दुनियाँ में जितने धर्म, सम्प्रदाय, देवता और भगवानों के प्रकार हैं उन्हें कुछ दिन मौन हो जाना चाहिये और एक नई उपासना पद्धति का प्रचलन करना चाहिए जिसमें केवल “माँ” की ही पूजा हो, माँ को ही भेंट चढ़ाई जाये?
माँ बच्चे को दूध ही नहीं पिलाती, पहले वह उसका रस, रक्त और हाड़-माँस से निर्माण भी करती है, पीछे उसके विकास, उसकी सुख-समृद्धि और समुन्नति के लिये अपना सब कुछ न्यौछावर कर देती है। उसकी एक ही कामना रहती है मेरे सब बच्चे परस्पर प्रेमपूर्वक रहें, मित्रता का आचरण करें, न्यायपूर्वक सम्पत्तियों का उपभोग करें, परस्पर ईर्ष्या-द्वेष का कारण न बनें। चिर शान्ति, विश्व-मैत्री और “सर्वे भवन्ति सुखिनः” वह आदर्श है, जिनके कारण माँ सब देवताओं से बड़ी है।
हमारी धरती ही हमारी माता है यह मानकर उसकी उपासना करें। अहंकारियों ने, दुष्ट-दुराचारियों स्वार्थी और इन्द्रिय लोलुप जनों ने मातृ-भू को कितना कलंकित किया है इस पर भावनापूर्वक विचार करते समय आंखें भर आती है। हमने अप्रत्यक्ष देवताओं को तो पूजा की पर प्रत्यक्ष देवी धरती माता के भजन का कभी ध्यान ही नहीं आया। आया होता तो आज हम अधिकार के प्रश्न पर रक्त न बहाते, स्वार्थ के लिये दूसरे भाई का खून न करते, तिजोरियाँ भरने के लिये मिलावट न करते, मिथ्या सम्मान के लिये अहंकार का प्रदर्शन न करते। संसार भर के प्राणी उसकी सन्तान-हमारे भाई हैं। यदि हमने माँ की उपासना की होती तो छल-कपट ईर्ष्या-द्वेष दम्भ, हिंसा, पाशविकता, युद्ध को प्रश्रय न देते। स्वर्ग और है भी क्या, जहाँ यह बुराइयाँ न हों वहीं तो स्वर्ग है। माँ की उपासना से स्वर्गीय आनंद की अनुभूति इसीलिये यहीं प्रत्यक्ष रूप से अभी मिलती है। इसलिये मैं कहता हूँ कि कुछ दिन और सब उपासना पद्धति बंद कर केवल “माँ” की मातृ-भूमि की उपासना करनी चाहिये।
-स्वामी विवेकानन्द
परमेश्वर का कराल मुख अग्नि-जिह्वा की तरह और उससे प्रेम करना यज्ञ। वह जिसमें देह, प्राण, मन, वस्तु, परिस्थिति, ममता, राग, कामना, मोह आदि को समिधायें बना कर स्वाहा किया जाता है। प्रेम की परीक्षा यही तो है कि हम अपनी प्रिय वस्तुओं का प्रेमी के लिये कितना निःस्वार्थ उत्सर्ग कर सकते हैं। जब तक विवाह नहीं होता व्यक्ति केवल अपने हित की बात सोचता है अपने लिये सबसे अच्छा खाना, सबसे अधिक खर्च, सबसे अच्छे साधन चाहता है उनमें कोई त्रुटि हो, अभाव दिखाई दे तो वह लड़ने-झगड़ने पर उतारू हो जाता है। और किसी को भी उसी तरह अधिक पाने की इच्छा और अधिकार का उसे किंचित् भी ज्ञान न था क्योंकि उसे मालूम नहीं था कि प्रेम जैसी, उत्सर्ग जैसी सुखद वस्तु भी संसार में कुछ है। जब तक लेना ही लेना, स्वार्थ ही स्वार्थ था तब तक अधिक पाकर भी उसके मन में सन्तोष और तृप्ति न थी।
फिर विवाह हो गया और घर नई दुल्हन आ गई। दुल्हन के अंग-प्रत्यंग नाक-नक्शा पहनाव-ओढ़ाव में अपनी बहन, बुआ, भावज से थोड़ा ही अन्तर था किन्तु वह एक समर्पण का भाव-मैं केवल तुम्हारी हूँ” ऐसा भाव लेकर जो आई थी इसलिये अब उस व्यक्ति के सुख और स्वार्थ, सन्तोष और तृप्ति का माध्यम धर्मपत्नी हो गई। अपना आपा नष्ट हो गया। धर्मपत्नी को आत्म-समर्पण का लाभ यह मिला कि उसे एक प्रेमास्पद स्वरूप, संरक्षक, स्वामी और न जाने क्या-क्या मिल गया पर खोया उस व्यक्ति ने भी नहीं। देखने में नव-वधू ने उसके स्थूल सुखों को छीनना प्रारम्भ कर दिया किन्तु वह जानता है कि बदले में उसे जो प्रेम मिल रहा है उस सुख की तुलना में वस्तुओं का सुख तुच्छ और नगण्य है इसलिये अब उसे अपना ध्यान नहीं रहता। वह अपने की अपेक्षा अपनी पत्नी की सुख-सुविधाओं की चिन्ता करने लगता है। प्रेम की इस परीक्षा में दोनों ही ने खोया पर उन दोनों ने ही जो कुछ पाया उस पर उससे भी अधिक न्यौछावर किया जा सकता है, यह कोई नव-विवाहित दम्पत्ति ही जानते हैं।
परमात्मा के प्रेम का अमृत समुद्र की तरह गहरा और अथाह है। सामान्य हाड़-माँस के शरीर वाले सौंदर्य के प्रति प्रेम-भाव से मनुष्य को थोड़ी देर के लिये ऐसी तृप्ति मिलती है कि मनुष्य उसको बार-बार याद करता है और भटक-भटक जाता है किन्तु प्रेम के अगाध सागर के पास पहुँच कर द्वन्द्व और भटकने की कल्पना भी नहीं की जा सकती। यह तो प्रेम का निरन्तर बहने वाला झरना है जो कभी सूखता नहीं और जिसके पास पहुँच कर तृप्ति कभी मिटती नहीं।
किन्तु ऐसा प्रेम, प्रार्थना और थोड़ी-सी पूजा तक ही सीमित नहीं रह सकता। जब नाशवान् वस्तुओं का प्रेम सीमित नहीं रह सकता। जब नाशवान् वस्तुओं का प्रेम आँखों में नशा बन कर छा जाता है एक प्रेमी को मूर्ति के अतिरिक्त और कुछ सुहाता नहीं, मन में उसी की भाव-भंगिमाओं मधुर निःश्वास और मीठी-मीठी बातों के अतिरिक्त कुछ टिकता नहीं तो परमेश्वर के बारे में यह कल्पना कैसे कर ली जाये कि वह थोड़ी देर को प्रार्थना पूजा से भावनाओं में मस्ती बनकर उतर आयेगा। उसके लिये तो मीरा, सूर, तुलसी, गोरखनाथ, रैदास, कबीर, चैतन्य महाप्रभु, नानक और सन्त गोविन्ददास की तरह बस एक ही रट-मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरा न कोई” “अखियाँ हरि दर्शन की भूखी”, “राम प्रान-त्रिय जीवन जी के”, “मन रे राजा राम होइ ले निरदन्द”, दरमन तोरा जीवन मोरा, “बिन दरसन क्यों जीवै चकोरा”, “राम न भूला दास कबीर”, “न धनं न जनं न सुन्दरी कविताँ वा जगदीश कामये”, “तुमरी अस्तुति तुम ते होइ और “वल्लभ चरन लग्यो चित मेरो” लगानी पड़ती है। अपने अहंभाव को भूल कर उस विशाल-बाहू सहस्त्राक्ष, सहत्रपाद परमेश्वर की प्रेमानुभूति का सुख मिलता है। इन सन्तों के पास कोई जमीन-जायदादें और जागीरें नहीं थी। प्रेम की सत्ता पर ही वह स्वर्गीय सुखों का रसास्वादन-जब तक जिये करते रहे और मरे तो-मुआ कबीर रमत श्रीराम-ईश्वर में ही विलीन हो गये।
पूर्ण समर्पण का ही दूसरा नाम ईश्वर-प्रेम है। पर अर्पित सभी वस्तुओं को बदले में उसी गुण और स्वभाव का अनन्त गुना सुख प्रेमी को मिलता है। देह भगवान् की हो जाये तो फिर वासनाओं से क्या लगाव। उसकी वस्तु उसी के लिये। फिर उस पर अनावश्यक कामनाओं का बोझ क्यों? जो रूखा-सूखा मिले वही खाना, जहाँ सौर भर की जगह मिले वहीं सो जाना उस संयमी के लिये रोग-शोक हारी-बीमारी की क्या चिन्ता। उसके लिये सर्वत्र सन्तोष ही सन्तोष के दर्शन होते हैं।
प्राण परमेश्वर को दे दे तो वह और भी बढ़ता है। प्राण की छोटी-मात्रा को किसी लौकिक कार्य में नियोजित कर के तल्लीनता का अपार सुख मिलता है पर उससे प्राण का विनिमय होता है। जिस तरह शारीरिक व्यक्ति देकर कामोपभोग का क्षणिक सुख प्राप्त किया जाता है प्राण के मूल्य पर ही तो साँसारिक भोग आकर्षित किये जाते हैं पर अपने प्राणों को जब प्रेमी भगवान् के प्राणों से जोड़ देता है तो उसकी अपनी मेधा, प्रज्ञा और ऋतम्भरा बुद्धि का विकास होता है। तालाब के पास के गड्ढे को तालाब से सम्बन्धित कर दो तो गड्ढे का पानी भला तालाब को क्या भरेगा? अपने पानी से भर कर उस नन्हे से गड्ढे को भी तालाब बना देने की क्षमता के समान प्रेमी मनुष्य को अपनी तरह का भगवान् बना देने की क्षमता परमेश्वर में ही है इसलिये उसके लिये हवन किया हुआ प्राण कभी निरर्थक नहीं जा सकता।
मन, वस्तुएँ, परिस्थितियाँ और साँसारिक सुखों को भगवान् के लिये जितना ही उत्सर्ग करते हैं उतना ही आमोद बढ़ता है। जिस प्रकार होम की वस्तुएँ अधिक सूक्ष्म और व्यापक होकर प्रभावित करती हैं, होम किये हुये साँसारिक सुख भी सूक्ष्म होकर आत्मिक सुख, श्रमशक्ति और सौंदर्य प्रदान करते हैं। जब सब कुछ छोड़ कर सहज स्थिति में अपने आपको खाली बना लिया जाता है तब केवल परमात्मा के प्यार का अन्तःकरण में दोहन होता है और उस निर्झरित प्रेम प्रवाह की मस्ती में प्रेमी भक्त संसार के सब कुछ दुःखों का भूल जाता है। उस प्रेम का अन्त नहीं होता, उस सौंदर्य की इति नहीं होती और उस आनन्द का कोई पारावार नहीं होता। वरन् रस और जीवन का माधुर्य बढ़ता ही जाता है।
ऐसे प्रेमी को अपने सुखों की लेशमात्र भी इच्छा नहीं रहती। इच्छाएँ सदैव विचारपूर्ण रहती हैं और जब-जब मन में विकार आता है आत्मा के उजलेपन में अन्धकार छा जाता है। विकार का अँधियारा बढ़ते-बढ़ते वह एक दिन आत्मा को घटाटोप की तरह छोड़ लेती है और दिव्य ईश्वरीय प्रकाश कूड़े में पड़े मोती की तरह निरर्थक हो जाता है। मनुष्य भटकता रहता है, फिर कभी अनायास ही वह प्रकाश मिल जाये तो हरि इच्छा अन्यथा विकार-प्रसूत 84 लाख योनियों में ही मनुष्य भटकता रहता है इसलिये परमेश्वर की आकांक्षा रखने वाले प्रत्येक व्यक्ति के लिये इच्छाएँ दूषण की ही नई हैं और इसीलिये भगवत् भक्त केवल ईश्वरीय प्रेम की ही अभिलाषा को दृढ़ बनाते रहे हैं। उससे जहाँ वे लौकिक खड्डों से बचे हैं वहीं उन्हें प्रेम-रस का धारा प्रवाह सिंचन मिलता रहा है।
प्रेम का विकास करते-करते एक दिन सब द्वन्द्व मिट जाते हैं। हम कभी भावनात्मक सुख की ओर जाते हैं फिर कभी पदार्थों की आसक्ति अपनी ओर खींच लेती है। मानव इतर योनियों भ्रमित कराने वाली आसक्ति से ठीक उलटी स्थिति परमेश्वर के प्रेम की है। उसमें लौकिक सुखों के द्वन्द्व समान होकर जीवन में एक प्रकाश की स्थिति शेष रह जाती है प्रियतम की छवि, सौंदर्य और माधुर्य ही शेष रह जाता है। उसे सबसे प्रेम की ही चाह दिखाई देती है। उसे सबमें प्रेम का ही व्यापार दिखाई देने लगता है वह उसी प्रेम के सागर में डूब कर प्रेम-स्वरूप हो जाता है। यही ईश्वरत्व है, इसी का नाम अमृत है। जो प्रेम का अमृत पा गया वह ईश्वर को पा गया।
देवर्षि नारद ने ध्रुव की निष्ठा परखते हुए पूछा-वत्स घेर तपस्या के बाद भी यदि तुम्हें भगवान् के दर्शन न हुए तब क्या करोगे? बालक ने मुस्कराते हुए कहा-भगवन् तब मैं आगे भी तप करता रहूँगा और ज्ञात करूँगा कि क्या ईश्वर को पाने के लिये एक जन्म पर्याप्त नहीं।
कहते हैं रूस का मास्को शहर संसार का सबसे बड़ा शहर है। दो लाख एकड़ क्षेत्र में से इस भव्य नगर में 65 लाख से भी अधिक नागरिक निवास करते हैं। प्रति वर्ष 1 लाख 20 हजार के हिसाब से नये फ्लैट बनते जा रहे हैं प्रति दिन 350 परिवारों को नये मकान दिये जाते हैं। पूरे शहर में 30 नाट्यकार, 100 सिनेमाघर, 80 उच्चतर माध्यमिक विद्यालय हैं। इनमें 5 लाख छात्र शिक्षा पाते हैं। राजकीय लेनिनग्राड पुस्तकालय में 2 करोड़ 20 लाख पुस्तकें संगृहीत हैं। इस विशालता में लन्दन जैसे ढाई शहर और पेरिस जैसे 8 शहर समा सकते हैं। मास्को शहर की विशालता का क्या कहना?
हम जिस पृथ्वी में रहते हैं उसमें ऐसे-ऐसे 4 और विशाल शहर हैं। छोटों की तो कोई गणना ही नहीं। अकेले भारतवर्ष में ही 6 हजार के लगभग शहर हैं, दुनियाँ में तो उनकी संख्या लाखों में होगी। इसी प्रकार गाँवों की संख्या और उनमें रहने वाले निवासी भी पृथ्वी में भरे पड़े हैं। 13000 किलोमीटर व्यास वाली पृथ्वी के सूखे भाग की इस व्यापक हलचल और कल्पना में न उतरने वाली विशालता को भला मनुष्य की एक-एक इंच से भी छोटी आंखें कहाँ देखती हैं?
पृथ्वी के जिस भाग का वर्णन किया जा रहा है जो सूखा और आबाद है वह तो कुल द हिस्सा ही है हिस्से में जल भरा हुआ है। समुद्र ही समुद्र है आइये देखें उसकी लम्बाई चौड़ाई कितनी है।
हिन्द महासागर का क्षेत्रफल 2 करोड़ 80 लाख वर्गमील है जब कि भारतवर्ष और पाकिस्तान दोनों का कुल मिला कर 1626148 ही वर्गमील क्षेत्रफल है। अफ्रीका के दक्षिणी सिरे से लेकर आस्ट्रेलिया के बीच तक इसकी लम्बाई 6200 मील है। उसमें 30 लाख खरब टन जलराशि, 80 हजार खरब टन नमक और 20 किलोवाट प्रति घन्टे की विद्युत शक्ति उसमें भरी हुई है। उसमें रहने वाले जीव-जन्तुओं की संख्या तो मनुष्य शरीर में जीन्स की तरह असंख्य है जब कि अभी ऐसे-ऐसे तीन और महासागर हैं। प्रशान्त महासागर जिसकी औसत गहराई 14050 फुट है 63800000 वर्गमील, अटलांटिक महासागर 12880 फीट गहरा 31830000 वर्गमील, आर्कटिक महासागर 4200 फुट गहरा और 5440000 वर्गमील में फैला हुआ है। सूखी धरती और वह जल भाग जो उसके अतिरिक्त है वाली धरती की विशालता का अनुभव मनुष्य जैसा छोटा प्राणी कर भी कैसे सकता है? वह तो मनुष्य की किसी का अभिशाप लग गया है जो वह अपनी शक्ति का इतना अहंकार करता है। अन्यथा पृथ्वी की तुलना में ही वह इतना छोटा है जितना हिमालय पहाड़ की तुलना में चींटी के शरीर का सौवां भाग। 19 करोड़ 70 लाख वर्गमील की पृथ्वी और अधिक से अधिक 9 वर्ग फीट का मनुष्य- यह तो नगण्य स्थिति हुई।
विशालता की इस माप में पृथ्वी का क्षेत्रफल कोई अन्तिम दूरी नहीं है। उससे तो सूर्य ही कई हजार गुना बड़ा है। पृथ्वी का व्यास 13000 किलोमीटर है तो सूर्य 1390000 किलोमीटर है। आप यह न समझें कि यह सूर्य ही विशालता में सरताज हो गया। वह अपना एक सौर परिवार भी रखता है जिसमें 9 ग्रह बुध (मरकरी), शुक्र (वीनस), पृथ्वी (अर्थ), मंगल (मार्स), बृहस्पति (ज्यूपीटर), शनि (सेटर्न), वारुणी (यूरेनस), वरुण (नेपच्यून) और यम (प्लूटो) और 61 उपग्रह हैं। 1500 छोटे-छोटे ग्रह और भी हैं जिन्हें अवान्तर ग्रह या मध्यग्रह (एस्टोरोइड्स) कहते हैं। अन्तरिक्ष कीट और अनेक पुच्छल तारे भी इस सौर मण्डल में आते हैं। इस सौर मण्डल का व्यास 11800000000000 किमी. है। इन्हें मंदाकिनी (स्याइरल) नामक आकाश गंगा से प्रकाश मिलता है।
आइये देखें सूर्य से भी बढ़कर कोई और बड़ा आकार आकाश में है या नहीं? यदि उसकी खोज करना चाहते हैं तो रात में किसी एकान्त में खड़े होकर आकाश की ओर देखें। आपको असंख्य टिमटिमाते हुए तारे दिखाई देंगे। जुगनूँ आँखों से भी छोटे दिखाई पड़ने वाले इन तारों में से कई जैसे इतने बड़े हैं जिनकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते। एटारेस तारे का व्यास 600000000 किलोमीटर, पृथ्वी से लगभग 5000 गुना बड़ा। बैगनर तारा समूह में एक और ऐसा ही तारा समूह में आया है जिसका नाम एप्सिलान और व्यास 4000000000 किलोमीटर है। अब तक विशालता की नुमाइश करते-करते हम जिस स्थान पर पहुँचे हैं, वहाँ खड़े होकर देखें और कल्पना करें कि पृथ्वी इतनी छोटी हो गई है कि उसका व्यास 1/10 किलोमीटर अर्थात् बाल की चौड़ाई के बराबर है तो आकाश में चमकने वाला सूर्य चने के दाने के बराबर होगा। एन्टारेस तारा एक साधारण-सी कटोरी जितना बड़ा है। बैगनर तारा समूह का एप्सिलान 6 मंजिलें मकान जितना लगेगा। सौर मण्डल की स्थिति अधिक से अधिक एक फुटबाल के मैदान जैसी दिखाई देगी।
अभी तक जितना संसार ऊपर देख चुके वह भी कोई सम्पूर्ण नहीं है। बैगनर तारा समूह की तरह के 88 और तारा-समूह वैज्ञानिकों की दृष्टि में अब तक आ चुके हैं। अनुमान है कि यह सब
9000000000000000000 किलोमीटर व्यास वाली आकाश गंगा से प्रकाश लेते हैं। इस क्षेत्र को आकाश गंगा विश्व (गैलेक्सी) कहते हैं। इस आकाश गंगा का आकार अस्पतालों में गर्म सिर को ठण्डा करने वाली गोर बरफ की थैली या फूली हुई पूरी जैसा है। और दूरी इतनी बड़ी है कि 186000 मील प्रति सेकेण्ड की गति से कोई जहाज या मनुष्य दौड़े तो एक छोर से दूसरे छोर तक पहुँचने में उसे लगभग 1 करोड़ 69 लाख पचास हजार वर्ष लग जायेंगे। इस आकाश गंगा में सूर्य जैसे ग्रहों की ही संख्या 10 x 10 x 10 x 10 x 10 x 10 x 10 x 10 x 10 x 10 x 10 x 10 (10 खरब) है यदि विश्व की सभी आकाश गंगाओं में पाये जाने वाले तारों का अनुमान इस हिसाब से करे तो यह संख्या 10 घात 24 अर्थात् 10 को 24 बार गुणा करने से जो संख्या आयेगी उतनी होगी, जब कि अनुमान यह जगत का है जिसके सम्बन्ध में अब तक कुछ न कुछ जानकारी मिल चुकी है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि जो नहीं जाना जा सकता वह इससे कई अरब गुना बड़ा है। इंग्लैण्ड की जोर्डेल वेधशाला में दुनियाँ का सबसे बड़ा दूरदर्शी लगाया गया है जिसके एरियल का मुँह 250 फुट चौड़ा और वजन तीन सौ टन है। इसे साधने के लिये विशाल गर्डर स्तम्भ लगाये गये हैं। ऊपर जो अन्तरिक्ष सम्बन्धी जानकारी दी गई हैं वह अधिकांश इसी वेधशाला की उपलब्धि है जब कि वैज्ञानिक का कथन है कि विराट ब्रह्माण्ड की वास्तविक जानकारी करनी हो तो सूर्य जितनी प्रचण्ड इलेक्ट्रानिक शक्ति ऊँचाई और व्यास वाला दूरदर्शी होना चाहिये। तात्पर्य यह कि न इतना बड़ा दूरदर्शी बन सकता है और न अनन्त आकाश का निश्चित पता लगाया जा सकता है। वैज्ञानिकों ने केवल सैद्धान्तिक अनुमान लगाया है उसके अनुसार सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का व्यास
1000000000000000000000000 किलोमीटर होना चाहिये। स्मरण रहे यह संख्या अनुमान मात्र है अन्तिम सत्य नहीं।
भगवान् ने इतना विशाल ब्रह्माण्ड रच कर तैयार कर दिया। हतभाग्य मनुष्य उस सबको घूम कर देख भी नहीं सकता। गाँवों में सबसे बढ़ा दुर्भाग्य उसका माना जाता है जो कोई बड़ा शहर नहीं देख पाता। जो शहरों की खाक छान चुके होते हैं उनमें से अग्रणी वे माने जाते हैं जो सारे देश का भ्रमण कर लेते हैं। उनमें से एक ही ऐसे निकलते हैं जो समुद्री या हवाई रास्ते से दुनियाँ के प्रमुख शहरों और देशों का भ्रमण कर लेते हैं। अब कोई चन्द्रमा जाता है तो उसका नाम अखबारों में बड़े शीर्षक देकर छपता है। जब कि वैसे ही करोड़ों मनुष्य इस पृथ्वी पर हैं जिन्हें चन्द्रमा तो क्या पृथ्वी से दस मील ऊपर की भी कल्पना नहीं आखिर मनुष्य को भगवान् ने इतना असमर्थ क्यों बनाया? इस पर विचार करते हैं तो लगता है उसने यदि अपनी इच्छा से संसार बनाया तो मनुष्य के साथ न्याय क्यों नहीं किया? उसे ऐसी शक्ति क्यों नहीं दी कि वह भी विराट् ब्रह्माण्ड में बिहार का आनन्द ले पाता।
इसके लिये भगवान् को कोसने के पहले उसके न्याय का अध्ययन कर लेना आवश्यक है। पर उसके लिये आप ब्रह्माण्ड की तुलना में जितने छोटे हैं अपनी तुलना में उतना ही छोटा और बनना पड़ेगा अपना अहंकार नष्ट करना पड़ेगा जितने छोटे हो सकते हैं होते चले जाइये। आप देखेंगे कि भगवान् न जो विराट् सृष्टि दृश्य जगत में बनाई है अदृश्य जगत में, सूक्ष्म रूप से वह पूरी-पूरी विद्यमान् है। उसको खोजने, उसे पाने, उसमें भ्रमण का आनन्द लेने के लिये अन्यत्र जाने, पैसा खर्च करने या भाग्य को कोसने
की आवश्यकता नहीं। अपने आप में छोटे होते चले जाइये आपको उस विराट् के दर्शन अपने में ही हो सकते हैं।
सूर्य-चन्द्रमा आदि ग्रह-नक्षत्र जितने बड़े हैं अमीबा उतना ही छोटा 0.8 मिलीमीटर का जीव है। जीवाणु विज्ञान के अनुसार सूक्ष्म जीवाणु 1/25000 इंच का बाल की नोंक से भी छोटा होता है। बैक्टीरिया (जीवाणु) में अपनी तरह की चेतना गुण-कर्म-स्वभाव विद्यमान् है और अपनी सृष्टि में वह सन्तुष्ट होने के साथ ही उसकी गति ऐसी है जो एक सेकेण्ड में पृथ्वी के ओर-छोर की यात्रा मजे में सम्पन्न कर सकता है। जो जितना छोटा उतना ही गतिमान।
वह छोटापन अभी अन्तिम नहीं है। संसार के सब पदार्थ परमाणुओं से बने हैं। एक परमाणु का व्यास 0.0000001 मिलीमीटर होता है। और उसमें पाये जाने वाले इलेक्ट्रान, प्रोटान, न्यूट्रान सब सूर्य-चन्द्रमा की तरह शक्ति सम्पन्न है। परमाणु विज्ञान में उसे कोई आश्चर्य नहीं माना जाता, जबकि परमाणु की शक्ति को नागाशाकी और हिरोशिमा में अच्छी तरह देखा जा चुका है।
परमाणु के अन्दर नाभिक सृष्टि का सबसे बड़ा आश्चर्य है। यह एक चेतन और मनोमय शक्ति है। और उसके अन्दर सम्पूर्ण सृष्टि-सी विद्यमान् लगती है। जब कि उसका छोटापन उसी तरह कल्पनातीत है जितना ब्रह्माण्ड की विशालता। परमाणु के नाभिक का व्यास 0.00000000000 मिलीमीटर है ब्रह्माण्ड उससे एक सेप्टिलियन गुना बड़ा है। एक सेप्टिलियन 1 के बाद 42 शून्य रखने से बनेगा। ब्रह्माण्ड की तरह यह केवल सैद्धान्तिक अनुमान है जिस तरह ब्रह्माण्ड के विस्तार का अन्तिम निर्णय नहीं किया जा सका उसी तरह परमाणु के ‘नाभिक’ की लघुता का भी अन्तिम
निर्माण नहीं किया जा सकता। यह तो बिन्दु में सिन्धु की अणु में विभु की स्थिति है अर्थात् ब्रह्माण्ड ही परमाणु नाभिक है और परमाणु नाभिक ही ब्रह्माण्ड यदि हम अपने भीतर बैठे चेतन परमाणु को देख लें तो विराट् ब्रह्माण्ड को देख सकते हैं यदि हम अपनी चेतना के ‘नाभिक’ या मूल को पहचान लें तो विश्व में जो कुछ भी है उसके स्वामी हो सकते हैं।
इस लघुता तक पहुँचने के लिये दीर्घकालीन अभ्यास और साधनायें अपेक्षित है क्योंकि उनकी अनुभूति में समय लगाना आवश्यक है। ब्रह्माण्ड की तुलना की तरह चेतन परमाणु इतना छोटा है कि यदि उसके नाभिक का व्यास 1/10 मिलीमीटर मानें तो पूरा परमाणु एक भव्य इमारत जैसा लगेगा और बैक्टीरिया जिसका व्यास ऊपर दिया है इतना बड़ा लगेगा जितनी लंदन से बर्लिन की दूरी। अमीबा जो सबसे छोटा एक कोशिकीय जीव है इतना बड़ा होगा कि उसे पृथ्वी की गोलाई में दो बार आसानी से लपेटा जा सकेगा। उस तुलना में मनुष्य इतना बड़ा होगा कि पृथ्वी में खड़ा होकर बड़े आराम से सूर्य को पकड़ ले तब पृथ्वी इतनी बड़ी होगी कि दोनों ध्रुवों के बीच की दूरी प्रकाश की गति से चलकर पूरी की जाये तो पूरे दो वर्ष लग जायें। एक ओर ब्रह्माण्ड की यह विशालता एक ओर जीवन की यह लघुता दोनों पर विचार करते हैं तो ऋषियों की ‘अणोरणीयान् महतो महीयान्’ वह अणु से भी छोटा और ब्रह्माण्ड के समान विशाल है, की उक्ति को ही शिरोधार्य करना पड़ता है। और तब विराट् के दर्शन के लिये उपाय एक ही रह जाता है कि हम अपनी लघुता को अन्तःकरण की गहराई तक अनुभव करें।
परमाणु-संसार की खोज करते समय जो शक्ति कण पाये गये हैं वह ब्रह्माण्ड के एक नक्शे की तरह हैं। केन्द्रक (न्यूक्लियस) उसका मुख्य भाग है उसके आस-पास शून्य (आकाश) है। उस पोले स्थान में इलेक्ट्रान चक्कर लगाते हैं। इनकी संख्या प्रत्येक पदार्थ के परमाणु में अलग-अलग तरह की होती है। चक्कर काटते हुए इलेक्ट्रान ठीक उसी प्रकार है जिस प्रकार सौर मण्डल के ग्रह-उपग्रह केन्द्रक या नाभिक (न्यूक्लियस) सूर्य की तरह है जो सेन्ट्रीफ्यूगल फोर्स के द्वारा इलेक्ट्रानों को नियमित किये रहता है। इलेक्ट्रान स्वयं सेन्ट्रोफ्यूमल फोर्स के द्वारा केन्द्रक की ओर खिंचे रहते हैं। यह व्यवस्था भी ब्रह्माण्ड में गुरुत्वाकर्षण सिद्धान्तों की तरह है। यह दृश्य सौर मण्डल भी ब्रह्माण्ड का एक परमाणु ही है जिसका केन्द्रक सूर्य और इलेक्ट्रान अनेक ग्रह-उपग्रह हैं।
बहुत दिन तक पृथ्वी में केवल विवेक और ज्ञान शून्य पशुओं और जीव-जन्तुओं का बाहुल्य रहा। इनमें शक्ति थी, ज्ञानेन्द्रियाँ और कामेन्द्रियाँ थीं, किन्तु विवेक और विचार नहीं था इसलिये वह सबके सब अपनी-अपनी मनमानी करते थे। एक दूसरे को मार कर खा जाते थे। जो अधिक शक्तिशाली होता था वही समाज का मुखिया होता था और उसकी अन्तिम इच्छा ही न्याय होती थी। शक्तिशाली किन्तु विचारहीन के हाथ सत्ता होने से उसका दुरुपयोग होना स्वाभाविक था, उससे पशु-प्रवृत्ति वाले संसार में सर्वत्र अशान्ति छा गई। तब भगवान् ने मनुष्य शरीर पैदा किया उसे बुद्धि और विचार भी दिये और वह विश्वास किया कि अब संसार में शान्ति और सुव्यवस्था स्थापित की जा सकेगी।
मनुष्य पशु-योनियों से विकसित हुआ है इसलिये पूर्व संस्कार एवं पाञ्चिक वृत्तियाँ भी निश्चित रूप से भड़की और उनकी पूर्ति का औचित्य ठहराने के लिये उसने उपयोगितावाद जैसे भ्रान्त सिद्धांत का आश्रय लिया। यह देखकर ही ऋषियों ने ऐसी व्यवस्था बनाई थी कि मनुष्य इन पशुप्रवृत्तियों से अपने आपको विलग माने और यह अनुभव करे कि अन्य जीवों की तुलना में उसे जा अधिक साधन और सुविधायें मिली हैं वह आत्म-कल्याण और क्षमताओं का उपयोग इस तरह करना चाहिये जिससे अपना विकास भी हो सकता हो और सामाजिक शान्ति एवं सुव्यवस्था भी अक्षुण्ण रह सकती हो। वर्णाश्रम संस्कृति की स्थापना मनुष्य-समाज को उपयोगितावाद जैसी भ्रान्त धारणा से बचाने का ही एक वैज्ञानिक उपाय था। यह व्यवस्था ईश्वरीय आदेश की तरह है। विश्व-शान्ति के लिये उसके अतिरिक्त कोई दूसरा उपाय भी नहीं है।
सहयोग और सामूहिकता को ईश्वरीय आदेश या आत्मा की आवश्यकता मानने कारण हमारे सामने स्पष्टतया हमारा शरीर है। भगवान् बोलता नहीं, लिख कर भी कुछ बात समझाता नहीं पर उपयोगिता के विपरीत उसने अपने आदेशों का अनुबन्ध अवश्य किया है। मनुष्य-शरीर की रचना और उनकी क्रिया प्रणाली (एनोटामी एण्ड फिजियोलॉजी) वह उत्तर है जिससे उपयोगितावाद का खण्डन किया जा सकता है।
शरीर एक समाज है। ऐसा समाज जिसमें अनेक गुण, प्रकृति, कर्म एवं स्वभाव वाले लोग निवास करते हैं,। यों पृथ्वी एक है पर उसमें रहने वाले जितने भी मनुष्य हैं वह सब अलग-अलग प्रकृति और स्वभाव के हैं। ठीक उसी प्रकार शरीर एक है पर उसमें कई अरब जीव-कोष (सेल्स) पाये जाते हैं वह सब के सब अनेक तरह के गुण, कर्म और स्वभाव वाले हैं तो भी शरीर जगत के सारे प्राणी और उनके समाज परस्पर इस तरह व्यवहार करते हैं कि शरीर में कहीं भी किसी तरह का गतिरोध, अव्यवस्था एवं कलह उत्पन्न नहीं होती। जब तक सारे जीव-कोष सहयोग और सामूहिकता के नियम का पालन करते रहते हैं, सारा शरीर प्रसन्नतापूर्वक अपने कार्य में जुटा रहता है। इस व्यवस्था में उपयोगितावाद को प्रश्रय मिल गया होता तो मनुष्य का एक महीने जीवित रहना कठिन हो जाता। जिस स्थान का कोष सशक्त होते दूसरे कमजोर कोषों को खाते चले जाने और मनुष्य-शरीर कुछ क्षणों में ही धराशायी हो जाता।
मनुष्य में इतना विवेक नहीं कि वह यह अनुभव करे कि हम एक ही पितामह की सन्तान परस्पर भाई-भाई हैं और इसलिये हम सजातीय हैं। जीव-कोष बताते हैं कि अनेक समाज, संस्कृति और राष्ट्रों में विभक्त मनुष्य दरअसल एक ही माता पृथ्वी और पिता परमात्मा के पुत्र हैं। यदि इस मान्यता को स्वीकार कर लिया गया होता तो परस्पर उसी तरह का प्रेम, स्नेह, सहयोग, सौजन्य, उदारता, बुद्धिमतां, दया, करुणा, माता, समता और कर्त्तव्य भावना का विकास हुआ होता जिस तरह मनुष्य शरीर में छोटे-छोटे कोष (सेल्स) व्यवहार करते और शरीर समाज की व्यवस्था को सन्तुलित बनाये रखते हैं। यदि विश्व-शान्ति और समृद्धि और कल्याण की भावना को जीवित रखना हो तो हम उन्हीं आदर्शों का पालन करना होगा।
मनुष्य-शरीर के सभी कोष चाहे वह पैर में हों या पेट और मुख में एक ही जीव-कोष (स्पर्म) प्रविष्ट हुआ था उसी से अनेक कोषों वाला शरीर अस्तित्व में आया था। शरीर में जितने कोष हैं वह सब अपने को भाई-भाई मानते हैं और उनके जितने भी समाज बने हैं सब परस्पर सहयोग, सहानुभूति, दया, करुणा, उदारता का पालन करते हैं।
शरीर का कोई भी कोष बिना खाद्य के जीवित नहीं रह सकता। आक्सीजन ही वह खाद्य है जो रक्त के द्वारा शरीर के सम्पूर्ण भागों में पहुँचता और प्राण-संचार करता है। रक्त पैदा करना, सफाई करना और संग्रह करना हृदय का काम है उसके लिये वह जीवन भर क्रियाशील रहता है। हृदय एक क्षण भी रुकता नहीं। उदार मनुष्य उसी तरह एक क्षण भी विश्राम किये बिना सोते-जाते हृदय के समान तप करके अपनी शक्ति बढ़ाते रहते हैं और उस संचित शक्ति या तप से सारे समाज को जीवन-दान देते रहते हैं। यदि उपयोगितावाद का सिद्धान्त सच रहा होता तो हृदय अपने रक्त की एक बूँद भी औरों को न देता। अपने लिये तो वह बहुत थोड़ा लेता है शेष सारा का सारा समाज को दे देता है इसलिये हृदय बड़ा है, पूज्य है, सम्माननीय है। यदि वह इस तरह आत्म-त्याग न करता तो शरीर कैसे जिन्दा रहता?
