जीवन का अभिप्राय- दिव्य-प्रेम

प्रेम की गति मनुष्यों तक ही परिमित नहीं है मानव-जाति की अपेक्षा अन्य सृष्टियों में सम्भवतः यह कम विकृत अवस्था में है। पुष्पों और वृक्षों को देखो। जब सूर्य अस्त हो जाता है और सब कुछ नीरव हो जाता है, तब क्षण भर के लिए शाँत होकर बैठो और अपने आपको प्रकृति के साथ एक कर दो, तुम यह अनुभव करोगे कि पृथ्वी से, वृक्षों को जड़ के नीचे से, प्रगाढ़ प्रेम की कामना से पूर्ण एक अभीप्सा ऊपर उठ रही है यह अभीप्सा ऊपर की ओर बढ़ती हुई तथा वृक्षों के तंतुओं में से संचार करती हुई उनकी उच्चतम शाखाओं तक में हो रही है-कामना उस किसी वस्तु के लिये जो प्रकाश को लाती और सुख को फैलाती, उस प्रकाश के लिये जो चला गया है और जिसको वे चाहते हैं कि फिर लौट आवे। वहाँ यह इतनी पवित्र और तीव्र होती है कि यदि तुम वृक्षों में जो यह गति होती है, उसे अनुभव कर सको, तो तुम्हारी अपनी सत्ता भी उस शाँति और प्रकाश और प्रेम के लिये, जो यहाँ अभी तक अभिव्यक्त नहीं है, हार्दिक प्रार्थना करने लग जायेगी।

एक बार भी यदि तुम इस विशाल, विशुद्ध और सत्य दिव्य प्रेम के संस्पर्श में आ जाओ, यदि तुम इसको थोड़ी-सी देर के लिये भी और इसके लघुतम रूप का ही अनुभव कर पाओ, तो तुम यह अनुभव कर लोगे कि मनुष्य की वासना ने इसके स्वरूप को कितना नीच बना डाला है।

- श्री माता जी


दर्शन की प्यास

पूर्णमासी का चन्द्रमा जब पूरे आकाश पर छा जाता है, तब लोग उसे देखकर आदिशा के महान् तप को स्मरण करते हैं- आज आदिशा के समकक्ष सारी पृथ्वी में वैसे ही कोई दूसरा तपस्वी नहीं है, जैसे पूर्ण चन्द्र के सम्मुख कोई दूसरा चन्द्रमा नहीं। आदिशा का मनोनिग्रह इतना कठोर था कि राज-नर्तकियाँ वस्त्र-विहीन होकर उनके समझ पहुँचतीं तो भी उन्हें किसी प्रकार का क्षोभ न होता। वे उन्हें दो वर्षीय बालिका की तरह देखते। राज-भवन से पहुँचे सुगन्धित षट्रस व्यंजनों और अलोने-सत्तुओं में उन्हें कोई भेद न लगता था। ऐसा इन्द्रिय नियंत्रण शायद ही कोई और तपस्वी कर पाया हो।

इतने पर भी आदिशा का चित शाँत न था। वर्षों तप करते हो गये थे पर उन्हें भगवान् पाशुपत के दर्शन नहीं हो पाये थे। उनके पूजा-उपवास, यम-नियम, प्राणायाम-प्रत्याहार में कभी कोई त्रुटि नहीं आई थी। वर्षों बीत गये क्रम कहीं भी टूटा नहीं था। उन्होंने तप से पूर्ण निष्ठा दर्शायी भी तो वे आराध्य के दर्शनों से अब तक वंचित थे। वे स्वयं भी उसका कारण समझ नहीं पाये थे।

नर्मदा तट पर बने आदिशा के आश्रम में आज का दिन बड़े मंगल और आनन्द का है। प्रतिवर्ष भी भगवान पाशुपतनाथ की झाँकी सजाई गई है, उनका कीर्तन हो रहा है। दर्शनार्थी दूर-दूर से आ रहे हैं। सन्ध्या कालीन आरती में भाग लेने के लिये दूर-दूर से लोग दौड़े चले आ रहे हैं। भीड़ बढ़ती ही चली जा रही है।

राज-महल की परिचारिका सुनयना आज सम्पूर्ण दिन व्यग्र रही। प्रातःकाल भगवान की आरती देखने की इच्छा उमड़ी थी, जैसे-जैसे दिन चढ़ता गया, उसकी आकाँक्षा उतनी तीव्र होती गई। पर राजमहल के कार्यों से निवृत्ति कहाँ? आज अन्तःपुर भी तो उत्सव में सम्मिलित होने वाला था, सुनयना को तब फिर अवकाश कहाँ से मिलता?

सायंकाल उसे अवकाश मिला। दिन भर की भूखी-प्यासी सुनयना ने अपने कुटीर की ओर न जाकर सीधे नर्मदा-तट की ओर प्रस्थान किया। मार्ग में कौन मिला क्या मिला उसे कुछ भी सुधि न थी, उसके अंतर्मन में तो प्रभु की आरती थी और उसी के ध्यान में वह क्षिप्र गति से आगे बढ़ती जा रही थी।

आँगन पर मरकत-स्तम्भ के सहारे स्वयं सन्त आदिशा खड़े हुये आरती का दृश्य देख रहे थे, शेष जन समुदाय उनके दोनों बाजुओं की ओर खड़ा था। सुनयना वहाँ पहुँच तो गई पर सघन जन-समुदाय को चीरकर भीतर पहुँचना उसके लिए कठिन था। वह उसी मरकत स्तम्भ पर चढ़ गयी। खड़े होने के स्थान का अभाव दिखा, सो एक पाँव स्तम्भ पर दूसरा आदिशा के कन्धों पर टिकाकर वह भगवान की आरती देखने लगी।

आरती समाप्त हुई तब लोगों का ध्यान उधर गया। सन्त आदिशा के कन्धों पर क्षुद्र सुनयना की लात-बड़ी अशोभनीय बात थी। लोगों ने डाँटा- मूर्ख! तुझे दिखाई नहीं दिया, महात्मा के कन्धों पर पैर रख दिये। इससे पूर्व की सुनयना कुछ कहे और क्षमा माँगे, महात्मा आदिशा ने कहा- उसे बुरा मत कहो सुनयना मेरी गुरु हुई। आज तक मैं भले-बुरे, ऊंच-नीच के भेद-भाव में पड़ा रहा, इसलिये तप का अभीष्ट लाभ न मिल पाया। आज पता चला कि साधक की उत्कृष्ट अभिलाषा ही दर्शन का आधार है। जब तक दर्शनों की तीव्र प्यास न हो, ध्येय का मिलना कैसे सम्भव हो सकता है।

उस दिन आदिशा की रही-सही, साँसारिक दृष्टि का अन्त हुआ और उन्हें दिव्य प्रकाश के दर्शन हुये।


हमारी अदृश्य किन्तु अतिसमर्थ सूक्ष्म शक्तियाँ

प्रकाश एक शक्ति है पर अपने मौलिक रूप में पदार्थ भी है, क्योंकि वह टुकड़ों में विभक्त हो जाता है, यह प्रकाश-परमाणु ‘फोटो-सेल्स’ कहलाते हैं। उनमें भी इलेक्ट्रान, प्रोट्रॉन और न्यूक्लियस की रचना होती है। अर्थात् प्रकाश से भी सूक्ष्म सत्ताएं इस संसार में हैं, यह मानना पड़ता है।

वस्तुयें हम प्रकाश की सहायता से देख सकते हैं। किन्तु साधारण प्रकाश कणों की सहायता से हम शरीर के कोश (सेल) को देखना चाहें तो वह इतने सूक्ष्म हैं कि उन्हें देख नहीं सकते। इलेक्ट्रानों को जब 50000 बोल्ट आवेश पर सूक्ष्मदर्शी (माइक्रोस्कोप) में भेजा जाता है तो उनकी तरंग दैर्ध्य श्वेत प्रकाश कणों की तुलना में 1/100000 भाग सूक्ष्म होती है, तब वह हाइड्रोजन के परमाणु का जितना व्यास होता है, उसके भी 42.4 वें हिस्से छोटे परमाणु में भी प्रवेश करके वहाँ की गतिविधियाँ दिखा सकती है। उदाहरण के लिए यदि मनुष्य की आँख एक इंच घेरे को देख सकती है तो उससे भी 500 अंश कम को प्रकाश-सूक्ष्मदर्शी और 10000 अंश छोटे भाग को इलेक्ट्रान सूक्ष्मदर्शी। इसी से अनुमान लगा सकते हैं कि मनुष्य शरीर के कोश (सेल्स) का चेतन भाग कितना सूक्ष्म होना चाहिये। इस तरह के सूक्ष्मदर्शी से जब कोश का निरीक्षण किया गया तो उसमें भी एक टिमटिमाता हुआ प्रकाश दिखाई दिया। चेतना या महत्तत्व इस प्रकार के प्रकाश का ही अति सूक्ष्म स्फुरण है, यह विज्ञान भी मानता है।

मास्को के जीव वैज्ञानिक प्रो. तारासोव ने यह देख कर बताया था कि मनुष्य का प्रत्येक सेल टिमटिमाते हुये दीपक की तरह है, कुल शरीर ब्रह्माँड के नक्षत्रों की तरह- तो यह सूक्ष्मतम चेतना ही उसमें जीवन है।

यह जीवन तत्व शरीर के प्रत्येक अंग में छिटका हुआ है पर उसका एक नियत स्थान भी है, जहाँ से वह प्रभासित होता है। हम देखते हैं कि आत्मा नामक कोई वस्तु शरीर में है तो उससे प्रकाश-अणुओं के रूप में पाया जाना चाहिये पर जैसे सूर्य सारे ब्रह्माँड में बिखर गया है, यह चेतना भी सारे शरीर में संव्याप्त है और विचार तथा भावनाओं के रूप में निःसृत होता रहता है, इस तरह प्रत्येक व्यक्ति के साथ उसके विचारों के तरंग-दैर्ध्य चलती रहती है जो अधिक स्थूल स्वभाव और आचार-विचार के व्यक्ति होते हैं, उनका यह तरंग दैर्ध्य बहुत सीमित और दुर्गन्धित होता है इसलिये बुरे लोग अपने पास वाले को भी प्रभावित नहीं कर पाते, जबकि विचारशील लोग विशेष प्राणवान् लोग सभा-मण्डप में बैठे हजारों लोगों को अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति भाषणों द्वारा इतनी शक्ति और प्रेरणा दे सकते हैं कि सैंकड़ों लोग थोड़ी ही देर में अपने विचार पलटकर रख देते हैं। इस तरह के प्राणवान् व्यक्ति आदिकाल से ही लोगों की जीवन दिशायें बदलते और युगों में परिवर्तन लाते आये हैं।

हमारा शरीर एक प्रकार से आकाश है यदि त्वचा के आवरण बाँधकर उसे एक विशेष गुरुत्वाकर्षण शक्ति द्वारा पृथ्वी से बाँध नहीं दिया गया होता तो हम आकाश में कहीं विचरण कर रहे होते। सूक्ष्म रूप से हमारी चेतना विचार और संकल्पों के रूप में आकाश तत्व में तरंगित होती रहती है। भारतीय योगियों ने उस चेतना को विभिन्न प्राणायाम, धारणा, ध्यान, समाधि आदि योग क्रियाओं द्वारा मन के रूप में नियंत्रित किया था। आज्ञाचक्र नामक स्थान जो माथे में दोनों भौवों के बीच में पाया जाता है, ध्यान द्वारा देखा गया तो उस बिखरी हुई ज्योति के एकाकार दर्शन ऐसे ही हुए जैसे हजार दिशाओं में बिखरे होने पर भी सूर्य का एक पुंजीभूत रूप भी है और वह उन बिखरे हुए अस्त-व्यस्त कणों की तुलना में जो कि सारे सौर मण्डल की प्रकृति का निर्धारण करते हैं, कई अधिक ऊर्जा (प्रकाश, विद्युत, ताप) से सम्पन्न होता है। ऐसे ही मन जब शरीर के सब कोशों की ऊर्जा के रूप में नियन्त्रित हो जाता है तो उसकी शक्ति सामर्थ्य और विभेदन क्षमता का कोई पारावार नहीं रहता है। इस तरह का मन ही सर्वत्र गमनशील, सर्वदर्शी और सर्वव्यापी होता है। वही क्षण में कहीं का कहीं पहुँचकर बेतार के तार की तरह सन्देश पहुँचाता रहता है।

ऊर्जा का प्रकाश में बदलना एक अत्यन्त जटिल प्रणाली है पर वह वैज्ञानिक यह जान चुके हैं कि जब यह ऊर्जा किसी वस्तु में प्रवेश करती है तो उसके परमाणु उत्तेजित हो उठते हैं। फिर थोड़ा शाँत होकर जब वे अपने मूल स्थान को लौटते हैं तो उस सोखी हुई ऊर्जा को प्रकाश में बदल देते हैं इस क्रिया को ‘संदीप्ति’ कहते हैं। यह गुण संसार के सभी प्राणियों में पाया जाता है, हम उसे जानते नहीं पर यह वैज्ञानिकों को पता है कि मनुष्य जो कुछ सोचता है, वह कितना ही छुपाये छुप नहीं सकता। वह इसी प्रकार सूक्ष्म प्रकाश तरंगों के रूप में बाहर निकलता रहता है, यदि हम उन तरंगों से भी सूक्ष्म आत्म-चेतना द्वारा उन तरंगों में प्रवेश पा सकें, जैसा कि ऊपर के प्रयोग में बताया गया है तो हम आसानी से समझ सकते हैं कि यह व्यक्ति क्या सोच रहा है, भविष्य की इसकी योजनायें क्या हैं, आदि आदि। पर यह सब तभी संभव है, जब नितान्त शुद्ध रूप में हम मन पर नियंत्रण कर चुके हों।

पहले लोगों का विश्वास था कि प्रकाश छोड़ने का यह गुण (संदीप्ति) केवल जड़ वस्तुओं का गुण है पर अब यह स्पष्ट हो गया है कि यह गुण जीवधारियों में भी पाया जाता है। ‘अणु और आत्मा’ पुस्तक में श्रीमती जे.सी. ट्रस्ट ने इसी विज्ञान की व्याख्या की है और इस आत्म विज्ञान के पहलू को प्रकाश में लाकर उन्होंने वैज्ञानिकों को शोध की नई दिशा भी दी है। हम उस बात को सामान्यतः फुँगी मधुरिका, जुगनू आदि जीवों से समझ सकते हैं, जुगनू की तरह कई जीव समुद्र में भी पाये जाते हैं जो अपने शरीर में ‘एजाइमी आक्सीकरण’ की प्रक्रिया में मुक्त होने वाली ऊर्जा को प्रकाश में बदल देते हैं। यही प्रकाश इनमें टिमटिमाता दिखाई देता है। मादा जुगनू जब कभी कामोत्तेजित होती है तो उसके शरीर में एक जैव-रासायनिक क्रिया उत्पन्न होती है, जिसमें रासायनिक द्रव्य लूसी फेरस एन्जाइम, लूसीफिरिन और ए.टी.पी. कम्पाउण्ड भाग लेते हैं इससे एक विशेष प्रकार की रासायनिक ऊर्जा तरंग उत्पन्न होती है। अर्थात् उस विद्युत तरंग में उस मादा की गन्ध रहती है, इसलिये उस विशेष सिग्नल को नर जुगनू पहचान लेता है। और मादा के पास जा पहुँचता है।

योग साधनाओं द्वारा जब किसी को कोई सन्देश देना होता है तो उसके शरीर के पसीने से लगा कोई कपड़ा इसलिये आवश्यक होता है कि ठीक उस व्यक्ति के स्वभाव से मिलते जुलते तत्वों वाली ऊर्जा उसके पास भेजी जाये और उसके मस्तिष्क में सन्देश भरकर अपनी ओर से उसे इतना प्रभावित कर दिया जाये कि वह वैसा ही करने को विवश हो जाये यह सब शरीर में प्राप्त विद्युत के उन सूक्ष्म विकिरणों के फलस्वरूप ही सम्भव होता है, जिसकी चर्चा ऊपर कर चुके हैं।

एन्जाइम एक प्रकार के सूक्ष्म नाड़ी तन्तु हैं, जो साँस द्वारा प्राप्त ऑक्सीजन को सारे शरीर में पहुँचा कर जीवन शक्ति बनाये रखते हैं। मानसिक शक्तियों का शुद्ध परिष्कार भी अधिकाँश प्राणायाम के अभ्यास पर ही निर्भर है, उसमें वायु में पाये गये प्राण तत्व (प्राकृतिक ऊर्जा) के द्वारा मन को प्रखर और शुद्ध बनाया जाता है।


Quotation

अद्भिर्गात्राणि शुद्धियन्ति मनः सत्येन शुद्धयति।

विद्यातपोभ्याँ भूतात्मा तुद्धिर्ज्ञनेन शुद्धयति॥

जल से शरीर शुद्ध होता है और मन सत्य से शुद्ध होता है, विद्या और तप से प्राणियों की आत्मा शुद्ध होती और बुद्धि ज्ञान से शुद्ध होती है।

डॉ. हर्टलाइन ने सन् 1967 में पहली बार नेत्र कोशिकाओं में उत्पन्न विद्युत आवेगों को इलेक्ट्रॉनिक युक्तियों से रिकार्ड करके बताया कि प्रत्येक कोश में उस बिंब की सारी बारीकियों अर्थात् रंग आकार उभरी-धंसी रेखायें आदि निहित होती हैं, प्रत्येक कोश एक सेकिण्ड के भी करोड़वें हिस्से में उस प्रतिबिम्ब को अगले कोश को पार कर देता है और इस प्रकार सामने दिखाई देने वाले बिंब की सूचना प्रकाश की गति के हिसाब से मस्तिष्क के दृश्य स्थान (ओप्टिक सेन्टर) में पहुँच जाता है।

इस दृश्य को मन के द्वारा प्रकृति के प्राण विद्युत प्रवाह में घोल कर वह दृश्य जो हमारे मस्तिष्क में है किसी भी दूरवर्ती व्यक्ति को भेज सकते हैं। उपग्रह-संचार पद्धति के विकास में इस मान्यता को भी पुष्ट कर दिया है, अब लंदन में होने वाली शल्य चिकित्सा को हजारों मील दूर के अस्पतालों में देखा जा सकेगा अभी रॉयल फ्री हॉस्पिटल के सर्जनों द्वारा संपर्क परीक्षणों को मैनचेस्टर का बर्मिंघम स्थित मेडीकल स्कूल के विद्यार्थियों ने देखा। इसमें भारतीय विद्यार्थियों सहित 2000 विद्यार्थी सम्मिलित थे। इस प्रणाली से किसी भी दृश्य को फोटो सेल्स के माध्यम से आठ संचार उपग्रह (टेलस्टार) जो पृथ्वी की परिक्रमा लगा रहे हैं, को भेजा। संचार उपग्रह ने उसे एक नियत फ्रीक्वैन्सी पर सारे संसार में फैला दिया। इस तरह एक ही दृश्य का सारे संसार में पहुँचना तक सम्भव है दूरदर्शी दृश्यों को देखने के पीछे प्रकाश-परमाणुओं पर पड़े बिम्बों को ऊर्जा की एक धारा में बहाकर लाना या ले जाना होता है, जिसे नियंत्रित मन से पूरा किया जा सकता है। हम किसी के मन में अचानक सन्देश और दृश्य भेज ही नहीं-सुन और देख भी लेते हैं, वह सब इन प्रकाश अणुओं और उसमें व्याप्त चेतना की ही करामात होती है।

अपनी उपस्थिति को कोई व्यक्ति और यंत्र न पकड़ सके, प्रकाश अणु के नियंत्रण में ऐसी भी शक्ति है। ‘देहरादून उपकरण अनुसंधान एवं विकास संस्थान’ ने एक ऐसे उपकरण का आविष्कार किया है, जो अवरक्त प्रकाश (इन्फ्रारेड लाइट ) उत्पन्न करके प्रकाश किरणों के मार्ग में इन किरणों का जाल फैला देता है, फलस्वरूप आपका यह शरीर ही दुश्मन के पास खड़ा हो तो वह भी आपको देख न सकेगा, जबकि आप उसे अच्छी तरह देख रहे होंगे।

प्रकाश के यह जादू ही मन के वह चमत्कार हैं, जिसका प्रयोग योगियों ने चेतना के स्तर पर किया और बिना पाँव गमन, बिना आँखों देखना तथा बिना कान के सुनना, जैसे चमत्कारों का स्वामित्व प्राप्त किया। मन की यह शक्तियाँ आत्मिक स्तर पर बड़ी स्थूल है। मन की सामर्थ्य उससे हजार गुना अधिक है, उसे अच्छी प्रकार साध लिया जाये तो मारण, मोहन, वशीकरण, उच्चारण, ईशत्व, वशीत्व जैसी दुर्लभ सिद्धियाँ भी मनुष्य इस शरीर में रहकर ही प्राप्त कर सकता है।


ध्यान

यह अधिकार नारद को ही था कि वे भगवान कृष्ण के अन्तःपुर तक चले जाते थे। उन्हें टोकने का किसी को साहस न होता था।

एक बार ऐसे ही वे जब द्वारिका पहुँचे तो भगवान् कृष्ण कहीं दिखाई नहीं दिये, नारद सीधे रुक्मिणी के पास पहुँचे और पूछा- “आज यजमान के दर्शन नहीं हो रहे हैं, कहाँ है वे?”

रुक्मिणी ने पूजा गृह की ओर संकेत करते हुए कहा- “वहाँ बैठे जप कर रहे हैं”

नारद को बड़ा आश्चर्य हुआ वे पूजा गृह में पहुँचे तो देखा भगवान् श्रीकृष्ण सचमुच ध्यान लगाये बैठे हैं। नारद की आहट पाते ही उन्होंने आंखें खोल दीं और उनका हंसकर स्वागत किया।

नारद ने आश्चर्य से पूछा- “हे भगवन् आप किसका ध्यान करते हैं।”

भगवान कृष्ण ने गम्भीर होकर उत्तर दिया- “नारद! जो मेरा ध्यान करते हैं, मुझे भी उनका ध्यान करना पड़ता है।”


सूक्ष्म शरीर का आणविक विश्लेषण (2)

सूर्य, चन्द्रमा, शनि वरुण, यम गुरु जितने भी ग्रह नक्षत्र हैं, उनमें एक थरथराहट या कम्पन काम करता है, उसी के द्वारा वे अपना प्रकाश स्फुरित करते हैं। यह प्रकाश उनमें सूर्य से आता है। सूर्य यह प्रकाश किसी भी आकाश गंगा से लेता है। और अब ‘क्वासार’ किरणों की शोध से यह भी सिद्ध हो गया है कि ब्रह्माँड में ऐसे अनजाने शक्ति स्रोत हैं आकाश गंगायें उन्हीं से प्रकाश लेकर दौड़ती हैं। ऐसी-ऐसी आकाश गंगाएं या निहारिकायें दस करोड़ से भी अधिक हैं। सूर्य ग्रह नक्षत्रों का तो पता ही नहीं, वे कितने हैं।

सौर मण्डल में आने वाला प्रकाश और अन्य प्रकाश स्रोत जहाँ से भी चलता है, उस स्थान से भी प्रभावित होता है। उदाहरण के लिये पृथ्वी से प्रस्फुटित होने वाली प्रकाश किरणों में प्रकाश के मूल स्रोत के गुण तो होंगे ही, पृथ्वी तत्व का सूक्ष्म प्रभाव भी उसमें होगा। इसी तरह संसार के सभी पिण्ड सूक्ष्म स्थूल और कारण प्रक्रिया धारण किये हुये, प्रकाश कणों की उपस्थिति से पूरी तरह आच्छादित हैं, भले ही स्थान-स्थान पर उनका वर्ण, स्वभाव भिन्न-भिन्न प्रकार का हो।

प्रश्न उत्पन्न होता है कि दिखाई तो किरणें देती हैं, प्रकाश में परमाणु कहाँ से आ गये? पर इसका उत्तर देना सम्भव हो गया है। पिछले दशक की यह महत्वपूर्ण वैज्ञानिक उपलब्धि है। प्रकाश के ऐसे टुकड़े बनाये गये हैं, जो एक क्षण के 1 लाख हिस्से के करोड़वें भाग में सीमित है। इस समय की अवधि को ‘पिको सेकिण्ड’ कहते हैं, ऐसे प्रकाश खण्डों के उत्पादन तथा परीक्षण के लिए लेसर (एक प्रकाश यन्त्र) का प्रयोग किया जा रहा है। प्रकाश को सोखने वाले विरंजनों ‘नीयोडाइमियम ग्लास लेसर’ के भीतर प्रयोग करके इन प्रकाश खण्डों को प्राप्त किया जाता है।

उपरोक्त कथन से स्पष्ट है कि पोले आकाश में प्रकाश अणुओं की उपस्थिति अदृश्य है और अयथार्थ नहीं है। पृथ्वी के पास सूर्य-चन्द्रमा आदि सौर ग्रहों के प्रकाश कणों के साथ विद्युत आवेष्टित धूलि कणों की बहुतायत है तो सूर्य के समीप किसी और तरह के सम्मिश्रण की बहुतायत होगी। इस तरह आकाश एक प्रकाश अणुओं का अन्तर्जाल अथवा व्यूहाणु बन गया है।

जो कुछ आकाश में है, वह मनुष्य शरीर में है- ‘यत् ब्रह्माँडे तत् पिण्डे।’ के अनुसार जहाँ शरीर में स्थूल पंच भौतिक पदार्थ हैं, वहाँ उसके पोले भाग में यह अदृश्य प्रकाश अणु भी विद्यमान हैं, इसमें सन्देह नहीं। हड्डियों के पोले भाग में अदृश्य लोकों के प्रकाश अणु संकुल और सघन हो जाने से वहाँ उन लोकों का भान होने लगता है, इन्हें भारतीय भाषा में ‘सूक्ष्म लोक’ और अंग्रेजी में इन्हें ‘एस्ट्रल बॉडी’ के नाम से जाना जाने लगा है। योग ग्रन्थों में षटचक्रों की स्थान-स्थान पर चर्चा हुई है यह 6 चक्र, सूक्ष्म लोकों के ही प्रतिनिधि हैं। सातवाँ लोक शून्य लोक या सहस्रार चक्र मस्तिष्क में अवस्थित बताया गया है।

इनके अतिरिक्त शरीर में जितना भी पोला भाग है वहाँ विभिन्न वर्ण, रचना और गुण वाले वह प्रकाश अणु भरे पड़े हैं, जो आकाश में तैरते हैं। श्वास, भोजन आदि के द्वारा भी यह प्रकाश कण शरीर में विकसित होते रहते हैं और इनके योजनापूर्वक धारण की दूसरी प्राणायाम जैसी हठयोगी क्रियाएं भारतीय लोक में प्रचलित हैं, वह सब श्रीमती जे.सी. ट्रस्ट के मानव अणु विकास के द्वारा आत्मोन्नति के सिद्धाँत का ही प्रतिपादन करते हैं।

शरीर में सबसे अधिक प्रतिशत खनिज तत्वों का है, क्योंकि वे अधिक स्थूल होते हैं 60 प्रतिशत तो केवल जल है। इस 60 प्रतिशत में 40 भाग हाइड्रोजन और 20 भाग ऑक्सीजन के अणु होते हैं। शेष 40 प्रतिशत में फास्फोरस, कैल्शियम, सोडियम, आयरन, सोना-चाँदी और दूसरे खनिज होते हैं सबसे कम भार इन प्रकाश अणुओं का होता है पर उनकी उपस्थिति में कोई सन्देह नहीं रह गया है।

कर्नल अलबर्ट डेरोचस ने मृत्यु के पूर्व एक व्यक्ति का भार लिया और फिर उसे अत्यन्त सूक्ष्म नाम तक करने वाले तराजू से सम्बन्धित कर लिटा दिया। मृत्यु हो जाने के बाद शव के भार में सवा दो औंस की कमी आ गई। इस प्रयोग के आधार पर ही श्री डेरोचस ने सूक्ष्म शरीर का भार 2। औंस बताया। संसार के दूसरे कई वैज्ञानिकों ने भी इसकी पुष्टि की।

सूक्ष्म शरीर का भार इतना कम होते हुए भी उसके अणु इतने हलके और सूक्ष्म होते हैं कि वह सारे शरीर में आच्छादित रहकर रासायनिक क्रिया का प्रसार करते रहते हैं। शरीर के आस-पास इन्हीं की आभा-प्रदीप्तमान होती है। श्री डॉ. डेरोचस के अनुसार स्वतन्त्र अवस्था में यह प्रकाश अणुओं वाला सूक्ष्म शरीर तीन इंच का होता है पर प्रकाश-अणुओं के द्वारा उसका कई गुना विस्तार हो सकता है।

हाइड्रोजन संसार का सबसे हल्का तत्व है और वह सारे विश्व में व्याप्त है। उसके अणु का विस्फोट कर दिया जाये तो उसकी शक्ति संसार के किसी भी तत्व की तुलना में अधिक होगी। जो कितना हलका वह उतना ही आग्नेय, शक्तिशाली सामर्थ्यवान और विश्व-व्यापी यह कुछ अटपटा-सा लगता है पर है ऐसा ही।

किसी गुब्बारे में 300 पौंड हवा भरी जा सकती है तो हाइड्रोजन उतने स्थान के लिए 100 पौंड ही पर्याप्त होगा। उसी प्रकार जितने स्थान में एक औंस पानी या 2/3 औंस हाइड्रोजन रहेगा, उतने स्थान को मनुष्य के सूक्ष्म शरीर के प्रकाश अणुओं का 1224 वाँ भाग ही घेर लेगा। यदि प्रयत्न किया जाये तो इन अणुओं की सूक्ष्मतम अवस्था में पहुँच कर विराट् विश्व व्यापी आत्म-चेतना के रूप में अपने आपको विकसित और परिपूर्ण बनाया जा सकता है।

प्राण विद्या के द्वारा इस रहस्य की जानकारी संसार में आज तक केवल भारतवर्ष ही कर सका है। इन प्रकाश अणुओं की शक्ति तुलना हाइड्रोजन के परमाणुओं से करें तो लोग अनुमान कर सकेंगे, भारतीय योगी के पास इतनी अकूत शक्ति का भण्डार होता होगा। पूर्ण पुरुषों, अवतारों की क्षमता का तो अनुमान करना ही कठिन है।

सूक्ष्म शरीर, नैसर्गिक प्रकाश-अणुओं या आग्नेय अणुओं को ही भारतीय तत्व-दर्शियों ने एक शब्द ‘प्राण’ से सम्बोधित किया है। उसकी स्थान-स्थान पर विशद व्याख्या हुई है, जो ऊपर दिये गये विश्लेषण के अनुसार ही विज्ञान सम्मत है।

एषोऽग्निस्तपत्येष सूर्य एष पर्जन्यो मधवानष वायुः एष पृथिवी रपिदेवः सहसच्चामृतं चयत्।

-एतरेय,

यही प्राण अग्नि रूप में तपता है, सूर्य मेघ, इन्द्र, वायु, पृथ्वी, रवि (चन्द्रमा) यही है। सत्, असत् भी यही है और यही अमृत भी है।

एतमेकेदन्त्याग्नि मनुमन्ये प्रजापतिम्।

इन्दुमेके परे प्राणम् परब्रह्मशाश्वतम्॥

-मनुस्मृति अ. 12,

उसे ही अग्नि कहते हैं, वही प्रजापति (मन) कहलाता है। उसे ही इन्द्र या प्राण कहते हैं, कोई उसे ब्रह्म कहता है।


Quotation

प्रार्थना या नमाज का एक ही मकसद है और वह यह कि हम अपने आपको तमाम गन्दगी और कमीनेपन से बरी कर लें। प्रार्थना का मतलब ईश्वर को खुश करना नहीं है। वह तो विश्व के जर्रे-जर्रे में मौजूद है। अपने को पाक-साफ बनाने का तरीका यह है कि हम ईश्वर की मौजूदगी को अपने अन्दर गहराई से महसूस करें। इस तरह जो ताकत प्रार्थना से हमें मिलती है उससे बढ़कर दूसरी कोई ताकत नहीं।

-खान बादशाह (सरहदी गाँधी)

यथाग्नेः क्षुद्राविस्फुल्लिंगाव्युच्चन्तरेव मेवास्यादात्मनः सर्वप्राणाः॥

-वृहदारण्यक 2। 9। 2। 20,

जैसे अग्नि से छोटी चिनगारियाँ निकलती हैं, वैसे ही इस आत्मा से समस्त प्राण निकलते हैं।

इसी प्रकार, प्रश्नोपनिषद् के 6।7।8 मंत्रों तक विस्तार से कहा है+

अरा इव रथ नाभौ प्राणे सर्व प्रतिष्ठितम्।

ऋचो यंजूषि सामानि यज्ञः क्षत्रं ब्रह्म च॥6॥

प्रजापतिश्चरसि गर्भे त्वमेव प्रति जायसे।

तुभ्यं प्राण प्रजास्त्विया बलिं हरिन्तिमः प्राणे प्रतिष्ठिसि॥7॥

देवानामासि वन्हितमः पितृर्णा प्रथमः स्वधा।

ऋषीणाँ चरितं सत्यभथर्वागिंरसामसि॥8॥

जिस प्रकार रथ के पहियों की धुरी में अरे लगे रहते हैं, उसी प्रकार चारों वेद, यज्ञ, ज्ञान-बल ये सब प्राण में है। हे प्राण! आप ही प्रजापति हैं, आप ही गर्भ में विचरण करते हैं। जन्म लेते हैं प्राणी आपमें ही मिल जाते हैं। आपके ही साथ स्थित रहते हैं॥7॥ हे प्राण! आप ही देवताओं को हवि पहुँचाने वाली अग्नि हैं। ऋषियों द्वारा अनुभूत सत्य आप ही हैं।

उपरोक्त प्रसंगों में यद्यपि शास्त्रकार ने सर्वत्र ‘प्राण’ की व्याख्या एक वचन में की है पर उसके विभिन्न प्रकाश स्रोतों से निःसृत होने के प्रमाण भी उपर्युक्त श्लोकों में है। प्रकाश अणुओं में मनोमयता के सिद्धान्त का प्रतिपादन अगले अंक में करेंगे।

(क्रमशः)


अपनी-अपनी पात्रता

शिष्य ने प्रश्न किया- “गुरुवर! जब संसार में सभी मनुष्य एक ही तत्व के एक से बने हैं तो यह छोटे-बड़े का भेद-भाव क्यों है?”

