निःस्वार्थ प्रेम

यथार्थ ईश्वर भक्त या भगवत् प्रेमी अकेला ही लाखों योद्धाओं की शक्ति रखता है। वह किसी पार्थिव सहायता का मुखापेक्षी नहीं रहता। वह तो केवल उस सर्व-शक्तिमान विश्व-नियामक परमेश्वर की कृपा का ही भिखारी होता है, उस महाशक्ति के प्रभाव सो ही वह प्रेम एवं विरह रहित होकर अपने समस्त कर्तव्यों को पूर्ण करता है। कोई भी दुःख उसे अभिभूत एवं प्रलोभन उसे विपन्न नहीं कर सकता।

उस भगवद्-भक्त का हृदय किसी निष्फल भाव अथवा किसी विपक्ष चेष्टा से कातर नहीं होता है। इसी प्रकार आरम्भ किये हुए किसी कार्य में वह असफल भी नहीं होता। अतः हे हमारे विरही दीन-हृदय जिससे प्रेम किया है, उस प्रेमी का एक बार परिचय तो दो! अपने उस ईश्वर के लिए तुमने कौन सा कर्तव्य पूर्ण किया है, और किस प्रलोभन के संग्राम में विजय प्राप्त की है, सो तो बताओ। एक बार उसकी महिमा की दीप्ति उज्ज्वल बनाने के लिए किस शत्रु को पराजित किया है, एवं कौन सा दुख सहन कर किस रूप में कीर्ति स्थापित की है, उसका भी तो हिसाब दो। अरे, तुम्हारे मुख का प्रेम केवल शब्द मात्र ही है। तभी तो तुम साधारण से दुःख या तुच्छ से द्वन्द्व अथवा स्वल्प मात्र परिश्रम से शान्त जो जाते हो।

तुम आक्षेप करते हो कि तुम्हारी शक्ति किसी प्रतिकूलता के सम्मुख ठहर नहीं सकती। किसी परीक्षा में उत्तीर्ण नहीं हो सकती। भला, जो प्रेम जीवन की प्रबल शक्ति नहीं होता, उसे मिथ्या के अतिरिक्त और क्या कहा जा सकता है? जो प्रेम स्वार्थ विमुख (निस्वार्थ) नहीं है, वह नितान्त बलहीन ही होता है।

-योगी अरविन्द


निर्भय, निष्काम, निःशेष

“आत्म जागृति के लिये अन्तःकरण को निर्भय निष्काम और सम्पूर्ण समर्पण की साधना करनी पड़ती है तात! जिस दिन तू इस तत्व ज्ञान को समझ लेगा, उस दिन तेरी अवरुद्ध आत्म प्रगति के द्वार अपने आप खुल जायेंगे।”

बहुत दिन तक आत्म शोध करते रहने के बाद भी जब सफलता के दर्शन न हुए, तब साधक को गुरुदेव के यह शब्द स्मरण आये। उन्होंने कहा था-वत्स! जब तुम्हें ऐसा लगे कि इन शब्दों का मर्म समझ से परे है, तब तुम प्रकृति की शरण में चले जाना। वह तुम्हें आत्म जागृति के लिये प्रकाश मिल जायेगा।

वर्षों तक आश्रम के जीवन में बँधे रहने वाले साधक ने उन वचनों का मर्म जानने का निश्चय किया। आश्रम का परित्याग कर वह प्रकृति की गोद में विचरण करने वाला पथिक बन गया। पथिक साधक।

वर्षा के दिन थे, मेघ आसमान में धरे थे। बूँदें अपनी सम्पूर्ण शक्ति लगाकर उत्तुंग शिखर को बहा देने में लगी थीं। प्रत्येक आघात के साथ मिट्टी का एक कण टूट जाता और ढाल में बहता बहता नीचे जा गिरता। पर्वत की देह छिन्न विच्छिन्न हो चली थी। पत्थर और वृक्ष नरकंकाल की नसों और हड्डियों की तरह लगते थे। इतने कुटिल आघात झेलने वाले शिखर के प्रति बूँदों के मन में किंचित् मात्र करुणा भी नहीं झलक रही थी।

पथिक ने पूछा-पर्वतराज! छोटी छोटी बूँदें तुम्हें चुकाये दे रही है, सारा बदन गलता जा रहा है, फिर भी तुम इतने निर्भय खड़े हो। अपने आपको इन बूँदों से बचा लो तात्! अन्यथा तुम्हारा तो अस्तित्व ही कुछ दिन में समाप्त हो सकता है।”

बादलों की हँसी में अपनी हँसी मिलाते हुए अडिग शैल ने उत्तर दिया-साधक! तुम इतना भी न जान पाये कि परिस्थितियों के आघात मनुष्य को चुकाते नहीं, ऊँचे उठाते है। तुम देखते नहीं मेरा शरीर छिला जा रहा है पर बूँदों के आघात जितने तीव्र होते है मेरे अन्तर की शक्ति और उल्लास उतना ही उद्दीप्त होता चला जाता है, तुम्हें लगता है मैं घट रहा हूँ पर मैं प्रति वर्ष कुछ न कुछ बढ़ ही जाता हूँ।”

पथिक ने कहा - हिमधर! तुम्हारी निर्भयता धन्य है। सचमुच निर्भय हुये बिना, आघातों से टकराये बिना कोई ऊँचा नहीं उठ सकता।

पथिक आगे बढ़ा-दिन भर चला, पाँव थक गये। सरिता का शीतल किनारा देखकर वह चुपचाप बैठ गया। पैर पानी में डाल दिये, बड़ी शीतलता मिली उसे पर साथ ही आत्म-ग्लानि भी हुई कि मैंने क्यों इन्हें पाद-प्रहार किया। अपने इस दुर्व्यवहार पर साधक को दुःख भी हुआ साथ की कौतूहल भी कि इतने पर भी नदी ने उसे न तो कुछ बुरा कहा और नहीं पाँव को ठोकर मारी, उल्टे उन्होंने शीतलता ही दी, जीवन ही दिया।

इतनी सरल क्यों हो सरिते? पथिक ने प्रश्न किया-इस पर नदी बोली “तात्! क्षुद्र जनों को भी हीन न समझें -इसलिये तुम नहीं जानते जो जैसा देखता है उसका अन्तरंग भी वैसा ही बनता है, यदि मैं औरों को छोटा मानूँ तो हर किसी से लड़ने झगड़ने वाली जीवन की क्षुद्रता में बदल जाऊँ। मैंने नियम लिया कोई कुछ भी करे, मुझे तो उसे उपकार की भावना से ही देखना चाहिये।”

लेकिन देवी! ठहरती तो तुम कहीं, एक पल भी नहीं सा क्यों? नदी उसी शान्त भाव से बाली - “इसलिये कि बल के चरणों में मेरा शीश न झेले, बुराइयों के आगे मेरा मस्तक नत न हो। शक्ति और शुद्धता के लिये निष्काम होना आवश्यक था, उसी व्रत का पालन मैं कर रही हूँ।”

साधक वहाँ से चलकर समुद्र के तट पर पहुँचा। साँझ हो गई थी तो भी आतप उसे जलाये ही जा रहे थे। पथिक ने पूछा-सिन्धुराज! इस तरह तो तुम्हारा सारा ही जल भाप बनकर उड़ जायेगा, तुम बड़वाग्नि का प्रतिरोध क्यों नहीं करते। निरन्तर जलते रहने में भी कुछ आनन्द है क्या।”

समुद्र ने हँसकर कहा-तात्! मैं खो रहा हूँ, तुम्हें ऐसा भ्रम हो गया है। मैं जला नहीं तो भाप कहाँ से बने, भाप न हो तो जल कहाँ से बरसे, जल न गिरे तो वृक्ष, वनस्पतियों और संसार को जीवन कहाँ से मिले? पथिक! मुझे जो जल मिलता है, यह भी तो मेरे उत्सर्ग का ही प्रतिफल है, मेरी तो इच्छा है कि और वेग से जलूँ, ताकि संसार को और भी तीव्रता से पोषण मिले। तुम नहीं जानते साधक, तब नदियाँ भी मुझे अब की अपेक्षा अधिक जल देने लगेंगी।”

पथिक को प्रत्यक्ष ज्ञान मिल गया। आत्म जागृति के लिये निर्भयता अनिवार्य है, निष्कामता होना ही चाहिये। अपने पास जो कुछ है, उस सम्पूर्ण को विश्व हित में जला देने वाले ही पूर्णता का आनन्द ले सकते है। यह मर्म समझ में आ गया, तो साधक अन्तिम साधना के लिये पुनः गुरु चरणों में वापिस लौट आया।


दीवानगी तो अब तुमसे मिलकर ही रहेगी

माँ थोड़ी देर के लिये बच्चे को छोड़कर काम में लग गई थी। बच्चे की आँखों में बड़े बड़े टेसू से आँसू भर आये। बच्चा रोया किसी ने आवाज नहीं सुनी। जिसने सुनी भी डाँटा ही, कितना मूरख है रोता है, माँ नहीं आई। बच्चे का छोटा सा जीवन दुःख और निराशा में बदल गया। घुचमुच भरे वह माँ-माँ पुकारता रहा। माँ ने सुना बच्चा रो रहा है, काम छोड़कर भागी थी वह और अपने अंग में भर कर उसे चूम-चूम कर आश्वस्त कर दिया था-वत्स मैं तुझसे दूर थोड़े ही थी। तेरे लिये ही तो कुछ करने गई थी।”

प्रियतम! मुझे नहीं पता तुम कहाँ गये, क्या करते हो। मेरे मन में तो आज विरह व्यथा के बादल घुमड़ रहे है। प्रेमी होंगे तो तुम्हें पता होगा, विरह की वेदना में कितनी छटपटाहट है। प्राणाधार! तुम कहाँ हो। तुम्हें पुकार कर मेरा मन अधीर हो चला। संसार से विरक्ति कर ली, अब यहाँ मेरा कौन रहा। तुम भी छोड़ दोगे? तुम्हारे भक्त की, तुम्हारे प्रेमी की कैसी दशा है, क्या तुम उसे भी नहीं देखने आओगे? क्या यों ही मन भटकता रहेगा और तुम दर्शन नहीं दोगे?

विरह की पीड़ा घनी ओर घनी-घनी घनी होती जा रही है। मुझे अपनी परम ज्योति का साक्षात्कार करा कर सन्तोष दो प्रभुवर! कब से आँखें तुम्हारी और निर्निमेष देख रही है। तुम कहोगे मैं पागल हो गया हूँ, उन्मत्त हो गया हूँ, देवेश! कैसे बताऊँ मेरी मनोदशा तुम्हें न पाकर कैसी हो गई है।

धैर्य टूट रहा है, इधर-उधर दौड़ रहा हूँ, व्याकुल होकर भुजा पसारे तुम्हें पा जाने के लिये बेचैन भटक रहा हूँ। हृदय रोने लगता है। विरह अग्नि से सारा शरीर झुलसा जा रहा है। कैसे निष्ठुर हो तुम। अपने समीप नहीं रखना था तो जीवन क्यों दिया था। जीवन दिया तो भक्ति क्यों दी? भक्ति दे दी तो प्रेम-विहीन ही रखते। पर अब जब यह कसक जाग गई है तो तुम्हें पाये बिना जीवित कहाँ रह सकता हूँ? तुम कहाँ हो, तुम कहाँ हो, आते क्यों नहीं, दिखाई क्यों नहीं देते। जीवन की नाव में विरह का जल भर चुका है। नाव तली में बैठने को है, लगता है अब भी बचाने नहीं आओगे, तो क्या संसार मेरे विश्वास को झूठ नहीं कहेगा? मेरी तपश्चर्या को विक्षिप्त का प्रलाप नहीं कहेगा क्या? क्या तम यह सब सुनकर भी नहीं आओगे?

साँसें बहरी हो गई है, गर्म हो गई है। शरीर मूर्छित पड़ा है। रात में नींद आई। मन तुम्हारे लिये दौड़ता रहा। नक्षत्रों के बीच एक क्षण टिक कर तुम्हारे सौंदर्य का रसपान करने के लिये बिलखता रहा। तुम्हारी ज्योति कभी पूर्व में दिखाई दी, कभी पश्चिम में। इतना भटकते हो, कभी दक्षिण में होते हो और जब तक आत्मा यहाँ पहुँचे, तुम उत्तर की और क्यों चला जाते हो। क्या यह छलना ही तुम्हारी नीति है? क्या विरहाग्नि में मुझे जला कर ही तुम्हें सुख मिलेगा?

देखो प्रभु! यह शरीर मृत्तिका कणों से भर गया। सूजी हुई आँखें नहीं देखते क्या? वृश्चिक दर्शन से पीड़ित शरीर की तरह-हृदय ड़ड़ड़ड़ व्यथा से चल रहा है। छहों ऋतुओं मेरे भीतर भर गई है। श्वाँस में ग्रीष्म, नेत्रों में बारिधारा बहने से वर्षा ऋतु का आगमन हो गया लगता है। निस्पन्द शरीर की शिथिलता में शरद ऋतु और प्रेम की पुलक में हेमन्त आसीन हो गया है। बुद्धि में शिशिर ऋतु प्रतिष्ठित है। मेरी भावनाओं में तुम्हारी दिव्य आभा के लिये अकुलाहट ही बसंत बन रही है। इन्हें इसलिये अपने शरीर में बसाया था कि तुम प्रकृति राज हो। पर तुम अन्यत्र विहार करते रहे मुझे एक क्षण के लिये ही अपना पावन प्रकाश दे देते तो हृदय में बढ़ती हुई विरहाग्नि को क्षणिक ही सही शीतलता मिलती।

तुम्हारे नामों में कितना आकर्षण है। तुम्हें करुणा सागर कहते है, पर तुम बड़े निष्ठुर हो। तुम दीन बन्धु हो पर तुम्हें मेरी दीनता पद दया कहाँ आई? कहते है तुम इतने स्नेह कातर हो कि प्रेम से भरी एक ही आवाज पर दौड़े चले आते हो, पर अपना मन सारे ब्रह्माण्ड में भटक गया पर तुम कहीं भी तो दिखाई नहीं दिये। पीड़ा निधि तुम्हें मेरी पीड़ा का पता होता तो यों ही प्रकृति की ओट में छुपे ने रहते। तुम ऐश्वर्यवान हो, प्रभुता सम्पन्न हो, सारे संसार में तुम्हारा ही वैभव है, तुम भला क्यों अपने विलास को छोड़कर आने लगे? यों ही भटकना था तो तुमने प्रेम का प्रकाश अन्तः करण में जगाया ही क्यों?

समुद्र में बड़े जोर का ज्वार आता है। उठते-उठते जल जब आकाश की सीमा का उल्लंघन नहीं कर पाता तो फिर सम हो जाता है। प्रेम का ज्वार उठता है और फिर एक क्षण के लिये चेतना ज्ञान शून्य हो जाती है। सारे शरीर में सिहरन हो उठी है। कण्ठ से बोल नहीं फूट रहे, आँखें खारी जल बरसाने लगीं। शरीर उत्तप्त हो गया। मन मन में ही आवाज आती है, मेरी आवाज को अब कौन सुनेगा। कैसी मर्म-भेद पीड़ा जागृत हुई है, न शान्त होती है और न शान्त रहने देती है। कैसी विलक्षण मिलन की इच्छा जगी है कि न समाप्त होती है न पूरी होती दीखती है।

थके-थके शरीर में भी आत्मा को चैन नहीं मिलता। फिर एक प्रकाश आता है, बुद्धि में भर जाता है। मस्तिष्क में फिर कोई कहने लगता है, आराध्य! तुम मुझसे दूर नहीं हो। मन में तुम्हीं तो बसे हो, आँखों में तुम्हारी ही तो छवि विद्यमान है। मेरी पहुँच के बाहर थोड़े ही हो। मेरे पास तुम्हीं तो खड़े हो। अभी हाथ बढ़ा दूँ तो तुम्हें पकड़ लूँ। बहुत समीप हो तुम। कही ऐसा तो नहीं फिर छल करने आये हो। अब पूरी तरह विश्वास कर लूँगा कि अब नहीं जाओगे, तभी हाथ बढ़ाऊँगा। तुम्हें मेरे प्रेम की प्यास है तो उसका आनन्द पास खड़े खड़े लेते रहते हो। मुझे भी तो तुम्हारे प्रेम की प्यास है तो फिर तुम मुझसे दूर क्यों हो जाते हो। अच्छा अब मैं हाथ बढ़ाता हूँ। तुम ओझल नहीं हो रहे हो पर पास भी तो नहीं आते। चमक उठते हो तुम, जब-जब मैं तुम्हें ढूँढ़ता हूँ पर जब तुम्हीं में आत्मसात् हो जाने के लिये दो पग आगे बढ़ता हूँ तो मैं ही मैं अकेला मैं ही रह जाता हूँ, तुम कहाँ चले जाते हो। कैसी विलक्षण कहानी है, कुछ कहते नहीं बनता। गूँगे को गुड़ की सी मधुरिमा मेरे अंग प्रत्यंग में भर देते हो। इतना विश्वास दिलाते हो जितना संसार के करोड़ों जन मिलकर भी नहीं दिला सकते, पर इतने अविश्वासी हो कि एक ही क्षण में दूर भाग जाते हो प्रभु! अब इस निबन्ध को पूरा करो। प्रेम की पीड़ा इतनी न बढ़े कि आग बन जाये और उसमें तुम्हारे भक्त का अस्तित्व ही समाप्त हो जाय?

समाप्त होना है तो हो जाये। कब तक यह दर्द सहूँ? तुम्हारे सान्निध्य की ललक है। चाह से मन भर गया है। तुम्हें पाने के लिये मेरा जो कुछ था, सब छोड़ दिया, अब जो है वह तुम्हारा ही तो है। तुम्हारा तुमसे ही समाप्त होता है तो हो जाने दूँगा। अब अपनेपन का भाव भी नहीं रखूँगा। अब यह नहीं भूलूंगा कि मुझे अपना अहंभाव भी तुम्हीं में समर्पित कर देना है। अपने अस्तित्व को अब मिलन के रास्ते में बाधा न बनने दूँगा। पैरों में चाहे कितने काँटे और कंकड़ चुभे पर मुस्कराता हुआ चलता ही रहूँगा, जब तक तुम्हें अपने आपमें भर न लूँ, तुम में स्वयं न समा जाऊँ, कितनी ही पीड़ा हो, कितनी ही छटपटाहट हो, हूक और ललक उठे मेरे पग रुकें नहीं। दीवानगी को इति-श्री तो अब तुमसे मिलकर ही होगी।


ईसा

अपनी गिरफ्तारी से कुछ दिन पूर्व ईसा जेरूसलम में ही प्रचार कर रहे थे, जहाँ कि उनकी जान के ग्राहक सबसे ज्यादा थे, साथ ही जहाँ प्रचार की सबसे अधिक आवश्यकता थी। उनके शिष्यों ने उनसे जेरूसलम छोड़ देने के लिये अनुरोध करते हुये कहा-यहाँ के लोग आपको मार डालने की घात में हैं।” किन्तु ईसा ने वहाँ से जाना अस्वीकार करते हुये कहा-जीवन को उत्सर्ग किये बिना न तो सत्य की प्रतिष्ठा होगी और न उसका महत्व बढ़ेगा।”


भगवान् का स्वरूप, दार्शनिकों और वैज्ञानिकों की दृष्टि में

विश्व विख्यात वैज्ञानिक डा अरिस्ट्रोटल को संसार में सबसे बड़ा आश्चर्य था, ब्रह्माण्ड का स्वरूप और उसकी नियमित गति। एक प्रकाश वर्ष की दूरी 186000x60x60x24x3651/4= 20543997600000 मील होती है। सैद्धान्तिक अनुमान है कि यह जो ब्रह्माण्ड दिखाई दे रहा है, वह 50 करोड़ प्रकाश वर्ष की दूरी में (व्यास) में फैला हुआ है। हम जिस सूर्य के प्रकाश से अपना जीवन चलाते है, वह जिस आकाश गंगा (नेबुला) से प्रकाश लेता है, ऐसी ऐसी दस करोड़ दस करोड़ आकाश गंगायें अन्तरिक्ष में प्रकाश फैलाती हुई अरबों सूर्यों को चमका रही है। इसमें अन्य ग्रह नक्षत्रों की तो संख्या गिनी भी नहीं जा सकती।

इतना बड़ा संसार भी कितनी नियम और व्यवस्था के साथ चल रहा है। और तो और हमारा मस्तिष्क गणित के द्वारा पहले ही ग्रह-नक्षत्रों के परिभ्रमण पथ पर होने वाले ग्रहण आदि संघात का पता लगा लेता है, इसका अर्थ हे कि संसार अनियमित नहीं। इतने विराट् जगत को घुमाने वाला कोई महान् शक्तिशाली तत्व होना चाहिये। अरिस्टोल का कथन है, वह केवल ईश्वर ही हो सकता है। भगवान के अतिरिक्त और किसी में यह शक्ति नहीं “परमात्मा सृष्टि का संचालक है।” यह उनकी मान्यता थी।

हवेर्ट स्पेन्सर की दृष्टि में भगवान् एक विराट् शक्ति है, जो संसार की सब गतिविधियों का नियन्त्रण उसी प्रकार करते है, जिस प्रकार मुखिया घर का, प्रधान गाँव का, कलेक्टर जिले का, गवर्नर प्रदेश का और राष्ट्रपति राष्ट्र की भोजन, वस्त्र, निवास, सुरक्षा आदि की व्यवस्था करता है। उन्होंने कहा-राज्य के नियमों का हम इसलिये आदर करते है, क्योंकि हमें राज्य की शक्ति से भय होता है। नैतिक नियमों का पालन न करने पर भी हमें भय लगता है, जबकि हम उसके लिये पूर्ण स्वतन्त्र होते है, यह इस बात का प्रमाण है कि संसार में कोई सर्वोच्च सत्ता काम करती है, हम उसके परिचय में कभी न कभी रहे है। क्योंकि हम डरते है। निर्भीक व्यक्ति नैतिक व्यक्ति ही हो सकता है, इसलिये उसे संसार की व्यवस्था ईमानदारी और न्याय से करने वाला प्रजावत्सल तत्व होना चाहिये।”

सुप्रसिद्ध दार्शनिक कान्ट ने हर्बर्ट स्पेन्सर के कथन को अधिक स्पष्ट किया है। वह लिखते है - “नैतिक नियमों से स्वीकृति ही परमात्मा के अस्तित्व का प्रमाण और पूर्ण नैतिकता ही उसका स्वरूप है। संसार का बुरे से बुरा व्यक्ति भी किसी न किसी के प्रति नैतिक अवश्य होता है। चोर, डकैत भी नहीं चाहते कि कोई उनसे झूठ बोले, छल या कपट करे। जबकि वे स्वयं सारे जीवन भर यही किया करते है। अपने भीतर से नैतिक नियमों की स्वीकृति इस बात का प्रमाण है कि संसार केवल नैतिकता के लिये ही जीवित है उसी से संसार का निर्माण पालन और पोषण हो रहा है, इसलिये भगवान् नैतिक-शक्ति के रूप में माना जाने योग्य है।”

हैब्रयू ग्रंथों में ईश्वर को ‘जेनोवाह’ कहा गया है। जेनोवाह का अर्थ है, वह जो सदैव सत्य नीति ही प्रदान करता है। मनुष्य अपने स्वार्थ के लिये दूसरों को ठगता देखा जाता है पर पाया गया है कि ऐसा व्यक्ति कुछ ही दिनों में लोगों के आदर से, सम्मान से वंचित हो जाता है। कभी-कभी तो ऐसे लोगों की इसी जीवन में दुर्गति होते देखी गई है। इस सब का यह अर्थ है कि विश्व की सम्पूर्ण व्यवस्था किसी सत्य के आधार पर चल रही है। जो भी उससे हटने का प्रयत्न करता है, वह पीड़ित और प्रताड़ित होता है, जबकि इन नियमों पर आजीवन आरुढ रहने वाले व्यक्ति साँसारिक दृष्टि से कुछ घाटे में भी रहें तो भी उनकी प्रसन्नता में कोई अन्तर नहीं आता।

सत्य और नीति निष्ठा द्वारा संसार का नियन्त्रण करने वाली ऐसी शक्ति जो प्रत्येक व्यक्ति की आकांक्षाओं में विद्यमान् रहती है, वही ईश्वर है।

प्रसिद्ध दार्शनिक प्लेटो की ईश्वरीय मान्यता भी लगभग ऐसी ही थी, कहते थे-ईश्वर अच्छाई का विचार है।” संसार के प्रत्येक व्यक्ति यहाँ तक कि जीव-जन्तुओं को भी अच्छाई की चाह रहती है। जहाँ अच्छाई होती है, वहीं आनन्द रहता है। अच्छाई शरीर और सौंदर्य की जो संयम और सदाचार के द्वारा सुरक्षित हो, अच्छाई शरीर और वस्त्रों की जो धोने और स्नान करने से सुरक्षित हो अच्छाई वातावरण की, घर, गाँव और नगरों की जो स्वच्छता और सफाई द्वारा सुरक्षित हो, अच्छाई प्रकृति की, जो हरे भरे पौधों और खिलते हुये रंग-बिरंगे फूलों, भोले भाले पशु-पक्षियों के कलरव और उछल कूद से सुरक्षित हो। इस तरह संसार में हम सर्वत्र अच्छाई के दर्शन करके प्रसन्नता अनुभव करते है। यही प्रभुत्व है, इन्हीं से आनन्द मिलता है, इन्हीं से संसार में आने का मजा आता है। सो भगवान को यदि मानें तो उसे अच्छाई का वह बीज मानना पड़ेगा, जो आँखों को दिव्य मनोरम और बहुत प्यारा लगता है।

प्रसिद्ध वैज्ञानिक न्यूटन के एक बार उनके एक मित्र ने आश्चर्य व्यक्त करते हुए पूछा - “आप वैज्ञानिक होकर भी ईश्वर में आस्था रखते है? उसकी प्रार्थना किया करते है? यदि भगवान सचमुच है तो वह क्या है?

‘ज्ञान’ न्यूटन ने गम्भीरतापूर्वक उत्तर दिया। उन्होंने कहा-हमारा मस्तिष्क ज्ञान की खोज में जहाँ पहुँचेगा है, वहीं उसे एक शाश्वत चेतना का ज्ञान होता है। कण-कण में यह जो ज्ञान की अनुभूति भरी हुई है, वह परमात्मा का ही स्वरूप है। सृष्टि का कोई कण चेतना से वंचित नहीं, परमात्मा इसी रूप में सर्वव्यापी है। ज्ञान की ही शक्ति से संसार का नियन्त्रण होता है, विनाश करना चाहो तो भी ज्ञान की ही आवश्यकता होती है। परमात्मा इस रूप से ही सर्व शक्तिमान है। शरीर के एक एक कोष (सेल्स) में ज्ञान की ही पैठ है और उसने कोई सूक्ष्म तत्व नहीं, जो अणु से अणु में भी प्रवेश कर सके, परमात्मा इस रूप में ही अनन्त विस्तार के जगत् में समाया हुआ है।”

स्पिनोजा ने विज्ञान और दर्शन दोनों का अध्ययन करके बताया कि “संसार में दो प्रकार की सत्तायें काम कर रही हैं, एक दृश्य, एक अदृश्य। एक का नाम है, प्रकृति या पदार्थ यह दिखाई देता है दृश्य, एक अदृश्य। एक का नाम है, प्रकृति या पदार्थ यह दिखाई देता है। दृश्य संसार प्रकृति की ही रचना है, अपना शरीर भी पदार्थ से बना है। इसमें भी धातुएँ, खनिज, लवण, गैसें आदि भरी पड़ी है पर विचार उससे भिन्न है, यह दिखाई नहीं देता पर हम उसे हर घड़ी अनुभव करते है। हमारे जीवन की सारी क्रियाशीलता विचारों की ही देन है। विचार ठण्डे पड़ते ही शरीर ठण्डा पड़ जाता है। विचार मरे शरीर मर गया। मृत्यु के अन्तिम क्षण तक विचार-प्रक्रिया का बने रहना बताता है कि विचार ही विश्व-व्यापी चेतना या ईश्वर है। विचार कभी नष्ट नहीं होते, ईश्वर भी अविनाशी है। निःसन्देह अविनाशी विचार ही भगवान् है। या यों कहें कि भगवान का स्वरूप गुण ओर विचारमय ही हो सकता है, चाहें वह किसी शक्ति कणों के रूप में हो अथवा प्रकाश रूप में पर विचारों का अस्तित्व संसार में है अवश्य। हम सदैव ही उनसे प्रेरित, प्रभावित होते रहते है। विचारों को काई भी व्यक्ति अपना नहीं कह सकता। फ्रायड को भी कहना पड़ा था कि विचार अवचेतन मन से आते है और मनुष्य का उस पर काई नियन्त्रण नहीं, वह कोई स्वतन्त्र सत्ता है।”

वैज्ञानिक हीगल ने भी भगवान् को सामान्य इच्छाओं से उठा हुआ, इच्छाओं को भी नियन्त्रण में रखने वाला परम विचार (एब्सोल्यूट आइडिया) बताया है। जिस प्रकार प्रत्यक्ष में देखने से हमारा मस्तिष्क एक प्रकार से विचारों का पुँज है, इसी के किसी कोने से विचारों का प्रवाह निरन्तर चलता रहता है। इसी तरह सारे विश्व में फैले विचार किसी केन्द्रीभूत सत्ता से प्रस्फुटित हो रहे है, जिस प्रकार सूर्य में आक्सीजन जलती रहती है और होतियक के कण उछलते रहते है, उसी प्रकार संसार के किसी भाग से नियमित विचारों का निर्झर झरता रहता है। उस केन्द्रीभूत सत्ता का नाम हीगल ने परमेश्वर बताया।

इमर्सन और बर्कले के मत में ईश्वर सब आत्माओं में श्रेष्ठ शक्ति का नाम ही परमात्मा है। उन्होंने तत्व दर्शन का सहारा लिया था। सारा संसार कहीं से उधार प्राण और चेतना ले रहा है। यह चेतना और प्राण शक्ति अपने मूलरूप में एक जैसी ही है। विचार ग्रस्त होने के कारण वह अनेक जीवों के रूप में दिखाई देती है पर आत्म-चेतनता के सभी लक्षण मनुष्य और पशु प्राणियों में समान है। जिस तरह बड़े विद्युत घर से विद्युत लेकर छोटे छोटे बल्ब जलने लगते है, उसी प्रकार प्राणियों की चेतना भी किसी मूल तत्व से प्राण और प्रकाश लेकर अस्तित्व में आती है। जो सब आत्माओं का उद्गम है, वही परमेश्वर है। यदि आत्माओं का स्वरूप प्रकाश है तो परमात्मा भी प्रकाश है, यदि ज्ञान या विचार तो परमात्मा भी ज्ञान या विचार है। यह सारी विशेषताएँ वस्तुतः एक ही हैं, कहने भर का अन्तर जान पड़ता है।

डा ब्रडले भगवान को जानने के लिये अनुभवों का रूप समझने की प्रेरणा देते है। उनका कहना है, हमारे अन्दर जो अनुभूति कोष है, वह पदार्थ ही नहीं प्रकाश, ताप, चुम्बक, विद्युत कणों से भी भिन्न है, इसलिये उन्होंने भगवान को अनुभव (एब्सोल्यूट) अनुभव कहा है। यह सारी बातें मिलकर एक अध्यात्मवादी सृष्टि का निर्माण करती हैं, इसलिये यूकन ने उसे आध्यात्मिक जीवन का आधार कहा। जगद्गुरु शंकराचार्य और उपनिषद् दर्शन उसे ही ‘अहंब्रहास्मि’ ‘तत्वमसि’ ‘अयमात्मा ब्रह्म’ मैं ही ब्रह्म हूँ, ‘परमात्मा तत्व रूप है। यह मेरी आत्मा ही ब्रह्म है आदि सूक्तों से सम्बोधित करते है। यह सारी विशेषताएँ परमात्मा के स्वरूप के भिन्न भिन्न विशेषण है, तत्परः वह एक ही है।

डा ब्रडले भगवान को जानने के लिये अनुभवों का रूप समझने की प्रेरणा देते है। उनका कहना है, हमारे अन्दर जो अनुभूति कोष है, वह पदार्थ ही नहीं प्रकाश, ताप, चुम्बक, विद्युत कणों से भी भिन्न है, इसलिये उन्होंने भगवान को अनुभव (एब्सोल्यूट) अनुभव कहा है। यह सारी बातें मिलकर एक अध्यात्मवादी सृष्टि का निर्माण करती हैं, इसलिये यूकन ने उसे आध्यात्मिक जीवन का आधार कहा। जगद्गुरु शंकराचार्य और उपनिषद् दर्शन उसे ही ‘अहंब्रह्मास्मि’ ‘तत्वमसि’ ‘अयमात्मा ब्रह्म’ मैं ही ब्रह्म हूँ, ‘परमात्मा तत्व रूप है। यह मेरी आत्मा ही ब्रह्म है आदि सूक्तों से सम्बोधित करते है। यह सारी विशेषताएँ परमात्मा के स्वरूप के भिन्न भिन्न विशेषण है, तत्वतः वह एक ही है।


असंभाव्य का संभव होना

असंभाव्य का संभव होना ही ईश्वर की उपस्थिति का प्रमाण है, समर्थ गुरु रामदास ने अपने शिष्यों को समझाया पर उनकी समझ में यह बात आई नहीं। रामदास उन्हें लेकर एक स्थान में गये, जहाँ कुछ मजदूर पत्थर तोड़ रहे थे। एक मजदूर ने घन चलाकर एक बड़े पत्थर को जैसे ही तोड़ा तो सब लोग यह देखकर अवाक् रह गये, उसके भीतर जहाँ हवा भी न जा सकती थी-पानी भी है और एक मेंढक भी। उन्हें सब बात समझ में आ गई।


आत्मा की अमरता कल्पना मात्र नहीं

लेनिनग्राड के प्रसिद्ध वैज्ञानिक प्रोफेसर एल॰ लोजिन लोजिनस्की की ड़ड़ड़ड़ विषय में गम्भीर रुचि है, उन्होंने अनेक प्रयोग करके यह जानने का प्रयत्न किया है कि मृत्यु और जीवन में मूलमंत्र क्या है मृत्यु के बाद भी चेतना का अस्तित्व बना रहता है।

1964 में उन्होंने एक प्रयोग किया। मक्के के कीटों की 269 अर्थात् शून्य से 4 डिग्री ऊपर हीलियम द्रव (लिबिम्बड) में जमा दिया। साड़े छः घण्टे इसी दशा में रखने के बाद उन्होंने ताप देकर उनमें क्रमिक रूप से चेतना लाने का प्रयत्न किया। निष्कर्ष यह निकला कि 20 में से 13 कीट तो फिर से जीवित हो गये, किन्तु शेष 7 में किसी प्रकार की चेतना लाना सम्भव न हुआ।

इसी प्रकार का एक और प्रयोग सोवियत के ही दूसरे वैज्ञानिक नेगोवस्की ने किया, इसका विवरण कुछ दिन पहले ‘डिस्कवरी’ पत्रिका में छपा था। बात यों हुई कि एक 23 वर्षीय युवक कृषक ड़ड़ड़ड़ खारिन एक दिन अपने खेतों पर ट्रैक्टर चला रहा था। एकाएक जोर का बर्फीला तूफान आ गया और ड़ड़ड़ड़ खारिन गिर पड़ा। उसके ऊपर बर्फ जमा हो गई। इसी अवस्था में वह 6 घण्टे तक पड़ा रहा। 6 घण्टे बाद उसका शरीर बाहर निकाल कर अस्पताल पहुँचाया गया। डाक्टरों ने घोषणा की युवक की मृत्यु हो गई है।

नेवोवस्की ने तब एक प्रयोग किया। उन्होंने मृतक के पाँवों को गर्म पानी में डाला और उसे एड्रेनेलीन का इञ्जेक्शन देकर कृत्रिम श्वाँस देना प्रारम्भ किया शरीर में बाहर से थोड़ा रक्त पहुँचाकर उसे बिस्तर पर लिटाया गया और गर्म बोतल से ड़ड़ड़ड़ गई। उष्णता का संचार होते ही धीरे धीरे साँस क्रिया भी चलने लगी। मृतक जीवित हो गया और पूर्ण स्वस्थ होकर काम-काज भी करने लगा।

इन दोनों घटनाओं के विश्लेषण से पूर्व यह जान लेना आवश्यक है, मृत्यु है क्या साधारणतया हृदय और श्वाँस गति रुक जाने को मृत्यु कहते है। किन्तु अब वैज्ञानिक यह बात नहीं मानते। आपरेशन करते समय हृदय-गति रुक जाती है, डाक्टर मालिश करके उसे फिर प्रारम्भ कर लेते हैं, इन दिनों हृदय बदलने के अनेक प्रयोग हो रहे है, इस क्रिया में दूसरा हृदय-प्रतिरोपण करने से पहले, पहला हृदय निकालना आवश्यक होता है। 20 अगस्त 1968 में जालन्धर में हुई एक ताँगा दौड़ में रोशनलाल नामक ताँगे वाले का मोटर ऐक्सीडेन्ट हो गया। जब तक उसे अस्पताल पहुँचाया जाये उसकी हृदय गति रुक गई और 20 मिनट तक उसकी यह अवस्था रही। इसके बाद डाक्टरों ने कृत्रिम विधि से मालिश द्वारा पुनः हृदय में धड़कन पैदा की और रोशनलाल जीवित कर लिया गया। रुकी हुई साँस पुनः प्रारम्भ की जा सकती है, हृदय गति रुकना मृत्यु नहीं। इस तरह मृत्यु के रहस्य-वैज्ञानिकों के लिये और भी रहस्यपूर्ण हो गये है।

लोगों की यह कल्पना कि मनुष्य को आक्सीजन भोजन या पानी नहीं मिले तो उसकी मृत्यु हो जायेगी, भी निराधार सिद्ध हो चुकी है। शरीर को गर्म रखने के लिये यह वस्तुऐं केवल घड़ी की सुई की तरह काम करती है। यदि हवा, पानी और भोजन न मिले तो भी मनुष्य जिन्दा रह सकता है, भारतवर्ष में समाधि लगाने वाले योगी इस बात के प्रत्यक्ष उदाहरण है। इस सम्बन्ध में कभी विस्तृत प्रकाश डालेंगे पर आज यदि कोई योग की यह बात मानने को तैयार न होता उसे हम अन्तरिक्ष अभियान के वैज्ञानिकों के पास ले चलना चाहेंगे।

बुध, शुक्र, मंगल, बृहस्पति आदि की दूरी के अनुपात से जो विवरण प्राप्त किये गये हैं, उनसे पता चलता है कि यदि कोई अन्तरिक्ष यात्री यूरेनस नेपच्यून जाना चाहे तो उसे 32 और 61 वर्ष तो केवल वहाँ जाने और आने में ही लग जायेंगे, इतनी आयु अन्तरिक्ष में गँवाना किसी भी स्थिति में सम्भव नहीं। इस स्थित के लिये रसायनज्ञों ने एक उपाय यह निकाला है कि मनुष्य अपने शरीर से निकाले गये परमाणुओं का बार बार उपयोग कर सके और उसे प्रसूत अवस्था में लाया जा सके तो बिना कुछ खाये पिये, हवा लिये भी मनुष्य इतनी लम्बी अवधि तक जीवित बन रह सकता है। अर्थात् उसके मस्तिष्क के कोश भी अर्द्ध-मूर्छित अवस्था में स्वप्न की चेतना की तरह काम करते रहेंगे पर उन्हें बाह्य दृष्टि से कोई जानकारी न होगी। वैज्ञानिकों के इस निष्कर्ष से पता चलता है कि जीवन के समान ‘सुषुप्ति’ भी एक अवस्था है। जीवन और मृत्यु के इस बीच की इस स्थिति के सम्बन्ध में व्यापक खोज की जा रही है और यह निकट भविष्य में ही सम्भव हो जायेगा, जब मृत्यु को भी प्राणी के जीवन की एक सामान्य अवस्था मान लिया जायेगा।

उदाहरण के लिये सोवियत वैज्ञानिक प्रोफेसर पी0 कोप्तरेव ने जल-कीट डाफनिया (जल में पाया जाने वाला एक विशेष कीड़ा) और शैवाल को उन क्षेत्रों से निकाला, जहाँ स्थायी रूप से बर्फ जमी रहती है। हिसाब लगाकर देखा गया कि इनमें से कुछ जीव 25 हजार वर्ष प्राचीन थे। बर्फ में यह गुण होता है कि उसमें शरीर के कोष मरते नहीं हिमालय के भालू 6-6 महीने बर्फ में दबे पड़े रहते है, फिर बर्फ के हटते ही सूर्य की धूप लगने से उनके शरीर में स्वतः श्वाँस प्रश्वास प्रारम्भ हो जाता है और वे इतने दिन बिना किसी आहार, आक्सीजन और पानी के भी जीवित हो उठते है। डा कोप्तरेव ने भी इसी तरह गर्मी देकर इन 25 हजार वर्ष पूर्व के जीवों को जीवित कर दिया। इतनी लम्बी अवधि तक सुषुप्ति अवस्था में रहना रह बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि चेतना का कभी अन्त नहीं होता। शरीर ही उसे स्वीकार न करे या उसके निवास योग्य न रहे, यह दूसरी बात है।

अब वैज्ञानिक इस बात का अध्ययन कर रहे है कि रासायनिक तत्वों का कार्बनिक (आर्गेनिक) पदार्थों से संश्लेषण किस प्रकार हो सकता है। सम्भवतः अन्तरिक्ष यानों में क्लोरेला (माइक्रोस्कोपिक एल्गी एक प्रकार का पौधा) की नर्सरी से संश्लेषण की क्रिया पूरी की जा सकती है, इससे अचेतन अवस्था में पड़े शरीर अपने शारीरिक अक्लिष्ट से ही उसी प्रकार जीवन बनाये रख सकते है, जैसे मनुष्यों और पशुओं द्वारा छोड़ी साँस और मल मूत्र से पौधे जीवनी शक्ति लेते रहते है। यदि यह प्रयोग सफल हो गया तो मनुष्य के शरीर को अचेतन अवस्था में कितने भी वर्ष तक रखकर उसे इच्छानुसार मारा और जगाया जा सकता है। इस बीच की अवधि में उसे बाहर से न तो भोजन की आवश्यकता होगी, न पानी की और न आक्सीजन की।

इन बातों से उपरोक्त प्रयोगों का विश्लेषण किया जा सकता है। पूर्ण मृत्यु तब होती है, जब मस्तिष्क के कोषों (सेल्स) को इतना आघात पहुँच जाये कि वे सदैव के लिये काम करना बन्द कर दें। हृदय और साँस की क्रियायें बन्द हो जाती है, तब भी मस्तिष्क काम करता रहता है। इससे निर्विवाद साबित होता है कि चेतना का प्रत्यक्ष सम्बन्ध शरीर से नहीं, मानसिक शक्तियों से है। मस्तिष्क एक ऐसी जटिल प्रणाली है, जिसके बारे में वैज्ञानिक भी हाथ पर हाथ धरे बैठे है, अभी तक बाह्य मस्तिष्क की अधिक से अधिक 17 प्रतिशत जानकारी उपलब्ध की जा सकी है। मध्य-मस्तिष्क (मिलि ब्रेन) की तो कुल 3 प्रतिशत ही जानकारी हो सकी है। इसीलिये वैज्ञानिकों के लिये मृत्यु अब भी रहस्य बनी हुई है।

