मनुष्य का इतिहास जीव-धर्मी है। वह निगूढ़ प्राण -शक्ति से बढ़ता रहता है। वह लोहे-पीतल की तरह साँचे में ढालने की वस्तु नहीं है। बाज़ार में किसी विशेष समय पर किसी विशेष सभ्यता का मूल्य बहुत अधिक बढ़ जाने के कारण ही समस्त मानव-समाज को एक ही कारखाने में ढाल कर फैशन के वशीभूत मूढ़ खरीददारों को खुश कर देने की दुराशा बिल्कुल व्यर्थ की वस्तु है।
पैरों का छोटा होना सौंदर्य या अभिजात्य का लक्षण है, यह समझकर कृत्रिम उपायों से उन्हें संकुचित करके चीन की स्त्रियों ने छोटे पैर नहीं पाये, बल्कि विकृत पैर ही उन्हें मिले हैं। भारतवर्ष यदि हठ से जबरन अपने को यूरोपीय आदर्श का अनुगामी बनाएँ, तो वह यूरोप नहीं बन सकता, सिर्फ विकृत भारतवर्ष ही बन सकता है।
इस बात को दृढ़ता के साथ याद रखना चाहिये कि एक राष्ट्र के साथ अन्य राष्ट्रों का अनुकरण और अनुसरण का सम्बन्ध नहीं, बल्कि आदान-प्रदान का सम्बन्ध है। हमारे अन्दर जिस वस्तु की कमी नहीं या हमें जिस वस्तु की आवश्यकता नहीं, तुम्हारे पास भी ठीक वही वस्तु मौजूद हो तो तुम्हारे साथ हमारा लेन देन या परिवर्तन नहीं चल सकता और उसी हालत में हमारे लिये तुम्हारी समकक्ष रूप में कोई आवश्यकता ही नहीं रहतीं भारतवर्ष यदि असली भारतवर्ष न बन सकें तो दूसरों के बाजारों में मजदूरी करने के सिवा संसार में उसकी और कोई आवश्यकता ही नहीं रहेगी। इसलिये आज हमें अच्छी तरह समझ-बूझ कर निर्णय करना होगा कि जिस सत्य दूसरे देशों का अनुकरण नहीं वरन् विश्व-बन्धुत्व है जो भारतीय तपोवन में साधित हुआ है। हमारे भारतवर्ष में ब्रह्मचर्य ब्रह्म-ज्ञान सब जीवों पर दया, सब प्राणियों में आत्मोपलब्धि और आत्मा की अनुभूति की शोध हुई थी। इस तत्त्वज्ञान की रक्षा और अनुशासन से ही हम अपने को पा सकते हैं और संसार से आगे बढ़ सकते हैं।
सिद्धि के क्षण समीप थे। सहाद्रि तब अपनी वनवासी गुफा छोड़कर कहीं नहीं जाते थे। गुरु का आदेश भी ऐसा ही था, उन्हें पता था साधना के परिपक्व अवस्था तक पहुँचने में साधक के चित्त उसी प्रकार चंचल होते हैं। उनके आहार में से लवण और मधु दोनों निकाल दिए गये थे। सहाद्रि अस्वाद व्रत और निर्झर के शीतल के अतिरिक्त और कुछ भी ग्रहण नहीं करते थे।
प्रातः कालीन बयार के शीतल मन्द झोंके ऐसे सुखद लग रहे थे, जैसे माँ की गोद। सहाद्रि का ध्यान उस दिन चरम बिन्दु तक पहुँच रहा था। आत्मा, परमात्मा की दिव्य ज्योति में समा जाने के लिये उतावली हो रही थी, तभी भव्य एकान्त को चीरता हुआ कोकिल स्वर और साथ में पायलों की ड़ड़ड़ड़ झंकार सहाद्रि के अन्तस्तल को बेध गया। समाधि भंग ही गई, नेत्र खुल गये, ड़ड़ड़ड़ हो गया। सामने दाड़िम-प्रभा बिखेरने वाली राजनर्तकी अलोपा सम्पूर्ण साज-शृंगार के साथ उपस्थित थी। वह वन-विहार के लिये आई थी। योगी के अंग सौष्ठव और साधना से दीप्त मुखमण्डल ने उसे इस ओर आने को आकृष्ट किया। आलोपा अपने आपको रोक नहीं पाई थी।
आलोप ने पखवाड़ा सहाद्रि के आश्रम में ही बिताया और जब वहाँ से लौटी तब सहाद्रि अपने योग से, तप से पूर्णतया भ्रष्ट हो चुके थे। हीरा कौड़ियों के मोल बिक चुका था। वासना के इन्द्रजाल ने सिद्ध के प्रकाश का अपहरण कर लिया था। लक्ष्य की ऊँचाई तक आ जाने पर सहाद्रि इतने वेग से गिर कि अब उनके लिये उतनी ऊँचाई पर चढ़ना इस तरह असम्भव लगा, जैसे चींटी के लिये समुद्र पार करना। हृदय क्षोभ और आत्म-ग्लानि से भर गया। सहाद्रि पश्चाताप की अग्नि में जलने लगे। एक मास तक उन्होंने कुछ खाया-पिया नहीं और इसी अवस्था में उन्होंने अपना प्राणान्त कर लिया।
कहते हैं, योग भ्रष्ट को भगवान् दूसरे जन्म में वह सब परिस्थिति अपने आप प्रदान करते है, जिससे वह अपने आत्म-कल्याण की शेष दूरी स्वल्प प्रयत्न में ही सुविधा-पूर्वक पूरी कर ले। सहाद्रि का जन्म भी ऐसी ही परिस्थिति में महान्, सम्पन्न और ईश्वर भक्त घर में हुआ। पूर्व जन्मों के सभी संस्कार सहाद्रि में प्रारम्भ से ही विद्यमान् थे पर अब वह रिपुदमन के पुत्र विश्वजित् के नाम से पुकारे जाते थे।
बालक विश्वजित् तब बालक ही था, वह एक दिन मिट्टी में खेल रहा था। सचिव पुत्र को मिट्टी से क्यों खेलते देख कर राजा ने पूछा-शरीर मिट्टी से बना है, सो उसे मिट्टी में खेलने से बढ़कर आनन्द खिलौनों में नहीं मिलता।”
राजा इस उत्तर से बड़ा विस्मित हुआ। उसने बालक को राज्य-संरक्षण में लेने की इच्छा से कहा- “वत्स! तू हमारे साथ चलो हम तुम्हें अच्छे वस्त्र स्वाद युक्त भोजन और आभूषणों से युक्त सुखद जीवन के सब साधन अनुभव करोगे।”
विश्वजित् ने गम्भीर होकर उत्तर दिया- “राजन्! मनुष्य का एकमात्र सहचर तो परमात्मा है, जो उसको छोड़कर अन्य किसी की शरण ढूँढ़ते है, वह संसार में व्यर्थ भटकते है।” वह कहकर बालक घर की ओर चल पड़ा! महाराज उसे विस्मय विस्मित नेत्रों से देखते ही रह गये। पूर्व जन्म के शुभ संस्कार जब उदय होते है, तब ऐसी ही ज्ञान गरिमा अनायास प्रस्फुटित देखी जाती है। अन्त में विश्वजित् महान् तपस्वी बनकर उस युग के बिल-क्षण सिद्ध-पुरुषों की पंक्ति में जा विराजे।
मेरे जीवन का अथ क्या है, इति क्या है, प्रभु! मैं यह भी ता नहीं जानता। मुझे ऐसा लगता है, तुम्हारे जीवन का ही एक अंश लेकर प्रादुर्भूत हुआ, प्राणी मैं केवल तुम्हारा ही हूँ। तुम्हीं मेरे भीतर और बाहर भी तुम्हीं हो। तुम्हीं मेरे सर्वस्व हो। मेरे सर्वस्व तुम्हीं तो हो।
प्रेम और प्यार के साँसारिक नाते-रिश्ते मेरे लिये क्या है? मैं संसार के लिये क्या हूँ? हाड़-माँस का पुतला। उससे लोग कितना चाहते हैं। मैं सब निकली है, उसे तुम्हारे अतिरिक्त और कौन समझेगा, मेरे प्रियतम! मेरे लिये तुम्हीं सबसे प्रिय हो। सबसे प्रिय संसार में तुम्हीं मेरे लिये हो।
मछली को मैंने जल से बाहर आकर तड़पते देखा! माँ के अगाध वात्सल्य से बाहर आकर तड़पते देखा। माँ के अगाध वात्सल्य से रिक्त होते हुये बालक का करुण क्रन्दन मैंने देखा, 14 वर्ष हो गये वनवासी प्रियतम नहीं आये, उनके प्रेम की पीर में विकल विरहिणी की पीड़ा को मैंने देखा। प्रभु! तुमसे पृथक् होकर मैं भी तो पीड़ाओं के सागर में गिर गया हूँ। मेरी सुनने वाला कोई नहीं रह गया, देवेश! मुझे ते अब अपनी इस पृथकता को देर तक बनाये रखना में खींच लो। मुझे आत्मसात् कर लो प्रभु!
मेरे मन, मेरी बुद्धि, मेरी चेतना में, अब तुम्हारा ही ध्यान शेष हैं। कहने को श्वाँस चल रही है, किन्तु यह मुझे ऊपर उठाया लिये जा रही है। नीले आकाश में जहाँ हे दिव्य! केवल तुम्हारा ही प्रकाश प्रस्फुटित हो रहा है। जहाँ केवल तुम्हीं अपने अनहद नाद से विश्व भुवन में मधुर संगीत आलोड़ित कर रहे हो। अब यह श्वाँस जो तुम्हारी दिव्य-ध्वनि में अटक गई है, पीछे नहीं लौटना चाहती सर्वेश्वर! अब इसे पीछे न लोटने दो, महाभाग! कौन जाने फिर तुम्हारी कृपा की किरण मिले या न मिले।
विचार मन्थन की प्रक्रिया में कष्ट उठाते बहुत दिन हो गये प्रभु। एक दिन मुझे ऐसा लगा था, संसार में केवल तुम्हीं सत्य हो। उस दिन मेरे जीवन की चन्द श्वाँसें तुम्हें ही समर्पित हो गई थीं। उस दिन से तुम्हारा दिया ही खाया, जो तुमने पिलाया पिया। अमृत भी, विष भी। कामनायें कभी मिटी, कभी भड़की तुमने कई बार बहुत समीप आकर मुझ व्यथित को संभाला। कई बार पुकार पर पुकार लगाई पर तुम मेरे द्वारा तक भी न आये। कभी एक क्षण के लिये भी आ जाते तो ऐसा ड़ड़ड़ड़ जीवर परिपूर्ण हो गया। एक पल की अनुभूति से ही हृदय कमल खिल उठता था, सुख की खोज के लिए ड़ड़ड़ड़ की तरह उड़ते मन की डोर टूट जाती और लगता, मुक्त में, तुम में कोई अन्तर नहीं रह गया। जो तुम, सौ में। किन्तु अगले ही क्षण कौन-सा पर्दा डाल देते हो, जो तुम एक तरफ और मैं दूसरी ओर खड़ा ताकता रह जाता हूँ। अतीत की सुधियों में खोये मन को विश्राम दो प्रभु! अब मुझ में और अधिक प्रतीक्षा की शक्ति शेष नहीं रही है। मेरी आँखें तुम्हें अपलक ढूँढ़ते थक गई हैं।
मैं अपने लिये अलग क्या हूँ। मैं तो तुमसे अलग हूँ भी नहीं। मुझमें तुम्हीं तो सुनते हो, मैंने देखा ही कब, यह तुम्हीं तो मेरी आँखों के भीतर बस कर देखते हो। मुझे क्यों दोष देते हो प्रभ्रुवर। मैंने इच्छा ही क्या की। तुम मेरे भीतर बैठकर नाना प्रकार की इच्छाएँ न जगाते तो मुझे क्या आवश्यकता थी, जो मैं संसार में भटकता। जो कुछ भी है, अच्छा या बुरा तुम्हारा ही हैं। अब मुझे इस प्रपंच में पड़कर रहा नहीं जाता, मेरे सर्वस्व! जो कुछ भी है, तुम्हारा है, सो तुम ले लो। अपना दिया हुआ सब वापस कर लो।
पीड़ाओं के सागर से निकल कर यों ही मैं एक दिन ध्यानावस्थित होकर प्रभु से अनवरत पुकार किये चला जा रहा था। वहाँ मेरे अतिरिक्त एक दूर-दूर तक निर्जन पृथ्वी थी और उसे ड़ड़ड़ड़ में भरता हुआ शुभ्र नीलाकाश। समस्त बहिर्मुखी चित्त-वृत्तियों को मैंने समेट कर अपने भीतर भर लिया था, यों कहें मैं अपने हृदय की गुफा में आ बैठा था और उसमें बैठा-बैठा उस परम ज्योति के दर्शन कर रहा था, जो इतने समीप थी, जितना मेरा हृदय और इतनी दूर कि उसे अनन्त आकाश की विशाल बाहों से भी स्पर्श करना मेरे लिये कठिन हो रहा था। मैं निरन्तर उन पावन-ज्योति परमात्मा का भजन कर रहा था। उनके भजन में मैं संसार की सुध-बुध खो बैठा था।
हे प्रभु! मुझे क्या पता तुम दोष रहित हो, ड़ड़ड़ड़ हो या सर्वथा विकार-ग्रस्त और गुणहीन। तुम प्रकृति हो या प्रकाश, निर्मल हो या मलीन मुझे तो एक दृष्टि में तुम ही तुम दिखाई दे रहे हो, तुम्हारी ही सत्ता सारे जग में समा रही है, तुम्हीं फूलों में हँस रही हो, पत्तों में डोल रहे हो। वनस्पतियों का रस और हरीतिमा भी तुम्हीं हो, सूर्य, चन्द्र और नक्षत्रों की चमक तुम्हीं हो, बादलों की गरज, विद्युत की चमक, मेघों का वर्षण, नक्षत्रों की गति, सब कुछ तुम्हीं हो, यह संसार तुम्हीं में सभा रहा है या तुम्हीं संसार में समा रहे हो।
तुमसे बढ़कर सुन्दरतम, रूपराशि वाला मैंने और नहीं देखा, तुम से महान् और नहीं पाया तुम्हारी जैसी करुणा तो सम्राटों के हृदय में भी नहीं देखी। पृथ्वी से भी अधिक क्षमाशील और जननी से भी बढ़कर वात्सल्य का प्रवाह भेजने वाले प्रियतम! तुम्हारे अतिरिक्त और मुझे कुछ सूझ नहीं रहा। यदि मैं किसी और का गुणगान करूँ, किसी और को देखूँ, किसी और की सुनूँ तो मेरे जीवन! में आँखें न रहें, कान न रहें, जिह्वा न रहे प्रभु! तुम्हारे प्रेम की चाह लेकर तुम्हारे द्वार पड़ा हूँ। मेरे जीवन धन! ठुकरा दो अथवा प्यार करो, अब मेरे लिए और कहीं ठौर भी तो नहीं है।
हे प्रभु! मेरा जीवन तुम्हें समर्पित है। अब मैं कहीं भी रहूँ, कैसे भी रहूँ। दुःख मिले या सुख तेरा प्रेम तो निबाहूँगा ही। मेरे मन में अब सांसारिकता की चाह नहीं रही। स्वर्ग मिले या मुक्ति, नरक मिले या पुनर्भव मुझे उसकी भी चिन्ता नहीं है, प्रभु तुम्हें पाकर अब मुझे और कुछ पाने की कामना शेष नहीं रही। हे प्रभु! तुम्हारा ही प्यार, तुम्हारा ही नाम, तुम्हारा ही भजन मेरे शरीर, मन और आत्मा में छाया रहे। हे मेरे जीवन-आधार मुझ पर तुम्हारा पूर्ण अधिकार रहे, तुम मुझ पर पूर्ण अधिकार रखना।
प्रेम के टाँके :-
सन्त-महात्माओं को उनके शिष्य तथा अनुयायी समय-समय पर मूल्यवान् वस्तुएँ भेंट में देते रहते है। और महात्मा उन वस्तुओं को समाज के व्यक्तियों में वितरित करवा देते हैं। स्वामीनारायण सम्प्रदाय के अनुयायी स्वामी सहजानन्द के चरणों में सूरत निवासी आत्माराम नामक दरजी ने एक सुन्दर अँगरखा भेंट किया। तो उपस्थित भक्तगण उसे देखते ही रह गये।
पास में ही भावनगर के राजा विजयसिंह जी बैठे थे। उन्हें वह अँगरखा बहुत पसन्द आया। वह चाहते थे कि यह अँगरखा कैसे भी प्राप्त हो जाये। उन्होंने दरजी की मुक्त कण्ठ से प्रशंसा की “तुम एक अँगरखा मुझे भी बना दो, सिलाई के सौ रुपये मैं तुम्हें दूँगा।
यह सुनकर दरजी बोला-राजन् अब इस प्रकार का अँगरखा बनाना मेरे बस की बात नहीं है। क्योंकि स्वामी जी के लिए सींया गया अँगरखा पैसों के टाँकों से नहीं सींया गया है वरन् इसमें प्रेम के टाँके लगाये गये है। दूसरा अँगरखा सीने के लिए वैसा प्रेम में कहाँ से लाऊँगा।”
प्रसिद्ध वैज्ञानिक ब्वायल ने एक सिद्धान्त (व्वायल्स) प्रतिपादित कर बताया कि यदि दबाव (प्रेशर) बढ़ाया जाये तो आयतन (बालूम) कम हो जायेगा। अर्थात् आयतन और दबाव दोनों एक दूसरे के विपरीत अनुपात (रेसीप्रोकल प्रपोर्शन) में है। हवा भर कर किसी गुब्बारे को एक निश्चित आयतन में फुला लें और फिर उसे दबाये तो जितना अधिक गुब्बारे को दबाते चलेंगे, उसका आकार उतना ही छोटा होता चला जायेगा।
धर्म और विज्ञान भी इसी प्रकार एक दूसरे के विपरीत अनुपात (रेसीप्रोकल प्रपोर्शन) में दिखाई देते है, जहाँ पर धर्म आ जाता है, वहाँ विज्ञान की आवश्यकता कम हो जाती है और जहाँ पर विज्ञान की मात्रा बढ़ जाती है, वहाँ धर्म को उतना स्थान छोड़ना पड़ता है। इस विपरीत अनुपाती सिद्धान्त के अनुसार ऐसा जान पड़ता है, धर्म और विज्ञान में परस्पर विरोध है।
लेकिन तार्किक दृष्टि से देखें तो दोनों अन्योऽन्याश्रित सम्बन्धित भी है। स्त्री की अपनी प्रकृति होती है, पुरुष को अपनी प्रकृति, दोनों की इच्छाएँ और जरूरतें अपनी-अपनी तरह की है, किन्तु अपने आप में दोनों अपूर्ण है और जीवन का आनन्द तभी आता है, तब दोनों एक बिन्दु पर एक समझौते पर सम्बन्धित हो जाते है। दोनों एक दूसरे के हित की रक्षा करने लगते हैं तो परस्पर विपरीतता भी अभिन्न एकता में बदल जाती है, सृष्टि एवं जीवन का आनन्द निर्झर हिलोरें लेने लगता है।
दोनों में से कोई अकेला नहीं रह सकता। दबाव बढ़ाते जाने की भी एक सीमा है, उस सीमा के आगे गुब्बारा फट जाने की तरह उस वस्तु का अस्तित्व ही समाप्त हो सकता है, उसी प्रकार आयतन बढ़ाते चलो तो एक अवस्था ऐसी आयेगी, जब भीतरी फैलाव ही उस वस्तु के अस्तित्व को फोड़कर नष्ट कर देगा।
धर्म को इतना बढ़ाते चला जाये कि विज्ञान से कोई वास्ता हो न रहे तो धर्म, धर्म न रहकर अन्ध-विश्वास हो जायेगा। भारतवर्ष महान् धार्मिक देश रहा है। यहाँ श्रद्धा भक्ति का, विश्वास और आस्तिकता का अति-सीमा तक विकास हुआ। वह इतना सूक्ष्म और जटिल होता गया कि सर्वसाधारण उसे समझ नहीं पाया यदि उसे छोटे-छोटे वैज्ञानिक उदाहरणों द्वारा समझाया गया होता तो कम बुद्धि के लोग भी उन गहराइयों में उतरते चले जाते और धर्म अन्ध-विश्वास अन्ध-श्रद्धा में परिणत होने से बच जाता। धार्मिक विडम्बनाएँ इसीलिये उठ खड़ी हुई कि अल्प-बुद्धि के लोगों ने उसके तत्त्व-दर्शन को समझा तो था नहीं उल्टे उन पर जबरन विश्वास करने का दबाव डाला और उन्होंने प्रबुद्ध वर्ग में धर्म के प्रति घृणा उत्पन्न कर दी।
धर्म का आधार काल्पनिक नहीं। श्रद्धा और विश्वास की शक्ति निर्जीव नहीं। यदि कोई परम तत्त्व (एब्सोल्यूटएलिमेन्ट) नहीं था तो यह विविधता वाला संसार कहाँ से आया। इस पर हमें विश्वास करना ही चाहिये था। जो शक्ति आप प्रस्फुटित होकर विराट, विश्व का सृजन, निर्माण और विकास कर सकती है, उसके सर्वव्यापी और सर्वशक्तिमान् होने में कोई आश्चर्य नहीं करना चाहिए था, किन्तु जब सामान्य मस्तिष्क उस दौड़ को पूरा न कर पायें और उन्होंने कर्म और कर्म व्यवस्था को न समझा तो ईश्वरीय सर्वशक्तिमत्ता को मन-मनोरथ पूरा करते रहने का माध्यम मान लिया। फल यह हुआ कि धर्म जैसी शाश्वत सत्ता से पढ़ा-लिखा विचारशील वर्ग विदक गया और इस तरह धर्म अपने आप ही नष्ट होता गया। सिद्धांतत यह स्थान विज्ञान लेता चला गया क्योंकि बुद्धिमान आदमी को भी तो आखिर अपने लक्ष्य, इष्ट और सत्य की खोज की आवश्यकता थी ही। उसके लिए स्वाभाविक ही था कि यह विज्ञान का आश्रय लेता और अन्ततः यही हुआ भी।
धर्म जीवन की महान् और अन्यतम आवश्यकता है पर अन्ध-विश्वास के लिए मनुष्य जीवन में क्या स्थान हो सकता है? बाइबिल कहती थी, पृथ्वी चपटी है, लोग उस बात का अन्धानुकरण किये चले आये। गैलीलियो वैज्ञानिक था, विचारशील व्यक्ति था उसने और ग्रह-नक्षत्रों से तुलना की, अपने दृष्टिकोण को बड़ा किया तो समझ में आया पृथ्वी चपटी नहीं गोल हैं। उसने लोगों को बताया पृथ्वी गोल हैं। धर्म वाल को यह चाहिये था कि वे इस बात पर विचार करते, किन्तु यह अन्ध-विश्वास का ही पाप था कि पादरियों ने गैलीलियो को मरवा दिया। एक वैज्ञानिक सत्य को छुपाना सफल न हो सका, अन्ततः सत्य, सत्य ही रहा और बाइबिल को अपने आपमें उतना अंश निकालकर फेंकना ही पड़ा। जबकि धर्म की सत्य की शोध-प्रक्रिया है तो उसे पूर्णग्रही या अन्ध-विश्वासी क्यों होना चाहिए?
इस दृष्टि से ही विज्ञान अनिवार्यता सामने आई। धर्म एक विश्वास के आधार पर दार्शनिक गहराई लेकर चला था, विज्ञान प्रकृति के तथ्यों (फैक्ट्स) को लेकर प्रारम्भ धातुओं से किया गया था, धीरे-धीरे मिट्टी, पानी, धातुएँ, गैसें, अग्नि, चुम्बकत्व, प्रकाश, विद्युत और इन सबसे बनने वाले तरह-तरह के यन्त्र (मैकेनिज्म) बनने प्रारम्भ हुये। विज्ञान हमें बताता है कि प्रकृति के तथ्य क्या है, उनमें परस्पर किस प्रकार और किन परिस्थितियों में संबन्ध बैठाया जा सकता है, इसी आधार पर उसने महान् खोजें की, जो हमें इस आधुनिक संसार में चमत्कार की तरह दिखाई देती है। इन्होंने माना हमारी सूख-सुविधायें भी बढ़ाई, किन्तु इन सब का अन्तिम उद्देश्य क्या हो, यह बताना विज्ञान भूल गया। वह चला तो था, सत्य की खोज के लिये पर मार्ग में मिलने वाले फलों के स्वाद फूलों की सुगन्ध, वृक्षों की छाया में आराम करने के पीछे व जिस रास्ते पर चला था, उसे भूलकर एक घने जंगल में भटक गया, जहाँ केवल फल-फूल ही नहीं जंगली जानवर भी थे। काँटे, नदियाँ, टीले और पहाड़ भी थे। आज वान ने मनुष्य जीवन को कुछ इस तरह उलझा दिया है कि मनुष्य अपनी मूलभूत आवश्यकताओं (एब्सौल्यूट नेसेसिटीज) को समझ ही नहीं पा रहा।
लक्ष्य प्रयोग के द्वारा नहीं आ सकता, किन्तु सामाजिक जीवन में उसकी गहराई कहीं भी देखी जा सकती है। (1) मरने की इच्छा कोई नहीं करता (2) प्रेम की प्यास हर किसी को है, (3) छोटे से छोटा प्राणी भी प्रभुत्व की इच्छा करता है, (4) आनन्द के लिये सब बेचैन है, (5) मनुष्य अपने आप में संतुष्ट नहीं। इन शक्तिशाली आकांक्षाओं (पावरफुल ट्रेडीशन्स) के पीछे सत्य क्या है, यह जब तक समझ न पाये, तब तक विज्ञान के हजार हाथ और उसके द्वारा अर्जित सफलतायें क्या प्रसन्नता दे सकती है। आज अमेरिका, रूस, ब्रिटेन, जर्मनी, फ्राँस, जापान ने विज्ञान के क्षेत्र में भारी सफलतायें पाई है, किन्तु मानवीय व्यवहार के इस अत्यावश्यक पहलू को वह भी हल नहीं कर सकें।
विज्ञान इतना छितर गया है कि वह स्वयं भी एक अन्ध-विश्वास बन गया हैं। हर नया प्रयोग व्यक्ति के वर्तमान दृष्टिकोण और मान्यता का बदल देता हैं। पदार्थ के सम्बन्ध में डाल्टन के परमाणुवाद (डाल्टन एटामिक थ्योरी) से लेकर आइन्स्टीन के सापेक्षवाद (थ्योरी आफ रिलेटिविटी) तक अनेक मान्यतायें परिवर्तित होती गयी और उनने प्रत्येक बार एक नया चिन्तन देकर मनुष्य को और भी अशान्त किया, किसी अन्तिम निष्कर्ष पर पहुँचना संभव न हुआ।
विज्ञान किसी भी वस्तु (आब्जेक्टिव फील्ड) का वैज्ञानिक निर्णय और तार्किक चिन्तन (लॉजिकल थिंकिंग) सही दे सकता है, उदाहरण के लिये वह मौसम की जानकारी दे सकता है। बम विस्फोट से कितनी ऊर्जा (एनर्जी) पैदा होगी, यह बता सकता है, पृथ्वी से चन्द्रमा के बीच की दूरी को नाप सकता है, किन्तु मानवीय व्यवहार और न्याय का एक क्षेत्र है, उसे विज्ञान अपनी तार्किक चिन्तन (लॉजिकल थिंकिंग) से बताये तो उसका निर्णय गलत बैठेगा। वान एक शक्तिशाली साधन है, पदार्थ के अध्ययन का, पर अन्तिम उद्देश्य केवल धर्म द्वारा ही निर्धारित किये जा सकते है। वैज्ञानिकों शोधों का मूल्यांकन और उन्हें मानवीय जीवन में उतारना एक सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य है, जिसे केवल धर्म ही पूरा कर सकता है।
विज्ञान इस सम्बन्ध में अन्ध विश्वास फैलाता है, माँसाहार प्राणियों का उत्पीड़न, जीवन में असंख्य प्रकार के वैभव के उपकरण मनुष्य की सुख की आकांक्षा को उत्तेजित करके बढ़ा तो देते हैं पर उनसे किसी भी व्यक्ति को संतुष्टि नहीं होती, फलस्वरूप परस्पर प्रेम, सहयोग, न्याय, नैतिकता, ईमानदारी के स्थान पर हिंसा, घृणा, बैर-भाव अन्याय, अनीति और बेईमानी बढ़ती है। यही हुआ भी। इस स्थान पर आकर विज्ञान भी फेल हुआ। और लोगों को फिर मानवीय जीवन के सम्बन्ध में एक नये सिरे से विचार करने की आवश्यकता अनुभव होने लगी।
बायोलॉजी का ज्ञान मनुष्य को जीव-कोष (सेल्स) और अनेकों प्रकार के सूक्ष्मतम जीवाणुओं (वैसिलाई) तक ले आया-इनका क्या हो मनुष्य समझ नहीं पाया। बाटनी और जूलाजी ने करोड़ों वृक्ष वनस्पतियों और जीव-जन्तुओं के आकार-प्रकार गुण-स्वभाव आदि का परिचय पाया पर इनका किया क्या जाये-कुछ पता नहीं। एनाटॉमी और फिजियोलॉजी ने हाथ, पाँव, पेट, मुख, आँख, कान, नाक, दाँत, आँत, गुर्दे, हृदय, आमाशय, कण्ठ, मस्तिष्क, माँसपेशियाँ, धमनियों किरणें, कोशिकाएँ की रचना और क्रियाशास्त्र का पता लगाकर ग्रन्थ के ग्रन्थ रचकर तैयार कर दिये पर उनका क्या उपयोग हो कुछ पता नहीं। चिकित्सा की दृष्टि से भी हमने जितने रोगों की जानकारी प्राप्त की, उससे कई गुना नये रोग पैदा हुए, दवाइयाँ तो इतनी बनीं कि उन्हें केवल अलमारियों और काँच की बोतलों में रखा जाये तो संसार भर की सारी औषधियों को रखने के लिये लंका जितने कम से कम दस द्वीपों की आवश्यकता पड़े लेकिन रोग और मृत्यु की दर अभी पहले जितनी ही बनी हुई है। चन्द्रमा से लेकर विशाल ब्रह्माण्ड (गैलेक्सी) के अरबों नक्षत्र गिन लिये पर उनका क्या उपयोग हो कुछ पता नहीं। धर्म जिस तरह जटिल होकर अन्ध-विश्वास बन गया था, उसी प्रकार विज्ञान भी जटिल होकर अन्ध-विश्वास बन गया हे और इस तरह अब इसकी भी अपूर्णता सिद्ध हो गई है। लोग चन्द्रमा पर पहुँचकर यह अनुभव कर रहे है कि मनुष्य जीवन के मूलभूत तथ्यों के सम्बन्ध में अपने दृष्टिकोण में परिवर्तन लाये बिना काम न चलेगा।
“धर्म और विज्ञान” विषय गोष्ठी पर भाषण करते समय 16 मई 1939 को अल्बर्ट आइन्स्टीन ने प्रिन्सटन यूनिवर्सिटी में कहा था-संसार में ज्ञान और विश्वास दो वस्तुएँ है। ज्ञान को विज्ञान और विश्वास को धर्म कहेंगे। इस युग में लोगों की मान्यता है कि ज्ञान बड़ा है क्योंकि यह क्रमबद्ध है, स्कूलों में इसी का शिक्षण होता है, किन्तु यह मानव-जीवन के उद्देश्य को बहुत देर तक प्रयोग करके भी शायद ही बता सके। जबकि विश्वास में तार्किक चिन्तन और क्रमबद्ध ज्ञान (राशनल नॉलेज) दोनों ही आधार है, जो हमारा सम्बन्ध सीधे परम अवस्था या अपने मूलीत उद्देश्य से जोड़ देता है।
22 जुलाई 1969 को जिस दिन चन्द्र-यात्री नील आर्मस्ट्राँग और एडविन एल्ड्रिन ने अपनी चन्द्र-यात्रा के निर्धारित कार्यक्रम पूरे कर लिये और सकुशल पृथ्वी की ओर चल पड़े थे, उस दिन अन्तरिक्ष केन्द्र ह्यूस्टन, टैसास (अमेरिका) के अन्तरिक्ष उड़ान केन्द्र के निर्देशक श्री डा० वेरनेर बान बौन ने बड़े गम्भीर शब्दों में कहा था-मेरे विचार है कि अन्य लोकों में जीवन की सम्भावनायें निश्चित हो गई है और उससे मानव-जाति की अमरता निश्चित हो गई है।”
यह कथन उनका विज्ञान की ओर से धार्मिक सत्य की ही ओर झुकाव था, इसी दिन अहमदाबाद में परमाणु शक्ति आयोग के अध्यक्ष डा० विक्रम साराभाई ने कहा कि-मानव के अब तक के साहसिक कदमों में से यह सबसे बड़ा कदम है, इससे विश्व के बारे में हमारी धारणाओं में बुनियादी परिवर्तन हो सकता है।”
तात्पर्य यह कि विज्ञान के पीछे किसी सशक्त सत्ता का रहना आवश्यक है, अन्यथा उसकी उपयोगिता मारी जा सकती है। मानवता के लिये उसका उपयोग तभी सम्भव है। यह सत्ता केवल धर्म या विश्वास की ही हो सकती है। धार्मिक लक्ष्य की पूर्ति के लिये भी यदि हम समय रखें तो साधनों का अभाव हमारे लिये कोई अभाव नहीं है। इसी तरह हम धार्मिक आधार पर मनुष्य जीवन का अन्तिम लक्ष्य निर्धारित करें, किन्तु उसके पीछे वैज्ञानिक तर्कों का समावेश आवश्यक है।
ब्वायल के सिद्धान्त (ब्वायल्स ला) के अनुसार विपरीत जान पड़ने वाले धर्म और विज्ञान वस्तुतः ड़ड़ड़ड़ होकर ही एक स्थान पर रहकर ही मानव-जीवन का कल्याण कर सकते हैं। चार्ल्स का सिद्धान्त (चार्ल्स ला) के अनुसार जैसे-जैसे ताप (टेम्परेचर) बढ़ेगा उसी अनुपात में आयतन (वालयूम) भी बढ़ेगा। अर्थात् ताप और आयतन सीधे अनुपात (डाइरेक्टली प्रयोर्शन) में हैं। विज्ञान और धर्म का भी सम्बन्ध ऐसा ही है, जब धर्म बढ़ेगा उसकी रूढ़िवादिता और अन्ध-विश्वास को दूर करने के लिये विज्ञान का बढ़ना अनिवार्य हो जायेगा, उसी तरह अब जब कि विज्ञान अपनी चरम प्रगति पर बढ़ चुका है, उसके एकाधिकार और निरंकुशता को समाप्त करने एवं मनुष्य जीवन का निश्चित लक्ष्य निर्धारित करने के लिये धर्म का विकास आवश्यक ही नहीं अनिवार्य हो गया है। यह एक तरह का अटल सिद्धान्त है, अगले दिनों विश्व-विराट् हमारे लिये जितना स्पष्ट होता चलेगा हमें उतना ही धार्मिक होना पड़ेगा, यह प्रकृति और परमेश्वर दोनों का ही अटल विधान है।
दार्शनिक की विजयः-
एक दिन देवलोक से एक विशेष विज्ञप्ति निकाली गई। जिसने आकाश, पाताल तथा पृथ्वी तीनों लोकों में हलचल मचा दी। प्रसारण इस प्रकार था।
“अगले सात दिन तक लगातार श्री चित्रगुप्त जी की प्रयोगशाला के मुख्य द्वार पर कोई भी प्राणी असुन्दर वस्तु देकर उसके स्थान पर सुन्दर वस्तु प्राप्त कर सकेगा। शर्त यही है कि वह विधाता की सत्ता में विश्वास रखता हो। इसकी परीक्षा वहीं कर ली जायेगी।
बस फिर क्या था। सभी अपनी-अपनी बदलने वाली वस्तुओं की सूची तैयार करने लगे। याद कर-करके सबों ने अपनी उन उन वस्तुओं को लिख लिया जो उन्हें अरुचिकर या असुन्दर लगती थीं।
निश्चित तिथि पर देवलोक से कई विमान भेजे गये, जो सुविधापूर्वक सबों को देवलोक पहुँचाने लगे। जब सब लोग वहाँ पहुँच गये तो विधाता ने अपने तीसरे नेत्र की योग दृष्टि से तीनों लोकों का अवलोकन किया कि कोई बचा तो नहीं आने से। उन्होंने पाया कि स्वर्ग तथा पाताल में कोई शेष नहीं रहा केवल पृथ्वी पर एक मनुष्य आराम से पड़ा अपनी मस्ती में डूबा आनन्द मग्न है। पास जाकर उन्होंने उससे पूछा -”तात्! तुमने हमारा आदेश नहीं सुना क्या?” तुम भी चित्रगुप्त के दरबार में क्यों नहीं चले जाते और अपने पास जो कुरूप, कुरुचिपूर्ण वस्तुएँ हैं, उन्हें बदलकर अच्छी वस्तुएँ ले आते, जानते नहीं अच्छाई की वृद्धि से सम्मान बढ़ता है। “
वह व्यक्ति बड़ी ही नम्रता तथा गम्भीरता से बोला-सुना था भगवन्! किन्तु मुझे तो आपकी बनाई इस सृष्टि में कुछ भी असुन्दर नहीं दीखता। जब सभी कुछ आपका बनाया हुआ है-सब में ही आपकी सत्ता व्याप्त हो रही है तो असुन्दरता कहाँ रह सकती है वहाँ? मुझे तो इस सृष्टि का कण-कण सुन्दर दिखाई देता है, प्रभु! फिर भला मैं किसी वस्तु को असुन्दर कहने का दुःसाहस कैसे कर सकता हूँ?”