गुरु ने उत्तर दिया- “वत्स! छोटा-बड़ा संसार में कोई नहीं, यह सब अपने-अपने आचरण का खेल है, जो सज्जन होते हैं, वह बड़े हो जाते हैं, जबकि नेकी और सज्जनता के अभाव में वही छोटे कहलाने लगते हैं।” गुरु ने बात ठीक समझा दी पर शिष्य की समझ में अच्छी तरह जमी नहीं।

कुछ दिन पीछे राजा की सवारी निकली। गुरु अपने शिष्य को लेकर राज-पथ के बीचों-बीच जा बैठे। पहले पहल सैनिकों का दल आया। एक सिपाही ने आगे बढ़कर वृद्ध संन्यासी को धक्का मारा और कहा-”मूर्ख! मार्ग में आ बैठा, पता नहीं, महाराज की सवारी आ रही है।” सैनिकों के पीछे प्रधान सेनापति था, उसने धक्का तो नहीं दिया, हाँ वहाँ से हटने के लिए साधु को डाँट अवश्य बतलाई।

इसके बाद मन्त्री निकले, उन्होंने बिना कुछ कहे अपना रथ एक ओर से निकाल लिया और आगे बढ़ गये। सबसे पीछे आ रहे महाराज ने संन्यासी को देखा तो रथ से उतर कर उनके पास आये और पूछा- “भगवन्! यहाँ बैठे हैं, कोई कष्ट तो नहीं। हम आपके सेवक हैं, कोई कष्ट हो तो कहें।” संन्यासी ने उत्तर में केवल आशीर्वाद दिया और महाराज को भी वहाँ से जाने दिया।

शिष्य बगल में खड़ा यह सब देख रहा था। गुरु के पास आकर उसने कहा- “सच है गुरुदेव! व्यक्ति अपने आपमें न छोटा है न बड़ा। गुणों के आधार पर ही कुछ बड़े हो जाते हैं, जबकि दूसरे छोटे के छोटे बने रहते हैं।”


अध्यात्म का भावनात्मक आधार

ऐसे लोगों की कमी नहीं है, जो प्रतिदिन भजन-पूजन करते और थोड़ी देर नहीं दो-दो, चार-चार घण्टे किया करते हैं। बहुत समय तक इस प्रकार पूजा-पाठ और भजन पूजन करते रहने पर भी जब वे अपने मोह-पाशों और और अशाँति-असन्तोष के कंटकित जीवन से मुक्ति नहीं पाते तो प्रतिक्रिया रूप भजन-पूजन को बेकार का काम और अध्यात्म को झूठा आडम्बर मानने लगते हैं। उनकी आस्तिक आस्था डगमगाने लगती है और वे नास्तिकता की ओर उन्मुख होने लगते हैं। वास्तव में आध्यात्मिक प्रयासों का यह परिणाम बड़ा खेदजनक है।

अध्यात्म क्षेत्र में इस प्रकार का निराशापूर्ण परिणाम उन लोगों को अंगीकार करना ही होता है, जो केवल मात्र स्थूल रूप से भजन-पूजन करते रहने में ही अध्यात्मवाद की चरमावधि मान लेते हैं। वैसे सत्य यह है कि आध्यात्मिक प्रयासों का, जीवन की सुख-शाँतिपूर्ण दिशा में सफल होना अनिवार्य है। अध्यात्म का वास्तविक उद्देश्य मानव-जीवन का सर्वांगीण विकास ही है। इससे आत्मा को उस अलौकिक आनन्द की उपलब्धि होनी ही चाहिए, जिसके सामने संसार के सारे सुख, सारे आनन्द तुच्छ होते हैं।

भजन-पूजन आध्यात्मिक उन्नति की ओर बढ़ने के लिए एक उपाय है, स्वयं में अध्यात्म नहीं। अध्यात्मवाद का आशय कुछ ऊंचा और विस्तृत है। उसे आत्म-विज्ञान अथवा जीवन-विज्ञान ही मानना चाहिये। अध्यात्म द्वारा ही मनुष्य का आत्म-सुधार, आत्म-विकास हो जाने से मनुष्य के पास सुख-शाँति उसी प्रकार आ जाती है, जिस प्रकार सूर्य उदय होने पर संसार को प्रकाश स्वतः प्राप्त हो जाता है।

भजन-पूजन में आत्म-शाँति की आशा से निराश होने वाले बहुधा पूजा-पाठ को ही अध्यात्म मान लेते हैं और सोचते हैं कि वे कुछ जितना कर रहे हैं, वह उनके आत्म-कल्याण के लिए पर्याप्त है। अपनी इस गलत धारणा के कारण वे काम-क्रोध-मद-लोभ आदि बाधक विकारों से मुक्त होने का प्रयत्न नहीं करते। बाधक-विकारों से युक्त व्यक्ति कितना ही और कितनी देर ही पूजा पाठ क्यों न करे, अध्यात्म की वह आलोकित दिशा नहीं पा सकता जो वस्तुतः वाँछनीय होती है।

भजन-पूजन का मूल आशय यह होता है कि मनुष्य अपनी बुराइयों तथा विकारों से मुक्त हो। धार्मिक क्रियाओं में निरत होना एक प्रकार से आचरण निर्माण का संकल्प है। जो व्यक्ति पूजा-पाठ करता है, उसके माध्यम से परमात्मा से संपर्क बढ़ाता है, वह उस उच्चादर्श के कारण बाध्य है कि अपनी बुराइयाँ दूर करे और गुण ग्रहण करे। जो ऐसा नहीं करता, वह उस पुण्य क्रिया से वंचित करता है और परमात्मा के उस पवित्र सम्बन्ध का अपमान करता है। ऐसी वंचक उपासना करने वाले लोग आनन्द और सुख के कल्याणकारी परिणाम से वंचित ही रहते हैं।

उपासना अथवा पूजा-पाठ वाले बाध्य हैं कि वे हर मूल्य और हर प्रयत्न पर निर्विकार बनें, शुद्ध और प्रबुद्ध बनें। किन्तु खेद है कि पूजा-पाठ का नियम निभाने वाले इस आवश्यकता की ओर ध्यान नहीं देते। बल्कि अहंकार के वशीभूत होकर ऐसा समझ बैठते हैं कि वे तो भगवान् के भक्त हैं। उसकी पूजा उपासना करते हैं। इसके उपलक्ष में उनके विकार क्षमा कर दिए जायेंगे। विकारों के रहते हुए उन पर भगवान् की कृपा होगी और उनकी साधना में सुख शाँति के मनोवाँछित फल लगेंगे। किन्तु उनकी यह धारणा कभी सत्य सिद्ध नहीं हो सकती। अध्यात्म में सफल होने, पूजा-पाठ का उचित फल पाने और परमात्मा से सच्चा सम्बन्ध स्थापित करने के लिए विकारों का त्याग और गुणों का ग्रहण करना आवश्यक है।

भजन-पूजन अथवा पूजा-पाठ आत्म विकास का एक उपाय है। अध्यात्मवाद का एक अंग है। स्वयं आध्यात्म नहीं। यह साधन है साध्य नहीं। किन्तु इस उपाय से आध्यात्मिक उन्नति करते हुए आत्म-कल्याण की ओर तभी बढ़ा जा सकता है जब बुराइयों को छोड़कर सर्वथा निर्विकार बनता चले। काम-क्रोध-मद-मोह आदि के बन्धन पाश से जकड़ा हुआ मनुष्य आत्म कल्याण का सुखद परिणाम नहीं पा सकता। किन्तु यह साधना तब तक अधूरी है एकाँगी है, जब तक आत्म विकास और आत्म सुधार की प्रक्रिया भी इसमें नहीं जोड़ दी जाती। उपासक का कर्त्तव्य है कि वह भजन-पूजन तो करे ही साथ ही मानसिक मलों और शारीरिक दुष्टताओं का भी परिशोधन करता चले। उसकी उपासना तभी पूर्ण होगी, तभी फलवती होगी और तभी आनन्द-दायिनी।

मानव-जीवन की सफलता धन-संपत्ति संचय करने अथवा पूजा प्रतिष्ठा पा लेने में नहीं है। उसकी सफलता का लक्षण है समस्याओं, उलझनों, अशाँति एवं असन्तोष से मुक्त जीवन यापन की विधि। जो व्यक्ति जितनी मात्रा में पाश-मुक्त प्रसन्न जीवन जीता है, वह उतना ही सफल माना जायेगा। सुख के प्रचुर साधन प्राप्त हों समाज में सम्मान और प्रतिष्ठा बनी हो, लेकिन हृदय में क्षोभ, उद्वेग, असन्तोष और भयभीरुता भरी हो तो इस स्थिति में किसी मनुष्य का जीवन सफल नहीं माना जा सकता है। बाह्य स्थिति कितनी ही सामान्य और साधारण क्यों न हो। एक बार अभाव तथा आवश्यकता का सामना क्यों न करना पड़ जाये, तथापि यदि मनुष्य अपनी मानसिक शाँति की रक्षा कर लेता है और प्रतिकूल परिस्थिति में अनुकूलता की खोज कर लेता है तो वह सफल मनुष्य ही माना जायेगा। मानव जीवन की सफलता बाह्य वैभव में नहीं आन्तरिक विभूति में है।

जिस प्रकार धन-दौलत, जमीन-जायदाद, मान-सम्मान, पद-प्रतिष्ठा बाह्य जीवन की विभूतियाँ हैं, उसी प्रकार शाँति-सन्तोष, प्रसन्नता, हर्ष, उल्लास आदि की सुखदायिनी स्थिति मानसिक विभूतियों के नाम से पुकारी जाती है। मानव जीवन की सच्ची विभूतियाँ मानसिक विभूतियाँ ही हैं। इनके अभाव में धन-दौलत के कितने भण्डार क्यों न भरे हों, मनुष्य दरिद्री ही बना रहेगा। अस्तु मानव-जीवन की वास्तविक सफलता के लिए मनुष्य भौतिक अथवा बाह्य उपार्जन के लिए तो प्रयास करे, वह करेगी साथ ही आन्तरिक विभूतियों के उपार्जन, संचय और अभिवृद्धि के लिए निश्चय ही प्रयत्न करता रहे। ज्यों-ज्यों मानसिक विभूतियों की अभिवृद्धि हो जायेगी, त्यों-त्यों मानव जीवन सफलता और पूर्णता की ओर अग्रसर होता जायेगा।

मानसिक वैभव प्राप्त करने का एक मात्र उपाय है- जीवन में आध्यात्म का समावेश। आध्यात्म की सीमा, मात्र पूजा पाठ तक ही नहीं है। उसका प्रसार जीवन के प्रत्येक क्षेत्र और प्रत्येक दिशा तक पहुँचता है। यदि उसे संजीवनी विद्या अथवा जीवन-विज्ञान भी कह लिया जाय तो भी असंगत न होगा, अध्यात्म वस्तुतः एक महान विज्ञान ही है। वह विज्ञान जिसके आधार पर मनुष्य उन गतिविधियों की प्राप्ति कर लेता है, जिनका पालन मानसिक संवृद्धि की ओर बढ़ाता है। अध्यात्म के ज्ञान और उसके समुचित पालन से ही जीवन जैसे मूल्यवान अवसर का सही-सही उपयोग संभव होता है। जो अध्यात्म नामी जीवन-विज्ञान से अनभिज्ञ है, वह अपने जीवन का सही उपयोग करने में सफल नहीं हो सकता। किसी बात के समुचित उपयोग पर ही सफलता का आधार निर्भर है। जीवन का समुचित उपयोग सफलता की ओर और अनुचित उपयोग असफलता की ओर ले जायेगा। यह निश्चित है, अटल है।


Quotation

जीवन वीणा की तरह है। यदि इसके तार ज्यादा कस दोगे तो वह टूट जायेगा यदि ढीले छोड़ दोगे तो उसमें से स्वर नहीं निकलेगा। जीवन को यदि विलासमय बनाओगे तो संसार की तृष्णा में फंसे रह जाओगे और यदि अत्यन्त कष्टमय बनाओगे तो जीते जी मर जाओगे अतः मध्य मार्ग अपनाओ। जब तार न ज्यादा कसे होते हैं और न ढीले होते हैं, तभी वीणा बजती है। जीवन के तार भी मध्यम स्तर पर कसो, तभी निर्वाण प्राप्त कर सकोगे।

-महात्मा गौतम बुद्ध,

जिस प्रकार कोई बड़ा आयोजन किसी अज्ञानी अथवा अनाड़ी आदमी के हाथ में दिए जाने से उसकी सफलता की आशा निरर्थक हो जाती है, उसी प्रकार जीवन जैसा दुर्लभ अवसर जीवनी-विद्या से अनभिज्ञ व्यक्ति के पास असफलता और असार भाव से समाप्त हो जाता है। इतना ही क्यों संजीवनी-विद्या से अनभिज्ञ व्यक्ति उस मानव जीवन को जिसमें स्वर्गीय परिस्थितियों का अवतरण किया जा सकता है, अपने विज्ञान के कारण नरक की विभीषिका बना लेता है। अशाँति, असन्तोष तथा शोक-सन्तापों का आखेट बनकर जीवनकाल में दुःखी और दरिद्री बना रहता है और उसके उपरान्त अंध लोक में जा पड़ता है। किसी बड़े आयोजन को सफलतापूर्वक चलाने के लिए जिस प्रकार तत्सम्बन्धी योग्यता और प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है। उसी प्रकार मानसिक विभूतियों के साथ सफल जीवन यापन करने के लिए जीवन विज्ञान के प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है। अध्यात्मवाद से मनुष्य को इसी जीवन-विज्ञान का प्रशिक्षण प्राप्त होता है।

साध्य न होने पर भी भौतिक अथवा बाह्य विभूतियाँ जीवन की सफलता में किसी हद तक साधन के रूप में तो सहायक होती हैं। इस थोड़ी-सी सहायता के लोभ में ही मनुष्य भौतिक सम्पदाओं को भ्रमवश सर्वस्व मानकर उनके संचय में ही बुरी तरह लग जाता है। वह सोचता है कि यदि किसी प्रकार उसके पास वैभव हो जाये तो फिर उसके लिये संसार में अशाँति अथवा असन्तोष का कोई कारण न रह जाये और सुख-सन्तोष की उपलब्धि के रूप में उसका जीवन सफल हो जाये। अपनी इस धारणा के कारण वह उचित-अनुचित उपायों द्वारा धन-दौलत बटोरने में लग जाता है और अध्यात्म अर्थात् जीवन-विज्ञान की उपेक्षा कर देता है। जिसका कुफल यह होता है वह दिन प्रतिदिन तृष्णा का शिकार बनता हुआ अशाँतिदायक भव-बंधनों में फंसता चला जाता है। जीवन का उद्देश्य समझने और उसे पाने के लिए प्रयास करने का उसे अवसर ही नहीं मिल पाता। भौतिक लिप्सा मनुष्य को अध्यात्मिक जीवन से कोसों दूर कर देती है।

भौतिक विभूतियों की प्राप्ति हो जाने पर अध्यात्मिक विभूतियाँ भी मिल जाएं यह सम्भव नहीं, किन्तु आध्यात्मिक जीवन की सिद्धि कर लेने पर भौतिक विभूतियाँ आप से आप प्राप्त हो जाती हैं। अध्यात्मवाद जीवन को सुव्यवस्थित ढंग से जीने की शिक्षा देता है। जो व्यक्ति जीवन में एक व्यवस्था बनाकर पुरुषार्थ करेगा। पुरुषार्थ में उचित-अनुचित विचार रखेगा। आचार-विचार और चरित्र के शिव-तत्व की रक्षा करेगा, उसे संसार में किसी भी सिद्धि एवं समृद्धि की कमी नहीं रह सकती।

सिद्धि और समृद्धि निश्चित रूप से पुण्य का फल होती है। सुख शाँति और वैभव विभूतियों में पुण्यात्मा का अधिकार माना गया है। पापी का नहीं। बहुत बार लोग अनुचित उपायों का आश्रय लेने वालों को भी समृद्धिवान होते देखकर इस भ्रम में पड़ जाते हैं कि संसार में समृद्धि प्राप्त करने के उपायों में औचित्य अथवा अनौचित्य के विचार की आवश्यकता नहीं। किन्तु ऐसे लोग वास्तविक तथ्य को समझने में भूल करते हैं। आज प्रत्यक्ष में पाप करने वाला यदि समृद्धिवान होता देखा जाता है तो यह न समझ लेना चाहिये कि उसकी वर्तमान उपलब्धि उसके इसी जीवन कर्मों का परिणाम है। ऐसा नहीं होता। आज के सुफल उसके उन पुण्यों का परिणाम होते हैं, जो उसने पूर्व जन्म में संचय किये होते हैं। साथ ही वह आज जिन असत् कर्मों का संचय कर रहा है, उनका वह फल, तद्नुरूप अगले जन्म में पायेगा। वर्तमान पुण्य अथवा पापों का फल वर्तमान में ही मिल जाये, यह आवश्यक नहीं। वे कभी भी समयानुसार परिपाक में आकर प्रकट हो सकते हैं। इस प्रकार सुख-समृद्धि का एकमात्र आधार पुण्य ही है जिनका संचय आध्यात्मिक जीवन पद्धति से ही होता है।


Quotation

जो लोग कृष्ण-कृष्ण कहते हैं वे उसके पुजारी नहीं हैं। जो उसका काम करते हैं वे ही पुजारी हैं।

उसी प्रकार रोटी-रोटी कहने से पेट नहीं भरता, रोटी खाने से भरता है।

-बापू,

जीवन को सफल तथा सुख शाँतिमय बनाने और आगामी जीवन के अनुकूल भूमि का निर्माण करने के लिए मनुष्य को आध्यात्मिक जीवन पद्धति द्वारा पुण्य और परमार्थ संचय करते रहने चाहिएं। इस मंगलमय विचारधारा से ओत-प्रोत बुद्धिमान न तो वर्तमान जीवन में दुःखी रहते हैं और न उनके लिए किसी आगामी जीवन में भय का कारण शेष रह जाता है।


अपमान और युक्ति का अन्तर

राजगृह के एक चरवाहे की पत्नी बड़ी कला कुशल थी नृत्य और संगीत विद्या में उसे ऐसी निपुणता प्राप्त हुई थी कि कुलीन घरानों की कन्यायें भी उससे ईर्ष्या करती थीं। सच है साधना और अभ्यास से छोटे व्यक्ति सम्पन्न व्यक्तियों के समकक्ष योग्य और श्रद्धास्पद हो जाते हैं। चरवाहे की पत्नी को इस कला निपुणता के कारण राजदरबार तक में आमंत्रित किया जाता था।

राजगृह में एक बड़े उत्सव की तैयारी हुई। उसमें नृत्य के लिए इसी ग्वाले की पत्नी को कहा। स्त्री उन दिनों गर्भवती थी, उससे बहुत मना किया पर सामन्तों ने एक न सुनी। उसे अपमानित और विवश किया गया कि वह नृत्य करे।

नृत्य तो किया उसने पर इस अपमान से उसके हृदय में प्रतिशोध भड़क उठा। यह प्रतिशोध का भाव मृत्युपर्यन्त उसके मन से नहीं गया। दूसरे जन्म में वह यही संस्कार लेकर यक्षिणी होकर राजगृह में ही जन्मी।

जहाँ उसमें इस प्रतिशोध और दुर्भावना के संस्कार थे वहाँ पूर्व जन्मों की कला और ज्ञान का संचित कोष भी उसे संस्कार रूप में मिला। इसी कारण वह अपने पिता के स्थान पर नगर देवता की पुजारिन भी नियुक्त की गई।

जहाँ श्रेष्ठ कर्म और साधना ने उसे इस जीवन में सुखद परिस्थितियाँ दी, वहाँ पूर्व जन्म का प्रतिशोध पाप की प्रेरणा बनकर फूटा। यक्षिणी जिसका नाम हारीति था, नगर के बच्चे चुरा-चुराकर मारने और उनका भक्षण करने लगी। पुण्य की आड़ में पल रहे इस पाप को लोगों ने बहुत दिन बाद जाना। जब राजगृह नरेश को उसका पता चला तो उन्होंने हारीति को बन्दी बनाकर कारागृह में डाल दिया।

सामान्य व्यक्ति असामान्य घटनाओं को भी सामान्य दृष्टि से देखते हैं पर महापुरुषों की पैनी दृष्टि जब तक दूर तक विचार नहीं कर लेती, कोई तत्काल निर्णय नहीं देती। भगवान बुद्ध ने जब सुना कि हारीति को अनेक बालकों के वध के अभियोग में बन्दी बना लिया गया है, तब उनके मस्तिष्क में एक हलचल उठ खड़ी हुई कि ऐसे कुत्सित संस्कार इस विदुषी और कला निष्णात बालिका में आये कहाँ से? अन्तः दृष्टि से उन्होंने देखा यह सब पूर्व जन्मों के कर्म और उसके साथ हुए दुर्व्यवहार का परिणाम है, उसके लिये सर्वथा उसे ही दोषी नहीं ठहराया जा सकता है।

राजगृह नरेश से कहकर इधर तो उसे कारामुक्त करा दिया, उधर उसके बच्चे की चोरी करा ली। पुत्र के खो जाने से उसे मर्मान्तक पीड़ा हुई उसकी करुणा, उसका वात्सल्य भाव तीव्र रूप से जागृत हो उठा, तब उसने अनुभव किया कि ऐसा ही कष्ट उन माताओं को भी हुआ होगा, जिनके बच्चे चुराकर उसने भक्षण कर लिये हैं।

पुत्र वियोग से दुःखी हारीति का मन पश्चाताप से भर गया वह भगवान बुद्ध के पास गयी और बोली-”भगवन्! मेरे कर्मों का फल तो मुझे मिल गया पर अब यह बताएं कि उस पाप से मुक्ति कैसे मिले।”

बुद्ध ने कहा- “अब तक तुमने शिशुओं का भक्षण किया है, अब तुम शिशुओं की रक्षा और विकास में जुट जाओ। उसी से तुम्हें शाँति मिलेगी समाज के साथ की हुई छोटी सी भूल भी तब तक नहीं धुलती, जब तक सेवा के साबुन से उसे धोकर साफ न कर दिया जाय।

हारीति आजीवन बच्चों की रक्षा और उन्हें भगवान मानकर सेवा करती रही, जिससे अन्तिम समय उसे शाँति मिली और दूसरे जन्म में वह साति यक्ष की पुत्री अभिरति हुई उसका विवाह कुबेर के साथ हुआ।


भारतीय-दर्शन का विस्तार व वैज्ञानिक विश्लेषण-(2)

वाजिश्रवा का अश्वमेध यज्ञ सम्पन्न हो गया। महाराज ने बहुत सारी गायें ब्राह्मणों को दान में दीं पर वह अधिकाँश गायें बूढ़ी और बेकार थीं। दान में वास्तविकता कम दिखावा अधिक था।

यह बात वाजिश्रवा के पुत्र नचिकेता को अखरी। उसने पिता से कहा- “तात्! कोई भी कार्य छोटा क्यों न हो उत्कृष्ट होना चाहिए, वृद्ध गायें दान देकर आपने पुण्य नहीं आत्म प्रवंचना ही अर्जित की। पुत्र की इस आलोचना पर वाजिश्रवा बहुत नाराज हुये उन्होंने तब नचिकेता को यमराज को दान कर दिया”

नचिकेता पिता का घर का छोड़कर महर्षि यमराज के आश्रम पहुँचे। शिष्टाचार वश उनके न होने तक निराहार प्रतीक्षा करते रहे। यमराज नचिकेता के आदर्श और उनकी विनय से बहुत प्रभावित हुये उन्होंने आने का मंतव्य पूछा। नचिकेता ने कहा- “भगवन्! संसार का अध्ययन कर लिया, किसी वस्तु में कोई सार दिखाई नहीं देता, मुझे वह विद्या दीजिये जिससे साँसारिक बन्धनों से मुक्त होकर अमरत्व प्राप्त करूं।”

निष्ठा की परख के लिये पहले तो यमराज ने नचिकेता को बहुत प्रलोभन दिया। राज्य-सुख, स्त्री और पुत्र सुख तथा यश आदि का उन्होंने प्रस्ताव किया पर नचिकेता ने उन सब को ठुकराते हुए कहा- “क्षण-भंगुर वस्तुयें लेकर मैं क्या करूंगा, यह तो आज हैं, कल फिर न रहेंगी।”

तब यमराज ने नचिकेता को आत्म-विद्या का उपदेश दिया। भारतीय-दर्शन का दूसरा सिद्धाँत व्यक्ति को आत्म साक्षात्कार की प्रेरणा देता है। ‘अविनाशी वा अरे अयमात्मा अनुच्छित्ति धर्मा।’ (वृहदारण्यक 4।5।14) में शास्त्रकार का कथन है- यह आत्मा अविनाशी है इसे जानने से ही मुक्ति अर्थात् जीवन मरण के बन्धनों से परित्राण मिलता है। ‘आ च परा च पथिभिश्चरन्तम्।’ ऋग्वेद 1।164।31। यह आत्मा कर्म करने में पूर्ण स्वतन्त्र है, अर्थात् अपनी इच्छा से कहीं भी जा सकती है, कुछ भी कर सकती है, चाहे वह कर्म इन्द्रियों की सुख की लालसा में अधोगामी हो अथवा ज्ञान, विवेक, वैराग्य और अमृतत्व की प्राप्ति के लिए तपश्चर्याजन्य। ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।’ (श्रीमद्भगवद् गीता 2।47) अर्थात् वह कर्म करने में स्वतंत्र है किन्तु फल प्राप्ति में वह ईश्वरीय नियमों से बंधा हुआ है। ‘आ वरीवर्ति भुवनेष्वन्तः’ (ऋग्वेद 1।164।31) यह आत्मा विभिन्न लोकों में बार-बार चक्कर काटता है। यह स्वतंत्र कर्मों के दुरुपयोग के कारण होता है, अधोगामी आत्मायें निम्नगामी घृणित योनियों में जन्म लेती हैं तो सत्कर्म करने वाली आत्मायें अच्छे लोकों में। यह लोक कोई स्थान नहीं, अवस्थायें हैं। उसका विवरण पाठक अन्यत्र पढ़ेंगे।

कोशिकाओं की रचना से ज्ञात हो चुका है कि मनुष्य शरीर जिन तत्वों से बना है, वे क्रमशः सूक्ष्म होते हुए भी एक ऐसी अवस्था तक पहुँच गये हैं, जो आँखों से न दिखाई देने पर भी हैं, जीवन विकास के सम्पूर्ण संस्कार और सूत्र उनमें पिराये हुए हैं। यह सूक्ष्म तत्व जीन्स कहलाते हैं और वह अविनाशी तत्व है अर्थात् मनुष्य शरीर की कोशिकायें नष्ट हो जाती हैं, तो भी वह नहीं मरती हैं। बीज कोश (स्पर्म) के यह सूक्ष्म संस्कार ही नये शरीर के निर्माण और नये व्यक्तित्व के विकास की नींव बनकर गर्भ में पहुँचते हैं।

इस सूक्ष्म सत्ता की लघुता पर महान महत्ता को प्रतिपादित करते हुये प्रसिद्ध जीवशास्त्री डॉ. फ्रीटुज ने लिखा है- एक ओर अणु का व्यास एक सेण्टीमीटर का करोड़वाँ भाग है, दूसरी ओर आकाश गंगा का व्यास 9 शंख कि.मी. है। पृथ्वी का व्यास तो 13000 कि.मी. है। उपरोक्त अणु में आकाश गंगा की सारी शक्ति और संरचना विद्यमान है, इससे शास्त्रकार की ‘अणोरणीयान् महतो महीयान्’ यह आत्मा अणु होकर भी महत्तम है, वाली बात सिद्ध होती है तो यह बात भी कि आत्मा में परमात्मा की सारी शक्तियाँ और सम्भावनायें सूत्र रूप में पिरोई हुई हैं।

आत्मा विराट ब्रह्माँड का बीज है। लघुतम में महानतम की जटिल प्रणाली को देखने के लिए शास्त्रकारों ने जप,तप साधन, स्वाध्याय, योगासन, प्राणायाम, प्रत्याहार आदि का सहारा लिया और आत्मा को आत्मा के प्रकाश में देखा अनुभव किया और अपना जीवन धन्य बना दिया।

आत्म-साक्षात्कार की यह प्रक्रिया कुछ कष्ट-साध्य, साधन साध्य और जटिल थी, इसलिये वह हर किसी की समझ में न आयी। वहाँ प्राणियों के जीवन में आत्मा की उपस्थिति को दूसरी तरह के गुणों और घटनाओं ने अवश्य प्रभावित किया, उन्हें मनुष्य आसानी से हृदयंगम कर सकता है और उनके आधार पर ही मनुष्य जीवन में आने के सौभाग्य को सार्थक कर सकता है।

ऐसे घटकों में (1) पुनर्जन्म, (2) इन्द्रियातीत अवस्था (3) मरणोत्तर जीवन की पुष्टि करने वाली घटनायें ली जा सकती हैं। ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति हर देश, समाज और काल में हुआ करती है। कुछ प्रमाणित घटनायें यहाँ दी जा रही हैं। पुनर्जन्म की अनेक घटनायें छोटे-छोटे बालकों की स्मरण शक्ति के रूप में अखण्ड ज्योति के पाठक कई बार पढ़ चुके हैं। प्रस्तुत घटना उससे भिन्न कोटि की है। इस घटना का ब्रिटेन की परामनोवैज्ञानिक संस्था द्वारा विस्तार से अध्ययन किया गया और उसके शोधकर्ताओं ने यह पाया कि मानवीय चेतना कोई पदार्थ न होकर एक प्रकार का प्रवाह है, जो कहीं से निःसृत होकर निरन्तर चल रहा है- किस लक्ष्य की ओर यह तो पता नहीं पर यह गति विराम नहीं लेना चाहती ऐसा लगता है।

इंग्लैण्ड के माइकेल शेल्डन नामक एक अंग्रेज को इटली जाने की एकाएक इच्छा उठी। उसने वहाँ जाने का निश्चय कर लिया। उसी रात उसने स्वप्न में एक ऊबड़-खाबड़ सड़क से चलते हुए अपने आपको एक भारी मकान के पास पाया। ऐसा प्रतीत हुआ कोई शक्ति उसे बलात् मकान के अन्दर चलने को प्रेरित कर रही है। वह दुमंजिले मकान पर चढ़ गया। उसने देखा ऊपर दो कमरे हैं दाहिने हाथ के कमरे की ओर जाकर उसने दरवाजा थपथपाया साथ ही वह- मारिया दरवाजा खोला-मारिया दरवाजा खोलो यह भी चिल्लाया। दरवाजा एकाएक खुलता है। शेल्डन ने देखा एक युवती औंधी पड़ी है, उसके मुख से खून निकल रहा है। शेल्डन ने उसे उठाया तो पता चला कि वह मर चुकी है और उसे मारा भी स्वयं उसने ही है। इस वीभत्स दृश्य को देखते ही हृदय की धड़कनें तेज हो उठीं। नींद टूट गई, शेल्डन उठ बैठा। दूसरे कामों में लग गया पर उसके मस्तिष्क से यह घटना न विस्मृत हुईं।

डेढ़ मास बीते शेल्डन को इटली का वीजा मिल गया। वह जहाज से जिनाओ शहर पहुँचा। सब कुछ अनायास, अयाचित सा न जाने किन पूर्वजन्मों के बन्धनों में बंधा हुआ सा। हमारे जीवन में भी ऐसे हजारों क्षण आते हैं, जब हम न चाहते हुये, कुछ ऐसे कर्म कर बैठते हैं, जिनके संस्कार और प्रेरणाएं पता नहीं मस्तिष्क के किस कोने से निकल आई, हम यह नहीं समझते। चाहे तो उन अज्ञात प्रेरणाओं से भूत की स्थिति का आभास करें और भविष्य को लक्ष्य की ओर ले चलने का प्रयत्न करें पर इन सब सूक्ष्म बातों के लिये हमारे पास समय कहाँ? जब तक जीवन है, इन्द्रियों की तृष्णा की पूर्ति में ही पड़े रहते हैं। मनुष्य का इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या हो सकता है।


Quotation

तुमहि नाम तं चेव जं हंतव्वं ति मन्नसि।

तुमसि नाम तं चेवं जं अज्जावेयव्वं ति मन्नसि।

तुमसि नाम तं चेवं जं परियावेव्वं ति मन्नसि॥

-आचाराँग, 1।5।5

जिसे तू मारना चाहता है, वह तू ही है। जिसे तू शासित करना चाहता है, वह तू ही है। जिसे तू परिताप देना चाहता है वह तू ही है। अर्थात् विश्वव्यापी चेतना एक समान और अद्वैत है।

माइकेल शेल्डन एक दिन शहर के दृश्य देखता हुआ बढ़ रहा था कि सहसा उसने अपने आपको उसी स्वप्न वाली सड़क के बीच पाया। दाहिनी ओर एक मकान खड़ा था। वह किसी अज्ञात प्रेरणा से उसी में घुस गया। वैसा ही मकान, वैसे ही दरवाजे और कमरे। शेल्डन सब कुछ कठपुतली की भाँति कर रहा था। उसी तरह उसने दरवाजा खोला और शुद्ध इटेलियन में चिल्लाया- मारिया, मारिया तुम कहाँ हो?

उसकी आवाज सुनकर पीछे से एक वृद्धा निकली और बोली- “लुइगी ब्रोन्दोनो! मारिया को मारने के बाद आज दिखाई दे रहे हो? इतने दिन कहाँ छिपे रहे।” शेल्डन कुछ भी उत्तर दिये बिना नीचे उतर आया और सीधे पुलिस स्टेशन पहुँचकर इंस्पेक्टर से उसने स्वप्न से लेकर अब तक का सारा हाल कह सुनाया। उसने यह भी बताया कि मारिया का हत्यारा वह स्वयं ही है।

पुलिस रिकार्ड्स देखने पर पता चला कि सचमुच सन् 1825 में उस मकान में मारिया नामक एक युवती की हत्या हुई थी, हत्यारा इटली से भाग गया था। बाद में मनोवैज्ञानिकों ने विस्तृत खोज के बाद यह निश्चय किया कि शेल्डन ही पहले जन्म में लुइगी ब्रान्दोनो था। वह संस्कार इतने बलवान थे कि शेल्डन को जबरन इटली खींच ले गये। हमारे जीवन में आकस्मिक वैराग्य, प्रेम और श्रद्धा के क्षण आते हैं, वह भी पूर्वजन्मों के ही संस्कार होते हैं और यह बताते हैं कि हम आज जो भी कुछ कर रहे हैं, उसका परिणाम आज ही समाप्त होने वाला नहीं। हम कर्मफल से जन्म-जन्मांतरों तक जुड़े रहने वाले हैं। इसलिये हमें ऐसे कर्म करने चाहिये, जो हमारे जीवन को ऊंचा उठाते हों। अशाँति और जटिलता उत्पन्न करने वाले घृणित कर्म करना छोड़ दें तो जीवन अपनी सरल गति से चलता हुआ जहाँ से आया वहाँ पहुँचकर चिर शाँति और अव्यक्त किन्तु परिपूर्ण आनन्द की उपलब्धि कर सकता है।

आत्मा इन्द्रियों से परे की सत्ता है, इसकी पुष्टि करते हुए स्वामी रामतीर्थ ने अमेरिका के एक भाषण में बताया था- “भारत के एक ऐसे व्यक्ति को हम जानते हैं, जो कि एक प्रकार से 6 महीने की मृत्यु की दशा में पड़ा रहा। प्राण विद्या का नियन्त्रण करने की इस विधि को खेचरी मुद्रा कहते हैं, इसका पूरा विवरण हठयोग में मिल सकता है। उस अवस्था में जीवन-क्रिया का कोई चिह्न शेष नहीं रहता पर 6 माह बाद वह पुनः अपनी पूर्व अवस्था में आ गया।”

मार्च 1968 नवनीत के पृष्ठ 165 पर मार्गरेट बोजेमवाल नामक 21 वर्षीया युवती की घटना दी गई है और बताया है कि एक बार 1883 में वह इतना डर गई कि बेहोश होकर गिर गई और 20 वर्ष तक लगातार उसी अवस्था में पड़ी रही। 20 वर्ष तक उसे नली द्वारा भोजन पहुँचाकर जीवित रखा गया। यह घटनायें यह बताती हैं कि शरीर के सम्पूर्ण अवयव काम करते रहें तो आत्मा कहीं भटक जाये तो शरीर निष्क्रिय हो जाता है, साथ उससे इस बात की भी पुष्टि होती है कि आत्म-चेतना इन्द्रियों से परे की स्वतन्त्र सत्ता है।

मृत्यु के बाद जीवन के अस्तित्व को प्रमाणित करने वाले अनेक तथ्य भी भूत प्रेतों की घटनाओं और आत्मा की आवाहन की घटना के रूप में मिलते हैं। प्रसिद्ध भविष्यवक्ता कीरो ने उसके सैंकड़ों उदाहरण एकत्रित किये और छपाये। मनोविज्ञान जगत में उनकी जानकारी सर्वत्र है। आगे के अंकों में ऐसी घटनाओं से भी परिचय करायेंगे।

(क्रमशः)


राह से भटके हुए मनुष्य

गड़रिये ने भेड़ को बड़े प्यार से कन्धे से उतारा उसने स्नान कराया, बाल सुखाये और हरी घास खाने को दी जब भेड़ उस घास को खा रही थी, तब गड़रिये का आह्लाद देखते ही बनता था। महापुरुष ईसा उस गड़रिये की पर्णशाला के समीप बैठे विश्राम कर रहे थे। उन्होंने इस प्रसन्नचित गड़रिये को देखकर पूछा- वत्स! आज तुम इतने प्रसन्न क्यों हो रहे हो?

