव बन सके।
उस सौभाग्य को कितना सराहें जिसने हमें पेट और प्रजनन के, तृष्णा और वासनाओं के उस आकर्षण से बचा लिया, जो नर-पशुओं को भव-बन्धनों में बाँधे रहने के लिये लौह जंजीरों का काम करते हैं, जिनमें जकड़ा हुआ प्राणी असह्य प्रताड़नायें सहता हुआ, मानव-जीवन जैसे अलभ्य अवसर को व्यर्थ विडम्बनाओं में गवाँ देता हैं। धन्य हैं, हमारे सौभाग्य जिसने हमें जीवनोद्देश्य के लिये कदम बढ़ाने का शौर्य और तथाकथित सम्बन्धी शुभ-चिन्तकों के मोह और अज्ञान भरे परामर्श, अनुरोध को ठुकरा देने का साहस प्रदान किया। यदि भीतर से यह पात्रता न उगी होती तो गुरुदेव का अनुग्रह और भगवान् का आशीर्वाद कहाँ मिल सका होता।
यह सौभाग्य जो हमारे ऊपर बरसा, हमारे भीतर से उगा, भगवान् करे हमारे सारे परिवार के ऊपर बरसे और हम सभी के भीतर से उगे, उपजे।
जिनके लिये सम्भव हो यह अलभ्य अवसर चूकें नहीं
जीवन विकास की महत्त्वपूर्ण दिशायें देने की दृष्टि से ज्येष्ठ और आश्विन मास में हर वर्ष गायत्री तपोभूमि में शिक्षण शिविरों की व्यवस्था होती चली आई है। अब चूँकि हमारा कार्यकाल समाप्त हो रहा है इस लिये शिक्षण का स्तर बहुत आगे बढ़ा दिया गया है और आवाहन किया गया है कि जिनके लिये सम्भव हो वे इन शिविरों में अवश्य सम्मिलित हों।
हमने जीवन के कई क्षेत्रों में कतिपय प्रकार के संघर्षों से जूझते हुए आशाजनक सफलतायें पाई हैं और कितने ही महत्त्वपूर्ण अनुभव एकत्रित किये हैं। इन शिविरों में अपने इन्हीं रहस्यमय अनुभवों को बताना, सिखाना है, ताकि वैसी ही प्रगति दूसरों के लिये भी सम्भव और सरल हो सके। पत्र-व्यवहार और साहित्य द्वारा हमारे विचार तो दूरवर्ती लोगों को प्राप्त होते रहे हैं पर प्राण शक्ति का लाभ उठा सकना समीपता से ही सम्भव है। गर्मी का लाभ आग की समीपता से ही मिलता है। सत्संग एवं सान्निध्य का भी उतना महत्व है। इससे जो मिलता है वह दूर रहने पर मिल सकना कठिन है। पारस्परिक सद्भावना, घनिष्ठता एवं आत्मीयता के अभिवर्द्धन के अतिरिक्त प्राण शक्ति का पारस्परिक प्रत्यावर्तन भी इस शिविर शृंखला का विशेष प्रयोजन है। जिनके लिये सम्भव हो उन्हें शिविरों में आने के लिये आग्रहपूर्वक इन पंक्तियों द्वारा आमन्त्रित किया जा रहा है। हर वर्ष ज्येष्ठ में नौ-नौ दिन के दो शिविर किये जाने से वे चार किये जायेंगे। (1) नौ दिनों में 24 हजार का एक गायत्री अनुष्ठान इस पुनीत सिद्धपीठ में हमारे समीप और संरक्षण में रह कर करना, घर पर किये हुए 24 लाख पुरश्चरण के बराबर फलप्रद होता है। सभी शिविरार्थी प्रायः 55555 एक अनुष्ठान उन दिनों करेंगे, जिससे उन्हें नया आत्म-प्रकाश प्राप्त हो। (2) हमारे जीवन निष्कर्ष एवं अनुभवों को प्रतिदिन दो प्रवचनों के रूप में सुनना एक अनुपम लाभ है। 