बाद में पता चला कि विधाता की उस कसौटी पर केवल वही मनुष्य खरा उतरा था। बाकी सबको निराश ही लौटना पड़ा था।
यह थी एक दार्शनिक की विश्व-विजय जो संसार की कुरूप वस्तु में भी सौंदर्य का दर्शन करे वही सच्चा दार्शनिक है।
विज्ञान मनुष्य को किस तरह के आचरण की प्रेरणा देता है? थोड़ी देर के लिये इस प्रश्न को मन से बिल्कुल निकाल दें और यह देखें कि विज्ञान करता क्या है तो हमें पता चलेगा कि विज्ञान की दौड़ भी शाश्वत आकांक्षाओं की पूर्ति के लिये है। अर्थात् वह स्वीकार करता है कि संसार में कुछ रहस्यपूर्ण अन्तिम सत्य भी है, जो अभी यंत्रों द्वारा जाना नहीं गया। संक्षेप में अपूर्णता से पूर्णता की प्राप्ति का प्रयत्न ही विज्ञान है।
विज्ञान दुःखी लोगों को, बच्चों को खिलौने देकर प्रसन्न करने के समान, प्रसन्न करता है। नक्षत्रों की गति विधि के बारे में भविष्य-वाणी करता है, परमाणुओं की रचना और पदार्थों में क्या है, उसका विश्लेषण करता है। वह इस प्रकार मनुष्य जीवन की रक्षा का प्रयत्न करता है। प्रकृति की अनन्त क्लिष्टता को तो बताने का प्रयास करता है, किन्तु उत्तेजना, क्रोध, प्रेम, लालसा, उत्कण्ठा आदि भाव क्या हैं, क्यों हैं, कहाँ से उद्भव होते हैं, यह कुछ नहीं बताता और इसीलिये वह भगवान् के सम्बन्ध में सोचने को विवश करता है। विज्ञान इस प्रकार स्वयं ही ईश्वर का भाव (आइडिया) प्रदान करता है।
अपने 23 जुलाई के कथन में ह्यू स्टन (अमेरिका) के अन्तरिक्ष उड्डयन के संचालक डा वार्न ने चन्द्र-यात्रा की सफलता पर अपनी अभिव्यक्ति प्रस्तुत करते हुए बताया- “इस महान् सफलता से हमें ऐसा लगता है कि मनुष्य जीवन के सम्बन्ध में हम अब तक कहीं मूर्खतापूर्ण दृष्टिकोण न लिये बैठे हों।” इन शब्दों में अपने भौतिकवादी दृष्टिकोण से फिसलने और आध्यात्मिक सत्य को स्वीकार करने का स्पष्ट संकेत है। ब्रह्माण्ड की दूरियाँ जितनी कम होंगी, ईश्वरीय सत्ता के अस्तित्व का भाव उतना ही तीव्र होगा। इसलिये विज्ञान ईश्वर को प्रमाणित करता है, ऐसा मानने में कोई संकोच नहीं होना चाहिये।
वृद्धावस्था में जब मृत्यु समय समीप होता है तो भगवान् की याद बहुत तीव्र हो उठती है। नीत्से और फ्रायड जैसे महान् नास्तिकतावादी और व्यक्तिवादी चिंतकों को भी अपने जीवन के अन्तिम चरण में अपने सिद्धान्तों को करवट देनी पड़ी थी। जिन परिस्थितियों में विज्ञान सीमित और असफल हो जाता है, वहीं वह ईश्वरीय चिन्तन देने के लिये विवश हो जाता है।
पूर्ण स्वतन्त्रता, बुद्धि एवं सद्विवेक के रूप में भगवान् ने अपना तेज मनुष्य को प्रदान किया। इसी को कहते हैं कि भगवान् तुम्हारे अन्दर है। हमारे भीतर की जो विभिन्न प्रकार की प्रवृत्तियाँ हैं, वह दरअसल ईश्वर को मापने की इकाई हैं। जैसे कोई पत्थर में भार है, यह तो हम जानते हैं पर कितना भार हैं, यह जानने के लिये भार की ही कोई मन, सेर, छटाँक, पौण्ड आदि इकाई काम में लाते हैं। थान के बान कपड़ों में विस्तृत लम्बाई होती है पर उसे नापा तभी जा सकता है, जब गज, फिट, इंच के रूप में लम्बाई नापने की छोटी से छोटी इकाई हो। यह व्यक्ति इतिहास का कितना जानकार है, उसके लिये उस व्यक्ति से इतिहास के ही छोटे-छोटे प्रश्न पूछ कर उसके शान की तौल करते हैं। ईश्वर की इकाई मनुष्य है, मनुष्य सदैव योजना बद्ध तरीके से कुछ विशेष प्रकार की इच्छाएँ और आदर्श मान्यतायें लेकर जी रहा है, इसलिये हम विश्वास करते हैं कि एक विस्तृत क्षेत्र में भी ऐसी प्रवृत्तियों वाली मूक किन्तु सशक्त चेतना काम अवश्य करती है।
भगवान् को ‘ठोस’ रूप (फिजिकल फार्म) में नहीं जाना जा सकता। उसे आध्यात्मिक प्रयत्नों द्वारा उसी प्रकार अनुभव किया जा सकता है, जिस तरह विद्युत, चुम्बकत्व शब्द और ताप का कोई ठोस रूप नहीं हैं, किन्तु विशेष परिस्थितियों में उन्हें अनुभव किया जा सकता है।
मुख्य संकट ईश्वर में अविश्वास नहीं प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में इस तथ्य से तो कोई इनकार कर ही नहीं सकता कि कोई अज्ञात सत्ता सृष्टि में काम कर रही है। मुख्य बाधा उसके गुणों सम्बन्धी है। हम प्रतिदिन लोगों को अन्याय करते देखते हैं पर उन्हें दण्ड नहीं मिलता, इसलिये ईश्वर की न्याय परायणता और सर्वव्यापकता वाली बात गलत हो जाती। यदि भगवान् सर्वशक्तिमान है तो वह प्रारम्भ से ही पूर्ण मनुष्य का निर्माण क्यों नहीं करता? क्यों मनुष्य अनैतिकता के लिये आकृष्ट होता है। यह प्रश्न वास्तव में गम्भीर हैं और उनका तो तार्किक उत्तर हमारे पास नहीं है।
पर यदि हम यह विश्वास कर लें कि ईश्वर सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापक और सबके साथ न्याय करने वाला है तो हमें यह भी विश्वास करना पड़ेगा कि इतने बड़े विराट् ब्रह्माण्ड की व्यवस्था जिसमें प्रत्येक जीवित प्राणियों वाले ग्रह-नक्षत्रों के लिये सूर्य प्रकाश, चन्द्र प्रकाश, वृक्ष-वनस्पति अन्न, जल आदि से लेकर उन्हें क्रियाशील रखने तक की जिम्मेदारी को पूरा करने के लिये, वह समय से बँधा हुआ (बाउण्ड) नहीं हो सकता। हमारे लिए आयु के सौ वर्ष बहुत अधिक है पर जिसके लिये समय कोई अवरोध (डाइमेन्शन) है ही नहीं, उसके लिये सौ वर्ष एक क्षण की भाँति है, एक क्षण मनुष्य को आत्म-विकास के लिये दिया गया था और उसे भगवान ने पूर्ण स्वतन्त्र इसलिये बनाया कि वह किसी भी सुविधाजनक माध्यम से अपने आत्म-विकास की प्रक्रिया को पूर्ण कर ले यदि उस क्षण का उपयोग मनुष्य समझ बूझकर नहीं करता, जैसा है उससे भी पदच्युत होने का हठ करता है तो दूसरे क्षण उसकी क्या स्थित हो यह देखना भगवान का काम है। “कर्मणा गहनो गति” में आत्म-प्रवंचना और आत्म-विकास की सिद्धि की इस रहस्यमयता को ही विस्मय से देखा है।
मान लीजिए एक व्यक्ति का जीवन 100 लाख वर्ष है और उसके लिये 10 लाख आदमियों और समस्याओं का प्रबन्ध करना है तो वह मनुष्य के उपरोक्त तर्कों को सन्तुष्ट कदापि नहीं कर सकेगा। लेखपाल, तहसीलदार को हर समय केवल अपने ही हलके के बारे में नहीं उलझाये रख सकता, क्रम-क्रम से वह सबको देखता है। कलक्टर गवर्नर और राष्ट्रपति के कार्य-क्षेत्र जितने बड़े है, उन्हें अपने ढंग से काम करने के लिये उतने ही अधिकार प्रदान किये गये है और उन कर्तव्य और अधिकारों का प्रयोग वह अपने नियमों और संवैधानिक ढाँचों में करता है, वह प्रत्येक व्यक्ति की बात हर समय सुनने के लिये बँधा नहीं रहता।
एक व्यक्ति यदि केवल गिनती ही करे तो 200 तक गिनने में उसे एक मिनट का समय लग जायेगा। 12000 तक गिनने के लिए उसे पूरा एक घण्टा और 288000 तक गिनने के लिए उसे एक सम्पूर्ण दिन लगाना पड़ेगा, इस बीच पहले गिने अक्षरों की यदि पुनरावृत्ति न हो और वे पूर्ण स्वतन्त्र जान पड़ें तो यह नहीं माना चाहिये कि गिनने वाला कमजोर है या उसे गिनती गिनना नहीं आता। उस गिनने वाले को मालूम है कि अभी तो 105120000 तक गिनना है, उसके लिए एक वर्ष पड़ा है। सृष्टि का प्रथम व्यक्ति यदि उस दिन से गणना करना शुरू करे जिस दिन सृष्टि का आविर्भाव हुआ हो तो केवल एक अरब तक गिनने के लिए उसे 9512 वर्ष 34 दिन 5 घंटे 20 मिनट का समय लगेगा। जबकि अकेली पृथ्वी पर केवल मनुष्यों की संख्या 3 अरब के लगभग है, तब फिर हर व्यक्ति के साथ ईश्वरीय हस्तक्षेप यदि 28536 वर्ष 102 दिन और 16 घंटे तो देने ही पड़ेंगे।
सृष्टि के समय को कोई आदि अन्त नहीं, उसी कर्मफल के साथ भगवान को अल्पकालिक व्यवस्था की भाँति नहीं जोड़ा जा सकता। उसकी कार्य-विधि अपनी तरह की हे और उसे हम केवल आत्म-विकास के गहन अध्ययन और मनुष्य के लाखों वर्ष के अतीत का इतिहास पढ़कर ही निश्चित कर सकते है।
मनुष्य अपनी अवस्था में रहकर ही अपना उद्देश्य पूरा कर सकता है। उसे चाहिये तो यह था कि वह ईश्वरीय योजनाओं में साथ देता। यह मानता कि आत्म-प्रगति का सारा भार अपने ऊपर ही है और इस तरह वह किसी व्यक्ति, भाग्य या भगवान पर निर्भर न होकर अपने लक्ष्य की पूर्ति के लिये आप ही प्रयत्नशील होता।
प्रगति के लिए, विकास के लिए, साधनों के समान स्वतन्त्रता भी आवश्यक है, तभी तो मनुष्य किसी तरह का उद्यम उद्योग सफल कर सकता है। आत्म-विकास के लिए स्वतन्त्रता की आवश्यकता थी सो मनुष्य को भगवान ने कर्म के लिए स्वतन्त्र कर दिया। गीताकार ने कहा-कर्मण्येवाधिकारस्ते कर्म करने के लिये तू स्वतन्त्र है, किन्तु उद्धरेदात्मनात्मान” अपने आपको उद्धार भी तू आप ही कर। भगवान ने किसी बात के लिये नियन्त्रण नहीं लगाया यदि वह ऐसा करता तो वह स्वयं भी पूर्णग्रह का दोषी ठहराया जा सकता था।
उसने अपना प्रकाश भी दिया है ताकि मनुष्य सही अर्थों में अपने व्यक्तित्व और महानता, अनुसन्धान और आदर आप करें। अपनी बुद्धि के द्वारा वह आप निर्णय करे कि उसे किन कामों से सुख और सन्तोष मिलता है, किससे नहीं। उसने बुद्धि को ज्यादा से ज्यादा चौड़ा करके अपनी तरह विराट की सम्भावनाओं पर विचार करके अपना कर्तव्य निर्धारित करने की क्षमता भी दी हैं ईश्वर प्रदत्त मुक्त इच्छा (फ्री विल) का उपयोग हमें आप ही करना पड़ेगा और ईश्वरीय अनुभूति की ओर अग्रसर होना पड़ेगा, इसके लिए परमात्मा दोषी नहीं, प्रतिबन्धित भी नहीं। हाँ वह साक्षी अवश्य है और जब भी कोई मनुष्य घृणित या अपकर्म करता है तो वह भीतर ही भीतर यह अवश्य कहता है कि “इससे तुम्हारी आत्मा का हनन हो रहा है, यह कर्म न करो।" अब यह मनुष्य की इच्छा है कि वह उससे रुके या न रुके।
ईश्वर विश्वास हमें अच्छाई को, गुणों को, एक या अनेक भगवान के रूप में प्रदर्शित करता है। बुराई को वह उसी प्रकार बुरी आत्माओं के रूप में दर्शाता है। अच्छाई भविष्य में प्रसन्न जीवन का द्योतक है, इसलिये हम उसे आत्म विकास के लिये अनिवार्य कर देते है, बुराई का भविष्य भी उसी प्रकार सदैव बुराई और अप्रसन्नता में दिखाई देता है, इसलिये बुराई को आत्म-विकास के मार्ग का अवरोध मानकर निरन्तर शुद्ध और स्वच्छ जीवन जीने की प्रेरणा देते हैं
कोई भी ईश्वरवादी महापुरुष हुए है उनके जीवन में अच्छाइयाँ ही अच्छाइयाँ हम पाते है, इसलिए हमें यह कहने का अधिकार हो जाता है कि अच्छे से अच्छे बर्ताव, व्यवहार वाला व्यक्ति ईश्वर को भी आप पा लेता है, किसी अन्य सहारे और साधन की उसे आवश्यकता भी नहीं होती।
अच्छाई के विकास में हमें चिन्ता, दुःख, और भय भी सामने आये तो भी उसके सुखप्रद परिणाम की आशा से हमें उस प्रक्रिया को बन्द नहीं कर देना चाहिए। सरल शुद्ध और सहन करने योग्य दुःखों ने सदैव आत्मा को बलवान ही बनाया है, उसे ईश्वरीय दिव्य शक्तियों की अनुभूति ही कराई है। यदि यह दुःख प्रेम, दया, कृतज्ञता और विश्वास का अन्त करते हो, तब हमें एक वीर योद्धा की भाँति उनका सामना भी करना चाहिये, इससे हम शुद्ध सरल और अनुभूति प्रद सुख प्राप्ति की दिशा में ही अग्रसर होंगे। आत्म-विकास का यही लक्ष्य भी है। ऐसा ही अभ्यास अपने जीवन में करना चाहिये।
दूध ने पानी से कहा-बन्धु किसी मित्र के अभाव में मुझे सूना-सूना अनुभव होता है। आओ, तुम्हीं को हृदय से लगाकर मित्र बनाऊँ।”
पानी ने उत्तर दिया-भाई तुम्हारी बात तो मुझे अच्छी लगी, पर यह विश्वास कैसे हो कि अग्नि परीक्षा के समय भी तुम मेरे साथ रहोगे।”
दूध ने कहा-विश्वास रखो। ऐसा ही होगा।
और दोनों में मित्रता हो गई। ऐसी मित्रता कि दोनों के स्वरूप को अलग करना कठिन हो गया।
अग्नि नित्य परीक्षा लेकर पानी को जला देती है पर दूध है कि हर बार मित्र की रक्षा के लिए अपने अस्तित्व की भी चिन्ता न करते हुए जलने को प्रस्तुत हो जाता है।
अपने पारिवारिक जीवन में दूध की तरह जो परस्पर विश्वास रखते है, उन्हीं का जीवन धन्य है।
अधिक से अधिक तीन पौण्ड भार की मानव खोपड़ी में वैज्ञानिकों की जाँच के अनुसार लगभग 14000500000 (चौदह अरब पाँच लाख) ज्ञान-तन्तु बैठे हुए है। सरकारी कार्यालयों में काम करने वाले क्लर्कों कर्मचारियों और पदाधिकारियों की तरह यह ज्ञान-तन्तु ही सम्पूर्ण शरीर समाज का रिकार्ड, लेखा-जोखा रखते है और एक शुभचिन्तक अभिभावक की भाँति शरीर की समस्त अंग-प्रत्यंगों की सुरक्षा और भरण-पोषण का ध्यान रखते हैं। मस्तिष्क से विलक्षण मशीन और रहस्यपूर्ण प्रयोग शाला इस संसार में दूसरी नहीं। सम्भवतः भगवान् ने जितना जटिल बनाकर वह मनुष्य रूप में इस तरह प्रकट हो गया, जिस प्रकार विचित्र दृश्यों वाले विराट् जगत् में वह विभिन्न क्रीड़ायें किया करती है।
भौतिक दृष्टि से अब तक मस्तिष्क के सम्बन्ध में कुल 17 प्रतिशत जानकारी प्राप्त की जा सकी है, जिसमें मस्तिष्क के अगले भाग (फोरब्रेन) के सम्बन्ध तो अब तक कुल 3 प्रतिशत जानकारी प्राप्त की जा सकी है, शेष 97 प्रतिशत भाग अभी भी अविज्ञात है।
तो भी वैज्ञानिकों ने यह बात मान ली है कि मनुष्य जीवन के सम्पूर्ण सुख-दुःख ईर्ष्या-द्वेष काम-क्रोध तृष्णा-ऐष्णा भय-निर्भयता स्वार्थ-परमार्थ आदि सभी गुण अवगुण यही से सम्बन्धित है, मस्तिष्कीय शक्ति का किसी भी दिशा में विकास करके कैसी भी सफलता प्राप्त की जा सकती है।
फ्राँसीसी वैज्ञानिक प्रो० डेलगाडो ने एक बार बाल से भी अधिक सूक्ष्म विद्युदग्र (इलेक्ट्राड) बनाया और उसे लूलू जंतु की कनपटी में स्पर्श कराया। लूलू बड़ा ही डरपोक जानवर होता है पर विद्युत द्वारा मस्तिष्क के एक विशेष भाग को उत्तेजित करते ही उसका सारा भय निर्भयता में बदल गया और वह इस तरह से कार्य करने लगा जैसे वह कोई शेर हो। उससे अधिक बलवान और खूँखार जानवर उसके लाये गये पर वह तनिक भी नहीं डरा वरन् उल्टे उन्हें धमकाकर यह सिद्ध कर दिया भय जीवन की स्वाभाविकता नहीं है वरन् मस्तिष्क की एक अवस्था मात्र है। हम किसी भी गुण को अपने आप में एक नये सिरे से पैदा करके उसकी पूर्णता प्राप्त कर सकते है।
इस प्रयोग से मानसिक दृष्टि से कमजोर व्यक्तियों को यह सोचने का अवसर मिला कि कमजोरी अपनी भूल है, वस्तुतः दुःख और कमजोरियाँ मनुष्य के लिये है ही नहीं, यदि अपने मस्तिष्क के गुण परक, साहस परक, सुख और आनन्द परक भाग को जागृत रखें तो न हम अपने ही आनन्द से आनन्दित रह सकते है वरन् संसार में और भी जो सर्वत्र गुण और आनन्द के कण बिखरे पड़े है, उनसे भी खींच-खींचकर गुण और आनन्द की मात्रा बढ़ाकर सुख शांति और समृद्धि का जीवन जी सकते है। भय, बुराई और निराशायें यदि अपने ही अन्दर से उत्तेजित हो रही हों तो प्राकृतिक नियम के अनुसार और भी सब जगह से दुःख ही दुःख दौड़ता चला आयेगा और जीवन में जो थोड़ी सी शांति और प्रसन्नता थी उसे भी नष्ट कर डालेगा।
प्रसिद्ध रूसी वैज्ञानिक प्रोफेसर एनोरवीन ने कई प्रयोग करके यह दिखाया कि दुःख या सुख मस्तिष्क से स्रवित होकर रक्त में मिल जाने वाले दो विभिन्न प्रकार के रस है। और यह मनुष्य की इच्छा, स्वभाव और अभ्यास पर निर्भर है कि वह अपने मस्तिष्क के किस स्रोत का स्राव करता है। उन्होंने बताया कि मस्तिष्क की अत्यन्त गहराई में ऐसे सूक्ष्म संस्थान है, जिनका सम्बन्ध मस्तिष्क और रीढ़ की हड्डी को जोड़ने वाले ‘रेटिक्यलर फार्मेशन’ से है। यही से कुछ ग्रंथियों का स्राव होता रहता है। कुछ ग्रंथियों से अच्छे मधुर रस का स्राव होता है, जिससे प्रसन्नता, प्रफुल्लता, मुस्कान, हँसी, मृदुलता, शिष्टता, सौम्यता आदि गुण फूटते रहते है और अच्छा-सा लगता है और दूसरे प्रकार के रस में बुराई के अंश जुड़े रहते है, उससे मनुष्य चिन्तित, दुःखी, निराश और उद्विग्न बना रहता है। डा० एनोरवीन ने यह भी बताया कि इन ग्रन्थियों का स्राव अपने आप नहीं होता वरन् यह सब विचारणाओं से होता है अर्थात् हमारे अच्छे बुरे विचार और भावनायें ही सुख-दुःख की जन्मदाता है।
प्रश्न उठता है-फिर सारा संसार सुखी क्यों नहीं है? उसका एकमात्र कारण है, आसक्ति और पूर्णग्रह। हम सुख और शांति, प्रसन्नता और प्रफुल्लता वाह्य पदार्थों में ढूँढ़ते है, जबकि उनका उद्गार तो अपने ही भीतर है उसे जागृत रखकर ही अपने विचारों में मस्त रहकर ही हम निरन्तर उसका रसास्वादन कर सकते है।
कुछ ऐसी घटनायें भी प्रकाश में आई है, जिनसे पता चलता है कि हमारे जीवन की गतिविधियों के कारण कई बार अत्यन्त प्राचीन अर्थात् पूर्व-जन्मों के संस्कार भी होते है, किन्तु मनुष्य शरीर की बनावट ऐसी है कि मनुष्य इसी जीवन में संस्कारों का वह मैल धोकर पुनः पूर्णानन्द की प्राप्ति कर सकता है।
कनाडा के शोध वैज्ञानिक रिसर्च-साँइटिस्ट डाक्टर डब्ल्यू जीपेन फील्ड ने भी एक ऐसा ही यन्त्र बनाया, जैसा फ्राँस के डा० डेलगाडो ने बनाया था। ऐसा एक व्यक्ति की कनपटी में स्पर्श कराते ही उसकी पूर्व जीवन की स्मृतियाँ जागृत हो गई। वह अपने आप उन मित्रों से बातचीत करने लगा, जो कई वर्ष पूर्व मर चुके थे। एक मिर्गी की बीमार लड़की का मस्तिष्क खोलकर देखा गया जब भी उसे मिर्गी आती थी, उसकी एक नस फूल जाती थी, उस समय हर बार उसे एक ही तरह का भयंकर स्वप्न दिखाई दिया करता था।, डाक्टरों ने अनुमान लगाया, इस स्थान पर किसी भयंकर घटना के शब्द और दृश्य अंकित (टेप) है, उसके उत्तेजित होते ही उसे मिर्गी आने लगती है, स्त्री के वर्तमान जीवन में कभी ऐसी कोई घटना घटी ही नहीं थी। जब उस नस के फलने वाले भाग को काटकर फेंक दिया गया तो स्त्री हमेशा के लिये चंगी हो गयी। इस पर वैज्ञानिकों ने बताया कि हम आज जो भी करते है, चाहे कितना ही छिपकर करें पर वह सबका सब मस्तिष्क में ‘चित्रगुप्त’ अचेतन मन-के लेखे-जोखे की तरह अंकित हो जाता है। अपना मस्तिष्क एक साक्षी तत्त्व है और वह इस सम्बन्ध में किसी से भी पक्षपात नहीं करता है। अच्छे दृश्य, शब्द घटनायें और अनुभूतियाँ मस्तिष्क में होंगी तो उसके सुखद परिणाम मनुष्य भोगेगा और बुरे दृश्य होंगे, बुराइयाँ उसने जीवन में की होगी, तो उनसे भी वह कभी बच नहीं सकेगा।
प्रसिद्ध जीव-शास्त्री जम्स ओल्ड्स के एक विद्यार्थी ने एक चूहे के मस्तिष्क में ऐसा प्रयोग करके दिखाया कि उसके मस्तिष्क के एक भाग को सचेत कर देने से वह अपना व्यक्तित्व ही भूल गया और एक बच्चे की साइकिल का पाइडिल घुमाने लगा, उसे इसमें इतना आनन्द आया कि उसने एक घंटे में कोई आठ सौ पाइडिल घुमाये, इस बीच उसके आगे मीठे भोजन का थाल भी रखा गया जिसे खाना और सूँघना तो दूर उसने देखा तक भी नहीं।
एक शरीर में भिन्न व्यक्तित्व का सन्निहित होना यह बताता है कि मनुष्य जीवन आत्म-विकास की एक कड़ी है, हमारी ज्ञान-धारायें हमारी चेतना शाश्वत है उसे शुद्ध, पवित्र, बलवान और आनन्दपूर्ण बनाकर हम सदैव ही अच्छे जीवन का आनन्द ले सकते हैं
जो थोड़ी-सी घटनायें पाश्चात्य वैज्ञानिकों ने चूहों, बन्दरों पर प्रयोग करके देखी, वह वस्तुतः हमारे सामने प्रतिदिन, प्रतिक्षण घटित होती रहती है। भारतीय योगियों ने हमें जप करना, प्रार्थना करना, सेवा, सहयोग और सहानुभूतिपूर्ण जीवन जीना सिखाया है, उसके पीछे उनकी आत्म-चेतनता की गहनतम खोजें, प्रयोग और अनुभूतियाँ ही है, उन्होंने देखा था, हम जो भी है या जो कुछ रहे हे और आगे होंगे, वह सब मस्तिष्क की रचना है। चोट लगती है पाँव में अनुभव करता है मस्तिष्क, रोती है आँखें दुःख करता है मस्तिष्क, पत्थर उठाते है हाथ किन्तु उसके लिए आदेश देता है मस्तिष्क, अन्धकार होता है, हमारे शरीर से काई वस्तु टकराती है, उसकी चिन्ता करता है मस्तिष्क, विश्लेषण करता है मस्तिष्क और फिर उसे बचने या उठा लेने की बात सोचना और आदेश भी देना यह सब मस्तिष्क के ही कार्य है, इसलिये उन्होंने मस्तिष्क की ही खोज करने का निश्चय किया।
भ्रूमध्य (दोनों भौहों के बीच) एक प्रकाशपूर्ण प्रयोगशाला की शोध करना उसी का प्रतिफल था। भारतीय योगियों ने ध्यान जमाकर देखा कि शरीर में एक चेताना काम करती है, ‘मन’ नामक इस चेतना के द्वारा उन्होंने इसके द्वारा सारे शरीर को अपने वाहन की तरह नियंत्रण में करने का लाभ प्राप्त किया, जैसा कि संसार के इतिहास में आज तक कहीं नहीं हुआ। लोग समय नहीं लगाना चाहते, उस कष्ट-साध्य प्रक्रिया से नहीं गुजरना चाहते और एक बात यह भी है कि भौतिकता के चंगुल से छूटना उन्हें अच्छा भी नहीं लगता, अन्यथा ध्यान और जप प्रणाली के द्वारा इन तथ्यों को आज भी एकाग्रचित्त होकर ढूँढ़ा और उनसे लाभान्वित हुआ जा सकता है।
यह बात तो डाक्टर और एनाटामिस्ट्स भी जानते है कि दोनों भौहों के सीध में जहाँ दोनों आँखों की नसें (आप्टिकनर्ब्स) मिलकर आप्टिक कैजमा बनाती है, उस स्थान पर ‘पिचुट्री’ नाम की एक ग्रन्थि (ग्लैण्ड) पाई जाती है, यही से सारे शरीर का नियन्त्रण करने वाले क्रोध, भय, चिन्ता, प्रसन्नता आदि के हारमोन्स निकलते है इसका सारे शरीर में नियन्त्रण है, इसीलिये इसे स्वामी ग्रन्थि (मास्टर ग्लैण्ड) कहते है। भारतीय इसे ही मन ‘आज्ञा चक्र’ कहते है। इसी में सूँघने, स्वाद अनुभव करने, देखने आदि का ज्ञान होता है। यहाँ पर दाहिने-बायें दो बल्ब (आल फैक्ट्री बाल्ब्स) लगे होते है। इनकी सूक्ष्म रचना के बारे में तो वैज्ञानिक नहीं जान पाये, किन्तु वे यह मानते है कि इस स्थान की आन्तरिक जानकारी मिलने से मस्तिष्क और शरीर के सूक्ष्म अंतर्वर्ती रहस्यों का पता लगाया जा सकता है।
मन को स्वस्थ और प्रसन्न रखकर अपने आपको प्रसन्न रखने का एक तरीका मनोवैज्ञानिक है, दूसरा वैज्ञानिक। पर वह यंत्रों से नहीं मन की इसी सूक्ष्म-शक्ति के नियन्त्रण से ही प्रयोग में लाया जा सकता है। हम जो कुछ भी है मस्तिष्क है, हमारी जो कुछ भी शक्तियाँ है, वह मस्तिष्क में सन्निहित है। मस्तिष्क को जाने बिना न तो हम शरीर की यथार्थता का पता लगा सकते है और न अपने आपका। मस्तिष्क में ही आत्मा है, परलोक पुनर्जन्म, विश्वज्ञान और परमात्मा भी उसी में है। तत्त्व-दर्शन का आधार मस्तिष्क है, मस्तिष्क की सूक्ष्म प्राण और मनोमय प्रणाली को जान लिया जाये तो सम्पूर्ण ज्ञान-विज्ञान सुख-सन्तोष एवं आनन्द को करतल गत किया जा सकता है।
ध्यान बिन्दु उपनिषद् में लिखा है-
कपाल कुहरे मध्ये चतुर्द्वारस्य मध्यमें।
तदात्मा राजते तत्र यथाव्योम्नि दिवाकरः॥
कोदण्डद्वय मध्येस्तु ब्रह्मरन्ध्रेषु शक्ति च।
स्वात्मानं पुरुषं पश्येन्म्नस्तत्र लयं गतम॥
रत्नानि ज्योत्स्निनादं तु बिन्दुमाहेश्वरं पदम्।
य एवं वेद पुरुषः सकैवल्यं समश्नुते॥
-ध्यानबिन्दु. 103 से 106
“अर्थात् कपाल कुहर के मध्य में चारों द्वारों (आँख, कान, नाक, मुख) का मध्य स्थान है, वहाँ आकाश रन्ध्र से आता हुआ नाद मोर के नाद के समान सुनाई देता है। जैसे आकाश में सूर्य विद्यमान् है, उसी प्रकार यहाँ आत्मा विराजमान् है और ब्रह्म-रन्ध्र में दो कोदण्ड के मध्य शक्ति संस्थित है। वहाँ पुरुष अपने मन को लय करके स्वात्मा को देखो वहाँ रत्नों की प्रभा वाले नाद, बिन्दु महेश्वर निवास है, जो इसे जानता है कैवल्य को प्राप्त होता है।”
वैज्ञानिक पद्धति से मस्तिष्क के अधिक से अधिक 17 प्रतिशत भाग को जाना जा सकता है, जबकि अत्यन्त कौतूहल वर्धक रहस्य, शेष 83 प्रतिशत में छिपे है। सुपीरियर एण्ड इन्फीरियर सेरेयल पेडेवल्स के बीच अवस्थित मस्तिष्क में ही सम्पूर्ण दृश्य केन्द्र (आप्टिक एरिया) अनुभूति केन्द्र (सेन्सरी एरिया) बने हैं मस्तिष्क से निकलने वाली सभी नसों के नाभिक (न्यूक्लियाई) ड़ड़ड़ड़ पर हैं यहाँ एक अद्भुत संसार छिपा है पर उसे यन्त्रों से नहीं, भावनाओं से, ध्यान से ही देखा जा सकता है, उसकी जानकारी चित्त-वृत्तियों के निरोध, एकाग्रता, आध्यात्मिकता के समन्वय से ही की जा सकती है, अन्य के उपाय शायद ही सम्भव हो।
दिन बीता, रजनी आई, रात गई दिन आया। यह आँख मिचौली चलती रही। कभी साधनों का अभाव कभी आजीविका का, कभी ज्ञान का अभाव कभी विवेक का। कभी शक्ति का अभाव, कभी सामर्थ्य का। सब मिलकर इतने जीवन में कण्व को न कहीं शांति मिली न संतोष। उन्हें मनुष्य जीवन में सर्वत्र अपूर्णता ही अपूर्णता दिखाई दी। शरीर भी न अपनी इच्छा से मिलता है, न स्वेच्छा से अन्त होता है, न जाने किन बन्धनों में बंधा पड़ा हूँ, ऐसी अशान्ति बार-बार उठती रही, अतएव ड़ड़ड़ड़ ने निश्चय किया, वे पूर्णता की प्राप्ति करके ही रहेंगे।
प्रातःकाल जब शीतल समीर के सुगन्धित झोंकों में सारा नगर निद्रामग्न हो रहा था, कण्व उठे और एक ओर कानन की ओर चल पड़े। चलते ही गये, शाम होने को आई। कण्व ने विशाल शैल शृंखला देखी जिसकी एक बाहु दक्षिण के हृदय में प्रवेश कर रही थी, दूसरी उत्तर के अन्तस्तल में। भगवान भुवन भास्कर आभा के साथ इस अचल में ही अस्त होते जा रहे थे। कण्व के लिए यह अलौकिक दृश्य था। वे अभी बालक ही तो थे। सोचा भगवान सूर्य को अपने अंक में शयन कराने वाले यह पर्वतराज ही पूर्ण है। कण्व वहीं टिक गये और पूर्णता के लिये पर्वत की उपासना करने लगे।
गौरवर्ण
इसी पर्वत पर एक और महात्मा रहा करते थे। कण्व की बातचीत से उन्हें पता चला कि इस बालक ने इस पर्वत की ऊँचाई में ही पूर्णता देखी तो उन्हें हँसी आ गई। उन्होंने मन्द-मन्द मुस्कराते हुए कहा-रे कण्व! तूने समुद्र देखा होता तो पर्वत की ऊँचाई को कभी भी पूर्ण नहीं मानता।”
गाय जिस प्रकार हरित तृण की खोज में वन-वन भटकती है, कण्व भी उसी तरह पूर्णता की खोज में भटकने लगे। उन्हें अपनी भूल पर विस्मय हुआ और ज्ञान की लघुता पर दुःख भी, किन्तु एक निश्चय-मुझे पूर्णता प्राप्त करनी चाहिये” का बल उनके साथ था। चल पड़े कण्व, और कई दिन यात्रा के बाद वे प्रशान्त सिन्धु के तट पर जा पहुँचे।
विशाल जल-राशि और अनन्त ड़ड़ड़ड़ की अन्तस्तल में आश्रय दिये, अनन्त दूरी तक फैले भगवान समुद्र को देखकर कण्व का मस्तक श्रद्धावनत हो गया है। उन्होंने कहा-धन्य हो प्रभु! तुम्हारी गहराई ही पूर्णता है। सूर्य पर्वत में डूबता दिखाई दिया था, यह तो भ्रम मात्र था अब मुझे पता चला पूर्व और पश्चिम दोनों तुम्हारे ही बाहु है, एक से सूर्य भगवान निकलते और दूसरे में समा जाते है।” क्षमा करना प्रभु! हम मनुष्यों की दृष्टि और ज्ञान बहुत सीमित है, इसलिये यह भूल हुई। आगे ऐसी भूल नहीं करेंगे।
बाल सुलभ वाणी सुनकर सिन्धुराज अपनी हँसी नहीं रोक सके, उन्होंने कण्व को अपने एक ज्वार की शीतलता का स्पर्श कराते हुए कहा-वत्स ऊँचाई और गहराई में पूर्णता नहीं होती, तुम मन्दराचल पर तप कर रहे तपस्वी वेण के पास जाओ, तुम देखोगे उनका तप विन्ध्याचल के समान ड़ड़ड़ड़ और साधना में मुझ सागर से भी बढ़कर गहराई है। निश्चय ही उनके पास जाकर तुम पूर्णता की प्राप्ति कर सकोगे।”
तप और तपस्वी यह दो नाम कण्व के कानों में पहली बार आये थे। यद्यपि यह जो कुछ चल रहा था, तप ही था पर वह उससे उसी तरह अबोध थे। जिस प्रकार शरीर में समाया हवा, चेतन-आत्मा शरीर को तो सब कुछ मानता है और स्वयं को जानता तक नहीं उसकी सारी भ्रांति केवल अपने प्रति होती है।
कण्व महात्मा बेण के पास पहुँचे और उनके चरणों में अपनी श्रद्धा समर्पित करते हुए भोले बालक ने अभ्यर्थना की-भगवन् पूर्णता के लिए भटक रहा हूँ, कहीं शांति नहीं मिलती, मुझे अपनी शरण में लें और मेरा उद्धार करें।”
बालक की निश्चल श्रद्धा और भक्ति को देखकर तपस्वी का हृदय भर आया उन्होंने आशीर्वाद दिया-वत्स तुम्हारा यश चन्द्रमा की भाँति चमके।”
“किन्तु मैं तो पूर्णता के लिए आया हूँ, महात्मन्! यश से आत्मा मुक्त थोड़े ही होती है।” कण्व ने कोमल किन्तु दृढ़ स्वर में प्रार्थना की।
तपस्वी ने एक क्षण बालक की ओर देखा और वे सहसा गम्भीर होते गये उन्होंने कहा-तात पूर्णता के लिए ऊँचाई और गहराई ही पर्याप्त नहीं, तप से भी कुछ काम नहीं चलता, उसके लिए गति चाहिये, मुझे भी मुक्ति की कामना है, इसलिए मैंने सामाजिक बन्धन तोड़ डाले है, अब मैं केवल अपने लिए स्थिर हूँ, इसलिए तुम जो कुछ चाहते हो वह मेरे पास कहाँ है? अच्छा हो तुम शुद्धायतन के पास चले जाओ जो काम-क्रोध लाभ-मोह और यश की कामनाओं के बीच भी अपने लक्ष्य के लिए पर्वत के समान अटल और अडिग है, उन्होंने गति को ही तपश्चर्या माना है। वे दिन-रात बन्धु-बान्धवों पड़ोस और समाज के लिए राष्ट्र और अन्तर्राष्ट्रीय सुख-शांति के लिए बुला करते है, वे मुझसे श्रेष्ठ है, उनके पास जाने से तुम्हें अभीष्ट की प्राप्ति हो सकेगी।”
