आन्तरिक सामर्थ्य ही साथ देगी

एक दिन मैं किसी पहाड़ी से गुजर रहा था। एक बड़ा विशाल बरगद का पेड़ खड़ा तलहटी की शोभा बढ़ा रहा था। उसे देखकर बड़ी प्रसन्नता हुई संसार में कैसे कैसे सामर्थ्यवान् लोग हैं, ऐसे लोग दूसरों का कितना हित करते हैं। इस तरह सोचता हुआ मैं आगे बढ़ गया।

कुछ दिन बीते उसी रास्ते से पुनः लौटना हुआ। जब उस पहाड़ी पर पहुँचा तो वहाँ वट वृक्ष न देखकर बड़ा विस्मय हुआ। ग्रामवासियों से पूछने पर पता चला कि दो दिन पहले तेज तूफान आया था, वृक्ष उसी में उखड़ कर लुढ़क गया। मैंने पूछा - "भाई वृक्ष तो बहुत मजबूत था फिर वह उखड़ कैसे गया।” उन्होंने बताया- "उसकी विशालता दिखावा मात्र थी। भीतर से तो वह खोखला था। खोखले लोग हल्के आघात भी सहन नहीं कर सकते।”

तब से मैं बराबर सोचा करता हूँ कि जो बाहर से बलवान्, किन्तु भीतर से दुर्बल हैं, ऐसे लोग संसार में औरों का हित तो क्या कर सकते हैं, वे स्वयं अपना ही अस्तित्व सुरक्षित नहीं रख सकते। खोखले पेड़ की तरह एक ही झोंके में उखड़ कर गिर जाता है और फिर कभी ऊपर नहीं उठ पाता। जिसके पास भावनाओं का बल है, साहस की पूँजी है, जिसने मानसिक शक्तियों को, संसार की किसी भी परिस्थिति से मोर्चा लेने योग्य बना लिया है, उसे विपरीत परिस्थितियों से लड़ने में किसी प्रकार परेशानी अनुभव न होगी। भीतर की शक्ति सूर्य की तेजस्विता के समान है जो घने बादलों को चीर कर भी अपनी शक्ति और अस्तित्व का परिचय देती है। हम में जब तक इस तरह की आन्तरिक शक्ति नहीं आयेगी, तब तक हम उस खोखले पेड़ की तरह ही उखड़ते रहेंगे, जो उस पहाड़ी पर उखड़ कर गिर पड़ा था।

-सुभाषचन्द्र बोस,


भगवान् की दया और करुणा

मनुष्य एक बार जब धर्मपथ पर चल देता है तो उसके जीवन के तार झनझना उठते है। हलचल छा जाती है। विचार मंथन उठ पड़ता है। विचारों, संकल्पों, कभी आशा कभी निराशा, आशंका और विश्वास के थपेड़ों में झूलता मनुष्य अपने आपको कुछ उसी तरह का असहाय अनुभव करने लगता है, जिस तरह घनघोर जंगल में अंधेरी राज को भटका हुआ पथिक असहाय अनुभव करता है।

तब जिज्ञासु उस स्थिति में यह तो अनुभव करता है कि मैं अनाम हूँ, नाम तो मेरी देह का है देह नष्ट होने के साथ-साथ नाम भी समाप्त हो जायेगा, मेरे गुण, विद्याएँ, कलायें और क्षमताएँ जिनसे अनेक बन्धु-बान्धवों का कुछ अपेक्षा है, वह भी शरीर के ही विशेषण हैं। जिन्हें हम अपना पुत्र, पति, माता-पिता पत्नी, मित्र सुहृद सखा मानते हैं वह भी शरीर के ही नाते-रिश्ते हैं। मेरे अन्दर जो चेतना काम कर रही है, न उसका कोई भाई है, न बन्धु, माता-पिता साले-बहनोई श्वसुर-दामाद ताऊ-चाचा सब काल के गाल में समा जाने वाली देहें थीं। उन सगों का मुझ चेतन के साथ संकल्प-सम्बन्ध होने पर भी कोई सम्बन्ध नहीं है। मैं नितान्त अकेला एक निर्गुण निराकार हूँ, ऐसी मान्यता परिपुष्ट होती चली जाती है, उसकी जो अपने जीवन का दृष्टिकोण भौतिक जगत् से हटाकर आध्यात्मिक संस्करणों से जोड़ लेता है।

भीतर की यथार्थता का प्रकट होना और उस घुमड़ती हुई द्वन्द्वपूर्ण स्थिति से संसार के साथ ताल-मेल बैठा लेना दोनों विरोधी बातें है, दोनों में टक्कर अवश्य होती है। इस ही आध्यात्मिक भाषा में अग्नि परीक्षा कहा जाता है। जिसने भी भगवान् के नाम पर अपना कदम आगे बढ़ाया उसके पैरों में काँटे अवश्य चुभे। अपनी मोह-माया वासना, क्रोध आदि से ही टक्कर नहीं लेनी पड़ी वरन् उन सब का विरोध भी अवश्य सहन करना पड़ा जिनके स्वार्थ अपने से टकराते थे।

पिता का स्नेह इसलिये था कि बच्चा बड़ा होकर कुछ कमाएगा, प्रतिष्ठा अर्जित करेगा, उससे अपने परिवार की महत्त्वाकाँक्षाओं की पूर्ति होगी। सुख-सौभाग्य बढ़ेगा पर जब वह यह देखता है कि वही पुत्र आत्मा, परमात्मा, समाज-सेवा आदि की बातें करता है तो उसे अपना ही पुत्र शत्रु जैसा दीखता है। संसार में ऐसे पिता थोड़े हुए हैं, ऐसी माताएँ नगण्य हुई है, जिन्होंने अपने पुत्र को तिलक लगाकर यह कहा हो-वत्स जा तूने जिस पथ पर पाँव बढ़ाया है, वह जीव का परम पुरुषार्थ है, तू, उस पर निष्ठापूर्वक बढ़कर और ऐश्वर्य प्राप्त कर, तेरा स्मरण करते हुए हम भी संसार सागर से उन्मुक्त हो जाएँगे

अधिकांश तो हिरण्यकश्यप और राणा कुम्भाराव ही हुए हैं, जिन्होंने अपने बेटों को, पत्नी को मारा-पीटा सताया, विषय दिया और उस पुण्य-पथ से खींचकर दैत्य और दुर्भाग्य के फर्श पर ला पटका। बाहुल्य ऐसे ही लोगों का रहा है, अन्यथा आज संसार जिस अनात्मा आस्थाओं पर झुलस रहा है, वह स्थिति पैदा न हुई होती। भगवान् की शरण लेने वाले हर लोक-सेवी को लोगों की भर्त्सना ही उपलब्ध हुई है, यह संसार का नियम-सा बन गया है।

देखने में ऐसा लगता है कि यह भगवान् की अकृपा है, किन्तु यदि गहराई तक देखें तो इससे बढ़कर परमात्मा का और कोई अनुग्रह हो नहीं सकता। अपने पुत्र को तरसते, तड़पते, मार खाते देखकर भी धैर्यपूर्वक तटस्थ बने रहने का साहस भी परमात्मा ही कर सकता है कोई और कमजोर व्यक्ति नहीं। भगवान् उसकी सहायता के लिये तत्पर न रहते हों, सो बात नहीं, उन्हें तो कभी-कभी वाहन-विहीन दौड़ना पड़ा। वे अनेक बार नंगे पावों भागे है और अपने भक्त को बचाया है पर ऐसा अपवाद ही है अधिकांश तो वे अपने भक्त को परीक्षा की अग्नि में झुलसते हुए देखते रहे, बोले कुछ नहीं।

इसमें जीव के पुरुषार्थ को जागृत करना ही भगवान् का उद्देश्य होता है। जीव की आन्तरिक गरिमा और सर्वव्यापकता की अनुभूति करना भी उसका लक्ष्य रहता है। मीरा के अन्तःकरण से वह संगीत कहाँ से आता, यदि उसे मारा-पीटा और तड़पाया न गया होता, सूरदास की पीड़ायें न उठतीं तो प्रेम और वात्सल्य की मार्मिक अनुभूति जो उनके प्रत्येक पाठक को रोमांचित कर देती है, कहाँ से प्रवाहित होती, भक्त नरसी, प्रहलाद, निमाई पण्डित को वह तेज कहाँ से मिलता, जिसने बार-बार भारतीय जीवन में आस्तिकता और ईश्वर परायणता के भावों को पुनर्जीवित किया है।

भगवान् आकर सहायता कर जाता तो भक्त को प्रेम का आनन्द न मिलता वरन् उसे अहंकार और आसक्ति ने घेरा डालकर पुनः संसार चक्र में खींच लिया होता। जीव की तड़प और उसकी आधि भौतिक कथाएँ और उस अवधि में भगवान् का चुप रहना तो भक्त के कल्याण का ही कारण है। उस कठिन घड़ी में ही आत्म-ज्ञान का प्रकाश फूटता है। मैं कौन और मेरी साधना क्या है, ऐसी कल्याणकारक जिज्ञासाओं की पृष्ठ-भूमि न परिपक्व होती, यदि जीव को तड़पाया, पीड़ित ओर, परेशान न किया गया होता। जल-जलकर ही तो उसकी ईश्वर-निष्ठा प्रगाढ़ होती है और तभी तो वह करुणा का उद्गार फूटता है- “ है प्रभु! सब तुम्हारी ही इच्छा की पूर्ति है। मेरे प्रियतम देव! मेरा स्वरूप और मेरा ज्ञान सब तुम्हारी ही तो प्रचेतना है। हे मेरे जीवन प्राण मेरा यश और विस्तार सब तुम्हारे ही सुस्नेह की तो सुगन्ध है। तुम्हीं मेरे प्रेमाधार हो, तुम्हारे बिना अब मैं रह कैसे सकता हूँ। तुम्हारे दर्शन किये बिना में सुश्री कैसे हो सकता हूँ?

बेटे को दण्ड दिया जाता है तो वह अपने नन्हे-नन्हे हाथ जोड़कर पिता से क्षमा-याचना ही तो करता है। वह यही तो कहता है-” पिता जी अब मैं यह भूल नहीं करूँगा, मैं तुम्हारी शरण हूँ, अब मुझे मत मारो।” पिता दण्ड भी देता है और हृदय से रोता भी जाता है। दण्ड इसलिये देता है कि पाप-वासना और बुराई का धैर्य छूट जाये, रोता इसलिये है कि उसे पता है वह चोट पुत्र पर नहीं उसी पर हो रही है। बेटा कोई और तो नहीं हैं वह तो मेरे अन्तःकरण से निकला हुआ टुकड़ा हैं उसकी देह, उसका मन, उसके प्राण सब मुझसे ही निर्गत है, इतनी दया और करुणा होते भी वह दण्ड प्रक्रिया बन्द नहीं करता। जीव के, पुत्र के कल्याण के लिये हृदय को कठोर बनाकर कष्ट देने वाले भगवान् के साहस की सराहना की जाये। उस पीड़ा और विपन्नता को तो वही जानता है।

कष्ट पाकर दूसरे के कष्टों की अनुभूति होती है, उस स्थिति में भक्त के हृदय में भी प्रतिरोध की नहीं करुणा और दया की निर्झरिणी फूटती है। उसको संसार में सब कुछ अपनी ही स्वरूप दिखाई देने लगता है। और उससे अपना अहंकार समाप्त होने लगता है। अहंकार ही तो आसक्ति, आसक्ति ही तो बन्धन, बन्धन ही तो दुःख का कारण था, यह अहंकार ही न रहा तो कैसी ईर्ष्या, कैसा द्वेष, मोह और कैसी ममता सब कुछ भगवान् का अपना हो गया। जब अपनी ममता ही समाप्त हो गई तो सारा विश्व ही अपना हो गया, सब अपने ही आत्म स्वरूप प्रिय परिजन से जान पड़ने लगें। अपना मोह समाप्त होते ही सम्पूर्ण जगत् के प्रति प्रेम का निर्झर प्रवाह फूट पड़ता है।

भगवान के प्रति प्रेम का ही दूसरा स्वरूप विश्व-प्रेम है। मन में तस्वीर उस प्यारे की ही होती है, जिस में सौंदर्य ही सौंदर्य, शिव ही शिव और सत्य ही सत्य है। शिव, सत्य और सुन्दरता ही तो विश्व के कण-कण में व्याप्ति है तो वही अन्तःकरण वाली तस्वीर बाहर भी झलकने लगती है। सबमें सौंदर्य, सत्य और शिव के दर्शन करने का आनन्द वही प्रेमी जानता है, जो भगवान् को सच्चे हृदय से प्यार करता है। उसे भगवान् को ढूँढ़ने के लिये और कही नहीं जाना पड़ता जब चाहे किसी भी पीड़ित हृदय, निराश अन्तःकरण और इसकी आत्मा से अपनी आत्मा को मिलाकर वह उस समय सौंदर्य स्रोत का पान करता है।

पाने और सब कुछ पाने की पुकार करने वाला भक्त जब यह देखता है कि भगवान् की शक्तियाँ देती है निरन्तर देती ही देती हैं, तब उसे देने के सुख का पता चलता है। भूमि को सींचते हुए मेघों की व्यापकता, विश्व-भुवन को प्रकाश से भरते हुए भगवान सूर्य की व्यापकता संसार को जल देन के लिये जलने वाले समुद्र की व्यापकता को देखकर भक्त की अपनी तुच्छता और संकीर्णता का मैल जल जाता है, तब उसे अपने प्रति किया गया सांसारिक छल अपनाकर भी उपकार जैसी ही दीखता है। वह यह अनुभव करता है कि संसार में सब कुछ करुणा ही करुणा दया ही दया रही होती तो सम्भवतः उसे अपने अहंकार है छुट्टी न मिलती। वह उन कष्टों की पीड़ाओं को भगवान् का वरदान मान लेता है, जिसने उसे भगवान् को भरी भावनाओं से पुकारने का अवसर प्रदान किया। भगवान् के लिये जब तक वैसी पुकार अन्तःकरण से नहीं फूटती जैसी प्रेमिका को अपने प्रेमी के मिलन की इच्छा, तब तक जीवात्मा के बन्धन मुक्त नहीं होते।

इसलिये कष्ट और पीड़ाओं से भरे संसार में यदि सहारे के लिये, पुकारने के लिये कोई सुहृदय मित्र है, पिता है तो परमात्मा ही है, वही हर जन की पुकार सुनता है, वही हर व्यक्ति के कष्ट दूर करता है। मन्त्र दृष्टा ने जब ऐसी ही पुकार लगाई थी, तभी परमात्मा ने उस पर अपने प्रेम की शीतल छाया आच्छादित कर दी थी।


स्थायी सुख-शांति और प्रसन्नता (kahani)

मिट्टी के टीले पर बैठे हुए सन्त अनाम अस्ताचल गामी भगवान् सूर्य को बड़े ध्यान से देख रहे थे। वे देख रहे थे, किस प्रकार एक दिन महाशक्तियों का भी वैभव नष्ट हो जाता है।

सन्त अनाम इन्हीं विचारों में डूबे थे कि एक आदमी उनके समीप आया और प्रणाम कर चुपचाप खड़ा हो गया। मुस्कराते हुये सन्त अनाम ने पूछा- "वत्स मुझ से कुछ काम है?”

आगन्तुक ने विनय की- "भगवान मैं पुरु देश का धनी सेठ हूँ। तीर्थयात्रा के लिये चलने लगा तो मेरे एक मित्र ने मुझसे कहा-आप इतने स्थानों की यात्रा करेंगे कहीं से मेरे लिये शान्ति, सुख और प्रसन्नता मोल ले आना।” मैंने अनेक स्थानों पर ढूँढ़ा पर यही तीन वस्तुयें कहीं नहीं मिलीं। आपको अत्यन्त शान्त, सुखी और प्रसन्न देखकर ही आपके पास आया हूँ, सम्भव है आपके पास ही वह वस्तुयें उपलब्ध हो जायें।

सन्त अनाम फिर मुस्कराए और अपनी कुटिया के भीतर चले गये। एक निमित्त के उपरान्त ही लौटकर आये और एक कागज की पुड़िया देते हुए बोले-यह अपने मित्र को दे देना और तब तक इस कहीं खोलना मत।”

आगन्तुक पुड़िया लेकर चला गया। मित्र ने एकान्त में ले जाकर उसे खोला और उसमें रखी औषधि का सेवन करके कुछ दिन में ही सुखी, शान्त और प्रसन्न हो गया। एक दिन वह उसी मित्र के पास जाकर बोले- ”मित्र मुझे भी अपनी औषधि का कुछ अंश दे तो मेरा भी कल्याण हो जाये।”

मित्र ने पुड़िया खोलकर दिखाई - उसमें लिखा था- "अन्तःकरण में विवेक और सन्तोष से ही स्थायी सुख-शांति और प्रसन्नता मिलती है।”


सर्वव्यापी आत्मा की सर्वज्ञता

साधना खण्ड के अनेक उपनिषदों में सिद्धियों के अनेक चमत्कारिक वर्णन मिलते हैं। उनमें एक सिद्धि ‘ज्ञान सिद्धि’ है। ‘योग कुण्डल्युपनिपत्’ में आत्म-भेदन की विभिन्न क्रियाओं का वर्णन करते हुए अन्त में कहा है-

पिन्डबहाडयोरैक्य सिग्सूत्रात्मनोरति। स्वापाव्या कृतवोरैक्य’ स्वप्रकाशांच वात्मनोः॥

-अध्याय 1181

“इस तरह पिण्ड और ब्रह्माण्ड, लिंगदेह और सूत्र रूप से शरीरस्थ आत्मा में एकता हो जाती है और आत्मा अपने आपको प्रकाश या ज्ञान रूप में अनुभव करने लगता है।”

इस स्थिति में शरीर धारी आत्मा भी तीक्ष्ण बुद्धि, तीव्र स्मरण शक्ति, भूत और भविष्यत् में होने वाली घटनाओं का ज्ञाता दूरवर्ती और समीपवर्ती सभी वस्तुओं की वाह्य और अन्तरंग स्थिति को जानने वाला, पूर्वजन्मों के वृत्तान्त जानने वाला, सब प्राणियों के मनोगत भावों को जानने वाला शास्त्रों का ज्ञानी, वैरागी और निस्पृह प्रेमी हो जाता है।

आत्मा की सूक्ष्म शक्तियों का इससे भी विस्तृत विश्लेषण शास्त्रकारों ने किया है पर अब जब उसे प्राप्त करने की साधनाओं से लोग विमुख होने लगे तो वह बातें भी मिथ्या प्रतीत होने लगीं। यह अज्ञान सारी मानव जाति के लिये दुर्भाग्य का विषय है।

साधनाओं की पृष्ठ-भूमि पर न उतरें, न सही पर संसार में होने वाली अनेक घटनाओं से वस्तुस्थिति का यथार्थ ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। ऐसी घटनायें हर मनुष्य के जीवन में देखने-सुनने में आया करती है, उनसे आत्म-तत्व की विवशता की अनुभूति की जा सकती है और उसकी जागृति की चेष्टाएँ भी उभारी जा सकती हैं।

24 नवम्बर 1963 के धर्मयुग में एक घटना गीता कपूर ने दी है। वे लिखती है- “सन् 1951” में मेरे चाचा जी एकाएक बीमार हो गये। बीमारी गम्भीर रूप धारण करती चली गई। अमावस्या का दिन था, रात हो गई थी, सब लोग मंद-मंद दीपक के प्रकाश में रुग्ण चाचा जी के समीप बैठे थे। तभी ऐसा जान पड़ा कोई स्त्री गहन वासित वस्त्र धारण किये कमरे में प्रविष्ट हुई और फिर एक झटके से बाहर भाग गई। वह कोई प्रेत था या छाया पुरुष कुछ पता न चला। इसी बीच चाचा जी बोल- ”अब सब लोग विदा दीजिये।"। यह कहकर उन्होंने दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम की मुद्रा अभिव्यक्त की। यह दृश्य देखकर सब लोग रो पड़े। बड़े दादा भी पास ही थे, अश्रु बहाते हुए उन्होंने कहा- “कहाँ? जाओगे?” चाचा जी ने कहा-वहाँ जहाँ एक दिन सब को जाना पड़ता है, वहाँ जीवन का विराम है।” बड़े ताऊ ने पूर्ण ममत्व भरें स्वर में पूछा- “अकेले जाने में वहाँ डर न लगेगा?” चाचा जी ने उत्तर दिया- "अकेले नहीं एक साधु बाबा भी साथ आ रहे हैं।” यह कहकर उन्होंने आँखें मूंदी और इस नश्वर देह का त्याग कर दिया।”

साधू बाबा वासी रात उस समय समझ में नहीं आई। प्रातःकाल अर्थी उठाई गई, घाट पर पहुँचा ठीक उसी समय एक ओर अर्थी आई। पूछने पर पता चला कि वे एक साधू हैं और ठीक उसी समय बड़े चाचा जी की मृत्यु हुई इनकी भी मृत्यु हुई।

कई कोस दूर एक व्यक्ति की मृत्यु का ज्ञान इस तरह होना, जैसे वह बिल्कुल पास हो, आत्मा की सर्वव्यापकता और सर्वज्ञता का प्रमाण नहीं तो और क्या है?

मुरादनगर से पाँच मील दूर मुरादनगर किसान नेशनल इंटर कालेज के 42 वर्षीय एक अध्यापक श्री सत्यदेव शर्मा ने अपने प्राण त्यागने से लगभग आठ घण्टे पूर्व अपनी मृत्यु की सूचना दे दी थी। श्री सत्यदेव शर्मा कुछ समय से रोग से पीड़ित थे। उन्होंने एक दिन अर्धरात्रि को अपनी बहन को बुलवाकर कहा- ”प्रातः आठ बजे यात्रा पर जाऊँगा, अतः गायत्री मन्त्र का यज्ञादि का कुछ आयोजन करवा दो। बहन समझ गई, प्रातः तीन बजे से ही गायत्री जप और हवन की व्यवस्था कर दी गई। मुहल्ले के सैकड़ों स्त्री-पुरुष भी पूजा-पाठ में सम्मिलित हो गये। श्री सत्यदेव जी ने स्वयं गायत्री मंत्र का पाठ किया और पूजन आदि शान्तिपूर्वक देखते हुए ठीक आठ बजे प्राण छोड़ दिये। वे बड़े साधु प्रकृति के कर्तव्य निष्ठ अध्यापक थे।

विज्ञान ने ऐसे-ऐसे यंत्र दिये हैं, जो प्राकृतिक परिवर्तनों का बड़ी सही जानकारी देते है। वर्षा, भूकम्प तूफान का बहुत पहले इन यंत्रों से पता लगा लिया जाता है। रैडारों द्वारा दूर के दृश्यों, जहाजों, सूर्य-चन्द्रमा और ग्रह-नक्षत्रों में होने वाली हलचलों एवं ग्रहण आदि का सही पता लगा लिया जाता है पर मृत्यु आदि सूक्ष्म वस्तुओं का पता लगाना, अभी विज्ञान के लिये कहाँ सम्भव हुआ। यह ज्ञान तो आत्मा का अपना विज्ञान है।

गुरुकुल काँगड़ी की बात है। 1917 में डॉ. शुकदेव जी ने एक नौकर रखा, वह जाति का चमार था नाम था बारू। उसके भोजन की व्यवस्था सबके साथ ही की गई’ ताकि मानव मात्र एक है’, का रचनात्मक शिक्षण लोगों को दिया जा सकें।

गुरुकुल के एक कर्मचारी बिहारी को यह बात सहन न हुई। उसने द्वेषवश भण्डार में खाना बन्द कर दिया। एक दिन दुर्भाग्य से स्प्रिट का ड्रम खोलते समय बारू उसमें बुरी तरह जल गया। बिहारी ने जो अब तक उससे द्वेष रखता था, अब अपना दृष्टिकोण बदल दिया। उसने जान लिया बारू की अमुक दिन मृत्यु हो जायेगी। इस अनायास की आत्म-प्रेरणा ने उसके हृदय का मल विक्षेप और अंधकार निकाल दिया। अब बिहारी को प्रत्येक जीव, प्रत्येक प्राणी में एक ही आत्मा के दर्शन हो रहे थे।

साथ ही उसे अपने कृत्य पर दुःख भी हुआ। प्रायश्चित के लिये उसने उसी दिन से अन्न ग्रहण करना बन्द कर दिया प्रतिदिन अपने घर से भोजन लेकर जाता और बारू को स्वयं खिलाता, आप ही उसकी सेवा करता।

वह दिन आया जिस दिन बारू की मृत्यु होनी थी। लोग हैरान थे कि उस दिन बिहारी क्यों नहीं आया। उस दिन वह अपने घर पर ही लेट गया। बारू का निधन हो गया। तब लोगों ने खबर ली तो पता चला कि ठीक उसी समय बिहारी भी प्राणान्त किये।

बिहारी ने कोई अपघात नहीं किया, उसे कुछ रोग नहीं था पर उसने ठीक उसी समय प्राण त्याग कैसे किया, यह अब तक रहस्य है। यह रहस्य तन्त्र का नहीं आत्मा का रहस्य ही हो सकता है।

27 मई 1964 को श्री टी. पी. झुनझुन वाला (घटना धर्मयुग 12 जुलाई 1964 में छपी) नाम के एक सज्जन महाबलेश्वर के पर्यटन पर थे। उस दिन उनका ‘प्राकृतिक सौंदर्य दर्शन’ का कार्यक्रम था उसका बच्चा अमित भी उनके साथ था। दोपहर के विश्राम के बाद जागते ही बच्चे ने एकाएक अपने पिताजी का बुलाते हुए कहा-पापा जी, पापा जी, चाचा नेहरू अब इस संसार में नहीं रहे।”

पर आत्मा के लिये न तो कुछ शुभ है और न अशुभ वह तो दृष्टा है, जो अन्तरंग में सच-सच देखा वही ही कहा था उसने। वह बच्चे का पार्थिव शरीर नहीं आत्मा थी, जिसने घटना का पूर्वाभास किया था। उस का उन लोगों को ही घर से निकले वैसे ही चल गया।

कहते है आत्मा से, सम्पूर्ण प्राणियों में व्याप्त है।

गीता कहती है-

देही नित्यमबध्योय देहे सर्वस्य भारत। तस्मात्सर्वाणि भूतानि न स्व सोचितुमर्हसि॥

अध्याय 2।30,

हे अर्जुन यह आत्मा तो सबके शरीर में व्याप्त बार अवाप्य है, इसलिये सम्पूर्ण भूत प्राणियों ने निधन पर भी तुझे शोक नहीं होना चाहिये।

यदि आत्मा सर्वव्यापी है तो सर्वज्ञता की स्थिति भी एक-सी होनी चाहिये। यह भी सत्य, है, प्राणियों में वाणी और विचार व्यक्त करने की भाषाएँ अलग-अलग होती हैं पर परावाणी जो अन्तरंग में ही देखती और अन्तरंग में ही सुनती हे वह सबकी एक हैं। मुंडकोपनिषद् में महर्षि अंगिरा ने शौनक मुनि के पूछने पर परविद्या का तात्त्विक विश्लेषण विस्तार से किया है। उसमें उन्होंने बताया है कि आत्मायें परावाणी से ही सब कुछ ऐसे देखती-सुनती समझती है, जैसे इन स्थूल नेत्रों, कर्ण एवं बुद्धि से देखा-सुना और समझा जाता है।

अनेक पक्षियों, जीव-जन्तुओं द्वारा इस तरह का भविष्य ज्ञान उपरोक्त तथ्य की पुष्ट करता है। चींटियों, दीमकों को वर्षा का पूर्व ज्ञान हो जाता है। इस दिशा में मकड़ी का ज्ञान इससे भी बढ़कर है। कोई दुर्घटना होनी होती है तो कुत्तों को उसका पूर्वाभास मिल जाता हे। इस तरह की बातें आत्मा की सर्वज्ञता को और पुष्ट करती है।

सन् 1931 की एक घटना धर्मयुग के सुपरिचित लेखक श्री मदनगोपाल ने दी है, उसमें जीव और मनुष्य रूप दोनों में आत्मा की सर्वज्ञता का सिद्धान्त सत्य समर्थन होता है।

वहाँ उस वर्ष शेर साम्प्रदायिक दंगे हुये थे। लाखों करोड़ों की सम्पत्ति नष्ट हुई, अग्निकाण्ड, मारकाट, छुरेबाजी के भयंकर दृश्य जबलपुर और उसके आस-पास के लोगों को अब भी नहीं भूलते। वहाँ यह बात भी लोग यहीं भूल सकते कि इस घटना से काफी समय पहले से ही नगर के कुत्ते बड़ी भयावनी आवाज में रोया करते थे। बिल्लियों भी संगति किया करतीं इस दिन उक्त सज्जन की इसी कारण रात भर नींद न आई थी। बेचारे झुँझलाये हुए थे, सवेरे का समय था, उसी समय एक भिखारी आया। उसने भिक्षा के लिये आवाज लगाई। श्री मदनगोपाल जी चिल्लाए, भाग जा अरे रात भर कुत्ते नहीं सोने देते और अब तू आ गया उन्हीं का सखा। भिखारी ने मुस्कराकर कहा-बाबू जी, आज क्या समझेंगे, बेचारे कुत्तों की भाषा। यह तो आप लोगों को सावधान कर रहे है कि कोई भयंकर घटना घटित होने वाली है, उससे सुरक्षा का कोई उपाय कीजिये।

साधु चला गया और दूसरे दिन से ही जो साम्प्रदायिक दंगे प्रारम्भ हुये कि सारा जबलपुर त्राहि-त्राहि कर उठा। लोग अब भी उक्त घटना की याद करते है और आश्चर्य करते है कि कुत्ते, बिल्लियों को भविष्य काल कैसे हो जाता है।

यहाँ लोग पूछेंगे उस आत्मा को कैसे पाया जाये। ‘वृहदारण्यक उपनिषद्’ में भी ऐसी ही प्रश्न किया गया है कि- “ विज्ञातारमरे केन विजानीयात्” अर्थात् जो ज्ञाता है (आत्मा) उसे किस प्रकार जाना जायेगा।

यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है। सब लोग उपरोक्त गीत के चाचा जी, सत्यदेव जी शर्मा, अमित और जबलपुर के कुत्ते-बिल्लियों की तरह भूत-भविष्यत् का ज्ञान क्यों नहीं पा लेते। उत्तर है कि इन सबने प्रायः मृत्यु या प्रकृति की समीपता की स्थिति में जबकि आत्मा निश्छल और निर्विकार होती है, जब वह राग द्वेष, काम-क्रोध भय, मद-मोह से विमुख होती है, तब इस तरह की अनुभूति की। निस्पृह और पवित्र आत्मायें इस तरह की अनुभूतियाँ हर घड़ी प्राप्त कर सकती है।

ब्रह्मोपनिषद् साक्षी है-

तिलैपु तैलं रयनीव सर्विरायः स्रोत स्वरणीषु आम्बिः। एवमात्मात्मनि डडडड।

अर्थात्- जिस प्रकार तिल में तेल, दही में दुग्ध, प्रवाह में पानी, लकड़ी में अग्नि छिपी रहती है, उसी प्रकार आत्मा भी हमारे भीतर छिपी है, वह आत्मा तप और सत्य से प्रकट होती है।


आत्मा में परमात्मा का निकटतम अनुभूति

ईश्वर ज्ञान की वस्तु नहीं है, इसलिये वैज्ञानिक उसके सम्बन्ध में कोई निश्चित विचार देने से हिचकिचाते है तो भी वह इस बात को मानते है क संसार में एक कोई ऐसी वस्तु अवश्य है, जिससे निकल कर ही यह विविधतापूर्ण संसार आया। निर्माण-कर्ता और पालन-कर्ता के रूप में विज्ञान भगवान् को नहीं देखता। 17 वीं शताब्दी ईश्वर के अस्तित्व की मान्यता का सबसे बुरा युग था, क्योंकि इस शताब्दी के अधिकांश वैज्ञानिकों ने तो यही माना कि ईश्वर की कल्पना भ्रामक है। जे. बी. एस. हाल्डेन पाश्चात्यों के ईश्वर विश्वास का खण्डन करते हुए बताया-” जब मैं कोई प्रयोग करने बैठता हूँ तब मैं विचार करता हूँ कि कोई भी ईश्वर अथवा देवदूत अपने क्रिया-कलापों द्वारा मुझको बाधा नहीं डाल रहे, इसलिये मैं कह सकता हूँ कि ऐसी कोई सत्ता नहीं है, जिसे ईश्वर कहा जा सके।”

बरनाल ने भी ऐसी विचार-धारा व्यक्त की और सन्देह व्यक्त किया-ईश्वर का कार्य या दायित्व रोल वस्तुवादी संसार में भी धीरे-धीरे क्षीण होता जा रहा है, भौतिक-शास्त्र में ईश्वर की आवश्यकता केवल विश्व की उत्पत्ति व्यक्त करने के लिये तो हो भी सकती है।’

न्यूटन ने इस स्थिति को न सम्भाला होता तो संभवतः आज ईश्वर के सम्बन्ध में थोड़ी सी मान्यतायें शिक्षित वर्ग में बनी हुई हैं, वह भी समाप्त हो जातीं। न्यूटन ने कहा-” सृष्टि के उत्पादन में जो एक सिद्धान्त और क्रम है, उसे न तो विज्ञान बिगाड़ सकता है, न ही उस पर शासन या निर्माण थोप सकता है। इसलिये हम एक ऐसी सत्ता से इनकार नहीं कर सकते जिसको ईश्वर कहा जा सके।”

इस प्रकार विज्ञान भी एक ऐसा क्षेत्र है, जिसमें ईश्वरीय अस्तित्व के सम्बन्ध में शंकाएँ भी है और धारणायें भी। तथापि सभी बड़े वैज्ञानिकों का विश्वास ईश्वरवादी रहा है। पिछले दिनों आइन्स्टीन सबसे बड़े वैज्ञानिक होकर चुके है, उनसे जब इस सम्बन्ध में अपनी सम्मति देने को कहा गया तो उन्होंने बताया-संसार के सम्पूर्ण उच्च वैज्ञानिक कार्यों में अपराध स्वीकृति बौद्धिकता और निपुणता का सन्निहित होना यह व्यक्त करता है कि धार्मिक भावनायें गलत नहीं है, इसलिये गहन भावनाओं से घिरे हुये इस विश्वास को हमें मानना ही पड़ेगा कि ईश्वर है और वह एक श्रेष्ठ मस्तिष्क है, जो संसार के अनुभवों में स्वयं व्यक्त होता है।”

गैलीलियो का कथन है- ‘‘प्रकृति की बृहद् पुस्तकें गणित की भाषा में लिखी हुई है, उसे कोई बुद्धि ही लिख सकती है, इसलिये हम भगवान् को बुद्धि या विचार कह सकते है।” ‘ईश्वर सदैव रेखागणित कर रहा है’( गाॅड इस आँलवेज डूइंग ज्योमेट्री) यह मान्यता प्लेटो की है। इसी प्रकार एडिंग्टन ने भी बौद्धिक सूक्ष्म दर्शन को ईश्वरीय अस्तित्व के रूप में प्रमाणित करने का प्रयत्न किया है।

संसार में बुराइयों, कष्टों की विद्यमानता कभी-कभी ईश्वर की सत्यता पर शंका उत्पन्न करती है कि किस प्रकार ईश्वर निर्दयता, अन्याय और युद्ध की अनुमति देता है। अन्यथा विश्व के सभी धर्म और महापुरुषों ने ईश्वरीय सत्ता को माना उसकी सर्वशक्ति सत्ता, सर्वव्यापकता, सर्वज्ञता, सर्वन्याय प्रियता, करुणाशीलता, सुरक्षा-शक्ति पर विश्वास किया है।

महापुरुषों के रूप में ईश्वर की प्रामाणिकता का प्रयत्न भी प्रायः सभी धर्मों में किया गया है। किसी-किसी धर्म में वह पैगम्बर या फरिश्ते के रूप में प्रकट होता है, किसी-किसी में अवतार के रूप में। पर ईश्वर की सत्यता के बारे में संसार के सभी धर्म एकमत है। किसी ने उसे न्यायकारी गुणवाचक से संबोधित किया और किसी ने उसे धर्म-उद्धारक के रूप में। पर उसका पूर्ण वैज्ञानिक विश्लेषण कोई धर्म नहीं कर सका ऐसी कि जिसमें संसार की सम्पूर्ण परिस्थितियों में उसे विश्वस्त ठहराया जा सका होता। इसीलिये संसार के धर्म अपनी इस मान्यता पर लड़खड़ाते रहे है।

मुसलमानों में से अनेक ऐसे हुये है, जिन्होंने अल्लाह की सत्ता को प्रवंचना कहा। अनेक कैथोलिकों ने ईसा को भगवान् मानने से इनकार किया, प्रोटेस्टेण्ट मत उसी का परिणाम था। अवतारवाद का झगड़ा हिन्दू-धर्म में भी कम नहीं है। वे राम, कृष्ण, बुद्ध, शंकर आदि को ईश्वर के रूप में मानते है, जैन तीर्थंकरों के रूप में तो सिख गुरुओं के रूप में। अनेक प्रकार के ईश्वरों का अस्तित्व ही इस संसार को भ्रमित करता है। प्रत्यक्ष प्रमाणों द्वारा उसे सिद्ध करना वैसे ही कठिन था। जब धर्मों में भी प्रतिद्वंद्विता लोगों का उस मान्यता से फिसलना स्वाभाविक ही था।

इस स्थिति में वेदान्त ही एक मात्र ऐसा धर्म है, जिसकी ईश्वरीय व्याख्या को पूर्ण शुद्ध और बुद्धि-संगत कहा जा सकता है। सम्पूर्ण मीमाँसा पड़ने के बाद किसी के भी मन में तर्क का सन्देह नहीं रह जाता है। क्योंकि वह व्याख्याएँ विज्ञान के आधार-भूत सिद्धान्तों को लेकर चली हैं और उनमें सम्पूर्ण दार्शनिक एवं लौकिक परिस्थितियों का विवेचन भी आ जाता है।

वेदान्त ईश्वरीय सत्ता की अनुभूति के लिये सबसे पास से अपने आपसे चलने को कहता है। हम शरीर की स्थूलता में भी गुण है और गुणों को अपने शरीर से अधिक महत्व देते है। आत्म-तुष्टि के लिये माता-पिता अपनी प्रिय वस्तुयें अपने बच्चों को दे देते है, जबकि उसका उपभोग करने में उन्हें भी सुख मिल सकता था। शरीर की आकांक्षा को मन की आकांक्षा से निरन्तर मानने के साथ ही संसार में दो तत्त्वों की विलगता का स्पष्ट आभास हो जाता है, एक को चेतन और दूसरे को जड़ कहते है। जड़ एक देशीय पदार्थ है और चेतन सर्वव्यापी। यहीं से ईश्वर के सिद्धान्त का तात्त्विक विकास वेदान्त ने प्रारम्भ किया है।

‘ईश्वर साकार है या सशरीर है, यह एक तथ्य नहीं अपितु कल्पना मात्र है और चूँकि मृत्यु का प्रभाव उस पर पड़ता है, जिसके शरीर है किन्तु जब हम इस विश्वास को पुष्ट कर लेते हैं कि हमारी चेतना का अन्त नहीं होता हम विश्वात्मा या परमात्मा के बिल्कुल अनुरूप है तो मृत्यु भी इस विचार के सामने शक्ति और सामर्थ्य-विहीन हो जाती है। यह एक कल्पना मात्र नहीं वरन् सत्य भी है कि शरीर ही मरता है, अहंभाव या अपना मन, अपनी चेतना का नाश नहीं होता, वह एक अविनाशी तत्व है। हम जब स्वप्न की अवस्था में होते है, तब भी हमारी क्रियायें शरीर धारी जैसी ही होती हैं, वैसे ही संवेगों से हम प्रभावित होते रहते है, वैसा ही दुःख-सुख हमारे अनुभव में आता है। इसलिये उस स्थिति में भी हम जीवन से बँधे होते है, ऐसा कहना कोई निराधार कल्पना नहीं है।

दुःख और सुख इन दोनों से जब हम अपने आपको रहित मानने लगते है और इस विश्वास को अन्तिम स्थिति तक सिद्ध कर लेते है कि हमारे लिये संसार में मोह-माया की भ्रान्ति कुछ है ही नहीं न यहाँ कोई अपना है, न हम किसी के है, सब चेतना ही अपनी इच्छा से बनती-बिगड़ती रहती है, तब हमारे सामने उसका तात्त्विक रूप प्रकट होता है ओर हम अपने आपको मुक्त अनुभव करने लगते है।

कण्ठ उपनिषद् में कहा है-

हम ब्रह्म है और मृत्यु हमारे लिये एक खाद्य है, (1/2/25) छाँदोग्य (6-8-7) में उसे ही ‘तत्वमसि’ वू वही है-कहा है। वृहदारण्यक (24/4/5) अहं ब्रह्मास्मि ‘मैं ही ब्रह्म हूँ, एतरेय उपनिषद् (3/1/3) शुद्ध ज्ञान ही ब्रह्म है, वृहदारण्यक 4/4/5 में अयमात्मा ब्रह्म-वह आत्मा ही ब्रह्म है। इसी उपनिषद् के 4/4/19 मंत्र में कहा है कि यहाँ इस संसार में कुछ भी बहुतायत नहीं है और यथार्थ ही संसार के प्राणियों में जो गुण बर्तते हैं, अर्थात् इच्छाओं, आकांक्षाओं को यदि निकालकर मानसिक चेतना का विश्लेषण किया जाये तो ऐसा समझ में आ जाता है, चेतना एक अगाध सिन्धु की तरह है और मनुष्य उसमें से इच्छाओं की लहरों की तरह है। ‘अहं ब्रह्मास्मि इच्छाओं और वासनाओं से ग्रस्त मानसिक स्थिति को नहीं कहा गया तो उस सबसे परम पद में अर्थात् विश्व चेतना तादात्म्य की स्थिति होती है, जिसमें न तो किसी प्रकार का राग होता है और न द्वेष, वह कर्म भी करता है और किसी से आसक्त भी नहीं होता इसीलिये सर्व न्यायकारी है, उसमें व्यक्ति के गुणों का समावेश हो गया है, वह गुण है, प्रेम, दया, करुणा, उदारता, पर वहीं वह स्वयं इन गुणों से प्रभावित नहीं होता अर्थात् उनसे अलग नहीं है, शुद्ध चेतन अवस्था में वह यह गुणों की ही संज्ञा मात्र है, भाव मात्र है। इस बात को ‘बर्कले’ ने भी स्वीकार किया था ओर कहता था-सारे जगत् के पदार्थ मानसिक-संवेदना ही है।” मांडूक्यकारिका 2/11 में उसे ही ‘कएतान्बुध्यते भेदन्को व। तेषां विकरुपकः? अर्थात् कौन इस भिन्न-भिन्न विश्व में दिखाई देने वाले पदार्थों का दृष्टा और कौन इनकी कल्पना करता है?