शरीर रचना शास्त्र (एनाटॉमी) का एक बहुश्रुत सिद्धान्त है- एनक्सिया आफ ब्रोन” जिसका अर्थ है यदि मनुष्य को 3 मिनट तक रक्त न मिले तो उसका तुरन्त अन्त हो जाये। मस्तिष्क के मर जाने का अर्थ है शरीर का मर जाना। उसी प्रकार माँसपेशियों को रक्त न मिले तो वह मर (गैंयरीन) जाती हैं। कारोनरी आट्रोज को रक्त न मिले तो दिल का दौरा आ जाता है, रेटिनल आट्रोज को रक्त न पहुँचे तो दीखना बन्द हो जाता है। आँतें, जिगर, फेफड़े, माँसपेशियाँ शरीर का कोई ऐसा हिस्सा नहीं जिसे रक्त का उचित वितरण न होता हो। इससे सिद्ध होता है कि साधनों का एक स्थान पर संग्रह (स्टोर) नहीं होना चाहिये वरन् उन्हें क्रियाशील रहना चाहिये। सामाजिक जीवन में जहाँ भी साधनों का उदारतापूर्वक वितरण होता रहता है वहाँ व्यवस्था रहती है, शान्ति और प्रसन्नता बनी रहती है। पर जहाँ ऐसा नहीं होता किसी स्थान को साधनों का मिलना बन्द कर दिया जाता है तो शरीर के समान उसका दुष्प्रभाव सारी मनुष्य जाति को भुगतना पड़ता है।
साधनों का वितरण समान रूप से नहीं किया जा सकता। आवश्यकता और कार्य का स्वरूप देखना पड़ता है। जो ज्यादा महत्त्वपूर्ण कार्य करते हैं उन्हें अधिक अधिकार, साधन और सुविधायें देनी ही पड़ती है, उनकी तुलना में जो कम महत्व का स्थूल कार्य करते हैं। शरीर में ज्ञान का, चेतना का महत्व सब से अधिक है। व्यवस्थापक ही न रहे तो व्यवस्था कहाँ रहेगी? मकान मालिक ही न हो तो मकान कहाँ सुरक्षित रह सकता है? व्यवस्थापक को, मकान मालिक को अधिक महत्व देने की तरह ही शरीर में ज्ञान वाले भाग की भी अधिक देख-रेख की आवश्यकता है। शरीर में यह व्यवस्था है। हृदय से बाई ओर (लेफ्ट वैन्ट्रिकिल) सबसे बड़ी धमनी (एओटी्र) निकलती है और सबसे शुद्ध रक्त का सबसे शुद्ध भाग कैरोटेड एवं इनामिनेटेड धमनी द्वारा होकर बरटेबरल आट्रीज में पहुँचता है। यहाँ से सेरीब्रल आट्रीज में वह शुद्ध रक्त पहुँच कर सारे शरीर को पोषण प्रदान करता है। मस्तिष्क में जितना शुद्ध रक्त पहुँचता रहता है उतना ही शरीर निषेधात्मक आवेग (निगेटिव इम्पल्सेज) जैसे क्रोध, चिड़चिड़ापन, भय, आतुरता, आलस्य से बचा रहता है और प्रसन्नता एवं दीर्घ जीवन बना रहता है। इससे यह पता चलता है कि जिस समाज में उन बुद्धिजीवियों को, जो लोगों को सद्ज्ञान और सत्कर्मों की प्रेरणा देते रहते हैं, पर्याप्त पोषण मिलता रहता है, वहाँ सुख और शान्ति बनी रहती है। जीवन और प्राण बना, रहता है।
समाज की सुरक्षा का प्रश्न द्वितीय है। पोषण अनिवार्य रूप से मिले पर समाज को बाहरी आक्रमणों से बचाना भी आवश्यक है। ऐसे वर्ग को जो शान्ति और सुव्यवस्था की रक्षा करते हैं क्षत्रिय कहते हैं और उन्हें द्वितीय श्रेणी का शुद्ध रक्त दिया जाता है। हाथ शरीर की रक्षा करते हैं उन्हें अन्य अंगों की अपेक्षा अधिक सक्रिय रहना पड़ता है, यह समझ कर ही हृदय उन्हें सब क्लेरियन आट्रीज द्वारा द्वितीय श्रेणी का रक्त प्रदान करता है। हाथ शरीर की रक्षा करते हैं उन्हें अन्य अंकों की अपेक्षा अधिक सक्रिय रहना पड़ता है यह समझ कर ही हृदय उन्हें सबक्लेरियन आट्रीज द्वारा द्वितीय रेणी का रक् प्रदान करता है। उसमें भेद-भाव नहीं आवश्यकता को ही प्राथमिकता दी गई है।
तीसरे नम्बर पर शरीर के वे निचले भाग पेट, पैर आदि आते हैं उन्हें डिसेन्डिग एऔर्टा से रक्त पहुँचाया जाता है उन्हें आवश्यकतानुसार मात्रा तो अधिक दी जाती है पर उसकी शुद्धता दोनों से कम होती है।
समाज में एक शूद्र वर्ग मी होता है। शूद्र का अर्थ कोई जाति नहीं। विभाग सभी कर्मानुसार हैं। ब्राह्मण वह है जो बुद्धिजीवी ही नहीं सच्चरित्र और परमार्थी भी है। क्षत्रिय यह है जो समाज को बुरे तत्त्वों से रक्षा करता है। वैश्य वह है जो अपने चार्बों को तो थोड़ा अधिक देखता है पर समाज के पोषण का कार्य ईमानदारी से करता है। शूद्र वह है जो सद्गुण रहित है। यद्यपि वह हानिकारक है पर त्याज्य नहीं। उसका भी उपयोग करना चाहिये, यह शिक्षा हमें अपने शरीर रूपी समाज से मिलती है।
सारे शरीर में प्रयोग के बाद रक्त में आक्सीजन की कमी हो जाती है प्लाज्मा वही बना रहता है अर्थात् श्वेताणु (व्हाइट ब्लड कार्पसल्स) एवं लाल-अणु (रेड ब्लड कार्पसल्स) को मात्रा वही रहती है, केवल शुद्धता नष्ट हो जाती है। ऐसे रक्त को शिराओं द्वारा लौटा कर हृदय में पहुँचाने की व्यवस्था की गई है शिराओं में वालव लगे होते हैं वह रक्त को नीचे वहीं जाने देते दूसरे फेफड़ों में से साँस निकलने के बाद वायु-शून्यता (वैकुअम) उत्पन्न होने से भी रक्त ऊपर की ओर दौड़ने लगता है। माँसपेशियों के दबाव के द्वारा भी अशुद्ध रक्त हृदय की ओर बढ़ता है। तात्पर्य यह है कि समाज में फैल रही गन्दगी और कुरीति का सब तरफ से ऐसा सामना करना चाहिये जिससे उसे शुद्ध और उपयोगी बनाया जा सके। ऐसा नहीं होता तो समाज विश्रृंखलित होने लगते हैं, ठीक उसी तरह जिस तरह शरीर में अशुद्ध रक्त न लौटे तो बीमारी (कन्जस्टिव कार्डियक फेलर) हो जाती है और हाथ-पैर में सूजन, फेफड़ों में बलगम इकट्ठा हो जाता है। जिगर बढ़ जाता है। दिल बड़ा (डाइलेटेड) और कमजोर हो जाता है।
साधनों का अभेद वितरण, आवश्यकतानुसार वितरण और समाज में गुणों की दृष्टि से शुद्धिकरण का क्रम जहाँ शरीर की भाँति चलता रहता है वहाँ स्थिर, शान्ति और सुव्यवस्था बनी रहती है। शरीर उसका प्रत्यक्ष प्रमाण है। इसी आधार पर ही ऋषियों ने वर्णाश्रम संस्कृत का ढाँचा तैयार किया था। सारा समाज अपने-अपने कर्तव्यों का पालन किस प्रकार करे इसका निर्धारण भी उन्होंने शरीर के विभिन्न अवयवों की कार्य-प्रणाली का अध्ययन करके किया था। उसमें भी भेदभाव का नाम नहीं है। सामाजिक अवस्था को ही वहाँ भी प्रमुख स्थान दिया गया है। साम्यवाद और उपयोगितावाद का यह मिला-जुला रूप ही इस पृथ्वी में स्थायी शान्ति का आधार हो सकता है। इसमें व्यक्ति को उदार और त्यागी होना पड़ता है सामाजिक उपयोगिता को ध्यान में रख कर सर्व हित परायण, कर्तव्य परायण होना पड़ता है।
“शिवाजी तू बल की उपासना कर, बुद्धि को पूजा, संकल्पवान् बन और चरित्र की दृढ़ता को अपने जीवन में उतार, यही तेरी ईश्वर-भक्ति है। भारतवर्ष में बढ़ रहे पाप, हिंसा, अनैतिकता और अनादर के यवनी-कुचक्र से लोहा लेने और भगवान् की सृष्टि को सुन्दर बनाने के लिये इसके अतिरिक्त कोई उपाय नहीं है।” समर्थ गुरु रामदास ने समझाया।
“आज्ञा शिरोधार्य देव। किन्तु यह तो गुरु-दीक्षा हुई अब, गुरु दक्षिणा का आदेश दीजिये।” शिवाजी ने दृढ़ किन्तु विनीत भास से प्रार्थना की।
गुरु की आंखें चमक उठीं। शिवाजी के शीश पर हाथ फेरते हुए बोले-गुरु-दक्षिणा में मुझे 1 लाख शिवाजी चाहिये, बोल देगा?
“दूँगा गुरुदेव। एक वर्ष एक दिन में ही यह गुरु-दक्षिणा चुका दूँगा-कहकर शिवाजी ने गुरुदेव की चरण धूलि ली और महाराष्ट्र के निर्माण में जुट गये।
श्री रमेशचन्द्र के पास कुछ रुपए हैं। उनको 3 लड़ी उमेश, दिनेश, और सुशील में बँटवारा करना है। उमेश को कुल धन का 1/2 और दिनेश को 1/3 देने के बाद सुशील के लिये कुल सौ रुपए बचे तो बताओ श्री रमेशचन्द्र के पास कुल कितने रुपये थे?
कल्पना मात्र में यह एक पेचीदा पश्च है। आप अपनी बुद्धि से प्रश्न को निकालना चाहें तो कठिन हो जाएगा। क्योंकि आपको उत्तर निकालने के लिये सैकड़ों, संख्याओं की कल्पना करनी पड़ेगी और वह सब तब तक गलत होंगी जब तक ठीक वही संख्या अपने आप कल्पना में न आ जायेगी भले ही वह संख्या एक दिन, एक सप्ताह, महीने भर या साल भर में आयें। कल्पना तो आखिर कल्पना ही है। उसका सत्य से उतना ही सम्बन्ध है जितना 1 रु. की लाटरी का 1 लाख रु. के पुरस्कार से है। मिल जाये तो मिल जाये न मिले तो करोड़ों बार एक रुपया लगाते रहने पर भी हाथ कुछ न लगे।
इन दिक्कतों से बचने के लिये गणितज्ञों ने कुछ सूत्र ढूँढ़े हैं। उसका आधार “मान कि उत्तर अमुक है” एक विश्वास है और जब उस विश्वास को प्रयोग में लाते हैं तो वह फलितार्थ शत-प्रतिशत सत्य निकलते हैं इसलिये हमारा विश्वास करना सार्थक हो जाता है।
आइये विश्वास के आधार पर ऊपर के प्रश्न को हल करें। माना यह धन 1 रुपया है। 1/ का 1/2= 1/2 भाग उमेंश को दिया गया 1 का 1/3=1/3 भाग दिनेश को दिया गया। कुल 1/2+1/3=516 भाग दो भाइयों में बाँट दिया गया। अब 1/1/6=1/6 भाग शेष रहा यही हिस्सा सुशील को दिया गया जो 100 रुपये के बराबर था। ऐकिक नियम के अनुसार चूँकि 1/6=100 के, इसलिए 1 बराबर है 600 रुपये के। यही उत्तर है और सही है जब कि सारी दुनियाँ में एक छः सौ के बराबर कभी हो ही नहीं सकता। असम्भव तरीके से सम्भव की खोज का नाम विश्वास है। वहाँ एक समर्थ सूत्र है जिसके आधार पर ही परमात्मा की खोज की जा सकती है। विज्ञान का रास्ता कल्पना और भटकाव का है उससे संसार के सृजन, विकास और संहार वाली शक्तियों का पता चलेगा तो सही, किन्तु भीषण संघर्ष, ध्वंस और हिंसा से भरा हुआ यह लम्बा रास्ता बड़ा अशान्ति और असन्तोष से पार होगा और आद्यशक्ति तक पहुँचना कठिनाई से ही सम्भव होगा।
ईश्वर पर विश्वास कर लेने में जहाँ अनेक व्यक्तिगत लाभ है वहाँ विश्व-शांति के लिये एक सुदृढ़ आधार भी मिलता है। मान लेना एक सूत्र है जिसके आधार पर गणित के उत्तर निकाले जा सकते हैं उसी तरह संसार में प्राणियों का आविर्भाव क्यों और कहाँ से हुआ है? अनेक योनियों में बिखरी प्राण-सत्ता का रहस्य क्या है? जीवन का उद्देश्य क्या है और उसे किस तरह प्राप्त किया जा सकता है? इन प्रश्नों का विज्ञान के पास कोई उत्तर नहीं। वह स्थूलता का ही अध्ययन और प्रतिपादन कर सकता है जब कि मनुष्य-शरीर की आधी शक्तियाँ भावनामय, विचारमय, संकल्पमयी है शारीरिक इन्द्रियों की तरह भावनायें भी तृप्ति माँगती हैं और उनका अपना अलग क्षेत्र है। जब ईश्वर को मानवीय चेतना की तरह की ही कोई सत्ता मान लेते हैं तो जीवन के प्रति हमारा दृष्टिकोण बदल जाता है। हमारी भावनात्मक शक्ति का विकास होने लगता है।
प्राणिमात्र से प्रेम, दया, करुणा, व्यवस्था, समता, सहिष्णुता, उदारता, मैत्री के भावों का विकास होने लगता है। जब हम मान लेते हैं कि संसार किसी भावनाशील शक्ति के द्वारा प्रेरित और नियन्त्रित है। यह भावनायें ही स्थायी सुख और शान्ति प्रदान करती हैं उसी के लिये तो विज्ञान का आश्रय लेते हैं, पर विज्ञान से तो मनुष्य उलझता ही जाता है। जो तृष्णायें, विलासतायें, अहंवृत्तियाँ-क्रोध विक्षोभ, ईर्ष्या, स्पर्द्धा, प्रतिशोध, भौतिक उन्नति के मार्ग में भड़कती है, ईश्वर विश्वास के मार्ग तो वह तप, त्याग स्वाभिमान, सहयोग और सहानुभूति में बदल जाती हैं, जिससे सारा संसार भी शान्तिमय परिस्थितियों में बना रहता है। यही मनुष्य-जीवन का उद्देश्य भी है।
तमाम रेखागणित (ज्योमेट्री) एक बिन्दु (प्वाइंट) से विकसित होती है। रेखा अनेक बिन्दुओं से बनी एक दूरी है जिसमें लम्बाई है किन्तु चौड़ाई नहीं। बिन्दु वह वस्तु है जिसमें न तो लम्बाई है, मोटाई और न चौड़ाई। ऐसी वस्तु का कोई अस्तित्व ही नहीं होना चाहिये। कोई भी बिन्दु अंकित किया जायेगा भले ही दशमलव के आगे कई शून्यों के बाद उसका व्यास आये पर मोटाई होगी अवश्य। यदि मोटाई हो जाती है तो वह बिन्दु नहीं रहता और बिन्दु रहता है तो परिभाषा गलत। अस्तित्वहीन वस्तु केवल विश्वास मात्र है उसी पर सम्पूर्ण रेखागणित का धरातल टिका हुआ है और उसके माध्यम से जो भी अर्थ और निष्कर्ष निकाले जाते हैं एक और एक सही निकलते हैं। यह है विश्वास का प्रतिफल। उसी प्रकार ईश्वरीय सत्ता को मान लेने पर व्यक्तिगत कल्याण, समाज और विश्व के हित के परिणाम सही उतरने लगते हैं। दृश्य न होने पर भी उसकी कल्पना बिन्दु की तरह एवं शक्तिशाली सिद्धान्त है। परमात्मा को भी हम उसी रूप में ले लें तो इसमें भी मानवता का कल्याण ही सन्निहित हैं।
मनुष्य-समाज की अधिकांश व्यवस्था विश्वास पर ही आधारित है और उसी से हम सुखी हैं। भाई-भाई में पति-पत्नी में, पिता-पुत्र डाक्टर-मरीज दुकानदार-खरीददार सरकार और ठेकेदार सबका काम विश्वास पर ही चल रहा है। विश्वास प्राप्त करके ही एक साधारण व्यक्ति पार्लियामेण्ट का सदस्य और प्रधानमन्त्री बन जाता है। हमारे विश्वास में इतनी जबर्दस्त शक्ति है कि वह सामान्य-सी परिस्थितियों को कुछ का कुछ बना सकती है। जो केवल दूसरों पर अविश्वास करने वाला अपने आप ही दुःखी, अशान्त और अव्यवस्थित बना रहता है। विश्वास की शक्ति पर ही संसार टिका हुआ है। हमारे लिये उसके अतिरिक्त और कोई रास्ता नहीं है कि ईश्वरीय शक्तियों पर ही विश्वास करें और यह देखें कि उसके फलितार्थ हमारे जीवन में उसी प्रकार सही उतरते हैं या नहीं जिस प्रकार पत्नी, पिता, माता, भाई, भतीजों पर विश्वास करके परस्पर हँसी-खुशी प्रेम और आनन्द का जीवन जी लेते हैं।
रेखागणित की एक स्वयं सिद्ध साध्य (एक्सिअम) यह है- “अ” “ब” एक सरल रेखा है। “उ” बिन्दु पर एक दूसरी सरल रेखा “द” उसे काटती है। इस प्रकार “उ” बिन्दु पर बने हुए दोनों कोणों का योग बराबर दो समकोण होता है। यह एक विश्वास है, उसकी सत्यता का कोई आधार नहीं है। हम चाहें तो उसके टुकड़े (ग्रेजुएशर) ऐसे करें कि वह 180. न होकर 269 हो जायें या कुल 31 ही रखें। 180 डिग्री एक विश्वास की गई संख्या मात्र है। और संसार में अब तक जितनी भी रेखागणित विकसित हुई है सभी त्रिभुजीय (ट्रेन्ग्यूलर) प्रमेय निमेयों का आधार केवल यह प्रारम्भिक विश्वास है। और यह विश्वास इतना सही उतरता है कि हम पृथ्वी में बैठे-बैठे सूर्य, चन्द्रमा, बुध हर्शल प्लूटो, एन्टलारि आदि विस्तृत तारा-मण्डल (गैलेक्सी) की दूरी नाप लेते हैं। एक सरल रेखा पर दूसरी सरल रेखा खड़ी होकर दो समकोण बनाती है इस विश्वास के द्वारा ही अन्तरिक्ष यान चन्द्रमा तक मंगल तक, शुक्र तक चला जाता है। वीनस 5 अभी 2 करोड़ से भी अधिक मीलों की यात्रा कर शुक्र में जा उतरा। यह उस विश्वास का ही फलितार्थ है जो बहुत हलका बिलकुल छोटा वाला निर्जीव विश्वास है। जब कि ईश्वर एक समर्थ विश्वास है कीट-पतंगों के जीवन से लेकर वृक्ष-वनस्पतियों के अस्तित्व तक का भेदन इसी शक्ति के द्वारा किया और आध्यात्मिक रहस्यों का पता लगाया जा सकता है।
सारी खगोल विद्या की जानकारी वृत्त-सिद्धान्तों पर आधारित है। एक विश्वास या स्वयं सिद्ध प्रतिज्ञा (एनन्सियेश) है- तुल्य चापों (ईक्वल आर्म्स) पर आधारित कोण भी तुल्य (ईक्वल) होते हैं। एक गोलाकार वृत्त (सर्किल) में कहीं भी “अ ब” और “स द” दो समान दूरी के चाप (आर्क) लीजिये। अब चाप (आर्क) “अ ब” को उसी वृत्त के किसी भी बिन्दु “य” से मिलाइये, चाप “स द” को भी उसी प्रकार किसी बिन्दू “र” से मिलाइये। इस तरह बिन्दू “य” और “र” पर बने कोण बराबर होते हैं। यह एक स्वयंसिद्ध साध्य है उस पर सारी ग्रह रेखागणित टिकी हुई है, यदि कोई अविश्वास करें कि हम यह बात नहीं मानेंगे तो उसके लिये शेष सारे अभ्यास गलत हो जाते हैं पर यह स्वयं सिद्ध साध्य फलित होती है तो उसके आधार पर सारे विश्व में भ्रमण कर आना उसी तरह सम्भव हो जाता है जिस प्रकार हम अपने किसी जाने-माने शहर तक घूम आते हैं। मान्यता पर चलने वाली गणित जब ऐसे ठोस और सत्य फलितार्थ प्रस्तुत कर सकती है तो हम ईश्वर पर विश्वास करके क्या विश्व के रहस्यों का मूल्यांकन नहीं कर सकते? ऐसी एक विचारधारा ऋषि के अन्तरंग में उठी थी और उन्होंने प्रश्न करके सृष्टि के तत्त्वों की खोज डाला था। वेदों में सन्निहित ज्ञान वहीं विज्ञान है जिसको पाने के लिये आज पाश्चात्य वैज्ञानिक भारी असन्तुलन, यंत्रीकरण, हिंसा और असामाजिकता पैदा कर रहे हैं। फिर भी वस्तुस्थिति की खोज नहीं कर पा रहे हैं। सिद्धान्त बनते हैं अगले वाला वैज्ञानिक उस सिद्धान्त में या तो संशोधन कर देता या काट कर रख देता है। संशोधनकर्ता भी अपने आपको पूर्ण विश्वस्त नहीं मानता। उसे तब भी यह आशंका बनी रहती है कि कहीं उसी के रहते हुये हो उसका सिद्धान्त काट न दिया जाये। अनेक नोबुल पुरस्कार प्राप्त वैज्ञानिकों के सिद्धान्तों के धुरे उड़ गये। तब यही मानना पड़ता है कि पाश्चात्य जगत् जिस विज्ञान पर ऐंठा हुआ बैठा है वह खेल खिलौना है। तथ्य उनमें कुछ भी नहीं है।
विशाल ब्रह्माण्ड के रहस्यों, पृथ्वी पर होने पुनर्जन्म की घटनाओं अति मानसिक शक्ति बौद्धिक क्षमता आत्म शक्ति के करतबों, दूर दर्शन, पूर्णाहुतियों, स्वत्नानुभूतियों, भविष्य के ज्ञान आदि के प्रात हमारे मस्तिष्क में रचनात्मक और उपयोगी दृष्टिकोण ईश्वर को मान लेने पर ही बनता है।
विश्वास एक उत्पादक शक्ति है जो सृष्टि के गहन अन्तराल से ज्ञान के हीरे-मोती खोज-खोज कर हमारे ज्ञान-बुद्धि और वर्चस्व को महान् बना देता है। वैज्ञानिक फलितार्थों से भी यह निश्चय हो चुका है कि ईश्वर एक प्रकार की पूर्ण शक्ति है और उस पूर्णता का कितना भी अंश निकाल लेने पर पूर्णता ही शेष रहती है। बात कुछ अटपटी लगती है पर है सत्य। एक चुम्बक पत्थर को कागज में रखकर उसकी शक्ति का चार्ट तैयार कर लें। फिर उस चुम्बक को लोहे से स्पर्श करायें तो लोहा भी चुम्बक बन जाता है। चुम्बक को हटा कर फिर उसका चार्ट तैयार करें तो पता चलेगा कि उसके आवेश का काफी अंश लोहे में खिंच जाने के बाद भी उसकी मूल शक्ति में कोई अन्तर नहीं पड़ा। उसी प्रकार केवल विश्वास के आधार पर अपनी चेतना का विश्व चेतना के साथ सम्बन्ध जोड़ कर हम उन शक्तियों को विकसित और व्यवस्थित कर सकते हैं जिन्हें ईश्वरीय वैभव के रूप में जाना जाता है और जिनसे हमारे जीवन का वास्तविक अर्थ फलित होता है।
अंकगणित में कुल 9 अक्षर हैं। 1 से लेकर 9 तक पहुँचने के बाद वैज्ञानिकों ने देखा कि इस तरह कितनी ही संख्या कल्पित करते चलें उनका अन्त नहीं हो सकता इसलिये उन्हीं 9 अंकों से आगे की संख्याएँ बनाई गई और पूर्णता के लिये एक ऐसी संख्या की कल्पना की गई जिसमें संख्याओं की ईकाई-दहाई या सैकड़ा की किसी भी दौड़ को विश्राम दिया जा सके। उस संख्या का नाम है शून्य (जीरो)। इस शून्य पर अंकगणित और लम्बी-लम्बी गणनाएँ टिकी हुई हैं वह सत्य भी निकलती हैं पर शून्य अपने आप में क्या है, थोड़ा इस पर भी दृष्टि डाल लें। 3/4 का अर्थ है किसी वस्तु के चार टुकड़े किये जायें और उनमें से 3 टुकड़े लिये जायें तो वह 3/4 कहलायेगा। दो भागों से 1 टुकड़ा लें वह 1/2 कहलायेगा। भिन्न-गणित इन टुकड़ों (पार्टीशन्स )पर ही आधारित है और उससे बड़े लम्बे प्रश्नों को सीमित करना सम्भव हो गया है। पर यदि किसी वस्तु के शून्य टुकड़े करें और उसमें से 1 टुकड़ा लें तब 1/॰ और एक बटा शून्य का क्या अर्थ-
अनन्तता (इमाफिनिटी)। दो, चार, छः, दस किन्हीं संख्याओं के शून्य-टुकड़े करें उत्तर वही अनन्तता आता है जिसका कुछ भी अर्थ नहीं है। अनन्तता कोई संख्या ही नहीं जब कि शून्य को एक संख्या माना गया है उसे हटा दें तो तमाम गणित फेल हो जाये। किसी वस्तु के चार बराबर-बराबर भाग करें और उसमें से शून्य भाग लें तो उत्तर आयेगा शून्य (शून्य नहीं)। इसी प्रकार शून्य के टुकड़े करने और उसमें से कितने ही टुकड़े लेने से जो अनन्तता आई थी उसमें 10 घटाये तो भी अनन्तता ही बचेगी। 1 करोड़ घटाये तो भी अनन्तता ही बचती हैं। शून्य में शून्य घटाने का फलितार्थ शून्य और अनन्तता यह कोई बात नहीं हुई। पर उन्हें निकाला नहीं जा सकता क्योंकि उस पर सारा अंकगणित का आधार बना हुआ है। विश्व की सार्थकता को समझने के लिये वैसे ही हमें भी अनिवार्यतः एक बिन्दु की कल्पना करनी पड़ती है। उसे ईश्वर मानना पड़ता है यदि उसे मान लेते हैं तो निश्चित है कि समाज और देश, अनुशासित, व्यय स्थित और मैत्रीपूर्ण रह सकते हैं।
“आपकी साधना, आपका ज्ञान, आपका ब्रह्म-वर्चस्व विश्व के कल्याण के लिये है भगवन्। पर यह कहाँ सम्भव है कि आप सुदूर प्रान्तों का निरन्तर परिव्राजन करें और लोभों की ज्ञान-पिपासा को तृप्त करें। गुरुकुल को स्थापना करनी ही होगी देव। उसके बिना भावी पीढ़ी का आध्यात्मिक प्रशिक्षण किस प्रकार सम्भव होगा? आप ही तो कहते हैं कि धर्म-तत्त्व का प्रशिक्षण और प्रसार किये बिना प्रजा का नैतिक, चारित्रिक, सैद्धान्तिक और आत्मिक विकास नहीं हो पाता।”
“सो तो यथार्थ है, तात।” महर्षि कणाद ने शिष्य भौम्यवाद के कथन का समाधान करते हुये कहा-वत्स जिस राष्ट्र के नागरिकों को शिक्षा के साथ दीक्षा नहीं मिलती वहाँ लोगों को बौद्धिक, आत्मिक, आध्यात्मिक, धार्मिक, सामाजिक व्यवस्था संबंधी क्षमताएँ कुण्ठित हो जाती है इसलिये विद्यालय का निर्माण आवश्यक ही नहीं अनिवार्य है, तात। पर गुरुकुल चलते हैं जिन पर ऐसे साधन कहाँ से उपलब्ध होंगे?”
“आप उनकी चिन्ता न करें देव। मुझे आदेश दें भगवन्। साधनों का अनुसन्धान मैं करूँगा मैं लोगों के द्वार-द्वार जाकर साधन एकत्रित करूँगा आवश्यकता हुई तो इस पुनीत उद्देश्य के लिये भीख भी मागूंगा वन के पक्षी अपना आहार जुटा लेते हैं, वणिक नौकाओं में धान्य लाद कर समुद्र की विस्तृत सीमायें लाँघ कर चले जाते हैं और द्रव्यार्जन कर लाते हैं। बादल बरसने की इच्छा करते हैं तो उन्हें समुद्र से जल भी मिल जाता है। भगवती भागीरथी ने जब लोक-कल्याण के लिये अपनी धर्म-यात्रा प्रारम्भ की तब उन्हें भी ऐसी चिन्ता हुई थी, पर क्या हिमालय का अञ्चल इतना संकीर्ण था कि वह गंगा माता को वर्ष भर निरन्तर प्रवाहित होने के लिये जल न दे पाता? भगवन्। मुझे विश्वास है सदुद्देश्य के लिये साधनों का कभी अभाव नहीं होता।” धौम्यपाद ने पुनश्च विनीत निवेदन किया।
“तुम्हारा संकल्प पूर्ण हो वत्स। जाओ मेरा आशीर्वाद तुम्हारे साथ है। तुम गुरुकुल की स्थापना के लिये साधनों का अनुसन्धान करो।” महर्षि कणाद ने मुसकराते हुये उत्तर दिया। ऐसा लगता था उनकी मुस्कुराहट में कुछ रहस्य भरा पड़ा है।
धौम्य चल पड़े। सम्पूर्ण राष्ट्र के नाम एक परिपत्र वितरित कर उन्होंने प्रजा से सहयोग की याचना की। तब महर्षि कणाद की तपश्चर्या का प्रभाव शरद पूर्णमासी के चन्द्रमा की भाँति दिव्य और निष्कलंक चमक रहा था। प्रजा ने अपना अहोभाग्य समझ। जिसके पास जो कुछ था खुशी-खुशी दान देने लगे। देखते-देखते धन-धान्य रत्न, स्वर्ण, रजत, वस्त्राभूषणों के ढेर लग गये। किसी ने भवन निर्माण का उत्तरदायित्व ले लिया, किसी ने छात्रों की भोजन व्यवस्था का। एक वर्ष के भीतर ही साधनों का अंबार लग गया। धौम्यपाद सगर्व गुरुदेव के समीप पहुँचते हैं और उन्हें साधनों की तालिका भेंट करते हे।
तालिका के अंकित अक्षरों को पढ़ते गये ऋषि कणाद, उतनी ही उनकी मुख-मुद्रा गम्भीर होती गई। उन्होंने कहा-तुम्हारा उत्साह सार्थक हो धौम्य, गुरुकुल की स्थापना का कार्य प्रारम्भ कर दो, विद्यार्थियों के प्रवेश का प्रबन्ध अविलम्ब किया जाये, पर इससे पूर्व यह एकत्रित धन-धान्य जहाँ से आया है यथावत् उसे अविलम्ब वापिस कर दिया जाय। जिन साधनों की आवश्यकता थी वह अभी तक नहीं मिले।, अभी उसका अनुसन्धान करना होगा। महर्षि का प्रतिवाद करने की हिम्मत धौम्य में थी कहाँ? उसने उनकी आज्ञा का अक्षरशः पाल किया। जहाँ से धन आया था लौटा दिया गया।
ऋषि कणादि ने उसी दिन मौन व्रत ले लिया। वाणी के प्रसुप्त होते ही स्वप्न-जाल की भाँति उनकी क्रियाशीलता के प्रसुप्त होते ही स्वप्न-जाल की भाँति उनकी क्रियाशीलता जाग पड़ी महर्षि प्रति दिन सूर्योदय होते-होते जंगल में प्रवेश कर जाते और दिन भर लकड़ियाँ एकत्रित कर लीं जिनसे छात्रों के आवास का प्रबन्ध किया जा सके। अगले मास काँस और कुल की उतनी मात्रा काटी कणाद ने, जिससे पर्णकुटीरों में छाया का यथेष्ट प्रबन्ध हो जाता। अगले मास महर्षि ने सघन वृक्षारोपण का कार्य प्रारम्भ किया। कुछ ही दिनों में पौधे बढ़ते दिखाई देने लगे। इसी बीच उन्होंने पर्णकुटीर तैयार किये। निजी आश्रम, शिक्षकों के निवास, छात्रावास और पाठन के कक्ष निर्माण में ऋषि ने अपने स्वेद कणों की एक-एक बूँद उत्सर्ग कर दीं, तब जाकर गुरुकुल की स्थापत्य आवश्यकता की पूर्ति हो पाई। इस बीच भी उन्होंने अपनी आहार की आवश्यकता खेतों बीने हुए दानों से ही पूर्ण की। महर्षि के इस कठोर श्रम को देख कर देश की प्रजा रोमांचित हो उठी। लोगों ने अपने बालकों को भेजना प्रारम्भ कर दिया। और इस प्रकार गुरुकुल की स्थापना हो गई। उसका प्रथम सत्र प्रारम्भ हो गया।
विद्यार्थियों की संख्या पर्याप्त हो गई। सामान्य कृषकों के बच्चों से लेकर महात्माओं और महाराजाओं तक के पुत्रों ने प्रवेश लिया। लोगों को विश्वास था महर्षि कणाद विद्यालय में प्रविष्ट हुये उन्होंने अपना अहोभाग्य समझा। किन्तु महर्षि कणाद को अब तक कोई भी सहायक उपलब्ध नहीं हुआ था। धौम्यपाद उनके आश्रम की देख-रेख करते थे। पर छात्रों के विद्याध्ययन से लेकर उनकी सामान्य देख-रेख तक का सारा कार्य महर्षि को स्वयं ही देखना पड़ता था। प्रथम सत्र के समापन का समय समीप आ चुका था, अब तक भगवान् कणाद ने एक दिन भी विश्राम नहीं किया था। आश्रम के अतिरिक्त वे समीपवर्ती गाँव भी न जा पाये थे। उनकी परिश्रमशीलता, लगन और अध्यवसाय के साथ महान् तप और त्याग-वृत्ति की चर्चा सारे विश्व में छा गई थी। इतने पर भी उनके वृद्ध शरीर में किसी प्रकार की थकावट के लक्षण परिलक्षित नहीं हो रहे थे।
भगवती वर्षा का आगमन निकट देख कर महर्षि ने विचार किया कि जंगल का सम्पूर्ण काष्ट गीला हो जाता है इसलिये समिधाओं के लिये सूखा ईधन एकत्रित कर लेना चाहिये। कुल्हाड़ी और रस्सियाँ लिये छात्रों के साथ महर्षि कणाद वन की ओर चल पड़े। उनके वृषभ-स्कन्ध पर भी एक कुल्हाड़ी विराजमान् थी और वे साल्हाद आगे बढ़ते हुये जा रहे थे। मौन शिष्ट-मण्डल पीछे-पीछे चल रहा था। बादलों ने छाया कर ली थी। सूर्यदेव ने अपना आक्रोश हलका कर लिया था इसलिये मौसम और भी सुहावना हो रहा था।
महर्षि ने शिष्यों के साथ सायंकाल तक लकड़ियाँ काटी। उनकी वृद्ध देह और गौरवर्ण से झर रहे स्वेद बिन्दु ऐसे दीख रहे थे जैसे हिम शिखर से भगवती गंगा का फैलाव मन्द गति से उतर रहा हो। उनकी मुखाकृति और भी उद्दीप्त हो उठी थी। एक-एक विद्यार्थी की वही स्थिति थी। अपने-अपने गट्ठर लिये सभी छात्रों ने जब आश्रम में प्रवेश किया तब ऐसा लग रहा था जैसे श्रम, संयम, स्वावलम्बन और अध्यवसाय ने अनेकों भव्य रूप ले रखे हैं और धीरे-धीरे आश्रम की प्राचीरों में समाते चले जा रहे हैं।
ईधन, समिधायें सुरक्षित स्थानों पर पहुँचा कर अब सब विद्यार्थी संध्या-वंदन के लिये बैठे तब भी महर्षि यह देख रहे थे कि उनके भोजन की व्यवस्था हो गई है या नहीं? किसी पर्णकुटीर में छेद तो नहीं हो गये, कल के लिये समुचित खाद्यान्न जुटाया जा चुका है या नहीं?