महात्मन्! यह जंगल में प्रायः हमेशा भटक जाती है मेरे पास सौ और भी भेड़ें हैं पर वह सब सीधे घर आती हैं, इसे इतना प्यार इसलिये दिया कि यह फिर कहीं न भटके।

और तब ईसा ने अपने शिष्यों से कहा जो अपने राह से भटक गये हैं उन मनुष्यों को प्यारपूर्वक ही सीधे मार्ग पर लाना चाहिये।


शब्द की सामर्थ्य मंत्र का विज्ञान- (2)

पिछले अंक में जिस अल्ट्रा साउण्ड के ‘ट्रान्स्डूसर’ नामक अति सूक्ष्म ध्वनि कम्पन यन्त्र का विवरण दिया गया है, वह न केवल रोगों का पता लगाने में वरन् कैन्सर और टी.बी. आदि के रोगों के उपचार में भी प्रयुक्त होने लगा है। शब्द कम्पनों को एक चिमटी की आकृति में बदल कर बारीक से बारीक कीटाणुओं और विषाणुओं को भी पकड़ कर खींचा जा सकता है।

एक लड़के की आँख में पीतल का बहुत बारीक कण घुस गया। किसी भी धातु की चीमटी से धोखा हो सकता था, उस स्थिति में ध्वनि-कम्पनों द्वारा बनाई गई यह चीमटी प्रयोग में लाई गई और उससे 10 सेकिंड में ही वह टुकड़ा निकाल लिया गया। यह कार्य डॉ. नैथेनियल ब्रान्सन द्वारा सम्पन्न हुआ। डॉ. ब्रान्सन मैनहैटन (अमेरिका) में आँख कान और गले के रोगों के विशेषज्ञ हैं।

अल्ट्रासाउंड का उपयोग वियेना के प्रसिद्ध वैज्ञानिक डॉ. कार्ल टी डसिक ने सर्वप्रथम 1942 में किया, यद्यपि इसकी जानकारी एक्सरे की खोज सन 1895 के कुल दो वर्ष बाद ही हो रही थी। इन दिनों इंग्लैण्ड, अमेरिका, स्वीडन तथा जापान आदि देशों में मस्तिष्कीय जानकारी के लिए अल्ट्रासाउण्ड पर विस्तृत खोजें की जा रही हैं। पश्चिम जर्मनी के ड्शल डोर्फ के डॉक्टर डब्लू ब्लाईफील्ड और डॉ. स्वेन एफर्ट ने कोई 10000 व्यक्तियों के शरीर के विभिन्न अल्ट्रासाउण्ड के चित्र उतारे ओर उनके अध्ययन के द्वारा अनेक नये तथ्यों का पता लगाया।

चिकित्सा जगत में शब्द के सूक्ष्मतम प्रयोग की यह उपलब्धियाँ यह बताती हैं कि यदि भारतीय तत्वदर्शियों ने मंत्र विद्या की इतनी जानकारी कर ली हो शब्दों के कम्पनों द्वारा विश्व निवारण, रोग निवारण अदृश्य शक्तियों का आकर्षण मनोगति द्वारा मारण-मोहन उच्चाटन आदि प्रयोग सफलतापूर्वक होते रहें तो उसे अतिशयोक्ति न माना जाये। महाभारत काल में मन्त्र प्रेरित शस्त्रों की मार होती थी, उस परमाणु बमों से भी भयंकर ऊर्जा उत्पन्न होती थी उसका बड़ा सधा हुआ उपयोग सम्भव था उस शक्ति से सैनिकों के समूहों को भी नष्ट किया जा सकता था और हजारों की भीड़ में केवल एक ही किसी व्यक्ति को मारा जा सकता था। यह सब उस शब्द विज्ञान का ही चमत्कार था, जिसकी क्षीण सी जानकारी भौतिक विज्ञान जान पाया है।

बात कहने की नहीं, अब सभी पढ़े-लिखे लोग जान गये हैं कि प्रत्येक ध्वनि को चित्रित किया जा सकता है ध्वनि कम्पनों के इस चित्रण को ‘स्पेक्ट्रोग्राफ’ कहते हैं। हम जो कुछ भी बोलते हैं उन शब्द तरंगों को ‘स्पेक्ट्रोग्राफ’ टेढ़ी-मेढ़ी लकीरों के रूप में प्रस्तुत कर देता है। न्यूयार्क (अमेरिका) की बेल टेलीफोन लैबोरेटरी के वैज्ञानिक डॉक्टर लारेन्स केर्स्टा ने अनेकों लोगों की आवाज का ‘स्पेक्ट्रोग्राफ’ खींच कर देखा तो पाया कि हर व्यक्ति के ध्वनि कम्पनों से जो रेखायें बनाते हैं, वे चाहे एक ही वाक्य बोलें, रेखाओं का प्रकार अलग-अलग तरह का होता है पर किसी व्यक्ति द्वारा एक ही वाक्य स्वस्थ, अस्वस्थ, जुकाम, अधिक या कम तापमान (टेम्परेचर) वायुदाब (प्रेशर) आदि में सदैव में अपरिवर्तित रहता है। इसका अर्थ यह हुआ कि ध्वनि तरंगों में इतनी सामर्थ्य होती है कि प्राकृतिक परिवर्तन- तूफान, वर्षा, तापमान, हवा के दबाव आदि का उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। प्रत्येक अवस्था में लकीरें एक व्यक्ति की एक ही तरह की होंगी। इसी तरह प्रत्येक मंत्र का तरंगों के रूप में विस्तार एक ही तरह का होता है, लकीरों की आकृति भिन्न-भिन्न व्यक्तियों द्वारा भले ही भिन्न हो अर्थात् यदि एक व्यक्ति एक वाक्य बोलता है तो आगे बढ़ने और पीछे लौटने वाली लकीरें तो लम्बी या छोटी हो सकती हैं पर उनकी आवृत्ति एक ही तरह की होगी।

सामान्य रूप में बोली जाने वाली ध्वनि तरंगें थोड़ा आगे बढ़कर सारे विश्व भर के परमाणुओं में फैल जाती हैं।और जैसे छुई मुई को छूते ही सारी पत्तियाँ बात की बात में हलचल करती हुई मुरझा जाती हैं, उसी प्रकार यह कम्पन सारे विश्व के विस्तार को कुछ ही सेकेंडों में पार कर प्रतिक्रिया सहित वापिस लौट आता है। परावर्तित कम्पनों में उसी तरह के अनेक विचार भागे चले आते हैं, यही कारण है जब कोई क्रोध में बड़बड़ाता है तो उसी तरह के विचार दौड़े चले आते हैं पर जब कोई प्रेम और करुणाजनक शब्द बोलता है तो वैसे ही मिठास भरे कोमल विचार मस्तिष्क में चले आते हैं। इसीलिये कहा जाता है कि बोला हुआ प्रत्येक शब्द मन्त्र है मनुष्य को बहुत सम्भालकर केवल मीठा और आशयपूर्ण ही बोलना चाहिये। कड़वा, तीखा और निरर्थकता की बकवाद की प्रतिक्रिया वैसे ही तत्वों को और बढ़ा देती है, जिससे मन में अशान्ति ही बढ़ती है।

मंत्र का विज्ञान इससे भिन्न प्रकार का है। अभी तक हम जिन शब्द-तरंगों की बात करते रहे हैं, उनका आकार प्रकार विद्युत शक्ति द्वारा निश्चित और प्रयुक्त होता रहा है। प्रश्न यह उठता है कि मंत्र में जबकि किसी प्रकार की बाह्य शक्ति उन शब्द तरंगों को रूपांतरित नहीं करती तो उनसे विज्ञान की तरह के लाभ कैसे प्राप्त हो सकते हैं? इस प्रश्न का उत्तर ‘रेट्रोमीटर’ यन्त्र के आविष्कार के साथ सम्भव हो गया है। इस यन्त्र में बाहरी शक्ति स्रोत की आवश्यकता नहीं पड़ती है वरन् ध्वनि में सन्निहित ऊर्जा ही विद्युत ऊर्जा का काम करती है। ‘रेट्रोमीटर’ का आविष्कार न्यूमा ई, थामस नामक अमेरिकी वैज्ञानिक ने किया है। श्री थापस लेंगले स्थित ‘नेशनल एरोनोटिक्स एण्ड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन’ रिसर्च के अन्वेषक हैं। इस यन्त्र में किसी माध्यम से प्रकाश फोटोसेंस्टिव सेल में भेजकर विद्युत ऊर्जा में बदल दिया जाता है, और फिर रिसीवर यन्त्र में विद्युत ऊर्जा में बदली तरंगों को ध्वनि में बदलकर सुन लिया जाता है।

इस सिद्धाँत से यह निश्चित हो गया है कि कर्णातीत तरंगों का स्वभाव लगभग प्रकाश तरंगों जैसा ही होता है। कर्णातीत तरंगों का तरंगदैर्ध्य जितना कम होता है, यह समता उतनी ही बढ़ती है, इससे पता चलता है कि कर्णातीत तरंगों को बड़ी ही सुविधापूर्वक आवर्तित और परावर्तित किया जा सकता है। इनका व्यवहार भी प्रकाश तरंगों से ठीक उल्टा होता है, इसलिये इन तरंगों से विभिन्न प्रकार के प्रकाश स्रोतों की शक्ति को प्रतिक्रिया द्वारा आसानी से अपनी ओर आकर्षित किया जा सकता है। ऐसा इसलिये होता है कि कर्णातीत तरंगें किसी सघन पदार्थ में तो तेजी से चलती हैं पर विरल माध्यमों में वे मन्दगति से चलने लगती हैं।

वेदों में प्रयुक्त प्रत्येक मन्त्र का कोई न कोई देवता होता है। गायत्री का देवता सविता है, अर्थात् गायत्री उपासना से जो भी लाभ यथा आरोग्य, प्राण, धन-संपत्ति पुत्र और अपनी महत्वाकाँक्षायें आदि पूर्ण होती हैं, उसकी शक्ति अथवा प्रेरणा सूर्य लोक से आती है। किसी भी मंत्र का जब उच्चारण किया जाता है, तब वह एक विशेष गति से आकाश के परमाणुओं के बीच बढ़ता हुआ, उस देवता (शक्ति-केन्द्र) तक पहुँचता है, जिसका उस मन्त्र से सम्बन्ध होता है। मन्त्र-जप के समय ऊर्जा मन को शक्ति के द्वारा प्राप्त होती है, इस शक्ति के द्वारा जप के समय की ध्वनि तरंगों को विद्युत तरंगों के रूप में प्रेक्षित किया जाता है। वह तेजी से बढ़ती हुई कुछ ही क्षणों में देव शक्ति से टकराती हैं, उससे अदृश्य सूक्ष्म-परमाणु मन्दगति से परावर्तित होने लगते हैं, उनकी दिशा ठीक उल्टी होती है। सूक्ष्म और स्थूल दोनों तरह के परमाणु दौड़ पड़ते हैं और साधक को शारीरिक लाभ और मानसिक प्रेरणायें देने लगते हैं। यह शक्ति ही मनुष्य को क्रमशः उन्नत जीवन और अनेक प्रत्याशित लाभों की ओर अग्रसर करती रहती है।


Quotation

आक्रुश्यमानो नाक्रोशेन्मयुमेव तितिक्षतः।

आक्रोष्टारं निर्दहति सुकृतं चास्य निन्दति॥

कटु वचन कहने वाले पुरुष से भी कभी स्वयं कटु वचन नहीं कहें और उस समय समुत्पन्न क्रोध को भी सहन कर लेना चाहिये। इससे विपक्षी नष्ट हो जायगा और पुण्य क्षीण हो आयेंगे।

प्रारम्भ में आदान-प्रदान, आवर्तन-परावर्तन की यह क्रिया थोड़ी धीमी होती है पर जैसे-जैसे मानसिक एकाग्रता बढ़ती है, प्रतिक्रिया भी तीव्र होती है और सूक्ष्म आत्मसत्ता भी तेजी से उन प्रकाश परमाणुओं से सुसज्जित होने लगती है, जो देव शक्ति से आकर्षित होते हैं।

उदाहरण के लिए सूर्य सम्पूर्ण सौर-मण्डल की आत्मा है, अर्थात् सूर्य की किरणों सम्पूर्ण ग्रह-नक्षत्रों को देखती हैं। सूर्य के प्रकाश परमाणुओं की किरणें सर्वदर्शी होती हैं, यह प्रकाश परमाणु गायत्री उपासक में जितना अधिक विकसित होते जाते हैं, वह उतना ही अधिक स्पष्ट भविष्यदर्शी, सार्थक स्वप्न देखने वाला और चमत्कारिक प्रेरणायें प्राप्त करने वाला होता जाता है। उसी प्रकार स्थूल ऊर्जा का लाभ स्वास्थ्य सुधार में होता है। अनेक रोगी गायत्री उपासक रोग मुक्त होते देखे गये हैं, वह सूर्य की किरणों की इस परावर्तित प्रतिक्रिया का ही परिणाम होता है। मन्त्र का लाभ इसीलिये अश्रद्धा होने पर भी अवश्य मिलता है। यद्यपि श्रद्धा और विश्वास के प्रगाढ़ होने पर लाभी भी द्रुतगामी होते हैं पर यदि ऐसा न हो तो भी साधक मंत्र जप के लाभ से कभी वंचित नहीं होता।


प्रजापति ब्रह्म

महाप्रलय की रात्रि का चौथा चरण- प्रजापति ब्रह्म की निद्रा टूटी। परमेश्वर का स्मरण कर पुनः सृष्टि रचना की इच्छा से उन्होंने शैया त्याग की ओर बाहर आये तो देखा कि सृष्टि तो पहले से ही तैयार है।

“जिस सृष्टि की रचना की बात मेरे मन में आ रही थी, वह पहले से ही तैयार है।” यह सोचकर ब्रह्मा को बड़ा विस्मय हुआ, उनने सूर्य भगवान् से प्रश्न किया-देव! मैं यह क्या देख रहा हूँ, सृष्टि निर्माण की क्षमता का अधिकार तो केवल मुझे प्रजापति को ही है, फिर यह सृष्टि किसने रचकर तैयार कर दी?

जगदात्मा सविता देवता- हंसे और बोले-महापुरुष! यह तो आपने एक ओर ही देखा, अभी आप आग्नेय, दक्षिण नैऋत्य, पश्चिम, वायव्य, उत्तर, ईशान ऊर्ध्व ओर अधः दिशाओं की ओर भी तो दृष्टिपात करें।

प्रजापति ने दशों दिशाओं की ओर घूमकर देखा तो उन्हें सर्वत्र एक-एक सृष्टि के दर्शन हुये इससे उनका असमंजस और भी गहरा होता गया। विस्मित ब्रह्म ने कहा-भगवन्! अब और अधिक पहेली मत बुझाइये कृपया यह तो बताइये कि यह सब सृष्टियाँ रचीं किसने? मुझ जैसी क्षमता किसी में आई तो कैसे आई?

सूर्य भगवान ने तब बताया-प्रजापति! आपकी पूर्व रचित सृष्टि में इन्दु नामक एक ब्राह्मण के बहुत समय तक कोई सन्तान न हुई, तब उसने भगवान् शिव की पूजा की। शिव ने प्रसन्न होकर उन्हें दस पुत्रों का वरदान दिया। समय पाकर इन्दु के दस पुत्र उत्पन्न हुए। उनकी शिक्षा-दीक्षा सम्पन्न हुई ही थी कि एक दिन ब्राह्मण इन्दु की मृत्यु हो गई। पुत्रों ने सोचा कोई ऐसा काम करना चाहिये, जिससे हमारे पिता की कीर्ति अमर हो जाये। उन सबने निर्णय किया कि आज तक किसी मनुष्य ने सृष्टि नहीं रची सो हम दसों को दस ब्रह्म बनकर अपने पिता की स्मृति में दस सृष्टियों की रचना करनी चाहिये। इस निर्णय के साथ ही वह आपका ध्यान करने बैठ गये। कुछ ही दिन में आपका ध्यान करते-करते उनका संकल्प पक गया तो उनमें भी आपकी सी शक्ति आ गयी और उसके आगे का चमत्कार आप देख ही रहे हैं।

इतनी कथा सुनाने के बाद महर्षि वशिष्ठ ने कहा- हे राम! मन्त्र के साथ ध्यान का यही विज्ञान है। मनुष्य जिसका भी दृढ़ता से ध्यान करता है, वैसी ही शक्तिवाला बन जाता है।


वैराग्य की प्रथम पाठशाला

देवदत्त सन्त थे पर साँसारिक सन्त। यों नहीं कि उन्होंने गृहस्थ का परित्याग नहीं किया हो वरन् इसलिये कि वे ईश्वर का भजन, साधन, स्वाध्याय, सदाचार, सद्-व्यवहार का आचरण करते हुए भी कभी-कभी क्रोध का व्यवहार कर जाते थे। धैर्य स्थिर रख सकना उनके लिए कठिन हो जाता था और घर में जब कभी ऐसी स्थिति आती, धर्मपत्नी को डाँटने लगते- ‘देख यदि तूने अमुक कार्य नहीं किया तो सन्त पुनीत के आश्रम में चला जाऊँगा और संन्यासी हो जाऊँगा।” सहिष्णुता का उनमें निताँत अभाव था।

धर्मपत्नी को उनसे तो नहीं, उनकी धमकी से बड़ा भय लगता था। नन्हें-नन्हें बच्चों के पालन पोषण का प्रबन्ध कौन करेगा, यदि ये संन्यासी हो गये, यह कल्पना करते ही वह डर जाती और वे जैसा कहते करने लगती। किंतु ब्राह्मणी देवदत्त के इस आचरण से मन ही मन बहुत दुःखी रहती है। इन्हीं देवदत्त की गाँव के लोग कितनी श्रद्धा करते हैं, कितना स्नेह और आदर देते हैं, वह गाँव वालों से कैसी मीठे-मीठे बोलते हैं, इस पर ध्यान जाता तो उसे शंका होने लगती कि क्या दूसरों के लिये मीठा होना और घर के निरीह सदस्यों को दबाना और भक्ति का रोब जमाना ही सन्त का लक्षण है। यदि ऐसा ही है तो ईश्वर की उपासना व्यर्थ वस्तु है, ऐसा वह सोचती पर बोलती कुछ नहीं, क्योंकि उस बेचारी को ईश्वर की नहीं, पति की आवश्यकता थी।

सन्त पुनीत का आश्रम समीप ही था। महर्षि कभी-कभी गाँवों में चले जाते और लोगों के दुःख कष्ट पूछते, औषधि वितरण करते, ज्ञान-दान देकर शाम तक आश्रम लौट आते। एक दिन वे इसी प्रकार उस ब्राह्मणी को दुःखी देखकर उन्होंने पूछा- “विद्यावती! तू दिन-प्रति-दिन दुबली होती जाती है, तुझे कोई कष्ट है क्या?”

दुःखी आत्मायें करुणा की प्यासी होती हैं। महर्षि के स्नेह वचन सुनकर विद्यावती की आंखें भर आईं, उसने भरे कण्ठ से कहा- “भगवन्! और तो कोई दुःख नहीं है, वे पूजा-भक्ति करते हैं, वह मुझे भी अच्छा लगता है। ईश्वर की उपासना से मनुष्य के अन्तःकरण में प्रकाश आता है, वह मैं जानती हूँ पर मुझे यह समझ में नहीं आता कि उसके लिये क्या घर छोड़ना आवश्यक ही है। ऐसा न होता तो ये (अपने पति का संकेत सम्बोधन) यों कहकर धमकाते नहीं- “मैं घर छोड़कर सन्त पुनीत के आश्रम में चला जाऊँगा और संन्यासी हो जाऊँगा?” क्या ईश्वर को प्राप्त करने के लिए संन्यासी होना ही आवश्यक है।”

“नहीं नहीं बेटी!” सन्त ने आश्वासन का हाथ उठाया और बोले- “मनुष्य अपने घर पर रहकर यदि मानवीय गुणों का आचरण निष्ठापूर्वक कर सके तो उतनी ही ईश्वर भक्ति पर्याप्त है, इतने से ही वह ईश्वरीय विभूतियों को प्राप्त कर सकता है! जो यहाँ अपना अहंकार नहीं छोड़ सका, वह मेरे आश्रम में आकर क्या वैराग्य करेगा।”

उन्होंने समझाया- “अच्छा बेटी! तू चिन्ता मत कर मैं ऐसा कर दूँगा कि देवदत्त फिर कभी ऐसे वचन न बोले। पर हाँ तू थोड़ा साहस करना। इस बार जब कभी देवदत्त यह कहे कि मैं सन्त के आश्रम चला जाऊँगा तो तू भी कह देना- हाँ, हाँ चले जाइये। आगे हम सम्भाल लेंगे।”

बात-बात में थोड़ा विलम्ब हो गया और उस दिन भी भोजन बनाकर तैयार होने में थोड़ा अधिक समय लग गया। देवदत्त घर लौटे और भोजन तैयार न मिला तो बहुत कुपित हुए, वही चिर-परिचित अस्त्र उठाया उन्होंने, बोले- “आज पहले यह बता दो कल से भोजन समय पर मिलेगा या नहीं, अन्यथा मैं अभी चला जाऊँगा और संन्यासी हो जाऊँगा।”

विद्यावती के मुख पर आज भय नहीं, मुस्कान थी। हलकी हंसी हंसती हुई बोलीं- “अजी! अभी ऐसी शाम नहीं हो गई, कल की कौन जाने, आज ही चले जाइये और संन्यासी हो जाइये। मुझे उसका जरा भी भय नहीं।”

जलती आग में घृत डालो तो आग और तीव्र हो उठती है। क्रोध भी असह्य जो जाता है, फिर यहाँ तो घृत उलीचा गया। देवदत्त ने पीछे मुड़कर भी नहीं देखा तुरन्त आश्रम की ओर चल पड़े। रात उन्होंने आश्रम जाकर बिताई।

सवेरा हुआ। महर्षि पुनीत का सत्संग जुड़ा। आज उसमें एक नये अतिथि भी थे। महर्षि ने मुस्कराते हुये, देवदत्त की कुशल-मंगल पूछी। देवदत्त ने कहा- भगवन्! संन्यास-दीक्षा लेना चाहता हूँ, उसका प्रबन्ध आज ही, अभी-अभी करा देने का अनुग्रह करें।

उसी तरह मुस्कराते हुए सन्त पुनीत ने कहा- “हाँ, हाँ वत्स! तू वस्त्र उतारकर यहाँ रख दे और गोदावरी स्नान कर, शीघ्र वापिस आ जा। अभी-अभी दीक्षा का प्रबन्ध किये देता हूँ।” देवदत्त उठे और अपने वस्त्र उतार कर एक ओर चल पड़े।

इधर सन्त ने उनके सब कपड़े फाड़कर फेंक दिये। खाने के लिए कुछ कडुए और कसैले फल मंगा लिये। देवदत्त स्नान करके आये तो अपने कपड़े माँगे। सन्त ने चिथड़ों की ओर संकेत किया- देवदत्त फटे कपड़े देख कर हो तो उठा क्रुद्ध। पर कुछ बोल न सका। महर्षि ने कहा- “क्या देखते हो, संन्यासियों को अपरिग्रही बनना पड़ता है। कम से कम वस्तुओं में काम चलाना पड़ता है। अच्छा ले भोजन कर ले।” यह कहकर वही कड़ुवे फल आगे कर दिये।

देवदत्त से एक फल कठिनाई से खाते बना। दूसरा तो मुख में रखते ही थूक दिया और बिगड़कर बोले- “मैं ऐसे कड़ुवे फल खाऊँगा? यह तो जानवर भी नहीं खाते?

शान्त हूजिये वत्स! ईश्वर को पाना एक बड़ी भारी कसौटी है। बैरागी को सन्तोषी धैर्यवान् और सहिष्णु होना पड़ता है, यदि तू पहले यही नहीं सीख सका तो क्या बनेगा, ईश्वर-निष्ठ! दया, करुणा, उदारता, संयम, सेवा ही नहीं, मिष्ट भाषण, धैर्य और सहिष्णुता भी ईश्वर-निष्ठा के आवश्यक गुण हैं। इनका तुझे अनिवार्य रूप से अभ्यास करना पड़ेगा।

अपनी अब तक की क्षुब्धता से उबलते हुये देवदत्त ने कहा- “तो फिर इनका अभ्यास तो मैं अपने घर में ही कर सकता था। आपके पास तो मैं इस कामना से आया था कि आप हमें कुछ विशेष विभूतियाँ और साधनायें सिखायेंगे।”


Quotation

करिष्यामि करिष्यामि करिष्यामीति चिन्तया।

मरिष्यामि मरिष्यामि मरिण्यामीति विस्मृतम्॥

मैं एक दिन मर जाऊँगा, मर जाऊँगा निश्चय ही शरीर नाशवान् है, यह भूल कर मनुष्य यह करूंगा, वह करूंगा, अभी सब कुछ करने को पड़ा है यही सोचता रह जाता है और परलोक जैसी महत्वपूर्ण आवश्यकता अधूरी की अधूरी रह जाती है।

महर्षि ने हँसकर कहा- “तात्। यह बाद की बातें हैं, अभी तो तू घर लौट जा और वहीं रहकर सद्गुणों का अभ्यास कर।”

देवदत्त की समझ में बात आ गई। वे घर लौट आये और धर्मपत्नी से क्षमा माँगते हुए कहा- “मुझे पता नहीं था, वैराग्य की पहली पाठशाला गृहस्थ है। अन्यथा अब तक तुम्हें जो कष्ट दिया, वह न दिया होता।”


परमार्थ के लिए आत्मोन्नति आवश्यक

अधिकाँश लोगों के सोचने का ढंग इस प्रकार का होता है कि हमें कोई बड़ा आदमी तो बनना नहीं और न कोई नामवरी कमाने की कामना है, तब जीवन को क्यों न आनन्द के साथ बिताया जाये। नियमों-संयमों का प्रतिबन्ध अपने पर क्यों लगाया जाये और हर कदम फूँक-फूँक कर रखा जाये। इस प्रकार के नियमन से जीवन नीरस तथा बोझिल बन जाया करता है।

सोचने का यह ढंग प्रतिगामी विचार-धारा का दोष है। पहली बात तो यह है कि आपको बड़ा आदमी क्यों नहीं बनना है। जब संसार में दूसरे लोग आगे बढ़ते, उन्नति के सोपानों पर चढ़ते और अधिक श्रेष्ठ स्थिति पाने का प्रयत्न करते हैं, तब आप क्यों नहीं? आगे बढ़ने और उन्नति करने वाले लोग भी तो आखिर आपकी तरह ही दो हाथ और दो पैरों वाले होते हैं। फिर उन्नति एवं विकास केवल अपने लिये ही तो नहीं किया जाता, वह तो समाज तथा संसार का हित साधन करने के लिए किया जाता है। उन्नति करने के लिए मनुष्य को सद्गुणों को ग्रहण करना होता है। यदि समाज के सारे लोग उन्नति की ओर अग्रसर होने की भावना से भर जायें तो सबको ही सद्गुणी बनना हो और इस प्रकार पूरे समाज में सद्गुणों का ही प्रसार हो जाये। इससे संसार का कितना हित हो। अपने व्यक्तिगत सुख के लिये भले ही उन्नति की अभिलाषा न रखें, किन्तु समाज और मानवता के कल्याण के लिए हम उन्नतिशील होने के लिए कर्तव्यबद्ध हैं।

मनुष्य-शरीर विविध अंगों एवं अवयवों से मिलकर बना है। क्या शरीर का कोई अंग व्यक्तिगत रूप से इस बात का अधिकारी है कि वह अपना विकास त्याग दे और यह कहकर स्वस्थ रहना छोड़ दे कि यह तो हमारी इच्छा है कि हम उन्नत अवस्था में रहते हैं या गिरी दशा में। निश्चय ही शरीर के किसी अंग अथवा अवयव को ऐसा अधिकार नहीं है। उसकी दशा केवल उसकी अपनी व्यक्तिगत दशा नहीं है। उसकी दशा का सम्बन्ध पूरे शरीर से है। उसका अस्वस्थ अथवा अविकसित रहना पूरे शरीर पर प्रभाव डालेगा, उसकी अनुपयुक्तता समग्र शरीर को या तो अस्वस्थ कर देगी अथवा उसकी सुघड़ता सुन्दरता को बिगाड़ देगी।

उसी प्रकार हर मनुष्य समाज रूपी शरीर का एक अभिन्न अंग अथवा अवयव है। उसकी व्यक्तिगत कोई सत्ता नहीं है। और न समाज से उसका अस्तित्व ही अलग है। उसकी हर दशा का प्रभाव शरीर पर पड़ना ही है। समाज के सदस्य जितने स्वस्थ, शिक्षित, शिष्ट और उन्नत अवस्था वाले होंगे, समाज भी उतना ही स्वस्थ, शिष्ट और उन्नत होगा और उसके सदस्य जितनी अवनत अवस्था के होंगे, समाज भी उतना पतित और निकृष्ट अवस्था वाला होगा। हममें से जिस प्रकार किसी को अपना अलग अस्तित्व मानने का अधिकार नहीं है, उसी प्रकार यह भी अधिकार नहीं है कि हम उन्नत दशा में रहकर समाज को नीचे घसीटने की चेष्टा करें, हम समाज के अभिन्न अंग हैं और इसके लिए नैतिकता-बद्ध हैं कि आत्मोन्नति द्वारा समाज की स्थिति में उच्चता का समावेश करें।

अब एक बार उन्नति अथवा अनुन्नति को व्यक्तिगत बात भी मान लें, तब भी उन्नत दिशा की ओर अग्रसर हुए बिना जीवन में सुख-सन्तोष कहाँ? सुख-सन्तोष तो व्यक्तिगत जीवन का लक्ष्य है ही। इसके विषय में तो कोई यह कह ही नहीं सकता कि हमें सुख-सन्तोष की कामना नहीं है। हम दुःख-दर्द का ही जीवन व्यतीत करते रहेंगे। यह हमारी व्यक्तिगत वस्तु होगी। इससे किसी का कोई सम्बन्ध नहीं। सुख-सन्तोष के लिए हम जीवन पर कोई प्रतिबन्ध अथवा नियम आरोपित करना पसन्द नहीं करते। कहने को कोई भले ही मुख से बकवास कर दे, किन्तु सुख-सन्तोष संसार का प्रत्येक व्यक्ति चाहता है। इसके अथवा इसकी आशा के बिना कोई जीवित ही नहीं रह सकता।

जो उन्नति की ओर बढ़ने का प्रयत्न नहीं करेगा, वह पतन की ओर फिसलेगा। यह स्वाभाविक क्रम है। कोई भी उन्नति अथवा अवनति के बीच खड़ा नहीं रह सकता। इस संसार में मनुष्य जीवन की दो ही गतियाँ हैं, उत्थान अथवा पतन। तीसरी कोई भी माध्यमिक गति नहीं है। मनुष्य उन्नति की ओर न बढ़ेगा तो समय उसे पतन के गर्त में गिरा देगा। उस अवस्था में उसके जीवन में दुःख, पश्चाताप, आत्म-ग्लानि अथवा कष्ट-क्लेशों के सिवाय सुख-शाँति की एक क्षीण किरण भी पास ना आ सकेगी।

इतना ही नहीं हम सब आध्यात्मिक दृष्टि से भी उन्नति की ओर बढ़ने में कर्तव्यबद्ध हैं। यह शरीर, यह जीवन और यह सारी सुविधायें हमारी व्यक्तिगत सम्पत्तियाँ नहीं हैं कि हम इन्हें जिस प्रकार चाहें सदुपयुक्त अथवा दुरुपयुक्त करते रहें। यह सब वस्तुयें किसी दूसरे की सम्पदा हैं जो हमें एक विशेष प्रयोजन के लिए प्रदान की गई हैं। यह सारी वस्तुयें ईश्वर की धरोहर हैं और जीवात्मा का उद्धार करने कि लिए, प्रयोग करने के लिए दी गई हैं। हम इनको विषयों के भाग में समाप्त कर डालें, किसी प्रकार भी हमें यह अधिकार प्राप्त नहीं है। जो कोई इस सम्बन्ध में अनाधिकार चेष्टा करता है, उसे लोक से लेकर परलोक तक उसका समुचित दण्ड भोगना पड़ता है। यदि विषय-भोग ही इसका उद्देश्य रहा होता तो परमात्मा हमें पशु-योनियों से बढ़ाकर मनुष्य की योनि में क्यों पहुँचने देता और क्यों बुद्धि, विवेक, विचार और भावनाओं की अनुपम विभूतियाँ ही अनुग्रह करता?