18 प्रवचनों में हमारी अनुभव गीता के 18 अध्याय सुनने का एक अनोखा महत्व है। (3) व्यक्तिगत समस्याओं एवं कठिनाइयों पर आवश्यक विचार विनिमय, परामर्श तथा उन्हें सरल बनाने में सम्भव सहयोग। (4) ब्रज के लगभग सभी तीर्थों की सामूहिक यात्रा। यह चार लाभ ऐसे हैं, जिनसे इन शिविरों में आना एक अविस्मरणीय जीवन घटना की तरह सदा याद रहती है।
इस बार एक अन्य अनोखा कार्यक्रम भी है, जो कभी पहले नहीं हुआ और न आये होने की सम्भावना है। वह है अपनी कार्य पद्धति पर एक रंगीन फिल्म का निर्माण। युग-निर्माण योजना का आरम्भ और अन्त तथा बीच में हो चुके और होने वाले कार्यक्रमों का स्वरूप, यह सभी बातें एक कथानक के रूप में प्रस्तुत की जायेगी। इन्हीं पर एक पूरी फिल्म बनेगी। उसमें अभिनय कर्ता अपने शिविरार्थी हो होंगे। प्रयत्न यह किया जाएगा कि चारों शिविरों में आने वाले प्रायः सभी सदस्यों को उसमें किसी रूप में भाग लेने का अवसर मिल जाय। ताकि इन सभी की छवियाँ चित्र-बद्ध होकर एक चिरस्थायी स्मृति के रूप में विद्यमान् रहें। यह फिल्म समय-समय पर अपनी ही सिनेमा मशीनों से शाखाओं में दिखाने के लिये भेजे जाते रहें थे और परिवार के दूरगामी सदस्य भी इस माध्यम से परस्पर एक दूसरे के दर्शन का लाभ लेते रह सकेंगे। नव-निर्माण के कार्यक्रमों की जानकारी और प्रेरणा सर्वसाधारण को देने के लिये तथा परिजनों का परिचय एक दूसरे तक कराये रखने की दृष्टि से यह फिल्म व्यवस्था उपयोगी समझी गई और उसका प्रबन्ध किया गया।
गायत्री तपोभूमि में स्थान बहुत सीमित है। प्रवचन-हाल भी बहुत बड़ा नहीं है। इसलिये शिविरार्थियों की संख्या सीमित रखी जाती है। यह इसलिये भी आवश्यक है कि आगन्तुकों के साथ समुचित संपर्क रख सकने एवं विचार विनिमय कर सकने में सुविधा हो एक बार ही बहुत अधिक लोगों को बुला लेने पर व्यक्तिगत संपर्क की सुविधा नहीं रहती, जो नितान्त आवश्यक है। हर शिविर में एक नियत निर्धारित संख्या के लिये ही स्वीकृति देना और जिन्हें स्वीकृति है, उनके अतिरिक्त अन्यों को न आने की रोक रखने का यही कारण है।
पिछले दिनों कई सज्जन कई शिविरों में भी विशेष छूट प्राप्त कर लेते थे पर इस बार कड़ाई के साथ यह प्रतिबन्ध रखा गया है कि केवल एक ही शिविर में रहा जा सकेगा। पाँच वर्ष से कम आयु के बच्चे जिनकी गोदी में हैं, ऐसी महिलाओं को आने की भी इस बार रोक रहेगी। भोजन स्वयं बनाने में जिन्हें असुविधा है, उनके लिये सस्ते होटलों की व्यवस्था की जा रही है, ताकि उन तेज गर्मी के दिनों में भोजन बनाने की कठिनाई जिन्हें अखरती है, उन्हें भी सुविधा मिल सके।