कण्व उनके पास भी गये, पर मिला वहाँ भी कुछ नहीं एक और रास्ता उन्होंने सुझाया-कण्व इस संसार में, ऊँचाई, गहराई, तप और कर्मठता के साथ ज्ञान का होना भी आवश्यक है, तुम को मैं ऐसे ज्ञानी सद्गृहस्थ पुरुष का परिचय देता हूँ, वहाँ चले जाने से तुम पूर्णता की प्राप्ति कर सकोगे।
कण्व उनके पास भी गये। उन्होंने विनीत भाव से अपने आने का उद्देश्य कह सुनाया, विरुध ने उत्तर दिया-वत्स मानता हूँ मुझे ज्ञान के कुछ कण मिले है, किन्तु मुझसे उसके कारण जो अहंकार आ गया है, उसके कारण मेरा व्यक्तित्व सीमित रह गया है। अहंकार मनुष्य के संसार को छोटा कर देता है, उसके रहते पूर्णता की कल्पना कहाँ की जा सकती है। भगवान कृष्ण ने तो उसे श्रेष्ठ कहा है, जो अपने कर्तापन के भाव को भी भगवान को समर्पण कर देता है। तुम भक्त देवदास के पास चले जाओ आशा है, तुम्हें अपने लक्ष्य की पूर्ति का साधन वहाँ मिल जायेगा।
कण्व बहुत थक चुके थे। अब तक वे किसी एकान्त में बैठकर तप करते तो पूर्णता का प्रकाश पा लेते पर यहाँ तो अभी तक भी भटकने के अतिरिक्त कुछ हाथ न लगा। पर यह हम सोचते है। कण्व तो ब्रह्म जिज्ञासा की अनन्त प्यास लेकर भटक रहे थे, बुझना तो लक्ष्य प्राप्ति से ही सम्भव था।
कण्व आगे बढ़ते और भक्त देवदास की शरण में जा पहुँचे। उन्होंने कहा-भगवन् मुझे भक्ति के दर्शन कराइए मैंने सुना है भक्ति से पूर्णता की प्राप्ति होती है।”
भक्त देवदास मुसकराये और कहने लगे-तात् मैंने अपना सम्पूर्ण कर्ता-भाव भगवान को सौंप दिया हे तो भी जब कभी मुझे स्वर्ग और मुक्ति की कल्पना उठती है तो मैं यह अनुभव करता हूँ कि मेरा कर्तापन पूर्णतया नष्ट नहीं हुआ। जब तक मैं अपनी ही सीमा मर्यादा में बंधा हूँ और सृष्टि के अणु-अणु में व्याप्त आत्मा के साथ एकरस नहीं हो जाता तब तक पूर्णता कहाँ। तुम वशिष्ठ के पास चले जाओ, वहां सम्भव है तुम्हें कोई उचित मार्ग मिल सके। उन्होंने जनसेवा में अपने आपको पूरी तरह घुला दिया है।”
कण्व वशिष्ठ के आश्रम में पहुँचे तब वह एक रोगी की परिचर्या में लगे थे। उसकी चोट पर पट्टी बाँधते समय कण्व उनके समीप जा खड़े हुए और बोले-भगवन् आपके पास पूर्णता की प्राप्ति के लिये आया हूँ, मिल सकेगी क्या?” वशिष्ठ ने कण्व से पूछा-तुम मेरे साथ काम कर सकते हो क्या?” कण्व ने सिर हिलाकर ‘हाँ’ कही। और स्वयं भी रोगी की परिचर्या में जुट गये। सायंकाल तक दोनों उसकी सेवा में जुटे रहे और जब काम समाप्त कर उठे तो देखा भगवती सन्ध्या उन्हें अपनी गोद में भर लेने के लिए तैयार खड़ी थी। कण्व ने पूर्णता का मर्म पा लिया। सेवा-सेवा-सेवा कण्व समाज की सेवा में ऐसे खो गये कि उन्हें पूर्णता का कभी ध्यान ही नहीं आया। वे सेवा-साधना के द्वारा अपने आप में पूर्ण हो गये।
9 वर्ष की एक छोटी सी अमेरिकन लड़की ने अपनी माँ और घर वालों को बुलाया और पूछा-अच्छा बताओ पिताजी घर लौटने पर क्या ला रहे है?” घर वालों ने कई तरह की अटकलें लगाई, अन्त में उन्होंने उस लड़की से भी पूछा-अच्छा तू ही बता-जीन डिक्सन तेरे-डैडी क्या लायेंगे?” उस लड़की ने आँखें ऊपर चढ़ाकर उँगलियाँ हवा में नचाते हुए कहा-बहुत अच्छा सफेद कुत्ता।” उस समय की बात आमोद-प्रमोद में धुल गई। किसी को क्या पता था कि 1000 मील दूर उनके पिता क्या खरीद रहे होंगे।
लेकिन जब पिता घर लौटे तो सब लोग यह देखकर अवाक् रह गये कि सचमुच पिता एक सफेद कुत्ता लाये थे। जिस समय घर में उपरोक्त बात चल रही थी, कुत्ता ठीक उसी समय खरीदा गया था। पिता से उसकी पुष्टि मिलने पर घर के सभी लोगों को बड़ा विस्मय हुआ कि जीन डिक्सन को इतनी दूर का आभास कैसे हुआ? क्या संसार में कुछ ऐसे तथ्य और सत्य भी है, जो पदार्थ की जटिलता से भी बढ़कर जटिल किन्तु व्यवहार से इतने सरल हो सकते है कि उन्हें विकसित करके मनुष्य अपने आपको जीवित चमत्कार सिद्ध कर सकता है।
जीन डिक्सन ने कहा-हाँ है क्यों नहीं, अपनी आत्मा ही वह तत्त्व और वस्तु है। वह सर्वव्यापी है, सब जग की देख सुन सकती है। विकार युक्त होने से हम अपने अन्तःकरण के प्रकाश में देख नहीं पाते, अन्यथा मनुष्य अपने आप और भविष्य को गणित की तरह निश्चित रूप से देख और जान सकता है।”
यह लड़की जो जीन डिक्सन के नाम से अमेरिका ही नहीं, सारे विश्व में विख्यात हुई, विश्व के रंगमंच पर घटित होने वाली अनेक महत्त्वपूर्ण घटनाओं की पूर्णभिवक्ता हुई। उसने अपने अधिकांश भविष्य कथनों को सत्य करके यह दिखाने का प्रयत्न किया कि मनुष्य केवल रासायनिक उद्विज नहीं है। उसमें ऐसी अनेक विभूतियाँ है, जो अपनी अलौकिकता और आध्यात्मिकता का परिचय दे सकती है।
जीन डिक्सन में भविष्य दर्शन की जबर्दस्त प्रतिभा थी, और जिस तरह कोई महापुरुष तप और साधना शक्ति से अपना आत्म-बल बढ़ाकर उससे औरों का हित किया करते है, जीन डिक्सन भी हजारों लोगों का हित किया करती।
जीन डिक्सन अधिकांश भविष्य वाणियाँ ध्यानावस्थित होकर मन से करती थी पर कुछ दिन बाद उसे एक गिप्सी स्त्री ने एक गेंद (क्रिस्टल बाल) दी-उस गेंद का प्रयोग जीन डिक्सन अपने भविष्य दर्शन में करने लगी।
जीन डिक्सन छोटी अवस्था में ही बहुत विख्यात हो चुकी थी। एक बार एक असफल और निराश फिल्म अभिनेत्री उसके पास आई और पूछा-मुझे अपना अभिनय जारी रखना चाहिये अथवा एक छात्रावास चलाना चाहिए, दोनों में से मेरे लिए क्या लाभदायक रहेगा।” जीन ने हँसते हुए कहा-बहन मनुष्य कार्यक्षेत्र में स्वतन्त्र है, परिश्रम से भाग्य की लकीरें भी बदली जा सकती है, तुम यदि परिश्रम करती रहो तो अपने क्षेत्र में ही पर्याप्त सफलता प्राप्त कर सकती हो, मेरी ड्रेसप नाम की उक्त अमेरिकी अभिनेत्री इन शब्दों से बहुत प्रभावित हुई और वह पुनः कला के क्षेत्र में निष्काम परिश्रम करने लगी, उसे उस क्षेत्र में बड़ी सफलता मिली। एक दिन वह अमेरिका की सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री बनी।
एक अन्य अभिनेत्री कुमारी लोक्बार्ड भी उसके कुछ दिन बाद जीन डिक्सन से मिलने गई। उसे देखते ही जीन डिक्सन ने कहा-कुमारी लोम्बार्ड! आप अपनी कुशलता चाहती है तो 7 सप्ताह तक हवाई यात्रा न करें। यात्रा करना अनिवार्य ही हो तो कार या रेलगाड़ी से करें। तीन सप्ताह बाद कुमारी लोम्बार्ड ने सचमुच एक हवाई यात्रा की। जहाज में आग लग जाने से वह जमीन में गिरकर ध्वस्त हो गया और कुमारी लोम्बार्ड भी उसी में मारी गई।
21 वर्ष की अवस्था में जीन डिक्सन का विवाह हुआ। उन्होंने एक दिन अपने पति को हवाई यात्रा करने से रोका और कहा आप रेल से यात्रा करे। उनके पति अपनी नवविवाहिता धर्मपत्नी के भविष्य-दर्शन की ख्याति से परिचित थे। जिस तरह श्रद्धालु शिष्य योग्य गुरुजनों के मार्ग-दर्शन से लाभ उठाते और अपने जीवन को उत्थान की ओर अग्रसर करने में हिचकिचाते नहीं उसी प्रकार उन्होंने भी अपना निश्चय बदल दिया और यात्रा रेलगाड़ी से कर ली। उस समय लोगों के आश्चर्य का ठिकाना न रहा, जब उसी शाम खबर मिली कि वह जहाज जिसमें जीन डिक्सन के पति यात्रा करने वाले थे, दुर्घटना का शिकार हो गया है। पति ने धर्मपत्नी जीन डिक्सन को उसके लिए हार्दिक धन्यवाद दिया।
सलग्रैव क्लब की एक चेरिटी पार्टी में जीन डिक्सन आमन्त्रित थी। प्रेसीडेन्ट ट्रूमैन तब वाइस प्रेसीडेन्ट थे। उन्होंने हँसी-हँसी में पूछा-आप तो बहुत ईश्वर भक्त है, क्या आप बता सकती है, मेरा भविष्य क्या है-आप बहुत शीघ्र प्रेसीडेन्ट हो जायेंगे” जीन डिक्सन ने हँसते हुए उत्तर दिया और सचमुच ट्रूमैन थोड़े ही दिन बाद राष्ट्रपति निर्वाचित हो गये। राष्ट्रपति बनने पर उन्होंने स्वीकार किया-आध्यात्मिक शक्तियों की भौतिक शक्तियों से शक्तिशाली मानने के अतिरिक्त हमारे सामने और कोई चारा नहीं है।” जीन डिक्सन की इस विलक्षण पूर्व-दर्शन शक्ति पर सारे अमेरिका को ही आश्चर्य था। 1944 प्रेसीडेन्ट रूजवेल्ट ने एक दिन जीन डिक्सन को व्हाइट हाउस बुलाकर पूछा-मुझे अपना कार्य पूरा करने में कितना समय लगेगा।” डिक्सन ने गम्भीर होकर कहा-प्रेसीडेन्ट मुझे यह बताते हुए हार्दिक दुःख है कि आपका जीवन अब अधिक नहीं है।” रूजवेल्ट को तब हँसी आये बिना नहीं ही थी सचमुच उसके कुछ दिन बाद ही उनकी मृत्यु हो गई। उनकी मृत्यु भी जिस तरह जीन डिक्सन ने कहा था, मस्तिष्क की एक नस फट जाने के कारण हो गई।
जीन कहा करती थी कि आध्यात्मिक पुरुष किसी व्यक्ति के बारे में ही नहीं संसार के घटना चक्रों की भी जानकारी रखते है, जो अपनी इन क्षमताओं को यों ही सर्वसाधारण के आगे खोलते नहीं रहते उनकी अंतर्वर्ती दृष्टि का दिनों-दिन विकास ही होता जाता है और उनमें इतनी शक्ति आ जाती है कि भविष्य की घटनायें जान लेने के साथ उनमें हस्तक्षेप भी कर सकते है और किसी भी तरह का मनोवाँछित परिवर्तन भी ला सकते है। यह उस व्यक्ति के आत्म-विकास की मात्रा और क्षमता पर निर्भर है।
उक्त कथन की पुष्टि एक राज दरबार में हुई। भारतवर्ष के जनरल एजेन्ट श्री गिरजाशंकर बाजपेई ने एक भोज आमन्त्रित किया। कर्नल जबाबजादा शेरअली भी उस भोज में सम्मिलित थे और जीन डिक्सन भी। कर्नल नवाब शेरअली ने उनसे प्रश्न किया-मैडम क्या आप मेरे सम्बन्ध में भी कुछ भविष्य वाणी कर सकती है?” हाँ, हाँ जीन डिक्सन ने एक क्षण रुककर कहा-जून 1947 को भारतवर्ष का दो भागों में बँटवारा हो जायेगा, जिस भाग में मुसलमान रहेंगे आपको उसमें जाना पड़ेगा?”
2 जून 1947 की प्रातः कर्नल साहब ने जीन डिक्सन को फोन किया-मैडम आपकी भविष्यवाणी झूठी सिद्ध हुई है।” पर जीन ने बड़े आत्म-विश्वास के साथ कहा-महोदय घटनायें एक क्षण में होती है, अभी दिन भर पड़ा है। प्रतीक्षा कीजिए।” और सचमुच 3 जून 1947 को अमेरिका के अखबारों में बड़े-बड़े अक्षरों में छपा था-भारतवर्ष भारत और पाकिस्तान दो हिस्सों में बँट गया।” इसके साथ ही सेनाएँ भी बँटी और सचमुच कर्नल साहब का स्थानान्तरण पाकिस्तान में हो गया।
1947 की एक शाम जीन डिक्सन के मकान में ही राजनैतिक विषयों पर चर्चा होते-होते नई दिल्ली का नाम भी आया। जीन ने टोककर एकाएक कहा-लगता है गाँधी जी की हत्या कर दी जायेगी और उसमें छः माह से अधिक का समय नहीं लगेगा।” 30 जनवरी 1948 को सचमुच गाँधी जी की हत्या कर दी गई। इसी तरह 1963 में वे राष्ट्रपति केनेडी की हत्या के सम्बन्ध में बहुत चिन्तित रही। उन्होंने एक दिन कैनेडी के मित्र हैलो के पास जाकर भी समझाया कि आप उन्हें कम से कम अगले कुछ दिन की यात्राएँ रद्द करने को कहें। जिस कैनेडी के लिए उन्होंने 1956 में ही राष्ट्रपति बनने की भविष्यवाणी कर दी थी उसकी मृत्यु की भविष्यवाणी करते हुए, जीन डिक्सन ने यह भी बताया कि हत्यारे के नाम का पहला अक्षर ‘ओ’ और आखिरी अक्षर ‘डी’ होगा। इसके बाद सब ने देखा कि कैनेडी की हत्या टैक्सास की यात्रा के दौरान ही कर दी गई और हत्यारे का नाम जैसा जीन ने कहा था ओस्वाल्ड ही था।
भविष्य दर्शन का अर्थ है कि हमने अपने आपको ईश्वरीय सम्पर्क में साध लिया है। परमात्मा सर्वज्ञ और सर्वव्यापी है। जो उससे जितने अंश में मिल जाता है, वह भी उतनी दूरी और समय की बात बिना किसी मंत्र की सहायता से जान सकता है, आध्यात्मिक शक्तियों में विश्वास का यह एक जबर्दस्त कारण है पर साधक के लिए यह उतना ही अहित कारक भी। यदि उसे यों ही सामान्य चर्चा का विषय बना लिया जाये तो लोक यश की कामना बढ़ती है और आत्म-शक्ति का पतन होने लगता है। इसीलिए भारतीय ग्रन्थों में यौगिक शक्तियों के प्रदर्शन की मनाही की गई है। चमत्कारों से किसी का मूल हित तो किया जा सकता है पर ऐसा नहीं, जिससे अहंकार बड़े, उससे साधक का विनाश तक हो सकता है। जीन डिक्सन जिनकी एक भी भविष्यवाणी कभी गलत नहीं होती थी, बाद के दिनों में उनकी कई बातें गलत हो जाती थी। ‘गिफ्ट आफ प्रोफेसी’ नामक पुस्तक में जीन डिक्सन की भविष्यवाणियों का इतिहास लिखने वाली श्रीमती रूथ मांटगुमरी ने भी यह बात स्वीकार की है कि बाद में उनकी 30 प्रतिशत तक भविष्यवाणियाँ गलत होते देखी गई।
तो भी उन्होंने भविष्यवाणियों की सत्यता सिद्ध कर यह दिखा दिया कि मनुष्य निरा भौतिक नहीं अधिकांश आध्यात्मिक शक्ति है ओर उस शक्ति का आत्म-कल्याण समाज और विश्व-कल्याण के लिए सर्वाधिक उपयोग किया जा सकता है। चन्द्रमा पर रूस का पहला अमानव अन्तरिक्ष यान पहुँचे, आइजनहावर के चुनाव में विजयी होने, चीन के कम्युनिस्ट देश में बदल जाने, नेहरू जी के बाद शास्त्री जी के प्रधानमंत्री होने की उनकी भविष्यवाणियाँ बहुत समय पहले हुई और सत्य सिद्ध हुई जिनसे यह प्रमाण मिलता है कि मनुष्य शरीर के भीतर सचमुच कोई ऐसी आध्यात्मिक सत्ता विद्यमान् है, जो त्रिकालज्ञ, सर्वज्ञ भी हो सकती है। अभी पिछले वर्ष ही उनकी पूर्व घोषित दो भविष्यवाणियाँ अमेरिका के चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी की विजय और चीन द्वारा रूसी क्षेत्र में आक्रमण की दो घटनायें सत्य सिद्ध हो चुकी है।
उनकी भविष्यवाणियों में आगे होने वाले महत्त्वपूर्ण परिवर्तन भी है। लाल चीन कीटाणु युद्ध (ड़ड़ड़ड़) प्रारम्भ करेगा, उससे एक बार विश्व में घोर संकट आयेंगे। विश्व के कुछ बड़े नेताओं की हत्या के षड्यन्त्र होंगे, अन्तरिक्ष यात्राओं में प्रगति होगी और उससे लोगों की भौतिकतावादी मान्यताओं में अन्तर आयेगा। लोग धर्म और ईश्वर पर अधिक विश्वास करने लगेंगे। उनकी यह भी भविष्यवाणी है कि-एशिया के किसी देश-संभवतः भारतवर्ष में एक नम्र ग्रामीण परिवार में एक महान् आत्मा ने जन्म ले लिया है, जो एक महान् आध्यात्मिक क्राँति का सूत्रपात, संचालन और नियन्त्रण करेगा। उसके पीछे क्रियाशील आत्माओं की शक्ति होगी, जो संसार की वर्तमान विकृत परिस्थितियों को बदल डालेगी।” यह विवरण विस्तार से “गिफ्ट आफ प्रोफेसी’ पुस्तक में दिये गये है।
भाग्य और भविष्य परमात्मा की जबर्दस्त शक्तियाँ है। मनुष्य की शक्ति इनके आगे छोटी है। पर वह अपने विवेक से यह निर्णय अवश्य ले सकता है कि उसका जन्म किस लिये हुआ है और वह ईश्वरीय विधान में किस हद तक सहायक हो सकता हैं यदि वह इसके लिए तैयार हो सके तो इसी जीवन में अनेक आध्यात्मिक शक्तियों का विकास करता हुआ, प्रत्येक व्यक्ति आत्म-कल्याण का पथ प्रशस्त कर सकता है।
विद्युत प्रकाश, ऊष्मा यह शक्तियाँ हैं। ध्वनि और चुम्बकत्व भी शक्तियों की श्रेणी में आते है। पदार्थ जगत में इन शक्तियों को चमत्कार के रूप में देखा जा रहा है। बड़े-बड़े कल-कारखाने जहाज, अन्तरिक्ष यान, रेल, मोटरें, ट्रामें आदि सब इन शक्तियों से ही संचालित होते है, यह थोड़े समय में उतना कार्य कर सकते है, जितना 1 लाख आदमी मिलकर भी एक घंटे में नहीं कर सकते। इनकी शक्ति करोड़ों मनुष्यों की शक्ति से भी बढ़कर-घोड़ों की शक्ति (हार्स पावर) में मापी जाती है।
विचार भी इन्हीं की तरह की एक प्रबल शक्ति है। विचारों की शक्ति का अनुमान करने में विज्ञान समर्थ नहीं हो पा रहा। क्योंकि वह अत्यन्त सूक्ष्म है और मशीनी शक्ति की पकड़ से परे है। किसी यन्त्र द्वारा उन्हें पकड़ा और प्रयोग में नहीं लाया जा सकता। क्योंकि इसका सम्बन्ध मानवीय चेतना से है, पदार्थ से नहीं।
प्राण-शक्ति (वाइटल फोर्स) की स्फुरणा (डिस्चार्ज) का नाम ही विचार है। हमारी प्राण-शक्ति जिससे कम या अधिक बलयुक्त गति (वेलासिटी आफ वाइटल फोर्स) से स्फुरित होती है, उसी अनुपात से विचारों की सत्ता कम या अधिक शक्तिशाली रूप में प्रकाश में आती है।
विचार की गति (वेलासिटी) प्रकाश की गति से भी तेज होती है। सेकेंड के करोड़वें हिस्से से भी कम समय में हम संसार के किसी भी बिन्दु पर विचार शक्ति द्वारा होकर लौ आते है। महान् वैज्ञानिक आइन्स्टीन ने अपने सापेक्षवाद के सिद्धान्त (थ्योरी आफ रिलेटिविटी) में बताया कि यदि कोई वस्तु प्रकाश की गति से भी तेज चले तो समय पीछे रह जाता है और क्रिया आगे निकल जाती है, अर्थात् क्रिया ऋण-समय (निगेटिव टाइम) में पूरी हो जाती है। आइन्स्टीन का यह भी कहना है कि कोई भी वस्तु प्रकाश की गति से तीव्र नहीं चल सकती (प्रकाश) एक सेकेंड में एक लाख 86 हजार मील की गति से चलाता है। क्योंकि जैसे-जैसे वेग (वेलासिटी) बढ़ेगा, भार कम हो जाएगा। प्रकाश की गति से अधिक तेज चलने का अर्थ है कि उसका भार प्रकाश के भार से भी कम होना चाहिये। प्रकाश स्वयं शक्ति है, उसका कोई भार नहीं, इसलिए जो वस्तु प्रकाश की गति से भी तीव्र चलेगी उसका भी भार शून्य हो जायेगा। इस विश्लेषण से पता चलता है कि विचार एक सर्वव्यापी और सर्वशक्तिमान सत्ता है। वह चेतन शक्ति है, इसलिए उसका मूल्य और महत्व भौतिक शक्तियों की तुलना में करोड़ों गुणा अधिक है।
हम ऐसा अनुभव (रियलाइज) क्यों नहीं करते? ऐसी अदम्य शक्ति हमारे मस्तिष्क में अन्तर्निहित है, फिर हम उसका लाभ क्यों नहीं उठा पाते? यह प्रश्न हमारे सामने आ सकते है। वास्तविकता भी ऐसी ही है। आज संसार में कितने लोग, जो सामान्य जीवन से उठे है या असामान्य सफलतायें पाई है, इसकी खोज करें तो उनकी संख्या उँगलियों में गिनने जितनी ही मिलेगी। अधिक से अधिक राम, कृष्ण, गौतम, गाँधी, बिनोवा, ईसा, मूसा, वाशिंगटन, अब्राहम लिंकन, रूजवेल्ट, मार्टिन लूथर किंग,रौर्म्यारोला, सुकरात, अरस्तू, लाओब्जे, कन्फ्यूशियस, स्पिनोज, आइन्स्टीन, न्यूटन गैलीलियो जैसे थोड़े से नाम ही स्मरण किये जा सकते है और याददाश्त पर दबाव डालें तो अधिक से अधिक 5 पेज समा सकने योग्य वह नाम ढूँढ़े जा सकते है, जिन्होंने मनुष्य जीवन को सामान्य से असामान्य स्थिति का सौभाग्य सिद्ध किया होगा। 99.5 प्रतिशत से भी अधिक लोग तो कीड़े-मकोड़ों पशु-पक्षियों जैसा निकृष्ट जीवन जीकर ही मौत के घाट उतर जाते है।
एक ही दुर्भाग्य मनुष्य का है कि वह अपनी विचार-शक्ति का उपयोग नहीं करता। मस्तिष्क में यदाकदा विचार और भावनायें उठती भी है तो वह इतनी कमजोर और विश्रृंखलित कि साधारण-सी इच्छाओं की पूर्ति के अतिरिक्त वे कोई और बड़ा प्रभाव व्यक्त न कर सकें। साधारण लोगों का जीवन तुच्छ भोग-वासनाओं तक ही सीमित बना रहता है। उनके विचार जड़ पदार्थों में ही सुख ढूँढ़ने की भटक में भूल जाते है और एक महान् उपयोगिता और लक्ष्य प्राप्ति का जीवन निरर्थक चला जाता है।
भारतीय आचार्यों ने विचार शक्ति का गहराई तक अध्ययन करके ही ध्यान प्रणाली का आविर्भाव किया था। ध्यान से चित्त एकाग्र किया जाता है। एकाग्र चित्त से निक्षेपित विचारों में इतनी सामर्थ्य आ जाती है कि उनसे असाधारण शक्ति व्यय होकर किये जाने वाले कार्य क्षणभर में सम्पन्न किये जा सकते है। संतुलित विचार शक्ति से किसी भी दूरस्थ देश में रहने वाले व्यक्ति की सहायता कर सकते है, दुःख भी दे सकते है, आराम भी पहुँचा सकते हैं विचार एक शक्ति है, उसका अच्छे कार्यों में भी प्रयोग किया जा सकता है और मानवता को कलंकित करने वाले कार्यों में भी नष्ट किया जा सकता है।
भारतवर्ष में महामानवों की संख्या शेष विश्व के महापुरुषों की सम्मिलित संख्या से भी बहुत अधिक है, उसका एक ही कारण है कि यहाँ विचार-शक्ति का नियन्त्रित उपयोग किया गया। विश्व के इतिहास में ऐसा कोई भी देश नहीं है, जिसने विचार-बल की इतनी तत्परतापूर्वक शोध की हो और उसका उपयोग जन-कल्याण में किया हो। हमारे यहाँ इस महा महिमामय शक्ति का उपयोग व्यक्तिगत उत्थान, शिक्षा, सम्पत्ति, शोध कार्य आदि में भी किया गया और लोकोत्तर जीवन के रहस्य जानने के लिए भी उसे काम में लाया गया।
तीव्रता (इन्टेन्सिटी) के आधार पर इस शक्ति को तीन भागों में विभक्त करते है-(1) मन्द, (2) मध्यम, (3) गहन। जब कोई व्यक्ति कम विचार करता है या विचार टूटे-टूटे अनियमित होते है, तब उनका बल मन्द होता है। इस तरह के विचारों से किसी को प्रभावित भी नहीं किया जा सकता, मन्द बल से स्फुरित (डिचार्ज्ड) विचार को बहुत थोड़ी दूर तक ही प्रेषित किया जा सकता है।
जन-साधारण मध्यम बल के विचारों वाले होते है। इससे उनका दैनिक कार्यक्रम भली-भाँति चलता रहता है। ऐसे लोग शिक्षा और सम्पत्ति अर्जित करने में यथेष्ट सफलता पाते है। यही विचार और इच्छाएँ यदि मस्तिष्क में काफी समय तक बनी रहती है तो उनसे संवेग (मूमेन्टम) इकट्ठा होता रहता है और धीरे-धीरे वे शक्तिशाली होने लगते हैं गहनता से सोचने और उस इच्छित फल के लिए अपनी सम्पूर्ण ध्यान शक्ति समर्पित कर देने से विचार बलवान हो उठते है। उनसे अधिक प्राण-शक्ति स्फुरित होती है, उसमें मस्तिष्क और हृदय (माइन्उ एण्ड हर्ट) दोनों का बल काम करने लगता है। पूर्व विकसित इच्छा शक्ति को विचारों में जीन कर देते है तो वह विचार तीव्र और गहन हो जाते है। वह बहुत शक्तिशाली और तुरन्त फल देने वाले होते है। कोई भी ध्वंसात्मक अथवा रचनात्मक कार्य क्षण भर में सम्पन्न करने की शक्ति ऐसे ही विचारों में होती है। किन्हीं योगी व्यक्तियों में दूर-दर्शन दूर श्रवण और दूर-संवाद प्रेषण (टेले पैथी) के चमत्कार देखने को मिलते है, वह इस नियोजित विचार-शक्ति की ही सिद्धियाँ है और वह सिद्धान्त सत्य है, उनमें अविश्वास का कोई कारण नहीं है।
शक्तियाँ आपस में परिवर्तनीय (म्युचुअली कनवर्टेबल) होती है, प्रकाश को अग्नि, विद्युत में बदला जा सकता है, ध्वनि से उत्पन्न ताप और विद्युत शक्ति से अब बड़ी-बड़ी इस्पात चादरें काटने से लेकर सूक्ष्म से सूक्ष्म घड़ियों के पुर्जे ठीक करने का काम लिया जाने लगा। कैलीफोर्निया के प्रसिद्ध भूगर्भ शास्त्री हर्वर्ट अपर ने करोड़ों वर्ष प्राचीन खस्ता हड्डियों की सफाई के लिए ध्वनि शक्ति का आश्चर्यजनक उपयोग किया तब से इस शक्ति से बड़े उपयोगी काम लिये जाने लगे।
चुम्बक को ताप, ताप को विद्युत, विद्युत को प्रकाश और प्रकाश को ध्वनि तरंगों में बदला जा सकता है। अब चूँकि विचार भी एक शक्ति (इनर्जी) है, इसलिये कोई सन्देह नहीं कि उसे भी और शक्तियों में बदला जा सकता है। विचार-बल से अग्नि, विद्युत, प्रकाश ही नहीं, ध्वनि और आकर्षण भी उत्पन्न किया जा सकता है। तन्त्र साधनाओं में मारण, मोहन, उच्चाटन, अभिसार आदि अनेक विधानों का वर्णन मिलता है, वह सब विचार-शक्ति के नियन्त्रित प्रयोग से ही होता है।
यह प्रयोग असाधारण स्थिति के है, हमें यह देखना चाहिये कि क्या इस महान् शक्ति का उपयोग सुख, शांति व्यवस्था और आत्म-कल्याण में किया जा सकता है। उत्तर मिलेगा-किया ही नहीं जा सकता, किया जाना आवश्यक भी है। हमारे जीवन के सभी क्षेत्र विचारों से भी प्रभावित है पर भौतिक सुख और इच्छाओं की ओर अधिक ध्यान बना रहने के कारण हमारी मानसिक स्थिति साधारण अवस्था से ऊपर उठ ही नहीं पाती। ईश्वर, आत्मा जैसी कोई चेतन-शक्तियाँ भी हैं। हमारा जीवन इसी संसार तक सीमित नहीं वरन् मरणोत्तर अवस्था का भी अस्तित्व है? यह सारे प्रश्न विचार बल द्वारा ही अनुभव में ले हम आत्मकेन्द्रित होते है तो बाह्य सफलता के द्वार तो अनायास ही खुल जाते है, महत्व उन रहस्यों और अनुभूतियों का है, जो विचारों को विकेन्द्रित करने से संसार की वस्तुस्थिति की यथार्थता का ज्ञान होने पर प्रत्यक्ष होते है।
विचार की शक्ति या बल अपना वास्तविक प्रभाव तब दिखाता है, जब उसे आधार देने वाले आवेशों की तीव्रता बढ़ जाती हैं। सूर अधिक पढ़े-लिखे नहीं, तुलसी की शैक्षणिक योग्यता बहुत कम थी, मारा का साहित्यिक अध्ययन नगण्य जैसा था, कबीर तो बेचारे पढ़े भी नहीं थे पर भावनाओं की शक्ति ने उनके विचारों को प्रौढ़ और परिष्कृत होने का अवसर दिया उससे इनकी बौद्धिक क्षमताएँ कुछ से कुछ हो गई। आज उनकी आन्तरिक अनुभूतियों को अच्छी शैक्षणिक योग्यता के लोग ही कठिनाई से पकड़ पाते है।
इच्छा शक्ति के अभ्यास (एक्सर-साइज) के द्वारा हम अपने विचार-बल को बढ़ा सकते है, संतुलित विचार जो कि एकाग्रता और इच्छा-शक्ति लिए होते है, बहुत बड़ी शक्ति को प्रदर्शित करते है। चेतन तत्त्वों की खोज-खबर भी उन्हीं से सम्भव है। वे कभी असफल नहीं होते। इस प्रकार का बहुत-सा तेज, विचार-बल बिना किसी समय के गमन कर सकता है, इसीलिये उससे आध्यात्मिक रहस्यों का प्रतिपादन तेजी से किया जा सकता है। विचारों का भौतिक अस्तित्व न होने से उनका लाभ नहीं उठा पाते पर उनके आध्यात्मिक मूल्य को समझ लेने के बाद एक बहुत बड़ा जीवन लाभ प्राप्त किया जाना सम्भव हो जाता है।
भारतीय संस्कृति की श्रेष्ठता
भारतीय संस्कृति पर लेख लिखने के लिए गाँधी जी ने कलम उठाई। उन्होंने प्रािम वाक्य लिख-भारत की संस्कृति से तुलना करने वाली विश्व की कोई भी संस्कृति नहीं है।” पहला वाक्य पूरा लिख पाये थे कि कलम रुक गई। अभी तो बहुत कुछ लिखना शेष था। अब बार-बार उस वाक्य पर ही उनकी दृष्टि जाने लगी। वे स्तब्ध हो गये। और आगे कुछ लिखने के स्थान पर उनके नेत्रों से आँसुओं की धारा बहने लगी।
गाँधी जी से उनकी आत्मा ने पूछा-तुम तो सत्याग्रही हो, फिर क्या सोचकर अपनी संस्कृति की इतनी प्रशंसा करने लगे। क्या तुम्हें ध्यान नहीं कि देश के लाखों अस्पृश्य नारकीय जीवन व्यतीत कर रहे है। इनसे अच्छी स्थिति तो पशु-पक्षियों की है। फिर यह तुमने कैसे लिख दिया कि इस संस्कृति की समानता विश्व की अन्य कोई संस्कृति नहीं कर सकती।” और बाद को भारतीय संस्कृति की महिमा पर लेख लिखने का विचार ही छोड़ दिया।
भगवान् महावीर राजगृह में थे। अपरिग्रह पर उनकी व्याख्यान माला चल रही थी। प्रतिदिन हजारों की संख्या में प्रजा आती और अपनी संग्रह लोभ वृत्ति महात्मा के चरणों में छोड़ जाती। सारा देश तब समता के सागर में हिलोरें लेने लगा। धनिक वर्ग निर्धनों के हित के लिये अपना सर्वस्व अर्पण करने लगा। भौतिकवादी दृष्टिकोण में परिवर्तन लाने के लिये यह आवश्यक था, सो लोगों में आध्यात्मिक वृत्ति विकसित होते ही प्रजा में सुख-शांति सौम्यता का वर्षण होने लगा।
गाथापति महाशतक उन दिनों राजगृह में सर्वश्रेष्ठ धनिक था। उसके व्यापार में कोटियों स्वर्ण मुद्रायें लगी हुई थी। महाशतक का जितना धन उसके व्यापार में लगा था, उससे अधिक उसके सुरक्षित कोष में। उसकी विलासिनी धर्म-पत्नी रेवती इस धन का अधिकांश सुखोपभोग स्वयं करती थी। महाशतक उसे अपना सौभाग्य मानता था, इसलिये वह बहुत दिन हो जाने पर भी तथागत की सेवा में उपस्थित नहीं हुआ।
पर भगवान तो मानों उसी के उद्धार के लिये ठहरे हुये थे। प्रवचन सुनने वालों की भीड़ बढ़ती ही जा रही थी। राजगृह के सम्पन्न धनपति अपना कोष प्रजा के लिये दान कर चुके थे, यह चर्चा प्रतिदिन महाशतक तक पहुँचती किन्तु उसके कानों में जूँ तक न रेंगी।
एक दिन महाशतक ने अभूतपूर्व घटना सुनी। एक बालिका भगवान् महावीर के पास पहुँची और उनके चरणों में श्रद्धा सुमन अर्पित करती हुई बोली-महाभाग मेरे जीवन में क्षणों का अक्षय कोष सुरक्षित है, क्या यह परिग्रह नहीं है कि मैं अपनी आयु का उपयोग अपनी ही सुख-समृद्धि में करूँ। धन के संग्रह की भाँति अपने ही सुखों में जीवन का उपयोग का संग्रह नहीं। यदि हाँ तो आपके चरणों में मेरा जीवन समर्पित है। आज्ञा हो देव! मैं प्रजा की भलाई का कार्य किस प्रकार करूँ।
आयुष्मते! तुम धन्य हो। शीश पर वरद-हस्त फिराते हुए भगवान महावीर ने कहा-जिस देश के नर-नारी समाज के प्रति इतना आदर भाव रखते है, वहाँ न कोई निर्धन रहेगा, न दीन और दरिद्र। भद्रे! ऐसे पुण्यतीर्था की रक्षा के लिए एक ही आवश्यकता शेष रहती है और वह यह कि उसे ज्ञान की धारा और विवेक के प्रकाश से निरन्तर स्ना रखा जाये सो तुम जाओ और सारे देश में मानवीय सदाचरण और ज्ञान की धारा बहाओ।
इस घटना का समाचार महाशतक के पास पहुँचा तो उसकी आत्मा हाहाकार कर उठी। देश का बच्चा-बच्चा समाज के उत्कर्ष के लिए उत्सर्ग होने को तैयार है और वह अक्षय कोष का स्वामी होकर भी प्रजा के हित के लिये कुछ भी करने को तैयार नहीं। उसके मन में अपने ही लिये तीव्र घृणा उठ खड़ी हुई। उस रात महाशतक अच्छी तरह नींद भी नहीं ले सका।
रेवती से परामर्श किये बिना ही महाशतक दूसरे दिन प्रातःकाल तथागत के चरणों में उपस्थित हो गया। उसने अपना सम्पूर्ण वैभव तीर्थंकर के चरणों में समर्पित कर दिया। भगवान ने उसके शीश पद आशीर्वाद के हाथ फेरते हुए कहा-उठो तात्! जिस देश में तुम्हारे जैसे पुरुषार्थी व्यक्ति इतना त्याग करने को कटिबद्ध हो सकते है, उसमें धर्म और संस्कृति अपराजेय रहती है, उसे देश के नागरिकों में परस्पर मनोमालिन्य नहीं रहता। संगठन और परस्पर हित की दृष्टि रखने वाली प्रजा का कोई भी अहित करने में समर्थ नहीं हो सकता। महाशतक को उस दिन जितना सन्तोष ओर हल्कापन अनुभव हुआ, उतना किसी महाभोग से भी नहीं हुआ था।”