इसी अवस्था में वेदान्त न मन का तादात्म्य ब्रह्म से कराने का यत्न किया है। शास्त्रों में स्थूल अन्न की सात अवस्थायें कही हैं- अन्न से रस बनता है, रस से रक्त, रक्त से माँस, माँस से मज्जा, मेदा, अस्थि और वीर्य बनता में। वीर्य अन्न की सूक्ष्म अवस्था है और शरीर में व्याप्त है पर किसी एक स्थान को काट कर उसे प्राप्त नहीं किया जा सकता है। वह मन्थन से ही दिखाई देता है। वीर्य ही अन्तःकरण चतुष्टय, मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार के रूप में सूक्ष्म से सूक्ष्मरूप होता चला गया है। यह क्रमशः इच्छा आवेग और भावनाओं की गहराइयाँ है, जो अन्त में जाकर एक ही विश्व चेतना-अहंकार में ढल जाती है।

पैंगल उपनिषद् में इस बात को और स्पष्ट कर दिया है कि चूँकि अहंभाव प्रत्येक क्षुद्र प्राणी में होता है, इसलिये शास्त्र की उक्त मान्यताओं को लेकर ही कोई अपने को ब्रह्मं न कहने लगे। बहुत से पाखण्डी और दम्भी लोग ऐसा करते भी हैं, इसीलिये वेदान्त ने पहले ही स्पष्ट कर दिया कि-” हृदय को निर्मल करके और अनामय ब्रह्मं का चिन्तन करके यह अनुभव करना चाहिये कि मैं ही सर्वरूप ब्रह्मं हूँ, मैं ही परम सुख रूप हूँ। जल में जल डालने से, दूध में दूध डालने ओर घी में घी मिला देने से वे एक रूप हो जाते है। उसी प्रकार परमात्मा के मिल जाने पर उनमें कोई अन्तर नहीं रह जाता। जब इस तरह ज्ञान द्वारा देहाभिमान नष्ट हो जाता है और बुद्धि अखण्डाकार हो जाती हे कर्मों में कोई आसक्ति नहीं रह जाती, मोह और वासनायें जलकर नष्ट हो जाते है, तभी अद्वैत ब्रह्मा की प्राप्ति होती है।”

इस स्थिति में मनुष्य पृथ्वी पर ही निवास करता हुआ भी उससे भिन्न रहता है, उसका नियन्त्रण भी करता है। उत्पत्ति रक्षा और विनाश इसी प्रकृति के स्पष्ट गुण हैं, वह अच्छाई और बुराई से परे तत्व रूप मात्र है। यह कल्पना और वैज्ञानिक शोध केवल वेदान्त ही संसार को दे सका है और इन तथ्यों का जितना अधिक चिन्तन मनन और धारण किया जाता है, ईश्वरीय सत्ता का बोध उतना ही निर्मल होता चला जाता है। उसके लिये न तो मनुष्य को कही अलग जाने की आवश्यकता है और न कुछ और अध्ययन कीं गीता के 9 वे अध्याय में इसी तथ्य को स्पष्ट करते हुए भगवान् कृष्ण ने कहा था-

मया ततमिद सर्व जगद व्यक्तमूर्तिमा। मस्स्वानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्डडडड स्थितः।

सर्वभूतानि कौतेय प्रकृर्ति यान्ति मामिकाम्। कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पातौ विसृजम्यहम्।

मयाध्यक्षेण प्रकृतिःसूयते सचराचरम्। हेतु नानेन कौतेय जगद्विपरिवर्तते।

है अर्जुन मैंने (विश्व चेतना) अपने अव्यक्त स्वरूप से इस समग्र जगत् को फैलाया अथवा व्याप्त किया है, परन्तु चह आश्चर्य देख कि मुझमें ही सब सृष्टि संग्रहित है पर मैं उनमें नहीं हूँ, कल्प के अन्त में सब भूत मेरी प्रकृति में आ मिलते है ओर फिर कल्प के आरम्भ में मेरी अध्यक्षता में प्रकृति ही सब चराचर सृष्टि को उत्पन्न करती रहती है।

अदृश्य की इतनी अच्छी शोध किसी धर्म में नहीं हुई। यहाँ उसका विकास भी किया गया है, जीव को ही ब्रह्मा रूप में शुद्ध करके उसके सर्वव्यापी, सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान्, शुद्ध, चैतन्य, मुक्त, कर्माध्यक्ष, साक्षी, दृष्टा स्वरूप को प्रमाणित किया है।


सारा संसार एक बिन्दु पर

एक बार कई देवता मिलकर प्रजापति ब्रह्मा जी के समीप जाकर बोले-” भगवान् हम वह विद्या जानना चाहते हैं, जिसके जान लेने से ‘ अनुष्टुप् सिद्धि होती हो। किसी के मन की बात जान ले, कितनी ही दूर बैठे हुये अपने किसी प्रियजन के दर्शन कर लें, बातचीत कर लें, एक पल में कहीं भी जाकर वहाँ का सब कुछ देखकर लौट आने की विद्या सीखने के लिये आपके समीप हम देवगण उपस्थित हुये है।”

ब्रह्मा जी वह सुनकर बहुत प्रसन्न हुए और बोले- “आज मैं तुम्हें 6 नारसिंह चक्र का वर्णन करता हूँ, उसे जान लेने वाला ऐसी सिद्धियों का स्वामी हो जाता है।”

चार ‘अर’ (रथ आदि पहियों में जो गोलाकार डंडे लगे रहते हैं उन्हें ‘अर’ कहते हैं) वाला आचक्र, दूसरी भी चार अर वाला सूचक,तीसरा आठ अरों वाला महाचक्र, पाँच-पाँच अरों वाले चौथे और पाँचवें सकललोक रक्षण और द्यूतचक्र और अन्तिम आठ अरों वाला असुरान्त चक्र और इनके आन्तर, माध्यम एवं वाह् तीन लय हैं, इनको जानने वाले को सभी लोक सिद्ध हो जाते सो है देवगणों क्रमशः हृदय, शिर, शिखा, शेष सभी शरीर के सब अंगों में रहने वाले इन चक्रों को जानने का प्रयत्न कीजिये।

इन सूत्रों में विज्ञान के वह सिद्धान्त और रहस्य छिपे हुये हैं, जिन्हें यदि जान लिया जाय तो सचमुच मनुष्य ऐसी सिद्धि -सम्पदा को प्राप्त कर सकता है, जिसका संकेत प्रजापति ब्रह्मा ने उपरोक्त पंक्तियों में किया है किन्तु इस युग का शिक्षित और विज्ञान मुखापेक्षी व्यक्ति इसे केवल गरिमा कहकर टाल जाते हैं या उसका उपहास उड़ाते है और कहते हैं कि ऐसा भी कहीं सम्भव है कि मनुष्य किसी व्यक्ति के मन की बात जान ले, दूरवर्ती लोगों से बातचीत कर ले, वस्तुओं का स्थानान्तरण और दूरवर्ती सन्देश जो एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक पहुँचे क्या कभी सम्भव हो सकते है? क्या संसार इतने सभी डडडड सकता है?

टेलीफोन, रेडियो, बेतार का तार (वायरलैस) आदि की बात जाने दीजिये इनकी शक्ति और सीमा बहुत थोड़ी है। टेलीविजन भी अभी बड़ा महँगा और यांत्रिक है एक ऐसे आविष्कार की ओर ध्यान आकृष्ट कर रहे है जिससे उपरोक्त पौराणिक आख्यान को शब्दशः सत्य सिद्ध करने करने में अब थोड़ा ही समय और शेष रहा है। जब इस यंत्र का पूर्ण विकास हो जायेगा तो यह संसार इतना समीप आ जायेगा कि भारत और अमेरिका की दूरी ही नहीं विश्व ब्रह्माण्ड ही सिमट कर एक बिन्दू पर आ जायेगा।

ऐसी सम्भावना के प्रथम यंत्र का नाम है ‘टेल स्टार’ इसमें न तो कोई विध्वंसक है और न ही कोई ऐसे कारण जो अन्तरिक्ष यात्रा के काम आयें। इन सबसे कर एक नया ही प्रयोग हुआ है, उसे विश्व-शांति कल्याण के लिये अणु सत्ता का उपयोग की संज्ञा दी जा सकती है। उसमें ऐसी संचार और ग्रहण व्यवस्था की गई है, जिसकी सहायता से दुनियाँ के किसी भी डडडड बैठे मनुष्य को देखना, बातचीत करना आदि सम्भव हो जायेगा। अभी विशेष प्रग्रहण केन्द्रों (रिसीविंग स्टेशन्स) के माध्यम से ही यह व्यवस्था सम्भव होगी पर टेल-स्टार का विस्तृत अध्ययन एक दिन मनुष्य-मनुष्य के बीच बेतार-के-तार की तरह का सम्बन्ध सूत्र बन जायेगा, ऐसी सम्भावना उसके निर्माता डॉ. पियर्स ने स्वयं ही व्यक्त की है।

टेल-स्टार एक प्रकार का चक्र है, जिसमें भीतर तो वैज्ञानिक उपकरण है और बाहर सन्देश प्रेषित (ट्रांसमीटर) और ग्रहण (रिसीव) करने वाली विचित्र प्रणाली का अंकन किया गया है। इसमें गहरे रंग की 3600 वर्ग और सेल (वह बैटरियाँ जो सूर्य की ऊर्जा से चलती है) और भीतर पट्टियों की तरह की एण्टेना है’ ऊपर वाली पट्टी 6390 मेगासाइकिल्स पर सन्देश ग्रहण करती है, अर्थात् इस फ्रीक्वेंसी पर कहीं से भी प्रेषित समाचार या वृत्तचित्र को वह ग्रहण कर लेगी और निचली पट्टी 4170 मेगासाइकिल से उस सन्देश या चित्र को सारी सृष्टि में फैला देगी। पिछले दिनों अन्तरिक्ष यात्री कूपर की यात्रा की अमेरिका के अतिरिक्त इंग्लैण्ड, फ्राँस, जर्मनी आदि कई देशों में दिखाया गया, वह टेल-स्टार की सहायता से ही था।

टेल-स्टार की तकनीकी (टेक्निकल) रचना मानव शरीर से कम आश्चर्यजनक नहीं है। जिस प्रकार हमारे शरीर में 72 हजार नाड़ियों का जाल बिछा है और वह सब कुछ ऐसे शक्ति केन्द्रों (कोष या चक्रों) उपकेन्द्रों से सम्बद्ध हैं, जहाँ की शक्ति से इन नाड़ियों के माध्यम से बाह्य और अन्तर जगत् से सम्बन्ध और सामंजस्य स्थापित होता है। शरीर के एक स्थान की प्रतिक्रिया दूसरे अंगों पर होती है, वह इन नाड़ियों के माध्यम से होती हैं, उसे विशेष शक्ति कोषों की अस्तर अनुभूति (सेल्फ रियलाइजेशन) कह सकते हैं, उसी प्रकार टेलस्टार में भी हजारों ग्रहण और प्रेषण (रिसीविंग एण्ड ट्रान्समिसिंग) प्रणालियाँ रखी गई है, जिससे उन्हें विश्व के किसी भी भाग में सुना और देखा जा सके।

टेलस्टार का कुल वजन 170 पौण्ड और व्यास केवल 34 इंच है, जिस तरह एक बालक किसी पतंग को मजे से आकाश में उड़ा लेता है, उसी प्रकार टेलस्टार को अन्तरिक्ष में पृथ्वी की कक्षा में स्थापित कर दिया जाता है। वहाँ से अपना काम प्रारम्भ कर देता है। अभी इसे केवल अमेरिका की बैल टेलीफोन प्रयोगशाला ने तैयार किया। उसे छोड़ने के लिये एण्डोवर नामक स्थान में एक विशाल एण्टेना निर्मित किया गया है। अभी केवल यूरोप में ही कुछ ऐसे केन्द्र स्थापित हुए है, जो इस संचार व्यवस्था का लाभ उठा रहे हैं पर वह दिन दूर नहीं जब इसकी सहायता से चन्द्रमा और शुक्र आदि ग्रहों में पहुँचे लोगों से भी बातचीत करने में सहायता मिलेगी।

‘टेलस्टार’ की मुख्य भूमिका यह है कि वह धरती के प्राप्त संकेतों को दस अरब गुना शक्ति बढ़ा देता है और फिर उस बढ़ी हुई शक्ति से उस सन्देश को धरती की ओर प्रेषित करता है। उपग्रह से संकेत भेजने की शक्ति ढाई वाट की है, जो पृथ्वी पर आने तक घटकर अरबों हिस्से के बराबर रह जाती हे। इस कारण सामान्य स्तर पर उसे सुना जाना सम्भव नहीं होता, इसलिये एण्डोवर (स्थान का नाम) 177 फूट ऊँचा एण्टीना (उपग्रह संचार-केन्द्र बनाया गया। यह संकेतों की आवाज को फिर बढ़ा देता है, जिससे सामान्य संचार व्यवस्था का कार्यक्रम चलने लगता है, अर्थात् एण्डोवर की फ्रीक्वेंसी पर यूरोप के (अभी) सभी देश अपने रेडियो और टेलीविजन सेटों पर सुन और देख लेते है। बाद में वह व्यवस्था सारे संसार के लिये उपलब्ध हो जायेगी।

इस व्यवस्था पर भारी व्यय लगता है। 30 लाख डालर की धनराशि केवल एक बार के प्रयोग में व्यय होती है। इतना व्यय हर बार उपग्रह भेजने पर उठाना पड़ता है। फिर यहाँ पृथ्वी में अनेक एण्टीना स्थापित करने का व्यय भी बहुत अधिक है। अमेरिका में 177 फुट का विशाल एण्टीना बना है, उसका 370 टन भार है और डिग्री के बीसवें भाग तक नियन्त्रण कर सकता है, का निर्माण व्यय कई करोड़ डालर तक बैठा है, इसलिये यह व्यवस्था सब के लिये सम्भव नहीं। इंग्लैण्ड में ‘गूनहिली डाउन्स’, फ्राँस में ब्रिटोनी और पश्चिम जर्मनी में म्यूनिख के बाहर बिल्हेम में ही एण्टीना निर्मित होने की सम्भावनायें है, शेष देश तो अभी उसकी प्रारम्भिक जानकारी जुटाने में ही संलग्न है। सभी देशों में व्यवस्थायें हो जायेंगी तो एक महाद्वीप का दूसरे महाद्वीप से संचार का सीधा सम्बन्ध जुड़ जायेगा और तब अन्तरिक्ष यात्रियों के सन्देश, उनके चित्र आदि भी यहाँ उतने ही साफ देखे और सुने जा सकेंगे।

11 जुलाई 1962 को पहला टेलस्टार आकाश में स्थापित किया गया। जब वह एण्डीवर की एण्टीना से उड़कर अपने नियत स्थान पर चक्कर लगाने लगा। 25 टन वजन और नकली रबर मिले डेक्रोन तन्तुओं से बने एण्डोवर एण्टीना ने आध घण्टे में ही सन्देश अमेरिका के उपराष्ट्रपति टेलीफोन हाथ में लेकर खड़े थे। इधर फ्रैड कैपेल एण्डोवर से बोल-” आप जानते होंगे कि यह आवाज टेलस्टार उपग्रह द्वारा प्रसारित की जा रही है, आपको आवाज कैसी सुनाई दे रही है। उधर से उपराष्ट्रपति ने अभिवादन का उत्तर इन शब्दों में दिया- “मि० कैपेल, आपकी बिल्कुल साफ सुनाई दे रही है।” यह उद्घाटन थ इसके बाद लाखों अमेरिकियों न सारे पेरिस को अपने टेलीविजनों में देखा। वहाँ की प्रत्येक वस्तु साफ ऐसे ही दिखाई दे रही थी, जैसे कोई आकाश में बैठकर विस्तृत भूभाग का दृश्य देख रहा हो। पेरिस का संगीत दृश्य और स्वर बिल्कुल स्पष्ट और साफ सुने गये। फिर इंग्लैण्ड का कार्यक्रम दिखाया गया। टेलस्टार से अन्तरिक्ष की अनेक महत्त्वपूर्ण जानकारियाँ मिलने के भी समाचार मिले है। अनुमान है कि यह टेलस्टार दो-सौ वर्ष तक काम करता रहेगा।

इस अनुसन्धान से सामान्य जनता को अभी लाभ मिले भले ही न मिला हो पर लोग यह अनुभव कर रहे है कि ऐसी कोई सत्ता, जो टेलस्टार की तरह की सम्भावनाओं से परिपूर्ण हैं, मानव शरीर में हो सकती है क्या? यदि हाँ तो क्या उपनिषद् का वह अंश जो ऊपर प्रजापति ने देवताओं को सुनाया, उसी का संकेत तो नहीं है। यदि हाँ तो मनुष्य इस खर्चीली और जटिल यांत्रिक प्रक्रिया में क्यों पड़े। अपने आन्तरिक ‘टेलस्टारों’ का ही विकास क्यों न किया जाये?

वैज्ञानिक इस बात को मानते हैं कि यांत्रिक संचार और दूरदर्शन (टेलीविजन) प्रणाली शरीर की संचार और दर्शन प्रणाली का नमूना है, वे यह भी मानते ह। कि मनुष्य के मस्तिष्क में उठने वाले विचारों को भी एक नियत फ्रीक्वेंसी पर ग्रहण किया जा सकता ह पर उसके लिये भेजे जाने वाले सन्देशों की शक्ति टेलस्टार की तरह किसी अणु-शक्ति द्वारा बढ़ा दी जाये, उसी प्रकार ग्रहण करने वाला भी अपनी शक्ति को उतना बढ़ाने की वह हवा में तैरते हुये सन्देशों में से अपनी फ्रीक्वेंसी के सन्देश की शक्ति को बढ़ाकर ग्रहण कर लें। ऐसे चक्र ऐसे संस्थान जो 3600 बैटरियों की तरह उन विचारों को शक्ति दे सकें, शरीर में हैं केवल उनके विकास की आवश्यकता है, इसकी पुष्टि वैज्ञानिक संचार-उपग्रह टेलस्टार से कर रहें हैं।

जिस दिन यह अभ्यास मनुष्य पूरा कर लेगा उस दिन मनुष्य-मनुष्य तो क्या सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड एक बिन्दु पर आ जायेगा। तब न कोई कष्ट होगा। न कोई अभाव, न किसी की प्रेम पीड़ा और न कोई अज्ञान। भले ही अभी इस तरह के आध्यात्मिक विकास में कुछ समय लगे।


परोपकार

एक साधु थे, योग साधना करते थे और प्रतिदिन सायंकाल ग्रामवासियों को एकत्रित कर उन्हें ज्ञान दान भी दिया करते थे। साधु का ही प्रभाव था कि गाँव में न कोई चोरी करता था और न छल-कपट ईर्ष्या-द्वेष और बेईमानी। सब लोग प्रेमपूर्वक रहते थे।

एक दिन गाँव के कुछ मनचले लड़कों को शरारत सूझी। कई लड़के इकट्ठा होकर साधु के पास गये और बोले- महात्मन्! अपने गाँव के पास जो गंगा जी का पुल है, नाराज हो गया हे, कहता है, मुझे दस हजार रुपये दो तो रुकूँगा, नहीं कहीं दूर चला जाऊँगा हम लोगों ने बहुत मनाया, मानता ही नहीं। हारकर गाँव वाले चन्दा इकट्ठा कर रहें हैं। खुद आप भी दान दीजिये।

साधु ने ध्यान से सब बात सुनि बच्चों की ओर देखा- थोड़ा मुस्कराए, भीतर कुटी में गये और पाँच रुपये लाकर लड़कों को देते हुये बोले- “लो शीघ्र जाओ और पुल को कहीं बाहर जाने से रोको।”

लड़के तब तो चले गये पर दूसरे दिन आकर उन्होंने भक्तिपूर्वक प्रणाम किया और पूछा- “महाराज! आप तो इतने ज्ञानी हैं, फिर आप इतना भी नहीं समझ सके कि पुल भी कहीं रुकता है?”

साधु हँसे और बोले- “बेटा! वह तो मैं भी समझ गया था पर आप लोगों की परोपकार की भावना की रक्षा तो करनी थी।”

बालक बहुत संतुष्ट हुये ओर उस दिन से सच्चे मन से परोपकार करना प्रारम्भ कर दिया।


अपनी शक्तियाँ सही दिशा में विकसित कीजिए

विश्वासी मनुष्य विश्व-विजय कर सकता है-इसमें सन्देह नहीं। जिसको अपने पर, अपने चरित्र पर, अपनी शक्तियों पर, अपनी आत्मा और परमात्मा पर विश्वास है, वह मरुभूमि को मालवा बना सकता है। मनुष्य से देवता और नगण्य से गण्यमान बन सकता है। असंदिग्ध विश्वास वाले व्यक्ति के लिये न कहीं भय है और न अभाव। वह किसी स्थान में रहे, किसी परिस्थिति में पड़ जाये सफल होकर ही बाहर आता हैं।

इसका साधारण-सा सार यह है कि जिसको अपने पर और अपनी शक्तियों में अडिग विश्वास है, उसका साहस एवं उत्साह हर चैतन्य बना रहता है। आशा उसकी अगवानी के लिये पथ में प्रस्तुत खड़ी रहती है। आशा-विश्वास साहस और उत्साह का चतुष्टय जिस भाग्यवान् के पास है, वह किसी भी कार्य-क्षेत्र में कूद पड़ने से कब हिचक सकता है? जो कर्म-क्षेम में उतरेगा पुरुषार्थ एवं परिश्रम करेगा- उसका फल उसे मिलेगी ही जो समुद्र में बैठेगा मणि-मुक्ता पायेगा ही। जो पर्वत पर चढ़ेगा वही तो चन्दन उपलब्ध करेगा। यह तो एक साधारण नियम है। इसमें कोई आश्चर्य एवं विचित्रता नहीं है।

यह सब होते हुए भी संसार में अधिकतर मनुष्य ऐसे ही दीख पड़ते हैं, जो दीन-हीन अवस्था में पड़े जीवन को आगे ठेल रहे है। न उसमें कोई उत्साह दृष्टिगोचर होता है और न कर्त्तव्य की कोई साधना काम करना पड़ा तो उल्टा-सीधा कर फेंका। जो कुछ उल्टा-सीधा खाने को मिला पेट में डाला और बस पड़ रहे असहायों जैसे समय और जीवन की हत्या करने के लिये।

बड़ा आश्चर्य होता है- कि ऐसे आदमियों की यह समझ में क्यों नहीं आता कि उनका यह जीवन-यापन मृत्यु-यापन का ही एक स्वरूप है। केवल हाथ-पैरों का हिल-डुल सकना और श्वाँसों का आगमन ही जीवन का प्रमाण नहीं है। यह तो केवल मिट्टी और आदमी के बीच अन्तर का संसूचक है। जीवन का चिह्न तो मनुष्य की प्रगति एवं विकास है। उसके वे कर्त्तृत्व है जो अपना और दूसरों का कुछ भला कर सकें। जीवन का लक्षण मनुष्य की वे भावनायें एवं विचार है जिनमें कुछ ताजगी, कुछ प्रेरणा और स्फूर्ति हो। जिसके मस्तिष्क से प्रेरक विचार और उद्बोधक भावनाओं का स्फुरण नहीं होता, जीवित कैसा? वह तो जड़ अथवा जड़ीभूत प्राणी ही माना जायेगा।

कर्त्तव्य का अर्थ कमाई कर लेना और जीवन-यापन का मतलब खाना-पीना सोना-जागना बोलना-चालना घूमना-फिरना लगाने वाले भूल करते है। यह सारी क्रियायें तो नैसर्गिक कार्य-कलाप है, जिन्हें जीवन बनाये रखने के लिये विवश होकर करना ही पड़ता है यदि मनुष्य इन क्रियाओं से विमुख होकर इन्हें स्थगित कर दे तो उसका जीवन ही न रहे, फिर उसके यापन का प्रश्न ही नहीं उठता। यापन का अर्थ है उपयोग करना। जीवन को बचाने के लिये, उपार्जन आदि के कार्य जीवन के उपयोग में सम्मिलित नहीं किये जा सकते। यह तो खाने-पीने के लिये जीना और जीने के लिये खाना-पीना जैसा एक चक्रात्मक कम हो गया, जिसमें जीवन की उपयोगिता जैसा अंश कहाँ है।

जीवन-यापन अथवा उसकी उपयोगिता का अर्थ यह है कि जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति के अतिरिक्त कुछ ऐसे काम भी किये जायें, जो परमार्थ परक हों अर्थात् जो अपनी आत्मा और परमात्मा की इस सृष्टि के लिये कुछ उपयोगी हो सकें। जिनको करने से संसार में कुछ सौंदर्य-वर्धन हो, दीन-हीन और रोगी, दोषी व्यक्तियों की संख्या कम हो, अभाव एवं अशिक्षा का अंश अर्धांश दूर हो, सहचर, सौहार्द एवं सद्भावना का वातावरण बढ़े, आस्तिकता में गम्भीरता का समावेश हो, अज्ञान एवं अमित्रता के अन्धकार में ज्ञान एवं मैत्री के दीप जलें विरोध एवं संघर्ष के स्थान पर सामंजस्य और सहकारिता की स्थापना हो- आदि अनेक ऐसे सत्कर्म एवं सद्विचार हो सकते जिनके प्रसार एवं प्रकाश से हमारा संसार स्वर्गोपम स्थिति की ओर अग्रसर हो सकता है।

यदि हमारे जीवन का थोड़ा भी अंश इस स्वर्गीय उद्देश्य के लिए नहीं लगता और खाने, कमाने, भोगने और बचाने में ही लग जाता है तो मानना पड़ेगा कि हमने जीवन-यापन नहीं किया उसका विनाश किया है, हत्या की है और हम समाज का बहुत कुछ चुराकर उसको वंचित करके आत्मघात के अपराधी हुए है। इतनी एकांकी, एकांगी और निजत्वपूर्ण जीवन तो कीट-पतंग एवं पशु-पक्षी भी नहीं बिताते। वे भी अपने अतिरिक्त दूसरों का कुछ करते दिखाई देते है।

लोग धन कमाते, उसे खाते, व्यय करते और बचाकर रख लेते है। विद्या प्राप्त करते-उसे अर्थकारी बनाकर अपने तक सीमित कर लेते, लोग शक्ति संचय करते- उससे यह तो दूसरों पर प्रभाव का आनन्द लेते अथवा अपने को बलवान् समझकर संतुष्ट हो जाते, कला-कौशल का विकास करते और उसके पैसे खड़े कर लेते, शिल्प सीखते उनमें मौलिकता की वृद्धि करते और उसके आधार पर मालामाल होने के मंसूबे बनाते, लोग आध्यात्मिक उन्नति करते और अपने में लीन हो जाते है। अनेक विषयों पर एवं समस्याओं पर विचार करते और स्वयं समाधान समझकर चुप हो जाते हैं। यह और इस प्रकार की सारी बातें घोर स्वार्थपरता है। अपने स्वार्थ तक अपनी उन्नति एवं विकास को सीमित कर लेना अथवा उन्नति एवं विकास न करना एक ही बात है। कोई भी गुण, कोई भी विशेषता, कोई भी कला अथवा कोई भी उपलब्धि जो संसार एवं समाज एवं समाज के काम नहीं आती व्यर्थ एवं निरर्थक है। अस्तु, इस परिश्रम एवं पुरुषार्थ की निरर्थकता से बचने के लिये अपने से बाहर निकल कर विशेषताओं एवं उपलब्धियों का प्रसारण कीजिये और तब देखिये कि आपको उस स्थिति से भी सहस्र गुना सुख सन्तोष मिलता और लोक के साथ परलोक का भी सुधार होता है।

आपने प्रयत्न किया और परमात्मा ने आपको धन दिया। बड़े हर्ष का विषय, प्रसन्नता की बात है, आप बधाई के पात्र है। किन्तु इसको सार्थक बनाने के लिये, आपके व्यय से जो कुछ बचे उसमें से कुछ भाग से समाज का भला कीजिये। न जाने कितनी जरूरतमन्द अपनी जिन्दगी, जो कि उपयोगी हो सकती है, इसके अभाव में नष्ट कर रहे है। न जाने कितने होनहार निर्धन विद्यार्थियों की शिक्षा इसके अभाव में बन्द हो जाती है। न जाने कितने समाज-सेवी और सत्पुरुष आर्थिक असुविधा से हाथ-पैर बाँधे यथास्थान तड़पते रहते है। न जाने कितनी भूखी आत्मायें अकाल में ही शरीर त्याग देती हे। न जाने कितने अनाथ एवं अपाहिज बच्चे याचना भरी आँखों से टुकुर-टुकुर देखा करते है। अपने धन का उपयोग इनकी सहायता करने में करिये। इससे आपको यश एवं पुण्य का लाभ तो होगा ही साथ ही आपका वह समय जिसे आवश्यकता से अधिक धन कमाने में लगाया था, अब जीवन-यापन अथवा उपभोग में गिना जायेगा।

इसी प्रकार यदि आप विद्वान्, कुशल, शिल्पी, विचारक, बलवान् आदि किन्हीं भी विशेषताओं से विभूषित क्यों न हों, उससे समाज को प्रभावित करने और लाभ उठाने के स्थान पर उसकी सेवा, सहायता एवं सान्त्वना कीजिये आपके गुण, आपकी विशेषताएँ अपनी सता से आगे बढ़ कर पुण्य एवं परमार्थ की उपाधि प्राप्त कर लेगी।

यदि आपके पास धन-दौलत व गण-विशेषताएँ कुछ भी नहीं हैं। आप सन्तानवान् है तो अपनी सभी सन्तानों को अपने तक अथवा उनके अपने जीवन तक ही सीमित न कर दीजिये, कम-से-कम एक सन्तान को अवश्य ही समाज-सेवा लोक-हित के लिये प्रेरित कीजिये। यह आवश्यक नहीं कि वह साधु-संन्यासी अथवा नेता-नायक बनकर ही समाज-सेवा के लिये आगे बढ़े। वह साधारण नागरिक और गृहस्थ रहकर भी लोक-हित के काम कर सकता है। आपका केवल यह कर्त्तव्य है कि आप उसका निर्माण इस प्रकार से करें कि उसकी वृत्तियाँ स्वार्थी न होकर परमार्थोन्मुखी हो जायें।

यदि सीमा यहाँ तक हो कि किसी के पास उसके शरीर के अतिरिक्त और कुछ नहीं है तो वह ओर कुछ न सही समाज को समय देकर उसकी शारीरिक सेवा करके पुण्यवान बन सकता है। तात्पर्य यह कि लोक-हित के कार्यों के लिये मात्रा अथवा परिमाण का कोई महत्व नहीं है। महत्व है उस प्रकार की भावना और यथासाध्य तदनुरूप सक्रियता की। यहाँ तक कि यह सेवा मानसिक, बौद्धिक और वाचिक भी हो सकती है, वैचारिक और भावनात्मक हो सकती है। अपनी संकुचित सीमा से निकलकर अपने सामाजिक स्वरूप को जानना और उसके दुःख-सुख और उत्थान-पतन से समभाव होना ही इसका आधारभूत सिद्धांत है। इस सिद्धांत में विश्वास रखने वालों से लोक-हित के थोड़े बहुत कार्य अनायास ही होते रहते हैं।

आइये हम सब अपने प्रति विश्वास का महामन्त्र सिद्ध करें और जीवन के उन्नत सोपानों पर चढ़े चलें। हम जितनी उन्नति कर सकेंगे उतना अपना और साज का हित कर सकेंगे। यदि हम गई-गुजरी और आश्रित अवस्था में अपने को डाले रहें, दूसरों पर मुखापेक्षी बने रहे तो स्वयं कुछ भी परमार्थ न कर दूसरों को अपने द्वारा परमार्थ का अवसर देने पर बाध्य होंगे और इस प्रकार अपने स्वयं के जीवन की सार्थकता एवं उपयोगिता से वंचित रह जायेंगे।

यह सोचना और यह कहना कि हम किसी योग्य ही नहीं हैं, हमारे पास है ही क्या जिससे हम उन्नति कर सकते हैं और दूसरों का हित सम्पादित कर सकते हैं। यह भावना निराशाजनक है। इसको अपने मस्तिष्क से निकाल फेंकिये। आपमें उत्साह, साहस और स्फूर्ति के भण्डार भरे पड़े हैं। अपने पर विश्वास तो कीजिये आस्थापूर्वक आगे कदम तो बढ़ाइये फिर देखिये कि आपका मार्ग आप से आप स्पष्ट होता जायेगा।

हो सकता है आपमें विश्वास की कमी हो। उमंग आने पर भी आपका कदम न बढ़ता हो। बढ़ा कदम किसी भय से अथवा आशंका से ठिठक जाता हो और आप इस बात से दुखी हों कि आपका आदि ही प्रारम्भ नहीं हो पा रहा है। तब भी दुखी अथवा निराश होने की आवश्यकता नहीं। अपने को देखिये, अपनी परीक्षा कीजिये। अवश्य ही कोई न कोई कमजोरी अथवा कमी आपको भयभीत बनाते हुये है।

यदि आपमें शिक्षा की कमी है तो आज ही पढ़ना आरम्भ कर दीजिये। पढ़ने के लिये कोई भी समय असमय नहीं होता। सबको सब समय विद्या लाभ हो सकता है, यदि वह उसके लिये जिज्ञासापूर्वक प्रयत्न करता है। साक्षर बनिये और सत्साहित्य का अध्ययन कीजिये, सत्साहित्य का अध्ययन मनुष्य के विचार को अनायास ही खोल देना है, प्रकाश एवं प्रेरणा देता है। नई-नई योजनाएँ और क्रियाओं की प्रेरणा देता और मनुष्य में आत्मविश्वास की वृद्धि करता है। शिक्षा की कमी दूर होने से मनुष्य की अनेक अन्य कमियाँ स्वयं दूर हो जाया करती है। अविश्वास, सन्देह, शंका और संशय का कुहासा तो विद्या की एक किरण बात की बात में विलीन कर देती है।

यदि आपमें चारित्रिक दुर्बलता तो चरित्रवानों की संग कीजिये। सज्जनों का सत्संग और उनका जीवन देखने अध्ययन करने से यह दुर्बलता तो शीघ्र ही दूर हो जाती है। यदि आपके संकल्प शुद्ध है, उद्देश्य उन्नत एवं हितकारी हैं, यदि आप लोक-मंगल की भावना से प्रेरित है यों चारित्रिक दुर्बलता के प्रति निराशा अथवा आत्महीन होने की आवश्यकता नहीं, चरित्र का सुन्दर एवं शिव स्वरूप में देख सकने के कारण ही मनुष्य अन्धकार की भाँति भटक जाता है। जब आप सत्साहित्य और सत्संग द्वारा चरित्र का उज्ज्वल पक्ष देख लेंगे, आपकी सारी उपलब्धियां लजाकर तिरोहित हो जायेंगी और तब आप दर्पण की तरह प्रसन्न होकर पुलकित उठेंगे

इस प्रकार अपनी कमियाँ एवं कमजोरियों को निकाल फेंकिये, आपमें आत्म-विश्वास की वृद्धि होगी, जिसके साथ ही साहस, उत्साह और आशा की त्रिपथगा भी आपके अन्दर लहराने लगेगी। अपने शिव संकल्पों और लोक-कल्याण की भावना के साथ आप अपने इस विश्वास चतुष्टय को नियोजित कीजिये और वह सब कुछ बनकर वह सब कुछ कर दिखाइये, जो पुण्य एवं पुरुषार्थ उन्नति एवं विकास के नाम से पुकारा जाता है।


मनुष्य देह में ब्रह्म-वैवर्त

सृष्टि के आदि काल में विविधता कुछ भी न थी न पृथ्वी न पहाड़, जल, थल, नभ, तारे, विद्युत, वृक्ष, फल-फूल खेत आदि कुछ भी न था, जो कुछ इन स्थूल आँखों से देखा जा सकता है। एक परमात्मा ही तत्त्व रूप में सर्वत्र व्याप्त था। उस विश्व-व्यापी सत्ता ने सृष्टिः सृजन की इच्छा से तप किया। तप से अण्ड की उत्पत्ति और उस अण्ड से ही शरीर के विभिन्न अवयवों का विकास हुआ, ऐसी ऐतरेय उपनिषद् में बताया गया।

सृजन की इस मूल-प्रक्रिया का वर्णन करते हुये उपनिषदकार आगे बताते हैं ( ऐतरेय उपनिषद् द्वितीय व तृतीय खण्ड) कि “ परमात्मा ने अपनी प्राण देह से देवताओं को उत्पन्न किया। वे सब देवता समुद्र में आ गिरे। फिर उनमें भूख उत्पन्न हुई उन्होंने परमात्मा से कहा- “ हमारे लिये ऐसे शरीर का निर्माण करो, जिसमें रहकर हम अन्न आदि खा सकें।” परमात्मा ने उन्हें गाय, घोड़ा आदि शरीर दिखाये पर देवताओं को वे पसन्द न आये। अन्त में उन्हें मनुष्य शरीर दिखाया, वह देवताओं को पसन्द आ गया और उसमें प्रवेश कर गये। “ अग्नि वाणी बनकर मुख में, वायु प्राण बनकर नासिका में और सूर्य चक्षु बनकर नेत्र गोलकों में प्रविष्ट हुआ। दिशायें स्रोत बनकर कानों में घुसी। औषधियों ने राम बनकर हृदय में स्थित हुआ। मृत्यु अपान बनकर नाभि में और जल रेत बनकर उपस्थ में स्थित हो गया। परमात्मा ने तब क्षुधा और प्यास को भी सब देवताओं के अंशों में बाँट दिया और वे ही हवि ग्रहण करने लगी। तदनंतर परमेश्वर ने जल का तपाया और अन्न की उत्पत्ति की। अन्न को केवल अपान वायु ही ग्रहण कर सकी और उन्हीं के द्वारा प्रत्येक देवता को वाँछित हवि मिलने लगी।

“अब परमात्मा ने विचार किया कि इन्द्रियों में बैठे हुये देवताओं ने अपने-अपने विशय ग्रहण कर लिये तो फिर इनके लिये मैं कौन हुआ। यदि मैं न हुआ तो देवताओं की शक्ति का नियन्त्रण कोन करेगा? तब परमेश्वर न मनुष्य की मुर्दा को चीर कर देह में प्रवेश किया। वह द्वार विहित कहलाता है और उसे प्राप्त करने वाला आनंद का स्वामी बनाता है। उस परमात्मा के तीन आश्रम हैं, तीन स्वप्न हैं। हृदय प्रथम, ब्रह्मधाम दूसरा और ब्रह्माण्ड तीसरा। देवताओं को जब भोग से भी तृप्ति नहीं हुई, तब उनके विचार में आया कि यहाँ कौन मूल है, तब उन्होंने परमेश्वर को पहचाना और उनके दर्शन प्राप्त किये।”

इस प्रकार शरीर में स्थित इन देव-शक्तियों को गर्भ में रहकर ऋषियों में स्थित पर देव-शक्तियों को गर्भ में रहकर ऋषियों ने जाना ज्ञान-शक्ति आदेश शक्ति, विज्ञान-प्रज्ञान मेधा, दृष्टि, धैर्य, बुद्धि, मनन-शक्ति स्मृति, संकल्प, वेग, मनोरथ, कामना, योग, प्राण-शक्ति आदि सभी उस परमात्मा की सत्ता का ज्ञान कराने वाले है। जो परमात्मा की जान लेता है, वह इस लोक से उठकर स्वर्गलोक में ब्रह्म के साथ सभी दिव्य मोमों को पाता है। यह ज्ञानी अमृतत्व को प्राप्त होता है।

ऐतरेय उपनिषद् के इन यन्त्रों में मनुष्य-जीवन की उत्पत्ति-विकास और उसके विज्ञान के ऐसे गूढ़ रहस्य छिपे हुये हैं, जिन्हें जान लेने वाला सचमुच महान् ऐश्वर्य का स्वामी बन सकता है। मनुष्य शरीर देव-शक्तियों का आश्रम है। देव-शक्तियों एक ही गुणों वाली बाल्मीकि में सन्निहित शक्तियों का स्रोत कही सकती हैं, वह सब इस शरीर में विद्यमान् होने से मनुष्य के अभाव-ग्रस्त और असमर्थ होने का कोई कारण नहीं है। परमात्मा की उपस्थिति के कारण तो यह स्वयं ब्रह्मरूप ही है, किन्तु अज्ञानता वह उन शक्तियों को पहचानता नहीं और ऐसे कर्म करता है, जिससे उन देव-शक्तियों को पहचानता नहीं और ऐसे कर्म करता है, जिससे उन देव-शक्तियों का वरदान मिलने की अपेक्षा दुःख-दारिद्रय ही हाथ लगता है। मनुष्य अनन्त शक्तियों और साधनों से सम्पन्न होकर भी पग-पग पर रोग, शोक, पीड़ा-कष्ट बीमारी, दुर्बलता का शिकार होता रहता है। शरीर के प्रति आसक्ति के कारण वह दीन-हीन स्थिति में पड़ा रहता है।

भारतीय दर्शन के इन उच्चादर्शों को अब लोग अनर्गल और असंगत बातें कहकर टालते हैं। किन्तु पृथ्वी पर जीवन विकास के वर्तमान सिद्धान्त (थ्योरीज) जो विद्यालयों में पढ़ायें जाते हैं और जो विज्ञान के मुख्य सूत्र हैं, उन्हें यदि तथ्य की कसौटी पर देखें तो यह पायेंगे कि वे न तो बुद्धि-संगत हैं ओर न ही जीवन के आदि स्त्रोत को प्रभावित कर पाते हैं। विश्व व्यवस्था की तरह पूर्ण पुरुष का प्रादुर्भाव भी ईश्वर की रहस्यपूर्ण क्रिया है।

पहली मान्यता यह थी कि मनुष्य का विकास अमीबा से हुआ है। अमीबा एक कोशीय जन्तु है जो जल में रहता है और उसमें प्राणधारी के सभी गुण पाये जाते हैं। अमीबा को काँच की स्लाइड पर रखकर सूक्ष्मदर्शी की सहायता से ही अच्छी तरह देखा और उसके गुणों का पता चलाया जा सकता है।

अमीबा की प्रजनन क्रिया बड़ी विचित्र है, उसकी कोशिका जो प्रोटोप्लाज्मा की थैली होती है और उँगलियों की तरह अनेक दिशाओं में निकलती रहती है, जब कोई उँगली काफी आगे निकल जाती है तो वही प्रोटोप्लाज्म निकलकर एक नया अमीबा बन जाता है। इसकी ओर विद्युत आवेश या गर्मी रखी जाये तो वह तुरन्त पीछे हटकर अपनी रक्षा करता है। कोई खाद्य पदार्थ रखा जाये तो वह दो उँगलियों की तरह चिमटी-सी बनाकर उसे ग्रहण कर लेता है और उसे इस तरह रस में बदल लेता है कि नया प्रोटोप्लाज्मा तैयार कर ले, इस तरह उसे शक्ति मिलती है। अन्य जीवों की तरह वह उत्सर्जन भी करता है। पेट के मल को वह पानी में छोड़ता रहता है। अमीबा अपनी संतति को एक से दो, दो से चार और चार से आठ के क्रम में निरन्तर बढ़ता रहता है। इसी अमीबा में बाद में जीवन-विकास का सिद्धान्त (थ्योरी आफ इवोल्यूशन) माना गया और यह कहा गया कि एक कोशीय जीव ने ही अन्त में बहु-कोशीय जीव के रूप में अपने आपको परिणत किया।

किन्तु जब मनुष्य शरीर के कोशों (सेल्स) का अध्ययन किया गया तो जीवन विकास की अनेक नई बातें सामने आई और विज्ञान यह मानने लगा कि अमीबा मनुष्य की विकास शृंखला का मूल घटक नहीं हो सकता। यदि ऐसा होता तो मनुष्य शरीर के सूक्ष्म कोश जो स्वयं भी प्रोटोप्लाज्म से बना होता है, निकालकर एक स्वतन्त्र जीव बना दिया जाना सम्भव होता, जबकि नये बालक का जन्म गर्भाधान की विलक्षण प्रक्रिया से सम्पन्न होता है।

19 वीं और 20 वीं शताब्दी में इस सम्बन्ध में व्यापक खोजें हुई। पर वे सब अपनी-अपनी तरह से एकांगी हल ही प्रस्तुत करती हैं। वैज्ञानिक चेतना के अत्यन्त सूक्ष्म स्वरूप का अध्ययन तो कर सके हैं, किन्तु उसका विश्व-व्यापी शक्ति के साथ कोई सामंजस्य नहीं बिठा सके। यदि मनुष्य अमीबा, अमीबा से मछली, मछली से सुअर, सुअर से बन्दर, बन्दर से गोरिल्ला और गोरिल्ला से वर्तमान मनुष्य रूप में आया होता तो विकास की इस गति को आगे बढ़ते जाना चाहिये था और उस मूल प्रक्रिया को भी चलते रहना चाहिये था और हमें लाखों वर्ष मनुष्य योनि से आगे बढ़कर किसी और प्रकार की शरीर स्थिति में बदल जाना चाहिये था, हम इतनी लम्बी अवधि तक मनुष्य ही क्यों बने रहते? किन्तु उल्टा हो यह रहा है कि धरती में जितने भी जीवित प्रणी हैं, उनकी शक्तियाँ घटती जा रही हैं, मनुष्य की शारीरिक शक्तियाँ भी धीरे-धीरे घटती जा रही हैं। विकास अपेक्षा जीव विनाश की दिशा में चल रहे हैं। इसलिये विकास की थ्योरी गले नहीं उतरती।

चेतना को रसायन की देन कहा जाता तो उसे लैबोरेटरी में बना लिया गया होता और अब जो कम्प्यूटर तैयार किये जाते हैं, उनके स्थान पर मनुष्य शरीर तैयार करने वाले कारखाने चल रहे होते। मनुष्य शरीर में जो भावना-विज्ञान छुपा हुआ है, उससे स्पष्ट ही है कि मनुष्य की उत्पत्ति भी उतनी ही रहस्यपूर्ण है, जितनी उसकी आन्तरिक शक्तियाँ। भौतिक शरीर तैयार हो भी जाये तो उसमें भावनायें कैसे डाली जायें?