बालक अपने-अपने कक्ष में पहुँच चुके थे। दीप वृन्द जल उठे थे। शान्त वातावरण में स्वाध्याय करते छात्र ऐसे भले लग रहे थे जैसे नक्षत्रों से फूटती दिव्य किरणों ने मूर्त स्वरूप धारण कर लिया हो और तब महर्षि कणाद ने स्नान कर साधना-कक्ष में प्रवेश किया। किन्तु आज उनका शरीर इतना थक चुका था कि साधना-प्रकोष्ठ के तीन सोपान भी उनसे चढ़े न जा सके। अन्तिम पैर बढ़ाते ही वह लड़खड़ा गये। उनका कृश-मात भगवती गायत्री की प्रतिमा के सम्मुख जा गिरा। ऋषि अचेत हो गये स्त्र धौम्य। भागते हुये आये। जल की छींटे देकर उन्होंने गुरुदेव को सँभाला। अचेतना दूर हुई। ऋषि ने आंखें खोलीं। पूछा-धौम्य विद्यालय के लिये किसी साधना का अभाव हो तो देखना, उसे पूरा करना। अब यह शरीर बहुत थक गया है।” यह कहते-कहते उनकी आंखें भर आई धौम्य
ने गुरुदेव को उठाया और उन्हें शयनासन पर पौढ़ाया। उनकी चरण रज मस्तिष्क पर चढ़ाते हुये धौम्य ने उत्तर दिया-भगवन् आपने जिन साधनों को आवश्यकता अनुभव की मैंने उन्हें देर से समझा।”
आकाश शून्य है पर फैला नहीं। भारतीय तत्त्वदर्शन (फिलॉसफी) वैदिक काल से ही मानता और जानता रहा कि आकाश एक महत्त्वपूर्ण शक्तिशाली तत्त्व है। शेष 4 तत्त्व वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी क्रमशः आकाश के ही स्थूल रूप हैं। आकाश-तत्त्व ईश्वर या आत्मा की निकटता की दृष्टि से सर्वप्रथम है इसलिये उसकी शक्ति, ध्यान, फल भी अधिक महत्त्वपूर्ण हैं। योग चूड़ामण्युपनिषद में कहा गया है-
तस्माज्जता परा शक्तिः स्वयं ज्योति रात्मिका
आतमन् आकाशः संभूतः। आकाशाद्वायुः। वायोरग्निः। अग्नेरापः। अद्भयः पृथिवी। तेषाँ मनुष्यादीनाँ पंचभूत समवायः शरीरम्।
ब्रह्म से स्वयं प्रकाश रूप आत्मा की उत्पत्ति हुई। आत्मा से आकाश, आकाश से वायु, वायु से अग्नि से जल, जल से पृथ्वी की उत्पत्ति हुई। इन पाँचों तत्त्वों से मिलकर ही मनुष्य-शरीर की रचना हुई है।” यह पाँच तत्त्व ही मिलकर शरीर के स्थूल और सूक्ष्म अवयवों का निर्माण करते हैं। इन तत्त्वों की स्थिति ही क्रमशः स्थूल से सूक्ष्म होती गई है। पृथ्वी से शरीर का विकास होता है। अग्नि से दृश्य की अनुभूति होती है। वायु से शरीर में प्राणों का संचार होता है गति एवं चेतनता आती है। आकाश-तत्त्व इन सब से सूक्ष्म अदृश्य एवं नियन्त्रक है। विचार, भावनायें और विज्ञान उसी से प्रादुर्भूत होता है। शरीर के पोले भाग में भी यह आकाश-तत्त्व ही भरा हुआ है। उसकी शुद्धि से विचार और भावनाएँ ऊर्ध्वगामी होती हैं। यह पाँच कोश हैं, पाँच महातत्व हैं इनसे ही शरीर का निर्माण हुआ है और बाहर जो कुछ दिखाई देता है उस संसार का विस्तार भी इनसे ही हुआ है। इन पाँच आवरणों के बीच में ब्रह्म छुपा बैठा है ऐसी भारतीय तत्त्वदर्शन की मीमांसा है।
एक समय आया जब पाश्चात्य सभ्यतावादी और प्रारम्भिक स्तर के वैज्ञानिकों ने इस तत्त्व-दर्शन को अस्वीकार ही नहीं कर दिया वरन् उसका उपहास भी उड़ाया। लोगों ने कहा कि ग्रह-उपग्रहों के बीच में ब्रह्माण्ड का करोड़ों-करोड़ मील क्षेत्र पोला नहीं तो और क्या है। वह तो स्पष्ट ही दिखाई दे रहा है। जो वस्तु है ही नहीं वह शरीर रचना में भाग भी कैसे ले सकती है। इस तरह की बातों से भारतीय तत्त्वदर्शन को वाक्जाल कहकर उसे सब तरफ से अपदस्थ करने का प्रयत्न किया गया।
इस भ्रान्त धारण पर प्रहार सर्व प्रथम 12 दिसम्बर 1901 में रेडियो संसार के अन्वेषणकर्ता मारकोनी ने किया। उन्होंने इंग्लैण्ड के पोल्डू नामक स्थान में एक अल्प विकसित संप्रेषण यन्त्र (ट्रान्समीटर) लगाया और एक संग्राह्य यन्त्र (रिसेप्शन) लेकर अमेरिका के न्यूफाउण्डलैण्ड पहुँचे। उनका कहना था कि वायु-मण्डल से भी ऊँचाई पर भी कोई ऐसी व्यवस्था है जो रेडियो तरंगों को परावर्तित कर सकती है। इस कल्पना का अन्य वैज्ञानिकों ने ठीक उसी तरह उपहास किया जिस तरह भारतीय तत्त्वदर्शन को ठुकराने का प्रयत्न किया गया था, तब रेडियो संचार व्यवस्था का स्थापना काल था। मारकोनी के पास कोई विकसित यन्त्र न थे। एरियल का तब विकास नहीं हुआ था, इसलिये इंग्लैण्ड से प्रेरित होने वाले संकेतों को पकड़ने के लिये धातु के तार से उड़ने वाली पतंग को एरियल बनाया गया। उस पतंग को 400 फीट ऊँचे उड़ाकर संग्रह यन्त्र (रिसीवर) से उसका सम्बन्ध जोड़ दिया गया। ठीक 12॥ बजे मारकोनी ने ही नहीं अनेकों वैज्ञानिकों ने भी इंग्लैण्ड से प्रसारित होने वाले तीन बिन्दुओं के संकेत सुने तो लोगों को मारकोनी के प्रमाणों के सम्मुख सिर झुकाना पड़ा और इस तरह पहली बार विश्व के बुद्धिमान् लोगों ने यह माना कि वायुमण्डल के अतिरिक्त भी कोई शक्ति तरंगें विद्यमान् हैं। आकाश-तत्त्व की जानकारी का यह श्रीगणेश मात्र था।
सूर्य के 11 वर्षीय चक्र के अनुसार सन् 1872 और 1889 में पृथ्वी पर दो भयंकर चुम्बकीय तूफान (मैगनेटिक स्टामर्सस) आये थे तब भी डा. स्टुअर्ट और डा.शूस्टर ने इस तरह का प्रतिपादन किया था पर वह प्रामाणिकता के अभाव में सिद्ध न किया जा सका, पर मारकोनी के प्रयोग ने वैज्ञानिक अनुसन्धान के लिये एक नई दिशा दी। इसके बाद इंग्लैण्ड के हैवी साइड और अमरीका के वैज्ञानिक डा.कैनेली ने इस विज्ञान को आगे बढ़ाया और अनेक प्रयोगों से यह सिद्ध किया कि आकाश में विद्युत कणों की परतें हैं इन्हें उन्होंने अपने नाम पर “कैनेली हैवी साइड परत” का नाम दिया। इसके बाद डा.ब्रीट, ट्यूब और डा.एडवर्ड एपल्टन आदि ने इस खोज को जारी रख कर यह सिद्ध किया कि आकाश में विद्युत कणों की ऐसी अनेक परतें हैं। इन अनेक परतों को “अयन मण्डल” (आइनोस्फियर) के नाम से पुकारा गया और तब से आइनोस्फियर सम्बन्धी एक स्वतन्त्र साइन्स बन गई है।
आकाश-तत्त्व की व्याख्या करते हुये महर्षि वशिष्ठ लिखते हैं-
चिंताकाशं चिदाकाशं माकाशं च तृतीयकम्। दाभ्याँ शून्यतरं विद्धि चिदाकाशं वरानने॥
देश देशान्तर प्राप्तौ सविदो मध्यमेव यत्। निमेषेण चिदाकाश तद्विद्धि वस्वर्णिनि॥
तस्मिन्निरस्तनिः शेषसंकल्पस्थिति मेषि चेत्। सर्वात्मकं पदं तत्वं तदाप्नाष्यसशयम्॥
चित्ताकाश चिदाकाश याकाश च तृतीयकम्। विद्दयेतत्मयमेकं त्वमविनाभावनावशात्॥
-योगवाशिष्ठ 3/17/10,12,13,19
अर्थात्-आकाश नाम का व्यापक तत्त्व आकाश, चित्ताकाश और चिदाकाश तीन रूपों में सर्वत्र व्याप्त है। चिदाकाश जो ज्ञान का आश्रय है सबसे सूक्ष्म है। एक विषय से दूसरे विषय की प्राप्ति के मध्य में क्षण भर का जो अवकाश अनुभव में आता है वह चिदाकाश ही है। केवल वही संकल्प रहित है उसमें स्थिर हो जाने से आत्मा परम तत्त्व या परमपद की प्राप्ति होती है। यह तीनों आकाश एक ही तत्त्व के त्रिगुणात्मक रूप हैं।
आकाशतत्त्व के उपरोक्त विश्लेषण से यह पता चलता है कि ईश्वरीय सत्ता के सबसे समीप तत्त्व आकाश ही है उसमें विराट् जगत् की सर्व व्यापकता समाहित है। अयन मण्डल की खोजों के परिणाम स्वरूप जो निष्कर्ष सामने आये हैं उनमें से भी ऐसे ही अनेक रहस्यों का उद्घाटन होता चला आ रहा है। अयन मण्डल बृहस्पति पर वलय की भाँति पृथ्वी को सभी ओर से घेरे हुये हैं या यों कहें हम हमारी पृथ्वी आकाश में स्थिति है। इस आयन मण्डल (आयनोस्फियर) में विद्युत कणों की अनेक नियमित-अनियमित परतें हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार भी उनमें से तीन प्रमुख हैं। इन परतों को एयल्टन ने “ई”, “एफ” और “डी” परतों का नाम दिया। धरती की ऊँचाई पर जहाँ वायुमण्डल का दबाव कम है वहाँ विचरण करने वाले अणु और परमाणु अपने अणु (इलेक्ट्रान) खो देते हैं। इलेक्ट्रानों के तोड़ने की यह क्रिया सूर्य सम्पन्न करता है-यह क्रियाशीलता जिस सीमा तक तीव्र होती है, अयन मण्डल उतनी ही तीव्रता से पृथ्वी में जलवायु आदि का नियन्त्रण करता है। यही नहीं वह लोगों के मन, हृदय और गुणों को भी प्रभावित करता है। यह कार्य वह केन्द्रक शक्ति करती है जो इलेक्ट्रान के खो जाने के पश्चात् शेष रहती है। इसी से पता चलता है कि केन्द्रक- कोई मनोमय शक्ति है।
एक निश्चित सीमा के बाद इन कणों की तीव्रता घटने लगती है। वायु-मण्डल का जितना दबाव बढ़ता जाता है अयन मण्डल का सूक्ष्म प्रभाव घटता जाता है और पृथ्वी पर पहुँचते-पहुँचते उनकी सक्रियता में पृथ्वी के धूल और गैसें आदि के कण भी मिल जाते हैं जिससे उनका प्रभाव कम होने लगता है। अधिक ऊँचाई पर अधिक स्वच्छ वायु से स्वास्थ्य पर जो प्रभाव पड़ता है उससे भी अधिक महत्व इन सूक्ष्म कणों द्वारा चित्त को प्रसन्नता देने का है। हम जितना ऊपर उठते हैं उतना ही हमारी प्रसन्नता और अन्य गुण विकसित होते हैं। यह आकाश तत्त्व की ही सूक्ष्म सक्रियता है।
विज्ञान की यह खोज प्रारम्भिक स्तर की है। अब यह निरन्तर गहराई की ओर बढ़ रही है। कुछ समय पूर्व तक अयन मण्डल को सूर्य से आभासित होने वाले कणों का ही आश्रय मानते थे किन्तु हाल ही में गैलेक्सी के केन्द्रीय क्षेत्र (विशाल नारा) विश्व जिसमें सूर्य जैसे कोई 10 खरब और अब तक सिद्धांतत ज्ञात कुल तारों की संख्या 10&24 (दस घात चौबीस) है। इस विस्तार को गैलेक्सी कहते हैं। इसका अध्ययन करने वाले कुछ प्रमुख ज्योतिषी भौतिकशास्त्रियों (एस्ट्राफिजिसिस्ट्स) ने यह बताया कि इस केन्द्रीय क्षेत्र में कणों का विघटन तेजी से होता है। यह कण जो दिखाई नहीं देते वह अनेक तारों से निकल कर आते हैं और प्लाज्मा के रूप में उनसे अलग होकर पोला दीखने वाले क्षेत्र में अनेक प्रकार के क्षेत्र बनाते हुये फैल जाते हैं। विद्युत चुम्बकीय क्षेत्र और गुरुत्वाकर्षण जैसी महत्त्वपूर्ण क्रियायें उसी से सम्पन्न होती हैं। यह आयनी करण कृत (आइनोस्फेरिक प्लाज्मा) ही सारे सौर जगत में विचरण करता रहता है। लाखों वर्षों से विचरण करते-करते यह कण भूल गये हैं कि वे कहाँ से आये हैं और इस तरह विभिन्न विचारों प्रक्रियाओं घटनाओं, दृश्यों वाला हलचल पूर्ण जगत आ गया है। यह पदार्थ निरन्तर हलचल में रहता है। ये भूले हुये कण ही कास्मिक किरणों के रूप में पृथ्वी की ओर भी आते रहते हैं। इन कणों में उच्च गति वाले प्रोटान, उन तत्त्वों के परमाणु आदि होते हैं, उनमें बहुत अधिक ऊर्जा होती है। इसलिये वह जैसे ही वायु मण्डल में प्रवेश करते हैं यहाँ की वायु में हलचल पैदा कर देते। उससे फैले हुये वायु शाबरों (एक्सेन्डेट एअर साबर्स) का निर्माण होता है। इस तरह हम देखते हैं कि आकाश जो अनेक गुण, प्रकृति वाले कणों का समुद्र-सा है वही पृथ्वी की स्थूल हलचल का कारण है।
योग ग्रन्थों में जो वर्णन मिलते हैं उनसे पता चलता है कि उन्होंने आकाश तत्त्व का ज्ञान उसी प्रकार प्राप्त किया था जिस तरह आज के वैज्ञानिकों ने परमाणु का। आकाश परमाणु से भी सूक्ष्म है इसलिये उस शक्ति का कोई पारावार नहीं। योग कुंडल्युपनिषद् में षट्चक्रों का वर्णन करते हुये बताया है कि शरीर में आकाश तत्त्व का प्रतिनिधि चक्र विशुद्धास्थ कण्ठ में स्थित है। धूम्रवर्णा का एक तत्त्व उसमें भरा है उसका ध्यान करने से चित-शान्ति त्रिकाल दर्शन, दीर्घ जीवन, तेजस्विता एवं सर्वहित-परायणता का आत्मा में विकास होना है। योग-सूत्र (3-17) में उससे “भूतरुत ज्ञानम्” अर्थात् आकाश की तन्मात्रा पर अधिकार हो जाने पर प्राणिमात्र की भाषा समझ लेने की शक्ति आने का उल्लेख है। यह भाषा चाहे कोई जर्मनी बोले अँगरेजी, उड़िया या तमिल। शब्द का मूल भाव और भावनाओं के स्पन्दन अपनी-अपनी तरह के होते हैं शब्द तो उन्हें केवल व्यक्त करते हैं। आकाश तत्त्व की संसिद्धिं से स्थूल शब्दों को न जानने पर भी उनका अर्थ ज्यों का त्यों समझ लिया जाता है। श्रोत्राकाशयोः संयभाद् दिव्यं श्रोतम् (भवति) योगसूत्र (3-41) में इसी तत्त्व दर्शन का संकेत किया गया है। जिन दिव्य-ध्वनियों को आज तक विज्ञान नहीं पकड़ सका आकाश तत्त्व के वशित्व द्वारा उन्हें भारतीय योगियों ने करोड़ों वर्ष पूर्व ही जान लिया था। दूर से दूर की आवाज को भी वे परस्पर वार्तालाप की तरह सुन सकते थे। यह सब आकाश स्थित ज्ञानवाहक सूत्रों का मनुष्य-शरीर स्थित ज्ञानवाहक सूत्रों में परस्पर सम्बन्ध के द्वारा हो सम्भव होता था। ऐसे अनेक तन्मात्रा वाले परमाणु आकाश में भरे पड़े हैं उनका ज्ञान अब वैज्ञानिकों को भी हो चला है।
कोई 32 वर्ष पूर्व दो वैज्ञानिकों कोक्राफ्ट और वाल्टन ने एक एक्सीलेटर का निर्माण कर यह बताया कि उससे दस लाख इलेक्ट्रान बोल्ट की ऊर्जा (विद्युत + प्रकाश और ताप) के कण उत्पन्न किये जा सकते हैं। इसी क्रम में सायग्लोट्रान और बीटाट्रान का निर्माण हुआ उनसे डेढ़ करोड़ इलेक्ट्रान बोल्ट की ऊर्जा वाले कण उत्पन्न किये जा सकते हैं। इतनी शक्ति वाले एक्सीलेटर ही पृथ्वी की मोटरों से लेकर विशाल अन्तरिक्ष यानों को ढोकर कहीं का कहीं पहुँचा देते हैं। बाद में रूस और अमेरिका के वैज्ञानिकों ने अनेक अनुसन्धानों के आधार पर बताया कि प्रकृति में अपने आप बहुत ऊर्जा वाले कण विद्यमान् है। उन्होंने ‘कास्मिक’ किरणों में पाये जाने वाले ‘मेसान हायपरान’ आदि अस्थिर कणों को पकड़ कर उनकी प्रकृति और गुणों का प्रयोगशाला में अध्ययन कर बताया कि उनमें इतनी अधिक ऊर्जा है जितनी एक्सीलेटरों के द्वारा कभी पैदा भी नहीं की जा सकती। वायु शावरों (एयर शावर्स) के विस्तृत अध्ययन के बाद यह पाया कि उनमें लाखों-करोड़ों ऐसे उच्च ऊर्जा वाले कण विद्यमान् हैं जिनकी हजारवें हिस्से की ही शक्ति से अन्तरिक्ष यान जैसे विशाल भार को चन्द क्षणों में ही किसी भी ग्रह-नक्षत्रों तक पहुँचाया जा सकता है। ऐसे कणों में इलेक्ट्रान और प्रोट्रान कण भी सम्मिलित हैं। जब ब्रह्माण्ड किरणों (कास्मिक रेंज) वायुमण्डल पर पहुँचती है तो उन्हीं के द्वारा अनेक प्रकार के भौतिक पदार्थों की रचना सम्भव होती है। उन भौतिक पदार्थों की मानसिक प्रक्रिया का भी अध्ययन अब सम्भव हो पाया है और वैज्ञानिक यह विश्वास करने लगे हैं कि स्थूल पदार्थों और शरीर के कणों में भी वह तत्त्व बीज रूप से विद्यमान् है जो सृष्टि के आविर्भाव काल से ब्रह्माण्ड अस्तित्व में है। विचारों की तरंगें वहीं पैदा करते हैं। अभी तो नहीं पर एक दिन निश्चित रूप से वैज्ञानिक यह मानने के लिये विवश होंगे कि यह विचार-तरंगें निरर्थक नहीं वरन् किसी संकल्प और गणितीय नियमों में सधे हुये होते हैं। तात्पर्य यह है कि ब्रह्माण्ड में देवताओं या ईश्वर जैसी चेतन शक्तियाँ विद्यमान् है और उनसे मानसिक संपर्क स्थापित कर अनेक तरह की सिद्धियाँ प्राप्त की जा सकती हैं।
आकाश में ऐसी तरंगें उत्पन्न करने वाले कण इतने सूक्ष्म होते हैं कि उनका जीवन काल 2.2&10-6 सेकेण्ड का होता है अर्थात् अस्तित्व में कब आते हैं और कब नष्ट हो जाते हैं इसका अनुमान भी नहीं किया जा सकता। यह कण धन और ऋण दोनों आवेशों वाले होते हैं, उनकी संगति, विचार और भावनाओं के त्वरित निर्माण से स्पष्ट मेल खा जाती है। हम जिस देवता की ध्यान धारणा करते हैं उसी तरह की क्षमताओं से सम्पन्न होने का रहस्य अपने अन्दर इस तरह के अत्यन्त सूक्ष्म करोड़ों टन वाली ऊर्जा के कणों का संचय ही है। जो शक्तियाँ जितनी बलवती होती हैं वह उतनी ही अधिक सिद्ध और सामर्थ्य अपने उपासक को दे जाती है। आत्मा और परमात्मा की शक्तियाँ इस तरह की मानी गई हैं। यह वस्तुतः नाभिकीय चेतनाएँ (न्यूक्लियर एक्टिविटीज) हैं इनका कारण क्यू-मेसान न्यूट्रिनो और पाई मेसान जैसे अत्यन्त सूक्ष्म कणों में से कोई हो सकते हैं। गैलेक्सी के चुम्बकीय क्षेत्र भी इन पर प्रभाव नहीं डाल सकते। इनकी क्रियायें बड़ी स्वतन्त्र हैं। आज-कल आस्ट्रेलिया के वैज्ञानिक इन आकाश-कणों की बड़ी तत्परतापूर्वक खोज करने में संलग्न है।
बम्बई के टाटा इंस्टीट्यूट के प्रसिद्ध वैज्ञानिक डा०. प्राइस ने अपनी हाल की खोजों में यह पता लगाया कि ब्रह्माण्ड-किरणों और अन्य ऊज्वैसित कण जब ठोस पदार्थों से गुजरते हैं तो वे उसमें अपना स्थायी प्रभाव छोड़ जाते हैं। इस छोड़े हुये प्रभाव को अब सूक्ष्मदर्शी यन्त्रों से देखा जाना सम्भव हो गया। डा०. प्राइस का कहना है कि जड़ पदार्थों में करोड़ों वर्ष पूर्व से विद्यमान् इन चेतन किरणों का प्रभाव अभी भी विद्यमान् हैं। उसके आधार पर कहीं भी बैठकर ब्रह्माण्ड में हो चुकी या अब जो हो रही है और सम्भव हुआ तो आगे करोड़ों वर्ष तक घटित होने वाली घटनाओं का दृश्य देखा जा सकेगा। यह स्थिति त्रिकाल दर्शन की नहीं तो और क्या होगी? उसी बात को आकाश तत्त्व से प्राप्त करने की बात भारतीय तत्त्ववेत्ता कहते हैं तो उससे इनकार क्यों किया जाता है? यह ब्रह्माण्ड किरणें भी कोई अधिक नहीं हैं। जिस तरह आकाश में तीन ही प्रकार के सूक्ष्म कण (ऊपर बताये गये) पाये जाते हैं उसी प्रकार इस तरह चिर प्रभाव वाली ब्रह्माण्ड किरणों की संख्या बहुत थोड़ी है, यह बात डा०. प्राइस भी मानते हैं।
विज्ञान की गहराई की तरह आकाश की गहराई भी अनन्त है, उसकी शक्तियाँ अनन्त हैं, सिद्धियाँ अनन्त हैं, अभी तक उनका कोई वैज्ञानिक उपयोग सम्भव नहीं हुआ किन्तु “इनके अध्ययन से मानव प्रकृति के आन्तरिक गूढ़तम रहस्यों में प्रवेश कर सकेगा। इनके अध्ययन से एक ओर तो माइक्रोकोरम के महत्त्वपूर्ण गुणों पर प्रकाश पड़ेगा तथा वायु शावरों का अध्ययन हमारी गैलेक्सी में तथा सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में होने वाली अद्भुत मेक्रोकोस्म घटनाओं को समझने में सहायक होगा।” विज्ञान-लोक अप्रैल 1965 का अन्तिम पैराग्राफ)
आकाश इन उच्च ऊर्जा और अदृश्य गुणों वाले सूक्ष्म कणों का पुँज है। उस तत्त्व से मानसिक सम्बन्ध जोड़कर ही भारतीय तत्त्वदर्शियों ने वह
शक्तियाँ, सिद्धियाँ और सामर्थ्य विकसित की है जो आज के वैज्ञानिकों के लिये संभावनाएँ मात्र हैं। हिन्दू तत्त्वदर्शन के इन अनुभवों का आधार लिया जा सके तो संसार क सभी मनुष्य उन लाभों को सुगमता से प्राप्त कर सकेंगे जो विज्ञान के द्वारा बहुत लंबे समय के बाद कुछ साधन-संपन्न लोगों को ही मिल सकेंगे।
अलबर्ट का मनोविज्ञान वस्तुतः मानवीय चेतना का मनोविज्ञान न होकर पाशविक वृत्तियों का तोड़ा-मरोड़ा इतिहास मात्र है। वह कहता है-मनुष्य श्रेष्ठ पशु है (मैन इज दि सुपर इनिमन) अर्थात् मनुष्यों में जो पाशविक वृत्तियाँ हैं वह कोई दोष-दुर्गुण नहीं वरन् प्राकृतिक है।” और इस दृष्टि से उसकी जो भी स्वाभाविक आकांक्षाएँ हैं वह अनुचित नहीं है भले ही उसे उसके लिये अन्य प्राणियों का भी शोषण और उत्पीड़न करना पड़ता है। जो जितना उपयोगी है वह उतने ही अधिक अधिकारों का पात्र है भले ही इस स्वायत्तता का उपयोग वह अपने निजी सुख और स्वार्थों के लिये करता हो। उपयोगितावाद की यह संक्षिप्त व्याख्या हुई। आज योरोप ही नहीं संचार के प्रायः सभी देशों के पढ़े-लिखे लोग इसी मान्यता का आचरण व्यवहार कर रहे हैं, भले ही कहने-सुनने को उनके सिद्धांत चाहे कितने ही आदर्शवादी क्यों न हों।
उपयोगिता का समर्थन भी जिस ढंग से किया गया है वह कम हास्यास्पद नहीं। बड़ी मछली छोटी मछली को खा जाती है इसलिये कम शक्ति वालों का शोषण कोई पाप नहीं, एक प्राकृतिक प्रक्रिया हुई। जीव-हिंसा पशु-उत्पीड़न और बढ़ता हुआ माँसाहार इसी दुष्ट सिद्धान्त की देन है। इस मान्यता का प्रतिपादन है कि-जो अधिक ताकतवर होता है वही बन्दर अपने समूह का मुखिया होता है।” खरगोश, हिरन, भेड़ और बकरियों की शक्ति न्यूनतम है उन्हें भेड़िये, बाघ, शेर और चीते आदि शक्तिशाली जन्तु खा जाते हैं। यदि सहयोग, सादगी, सहानुभूति और सदाचार ईश्वरीय आदेश हुए होते तो शाकाहारी भेड़ें और बकरियाँ कमजोर न होतीं और न ही वह हिंसक जन्तुओं द्वारा भक्षण कर ली जातीं। बड़ा वृक्ष अपने घेरे में दूसरे वृक्ष को पनपने नहीं देता। हर शक्तिशाली, कम शक्ति वाले को खा जाता है। यदि इन प्राकृतिक सिद्धान्तों को मनुष्य भी अपने व्यवहार में आचरण में लाता है तो यह कोई दोष नहीं।
उपयोगितावाद सच पूछा जाये तो शक्वाद-जिसकी लाठी उसकी भैंस’ और सामंतवादी का ही दूसरा नाम है। इस सिद्धान्त ने ही संसार को नास्तिक और स्वच्छन्दतावादी बनाया है। भावनाओं का अन्त इस सिद्धान्त ने ही किया है। ठीक भी है जहाँ केवल शक्ति और उपयोगिता को ही महत्व देना हुआ वहाँ परस्पर प्रेम, उदारता, सहयोग, सौजन्य, स्नेह, सामूहिकता का क्या मूल्य रहा? जहाँ उत्कृष्टता की भावनायें न होंगी वहाँ क्यों तो व्यवस्था रहेगी और क्यों विश्व-शान्ति जिंदा रहेगी। आज उपर्युक्त प्रकार की मान्यताओं के कारण ही सारा विश्व अशान्ति असन्तोष, कलह-क्लेश और शोषण के जाल में उलझता चला जा रहा है।
इस जड़वादी मान्यता का जो भी परिपोषण करते हों उन्हें मनुष्य शरीर की आन्तरिक स्थिति पर एक बार भावनापूर्वक विचार करने की आवश्यकता है। हमारे शरीर का प्रत्येक कोष एक स्वतन्त्र मानव बीज है उसमें मनुष्य की सारी स्थूल और चेतन क्रियायें विद्यमान् हैं। ‘कोष’ साँस लेता है, खाता है, पीता है, चलता है, डरता है, बचाव करता है, भागता है, मल विसर्जन करता है। ‘अमीबा’
एककोशीय जीव है। उसका नाभिक जब दो भागों में बँट जाता है तो वह दो अमीबा बन जाते हैं और दोनों अपनी-अपनी तरह से उक्त क्रियायें और अनुभूति करने लगते हैं। दो विभाज्य अमीबा, दो अलग गुणों वाले अमीबा आत्मा (न्यूक्लियस) की दृष्टि से एक ही है। और उदाहरण के लिये जब दो अमीबा अपनी शक्ति में ह्रास अनुभव करते हैं तो वह एक दूसरे में मिलकर दो नाभिक (न्यूक्लियस) से एक नाभिक (न्यूक्लियस) वाला एक अमीबा बन जाते हैं उस स्थिति में वह नवजात अमीबा की-सी शक्ति अनुभव करता है। इससे सिद्ध हो जाता है कि शरीर के अनेक कोषों (सेल्स) में बँट जाने पर भी उनकी आत्मिक चेतना एक ही है। मनुष्य इस बात का ध्यान रखे या न रखे वह उपयोगितावाद जैसे खण्डनात्मक तथ्य को माने तो मानता रहे पर लघुकोशीय जीव भूल करने को तैयार नहीं।
मनुष्य शरीर के विचित्र अवयव एक ही कोष “स्पर्म” से पैदा होते हैं। स्थान की आवश्यकता के अनुरूप वे अपना आकार बदल कर मस्तिष्क, हृदय, जिगर, तिल्ली, नसें, माँसपेशियाँ आदि बनाते हैं पर उन्हें पता है कि विभिन्न स्थिति में काम की जिम्मेदारियाँ उठाते हुए भी वह सब एक ही पिता की सन्तान, भाई-भाई हैं और इसीलिये वे बराबर प्रेम, दया, सहयोग, सहानुभूति, श्रम, सामूहिकता आदि का व्यवहार करते रहते हैं इसी कारण शरीर स्थिर है।
जिस प्रकार बहुत से कोषों (लगभग 2 अरब) से मिल-कर शरीर बना उसी प्रकार बहुत से मनुष्यों से समाज, देश और विश्व बना। स्थान की स्थिति और जलवायु की भिन्नता के कारण वर्ण-भेद स्वभाव-भेद होते हुए भी सब एक ही आत्मा के अंग हैं यह मानकर जो शरीर की सहयोग-भावना का पालन करते हैं वह विश्व शान्ति बढ़ाने और ईश्वरीय मर्यादाओं का पालन करने का पुण्य करते हैं जो उससे विपरीत जड़वादी आचरण करते हैं प्रकृति उन्हें दण्ड देती है। इसी सूक्ष्म न्याय प्रणाली पर सृष्टि की व्यवस्था अब तक विद्यमान् है। यदि प्रेम, दया, उदारता, करुणा आदि सद्गुणों का अन्त हो गया होता तो सृष्टि का भी अन्त हो गया होता।
मनुष्य-शरीर मानवीय सद्गुणों का जिस रीति से परिपालन करता है उसका वक्तव्य बड़ा ही रोचक है। आन्तरिक क्रिया-शास्त्र (फिजियोलॉजी) का गहन अध्ययन किया जाये तो पता चलेगा कि व्यक्ति और समाज को सुखी सन्तुलित और सुव्यवस्थित बनाने वाले जो भी गुण हैं वह दूध से नवनीत काढ़ने की तरह से ही निकाले गये हैं।
उदाहरण के लिये सहयोग और सहानुभूति को ही ले लें। मनुष्य इतना कठोर हृदय हो सकता है कि अपने भाई, अपने पड़ोसी को कष्ट और पीड़ित अवस्था में देखकर भी चुप रह जाय पर हमारे शरीर के सदस्य ऐसे हृदयहीन नहीं। परस्पर सहयोग और दूसरे के दुःख में हाथ बटाना ही उनका जीवन है। उदाहरणार्थ यदि एक गुर्दा खराब हो जाये जैसा कि पथरी की बीमारी के समय होता है, तो अच्छा गुर्दा दूसरे पीड़ित गुर्दे का सारा कार्य भार स्वयं संभाल लेता है जब तक वह ठीक न हो जाये स्वयं कष्ट सहेगा किन्तु शरीर की साधारण क्रिया में कोई अन्तर न आने देगा।
धमनियाँ (आर्ट्रीज) शरीर को रक्त पहुँचाती है। बड़ों के साथ छोटे-छोटे भी रहते हैं और तब उनका कोई विशेष महत्व जान नहीं पड़ता जैसा कि बड़ी धमनियों के साथ कुछ पतली धमनियाँ भी बनी रहती हैं। मनुष्य अपने छोटों को कष्ट दे सकता है, उनका शोषण और उत्पीड़न कर सकता है पर धमनियों को पता है कि छोटे से छोटे जीव का भी कितना महत्व है इसलिये वह पतली धमनियों को भी पोषण देती रहती है। कभी कोई धमनी (आर्ट्रीज) कट जाये तो उस स्थिति पतली धमनियाँ (एनास्टोमोसेस) रक्त प्रवाह के किनारे फूल कर आगे जोड़ देती है और रक्त परिभ्रमण किया को तब तक साधे रहती है जब तक घाव अच्छा न हो जावे। इससे आगे वाला हिस्सा काम करता रहता है। यदि ऐसा न भी हो तो भी पतली धमनियाँ (एनास्टोमोसेस) आजीवन काम करती है।
‘नेमोनेक्टामी’ के अनुसार यदि एक फेफड़ा काटकर निकाल देना पड़े तो दूसरा फेफड़ा साधारण स्थिति के सारे काम संभाल लेता है। यह सहयोग और सहानुभूति क्रियायें बताती हैं कि हम जिस समाज में रहते हैं उसमें आये दिन दुर्घटनायें घटती हैं उनसे कुछ लोग पीड़ित होते हैं उनके प्रति भी हमारे कर्तव्य वैसे ही हैं जैसे स्वयं अपने प्रति। व्यवस्था, विश्व-शान्ति और मानवता ऐसे ही अक्षुण्ण रहती है।
आज लोगों ने इन बातों को भुला दिया। स्वार्थ और प्रवंचनायें प्रबल हो उठी हैं। सारा समाज उन प्रवंचनाओं में धू-धू कर जल रहा है। सर्वत्र शोषण, लूट-पाट बेईमानी, छल-कपट कलह के बाहरी शत्रु आक्रमण कर समाज की भलाई की धराशायी करते जा रहे हैं पर हममें से मुकाबले की शक्ति भी जागृत नहीं होती। शरीर के छोटे-छोटे कोषों को पता है कि जब बुराइयों, बीमारियों की तीव्रता कोषों को पता है तो शरीर सम्बन्धित अंग ही नहीं सारा शरीर बेचैन हो उठता है। इसलिये वे सब के सब एक जुट प्रयत्न करते हुए बुराइयों के उन्मूलन में लग जाते हैं। कई बार चमड़ी खुल जाने या चोट लग जाने के कारण कोई कीटाणु बाहर से आकर शरीर में घुस जाते हैं और लोगों को सताना, काटना, लूटना, भक्षण करना प्रारम्भ कर देते हैं तब शुद्ध रक्ताणु दौड़ पड़ते हैं। (1) सूजन, (2) उस स्थान की चमड़ी का लाल हो जाना, (3) उस हिस्से का गर्म हो जाना, (4) तनाव बढ़ने से नस पर दबाव पड़ता है और दर्द बढ़ता है। इससे पता चलता है कि अच्छे कोषों की सेना एकत्रित हो गई ओर बुराइयों का निष्कासन प्रारम्भ हो गया। दरअसल जिस मनुष्य समाज में बुराई के प्रति इतनी सजगता और तत्परता नहीं बरती जाती वह समाज उसी तरह सड़ जाते, निकम्मे हो जाते हैं जैसे शरीर का कोई हिस्सा जहाँ कीटाणु हमला कर देते हैं। ऐसे विषाक्त वातावरण को जितनी जल्दी साफ कर दिया जाता है शरीर की तरह समाज उतनी ही शीघ्र चैन अनुभव करता है।
कई बार बुराई की मात्रा काफी बढ़ जाती है। रक्त में हानिकारक कीटाणु (इनफैक्टिव बैसिलाई) पैदा हो जाते हैं उससे रोग और विकृति पैदा होती है उसके मुकाबले के लिए रक्त के श्वेत अणु (व्हाइट ब्लड कारपैसल्स) पहुँचते हैं और शरीर रक्षा का पूर्ण प्रयत्न करते हैं पर बेचारों की शक्ति बुराई के मुकाबले हुई कम तो हार जाते हैं और मार दिये जाते हैं किन्तु त्याग और बलिदान की उपयोगिता समझने वाले ये अणु मरते-मरते भी कुछ न कुछ उपकार कर जाते हैं। मरे हुए श्वेत अणु प्रोटियोलाइटिक एन्ज़ाइम बन जाते हैं ओर (1) शरीर के मरे हुए कोच (बैक्टीरिया) (2) एवं नष्ट हुए श्वेत अणु को घोल कर पीब बना देते हैं और उन्हें बाहर निकाल देते हैं इससे दर्द कम हो जाता है।
आजकल बुराइयाँ अधिक बढ़ गई हैं इसलिये असामान्य परिस्थितियाँ पैदा की जा रही हैं। यह परिस्थितियाँ असामान्य इसलिये कहीं जायेंगी कि इनमें समाज के सभी विचारशील लोग अपना ध्यान निजी हितों से हटा कर पूरी तरह समाज सुधार और दुष्प्रवृत्तियों के उन्मूलन में लगाते हुए चले जायेंगे तब समाज-शरीर उसी तरह बच्चा हो जाएगा जिस तरह शरीर के बुरे तत्त्व नष्ट कर देने पर। टी.वी. के जीवाणु (बैक्टीरिया) जब एसिड फास्ट बैसिलाई बन जाते हैं अर्थात् एसिड भी उसका मुकाबला नहीं कर पाते उस समय श्वेत अणुओं के 5 प्रकार के कोष (सेल्स) (1) पोलियोभोर्फ्स 70 से 75', (2) लिम्फोसाइड्स 20 से 30 प्रतिशत, (3) मोनोसाइड्स 5 से 10 प्रतिशत, (4) इजिनेफिल 5 से 6 प्रतिशत और(5) वेसोफिल्स आधा प्रतिशत तैयार होते हैं। लड़ाई के दिनों में जिस तरह सेनापति परस्पर ऐसी योजनाएँ बनाते हैं कि दुश्मन को हर तरह से मात भी दीं जायें उसी तरह शारीरिक बुराई के प्रति यह संघर्ष भी बड़ा प्रेरक होता है। सर्व प्रथम पोलियोमार्फ्स आते हैं यदि वे अपने आपको मुकाबला करने में असमर्थ पाते हैं तब सिम्फोसाइड्स की टुकड़ी आगे बढ़कर दुश्मन को ललकारती है यदि तब भी टी.वी. के कीटाणु शसक्त हुए और लिम्फोसाइड्स हार गये तो कई-कई इपिथेलाइड्स कोष मिलकर दैत्वाकार कोष (जाइन्ट सेल्स) बनाकर टी.वी. के कीटाणुओं को खा जाते हैं। शरीर की यह सुरक्षा-शक्ति आह्वान करती है कि जब कभी सामाजिक बुराइयाँ, पाप, अपराध, अनैतिकता का कुछ ऐसा बाहुल्य हो जाये कि अग्रगण्य लोग भी उन्हें दूर न कर पायें तब संगठित प्रयत्नों द्वारा उन्हें नष्ट करने के लिये अपनी सारी शक्ति जुटा देनी चाहिये।
गुर्दे के ऊपर एक सुआरीनल ग्रन्थि (ग्लैंड) होती है वह एड्रेनेलीन एवं कार्ठिकों स्टराइड्स निकालती है जो शरीर को उसी प्रकार विषम स्थिति में कार्य करने की शक्ति देती है जैसे महापुरुष अपने अनुयायियों को देकर बुराइयों का अन्त कराते हैं। उदाहरण के लिये सामने कोई जंगली जानवर आ जाये तो एड्रेनेलीन रक्त चाप बढ़ाकर पैरों को अधिक कार्य करने के लिये अधिक शक्ति दे देती है। उतनी ही शक्ति मस्तिष्क को मिलती है जिससे वह तुरन्त कोई निर्णय ले सके। दौड़ते समय फेफड़े माँसपेशियों (मसल्स) को आक्सीजन की बहुत मात्रा अनुदान दे देते हैं। उतनी ही शक्ति मस्तिष्क को मिलती है जिससे वह तुरन्त कोई निर्णय ले सके। दौड़ते समय फेफड़े माँसपेशियों (मसल्स) को आक्सीजन की बहुत मात्रा अनुदान दे देते हैं दौड़कर आने के बाद काफी देर तक तेज हांफती रहती है इस तरह फेफड़े अपनी खोई शक्ति पुनः अर्जित कर लेते हैं। सम्भवतः यह व्यवस्था भगवान् ने इसलिये की कि मनुष्य यह जान ले औरों की भलाई में उत्सर्ग की हुई शक्ति और क्षमताएँ नष्ट नहीं होती वरन् एक नई चेतना लेकर भगवान् के वरदान की तरह पुनः मिलती है। मनुष्य अपने उपकार का पुष्य फल उसी प्रकार प्राप्त करता है जिस तरह स्वतन्त्रता संग्राम के सिपाही अपने महत्त्वपूर्ण पदों का आनंद ले रहे हैं।
वस्तुतः शरीर रचना की आधारभूत शिक्षायें यदि सम्पूर्ण रूप में मनुष्य समाज में ढाल दी जायें तो विश्वशान्ति के लिये बाह्य साधनों की खोज नहीं करनी पड़े। हम समता के सिद्धान्त पर धरती में जीवित है और एक दूसरे के प्रति त्याग भावना से सुरक्षित हैं। केवल स्वार्थ ही स्वार्थ और अहंमन्यता मात्र रहे होते तो मानवीय संस्कृति का जीवित बने रहना कठिन हो जाता। पहले यह परिस्थितियाँ नहीं थीं पर अब उनकी मात्रा बढ़ रही हैं, अब हर व्यक्ति स्वार्थी होता जा रहा है। खुदगर्जी के कारण ही लोभ-लालच बेईमानी और संग्रहवृत्ति पनप रही है। इससे सामाजिक विषमता पैदा होती है और लोगों में अविश्वास की भावनाएँ भड़कती हैं। इस स्थिति का मुकाबला त्याग और उदारता के बल पर ही किया जा सकता है।
हमारे शरीर की व्यवस्था ऐसी ही जिसके संग्रह तो हैं पर एक अच्छे सहयोग के लिये, त्याग और उदारतापूर्वक औरों की सुविधाएँ बढ़ाने के लिये, त्याग और उदारतापूर्वक औरों की सुविधाएँ बढ़ाने के लिये, त्याग और उदारतापूर्वक औरों की सुविधाएँ बढ़ाने के लिए हैं। (1) हर हड्डी के पोले भाग में, (2) प्लीहा (सप्लीन), (3) जिगर (लिवर) में रक्त की मात्रा संगृहीत रहती हैं। कभी चोट या घाव हो जाने पर वह संस्थान अविलम्ब रक्त पहुँचा कर उस स्थान को ठीक रखने और कमजोर न होने देने का प्रयत्न करते हैं। सामूहिकता की इसी भावना पर समाज की सुख-शान्ति अवलम्बित है।
रक्त ही नहीं शरीर में चर्बी का स्टोर रहता है। चमड़ी और माँस के बीच चर्बी सुरक्षित रहती है। कई दिन तक भोजन न मिले तो भी सब अंग काम करते रहते हैं। चमड़ी पीली पड़ जाती है तो भी किसी की मृत्यु नहीं होने दी जाती। मृत्यु तो हृदय और मस्तिष्क को पोषण न मिलने से होती है पर शरीर-संस्कृति जानती है कि भावनाशील और चरित्रवान् लोगों ने मिट जाने से समाज की सुख-शान्ति मिट जाती है इसलिये अय अपनी सुरक्षित शक्ति उनके लिये खुशी-खुशी दान कर देती है।
यह भलाई की शक्तियाँ ही मनुष्य को जीवन दान देती हैं। डाक्टर जानते हैं कि शरीर में शक्ति ग्लूकोज के टूटने से प्रसारित होती है। जब कोई माँसपेशी या कोष (सेल) काम करता है तो ग्लूकोज लैक्टिन एसिड में परिवर्तित होकर शक्ति प्रदान करता है। जिगर का ग्लाइकोजन ग्लूकोज में परिवर्तित होता है। यह माँसपेशियों में ए.टी.पी. (एडिनोसिन ट्राइ फास्फेट) टूट कर ए.डी.पी. (एडिनोसिन ट्राइ फास्फेट) एवं फास्फोरस में बदलता है यह फास्फोरस क्रियेटिंग फास्फेट से मिलता है जो अपनी शक्ति ग्लाइकोजन से लेता है। विश्राम के समय यही ग्लाइकोजन फिर जिगर में संगृहीत हो जाता है। सामान्य स्थिति में वह रक्त में भी संचारित होता रहता है। हमारे साधन, सत्कार्यों में निरन्तर लगते रहें और आवश्यकता पड़ने पर तो दूसरी बातों को गौण मानकर भी अपनी तमाम शक्तियाँ, प्रतिभाएँ और योग्यताएँ सामाजिक भाई के कार्यों में लग जायें यह प्रेरणा हमें उक्त क्रिया से मिलती हैं।
संसार में सभी नर-नारी स्वभावतः शान्ति-प्रेमी होते हैं क्योंकि शान्तिमय जीवन में ही उनको अपना कल्याण दिखाई पड़ता है। केवल थोड़े से असाधारण पेटू-घोर स्वार्थी राजनैतिक व्यक्ति भले ही युद्ध को आदर्श मानें और उसकी प्रशंसा के गीत गायें, पर उनकी गिनती स्वस्थ-समाज के व्यक्तियों में नहीं की जा सकती। संसार के करोड़ों और अरबों लोग ईमानदारी से अपनी मेहनत की रोटी कमाना, गृहस्थी पालन, निर्दोष मनोरंजन करना, किसी धर्म या निष्ठा पर विश्वास रखना, अभागों और जरूरतमन्दों की सहायता करना पसन्द करते है। -ला. हरदयाल
“नहीं, नहीं, विरोचन। श्रेष्ठता का आधार वह तप अर्थ नहीं जो व्यक्ति को मात्र सिद्धियाँ और सामर्थ्य प्रदान करे। ऐसा तप तो शक्ति-संचय का साधन मात्र है। श्रेष्ठ तपस्वी तो वह है जो अपने लिये कुछ चाहे बिना समाज के शोषित, उत्पीड़ित, दलित और असहाय जनों को निरन्तर ऊपर उठाने के लिये परिश्रम किया करता है। इस दृष्टि से महर्षि कण्व की तुलना राजर्षि विश्वामित्र नहीं कर सकते। कण्व की सर्वोच्च प्रतिष्ठा इसलिये है कि वह समाज और संस्कृति, व्यष्टि और समष्टि के उत्थान के लिये निरंतर घुलते रहते हैं।” भगवान इन्द्र ने विनोद भाव से विरोचन की बात का प्रतिवाद किया।
और विरोचन अपनी बात पर दृढ़ थे। उनका कहना था-तपस्वियों में तो श्रेष्ठ विश्वामित्र ही हैं। उन दिनों विश्वामित्र शिवालिक-शिखर पर सविकल्प समाधि अवस्था में थे और कण्व वहाँ से कुछ दूर आश्रम-जीवन ज्ञापन कर रहे थे। कण्व के आश्रम में बालकों का ही शिक्षण नहीं बालिकाओं को भी समानान्तर आध्यात्मिक, धार्मिक एवं साधनात्मक प्रशिक्षण प्रदान किया जाता था।
विरोचन के फिर वही व्यंग्य करते हुए कहा-भगवान् आपको तो स्पर्धा का भय है किन्तु आप विश्वास रखिये विश्वामित्र त्यागी सर्व प्रथम है तपस्वी बाद में। उन्हें इन्द्रासन का कोई लोभ नहीं, तप तो वह आत्म-कल्याण के लिये कर रहे हैं। उन्होंने न झुकने वाली सिद्धियाँ अर्जित की हैं। उन सिद्धियों का नाम तो समाज को भी दिया जा सकता है।
विश्वामित्र की सिद्धियों को मैं जानता हूँ विरोचन। भगवान् इन्द्र ने पुनः अपने तर्क के प्रमाणित किया-किन्तु सिद्धियाँ प्राप्त कर लेने के बाद यह आवश्यक नहीं कि वह व्यक्ति उनका उपयोग लोक-कल्याण में करे। शक्ति में अहंभाव का जो दोष है वह सेवा में नहीं इसलिये सेवा को मैं शक्ति से श्रेष्ठ मानता हूँ इसीलिये कण्व की विश्वामित्र से बड़ा मानता हूँ।
बात आगे बढ़ती किन्तु महारानी शची के आ जाने से विवाद रुक गया। रुका नहीं-एक मोड़ ले लिया। शची ने हँसते हुए कहा-अनुचित क्या है? क्यों न इस बात की हाथों-हाथ परीक्षा कर ली जाये।
बात निश्चित हो गई। कण्व और विश्वामित्र की परीक्षा होगी, यह बात कानों-कान सारी इन्द्रपुरी में पहुँच गई। लोग उत्सुकतापूर्वक प्रतीक्षा करने लगे देखें सिद्धि की विजय होती है या सेवा की।
निशादेवी ने पहला पाँव रखा। दीप जले, देव-आरती से उनका स्वागत किया गया। दिव्य-ज्योतियों से सारा इन्द्रपुर लगभग-जगमग करने सका। ऐसे समय भगवान् इन्द्र ने अनुचर को बुलाकर रुपसी अप्सरा मेनका को उपस्थित करने की आज्ञा दी। अविलम्ब आज्ञा का पालन किया गया। थोड़ी ही देर में मेनका वहाँ आ गई। इन्द्र ने उसे सारी बातें समझा दीं। वह रात इस तरह इन्द्रपुर में अनेक प्रकार की मनोभावों में ही बीती।
सबेरा हुआ। भगवती उषा का साम्राज्य ढलने लगा। भुवन भास्कर देव प्राची में अपनी दिव्य सभा के साथ उगने लगे। भगवती गायत्री के आराधना का यह सर्वोत्कृष्ट समय होता है। तपस्वी विश्वामित्र आसन बंध और प्राणायाम समाप्त कर जप के लिये बैठे थे। उनके हृदय में वैराग्य की धारा अहर्निश बहा करती थी। जप और ध्यान में कोई कष्ट नहीं होता था। बैठते-बैठते चित्त भगवान् सविता के भर्ग से आच्छादित हो गया। एक प्राण भगवती गायत्री और राजर्षि विश्वामित्र। दिव्य तेज फूट रहा था उनकी मुखाकृति से। पक्षी और वन्य जन्तु भी उनकी साधना देख मुग्ध हो जाते थे।
उनकी यह गहन शान्ति और स्थिरता देखकर पक्षियों को कलरव करने का साहस न होता। जन्तु चराचर नहीं करते थे, उन्हें भय था कहीं ध्यान न टूट जाये और तपस्वी के कोप का भाजन बनना पड़े। सिंह तब दहाड़ना भूल जाते वे दिन के तृतीय प्रहर में ही दहाड़ते और वह भी विश्वामित्र की प्रसन्नता बढ़ाने के लिये क्योंकि वह उस समय वन-विहार के लिये आश्रम छोड़ चुके होते थे।
किन्तु आज उस स्तब्धता को तोड़ने को साहस किया किसी अबला ने। अबला नहीं अप्सरा। मेनका। इन्द्रपुर जिसकी छवि पर दीपक की लौ पर शलभ की भाँति जल जाने के लिये तैयार रहता था। आज उसने अप्रतिम शृंगार कर विश्वामित्र के आश्रम में प्रवेश किया था। पायल की मधुर झंकार से वहाँ का प्राण-पूत वातावरण भी सिहर उठा। लौध्र पुष्प की सुगन्ध सारे आश्रम में छा गई। जहाँ अब तक शान्ति थी, साधना थी वहाँ देखते-देखते मादकता, वैभव और विलास खेलने लगा।
किन्तु विश्वामित्र की समाधि निश्चल अविचलित। अन्तरिक्ष में गये प्राण जिस सुख और शान्ति की अनुभूति में निमग्न थे लगता है यह नयापन उसकी तुलना में नगण्य था किन्तु जैसे-जैसे मेनका के पाँवों की थिरकन, कण्ठ का संगीत और अंगराग वहाँ तीव्रता से बिखरने लगा। विश्वामित्र की चेतना में आकुलता बढ़ने लगी। रूप और सौंदर्य के इन्द्रजाल में आकाश में विलीन विश्वामित्र की एकाग्रता को आश्रम में ला पटका। नेत्र-पटल खुल गये। मेनका नृत्य में खो गई और विश्वामित्र को स्थिरता खो गई। उसके अंग सौठव, रूप-सज्जा और प्रबल कामासक्ति में।
दण्ड और कमण्डलु ऋषि ने एक ओर रख दिये। कस्तूरी मृग जिस तरह बहेलिये की संगीत-ध्वनि से मोहित होकर कालातीत होने के लिये चल पड़ता है। लहराने लगता है। सर्प जिस तरह वेणु का नाच सुनकर उसी प्रकार महर्षि विश्वामित्र ने अपना सर्वस्व उस रुपसी अप्सरा के अञ्चल में न्यौछावर कर दिया। सारे भारतवर्ष में कोलाहल मच गया कि विश्वामित्र का तप भंग हो गया।
एक दिन, दो दिन, सप्ताह, पक्ष और मास बीतते गये और उनके साथ ही विश्वामित्र का तप और तेज भी स्खलित होता गया। विश्वामित्र का अर्जित तप काम के दो कौड़ी वाम बिक गया। और जब तप के साथ उनकी शांति उनका यश और वैभव भी नष्ट हो गया तब उन्हें पता चला कि भूल नहीं अपराध हो गया। विश्वामित्र प्रायश्चित की अग्नि में चलने लगे।
क्रोधोच्छ्दासित विश्वामित्र ने मेनका को दंड देने का निश्चय किया पर प्रातःकाल होने तक मेनका आश्रम से जा चुकी थी, इतने दिन की योग-साधना का परिणाम एक कन्या के रूप में छोड़ कर। विश्वामित्र ने बिलखती आत्मजा के पास भी मेनका को नहीं देखा तो उनकी देह क्रोध से जलने लगी पर अब हो ही क्या सकता? मेनका इन्द्रपुर जा चुकी थी।
रोती-बिलखती कन्या को देखकर भी विश्वामित्र को दया नहीं आई। पाप उन्होंने किया था पश्चाताप भी उन्हें ही करना चाहिये था पर उनकी आँखों में तो प्रतिशोध छाया हुआ था। ऐसे समय मनुष्य को इतना विवेक कहाँ रहता है कि वह यह सोचे कि मनुष्य अपनी भूलें सुधार भी सकता है। और नहीं तो अपनी सन्तान, अपने आगे आने वाली पीढ़ी के मार्गदर्शन के लिये तथ्य और सत्य को उजागर ही रख सकता है। विश्वामित्र को आत्म-कल्याण की चिन्ता थी इसलिये उन्हें इतनी भी दया नहीं आई कि वह बालिका को उठाकर उसके लिये दूध और जल की व्यवस्था करते। बालिका को वही बिलखता छोड़कर वे वहाँ से चले गये।
मध्याह्न वेला। ऋषि कण्व लकड़ियाँ काटकर लौट रहे थे। मार्ग में विश्वामित्र का आश्रम पड़ता था। बालिका के रोने का स्वर सुनकर कण्व ने निर्जन आश्रम में प्रवेश किया। आश्रम सूना पड़ा था। अकेली बालिका दोनों हाथों के अंगूठे मुँह में चूसती हुई भूख को धोखा देने का असफल प्रयत्न कर रही थी।
कण्व ने भोली बालिका को देखा, स्थिति का अनुमान करते ही उनकी आंखें छलक उठीं। उन्होंने बालिका को उठाया, चूमा और प्यार किया और गले लगाकर अपने आश्रम की ओर चल पड़े। पीछे-पीछे उनके सब शिष्य चल रहे थे। इन्द्र ने विरोचन से पूछा-तात बोलो न। जिस व्यक्ति के हृदय में पाप करने वाले के प्रति कोई दुर्भाव नहीं, पाप से उत्पीड़ित के लिये इतना गहन प्यार की उसकी सेवा माता की तरह करने को तैयार वह कण्व
श्रेष्ठ हैं या विश्वामित्र?