हम आज मनुष्य हैं। यह स्थिति यों ही अनायास हमें प्राप्त हो गई है। यह वह सुफल है, जो हमें निरन्तर उन्नति करने के पुण्य प्रयास में दिया गया है। कीट पतंगों और पशु-पक्षियों की चौरासी लाख योनियों को क्रमशः पार करते हुए इस जीवात्मा को मनुष्य शरीर में ला सकने में सफल हो सके हैं। और यही वह अवसर है, जब हम सबको मुक्त कर मोक्ष की स्थिति में पहुँचाकर अपने कर्तव्य से निवृत्त हो जायें। निम्न एवं साधन रहित कीट-पतंगों की स्थिति से उन्नति करते-करते मनुष्य जैसे महान् जीवन में आकर हम उस अभियान को बन्द कर पतन की ओर जाने लगें, इसमें कोई बुद्धिमानी जैसी बात तो समझ नहीं आती। जबकि यही वह अवसर है, जिसमें उन्नति का प्रयास सबसे अधिक करने की आवश्यकता है।

सामाजिक हित, सुख-शाँति अथवा आत्मोद्धार कोई भी उद्देश्य लेकर क्यों न किया जाये, हम उन्नति की ओर अग्रसर होने को बाध्य हैं और हमें यह हितकर बन्धन स्वीकार करना चाहिए। इन सभी उन्नतियों की ओर एक साथ अग्रसर होने का एक ऐसा समन्वित मार्ग निकाला जा सकता है, जिसमें सामान्य जीवन से हटकर किसी विशेष प्रयत्न करने की आवश्यकता नहीं है। वह मार्ग है किसी सदुद्देश्यपूर्वक जीवन की धारा को मर्यादित मार्गों से चलाना और ऐसे मार्ग न अपनाना जिस पर चलने से आत्मा निषेध करे।

स्वार्थपूर्ण जीवन सबसे दुःखदायी जीवन है। इसका परिणाम नरक जैसी परिस्थितियाँ उत्पन्न कर देता है।


Quotation

यो यमर्थं प्रार्थयते तदर्थं चेहते क्रमात्।

अवश्यं स तमान्प्रोति न चेदर्धान्निवर्त्तते॥

जो जिस वस्तु की प्राप्ति के लिये इच्छा करे और उसके लिये क्रमपूर्वक वैसा ही प्रयत्न भी करे तो उसकी प्राप्ति अवश्य ही हो जाती है, यदि अपने आरब्ध प्रयत्न को बीच में ही न छोड़ दे।

संघर्ष, द्वेष, ईर्ष्या, लोभ, लिप्सा यदि दोषों का मूल कारण स्वार्थपरता ही है। स्वार्थपरता के कारण ही मनुष्य चोर, छली, बेईमानी और दुष्ट बन जाता है। ऐसा नहीं कि लोग इसको जानते न हों। लोग जानते हैं फिर भी इसी विभीषिका में गिरते चले जाते हैं, स्वार्थ की ओर पैर बढ़ाने से उन्हें आशंका होती है, आत्मा धिक्कारती है और लोग उसकी आवाज अनसुनी करके उस ओर बढ़ते रहते हैं। यह अप्राकृतिक प्रवृत्ति है, मनुष्य को इस निन्दनीय दुर्बलता को त्याग देना चाहिए। निःस्वार्थ भाव से अपने स्वत्वों की रक्षा और कर्तव्यों का पालन करने से सुन्दर शीतल और सन्तोषपूर्ण अन्तःशान्ति मिलती है।

स्वार्थ त्याग देने से परमार्थ का भाव स्वतः आ जाता है। परमार्थपूर्ण जीवन स्वर्गीय सुख-शाँति का आधार है। किसी का हित करना, आवश्यकता पीड़ितों की सेवा करना, किसी सहायता में तत्पर रहना और किसी को दुःख न देना आदि ऐसी वृत्तियां हैं, जिसमें आनन्द की अनिर्वचनीय पुलक समायी रहती है।

परमार्थी व्यक्ति बाहर से भले ही साधारण स्थिति का दिखाई दे, वह जोर-जोर से हंसता, खिलखिलाता भले ही दृष्टिगोचर न हो तथापि उसका अन्तःकरण परिपूर्ण ही बना रहता है। उसमें एक अहेतुक सम्पन्नता, गरिमा और गौरव की अनुभूति बनी रहती है। परमार्थी की आत्मा ही सन्तुष्ट नहीं रहती, बल्कि उसके संपर्क में आने वाला हर आदमी सन्तुष्ट और प्रसन्न रहता है, जिससे उसकी स्वयं की आत्मा का आनन्द बढ़ जाता है। सारे लोग उसे प्यार करते हैं। समाज का यह अनुदान किसी के लिये भी सदा-सर्वदा वाँछनीय है।

परमार्थ बुद्धि रखने वाले व्यक्ति का सामाजिक ही नहीं पारिवारिक जीवन भी बड़ा सुखी व सन्तुष्ट रहता है। परिवारों में अधिकतर कलह का कारण स्वार्थपरता ही होती है। लोग अपनी-अपनी लगाए रहते हैं। अपने लिये ही अधिक से अधिक वस्तुयें और अपेक्षा चाहते रहते हैं। हर कोई यह चाहता है कि परिवार में उसकी महत्ता और नेतृत्व ही बना रहे, प्रौढ़ सदस्य प्रौढ़ों के बीच और वयस्क सदस्य समवयस्कों के बीच इसी भावना से प्रेरित रहकर कलह उत्पन्न करते रहते हैं। ऐसी स्थिति में तू-तू, मैं-मैं होना स्वाभाविक ही है। जिस पारिवारिक जीवन को स्वर्ग तुल्य सुखदायक बतलाया गया है, वह नरक तुल्य कष्टदायक बन जाता है।

जिन परिवारों के प्रमुख गृहस्थ परमार्थ दृष्टिकोण के होते हैं, वे सबसे पहले अपने स्वार्थ का त्याग कर अधिकारों को कर्तव्यों में समाविष्ट कर लिया करते हैं। सबके साथ समान प्रेम करते और सबको यथोचित आदर देते हैं। अपना कोई भाग न रखकर सारे का सारा परिजनों को बाँट देते हैं। ऐसे समभावी मुखिया को कष्ट पहुँचाने वाला कोई काम करना किसी परिजन को पसन्द न होगा। फिर जिस परिवार में त्याग, निःस्वार्थ और स्नेह का त्रिविधि समीर बहता हो, वहाँ के किसी सदस्य का चित अवाँछनीय ताप से व्याकुल रह भी कैसे सकता है। सुगन्ध का स्वभाव है कि वह जिसके संपर्क में आती है उसे भी अपने समान ही सुगन्धित कर देती है। गुणों का संपर्क दूसरों को भी गुणी बना देता है। परिवार नायक की त्यागमय गतिविधि अन्य सदस्यों को प्रभावित किये बिना नहीं रह सकती। एक बार अस्वार्थ का सुख अनुभव कर लेने पर फिर कोई भी व्यक्ति स्वार्थ को पास नहीं ठहरने देगा।

इस प्रकार जिसने स्वार्थ के त्याग और परमार्थ के ग्रहण की महानता स्वीकार कर अपना जीवन तदनुरूप ढाल लिया, उसके लिए मानो इसी संसार में स्वर्ग का द्वार उद्घाटित हो गया। जिसके परिवार में सुख-शान्ति बनी रहे और समाज जिसके लिये स्नेह एवं श्रद्धा के सुमन लिए खड़ा रहे उसके लिए इससे बढ़कर स्वर्ग अन्यत्र कहाँ हो सकता है? हम सब देवताओं के जिस अनदेखे स्वर्ग की कल्पना करते हैं, उसमें भी तो इस प्रकार के सुख-सन्तोष और हर्ष, प्रसन्नता का आरोप किया करते हैं। वहाँ भी इससे अधिक और क्या होता है। और उसे पाने के लिए भी तो स्वार्थ का त्याग कर परमार्थ का ही पथ अपनाना पड़ता है।

इस सन्तोषपूर्ण स्थिति में मनुष्य की कितनी मानसिक और आत्मिक उन्नति हो सकती है, यह तो कोई भुक्तभोगी ही जान सकता है। आत्मा की उन्नति संसार की धन-वैभव प्रधान उन्नति से कहीं बढ़-चढ़कर है। उसे प्राप्त करने के लिये प्रत्येक विवेकशील व्यक्ति को प्रयत्न करना ही चाहिये। जिसमें कोई विशेष प्रयत्न अथवा पुरुषार्थ की आवश्यकता नहीं, जिस प्रकार किसी प्रकार का कोई खतरा नहीं और जिसमें कुछ पास से व्यय नहीं होना ऐसे परमार्थ पथ को अपनाकर कोई पतन से बचना और उन्नति प्राप्त न करना चाहेगा, यह बात किसी प्रकार समझ में नहीं आती। जो बुद्धिमान हैं, वे तो ऐसी भूल करेंगे नहीं और जिन पर दुर्भाग्य की छाया हो और दुर्बुद्धि की छाप पड़ी हो, उनके विषय में कुछ कहा नहीं जा सकता।


गंगा जल की महान् महिमा-2

“भगवती गंगा का जल औषधि तुल्य है, वह रूप को चमका देता है, रोग का नाश करता है।” यह पंक्तियाँ पढ़ीं तो कुष्ठ रोग से पीड़ित महाकवि पद्माकर कानपुर पहुँचे और ‘पद्माकर-कोटी’ नाम से एक स्थान गंगा जी के किनारे लेकर वहीं रहने लगे। गंगा जी का जल पीना, उसी से स्नान करना, उसी के जल से भोजन बनाना, गंगा जी की ही पावन तटी पर विहार करना यही उनका क्रम हो गया।

जिस रोग को वैद्यों, डाक्टरों ने असाध्य घोषित कर दिया, गंगा माँ की कृपा से वह रोग अच्छा हो गया तो कवि हृदय से उनके प्रति स्वाभाविक श्रद्धा फूट पड़ी। “गंगा-लहरी” नाम से 55 छन्दों वाला उनका खण्ड, काव्य उन्हीं भावों की अभिव्यक्ति है। लगता है, भारतीय जन-जीवन को आदिकाल से गंगा जी से ऐसे ही चमत्कारी लाभ प्राप्त हुये हैं, तभी स्थान-स्थान पर उनकी स्तुति और भक्ति-गाथा गाई गई है।

बाल गंगाधर तिलक ने गंगा जी को संसार की सभी नदियों से पवित्र माना था। गाँधी जी तो थे ही महान् धार्मिक उनने भी भगवती गंगा के प्रति प्रगाढ़ निष्ठा व्यक्त की। बंगाल के प्रसिद्ध कवि श्रीयुत द्विजेन्द्रलाल राय ने भारतीय आत्मा की अन्तिम श्रद्धा व्यक्त करते हुए भावपूर्ण शब्दों में लिखा है-

परिहरि भव सुख दुःख जे खत्ने,

माँ! शापित अन्तिम शपने।

वरषि श्रवणे तब जल कल-कल,

वरषि सुप्ति मम नयने।

बरषि शान्तिमम शंकित प्राणे,

बरषि अमृत मम अंगे।

माँ! भागीरथि जान्हवि सुरधुनि,

माँ! कल्लोलिनि गंगे।

हे कल्लोलिनि गंगे। तुम जन्म-जन्मान्तरों के दुःखों को दूर करने वाली हो। अन्तिम समय मेरे शंकित मन और प्राणों को शाँति और तृप्ति प्रदान करो। अपने अमृतमय जल की हमारे सम्पूर्ण अंगों में वर्षा करो।

कवियों और शास्त्रकारों द्वारा अभिव्यक्त इस श्रद्धा के पीछे कोई निराधार कल्पनायें और मात्र भावुकता नहीं रही। किसी भी तत्व के प्रति श्रद्धा, उसकी उपयोगिता और वैज्ञानिक गुणों के आधार पर रही है। गंगा जी के जल में ऐसे उपयोगी तत्व और रसायन पाये जाते हैं, जो मनुष्य की शारीरिक विकृतियों को ही नष्ट नहीं करते वरन् विशेष आत्मिक संस्कार जागृत करने में भी वे समर्थ हैं, इसीलिए उनके प्रति इतनी श्रद्धा व्यक्त की गई। वैज्ञानिक परीक्षणों से भी यह बातें स्पष्ट होती जा रही हैं।

प्राचीनकाल में जब भारतवर्ष का अरब, मिश्र और योरोपीय देशों से व्यापार चलता था, तब भी और इस युग में भी सब देशों के नाविक गंगा की गरिमा स्वीकार करते रहे हैं। डॉ. नेल्सन ने लिखा है कि हुगली नदी का जो जल कलकत्ता से जहाजों में ले जाते हैं, वह लन्दन पहुँचने तक खराब नहीं होता, परन्तु टेक्स नदी का जल जो लन्दन से जहाजों में भरा जाता है, बम्बई पहुँचने के पहले ही खराब हो जाता है।

तब जबकि जल को रासायनिक सम्मिश्रणों से शुद्ध रखने की विद्या की जानकारी नहीं हुई थी, तब पीने के पानी की बड़ी दिक्कत होती थी। खारा होने के कारण लोग समुद्र का पानी नहीं पी सकते थे। अपने साथ जो जल लाते थे, वह भी कुछ ही दिन ठहरता था, जबकि समुद्री यात्रायें महीनों लम्बी होती हैं। यह दिक्कत उन्हें आने में ही रहती थी। जाते समय वे लोग (हुगली) गंगा जी का बहुत जल भर ले जाते थे, बहुत दिनों तक रखा रहने पर भी उसमें किसी प्रकार के कीड़े नहीं पड़ते थे। समुद्री जल में रखे चावल बहुत दिन तक अच्छे नहीं रहते, सड़ने लगते हैं, जबकि गंगा जी के पानी में वह शीघ्र नहीं सड़ते। यों संसार में और भी अनेक पवित्र नदियाँ हैं पर गंगाजी के जल में पाई जाने वाली जैसी पवित्रता किसी में भी नहीं है।

योरोपीय देशों में चैटल, गायोन सेण्ट नेक्टेयर बार्बूले और मोन्टेडोरे के कुण्डों को अति पवित्र माना जाता रहा है। हमारे देश में लखनऊ के पास कुकरैल नदी के स्नान से कुत्ते के काटे के अच्छा हो जाने का विश्वास किया जाता है। मोण्टेडोरे के बारे में भी वहाँ के लोगों का ऐसा ही विश्वास है। फ्रान्स के डॉ. मोनोद ने इन जल-कुण्डों की वैज्ञानिक जाँच करके यह बताया कि सचमुच इन जल-कुण्डों में कुछ ऐसे उपयोगी रसायन घुले हुये हैं, जो डिप्थीरिया, दमा आदि बीमारियों पर लाभकारी होते हैं। 1930 में इण्टेरियन लेक्चर में डॉ. मोनोद ने इन निष्कर्षों का विवरण दिया तो लोगों को उन मान्यताओं की वास्तविकता स्वीकार करनी पड़ी। फिर इन जलकुण्डों से बढ़चढ़कर गुण देखने के कारण गंगा जी को पुराणों में इतना महत्व दिया गया तो उस पर आक्षेप करने का कोई कारण नहीं होना चाहिये था।

कानपुर और वाराणसी की बात और है, वहाँ पहुँचने तक गंगा जी के मार्ग में पड़ने वाले शहरों का मल और कारखानों की सारी गन्दगी उसमें ही पड़ती है। जहाँ ऐसी मिलावट नहीं होती, वहाँ से ऊपर का गंगा-जल गुणों की दृष्टि से अमृत के समान है, अब इसका वैज्ञानिक परीक्षण भी हो चुका है। गंगा-जल के जो रासायनिक परीक्षण किए गए हैं, उनके निष्कर्षों पर एकाएक वैज्ञानिक भी विश्वास नहीं करते, क्योंकि उसमें कुछ ऐसे तत्व पाये जाते हैं, जो संसार की और किसी भी नदी के जल में नहीं पाये जाते, चाहे वह अफ्रीका की आमेजन नदी हो अथवा अमेरिका की मिसीसिपी मिसौरी नदियाँ। यमुना में भी वह तत्व उपलब्ध नहीं, जो गंगा जी में बहुतायत से विद्यमान् है। इन तत्वों की वैज्ञानिक जानकारी प्राप्त नहीं की जा सकी कि वे क्या हैं और क्यों हैं पर उनमें अत्यधिक शक्तिशाली कीटाणु-निरोधक तत्व पाया गया है- उनका नाम ‘कालोइड’ रखा गया है।

फ्रान्स के प्रसिद्ध डॉ. हेरेल ने जब गंगा-जल की इतनी प्रशंसा सुनी तो वे भारत आये और गंगा जल का वैज्ञानिक परीक्षण किया। उन्होंने पाया कि इस जल में संक्रामक रोगों के कीटाणुओं को मारने की जबर्दस्त शक्ति है। आश्चर्यजनक बात तो यह है कि एक गिलास में किसी नदी या कूयें का पानी लें, जिसमें कोई भी कीटाणु नाशक तत्व न हो, उसे गंगा-जल से मिला दो तो गंगा-जल के कृमिनाशक कीटाणुओं की संख्या बढ़ जाती है, इससे सिद्ध होता है कि गंगा जी में कोई ऐसा विशेष तत्त्व है जो किसी भी मिश्रण वाले जल को भी अपने ही समान बना लेता है। यही कारण है 1557 मील लम्बी गंगा जी में गोमती, घाघरा, यमुना सोन, गण्डक और हजारों छोटी-छोटी नदियाँ मिलती चली गई, तब भी गंगासागर पर उसकी यह कृमिनाशक क्षमता अक्षुण्ण बनी रही। यह एक प्रकार का चमत्कार ही है।

डॉ. हेरेल ने अपने प्रयोगों से सिद्ध कर दिया कि इस जल में टी. बी., अतिसार, संग्रहणी, व्रण, हैजा के जीवाणुओं को मारने की शक्ति विद्यमान है। गंगा जी के कीटाणुओं की सहायता से ही उन्होंने सुप्रसिद्ध औषधि ‘बैक्टीरियोफैज’ का निर्माण किया, जो ऊपर कही गई बीमारियों के लिए सारे संसार में लाभप्रद सिद्ध हुई। आज भी भारतवर्ष के लगभग 15 हजार कुष्ठ रोगी रोग-निवारण की आशा से गंगा जी के किनारे रहते हैं। दूसरे देशवासी हमारी इस ईश्वरीय देन का विश्वासपूर्वक लाभ ले रहे हैं और हम भारतीयों ने उन्हीं श्रद्धास्पद भगवती गंगा में कितनी गन्दगी भर दी, उसका स्मरण करने भर से बड़ा कष्ट होता है।


Quotation

अपहत्य तमस्तीव्रं यथा भत्युढपे रविः।

तथापहृत्य पाप्मानं भाति गंगाजलोक्षितः॥

-वेद व्यास,

उदय काल में भगवान् सूर्य जिस प्रकार रात्रि के अन्धकार को विदीर्ण कर डालते हैं, उसी प्रकार गंगा जल से स्नान करने वाले के पाप नष्ट होकर तेजस की वृद्धि होती है।

यदि अपनी इस धार्मिक आध्यात्मिक और महानतम साँस्कृतिक उपलब्धि को पवित्र और लोकोपयोगी रखना है तो गंगा जल की शुद्धि के लिये भी एक सत्याग्रह आन्दोलन छेड़ना पड़ेगा।

जो गंगा हम भारतीयों के जीवन-मरण के साथ जुड़ी हुई है, उसे यों अशुद्ध करना उन लाखों-करोड़ों भारतीयों की श्रद्धा और भावनाओं का अपमान है, जो अमावस्या, सूर्य ग्रहण और कार्तिकी पूर्णिमा जैसे विशेष पर्वों पर गंगा जी के घाट-घाट परा कोसों मील दूर से चलकर पहुँचते और स्नान करते हैं।

हमारी इस श्रद्धा का आधार वह विज्ञान है, जिसे भारतीय तत्ववेत्ता आदि काल से जानते रहे हैं और आज का विज्ञान जिसकी अक्षरशः पुष्टि करता है। डॉ. केहिमान ने लिखा है- “किसी के शरीर की शक्ति जवाब देने लगे तो उस समय यदि उसे गंगा-जल दिया जाये तो आश्चर्यजनक ढंग से जीवन शक्ति बढ़ती है और रोगी को ऐसा लगता है कि उसके भीतर किसी सात्विक आनन्द का स्रोत फूट रहा है।”

लगता है इस बात का पता भारतीयों को आदिकाल से था तभी प्राचीन काल के अधिकाँश सभी वानप्रस्थ और संन्यासी जीवन के अन्तिम दिनों में हिमालय की ओर चले जाते थे। आज भी गंगा जी के किनारे जितने आश्रम हैं, उतने सब मिलाकर समूचे भारतवर्ष में भी नहीं हैं।

(क्रमशः)


स्वर्ग और नरक करनी के फल हैं

स्वर्ग और नरक करनी के फल हैं, एक सन्त ने अपने शिष्य को समझाया पर शिष्य की समझ में बात चढ़ी नहीं। तब उसका उत्तर देने के लिये अगले दिन सन्त शिष्य को लेकर एक बहेलिये के पास पहुँचे। वहाँ जाकर देखा व्याध कुछ जंगल के निरीह पक्षी पकड़कर लाया था, वह उन्हें काट रहा था, उसे देखते ही शिष्य चिल्लाया-महाराज! यहाँ तो नरक है, यहाँ से शीघ्र चलिये।

सन्त बोले-सचमुच इस बहेलिये ने इतने जीव मार डाले पर आज तक फूटी कौड़ी इसे न जुड़ी, न जुड़ेगी। कपड़ों तक के पैसे नहीं, इसके लिये यह संसार भी नरक है और परलोक में तो इतने मारे गये जीवों की तड़पती आत्मायें उसे कष्ट देंगी, उसकी तो कल्पना भी नहीं हो सकती।

सन्त दूसरे दिन एक साधु की कुटी पर पधारे। शिष्य भी साथ थे, वहाँ जाकर देखा, साधु के पास है तो कुछ नहीं पर उनकी मस्ती का कुछ ठिकाना नहीं, बड़े सन्तुष्ट, बड़े प्रसन्न दिखाई दे रहे थे। सन्त ने कहा- वत्स! यह साधु इस जीवन में कष्ट का, तपश्चर्या का जीवन जी रहे हैं तो भी मन में इतना आह्लाद- यह इस बात का प्रतीक है कि इन्हें पारलौकिक सुख तो निश्चित ही है।

सायंकाल सन्त एक वेश्या के घर में प्रवेश करने लगे तो शिष्य चिल्लाया-महाराज! यहाँ कहाँ? सन्त बोले-वत्स! यहाँ का वैभव भी देख लें। मनुष्य इस साँसारिक सुखोपभोग के लिये अपने शरीर, शील और चरित्र को भी जिस तरह बेचकर मौज उड़ाता है पर शरीर का सौंदर्य नष्ट होते ही कोई पास नहीं आता, यह इस बात का प्रतीक है कि इसके लिये यह संसार स्वर्ग की तरह है पर अन्त इसका वही है, जो उस बहेलिये का था।

अन्तिम दिन वे एक सद्गृहस्थ के घर रुके। गृहस्थ बड़ा परिश्रमी, संयमशील, नेक और ईमानदार था सो सुख-समृद्धि की उसे कोई कमी नहीं थी वरन् वह बढ़ ही रही थी। सन्त ने कहा-यह वह व्यक्ति है। जिसे इस पृथ्वी पर भी स्वर्ग है और परलोक में भी।

शिष्य ने इस तत्व-ज्ञान को भली प्रकार समझ लिया कि स्वर्ग और नरक वस्तुतः करनी का फल है।


वृत्ति शोधन से आत्मिक प्रगति

“आग्नीध्र! तुम आ गये। मैं तुम्हारी ही प्रतीक्षा कर रहा था। राज्य का सम्पूर्ण उत्तरदायित्व तुम्हें सौंप कर अब मैं मुक्त हो जाना चाहता हूँ। मेरी एक ही इच्छा शेष रही है “आत्म-दर्शन” और “ईश्वर प्राप्ति”। कुलगुरु से आज्ञा मिल चुकी है। तपश्चर्या के लिये उन्होंने हिमावर्त जाने की आज्ञा प्रदान कर दी है। आज ही मुहूर्त है, तीसरे प्रहर मैं यहाँ से प्रस्थान कर दूँगा। इस बीच तुम्हें राज्य सम्बन्धी आवश्यक बातें समझा देना आवश्यक धर्म समझता हूँ। इसी हेतु तुम्हें यहाँ बुलाया है।” प्रियव्रत ने संक्षेप में सारी बात पुत्र आग्नीध्र को समझा दी।

आग्नीध्र को यह बात कुछ दिन पूर्व ज्ञात हो गई थी। उन्हें यह भी पता था कि मेरा राज्याभिषेक होने वाला है, किन्तु जब उन्होंने पिता के भावी-जीवन की कल्पना की तो उन्हें निश्चय हो गया था कि आत्म-निर्वाण और ईश्वरत्व की प्राप्ति से बढ़कर और कोई पुरुषार्थ नहीं है। मनुष्य जीवन में आने का सच्चा उद्देश्य भी वही है, ऐसा न होता तो ऋषियों-महर्षियों ने ऐश्वर्य का जीवन ठुकराया न होता। पिता-श्री स्वयं शास्त्रों के ज्ञाता हैं, उनकी बौद्धिक क्षमता किसी भी आचार्य से कम नहीं है। यदि उन्होंने तपश्चर्या का मार्ग चुना तो इसका यही अर्थ है कि आत्मोत्थान के लिये राज्य-वैभव भी ठुकराया जा सकता है। आत्म लाभ के आगे राज्य सुख भी तुच्छ है।

उन्होंने विनीत भाव से कहा-”तात्! आप जानते हैं कि सुख सम्पन्नता, राज्य-वैभव आत्म-कल्याण में बाधक है, इसलिये तो यह सब छोड़कर जीवन मुक्ति के लिये तप करने जा रहे हैं। आप ही बतायें अपना बन्धन मेरे पैरों में डालना क्या मुझे पाश-बद्ध करना नहीं। यदि हाँ तो मुझे यह ऐश्वर्य नहीं चाहिये। मैं भी आपके ही साथ चलूँगा और वन में रहकर तपश्चर्याएं करके आत्म शक्तियाँ जागृत करूंगा ताकि वे मेरे लिये ईश्वर दर्शन में सहायक बनें।”

राज्याभिषेक देखने के लिये आज राजधानी के सम्भ्राँत नागरिक नहीं राज्य भर से दूर-दूर की प्रजा आई थी। राज-भवन नर-नारियों से खचाखच भरा हुआ था। उस मंगल पर्व पर एकाएक वैराग्य-भाव उदय हो जाने से सारे सभा-भवन में सन्नाटा छा गया। सब के मन में उत्सुकता थी, देखें राजकुमार आग्नीध्र राज्य-सिंहासन सँभालते हैं या पिता के साथ ही वन गमन करते हैं।

महाराज प्रियव्रत ने राज-मुकुट उतारकर उसे सम्मानपूर्वक शीर्ष सिंहासन पर प्रतिष्ठित कर दिया, फिर प्रजा की ओर भाव वत्सल दृष्टि डाली। नर-नारियों के मुख-मंडलों पर एक मात्र जिज्ञासा दिखाई दी। तब उन्होंने आग्नीध्र के सम्मुख होकर कहा- “तुम्हारी अनासक्ति सराहनीय है आग्नीध्र! किन्तु क्या तुम यह जानते हो कि मैंने वर्णाश्रम धर्म का पालन किया है। आज तक मुझसे जितना बन सका प्रजा और परिजनों की सेवा की। उन्हें भगवान् के प्रतिनिधि मानकर पूजता रहा। मैंने राज्य सुखों का उपभोग भी किया है, आवश्यकता पड़ी है तो अपराधियों को दंड देने की कठोरता भी दिखाई है अब धार्मिक मर्यादा के अनुसार मैं चतुर्थ वय में प्रवेश कर रहा हूँ। मुझे उचित है कि मैं अब शेष जीवन तप करूं और अपना लोकोत्तर जीवन सुनिश्चित बनाऊँ।”

तुम्हारे लिये यही उचित होगा कि तुम अभी प्रजा की सेवा करते हुए अपनी महत्वाकाँक्षायें भी तृप्त करो योग और तपश्चर्या के लिये इन्द्रियासक्ति पर विजय पाना आवश्यक है तात्! तुम्हें पता नहीं दमन की हुई इन्द्रियाँ और भी बलवती हो उठती हैं, जो अपरिपक्व साधक को कभी भी साधन-भ्रष्ट कर सकती हैं। प्रजापति ने गृहस्थाश्रम की प्रतिष्ठा इसीलिये की कि मनुष्य इन्द्रिय सुखों का उपभोग करता हुआ उनकी निस्सारता की स्पष्ट अनुभूति करे, यदि ऐसा समझ में आ जाये तो चित-वृत्तियों का नियन्त्रण सरल हो जाता है। चित-वृत्तियों का निरोध अपने वश में न हो जावे, तब तक योग करने की अनुमति नहीं दी जाती।”

आग्नीध्र! चुप हो गये। पितृ देव का प्रतिवाद करना अच्छा न लगा। राज्याभिषेक के लिये आचार्यों ने मन्त्रोच्चारण प्रारम्भ किया। एक क्षण के लिये उभरी हुई निराशा, उत्साह और चहल-पहल में बदल गई। राज्याभिषेक हो गया। प्रजा ने प्रीति-भोज का आनन्द लिया। तृतीय प्रहर सबने महाराज प्रियव्रत को भाव भीनी विदाई दी। राज्य-भवन एक बार महाराज आग्नीध्र की जयकार से गूँज गया।

पर एक ही रात बीती होगी कि राज्य-सिंहासन सूना हो गया। आग्नीध्र के अन्तःकरण में आत्म-दर्शन की कामना ने इतनी तीव्रता से प्रवेश किया था कि उसके प्रभाव को सम्भाल पाना उनके लिये कठिन हो गया था। अधैर्य और क्षणिक आवेश ही तो कर्तव्य-पलायन कराते हैं। आग्नीध्र ने उसी प्रकार बिना विचारे राज-वैभव का परित्याग कर दिया और मन्दराचल पर तप करने लगे। चतुर मन्त्रियों ने राज्य हित में इस बात का कानो-कान समाचार न फैलने दिया। सारी व्यवस्था ज्यों-की-त्यों चलती रही। चिन्ता की बात इतनी ही थी कि आग्नीध्र के अतिरिक्त राज्य सम्भालने वाला और कोई दूसरा नहीं था। सब कुलगुरु के आदेश की प्रतीक्षा करने लगे।

मन में अविचल वैराग्य हो और ईश्वर के प्रति प्रगाढ़ प्रेम तो साधना की सफलता में देर नहीं लगती। आग्नीध्र थोड़े दिनों में ही समाधि-सुख की अनुभूति करने लगे। जब वे तप के लिये बैठते तो साँसारिकता की ओर उनका चित तक न डोलता। आत्मा मुक्त आकाश में विचरण करने और देव-शक्तियों के दर्शन का आनन्द लेने में निमग्न होने लगी।

कुछ ही पखवारे बीते थे। आग्नीध्र एक दिन ऐसी ही अवस्था में ध्यानावस्थित ईश्वर चिन्तन कर रहे थे। बसन्त के दिन वैसे ही रमणीक होते हैं, उस पर मन्दराचल की सौंदर्यमयी छटा तो वातावरण को और भी चारु बना रही थी। सघन तरुवरों पर फैली स्वर्णलताओं की हरीतिम प्रभा, कोयल की कूक मयूरों का नृत्य, सरोवर में कारण्डव, जल कुक्कुट और कलहंसों का कूजन, कमल-पुष्प का हास और सुवास बिखेरता सौरभ वैसे ही साधकों के चित में माधुर्य जगा रहे थे। फिर आज तो एक और मधुर झंकार प्रातःकाल से ही आश्रम में गूँज रही थी, पायलों की झंकार। नृत्य और कोयल-कण्ठ को लुभाने वाला मधुरिम गीत। सब मिलाकर ऐसा लग रहा था, कामदेव रति को लेकर आश्रम में उतर आये हों।

आग्नीध्र का ध्यान टूट गया। स्वर संगीत अब मन को अधीर कर रहे थे। आंखें खुल गई, हृदय उसे देखने के लिये लालायित हो उठा था, जो आलौकिक सौंदर्य के संस्कार सारे वातावरण में बिखेरे दे रहा था। हृदय और मन को आल्हारित करने वाली विलासपूर्ण गति भेद-भरी चितवन, क्रीड़ा-चापल्य और अंगराग से सारे वातावरण को कामाभिसिक्त बनाने वाली कामिनी-आँख उठाकर आग्नीध्र ने देखा- सामने पूर्वचित्ति ऐसे खड़ी है जैसे किसी चित्रकार ने सौंदर्य की साक्षात् प्रतिमा गढ़ दी हो।

आंखें देखते-देखते थक गई तो पाँव गतिमान हो उठे। आग्नीध्र ने आसन त्याग दिया और पागल की भाँति सुन्दरी पूर्वचित्ति की ओर भागे। रूप और वासना में वह शक्ति भर दी है, भगवान ने कि उन्हें पाकर मनुष्य अपने आपको भी भूल जाता है, अपने परम हितैषी परमात्मा को भी बिसरा देता है। यही तो प्रधान बाधा है, ईश्वर प्राप्ति के मार्ग में। शास्त्रकार तभी तो कहते हैं, “योगी बनने से पहले चित्त-निरोधी होना आवश्यक है।”

पर जब चित चंचल हो गया तो फिर उसे रोक सकना स्वयं भगवान् के वश में नहीं, आग्नीध्र ने पूर्वचित्ति के सौंदर्य के सम्मुख आत्म-समर्पण कर दिया।

आग्नीध्र! बालकों की तरह प्रलाप करता जा रहा था- “पूर्वचित्ति! तुमने मुझे स्वीकार न किया तो मैं यहीं प्राणांत कर दूँगा, अब तुम्हारे बिना मैं एक क्षण भी नहीं रह सकता।”

और तभी सामने से मुस्कराते हुये महात्मा प्रियव्रत आते दिखाई दिये।- तात् उन्होंने आशीर्वाद का हाथ उठाते हुये कहा- “मैंने यही तो कहा था कि वर्णाश्रम धर्म का पालन करो, गृहस्थ में रहकर महत्वाकाँक्षाओं को पूरा किया जाता है, वह सच्ची तपस्या है, उसके बाद योग-भ्रष्ट होने की आशंका नहीं रहती। और तब उन्होंने पूर्वचित्ति का हाथ- आग्नीध्र के हाथ में देते हुये कहा ‘वत्स’! हमारा आशीर्वाद तुम्हारे साथ है, तुम दोनों आज से सम्राट और साम्राज्ञी की तरह रहो, कुल धर्म वर्ण, श्रम धर्म का पालन करते हुये, प्रजा की सेवा करो भगवान तुम्हें वह अवसर भी देंगे, जब तुम ‘ब्रह्म-प्राप्ति’ करोगे।”

आग्नीध्र ने पलायनवादी दृष्टिकोण का परित्याग किया और सुखपूर्वक राज्य संचालन करने लगे। समयानुसार उन्होंने राज्य भोग त्याग कर संन्यास लिया और ‘ब्रह्म-निर्वाण’ का पद प्राप्त किया।


आओ हम-आप दोनों जियें

एक समय था अंजीर केवल अर्जेन्टाइना में पाई जाती थी। वहाँ से स्माइराना नामक अंजीर के कुछ पौधे कैलीफोर्निया (अमेरिका) में लाए गये। इन पौधों को उगाने के लिये बहुत प्रयत्न किये गये, अच्छी खाद दी गई, पानी दिया गया, मिट्टी दी गई पर सब कुछ निरर्थक गया। अंजीर का पौधा बढ़ तो गया, उसमें फूल भी आ गये, किन्तु बाँझ। उन फूलों पर फल उतरे ही नहीं। वैज्ञानिकों के परागण (पोलीनेशन) के सारे प्रयत्न कर लिये पर उनकी एक न चली।

अन्त में अमेरिका के एक वैज्ञानिक उस देश गये जहाँ से अंजीर का पौधा आया था। पौधे के विकास का सूक्ष्म अध्ययन करते समय उन्होंने देखा कि एक विशेष जाति की बर्र (मक्खी) ही जब इन पौधों पर आती है तभी ‘पोलीनेशन’ (पौधों में संयोग) की क्रिया सम्पन्न होती है। इन बर्रों को तब कैलीफोर्निया लाया गया। जैसे ही वह बर्रे इन पौधों के फूलों पर बैठीं ‘पोलीनेशन’ क्रिया प्रारम्भ हो गई और बाँझ अंजीर के पौधे खूब फलने लगे। यह बर्र भी इस फूल से अपने लिये पर्याप्त पराग प्राप्त करती रहती है। उसका अधिकाँश पोषण इन अंजीर के फूलों से होता है।

इस घटना को पढ़कर मुल्कराज आनन्द रचित अंग्रेजी कहानी ‘दि लास्ट चाइल्ड’ (खोया बच्चा) की याद आती है, जिसमें यह दिखाया गया है कि जीवन जिस धातु का बना है वह भौतिक पदार्थों से नहीं प्रेम, आत्मीयता, सहयोग और सहानुभूति से विकसित होता है, फलता और फूलता है।

यह बच्चा एक अच्छे माता-पिता का है वे बच्चे को लेकर एक मेले में जाते हैं। बच्चा खिलौने देखता है तो वह मचल उठता है। माँ के डाँटने पर भी वह जबतक खिलौने नहीं मिल जाते, जिद करता रहता है, उसे मिठाई मिल जाती है। इस तरह बच्चा मिठाई, खिलौने, गुब्बारे, बाजे आदि बहुत-सी वस्तुयें इकट्ठा कर लेता है वह खूब प्रसन्न होता है।

मेले की बात- भीड़ अधिक थी बच्चा माँ की उंगली पकड़े चल रहा था। एक ही मौके में उंगली छूट गयी और वह अपने माता-पिता से अलग हो गया। बहुत प्रयत्न करने पर भी वे मिल न सके।

एक सहृदय व्यक्ति ने बच्चे को रोते हुये देखकर अपनी गोद में उठा लिया। उन्होंने समझ लिया बच्चा खो गया है, उसे चुप करने और सन्तोष दिलाने के लिये उन्होंने खिलौने, मिठाई, बाजे तरह-तरह की वस्तुयें ला कर दीं पर बच्चा चुप न हुआ प्रसन्न न हुआ। थोड़ी देर पहले तक जो बच्चा इन वस्तुओं के लिये माता-पिता से लड़ रहा था झगड़ रहा था, उसे अब वह वस्तु बिना माँगे मिल रही थी। तो भी वह उन्हें न लेकर केवल अपने माता-पिता को पाने के लिये बेचैन था उसकी प्रसन्नता लौटी भी तभी जब वे उसे मिल गये।

उपरोक्त घटना का सार यह है कि संसार कंकड़, पत्थर, लोहे, पीतल, चाँदी और सोने के टुकड़े पर सुख ढूँढ़ता है पर ये पदार्थ उसकी अन्तिम आवश्यकता नहीं। सुखी और प्रसन्न रहने के लिये- प्रेम, अपनी तरह संयोग और संगठन, मैत्री और उदारता इन्हीं गुणों के आधार पर संसार चल रहा है। यदि इनका अभाव होता है तो संसार का विकास और उसकी प्रसन्नता उस प्रकार छिन जाती है जिस प्रकार बर्र का सहयोग भर न मिलने से अंजीर बाँझ हो जाती है। जबकि इस विकास से संसार ऐसे खुश हो जाता है जैसे खोया हुआ बच्चा अपने माता-पिता को पाकर प्रसन्नता से नाच उठता है।

‘पोलीनेशन’ के लिये सहयोग की क्रिया और भी कई पौधों पर विचित्र ढंग से होती है। मक्खियाँ, तितलियाँ तो चाहे जिस पौधे को इस क्रिया में एक फूल का प्रेम दूसरे फूल में पहुँचाकर करती रहती हैं, किन्तु अमेरिका में एक ऐसा जंगली पौधा पाया जाता है, जो ‘प्रोन्यूबा’ नामक एक सफेद पतंगे के बिना गर्भ ही धारण (फर्टलाइज) नहीं करता।

प्रेम, सहानुभूति और दया एक दूसरे की आत्मिक आवश्यकताओं को पहचान कर सहयोग देने की पद्धति के पर्याय हैं। उन आवश्यकताओं को अन्तरंग में प्रवेश करके ही जाना जा सकता है। मादा प्रोन्यूबा जब यह पौधा खिलता है तो फूल पर जा बैठती है ओर अपनी टाँगों की सहायता से पराग को इकट्ठा करके छोटी गेंद की आकार बना लेती है उसे अपने पैरों में ही चिपका लेती है। फिर वह वहाँ से उड़ती है और दूसरे फूल पर जा बैठती है और गोलाकार बनाये हुए उस पराग को फूल में छोड़ देती है जिससे वह फूल ‘फर्टलाइज’ हो जाता है। प्रोन्यूबा उसी फूल की ‘ओवरी’ (गर्भाशय) में बैठकर फिर यह पतंगा अपने अण्डे दे देती है। यह अण्डे काफी बड़े होने तक उसी फूल में पलते रहते हैं। न तो इस फूल के बिना पतंगे का वंश विकास सम्भव है न तो इस पतंगे के बिना फूल का। यह तो उदाहरण मात्र है, सच बात तो यह है कि यह सारा संसार ही प्रेम और सहयोग के द्वारा विकसित हो रहा है। इन गुणों के बिना सृष्टि का चलना एक पल को भी सम्भव नहीं।