अब हम अपने प्राचीन दर्शन की ओर लौटते हैं, जिसमें परमात्मा की इच्छा से अण्ड का निर्माण, अण्ड से अनेक अवयवों का विकास और उसमें देवताओं की परआत्मा की प्रतिष्ठा हुई। सूर्य और चन्द्रमा आदि का वर्तमान स्वरूप कुछ भी हो पर उनका निर्माण एकाएक हुआ है। विकास या विघटन स्थूल और सूक्ष्म दोनों में चलता है, किन्तु उनका आदि - आविर्भाव किसी पराशक्ति का ही महान् चमत्कार हो सकता है, इस बात को अब शरीर विज्ञान के पण्डित भी मानने लगे हैं। ओकाल्ट एनाटामी के प्रसिद्ध विद्वान् ‘एलानलियो’ ने उपरोक्त भारतीय दर्शन को इन शब्दों में प्रमाणित किया है- “ यदि हम इतने बुद्धिमान् होते कि विश्व-व्यवस्था को अच्छी तरह समझ लेते तो वह देखते कि सूर्य-चन्द्रमा एवं अन्य ग्रहों का शरीर के समस्त अवयवों एवं उनके कार्यों पर कितना हस्तक्षेप है।”

“ दो मस्तिष्क प्रणाली एवं उनका आत्मिक उत्थान से सम्बन्ध” नामक पुस्तक के रचयिता डॉ. कोरिन हेलिन (दि भरस एण्ड कूँ नार्थ-स्ट्रीट द्वारा प्रकाशित) ने शरीर की जटिल प्रक्रियाओं को विस्तृत अध्ययन करने के बाद यह लिखा कि-यह बड़े आश्चर्य की बात है कि सारी की सारी प्राकृतिक कला और ज्ञान नक्षत्रों द्वारा मनुष्य समाज को मिला है। सारे बुद्धिजीवी प्राणी नक्षत्रों के ही शिष्य है।” आकास्ट एनाटामी यह मानती है कि मनुष्य के दो शरीर हैं, एक पंच-तत्वों से बना हुआ है स्थूल। दूसरा सूक्ष्म है जो नक्षत्रों से (नक्षत्रों का अर्थ स्पष्टतया उन देव शक्तियों से ही है, जिनका वर्णन ऐतरेय उपनिषद् में किया है।) है।

हमारे शरीर का स्थूल भाग जो दृश्य (विजिवल) और स्पृश्य (टचेबुल) है, पृथ्वी से बना है, यह कितने आश्चर्य की बात है कि अन्य लोकों में यथा चन्द्रमा-सूर्य बुध-बृहस्पति आदि में जो ठोस तत्त्व है, वह पृथ्वी की देन है, पृथ्वी भी अपने अणुओं को उसी प्रकार बिखेरती रहती है, जिस प्रकार सूर्य और चन्द्रमा आदि बिखेरते रहते हैं। तात्पर्य यह कि जिस प्रकार अपनी-अपनी शक्ति धाराओं द्वारा नक्षत्रों ने पृथ्वी को आच्छादित कर रखा है, पृथ्वी भी सभी नक्षत्रों पर छाई हुई है। सब अन्योऽन्याश्रित हैं।

इस जटिल प्रक्रिया को मनुष्य शरीर में दो मस्तिष्क प्रणाली को समझ कर अनुभव किया जा सकता है। मस्तिष्क कोष दो पर्तों का बना होता है, सफेद एवं भूरा तत्त्व। सफेद तत्त्व नसें बनाता है और भूरा नसों में ग्रन्थियाँ (गैम्लियन)। गैग्लियन में न्यूक्लियस वाली नसें पाई जाती हैं जो प्रोटोप्लाज्मा के भीतर तक धँसी होती हैं और फास्फोरस तत्त्व वाली होती हैं। फास्फोरस अग्नि तत्त्व है और वह जीवन में महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है। शरीर में अग्नि की मन्दता ही अपच, अजीर्णता, कान्तिहीनता, दुर्बलता और रोगों का कारण होती है, अग्नि न हो तो मनुष्य निर्बल और कमजोर पड़ जाये। यह अग्नि तत्त्व सूर्य नक्षत्र (सोलर) का अदृश्य भाग ही है। फास्फोरस तत्त्व शरीर में आहार प्रक्रिया पर उतना आधारित नहीं है, जितना कि मस्तिष्क की उत्थान प्रक्रिया से। भौतिक विज्ञान अभी केवल स्थूल संरचना को देखती है, एक दिन भौतिक विज्ञान और मैटाफिजिक्स समझ सकेगी कि ब्रह्माण्ड व्यापी ऊर्जा शारीरिक तत्त्वों में कैसे बदलती है और उसे शक्ति के साथ ही बुद्धि, मेधा, प्रज्ञा प्रधान करती है।

एक आम का वृक्ष लगायें उसे पर्याप्त खाद और पानी दें, किन्तु उस पर सूर्य का प्रकाश न पड़े तो सर्वप्रथम तो उसका बचना और बढ़ना ही असम्भव है, किन्तु वैज्ञानिकों की यह थ्योरी मान लें कि प्रकाश सीधा ही नहीं रुकावट (रेजिस्टैनस) को घेरकर भी पहुँचता है तो भी उस वृक्ष में फूल और मीठे फल उपलब्ध नहीं किये जो सकेंगे, क्योंकि खटाई, मिठाई, रंग यह सब सूर्य की रश्मियों के ही ग्रहण (आर्ब्जब) किये जाते हैं, तात्पर्य यह कि पृथ्वी में पाया जाने वाला आस्वाद भाग भी उसका अपना नहीं है। वह सब कुछ ब्रह्माण्ड में कहीं गैस के रूप में विद्यमान् है और यदि उस विज्ञान को कोई सीधे-सीधे समझ लें तो वह मनुष्य किसी भी स्थान पर किसी भी क्षण मन चाहे कितना भी तत्त्व या पदार्थ अपने लिये आकर्षित कर सकता है।

आर्य ग्रन्थों में गौ नाम सूर्य प्राण का है। उससे मिलकर यह पृथ्वी प्राण आस्वाद योग्य रस बनाता है। इसलिये जो भी आस्वाद वस्तुयें हैं, जब उन पर सूर्य का सीधा हस्तक्षेप है, तब मनुष्य शरीर का तो कहना ही क्या? हम तो सूर्य के बिना चल फिर भी नहीं सकते।

भिन्न-भिन्न तत्त्व (एलिमेन्ट्स) जलने पर अलग-अलग प्रकार का प्रकाश उत्सर्ज करते हैं, ये प्रकाश साधारणतया आँखों से देखने पर एक से प्रतीत हो सकते हैं, परन्तु इन प्रकाशों को विक्षेपण (डिस्पर्शन) करके यदि इनका वर्ण क्रम अध्ययन (त्रिकोण प्रिज़्म पर किरण फेंक कर पर्दे पर विक्षेपित प्रकाश अलग-अलग वर्णों में दिखाई दे जाता है।) किया जाये तो पता चलता है कि प्रत्येक प्रकार के प्रकाश के वर्णाश्रम में अन्तर होगा जो दूसरे प्रकार के प्रकाश में नहीं होगा। उदाहरणार्थ सोडियम से पीला, पोटैशियम से लाल-लाल और कैल्शियम से लाल-लाल नारंगी, पीला, हरा-हरा इस प्रकार का वर्णाश्रम बनता है।

इन विशेषताओं का अध्ययन करके बिना तत्त्व का ज्ञान हुये बिना यह बताया जा सकता है कि प्रकाश कौन से तत्त्व से आ रहा है, इतना ही नहीं बल्कि एक से अधिक तत्त्वों के मिश्रण को जलाकर और मिश्रित प्रकाश के वर्णाश्रम (स्पेक्ट्रम) का अध्ययन करके यह बता सकना सम्भव है कि मिश्रण में कौन-कौन से तत्त्व विद्यमान् हैं, भिन्न-भिन्न विशेषताओं से प्रत्येक भिन्न-तत्त्व को पहचान सकना सम्भव हो गया है।

अब इस विश्लेषण का दूसरी तरह से अध्ययन करें तो हम निश्चित ही इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि प्रकाश जिस तरह पदार्थों की ज्वलन शक्ति है, उसी प्रकार उसमें स्थूल पदार्थों का परिवर्तन यह एक चक्र है और इसी सिद्धान्त पर शरीर में स्थूल और चेतन दोनों तत्त्व एक बिन्दु पर बैठ जाते हैं, स्थूल को हम पदार्थ रूप में देखें तो चेतना प्रकाश ही होगी और प्रकाश चूँकि मिट्टी ( पृथ्वी) के अणु की देन नहीं और वह भिन्न-भिन्न प्रकृति का होता है, इसलिये वह भिन्न प्रकृतियाँ निःसन्देह आकाश के भिन्न-भिन्न नक्षत्रों ( देवताओं) के प्राण या प्रकाश प्रवाह कहे जायेंगे। तभी आकाश स्थित देवताओं की शरीर में विद्यमानता सिद्ध होगी।

शरीर में हाथ-पाँव रक्त, माँस-मज्जा को स्थूल पदार्थों की रासायनिक क्रिया कह सकते हैं, मन-बुद्धि प्राण, इच्छा, ज्ञान इन सूक्ष्म गुणों को पदार्थ नहीं कह सकते, जबकि मनुष्य का जीवन इन्हीं से सधा हुआ है, मनुष्य जिस दिन मर जाता है, लाश बनी रहती है तो भी वह गति नहीं कर सकता। गति और क्रियाशीलता प्रकाश का गुण है, भले ही वह किसी भी आकृति और प्रकृति का क्यों न हो? यदि अन्न से ही मन-प्राण बुद्धि, चित्त, अहंकार का निर्माण होता है तो वह उसके स्थूल द्रव्य न होकर ‘न्यूक्लियाई’ ही होंगे और वह ‘न्यूक्लियाई’ आच्छादित आकाश के किसी नक्षत्र द्वारा आकर्षित शक्ति कण ही हो सकते हैं यह शरीर में पहुँच कर अपना-अपना स्थान ग्रहण करते है, मन को चन्द्रमा की तेजस शक्ति कहते हैं-चन्द्रमा किस प्रकार वनस्पति और वनस्पति ही मन का निर्माण करती है, इस सम्बन्ध में हम पहले बता चुके हैं। यह वह निष्कर्ष है जिन्हें वैज्ञानिक जान चुके हैं अन्य देवताओं की स्थिति शरीर में कहाँ और किस प्रकार है, यह तब पता चलेगा जब विज्ञान का प्रवेश मस्तिष्क से फैलने वाले नाड़ी जाल और उनके भीतर की रहस्यमय प्रक्रिया में होगा। अभी तक भी जितना समझा जा सका है, वह अति गम्भीर और भारतीय दर्शन की ही पुष्टि करने वाला है।

मस्तिष्क का अध्ययन करने वाले डाक्टर और वैज्ञानिक यह मानते है कि शरीर में दो प्रकार की नसों का जाल बिछा हुआ है-(1) सैम्पैथेटिक नसें-यह शरीरगत भाग की नसें हैं। उनसे पाचन क्रिया चलती है, खाद्य से शक्ति-चूषण और रक्त परिभ्रमण का कार्य भी यही नसें करती है। ग्रन्थियों से होने वाले स्राव को यह नसें ही नियंत्रित करती हैं। शरीर की टूट-फूट को जोड़ना और मलमूत्र बाहर निकालने में इन नसों का ही योग दान रहता है जब मस्तिष्क की सुषुम्ना प्रणाली की नसें विश्राम करती हैं, तब यही सैम्पैथेटिक प्रणाली टूट-फूट जोड़ती, माँस और अन्य शरीर कोशों में जो क्षति हुई होती है, उसे सुधारती रहती है। नसों की यह जटिलता मनुष्य शरीर में ही है, पशुओं के शरीर में नहीं।

इन नसों के मूल स्रोत और शक्ति का पता लगाते हुए शरीर शास्त्री जब मस्तिष्क में पहुँचे तो उन्होंने पाया कि नसें मात्र इच्छा प्रवाह हैं और आगे चलकर वह जटिल और स्थूल रूप ले लेती हैं, इसलिये शरीर शास्त्रियों को एक वर्ग मनोविज्ञान का हिमायती हो गया और यह मानने एवं कहने लगा कि मनुष्य अपनी इच्छाओं को स्वस्थ, पवित्र एवं सृजनात्मक बनाकर अपने स्वास्थ्य को स्थिर रख सकता है। अधोगामी विचारों और कुप्रवृत्तियों से अपने आपको बचाकर अपना स्वास्थ्य भी बचाये रख सकता है।

मनोविज्ञान का यह सिद्धान्त जितना विकसित हुआ उतनी ही महत्त्वपूर्ण मन और मानवीय चेतना गुणों सम्बन्धी बातें सामने आई। शरीर विज्ञानी अब यह भी मानते हैं कि इच्छा शक्ति धाराओं और रंगों के रूप में मस्तिष्क प्रणाली के कोषों में बहता देखा जो सकता है।

सैम्पैथेटिक मस्तिष्क प्रणाली स्त्री स्वभाव (निगेटिव) की है। नसों का एक बड़ा झुण्ड हृदय के निकट से फूटता है। भावनाओं का, मन का, इसी स्थान से सम्बन्ध है, इसलिये मानवीय इच्छाओं, अनुभूतियों और शरीर विज्ञान सभी दृष्टि से इनका मूल्य महत्व बढ़ जाता है, इनके व्यापक और सूक्ष्म अध्ययन की आवश्यकता भी उतनी ही अधिक है।

शरीर, हृदय या मन के कष्ट मस्तिष्क को प्रभावित करते हैं, इसलिये जब तक मस्तिष्क की शक्तियों का पता नहीं चलता, तब तक इच्छाएँ और भावनायें भी मनुष्य को सुख और आत्मिक शांति प्रदान नहीं कर सकती। अब वैज्ञानिक यह मानने लगे हैं कि मस्तिष्क आध्यात्मिक ब्रह्माण्ड से प्रभावित है और जीवन सुधार के लिये उसका जानकारी नितान्त आवश्यक है।

मस्तिष्क के इस भाव को अवचेतन मन कहते है और वह जिन नसों से शेष शरीर के साथ सम्बन्ध स्थापित करता है उन्हें सैरी ब्रोस्पाइनस कहते है। यह जिन कोषों से बना है, यह रेशों के पुरकुन्ज ही जान पड़ते हैं, वही शरीर की तनमात्रायें ग्रहण करते है और सुषुम्ना प्रवाह से लेकर रीढ़ की हड्डी के सारे भाग में छाये रहते हैं। हृदय स्थित मन से यह सम्बन्ध स्थापित कर उसे शक्ति देते हैं, यदि मन को विकसित कर दिया जाय और सुषुम्ना प्रवाह में निवास करने वाली इन शक्ति धाराओं को ऊर्ध्वगामी बना लिया जाये तो मनुष्य आकाश-स्थित अदृश्य शक्तियों की महत्त्वपूर्ण और आश्चर्यजनक जानकारियाँ और रहस्य प्राप्त कर सकता है। देवताओं का सम्बन्ध भी सेरी ब्रोस्पाइनल प्रणाली से, इसे ही विहित ‘द्वार कह सकते है’ अभी उसकी विस्तृत जानकारी नहीं हो पाई पर यदि विज्ञान किसी तरह इसे नियन्त्रित कर सका तो अंतरिक्षीय ज्ञान अत्यन्त सुलभ हो जाने की सम्भावनायें हैं।


अभाव का दुःख-सन्तोष का सुख

शहर में एक युवक रहता था, वह बड़ा परिश्रमी था। दिन भर काम करता और शाम को जो मिलता खा पीकर चैन की नींद लेता।

एक दिन एक धनी व्यक्ति को देखकर उसकी ईर्ष्या जाग पड़ी। ईर्ष्या की जलन में युवक को रात में अच्छी तरह नींद भी नहीं आती थी।

संयोग से एक दिन उसे बहुत-सा घन जमीन में गड़ा मिल गया। अब तो उसकी सारी चिन्ता दूर हो गई। दूसरे दिन से ही उसका समय भोग और वासना की तृप्ति में बीतने लगा। कुछ ही दिन में उसका सारा शरीर कमजोर पड़ गया। मित्र लोग ईर्ष्या करने लगे, सब पैसे से प्रेम करने वाले मिलते, उसे किसी पर विश्वास न रहा। फलस्वरूप उसकी चिन्ता पहले से दुगुनी हो गई। उसने सोचा इससे तो पहले ही अच्छे थे, सुख और सन्तोष की नींद सो लेते थे।

‘एक दिन एक महात्मा उधर से निकले, युवक ने उनसे सुखी होने का उपाय पूछा। महात्मा ने कहा-सन्तोष और इतना कहकर आगे बढ़ गये। युवक ने बात समझी, अपनी मुफ्त की सम्पत्ति एक विद्यालय को दान कर दी और फिर से वही परिश्रमशील जीवन जीने में लग गया।


विचार ही चरित्र निर्माण करते हैं

ड़ड़ड़ड मस्तिष्क में बना रहता है, वह ड़ड़ड़ड स्थान बना लेता है। यही ड़ड़ड़ड स।सकार बन जाता है। संस्कारों ड़ड़ड़ड बहुत महत्व है। सामान्य-विचार ड़ड़ड़ड के लिए मनुष्य को स्वयं प्रयत्न करना ड़ड़ड़ड उसको यन्त्रवत् संचालित कर ड़ड़ड़ड जिसके द्वारा सारी क्रियायें ड़ड़ड़ड विचारों के अधीन नहीं होता है इसके विपरीत इस पर संस्कारों का पूर्ण आधिपत्य होता ड़ड़ड़ड भी शरीर-यन्त्र संस्कारों की प्रेरणा से ड़ड़ड़ड सक्रिय हो सकता है। और तदनुसार आचरण प्रति ड़ड़ड़ड़ करना है। मानव-जीवन में संस्कारों का बहुत महत्व होता है। इन्हें यदि मानव-जीवन का अधिष्ठाता और आचरण का प्रेरक कह दिया जाय तब भी असंगत न होगा।

केवल विचार मात्र ही मानव चरित्र के प्रकाशक प्रतीक नहीं होते। मनुष्य का चरित्र विचार और आचार दोनों से मिलकर बनता है। संसार में बहुत से ऐसे लोग पाये जा सकते हैं, जिनके विचार बड़े ही उदार, महान् और आदर्शपूर्ण होते हैं, किन्तु उनकी क्रियायें उसके अनुसार नहीं होता है। विचार पवित्र हों और कर्म अपावन तो वह सच्चरित्रता नहीं हुई। इसी प्रकार बहुत से लोग ऊपर से बड़े ही सत्यवादी, आदर्शवादी और धर्म-कर्म वाले दीखते हैं, किन्तु उनके भीतर कलुषपूर्ण विचारधारा बहती रहती है। ऐसे व्यक्ति भी सच्चे चरित्र वाले नहीं माने जा सकते। सच्चा चरित्रवान् वही माना जायेगा ओर वास्तव में वही होता भी है, जो विचार और आचार दोनों को समान रूप से उच्च और पुनीत रखकर चलता है।

चरित्र मनुष्य की सर्वोपरि सम्मति है। विचारकों का कहना है-धन चला गया, कुछ नहीं गया। स्वास्थ्य चला गया, कुछ चला गया। किन्तु यदि चरित्र चला गया तो सब कुछ चला गया।” विचारकों का यह कथन शतप्रतिशत भाव से अक्षरशः सत्य है। गया हुआ धन वापस आ जाता है। नित्य प्रति संसार में लोग धनी से निर्धन और निर्धन से धनवान् होते रहते है। धूप-छाँव जैसी धन अथवा अधन की इस स्थिति का जरा भी महत्व नहीं है। इसी प्रकार रोगों, व्याधियों और चिन्ताओं के प्रभावों से लोगों का स्वास्थ्य बिगड़ता और तदनुकूल उपायों द्वारा बनता रहता है। नित्य प्रति अस्वास्थ्य के बाद लोग स्वस्थ होते देखे जा सकते हैं। किन्तु गया हुआ चरित्र दुबारा वापस नहीं मिलता। ऐसी बात नहीं कि गिरे हुए चरित्र के लोग अपना परिष्कार नहीं कर सकते। दुश्चरित्र व्यक्ति भी सदाचार, सद्विचार और सत्संग द्वारा चरित्रवान् बन सकता है। तथापि वह अपना वह असंदिग्ध विश्वास नहीं पा पाता, चरित्रहीनता के कारण जिसे वह खो चुका होता है।

समाज जिसके ऊपर विश्वास नहीं करता, लोग जिसे सन्देह और शंका की दृष्टि से देखते हों, चरित्रवान् होने पर भी दसवें चरित्र का कोई मूल्य, महत्व नहीं है। वह अपनी निज की दृष्टि में भले ही चरित्रवान् बना रहे। आत्मा और अपने परमात्मा की दृष्टि में समान रूप से असंदिग्ध और सन्देह रहित हो। इस प्रकार की साम्य और निःशंक चरित्रमत्ता ही वह आध्यात्मिक स्थित है, जिसके आधार पर सम्मान, सुख, सफलता और आत्मशान्ति का लाभ होता है। मनुष्य को अपनी चारित्रिक महानता की अवश्य रक्षा करनी चाहिये। यदि चरित्र गया।

धन और स्वास्थ्य भी मानव-जीवन की सम्पत्तियाँ हैं- इसमें सन्देह नहीं। किन्तु चरित्र की तुलना में वह नगण्य है। चरित्र के आधार पर मन और स्वास्थ्य तो पाये जा सकते हैं किन्तु धन और स्वास्थ्य के आधार पर चरित्र नहीं पाया जा सकता। यदि चरित्र सुरक्षित है, समाज में विश्वास बना है तो मनुष्य अपने परिश्रम और पुरुषार्थ के बल पर पुनः धन की प्राप्ति कर सकता है। चरित्र में यदि दृढ़ता है, सन्मार्ग का त्याग नहीं किया गया है तो उसके आधार पर संयम, नियम और आचार-प्रकार के द्वारा खोया हुआ स्वास्थ्य फिर वापस बुलाया जा सकता है। किन्तु यदि चारित्रिक विशेषता का ह्रास हो गया है तो इनमें से एक की भी क्षति पूर्ति नहीं की जा सकती। इसलिये चरित्र का महत्व धन और स्वास्थ्य दोनों से ऊपर है। इसलिए विद्वान् विचारकों ने यह घोषणा की है, कि-धन चला गया, तो कुछ नहीं गया। स्वास्थ्य चला गया, तो कुछ गया। किन्तु यदि चरित्र चला गया तो सब कुछ चला गया।”

मनुष्य के चरित्र का निर्माण संस्कारों के आधार पर होता है। मनुष्य जिस प्रकार के संस्कार संचय करता रहता है, उसी प्रकार उसका चरित्र ढलता रहता है। अस्तु अपने चरित्र का निर्माण करने के लिए मनुष्य को अपने संस्कारों का निर्माण करना चाहिये। संस्कार, मनुष्य के उन विचारों के ही प्रौढ़ रूप होते हैं, जो दीर्घकाल तक रहने से मस्तिष्क में अपना स्थायी स्थान बना लेते हैं। यदि सद्विचारों को अपनाकर उनका ही चिन्तन और मनन किया जाता रहे तो मनुष्य के संस्कार शुभ और सुन्दर बनेंगे इसके विपरीत यदि अशुद्विचारों को ग्रहण कर मस्तिष्क में बसाया और मनन किया जायेगा तो संस्कारों के रूप में कूड़ा-कर्कट ही इकट्ठा होता जायेगा।

विचारों का निवास चेतन मस्तिष्क और संस्कारों का निवास अवचेतन मस्तिष्क अप्रत्यक्ष अथवा गुप्त होता है। यही कारण है कि कभी-कभी विचारों के विपरीत क्रिया हो जाया करती हैं। मनुष्य देखता है कि उसके विचार अच्छे और सदाशयी है, तब भी उसकी क्रियायें उसके विपरीत हो जाया करती हैं। इस रहस्य को न समझ सकने के कारण कभी-कभी वह बड़ा व्यग्र होने लगता है। विचारों के विपरीत कार्य हो जाने का रहस्य यही होता है कि मनुष्य की क्रिया प्रवृत्ति पर संस्कारों का प्रभाव रहता है और गुप्त मन में छिपे रहने से उनका पता नहीं चल पाता। संस्कार विचारों को व्यर्थ कर अपने अनुसार मनुष्य की क्रियायें प्रेरित कर दिया करते हैं। जिस प्रकार पानी के ऊपर दीखने वाले छोटे से कमल पुष्प का मूल पानी के तल में कीचड़ में छिपा रहने से नहीं दीखता, उसी प्रकार परिणाम रूप क्रिया का मूल संस्कार अवचेतन मन में छिपा होने से नहीं दीखता।

कोई-कोई विचार ही तात्कालिक क्रिया के रूप परिणत हो पाता है अन्यथा मनुष्य के वे ही विचार क्रिया के रूप में परिणत होते हैं, जो प्रौढ़ होकर संस्कार बन जाते हैं। वे विचार जो जन्म के साथ ही क्रियान्वित हो जाते हैं, प्रायः संस्कारों के जाति के ही होते हैं। संस्कार से भिन्न तात्कालिक विचार कदाचित् ही क्रिया के रूप में परिणत हो पाते हैं, बशर्ते कि वे संस्कार के रूप में परिपक्व न हो गये हों। वे संतुलित तथा प्रौढ़ मस्तिष्क वाले व्यक्ति अपने अवचेतन मस्तिष्क को पहले से ही उपयुक्त बनाये रहते हैं, जो अपने तात्कालिक विचारों को क्रिया रूप में बदल देते हैं। इसका कारण इसके सिवाय और कुछ नहीं होता है कि उनके संस्कारों और प्रौढ़ विचारों में भिन्नता नहीं होती-एक साम्य तथा ड़ड़ड़ड़ होती है।

संस्कारों के अनुरूप मनुष्य का चरित्र बनता है और विचारों के अनुरूप संस्कार। विचारों की एक विशेषता यह होती है कि यदि उनके साथ भावनात्मक अनुभूति का समन्वय कर दिया जाता है तो वे न केवल तीव्र और प्रभावशाली हो जाते हैं, बल्कि शीघ्र ही पक कर संस्कारों का रूप धारण कर लेते हैं। किन्हीं विषयों के चिन्तन के साथ यदि मनुष्य की भावनात्मक अनुभूति जुड़ जाती है तो वह विषय मनुष्य का बड़ा प्रिय बन जाता है। यही प्रियता उस विषय को मानव-मस्तिष्क पर हर समय प्रतिबिम्बित बनाये रहती है। फलतः उसी विषयों में चिन्तन, मनन की प्रक्रिया भी अबाध गति से चलती रहती है और वह विषय अवचेतन में जा-जाकर संस्कार रूप में परिणत होता रहता है। इसी नियम के अनुसार बहुधा देखा जाता है कि अनेक लोग, जो कि प्रियता के कारण भोग वासनाओं को निरन्तर चिन्तन से संस्कारों में सम्मिलित कर लेते हैं, बहुत कुछ पूजा-पाठ सत्संग और धार्मिक साहित्य का अध्ययन करते रहने पर भी उनसे मुक्त नहीं ड़ड़ड़ड़ चाहते है कि संसार के नश्वर भोगों और ड़ड़ड़ड़ वासनाओं से विरक्ति हो जाये, लेकिन उनकी ड़ड़ड़ड पूरी नहीं हो पाती

कर्म और विरक्ति भाव में रुचि होने पर भी-- वासनायें उनका साथ नहीं छोड़ पाती। विचार जब तक संस्कार नहीं बन जाते मानव-वृत्तियों में परिवर्तन नहीं ला सकते। संस्कार रूप भोग वासनाओं से छूट सकना तभी सम्भव होता है जब अखण्ड प्रयत्न द्वारा पूर्व संस्कारों को धूमिल बनाया जाये और वाँछनीय विचारों को भावनात्मक अनुभूति के साथ, चिन्तन-मनन और विश्वास के द्वारा संस्कार रूप में प्रौढ़ और परिपुष्ट किया जाय। पुराने संस्कार बदलने के लिये नये संस्कारों की रचना परमावश्यक है।

चरित्र मानव-जीवन की सर्वश्रेष्ठ सम्पदा है। यही वह धुरी है, जिस पर मनुष्य का जीवन सुख-शांति और मान-सम्मान की अनुकूल दिशा अथवा दुःख दारिद्रय तथा अशान्ति, असन्तोष की प्रतिकूल दिशा में गतिमान होता है। जिसने अपने चरित्र का निर्माण आदर्श रूप में कर लिया उसने मानो लौकिक सफलताओं के साथ परलौकिक सुख-शांति की सम्भावनायें स्थिर कर ली और जिसने अन्य नश्वर सम्पदाओं के माया-मोह में पड़कर अपनी चारित्रिक सम्पदा की उपेक्षा कर दी उसने माने लोक से लेकर परलोक तक के जीवन-पथ में अपने लिये नारकीय पड़ाव का प्रबन्ध कर लिया। यदि सुख की इच्छा है तो चरित्र का निर्माण करिये। धन की कामना है ते आचरण ऊँचा करिये, स्वयं की ड़ड़ड़ड है तो भी चरित्र को देवोपम बनाइए और यदि आत्मा, परमात्मा अथवा मोक्ष मुक्ति की जिज्ञासा है तो भी चरित्र को आदर्श एवं उदार बनाना होगा। जहाँ चरित्र है वहाँ सब कुछ है, जहाँ चरित्र नहीं वहाँ कुछ भी नहीं। भले भी देखने-सुनने के लिये भण्डार क्यों न भरे पड़े हों।

चरित्र की रचना संस्कारों के अनुसार होती है और संस्कारों की रचना विचारों के अनुसार। अस्तु आदर्श चरित्र के लिये, आदर्श विचारों को ही ग्रहण करना होगा। पवित्र कल्याणकारी और उत्पादक विचारों को चुन-चुनकर अपने मस्तिष्क में स्थान दीजिये। अकल्याणकारी दूषित विचारों को एक क्षण के लिये भी पास मत आने दीजिये। अच्छे विचारों का भी चिन्तन और मनन करिये। अच्छे विचार वालों से संसर्ग करिये, अच्छे विचारों का साहित्य पढ़िये और इस प्रकार हर ओर से अच्छे विचारों से ओत-प्रोत हो जाइये। कुल ही समय में आपके उन शुभ विचारों से आपकी एकात्मक अनुभूति जुड़ जायेगी, उनके चिन्तन-मनन में निरन्तरता आ जायेगी, जिसके फलस्वरूप वे मांगलिक विचार चेतन मस्तिष्क से अवचेतन मस्तिष्क में संस्कार बन-बनकर संचित होने लगेंगे और तब उन्हीं के अनुसार आपका चरित्र निर्मित और आपकी क्रियायें स्वाभाविक रूप से आपने आप संचालित होने लगेंगी। आप एक आदर्श चरित्र वाले व्यक्ति बनकर सारे श्रेयों के अधिकारी बन जायेंगे


भगवान् बुद्ध

भगवान् बुद्ध मृत्यु-शैया पर पड़े थे। उनकी जीवन-ज्योति के अस्त होने में कुछ ही विलम्ब था। सुभद्र नामक साधु ने यह समाचार सुना तो वह अपनी धर्म सम्बन्धी कुछ शंकाओं को निवारण करने के उद्देश्य से उनकी सेवा में उपस्थित हुआ। पर आनन्द ने, जो कुटी के द्वार पर स्थित था उसे भीतर जाने से रोका और कहा कि-” भगवान् को इस समय कष्ट देना उचित न होगा।” पर सुभद्र बराबर आग्रह करता रहा कि उसे भगवान् का दर्शन कर लेने दिया जाय।

बुद्ध जी ने भीतर पड़े हुए इस चर्चा को अस्पष्ट रूप से सुना और वहीं से कहा-आनन्द सुभद्र को भीतर आने दो। वह ज्ञान-प्राप्ति की इच्छा से आया है, मुझे कष्ट देने नहीं आया।”

सुभद्र ने जैसे ही भीतर जाकर करुणा की उस शांत मूर्ति को देखा, वैसे ही बुद्ध जी के उपदेश उसके हृदय में प्रविष्ट हो गये और वह प्रव्रज्या लेकर बौद्ध भिक्षु बन गया। बुद्ध भगवान् ने शरीरान्त होते हुये भी किसी ज्ञान के अभिलाषी को निराश नहीं किया।


शक्ति नहीं, करुणा जीतेगी

1 मार्च 1954 की प्रातःकाल जब भगवान् सूर्यदेव का आगमन हो रहा था, पृथ्वी में-अमेरिका में विकिनी प्रवाल, द्वीप -विकिनी अटोल- में हाइड्रोजन बम का परीक्षण विस्फोट किया गया। जैक क्लार्क जो विस्फोट के बाद उत्पन्न हुए रेडियो बादल और परिस्थितियों के अध्ययन दल का नेतृत्व कर रहा था, अपने 9 साथियों सहित अस्थायी रूप से बनाये गये एक ऐसे दुर्ग में, वहाँ न तो हवा जा सकती थी और न जल का तूफान, भूकम्प से भी उसे कुछ क्षति नहीं पहुँच सकती थी, जाकर छुप गये। यह स्थान विस्फोट स्थल से 20 मील दूर दक्षिणी हिस्से पर बनाया गया था। यहीं से उन लोगों को विस्फोट और रेडियो सक्रिय धूल के दुष्परिणामों का अध्ययन करना था।

नागाशाकी और हिरोशिमा धीरे-धीरे ठण्डे पड़ गये। यह वह दो दुर्भाग्यशाली स्थान हैं, जिन्होंने परमाणु बम का सर्वप्रथम आघात झेला था। इस प्रदेश की विनाशलीला का छोटा उदाहरण यही है कि वहाँ 17 वर्ष तक लगातार जो भी पक्षी गया रेडियो-सक्रियता के दुष्प्रभाव से वह तुरंत बीमार पड़ा और मर गया।

वह आग अब ठण्डी हो चुकी है, किन्तु परीक्षण के नाम पर जो परमाणु-बमों का विस्फोट किया जाता है, वह वर्तमान संसार के लिये कितना घातक है, यह अनुमान उन लोगों तक ही सीमित है, जो रेडियो-सक्रियता की विनाशक शक्ति को पहचानते हैं। दिनों-दिन नये-नये रोग और मानसिक संताप बढ़ता जा रहा है, लोगों को यह पता भी नहीं है कि यह सब इन विस्फोटों से उत्पन्न रेडियो धर्मी धूल के कारण हो रहा है। विज्ञान का यह वीभत्स स्वरूप एक दिन मनुष्य जाति को जिन्दा जलाकर या तड़पा-तड़पा कर ही मारेगा। परित्राण का तो उपाय एक ही है कि विज्ञान-बुद्धि का उपयोग विध्वंसात्मक कार्यों में ने होकर ऐसे प्रयोग और शिक्षणों में हो जिनसे मनुष्य का सम्बन्ध नियामक शक्तियों से जुड़ता हो। जिससे मनुष्य की सुख-सुविधाओं की अभिवृद्धि के साथ संसार में स्नेह, अहिंसा, सात्विकता और सृजनशीलता का विस्तार होता हो।

विकिनी द्वीप एक छोटा-सा द्वीप है, जिसमें केवल मूँगे की चट्टानें हैं, पूर्व में एलिजिले राँजलैप और राँजेरिक द्वीप है, युटिरिक सबसे दूर है। दक्षिण में क्वाजामीन द्वीप दक्षिण पूर्व में मजुरो और पश्चिम में एनिवेटोक द्वीप है यहीं से अध्ययन दल अपने कार्य कर रहा था। उत्तर ही एकमात्र ऐसा स्थान था, जिस तरफ कोई द्वीप नहीं था। इसलिये इस बात की प्रतीक्षा 14 फरवरी से ही की जा रही थी कि जब वायु का रुख उत्तर की ओर हो, तभी विस्फोट करना चाहिये। बहुत प्रतीक्षा के बाद मौसम विभाग ने 1 मार्च की स्वीकृति यों दे दी कि उस दिन वायु उत्तर-पूर्व को बह रही थी, इसलिये आँशिक दुष्परिणाम की ही आशा की गई थी, किन्तु दुर्भाग्य से बम का विस्फोट होते ही वायु ने अपना कोण बदल दिया और वह अधिकांश पूर्व की ओर बह निकली।

उस समय राँजलैप में आदिवासी जाति के कुल 64 व्यक्ति ताड़ के बने मकानों में रह रहे थे। ऐलिजिले में 18 मार्शल द्वीपवासी मछलियाँ पकड़ने गये थे। राँजेरिक में 200 अमेरिकी मौसम सम्बन्धी जाँच और यूटिरिक में 157 निवासी थे। उसी दिन दुर्भाग्य से एक जापानी नौका ‘फुकुयं मारु’ जिसमें 23 व्यक्ति सवार थे, उसी क्षेत्र में पहुँच गई। इन लोगों को कोई चेतावनी भी न दी जा सकी। इनके अतिरिक्त 200 मील के क्षेत्र में सुरक्षा-परिधानों से लैस 1000 से भी अधिक अमेरिकी नौ-सैनिक अलग्रेव्स की दिशा में विस्फोट की पड़ताल कर रहे थे। विस्फोट की प्रथम माप से पता चला कि उसकी शक्ति 15 मेगाटन है।