रेवती जिस बात के लिए तैयार नहीं थी, वह आखिर हो ही गयी। जैसे ही उसने सुना महाशतक ने सारा कोष प्रजा के लिए दान कर दिया, मार खाई नागिन के समान वह फुफकार कर उठी। सारा धन उसने सिर पर उठा लिया। खटपाटी लेकर उस दिन रेवती कोप-भवन जा पहुँची।
महाशतक घर पहुँचा तो दास-दासियों ने सारी बात कह सुनाई। महाशतक को उससे कोई क्षोभ नहीं हुआ। निरन्तर गिरने वाली जल की बूँदें जिस तरह कमल-पत्र का भेदन करने में असमर्थ होती है, उसी प्रकार परिग्रह के पाप से मुक्त महाशतक की आत्मा में किसी प्रकार का विचार नहीं उठा। वह सीधे कोप-भव पहुँचा ओर बहुतेरा समझाया, किन्तु रेवती स्त्री हठ त्यागने को तैयार न हुई।
उस दिन से महाशतक के सामान्य प्रजा का सा आहार, वस्त्र और जीवनोपयोगी वस्तुएँ ही लेना प्रारम्भ कर दिया। रेवती के लिए यह और अपमान की सी बात लगी। सो उसने भी बदला लेने का निश्चय किया।
दूसरे दिन रेवती ने चुपके से गौशाला के दो शिशु बच्चों का वध कराकर वे पाकशाला भिजवाये और रसोइये को स्वादिष्ट व्यंजन बनाने का आदेश देकर आज साज-शृंगार में लग गई। सायंकाल उसने माँसाहार के साथ मदिरा भी पी। फिर वह सीधे महाशतक के आवास कक्ष की ओर चली गई जो इन दिनों साधना कक्ष में बदल चुका था। इससे पूर्व कि महाशतक कुछ कहे, उसने अपने आपको उसी गोद में समर्पित कर दिया।
वासना और वैराग्य में विजयी हुआ क्रोध। महाशतक को अपनी पत्नी की इस मूर्खता पर बड़ा क्रोध आया। उसने कल्पना भी न की थी कि रेवती अब पुनः मदिरापान कर उसकी आत्म-निर्माण की साधना में विघ्न उपस्थित करेगी। विद्युत की कड़क जिस प्रकार बिना कहे दीवारों से प्रतिध्वनित होकर गूँजती है, महाशतक का क्रोध भी उसी प्रकार वर्तमान परिस्थिति से टकराकर द्विगुणित हो उठा। उसने अपनी पत्नी रेवती को जो भी कह सकता था, दुर्वचन कह और दाँत पीस कर उसे मारने को दौड़ा। महाशतक ने अब तक जितना सहन कर लिया था वही उसके लिए कम नहीं था। महाशतक ने पत्नी रेवती को कड़ककर डाँटा ही था कि-सामने तथागत आ गये। सावधान करते हुए उन्होंने पूछा-तात तुमने तो अपरिग्रह का व्रत लिया है, फिर उसे तोड़ने का यह साहस क्यों कर रहे हो।”
विस्मय अवाक्, महाशतक पूछ बैठा-भगवन् आप ऐसा क्यों कह रहे है, मैं तो अपने संकल्प की रक्षा ही कर रहा हूँ। रेवती मेरे व्रत में आड़े आ रही है, सो मैं तो उसे दंड देने के लिये समद्यत हुआ हूँ।”
तात्! यह न भूलों कि-तथागत ने कोमल करुणा शीलता में कहा-आत्मा के अन्तराल में मधुर शब्दों का भी कोष भरा हुआ है ओर जो उसे गुप्त रखता है, प्रजा की भलाई के लिए बाँटने का साहस नहीं कर सकता वह भी परिग्रह का ही पापी है। तात्! केवल धन का प्रजा के लिए उत्सर्ग ही नहीं वरन् अपने जीवन, अपनी प्रतिभा अपनी योग्यता और आत्मिक गुणों का प्रजा के लिए दान व्यर्थ है।”
महाशतक को अपनी भूल का पता चला। उसने रेवती से अभद्र शब्दों के लिए क्षमा माँगी और एक बार फिर भगवान के चरणों में गिर गया। इस बार उसके पीछे रेवती भी शीश झुकाये विनीत मुद्रा में खड़ी प्रतीक्षा कर रही थी कि महाशतक उठें और मैं भी तथागत की पद-रज स्पर्श का धन्य बनूँ।
चन्द्रमा ने डाँट कर कहा-सिंधुराज तुम्हें सारा जल अपने उदर में समेटते लाज नहीं आई। सारी नदियों का जल पीकर भी तुम्हें सन्तोष नहीं।
समुद्र ने गम्भीर होकर कहा-ऐसा न कहें देव! यदि अनावश्यको से लेकर संसार में जल-वृष्टि का उत्तरदायित्व पूरा न करें तो सृष्टि कैसे चले। शशि को अपने कथन पर बड़ा पश्चाताप हुआ। उसने सिर झुका लिया।
आत्मा के लिए भगवान ने जितने शरीर बनाये है, उनमें से एक मनुष्य शरीर ही सर्वांगपूर्ण और सुन्दर है। मनुष्य शरीर के एक-एक अवयव, चक्र, कोण और उपत्यिकाओं में भगवान ने ऐसी-ऐसी शक्तियाँ भरी है, जिनके द्वारा वह सम्पूर्ण त्रैलोक्य में शासन कर सकता है। बुद्धि, विवेक, ज्ञान, श्रवण, दर्शन, धरनब, सन्देश, सम्प्रेषण के लिए वाणी, लेखनी आदि के ऐसे-ऐसे सुन्दर साधन उसे मिले है, जैसे सृष्टि के किसी भी प्राणी को नहीं मिले। भगवान की शक्तियाँ अनन्त है पर वह प्रकाश में नहीं आ सकती। मनुष्य को उसने अपना प्रतिनिधि बनाकर इस आशा से भेजा कि वह अपनी क्षमताओं का उपयोग विश्व-कल्याण और प्राणि मात्र के हित में करेगा। किन्तु बन्दर के हाथ तलवार वाली कहावत की तरह मनुष्य ने उन ईश्वर प्रदत्त शक्तियों का दुरुपयोग ही किया। बेईमान रिश्वतखोर ऑफिसर की तरह उसने किया तो उत्पीड़न, शोषण और अत्याचार ढाये या फिर रोटी-बेटी रुपया पैसा वाले निकृष्ट जीवन में गलकर मर गया और अपने पीछे परमात्मा की दी हुई विभूति-मनुष्य शरीर को भी कलंकित कर गया।
मनुष्य से तो अच्छे पेड़-पौधे जो अपने बन्धन-मुक्त मूक जीवन से भी प्रेरणाओं के स्रोत उड़ेलते रहते है। योग वशिष्ठ में महर्षि वशिष्ठ ने भगवान् राम के तत्त्व-चर्चा करते समय कहा था-
ये च मध्यमधर्माणों मृतिमोहादनन्तरम्।
ते व्योमवायु वलिताः प्रयान्त्योषधि पल्लवम्॥
-3।55।24
हे राम! ऐसे जीव जिनके पुण्य मध्यम श्रेणी के होते है, वह वायु द्वारा उड़कर औषधि फल-फूल आदि वृक्षों की योनियों में जनम लेते हैं अपने-अपने कर्मों का फल भोग कर वे पुनः पुण्यार्जन के लिये मनुष्य शरीर में आते है।
खेद है कि जिस मनुष्य को अपना जीवन पुण्य और परमार्थ की साधना में व्यतीत करना चाहिये था, वह निकृष्ट और हेय जिन्दगी जीता है, जब कि निकृष्ट कहे जाने वाले पेड़-पौधों के आचरण बड़े प्रेरक और प्रकाश देने वाले होते है। मनुष्य चाहे तो इन तुच्छ जीवों से भी बड़ी महत्त्वपूर्ण शिक्षायें ग्रहण कर सकता है।
वनस्पति शास्त्र का एक सिद्धान्त है, हेरेडिटी करेक्टर (वशानसंक्रमण) जो बीज बोया जाता है (पैरेन्ट सीड्स) उसके गुण पैदा होने वाले बीजों (डाटर सीड्स) में ज्यों-के-त्यों आ जाते हैं उदाहरण के लिए मटर के एक बीज में बीमारी के कुछ कीटाणु थे, उसे बो दिया। उस मटर की पौध में जितनी भी फलियाँ लगेंगी, उन सब में उस बीमारी के लक्षण (सिम्पटम्स) विद्यमान् होंगे। जब तक बीज के इस वंश (जनरेशन) को चलता रहने दिया जाता है, बीमारी के सिम्पटम्स अन्त तक बने रहते हैं इससे यह प्रेरणा मिलती है कि मनुष्य की जनरेशन कमजोर और निकम्मी न रहने पाये, इसके लिए मनुष्य अपने स्वास्थ्य शरीर, चरित्र और भावनाओं का निर्माण करें। मानसिक धार्मिक, साँस्कृतिक और आध्यात्मिक दृढ़ता वाले मनुष्य इस तरह की सन्तानें भी पैदा करते है, रोगी, आलसी, अपाहिज तो बिना किये भावी पीढ़ी को दोषी बनाने का पाप लेकर मर जाते है।
आजकल पाश्चात्य शिक्षा और सभ्यता से प्रभावित लोग यौन सदाचार का पालन करते हुए हिचकिचाते है और तर्क प्रस्तुत करते है कि मनुष्य ने प्रकृति से ही प्रेरणाएँ ली है, प्रकृति के अनुसार फिर आचरण करने में हानि क्या है? कुत्ते बकरी, भेड़ें, बैल और दूसरे पशुओं में कामाचार की मर्यादायें अपने परिवार तक में लागू नहीं होती, इसलिये मनुष्य भी वैसा ही करता है तो वह कोई पाप नहीं। पहले विवाह सम्बन्ध दूर किये जाते थे, अब समीपवर्ती वातावरण में ही विवाह करने की परम्परा चल पड़ी। पेड़-पौधे यह बताते है, यदि मनुष्य ने ऐसा किया तो उससे पीढ़ियाँ कमजोर होंगी।
दो अलग-अलग श्रेणी के बीज लेकर संयोजन (क्रासब्रीडिंग) से उत्पन्न हुए बीज (सीड्स) बहुत बलवान् होते है जबकि एक ही वृक्ष के फूल के स्त्रीकेशर और उसी फूल के पुँकेसर में स्वयंसेचन की क्रिया से जो बीज पैदा होता है, वह बिलकुल कमजोर होता है। यदि प्रकृति का यह नियम रहा होता कि निकटवर्ती परिवार में यौन सदाचार का पालन न किया जाये तो पेड़-पौधों का यह आदर्श और उदाहरण सामने न आता।
पराग (पालिनग्रेन) एक प्रकार के पीले कण है, जो फल के पुँकेसर में होते है। जब पराग कण स्त्री केशर के वर्तिनाग्र (स्टिगमा) तक पहुँचता है उसे परागण कहते है। परागण की क्रिया में स्वयं सेचन सरल है, एक ही पुल के पुँकेसर का पराग कर स्त्रीकेशर के वर्तिकाग्र (स्टिगमा) तक आसानी से पहुँच जाता है, यह क्रिया पराग-झड़ना (पोलीनेशन) कहलाती है। क्रास-ब्रीडिंग में दूरी और मेल जोल की परेशानी होती है, इस तरह का तर्क किया जा सकता है, किन्तु भगवान ने विकास की सुविधाओं से किसी को वंचित नहीं रखा। भौंरे-तितलियाँ और मधु-मक्खियाँ पराग का मधु चूसते हुए एक फूल पर बैठते है, रस तो वे चूस लेते है पर इतने स्वार्थी नहीं कि केवल अपना ही काम करके चल देते है। वे अपने पैरों में पराग के कण चिपका लेते है और फिर वहाँ से उड़कर दूर किसी मादा फूल के वर्तिकाग्र (स्टिगमा) में जो बैठते है, इस तरह नर-मादा फलों का दूरवर्ती सम्बन्ध हो जाता है। इस तरह ग्रास-ब्रीडिंग से उत्पन्न हुए बीज बड़े बलवान् होते है।
इसी प्रकार यही बीज पक चुका है तो ही उसके डाटर बीज अच्छे खाद्य वाले होंगे। इससे मनुष्य को एक सन्देश मिलता है कि वह गृहस्थाश्रम पूर्ण और परिपक्व अवस्था के बाद आरम्भ करे। भारतीय संस्कृति में 25 वर्ष तक ब्रह्मचर्य और विद्याध्ययन की अनिवार्यता थी। उससे बच्चों के शरीर ही नहीं मन और बुद्धि भी पर्याप्त परिपक्व हो जाते थे इसीलिये उनका गृहस्थ भी सुखी होता था और आज जबकि छोटे-छोटे बच्चों के विवाह कर देय जाते है, तब क्या यह आशा की जा सकती है कि आने वाली पीढ़ी मजबूत होगी? पीढ़ियाँ समर्थ और शक्तिशाली तभी होगी, जब कामाचार में परिपक्वता, चारित्रिक दृढ़ता का पालन किया जायेगा।
कम फल देने वाले पौधों के बीज ऐसी जगह ले जाये जहाँ उसे विकसित होने के लिए पर्याप्त जल-वायु ताप, खाद्य पदार्थ और हवा की नमी (माएश्चर) उपलब्ध हो, वह बीज भी अधिक फल देने वाली जाति के बदल जाते है। वही सिद्धान्त मानवीय जीवन में भी काम करता है। हमारे समाज में अनेक पिछड़े और पद-दलित लोग पड़े है, वह भगवान के बनाये या कर्मभोग के दोषी नहीं। मनुष्य की योनी कर्मभोग प्राप्त कर लेने के बाद ही मिलती है, यहाँ जन्म लेने के बाद उसका अच्छा बुरा होना, बढ़ना विकसित होना या दीनता, दरिद्रता की स्थिति में पड़े रहना अधिकांश परिस्थिति वश होता है। इसलिये विचारशील लोग अपनी योग्यता का थोड़ा भाग अपने स्वार्थ में लगाकर अधिकांश शक्तियाँ समाज सेवा में जुटाते है। शिक्षा, स्वाध्याय, स्वास्थ्य, सहयोग आदि के द्वारा कम शिक्षित और दलित लोगों को भी आगे बढ़ाते है, इसका सामूहिक फल प्रत्येक मनुष्य के लिए लाभदायक ही होता है। इसका एक दूसरा पहलू भी है और वह यह कि कमजोर मनुष्य अविकसित मनुष्य बाह्य परिस्थितियों से सीखकर भी अपनी क्षमताएँ और योग्यताएँ इसी प्रकार बढ़ा सकता है।
मनुष्य सामाजिक प्राणी है, वह परस्पर सहयोग,दूसरों के अनुभवों और ज्ञान के सहारे से ही तो आज की इस विकसित अवस्था तक पहुँचा है। इसलिये वह भी केवल लेने का ही अधिकारी नहीं, वह जन्म से ही समाज का ऋणी है, इस ऋण का भुगतान उसे परस्पर सहयोग ओर सहानुभूति द्वारा करना चाहिये।
वृक्ष-वनस्पतियों में एक सिम्बायसिस सिद्धान्त काम करता है। द्विदल वनस्पतियाँ (लिग्विम कार्प्स) जैसे चना, मटर, अरहर, मूँगफली, मूँग, मोंठ आदि की जड़ों में एक प्रकार की गांठें होती है, जिनमें गुलाबी रंग का एक विशेष रस (सीरप) भरा होता है। उस रस में जीवाणु (बैक्टीरिया) होते है, जो एरियेशन क्रिया के द्वारा वायु मण्डल से बहुत-सा नाइट्रोजन एकत्रित करते रहते है। यह संचित नाइट्रोजन उस पौधे के ही काम आता हो, जिसकी वह जड़ है ऐसा नहीं। ऊपर की पौधे काट ली जाती है, तब वह जड़े मिट्टी में ही रह जाती है। गाँठों के रूप में सुरक्षित नाइट्रोजन अब मिट्टी में मिल जाती है और उसकी खोई हुई उर्वरता को फिर से जगा देती है। सामाजिक जीवन में मनुष्य जन्म उनका सराहा जाता है, जो अपने संचय का थोड़ा लाभ ही अपने लिये रखते है, शेष समाज की उपयोगिता और समर्थता बढ़ाने में व्यय कर देते है।
यह क्रिया परस्पर आदान-प्रदान द्वारा भी सम्भव है। धान के खेतों में चना बहुत अच्छा उगता है, क्योंकि धान अपना वह अंश छोड़ जाता है, जो चने के लिये उपयोगी होता है, बदले में चना भी वैसा ही करता है, जिससे दुबारा उस खेत में धान की फसल अच्छी होती है। दोनों एक दूसरे की कृतज्ञता निबाहते है और मनुष्य से कहते है कि और अधिक नहीं तो जितना दूसरों से ग्रहण करता है अपनी योग्यताओं, विशेषताओं के अनुसार कम से कम उतना तो औरों के विकास में योगदान दिया ही जाना चाहिये। अरहर और ज्वार साथ-साथ बोये जाते है, दोनों दो जाति के पौधे है पर परस्पर सहयोग से दोनों फलते-फूलते रहते है। अरहर नाइट्रोजन खींचती है और उसका थोड़ा सा अंश अपने काम में लेकर ज्वार को दे देती है और इस तरह दोनों ही विकसित होते रहते है।
आम की सघन छाया में पान की बेलें बड़ी आसानी से विकसित हो लेती है, आम ऐसा करने से इनकार कर दे तो पानों का अस्तित्व ही कहाँ रहे। नारियल की छाया में ही इलायची फलती-फूलती हैं छोटों को बड़े खा जाते है, यह सिद्धान्त गलत है। सच्ची बात यह है कि छोटों को बड़ों से संरक्षण, प्रेम, स्नेह और उदारता मिलनी चाहिये। प्रीव (रैसीडुअल इफैक्ट) वनस्पति पर ही नहीं, मनुष्य जीवन भी लागू होता है। यदि हम उसका पालन करें तो समाज की शान्ति और व्यवस्था में भारी योगदान दे सकते है।
वृक्षों में सामूहिकता की भावना का आदर्श चीकू के पेड़ में देखने को मिलता है। लोग कहते है कि अकेला हो तो शक्ति का मनमाना उपभोग करने को मिलता है पर उससे मनुष्य की प्रसन्नता नहीं बढ़ सकती। एकाकी मनुष्य न किसी से प्रेम कर सकता है, न उदारता व्यक्त कर सकता है। न्याय-नीति सेवा और सदाचार के फलितार्थ भी अकेले में नहीं भोगे जा सकते, यह बात मनुष्य को चीकू से सीखनी पड़ेगी। अकेला चीकू फल तो देता है पर कम लेकिन जब उसके बहुत से साथी भी आ जाते है तो यद्यपि उसकी खुराक के साझीदार बढ़ जाते है तो भी वह अधिक फल देने लगता है। उसकी आत्मिक प्रसन्नता बढ़ती सौजन्य और सौहार्द्र को आधार मिलता है, तब चीकू अधिक फल देने लगता हैं यदि मनुष्य भी उस धरातल पर विचारपूर्वक काम कर सका होता तो आज संसार में जो अशान्ति और संघर्ष है, वह न होता उसके स्थान पर परस्पर प्रेम, सहयोग, उदारता, सहानुभूति की परिस्थितियाँ होती। स्थायी विश्व-शांति के यही आधार है, यदि उन्हें हम अपने अन्दर से विकसित नहीं कर सकते तो अब पेड़-पौधों से वह शिक्षायें ग्रहण करनी होगी और उनकी तरह अपना सम्पूर्ण जीवन सेवा, सेवा, सेवा, उत्सर्ग, उत्सर्ग, उत्सर्ग में ही बिताना पड़ेगा।
कुएँ की जगत नई बनी थी। एक पनिहारन ने मटका लाकर उस पर रखा भरने के लिए। मटका लुढ़कने लगा। तब कुएँ की जगत में लगा वह पत्थर हँसा और बोता-बेपैंदी के लोगों का भी क्या ठिकाना। कभी इधर लुढ़कते हे, कभी उधर।” घड़ा उस दिन चुप रहा। कई दिन बीत गये। पनिहारिन आती रोज और उसी स्थान पर घड़ा रखती। कालान्तर में उस स्थान पर एक गोल गड्ढा-सा हो गया। अब घड़ा लुढ़कता नहीं, उस पर स्थिर रखा रहता। तब एक दिन घड़ा उस पत्थर से बोला-देखो भाई पत्थर! एक दिन तुम मेरी ओर देखकर हँसे थे। पर मैंने निरन्तर के अभ्यास द्वारा अपने कोमल अंगों की ही रगड़ से तुम्हारे कठोर शरीर में भी अपने उपयुक्त स्थान बना ही लिया।”
पत्थर नतमस्तक हो गया।
हम जिस पृथ्वी को देख रहे है, वह करोड़ों वर्ष आयु की बुढ़िया है। नबोढ़ा धरती का तो रूप ही कुछ और था। भूगर्भ शास्त्र (जिआँलाजी) के अनुसार अपने आविर्भाव काल में पृथ्वी वातीय स्थिति गैस-फार्म में थी। वह सूर्य की तरह प्रचण्ड ऊर्जा वाला गोला थी, जिसमें जीव का तो क्या जल का रहना भी सम्भव न था। जब भी तब वाष्प रूप में ही था।
ऊर्जा फेंकना ग्रहों का स्वभाव है, उससे उनका ताप क्षीण होता है, ऐसे ही पृथ्वी की गर्मी भी धीरे-धीरे शांत होने लगी। पानी बरसा कुछ उस में भी गर्मी कम हुई और एक दिन पृथ्वी अर्द्ध तरल स्थिति में आ गई। वायु-मंडल के सम्पर्क के कारण पृथ्वी का ऊपरी हिस्सा शीघ्र ठण्डा हो गया और उसमें पपड़ी पड़ती गई, जिसके कारण कहीं पहाड़ बन गये, ऊबड़-खाबड़ पृथ्वी धरातल में क्रमशः ठण्डक के प्रवेश के कारण बनती चली गई।
सृष्टि में वस्तुओं के रूपान्तर होते है, नाश नहीं होता। इस सिद्धान्त के अनुसार मनुष्य का अस्तित्व किसी भी रूप में तब भी रहा होगा। पृथ्वी गैस रूप में तब भी रहा होगा। पृथ्वी गैस रूप में थी तो जीवन भी तब गैस जैसी हो किसी स्थिति में रहा होगा। धीरे-धीरे जब पृथ्वी गैस रूप में थी तो जीवन भी तब गैस जैसी हो किसी स्थिति में रहा होगा। धीरे-धीरे जब पृथ्वी ठण्डी पड़ने लगी तो उसके परमाणु अधिक स्थूल और दृश्य होते गये इन परमाणुओं से बने शरीर भी धीरे-धीरे स्थूल आकार लेने लगे। पृथ्वी में प्राप्त प्राकृतिक और खनिज तत्त्वों के अनुरूप ही शरीरों में परिवर्तन होता आया है, क्योंकि दिखाई देने वाला शरीर तो पार्थिव प्रकृति के अंश लेकर ही बनता बिगड़ता रहता है। पृथ्वी में जो तत्त्व घटते-बढ़ते है, वही शरीरों में भी घटते-बढ़ते रहते है और तो और वायु-मंडल में जैसी गैसें धूल और रेडियो सक्रिय (रेडियो एक्टिव) तत्त्व भरे पड़े है, मनुष्य शरीर में भी वह तत्त्व आते जाते और अपना प्रभाव दिखलाते रहते हैं, इसी कारण वायु-मंडल के शुद्धिकरण का ध्यान सभी धर्मों ने रखा है। अगरबत्ती जलाने का नियम सभी धर्मों ने इसी दृष्टि से अपनाया। यज्ञ उसका बृहद् और महत्त्वोपयोगी स्वरूप है। इस तुलनात्मक अध्ययन से हम कहते है कि मनुष्य 3/4 से भी अधिक पृथ्वी, जल है, जीवन की गतिविधियाँ इतने अंशों में पार्थिव वातावरण से सदैव प्रभावित होती रहती है।
पृथ्वी जैसे ऊपर से दिखाई देती है, भीतर से वैसी नहीं है। इसके अन्दर अभी भी वह पुराने द्रव्य और संस्कार दबे पड़े है, जो करोड़ों वर्ष पूर्व उसमें सर्वत्र भरे पड़े थे। पृथ्वी ऊपर से ठण्डी होती गई पर अभी उसके गर्भ में अपार ऊष्मा संगृहीत, सुरक्षित है। वह ज्वालामुखी (वालकैनो) के रूप में कभी-कभी फूट पड़ती है तो उसकी शक्ति का पता चलता है। भूगर्भ शास्त्री ज्वालामुखी को पृथ्वी का सशक्त कार्य और गुण मानते है। सन् 1737 में ज्वालामुखी फूटने से इतना भयंकर भूकम्प आया था कि अकेले भारतवर्ष में लगभग 300000 व्यक्तियों की जानें चली गई थीं। 1755 ई॰ सन् में लिसवन (पुर्तगाल) में ज्वालामुखी भूकम्प के कारण 1400000 वर्ग मील पृथ्वी चीमटे की तरह थरथरा गई थी, 1908 में सिसली और कैलेब्रिया के ज्वालामुखी विस्फोट के कारण 77282 व्यक्तियों की जानें गई और 95000 व्यक्ति आँशिक या बुरी तरह घायल हुये।
सन् 1933 में जापान के दो प्रमुख नगर टोकियो और योकोहामा के ध्वंस को शताब्दियों तक नहीं भूला जा सकेगा। यह विध्वंस ज्वालामुखी फटने का ही परिणाम था उसमें 142800 मनुष्य मरे, 103733 घायल हुए और कितने लोगों का कुछ पता ही नहीं चला वे कहाँ चले गये। क्वेटा (भारत) में 1935 में 56000 प्राणियों को आहत करने का श्रेय भी ज्वालामुखी को ही है। इसी वर्ष मध्य इटली के 370 शहर और गाँव ज्वालामुखी की अग्नि में हवन हो गये थे। उसमें कोई 30 हजार व्यक्ति मारे गये थे।
निरन्तर फूटते रहने वाली ज्वालामुखी पेटियाँ है (बालकैनिक वैल्ट) के ज्वालामुखियों की संख्या तो और भी अधिक है विसूवियस और एटना तो विश्व-विख्यात ज्वालामुखी है। जापान, इटली और अलास्क् में उनकी संख्या सर्वाधिक है, प्रमुख पेटियाँ - (1)प्रशान्त महासागरीय पेटी में फारमोसा, फिलीपीन्स, न्यूगिनी। (2)अन्धमहासागरीय पेटी में मैडेरिस, कैनेरी, सेन्ट हैलेना आदि। (3) हिन्दमहासागरीय पेटी में वाली जावा, सुमात्रा आदि द्वीपों पर(4) भूमध्य सागरीय पेटी में सिसली, इटली टर्की, ग्रीस आदि और (5) समुद्रतल में स्थित उत्तरी अमेरिका के अल्तूशियन द्वीप से जापान तक फैले हुए कोई 430 ज्वालामुखी निरन्तर फूटते और प्रकृति की प्रबलतम एवं प्रचण्ड क्षमता का परिचय देते रहते है।
पृथ्वी की यह शक्ति उसकी मूलभूत स्थिति के विद्यमान् होने के कारण है। पृथ्वी ऊपर से ठण्डी हो गई, किन्तु अनेक पर्तों के दबाव के नीचे अब भी प्राचीनतम गैसीय और तरल स्थिति विद्यमान् है। पृथ्वी का कुल व्यास 7998 मील है, उसका हृदय (कोर ) इस हिसाब से 3999 मील होना चाहिये। अभी तक अधिकतर 5॥। मील दूरी तक, वह भी प्रशान्त महासागर में उतरा जा सका है। अनुमान है कि 4000 मील की दूरी पर पृथ्वी के सभी खनिज और धातुएँ या तो गैस स्थिति में होंगी या तरल स्थिति में। एक से एक महत्त्वपूर्ण वस्तुएँ भूगर्भ में छिपी पड़ी है। पेट्रोलियम और मिट्टी के तेल पृथ्वी की गहराई में ही मिलते है। सोने चाँदी और मुख्यतया कोयले की खानें गहराई में ही है। साधारण स्थिति में ऊपरी पृथ्वी का दबाव अधिक और भीतर की गैसों का दबाव कम रहता है, इसलिये 4000 मील अन्तराल की स्थिति का पता नहीं चल पाता, किन्तु क्षरण द्वारा पृथ्वी का दबाव भीतरी गैसों की तुलना में कम होते ही भीतर की शक्ति उबल पड़ती है और पृथ्वी को फोड़कर अपने साथ चट्टानों का पिघला रूप लावा और संग्रहित गैसों की प्रबलता लेकर पृथ्वी को फोड़कर मीलों आकाश में उछलने लगती है। इस समय विनाशकारी दृश्य उपस्थित है उठते है। लावा चारों और फैल जाता है, भूकम्प उठ खड़े होते है, चारों ओर भाग-दौड़ मच जाती है।
ऐसी विस्फोटक स्थिति सृष्टि के आविर्भाव काल में नहीं थी। तब पृथ्वी कठोर नहीं थी, भीतर का लावा भी सरल रूप में था, इसलिए वह कभी फूटता भी था तो चश्मों की तरह पृथ्वी को हौले-हौले फोड़कर तरल रूप में वह निकलता था।
मनुष्य की आदि-शक्तियों के बारे में पहले कोई असमंजस न था। शारीरिक भोग वासनाओं और इन्द्रिय जन्य आसक्ति तब इतनी कड़ी न हुई थी कि आत्म भाव को व्यक्त होने में कोई कठिनाई होती। आज से पिछले इतिहास की सभी पर्तें यह बताती है कि तब लोगों में अध्यात्मिकता का भाव बिलकुल सहज रूप में था। भौतिक आकर्षण कम थे, इससे आध्यात्मिक तथ्यों के प्राकट्य में कोई कष्ट न होता था।
धीरे-धीरे आध्यात्मिक शक्तियाँ दबने लगीं। ऊपरी आवरण कठोर होने लगे, शरीरों की वासनायें तीव्र होने लगी। इससे आत्म तत्त्व का स्थिति शक्ति और स्वरूप को भूला जाने लगा। शरीर के गहन ड़ड़ड़ड़ में धरती के समान ही वह आत्म-शक्तियाँ भरी हुई है, जो शाश्वत ओर सनातन है, किन्तु हमारे बाह्य जीवन इतने कठिन और जटिल हो गये है कि उनकी और हमारा ध्यान ही नहीं जाता।
कभी-कभी परिस्थितियों के प्रतिघात के कारण बाह्य आवरण हल्का और कमजोर पड़ जाता है। भोग वासनायें कई बार स्वयं ही शिथिल पड़ जाती है, कई बार विवेक और वैराग्य के उदय होने पर उनकी निस्सारता प्रकट हो जाती है। हम सोचने लगते है कि मनुष्य जीवन, जो समय की अधिक से अधिक 100 पगडण्डियाँ पार करते ही समाप्त हो जाता है, क्या क्षणिक भोग-वासनाओं तृष्णा और महत्त्वाकाँक्षाओं की पूर्ति के लिये ही मिला है। क्या बाह्य जीवन से मनुष्य चिरन्तन सुख शांति और सन्तोष का अनुभव कर सकता है। इस तरह की भावनाओं के उदय से बाह्माडम्बरों की पर्तें ढीली पड़ जाती है। और आध्यात्मिक शक्तियाँ अपनी सम्पूर्ण विशेषताओं के साथ फूट पड़ती है। द्वन्द्व उठ खड़ा होता है और विघटन की सी, क्राँति की सी, विचार-मन्थन की सी स्थिति उत्पन्न हो उठती है। इस हलचल पूर्ण स्थिति में अशान्ति, विचारों की मारकाट तो दिखाई देती है पर उससे अन्ततः दुर्वासनाओं, कुटिलताओं, महत्त्वाकाँक्षाओं और इन्द्रिय जन्य आकर्षणों का ही सत्यानाश हो जाता है और शुद्ध जीवन-ज्योति का प्रकाश फैलने लगता है।
ज्वालामुखी प्रकृति का सशक्ततम कार्य है और आत्मा चिर-शक्ति की अप्रतिम अभिव्यक्ति। पृथ्वी के अन्तराल में बसे ज्वालामुखी के समान मनुष्य शरीर में व्याप्त आत्मतत्त्व जब जागृत होता है तो उससे हजारों लाखों अतृप्त अशान्त और विक्षुब्ध आत्मायें प्रकाश और शीतलता अनुभव करती है यह शक्ति सद्गुणों के रूप में फूटती और सब पर कृपा एवं स्नेह की वर्षा करती चली जाती है। जो भी उसके सम्पर्क में आते, लोहे से स्वर्ण बनते चले जाते है। ऐसी सद्गुणों की स्रोत आत्म-सत्ता का जहाँ भी प्राकट्य होता है, वहीं सुख-शांति और निर्मलता की धारायें वह निकलती है। ज्वालामुखी की प्रचण्ड शक्ति से अस्थिर असावधान लोग हानि उठाते है पर उनसे मानवता की बड़ी सेवा होती है। पृथ्वी के जिस भूभाग में सर्वाधिक ज्वालामुखी फूटते रहते है, वह सबसे अधिक धनी आबादी वाले प्रान्त है, क्योंकि लावा पृथ्वी की पकी पकाई उर्वरा शक्ति है, उससे पृथ्वी की उपज बहुत अधिक बढ़ जाती है। कई बार बहुमूल्य धातुएँ लोगों को उस चमत्कार की तरह मिल जाती है, जिस प्रकार सद्गुण सम्पन्न आत्मानुवर्ती महापुरुषों के संसर्ग से स्वल्प क्षमता वाले लोगों को भी अपार शक्ति मिल जाती है। सुदूर भूभाग में दया, करुणा, स्नेह, आत्मीयता, सहयोग, सौजन्य की उर्वरता ऐसे महापुरुष ही बढ़ाते है और अपने पीछे ज्वालामुखी के समान शांति और सन्तोष का वातावरण छोड़ते हुए, इस संसार से विदा होते है। संसार में 432 ज्वालामुखी प्रमुख है, यदि इतनी ही सद्गुणों की स्रोत आत्म-शक्तियाँ इस देश, इस पृथ्वी पर जाग पड़े तो देखते देखते संसार सुख शांति, समानता और समृद्धि से लहलहाने लगे।
देव, दानव, मनुष्य, ऋषि-मुनि गन्धर्व, किन्नर तथा यक्ष सभी परेशान थे। आकाश हैरान हुआ खड़ा था। पृथ्वी स्तब्ध। सम्पूर्ण वनस्पतियाँ, उसके अभाव में जीवन हीन सी पड़ी थी। किन्तु सूर्यदेव थे, कि निकलने का नाम ही नहीं ले रहे थे। उन्होंने साफ मना कर दिया था उगने से। आखिर हार कर स्वयं प्राची उनके पास पहुँची। अनुनय भरे स्वर में बोली- “चलो प्रिय! तुम्हारी अनुपस्थिति में सब चेतना हीन से हो रहे है। बड़ी उत्कट प्रतीक्षा हो रही है तुम्हारी।”
लेकिन सूर्यदेव बहुत क्रुद्ध थे। शिकायत के स्वर में बोले-मैं नहीं जानता था कि यह संसार इतना कृतघ्न है। अनादि काल से जो मेरी पूजा करता चला आ रहा था देवता कह कर। वही मानव अब कोरी बुद्धि के विकसित हो जाने पर मुझे केवल आग का गोला कहता है। ऐसे संसार के लिए अब मैं एक किरण तक नहीं दूँगा।”
प्राची ने सुना और तनिक गाम्भीर्य में डूब गई। फिर सूरज से बोली-तुम इतना समझते हुए भी अनजान बन गये प्रिय! बुद्धि का तो काम ही है पत्थर फेंकना। और मन का काम है, उन्हें झेलना। मन यदि समुद्र जैसा बन जाय तो उसमें ऐसे ऐसे न जाने कितने पत्थर समा जायेंगे। हाँ, और यदि उसे कच्चा घड़ा बना लिया तो एक ही चोट में वह टूट कर बिखर जाएगा। अब तुम जैसा उचित समझो करो पर मन को सीमित करके नहीं।”
सूर्यदेव ने प्राची को नमन किया और अपने रथ पर आरूढ़ हो गये। तम से आच्छादित धरा प्रखर आलोक से दीप्त हो उठी।
दान की सर्वश्रेष्ठता पर तीन भाइयों में विवाद छिड़ गया। एक धन को सर्वश्रेष्ठ दान कहता था, दूसरा व तीसरा गोदान और भूमिदान को, निर्णय के लिये तीनों पिता के पास पहुँचे। पिता ने कुछ उत्तर न दिया। बड़े लड़के को कुछ धन देकर भेजा। लड़का गया और वह धन मार्ग में खड़े एक भिखारी को दे आया। दूसरे दिन दूसरा गाय लेकर गया, उसे भी वही भिखारी मिला। गाय दान करके वह भी लौट आया। इसी प्रकार तीसरे ने भी उसी भिखारी को भूमि दान में दी और प्रसन्न होकर धर लौट आया।
कुछ दिन के बाद पिता तीनों पुत्रों को लेकर उसी रास्ते से निकला तो देखा वही भिखारी अब भी भीख माँग रहा है। गायें और भूमि बेचकर उसका पैसा भी वह खा चुका था। लड़कों को इस पर बड़ा आश्चर्य हुआ। अब पिता ने समझाया दान सर्वश्रेष्ठ वही है, जिसका सदुपयोग हो, जब तक यह स्थिति न आये ज्ञान-दान ही तब तक सर्वश्रेष्ठ है।
डार्विन और लेम्मार्क आदि ने विकासवाद (थ्योरी आफ एवोल्यूश्न) का जो सिद्धान्त दिया है, यदि वह सत्य नहीं है तो पृथ्वी में मानव की उत्पत्ति को आकस्मिक और ईश्वरीय इच्छा का प्रतिफल ही कहना होगा। ईश्वरीय सत्ता और उसकी सर्वशक्तिमत्ता को काल्पनिक कहने वाले लोग तब यह तर्क प्रस्तुत करते है कि यदि मनुष्य का प्रादुर्भाव आकस्मिक संयोग है और सबसे प्रथम ब्रह्म का पुरुष वेष में जन्म हुआ तो उनके द्वारा सन्तानोत्पत्ति कैसे सम्भव हुई? सन्तान की उत्पत्ति के लिये स्त्री और पुरुष का समायोजन आवश्यक है, फिर अकेले ब्रह्म जी अमैथुनी सृष्टि उत्पन्न करने में किस प्रकार समर्थ हुए?