‘जूक्लोरेली’ एक प्रकार की वनस्पति है, जो अन्य वनस्पतियों के समान खुले आकाश में नहीं, जीवित रह पातीं। उसकी कोमल- कोशायें धूप, शीत और वर्षा के तीव्र आघात सहन करने में वैसे ही असमर्थ होती हैं, जैसे कोमल बच्चे बीमार और अपाहिज व्यक्ति।

हाइड्रा एक छोटा सा जीव है, उसे भोजन की आवश्यकता होती है पर अपने लिये उपयुक्त भोजन की प्राप्ति कर पाना उसके लिये कठिन होता है। प्रकृति ने उसकी परिस्थितियाँ ही कुछ ऐसी बनाई हैं।

एक वनस्पति दूसरा जीव दोनों इस संसार में दिखाई न देते, यदि सचमुच संसार में ‘समर्थ का जीवन’ का ही सिद्धान्त काम कर रहा होता। माना कि जीव-मात्र के सुधार के लिये प्रकृति को कठोर और दण्डात्मक प्रक्रिया का भी कभी-कभी संचालन करना पड़ता है पर वह कोमल और सम्वेदनशील अधिक है। अपने प्रत्येक अणु-अणु को वह परस्पर प्रेम-सहयोग और सहानुभूतिपूर्वक जीवन जीने की प्रेरणा देती रहती है। उसका उदाहरण जब इन छोटे-छोटे जीवों और वनस्पतियों पर भी देखने को मिलता है, तब विश्वास हो जाता है कि निर्माण ही विश्व का सत्य है ध्वंस नहीं, सहयोगी ही सर्वकल्याण का सर्वोत्तम सिद्धान्त है, उपयोगितावाद नहीं।

उपरोक्त परिस्थितियों में ‘जूक्लोरेली’ पौधा ‘हाइड्राजीव’ के शरीर में रहने लगता है वहाँ वह अपने आप को सुरक्षित अनुभव करता है पर चूँकि वह वनस्पति है इसलिये उसे भोजन प्रकाश संश्लेषण (फोटो सिंथेसिस अर्थात् सूर्य प्रकाश में होने वाली एक रासायनिक प्रक्रिया) क्रिया से ही मिल सकता है उसे कार्बनडाई ऑक्साइड गैस मिलना आवश्यक हो जाता है ताकि आवश्यक क्लोरोफिल (हरा पदार्थ) तैयार करके वह अपने सम्पूर्ण अंगों का सेवन कर सके। इस कार्बनडाई ऑक्साइड की आवश्यकता को हाइड्रा अपनी छोटी साँस से पूरी कर देता है ‘जूक्लोरेली’ द्वारा छोड़ी हुई ऑक्सीजन आप ग्रहण कर लेता है। इस तरह परस्पर सहयोग से दोनों प्रसन्नतापूर्वक जीते हैं। फोटो-सिंथेसिस क्रिया से हाइड्रा को भी शक्ति मिलती है।


Quotation

केवल किसी मनुष्य की बाह्य आकृति को देखकर उसके विषय में बुरा विचार कर लेना मूर्खता है। सम्भव है कि कोई मनुष्य फटे पुराने कपड़े पहिन रहा हो, रूप रंग में मेला हो परन्तु विचार उच्च और उत्तम हों, उसके हृदय में दया और परोपकार का भाव हो और वह शुद्ध हृदय से मनुष्य जाति का शुभचिन्तक हो। अतएव तुम भूलकर कभी भी किसी विषय में यहाँ तक कि शत्रु तक के विषय में भी अपने मन में बुरे विचार ना लाओ। स्मरण रखो! मनुष्य ईश्वर का रूप है।

- महात्मा प्रभुआश्रित

जीव और वनस्पति में सहयोग को और अच्छी तरह समझना हो तो हमें कृषि-विज्ञान में ‘लैग्युमिनौसी’ अर्थात् फलियों वाले पौधों जैसे चना, मटर, सेम, सोयाबीन आदि की रचना जीवन धारणा और विकास पद्धति का अध्ययन करना पड़ेगा। इन पौधों की जड़ों में बड़ी-बड़ी गाँठें होती हैं। स्थूल आँख से तो नहीं पर किसी गाँठ को चीड़ कर सूक्ष्मदर्शी (साउक्रास्कोप) से देखें तो उसके अन्दर अरबों की संख्या में (बैक्टीरिया) हलचल करते हुए दिखाई देंगे। प्रकृति ने सूक्ष्म से सूक्ष्म जीवों को सुरक्षा के कितने सुदृढ़ खोल तैयार किये हैं, यह देखकर आश्चर्य होता है पर यह सब उसने केवल सुरक्षा के लिये ही नहीं, विश्व में मैत्री और सहयोगी प्रवृत्ति के विकास के लिये किया लगता है क्योंकि इन गाँठों में रहने वाले जीवाणु सुरक्षित पड़े रहते हों, इतना ही नहीं जीवाणु और यह पौधे दोनों एक दूसरे के विकास में पति-पत्नी की तरह, भाई-भाई और पड़ौसी-पड़ौसी के समान महत्वपूर्ण सहयोग प्रदान करते हैं।

पौधों के अच्छे विकास के लिये आवश्यक है कि मिट्टी से नाइट्रोजन की पर्याप्त मात्रा मिले। जड़ें हलकी होने के कारण यह काम नहीं कर सकतीं, इसलिये मात्र नाइट्रोजन चूसकर देने का किराया लेकर यह पौधे उन जीवाणुओं को आजीवन अपने भीतर सुरक्षित स्थान दिये रहते हैं।

हमारे समाज में बहुत लोग ऐसे हैं, जो शिक्षा, ज्ञान, उपार्जन, शरीर, साधना आदि कि दृष्टि से अत्यन्त अविकसित स्थिति में पड़े हैं, प्रकृति का यह सहयोग हमें सिखाता और पाठ पढ़ाता है कि हमें उन सबके प्रति भी श्रद्धा रखनी चाहिए उनके उत्थान, भरण-पोषण और संरक्षण के लिये जो भी सम्भव सहयोग कर सकते हैं, वह करना चाहिये। सहयोग के सिद्धान्त से समाज के नकारा लोग भी पल जाते हैं और समर्थ लोगों के विकास और सफलता की सम्भावनायें बदलती हैं।


सब जग एक समान

गाँधी जी कश्मीर जा रहे थे। थर्ड क्लास के जिस डब्बे में वे यात्रा कर रहे थे, उसमें वर्षा का बहुत सा जल भर जाने से डिब्बा गीला हो गया था।

गार्ड ने यह देखा तो गाँधी जी से जाकर कहा- “आप डिब्बा बदल लें, आपके लिये अन्यत्र व्यवस्था कर देते हैं।”

फिर इस डिब्बे का क्या होगा गाँधी जी ने पूछा। तो गार्ड ने बताया- इसमें दूसरे यात्रियों को बैठा दिया जायेगा।

अपने आराम के लिये दूसरों को यहाँ बैठाने की बात सोचना भी मेरे लिये कठिन है। यह कहकर गाँधी जी ने डिब्बा बदलने से इनकार कर दिया।


बिना पतवार- सिद्धि के द्वार (2)

पीटर हरकौस की ख्याति सामान्य घटनाओं से प्रारम्भ हुई थी और विस्तृत यहाँ तक हुई कि देश-विदेश के धनी-निर्धन, सरकारी-गैरसरकारी, साधारण नागरिकों से लेकर बड़े राज-परिवारों तक उन्हें बुलाकर और कठिन समस्याओं में उनकी सहायता ली जाने लगी। सिद्धि का स्वरूप ही ऐसा है कि उसका उपयोग करके धनी को निर्धन और रंक को महाराजा तक बनाया जा सकता है। जहाँ सूर्य का प्रकाश नहीं पहुँच सकता। योनी की सूक्ष्म-गति वहाँ भी पहुँच सकती है और वहाँ का सारा भेद खोल सकती है। हरकौस आकस्मिक शक्ति पाकर यही सब करने में लग गया।

सन 1850 में इंग्लैण्ड की ‘वेस्टमिंस्टर एबी’ से स्कोन नामक मणि चोरी चली गई। ‘वेस्टमिंस्टर एबी’ एक ऐसा संग्रहालय है, जहाँ इंग्लैण्ड के राज-दरबार और राजनैतिक नेताओं को विदेशों में मिलने वाले उपहार और राष्ट्रीय महत्व की वस्तुओं का संग्रह रहता है। स्कोन मणि के बारे में कहा जाता है कि स्काटलैण्ड की थी और चुराकर इंग्लैण्ड लाई गयी थी। यह एक ऐसी चोरी थी जिसने सारे इंग्लैण्ड में तहलका मचा दिया। बड़े-बड़े सी. आई. डी. उसमें जूझे, मणि का फलक तो किसी तरह लन्दन की टफटन स्टीट में पा लिया गया, बस उसके अतिरिक्त चोरों को उसकी पूँछ का भी कहीं पता नहीं चला।

अंत में पीटर हरकौस की सहायता ली गई। अपनी धर्मपत्नी के साथ हरकौस ने लन्दन की यात्रा की। लोहे की शलाखा से ‘एबी’ का दरवाजा तोड़ा गया था। उसे हाथ में लेते ही हरकौस एक क्षण के लिये ध्यानावस्थित सा हुआ, मानो उस घटना को पढ़ने के लिये उतना समय आवश्यक था। थोड़ी देर चुप रहकर पीटर हरकौस हँसे जैसे उनके लिये यह घटना बिलकुल सामान्य हो। जिन घटनाओं पर साधारण व्यक्ति थोड़े में बुरी तरह व्यथित हो उठते हैं, दूरदर्शी व्यक्ति उन्हें एक खेल की तरह टरका देते हैं, यह बात उस दिन देखने में आई। जिस घटना पर सारा इंग्लैण्ड स्तब्ध था, हरकौस की दृष्टि में वह एक खेल जैसा था। सचमुच खेल- उसने बताया- मणि पाँच लड़कों ने चुराई है, वे उसे कार में रखकर ग्लासगो ले गये हैं। उसने मणि जहाँ-जहाँ होकर गयी उसका ‘स्केच’ बनाकर भी समझा दिया और बताया कि एक महीने में मणि मिल जायेगी। पीछे एक दिन मणियों सम्बन्धी पुस्तक पढ़ती हुयी एक महिला द्वारा उस रहस्य का पता चल गया। चोरी सचमुच खिलवाड़ में विद्यार्थियों द्वारा की गई थी। विद्यार्थी पाँच ही थे। इस मामले में हरकौस को मिला तो कुछ नहीं पर उसे अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति अवश्य मिली।

फूल की सुगन्ध मीलों दूर की मधुमक्खियों, भ्रमरों तितलियों को ऐसे आकर्षित कर लेती है, जैसे मेले में रग-बिरंगे खिलौने बच्चों के मन। सद्गुणों की सुगन्ध और सिद्धि के प्रकाश में कुछ ऐसी मादकता है कि वह हजारों-लाखों व्यक्तियों को अपनी ओर आकर्षित कर लेती है। गुणी व्यक्ति की ओर श्रेष्ठ सम्भ्रान्त भी ऐसे आकर्षित हो जाते हैं जैसे चुम्बक लोहे के परमाणुओं को दूर-दूर से अपनी ओर समेट लेता है और उन्हें अपनी ही तरह का चुम्बकत्व प्रदान करता चला जाता है। देने की यह निष्काम साधना व्यक्ति की शक्ति और महत्व को हजार गुना बढ़ा देती है। जबकि स्वार्थ से सने व्यक्ति भी कालान्तर में छूछे हाथ खोखली झोली रह जाती है। पीटर हरकौस के इस चमत्कार ने एक बार तो सारे संसार को चमत्कृत कर दिया, धीरे-धीरे वह उसका व्यवसाय बन गया। वह इस शक्ति को मनुष्य जीवन में बढ़ते हुये पाप और दुर्भाव को रोकने में लगाकर ईश्वरीय प्रयोजन भी पूरा कर सकता था पर स्वार्थवश ऐसा कुछ न हुआ, चमत्कार तो चमत्कार ही होता है, थोड़ी नामवरी भले ही मिल ले पर उससे आत्म-शान्ति, आत्म-कल्याण का महान उद्देश्य कहाँ से पूरा हो पाता है।

इंग्लैंड के इस समाचार को फ्रान्स में अति उत्सुकता से सुना गया। जहाँ कुछ लोग आश्चर्यजनक घटनाओं को मात्र मनोरंजन समझकर थोड़े ही समय में भूल जाते हैं, वहाँ कुछ ऐसे भी लोग होते हैं जो उनकी गहराइयों में प्रवेश करते हैं और महत्वपूर्ण अनुभव प्राप्त करते हैं। जिज्ञासाओं की यह प्रबलता ही ज्ञान-विज्ञान के आश्चर्य प्रकट करने में समर्थ हुई है। जिज्ञासा ही आत्मा-परमात्मा जैसी सूक्ष्म सत्ताओं की शोध ओर प्राप्ति की जननी है। जिज्ञासा हो तो फिर इन रहस्यों की प्राप्ति के लिये केवल मार्गदर्शन और पराक्रम ही शेष रह जाता है और वह भी कहीं न कहीं मिल ही जाता है। पेरिस की पुलिस ने इस अतीन्द्रिय सत्ता को जाँचना और उसका उपयोग करना चाहा। इसके लिये पीटर हरकौस को पेरिस बुलाया गया। एक सभा आयोजित की गयी, जिसमें 20 न्यायाधीश और कई पुलिस कर्मचारी भी थे। उन्होंने हरकौस को पाँच वस्तुयें देकर कहा- हम यह नहीं जानते मामला क्या है यह तो आपकी परीक्षा है कि इन वस्तुओं के आधार पर सारे मामले का पता भी आप ही लगायें और निर्णय भी आप ही दें। हरकौस के जीवन में यह एक कठिन परीक्षा थी। यहाँ यह सिद्ध होना था कि सचमुच अतीन्द्रिय क्षमतायें याँत्रिक शक्तियों से भी अधिक सूक्ष्म, संवेदनशील और सशक्त होती हैं।

यह पाँच वस्तुयें थीं- (1) कंघा, (2) कैंची, (3) घड़ी, (4) सिगरेट लाइटर और (5) बटुआ (पर्स)।

पीटर हरकौस ने प्रारम्भिक जाँच के तौर पर उन्हें स्पर्श किया और बताया कि इनमें से तीन वस्तुयें इस मामले में आवश्यक हैं। दो से कोई सम्बन्ध नहीं। सभी उपस्थित व्यक्ति चुप थे।

इसके बाद पीटर हरकौस ने बटुआ हाथ में लिया और कहना प्रारम्भ किया-सफेद कोट पहने एक गंजा आदमी दिखाई दे रहा है, यह सब एक पहाड़ी के पास एक छोटे से मकान में है, जहाँ से रेलवे लाइन गुजरती है। थोड़ी ही दूर पर एक कोठार दिखाई दे रहा है, इस मकान और कोठार के बीच एक व्यक्ति मरा पड़ा हुआ है। इस हत्या का सम्बन्ध ‘निकोला’ नामक व्यक्ति से है, उसने दूध में विष मिलाकर पिलाया है। यह गंजा व्यक्ति ही निकोला लगता है, वह इस समय जेल में है, मृत व्यक्ति एक स्त्री है और यह गंजा व्यक्ति भी जेल में मर चुका है। इतना कहते-कहते पीटर हरकौस ने उन सारी परिस्थितियों का एक पेन्सिल-चित्र भी कागज पर खींच दिया।

अब तक सभी उपस्थित व्यक्ति बिलकुल चुप थे। सब बता देने के बाद सबने तालियाँ पीटीं। हरकौस ने सारी घटना सच-सच कही थी। अलबत्ता उससे एक भूल हुयी थी, वह यह कि अधिकारियों के अनुसार हत्यारा जेल में है मरा नहीं। लेकिन अधिकारियों के आश्चर्य का तब कोई ठिकाना न रहा, जब उन्हें यह समाचार मिला कि सचमुच ‘निकोला’ ने अब से कुछ दो घण्टे पूर्व जेल में आत्म-हत्या कर ली है और वह सचमुच मर चुका है। इस सफलता ने पीटर हरकौस की ख्याति सारे विश्व में फैला दी।

इधर पीटर की ख्याति बढ़ रही थी, उधर उसके जीवन की अशान्ति भी। वह यह अनुभव करता था कि वह परमात्मा के दिये हुए इस वरदान का दुरुपयोग कर रहा है।


Quotation

हमारे बदन लोहे के हों और उसी तरह लोहे की हमारी इच्छा-शक्ति! इस योग्यता के साथ अगर लौह-दण्ड भी हमारे हाथ में हो तो एक राष्ट्र क्या सारी पृथ्वी को हम भय मुक्त कर सकते हैं। इच्छा-शक्ति की प्रचण्डता सबसे बड़ी सिद्धि है।

योगी सब कुछ जानता है, वह इशारे से लोगों को कुछ समझा भी सकता है, किसी की अदृश्य सहायता करना चाहे तो भी वह कर सकता है पर ऐसा करते हुये यह निर्देश है कि वह अपना अहंकार न बढ़ा ले और सब कुछ कर सकने का मिथ्याभिमान न कर ले। मनुष्य अन्ततः मरणधर्मा है। उसे किसी भी आत्मा की स्वाधीनता में हस्तक्षेप का अधिकार नहीं। कर्माध्यक्ष तो एक ईश्वर ही है, उसके कार्यों में सहयोग तो किया जा सकता है पर उन अधिकाधिकारों को अपने हाथ में लेने वाला व्यक्ति अपने जीवन की शान्ति ही खो देता है। ऐसा पीटर को कई एक घटनाओं से स्पष्ट आभास हुआ।

उन दिनों इंग्लैण्ड में एक जादूगर भी रहता था, जो हाथ की सफाई से कई करतब दिखाकर लोगों का मनोरंजन किया करता था। एक दिन हरकौस का एक मित्र हरकौस को भी उसका कार्यक्रम देखने ले गया। वह जादूगर लोगों के मनोरंजन के लिये बीच-बीच में प्रश्न भी करता था। प्रश्नोत्तर काल में मित्र महोदय ने एक पर्चा थमा दिया कि इस सभा में ‘पीटर हरकौस’ नामक एक ऐसा भी व्यक्ति बैठा है, जो आपसे अधिक योग्य है।

जादूगर को यह बात कुछ अखरी सी। उसने व्यंग्य-पूर्वक उस पर्चे को पढ़ा और कहा-अब आप लोगों को ‘पीटर हरकौस’ अपना चमत्कार दिखायेंगे। उसने यह शब्द ऐसे लहजे में कहे कि दर्शक कई बार हँसी से लोट-पोट हो गये।

योगी संयमी होता है। उसे मान ही नहीं, अपमान में भी संयत रहने की शिक्षा दी जाती है। हरकौस को ऐसा कोई शिक्षण मिला नहीं था। शक्ति आकस्मिक हाथ लगी थी, इसलिये उसके व्यावहारिक उपयोग का तो उसे पता था नहीं। इसलिये स्वभावतः वह कुछ उत्तेजित हो गया। वह रंगमंच पर पहुँचा और कहा- अपनी कोई वस्तु मुझे दीजिये। जादूगर ने अपनी घड़ी थमा दी और ऐसा करते-करते एक व्यंग्य और कस दिया। दर्शक खिल-खिला कर हँस पड़े। पीटर हरकौस का बुरा हाल था।

लोग चुप हुये तो हरकौस ने कहा- मैं इस घड़ी में देख रहा हूँ कि आप अपनी धर्मपत्नी के साथ अविश्राम कर रहे हैं, आपका आकर्षण एक दूसरी युवती की ओर है। उसका नाम ग्रीटा है, वह यहां उपस्थित भी हैं। यह शब्द सुनते ही जादूगर सन्नाटे में रह गया। उसकी स्त्री आश्चर्यचकित देख रही थी। सारी सभा में सन्नाटा छा गया।

पीटर हरकौस स्टेज से उतरा और वहाँ से चलकर सीधा एक युवती के पास जाकर खड़ा हो गया और बोला- अब मैं ’ग्रीटा’ के पास खड़ा हूँ। युवती घबरा गई, उसने स्वीकार किया कि पीटर हरकौस ने जो कुछ कहा है, वह सब सच है। इस घटना से पीटर हरकौस की ख्याति तो बहुत बढ़ गई पर उसे ऐसा अनुभव होने लगा कि वह जो कुछ कर रहा है, ईश्वरीय व्यवस्था के अनुकूल नहीं है, यदि उसे ऐसी शक्ति मिली है तो उससे दूसरे लोगों को सत्य मार्ग की दिशायें तो दी जा सकती हैं पर किसी का जी नहीं दुःखाया जाना चाहिये। कर्म के फल से जीवात्मा आप बँधी रहती है, उसका फल उसे मिलेगा ही, फिर कोई ऐसा मार्ग क्यों अपनाया जाये जिससे अपना अहंकार बढ़े और दूसरों का जी दुःखे। निष्काम कर्त्तव्य की बात होती तो भी एक बात थी यहाँ तो सब कुछ मानो लोकेषणा के वशीभूत हो रहा था।

“आप तो उनके साथ बहुत दिनों से रह रहे हैं उन पर श्रद्धा भी अपार है, फिर भी आप स्वामी जी (दयानन्द) का जीवन-चरित्र ही लिख डालिए।” एक सज्जन ने पं. गुरुदत्त विद्यार्थी से आग्रह किया। इस पर उन्होंने कहा-लिख तो रहा हूँ श्रीमान जी!

विस्मित मित्र ने पूछा- कितने दिन में लिख डालोगे। इस पर विद्यार्थी जी ने कहा-भाई! मैं कोई पुस्तक नहीं लिख रहा वरन् उसे अपने जीवन में लिख रहा हूँ।

इसी तरह की एक दुर्घटना हरकौस से 1945 में तब हो गई जब कि हरकौस हालैण्ड के प्रख्यात हास्य अभिनेता बर्नार्ड बारेन्स के दल में काम करने लगा था। एक महिला ने अपने अँगूठी देकर अपने बारे में पूछा-तो हरकौस ने सबके सामने कह दिया- आपके दो बच्चे हैं। आप अपने पति से झूठ बोलकर आयी हैं कि मैं अपनी बीमार माँ को देखने जा रही हूँ, सच बात यह है कि आप अपने प्रेमी से मिलने आई हैं, वह आपकी बगल में ही बैठे हैं।

महिला स्तब्ध रह गई और वहाँ से उठकर चली गयी, तब पीटर हरकौस ने अनुभव किया कि वह ईश्वरीय देन का दुरुपयोग कर रहा है। यह घटना उसे बहुत दिन तक अशाँत किये रही।

(क्रमशः)


भूत बड़े-बड़ों ने देखा

फ्राँस के सम्राट हेनरी चतुर्थ एक दिन सायंकाल अपने राजोद्यान में भ्रमण कर रहे थे। घूमते-घूमते थोड़ा आगे बढ़ जाने से लौटने में देर हो गई। सूर्य डूब गया। झुरमुट हो गई।

एक प्रकाश जैसी छाया-आकृति उन्हें सामने और अपने आस-पास चक्कर सी काटती दिखाई दी। हेनरी पहले तो कुछ झिझके पर शीघ्र ही सम्भल गये और पूछा-कौन हो छाया बोली-प्रेत हूँ और यह बताने आया हूँ कि तुम्हारी हत्या का षड़यन्त्र रचा जा रहा है। शीघ्र ही मार दिये जाओगे। कर सकते हो तो बचाव का कोई प्रबन्ध कर लो।

उत्सुकतावश हेनरी ने पूछा- तुम प्रेत क्यों हुए! यह बातें शरीर न होने पर तुम कैसे जान गये! क्या तुम मेरे षड़यन्त्रकारियों को मार नहीं सकते!

इस पर प्रेत ने उत्तर दिया-प्रमादवश किए हुए पाप, शोषण, हिंसा आदि के कारण आत्मा इतनी उत्तेजित हो उठती है कि शरीर की मृत्यु हो जाने पर भी इच्छा-शरीर उत्तेजित बनी रहती है, यही हमारी स्थिति है। इस अवस्था में हमारा मन ही सभी इन्द्रियों का काम करता है। कान, आँख, नाक आदि के सभी ज्ञान ही मन के द्वारा नहीं होने लगते वरन् उनकी शक्ति और भी विस्तृत हो जाती है। मेरे द्वारा किये हुये भूत के सब कर्म प्रकट हैं, साथ ही भविष्य में होने वाली घटनाओं के आभास भी पहले ही हो जाते हैं, इस शरीर से दूसरे का अहित भी किया जा सकता है पर हमारी स्थिति पहले ही पश्चाताप पूर्ण है, किसी का उपकार करने में प्रसन्नता होती है, इसलिये अधिकाँश- प्रेत-पिशाच लोगों का भला ही करने की सोचते हैं, हम आपके षड़यन्त्रकारियों को जानते हैं पर उनका अहित करने में असमर्थ हैं। यह कहकर वह छाया वहाँ से अदृश्य हो गई।

हेनरी चतुर्थ ने अपने सभी दरबारियों को यह घटना सुनाई तो सब लोग हँस पड़े और बोले- श्रीमान जी! आपने दिवास्वप्न देखा होगा। आपकी हत्या भला कौन करेगा, किन्तु सारे फ्रान्स और संसार ने सुना कि उसके कुछ ही दिन बाद उनकी सचमुच हत्या कर दी गई।

प्रेत या पिशाच योनि, निकृष्ट योनि है, वह दुष्कर्म करने वालों को ही मिलता है, इस तरह का ज्ञान वेद ने भी दिया है-

आरादरातिं निऋतिं परोग्राहिं क्रव्यादः पिशाचन।

रक्षो सर्त्सव दुर्भूतं तत्रम इवाय हन्मसि॥

अथर्व 8.2.12

अर्थात्- निऋति (जो सत्य और सीधे मार्ग पर नहीं चलते), बुरी भावनायें (ईर्ष्या, प्रतिशोध, क्रोध आदि) रखने वाले माँस भक्षण करने वाले तथा जीवों का रक्त पीने वाले, शोषण करने वाले ऐसे जो लोग पिशाच हो गये हैं। यजमान मैं उनसे तुम्हारी रक्षा करता हूँ, उन्हें मार भगाता हूँ।

इस मन्त्र में यद्यपि भूतों से छुटकारे का संकल्प है तथापि उसमें वह परिस्थितियाँ भी प्रकट हैं, जिनमें शरीरधारी मनुष्य भ्रष्ट होकर मृत्योपरान्त इस योनि में कुछ काल तक जीवन-यापन के लिये विवश होते हैं। इसका एक दूसरा उदाहरण जर्मनी का है।

जर्मनी में अनाथों को संरक्षण प्रदान करने वाली एक विख्याता ‘अनाथ आश्रम संस्था’ काम करती है। उस संस्था के भूतपूर्व डायरेक्टर बहुत चरित्रवान और नेक-नीयत व्यक्ति समझ जाते थे। लिफाफे के भीतर रखे पत्र की परिभाषा तो वही जान सकता है, जिसका पत्र हो। बाहर से ईमानदारी का आवरण ओढ़े वह सज्जन अपनी आत्म से अपने पाप छुपा नहीं सके, कोई नहीं देखता, इसलिये धन चुराया जा सकता है, रिश्वत ली जा सकती है, मिलावट की जा सकती है, पशु वध, हत्या, डकैती आदि किये जा सकते हैं, उनका यह अज्ञान शीघ्र धुल गया, जब कि मृत्यु के इस पर्दे पर तो उनकी प्रशंसा हो रही थी और दूसरे पर्दे पर वे प्रेत-योनि का कष्ट भुगतने लगे।

भूत-योनी में पड़े संचालक को ईश्वरीय प्रेरणा से ऐसा सूझा कि आश्रम का जो धन चोरी छिपे इकट्ठा कर अपने पुत्र को छोड़ दिया है, यदि अभी भी उसे मानकर पश्चाताप कर लिया जाये तो उस दुःखद प्रसंग से छूटा जा सकता है। यह विचार आते ही वह एक दिन अपनी सेविका को दिखाई दिया। बुढ़िया को अपने मकान के एकान्त में ले जाकर भूत ने एक दस्तावेज निकलवाया, जिसमें उसने अपने हस्ताक्षरों सहित यह स्वीकार किया था कि उसने बहुत-सा धन चोरी करके अपने पुत्र को दिया है, वह धन उससे ले कर संस्था को दे दिया जाये।

बुढ़िया वह प्रमाण-पत्र लेकर वर्तमान डाइरेक्टर के पास गई। उन्होंने भूतपूर्व संचालक के लड़के से इस सम्बन्ध में पूछा तो लड़के ने कोई भी धन देने से इंकार कर दिया। निदान उस दस्तावेज के आधार पर न्यायालय में मुकदमा प्रस्तुत हुआ।

लड़के के बयान लिये जाने लगे, उस समय जैसे ही उसने कहा- मुझे मेरे पिता ने कोई धन नहीं दिया। भूत की वात मिथ्या है, सब कुछ खाली है। वैसे ही उसके गाल पर जोर का तमाचा पड़ा कि सारा कोर्ट स्तब्ध रह गया। लड़के ने गाल पर हाथ रख लिया पर कोई दिखाई तक नहीं दिया कि तमाचा किसने मारा। इसी समय एक अज्ञात काँपती आवाज भी आई-सचमुच मैंने रुपये चोरी किये थे, वह रुपये संस्था को दिये जायें।

कचहरी में चारों ओर से पहरा था। चिड़िया भी अन्दर घुसी नहीं थी, यह आवाज सबने सुनी पर कोई नहीं देख पाया कि आवाज किसने दी। आखिर लज्जित होकर युवक ने बाप का चोरी किया हुआ सारा धन न्यायालय में जमा कर दिया।

भूत-प्रेत की ऐसी घटनायें व चर्चायें आदिकाल से होती चली आ रही हैं, किन्तु अब शिक्षितों में उसे अन्ध-विश्वास और रूढ़िवादिता कहा जाने लगा है। एक हद तक यह ठीक भी है कि इन बातों को अमान्य किया जाय! भूत-प्रेत प्रायः दुर्बल मनोभावों वाले लोगों को ही दिखाई देते हैं, यदि उनमें यह विश्वास दृढ़ हो सके और वे भय से बच सकें तो अच्छा ही है। भूत-प्रेत की मान्यता जहाँ अनेक भोले-भाले लोगों को ठगती है, वहाँ उनका मनोबल बढ़ाया जाना ही चाहिये, वहाँ इस विज्ञान को भूलना भी नहीं चाहिये। यदि शिक्षित पीढ़ी ने अधोगति के इस विज्ञान को नहीं माना और नहीं समझा तो अदृश्य जगत हाहाकार करती हुई पापात्माओं से भरता चला जायेगा और आज की अपेक्षा मानवीय अशान्ति का भी विस्तार ही होता चला जायेगा। इसलिये प्रस्तुत की जाने वाली घटनायें उन प्रमाणिक व्यक्तियों की है, जिनके बारे में रूढ़िवादिता या अन्ध-विश्वास जैसी कल्पना ही नहीं की जा सकती।

कोई साधारण अशिक्षित ग्रामीण या अन्य कोई भावुक व्यक्ति इन घटनाओं का प्रतिपादन करता तो वह अमान्य भी किया जा सकता था, किन्तु असाधारण व्यक्तित्व के सम्बन्ध में तो यह सोचा नहीं जा सकता।


Quotation

सिर्फ दो तरह के लोगों को आत्म-ज्ञान हो सकता है। उनको जिनके दिमाग विद्वत्ता यानी दूसरों के उधार लिये हुये विचारों से बिलकुल लदे हुये नहीं हैं, और उनको जो तमाम शास्त्रों और साइन्सों को पढ़कर यह महसूस करने लगे हैं कि वे कुछ नहीं जानते।

-श्रद्धानन्द

इंग्लैंड की डफरिन और अवा रियासतों के सामन्त लार्ड डफरिन कभी भारतवर्ष के वायसराय रह चुके थे, कनाडा के गवर्नर जनरल और रोम के राजदूत रहने का भी उन्हें सौभाग्य मिला था। सन 1891 में वे पेरिस के राजदूत नियुक्त हुए। एक दिन उन्हें एक मित्र ने आयरलैंड में एक दावत दी। रात के बारह बजे भोज चला। इसके बाद उनके लिये अत्यन्त सजे हुए एकान्त कमरे में विश्राम की व्यवस्था कर दी गई, लार्ड डफरिन अभी लेटे ही थे कि सारा कमरा एकाएक तीव्र प्रकाश से भर गया। यों उस दिन पूर्णमासी थी। बाहर चन्द्रमा पूरे वेग से छिटक रहा था तो भी कमरे के सभी दरवाजों और खिड़कियों पर पर्दा पड़ा था भीतर प्रकाश जाने की कोई सम्भावना नहीं थी। बल्ब बुझे हुये थे। लार्ड डफरिन को आशंका हुई, वे उठे सब तरफ देखा कहीं कुछ गड़बड़ तो नहीं। फिर लेटे ही थे कि वही पहले जैसा तीव्र प्रकाश अनुभव हुआ। उन्होंने अच्छी तरह परखा कि वे जाग रहे हैं और होश में हैं। फिर खड़े होकर खिड़की से झाँककर देखा तो कुछ ही गज की दूरी पर एक आकृति अपने कन्धे पर एक शव ढोने के कठघरे जैसा बोझ लिये दिखाई दी। वह कराह सी रही थी। लगता था बोझ भारी है, उसे जाने में कष्ट हो रहा है।

उन दिनों प्रयोगशालाओं के लिये शवों की बड़ी आवश्यकता रहती थी। वैज्ञानिक मुँह माँगे दाम देते थे, इसलिए फ्राँस में मुर्दों की चोरी की एक आम हवा चल पड़ी थी। डफरिन ने सोचा कोई मुर्दा चोर है सो साहस करके वे आगे बढ़े और पास पहुँचते ही ललकार कर पूछा- “कौन हो!” आकृति ने उनकी ओर थोड़ा घूरकर देखा तो वे स्तब्ध रह गये, इतना भयानक चेहरा लार्ड डफरिन ने पहले कभी न देखा था तो भी उन्होंने साहस किया और आक्रमण के लिये जैसे ही थोड़ा आगे बढ़े कि आकृति वहीं अन्तर्धान हो गयी। न कोई व्यक्ति था, ना कोई बोझ। टार्च के सहारे दूर तक देखा पृथ्वी पर पैरों के भी चिन्ह नहीं थे। लार्ड डफरिन तब कुछ डरे। यह एक अविस्मरणीय घटना थी। वे कमरे में लौटे और उसी समय जो कुछ देखा था वैसे ही डायरी में नोट कर लिया फिर वे रात भर सो नहीं सके। कुछ दिन बात आई गई हो गयी।

कुछ वर्ष बीते लार्ड डफरिन तब पेरिस में राजदूत ही थे, एक दिन सभी राजनैतिक व्यक्तियों को भोज दिया गया। पेरिस के ग्रन्ड होटल में उनका प्रबन्ध किया गया। समय पर सब लोग होटल में इकट्ठे हो गये। ऊपर होटल तक ले जाने के लिये ‘लिफ्ट’ (एक ऐसी मशीन जो बिजली के सहारे रेल की तरह ऊपर तक चढ़ती है कई मंजिलों की इमारत में वह ऊपर बोझ और व्यक्तियों को पहुँचाने में काम आती है) तैयार थी। वरिष्ठ होने के नाते सब लार्ड डफरिन की ही प्रतीक्षा में थे।

नियत समय पर जैसे ही वे उस लिफ्ट के पास पहुँचे वर्षों पूर्व देखी हुई वही भयानक आकृति वहाँ उपस्थित पायी। उस दिन की सारी घटना एक सेकेंड में मस्तिष्क में नाच गयी। वे पीछे हट गये, अपने सेक्रेटरी से भोज में सम्मिलित होने से इन्कार करते हुये वे लौट पड़े और सीधे होटल के मैनेजर के पास जाकर पूछा- लिफ्ट पर किसे नियुक्त किया गया है! जब तक वह कोई उत्तर दें एक धड़ाम की आवाज आई सब लोग लिफ्ट की ओर दौड़े देखा लिफ्ट बीच में ही कट कर टूट गई और सारे सवार अतिथि गिरकर चूर-चूर हो गये। डफरिन के अतिरिक्त सब लोग मर चुके थे। यह समाचार फ्राँस के सभी समाचार-पत्रों ने छापा और यह स्वीकार किया कि भूत की सत्ता सचमुच कुछ न कुछ है। उसका विज्ञान कुछ भी होता हो! लुई आन्स्पैचर द्वारा यह घटना ‘रीडर्स डाइजेस्ट’ पत्रिका में भी छपी थी।