हृदय-गति रुकने से मस्तिष्क को शुद्ध रक्त मिलना बन्द हो जाता है। इससे वह शकर-प्रज्वलित कर सकने में असमर्थ होता है। इसी क्रिया के द्वारा मस्तिष्क को शक्ति मिलती है। देखा गया है कि रक्त न मिलने पर भी वह 6 मिनट तक आपत्तिकालीन उपायों के सहारे जीवित बन रह सकता है। वैज्ञानिक इन आपत्तिकालीन सहायताओं का अध्ययन करके मस्तिष्क का सीधा सम्बन्ध अर्गानिक पदार्थ के संश्लेषण से जोड़ने के प्रयत्न में है। यदि ऐसा कोई उपाय निकल आया तो योगीजन की समाधि के समान वैज्ञानिक भी मनुष्य को अर्द्ध-जीवित (सुषुप्ति) अवस्था में सैकड़ों वर्ष तक बनाये रख सकते है।

विज्ञान के लिये जो सम्भावना है, योगियों के लिये वही इच्छा मृत्यु। चेतना की अमरता की परिपूर्ण जानकारी भारतीय तत्व-वेत्ताओं ने मानसिक एकाग्रता, ध्यान और समाधि के द्वारा प्राप्त करके ही यह बताया है कि-

देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवन जरा।

तथा देहान्तर प्राप्तिर्धीस्तत्र न मुह्मति॥

-गीता 2।13,

अर्थात्-जैसे जीवात्मा की इस देह में कुमार युवा और वृद्ध अवस्था होता है, वैसे ही वह अन्य शरीरों की भी प्राप्ति करता है। धीर पुरुष शरीर में मोहित नहीं होते।

न जायते भ्रियते वा कदाचि-त्रायं भूत्वा भविता वान भूपः।

टजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो,

न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥

-गीता 2।20

हे अर्जुन! यह आत्मा व किसी काल में जन्म लेती है और न मरती है और न यह आत्मा ही करके फिर होने वाली है, यह अजन्मा, नित्य शाश्वत (अमर) और पुरातन है, शरीर के नाश हो जाने पर भी यह नाश नहीं होती।

शरीर के कोषों को सुरक्षित रखकर लम्बे समय तक चेतना को अमर बनाये रखा जा सकता है पर यह केवल तभी सम्भव है जब मस्तिष्क की आधी चेतना बनी रहे। ऐसा भी हुआ है कि जब मस्तिष्क के एक दो ‘सेल’ मात्र ही जीवित बन रहे हों और उनसे मृत शरीर को कई महीनों बाद भी पुनर्जीवन जाग गया हो। प्लूटो आदि की लम्बी यात्राओं में भी अन्तरिक्ष यात्री को ऐसे उपकरणों में घेरकर लिटाया जायेगा जो अचेतावस्था (एनेबायोसिस) निद्रा का नियन्त्रण और रक्षा करते रहेंगे क्योंकि वैज्ञानिक जान गये है कि चेतना को बाँधा नहीं जा सकता अधिक से अधिक अवस्था परिवर्तन किया जा सकता है, क्योंकि मृत्यु स्वयं भी एक अवस्था परिवर्तन है, अर्थात् चेतना शरीर से लुप्त होकर भी मानसिक जगत् में उसी तरह बनी रह सकती है, जिस तरह स्वप्न या सुषुप्ति की अवस्था में अनुभूतियाँ होती है पर बाह्य इन्द्रियों का सहयोग न मिलने से स्थूल जानकारियाँ नहीं मिल पातीं। आत्मा तब अपने ही प्रकाश में काम करती है।

शरीर की बनावट और जीवन का उससे सम्बन्ध इतना जानना ही जीवन की यथार्थ जानकारी नहीं दे सकता क्योंकि वह अवस्था भी है, और मनोविज्ञान भी। वैज्ञानिकों में से अनेक ऐसे है, जो अब यह स्वीकार मात्र का परिवर्तन होता है और वह भी नियम बद्ध होता है। हमें देखना होगा कि क्या हमारी मानसिक क्रियायें आत्मा को प्रभावित करती हैं। एक शरीर से, दूसरे शरीर में आने जाने में मनोमय जगत् का क्या हाथ है? यदि हम इन बातों को समझ पाये तो आध्यात्मिक स्तर पर जीवन को शुद्ध सात्विक बनाने और आत्मा की प्राप्ति अमरत्व या मुक्ति की आवश्यकता भी अनुभव करने लगेंगे।

वैज्ञानिकों ने जो प्रयोग किये है, वह चेतना के शारीरिक सम्बन्ध तक ही सीमित है, उसके आगे की लक्ष्य पूर्ति आध्यात्मिक उपादान द्वारा ही सम्भव होगी। हमारे लिये यह सबसे बड़े सौभाग्य की बात होगी, यदि हम जीवन की इस अनिवार्य आवश्यकता को समझ जायें और लक्ष्य प्राप्ति के प्रयत्नों में जुट जायें।


मैं तुम दोनों से श्रेष्ठ हूँ

शिल्पी और उसकी कला, आपस में ही उलझ पड़े। शिल्पी से कला बाली-मेरे ही कारण तुम्हारा नाम संसार में अमर रहता है। अतः मैं तुम से श्रेष्ठ हूँ।”

शिल्पी का कहना था-मैं तेरा जन्मदाता हूँ। मेरे ही कारण तुझे अमरत्व प्राप्त होता है। अगर मैं न होऊँ, तो तेरी अभिव्यक्ति कौन करे? अतः मैं तुझसे श्रेष्ठ हूँ।”

विवाद बड़ी देर तक चलता रहा कोई हार मानने को तैयार न हुआ। तभी पास पड़ा हुआ पत्थर का टुकड़ा बोल उठा-बावलों! क्यों झगड़ते हो आपस में? मेरे बिना-न तो तुम्हारी भावाभिव्यक्ति भी नहीं हो सकती है शिल्पी! और कला बहन! तुम भी तो आकार मुझ से पाती हो। अतः मैं तुम दोनों से श्रेष्ठ हूँ।”


आध्यात्मिक जीवन इस तरह जिये

इस जीवन के बाद मनुष्य का एक और भी जीवन है, जो कि इस जीवन से लाखों करोड़ों गुना लम्बा है। कितने वर्षा, युगों और कल्पों तक यह जीवन चलता है, इसका अनुमान सम्भव नहीं है। यह एक प्रकार से अपनी अपरिमित अवधि के कारण अनन्त और अमर भी कहा जा सकता है। उसे पारलौकिक जीवन कहा गया है।

पारलौकिक जीवन के विश्वास में सन्देह की गुँजाइश अब नहीं रह गई। आज का विज्ञान भी मनुष्य के रहस्यों को खोजता हुआ, कुछ ऐसे निष्कर्ष पर पहुँच रहा है, जिसमें पारलौकिक जीवन के प्रमाण मिले है। किन्तु भारतीय ऋषि-मुनियों ने तो अपनी साधना, अपने ज्ञान और अपनी तपस्या के आधार पर इसका बहुत पहले पता लगाकर घोषणा कर दी थी और इसीलिए सारा भारतीय जीवन उसको ही लक्ष्य मानकर, उसको ही दृष्टि में रखकर निर्धारित किया गया है। पारलौकिक जीवन को अदृष्टिगोचर रखकर लौकिक जीवन नहीं जिया जा सकता और जो ऐसा करते है, अनियोजित तथा अबूझ जीवन जीते है, वे धोखा खाते है और अपने उस अनन्तकाल जीवन के लिये काँटे बो लेते है।

लौकिक जीवन पारलौकिक जीवन की तैयारी का अवसर है। इसको ही यथार्थ अन्तिम जीवन मान लेना भारी भूल है। मनुष्य यहाँ इस जीवन में जो कुछ पाप-पुण्य दुख-सुख भलाई-बुराई स्वार्थ-परमार्थ संचय करता है, वही उसके साथ जाकर उस पारलौकिक जीवन में फलित तथा प्रस्फुटित होता और उसी के अनुरूप जीव अनन्तकाल तक सुख दुख अथवा स्वर्ग नरक भोगा करता है। वर्तमान जीवन अनागत जीवन की तैयारी का एक अवसर है। इस तथ्य को कभी न भूलना चाहिये और उसको सुखद तथा सन्तोषप्रद बनाने के लिए, यहीं अभी से तैयारी कर लेनी चाहिये।

जीव का जागरूक जीवन अविश्वनीय तथा नश्वर है। इसे नष्ट तो होना ही है, पर साथ ही यह भी पता नहीं कि यह सौ वर्ष तक जायेगा या इसी क्षण अथवा अगले क्षण छुट जायेगा। इस नश्वरता और क्षणिकता के प्रमाण बनकर न जाने कितने ही आकस्मिक मरने वाले आँखों और कानों के सामने से गुजरते रहते है। सोते हुये, खाते और पीते हुए, हँसते और बोलते हुये, खेलते और काम करते हुये, न जाने कितने जीव नित्य ही इह लीला समाप्त कर अपने दीर्घकालीन पारलौकिक जीवन में प्रवेश करने और यहाँ का लेखा जोखा भोगने के लिये चल देते है। बेटा बैठा रहता है, पत्नी खड़ी रहती है, सम्बन्धी देखते रहते हे, सम्पत्ति और संचय पड़ा रहता है पर आवाज सुनते ही पंछी पूरी अधूरी योजनाएँ, कार्यक्रम, बात-चीत और व्यवहार बर्ताव सब कुछ छोड़कर उड़ जाता है।

अस्तु इस जीवन का कुछ पता नहीं कि यह किस समय अपनी गति को मति में बदल दे। इसलिये बुद्धिमानी इसी में है कि इसकी क्षणभंगुरता को स्वीकार कर तुरन्त इसी क्षण से अपने पारलौकिक जीवन की तैयारी में संलग्न जो जाया जाये। जो बिना संबल, संचय किये अनन्त प्रवास में चला जायेगा, उसे अनन्त कष्ट होंगे, यह निश्चय है। वहाँ यहाँ जैसी स्वाधीनता और सुविधा नहीं है, जो यहाँ से न भी ने जायें, वहाँ बना लेंगे, संचय कर लेंगे। वहाँ तो यहाँ साथ लिये पाथेय के बल पर ही अवधि यापन करनी होगी। वहाँ न सत्कर्म का अवसर मिलेगा और न अपकर्म का। वहाँ तो केवल यहीं के कर्मों के अनुसार आपको आपका संचय दे दिया जायेगा, जिसके ड़ड़ड़ड़ पर फिर चाहे आपको आनन्द भोगना पड़े और चाहें यातनाएँ।

यहाँ का संचय किया हुआ वह सम्बल क्या है, जो वहाँ काम आना है? वह सम्बल है पुण्य-परमार्थ निर्मोह और निर्लिप्तता पुण्य परमार्थ का अर्जन सत्कर्म और उसके साथ लगी हुई, सद्भावना से होता है। यदि सत्कर्म के साथ सद्भावना का संयोग नहीं है तो उस सत्कर्म का पुण्य परास्त हो जायेगा। एक मनुष्य किसी दुःखी की सहायता करता है पर भावना यह रखता कि ऐसा करने से यह मनुष्य मुझे अमीर और उदार समझेगा, मेरा आभारी होगा और यथासम्भव मेरी पूजा-प्रतिष्ठा करेगा। समाज में जो देखे, सुनेगा, वह मुझे सम्मान देगा, मेरा आदर करेगा, जिससे समाज में मेरा स्थान बनेगा। बस उसका सत्कर्म दूषित हो गया, उसका पुण्य ऋणी हो गया, ऐसा सत्कर्म पारलौकिक जीवन में सम्बल बन कर काम न आ सकेगा।

यह पुण्य बन कर सम्बल तब बनेगा, जब सहायता करने के पीछे कोई भाव ही न रहे और यदि रहे तो यह भाव रहे कि अमुक व्यक्ति हमारी तरह ही मनुष्य है। हमारा भाई है। उसकी आवश्यकता, उसकी तकलीफ और उसका कष्ट हमारा कष्ट है। हमारी सहायता पाना उसका नैसर्गिक अधिकार है और सहायता करना हमारा नैतिक कर्तव्य है। मेरे पास जो कुछ है, वह सब प्राणी मात्र की धरोहर है, जो सबको उचित प्रकार से मिलनी ही है। मेरा इस पर कोई आभार नहीं, बल्कि इसका ही आभार मुझ पर है, जो यह मेरी सेवा, मेरी सहायता स्वीकार करने की कृपा कर रहा है। इस प्रकार के अहंकार रहित सत्कर्म ही पारलौकिक जीवन के सम्बल बना करते है।

किन्तु यह निरहंकार भावना प्राप्त कैसे हो? इसके लिये भी उपाय करना होगा। और वह उपाय है उपासना ईश्वर पुनीति। सम्पूर्ण आत्म-समर्पण के साथ परमात्मा की उपासना करते करते जब व्यक्ति के हृदय में उसका प्रकाश आ विराजेंगे, तब उसे सारा जड़-चेतन संसार परमात्मा रूप ही दीखने और अनुभव होने लगेगा। उसका ‘स्व’ सार्वभौम हो जायेगा। ऐसी स्थिति में उसे किसी से पृथकता का अनुभव ही न होगा। स्वयं सहायक, समानार्थी, सहायता और परिणाम सबका सब ईश्वर रूप ही दिखाई देगा। ऐसी दशा में उसे न तो यह पता चलेगा कि वह किसी की सहायता कर रहा है या कोई उससे सहायता पा रहा है।

पारलौकिक जीवन की तैयारी में निर्मोह, निर्लिप्तता अथवा अनासक्ति की साधना भी परमावश्यक है। इस असार संसार के माया मोह लेकर जाने वाले उस पार के अपार जीवन में बड़ी सघन यातना के भागीदार बनते है को माया मोह के कारण रो-रोकर प्राण छोड़ते और तड़प तड़प कर संसार से विदा होते है, वे वहाँ भी अपनी अस अन्तिम स्थिति के अनुसार वैसे ही रो रो और तड़प तड़प कर जीवन बितायेगा। मनुष्य की अतिमानसिक स्थिति इस बात का स्पष्ट विज्ञापन है कि उसे उस पारलौकिक जीवन में किस भोग का भागी बनना होगा। यदि वह निर्लिप्तावस्था में हँसता खेलता हुआ गया, तब तो समझना चाहिये कि वहाँ भी हँसता खेलता ही रहेगा और यदि रोता सिसकता हुआ, विदा हुआ तो वहाँ भी रोता सिसकता ही रहेगा। इसमें दो सम्भावनायें नहीं हो सकती।

इह जीवन के दुःख अन्त का सबसे बड़ा और अगाध कारण आसक्ति ही है, आसक्ति के कारण ही सम्बन्धियों के बिछुड़ने पर ड़ड़ड़ड़ का घेरा पड़ता है। आसक्ति के कारण ही थोड़ी सी असफलता निराशा की घटाये घेर लेती है। आसक्ति के कारण ही जरा सी उपेक्षा प्रतिहिंसा की आग जला देती है और आसक्ति के कारण ही धन वैभव के लिए पाप कर्मों में संलग्न हो जाते है। अस्तु आसक्ति ही को सारे दुःखों का मूल कारण मानना और उससे छूटने का उपाय करना चाहिये।

आसक्ति बड़ा भयंकर रोग है, फिर चाहे वह पुत्र-पत्नी के प्रति हो, धन-दौलत के प्रति हो, सुहृद सहचरों के प्रति हो देह अथवा अभिरुचियों के प्रति हो। इस रोग से बच कर ही मनुष्य एक निरामय एवं निर्भय जिन्दगी जी सकता है और निश्शंक अनत अपना सकता है।

जिस भय के कारण लोग कायर-कुचाल और कापुरुष बन जाते है, उसकी जननी आसक्ति ही है देहासक्ति के कारण ही लोग इस भय से उसके रंजन, भंजन में लगे रहते है कि कहीं यह बूढ़ी न हो जाये, कहीं इसकी शक्ति न चली जाये, कहीं भोग वासना के अयोग्य न हो जाये। इसी भय के कारण ही उसे विधि और पट-परिधानों की पूजा पगार चढ़ाते रहते है। वे पता नहीं, यह क्यों नहीं सोच पाते कि यह नश्वर मिट्टी एक दिन मिट ही जानी है। इस पर कितना ही चन्दन बदन क्यों न चढ़ाया जाये, कितनी ही मनौती और भिन्न क्यों न की जाये समय पाकर यह बूढ़ी तथा कुरूप हो ही जायेगी। आवश्यकता से अधिक शरीर को मान्यता देने का कारण यह देहासक्ति ही है। इस निःसार देहासक्ति के कारण मनुष्य न तो दृढ़ता पूर्वक साधन कर पाता है और न नियम, संयम का निर्वाह। अधिक साधने अथवा बाल खींचने से कहीं यह निर्बल न हो जाये-अधिक संयम, नियमों से इसको कष्ट होगा। परमार्थ पथ पर डाल देने से इसके भोग विलास के अधिकार छिन जायेंगे आदि आदि न जाने कितनी कल्पनायें मनुष्य को देहारोधक बना देती है।

इस ड़ड़ड़ड़ देहासक्ति से मनुष्य की बड़ी गहरी हानि होती है। देह को प्रधानता मिलते ही आत्मा पीछे रह जाती है। आत्मा के गौण होते ही अज्ञान का घना अंधकार घेर लेता है और तब उस अंधकार में इस मान जीव की जो दुर्दशा होती है, उसका वर्णन नहीं किया जा सकता है। उसे भय, संशय, सन्देह तथा आशंकाओं की डायन हर समय सताया करती है। एष्णा और तृष्णायें उसे एक क्षण भी विश्राम नहीं लेने देतीं। आस्तिकता, आस्था और अञनागत भविष्य के सारे दीप बुझ जाते है और मनुष्य एक अँधेरा अन्त पाकर अनन्त अंधकार में जाकर तुम कल्पों के लिए डूब जाता है।

शरीर और कुछ नहीं एक साधन मात्र है, आत्मा के उद्धार का साधन। इसकी खोज खबर रखनी तो चाहिये, पर उसी सीमा तक जहाँ तक यह साधन रूप में आत्मोद्धार में सहायक हो सके। इसे स्वस्थ तथा सशक्त बनाये रखने के लिये जो भी जरूरी हो करिये पर इसकी इन्द्रिय लिप्सा की जिज्ञासा का कभी भी रंजन न करिये। विषय भोग और आराम, विश्राम जिन्हें यह माँगा करता है, इसके लिये घातक तथा अनावश्यक है। इनकी सुविधा पाकर यह शरीर आलसी, प्रमादी और ढीठ बन जाता है और तब हर उस साधना में आनाकानी करने लगता है, जो आत्मा के उद्धार में आवश्यक होते है। अस्तु देहाभिमान अथवा आशक्ति से सदा सावधान रहकर दूर रहना चाहिये।

देहासक्ति छूटते ही बाकी सारी आसक्तियाँ आपसे आप छूट जाती है। इसका पोषण करते हुए, इसको ठीक वैसे ही भूले रहिये, जैसे जीव इसका विसर्जन हो जान के बाद भूल जाता है। ममता मोह और माया के सारे सम्बन्ध भी टूट जाते है, ठीक उसी प्रकार इसका विस्मरण किए रहने से सारी आसक्तियाँ छूट जावेंगी और तब अन्तिम समय में उनको अनुभूति भी साथ लगी हुई न जायेगी। जीवनिर्लित और निर्मोहपूर्वक जाकर अनन्त जीवन को ग्रहण कर लेगा।

मनुष्य का जीवन ही अन्तिम नहीं है, इसके बाद एक दीर्घकालीन जीव भी है, जिसके यापन में आवश्यक पुष्य का सम्बल इस जीवन में संचय करने के लिए अनासक्ति भाव से कर्म करते हुए, जीवन चलाइये और बाद में माया-मोह तथा आसक्ति से निवृत्त होकर संसार से यात्रा कीजिए। तभी वहाँ जाकर दीर्घकालीन सुख, सन्तोष की प्राप्ति होगी।


अल्लाह मुझे माफ करना

तपती दोपहरी में ईरान के कविवर शेखसादी नमाज पढ़ने मस्जिद जा रहे थे। उनके पैर में जूते नहीं थे, अतः उन्हें बड़ी पीड़ा हो रही थी। इतने में एक आदमी चमचमाते जूते पहने वहाँ से निकला। वह भी नमाज पढ़ने जा रहा था। शेखसादी का दिल उदास हो गया। एकाएक वे बोल उठे-परवरदिगार! यह है तेरा न्याय? मेरे पास पहनने के लिए फटी पुरानी जूतियाँ भी नहीं और यह आदमी चमचमाते जूते पहने है।”

थोड़ी दूर चलने पर शेखसादी को एक अपंग दिखायी दिया। अब तो कवि की आँख खुल गई। तत्काल ही उन्होंने अपने गाल पर एक तमाचा मारा और दोनों हाथ आकाश की और उठाकर कहने लगे-अल्लाह मुझे माफ करना। मुझसे भयंकर भूल हो गई। तूने मुझे कैसे सुन्दर पाँव दिये हैं, जबकि यह बेचारा तो अपंग है।


वह जो शरीर सहन नहीं कर सकता

प्रेम व प्रसन्नता का अभाव। शरीर में जितने भी रोग होते है, हम यह तो नहीं कह सकते कि उनका सम्बन्ध कितने प्राचीन समय और पिछले जन्मों से होता है पर यह निश्चित है कि शरीर में रोग और विजातीय द्रव्य, जिससे बीमारी और दुर्बलता का विकास होता है, अधिकाँश मनोविकारों की देन होते है। चिन्ता, द्वेष, क्षोभ, दम्भ, पाखण्ड, अभिमान, असत्य भाषण, चुगली, निराशा, तृष्णा, कुत्सा का सदैव मस्तिष्क में छाये रहना, यही वह कारण है जिनसे रोग पैदा होते है। शरीर और सब कुछ सह सकता है पर यही वह दूषित तत्व है जो स्वास्थ्य और आरोग्य को नष्ट कर डालते है।

यदि मनुष्य अपने मस्तिष्क में रचनात्मक और प्रसन्नता दायक विचार रखकर जीवन यापन कर सके तो वह सम्पूर्ण आयु स्वस्थ और निरोग जीवन जी सकता है। औषधि की आवश्यकता को भी वह निरस्त कर सकता है।

नैपोलियन सेंट हेलेना में था, तब उसके पेट में दर्द रहा करता था। डाक्टरों ने निरीक्षण करके बताया पेट का कैंसर या गैस्टिक अल्सर है। औषधि प्रारम्भ हुई। बहुत दिन तक दवा लेते रहने के बाद भी पेट ठीक न हुआ। एक दिन उसे ऐसा लगा कि दवा पेट ठीक नहीं कर सकती? क्यों उसने यह जानने का निश्चय किया। डाक्टर दवा लेकर आया तो उसने कहा-महाशय!यह दवा आज आप भी लें तो मैं अच्छा हो जाऊँ। डाक्टर हैरान था, बोनापार्ट कर क्या रहे है पर वीरवर नैपोलियन की बात न मानने की हिम्मत उसमें नहीं थी। बेचारे ने दवा पी थोड़ी देर में उसकी तबियत खराब हो गई। नैपोलियन ने कहा-जो दवा डाक्टर को अच्छा नहीं कर सकती, वह मुझे तीन जन्म में भी अच्छा नहीं कर सकती। उसे उन दिनों सैनिकों के विद्रोह का भीतरी भय बना रहता था, उस भय को उसने निकाल दिया और मृत्यु को निश्चित समझ कर पुनः प्रसन्न रहने लगा। डाक्टरों ने उसकी दुबारा परीक्षा की तो वे हैरान थे कि उसके रोग का पता ही न था। कहावत हो गई-नैपोलियन से रोग भी भय खाते है” पर सही बात यह थी कि उसके मनोबल ने उन अवांछनीय तत्वों को मार दिया जो पेट की बीमारी के रूप में उछल रहे थे।

अमेरिका में एक सर्वेक्षण में पाया गया कि पेट के बीमारों में से अधिकाँश मानसिक दुश्चिन्ताओं से ग्रस्त होते है उन्हें पेट के विकार प्रायः हमेशा बने रहते है। वैवाहिक जीवन सुखमय न हो, परिवार में कलह रहती हो, ऐसे लोगों को पेट की बीमारियाँ घेरे रहती है। 16 प्रतिशत पेट के रोगी वह होते है, जो साँसारिक संघर्षों के प्रति अपना मनोबल खो चुके होते है।

द्वितीय महायुद्ध के समय एक बार जर्मनी सैनिकों ने मित्र राष्ट्रों की सेनाओं पर तीव्र हमले प्रारम्भ किये। उससे सैनिकों का मनोबल टूट गया और उनमें से अधिकाँश पेट के रोगी होकर बिस्तरों में पड़ गये। डाक्टरों ने रिपोर्ट दी कि सिपाहियों का हौंसला टूट जाने से उन्हें हर समय दुश्चिन्ता घेरे रहती है। उससे वे कभी अधिक खा जाते है, कभी उन्हें ध्यान नहीं रहता कि खाया या नहीं जब तक ध्यान आता है, तब तक स्वाभाविक भूख मिट चुकी होती है। पेट में कोई ड़ड़ड़ड़ नहीं और कोई कीटाणु नहीं, पानी भी जाँच करके ही दिया जाता था, केवल हिम्मत हारने का ही परिणाम था कि सैकड़ों सैनिक पेट के बीमार हो गये।

भगवान ने मनुष्य शरीर ऐसा बनाया है कि यदि उसे खराब न किया जाये, उसमें मानसिक चिन्ताओं, कामनाओं, काम-वासना आदि दूषित विचारों का रोपण न किया जाये तो बड़े प्राकृतिक परिवर्तन मौसम के झटके और भूल से ग्रहण किये हुये विषैले खाद्य भी शंकर और मीरा के द्वारा विषपान के समान पचाये जा सकते है। मन खराब न हो तो तन कभी बिगड़ेगा नहीं, मौसम और परिस्थितियों में चाहे कितने ही जबर्दस्त परिवर्तन क्यों न होते रहें।

पोर्टलैण्ड (ओरगन) की 8 वर्षीय लड़की सड़क पर खेल रही थी, खेल में वह इतनी मस्त थी कि उसे पता भी न चला कि उधर से सड़क पीटने वाला इंजन दौड़ा आ रहा है। वह गिर पड़ीं। 3 टन वजन का रोलर पहिया उसके पैरों से निकल गया। इंजन आगे बढ़कर रुक गया। ड्राइवर यह देखकर भौचक्का रह गया कि वह लड़की उठकर खड़ी हो गई है और जिस लड़के के साथ खेल रही थी, उसे पकड़कर खिलखिलाकर हँस रही है, जैसे कुछ हुआ ही न हो।

बाद में अलबला में मैक्सफील्ड की एयर-यूनिवर्सिटी के नौसैनिक डाक्टरों ने इस घटना की जाँच की तो उन्होंने पाया कि जिस समय लड़की पहिये के नीचे थी, तब भी उसके मस्तिष्क में पहले वाली प्रसन्नता और मोद भाव गूँज रहा था। उसे रत्ती भर भय या चिन्ता नहीं हुई। इससे उसके शरीर में इतनी सहन शक्ति आ गई कि 3 टन वजन के पहिये से भी उसका कुछ नहीं बिगड़ा।

एक बार अमेरिका में 10 अमेरिकी उड़ाकों ने उड़ान भरी। उन्हें किसी प्रकार के तूफान की आशंका नहीं थी, इसलिये उन्होंने ‘आइस कैप’ भी नहीं बाँधी थी, दुर्भाग्य से ग्रीनलैण्ड में वे एक बर्फीले तूफान में फँस गये। 88 दिन तक वे इसी अवस्था में पड़े रहे, शीत से बचने के लिये उसके पास पर्याप्त वस्त्र भी नहीं थे। तापमान शून्य से भी 40 डिग्री कम था। 10 दिन बाद जब खोजी विमानों ने आकाश से ताक कर देखा तो वे सभी सैनिक खेलने और आमोद प्रमोद में मस्त थे। जहाज उतर नहीं सकते थे, इसलिए 10 वे दिन से उन्हें आहार गिराना प्रारम्भ किया गया। 88 दिन तक वे ऐसे ही रहे और जब तूफान शाँत हुआ, वे बाहर निकाले गये तो स्वास्थ्य परीक्षण से यह पाया गया कि इतनी भयंकर सर्दी के बाद भी उनके शरीर में स्वास्थ्य की खराबी के कोई लक्षण नहीं थे।

फिलफीडिया (अमेरिका) की एक नर्स हेमेना का विवाह हुए कुछ ही दिन हुए थे कि वह एका एक बीमार पड़ गई। उस समय भी वह सदैव प्रसन्न और हँसमुख रहती थी। उसका पति जब भी उसे मिलने जाता उदास होकर जाता पर वहाँ से लौटता तो एक अजीब गुदगुदी लेकर आता। पत्नी उसे छेड़ और मजाक किए बिना न रहती। डाक्टर भी उसकी बेढब मस्ती से प्रभावित हुए बिना न रहे। किसी ने उसे अप्रसन्न नहीं देखा।

एक दिन अचानक उसका ज्वर बढ़ना प्रारम्भ हुआ। 107 डिग्री तक पहुँचते पहुँचते डाक्टरों ने घोषणा कर दी कि इसके मस्तिष्क को क्षति पहुँचेगी, यदि मृत्यु से बच भी गई तो निश्चित रूप से पागल हो जायेगी पर ज्वर इतने पर भा नहीं थमा। 110 डिग्री तक पहुँच कर उसने साँस ली। फिर बुखार उतरना प्रारम्भ हुआ। तापमान सामान्य हो जाने पर डाक्टरों ने परीक्षण किया तो वे हैरान थे कि उसके शरीर पर इतने बुखार का भी कोई प्रभाव नहीं पड़ा।

डा पाल एच॰ ड़ड़ड़ड़ ने ऐसी अनेक घटनाओं का संकलन कर लिखा है कि “मनुष्य शरीर से बड़ कर सहनशील और टिकाऊ यन्त्र” अभी तक बना नहीं। यदि उसे हमेशा प्रसन्नता और आमोद प्रमोद से चिकनाया जाता रहे तो न कभी जंग लगे, न ज्वर आये। आये भी तो उसका बाल भी बाँका न कर पाये।

मनुष्य भूलों का पुतला है। अब तक सम्भव है, भूलें बहुत हुई हों, उनके जो दण्ड प्रकृति द्वारा हमें मिल रहे है, या मिलने वाले है, उन्हें तो हम साहस पूर्वक सहन करके काट दें पर आगे के लिए यह उचित है कि मन में दुश्चिन्ताओं का, मनोविकारों का बोझ न पड़ने दे। कहते है मनुष्य खाना नहीं शक्ति और सौन्दर्य खाता है। जब वह भोजन शाँति, सन्तोष और प्रसन्नता में करता है। शरीर पोषण के लिये शक्ति पेट में बनती है। शक्ति और ओजस के कण जो सारे शरीर में बिखरे घूमते है, वह भी पेट के कारखाने में ही बनते और विकीर्ण होते है, यदि मानसिक दुश्चिन्ताओं का प्रकोप हो तो शक्ति का स्रोत अस्त-व्यस्त हो जाता है, पाचन और शक्ति चूसने की क्रिया पर दूषित प्रभाव पड़ता है। जाँच करने पर आमाशय में कोई खराबी नहीं मिलेगी तो भी शरीर अस्वस्थ रहेगा। ऐसे व्यक्तियों के लिये भावनाओं का प्रतिदान ही रामबाण औषधि है, उन्हें हर घड़ी प्रसन्न रहने औरों के साथ मीठा मधुर व्यवहार करने का प्रयत्न करना चाहिए, ताकि बदले में वही उसे भी मिलें। मानसिक प्रसन्नता ही जीवन है जबकि मनोविकार बोझ। जिसे शरीर कभी भी स्वीकार नहीं करता।

फिनलैण्ड की एक युवती बहुत बीमार थी। डाक्टरों ने जाँच करके बताया, इसे कैन्सर है। वह अविवाहित थी और गर्भाशय में रोग था, जिसे डाक्टरों ने असाध्य कह दिया था। युवती का जीवन अंधकार में भटक रहा था। गौनर मैटन नामक एक कवि उसके पड़ोस में रहता था। उसे इस लड़की से सहानुभूति थी। प्रायः उसे देखने जाया करता था। लड़की को उसका आना अच्छा लगता। वह उससे प्रेम भी करती थी। पर उसे यह विश्वास नहीं था कि मुझ रोगी से वह कभी विवाह करेगा। युवक की करुणा भी धीरे धीरे प्रेम में बदल गई। उसने अपनी ओर से विवाह का प्रस्ताव रखा। स्वीकृति मिल गई और विवाह भी हो गया।

असाध्य लड़की जो सदैव बिस्तर पर लेटी रहती थी, चलने फिरने लगी। यही नहीं वह कुछ ही दिन में गर्भवती भी हो गई। जून 1967 की बात है, उसे पुत्र पैदा हुआ। उन्हीं डाक्टरों ने जिन्होंने उसे असाध्य घोषित कर दिया था, उसकी जाँच की लड़के की भी मेडिकल जाँच की तो वे यह देखकर आश्चर्य चकित रह गये कि युवती और नवजात शिशु में से किसी को भी रोग का धब्बा तक नहीं था। फिनलैण्ड में कुछ दिन इस घटना की बड़ी चर्चा हुई। लोगों ने अनुभव किया मनुष्य की उच्च भावनाओं में जबर्दस्त जीवन शक्ति है, शरीर की सम्पूर्ण सहनशीलता इन भावनाओं का ही परिणाम है।

बच्चा बीमार पड़ जाये तो उसकी माँ रात रात भर जागती रहती है और बिना कुछ खाये पिये उसकी सेवा सुश्रूषा करती रहती है, उस अवस्था में अकारण किसी और को रखा जाय तो वह एक रात के जगने में ही ढीला पड़ जाये पर माँ कई कई रात जगकर भी स्वस्थ और क्रियाशील बनी रहती है।

‘साउथ ऑफ सहारा’ पुस्तक में लेखक कमाँडर अटिलियों गट्टी ने प्रसिद्ध नीग्रो जाति वाटुसी का जिक्र छेड़ते हुए लिखा है कि यह लोग संसार के सबसे अधिक लम्बे स्वस्थ और क्रियाशील लोग होते है। यह लोग माँस नहीं खाते, शाकाहारी होने पर भी उनके गज़ब के स्वास्थ्य पर लेखक को आश्चर्य हुआ तो वह कुछ दिन इनके बीच रहा। बाटुसी लोगों के जीवन क्रम का अध्ययन करके लेखक ने लिखा है कि वाटुसी जब बच्चे होते है, तभी से उन्हें उछलने, कूदने, खेलने, नाचने और सदैव प्रसन्न रहने का अभ्यास कराया जाता है। खिलाड़ी होना इस जाति के लिए आवश्यक है इसके लिये परिवारों में ही एक 6 वर्षीय शिक्षण चलता है, जो 8 वर्ष की आयु से 14 वर्ष की आयु तक चलता है। परिणाम यह होता है कि हँसी खुशी उनकी जिन्दगी में ढल जाती है, यह निश्चिन्तता ही उन्हें आजीवन निरोग रखती है। और शक्ति इतनी होती है कि 20 मील जाकर शाम को फिर घर वापिस आ जायें पर थकावट का कहीं नाम निशान भी न हो। इतनी जबर्दस्त सहन शक्ति और निरोगिता का रहस्य और कुछ नहीं, भावनाओं की मस्ती है। यदि वही न हो तो लाखों की सम्पत्ति होकर भी मनुष्य सुखी नहीं रह सकता। प्रेम, प्यार, आशा, उत्साह और प्रसन्नता के अभाव को शरीर सहन नहीं कर सकता। इनके न होने पर रोग और बीमारी ही सम्भव है, दुश्चिन्ताओं से घिरे लोगों को भाग्य में मिलता भी यही है।


क्रोध

महाराष्ट्र के सन्त श्री एकनाथ जी को कुछ मसखरा युवक सदा उन्हें तंग किया करते थे। एक बार एक भूखा ब्राह्मण उस गाँव में आया और भोजन की याचना की। गाँव के उन्हीं दुष्टजन ने उससे कहा कि ‘यदि तुम सन्त एकनाथ को क्रोधित कर दो तो हम तुम्हें दो सौ रुपये देंगे। हम तो हार चुके शरारत कर करके पर उन्हें क्रोध आता ही नहीं।” दरिद्र ब्राह्मण भला कब मौका चूकने वाला था। फौरन उनके धर गया, वहाँ वे न मिले तो मन्दिर में जा पहुँचा जहाँ पर वे ध्यान मग्न बैठे थे। वह जाकर उनके कन्धे पर चढ़कर बैठ गया। सन्त ने नेत्र खोले और शाँत मुद्रा में बोले-ब्राह्मण देवता! अतिथि तो मेरे यहाँ नित्य ही आते हैं, किन्तु आप जैसा स्नेह आज तक किसी ने नहीं जताया। अब तो आपको मैं बिना भोजन किये वापिस नहीं जाने दूँगा।


सन्तोष का आभूषण

“मेरी महत्त्वाकाँक्षा के लिए क्षमा करें देव! मैं सुहागिन हूँ, किन्तु शरीर में एक भी आभूषण न होने से भद्र महिलायें मुझे असम्मान की दृष्टि से देखती है। लोक सेवा आपके जीवन का लक्ष्य है स्वामी। आपकी सहधर्मिणी होने के फलस्वरूप मेरा कर्तव्य है, मैं आपके आदर्शों का अनुगमन करूँ किन्तु सामाजिकता को भी तो सर्वथा ठुकराया नहीं जा सकता। यही एक छोटी सी बात है। एक दो मंगल आभूषणों की व्यवस्था हो जाती तो इस असम्मान से तो बच जाती।” लोपामुद्रा ने बड़े संयत और विनीत शब्दों में अपने मन की बात पति से कह दी।

महर्षि अगस्त्य कुछ गम्भीर होकर बोले-भद्र अपने मन की बात बड़ों से स्पष्ट कर देना उनका नैतिक अधिकार है। पति पत्नी अन्तरंग के सखा होते है, अपनी आकांक्षायें एक दूसरे से व्यक्त न करें तो फिर गृहस्थी का आनन्द ही क्या रहे। इसमें भूल या क्षमा जैसी कोई बात नहीं है। गृहस्थ होने के साथ मुझे उन आवश्यकताओं का भी ध्यान रखना आवश्यक था, जिससे परिजनों को सुख कल्याण के लोकोत्तर साधनों पर तो चर्चा करते रह पर साँसारिक होकर भी साँसारिकता को सर्वथा व्याप्य समझते रहे। आगे कभी ऐसी भूल न होगी।”

किन्तु वर्तमान परिस्थितियों में भार्या लोपामुद्रा के लिए आभूषणों की व्यवस्था कैसे हो इसकी, उन्हें स्वाभाविक चिन्ता उठ खड़ी हुई। महर्षि ने जप तप किया था, साधन, योगाभ्यास किया था, अष्टांग नियमों का पालन किया था, सो वे आत्मिक सम्पत्ति से तो परिपूर्ण थे पर लोकोपकार और आत्म तत्व की शोध में निरन्तर व्यस्त रहने के कारण वे लौकिक सम्पत्ति न जुटा पाये थे। इसलिए लोपामुद्रा की आकांक्षा को पूरा करना वस्तुतः चिन्ता का ही विषय था।

महर्षि ने हजारों शिष्यों को पढ़ाया लिखाया और योगाभ्यास कराया था। नीति, समास-शास्त्र अर्थ-शास्त्र तर्क-मीमांसा तत्व दर्शन आदि अनेक विद्याओं से सैकड़ों शिष्यों को दीक्षित प्रशिक्षित किया था पर ड़ड़ड़ड़ की भावना से आज तक उन्होंने किसी से भी कुछ स्वीकार नहीं किया था। यद्यपि पारिश्रमिक ले लेना उनका नैतिक अधिकार था, तथापि ब्राह्मणत्व के तेज और वर्चस्व को बनाये रखने के लिए उन्होंने धन को अपने से दूर ही रखा था। जीवन निर्वाह भी वह अपने दो हाथों की कमाई से ही करते थे। ऐसा न करते तो ऋषि जीवन की शान कहाँ रहती?