अमैथुनी सृष्टि का मातृक पक्ष भी है, जिसमें केवल स्त्रियों द्वारा सन्तान पैदा करने की बात आती है। यह बात केवल भारतीयों में ही प्रचलित नहीं है वरन् प्रायः सभी धर्मों में ऐसे आख्यान मिलते हैं, जिसमें अमैथुनी प्रथा का यह दूसरा रूप अर्थात् बिना पुरुष के संभोग के स्त्री द्वारा सन्तानोत्पत्ति का, विवरण मिलता है। सामान्य श्रेणी के व्यक्तियों के लिये यह दोनों ही प्रसंग अप्रमाणिक है। इस सम्बन्ध में समुचित जानकारी न होने से ही आज तक अति-मानवता के उत्तर स्तर उत्पन्न ड़ड़ड़ड़ कलंकित हुई है।
भगवान् राम अपने भाइयों सहित पिता के संयोग के बिना जन्मे थे। इतिहास प्रसिद्ध घटना है कि जब दशरथ की आयु ढलने लगी और उन्हें कोई सन्तान नहीं हुई तो उन्होंने गुरु वशिष्ठ के पास जाकर अपना दुःख प्रकट किया। वशिष्ठ ने तब श्रृंगी ऋषि को बुलाकर पुऋयेष्टि यज्ञ कराया। इस यज्ञ में ‘चरु’ में देव शक्तियों का आह्वान कर उसे चारों रानियों को बाँट दिया गया। एक एक भाग मिलने के कारण कौशल्या और कैकेयी को एक एक और दो भाग मिलने के कारण सुमित्रा ने जुड़वा बच्चों को जन्म दिया। इस घटना ने सिद्ध कर दिया था कि देव-शक्तियों को कृत्रिम गर्भाधान द्वारा मानव आकृतियों में लाया जा सकता है। ऐसे जो भी शरीर पैदा हुए है, शारीरिक ड़ड़ड़ड़ धर्म से वह भले ही मनुष्य जैसे रहे हों पर उनकी अतीन्द्रिय क्षमताएँ बहुत बढ़ी चढ़ी रही है, इसलिये उन्हें देवदूत पैगम्बर और साक्षात भगवान माना जाता रहा। देव उपासना के द्वारा पुरुष और स्त्री शरीरों में ऐसी शक्तियों का आवाहन धारण और प्रजनन आज भी सम्भव है।
मरियम तब कुमारी ही थी, जब उन्होंने महापुरुष ईसा को जन्म दिया। मरियम को ईश्वर भक्ति और उनकी आत्म-पवित्रता सर्वविदित थी, इसलिए तब उन पर किसी के दुराचरण का दोषारोपण नहीं किया। पीछे जिन लोगों ने सन्देह किया वह उनकी अपनी भ्रान्त धारणायें थी। महापुरुष ईसा में जो विशेषताएँ थी, वह बताती थी कि इस आत्मा का प्रादुर्भाव वंशगत नहीं वरन ब्रह्माण्ड की किन्हीं अदृश्य शक्तियों से है। तभी तो वे हर किसी के मन की बात जान सकते थे एक रोटी से, सैकड़ों आदमियों की भूख मिटा सकते थे, किसी भी रोगी को केवल स्पर्श और आशीर्वाद से अच्छा कर सकते थे। विज्ञान ने अमैथुनी सृष्टि की पुष्टि कर दी है, एक दिन वह भी आयेगा, जब चमत्कार जैसी लगने वाली महापुरुषों की यह बातें भी विज्ञान ऐसे सत्य सिद्ध कर देगा जैसे किसी छोटी सी डाल के पत्ते गिनकर बता देना।
कर्ण का जन्म कुन्ती के उदर से हुआ था। कुन्ती एक दिन गायत्री मन्त्र का जप कर रही थी। महाभारत में कथा आती है कि वे उस दिन अत्यधिक ध्यानावस्थित थीं। उन्हें लगा जैसे भगवान सूर्यदेव उनके पास है, उन्हें स्वीकार कर रहे है, उनका तेज उनके गर्भ में प्रविष्ट हुआ और वे सचमुच गर्भवती हो गई। कर्ण सूर्य के समान तेजस्वी और अप्रतिम दानी थे। वह क्षमता महाभारत के और किसी योद्धा में नहीं थी।
पाण्डु ने एक बार जंगल में एक ऐसे मृग के जोड़ें का वध कर दिया था, जो उस समय काम-क्रीड़ा कर रहें थे। पाण्डु को मृगों ने शाप दिया-तुम्हारी मृत्यु भी ऐसे ही होगी” और इसके बाद की घटना है कि उनकी दोनों रानियों कुन्ती और माद्री ने देव-शक्तियों के आवाहन द्वारा अमैथुन पुत्रों को जन्म दिया। यम के पुत्र युधिष्ठिर साक्षात् धर्मावतार थे। इन्द्र के पुत्र अर्जुन के शौर्य और पराक्रम का कोई और जोड़ीदार नहीं था। भीम मरुत पुत्र थे, उनमें वायु से भी प्रचण्ड बल विद्यमान् था, नकुल सोम के अंश से जन्मे होने के कारण ज्योतिर्विद्या के अद्वितीय पण्डित थे। एक मात्र सहदेव ही ऐसे थे, जो सहवास से पैदा हुए थे और वही ऐसे थे, जिनमें अन्य भाइयों की अपेक्षा साँसारिकता का भाव और कामनायें अधिक थी। हम देवशक्तियों के सम्पर्क में आकर आत्म तेज विकसित करते है, उसका प्रभाव पीढ़ी दर पीढ़ी चलता हुआ चला जाता है। यह बात हमें इन उदाहरणों से देखने को मिलती है। भारतीय अपने आपको देव-शक्तियों का अंश ऋषि पुत्र आदि मानते है उनके ज्ञान, गुण, सौंदर्य आदि को समता पाश्चात्य जगत नहीं कर सकता।
कौरव भ्रूण सन्तान थे। अंजनी पुत्र हनुमान पितृहीन सन्तान थे। महापुरुष रामकृष्ण परमहंस का जन्म पिता के संयोग के बिना ही हुआ और उससे यह सिद्ध हो गया कि संसार में ऐसे तथ्य विद्यमान् है, जो गुण और स्वभाव से मानव प्रकृति के होकर भी ज्ञान, शक्ति और गुणों की दृष्टि से बहुत विकसित होते है, उनसे अतीन्द्रिय सम्पर्क स्थापित कर कोई भी स्त्री या पुरुष अपने आपमें उन दैवी प्रतिभाओं को विकसित कर सकता है।
प्रमाण और वैज्ञानिक व्याख्याएँ इस तथ्य का समर्थन ही करती हैं। बच्चे का जन्म, स्त्री के अण्ड (ओवम) और पुरुष के शुक्राणु (र्स्पम) के मिलने से होता है। अभी तक लोगों को पता था कि अण्ड और शुक्राणु की भेंट केवल सम्भोग से ही सम्भव है, किन्तु डा० स्टीवर्ड ने गाजर पर कई तरह के प्रयोग करके यह सिद्ध कर दिया है कि प्रत्येक कोशिका (सेल) में जीव-निर्माण की क्षमताएँ विद्यमान् रहती है। इसलिये केवल अण्ड (आवम) से ही सन्तान का जन्म सम्भव है, यह मान बैठना उचित नहीं। इस दिशा में विज्ञान की शोध अब काफी आगे तक बढ़ चुकी है।
1899 में डा० जैम्बीस लौब ने एक प्रयोग किया। उन्होंने समुद्र में पाये जाने वाले ‘अर्चिन’ नामक जन्तु की मादा के अण्ड को मैग्नीशियम क्लोराइड से उद्दीप्त किया, उससे अण्ड में गर्भाधान (फरटलाइजेशन) बिना किसी शुक्राणु की सहायता से हो गया। इस घटना से वैज्ञानिक जगत् में तीव्र प्रतिक्रिया हुई और कृत्रिम गर्भाधान की खोज के लिए वैज्ञानिकों में सर्वत्र होड़ मच गई।
स्त्री के अण्ड (ओवम) में गर्भाधान के लिये यह आवश्यक है कि 24 गुणसूत्र (क्रोमोसोम्स) स्त्री के और 24 गुणसूत्र पुरुष के मिलना आवश्यक है। पुरुषे मिलना आवश्यक है पुरुष के गुणसूत्रों में एक विशेषता यह होती है कि एक ग्रुप में 24 गुणसूत्र समान होते है। किन्तु दूसरे ग्रुप में 23 गुणसूत्र समान धर्म वाले होते है और एक गुणसूत्र ऐसा होता है, जो शेष 47 से किसी प्रकार भी नहीं मिलता। यह एक गुणसूत्र ही पुरुष के जन्म का कारण है, यदि स्त्री और पुरुष के वह ग्रुप मिलें, जिनमें 24 गुणसूत्र समान (इन्हें अंग्रेजी में एक्स एक्स क्रोमोसोम कहते है) होते है तो कन्या जन्म लेगी, किन्तु यदि स्त्री के 24 गुणसूत्रों से पुरुष के गुणसूत्रों का वह ग्रुप मिले, जिसमें एक गुणसूत्र भिन्न प्रकृति का होता है (इसे बाँई क्रोमोज़ोम कहते है) तो सन्तान पुत्र होगा। अर्चिन के मामने में शुक्राणु का कार्य मैग्नीशियम द्वारा सम्पन्न होना यह बताता है कि अन्तरिक्षीय शक्तियों के माध्यम से गर्भ में पितृहीन सन्तानों को स्थापित किया जा सकता है। इस बा डा० यूजीन बटाइलोन में मेढ़क के अण्ड में पिन चुभोकर निषेचन की क्रिया के लिये प्रयास किया और इसमें उन्हें सफलता भी मिल गई। निषेचन का अर्थ है, गुणसूत्रों की संख्या दुगुनी हो जाना। यदि गुणसूत्रों की संख्या दुगुनी हो जाती है तो बिना पिता की सहायता से अण्ड में सन्तान रह सकती है। इस प्रयोग में ऐसा ही हुआ, पिन चुभाने से मेढ़क का निषेचन हो गया और उसको इस कृत्रिम गर्भाधान से ही सन्तान हो गई। यह प्रयोग खरगोशों पर भी सफल हुये। 15 जुलाई 1967 को, लन्दन से प्रकाशित होने वाली ‘टिटबिट्स’ पत्रिका में डा० जिराल्ड मैकनाइट ने यह लिखा है कि ब्रिटेन में इस तरह का क्रमबद्ध प्रयोग चल रहा है। 100 स्त्रियों ने अपने आपको कृत्रिम निवेचन के लिये प्रस्तुत किया। जिनमें कम से कम 8 महिलायें ऐसी थीं, जिन्हें बच्चा पैदा करने में किसी प्रकार पुरुष के सहयोग की आवश्यकता नहीं पड़ी। श्रीमती एमोनेरी जोन्स ने ‘मोनिका’ नामक पुत्री को जन्म दिया। वैज्ञानिकों ने जोन्स की पूरी देख-रेख की थी। वे इनके बारे में निर्विवाद थे, मोनिका के रंग-रूप आकृति, प्रकृति में मानवोचित गुण, धर्म एवं प्रकृति में बिलकुल अन्तर नहीं था। वैज्ञानिक अब उन तत्त्वों की खोज में है, जो कृत्रिम गर्भाधान की क्रिया में शुक्राणु (स्पर्म) का स्थान ले सकते है। इन प्रयोगों की सफलता देवाँ या ब्रह्माण्ड स्थित चेतन शक्तियों के रहस्यों की भी उद्घाटन करेगी।
अब एक ही प्रश्न शेष रह जाता है वह है, स्त्री के प्रजनन कोषों में बाई किस्म के गुणसूत्र की विद्यमानता अभी तक स्त्रियों के शरीर में इस गुणसूत्र की उपस्थिति का समर्थन नहीं हो पाया। यदि इतना और हो जाये तो किसी को यह मानने में आपत्ति शेष न रहेगी कि अमैथुनी सृष्टि का सिद्धान्त गलत है।
वैज्ञानिक स्पष्ट रूप से व्याख्या भले ही न कर पाये हों, किन्तु ऐसे प्रमाण मिल चुके है, जिनमें पुरुषों में पर्याप्त मात्रा में स्त्रियोचित गुण और स्त्रियों में पुरुषोचित गुण पाये गये है। अमेरिका में इन दिनों यौन-परिवर्तन सामान्य आपरेशन की श्रेणी में आता जा रहा है। वहाँ के अखबारों में आये दिन किसी लड़की को लड़का और लड़के को लड़की की योनि में बदल जाने के समाचार छपते रहते है। यह आपरेशन उन दशाओं में ही सम्भव है, जब कि यौन परिवर्तन की इच्छा करने वालों में परिवर्तन के लिए उपयुक्त गुण किसी न किसी अंश में पहले से ही विद्यमान् हों। इतिहास ऐसी घटनाओं से भरा पड़ा है, जिससे पता चलता है कि स्त्रियों में पुरुषों के और पुरुषों में स्त्रियों के तत्त्व भी होते है और यह तभी सम्भव है जब कि उनके वंश को निर्धारित करने वाले गुणसूत्रों में भी यह विशेषताएँ विद्यमान् हों। यदि यह सच है तो यह मानने में किसी को कोई आपत्ति ने होगी कि प्रकृति के प्रत्येक कण में पुरुष और स्त्री दोनों स्वभाव सनातन है, इसी को प्रकृति और परमेश्वर की-गिरा अरथ जल-बीच सम” अभिन्नता कहते है। मैड्रिक (स्पेन) में मेडिकल फैकल्टीके एक सर्वेक्षण में डा० जान केस्लर नामक एक डा० का बयान छपा है डा० केस्लर ने बताया कि लोजानो नामक व्यक्ति की स्त्री की दो जुड़वा सन्तानें हुई। एक बालक था, एक बालिका माँ के स्तनों में उतना दूध नहीं होता था, जितने से बच्चों की भूख मिट जाती। इस कारण बच्चे दिन भर रोया करते थे। संयोग से लोजानो के स्तन सामान्य पुरुषों के स्तनों से कुछ बड़े थे, सो वह बच्चों को बहलाने के लिये उन्हें अपने स्तनों में लगा लेता। बच्चे दूध पीने लगते, धीरे धीरे लोजानो के स्तनों से दूध निकलने लगा। दूध इतना निकलने लगा कि उसने अपने बच्चे को 5 माह तक दूध पिलाया, पिता का दूध पी पीकर बच्चा खूब स्वस्थ हो गया।
नीमेस के डा० रेवाल ने एक 15 वर्षीय बालक का परिचय छापा था, जिसके दोनों स्तन बालिकाओं की तरह के थे, कुछ दिन में उनसे इतना दूध निकलने लगा कि उसे शर्म से स्तनों में रुई बाँधे रहना पड़ता था।
जनवरी 1924 के एक अमेरिकन समाचार पत्र में जबोटा जियोबिच नाम के 22 वर्षीय सर्वियन युवक का समाचार छपा है और उसमें आश्चर्यपूर्वक स्वीकार किया गया है कि बेलग्रेड के अस्पताल में उसके पेट का आपरेशन करके 10 और 5 इंच लम्बे दे भ्रूण निकाले। इन भ्रूणों के गर्दन, छाती, हाथ, पाँव काफी पुष्ट हो चुके थे।
यह घटनायें पुरुषों की है और यह प्रमाणित करती है कि पुरुषों में स्त्रियोचित संस्कार होना असम्भव नहीं है। भले ही वे प्रसुप्त अवस्था में हों पर यदि वे विकसित किये जा सकें तो मनुष्य स्वयं भी अपने शरीर में अमैथुनी सृष्टि पैदा कर सकता है।
यही बात स्त्रियों के सम्बन्ध में भी है। उनमें अनेक बार पुरुषोचित गुण स्पष्ट रूप से देखने में आते है, यह तभी सम्भव हो सकता है, जब पुरुषों के गुण धर्म वाले सूत्र उनके शरीर में पहले से ही विद्यमान् हों।
अमेरिका की श्रीमती टेलर जैसे वृद्ध होती गई, उनकी दाढ़ी मूँछें काफी बड़ी निकल आई। इनकी दाढ़ी के बाल स्तनों के नीचे तक पहुँच गये थे। 1732 में ड्रेसडेन में रोजिने मार्गरेट मुलर का निधन हुआ। उनके निधन का समाचार छापते हुये डा० गाल्ड और डा० पाइले ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘एनामलीज एण्ड क्युरियासिटीज आव मेडिसन’ में लिखा है कि श्रीमती मार्गरेट मुलर के खूब घनी और लम्बी-लम्बी दाढ़ी-मूँछें थी।
नील्स होपर ने अपनी पुस्तक पुरुष-स्त्री (मैन इनटू अमैन) में लिखा है कि ड्रेसडन (जर्मनी) के शल्य चिकित्सक डा० वार्नेक्रुत्सने ने ईनर वेलनर नामक एक चित्रकार की शल्य-चिकित्सा की और उसे मनुष्य से स्त्री बना दिया। इसके जीवन का मनोरंजक वृत्तान्त भी इसमें छपा है। 18 अप्रैल 1943 के ‘हिन्दुस्तान स्टैर्ण्डड’ (जो कलकत्ता से छपता है) में जोरहाट के पास चारबाल गाँव के केवट की 17 वर्षीया सईदा खातून के पुरुष बन जाने का समाचार छापा है।
ऐसे समाचारों की हमारे पास इतनी अधिक जानकारी है, जिनसे एक स्वतन्त्र पुस्तक ही लिखी जा सकती हैं। यह समाचार, यह घटनायें, यह प्रमाणित करती हैं कि पुरुषों में स्त्रियोचित और स्त्रियों में पुरुषोचित गुणों की विद्यमानता प्रकृति का विलक्षण रहस्य है और उससे अमैथुनी सृष्टि का सिद्धान्त सत्य प्रमाणित होता है। प्रमाण और विज्ञान दोनों ही उसकी पुष्टि करते हैं। क्रमशः;
पंच-रत्न
महर्षि कपिल प्रतिदिन गंगा-स्नान के लिये जाया करते थे। मार्ग में एक गाँव पड़ता था। कृषक लोग उसमें रहा करते थे। जिस रास्ते से महामुनि जाया करते थे, उसमें एक विधवा ब्राह्मणी की भी झोपड़ी पड़ती थी। महामुनि जब भी उधर से निकलते विधवा या तो चरखा कातने मिलती या धान कूटते। पूछने पर पता चला कि उसके पति के अतिरिक्त घर में आजीविका चलाने वाला और कोई है नहीं, सारे परिवार का भरण-पोषण उसी को करना पड़ता है।
मुनि कपिल को उसकी इस अवस्था पर बड़ी दया आई। उन्होंने उसके पास जाकर कहा-भद्रे मैं इस आश्रम का कुलपति कपिल हूँ। मेरे कई शिष्य राज्य-परिवारों से सम्बन्ध रखते हैं, तुम चाहो तो तुम्हारे लिए, आजीविका की स्थायी व्यवस्था कराई जा सकती है। तुम्हारी असहाय अवस्था मुझसे देखी नहीं जाती।”
ब्राह्मणी ने आभार व्यक्त करते हुये कहा-देव आपकी इस दयालुता के लिये हार्दिक धन्यवाद। किन्तु आपने पहचानने में भूल की, न तो मैं असहाय ही हूँ और न ही निर्धन। आपने देखे नहीं, मेरे पास पाँच ऐसे रत्न हैं, जिनसे चाहूँ तो मैं स्वयं राजाओं जैसा जीवन प्राप्त कर सकती हूँ, मैंने उसकी आवश्यकता अनुभव नहीं की, इसलिए वह पाँच रत्न सुरक्षित रखे हैं।”
कपिल बड़े आश्चर्यचकित हुये, उन्होंने पूछा-भद्रे अनुचित न समझे तो वह रत्न कृपया मुझे भी दिखायें। देखूँ तो तुम्हारे पास कैसे रत्न हैं।”
ब्राह्मणी ने आसन बिछा दिया। बोली-आप थोड़ी देर बैठें, अभी रत्न दिखाती हूँ।” यह कहकर ब्राह्मणी पुनः चरखा कातने लगी। थोड़ी देर में उसके पाँच बेटे विद्यालय से लौटकर आये। उन्होंने माँ के पैर छूकर कहा-माँ हमने आज भी किसी से झूठ नहीं बोला, किसी की बुराई नहीं की, किसी को कटु वचन नहीं कहा, गुरुदेव ने जो सिखाया और बताया उसे परिश्रमपूर्वक पूरा किया है।”
कपिल मुनि को और कुछ कहने की आवश्यकता नहीं पड़ी, उन्होंने ब्राह्मणी को प्रणाम कर कहा-भद्रे सचमुच तुम्हारे पाँच रत्न बहुमूल्य हैं, ऐसे अनुशासित बच्चे जिस घर में, जिस देश में हों, वह कभी अभाव ग्रस्त नहीं रह सकता।”
17 मई 1958 को लन्दन से छपने वाले दैनिक अख़बार ‘डेली मिरर’ में जीर्ण और खोये हुये स्वास्थ्य को पुनः युवावस्था में बदलने का विज्ञापन छपा था। यह प्रयोग धनी आदमियों को उनकी विलासिता से शेष बचे शरीर को फिर से यौवन में बदलने और खूब पैसा कमाने के लिये किया गया है। हुआ है यह सब मानवता की सेवा के नाम पर उसके पीछे उद्देश्य और औषधि-निर्माण की प्रक्रियाएँ कितनी दानवीय हैं, आज के शिक्षित समाज को यह जानने की आवश्यकता ही कहाँ है। इंग्लैण्ड के एक डा० नीहान्स महोदय को यह औषधि बनाने का श्रेय मिला है। गर्भिणी भेड़ों के भ्रूण निकाल-निकाल कर उनका सत निकाला और उसे जवानी की दवा के रूप में प्रयोग किया। इस दवा से कुछ महीनों के लिये ही उत्तेजना आई और फिर वे सेवन-कर्ता और भी अधिक गई-गुजरी स्थिति में चले गये।
30 नवम्बर 1960 के ‘एलू यूनियट’ दैनिक पत्र (यह पत्र अमेरिका के ब्राजील राज्य में फोर्टालीजा नगर से निकलता है) में ‘वैक्सीनेशन आन सन्टे’ शीर्षक से एक समाचार छपा, जिसमें एक टीका लगाने से 20 व्यक्तियों के पागल होकर मर जाने की सूचना दी गई है। यह टीका 108 व्यक्तियों को तब तक और भी लग चुका था, जो या तो अस्पताल में अपना इलाज करा रहे थे अथवा पागल होकर घरों में भूँक रहे थे।
यह टीका निरन्तर बीस वर्षों तक पशुओं को मार-मारकर और बुरी तरह के प्रयोग और परीक्षणों के बाद फोर्टलीजा को स्वास्थ्य डाइरेक्टोरेट के डाइरेवटर डा लिटन ने इस आशा से बनाया था कि उससे विश्व भर में उनकी ख्याति हो जायेगी और अथाह धन मिलेगा। पर परीक्षण के नीचे आते ही टीके के विषाक्त पहलू सामने आ गये और उसने तीन लाख आबादी वाले इस शहर में हाहाकार मचा दिया। एक घर की तो ऐसे बरबादी हुई, जिसका वर्णन भी नहीं हो सकता। एक लड़के की इस टीके से मृत्यु हो गई। दूसरा बिलकुल कुरूप हो गया। बाप स्वयं भी पागल हो गया। प्रतिशोध वश वह डाक्टर के पास पहुँचा और उसे भी बुरी तरह घायल कर दिया। सारे नगर में इस टीके का आतंक छा गया, तब सरकार ने सड़कों पर लाउडस्पीकर लगवा-लगवाकर लोगों को उससे बचने और जो खरीद चुके हैं, वापिस करने की आज्ञा प्रसारित की, जबकि इससे पूर्व वह सरकारी अधिकारियों द्वारा प्रमाणित भी किया जा चुका था।
यह दुष्परिणाम आज के शिक्षित समाज को यह सोचने के लिये विवश करते हैं कि कुछ अधिकारियों की वैज्ञानिक प्रामाणिकता को ही शिरोधार्य नहीं किया जा सकता। प्रकृति का नियम है, दण्ड -बुरे कार्य के दण्ड से यदि हम बचना चाहेंगे तो वह प्रतिक्रिया और भी तीव्र और सामूहिक होगी, उसका दुष्परिणाम सारे समाज को भोगना पड़ेगा। ऐसा ही सब कुछ आज हो रहा है और यदि हम उससे बचना चाहते हैं तो हमें मनुष्य जीवन के सूक्ष्म, धार्मिक, ईश्वरवादी, मानवतावादी पहलुओं को स्वीकार करना ही पड़ेगा। अन्यथा एक दिन मनुष्य, मनुष्य को ही खाने लगेगा और अब जो थोड़ी बहुत स्नेह, उदारता का प्रकाश रहा है, वह भी निश्चित रूप से नष्ट हो जायेगा।
“वैज्ञानिक अन्ध-विश्वास और उसकी लाल रोशनी” शीर्षक से पिछली जुलाई 69 की अखण्ड-ज्योति में एक लेख दिया गया था, उसमें बताया गया था कि औषधियों के लिये प्राणियों की किस प्रकार हिंसा की जाती है। कैसे-कैसे उत्पीड़ित करके उन पर प्रयोग किये जाते हैं। उनके रक्त, मल-मूत्र से जाने कैसी-कैसी औषधियाँ बनती और जन स्वास्थ्य सेवा के नाम पर प्रयुक्त की जाती हैं। यदि विश्लेषण करके देखा जाये तो यह सब कुत्सित प्रयोग केवल व्यवसाय बहुत धन कमाने अथवा नोबुल पुरस्कार के लोभ में किये गये होते हैं। सेवा तो तथाकथित प्रयोग परीक्षण और औषधि निर्माण का ऊपरी खोल है, जिससे कि हिंसा की कुत्सा ढकी और छिपी रहे।
उत्पीड़ित पशुओं के शरीर का माँस, मल-मूत्र मनुष्य जीवन को किस प्रकार पीढ़ी दर पीढ़ी कुसंस्कारित करता जा रहा है, इसका स्पष्ट निर्णय करना हो तो पाठकों को पंजाब और उत्तर प्रदेश के उन क्षेत्रों की यात्रा करनी चाहिये, जहाँ आम अधिक पैदा होते हैं। इन प्रान्तों में कई देशी आमों के नाम सौंफिया, हिंगहा, केशरी, कपूरी आदि होते हैं। यह नाम इसलिये होते हैं कि इन आमों में सौंफ, हींग, केशर और कपूर की सी सुगन्ध भी भाया करती है। यह सुगन्ध अपने आप नहीं आती। किसान आम की गुठली रोपने से पहले सौंफ, हींग, केशर आदि जिस किसी तरह की सुगन्ध वाला आम चाहता है उसके घोल में उस गुठली को डाल देता है। तीन-चार दिन उसी में पड़ी रहने पर वह गुठली उस वस्तु के गुण ग्रहण कर लेती है। इसके बाद गुठली बो देते हैं, यदि गुठली सौंफ के घोल में रखी गई है तो उस आम के वृक्ष में आने वाले सभी फल सौंफ की सुगन्ध वाले होते हैं। किसी भी आम की गुठली लेकर उसका रासायनिक विश्लेषण करें तो उसमें सौंफ नाम की कोई वस्तु नहीं होगी पर इस आम की गुठली चाहे कहीं भी, चाहे कई पीढ़ियों बाद कहीं लगाई जाये तो भी उसके फलों में तब तक वही सुगन्ध बनी रहेगी, जब तक उससे भी तीव्र प्रभाव से गुठली को संस्कारित न किया जाय।
संस्कार भौतिक प्रकृति के गुण नहीं अत्यन्त सूक्ष्म और मनोमय चेतना है पर उसकी सत्यता उपरोक्त प्रयोग से ही परखी जा सकती है। अब जबकि भेड़, सुअर, बन्दर, कुत्ते, बिल्ली, चूहे, कबूतर आदि पशु-पक्षियों के दुर्गुण युक्त मल-मूत्र रक्त-माँस शरीर में औषधि रूप में जायेंगे तो उसके क्या प्रभाव होंगे? यह हममें से प्रत्येक व्यक्ति को विचारणा ही चाहिये। यह अन्धाधुन्ध प्रयोग संस्कार ही नहीं स्वास्थ्य के लिये भी बड़े घातक हैं। अमेरिका, इंग्लैण्ड और फ्राँस में आज ही जितना अधिक वीर्य-रोग बढ़े हैं, वही इतनी बड़ी चिन्ता के कारण हैं कि वहाँ कुछ दिनों में ही पैदा होने वाला कोई भी बच्चा ऐसा न होगा, जो वीर्य रोग से बचा होगा। रूस को विश्व में बढ़ रहे पूँजीवाद का उतना खतरा नहीं, जितना अपने देश के नवयुवकों में बढ़ रही नपुंसकता का था। इंजेक्शनों, औषधियों और आहार में सिवाय विष, कीटाणु और रक्त-माँस के, हमारे शरीरों में और जाता भी क्या है। अब उसके दुष्परिणामों की कल्पना भी हमें ही करनी चाहिये।
आज का वैज्ञानिक संसार औषधि क्षेत्र में खूब उन्नति कर रहा है। नया रोग पैदा होने में कम समय लगता हैं, उसके इलाज बनने में देर नहीं लगती। चमत्कारी औषधियाँ तुरन्त तैयार होती हैं और सजी-सजाई वेषभूषा में सभ्य ओर शिक्षित लोगों तक पहुँचती है। लोग दवाओं की प्रशंसा भी करते हैं, पैसे भी देते हैं और अनजान में ही नये-नये रोगों की जड़ें अपने शरीर में भरते चले जाते हैं। इन बुराइयों की विस्तृत जानकारी कोई पढ़ना चाहें तो उसे प्रसिद्ध अमेरिकी वैज्ञानिक डा डब्ल्यू हिम्स की पुस्तक - ‘डाक्टरों के विरोध में’ (रिवेल्ट अगेन्स्ट डार्क्टस) और डा नार्मन बार्नबी एमूडी की पुस्तक डाबटरी अन्धेर और पाप’ (मेडिकल चाओस एण्ड क्राइम) पढ़ना चाहिये। उन्होंने इन पुस्तकों में लिखा है कि आधुनिक विज्ञान बिलकुल खोखला है और औषधियों के नाम पर मानवता एवं जनस्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। इन्होंने लिखा है कि स्टेप्टोमाइसीन के प्रयोग से आँखों और कानों में खराबी आती है। पेन्सिलीन से चमड़ी में दूषित प्रतिक्रिया होती है। क्लोरटेट्रासाइक्लीन और आक्सीटेट्रासाइक्लीन के प्रयोग से पेट में अन्न पचाने वाले कीटाणु नष्ट हो जाते हैं, इनमें तीव्र विष होता है। क्लोरम्पैनिकोल हड्डियों के द्रव में खराबी उत्पन्न करता हैं, जिससे शरीर का रक्त सूख जाता है। एलोपैथी की प्रायः सभी औषधियाँ तीव्र प्रतिक्रिया वाली होती हैं और उससे शरीर के किसी न किसी हिस्से की शक्ति का ह्रास और विषवर्द्धन ही होता है।
सब लोग स्पष्ट जानते हैं कि डी डी टी कीड़ों को मारने वाली एक विषैली औषधि है तो भी उसे जानबूझ कर खाद्य पदार्थों में मिलाया जाता है और यह सब डाक्टरी निरीक्षण में इस दृष्टि से किया जाता है, जिससे कि उन पदार्थों में किसी प्रकार के कीटाणु न पड़ें। विदेशों से आने वाले अनाज में दस लाख टन अनाज में सात टन डी डी टी होती है। जिस प्रकार पीढ़ी दर पीढ़ी और अधिक दूषित प्रभाव डालते चले जाते हैं, उसी तरह इन औषधियों के सूक्ष्म संस्कार आने वाली पीढ़ी को किस तरह कमजोर और अष्टावक्र बनायेंगी, उसका सहज में ही अनुमान नहीं लगाया जा सकता।
“अथातो ब्रह्म जिज्ञासा” तात्! जिसकी ब्रह्म-दर्शन की जिज्ञासा जितनी प्रबल होती है, वह उतनी ही शीघ्रता से नारायण का दर्शन करता है, ब्रह्म ही क्यों वत्स! जिज्ञासा तो मनुष्य को किसी भी कला, किसी भी विद्या का पारंगत बना देती है। हमारे आशीर्वाद तुम्हारे साथ हैं, तुम आश्रम में रहो और तप करो एक दिन तुम्हें निश्चित हो भगवान् का साक्षात्कार होगा यह कहकर महर्षि ऐलूष ने राजकुमार नीरवता की पीठ पर हाथ फेरा और उन्हें सामान्य शिक्षार्थियों की तरह छात्रावास के एक सामान्य कक्ष में रहने का प्रबन्ध कर दिया।
नीरवता पहली बार अपना सामान अपने हाथों से उठाया। वे प्रथम बार एक ऐसे निवास में ठहरें, जिस तरह के निवास में उनके दास-दासियाँ भी नहीं रहते थे। नीरवता ने उस दिन ही उतना सादा भोजन ग्रहण किया था। आश्रम व्यवस्था के अपमान की बात न रही होती तो वह उस थाल को, जो उनके लिये परोसा गया था, दूर फेंक देते। सायंकाल होने में विलम्ब लगा रहेगा पर जीवन की इन प्रारम्भिक विपरीत दिशाओं में अविलम्ब ही मस्तिष्क में क्राँति, विचार-मन्थन प्रारम्भ कर दिया। इतना शुष्क जीवन नीरवता ने पहले कभी नहीं देखा था, इसलिये उससे अरुचि होना कुछ स्वाभाविक ही था।
शयन में जाने से पूर्व उन्होंने एक अन्य स्नातक को बुलाकर पूछा-तात् आप कहाँ से आये हैं? आपके पिता क्या करते हैं?आश्रम में निवास करते आपको कितने दिन हो गये? क्या आपने सिद्धि प्राप्त कर ली? क्या आपने ईश्वर का साक्षात्कार कर लिया?”