इससे पूर्व कि इस विस्फोट से हुए दुष्परिणामों पर दृष्टि डालें, यह जान लेना आवश्यक है कि विस्फोट के बाद उत्पन्न रेडियो धूल की वह मात्रा जो शरीर को जलाती, रुग्ण बनाती या मार डालती है, उसे नापने की इकाई को ‘रोएन्टजन’ कहते हैं। 1 रोएन्टजन का अर्थ है शरीर के एक इंच के पच्चीसवें हिस्से को उठाने की शक्ति रखता है। यह शक्ति प्रति औंस 60 अरब अयन-जोड़ी के बराबर होता है, जबकि एक अयन जोड़ी 32 इलेक्ट्रान वाल्ट शक्ति के स्थानान्तरण के बराबर होती है, उसी से अनुमान लगाया जा सकता है कि रोएन्टजन शारीर को कितनी तीव्रता से जलाता और उसे रुग्ण कर सकता है। यह शक्ति तरंग के रूप में उठती है, इसलिये दिखाई तो नहीं दे सकती, किन्तु उसका देर तक प्रभाव पड़ता रहता है। कहते हैं 50 से 100 रोएन्टजन केवल खाद्य सामग्री की शक्ति ही कमजोर करते हैं, उससे मनुष्य मरता नहीं तो भी शक्ति का ह्रास अवश्य होता है पर 100 से आधिक रोएन्टजन की मात्रा रुग्ण मनुष्य को तत्काल मार तक डालती है।

बम विस्फोट से पूर्व उसकी भीतरी हलचल में जितनी तीव्रता होती है, उतना ही बाह्य क्षेत्र प्रभावित होता है। भीतर का न्यूक्लियर वेग कई सौ मील गति से परिभ्रमण करता है और जब बम का आवरण फटता है। उतने ही सीमा क्षेत्र की वायु में आग लग जाती है और एक आग का गोला फायर बाल) सा उठता है। हवा के दबाव के कारण शक्ति साधारण ध्वनि की गति से भी अधिक तेजी से फैलता है और आँधी-तूफान की तरह सारे क्षेत्र को मथ डालता है। छोटा-सा बम भी 200 मील के घेरे में जो लोग होंगे, यदि उनकी आँखों में कोई रक्षा-यन्त्र न होगा तो उन्हें यह अग्नि-ज्वाल अन्धा कर देता है। दूसरी ओर आघात तरंगें (शाक-) वेग से विस्फोटक तत्व लेकर फैलती है और जब तक विस्फोट की गूँज शांत हो कई मील फैल जाती है।

जैसे ही उक्त विस्फोट किया गया, 20 मील दूर का सुरक्षा दुर्ग हिल गया। समुद्र का पानी उछलने लगा, एक मिनट बाद जब वायु आघात वहाँ से गुजरा तो उसके धूल ऐसे हिल उठे जैसे वे एक क्षण में ही चरमरा कर बैठ जाने वाले हों। जहाजों पर विनाशकारी तत्त्वों की वर्षा भी होने लगी। इसलिये सारे जहाजों को वहाँ से तुरन्त हट जाने का निर्देश दिया गया। सारे वातावरण में वीभत्सता छा गई। लोगों के दिल हिल गये, बेचारे राँजलैप और एलिजिले द्वीपवासियों को कोई खबर नहीं दी गई थी उन्हें बचाव के कुछ उपायों का पता भी न था, इसलिये उनमें से अधिकांश की त्वचा जल गई। अन्य जीव-जन्तुओं के शरीर किस तरह जले होंगे, इसका अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि एक तीन मास के खरगोश के बच्चे को एस. आर. 89 का इंजेक्शन दिया गया तो भी वह दस मिनट के अन्दर मर गया, उसकी टाँग की हड्डी पर स्ट्रानटियम की ऐसी प्रतिक्रिया हुई कि भीतर तक हड्डी जलकर काली पड़ गई।

राँजेरिक के निवासियों को इस विस्फोट का पता था, वे अधिक समय तक एल्युमीनियम के झोपड़ों में रहे स्नान भी किया और अधिक कपड़े भी पहने तो भी उत्तरी क्षेत्र के निवासियों के शरीर में 200 रोएन्टजन रेडियो सक्रियता ने प्रभाव डाला और वे सब बीमार पड़ गये, राँजलैप की स्थिति तो बड़ी ही दुर्भाग्यपूर्ण थी। सबसे बुरी स्थिति उत्तर की ओर थी वहाँ 15 मील की दूरी तक 50 प्रतिशत अधजली स्थिति में पड़ा तड़प-तड़प कर अपने प्राण दे रहा था। 30 मील की दूरी पर तो 1000 रोएन्टजनों का प्रभाव पड़ा था, जिन-जिन पर इतना प्रभाव पड़ा वे 1 माह के अन्दर ही मर गये।

प्राकृतिक प्रकोप भी माना बहुत भयंकर होते हैं पर उनमें मानवीय सुरक्षा के लिये बहुत गुँजाइश रहती है। जो विनाशलीला इन विस्फोटों से होती है, वैसी तो भयंकर ज्वालामुखी फटने से भी नहीं होती। विस्फोट के एक पर्यवेक्षक एडवर्ड टेलर का कहना है-विस्फोट के 6-7 घण्टे बाद राँजेरिक स्थित अमेरिकी सैनिकों ने अत्यधिक रेडियो सक्रिय धूल की कुहरे जैसी वर्षा देखी। धीरे-धीरे यह धूलि चारों तरफ फैल गई। इन घण्टों में इस क्षेत्र में कैसी विनाशलीला हुई उसका कोई अनुमान नहीं लगा सकता।

विस्फोट समाप्त हो जाने के 15 दिन बाद जापानी नौका जब ‘येंजू’ बन्दरगाह पहुँची तब लोगों को पता चला कि उसमें सवार सभी 23 व्यक्ति बीमार पड़ गये हैं और उन सब पर 200 से अधिक रोएन्टजनों का प्रभाव पड़ा है। एक तो तत्काल ही मर गया था, शेष के बारे में कोई निश्चित जानकारी नहीं दी गई। राँजलैप की चार स्त्रियाँ विस्फोट के समय गर्भवती थीं, उनमें से एक बच्चा तो जन्मा ही मृत, शेष तीनों बीमार और दुर्बल थे।

प्रश्न एक विस्फोट से उत्पन्न इस गम्भीरता का नहीं है वरन् तब से निरन्तर हो रहे परीक्षणों और अब उनके रूस, फ्राँस, ब्रिटेन, चीन और दूसरे देशों में भी फैल जाने का है। अमेरिका अब तक 15 से भी अधिक बम विस्फोट कर चुका है, इनमें 1000 मेगाटन क्षमता वाले विस्फोट भी सम्मिलित हैं। अमेरिका का परमाणविक शक्ति आयोग का चिकित्सक दल इस बात की तत्परतापूर्वक खोज कर रहा है कि इन विस्फोटों का मानवीय जीवन पर दीर्घकालीन प्रभाव क्या होगा। चूँकि रसायन शास्त्र का सम्पूर्ण जानकारी वैज्ञानिकों को नहीं है, इसलिये उसका निश्चित अनुमान तो नहीं किया जा सकता पर जितने तथ्य प्रकाश में आये हैं, उनसे पता चलता है कि आगामी तीस वर्षों में सम्पूर्ण विश्व में साठ लाख व्यक्ति ल्युकेकिया और हड्डियों के कैंसर से मरेंगे। दस हजार अतिरिक्त घटनायें, जिनमें अयन-मण्डल में छा गये विनाशक रेडियो धूल के कारण प्राकृतिक प्रकोप भी सम्मिलित हैं, घटित होंगी। दस हजार व्यक्तियों की आयु कम होगी। रेडियो-सक्रियता का सम्बन्ध ‘जीन्स’ से होता है और ‘जीन्स’ ही भावी सन्तानों के आकार-प्रकार तय करते हैं, इसलिये आगामी पीढ़ी जन्म से ही 05 रोएन्टजन का प्रभाव लेकर जन्मेगी। उसका असर शरीर कुरूपता, जन्म से रोगी और मानसिक विक्षिप्तता के रूप में प्रकट हो सकता है। इतने पर भी वैज्ञानिक पूर्ण दुष्परिणामों के बारे में कुछ भी कहने से इनकार करते हैं। तात्पर्य यह है कि वह अब तक भी जो बम-परीक्षण हो चुके हैं, मनुष्य जाति के दुःख और कष्ट अत्यधिक बढ़ा देने वाले हैं, अभी उनके बारे में तो कुछ कहा नहीं जा सकता, जो युद्ध सामग्री के रूप में सुरक्षित रखे हुए हैं और जिनका प्रयोग कभी भी किसी भी युद्ध में विश्व के किसी भी भूभाग में किया जा सकता है।

प्रश्न यह है कि इतना सब जानते हुए भी इन विनाशक आयुधों को निर्माण क्यों होता है। अपनी शक्ति औरों पर जमाने, दूसरों पर आक्रमण कर उन्हें जीतने के लिये ही तो इनका निर्माण किया गया है पर क्या -- कभी शक्तियों से जीते गये हैं। जो लोगों को अपना बनाती है, वह है अहिंसा की शक्ति, धर्म की शक्ति, प्रेम, दया, न्याय, करुणा, क्षमा और उदारता की शक्ति। मानवता इन्हीं पर जिन्दा है। बम और राकेटों पर नहीं और निश्चित है कि मनुष्यता तभी जीवित रह सकेगी, जब मनुष्य अपना ध्यान इन विध्वंसक शक्तियों से हटाकर आत्म-केन्द्रित बने। यह भी देखने और ढूँढ़ने का प्रयत्न करे कि मानवीय आत्म-चेतना की सोच और परिष्कार के द्वारा भी क्या विश्व-शांति और आत्म-शांति सम्भव है।


सुन्दरता और लज्जा

भगवान् प्रजापति ने सुन्दरता को जन्म दिया उसके साथ ही लज्जा को भी उत्पन्न कर कहा- “तुम दोनों एक दूसरे की रक्षा करते हुए प्रसन्नता को प्राप्त करो। दोनों सुखपूर्वक करने लगीं।

एक बार सुन्दरता ने लज्जा को डाँटा और कहा-मैं संसार के सुख भोगने के लिये पैदा हुई हूँ, तुम मुझे बार-बार रोका मत करो।” लज्जा ने सिर झुका कर कहा-बहन ऐसा न कहो, मैं तो तुम्हारी सेविका हूँ। भगवान् ने तुम्हारी रक्षा करने के लिये मुझे भेजा है।” सुन्दरता को यह सिखावन अच्छी न लगी उसने कहा-मैं अपनी रक्षा स्वयं कर लूँगी” और डाँट कर लज्जा को अपने पास से भगा दिया। स्वच्छन्द सुन्दरता ने हर कहीं से सुख पाना आरम्भ कर दिया। जिससे उसकी शक्ति घटने लगी। एक दिन अपना सारा सौंदर्य खोकर वह अस्तित्वहीन हो गई, तब उसे अपनी भूल का पता लगा।

प्रजापति ब्रह्मा उसको दुःखी देखकर प्रकट हुये और बोले-पुत्री अब आगे कभी लज्जा का परित्याग न करना नहीं तो फिर ऐसे ही पछताओगी। बहुत अनुनय, आग्रह की तब लज्जा फिर सौंदर्य के पास आ गई।


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सौंदर्य एक स्वाभाविक गुण है। जो स्वाभाविक रूप से सुन्दर होगा, वह सुन्दरता के किसी प्रसाधन का प्रयोग नहीं करेगा। उसका ओज-तेज सुन्दरता बनकर उसके मुख-मण्डल पर दमकता रहेगा। फूल-सा खिला हुआ उसका चेहरा स्वाभाविक रूप से दूसरे की दृष्टि आकर्षित कर लेगा। स्वाभाविक रूप से सुन्दर व्यक्ति को किसी भी कृत्रिम उपाय की आवश्यकता नहीं होती और यदि वह किसी प्रसाधन का प्रयोग करेगा तो उसका आकर्षण बढ़ने के बजाय घट जायेगा।

किस देश में कितना स्वाभाविक सौंदर्य है, इसका अन्दाज इसी से लगाया जा सकता है कि उस देश में कृत्रिम सौंदर्य सामग्री की कितनी खपत है। जिस देश में जितनी अधिक प्रसाधन सामग्री बिकती हो समझ लेना चाहिये कि उस देश के लोग उसी अनुपात में स्वाभाविक सुन्दरता से वंचित है और जिस देश में जितनी कम श्रृंगार सामग्री बिकती हो बिना किसी हिचक के विश्वास कर लेना चाहिये कि उस देश के लोग उतने ही स्वाभाविक रूप से सुन्दर है।

सुन्दरता का आगमन बाहर से नहीं अन्दर से होता है। उसका कारण 'प्रसाधन' नहीं बल्कि स्वास्थ्य है। स्वस्थ व्यक्ति, चाहे वह स्त्री हो अथवा पुरुष, कैसे भी फटे पुराने कपड़े क्यों न पहने हुए हो, कितना ही परिश्रम तथा पसीने से लथपथ क्यों न हो देखने में सुन्दर ही लगेगा। उसकी स्वाभाविक सुन्दरता बाह्य दशा में छिप नहीं सकती। उसका भरा हुआ चेहरा, पुष्ट शरीर, सुडौल अवयव, कपोलों की लाली, माथे की चमक और आँखों की सम्पन्नता क्षीण वेशभूषा के ऊपर चढ़कर चमकेगी।

अस्वस्थ व्यक्ति क्यों न मखमल पहने हो, क्यों न कितना ही क्रीम और पाउडर का प्रयोग किये हुए हो, उसके पिचके गाल, उभरी हड्डियाँ, भद्दा शरीर, धँसी आँखें इस बात की गवाही देंगी कि यह व्यक्ति असुन्दर है। इतना ही नहीं अस्वस्थ व्यक्ति पर अच्छी वेशभूषा एक -- जैसी लगकर उसका उपहास ही उड़ाया करती है।

सुन्दरता स्वास्थ्य की देन है और स्वास्थ्य संयम और प्रकृति के संपर्क की देन है। प्रकृति की गोद में स्वास्थ्य और सुन्दरता दोनों का निवास है। जो व्यक्ति अधिक-से अधिक अकृत्रिम और प्राकृतिक जीवन व्यतीत करते हैं, वे अवश्य ही स्वस्थ एवं सुन्दर रहते हैं। प्राकृतिक जीवन बिताने वाला संयमी वृद्ध भी असंयमी युवक से अधिक आकर्षक और सुन्दर लगा करता है। उसके चाँदी जैसे चमकते बाल, भरे हुए अरुणामय गाल और उभरा हुआ ललाट युवकों के लिये ईर्ष्या का विषय बन जाता है।

अपना भारत देश सदा ही धीरों-वीरों और बलवानों का देश रहा है। राम, कृष्ण, भीम, अर्जुन, भीष्म, द्रोण, प्रताप, शिवा, छत्रसाल जैसे वीर योद्धा इसी भूमि के रत्न थे। सिकन्दर की विश्वविजयी वाहिनी को रोक देने वाले पोरस और सेल्युकस जैसे दुर्धर्ष ग्रीक सेनानी को परास्त करने वाले चन्द्रगुप्त इसी भूमि पर उत्पन्न हुये। राममूर्ति, गामा और जोधासिंह पहलवान इसी भारत में हुए हैं, जिन्होंने मल्ल-युद्ध में संसार में ऊँचा किया है।

किन्तु आज उसी भारत भूमि पर पतली टाँगों और बैठी आँखों वाले नौजवान ही अधिक देखने में आते है। देश की तरुण पीढ़ी का स्वास्थ्य और उसके लक्षण देख कर आगे की सम्भावनायें भी कुछ अधिक आशापूर्ण नहीं दीखती। आज फैशन ने संसार में सबसे अधिक इस भारत, इस ऋषि भूमि को ही घेर रखा है। आमदनी को देखते हुए, जिस अनुपात से फैशन और प्रसाधन पर जितना पैसा भारत में व्यय किया जाता है, शायद उतना पैसा संसार में किसी भी देश में व्यय नहीं किया जाता।

फैशन का रोग इस कदर बढ़ गया है कि घर में भले ही कठिनता से रोटी मिल पाती हो, लेकिन बाहर आधुनिक तरह की पोशाक पहनकर निकलना आवश्यक है। लोग एक कपड़े की सिलाई पर इतना पैसा व्यय करते हैं कि उतने ‘में’ एक और कपड़ा बन सकता है। फैशन के दीवाने ऐसे सैकड़ों नवयुवक देखने को मिल सकते हैं, जो एक बार अपनी हविस पूरी करने के लिये बहुत-सा पैसा विचित्र पोशाक बनवाने में लगा देते हैं और फिर उसका निर्वाह न कर सकने पर वही फटी-पुरानी फैशनेबुल ब्रुश-शर्ट और पतलून वर्षों पहनते हुए अपनी और अपने फैशन की मखौल कराया करते हैं। जितने पैसे को उन्होंने एक बार फैशन की हविस पूरी करने में व्यय किया था, यदि उससे वे साधारण से कपड़े बनवाते तो अवश्य ही कई वर्ष तक अच्छी दशा में रह सकते थे। इस प्रकार के उपहासास्पद फैशन से यदि कोई आकर्षक दीखने के स्वप्न देखता है तो वह बहुत बड़ी गलती करता है।

स्वास्थ्य एवं संयम से पाये हुए व्यक्तित्व वाले स्वामी विवेकानन्द जैसे भारतीयों ने साधु की वेशभूषा में ही अमेरिका जैसे आधुनिक और धनवान्, फैशनपरस्त देश के लोगों को यह मानने पर विवश कर दिया कि आकर्षण वेशभूषा में नहीं स्वाभाविक स्वास्थ्य और सादगी में है, जो कि अकृत्रिम एवं स्वाभाविक जीवन पद्धति से ही संभव है। अपनी साधारणतम वेशभूषा पर हँसने वाले अमेरिकियों को अपने जिन शब्दों से स्वामी विवेकानन्द जी ने लज्जित किया था वास्तव में वे शब्द ही भारतीय जीवन का आदर्श है और आज भी होने चाहिये।

हँसने वाले अपटूडेट अमेरिकियों से स्वामी जी ने कहा था-दाई टेलर मेक्स यू जेन्टलमैन, बट इट इज माई कन्ट्री व्हेअर केरेक्टर मेक्स ए मैन जेन्टिल।’ जिसका अर्थ यह है कि- ‘‘आप का दर्जी आपको भद्र पुरुष बनाता है।”

स्वामी विवेकानन्द के इस सारपूर्ण शब्दों का तात्पर्य यही है कि मनुष्य का वास्तविक व्यक्तित्व कपड़ों, वेशभूषा अथवा फैशन से प्रकट नहीं होता बल्कि मनुष्य का आचरण ही उसका वास्तविक व्यक्तित्व है। स्वामी विवेकानन्द जी ने जिस समय यह शब्द अमेरिका में कहे थे, उस समय भारत में फैशन का रोग इतना जोर पर नहीं था। लोग फैशन के बजाय अपने स्वास्थ्य और आचरण पर अधिक ध्यान देते थे। स्वामी जी को उस समय स्वप्न में भी यह मान न रहा होगा कि जिस भारतवर्ष की साधारण वेशभूषा और असाधारण चरित्र को इस गौरवपूर्ण ढंग से आज अमेरिका में रख रहे हैं, वही भारतवर्ष आगे चलकर फैशन में इंग्लैंड, अमेरिका आदि देशों के फैशन का गुलाम हो जायेगा।

फैशन प्रदर्शन की महामारी से ग्रस्त भारतीय नवयुवक आज स्वास्थ्य और चरित्र की ओर से पूरी तरह उदासीन होते जा रहे हैं। स्वास्थ्य-जन्य आकर्षण को वे प्रसाधनों के बल पर स्थानापन्न कर लेने और संयम को अप्राकृतिक बन्धन और चरित्र को जड़ता मानने लगे हैं। उन्हें कभी यह चिन्ता नहीं होती कि उनके अंग पुष्ट, उनका शरीर सुडौल, उनका मुख ओजस्वी और उनका चरित्र तेजस्वी बने। उन्हें कभी भी यह धौंस नहीं होता कि वे बिना किसी प्रसाधन के सुन्दर लगे और अपने भरे पूरे शरीर के साथ शेर जैसी चाल से चलते हुए लोगों के लिए हर्ष का विषय बनें। उन्हें यदि चाह होती है तो इसकी कि वे कितनी किसी प्रकार की क्रीम प्रयोग कर पा रहे हैं कितना और कौन-सा पाउडर उनके शरीर को सुगन्धित करता है। आधुनिक तरह के कितने प्रकार के-कितने कपड़े-उनके पास हैं। उन पर किन रंगों और किन डिजाइनों के कपड़े फबते है और किस वेशभूषा में वे लोगों के लिये आकर्षण के पात्र बनते हैं। आज का कोई भारतीय तरुण कदाचित ही यह बतला पाये कि व्यायाम के कितने प्रकार है और उनका अभ्यास किस प्रकार किया जाता है। किस आयु के व्यक्ति को किस प्रकार का कितना व्यायाम करना चाहिये। शरीर को पुष्ट रहने के लिये किस प्रकार का कितना भोजन करना और किस प्रकार रहना-सहना चाहिये। जीवन में शम, दम, नियम, संयम का क्या महत्व है और उनके पालन का क्या अर्थ एवं विधि है। इसके विपरीत वह यह अवश्य प्रामाणिक रूप से बतला सकता है कि अमुक प्रकार का फैशन अमुक देश का है। इस प्रकार की कमीज का नाम यह है। पतलून का यह डिजाइन इस देश से आविष्कृत हुआ है। सबसे आधुनिक फैशन यह है और इस वस्त्र के लिये यह कपड़ा सबसे अच्छा रहता है। वह भोजन के विषय में भले ही कुछ न जानता हो, किन्तु यह अवश्य बतला सकता है कि ड़ड़ड़ड़-प्रकार से बनती है। काफी की इतनी किस्में होती है। किस होटल के मीनू में क्या-क्या वस्तुयें मिल सकती है। उनकी रुचियों में दूध, घी, मलाई, फल, शाक-भाजी और ड़ड़ड़ड का स्थान आलू, कचालू, खटाई, मिठाई, ड़ड़ड़ड़ कचौड़ी, कटलस, पुटैटो, चाय, डबलरोटी, बिस्किट, चाकलेट और सोडा, शराब न ले लिया है। किस खाद्य पदार्थ से क्या हानि लाभ होता है, इसका ज्ञान आज के भारतीय नवयुवक में बिल्कुल भी नहीं रहा है और यदि उसे इस विषय में बताने का प्रयत्न भी किया जाता है तो वह उस पर अविश्वास करता हुआ कह देता है कि यह सब पुराने जमाने की बातें हैं, आज के नये जमाने में उनका कोई मूल्य, महत्व नहीं है।

प्राकृतिक जीवन से तो वह इतना दूर चला गया है, जैसे वह प्रकृति-जन्य प्रणी ही न हो, कमरों के भीतर देर तक जागना ओर देर तक सोना उसका स्वभाव बन गया है। अवसर होने पर भी वह बाहर स्वच्छ हवा में प्रकृति के निकट सोने के स्थान पर कमरे में बन्द होकर बिजली के पंखे की हवा खाना ज्यादा पसन्द करेगा और इसे आज की सभ्यता बतलायेगा।

भारतीय तरुणों का कृत्रिम जीवन आज बहुत बड़े खेद का विषय बन गया है। कृत्रिम जीवन ने उनके स्वास्थ्य और स्वाभाविक सौंदर्य का बहुत बड़ा अंश अपहरण कर लिया है। इसी कृत्रिमता के कारण भारत का तरुण वर्ग परिश्रम एवं पुरुषार्थ से दूर भागने का प्रयत्न करने लगा है। जहाँ अन्य देशों के नवयुवक शहरी जीवन से निकल-निकल कर खेतों में काम करने के लिये पहुँच रहे हैं, वहाँ भारत के नवयुवक खेतों से भाग-भाग कर शहरों में चपरासीगीरी अथवा ड़ड़ड़ड़ ़ दिखाई दे रहे हैं। भारतीय नवयुवक ड़ड़ड़ड भोजन और फैशन बल पहनावे में प्रसन्न रहने लगा है। उसे स्वास्थ्य की उतनी चिन्ता नहीं है, उसे देश की गरीबी और भुखमरी की इतनी परवाह नहीं है, जितनी कि फैशन और प्रदर्शन की। यह वास्तव में बड़े ही खेद का विषय है। आज जब देश के चारों ओर दुश्मनों की गतिविधियाँ सक्रिय हो रही हैं, तब यहाँ के नवयुवक का इस बुरी तरह फैशन परस्त और स्वास्थ्य क प्रति उदासीन होना कम खतरे की बात नहीं है। सारा संसार भारतीय नवयुवक की इस कमजोरी को अपनी नजर में भरे हुए है और किसी अवसर पर वह उस पर लाभ उठाने में कदापि भी नहीं चूकेंगे।

भारतीय तरुण को जागना और सोचना चाहिये कि सुन्दरता प्रसाधन अथवा फैशन में नहीं है। उसका जन्म स्वास्थ्य से होता है वास्तविक स्वास्थ्य उसे ही मिल सकता है, जो सदा, संयमपूर्ण और प्राकृतिक जीवन पद्धति से रहता है। नवयुवकों को फैशनों, प्रसाधनों और होटली वस्तुओं का ज्ञान बढ़ाने के बजाय स्वास्थ्य के नियमों, आचरण की रीतियों, संयम निर्वाह की रीतियों का ज्ञान बढ़ाना और उनका पालन करना चाहिये जिससे वे सादी वेशभूषा में भी अपने दमकते हुये व्यक्तित्व से फैशनेबल देशों को स्वामी विवेकानन्द की तरह प्रभावित कर सकें। साथ ही भीम, अर्जुन, भीष्म, और राणा, शिवा एवं पोरस, चन्द्रगुप्त की तरह आक्रान्ताओं को परास्त कर सकने की शक्ति पा सकें।


सन्त सुकरात

सन्त सुकरात से मिलने गये एक भक्त ने प्रश्न किया-महात्मन् चन्द्रमा में कलंक और दीपक तले अँधेरा क्यों रहता है?” सुकरात ने पूछा-अच्छा तुम्हीं बताओ-तुम्हें दीपक का प्रकाश और चन्द्रमा की ज्योति क्यों नहीं दिखाई देती?”

भक्त ने विचार किया-सचमुच संसार में हर वस्तु में अच्छे और बुरे दो पहलू हैं, जो अच्छा पहलू देखते हैं, वे अच्छाई और जिन्हें केवल बुरा पहलू देखना आता है, वह बुराई संग्रह करते हैं।


विलक्षण मानसिक शक्तियाँ और उसका आधार

माको रूस की एक अधेड़ महिला नेल्या ड़ड़ड़ड़ सिर्फ घड़ी की ओर देखकर उसका चलना रोक सकती है। वह मेज़ पद रखे बर्तनों और भोज्य पदार्थों को भी खिसका सकती है। दिशा सूचक यन्त्र (कम्पास) की सुई जो केवल चुम्बकीय शक्ति (मैगनेटिक फील्ड) से ही प्रभावित होती है, उसे भी अपनी इस शक्ति से घुमा देती है।

रूसी ‘मास्कोवास्कामा’ समाचार पत्र ने इस महिला की गहरी ध्यान-शक्ति पर टिप्पणी करते हुए लिखा है कि “मनुष्य के मन में वस्तुतः विज्ञान से परे विलक्षण शक्तियाँ विद्यमान् हैं। उनका विकास करके वर्तमान वैज्ञानिक उपकरणों को ही नहीं पछाड़ा जा सकता मानव से संबंधित गहन आध्यात्मिक तथ्यों का भी पता लगाया जा सकता है।”

प्रसिद्ध फ्राँसीसी विद्वान् लुई जकालियट जो भारतवर्ष में बहुत दिन रहे और योग-विद्या का गहन अन्वेषण किया उन्होंने गोविन्द स्वामी नामक एक दक्षिणी योगी के सम्बन्ध में लिखा है-पानी से भरे हुए घड़े को वह दूर बैठकर अपनी मानसिक या दैवी शक्ति से आगे-पीछे और ऊपर हवा में उठा देता था। उसके आदेश पर जल से भरा हुआ घड़ा भी अधर लटक जाता हुआ मैंने देखा है। भारतीय योगियों के इन विलक्षण करतबों को कई लोग मनोरंजन की दृष्टि से देखते हैं पर मुझे उस कौतूहल के पीछे किसी बड़े रहस्य की अनुभूति होती है ऐसा लगता है मनुष्य के मन में वह शक्तियाँ है, जिनका विकास यदि किया जा सके तो मनुष्य जीवन के अनेक सत्यों का रहस्य जान सकता है।”

वैज्ञानिक और डाक्टर भी यह मानते है कि शरीर में इन्द्रियों की चेतना भी अस्थायी महत्व ही है। स्थायी रूप से दृष्टि श्रवण, प्राण प्रेरक और संवेदन सभी क्षमतायें मस्तिष्क में विद्यमान् है। ड़ड़ड़ड़-नामक एक पिंडली ड़ड़ड़ड़ भीतरी मस्तिष्क में होती है और जो सिर के केन्द्र में अवस्थित है, यही स्थान सभी ड़ड़ड़ड़- के ठहरने का स्थान (स्टेशन) है, वही से ड़ड़ड़ड़ निकलती है जो देखने का काम करती है। ड़ड़ड़ड़ ़- को तीसरा नेत्र भी कहते हैं। ड़ड़ड़ड़ शरीर के सम्पूर्ण अवयवों का नियन्त्रण करती है, ये सब भी मन से ही सम्बन्धित हैं मस्तिष्क का यदि यह केन्द्र काट दिया जाये तो शरीर के अन्य ड़ड़ड़ड़ ़- बेकार हो जायेंगे।

विज्ञान और शरीर रचना शास्त्र एनाटावी की उपरोक्त आधुनिक जानकारियों का काफी विस्तार हो चुका है, किन्तु योग पद्धति और भारतीय ड़ड़ड़ड दर्शन की जानकारी की तुलना में वह ड़ड़ड़ड़ समुद्र में एक बूँद की तरह ही है। भारतीय ड़ड़ड़ड़़ ने इनका सर्वशक्तिमय इन्द्रियातीत ज्ञान का ड़ड़ड़ड़- परमब्रह्म का ही लघुरूप माना है। मन की शक्तियों को ही ब्रह्म में तादात्म्य कर देने से हाड़-माँस का मनुष्य भगवान् हो जाता है। उसकी शक्तियों का आश्चर्यजनक और चमत्कारिक विकास इसी अवस्था पर होता है। मन की अनन्त सामर्थ्यों का उल्लेख करते हुए ड़ड़ड़ड़ में बताया गया है--

मनो हि जगतां कतृं मनो हि पुरुषः स्मृतः। -3,91,4,

स्वकर्य सर्वकृत्यं च ड़ड़ड़ड़ च महात्मनः। -3,9,1,16,

ड़ड़ड़ड़ यद्यदस्य हि चेतलः। तत्ततप्रकटतामेति ड़ड़ड़ड़॥-3।91।17

कल्पं क्षणीकरोति ड़ड़ड़ड़ नयति कल्पताम्। मनस्तवायत्तमतो देशकाल ड़ड़ड़ड़ गिदुः॥ -3।103।14

अर्थात्- संसार को रचने वाला पुरुष भी स्वयं मन ही है, मन में सब प्रकार की शक्तियाँ है। मन अपने भीतर जैसी भावना करता है, क्षण भर में वैसा ही हो जाता है। देशकाल का विस्तार और क्रम भी मन के अधीन ही है। मन ही कल्प को क्षण, क्षण को कल्प बना देता है।

इस तरह की महत्त्वपूर्ण शक्ति का स्वामी होकर भी खेद है कि मनुष्य तुच्छ भोग वासनाओं पर पड़ा हुआ निरन्तर अपने आध्यात्मिक शक्तियों का विघटन करता रहता है। यदि मानसिक शक्तियों के उत्थान का मार्ग मनुष्य ढूँढ़ ले उसे संतुलित कर ले, साथ ले, असंयम के द्वारा नष्ट होने से बचाकर उसे आदि पुरुष ब्रह्म के साथ तादात्म्य कर ले फिर संसार का जीवन का रहस्य अपने आप ही प्रकट हो जाये, तब मनुष्य दीन न रहे वरन् स्वयं ब्रह्म हो जाये।

हमारे मन में चूँकि ईश्वरीय शक्ति का बड़ा बढ़ा-चढ़ा रूप है। इसलिये इन बातों पर एकाएक विश्वास नहीं होता। मन की शक्तियों से सम्बन्ध न होने के कारण यह बातें कुछ भ्रम-सी लगती है और सहसा यह समझ में नहीं आता कि प्रत्येक मनुष्य के मन में सब कुछ जान लेने, दूसरों के अन्तरंग के मनोभाव तक पढ़ लेने, जो कुछ संसार में है, उसे प्राप्त कर लेने, ब्रह्माण्ड के विस्तार को जिससे किसी प्रकाश की गति से चलने पर भी करोड़ों मनुष्य संसार में जो कुछ है, उसे कैसे जान सकता है। दूसरों के अन्तरंग में क्या भाव है, उसे कैसे पढ़ा जा सकता है, मनोवाँछित वस्तुओं को कैसे प्राप्त किया जा सकता है? ब्रह्माण्ड का विस्तार इतना अनन्त हे कि प्रकाश की गति से चलकर भी उसे लाखों प्रकाश वर्षों में नहीं नापा जा सकता उस अनन्तता को ज्ञान में, अनुभव में, दृष्टि में छोटा-सा मन किस प्रकार ला सकता है।

इससे पूर्व कि इसका संक्षिप्त वैज्ञानिक रहस्य समझाया जाये, इन सम्भावनाओं की संक्षिप्त घटना परक जानकारी बड़ी उपयोगी होगी।

5 अक्टूबर 1950 को लन्दन में एक भारतीय महिला शकुन्तला देवी, जिन्हें गणित की जादूगरनी (विजार्ड आफ मैथेमेटिक) कहा जाता है, टेलीविजन पर अपना कार्यक्रम प्रस्तुत कर रही थी। तभी एक सज्जन ने उन्हें एक गणित का प्रश्न हल करने को कहा। बिना एक क्षण का विलम्ब किये हुये उन्होंने कहा यह प्रश्न गलत है। यह प्रश्न ब्रिटेन के बड़े-बड़े गणिताचार्यों ने तैयार किया था, इसलिये सब लोग एकदम आश्चर्य में डूब गये-प्रश्न गलत कैसे हो सकता है? बी. बी. सी. कार्यक्रम के आयोजन कर्ता ने प्रश्न की जाँच कराई तो वह विस्मित रह गया कि प्रश्न सचमुच गलत है। उसने भी यह माना कि-हम जितना समझ पाये हैं, मन की शक्ति और सामर्थ्य उससे बहुत अधिक है।”

कंप्यूटर मशीन (संगणक) की आज बड़ी आश्चर्य की दृष्टि से देखा जाता है किन्तु मन की शक्ति की तुलना में उसका मूल्य और महत्व एक कौड़ी से अधिक नहीं है। यह लोगों ने तब जाना, जब श्रीमती शकुन्तला देवी से एक सज्जन ने पूछा-”8 फरवरी 1936 को रविवार था या शनिवार कोई और व्यक्ति होता तो इतनी गणना (कैलकुलेशन) करने में उसे पूरे दो घण्टे लगते, कम्प्यूटर भी 10-15 सेकेण्ड तो लेता ही, किन्तु शकुन्तला जी को बताते एक सेकेण्ड समय भी नहीं लगा होगा।

शकुन्तला देवी बेंगलोर के एक प्रतिष्ठित परिवार में जन्मी। अन्नामलाई विश्वविद्यालय के उपकुलपति श्री बी. एस॰ शास्त्री ने उन्हें “जीते जागते आश्चर्य का विशेषण दिया है। सिडनी (आस्ट्रेलिया) स्थित न्यू साउथ वेल्स विश्वविद्यालय में उनकी प्रतिद्वंद्विता 20 हजार पौण्ड मूल्य के संगणक (कम्प्यूटर) से हुई। यह कम्प्यूटर विद्युत चालित था और उसका आपरेशन प्रसिद्ध गणितज्ञ श्री आर॰ जी0 स्मार्ट और मेरी थार्नटन कर रहे थे, किन्तु जब भी कोई प्रश्न पूछा जाता था शकुन्तला उसका तुरन्त उत्तर दे देती थी, जबकि मशीन के उत्तर की प्रतीक्षा करनी पड़ती थी। शकुन्तला के उत्तर शतप्रतिशत सेंट-पर-सेंट सही पाकर वे सब चौंक पड़े। और कहने लगे-” सचमुच मन में ऐसी कोई विलक्षण क्षमता है, जिसका विकास भारतीय योग पद्धति से करके मनुष्य सर्वज्ञ बन सकता है।” शकुन्तला जी अब तक 42 अंकों की संख्याओं का 20 वा रूट (वर्गमूल) तक निकालने में सफल हुई हैं। वह गणित जगत् के लिये लोहा मनवाने जैसी बात है। किन्तु शकुन्तला जी की मान्यता है कि यह विकेन्द्रित मन की साधारण-सी शक्ति है मन की नाप-तोल करना कठिन है वह एक सर्वसमर्थ तत्व जैसा कुछ है।

इन्हीं बातों को देखकर ही वैज्ञानिक शरीर में आत्मा जैसी किसी सर्वव्यापक शक्ति के अस्तित्व की बात स्वीकार करने लगे हों, भले ही अभी उसका विस्तृत अध्ययन वे लोग न कर पाये हैं। अमेरिका के एक दिल बदल विशेषज्ञ डा० एम० डी० कुले ने चारमोट्सबिल (वर्जीनिया) में डाक्टरी का अध्ययन करने वाले सैकड़ों छात्रों के सामने बोलते हुए बताया कि “मनुष्य की आत्मा का मास मस्तिष्क में है। “उन्होंने मृत्यु के सम्बन्ध में अपना स्पष्ट कारण देते हुए बताया कि “मृत्यु एक अकेली घटना नहीं बल्कि वह एक प्रक्रिया है और वह मस्तिष्क के मरने के बाद आरम्भ होती है, शरीर के कई अंग जैसे दिन तो मृत्यु के कई मिनट बाद तक जीवित रह सकता है, किन्तु मस्तिष्क के अणुओं की चेतना समाप्त होते ही मनुष्य का जीवन समाप्त हो जाता है।”

इस बात को हमारे पितामह ऋषि और योगी काफी समय पूर्व जान गये थे। समाधि अवस्था में आत्म-चेतना को ब्रह्माण्ड ( खोपड़ी ) में चढ़ाकर बिना साँस लिये हुए कहीं भी दबे पड़े रहने के अनेक प्रयोग भारत में हुए है, उनका कहीं अन्यत्र वर्णन करेंगे यहाँ डॉ एम. डी. कुले की बात का समर्थन करते हुए यदि यह कहा जाये कि मनुष्य शरीर के प्रत्येक सेल के अन्दर जो चेतना है, उस सामूहिक प्रक्रिया का ही नाम मन या जीवन है और उसमें सर्वव्यापकता, सर्वज्ञता जैसे विलक्षण गुण भी विद्यमान् हैं।

योगवाशिष्ठ में भगवान् राम को वसिष्ठ ने बताया-

यथा बीजेषु पुष्पादि मृदौराशौ घटोयथा। तथान्तः संस्थिता साधो स्थावरेषु स्व वासना। -6।1 10।19,

एतच्चितशरोरत्वं विद्धि सर्वगतादयम्। - 3।40।20

चिच्छक्तिर्वासना बीज रूपिणी स्वायधमिणी। स्थिता रस तथा नित्यं स्थावरादिषु वस्तुष -6।1।10।23,

बीजेषूल्लास रूपेण आडयेन जड़रुपिषु। द्रव्येषु द्रव्यमावेन काठिम्येनेतरेषु च॥ -6।1।10।24,

प्राणी बीर्य रसान्तस्था संविज्जग्ंममाततम्। तनोति सतिकान्तस्यो रसः पुष्पफर्ल यषा॥ -6।2।28।18,

हे राम! जैसे बीज के भीतर पुष्प, डाल-पत्ते आदि मिट्टी में घड़े की सम्भावनायें छिपी रहती हैं, जड़ पदार्थों के भीतर भी वासना छुपी रहती है। जड़ की वासना की तरह ही संसार की सब वस्तुओं के भीतर चित्त (मन) विद्यमान् है। वह शक्ति सम्पूर्ण जड़-चेतन में वासना के रूप के सोई हुई उसके रस के रूप में सदैव वर्तमान रहती है। यह शक्ति बीजों में उल्लास, जड़ पदार्थों में जड़ता द्रव्यों में द्रव्य भाव और ठोस में ठोस भाव से बना रहता है। जिस प्रकार लता के भीतर रहने वाला रस ही फूल और फल आदि के आकार में विकसित होता है, उसी प्रकार प्राणियों के वीर्य के रस के भीतर वास करती हुई यह चेतन सत्ता ही सब वस्तुओं का विकास करती है।

इन पंक्तियों में शास्त्राकार ने जहाँ गहन दार्शनिक सत्य का उद्घाटन किया है, उसकी वैज्ञानिक व्याख्या करने का भी यत्न किया है। अर्थात् संसार में जितनी भी धातुएँ या पदार्थ है चेतना (मन) उन सब से सूक्ष्मतम है। वह यद्यपि मनुष्यों में वासना रूप में सोई रहती है, किन्तु यदि उसे संयमित कर लिया जाये तो मनुष्य अपने में उन सभी शक्तियों को विकसित देख सकता है, जिनकी कल्पना हम परमात्मा, ईश्वर या ब्रह्म में करते है। अर्थात् वासनाओं से उन्मुक्त मन, मन ही ईश्वर है। जो भी मनोभूमि में रम गया वह ईश्वर हो गया। नरतन में ऐसे अनेक महापुरुष भगवान् हुए हैं, जिनकी विलक्षण शक्तियों के बारे में इनकार नहीं किया जा सकता।