विरोचन आगे कुछ न बोल सके। उन्होंने लज्जावश अपना सिर नीचे झुका लिया।
शास्त्रों में कुण्डलिनी को अनेक शक्तियों का प्राण कहा है। सुषुप्त पड़ी कुण्डलिनी को जागृत कर लेने वाला इस लोक के अनन्त ऐश्वर्य का स्वामी वन जाता है। भारतवर्ष में इस विद्या की शोध की गई है। कुण्डलिनी शक्ति की कोई सीमा और थाह नहीं है।
किन्तु कुण्डलिनी जागृत कर लेना जीव का अन्तिम लक्ष्य नहीं है। जीव का अन्तिम लक्ष्य है मोक्ष की प्राप्ति या ब्रह्म निर्वाण। अपने आपको ब्रह्म की सायुज्यता में पहुँचा देना ही मनुष्य देह धारण करने का उद्देश्य है अनेक साधन और योग उसी के लिये बने हैं। कुण्डलिनी का भी वही उद्देश्य है उस पर अपनी टिप्पणी करते हुए योग प्रदीपिका में लिखा है-
उद्घाटयेत्कपार्ट तु यथा कुँचिकया हठात्।
कुँडलिन्या तथा योगी मोक्ष द्वारं विभेदयेत्॥
(105)
अर्थात् जिस प्रकार कोई मनुष्य अपने बल से द्वार पर लगी हुई अगँला आदि को ताली से खोलता है उसी प्रकार योगी कुण्डलिनी के अभ्यास द्वारा सुषुम्ना के मार्ग का भेदन करता है और ब्रह्म-लोक में पहुँच कर मोक्ष को प्राप्त होता है।
शिर के मध्य से (ब्रह्मरंध्र) में 1 हजार पंखुड़ियों का कमल है उसे ही सहस्रार चक्र कहते हैं उसी में ब्राह्मी शक्ति या शिव का वास बताया गया है यहीं आकर कुण्डलिनी शिव से मिल गई है। इसे आत्मा का स्थान, सूत्रात्मा धाम आदि कहते हैं। यहीं से सारे शरीर की गतिविधियों का उसी प्रकार संचालन होता है जिस प्रकार पर्दे में बैठा हुआ कलाकार उँगलियों को गति दे-देकर कठपुतलियों को नचाया करता है। विराट् ब्रह्माण्ड में हलचल पैदा करने वाली सूत्र शक्ति और विभाग इस सहस्रार कमल के आसपास फैल पड़े हैं। यहीं अमृत पान का सुख, विश्व-दर्शन संचालन की शक्ति और समाधि का आनन्द मिलता है। यहाँ तक पहुँचना बड़ा कठिन होता है। अनेक साधक तो नीचे के ही चक्रों में रह जाते हैं उनमें जो आनन्द मिलता है उसी में लीन हो जाते हैं। इसलिये कुण्डलिनी साधना द्वारा मिलने वाली प्रारम्भिक सिद्धियों को बाधक माना गया है। जिस प्रकार धन-वैभव ऐश्वर्य और सौंदर्यवान युवती पत्नियों का सुख पाकर मनुष्य संसार को ही सब कुछ समझ लेता है उसी प्रकार कुण्डलिनी का साधक भी बीच के ही छः चक्रों में दूर दर्शन, दूर श्रवण, दूसरों के मन की बात जानना, भविष्य दर्शन आदि अनेक सिद्धियाँ पाकर उनमें ही आनन्द का अनुभव करने लगता है और परम-पद का लक्ष्य अधूरा ही रह जाता है।
सहस्रार चक्र में पहुँच कर भी साधक बहुत समय तक उस पर स्थिर नहीं रह पाते हैं। वह साधक की आन्तरिक और आध्यात्मिक शक्ति तथा साधना के स्वरूप पर निर्भर है कि वह सहस्रार में कितने समय तक रहता है उसके बाद वह फिर निम्नतम लोकों के सुखों में जा भटकता है पर जो अपने सहस्रार को पका लेते हैं वह पूर्ण ब्रह्म को प्राप्त कर अनन्त काल तक ऐश्वर्य सुखोपभोग करते हैं।
सहस्रार दोनों कनपटियों से 2-2 इंच अन्दर और भौहों से भी लगभग 3-3 इंच अन्दर मस्तिष्क के मध्य में “महाविवर” नामक महाछिद्र के ऊपर छोटे से पोले भाग में ज्योति-पुँज के रूप में अवस्थित है। कुण्डलिनी साधना द्वारा इसी छिद्र को तोड़ कर ब्राह्मी स्थिति में प्रवेश करना पड़ता है इसलिये इसे “दशम द्वार” या ब्रह्मरंध्र भी कहते हैं। ध्यान बिन्दु उपनिषद् में कहा है-
मस्तकेमणिवद्भिन्नं यो जानाति स योगवित्।
तप्तचामीकराकारं तडिल्लेखेव विस्फुरत्॥
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अर्थात्-मस्तक में जो मणि के समान प्रकाश है जो उसे जानते हैं वहीं योगी है। तप्त स्वर्ण के समान विद्युत धारा-सी प्रकाशित वह मणि अग्नि स्थान से चार अंगुल ऊर्ध्व और मेढ़ स्थान के नीचे है यह स्वाधिष्ठान चक्र वे आश्रम में हैं और स्वयं नाद युक्त हैं।
इस स्थान पर पहुँचने की शक्यों का वर्णन करते हुए शास्त्रकार ने कहा है-तस्य सर्वेषु लोकेषु कामचारी भवति” अर्थात् वह परम विज्ञानी, त्रिकालदर्शी और सब कुछ कर सकने की सामर्थ्य प्राप्त कर लेता है वह चाहे जो कुछ करे उसे कोई पाप नहीं होता। उसे कोई जीत नहीं सकता।
ब्रह्मरंध्र एक प्रकाश से जीवात्मा का कार्यालय इस दृश्य जगत में जो कुछ है और जहाँ तक हमारी दृष्टि नहीं पहुँच सकती उन सबकी प्राप्ति की प्रयोगशाला है। भारतीय तत्त्वदर्शन के अनुसार यहाँ 17 तत्त्वों से संगठित ऐसे विलक्षण ज्योति पुँज विद्यमान् हैं जो दृश्य जगत में स्थूल नेत्रों से कहीं भी नहीं देखे जा सकते। समस्त ज्ञानवाहक सूत्र और बात नाड़ियाँ यहीं से निकल कर सारे शरीर में फैलती हैं। सूत्रात्मा इसी भास्कर श्वेत दल कमल में बैठा हुआ चाहे जिस नाड़ी के माध्यम से शरीर के किसी भी अंग को आदेश-निर्देश और सन्देश भेजता ओर प्राप्त करता रहता है। वह किसी भी स्थान में हलचल पैदा कर सकता है किसी भी स्थान की बिना किसी बाध्य-उपकरण के सफाई ओर प्राणवर्धा आदि, जो हम सब नहीं कर सकते वह सब कुछ कर सकता है। यह सब ज्योति पुञ्जों के स्स्रण आकुंचन-प्रकुञ्चन आदि से होता है। नाक, जीभ, नेत्र, कर्ण, त्वचा इन सभी स्थूल इन्द्रियों को यह प्रकाश-गोलक ही काम कराते हैं और उन पर नियन्त्रण सहस्रारवासी परमात्मा का होता है। ध्यान की पूर्वावस्था में यह प्रकाश टिमटिमाते जुगनू चमकते तारे, चमकीली कलियाँ, मोमबत्ती, आधे या पूर्ण चन्द्रमा आदि के प्रकाश-सा झलकता है। धीरे-धीरे उनका दिव्य रूप प्रतिभासित होने लगता है उससे स्थूल इन्द्रियों की गतिविधियों में शिथिलता आने लगती है और आत्मा का कार्य-क्षेत्र सारे विश्व में प्रकाशित होने लगता है। सामान्य व्यक्ति को केवल अपने शरीर और सम्बन्धियों तक ही चिन्ता होती है उस पर योगी की व्यवस्था का क्षेत्र सारी पृथ्वी, और दूसरे लोकों तक फैल जाता है उसे यह भी देखना पड़ता है कि ग्रह-नक्षत्रों की क्रियायें भी तो असंतुलित नहीं हो रही। स्थूल रूप से इन गतिविधियों से पृथ्वी वासी भी प्रभावित होते रहते हैं इसलिये अनजाने में ही ऐसी ब्राह्मी स्थिति का साधक लोगों का केवल हित संपादित किया करता है। उसे जो अधिकार और सामर्थ्य मिली होती हैं वह इतने बड़े उत्तरदायित्व को संभालने की दृष्टि से ही होती है। वैसे वह भले ही शरीरधारी दिखाई दे पर उसे शरीर की सत्ता का बिलकुल ज्ञान नहीं होता। वह सब कुछ जानता, देखता, सुनता और आगे क्या होने वाला है वह सब पहचानता है।
विज्ञानमय कोष और मनोमय कोष के अध्यक्ष मन और बुद्धि यहीं रहते हैं और ज्ञानेन्द्रियों से परे दूर के या कहीं भी छिपे हुए पदार्थों के समाचार पहुँचाते रहते हैं। आत्म-संकल्प जब चित्त वाले क्षेत्र से बुद्धि क्षेत्र में पदार्पण करता है तब दिव्य दृष्टि बनती है और वह आज्ञा चक्र से निकल कर विश्व ब्रह्माण्ड में जो अनेक प्रकार की रश्मियाँ फैली हैं उनसे मिलकर किसी भी लोक के ज्ञान को प्राप्त कर लेती है। विद्युत तरंगों के माध्यम से जिस प्रकार दूर के अन्तरिक्ष यानों को पृथ्वी से ही दाहिने-बायें (ट्रीवर्स) किया जा सकता है। जिस प्रकार टेलीविजन के द्वारा कहीं का भी दृश्य देखा जा सकता है उसी प्रकार बुद्धि और संकल्प की रश्मियों से कहीं के भी दृश्य देखे जाना या किसी भी हलचल में हस्तक्षेप करना मनुष्य को भी सम्भव हो जाता है। मुण्डक और छान्दोग्य उपनिषदों में क्रमशः खण्ड 2 और 9 में इन साक्षात्कारों का विशद वर्णन है और कहा गया है-हिरण्यभये परेकोणे विरजं ब्रह्म निष्फलं, तच्छुत्रं ज्योतिषाँ ज्योति तद् परात्मनो बिदुः” अर्थात् आत्मज पुरुष इस हिरण्मयं कोष में शुभ्रतम ज्योति के रूप में उस कला रहित ब्रह्म का साक्षात्कार करते हैं।
धीरे-धीरे विज्ञान भी इन मान्यताओं पर पहुँचने लगा है। पाश्चात्य देशों में मस्तिष्क के अनेक आश्चर्यजनक तथ्यों की खोज की गई है। यद्यपि अभी उनकी जानकारी बहुत स्वल्प और सीमित है तथापि उससे भारतीय तत्त्व दर्शन की पुष्टि को बड़ा बल मिला है। लोग यह मानने लगे हैं कि मस्तिष्क में ऐसे तत्त्व हैं जो अधिक नहीं तो किसी भी पुस्तक के 20 अरब पृष्ठों से भी अधिक ज्ञान भण्डार अपने मस्तिष्क में सुरक्षित रख सकते हैं। एक व्यक्ति एक दिन में लगभग 50 लाख चित्र देखता है। चित्रों के साथ ही वह उनकी बनावट, रंग-रूप ध्वनि, सुगन्ध और मनोभावों का भी आकलन करता है। कुछ समय बाद वह चित्र और पढ़ा हुआ सब विस्तृत हो जाता है। हम केवल यह बातें याद रख पाते हैं जो या तो बहुत आकर्षक रहीं हो अथवा जिनसे अपने जीवन का कोई अंश या सम्पूर्ण जीवन बहुत तीव्रता से प्रभावित हुआ है। ऐसी अविस्मरणीय घटनाओं को छोड़ कर शेष सब भूल जाता है किन्तु ऐसा सोचना भारी भूल है। जिस तरह प्रभावी घटनाओं को हम सेकेण्डों में दोहरा लेते हैं उसी प्रकार मस्तिष्क के तहखानों में संगृहीत प्रति सेकेण्ड एक चित्र की दर से अब तक जो कुछ देख, सुन सके हैं उस सबको कभी भी किसी भी समय मस्तिष्क की पेटी से खोलकर ढूँढ़ा और उसी तरह रंग, वर्ण, सुगन्ध आदि के साथ देखा जा सकता है जिस तरह किसी समय देखा गया है।
इस दिशा में प्रसिद्ध अमरीकी डाक्टर बिल्डर पेनफील्ड ने उल्लेखनीय खोजें की हैं। उन्होंने मस्तिष्क की अनेक बात नाड़ियों की विद्युत इलेक्ट्रान छुआकर देखा कि कोई विशेष नस या नाड़ी उत्तेजित करने से विलक्षण याददाश्तें आती हैं। उन्होंने एक एक बार 9 वर्षीय लड़की पर प्रयोग किया। मस्तिष्क के एक भाग पर विद्युत आवेश देते ही वह एक घटना सुनाने लगी-मैं अपने भाइयों के साथ खेत में घूम रही थी। मेरे भाई मुझे चिढ़ाने के लिये खेत में छुप-छुप जाते। इस तरह मैं उनसे भटक गई तभी एक आदमी दिखाई दिया। कोई सपेरा था। उसने मुझे साँपों का थैला दिखाया तो मैं डर गई और भागकर हाँफते हुए घर पहुँची।”
जब डा.पेनफील्ड ने उस लड़की की माता से पूछा तो माता ने बताया कि सचमुच जब वह 3 वर्ष की थी तब ऐसी घटना घटी थी। आमतौर पर 3 वर्ष की बालिका को कोई घटनायें याद नहीं रहतीं पर इस प्रयोग ने यह सिद्ध कर दिया कि मनुष्य के मस्तिष्क में न जाने कितने जीवनों के संस्कार छिपे पड़े हैं और वह फिल्म की रील की तरह जाग्रत और स्वप्नावस्था में गूँजते रहते हैं।
यह घटना ऐसी थी जो केवल वर्तमान जीवन के ही अदृश्य भाग से सम्बन्धित थी पर एक बार उन्होंने एक लड़के पर जब ऐसा ही प्रयोग किया तो वह लड़का एक मधुर गीत गुनगुनाने लगा। वह गीत रिकार्ड पर लिया गया। यद्यपि उसे वह लड़का भी नहीं जानता था पर पीछे पता लगाने पर मालूम हुआ कि वह गीत किसी अन्य भाषा का अर्थयुक्त सुन्दर गीत था। इस घटना को मस्तिष्क की “सर्वज्ञता” शक्ति के रूप में भी लिया जा सकता है और पुनर्जन्म के भी रूप में। किसी भी रूप में ले सूत्रात्मा की अमरता या उनकी अक्षय शक्ति ही सिद्ध होती है। डा.पेनफील्ड ने अनेक ऐसे प्रयोग किये जो कर्मफल की भी पुष्टि करने में समर्थ हैं।
डा. पेनफील्ड के पास ऐसा रोगी आया जिसे मिर्गी आती थी। उसका आपरेशन करके उन्होंने देखा कि जब मिर्गी आती है तो एक विशेष नस ही उत्तेजित होती है उसे काटकर अलग कर दिया तो वह रोगी सदा के लिए अच्छा हो गया। बाद में पेनफील्ड ने बताया कि मस्तिष्क में कई अरब प्रोटीन-अणु पाये जाते हैं इन प्रोटीन-अणुओं में औसत आयु 70 वर्ष के लगभग सवा दो अरब सेकेण्ड होते हैं इन क्षणों में जागृत स्वप्न में वह जो कुछ देखता, सुनता और अनुभव करता है वह सब मस्तिष्क के कार्यालय में जमा रहता है और उसमें से किसी भी अंश को विज्ञान की मदद से पढ़ा जाना सम्भव है। मस्तिष्क के 10 अरब स्नायु नसों में अगणित आश्चर्य संगृहीत है उन सबकी विधिवत् जानकारी करने वाला कोई यन्त्र बना सका तो जीव किन-किन योनियों में कहाँ-कहाँ जन्म लेकर आया है और उसने कब क्या पाप, क्या पुण्य किया है उस सबकी जानकारी प्राप्त करना सम्भव हो जायेगा। उन सबकी याददाश्त दिलाने वाला सहस्रार में बैठा हुआ वह क्रिस्टल मात्र है जिसे हमारे धर्म ग्रन्थों में सूक्ष्मात्मा कहते हैं।
इस आचरण की पुष्टि के लिये हनावा होकाइशी (जापान) का एक उदाहरण दिया जा सकता है। 101 वर्ष की आयु में मरने वाले इस ज्ञान के अवतार का जन्म सन् 1722 में हुआ था और मृत्यु 1883 में। जब वह सात वर्ष का था विधाता ने उससे नेत्र-ज्योति छीन ली। उसने नेत्रहीन होकर भी ज्ञानार्जन की साधना आरम्भ की। उसने 40 हजार पुस्तकें पढ़ीं। कुछ ग्रन्थ तो उसे केवल एक बार ही सुनाये गये थे। उसके मस्तिष्क में ज्ञान का अनन्त भण्डार जमा हो गया। वह ऐसे उदाहरण प्रस्तुत कर देता था जो कभी औरों की कल्पना में भी न आते थे। अपने मित्रों के आग्रह पर उसने एक पुस्तक लिखी जो 2810 खण्डों में तैयार हुई। क्या इसे मस्तिष्क की साधारण शक्ति कहा जा सकता है?
असाधारण ज्ञान, असाधारण कार्य प्रणाली मस्तिष्क की विलक्षण रचना से जहाँ जीवात्मा के अनेक रहस्यों का ज्ञान होता है वहाँ उसकी दूर-दर्शन और इन्द्रियातीत ज्ञान के भी अनेक प्रमाण पाश्चात्य देशों में संकलित और संगृहीत किये गये है। “दि न्यू फ्रंटियर्स आफ माइन्ड” के लेखक श्री जे.पी. राइन ने दूर-दर्शन के तथ्यों का वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक दोनों तरह से अध्ययन किया और यह पाया कि कुछ मामलों में अभ्यास के द्वारा ऐसे प्रयोग 50 प्रतिशत से अधिक सत्य पाये गये जब कि स्वप्नों एवं मनोयोगों द्वारा भविष्य-दर्शन की अनेक घटनाओं को शत-प्रतिशत सत्य माना गया।
एक घटना का उल्लेख इस प्रकार है-मेरे पड़ोस में एक सज्जन रहते थे। एक रात उनकी धर्मपत्नी ने स्वप्न देखा कि उसका भाई जो वहाँ से काफी दूर एक गाँव में रहता था, अपने खलिहान जाता है। खलिहान पहुँच कर उसने घोड़ा-गाड़ी खोल दी। फिर न जाने क्या सोचकर भूसे के ऊपर बने स्थान पर चढ़ गया और वहीं खड़े होकर उसने पिस्तौल चलाकर आत्म-हत्या कर ली। गोली लगते ही भाई भूसे पर लुढ़क गया। इस स्वप्न से वह स्त्री इतनी घबड़ा गई कि उसने अपने पति से तुरन्त गाँव चलने को कह। वे सज्जन मेरे घर आये और मेरे पिताजी से घोड़ा-गाड़ी देने को कहा। पिताजी ने गाड़ी दे दी। वह स्त्री अपने पति को लेकर गाँव गई और लोगों के आश्चर्य का ठिकाना न रहा जब उन्होंने खलिहान में जाकर पाया कि उसके भाई की मृत्यु ठीक वैसे ही स्थान और परिस्थितियों में हुई पड़ी थी।
स्वप्नावस्था में हमारे शरीर के सारे क्रिया-कलाप अन्त-मुखी हो जाते हैं। उस समय भी मस्तिष्क जागृत अवस्था के समान ही क्रियाशील रहता है। यदि उस स्थिति में देखे हुए दृश्य सत्य हो सकते हैं तो यह मानना ही पड़ेगा कि आत्म-चेतना का भी अन्त नहीं होता वह एक सर्वव्यापी और अतीन्द्रिय तत्त्व है पर सम्पूर्ण तन्मात्राओं की अनुभूति उसे होती है।
उक्त घटना श्री राइन महोदय के एक प्रोफेसर द्वारा बताई गई जब वे स्नातक थे। बाद में वह लिखते हैं कि मैं जब पेन्सिलवानिया के पहाड़ों पर रहता था तो मुझे भी अनेक निर्देश और सन्देश इसी प्रकार अदृश्य शक्तियों द्वारा भेजे हुए मिलते थे। जब कभी किसी अपवित्र स्थान में चला जाता तब मुझे वैसी अनुभूतियाँ नहीं होती थीं इससे पता चलता है कि मस्तिष्क मानव-जीव की शुद्धता और पवित्रता की अपेक्षा में रहता है या यहीं उसका यथार्थ गुण है और जैसे-जैसे लोग इन गुणों के विपरीत बुराइयों और दुर्गुणों की गांठें मस्तिष्क में पैदा करते जाते हैं शक्तियों का ह्रास होने लगता है। मनुष्य की जड़ता के साथ तो वे बिलकुल समाप्त हो जाती है।
एक अन्य प्रोफेसर की धर्मपत्नी का भी इसी पुस्तक में उल्लेख है और यह बताया है कि वह जब अपनी एक सहेली के घर ब्रिज खेल रही थी तो उन्हें एकाएक ऐसे लगा जैसे उनकी बालिका किसी गहरे संकट में हो। उन्होंने बीच में ही उठकर टेलीफोन में घर से पूछना चाहा पर सहेली के आग्रह पर वे थोड़ी देर खेलती रहीं इस बीच उनकी मानसिक परेशानी काफी बढ़ जाने से वह बीच में ही छोड़ कर टेलीफोन पर गई और अपनी नौकरानी से पूछा- लड़की ठीक है? उसने थोड़ा रुककर कहा, हाँ ठीक है इसके बाद वे फिर खेल खेलने लगीं खेल समाप्त कर जब वे घर लौटी तो पता चला कि एक बड़ी दुर्घटना हो गई थी। उनकी लड़की पिता के साथ कार में आ रही थी वह खेलते खेलते शीशे के बाहर लटक गई और काफी सफर उसने उस भयानक स्थिति में पार किया। जब एक पुलिस वाले ने गाड़ी रोकी तब पता चला कि लड़की मजबूती से कार की दीवार पकड़े न रहती तो किसी भी स्थान पर वह कार से कुचल कर मर गई होती। नौकरानी ने कहा चूँकि बच्ची सकुशल थी इसलिये आपको परेशानी से बचाने के लिये झूठ बोलना पड़ा। यह घटनायें यह बताती हैं कि मस्तिष्क में वह तत्त्व हैं जो जीवात्मा की अमरता, शुद्धता और सर्वव्यापकता से सम्बन्धित हैं। योग प्रणाली द्वारा रूस के विकास का एक निश्चित विधान भारतीय योग शास्त्रों में है पर जो उन कठिनाइयों में प्रवेश नहीं कर सकते वह भी भगवान् के ध्यान और आत्मिक पवित्रता बढ़ाकर सूत्रात्मा के इन गुणों को विकसित कर सकते हैं।
विज्ञान ने अब इतनी प्रगति कर ली है कि वह भौतिकवादी मान्यताओं को पीछे छोड़कर आध्यात्मिक तत्त्वों के अनुसन्धान और अनुशीलन की कक्षा में जा पहुँचा है। अलबर्ट आइन्स्टीन का सापेक्षवाद (थ्योरी आफ रिलेटिविटी) इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है और उससे यह ज्ञात होता है कि वैज्ञानिक भी जिस अन्तिम सत्य की जानकारी के लिये बेचैन हैं, उसके लिये उन्हें पदार्थ की भौतिकीय जानकारी (फि लीकल नालेज आफ एलेमेनट्स) से हटकर चतुष्दिमतीय (फोर डाइमेन्शनल) अथवा उससे भी अधिक विमतीय (मल्टी डाइमेन्शनल) संसार और तथ्यों का अध्ययन करना आवश्यक होगा।
डाइमेन्शन का अर्थ है आकार। आकार में जितनी बातें सम्मिलित हों, उतने ही डाइमेन्शन की वह वस्तु होगी। सरल या सीधी रेखा जिसमें केवल लम्बाई होती है एक विमतीय (वन डाइमेन्शन), आयत (रेक्टंन्गिल) जिसमें लम्बाई और चौड़ाई होती है द्विविमतीय (टू हाडमेन्शन) और इसी प्रकार कोई ठोस (सालिड) वस्तु लें तो उसमें लम्बाई-चौड़ाई और ऊँचाई (बी डाइमेन्शन्स) होंगे। संसार के जितने भी पदार्थ हैं, वह इन्हीं तीन प्रकार के आकारों के अंतर्गत आते हैं। हमारे पास जो भी वस्तुएँ हैं, वह इन्हीं तक सीमित हैं, इसलिये भौतिक विज्ञान जब भी किन्हीं वस्तुओं का अध्ययन करता है, वह इसी सीमा की जानकारी दे पाता है।
लेकिन अलबर्ट आइन्स्टीन ने बताया कि यह गलत है। जब तक हम एक और चौथे डाइमेन्शन समय (टाइम) की कल्पना नहीं करते, तब तक वस्तुओं के स्वरूप को अच्छी प्रकार समझ नहीं सकते। सभी पदार्थ समय की सीमा से बँधे हैं, अर्थात् हर वस्तु का समय भी निर्धारित है, उसके बाद या तो वह अपना रूपान्तर कर देता है या नष्ट हो जाता है। मनुष्य शरीर भी एक दिन नष्ट हो जाता है, फिर वस्तुओं के बारे में तो कहना ही क्या? मनुष्य धोखे में रहता है कि यह वस्तु मेरी है, इस पर मेरा अधिकार है, इसका मैं उपभोग करूँगा, यह मेरे काम की है, इसका उपार्जन मैंने किया है पर यदि इस चौथे डाइमेन्शन को ध्यान में रखकर विचार करें तो पता चलेगा कि जिन वस्तुओं को हम अपना कहते हैं, वह न अपनी हैं और न किसी दूसरे की, सब प्राकृतिक परमाणुओं से बनी आकृतियाँ मात्र हैं। उनका कोई निश्चित स्वरूप नहीं। समय की मर्यादा में बँधे परमाणु जब टूट-टूटकर अलग हो जाते हैं तो वस्तु का अस्तित्व ही समाप्त हो जाता है। इस तरह पानी के बुलबुले के समान संसार बनता और बिगड़ता रहता है। स्थिर-तत्त्व तो कुछ और ही है।
आइन्स्टीन का सम्पूर्ण सापेक्षवाद का सिद्धान्त (थ्योरी आफ रिलेटिविटी) इसी तथ्य को समझना है। आज वैज्ञानिकों, भौतिकवादी शिक्षितों ओर पाश्चात्य देशों के निवासियों तक को इस सापेक्षवाद के सिद्धान्त ने उलझन में डाल रखा है। बड़े-बड़े डिफरैन्शियल केलकुलस (एक प्रकार की गणित) और थाइनामियल जैसी थ्योरम [थह बीजगणित की एक लम्बे पृष्ठों में हल होने वाला समीकरण (इक्वेशन) है जो समझ लेना आसान समझा जाता है, किन्तु आइन्स्टीन के सापेक्षवाद (थ्योरी आफ रिलेटिविटी) की भावानुभूति (कान्सेप्ट) को समझना दुस्तर हो रहा है। कारण कि वह संसार, साँसारिक परिस्थितियों प्रकृति और मानवीय चेतना का एक ऐसा अध्ययन (स्टडी) है, जो मनुष्य को संसार की यथार्थता से अवगत कराती है और उसे जीवन के प्रति एक नये प्रकार का दृष्टिकोण अपनाने की सम्मति प्रदान करती है, जिसमें प्रकृति ही प्रकृति, पदार्थ ही पदार्थ नहीं वरन् एक परम तत्त्व (एब्सोल्यूट एलीमेण्ट) भी है, जिसके जानने से ही संसार की वास्तविकता का पता लगाया जा सकता है। भारतीय अध्यात्म विज्ञान उसे ही ईश्वर, परमात्मा परमगति और संसार की सर्वोच्च सत्ता मानता है। दोनों सिद्धान्त एक स्थान पर मिल रहे हैं, केवल नाम और अनुभूति के तरीके (वे आफ कान्सेप्शन) में अन्तर है।
संसार में जितने भी पदार्थ हैं, वह 1. समय (टाइम) 2. स्थान (स्पेस), 3. गति (मोशन), 4. कारण काज-इन चार के ही अंतर्गत है। हम समय की सीमा में बँधे हैं। अर्थात् हमारा एक निश्चित समय है, अधिकतम अपनी आयु भर के अन्दर की वस्तुएँ सोचते विचारते हैं न तो जन्म से पहले की कल्पना है और मृत्यु के बाद की इसलिये जो कुछ भी करते हैं, उसका सीधा सम्बन्ध इस समय से ही होता है। उसके बाहर का कोई भी संसार हमारे मस्तिष्क में नहीं आता।
होना यह चाहिये कि हम परम समय (एब्सोल्यूट टाइम) को ध्यान में रखकर ही अपने क्रियाकलाप निर्धारित करें। भारतीय आचार्यों ने आचार संहिता तैयार करते समय इस बात को ध्यान में रखा था और ऐसी व्यवस्था की थी कि मनुष्य पूजा, उपासना, संयम, सेवा, सदाचार का पालन करता हुआ अपने भौतिक कर्तव्य पूरे करे, ताकि आत्म-शक्तियों का ह्रास न हो। शक्ति को विघटित कर देने से मनुष्य इस जीवन में भी दुःखी होता है और यह निम्नगामी योनियों की ओर आकर्षित हो जाता है। बढ़ी हुई शक्ति चाहे वह शारीरिक हो, मानसिक, बौद्धिक अथवा आत्मिक उससे यह जीवन तो सफल होता ही है, उस परम स्थिति को प्राप्त करने से मूल लाभ मिलता है। इस विज्ञता का ही परिणाम है कि भारतीय जीवन शैली आज भी अपने ही ढंग की है। उसमें पाश्चात्य ढंग के विकारों के लिये कोई स्थान नहीं है।
‘समय’ की तरह ही हम ‘देश’ से भी बँधे हैं। अब जब विज्ञान और समाज-शास्त्र ने इतनी उन्नति कर ली है कि सारी पृथ्वी एक परिवार की तरह हो गई है और हमारी प्रत्येक क्रिया का प्रभाव सारे विश्व में पड़ता है। अब हम सम्पूर्ण पृथ्वी की घटनाओं और हलचलों के बारे में विचारते हैं पर इससे पहले का मनुष्य अधिक से अधिक अपने देश तक की बात सोच पाता था, क्योंकि उसके लिये संसार उतने ही देश (स्पेस) में बँधा था। कोई समय ऐसा भी रहा होगा, जब उसका यह विस्तार का संसार और भी छोटा रहा होगा। आज तो मनुष्य स्वार्थी नहीं रह सकता, उसे विवश होकर संसार के और लोगों के हित पर ध्यान देना अनिवार्य हो गया है, पर पहले उसके कर्तव्य की सीमा बहुत छोटी थी। सापेक्षवाद के चार अनुभागों (फैक्टर्स) में दूसरा देश या स्थान (स्पेस) हमें यह बताता है कि हम जितने संसार से परिचित हैं, उतने से ही अपने कर्तव्य से जुड़े रहते हैं और उतने लोगों की भलाई या बुराई को ध्यान में रखकर काम करते हैं।
एक अन्य तथ्य यह है कि हम ‘गति’ के नियमों से भी बँधे हुए हैं। प्रकृति के सभी परमाणु क्रियाशील हैं, छोटे छोटे टीले बढ़कर पहाड़ बन जाते हैं और छोटी-छोटी नालियाँ नदियाँ, गड्ढे तालाब बन जाते हैं और पौधे विशालकाय वृक्ष। हमारी पृथ्वी में जलवायु और दिन-रात सम्बन्धी परिवर्तन भी गति (मोशन) के ही परिणाम स्वरूप हैं, प्राकृतिक गतिशीलता से हम स्वयं भी प्रभावित होते हैं। ऐसा कोई भी पदार्थ और प्राणी इस धरती पर नहीं है जो इन परिवर्तनों से प्रभावित न होता हो। हमारे सुख-दुःख भी इनसे जुड़े हुए हैं, कभी-कभी परिवर्तन हमारी इच्छाओं के अनुरूप होते हैं तो हमें सुख मिलता है और कभी-कभी प्रतिकूल होने से हमें दुःख और कष्ट का अनुभव होने लगता है, तात्पर्य यह कि गति (मोशन) हमारे भौतिक जीवन को ही नहीं चेतन विचार और भावनाओं को भी प्रभावित करता है।
आज हम जिस स्थिति में हैं, वह अनेक घटनाओं का क्रम-बद्ध इतिहास होता है। इसे ही कारण (कांजेशन) कहते हैं, जो आइन्स्टीन के सापेक्षवाद सिद्धान्त। थ्योरी आफ रिलेटिविटी का चौथा तत्त्व (फैक्टर) है। हमारा जन्म स्वयं भी कारण के विकास को प्रतिक्रिया है। इसी प्रकार संसार में जो कुछ भी है, वह पूर्व से घटनाबद्ध है कोई भी प्रभाव या परिणाम कारण (कांजेशन) के बिना सम्भव नहीं है।
यह चार बातें हैं, जो हमारे जीवन को घेरे हुये हैं, हम समय, स्थान, गति और कारण (टाइम, स्पेस, मोशन एण्ड कांजेशन) से बँधे हुए हैं। इन चार से अतिरिक्त और कोई बात हम सोच भी नहीं सकते। सही बात तो यह है कि हमारे विचार इन चार बातों में इतना आसक्त हो गये हैं कि हम इससे आगे की कोई बात सोच ही नहीं पाते। इन चारों की जो जितनी कम मात्रा से बँधा रहता है, वह उतना ही स्वार्थी, संकीर्ण और भोगवादी होता है। जो व्यक्ति केवल वर्तमान की ही बात सोचता है, भूत और भविष्य के निष्कर्षों का लाभ नहीं लेता, वही पाप और स्वार्थपूर्ण प्रवृत्तियों को स्वयं भी करता है और दूसरों को भी प्रोत्साहित करता है। इसी प्रकार जो केवल अपने शरीर या अधिक से अधिक अपने परिवार के ही हित की बात सोचता, उसके भी कार्य संकीर्ण और दुःखद होते हैं। विकास सम्बन्धी अवस्था को भी जो बहुत छोटी सीमा में मानते हैं और भौतिक जगत् में होने वाली गतिविधियों में किसी दूरवर्ती कारण को नहीं देखते वह गलत लक्ष्य बनाते या अधिक से अधिक अपने स्वार्थ की बात सोचते हैं। संकीर्णता की यह मनोवृत्ति ही संसार में दुःख का कारण है। इसी का नाम माया था कहा गया है। “तू मैं और तोर से माया। स्ववश कीन्ह जिन्ह विश्व निकाया॥” अर्थात् मैं और मेरे, तू और तेरे का संकीर्णता ने ही मनुष्य को भौतिक बन्धनों में बाँध लिया है, इसी का नाम आया है।
मानवीय चेतना और मानवीय लक्ष्य का विस्तृत अध्ययन चिन्तन और मनन करने के बाद आइन्स्टीन को भी कहना ही पड़ा कि मनुष्य का इस प्रकार समय, स्थान या देश, गति और कारण (टाइम, स्पेस, मोशन, एण्ड कांजेशन) की संकीर्णता में बँधना उसकी भयंकर भूल है। उन्होंने बताया कि वह सम्पूर्ण चीजें हैं ही नहीं। संसार में न तो समय का कोई अस्तित्व है, न स्थान का, न गति का और नहीं किसी कारण या परिणाम का। यह चारों मस्तिष्क की उपज है और हम जब तक इनसे प्रतिबन्धित है, तब तक अन्तिम सत्य (एब्सोल्यूट) की अनुभूति नहीं कर सकते। अन्तिम सत्य वह है, जो इन चारों से बँधकर नहीं इनको बाँधकर रखता है। जो स्वयं इनसे प्रभावित नहीं होता वरन् इन्हें प्रभावित करता है। उन्होंने बताया जो भी है जैसा भी है, मस्तिष्क इन चारों से ऊपर का एक बहुविमतीय (मल्टी डाइमेन्शन) तत्त्व है, उसे इन चारों चीजों से मुक्त कर दिया जाये तो परम स्थिति (एब्सोल्यूट स्टेज) को अच्छी तरह जाना जा सकता है। वही संसार का अन्तिम सत्य, परमात्मा, परमपद, मोक्ष या स्वर्ग और मुक्ति की स्थिति है।
इतने भारी दृश्य संसार को मिथ्या कह देना एक वैज्ञानिक के लिये साधारण बात नहीं थी। उन्हें सापेक्षवाद के सिद्धान्त पर ‘नोबुल पुरस्कार’ प्रदान किया गया था, इसलिये जो लोग इस सिद्धान्त की गहराई के नहीं समझ सके, उनका प्रश्नों पर प्रश्न करना स्वाभाविक था। आइन्स्टीन से पूछा गया तब फिर यह जो समय और पदार्थों की हमें अनुभूति होती है, दिखाई देते हैं, यह सब क्या है? उसने उत्तर दिया माया-अर्थात् सापेक्षता (रिलेटिविटी) हमने अनुभव कर लिया है कि सूर्योदय से सूर्यास्त तक का समय 24 घण्टे का होता है। समय कोई भौतिक पदार्थ नहीं है, यह तो दो घटनाओं के बीच की अवधि की माप (मेजरमेन्ट्स) है, जो कभी सत्य नहीं हो सकता, क्योंकि यदि आप चंद्रमा पर बैठे हों एक बार सूर्य के उदय होने और उसके अस्त होने में 12&7=84 घन्टे लग जाते हैं। 84 घण्टों को यदि 60 मिनट से एक घन्टे से बाँटे तो वहाँ का दिन 100 घन्टे से भी बड़ा होगा इसलिये समय कोई स्थिर या शाश्वत वस्तु नहीं है। हम सृष्टि जहाँ से प्रारम्भ हुई है। वहाँ से लेकर सृष्टि जहाँ समाप्त होगी, वहाँ तक की समय की ईकाई क्यों न मानें? क्योंकि अन्तिम सत्य तो यही दो घटनायें होंगी। हमारे जन्म से मृत्यु तक का समय इसी विशाल समय की सापेक्षता (रिलेटिविटी) ही तो है। इसलिये जब तक हम उस अन्तिम समय (एब्सोल्यूट टाइम) को नहीं जान लेते, समय सम्बन्धी सारे माप (मेजरमेन्ट्स) और उनको प्रभावित करने वाले कार्य सब गलत है।