इस बार क्षेत्र के विभाजन का भी क्रम रखा गया है ताकि एक प्रान्त के लोग एक समय एक साथ इकट्ठे होकर परस्पर परिचय प्राप्त कर सकें और अपने क्षेत्र में काम करने के लिये एक दूसरे का सहयोग प्राप्त कर सकें। कोई अनिवार्य कठिनाई न हो तो अपने प्रान्त की दृष्टि से ही शिविर का चुनाव करना चाहिये और उसी में आने की स्वीकृति माँगनी चाहिये। चार शिविरों का क्रम इस प्रकार है-
(1) पहला शिविर- दिनाँक 22 से 30 मई 1969 तक। प्रान्त गुजरात, महाराष्ट्र, केरल, मद्रास।
(2) दूसरा शिविर- दिनाँक 1 से 9 जून तक। प्रान्त- मध्यप्रदेश, आन्ध्र, मैसूर।
(3) तीसरा शिविर- दिनाँक 11 से 19 जून तक। प्रान्त-राजस्थान पंजाब, हरियाणा, हिमांचल-प्रदेश दिल्ली, जम्मू-काश्मीर
(4) चौथा शिविर- दिनाँक 21 से 29 जून तक। प्रान्त- उत्तर प्रदेश, बिहार, आसाम, उड़ीसा, नेपाल, भूटान, नागालैण्ड, बंगाल, त्रिपुरा, मणिपुर।
इस बीच 31 मई और 10 तथा 20 जून के तीन दिन इसलिये खाली रखे गये हैं कि शिविर में एक दिन पहले तथा एक दिन बाद में जाने की हलचल उस दिन पूरी होती रहे और किसी कार्यक्रम में बाधा न पड़े।
आगन्तुकों को अपना तथा अपने साथियों का पूर्ण परिचय लिखते हुए यथा सम्भव शीघ्र ही स्वीकृति प्राप्त कर लेनी चाहिये और उस स्वीकृति पत्र को साथ ही लेकर आना चाहिये। अच्छा तो यह है कि मार्च मास में ही स्वीकृति प्राप्त कर ली जाय, 20 अप्रैल अन्तिम तिथि रखी गई हैं पर यदि निर्धारित संख्या पहले ही पूरी हो गई तो बीच में भी प्रवेश बन्द किया जा सकता है। अतएव जिन्हें आना हो यथासम्भव शीघ्रता कर लें तो ही अच्छा हैं।
आप अपने बालकों को उसका लाभ उठाने दीजिये
गायत्री तपोभूमि में युग-निर्माण विद्यालय की स्थापना दो वर्ष इसलिये की गई थी कि अपने परिवार के वयस्क बच्चे गुण, कर्म, स्वभाव की दृष्टि से अपने व्यक्तित्व का उत्कृष्ट विकास कर सकने में समर्थ हो साथ ही आजीविका की दृष्टि से स्वावलम्बी भी बनें। कहते हुए हर्ष होता है कि अपने ढंग के अनोखे इस विद्यालय ने इस थोड़ी अवधि में आशाजनक सफलता प्राप्त की है। जो छात्र अब तक यहाँ का प्रशिक्षण प्राप्त करके गये हैं, उन्होंने अपनी गतिविधियाँ नये सिरे से इस उत्तमता के आधार पर विनिर्मित की है कि उनके परिवार, पड़ोस के व्यक्ति उस लड़के को आश्चर्यजनक ढंग से परिवर्तित हुआ अनुभव करते है। इस सफलता को देखते हुए अब अभिभावकों को यह परामर्श दिया जा सकता है कि वे अपने वयस्क बालकों की एक वर्ष की पढ़ाई रोक कर भी इस शिक्षा का लाभ उठा सकते हैं।