भारतवर्ष की बात नहीं करते-अमेरिका के अलाबामा राज्य में माड्स डेन नगर के समीप रहने वाले श्री फ्रेंक रेम्स में ऐसी ही एक विलक्षण शक्ति है, जो व्यक्ति में ईश्वरीय शक्ति के अस्तित्व को प्रमाणित करने में सहायक ही सिद्ध होगी।

श्री फ्रेंक रेम्स अँग्रेजी अच्छी तरह बोल सकता है, शेष दुनियाँ की भाषाओं से वह पूर्णतया अनभिज्ञ है किन्तु आप दुनियाँ की कोई भी भाषा किसी भी लहजे में बोले- बिना एक सेकेण्ड का अन्तर किये हुए वही शब्द उसी लहजे में आपके साथ बोलते चले जायेंगे ओठों की फड़कन देखकर भी कोई यह अनुमान नहीं लगा सकता कि यह व्यक्ति क्या बोलेगा, फिर यदि ऐसी भाषा का ज्ञान न हो जिसमें वक्ता बोले तब तो वह क्या कहेगा, इसका बिल्कुल भी अनुमान नहीं लगाया जा सकता पर आप चाहे पीठ पर कर खड़े हो जायें या बीच में पर्दा लगाकर फ्रेंक रेन्स आपके साथ ही उन शब्दों को दोहराते हुए (कोन्सीडेन्स) चले जायेंगे देखने में ऐसा लगेगा जैसा एक ही ग्रामोफोन से दो लाउडस्पीकरों का सम्बन्ध हो। टेलीविजन के कुछ कार्यक्रमों में वक्ता बोलने के साथ गाने भी लगे तो फ्रेंक रेन्स ने उसी तान और स्वर में गा भी दिया। एक बार विख्यात हास्य अभिनेता जेरी ल्यूक्सि ने एक कार्यक्रम संचालित किया, उसमें लोलो ब्रिगिडा ने भी भाग लिया। उक्त महिला कई भाषायें बोल सकती थी। फ्रेंक रेन्स उन सब भाषाओं को दोहराते गये। लोलो ब्रिगिडा ने कुछ बनावटी शब्द जिनका न तो कुछ अर्थ हो न किसी भाषा के हों- बोलना प्रारम्भ किया तो लोग आश्चर्यचकित रह गये कि फ्रेंक रेन्स वह शब्द भी उसी तरह में स्वर मिलाकर बोलता चला जा रहा है।

दूसरा अमुक शब्द बोलेगा इसकी इन्द्रियातीत जानकारी फ्रेंक रेन्स को क्यों हो जाती है। भाषा न जानने पर भी वह अनजाने शब्द किस तरह बोल लेता है यह तो विलक्षण आश्चर्य है, जिसकी व्याख्या करने में डाक्टर वैज्ञानिक और अनेक विशेषज्ञ भी असफल रहे है। फ्रेंक रेन्स कहते हैं, मैं स्वयं भी नहीं जानता कि इस विलक्षण शक्ति का स्रोत क्या है पर यह भारतीय तत्व वक्ताओं और सिद्ध पुरुषों के लिए बहुत छोटी-सी बात है। मन की एक धारा का विकास ही इस सामर्थ्य का आधार है और कुछ हो या ना हो पर इससे इतना तो सिद्ध हो ही जाता है कि मन में कोई ऐसी अज्ञात शक्ति है अवश्य जो दूसरों के मन में जो कुछ है और जो कुछ नहीं भी है, यह सब जान सकती है।

मन में ऐसी-ऐसी असंख्य सामर्थ्यों का भण्डार छुपा हुआ है, मन जीवन है, मन ही सब सिद्धियों का साधन है, मन ही भगवान् है, मन का पूर्ण विकास ही एक दिन मनुष्य को अनन्त सिद्धियों, सामर्थ्यों का स्वामी बना देता है पर इसके लिए गहन संयम, साधना और तपस्या के बिना एक कदम भी आगे नहीं बढ़ा जा सकता।


फसल बेचने के लिए नहीं

फसल बेचने के लिए नहीं-

स्वामी रामतीर्थ हमारे देश के एक प्रतिष्ठित विद्वान् सन्त हो गये है। उनकी विद्याध्ययन की रुचि और तेजस्वी बुद्धि से प्रभावित होकर लाहौर कालेज के प्रिंसिपल ने उनका नाम सिविल-सर्विस की परीक्षा के लिए देने का निर्णय किया।

इस बात की सूचना जैसे ही उन्हें मिली वे तुरन्त ही प्रिंसिपल महोदय के पास पहुँचे और उनसे नम्रतापूर्वक बोले-” मैंने अपनी फसल के लाभ उठाने के लिये, उसे बेचकर टके गिनने के लिये, मेहनत नहीं की। मैंने तो उसे बाँटकर खाने के लिए तैयार की है। मैं कोई बड़ा अधिकारी नहीं बनना चाहता। मैं तो सेवक हूँ, अतः सेवा करना चाहता हूँ। इसलिये मैं अफसर बनने की बजाय अध्यापक बनना ही पसन्द करूँगा

प्रिंसिपल ने उन्हें बहुत समझाया पर वे अपने निर्णय पर दृढ़तापूर्वक कायम रहे। आज अपनी योग्यता से जनहित के बदले हममें स्वहित अधिक पनप रहा है। ऐसे समय में यह प्रसंग हमें स्वार्थ–लोलुपता से हटाने में सहायक हो सकता है। काश! आज के सेवा की इस तिलमिलाहट को महसूस कर सकते।


जीवन-मुक्ति का अधिकार

शिखिध्वज मालव के महान् यशस्वी सम्राट् थे। सम्राट् होने के साथ शिखिध्वज उदार और सदाचारी भी थे। वे सदैव शास्त्रों की मर्यादा का पालन करते थे। उनका विवाह सौराष्ट्र प्रदेश की राजकन्या चुड़ाला के साथ हुआ। चुड़ाला भी अत्यन्त विदुषी और रूपवती थी। एक दूसरे को पाकर दोनों की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा।

बहुत काल तक दोनों साँसारिक और इन्द्रिय-जन्य सुखों का उपयोग करते रहे पर उससे स्थायी तृप्ति कभी न मिली। घृत डालने से जिस प्रकार अग्नि प्रज्ज्वलित होती है, भोगों से उसी तरह भोगों की इच्छा शांत नहीं प्रज्ज्वलित होती है यह भगवान् का विचित्र विधान है, सम्भवतः ऐसा इसलिये किया गया कि मनुष्य पार्थिव सुखों को सब कुछ मानने की भूल न करें।

बहुत दिन तक भोगों का आनन्द लूटने में उनकी तमाम शारीरिक शक्तियाँ क्षीण हो चलीं। चित वासना में डूबा रहने से घृणा और संसार से विरक्ति हो चली तब राजा और रानी दोनों ने परस्पर विचार किया कि ऐसे आनन्द की खोज में जाये, जिसका कभी अन्त न हो। जिसमें इन्द्रियों की शिथिलता, घृणा मनोमालिन्य आदि कुछ न हो।

राज्य के विद्वान् मनीषियों ने बतलाया-” महाराज! आत्म-ज्ञान ही वह मार्ग है, जो मनुष्य को स्थायी सुख-शांति और आनन्द प्रदान कर सकता है। जब मनुष्य किसी वस्तु की खोज करने लगता है तो उसे उसी क्षेत्र में ऐसी-ऐसी बातों का पता चलता है, जिनके बारे में उसे कभी कल्पना भी न हुई हो। महाराज शिखिध्वज और देवी चुड़ाला दोनों ने आत्म तत्व का विशद ज्ञान प्राप्त किया। उसे प्राप्त करने के अनेक योग साधन और मार्ग दर्शन प्राप्त किये। फिर दोनों ही उस प्रयत्न में जुट गये।

चुड़ाला की बुद्धि सूक्ष्मग्राही भी थी और अपेक्षाकृत पवित्र भी। कोमलता, करुणा, क्षमा और उदारता जैसे गुण नारी में स्वभाव से ही अधिक होते हैं, इसलिये उन्हें आत्म ज्ञान के मार्ग में काम, क्रोध, स्वाध्याय से अरुचि जैसी बाधाओं ने ज्यादा पीछा नहीं किया। स्वल्प काल की साधना और तपस्या से ही उन्हें आत्मानुभूति हुई। उनका मुख मण्डल सौंदर्य और आत्मानन्द से खिल उठा। अब उन्हें संसार के अणु-अणु में आनन्द प्राप्त करती हुई, अपनी ही आत्मा दिखाई देने लगी। सब दुःख द्वन्द्व छूट गये। प्रसन्नता ही प्रसन्नता, उल्लास ही उल्लास, शांति और आनन्द उनके जीवन में भर गया। गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी उन्हें जीवन-मुक्ति प्राप्त हो गई।

शिखिध्वज का मन योग साधना में तब तक ही लगता जब तक इन्द्रियाँ शिथिल होती पर न उनसे स्वाद, संयम सधा और न चित्त-वृत्तियों को रोकने के लिए उन्होंने ज्ञानार्जन की वृत्ति अपनाई इसलिये वे पीछे रह गये। उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ कि चुड़ाला के जीवन में आनन्द का स्रोत कहाँ से फूट रहा है। सामान्य काम-काज में हानि-लाभ जीवन-मरण यश-अपयश से भी अप्रभावित और सदैव प्रसन्न कैसे रहती है। पूछने पर रानी ने बताया-महाराज! हम उस स्थिति में हैं जिसकी खोज के लिये हम दोनों साथ-साथ चले थे।”

चुड़ाला अपने पति को मार्ग सुझाती, किन्तु महाराज शिखिध्वज उसे अपना अपमान समझते। उन्हें किसी विमति पण्डित ने यह बता दिया कि स्त्रियों को आत्म-ज्ञान की साधना का अधिकार नहीं है, क्योंकि आत्म-ज्ञान घर में नहीं मिलता। उसके लिए जंगल में एकान्त वास करना पड़ता है पर स्त्रियाँ एकान्त वास कर ही नहीं सकती इसलिये नारी को आत्म ज्ञान का अधिकार प्रदान नहीं किया गया।

शिखिध्वज उस स्थिति में नहीं थे कि किसी भी बात का समाधान अपनी बुद्धि और विवेक से कर लेते। रानी ने बहुतेरा समझाया कि महाराज ऐसे प्रश्नों पर मनुष्य को किसी की राय सीधे नहीं मान लेनी चाहिये, अपनी बुद्धि से भी सोचना चाहिये। आप स्वयं विचार करें क्या यहाँ रहकर आपको एकान्त में रहने से अधिक सुविधाएँ नहीं है? अपनी इच्छा से आप कितना ही समय योग साधनाओं के लिये नियत कर ले, पूजा, उपासना, स्वाध्याय और मार्ग दर्शन के जितने अच्छे साधन यहाँ है, उतने अच्छे साधन बन में कहाँ मिल सकते हैं?

बहुतेरा समझाया किन्तु राजा ने एक न सुनी। उन्हें लगा स्त्री की बात मानना पौरुष का अपमान है। इस अहंकार ने ही एक दिन उन्हें घर छुड़ा दिया। महाराज राज्य छोड़कर वन चले गये और आत्म-ज्ञान की साधना में लग गये।

वृत्तियाँ तो आखिर वृत्तियाँ ही है। यहाँ रानी को देखकर उनकी काम-वासना भड़कती थी, वहाँ पक्षियों और दूसरे जीव-जन्तुओं को काम किलोल करते देखकर उनका हृदय क्षुब्ध हो उठता, अतएव पर्वतीय उपत्यिका में आने वाली किसी भी नारी को वे कामुकता की दृष्टि से देखते। काम-संवेग तृप्त नहीं होते, जो क्रोध, क्रोध से मोह पैदा होते ही है। राजा इसी इन्द्रजाल में पड़ा रहा। न स्वर्ग, न मुक्ति। जो थोड़े आराम और प्रसन्नता के साधन थे, सो भी हाथ से छिन गये। अपने अविवेक और उतावलेपन पर स्वयं शिखिध्वज को बहुत दुःख हुआ।

इधर राजा के एकाएक चले जाने से राज्य में विद्रोह और अराजकता की स्थिति उत्पन्न न हो जाये, इसलिये देवी चुड़ाला ने राज्य संचालन अपने हाथ में ले लिया और यह घोषणा कर दी कि महाराज पर्यटन पर गये हैं, जब तक लौटते नहीं तब तक शासन-भार हमें ही सम्भालना है। बिना किसी पक्ष-पात या भेद-भावना से सभी राज्य सम्बन्धी काम-काजों का निपटारा कुशलतापूर्वक करती रही।

अब उन्होंने यह भी जानना चाहा कि राजा की स्थिति क्या है, एक दिन अपने सूक्ष्म शरीर को योग क्रियाओं द्वारा बाहर निकालकर उन्होंने राजा की अब तक की स्थिति का सब पता लगा लिया। अभी तक उन्हें वासनाओं से मुक्ति नहीं मिली, यह देखकर चुड़ाला को बड़ी चिन्ता हुई पर वे हतोत्साह न हुई। राज्य भार सम्भालते हुये भी उन्होंने राजी की सहायता का निश्चय किया। इससे उनकी व्यस्तता तो बढ़ गई, किन्तु मानसिक आल्हाद और आत्मिक प्रसन्नता में कोई अन्तर न आया।

चुड़ाला ने ऋषि-कुमार का छद्म-वेश बनाया और महाराज के सामने जा उपस्थित हुई। महाराज इस वेश में रानी को पहचान नहीं पाये, उन्होंने उन्हें ही मार्ग दर्शक गुरु मान लिया। रानी उन्हें दिन भर योगाभ्यास कराती और निश्चित समय पर राजधानी पहुँचकर राज्य का कार्य-भार भी संभालती। राजा इसलिये प्रसन्न थे कि अब उनकी साधना अच्छी तरह चल रही थी, उन्हें आत्म ज्ञानी गुरु मिल जाने पर बड़ा संतोष था। लेकिन एक बात उन्हें बराबर परेशान किये थी कि उनके गुरु रात्रि में अदृश्य क्यों रहते है।

एक दिन उन्होंने यह प्रश्न ऋषि-कुमार से ही पूछा तो उन्होंने दुःखी होकर बताया कि “उन्हें एक ऋषि ने शाप दे दिया है कि तुम रात्रि में स्त्री हो जाया करोगे।” यह सुनकर राजा हँसे और कहने लगे- “ महात्मन्! इसमें दुःख की क्या बात है, स्त्री हो या पुरुष सब आत्मा है। अपना-अपना कर्त्तृत्व पूरा करने पर भी आत्मा का स्वरूप तो नितान्त पवित्र और दिव्य है, पाप तो आशक्ति और वासनायें हैं। आप उनसे सर्वथा रहित हैं तो फिर दुःख करने की क्या बात?

राजा को इस तरह आत्म-ज्ञान प्राप्त हुआ देखकर चुड़ाला अति प्रसन्न हुई। अब उन्होंने अपने आपको प्रकट कर दिया। महाराज को बड़ी प्रसन्नता हुई और उन्होंने रानी का आभार माना और स्त्री-पुरुषों में भेद मानने के अपने पूर्व हठ पर बड़ा पश्चाताप किया। शिखिध्वज पुनः गृहस्थ और राज्य के उत्तरदायित्वों का पालन करने लगे।

इतनी कथा कहने के बाद महर्षि वशिष्ठ ने राम को समझाया-” युवराज राम! इस उपाख्यान का तात्पर्य यही है कि आत्म-ज्ञान प्राप्ति का अधिकार स्त्री और पुरुष दोनों को है और उसके लिये घर छोड़ने की आवश्यकता नहीं आशक्ति विमुख होना चाहिये।


मनुष्य-अनन्त आकाश का क्षुद्रतम अंश

ध्रुवों की ओर से नाम करें तो 24860 और भूमध्यरेखा पर से नापें तो हम पृथ्वी पर रहते है, उसकी परिधि 24902 मील लम्बी है दूरी की कोई पैदल नापना चाहे तो यह मानकर चले कि मार्ग में पड़ने वाली नदियाँ, पहाड़ समुद्र, ग्लेशियर, चट्टानें, बड़े-बड़े वृक्ष, खाने, जीव-जन्तु और हिंसक जानवरों की रुकावटें नहीं जायेगी तो भी कम से कम 5 वर्ष का समय इस परिक्रमा में लग जायेगा।

हमारी पृथ्वी जिस सौर मण्डल का सदस्य है, सूर्य उसका प्रमुख तारा है यह तो स्वयं प्रकाशित होते हैं और उपग्रह को किसी अन्य स्रोत से प्रकाश ग्रहण करके प्रकाशित होते हैं- ऐसे अगणित ग्रह-उपग्रह सूर्य की परिक्रमा करते हैं, 10 इनमें प्रमुख हैं, चन्द्रमा पृथ्वी का उपग्रह है अन्यों में से मंगल और शुक्र ग्रह सबसे पास हैं, उसके बाद सूर्य है, जिसकी एक परिक्रमा करने में पृथ्वी को 365 1/4 दिन लगाने पड़ते हैं। बुध जो सूर्य के सबसे समीप है 88 दिन में सूर्य की एक परिक्रमा करता है। पृथ्वी के पास उसके बाद जो ग्रह है, वह है बृहस्पति। बृहस्पति को तीन चन्द्रमा प्रकाश देते हैं। इस प्रकार की नीहारिक (नेबुला) से वंचित शनि ग्रह का उसके बाद स्थान है, इसका भी एक चन्द्रमा है। यूरेनस के 3 चन्द्रमा, नेपच्यून एक चन्द्रमा का ग्रह है और सबसे दूर का ग्रह प्लूटो है। यह सभी ग्रह-उपग्रह अपनी-अपनी कक्षाओं का परिभ्रमण करते हुए सूर्य की परिक्रमा करते हैं और उसमें जितना अन्तरिक्ष उनकी क्रियाशीलता में आता है, उसको कोई सीमा निर्धारित करना कठिन है।

बिना किसी यन्त्र के सायंकाल आकाश की और खड़े होकर देखे तो हम संसार के सम्पूर्ण भागों से अधिक से अधिक 10000 तारे ही देख सकते हैं। एक स्थान से तो 2000 तारों से अधिक नहीं देख सकते, यह सभी तारे एक सर्पिल निहारिका (सरपेन्टल नेबुला) के बाह्य प्रदेश में अवस्थित है। जो हमारी दृष्टि में आ जाते हैं और जो बहुत प्रयत्न करने पर भी नहीं दिखाई देते आकाश गंगा में ऐसे तारों की संख्या 150000000000 है। इनमें से अनेक तारे सूर्य से छोटे और अनेक सूर्य से कई गुना बड़े तक है। इनकी परस्पर की दूरी इतनी अधिक है कि उन सब की अलग नाप करना भी कठिन है। पृथ्वी से सूर्य की ही दूरी 13000000 मील है, चन्द्रमा हमसे कुल 240000 मील दूर है। प्लूटो ग्रह जो सूर्य से सबसे अधिक दूर है, उसमें सूर्य का प्रकाश पहुँचने में 5 घण्टे 30 मिनट समय लगता है। अर्थात् सूर्य और प्लूटो के बीच का अन्तर 186000 मील × 19800 सेकेण्ड = 3682800000 मील है। मनुष्य का आकार प्रकार इतने विशाल अन्तरिक्ष की तुलना में सागर की एक बूँद, मरुस्थल के एक रेणु-कण से भी छोटा होना चाहिये।

यह तो रहा सौर परिवार का विस्तार और उसकी परिवार संख्या संक्षिप्त सा विवरण। इनमें होने वाली गति शक्ति और क्रियाशीलता का क्षेत्र तो और भी व्यापक है। सूर्य स्वयं भी स्थिर नहीं। वह अपनी धुरी पर 43000 मील प्रति घण्टे की भयंकर गति से घूमता रहता है और प्रति सेकेण्ड 40 लाख टन शक्ति आकाश में फेंकता रहता है। पृथ्वी को उस शक्ति में से कुल चार पौण्ड शक्ति प्रति सेकेण्ड मिलती है और उतने से ही यहाँ के जलवायु का नियंत्रण खनिज पदार्थ और मनुष्यों को ताप आदि मिलता रहता है। यह शक्ति देखने में कम जान पड़ती है, किन्तु उसे यदि किसी परमाणु केन्द्र में पैदा करना पड़े तो उसके लिए प्रति घण्टा 1700000000000 डालर व्यय करने पड़ेंगे सूर्य की यह शक्ति जो वह अपने सौर परिवार की रक्षा और व्यवस्था में व्यय करता है, वह उसकी सम्पूर्ण शक्ति के दस लाख वे भाग का भी दस लाखवाँ हिस्सा होता है। काम में आने वाली शक्ति के अतिरिक्त को वह अपने भीतर न जाने किस प्रयोजन के लिए धारण किये हुए है और थोड़ी सी शक्ति भी कंजूसी से व्यय करता है। उससे जहाँ सूर्य (आत्मा) की शक्ति का बोध होता है, वहाँ यह भी पता चलता है कि नियामक शक्तियाँ कितनी सामर्थ्यवान् है और मनुष्य कितना क्षुद्र है और शारीरिक और मानसिक दृष्टि से तो वह कीड़े-मकोड़ों से भी गया-बीता रहा गया। आत्मिक दृष्टि से भले ही उसकी सामर्थ्य बढ़ी-चढ़ी हो, किन्तु उसका उद्घाटन और उद्बोधन एकाएक नहीं हो जाता, उसके लिए अपूर्व विश्वास, अविरल साधना और प्रचंड साहस की आवश्यकता पड़ती है। यह सौर-मण्डल अपने परिवार को लेकर किसी अभिजित नक्षत्र की ओर जा रहा है, ऐसा भारतीय ज्योतिविदों का मत है, और ऐसी-ऐसी आकाश गंगायें, हजारों निहारिकायें और अगणित सूर्य अभी इस अन्तरिक्ष में है। ऋग्वेद में भी सृष्टि के विस्तार का वर्णन में ‘बहवो सूर्या’ अनन्त आकाश गंगा में है ऐसा कहा है। उस विस्तार को समझने से पूर्व हमें दूरी का दूसरा माप जान लेना चाहिये। बहुत दूरी के ग्रह-नक्षत्रों को प्रकाश वर्ष से नापा जाता है। एक सेकेंड में प्रकाश 1 लाख 68 हजार 317 मील चलता है। इस हिसाब से 1 वर्ष में प्रकाश कितना चल सकता है, उस दूरी को प्रकाश वर्ष 1 प्रकाश वर्ष कहते हैं, एक प्रकाश वर्ष की गणना लगभग 5840000000000 मील है। आकाश में कुछ ग्रह नक्षत्र तो इतनी दूरी पर बसे हुए है कि मनुष्य मरे और फिर जीवन धारण करें, फिर मरे और फिर जीवन धारण करे इस तरह कई जन्मों की आवृत्ति कर ले तो भी उनका प्रकाश पृथ्वी तक न पहुँचे। ज्योतिविदों का कहना है कि आकाश में ऐसे कई तारे दिखाई दे रहे है, जो वास्तव में हैं ही नहीं। किन्तु चूँकि उनका प्रकाशक वहाँ से चल पड़ा है और वह आकाश को पार करता हुआ आ रहा है, इसलिये उस तारे की उपस्थिति तो मालूम होती है पर वस्तुतः टूटकर या तो नष्ट हो जाता है, अथवा किसी समीपवर्ती ग्रह में आकर्षित होकर उसमें जा समाया है।

हमारा सौर-मण्डल जिस निहारिका से सम्बद्ध है, उसे मंदाकिनी आकाश गंगा कहते हैं, वह आकाश गंगा ही इतनी विशाल है कि एक सिरे से दूसरे सिरे तक पहुँचने के लिए 1 लाख वर्ष लगेंगे। कुछ चमकीले तारे जैसे व्याध या लुब्धक पृथ्वी से 10 प्रकाश वर्ष दूर है, यदि कोई तेज से तेज जहाज से चले तो भी वहाँ तक पहुँचने में तीन लाख वर्ष लग जायेंगे वह भी इसी निहारिका से सम्बन्ध रखते है। इस विस्तार की ही तय करने में मनुष्य को लाखों वर्ष लग सकते हैं तो शेष विस्तार को तो वह लाखों बार जन्म लेकर भी पूरा नहीं कर सकता वैज्ञानिकों ने अब तक ऐसी दस करोड़ निहारिकाओं (नेबुलाज) का अनुमान लगाया है। जबकि यह विस्तार भी ब्रह्माण्ड के सम्पूर्ण विस्तार की तुलना में वैसा ही है जैसे समुद्र तट पर बिखरे हुए रेत के एक कण को करोड़वाँ छोटा अणु।

सूर्य का बार-बार 864000 मील है। पृथ्वी की परिधि से 108 गुणा अधिक है। ऐसे-ऐसे अनेक सौर मण्डल इस अन्तरिक्ष में समाये हुए है और उनकी गतिशीलता इतनी तीव्र है कि कई-कई ग्रह-उपग्रह तो 72 हजार मील प्रति घण्टा की रफ्तार से अपने-अपने में भ्रमणशील है। कई तारे युगल (डबल) और कई बहुत (मल्टीपल) होकर ब्रह्माण्ड (कास्मास) के आश्चर्य को और भी बढ़ा देते हैं। हमारे सौर-मण्डल में ही 1000 छोटे उपग्रह अनेक पुच्छल तारे ओर असंख्य उल्कायें विद्यमान् है। इस प्रकार की बनावटें प्रायः सभी सौर-मण्डलों में है। ऐस-ऐसे 1 विलियन (1 करोड़) सूर्यों की खोज की जा चुकी है। खगोल शास्त्री एण्ड्रोमीडा नामक निहारिका नेबुला में 2700 लाख सूर्यों की उपस्थिति की पुष्टि कर चुके है। यह हमारे सौर-मण्डल की ओर 200 मील प्रति घण्टा की गति से बन रहा है।

कुछ ऐसे तारों का पता लगाया गया है जो पृथ्वी से इतनी दूर बसे है, जहाँ हमारी कल्पना भी नहीं पहुँच सकती। उदाहरणार्थ सिरस 8॥ प्रकाश वर्ष ‘प्रोस्योन’ 11 प्रकाश वर्ष ‘एलटेयर’ 15 प्रकाश वर्ष दूर है बोडा ओर ऐरीटयूरस तारा समूह पृथ्वी से 30 प्रकाश वर्ष कैरीला 54 प्रकाश वर्ष, सप्तर्षि मण्डल 100 प्रकाश वर्ष रीगल इन ओरिओन 500 प्रकाश वर्ष हाइडेसे 130, प्लाइडम 325 ओर ओरिओम का नीला तारा 600 प्रकाश वर्ष की दूरी पर बसा हुआ है। ड़ड़ड़ड़ तारे विभिन्न प्रकार की जलवायु तापीय और ऊर्जा शक्कित वाले है। कई लम्बाई-चढ़ाई में बहुत बड़ा है। अन्टलारि नामक तारा पृथ्वी जैसी 21 पृथ्वियाँ अपने भीतर भर ले तो भी बहुत स्थानी खाली पड़ा रहे। ओरियन तारा समूल का तारा बैटिल जीन्स का व्यास 2500 लाख मील है, कुछ तारे तो इतनी दूर है कि उनकी प्रथम किरण के दर्शन पृथ्वी वासियों को 36 हजार वर्ष बाद होंगे, तब तक उनका प्रकाश यात्रा करता हुआ बढ़ता रहेगा।

रेडियो ज्योतिष नाम की विद्या का जन्म अब इन सब आश्चर्यजनक माना जाने लगा है। अर्थात् रेडियो दूरबीनों का निर्माण हुआ, जिसमें रेडियो तारे और रेडियो निहारिकाओं की खोज की गई। वैज्ञानिक कहते है कि लाखों-करोड़ों प्रकाश वर्ष की दूरी के तारे केवल प्रकाश के हैं। नवासर और पल्सार ज्योतियों ने अनेक तारों का पता चला है। एक महाभयंकर काले तारे का पता चला है, जिसकी सीमा और दूरी का अनुमान नहीं लगाया जा रहा। यह दूरी का विस्तार जितना बढ़ता जा रहा है, मनुष्य उतना ही छोटा होता जा रहा है। पृथ्वी की तुलना में एक परमाणु बड़ा हो सकता है पर ब्रह्माण्ड की तुलना में मनुष्य तो परमाणु के बराबर भी नहीं है। वह परमाणु, का अणु से भी छोटा नगण्य अणु ही हो सकता है।

एक ओर सृष्टि का यह अग्राह्य अकल्पनीय विस्तार और दूसरी ओर मनुष्य की लघुता, पर उसका बढ़ा-चढ़ा अभियान। हँसी आती है उस पर। लगता है मनुष्य पागल ही रहा। उसने कुछ न जानकर बड़ा दंभ और पाखण्ड फैलाया। सेवा और प्यार करने की बात भूलकर व्यक्ति के प्रभाव में उसने जिसे बन पड़ा सताया ही सताया। ऐसे विवेकहीन मनुष्य की जितनी भर्त्सना की जाय थोड़ा ही है। भौतिक दृष्टि से मनुष्य बहुत दीन और दुर्बल प्राणी है, जो कुछ शक्ति और सामर्थ्यवान् है, वह उसकी आत्मिक शक्ति ही है पर हम मानव मन और मानव आचरण के भटकने से ही कब अवकाश पाते हैं, जो अपने लघु रूप को विश्व-व्यापी चेतना के साथ सम्बन्ध जोड़ पाने की बात सोच पाये। उसके लिए तो मनुष्य को अपने छोटेपन का ध्यान रखना ही पड़ेगा। जब तक वह अपनी लघुता स्वीकार नहीं करता, विश्व की व्यापकता को समझ पाना और उसमें अपने आप को धुला पाना उसके लिए नितान्त असम्भव है।


पर्वत की चुनौती

घर के सामने कई पीढ़ियों से खड़े पर्वत ने चुनौती दी- ”है कोई माई का लाल जो मुझे अपने स्थान से हटा दे।” पर्वत की यह गर्वोक्ति किसी ने सुनि, किसी ने नहीं सुनि किसी ने सुनकर भी अनसुनी कर दी पर सामने वाले मकान में बैठे हुये एक बूढ़े किसान ने सोचा यदि पहाड़ इस स्थान से हट जाता तो कई बीघे जमीन खेती के लिए निकल आती, बालक-बच्चों का उदर-पोषण होता।

दाढ़ी पर हाथ फेरा, घर वालों को आवाज लगाई। पिता की आवाज सुनकर सब लड़के और पोते घर से बाहर निकल आये-बाबा कहिये क्या आज्ञा है।” वृद्ध ने संकेत करते हुए कहा-” बच्चों वह देखो पहाड़ दिखाई देता है न कितनी जमीन घेरे खड़ा है, हम लोग प्रयत्न करें तो उसे अपने स्थान से हटा सकते हैं। एक-दो चार दिन नहीं जब तक वह हट न जाये चैन नहीं ले तो निश्चित ही पहाड़ को खोदकर समतल भूमि निकाल सकते हैं?”

इसकी उत्साह भरी बातें बच्चों को भा गई। उसने कहा- हाँ बाबा हटा क्यों नहीं से कहा। फावड़ा-कुदाली लेकर सब जुट गये पर समस्या आ खड़ी हुई इतना बड़ा पहाड़ खोदकर डाला कहाँ जाये। वृद्ध ने बच्चों को निरुत्साहित होते देखा तो फिर दौड़ा-दौड़ा आया और बोला- “थोड़ा चलना ही तो पड़ेगा पर समुद्र में तो हम ऐसे ऐसे हजारों पहाड़ फेंक सकते हैं।” बच्चे अब दुगुने उत्साह से खुद गये और पहाड़ को खोदकर समुद्र में फेंक डाला।


प्रगति पथ के आन्तरिक अवरोध

संसार के प्रायः लोग उन्नति चाहते हैं और उसके लिए प्रयत्न भी करते रहते हैं। कदाचित ही कोई ऐसा व्यक्ति मिले जो उन्नति एवं विकास के अनिच्छुक हो, अन्यथा उन्नति एवं विकास ऐसे आकर्षण लक्ष्य हैं जो प्रत्येक को अपनी ओर उन्मुख कर ही लेते हैं। यह दूसरी बात है कि लोगों के उन्नति सम्बन्धी केन्द्र बिन्दु भिन्न-भिन्न हो। कोई आर्थिक उन्नति का इच्छुक हो सकता है तो कोई राजनीतिक उन्नति का। किसी को शारीरिक उन्नति के प्रति आकर्षण रह सकता है तो किसी को आत्मिक उन्नति के प्रति। कतिपय सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए लालायित हो सकते हैं तो अनेक धर्म लाभ की जिज्ञासा रख सकते है। तात्पर्य यह है कि सभी किसी न किसी प्रकार की उन्नति के लिए इच्छुक एवं क्रियाशील देखे जा सकते हैं।

संसार में उन्नति करने के अगणित क्षेत्र हो सकते हैं, उसी प्रकार उनके लिये प्रयत्नों के रूपों में भी तदनुकूलता के साथ विभिन्नता एवं विविधता हो सकती है। उदाहरण के लिए आर्थिक उन्नति प्राप्त करने का मार्ग साधारणतः सही हो सकता है कि मनुष्य किसी व्यवसाय, व्यापार अथवा उद्योग का आश्चर्य ले। ऐसे कार्य और इस प्रकार की कुशलताओं को काम में लाये जिससे उसकी आय में वृद्धि हो। व्यवसायिक क्षेत्र में उसको सामाजिक सद्भावना प्रचुर रूप से प्राप्त है। इस प्रकार का प्रयत्न करे कि अर्थागमन की अपेक्षा अर्थ निर्गमन की सम्भावना कम रहे। अपने सम्पूर्ण प्रयत्नों एवं प्रतीक्षा को आर्थिक योजनाओं के मार्ग में नियोजित करने से ही अर्थोन्नति का लक्ष्य पूरा हो सकता है।

राजनीतिक उन्नति के लिये व्यवहार चातुर्य, वाक-नैपुण्य तथा देश काल सम्बन्धी गतिविधियों के ज्ञान तथा उपयोग की कुशलता का होना आवश्यक है। वर्तमान समस्याओं के कारणों एवं निवारण का ज्ञान इस क्षेत्र की अनिवार्य शर्त है। प्रतिभा एवं प्रभाव की निष्णातता विकसित किये बिना राजनीति में आये बढ़ सकना सम्भव नहीं।

शारीरिक उन्नति का मूल भाव स्वास्थ्य एवं सबलता है। उसे प्राप्त करने के लिए व्यायाम, संयम भोजन को उस सीमा तक उचित एवं अनुकूल बनाना होगा, वहाँ तक उसकी क्षमता है। अधिक से अधिक पौष्टिक पदार्थ खाना और व्यायाम द्वारा उन्हें पूर्ण रूप से पचाना और उनके तत्त्वों को ह्रास से बचाना ही मोटे तौर पर शारीरिक उन्नति का विभाग है। संक्षेप में यों कहा जा सकता है कि वह हर काम करना जिससे शरीर का पोषण एवं संचय हो और किसी भी उस काम को न करना जिससे शरीर का पोषण का अपव्यय हो।

आत्मिक उन्नति का मार्ग तपोमय मार्ग ही हो सकता है। इस तपोमय मार्ग से उस तपस्या का तात्पर्य नहीं है, जो ड़ड़ड़ड़ प्रान्तों में जाकर भूखे-नंगे रहकर समाधि लगाने अथवा पंचाग्नि तपने आदि के रूप में निभाई जाती है। इस तपोमय मार्ग का तात्पर्य अपनी आन्तरिक वृत्तियों तथा ब्रह्मा क्रियाओं को शिवत्व की ओर अग्रसर करना ही है। अपने अन्तःकरण से काम, क्रोध, लोभ, भय, मोहर आदि आत्म के शत्रुओं को निर्वासित करना और उनके स्थान पर त्याग, दया, उदारता, नम्रता तथा ज्ञान आदि की प्रतिष्ठा करना। यथा सम्भव धर्म के ड़ड़ड़ड़ दस लक्षणों का प्रतिपादन करना। सामान्यता ही नहीं संकटों तथा आपत्तियों में भी अपने धैर्य एवं उद्देश्य से विचलित न होना। भावाभाव में यथा सम्भव समभाव रहना। दया और अनुकूलता आदि गुणों का विकास करने के साथ साथ सत्य, अस्वार्थ एवं आत्मादर को प्रश्रय देना न्याय नैपुण्य तथा कर्तव्यशीलता को धारण करना परिश्रम, पुरुषार्थ तथा कर्म कर्त्तव्य को प्रवंचित न करना आदि ऐसे संयम एवं नियम हैं, इस प्रकार अनुसरण करना ही तपोमय मार्ग है। इस प्रकार का शुभ मार्ग अवलंबन करने से ही आत्मोन्नति की ओर अग्रसर हुआ जा सकता है।

उसी प्रकार सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए तदनुसार मार्ग का आश्रय लेना होगा। जैसे समाज के प्रत्येक सदस्य की अपना सहोदर समझकर व्यवहार करना। प्रतिक्षण सबसे सहयोग करने में तत्पर रहना। विनम्रता, उदारता तथा अनुकूलता का प्रमाण प्रस्तुत करना। सेवा, सद्भावना, प्रेम एवं परस्परता का मूल्य समझना तथा अपने और दूसरों के कर्त्तव्य व एकाधिकार के प्रति जागरूक तथा न्यायशील रहना, सामाजिक नियमों एवं मान्यताओं का मान करना, कोई ऐसा काम करने से बचना जिसका दूषित प्रभाव समाज के किसी अंग पर प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से प्रतिकूल पड़े, समाज के सुन्दर, सभ्य, संस्कृत, स्वस्थ और सम्पन्न बनाने में यथाशक्ति योग प्रदान करना, प्रभाव के पिछड़े और गिरे बन्धुओं को आवश्यकतानुसार सहायता एवं सहयोग देकर बढ़ाने और उठाने के प्रयत्नों में भाग लेना आदि ऐसी भावनायें एवं क्रियाएँ है जिनका परिणाम सामाजिक सद्भावना एवं सम्मान के रूप में ही साक्षात होता है।

इस प्रकार अपनी अभीप्सित उन्नति के लिए तदनुकूल पद एवं प्रयत्नों को अपनाने से मनुष्य उद्देश्य को प्राप्त कर सकता है।

यह सब होते हुए भी एक बड़ा प्रश्न है कि लोग उन्नति की आकांक्षा करते है और उसके लिए प्रयत्न भी, तथापि अधिकतर देखा जाता है कि वे इस उद्देश्य में सदा सफल ही नहीं होते। प्रयत्न एवं परिश्रम करते हुए भी पिछड़ कर रह जाते हैं। ऐसा क्यों होता है अवश्य ही कुछ अवरोध ऐसे आड़े आते ही रहते होंगे, जो अग्रसर हो तो चरणों को यथा स्थान रोक रखते हैं। इस प्रश्न पर विचार करने से ‘अहं’ एवं ‘अज्ञान’ दो ऐसे अवरोध समझ में आते हैं, जो श्रृंखला बनकर चरणों की गति अवरुद्ध कर देते ह, मार्ग को कठिन बना देते हैं। सबसे बड़ी विचित्रता यह है कि यह दोनों अवरोध साथ चलते हुए मनुष्य की दृष्टि से बचे हुए अपना काम करते रहते हैं।

अहं के अनेक स्वरूप हो सकते हैं। अहंकार, अभिमान गर्व, दम्भ, अविनय, असम्मान, पुरुषता, क्रूरता, कठोरता, शासन भावना आदि अहं के ही तो अनेक रूप हैं और इसके यह अनेक रूप अवसरानुकूल अथवा ड़ड़ड़ड़ अदा करके अवरोध का काम कर जाते है किन्तु बहुचतुर, बहरूपिया इस ढंग से साथ लगा और जड़ काटता रहता है कि पता ही नहीं चल पाता कि वह संतोषदायी मित्र जैसा लगने वाला उन्नति मार्ग का भयानक शत्रु है।

सबसे पहले तो यह ऊँची-ऊँची कल्पनाओं में बुलाकर आसमान के सब्जबाग दिखलाकर मनुष्य को आगे बढ़ने से ही रोके रहता है। मात्र आकांक्षा को ही कर्त्तव्य जैसा अनुभव कराता रहता है। उन्नति की आकांक्षा मात्र रखने पर ही अहंकारी व्यक्ति अपने को असमर्थ समझने लगता है। उसकी आकांक्षायें इतनी ज्वलित होती है कि उनमें मूर्तिमानता का ही संतोष प्राप्त करने लगता है। इस प्रकार जब बैठे बिठाये ही उन्नति का संतोष प्राप्त होने लगता है, तब स्वाभाविक ही है कि बढ़कर पुरुषार्थ करने की उसकी वृत्ति सोती ही पड़ी रहेगी।

अहंकार की एक चतुरता यह भी कि यह मनुष्य को स्थगनशील और दीर्घसूत्री बना देता है। अहं प्रधान व्यक्ति हमेशा यह हौंसला रखता है कि वह जब चाहेगा उठकर उन्नति के शिखर पर जा पहुँचेगा। जिस दिन से कार्य प्रारम्भ करेगा, बढ़ता ही चला जायेगा किन्तु बढ़ने के लिए न तो वह उठकर खड़ा ही होता है और न ऊपर चढ़ने के क्रियाशील एवं अहंकारी व्यक्ति को हर कार्य सुगम और प्रत्येक लक्ष्य सहज साध्य लगा करता है। इसलिये अपनी क्रियाओं को सदा स्थगित ही रखता है। ऐसी दशा में उसके जीवन के सारे अवसर निकल जाते हैं, सारी सम्भावनायें समाप्त हो जाती हैं। तब क्रिया और और अवसर के अभाव में उन्नति कहाँ? निदान अहंकारी व्यक्ति के हाथ शिवाय उस कोरे अहंकार के और कुछ ना आ पाता है।