इस दृष्टि से केवल वही कार्य और कर्तव्य हमारे लिये सच्चे होते हैं, जो समय की इस परमगति को प्रभावित करते हैं, शेष सभी कार्य चाहें उसने खाना, पहनना, चलना, उठना-बैठना भी क्यों न सम्मिलित हो गलत भ्रम है, यह कार्य वैसे दोनों ही परिस्थितियों में उभयनिष्ठ रहते हैं, इसलिये हम अपने जीवन में उन्हीं कार्यों को शुद्ध और यथार्थ मानते हैं, जिनसे हमें परम-काल गति की अनुभूति में सहायता मिलती है। केवल भौतिक सुख के लिये किये गये सभी कार्य व्यर्थ है, उसमें हमारा चाहे कितना ही अधिक श्रम, बुद्धि कौशल, साधन क्यों न प्रयुक्त हो रहा हो।
हमारे लिये कोई भी स्थान सत्य नहीं है। हमारे द्वारा वस्तुओं को पहचानने के अतिरिक्त स्थान का कोई अर्थ ही नहीं है। जिस प्रकार समय अनुभव के अतिरिक्त कुछ नहीं था। उसी तरह देश या ब्रह्माण्ड (स्पेस) हमारे मस्तिष्क द्वारा उत्पन्न काल्पनिक वस्तु के अतिरिक्त कुछ नहीं है। वस्तुओं को समझने तथा उनकी व्यवस्था (अरेन्जमेन्ट) जानने में सहायता मिलती है, इसलिये स्थान (स्पेस) को कल्पना को हम सत्य मान लेते हैं, अन्यथा स्थान कुछ निश्चित तरीके के परमाणुओं के अतिरिक्त और है भी क्या? परमाणु भी इलेक्ट्रान्समय होते हैं, इलेक्ट्रान एक प्रकार की ऊर्जा निकालता रहता है, जो तरंग रूप (वेविकल फार्म) में होता है। जिन वस्तुओं के इलेक्ट्रान जितने मन्द गति के हो गये हैं, वह उतने ही स्थूल दिखाई देते हैं। यह हमारे मस्तिष्क की देखने की स्थिति पर निर्भर करता है, यदि हम पृथ्वी को छोड़कर किसी सूर्य जैसे ग्रह में बैठे हों तो पृथ्वी एक प्रकार के विकिरण (रेडिएशन) के अतिरिक्त और कुछ न दिखाई देगी। इसलिये देश या ब्रह्माण्ड भी वस्तुओं की संरचना का अपेक्षित (रिलेटिव) रूप है। उसकी यथार्थता भी परम अवस्था (एब्सोल्यूट स्टेज) पर ही हो सकती है।
यदि हमारे आकाश में और कोई सूर्य, चन्द्रमा और सितारे नहीं होते, तब क्या हम कह सकते थे कि पृथ्वी एक सेकेण्ड में 18 मील प्रति घन्टे की गति से दौड़ रही है। गति (मोशन) का ज्ञान भी हमारी सापेक्ष बुद्धि (रिलेटिव सेन्स) का ही परिणाम है। अभी हम कहते हैं कि यह हमारा कमरा स्थिर है। ऐसा कहने का हमें इसलिये अधिकार है कि पृथ्वी के साथ हमारा कमरा ही नहीं घूमता हम भी घूमते हैं, यदि एक स्टेशन पर दो गाड़ियाँ समान गति से एक ही दिशा में दौड़ रहीं हों तो दोनों गाड़ियों के सवार अपने आपको स्थिर अनुभव करेंगे। यदि एक गाड़ी 45 मील प्रति घण्टा की गति से पूर्व को जा रही हो और दूसरी 45 मील प्रति घण्टा पश्चिम की ओर तो दोनों गाड़ियाँ जिस स्थान पर साथ-साथ होंगी (विल कम ए क्रस) वहीं एक दूसरे की गति 90 मील प्रति घंटा अनुभव करेंगी। इससे यह सिद्ध होता है कि गति भी एक परम गति (एब्सोल्यूट मोशन) की सापेक्ष (रिलेटिव) है, उसमें भी कोई अन्तिम सत्य नहीं है। सौर-मण्डल की तुलना में पृथ्वी की गति 18 मील प्रति सेकेण्ड की समझ में आती है पर यदि हम गैलेक्सी (तारा संसार) के किसी अन्य तारे में बैठकर देख (आर्ब्जव) रहे हों तो यह गति कुछ और हो, तो या तो बहुत धीमी या बहुत तीव्र नजर आ रही होगी। इस तरह गति सम्बन्धी हमारी भौतिक मान्यतायें सही नहीं हैं।
पदार्थों के कारण (कांजेशन) के सम्बन्ध में भी हम पूर्ण सापेक्ष हैं। थोड़े से तत्त्व चाहे उन्हें पृथ्वी, जल, आकाश, अग्नि ओर वायु कहें अथवा हाइड्रोजन, आक्सीजन सल्फर, जिंक, कोबाल्ट, एसिड कहें, इन्हीं से मिल-जुलकर भौतिक पदार्थों का बनना, बिगड़ना जारी रहता है। हमारे कोई भी कार्बोनिक (आर्गेनिक) तथा अकार्बनिक (इनार्गेनिक) पदार्थ इन तत्त्वों की परस्पर रासायनिक क्रिया (केमिकल एक्शन) का ही परिणाम होते हैं। परन्तु जब हम पदार्थ के अन्तिम टुकड़े परमाणु की संरचना, जो कि रासायनिक क्रिया (केमिकल एक्शन) में भाग लेता है, पर विचार करते हैं तो पाते हैं कि सम्पूर्ण पदार्थों में आवेश (इलेक्ट्रान) का अन्तर है अन्यथा मूलभूत तत्त्व (एब्सोल्यूट एलीमेण्ट) कोई और ही है। एक पदार्थ का दूसरे पदार्थ में परिवर्तन आवेश की मुक्ति (चेन्ज आफ इलेक्ट्रान) के कारण होता है। पदार्थ शक्तियों के परिवर्तित रूप हैं, इसी प्रकार शक्तियों (इनर्जीस) की भी एक अन्तिम स्थिति (एब्सोल्यूट पोजीशन) होनी चाहिये। इसका आभास प्रकाश की क्वाण्टम थ्योरी से होता है। अर्थात् संसार का कारण भी भौतिक नहीं कोई परम (एब्सोल्यूट)
तत्त्व ही है। उस परम अवस्था (एब्सोल्यूट स्टेज) को कैसे अनुभव करें, जब आइन्स्टीन से यह प्रश्न किया गया तो उसने कहा हम समय, स्थान, गति और कारण (टाइम, स्पेस, मोशन एण्ड कांजेशन) की सापेक्ष अवस्था (रिलेटिविटी) से यदि अपने मस्तिष्क को ऊपर उठा दें तो परम अवस्था की अनुभूति कर सकते हैं। हमारी सापेक्ष अवस्था की अनुभूति ही माया या भौतिकवाद है, यदि हम इन चारों से ऊपर उठकर संसार का अनुभव करें तो अन्तिम सत्य या भगवान् की अनुभूति कर सकते हैं। सापेक्षवाद के सिद्धान्त का यही संक्षेप में सार और निष्कर्ष है।
(प. श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा लिखित और युग-निर्माण योजना मथुरा द्वारा प्रकाशित)
(‘आलस्य छोड़िये परिश्रमी बनिये’ पुस्तिका का एक अंश)
छोटे से बीज में वृक्ष की सारी विशालता सूक्ष्म रूप से छिपी रहती है। उसी प्रकार मानव-जीवन की महान् सम्भावनायें उसकी श्रमशीलता में छिपी हुई है। अगणित विभूतियाँ, समृद्धियाँ सफलता और महान् सम्भावनायें मानव-जीवन में सन्निहित हैं पर सभी सूक्ष्म रूप में पड़ी हैं, उन्हें जगाने के लिए श्रमशीलता की आवश्यकता है। जिन्हें परिश्रम से प्रेम है, जो मेहनत करने में-व्यस्त रहने में, रस लेता है, वह किसी भी दिशा में आशाजनक प्रगति कर सकता है। जिसने परिश्रम से जी चुराया उसके लिए प्रगति का हर द्वार बन्द होता चला जाएगा आलस्य और दुर्भाग्य एक ही वस्तु के दो नाम हैं। जो आलसी है, न श्रम का महत्व समझता है, न समय का मूल्य ऐसे मनुष्य को कोई सफलता नहीं मिल सकती। सौभाग्य का पुरस्कार उनके लिए सुरक्षित है, जो उसका मूल्य चुकाने के लिये तत्पर हैं। यह मूल्य कठोर श्रम के रूप में चुकाना पड़ता है। समय ही भगवान् की दी हुई सम्पदा है। हमारी हर श्वाँस बड़ी मूल्यवान् है। यदि प्रस्तुत क्षणों का ठीक तरह उपयोग करते रहा जाय तो बूँद-बूँद से घट भरने की तरह अगणित सफलतायें और समृद्धियाँ अनायास ही इकट्ठी होने लगेंगी। पर यदि समय की आलस्य में व्यर्थ गँवाते रहा गया तो फूटे बर्तन में से बूँद-बूँद करके टपकने वाले दूध की जैसी दुर्गति होगी, हम सुख-सुविधाओं ओर सम्पदाओं से वंचित होते चले जायेंगे और केवल दरिद्रता और दुर्भाग्य भरा पश्चाताप हाथ रह जाएगा विजयलक्ष्मी केवल पुरुषार्थी का वरण करती है। आलसी का भविष्य तो दुर्भाग्य का रोना रोने के लिये है।
भगवान् ने मनुष्य जीवन में असंख्य महान् सम्भावनाओं का समावेश किया है। हर क्षेत्र में सफलता प्राप्त करने की सुविधा प्रस्तुत की है पर साथ ही यह भी नियन्त्रण रखा है कि उन विभूतियों का लाभ सत्पात्र ही उपलब्ध करें। कुपात्रों के हाथ में जाने पर हर वस्तु का दुरुपयोग होता है। सफलतायें और समृद्धियाँ कुपात्र के हाथ में चली जायें तो देर तक टिकेगी नहीं, जितनी देर टिकेगी, उसे दुर्व्यसनों और उद्धत आचरणों के लिए प्रेरित करेंगी। किसी वस्तु का लाभ तो सदुपयोग करने वाला ही उठा सकता है। सदुपयोग करने की क्षमता सत्पात्र में होती है। इसलिए सफलतायें सत्पात्र के लिए सुरक्षित है। और सत्पात्रता का पहला चिह्न है-श्रमशीलता कई अनैतिक और असदाचारी भी सफलतायें प्राप्त कर लेते हैं, भले ही पीछे उन्हें कुमार्गगामिता का दण्ड भुगतना पड़े पर संसार में एक भी उदाहरण ऐसा न मिलेगा, जिसमें परिश्रम के बिना बड़ी सफलतायें प्राप्त की गई हों। इसलिये सद्गुणों की पंक्ति में नैतिकता से भी पहला नम्बर श्रमशीलता का आता है।
जिन्हें अपना भविष्य उज्ज्वल बनाने में दिलचस्पी हो, जिन्हें कुछ महत्त्वपूर्ण सफलतायें पानी हों, उन्हें कठोर परिश्रम करने की आदत डालनी चाहिये और समय के एक-एक क्षण को व्यस्त रखने के लिए तत्पर रहना चाहिये। यह अभ्यास क्रमशः प्रगति पथ पर अग्रसर करता चला जाएगा और एक दिन उन्नति के उच्च शिखर तक जा पहुँचने की सम्भावनायें मूर्तिमान् होकर सामने आ उपस्थित होंगी। प्रगतिशील राष्ट्रों के नागरिक घोर परिश्रमी होते हैं। जिन समाजों ने अपना वर्चस्व प्रतिपादित किया है, उनका जातीय गुण कठोर श्रम करने में रस लेता रहा है। जिन व्यक्तियों ने उत्कर्ष किया है, उनने अपना एक-एक क्षण कड़ी मेहनत के साथ गुजारा है।
आलसी का भविष्य अन्धकारपूर्ण है। जिसे श्रम करने में रुचि नहीं जो मेहनत से डरता है, आराम-तलबी जिसे पसन्द हैं, जो समय को ज्यों-त्यों करके अस्त-व्यस्त करता रहता है, समझना चाहिये, दुर्भाग्य इसके पीछे लग गया। यह कुछ उपलब्धियाँ प्राप्त कर सकना तो दूर यदि संयोगवश उत्तराधिकार में कुछ मिल गया है तो उसे भी स्थिर न रख सकेगा। कहते हैं-लक्ष्मी आलसी के घर नहीं रहती। सुना जाता है कि दारिद्रय वहाँ घोंसला बनाता है, जहाँ आलस्य की सघनता छाई रहती है।
संसार में अनेक महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों ने अनेक महान् सफलतायें सम्पादित की हैं। उनमें मूलतः कोई विशेषता एवं प्रतिभा न थी। सामान्य मनुष्यों जैसा ही शरीर और मन उनका भी था, पर गुण उन्होंने अपने में उत्पन्न किया, श्रम में रस लेना और निरन्तर मेहनत में संलग्न रहना, बस इस एक गुण ने ही उनकी प्रतिभा का निखारा, अनेक सद्गुण पैदा किये और विद्या-बुद्धि धन, अनुभव, स्वास्थ्य, सहयोग एवं सुविधा साधनों से उन्हें भर-पूर बना दिया। जिस काम को भी हम मेहनत-लगन और दिलचस्पी के साथ हाथ में लेते हैं, वह चमकने लगता है। जिसे बेगार भुगतने की तरह आधे मन से करते हैं, वह बिगड़ता और घटिया होता है। काम का ऊँचा स्तर प्रस्तुत प्रयोजन को ही सिद्ध नहीं करता वरन् कर्ता का स्तर भी ऊँचा उठाता है। यही प्रगति का रहस्य है। जो आगे बढ़ना चाहता हो, ऊँचा उठना चाहता हो, उसे यह गुरु मन्त्र गाँठ बाँध लेना चाहिये कि “निरन्तर कठोर श्रम करने में कस लिया जाय और एक क्षण भी व्यर्थ बर्बाद न किया जाय”
आराम की ऐसी जिन्दगी जिसमें कुछ काम न करना पड़े, केवल निर्जीव, निरुद्देश्य और निकम्मे लोगों को रुचिकर हो सकती है। वे ही उसे सौभाग्य गिन सकते हैं। प्रगतिशील महत्त्वाकाँक्षी लोगों की दृष्टि में तो यह एक मानसिक रुग्णता मात्र है। जिसके कारण व्यक्ति का भाग्य, भविष्य बल और वर्चस्व निरन्तर घटता ही जाता है। अपने देश का दुर्भाग्य श्रम के प्रति उपेक्षा करने की दुष्प्रवृत्ति के साथ आरम्भ हुआ है और वह तब तक बना ही रहेगा, जब तक कि हम प्रगतिशील लोगों की तरह परिश्रम के प्रति प्रगाढ़ आस्था उत्पन्न न करेंगे।
अपने यहाँ लड़कियाँ वे सुखी मानी जाती हैं, जिन्हें हाथ से कुछ काम न करना पड़े। नौकर-नौकरानी सब काम किया करें और उन्हें आराम के साथ दिन गुजारने का अवसर मिले। ऐसी महिलायें सदा शारीरिक और मानसिक दृष्टि से रुग्ण ही बनी रहेंगी। प्रसव के समय उन्हें बहुत कष्ट सहना पड़ेगा। आये दिन जुकाम बदहजमी, सिरदर्द आदि दूसरी किस्म की बीमारियाँ घेरे रहेंगी। डाक्टरों के महँगे बिल चुकाने पड़ेंगे और इञ्जेक्शनों के दर्द दण्ड सहने पड़ेंगे। श्रमशील महिलायें निरोग रहती और स्वस्थ एवं दीर्घजीवी सन्तानें उत्पन्न करती हैं। आराम तलबी को भ्रमवश सौभाग्य भले ही मान लिया जाय, अन्ततः वह गरीब मजदूरों के पल्ले पड़ने वाले असुविधाओं से भी अधिक महँगा पड़ता है।
अपने यहाँ रईस, अमीर, सन्त, महन्त, विद्वान्, कलाकार अक्सर शारीरिक श्रम से बचना चाहते हैं, फलतः वे रुग्ण बने रहते हैं और प्रस्तुत प्रतिभा से जो अपना और दूसरों का हित साधन कर सकते थे, नहीं कर पाते। धोबी, मोची, राज, मजूर, चमार, कुम्हार श्रमजीवी वर्ग को अपने यहाँ नीच समझा जाता है। मेहनत करने वाले नीच आराम तलब ऊँच। इस मान्यता ने हमारे समाज में हरामखोरी को प्रोत्साहन दिया। फलस्वरूप हम दरिद्र होते चले गये। दूसरी ओर रूस, ब्रिटेन, जापान और अमेरिका आदि समृद्ध देशों के नागरिकों में कठोर श्रम में भारी अभिरुचि लेने की प्रवृत्ति को देखते हैं तो सहज ही यह पता चल जाता है कि उनकी समृद्धियों और सफलताओं का कारण क्या है। हालैण्ड, डेनमार्क, यूगोस्लाविया आदि कितने ही देशों की समृद्धि वहाँ के महिला वर्ग की श्रमशीलता पर ही निर्भर है। हमें भी यदि वर्तमान अज्ञान और दरिद्रता के दुःखदायी चंगुल से छूटना हो तो देश के हर नागरिक में कठोर श्रम करने की-आलस्य से घृणा करने की और समय का एक क्षण भी व्यर्थ न गँवाने की प्रवृत्ति उत्पन्न करनी चाहिये।
हम विद्या से वंचित इसलिए नहीं रहते कि अमुक साधन नहीं। अशिक्षा का एकमात्र कारण इस ओर बढ़ती जाने वाली उपेक्षा है। कोई व्यक्ति यदि एक-दो घण्टा भी नियमित रूप से अध्ययन में लगाता रहे तो कुछ ही दिनों में अच्छा विद्वान् बन जाएगा परिश्रमी मनुष्य भूखा-नंगा नहीं रह सकता। उपार्जन के अनेक द्वार उद्यमी के लिए खुले रहते हैं। जो मेहनत करेगा, निरोग रहेगा। बेकार पड़े हुए चाकू को जंग खा जाती है पर जो काम में आता रहता है, उसकी जिन्दगी बढ़ती है। तलवार वही तेज रहती और चमकती है, जो शान के पत्थर पर घिसी जाती है। हीरा खराद पर चढ़कर कीमती बनता है। मकान की गरिमा भी मेहनत की खराद पर चढ़ने के बाद ही चमकती है। जिसे चमकना हो-जीवन का वास्तविक आनन्द लेना हो उसे चाहिये कि तन्मयता, तत्परता और मनोयोग पूर्वक सामने प्रस्तुत कार्यों को पूरी मेहनत और दिलचस्पी के साथ करना सीखें।
‘खाली मस्तिष्क शैतान की दुकान’ की कहावत सोलह आने सच है। जो फालतू बैठा रहेगा उसके मस्तिष्क में अनावश्यक और अवांछनीय बातें घूमती रहेंगी और कुछ न कुछ अनुचित, अनुपयुक्त करने तथा उद्विग्न संतप्त रहने की विपत्तियाँ मोल लेगा। जो व्यस्त है, उसे बेकार की बातें सोचने की फुरसत ही नहीं। गहरी नींद भी उसी को आती है। कुसंग और दुर्व्यसनों से भी वही बचा रहता है। जो मेहनत से कमाता है, उसे फिजूलखर्ची भी नहीं सूझती इस प्रकार परिश्रमी व्यक्ति अनेक दोष दुर्गुणों से बच जाता है।
प्रगतिशील वर्गों का जातीय गुण श्रमशीलता है। हमें अपने आपको कड़ी मेहनत करने का अभ्यस्त बनाना चाहिए। जो भी लक्ष्य, प्रयोजन एवं कार्य सामने हों उनमें तत्परतापूर्वक दिलचस्पी के साथ लगे रहना चाहिये। एक क्षण का भी समय बर्बाद नहीं करना चाहिये। यदि यह प्रकृति अपने में- अपने परिवार में और समाज में हम उत्पन्न कर सकें तो अगले दिनों हर दिशा में हम बहुत ही समृद्ध और समुन्नत बन सकते हैं।
(प. श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा लिखित और युग-निर्माण योजना मथुरा द्वारा प्रकाशित)
(‘अशिष्टता न कीजिए पुस्तिका का एक अंश)
किसी के भीतर क्या है, इसका परिचय उसके व्यवहार से जाना जा सकता है। जो शराब पीकर और लहसुन खाकर आया होगा, उसके मुख से बदबू आ रही होगी। इसी प्रकार जिसके भीतर दुर्भावनायें, अहंकार और दुष्टता का ओछापन भरा होगा, वह दूसरों के साथ अभद्रतापूर्ण व्यवहार करेगा। उसकी वाणी से कर्कशता और असभ्यता टपकेगी। दूसरे से इस तरह बोलेगा जिससे उसे नीचा दिखाने, चिढ़ाने, तिरस्कृत करने और मूर्ख सिद्ध करने का भाव टपके। ऐसे लोग किसी पर अपने बड़प्पन की छाप नहीं छोड़ सकते, उल्टे घृणास्पद और द्वेष भाजन बनते चले जाते हैं। कटु वचन मर्म बेधी होते हैं, वे जिस पर छोड़े जाते हैं, उसे तिलमिला देते हैं और सदा के लिए शत्रु बना लेते हैं। कहते हैं कि ‘तीर का घाव भर जाता है, पर बात का घाव नहीं भरता’ यह कहावत बहुत उदार लोगों को छोड़कर सर्वसाधारण के सम्बन्ध में सोलह आने सच है। कटु-भाषी निरन्तर अपने शत्रुओं की संख्या बढ़ाता है और मित्रों को घटाता चला जाता है। किसी के मन में उसके प्रति आदर नहीं रह जाता। आश्रित परिवार के सदस्यों और कुछ स्वार्थ सिद्ध के लिये कानाफूसी करने वालों के अतिरिक्त और किसी की उनमें दिलचस्पी नहीं रह जाती। उद्धत स्वभाव के व्यक्ति अपना दोष आप भले ही न समझें, दूसरे लोग उन्हें बहुत उथला हलका मानते हैं और उदासीनता, उपेक्षा का व्यवहार करने लगते हैं। समय पड़ने पर ऐसा व्यक्ति किसी को अपना सच्चा मित्र नहीं पाता और आड़े वक्त उसके काम नहीं आता है। सच तो यह है कि मुसीबत के वक्त वे सब लोग प्रसन्न होते हैं, जिनको कभी तिरस्कार सहना पड़ा था। ऐसे अवसर पर वे बदला निकालने और कठिनाई बढ़ाने की ही घात सोच सकते हैं।
हमें संसार में रहना है तो सही व्यवहार करना भी सीखना चाहिये। सेवा सहायता करना तो आगे की बात है पर इतनी सज्जनता तो हर व्यक्ति में होनी ही चाहिये कि जिससे वास्ता पड़े उससे नम्रता, सद्भावना के साथ मीठे वचन बोलें और थोड़ी-सी देर जब कभी किसी से मिलने का अवसर आवे, तब शिष्टाचार बरतें। इसमें न तो पैसा व्यय होता है, न समय। कितने समय में कटु वचन बोले जाते हैं और अभद्र व्यवहार किया जाता है उससे भी कम समय में पीछे और शिष्ट तरीके से भी बरता जा सकता है। जो बात कड़ेपन और रुखाई के साथ कही गई थी, उसे ही मिठास के साथ भी उतनी ही देर में कहा जा सकता है। उद्धत स्वभाव दूसरों पर बुरी छाप छोड़ता है और उसका परिणाम कभी न कभी बुरा ही निकलता है। अकारण अपने शत्रु बढ़ाते चलना, कुछ बुद्धिमानी की बात नहीं। इस प्रकार के स्वभाव का व्यक्ति अन्ततः घाटे में ही रहता है। जिसके साथ दुर्व्यवहार किया गया, अप्रसन्न केवल वही नहीं होता वरन् जिनने उस प्रसंग को देखा, सुना है वे भी दुःखी और असन्तुष्ट होते हैं। उद्धतता के ओछेपन की बुरी छाप उन सुनने, देखने वालों पर भी पड़ती है और उनके मन में भी ऐसा व्यक्ति हेय स्तर का ही जँचता है। ऐसे लोग किसी का सच्चा सम्मान नहीं पा सकते और उसके बिना सहयोग भी किसे मिलता है। एकाकी मनुष्य जिसे दूसरों का सहयोग न मिल सके, वह कभी कोई बड़ी प्रगति न कर सकेगा।
श्रेष्ठ, उदार और सज्जन प्रकृति के मनुष्य सदा दूसरों का आदर करते हैं और हर किसी से सम्मान और मिठास भरे शब्द बोलते हैं। इसमें उनका जाता कुछ नहीं-अपने बड़प्पन की छाप ही दूसरों पर पड़ती है। उद्धतता से नहीं, सज्जनता से हम दूसरों का आदर पा सकते हैं, उन्हें अपना बना सकते हैं और ऐसे ही शिष्ट व्यवहार की आशा उनसे भी कर सकते हैं। सज्जनता में ही मनुष्य का वास्तविक बड़प्पन छिपा है और उसका प्रमाण मीठे वचन और शिष्ट व्यवहार से ही पाया जा सकता है। यह संसार कुएँ की आवाज की तरह प्रतिध्वनि करता है। जैसा व्यवहार हम दूसरों के साथ करते हैं, लगभग उसी स्तर की प्रतिक्रिया उनसे हमें प्राप्त होती है। कटुवादी, अहमन्यता और तिरस्कार का व्यवहार करने वाले लगभग वैसा ही व्यवहार बदले में पायेंगे। हो सकता है तत्काल किसी कारणवश लोग वैसा ही बरताव न करें पर उनके मन में वही आवेश दूने-चौगुने वेग से अवश्य ही उठ रहे होंगे। अच्छा होता वे लड़ाई-झगड़े के भय से तत्काल निकल जाते पर यदि वे दवे पड़े रहे तो कालान्तर में ब्याज समेत छूटेंगे, तब और भी अधिक घात सिद्ध होंगे। कटु व्यवहार की बुरी प्रतिक्रिया जो दूसरों पर होती है, वह लौटकर अन्ततः अपने ही ऊपर जाती है। हम दूसरों को तिरस्कृत, अपमानित करके वस्तुतः अपने को ही तिरस्कृत, अपमानित करते हैं। अपने ही ओछेपन और निकृष्ट व्यक्तित्व को दुनियाँ के सामने प्रसिद्ध करते हैं।
सज्जनता मनुष्यता का ही दूसरा नाम है। जिसमें सज्जनता नहीं उसे नर-पशु हो कहना पड़ेगा। हम सच्चे अर्थों में मनुष्य है, उसको प्रमाणित करने के लिए हमें सज्जनता की रीति-नीति अपनानी चाहिये। इसका प्रारम्भ मधुर भाषण और विनम्र एवं शिष्ट व्यवहार से होता है। छोटे-बड़े या दुष्ट-दुराचारी किसी से भी बात करनी है, हमें यह नहीं भूल जाना चाहिये कि कटु या ओछे वचन बोलकर जहाँ उसे तिरस्कृत करते हैं, वहाँ अपने को भी ओछा सिद्ध करते हैं। हमें पहले अपनी चिंता करनी चाहिये। अपना स्वभाव स्तर और अभ्यास गिराकर यदि किसी भी भर्त्सना की गई तो वह अपने लिये ही महंगी पड़ेगी। दूसरे लोग गंदे हैं, इसलिये हम क्यों गंदे बनें। हमें अपना स्तर हर हालत में ऊँचा उठाये रहना चाहिये और जिससे भी-जो कुछ भी कहना हो-उसे कहें तो पर सज्जनता और शिष्टता की भाषा में ही बोलें। अच्छे शब्दों में भी हर बुरी-भली बात कही जा सकती है। इस कला को सीख लेना भलमनसाहत का पहला चिह्न है।
घर में छोटों से भी ‘आप’ या ‘तुम’ कहकर बोलना चाहिये। जहाँ आवश्यकता हो वहाँ नाम के आगे ‘जी’ भी लगाना चाहिये। ‘तू’ कहना अति निकटवर्ती स्त्री, पुत्र, पौत्र आदि के लिए चलता है। इसमें आत्मीयता का पुट माना जाता है। पर इसमें दोष अपनी आदत बिगड़ने का है। दूसरे वे लोग जिन्हें ‘तू’ से सम्बोधन किया जाता है, देखा-देशी दूसरों से भी वैसा ही कहने लगेंगे आवश्यकता इस बात की है कि मनुष्य मात्र एक दूसरे को आयु, शिक्षा, धन अथवा पद का विचार किये बिना एक दूसरे के प्रति नम्रता और आदर भरा व्यवहार एवं वार्तालाप करें।
जब हम किसी से मिलें या कोई हमसे मिले, प्रसन्नता व्यक्त की जानी चाहिये। मुसकराते हुए अभिवादन करना चाहिये और बिठाने-बैठने कुशल समाचार पूछने और साधारण शिष्टाचार बरतने के बाद आने का कारण पूछना बताना चाहिये। यदि सहयोग किया जा सकता हो तो वैसा करना चाहिये अन्यथा अपनी परिस्थितियाँ स्पष्ट करते हुए सहयोग न कर सकने का दुःख व्यक्त करना चाहिये। इसी प्रकार यदि दूसरा कोई सहयोग नहीं कर सका है तो भी उसका समय लेने और सहानुभूति रखने के लिये धन्यवाद देना चाहिये तथा नाराजी अथवा अविश्वास उस हालत में भी व्यक्त नहीं करना चाहिये, साधारण पूछताछ का उत्तर भी मीठे और सहानुभूतिपूर्ण शब्दों में ही देना चाहिये। रूखा, कर्कश, उपेक्षापूर्वक, अथवा झल्लाहट, तिरस्कार भरा उत्तर देना ढीठ और गँवार को ही शोभा देता है। हमें अपने को इस पंक्ति में खड़ा नहीं करना चाहिये।
बड़े जो व्यवहार करेंगे बच्चे वैसा ही अनुकरण सीखेंगे। यदि हमें अपने बच्चों को अशिष्ट, उद्दण्ड बनाना हो तो हमें असभ्य व्यवहार की आदत बनाये रहनी चाहिये अन्यथा औचित्य इसी में है कि आवेश, उत्तेजना, उबल पड़ना, क्रोध में तमतमा जाना, अशिष्ट वचन बोलना और असत्य व्यवहार करने को दोष अपने अन्दर यदि स्वल्प मात्रा में हो तो भी उसे हटाने के लिये सख्ती के साथ अपने स्वभाव के साथ संघर्ष करें और तभी चैन लें, जब अपने में सज्जनता की प्रवृत्ति का समुचित समावेश हो जाय।
हम अपनी और दूसरों की दृष्टि में सज्जनता और शालीनता से परिपूर्ण एक श्रेष्ठ मनुष्य की तरह अपना आचरण और व्यक्तित्व बना सकें तो समझना चाहिये कि मनुष्यता की प्रथम परीक्षा में उत्तीर्ण हो गये। उसके आगे के कदम नैतिकता, सेवा, उदारता, संयम, सदाचार, पुण्य, परमार्थ के हैं। इससे भी पहली एक अति आवश्यक शर्त यह है कि हम सज्जनता की सामान्य परिभाषा समझें और अपनाये जिसके अंतर्गत मधुर भाषण और विनम्र शिष्ट एवं मृदु व्यवहार अनिवार्य हो जाता है।
युग-निर्माण योजना मथुरा द्वारा प्रकाशित ‘हरिजन उत्कर्ष के लिए कदम उठें’)
पुस्तिका का एक अंश
गाय, घोड़ा, बन्दर, मोर, कबूतर आदि पशु-पक्षियों की तरह मनुष्य भी एक जाति है। उनके रंग आकृति में प्रवेश और प्रकृति के कारण कुछ अन्तर भी हो सकता है, पर मूलतः वे एक ही वर्ग या जाति के गिने जाते रहेंगे। यदि भाषा, प्रदेश, आकृति-प्रकृति आदि के आधार पर उनका वर्गीकरण भी किया जाय तो भी उससे मूल अधिकार समान स्तर का ही प्रतिपादन होता रहेगा। मनुष्य भगवान् का पुत्र है। पिता को अपने हर बच्चे से समान प्यार होता है। और वे सभी बच्चे एक वंश वर्ग के माने जाते हैं। परमपिता परमात्मा ने मानव जाति को अपनी श्रेष्ठ सन्तान के रूप में सृजा है और उसे समान स्तर एवं समान अधिकार का बनाकर संसार में भेजा है। सभी परस्पर भाई-भाई एक ही परिवार एवं अंश-वंश के हैं।
प्राचीनकाल में कार्य और व्यवसाय के विभाजन की दृष्टि से समाज की ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र इन चार वर्गों में बाँटा गया था। वह विभाजन स्वाभाविक है। अभी तो बुद्धिजीवी, संरक्षक, उत्पादक एवं श्रमिक इन चार वर्गों में संसार के समस्त समाज बँटे हुए हैं। इस विभाजन से सामाजिक सुविधा रहती है और वंश परम्परा से चली आने वाली कुशलता में अञुच्चता एवं अभिवृद्धि होती चलती है। योग्यता, प्रकृति, परिस्थिति एवं अभिरुचि के अनुसार इस कार्य विभाजन में किसी को कोई आपत्ति नहीं हो सकती। पर कठिनाई तब उत्पन्न होती है, जब वंश या कार्य के कारण किसी वर्ग को ऊँच और किसी को नीच बताया जाने लगे। अध्यापक अपने को ऊँचा कहे और सैनिक नीचा माना जाय। इतना ही नहीं इस विभेद के कारण कोई किसी को सुने तथा हाथ से छुआ पानी पीने रोटी खाने तक से इनकार करने लगे, तब आश्चर्य होता है और कठिनाई उत्पन्न होती है।
दुष्टता भरे दुष्चक्र करने वाले को नीच कहा जाय और उनके सामाजिक बहिष्कार का क्रम बनाया जाय तो बात समझ म आती है। ज्ञान, सेवा, सद्गुण, सदाचरण के आधार पर किसी को बड़ा या ऊँचा माना जाय और सम्मानित किया जाय, इसके पीछे भी कारण है। सम्मान और असम्मान की स्थिति किसी को अपनी चारित्रिक उत्कृष्टता-निकटता के आधार पर मिले तो इसमें औचित्य माना जाएगा पर गुण-कर्म स्वभाव को समानता होते हुए भी केवल वंश के आधार पर कुछ लोग ऊँचे समझे जायें और कुछ को नीच कहा जाय, यह बात किसी तर्क या कारण की परख पर उचित नहीं उतरती। कोई वंश ऊँचा क्यों हो सकता है? कोई वंश नीचा क्यों कहलाये? इसका न कोई कारण समझ में आता है और न इस प्रतिपादन का कोई औचित्य ही सिद्ध होता है।
किसी वंश में किसी समय कुछ श्रेष्ठ पुरुष हुए थे, इसलिए उस वंश के लोगों को अभी भी उन श्रेष्ठ पुरुषों जैसा सम्मान मिले, यह दावा बेबुनियाद है। ब्राह्मण वंश में वशिष्ठ, मंत्री, याज्ञवल्क्य, भारद्वाज आदि ऋषि-मुनि त्यागी-तपस्वी हुए हैं तो रावण, कुम्भकरण, मरीच, खर-दूषण जैसे दुष्ट भी हुए हैं। यदि उत्तराधिकार का दावा किया जाय तो उसमें श्रेष्ठता ही नहीं, निकृष्टता भी हिस्से आयेगी। तब सम्मान ही नहीं, तिरस्कार का भाजन भी बनना पड़ेगा। किसी भी वंश में न तो सभी लोग अच्छे हुए हैं, न बुरे। सबको उनकी उत्कृष्टता निकृष्टता के अनुरूप मान तिरस्कार मिलता रहा है। उत्कृष्टता किसी वंश की बपौती नहीं। हर वर्ग में श्रेष्ठ व्यक्ति होते रहे हैं। इसी प्रकार कोई वर्ग ऐसा नहीं जिसमें निकृष्ट चरित्र के पूर्व पुरुषों की एक लम्बी शृंखला न मिल सके। फिर उनके वंशजों का दावा केवल उत्कृष्टता पर ही हो और वे उसी आधार पर अपने को ऊँचा घोषित करें और ऊँचे लोगों को मिलने वाले सम्मान को प्राप्त करना चाहें तो यह उनकी अनाधिकार चेष्टा होगी। इसी प्रकार किसी वंश के किन्हीं पूर्व पुरुषों ने कुछ अनुपयुक्त कार्य किये हों और उस कारण उन्हें तिरस्कार मिला हो तो उन दोषों से रहित वंशजों को इसलिए तिरस्कृत किया जाना भी अन्याय है।
जाति-पाँति की बात समझ में आ सकती है पर ऊँच-नीच का विभेद सर्वथा अवांछनीय है। कोई ईमानदार और समझदार व्यक्ति इसका समर्थन नहीं कर सकता है। भारतीय धर्म-शास्त्र इसी मान्यता का सर्वथा विरोधी है। यहाँ अपने श्रेष्ठ कर्मों के कारण शूद्र-वंश के अगणित व्यक्ति ब्राह्मण पद पाते रहे हैं। इन प्रमाणों से भारतीय इतिहास पुराणों का पन्ना-पन्ना भरा पड़ा है। मध्यकाल में भी रैदास, कबीर, नानक, दादू, नामदेव, विवेकानन्द आदि अनेक भक्त ब्राहणेतर जातियों में और कितने ही तो शूद्र वर्ण में पैदा हुए पर उनकी गरिमा किसी ब्राह्मण से कम नहीं आँकी गई, गाँधी बुद्ध, महावीर भी तो ब्राह्मण नहीं थे। राम-कृष्ण क्षत्रिय थे पर उनकी पूजा ब्राह्मण भी कहते हैं। श्रेष्ठता को जातीयता की सीमा में आबद्ध नहीं किया जा सकता।