पर आज का प्रश्न उतना ही उलझनों के साथ आ खड़ा हुआ, जितनी उलझने साँसारिकता से ग्रस्त मनुष्य अपनी भूलों के द्वारा पैदा कर लिया करता है। ऋषि ने आज तक पढ़ा था-कामनाओं की बाढ़ से चिन्ताओं का बोझ बढ़ता है।” आज उसकी स्पष्ट अनुभूति हुई। अब वे इस बात पर विचार करने लगे आभूषणों की व्यवस्था कैसे हो कि अपने आदर्शों का परित्याग भी न हो और लोपामुद्रा की भावना का अनादर भी।

महर्षि अपने कुछ प्रमुख शिष्यों को लेकर राजा ड़ड़ड़ड़ के पास चल पड़े। श्रुतर्वा उनका शिष्य रह चुका था। गुरु के प्रति उसके हृदय में अपार आदर और निष्ठा थी। यह सोचकर ही महर्षि अगस्त उसके पास चले थे। तो भी उनका अन्तिम निश्चय यही था कि वे आभूषण या आभूषणों के लिए वही धन स्वीकार करेंगे जो शिष्यों द्वारा न्यायपूर्वक अर्जित किया गया हो। अनीति से उपार्जित धन ग्रहण करना ऋषि के लिए सम्भव न था।

गुरुदेव! को अपने द्वार आया देखकर वीर्यवान श्रुतर्वा के हर्ष का पारावार न रहा। उसने उनकी सब प्रकार आवभगत की। वर्षों से बिछुड़े गुरु-शिष्य माँ-बेटे की तरह मिले। कई दिन स्वागत सत्कार में ही निकल गये। तब श्रुतर्वा को ध्यान आया कि गुरुदेव का आगमन किसी उद्देश्य से तो नहीं हुआ। उसने शिष्यों से सब ड़ड़ड़ड़ जाना। उसके लिए यह सौभाग्य की बात थी, गुरु-माता की छोटी-सी इच्छा उसके द्वारा पूरी होने जा रही थी।

प्रातः काल उसने अनेक सुन्दर आभूषणों और स्वर्ण मुद्राओं से भरी मंजूषा गुरु-चरणों में समर्पित कर दी। उसे स्वीकार करने की प्रार्थना करते हुए श्रुतर्वा ने कहा-भगवन्! आज्ञा दे तो श्रृँगार के लिए स्वयं सामारजी को आश्रम भेजने का प्रबन्ध कर दें। श्रुतर्वा की गुरु-भक्ति से महर्षि अगत्स्य का हृदय भर आया, किन्तु आभूषण स्वीकार करने से पूर्व उन्होंने प्रश्न किया-वत्स! पहले बताओ इन आभूषणों में कही अधर्म और अन्याय की कमाई तो नहीं लगी।

श्रुतर्वा ने चिंतित स्वर में बताया-देव! यह आभूषण राज्य कोष से बने। कोष के लिए धन प्रजा देती है, कितने लोगों ने परिश्रम की कमाई दी है, कितनों ने अधर्म की, यह तो मुझे भी अविज्ञात है। लगता है इसमें शोषण और उत्पीड़न से प्राप्त धन भी है, भगवन् भूल हुई जो आपका शिष्य होकर भी यह ध्यान न रख सका और परिग्रह में पड़ा रहा।

निश्चय ही कर देने वालों में से कितनों ने ही बिना परिश्रम अनीतिपूर्वक धन कमाया होगा, इस आशंका के मन में आते ही महर्षि ने वह मंजूषा लौटा दी और उदास मन वापिस चल पड़े।

अब वे राजा धनस्व के पास पहुँचे। धनस्व प्रजापालक और धर्मज्ञ राजा के साथ ही साथ निष्ठावान् शिष्य था। किन्तु गुरु का सत्कार उसने बहुत सादगी से किया। उसका निवास भी श्रुतर्वा जैसा नहीं था। पूछने पर ज्ञात हुआ कि धनस्व राज्य संचालन और अपने निर्वाह के लिए इतना कर लेता है, जिससे राज्य की आवश्यकतायें तो पूरी हो जाती है पर बचता कुछ नहीं। महर्षि अगत्स्य ने शिष्य धनस्व की पीठ थपथपाकर आशीर्वाद दिया-वत्स जिस देश में तुम्हारे जैसे नीति निपुण और त्याग वृत्ति वाले शासक होंगे वहाँ प्रजा कभी दुःखी न रहेगी। धनस्व को अपने गुरु की आवश्यकता पूरी न कर सकने का दुःख अवश्य था पर उसे अपनी कर्तव्य परायणता के लिए सन्तोष भी था। उसी सन्तोष के साथ उसने गुरुदेव को सादर विदा दी।

इसके बाद महर्षि अपने कई शिष्यों के पास गये पर निराशा ही हाथ लगी। जहाँ शिष्य कर्तव्य परायण और परिश्रमी मिले वहाँ उपयोग से अधिक धन नहीं मिला जहाँ धन मिला वहाँ साधन दूषित थे, अतएव उनकी आशा सब जगह अधूरी ही रही।

अन्ततः वे अपने दैत्य शिष्य इल्वण के पास गये। गुरु को पाकर शिष्य की वर्षों से सोई श्रद्धा उमड़ पड़ी। महर्षि अगत्स्य का उसने भारी स्वागत किया। उसके पास धन सम्पत्ति और सवर्ण आभूषणों का किंचित् मात्र भी अभाव नहीं था। शिष्यों से उसने चुपचाप गुरु का आशय भी जान लिया। और इससे पूर्व कि वे कुछ कहें उसने अपने प्रमुख भृत्यों के साथ प्रचुर आभूषण भर कर आश्रम भिजवा दिये। महर्षि को जब तक बात मालूम पड़े आभूषण आश्रम में लोपामुद्रा के पास पहुँच गये।

आभूषण एक और रखवा कर विदुषी लोपामुद्रा ने भृत्यों को जल पिलाया और उनसे महर्षि की कुशल मंगल पूछी। नौकरों ने वह तब समाचार सुनाये, जिस तरह अगत्स्य श्रुतर्वा से लेकर इल्वण के दरबार तक दौड़े थे। लोपामुद्रा पति की इस अकारण भाग दौड़ के लिए बहुत दुःखी हुई। उन्हें अपनी महत्त्वाकाँक्षा रोक न सकने का बड़ा दुःख हुआ।

उन्होंने पूछा-इल्वण के पास इतना धन कहाँ से आता है, जो उसने ढेर सारे आभूषण यहाँ पर भेज दिये। भृत्य हंसे और बोले-भगवती वह शासक है, उनके लिये यह कोई बड़ी बात नहीं। इतना धन तो वे एक क्षण में किसी से भी अधिकारपूर्वक ले सकते है।

लोपामुद्रा की आँखें खुल गई। उसके लिये अनीति की कमाई स्वीकार करना असम्भव हो गया। अस्तु उसने वे आभूषण वापिस कर दिये। तब तक महर्षि अगत्स्य भी वहाँ पहुँच गये। उन्हें अपनी असमर्थता नहीं प्रकट करनी पड़ी, लोपामुद्रा ने भरे हृदय से उनका स्वागत करते हुए क्षमा माँगी। महर्षि ने लोपामुद्रा को हृदय से लगाते हुए कहा-प्रिये आज तुमने सच्चा आभूषण पा लिया। सन्तोष ही वह आभूषण है, जिससे बढ़कर दूसरा आभूषण धरती पर नहीं है।


बहुरूपिये विज्ञान से सत्य का सम्बन्ध कितना?

ईसा से 200 वर्ष पूर्व नीसिया के वैज्ञानिक हिप्पार्कस ने बताया कि ब्रह्माण्ड का केन्द्र पृथ्वी है, अन्य ग्रह-उपग्रह उसके चारों ओर केन्द्रीय शक्ति (एक्सेंट्रिक) कक्षाओं में अधिचक्रों (एपिसाइकिल्स) में घूमते है। प्रसिद्ध यूनानी वैज्ञानिक टालेमियस (संक्षिप्त नाम टालेमी) ने इसी सिद्धान्त को स्वीकार कर सौर मण्डल की रचना की और 1028 ग्रह नक्षत्रों को पृथ्वी के क्रम से इस तरह स्थापित कि बीच में पृथ्वी, दूसरे के क्रम से इस तरह स्थापित कि बीच में पृथ्वी, दूसरे वृत्त में चन्द्रमा, तीसरे में बुध, चौथे में शुक्र, पाँचवें में सूर्य, छठे में मंगल, सातवें में बृहस्पति आठवें में शनि, नवें में स्फटिक पिण्ड व तारे और दसवें में प्राइमममोबाल्स रखे। इसी आधार पर ही ज्योतिष शास्त्र का बहु-चर्चित ग्रन्थ अलमागेस्ट तैयार किया गया था। 1400 वर्षों तक यह सिद्धान्त अकाट्य माना गया। यही नहीं उसके आधार पर की जाने वाली अधिकाँश भविष्य वाणियाँ सत्य भी होती थीं। लोग अलमागेस्ट को पूजते थे। एक प्रामाणिक वैज्ञानिक ग्रन्थ मानते थे। टालेमी ने इसी पुस्तक में वृत्त (सर्किल) को 360 भाग (ग्रेजुएशन्स) में विभक्त कर पाई (वृत्त की परिधि और अर्द्धव्यास के अनुपात को रोमन अक्षर में व्यक्त किया जाता है, उसे पाई कहते है) का मूल्य 3.1416 निकाला था, वर्तमान पाई का मूल्य 3.1428 है, अन्तर .0012 का नगण्य सा है, किन्तु इसी अन्तर को यदि करोड़ों प्रकाश की दूरी पर आरोपित किया जायेगा तो जो ग्रह यहाँ से 10 करोड़ मील की दूरी पर होगा, वह लाखों मील आगे पीछे हो जायेगा।

उस समय भी यदि विज्ञान को लोग इसी तरह मानते रहे हों जैसे आज तो उनसे पूछा जाना चाहिये कि विज्ञान झूठा क्यों हो गया। पृथ्वी से थोड़ी दूर तक सीमित रहने वाले तत्वों की भविष्य वाणियाँ सही उतरी तो भी फलितार्थ गलत यही तो है विज्ञान की परिमिति। हम जिसे कल तक अकाट्य माने बैठे थे, वही आज गलत साबित हो गया, ऐसे विज्ञान को कौन पूर्ण कहेगा? कौन यह दावा करेगा कि विज्ञान सत्य है। धर्म नहीं। विज्ञान मनुष्य के सीमित ज्ञान के सीमित निष्कर्ष हैं, उनको ही सब कुछ बिलकुल सत्य मान लेना मनुष्य के लिए कभी भी हितकारक न होगा। शाश्वत और सनातन नियम जो भी हैं, धर्म के हैं। सारे संसार का एक ही नियामक है, यह मान लेने में किसकी हानि है? परस्पर प्रेम न्याय, ईमानदारी का व्यवहार करना चाहिये, हम सब भाई-भाई है, यह मान लेने पर किसका बुरा हो गया? धर्म सुख और शान्ति प्राप्त करने का अकाट्य सिद्धान्त है, यदि कोई सिद्धान्त इसके विपरीत जाते है तो वह धर्म नहीं हो सकते, जबकि विज्ञान की सत्यता को कभी भी अन्तिम नहीं कहा जा सकता।

कोपर्निकस ने अलमागेस्ट से असहमति प्रकट न की होती तो आज जो ग्रह गणित का इतना सुधरा रूप सामने आ रहा है, वह न आया होता। कोपर्निकस ने पहली बार बताया कि वैज्ञानिक धारणाओं को कभी अन्तिम सत्य नहीं मान लिया जान चाहिये, उसने सूर्य को ब्रह्माण्ड का केन्द्र बताया। यह धारणायें बहुत वर्षों तक चलती रहीं। अब 19 वीं शताब्दी में तो अन्तरिक्ष एक ऐसा आश्चर्य बन गया है कि उसमें यही तय नहीं किया जा सकता है कि विराट् ब्रह्माण्ड का केन्द्रक (न्यूक्लियस) कहाँ पर है। ‘सूर्य’ - सौर जगत् का केन्द्रक हो सकता है, ब्रह्माण्ड का नहीं। अकेली हमारी आकाश गंगा से ही प्रकाश पाने वाले अनेक सूर्य और उनके सौर-मंडल विद्यमान है, फिर ऐसी अनेक सूर्य और उनके सौर-मंडल विद्यमान है, फिर ऐसी ऐसी करोड़ों आकाश गंगायें और है, उनमें कितने सौर जगत् है, उसकी कुछ कल्पना ही नहीं की जा सकती। 50 करोड़ प्रकाश वर्ष और 10 करोड़ निहारिकाओं का अनुमान लगाने वाले आज के वैज्ञानिक भी इस जानकारी को आँशिक सत्य मानते है, पूर्ण सत्य नहीं। क्या उस विज्ञान पर भरोसा किया जा सकता है।

इस विज्ञान को लोग प्रत्यक्षदर्शी और सर्वमान्य कहते है, क्या यह प्रत्यक्ष दर्शन और सर्वमान्य सत्य है? इस पर नई पीढ़ी को नये सिरे से विचार करना पड़ेगा और उन सार्वभौमिक सिद्धान्तों का अन्वेषण करना पड़ेगा, जो मानव प्रकृति और चेतन क सम्बन्ध में सही जानकारी दे सकते हों। जब भी ऐसी आवश्यकता उठेगी, हमें अपने अन्दर से हल खोजना पड़ेगा। अपने अहंभाव का विश्लेषण और विकास करना पड़ेगा, इसी का नाम धर्म है, इसी का नाम अध्यात्म है। आध्यात्मिक विश्वास किये बिना मानवीय प्रगति का एक पग भी आगे बढ़ नहीं सकता।

ब्रह्माण्ड सम्बन्धी उपरोक्त सिद्धान्तों के साथ अब सैकड़ों वर्ष तक काम करने वाला न्यूटन का गुरुत्वाकर्षण सिद्धान्त भी हवा में उड़ने लगा। एक दिन महाशय न्यूटन एक बगीचे में बैठे थे। उन्होंने देखा एक फल टूटकर नीचे जमीन पर आ गिरा। प्रश्न उठा - फल नीचे ही क्यों आया वह आकाश में क्या नहीं चला गया। इस घटना के बाद न्यूटन ने गुरुत्वाकर्षण से सिद्धान्त को प्रतिपादित किया। उन्होंने बताया कणों के परिणाम के अनुपात से संसार के सभी कण दूसरे कणों को आकर्षित करते है। न्यूटन के अनुसार कणों की दूरी बढ़ने के साथ यह आकर्षण बल घटने लगता है। न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण सिद्धान्त पर अनेकों मशीनें बनी है, जो काम भी करती है, किन्तु 1916 में आइन्स्टीन ने बताया कि ब्रह्माण्ड के कण स्थान और समय में एक सीधी रेखा में चलते है, यही बात ग्रह-नक्षत्रों के बारे में भी है। वह भी सीधे चलते है, किन्तु द्रव्य (मास) की उपस्थिति के कारण स्थान और समय का रूप बदल जाता है और ऐसा लगने लगता है कि कण या ग्रह नक्षत्र वर्गाकार पथ पर चलते है, इस नये सिद्धान्त को आइन्स्टाइन ने ‘सामान्य आपेक्षिकता सिद्धान्त’ (थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी) नाम दिया और बताया कि गुरुत्वाकर्षण द्रव्य का गुण न होकर स्थान और समय का गुण है।

आइन्स्टाइन उन वैज्ञानिकों में से हैं, जिनके सिद्धान्त इतने गम्भीर और क्लिष्ट हैं कि उनकी सतह तक पहुँचना हर व्यक्ति के वश की बात नहीं। कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था कि एक दिन उनके सिद्धांत को भी गलत किया जा सकता है पर हुआ यही 1964 में प्रसिद्ध भारतीय वैज्ञानिक डा जयन्त विष्णु नार्लिकर तथा प्रोफेसर फ्रेड हायल ने एक नये गुरुत्वाकर्षण सिद्धान्त को जन्म दिया और बताया कि गुरुत्वाकर्षण न तो स्थान और समय का गुण है न कणों का। वह तो ब्रह्माण्ड का गुण है। हायल ने अपने मत की पुष्टि में संतुलित अवस्था का सिद्धान्त’ प्रकाशित किया और बताया कि आकाश की पुरानी आकाश गंगायें मरती और नई जन्म लेती रहती है। ब्रह्माण्ड फैल रहा है और उसी के फलस्वरूप ऊर्जा द्रव्य(मास) में बदलती रहती है। जहाँ इस तरह की क्रियायें चलती है, उसे हालल ने सृजन क्षेत्र (क्रियेशन फील्ड) का नाम दिया। इन तथ्यों से ब्रह्माण्ड को कल्पना और गुरुत्वाकर्षण को अब तक चली आ रही मान्यतायें व्यस्त हो जाती है, तब क्या न्यूटन टायस, बोल्ड हर्मन बाँडो और आइन्स्टाइन की बातें सच थीं। इस पर विचारं करें तो लगता है कि यह बुद्धिमान् वैज्ञानिक भी यथार्थ की दृष्टि में अपरिपक्व बुद्धि वाले बच्चों जैसे थे। और जो बच्चे आज का विज्ञान पढ़ते है, उनकी अपरिपक्वता के बारे में तो कुछ कहा ही नहीं जा सकता। सामान्य बातों को छोड़कर 10 वर्ष पूर्व एक विद्यार्थी ने जो कुछ पढ़ा था, आज उसका 50 प्रतिशत गलत हो गया, जिसकी उसे जानकारी तक नहीं और वह अपने विद्यार्थियों को, अपने मित्रों का वही बातें बता रहा होगा, अब जिनको अमान्य कर दिया गया है, क्या इस स्थिति में विज्ञान को सत्य कहा जा सकता है। नहीं कभी नहीं। यथार्थ की खोज के लिए तो कोई और ही रास्ता ढूँढ़ना पड़ेगा और अन्ततः उसके लिये फिर अपने आपसे चलना पड़ेगा। अपना अध्ययन और विकास करना आवश्यक होगा, उसके बिना मनुष्य जीवन के मूल प्रश्न सुलझाए नहीं जा सकते।

एक समय था जब डाल्टन के परमाणुवाद को एक सर्वमान्य सिद्धान्त के रूप में स्वीकार किया गया था। डाल्टन का कहना था परमाणु अजन्मा, अविनाशी और अविभाज्य है। इस सिद्धान्त को 120 वर्ष तक अकाट्य माना जाता रहा। इस सिद्धान्त ने ही डाल्टन को मूर्धन्य वैज्ञानिक का सम्मान दिलाया था।

किन्तु क्या डाल्टन सत्य था। वही सिद्धान्त जो 120 वर्ष तक वैज्ञानिकों की अन्य शोधों का माध्यम बना रहा, एक दिन खण्ड-खण्ड कर दिया। सन 1897 में जे जे थाम्प्सन नामक वैज्ञानिक ने कैथोड किरणों (कैथौड़ रेज) का आविष्कार करके डाल्टन के परमाणुवाद सिद्धान्त को खण्डित कर दिया और बताया कि परमाणु भी विभाज्य है। एक दिन उन्होंने न्यूनतम वायु दबाव की एक नली में ऋण ध्रुव(कैथोड)से विद्युत धारा प्रवाहित की उससे एक प्रकार की किरण कैथोड से निकलती हुई दिखाई दीं, जिनके अध्ययन से सिद्ध हो गया कि परमाणु के भीतर भी आवेश या शक्ति कण होते है, इन किरणों के मार्ग में ऋण पोल (निगेटिव पोल) लाने से विकर्षण (रिपल्सन) की क्रिया हुई और उन किरणों ने अपना मार्ग बदल दिया, इससे यह सिद्ध हुआ कि परमाणु के भीतर ऋण विद्युत आवेश विद्यमान है, उसे इलेक्ट्रान्स कहा गया। इलेक्ट्रान्स का भार हाइड्रोजन परमाणु के भार का 1/1850 होता है। इसलिये वैज्ञानिकों की इसकी खोज के बाद भी अनिश्चय सा रहा कि परमाणु की अभी अन्तिम जानकारी नहीं हो सकी।

सन् 1911 में रदरफोर्ड सोने की पत्तर पर अल्फा किरणों का बम्बार्डमेंट कर रहे थे। कुछ किरणें तो पत्तर को पार कर गई कुछ दाहिने बायें मुड़ गई पर रदरफोर्ड ने देखा कि कुछ किरणों जिस मार्ग से जा रही थी, उसी मार्ग से लौट आई। चुम्बक विज्ञान का एक सिद्धांत है, समान ध्रुव एक दूसरे को विपरीत दिशा में धकेलते है, असमान ध्रुव आकर्षित (एट्रक्ट) होकर जुड़ जाते है, अल्फा किरणें जो वापिस लौट रही थीं, वे धनावेश युक्त थीं, इसलिये यह निश्चित किया गया कि सोने के परमाणु में वैसा ही धन आवेश होना चाहिये। तब परमाणु में दो कणों का अस्तित्व सामने आया जिन्हें इलेक्ट्रान और प्रोट्रान नाम दिया गया।

इस सिद्धान्त ने बहुत दिन तक वैज्ञानिकों का मार्ग दर्शन किया और उस युग में उसे ही सत्य माना जाता रहा। विज्ञान की भाषा तो तोतली है, जो मीठी भले ही लगती हो पर होती निरर्थक है, उसे मानने वाले उस बालक की तरह है, जिन्हें अबोध कहा जा सकता है पर उनकी बात को सत्य नहीं कहा जा सकता, क्योंकि आने वाला प्रत्येक नया वैज्ञानिक उस सिद्धान्त को काटता हुआ या संशोधन करता हुआ आता है, जो सिद्धांत अब तक अकाट्य समझे जाते थे, वह एक नये पैसे के गुब्बारे की तरह अगले ही दिन फट हो जाते है।

महाशय नील्स बोहर ने परमाणु के सिद्धांत को एक नया मोड़ दिया। उन्होंने कहा परमाणु में इलेक्ट्रान (ऋण आवेश) और प्रोटान (धन आवेश) है तो पर वह एक साथ रह नहीं सकते। असमान विद्युत आवेश होने के कारण उन्हें एक दूसरे में मिल जाना चाहिये तथा नष्ट हो जाना चाहिये। उनके नष्ट होने का अर्थ था परमाणु का नष्ट हो जाना पर ऐसा होता नहीं। इसलिये उसने एक नये सिद्धान्त को जन्म दिया और बताया कि इलेक्ट्रान नाभिक के चारों ओर चक्कर लगाते है। नाभिक उन्हें सेन्ट्रोफयूल कोर्स से उसे साधे हुए है ओर इलेक्ट्रान स्वयं भी सेन्ट्रीपीटल फोर्स से नाभिक की और खिंचे रहते है कक्षा छोड़कर बाहर नहीं जाते।

बाद में अपने सिद्धान्त को उसी ने फिर सुधारा और कहा कि इलेक्ट्रान एक बन्द कक्षा में घूमते है, अन्यथा इलेक्ट्रान को घुमाने वाली शक्ति का ह्रास होने पर वह केन्द्रक में गिर जाता और परमाणु नष्ट हो जाता। परमाणु के नष्ट होने का अर्थ या संसार का नष्ट हो जाना। अपने इस सिद्धांत की पुष्टि इन्हीं महोदय ने नागाशाकी और हिरोशिमा में बम गिराकर की तो भी वह परमाणु के अन्तिम सत्य को स्थिर नहीं कर सके।

आँशिक जानकारियाँ विषयों का पूर्ण प्रतिपादन नहीं कर सकतीं। मनुष्य के उलझाव वाले प्रश्न है, उसका ‘अहं’ और अहं से सम्बन्धित सैकड़ों प्रश्न। हमारी चेतना का वास्तविक स्वरूप क्या है? विज्ञान के पास इसका कोई उत्तर नहीं? मृत्यु के बाद हमारा क्या होता है? विज्ञान चुप। प्राणि मात्र के साथ हमारे क्या सम्बन्ध है? हम क्यों अस्थिर है? चिर शाँति के उपाय क्या हैं, क्यों हम जीते और मर जाते है, जब तक इनका स्पष्ट उत्तर नहीं मिलता, मनुष्य भटकता रहेगा, जबकि विज्ञान के पास इन भवरोग का कोई इलाज नहीं। बेचारा धर्म भी करे क्या हम उसकी सुनने को तैयार नहीं।

इलेक्ट्रान और प्रोट्रान का सम्मिलित भार अभी भी परमाणु भार से कम था, इसलिये यह सोचा गया कि नाभिक (न्यूक्लियस) में कोई ऐसा कण है, जिसमें भार तो है पर विद्युत आवेश नहीं। उससे न्यूट्रान का अस्तित्व सामने आया। इसके बाद एक और कण पॉजीट्रान की खोज की गई। अभी तक यह कहा जाता था कि इलेक्ट्रान वृत्ताकार कक्ष (सरकुलर आरबिट) में चक्कर लगाते है, किन्तु समर फोल्ड ने उसे भी संशोधित कर दिया और बताया कि इलेक्ट्रान वृत्ताकार कक्ष में नहीं अण्डाकार कक्ष (इलिप्टिकल आरबिट) में चक्कर लगाते है।

अब एक और सिद्धान्त -क्लाउड थ्योरी-का सृजन हो रहा है। उसके अनुसार इलेक्ट्रान्स की कोई कक्षा नहीं बल्कि वे न्यूक्लियस के चारों और घिरे सघन बादलों में कुछ विचित्र प्रकार से उस तरह घूमते है, जैसे आकाश में ग्रह नक्षत्र। अभी भी अन्तिम सत्य की खोज नहीं की गई। वैज्ञानिक पदार्थों के अतिरिक्त किसी शक्ति को नहीं मानते पर उनसे यह पूछा जाना चाहिये कि प्राकृतिक नियमों (लॉज ऑफ नेचर) को तोड़कर शाप, वरदान, पूर्वाभास स्वप्न आभास वाली शक्ति कौन सी है और क्या उसका परमाणु या विराट् ब्रह्माण्ड से कोई सम्बन्ध है। मस्तिष्क में विचार कहाँ से आते है, भावनाओं का अस्तित्व क्या है, जब तक विज्ञान इनकी जानकारी नहीं दे देता क्या उसे सत्य रूप में स्वीकार किया जा सकता है? जबकि वे अभी परमाणु के बारे में ही अनिश्चित है कि उसमें इतनी शक्ति कहाँ से आती है।

मानवीय जीवन के इन प्रश्नों को हल करना तो दूर वैज्ञानिक अपने ही सिद्धान्तों के प्रति आश्वस्त नहीं अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति के वैज्ञानिकों के सिद्धान्तों को भी अब केले के पत्तों की तरह जगह जगह से काट दिया जाता है। कल तक जो औषधि रोगनाशक समझी जाती थी आज उसे विष उत्पादक और रोग-वर्धक कहकर रोक दिया जाता है। इञ्जेक्शन बदलते चले आ रहे है, तो भी स्वास्थ्य की समस्या हल नहीं हुई। पहले नींद के लिये लेसरजिक एसिड डाइ इथाइल एमाइड (एल॰ एस॰ डी) दी जाती थी, उससे अनेकों लोग बहरे हो गये, अनेकों मस्तिष्क सम्बन्धी बीमारियाँ खड़ी हो गई, एक 42 वर्षीय बुढ़िया ने उक्त दवा का सेवन का और पीने के 36 घण्टे बाद मर गई। उसके दुष्फल देखकर उसे बदला गया फिर पैरानोइया दी जाने लगी। वह भी खतरनाक सिद्ध हुई इसके बाद और कई तरह के मिश्रण बदले, सारजेक्टिल, एलेविजर बेलेरियन, ड़ड़ड़ड़ मिक्चर और मर्फिया आदि बदलती चली आई पर इनमें से ऐसी एक भी नहीं जो ड़ड़ड़ड़ न हो।

तत्वों के बारे में भी वैज्ञानिक अभी बीच में है, प्रारम्भ 12 तत्वों से हुआ था और फिर वह 92 की संख्या में स्थिर हुआ। 92 तत्वों की एक पीरियाडिक टेबुल डा0 मैन्डिलीफ ने बनाई थी, जिसका सिद्धान्त था तत्वों के भौतिक और रसायनिक गुण (फिजिकल एण्ड केमिकल प्रापरटी) उनके बढ़ते हुए परमाणु भार के आवर्त फल (पीरियाडिक कंक्शन) होते है। किन्तु इसमें आवर्त का परमाणु भार 39.944 है और पोटेशियम का 39.1 है। इस सिद्धान्त के अनुसार पोटैशियम को आर्यन से पहले आवर्त सारिणी (पीरियाडिक टेबुल) में रखा जाना चाहिये था, परन्तु ऐसा नहीं हुआ, आर्यन पहले रखा गया पोटैशियकत बाद में। यही गलती आयोडीन जिसकी इलेक्ट्रान संख्या 53 है और टिल्यूरियम (टी ई) जिनकी इलेक्ट्रान संख्या 52 है। परन्तु आयोडीन का परमाणु भार 126.92 और टिल्यूरियम का 127.61 है, इस तरह टिल्यूरियम को बाद में होना चाहिये था। बाद में उस टेबल को बोहर ने ठीक किया। किन्तु अब तक भी लेन्थेनाइड और एक्टीनाइड तत्वों की ठीक स्थिति निर्धारित नहीं की जिसकी, हाँ तत्व अवश्य ही बढ़कर अब तक 108 तक जा पहुँचे, अभी यह सिद्धान्त कहाँ जाकर कट जायेंगे इसका कुछ पता नहीं है।

विज्ञान को सत्य इष्ट है पर वह स्वयं सत्य नहीं। क्रमशः विकसित होने वाला विज्ञान सत्य तक पहुँच भी सकता है और सारे संसार को नष्ट-भ्रष्ट भी कर डाल सकता है। नागाशाकी जैसा कोई विस्फोट प्रयोग प्रयोगशाला में ही हो सकता है। जो धन जनकल्याण में लगना चाहिये, वह युद्ध और अन्तरिक्ष यात्राओं में लग रहा है और लोग भूखों मर रहे है, यंत्रीकरण के कारण विलासिता बढ़ी, स्वास्थ्य खराब हो रहे है, जनसंख्या बढ़ रह है। कुल मिलाकर विज्ञान ने मानव जीवन की शाँति-सन्तोष और व्यवस्था को बुरी तरह छिन्न-भिन्न किया है, उससे त्राण केवल धर्म और अध्यात्म ही दिला सकते है, धर्म विमुख होकर मनुष्य जीवन अक्षुण्ण नहीं रह सकता।


सुख-दुःख मानसिक स्थिति पर अवलम्बित हैं

सुख-शाँति की उपलब्धि हो सकती है, यह ध्रुव सत्य है। जो लोग यह मान्यता बनाये बैठे है कि यह संसार तो दुःखों का आगार है, यहाँ पर सुख दुर्लभ है, नहीं मिल सकता-वे निश्चय ही भूल पर है। ऐसे लोग संसार के नाम से अपने मनोयोग का ही कथन करते है। चूँकि उनका अपना मानस जीवन शोक-संतापों असन्तोष, अशान्ति से भरा होता है, इसलिए उन्हें यह सारा संसार ही दुःख का आगार आभासित होता है। जबकि वास्तविक बात यह है कि संसार में दुःख की अपेक्षा सुख की मात्रा अधिक है।

यदि ऐसा न होता तो यह संसार अब तक मनुष्यों से रिक्त हो चुका होता। दुःख और कष्टों में कोई जीता ही न रह पाता। इसके विपरीत बराबर देखा जाता है कि लोग उत्साहपूर्वक जी रहे है। संसार से मनुष्यों को प्यार है। वे इसकी अधिकाधिक उन्नति के लिए प्राणपण से प्रयत्नरत है। यदि उन्हें इस संसार में सुख-शाँति और आनन्द न मिलता तो क्यों तो वे इसमें जीना पसन्द करते और क्यों इसको सजाने का प्रयत्न करते। जिया तो सुख और आनंद के लिए जाता है, न कि दुख और शोक सन्ताप के लिये। हर मनुष्य के पास उसका एक सुख है, जो उसे मिलता है। अब यह भिन्न बात है कि वह उसको समझ न पाये और अपने किन्हीं भ्रमों और अज्ञान से आहत उल्टा अनुभव करे अथवा अपनी गलतियों से अपने सुख में आग लगाता रहे। मनुष्य निश्चय ही कतिपय सुधारों के आधार पर अपने सुख के भाग को स्थायी अधिक तथा निरापद बना सकता है। और उसे बनाना भी चाहिये।

किन्तु सुख भाग योंही सुरक्षित न हो जायेगा। उसके लिए कुछ प्रयत्न करना होगा। प्रयत्नों में सबसे पहला प्रयत्न है मन का परिष्कार। सुख दुख वस्तुतः और कुछ नहीं। वे मन की दो दिशाओं के भिन्न-भिन्न नाम मात्र है। इनका जन्म बाह्य संयोगों से न होकर मन से ही होता है। इसलिये सुख और दुःख को मनुष्य का मानस पुत्र कहा गया है। पिता स्वस्थ होता है सन्तान भी स्वस्थ होती है। पिता सज्जन होता है, सन्तान भी सज्जन होती है। पिता रोगी होता है, सन्तान भी वैसी होती है। पिता दुष्ट हो तो है, सन्तान का सज्जन होना कठिन है। इसी प्रकार मन यदि सुन्दर दशा में है, उससे तदनुरूप सुख का जन्म और यदि मन की दशा अच्छी नहीं है तो उससे दुःख का ही जन्म होना है।

सुख-दुख का मन की स्थिति पर निर्भर होने का प्रमाण यह है कि बहुत बार मन को स्थिति के अनुसार मनुष्य एक ही बात में विपरीत अनुभूतियाँ पाया करता है। जिस समय मन स्वस्थ और शाँत होता है, उस समय कोई अप्रियता भी विक्षोभ उत्पन्न नहीं करने पाती और जब मन की स्थिति प्रतिकूल होती है तो प्रिय बातें भी अच्छी नहीं लगती। जैसे जब कोई पिता विनोद पूर्ण मनःस्थिति में होता है तो बच्चों की शरारत में भी उसे आनन्द आता है किन्तु जब वह मलिन मनःस्थिति में होता है तो बच्चों की उचित प्रसन्नता भी उस क्षुभित और दुःखी कर देती है। हानि लाभ की सूचनाओं में भी इसी तरह मनःस्थिति के अनुसार दुःख सुख होता रहता है। दुःख-सुख का जन्म बाहरी पदार्थों अथवा परिस्थितियों पर निर्भर नहीं है। उसका जन्म मन से मन में ही होता है। इसीलिए उन्हें मनुष्य का मानस पुत्र कहा गया है।

हमारे हृदय में सदा सुख का ही जन्म होता रहे, दुख की स्थिति में भी हम सुख का अनुभव करते रहें-इसके लिए आवश्यक है कि हम अपनी मनोभूमि को अनुकूल बनायें। मन की अनुकूलता का उपाय है ‘संतुलन’। संतुलन का आशय है, जल्दी जल्दी आन्दोलित न होना। उन्नति लाभ और सफलता के अवसरों पर खुशी से नाच उठना, हर्षातिरेक बावले हो में जाना और गतिरोध, हानि अथवा असफलता के क्षणों में निराश, ह्रास अथवा शोकातिरेक से रो उठना वास्तव में मानसिक असंतुलन के लक्षण है।

अभ्यास पूर्वक यदि मनुष्य अपने इस मानसिक असंतुलन पर काबू रखने लगे तो वह एक सन्तोषप्रद सीमा तक सुख-दुख के घात-प्रतिघात से बचा रह सकता है। जो सुखात्मक अशाँत स्थिति में हर्षातिरेक से आन्दोलित हो उठेगा। दुःख के समय उसका शोक विह्वल हो उठना स्वाभाविक ही है। सुख का आघात तो एक हद तक सहा भी जा सकता है। उससे अधिक हानि नहीं होती। केवल पुरुषोचित गाम्भीर्य और सुखोपभोग में समय की हानि अवश्य होती है बाकी हर्षातिरेक कोई गहरी हानि ऐसी हानि नहीं करता, जिसकी पूर्ति न हो सके अथवा दूर तक जिसका प्रभाव पड़े। किन्तु दुःख का आघात प्रायः असहाय होता है। उससे शक्तियों चेतना और यहाँ तक कि बुद्धि को भी दूरगामी हानि होती है। इसलिये सुख की अपेक्षा दुख के आघात से बचाव करना अधिक आवश्यक है। तथापि इसके उपाय मानसिक संतुलन की सिद्धि तभी सम्भव है, जब सुख के समय भी न आन्दोलित होने का अभ्यास रक्खा जाये। दुख के समय तो संभले रहने का प्रयत्न किया जाये और सुख के समय अतिरेक में बहते रहा जाये तो इस अधूरे प्रयत्न द्वारा प्रयोजन सिद्ध न होगा। यह तो एक और अभ्यास करना और दूसरी ओर उसे बिगाड़ लेना होगा।

जो मनीषी संतुलित मन वाले होते है। राग-द्वेष ईर्ष्या, स्पर्धा, उद्वेगों आवेशों से चलायमान नहीं होते, उनको असन्तोष के कारण प्रभावित नहीं करने पाते। वे सुख दुख को धूप-छाँव की माया मात्र मानकर उनकी उपस्थिति में भीषण स्थिति भी सामान्य ही बने रहते है। न उनका मन विचलित होता है और न स्वयं वे। जिनका मन विविध विकारों और विकृतियों से भरा रहता है, जो क्षिप्त-विक्षिप्त और विक्षोभ के रोगी होते है, उनका मन संतुलित नहीं रहता, वे क्षण क्षण पर आन्दोलित और चलायमान होते हुए, सुख-दुख के झूले में झटके खाते रहते है। जिन्होंने प्रयत्नपूर्वक मन को स्थिरता, एकाग्रता और निरोध का अभ्यास करा लिया है, वे हर स्थिति और हर परिस्थिति में संतुलित रहकर सुख-शाँति के अधिकारी बनते है। मानसिक संतुलन सुख-सन्तोष का बहुत बड़ा आधार है, उसे प्राप्त करने का प्रयत्न करते ही रहना चाहिये।

अनुरूपता भी सुख शाँति का एक महत्वपूर्ण आधार है। अनुरूपता के अर्थ है अन्तर और बाह्य की अनुरूपता जिसका अन्तर पवित्र और आदर्शपूर्ण है, किन्तु उसके कार्य उसके अनुरूप नहीं है, तब भी सुख शाँति का सुलभ होना सम्भव नहीं। मन कुछ और चाहे, तन कुछ करता रहे- इससे भी मनुष्य में एक विरोध बना रहता है। अपनी अवहेलना होते रहने से मन सदा अक्लांत और संतप्त बना रहता है। जो अन्तर बाहर की द्विविधि स्थिति में पड़े रहते है, वे कभी संतुष्ट नहीं होते। उन्हें मन, की प्रेरणा पर चलने से तन की तृष्णायें सताती है और तन की प्रेरणा पर चलने से मन धिक्कारता है। बहुत बार बहुत से लोगों की नैतिक बुद्धि प्रबल होती है। अन्तरमन में आदर्श प्रेरणाएँ मचलती रहती है, किन्तु उन्होंने आदर्श व्यवहार का अभ्यास नहीं किया होता है। ऐसी स्थिति में उनसे यंत्रवत ही आदर्श से घिरे कार्य हो जाते है। जिससे पश्चाताप तो होता ही है साथ ही कर्मों के फलस्वरूप भी कष्ट और क्लेश उठाने पड़ते है।

इसी प्रकार बहुत से बाहर से बड़े सत्यनिष्ठ और आदर्शवादी होते है। वे सत्कर्म करने का प्रयत्न करते है। किन्तु उनका कुसंस्कारी मन उनका विरोध करता है। उनके किये पर स्वार्थ हानि, लाभ आदि का अभियोग लगाता है। बाहर से आदर्शवादियों को मन को ताड़ना में पड़ कर बड़ी भयंकर यातना उठानी पड़ती है।

बहुत से लोग कपटपूर्ण स्थिति वाले भी होते है। वे ऊपर से तो बड़े सज्जन और अनुरूप दिखलाई देने का प्रयत्न करते रहते है। उसी के अनुरूप बोलते और उसी के अनुरूप आचरण भी प्रदर्शित करते है। पर यह सब उनका होता दिखावा ही है उनका इस प्रकार का बाह्य अन्तर के छल पर एक आवरण होता है। अवसर पाते ही ऐसे कपटी व्यक्ति दूसरों की हानि करते देर नहीं करते। वास्तविकता तो यह होती है कि बाहर का आदर्श उनका एक जाल के समान होता है, वह मात्र एक छल और छलावा होता है। अवसर पाकर दूसरों को छल लेने का, धोखा देने का एक उपाय मात्र होता है। ऐसे छली और कपटी लोग स्वप्न में भी कभी सुख शाँति नहीं पा सकते। वे ऊपर से कितनी ही शाँति-सन्तोष और स्थिरता का अभिनय करने में क्यों न सफल हो जायें पर अन्दर ही अन्दर अशाँत, भीत व्यग्र बने रहते है। उनकी अन्तरात्मा उनकी कुरूपता पर उन्हें धिक्कारती रहती है। उन्हें स्पष्ट अनुभव होता है कि वे जो कुछ दिखला और कर रहे है, वह सब मिथ्या है। एक दिन इसका परिणाम उन्हें भोगना ही होगा। उनकी अन्तरात्मा उन्हें क्षमा नहीं करेगी और तब समय आयेगा तो यही आत्मा जो मनुष्य का मित्र कही गई है, शत्रु बनकर उनके सामने खड़ी हो जायेगी। तन, मन और बुद्धि की सारी शक्तियाँ कुण्ठित कर देगी और उनको परिणाम भोगने के लिए निर्बल से निर्बल करके डाल देगी। उभय रूपी व्यक्ति इस सारे सत्य को भली प्रकार जानते है और भविष्य के भय से हर समय जलते गलते रहते है।

इसी अन्तर बाहर को अनुरूपता के कारण, विरोधी चिन्तन के फलस्वरूप इतना मानसिक ताप हो जाता है कि बहुत बार मानसिक और शारीरिक बीमारियाँ तक पैदा हो जाती है। इसी विरोधाभास के कारण हृदय कमजोर होकर बैठ जाते है और कभी कभी लोग इस आपत्ति से पागल तक हो जाते है। अन्दर बाहर का यह विरोधाभास भयंकर यातना भरी स्थिति है। इसमें कैसे अबुद्धिमान लोग एक क्षण को भी शाँति के लिए तरसते रहते है। इस द्विविधि जीवन से उसी तरह बचते रहना चाहिये, जिस प्रकार सावधान लोग दुमुँही साँप से बचते है।

इन दोनों उपायों के साथ सुख-शाँति की सुरक्षा करने के लिये, एक छोटी-सी आवश्यकता और है। वह है ‘सामंजस्य’। बिना सामंजस्य बुद्धि के भी काम नहीं चल सकता। यदि कोई व्यक्ति अन्तर से आदर्शवादी है और उसका बाह्य व्यवहार भी उसी के अनुरूप है, तथापि सामंजस्य गुण का अभाव है, तब भी वह दूसरों के गलत काम देख सुनकर अथवा अनुभव करके अशाँत होता रहेगा। असामंजस्य बुद्धि वाले व्यक्तियों का यह एक मिजाज हो जाता है कि जैसा मैं आदर्शवादी हूँ, वैसा ही हर आदमी बने और जब वे इसके विरुद्ध देखते है तो अशाँत और व्यग्र होते है। इस अच्छाई बुराई से भरे संसार में सबका एक सा होना सम्भव नहीं। जो जैसा है उसे उसके भाग्य और अन्त पर छोड़कर अपनी सुख-शाँति की रक्षा करना ही चाहिये। आवश्यकता बस इतनी है की किसी को समझा बुझाकर, सही रास्ते पर लाने का प्रयत्न तो किया जाये किन्तु इस विषय में इस सीमा तक भावुक न हो जाये कि उसके दुर्भाग्य में अपना भाग बना ले। मानवीय सद्भावना रखते हुए उसे उसके कर्मों पर छोड़िये, न उस पर क्रोध करिये और न क्षोभ। यदि उसकी बुराई के छींटे अपने आप पर भी कभी आ जाते है तो उन्हें सहन करिये, साधारण सामंजस्य बनाए रहिये और इस प्रकार अपनी सुख शाँति को प्रभावित मन होने दीजिये, यही बुद्धिमानी है और यही उचित है।

इस प्रकार जीवन में यदि स्थायी सुख शाँति की आकांक्षा है तो संतुलन, समरूपता और सामंजस्य का अभ्यास करिये। इनका अवलम्बन लिए बिना, अभिमत फल की आशा नहीं की जा सकती।


जन-मानस के मोती

स्वाति नक्षत्र था। वारिद से जल-बिन्दु तेजी से चला आ रहा था।

वृक्ष की हरित नवल कोपल ने रोककर पूछा-प्रिय किधर चले?”

“भद्रे! जलनिधि पर सूर्य की कोप-दृष्टि हुई है, वह उसे सुखाय डाल रहा है। जलधि की सहायता करने जा रहा हूँ।”

“छोड़ो भी व्यर्थ की चिन्ता। खुद को मिटा कर भी कोई किसी की सहायता करता है। चार दिन की जिन्दगी है, कर लो आनन्दोपभोग। कहाँ मिलेगी ऐसी कोमल शय्या!”