अहंकार का एक दोष यह भी है वह मनुष्य को किसी भी अन्य उन्नत व्यक्ति को गणना में ही नहीं लाने देता। वह हमेशा किसी भी उन्नत व्यक्ति को देखकर यहीं कहता ओर सोचता रहता है कि -यह भी कोई उन्नति है। कुछ पैसा हो जाना अथवा विद्या प्राप्त कर लेना कोई बड़ी बात है? इतना तो हम जब चाहें उपलब्ध कर सकते हैं। ऐसी दशा में जब उन्नति विकास को कोई मूल्य ही उसकी दृष्टि में नहीं होता, वह हर उपलब्धि को हेय समझता है, तब स्वयं सारी वृत्तियों ओर विश्रृंखलताओं को समेट कर उन्नति मार्ग पर सतर्कतापूर्वक अभिघात करेगा ऐसी आशा किसी भी अभिमानी व्यक्ति से नहीं की जा सकती है।

बहुत से व्यक्ति आरम्भ में तो अहंकारी नहीं होते। कुछ उन्नति भी कर लेते हैं पर क्यों ही उनके हाथ में उन्नति के कुछ फूल आये नहीं कि वह तुरन्त ही गर्व का रूप रखकर आ पहुँचा और लगा व्यक्ति को भ्रमित करने, अभिमान की चपेट में आते ही मनुष्य की सीधे चाल टेड़ी हो जाती है। पैसा या प्रतिष्ठा मिलते ही वह दूसरों पर शासन करने के दोष से उन्माद हो जाता है उसका व्यवहार बदल जाता है, भावनायें वह नहीं रहती, विनम्रता का गुण चला जाता है और कठोरता, पुरुषता आदि के दुर्गुण आ दबाते हैं। निदान से सारी परिस्थितियाँ उलटी हो जाती हैं जो प्रारम्भ में उन्नति एवं विकास की सहायक बनी थी ऐसी दशा में आगे उन्नति होना तो दूर प्राप्त उन्नति भी अधिकार से निकल जाती है और मनुष्य फिर प्रारम्भ जैसा रिक्त हो जाता है। इस प्रकार वह उन्नति पथ बहुत बड़ा अवरोध सिद्ध होता है इससे दूर रहकर ही कोई व्यक्ति कर स्थिर रख सकता।

अज्ञान उन्नति पथ का अवरोध ही नहीं पतन की आधारशिला है। ‘अज्ञान’ अन्धकार का परिचायक है। कोई कितना भी शक्तिशाली क्षिप्र अथवा गतिगामी क्यों न हो अन्धकार की स्थिति में उसकी गति अवरुद्ध हो ही जायेगी उसके शक्तिशाली पाँव जहाँ के तहाँ ठिठककर रुक जायेंगे। आगे बढ़ने का उसका साहस तिरोहित हो जायेगा। अन्धकार की अवस्था में मार्ग लक्ष्य आदि कुछ भी नहीं दिखता। अविश्वास संशय और सन्देह अन्धकार की की अनिवार्य अनुभूतियाँ है, भ्रम एवं भूले अन्धकार के कारण ही उत्पन्न होती है। फिर भला इतनी उलझनों के साथ यदि कोई उन्नति की ओर अग्रसर होना चाहिये तो किस प्रकार सम्भव हो सकता है।

उन्नति की आकांक्षा रखता हुआ भी जो व्यक्ति अज्ञान से आक्रान्त है, वह अपने लक्ष्य में सफल नहीं हो सकता है। प्रथम तो वह अज्ञान के कारण वह निर्णय ही न कर सकेगा कि उसने उन्नति के लिए जिस क्षेत्र अथवा दिशा का चयन किया है, वह उसके लिए उपयुक्त भी है या अथवा नहीं। अपनी क्षमताओं और आकांक्षा में सन्तुलन बना सकना अज्ञानी व्यक्ति के वश की बात नहीं होती। अज्ञानी व दूरदर्शी तो होता ही है। उसकी यह न्यूनता उसे इस योग्य नहीं होने देती कि वह दूर भविष्य के गर्भ में अन्तर्हित अपने लक्ष्य को स्पष्ट देख सके और यदि वह एक बार वह उसको देख समझ भी ले तो उसके अनुभव मार्ग चुनने और कार्य पद्धति का निर्माण उसके लिए सम्भव है? लक्ष्य प्राप्ति अनेक गतिविधियों के बीच उसकी ज्ञान हीनता कहीं न कहीं धोखा दे ही देगी।

उन्नति का लक्ष्य प्राप्त करने के लिए कार्य कुशलता के साथ व्यवहार कुशलता भी तो अपेक्षित है। अब वो अज्ञानी है वह व्यवहार कुशल भी किस प्रकार हो सकता है। व्यवहार में विख्यात होने के लिए जिस मानव मनोविज्ञान की उसकी सूक्ष्म वृत्तियों के अध्ययन की आवश्यकता होती है, उसकी अज्ञानी व्यक्ति कहाँ से पूरी कर सकता है। अज्ञान की दिशायें एक विचित्रता यह भी होती है कि उल्टी बात सीधी और सीधी बात उल्टी लगा करती है। इसलिये अज्ञानी व्यक्ति अधिकतर विपरीत दिशाओं में ही क्रियाशील हुआ करते हैं। इससे उन्नति की सम्भावनायें तो दूर उल्टे पतन होना ही निश्चित होता है।

हम आप सभी तो उन्नति की आकांक्षा रखते हैं पर केवल आकांक्षा भर तो हम उन्नतिशील हो नहीं जायेंगे आकांक्षा के साथ क्रिया का समन्वय होना नितान्त आवश्यक है किन्तु सबसे पूर्व हमें अपनी अहं एवं अज्ञान की न्यूनताओं को दूर कर लेना चाहिये। अध्ययन, अनुभव, दर्शन एवं श्रवण द्वारा अपने अज्ञान को दूर कर उचित ज्ञान का विकास कर लेने पर ही उन्नति का मार्ग निश्चित और तद्नुकूल क्रिया-कलाप की योजना करें। उन्नति की ओर उन्मुख होने अथवा उन्नत व्यवस्था में आ जाने पर भी अहं और अज्ञान से सावधान रहने की आवश्यकता है, तभी किसी वाँछित क्षेत्र में उन्नति भी हो सकती है और स्थिर भी रह सकती है।


सुरघु की समाधि

कैलाश पर्वत पर हेमजटा नामक जाति रहती थी, सुरघु उनका राजा था। सुरघु बड़ा दयालु, न्यायप्रिय और उदार था तो भी राज्य में कुछ न कुछ ऐसे दुष्ट और दुराचारी तो थे ही जिनके साथ उसे कठोरता बरतनी पड़ती थी। उन्हें दण्ड भी देना पड़ता था।

एक बार राज्य का कर न चुका पाने के अपराध में उसे एक नागरिक को दण्ड देना पड़ा। सुरघु का मन पश्चाताप से भर गया। उसने विचार किया कि राज्यकोष के लोभ में ही उसे दण्ड देना पड़ा इसलिये उसे क्रम के प्रति घृणा हो गई। यह एक दिन चुपचाप तपश्चर्या के लिये घर से भाग निकला।

सुरघु के शान्त तपोवन में आश्रम बनाया और तप करने लगा। तपश्चर्या के प्रभाव से चित-वृत्तियाँ निर्मल होने लगी। भगवान की भक्ति में सुरघु को आनन्द आने लगा।

आश्रम में अनेक पक्षी भी निवास करते थे, उनमें से कुछ शान्त और मधुर प्रकृति के पक्षी थे और दुष्ट और हिंसक स्वभाव के भी। एक दिन प्रातःकाल सुरघु अग्नि-होम समाप्त कर जैसे ही उठे थे कि उनकी दृष्टि सामने वाले आम वृक्ष पर गई जहाँ एक बाज़ एक तोते के बच्चे को पंजों में पकड़े बैठा उसे मारकर खा जाने के प्रयत्न में था। बच्चा चीं -चीं कर अपना दुःख प्रकट करता था पर दुष्ट बाज़ को जरा भी दया न आ रही थी।

सुरघु का न्यायप्रिय हृदय एक बार फिर शक्ति के आक्रोश में जागा। धनुष-बाण तो था नहीं पास ही एक पत्थर पड़ा था। उसे ही निशाना साध कर जो मारा कि बाज़ घायल होकर भूमि पर आ गिरा। तोते का बच्चा मुक्ति पाकर अपनी माँ की गोद में जा लिपटा। दृश्य बदल गया, मृत्यु आई थी शुक शावक को लेने पर हाथ बाज़ लगा।

अपने हाथ बाज़ की मृत्यु देखकर एक बार सुरघु का हृदय फिर काँप गया। उसे बड़ा पश्चाताप हुआ। जिस कारण राज्य और वैभव का परित्याग किया वही फिर करना पड़ा यह सोचकर उसका चित्त बेचैन हो उठा। आँखों में आँसू भरने लगे। सुरघु सोच रहे थे- विधाता कैसी है तेरी सृष्टि कि न चाहते हुए भी मनुष्य को क्या-क्या करना पड़ता है।

सुरघु यह सोच ही रहे थे कि उधर से मुनि माण्डव्य घूमते-घूमते आ पहुँचे। सुरघु को दुःखी देखकर प्रेम-भावना मुनि सब बात समझ गये। राजन ने मुनि को प्रणाम किया और सविस्तार अपना दुःख उनसे प्रकट कर उससे मुक्ति पाने का उपाय पूछा।

महामुनि माण्डव्य बोलें- “राजन न्याय न किया जाये, कठोरता न करती जाये तो दुराचारी लोगों के हाथों धर्मनिष्ठ सज्जन लोग भी कष्ट पाते है, इसलिये व्यवस्थायें सम्भालना भी भगवान का ही हाथ बटाना है। मनुष्य अपने लिये कुछ न चाह कर ईश्वर की इच्छा मानकर निष्कामभाव से संसार सेवा करें तो यह कठोरता भी पाप नहीं होती। उस स्थिति में आनन्द और शांति का अभाव भी नहीं होता।

सुरघु अब पुनः राजधानी लौट आये और प्रजा की सेवा और उसके विकास में इस तरह लीन हो गये कि अपना हित भी उन्होंने भुला दिया। उनकी कुशल-क्षेत्र भगवान आप वहन करने लगे।

सेवा का सुख, प्रजा के प्यार का सुख पाकर आत्मदर्शी सुरघु की सत्र मानसिक विफलतायें दूर हो गई। उन्हें सर्वत्र आनन्द की निर्झरिणी प्रवाहित अनुभव होने लगी।

उन्हीं दिनों पारसी नरेश परिथ ने आर्यावर्त की यात्रा की। आत्म-ज्ञान और समाधि-सुख की आकांक्षा से परिथ ने सारे भारतवर्ष के सन्त-ज्ञानियों की शरण ली। अनेक प्रकार की साधनायें सम्पन्न की उसने। दम, नियम, ध्यान, धारण प्रत्याहार के द्वारा उसके इन्द्रियों पर नियन्त्रण करना भी सीख लिया। कई तरह की सिद्धियाँ भी उसने अर्जित की, किन्तु न जाने क्यों उसके अन्तःकरण में कुछ सूना-सूना-सा लगता था। पति क अभाव में भूषण-भूषित साधना की जिस तरह की छट–पटाहट और पीड़ा होती है, इसी प्रकार परिष का अंतर्द्वन्द्व समाप्त न होता था। व्याकुलता उसे सदैव घेरे रहती थी।

इसी अवस्था में परिभ्रमण करते हुए परिधि की भेंट मुनि माण्डव्य से हो गई। माण्डव्य ने नरेश को सम्राट सूरथ के पास जाने और योग-विधा सीखकर आत्म-शांति का परामर्श दिया। महान् जिज्ञासु शीघ्र ही कैलाश के लिये चल पड़ा।

राजधानी पहुँचने पर प्रधान सचिव ने बताया महाराज प्रतिदिन अपनी प्रजा के कष्ट-दुःख देखने के लिये स्वयं वेश बदलकर आया करते है, उन्हें एक सप्ताह हुये लौटे नहीं। राज्य-संचालन महारानी करती है, आप चाहें तो उनसे भेंट कर लें। परिथ में सुना और चुपचाप एक ओर चल पड़ा। सायंकाल हो गई। परिथ एक गाँव में रुका। जिस द्वार पर उसने विश्राम करना निश्चय किया दैवयोग से उस घर में एक वृद्धा माता के अतिरिक्त कोई न था। वृद्धा का पुत्र युद्ध में गया था, वृद्धा आज एक सप्ताह से बीमार थी, कोई अपरिचित व्यक्ति उसकी सेवा सुश्रूषा कर रहे थे। परिथ ने देखा अद्वितीय ओजस्वी का धनी वह व्यक्ति कोई साधारण मनुष्य नहीं था, वृद्धा की सेवा,घर की सफाई जैसे साधारण कार्यों में भी उसकी तल्लीनता देखते ही बनती थी। जिस वृद्धा में कोई सौंदर्य न था जिस वृद्धा को हाथ लगाने के लिए पड़ोसी भी न तैयार ना थे, उसकी इतनी आदर-भाव से सेवा परिध के मन में उस अपरिचित सज्जन का परिचय प्राप्त करने का कौतूहल जाग उठा।

नियमानुसार जैसे ही वृद्धा को औषधि पिलाकर परिचारक आश्वस्त हुये कि किसी जाने-पहचाने स्वर ने उन्हें प्रणाम करते हुये विभव की- ‘‘महाराज, आज सात दिन हो गये आपके न होने से सम्पूर्ण राजधानी और हेमबटा दुःख से छटपटा रही है।”

वह महाराज सुरघु थे। अपने अंग-रक्षक सैनिक की ओर ऐसे देखा जैसे उन्हें पता ही न चला हो कि राजधानी में उनकी अनुपस्थिति को पूरे सात दिन हो चुके है। उनके मुखमण्डल पर सेवा की अपूर्ण शान्ति और आत्म-दर्शन की गम्भीरता स्पष्ट चमक रही थी। उन्होंने सैनिक को सम्बोधित करते हुये कहा-तात मेरी प्रत्येक प्रजा, मेरे धर्म से जुड़ी हुई है-वह भी तो मेरा ही कर्त्तव्य था कि मैं इस वृद्धा की देख-भाल करता। तुम चलो और राजमाता को मेरा सन्देश कहो- वे मेरे न पहुँचने तक वहाँ की व्यवस्था सम्भाले रखें।

सैनिक लोटा और दूसरे सम्राट परिध महाराज सुरघु के समीप थे आज उन्होंने समाधिक का धर्म समक्ष लिया था। सेवा-सेवा-सेवा प्यार-प्यार-प्यार ऐसा आत्मदर्शन जिसमें हर प्राणी की पीड़ा अपनी पीड़ा,

हगंलैंड के विख्यात राजनैतिक लार्ड अस्थिव का बड़ा पुत्र लड़ाई के मोरचे पर गया हुआ था। कई दिनों से उसका कोई समाचार नहीं मिला था।

एक दिन अस्थिव महोदय अपने कार्यालय में काम कर रहे थे टेलीफोन की घंटी बजी उन्होंने संदेश सुना और ‘अच्छा, ऐसी बात है’। यह कह कर रिसीवर रख दिया। उन्होंने कहा-प्रभु की इच्छानुसार ही सब कुछ होता है”। इतना कह कर वह पुनः अपनी मेज़ पर आ गये और पूर्ववत् अपने काम में जुट गये। उनके साथी यह देखकर विस्मय विभूत हो गये कि- इनका बेटा लड़ाई में मारा गया है तब भी उस में कितनी गंभीरता है, जैसे कुछ हुआ ही नहीं। इसे ही कहते है-स्थिति प्रज्ञता।

जीव का दुःख दर्द अपना दुःख दर्द अनन्त आत्मा की अनुभूति और उसमें खो जाने के सुख से बढ़कर और कोई साधना क्या हो सकती है। परिध को वह जान लेने के बाद और कुछ जानना शेष नहीं रह गया था।

विध्य-भाव से उसमें सम्राट सरघु के चरण स्पर्श किये और अपने देश लौट गया। वो शान्ति परिथ को किसी योग साधना और साँसारिक वैभव न मिल सकी थी, वह निष्काम करम योग के प्रयोग से सहज ही मिल गई।


महाशक्ति कुण्डलिनी और उसका जागरण

देवताओं और असुरों के बारे में हमारी कोई कल्पना न होने से उनके शरीरों के संबन्ध में निश्चित कुछ नहीं कहा जा सकता, किन्तु मनुष्य और पृथ्वी पर पाये जाने वाले अन्य जीव जैसे गाये, बैल, मृग, मगर, कीड़े मकोड़े और अनेक प्रकार के पक्षियों के बारे में नियम पूर्वक कहा जा सकता है कि उनके शरीरों का ढाँचा एक समान नहीं होता किन्हीं में हड्डियाँ बहुत कम और इतनी कमजोर होती है कि साधारण भटके से उन्हें तोड़ा जा सकता है। कछुए आदि सरकने वाले जीवों में हड्डियाँ होती ही नहीं। मस्तिष्क, नाक, कान, मुख आदि कि बाहरी और भीतरी बनावट संसार के सभी जीव-जातियों में अलग-अलग ही पाई जाती है।

प्राणियों की शरीर की रचना में यद्यपि बहुत अन्तर होता है फिर भी आँतों में घिरी हुयी ड़ड़ड़ड़ नाम की एक ऐसी नाड़ी है जो संसार के सभी जीवों में एक सी पायी जाती है। वीणा के मूल भाव में स्थित गोलाई, जल के भंवर और कुण्डल के चक्र के समान आकृति वाली इस नाड़ी का बीच चेतना के महत्त्वपूर्ण सम्भव माना जाता है। वही से सैकड़ों नाड़ियाँ निकलकर शरीर के विभिन्न प्रदेशों तक फैली जाती है।

यह नाड़ी देखने में ऐसी लगती है जैसे शीत से सिकुड़कर कोई सर्पिणी कुण्डली मारकर सो गई हो। उसकी आकृति के अनुसार ही उसे कुण्डलिनी नाम से सम्बोधित किया गया है। यह नाड़ी ही जीव चेतना का सम्पूर्ण आधार है। उसी से जीवधारियों को शक्ति और तेजस्विता मिलती है, सामान्य स्थित में जिस व्यक्ति की कुण्डलिनी शक्ति जितनी मात्रा में स्पन्दन करती है, उतना ही प्रभाव क्षेत्र, उस मनुष्य का होता है। उसी के आधार और अनुपात से लोगों को सुख-दुःख आदर सम्मान, लोक प्रतीक्षा आदि मिलती है। इसीलिये कहना न होगा कि मनुष्य के स्थूल जीवन ही नहीं व्यवहारिक जीवन की सफलता और समुन्नति का आधार भी कुण्डलिनी शक्ति ही है।

पाँचों प्रकार के ज्ञान इन्द्रियाँ भी बिजली के तारों की तरह इसी परम शक्ति से जुड़ गयी है इसलिये वह सूक्ष्म चेतना होने के कारण चिति, जीने से जीव, मनन करने से मन और मोक्ष प्राप्त करने से चेतना को विधि रूप में देखा जाता है। अहंकार रूप से उस ही ड़ड़ड़ड़ कहते है। इस पर विभिन्न नामों का एक ही आधार है। चेतना इन चेतना को शक्तियों को मूलाधार शक्ति को ही कुण्डलिनी कहा जाता है। ज्ञान और अनुभव के पाँचों कोष के बीच रूप से इसी में पायी जाती है, इसलिये कुण्डलिनी शक्ति जागृत कर लेने वाला इन्द्रियों को उसी तरह पक्ष में कर देता है जिस तरह लगाम लगे हुये घोड़ों को वश में कर लिया जाता है जिसने इन्द्रियों को जीते लिया संसार में उसका भय जो निर्भय हो गया वही विजय-विजेता हो गया।

कुण्डलिनी की इन्हीं महान् सामर्थ्यों को बन कर ही योग शाखों ने उसे सर्वाधिक महत्व दिया गाया है उसके साथ अनेक प्रकार की कल्पनायें जोड़ दी गयीं है। अनेक प्रकार से वर्णन किया जाता है। सीधे सरल शब्दों में कुण्डलिनी वह दिव्य मानस तेज है जो आत्म-चेतना के परिसिक्त है। और शरीर भर में व्याप्त है। साधना के फलस्वरूप वह तेज निपट कर ध्यान के समय ज्योति बनकर देह में कार्य करने लगता है।

कुण्डलिनी शक्ति को अच्छी तरह समझने के लिये ड़ड़ड़ड़ क्रिया और सम्पूर्ण शीर्षक (मेडुला आफ लोगलेटा) का विस्तृत अध्ययन आवश्यक है। पाश्चात्य वैज्ञानिक अभी तक इतना ही जान पाये हैं कि नाक से ली हुयी साँस मन से होती हुई फुपफुमों (फेफड़ों) तक पहुँचती है। फेफड़ों के छिद्रों में भरे हुये रक्त को वायु शुद्ध कर देती है। और रक्त-परिसंचालन की गतिविधि शरीर में चलती रहती है।

किन्तु प्राणायाम द्वारा श्वाँस-क्रिया को बन्द करके भारतीय योगियों ने यह सिद्ध कर दिया कि चेतना जिस प्राण-तत्व को धारण किये हुये जीवित है, उसके लिये श्वाँस- क्रिया आवश्यक नहीं है। साँस ली हुई हवा का स्थूल भाग ही रक्त शुद्धि का काम करता है, उसका सूक्ष्म भाग सुषुम्ना शीर्षक में अवस्थित खड़ा और पिंगला नाड़ियों के माध्यम से नाभि-कम्द स्थित चेतना को उद्दीप्त किये रहता है। ”गोरक्ष पद्धति” में श्लोक 48 में इस क्रिया को शक्ति-चालन महामुद्रा, नाड़ी शोभन आदि नाम दिये है और लिखा है कि सामान्य अवस्था में इड़ा और पिंगला-नाड़ियों का शरीर की जिस ग्रन्थि या इन्द्रिय से सम्बन्ध होता है, मनुष्य उसी प्रकार के विचारों से प्रभावित होता रहता है, इस अवस्था में नाड़ियों के स्वतः संचालन का अपना कोई क्रम नहीं होता। किन्तु जब विशेष रूप (प्राणायाम) से प्राण-वायु को चौंका जाता है तो इड़ा (गर्म नाड़ी) और पिंगला (ठण्डी नाड़ी) दोनों सम-स्वर में प्रवाहित होने लगती है। इस अवस्था के विकास के साथ-साथ नाभि-कन्द में प्रकाश स्वरूप गोला भी विकसित होने लगता है। उसके प्राण-शक्ति का

विद्युत-शक्ति के समान निस्तारण होता है। चूँकि सभी नाड़ियाँ इसी भाग से निकलती है, इसलिये वह इस ज्योति भोले के संस्पर्श में होती है। सभी नाड़ियों में वह विषय-व्यापी शक्ति भरने से सारे शरीर में वह तेज ‘ओजस’ के रूप में प्रकट होने लगता हैं। इन्द्रियों में वही जल के रूप में, नेत्रों में चमक के रूप में परिलक्षित होता है। इस प्राण-शक्ति के कारण प्रबल आकर्षण शक्ति पैदा होती है।

यह शक्ति नाभि प्रवेश में प्रस्फुटित होती है और चूँकि दृष्टि प्रवेश भी उसी के समीप है, इसलिए वह भाग शीघ्र और तेजी से प्रभावित होता है। इसलिये यौन-शक्ति केन्द्रों का नियन्त्रण में रखना अधिक आवश्यक होता है। साधना की अवधि में संयम पर इसीलिये अधिक जोर दिया जाता है, जिससे कुण्डलिनी शक्ति का फैलाव ऊर्ध्वगामी हो जाये उसी से ओज की वृद्धि होती है।

स्थूल रूप से शरीर के वायु मंडल की ही प्रख्यात वैज्ञानिक देख पाते है, वे अभी तक नाड़ियों के भीतर बहने और जीवन की गतिविधियों को मूलरूप से प्रभावित करने वाले प्राण प्रवाह को नहीं जान सके। सूक्ष्म नेत्रों से उसे देखा जाना संभव भी नहीं है। उसे भारतीय योगियों ने चेतना के अति सूक्ष्म-स्तर का चेतन करके देखा। योग शिखोपनिषद् में 101 नाड़ियों का वर्णन करते हुये शास्त्रकार ने सुषुम्ना शीर्षक को परानाड़ी बताया है। यह कोई नाड़ी नहीं है वरन इड़ा और पिंगला के समान विद्युत-प्रवाह से उत्पन्न हुई एक तीसरी धारा है। जिसका स्थूल रूप से अस्तित्व नहीं भी है और सूक्ष्म रूप से इतना व्यापक एवं विशाल है कि जीव की चेतना अब उसमें से होकर चला करती है तो ऐसा लगता है कि वह किसी आकाश गंगा में प्रभावित हो रही हो। वहाँ से विशाल ब्रह्माण्ड की भाँति होती है। अन्तरिक्ष में अव-स्थित अगणित सूर्य, चन्द्रमा, ग्रह-नक्षत्र की स्थिति समझने का अलभ्य अवसर, जो किसी चन्द्रयान या राकेट के द्वारा भी सम्भव नहीं है, इसी शरीर में मिलता है। उस स्थिति का वर्णन किया जाये तो प्रतीत होगा कि जो कुछ स्थल और सूक्ष्म इस संसार में विद्यमान् है, उन सब के साथ सम्बन्ध मिला लेने और उनका मान उपलब्ध करने की क्षमता उस महान् आत्म-तेज में विद्यमान् है जो कुण्डलिनी के भीतर बीज रूप में मौजूद है।

सुषुम्ना नाड़ी (स्पाइनलकर्ड) मेरुदण्ड में प्रवाहित होती है और ऊपर मस्तिष्क के चौथे निचले भाग (फोर्थ वेन्टिकस) में जाकर सहस्रार चक्र में उसी तरह प्रविष्ट हो जाती है, जिस तरह तालाब के पानी में से निकलती हुई कमल नाल से शत-दल कमल विकसित हो उठता है। सहस्रार चक्र ब्रह्माण्ड लोक का प्रतिनिधि है, यहाँ ब्रह्म की सम्पूर्ण विभूति-बीज रूप से विद्यमान् है और कुण्डलिनी की ज्वाला वहीं जाकर अन्तिम रूप से जा ठहरती है, उस स्थिति में निरन्तर मधुपान का सा, सम्भोग की तरह का सुख (जिसका कभी अन्त नहीं होता) है, उसी कारण कुण्डलिनी शक्ति से ब्रह्म प्राप्ति होना बताया जाता है।

कुण्डलिनी का महत्व इसी शरीर में परिपूर्ण ड़ड़ड़ड़ और सामर्थ्य का स्वामी बनकर आत्मा की अनुभूति और ईश्वर दर्शन प्राप्त करने से निःसन्देह बहुत अधिक बढ़ जाता है। पृथ्वी का आधार जिस प्रकार शेष भगवान को मानते है, उसी प्रकार कुण्डलिनी शक्ति पर ही प्राणि मात्र का जीवन अस्थित्व टिका हुआ है। सर्प के आकर की वह महाशक्ति ऊपर जिस प्रकार मस्तिष्क में अवस्थित शून्य-चक्र से मिलती है, उसी प्रकार नीचे वह यौन-स्थान में विद्यमान् कुण्डलिनी के ऊपर टिकी रहती है। प्राण और अपान वायु के चौंकने से वह धीरे-धीरे मोटी, ड़ड़ड़ड़, सशक्त और पिरपुड होने लगती है। साधना की प्रारम्भिक अवस्था में यही क्रिया धीरे-धीरे होती है। किन्तु साक्षात्कार या सिद्धि की अवस्था में यह सीधी हो जाती है और सुषुम्ना का द्वार खुल जाने से शक्ति का स्फुरण वेग से फूट कर सारे शरीर में-विशेष रूप से मुख्यकृति में-फूट पड़ता है। कुण्डलिनी जागरण दिव्य-ज्ञान दिव्य अनुभूति और अलौकिक सुख का सरोवर इसी शरीर में मिल जाता है।

सुषुम्ना नाड़ी का रुका हुआ छिद्र जब खुल जाता है तो साधक को एक ध्वनि प्रारम्भ में मेघ के गर्जन, वर्षा समुद्र की हहराहट, घण्टा, भक्ति, विराग और भ्रमर-गुजार के तुल्य विकसित होती है, यही बाद में अनहद नाद में परिवर्तित हो जाती है। नाभि से 4 उंगल ऊपर यह आवाज सुनाई देती है, उसे सुनकर चित्त उसी प्रकार मोहित होता है, जिस प्रकार वेणुनाद सुनकर सर्प सब कुछ भूल जाता है। अनहद नाद से साधक के मन पर चढ़े हुए जन्म-जन्मान्तरों के सुसंस्कार छूट जाते हैं।

नाद ही नहीं कुण्डलिनी शक्ति अपने जिस पुर्यष्टक नाम प्राण-स्वरूप में स्थिर है उसमें ऐसी सुगन्ध प्रस्फुटित होती है, जैसे वहाँ कोई मञ्जरी या कस्तूरी बड़े यत्न से सुरक्षित रखी गई है।

कुण्डलिनी जाग्रत करने के लिये जितनी दुस्तर उसकी सिद्धियाँ है, उतना कठिन साहस भी करना पड़ता है, किन्तु यह शक्ति जब जागृत हो जाती है और उसके प्रवाह का अन्त नाड़ियों में फैलने से रोककर ब्रह्म नाड़ी से ऊपर की ओर से जाते है (ब्रह्म नाड़ी सुषुम्ना की भी मध्यवर्ती और अत्यन्त सूक्ष्म नाड़ी है। नाड़ियों के विषय पाठक पढ़ेंगे सुषुम्ना के भीतर भी केले के पत्तों की तरह बज्व्रा और चित्रणी नाड़ी है, उनकी विषम धारा का नाम ब्रह्म नाड़ी है, इन नाड़ियों को पाश्चात्य वैज्ञानिकों ने एक धूमर पदार्थ (ग्रे कैटर) के रूप में जानने का प्रयत्न किया है पर वे अभी तक इस सम्बन्ध में कोई यांत्रिक जानकारी उपलब्ध नहीं कर सके ) तो वह इस शरीर को आकाश गगन की शक्ति से भर देती है। योग वसिष्ठ में कुण्डलिनी साधन की दिव्य सिद्धियों का वर्णन करते हुए लिखा है-

ड़ड़ड़ड़ मुहूर्त स्थितिमाप्नोति तथा ड़ड़ड़ड़

मुखाह्नाहिद्धविशान्ते रेचकाम्यासयुक्तिः। प्राणे चिरं स्यितं नीते प्रविशत्यवशं पुरीम॥

रेवकाभयासयोगेन जीवः कण्डरिलिनीव्रह्मत। उदृघत्य योज्यते यावदामोदः पवनादिव॥

त्याज्यते विरतस्वम्वो देह्मयं कोष्ठोष्टव्त। छेहेऽपि जोथेऽपि मताषा सेवक उपचारः॥

स्थाचरे जंगमे थापि यथाभिमतयेचहया। भोक्तु तत्सपद सम्यग्जीवोऽन्तविनिवेश्यते॥

इति सिद्धिमियं भुक्त्वा स्थित चेतहपुः पुः। प्रविश्ते स्वमन्यद्वा यधत्तात विरोचते॥

देहादयस्तथा विम्वामयाप्सवश्यापिलमय। संविदा जगदापूर्य संपुर्ण स्थीयतेऽथवा॥

अर्थात्-रेचक के प्रयोग से जब कुण्डलिनी शक्ति मस्तिष्क में थोड़ी देर के लिये टिक जाती है तो उन सिद्ध पुरुषों के दर्शन होते है जो बहुत पहले इस नश्वर देह का परित्याग कर चुके है। प्राणों को मुख से 12 गुना बाहर रखने का अभ्यास कर लेने वाला योगी किसी दूसरे शरीर में प्रवेश कर सकता है। इन्हीं युक्तियों से योगी में जीव को कुण्डली से उसी प्रकार बाहर निकालने की क्षमता मिल जाती है, जिस प्रकार वायु से सुगन्ध खींच ली जाये। इस स्थिति में शरीर कही भी पड़ा रहे चेतना उससे अलग होकर बाहर के दृश्यों का उसी प्रकार घूम कर आनन्द ले सकती है, जैसे कोई इस शरीर से ही कहीं भ्रमण कर रहा हो। दूसरे शरीर चाहे यह जड़ जैसे वृक्ष ही क्यों न हों उसमें भी यह चेतना प्रवेश करके यहाँ के सब ड़ड़ड़ड़ जान सकती है, किसी और के शरीर में प्रवेश करके उस शरीर को मिलने वाले भोग आदि सुखों का रसा- ड़ड़ड़ड़ किया जा सकता है। अपने शरीर से भोग-भोग कर चेतना को किसी और के शरीर में बदलता रहे तो बहुत काल तक भौतिक सुख और उसे सारे संसार में फैला कर वह सर्व-व्यापी और अन्तर्यामी हो सकता है।

कुण्डलिनी शक्ति की सिद्धियों का कोई आर-पार नहीं है। अन्य योगों की अपेक्षा यह योग सरल भी है, किन्तु साधना काल के विक्षेप और कठिनाइयों को सम्भालने के लिये उसमें भी बड़े साहस और कठोर तप की आवश्यकता होती है। कुण्डलिनी शक्ति मूलतः नाड़ियों से सम्बन्धित है। और नाड़ी जाल के द्वारा ही वह सारे शरीर में फैलती है। इसलिये उसे जाग्रत करने का सम्पूर्ण विश्राम नाड़ियों के उत्तेजन से ही सम्भव होता है। साधना काल में साधक को अपनी मन स्थिति को वशवर्ती और स्थिर बनाये रखने के लिये यधति यम, नियम, ध्यान, धारण, प्रत्याहार आदि का भी अभ्यास करना आवश्यक होता है किन्तु कुण्डलिनी प्राण-शक्ति है, इसलिये उनका जागरण मूलतः प्राणायाम की क्रियाओं से होता है। कुछ साधन ऐसे भी है जिनमें प्राणायाम के साथ मूलबन्ध और उद्धिमान-ग्रन्ध भी करने पड़ते है। यह क्रियायें हठवादी होने से कई जोखिम भी हो सकते है यद्यपि इनमें कुण्डलिनी शक्ति का जागरण थोड़े समय में ही हो जाता है, किन्तु योनियों में उन कठिनाइयों और बाधाओं को देखकर ऐसे सुगम प्राणायाम में खोज निकाले जो किसी भी स्वरूप, निर्मल, युवक, वृद्ध या नारियों द्वारा किये जा सके और कुण्डलिनी के क्रमिक विकास का लाभ प्राप्त कर सकें।

प्राणायाम के अभ्यास से यहाँ शरीर में प्राण शक्ति बढ़ती है, वहाँ कुण्डलिनी जागरण के लिये आवश्यक साहस और आत्मबल भी प्राप्त होता है। आत्मबल के ड़ड़ड़ड़ में कठिन साधनायें लोग स्वरूप समय में ही छोड़ बैठते है, किन्तु प्राणायाम के शारीरिक और मानसिक लाभ तुरन्त मिलते है, जिससे मनोबल बढ़ता है और आगे का मार्ग साफ होता चला जाता है। बुद्धि के सूक्ष्म ड़ड़ड़ड़ का विकास होने से स्थूल भागो और दुर्बल साधनाओं से भी अधिक होने लगती है और पारलौकिक साधना में आस्था बढ़ने लगती है इस विधि से मार्ग में पड़ने वाली कठिनाइयों के प्रति उसी तरह साहस बढ़ता जाता है जिस तरह किसी को यदि यह मालूम हो जाये कि यहाँ से इतनी दूरी पर रत्नों का भण्डार छिपा हुआ है तो वह मनुष्य रत्नों के लोभ में मार्ग में आने वाली व्यक्तियों को भी ड़ड़ड़ड़ ठहराकर उन्हें प्राप्त करने के लिये चल पड़ता है।


असत्य का सम्मान

सत्य ओर असत्य नाम के दो भाई थे। सत्य स्वच्छ और सुन्दर,असत्य मलिन और देखने से ही अप्रिय लग रहा था। जहाँ जाता असत्य ठुकराया जाता ओर दुत्कारा ही जाता,इसलिये उसने बदला लेने का निश्चय कर लिया।

एक बार दोनों तीर्थ -यात्रा पर निकले वहाँ भी यही स्थिति रही। सत्य का तो सम्मान होता क्योंकि वह सुन्दर लगता था और असत्य का अनादर क्योंकि न उसके वस्त्र साफ थे, न आकृति।

घूमते -घूमते बद्रीनाथ पहुँचे। स्नान के लिये दोनों एक सरोवर में उतरे। सत्य देह मन-लगाकर स्नान करने में लगा रहा,उसने यह भी न देखा कि इस बीज असत्य चुपचाप उसके कपड़े पहनकर चला गया। बाहर निकलने पर सत्य को विवश होकर असत्य के कपड़े पहनने पड़े। तब से दानों बराबर चल रहे है और हर व्यक्ति के पास आते हैं पर असत्य की पूजा होती है, क्योंकि उसने सत्य के कपड़े पहन लिये थे। सत्य अब दर-दर मारा फिर रहा है।


पात्रत्व की परीक्षा

पाटलिपुत्र अपने वैभव के लिये विख्यात थी, कोशा अपने अनुपम सौंदर्य के लिये। मगध-राज्य की पटरानियों को भी नगर-वधू कोशा के रूप-सौंदर्य पर ईर्ष्या होती थी। उसका कल-कण्ठ श्रोताओं के अन्तःकरण ड़ड़ड़ड़ कर देता तो नृत्य के समय नूपुर-झंकार लोगों ड़ड़ड़ड़ उद्दाम वासना से आविर्भूत कर देती। सम्पूर्ण ड़ड़ड़ड़ तक कि सेनापति और सामन्त भी कोशा का ड़ड़ड़ड़ लिये सदैव न्यौछावर रहते थे।

पाटलिपुत्र के प्रधान आमात्य के पुत्र स्थूलिभद्र ने तब यौवन के प्रथम चरण में पदार्पण किया था। शक्ति और सौंदर्य दोनों एक स्थान पर जा मिले। ईर्ष्या, षड्यन्त्र ड़ड़ड़ड़ विशेष के बीच नगर-वधू कोशा ने स्थूलिभद्र को ड़ड़ड़ड़ चुन लिया। आमात्य -पुत्र कोशा के प्रणय में इस तरह आया कि 12 वर्षों तक उसने अपने पिता, भाइयों, परिजनों, सम्बन्धियों किसी की सुध तक न ली। ओर कोशा ने भी अपना सर्वस्व स्थूलिभद्र की भेंट चढ़ा दिया।

दिन जाते देर नहीं लगता फिर सुख के क्षण कब बीत गये पता ही नहीं चलता। कोशा के नेत्रों से अब स्थूलिभद्र का प्रतिबिम्ब हटने लगता है, क्योंकि उसे वासना से विरक्ति हो चली थी। वैभव-वंचित हुये स्थूलिभद्र का अन्तस्तल अब पश्चाताप की अग्नि में जलने लगा और मानसिक सन्ताप की इसी अवस्था में उसने एक दिन पाटलिपुत्र, कोशा सबका परित्याग कर दिया। महलों में सौंदर्य की अर्चना करने वाला स्थूलिभद्र अब आत्मा के दर्शनों की पीड़ा से मुनि विसर्जन की शरण में था। 12 वर्ष तक जिसने कोशा को ही जीवन का सम्पूर्ण रस माना था, उसी स्थूलिभद्र ने अब अपने आपको तपस्या की भेंट चढ़ा दिया।

दिन बीतते गये। स्थूलिभद्र का तप शुक्ल पक्ष के चन्द्रमा की तरह बढ़ने ओर प्रकाशित होने लगा। मुनि विसर्जन यों तो अपने सभी शिष्यों पर स्नेह रखते हैं पर जो स्नेह आत्मीयता उन्हें स्थूलिभद्र के लिये थी, वह अन्य के लिये नहीं। स्थूलिभद्र तपस्वी ही नहीं आज्ञाकारी और चरित्र के प्रति निष्ठावान् भी था।

स्थूलिभद्र पर गुरु का अत्यधिक स्नेह अन्य शिष्यों से देखा न गया। वे मन ही मन कुढ़ते ओर अनेक तरह से उसे नीचा दिखाने का प्रयत्न भी करते, किन्तु स्थूलिभद्र उसका कभी बुरा न मानता। न ही वह अपने गुरु भाइयों के प्रति ईर्ष्या-द्वेष करता। किन्तु शिष्यों में कृतवर्मा ऐसा था, जो इतने पर भी उसे नीचा दिखाने का यत्न करता रहता था।

गुरुदेव यह बात अच्छी तरह समझते थे। अन्य शिष्यों को वह समझाते भी थे किन्तु ईर्ष्या और महत्त्वाकाँक्षा यह दो दुर्गुण ऐसे हैं कि जहाँ जाते हैं, वहाँ बुद्धि और विवेक के लिये सदैव-सदैव के लिये द्वार बन्द कर देते हैं। कृतवर्मा के मन में कोई बात चढ़ी नहीं। वे बराबर यहीं कहता-” न हमारे आचरण में कोई दोष है, न तप में, निष्ठा का भी अभाव नहीं तो भी स्थूलिभद्र में ऐसा कौन-सा गुण है, जो गुरुदेव उसे अधिक प्यार करते हैं।

ग्रीष्म गई वर्षा ऋतु आई। चतुर्मास भर शिष्यों को बाहर भेजकर मुनि विसर्जन एकान्तवास करते थे। उन्होंने कृतवर्मा को विन्ध्याचल की उस गुफा में भेज दिया जहाँ हिंसक सिंह, व्याघ्र रहा करते थे ओर स्थूलिभद्र को फिर वहीं जहाँ से वह आया था- पाटलिपुत्र-कोशा के सौंदर्य पूर भवन में।