नैपोलियन बोनापार्ट जिन दिनों सेंट हेलेना द्वीप में था, उसे भी एक प्रेत ने उसकी मृत्यु की सूचना दी थी, जिसे उसके साथियों ने अमान्य कर दिया था पर अन्त में नैपोलियन की मृत्यु ठीक उसी दिन उन्हीं परिस्थितियों में हुई, जो प्रेत ने बताई थीं यह घटनायें यह बताती हैं कि भूत कोई अमान्य तथ्य नहीं वरन् जीव-चेतना की एक अवस्था है, जो उसे अपने ही दुष्कर्मों के कारण मिली होती है।

(क्रमशः)


भूत को भूत देखता रहेगा

रोते हुये शिष्य को देखकर महात्मा ने पूछा-”क्या कष्ट है” शिष्य मैथ्यू ने सिसकते हुये कहा- “महाप्रभु! पिता की मृत्यु हो गई है, उन्हें दफनाने जा रहा हूँ।” यह कहकर मैथ्यू दूसरी ओर चलने लगा। शिष्य के इस व्यवहार को देखकर ईसा ने कहा- वत्स! भूत को भूत देखता रहेगा, तू यहाँ आ और मेरे साथ चल।

जो हुआ उसके लिये दुःख करने की अपेक्षा जो आगे है, उसे सुधारना आवश्यक है। ऐसा समझकर मैथ्यू लौट पड़ा और ईसा के साथ चल पड़ा।


ईर्ष्या न करें, प्रेरणा ग्रहण करें।

हृदय में ईर्ष्या का भाव पाल लेने का अर्थ है, अपने अच्छे-खासे जीवन में आग लगा लेना। जंगल में आग लग जाने से जिस प्रकार हरे-भरे पेड़ जलकर राख हो जाते हैं, उसी प्रकार ईर्ष्या का भाव भर जाने से मानव-जीवन भी जल-भुनकर समाप्त हो जाता है। ईर्ष्या से हानि के सिवाय कोई लाभ नहीं। किसी से ईर्ष्या करके मनुष्य उसका तो कुछ बिगाड़ नहीं सकता है। हाँ अपनी निद्रा, अपना सुख और अपना सुख-सन्तोष अवश्य खो देता है। ऐसे भाव को, जिससे केवल अपनी ही हानि होती रहे, अपने हृदय में जमा लेना किसी प्रकार हित कर नहीं। यह आत्म-घात के समान अबोधता है।

ईर्ष्या की उत्पत्ति दूसरों की उन्नति देखकर होती है। और होती केवल उन्हीं व्यक्तियों को है जो अक्षम और अशक्त होते हैं। वे स्वयं तो कोई उन्नति करने योग्य होते नहीं और न अपनी मानसिक निर्बलता के कारण प्रयत्न ही करते हैं, लेकिन औरों का अभ्युदय देखकर जलने अवश्य लगते हैं। किन्तु इससे किसी का क्या बनता-बिगड़ता है। केवल अपने हृदय में एक ऐसी आग लग जाती है, जो गीली लकड़ी की तरह जीवन को दिन रात सुलगाती रहती है।

संसार में एक से एक अच्छे श्रेष्ठ, सफल और उन्नतिशील व्यक्ति पड़े हैं। एक से एक बढ़कर धनवान, ऐश्वर्यवान और सम्मानित व्यक्ति मौजूद हैं। उनसे यदि व्यर्थ में ईर्ष्या की जाने लगे तो उससे उनका क्या बिगड़ सकता है। किसी की उन्नति किसी के ईर्ष्या अथवा प्रेम पर तो निर्भर होती नहीं। हर आदमी अपने परिश्रम, पुरुषार्थ और प्रयत्न के बल पर आगे बढ़ता और ऊँचे चढ़ता है। यदि कोई व्यक्ति उससे मन ही मन ईर्ष्या करता रहे तो उसका प्रभाव उस पर क्या पड़ सकता है। वह अपनी ओर से जब तक अपने परिश्रम और प्रयत्न को सक्रिय रखेगा, प्रगति के पथ पर बढ़ता जायेगा। उसे न तो किसी की ईर्ष्या रोक सकती है और न द्वेष।

ईर्ष्या की आग में अपनी शक्तियाँ जलाने की अपेक्षा कहीं अच्छा और कल्याणकारी है कि दूसरों की उन्नति को ईर्ष्या की दृष्टि से से देखने के बदले उसके उन गुणों और प्रयत्नों को देखें, जिनके आधार पर अमुक व्यक्ति ने वह स्थिति प्राप्त की है। दूसरों के उदाहरण से केवल वे ही व्यक्ति लाभ उठा पाते हैं, जो उसकी स्थिति को देखकर जलने के बजाय पुरुषार्थ की प्रेरणा पाते हैं। दूसरों की अपेक्षा अपने को निर्बल और दीन-हीन बनाकर ईर्ष्या की आग में जलने के स्थान पर मनुष्य को चाहिए कि वह उससे अध्यवसाय की शिक्षा लेकर स्वयं भी वैसी स्थिति पाने का प्रयत्न करे। ऐसा करने से उन्नति की सम्भावना उसके बराबर होने तक ही सीमित नहीं है। उससे आगे भी बढ़ा जा सकता है और उसकी अपेक्षा कहीं अधिक सफलता पाई जा सकती है।

ईर्ष्या की आग आत्म-जन्य होती है। कोई मनुष्य किसी को प्रगति करते देखता और उससे ईर्ष्या करने लगता है, तो उस प्रगतिशील का उसमें क्या दोष है। वह तो पथ पर अपने कर्त्तव्यों में तल्लीन हुआ चला जाता है। अब उसके प्रति यदि कोई ईर्ष्या भाव बना ले तो उसमें वह क्या कर सकता है। वह अपनी उन्नति रोककर और अवनति करके किसी को ईर्ष्या की आग से बचने में सहायता तो कर नहीं सकता। हाँ अपने प्रति ईर्ष्यालु पर तरस अवश्य खा सकता है। ईर्ष्यालु व्यक्ति अज्ञानवश ही किसी को अपनी ईर्ष्या का हेतु मान बैठते हैं। ईर्ष्या का कारण बाहरी व्यक्तियों अथवा वस्तुओं में देखने के बजाय उसका हेतु अपने अन्दर खोजना चाहिये। ऐसा करने से निश्चय ही पता चल जायेगा कि वह उसकी स्वयं की एक निर्बलता तथा न्यूनता है। कारण जानकर उसका निवारण भी आसानी से किया जा सकता है। मनुष्य को ऐसा करना भी चाहिए। उसी में उसका हित और कल्याण है। दूसरों की उन्नति तथा प्रगति से ईर्ष्या करने का, सिवाय इसके कि मनुष्य की अपनी दुर्बलता और चरित्र-हीनता है और कोई कारण तो है नहीं। ईर्ष्यालु व्यक्ति यदि सौ बार किसी की उन्नति पर जलती दृष्टि डालता है तो यह भी उचित है कि एक बार उन संतोषियों पर भी दृष्टि डाल ले, जो उसकी तुलना में कहीं अधिक गई-गुजरी स्थिति में चल रहे हैं। लेकिन उससे ईर्ष्या नहीं करते, जब कोई दूसरा निम्न स्थिति वाला उससे ईर्ष्या नहीं करता तो क्या कारण है कि अपने से अच्छी परिस्थितियों वाले से ईर्ष्या करे। मनुष्य को केवल अपनी ओर ही न देखते रहकर, दूसरों की ओर भी देखना चाहिये।

ईर्ष्या एक भयानक आसुरी वृत्ति है यह अपने साथ एक असुर परिवार भी रखती है। जिसके सदस्य मिलकर मनुष्य का जीवन ही नष्ट कर देते हैं। द्वेष, निराशा, निरुत्साह आदि उसी परिवार के सदस्य हैं। ईर्ष्या जब बहुत बढ़ जाती है तो द्वेष भी उठ खड़ा होता है। द्वेष के कारण मनुष्य में दूसरों को हानि पहुँचाने, उसका विरोध करने और अनावश्यक रूप से शत्रुता बाँध लेने का दोष उत्पन्न हो जाता है। जिसका परिपाक अपराधों के रूप में होता है और असम्मान के रूप में भोगना पड़ता है। जो दुर्भाग्य से एक बार अपराधी बन जाता है, उसके लिये पतन कि ओर जाने के सिवाय उन्नति का कोई मार्ग नहीं रह जाता।

उन्नति की संभावनायें समाप्त हो जाने पर मनुष्य का निराश हो जाना स्वभाविक ही है। निराशा का अंधकार आता है, मन, बुद्धि और आत्मा का अंधा हो जाना निश्चित है। जिसका मन भर गया, बुद्धि नष्ट हो गयी और आत्मा की चेतना जाती रही, उसके जीवन में फिर रह क्या जाता है। केवल मिट्टी का आकार और श्वासों का निरर्थक आवागमन। निराश व्यक्ति जीवन का कोई आनन्द नहीं लूट सकते। निराशा से भय, आशंका और अकर्मण्यता के अभिशाप उठ खड़े होते हैं। इतने शत्रुओं से घिरे मनुष्य को शोक-सन्तापों के सिवाय इस वैभव और ऐश्वर्य से भरे संसार में कुछ नहीं मिल पाता। इस सब दुर्दशा का मूल हेतु वही ईर्ष्या है, जिसे मनुष्य अकारण ही अपने हृदय में बसा लेता है और पालता रहता है।

जीवन में यदि सफलता और सुख पाना है तो ईर्ष्या के द्वेष से बचिये। यदि किसी की उन्नति और प्रगति देखकर आपको कुछ अन्यथा अनुभव ही होता है तो ईर्ष्या करने के बजाय, एक बार स्पर्धा करने लगें तो भी जीवन-दाहिनी आग में जलने से बच सकता है। स्पर्धा रखने पर कम से कम द्वेष, ध्वंस और अपराध वृत्ति से तो बचा जा सकता है। और यदि वह स्पर्धा प्रतियोगितापूर्ण है, तब तो परिश्रम और पुरुषार्थ का भाव जागेगा। आप किसी की उन्नति देखकर आह-कराह करने के बजाय ऐसी गतिविधियों को अपनाने लगेंगे, जिससे आपकी भी उन्नति हो और उससे आगे निकल जाने का प्रयत्न करने लगें।

कभी किसी से ईर्ष्या न करना चाहिये। यह अनिष्टकर आसुरी भाव है, असात्विक वृत्ति है। इससे मनुष्य की स्वयं अपनी ही हानि होती है। किसी और का कुछ नहीं बिगड़ता। आपके ईर्ष्या करने से न तो किसी कि उन्नति रुक जायेगी और न ही प्रगति में बाधा आयेगी। इसके विपरीत आप स्वयं जल-जल कर अपना जीवन रस सुखा डालेंगे और क्षमताओं को नष्ट कर लेंगे। ईर्ष्या की जलन में जीवन, समय और शक्ति नष्ट करते रहने के बजाय अपनी प्रगति का प्रयास करिये। दूसरों की उन्नति के कारणों का अध्ययन करिये और देखिये आप भी उन्नति के मार्ग पर तेजी से बढ़ने लगेंगे।


Quotation

नहि वैरेण वैराणि शाम्यन्तहि कदाचन।

अवैरेण च शाम्यन्ति एष धर्मः सनातनः॥

द्वेषी के साथ सदा द्वेषभाव बनाये रखने से द्वेष कभी शान्त नहीं होता है। बैर का त्याग कर देने से बैर शान्त हुआ करता है।

ईर्ष्या उत्पन्न होने का कारण आत्महीनता का भाव ही होता है। जब मनुष्य अपने को दूसरों की तुलना में हीन और हेय समझकर यह समझने लगता है कि उसके पास उन्नति करने के लिये न तो साधन हैं और न शक्ति। मेरा भाग्य खोटा है, मुझ पर ईश्वर की अकृपा है तो स्वभावतः उसमें ईर्ष्या के अंकुर उग आते हैं। इसके विपरित यदि मनुष्य इस प्रकार सोचे कि परमपिता परमात्मा ने सभी मनुष्यों को समान शक्ति और सम्भावनायें दी हैं।

मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है। गुणों और पराक्रम के आधार पर संसार की कोई भी उपलब्धि सम्भव बनाई जा सकती है। जिस बुद्धि और परिश्रम के सहयोग से कोई दूसरा मनचाही उन्नति कर सकता है, तो हम क्यों नहीं कर सकते। मेरे पास ईश्वर का दिया सब कुछ है, उसका सदुपयोग कर मैं भी ऊपर चढूँगा और आगे बढूँगा- तो निश्चय ही उसका महान मंगल हो। इस प्रकार के विचार दैवी विचार होते हैं, जो मनुष्य को श्रेय की ओर ही ले जाते हैं।

दूसरों की अपेक्षा अपने को हीन मान लेना भारी भूल है इससे मनुष्य की कार्यकारिणी शक्तियाँ कुण्ठित हो जाती हैं। निराशा और निरुत्साह का भाव आता है। किसी एक ओर न देखिये, इस लम्बे-चौड़े संसार में सब तरफ देखिये। आप पायेंगे कि यदि प्रभु ने आपको किन्हीं दस-बीस से कम सुविधायें दी हैं तो हजारों लाखों से बढ़-चढ़कर बनाया है। साधनों की कमी से अपने को अभागा अथवा ईश्वर का अकृपा पात्र मान लेना ठीक नहीं है। यही क्या कम बड़ा सौभाग्य है कि आप मनुष्य बने हैं।

आपको सुर-दुर्लभ कर्मयोनि प्राप्त हुई है। क्या परमात्मा की यह कम कृपा है कि उसने आपको अपनी चेतना का अंश देकर चैतन्य बनाया है आपको इच्छाओं, आकांक्षाओं का प्रसाद दिया, बुद्धि, विवेक और शारीरिक बल दिया। एक चेतनापूर्ण प्रखर मन दिया है। यह सब साधन ऐसे हैं कि जिनका सदुपयोग करके मनुष्य मानव से महामानव बन सकता है, मृत्यु से अमर हो सकता है। इस दशा में भी अपने पर ईश्वर की अकृपा समझना अज्ञान के सिवाय और क्या कहा जा सकता है।

संसार में मनुष्य होते हुये भी न जाने कितने व्यक्ति बल, बुद्धि, विधा, इच्छा, आकाँक्षाओं से हीन बने पशुवत जीवन जी रहे हैं। यदि परमपिता परमात्मा अकृत करता है तो एक शुद्ध-बुद्ध मानव बनाने के बजाय उसे मानव-पशु की श्रेणी में न भेज देता। अपनी इस दक्षता के लिये परमात्मा को धन्यवाद दीजिये और अपनी स्थिति को सम्मान और गौरव की दृष्टि से देखिए।

यदि आपमें ईर्ष्या का दोष है तो उसे तुरन्त दूर कर डालिये। इस सर्पिणी का पालन ठीक नहीं। इसका भाग भर विष, जीवन का सारा सुख, सारा सन्तोष और सारी शाँति जलाकर खाक कर देता है। दूसरों की उन्नति देखने के बजाये उसके उन आधारभूत गुणों को देखिए और ग्रहण करिये। जिसने अपने प्रसाद से उसे स्पृहणीय स्थिति पर पहुंचाया है। किसी को आप यदि धन-दौलत के क्षेत्र में बढ़ते देखकर लालायित होते हैं, किन्तु अपनी परिस्थितियों से विवश रहते हैं तो उन्नति का एक वही क्षेत्र तो नहीं है। आप विद्या, शिल्प, कला और कौशल के क्षेत्र में बढ़िये। यदि भौतिक क्षेत्र आपके अनुकूल नहीं है तो आध्यात्मिक दिशा में प्रगति करिये। यदि स्वामित्व आपको दुर्लभ दीखता है तो जन-सेवा के क्षेत्र में उतर जाइये।

उन्नति और प्रगति के लिए एक नहीं हजारों क्षेत्र हैं। जिनमें से अनेक हर परिस्थिति के लोगों के लिये उपयुक्त हो सकते हैं। यदि संसार में किसी सत्ताधारी का सम्मान होता है तो जनसेवक भी उससे कम सम्मानित नहीं होता। यदि धन ने अपना स्थान बनाया हुआ है तो विद्या का स्थान भी सुरक्षित है। संसार में किसी से ईर्ष्या का पाप करने का कोई कारण नहीं है। उन्नति और प्रगति के लिये अवसर ही अवसर बिखरे पड़े हैं। किसी एक को पकड़ लीजिये। पूरे तन मन से जुट जाएं। आप भी उन्नतिशील बनकर उस सुख-शाँति तथा सम्मान को पाने लगेंगे, जिसे हर उन्नति का परिणाम कहा जा सकता है।


Quotation

किसी द्रव्य के प्रति राग-द्वेष न हो, जो सुख दुःख में समभाव रखता है, उसे न पुण्य का आश्रय होता है और न पाप का।


संगीत-सत्ता और उसकी महान महत्ता

पिटसवर्ग (अमेरिका) की एक एल्युमिनियम कम्पनी (अल्कोआ) की फिल्म डाइरेक्टर राल्फ लाइन्स हॉय संगीत से बड़ा प्रेम रखते हैं। वे स्वयं एक सुप्रसिद्ध वायलिन वादक और उनकी धर्मपत्नी ग्रेश्चेन अच्छी पियानोवादक हैं। दोनों एक दिन संगीत का अभ्यास कर रहे थे। एकाएक उन्हें एक महिला की याद आई। इस परिवार से उनका घनिष्ठ सम्बन्ध था पर इधर बहुत दिनों से उनकी भेंट नहीं हो सकी थी।

दूसरे दिन उन्होंने विस्तृत छान-बीन की तो पता चला कि वह महिला रुधिर नाड़ियों की किसी भयंकर बीमारी से पीड़ित, रोग शैया पर पड़ी दिन काट रही है। अगले दिन लारेन्स हॉय अपनी धर्मपत्नी सहित उनसे मिलने गये। रोगियों का उपचार करने वाले डाक्टरों से पूछ-ताछ करने पर पता चला कि रोग असाध्य हो चुका है और उसके अच्छा होने की कोई सम्भावना नहीं है।

कितने दिनों से वह इस तरह का कष्ट भुगत रही है। इस बीच उनकी आत्मा ने शायद ही कभी प्रफुल्लता अनुभव की हो। शरीर आधि-व्याधि से पीड़ित होता है तो यह संसार किसे अच्छा लगता है। पर एक वस्तु परमात्मा ने ऐसी भी बनाई है- लारेन्स हॉय ने विचार किया कि वह कैसे भी पीड़ित हृदय को भी प्रसन्नता प्रदान करती है। संगीत, उन्होंने सोचा-सबको आत्म-सन्तोष देता है, क्यों न आज इन्हें संगीत सुनाऊँ, सम्भवतः उससे इन्हें कुछ शीतलता मिले।

पति-पत्नी रोगिणी के पास बैठ गये। पति ने वायलिन उठाया, पत्नी ने पियानो पर संगत दी। धीरे-धीरे संगीत लहरियाँ उस क्रन्दन भर कमरे में गूँजने लगीं। रोगिणी को ऐसा लगा जैसे कष्ट पीड़ित अंगों पर कोई हलकी-हलकी मालिश कर रहा है। कर्ण-प्रिय मधुर संगीत धारा प्राण-प्रिय वस्तु की तरह मिली। मन्त्र-मुग्ध की तरह वे उन स्वर लहरियों का आनन्द लेती रहीं और उसमें आत्म-विभोर होकर सो गई। रोगिणी होने के बाद ऐसी प्रगाढ़ निद्रा उन्हें कभी नहीं आई थी। जागी आंखें खोलीं तो उन्होंने अपने मन में विलक्षण शाँति और विश्राम की अनुभूति की। इस कृपा के लिये उन्होंने लारेन्स हाय को हार्दिक धन्यवाद प्रदान किया। उन्हें रोग में भी बड़ा आराम मिला।

लारेन्स हॉय घर लौट आए और कई दिन तक इस घटना पर विचार करते रहे। उनकी पत्नी ने सुझाया क्यों न ऐसी कोई व्यवस्था करें कि इन्हें प्रतिदिन ऐसा संगीत सुनने को मिल जाया करे। बहुत देर तक उन्होंने विचार-विनिमय कर एक योजना बनाई। उसके अनुसार कई तरह के गीतों को विभिन्न मनमोहक ताल, स्वरों पर टेप-रिकार्ड करा लिया और वह सारे टेप उस महिला को भेज दिये, जो वर्षों से स्नायु रोग से पीड़ित थीं। यह टेप पाकर महिला को मानो अमृत मिला वह नियमित रूप से यह संगीत भरे टेप-रिकार्ड सुना करतीं और उन स्वरों में तन्मय हो जातीं। जब स्वर समाप्त होते तो लगता शरीर के रोगी परमाणु शरीर से निकल गये हैं और वह हलकापन महसूस कर रही हैं। सचमुच कुछ ही दिनों में वह पूर्ण स्वस्थ हो गई। संगीत शक्ति की यह बड़ी भारी विजय थी। जिसने भौतिक विज्ञान (डाक्टरी) को भी पछाड़ कर रख दिया।

राल्फ लारेन्स हॉय इस घटना से इतने प्रभावित हुये कि उन्होंने रोगियों के लिये संगीत-चिकित्सा की एक नई दिशा ही खोल दी। ‘आर फोर आर’ (रिकार्डिंग फॉर रिलैक्जेशन, रिफ्लेक्शन, रेस्पाँस एण्ड रिकवरी) नाम से यह प्रतिष्ठान आज सारे अमेरिका और यूरोप में छाई हुई है। उस संस्थान की संगीत-चिकित्सा ने हजारों रोगियों को अच्छा किया है और अब वह एक अति साधन सम्पन्न संस्था की तरह विकसित होकर लोक-कल्याण की दिशा में प्रवृत्त है।

उसके इतिहास और उसकी उपलब्धियों से पाठकों को अगले अंकों में परिचित करायेंगे, तब उन्हें पता चलेगा कि सचमुच संगीत मानव मन, शरीर एवं आत्मा को प्रभावित करने वाली आयु, प्राण, बल और आरोग्य वर्धक शक्ति है। हम भारतवासी अपनी इस विरासत को खोते जा रहे हैं, जबकि यूरोपवासी उसके लिये हर तरह का त्याग करने को प्रस्तुत हो रहे हैं।

राल्फ लारेत्स हॉय इस तरह का प्रयोग करने वाले कोई प्रथम व्यक्ति नहीं हैं। उन्हें मिशनबद्ध काम करने में ख्याति मिली है, वैसे इनसे पूर्व डॉ. एडवर्ड पोडोलास्की (न्यूयार्क) भी प्रसिद्ध चिकित्सक और संगीतज्ञ हो चुके हैं उन्होंने लिखा है-गाने से रक्त संचालन बढ़ता है, शिखाओं में नवजीवन संचार होता है। जो लोग गाने-बजाने और नाचने आदि में से किसी का भी नियमित अभ्यास करते हैं, उनमें फेफड़े और जिगर सम्बन्धी रोग बहुत कम पाये जाते हैं। शरीर के विजातीय द्रव्य और विषैले पदार्थों को निकाल बाहर करने में संगीत का असाधारण महत्व है यदि सहायता ली जाये तो उससे अनेक प्रकार के रोगों का उपचार किया जा सकता है।

यह शारीरिक लाभ किसी श्रद्धा या विश्वास के परिणाम हों सो बात नहीं। श्रद्धा या विश्वास की मात्रा तो आश्चर्यजनक ढंग से बढ़ती है पर यदि वह न हो तो भी लाभ मिलने का सुनिश्चित विज्ञान है, उसे समझने के लिये हमें शब्द की उत्पत्ति और उसके विज्ञान को जानना पड़ेगा।

एक वस्तु से आघात होता है, तब ‘शब्द’ की उत्पत्ति होती है। जिस वस्तु पर चोट की जाती है उसके परमाणुओं में कंपन होती है। वह कम्पन आस-पास की वायु को भी प्रकम्पित करता है। हवा में उत्पन्न कम्पन की लहरें मण्डलाकार गति से फैलती हैं और कुछ ही समय में सारे संसार में छा जाती हैं। यह कम्पन कान के पर्दे से टकराते हैं तो कान की भीतरी झिल्ली समानुपाती गति से हिलने-डुलने लगती है। और विद्युत चुम्बकीय तरंगों के रूप में कान की नसों से होती हुई मस्तिष्क के श्रवण-केन्द्र तक जा पहुँचती है।

हम जानते हैं कि शरीर में नाड़ियों की संख्या और बुनावट इतनी अधिक और सघन है कि प्रत्येक अवयव का सम्बन्ध शरीर के रत्ती-रत्ती भर स्थान से है। कभी कान में कोई पतली लकड़ी या और कोई वस्तु चली जाती है तो सारे शरीर में विद्युत आवेश दौड़ जाने की तरह की सिहरन होती है। बाह्याघात से परमाणुओं के कम्पन जब मस्तिष्क के श्रवण-केन्द्र तक पहुँचते हैं, तब वे इसी सिद्धान्त के आधार पर शरीर का सम्पूर्ण परमाणुओं में थिरकन उत्पन्न कर देते हैं पर यह थिरकन, कम्पन या सिहरन शब्द के ताल-सुर और गति पर अवलम्बित होती है। इसलिये प्रत्येक शब्द का एक-सा प्रभाव शरीर पर नहीं पड़ता वरन् जो कुछ भी बोला और सुना जाता है, उसका भिन्न-भिन्न तरह का प्रभाव शरीर पर पड़ता है।

शरीर की सम्वेदनशीलता परमाणुओं में स्थित सबसे कोमल भाग में कम्पन के कारण होती है। वैज्ञानिकों ने पता लगाया कि शब्द के 45000 बार तक के कम्पन को हम सुन सकते हैं, उससे अधिक और 14 कम्पनों से कम के शब्द को हम नहीं सुन सकते। इस बीच के ध्वनि-तरंगों में दो तरंगों के बीच में जितना समय लगता है, ध्वनी-तरंगें यदि उसी समय को स्थिर रखकर बराबर प्रवाहित होती रहें तो शरीर स्थित परमाणुओं के कोमल तन्तुओं का आकुँचन-प्रकुँचन (फैलना और सिमटना) होता है, उससे उन कोशों में स्थित भारी अणु अर्थात् रोग और गन्दगी के कीटाणु निकलने लगते हैं। समान समय वाले यह कम्पन ही संगीत में सुर कहे जाते हैं। उनका जीवन विज्ञान से घनिष्ठतम सम्बन्ध माना गया है। यदि कोई प्रतिदिन मधुर संगीत सुनता, बजाता, गाता अथवा ताल और गति के साथ नृत्य करता है तो उसका शरीर अपने दूषित तत्व बराबर निकालता रहता है, इस तरह रोगों के कीटाणु भी घुल जाते हैं और शरीर भी स्वस्थ बना रहता है। मन को विश्राम और प्रसन्नता मिलना शरीर के हलकेपन का ही दूसरा नाम है, अर्थात् यही ध्वनि-कम्पन आत्मा तक को प्रभावित करने का काम करते हैं।


Quotation

हमारे यहाँ तो भगवान भी बिना मुरली या डमरू के पूरे नहीं समझे गये, मानव का तो प्रश्न ही क्या है, यह अकारण नहीं है कि विद्या की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती के हाथ में पुस्तक के साथ-साथ वीणा भी लगाई जाती है, संगीत आत्मा का प्रकाश है, मनुष्य को तो उससे अनिवार्य सम्बन्ध रखना ही चाहिये।

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद,

अमेरिका के पथरी के एक रोगी पर डॉ. पोडोलास्की ने प्रयोग करके देखा कि संगीत की सूक्ष्म ध्वनि-तरंगों के आघात से पथरी के कुछ कण प्रतिदिन टूटकर उससे अलग हो जाते और मूत्र के साथ मिलकर बाहर निकल आते हैं। प्रयोग के दौरान प्रतिदिन मूत्र का परीक्षण किया जाता रहा। देखा गया कि जिस दिन संगीत बिलकुल नहीं बजा उस दिन के मूत्र परीक्षण में पथरी का एक भी टुकड़ा नहीं मिला। इसके बाद यह क्रम बीच में कभी बन्द नहीं किया गया तो उससे पथरी घूमकर पूरी की पूरी घुल गई।

‘आमेलिता गलिगुर कुर्सी’ नामक एक लड़की बाल्य काल से ही लकवे का शिकार हो गई। न तो उसके हाथ काम करते थे, न पाँव। उसके इलाज के लिये अच्छे-अच्छे डॉक्टर लगाये गये, फिर भी कोई लाभ न हुआ। कहीं से उसे संगीत का प्रेम जाग गया। वह नियमित रूप से गाने का अभ्यास करने लगी। जब तक वह बजा नहीं सकती थी, वाद्य-यन्त्र कोई और बजा देता था। वह घण्टों भाव-विभोर गाती रहती और उसका प्रभाव यह हुआ कि उसका शरीर धीरे-धीरे स्वस्थ होने लगा। वह स्वयं भी बजाने लगी। फिर चलने-फिरने और दौड़ने भी लगी। पूर्ण स्वस्थ होने के अठारह वर्ष बाद उसने अपने एक संस्मरण में बताया कि- “विगत अठारह वर्षों से मैं एक भी दिन बीमार नहीं पड़ी। मैं प्रतिदिन गाने का आधा घण्टा अभ्यास करती हूँ।

कैलिफोर्निया के एक व्यक्ति की जबान बन्द हो गई थी। वह कुछ भी बोल नहीं सकता था। चिकित्सकों ने उसे ‘मनोरोगी’ कहकर असाध्य ठहरा दिया था पर ऊपर अमेरिका की जिस संस्था का नाम दिया गया है, एक स्वयं-सेविका ने उसके रिकार्ड दो वर्ष तक लगातार इस व्यक्ति को सुनाये और एक दिन सब लोग यह देखकर आश्चर्यचकित रह गये कि संगीत-ध्वनि के कारण वह इतना आह्लादित हो उठा कि एकाएक उसकी जबान फूट पड़ी और धीरे-धीरे वह सब की तरह खूब अच्छी तरह बोलने और बात-चीत करने लगा।

यह घटनायें देखकर नारद संहिता का वह श्लोक याद आ जाता है, जो भगवान विष्णु जी ने नारद जी से कहा था-

खगाः भृंगाः पतंगाश्च कुरश्वाद्योपिजन्तवः।

सर्व एव प्रगीयन्ते गीतव्याप्तिर्दिगन्तरे॥

हे नारद! पक्षी, भौंरे पतंगे, हिरण आदि जीव-जन्तुओं को भी संगीत से प्रेम होता है। संगीत से संसार का कोई भी स्थान रिक्त नहीं। अर्थात् संगीत एक सर्वव्यापी ईश्वरीय तत्व है और वह परमात्मा के समान ही सम्पूर्ण संसार को शारीरिक, मानसिक और आत्मिक आरोग्य प्रदान करता है।

अमर कहानीकार मुंशी प्रेमचन्द्र ने इसी तथ्य को व्यक्त करते हुए लिखा है- “मनोव्यथा जब असह्य हो जाती और अपार हो जाती है, जब उसे कहीं प्राण नहीं मिलता, जब वह रुदन और क्रन्दन की गोद में आश्रय नहीं पाती तो वह संगीत के चरणों में जा गिरती है।”

संगीत मनुष्य की आत्मा है, उसे अपने जीवन से अभिन्न करें तो आत्मोत्थान के स्वर्गीय सुख से भी हम कभी वंचित न हों।

(क्रमशः)


सुन्दर वाणी

महाराज अज के समय की बात है, एक दिन महर्षि वशिष्ठ किसी यज्ञ में पुरोहित बनकर जा रहे थे। मार्ग में मंकी नामक एक व्यक्ति मिला। उसने अपना दुःख प्रकट करते हुए कहा- “देव  मैंने सदैव सदाचरण किया है तो भी आज तक किसी ने न तो मेरी प्रशंसा की न ही प्यार।”

वशिष्ठ ने कुछ विचार किया फिर बोले-”आज से सदाचरण के साथ वाणी से सदा सुन्दर बोलने का भी अभ्यास करो तो तुम्हें सर्वत्र सम्मान मिलेगा।” प्रिय बोलने के अभ्यास से मंकी कुछ ही दिनों में सर्वप्रिय बन गया।


सदाचार की शक्ति

धर्मराज युधिष्ठिर ने अश्वमेध यज्ञ करने का निश्चय किया। अश्वमेध की प्रथा के अनुसार विश्व-विजय के लिए घोड़ा छोड़ा गया, उसके पीछे महाबली अर्जुन चले। जिस किसी ने घोड़े को पकड़ा अर्जुन ने उसे युद्ध में परास्त किया। इस प्रकार दिग्विजय करते हुये वे आगे बढ़ रहे थे।

घोड़ा विन्ध्याचल पारकर चम्पापुरी में प्रविष्ट हुआ। उस समय वहाँ सम्राट हंसध्वज राज्य करते थे। उन्होंने अपने पुत्र सुधन्वा को घोड़ा पकड़ने की आज्ञा दी। यशस्वी राजकुमार सुधन्वा ने घोड़े को बन्दी बना लिया। यह समाचार मिलते ही दोनों ओर से युद्ध की तैयारियाँ होने लगीं।

रणक्षेत्र में उतरने से पूर्व सुधन्वा अपनी पत्नी प्रभावती से मिलने गया। युद्ध-वेष में पति को सामने खड़ा देखकर वीर बाला प्रभावती की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। उसने कहा- “देव! शत्रु से संघर्ष करना ही हम क्षत्रियों का धर्म है, संघर्ष न करें तो सारा संसार अपनी हर अच्छी-बुरी इच्छा मनवाने का दुस्साहस करने लगता है।”

“किन्तु ........।” कहकर प्रभावती चुप हो गई। सुधन्वा ने पूछा- “प्रियतमे! कहो- रुक क्यों गई। हमने अग्नि के समक्ष एक दूसरे की आकाँक्षाओं को पूर्ण करने की प्रतिज्ञा की थी, वह मुझे याद है, तुम्हारी किसी भी कामना को पूर्ण करना, मैं अपना धर्म समझता हूँ।”

स्वामिन्! प्रभावती ने विनीत भाव से कहा- “आज तक आपने विवाहित होकर ब्रह्मचर्य की मर्यादाओं का पालन किया है, मैं उससे सन्तुष्ट ही रही हूँ, आप युद्ध में जा रहे हैं, युद्ध में विजय ही नहीं होती- पराजय और मृत्यु की सम्भावनायें भी स्वाभाविक होती हैं। यदि आपको कुछ हो गया तो मुझे निःसन्तान रहना पड़ेगा। एकाकी जीवन काटना नारी के लिए कठिन है। आज मेरे रजस्वला होने का 16 वाँ दिन है, आप युद्ध प्रातःकाल प्रारम्भ करते तो महान् कृपा होती?”