आज अपने देश की विचित्र दशा है। हिन्दू समाज की एक तिहाई जनसंख्या अछूत अस्पर्श कहलाती है। उन्हें सवर्ण हिन्दुओं के समान नागरिक अधिकार अभी तो नहीं मिले हैं। संविधान ने अस्पर्शता को अवांछनीय और कानून ने उसे दण्डनीय माना है। जन्नत का विवेक ऊँच-नीच को मान्यता की अनर्गल घोषित कर चुका है। पर अभी भी हमारे मस्तिष्क और व्यवहार में वे ही मान्यताएँ जमी बैठी हैं। यह विषय इतना गहरा उतर गया है कि एक ही जाति के लोग अपनी उपजातियों को नीच-ऊँच मानते हैं। ब्राह्मणों की एक उपजाति दूसरी की अपने से नीचा मानती है। एक ही उपजाति के लोग हम इतने विश्वा के हैं- अमुक इतने विश्वा का है, ऐसी मूढ़ मान्यता अपनाकर ऊँच-नीच का ढोंग रचते हैं और विवाह-शादियों में तो इसी आधार पर दहेज का बारा-न्यारा करते हैं। अछूत कहे जाने वाले वर्ग परस्पर इसी ऊँच-नीच की मान्यता को चरितार्थ करते हैं। चमार, धोबी, मोची, भंगी, धनुक आदि अछूत समझे जाने वाले लोग परस्पर भी ऊँच-नीच मानते हैं और आपस में भी बड़प्पन छोटाई की बात कहकर अपने को बड़ा दूसरे को छोटा मानते हैं और वैसा ही व्यवहार करते हैं, जैसा सवर्ण उनके साथ करते हैं।
बहुत सोचने पर भी इस ऊँच नीच की मान्यता का कोई औचित्य समझ में नहीं आता। शास्त्रों ओर पूर्व पुरुषों की दुहाई देना व्यर्थ है। अन्धकार युग में किसी ने कुछ श्लोक गढ़कर किसी ग्रन्थ में चिपका दिये हों तो बात दूसरी है। पर महान्-हिन्दू धर्म इतना अनुदार और संकीर्ण हो ही नहीं सकता कि वह मनुष्य-मनुष्य के बीच पड़ने वाली और घृणा-द्वेष बढ़ाकर सामाजिक एकता को छिन्न-भिन्न करने वाली खाई खो दें। हमने बारीकी से हिन्दू-धर्म का अध्ययन किया है। और उसमें कहीं इस बात की गन्ध भी नहीं पाई है कि केवल वंश परम्परा के कारण किसी को नीच, किसी को ऊँच माना जाय। फिर यह मान्यता कहाँ से चल पड़ी? लगता है विधर्मियों ने भारतीय जन-जीवन को नष्ट-भ्रष्ट अस्त-व्यस्त और विश्रृंखलित करने के लिये यह षड्यन्त्र रचा होगा और अपनी बन्दूक उस समय के पुरोहितों के कन्धों पर रखकर चलाई होगी।
वर्ण भेद की अनुदार और संकीर्ण विचार-धारा को सम्पूर्ण विश्व में भर्त्सना हो रही है। अमेरिका के काले-गोरे रंग के आधार पर जो ऊँच-नीच की भावना जहाँ-तहाँ पाई जाती है, उसको विश्व के लोकमत ने एक स्वर से धिक्कारा है। अफ्रीका की जो गोरी सरकारें इस नीति पर चल रही है, उनकी राष्ट्र संघ तक ने भर्त्सना की है और इस चाल से बाज़ आने की चेतावनी दी है। महात्मा गाँधी ने इसके विरुद्ध दक्षिण अफ्रीका में सत्याग्रह आन्दोलन चलाया था। जहाँ कहीं यह नीति बरती जाती है, जो भी इसका प्रतिपादन करता है, वह विवेकशील लोकमत के आगे अपराधी ठहरता है। न्याय और विवेक की कसौटी पर मनुष्य-मनुष्य के बीच ऊँच-नीच की मान्यता का समर्थन करना मानवता के प्रति एक अपराध ही माना जाता रहेगा।
इस मान्यता ने हिन्दू समाज की अपार क्षति की है। अछूत वर्ग इस तिरस्कृत सामाजिक स्थिति को स्वीकार न करेगा, यह निश्चित है। जैसे-जैसे उनमें चेतना उभरेगी वे इस अवस्था के प्रति विद्रोह करेंगे। यह विद्रोह पिछले पचास वर्ष से दिन-दिन उम्र होता चला जा रहा है। मुसलमानी शासन में अगणित अछूत मुसलमान बने, ईसाई शासन में उनका झुकाव ईसाई धर्म की ओर हुआ। अब वे अपनी स्वतन्त्र चेतना के उभार पर बौद्ध और ईसाई इतनी तेजी से होते चले जाते हैं कि यह आशंका होती है कि कुछ दिन में एक भी अछूत वर्तमान मान्यताओं वाले हिन्दू-समाज में न रह सकेगा। मद्रास में यह विद्रोह शासन सत्ता तक अपने हाथ में ले चुका है। नागालैण्ड का ईसाईस्तान उस मूल की प्रतिक्रिया है। इन दिनों जिस प्रकार के राजनैतिक षड्यन्त्र चल रहे हैं, उन्हें देखते हुए यह असम्भव नहीं कि अछूत सवर्ण हिन्दुओं से अलग होकर ईसाई, मुसलमानों में जा मिलें और बहुमत उनका हो जाय। ऐसी दशा में सवर्ण हिन्दुओं के सामाजिक अन्याय का कैसा कठोर प्रायश्चित्त करना पड़ेगा, उसका अनुमान लगा सकना किसी भी दूरदर्शी के लिए कठिन नहीं होना चाहिये।
वर्तमान ऊँच-नीच परक वंश जाति की मान्यतायें हिन्दू समाज की न्याय-निष्ठा पर भारी कलंक लगाती हैं। इससे विश्व के हर विचारशील वर्ग में हमारी अप्रतिष्ठा होती है। हमें संकीर्ण अनुदार और अन्यायी कहा जाता है। सामाजिक दृष्टि से हम छिन्न-परिछिन्न विभाजित और अस्त-व्यस्त होते हैं। अन्याय का दोष लगाकर अपना ही एक तिहाई वर्ग अपने से अलग हो जाय, यह हमारे लिए हर दृष्टि से लज्जा की बात है। बात यहीं तक सीमित नहीं हमारी अनीति से क्षुब्ध होकर दूसरे धर्मों में गये हुए अपने लोग अगले दिनों प्रतिशोध की भावना से ओत-प्रोत होंगे और हमें अपनी करतूतों का दण्ड कराह-कराह कर भुगतना पड़ेगा।
अच्छा हो हम समय रहते चेतें। अपनी भूल सुधारें और मानव मात्र की एकता एवं समता के सार्वभौम न्याय सिद्धान्त को स्वीकार करें। ऊँच-नीच की मान्यताओं का जितना शीघ्र उन्मूलन हो उतना ही हमारा कल्याण है।
(प. श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा लिखित और युग-निर्माण योजना मथुरा द्वारा प्रकाशित)
(‘हमारी एक महत्त्वपूर्ण-संयम पुस्तिका का एक अंश)
मनुष्य के शरीर और मन में शक्तियों का अकूत भण्डार भरा पड़ा है। उनको नष्ट होने से बचाया जा सके और उस बचत का सदुपयोग किया जा सके तो अभीष्ट दिशा में आशाजनक सफलतायें प्राप्त की जा सकती है। इस तथ्य को न समझकर हम अपनी बहुमूल्य शक्तियों का निरर्थक अपव्यय करते रहते हैं और ईश्वर प्रदत्त शक्ति भण्डार को खोकर खोखला, रुग्ण, अशक्त और असफल जीवन जीते हुए मौत के दिन पूरे करते रहते हैं।
शरीर और मन अपने-अपने आहारों द्वारा शक्तियों का निरन्तर उत्पादन करते रहते हैं और हमारा सामर्थ्य भण्डार निरन्तर बढ़ता रहता है। इस उत्पादन को यदि अपव्यय से बचाया जा सके और उसे रचनात्मक दिशा में प्रयुक्त किया जा सके तो निस्सन्देह किसी भी दिशा में आशाजनक प्रगति का सुयोग मिल सकता है।
संयम का अर्थ है-शक्तियों के अपव्यय को रोकना। यह अपव्यय अधिकतर हारी इन्द्रियों द्वारा होता है। इन्द्रियों में दो प्रमुख है-एक जीभ, दूसरी जननेन्द्रिय। जीभ के द्वारा हम निरर्थक बकवास करते रहते हैं, निन्दा चुगली, शेखी तथा गप्पें हाँकने में जिव्हा की बहुत सारी शक्ति का अपव्यय होता है। असत्य और कटु बोलने का जिह्वा संयम यदि धरता जा सके तो हमारी वाणी इतनी प्रभावशाली हो सकती है कि उसका दूसरों पर आश्चर्यजनक प्रभाव पड़े और वरदान आशीर्वाद देने की क्षमता उत्पन्न हो जाय। निरर्थक बकवास से, हमारा बहुत मनोबल नष्ट होता है। वाचाल व्यक्ति की अन्तरंग क्षमता खोखली होती जाती हैं और यह एक विदूषक मात्र रह जाता है। मौन को तप माना गया है। तपस्वियों का मौन तो हर किसी के लिए सम्भव नहीं पर इतना तो कोई भी कर सकता है कि अनर्गल बकवास पर नियन्त्रण करे और उतना ही नपा-तुला बोलें जो अपने तथा दूसरों के लिए आवश्यक एवं हितकर हो। यह किया जा सके तो कोई भी अपने व्यक्तित्व एवं प्रतिभा में आश्चर्यजनक अभिवृद्धि का अनुभव कर सकता है।
जिह्वा का दूसरा अर्थ है-चटोरापन विकृत जायके के लिए हम अवांछनीय अपथ्य पदार्थ खाते रहते हैं। स्वाद का आकर्षण आवश्यकता से अधिक मात्रा में खा जाने के लिए ललचाता है। यह बढ़ी हुई मात्रा पेट पर भारी बनती और उसे दिन-दिन दुर्बल करती चली जाती है। मसाले एक प्रकार के मन्द विष हैं। ये जीभ, पेट, आँतें ओर उदर के हर हिस्से को जलाते हैं। उत्तेजना में आदमी खा तो अधिक जाता है पर मात्रा से अधिक पचावे कौन। धीरे-धीरे अपच बढ़ता जाता है और पाचन यन्त्र इतना कमजोर बन जाता है कि स्वल्प मात्रा में आहार पहचाना भी कठिन पड़ता है। यहीं से दुर्बलता और रुग्णता की नींव पड़ती है, बिना पचा भोजन पेट का भार मात्र है, वह शक्ति पैदा न कर सकेगा तो दुर्बलता बढ़ेगी ही। अपच के कारण पेट में जो विषैली सड़न पैदा होती है, वही शिर के विभिन्न अंगों में पहुँच कर वहाँ विविध रोगों का सृजन करती चली जाती हैं और व्यक्ति व्यथा, पीड़ायें भोगता हुआ अकाल में ही कबलित होता है।
लुकमान सच कहते थे कि-आदमी अपनी जीभ से अपने मरने-गढ़ने के लिए कब्र खोदता है।” जीभ यदि काबू में हो तो मिठाई, खटाई, मिर्च और मसाले हमारे ऊपर सवार क्यों हों? और तरह-तरह के व्यंजन, पकवान, अचार, चटनी की लपक क्यों लगे? लोग समझते भर हैं कि हमने जायकेदार और कीमती चीजें खाकर मजा उठाया पर वस्तुतः यह अपने पैरों आप कुल्हाड़ी मारने की तरह है। यदि हम जायके को महत्व न दें और केवल गुण एवं लाभ को ध्यान में रखते हुए औषधि की तरह सात्विक आहार करें। तो पेट खराब न हो और दुर्बलता एवं रुग्णता का शिकार न होना पड़े। यह जीभ ही है, जो जायके और चटोरेपन की शिकार बनकर हमारे स्वास्थ्य, आनन्द और दीर्घजीवन पर कुठाराघात करती है। यदि जिह्वा को संयम, नियन्त्रण में रखा जा सके तो यह उपलब्धि निस्सन्देह बहुत बड़ा वरदान सिद्ध हो सकती है।
जननेन्द्रिय का संयम और भी अधिक महत्त्वपूर्ण हैं। शरीर जो कुछ उपलब्ध करता है, उसका सार तत्त्व-दूध में से घी की तरह-बचाता है। इसी का नाम शुक्र और अन्ततः ओजस है। चेहरे पर चमक, वाणी में प्रभाव, आँखों में ज्योति, मस्तिष्क में मेधा, स्वभाव में साहस इसी महत्व का प्रतिफल है। देह में यह थोड़ी-सी ही बूँदें रहती हैं पर वे समय प्रतिभा के रूप में प्रकाशवान् बनती हैं। इनमें इतनी सामर्थ्य है कि अपने जैसे कितने ही नये मनुष्य विनिर्मित कर सकें। इस आश्चर्यजनक शक्ति को सर्प की मणि की तरह कहा जा सकता है। कहते हैं कि सर्प अपनी मणि जब खो बैठता है, तब उसकी देह निर्जीव जैसी बन जाती है। मनुष्य की भी यही स्थिति है। इस सार
तत्त्व का जितना ही अपव्यय करता है, वह शारीरिक और मानसिक दृष्टि से उतना ही दुर्बल बनता चला जाता है। कामुक व्यक्ति न निरोग रह सकते हैं और न दीर्घजीवन का आनन्द ले सकते हैं। उन्हें अनेक रोग घेरे रहते हैं और मनस्विता गँवाकर दीन, दुर्बल, कायर, भीरु, अस्थिर और अन्यमनस्क बनते चले जाते हैं। मन में उत्साह की नहीं, आशंकाओं की ही भीड़ जमी रहती है। ब्रह्मचर्य की दिशा में असंयम बरतने वाले रुग्ण और दुर्बल सन्तानें ही उत्पन्न करेंगे।
कामुकता पर अंकुश लगाना ब्रह्मचर्य का समुचित ध्यान रखना, जननेन्द्रिय का संयम बरतना हर विचार शील व्यक्ति के लिए आवश्यक है। जिसे शारीरिक परिपुष्टता, दीर्घजीवन और समर्थ मनस्विता की आवश्यकता है, उसे यह तथ्य गाँठ बाँध लेना चाहिये कि शरीर के सार तत्त्व को खिलवाड़ का विषय न बनायें। सन्तान वृद्धि को जितनी आवश्यकता हो उसके अनुरूप वासना में ढील दें, अन्यथा इस दिशा में आवश्यक मर्यादाओं का निरंतर पालन करता रहे। यह स्मरण रखा जाना चाहिये कि विवाह का उद्देश्य दो आत्माओं का पवित्र गठबंधन और एक दूसरे के सहयोग से एक सम्मिलित आत्म-चेतना का विकास करना है। स्वच्छन्द अनियन्त्रित और अनावश्यक काम वासना भड़काने और एक दूसरे के शारीरिक, मानसिक सार तत्त्व को नष्ट-भ्रष्ट करने में जुट जाने का नाम विवाह मैत्री नहीं है। यह तो प्रत्यक्ष शत्रुता है। विवाह के भाव पति-पत्नि एक दूसरे की समर्थता और प्रतिभा का विकास करे यही अभीष्ट है। एक क्षणिक कुत्सित मनोरंजन के लिए एक दूसरे के शरीर और मन को हम दुर्बल बनाने लगें तो यह न तो प्रीति रही, न नीति। मित्रता की आड़ में यह प्रत्यक्ष शत्रुता है। अच्छा हो हमारे दाम्पत्य-जीवन के प्रतीक न बने और दोनों में एक दूसरे के शारीरिक, मानसिक स्वास्थ्य का संरक्षण करने की दृष्टि से आत्म-संयम की प्रवृत्ति पनपे
दाम्पत्य-जीवन से बाहर का दुराचार तो अति कुत्सित है। अप्राकृतिक दुर्बुद्धि का लुक-छिपकर आज नवयुवकों में बहुत बढ़ चला है। दस दुर्व्यसन से वे कलियाँ असमय ही मुरझा जाती हैं। जवानी का आरम्भ भी नहीं हुआ कि बुढ़ापे ने आ घेरा। कितने ही नासमझ लड़के “जिस डाल पर बैठना उसी को काटना” की दुर्बुद्धि चरितार्थ करते रहते हैं। इन्हें सिखाया जाना चाहिये कि जीवन रस को फुलझड़ी समझकर उन्हें जलाने का कौतूहल न बरतें यह खतरनाक खेल हैं, जिसकी कीमत आगे चलकर भारी पश्चाताप के साथ चुकानी पड़ेगी। इसी प्रकार नर-नारी के बीच पवित्र सम्बन्धों की पुण्य परम्परा में विष घोलना हर दृष्टि से अवांछनीय है। प्रेम और मैत्री का अर्थ कामुकता नहीं है। शुभ-चिन्तक और हितैषी होने का अर्थ अपने प्रिय पात्र का चरित्र गिराना और उसे अपने गृहस्थ-जीवन के प्रति अनास्थावान् बनाना नहीं है। नर और नर की भाँति, नर और नारी में भी प्रेम हो सकता है। इसमें कोई दोष नहीं पर जब वह मैत्री कामुकता से विषाक्त होने लगे तो समझना चाहिये कि यह सद्भावना की आड़ में दुष्ट प्रयोजन खुल खेल रहे हैं। अच्छा हो-जहाँ भी नर-नारी के बीच पनपने वाली मित्रता विषाक्त होने से बची रहे और उसके दूरगामी दुष्परिणामों से व्यक्ति दूरगामी दुष्परिणामों से व्यक्ति और समाज को दुष्परिणाम न भोगने पड़े।
अन्य इन्द्रियाँ भी ऐसी ही हैं, जिन्हें संयम की शिक्षा मिलनी चाहिये। आँखों में शुद्ध सौंदर्य की आकांक्षा तो बनी रहे पर कामुकता की दुर्भावना से चारों ओर बिखरे सौंदर्य को न निहारें। इससे मिलने वाला कुछ नहीं, केवल अपनी आन्तरिक शक्ति ही नष्ट होगी और अकारण उद्विग्नता बढ़ेगी, मन कलुषित होगा, कुमार्ग पर कदम बढ़ेंगे और आध्यात्मिकता की पवित्र दृष्टि से देखें और हर घड़ी प्रमुदित और संतुष्ट रहने की ही स्थिति प्राप्त करें। कान शृंगार और अश्लीलता सुनने के लिए लालायित न रहें। निन्दा, चुगली में रस न लें। बहुत कुछ आवश्यक तथ्य सुनने के लिए शेष हैं, उन्हीं के लिए प्रवृत्ति क्यों न मोड़ी जाय? नासिका माँस, मदिरा जैसे अभक्ष्यों की दुर्गन्ध को सहन क्यों करें? अस्वच्छता भरी परिस्थितियों में रहने के लिये उसे क्यों विवश किया गया? नासिका की स्वाभाविकता प्रीति स्वच्छता और सात्विकता को पसन्द करने में है। अच्छा हो हमारी नासिका सही पथ प्रदर्शन कर सकने में समर्थ बनी रहे।
संयम अर्थात् शक्तियों का संचय। असंयम अर्थात् सामर्थ्य की बर्बादी। यह मोटा तथ्य है कि बर्बादी का अवलम्बन करने वाला एक दिन दिवालिया बन जाता है और जो थोड़ा-थोड़ा बनाता रहता है, उसकी सम्पदा समय-समय पर अनेक सुविधायें प्रस्तुत करती हैं। इन्द्रियों का संयम अपने आपको बर्बादी से बचाकर समृद्धि की ओर अग्रसर करने का बुद्धिमत्तापूर्ण प्रयास है। इसी में हम सबका कल्याण है।
(प. श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा लिखित और युग-निर्माण योजना मथुरा द्वारा प्रकाशित)
(‘गौरस बेचन हरि मिलन’ पुस्तिका का एक अंश)
अपने देश में गौरक्षा का गौ-पालन और गौ-पूजा का महत्व बहुत है। भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी अभिरुचि इस दिशा में सबसे अधिक प्रदर्शित करके सर्वसाधारण का ध्यान इस ओर आकर्षित किया था कि उन्हें गौ का महत्व और उपयोग भली प्रकार समझना चाहिये और इस संदर्भ में व्यवहारतः कुछ करते रहना चाहिए
मानवी स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए जिस पौष्टिक आहार की आवश्यकता है, उसमें गौ दुग्ध अग्रणी है। यों दूध तो भैंस और भेड़-बकरी का भी मिलता है और कहीं-कहीं गधी और ऊँटनी का भी प्रयुक्त होता है पर विटामिन ‘ए’ जैसे बहुमूल्य तत्त्व जितनी मात्रा में गाय के दुग्ध में है, उतने और किसी में नहीं। देखने में भैंसा या भेड़ का दूध चिकना, गाढ़ा निकलता है पर गुणों में गोरस से उनकी कोई तुलना नहीं। जितने उपयोगी खनिज, लवण, रोग निरोधक, बलवर्धक जीवन तत्त्व गाय के दूध में हैं, और शिक्षित देशों में जो गुण और लाभ को परखना जानते हैं, केवल गौदुग्ध ही उपयुक्त होता है। योरोप और अमेरिका का समस्त देश प्रायः गौ दुग्ध ही सेवन करता है। भैंस तो अफ्रीका और भारत को छोड़कर अन्यत्र पाई भी नहीं जाती।
आयुर्वेद शास्त्र में भी गौदुग्ध का ही प्रतिपादन है। धर्म ग्रन्थों में जहाँ कहीं दूध, घी की आवश्यकता का वर्णन है, वहाँ गौरस का ही उल्लेख समझना चाहिये। दूरदर्शी ऋषियों को शारीरिक दृष्टि से गोरस की शारीरिक उपयोगिता विदित ही थी, इसके अतिरिक्त वे उसके मानसिक और आध्यात्मिक गुणों से भी परिचित थे। गाय में, गाय के बछड़े में-जैसी फुर्ती और चतुरता रहती है, वैसी भेड़ या भैंस में नहीं। स्पष्टतः इन पशुओं का मानसिक स्तर भी दूध में धुला रहता है। भैंस का दूध पीने से उसी जैसा आलस्य, प्रमाद एवं बुद्धूपन बढ़ता है। ‘भेड़चाल’ उक्ति में उस प्राणी की अदूरदर्शिता का ही वर्णन है। गाय इन सबसे निराली है। उसकी स्फूर्ति एवं चतुरता बात-बात में परखी जा सकती है। मार्ग में खेलते हुए बच्चे को गाय बचाती हुई चलेगी पर भैंस अपनी राह चलती जाएगी, चाहे बूढ़ा, बच्चा कोई भी क्यों न कुचल जाय। तनिक-सी गर्मी-सर्दी और थकान, बर्दाश्त करना भैंस के लिए कठिन है। पर गाय की सहिष्णुता प्रख्यात है। यही गुण उसके दूध में रहते है। माता के दूध का बच्चे पर असर पड़ता है। माता का जैसा स्वभाव होता है, बच्चा भी वैसी प्रकृति का बन जाता है। यह दूध का गुण है। भैंसा या भेड़-बकरी का दूध पीने वाले उन्हीं जैसे हेय गुणी वाले बनते चले जाते हैं।
गाय की सबसे बड़ी विशेषता उसमें पाई जाने वाली आध्यात्मिक विशेषता है। हर पदार्थ एवं प्राणी में कुछ अति सूक्ष्म एवं रहस्यमय गुण होते हैं। सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण की मात्राएँ सबमें पाई जाती हैं। जिस प्रकृति के पदार्थों और प्राणियों से हम संपर्क रखते हैं, हमारी अंतःस्थिति भी उसी प्रकार छलने लगती है। हँस पाल कर बढ़ता हुआ सतोगुण और कौआ पाल कर घर में में बढ़ता हुआ तमोगुण कभी भी अनुभव किया जा सकता है। भेड़-बकरी और भैंस को तमोगुण प्रधान माना गया है। गाय में सतोगुण की भारी मात्रा विद्यमान् है। अपने बच्चे के प्रति गाय की ममता प्रसिद्ध है। वह अपने पालन करने वाले तथा उस परिवार को भी बहुत प्यार करती है। जंगलों में शेर, बाघ का सामना होने पर अपने ग्वाले की चारों और से घेर कर गाय झुण्ड बना लेती हैं और अपनी जान पर खेल कर अपने रक्षक को बचाने का त्याग, बलिदान एवं कृतज्ञता आत्मीयता का आदर्श भरा उदाहरण प्रस्तुत करती है। ऐसी आध्यात्मिक विशेषता और किसी प्राणी में नहीं पाई जाती। इस स्तर के उच्च सद्गुण उन लोगों में भी बढ़ते हैं जो उसका दूध पीते हैं। बैल की परिश्रम-शीलता ओर सहिष्णुता प्रख्यात है। यह विशेषताएँ गौ दुग्ध का उपयोग करने वाले में भी बढ़ती है।
गौरस एक सर्वांगपूर्ण परिपुष्ट आहार है। उसमें मानसिक स्फूर्ति एवं आध्यात्मिक सतोगुणी तत्त्वों का बाहुल्य रहता है, इसलिए मनीषियों तथा शास्त्रकारों ने-गाय का वर्चस्व स्वीकार करते हुए उसे पूज्य, संरक्षणीय एवं सेवा के योग्य माना है। गाय की ब्राह्मण से तुलना की है और उसे अवध्य-मारे न जाने योग्य घोषित किया गया है। गोपाष्टमी और गोवर्धन दो त्यौहार ही गौरक्षा की और जनसाधारण का ध्यान स्थिर रखने के लिए बनाये गये हैं। चूँकि ये पहली रोटी गाय के लिए निकालने की परम्परा भी इसीलिये है कि गाय को एक कुटुम्ब का प्राणी समझते रहा जाय। राजा दिलीप जैसे ऐतिहासिक महापुरुषों की गौ-भक्ति प्रसिद्ध है जिसके कारण उन्होंने सुसन्तति प्राप्त की। आज भी वह तथ्य ज्यों का त्यों है। गाय के संपर्क में रहने वाले, गोरस पीने वाले पति-पत्नि निस्सन्देह सुयोग्य और स्वस्थ सन्तान पैदा कर सकते हैं, उनका पुरुषत्व साँड़ की तरह सुस्थिर बना रहता है। पुराणों में गौ भक्ति और गौ सेवा के लिये बहुत कुछ करने वाले सत्पुरुषों के अगणित उदाहरण विद्यमान् है। उस समय-शिक्षा की गुरुकुल प्रणाली थी। हर छात्र को आश्रम की गौएं चरानी पड़ती थी और आहार में गोरस की समुचित मात्रा मिलती थी। उस समय के छात्रों की प्रतीक्षा परिपुष्टता एवं सज्जनता की अभिवृद्धि के जो महत्त्वपूर्ण लाभ मिलते थे, उसमें गौ संपर्क भी एक बहुत बड़ा कारण था।
भारत कृषि प्रधान देश है। यहाँ जुताई, सिंचाई और गुड़ाई, (अन्न को पौधे से अलग करना) के लिए बैल की अनिवार्य आवश्यकता है। गाय का गोबर अपने ढंग का अति उर्वरक खाद्य है। अपने देश की कृषि गौवंश पर निर्भर है। रासायनिक खाद अचार, चटनी की तरह है, उनसे धरती की भूख नहीं बुझ सकती, वह तो गोबर से ही सम्भव है। महंगी बार-बार बिगड़ने वाली, खर्चीली ओर तकनीकी ज्ञान की अपेक्षा रखने वाली मशीनें भारत की कृषि समस्या को हम नहीं कर सकती। अनेक कारणों से यहाँ तो बैल ही सफल होगा। अन्न और दूध हम गौवंश की कृपा से ही प्राप्त कर सकते हैं, इसलिये उसका संरक्षण सब प्रकार से उपयुक्त है।
गोबर से लीपने पर घर रोग कीटाणु मुक्त होते हैं। गौ मूत्र असाध्य रोगों में भी रामबाण औषधि का काम करता है। इनकी गन्ध से विषैले रोगकर्मी अनायास ही मरते हैं और स्वास्थ्य रखा की एक सहज व्यवस्था बनती रहती है।
आवश्यकता है कि हम गौरक्षा पर ध्यान दें और अपनी शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक, आर्थिक एवं धार्मिक स्थिति की परिपुष्ट बनाने के लिए इस दिशा में कुछ ठोस कदम उठाये
यह एक दुर्भाग्य ही है कि जिस देश में गौ को पूज्य और गौरक्षा को धर्म माना जाता है, उसी में उसकी सबसे अधिक दुर्गति हो। गौ नस बुरी तरह खराब हो चुकी है। जरा सा दूध देती और बेकार समझी जाती है। कलाई को छुरी के नीचे ही उन्हें आश्रय मिलता है। गौवंश बुरी तरह घटता और नष्ट होता चला जा रहा है। उसका एक मात्र कारण उस ओर बरती जाने वाली हमारी उपेक्षा ही प्रधान कारण है। माँसाहारी देशों में गायें एक-एक मन दूध दें और गौरस की नहरें बहे और हम गौ-भक्तों में उसका दर्शन भी दुर्लभ रहें, यह कैसी विडम्बना है।
हमें चाहिये कि गौ-दूध की उपयोगिता स्वीकार करें और उसी की माँग करें। ऐसी दशा में भैंस पालने वाले सहज ही गौ पालने लगेंगे। जिसकी माँग होगी उसका उत्पादन भी होगा और उसका स्तर भी उठेगा। हम जय गाय की बोलते हैं और दूध भैंस का पीते हैं। इस प्रकार गौरक्षा कैसे सम्भव होगी? जिस दिन जनसाधारण की समझ में गौरस की उपयोगिता आ जाएगी, उसी की माँग की जाएगी तो देखते-देखते यह देश गौधन से भरा-पूरा गौ संवर्धन और गोरस उत्पादन के लिए बड़े पैमाने पर व्यवसायिक स्तर पर काम करें, चाय वालों की तरह गोरस की महत्ता समझने के लिए व्यापक प्रचार करें और धन, पुण्य तथा राष्ट्र की महती सेवा का सुयोग प्राप्त करें। सरकार और जनता ये दोनों वर्ग मिलकर गौरक्षा के लिए कुछ ठोस काम करें, यह आज की एक महती आवश्यकता है।
युग-निर्माण योजना मथुरा द्वारा प्रकाशित ‘सन्तान की संख्या न बढ़ाए’)
पुस्तिका का सारांश
कोई समय था जब अपने देश की जनसंख्या बहुत थोड़ी थी, विस्तृत वन भरे पड़े थे। पशु-पालन और कृषि के लिए मन चाही जमीन उपलब्ध थी। तब अर्थ व्यवस्था और सुरक्षा के लिए परिवार के सदस्यों की संख्या बड़ी होना उपयोगी था। जंगली जानवरों और दस्युओं से निपटने में भी वे समर्थ रहते थे, जिनका परिवार बड़ा था। उन दिनों पुत्र का जन्म, सन्तान की वृद्धि एक दैवी कृपा मानी जाती थी।
इन दिनों देश की जनसंख्या खतरे के बिन्दु तक बढ़ गई है। हर व्यक्ति हिस्से में इतनी कम भूमि आती है, जिससे पर्याप्त अन्न उगाना और पशुओं के निर्वाह के लिए चारा प्राप्त करना अति कठिन होता चला जाता है। अन्न उत्पादन के लिए सिर तोड़ परिश्रम करने पर भी विदेशों से कर्ज उधार तथा बदले में अति आवश्यक वस्तुएँ देकर किसी प्रकार पेट पालना सम्भव होता है। अनाज की महंगाई आकाश को छू रही है। दूध, घी देवताओं को दुर्लभ हो रहा है। चाय और डालडा से इन पदार्थों की स्मृतिजन्द, है। जिस क्रम से आबादी बढ़ रही है, उसे देखते हुए अगले दिनों अन्न की कमी, महंगाई, दूध-घी की दुर्लभता अड़ेगी। मनुष्यों के लिए ही जब निवास व अन्न कठिन हो जाएगा तो बेचारे पशु कहाँ रहेंगे- कैसे जियेंगे।
पचास वर्ष पूर्व की और आज की परिस्थिति में आज इस जनसंख्या की दृष्टि ने जमीन, आसमान जितना अन्तर उत्पन्न कर दिया। यह क्रम, चक्र-वृद्धि क्रम से बढ़ रहा है। अस्तु अगले दिनों यह विपन्नता और भी अधिक बढ़ेगी। उद्योग-धन्धे व्यापार, शिक्षा, सवारी आदि के साधन कितने भी बढ़ाये जायें-आबादी जिस तेजी से बढ़ रही है, उसे देखते हुए वे कम ही पड़ते चले जायेंगे और दरिद्रता से लेकर अस्वस्थता तक असंख्य समस्यायें बढ़ती और उलझती चली जायेंगी। निवास, बेरोजगारी, चिकित्सा की गुत्थियाँ अब भी पेचीदा हो रही हैं, अगले दिनों तो वे न सुलझने की स्थिति में जा पहुँचेगी।
सन्तान की संख्या बढ़ाना आज की परिस्थिति में अपने व्यक्तिगत और पारिवारिक जीवन में विपत्तियों को सीधा आमन्त्रण देना है। महंगाई और अपर्याप्त आजीविका के कारण बच्चों के निवास, खेल-कूद के लिए स्थान कम मिलता है, उन्हें पौष्टिक भोजन नहीं मिल पाता, महंगी शिक्षा और चिकित्सा के कारण न उनको समय के अनुरूप ऊँची पढ़ाई की व्यवस्था बन पाती है और न चिकित्सा का समुचित प्रबन्ध होता है। ऐसी दशा में कौन आशा करेगा कि इन ढेरों बच्चों का समुचित विकास एक औसत दर्जे का आदमी कर सकता है। उँगलियों पर गिने जाने वाले अमीरों की बात दूसरी है, सर्व साधारण के लिए तो यह भार जितना बढ़ेगा, उतना ही असह्य बनेगा। समय कम और बच्चे अधिक होने पर उनकी ओर समुचित ध्यान भी तो नहीं दिया जा सकता। उनका स्वभाव, संस्कार, स्वास्थ्य सुविकसित करने के लिए अभिभावकों को पूरा ध्यान देना, समय और श्रम लगाना तथा पर्याप्त खर्च करना चाहिये। पर यह अधिक बालकों ने सम्भव नहीं। इसलिए वे बेचारे जंगली घास-फूँस की तरह बढ़ते-अपनी मौत के पास जाते और कुसंस्कारी बनते रहते हैं। ऐसे बालक सारे परिवार के लिए-समस्त समाज के लिए एक सिर-दर्द हो रहते हैं। कुमार्गगामी या अस्वस्थ हो गये, तब तो उन्हें एक विपत्ति एवं अभिशाप ही कहा जाएगा
काम उतना ही हाथ में लेना चाहिये, जो ठीक तरह निबाहा जा सके। बच्चे उत्पन्न करना क्रीड़ा-विनोद मात्र नहीं है। उसके पीछे भारी उत्तरदायित्व लदे हैं। जो उसे ठीक तरह बहन कर सकने में समर्थ हैं, उन्हें ही यह बोझा उठाने का साहस करना चाहिए अन्यथा बिना आगा-पीछा सोचे संतान बढ़ाते जाना, अपने लिए, बच्चों के लिए और समस्त समाज के लिए संकट प्रस्तुत करने का अपराध ही माना जाएगा
सन्तान संख्या को बढ़ाना अपनी पत्नी के साथ प्रत्यक्ष अत्याचार है। बच्चे को नौ महीने पेट में रखने उसका शरीर अपने रक्त-माँस में से बनाने, प्रसव पीड़ा और दूध पिलाना और अधूरी नींद ले पाना माता के लिए एक असाधारण भार है। उसकी पूर्ति के लिए उसे बहुमूल्य पौष्टिक भोजन, विश्राम तथा कई तरह की सुविधायें चाहिये। वे न मिलें और एक के बाद, दूसरे बच्चे जल्दी-जल्दी पैदा होते चले जायें तो निश्चित रूप से उस माता का स्वास्थ्य बिगड़ जायेगा। अपने देश की तीन चौथाई स्त्रियों का स्वास्थ्य इसी कारण खराब है, उन्हें अनेक तरह के भीतरी रोग घेरे रहते हैं। जवानी दो-चार वर्ष के भीतर चली जाती है और देखते-देखते बुढ़ापा आ घेरता है। प्रसवकाल में अगणित स्त्रियाँ मरती हैं। दुर्बल शरीरों के लिए यह भार और क्या परिणाम उत्पन्न कर सकता है। यह स्पष्टतः एक हत्या-काण्डों की शृंखला है। जो जिस वजन को उठाने में असमर्थ है उसके ऊपर लादते ही चले जायें तो आखिर बेचारे को मरना ही पड़ेगा। हम कहने भर को ही अपनी पत्नी से दिखावटी प्यार करते हैं, व्यवहार हमारा कसाई जैसा होता है। प्रजनन के भार से कराहती हुई-बेमौत मरी हुई-अनेक रोगों से ग्रस्त महिलाओं की अगणित आत्मायें अपने पतियों के नृशंस अत्याचारों की ही शिकार होती है। भले ही कोई इस तथ्य की उपेक्षा करे पर सच्चाई तो अन्ततः सच्चाई ही रहेगी। दुर्बल माताएँ चिड़चिड़ी, दुर्गुणी और रुग्ण सन्तान ही उत्पन्न करेंगी। इससे किसी परिवार को प्रसन्नता अनुभव करने का नहीं विपत्ति का ही मुख देखना पड़ेगा। अच्छा हो हम समझ से काम लें और प्रस्तुत परिस्थितियों को देखते हुए सन्तान की संख्या वृद्धि का संकट मोल लेने से पहले हजार बार उस जिम्मेदारी के सम्बन्ध में विचार करें। यदि अपनी पत्नी की शारीरिक, मानसिक और आर्थिक स्थिति इसके लिए हर दृष्टि से उपयुक्त है तो ही आगे बढ़ें। अन्यथा कदम रोक लेने में ही दूर दर्शिता है।
आज की परिस्थिति में बच्चों को बढ़ाना सौभाग्य सूचक नहीं, दुर्भाग्य का प्रतीक बन गया है। प्राचीन काल में सन्तान की कामना और प्रार्थना की जाती हो, उनके जन्म का उत्सव मनाया जाना, यह तो समझ में आता है पर आज भी उसी तरह सोचना अनुपयुक्त है। एक रुपये के बीस-तीस सेर गेहूँ बिने के दिनों की बात आज एक सेर भाव के गेहूँ दिनों में ज्यों की त्यों लागू नहीं की जा सकती। तब सन्तान हीन अभागे कहे जाते थे। पर आज तो सच्चे अर्थों में वे ही भाग्यवान् हैं। उन्हें देश-भक्त एवं पुण्यात्मा कहा जा सकता है, क्योंकि उन्होंने राष्ट्रीय संकट को बढ़ाने का पाप नहीं किया।