कृतवर्मा के तप के प्रभाव ने हिंसक जीवों की मनोवृत्ति बदल दी। वह इतना साहसी था कि वनराज की गुफा में भी वह चैन से सोता था और इसी तरह मृत्यु की विभीषिका के बीचों-बीच अपना चतुर्मास बिताया और जब आश्रम लौटा तो उसके मुख-मण्डल पर विजय अभिमान ड़ड़ड़ड़ बनकर झलक रहा था।

स्थूलिभद्र ने शान्त निर्विकार मन से कोशा के भवन में प्रवेश किया। ड़ड़ड़ड़ से आभूषित ड़ड़ड़ड़ स्थूलिभद्र उतना सुन्दर नहीं लगा करता था, जितना आज वह ड़ड़ड़ड़ होने पर लग रहा था। उसके मुख-मण्डल पर प्रभावित तपस्या का ओज वैसे ही लोगों को आकर्षित कर लेता था। कोशा के लिये तो भगवान का वरदान ही था। चिर चिरह की धूप के बाद बरसात का सुहावनापन जिस तरह मन को भा जाता है, वैसे ही वह स्थूलिभद्र को यों अचानक आया देखकर प्रसन्नता से पागल हो उठी। एक बार उस भवन में फिर से बाहर आ गई।

सारा महल चन्दन ड़ड़ड़ड़ जल से धोया गया। पुष्प वेलों और ड़ड़ड़ड़ से घर के सम्पूर्ण द्वार और वातायन महकने लगे। कोशा ने यह वस्त्राभूषण धारण किये जो दुल्हन ससुराल जाने से पूर्व पहली बार धारण करती है।

स्थूलिभद्र को अब सबसे प्रसन्नता थी, मोह नहीं। प्रेम था, आशक्ति नहीं। प्रत्येक वस्तु में उसे केवल सौन्दर्य, परमात्मा का सचेतन सौन्दर्य झलक रहा था, वासना नहीं। स्थूलिभद्र के मन में कोई विकार न था।

रात आई। कोशा के नूपुर बजे ओर शांत हो गये। कोशा ने अपनी बाँहें स्थूलिभद्र के गले में डाली और उसके लिये कोशा और दो वर्ष की चंचल बालिका में कोई अन्तर न था। कोशा ने उसे कामदेवता के रूप में देखा स्थूलिभद्र ने कोशा ईश्वरीय सौंदर्य और प्रकाश की अनुभूति के रूप में। वह कुछ बोला नहीं, कोशा बेचैन थी, पूर्व के समान अब स्थूलिभद्र को उसके शरीर का सौंदर्य से मोह क्यों नहीं? उस बेचारी को क्या पता था कि आत्मा में अनन्त सौंदर्य की अनुभूति प्राप्त कर लेने वाले तपस्वी के लिये शारीरिक सौंदर्य का कितना मूल्य रह गया।

हारकर कोशा निद्रा देवी की गोद में चली गई। एक दिन, दो दिन, तीन दिन मास और चतुर्मास इसी तरह बीता। कोशा की उद्दाम वासना भी तपस्वी के ड़ड़ड़ड़ से ईश्वर-प्रेम में परिणत हो गई और स्थूलिभद्र तो जैसे आश्रम से आया था, वैसे ही आश्रम को लौट गया।

ड़ड़ड़ड़ स्थूलिभद्र का स्वागत करते हुए कृतवर्मा ने कहा-आइये महाशय! कोशा की ड़ड़ड़ड़ से पीड़ित होंगे आपकी कुछ सेवा कर दूँ। “ स्थूलिभद्र मुस्कराये बोले कुछ नहीं। कृतवर्मा के तप और साहस की उसने भी प्रशंसा ही की। उसने कृतवर्मा का अहंकार और भी बढ़ गया। इस प्रकार एक वर्ष और बीता।

सूक्ष्मदर्शी गुरुदेव सब परिस्थितियों का अध्ययन गम्भीरता से कर रहे थे। अगला चतुर्मास आया तो स्थूलिभद्र को सिंह की गुफा में और कृतवर्मा को कोशा के महल में भेजा गया। स्थूलिभद्र ने साहस से नहीं आत्म-प्रेम के विस्तार से हिंसक जीवों को अहिंसक बना लिया और उनके बीच साहस से नहीं वह प्रभाव से बने रहे, जैसे वह भी उस वनचर परिवार का सदस्य हो। चतुर्मास बिताने में कोई भय प्रतीत न हुआ।

किन्तु कृतवर्मा-जिससे सामान्य सौंदर्य का भी सामना नहीं किया था, कोशा के महल में जाते ही भावुकता में बह गये। कोशा और उसका सौंदर्य मस्तिष्क में इस तरह

न जातु काम- कामानामुपभोयेन शाक्यति।

ड़ड़ड़ड़ कृष्णवर्त्मेव भूप एवाभिवर्चते।

- भागवत् ड़ड़ड़ड़

हे वत्स! अग्नि में घृत डालों तो उसकी लौ और भी तीव्र होती है, उसी प्रकार भोग से वासनायें शांत नहीं होती। तात् उनसे बचकर रहने में ही तुम्हारा कल्याण है।

भर गया कि ध्यान, समाधि सब न जाने कहाँ सो गये। कृतवर्मा धीरे-धीरे निस्तेज होते गये। ड़ड़ड़ड़ वासना ने उसकी बौद्धिक प्रखरता को ही नहीं, शरीर को भी निर्बल बना दिया। वह जब आश्रम लौटा तो अकाल से आये हुये पीड़ित की भाँति दुर्बल और शक्तिहीन लग रहा था।

किसी को कुछ कहना पड़े इससे पूर्व ही कृतवर्मा ने आँखें झुका ली। मानो उसने स्वयं ही अपनी हार स्वीकार कर ली हो। आज उसे पता चला- आत्मा जीत लेने वाले ही सम्मान के सच्चे अधिकारी होते हैं।


कामनाओं और वासनाओं का सदुपयोग

कामना और वासनाओं को त्याज्य बतलाया गया है। कहा गया है कि इनके रहने से मनुष्य सुख-शांति और आत्म-सन्तोष में बाधा पड़ती है। इनकी कोई सीमा नहीं होती, यह रक्त-बीज की भाँति एक से दूसरी उत्पन्न ही होती रहती हैं। ऐसी दशा में उनकी पूर्ति सम्भव नहीं निदान मनुष्य को अशान्ति एवं असंतोष के हाथ जाना पड़ता है।

बताया जाता है कि कामनाओं के कोष तथा उनकी अतृप्ति के फलस्वरूप मनुष्य का मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य चौपट हो जाता है, उसको अनेक प्रकार के विकार घेर लेते हैं। बात भी कुछ ठीक ही है। मनुष्य कामना करता है। उनके लिये पूरी तरह प्रयत्न करता है और यदि सत्पथ से काम चलता नहीं दीखता तो विपथ पर भी पग रख देता है। दिन-रात भरना-खपना पथ-विपथ पर दौड़ना आदि ऐसी क्रियायें हैं, जो मनुष्य का स्वास्थ्य समाप्त कर देती है। उसे अन्दर से खोखला बना देती है। उसका मानसिक पतन कर देती है। निद्रा, लाँछन, अपवाद, तिरस्कार, सरकार समाज और लोक लज्जा का भय उसकी भूख हर लेता है, उसकी निद्रा नष्ट कर देता है। अशान्ति, चिन्ता ओर आशंकाओं के भूत-प्रेत उसके मनोमन्दिर में अड्डा जाम लेते हैं। इतना सब कुछ सहने पर भी जब उसकी मनोकामनायें पूरी नहीं होती तो उसके विक्षोभ और अशान्ति की सीमा नहीं रहती। कभी-कभी मानसिक संतुलन तक बिगड़ जाता है और मनुष्य पागल तक हो जाता है। निःसन्देह कामनायें बड़ी भयानक होती हैं।

यही हाल इन्द्रिय भोग की वासना का भी है। इसकी तृप्ति भी कभी नहीं होती, बल्कि तृप्ति के प्रयास में वह बढ़ती ही है। इसकी अनियन्त्रित तृष्णा मनुष्य को इस सीमा तक पतित कर देती है कि वह सामान्य मर्यादाओं का ही उल्लंघन करने लगता है। भोगात्मक वासना से कुछ ही समय मनुष्य खोखला होकर निर्जीव हो जाता है। उसकी निराश और निरुत्साह यहाँ तक बढ़ जाती है कि फिर उसका किसी बात में मन नहीं लगता। ड़ड़ड़ड़ में मानसिक ड़ड़ड़ड़ बढ़ जाता है और मस्तिष्क का धरातल हल्का हो जाता है, जिसने उसे अच्छी बात भी कड़वी लगने लगती है। बात-बात में लड़-झगड़ पड़ने का स्वभाव बन जाता है। क्षण-क्षण पर क्रोध करता और झल्लाता रहता है। इस प्रकार का निर्बलता जन्म क्रोध करता नाना प्रकार के संकटों की जड़ होती है।

वासना प्रधान इन्द्रिय लोलुप की व्यभिचारी और आचरण हीन होते देर नहीं लगती। उसके मन के साथ उसकी दृष्टि भी दूषित हो जाती है। स्त्री जाति को माता और बहन के रूप में देख सकता उसके नसीब में नहीं होता। वह जिसकी और भी देखता है, भोग्या की ही दृष्टि से देखता। जिसके लिये वह समाज में निन्दा, अपवाद और असम्मान का भागी बनता है और अधिक आगे बढ़ जाने पर अपनी इज्जत खोता ओर राजदण्ड तक का भागी बनता है। भोग वासना मनुष्य में श्वान वृत्ति जमा देती है, उसे एक स्थान, अपने घर पर तृप्ति नहीं होती जगह-जगह कुत्तों की तरह मारा फिरता है। अवसर पाते ही इसी प्रवंचना में लग जाता है, जिसके फलस्वरूप ड़ड़ड़ड़ के साथ विभिन्न प्रकार के रोग पा लेता है। और तब जीवन के शेष दिन पश्चाताप की आग में जल-जलकर पूरे किया करता है। निःसन्देह वासना भयंकर वृत्ति है। वह मनुष्य का जीवन नारकीय वासना में बदल कर रख देती है।

भागों की भयंकरता समझने के लिए महाराज ययाति का ही उदाहरण काफी है। जैसे तो न जाने रावण, शिशुपाल, जरासन्ध और दुर्योधन जैसे कितने शक्तिमान और समर्थ लोग इस इन्द्रिय भोग की लिप्सा में लिपटकर कीट पतंगों की मौत मरे और अपना नाम कलंकित करके इस संसार से चले गये हैं। जब ऐसे-ऐसे सत्ता-धारियों की वह दशा हो गई है, तब जन-साधारण की वासनाओं के कारण क्या कुमति हो सकती है, इसका अनुमान नहीं लगाया जा सकता।

महाराजा ययाति वैसे तो बड़े विद्वान् और ज्ञानवान राजा थे। किन्तु दुर्भाग्यवश उन्हें वासनाओं का रोग लग पड़ा और वे उनकी तृप्ति में निमग्न हो गये। स्वाभाविक था कि ज्यों-ज्यों वे इस अग्नि में आहुति देते गये, त्यों-त्यों का त्यों बना रहा। तृप्ति न हो सकी और वासनाओं का बवण्डर ज्यों का त्यों बना रहा। इस स्थिति में जाकर उनके वासना प्रधान हृदय में अशान्ति एवं असमर्थता की घोर पीड़ा रहने लगी। बुद्धि भ्रष्ट हो गई सारा ज्ञान जबाब दे गया। वे वासनाओं के बन्दी बनकर यहाँ तक पतित हो गये कि अपने पुत्रों से यौवन की याचना करने लगे। अनेक पुत्रों ने तो उनकी इस अनुचित इच्छा का आदर न किया, किन्तु छोटे पुत्र को उन पर दया आ ही गई और उसने उनके अशक्त बुढ़ापे से अपना यौवन बदल लिया। इससे प्रसन्न होकर राजा ययाति ने उसे अपने सारे पुण्य उपहार में दे दिये और फिर वासनाओं की तृप्ति में लग गये। जीवन भर लगे रहे, किन्तु सन्तोष न हो सका। सारे सकृत् खोये, बेटे के प्रति अत्याचारी प्रसिद्ध हुए, परमार्थ का अवसर खोया और मृत्यु के बाद युग-युग के लिए गिरगिट की योनि पाई, किन्तु वासना की पूर्ति न हो सकी। पाण्डू जैसे बुद्धिमान राजा पीलिया रोग के साथ वासना के कारण अकाल मृत्यु को प्राप्त हुये। शान्तनु जैसे राजा ने बुढ़ापे में वासना के वशीभूत होकर अपने देवव्रत भीष्म जैसे महान् पुत्र को गृहस्थ सुख से वंचित कर दिया। विश्वामित्र जैसे तपस्वी ओर इन्द्र जैसे देवता वासना के कारण ही व्यभिचारी और तप-भ्रष्ट होने के पातकी बने। वासना का विषय निःसंदेह बड़ा भयंकर होता है, जिसके शरीर का शोषण पाता है, उसका लोक-परलोक पराकाष्ठा तक बिगाड़ देता है। इस ड़ड़ड़ड़ से बचे रहने में ही मनुष्य का मंगल है।

इन तथ्यों का उदाहरणों के आधार पर कामना एवं वासनाओं को त्याज्य ही मानना होगा। किन्तु इनका एक पक्ष और भी है। यह कामनाओं का ही चमत्कार है, मनुष्य की इच्छा-शक्ति ओर अभिव्यक्ति है, जिसको हम संसार उन्नति, विकास और परिष्कार के रूप में देख रहे हैं। यह इच्छाओं ही की प्रेरणा तो है कि मनुष्य नित्य नये आविष्कार कर प्रकृति पर विजय प्राप्त करता जा रहा है। यह कामनाओं का ही तो चमत्कार है कि आज हम एक से बढ़कर सुख साधनों का उपयोग कर रहे हैं। यदि कामनाओं का अस्तित्व न होता तो क्या मनुष्य इतनी उन्नति कर सकता था, जो आज दिखलाई दे रही है। कामनाओं से प्रेरित होकर ही तो मनुष्य परिश्रम एवं पुरुषार्थ किया करता है। यदि कामनायें न हो, इच्छाओं का तिरोधान हो जाये तो मनुष्य भी जड़ बनकर पत्थर प्रस्तर की तरह यथास्थान पड़ा-पड़ा जीवन बिता डाले।

दान-पुण्य परमार्थ और परोपकार की प्रेरणा-कामना ही तो दिया करती है। अर्थ, भ्रम, काम, मोक्ष की खोज कामनाओं से ही प्रेरित होकर की गई है। देश को स्वतन्त्र कराने की कामनाओं की प्रेरणा ने ही वीरों का निर्माण किया और वे मातृ-भूमि की वेदी पर हँसते-हँसते उत्सर्ग हो सदा-सर्वदा के लिए अमर हो गये। यह ईश्वर प्राप्ति की कामना ही तो है, जो मनुष्य को भक्त, और तपस्वी बना देती है। यश-पुण्य और लोक-मंगल की कामना से ही लोग जनसेवा और लोक-रंजन में नियुक्त होते हैं। उन्नति की कामना उसके पुरुषार्थ को जमाकर समाज में आदर और श्रद्धा का भोजन बना देती है। मनुष्य सारे श्रेय, सारी उन्नति ओर सारा विकास कामनाओं के अस्तित्व पर ही निर्भर है। कामनायें मनुष्य जीवन की प्रेरणा और उन्नति का हेतु है, इन्हें सब प्रकार से ड़ड़ड़ड़ नहीं माना जा सकता।

यही बात वासना के विषय में भी है। वासना के कारण ही नर-नारी पति-पत्नी के प्रेम की वृद्धि और आत्मीयता की पुष्टि होती है। यह वासना ही है जो मनुष्य को नारी का श्रृँगार करने और उसको प्रसन्न रखने के लिए उपादान एकत्र कराने के लिये संसार पथों पर दौड़ाया करती है। वासना शून्य मनुष्य मृत्यु के समान हो जाता है। उसकी ड़ड़ड़ड़ कलात्मक और श्रृँगार वृत्तियाँ मर कर नष्ट हो जाती है। यह वासनाओं का ही चमत्कार है कि मनुष्य विवाह कर, घर बसाकर और विभिन्न प्रकार के आयोजन कर एक सभ्य, सुसंस्कृत और स्थिर जीवन-यापन का सुख लाभ करता है। यदि वासनाओं की प्रेरणा न रही होती संसार में जीवों का क्रम बन्द हो जाता। प्रजा की उत्पत्ति का आधार वासना ही है। वासना के मार्ग से ही मनुष्य पुत्रवान् होता है, समाज को नागरिक और संसार को मनुष्य मिलते हैं। यदि आज मनुष्यों के हृदय में वासनाओं का नितान्त अभाव हो जाये तो कल ही चलता हुआ संसार चक्र जाये और यह सुन्दर चहल-पहल मुखरित विश्व श्मशान में परिवर्तित हो जाये। मनुष्य जीवन में वासना का बड़ा ही महत्त्वपूर्ण स्थान है। इन्हें सर्वथा हेय अथवा त्याज्य नहीं माना जा सकता।

इस प्रकार एक ओर तो कामनायें और वासनायें मनुष्य जीवन के लिये बड़ी ही भयंकर और त्याज्य है ओर दूसरी और उसका अनिवार्य महत्व है तो आखिर इनका यह भेद क्यों है और क्यों यह ग्राह्म्र अथवा त्याज्य दो प्रकार से मानी और कही जाती है?

उत्तर स्पष्ट है कि जो कामनायें एवं वासनायें विकृत ओर भ्रांतिमूलक है, वे सर्वथा त्याज्य है और जो सुन्दर, उपयोगी और सृजनात्मक हैं वे ग्राह्य एवं महत्त्वपूर्ण है। जिन कामनाओं में परोपकार, परमार्थ और पुण्य की प्रेरणा रहती है, जो दूसरों की सेवा, सहायता और उन्हें सुख पहुँचाने की प्रेरणा देती है, जिनके पीछे संसार को सजाने, सम्पन्न करने और अधिकाधिक सरल बनाने का उद्देश्य रहता है, वे ग्राह्य एवं माननीय मानी गई हैं। पुरुषार्थ करने, दान देने और त्याग करने की कामनायें पुण्यवती कामनायें होती हैं, जिसको यह प्राप्त हो जाती है, उसे भाग्यवान ही मानना चाहिये। परहित, पर पालन आत्मोत्सर्ग, त्याग, बलिदान और अपरिग्रह की कामनाओं को सदा सम्मान की दृष्टि से देखा गया है। इन्हीं कामनाओं की पूर्ति में प्रयत्न करने वाले ही तो संसार में महापुरुष, महानुभाव और महात्माओं के नाम से पुकारे और पूज जाते हैं। ऐसी कामनायें सर्वथा ग्राह्य और पालनीय ही है।

इसके विपरीत जिन कामनाओं के पीछे अपना स्वार्थ, दूसरों का अहित और शोषण संग्रह, कृपणता, प्रदर्शन लोकेषणा आदि के हीन भाव प्रेरणा देते हैं वे विकृत एवं अपवित्र कामनायें हैं। इनका त्याग ही उचित माना गया है।

इसी प्रकार जो वासनायें इन्द्रिय भोग तक ही सीमित हैं, जिनका एक मात्र उद्देश्य व्यभिचार ओर काम सेवन है, उनका त्याज्य ही माना गया है। भोग-विलास के लिये परिवार बसाने की कामना भी एक प्रकार से व्यभिचार वृत्ति ही है, जो किसी प्रकार की उचित नहीं ठहराई जा सकती।

किन्तु यदि इसी वासना को परिमार्जित कर सत्संतान, दाम्पत्य प्रेम, नर-नारी की नैसर्गिक अनुभूति, ड़ड़ड़ड़ पालन का आधार बना लिया जाये तो यह सर्वथा मान्य और ग्राह्य बन जाती है। जो महानुभाव इस इच्छा से वासना को कर्त्तव्य समझकर प्रश्रय देते हैं उन्हें समाज को एक अच्छा नागरिक, एक सुशील प्रतिनिधि और परम्परा में एक में एक सुन्दर कड़ी प्रदान करना है, वे सर्वथा प्रशंसनीय ओर आदरणीय ही माने जायेंगे, उन्हें अपनी उस वासना की तृप्ति के लिये निन्दनीय नहीं कहा जा सकता। जहाँ इन्द्रिय लोलुपता के रूप में वासना हेय और त्रग्राहृा मानी गई है, वहाँ यदि उसकी पारिवारिक उद्यान सजाने, दाम्पत्य-जीवन को अधिक सरस ओर सार्थक बनाने, सृष्टि क्रम को जारी रखने, पारस्परिक आत्मीयता बढ़ाने, एक-दूसरे की सेवा, प्रेम और स्नेह के लिये अपनाया गया है तो वह उचित ही कहीं जायेगी।

सारांश यह है कि जिन कामनाओं एवं वासनाओं के पीछे ओर इन्द्रिय लोलुपता वास करती है, वे सर्वथा त्याज्य ही है। इस प्रकार की कामनायें एवं वासनायें व्यक्ति, समाज और संसार के लिये अहितकर ही हैं। किन्तु जिन कामनाओं और वासनाओं के पीछे परोपकार पारस्परिकता, सहायता, सहयोग पुण्य परमार्थ ओर आत्मीयता की भावना भरी रहती है, जो मनुष्य को उन्नत और अधिकाधिक विकसित एवं आदर्शवादी बनने की ओर प्रेरित करती हैं, वे सर्वथा प्रशंसनीय और ब्राह्म मानी गई है। मनुष्य उनका अन्तर समझकर उनका आनन्द से इसमें कोई अहित ओर अमंगल नहीं है।


गायत्री-साधना - गायत्री महाशक्ति और उसकी सुविस्तृत ‘माया’

गायत्री माता केवल पूजा, उपासना का -जप करने का-छोटा-सा मंत्र मात्र नहीं है। वह इस विश्व ब्रह्माण्ड की एक सर्वोपरि शक्ति है। उस शक्ति के साथ उपासना के माध्यम से हम अपना संपर्क बना देते हैं तो संपर्कजनय लाभ उठाने का सुअवसर प्राप्त करते हैं। उपासना में जितना समय लगता है, उसकी तुलना में कहीं अधिक लाभ हम अपने भीतर उस संपर्क की ऊष्मा एवं शक्ति के संपर्क से ज्ञान और धनवानों के संपर्क से धन प्राप्त करने के सुअवसर सहज ही मिलते रहते हैं फिर सर्वशक्तियों की उद्भूत गायत्री माता के संपर्क से हमें कुछ भी लाभ न मिले, ऐसा नहीं हो सकता।

किन्तु वहीं न मान बैठना चाहिये कि गायत्री का उपयोग उपासना में ही है या वह इतने भर काम के लिये अवतरित हुई है। वस्तुतः इस महाशक्ति के प्रभाव एवं प्रकाश में सारा ब्रह्माण्ड गतिशील हो रहा है। प्राणियों की प्राण-शक्ति जो बीच रूप में सुषुप्तावस्था में-पड़ी रहती है, उसका जागरण, पोषण और अभिवर्धन इसी महत्व के प्रभाव से होता है। जड़ जगत् में जो अणु हलचल दृष्टिगोचर होती है और प्रत्येक पदार्थ गतिशील दिखाई देता है, उसके मूल में भी वहीं महाशक्ति काम कर रही है। आकर्षण-विकर्षण के ऋण बन-द्वन्द्वात्मक जितने भी विधान एवं संचरण प्रकृति के अन्तराल में काम कर रहे हैं उनके पीछे एक अति प्रचण्ड शक्ति काम कर रही है। उसकी इच्छा एवं प्रेरणा इस जगत को वर्तमान रूप में प्रतिष्ठित किये हुए है। उसी सत्ता केन्द्र का नाम गायत्री है।

यह जगत गायत्री मय है। यों वह जड़ रूप में पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, आकाश-पंच तत्त्वों से बना हुआ है। चेतन रूप से सत्, रज, तम- तीन गुणों से विनिर्मित प्रतीत होता है पर इस तत्व और मुख ड़ड़ड़ड़ के भीतर एक ऐसी शक्ति काम कर रही है जिसका वर्णन अनिर्वचनीय है। उसकी गति सर्वत्र है। निम्न ने निम्न और उच्च से उस स्तर पर हो रही गतिविधियों के पीछे जिसका सर्वतोमुखी अस्तित्व एवं प्रभाव दीख पड़ता है, उसका ठीक से विवेचन और अनुभव कर सकना मनुष्य की स्वल्प बुद्धि मर्यादा के अंतर्गत सम्भव भी नहीं है।

फिर भी जिज्ञासा तो मनुष्य का स्वभाव है। बहुत जानना भी चाहता है कि वह शक्ति आखिर है क्या-जिसके प्रभाव से यह समस्त जगत् निर्जीव से सजीव बना है, विभिन्न स्तर की गतिविधियों का अद्भुत ड़ड़ड़ड़ दृष्टि गोचर होता है। इस जिज्ञासा का समाधान देवी भागवत् के माध्यम से उस ड़ड़ड़ड़ शक्ति ने स्वयं ही दिया।

पदार्थ विज्ञान वेत्ता उसे आदर, फोर्स और ड़ड़ड़ड़ नाम से पुकारते है। अध्यात्म क्षेत्र में उसे पूरा और अपरा प्रकृति कहकर संबोधित किया जाता है। चेतना और भावना क्षेत्र में इस शक्ति के प्रभाव की जो मानवीय प्रतिक्रिया होती है उसे ‘माया’ कहते हैं। पेट ठीक न होने पर खाया हुआ उत्तम भोजन भी जिस विकार उत्पन्न करता है, उसी प्रकार अवास्तविक एवं अज्ञान ग्रस्त दृष्टिकोण वाले व्यक्ति उस आलोक की प्रतिक्रिया उल्टी ग्रहण करते हैं ओर वासना, तृष्णा के माध्यम से उसका उपयोग करने के लिये लालायित हो उठते हैं। उल्टा अनुभव उल्टे काम करने में प्रेरणा देता है। फलस्वरूप दुःख दारिद्र एवं शोक-संताप से भरा जीवन यापन करने के लिये ड़ड़ड़ड़ पड़ता है।

इस माया से छुटकारा पाने के लिए अध्यात्म शास्त्र में बहुत विस्तार से वर्णन है। इस वर्णन में बार-बार माया शब्द का प्रयोग होता है। माया बुद्ध -अर्थात् अज्ञान ग्रस्त। माया बन्धनों से छूटना अर्थात् दृष्टिकोण परिष्कृत करके तत्व का यथार्थ दर्शन करना और वस्तु स्थिति के अनुरूप अपनी विचारणा एवं कार्य-पद्धति को सही करना। माया के बन्धनों में जीव नाना प्रकार के दुःख पाता है और उससे छूटने पर स्वर्ग एवं मुक्ति का आनन्द अनुभव करता है। यह माया बन्धन अपने दृष्टिकोण की निकृष्ट स्थिति का ओर माया मुक्ति परिष्कृत दृष्टिकोण का बोधक है। वस्तुतः भगवान् की माया तो बड़ी अपरा-प्रकृति के रूप में समस्त ब्रह्माण्डों में अनादि काल से व्याप्त है। उससे छुटकारे का प्रश्न ही नहीं। इन सबको माया की शरण में रहना पड़ता है। माता की गोद में किसी को कष्ट भी क्या हो सकता है, उसमें अहंशून्य सुख ही सुख है। माता गायत्री की शरण में, उसकी ड़ड़ड़ड़ में हम केवल सुख शांति ही उपलब्ध कर सकते हैं।

उपरोक्त तथ्य का भगवती ने स्वयं भी यथा अवसर रहस्योद्घाटन किया है। उनमें कुछ उद्धरण नीचे देखिये-

रुपं मदीर्य ब्रहृातर्त्सव कारण कारणम्।

मायानिहान भूतं तु सर्वसाक्षि निराममम्॥

ड़ड़ड़ड़ यत्पदमामनन्ति तपांसि सर्वाि च युद्ववन्ति ड़ड़ड़ड़ ब्रह्मचर्य चरन्ति तत्ते पद सगंहेण ब्रबीमि।

सम्पूर्ण कारणों का कारण भूत ब्रह्म मेरा ही स्वरूप है, वह माया का अधिष्ठान भूत सम्पूर्ण का साक्षी और निरामय है। सम्पूर्ण वेद जिस पद का कथन किया करते है, समस्त तपस्याओं का ध्येय एक वह ही है, जिसे उत्कट अभिलाषा से प्राप्त करने के लिये योगी-ऋषिगण एं ड़ड़ड़ड़ ब्रह्मा (वेद) की कठिन चर्या का पालन किया करते हैं, उस अभीप्सित पद को मैं संक्षेप से स्वयं बतलाती हूँ। इससे मेरे स्वरूप का स्पष्ट ज्ञान हो सकता है।

युष्मानहं नर्त्तयामि काण्ड पुतलिकोपमाम्।

ताँ मा सर्वात्मिकाँ यूयं विस्मृत्य निजगर्वतः॥

अहंकारा वृतात्मानो मोहमाप्ता दुरन्तकम्।

अनुग्रहं ततः कतु युष्मद्देश अनुतमम्॥

निःसृतं सहसा तेजो मदीयं यक्षमित्यपि।

अतः परं सर्व भावैहित्वा गर्व तु देहजम्।

मानेव शरणं यात सच्चिदानन्द रुचिणीम्॥

मैं आप सब के हृदयन्तभ्रारिणी होकर आप सबको काठ की पुतली के समान नचाती हूँ। अपने अहंकार से अभिभूत होकर सर्वात्मिका मुझे निज गर्व से भूलकर आप लोग दुर्दान्त को, मोह को प्राप्त होते है। उस समय आपके कार्यों की सिद्धि के लिये अनुग्रह करके आविर्भूत होकर तेजःस्वरूप में अवस्थित होती है। इसलिये अब आप लोग सर्वभाव से देह के गर्व का त्याग कर सच्चिदानन्द रूपिणी मुझमें ही शरण लीजिये। आपका सर्वत्र शुभोदय होगा।

मन्याया शक्ति संक्लप्तं जगर्त्सव चराचरम्।

सापि मतः पृथगमाया नास्त्येव परमार्थतः॥

ग्रहमेवासं पूर्वतुनानवत्किञिचराधिणः॥

तदाम्म रुपंचित सम्वित् पर ब्रहृाक नामकम।

तस्य करचित्त्पतः सिद्वा शक्तिर्मायेति विश्रुवा।

पानकसयोष्णते नेम मुष्णाँशोरिन वीधितिः।

स्व शत्पेश्च समायोगादहं बीजात्मतांगता।

यह सम्पूर्ण चराचर जगत मेरी माया शक्ति के स्रोत -प्रोत है। वास्तव में परमार्थ रूप से मुझमें पृथक् माया नाम की कोई भी वस्तु नहीं है। यह सब मेरा ही सर्वत्र निवास है। है नागाधिप! पहले मैं ही स्थित थी और कुछ भी नहीं था। मेरा आत्म स्वरूप ही चित-सम्वित् और पर ब्रह्मा नामक ही एक है। उसकी ही स्वतः सिद्धा शक्ति माया नाम से विख्यात है। जैसे अग्नि की उष्णता और सूर्य देव की किरणों की अभिन्नता है, उसी प्रकार से शक्ति में शक्तिवान के अभेद रूप से रहती हूँ। अपनी स्वतः प्रकाश शक्ति के योग से ही मैं बीजात्मक हूँ।

अत ऊर्ध्व परं ब्रह्मा मूद्रूपं रूप वर्जितम्।

निगुणम् सगुणम् चेति द्विचा मदु्रप मुच्यते॥

निगुणम् मायया हीनं सगुण मायया युतम।

साहं सर्व जगत्सृष्ट्वा तवन्तः सम्प्रविश्व च॥

प्रेरयाम्य निशं जीवं यथा कर्म यथाश्रुतम।

सृष्टि स्थिति तिरोधाने प्रेरयाम्महमेवहि॥

इससे ऊपर रूप से वर्जित मेरा स्वरूप ही पर ब्रह्मा है। वह मेरा स्वरूप निर्गुण ओर सगुण दो रूपों वाला कहा गया है। मेरा जो निर्गुण रूप होता है, वह माया से हीन है और सगुण रूप माया से युक्त होता है। अपनी सत्य संकल्प भावना से इस सम्पूर्ण जगत का सृजन करके और उसमें अन्दर प्रवेश करके यथा कर्म ओर यथाश्रुत मैं ड़ड़ड़ड़ जीवों को प्रेरणा किया करती हूँ। जगत के उत्पादन स्थिति ओर तिरोधान के कर्म में ब्रह्मादिक को मैं ही प्रेरित किया करती हूँ।

ड़ड़ड़ड़ ब्रह्रा तदेवाहुश्च ह्रींमयम्।

के बीजे मम मन्तोस्तो मुख्यत्वेन सुरोतम!॥

भागह्रयवती यस्मान्सृजामि सकलं जगत।

तत्रैक भागः संजस्तु द्वितीयो भाग ईरितः।

सा च माया पराशक्ति शक्तिभत्यहमीश्वरी॥

ड़ड़ड़ड़ यह एकाक्षर नित्याः ब्रह्मा है। इसे ही ह्रीं मय कहा जाता है। हे सुरोतम! मुख्यतया ड़ड़ड़ड़ और ह्रीं बीज मेरे ही मन्त्र हैं। इस सम्पूर्ण संसार को दो भागों वाली होकर मैं इससे निर्मित किया करती हूँ। एक भाग सच्चिदानन्द नाम वाला है और दूसरा भाग माया और प्रकृति वाला है। वही माया पराशक्ति शक्तिमयी ईश्वर में ही हूँ।

चन्द्रस्य चन्द्रिकेवेयं ममाभिन्न त्वभागता।

साम्यावस्थात्मिका चैवा माया मम सुरोतम॥

प्रलये सर्वजगतो मर्वाभन्नेव तिष्ठति।

प्राण कर्म परीमाक वशतः पुररेवहिम॥

रुपं तदेव मव्यक्तं व्यक्ती भाव भूपति च।

अन्तर्मुखा तु यावस्था सा मायेत्यभिषीयते।

वर्हिमुखा तु मा माया तमः शब्देन चाच्यते।

वर्हिमुखा जातमी रुपाज्यायते सत्व सम्भवः॥

रजोगुणस्त दैव स्यात्सर्गाहौ सुरसतम।

गुणत्रयात्मकाः प्रोक्ता ब्रह्मा विष्णु महेश्वराः॥

रजो गुणाधि को ब्रह्मा विष्णुः सस्वाधिको भवेत्।

तमो गुणाधिको रुद्र! सर्व कारण रूप धृक्।

स्थूल देहो भवेद ब्रह्मा लिंग देहो हरिः स्मृतः।

रुद्रस्तु कारणो देह स्तुरीया त्वहमेव हि॥

साम्यावस्था तु या प्रोक्ता सर्वान्तिर्यामि रूपिणी॥

चन्द्र और चन्द्रिका (चाँदनी ) के समान ही ये सब मुझसे अभिन्न हैं। हे सुरोतम! यह मेरी माया सम्पूर्ण संसार में प्राणिमात्र के प्रलय होने पर साम्यावस्था धारण करती हुई, मुझसे अभिन्न ही रहा करती है। फिर ड़ड़ड़ड़ के आदि में कर्मों के परिवाक्वत्र वह अशक्त रूप से व्यक्त होता है। अंतर्मुखी जो अवस्था है वह माया कहलाती है, बहिर्मुखी अवस्था जो माया है, वह ‘तम’- इस शब्द से कही जाती है। हे सूरश्रेषु! बहिर्मुख तमोरूप से ही तत्व की उत्पत्ति होती है ओर ड़ड़ड़ड़ के आदि में वही रजोगुण होकर उत्पत्ति का कारण बना करती है। ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर, ये गुण त्रयात्मक है। रजोगुणाधिष्ठाता ब्रह्मा सत्वाधिष्ठाता विष्णु और तमोगुणाधिक रुद्र सम्पूर्ण कारण रूप धारण करने वाले हैं। स्थूल देह वाले ब्रह्मा, लिंग देह हरि (विष्णु) है और रुद्र कारण देह है। तुरीया तो सिद्ध मैं ही हूँ। जो कि तर्वान्तर्यामी रुचिणी साम्यावस्था कही जाती है।

माया- मोह की जोड़ी प्रसिद्ध है। जहाँ माया होगी वहाँ मोह होगा। जहाँ मोह हो समझना चाहिये यहाँ माया का प्रभाव है। यह अर्थ सामान्य लोक व्यवहार में प्रयुक्त होता है। साधारणतः अज्ञान के अर्थ में आया शब्द प्रयुक्त होता है। साधारणतः अज्ञान के अर्थ में आया शब्द का प्रयोग प्रचलित है। पर वस्तुतः यह समस्त प्रकृति वैभव ही माया है और उस माया से प्रेरित मनुष्यों से लेकर देवताओं तक चैतन्य प्राणधारियों की और हृदय पदार्थों से लेकर आणविक हलचलों एवं आकर्षण, विकर्षण अदृश्य शक्तियों की गतिविधियों में एक माया को ही ओत-प्रोत समझना चाहिये। इस तथ्य का देवी भागवत् में इस प्रकार उल्लेख है-

अन्येषां चैव का संसारेस्मिननृपोतम!।

मायाधीनं जगर्त्सव सदेवासुर मानुवम्॥

तस्याद्राजन्म कर्तत्यः सम्बेहोत्र कदाचन।

देही मायापराधीन श्रेहते तदृश्या नुगः।

सा च माया परे तत्वे सम्विद्रुपेति सर्वदा।

ततो माया विशिष्ठां तां जीवेषु सर्वदा॥

ततो माया विशिष्ठां तो सम्विदं परम्इश्वरीम्।

मायेश्वरी भगवती सच्चिदानन्द रुपिणीम्।

ड़ड़ड़ड़ प्रणमेय दयेदपि।

तेन सा सजयाभूरव भीममश्येग देहिनम्॥

अर्थ- व्यास- नारद सम्वाद में देवर्षि नारद ने कहा है - इस संसार में साधारण जीवों के विषय में कहा ही क्या जाये यह संसार सम्पूर्ण जगत जिसमें देव-असुर और मानव सभी आते हैं, माया के अधीन रहता है। इसलिए हे राजन! इस विषय में कभी भी सन्देह नहीं करना चाहिये। यह देहधारी माया के पराधीन है और उसी का अनुगामी होकर चेष्टा किया करता है। वह माया सम्विद स्वरूप पर तत्व में सर्वदा संस्थिति रहती है। वह उसके अधीन और उसी के द्वारा प्रेरित होकर सर्वदा जीवों में व्याप्त होती है। इसलिए माया से विशिष्ट, मायेश्वरी, सञ्चित और आनंदस्वरूप वाली, परमेश्वरी भगवती सम्विद का ध्यान करना, उसी की आराधना करना, उसका जाप करना और उसका प्रणमन सदा करना चाहिये। ऐसा करने से वह अपनी स्वाभाविक दया प्रकट करके देही का मोचन निश्चय ही कर दिया करती है।

तस्मान्माया निरासार्थ नान्य द्वै देवतान्तरम्।

समर्थन्तु बिना देवीं सच्चिदानन्द रुपिणीम्॥

तस्मान्मायेइवरीमम्बां स्वप्रकाशां तु सम्विदम्।

आराश्रयेदति प्रीत्या माया गुण निवृतणे॥

अर्थ- इसलिये माया का निरसन करने के लिये सच्चिदानन्द वाली देवी के बिना अन्य कोई भी देवता समर्थ नहीं है। अतएव माया की स्वामिनी - स्वप्रकाशस्वरूपा अम्बा सम्विद की माया की निवृत्ति के लिए अत्यन्त प्रेम-भक्ति के साथ आराधना करनी चाहिये।

वृहदस्य शरीरं तु यद प्रमेय प्रमाणतः।

धातुर्महेति पूजायाँ महादेवी ततः स्मृतः॥

वर्तते सर्वभूतेषु शक्तिः सर्वातमना नृप।

शव वच्छकितः हीनस्तु प्राणी भवति सर्वदां॥

चिच्छक्तिः सर्वभूतेषु रुपं तस्यास्तदेव हि।

इसका परम विशाल देह है, जो किसी भी प्रमाण के द्वारा प्रमेय नहीं होता है। इसी को पूजा में धाता का तेज स्वरूप कहते हैं और इसी का ‘महादेवी’ - यह नाम कहा गया है। हे राजन्! यह सम्पूर्ण प्राणियों में सर्वात्मना व्याप्त है और इसकी शक्ति से हीन होकर तो सर्वथा प्राणी शव के समान हो जाया करता है। उस चिच्छक्ति का रूप ही समस्त प्राणियों में व्याप्त रहता है।

सा विश्वं कुरुते कामं सा पालयति पालितम्।

कस्पान्ते संहरत्येव त्रिरुपा विश्वमोहिनी॥

तपा युक्तः सृजेद ब्रह्म विष्णुः पाति तयान्वितः।

रुद्रः संहरते कामें तपा समिमलितो जगत्॥

सा वधनाति जगत्कृत्सनं माया पाशेन मोहितम्।

अहं ममेति पाषेन सुदृढ़ेन नराश्रिप।

योगिनी मुक्त सगांश्च मुक्ति कांमा मुमुक्ष चः।

तामेव समुयासन्ते देवी विश्वेश्वरीं शिवाम्॥

वह महामाया ही इस विश्व का सृजन, पालन और कल्पान्त में संहार करती है, वह त्रिरूपा विश्व को मोति करने वाली है। उससे युक्त होकर ही ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र इस विश्व का सृजन, पालन और संहार किया करते हैं। उसी से यह जगत व्याप्त है, वही मायापाश से मोहित सम्पूर्ण जगत को बाँध लेता है। वह मैं और मेरे इस सुदृढ़ पाश से हे राजन! बँधा रहता है। संसार के संग से मुक्त योगी जो मुक्ति की कामना करते हैं वे इस विश्वेश्वरी की उपासना अपने अभीष्ट की सिद्धि के लिए किया करते हैं।