प्रश्न करने की इस शैली पर स्नातक को हँसी आ गयी, उसने कहा- “मित्र! शेष प्रश्नों का उत्तर बाद में मिलेगा, अभी आप इतना ही समझ लें, मैं उपकोशल का राजकुमार हूँ और यह मेरा समापन वर्ष है, आप यहाँ प्रवेश ले रहे है। “तरुण स्नातक ने अपने तेजस्वी ललाट का, वक्ष स्थल उत्पन्न कर ऊपर उठाया और ऋषि ऐलूष जहाँ रहते थे, उस और चला गया।
नीरवता किंकर्तव्यविमूढ़ वस्तुतः मुखाकृति राजकुमारों से कम नहीं पर यह सभी स्नातक इतनी सरल वेषभूषा में, इतने मौन धारी और इतने अनुशासन बद्ध क्या इनकी अपनी इच्छाएँ कुछ हैं ही नहीं? क्या इनकी सुखाकाँक्षायें नष्ट हो गई है? सच पूछा जाये तो नीरवता का माथा फट गया होता, इस तरह के प्रश्नों से, किन्तु अच्छा हुआ उन्हें निद्रा देवी ने विश्राम दिया।
प्रातःकाल सूर्योदय से दो घड़ी पूर्व ही जब भगवती रूपा के आगमन की तैयारी हो रही थी, सब स्नातक जाग पड़े, प्रार्थना हुई, उसी हलचल में नीरवता की निद्रा टूट गई। नीरवता ने शैया का परित्याग किया। शरीर हल्का था। शौच-स्नान से निवृत्त होकर वह गायत्री-वन्दन के लिये आसन पर बैठे। आज आश्रम जीवन का प्रथम दिन था। ध्यान तो नहीं जमा पर चिन्तन से एक बात सामने आई-जब देह नष्ट हो जाती है, तब भी क्या राजा ड़ड़ड़ड़ स्त्री-पुरुष बाल-वृद्ध का भेद रह जाता है, नहीं नहीं। मनने कहा नहीं। जीवन के दृश्य भाग नश्वर हैं, क्षणिक हैं, असन्तोषप्रद है, जब तक मनुष्य पूर्णता नहीं प्राप्त कर लेता, तब तक उसे ऐसी कोई मान्यता नहीं बना लेनी चाहिये। इस चिन्तन से कल वाला बोझ हल्का हो गया। राजकुमार नीरवता ने मान लिया कि वह भी शरीर में अभिव्यक्त, अव्यक्त आत्मा है और उसे पाने के लिये अहंभाव छोड़ना ही पड़ता है।
किन्तु यह अहंभाव भी कितना बलवान् है कि मनुष्य को बार-बार अपने शिकंजे में कसता ही रहता है। उससे यदि कोई बचाव कर पाता है तो वह है निरन्तर विचार भावनाओं के प्रवाह ओर प्रबल निष्ठाएं। नीरवता ने विचार करने की कला सीखी, भावनाओं को उभार देना सीखा तो भी अहंकार का अपराध अभी पीछा नहीं छोड़ रहा था। वह कभी-कभी सह स्नातकों से ही झगड़ बैठते, कभी-कभी शिक्षकों से भी दुराग्रह कर बैठते। उस समय उन्हें लगता कि उनके पक्ष में न्याय है पर जब भी वह विचार की तुला उठाते और विराट् जीवन की तुलना में अपनी छोटी-सी इकाई को तोलते तो अहंकार तिरोहित हो जाता। मान मर्यादा, मोह, दम्भ, दुराग्रह सब कुछ तिरोहित हो जाता। नीरवता अपने को शुद्ध चेतन, अर्थात् आत्मा अनुभव करते शिक्षण का यह क्रम ही उनके अन्तर को परिवर्तित परिष्कृत और विकसित करता हुआ चला जा रहा था। मान्यताओं के प्रति दृष्टिकोण परिवर्तन के साथ-साथ उनका व्यक्तित्व भी विकास होता जाता। तो भी अभी वे अविराम स्थिति में ही थे। अपरिपक्व अवस्था में ही थे।
आश्रम का नियम था कि सभी स्नातक भिक्षाटन के लिये जाया करते थे। तब भिक्षा केवल सत्कार्य के लिये संन्यासियों को भोजन के रूप में और आश्रमवासी ब्रह्मचारियों को धान्य के रूप में दी जाती थी, इसके अतिरिक्त और कोई भी व्यक्ति भिक्षा नहीं माँग सकता था। आश्रम राजाओं के दान से चलते थे तो भी यह परम्परा थी, स्नातक अपने आपको समाज का एक बालक ही समझें, वे कभी अहंकार न करें, इसलिये भिक्षावृत्ति प्रत्येक स्नातक के लिये आवश्यक थी। वीरव्रत को इस तरह का आदेश प्रथम बार मिला था। एक बार उनका वर्षों का प्रसुप्त अहंभाव पुनः जाग पड़ा था। एक राजकुमार कभी भिक्षा नहीं माँग सकता। इस तरह का प्रतिवाद उनके अन्तःकरण ने किया था, किन्तु पुनश्च वही अर्थात् ब्रह्म जिज्ञासा नीरवता को अपने आपको दबाना ही पड़ा।
भिखारी नीरवता। भिक्षापात्र लिये एक ग्राम में प्रविष्ट हुये। किसी के दरवाजे जाते, उन्हें लज्जा अनुभव हो रही थी। ग्राम प्रमुख की कन्या विद्या ने उस संकोच को पहचाना। उसने एक मुट्ठी धान्य लिया और नीरवता के समीप ले जाकर भिक्षापात्र में डालने की अपेक्षा भूमि पर गिरा दिया। स्नातक ने पूछा-भद्रे यदि जान-बूझकर अन्न को फेंकना ही था तो आप उसे लेकर यहाँ तक लाई ही क्यों?”
विद्या ने हँसकर उत्तर दिया- “तात्! मैंने ही क्यों संसार ही ऐसा करता है, हमने जीवन किसके लिये ग्रहण किया ओर उसका उपयोग कहाँ करते हैं? हम किस उद्देश्य से आते है और वह उद्देश्य हमें पूरा करते कितना संकोच, कितना भारीपन लगता है, क्या यह धान्य बाहर गिराने की तरह का ही अपराध नहीं हुआ। “
नीरवता की आँखें खुल गई। किसी भी लक्ष्य की प्राप्ति के लिये दृढ़ता अपेक्षित है, ऐसा निश्चय कर लिया जब उन्होंने तो उनकी लज्जा और उनका अहंभाव धुल गया। और वे प्रसन्नतापूर्वक संग्रह भिक्षाटन के लिये आगे बढ़ गये।
भिक्षापात्र को आश्रम के कोष में पहुँचा आये नीरवता, वह अब उस बोझ से हल्के हो चुके थे, जिसने अब तक के जीवन को जटिल, भ्रमपूर्ण और असंतोष में रखा था। नीरवता जब सायंकाल संध्या करने के लिये बैठे तो शून्य की शांति में इस तरह खो गये, जैसे उनका बाह्य जीवन से सम्बन्ध ही न रहा हो। उनकी इन्द्रियाँ, उनका मन, उनकी सम्पूर्ण चेतना देह के अहंभाव से उठकर अनन्त अन्तरिक्ष में फैल गयी थी, वे अब संकीर्ण परिधि से निकलकर अनन्तता की अनुभूति कर रहे थे। अपने आपको निर्मल, स्वच्छ, धुला हुआ, शान्त, संतुष्ट और बहुत हल्का-फुलका अनुभव कर रहे थे।
समुद्री यात्रा से लौटे हुए एक यात्री ने एक गोताखोर से पूछा-बन्धु मैं तो हजार मील यात्रा कर आया पर मुझे तो कहीं, एक भी मोती न मिला, तुम तो एक दिन में ही ढेरों मोती ढूँढ़ लेते हो?”
गोताखोर ने डुबकी लगाने से पूर्व कहा-भाई मैं अपने जीवन को संकट में डालकर गहरे में उतरता भी तो हूँ, तुम्हारी तरह चलता ही नहीं रहता। “
काम, प्रेम, गृहस्थ और दाम्पत्य आदि के लिये इन जीवों का जगत् बड़ा विचित्र है, कई जीवों में जोड़ों की घनिष्ठता ऐसी प्रगाढ़ होती है कि एक के न रहने पर दूसरे का दुःख शरीरान्त से ही छूटता है। कबूतर के बारे में यजुर्वेद तक में उदाहरण देते हुए बताया है- मित्रवरुणा-भ्याँ कपोतान्” मित्रता, प्रेम और दाम्पत्य-निष्ठा हममें कपोतों जैसी हों। सारस भी ऐसा ही पक्षी है, जोड़े में कोई एक बिछुड़ जाये तो दूसरा बहुत दुःखी हो जाता है। पंड़ुक नर मर जाता है तो उसकी मादा उसके शव में शरीर फूट-फूट कर विलाप करती है। उसका वह आर्तनाद देखकर मनुष्य के भी आँसू आ जाते है और ऐसा लगता है कि मनुष्य में भी ऐसा निष्ठा होती तो उसका जीवन कितना सुखमय होता।
थोड़ी सी बात में गाल फुला लेने और सप्ताहों मन में क्रोध भरे रहने की बेवकूफी केवल मनुष्य ही करता है। अन्य जीव नहीं। सृष्टि के प्रायः सभी जीव प्रबल प्रतिरोधी या आक्रमण की स्थिति में ही क्रोध व्यक्त करते हैं, अन्यथा उनका जीवन बड़ा हल्का-फुल्का और विनोद प्रिय होता है। मनुष्येत्तर जीवों का यह मनोविनोदी स्वभाव देखते ही बनता हैं। पेन्गुइन पक्षी अपनी पत्नी से मनोविनोद के लिये अपनी चोंच उसकी चोंच में डालकर बड़ी देर तक विचित्र क्रियायें करके उसका मन प्रसन्न करता है। कछुआ अपनी मादा की आँख को खुजलाता और पीठ पर हल्की चपत सी लगाकर खेल करता है। मैडम अब्रू नामक क्यूबा की एक महिला के पास एक चिंपेंजी था, वह बड़ा ही मजाकिया स्वभाव का था। नर जाति के इस चिंपेंजी की विशेषता यह थी कि वह हमेशा अपनी मादा के साथ ही रहता, कोई स्त्री पास आ जाये तो कोई बात नहीं पर किसी आदमी के पास पहुँचते ही वह अपनी पत्नी को छिपा लिया करता था। ऐसा करते समय वह मुस्कराता भी था। लोग इसके इस विनोद का घंटों आनन्द लिया करते थे पर वह मानों खेल-क्षेत्र में ही मनुष्य के प्रति अविश्वास और व्यंग व्यक्त किया करता था। पराई इज्जत पर हाथ साफ करने की मानवीय दुष्प्रवृत्ति के नाम पर चिंपेंजी का यह व्यंग अयुक्ति संगत नहीं कहा जा सकता।
बया को खेल-कूद और मनोविनोद की जिन्दगी विशेष प्रिय है, वह इधर-उधर से, कहीं से रुई या डोरा ढूँढ़ लाता है, फिर उससे झूला बनाकर स्वयं भी झूलता है, पड़ोसियों और बच्चों को भी झुलाता है, बीच-बीच में क्या उनको सिखाती और समझाती भी है। नृत्य का भी आनन्द लेती है। पेन्गुइन पक्षी बर्फ में फिसलने का एक विशेष खेल खेलता है। बत्तखों की जल-क्रीड़ा देखते ही बनती है। कोयल का गाना और मैनाओं की मनुष्य की भाषा की नकल करना भी कम मनोरंजन नहीं। आश्चर्य की बात यह हे कि नृत्य आदि उत्सवों में अधिकांश विनोदी कार्य नर को ही करने पड़ते हैं। गौरेयाव दिन में कई बार खेल-खेल में वकली गुडाभ्यास करती है। कई चिड़ियाँ नटों जैसे करतब दिखाकर अपने अन्य साथियों को हँसाती है।
और तो और अतिभ्य और मैत्री भाव के लिये भी पशु-पक्षियों का संसार मानवीय क्षेत्र से अधिक सुन्दर और विश्वस्त है। सजातियों से प्रेम तो सभी कर लेते हैं, अपने परिवार का आदर-सत्कार कर लेना बड़ी बात नहीं हृदय की विशालता और सौजन्य की रक्षा तब होती है, जब मनुष्य अपने परिश्रम से उत्पन्न किये धन और वस्तुओं को केवल आत्मीयता ओर मैत्री के सुख के लिये दूर से आये अतिथियों को खिला-पिलाकर अथवा देकर प्रसन्न होता है। यह सत्प्रवृत्ति ही मनुष्य को संकीर्णता से निकालकर विराट् के साथ संबंध स्थापित करने में सहायता करती है पर आज का मनुष्य तो इन सद्गुणों को भी भूलता जा रहा है।
आपको इस बात का अनुभव तब हो, जब आप कभी ध्रुव प्रदेश की यात्रा करें। वहाँ का निर्जन क्षेत्र और बर्फ से ढके पहाड़ आपको शायद ही कुछ दे सकें पर उस प्रदेश के निवासी-मनुष्य नहीं, पक्षी आपकी उतनी आवभगत करेंगे, जितनी आपके कोई अत्यन्त प्रिय संबंधी कर सकते होंगे। आदर सूचक मीठी बोली बोलती हुई, वह अनेक साथियों के साथ पंक्तिबद्ध होकर आपको और चल देंगी। कोई जीव पशु या पक्षी मनुष्य के पास जाकर उसके विश्वासघात का भोजन बन सकता है पर विचारा साधारण-सा पक्षी आपके पास निर्भय इस दृष्टि से आता है कि आप उसकी पीठ पर हाथ फेरेगें और पुचकारेगें, प्यार करेंगे। आपका मिष्ठान ओर मखमली गद्दों से स्वागत कर सकते होते, यह वस्तुएँ उनके पास होती तो अवश्य ही आपके आतिथ्य में वे यह सब प्रस्तुत करते।
शुतुरमुर्ग अपने लम्बे डीलडोल और लम्बी दौड़ान के लिये तो प्रसिद्ध है ही सहृदयता और मित्रभाव के लिए भी लोग उसका उदाहरण देते हैं, इसकी मैत्री प्रायः जेबराओं के साथ होती हैं अन्य चौपाये भी यदि इसके निवास-स्थान के आस-पास आ जाये तो यह उनसे भी बड़ी जल्दी घनिष्ठता स्थापित कर लेता है, उसमें न तो उसका कोई स्वार्थ है, न भय। आत्म-सन्तुष्टि के लिये ही वह मित्रता करता है और जिसके साथ मैत्री करता है, उसको अन्त तक निभाता भी हैं मनुष्यों की मित्रता अधिकांश स्वार्थ और मतलब खुदगर्जी की होती है, मित्र के लिये आत्मोत्सर्ग वाली दृढ़ता एकाध मनुष्य में ही होगी पर शुतुरमुर्ग जिसके साथ दोस्ती करता है, उसे न केवल उसकी असहाय अवस्था में उसके भोजन, पानी का प्रबन्ध करता है वरन् वैसे भी उसे कुछ न कुछ खिलाता रहता है। जेबराओं से विशेष मैत्री का कारण यह है कि जेबरा स्वयं भी उसे अच्छी-अच्छी वस्तुएँ खाने को देते हैं और उसके प्रत्युपकार के लिये, वह अपनी ऊँची गर्दन से आस-पास के क्षेत्र में चौकसी रखता है, कोई शिकारी या आक्रमणकारी हिंसक जीव दिखाई दे जाये तो जेबरा अपने मित्र की तुरन्त आगाह करेगा उसे किसी सुरक्षित स्थान पर पहुंचायेगा।
खेलना आसेर प्राकृतिक सौंदर्य वाले स्थानों में भ्रमण का आनन्द लेने के लिये पशु-पक्षी सैकड़ों कोस की यात्रा करते और अपनी प्रकृति-स्िता का परिचय देते हैं। घुमक्कड़ प्रकृति के लिये स्टिल्ट सबसे आगे हैं, वह अमेरिका और उत्तरी-ध्रुव तक की यात्रा करता है और सुन्दर स्थानों में चार-चार महीने तक रहता है। खंजन चिड़िया ऋतु परिवर्तन के साथ उत्तर से दक्षिण की और बढ़ता रहता है। भुज (कच्छ) के रन और बेटों में जहाँ समुद्री पानी जमा रहता है, वहाँ संसार के कोने-कोने से गर्मियों में पक्षी आकार, वहाँ का आनन्द लेते हैं। साइबेरिया के पक्षियों को भरतपुर के जलाशय और झीलें बहुत पसन्द है, वहाँ प्रति वर्ष जीव-विशेषज्ञों को इसलिये खींच लाते हैं, ताकि वे जीवनों की इस घुमक्कड़ प्रवृत्ति का अध्ययन कर सकें। संसार के अनेक जीव विशेषज्ञ आश्चर्यचकित है कि इतनी अधिक मात्रा में भारत भ्रमण पर जाने का रहस्य क्या हैं जो कुछ भी ही एक स्थान पर जमकर सड़ी-गली जिन्दगी बिताने वाले मनुष्यों को उनसे एक प्रेरणा अवश्य मिलती है कि यह जीवन प्राकृतिक सौन्दर्य का रसास्वादन करते जिया जाय। कृत्रिम जीवन में ही आसक्त रहकर भावी पीढ़ी को दिग्भ्रांत न किया जाये। इस जीवन में थकावट और नये रक्त के लिये बोझ रहता है, उस बोझ की परेशानी न स्वयं उठाई जाये और न औरों पर थोपा जाये।
जीव-जन्तुओं जितनी भी दया, करुणा, उदारता, मैत्री-भावना परिश्रम-शीलता प्रेम ओर निष्ठा मनुष्य में होती तो वह आज की अपेक्षा कहीं अधिक सुखी होता। पर उसे तो अपनी बुद्धि का, ज्ञान का अभियान है। वह यह समझता है कि भावनाओं का अन्त करके जीवन में मानवीय संवेगों और मर्यादाओं को तोड़कर अधिक सुखी रहा जा सकता है। दरअसल यह उसकी बुद्धिमानी नहीं मूर्खता ही है। बुद्धिशाली व्यक्ति विवेकी न हो तो उस अर्जित ज्ञान का भी कोई महत्व नहीं रह जाता, फिर मनुष्य यह भी तो नहीं कह सकता कि ज्ञान की सर्वाधिक पूँजी उसी के पास है। सृष्टि के अन्य जीवधारियों में भी मनुष्य के समान ही अद्भुत ज्ञान और विलक्षण-प्रतिभायें पाई जाती है।
चींटी का भूमिगत निवास स्थान कभी देखें तो उनके बुद्धि कौशल का पता चले। यह जमीन में सुरंगें बनाकर रहती है, जो 15-20 फुट क्षेत्र तक में फैली होती है। इन सुरंगों में हजारों लाखों कमरे होते हैं। यह कमरे विभागशः होते हैं, जल भण्डार के कमरे अलग, चिकित्सालय अलग कुछ कमरों में चींटियों का खाद्य निगम काम करता है और कुछ में उनके सिपाही सैनिक अभ्यास। मजदूरों के कक्ष अलग और रानी चींटी का विशाल हवादार महल अलग यदि उनमें बौद्धिक क्षमताएँ न होतीं तो इतनी सुन्दर कल्पना का साकार स्वरूप कहाँ से आ जाता? दीमक अपने घरों को इस तरह उठाती है कि उसमें हवा-पानी तूफान और ऊपर के धमाके की भी कोई प्रतिक्रिया भीतर तक नहीं पहुँच सकती। यह दोनों जन्तु मौसम विशेषज्ञ होते हैं, मशीनें धोखा दे सकती है पर वर्षा होने के समय की इतनी अच्छी जानकारी उन्हें होती है कि एक बूँद आने से पहले ही अपना सारा सामान ढोकर सुरक्षित स्थानों पर पहुँचा देती है और पानी आने से पहले ही स्वयं भी छिप जाती है।
एक बार मास्को (रूस) के एक कारखाने के प्रमुख सहायक इंजीनियर अनातोली बाइकोव ने कही यह पढ़ा कि पक्षियों में बहुत दिनों तक याद रखने वाली विलक्षण स्मरण शक्ति होती है, उसने इससे लाभ उठाने का निश्चय किया। उसने कुछ कबूतर पाले और उन्हें मशीनों का ज्ञान कराया और ऐसा प्रशिक्षण दिया कि मशीन का जो पुर्जा खराब हो कबूतर चोंच मारकर उसका संकेत कर दिया करें। कई तरह की कठिनाइयों के बावजूद भी यह प्रशिक्षण चलता रहा और एक दिन उसने इसमें महत्त्वपूर्ण सफलता पाई। कई प्रशिक्षित कबूतरों ने एक घंटे में 4-5 हजार तक पूर्जों की जाँच का काम करना सीख लिया। कबूतरों को उक्त प्रशिक्षण 4-5 दिन में ही दे दिया जाता हैं। तीन सप्ताह में तो वे उसके विशेषज्ञ हो जाते हैं, रूस का यह प्रयोग एक दिन अन्य जीव-जन्तुओं को मनुष्य की समानता में लाकर खड़ा कर दे तो कोई आश्चर्य नहीं। ऐसे प्रशिक्षित कबूतर तो रंग ही नहीं उँगलियों के निशान जैसी सूक्ष्म बातों का पता लगा लेते है, यह देखकर मानना पड़ता है कि मनुष्य ही नहीं, पशु-पक्षी भी बुद्धि और ज्ञान रखते है।
सन् 1941 में दो वैज्ञानिक ने चमगादड़ की विचित्र ज्ञान-शक्ति का पता लगाकर बताया कि वे जीते, जागते प्राकृतिक रैडार है। रैडार यन्त्र का सिद्धान्त ध्वनि पर आधारित है। किसी भी ध्वनि प्रेषक वस्तु की विद्युत चुम्बकीय तरंगें वायुमण्डल में टकराती है। रैडार के यन्त्र उस ध्वनि के आधार पर ही उस वस्तु की दूरी, गति आदि का पता लगाने है पर यह तो उन वस्तुओं तक ही सीमित है, जिनकी ध्वनि काफी स्थूल होती है। संसार के सभी पदार्थ गतिशील है, इसलिये उन सबको अत्यन्त सूक्ष्म कम्पन हुआ करता है, उस कम्पन की ध्वनि इतनी बारीक होती है कि बड़ी शक्ति वाला लाउडस्पीकर लगाकर भी उसे नहीं सुना जा सकता। उसे सुनने के लिए अति उच्च आवृत्तियों की ग्रहण शीलता चाहिए। यह शक्ति चमगादड़ में पाई जाती है, चमगादड़ 50000 आवृत्ति प्रति सेकेण्ड की तरंगें प्रसारित कर सकता है, उससे यदि उसकी आँखें बन्द करके किसी अंधेरे कमरे में, अत्यन्त पतले सैकड़ों धागे बाँधकर भी, दौड़ाया जाये तो वह बिना किसी धागे से टकराये अपनी पूर्ण गति से उड़ता रहेगा। आवाज की अत्यन्त सूक्ष्म ग्रहण-शीलता के आधार पर वह बाधाएँ पार कर लेता है चमगादड़ की यह क्षमता मनुष्य के लिए भी एक चुनौती बन गयी है कि वह यह सोचे कि क्या उसका मात्र किताबी ज्ञान इस विलक्षण ज्ञान-शक्ति की तुलना कर सकता है।
जर्मन वैज्ञानिक कोलर ने एक बार एक चिंपेंजी बन्दर पर प्रयोग करके यह सिद्ध किया वह अपनी आयु के मनुष्य से कहीं अधिक समझदार होता हैं। हम मनुष्यों के मन में जो कुछ भी ऊँट-पटाँग आता है, वैसा ही करते रहते है, यह नहीं सोचते कि इससे अपने स्वास्थ्य को हानि तो नहीं? इस भावी पीढ़ी अथवा समाज का अहित तो नहीं हो रहा। अविवेक शीलता के कारण हमने कितनी समस्यायें पैदा कर लीं, उनकी गणना भी नहीं की जा सकती पर चिंपेंजी हर बात पर बड़ी सूक्ष्म दृष्टि से विचार करता है और तब कोई निश्चित कार्य करता है, उतावली करने की भूल मनुष्य करते है चिंपेंजी नहीं।
प्रयोग के दिनों में उन्होंने एक बार चिंपेंजी के पिंजड़े से कुछ दूर पर एक केला टाँग दिया। पास में दो डंडे रख दिये। हाथ से तो वह कैसे को नहीं पकड़ सकता था पर दोनों डंडों की लम्बाई इतनी थी जितने से केले को आसानी से स्पर्श किया जा सकता था। दोनों डंडे एक बोल्ट से जोड़े जा सकते थे, वह सामग्री भी पास रख दी गई। चिंपेंजी ने सारी वस्तुएँ देखीं। थोड़ी देर तक सोचता रहा, फिर डंडों को जोड़कर उसने केले को उतार ही लिया। इस प्रयोग से उनकी यह धारणा कि अन्य जीवों में भी विचार करने की क्षमता विद्यमान् है, की पुष्टि ही होती है। इसी प्रकार लन्दन के जीव संग्रहालय ‘जू’ में दो ऐसे बन्दर थे, जिनमें से एक टाइप राइटिंग कर सकता था, दूसरा चित्रकारी, इन दोनों ने अपने समय में बहुत यश अर्जित किया।
मनुष्य में तो इतनी भी क्षमता नहीं कि वह 8-10 दिन निराहार रहकर पेट शुद्धि और-परिमार्जन कर सके। बहुत थोड़े लोग भी अधिक से दो-तीन दिन नहीं निराहार नहीं रह सकते हैं, किन्तु पेन्गुइन में 90 से 120 दिन तक निराहार रह जाने की विलक्षण क्षमता है।
यह सब बातें बताती हैं कि पशु-पक्षियों और कीट-पतंगों का संसार भी मनुष्यों का संसार जैसा ही है। यदि मनुष्यों का संसार जैसा ही है। यदि मनुष्य अपनी सम्पूर्ण आत्म-शक्ति का उपयोग आत्म-कल्याण और लोकोपकार में नहीं करता तो उसमें और अन्य जीवों में अन्तर हो क्या रह जाता है।
नेआखाली में हिन्दू-मुस्लिम दंगे के शिकार एक चौधरी परिवार के मकान में जब गाँधी जी गये तो उन्होंने एक आदर्शजनक भयानक दृश्य देखा। इस विशाल मकान के बड़े आँगन में तीन नरकंकाल पड़े हुये थे। चारों तरफ हड्डियाँ बिखरी हुई थीं। एक काला कुत्ता इन हड्डियों के दिन से कुछ नहीं खाया। वह पागल जैसा मालूम हो रहा था। सब उसको देखकर डर गये। गाँधी जी को देखते ही वह उनके पास धीरे-धीरे आया। उस कुत्ते को इस मकान के लोग और गाँव वाले कालू कहकर पुकारते थे। जब कालू गाँधी जी के पास आया तो सब डर गये कि वह कहीं काट न ले।
किन्तु गाँधी जी बिलकुल विचलित न थे। कालू को अपनी ओर आते देखकर वे रुक गये। कालू उनके पैरों के पास माथा टेककर रो उठा। कुछ लोग उसको मार कर भगाने की चेष्टा करने लगे। किन्तु गाँधी जी ने उनको ऐसा करने से रोक दिया। उन्होंने कालू के मस्तक पर हाथ लगाया और पुचकार कर कहा-कोई डरो मत कुत्ता है तो क्या यह भी तो आत्मा है, हमारी, आपकी तरह इसमें भी समझ है।
कालू जिस परिवार के साथ उस परिवार के आठ व्यक्ति नोआखली के दंगों में इसी मकान में मारे गये थे। कालू शायद गाँधी जी को इस भयंकर नर-हत्या काण्ड की घटनायें दिखाने के लिये हो प्रतीक्षा कर रहा था।
कालू गाँधी जी को मार्ग दिखता चलने लगा। गाँधी जी धीरे-धीरे उसके पीछे चलने लगे। उस विशाल मकान के एक-एक कमरे में कालू उनको ले जाता और चिल्लाकर रोता है, फिर मकान के बाहर बगीचे में वह गाँधी जी को ले गया। एक जगह वह रुक गया और अपने नाखून से मिट्टी खोदने लगा। उसकी इसे हरकत से ऐसा प्रतीत हुआ कि वहाँ छिपा हुआ है। वहाँ खोदने पर मकान के मालिक और चौधरी परिवार के मुखिया का मृत देह वहाँ से निकाला गया।
यह घटना हृदय-विदारक थी। उस विशाल मकान में जहाँ एक परिवार में 80 लोग रहते थे, आज केवल कालू ही अकेला बचा था। गुण्डों द्वारा बनाये गये इस श्मशान में कालू की कहानी चिरस्मरणीय रहेगी लोगों को यह प्रेरणा देती रहेगी कि मानवेत्तर जीवों में भी बुद्धि, विवेक, ज्ञान और संवेदनशीलता होती है। वह भी आत्मा हैं, यह समझकर किसी भी जीव की हिंसा न करें।
(पू० श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा लिखित और युग-निर्माण योजना मथुरा द्वारा प्रकाशित
‘जो करें मन लगाकर करें पुस्तिका का एक अंश)
आकाश में अधर में लटके हुए ग्रह-नक्षत्र एक दूसरे को आकर्षण शक्ति के बल पर ड़ड़ड़ड़ हुए टंगे रहे हैं। यदि यह आकर्षण शिथिल हो जाय तो अन्तरिक्ष के शोभायमान यह सितारे अपनी कक्षा से च्युत होकर किसी दूसरे ग्रह से जा टकरायें या अनन्त आकाश की किसी दिशा में डूबकर विलीन हो जायें। इन्हें अतीत काल से यथास्थान स्थिर रखने वाला और अपनी निर्धारित क्रिया प्रणाली से नियोजित किये रहने वाली शक्ति एक ही हैं। ग्रहों की ‘पारस्परिक आकर्षण क्षमता’। इसके बिना किसी नक्षत्र का अस्तित्व एवं क्रिया-कलाप एक क्षण भी स्थिर नहीं रह सकता।
मनुष्य जीवन की स्थिरता एवं प्रगति का अस्तित्व एवं आधार शिला है, उसकी कर्तव्य परायणता। यदि हम अपनी जिम्मेदारियों को छोड़ दें और निर्धारित कर्तव्यों की उपेक्षा करे तो फिर ऐसा गतिरोध हो जाय कि प्रगति एवं उपलब्धियों की बात तो दूर मनुष्य की तरह जीवन यापन कर सकना भी सम्भव न रहें।,
जीवन की हर विभूति, कर्तव्य परायणता पर निर्भर है। हर ड़ड़ड़ड की स्थिरता एवं सुरक्षा, कर्तव्य-निष्ठा पर ही निर्भर है। हमें बहुमूल्य शरीर मिला है। उसे निरोग, परिपुष्ट एवं दीर्घजीवी तभी बनाया जा सकता है, जब शौच, स्नान, स्वच्छता, कठोर श्रम, समय का पालन, ड़ड़ड़ड़ की सुव्यवस्था, इन्द्रिय संयम, विश्वास आदि की जिम्मेदारियों को ठीक तरह निभाया जाय। मन की प्रखरता एवं समर्थता इस बात पर निर्भर है कि चिन्ता, शोक, निराशा, भय क्रोध, आवेश आदि से उसे बचाये रखने और उत्साह, उल्लास, धैर्य, साहस, सन्तोष, विश्वास, संतुलन, स्थिरता, एकाग्रता जैसे सद्गुणों से सुसज्जित रखा जाय। यदि मन को ऐसे ही जंगली घास-फूस और झाड़-झंखाड़ की तरह चाहे जिस दिशा में बढ़ने दिया जाय तो वह आप ही अपने लिए सबसे बड़ा शत्रु सिद्ध होगा। मन को साधने और सुसंस्कृत बनाने की जिम्मेदारी उस प्रत्येक व्यक्ति की है, जिसे मानसिक क्षमता का वरदान मिला है।
परिवार से जीवन में बहुत सुविधा और सुव्यवस्था रहती है। पर वे उपलब्धियाँ केवल उन्हीं को प्राप्त होती है, जो परिवार के हर सदस्य के साथ के साथ अपनी जिम्मेदारियों की पूरी तत्परता, सावधानी और ईमानदारी के साथ निबाहते है। स्ऋाी केवल सेवा के लिए ही नहीं मिली है। उसके विकास, सुविधा, सन्तोष एवं स्वास्थ्य की हर आवश्यकता को पूरा करना भी कर्तव्य है। गाय उसी की दूध देगी, जो भर पेट चारा खिलायेगा। दाम्पत्य-जीवन का आनन्द उसे मिलेगा, जो अपना परिपूर्ण कर्तव्य पालन करते हुए उसके हृदय जीत लेगा। बच्चे उसी के सुसंस्कृत और सुविकसित होंगे, जो उन्हें प्यार, समय और सहयोग देकर विकासोन्मुख एवं सुसंस्कृत बनाने को निरन्तर तत्पर रहेगा। माता-पिता एवं गुरुजनों का वात्सल्य एवं आशीर्वाद उसे मिलेगा, जो उनकी सुविधा तथा इज्जत में कमी न आने देने का शक्ति भर प्रयत्न करेगा। भाई और बहिनों का अनन्य श्रेय और सहकार पाने की आशा उन्हें ही करनी चाहिये, जो उनके लिए जान देता और भरपूर प्यार करता है। परिवार का आनन्द केवल कर्तव्य परायण ही करनी चाहिये, जो उनके लिए जान देता और भरपूर प्यार करता है। परिवार का आनन्द केवल कर्तव्य परायण ही लेते है। इसके विपरीत जिन्होंने सुविधायें पाने का अधिकार तो जाना, पर कर्तव्य परायण ही लेते हैं। इसके विपरीत जिन्होंने सुविधायें और भरपूर प्यार करता है। परिवार का आनन्द केवल कर्तव्य पालन की शर्त भूल गये, उनके लिए घर और नरक में कोई अन्तर न रहेगा। मनोमालिन्य और कलह से घर का वातावरण विषाक्त बना रहेगा। न पत्नी जीवन-संगिनी बनकर रहेगी, न बच्चे आज्ञानुवर्ती होंगे। माता-पिता का असन्तोष और भाई-बहिनों का ड़ड़ड़ड़ धरमें मरघट बनाये रहेंगे। परिवार स्वर्ग उनके लिए है, जो पग-पग पर जिम्मेदारियाँ निबाहने में साथियों की कमियाँ सहन करने में तत्पर हैं। नरक उनके लिए है, जो घर वालों से बड़ी-बड़ी आशाएँ रखते हैं, पर अपनी जिम्मेदारियों की ओर से आँख मूँद कर बैठे है।