अपना देश मूढ़ मान्यताओं के जंजालों में जकड़ा हुआ है। इसमें लोग पाँच हजार वर्ष पुराने ढर्रे पर ही अभी भी सोचने के आदी है। विवाह होते ही संतान की शीघ्रता पड़ती है। जिसने बच्चा पैदा कर लिया, उसने किला जीत लिया, जो उससे बचा रहा वह अभागा और अभाव ग्रस्त समझा गया। असंख्य नर-नारी इसी मूढ़ विचार धारा से प्रभावित होकर सन्तान के अभाव में रोते, कलपते पाये जाते हैं। सन्तान न होने पर पति-पत्नि अधिक स्वस्थ रह सकते हैं। शिशु-पालन से बचे हुए समय और धन को समाज सेवा की ज्ञान-यज्ञ जैसी अति महत्त्वपूर्ण आवश्यकताओं में व्यय कर सकते हैं और अपना लोक-परलोक हर दृष्टि से शानदार बना सकते हैं। बेटे से वंश चलने और पिण्ड मिलने वाली बात दिल्लगी बाजी जितना ही महत्व रखती है। पिण्ड अपने ही सत्कर्मों का मिलता है, बेटे का उसमें कोई हस्तक्षेप नहीं। वंश अपने यश का चलता है अन्यथा तीन-चार पीढ़ी बाद तो अपने ही अंश-वंश के लोग नाम भूल जाते हैं, फिर आगे उसके चलने की क्या आशा है।
हम आज की परिस्थितियों को समझें और सन्तान उत्पादन का उत्तरदायित्व तभी बहन करें जब उसकी योग्यता एवं क्षमता अपने में हो। ऐसी दशा में भी संख्या न्यूनतम ही रखना उचित है।
(प. श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा लिखित और युग-निर्माण योजना मथुरा द्वारा प्रकाशित)
(धन का उपार्जन और उपयोग पुस्तिका का एक अंश)
पिछले दिनों अमीरी को इज्जत का माध्यम माना जाता रहा है। इज्जत पाना हर मनुष्य की स्वाभाविक इच्छा है। इसलिये प्रचलित मान्यताओं के अनुसार हर मनुष्य अमीरी का इच्छुक रहता है, ताकि उसे दूसरे लोग बड़ा आदमी समझें और इज्जत करें। अमीरी सीधे रास्ते नहीं आ सकती। उसके लिए टेड़े रास्ते अपनाने पड़ते हैं। हर समाज और देश की अर्थ व्यवस्था एक स्तर होता है। उत्पादन, श्रम और क्षमता के आधार पर दौलत बढ़ती है। देश में वैसे साधन न हों तो सर्वसाधारण के गुजारे भर के लिए ही मिल सकता है। अपने देश की स्थिति आज ऐसी ही है, जिसमें किसी प्रकार निर्वाह चलता रहे तो पर्याप्त है। औसत देशवासी की परिस्थिति से अपने को मिलाकर काम चलाऊ आजीविका से सन्तोष करना चाहिये। हम सब एक तरह का जीवन जीते हैं और ईर्ष्या, असन्तोष का अवसर नहीं आने देते इतना ही सोचना पर्याप्त है। अमीरी की ललक पैदा करना सीधा मार्ग छोड़कर टेढ़ा अपनाने का कदम बढ़ाना है। पिछले दिनों अनैतिक मार्ग अपनाने वाले-अमीरों इकट्ठी कर लेने वाले इज्जत आबरू वाले बड़े आदमी माने जाते रहे होंगे। पर अब वे दिन लद चुके। अब समझदारी बढ़ रही है। दौलत अब बेइज्जती की निशानी बनती चली जा रही है। लोग सोचते हैं, यह आधे मार्ग अपनाने वाला आदमी है। यदि सीधे मार्ग से कमाता है तो भी ईमानदारी का लोभ है कि देश-वासियों ने औसत वर्ग की तरह जिये और बचत को लोक मंगल के लिए लौटा दे। यदि ऐसा नहीं किया जाता, बढ़ी हुई कमाई को ऐयाशों में बड़प्पन के अहंकारी प्रदर्शन में खर्च किया जाता है अथवा बेटे-पोतों के लिए जोड़ा जमा किया जाता है तो ऐसा कर्तव्य विचारशीलता की कसौटी पर अवांछनीय ही माना जाएगा अमीरी अब निस्सन्देह एवं निष्ठुर वर्ग माना जाएगा हमें सन्देह है कि अमीरी अब पचास वर्ष भी जीवित रह सकेगी। विवेकशीलता उसे छोड़ने के लिए बाध्य करेंगी अन्यथा कानून विद्रोह उसका अन्त कर देगा।
अमीरी इकट्ठी तो कोई बिरले ही कर पाते हैं पर उसकी नकल बनाने वाले विदूषक हर जगह भरे पड़े हैं। चूँकि अमीरी इज्जत का प्रतीक बनी हुई थी, इसलिए इज्जत पाने के लिये अमीरी इकट्ठी करनी चाहिये और यदि वह न मिले तो कम से कम उसका ढोंग ही बना लेना चाहिये, यह बात नासमझ वर्ग में धर कर गई है और वह इस नकलची मन पर बेतरह अपने आपको बर्बाद करता और अर्थ संकट के दल-दल में धँसता चला जाता है। लोग सोचते हैं कि हम अपना ठाठ-बाठ अमीरों जैसा बना लें तो दूसरे यह समझेंगे कि यह अमीर और बड़ा आदमी है और चटपट उसकी इज्जत करने लगेंगे, इसी नासमझी के शिकार असंख्य ऐसे व्यक्ति, जिनकी आर्थिक स्थिति सामान्य जीवन यापन के भी उपयुक्त नहीं, अमीरी का ठाठ-बाठ बनायें फिरते हैं। कपड़े जेवर, फर्नीचर, सुसज्जा आदि को प्रदर्शनात्मक बनाने में इतना खर्च करते रहते हैं कि उनकी आर्थिक कमर ही टूट जाती है। दोस्तों के सामने अपनी अमीरी का पाखण्ड प्रदर्शित करने के लिए पान-सिगरेट सिनेमा, होटल आदि के खर्च बढ़ाते हैं और उसमें उन्हें भी शामिल करते हैं ताकि उन पर अपनी अमीरी का रौब बैठ जाय और इज्जत मिलने लगे। कैसी झाड़ी समझ है यह और कैसा फूहड़ तरीका है। कोई समझदार व्यक्ति उस नासमझी पर हँस ही सकता है। पर असंख्य लोग इसी बहम में फँसे फिजूल खर्ची और फैशन में पैसा उड़ाते रहते हैं और अपनी आर्थिक स्थिरता को खोखली करते चलते हैं।
मामूली आमदनी के लोग जब अपनी स्त्रियों के बक्से कीमती साड़ियों से भरते हैं और जेवरों में धन गँवाते हैं, तब उसके पीछे यही ओछापन काम करता है कि ऐसी सजी-धजी हमारी औरत को देखकर हमें अमीर मानेंगे। पुरुष साड़ी, जेवर तो नहीं पहनते पर सूट-बूट घड़ी, छड़ी उनकी भी कीमती होती है, ताकि मित्रों के आगे बढ़-चढ़कर शेखी मार सकें। विवाह-शादियों के वक्त यह ओछापन हद दर्जे तक पहुँच जाता है। स्त्रियाँ ऐसे कपड़े लटकाये फिरती हैं, जैसे सिनेमा, नाटक के नट लोग पहनते हैं। बारातियों का औघड़पन देखते ही बनता है। ऐसा ठाठ-बाठ बनाते हैं मानों कोई बड़े मिल मालिक, जागीरदार अफसर अथवा सेठ-साहूकार हों। जानने वाले जब जानते हैं कि जरा-सी आमदनी वाला यह ढोंग बनाये फिरता है तो हर कोई असलियत समझ जाता है और दो ही अनुमान लगाता है या तो यह कर्जदार रहता होगा या बेईमानी से कमाता होगा। यह दोनों ही बातें बेइज्जती की हैं। सोचा यह गया था कि ठाठ-बाठ वाले बाबू को गैर सरकारी नौकरी नहीं मिलती। मालिक जानता है, इतना वेतन तो ठाठ-बाठ में ही उड़ जाएगा, फिर बच्चों को खिलाने के लिए इस हमारे यहाँ चोरी का जाल फैलाना पड़ेगा। यही बात स्त्रियाँ के सम्बन्ध में है। बहुत फैशन बनाने वाली महिलायें दो छाप छोड़कर जाती हैं या तो इनके घर में अनुचित पैसा आता है अथवा इनका चरित्र एवं स्वभाव ओछा है। यह दोनों ही लाँछन किसी कुलीन महिला की इज्जत बढ़ाते नहीं घटाते हैं। घर परिवार में यह सज-धज की प्रवृत्ति मनोमालिन्य पैदा करती है। अपव्यय हर किसी को बुरा लगता है। जो पैसा परिवार के शिक्षा, चिकित्सा, व्यवसाय, विनोद, पौष्टिक आहार आदि में लग सकता था, उसे फैशन में खर्च किया जाने लगे तो प्रत्यक्षतः परिवार के अन्य सदस्यों की सुख का अपहरण है। ठाठ-बाठ की कोई बाहर से प्रशंसा कर दे किसी को कुछ समय के लिये भ्रम में डाल दे यह हो सकता है पर साथियों में घृणा और ईर्ष्या ही पैदा होगी, वहाँ इज्जत बढ़ेगी नहीं घटेगी। बढ़े चढ़े खर्चों की पूर्ति के लिए अवांछनीय मार्ग ही अपनाने पड़ेंगे। कर्जदार और निष्ठुर जीवन जीना पड़ेगा। आमदनी सही भी है तो भी उसे व्यक्तिगत व्यय में सामाजिक स्तर के अनुरूप ही खर्च करना चाहिये। अधिक खर्च लोक-मुगल का हक मारना है।
अच्छा हो हम समझदारी और सज्जनता से भरा हुआ, सादगी का जीवन जिये अपनी बाह्य सुसज्जा वाले खर्च को तुरन्त घटा दें और उस बचत से अपनी-अपने परिवार की तथा समाज की वास्तविक आवश्यकताओं को पूरा करने में लगाने लगें। सादगी सज्जनता का प्रतिनिधित्व करती है। जिसका देश विन्यास सादगी पूर्ण है, उसे अधिक प्रामाणिक एवं विश्वस्त माना जा सकता है। जो जितना ही उद्दीपन दिखायेगा, समझदारों की दृष्टि में उतना ही इज्जत गिरा लेगा। इसलिये उचित यही है कि हम अपने वस्त्र सादा रखें, उनकी सिलाई भले मानसी जैसी करायें, जेवर न झनकारें, नाखून और होंठ न रंगे, बालों को इस तरह न सजाये, जिससे दूसरों को दिखाने का उपक्रम करना पड़े। नर-नारी के बीच मानसिक व्यभिचार का बहुत कुछ सृजन इस फैशन-परस्ती में होता है।
सादगी-शालीनता और सज्जनता का सृजन करती है। उसके पीछे गम्भीरता और प्रामाणिकता, विवेक शीलता और बौद्धिक परिपक्वता झाँकती है। वस्तुतः इसी में इज्जत के सूत्र सन्निहित हैं। सादगी घोषणा करती है कि यह व्यक्ति दूसरों को आकर्षित या प्रभावित करने की चालबाजी नहीं, अपनी वास्तविकता विदित करने में सन्तुष्ट है। यही ईमानदारी और सच्चाई की राह है। यह आमदनी बढ़ाने का भी एक तरीका है फिजूलखर्ची विदित करने में संतुष्ट है। यही ईमानदारी और सच्चाई की राह है। यह आमदनी बढ़ाने का भी एक तरीका है। फिजूलखर्ची रोकना अर्थात् आमदनी बढ़ाना। विवाह-शादियाँ उत्सव, आयोजन, प्रीति-भोजों और अमन-चलनों में अपना पैसा बुरी तरह कटता है, उसके पीछे यही ओछी प्रवृत्ति काम करती है कि जितना अधिक पैसा खर्च होगा, उतना ही अमीरी का रौब जमेगा और उसी हिसाब में इज्जत बढ़ेगी। समय आ गया कि इस बाल-बुद्धि को छोड़ कर प्रौढ़ता का दृष्टिकोण अपनाया जाय। हम गरीब देश के निवासी हैं। सर्वसाधारण को सामान्य सुसज्जा और परिमित खर्च के काम चलाना पड़ता है। अपनी वस्तुस्थिति यही है। अपने करोड़ों भाई-बहिनों की पंक्ति में ही हमें खड़े होना चाहिये और उन्हीं की तरह रहन-सहन का तरीका अपनाना चाहिये। इस समझदारी में ही इज्जत पाने के सूत्र सन्निहित हैं। फैशन परस्ती और अपव्यय की राह अपनाकर हम आर्थिक संकट को तो निमन्त्रित करते ही हैं।
स्वच्छता के साथ जुड़ी हुई सादगी अपने आपमें एक उत्कृष्ट स्तर का फैशन है। उसमें गरीबी का नहीं महानता का पुट है। सादा वेश भूषा और सुसज्जा वाला व्यक्ति अपनी स्वतन्त्र प्रतिभा और स्वतन्त्र चिन्तन का परिचय देता है। भेड़चाल को तोड़कर जो विवेकशीलता का रास्ता अपनाता है, वह बहादुर है। अपनी संस्कृति और परम्परा के अनुरूप यदि हमारा आचरण है तो कोई भी परखने वाला हमें दूरदर्शी, विवेकशील एवं दृढ़ चरित्र ही कहेगा। सादगी हमें फिजूल-खर्ची से बचाकर आर्थिक स्थिरता में ही समर्थ नहीं करती वरन् हमारी चारित्रिक दृढ़ता भी प्रमाणित करती है। अकारण उत्पन्न होने वाली ईर्ष्या और लाँछना से बचने का भी यही सल मार्ग है।
(प. श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा लिखित और युग-निर्माण योजना मथुरा द्वारा प्रकाशित)
(‘मन्दिर जन-साधारण के केन्द्र बनें’ पुस्तिका का सारांश)
भगवान हर जगह मौजूद है। उसी प्रकार निराकार विधि से कहीं भी-किसी भी प्रतीक माध्यम से पूजा जा सकता है। कागज का चित्र या मिट्टी की प्रतिमा घर पर रखकर भी भावनापूर्वक पूजा से उपासना का प्रयोजन पूरी तरह प्राप्त किया जा सकता है। विशालकाय मन्दिरों का निर्माण करने की प्रक्रिया भारतीय मनीषियों ने अति महत्त्वपूर्ण प्रयोजन की पूर्ति के लिए विनिर्मित की है।
भगवान् की मन्दिरों में स्थापना करके सर्वसाधारण के मन में आस्तिकता की मान्यताएँ परिपुष्ट करना हमारे देवालयों का प्रमुख प्रयोजन है। आस्तिकता का अर्थ है ईश्वर के आदेशों को करना- नैतिक जीवन जीना। दुष्कर्मों से बचे रहना और विश्वात्ममय-परमात्मा को सुरभित बनाने के लिए अपना अधिकाधिक योगदान देना। आस्तिकता का प्रथम चरण जप, ध्यान एवं पूजा पाठ हो सकता है पर उसकी पूर्णता भगवान् को, उनके आदेशों को जीवन में धुला लेना ही है। नेक, सदाचारी, भला और परमार्थ परायण जीवन क्रम ही किसी की आस्तिकता का प्रमाण हो सकता है। इस आस्तिकता के ऊपर ही व्यक्ति और समाज की उत्कृष्टता एवं सुख-शांति निर्भर है। भगवान् हमारे अति समीप अन्तःकरण में विद्यमान् है। उसे किसी की निन्दा स्तुति से कुछ लेना-देना नहीं। उसकी प्रसन्नता, अप्रसन्नता-कृपा-अकृपा इस बात पर निर्भर है कि कौन उसके आदेशों का कितना पालन करता है। इस तथ्य को समझने वाला सज्जनोचित सदाचारी जीवन ही जियेगा और समाज के प्रति अपने महान् कर्तव्यों को ध्यान में रखते हुए लोक-मंगल के लिए अपना बढ़ा-चढ़ा अनुदान देने में तत्पर रहेगा। आस्तिकता व्यक्ति और समाज की भावनात्मक भूमिका को ऊँची उठाने का प्रयोजन पूरा करती है। इसलिए उसे मानव-जीवन की एक महत्तम आवश्यकता माना गया है। पूजा-उपासना का सारा कलेवर इसी प्रयोजन के लिए खड़ा किया गया है। मंदिरों की स्थापना के भूल में मनीषियों का एक मात्र प्रयोजन यही था कि इन धर्म केन्द्रों के द्वारा आस्तिकता के आदर्शों का जन-मानस में व्यापक प्रकाश पहुँचाया जाय।
मन्दिरों के निर्माण में विपुल धन सम्पत्तियों में लगाये जाने में एकमात्र प्रयोजन यह है कि इन धर्म केन्द्रों के द्वारा आस्तिकता की सर्वतोमुखी प्रवृत्तियों का विस्तार किया जाय। पूजा-आरती भी वहाँ होती रहे सो ठीक है। लोग दर्शन करने आयें और यह स्मरण करें कि भगवान् की सत्त इस संसार में विद्यमान् है। अस्तु हमें उसके दण्ड से बचने और अनुग्रहों को पाने के लिए सज्जनोचित जीवन जीना चाहिये। मनुष्य की भावना को भूलकर ही कोई कुकर्म कर सकता है। यदि परमात्मा और उसकी न्याय व्यवस्था हमारी स्मृति में बनी रहे तो अनीति को दिशा में एक कदम भी बढ़ सकना सम्भव नहीं। भावनात्मक परिष्कार की दृष्टि से आस्तिकता का भारी महत्व है। व्यक्ति एवं समाज का कल्याण उसी पर निर्भर है। मंदिरों का प्रयोजन है कि भगवान् की प्रतिभा का दर्शन, पूजन करने के लिए जनसाधारण को आमंत्रित आकर्षित करें सा ही उन आगन्तुकों में आस्तिकता की मूल मान्यतायें हृदयंगम कराने के लिए बहुमुखी प्रवृत्तियों का संचालन करें।
मंदिर वस्तुतः एक धर्म केन्द्र है। जहाँ से मनुष्य के भावनात्मक निर्माण के लिए आवश्यक हर प्रवृत्ति का संचालन होता रहे। नित्य के कथा-प्रवचन वहाँ इसीलिए होते हैं। जुमा की नमाज के बाद मसजिदों में मुल्ला लोग भाव भरे और दिशा देने वाले प्रवचन करते हैं। गिरजाघरों में पादरी लोग रविवार को प्रार्थना के बाद उपस्थित धर्म-प्रेमियों को उनके व्यक्तिगत एवं सामाजिक कर्तव्यों का बोध कराते हैं। हिन्दू धर्म किसी समय सबसे आगे था, वहाँ कथा प्रवचनों के माध्यम से वह सब कुछ हर दिन नियमित रूप से सिखाया जाता था, जो समग्र स्थिरता एवं प्राप्ति के लिए आवश्यक था। इतना ही नहीं, वहाँ पाठशालाओं, पुस्तकालयों, व्यायामशालाओं, संगीत एवं कला-कौशलों की समस्त उन प्रवृत्तियों का संचालन होता था, जो भावनात्मक निर्माण में सहायक हो सकती है। सर्वतोमुखी विकास की सम्पूर्ण योजनाएँ और प्रक्रियाएँ मंदिरों के धर्म-केन्द्र ही संचालित करते थे। उनका भारी प्रभाव पड़ता है। आस्तिकता की भावनायें किस प्रकार कार्यान्वित की जा सकती है? उनका रचनात्मक, व्यावहारिक स्वरूप क्या हो सकता है? इसका प्रत्यक्ष स्वरूप देखने और प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए हर व्यक्ति मंदिरों में जाता था और उनकी उपयोगिता अनुभव करता था। उनके निर्माण को पुण्य कर्म माना और उनमें विपुल धन लगाया जाना, इसीलिए उपयुक्त माना जाता था कि उस रचना से अगणित व्यक्ति प्रकाश पाने और समग्र
उत्कर्ष के लिए अग्रसर होने में समर्थ होंगे।
धर्म प्रेमी लोग अपनी उपार्जित सम्पत्ति को मन्दिरों के बनाने और चलाने में समर्पित करके अपने को धन्य मानते थे, क्योंकि उससे अच्छा उपयोग किसी पैसे का हो नहीं सकता। जनता भी देव प्रतिमा के आगे कुछ न कुछ श्रद्धाञ्जलि अर्पित करती रहती थी, ताकि उस पैसे से रचनात्मक सत्प्रवृत्तियों का संचालन हो सके। पुजारी लोग पूजा-अर्चा में प्रातः सायंकाल देव प्रतिमा के लिए लगाकर शेष सारा समय मंदिर संस्था द्वारा संचालित सत्प्रवृत्तियों में लगाते रहते थे। वे सुयोग्य विद्वान् ही नहीं, सदाचारी और लोक-सेवी भी होते थे। उन्हें सामाजिक आवश्यकताओं का ज्ञान रहता था, तदनुरूप वे अपने व्यक्तित्व, प्रभाव एवं आधार का उपयोग जनमानस की दिशा सुव्यवस्थित करने में लगाते रहते थे। समर्थ गुरु रामदास ने महाराष्ट्र में सैकड़ों महावीर मंदिर स्थापित किये थे और उन स्रोतों से शिवाजी के स्वतन्त्रता संग्राम के लिए धन एवं जन शक्ति को विपुल मात्रा में उपलब्ध किया था। सिख धर्म के सारे गुरुद्वारे अनुपयुक्त शासन के लिए धन एवं जन शक्ति को विपुल मात्रा में उपलब्ध किया था। सिख धर्म के सारे गुरुद्वारे अनुपयुक्त शासन को हटाने में केन्द्र बिन्दु बनकर अपनी स्थापना का महत्व प्रतिपादित करते रहे। बुद्ध विहार विश्व व्यापी धर्म प्रसार योजना के सुव्यवस्थित केन्द्र थे। यहाँ सदा से यही परम्परा प्रचलित रही और मंदिरों ने अविस्मरणीय भूमिका सदा से प्रस्तुत की।
आज सब कुछ उल्टा हो गया है। मंदिर केवल शंख-घड़ियाल बजाने और आरती उतारने तक सीमित है। पुजारी लोग प्रातः साँय की थोड़ी-सी टंट-घट करके अपने कर्तव्य को इतिश्री कर लेते हैं। उन विशाल इमारतों को कोई उपयोग नहीं और जो प्रचुर बन उनमें लगा हुआ है, वह उन मठाधीशों की व्यक्तिगत सम्पत्ति बनता और उन्हीं के उपयोग में व्यय होता देखा जाता है। किन्हीं प्रेरक प्रवृत्तियों के संचालन की बात भी वहाँ सुनाई नहीं पड़ती। ऐसी दिशा में उन्हें प्राण रहित निर्जीव कलेवर की तरह ही जहाँ-तहाँ खड़ा देखा जा सकता है। उपयोगिता खोजने पर जन-आकर्षण का पट जाना भी स्वाभाविक है। किन्हीं मेले उत्सवों पर थोड़ी भीड़ दीखने के अतिरिक्त नियमित रूप से पहुँचने वाले यहाँ थोड़े से ही रहते हैं। जो पहुँचते हैं वे भी समय काटने की दृष्टि से ही जाते हैं। मिलता इन्हें भी कुछ नहीं। अनुपयोगी चीज सड़ने लगती है। इन धर्म स्थानों में धीरे-धीरे अनाचार का प्रवेश जिस प्रकार हो रहा है, उससे दुःख और दोष ही उत्पन्न होते हैं।
अपने मंदिरों में लगभग सौ अरब रुपये की सम्पत्ति लगी है। उनकी दैनिक आमदनी करोड़ों रुपया है। इमारतें इतनी विस्तृत है कि उनमें ईसाई मिशन के द्वारा संसार भर में हो रहे कार्यों से भी कई गुने रचनात्मक कार्य के हों और उन्हें रचनात्मक दिशा में लगाया जा सके तो सारे समाज का काया-कल्प हो सकता है। जनता जिस श्रद्धा से धन इनमें चढ़ाती है, उसके अनुरूप यदि धर्म संस्थापना की बहुमुखी प्रवृत्तियाँ भी इनमें संचालित हो सकें तो हमारा समाज कुछ ही दिनों में कहाँ से कहाँ पहुँच सकता है। साधनों के अभाव में काम रुका रहे यह समझ में आता है, किन्तु प्रचुर सावन होते हुए भी उनका सदुपयोग न हो सके यह बड़ी लज्जा और पीड़ा की बात है।
समय आ गया है कि इन धर्म-केन्द्रों का सदुपयोग करने की दिशा में हम विचार करें और साहसपूर्ण कदम उठाये जिनके हाथ में मंदिर संचालन व्यवस्था है, उन्हें सोचना चाहिये कि-क्या इन केन्द्रों में लगे हुए धन का सही उपयोग हो रहा है? भगवान् की पूजा उचित है और आवश्यक भी, पर यह अबुद्धिमत्तापूर्ण है कि प्रचुर धन-शक्ति और जन-शक्ति का उपयोग इतने भर के लिए ही समाप्त हो जाय। ईश्वर भक्ति, पूजा आरती तक ही सीमित नहीं है। व्यक्ति और समाज का भावनात्मक उत्कर्ष भी ईश्वर भक्ति का ही अंग है। देश-धर्म समाज और संस्कृति की उत्कृष्टता अभिवर्द्धन के लिए जो रचनात्मक कार्य हो सकते हैं उन्हें ईश्वर पूजा से कम महत्व का किसी भी प्रकार नहीं समझा जाना चाहिए। मंदिरों की उपयोगिता तभी अक्षुण्ण रह सकती है, जब उनमें पूजा के साथ-साथ आस्तिकता के अभिवर्द्धन एवं परिपोषण में सत्प्रवृत्तियाँ भी संचालित होती रहें।
(प. श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा लिखित और युग-निर्माण योजना मथुरा द्वारा प्रकाशित)
(भिक्षा व्यवसाय देश, जाति का कलंक’ पुस्तिका का एक अंश)
मनुष्यता का यह सबसे बड़ा अपमान है कि समर्थ होते हुए भी व्यक्ति दूसरों के आये अपने व्यक्तिगत व्यय के लिए हाथ पसारे। स्वाभिमान, आत्म-सम्मान कष्ट और अभाव सहकर भी सुरक्षित रखा जाना चाहिए। कोई दुर्घटना अथवा आकस्मिक विपत्ति के समय आपत्ति धर्म की बात दूसरी है पर सामान्यतया यही नीति धर्म है कि मनुष्य अपने हाथ-पैर से कमा कर गुजारा करे। दूसरों के आगे हाथ न पसारे और अपने आत्म-सम्मान को न गिराये।
अपने देश में अब भिखमंगेपन ने एक सुव्यवस्थित व्यवसाय का रूप धारण कर लिया है। पिछली सरकारी जनगणना के अनुसार अपने यहाँ 56 लाख व्यक्ति भिक्षा व्यवसाय से अपनी आजीविका चलाते हैं। इसमें असमर्थ एवं अधर्मों की संख्या एक लाख से भी कम है, द्वेष सभी इस योग्य है कि अपनी आजीविका अपने श्रम द्वारा उपार्जित कर सकें। पर वे करते नहीं।
भिक्षा व्यवसाय पर निर्भर लोगों में 50 लाख व्यक्ति साधु ब्राह्मणों का भेष बनाकर विचरण करते हैं और 6 लाख अपने को दरिद्र असमर्थ बताते हैं। दोनों ही धर्मों में अधिकांश लोगों की स्थिति ऐसी नहीं है कि उन्हें भीख माँगने पर उतारू होने के अतिरिक्त कोई मार्ग न हो। भजन के लिए यह आवश्यक नहीं कि भिक्षा जीवी बनकर ही उसे किया जाय। अपनी आजीविका से निर्वाह करते हुए भजन से ही उसका उद्देश्य पूरा हो सकता है। अन्यथा ऋण भार में वह भजन भी चला जाएगा, वह बात मोटी वृद्धि से भी समझी जा सकती है। 56 लाख तो वे भिखारी हैं, जिनने अपनी एक मात्र आजीविका भिक्षा घोषित की है। ऐसे लोग जो व्यवसाय तो दूसरे करते हैं पर समय-समय पर भिक्षा का लाभ भी लेते रहते हैं, ऐसे ‘अर्थ’ भिक्षुक’ भी लगभग इतने ही होंगे। इन एक करोड़ लोगों का भार 30 करोड़ हिन्दू जनता को बहन करना पड़े। हर तीस व्यक्तियों में से एक भिक्षुक ही, यह बहुत ही बुरी बात है। इससे अपने समाज के गये-गुजरे आत्म-सम्मान का घृणित चित्र उपस्थित होता है।
प्राचीन काल में साधु ब्राह्मण भिक्षा माँगा करते थे। इसलिये कि वे अपना सारा समय लोक-मंगल के लिए समर्पित कर सकें। आत्म-शुद्धि और आत्म-समर्थता के लिए वे थोड़ा समय भजन, स्वाध्याय में लगाते थे और शेष सारा समय लोक-मंगल में लगाते थे। निज की न उनकी कोई सम्पत्ति होती थी, न आकांक्षा भजन और स्वाध्याय भी वे इसलिये करते थे कि इन माध्यमों से विनिर्मित उनका प्रखर व्यक्तित्व लोक-मंगल के लिए अधिक उपयोगी एवं समर्थ सिद्ध हो सके। भिक्षा इसलिये माँगते थे कि आजीविका उपार्जन में उनका बहुमूल्य समय नष्ट न होकर वह समाज के काम आये। ऐसे लोक -सेवी कम संख्या में होते थे, उनके पुनीत कर्तृत्व को देखकर लोग भिक्षा देते हुए भी अपने को धन्य मानते थे। उन दिनों उन हजारों-लाखों लोक-सेवी साधु ब्राह्मणों के सत्प्रयत्नों से अपना समाज हर दृष्टि से सुविकसित और समुन्नत बनता था। तब साधु ब्राह्मणों की संख्या वृद्धि राष्ट्रीय सौभाग्य की वृद्धि गिनी जाती थी।
आज परिस्थितियाँ बिलकुल उल्टी हो गई हैं। प्राचीनकाल जैसे साधु-ब्राह्मण अब इतने कम हैं कि उन्हें उँगलियों पर गिना जा सके। अधिकांश तो परिश्रम से बचने के लिए ही यह धन्धा अपनाये हुए हैं।
पचास लाख व्यक्ति रचनात्मक कार्यों में लग सके होते तो आज परिस्थितियाँ कुछ और ही रही होतीं। भारत में सात लाख गाँव है। पचास लाख साधु वेशधारी यदि उनका कायाकल्प करने के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, सदाचार आदि समस्याओं को हल करने के लिए जुट पड़े तो हर गाँव के पीछे सात साधु आते हैं और वे अपने प्रयत्न से वहाँ स्वर्गीय वातावरण पैदा कर सकते हैं। साक्षरता की आवश्यकता एक-दो वर्षों में पूरी हो सकती है। गृह-उद्योग पनप सकते हैं, व्यायामशालायें, पाठशालाएँ, पुस्तकालय, सुरक्षा-दल सार्वजनिक स्वच्छता सामाजिक कुरीतियाँ, व्यसन, आलस्य आदि क्षेत्रों में आशाजनक संस्थापन और परिवर्तन देखा जा सकता है। इतने लोक-सेवियों के द्वारा देश की परिस्थितियाँ कुछ से कुछ बनाई जा सकती है। चीन की पचास लाख सेना संसार भर में आतंक पैदा करती हैं। अपने पचास लाख सन्त सारे संसार में भारतीय धर्म और संस्कृति की ध्वजा फहरा सकते हैं। पर दुर्भाग्य को क्या कहा जाय, जिसने साधु वेशधारी तो हमारे सामने खड़े कर दिये किन्तु प्राचीनकाल जैसा दृष्टिकोण और कर्तृत्व उनमें ढूँढ़े नहीं दीखता।
ऐसी दशा में क्या यह उचित है कि इतनी बड़ी जनसंख्या इस प्रकार जनता पर भार बनी बैठी रहे और अपनी उपयोगिता सिद्ध करने के लिए नाना प्रकार के प्रपंच रचती तथा मूढ़ विश्वास फैलाती हुई लोक-मानस को विकृत करती रहें। इसी प्रकार उन भिखारियों का प्रश्न है, जो काम करने में सर्वथा असमर्थ न होते हुए भी भिक्षा पर उतर आये हैं। यदि मनुष्य चाहे तो थोड़ी बहुत शारीरिक असमर्थता के बीच भी कुछ न कुछ श्रम और उपार्जन कर सकता है। इच्छा हो तो काम भी मिल सकता है और राह भी। अनिच्छा हो तो असमर्थता, अपंगता और दरिद्रता का ढोंग बनाने में अब वे भी बड़े प्रवीण हो गये हैं। ऐसे भी अनेक उदाहरण मिले हैं कि यह निष्ठुर लोग अपने बालकों के हाथ-पैर तोड़कर, आंखें फोड़कर उन्हें अपंग बना देते हैं ताकि उनके बहाने अधिक आजीविका उपार्जन हो सके।
जो सर्वथा अपंग, असहाय हैं, उनके निर्वाह का प्रबन्ध संस्थाओं अथवा सरकार को करना चाहिये। जो लोक-सेवा में संलग्न साधु-ब्राह्मण हैं, उनके निर्वाह का प्रबन्ध धर्म संस्थाओं को करना चाहिये। प्राचीनकाल में यातायात डाक, बैंक आदि का प्रबन्ध न होने से सर्वत्र मिल सकने वाली भिक्षा उपयोगी रही होगी। अब सुयोग्य लोक-सेवी साधुओं के निर्वाह का क्रम ईसाई मिशनों, पादरियों की तरह बड़ी आसानी से हो सकता है। उपरोक्त दोनों ही वर्गों के अधिकार व्यक्तित्वों को छोड़कर शेष उन सभी भिक्षुकों को निरुत्साहित किया जाना चाहिये, जो न तो लोक-सेवी है और न अपंग। प्राचीनकाल में साधु पुजते थे, इसलिये वे गुणी न होते हुए भी वेश धारण मात्र से उन्हें पूजा जाय, यह कोई तर्क नहीं। प्राचीनकाल के ब्राह्मण अपने महान् व्यक्तित्व और कर्तृत्व के कारण श्रद्धास्पद थे। वे गुण न रहने पर भी उनके वंशज वही सम्मान पायें, इसका कोई कारण नहीं। संज्ञा, कर्तृत्व है, भिक्षा अधिकार। यदि सेवा नहीं तो भिक्षा भी नहीं। यह तथ्य सार्वजनिक रूप से स्वीकार कर लिया जाय तो यह एक करोड़ लोगों की भिक्षुक एवं अर्थ-भिक्षुक जनसंख्या कुछ उपार्जन में लग सकती है। गरीब जनता पर पड़ने वाला एक भार बच सकता है। उपार्जन और श्रम से इन लोगों का आत्म-गौरव और कर्तृत्व निखर सकता है। वे अपने लिए और समाज के लिए उपयोगी व्यक्ति सिद्ध हो सकते हैं।
भिक्षा अनैतिक है। भिक्षा व्यवसायी की मनोभूमि दिन-दिन पतित होती जाती है। उसका शौर्य, साहस, पौरुष, गौरव सब कुछ नष्ट हो जाता है और दीनता मस्तिष्क पर बुरी तरह छाई रहती है। अपराधी की तरह उसका शिर नीचा रहता है। अपनी स्थिति का औचित्य सिद्ध करने के लिए उसे हजार ढोंग रचने पड़ते हैं और लाख तरह की मूढ़तायें फैलानी पड़ती हैं। यह भार जनमानस को विकृत बनाने की दृष्टि से और भी अधिक भयावह है।
हर विचारशील का कर्तव्य है कि भिक्षा व्यवसाय को निरुत्साहित करे। कुपात्रों को वाणी मात्र से भी उत्साह न दें। जिन पर प्रभाव पड़ सके, उन्हें भिक्षा छोड़ने और श्रम करने के लिए कहें। इतनी बड़ी जनसंख्या को इस अवांछनीय व्यवसाय से विरत करने के लिए हमें गम्भीरता सोचना चाहिये और उसके लिए कुछ ठोस प्रयत्न करना चाहिये।
(प. श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा लिखित और युग-निर्माण योजना मथुरा द्वारा प्रकाशित)
(‘उनसे जो पचास वर्ष के हो चले’ पुस्तिका का एक अंश)
भारतीय परम्परा के अनुरूप मानव-जीवन चार भागों में विभक्त है। इस विभाजन को चार आश्रम कहते हैं। मनुष्य की यदि सौ वर्ष पूर्ण आयु मानी जाय तो उसमें से 25 वर्ष ब्रह्मचर्य, विद्याध्ययन, शरीर पुष्टि के लिए। 25 वर्ष पारिवारिक उत्तरदायित्वों को निबाहने के लिये। 25 वर्ष परिवार को स्वावलम्बी, सुसंस्कृत बनाने की देख-भाल रखते हुए आत्म-विकास एवं लोक-मंगल की संयुक्त साधना के लिए तथा अन्तिम 25 वर्ष घर परिवार को मोह, ममता से छुटकारा पाकर परि भ्रमण करते हुए विश्व-मानव के लिए-परमात्मा के लिए अपना पूर्णतया समर्पण करने के लिए है। इन चार अवधि विभाजन को चार आश्रम ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास कहते हैं। यह ऐसा संतुलित विभाजन है कि जब तक उसे क्रियान्वित किया जाता रहा, यह देश संसार वासियों की दृष्टि में स्वर्ग और इस देश का नागरिक देवता की तरह आदर्श एवं अभिनन्दनीय माना जाता रहा। जीवन का यह विभाजन क्रम प्राचीनकाल की तरह आज भी आवश्यक एवं उपयोगी है।
यह सभी जानते हैं कि जीवन का आरम्भिक चौथाई भाग शारीरिक और मानसिक विकास के लिए है। संयम, व्यायाम, विद्याध्ययन, अनुशासन आदि सत्प्रवृत्तियों में निरत रहकर ब्रह्मचारी वर्ग भावी जीवन की आधार शिला सुदृढ़ करता है। जिसने यह मूल्यवान् समय उच्छृंखलता में गँवा दिया वह शेष सारा जीवन रोते-कलपते ही गुजरेगा युवावस्था, उपार्जन, उत्पादन, अभिवर्द्धन एवं स्थिरता उत्पन्न करने के लिए है। जो विवाह करना आवश्यक समझते हों और उसके लिए अपने को सुयोग्य, समर्थ मानते हों, बहिन तथा समाज के अन्य दुर्बल परिस्थिति वालों की सहायता किया जा सकता है। विवाह उचित तो है पर अनिवार्य नहीं। गृहस्थ जीवन का अर्थ विवाह नहीं वरन् पारिवारिक सुव्यवस्था के लिए अपना कर्तव्य एवं अनुदान प्रस्तुत करना है। ब्रह्मचारी अवधि में जो शक्तियाँ प्राप्त की थीं, उनका उपयोग परिवार संस्था के विकास में किस तरह किया जा सकता है, यह गृहस्थी जीवन की साधना है।