मोहो नैवायसरति किं तत्कारण मद्भतम्।

स्वामिं स्त्वमसि सर्वशः सर्व संशय नाशंकृत्॥

इति पृष्टस्तदा राजा सुमेधा मुनि सत्तमः॥

तमुवाच परं ज्ञानं शोक मोह विनाशतम्।

अर्थ - राजा ने मुनि से पूछा - हे स्वामिन्! यह मेरे हृदय का मोह क्यों नहीं दूर हटता है? इसका कौन सा अद्भुत कारण है? आप तो सभी कुछ के ज्ञाता हैं और सब प्रकार के संशयों के नाश कर देने वाले हैं। हे कृपा के सागर! मेरे इस हार्दिक मोह का कारण बतलाइये। व्यास जी ने कहा - इस प्रकार से पूछे जाने पर मुनियों में परम श्रेष्ठ सुमेधा ने उस राजा को शोक और मोह के नाश करने वाला परम ज्ञान बतलाया था।

श्रृतु राजन् प्रवरुयामि कारणं बन्ध मोक्षयोः।

महामायेति विख्याता सर्वेवाँ प्राणिनामिह॥

ब्रह्मा विश्णुस्तथे शान स्तुराच्छ वरुणोमितः।

सर्वे देवा मनुश्याश्च गन्दर्वोरेगराक्षसाः॥

वृक्षाश्च विविधा पल्य पश्वो मृगपक्षिणः।

मायावी नाश्चते सर्वे भाजनं बन्ध मोक्षयोः॥

तथा सृष्ट’मिदं सर्व जगत्स्यावर जगमम्।

तद्धते बर्तते मूनं मोह जालेन यान्त्रितम्॥

स्वं क्रियान् मानुषेव्येकः क्षत्रियो रजसालिः।

ज्ञानिनामयि चेताँसि मोहय त्यनिशं हिया॥

उत्मेश वासुदेवा ज्ञाने सत्यपि शेषतः।

तेपि रामवशा श्लोके भ्रमन्ति परिमोताः॥

अर्थ - महर्षि ने कहा - हे राजा! मैं तुम्हारे सामने संसार में बन्ध और उससे छुटकारा प्राप्त करने का कारण बतलाता हूँ, उसका तुम श्रवण करो। इस संसार में समस्त प्राणियों के ऊपर पूर्ण प्रभाव रखने वाली भगवती महामाया हैं जो परम विख्यात हैं। ब्रह्म, विष्णु, शिव, तुराषाड, वरुण, अनिल आदि सब देवगण, मनुष्य, गन्धर्व, उरग और राक्षस, वृक्ष अनेक बल्ली, पशुगण और पक्षी आदि सभी उप महामाया के अधीन रहते हैं और वे समस्त बन्ध और मोक्ष के पात्र भी होते हैं। अर्थात् इनके लिए भवबंधन होता है तो इनका इस बन्धन से मोक्ष भी होता है। ये सभी माया के अधीन रहते हैं, क्योंकि उसी के द्वारा इस स्थावर (अचर) और जगंम (चर) जगत की सृष्टि हुई है। मोह के जाल में यन्त्रित होकर यह वक्त उसी महामाया के वश में रहता है। तुम तो एक साधारण मनुष्य हो और रजोगुण से लिप्त क्षत्रिय हो। तुम यदि मोह में आबद्ध हो तो क्या आश्चर्य है? वह भगवती तो बड़े-बड़े ज्ञानियों के चित्त को भी निरन्तर मोहित करती रहा करती है। ब्रह्मा, ईश और वासुदेव आदि पूर्ण ज्ञान के रहते हुए भी राम के वश में वशीभूत होकर मोहित होते हुए इस लोक में भ्रमण किया करते हैं - उस महामाया का ऐसा प्रबल प्रभाव है।

ता च ब्रह्म स्वरूपा च निस्म्य सा च सनातनी।

यथात्मा च तथा शक्तिर्यपाग्नौडाहिका स्थिता॥

अत एवं हि योगीन्द्रेः शी युग्भेदो म मन्यते।

यह आत्म स्वरूपा देवी अग्नि में जिस प्रकार से दाह-कृत्य शक्ति अनुपस्थित रहती है उसी तरह ब्रह्म स्वरूपा नित्याः-सनातनी यह आद्यशक्ति है। इसीलिये योगियों में शिरोमणि लोग इस महामाया के विषय में स्त्री एवं पुल्लिंग का भेद नहीं माना करते हैं।

ब्रह्माणं च विष्णुँ रुदं्र वै कारखाक्ष्मकम्।

मद्भ्याद्धाति पवनोभीत्या सूर्यश्च नच्छति॥

इन्द्राग्नि मृत्यवस्तद्धत्साहं सर्वोतमा स्मृता।

मत्प्रसादाद्भवहमिस्यु जयोलक्ष्योरित बवैश॥

इस जगत के कारण स्वरूप जो ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र हैं वे सब मुझसे ही प्रेरणा प्राप्त कर जगत की उत्पत्ति स्थिति और लय किया करते हैं। पवन मेरे ही भय से बहता है। सूर्य गमन करता है और इन्द्र, अग्नि और मृत्यु सब मेरी भीति से अपना-अपना काम करते हैं मैं सब में उत्तम हूँ और हे देवगण! मेरी ही कृपा से आप तीनों को जय प्राप्त होती है।

इस रहस्यमय अध्यात्म को जो जान लेता है वह अपने भय और संशय से छुटकारा पाकर लोभ-मोह से मुख फेर लेता हे। वासना, तृष्णा की प्रीति छोड़ आत्मकल्याण के मार्ग पर चलना आरम्भ करता है। भगवती की प्रेरणा जो अन्तःप्रेरणा के रूप में - परमार्थ पथ पर चलने को निरन्तर मिलती रहती है उसका अनुसरण करने वाला भवबन्धनों की दुर्गति से छूटकर शाश्वत सुख शान्ति का अधिकारी बनता और जीवन के परम लक्ष्य को प्राप्त करता हे। इस तथ्य को इस प्रकार बताया समझाया गया है -

छित्वा मित्वा च भूतानि हत्वा सबमिद जगत्।

देवीं नमति भक्तया यो न स पायै लिलिप्यते।

रहस्यं सर्व शास्त्राणां मया राजनुदीरितम्।

विमृश्ये तदशेवेण भव देवी षडाम्बुजम्।

अत्याँ नाम जानन्ति मायामा वैभवं महत्॥

गायत्री ब्राह्मणाः सर्वे जपन्ति हृदयान्तरे।

एततसर्व समाख्यातं यस्पृष्टं स्वया नध॥

समस्त भूतों का छेदन एवं भेदन करके और इस सम्पूर्ण जगत का हनन करके जो दृढ़ भक्ति की भावना से देवी को नमन किया करता है वह फिर पापों से कभी भी विलिप्त नहीं होता हैं। हे राजन! मैंने यह समस्त शास्त्रों का रहस्य तुमको बतला दिया है। इस पर भली भाँति विमर्श करके देवी के चरण कमलों का समाराधन करो। समस्त मनु अजया गायत्री का जा किया करते है, किन्तु उसकी माया का जो परम महान् वैभव है, उसकी महिमा को लोग नहीं जानते हैं। समस्त ब्राह्मण अपने हृदय -स्थल के अन्दर गायत्री का जाप किया करते है, किन्तु इसका महत्व पूर्णतया नहीं जानते हैं। हे अनथ तुमसे जो पूछा है, वह मैंने सब बतला दिया है।


अपनों से अपनी बात- - (2) हमारे प्रेम साधना और उसकी परिणति

मनुष्य अपने आपमें परिपूर्ण प्राणी है। उसके भीतर है ईश्वर की सभी शक्तियाँ बीच रूप से विद्यमान् है। साधना का तात्पर्य उन बीच तत्त्वों को प्रस्तुत स्थिति से जागृत कर सक्रिय एक समर्थ बनाना है। श्रम और जागृत कर सक्रिय एवं समर्थ बनाना है। श्रम और समय से शरीर, स्वाध्याय और विवेक से मन तथा प्रेम और सेवा से अन्तःकरण का विकास होता है। जीवन साधन के यह छः आधार ही व्यक्तित्व के उत्कर्ष में सहायक होते है। जिस प्रकार काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर यह छः शुभ माने गये हैं, उसी प्रकार अन्तरंग में अवस्थित यह छः मित्र भी ऐसे है कि यदि मनुष्य इनका समर्थन प्राप्त कर सके तो अपनी समस्त तुच्छताओं पर विजय प्राप्त कर जीवन लक्ष्य की प्राप्ति में निश्चित रूप से सफलता प्राप्त कर सकता है।

उपासना की दृष्टि से शरीर क्षेत्र में पूजन व्रत, यात्रा, समय, सदाचरण, दान, पुण्य, तप, साधना आदि कर्मकाण्डों का-मनः क्षेत्र में ध्यान, चिन्तन, स्वाध्याय, सत्संग आदि का और अन्तःकरण क्षेत्र में भाव तन्मयता, दृष्टि परिष्कार, समक्ष, समाधि तय, वैराग्य आदि निष्ठाओं का अपना महत्व है। इन प्रकरण को भी वाधि विषानपूर्वक अनुभव मार्ग-दर्शन में अग्रसर किया जाना चाहिये। आस्मिक प्रगति के लिये इनकी भी आवश्यकता है और उनके लिये समुचित प्रयत्न परिश्रम होना चाहिये, किन्तु यह नहीं मान बैठना चाहिये किम उपासना पद्धतियों का डडडड ही आत्मा कल्याण एवं देव अनुग्रह प्राप्त कर लेने के लिये पर्याप्त है। तथ्य यह है कि उपासना के साथ साधना जुड़ी हुई होनी चाहिये। उपासना शरीर है और साधना प्राप्त। दोनों एक दूसरे के पूरक है। बिजली के दो तारों के मिलने पर किया उत्पन्न होती है, दोनों पहिये ठीक होने पर ही गाड़ी चलती है। इसी प्रकार आत्मिक प्रगति कि लिये जीवन के तीनों स्तर पर स्थूल, सूक्ष्म, और कारण-देह-मन और आत्मा-तब विकसित होती है जब उपासना और साधना, की द्वितीय डडडड पर समुचित ध्यान दिया जाय।

उपरोक्त पंक्तियों को हमारा आध्यात्मिक क्रिया-कलाप का आधार और इस क्षेत्र में उपलब्ध अनुभवों का सार कह सकते है। दूसरे लोग है जिन्हें डडडड मार्ग-दर्शन में एकांगी मस्ती और सरल उपासना पद्धतियों के सुट-बुट प्रयोग बनाकर लम्बे-चौड़े आश्वासन दिये और उन वचन प्रयत्नों से ऋद्धि-सिद्धियाँ मिलने एवं मनोकामनायें पूरी होने के सब्जबाग दिखाये। लोग उस मार्ग पर चलें पर

मिला कुछ नहीं, इसलिये उदास मन से उन सस्ते कर्म-काण्डों को भी छोड़ बैठें। जो अतिशय सरल थे। अनास्था इसी प्रकार बढ़ी है। छछोर मार्ग-दर्शन ने समझा होगा कि नकली वस्तुयें सस्ती होने के कारण महँगी असली वस्तुओं की अपेक्षा भोली भीड़ को अधिक आकर्षित करती है, इसलिये क्यों न आत्मिक क्षेत्र में भी उसी प्रयोग को अपनाया जाय शायद यही उन्हें ठीक लगा होगा और इसलिये छुट-पुट पूजा पद्धतियों के महत्व आकाश-पाताल जितने लिखने और कहने प्रारम्भ किये होंगे डडडड त्रिआसु उभर सलचाँय भी बहुत-इतने कि असली बेचने वाली दुकानें सूची पढ़ी रहें। फिर भी नतीजा कुछ नहीं निकला। शीघ्र और सही मूल्य पर कीमती वस्तुयें प्राप्त करने का सिद्धान्त गलत है। हर वस्तु अपना मूल्य माँगती है। एम॰ ए॰ की पढ़ाई पूरी करने के लिये कठोर परिश्रम के साथ 16 वर्ष ही लगेंगे। आम का बाग 4 वर्ष में ही फल होगा और पानी, खाद, गुड़ाई-निराई की रखवाली अपेक्षा रखेगा। असली हीरा दस पैसे का नहीं मिल सकता, नोटों से भरी जेब खाली करने पर ही मन-पसन्द वस्तु प्राप्त की जा सकती है। फिर अध्यात्म क्षेत्र में ही ड़ड़ड़ड़ सस्ती का प्रयोजन पूरा कैसे होता। छुट-पुट मन्त्र-तन्त्र करके आत्मिक प्रगति की सिद्धियाँ प्राप्त कर सकता है, इसके लिये आत्म-विज्ञान की साड्डोपाड्ड प्रक्रिया को ही धैर्य और साहस के साथ अपनाना पड़ता है, और समुद्र-मन्थन करके अभीष्ट सिद्धियों के रत्न उपहार ड़ड़ड़ड़ करने होते है।

सौभाग्य से हमें आरम्भ में ही सही रास्ता मिल गया और उन बाल-जंगलों में नहीं भटकना पड़ा जिसमें चलने वाले दूसरे उतावली कल्पनाओं में भ्रमाये हुए लोग विवश होकर लौटते है। हमारा हर कदम, हर दिन सफलता का क्रमिक सन्देश लेकर सामने आता रहा है। और यह अहसास दिलाता रहा है कि मंजिल कितनी ही लम्बी क्यों न हो, प्रगति कितनी ही मन्द क्यों न हो, रास्ता यही सही है और इसी प्रकार आगे बढ़ते चलने पर देर-सबेर में ड़ड़ड़ड़ सफलता मिल जोगी।

हमारे मार्ग-दर्शक ने यह बात आरम्भ में ही कूट-कूट कर अन्तरंग में बिठा दी थी कि उपासना आवश्यक है, उसे पुरी तत्परता के साथ अपनाया जाय, किन्तु यह भली भाँति समझ लिया जाय कि इस क्षेत्र की सफलताओं का स्रोत भावनात्मक विकास की जीवन साधना पर ही अवसम्मित है। यदि साधना की उपेक्षा की गई और पूजा-पद्धति के सहारे लम्बे-चौड़े सपने देखे गये तो अन्य असंख्य जाल-जंजालों में भटकने वालों की तरह हमें भी खाली हाथ रहना पड़ेगा “हमने इस शिक्षा को गाँठ बाँध लिया और जिस दिन से उस क्षेत्र में प्रवेश किया, दोनों ही प्रक्रियाओं पर समान रूप से ध्यान दिया। चिकित्सा और पथ्य रोगी के लिए-खाद और पानी पौधे के लिए-पढ़ना और लिखना छात्र के लिए-पूँजी और बुद्धि व्यापार के लिए आवश्यक है, उसी प्रकार आत्मिक प्रगति कि लिए उपासना और साधना का जोड़ा अविच्छिन्न रूप से आवश्यक है। इसमें न तो ढील की गुँजाइश है, न उपेक्षा की। शास्त्रकारों से लेकर तपोनिष्ठ ऋषियों और सफल आराधकों ने सदा इसी तथ्य का प्रतिपादन किया है। सस्ते बेचने वाले कुँजड़े केवल ग्राहकों को भ्रम में डाल सकते है पर आवश्यकता किसी की पूरी नहीं करा सकते। धन्यवाद है भगवान् का जिसने हमें एक घंटे में ईश्वर दर्शन कराने वाले और चेला मूड़ने वाले, जादुई मन्त्र बताने वाले करामाती जंजालियों के चंगुल में फँसने से बचा लिया। धन्यवाद है भगवान जिसने हमें अपने पुरुषार्थ से आत्म-निर्माण करने का राजमार्ग बताया और परावलम्बन की प्रचलित पाखण्ड प्रक्रिया से दूर रहने का आदर्श पहुँचाया।

उपासना क्षेत्र में गायत्री महामन्त्र की साधना अनन्य श्रद्धा और विश्वास के साथ करने की शिक्षा हमें मिली थी, उसमें लम्बे-चौड़े विधि-विधान जुड़े हुए नहीं है। कितने ही व्यक्ति विधि-विधानों के अन्तर और कर्मकाण्डों के जोड़-तोड़ से साधना की सफलता, असफलता का कारण मानते है और इस ढूँढ़ खोज में रहते है कि कोई रहस्यमय ऐसी पद्धति हाथ लग जाय जिससे देखते-देखते जादुई चमत्कार का प्रतिफल सामने आ जाय। हमारी मान्यता वैसी नहीं रही। मंत्र शास्त्र का विशाल अध्ययन और अन्वेषण हमने किया है। महामंत्रिकों से हमारे सम्पर्क है और साधना पद्धतियों के सूक्ष्म अन्तर प्रत्यन्तरों को हम इतना अधिक जानते है, जितना बुद्धिमान पीढ़ी के मंत्र ज्ञाताओं से शायद ही कोई जानता हो। लोगों ने एकांकी पढ़ा सीखा होता है- हमने शोध और जिज्ञासा की दृष्टि से इस विद्या को अति विस्तार और अति गहराई के साथ ढूँढ़ा, समझा है। इस जानकारी का भी महत्व हम मानते है और जहाँ उपयोगिता आवश्यक होती है, उसका प्रयोग भी करते-कराते रहते है पर हमारी अपनी क्रिया-पद्धति अति सरल और सीधी-सादी है, यही सीधा सा एक ॐ, तीन ग्याहृति और 24 अक्षरों वाला वेदोक्त गायत्री मंत्र हमें मिला है और इसमें बिना अधिक ॐ, अधिक बीज सम्पुट आदि की लाग लपेट जोड़े जप-साधना में लग जाते है।

शरीर और वस्त्रों की शुद्धि, पूजा उपकरणों की स्वच्छता, शांत और सौम्य वातावरण, प्रफुल्ल मन का ध्यान रखकर पूजा के लिये बैठा जाये नियत समृत और निवास स्थान का ध्यान रखा जाये तो उपासना सरल बन जाती है। प्रातः 2 बजे हम उठते है और शौच, स्नान के नित्य कर्म से नि+वृत् होकर उपासना कक्ष में चले जाते है। अब तक मथुरा रहते हैं यही निवास स्थान है, जो इस घर में जब से ओ है, तब से नियत है। उपासना का समय तथा जप की संख्या भी निर्धारित है। यह तीनों नियभ्तायें सबके अचेतन मन को इस बात के लिए प्रशिक्षित कर देती है कि यथासम्भव यथावत अपने काम पर लग जाये। अन्तरमन की यह विशेषता है कि यह किसी प्रक्रिया को देर में पकड़ता है पर जब एक बार पकड़ लेता है तो नियत समय पर उसी की माँग करता है और सरलतापूर्वक उसी में प्रवृत्त रहता है। शौच, भूख, प्यास, नींद आदि की आदतें नियत समय पर प्रबल होती है। कोई स्थान विशेष भी किसी के लिए ऐसा बन जाता है, जहाँ अमुक मानसिक प्रक्रिया स्वयमेव गतिशील होने लगे। लेखकों, कवियों आदि किसी नियम स्थान पर-नियत समय पर अपना काम करना सरल होता है। अचेतन मन की इस विशेषता को ध्यान में रखकर हर साधक को अपनी उपासना का स्थान, समय और क्रम निर्धारित करना पड़ता है। आरम्भ में मन कुछ गड़बड़ करता है पर पीछे जब अभ्यस्त हो जाता है, तब सारी प्रक्रिया बड़ी शांति और सुविधा से होने लगती है। हमने पुराण काल में तथा सामान्य समय में इन तीनों ही बातों का समुचित ध्यान रखा है, अतएव उसमें स्थिरता बनी रही। मन उचटने जैसी अड़चन नहीं आई। समय स्थान और संख्या की समस्वरता का महत्व हम सभी को बताते रहते और जो उसे अपना लेते है, उन्हें मन उचटने की कठिनाई का सामना नहीं करना पड़ता।

शीघ्र उठना उनके लिए सम्भव है, जो शीघ्र सोते हैं। देर से सोने वाले शीघ्र नहीं उठ सकते। उपासना का सर्वश्रेष्ठ समय ब्रह्म मुहूर्त-सूर्योदय से पूर्व का है। हम आमतौर से 8-8.30 बजे तक सो जाते है। प्रायः 6 घण्टे में नींद पूरी हो जाती है और प्रातःकाल उठने में कठिनाई नहीं होती स्वतः ही नींद खुल जाती है और अगला क्रम निर्धारित ढर्रे पर चलने लगता है अपने उपासना स्थल की एक विशेषता है, यहाँ होते ड़ड़ड़ड़ अखण्ड यज्ञ। गत 42 वर्ष से हमारा अखण्ड व्रत दीप जलता है। साथ ही अमर पंक्तियों एवं पूणत्तियों के रूप में हवन सामग्री भी यहाँ यथा क्रम जलती रहती है। दीपक का भी और बत्तियों की कामियों निरन्तर बढ़ने से दोनों का समिधित धूम्र, बचंस, तेज तथा प्रभाव उपासना करु में वशीष वातावरण उत्पन्न करता है। अतएव यह केवल अखण्ड दीपक मात्र ही नहीं रहता वरन अखण्ड यज्ञ बन जाता है। ऐसे संयोग, सम्भालने में सतर्कता बहुत रखनी पड़ती है, और व्यय भी काफी आता है। फिर भी इसका प्रतिफल बहुत है। लम्बी अवधि से इस कक्ष में होते रहने वाले जप पुरभ्ररणा के साथ अखण्ड यज्ञ की इस प्रक्रिया में यहाँ का वातावरण अलौकिक बना रहता है। यहाँ उपासना ही हमें अपनी मनोभूमि ड़ड़ड़ड़ रखने और उस स्थिति के महत्त्वपूर्ण साथ लेने में सुविधा मिलती है।

हर किसी के लिये न तो अखण्ड वृत दीप सम्भव है और न ऐसा यज्ञीय वातावरण भरा कक्ष विनिर्मित कर सकना सरल है। यह हमारा एकाकी प्रयोग है। इसकी नकल उसी को करनी चाहिये, जिसकी पीठ पर हमारी ही जैसी संरक्षक शक्ति का बल हो। अन्यथा यह प्रयोग असफल रहेगा। गायत्री उपासना जितने समय चले उतने समय जिनके लिये सम्भव हो धूप, दीप एवं अगरबत्ती जलाने की व्यवस्था बना लेना उत्तम है। यज्ञीय वातावरण में गायत्री उपासना अधिक फलवती होती है। अनुदान काल में यथा सम्भव जप समय तक दीपक और धूप-बत्ती जलाने की व्यवस्था बनानी ही चाहिये।

जिनके लिए सम्भव है पूजा कक्ष ऐसा रहे जहाँ हर किसी का प्रवेश न हो, कोलाहल न हो और शान्ति बनी रहे। स्वच्छता और सुसज्जिता का समुचित ध्यान रखा जाय। पूजा प्रतीक थोड़े रहे पर वे उपेक्षा से मैले-कुचले न पड़े रहने दिये जाये तो उनकी सुरुचिपूर्ण सुसज्जा ऐसी आकर्षक रखी जाये जो मनोरम दिखे और चित वहाँ लगे।

जप आरम्भ करने से पूर्व ड़ड़ड़ड़ पृथ्वी पूजन के छः मध्या कर्म बहुमुक्ति का आह्वान, उपलब्ध गन्ध-पुष्प ड़ड़ड़ड़़ पूजन की विधि सर्वविदित है। पालथी मारकर बैठना, मेरुदण्ड सीधा रखना नेत्र अधखुले उच्चारण ऐसा जिसमें कण्ठ, होठ, जिह्वा की हलचल तो होती रहे पर उसे सुन समझ पास बैठने वाला भी न सके, दाहिने हाथ में माला, ड़ड़ड़ड़ फेरने में दर्जनों उगली का प्रयोग न करना, जा सके अन्त में प्रार्थना-, बारती कलश, रूप में रखे छोटे जल पात्र (आचमन का पंच पात्र नहीं ) को ज पके अन्त में सूर्य भगवान को चढ़ाना विसर्जन यही प्रख्यात उपासना क्रम हमारा भी है, जिसे प्रायः सभी गायत्री उपासक प्रयुक्त करते हैं।

जप के समय ध्यान करते रहने की आवश्यकता इस लिये रहती है कि मन एक सीमित परिधि में ही भ्रमण करता रहे, उसे व्यर्थ की उछल-कूद,भाग -दौड़ का अवसर न मिले। माता का चित्र सामने रहने से उनके ड़ड़ड़ड़ और आवरणों का बारीकी से मनोयोगपूर्वक निरीक्षण करते रहने का ध्यान साधना मन को इधर -उधर न भागने की समस्या हल कर देती है। यह छवि ध्यान थोड़े अभ्यास से तस्वीर को देखे बिना भी विशुद्ध ध्यान कल्पना के माध्यम से आँखें बन्द करके भी होने लगता है। जिन्हें निराकार साधना क्रम पसन्द है, उनके लिए प्रातःकाल उगते हुए अरुण वर्ण सूर्य का ध्यान करना उत्तम है।

मन को भागने से रोकने के लिए इष्टदेव की छवि को मनोयोगपूर्वक निहारते रहने से काम चल जाता है पर इसमें रस -प्रेम,एकता और तादात्म्य उत्पन्न करना और भी शेष रह जाता है और यह प्रयोजन ध्यान में प्रेम भावनाओं का समावेश करने से ही सम्भव होता है। उपासना के आरम्भ में अपनी एक दो वर्ष जितने निश्चिन्त, निर्मल, निष्काम, निर्भय बालक जैसी मनोभूमि बनाने की भावना करनी चाहिये ओर संसार में नीचे नील जल और ऊपर ड़ड़ड़ड़ आकाश के अतिरिक्त अन्य किसी पदार्थ एवं इष्टदेव के अतिरिक्त और किसी व्यक्ति के न होने की साम्यता जमानी चाहिए, बालक और माता, प्रेमी और प्रेमिका,सखा और सखा जिस प्रकार पुलकित हृदय परस्पर मिलते, आलिंगन करते है, वैसी ही अनुभूति इष्टदेव की समीपता की होनी चाहिये। चकोर जैसे चन्द्रमा को प्रेमपूर्वक नितान्त है ओर पतग जैसे दीपक पर अपना सर्वस्व समर्पण करते हुए तदनुरूप हो जाता है, ऐसे ही भावोद्रेक इष्टदेव की समीपता के उस ध्यान साधना में जुड़े रहने चाहिये। इससे भाव -विभोरता की स्थिति प्राप्त होती हैं। और उपासना ऐसी सरस बन जाती है कि उसे छोड़ने को जी नहीं चाहता।

गायत्री उपासना का न्यूनाधिक यही क्रम हमारा इसी प्रकार चलता रहा है। 24 अनुमानों के उपरान्त प्राण विद्या के उच्च स्तरीय प्रयोग एक विशिष्ट योग साधना के रूप में चलते चले है। जिनका चक्र वेधन ओर कुण्डलिनी जागरण से सीमा सम्बन्ध है। वे भावनायें सर्वोपयोगी नहीं ओर हमारे सामान्य साधन कम का कण भी नहीं, वे अतिरिक्त प्रयोजन के लिए है, इसलिए उनकी चर्चा यहाँ अनावश्यक समझी गई और उतना ही, उल्लेख किया गया जो सर्वसाधारण के लिए उपयुक्त था। यह लेख माला लिखी ही इस उद्देश्य से जा रही है कि हमारे अनुभवों के साथ अपने क्रिया-कलाप का ताल -मेल बिठाते हुए परिजन अपनी आत्मिक प्रगति का पथ -प्रशस्त कर सकें और उसी स्तर की सफलता प्राप्त कर सकें,जैसी कि हम कर सके है। इसमें आगे वाली मंजिलों का मार्ग दर्शन इन पंक्तियों में नहीं, अन्य माध्यमों से मिलेगा।

सामान्य उपासना क्रम जिसे आमतौर से हमने अपनी उपासना प्रक्रिया में सम्मिलित रखा है, अप्रैल 68 की अखण्ड ज्योति के पूरे अंक में विस्तार पूर्वक लिख चुके हैं। वह हमारे लिये जैसा उपयोगी सिद्ध हुआ,वैसा ही हर साधक के लिए फलप्रद हो सकता है। सर्वसाधारण के लिए गायत्री उपासना की उससे अच्छी पद्धति और कुछ नहीं हो सकती। गायत्री की उच्च-स्तरीय साधना प्राण तत्व की उत्खनन एवं अभिवर्धन प्रक्रिया है। पंच-कोशों का जागरण उसी पर निर्भर है। कई वर्ष पूर्व हमने अत्र भय कोश,मनोमय कोश, प्राणमय कोश, विज्ञानमय कोश,ओर आनन्दमय कोश,के जागरण की पंच-कोसी उच्च-स्तरीय गायत्री साधना पाठको को सिखानी आरम्भ की थी अखण्ड-ज्योति के पृष्ठों में उसका क्रम तीन वर्ष तक चला भी था पर अनुभव यह हुआ कि वह सर्वसाधारण का है। समस्त सत्प्रवृत्तियाँ उसी की सहचरी हैं। कृष्ण-चरित्र में जिस रास और महारास का- असंकारिक रूप से सुविस्तृत और आकर्षक वर्णन हुआ है, उसमें प्रेम-प्रसंग को कृष्ण के रूप में और सत्प्रवृत्तियों को गोपियों के रूप में चित्रित किया गया है। एक प्रेमी और अनेक प्रेमिकायें यह आश्रय अध्यात्म जगत में सम्भव है। प्रेम से भरी आत्मा को अगणित सत्प्रवृत्तियाँ असीम प्यार करती है और ये सभी दौड़ी-दौड़ी प्रियतम से मिलने और उसके साथ तादात्म्य होने चली आती है। महारास से वृन्दावन स्वर्गोपमय बन जाता है। उत्कृष्ट प्रेम और उसके आधार पर एकत्रित हुई सत्प्रवृत्तियाँ जीवन को आनन्द से भरा-पूरा बना देती है। द्वैत की अद्वैत में परिवर्तित-बहता का समर्पण में विषय- इसी का नाम मुक्त है। सच्चिदानन्द की उपलब्धि का यही मम्स्थस है। प्रेम आध्यात्मिक प्रगति का प्रधान अवलम्बन है। हमारी अनुभूतियों और उपलब्धियों का भी निष्कर्ष है और यही निष्कर्ष अब तक इस मार्ग पर सफल यात्रा कर चुकने वालों का है।

उपासना में प्रेम भावना का समावेश करते ही यह नीरस न रहकर अति सरल और मनोरम हो उठती है। कठोर जैसे चन्द्रमा को निहारते हुए सारी रात बिताता भ्रमर जैसे कमल की शोभा ओर सुगन्ध पर मुग्ध बना मंडराता रहता है। तितली जैसे पुष्प को नहीं छोड़ती, चींटी शक्कर पर से हटाये नहीं हटती, पतंगा दीपक की चारों ओर जीवन संकट के मूल्य पर भी खरीदता है, लोहा जैसे ड़ड़ड़ड़ से निपट जाने को सिसकता चलता है, नदी ड़ड़ड़ड़ के लिए आतुरता प्रकट करती है, उसी प्रकार ड़ड़ड़ड़ की दशा भगवान की ड़ड़ड़ड़ वाले के लिये आतुर जैसी होने लगती है। प्रेमिका को अपने प्रेमी की चर्चा और कल्पना में जैसे सुख मिलता है, उसी प्रकार भगवान की सरस कल्पना और ड़ड़ड़ड़ होता है। मीरा, सूर, कबीर, तुलसी, ड़ड़ड़ड़ आदि की ऐसी ही मनोदशा थी। उन्हें पूजा के फूल घण्टे मार नहीं सकते ड़ड़ड़ड़ व मन उचटता था, न फुरसत की कमी रहती थी। ड़ड़ड़ड़ के सामने यह कठिनाइयाँ लेकर नहीं गये कि हमारा मन नहीं लगता, ध्यान नहीं लगता। प्रेम का अभाव ही अन्य मनस्कता का एकमात्र कारण है। प्रेम के पीछे भी बीजांकुर आदि बनेंगे हो तो उपासना के ड़ड़ड़ड़ शायद ही अन्यत्र कहीं दीखें।

ईश्वर भक्ति का अभ्यास हमने गुरु भक्ति की प्रयोग शाखा में, व्यायामशाला में आरम्भ किया और विकास करते हुये प्रभु प्रेम के भंवर में जा पहुँचें जिसकी महानता को हर कसौटी पर रख कर खरा पाया हो उसी व्यक्तिगत अधिष्ठाता बढ़ाते चलना, प्रेम भावना के परिष्कार का सरल उपाय है। संसारी लोगों का प्रेम स्थानों पर आधारित होता है और उसमें बनावट भरी रहती है। उसे बदलते और बिगड़ते देर नहीं लगती। कृत्रिमता और स्वार्थपरता का जब भंडाफोड़ होता है, तब प्रेमी का मन टूट जाता है। और सन्देह, आशंका, दुःख तथा निराशा की प्रतिक्रिया, प्रेम को खतरे और जोखिम से भरा मान लेती है। फिर उचित स्थान पर भी प्रेम करने को मन नहीं करता और आत्मिक प्रगति का आधार सदा के लिए नष्ट हो जाता है। प्रेम का अभ्यास करने के लिए ऐसी नाव ढूँढ़नी पड़ती है, जो बीच में डूबने वाली न हो और किनारे पर पहुँचा दे। भावना और तृष्णाओं की पूर्ति के लिए चापलूसी जैसी हरकतें ही आज-कल प्रेम परिच्छेद में उछलती-कूदती दीखती है। वे बबूले की तरह उछलती और झाग की तरह बैठ जाती है। ऐसे प्रसंग प्रेम-साधना को परिपुष्ट नहीं वरन दुर्गम बनाते है। अभ्यास के लिये ऐसे व्यक्ति चुनने चाहिये जो प्रेम-तत्व का मार्ग, रहस्य, मूल्य, उत्तरदायित्व जानते हों और अपने प्रिय पात्र को निराश नहीं, अधिक उत्साह उल्लास उत्पन्न करने की परिस्थिति बनाते होंगे।

सौभाग्य ही कहना चाहिए कि हमें ड़ड़ड़ड़ का अनुभव ऐसा ही मिला जिन्होंने न केवल उपासना, साधना की दिशा से ही मार्ग दर्शन किया- न केवल अपना तन और बल ही हमें दिया वरन उतना वात्सल्य, स्नेह और अपना मन दिया जितना इस संसार में किसी भी प्रसिद्ध के ड़ड़ड़ड़ रिश्ते के प्रिय पात्र एक दूसरे को दे सकते है। हमने भी प्रयत्न किया कि समर्पण कि जितनी सर्वांगपूर्ण भावना और क्रिया चरितार्थ हो सकती हो, उसमें ड़ड़ड़ड़ की जाय। उनका हर आदर्श और हर संकेत ड़डड़ड़ की तरह शिरोधार्य रहा है। माँगना कुछ नहीं, देना सब कुछ’ प्रेम के इस अविच्छिन्न सिद्धान्त को दोनों ने ही चरम सीमा तक निबाहा है। दूसरी ओर से क्या किया गया, इसकी चर्चा हमारी वर्णन शक्ति से बाहर है। अपनी ओर से हम इतना ही कह सकते है कि भगवान से बढ़कर हमने उनके निर्देशों को शिरोधार्य किया है। उनके सन्देशों में ही अपना हित देखा हैं। आगा-पीछा सोचने और अनुनय करने की इच्छा ही नहीं उठी। अरुचिकर और कष्टकर कोई प्रसङ्ग आया तो भी उसी सहज स्वभाव स्वीकार किया। इन दिनों हमें प्रिय परिजनों को छोड़ना बहुत कठिन लग रहा है पर यह नहीं सोचते कि किसी बहाने उस आदेश का उल्लंघन करेंगे। प्रेम की ऐसी ही रीति-नीति है। उसे निबाहने के लिए एक पक्ष यदि पूरी तरह अड़ जाय तो दूसरे को भी द्रवीभूत होना पड़ता है। हमने अपनी ओर से प्रिय पात्र बनने में कुछ उठा नहीं रखा,फलतः गुरुदेव का अनुग्रह अमृत भी अपने ऊपर अजस्र रूप से बरसा है। प्रेम-तत्व के संवर्धन की साधना गुरु भक्ति से आरम्भ होकर ईश्वर भक्ति तक जा पहुँची। हमें इस प्रसङ्ग में उतने अधिक आनन्द-उल्लास का अनुभव होता रहा है कि उसके आगे संसार का बड़े-से बड़ा सुख भी तुच्छ लग सके। यह बढ़ती हुई प्रेम भावना, आत्मा-प्रेम, परिवार -प्रेम ओर विश्व-प्रेम में विकसित होती चली जा रही हैं और देखने वालों को उस अन्तः भूमिका की प्रतिध्वनि एक दिव्य जीवन के रूप में प्रतीत परिलक्षित हो रही हैं।

मनुष्य जिसे प्यार करता है, उसके उत्कर्ष एवं सुख के लिए बड़े से बड़ा त्याग और बलिदान करने को तैयार रहता है। अपने शरीर,मन,अन्तःकरण एवं भौतिक साधनों का अधिकाधिक भाग समाज और संस्कृति की सेवा में लगाने से रुका ही नहीं जाता। जितना भी कुछ डडडडे दीखता है, उसे अपने प्रिय आदर्श के लिए लुटा डालने की ऐसी हूक उठती है कि कोई भी साँसारिक प्रलोभन उसे रोक सकने में समर्थ नहीं होता। दूसरे लोग अपने छोटी-छोटी सेवाओं और उदारताओं की बार-बार चर्चा करते रहते है और उन्हें इसका प्रतिफल नहीं मिला ऐसी शिकायत करते रहते है। अपने लिए इस तरह सोच सकता सम्भव नहीं। क्योंकि लोक मंगल स्वांत, सुखाय आत्म-तृप्ति के लिए ही बन पड़ता है, किसी पर अहसान जताने या अपनी विशेषता प्रदर्शित करने के लिए नहीं।लोक -सेवा का प्रतिफल जब आत्म संतोष के रूप में तुरन्त मिल गया तो ओर कुछ चाहने की आवश्यकता ही क्या रहे

अपने संपर्क परिवार को विश्व-मानवता की व्यवहारिक सीमा मानते है ओर उससे अपनी आत्मा के समान,परमात्मा की पुनीत प्रतिकृति के समान,प्यार करते हैं। किसी से हमारा कोई स्वार्थ नहीं,न मोह,न प्रतिफल की किसी से इच्छा। बादल की तरह यों ही अपना मन सब पर प्रेम बरसाता रहता है। और उस सहज प्रवृत्ति से प्रेरित होकर दूसरों के दुःख बाँट लेने ओर अपनी विभूतियाँ लुटा देने की ललक निरन्तर उठती रहती हैं। उसी से प्रेरित होकर अपना तप देकर दूसरों के कष्ट हल्के करने का प्रकरण सहज स्वभाव चलता रहता है, न उसमें अपनी कुछ विशेषता दीखती है ओर न बढ़ाई।

विदाई के समय विरह -वेदना की जो हूक उठती।वह साथी सहचरों के साथ देर से बने चले आ रहे सम्बन्धों की स्मृति उभरने के कारण ही है। जब गहनता नहीं तो ममता कैसी? जब लोभ नहीं तो मोह कैसा? विशुद्ध प्रेम ही है,जो साथियों की अधिक समीपता,अधिक सेवा ओर अधिक आत्मीयता के अवसर पाने के लिए मचलता है। इस व्यथा में जो कसक है, वह उसी स्तर की है, जो भगवान की समीपता के लिए तड़पती हुई भक्ति भावना में होती है। परिजन हमारे लिए भगवान की ही प्रति है ओर उनसे अधिकाधिक गहरा प्रेम प्रसङ्ग बनाये रहने की उत्कंठा उमड़ती रहती है। इस वेदना के पीछे भी एक ऐसा दिव्य आनन्द झांकता रहता है। जिसे भक्ति योग के मर्मज्ञ ही जान सकते है।


ईश्वर का प्रतिबिम्ब प्रतिबिम्ब प्रेम

गन्ध विहीन फूल है जैसे चंद्र चन्द्रिका हीन।यों ही फीका है मनुष्य का जीवन प्रेम-विहीनप्रेम स्वर्ग है, स्वर्ग प्रेम है, प्रेम अशंक अशोक।ईश्वर का प्रतिबिम्ब प्रेम है, प्रेम हृदय आलोक॥

जग की सब पीड़ाओं से है होता हृदय अधीर।पर मीठी लगती है उर में सत्य प्रेम की पीर॥व्याकुल हुआ प्रेम-पीड़ा से जिसका कभी न प्राण।भाग्यहीन उस निष्ठुर का है उर सचमुच पाषाण॥

जिस पर दया दृष्टि करते है मंगलमय भगवान।पूर्ण प्रेम-पीड़ा से पीड़ित होता है वह प्राण॥जिसने अनुभव किया प्रेम की पीड़ा का आनन्द।उससे बढ़कर कौन जगत में सुखी और स्वच्छन्द।।

प्रेमोन्मत्त हृदय में रहता है न विरोध न क्रोध।दुर्गुण नहीं प्रेम-पथ का कर सकता है अवरोध॥मधुर प्रेम-वेदना-मुग्ध जन सुख-निद्रामय मस्त।है देखते प्रेम-छवि दृग भर फिर कर जगत समस्त॥

फूल पंखुड़ी में पल्लव, में प्रियतम रूप विलोक।भर जाता है महामोद से प्रेमी का उर ओक॥उसे प्रेममय लगता है सब सचराचर संसार।प्रेम मग्न करता है वह नित प्रेमोद्यान विहार॥

प्रेम वेदना व्यथित हृदय से मिथक प्रेम की आह।बढ़कर भूतल में भरती है नव-जीवन उत्साह॥करुणा भरे प्रेम के आँसू ढलकर सुधा समान।सोच दया की जड़ देती है जग को आश्रय दान॥

जन-जन में प्रेमी को दिखती है प्रीतम की कान्ति।इससे उसे लोक सेवा में मिलती है अति शान्ति॥कृशित जाति के उन्नति-पथ के कंटक चुनकर दूर।प्रेमी परम तृप्त होता है, आह्लादित भरपूर॥

राम नरेश त्रिपाठी,

*समाप्त*