जल बिन्दु ने एक न सुनी। तेजी से लुढ़क पड़ा सागर की और। नीचे तैर रही थी सीप। उसने जन बिन्दु को आँचल में समेट लिया। जन-बिन्दु जन बिन्दु न रहकर, हो गया ‘मोती’। सागर की लहरों से एक धीमी-सी ध्वनि निकली-निज अस्तित्व की चिन्ता छोड़कर समाज-सागर क कल्याण के लिये जो अग्रसर होते है, वे बन जाते हैं, जन-मानस के मोती’।


समाज निर्माण में पुस्तकालयों की भूमिका

1965 की सर्वे रिपोर्ट के अनुसार भारतवर्ष के नगरों की कुल संख्या 3018 थी गाँवों की 558089। 1951 की जनसंख्या सारिणी बताती है कि उस समय भारतवर्ष की कुल आबादी 356819394 थी, 1956 तक वह 38.65 करोड़ हो चुकी थी, अनुमान है कि अब भारतवर्ष की कुल जनसंख्या लगभग 45 करोड़ होगी। इस जनसंख्या का केवल 17.3 प्रतिशत भाग अर्थात् कुल 76635000 लोग शहरों में रहते है, शेष 373365000 लोग गाँवों में रहते है। 6.44 करोड़ घरों में 5.41 घर गाँवों में है। गाँव इस देश की आत्मा है। यहाँ के भाग्य बनने बिगड़ने का उत्तरदायित्व इस प्रकार इन गाँवों पर ही है, जबकि अभी भी यहाँ अशिक्षितों की संख्या 90 प्रतिशत से अधिक है।

राजनीति की बात नहीं कहते, क्योंकि वह पंगु हो गई है। सरकारें अपने स्थायित्व और प्रभुत्व की समस्या से ही मुक्ति नहीं ले पा रही। समृद्धि और सफलता के सही अर्थ को समझना इनके बूते की बात कहाँ? ऐसे समय एक प्रश्न जो केवल शिक्षितों से ही किया जा सकता है? यह है कि इस विशाल जनसंख्या के बौद्धिक स्तर को उठाये बिना क्या राष्ट्र की प्रगति हो सकती है? सबसे बड़े वर्ग की सामाजिक, नैतिक आर्थिक और मानसिक उन्नति किये बिना क्या राष्ट्र के भविष्य को समृद्धि और सफलता के द्वार तक पहुँचाया जा सकता है। यदि नहीं तो किन क्राँतिकारी उपायों द्वारा इन अभावों को दूर किया जा सकता है।

इस प्रश्न का सही उत्तर प्राप्त करने के लिये इतिहास के पन्ने पलटने पड़ेंगे। हम समृद्ध और सफल देशों के इतिहास की गहराई में प्रवेश करते है तो पाते है कि जिन देश ने भी क्राँतिकारी सफलतायें पाई है, उसने पुस्तकालय स्थापना को आन्दोलन का रूप देकर ही प्रजा में प्रगतिशीलता के विचार और साहस जागृत किया है। 1876 तक अमेरिका ने जो प्रगति की और उसके बाद की शताब्दी में उसने जो उपलब्धियाँ प्राप्त कीं, उनमें बाद की उपलब्धियों के आगे पिछली सारी समृद्धि और सफलता सूर्य के सम्मुख मिट्टी के दिये की तरह ही तुच्छ जान पड़ने लगती है।

1876 में केन्द्रीय सरकार ने पुस्तकालय आन्दोलन की सर्वसम्मत योजना बनाई और राज्य सरकारों के माध्यम से उनका तेजी से प्रसार किया। संचालन और व्यवस्था के लिये बड़े-बड़े कार्यक्रम बनाये गये। इस पर खर्च हुये धन को आज भी अमेरिका अपने विनियोग का सर्वोत्तम उपयोग मानती है। यहाँ के सभी सार्वजनिक संस्थानों के पास और कुछ हो या न हो पुस्तकालय अवश्य मिलेंगे। उनमें योग्य व्यक्तियों की नियुक्ति की गई। पुस्तकालय को एक स्वतन्त्र विज्ञान मानकर उसके विकास के लिये जो भी सम्भव प्रयत्न थे किये गये।

डा मेलविल ड्यूबी ने ‘वैज्ञानिक लाइब्रेरी क्लासी फिकेशन का आविष्कार किया जिसमें यह अध्ययन किया जाता कि किस क्षेत्र के लोगों के लिये किस प्रकार का साहित्य उपयुक्त रहेगा। 5000 जनसंख्या के लिये कम से कम एक पुस्तकालय की व्यवस्था अनिवार्य कर दी गई। पुस्तकालय आन्दोलन ने इतनी तीव्र प्रगति की कि अब वहाँ धर-धर ज्ञान-मन्दिरों के प्रतीक पुस्तकालयों की स्थापना लोगों की व्यक्तिगत हाॅबी बन गई है। इस समय वहाँ के 80 प्रतिशत नागरिक निःशुल्क सार्वजनिक पुस्तकालयों का उपयोग करते है। 13676 पुस्तकालयों में 7500 सार्वजनिक पुस्तकालय है, जिनकी 1500 शाखायें सारे अमेरिका में फैली हुई है।

इन पुस्तकों से 36000000 व्यक्ति लाभ उठाते है। प्रतिवर्ष 161127000 पुस्तकें वितरित की जाती है। पुस्तकों की खरीद में लगी पूँजी के अतिरिक्त केवल संचालन और व्यवस्था में अमेरिका प्रति वर्ष 109924000 डालर खर्च करता है। नई पुस्तकों की खरीद में 12000000 डालर का व्यय इससे अतिरिक्त होता है। राष्ट्रीय स्मारक के रूप में वाशिंगटन में डी सी स्थित काँग्रे पुस्तकालय सारे विश्व में एक उदाहरण है। यह पुस्तकालय 36 एकड़ भूमि में बना है। इसमें 1 करोड़ 30 लाख पुस्तकें, 3 करोड़ अन्य सामग्री जिसमें शोध ग्रन्थ पाण्डुलिपि मानचित्र और रिकार्ड पुस्तकें है। इसमें जितनी अलमारियाँ काम में ली गई है, यदि एक सीध में खड़ा कर दिया जाय तो उनकी लम्बाई 270 मील होगी।

इतने धन की व्यवस्था, प्रबन्ध की जिम्मेदारी केवल इसलिये उठाई गई है कि अमेरिकन पुस्तकालय के महत्व को समझते है। विज्ञान के प्रति नित्य नई शोधों के लिये आवश्यक मस्तिष्क विद्यालयों ने ही तैयार किया है। यहाँ लोगों ने पुस्तकालयों की उपयोगिता समझी इसका सबसे बड़ा प्रमाण यही है कि पाठकों को पुस्तकों के लिये स्वयं आग्रह करना पड़ता है, उन्हें आकर्षित नहीं किया जाता। कई बार तो ऐसा भी होता है कि अपने नम्बर के लिये लोगों को प्रतीक्षा भी करनी पड़ती है। लोग अनुभव करते है कि पुस्तकालय उनकी सम्पत्ति है और उनके जीवन के उत्थान में सबसे बड़ा सहयोग भी उन्हीं से मिल सकता है।

जन अभिरुचि और वहाँ के शिक्षितों के हार्दिक समर्थन का ही फल है कि सार्वजनिक पुस्तकालयों के अतिरिक्त अमेरिका में 1400 से अधिक कालेजों में 600 जूनियर कालेजों में तथा 42000 सार्वजनिक स्कूलों में पुस्तकालय है। 3000 विशेष पुस्तकालय 1000 चिकित्सा सम्बन्धी 600 कानूनी, 600 सेनाओं सम्बन्धी, 400 सार्वजनिक प्रशासन सम्बन्धी पुस्तकालय है। अमेरिका के जन-जीवन में पुस्तकालयों के प्रभाव का इससे बड़ा प्रमाण और क्या हो सकता है।

जापान की औद्योगिक क्राँति में पुस्तकालयों के योगदान पर पहले चर्चा कर चुके है। रूस ने 1921 में प्रारम्भिक शिक्षा अनिवार्य की पर उन्होंने देखा कि इससे सामान्य जन-जीवन में विचार क्राँति के आसार कम है, फलस्वरूप अनेक विद्वान् व्यक्तियों की एक कमेटी नियुक्त की गई, कमेटी ने अपनी योजना प्रस्तुत करते हुए, बताया “व्यक्ति और समाज दोनों के हित की दृष्टि से हमारी यह मान्यता है कि सारे देश में पुस्तकालयों का जाल बिछा दिया जाना चाहिये। लोग अपने भीतर छिपे हुये वर्चस्व को जागृत करने के लिये, तब तक अवसर नहीं मिलता, जब तक मस्तिष्क में विचारों का कीड़ा निरन्तर घूमता न रहे। पुस्तकालय लोगों के मन जगा सकते है और उन्हें उन्नति की तीव्र आकांक्षा के साथ सामाजिक कर्तव्यों की भी प्रेरणा दे सकते है। इस राज को सरकार ने स्वीकार कर लिया, उसी वर्ष पुस्तकालय सम्बन्धी कानून बनाकर उन्हें लागू भी कर दिया गया। आज संसार में सारे विश्व से अधिक पुस्तकालय रूस में है।

रूस में 381000 पुस्तकालय है। अधिकाँश पुस्तकालय ग्रामीणों की आवश्यकता को ध्यान में रखकर स्थापित किये गये है। यहाँ प्रत्येक 1000 व्यक्तियों पर 1 पुस्तकालय है, देहातों के लिये 1 लाख ग्रामीण पुस्तकालयों की स्थापना की गई हे। इन पुस्तकालयों में 1891 लाख पुस्तकें लोगों को टेक्नोलॉजी, साँस्कृतिक, बौद्धिक विकास की प्रेरणा देती रहती है।

अधिक से अधिक लोग पुस्तकालयों के सम्पर्क में आये और उनसे लाभ प्राप्त करें, इसके लिये सोवियत संघ में नगरों, सार्वजनिक स्थानों, मेलों और पर्व पर साहित्यिक प्रदर्शनियाँ आयोजित की जाती है। उनमें भाषणों की व्यवस्था रहती है, पुस्तकालय और स्वाध्याय के महत्व पर प्रकाश डाला जाता है, जिसके कारण आज वहाँ के पुस्तकालय लोगों के सामाजिक अंग बन चुके है।

अच्छा साहित्य सुनसान में भी जीवन ला देता है, इसका सबसे अच्छा उदाहरण है रूस। यहाँ की प्रगति देख कर कोई भी अनुमान कर सकता है कि लोगों के बौद्धिक स्तर को ऊँचा उठाने में पुस्तकालयों ने कितना योगदान दिया है।

ग्रेट ब्रिटेन की 30000 से अधिक लाइब्रेरियों का प्रबन्ध वहाँ का शिक्षा विभाग करता है। पुस्तकें वितरित करने के लिये ‘सर्विस पाइन्ट’ तैयार किये गये है, जो लोगों की मानसिक स्थिति का अध्ययन और क्षेत्रीय आवश्यकता के अनुसार पुस्तकें मँगाते और लोगों को पढ़ाते है।

आज तो स्थिति कुछ और है पर कोई दिन था, जब भारतवर्ष में पुस्तकालयों की आवश्यकता को उसी प्रकार अनुभव किया गया था, जिस प्रकार आज के सभी प्रगतिशील देशों ने अनुभव की है। यहाँ ग्रामीण पुस्तकालयों के अतिरिक्त चलते फिरते पुस्तकालय भी होते थे। मनीषियों सन्तों समाज सुधारकों के पास हस्तलिखित पुस्तकों के भण्डार हुआ करते थे। वे जहाँ भी जाते थे लोगों को इन ज्ञान-दीपों का प्रकाश दिया करते थे। पुस्तकालयों से निरन्तर प्रेरणा मिलती रहने के कारण सामाजिक क्रियाशीलता जीवित थी। अनुशासन था, सामाजिकता थी, कर्तव्य पालन के भाव थे, पांडित्य था, दर्शन था और वह सब कुछ था, जो आज किन्हीं वान एवं टेक्नोलॉजी में उन्नत देशों में उपलब्ध है।

राज्यकोष पुस्तकालयों में नालन्दा व तक्षशिला के पुस्तकालयों की अभी भी ख्याति है। प्रसिद्ध चीनी यात्री हवेनसाँग और इत्सिंग ने नालन्दा के विश्व-विद्यालय का वर्णन करते हुए लिखा है-वहाँ का पुस्तकालय तीन विशाल, रत्नरञ्जक थे।” रत्नसागर 9 मंजिला ऊँचा पुस्तकालय था, इनमें अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, नीतिशास्त्र, औषधि, आचारशास्त्र, वेद उपनिषद्, दर्शन, योगविद्या के साथ यन्त्र-तन्त्र सम्बन्धी पुस्तकें भी थी। इस देश के लोगों में ज्ञान प्राप्ति की अदम्य पिपासा भरी हुई है, ऐसा लगता है कि इस देश ने जो उन्नति की है, उसका कारण उनका बहुमुखी विकसित ज्ञान ही है।”

ज्ञान और विचार भी व्यक्तित्व के विकास का द्वारा खोलते है, अज्ञानी व्यक्ति तो अधिक से अधिक पेट भर सकता है बच्चे पैदा कर सकता है। आज हमारे देश में यही सब हो भी रहा है। हमारे ज्ञान-स्रोत सूखे पड़े है, यहाँ भी लोगों को निरन्तर ज्ञान का प्रकाश मिलता रहे, ऐसी कुछ भी व्यवस्था नहीं है। अमेरिका पुस्तकालय सेवा के लिये प्रति व्यक्ति 5 रु., ब्रिटेन तीन रुपया, चेकोस्लोवाकिया दो रुपया खर्च करता है। रूस में प्रति व्यक्ति 23 पुस्तकें आती है पर भारतवर्ष में कई हजार पर भी औसत 1 रुपया पुस्तकालयों के लिए नहीं आता यहाँ की सरकार भी इस दिशा में सुप्त है। पुस्तकालय जैसी सर्वाधिक महत्वपूर्ण योजना के लिये तृतीय पंचवर्षीय योजना के 630 पन्नों के इतिहास के कुल 15 लाइन मिली है।

यही कारण है कि 22 वर्षों की स्वाधीनता के बाद भी भारतवर्ष की प्रगति के आँकड़े कछुए की गति से बढ़ रहे है। शहरों में तो कुछ शिक्षा के भी अच्छे प्रबन्ध है, पुस्तकालय भी है पर साढ़े पाँच लाख गाँव तो ज्ञान के प्रकाश से शून्य पड़े है। इनमें रहने वाले ग्रामीणों में आज साहस है न मनोबल, ज्ञान है न बुद्धि, विवेक है न समुचित महत्वाकाँक्षायें। अंधविश्वास, रूढ़िवाद, सामाजिक कुरीतियों से घिरे जन-अन्तःकरण को आन्दोलित करने की आवश्यकता अधूरी पड़ी है।

हर शिक्षित व्यक्ति का यह उत्तरदायित्व होता है कि वह संसार को अच्छा बनाने का प्रयत्न करे। पर हमारे सामने तो आज अपने आप अच्छा बनने का ही उत्तरदायित्व बहुत काफी है। यदि इसे ही पूरा कर लें बहुत है। इतिहास के पृष्ठ पलटने और जन-क्राँति की गहराई में पैठ करने से पता चलता है कि राष्ट्र के अभ्युत्थान की आकांक्षा पुस्तकालयों से ही पूरी होगी। उसके लिये सरकार का मुख नहीं देखा जा सकता। यह उत्तरदायित्व शिक्षितों का है, उन्हें ही इसे पूरा भी करना पड़ेगा।


शिक्षा की उपयोगिता

समाज सेवक महात्मा हंसराज तब विद्यार्थी ही थे। आवश्यक कार्यों से बचा सारा समय मुहल्ले के गरीब तथा अनपढ़ लोगों की चिट्ठी लिखने तथा पढ़ने में ही लगा देते थे। जब परीक्षा निकट आई तो माता ने समझाया-क्यों रे! तू सारे दिन दूसरों की लिखा-पढ़ी करता रहता है-अपनी पढ़ाई कब करेगा? अब सब कुछ छोड़कर पढ़ाई की तरफ ध्यान देना चाहिये तुम्हें।” इस पर वे मुस्कराकर सहज भाव से बोले-माँ यदि पढ़ाई-लिखाई का लाभ अकेले ही उठाते रहे हम, दूसरों का उससे कुछ भला न हो तो ऐसी पढ़ाई-लिखाई किस काम की। शिक्षा की उपयोगिता तभी है जब उसका अधिक से अधिक लाभ दूसरों को मिले।”


कथा- अग्नि-दीक्षा

“अपनी सेवा आप करना, ब्रह्मचर्य व्रत पाल, भूमिशयन, वल्कल वसन, उपवास तथा उपासना से बचे समय में धर्म ग्रन्थों का स्वाध्याय, चिन्तन और मनन यह साधना की प्रारम्भिक आवश्यकतायें है, शिखिध्वज! आज तुम्हारी मन्त्र-दीक्षा सम्पन्न हुई। पूजन की सामग्री, उपयुक्त पात्र, कुश-आसन यह अपने पास रखने होंगे। पंचोपचार पूजन सहित मंत्र जप करना चाहिये और शुभ्र ज्योति स्वरूप निराकार भगवती गायत्री का ध्यान करना चाहिये। जब तुम इस प्रारम्भिक साधना को सफलतापूर्वक पूरा कर लोगे तो आगे उच्चस्तरीय साधना के लिये, तुम्हें अग्नि-दीक्षा भी देंगे।” यह कहकर महर्षि उद्दालक उठ खड़े हुए। शिखिध्वज ने गुरु-चरणों में प्रणिपात किया, महर्षि उद्दालक ने आशीर्वाद दिया और दोनों अपने-अपने पर्ण कुटीरों की ओर चले गये।

श्रद्धा शिष्य की प्रारम्भिक परख है। आत्म-जिज्ञासा होना अन्यत्र बात है, श्रद्धा अन्यत्र। जिज्ञासाएँ तो नास्तिकों को भी होती है, किन्तु मानवीय स्वभाव के विपरीत ऊर्ध्वगामी जीवन और कष्टपूर्ण साधनाओं में जिस धैर्य की आवश्यकता होती है, वह श्रद्धावान व्यक्तियों में ही होती है। ‘श्रद्धावान लभते ज्ञान’ ‘श्रद्धयासत्य माप्यते-श्रद्धावान् ही ज्ञानार्जन करते है, श्रद्धावान ही सत्य को प्राप्त करते है। शिखिध्वज में श्रद्धा भावना का अभाव न होने से ही महर्षि ने मंत्रदीक्षा दी थी। सामान्यतः हर किसी को वे दीक्षा दिया नहीं करते थे।

एक वर्ष में शिखिध्वज ने अच्छी प्रकार अनुभव कर लिया कि संसार जड़ और चेतन दो प्रकार के परमाणुओं से बना है, जिस प्रकार जड़-परमाणु इधर-उधर घूमते हुए अपना संसार-दृश्य जगत बनाते रहते है, उसी प्रकार चेतना भी आनन्द प्राप्ति के लिये, यहाँ वहाँ विचरण करती रहती है। जब तक मन जड़ परमाणुओं से बने संसार में सुख खोजता है, तब तक वह भूले हुए पथिक की भाँति वन और कंटकों में विचरण का सा कष्ट पाता है पर जब वह यह जान लेता हे कि आत्मा की प्यास विराट-आत्मा बनने से बुझती है तो फिर वह जन्म-मरण के चक्र में आत्मचेतना को भटकता नहीं वरन् अपने भौतिक संस्कारों का प्रचालन करने और आत्मा को परमात्मा में घुला कर असीम आनन्द की प्राप्ति की तैयारी में संलग्न हो जाता है।

साधना का यह द्वितीय द्वार सिद्धांत जितना सरल है, व्यवहार में उतना ही कठिन। जन्म-जन्मान्तरों का अभ्यासी मन लौकिक सुखों को सहज ही त्यागने के लिए तैयार नहीं होता। बड़ा भारी संग्राम करना पड़ता है, तब कहीं मन की मलिनता दूर होती है। इस अवस्था में पहुँचे हुए साधकों को थोड़ी सी भी चूक उन्हें पथ-भ्रष्ट कर सकती है, उन्हें पहाड़ जैसी उपलब्धियों से पल भर में नीचे गिरा सकती है, इसलिये योग्य आचार्यों एवं सिद्ध महापुरुषों ने अग्नि-दीक्षा उन्हीं को दी, जिन्हें पात्र समझा। इस किसी को अग्नि-दीक्षा का अधिकारी घोषित करने की भूल उन्होंने की होती तो साधन-तत्व नष्ट ही हो गया होता।

मंत्र-दीक्षा की वर्षगाँठ श्रावणी के पुण्य पर्व पर पड़ती थी। एक दिन पूर्व ही शिखिध्वज ने गुरुदेव के समीप जाकर प्रार्थना की भगवन्! आपकी कृपा से प्रारम्भिक साधना का अन्तिम चरण आज से पूरा हो रहा है। मेरी हार्दिक अभिलाषा है कि अब मैं उच्च-स्तरीय साधनाओं में प्रवेश कर सिद्धियाँ प्राप्त करूँ, पाँचों कोशों का अनावरण करते हुए आनन्दमय भूमिका में पहुँचूं।

महर्षि शिष्य की निष्ठा से प्रसन्न तो हुए पर उनकी प्रसन्नता टीन पात्र की तरह न थी जो हलकी आँच से गर्म और थोड़ी सी शीत से ही शीतल हो जाता है। वे बड़े पारखी थे। बोले कुछ नहीं। भीतर दृढ़ता को टटोले बिना आगे का पाठ्य-क्रम चलाने की अनुमति भी नहीं दी। अभी अग्नि-दीक्षा के उपयुक्त पात्रता की परीक्षा शेष थी, उसे परखे बिना स्वीकृति दी भी तो नहीं जा सकती थी।

उद्दालक महान तपस्वी थे। उन्होंने अनेक सिद्धियाँ प्राप्त की थी। भगवती गायत्री का दिया हुआ पारसमणि उनके पास था। उन्होंने चुपचाप मणि निकाली, एक अन्य विद्यार्थी को भेजकर थोड़ा लोहा मंगाया। शिखिध्वज को चिन्ता हो रही थी, गुरुदेव कुछ कर रहे है पर मेरी बात का उत्तर नहीं दे रहे। इस बीच वह शिष्य कई लौह-सलाखें लेकर आ उपस्थित हुआ। महर्षि ने पारसमणि का उन सलाखों से स्पर्श कराया विस्मय! महान विस्मय!! वह सलाखें स्वर्ण में परिवर्तित हो गई। शिखिध्वज गुरु का चमत्कार देखकर दंग रह गये।

धन्यः हो धन से ही तो धर्म होता है। धर्म से ही पुण्य और पुण्य से मुक्ति।” मिल गया मुक्ति का मार्ग मुझे। शिखिध्वज के मन में पारसमणि का लोभ आ गया। चढ़ने में तो परिश्रम भी पड़ता है। समय भी लगता है, फिसलते कितनी देर लगती है, साधना के द्वारा निर्मल किया मन एक ही क्षण में लोभ की कीचड़ में डूब गया। मुद्राध्यायी महर्षि! मुस्कराये-इतनी कमजोर निष्ठा वाले शिष्य कहीं अग्नि-दीक्षा के अधिकारी हो सकते है। यह तो धन की बात रही अभी तो सौंदर्य, स्वर, यश के कितने आकर्षण है, शिखिध्वज वित्तैषणा से ही मुक्त न हो सका तो यह ब्रह्म-दीक्षा तक पहुँचने की कठिनाई कैसे झेल सकेगा? स्वल्प शक्ति, योग्यता और प्रतिभा का मनुष्य जो अपने कल के भविष्य के लिए भी निश्चित नहीं होता, उसे राज-सम्मान के पद और प्रतिष्ठा प्राप्त करने में ही कितनी कठिन परीक्षाओं से गुजरना पड़ता है, सर्वशक्तिमान ब्रह्म और उसका अन्यतम ऐश्वर्य प्राप्त करने की कठिनाइयों का तो अनुमान ही कौन कर सकता है। परम पुरुषार्थ कहा है इसीलिये आत्म प्राप्ति को, क्योंकि उसमें सिवाय दमन-दमन के और कुछ नहीं। मनुष्य को अपनी प्रकृति का स्वभाव का, इच्छा और अहंकार का दमन करने में कितना कष्ट होता होगा, इसकी कल्पना कर सकना भी सहज नहीं है।

हतभाग्य शिखिध्वज पहले ही चरण में ढेर हो गया। अभी तक महर्षि उद्दालक कुछ बोले भी नहीं थे। अपना मन्तव्य शिखिध्सन ने अपने आप बदलते हुए कहा-गुरुदेव आप सचमुच भगवन् है, सर्व समर्थ है, कितना अच्छा हो यदि आप यह पारसमणि मुझे दे दें। इससे प्राप्त सुवर्ण-राशि का उपयोग मैं समाज की भलाई में, यज्ञकर्म में करूँगा और इस तरह संसार से मुक्त हो जाऊँगा।”

महर्षि शिखिध्वज के बालकपन पर मुस्कराये। चाहते तो पारसमणि दे भी देते पर शिष्य के कल्याणार्थ उन्होंने मणि दी नहीं। उन्होंने कुछ गम्भीर होकर कहा-वत्स पारसमणि तो तुम्हें दे दूँगा पर तुम इसे लेकर जाओ और साँसारिक आकर्षणों में फँसकर इसका दुरुपयोग करो, इससे पहले तुम्हें इस सत्यता की घोषणा करनी होगी कि धर्म और साँसारिकता में कौन बड़ा है। आसक्ति और वैराग्य में कौन श्रेष्ठ हैं। कहीं ऐसा न हो तु इसे लेकर जाओ और पाप-पंक में डूबकर धार्मिक मर्यादाओं को भी कलंकित कर डालो।

इसलिये पहले तुम्हें मेरे साथ यात्रा में चलना होगा। यात्रा के बाद ही तुम्हें पारसमणि सौंपने का निश्चय किया जा सकता है।

तब महर्षि उद्दालक और शिखिध्वज वहाँ से चल पड़े। दिन भर चले। रात्रि वहाँ से 5 योजन दूर एक गाँव में डेरा डाला। इस गाँव में उच्च वर्ण के ब्राह्मण और क्षत्रियों का बाहुल्य था। महर्षि एक कुलीन गृहस्थ के घर टिक गये।

सन्ध्या समाप्त कर उद्दालक ने गृहस्थ को बुलाकर पूछा-यदि आप रात्रि भर के लिए अपनी युवा-पुत्री को हमारे पास रहने दें, हम अपनी मंत्र शक्ति से तुम्हारे घर में उपलब्ध सम्पूर्ण लोहे की स्वर्ण-राशि में बदलकर दे सकते है। गृहस्थ को एक बार संन्यासी की धूर्तता पर क्रोध आया पर हाय रे कृश-मनुष्य उसने भी वही पाप किया जो शिखिध्वज ने करने की ठानी थी। स्वर्ण-राशि का लोभ, भविष्य में वैभव विलास के रंगीन सपनों ने उसकी प्रतिरोध की शक्ति वैसे ही नष्ट कर दी, जैसे आसक्त भारतीय राजाओं ने भविष्य के भय से विदेशी आक्रमणकारियों का सामना न कर उनसे समझौता कर देश को कलंकित किया। गृहस्थ ने सोने के लोभ में पुत्री देना स्वीकार कर लिया।

महर्षि ने गृहस्थ के घर की लौह-राशि को सोने में बदल दिया। गृहस्थ ने अपनी पुत्री महर्षि को समर्पित कर दी। महर्षि ने बालिका की पीठ पर स्नेह को हाथ फेरते हुए कहा-पुत्री तुम्हारी पितृ-भक्ति सराहनीय है, किन्तु धन के लोभी पिता की आज्ञा के आगे अपनी धार्मिक मर्यादायें बड़ी हे, आवश्यकता पड़े तो अपने माता-पिता का भी सामना करना चाहिये पर अविवेकपूर्ण निर्णय को स्वीकार नहीं करना चाहिये। शिखिध्वज ने यह सब अपनी आँखों देखा। इसके बाद महर्षि उद्दालक वहाँ रुके भी नहीं, रात में ही आगे चल पड़े।

प्रातः होने तक गुरु-शिष्य पारावती नगर जा पहुँचे। नर्मदा के पुण्य तट पर स्नान, सन्ध्या करने के उपरान्त वे एक धनी सेठ के द्वारा मेहमान बने। धनिक ने उनका स्वागत सत्कार किया। इस स्वागत के बदले महर्षि ने कहा-तात् एक घंटे में तु जितना लोहा ला सको ले आओ हम उसे स्वर्ण में बदल देंगे। वणिक का मन हर्ष से नाच उठा। सारे घर को लगा दिया। आध घंटे में घर में उपलब्ध सारा लोहा खोज लिया पर उससे वणिक की इच्छा तृप्त न हुई। पड़ोस में लुहार का घर था उसने अपने पुत्रों को भेजकर उसका भी बहुत-सा लोहा चोरी करा लिया। यह भी ध्यान न रहा कि दीन लुहार की आजीविका छिन रही है।

लोहे का अम्बार लग गया, महर्षि ने हँसकर कहा-धन्य है रे मनुष्य की तृष्णा तू कभी पूरी न हुई और मनुष्य कितना पागल की प्रतिक्षण तेरे पीछे ही दौड़ता फिरा।” उन्होंने वह लोहा भी सोने में बदल दिया और आगे चल पड़े।

अगली सन्ध्या उन्होंने राजगृह में बिताई। राजा अपने पुत्र के विवाह की तैयारी में था। महर्षि ने उसे भी बुलाकर कहा-यदि वह किसी नवजात शिशु को बलिदान के लिए दे सके तो उसके राजभवन की प्रत्येक वस्तु को सोने में बदला जा सकता है। लोभी नृपति ने पड़ोसी विधवा के बच्चे को गोद से छिन मँगाया और महर्षि को भेंट कर दिया। पुत्र तो महर्षि ने पीछे से उसकी माँ को पहुँचा दिया पर लोभी मनुष्य समाज के लिये भी कितना घातक हो सकता है, उसकी शिक्षा शिखिध्वज को मिल गई। इस तरह वे वहाँ से भी आगे बढ़ चले।

अगले दिन एक विद्वान ब्राह्मण के घर पहुँचकर महर्षि ने कहा-यदि आप अपने सम्पूर्ण ग्रन्थों को मुझे बेच दें, उनका स्वामी, रचयिता सब मुझे बना दे तो मैं आपके घर में प्राप्त सभी लोहे को सोना बना दूँगा।” विद्वान का स्वाभिमान सोने के लोभ में ढेर हो गया। उसने भी प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। साँसारिक सुख के लिये मनुष्य अपने आदर्श और सिद्धान्त ही नहीं शान और स्वाभिमान तक बेच सकता है। इस तरह की शिक्षा देकर गुरु-शिष्य वहाँ से भी चल पड़े और संध्या होने से पूर्व अपने आश्रम लौट आये।

गुरुदेव! के वापिस आने पर सारे आश्रमवासी हर्ष विभोर हो गये। सब लोग उन्हें प्रणाम करने आने लगे। शिक्षार्थी, वानप्रस्थी जो अपना सर्वस्व त्याग कर तप साधना के लिये आश्रम में आये थे, एक-एक कर महर्षि के चरणों में शीश झुकाते चले जा रहे थे और शिखिध्वज देख रहा था, इस अनुशासन में कितनी शाँति, सन्तोष, आनन्द और भाव छलक रहा है। आज उसे अपनी दीनता पर बड़ा पश्चाताप हो रहा था।

सबसे निवृत्त होकर महर्षि ने शिखिध्वज को बुलाकर कहा-तात् लो यह रही पारसमणि, इसे ले जाओ और साँसारिक सुखों का जी भर उपभोग करो।

किन्तु आज उसकी आसक्ति धुल चुकी थी। जो तृष्णायें मनुष्य से छल करा सकती, चोरी, हत्या और कुत्सित कर्म करा सकती है। उनसे तो निराहार रहकर जीना अच्छा। मनुष्य का आना, मनुष्यता से गिरकर पशु प्रवृत्ति में गिरने के लिये नहीं, अपने जीवन ध्येय को समझने ओर उसे प्राप्त करने के लिए बना है, इसलिये धर्म बड़ा है, लोकाचार बड़ा नहीं। उसने पारसमणि लौटाते हुए कहा-देव! मुझे यथार्थ पास तो अब मिला है, मेरी एक वर्ष की साधना व्यर्थ गई, इसका मुझे हार्दिक दुःख है। अब आशीर्वाद दे इसी साधना का पुनः अभ्यास करूँ और फिर से अग्नि दीक्षा की पात्रता उपलब्ध करूँ।


मनोविज्ञान हमारे सबसे बड़े शत्रु

निराशा, चिन्ता, असन्तोष अथवा उद्वेग किसी भी, आपत्ति अथवा विषमताओं का उपचार नहीं है। यह विकास स्वयं ही रोग और विपत्ति माने गये है। संसार में जो भी व्यक्ति सफल हुये हैं, उन्होंने अपने जीवन में निराशा, चिन्ता अथवा असन्तोष की कभी अवसर नहीं दिया। उन्होंने विकट से विकट परिस्थितियों में अपने को इन विकारों से बचाया है। संसार में जो भी असफल होते हैं, उनकी असफलता का कारण अभाव अथवा प्रतिकूल परिस्थितियाँ नहीं होती। उनका एक मात्र कारण निराशा, चिन्ता अथवा असन्तोष ही होता है। असफलता का निवास बाह्य परिस्थितियों की प्रतिकूलता में नहीं मनुष्य की प्रति गामिनी भावनाओं में होता है।

निराशा एक मानसिक रोग है। यह मनुष्य की गतिशीलता को अस्वस्थ बना देता है। निराशावादी व्यक्ति प्रगति की भावना और उन्नति की जिज्ञासा से उदासीन हो जाता है। प्रगति अथवा उन्नति की बात मन में आते ही उसे ऐसा आभास होने लगता है, मानो वह अपने ऊपर कोई विपत्ति लाने की बात सोच रहा हे। काम में प्रवृत्ति लाने से पूर्व ही उसे आपत्तियाँ, कठिनाईयाँ और असफलता दिखलाई देने लगती है। उसका साहस मर जाता है, उत्साह ठण्डा पड़ जाता है। आपने को जहाँ का तहाँ पड़ा सुरक्षित अनुभव करता है। एक निराशावादी और मृत व्यक्ति में कोई विशेष अन्तर नहीं होता। एक स्थित शव की तरह होता है, एक चलती-फिरती लाश की तरह।

चिन्ता की चिंता तक कहा गया है। किन्तु चिन्ता रूपी चिता श्मशान की चिता से अधिक भयंकर होती है। क्योंकि वह चिंता मेरे मनुष्य को जलाया करती है और यह जीवित मनुष्य को। चिंता-ग्रस्त मनुष्य अन्दर गीली लकड़ी की तरह सुलगता करता है। इस जलन में सबसे पहले उसकी प्रसन्नता जलती है, फिर जीवन की आशाएँ, अनन्त क्षमताएँ और अन्ततः शरीर। चिन्ता की आग इस प्रकार क्रम-क्रम से जलाकर मनुष्य का सारा जीवन खाक कर डालती है।

चिन्ता की चिंता में बैठा मनुष्य अपनी यातना पूर्ण मृत्यु की प्रतीक्षा करने के सिवाय और कुछ नहीं कर सकता। जिस वृक्ष में आग लग गई हो अथवा जिसे दावाग्नि ने झुलस डाला हो उससे हरियाली की आशा करना दुराशा मात्र है। ऐसे दाव-दुग्ध वृक्ष में न नये पत्ते उग सकते हैं, न फूल खिल सकते हैं और न फल आ सकते है। उसका ठूँठ होकर निरुपयोगी हो जाना निश्चित है।

प्रगति और उन्नति का उत्साह मन में उत्पन्न होता है। बुद्धि उसकी योजना बनाती है और शरीर उसकी कार्यान्वित करता हैं जिसका मन और मस्तिष्क चिन्ता से तप रहा हो, शारीरिक स्वास्थ्य उसकी आग में आहुति वन रहा हो, ऐसे व्यक्ति के हृदय में उत्साह का जन्म होना असम्भव है। बुद्धि का कुण्ठित तथा कलुषित हो जाना स्वाभाविक है। और अस्वस्थ शरीर तो किसी योग्य रह ही नहीं सकता। इस प्रकार जिस मनुष्य की यह तीनों शक्तियों बेकार हो जाएँ, उसे प्रगति और उन्नति के शब्द अपने शब्द-कोष से निकाल ही देने चाहिये।

असन्तोष भी एक प्रकार की मानसिक व्याधि ही होती हैं। यह मनुष्य की सुख-शान्ति की हरण कर लेता है। संतोषी सदा सुखी-की तरह करना होगा-असन्तोषी सदा दुःखी’। यह गलत भी नहीं है। असन्तोष का जन्म अभाव से बतलाया गया है। जिसके पास काम न हो, भोजन-वस्त्र का अभाव हो, जीवन यापन के सामान्य साधनों की कमी हो। उसे असन्तोष होना स्वाभाविक है। किन्तु यह असन्तोष वह असन्तोष नहीं होता, जिसको मानसिक व्याधि कहकर निन्दा की जाती है। इस प्रकार का अभाव जन्य असन्तोष वास्तव में असन्तोष न होकर आवश्यक का दबाव होता है। यह बुरा नहीं। यदि आवश्यकताओं का दबाव अकारण सह लेने का अभ्यास बना लिया जाये तो मनुष्य सामान्य स्थिति से भी नीचे गिरकर दीन और दरिद्री ही बन जाए। कहीं से कुछ मिल गया खा लिया, नहीं तो भूखे पड़े तरह रहे हैं। कपड़ों के स्थान पर चीथड़ों को ही लपेटे है। इस प्रकार की विवशतापूर्वक जीवन मनुष्य के योग्य नहीं। वह तो बुद्धि एवं पुरुषार्थ से वंचित पशुओं का जीवन हैं। आवश्यकतायें मनुष्य को पुरुषार्थ एवं परिश्रम को प्रेरणा देती हैं। उनकी माँग का उचित उत्तर दिया ही जाना चाहिये।

मानसिक व्याधि वाला असंतोष दूसरी चीज है। उसका जन्म अभाव अथवा आवश्यकता से नहीं, बल्कि लोभ और तृष्णा से होता हैं यह एक असात्विक स्वभाव और आसुरी वृत्ति होती है। जो अकारण ही यातना दिया करती है। इस वृत्ति का व्यक्ति सब कुछ होने पर भी उसके सुख से वंचित ही रहता है। असंतोष की पीड़ा उसे घेरे ही रहती है। लोभ के कारण असंतोषी व्यक्ति सम्पत्ति एवं सम्पन्नता की दशा में भी अपने को अभावग्रस्त अनुभव किया करता है। लक्ष्मी का भंडार, पृथ्वी की वसुधा और कुबेर का कोष क्यों न दे दिया जाए। किन्तु असंतोष का रोगी तब भी संतुष्ट न होगा। तब भी उसे अभाव और आवश्यकता अनुभव होती रहेगी। ऐसा वितृष्णा व्यक्ति सम्पन्नता में भी विपन्नता का दुःख भोगने पर मजबूर रहता है।

उद्वेग एक तरह का पागलपन होता है। उत्तेजना, आवेग और आवेश आदि के सारे उन्माद इसी के अंतर्गत आते है। उद्वेग दूषित व्यक्ति अकारण ही आने भीतर तना-तना-सा रहता है। वह किसी बात अथवा काम के विषय में पहले तो मौन रहता है, किन्तु जब खुलता है तो विस्फोट की तरह। इससे उसकी बात अथवा काम बिगड़ जाती है। उद्वेग मानसिक न्यूनता का लक्षण है। जो अन्दर से गम्भीर और सम्पन्न होते है। वे सब कुछ शाँति पूर्वक सोचते और सरलतापूर्वक करते है, इसलिये उनके सारे काम बनते चले जाते है, किसी अभाव अथवा आवश्यकता से दुःखी होकर उद्वेग व्यक्ति या तो अपने आप पर खीजते रहते है अथवा दूसरों से प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से लड़ते-झगड़ते रहते है। जिस काम में हाथ डालते है, उसको सुचारु रूप से करने के बजाय उससे झगड़ते से रहते है। जो काम करेंगे बेगार की तरह। उनका चंचल तथा क्षुब्ध मन काम में तन्मयता आने ही नहीं देता। किन्हीं अभावों अथवा कमियों को दूर करने की उत्सुकता में उद्वेग का प्रयोग करने से अपकृत्यता के सिवाय कृतकृत्वता प्राप्त नहीं होती।

जीवन की पूर्णता और सफलता के लिए मनुष्य को सबसे पहले निराशा, असंतोष, चिन्ता अथवा उद्वेग आदि के दोषों का परिमार्जन करके उनके स्थान पर आशा, निश्चिन्तता, संतोष तथा गम्भीरता के गुण विकसित करने होंगे। यह गुण सृजनात्मक प्रकृति के होते है। इनके द्वारा मनुष्य की शक्तियों का क्षय नहीं अभिवर्धन होता है। उनकी कार्य क्षमता बढ़ती, दक्षता तथा उत्साह की प्राप्ति होती है।

आशा का विकास सद्विचारों द्वारा आसानी से क्रिया जा सकता है। मनुष्य को सोचना चाहिये कि उसकी जीवन इसलिये नहीं मिला कि उसे निराशा के अन्धकार में इस प्रकार बिता दिया जाये। वह संसार में आनन्द खोजने पर और पाने के लिए भेजा गया है। उसका लक्ष्य प्रकाश है अन्धकार नहीं। वह एक आत्मवान् प्राणी है। उसकी आत्मा में ईश्वरीय प्रकाश की किरणें भरी हैं। उसे संसार की जरा-जरा-सी प्रतिकूलताओं से निराश होकर इस प्रकार बैठे न रहना चाहिये। उसे जीवन की सफलता और प्रगति के उद्देश्य से परिस्थितियों से संघर्ष करना चाहिये। लोहा लेना चाहिये। निराश हो जाने का अर्थ है जीवन-समर में हथियार डाल देना। हार मानकर पीछे हट जाना।

इस प्रकार हथियार डाल कर पीछे हट जाने से भी प्रयोजन पूरा नहीं होता। निराश होने से आज तक किसी का दुःख दूर नहीं हुआ है। दुःख-कष्टों से उन्हीं को छुटकारा मिलता है, जो वीर पुरुष की तरह हजार बार हारने पर भी साहस नहीं हारते। हर बार एक नई तैयारी के साथ खड़े होकर अपने कर्तव्य में लग जाते हैं और अन्ततः परिस्थितियों, प्रतिकूलताओं तथा विषमताओं पर विजय प्राप्त ही कर लेते है। असफलताओं से निराश होकर बैठे रहने के बजाय, आँख खोलकर संसार में देखना चाहिये। देखने में आएगा कि अपने जैसे न जाने कितने मनुष्य नित्य ही असफलताओं और विषमताओं में फँसते है। किन्तु वे हार मानकर बैठे नहीं रहते और न निराश होकर संघर्ष से मुख मोड़ लेते हैं। वे नये उत्साह, नये साहस और नये उपाय के साथ फिर मैदान में जाते हैं, और अन्त में विजय प्राप्त ही कर लेते है। संसार में सफलताओं के जो भी उन्नत स्तम्भ खड़े दीखते हैं, वे सब योंही एक साथ उठते नहीं चले गये हैं। पूरा होने तक उन पर हजारों बार पड़े हैं, अनेक बार गिरे हैं, टूटे और मिटे हैं, किन्तु उनको उठाने वाले इन सब विपरीतताओं से निराश अथवा हतोत्साह नहीं हुए। वे सारे आघात सहते हुए अपने निर्माण कार्य में लगे रहे और अंत में इन उन्नत स्तम्भों को स्थित करने में सफल हो ही गये। संसार में ऐसे उदाहरण होते हुये आपको निराश हो जाने का कोई कारण नहीं दीखता। उन्हीं की तरह आपमें भी शक्ति तथा क्षमता है। निराशा छोड़िये और आशावाद के साथ पुनः मैदान में आइये आपके सारे दुःख दूर होंगे, आप एक सफल व्यक्ति बन जायेंगे।

यह सुरदुर्लभ मानव-जीवन बहुत मूल्यवान उपलब्धि है। यह कल्प-वृक्ष ओर कामधेनु की तरह फलदायी हैं। आप इससे जो चाहें प्राप्त कर सकते है। किंतु यह फलदायक तभी होता है, जब इसे हरा-भरा और प्रसन्न रक्खा जाए। यदि आप इसको चिन्ता की चिंता में जलाते रहेंगे, तब तो यह सूख जायेगा। इसके सारे गुण, सारी विशेषताएँ और सारे अनुग्रह नष्ट हो जाएँगे। चिन्ता छोड़िये, यह मनुष्य की जीवित अवस्था में ही मृत बना देती है। चिन्ता में जल-जलकर मर जाने से कहीं अच्छा है कि आप पुरुषार्थ के मैदान में ही इसका बलिदान दे दें। इस निरर्थक मृत्यु से तो यह सार्थक अंत कहीं अच्छा है। उसमें एक आदर्श और एक ऊँचाई तो है। चिन्ता छोड़कर प्रसन्न होइए। पुरुषार्थ करिये, आप अवश्य सफल होंगे।