धन सबको अच्छा लगता है, उसे पाना और बढ़ाना सभी चाहते हैं पर कठोर श्रम, सतर्क जागरूकता, क्रमबद्ध सुव्यवस्था, हिसाब की स्वच्छता और मिलनसारी, ईमानदारी के गुण जिनमें हैं, उचित रीति से स्थिर सम्पदा वे ही कमा सकते है। उपार्जन-पुरुषार्थ और प्रतिभा पर निर्भर हैं। इन दोनों गुणों को बढ़ाते रहने की जिम्मेदारी जिससे समझी और उसके लिए सतत प्रयत्न किया, वह सम्पन्नता का अधिकारी बना। जिसने मितव्ययिता, बजट, हिसाब, घूर्ता से सतर्कता, सुरक्षा की सामर्थ्य, सदुपयोग की योजना बनाकर पैसा खर्च किया, वह यशस्वी हुआ और कमाने की तरह खर्च का आनन्द लेने का सौभाग्य भी प्राप्त किया। धन आकाश से नहीं बरसता और न जमीन में से निकलता हैं चोरी, चाण्डाली से जो धन आता है, वह हाथ-पाँव जलाकर बारूद की तरह ‘मक्क’ से जड़ जाता है। उससे किसी को न शान्ति मिलती है, न आनन्द आता है। सम्पदा और समृद्धि के उपार्जन एवं उपयोग के साथ उनके उत्तरदायित्व जुड़े हुए है, जो उन्हें निबाहना जानता है, उसी को सार्थक का लाभ मिलता है।
गैर जिम्मेदार, लापरवाह और अपने कर्तव्यों की उपेक्षा करने वाले अपना और सम्बन्धित व्यक्तियों का केवल अहित ही करते है। कर्मचारी जो निरन्तर अपनी जिम्मेदारियों की उपेक्षा किया करता है, मालिक के लिए केवल घाटा ही दे सकता है और दुत्कार का भाजन ही बन सकता है। चोर और चालक होते हुए भी तत्पर व्यक्ति लाभदायक रहता है, किन्तु ईमानदार और भला आदमी होते हुए भी लापरवाही और गैर जिम्मेदारी का व्यवहार करने वाला अधिक हानिकारक सिद्ध होता है। बेईमान नौकर भी मालिक की हानि करते है पर गैर जिम्मेदार तो जहाँ रहेंगे वहाँ का बंटा धार करके रहेंगे।
महत्त्वपूर्ण कार्य सदा उन्हीं के द्वारा सम्पन्न होते है, जो कर्तव्य पालन को प्राणों से भी अधिक प्यार करते हैं सैनिक का सबसे बड़ा पुण्य अनुशासन और अपने महान् उत्तरदायित्व का शानदार ढंग से निर्वाह कर देना ही तो है। सन्त, ब्राह्मण, पुरोहित, नेता ओर प्रवचनकर्ता अपनी जिम्मेदारियों के प्रति निष्ठावान् रहे तो वे मानव जाति का भारी हित साधन कर सकते है।
शासन तन्त्र की गैर जिम्मेदारी ने इस देश की कितनी क्षति पहुँचाई है, उसका लेखा-जोखा लिया जाय तो वह अकाल, बाढ़, भूकम्प एवं दैवी प्रकोप से उत्पन्न होने वाली समस्त क्षति की अपेक्षा कई गुना संकट उत्पन्न करने वाला सिद्ध होगा। लाल फीता शाही, रिश्वत, कामचोरी, बेगार भुगतने और टालने की वृत्ति आदि दोषों ने शासन तंत्र को लुँज-पुँज करके रख दिया है। इस गैर जिम्मेदारी ने अराजकता से भी बढ़कर क्षति पहुँचाई हैं यदि हमारे शासकीय कार्यकर्ता अपने-अपने कर्तव्यों का पूरी ईमानदारी ओर जिम्मेदारी से पालन करें तो देश का कायाकल्प होने में देर न लगे।
समाज के सदस्य-राष्ट्र का एक नागरिक होना भी मानवीय उत्तरदायित्वों से लदा हुआ है। अपनी सुविधा उसी सीमा तक चाहे जिससे दूसरों की सुविधा में कोई व्यवधान उत्पन्न न हो यह हर किसी की नैतिक जिम्मेदारी है। सड़कों पर केले और नारंगी के छिलके फेंक कर हम दूसरों को फिसल कर गिरने की कठिनाई उत्पन्न करते हैं बाई ओर रहने की अपेक्षा सारी सड़क को घेर कर चलना, सड़ ओर गलियों पर यों ही घर का कूड़ा फेंक देना, बच्चों का नालियों पर टट्टी करना, बहुत रात गये तक लाउडस्पीकर चलाना, सार्वजनिक स्थानों को घेर कर बैठ जाना या गन्दा करना, नियत समय पर वचन का पालन न करना आदि ऐसी बातें है, जो देखने में छोटी लगती है पर इन्हीं के पारस्परिक सद्व्यवहारों में भारी क्षति पहुँचती है। सभ्य समाज का हर नागरिक अपनी जिम्मेदारियों को समझता है और नैतिक, सामाजिक एवं राष्ट्रीय जिम्मेदारियों के प्रति सजग रहकर अपनी और अपने देश की प्रतिष्ठा बढ़ाता है।
अपने समाज के प्रति, हर व्यक्ति की जिम्मेदारी है। हम समाज के एक सदस्य है। समाज का वातावरण हमें अतिशय प्रभावित करता है। वैयक्तिक और सामूहिक प्रगति का द्वार तभी खुलता है, जब लोग अपने शरीर और परिवार की तरह सामाजिक सुव्यवस्था और उत्कर्ष का समुचित ध्यान रखें और उसके लिए कष्ट सहने और त्याग करने को तैयार रहें। सामूहिक उत्कर्ष में जो जितनी रुचि लेता है और लोक-मंगल के लिए जो जितना त्याग एवं सहयोग प्रस्तुत करता है, वह उतना ही बड़ा महामानव गिना जाता है।
आत्मा के प्रति हमारी जिम्मेदारी है। ईश्वर के प्रति भी। उन्हीं के कारण हमारा अस्तित्व है। आवश्यक है हम आत्मा की आवाज सुनें ओर परमात्मा द्वारा निर्धारित कर्तव्यों का पालन करते हुए मानव जीवन को सार्थक बनाने के लिए प्रयत्नशील रहे।
(पं० श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा लिखित और युग-निर्माण योजना मथुरा द्वारा प्रकाशित ‘ईमानदारी का परित्याग न करें’ पुस्तिका का एक अंश)
लगता ऐसा है कि जल्दी और अधिक कमाने के लिए बेईमानी का प्रयोग करना आवश्यक है। क्योंकि धनवान् लोगों में से अधिकांश ऐसे दीखते है, जिनके क्रिया-कलाप में बेईमानी का काफी पुट रहता है। ईमानदार लोगों में से बहुत करके गरीब दीखते है, इसलिये सामान्य बुद्धि से यही प्रतीत होता है कि हम भी ईमानदार रहेंगे तो गरीब बन जायेंगे। चूँकि इन दिनों धन की प्रमुखता है। धन के आधार पर ही अधिक सुविधा-साधन और सफलता सम्मान की उपलब्धि होती है। इसलिये मोटी बुद्धि से स्थिति का अवलोकन करने वाले और अुिसंख्यक जिस रास्ते चलें, उसी पर चलने वाले लोग आमतौर से उसी ढर्रे को अपना लेते है, जो पास-पड़ोस के लोग अपनाते दीखते है। आज की व्यापक क्षेत्र में फैली हुई बेईमानी का यही प्रधान कारण है।
वस्तुस्थिति को बारीकी से तलाश न करने पर बुद्धि भ्रम हो जाना स्वाभाविक है। बेईमानी की गरिमा स्वीकार करके लोग बुद्धि भ्रम से ही ग्रस्त हुए है। वास्तविकता वैसी है नहीं। बेईमानी से धन नहीं कमाया जा सकता। कमा लिया जाय तो स्थिर नहीं रखा जा सकता। लोग जिन गुणों से कमाते है, वे दूसरे ही है। उनकी आड़ में कुछ अनुपयुक्त लाभ प्राप्त कर लिया जाय तो इसका अर्थ यह नहीं हो सकता कि बेईमानी का परिणाम लाभदायक होता है। साहस, परिश्रम, सूझ-बूझ मधुर भाषण, व्यवस्था आदि वे गुण है, जो उपार्जन करते है। बेईमानी तो अपयश, अविश्वास, घृणा, असहयोग, राजदण्ड, आत्म-ग्लानि आदि दुष्परिणाम ही उत्पन्न करती है। वस्तुतः लोग सद्गुणों के आधार पर कमाते है। बेईमानी की तात्पर्य है, दूसरों को धोखा देना। यह तभी सम्भव है, जब उस पर ईमानदारी का आवरण चढ़ा हो। किसी को ठगा तभी जा सकता है, जब उसे अपनी ईमानदारी एवं विश्वसनीयता के बारे में आश्वस्त कर दिया जाय। यदि किसी को यह शक हो जाय कि हमारे साथ बेईमानी करने के लिए तानाबाना बुना जा रहा है तो वह ठगाई में न आयेगा और चालाकी से मिलने वाला लाभ न मिल सकेगा। बेईमानी तभी लाभदायक हो सकती है। जब वह ईमानदारी की आड़ में भली प्रकार छिपा ली जाय। असलियत जैसे ही प्रकट हुई, बेईमानी करने वाला न केवल उस समय के लिए वरन् सदा के लिए उन लोगों से अपना विश्वास खो बैठता है और लाभ कमाने के स्थान पर उल्टा घाटा उठाता है।
बेईमानी का प्रतिफल घृणा, अविश्वास, असहयोग, राजदंड, और आत्मदण्ड है, उसमें उपार्जन की कोई क्षमता नहीं। उपार्जन तो सद्गुण करते है। उन्हीं में उत्पादन तत्त्वों का समावेश है। जिसने अपनी विश्वस्तता का सिक्का दूसरों पर जमा दिया, अच्छी, सही, खरी चीजें उचित मूल्य पर दी और व्यवहार में प्रामाणिकता सिद्ध कर दी, लोग उस पर मुग्ध हो गये और सदा-सर्वदा के लिए उसके ग्राहक, प्रशंसक एवं सहयोगी बन गये, उन्नति का रहस्य यही है। जिसकी प्रामाणिकता है, उसका भविष्य उज्ज्वल है। किन्तु जो अपनी धूर्तता के कारण बदनाम हो गया। उसका ईश्वर ही रक्षक है। आज के मित्र, कल दुश्मन बनेंगे, कल के मित्र परसों घृणा करने लगेंगे और अन्ततः उसका कोई सच्चा सहयोगी न रह जाएगा। स्वार्थ के लिये चापलूसी करने वाले भी आड़े वक्त काम न आयेंगे। विश्वास करके कोई जोखिम उठाने के लिए वे चापलूस ‘मित्र’ भी समय पड़ने पर तैयार नहीं होते।
हमें यह भ्रम निकाल ही देना चाहिये कि बेईमानी कुछ कमा सकती है। वह शराब की तरह उत्तेजना मात्र है, जिससे ठगने वाला और ठगा जाने वाला बुद्धि भ्रम में ग्रस्त हो जाते है। नशा उतरने पर नशेबाज की जो खस्ता हालत होती है, वही पोल खुलने पर बेईमान की होती है। उसका न कारोबार रहता है, न कोई ग्राहक सहयोगी। दूध पानी और घी में बेजीटैविल मिलाने वाला तभी लाभ कमा सकता है जब वह कसम खा-खाकर अपनी ईमानदारी और चीज के असलीपन की विश्वास दिलाता रहे। यह ईमानदारी और विश्वास की विजय है। जो कमाया गया उसका आधार यही था। यदि वे लोग अपनी दुकान पर पानी और अरारोट मिला दूध, मिलावटी घी का साइनबोर्ड लगावें और अपनी वस्तु के दोषों को प्रकट कर दें, तब पता चले कि क्या बेईमानी अपने विशुद्ध रूप में कुछ कमा सकने में समर्थ है?
वेस्ट एण्ड वाच कम्पनी की घड़ियाँ, फोर्ड मोटरें, पार्कर के पैन लोग महँगी होने पर भी खुशी खुशी खरीदते है, क्योंकि वस्तु की प्रामाणिकता पर हर कोई भरोसा करता है। उनकी दिन प्रति दिन उन्नति होती चली जा रही हे। इसके विपरीत नकली, कमजोर, खराब चीजें बेचने वाले आये दिन दिवालिया होते रहते है। पूँजी गँवा बैठते है और फिर उस बदनामी के कारण नया काम कर सकने में भी सफल नहीं होते। बेईमानी देर तक छिपी नहीं रह सकती। पारे को पचाया नहीं जा सकता और पाप छिपाया नहीं जा सकता है। प्रकट होते समय दोनों ही भारी कष्ट देते हे।
व्यापार की ही भाँति जीवन के हर क्षेत्र की सफलता का स्थायित्व कठोर श्रम, सद्गुण, सद्व्यवहार, सचाई, ईमानदारी एवं प्रामाणिकता पर निर्भर रहता है। चालाकी से एक बारगी किन्हीं को चमत्कृत करके अपना उल्लू सीधा किया जा सकता है। पर उस लाभ को स्थिर नहीं रखा जा सकता। चोर, डाकू, जुआरी, गिरहकट आये दिन बहुत पैसा कमाते रहते हैं पर उस कमाई को स्थिर रखना या सदुपयोग करना उनके बस की बात नहीं होती। बादल की छाँव की तरह अनीति की कमाई भी अपव्यय और दुर्व्यसनों में देखते देखते समाप्त हो जाती है।
सम्पत्ति से नहीं, सद्बुद्धि और सत्प्रवृत्तियों से उन्नति होती है। धनवान् नहीं, चरित्रवान सुख पाते है। ईमानदारी से यदि कम भी कमाया जाय तो वह अनीति से अधिक कमाने की अपेक्षा अधिक श्रेयस्कर है। पसीने की कमाई फलती फूलती है और हराम का पैसा पानी के बुलबुले की तरह नष्ट हो जाता है। इतना ही नहीं, विदाई के बाद वह बहुत पश्चाताप, सन्ताप और अपयश छोड़कर जाता है।
यदि बेईमानी से ही धन कमाया जाता है तो आवश्यक नहीं कि धनवान् ही बना जाय। संसार में अधिकांश गरीब ही रहते है। हम भी उन्हीं में से एक रहें तो क्या हर्ज है? किन्तु वास्तविकता यह है कि धन ही नहीं, स्वास्थ्य, संतोष और सम्मान के क्षेत्रों में भी समृद्ध और सफल चरित्रवान एवं ईमानदार लोग ही बनते है। सफलता प्राप्त कर लेना ही काफी नहीं, उससे आत्म संतोष, जनकल्याण एवं स्वस्थ परम्परा का भी अभिवर्धन होना चाहिये। सही तरीके से प्राप्त की हुई सफलता ही वास्तविक सफलता है। यदि किसी ने कोई उन्नति या उपलब्धि अनुपयुक्त रीति से प्राप्त की है तो उससे अनेकों का वैसा ही करने की इच्छा उत्पन्न होगी और समाज में एक ऐसी प्रथा चल पड़ेगी, जो हर किसी के लिए अहित परिणाम ही उत्पन्न करती रह सके।
सद्गुणों का खाद और सचाई का पानी पाकर ही व्यक्तित्व का पौधा बढ़ता और फलता फूलता है। जादू से हथेली पर सरसों जमाई तो जा सकती है, कौतुक तो देखा जा सकता है पर उसका तेल निकालकर धन कमाया जा सके, ऐसा सम्भव नहीं होता। बेईमानी का चमत्कार तो देखा जा सकता है पर उसके सहारे सच्ची प्रगति और स्थिर सम्पदा का लाभ नहीं उठाया जा सकता। यदि हम वस्तुतः कुछ कहने लायक और आनन्द दे सकने लायक उपलब्धियाँ प्राप्त करना चाहते है तो एक ही रास्ता है कि हम ईमानदारी और भलमनसाहत को जीवन नीति की तरह हृदयंगम करें और सद्गुणों की सम्पदा से अपने व्यक्तित्व को सुसज्जित करते चले। जिस प्रकार रुपये के बदले दुकानों पर बिकने वाली चीजें आसानी से खरीदी जा सकती है, उसी प्रकार सद्गुणों के मूल्य पर प्रगति की किसी भी दिशा में द्रुतगति से अग्रसर हुआ जा सकता है।
बेईमानी की रीति नीति स्वीकार करने का प्रतिफल अपने लिए विपत्ति और समाज के लिए दुर्गति के रूप में ही प्रस्तुत होगा। हमें इस कंटकाकीर्ण पगडंडी पर चलने की अपेक्षा ईमानदारी के राजमार्ग पर ही चलना चाहिये। बेईमानी के दुष्परिणामों के अनुभव के आधार पर जानने की अपेक्षा यही अच्छा है किस मार्ग पर चलने वालों की दुर्गति देखे और उतने से ही सावधानी बरतने लग जाएँ। इतिहास के किसी भी पृष्ठ पर यह तथ्य देखा जा सकता है कि विभूतियों और सम्पत्तियों का लाभ केवल उनके लिए सुरक्षित रहा है, जो सद्गुणी, चरित्रवान और ईमानदार है।
( पं0 श्रीराम शर्मा आचार्य लिखित और युग-निर्माण योजना द्वारा प्रकाशित
“अपव्यय का ओछापन” पुस्तिका का एक अंश)
आर्थिक क्षेत्र में बुद्धिमान का चिह्न उपार्जन ही नहीं खर्च करने की क्रिया भी है। उपार्जन केवल बुद्धिमत्ता पर ही नहीं बहुत करके परिस्थितियों पर भी निर्भर रहता है। एक सी योग्यता और बुद्धिमत्ता होते हुए किसी को बहुत उपार्जन का अवसर मिल जाता है और किन्हीं को परिस्थितियाँ काफी पीछे छोड़ देती है। हर अधिक उपार्जन करने वाला अधिक सुयोग्य, अधिक बुद्धिमान या अधिक प्रयत्नशील हो सो बात नहीं है। जिसका खाँचा बैठ गया पूँजीवादी अर्थ प्रणाली में वही समृद्धि उपार्जित करने लगता है। पैसा पैसे को कमा सकता है। बापदादों की छोड़ी सम्पत्ति उत्तराधिकार में मिल सकती है। जुआ, सट्टा, लाटरी फल सकती है, चोरी चाण्डाली से भी बहुत कमाया जा सकता है। कहना इतना भर है कि उपार्जन की मात्रा को ही अर्थ क्षेत्र की बुद्धिमत्ता नहीं माना जा सकता। बुद्धिमत्ता की वास्तविक कसौटी यह है कि व्यक्ति किस तरह अपनी कमाई को खर्च करता है।
अनेक व्यक्ति कमाते तो बहुत है पर खर्च करने के सम्बन्ध में बड़े अदूरदर्शी होते हैं जो आता है वही अस्त व्यस्त तरीके में फूँक देते है और आये दिन अभाव ग्रस्त एवं कर्जदार बने रहते है वे पैसे का मूल्य नहीं समझते उसे खिलवाड़ जैसी कोई चीज समझते है और लोग हमें जितना अधिक खर्च करते देखेंगे उतना ही अमीर या बड़ा आदमी मानेंगे और उतना ही सम्मान करेंगे। इस दृष्टि से भी कई व्यक्ति बहुत फिजूल खर्ची करते है। कई तो इतने दुर्व्यसन पाल रखे होते हे कि कमाई का बहुत बड़ा भाग उसी में खर्च हो जाता है।
अनावश्यक रूप से हाथ खुला रखकर यदि पैसा उड़ाया जाय तो कुबेर का खजाना भी खाली हो सकता है और लक्ष्मी को भी दरिद्रता का शिकार बनना पड़ सकता है। कितने बड़े बर्तन में कितना ही पानी क्यों न भरा हो तली का एक छोटा छेद कुछ ही समय में उसे खाली कर देने के लिये पर्याप्त है। बिना सोचे समझे, चाहे जिस काम में- मन की तरंग के आधार पर खर्च करने वाले सदा अभाव ग्रस्त ओर दरिद्र ही रहेंगे भले ही उनकी आमदनी कितनी ही बढ़ी चढ़ी क्यों न हो।
पैसा किस प्रकार, किस काम में कितना खर्च किया जाता है उसको पूरा जान लेने पर ही किसी की बुद्धिमत्ता का स्तर परखा जा सकता है। अपव्यय सबसे बड़ी मूर्खता है। अपनी हैसियत, औकात, आमदनी और आवश्यकता का ध्यान रखे बिना जो अनावश्यक खर्च किया जाता है वह व्यक्ति तथा परिवार के विकास में सबसे बड़ा अवरोध सिद्ध होता है। इन दिनों उचित और आवश्यक कार्य ही इतने बढ़े चढ़े है कि उनकी पूर्ति कठिन हो जाती है। स्वास्थ्य, शिक्षा, चिकित्सा, व्यवसाय आदि आवश्यक कार्या के लिये ढेरों पैसा लगता है। अन्न, वस्त्र, मकान की जरूरतें बहुत सारा पैसा माँगती है। जब तक कुरीतियों का क्रान्तिकारी उन्मूलन न हो जाय तब तक विवाह शादी, अलन–चलन पर्व त्यौहार आदि पर भी पैसा खर्च करना ही पड़ेगा। यदि फिजूल खर्ची की आदत पड़ गई है और पैसों को कागज का टुकड़ा समझकर ज्यों त्यों उड़ा दिया जाता है तो समय पर अनिवार्य आवश्यकताओं के लिये हाथ खाली रहेगा और उनमें खेद पूर्वक कटौती करनी पड़ेगी।
व्यक्ति अकेला नहीं है। वह अनेक पारिवारिक कर्तव्यों ओर उत्तरदायित्वों से जुड़ा हुआ है। बूढ़े माता पिता और छोटे बहिन भाइयों के अतिरिक्त घर में दूसरे लोग भी होते है जो उपार्जन करने वालों से अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति चाहते है। संयुक्त परिवार प्रणाली के साथ जुड़ा हुआ यह एक पवित्र कर्तव्य है कि असमर्थ परिजनो की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए यथा सम्भव कुछ उठा न रखा जाय। विवाह होते ही पत्नी और उसके द्वारा सन्तान के लालन पालन की जिम्मेदारी आती हे। बड़े होने पर उनकी शिक्षा, शादी तथा आजीविका के साधन जुटाने पड़ते है। आजकल आये दिन अस्वस्थता का भी दौर रहता है। चिकित्सा चिकित्सा में कंजूसी करके करके साथियों के जीवन से खिलवाड़ भी नहीं की सकती। पारिवारिक प्रगति के अनेक द्वार खोले जा सकते है और प्रियजनों का सुयोग्य एवं समर्थ बनाने के लिये कितनी पूँजी जुटाई जा सकती है।
यदि अनावश्यक खर्च करने की आदत है तो धन अधिकतर बेकार बातों में ही उड़ जाएगा फिर उचित आवश्यकताओं से वंचित ही रहना पड़ेगा-हमें समझना चाहिए कि कमाते भले ही हम हों पर उस आजीविका में परिवार के हर सदस्य की साझेदारी है। खर्च करते समय परिवार की वर्तमान और भावी आवश्यकताओं का ध्यान रखते हुये यह मानना पड़ेगा कि व्यय करने के मामले में हम स्वतन्त्र नहीं हे। एक सद्गृहस्थ को इसी तरह सोचना चाहिये और अनावश्यक अपव्यय में एक कौडी खर्च करने से पूर्व हजार बार सोचना चाहिये।
आजकल ठाठ-बाठ और फैशन के नाम पर न जाने कितने पैसों की बर्बादी होती है। कीमती पोशाकें, जेवर, शृंगार, सजावट के लिये ढेरों धन बर्बाद होता रहता है। यदि विवेक से काम लिया जाता तो इसे आसानी से बचाया जा सकता था। शौक-मौज के नाम पर कमाई का बड़ा हिस्सा खर्च होता है। खाते पीते लोगों का एक नया व्यसन और है यारबाजी। पतंगबाजी, नशेबाजी, रंडीबाजी आदि की तरह ‘यारबाजी’ भी दुर्गति की निशानी है। निठल्ले, आवारा और सिरफिरे लोग इस तलाश में रहते हैं कि कोई आँख का अन्धा और गाँठ का पूरा ‘दोस्त’ मिले। समय काटने और अपने दुर्व्यसनों में सहायक ढूँढ़ने के लिये बड़ी चाल से और चापलूसी से दूसरों पर दोस्ती गाँठते है और फिर उसकी पीठ पर सवार हो लेते है। गपशप,ताश,चौपड़,सैर सपाटा यही उनके धन्धे रहते है। ऐसे दोस्त जिनके पीछे भूत पलीत की तरह लग जाय तो समझना चाहिये अब इसका बहुमूल्य समय और गाढ़ी कमाई का पैसा पानी की तरह बहेगा। यारबाजी के कुचक्र में सैकड़ों ने अपने को बर्बादी के गर्त में गिराया है।
पारिवारिक उत्तरदायित्वों के अतिरिक्त सामाजिक उत्कर्ष एवं पीड़ितों की सहायता भी मनुष्य का एक पवित्र कर्तव्य है। अपनी आमदनी का एक अंश अपनी श्रद्धा और सुविधानुसार नियमित रूप से लगाते रहना चाहिये, शरीर निर्वाह के अतिरिक्त अपने और अपने परिजनों के बौद्धिक एवं भावनात्मक उत्कर्ष के लिये स्वाध्याय एवं सत्संग के साधन भी जुटाये जाने चाहिये। अनुभवों के एकत्रीकरण के लिए योजनाबद्ध यात्राएँ उपयोगी होती है। मनोरंजन के लिये कुछ खर्च करना चाहिए। निर्वाह के अतिरिक्त उपरोक्त खर्च भी आवश्यक मद में ही जोड़े जा सकते है। इनके लिये कुछ पैसा तभी बचाया जा सकता है जब फिजूल खर्ची की सारी मदे कड़ाई के साथ काट दी जाय। आमदनी हरेक की सीमित ही होती है। अपव्यय की कोई सीमा नहीं। यदि अविवेक पूर्वक खर्च किया जाता रहा तो उससे महत्त्वपूर्ण आवश्यकताएँ ही रोकनी पड़ेगी, परिणाम दोनों ही दृष्टि से अहितकर होगा। अपव्यय से आदतें खराब होगी दुर्व्यसन पल्ले बँधेंगे, गैर जिम्मेदारी की प्रवृत्ति बढ़ेगी ओर तंगी भुगतनी पड़ेगी। दूसरी ओर अपने तथा परिवार के विकार की उचित आवश्यकताएँ पूरी न हो सकने की आत्म-ग्लानि ही रहेगी।
हमें अपनी आमदनी का एक भाग भावी उत्तरदायित्वों की पूर्ति के लिये बचत के रूप में सुरक्षित रखना चाहिये इसके बाद जो बचे उसे बजट बनाकर खर्च करना चाहिये। व्यक्तिगत शौक-मौज का बजट छोटा रहना चाहिए और कड़ाई बरती जानी चाहिए कि उनमें निर्धारित रकम से अधिक तनिक भी खर्च न किया जाय।
पैसा मनुष्य के कठिन परिश्रम का प्रतिफल है। उसका एक एक छोटा सिक्का उचित और उपयुक्त कार्यों में ही खर्च होना चाहिये। धन हमारी भौतिक और आत्म प्रगति में बहुत सहायक हो सकता है। उससे अपना और दूसरों का भारी हित किया जा सकता है पर यह सब होगा तभी जब खर्च के बारे में पूरी सतर्कता बरती जाय। उपयोगी प्रयोजनों की पूर्ति तभी हो सकती है जब अनुपयोगी अपव्यय को कड़ाई के साथ रोका जाय। ऐसी व्यवस्था जहाँ बने वहीं बुद्धिमत्ता का प्रयोग कुछ समझा जाएगा।
(पं० श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा लिखित और युग-निर्माण योजना द्वारा प्रकाशित
‘पशुबलि हिन्दू धर्म का कलंक’ पुस्तिका का एक अंश)
देवता उन्हें कहते है जो दें। प्यार, सेवा, सहायता, सौजन्य, करुणा, सद्भावना और ममता का जो निरन्तर परिचय देते रहते है, वे देवता है। अन्तरिक्ष में रहने वाली परमेश्वर की ऐसी ही अदृश्य शक्तियाँ जो संसार के हित साधन में निरन्तर प्रवृत्त रहती है। देवता, मानी और पजी जाती हे। इन गुणों वाले व्यक्ति भी धरती के दृश्य भूसुर-महामानव-नर नारायण कहलाते हे। चाहे दृश्य हो चाहे अदृश्य जो उच्च अध्यात्म तत्त्वों से सत्प्रवृत्तियों एवं सद्भावनाओं से परिपूर्ण है वे सत्ताएँ देव कही जायेगी और सदा उनका अर्चन अभिनन्दन होता रहेगा। भारतीय धर्म में अनेक देवताओं का अस्तित्व माना गया है यह कुछ नहीं एक ही परमेश्वर की ऐसी विभिन्न शक्तियाँ एवं गतिविधियाँ है जो विश्व मंगल में निरन्तर संलग्न है।
देव पूजन में स्वागत सम्मान के उपयुक्त वस्तुओं का नियोजन अर्पण किया जाता है। धूप, दीप, नैवेद्य, चन्दन, पुष्प, रोली, अक्षत जैसी मांगलिक वस्तुओं में ही वह सात्विकता रहती है जिसे पाकर देवता का परम सतोगुणी सत्ता प्रसन्नता पूर्वक स्वीकार करे। देव पूजा में दिव्य वातावरण एवं सतोगुणी भावनाओं गतिविधियों एवं वस्तुओं का अर्पण अभीप्सित है। होता भी यही है।
तथ्य के सर्वथा विपरीत कुछ शताब्दियों से अपने देश में हर क्षेत्र में बहुत कुछ ऐसा उद्दण्ड आचरण प्रचलित हो चला है जिसकी मूलतत्त्व के साथ कोई संगति नहीं बैठती। देव पूजा के लिये निरीह पशु पक्षियों की नृशंस हत्या उन्हीं की प्रतिमाओं के सामने की जाय इस कृत्य का किसी भी दृष्टि में कोई औचित्य दिखाई नहीं पड़ता। अध्यात्मिकता का तत्त्व ज्ञान,देवता की प्रकृति एवं स्थिति, पूजा की पवित्रता पर जितना अधिक विचार करते हे उतनी ही बलिदान की प्रचलित प्रथा सर्वथा अनुपयुक्त और अवांछनीय प्रतीत होती चली जाती है। निरीह प्राणियों की हत्या से देवता प्रसन्न होंगे और इस कुकृत्य को उचित मानकर उस कर्ता को कल्याणकारी वरदान देंगे। यह बात यदि वस्तुतः सही हो तो हमें देवत्व की स्थिति पर ही पुनर्विचार करना होगा। तब दया करुणा और देने की प्रकृति को उनके स्वभाव का अंग न मानकर यह कहना होगा कि वे निष्ठुर नृशंस, दुष्ट,शोषण के प्रतीक है। और मूल्य प्राप्त करने के बाद ही अपनी कृपा बेचते है। वह मूल्य भी सज्जनता पूर्ण नहीं-ऐसा नृशंस जिसे स्वीकार करना एक अविकसित बुद्धि के बालक के लिए भी असह्य हो उठे। यदि देवताओं की प्रकृति यही है तो हमें विचार करना पड़ेगा कि उनको अपनी अन्तः चेतना में आमंत्रित करके हम कही भारी भूल तो नहीं कर रहे है। देवत्व की दिशा में चलने की अपेक्षा हम कहीं असुरत्व को तो आमंत्रित नहीं कर रहे हे।
मध्य कालीन अन्धकार युग में इस देश में अनेक प्रकार की मूढ़ताओं का उद्भव हुआ है। उसने धर्म क्षेत्र को भी अछूता नहीं छोड़ा। दया की देवी-करुणा की सरिता ममतामयी माता भगवती महाशक्ति मनुष्यों को करुणा, सहृदयता, सज्जनता और उदारता की ही प्रेरणा दे सकती है। उसे ऐसे वीभत्स स्वरूप में प्रस्तुत करना कि “उसे नृशंस निर्दयता पसन्द है” वस्तुतः भगवती अम्बा को ही नहीं समस्त देव सत्ता का ही कलंकित करना है। देवता यदि माँस लोलुप है, हत्या देखकर प्रसन्न होते है, करुणा का परित्याग कर नृशंस आचरण करने की प्रेरणा करते है-तो उनमें और असुर में क्या अन्तर रहा? यदि ऐसा ही सच होता तो फिर देव और असुर की परख करना असम्भव ही हो जाता।
मध्य कालीन मूढ़ता और बौद्धिक विकृतियों की ही यह एक झाँकी है कि हम देवताओं के सामने मूक ओर निरीह पशुओं का हृदय विदारक उत्पीड़न ओर चीत्कार भरा वध करने को उचित मानने लगे। उचित ही नहीं मानते वरन उसे करने के लिए भी उत्साह पूर्वक अग्रसर होते है। कितने ही प्रान्तों में- कितने ही मठों में देवी भवानी अथवा भैरव की प्रतिमाओं के सामने आये दिन इन मूक प्राणियों की रक्त धारा बहती रहती है। इसे बलिदान कहा जाता है। बलिदान शब्द त्याग, उदारता एवं तपश्चर्या के अर्थ में प्रयुक्त होता है। बलिदान अपना किया जाता है। शास्त्रों में अलंकार रूप से काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद मत्सर जैसे दुर्गुणों को पशु कहा है और उनका वध करने की-परित्याग करने पुण्य प्रक्रिया में बलिदान के रूप में इंगित किया है। यह कैसा बलिदान जिसमें कर्ता को अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिये- मनोकामनाएँ पूरी कराने के लिए देवता को रिश्वत प्रस्तुत करते हुए एक दुष्ट कर्म करना पड़े। देवता यदि किसी के प्राण लेकर अपनी क्रूरता को तुष्ट करने लगे ओर रिश्वत लेकर मनोकामनाएँ पूरी करने लगे तो फिर हम मनुष्यों के सामने घोर अन्धकार ही अन्धकार है। हमें करुणा, दया, सेवा और उदारता की शिक्षा प्रेरणा कौन देगा? देवताओं में से देवत्व चला गया तो हमें मनुष्यों में उसका संचार कैसे होगा? जब देवताओं ने आसुरी प्रकृति अपना ली तो हम मनुष्यों के लिये पैशाचिकता ही स्वाभाविक बन जाएगी। तब धर्म का स्वरूप ‘अनर्थ’ के अतिरिक्त ओर क्या रह जायेगा? फिर देवत्व की व्याख्या दयालुता के अर्थ में कौन करेगा?