अभी हम स्वयं दो वर्षों का प्रशिक्षण अपनी देख-रेख में और चला सकेंगे, विद्यालय तो पीछे भी चलता रहेगा पर हमारी स्वयं की देख रेख उतनी स्पष्ट न रहेगी, इसलिये, जो शिक्षार्थी इधर आने ही वाले हो वे इन दो वर्षों का विशेष लाभ उठाने के लिये शीघ्र ही चेत जाएँ तो अच्छा है।
शिक्षा का मूल उद्देश्य है, (1) व्यक्तित्व का समग्र विकास, (2) आर्थिक स्वावलम्बन, खेद है कि आज की शिक्षा इन दोनों ही प्रयोजनों को पूरा नहीं कर रही है। अस्तु शिक्षा की अभिनव प्रणाली के रूप में इस विद्यालय की स्थापना की गई। प्रयोग स्थिति के कारण पाठ्य-क्रम अभी एक वर्ष का ही रखा गया है पर वह भी आशातीत सफलता प्राप्त कर रहा है।
छात्रों को अब नौकरियों की आशा छोड़कर स्वावलम्बी उत्पादन एवं व्यवसाय पर ध्यान देना होगा। जापान ने अपनी राष्ट्रीय समृद्धि और व्यक्तिगत आजीविका की समस्या, बिजली से चलने वाले सस्ते गृह-उद्योग घर-घर लगाकर हल की है। हमें भी यही मार्ग अपनाना होगा, तभी बेकारी की भारी व्याधा से छुटकारा मिलेगा अपना युग-निर्माण विद्यालय इस दृष्टि से एक व्यवहारिक मार्ग दर्शन प्रस्तुत करता है।
दैनिक प्रशिक्षण में आधा भाग व्यक्तित्व के विकास और शारीरिक, मानसिक, पारिवारिक, आर्थिक, सामाजिक और साँस्कृतिक गुत्थियों का परिस्थिति के अनुसार हल ढूँढ़ सकने की क्षमता उत्पन्न करने के प्रशिक्षण में लगाया जाता है और शेष आधा भाग उन गृह-उद्योगों की शिक्षा में लगाया जाता है, जो मामूली पूँजी से, बिजली की शक्ति से चलते हैं और काम करने वाले को सन्तोषजनक एवं सम्मानपूर्ण आजीविका देते हैं। आगे तो अन्य अनेक उद्योग और बढ़ाये जाने वाले हैं पर अभी केवल दस उद्योग हाथ में लिये गये हैं।
(1) विद्युत शक्ति का सामान्य ज्ञान, बिजली का मकानों में फिटिंग, बिजली की छोटी मशीनों, पंखा, हीटर, रेफ्रिजरेटर आदि की मरम्मत।
(2) रेडियो और ट्रांजिस्टर का नया निर्माण और पुरानों की खराबी सुधारना।
(3) प्लास्टिक उद्योग-फाउन्टेन पेन बाल पेन्सिलें एवं प्लास्टिक की अन्य वस्तुएँ बनाना।
(4) बिजली की मशीनों से ऊनी, सूती, रेशमी कपड़ों की तुरन्त धुलाई (ड्राई क्लीनिंग)।
(5) नहाने तथा धोने के साबुन, फिनायल, तरह-तरह के रंग, पेंट वानिसें, स्याहियाँ, सुगन्धित तेल, अनेक सौंदर्य प्रसाधन-क्रीम पाउडर, वैसलीन, लाली, बिन्दी आदि का बनाना।
(6) चश्मे के शीशे विभिन्न नम्बरों तथा डिजाइनों के तैयार करना।
(7) छपाई प्रेस की, प्रिंटिंग, कम्पोजिंग, बाइंडिंग, प्रुफ रीडिंग, व्यवस्था आदि साँगोपाँग शिक्षा।
(8) रबड़ की मुहरें बनाना।
(9) कई प्रकार के आकर्षक एवं सस्ते खिलौने बनाना।
(10) मोजे, बनियान, स्वेटर, गले बन्द आदि बुनना।