आप अभाव-ग्रस्त है। जरूरतों से पीड़ित है तो इसमें क्षुब्ध अथवा असंतुष्ट रहने का क्या काम। असन्तोष आपकी इन पीड़ाओं का उपचार नहीं है। इनका उपचार है, अधिकाधिक परिश्रम एवं पुरुषता। यह वे पैसे का उपचार करने में आपका क्या जाता है? पौरुष तथा श्रमशीलता की शक्ति आपको ईश्वर की ओर से मिली ही है। उसका उपयोग करिए तब अपनी पीड़ाओं से मुक्त हो जाइए। और यदि प्रसन्नता की स्थिति में भी आप संतुष्ट रहते हैं तो समझ लीजिए कि आप लोभ तथा तृष्णा के पिशाच से ग्रस्त है। इसका उपचार संतोष तथा उदारता ही है। अपनी वृत्ति पर विचार कीजिये, उसे बुरा समझकर त्याग दीजिए। लोभ तथा तृष्णा का उपचार उसका तिरस्कार तथा संसार की अमरता में विश्वास करना है। इन्हीं उपायों का अवलम्ब लीजिये, आप असंतोष के पिशाच से छूट कर सुखी हो जाइये।

कोई भी विपत्ति अथवा आपदा क्यों न आ जाए, मूल कर भी उद्वेग में मत बह जाइए। ईश्वर की कृपा में अखंड विश्वास रखिए। अपनी आत्मा तथा बुद्धि-विवेक में अखंड विश्राम रखिए। शान्त एवं गम्भीर बने रहिए। सारी आपदायें आप पर से ऐसे गुजर जायेगी, जैसे किसी सुदृढ़ वृक्ष पर से तूफान निकल जाता है। उद्वेग एक मानसिक त्रुटि है।

निराशा, चिन्ता, असंतोष अथवा उद्वेग किन्हीं समस्याओं का हल नहीं है। यह मानव-जीवन प्रकृति के दोष हैं, जो काम बनाने के बजाय बिगाड़ देते हैं। इसको त्याग कर मनुष्य को सृजनात्मक गुणों का ही अवलम्ब लेकर चलना चाहिए। तभी वह सफल होगा और तभी सुखी तथा संतुष्ट।


फूल और काँटा

फूल ने अपने साथ लगे काँटे से कहा-तुम्हारा यह लम्बा, नुकीला और भद्दा शरीर मेरे साथ अच्छा नहीं लगता हैं। देख मेरा शरीर कितना सुन्दर है, इससे कितनी मनमोहक सुगन्ध निकलती है, अपने इस गुण के कारण ही में महापुरुषों और देवताओं के गले का हार बनता हूँ।”

काँटे ने उत्तर दिया-यह सब ठीक है परन्तु जिस जीवन में फूल ही फूल है, सुख ही सुख है, उसमें निष्क्रियता आने लगती है और विकास रुक जाता है। जीवन का वास्तविक निर्माण तो काँटे नहीं है, वह जीवन नहीं है।”


विलासिता हमें अपंग करके छोड़ेगी

मानव का आदि वंश पाश्चात्य वैज्ञानिक पिथेकेण्ट्रोपस, सिनैण्ट्रोपस और निएन्टर पाल मानते है। इनकी आकृति से आज के मानव से तुलना करने से बड़ा अन्तर दिखाई देता है। क्रोमग्नन की तुलना में तो अब का मनुष्य पहचाना भी नहीं जा सकता। पाश्चात्यों की बात पाश्चात्य जानें पर हम अपने आपको जिस अपौरुषेय पूर्ण विकसित मनुष्य से वंश उत्पत्ति की बात मानते है, उनकी शक्ति शारीरिक रचना और सामर्थ्य की दृष्टि से आज के मनुष्य को तौलने है तो वह बिलकुल भिन्न और दीन-दुर्बल दिखाई देता है। इसका कारण उसकी अपनी भूलें है, जो उसने बिना बेचारे ही है, कर रहा है।

जीव वैज्ञानिक के अनुसार इस प्रक्रिया सृष्टि से सब जीव प्रभावित होते है। उदाहरणार्थ आज का जो आरंभ में लोमड़ी की शकल का था। तब सम्भवतः उसकी प्रकृति भी माँसाहारी थी। वह जंगलों में छिपा पड़ा रहता था। धीरे-धीरे उसने स्वभाव बदला घास खाने लगा। हिंसक प्रकृति के कारण पहले उसमें स्वाभाविक भय रहता था उसे छोड़ कर निर्भय मैदानों में रहने लगा। चिन्तायें छोड़ देने से जिस प्रकार दुर्बल लोगों के स्वास्थ्य भी बुलन्द हो जाते है, उसी प्रकार वह भी अपने डील–डौल को सुडौल बनाता चला आया। धीरे-धीरे मनुष्य उसे प्यार करने लगा और उससे अस्तबल की शोभा बढ़ने लगी। आज उसी लोमड़ी जैसे घोड़े की सुन्दरता साधारण व्यक्तियों से लेकर राजाओं महाराजाओं को भी आकर्षित करती है, उसकी शक्ति की तुलना मशीनों से की जाती है।

इसके विपरीत लुप्त जन्तु-शास्त्र (मिसिंग लिंक) के अध्ययन से पता चलता है कि पहले किसी समय पृथ्वी पर कई सुडौल और चरम सीमा तक विकसित जीव पाये जाते थे। किन्तु इन जन्तुओं ने अपने रहने सहने में हद दर्जे की कृत्रिमता उत्पन्न की और अद्यावधि ही नष्ट हो गये। आज मनुष्य जो उत्तरोत्तर विलासी जीवन की ओर अग्रसर होता जा रहा है तथा जनसंख्या अनियन्त्रित रूप से बढ़ता जा रहा है, उसे देखकर कुछ जीव-शास्त्रियों का यह भी मत है कि मनुष्य को सम्भवतः कार्टून युग तक पहुँचने का अवसर ही न मिले अर्थात् वह बीच में ही समाप्त हो जाय।

एक ओर जहाँ परिश्रम के अभाव और प्राकृतिक दबाव के कारण मनुष्य बिलकुल क्षीणकाय हो जायेगा, यहाँ मानवीय शरीर और स्वभाव के विपरीत माँसाहार, मद्यपान आदि के कारण कुछ लोग ऐसा दैत्याकार भी हो सकते है, जिस तरह एक समय भूमध्य सागर टापू और चीन में भीमकाय मानव पैदा हो चुके है। यह लोग बड़े स्वेच्छाचारी और निर्द्वन्द्व विचरण करने वाले थे। पशु-पक्षियों को मार कर कच्चा ही खा जाते थे। कालान्तर में इन दैत्यों की चर्बी और मोटापे की बीमारी अनियन्त्रित हो गई और वे कुछ ही दिनों में अपने आप नष्ट हो गये। इस प्रकार की दैत्याकृतियाँ भी सामने आ सकती है।

1924 में प्रोफेसर इलियट स्मिथ ने मिश्र की 30000 ममी (मिश्र में एक विशेष प्रकार के मशाल में शवों को सुरक्षित रखने की परम्परा है, इन शवों को ही ममी कहते है) का परीक्षण किया। उच्च वर्ग वाले शवों को छोड़कर अन्य लोगों के दाँत का क्षय बहुत कम मिला। कुछ अर्थराइटिस, किडनी के स्टोन के तीन और एक गाल के स्टोन का रोगी मिला। रिकेट्स और कैन्सर रोम के एक भी लक्षण किसी भी ममी में नहीं मिले। उस समय मिश्र के लोग भी अकृत्रिम और प्राकृतिक भोजन करते थे, वे लगभग पूर्ण शाकाहारी थे, तब ऐसी स्थिति थी, किन्तु स्थिति इससे सर्वथा भिन्न है पर अकेले कैंसर में ही हजारों रोगी है, इससे रोगों की बढ़ोत्तरी और स्वास्थ्य में अवांछित परिवर्तन का पता चलता है। कुछ हजार वर्ष बाद तो सम्भवतः एक ही बच्चा शुद्ध जन्म नहीं लेगा, उनमें से अधिकाँश कोई न कोई रोग लेकर जन्मेंगे कई तो ऐसे भी होंगे, जो आज के वीर्य रोगों से रोगी मनुष्य की क्रमागत संतान होने के कारण नपुंसक और लिंगहीन भी होंगे। आज की बीमारियों के सारे लक्षण संस्कार रूप में पहुँचने की बात विज्ञान पुष्ट ही कर चुका है, इसलिये कोई सन्देह नहीं, जो आने वाली कार्टून पीढ़ी अपने अनेक अंग ही खो दे। पैर की उँगलियों और बालों के बारे में तो जीवन-शास्त्री आशंका व्यक्त ही करते है कि हाथों में केवल एक-एक उँगली होगी और सारे के सारे बालों से पुरुषों को ही नहीं, स्त्रियों को भी मुक्ति मिल जायेगी।

इसका कारण हे, मानवीय मस्तिष्क के धन क्षेत्र का निरन्तर विस्तार। अब मनुष्य चलता बहुत अधिक है पर बैठे-बैठे चलता है। रेलें, मोटरें, ताँगे और रिक्शे चलाते है, अब मनुष्य खाता बहुत है पर भूख नहीं, जीभ खिलाती है, अब मनुष्य सुनता बहुत है पर स्वाभाविक इच्छा के अनुरूप नहीं मोटरें, रेल-गाड़ियाँ जहाज, मिलों-कारखानों के भौंपू, मशीनों की गड़गड़ाहट सुननी पड़ती है, अब मनुष्य देखता बहुत है पर आत्मा को बलवान और सौंदर्यवान बनाने वाले प्राकृतिक दृश्य, हरियाली और पुष्प, पौधों को शोभा नहीं, सिनेमा के दृश्य कृत्रिम पेन्सिलों से रंगे हुये चित्र वह भी दूषित भाव पैदा करने वाले। पहले लोग पदयात्रायें करते थे।, एकान्तवास रखा करते थे, प्राकृतिक दृश्यों के बीच रहा करते थे, संगीत और लोक गीतों का आनन्द लिया करते थे, इससे सूक्ष्म मनोजगत को प्रफुल्लित और आत्मा को शाँति देने वाले ‘हारमोन्स’ का स्राव होता रहता था और मनुष्य स्वस्थ और सुडौल बना रहता था। स्वाभाविक प्रक्रियायें बेकार मस्तिष्क की भूख बन गई है। सोचने-विचारने की प्रक्रिया के सम्बन्ध रखने वाले केन्द्रों, स्नायु-कोषों और नस-तंतुओं में निवास होता जा रहा है बढ़ी हुई जनसंख्या को तो भोजन चाहिये चाहे वह भीख माँग कर अमेरिका से मिले या समुद्र की मछलियों और अन्य जीवों को मारकर मिले। मस्तिष्क के अवयव बढ़ेंगे तो उन्हें भी चारा चाहिये। उन्हें प्रकृति ने जितना नियत किया है, उससे अधिक मिल नहीं सकता, फलस्वरूप वे हिंसा करते है, अर्थात् आँख की, नाक, कान और पेट की शक्ति चूसते है, इससे होगा यह कि और अंग कमजोर होते चले जायेंगे। विचार शक्ति प्रौढ़ होती चली जायेगी और इन्द्रियों की क्षमता गिरती चली जायेगी। अर्थात् यह कार्टून की आकृति वाले लोगों में शरीर ही क्षीण न होगा वरन् बहरे भी हो सकते है, गूँगे भी, आँखों से कम दीखने और एक फर्लांग चलकर थक जाने की बीमारियाँ जोर पकड़ लेंगी। इनसे बचने के लिए तब श्रवण यन्त्रों, अणुवीक्षण, दूरवीक्षण यन्त्रों को लोग उसी तरह शरीर से लटकाये घूमा करेंगे, जैसे स्त्रियाँ तरह-तरह के जेवरों से जकड़ी रहती है। मनुष्य और कम्प्यूटर में तब कोई विशेष अन्तर न रह जायेगा।

मनुष्य को प्रकृति ने जो दाँत दिये है, वह शाकाहार के लिये उपयुक्त है, माँसाहारी जन्तुओं के दाँत बड़े और नुकीले (कैनाइन टीथ) होते है। उनके पंजों के नाखून भी मुड़े हुए और तीखे होते है, क्योंकि माँस नोंचने में उनसे सहायता मिलती है, मनुष्य का पिछला इतिहास बताता है कि उनका मुख आगे निकला हुआ और जबड़े लम्बे होते थे, क्योंकि तब उसे अधिकाधिक कच्चा खाना पड़ता था, यदि मनुष्य माँस भक्षी हुआ तो उसके दाँत और उँगलियों के नाखून भालुओं, चीतों जैसे हो सकते है या फिर कच्चे और दाँतों से चबाकर खाने वाले खाने के कम उपयोग से उसका मुखर भीतर ही धँसता चला जायेगा। मुख ऐसा लगेगा, जैसे किसी गुफा में घुसने के लिए ‘होल’ (छेद) बनाया गया हो।

जीव वैज्ञानिकों का यह भी मत है, आगे आने वाले लोगों के पंजे और पीठें छोटी हो जायेंगी। पीठ की माँसपेशियों का सम्बन्ध हाथ से है, हाथ से बोझा उठाने इनको ऊपर नीचे, दायें-बायें मोड़ते रहने से पीठ में हलचल होती रहती है, इसलिये वह बढ़ती और स्वस्थ भी बनी रहती है पर हाथों से परिश्रम का काम न लेने पर पैरों को पूरे तरह धरती से टिका कर चलने के कारण पीठ और पाँव की उँगलियों में अस्वाभाविकता आ जायेगी। अधिकतर बैठे रहने के फलस्वरूप मनुष्य कमर से झुका हुआ भी हो सकता है। उसके जोड़ों में प्रायः दर्द बना रह सकता है यह बुराइयाँ तो अभी दिखाई देने लगी है, परिश्रम और सारे शरीर को हलचल में रखने के अभाव के कारण मनुष्य दुर्बल ही न होगा, टेढ़ा-मेढ़ा भी होगा, उससे वह और भी विचित्र लगा करेगा। यद्यपि होगा यह सब आज से ड़ड़ड़ड़ पीढ़ियों बाद पर यह लक्षण धीरे-धीरे हर अगली आने वाली पीढ़ी में उभरते चले जायेंगे, इस पाप के लिये ड़ड़ड़ड़ तौर पर दोषी आज की पीढ़ी होगी, जो कृत्रिमता और यंत्रीकरण को आभूषण समझाकर गले लगाती चली जा रही है।

अस्वाभाविक जीवन आर सम्भावित विकृतियों के लिये हमारा आचरण दोषी होगा पर आचरण चूँकि विचारों से पोषण पाते हे, इसलिये हम यह मानते है कि सारा दोष हमारे सोचने की पद्धति का है। गलत निर्णय हमें पतन के गड्ढे में गिराते है, गलत इच्छाएँ हमारे जीवन के प्राकृतिक आनन्द को नष्ट करती है। इच्छाओं की विकृति ही शारीरिक विकृति बनकर परिलक्षित होगी।

उदाहरण के लिये प्राचीनकाल में अफ्रीका में पाये जाने वाले जिराफ़ की गर्दन और पैर छोटे ही थे। उनको ऊँचे पेड़ों की पत्तियाँ खाने की आवश्यकता नहीं थी, जमीन की घास से काम चल जाता था, एक समय ऐसा (ग्लशियल पीरियड) आया कि सारी पृथ्वी बर्फ से ढक गई। तब पृथ्वी में घास न रही इसलिये जिराफ़ झाड़ियों के पत्तों को लपकने लगे। इसके लिये उन्हें गर्दन खींचने पड़ती थी। आगे पैरों को ऊँचा उठाना पड़ता था। फिर जब झाड़ियों की पत्तियाँ न रही तो और बड़े पेड़ों की पत्तियाँ प्राप्त करने के लिये उन्होंने अपने शरीर को और खींचा। परिणामतः उनकी गर्दन और आगे के पैर ऊँचे हो गये और वही जिराफ़ आज के भिन्न आकृति वाले जिराफ़ में बदल गया।

न चाहते हुए भी वातावरण के परिवर्तन प्रत्येक व्यक्ति को प्रभावित करते है। सबको आवश्यकतानुसार परिवर्तन की तीव्र इच्छा होगी, क्योंकि तब मनुष्य परिस्थितियों पर नहीं, परिस्थितियाँ मनुष्य पर हावी होंगी। तीव्र इच्छा के कारण बनावट में अन्तर आने से नये शरीरों के विकास की बात प्रत्येक जीव-शास्त्रों मानते है, इसलिये अब इसमें कोई सन्देह नहीं रह गया कि यदि मनुष्य ने अपनी इच्छाएँ अपने वर्तमान भौतिकता की ओर बढ़ रहे कदमों में परिवर्तन न किया तो उसके शरीरों का एकदम बदलकर विलक्षण आकृति धारण कर लेने में कोई सन्देह नहीं है।

आज की बुद्धिमत्ता से यह आग्रह है कि उसे भावी पीढ़ी को इस उपहासास्पद स्थिति से बचाने के लिये अपने आपको इतना निर्बल नहीं बना लेना चाहिये कि परिस्थितियों की सम्भालना कठिन हो जाये। हमें बढ़ती हुई भौतिकता को रोककर जीवन के जो अंश अधूरे और अनियमित पड़े है, उन्हें ठीक करके आने वाली सन्तानों को अधूरा और अनियमित बनाने का पाप नहीं ही करना चाहिये।


धार्मिक मुमुक्षा

एक धार्मिक मुमुक्षा ने अपनी सारी धन-दौलत लोकोपयोगी कार्यों में लगाकर संयम का जीवन व्यतीत करना शुरू कर दिया। अब तो उनके सत्कार्यों की सर्वत्र चर्चा होने लगी। जनता के कुछ प्रतिनिधियों ने उस मुमुक्षा के पास उपस्थित होकर निवेदन किया-आपका त्याग प्रशंसनीय है। आपकी सेवाओं से समाज ऋणी है, हम सब सार्वजनिक रूप से आपका अभिनन्दन कर दानवीर तथा मानव-रत्न के अलंकारों से विभूषित करना चाहते है। कृपया हम सबकी इस प्रार्थना को स्वीकार कीजिए”

मुमुक्षा ने मुसकराते हुए कहा-बन्धुओं मैंने कोई त्याग नहीं किया है, वरन् लाभ लिया है। बैंक में रुपये जमा करना त्याग नहीं वरन् ब्याज का लाभ है। ग्राहक को वस्तु देकर दुकानदार किसी प्रकार के त्याग का परिचय नहीं देता, वह तो बदले में उसकी कीमत लेकर लाभ कमाता ह। समुद्र के किनारे खड़े हुए व्यक्ति को जब मोती दिखाई दे तो उन्हें समेट कर कौन झोली न भरना चाहेगा। उस समय यदि उसकी झोली में शंख और सीपियाँ होंगी तो उन्हें खाली कर मूल्यवान् वस्तुऐं भरना क्या त्याग की वृत्ति का परिचायक है? उसी प्रकार क्रोध, लोभ, मोह आदि को छोड़कर अपने स्वभाव में अहिंसा, परोपकार और क्षमा जैसे सगुणता को स्थान देना त्याग नहीं वरन एक प्रकार का लाभ है। मैंने भी तो कोई त्याग नहीं किया है, वासनाओं से छुटकारा पाकर त्याग का लाभ ही प्राप्त किया है।”

इतना सुनकर जनता के प्रतिनिधियों को और कुछ कहने का साहस नहीं हुआ और नतमस्तक होकर चले गये।


अमैथुनी सृष्टि भी होती है-हो सकती है

विगत अंक में स्त्री और पुरुष के प्रजनन-कोषों (ओवम और स्पर्म) में उभयनिष्ठ (एक ही कोष में दोनों) सम्भावनाओं के अनेक उदाहरण दिए गये थे। उनसे यह सिद्ध होता था कि पुरुष प्रजनन केश (स्पर्म) में स्त्री और पुरुष दोनों के ही गुण सम्भाव्य है, उसी प्रकार बिना पुरुष के समायोजन के अकेले अण्ड (स्त्री प्रजनन कोष को अणु कहते है) की निषेचन क्रिया (गुण सूत्रों का दुगुना हो जाना-यह क्रिया ही गर्भाधान का करण होती है)। से ही सन्तान उत्पन्न की जा सकती है।

संसार के इतिहास में ऐसे उदाहरण सैकड़ों की संख्या में भरे पड़े है, जब केवल स्त्री ने ही सन्तान को जन्म दिया हो, अथवा पुरुष ने अकेले ही कोई बच्चा पैदा किया हो स्त्री पुरुषों में से किसी का भी सहयोग न हो ऐसे प्राणियों के जीवन की सम्भावनायें भी अब सत्य सिद्ध होने जा रही है और इस तरह विकासवाद के सिद्धान्त की धीरे-धीरे धज्जियाँ उड़ने जा रही है।

1634 में प्रकाशित अपनी उपलब्धियों के प्रसंग में फ्राँसीसी सर्जन डा एम्ब्राज पारे और मान्तेग्ने ने जार्मे गानयिर नामक एक 15 वर्षीय लड़की ने एकाएक पुष्य योनि में बदल जाने की घटना का उल्लेख किया ह। जार्मे गानयिर का जन्म विट्री ले फ्रान्से में हुआ। वह प्रायः सुअर चराने का काम करती थी। 15 वर्ष की आयु में एक दिन वह जंगल में सुअर चरा रही थी। उसके सुअर किसी किसान के खेत में घुस गये। खेत के किनारे-किनारे ऊँची खाई थी। जार्मे गानयिर को पता चला तो वह भागी और रास्ते में पड़ रही खाई को लाँघने के लिए जोर से कूदी। कूदने पर उसे पेडू में जोर का धक्का लगा। जिससे उसे यह जान पड़ा मानों उसकी आँतें फटकर बाहर निकल पड़ी हों। लड़की दर्द से चीख उठी। कुछ लोगों ने उसे उठाकर घर पहुँचाया। डाक्टरों को बुलाया गया। उन्होंने परीक्षा की और बड़े आश्चर्य के साथ घोषित किया कि लड़की-लड़का बन गई है। डाक्टर ने निरीक्षण करके बताया कि उसके पेडू में पुरुष जननेन्द्रिय का विकास काफी दिनों से हो रहा था। पूर्ण विकास हो जाने पर ही धक्के से पेडू फटा और पुरुष लिंग बाहर निकल आया। डाक्टरों ने इस बात का आश्चर्य किया कि मनुष्य शरीर की मूलतः ईकाई में दोनों प्रकार के गुण सूत्र किस प्रकार पाये जाते ह। इस घटना से सारे नगर में तहलका मच गया और वहाँ एक विशेष गीत गाया जाने लगा, जिसका यह अर्थ होता था-जोर से मत उछलो नहीं तो लड़का बन जाओगी।” इस घटना के बाद जार्मे गानयिर का एक पादरी द्वारा विधिवत् नाम संस्कार कराया गया और तब वह जर्मे मेरिया हो गया।

इंग्लैण्ड से छपने वाले साप्ताहिक पत्र ‘पियर्सन’ में एक लेख छपा जिसका शीर्षक ‘कुमारी कोब कोवा से श्री कोबेक’ है। कु जेकंन कोबकोवा चेकोस्लोवाकिया की प्रसिद्ध महिला खिलाड़ी थी। यौवन में प्रवेश करते समय नारियों के विशेष लक्षण उभरते है पर इनके साथ उलटा ही हुआ। प्रारम्भ में स्तन थे, वह छोटे होने लगे। पेडू में उन्हें प्रायः दर्द हुआ करता।डाक्टरों को दिखाने पर पता चला कि उनके शरीर में पुल्लिंग विद्यमान ह, तब उन्होंने अपना आपरेशन कराया। आपरेशन में कोई कष्ट नहीं हुआ और वे विधिवत् स्त्री से पुरुष बन गई।

यह घटनायें यह बताती है कि मनुष्य के शरीर का विकास करने वाला पहल कोष (सेल) स्त्री-पुरुष दे तो की सम्भावनाओं से परिपूर्ण था। लिंग वाले लक्षण-बीज (जीन्स) में से पहले एक उभार में आया पीछे दूसरे ने उभार कर लिया और उस मनुष्य ने इसी शरीर में यौन परिवर्तन कर लिया।

अनेक बार शारीरिक दृष्टि से यौन परिवर्तन नहीं होता शरीर पुरुष का ही रहता है पर गुण सूत्र (क्रोमोसोम्स) स्त्री के गुणों वाले विकसित हो जाते है, ऐसी अवस्था में पुरुष शरीर में रहने वाली चेतना भी स्त्रियों जैसे काम करती रहती है, उसे उसी में अच्छा लगता है ड़ड़ड़ड़ यह पद्धति बदलनी पड़ी तो उसमें उसे दुःख होता है। ऐसी अनेक घटनायें ‘मिस्ट्रीग ऑफ सेक्स’ नामक पुस्तक में री सी जे एस॰ टामस द्वारा दी गई है।

पेरिस के एक सरकारी पदाधिकारी में यह गुण असाधारण रूप में था। वह अपने ड्यूटी के घण्टों के अतिरिक्त जब घर में होता तो प्रायः हमेशा ही स्त्रियों के पकड़े पहनता, वैसी ही बात-चीत करता, मुख के हावभाव भी बिलकुल स्त्रियों जैसे ही होते। 1926 में कई दिन तक घर से बाहर नहीं निकला तब पुलिस ने सन्देह में घर का ताला तोड़ा। उसने आत्म-हत्या कर ली थी। मृत्यु के कारणों का तो पता नहीं चला पर छत से लटकने तक वह जो वस्तु पहने था, उससे उसकी नारी-वृत्ति का गहरा परिचय मिलता है। अन्य वस्त्रों की बात तो दूर रहीं, उसने अम्बर-बियर और मोजे दस्ताने भी स्त्रियों के ही पहने थे। बाल भी वह स्त्रियों जैसे ही सजाये हुये था।

1923 में अमेरिका में एक दुर्घटना घटी। टैस्मर नामक दम्पत्ति पर किन्हीं बदमाशों ने आक्रमण कर दिया। आक्रमणकारियों में एक स्त्री भी थी, जिसे श्रीमती टेस्मर ने पहचान लिया। प्रयत्न करते पर पुलिस ने एक शोफर और उसकी पत्नी को गिरफ्तार कर लिया। गिरफ्तार स्त्री को श्रीमती टेस्मर ने पहचान भी लिया। जेल में रह रही। वह स्त्री तब लोगों के आश्चर्य का कारण बनी, जब लोगों ने देखा कि उसके दाढ़ी मूँछें निकलनी प्रारम्भ हो गई। पुलिस ने जाँच की तो पता चला कि वह बदमाश पुरुष है। उसे स्त्री वेष, हावभाव इतने पसन्द कि वह छोटी अवस्था से ही स्त्रियों जैसे रहता, इस पर घर वालों ने उसे निकाल दिया। 1912 में उसने इन्डियाना के एक पुरुष से विवाह कर लिया। उसका गला बिलकुल स्त्रियों जैसा था, इसलिये उसे कई बार स्त्रियों के मध्य गाने का भी अवसर मिला। 12 वर्ष बाद उसके एक लड़की से भी विवाह कर लिया इस पर उसका पति नाराज हुआ पर बाद में तीनों साथ-साथ हरने को सहमत हो गये। दामस नामक लेखक ने इस व्यक्ति के संबंध में लिखा है, उसमें पुरुषत्व के कोई भी लक्षण नहीं थे।

इंग्लैण्ड की ‘वैवीजेन्स” तो इतिहास की एक मनोरंजक घटना बन गई थी। बैबीजेम्स की पुरुषत्व के हावभाव बहुत पसन्द थे। उसने अपना स्त्रीत्व आजीवन छिपाये रखकर अस्पताल में डाक्टर का काम किया। कालेज के दिन भी उसने पुरुष वेश में ही बिताए। 1819 में वह स्टाफ सर्जन के रूप में भरती हुई ओर उन्नति करते हुये, 1851 में डिप्टी इंस्पेक्टर जनरल, 1858 में इंस्पेक्टर जनरल के उच्च पद तक पहुँची। जब उसकी मृत्यु हुई तब जाकर पता चला कि आजीवन पुरुष का सफल अभिनय करने वाला इंस्पेक्टर जनरल पुरुष नहीं, स्त्री था।

इतिहास के यह पृष्ठ हमें यह सोचने के लिये विवश करते हैं कि शरीर का आत्मा के लिये कोई महत्व नहीं। चेतना मन और विचार है और वह इच्छानुसार स्त्री या पुरुष हो सकता हैं। इच्छाएँ यदि अविकसित रहें तो परिवर्तन एक शरीर में से ही दूसरे शरीर में हो सकता है।

कुछ दिन पूर्व अमृत बाज़ार पत्रिका में एक समाचार छपा था कि हैदराबाद (सिन्ध) की शेरपुर रियासत में गम्बात् के पास के छोटे से गाँव में काबू नामक 18 वर्षीय लड़का अचानक लड़की हो गया। इसे अब स्त्रियों की तरह मासिक धर्म भी होने लगा है और वह स्त्री के समान गर्भ धारण करने की क्षमता से भी परिपूर्ण है, जबकि जन्म से उसके शरीर में ऐसी कोई सम्भावनाऐं न थी।

विकासवाद में अंगों और जन्तुओं के लुप्त होकर दूसरे जीवनों में क्रमिक रूप से विकसित हो जाने का समय-सारिणी बड़ी लम्बी है। कई-कई परिवर्तन तो एक-एक लाख वर्ष में होते बताये गये हैं, जिनकी सत्यता कभी भी प्रामाणिक नहीं हो सकती। उस समय का कोई जैविक (बायोलॉजिकल) इतिहास उपलब्ध न होने से यह नहीं कहा जा सकता कि विकास की कल्पना सत्य होगी ही। हड्डियों और ढाँचों के बारे में समय संबंधी मान्यतायें गलत भी हो सकती है पर यह प्रत्यक्ष घटनायें तो इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि आत्म-चेतना आने आप में विलक्षण शक्ति है और वह इच्छानुसार शरीर धारण करने में समर्थ है। कई बार इच्छाएँ स्वयं अनिर्णीत रह जाती होंगी, जिनमें स्त्री व पुरुष दोनों के वंश-बीज विद्यमान रहते होंगे। शरीरों में आकस्मिक परिवर्तन इसी आधार पर होना सम्भव है। नील्सहायेर ने ‘मैन इन्टू धूमैन’ नाम ग्रन्थ में ऐसी अनेक घटनायें प्रस्तुत की है और अपनी सम्मति देते हुये लिखा है-यह घटनायें सचमुच मानव-जीवन के अस्तित्व को ओर भी रहस्यपूर्ण बनाती है कोई ऐसी सत्ता प्रकृति में काम कर रही है, जो अपने आप व्यक्त होने में समर्थ है। उसका स्वरूप और शरीर विचारमय ही हो सकता है।”

ऐसी घटनायें भारतीय संस्कृति के इतिहास में भी कम नहीं है, महाभारत में शिखण्डी के स्त्री से पुरुष में परिवर्तित होने का वर्णन आता है। पाँचाल नरेश द्रुपद को रुद्र के आशीर्वाद से एक कन्या हुई। रुद्र की आज्ञानुसार राजा द्रुपद और उनकी रानी के अतिरिक्त यह भेद और किसी को भी प्रकट न हुआ। शिखण्डी का पालन-पोषण राजकुमारों की तरह ही हुआ। युवावस्था में पदार्पण करते ही राजा द्रुपद ने शिखण्डी का विवाह दशार्ण के सम्राट् हिरण्यवर्मा की पुत्री के कर दिया। किन्तु राजकुमारी को शिखण्डी के संपर्क में आते ही पता चल गया कि वह स्त्री है। उसने यह बात अपने पिता तक पहुँचा दी। शिखण्डी को इस बात का पता चला तो उसने दुःखी होकर गृह-परित्याग कर दिया, वह वन में जाकर तप करने लगा। तप करते हुये शिखण्डी की व्यथा स्थूणाकर्ण नामक यक्ष को मालूम हुई। उसे शिखण्डी की शल्य चिकित्सा की और उसे पुरुष बना दिया।

सूर्य पुत्र वैवस्वत मनु के पुत्र का नाम सुद्युम्न था। सुद्युम्न एक बार जंगल की ओर गये। वहाँ शिव व पार्वती एकान्तवास में थे। सुद्युम्न को उस समय स्त्रियों की तरह काम-वासना भड़की। यह पौराणिक कथा यह है कि शिव ने शाप देकर उसे स्त्री बना दिया पर ऐतिहासिक तथ्य यह है कि शिव ने औषधि द्वारा उसके प्रसुप्त नारीतत्त्व के लक्षणों को जागृत कर दिया था। इससे वह लड़की बन गया और उसका नाम “इला” पड़ गया। महान सौंदर्य शाली राजकुमार पुरुरुवा का जनम इस यौन परिवर्तित इला के गर्भ से ही हुआ था, यह वर्णन अगले अंक में दे रहे हैं।

यह पौराणिक गाथायें पढ़कर लोग भारतीय धर्म और उसकी आख्यायिकाओं की कल्पना की विलक्षण उड़ान कह कर हँसते और टालते है। पर जब वही बात विज्ञान और वर्तमान प्रमाणों के द्वारा सत्य होती दीख पड़ती है, तब वेदांत और पुराणों की वैज्ञानिकता को स्वीकार नहीं किया जाता। वही बातें भारतीय संस्कृति और आध्यात्म के लिये अन्ध-विश्वास बन जाती है, जबकि विज्ञान के लिये सत्य और तथ्य। बातें दरअसल दोनों ही एक है।

इंग्लैण्ड में मिडिल गेट स्ट्रीट यारमाउथ नगर की दो बहिनों की घटना बड़ी विलक्षण है। इनका नाम था मार्जोरी और डेजीफेरो। मार्जोरी तब 13 वर्ष की थी और एक आर्ट-कालेज में पड़ती थी, तभी उसे अपनी आवाज कुछ भारी और शरीर में विचित्र परिवर्तन से अनुभव हुये। विवश होकर उसे डाक्टरों की शरण लेनी पड़ी। डाक्टरों ने उसके शरीर में पुरुषत्व के लक्षण उभरते देखे। लन्दन के एक अस्पताल में उसकी चिकित्सा हुई और वह लड़की से लड़का बन गई। अब उसका नाम मार्क रखा गया।

मार्क ओर डेजी फेरो कुछ दिन भाई-बहिन की तरह रहे पर इसी बीच मार्क वाली शिकायत उसे भी उठ खड़ी हुई और उसका भी डाक्टरों को आपरेशन करना पड़ा। मार्क की तरह डेजी फेरो भी लड़का बन गई। उसका नाम डेविड रखा गया, दोनों बहिनें-दो भाई हो गये और दोनों के बाद में पुनः लड़कों के स्कूल में साथ-साथ शिक्षा ग्रहण की।

इस घटना के पीछे भी वही रहस्य है, जो उन पौराणिक घटनाओं के पीछे। इन्हें कोई भी व्यक्ति अन्धविश्वास नहीं कहता, क्योंकि यह आधुनिक है। यदि यह घटनायें सत्य है तो भारतीय अध्यात्म की आख्यायिकाओं को भी सत्य ही मानना पड़ेगा। पुरातनकाल विज्ञान के विकास का चरम काल था, उस समय इन घटनाओं द्वारा वहीं बातें प्रमाणित की गई थीं, जो आज की जा रही है। अमैथुनी सृष्टि वस्तुतः आत्म-चेतना का यथार्थ इतिहास है, उसमें गहन आध्यात्मिक रहस्यों का प्रवेश है, जिन्हें विज्ञान क्रमशः खोलता चला जा रहा है। क्रमशः


बने अनुकूल बनें-सुखी रहें

बाह्य अनुकूलता भी आन्तरिक सुख-शाँति की साधिका होती है। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, वह समाज में ही जन्मता है, समाज में बड़ा होता हे, समाज की सहायता से ही अपना विकास करता है और समाज में ही बरतता हुआ अपना जीवन यापन करता है। हर मनुष्य को सुख शाँति वाँछित है। कोई नहीं चाहता कि उसकी जीवन यात्रा कंटकाकीर्ण हो। उसे पग पग पर बाधाओं और विपदाओं का सामना करना पड़े। सभी यह चाहते हैं कि हँसी, खुशी और सुख सफलता के साथ इस संसार में जिये।

मनुष्य की जीवन यात्रा में सुख-शाँति की सम्भावना तभी होती है, जब जिस समाज में वह रह रहा है, उसमें उसे अनुकूलता प्राप्त हो। प्रतिकूलता से बाधा और संघर्ष का जन्म होता है। किन्तु अनुकूलता की स्थिति में जीवन धारा, समतल पर बहती हुई निर्मल और प्रसन्न नदी की भाँति निर्बन्ध रूप से बहती चली जाती है। समाज हमारे अनुकूल हो, या हमारा कोई नैसर्गिक अधिकार नहीं है। और न समाज हमारे अधीन ही है, और न वह हमारे प्रति अनुकूल होकर चलने के लिए बाध्य है। समाज की अनुकूलता तभी प्राप्त होती है, जब हम स्वयं उसके अनुकूल हो। समाज तो समाज हम किसी एक व्यक्ति को भी, स्वयं प्रतिकूल रहते हुए अनुकूल नहीं बना सकते। समाज को अनुकूल बनाने के लिए स्वयं उसके अनुकूल होना पड़ेगा- यह अटल नियम है।

तथापि समाज के अनुकूल होने पर भी मनुष्य को सारी परिस्थितियाँ ही उसके अनुकूल बनी रहेंगी, यह आवश्यक नहीं। मानिए समाज अनुकूल है लेकिन अपना स्वास्थ्य अपने अनुकूल नहीं है तो क्या मनुष्य सुख-शाँति पूर्ण जीवन बिता सकता है। समाज भी अनुकूल हो और स्वास्थ्य भी साथ दे रहा हो, किन्तु कोई नागफनी आकर जीवन अशान्त कर दे तो समाज और स्वास्थ्य हमारी क्या सहायता कर सकता है? व्यापार में घाटा हो जाय। चोरी डकैती से धन चला जाय। कोई सन्तान निकम्मी निकल जाय अथवा इति भीति आदि का शिकार बनना पड़ जाये तो सब कुछ अनुकूल होते हुए भी मनुष्य को असुख और अशान्ति का आखेट होना ही पड़ेगा। समाज की अनुकूलता सुख-शाँति की साधिका अपदय है, लेकिन वह न तो किसी की सुख-शाँति चिर सुरक्षित रख सकती है और न संयोग, दैवयोग अथवा घटना जन्य अशान्ति अथवा असुख को आने से रोक सकती है।

आत्मा की अनुकूलता ही वह सच्ची और सम्पूर्ण अनुकूलता है,जो हर दशा और हर परिस्थिति में मनुष्य के सुख का एक बड़ा हेतु है, उसका सुरक्षित तथा निर्भय रहना। यदि आत्मा में सजीवता, सबलता और दृढ़ता की स्थिति विद्यमान् है तो मनुष्य का साहस, शक्ति तथा धैर्य बढ़ा चढ़ा रहेगा। वह स्वभाव से ही अपने को सुरक्षित तथा निर्भय अनुभव करता रहेगा। जा आत्मिक स्तर पर निर्भय तथा साहसी है, वह प्रायः आक्रामक तत्वों से सुरक्षित ही रहा करता है। जो निर्बल है, भीत स्वभाव का है, उसके विरोधियों तथा शत्रुओं की वृद्धि हो जाना आश्चर्यजनक नहीं चीर, लुटेरे उसके धन पर ही नजर मँडराते है, जो उसकी रक्षा नहीं कर सकता। प्रगति के मार्ग में उसके ही प्रतिद्वन्द्वी अधिक उत्पन्न हो जाते है, जो निर्बल होता है। अत्याचारी अपनी अनीति का लक्ष्य उसे ही बनाते है, जिसके कमजोर और कायर समझते है। रोगों का आक्रमण उसी पर होता है, जिसका शरीर दुर्बल तथा असहिष्णु होता है। तात्पर्य यह कि निर्बल और कायर व्यक्तियों के लिए उनकी प्रगति और सुख के साधन तक ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न कर देते है, जो असन्तोष, अशान्ति तथा असुख की संचालिका होती है। जिसकी आत्मा सजीवता, सबलता और दृढ़ता के रूप में अनुकूल होती है। उसके लिए न कहीं भय है और न कहीं पराभव। आत्मानुकूल व्यक्ति सदा ही निर्भय तथा निश्चिन्त रह कर सुख चैन की जिन्दगी बिताता है।

यदि मनुष्य की आत्मा उसके अनुकूल है तो उसे संयोग अथवा दैत्यराज से घटित प्रतिकूलताएँ भी प्रभावित नहीं कर सकती। आत्मा का मित्र मनुष्य सारी सृष्टि में अपनी आत्मा का ही प्रसार देखता है। वह दुःखद अथवा सुखद किसी प्रकार की घटना एवं परिस्थिति के पीछे परमात्मा का कोई महान् एवं कल्याणकारी मन्तव्य छिपा देखता है। आत्मा की मैत्री उसे सामान्य स्तर से उठाकर एक ऐसी उच्च भूमिका में पहुँचा देती हे, जहाँ वह संसार की हर क्रिया प्रक्रिया एवं प्रतिक्रिया के प्रति तटस्थता से स्थित रहता है। आत्मा के माध्यम से जब मनुष्य परमात्मा का सान्निध्य प्राप्त कर लेता है तो निसर्ग के अनुसार अपने को वही अनुभव करने लगता है। जो अपने को शरीर न समझकर आत्मा और परमात्मा अनुभव करने लगता है, वह संसार में घटित होती हुई हर परिस्थिति को को आत्मप्रेरणा ही मानेगा। ऐसी उच्च मनोभूमि और प्रतीति के बीच अशान्ति, असन्तोष अथवा सुख का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। धन्य है ऐसे मुक्त तथा श्रेयी पुरुष जो महापुरुषार्थ द्वारा परमात्मा के समकक्ष जा पहुँचते है।

आत्म अनुकूलता से सम्पन्न व्यक्ति ही नहीं आत्मा के प्रति स्वयं अनुकूल रहने वाले व्यक्ति भी दुःख तथा शोक संतापों से सदा सुरक्षित रहते है। आत्मा मानव शरीर में परमात्मा का प्रतिनिधि है। वह केवल मनुष्यों को चैतन्य ही नहीं रखता,बल्कि उसका निर्देशन कल्याण कर्तव्यों के सिवाय और क्या हो सकता है? आत्मा के प्रति अनुकूल रहने वाला व्यक्ति भूलकर भी न तो कभी कुपथ पर पाँव देगा और न दुराचरण में प्रवृत्त होगा। उसका हर कदम, उसकी हर गतिविधि उच्चादर्श से विभूषित और मानमर्यादा से नियन्त्रित होगी। वह सर्वांग रूप से स्वार्थ से विरत और परमार्थ में निरत रहेंगे। वह वही कुछ करेगा,, जिससे उसकी आत्मा सहमत और परमात्मा प्रसन्न होगा। ऐसे आत्मनिष्ठ पुण्य परमार्थी के पास अशान्ति, असन्तोष, दुःख अथवा शोक सन्ताप का कोई कारण फटक सकता है, यह असम्भव है। उसका अधिकार तो सच्चिदानन्द में लीन होकर रहना होता है, जिसका वह अनुरक्षण उपभोग करता हुआ, अपने सद्जीवन का फल पाता रहता है।