हो सकता है किसी माँसाहारी को अपने अभक्ष्य भोजन को भी देवता का प्रसाद समझकर खाने की सूझ सूझी हो और उसने वध की क्रिया को देव बलिदान कहकर लोलुपता में देव प्रसन्नता की उड़ान उड़ी हो। हो सकता है प्राचीन काल के तलवार युद्ध में सैनिकों को हाथ साध करने का अभ्यास भैंसे, बकरी की गरदन पर कराया जाता है। और सोचा गया हो कि यह कृत्य किसी अभ्यासी के मन की करुणा उसे विचलित न कर दे इसलिये उसे देव बलिदान का रूप दे दिया जाय। हो सकता है किन्हीं पुजारियों और उनकी मंडली ने माँसाहार की लोलुपता तृप्त करने के लिये भोले भक्तों को पशुबलि की सूझ सुझाई हो। हो सकता है किसी मठाधीश ने माँस चमड़ा और हड्डियों का अनायास ही बहुत सा लाभ पाने का रास्ता खोजा हो। हो सकता है किसी ने देवताओं की प्रकृति तक में दुष्टता सिद्ध करके अपनी दुष्टता की स्वाभाविकता और आवश्यकता प्रतिपादित की हो। कह नहीं सकते इस पशुबलि प्रचलन के पीछे क्या कारण थे। और यह प्रथा कैसे चल पड़ी? कारण जो भी रहा हो यह एक तथ्य हो कि सत्य और अहिंसा, दया और करुणा का आधार लेकर खड़ा हुआ भारतीय धर्म- देवताओं के सामने पशुबलि जैसी नृशंस प्रक्रिया का समर्थन नहीं कर सकता।
हो सकता है किन्हीं पुस्तकों में संस्कृत के कुछ श्लोक इस समर्थन में जुड़े हो। उन्हें अवांछनीय तत्त्वों द्वारा की गई घुस पैठ या मिलावट ही कहा जा सकता है। ऐसे दो पाँच श्लोक प्रस्तुत करके भारतीय धर्म की आत्मा को नहीं झुठलाया जा सकता। देवी सपना देकर या किसी अन्य प्रकार से ऐसा संकेत करती है कि मुझे हत्या और माँस द्वारा प्रसन्न किया जाया यह कल्पना आदि से अन्त तक निर्मूल है। जिस दिन देवी का हृदय इतना कठोर हो जाएगा उस दिन उसे माता या देवी कहलाने का अधिकार ही न रहेगा। वरदान, अनुदान या आशीर्वाद जिस दिन माँस मदिरा के मूल्य पर खरीदे जाने लगेंगे उस दिन वरदान दे सकने वाली अध्यात्म शक्ति का संसार से पलायन ही हो जाएगा। इन मान्यताओं में रत्ती भर भी सचाई नहीं है कि-देवता पशुबलि चाहते है या इस कुकृत्य द्वारा उन्हें प्रसन्न सन्तुष्ट किया जा सकता है। यदि कर्मफल का सिद्धान्त सत्य है। और यदि हत्या की गणना पाप कर्मों में है तो निश्चित रूप से इस नृशंस आयोजन से सम्बन्ध रखने वाले ओर समर्थन करने वाले अपनी आत्मा ओर परमात्मा के सामने पापी के रूप में ही प्रस्तुत होंगे और अपने कुकृत्य भोगेंगे।
समय आ गया कि हम अन्धकार युग की विकृतियाँ का संशोधन करे और जो अवांछनीय एवं अनुचित हे उसे तिरस्कृत बहिष्कृत करने के लिए साहस पूर्वक आगे आयें। पशुबलि भारतीय धर्म पर कलंक है। इस कार्लोच के रहते हम सत्य और अहिंसा का प्रतिपादन कैसे कर सकते है? फिर हमें भारतीय धर्म को असत्य और हिंसा का प्रतीक ही कहना पड़ेगा। देवताओं को दयालुता का प्रतीक रहने दिया जाय। जिन्हें माँसाहार करना हो उसे व्यक्तिगत रूप से करें। बेचारे देवताओं को उसमें सम्मिलित न करें। मन्दिरों की पवित्रता अक्षम्य रखी जानी चाहिए। पूजा प्रक्रिया में सात्विकता जुड़ी रहनी चाहिये। धर्म कृत्यों का वातावरण सद्भावना पूर्ण रहना चाहिए। इसके लिए यह नितान्त आवश्यक है कि पशुबलि जैसी नृशंस प्रक्रिया को किसी धर्म स्थान या धर्म आयोजन में तनिक भी स्थान या समर्थन न मिले।
आकाश पीला दीखता भर है पर वस्तुतः उसमें बहुत कुछ भरा रहता है। पोल में भरी हुई हवा को आसानी से अनुभव किया जा सकता है पर इसके भीतर ‘ईथर’ नामक तत्त्व रहता है। उसी के माध्यम से रेडियो का शब्द प्रवाह देश देशांतर तक पहुँचता है अन्तरिक्ष की यात्रा करने वाले राकेटों और उपग्रहों का पृथ्वी से नियन्त्रण एवं मार्ग दर्शन करना ईथर तत्त्व के कारण ही सम्भव होता है। ईथर की मात्रा अन्तरिक्ष में लबालब भरी न हो तो हमारी आवाज पड़ोस में बैठा व्यक्ति भी न सुन सके। और पृथ्वी पर तथा अन्तरिक्ष में काम करने वाले प्रक्षेपणास्त्रों। राकेटों की सम्भावना ही न रहे। तब आकाश में सैर करने की बड़ी बड़ी योजनाएँ बनाने का भी कोई आधार न रहे। रेडियो, ट्रांजिस्टर, टेलीविजन की बात तो दूर एक आदमी की बात दूसरे सुन सकें, यह साधारण बात भी असम्भव हो जाएगी। न दिखाई देने वाला, न अनुभव में आने वाला ‘ईथर’ तत्त्व कितने गज़ब की सामर्थ्य अपने भीतर भरे बैठा है, इसके महत्व पर जब ध्यान देते है, तब आश्चर्यचकित हो जाते है।
ईथर की तरह ही आकाश में एक ओर भी तत्त्व है, जिसका नाम हे ‘ऊर्जा’ ऊर्जा उष्णता से भिन्न है। एक ऐसा शक्ति प्रवाह परमाणुओं में बहता रहता हे, जिसमें अनन्त सामर्थ्य भरी पड़ी है। बिजली का समुद्र आकाश के उदर में लहलहा रहा है। बिजली घर की मशीनें तो उस आकाश में बहने वाले शक्ति प्रवाह को पकड़ने, रोकने और काम में लाने भर का प्रयोजन पूरा करती है। अन्तरिक्ष में ऊर्जा का शक्ति प्रवाह भरा न होता तो इस संसार में एक भी प्रकार की हलचल दिखाई न पड़ती। चन्द्रमा जैसी निस्तब्ध नीरवता का यहाँ साम्राज्य रहता। सुनसान और चुपचाप ही सब कुछ दीखता। विश्व व्यापी ऊर्जा ही है जो व्यक्ति के शरीर में रक्त संचालन हृदय की धड़कन, पाचन क्रिया, ज्ञान तन्तुओं में की हलचल मस्तिष्क की उथल पुथल यह सब कुछ ऊर्जा का ही खेल है। हमारा जीवन उसी पर निर्भर हे। बाह्य जगत् में हवा का चलना, नदी का बहना, पौधों का उगना, ऋतुओं का बदलना आदि समस्त क्रिया कलापों के मूल में विश्व व्यापी प्रचण्ड शक्ति से परिपूर्ण यह ऊर्जा ही अपने चमत्कार दिखा रही है और संसार में विविध विधि हलचलें हो रही है।
जड़ जगत् में जिस प्रकार अदृश्य ‘ईथर’ भरा पड़ा है और मोटी समझ में न आने वाली शक्तिशाली ऊर्जा का अस्तित्व मौजूद है। उसी प्रकार सूक्ष्म जगत् में भी ऐसी ही चमत्कारी शक्तियाँ मौजूद है। पंच तत्त्वों से बने जड़ जगत् की तरह एक दूसरा अदृश्य अति सूक्ष्म, चेतन जगत् भी है, जिसमें सत, रज, तम तीन ही तत्त्व है और उसमें कुछ ऐसी शक्तियाँ भरी पड़ी है, जो दृश्य जगत् में जो पाया गया है, उससे भी अधिक क्षमता सम्पन्न एवं चमत्कारी है। जड़ जगत् में जैसे ‘ईथर’ है, वैसा ही चेतन जगत् में ‘महत्तत्व’ है। जड़ परमाणु के पदार्थ बनाते है। उनके द्वारा विविध वस्तुएँ विनिर्मित होती है और चेतनता के परमाणु जीवन का सृजन करते है। गिनी जा सकने वाली 84 लाख योनियाँ और न गिनी जाने वाली कीटाणुओं की कोटि कोटि श्रेणियाँ इस चेतना प्रवाह का उत्पादन है। इसी को जीवन कहते है। इसके अंतर्गत एक जड़ जगत् में काम करने वाला ऊर्जा की तरह का एक प्रचण्ड शक्ति प्रवाह भरा पड़ा है, जिसे ‘प्राण’ कहते है। जीवन में सक्रियता इसी के बलबूते पर दिखाई देती है। शरीर के मर जाने पर भी उसमें जीवन रहता है, वह तुरन्त सड़ता है कृमि पैदा हो जाते है। स्यार, कुत्ते, कौए उसे रुचि पूर्वक खाते है। यदि मृत शरीर में से जीवन समाप्त हो गया होता तो वह पत्थर, लोहे या मिट्टी की तरह स्थिर पड़ा रहता। सड़न न होती, कीड़े न उत्पन्न होते और कोई जीव उसे खाना पसन्द न करता, स्पष्ट है कि मृत शरीर में भी जीवन तो है पर जिस कारण उसकी गतिविधियाँ बन्द हो गई, वह था प्राण निकल जाना। प्राण निकल जाना अर्थात् चेतन जगत में काम करने वाली ऊर्जा का जीवन से पृथक् हो जाना। प्राण के समन्वय से ही जीवन प्रगतिशील रह सकता है। दोनों अलग हुए कि मृत्यु घोषित कर दी गई। ‘प्राणी’ शब्द ही इस तथ्य का द्योतक है कि उसकी गतिविधियाँ प्राण तत्त्व पर अवलम्बित है। जिस क्षण प्राण विलग हो जाएगा प्राणी की सत्ता भी उसी क्षण अस्त हो जाएगी।
जड़ जगत् के वैज्ञानिक ईथर और ऊर्जा के मूल सिद्धान्तों के बारे में निरन्तर शोध करते हुए बहुत कुछ जान चुके है। जो जाना जा चुका, उससे असंख्य गुना जानने को बाकी और शेष है। सो अन्वेषण कर्ता अथक उत्साह के साथ प्रकृति के सूक्ष्म रहस्यों को जानने और उनसे लाभ उठाने की धुन में पुरी तन्मयता के साथ जुटें हुए है। इस कार्य में उन्हें सरकारी और गैर सरकारी अभीष्ट सहयोग भी मिलता है। पर खेद इस बात का है कि चेतन जगत् की महत्ता अत्यधिक होते हुए भी उसकी शोध, प्रयोग और उपलब्धियों के लिए अन्वेषण कार्य नहीं के बराबर ही हो रहा है और उस दिशा में अक्षम्य उपेक्षा बरती जा रही है। यदि इतनी शोध, जितनी कि जड़ जगत् की हो रही है-उतनी ही चेतन जगत् की की गई होती तो अब तक न जाने क्या क्या मिल गया होता और हम न जाने कहाँ से कहाँ जा पहुँचे होते।
प्राण-तत्त्व का योग और तन्त्र के उभय पक्षीय साधना ग्रन्थों में बहुत कुछ वर्णन है। चेतना जगत् में संव्याप्त ‘महत्तत्व’ की तुलना ईथर से की जा सकती है और प्राण की ऊर्जा से। प्राण किसी भी प्राणी की स्थिति, पुष्टि और प्रगति का प्रधान आधार है। जिसमें प्राण की जितनी मात्रा अधिक होगी, वह उतना ही मनस्वी और तेजस्वी होगा। यह मात्रा जितनी ही न्यून होगी, उसी अनुपात से प्राणी आलसी, दीर्घ सूत्री, मन्द, अज्ञ और अविकसित बना रहेगा। रक्त माँस से शरीर का कलेवर बढ़ता है और हड्डियाँ उसे मजबूती से खड़ा रहने भर का अवसर देती है। चमड़ी का रंग और बनावट से रूप, कुरूप का अन्तन आता है। आहार विहार के द्वारा उपलब्ध कलेवर केवल आँखों से दीखने वाली स्थूलता, कृशता एवं दिखावट भर की आवश्यकता पूरी करता है। इतने भर से कोई व्यक्ति समुन्नत स्तर को प्राप्त नहीं कर सकता। प्राण की दुर्बलता रहने पर शरीर भरापूरा लगने पर भी उसमें अदक्षता और अक्षमता ही बनी रहेगी।
प्राण की किसमें कितनी मात्रा इसका अनुमान उसकी प्रतिभा को देखकर लगाया जा सकता है। प्रतिभा प्राण की ही परिणित है। यह चमक प्रतिभावान मनुष्यों के अंग प्रत्यंग में चमकती ह। शरीर कृश है या कुरूप इससे कुछ बनता बिगड़ता नहीं, जिसमें प्राण प्रवाह समुचित मात्रा में भरा होगा, वह सहज ही तेजस्वी दृष्टिगोचर होगा। कई व्यक्तियों के चेहरे पर उदासी, खिन्नता, निराशा, अवसाद ग्रस्तता, अकर्मण्यता की काली छाया स्पष्ट दीखती है। वे जीवित होते हुए भी मृत जैसे लगते है। उन्हें न किसी कार्य में उत्साह होता है ओर न स्फूर्ति दिखाई देती हे। मरे मरे से जिन्दगी का भार ढोते हुए किसी तरह सामने पड़े कामकाज रो धोकर निपटा भर लेते हे। काम में रस नहीं आता और न उमंग ही उठती है कि इस कार्य को इस उत्तमता के साथ करके इस प्रकार की सफलता पाई जाय।
मरा हुआ मन महत्त्वाकाँक्षाएँ नहीं करता। कभी स्वप्न जैसी कल्पनाएँ तो उठती है पर अशक्ति का ध्यान आते ही वे दूसरे ही क्षण विलीन हो जाती है। शरीर देखने में पराश्ट होते हुए भी उस शक्ति से रहित होता है, जिसके द्वारा श्रम किया जाता है। महत्त्वपूर्ण काम करने में रक्त माँस में रहने वाली गर्मी काफी नहीं होती वरन एक और अन्तरंग क्षमता की आवश्यकता पड़ती है, जिसके आधार पर व्यक्ति बिना थके, देर तक, उत्साह के साथ काम करता रहता है- इस क्षमता का नाम ‘प्राण’ है। शरीर से रुग्ण और अशक्त होते हुए भी लोग इतना काम करते रहते है, जितना किसी बलवान पहलवान के लिए भी कठिन पड़ता है। काम के साथ गुँथ जाने और प्रस्तुत प्रयोजन की पूर्ति में तन्मय होकर जुट जाने की सामर्थ्य शरीर के भीतर रहने वाले प्राण की मात्रा पर निर्भर है।
अध्यात्म क्षेत्र के वैज्ञानिकों ने तपस्वी ऋषियों ने प्राण तत्त्व की अति महत्त्वपूर्ण शोध किसी समय की थी और उससे लाभ उठाने की सांगोपांग क्रिया पद्धति सर्वसाधारण के सामने प्रस्तुत की थी। प्राणायाम एक सुविस्तृत विज्ञान है। इसे छोटे से छोटे और बड़े से बड़े प्रयोजनों में प्रयुक्त किया जा सकता है। फेफड़ों को मजबूत बनाने और वायु विकारों के समाधान करने के लिए गहरी साँस लेना डी ब्रीदिगं प्राणायाम की हलकी किस्म है। इसे स्वास्थ्य संरक्षण के लिए काम में लाया जाता है। संध्या वन्दन में इसी किस्म के प्राणायाम का प्रयोग किया जाता है ताकि वायु संचारक अंगों का हल्का-सा व्यायाम होता रहे और उन अंगों से सम्बन्धित रोगों से ग्रस्त होने का अवसर न आवे।
विदेशों में इस स्तर पर और भी अधिक प्रयोग हुए हैं। जापान के डाक्टर शेराबुज 15 से 35 वर्श तक की आयु में फेफड़ों के क्षय से ग्रसित रहे। जापान के हर बड़े अस्पताल में उन्होंने प्रवेश लिया ओर फेफड़ों में हवा भराव रहने से लेकर कई पसलियाँ निकलवा देने तक-दवाओं से लेकर परिचर्या प्रतिबन्धों तक उन्होंने पूरी सावधानी बरती पर लाभ कुछ नहीं हुआ और उनका दाहिना फेफड़ा बिलकुल निकाल देने की नौबत आ गई। इसी समय किसी प्रकार उन्हें गहरी साँस लेने वाली प्राणायाम की प्रथम प्रक्रिया की जानकारी मिली और वे उसका प्रयोग करने लगे।परिणाम बहुत चमत्कारी हुआ। स्वास्थ्य तेजी से सुधरने लगा और एक वर्श के भीतर वे पूर्णतया क्षय मुक्त हो गये। इस पद्धति से वे बहुत प्रभावित हुए और अस्पताल से निकालते ही उन्होंने प्राणायाम प्रशिक्षण के सैकड़ों केन्द्र जापान के कोने-कोने में स्थापित किये और अपने जैसे ही हजारों-लाखों रोगियों के प्राण बचाये।
हलके एवं प्रारम्भिक प्राणायाम भी शरीर में प्राण शक्ति का अभिवर्धन कर सकते हैं। उस बढ़ी हुई शक्ति के द्वारा रोगों से लड़ना और उन्हें परास्त करना सरल है। जीवनी शक्ति सब कुछ कर सकती है। वह काम करने की क्षमता उत्साह स्फूर्ति आशा उमंग जैसी अभिनव क्षमता ही प्रदान करती हो सो बात नहीं रोगों से लड़ा और उन्हें मार भागने की भी सामर्थ्य उसमें भरी पड़ी है। इस जीवनी-शक्ति की -प्राण प्रवाह को किसी प्रकार बढ़ाया कमाया जा सके तो निश्चय ही रुग्णता पर विजय प्राप्त करके स्वास्थ्य और परिपुष्टता का लाभ उठाया जा सकता है।
प्राण शक्ति का छोटा चमत्कार आरोग्य संवर्धन है। पर वह इतने तक ही सीमित नहीं। जीवन के हर क्षेत्र में उसकी सामर्थ्य का सत्परिणाम देखा और पाया जा सकता है। चेहरे पर ओज और आँखों में तेज प्राण शक्ति का ही चमत्कार है। किसी के सामने जाते ही हम इतने प्रभावित हो जाते हैं कि विरोध और असहमति की बात जो सोचकर गये थे वे हवा में उड़ जाती हैं और उसके सामने सहमति प्रकट करने एवं हाँ में हाँ मिलाने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं रह जाता। मैस्मरेजम हिप्नोटिज्म की साधना में त्राटक गोलकों में विकसित इस प्राण प्रवाह के द्वारा केवल नेत्रों का तेज बढ़ाया जाता है और चक्षु गोलकों में विकसित इस प्राण प्रवाह के द्वारा सम्मोहन के कितने ही खेल चमत्कार दिखाये जाते हैं। इस प्रकार का प्राण प्रवाह अन्य इन्द्रियों में भी होता है। उस विकसित और व्यवस्थित किया जा सके तो शरीरगत प्राण प्रवाह हमारे व्यक्तित्व को प्रखर तेजस्वी एवं प्रभावशाली बना सकता है।
कुण्डलिनी शक्ति की चर्चा में गत वर्श दिसम्बर में हमने एक लेख-माला आरम्भ की थी। इसके बाद देश भर के दौरे का क्रम बन जाने से वह महत्त्वपूर्ण प्रतिपादन रुका पड़ा रहा अब उसे पुनः आरम्भ करने जा रहे है। उस लेख में हमने कुण्डलिनी के दक्षिणी ध्रुव-मूसलाधार चक्र की चर्चा की थी और कहा था कि जननेन्द्रिय केवल मूत्र विसर्जन अथवा काम-क्रीड़ा के लिए ही नहीं वरन उसमें प्राण शक्ति का क ध्रुव केन्द्र अवस्थित है। नये मनुष्य उत्पन्न कर सकने की क्षमता से सुसम्पन्न यह केन्द्र है। प्रजनन के द्वारा मनुष्य प्रजापति की एक छोटी भूमिका प्रस्तुत करता है। इस केन्द्र का वैज्ञानिक स्तर पर उत्खनन उदीप्तीकरण एवं प्रस्फुरण किया जा सके तो मनुष्य विश्वव्यापी प्राण तत्त्व के साथ अपना सम्बन्ध जोड़कर अति मानव बन सकता है शट चक्रों में सन्निहित अष्ट सिद्धि एवं नवानद्धि उसे करतल गत हो सकती हैं।
मूलाधार चक्र में मानव शरीर के प्राण प्रवाह का एक सिरा जुड़ा है। दूसरा सिरा सहस्रार कमल मस्तिष्क का मध्य बिन्दु है, जिसे ब्रह्मरंध्र भी कहने हैं। इन दोनों सिरों की शक्ति का एक दूसरे में आवर्तन प्रत्यावर्तन होता रहता है। मस्तिष्क और जननेन्द्रिय का परस्पर अविच्छिन्न सम्बन्ध है। काम वृत्ति को मनसिज अर्थात् मन से उत्पन्न कहते हैं। मन में कामुकता के विचार आयेंगे तो जननेन्द्रिय में हलचल होगी। जननेन्द्रिय स्वप्नावस्था में वीर्यपात कर रही होगी तो अनायास ही स्वप्न में विषयभोग के दृश्य दीखेंगे। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए हम विद्यार्थी को ब्रह्मचारी कहते हैं। जो ब्रह्मचर्य द्वारा शक्ति का संचय करेगा, वह विद्या प्राप्त कर लेगा। जिसने एक सिरे में छेड़छाड़ शुरू की उसका दूसरा सिरा उत्तेजित होगा। कामुकता ही हलचलें करने वाले को सफल विद्याभ्यासी होने ही आशा छोड़नी पड़ती है। मोटी आँखों से शिवलिंग की पूजा अश्लील प्रतीत होती है। नारी और नर की जननेन्द्रिय का सम्मिश्रित स्वरूप ‘शिवलिंग और जलहली’ बनाकर हम पूजते और उस पर जल चढ़ाते है, इसका आध्यात्मिक रहस्य ब्रह्मचर्य का प्रतिपादन और इन इन्द्रियों को ब्रह्म रूप मानकर उनका अति उच्च उद्देश्य, उद्देश्यों के लिए ही प्रयोग करने का तत्त्वज्ञान है। जल चढ़ाकर इन शक्ति संस्थानों को उत्तेजित न करके शीतल रखने की आस्था को ही सुदृढ़ करते हैं।
प्रकट रहस्य है कि शरीर के अन्य अंगों का स्पर्श हो जाने पर नर-नारी के बीच कोई खास विकृति नहीं आती। यदि जननेन्द्रियों का तनिक सा सम्पर्क एक दूसरे को न छूटने वाले दाम्पत्य जीवन में बाँध देता है। कारणवश न भी बँधे तो लगभग वैसी ही स्थिति उत्पन्न कर देता है। इसलिये इस सन्दर्भ में बहुत सतर्कता बरतने और बहुत सोच समक्ष कर ही इस दिशा में कदम बढ़ाने की अपनी परम्परा बनी है। जबकि दूसरे देशों में लुक छिपाकर काम सेवन को कोई महत्व नहीं दिया जाता है। कारण यही है कि यौन सम्पर्क से उत्पन्न आकर्षण इतना प्रबल होता है कि वह अवांछनीय जोड़ो को भी परस्पर जोड़कर भविष्य के लिए अवांछनीय परिणाम उत्पन्न करता है। ब्रह्मचर्य की महिमा इसीलिये है कि प्राण शक्ति के शरीरगत दक्षिणी ध्रुव का अवांछनीय दुरुपयोग न होने पाये। वैज्ञानिक कहने रहते हैं कि पृथ्वी के ध्रुवों से परमाणु परीक्षण आदि की बड़ी हलचलें दूर रखी जायें अन्यथा धरती अपनी धुरी से हटकर किसी दूसरी कक्षा में बहक सकती है और संसार का सारा क्रम एवं स्वरूप ही बिगड़ सकता है। ब्रह्मचर्य की छेड़छाड़ ऐसी ही संवेदनशील है, उसका भले से भला और बुरे से बुरा परिणाम हो सकता है।
गुदा और जननेन्द्रिय के बीच में जो थोड़ा सा खाली स्थान है, वही मूलाधार चक्र का स्थान है। सुमेरु भी यही है। कूर्म अवतार भी यहीं विराजमान् है। कुण्डलिनी शक्ति का एक सिरा इसी स्थान पर है। यहाँ प्राण शक्ति का आधा भाग विद्यमान् है। साधक इस संचित महाकोष से जितनी मात्रा में चाहे शक्ति का अनुदान प्राप्त कर सकते है और तेजस्वी, मनस्वी, यशस्वी बन सकते है। और दुरुपयोग करके जवानी में वृद्धावस्था वरण करके अकाल के काल कवलित भी हुआ जा सकता है।
समुद्र मन्थन की अलंकारिक पौराणिक कथा के कई रहस्य है। उनमें से एक यह ड़ड़ड़ड़-जीवन रूपी समुद्र को यदि कर्म रूपी मंदराचल पर्वत के माध्यम से मथा जाय तो उसमें से अनेक प्रकार की श्री, समृद्धि, सम्पत्ति और सफलताओं के चौदह रत्न निकल सकते है। एक यह भी है कि मूलाधार पर्वत है, उसके नीचे का कूर्म, कच्छप भगवान है। यह कायर समुद्र है। शेषनाग जिससे यह समुद्र मथा गया था, साड़े तीन चक्रों में लपेटी हुई कुण्डलिनी महासर्प है। तन्त्र शास्त्रों में समुद्र मन्थन को रतिक्रिया का प्रतीक बताया गया है और उससे सम्भव है सकने वाली शारीरिक एवं मानसिक उपलब्धियों की तुलना चौदह रत्नों से की गई है। इस मन्थन को कुण्डलिनी जागरण की प्रक्रिया, ऋद्धि-सिद्धियों के चौदह रत्नों से साधक को परिपूर्ण कर सकती है। समुद्र में पहले से ही बहुत कुछ भरा और छिपा था, मन्थन द्वारा उसे निकाला भर गया। हमारे तीन कलेवरों में- स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीरों में असम्भव लगने वाली सम्भावनाओं के भाण्डागार भरे पड़े है, उन्हें यदि ठीक से ढूँढ़ा, सँभाला, सजाया और सँजोया जा सके तो हम देवोपम परिस्थितियाँ और सर्वोत्तम सम्पत्तियाँ अपने भीतर ही प्राप्त कर सकते है। उसके लिये अन्यत्र भटकने की आवश्यकता नहीं।
बिना दहेज बिना जेवर बिना धूमधाम बारात और प्रदर्शन रहित अति सादगी के साथ सम्पन्न होने वाले आदर्श विवाहों के लिये जो सहमत हों वे ही प्रतिज्ञा-पत्र भरें फोटो भी साथ भेजे। अधिक फार्मों की आवश्यकता हो तो हाथ से लिखकर या टाइप कराकर बना लें अथवा मथुरा से मँगा लें। उत्तर के लिये 20 पैसे का टिकट हर बार भेजना चाहिये। यदि कहीं विवाह पक्का हो जावे तो उसकी सूचना तुरन्त भेज दें। यदि किसी कालम में पूरी बात न लिखी जा सके तो अलग कागज पर कालम नम्बर डालकर विवरण दें।
(1) नाम वर/कन्या ………………………………
(2) जन्म तिथि ………………………………
(3) शिक्षा …………………………….
(4)स्वभाव …………………………………..(5)विशेष योग्यता या दोष-व्यसन …………
(6)जाति ………………. (6) उपजाति ……………….
(8)रंग …………………….…(9)ऊँचाई …………...(10)वजन ………………
(11)लड़का/लड़की तथा अभिभावक की आजीविका का विस्तृत वर्णन ……………………….
(12)परिवार के सभी सदस्यों का पूरा परिचय शिक्षा आयु व्यवसाय आदि सहित ………………
(13) शारीरिक स्थितिः-पिछले दिनों कोई बड़ा रोग हुआ हो अथवा इस समय कोई शारीरिक या मानसिक कठिनाई हो तो उसका स्पष्ट उल्लेख ……………….
(14) किन उपजातियों में विवाह स्वीकार है …………………………………….............
(15)साथी वर या वधू किन विशेषताओं से युक्त हो ……………………………………...
(16) यदि विधुर विधवा या परित्यक्ता है तो पूर्व दाम्पत्य जीवन का वर्णन वियोग का कारण तथा सन्तानों का परिचय ……………………………………...
(17) कोई विशेष बात कहनी या बतानी हो तो वह भी लिखें ……………………………….
(18) वह पूरा पता जिस पर पत्र व्यवहार किया जाय ……………………………………...
हस्ताक्षर विवाहार्थी हस्ताक्षर अभिभावक
मुहूर्त माने गये हैं। 1 दैव उठनी एकादशी 2 गीता जयन्ती 3 बसन्त-पंचमी 4 शिवरात्रि 5 रामनवमी 6 अक्षय तृतीया 7 गायत्री जयन्ती 8 गुरुपूर्णिमा 9 विजय-दशमी 10 शरद पूर्णिमा। यह दस पर्व बिना मुहूर्त बनाये सदा सबके लिए शुभ होते हैं। इन पर्वों पर हर विवाह किया जा सकता है।फिर गायत्री माता के अचल में तो सारे मुहूर्त स्वयमेव शुभ हो जाते हैं। किसी अशुभ को उनके सामने ठहरने की कोई गुँजाइश नहीं रहती।
सिख सम्प्रदाय के एक वर्ग में एक ही दिन समस्त विवाह प्रधान गुरुद्वारे में सम्पन्न होते हैं। अपने लिए वैसा तो कठिन पड़ेगा पर इतना तो आसानी से हो सकता है कि जिन्हें अपने स्थानों पर असुविधा हो वे यहाँ आकर विवाह करा लिया करे। ऐसा भी हो सकता है कि कुछ आदर्शवादी विवाह सामूहिक रूप से एक साल एक बड़े आयोजन के रूप में सम्पन्न हुआ करें। जिससे दर्शकों में वैसा करने के लिए उस प्रदर्शन में अनुकरण का उत्साह उत्पन्न हो। माथुर वैश्य सभा द्वारा पिछले वर्षों में ऐसे आयोजन बहुत बड़ी संख्या में अपनी जाति वालों के सामूहिक विवाहों के साथ सम्पन्न करायें हैं। अपनी ड़ड़ड़ड़ शाखा का वार्षिकोत्सव हर साल एक विशाल गायत्री यज्ञ के साथ सम्पन्न होता है और उसमें सामूहिक रूप से कई आदर्श विवाह भी संपन्न होते हैं। जहाँ सुविधा हो ऐसे सामूहिक विवाह आयोजनों की भी व्यवस्था बनाई जा सकती है।
अपने परिवार में ऐसे आदर्श विवाहों का प्रचलन हो गया तो यह आग आँधी-तूफान की तरह सारे समाज में फैलेगी और उसका इतना व्यापक प्रभाव पड़ेगा कि आज की खर्चीली विवाह प्रथा होलिका दहन की तरह भस्मसात् होती हुई हम सब अपनी आँखों से देख सकेंगे। नेतृत्व की जरूरत है अनुकरण के लिए सारा समाज तैयार बैठा है। हमारा तनिक सा साहस सारे समाज का पथ प्रदर्शन कर सके और एक अति त्रासदायक विवाहोन्माद असुर का ध्वंस किया जा सके तो उससे सर्वत्र संतोष की साँस ले सकने वाला वातावरण बनेगा। अग्रणी बनने वाले लोगों के गुणगान चिरकाल तक सुने जाया करेंगे।
औसतन हर् विवाह में पाँच हजार का खर्च मान लिया जाय और हर परिवार की चार विवाह भी करने पड़ते हों तो बीस हजार की बचत हुई। अपने बीस हजार परिवारों में यह प्रथा चल पड़े तो 40 करोड़ रुपये का लाभ अपने छोटे से संगठन के लोगों को ही पहुँचा सकते है। और यह प्रथा व्यापक बन गई तो हम कुछ ही दिनों में अपने समाज की हजारों अरब रुपये की बर्बादी बचा सकते हैं। और उस बचत का यदि सदुपयोग हो सके तो अपने देशवासियों का जीवन स्तर हर दिशा में इतना विकसित हो सकता है कि हम अपने ही साधनों से रूस अमेरिका से बढ़कर अपनी गरिमा प्राप्त कर सकें।
विचार-क्राँति का अति महत्त्वपूर्ण मोर्चा विवाहोन्माद के असुर से लड़ने का है। वह कंस हिरण्यकश्यप जरासन्ध वृत्तासुर भस्मासुर रावण कुम्भकरण महिषासुर आदि से किसी प्रकार कम नहीं। इसे पछाड़ लिया तो समझना चाहिये कि भारतीय संस्कृति के सामने खड़े समुद्र जैसे अवरोध को पार कर लिया गया। सादगी से बिना खर्च विवाह सम्पन्न होने की प्रथा प्रचलित होने के साथ ही उभरी हुई विचार-शीलता अन्य अनेक मोर्चों को जीतेगी। आज की अन्य सामाजिक कुरीतियाँ उस दावानल में सहज ही जलजल कर भस्म होंगी। पुत्र और कन्या की-नर और नारी की असमानता का अन्त भी इस कुप्रथा के साि ही होना है। दोनों ही वर्ग जब प्रबुद्ध नागरिकों की तरह ईश्वर प्रदत्त समता का आनन्द लेते हुए कन्धे से कन्धा मिलाकर एक दूसरों को आगे बढ़ाते और ऊँचा उठाते हुए हर्ष उल्लास के साथ कार्य क्षेत्र में उतरेंगे तो उस समय की परिस्थितियाँ देखने ही योग्य होंगी। ऐसे ही सपनों के साथ नवयुग के अवतरण की आशा संजोये बैठे रहे हैं और अब उसे साकार करने के लिए गतिशील हो रहे हैं।
युग परिवर्तन की इस पुण्य बेला में हमें अपने कर्तव्य पालन के लिए अधिक उत्साह ओर अधिक साहस के साथ अग्रसर होना चाहिये। ज्ञान-यज्ञ का प्रथम चरण प्रचार और दूसरा परिवर्तन है। अपने यह अभियान ओर आन्दोलन एक दूसरे के प्रेरक हैं। प्रेरक विचारों की सार्थकता परिवर्तनकारी कार्यों के साथ जुड़ने पर ही सम्भव होती है। इस सन्दर्भ में हममें से प्रत्येक को उत्तरदायित्व और कर्तव्य को पूरा करना चाहिये।
*समाप्त*