व्यक्तिगत जीवन की दृष्टि में यह आधा जीवन अपने व्यक्तित्व और परिवार के लिए नियोजित है। यों उससे भी जीवनोपयोग की पूर्ति के लिए समय-समय पर बहुत कुछ करते रहा जा सकता है। इसके उपरांत वानप्रस्थ की स्थिति आती है। उसमें समर्थ और वयस्क बच्चों को स्वावलम्बी बनाना चाहिये। उनके ऊपर पारिवारिक उत्तर दायित्वों का बोझ धीरे-धीरे बढ़ाते चलना चाहिये और अपना हाथ खींचना चाहिये। बूढ़े लोग अपना ही आधिपत्य नियन्त्रण घर, परिवार पर बनाये रहें तो बच्चे अनुभवहीन और अनुत्तरदायी बने रहेंगे और बूढ़ों के न रहने पर भारी कठिनाई अनुभव करेंगे। नवयुवकों में जोश तो बहुत होता है पर अनुभव के अभाव में वे अक्सर भूलें करते रहते हैं। इसलिये परामर्श, मार्ग-दर्शन एवं देख-भाल की आवश्यकता बड़े लोग पूरा करते रहें। बाकी काम उन्हें करने और सँभालने दें। बड़े बच्चे अपने छोटे भाई-बहिनों को सँभाले। इस प्रकार व्यवस्था बना देने पर जो समय और मस्तिष्क बचे उसे अपनी आध्यात्मिक समर्थता बढ़ाने के लिए साधना, स्वाध्याय, संयम एवं सेवा में लगाना चाहिये। यहीं पूर्णता के लक्ष्य की प्राप्ति की दिशा में आगे बढ़ने की तैयारी है। ब्रह्मचारी अवधि में लौकिक जीवन की प्रगति एवं स्थिरता के लिए तैयारी की गई थी। वानप्रस्थ में आध्यात्मिक जीवन की-परमात्मा-विश्व-मानव की सेवा-साधना करने के लिए अग्रसर होते हैं। यह अति महत्त्वपूर्ण समय है। इसमें बच्चे भी सुयोग्य बनते हैं, अपनी आन्तरिक प्रगति का भी अवसर मिलता है और उसी अवधि में लोक-मंगल के वे महत्त्वपूर्ण कार्य बन पड़ते हैं, जिनके ऊपर किसी समाज या राष्ट्र की वास्तविक प्रगति निर्भर रहती है।
जीवन का लक्ष्य पूर्णता प्राप्त करना है। अपूर्णतायें, मानवीय दुर्बलताएँ, आत्म-निरीक्षण आत्म-शोधन आत्म सुधार एवं आत्म-विकास के चार आधारों पर अवलम्बित है। चिन्तन और मनन के द्वारा आत्म-निरीक्षण और आत्म-समीक्षा अपने दोष दुर्गुणों को प्रकाश में लाती है। आत्म-सुधार के लिए शरीरगत बुरी आदतों और मनोगत दुष्प्रवृत्तियों से संघर्ष करके पुराने क्रम में आमूल चूल परिवर्तन करना पड़ता है। तपश्चर्या इसे ही कहते हैं। तप साधना का यही उद्देश्य है। यह वनवास की तरह घर में रहकर भी की जा सकती। वानप्रस्थ इसी प्रयोजन के लिए है। लोक-मंगल में सेवा संदर्भ में संलग्न रहने से आत्म-विकास होता है। जिस स्वार्थपरता के साथ हम अपने निजी प्रयोजनों में अब तक लगे रहे, उसी तत्परता के साथ लोक-मंगल और परमार्थ प्रयोजन में रस लेने लगें तो समझना चाहिये कि आत्म-विकास की प्रक्रिया चल पड़ी। अपनेपन की परिधि को व्यापक बनाना, यह पूर्णता की दिशा में अग्रसर होने का मार्ग है। इसके लिए संकीर्ण स्वार्थपरता की परिधि से निकलकर विश्व-मानव की सेवा में अपने समय मन, तथा धन को नियोजित करना होता है। वानप्रस्थ साधना का यही क्रम है और भारतीय परम्परा के अनुरूप हमारा ढलता जीवन-पचास से पचहत्तर तक की आयु इसी में नियोजित होनी चाहिये।
व्यक्ति और समाज दोनों के ही कल्याण की दृष्टि से वानप्रस्थ की उपयोगिता असाधारण है। इससे समय रहते बड़े अच्छे सुयोग्य बन जाते हैं और अपने पारिवारिक उत्तरदायित्व को समझने, निबाहने लगते हैं। उनमें जिम्मेदारी की भावना बढ़ती है और अनुभवी बनते हैं यह व्यावहारिक प्रशिक्षण युवा बालकों को न मिले और वे देर तक परावलम्बी बने रहें तो आगे चलकर उन्हें उत्तरदायित्व सँभालने और निबाहने में बड़ी कठिनाई पड़ती है। परिवार को स्वावलम्बी बना देना-उसकी एक बड़ी सेवा है। उसमें छोटे बच्चे भी अपनी जिम्मेदारी अनुभव करने लगते हैं और वे बिगड़ते नहीं।
उपरोक्त प्रकार की व्यवस्था बनाकर ढलती आयु के हर व्यक्ति को स्वाध्याय, उपासना और आत्म-शोधन की तपश्चर्या के लिए समय निकालना चाहिये और लोक-मंगल की साधना में नियमित रूप से कम-से-कम चार घण्टा समय देना चाहिए प्रातः और सायंकाल का समय व्यक्तिगत साधना के लिए और दिन का बचा समय लोक-मंगल की सेवा प्रक्रिया में लगाने के लिए नियुक्त रहना चाहिये। कहना न होगा कि समय की आवश्यकता को देखते हुए, आज की सबसे बड़ी लोक सेवा विचार परिवर्तन की दृष्टि से किये गये, प्रयत्नों पर ही निर्भर है। आर्थिक, शारीरिक या बौद्धिक सुविधाएँ बढ़ाने वाले कार्य भी यों सेवा क्षेत्र में आते हैं पर उनका भी
महत्व तभी है, जब लोगों की विचार पद्धति का परिष्कार हो। अन्यथा अगणित सुख-सुविधाएँ रहते हुए भी मनुष्य दुःखी ही बना रहेगा। सुखी की मूल भित्ति उच्च विचारणा ही है। समाज में विचारशीलता, विवेकशीलता और सद्भावना बढ़ सके ऐसे लोक सेवा के कार्यों को हाथ में लेना वानप्रस्थ साधना का अविच्छिन्न अंग है। इस साधना को करते हुए आत्म-कल्याण पूर्णता की प्राप्ति और ईश्वरीय प्रकाश की उपलब्धि का पूरा लाभ एवं आनन्द उठा सकता है। सत्कर्मों से हो शुभ संस्कार बनते हैं और वे ही हमारी प्रधान आध्यात्मिक पूँजी है। सद्भावना अभिवर्द्धन की लोक-सेवा उसी प्रयोजन की पूर्ति करती है। वानप्रस्थ में साधु ब्राह्मणों जैसी लोक-मानस को परिष्कृत करने की सेवा, साधना करनी होती है।
जब तक वानप्रस्थ प्रणाली जीवित रही। देश को लाखों लोक-सेवी अनुभवों और सुयोग्य कार्यकर्ता निःशुल्क मिलते रहे। उनके द्वारा ज्ञान कल्याण के असंख्य प्रयोजन पूरे किये जाते रहे। और अपना देश सुसम्पन्न, समर्थ एवं सुसंस्कृत बना रहा। लोग स्वार्थी और संकीर्ण बनकर ढलती आयु को भी घर, परिवार के लिए ही व्यय करने लगे तो लोक-मंगल के लिए उच्च भावना सम्पन्न लोक-सेवियों का मिलना ही बन्द हो गया। व्यवसायों लोगों के हाथ सार्वजनिक क्षेत्र चला गया और समाज की भारी हानि हुई। देश के भावनात्मक अधःपतन का एक बहुत बड़ा कारण वानप्रस्थ परम्परा का लोप हो जाना ही है। समय की माँग है कि पचास वर्ष से अधिक आयु का हर व्यक्ति भले ही घर में रहे पर आत्म-निर्माण और आत्म-विकास की आध्यात्मिक प्रक्रिया में संलग्न होकर अपने और समाज के कल्याण का महत्त्वपूर्ण प्रयोजन पूर्ण करने में संलग्न हों।
(प. श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा लिखित और युग-निर्माण योजना मथुरा द्वारा प्रकाशित)
(‘हम भाग्यवादी नहीं कर्मवादी बनें’ पुस्तिका का एक अंश)
एक ही औषधि हर मर्ज पर, हर व्यक्ति के लिए काम नहीं आ सकती इसी प्रकार परिस्थितियों के अनुरूप अनेक सिद्धान्तों का प्रयोग किया जाता है। विद्यार्थियों और वानप्रस्थों के लिए ब्रह्मचर्य धर्म है, किन्तु विवाहित के लिए सन्तानोत्पादन के लिए काम सेवन भी धर्म बन जाता है। साधुओं का सम्मान एवं दुष्टों का प्रताड़न परस्पर विरोधी सिद्धान्त, विपरीत परिस्थितियों में प्रयुक्त होते हैं। भाग्यवाद का सिद्धान्त भी एक ऐसा ही प्रयोग है, जो केवल तब काम में लाया जाता है, जब मनुष्य के पुरुषार्थ करने पर भी अभीष्ट सफलता न मिले। असफलता में निराशा और खीज़ उत्पन्न होती है और अपनी भूल तथा दूसरों के असहयोग के अनेक प्रसंग ध्यान में आते हैं। ऐसी दशा में असफलता की हानि के साथ लोग भावी सतर्कता के लिए शिक्षा तो नहीं लेते, उल्टे अपने या दूसरों के ऊपर झल्लाते, उद्विग्न होते देखे जाते हैं। इन परिस्थितियों में भाग्यवाद को चर्चा करके चित को हल्का किया जा सकता है। उस समय के लिए वह उपयुक्त औषधि है।
पर यह दवा यदि कुसमय काम में लाई जाय तो पुरुषार्थ के उत्साह को ठण्डा कर सकती है और व्यक्ति को अकर्मण्य बना सकती है। अपने देश में ऐसा ही कुछ बहुत दिनों से होता चला आ रहा है और हम अपने कर्तव्यों के प्रति निर्जीव, नपुंसक, अन्यमनस्क और निराशा पसत अनते आ रहे हैं। “जो भाग्य में लिखा है, सो होगा।” होतव्यता टलेगी नहीं। जितना मिलना है उतना ही मिलेगा। कर्म रेख मिटती थोड़े ही है। अब अच्छे दिन आयेंगे, तभी सफलता मिलेगी। जैसी मान्यतायें यदि मजबूती से मन में जड़ जमा लें तो किसी भी मनुष्य को अकर्मण्य और निराशावादी बना देगी। वह यही सोचता रहेगा, जब अच्छा समय आयेगा, सब कुछ अपने आप ठीक हो जायेगा। यदि अपने भाग्य में नहीं है तो मेहनत करने पर भी क्यों बनेगा? ऐसे भाग्यवादी व्यक्ति न अपने पुरुषार्थ पर विश्वास करते हैं और न पूरे उत्साह से किसी काम में लगते हैं, फलस्वरूप उन्हें कोई महत्त्वपूर्ण सफलता भी नहीं मिलती। आशा की ज्योति चलती ही नहीं तो प्रगति पथ पर प्रकाश कैसे उत्पन्न होगा?
यह विचार-धारा भारतीय दर्शन के सर्वथा विपरीत है। अपने यहाँ सदा पुरुषार्थ कर्म, प्रयत्न और संघर्ष को मानव जीवन की अनिवार्य आवश्यकता के रूप में प्रतिपादित किया जाता रहा है। अपना सारा अध्यात्म इतिहास और दर्शन इसी प्रतिपादन से भरा पड़ा है। फिर यह भाग्यवादी विकृत विचार-धारा कहाँ से चल पड़ी? इसकी खोज करने पर स्पष्ट हो जाता है कि सामन्तवादी शोषकों ने अपने अत्याचारों से पीड़ित जनता को किसी प्रकार शान्त, सन्तुष्ट करने के लिए यह मनोवैज्ञानिक नशे की गोली विनिर्मित की। उनके इशारे पर साधु-पण्डित भी इसी पक्ष के किस्से-कहानी गढ़कर पीड़ितों के रोग प्रतिरोध को शांत शमन करने में लगे रहे। पिछले एक हजार वर्ष का हमारा दार्शनिक इतिहास बड़ा विचित्र है। एक ओर तो बन्दा वैरागी, गुरु गोविन्दसिंह आदि सत्ता का बुरी तरह उत्पीड़न हुआ, दूसरी ओर उन्हीं दिनों अनेक सम्प्रदायों के आविष्कर्ता भी फले-फूले अब यह प्रमाण मिल रहे हैं कि आक्रमणकारियों ने उन्हें गुप्तरूप से बहुत धन और सहयोग इस बात के लिए दिया कि वे धर्म सम्प्रदाय भक्ति आदि की अपनी मान्यता के साथ-साथ दैववाद-भाग्यवाद का गहरा पुट अवश्य मिलाये रखें। होता यही रहा है। हमें अनेक किस्से-कहानियाँ सुनाकर पूरा भाग्यवादी बना दिया गया।
नृशंस विदेशी शासन के द्वारा उत्पीड़ित जनता बहुत क्षुब्ध और आवेश ग्रस्त थी। आये दिन कत्लेआम, मन्दिरों का गिराया जाना सयानी लड़कियों को जबरदस्ती ले जाना, बलात् धर्म-परिवर्तन करना जैसी घटनायें किसका खून न खोला देंगी? कौन प्रतिरोध के लिए तैयार न होगा? पर आश्चर्य इसी बात का है कि मुट्ठी भर अत्याचारियों के विरुद्ध समुद्र जितनी विस्तृत और परम तेजस्वी भारतीय जनता प्रतिरोध की दृष्टि से कुछ भी न कर सकी और वे दुष्ट उत्पीड़न लम्बी अवधि तक यथावत् चलते रहें। इस नपुंसकता के पीछे हमारी भाग्यवादी दार्शनिक भ्रष्टता का ही प्रमुख हाथ रहा, जिसने हमारी क्षोभ, रोष, प्रतिरोध एवं संघर्ष की शौर्य प्रवृत्ति को चकनाचूर करके फेंक दिया।
कत्लेआम हुए और हमें कहा गया, जिनको जिस प्रकार, जिस दिन, जिसके हाथों मरना है, वह उसी तरह मरेंगे। उस विधान को कोई मेट नहीं सकता। उनका प्रारब्ध ऐसा ही था, जिसके कारण उन्हें मरना पड़ा। मारने वाले तो निमित्त मात्र थे, उन पर रोष करने से क्या लाभ? लड़कियों को घरों से उठाकर ले गये और कहा गया, जिस लड़की का अन्न-अन्न जहाँ वदा है, जिसके साथ इसका जूरी-संयोग लिखा-वदा है, जहाँ दुःख-सुख इसे भोगना है, वहीं तो यह रहेगी। इस विधि-विधान के प्रतिकूल रोष करने से क्या बनेगा? मुट्ठी भर विदेशी रोमांचकारी लूट-खसोट और नृशंस उत्पीड़न करते रहे और हमें कहा गया- भगवान् की इच्छा के बिना पत्ता भी नहीं हिलता, फिर यह अप्रिय लगने वाली घटनायें भी उन्हीं की इच्छा से हो रही है। उनका पुण्य-फल रहा होगा और हमारा पाप उदय हो रहा होगा। इसी से भगवान् का यह विधान चल रहा है। इसे सहन कर लेना और चुप बैठे रहना ही उचित है।
इन धारणाओं ने हमें नपुंसक बना दिया और एक हजार वर्षों तक हम मुट्ठी भर विदेशी शासकों के पैरों तले बेतरह कुचले जाते रहे। इतना ही नहीं हमारा व्यक्तिगत पौरुष, उल्लास, उत्साह एवं पराक्रम भी सो गया। जब ग्रह-दशा भाग्य-चक्र हस्तरेखा ही अनुकूल न हों, तब प्रयत्न करने का झंझट भी क्यों उठाया जाय? जब समय बदलेगा, तब भाग्य लक्ष्मी का उदय होने से घर बैठे धन-सम्पदा बरस पड़ेगी, इस मान्यता के रहते कठिन कष्टसाध्य पराक्रम करने के लिए किसके मन में उमंग उठेगी? व्यक्तिगत उत्कर्ष और सामाजिक सुव्यवस्था के लिए कौन प्रयत्न करें? क्यों प्रयत्न करें? जब सब कुछ भगवान् की इच्छा से ही हो रहा है, भाग्य-चक्र जब पलटा ही नहीं जा सकता है तो प्रयत्न करने का महत्व ही क्या रहा? ऐसी दशा में कोई कुछ सुधारात्मक बड़ा काम किस आधार पर आरम्भ करें? किसी बड़े परिवर्तन के लिए कोई किस लिए साहस इकट्ठा करें?
शोषक और दुष्ट दुराचारी अपने द्वारा उत्पीड़ित शोषित लोगों की उसी आधार पर ठण्डा करते रहे कि तुम्हारे भाग्य में कुछ ऐसा ही लिखा था, जिसके कारण दुःख दारिद्र सहन कने पड़ रहे है। हम तो निमित्त मात्र है। असली कारण तो तुम्हारा भाग्य है। गायें कटती रहें तो हम बधिकों को किस मुख से कह सकते हैं कि तुम्हारा कृत्य अनुचित है। भाग्य और भगवान् की इच्छा ही जब एक मात्र कारण है, तब उस कुकृत्य के रोकने का विरोध करने की बात सोचना ही बेकार है। हर पाप और अपराध का करने वाला अपने पक्ष में यही दलील देकर अपने को निर्दोष सिद्ध कर सकता है, फिर उस बेचारे को कोई क्यों रोके? संसार के दीन-दुःखी पीड़ित, अपंग जब भगवान् की इच्छा से ही इस स्थिति में पड़े है, विधि का विधान भोग रहे हैं तो उनकी सेवा, सहायता करना व्यर्थ है। इससे तो भगवान् और विधाता दोनों ही नाराज होंगे कि हमारे विधान में क्यों हस्तक्षेप किया? ऐसी दशा में दीन-दुनिया की सेवा, सहायता करना भी एक अपराध बन जाता है।
किसी समाज का दर्शन-दृष्टिकोण भ्रष्ट हो जाय तो उसमें सर्वांगीण भ्रष्टता आती है। भाग्यवाद हमारी दार्शनिक भ्रष्टता है, जिसने हमारी कर्तव्य-निष्ठा को बुरी तरह कुचल-मसल कर फेंक दिया और हम किसी समय के विश्व मूर्धन्य आज दुःख दारिद्र की हीन परिस्थितियों में पड़े बिलख रहे है। बड़े-से-बड़ झटके खाकर भी जर्मनी और जापान पुनः अपनी पूर्व स्थिति पर पहुँच गये पर बाईस वर्ष बीत जाने पर भी हमारी राजनैतिक स्वाधीनता हमें प्रगति पथ पर अग्रसर न कर सकी। इसका एक बहुत बड़ा कारण हमारी दार्शनिक पराधीनता है। बौद्धिक दृष्टि से हम अभी भी गुलाम है। अंग्रेज, मुसलमान भले ही चले गये हों पर हमारे मस्तिष्क को भाग्य, देवता, ग्रह-नक्षत्र विधि विधान, ईश्वर इच्छा, समय का फेर आदि मूढ़ मान्यताओं की जंजीर में उसी तरह जकड़े हुए हैं। वे हमें स्वतन्त्र मिलन से रोकती है, पुरुषार्थ को व्यर्थ बताती है अवांछनीयता के विरुद्ध लोहा लेने को व्यर्थ बताती है। कोई अवतार पैगम्बर आवे तब हमारी दशा सुधरे। हम तो किसी के हाथ की कठपुतली मात्र है, वह जैसे न चाहेगा, वैसे नाचेगा। यह सोचते रहने वाले कर्म रूपी परमेश्वर की निरंतर अवज्ञा करते रहेंगे और दुःख दारिद्र के गर्त में पड़े बिलखते रहेंगे। नास्तिकवादी रूस, चीन आदि कितने थोड़ दिनों में अपने पुरुषार्थ के बल पर कहाँ से कहाँ पहुँच गये और हम भाग्यवादी की ढपली बजाते हुए, जन्म-कुण्डलियाँ ही दिखाते फिर रहे हैं कि कब अच्छा समय आयेगा? और कब कोई सुख साधनों की वर्षा हमारे ऊपर करेगा?
भाग्यवाद के सिद्धान्त का कुछ उपयोग है तो केवल इतना कि हम जब मनुष्य असफल या हताश हो जाय तो थोड़ी देर के लिए अशान्ति को हल्का करने के लिए उसका वैसा ही उपयोग कर लिया जाय, जैसा तेज बुखार के सिर दर्द में ‘ऐस्प्रो’ की गोली खाकर थोड़ी देर के लिए राहत पाली जाती है। इसके अतिरिक्त यदि अपने कर्तव्य क्षेत्र में उसका उपयोग किया जाने लगा तो उससे केवल अनर्थ ही उत्पन्न होगा। लोग अपना कर्तव्य और पुरुषार्थ खो बैठेंगे। आशा और उत्साह, साहस और शौर्य सब कुछ कुण्ठित हो जाएगा न अनीति के विरुद्ध संघर्ष कर सकना सम्भव रहेगा और न सेवा तथा सुधार के लिए किसी के मन में उत्कृष्टता जगेगी। इस मान्यता के रहते हम युग-युगान्तरों तक दयनीय परिस्थितियों में ही निर्जीव और निश्चेष्ट बने पड़े रहेंगे। इसलिए आवश्यक है कि इस बौद्धिक दासता के भ्रष्ट सिद्धान्त को ठोकर मारें जिसे शोषकों ने हमारे रोप की प्रतिक्रिया से बचने के लिए गढ़ा और फैलाया है। कल का कम ही आज भाग्य बन सकता है। कल का दूध आज दही कहला सकता है। इसलिए यदि भाग्य कुछ है ही तो केवल हमारी कर्मठता की प्रतिक्रिया प्रतिध्वनि मात्र है इसलिए हमें भाग्य की ओर न देखकर कर्मनिष्ठा को ही प्रधानता देनी चाहिये।
(प. श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा लिखित और युग-निर्माण योजना मथुरा द्वारा प्रकाशित)
(‘जिन्दगी हँसते खेलते जिये पुस्तिका का एक अंश)
अपने पास दूसरों को देने के लिए धन-दौलत न हो, किसी को कुछ दे सकने की स्थिति न हो तो भी हम एक वस्तु सदा सब को देते रह सकने में समर्थ हो सकते हैं और निरन्तर पुष्प और सन्तोष लाभ करते रह सकते हैं। उस वस्तु का नाम है-प्रसन्नता यदि अपने स्वभाव में प्रसन्न रहने का समावेश कर लिया जाय, हँसने-मुस्कराने की आदत डाल ली जाय तो जहाँ वहीं भी रहेंगे, वहीं प्रसन्नता बखेरते रहेंगे और जो कोई भी संपर्क में आयेगा प्रसन्न और प्रभावित होता चला जाएगा अपने आपकी संतुष्टि भी प्रसन्नता की मनोदशा पर निर्भर रहती है।
यह अनुमान सही नहीं है कि जो सुखी एवं साधन सम्पन्न होता है, वह प्रसन्न रहता है। वस्तुस्थिति इससे बिलकुल उल्टी है। जो प्रसन्न रहता है, वह सुखी और साधन सम्पन्न बनता है। प्रसन्नता विशुद्ध रूप से एक ऐसी मनोदशा है, जो पूर्णतया आन्तरिक सुसंस्कारों पर निर्भर रहती है। गरीबी में भी मुस्कुराते और कठिनाइयों के बीच भी जो खोलकर हँसने वाले असंख्य व्यक्ति देखे जा सकते हैं। इसके विपरीत ऐसे भी अगणित लोग हैं, जिनके पास प्रचुर मात्रा में साधन सम्पन्न भरी पड़ी है पर उनकी आंखें, नाड़ी, तेवर, तने और मुखाकृति इठी रहती है। क्रुद्ध, चिन्तित, असंतुष्ट और उद्विग्न रहना एक मानसिक दुर्बलता मात्र है, जो अन्तःकरण की दृष्टि से पिछड़े हुए लोगों में ही पाई जाती है। परिस्थितियाँ नहीं, मनोभूमि का पिछड़ापन ही इस क्षुब्धता का कारण है। उदात्त और संतुलित दृष्टिकोण वाले व्यक्ति हर परिस्थिति में हँसते-हँसाते रहते हैं। वे जानते हैं कि मानव-जीवन सुविधाओं, असुविधाओं की-अनुकूलताओं और प्रतिकूलताओं के ताने गाने से बुना है। संसार में अब तक एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं जन्मा, जिसे केवल सुविधायें और अनुकूलताएँ ही मिली हों और अभाव एवं कठिनाइयों का सामना न करना पड़ा हो। इसी तरह ऐसा व्यक्ति भी संसार में नहीं है, जिसे केवल दुःख-दारिद्रय से ही पाला पड़ा हो।
हर किसी के जीवन में कुछ अनुकूलताएँ रहती हैं, कुछ प्रतिकूलताएँ प्रश्न इतना भर है कि कौन, किसको, कितना महत्व देता है। जो अपनी प्रतिकूलताओं पर ही विचार करता रहेगा, उन्हीं की बाबत सोचेगा, उन्हें ही अधिक महत्व देगा, उसे प्रतीत होगा कि वह मात्र कठिनाइयों में ही घिरा हुआ है। अस्तु उसे दुःखी रहना पड़ेगा इन कठिनाइयों के निमित्त कारण जो भी प्रतीत होंगे, इस स्तर पर अपनी मनोभूमि जमा देने वाला व्यक्ति सदा क्षुब्ध ही दिखाई पड़ेगा उसके स्वभाव में चिड़चिड़ापन जुड़ जाएगा और जब भी अवसर मिलेगा, वह अपनी व्यथा अथवा नाराजगी व्यक्त करते हुए अपनी मानसिक अस्त-व्यस्तता प्रकट कर रहा होगा।
इसके प्रतिकूल अपनी अनुकूलताओं पर विचार करना आरम्भ किया और अपनी तुलना पिछड़े हुए लोगों के साथ करना आरम्भ की उसे लगेगा हम करोड़ों में अच्छे हैं। हमारे पास जो हैं, उसके लिए भी-लाखों करोड़ों तरसते हैं। इस तथ्य को जो समझ लेगा, वह अपने को सौभाग्यशाली मानेगा और सन्तोष का बहुत बड़ा आधार प्राप्त कर लेगा। सभी सुविधायें किसे मिली हैं? हर दृष्टि से सुखी यहाँ कौन है? कुछ न कुछ अभाव हर किसी को रहेंगे, इस अपूर्णता के कारण ही हम मनुष्य हैं। जिसे हर सुविधा मिले उसे तो फिर देवता था भगवान् कहा जाएगा मनुष्य जीवन का कदम तो अनुकूलता, प्रतिकूलता के ताने-बाने से बुना गया है। यह तथ्य जिनकी समझ में आ गया वे अपनी सुविधाओं पर ही विचार करेंगे, दूसरों के द्वारा किये हुए सद्व्यवहारों को ही स्मरण रखेंगे- संसार में बिखरी पड़ी शोभा और अनुकूलता को ही देखेंगे, ऐसी मनःस्थिति में उन्हें ऐसा बहुत कुछ मिलेगा, जिसके आधार पर हर घड़ी प्रसन्न और संतुष्ट रहा जा सके।
प्रसन्नता एक ईश्वरीय वरदान है। और यह हर सुसंस्कृत मनोभूमि के व्यक्ति को प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हो सकता है। जिसे शुभ देखने की आदत है, वह प्रियदर्शी सर्वत्र आनन्द-मंगल ही देखेगा, ईश्वर की अनुकम्पा और लोगों की सद्भावना पर विश्वास रखेगा, ऐसी दशा में हँसने और हँसाने के लिए उसके पास बहुत कुछ होगा। किन्तु जिसे अशुभ चिन्तन की आदत है, दूसरों के दोष-दुर्गुण और अपने अभाव अवरोध ढूँढ़ने की आदत है, जो इसी शोध में लगे रहते हैं और जो प्रतिकूलताएँ दिखती हैं, उन्हें बढ़ा-चढ़ाकर सोचते हैं, उन्हें अपने चारों और केवल दुष्टता और विपन्नता ही दिखाई देती है। ऐसे लोगों को क्षुब्ध ही रहना पड़ेगा, वे असमंजस, खिन्नता और उद्विग्नता ही अनुभव करते रहेंगे। रोष उनकी वाणी से और असन्तोष उनकी आकृति से टपकता रहेगा, ऐसे व्यक्ति स्वयं दुःखी रहते हैं और अपने संपर्क में आने वाले दूसरों को दुःखी करते रहते हैं।
मनुष्य जीवन की एक भारी विडम्बना है कि वह सृष्टि का मुकुटमणि और संसार के समस्त प्राणियों की तुलना में अधिक साधन सम्पन्न होते हुए भी अपने को दुर्भाग्य ग्रस्त माने और दुःखी रहे। यह एक विपन्नता हो है कि दूसरों की सद्भावना, सज्जनता और सहकारिता को भुलाकर कोई केवल दोष-दुर्गुणों को ही ढूँढ़ता रहे। कठिनाइयों को सोचे और सुविधाओं को भुला दें, लाभ की ओर ध्यान न दें और हानि को ही सोचता रहे। यह एकांकी मनोभूमि अर्धांग पक्षाघात के रोगी की तरह है, जिसका एक ओर का आधा शरीर तो काम करता है पर दूसरी और निर्बलता, रुग्णता और पीड़ा की स्थिति बनी रहती है। हम जितनी देर, जितनी बढ़ा-चढ़ाकर अपनी प्रतिकूलताएँ सोचेंगे, उसी अनुपात से अपने रोष और विक्षोभ को बढ़ा लेंगे। इसके प्रतिकूल अपने चिन्तन की धारा यदि उपलब्ध सुविधाओं और सद्भावनाओं की ओर प्रवाहित हो चले तो संतोष और उल्लास की अभीष्ट मात्रा उपलब्ध करने के लिये पर्याप्त आधार मिल जाएगा
हमें क्रुद्ध, रुष्ट, असंतुष्ट और क्षुब्ध नहीं रहना चाहिये। इससे मस्तिष्क में अनेकों नई विकृतियाँ उत्पन्न होती और बढ़ती चली जाती हैं। आग जहाँ रहेगी, वहीं जलाएगी असंतोष जहाँ रहेगा, वहीं विक्षोभ उत्पन्न करेगा और उससे सारा मानसिक ढाँचा लड़खड़ाने लगेगा। चिड़चिड़ा मनुष्य एक प्रकार का पागल ही है। दुःखी, निराश और चिन्तित रहने वाले को सनकी और मुखों की पंक्ति में बिठाया जाएगा ऐसा व्यक्ति अपने ही दुर्गुण से अपने आपको जलाता-गलाता रहता है। और अनेक शारीरिक मानसिक रोगों से ग्रस्त होकर घोर अशान्ति की प्रेत-पिशाच जैसी अनुद्विग्न जिन्दगी जीता है। बुद्धिमान वे हैं जो सबसे अधिक ध्यान अपने मानसिक संतुलन पर देते हैं और सोचते हैं, जो नहीं मिला उसे प्राप्त करने का प्रयत्न करेंगे। इसके लिये दुःखी रहना तनिक भी आवश्यक नहीं। क्षोभ से तो वे मनःशक्तियाँ भी नष्ट हो जायेंगी, जिनके बलबूते कठिनाइयों का निवारण एवं सुविधाओं का अभिवर्धन, उपार्जन सम्भव होता है। हर समझदार व्यक्ति विक्षोभ की स्वनिर्मित विपत्ति से बचने की चेष्टा करता है ताकि अपने हाथों अपनी बहुमूल्य आन्तरिक समस्वरता को गँवा देने की क्षति न कर बैठें।
हँसते रहना एक दैवी गुण है, जिस पर अमीरों की सुविधायें निछावर की जा सकती है। हँसने की आदत चित्त को हल्का बनाती है और शरीर को निरोग-दीर्घजीवी एवं सुन्दर बनने की सुविधा उत्पन्न करती है। अपना सबसे बड़ा उपहार यही हो सकता है कि प्रसन्न रहने, मुस्कराने और हँसने की आदत को अपने स्वभाव का एक अंग बना लें। यह व्यक्तित्व को आकर्षक बनाने का बहुमूल्य गुण है। खिले हुए फूल के आस-पास जिस तरह तितलियाँ और मधु-मक्खियाँ घिरी रहती हैं, उसी प्रकार हँसते-हँसाते रहने वाले व्यक्ति से, समीपवर्ती लोग अनायास ही आकर्षित और प्रभावित होते हैं। प्रसन्नता की आवश्यकता सभी को है, हँसी का आनन्द हर कोई लेना चाहता है। मुस्कुराहट के साथ निखरने वाला सौंदर्य हर किसी को भाता है। इस प्रकार की आकृति और प्रकृति जिस किसी की भी दिखाई पड़ती है, लोग उसकी ओर खिंचते चले आते हैं। मिठाई खरीदने वाले हलवाई की दुकान पर पहुँचते हैं। हर्ष और उल्लास की-प्रसन्नता और मुसकान की मुख हर किसी को प्रसन्न चित्त मनुष्य के पास खींच कर ले आती है। उसके मित्रों, समर्थकों, प्रशंसकों और सहयोगियों की कमी नहीं रहती।
दूसरों को हम सर्वदा निर्धन और सक्षम होते हुए भी जो बहुमूल्य उपहार निरन्तर देते रह सकते हैं, वह प्रसन्नता की अभिव्यक्ति ही है। चन्दन अपने चारों ओर सुगन्ध और पुष्प अपने आस-पास शोभा सौंदर्य बखेरता है। हँसमुख और प्रसन्न चित्त मनुष्य भी अपने समीपवर्ती वातावरण में, परिवार और परिचितों में हर्ष-उल्लास की लहर उत्पन्न करता रहता है। संसार में दुःख बहुत है, दुःखियों की कमी नहीं। रोने और रुलाने वालों की भीड़ लगी हैं। चिढ़ने और चिढ़ाने वाले अगणित हैं। खोज उनकी है, जो हँसने और हँसाने की विभूतियाँ बखेरते हुए अपनी आन्तरिक समर्थता और मानसिक प्रौढ़ता का परिचय दे सकें। ऐसे ही लोग इस संसार में आनन्द की अभिवृद्धि कर सकते हैं, उन्हीं का अनुदान समीपवर्ती लोगों की हृदय कलिका को खिला सकता है। कठिनाइयाँ अपने पुरुषार्थ से हल होती हैं पर दूसरों को उल्लास एवं उत्साह प्रदान कर हम किसी का भी चित हल्का कर सकते हैं और निराश जीवनों में आशा की नई किरण बखेर सकते हैं।
हँसना एक दैवी गुण हैं, हँसाना एक उत्कृष्ट स्तर का उपकार है। मुस्कुराता हुआ चेहरा भले ही काला कुरूप क्यों न हो, सदा अति सुन्दर लगेगा। प्रसन्नता एक आदत है, जो कुछ समय के निरन्तर अभ्यास से अपने अन्दर उत्पन्न की जा सकती है। अपनी सुविधाओं को देखें और प्रसन्न रहें। शुभ और प्रिय देखें। उज्ज्वल भविष्य की कल्पना करें, सद्भावना और सत्प्रवृत्तियों का चिन्तन करें, हमें हँसने के लिए प्रसन्न, रहने के लिए बहुत कुछ मिलेगा। यदि हम हँसना और हँसाना जीवन जी सकें तो समझना चाहिये कि हमने एक सच्चे कलाकार की जैसी मंगलमयी सफलता एवं उल्लास भरी उपलब्धि प्राप्त कर ली।
देह से मानव हृदय से माँ, प्रकृति परमार्थ जिसकी।
क्षण विदाई का उसी की, अब हमें तड़पा रहा है॥
नयन जब खोले, सम्हाला होश, तो देखा धरा पर।
दुःख दर्दों से भरा जीवन, बिलखता आज जर्जर॥
सिसकती ममता, घुटे जाते दबे से- प्यार के स्वर।
जिन्दगी वे मौत मरने को चली, लाचार होकर॥
टीस सागी मोम से दिन में भ्रमित मनुजत्व के प्रति।
लक्ष्य है इसका कहाँ? मान किधर को जा रहा है॥
उस घड़ी से चेतना वह, नींद भर कर सो न पाई।
चार दिन की चाँदनी भी, हाय जिसकी हो न पाई॥
चीर दे तम को, अखण्डित ज्योति एक ऐसी जलाई।
जिन्दगी सारी ही इसी संघर्ष में अपनी बिताई॥
सोचता रहता महत् व्यक्तित्व था तब हर घड़ी वह।
‘क्या हुआ इंसान को, इंसानियत जो खा रहा है॥
देख पाया सूखता मन, तो वही अमृत बहाया।
घाव जो देखा कही-तो प्यार का मरहम लगाया॥
त्रस्त मानव को-सही जीवन जिये वह ढंग सिखाया।
धर्म का उत्थान करके निज वचन शाश्वत निभाया॥
प्यार का है हाथ फेरा, हर घड़ी दुखती रगों पर।
काल क्रम, ऐसे निकटतम से हमें पिछड़ा रहा है॥
अब समय आया हमारा, स्नेह की कीमत चुकाएँ।
है अधूरी बात जो, उसको सभी मिलकर बनाएँ॥
दी हमें उसने दिशा जो-दृढ़ चरण उस पर बढ़ाएँ।
युग नया निर्माण करने की अटल सौगन्ध खाएँ॥
भेंट दे, विश्वास की-हम दे विदा, अपने ‘परम’ को।
प्राण में प्रश्वास-सा घुलता चला जो जा रहा है॥
है पथिक मजबूर जाने को-उसे उस पार जाना।
है यही कर्तव्य अपना चेतना सोई-जगाना
रह गये पद-चिह्न जो, संसार को उन पर चलाना।
और जो अंकुर उगा है-खून दे-उसको बढ़ाना॥
प्राण की आवाज ये उस पार तक पहुँचा करेगी।
“हम मिटाएँगे सघन तम, जो धरा पर छा रहा है”॥
क्षण विदाई का उसी की, निकट आता जा रहा है।
-माया वर्मा,
*समाप्त*