सुधन्वा ने बात स्वीकार कर ली। उधर युद्ध की तैयारियाँ हो रही थीं, इधर गर्भाधान की तैयारी। सारी प्रजा अस्थिर थी, किन्तु सुधन्वा को किंचित मात्र असन्तोष न था। एक सद्गृहस्थ की भाँति उसने गृहस्थ धर्म का पालन हँसी-खुशी के साथ किया।

प्रातः काल सुधन्वा रणक्षेत्र में आ डटा। उसका रथ अर्जुन के रथ के सामने आया, शंख-ध्वनि हुई और दोनों सेनाओं में बाण-वर्षा होने लगी। सुधन्वा के साथ सुमति, सुगति, तुष्ट, श्रद्धालु, सुबल, सुरथ आदि भाई और सामन्त युद्धरत थे तो अर्जुन की ओर से सारथी भगवान् श्रीकृष्ण और वृषकेतु, प्रद्युम्न, अनुशाल्व और कृतवर्मा आदि योद्धा युद्ध में भाग ले रहे थे। बड़ा घमासान युद्ध हुआ।

आज युद्ध का अन्तिम दिन था। सुधन्वा और अर्जुन दोनों आमने-सामने विजय की आकाँक्षा से शस्त्र प्रहार कर रहे थे। सुधन्वा के बाणों के आगे अर्जुन की एक भी न चल पा रही थी, तभी अर्जुन ने क्रोध करके प्रतिज्ञा की- “यदि मैंने तीन बाणों से सुधन्वा का सिर न काट दिया तो फिर कभी शस्त्र ग्रहण नहीं करूंगा।” अर्जुन की प्रतिज्ञा सुनकर सुधन्वा ने भी शपथ ली- “यदि मैंने अर्जुन के तीनों बाण काट न दिये तो युद्ध में हार मानकर चला जाऊँगा।”

अर्जुन को विश्वास था, भगवान कृष्ण उनके साथ हैं, सो जयद्रथ वध की तरह प्रतिज्ञा तो पूरी होगी ही। सुधन्वा को अपने पर आत्म-विश्वास था-मैंने जीवन में कभी कोई कलुषित कर्म नहीं किया। कभी झूठ नहीं बोला, इसलिये मेरी आत्मा की आवाज कभी असत्य नहीं हो सकती। यों प्रतिज्ञायें अर्जुन और सुधन्वा ने कीं भी पर वस्तुतः टक्कर ईश्वर और सदाचार के बीच थी। भगवान को ही निर्णय करना था कि विजय सदाचारी की होती है अथवा भगवान के कृपा पात्र की।

युद्ध फिर प्रारम्भ हुआ- अन्तिम और निर्णायक युद्ध। अर्जुन ने धनुष पर बाण चढ़ाया और प्रत्यंचा कान तक खींची। भगवान कृष्ण ने कहा- “मैंने गोवर्धन उठाकर इन्द्र के कोप से गाय और गोपालों की रक्षा की थी। उसका जो पुण्य हुआ हो, वह मैं अर्जुन के बाण में जोड़ता हूँ। अर्जुन की प्रतिज्ञा पूरी हो।”

सुधन्वा भी उसी समय गरजकर बोला- ‘दिशाओं! यदि मैंने अपने जीवन में एक पत्नीव्रत का पालन किया हो, भूलकर भी किसी पराई स्त्री को कुदृष्टि से न देखा हो तो मेरा यह बाण अर्जुन को मध्य में ही काट दे।” यह कहकर उसने भी धनुष चढ़ाकर बाण छोड़ दिया। दोनों बाण एक साथ छूटे और सबने देखा कि अर्जुन का शक्तिशाली बाण सुधन्वा के बाण से बीच में ही कटकर चूर-चूर हो गया। सुधन्वा का बाल भी बाँका न हुआ।

अर्जुन ने दूसरा बाण चढ़ाया और पुनः उसे कान तक खींचा। भगवान कृष्ण ने पुनः शक्ति दी और कहा- “ऐरावत हाथी को ग्राह के चंगुल से बचाते समय द्रौपदी को दुर्योधन द्वारा चीर-हरण कराते समय बचाने से और भक्त प्रहलाद की हिरण्यकश्यपु से रक्षा करने से मुझे जो पुण्य प्राप्त हुआ था, वह पुण्य अर्जुन के इस बाण में जोड़ता हूँ।”

उधर अर्जुन को धनुष तानते हुये देखकर सुधन्वा ने भी धनुष पर बाण चढ़ाया और बोला- ‘राजा होकर भी यदि मैंने प्रजा से अधर्म का धन ग्रहण न किया हो, प्राप्त धनराशि को केवल प्रजा के ही हित में लगाया हो तो यह मेरा तीक्ष्ण बाण अर्जुन के बाण को काट डाले।” यह कहकर सुधन्वा ने भी अर्जुन के साथ ही बाण छोड़ दिया। दोनों बाण मध्य युद्धस्थल में टकराये और अर्जुन का बाण निरस्त होकर वहीं कट गिरा।

अन्तिम बाण, आखिरी शक्ति लगाकर अर्जुन ने ब्रह्मास्त्र शर का सन्धान किया। श्री कृष्ण बोले- “काल पुरुष होकर भी पृथ्वी को आसुरी शक्तियों से बचाने के लिए मैंने 24 बार मनुष्य शरीर धारण किया है, मैंने अपनी सारी शक्ति लोक कल्याण में ही लगाई है, उससे जो कुछ पुण्य हुआ हो, वह सब अर्जुन के इस तीसरे बाण में लग जाये।”

उधर सुधन्वा ने आकाश की ओर देखा और कहा- “हे तारागणों! तुम साक्षी हो एक सामान्य व्यक्ति होकर भी यदि मैं सम्पूर्ण जीवन अपने धर्म और अपनी संस्कृति की रक्षा में लगा रहा होऊँ तो अर्जुन का यह तीसरा बाण भी नष्ट हो जाये। यह कहकर उसने तीसरा बाण छोड़ा और उसने अर्जुन के तीसरे बाण को भी काट कर रख दिया।

अर्जुन ने भगवान श्री कृष्ण की ओर देखा और श्री कृष्ण ने अर्जुन की ओर- दोनों एक दूसरे का मुख ताकते खड़े थे और आकाश से देवतागण सुधन्वा पर पुष्पों की वर्षा कर रहे थे। सदाचार की इस विजय पर सारी चम्पापुरी हर्ष मना रही थी और पाण्डवों की सेना इस दुविधा में पड़ी खड़ी थी कि युद्ध को यहीं विश्राम दे दिया जाये अथवा उसे आगे भी प्रारम्भ रखा जाये।


कठिनाइयों का सामना

किसी उपद्रवी ने पत्थर फेंककर मारा। वह स्व. नीग्रो नेता डॉ. मार्टिन लूथर किंग के माथे पर लगा। माथा फट गया, रक्त बहने लगा।

घाव धोकर थोड़ी दवा लगाई और आफिस में जाकर काम करने लगे। एक पत्रकार ने पूछा- “श्रीमान जी! आप जानते थे कि उपद्रवी हिंसक रूप धारण कर सकते हैं, फिर आप उधर गये ही क्यों? क्या आपको संकटों से ही प्यार है।”

नीग्रो नेता ने कहा- “मैं चाहता हूँ लोगों के मन का सारा द्वेष मुझसे टकराये और अमृत में बदल जाये, इसलिए कठिनाइयों का मुझे सामना करना ही पड़ता है।”


खिन्नता के पाप सन्ताप से बचिए

संसार में ऐसे न जाने कितने व्यक्ति देखने का मिल सकते हैं, जो हर समय कुछ सोचते विचारते से रहते हैं। उनका मुख मलीन और मुद्रा गम्भीर रहती है। काम करते हैं तो स्पष्ट झलकता है कि यह जो काम कर रहा है, उसमें उसका मनोयोग रंचमात्र भी नहीं है, योंही हाथ पैर चलाता हुआ सक्रियता की अभिव्यक्ति ही कर रहा है। केवल उनकी क्रिया देखने से ही नहीं, काम का स्वरूप देखकर भी पता चल जाता है कि यह काम उत्साहपूर्वक, मनोयोग द्वारा नहीं किया गया है। बेगार टाली गई है, या कोई मजबूरी पूरी की गई है। किसी भी काम पर मनुष्य के मन की छाप पड़ना स्वाभाविक ही है। उत्साह के साथ, मन लगाकर कर्तव्यपूर्वक किये हुये किसी भी कार्य की सफलता, सुन्दरता, व्यवस्था तथा समयाँश स्पष्ट बता देता है कि इसका करने वाला कोई जीवन्त, उत्साही और कर्मों के धर्म और उसकी पवित्रता को जानने वाला उसमें आस्था रखने वाला व्यक्ति है। इसके विपरीत किसी भी ऐसे काम को, जिसमें किसी प्रकार का कर्तृत्व न झलका हो, जिनमें सफाई सुव्यवस्था और आकर्षण का अभाव है अथवा जिसे देखकर मन प्रसन्न न हो जाये, आंखें तृप्त न हो जायें, देखकर विश्वास कर लीजिये कि इस काम का करने वाला अदक्ष, अस्वस्थ अथवा निरुत्साही व्यक्ति है।

इस प्रकार की असफल अभिव्यक्तियों वाला अवश्य ही कोई ऐसा व्यक्ति होता है, जो व्यग्र, चिन्तित, खिन्न अथवा निराश मनोदशा वाला होता है। जिन लोगों की आदत खिन्न और अप्रसन्न रहने की हो जाती है, वे एक प्रकार से मानसिक रोगी ही होते हैं। किसी काम, किसी बात और किसी व्यवहार में उनका मन नहीं लगता। उनके अन्दर एक तनाव की स्थिति बनी रहती है और वे प्रतिक्षण मानसिक खींचातानी में पड़े रहते हैं जिसका फल यह होता है कि उनकी बहुत सी ऐसी जीवन शक्ति जलकर भस्म हो जाती है, जिसका सदुपयोग करने से सफलता के पथ पर, उन्नति के शिखर पर अनेक विश्वस्त कदमों को बढ़ाया जा सकता है।

परमात्मा ने मनुष्य को जीवन दिया, जीवनी शक्ति दी, सक्रियता तथा कार्य के प्रति अभिरुचि प्रदान की- इसलिए कि वह अपने कर्तव्यों में सुचारुता का समावेश करके संसार को सुन्दर बनाने, सुखी करने में अपना योगदान करे और उसी माध्यम अथवा मार्ग से स्वयं भी अभ्युदय की ओर बढ़े, अपना और अपनी आत्मा का उपकार करे, सुखी, सम्पन्न और सन्तुष्ट जीवन पाकर यह अनुभव कर सके कि मानव जीवन में सुन्दरताओं के भण्डार भरे पड़े हैं, उसके सत्य स्वरूप, सत्-चित्, आनन्द के विषय में सत्य ही कहा सुना गया है। किन्तु होता यह है कि लोग अपने अन्दर खिन्नता, अप्रसन्नता अथवा निराशा का रोग पाल कर सर्वसम्पन्न, मानव जीवन को आग और अंगारों का मार्ग बना लेते हैं। सफलता, अभ्युदय और प्रकाश की ओर अग्रसर होने के स्थान पर विफलता, अवनति और अन्धकार के शिकार बन जाते हैं। यह बहुत ही खेद का विषय है, किन्तु इससे भी अधिक दुख की बात यह है कि वे यह नहीं समझते कि इस प्रकार की मनोदशा से वे अपनी और इस संसार की कितनी गहरी क्षति कर रहे हैं। और यदि समझकर भी अपना सुधार करने खिन्नता की बेड़ियों से छूटने का प्रयत्न नहीं करते, तब तो इस पर होने वाले दुख का वारापार ही नहीं रह जाता खिन्नता अथवा अप्रसन्नता की स्थिति अकल्याणकर है- इससे शीघ्र ही छूट लेना अच्छा है। खिन्न रह कर जीवन को नष्ट करने का किसी भी मनुष्य को अधिकार नहीं है।

खिन्न मनःस्थिति वाले व्यक्ति को विक्षेप का रोग लग जाता है, कहीं भी किसी बात में उसका मन नहीं लगता, घर में प्रसन्न बच्चों की क्रीड़ा, उनका उछलना-कूदना, खेलना और प्रसन्न होना उसे ऐसा अखरता है मानो वे भोले-भाले प्रसन्न बच्चे उसका कोई अहित कर रहे हों। वह उनकी क्रीड़ा देखने पर प्रसन्न होने, हँसने और उनके केलिकल्लोल में सहभागी होने के बजाय उन्हें डाँटने-मारने लगता है अथवा उससे विरक्त होकर, दुखी होकर दूर हट जाता है, अथवा बाहर चला जाता है। यह कितने दुर्भाग्य की बात है कि उसका घर प्रसन्नता और उल्लास का आगार बना हुआ है, किन्तु खिन्न व्यक्ति उसका आनन्द नहीं ले सकता उल्टे अपने मानसिक वैपर्य के कारण वह पारिवारिक सुख उसे सालता और कष्ट देता है। इसे भाग्य की वंचना के अतिरिक्त और कुछ नहीं कहा जा सकता।

बच्चों की क्रीड़ा ही नहीं खिन्न मना व्यक्ति को अपनी पत्नी का विनोद, उसकी मुस्कान, उसका कथन अथवा अन्य प्रियतादायक बातें अच्छी नहीं लगतीं। पत्नी हँसती है तो वह गुर्रा उठता है। पत्नी कोई बात कहती, पूछती अथवा सुनाती है तो काटने दौड़ता है। अस्वस्थ मन वालों की अनुभव शक्ति कुछ इस प्रकार की उल्टी हो जाती है कि उन्हें अनुकूल से अनुकूल बात भी प्रतिकूल और सुन्दर से सुन्दर वातावरण दुखदायी लगने लगता है।

खिन्न व्यक्ति घर पर बाल-बच्चों के बीच तो त्रस्त रहता ही है, बाहर जाकर भी उसे शाँति एवं समाधान नहीं मिल पाता। कुछ ही समय में मित्रों के संपर्क से, उनके साथ मनोविनोद और वार्तालाप में ऊब उठता है। उसे उपयोगी से उपयोगी बातचीत बेकार की बकवास लगती है। उसे बाह्य संसार का कोलाहल, उसकी हलचल उसका क्रिया-कलाप काटने को दौड़ता है। उपवन अथवा एकान्त में भी उसका चित्त शाँति से वंचित रहता है। खिले हुये फूलों का सौंदर्य और कलरव करती हुई चिड़ियों का सुख उसके लिए असम्भव रहता है। कुछ ही देर में उपवन का सौंदर्य उसके लिए वन की भयानकता में बदल जाता है। एकान्त अथवा निर्जन स्थान में तो उसकी दशा और खराब हो जाती है। वहाँ पहुँचते ही उसके मन की भयानकता, बाह्य निर्जनता में मिलकर वातावरण इतना असह्य बना देती है कि उसे वह स्थान श्मशान जैसा लगने लगता है। उसे अपने से, अपनी छाया से भय लगने लगता है, जिससे वह उस शाँत स्थान में भी शाँति नहीं पा पाता, जिसमें पहुँचकर किसी भी स्वस्थ चित्त व्यक्ति को नये विचार, नूतन भाव और एक अलौकिक निस्तब्धता की उपलब्धि हो सकती है।

सुख-शाँति के स्थानों, घर और बाहर किसी का उद्विग्न रहना, त्रास एवं सन्ताप पाना कितना बड़ा दण्ड हो सकता है। यह दण्ड किसी बड़े पाप का ही परिणाम हो सकता है और वह पाप निश्चित रूप से वह पिशाचिनी खिन्नता ही है, जिसे अज्ञानी व्यक्ति अपने मनमन्दिर में बसा लेता है, जिसमें सद्विचारों और शाँति सन्तोष के देवी-देवताओं की स्थापना करनी चाहिये। जितना शीघ्र इस पाप से छूटा और बचा जा सके उतना ही कल्याणकारी है।

खिन्नता के दोष से मनुष्य के मन में विक्षेप का विकार उत्पन्न हो जाता है, जिससे न तो उसका मन किसी काम में लगता है और न किसी स्थान में उसे शाँति मिलती है।


Quotation

चित्तायत्तसिहं सर्वं जगच्चराचरात्मकम्।

चित्ताधीननतो राम बन्धमोक्षावयि स्फुटम्॥

- योग वशिष्ठ,

यह समस्त जड़ चेतनात्मक जगत चित्त के ही अधीन रहता है। हे राम! इस संसार का बन्धन और मोक्ष पद की प्राप्ति ये दोनों ही चित्त के वश में हैं। यह अपनी जैसी भी स्थिति बना लेता है, वही प्राप्त कर सकता है।

जहाँ आसपास लोग हँसते-बोलते अपना काम-काज करते संसार के सभी व्यवहारों को निभाते, उन्नति और प्रगति करते हुये दिखाई देते हैं, वह मलीन मन व्यक्ति हर समय शोक-सन्ताप में जलता और रोता-झींकता रहता है। संसार का कोई भी काम यह ठीक से नहीं कर पाता। अभी एक काम प्रारम्भ किया कि शीघ्र ही उसे छोड़कर दूसरा करने लगा। अभी कहीं जाने का उत्साह जागा कि दूसरे ही क्षण अन्दर बैठी खिन्नता की डायन ने उस क्षीण उत्साह का गला दबा दिया। खिन्न व्यक्ति का मनोबल नष्ट हो जाता है, उसका आत्मविश्वास उसे छोड़कर चला जाता है। जिससे वह संसार में आगे बढ़ने, अपनी आत्मा का उद्धार करने के लिए पुरुषार्थ के योग्य नहीं रहता। किसी भी काम के करने से पहले ही उसे असफलता, हानि अथवा निरर्थकता के भाव दबा लेते हैं, तिस पर भी यदि उसे कुछ करना ही पड़े तो सिवाय असफलता एवं निराशा के उसके हाथ कुछ भी नहीं लगता।

प्रश्न यह उठता है कि जब खिन्नता इतनी दुष्ट और अकल्याणकारी प्रवृत्ति है, तब लोग उसको प्रश्रय ही क्यों देते हैं? निश्चय ही कोई व्यक्ति जानबूझकर इस दोष को नहीं पालता। कोई भी खिन्न, अप्रसन्न अथवा असंतुष्ट नहीं रहना चाहता। किन्तु फिर भी ऐसी परिस्थितियाँ आ जाती हैं, जिनमें खिन्नता के कारण निहित रहा करते हैं और मनुष्य न चाहता हुआ भी उनसे प्रभावित हो जाता है। उदाहरण के लिए खिन्नता के कारणों में से अनेक कारण इस प्रकार हो सकते हैं- किसी कार्य में असफल हो जाना, किसी से अनपेक्षित व्यवहार पाना स्वाभिमान को चोट पहुँचना, किसी प्रियजन का विछोह अथवा परिजन का रुग्ण हो जाना। किसी आकस्मिक आपत्ति का आ पड़ना आर्थिक अथवा शारीरिक हानि होना, किसी से विवाद खड़ा हो जाना अथवा किन्हीं विषम परिस्थितियों में फँस जाना आदि।

इस संसार की रचना और उसका विधान ही कुछ इस प्रकार का है कि कोई भी व्यक्ति एक समान स्थिति में नहीं रह सकता। यहाँ पग-पग पर संघर्ष और प्रतिकूलताओं के अवसर आते ही रहते हैं। किसी भी समय कोई भी कारण खड़ा होकर खिन्नता को जन्म दे सकता है, विषाद को पैदा कर सकता है। किन्हीं निर्दिष्ट व्यक्तियों को ही नहीं, इस विषमतापूर्ण संसार में सभी व्यक्तियों को थोड़ा बहुत प्रतिकूलताओं से गुजरना ही पड़ता है। संसार में ऐसा व्यक्ति कदाचित ही मिले जिसे विषमताओं, असफलताओं, हानियों अथवा प्रतिकूलताओं से न टकराना पड़े। संसार की परिस्थितियाँ सबके लिए एक जैसी ही होती हैं। खिन्नता, विषाद, विषमता अथवा निराशा के कारण किसी को क्षमा नहीं करते।

तथापि हम देख सकते हैं, हजारों-लाखों और करोड़ों आदमी ऐसे हैं जो कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी प्रफुल्ल एवं प्रसन्न बने रहते हैं। खिन्नता के कारण न तो उन्हें अकर्मण्य बना पाते हैं और न उनकी जीवन रुचि को छीन पाते हैं। वे हर प्रतिकूल कारण से टकराते हुये, आगे बढ़ जाते हैं। न तो वे बैठकर विषाद मनाते हैं और न अपने जीवन तत्व को जलाते ही हैं। संसार की एक जैसी परिस्थितियों में यदि सभी व्यक्ति समान रूप से निराश एवं निष्क्रिय हो जावें तो क्या यह संसार एक क्षण को भी स्थिर रह सकता है? क्या इसकी प्रगति अथवा प्रसार हो सकता है। आज प्रति दिन होने वाले चमत्कार, सामने आने वाली उपलब्धियाँ और उन्नति की ओर बढ़ते हुये मानवता के चरण जहाँ के तहाँ रुक जायें और शीघ्र ही यह हरा-भरा और चलता फिरता संसार श्मशान की तरह नीरस और निर्जीव बन जाये।

विषादियों के अतिरिक्त संसार में ऐसे कर्मयोगी, पुरुषार्थी और मनोबल के धनी सत्पुरुष उत्पन्न ही होते रहेंगे, जो विषमताओं को पैरों तले रौंदकर, खिन्नता की पिशाचिनी को जीवन परिधि से निर्वासित करते हुये स्वयं आगे बढ़ते हुये संसार को प्रगति पथ पर चलाते ही रहेंगे। ईश्वर की इस सुन्दर रचना संसार को न तो वे नष्ट होने देंगे और न जड़ीभूत।

दुख अथवा विषादों से छुटकारा पाने का उपाय निराश होकर बैठ रहना नहीं है उसका उपाय है, कर्मठता एवं पुरुषार्थ। हँसना और मुस्काना जीवन की सफलता असफलता में सम-दृष्टिकोण रखकर साहस न हारना। हँसते-मुस्काते हुये अपना कर्तव्य करिये। विषमताओं और प्रतिकूलताओं से हारिये नहीं, उन पर अपने शारीरिक और मानसिक बल से विजय प्राप्त करिये। खिन्नता सारे शोक-सन्तापों, निराशा एवं निरुत्साह की जननी है। यह जीवन का सारा रस सारा सौंदर्य और समस्त पुण्यों को नष्ट-भ्रष्ट करके मनुष्य को निःसार बना देती है। इससे दूर रहिये, इसे जीवन से निकाल फेंकिये। खिन्नता कायर और कमजोर मन वालों का दण्ड है, आप जैसे पुरुषार्थी और वीर पुरुष का पुरस्कार प्रसन्नता एवं सम्पन्नता है, प्रयत्न कीजिये और उसे प्राप्त कर जीवन को सफल एवं प्रसन्न बनाइये।


मारने की बात बहुत हो चुकी, कुछ जिलाने की भी हो (1)

6 अगस्त 1945 को जापान के प्रमुख नगर हिरोशिमा पर जो बम गिराया गया था, उसकी शक्ति 20 हजार टी. एन. टी. के विस्फोट के बराबर थी। इस बमों के समाज में पिद्दी समझे जाने वाले बम ने एक लाख जापानियों को पल भर में ढेर कर दिया था। आज संसार में जितनी मारक शक्ति है, उससे तो सारी पृथ्वी को कम से कम 103 बार मारा जा सकता है।

संसार में जन्म लेने और जीवित रहने की आकाँक्षा प्रत्येक जीवनधारी को रहती है। चींटी, दीमक, गिलहरी, साँप, बिच्छू जैसे निरन्तर असुविधाओं का सामना करने वाले जीव-जन्तु भी मृत्यु की विभीषिका को देखकर बिलबिला उठते हैं। जीवन हमारी मूल-आकाँक्षा है, संसार भर के व्यापार उसी के लिए चलते हैं। माना आज मानवीय संकट इतने बढ़ चुके हैं कि सारे विश्व में प्रतिदिन 1000 आत्म-हत्यायें होती हैं, फिर भी इस समय कुल जनसंख्या 3 अरब 80 करोड़ व्यक्तियों में से प्रतिवर्ष 1000&360=360000 (तीन लाख 60 हजार व्यक्ति ही जीवन से ऊबे हुये होते हैं शेष 3 अरब 79640000 व्यक्ति तो भी वे चाहे कितने ही वृद्ध और अपाहिज क्यों न हों जीवित रहना चाहते हैं, यदि इनमें प्रति 3 घण्टे में जन्म लेने वाली 10000 की दर भी जोड़ दी जाये तो जीवन की इच्छा रखने वालों का औसत और भी अधिक हो जाता है।

बहुमत की इस अन्तिम आवश्यकता को ठुकरा कर केवल मृत्यु, हत्या के लिए जो सरंजाम जुटाये जा रहे हैं वह बताते हैं कि आज के मनुष्य की बौद्धिक दिशायें सही नहीं हैं। ऊपर वह चाहे जितना पढ़ा-लिखा हो पर उसने मानवीय भावनाओं का आदर नहीं, तिरस्कार ही किया है।

टी. एन. टी. पूरा नाम- ‘टाइनाइट्रोटोल्युएन’ एक प्रकार का पीले वर्ण का स्फटिक की तरह का ठोस पदार्थ है और तारपीड़ो, सुरंग व बम आदि में विस्फोटक (एक्सप्लासिव) के रूप में प्रयुक्त होता है। इसका आविष्कार आल्फ्रेड नोबल नामक वैज्ञानिक ने किया था। हिरोशिमा में बम गिराने के बाद इस शक्ति का तेजी से विकास हुआ। सन् 1963 तक अकेले रूस और अमेरिका के पास क्रमशः 24075 मेगाटन, 21970 मेगाटन शक्ति के परमाणु बम विद्यमान थे। एक मेगाटन बम की क्षमता दस लाख टी. एन. टी. के बराबर होती है, तात्पर्य यह कि 1963 तक इन दोनों के पास क्रमशः 2407500000 टी. एन. टी. व 2197000000 टी. एन. टी. कुल 4604500000 टी. एन. टी. क्षमता के बम थे। यह क्षमता हिरोशिमा में गिराये गये बम की अपेक्षा 230225 गुनी अधिक थी, अर्थात् वह 23022500000 (तेईस अरब दो करोड़ पच्चीस लाख) व्यक्तियों को मारने वाली थी पर तब तक पृथ्वी की जनसंख्या कुल तीन अरब थी अर्थात् वह विस्फोटक क्षमता सारी पृथ्वी को भून डालने में प्रयुक्त हो तो पृथ्वी के लोगों को सात बार मारा जा सकता था।

यह बताता है कि मनुष्य ने अपनी बुद्धि का प्रयोग भौतिक विज्ञान की प्रगति में करके अच्छा नहीं किया। यदि यही प्रयत्न सद्भावनाओं को उभारने, आन्तरिक करुणा और मनुष्य-मनुष्य में प्रेम भाव जागृत करने के लिए किये गये होते तो आज का मनुष्य समाज न केवल इस विस्फोटक विध्वंसक विभीषिका से काँप रहा होता वरन् वह शाँति और प्रसन्नता का जीवन जी रहा होता। धर्म और संस्कृति की आवश्यकता को भुलाकर केवल पदार्थ की क्षमता बढ़ाने में आज के बुद्धिजीवी ने जो भूल की है, सम्भवतः उसे भविष्य में एकाएक सुधारा भी न जा सके। यदि किसी तरह कुछ प्रयत्न किये भी जायें तो कई एक शताब्दियाँ भी उसके लिए कम ही पड़ेंगी।

लन्दन की इन्स्टीट्यूट आफ स्ट्रेटेजिक स्टडीज की रिपोर्ट पर आधारित एक तालिका अमेरिकी काँग्रेस ने 16 जनवरी 1963 को प्रकाशित की थी, उसमें अमेरिका की अणु शक्ति का ब्योरा इस प्रकार दिया गया था-

बी. 47 बमवर्षक कुल शक्ति 6000 मेगाटन और उन्हें ढोने वाले नभयानों की संख्या 600, बी-52 बमवर्षक 12000 मेगाटन बम, 600 शस्त्रवाहक, बी-58 बमवर्षक 2000 मेगाटन, शस्त्रवाहक व 100 एटलस मिसाइल 110 मेगाटन, 120 शस्त्रवाहक टाइटन एक मिसाइल 50 मेगाटन 50 शस्त्रवाहक (एक जहाज में एक ही मिसाइल जा सकता है।) टाइटन दो मिसाइल तीस मेगाटन बम, तीस शस्त्रवाहक, मिनिटमन मिसाइल 500 मेगाटन बम, 500 शस्त्रवाहक, स्काईहाक ए- 4 डी (नौसेना के लिए) 1000 मेगाटन 1000 शस्त्रवाहक, स्काई वारियर ए-3 डी (यह भी नौसेना के उपयोग के लिए थे) 150 मेगाटन, 150 शस्त्रवाहक, पोलारिस पनडुब्बियाँ जिनमें से 15 में 16-16 मिसाइल भी फिट थे, 120 मेगाटन बम की शक्ति के थे और उन्हें ढोने के लिए 240 शस्त्रवाहक विमान थे। इस तरह 21970 मेगाटन शक्ति के बम और उन्हें खींचने और दूर ले जाकर गिराने के लिए 3390 विमान केवल अमेरिका के पास थे।

इस समय तक संसार में एक लाख या इससे अधिक जनसंख्या वाले शहरों की संख्या 2000 थी और उनमें 60 करोड़ स्त्री-पुरुष रहते थे। अब यदि यह बम गिराने में लगभग एक तिहाई बम भी बेकार हो जाते तो भी अमेरिका इन सभी शहरों को 125 बार नष्ट करने में समर्थ था। कदाचित इतनी शक्ति इन शहरों के लोगों को भोजन देने में प्रयुक्त होती तो अकेले इतनी ही शक्ति से प्रत्येक नागरिक को वर्ष भर पूरा पेट अन्न, वस्त्र और चिकित्सा का प्रबन्ध बड़ी आसानी से हो सकता था। उस समय तक साम्यवादी देश रूस और चीन के 370 बड़े शहर थे, उन्हें अमेरिका 500 बार नष्ट कर सकता था और अकेले सोवियत संघ से यदि वह लड़ता जो उसका एकमात्र जानी दुश्मन है तो वह उसे 1250 बार नष्ट कर सकने में तब समर्थ था, जब उसके आधे बम ही सही माने में काम देते।

इसी अवधि में रूस के पास अंतर्महाद्वीपीय मिसाइलों की शक्ति 1875 मेगाटन और उन्हें ले जाने वाले शस्त्रवाहक 75 थे, लम्बी मार करने वाले बमवर्षक 4000 मेगाटन और 200 शस्त्रवाहक, पनडुब्बियाँ 200 मेगाटन 200 शस्त्रवाहक, मध्यम मार वाली मिसाइलें 3500 मेगाटन और 700 शस्त्रवाहक, मध्यम मार के बमवर्षक 14000 मेगाटन, 1400 शस्त्रवाहक और अंतर्महाद्वीपों से दूर मार करने वाली मिसाइलें 500 मेगाटन थीं। कुल 24075 मेगाटन और 2475 शस्त्रवाहकों की शक्ति इतनी थी कि वह इन दो हजार शहरों को 160 बार नष्ट कर सकता था। नाटो संधि वाले देशों के 404 शहरों को वह 450 बार में तब नष्ट कर सकता था, जब उसके भी एक तिहाई हथियार बेकार हो जाते। अमेरिका के 192 शहरों को वह अपने आधे बमों से ही 145 बार में मार सकता था।

यदि यही शक्ति छोटे-छोटे कुटीर उद्योग-धन्धे खोलने में प्रयुक्त कर दी गई होती तो आज संसार में एक भी व्यक्ति आजीविका की खोज में न भटक रहा होता। इतनी धनराशि केवल दूध के विकास पर लगा दी गई होती तो संसार का 5 वर्ष से कम आयु का एक भी बच्चा ऐसा न शेष रहता, जिसे दोनों वक्त भर पेट शुद्ध दूध न मिल जाता। यदि यही शक्ति साक्षरता के विकास में लगा दी गई होती तो संसार का प्रत्येक व्यक्ति आज शिक्षित होता, जब कि संसार के दो तिहाई लोग अभी भी निरक्षर हैं और सुधरे हुये जीवन में बाधायें सिद्ध हो रहे हैं, किसी भी रचनात्मक कार्यक्रम में इस मारक शक्ति को स्थानान्तरित कर दिया गया होता तो आज संसार उम्दा परिस्थितियों में सुख और शान्ति, हास और उल्लासपूर्वक जी रहा होता।


Quotation

अत्थि सत्थं परेण परं,

नत्थि असत्थं परेण परं।

-आचाराँग 1।3।4,

शस्त्र संसार में एक से एक बढ़कर हैं, परन्तु अहिंसा की साधना से बड़ा और कोई शस्त्र नहीं है।

अणुबम की अपेक्षा हाइड्रोजन बम अधिक विनाशक होता है। एक बार विस्फोट होने के बाद उसकी धुँध (रेडियो एक्टिव धूल) वायुमंडल में बिखर जाती है, उसका न केवल तुरन्त प्रभाव पड़ता है वरन् सैंकड़ों वर्षों तक भी उसका प्रभाव बना रहता है और नई-नई बीमारियाँ, रोग उत्पन्न होते रहते हैं। अगली पीढ़ी शारीरिक दृष्टि से तो विकलाँग होगी ही, मानसिक दृष्टि से भी विक्षिप्त होगी, यह सब इन बम विस्फोटों की ही कृपा होगी। इतना जानते और समझते हुये भी आज का शिक्षित वर्ग उसी विज्ञान का समर्थन करता चला जा रहा है। कहते हैं भेड़िया जब किसी बकरी को दबोचता है तो मूढ़ बकरी उससे लड़ने की अपेक्षा उसी के साथ भागने में अपनी सुरक्षा समझती है पर जब वह किसी गड्ढे में ले जाकर बकरी को धर पटकता और पेट फाड़ता है, तब उसे भूल का पता चलता है, लगता है अपने को बुद्धिमान् समझने वाला मनुष्य भी आज यही भूल कर रहा है, उसका अन्तिम परिणाम क्या होगा, यह तो समय ही बतायेगा पर विवेक यह कहता है कि यदि आणविक अस्त्र-शस्त्रों की यह होड़ निरन्तर जारी रही तो पृथ्वी के विनाश के क्षण अधिक दूर न होंगे।

यह आंकड़े आज से 6 वर्ष पूर्व के हैं। इन 6 वर्षों में तो स्थिति और भी भयंकर हुई है। 27 फरवरी 1969 को गाँधी-शाँति प्रतिष्ठान द्वारा आयोजित गोलमेज सम्मेलन में बताया गया कि- “अणु शक्ति देशों के पास अब इतना डायनामाइट (एक प्रकार का तीव्र विस्फोटक) है कि विश्व के प्रत्येक स्त्री पुरुष और बच्चे के हिस्से में 6 टन लगभग 162 मन डायनामाइट आ सकता है।

एक व्यक्ति एक बार में औसतन एक पाव अन्न लेता है, एक दिन में दो पाव, प्रतिमाह आठ सेर अन्न लेगा, यदि दो सेर नाश्ता माना जाये तो दस सेर से अधिक अन्न एक व्यक्ति के लिए आवश्यक नहीं होगा। एक वर्ष में इस हिसाब से 120 सेर अर्थात् कुल तीन ही मन अन्न चाहिये, यदि यह 162 मन डाइनामाइट जो भाव में गल्ले से महंगा ही पड़ता है, अन्न में बदल जाना सम्भव होता वह प्रत्येक मनुष्य के लिए आधी उम्र भर के लिए खाने का काम करता। यह तब होता जब उसकी उम्र सौ वर्ष की निश्चित होती।

एक क्षण में मार देने के भय को हम दूर कर सके होते तो प्रत्येक मनुष्य को औसत 50 वर्ष और अधिक जीने की क्षमता दे सके होते पर वैज्ञानिक अहंकार को क्या कहा जाये, उसे तो भूत सवार है, जो केवल मनुष्य को मारने और मार डालने पर ही उतारू है।

संसार में लोग आज हिंसा नहीं अहिंसा, अशाँति नहीं शाँति, बारूद नहीं अन्न, बेरोजगारी नहीं उद्यम निरक्षरता नहीं साक्षरता और वस्त्र-विहीन नहीं शरीर को ढक कर सन्तोष और प्रसन्नता का जीवन जीना चाहते हैं, क्या युद्धोन्माद बढ़ाने वाला आज का विज्ञान उसे पूरा कर सकता है? यह बड़ा भारी प्रश्न हमारे सामने है और जब उसे इन पंक्तियों से तौलते हैं तो यही लगता है कि मारने की बात तो बहुत हो चुकी अब तो संसार को जीवित रखने वाले प्रयत्नों का भी विकास होना चाहिये।

(क्रमशः)


अनावश्यक उपालंभ

जब तक मैं हरा था, मुझमें फूल लगते थे, फल आते थे तब यही लोग मेरे पास झोलियाँ लेकर आते थे, सेवा और सत्कार करते थे और आज जब मैं सूख गया हूँ, तब देखो यही लोग कुल्हाड़े लिये मुझे काटने आ रहे हैं। एक वृक्ष ने अपने साथी वृक्ष को दूर से आते हुये लोगों की ओर उंगली उठाकर कहा।

“ऐसा सोचने की अपेक्षा”- दूसरे वृक्ष ने उत्तर दिया- आप यह सोचते कि मेरी तो मृत्यु भी सार्थक हुई जो अब भी मैं लोगों की आवश्यकतायें पूरी कर सकता हूँ तो मित्र इस समय भी तुम्हें कितनी शक्ति कितना सन्तोष मिलता?