जीवन का दूसरा नाम शक्ति है। केवल प्राण का आवरण अथवा श्वाँस का आवागमन मात्र ही जीवन नहीं है। जिस जीवन में जीवनी शक्ति का अभाव हे उसे जीवन नहीं माना जा सकता। जो शरीर से स्वस्थ वृत्तियों से बलिष्ठ और स्वभाव से तेजस्वी है, वही यथार्थ रूप में जीवित है। वैसे चलती फिरती स्वत्वहीन लाशों की संसार में कमी नहीं हे। इन सब विशेषताओं को यदि कोई सामूहिक संज्ञा दी जा सकती है तो वह है ‘शक्ति’। वो शक्तिवान होता है, उसे संसार में सब ओर अनुकूलता ही अनुकूलता दिखलाई देती है। शक्ति के आधार पर ही संसार के पदार्थ उपयोगी, अनुकूल एवं सहायक सिद्ध होते है। जीवनी शक्ति की कमी होने पर भोजन के पुष्टिकर पदार्थ भी हानिकारक सिद्ध होने लगते है। शक्तिहीन व्यक्ति को शीघ्र ही अनिष्ट और आपत्तियाँ प्रभावित करने लगती है। निबल एवं निस्तेज आदमी को सभी ओर सहयोग तथा सहायता का अभाव हो जाता है। नीति की यह लोकोक्ति सर्वथा सत्य है कि “दैव भी दुर्बल के लिए घातक सिद्ध होता है। निर्बल तथा अशक्त व्यक्ति पर निरन्तर भय का आतंक छाया रहता है। जिससे उसका विवेक नष्ट हो जाता है, बुद्धि मारी जाती है। परिणामतः संसार पथ पर उसके चरण अस्त व्यस्त पड़ने लगते है। अस्त व्यस्तता और अव्यवस्था को आपत्तियों की जननी कहा गया है। इस प्रकार अशक्त व्यक्ति के लिए सभी ओर दुःख और संकट की घटाएँ छाई रहती है। पुकारने, चिल्लाने और दैव दैव करने पर भी अशक्तता के कारण निर्बल की पुकार में कोई प्रभाव और प्रार्थना में बल नहीं होता। निदान देवी उपेक्षा के कारण भी उसे आपत्ति के हाथों मिटने पर मजबूर ही होना पड़ता है। निर्बलता एक भयंकर पाप है।

मनुष्य की आत्मा सारी शक्तियों का भण्डार है। आत्म शक्ति ही सच्ची शिव शक्ति है। यही तो वह शक्ति है, जिसे पाकर मनुष्य भूषित हो जाता अन्यथा संसार की सारी भौतिक शक्तियाँ न केवल पाशविक शक्तियाँ ही होती है, अपितु मिथ्या तथा प्रवंचक भी होती है। संसार की बाह्य अथवा काई भी भौतिक शक्ति किसी समय भी निकम्मी तथा व्यर्थ हो सकती है। साधनों तथा उपायों पर निर्भर रहने के कारण उस पर किसी प्रकार विश्वास नहीं किया जा सकता, इसके अतिरिक्त इस विराट् ब्रह्माण्ड में जो कुछ भी भौतिक है, वह सब अनिश्चित, परिवर्तनशील तथा नश्वर है। इसीलिये किसी प्रकार की भी भौतिक शक्ति जा सकती है, अशक्ति में बदल सकती है अथवा नष्ट हो सकती है।

आत्मा शाश्वत तथा अमर है। इसलिये उसकी शक्ति का अमर एवं अक्षम होना अनिवार्य है। आत्मा स्वयं आत्म निर्भर है। न ता उसके लिये किसी आधार की आवश्यकता है और न वह किसी पर आधारित ही है। इसलिये उसकी शक्ति को स्थित रहने के लिये किसी अन्य आधार की आवश्यकता नहीं होती। उसकी शक्ति सदा आत्म निर्भर है, चिर सुरक्षित, अक्षय एवं विश्वस्त है। जीवन एवं जीवन के सच्चे स्वरूप शक्ति को पाने के लिये मनुष्य को आत्मा की आराधना करनी चाहिये उन्हीं शक्तियों को जगाना और ग्रहण करना चाहिये, जो आत्मभूत होती है। उस आत्म शक्ति का धनी मनुष्य एक मनुष्य ही क्या सारे जगत को अपने अनुकूल बना सकने में समर्थ हो हो सकता है।

जिसने आत्मा के ग्रहण कर उसको प्रबुद्ध बना लिया है। जिसने उसके प्रकाश को आवरण बन कर प्रकट कर लिया है और जिसने यह मान लिया है कि सर्वानुकूलता ही सुख-शाँति का हेतु है और इस सामूहिक अनुकूलता के लिए एक आत्मा की अनुकूलता ही पर्याप्त है, उसने मानो डंके की चोट पर उन सारे सुखों और सांख्यों पर अपना अधिकार घोषित कर दिया है, जितनी कामना अथवा कल्पना को जा सकती है। मनुष्य आत्मवान् प्राणी है। उसे सुख के साधन और उपादान खीजने के लिए बहुत दूर नहीं जाना है। उसकी आत्मा ही हर प्रकार की विभूतियाँ एवं सम्पदाओं से भरी है। जो कुछ बाह्य ब्रह्माण्ड में शिव और सुन्दर है, यह सब आत्मा में भी विद्यमान् है। उसे पाने के लिये जो जितना आत्मा के निकट और उसके अनुकूल होता जायेगा, वह उतनी उतनी ही ऋद्धियों तथा सिद्धियों का स्वामी बनता जायेगा, सहयोग, शक्ति और अनुकूलता सुख के बहुत बड़े आधार है। एक आत्मा को अपने अनुकूल कर लेने से इन सब आधारों की प्राप्ति सहज ही में हो जाएगी। आत्मा को अनुकूल करने का एक सरल सा उपाय है स्वयं आत्मा के अनुकूल होकर चलना। परमात्मा के उस प्रतिनिधि का निर्देश मानना और मानना और वैसा आचरण करना बस।


गोपालकृष्ण गोखले

गाँधी जी के राजनैतिक गुरु देशप्रिय गोपालकृष्ण गोखले बचपन में बहुत गरीब थे। जैसे तैसे स्कूल की शिक्षा समाप्त करने के बाद जब कालेज की पढ़ाई का समय आया तो खर्च का प्रश्न उपस्थित हुआ। गोखले के बड़े भाई गोविन्दराव को अपने छोटे भाई की योग्यता और प्रतिभा पर पूरा विश्वास था। उन्होंने कहा-मैं मेहनत-मजदूरी करके भी छोटे भाई को अवश्य पढ़ाऊंगा।” बड़े भाई की पत्नी ने देवर के लिये अपने गहने तक बेचकर प्रारम्भिक फीस आदि का प्रबन्ध किया और उन्हें राजाराम कालेज कोल्हापुर में दाखिल कर दिया।

बड़े भाई गोविन्दराव उस समय 15 रुपये प्रतिमास कमाते थे। उसमें से 7 वे छोटे भाई को मासिक खर्च के लिये नियमित रूप से भेज देते थे। गोखले इन रुपयों में बड़ी किफायत से अपना निर्वाह करते थे। बी. ए. हो जाने पर गोखले जी को 35 रुपये मासिक पर एक स्कूल में अध्यापक की नौकरी मिल गई। इस वेतन में से ते प्रतिमास 2 रुपये अपने भाई को नियमित रूप से भेजने लगे। वे जीवन भर अपने भाई भाभी के त्याग और उपकार को नहीं भूले थे। ऐसे थे गाँधी जी के गुरु श्री गोपालकृष्ण गोखले।


संयम ही हमें नष्ट होने से बचाएगा

“जनसंख्या की बढ़ोतरी और खाद्य सामग्री के बढ़ते हुए अभाव” का तुलनात्मक अध्ययन करते हुए प्रसिद्ध जनसंख्या शास्त्री माल्थस ने लिखा है-

“जनसंख्या बढ़ने की शक्ति पृथ्वी की जीवन निर्वाह करने वाली वस्तुऐं उत्पन्न करने की शक्ति से कहीं अधिक है। अनियन्त्रित जनसंख्या गुणोत्तर गति-ः-ः-ः-ः-ः से बढ़ती है, जबकि खाद्य सामग्री केवल अंक गणित गति 1 23456 से ही बढ़ती है। यदि 25 वर्षों तक इन दोने की वृद्धि दर का अध्ययन किया जाये तो यह स्पष्ट हो जाता है कि 25 वर्षों में जनसंख्या दुगुनी हो जाती है, जबकि खाद्य सामग्री इतने समय में तीव्र गति से घटती हुई दर से बढ़ती है। यदि सारी पृथ्वी को एक ईकाई माने और अब तक की आबादी को एक अरब ( एक हजार मिलियन ) मान कर जनसंख्या वृद्धि के 1ः 2ः 4ः 8ः 16ः 32ः 64ः 128ः 256 अनुपात से खाद्य सामग्री की वृद्धि 1ः 2ः 3ः 4ः 5ः6ः 7ः 8ः 9 की भाँति होगी, परिणामतः दो शताब्दियों में जनसंख्या और खाद्य सामग्री का अनुपात 256ः9 और शताब्दियों में 4096ः13 हो जायेगा। दो हजार वर्षों में तो खाद्य सामग्री के आँकड़े इतने पीछे रह जायेंगे क अधिकाँश जनसंख्या के भूखों मरने की नौबत आ जायेगी।

माल्थ्स का यह हिसाब भले ही कुछ त्रुटिपूर्ण हो पर उसमें बढ़ती हुई जनसंख्या के होने वाले दुष्परिणामों की सार्थक भविष्य वाणी छिपी हुई है। जिस रफ्तार से जनसंख्या बढ़ रही है वह केवल खाद्यान्न की दृष्टि से ही नहीं वरन् आध्यात्मिक, धार्मिक, साँस्कृतिक, नैतिक, आर्थिक, आजीविका आदि सभी दृष्टियों से चिन्ताजनक है।

ऐलिनाय विश्व विद्यालय के भौतिक -शास्त्री प्रोफेसर हीजवान फोस्टेक के अनुसार- “13 नवम्बर 2026 ई॰ दिन शुक्रवार अर्थात् अब से लगभग 55 वर्ष बाद मनुष्य जाति का अन्त हो जायेगा, क्योंकि उस दिन विश्व जनसंख्या चरम सीमा तक पहुँच जायेगी।” केलीफोर्नियाँ औद्योगिक संस्थान के डा जेम्स बोनर के अनुसार-विश्व की जनसंख्या ढाई करोड़ प्रति वर्ष के अनुपात से बढ़ रही है, यदि यह ऐसी ही बढ़ती रही तो अगली शताब्दी में जनसंख्या इतनी हो जायेगी कि प्रति व्यक्ति एक फुट पृथ्वी से अधिक न मिलेगी। इसका सोना, जागना, काम करना, खाना-पीना टट्टी-पेशाब करना सब कुछ इतने में ही होगा। स्पष्ट है कि यह स्थिति आने से पूर्व ही विस्फोट हो और मनुष्य, मनुष्य को ही खा जायें।

लन्दन के प्रसिद्ध स्वास्थ्य विशेषज्ञ ने ब्लैकपूल में स्वास्थ्य काँग्रेस की रायल सोसायटी में एक निबन्ध पढ़ा जिसमें उन्होंने बताया- “सन् 2050 अर्थात् अगले 80 वर्षों में संसार की दिशा महाप्रलय जैसी हो जायेगी। उस समय अब की तीन अरब जनसंख्या बढ़कर नौ अरब हो जायेगी।” भारतवर्ष में प्रति घण्टा 1100 की जनसंख्या वृद्धि होती है। प्रति वर्ष एक करोड़ बीस लाख लोग बढ़ जाते है, केरल जैसे छोटे से प्रान्त में 1976 तक 24347000 हो जायेगी, यहाँ प्रति दिन 1500 नये शिशु जन्म लेते है।”

जनसंख्या वृद्धि के यह आँकड़े वस्तुतः चिन्ताजनक है। जनसंख्या का बढ़ना मानव जाति के लिये भयंकर संकट है, किन्तु क्या इस संकट का हल अप्राकृतिक साधनों से किया जा सकता है, यह प्रश्न भी उतना ही जटिल है जितना जनसंख्या वृद्धि की समस्या। हमें उन फलितार्थ को आँख मूँदकर स्वीकार नहीं करना चाहिये, जो परिवार नियोजन के अंतर्गत इन दिनों चल रहे है, इनका मनुष्य के स्वास्थ्य शरीर,समाज पर किस तरह का प्रभाव पड़ रहा है, इसका जब तक अनुमान नहीं कर लेते, यह आयोजन महंगे और भारी पड़ेंगे।

माल्थस ने कहा था कि मनुष्य को पहले ही सद्बुद्धि से काम लेना चाहिये और जनसंख्या को इतना सीमित रखना चाहिये कि ऐसी परिस्थिति उत्पन्न न होने पाये कि प्राकृतिक अवरोधों के कारण कष्ट उठाने पड़े। उन्होंने जनसंख्या रोकने के दोनों ही उपाय बताये-(1) बुरे अवरोध- इसमें गर्भ क्षीण करना, आपरेशन कराना, एक ही स्त्री से बहुत व्यक्तियों द्वारा काम तुष्टि, छल्ले, लूप, गर्भ निरोधक औषधियाँ आदि। इन उपायों से देखने में भले ही लगता हो कि जनसंख्या वृद्धि का अनुपात कम हुआ पर उससे होने वाली हानियाँ समाज के लिए उतनी घातक होंगी जितनी जनसंख्या वृद्धि से भी तत्काल नहीं होंगी।

ऐसी स्थिति में केवल- (2) नैतिक संयम ही उचित प्रतिबन्धक अवरोध हो सकता है। माल्थस ने इस पर बहुत जोर दिया है। इसमें ब्रह्मचारी रहना, देर से विवाह करना, सन्तानोत्पत्ति की भावना न रखकर नियन्त्रित जीवन बिताना आदि सम्मिलित है। आहार का संयम, अश्लील चित्र और प्रसंगों से बचना आदि इसी के अंतर्गत आते है। हमारे लिये उचित यही है कि हम आत्म संयम का पालन करें और सन्तान की संख्या बढ़ने न दे।

जब डा मेरी स्कारलेब, सर रावट्स आर्मस्ट्राँग जोन्स, डा हेक्टर तथा डा मैकन आदि ने कृत्रिम उपकरणों द्वारा संतति निरोध के परिणामों का गहन अध्ययन कर उसको बुरा बताया। इस सम्बन्ध में इन सबकी सम्मिलित राय यही है-

“इससे उच्छृंखलता एवं कामुकता बढ़ने का खतरा है। सामाजिक जीवन में ‘काम’ जैसे गोपनीय विषय को इस प्रकार सार्वजनिक चर्चा का विषय बनाना, किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है। इससे मनुष्य का मन कामेन्द्रियाँ की ओर आकर्षित होता है, फलस्वरूप संयमी व्यक्तियों का मनोबल भी दुर्बल पड़ता है और वे भी कामुकता के शिकार हो जाते है।”

ठस दृष्टि से परिवार नियोजन के कार्यक्रमों को यह मानना चाहिये कि वे देश का नैतिक पतन करने का साधन बन गये है। भारतवर्ष पिछले आयोजनों में परिवार नियोजन पर एक अरब रुपया व्यय कर चुका है। इस योजना में उसके लिये 60 करोड़ रुपये व्यय का बजट रखा गया है। लाखों लोग इसके लिये सरकारी तौर पर नियुक्त किये गये है। रेडियो, समाचार-पत्रों पत्र-पत्रिकाओं में ऐसे लेखों को प्राथमिकता दी जाती है, इन सब का तात्पर्य यह हुआ कि इतने समस्त साधन जनसंख्या वृद्धि नहीं रोक रहे वरन् चारित्रिक भ्रष्टता को पोषण प्रदान कर रहे है।

यदि मनुष्य आत्म संयम द्वारा अपनी यह जनसंख्या वृद्धि की समस्या सुलझाने के लिये तैयार नहीं होता तो यह कार्य प्रकृति के लिये छोड़ देना चाहिये। प्रकृति अपने आप इतनी समझदार है कि वह जितने प्राणी पैदा करती है, उनके लिये आवश्यक सुविधायें भी देती रहे और यदि मानवीय विवेक निरन्तर असावधानी बरतने का दुःसाहस करे तो वह प्रकृति इस बात के लिये भी समर्थ है कि अपनी शक्ति से उसे नियन्त्रण में ले आये। भले ही वे नियन्त्रण अति कष्टकारक सिद्ध हो।

17 जनवरी 1969 को नई दिल्ली से प्रसारित एक वाप्ति में विश्व-स्वास्थ्य संगठन के विशेषज्ञों ने अपना मत व्यक्त करते हुए बताया कि चूहे तथा चुहिया के एक जोड़े वे पैदा हुई सन्तान से तीन वर्षों में 35 करोड़ चूहे हो सकते है। लेकिन प्रकृति ऐसा होने नहीं देती। यदि चूहों की मनमानी चल सकी होती तो तीन वर्षों में पृथ्वी पर अकेले चूहे इतने हो जाते कि चलने वाले व्यक्ति का हर अगला पाँव एक चूहे की देह पर पड़ता। प्रकृति ने चूहों पर यह प्रतिबन्ध लगा दिया है कि वे प्रति वर्ष अधिक से अधिक 60 बच्चे पैदा करे। मनुष्य भी यदि इसी ढंग से बच्चे पैदा करते रहे तो एक दिन अपने आप उनकी प्रजनन शक्ति समाप्त हो जायेगी। आज कल ऐसे व्यक्तियों की कमी नहीं है, जो प्रजनन की क्षमता खो चुके है या खो रहे है।

मक्खी एक बार में 120 अण्डे देती है। गर्मी के दिनों में वह 6 बार अण्डे देती। दस दिन में बच्चे भी निकल आते है और वह भी 14 दिन की आयु में प्रजनन (पावर ऑफ रिप्रोडक्षन ) के योग्य हो जाते है। 6 पीढ़ियों में जन्मे, यदि सब बच्चों को किसी प्रकार जीवित रखा जा सके तो वे 1/4 मिलियन क्यूबिक घन फीट अर्थात् 250000 घन फीट जगह एक मक्खी के जोड़े के बच्चों के द्वारा एक मौसम में घेरी जा सकती है। (एक घन फुट का अर्थ एक फुट लम्बा, एक फुट चौड़ा और एक फुट ऊँचा स्थान होता है।) अब यदि संसार में पाये जानें वाली सब मक्खियों का हिसाब लगाये तो मालूम पड़ेगा कि इस पृथ्वी जितनी कई पृथिव्यां तो केवल मक्खियों के रहने के लिये ही आवश्यक हो जायेंगी।

प्रकृति उनके लिये अपना संहार अस्त्र प्रयोग करती है। साधारण सी सर्दी आते ही मंडलियाँ मरकर अपने आप नष्ट हो जाती है। मनुष्य समाज के लिये भी यही बात हो सकती है। प्रजनन की गति जितनी बढ़ेगी मनुष्यों के स्वास्थ्य और शारीरिक क्षमताएँ गिरती हुई चली जायेगी और वे मौसम के हलके से परिवर्तनों को भी सहन करने की स्थिति में नहीं रहेंगी। तब बीमारियाँ, नये-नये रोग इस तरह बढ़ेंगे कि असमर्थ व्यक्ति अपने आप नष्ट हो जायें, केवल वे लोग बचेंगे जिनके स्वास्थ्य वीर्य नाश की बीमारी से सुरक्षित हो। यदि मनुष्य अपने आप नहीं सँभलता तो प्रकृति को विवश होकर यह सामूहिक दण्ड प्रणाली मानव जाति के लिये भी लागू करनी ही पड़ेगी है। आजकल बीमारियों में मृत्यु दर की वृद्धि और नये-नये रोगों की उत्पत्ति उसी का संकेत करती है, आगे की स्थिति कितनी भयानक हो सकती है। इसकी तो कल्पना करते भय लगता है।

एक सीप (आइस्टर) एक वर्ष में 60 मिलियन (एक मिलियन=10 लाख) अण्डे देती है, इस तरह एक जोड़े से पैदा होने वाली पाँच पीढ़ियों से ही जितनी सीपियाँ पैदा हो जायेंगी, उनका यदि एक स्थान पर ढेर किया जा सके तो वह पृथ्वी के आकार से आठ गुना बड़ा होगा। कार्डफिष नामक मछली एक करोड़ अण्डे देती है, यदि सभी अण्डों में से बच्चे निकल आये तो उन्हें रहने के लिये समुद्र भी पूरा न पड़े। इनको कम करने के लिये प्रकृति ने ऐसे शत्रु तैयार किये है, जो इन्हें खाते रहें, मछलियों को अनिवार्य वन्ध्याकरण का दण्ड भी भुगतना पड़ता है। यदि मनुष्य भी स्वयं सचेत न हो तो एक दिन वह स्थिति अपने आप बन जायेगी, जब या तो जनसंख्या स्वयं एक दूसरे को मार कर खा लेगी। (युद्ध, महामारी, अकाल भी इसी के रूप हो सकते है।) या फिर स्त्रियों में बन्ध्यात्व बढ़ जायेगा और वे बच्चे ही पैदा न कर सकेंगी।

हाथी संसार में सबसे धीमी प्रजनन (ब्रीडिंग) वाला जीव है। वह 30 वर्ष की आयु से बच्चे देना प्रारम्भ करता है, यदि वह 30 और 90 वर्ष की आयु के बीच 6 बच्चे पैदा करे और इसी अनुपात से वे बच्चे भी आगे प्रजनन करते रहें तो 500 वर्ष में ही एक जोड़े हाथी से डेढ़ करोड़ हाथी पैदा हो जायेंगे। अर्थात् पृथ्वी पर तब केवल हाथी ही हाथी हों और किसी को रहने, खाने-पीने कि लिये स्थान और साध नहीं शेष न रहे।

प्रकृति में वह जबर्दस्त समझ और शक्ति कि वह इस शारीरिक योग्यता वाले पशु की जनसंख्या को भी अनियन्त्रित नहीं होने देती। उन्हें वह हिसाब से भारती रहती है। यह उदाहरण यह बताते है कि यदि मनुष्य आत्म-नियन्त्रण के द्वारा जनसंख्या वृद्धि के लिये तैयार नहीं होता, तब या तो उसे अप्राकृतिक परिवार नियोजन प्रणाली भक्षण करेगी अथवा प्रकृति स्वयं ही अपनी संहारक प्रक्रिया द्वारा नष्ट करके रख देगी।

हमारे लिये व्यवहार्य यही है कि हम इन्द्रिय संयम और कामवासना का उदात्तीकरण सीखें। अप्राकृतिक प्रतिबन्धक अवरोधों से अपने चरित्र को भी बचाये और अपने स्वास्थ्य, शक्ति और समर्थता को भी बना रहने दें। यदि यह नहीं करते तो प्रकृति के इस नियम और दण्ड के लिये भी तैयार रहना आवश्यक है।


स्वामी जी का साहस

स्वामी विवेकानन्द उन दिनों इंग्लैण्ड में थे। एक दिन वे अपने कुछ मित्रो के साथ देहात का भ्रमण करने गये, तब अचानक एक बलिष्ठ साँड़ उधर से ही दौड़ता आ निकला। उसे आता देख उनके साथ के लोग घबराकर इधर-उधर भागने लगे। इस भगदड़ में एक छोटी सी लड़की टक्कर खाकर नीचे गिर गई। वह साँड उस बालिका की ओर ही आ रहा था। स्वामीजी यह देखकर सावधान हो गये और दौड़कर साँड के सामने डट गये। साँड एकदम रुक गया और दूसरी ओर चल दिया। बच्ची के बचाव के लिए अपने को खतरे में डालने वाले स्वामी जी का यह साहस देखकर उनके सब साथी चकित रह गये।


प्रचण्ड शक्ति सम्पन्न सविता

इटली के महान् खगोल वैज्ञानिक गैलीलियो ने एक बार यह घोषणा की कि सूर्य सम्पूर्ण है ही नहीं। इस पर सारे संसार में एक बार तहलका मच गया। लोगों में खलबली मच गई कि सूर्य इतना साफ दिखाई देता है फिर उसका सम्पूर्ण न होना कैसे हो सकता है? गैलीलियो ने एक बार समझाने की चेष्टा भी की कि वह तो एक प्रकार का आवेश अथवा चेतना है, जो सौर-मण्डल के प्रत्येक परमाणु में प्रतिभासित है। यही नहीं परमाणुओं में पाये जाने वाले सारे बीज उतने ही शक्तिशाली और समर्थ है, जितना स्वयं सूर्य। इस बात को तब तो किसी ने नहीं समझा पर खगोल विद्या का अध्ययन तेजी से अवश्य प्रारम्भ किया गया। तब से अब तक सूर्य का जितना अध्ययन किया जा चुका है, उससे गैलीलियो के सिद्धान्त तो परिपुष्ट हुए ही है, अनेक ऐसे रहस्य भी ज्ञात हुए है, इससे भारतवर्ष में प्रचलित गायत्री महाविद्या के सिद्धान्तों की भी पुष्टि होने लगी। स्मरण रहे गायत्री का देवता एवं शक्ति स्रोत सविता-अर्थात् सूर्य ही है।

अगर हम यह जानना चाहे कि सूर्य का मानव जीवन से क्या सम्बन्ध है? तो विज्ञान की भौतिक उपलब्धियों को ही देखकर सन्तुष्ट नहीं रह जाना होगा वरन् उनके आधार पर भारतीय अध्यात्म की संगति पर भी विचार करना आवश्यक होगा। पाश्चात्य देशों में उसे जलवायु, वनस्पति और दृश्य जगत् में परिवर्तनों के लिये प्रमुख उत्तरदायी माना जाता है, किन्तु भारतीय आचार्यों का मत है कि मनुष्य की भावनाओं का भी सूर्य से घनिष्ठ सम्बन्ध है, इस तादात्म्य की उपेक्षा करके मनुष्य सुखी नहीं रह सकता। गैलीलियो ने इसी सूक्ष्म विज्ञान पर प्रकाश डालने का प्रयत्न किया था। तब उसकी बातों की उपेक्षा की गई पर बाद में वैज्ञानिकों ने विस्तृत अध्ययन किया और अब तक जो कुछ खोजें हुई, उनसे यह बात निश्चित रूप से सिद्ध हो चुकी है कि मनुष्य पूर्ण या सूर्य का ही आश्रित है। उससे मानसिक सम्बन्ध स्थापित करके अनेक प्राकृतिक रहस्य और शक्तियाँ प्राप्त करने एवं आत्म विकास में प्रकाश पाने की विस्तृत खोज इस देश में गायत्री विद्या के नाम से हुई।

पृथ्वी और सूर्य समान तत्वों से बने है, अन्तर केवल ठोस और गैसीय अवस्था का है। पृथ्वी आक्सीजन, नाइट्रोजन, लोहा, गन्धक, कार्बन, सोडियम, आदि अनेक तत्व पाये जाते है, इन्हें ठोस तरल एवं गैसीय स्थिति में भी बदला जा सकता है, वह सब तापमान का खेल है। यह सब तत्व सूर्य में भी पाये जाते है, किन्तु उच्च ताप के कारण वहाँ स्थूल कुछ भी नहीं है। गैस स्थिति में यह तत्व सूर्य में विद्यमान् है। इसलिये मनुष्य प्रकृति में जो गुण सम्भव है, वह सूर्य में है और उन कणों को आकर्षित कर मनुष्य बिना किसी औषधि या खाद्य के अपना स्वास्थ्य और आरोग्य स्थिर रख सकता है।

मनुष्य का शरीर सूर्य और पृथ्वी के तत्वों के सम्मिश्रण से बना है, इसलिये शारीरिक और मानसिक दृष्टि से शरीर पृथ्वी से ही प्रभावित नहीं होते वरन् उन पर सूर्य का भी प्रचण्ड हस्तक्षेप होगा कि अन्न जल आदि पृथ्वी का रस सेवन करने से हमारे शरीर में आक्सीजन, नाइट्रोजन, कार्बन, लोहा, गन्धक, सोडियम, कैल्शियम आदि विभिन्न तत्व उत्पन्न होते है, वहाँ उसमें इन तत्वों से भी सूक्ष्म प्राण शक्तियाँ भी क्रियाशील है। प्राण के द्वारा ही हमारे शरीर में स्पन्दन है। छींकना, जम्हाई लेना, अपान वायु का विसर्जन, निद्रा, पलक झपकना आदि क्रियायें प्राण के द्वारा ही सम्भव है। यह क्रियायें जड़ तत्व मात्र नहीं कर सकते। प्राण इन सब तत्वों से अधिक सूक्ष्म है, इसलिये वह पहचान में नहीं आता पर सूर्य विज्ञान के द्वारा उसे आसानी से समझा जा सकता है।

खगोल शास्त्रियों का कहना है कि सूर्य में उपरोक्त रासायनिक तत्वों की गन्ध मात्र है, मूलतः सूर्य में दो ही तत्व पाये जाते है, एक हाइड्रोजन, दूसरा हीलियम। सूर्य हाइड्रोजन का आहार करता है और उसके चार परमाणुओं को हीलियम के एक परमाणु में बदल देता है। इसी से उसमें शक्ति आती है, ताप और प्रकाश उत्पन्न होता है, यदि यह क्रिया न होती तो सूर्य दिखाई भी नहीं देता, क्योंकि वह सौर-मण्डल के समग्र भाग में चेतना रूप में छाया हुआ है। दिखाई केवल उतना हिस्सा देता हे जहाँ यह क्रिया होती है, अन्यथा सूर्य सर्वव्यापी और सर्वान्तर्यामी तत्व है, अब चाहे उसे आत्मा कहें,प्राण पुँज कह लें या हाइड्रोजन का जलता हुआ गोला कह लें यदि किसी को यह भ्रांति हो कि सूर्य आग को जलता हुआ गोला है तो उसे दूरदर्शी (टेलिस्कोप) से सूर्य का अध्ययन करना चाहिये। उससे पता चलेगा कि सूर्य में यज्ञ कुण्ड के समान लपटें ही नहीं फूटती वरन् उसमें से ‘ऊर्जा भँवर’ जो कि प्रकाश, गर्मी और विद्युत का सम्मिश्रण होता है, फूटता रहता है। इसी तरह की क्रिया हमारे शरीर में होती है। विचारों के रूप में इसी तरह की ऊर्जा हमारे शरीर में भी विद्यमान् है। यह केवल स्पन्दन जैसी क्रिया है, इसलिये दिखाई नहीं देती पर हमारे शरीर की अधिकाँश शक्ति इसी तरह अभिव्यक्त होती है। यदि मनुष्य को विभिन्न स्थूल तत्वों का प्राणी कहें और स्वल्प क्षमता वाला माने तो सूर्य को भी उन्हीं शक्तियों का सूक्ष्म गैसीय स्थिति का विचारशील प्राणी मानना पड़ेगा। उसकी शक्ति चूँकि अनन्त और विशाल है। वह निरन्तर देता रहता है, इसलिये उन्हें ‘देवता’ नामक आदर सूचक शब्द से सम्बोधन करने की परम्परा रही है। सूर्य को यदि इस अर्थ में भावनाओं और विचारों की केन्द्रीभूत शक्ति माने और यह कल्पना करें कि मनुष्य उनसे शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, औद्योगिक और बौद्धिक वरदान प्राप्त कर सकता है ता किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिये। गायत्री मन्त्र उसी विद्या का उद्घाटन पृथ्वी पर किया गया है।

ध्वनि से सम्बन्धित एक सर्वज्ञात तथ्य है कि समान कम्पन गति वाले एक अँगरेजी के वाई के आकार के उपकरण (ट्यूनिंग फोर्क) तथा एक तार को ले। तार पर एक छोटा सा का कागज का टुकड़ा मोड़ कर रख दें। अब ट्यूनिंग फोर्क को किसी ठोस कि टकराकर कम्पन उत्पन्न करें और तार के समीप लाये। स्पष्ट दिखाई देता हे कि कागज का वह छोटा सा टुकड़ा तार पर नाचने लगा। जबकि तार और ट्यूनिंग फोर्क के मध्य संपर्क का माध्यम केवल आकाश था। ट्यूनिंग फोर्क के कम्पन समान अवस्था वाले तार में भी कम्पन उत्पन्न कर देते है। तार के इन वास्तविक कम्पनों के कारण की कागज का टुकड़ा नाचने लगता है।

एक और प्रयोग है। पंचम स्वर पर चढ़े हुए तबले को कस कर रख दें। बरसात के दिनों में यदि बादल पंचम स्वर में गरज उठे तो उसकी गड़गड़ाहट का पृथ्वी में रखे हुए तबले पर क्या प्रभाव पड़ेगा? यह देखे तबले का चमड़ा अपने आप फट जायेगा। यह शब्द की शक्तिशाली तरंगों के द्वारा होता है।

इन दोनों प्रयोगों के समान ही समान तत्वों वाले मनुष्य और सूर्य में मानसिक सम्बन्ध स्थापित करने का काम वह 24 अक्षरों के कम्पन करते है, जिन्हें गायत्री मंत्र कहा जाता है। ठीक उसी प्रकार सूर्य और मनुष्य में तात्त्विक एकता है। शास्त्रकार का कथन है-सूर्यात्मा जगतस्थ्स्थुष्च” सूर्य जगत् की आत्मा है। जबकि हमारी चेतना हमारे शरीर जगत् की आत्मा है। इन दो चेतनाओं को समान गति से कम्पित और सम्बन्ध कर सकने की सामर्थ्य उन 24 अक्षरों में है, जिन्हें गायत्री मंत्र कहते है।

विज्ञान का यह नियम है कि उच्चस्तर या अधिक शक्ति का प्रवाह निम्न स्तर अथवा कम शक्ति वाले केन्द्र की ओर तब तक बहता है, जब तक कि दोनों समान न हो जायें। गायत्री से प्राप्त सिद्धियाँ इसी तादात्म्य परिपक्व अवस्था ही है, जब मनुष्य भौतिक शरीर में ही सूर्य की चेतना के समान सर्वव्यापी, सर्वदर्शी और सर्वसमर्थ हो जाता है। वह न केवल जलवायु, लोगों के स्वास्थ्य, मन की बातें जान लेने की सामर्थ्य पा लेता है वरन् इनसे भी सूक्ष्म से सूक्ष्म गतिविधियों और शक्तियों का स्वामी हो जाता है। उनका विस्तृत विवरण किया ही नहीं जा सकता। वह सारे संसार को भी नष्ट कर सकता है, किन्तु सूर्य देवता से संपर्क स्थापित होने के बाद गायत्री उपासक में उन्हीं की सी करुणा सद्बुद्धि और परार्थ उत्सर्ग की भावना विकसित होने लगती है। दूसरे शब्दों में यदि गायत्री उपासक उपासना के साथ-साथ अपने सद्गुण सद्विचारों को अधिक से अधिक सत्कर्मों में लगाने लगता हे तो उसकी साधना की सफलता और भी सत्वर हो उठती है।

कोई मनुष्य शाँत और प्रसन्न मुद्रा में बैठा हो, उस समय अन्य कोई उसके पास जाकर भावनापूर्वक कुछ निवेदन करे तो उससे अशान्ति समर्थन प्राप्त किया जा सकता है। बजाय तब जब कि वह अस्त व्यस्त और अशाँत स्थिति में हो। कोई तालाब स्वच्छ और शाँत हो तो उस पर एक छोटा सा कंकड़ फेंककर ही तरंगों का उत्पादन किया जा सकता है। यह भाव और विज्ञान दोनों का मिला जुला स्वरूप है। भारतीय आचार्या ने जो आचार संहिताओं और वैज्ञानिक प्रयोग किये है, वह उक्त सिद्धान्त को दृष्टि में रख कर ही किये। पिछले दिनों हमने भी उसी सूक्ष्म दर्शन का आश्रय एक प्रयोग किया था। वह सहस्र कुंडी गायत्री महायज्ञ के रूप में था। हमने पढ़ा था कि कुछ विशिष्ट अवसरों पर विशिष्ट रीति से गायत्री उपासना एवं यज्ञादि प्रक्रियायें संपन्न की जाये तो उनसे सूर्य देव की आध्यात्मिक शक्तियों को विशेष रूप से प्रभावित एवं आकर्षित किया जा सकता है। उनसे न केवल अपने लिये वरन सम्पूर्ण समाज, राष्ट्र और विश्व के लिये सुख समृद्धि ओर शाँति अनुदान उपलब्ध किया जा सकता है।

अक्टूबर 1958 का सहस्र कुंडी यज्ञ एक ऐसा ही प्रयोग था। पीछे मौसम वैज्ञानिकों ने भी हमारी मान्यता के भाग की पुष्टि कर दी। 1 जुलाई 1957 से 31 दिसम्बर 1958 तक खगोल शास्त्रियों से अन्तर्राष्ट्रीय शाँत सूर्य वर्ष (इंटरनेशनल इयर ऑफ दि क्यायेट सन्) संक्षेप में इक्कीस मनाया। यह नाम इसलिये रखा गया कि इन दो वर्षों में सूर्य बिलकुल शाँत रहा और वैज्ञानिकों को उस पर अनेक प्रयोग ओर अध्ययन करने का अवसर मिल। लगभग इसी अवधि से हमारे उस यज्ञ की तैयारी हुई थी। साधकों ने एक वर्ष पूर्व से ही गायत्री के विशेष पुरश्चरण प्रारम्भ किये थे। और अक्टूबर 1958 में 4 दिन तक यज्ञ कर शरद पूर्णिमा के दिन पूर्णाहुति दी थी। गायत्री का देवता सविता है, इसलिए इस गायत्री अभियान का भी उद्देश्य उसका अध्ययन और प्रयोग भी था। और उन उपलब्धियों से सारे विश्व समाज को लाभान्वित कराना भी जो ऐसे अवसरों पर देव शक्तियों से सुविधा पूर्वक अर्जित की जा सकती है।

उस यज्ञ के बाद से विश्व की गतिविधियों का हम बराबर अध्ययन कर रहे है। और यह देखकर आश्चर्यचकित है कि न केवल प्रकृति अपने विधान बदल रही है वरन लोगों की भावनायें ओर विचार भी तेजी से बदल रहे है योरोप की विलासिता प्रिय और भौतिकतावादी प्रजा भी अध्यात्म का आश्रय पाने के लिए भागी चली आ रही है। भारतवर्ष को तो उसका सुनिश्चित लाभ मिलने वाला है, भले ही उसका प्रत्यक्ष दर्शन सन 1999 के बाद दिखाई दे। अपने दैनिक जीवन में सूर्य की शाँत स्थिति प्रातः और सन्ध्या के समय होती है, भारतीय आचार्यों ने यह दोनों ही समय जप के लिये उपयुक्त बताये है इसी प्रकार नवरात्र पर विशेष साधनायें करने का जो विधान है वह सूर्य की इस भौतिक प्रकृति की खोज का ही फल है। वह पूर्णतया विज्ञान सम्मत ही है।

दीर्घकालीन कालचक्र के अनुसार इस बीच दो महाक्रान्तियाँ होने को है। अन्तर्राष्ट्रीय शाँत सूर्य वर्ष समिति ने 1 जनवरी 1964 से 31 दिसम्बर 1965 तक दूसरा शाँत सूर्य वर्ष मनाया और यह बताया कि सूर्य में कुछ विचित्र प्रकार के स्पन्दन (फैक्यूले) उत्पन्न हो रहे है, उनके बाद ही विशेष प्रकार के काले धब्बे (सूर्य कलंक) दिखाई देते है और उसके कारण पृथ्वी को जलवायु में विशेष प्रकार की हलचल उत्पन्न होती है। अगले कुछ दिन बहुत अधिक तीव्र और शीघ्र अतिशीघ्र परिवर्तन होंगे। यो सूर्य कलंक (सन स्पाट्स) के कारण पृथ्वी में प्राकृतिक परिवर्तनों का क्रम 11 वर्षों बाद आता है पर किन्हीं अज्ञात कारणों से अगले दिनों इन नियमों को तोड़कर सूर्य पृथ्वी में परिवर्तन लायेगा। इसमें वृष्टि, अनावृष्टि, सूखा, अकाल, ओलावृष्टि आदि ही नहीं युद्ध और महामारियों के प्रकोप भी होंगे। उन प्रकोपों में उन्हीं की रक्षा होगी जो सूर्य से अपना सम्बन्ध जोड़े रहेंगे।

इस तरह की घोषणाएँ हम काफी समय पहले से ही कर रहे है वह गणित ज्योतिष और सूर्य विद्या के आधार पर ही करते रहे है। वैज्ञानिक निष्कर्ष उसकी पुष्टि करते हैं। भारतवर्ष को मुसलिम और अँगरेजी सभ्यता के बन्धन में रहते हुए कोई 1500 वर्ष बीत रहे है, सूर्य विद्या के आधार पर इन 1500 वर्षों का अन्त इसी शताब्दी में हो जायेगा। ग्रह गणित के अनुसार पृथ्वी को सूर्य की परिक्रमा करने में नौ करोड़ तीस लाख मील की यात्रा करनी पड़ती है, इस यात्रा को पृथ्वी लगभग 67 हजार मील प्रति घण्टा की गति से चलकर 365.25 दिनों में पूरा करती है। प्रत्येक चक्कर में 1/4 दिन बढ़ जाता है। 4 वर्ष में वह एक दिन के बराबर होता है, अँगरेजी हिसाब से प्रत्येक चौथे वर्ष फरवरी 29 दिन की और वर्ष 366 दिन का होता है। एक नया पूरा वर्ष होकर पृथ्वी को पुनः उसी कक्षा में आने के लिए 365.25 ड़ = 1461 वर्ष लग जाते हैं।

इस तरह 1461 वर्षों का एक क्रम इस शताब्दी के अन्त में पूरा हो जायेगा। इस बीच सूर्य की प्रचण्ड शक्तियों का पृथ्वी पर असर होगा और उससे वह तमाम शक्तियाँ नष्ट-भ्रष्ट हो जायेंगे, जो मानसिक दृष्टि से अध्यात्मवादी न होंगी। जो लोग सूर्य व्यक्तियों से सम्बन्ध बनाये रखेंगे, उनकी रक्षा और ड़ उसी प्रकार होगी, जिस तरह भयंकर ज्वार-भाटों आने पर भी समुद्र में पड़े फूलों का अनिष्ट नहीं होता, जबकि बड़े-बड़े जहाज यदि ड़ न जायें तो उस अनन्त जल राशि में डूबकर नष्ट हो जाते हैं। गायत्री उपासक इन परिवर्तनों को कौतूहलपूर्वक देखेंगे और उन कठिनाइयों में भी स्थिर बुद्धि बने रहने का साहस उसी प्रकार प्राप्त करेंगे, जिस प्रकार माँ का प्यार बच्चा माता के क्रोध होने पर भी उनसे भयभीत नहीं होता वरन् अपनी प्रार्थना से उन्हें शाँत कर लेता है।