इसके अतिरिक्त चारपाई बुनना, लालटेन, स्टोव आदि की मरम्मत, मकान तथा फर्नीचर की टूट-फूट सुधारना बर्तनों पर कलई करना, कपड़े धोना, रंगना तथा सीना, पाक-विद्या रोगी परिचर्या, सामान्य चिकित्सा, गृह-व्यवस्था की आवश्यक शिक्षा की विशेष व्यवस्था रखी गई है।
लाठी, तलवार, छुरा, भाला, धनुष, बन्दूक आदि शस्त्रों का चलाना- फौजी कवायद विभिन्न प्रकार के व्यायाम तथा खेल-कूद के मनोरंजक प्रशिक्षणों का दैनिक कार्यक्रम रहता है। समाज-सेवा एवं नव-निर्माण के विभिन्न प्रकार भी साथ ही सिखाये जाते हैं।
शिक्षार्थी की आयु कम से कम 15 वर्ष और शिक्षा आठवीं कक्षा तक होनी चाहिए। व्यसनी, अनुशासन तोड़ने वाले, उद्दण्ड एवं छूत रोगों से ग्रस्त छात्र नहीं लिये जाते। शिक्षा सर्वथा निःशुल्क है। भोजन अपना स्वयं बना सकते हैं। छात्रावास की सुन्दर व्यवस्था है, प्रवेश 1 जुलाई से आरम्भ होगा। स्थान केवल 40 छात्रों का है, प्रवेश लेने वालों को विद्यालय की नियमावली मंगाकर उसमें लगे फार्म आवेदन शीघ्र ही भेजने चाहिये और अप्रैल के अन्त तक स्वीकृति प्राप्त कर लेनी चाहिये। निर्धारित संख्या पूरी हो जाने पर शेष को अगले वर्ष के लिए प्रतीक्षा करनी पड़ती है, इसलिए जिन्हें प्रवेश लेना हो समय रहते अपना स्थान निश्चित करा लें।
गिरजा गिरे न मस्जिद टूटे वह मन्दिर निर्माण करें।
प्रतिमा करें प्रतिष्ठित जिसमें मानवता के प्राण भरें॥
पिता हिमालय की गोदी से गंगा चली लहर आती।
सबने स्वागत किया जाह्नवी जहाँ-जहाँ होकर जाती॥
हिन्दू-मुसलिम सिख-पारसी का न भेद मन में लाती।
बालक हो नर अथवा नारी स्नेहपूर्वक नहलाती॥
हरिद्वार से कलकत्ता तक, गंगा जल-कल्याण करें।
बिना किसी दैहिक विभेद ये सारे जग का त्राण करें॥
सूर्यदेव उगते प्राणी में फिर आगे बढ़ते जाते।
भारतवर्ष, यमन, इजराइल, रूस चीन भी हैं आत॥
अमरीका, इंग्लैण्ड, फ्राँस में भी प्रकाश वे फैलाते।
कोई भेद न भाव सूर्य भगवान् तभी तो कहलाते॥
प्यार करें हम भी रवि सा धरती में पावन प्राण भरें।
जहाँ दिखे दुःख कष्ट प्राणियों में पीड़ा औ ब्राण हरें॥
दीपक एक जला कर रख दो गिरजा या गुरुद्वारा हो।
वन हो या पर्वती गुफा हो ऊसर या गलियारा हो॥
जल-जल ज्योति सदा फैलाता जहाँ-जहाँ अँधियारा हो।
हम भी वैसे जलें कि जिससे घर-आँगन उजियारा हो।
जीवन में निष्काम कर्म का अब तो शिरस्त्राण पहरें।
महापुरुष पथ चले उसी पर जन-जन पुण्य प्रयाण करें॥
बहुत सताई गई मनुजता उसने बहुत चोट खाई।
अब तो उसे पुनर्जागृत करने की पुण्य घड़ी आई।
युग-निर्माण योजना वह संदेश मनोरम है लाई।
मन्दिर है तैयार प्रतिष्ठा की मुहूर्त भी बन आई॥
हो मंडल अभिषेक दूर अब तो सारे विष बाण टरें।
वह प्रभु करुणा का सागर है उसे नहीं पाषाण करें॥
-बलरामसिंह परिहार,
*समाप्त*