यह नहीं समझना चाहिये कि इन परिवर्तनों में विश्व संस्कृति का अन्त हो जायेगा। जब तक सूर्य है, तब तक सृष्टि बनी रहेगी, चेतन स्वरूप में प्राणि जगत् सूर्य या सूर्य का ही अंश है और सूर्य कम से कम एक अरब वर्ष इसी तरह प्रकाश और प्राण देता रहेगा, जब तक सूर्य है, जब तक सूर्य के पास ड़ है, तब तक सृष्टि बनी रहेगी पर अब वह एक बार स्नान कर अपनी सम्पूर्ण गन्दगी साफ कर देने का इच्छुक है, वर्तमान प्राकृतिक हलचलें युग परिवर्तन को सम्भावनायें उसी का प्रमाण है।

अन्तरिक्ष किरणों, उत्तरी ज्योति, पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र (मेगनेटिक फील्ड) पृथ्वी के ऊपरी वायु मण्डल और अयन मण्डल (ड़) पर सूर्य के प्रभाव का अध्ययन करने के बाद वैज्ञानिकों ने यह बताया कि सूर्य अपने आप उत्तेजित होता रहता है, उसका रहस्य क्या है? इसका उत्तर तो वे नहीं दे पाये पर उनका विश्वास है कि 11 वर्षों में एक वर्ष ऐसा आता है, जबकि उसकी उत्तेजना बढ़ जाती है। उत्तेजित सूर्य अपने सम्पूर्ण सौरमण्डल का जिसमें पृथ्वी सम्मिलित है, मन्थन करता है। उस समय उससे ज्वालाएँ फूटती हैं और सूक्ष्म कणों की वर्षा होती है। यह कण बाद में कहाँ विलीन हो जाने है, इसका पता वैज्ञानिक लगाने में असमर्थ रहे पर आत्मविद्या के आचार्य यह जानते है कि सृष्टि प्रत्येक के ड़ में अतिरिक्त व्यक्ति के रूप में यह उत्तेजित कण ही हलचल पैदा करते है, उससे स्थल प्रकृति ही प्रभावित नहीं होती वरन मनुष्य की सूक्ष्म प्रकृति अर्थात् विचार, भावनायें, संकल्प और विश्वास भी परिवर्तित होते है, इस परिवर्तन को आँका जाना यद्यपि सम्भव नहीं होता पर सामूहिक रूप से विश्व की राजनीति, उद्योग, व्यापार, श्रम, रोजगार, युद्ध एवं सामाजिक गतिविधियों पर उसके प्रभाव को देखकर वस्तुस्थिति को समीक्षा अवश्य जा सकता है। उसी से इस विश्वास की पुष्टि होती है कि सूर्य सिर्फ पदार्थों का पुँज ही नहीं प्राण और मनोमय जगत् का स्वामी है।

जो लोग इन बातों की अनुभूति करेंगे, वह तेजी से गायत्री विद्या के अन्तराल में प्रविष्ट होंगे। साधना ज्ञानार्जन और संयम में उनकी वृत्ति बढ़ेगी, ऐसे लोग ही आगे चलकर विश्व का मार्ग दर्शन करेंगे।

सूर्य द्वारा ही स्थूल प्रभाव को तो वैज्ञानिकों ने अच्छी तरह अनुभव कर लिया है। प्रकाश सूर्य से ही मिलता है, गर्मी सूर्य से ही मिलती, वर्षा सूर्य कराता है। भूमि और पानी को अलग अलग तरह की गर्मी प्रदान करके हवाएँ भी उसी के चलाये चलती है, पौधों को भोजन भी वही देता है। फलों में, वनस्पतियों में, खनिज सूर्य से ही आते है, वही बाद में मनुष्य पाता है। लकड़ी, पत्थर का कोयला, जल प्रपात और आदि सभी तत्व सूर्य ही देता। यह सब वह अपनी बाहरी क्रिया शक्ति और गर्मी से करता है। उसके तल का तापमान 11000 फारेनहाइट है। पृथ्वी की किसी वस्तु की इतनी गर्मी में कुछ सेकेंड तक ही रखा जा सकता है। सूर्य के यह प्रभाव तो दृश्य है और इतने सामान्य हो गये हैं कि लोग इसके महत्व को भी नहीं समझते। सूर्य अपने भीतर एक और विलक्षण 29000000 अंश फारेनहाइट रखता है, पृथ्वी की गर्मी तो उसके आगे बर्फ की तरह ठण्डी है, उस शक्ति से ही सूर्य बिम्ब पर सटी हुई कणिकाओं (ग्रेनल्स) में हलचल करता है। यह ग्रेनल्स 600 से 1400 किलोमीटर तक के गोले और समकोण आकार के होते हैं, उसी से उसके बिम्ब में ड़ जैसी होती है, देखने में वह तरंगें आकाश में ही शाँत हो जाती है, ऐसा जान पड़ता है, किन्तु उनसे पृथ्वी में विचित्र प्रकार की हलचलें होती हैं, यह लहर तन्तु (फिलामेंट) साँप की तरह लहराते हुए चलते हैं और गगन मण्डल में विचित्र परिवर्तन करते हैं, उसके फलस्वरूप पृथ्वी पर प्राकृतिक हलचलें पैदा हो जाती है। इन हलचलों में यद्यपि कोई निश्चित समय क्रम नहीं है पर अधिकाँश 11 वर्षों में एक बार तीव्र हलचल होती है। ऐसे समय साधनाओं की सिद्धि के लिए बड़े उपयोगी होते हैं, मानसिक जप से उन शक्ति कणों और स्पन्दनों को अपने भीतर स्थित कर अनेक शारीरिक, मानसिक और आत्मिक लाभ तीव्रता से प्राप्त किये जाते हैं, इसलिये इन दिनों गायत्री उपासना के प्रसार का एक व्यापक अभियान चलाकर उससे आधिदैविक लाभ प्राप्त करने का अवसर सारे देश को देना आवश्यक है, इस पुण्य में सभी गायत्री ड़ को भग लेना चाहिये।

सन् 1966 सूर्य के ग्यारह वर्षीय पट परिवर्तन का 19 वाँ चक्र था। उस वर्ष मई और जून के महीनों में रूस, चेकोस्लोवाकिया, वुलगारिया, भारत, इटली, अमेरिका, अफगानिस्तान आदि में भीषण बाढ़ आई, वुलगारिया में 16 जून को ऐतिहासिक स्मरण वाले ओले गिरे। कूबान में 18 मई को भयंकर तूफान आया, जिसमें लाखों पेड़ उखड़ गये, फसलें बरबाद हुई और मकानों की छत तक ड़। इसी अवधि में भारतवर्ष में भीषण बाढ़ आई और हजारों लोग बेघर बार हो गये।

हम ऊपर बता चुके हैं, अगले 30 वर्ष व्यापक हलचलों के है पर उनमें, से सन 1977, 1988 और 1999 यह तीन वर्ष भारी प्राकृतिक उथल पुथल के होंगे इन वर्षों में पृथ्वी की भौगोलिक स्थिति बदल जाये तो कुछ आश्चर्य नहीं। यह दृव्य परिवर्तन सूर्य के द्वारा होता है। पर क्यों? वैज्ञानिकों के पास इसका कोई उत्तर नहीं है।

गायत्री महाविद्या के अनुसार विश्व रचना के दो ही तत्व प्रधान है, एक देव या प्राण, दूसरा भूत या पदार्थ। भूत प्राण के बिना गतिशील नहीं होता। इसलिये प्रत्येक भौतिक गायत्री का जीवन तत्व उसका प्राण है। पंचभूत से बना मनुष्य शरीर नितान्त प्राकृत है। यह गायत्री का शब्द भाग है। और जिस तरह से उच्चारण करने के बाद गायत्री के अक्षर वायु में विलीन हो जाते हैं, उसी प्रकार मनुष्य अधीर जो उत्पन्न होकर विलीन होते रहते हैं। उसका दूसरा चरण प्राण है, यह प्राण सविता का ही ड़ है, उसका दृव्य भाग तो भौतिक है पर अदृश्य भाग मनोमय है अर्थात् उसमें चेष्टाएँ हैं, अपने इसी रूप में सूर्य सर्वाधिक शक्तिशाली है, उसी बान को ड़ कहती है-प्राणः प्रजानाँ उदयत्येष सूर्यः” यह सूर्य ही अपने प्राणों के संयोग से प्रजा की उत्पत्ति करता है। ब्रह्म सूर्य सम ज्योतिः (यजुर्वेद 23148) सूर्य का भौतिक प्रतीक स्थूल है पर उसमें चेतन ब्रह्मशक्ति भरी हुई है।

सूर्य को ऋषियों ने त्रयोविद्या कहा है, अर्थात् उसमें स्िल तत्व (जिनसे शरीर बनते हैं) प्राण (जिनसे चेतना आती है) और मन (जो चेष्टाएँ प्रदान करता है।) तीनों तत्व विद्यमान है। हम दृश्य रूप से सूर्य के परिवर्तनों से प्रभावित होकर दुःखी होते है, किन्तु गायत्री मंत्र के माध्यम से जब सूर्य के साथ हम अपने मनोमय जगत को जोड़ते है, तादात्म्य करते हैं जो हमें उसके आध्यात्मिक लाभ तीनों- स्वास्थ्य, तेजस्विता और मनस्विता के रूप में मिलता है। जिस दिन पृथ्वी के लोग इस विद्या को ठीक ठीक जान लेंगे उस दिन सुख शान्ति और समृद्धि का कोई अभाव नहीं रहेगा पर युग परिवर्तन की इस संधि और संक्रान्ति अवस्था में उन लोगों को अधिक श्रेय, सम्मान मिलेगा, जो इस तत्व ज्ञान के आवगाहतन और सारे विश्व में फैलाने का प्रयत्न करेंगे।


पूज्य आचार्य जी के आगामी कार्यक्रम

प्रति वर्ष एक सहस्र हवन कुण्डों के यज्ञों की श्रृंखला में इस वर्ष होने वाले यज्ञों का विवरण नीचे दिया जा रहा है। प्रस्तुत सभी कार्यक्रमों में अखिल प्रान्तीय युग निर्माण सम्मेलन भी अनिवार्य रूप से सम्मिलित है अतएव सभी क्षेत्रीय कार्यकर्ताओं, शाखा सदस्यों एवं पूज्य आचार्यजी से भेंट करने वाले जिज्ञासुओं को समीपवर्ती कार्यक्रमों में अधिक संख्या में पहुँचने का प्रयत्न करना चाहिए। सम्मेलन में उपस्थित होने की सूचना सम्बन्धित डड़ड़ड़़ पहुँचा दी जायें जिससे प्रबन्धकों को दिक्कत न हो। इनमें से अधिकाँश यज्ञ शतकुण्डी हैं। कार्यक्रम इस तरह हैं-

1-20 नवम्बर से 24 नवम्बर 69-पटना

पता-श्री कृष्णगोपाल माथुर

कृष्ण मेडिकल हाल, चौक- घटना(बिहार)

2-3 दिसम्बर से 7 दिसम्बर 69-झाँसी

पता- श्री बालकृष्ण अग्रवाल

232,तलैया खजांची बिल्डिंग झाँसी (उ॰ प्र0)

3- 12 दिसम्बर से 15 दिसम्बर 69- मिहींपुरवा

पता - श्री कन्हैयालाल श्रीवास्तव

प्राचार्य सर्योदय इन्टर कालेज

पो-मिहींपुरवा जि बहराइच उ॰ प्र

4-27 दिसम्बर से 1 जनवरी 70-बम्बई

पता - (1 ) अखंड ज्योति गायत्री परिवार शाखा

द्वारा-श्री शिवशंकर न॰ जोशी

राणा काटेज मंछुभाई रोड मलाड पूर्व बम्बई-64

पता - (2) श्री विश्वनाथ भाई सी त्रिवेदी

फोन नं 314187 परमानन्द बाड़ी

ठाकुर द्वार रोड, बम्बई-4

पता - (3) श्री हर्षनारायण सिंह

5, बिट्ठलवाडी कालबादेवी रोड

क्षवेरी बाज़ार फोन नं 299672 बम्बई

5- 2 जनवरी 70 से 4 जनवरी 70-बड़ौदा पता- श्री विनायक सदाशिव गोडवोले

नीलम विट्ठल सोसायटी, नवापुरा बड़ौदा (गुजरात)

6- 4 से 6 जनवरी 70-आणद (गुजरात)

पता-गायत्री परिवार शखा

नवारामजी मन्दिर, स्टेषन राड आणंद (गुज.)

7- 7 से 8 जनवरी 70-खेती−बाड़ी (गुजरात )

पता-श्री भूपेन्द्र सी पटेल

न्यू सी 21, खेती−बाड़ी आणद (गुजरात)

8-20 जनवरी से 24 जनवरी 70 तिनसुकिया आसाम

पता-(1 ) रामकुमार अग्रवाल

महावीरप्रसाद रतनलाल

कोयला पानी रोड, ड़ड़ड़ड़ (आसाम)

पता-(2) श्री भवानी प्रसाद

भवानी स्टोर्स ए टी रोड, तिनसुकिया

जि0 शिवसागार (आसाम)

9-30 जनवरी से 1 फरवरी 70-ग्वालियर (म॰ प्र0)

पता-श्री महेश प्रसाद सक्सेना

मजूमदार का बाडा चावडी बाजार, लश्कर (गवा0)

10- 6 फरवरी से 8 फरवरी 70 - नवसारी (गुजरात)

पता - श्री मगनलाल पो0 गाँधी

आशा बाग सोसायटी 66 गायत्री सदन

पो0 नवसारी, जि0 बलसाड (गुजरात)

11-13 फरवरी से 17 फरवरी 70 महासमुन्द (रायपुर)

पता - श्री ज्वालाप्रसाद ष्षर्मा

श्रीराम मंदिर पारा महासमुन्द (म॰ प्र0)

12-19 और 20 फरवरी 70 - साकोली

पता - श्रीमती चन्द्रकान्ता गुप्ता

ष्षारदा जनरल स्टोर्स, पो0 साकोली

जि0 भण्डारा (महा0)

13-21 फरवरी से 25 फरवरी 70- बिलासपुर

पता - श्री उमाषंकर चतुर्वेदी

जर्म्स किलर, दयाल बन्द, बिलासपुर (म॰ प्र0)


कुण्डलिनी प्रचंड प्राण शक्ति की गंगोत्री

समस्त शरीर गोलाकार शक्ति अणुओं से मिलकर बना है पर इसके दो केन्द्र बिन्दु ऐसे हैं, जिनकी रचना भिन्न प्रकार की है। उन दो अणुओं की आकृति में ही नहीं, प्रकृति में भी भिन्नता है। हाथ पैर तो क्रिया उपकरण मात्र हैं।काया की असली मशीन, धड़ और शिर समेत मध्य भाग ही है। हाथ पैर कट जायें तो भी मनुष्य आसानी से जीवन रह सकता है। जीवन की मूल धारायें धड़ और सिर वाले मध्य भाग में केन्द्रीभूत हो रही है। हृदय, मस्तिष्क, फुफ्फुस, यकृत, वृक, पाचक यन्त्र आदि वे महत्वपूर्ण अवयव इसी केन्द्र में अवस्थित हैं, जिन पर हमारी जीवन प्रणाली आधारित है। इस प्रणाली के दो सिरे हैं, एक को ‘मूलाधार’ कहते हैं, दूसरे को सहस्रार एक गुदा और जननेन्द्रिय के बीच में अवस्थित है, दूसरा मस्तिष्क के मध्य केन्द्र में। इस दोनों का परस्पर सम्बन्ध जोड़ती है रीढ़, मेरु दण्ड, हड्डियों का समुच्चय मात्र नहीं है, उसमें आश्चर्यचकित कर देने वाली विद्युत धारायें बहती हैं। उनमें से तीन प्रमुख धारायें हैं-(1) इड़ा (2) पिंगला, (3) सुषुम्ना। त्रिवेणी की तरह इन तीनों का संगम तीर्थ राज प्रयाग जैसी दिव्य स्थिति मानवी काया में उत्पन्न करता है।

पृथ्वी के दो सिरे हैं, जिन्हें उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव कहते है। वैज्ञानिक जानते हैं कि पृथ्वी के भीतर और बाहर जितनी क्षमताएँ दिखाई पड़ती हैं, उनके आधार सूत्र इन ध्रुवों में केन्द्रीभूत हैं। ध्रुव पृथ्वी के मर्मस्थल है। इन्हें यदि तनिक भी अवांछनीय आघात पहुँच जाय तो पृथ्वी अपनी धुरी से हिल कर जल थल को एक कर दे। इतना ही नहीं वह अपनी कक्षा से विचलित हो सकती है और इस अनन्त आकाश में डूबकर कहीं अपना अस्तित्व ही समाप्त कर सकती है। इन विचित्र सम्भावनाओं को ध्यान में रखते हुए, आधुनिक वैज्ञानिक अपने आणविक प्रयोगों को ध्रुव प्रदेशों से दूर ही रख रहे है। वे जानते हैं कि उनका अधूरा ज्ञान और असंबद्ध प्रयोग इस सुन्दर सृष्टि का अस्तित्व ही समाप्त करके रख सकता है। ध्रुवों पर जमी बर्फ यदि किसी वैज्ञानिक भूल से पिघल पड़े तो समुद्र में इतना पानी बढ़ जायेगा कि आज का लगभग आधा थल प्रदेश उसमें डूबकर समाप्त हो जायेगा। वैज्ञानिक ललचाने अवश्य हैं कि ध्रुव केन्द्रों में ड़ शक्तियों का यदि ठीक से पता चल जाय और उनको ठीक से उपयोग करने के स्त्रोत मिल जायें तो फिर इस पृथ्वी का भी वैसा ही मन माना प्रयोग किया जा सकता है, जैसे काया और बुद्धि का किया जाना है। तब मनुष्य अनन्त शक्तियों का स्वामी और तथाकथित देवताओं से अधिक समर्थ होगा

पंच तत्वों से बने पृथ्वी पिण्ड के ध्रुव केन्द्रों में ड़ हिल शक्तियों का थोड़ा सा परिचय प्राप्त करके भौतिक वैज्ञानिक इस निष्कर्ष पर पहुँचे है कि जिस प्रकार शरीर में हृदय और मस्तिष्क दो प्रधान प्राण पुञ्ज धारण करने वाले समर्थ अवयव हैं, उसी प्रकार पृथ्वी के दो ध्रुवों की स्थिति है। इनमें अपार शक्ति भण्डार भरा पड़ा है। कभी इस शक्ति पर अधिकार हो गया तो स्वर्ग की कल्पनाओं से अधिक सुविधायें इसी संसार में उपलब्ध की जा सकेंगी।

आत्म विद्या के अन्वेषकों ने सूक्ष्म जगत् में भरे चेतन तत्वों की शोध बड़ी तत्परतापूर्वक प्राचीनकाल में की थी। इस काया में ही उन्होंने जड़ जगत का सारा प्रतिबिम्ब पाया। जो स्थूल संसार में है, वह सूक्ष्म रूप से मनुष्य की काया में भी विद्यमान है। इस तथ्य को उन्होंने भली प्रकार समक्ष लिया था। इसलिए महंगे, उपकरणों और साधनों द्वारा की जा सकने वाली प्रकृतिगत शोधों की अपेक्षा उनने यह अधिक उचित समझा कि काया को पृथ्वी की प्रतिक्रिया मानकर उसे खोजे और जो अन्वेषण प्रयोग अभीष्ट हों वे इस देह पर ही कर लें। इसी प्रयोग पद्धति का नाम ‘योगाभ्यास’ है।

योगाभ्यास की अनेक प्रक्रियाओं में सबसे महत्वपूर्ण कुण्डलिनी महाशक्ति का स्वरूप समझने एवं उपयोग जानने ही की पद्धति ही मानी गई है। इसे काया के दो ध्रुवों पर किया जाने वाला प्रयोग एवं आधिपत्य माना जा सकता है। “ इस साधना के छोटे बड़े अनेक स्तर प्रयोग एवं फलितार्थ है। सर्वसुलभ आरम्भिक प्रयोग भी इस विद्या के हैं जो सामान्य जीवन में तेजस्विता, प्रखरता एवं क्रियाशीलता भर सकते हैं। कठिन और उच्च स्तर के प्रयोग भी है। जो व्यक्ति की अन्तरंग सत्ता को इतनी व्यापक बना सकते हैं कि वह ब्रह्माण्ड की महान सत्ताओं के साथ अपना सम्बन्ध जोड़ सके। इस ब्रह्माण्ड में इतना कुछ भरा पड़ा है कि मनुष्य की कल्पना तक अस सब को जानने समझने में समर्थ नहीं हो सकती। पर ब्रह्मा के अतुल वैभव को छू सकने की क्षमता जिस व्यक्ति को उपलब्ध हो जाय वह प्रकृति के समृद्ध भण्डार से अभीष्ट मात्रा में जो चाहे सो प्राप्त कर सकता है और उस महाकोष में अपना अनुदान देकर विश्व-व्यापी ब्रह्म चेतना को प्रभावित भी कर सकता है।

पृथ्वी के उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव सृष्टि की असंख्य ज्ञात और अज्ञात शक्तियों को अपने भीतर छिपाये बैठे है। यही बात काया रूपी पृथ्वी के दो ध्रुवों के बारे में लागू होती है। ब्रह्मरन्ध्र स्थित सहस्रार चक्र उत्तरी मूलाधार के नाम से विख्यात हैं इन दोनों मर्मस्थलों में दो विशेष आकृति ओर प्रकृति के शक्ति बीज विद्यमान हैं। मूलाधार का शक्ति बीज तिकोना है। उसकी आकृति पर्वत जैसी मानी गई है। सारे शरीर में विद्युत धारा का प्रवाह आगे बढ़ना तनिक पीछे हटना फिर आगे बढ़ना इस क्रम से संचारित होता है। साधारणतया बिजली की यही गति हैं किन्तु मूलाधार में अवस्थित त्रिकोण शक्ति बीज जिसे सुमेरु पर्वत भी कहते हैं।

एक सर्पाकार विद्युत प्रवाह इस सुमेरु के आस-पास लिपटा बैठा है। इसी को महा सर्पिणी कुण्डलिनी कहते है। इसे विद्युत भ्रमर भी कह सकते हैं। तेज बहने वाली नदियों में वहीं कहीं बड़े भँवर पड़ते है। वहाँ पानी की चाल सीधी अग्रगामी न होकर गोल गहर की गति में बदल जाती है। मनुष्य शरीर में सर्वत्र तो नाड़ी संस्थान के माध्यम से सामान्य गति से विद्युत प्रवाह बहता है। पर उस मूलाधार स्थित सुमेरु क समीप जाकर वह भँवर गहर की तरह चक्राकार घूमती रहती है। इस स्थिति को सर्पिणी कहते हैं। कुण्डलिनी की आकृति, सर्प की सी आकृति में मानी गई है।

नदी प्रवाह में भँवरों की शक्ति अद्भुत होती है। उनमें फँस कर बड़े-बड़े जहाज भी सम्भाल नहीं पाते और देखते -देखते डूब जाते हैं।साधारण नदी प्रवाह में जितनी शक्ति और गति रहती है, उससे 60 गुनी अधिक शक्ति भँवर में पाई जाती है। शरीरगत विद्युत प्रवाह में अन्यत्र पाई जाने वाली क्षमता की तुलना में कुण्डलिनी की शक्ति हजारों गुनी बड़ी है। उसका स्वरूप एवं विज्ञान यदि ठीक तरह समझा जा सके तो निस्सन्देह व्यक्ति सर्वसमर्थ सम्पन्न सिद्ध पुरुष बन सकता है।

कुण्डलिनी का मध्यवर्ती जागरण मनुष्य शरीर में एक अद्भुत प्रकार की तड़ित विद्युत उत्पन्न कर देता है। हमें एक ऐसे सिद्ध पुरुष का परिचय है जिसका शरीर भौतिक बिजली से हर घड़ी भरा-पूरा रहता है। उसे कोई स्पर्श नहीं कर सकता। छुए तो खुली बिजली छूने जैसा झटका लगे। वे हमेशा आँखें नीचे रखते हैं। एक बार उन्होंने गौर से एक काँच को देखा और वह तत्काल टूटकर चूरा हो गया।यह शरीरगत विद्युत प्रवाह था। यह धारा जब मनःक्षेत्र में प्रवाहित होती है तो मनस्विता का पारापार नहीं रहता। नहीं रहता। नारद के आगे बाल्मीकि और बुद्ध के आगे अंगुलिमाल जैसे दुर्दान्त दस्युओं को पानी-पानी हो जाना इसी मनस्विता का चमत्कार था। योग साधना शरीर कन और आत्मा के स्थूल सूक्ष्म एवं कारण कलेवरों में न जाने कितनी सामर्थ्य उत्पन्न कर सकती है। कहना न होगा कि कुण्डलिनी साधना योगाभ्यास की अति महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। इसे आरम्भिक स्तर पर करने से भी भौतिक जीवन प्रखर एवं प्रतिभा सम्पन्न बनाया जा सकता है। ऊँचे स्तर पर तो उस साधना को परिणति कितनी चमत्कारी हो सकती है, उसका उल्लेख कर सकना भी कठिन है।

मूलाधार अवस्थित दक्षिणी ध्रुव को-महासर्पिणी को चर्चा अभी की गई है। उत्तरी ध्रुव सहस्रार कमल का रहस्य और भी अधिक अद्भुत है। पुराणों में क्षीरसागर में सहस्र मुखी शेषनाग पर विष्णु भगवान के शयन करने की बात कही गई है। इस अलंकार में ब्रह्मरन्ध्र स्थित सहस्रार कमल का ही उल्लेख है। मस्तिष्क के बीच-बीच भी एक विचित्र आकृति और प्रकृति का शक्ति बीज मूलाधार की तरह ही है। इसमें आगे सूक्ष्म आरी जैसे दाँत सब ओर हैं। इन दाँतों को कमल की पंखुड़ियाँ भी कहते हैं। और उन्हें ही महासर्प के हजार फन माना गया है। मस्तिष्क में भरा हुआ, भूरे नवनीत जैसा पदार्थ क्षीरसागर के नाम से सम्बोधित किया गया है। इस पर विष्णु की स्थिति शयन अवस्था में हैं। आमतौर से लोगों का भगवान सोया ही रहा है, यदि वह जाग पढ़े तो उसका प्रकाश, आवेश रोम-रोम में भर जाय और उस व्यक्ति की तुलना भगवान के रूप में की जाने लगे।

पौराणिक अलंकार में विष्णु के साथ लक्ष्मी चरण दबाने में लगी दिखाई जाती है और एक ओर हनुमान दूसरी ओर नारद खड़े परिलक्षित होते हैं। जहाँ विष्णु है-भगवान है वहाँ श्री, समृद्धि, सम्मति और सफलता की-लक्ष्मी की -क्या कमी रहेगी? लक्ष्मी विष्णु की पत्नी है। उनके पैर दबाती हैं। अर्थात् जहाँ भी ब्रह्मा की प्रतिष्ठापना होगी वहाँ समृद्धियों की, विभूतियों की श्री लक्ष्मी अनायास ही प्रस्तुत रहेगी। सहस्रार तक पहुँचा हुआ साधक दिव्य विभूतियाँ से वंचित नहीं रह सकता। हनुमान भौतिक बल के प्रतीक हैं। और नारद ज्ञान के प्रतिनिधि। सहस्रार कमल में अवस्थित विष्णु जहाँ विद्यमान होंगे वहाँ भौतिक एवं आत्मिक बल की कमी न रहने पावेगी। यह दिग्दर्शन हमें शेषशायी विष्णु के उपलब्ध चित्रों से सहज हो विदित हो जाता है।

क्रमशः कुण्डलिनी महाशक्ति का स्वरूप, प्रयोग और प्रतिफल पाठक इन पंक्तियों में जानते, समझते चलेंगे संक्षेप में अभी हमें इतना ता जान हो लेना चाहिये कि मानव शरीर मात्र हाड़-माँस का पुतला नहीं है। यदि उसके आन्तरिक ढाँचे में छिपी पड़ी शक्तिपात का अनुसंधान किया जाय तो प्रतीत होगा, इस धरती,सृष्टि एवं ब्रह्माण्ड में जो कुछ अतुलित शक्ति भण्डार एवं विभूतियों का समुद्र भरा पड़ा है, वह बीज रूप में अपनी छोटी सी काया में भी विद्यमान है। और यदि उसका उपयोग पेट तथा प्रजनन से- वासना और तृष्णा से- ऊँचा उठकर अध्यात्म प्रयोजन के लिए किया जा सके तो व्यक्ति स्वयं भी धन्य बन सकता है और दूसरों के दुःख दारिद्र मिटा सकने का पुण्य परमार्थ भी कर सकता है। समुद्र मन्थन की कथा में देवताओं को 14 अद्भुत रत्न मिलने की बात का उल्लेख है। हम अपना समुद्र मन्थन कर सकें तो उसी स्तर के रत्नों से अपना भण्डार भर सकते है।

गत अंक में चर्चा की गई थी कि मूलाधार स्थित प्राण प्रवाह का क्षण आमतौर से रतिक्रिया में किया जाता रहता है। उसे बचाया जा सके तो बचत से बहुमूल्य वस्तुऐं खरीदी जा सकती है। योग साधना के दक्षिण मार्ग में ब्रह्मचर्य की सरल सर्वोपयोगी साधना का उल्लेख है। साधना का वाम मार्ग नेत्र है। उससे उस शक्ति को उत्तेजित करके ऐसी प्रक्रियाओं का वर्णन हे, जिससे उस उत्तेजना में अगणित प्रसुप्त क्षमताएँ जग पड़े। उपयोग, क्षरण या विनोद के लिए नेत्र में काम शक्ति को उत्तेजित करना और उससे लाभ उठाने के अद्भुत प्रयोगों का उल्लेख है। साधना के पंच ‘म’ कारो में एक मैथुन भी आता है। यह साधारण रतिक्रिया से सर्वथा भिन्न और अतीव विलक्षण प्रकार का है। चूँकि वह प्रसंग गुहा है। सार्वजनिक उपयोग का भी नहीं। कहने सुनने में अश्लील भी बन जाता है। लोग उसका अनैतिक प्रयोग भी कर सकते है, इसलिए तंत्र की अन्य साधनाओं की तरह यह भी गुहा प्रकरण में ही चला जाता है आरे केवल अधिकारी ही इस संदर्भ में चर्चा कर सकते है।

शारदा तिलक तंत्र, कुलाचवि तंत्र, महामंत्र आदि में भैरवी चक्र का वर्णन है। रामकृष्ण परमहंस की जीवनी में उनकी गुरुमाता ने उनसे ‘कुमारी पूजन’ की साधना कराई थी। परमहंस जी की धर्मपत्नी शारदामणि बड़े संकोच से ही उस संदर्भ में सहयोग के लिए उद्धत हुई थी। इस प्रकार के और भी साधन विधान है, जिनमें कामोत्तेजना को मनस्विता में परिणत करने का वैसा ही प्रयोग है, जैसा कि गिरते हुए जल प्रवाह कि शक्ति का उपयोग करके बिजलीघर बनाये जाते हैं अथवा बहती हुई तेज हवा की क्षमता से पनचक्की चलाई जाती है।

कहने का तात्पर्य इतना भर है कि काम-शक्ति केवल घृणित प्रयोजनों में अपव्यय करने के लिए नहीं वरन अंतरंग में अवस्थित गुहा शक्यों के जागरण के काम भी आती है और यदि उसका अपव्यय किया जाय तो शरीर को कम और प्राण को अधिक क्षीण कर देती है। प्रकट है कि हमारे आहार से क्रमशः

रस, रक्त माँस, अस्थि, मज्जा, मेद आदि बनने के उपरान्त अन्तिम धातु रजस

वीर्य बनता है। और यही रजस अन्ततः स्थूल से सूक्ष्म बनकर ड़डड़ड़ एवं तेजस के रूप में परिणत हो जाता है। चेहरे पर चमक, नसों में स्फूर्ति, कन में उमंग अन्तरंग में आकांक्षायें, स्वभाव में दृढ़ता और शौर्य यह सारे चमत्कार शरीर और मन के क्षेत्र में काम करने वाले ओजस के हैं और यह तेजस की ही परिणित है। किशोर अथवा कुमार अवस्था में यह तत्व बढ़ता एवं सुरक्षित रहता है, इसलिए किशोर और किशोरियों-में युवा और युवतियों में चंचलता, सक्रियता, उमंग और विनोद की मात्रा पर्याप्त मात्रा में रहती है। गृहस्थ में पड़ने के बाद लड़के और प्रजनन के बाद लड़कियाँ इस तत्व से वंचित होने लगते हैं उनमें अन्य मनस्कता, आलस्य तथा जैसे-तैसे समय गुजारने की मनोदशा बन जाती है। अविवाहित दिनों में जो उमंग उनके शरीर और मन में काम करती थीं, वे समाप्त हुई दिखने लगती हैं। यह परिवर्तन ओजस की कमी के रूप में प्रत्यक्ष देखी जा सकती है। इसलिए आत्म-बल का महत्व मानने वाले सदा ब्रह्मचर्य के सम्बन्ध में सतर्क रहते हैं। गृहस्थ में रहते हुए भी अधिक संयम बरता जा सकता है। इससे पति पत्नी दोनों को लाभ होता है। यदा-कदा किया हुआ समागम भी बहुत तृप्ति देता है। सुसन्तति का उत्पादन लम्पट दम्पत्तियों के लिए सम्भव है। जो दम्पत्ति इस संदर्भ में मर्यादायें तोड़ेंगे, उन्हें अपनी शारीरिक, मानसिक क्षमताएँ घटाने की तो हानि होगी ही, साथ ही सन्तान भी दुर्बल शरीर और मन वाली हो पल्ले पड़ेगी।

प्राण शक्ति का केन्द्र-बिन्दू मूलाधार चक्र है। यह जननेन्द्रिय के समीप होने से अपना शक्ति प्रवाह समीपवर्ती उपकरण में अधिक बहा देता है। इसलिए अध्यात्म मार्ग के पथिकों को इस दिशा में अधिक सतर्कता बरतनी पड़ती है। काम का दुरुपयोग ही बुरा है। उसकी उपस्थिति शरीर और मन की मूर्छना को हटाकर सर्वतोमुखी सक्रियता एवं प्रखरता उत्पन्न करती है। इस वेग को किसी प्रकार मोड़ा जा सकता है और उस दिशा परिवर्तन को जीवनी शक्ति के अभिवर्धन एवं मनस्विता के उन्नयन में किस प्रकार प्रयुक्त किया जा सकता है, इसका एक समग्र शास्त्र है। तन्त्र मार्ग में इनको उत्तेजित करके उस उद्दीप्त शक्ति पुँज को विविध प्रयोजन के लिए प्रयुक्त करने की प्रणाली निकाली है। इसके अनुसार कामुकता का अभिवर्धन और नियन्त्रण का प्रकरण मनस्विता की उपलब्धि और अतिशय सुप्त शक्तियों के जागरण में आश्चर्यजनक सफलता के लिए प्रयुक्त हो सकती है।

प्राण शरीर में सक्रियता स्फूर्ति एवं रोग निवारण जीवनी-शक्ति के रूप में चमकता है। मन में उसे साहस, धैर्य सन्तुलन और विनोद के रूप में देखा जा सकता है। जिनका प्राण दुर्बल है, वे आलस्य, अनुत्साह, अवसाद और दीर्घ सूत्र में ग्रसित पाये जायेंगे। काम करने को जी ही न करेगा-करेगा तो आधे अधूरे मन से बेगार भुगतायेंगे। चेहरा निस्तेज और आँखें निराशा,संकोच एवं आशंका से डूबी हुई डबडबाई भी दीखेंगी। मन को प्राण का ईधन न मिला तो वह भी बुझा मुरझाया पड़ा सहेगा। ऐसी शारीरिक और मानसिक दुर्घटनायें प्राण शक्ति की न्यूनता एवं क्षीणता व्यक्त करती है। कुण्डलिनी साधना का प्रयोग इन अभावों की पूर्ति सहज ही कर सकता है और उसकी उच्चस्तरीय प्रगति की प्रचण्ड शक्तियों और अद्भुत सिद्धियों का भाण्डागार सिद्ध कर सकती है।


नवयुवक सज्जनता और शालीनता सीखें

(पं श्रीराम आचार्य द्वारा लिखित और युग-निर्माण योजना मथुरा द्वारा प्रकाशित

‘सज्जनता की राह’ पुस्तिका का एक अंश)

जीवन निर्माण का महत्वपूर्ण समय 12 से लेकर 20 वर्ष तक की आयु तक रहने वाली किशोर अवस्था है। इस अवधि में मनुष्य गीली मिट्टी और हरी लकड़ी की तरह रहता है, जिसे चाहे जिधर ढाला और मोड़ा जा सकता है। पीछे तो वह पक्की मिट्टी और सूखी लकड़ी की तरह जैसा उठती उम्र में बन गया प्रायः वैसा ही अन्त तक बना रहता है। जो बूढ़े हो चले उन ढलती आयु के लोगों के दिन करीब हैं, उनके दोष दुर्गुणों को सहन भी किया जा सकता है और उपेक्षा भी की जा सकती है पर नई पीढ़ी के विकासमान् बालकों की उपेक्षा नहीं हो सकती। अगले दिनों महत्वपूर्ण भूमिकाएँ उन्हें ही सम्पादित करनी है।नेतृत्व उन्हीं के कन्धों पर आने वाला है। वे जैसे भी कुछ भले-बुरे होंगे उसी के अनुरूप समाज की भावी सम्भावनायें बनेंगी। यदि हम निकट भविष्य में अपने समाज को समुचित सुसंस्कृत देखना चाहते है। तो सारा ध्यान अपनी होनहार उदीयमान पीढ़ी पर केन्द्रित करना पड़ेगा।

कहना न होगा कि समस्त श्री, समृद्धि प्रगति और शान्ति का उद्भव मनुष्य के सद्गुणों पर अवलम्बित है। दुर्गुणी व्यक्ति हाथ में आई हुई, उत्तराधिकार में मिली हुई समृद्धियों को गँवा बैठते हैं और सगुणता गई-गुजरी परिस्थितियों में रहते हुए भी प्रगति के हजार मार्ग प्राप्त कर लेते हैं। सद्गुणों की विभूतियाँ ही व्यक्तित्व की प्रतिभावान बनाती है और प्रखर व्यक्तित्व ही रह क्षेत्र में सफलतायें वरण करते चले जाते हैं। विद्या, धन और स्वास्थ्य के आधार पर उन्नति करने की बात कही जाती है पर उनसे भी बढ़कर प्रगति के आधार सद् गुण हैं, उन्हीं के आधार पर विद्या, धन और स्वास्थ्य की शोभा है और उन्हीं के द्वारा प्रयत्नों के सत्परिणाम प्राप्त होते हैं।दुर्गुणी व्यक्ति अपने कौशल के आधार पर कुछ उपलब्धियाँ प्राप्त कर भी ले तो उन्हें सुरक्षित नहीं रख सकता। इतना ही नहीं उनके घमण्ड में उद्धत आचरण करके अपनी तथा दूसरों की शान्ति नष्ट करता है। अपने को तथा अपने समीपवर्ती समाज को संकट में डालता है।

उठती आयु में सबसे अधिक उपार्जन सद् गुणों का ही किया जाना चाहिये। विद्या पढ़ी जाय सो ठीक है, खेल-कूद व्यायाम आदि के द्वारा स्वास्थ्य बढ़ाया जाय, सों भी अच्छी बात है, विभिन्न कला-कौशल और चातुर्य सीखें जायें यह भी सन्तोष की बात है पर सबसे अधिक आवश्यकता इस बात की है कि इस आयु में जितनी अधिक सतर्कता और तत्परतापूर्वक सद्गुणों का अभ्यास किया जा सके, कना चाहिये। एक तराजू में एक ओर विद्या, बल, बुद्धि, धन आदि की सम्पत्तियाँ रखी जायें और दूसरे पलड़े में सद्गुण तो निश्चय ही यह दूसरा पलड़ा अधिक भारी और अधिक श्रेयस्कर सिद्ध होगा। दुर्गुणी व्यक्ति साक्षात संकट स्वरूप है। वह अपने लिये पग-पग पर काँटे खड़े करेगा, अपने परिवार को त्रास देगा और समाज में अगणित उलझनें पैदा करेगा। उसका उपार्जन चाहे कितना ही बढ़ा-चढ़ा क्यों न हो कुकर्म बढ़ाने और विक्षोभ उत्पन्न करने वाले मार्ग में ही खर्च होगा। ऐसे मनुष्य अपयश, घृणा, द्वेष निन्दा और भर्त्सना से तिरस्कृत होते हुए अन्ततः नारकीय यन्त्रणाएँ सहते है।

अभिभावकों को केवल इतना ही नहीं सोचना चाहिये की उनके बच्चे कमाऊ,चतुर और कोई पदाधिकारी बन जाय वरन अधिक ध्यान इस बात का रखना चाहिये कि बच्चे सच्चरित्र, सद्गुणी सज्जन एवं संस्कारवान बने। यही उपलब्धि उनके जीवन की सबसे बड़ी लाभदायक सम्पदा सिद्ध होगी। इसी के आधार पर वे अपना जीवन सुखी एवं समुन्नत बना सकेंगे। सच्चा प्यार इसी को कहते है। वे अभिभावक ही अपने कर्तव्य पालन में सफल कहे जाएँगे, जिन्होंने अपने बच्चों को सद्गुणी बनाने में कुछ उठा नहीं रखा सच्चे अध्यापक वे हैं, जो खेल, गणित,भूगोल, इतिहास आदि किताबी ज्ञान देकर निवृत्त नहीं हो जाते वरन छात्रों की गतिविधियों में निरन्तर सद्गुणों की मात्रा बढ़ाने में संलग्न रहते हैं।

आज कुछ ऐसी गन्दी हवा चली है, जिसने नई पीढ़ी में उद्धत एवं उच्छृंखल बनाने की विभीषिका खड़ी कर दी है। हमारे होनहार बच्चों में से अधिकाँश में ड़ड़ड़ अवज्ञा उद्दण्डता, अनुशासन-हीनता को मात्रा बहुत चली जाती है, यह चिन्ता की बात है। इसमें देश के दुर्भाग्य का खतरा छिपा हुआ है। परस्पर छुरे-बाजी अध्यापकों की अवज्ञा, परीक्षा में नकल, बिना टिकट यात्रा लड़कियों को छेड़ना सिनेमा की शौकीनी श्रृंगार सजावट की फिजूल खर्ची, उद्धत आचरण एवं वार्तालाप में विनय एवं शिष्टता का अभाव आदि कितने ही दुर्गुण अपने होनहार बालकों में देखते है तो भारी चिन्ता होती है कि इतने उथले व्यक्तित्व को लेकर वे कि प्रकार अपने भविष्य को उज्ज्वल और प्रकाशवान बना सकेंगे और अगले दिनों जो जिम्मेदारी उनके कन्धों पर आने वाली है, उसका निर्वाह किस प्रकार कर पायेंगे।

जो नवयुवक अपना भला-बुरा समझने की स्थिति में है।, उन्हें गिरह बाँध लेनी चाहिये कि सभ्य समाज के जिम्मेदार नागरिक हमेशा अपने व्यक्तित्व को तेजस्वी बनाने के लिये सद्गुणों को अपने स्वभाव में निरन्तर सम्मिलित करते रहते हैं। शिष्टता ही लोक-प्रिय बनाती है। अनुशासन प्रिय व्यक्ति के अनुशासन में ही दूसरे लोग रहते है। सज्जनों को ही श्रद्धा मिलती है। सद्गुणों दूसरों का हृदय जीतते हैं और दसों-दिशाओं में उन पर स्नेह, सहयोग बरसता है। इस राज-मार्ग को जिसने अपनाया उसे ही मनस्वी तेजस्वी और यशस्वी बनने का अवसर मिला है और दुष्टता के दुर्गुणों में ग्रस्त हो गये, वे घोड़े समय औरों को आतंकित करके क्षणिक रौब-दौब जमा सकते हैं और डरा-धमका कर कुछ उल्लू सीधा भी किया जा सकता है पर यह तनिक-सी सफलता अन्ततः बहुत महँगी और भारी पड़ी है। लोगों की निगाह में जब व्यक्तित्व गिर गया ओर गुंडा उपद्रवी मना जाने लगा तो समझना चाहिये कि सम्मान और सहयोग की स्थिति समाप्त हो गई। जीवन में प्रगति और शान्ति के लिए दूसरों की सद्भावना और सहायता की जरूरत पड़ती है। पर यह दोनों ही अनुदान केवल सज्जनों को मिलते है। आतंकवादी और उद्धत व्यक्ति किसी हृदय में अपने लिये स्थान न बना सकेंगे, उनके लिए सबके भीतर घृणा और अविश्वास भरा रहता है। ऐसे व्यक्ति अपने जीवन में कोई ऊँचा स्थान प्राप्त नहीं कर सकते और न उन्हें कोई बड़ी सफलता ही मिलती है।

हमारे नवयुवकों को समझना चाहिये कि ध्वंसात्मक दुष्प्रवृत्तियों को-अशिष्टता एवं ड़ड़ड़ को अपना लेना अति सरल हे। छिछोरे साथियों अथवा उद्धत अगुआ लोग उठती आये के बालकों को आसानी से गुमराह कर सकते है। पर शालीनता और सज्जनता का अभ्यास बनाना उनके बस की बात नहीं। इसलिये हेय व्यक्तित्व के -जोशीले और डड़ड़ड़ लोगों को अपने ऊपर हावी ही नहीं होने देना चाहिये। उनके प्रभाव और सान्निध्य से दूर रहना चाहिये। अन्यथा उनकी मैत्री अपने को भी ड़ड़ बना देगी और वह स्थिति पैदा कर देगी, जिसमें अपनी निज की और दूसरों की आँखों में अपना व्यक्तित्व गया-गुजरा ओछा, कमीना और निकृष्ट स्तर का बन जाय। इस स्थिति में पड़ा उसके सौभाग्य का सूर्य एवं उज्ज्वल भविष्य अस्त हो गया ही समझना चाहिये।

सभ्य समुन्नत देशों के नवयुवक अपने राष्ट्र की स्थिरता एवं प्रगति में भारी योगदान दे रहे है। उनकी प्रवृत्तियाँ रचनात्मक दिशा में लगी है। अध्ययन में गम्भीर रुचि लेकर वे अपनी योग्यता बढ़ाते हैं। ताकि अवसर आने पर अपनी प्रतिभा को किसी भी कसौटी पर खरी सिद्ध कर सकें।

एक हम हैं कि जिनके बच्चे हर कहीं सिर दर्द सिद्ध होते हैं। अभिभावक रुष्ट, अध्यापक दुःखी, साथी क्षुब्ध, स्वयं उद्विग्न। इस सब का एक ही कारण है-दुर्गुणों की मात्रा का बढ़ जाना। बुखार चढ़ने की तरह मर्यादाओं का उल्लंघन करने की प्रवृत्ति का बढ़ना भी खतरनाक है। अपने बालकों के उद्धत आचरण देखकर हमें दुःख पश्चाताप और दुर्भाग्य की कल्पना करें यह स्थिति हम सब के लिये लज्जाप्रद है।

जो भी हो हमें बच्चों को समझाने और सिखाने का हर मीठा-कडुआ उपाय करना चाहिये कि वे सज्जन, शालीन, परिश्रमी और सत्पथगामी बनें, इसी में उनका और हम सबका कल्याण हैं।


अपना ही नहीं कुछ समाज का भी हित, साधन करें

(पं श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा लिखित और युग-निर्माण योजना मथुरा द्वारा प्रकाशित

‘व्यक्तिवाद नहीं समूहवाद पुस्तिका का एक अंश)

अन्य जीव अपने आप में पूर्ण है। अपनी आवश्यकतायें, अपने बलबूते स्वयं पूरी कर लेते हैं। आहर, निवास आदि के लिए वे किसी दूसरे पर निर्भर नहीं। पर मनुष्य की स्थिति ऐसी नहीं उसका निर्वाह, विकास एवं स्थायित्व दूसरों की सहायता पर पूर्णतया आश्रित है। अन्य जीवों के बच्चे जन्म के कुछ ही समय बाद अपने पैरों पर खड़े हो जाते हैं पर पर मनुष्य का बालक, दूध पीने, करवट लेने तक में समर्थ नहीं होता। उसकी विभिन्न व्यवस्थायें माता न जुटायें तो जीवित रह सकना सम्भव नहीं अपने पैरों पर खड़ा होने लायक ता वह कहीं, बीस-पच्चीस वर्ष की आयु में बनता है। तब तक उसे अभिभावकों की कृपा पर अवलम्बित रहना पड़ता है। भोजन, वस्त्र, चिकित्सा शिक्षा, विवाह आदि का प्रबन्ध वे ही करते हैं। बोलना बात करना वह दूसरों का उच्चारण सुनकर करता है। शिक्षा दूसरों के संग्रहित ज्ञान के आधार पर होती है। किसी की लड़का जाकर अपना घर बसाती है। चिकित्सा के लिये दूसरों के ज्ञान पर अवलम्बित रहना पड़ता है। कला-कौशल दूसरे सिखाते हैं। लाखों वर्षों द्वारा उपार्जित एवं संग्रहित ज्ञान हमें मिलता है ओर तब कहीं कुछ सीख-समझकर किसी योग्य बन पाते हैं।

रेल, तार,डाक, प्रेस आदि आविष्कारों के आधार पर हमारी सुविधायें टिकी हुई हैं। व्यापार जन साधनों से चलता है, वे अगणित मनुष्यों की सूझबूझ, मेहनत के परिणाम हैं-छोटी-सी दियासलाई बनाने में जितने यन्त्र, श्रम, साधन एवं ज्ञान की आवश्यकता पड़ती है, उनकी एक-एक प्रक्रिया का विकास लाखों-करोड़ों के सहयोग से ही सम्भव हुआ होता है। जंगलों और गुफाओं में रहने वाले साधु-महात्माओं को भी वस्त्र, माला, कमण्डल, कुल्हाड़ी, दियासलाई कम्बल खड़ाऊँ आदि की आवश्यकता पड़ती है। इसके बिना उनका भी निर्वाह नहीं होता। यह वस्तुऐं भी समाज के असंख्य व्यक्तियों के सहयोग, श्रम, ज्ञान से ही उपलब्ध होती हैं। कहने का तात्पर्य इतना भर है कि मनुष्य ने जो कुछ पाया, कमाया, बढ़ाया है, वह सब कुछ दूसरों के सहयोग एवं अनुग्रह का फल है। मनुष्य पूर्णतया सामाजिक प्राणी है। उसकी स्थिति एवं प्रगति सब कुछ सामाजिक परिस्थितियों पर निर्भर है, इसलिये उसका स्वार्थ इस बात में समाया हुआ है कि सामाजिक वातावरण उत्तम बना रहे। यदि समाज में किसी तरह विपन्नता उत्पन्न होगी तो उसका प्रभाव अपने ऊपर पड़े बिना भी न रहेगा। मुहल्ले में दुष्ट, दुराचारी भरे पड़े हों तो अपनी इज्जत आबरू तथा सुरक्षा खतरे में है। गाँव में हैजा फैले तो उसका प्रभाव अपने घर में भी जान जोखिम खड़ी करेगा। पड़ोसी के छप्पर में आग लगे तो अपना छप्पर भी सुरक्षित न रहेगा इसलिये हमें अपने-अपने बच्चों के स्वार्थों की रक्षा सामाजिक जीवन के वातावरण को उत्कृष्ट बनाये रखने का प्रयत्न करते रहना चाहिये। ऐसे प्रयत्न इसलिए भी आवश्यक हैं, जिस समाज की सहायता से हमने अनेक सुविधायें प्राप्त की हैं। स्थिरता एवं प्रगति के उपहार पायें हैं, उसके प्रत्युपकार में प्रवृत्त होकर अपनी मानवोचित कृतज्ञता प्रकट करें। जिससे कुछ पाया है, उसे देना भी चाहिये, तभी ऋण से मुक्ति मिलती है। समाज सेवा के लिये कुछ निरन्तर करते रहने का व्रत लेकर हमें समाज ऋण से किसी कदर उऋण होने का प्रयत्न करते रहना चाहिये।

पेट पालने क प्रयत्नों में जीवन की बहुमूल्य विभूति समाप्त नहीं कर दी जानी चाहिये। स्त्री, बच्चों की आवश्यकतायें पूरी करते रहने में हमारी सारी क्षमता खर्च नहीं हो जानी चाहिये। पेट ओर परिवार से बाहर भी अपनत्व का विस्तार होना चाहिये आत्म-विकास का यही रास्ता है कि हम अपनी आत्मीयता को व्यापक क्षेत्र में विस्तृत करें। दूसरे के सुख को अपना सुख और दूसरों के दुःख को अपना दुःख मानकर कुछ ऐसा भी सोचें, कुछ ऐसा भी करें। जिससे दूसरों का दुःख घटे और सुख बड़े। निश्चय ही किसी की इतनी सामर्थ्य नहीं कि लोगों के अभाव अपनी सारी सम्पत्ति देकर भी पूरे कर सके। इसी प्रकार चौबीसों घण्टे का समय लोगों की सेवा करने में लगा दिया जाय तो भी बहुत थोड़े लोगों की तनिक सी आवश्यकतायें पूरी हो सकेंगी। इसलिये अन्न वस्त्र, जल, दवा आदि बाँटकर समाज का पिछड़ापन, कष्ट अभाव एवं अवसाद दूर होने की कल्पना की नहीं जा सकती है। संसार में सारे कष्ट दुर्बुद्धि एवं दुष्प्रभावों कारण हैं। इसलिये रोग के मूल कारण को समझकर जड़ पर ही कुठाराघात करना चाहिये। समाज सेवा का सर्वोत्तम तरीका यह है कि लोगों की विचारणा एवं प्रवृत्तियों को निकृष्टता की स्थिति से उबार कर उत्कृष्टता की दिशा में मोड़ा जाये लोग अपना रवैया और ढर्रा बदल दे तो अपने भीतर भरी हुई प्रचण्ड सामर्थ्य के आधार पर वे स्वयं ही अपने पिछड़ेपन एवं कष्टों का निवारण कर सकते है। हमें अपना सहयोग उनकी प्रवृत्तियों को इस ओर मोड़ने के लिए देना चाहिए। उनका ऐसे नेतृत्व करना चाहिए कि विघातक प्रवृत्तियों को छोड़कर वे रचनात्मक प्रवृत्तियों में रस लेने लगें और उनके अभ्यस्त बनकर अपना तथा असंख्य दूसरों का भला कर सकें।

आज संसार ने उत्कृष्टता के आभूषण उतार दिये हैं और निकृष्टता का चोला धारण कर लिया है। विचार पद्धति और कार्य प्रणाली में निकृष्टता घुस पड़ने के कारण प्रेत-पिशाचों जैसे जीवन बन गये हैं ओर मरघट जैसा वीभत्स वातावरण बन गया है। धीरे-धीरे हम अन्तर्द्वन्द्वों में-गृह-कलह में-परस्पर उत्पीड़न में निरत होकर सामूहिक आत्म-हत्या की ओर बढ़ते चले जा रहें हैं। इन परिस्थितियों में मानव जाति की एक ही सेवा हो सकती है कि उसे बुद्धि, भ्रम, अविवेक एवं अशुभ चिन्तन से बचाकर नीर-क्षीर विवेचना ऋतम्भरा प्रज्ञा का आश्रय लेने के लिए तत्पर किया जाय। आज की स्थिति में समाज की यही सबसे बड़ी सेवा है। विचार-क्राँति ही वर्तमान दुर्दशा को पलट कर धरती पर स्वर्ग का अवतरण सम्भव कर सकेगी।

विचार-क्राँति के लिए आदर्शवादी विचार-धारा का प्रतिपादन करने वाले पुस्तकालयों की सबसे बड़ी आवश्यकता है। देव-मन्दिरों की तरह आज ज्ञान-मन्दिरों की-पुस्तकालयों की स्थापना नितान्त आवश्यक है। जिनसे जीवन को आदर्शमय बनाने और सामयिक उलझनों को सुलझाने वाला प्रकाश मिल सके ऐसी पुस्तकें पत्र-पत्रिकाएँ जहाँ आती है, लोगों के पास तक उस साहित्य को पहुँचाने और लाने का प्रबन्ध सम्भव हो, ऐसे पुस्तकालयों की हर जगह भारी आवश्यकता है। धनीमानी इस कार्य में अपना दान देकर अपनी कमाई को धन्य बना सकते हैं। पूर्वजों की स्मृति किसी को बनानी हो तो उनके नाम पर पुस्तकालय ही स्थापित करना चाहिये। परस्पर मिलजुल कर चन्दे से भी ऐसी संस्था स्थापित की जा सकती है।कोई प्रबन्ध न हो सके तो व्यक्ति रूप से भी झोला पुस्तकालय बनाकर घर-घर ऐसा प्रेरक साहित्य पहुँचाने का पुण्य परमार्थ किया जा सकता है।

अपने देश में शिक्षा की बड़ी कमी है। लोग अभी भी शिक्षा की उपयोगिता समझ नहीं पाये हैं। देहातों में बहुत लोग अपने लड़कों की पढ़ने नहीं भेजते। लड़कियों को पढ़ाने का रिवाज तो बहुत कम है। हमें टोलियाँ बनाकर घरों में जाना चाहिये और शिक्षा योग्य लड़के-लड़कियों को स्कूल भिजवाने की प्रेरणा देनी चाहिये। सरकारी और गैर-सरकारी स्कूल खुलवाने चाहिये। वयस्क पुरुषों के लिए तथा महिलाओं के लिए तीसरे पहर अथवा रात्रि को चलने वाली प्रौढ़ पाठशालाएँ स्थापित करनी चाहिये, पैसा या श्रम देकर ऐसी शिक्षा संस्थाएँ लोग हर जगह चला सकते हैं। इन कार्यों के लिए सार्वजनिक धन संग्रह भी किया जा सकता हैं। काम से लगे हुए व्यक्ति आगे पढ़ने के लिए जिनमें सुविधा प्राप्त कर सके, ऐसे रात्रि विद्यालय तथा छात्रों की सहायता करने वाले कोचिंग स्कूल हर जगह चलने चाहिये। छोटे बच्चों के लिए मुहल्ले-मुहल्ले में शिशु-मन्दिर होने चाहिये। शिक्षा का जितना विकास सम्भव हो सके सरकारी और गैर-सरकारी दोनों स्तरों पर इसके लिए पूरा-पूरा प्रयत्न करना चाहिए। अपने 80 प्रतिशत अशिक्षित देशवासियों को साक्षर बनाकर ही हम उन्हें अविवेक रूढ़िवादिता के चंगुल से निकाल सकते हैं

आज की ज्वलन्त समस्याओं का स्वरूप समझने ओर उनका हम प्राप्त करने के लिए समय-समय पर-स्थान-स्थान पर विचार-गोष्ठियों के आयोजन होते रहने चाहिये जिनमें प्रश्न और उत्तर के रूप में आज की वैयक्तिक और सामाजिक समस्याओं का निराकरण समझने की सुविधा सर्वसाधारण की मिल सकें। समाज सेवा का सबसे पहला कार्य जनमानस में विवेकशीलता जगानी है, ताकि लोग अपनी अवांछनीय आदत और अवांछनीय रूढ़ियों को छोड़कर औचित्य अपनाने और सन्मार्ग पर चलने के लिए तत्पर हो सकें यह काष् जिन प्रयत्नों से हे सकता है उन्हें सर्वोत्तम समाज-सेवा माना जायेगा। हममें से हर भावनाशील व्यक्ति को मन में इसी प्रकार के कार्यों की व्यवस्था करने में संलग्न होकर अपना परम पवित्र सामाजिक कर्तव्य पालन करना चाहिये।


अपनों से अपनी बात

नव-निर्माण की मशाल अपने प्रिय परिजनों के हाथ सौंपते हुए हम एक सन्तोष की साँस लेते हैं। जिस उत्तर दायित्व को देर से हम निबाहते चले आ रहे हैं, उसे उत्तराधिकार में उन्हें दे रहे हैं, जो अपने को हमारा अनुयायी प्रशंसक श्रद्धालु एवं आत्मीय मानते है। बूढ़ा बाप अपने समर्थ उत्तराधिकारियों के कन्धों पर अपने बोझ सौंपकर अपने को हलका अनुभव करते हैं और उसकी क्रिया-प्रक्रिया यथावत चल रही है यह देखकर सन्तोष मानते हैं। हम अब अधिक देर अपने कन्धों पर रखी हुई गाड़ी खींच नहीं सकते। महीने की अवधि बहुत थोड़ी होती है। अधिक से इतने समय और हमारे कन्धों पर वजन रह सकता था, पीछे भी कहीं न कहीं को उसे सम्भालना ही था। अच्छा ही हुआ कि हमें अपने को हलका करने और अपनी आँखों यह देखने का अवसर मिल रहा है कि हमारे विश्वास और अपने कर्तव्य की रक्षा कर सकने में समर्थ रहे या असमर्थ?

व्यक्ति के नाम हमारा उद्बोधन सदा से यही रहा है कि-वह मात्र शरीर ही नहीं आत्मा भी हैं। केवल परिवार तक की उसकी जिम्मेदारी सीमित नहीं-वरन समाज तक व्यापक है। केवल इन्द्रियाँ ही नहीं-अन्तःकरण को भी तृप्त किया जाय। केवल भौतिक जीवन की महता एवं आवश्यकता को भी समझा जाय।” कह नहीं सकते हमारे उद्बोधन का किस प्रकार कितना प्रभाव पड़ा। पर यदि पड़ा होगा तो उसे सौ बार यह सोचने को विवश होना पड़ा होगा कि उसकी वर्तमान गतिविधियाँ न तो संतोषजनक हैं, न पर्याप्त। उसे कुछ कदम आगे बढ़कर कुछ ऐसा करना चाहिये, जो अधिक महत्वपूर्ण हो अधिक आत्म-शाँति और आन्तरिक सन्तोष दे सके।

ऐसे कदम उठा सकना हर किसी के लिए सम्भव है। केवल आत्म बल का अभाव ही ऐसे पारमार्थिक कदम उठाने से रोकता है, जो सुरदुर्लभ मानव जीवन के अमूल्य अवसर को सार्थक बना सके। तांत्रिक दृष्टि से देखने पर प्रतीत होता है कि हम व्यर्थ और अनर्थ कहे जा सकने वाले क्रिया कलापों में लगे रहे और कीमती जीवन के हीरे-मोतियों से तोले जा सकने योग्य बहुमूल्य क्षण यों ही गँवा दिये। जिन उपार्जन को तुच्छ-सा शरीर लेकर तुच्छ जीवधारी पूरा कर लेते हैं उन्हीं के इर्द-गिर्द मनुष्य का जीवन भी चक्कर काटे और अन्ततः अपने को बिना किसी उपलब्धि के योंही समाप्त करले तो इसे एक दुर्भाग्यपूर्ण दुर्घटना ही कहा जायेगा। हमने सदा सचेत किया है कि परिजनों का जीवन क्रम इतना घटिया न बीतना चाहिये। पेट और प्रजनन कोई बड़े आदर्श नहीं। प्रकृति ने ऐसी व्यवस्था कर रखी है कि कीट-पतंग और पशु पक्षी भी इन दो आवश्यकताओं के पूरा कर लेते है। फिर मनुष्य जैसे बुद्धि-जीवी के लिए उनकी पूर्ति क्या कठिन हो सकती है? इतना ही उद्देश्य अपना है तो उसे पशु जीवन कहा जायेगा। मानव-जीवन की विशेषता तो आदर्शवादिता और उत्कृष्टता पर निर्भर है। यदि उस दिशा में कुछ न किया जा सकता तो निस्संकोच यही कहा जाएगा कि जीवन व्यर्थ चला गया। जीवन बहुमूल्य है, उसे निरर्थक प्रयोजनों के लिए खर्च कर डालना एक ऐसी बड़ी भूल है जिसके लिए 84 लाख योनियों में भ्रमण करते हुए लगभग 84 लाख वर्ष प्रायश्चित करना होगा ओर हर दिन इसलिए अश्रुपात करना होगा कि नर शरीर का एक बहुमूल्य अवसर मिला था उसे हमने आत्मकल्याण के लिए खर्च न कर उन्हीं निरर्थकता में लगा दिया, जिन्हें निम्न यानि वाले जीव भी बड़ी आसानी से पूर कर लेते हैं। अगले ही दिनों इस पश्चाताप की आग में से अपने को गुजरना पड़ेगा, इस वस्तुस्थिति की आगाही हमने निरन्तर दी है। ता नहीं किस पर कितना उस चेतावनी का असर पड़ा और कितनों ने इसे निरर्थक बकवास कह मुख फेर लिया।

हमारा जीवन रूढ़ियों और विडम्बनाओं की धुरी पर नहीं घुमा है। उससे अति महत्वपूर्ण, प्रयोगों, परीक्षणों और अनुभवों का एक अच्छा खासा भण्डार जमा हो गया है। हम चाहते थे कि यह उपलब्धियाँ-अपने अनुयायियों को देते जाएँ, ताकि वे भी हमारी ही तरह जीवन की सार्थकता का सन्तोष अनुभव कर सके। लेख लिखने और पुस्तकें छाप कर बुकसेलर का धन्धा चलाने वाले दुकानदार हम नहीं हैं। सिर-दर्द के अतिरिक्त कुछ हाथ न लगने वाले धन्धे की अपेक्षा हम अपनी प्रतिभा के बल पर वे धन्धे कर सकते हैं, जिनमें मालामाल होने की पूरी गुँजाइश है। हमारे परामर्श से हजारों-लाखों मनुष्यों ने अपनी गतिविधियाँ मोड़कर सम्पन्नता प्राप्त की है। फिर हम उन प्रयोगों को अपने लिए भी कर सकते थे। बुकसेलर का धन्धा जिसमें झंझट हजार मन और लाभ रत्ती भर है, हमारे लिए क्या रुचिकर हो सकता है। इसी प्रकार प्रवचनों में सिर खपा कर दस-बीस रुपये दक्षिणा के लेने में हमें क्या रुचि हो सकती थी? हमारी प्रतिभा, विद्या ओर क्षमता बहुमूल्य है। उसको बाज़ार में भुनाया जाय तो बहुत कुछ वसूल किया जा सकता हैं। लेखन और प्रवचन हमारा व्यवसाय नहीं वरन अन्तःकरण की ऐंठन है जो निरन्तर इसलिए होती रहती है कि अनुभूतियों ओर उपलब्धियों का लाभ हमारे सहचरों को भी मिलना चाहिये। उपरोक्त दोनों ही क्रिया-कलाप हम अपनी आन्तरिक सम्पदा दूसरों को हस्तान्तरित करने के उच्च उद्देश्य से चलाते रहे हैं। कह नहीं सकते किसने उन्हें कितना महत्व दिया और कितनों ने उन्हें पढ़, सुनकर पल्ला झाड़ लिया।

जो हो, हम एकरस, एकनिष्ठ भाव से अपने मार्ग पर चलते हुए लम्बी मंजिल पूरी कर चुके। विराम का अवसर आया तो यह उत्कण्ठा तीव्र हो चली कि हमारा परिवार घटिया स्तर का जीवन-यापन करने को कलंक न ओढ़े रहे। प्रकारान्तर से यह लाँछन अपने ऊपर भी आता है। हम किस बूते पर अपना सिर गर्व से ऊँचा कर सकेंगे ओर किस मुख से यह कह सकेंगे कि अपने पीछे कुछ ऐसा छोड़ कर आये जिसे देखकर लोग उसके संचालक का अनुमान लगा सकें। ईश्वर की महान कृतियों को देखकर ही उसकी गरिमा का अनुमान लगाया जाता है। हमारा कर्तृत्व पीला था या ठोस यह अनुमान उन लोगों की परख करके लगाया जायेगा, जो हमारे श्रद्धालु एवं अनुयायी कहे जाते हैं। यदि वे वाचालता भर के प्रशासक और दण्डवत प्रणाम भर के श्रद्धालु रहे तो माना जायेगा कि सब कुछ पीला रहा। असड़िड़ कर्म में सन्निहित है। वास्तविकता की परख किया से होती हैं। यदि अपने परिवार की क्रिया से होती है। यदि अपने परिवार की क्रिया पद्धति का स्तर दूसरे अन्य नर-पशुओं जैसा ही बना रहा तो हमें स्वयं अपने श्रम और विश्वास की निरर्थकता पर कष्ट होगा और लोगों की दृष्टि में उपहासास्पद बनना पड़ेगा। यह अवसर न आये, इसलिए हम इन दिनों बहुत जार देकर अपने उद्बोधन का स्वर तीखा करते चले जा रहे हैं और गतिविधियों में गर्मी ला रहे हैं ताकि यदि कुछ सजीव लोग अपने साथियों में रहें हों तो आगे आयें और मृत मूर्छित अपनी माँद में जाकर चुपचाप पड़ जायें। बात बहुत काम कुछ नहीं वाली विडम्बना का तो अब अन्त होना ही चाहिये।

नव निर्माण के दो महत्वपूर्ण कार्यक्रम इन दिनों हाथ में लिए है। और इन्हें प्रगति पथ पर चलने वाले दो चरणों की उपमा दी है। दो पहियों की गाड़ी लुढ़कती है दो डंडों की नाव आगे बढ़ती है। सिपाही लेफ्ट-राइट करते हुए दोनों कदम मिलाकर चलते हैं। हमने दो कार्यक्रम इन दिनों प्रस्तुत करके अपने परिवार की वस्तुस्थिति पर हमें हर परिजन की मनोभूमि का पता लग जाएगा और सही रूप में यह जाना जा सकेगा कि कौन कितने पानी में हैं।

ज्ञान-यज्ञ के दो पहलू हैं-विचार पक्ष और क्रिया पक्ष-दोनों का महत्व एक दूसरे से बढ़कर है। विचार हीन क्रिया और क्रिया-हीन विचार दोनों को विडम्बना मात्र कहा जाएगा-नव-निर्माण की पुण्य प्रक्रिया विवेक के जागरण और सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्धन पर निर्भर है। नये युग का महल इन्हीं दोनों को ईंट, चूना मानकर चुना जाएगा। इसलिए दोनों पक्षों को प्रखरता से भर देने वाले अपने दो कार्यक्रम इन दिनों सामने प्रस्तुत हैं। और चुनौती देते हैं कि जिन पर आचार्य जी के लेखों और प्रवचनों का सान्निध्य और संपर्क का प्रभाव पड़ा हो, वे आगे आयें और जो कहा जा रहा है उसे अपनाये।

ज्ञान यज्ञ के विचार-पक्ष के अन्तर्गत नव-निर्माण की विचार-धारा को व्यापक बनाने के लिए अपना कुछ समय और कुछ पैसा नियमित रूप से व्यय करने का अनुरोध किया गया है। अपना घरेलू पुस्तकालय पूरा कर लेने के लिए हर एक को कहा गया है। हमारी प्रतिमा या स्मृति इससे सस्ते मोल में स्थापित नहीं की जा सकती। आजकल हाथ की बनी आइल पेंट की बड़ी तस्वीरें 100 से कम में नहीं बनती। पत्थर की मूर्तियाँ खरीदने जाएँ तो सौ रुपये में डेढ़ फुट ऊँचे गणेश जी भर मिलते हैं। पर हमारी प्रेरणा, भावना, प्रकाश और प्रोत्साहन भरा ट्रैक्ट साहित्य इससे कम में स्थापित किया जा सकता है। चित्र और प्रतिमायें बोलती नहीं पर हमारी लिखी पुस्तिकाएँ बोलती ही नहीं चिल्लाती भी हैं। चिल्लाती ही नहीं झकझोर कर खड़ा भी कर देती है। इसी मूर्तिमान् प्रेरणा घरेलू पुस्तकालय को कोई निर्धन भी प्रतिष्ठापित कर सकता है।

जरा-सी बीमारी में सौ रु ठण्डे होते हैं। शारीरिक और मानसिक बीमारियों का परिपूर्ण पुस्तकालय किसी को भारी नहीं पड़ना चाहिये। हाँ जिनके सामने विचारणा और भावना का कोई मूल्य नहीं, उन्हें यह सब रद्दी इकट्ठी करने जैसा उपेक्षणीय कार्य अवश्य प्रतीत होगा। घर के प्रत्येक छोटे-बड़े सदस्य को हमारे विचारों से प्रभावित करके उन्हें, सज्जन, शालीन और सुख-शान्तिमय जीवन बिता सकने वाला बनाया जा सकता है। जो अपने स्त्री-बच्चों का शरीर भर देखते हैं, वे उन्हें बढ़िया भोजन वस्त्र देकर बहलाते रहेंगे, पर जो उनका अन्तरंग भी देखते हैं, उन्हें प्रतीत होगा कि उन्हें उच्च विचारणा की भी आवश्यकता है। इस आवश्यकता की पूर्ति घरेलू युग-निर्माण पुस्तकालय कर सकते है। दोनों पत्रिकाएँ जिन घरों में पहुँचती हैं और ट्रैक्ट साहित्य का पूरा सैट मौजूद है। वे पड़े हों तो स्वयं पढ़कर और बिना पढ़ें हों तो दूसरों से सुनकर एक अति महत्वपूर्ण प्रकाश प्राप्त कर सकते हैं। कोई समझदार व्यक्ति अपने परिवार की इसे एक अनिवार्य आवश्यकता ही मानेगा।

परिजनों के घर-घर में ट्रैक्ट साहित्य के युग-निर्माण पुस्तकालय की स्थापना पर जोर इसलिए दिया गया है कि उनके घर परिवार के हर सदस्य तक हमारी प्रेरणा पहुँच सके ओर समीपवर्ती लोगों में-मित्र सम्बन्धी, परिचित एवं अपरिचितों में यह प्रकाश फैलते रहने को मार्ग खुल जाय। नया युग?, नई विचार-धारा साथ ही अवतरित होगा। विचारों का बड़ा महत्व है। विचार करने की पद्धति बदल जाय तो आज की नारकीय परिस्थितियों को स्वर्गीय बनने में देर न लगें। इसलिए विचार पक्ष का क्षेत्र व्यापक बनाने के लिए यह किया और कराया जा रहा है कि जो उचित हे, उसको ग्रहण करने एवं जो अनुचित है, उसे त्यागने के लिए जन-मानस में प्रबल उत्साह पैदा किया जाय। क्षेत्र सीमित न रहने दिया जाय वरन जन-जन के मन तक विचार-क्राँति की गर्मी को पहुँचाया जाय। यह प्रक्रिया विज्ञप्ति वितरण के सरल किन्तु अति आकर्षक प्रयोग से बड़ी सुविधापूर्वक गतिशील हो सकती है। पिछले दो महीने के अनुभव ने यह बताया है कि विज्ञप्ति वितरण वाला कार्य यदि ठीक ढंग से अखण्ड-ज्योति परिवार के मात्र सदस्यों ने चला लिया तो हम इस विचार-धारा को देशव्यापी ही नहीं, विश्व-व्यापी भी बना सकेंगे।

ज्ञान-यज्ञ के लिए महीने में एक दिन की आमदनी देने के लिए कहा गया है-न्यूनतम दस नया पैसा निकालने के लिए कहा गया है। यह एक-एक बूँद ऋषि-रक्त एकत्रित करके घड़ा भरे जाने और उससे असुर संहारिणी सीता का जन्म होने की पौराणिक पुनरावृत्ति कहा जा सकता है। देवताओं की थोड़ी-थोड़ी शक्ति इकट्ठी करके प्रजापति ने भगवती दुर्गा का सृजन किया था। एक युग परिवर्तनकारी संगठित शक्ति का उदय कर सकने वाली अपनी प्रक्रिया भी उसी दुर्गा अवतरण की पुनरावृत्ति है। थोड़ा-थोड़ा सहयोग सब लोग दें। कृपण बनकर मुख न लटका लें तो इतने भर से ज्ञान-यज्ञ की कोटि-कोटि किरणें अति व्यापक क्षेत्र में फैलाई जा सकती है।

धनिकों की आडम्बरों में रुचि है। वे अपनी कीर्ति के लिए खड़े होने वाले ईंट-पत्थरों में लाखों लुटा सकते है। पर जिससे उन्हें मोटी बुद्धि से अपना प्रत्सक्ष्ज्ञ परोक्ष लाभ न दीखता हो उसके लिए कुछ खर्च करा सकना कठिन है। होता भी यही रहा है। सुसम्पन्नों से कभी दो-चार बार ही छुट-पुट सहायता मिली है। यह धनिकों का नहीं भावनाओं का क्षेत्र है और भावनाशील सदा निर्धन होते निर्धनों से अर्थ सहयोग की इतनी ही आशा की जा सकती है कि वे पेट काट कर महीने में एक दिन की आय या न्यूनतम दस पैसा-अपने हाथों अपने क्षेत्र में ज्ञान यज्ञ का प्रकाश व्यापक बनाने के लिए नियमित रूप से खर्च कना स्वीकार करें। प्रसन्नता का बात है कि इस अनुरोध का आशाजनक प्रत्युत्तर मिला है। दो महीने के अनुभव के आधार पर यह कहा जा सकता है कि शायद ही कोई कृपण ऐसा निकले जो ज्ञान-यज्ञ के लिए एक घण्टा समय और थोड़ा पैसा खर्च करने की उपयोगिता ओर आवश्यकता से इनकार की निष्ठुरता धारण कर ले। ज्ञान-यज्ञ की प्रचंड प्रकाश किरणें शीघ्र ही देश-विदेशों में उदीयमान देखेंगे और उसके सत्परिणाम भी प्रस्तुत होकर रहेंगे।

ज्ञान-यज्ञ का दूसरा चरण है अनीति और अविवेक का उन्मूलन। इसके लिए सबसे पहला मोर्चों ‘विवाहोन्माद’ के विरुद्ध संघर्ष के रूप में उद्घोषित किया गया है। हिन्दू समाज के रोग ग्रस्त शरीर में सह सबसे भयंकर गलित कष्ट है। अन्य बीमारियों पीछे भी सम्भाला जा सकता है पर इसकी उपेक्षा अब एक क्षण के लिए भी असहाय हो गई है। धन और चरित्र की बर्बादी का यह सब ड़ड़ और इसे भयावह छिद्र है। उसे न रोका गया तो शिक्षा, व्यवसाय, आहार,विज्ञान आदि के आधार पर जो कुछ भी प्राप्त किया जा रहा है, वह सब इसी छिद्र से को कर धूलि में टपक जायेगा। रह कोई जानता है कि अपने समाज में विवाह से धूमधाम और भीतर से शोक-सन्ताप भरे हुए होते हैं।ढोंगी समाज अमरीका भौंड़ा प्रहसन प्रदर्शन करने में बुरी तरह खोखला हुआ जाता है।कमाई का एक तिहाई भाग शादियों में व्यय होता है। अधिकाँश लोग गुजारे भर की स्वल्प आजीविका उपार्जन करते हैं, वे हजारों रुपया इस बर्बादी के लिए कहाँ से लायें? विवश होकर उन्हें अनैतिक स्त्रोत ढूँढ़ने पड़ते है। जो यह भी नहीं कर पाते, वे भिखारी अभाव और अति सन्ताप का जीवन यापन करते हैं।

सुयोग्य कन्यायें अयोग्यों के यहाँ जाने को विवश होती है। धन के लोभी ससुराल वाले पग-पग पर उनका अपमान और उत्पीड़न करते हैं, कितनी ही अविवाहित रहने को विवश होती हैं। पर्दे के पीछे कितनी हत्याएँ और आत्म-हत्याएँ इस कुरीति की बलिवेदी पर होती हैं, उन सारे पापों का यहाँ भंडा फोड़ किया जाय तो दुर्गन्ध से नाक सड़ जाया और सारा विश्व धिक्कारे कि सभ्य बनने वाला हिंदू समाज वस्तुतः कितना घृणित, पतित और पाखण्डी है। स्थिति बहुत ही विषम है। कोसते रहने और रोते रहने से कुछ बनने वाला नहीं है। हमें आगे बढ़कर इस अविवेक भरी असुरता से जूझना पड़ेगा। यह कदम अनिवार्य है। विलाप करने से तो स्थिति विस्फोटक हो सकती थी। इसलिए समय पर शंखनाद करना हमारे लिए आवश्यक हो गया है। विवाहोन्माद विरोधी आन्दोलन का सूत्र संचालन यो बहुत देर से कर रहे थे, छुट-पुट गतिविधियाँ देर से चल रही थीं पर इसे एक अपरिहार्य संघर्ष के रूप में आरम्भ कर दिया गया है।

नेतृत्व अखंड-ज्योति परिवार को करना चाहिये। यों समय का तूफान अपना रास्ता आप बनाता चला आ रहा है। यह कुप्रथा जीवित नहीं रह सकती है। इस पूतना की अन्तिम घड़ी आ पहुँची, यह ताड़का मरने ही वाली है। यह सूर्पणखा कुछ ही समय नाक कटा कर रोती कलपती भागेंगी। विवाहोन्माद के महिषासुर का विचार-क्राँति की देवी के तीखे त्रिशूल से वध होकर ही रहेगा अच्छा हो इस बहती गंगा में हम हाथ धोले ओर नेतृत्व का श्रेय लेकर अपनी अपनी सजगता एवं साहस के आधार पर युग-निर्माताओं की अन्तिम पंक्ति में खड़े हो सकने वाले कहलाये।

अच्छा हो हम सब साहसपूर्वक यह निर्णय कर डालें ड़ड़ड़ड़़ विवाह आदर्श रीति से करेंगे। आदर्श ड़ड़ड़ड़़ जेवर, धूमधाम और बढ़ी हुई बरात, ड़ड़ड़ड़़ लड़के वाला दहेज के रूप में धन, सोना ड़ड़ड़ड़़ लंगड़-खंगड स्वीकार करने से इनकार कर ड़ड़ड़ड़़ वाला जेवर, कीमती कपड़े और दरवाजे की ड़ड़ड़ड़़ पर बाजे, आशिबाजी आदि को बिलकुल ड़ड़ड़ड़़ करें। पूर्ण सादगी और सज्जनता के वातावरण ड़ड़ड़ड़़ व्यक्ति बरात में जाकर लड़की-विदा कर ड़ड़ड़ड़़ और जिस तरह घर में दिवाली, होली जैसे उत्सव ड़ड़ड़ड़़ में मना लिये जाते हैं, वैसे ही विवाह भी बड़ी ड़ड़ड़ड़़ से हो जाया करें। प्रदर्शन की उसमें तनिक भी ड़ड़ड़ड़़ न समझी जाय। इस प्रकार जो समय और ड़ड़ड़ड़़ बर्बादी बचेगी, उससे परिवारों की अपनी शिक्षा, ड़ड़ड़ड़़ उद्योग आदि के लिये सुविधा मिलेगी और ड़ड़ड़ड़़ की सार्थकता बढ़ेगी। तब कन्याओं और पुत्रों का ड़ड़ड़ड़़ समाप्त हो जायेगा और विवाह से बचा पैसा बच्चों ड़ड़ड़ड़़, तन्दुरुस्ती एवं विकासोन्मुख प्रवृत्तियों में लगाया ड़ड़ड़ड़़ और देश, सहज ही समर्थ समुन्नत बन सकेगा। ड़ड़ड़ड़़ व्यय का बोझ उतर जाने पर बेईमानी करने ड़ड़ड़ड़़ भी तरकीबें लोग न सोचेंगे, न कर्जदार होंगे, न उद्विग्न ड़ड़ड़ड़़ न विक्षिप्त। सहज, सरल जीवन बन जाने पर आत्मिक नैतिक और सामाजिक जीवन में सुसम्पन्नता एवं प्रगति के लक्षण प्रत्यक्ष दीख पड़ने लगेंगे।

विवाहोन्माद का मोर्चा जीत लेने पर अन्य कुरीतियाँ अपने आप ही उर कर मर जायेंगी। विवेकशीलता और औचित्य अपनाने की प्रवृत्ति जग पड़ी तो छुट-पुट कुप्रथाओं को अपनाने के लिये कोई भी तैयार न होगा। बड़ा मोर्चा फतह होने पर छोटे मोर्चा सहज ही धराशायी हो जायेंगे। लड़ना तो इसी एक कठिन मोर्चे पर है। यदि जीत गये तो सामाजिक पुनर्निर्माण का कार्य सम्पन्न हुआ ही समझना चाहिये।

पिछले अंक में विवाह योग्य वर कन्याओं की जान ड़ड़ड़ड़़ का एक फार्म लगाया गया था। उसे भर कर ड़ड़ड़ड़़ सज्जन भेज दें। और अपने उपयुक्त रिश्तों की लिस्ट माँगते रहें। ऐसे पत्र व्यवहार में उत्तर के लिये 20 पैसे का टिकट भेजना अनिवार्य है। इतना बड़ा दफ्तर उत्तर दायित्व और पत्र-व्यवहार संभालने के बाद डाक व्यय भी अपने पास से लगायें इतना दबाव नहीं डाला जाना चाहिये। आशा है अपने विशाल परिवार में आदर्श विवाहों के लिये उपर्युक्त रिश्ते ढूँढ़ने में सुविधा होगी। अच्छा तो यह है कि ऐसे विवाह भी गायत्री तपोभूमि मथुरा में ही सम्पन्न किये जाय, ताकि समीपवर्ती लोगों को अनावश्यक चर्चा करने और प्रदर्शन की बेकार वस्तुऐं जमा करने का अवसर हो न आये।

विवाह कहीं भी हो, होना आदर्श पद्धति से चाहिये। अखण्ड-ज्योति परिवारों बीच प्रचलित हुई यह प्रथम आँधी-तूफान की तरह सारे देश में फैलेगी और देखते-देखते सामाजिक क्राँति का एक प्रखर सामने प्रस्तुत होगा। यह क्राँति आगे बढ़ेगी और हर क्षेत्र में फैली हुई अनैतिकता और अवांछनीयता को भस्म करके रहेगी।

प्रगति की दिशा में दो चरण बढ़ाने के लिये उद्बोधन करते हुए हम परिजनों के हाथ में अपनी मशाल थमाते हैं। मानवीय आदर्शों को अग्रसर बनाने के लिये प्रोत्साहन देते रहने को हमारी लंबी साधना का प्रतिफल परखने का अब समय आ गया है। परिजनों की मूर्छा विरत हुई या नहीं? हमारी साधना रंग लाई या नहीं? इन दोनों ही तथ्यों की परख उपरोक्त दो कसौटियों पर करने की ठानी है। 19 महीने का यही परीक्षा काल है। हम बहुत बारीकी से अपने स्वजनों की आस्था और सक्रियता का लेखा-जोखा रखेंगे कि जो कुछ कहा-सुना जाता रहा-जो कुछ लिखा-पढ़ा जाता रहा, उसका कुछ परिणाम भी निकला या योंही वह सब कुछ हवा में उड़ गया। हमें विश्वास है अपने परिवार में अधिकाँश व्यक्ति सत्य ओर तथ्य के प्रति निष्ठावान् है और वे अवसर पड़ने पर अपने आत्मिक एवं सामाजिक कर्तव्यों की उपेक्षा न करेंगे। प्रस्तुत दोनों कर्तव्य ऐसे ही हैं, जिन्हें पूरा किया जाना चाहिये और युग की आवश्यकता पूर्ण करने में योगदान दिया ही जाना चाहिये।

*समाप्त*