निष्काम कर्म-योग की शक्ति

सम्राट चक्ववेण अपनी न्यायकारिता और प्रजावत्सलता के लिये विश्व-विख्यात रहे हों सो बात नहीं, उनकी ख्याति का प्रमुख कारण यह था कि वे सम्राट होकर भी अपनी आजीविका अपने परिश्रम से कमाते थे।

चक्ववेण के राज्य का विस्तार दूर-दूर तक था। करोड़ों स्वर्ण मुद्रायें कर में आती थीं। किन्तु वह सब राज्य-व्यय में प्रयुक्त होती थीं। अपने आहार, वस्त्र और आवश्यकताओं का प्रबन्ध वे आप करते थे। कृषि योग्य भूमि उनके अधिकार में थी। अपनी आजीविका के लिए सम्राट-साम्राज्ञी स्वयं कृषि करते थे। उनका सामान्य जीवन विशुद्ध कृषक का था। 6 घण्टे उसमें लगाते थे, इससे बचा हुआ समय राज्य कार्यों पर।

अपने परिश्रम से मनुष्य आजीविका भर कमा सकता है, परिग्रह तो तब होता है, जब मनुष्य परिश्रम करे कम और आवश्यकताओं का कोई अन्त न हो। लोभ और लालच, वासनायें और तृष्णायें सम्राट से कोसों दूर थीं, इसलिए अर्थ संचय की उन्हें कभी आवश्यकता भी नहीं पड़ी।

अन्न अपने हाथ से उत्पन्न किया हुआ खाने से उनकी शक्ति और स्वाभिमान का कोई अन्त नहीं था। अपने खेतों से उत्पन्न की हुई कपास से रानी वस्त्र बुनतीं वही दोनों के पहनने के काम आते। परिश्रम का जीवन और कृत्रिमता से विरक्ति के कारण ही दोनों में विलक्षण तेजस्विता थी।

“यथा राजा तथा प्रजा - मार्ग दर्शक उसे ही तो कहते हैं, जिसके चरण चिन्हों का सारी प्रजा अनुसरण करती हो, जो तेजस्विता सम्राट के जीवन में थी, वही सभासदों, पदाधिकारियों और सम्पूर्ण प्रजा के जीवन में भी थी। किसी को कोई अभाव न था। कहीं दैन्यता न थी, रोग और शोक इस परिश्रमी और स्वावलम्बी राज्य में कभी प्रवेश नहीं पा सके।

घटनायें न हों तो इतिहास का निर्माण कैसे हो? इतिहास न हो तो पीढ़ियाँ प्रेरणायें कहाँ से ग्रहण करें। एक दिन सम्राट के जीवन में भी अग्नि-परीक्षा का दिन आ ही गया।

प्रजा की स्थिति जानने के लिए नृपति प्रतिवर्ष राजकीय समारोह किया करते थे। अब तक उसमें पुरुष ही सम्मिलित हुआ करते थे। राजनयिज्ञों के माध्यम से राज्य की विदुषी महिलाओं ने अपना सन्देश भेजकर पूछा- “क्या स्त्रियों को परिस्थितियाँ अवगत कराने और सार्वजनिक समस्याओं में भाग लेने का अधिकार नहीं है? यदि है तो राज्य की आधी प्रजा को उनके अधिकार से वंचित रखना कहाँ का न्याय है?”

बात उचित थी, मानी गई। सत्य बात स्वीकार करने में सम्राट ने अभी तक कभी भूल न की, इसीलिये एक भी नागरिक उनका विरोध नहीं कर सकता था। निश्चय हुआ कि सम्मेलन में महिलायें भी भाग लेंगी। उनके स्वतन्त्र शिविर होंगे, जिनका संचालन स्वयं साम्राज्ञी करेंगी। इस समाचार से स्त्रियों को बड़ी प्रसन्नता हुई। सम्मेलन में भाग लेने के लिए वह भी तैयारी में जुट गई।

अन्तःपुर में स्त्रियों का निजी सम्मेलन हुआ, उसमें परस्पर हितों की चर्चा भी हुई, किन्तु स्वभाववश स्त्रियाँ अपनी मानसिक दुर्बलता भी व्यक्त किये बिना न रह सकीं। साम्राज्ञी को अत्यन्त सादे वस्त्र और आभूषण विहीन देखकर उन्हें आश्चर्य हुआ। उन्होंने महारानी को उसके लिए कुछ ऐसा व्यंग्य भाव भी दर्शाया जिसे सहन कर सकना उनके लिए सम्भव न हुआ। स्त्रियों ने कहा- “हम सब आभूषण पहनें और राज-माता की वेशभूषा एक ग्रामीण की तरह हो, यह राज्य के लिए अपशकुन जैसा है। स्त्रियों का शिविर इसी चर्चा के साथ समाप्त हुआ।

अपशकुन अब तक न था, अब हो गया। दुर्बलता का छोटा सा छिद्र भी मनुष्य के पतन के लिए काफी है। वह दुर्बलता महारानी के मन में प्रवेश कर गई। उस दिन अवकाश पाकर उन्होंने सम्राट चक्ववेण से महिलाओं द्वारा समर्पित सारी बात कह सुनाई। राजा ने बहुतेरा समझाया पर महारानी के मन में आभूषणों की लिप्सा ने ऐसा तीव्र प्रभाव डाला था कि वे अपने हठ से एक इंच भी मुड़ने के लिए तैयार न हुई।

ऐसी दुर्बलतायें मनुष्य जीवन में स्वाभाविक हैं पर सामान्य मनुष्य उन्हें बहुत बढ़ा-चढ़ाकर देखने लगते हैं, इसलिए एक ही दुर्बलता से अनेक बुराइयों के द्वार खुलते चले जाते हैं, नृप चक्ववेण इस बात को समझते थे। इसलिये उन्होंने कोई बात शीघ्रता में नहीं की। ऐसे समय मनुष्य की अपनी स्वार्थ वृति या कामुकता आदर्शवादियों को भी पथ-भ्रष्ट कर देती है, इसीलिए चक्ववेण ने आज तक कोई भी कार्य सकाम दृष्टि से नहीं किया था। निष्काम कर्मयोग का पालन करने में इसी से ईश्वर-प्राप्ति सुदृढ़ होती है, क्योंकि निष्काम कर्म करने से सेवा, संयम और सदाचार की जड़ें गहरी होती चली जाती हैं। भूपति चक्ववेण अपनी आजीविका की दृष्टि से जहाँ प्रजा से निष्काम थे, वहाँ अपनी पत्नी के लिए भी उनकी निष्कामता में कोई अन्तर नहीं आया था।

उन्होंने समझाया- “प्रजा से और कर लेकर अपने स्वार्थ में नहीं लगाया जा सकता और अपनी कमाई इतनी नहीं है, जो आभूषण बनवाये जा सकें, इसलिये यदि अपनी बात पर पुनर्विचार कर सकें तो अच्छा है। इन बातों का भी रानी पर कोई प्रभाव न हुआ।

चक्ववेण ने सचिव को बुलाया और कहा- “लंकाधिपति रावण मेरे मित्र हैं, तुम उनके पास जाओ और महारानी के लिए आभूषण बन सकें, उतना स्वर्ण उनके पास से ले आओ।” सचिव आज्ञा शिरोधार्य कर लंका के लिए चल पड़ा। रावण से उसने सब समाचार कह सुनाये। आज तक चक्ववेण ने रावण को कभी सिर नहीं झुकाया था। अहंकारी रावण के लिए यह स्वर्ण अवसर था। उसने सचिव से कहा- “निःसन्देह हम तुम्हारे राजा के लिए अपने राज्यकोष के द्वार खोल देंगे, किन्तु अभी नहीं, तुम जाओ और सम्राट से कहना, वे स्वयं आयें और मुझ से याचना करें, जितनी स्वर्ण-राशि की आवश्यकता होगी, हम सहर्ष प्रदान करेंगे।”

सचिव को महारानी की आकस्मिक लोभ-वृत्ति पर जितना दुख नहीं हुआ था, उतना दुख उसे अपने सम्राट के प्रति इन दम्भपूर्ण वाक्यों को सुनकर हुआ पर उसे मालूम था, महाराज को स्वयं किसी फल की इच्छा नहीं है, वे महारानी को भी अपनी प्रजा मानकर उनके हित का संरक्षण करना चाहेंगे, इसलिए कहीं ऐसा न हो- याचना के लिए वे स्वयं चल पड़ें। स्वाभिमानी राज्य का नागरिक होकर मैं यह कैसे सहन कर सकता हूँ।

सचिव समुद्र तट पर आये, उन्होंने समुद्र की मिट्टी से एक कृत्रिम किन्तु कलाकारितापूर्ण लंका बनाई। फिर लौटकर लंका गये और रावण को वहाँ लाकर दिखाया लो यह रही तुम्हारी लंका- अभी चाहूँ तो इसे समुद्र में डुबा दूँ, देख लो यह लंका तुम्हारी ही है न।

रावण ने ध्यान से देखा। था तो घरौंदा पर बिलकुल लंका जैसा। सचिव की कला की प्रशंसा करते हुये रावण एक बार फिर हँसा और बोला- “सचिव! इस लंका के डुबो देने से हमारा क्या बिगड़ेगा?”

“सर्वत्र नष्ट हो जायेगा।” सचिव ने स्वाभिमानपूर्वक कहा- “क्या तुम इतना भी नहीं समझ पाये कि चक्ववेण का प्रत्येक नागरिक परिश्रम और अधिकार की कमाई खाता है, इसलिए उन सब की बौद्धिक और आत्मिक प्रतिभायें बहुत तीक्ष्ण हैं, यह लंकाकृति उसी का प्रमाण है। तुम नहीं समझते पर मैंने एक दृष्टि में जहाँ तुम्हारे वैभव का मूल्याँकन कर लिया है, वहाँ तुम्हारी प्रत्येक दुर्बलता का भी। तुम्हें यही दिखाने लाया था, यदि तुमने चक्ववेण को नीचा दिखाना चाहा तो हम राज्य के नागरिक तुम्हें एक दिन में नष्ट कर देंगे।

सचिव की बात सुनकर रावण सारी स्थिति समझ गया। जिस राज्य की प्रजा इतनी वीर हो वहाँ के सम्राट से मित्रता के बँधन में बँधे ही रहना चाहिए, यह सोचकर रावण ने स्वर्ण-राशि सहर्ष प्रदान कर दी।

किन्तु सचिव जब तक राजधानी पहुँचे, महारानी अपनी भूल स्वीकार कर चुकी थीं। उन्होंने वह स्वर्ण पुनः रावण के पास वापिस भिजवा दिया और इस तरह अपनी प्रजा को लोभ-लालच के त्रुटिपूर्ण प्रोत्साहन से बचा लिया।

अपनों से अपनी बात-


अगला विदाई वर्ष और हमारा पवित्र कर्त्तव्य

पं. लीलापति शर्मा

परम पूज्य गुरुदेव वर्ष जून में अपनी उग्र तपश्चर्या के लिए सदा के लिए हिमालय पर जा रहे हैं। उनके असीम उपकार हम लोगों के ऊपर हैं। भविष्य में तो वे और भी अनेक गुने अनुदान अपने प्रिय परिजनों को देने के लिए अधिक प्रयत्न करने वाले हैं।

इस युग की इस दिव्य आत्मा के संपर्क सान्निध्य में इतनी लम्बी अवधि तक रहे यह हमारा परम सौभाग्य ही है। पर साथ ही उनके स्वरूप और मिशन को ठीक तरह समझ न सकने के कारण उनके स्नेह, प्रकाश एवं मार्गदर्शन का लाभ लेने से कतराते रहे, यह दुर्भाग्य भी कम नहीं है। यही समय है जबकि हम गुरुदेव के प्रति अपनी सच्ची निष्ठा प्रकट करने और उनका अनुगमन करने के लिए कुछ ठोस प्रयत्न करें।

निश्चय किया गया है कि हम गायत्री परिवार, अखण्ड-ज्योति और युग-निर्माण शाखाओं के सदस्यगण सन् 70 से लेकर एक वर्ष तक विदाई वर्ष मनायेंगे। गुरुदेव के इस जन्म का एक मात्र उद्देश्य जन-मानस में परिवर्तन करने के लिए ‘ज्ञान-यज्ञ’ अभियान को ज्योतिर्मय एवं गतिशील बनाना है। हम अगले वर्ष को ‘ज्ञान-यज्ञ’ वर्ष भी कह सकते हैं।

पूज्य आचार्य जी 3 जून 71 को गायत्री जयन्ती मथुरा में मनाकर उसके दो-चार दिन बाद ही सदा के लिए अपनी साधना के लिए चले जायेंगे। अस्तु मई सन् 70 से लेकर मई 71 तक का एक वर्ष-विदाई वर्ष के रूप में मनाया जाय। इसी अवधि में आचार्य जी के शरीर का साठवाँ वर्ष पूरा होता है। 60 और 75 वें वर्ष में “हीरक जयन्ती” मनाये जाने की प्रथा है। इस वर्ष को ‘गुरुदेव का हीरक जयन्ती वर्ष’ भी कह सकते हैं। इसे ‘ज्ञान-यज्ञ वर्ष’ भी कह सकते हैं। क्योंकि आचार्य जी के इस जन्म का एकमात्र प्रयोजन नव-निर्माण के आधार बिन्दु ‘ज्ञान-यज्ञ’ को प्रभावी बनाना ही तो है। उनकी रुचि, इच्छा, आकाँक्षा, अभिलाषा, चेष्टा, क्रिया, साधना, तपस्या सब कुछ इसी केन्द्र बिन्दु के इर्द-गिर्द घूमी है। परिजनों को इस अभियान में सम्मिलित होने की आशा अनिवार्य स्तर पर रखी गई है। यों युग-निर्माण के शत सूत्री कार्यक्रम भी उन्होंने प्रस्तुत किये हैं और अपनी रुचि, सुविधा एवं योग्यता के अनुरूप उन्हें भी कार्यान्वित करने की प्रेरणा दी है। पर प्रथम और अनिवार्य प्रक्रिया के रूप में उन्होंने ज्ञान-यज्ञ की सदस्यता को ही आगे रखा है। नाम जो भी हो हम लोगों के लिए यह इतना आवश्यक है कि आचार्य जी के प्रति अपने संपर्क की सार्थकता सिद्ध करने के लिए इस वर्ष को कुछ निर्दिष्ट कार्यक्रमों के साथ मनाने के लिए आलस्य और प्रमाद छोड़कर तत्परतापूर्वक कदम बढ़ायें।

कार्यक्रम क्या हों, इस सम्बन्ध में गम्भीर विचार विनिमय के पश्चात् एक दस-सूत्री योजना बनाई गई है और आशा की गई है अपना समस्त परिवार इसे पूरा करने के लिए एकबारगी उठ खड़ा होगा और हममें से कोई भी ऐसा न रहेगा जिसके ऊपर इस अवसर पर भी उपेक्षा करने का आरोप लगाया जाय।

दस-सूत्री कार्यक्रम इस प्रकार हैं-

(1) पूज्य आचार्य जी की भावी साधना की सफलता के लिए हममें से प्रत्येक एक माला गायत्री मन्त्र की अतिरिक्त जप प्रारम्भ करें और उसे एक वर्ष तक चालू रखें। गायत्री जयन्ती और बसन्त पन्चमी को दो सामूहिक यज्ञ भी छोटे या बड़े जैसे भी बन पड़ें कर लें।

(2) एक घण्टा समय और दस पैसा प्रतिदिन ज्ञान-यज्ञ के लिये निकालें उससे अपने घर में युग-निर्माण साहित्य का एक घरेलू ज्ञान मन्दिर पुस्तकालय स्थापित करें। इस वर्ष हर महीने एक दिन की आमदनी बचावें और उस पैसे से अब तक का सारा युग-निर्माण साहित्य खरीद कर अपना घरेलू पुस्तकालय पूर्ण कर लें।

(3) नव-निर्माण साहित्य के स्वाध्याय के लिये कुछ नियमित समय नित्य निकालें और एक घण्टा समय जो ज्ञान-यज्ञ के लिए देना है, उसे इस प्रेरक साहित्य के अपने परिवार के सदस्यों और परिचित लोगों को पढ़ाने या सुनाने के लिए लगाने का नियम बनावें।

(4) अपने क्षेत्र में नियमित रूप से युग-निर्माण साहित्य पढ़ाने और बेचने के लिए एक चल पुस्तकालय-बिक्री गाड़ी-का प्रबन्ध करें।

(5) अपने क्षेत्र में एक पाँच कुण्डी छोटे या बड़े गायत्री यज्ञ और युग-निर्माण सम्मेलन का सामूहिक आयोजन करें और उसके माध्यम से उपस्थित लोगों को भावनात्मक नव-निर्माण की विधि व्यवस्था से परिचित करायें।

(6) इस वर्ष 15 मई 70 से 15 अक्टूबर तक चार-चार दिने के लगातार परामर्श शिविर गायत्री तपोभूमि में चलेंगे। इनमें से किसी में सभी परिजनों को सम्मिलित होने की तैयारी अभी से करनी चाहिये।

(7) संगठन, प्रचार, प्रवचन, यज्ञ व्यवस्था आदि ज्ञान-यज्ञ से सम्बन्धित कार्यों के लिए जो अपने को योग्य उपयुक्त समझते हों, वे अपने अवकाश का समय संस्था को दे दें और अपने पूरे परिचय सहित उसकी सूचना भेजें ताकि उस समय का उपयोग करने की व्यवस्था पहले से ही की जा सके।

(8) हिन्दी के अतिरिक्त गुजराती, मराठी, अँग्रेजी, उर्दू, तमिल, बांग्ला आदि अन्य भाषाओं में अखण्ड-ज्योति और युग-निर्माण पत्रिकाओं का साराँश लेकर मासिक पत्रिकायें निकाली जानी हैं और ट्रैक्ट साहित्य प्रकाशित किया जाना है। अन्य भाषा-भाषी अपनी भाषाओं में यह अनुवाद प्रकाशित कराने और फैलाने में योगदान करें।

(9) अखण्ड-ज्योति और युग-निर्माण पत्रिकाओं के लिए नये सदस्य बनाने के लिए अपने क्षेत्र में टोली बना कर भ्रमण करें।

(10) आचार्य जी के संपर्क में आने पर जिसने जो पाया है, उसका विवरण भेजें ताकि ऐसे संस्मरणों का एक विशाल ग्रन्थ प्रकाशित किया जा सके।

उपरोक्त दस कार्यक्रमों का स्वरूप, स्पष्टीकरण इस प्रकार है।

(1) हम 50 लाख व्यक्तियों में से 24 लाख भी प्रतिदिन एक-एक गायत्री महामन्त्र का जप पू. आचार्य जी द्वारा अगले वर्ष आरम्भ की जाने वाली इस युग की उग्रतम तपश्चर्या को सफल बनाने के लिये आरम्भ करें तो हर दिन 24 करोड़ गायत्री जप होता रह सकता है। इससे अन्तरिक्ष की शुद्धि भी होगी और उस तपश्चर्या में आने वाले विघ्नों का भी शमन होगा। इस जप पुरश्चरण में सम्मिलित होने वाले सामूहिक रूप से वर्ष में दो बार गायत्री जयन्ती और बसन्त-पंचमी को 100 आहुतियाँ भी दे लें तो अगले वर्ष 24-24 करोड़ आहुतियों के ही गायत्री महायज्ञ हो सकते हैं। अपना परिवार इस अमृत पूर्ण एक वर्ष साधना क्रम को ठीक तरह चला ले तो उसका सूक्ष्म जगत की परिशुद्धि पर भारी प्रभाव पड़ेगा।

(2) बच्चों के पैसा जमा करने की गुल्लकों की तरह ‘ज्ञान-यज्ञ’ के धर्म घट टीन के बने बहुत सुन्दर छोटे-छोटे बक्स बनाये गये हैं। इन्हें अपने पूजा के स्थान पर स्थापित करें और प्रतिदिन दस पैसा उसमें डालें। कभी नागा हो जाय तो अगले दिनों उसकी पूर्ति कर लें। धर्म घटों की स्थापना में भूल होने की आशंका न रहेगी और यह क्रम निरन्तर चलता रहेगा।

यह बचत 3 रु. मासिक की हुई। इससे अखण्ड-ज्योति और युग-निर्माण पत्रिका का चन्दा 12 रु. वर्ष (एक रुपया मासिक) गया। शेष 2 रु. मासिक से विज्ञप्ति वितरण किया जाय और नये प्रकाशित होते रहने वाले ट्रैक्ट साहित्य को मँगाया जाता रहे। इस प्रकार घरेलू ज्ञान मन्दिर पुस्तकालय की नियमित व्यवस्था इस धर्म घट के माध्यम से दस पैसा रोज निकालने से चलती रहेगी। धर्म घट लगभग 1 रु. के हैं। इन्हें मँगाकर अपने और अन्य परिजनों के घरों में स्थापित करने की व्यवस्था तुरन्त की जाय।

अब तक 200 निबन्ध-ट्रैक्ट 62 जीवन चरित्र, 12 पुस्तकें कविता, 10 कहानियाँ छोटी पुस्तिकाओं के रूप में छपी हैं। 1) सीरीज की 45 पुस्तकें, धर्म-मंच वाली पुस्तकें यह सभी साहित्य अपने घरेलू पुस्तकालय में होना चाहिये। अब तक जो पुस्तकें न आई हों, उन्हें अब मँगा लिया जाय। इसके लिये एक वर्ष तक महीने की आमदनी व्यय करने का संकल्प लेना चाहिये।

अच्छा यह है कि जो साहित्य कम पड़ रहा है उसे इकट्ठा ही रेल-पार्सल से मँगा लिया जाय। उसमें पैसा इकट्ठा लगा दिया जाय और उसकी पूर्ति हर महीने वाली बचत राशि में से कर ली जाय। जिनके पास इकट्ठा प्रबन्ध न हो, वे किसी मित्र से उधार लेकर यह व्यवस्था आरम्भ में ही कर लें और इनका उधार हर महीने की बचत में से चुकाते रहें। पुस्तकालय शीघ्र ही पूरा कर लेने के लिए आरम्भ में ही इकट्ठा साहित्य मँगा लेना उत्तम है। यों दो-दो महीने की बचत इकट्ठी करके धीर-धीरे भी पूरा साहित्य मँगाया जा सकता है। पर अच्छा यही है कि एक बार आरम्भ में ही सब मँगाकर पुस्तकालय पूरा कर लिया जाय।

(3) घर पर रहकर, यात्रा में या काम-धन्धे के बीच फुरसत के समय में नित्य एक घण्टा युग-निर्माण साहित्य का स्वाध्याय करना चाहिये। इससे आत्म-निर्माण होगा। घर के हर वयस्क सदस्य को यह साहित्य पढ़ाने या सुनने का क्रम चलाया जाय। इसके लिये रात्रि को एक परिवार-गोष्ठी चलाई जाय जिसमें घर के लोगों को इकट्ठा करके एक व्यक्ति उन्हें सुनाया करे। पढ़े सदस्य स्वयं पढ़ा करें। यह व्यवस्था परिवार-निर्माण के लिये आवश्यक है। पड़ोस, रिश्तेदार, साथी, सम्बन्धी और परिचितों को इस साहित्य का महात्म्य, महत्व बताकर पहले रुचि जगाई जाय, फिर उनकी रुचि के अनुरूप पुस्तकें दी जायें और वापिस ली जायें। यह कार्य आरम्भ में विज्ञप्तियों से चलाया जाय, जो जिस विषय को पसन्द करें, उन्हें उस विषय की पुस्तकें दी जायें। यह झोला पुस्तकालय क्रम समाज-निर्माण के लिये अति आवश्यक है।

इस प्रयोजन के लिये प्लास्टिक के बने, बहुत ही सुन्दर और सुविधाजनक ‘हैंड-बैग’ बनाये गये हैं, जिन पर ऊपर ‘युग-निर्माण योजना, मथुरा’ और नीचे विचार क्राँति अभियान तथा बीच में हाथ समेत मशाल वाला चित्र छपा है। यह बैग 7 रु. रुपये में गायत्री तपोभूमि से मिल सकते हैं।

(4) चल पुस्तकालयों के लिये ठोस रबड़ चढ़ी बाल वियरिंग वाली बहुत हलकी चलने वाली बड़ी आकर्षक गाड़ियाँ बनाई गई हैं। इनमें सारा साहित्य रखे जाने के लिये और आवश्यक सामान रखने के लिये पर्याप्त स्थान है। तीन ओर प्रचार-बोर्ड लगे हैं। इन गाड़ियों का सूक्ष्म 300 रु. है। 700 रु. का साहित्य लेकर 1000 रु. रुपये में यह एक पूरी संस्था या दुकान बन जाती है।

घर-घर, गली-मुहल्ला में ले जाकर विज्ञप्तियों और पुस्तकें पढ़ाने के लिये यह साधन बहुत ही उपयुक्त है। जिन्हें यह साहित्य पसन्द आये, वे खरीदते भी रहें। इसके लिए विद्यालयों, मन्दिरों, घाटों, दफ्तरों, फैक्ट्रियों, पार्कों में यह गाड़ी ले जाई जा सकती है और कुशल प्रचारक इस आकर्षक एवं उपयोगी साहित्य को बड़ी तादाद में बेचते रह सकते हैं। जहाँ कुशल व्यक्ति वैतनिक रूप से उस गाड़ी को चलाने के लिये मिल जायें वहाँ कमीशन में उसका खर्च चल सकता है। जहाँ अवैतनिक सेवा-भाव से हो सकता हो, वहाँ फुरसत का समय मिल-जुलकर निकालते हुए यह क्रम चलाया जा सकता है। घर-घर, जन-जन तक यह चल पुस्तकालय नितान्त आवश्यक है।

1000 रु. की पूँजी जुटाना कुछ बहुत कठिन काम नहीं है। चूँकि इसमें पैसा सामने है और सुरक्षित है, डूबने का भी कोई खतरा नहीं। इसलिये कोई एक खाता-पिता व्यक्ति या कई मिलकर यह पूँजी उधार के रूप में दे सकते हैं। कोई दानी भी इस ज्ञान-मन्दिर के लिये उदारता-प्रदर्शित कर सच्चा देवालय बनाने का पुण्य लाभ कर सकते हैं। शेयरों से भी यह पैसा जुटाया जा सकता है। सार्वजनिक चन्दा करना हो तो वह भी उचित है।

(5) पाँच कुण्डी गायत्री यज्ञ के लिये धार्मिक जनता आसानी से दान दे सकती है और मितव्ययितापूर्वक हवन करके उसी के साथ ज्ञान-यज्ञ का चिर स्मारक- ‘चल पुस्तकालय’ भी पूरा किया जा सकता है। बड़ी पूँजी से इतना प्रभावशाली माध्यम और कोई हो नहीं सकता। इसलिये नगर एवं क्षेत्र में इन गाड़ियों के लिये पैसे की, कार्यकर्त्ताओं की व्यवस्था की जाय।

इन यज्ञ आयोजनों के साथ युग-निर्माण सम्मेलन भी रखे जायें और समीपवर्ती प्रभावशाली, प्रगतिशील विचारों के वक्ताओं को पहले से ही प्रवचन का विषय बताकर उसके लिये उन्हें तैयार किया जाय, इसके लिये अपने साहित्य में से ही कुछ पुस्तकें उन्हें तैयारी के लिये पहले से ही दी जा सकती हैं। ऊटपटाँग अव्यवस्थित दिमाग के लोगों को इसलिए अपने मंच पर स्थान न मिलना चाहिए कि वे तथाकथित धार्मिक व्यक्ति हैं। प्रतिक्रियावादी नहीं, प्रगतिशाली विचार ही अभीष्ट हैं। इसलिये वक्ताओं को पहले से ही तैयार करना चाहिये तभी यज्ञों के साथ जुड़े हुए युग-निर्माण सम्मेलन सफल होंगे।

विचार है कि जिस प्रकार 1000 कुण्डी यज्ञ सन् 59 वाले व 1 वर्ष के आचार्य जी के अज्ञातवास के प्रारम्भ में किया गया था, उसी प्रकार के पाँच-पाँच कुण्ड वाले 250 गायत्री यज्ञ विभिन्न शाखाओं में इस वर्ष हो जायें तो खण्ड क्रम से 250 5 1250 सवा हजार कुण्डों का 25 लाख आहुतियों का एक पहले जैसा ही महायज्ञ सम्पन्न हो जाय। पहले एक ही जगह यज्ञ था तो 24 लाख आहुतियाँ दी गईं अब की बार खण्ड क्रम होने से 1 लाख आहुतियाँ और बढ़ा दी जायें। इस महापुरश्चरण से सूक्ष्म जगत् में नवनिर्माण के उपयुक्त परिस्थितियाँ उत्पन्न करने में बड़ी सहायता मिलेगी।

इन यज्ञों में बुद्धिमतापूर्वक योजना बद्ध रूप से कुछ बचत का उपरोक्त क्रम बनाया जाय तो 250 ज्ञान यज्ञ चल पुस्तकालय भी इसी योजना के अंतर्गत चल सकते हैं।

(6) पू. आचार्य जी जून ‘71 में गायत्री जयन्ती मनाकर अपना प्रयाण करने जा रहे हैं। सम्भवतः स्नेही-स्वजन उस समय उन्हें अन्तिम विदाई देने आयें। पर इससे सभी कोमल हृदयों पर-आचार्य जी के ममता भरे अन्तःकरण पर भी आघात लगेगा। उस भावनात्मक वातावरण में-बड़ी भीड़ के बीच कुछ काम की बात और परामर्श करना सम्भव न होगा। इसलिये उस समय कुछ उत्सव-आयोजन करने का विचार नहीं है।

किन्तु उत्तम विचार-विनिमय और परामर्श की आवश्यकता तो है ही। इसलिये 15 मई 70 से 15 अक्टूबर ‘70 तक लगातार चार-चार दिन के शिविर रखे गये हैं और सभी सम्बद्ध परिजनों को उनकी अपनी सुविधा वाले शिविर में सम्मिलित होने और उसकी पूर्व स्वीकृति प्राप्त करने का अनुरोध किया गया है। यह शिविर इस दृष्टि से अत्यन्त महत्वपूर्ण हैं कि आचार्य जी को किसके लिये क्या कहना है और स्वयं अपनी गतिविधियों का क्या निर्धारण करना है। इसकी एक दीर्घकालीन व्यवस्था बना ली जाय। इन शिविरों में प्रातःकाल एक प्रवचन हुआ करेगा। शेष समय में विचार-विनिमय का ही क्रम चलता रहेगा और हर परिजन उनसे अपने भावी जीवन की एक स्पष्ट रूप-रेखा लेकर जा सकेगा। इन शिविरों में 100-100 से अधिक आगन्तुकों को स्वीकृति न मिलेगी। क्योंकि अधिक एक साथ आ जाने पर व्यक्तिगत विचार-विनिमय विस्तृत रूप से नहीं हो सकता। इन शिविरों में सभी भावनाशील परिजनों को आने के लिये आमन्त्रित किया गया है। हर शाखा के लोग टोलियाँ बनाकर आवें। तीर्थयात्रा के लिये, अनुष्ठान के लिये, अधिक दिन रहने के लिये, अधिक बच्चे-कच्चे सहित इन शिविरों में आना निषिद्ध है।

(7) इस वर्ष सभी नये, सभी जीवित एवं सक्रिय आचार्य अपने यहाँ पाँच-पाँच कुण्डी गायत्री यज्ञ एवं युग-निर्माण सम्मेलन के आयोजन करेंगे। कम-से-कम 250 तो निश्चित ही हैं। इन आयोजनों में गायत्री तपोभूमि के प्रतिनिधि भी भेजे जाने आवश्यक हैं। इस प्रयोजन की पूर्ति के लिये ऐसे प्रबुद्ध व्यक्तियों की आवश्यकता पड़ेगी, जो पू. आचार्य जी का प्रतिनिधित्व वहाँ जाकर कर सकें। इस स्तर के लोगों को इस अवधि में जितना अधिक अवकाश सम्भव हो, उतना लेकर उपरोक्त प्रयोजन के लिये अपना समय देना चाहिये। कितने ही व्यक्ति रिटायर होने के बाद सारा समय आचार्य जी की प्रेरणानुसार लगाने की बात सोचते रहते हैं। मालूम नहीं वह अवसर कभी आये या नहीं पर इस वर्ष एक अनुपम अवसर है। यह सोच लिया जाय कि इस वर्ष हम कुछ महीनों के लिए बीमार पड़ गये हैं और अपने काम-व्यवसाय को दूसरे साथियों के सहारे चलाना पड़ रहा है तो किसी को भी छुट्टी मिल सकती है। नौकरी, कृषि, व्यवसाय कुछ भी करने वाला इस दृष्टिकोण को सामने रखे तो अवकाश मिल ही सकता है। कम-से-कम दो महीने और अधिक-से-अधिक छः महीने या पूरे वर्ष के लिये अवकाश लेकर मथुरा आने वाले इस एक वर्षीय विशेष योजना को सफल बनाने के लिए बहुत काम कर सकते हैं। जिन्हें ऐसी तत्परता हो वे अपनी योग्यता और अनुभव का पूरा विवरण लिखते हुए मथुरा सूचना भेजें ताकि उनके समय का उपयोग किया जा सके।

चूँकि अगले वर्ष पू. आचार्य जी का कार्यक्रम व्यस्त है। मई से अक्टूबर तक उन्हें चार-चार दिवसीय शिविर चलाने हैं। इसके बाद नवम्बर से अप्रैल तक उन्हें अधिकाँश समय हरिद्वार-ऋषिकेश के बीच सप्तर्षियों की तपोभूमि-गंगा तट पर माता भगवती देवी के निवास के लिये जो आश्रम बन रहा है, उसका निर्माण-कार्य कराना है। माता जी को सुनसान जंगल में रहने का अभ्यास भी कराना है। इसलिये वे दोनों अधिकतर उस अवधि में वहीं रहेंगे। बीच-बीच में मथुरा की व्यवस्था देखने के लिये आते-जाते तो रहेंगे पर इन यज्ञ आयोजनों में उनका जा सकना सम्भव न होगा। आयोजनकर्ता स्वभावतः मथुरा से किसी को बुलाने का आग्रह करेंगे। इसकी पूर्ति के लिये प्रतिनिधियों को भेजे जाने की आवश्यकता पड़ेगी। इसी प्रयोजन के लिये प्रतिभाशाली व्यक्तियों की आवश्यकता अनुभव की गई है। यह समय अवैतनिक रूप में ही देना है।

(8) युग-निर्माण योजना एवं ज्ञान-यज्ञ का सारा मिशन अभी तक हिन्दी भाषी लोगों तक ही सीमित रहा है। यह एक सीमित क्षेत्र है। समय आ गया है कि अब उनका मिशन देशव्यापी बने। इसके लिए अन्य भाषाओं का भी सहारा लेना अनिवार्य है। अपनी दोनों पत्रिकाओं में आचार्य जी जो कुछ लिखते हैं उसका साराँश लेकर निकलने वाली एक पत्रिका हर भाषा में होनी चाहिये और सारा साहित्य उन भाषाओं में अनुवादित, प्रकाशित होना चाहिये।

इस वर्ष गुजराती, अँग्रेजी और मराठी में यह कार्य आरम्भ करने का निश्चय किया गया है। अस्तु इन भाषाओं से सम्बन्ध रखने वाले परिजनों के कन्धों पर विशेष जिम्मेदारी आई है। उन्हें अपनी भाषा की पत्रिका के कितनी संख्या में ग्राहक बना देंगे, यह पेशगी वचन देना चाहिए। इन वचनों की संख्या देखकर निकालने का साहस किया जायेगा। फिलहाल इस भाषा से सम्बन्धित स्वजनों के उत्साह के साथ परिश्रम करने और ग्राहक बनाने का उत्तरदायित्व अपने-अपने कन्धों पर उठायें। पत्रिकाओं का चलना ग्राहक संख्या पर ही निर्भर है। इसलिये जिन्हें अपनी भाषा-क्षेत्र में इस मिशन का प्रकाश पहुँचाने की आवश्यकता अनुभव होती हो उन्हें उसके लिए कुछ सहयोग करने के लिए भी तैयार होना ही चाहिये।

अन्य भाषाओं में अच्छी योग्यता रखने वाले अनुवाद कार्य में भी सहयोग दे सकते हैं हर महीने एक दिन की आमदनी अन्य भाषाओं वाले इसी प्रयोजन के लिए भेजते रह सकते हैं। इससे आर्थिक साधन जुटेंगे और उपरोक्त महान् कार्य के लिए व्यवस्था बनेगी। उदार और सम्पन्न लोग कुछ आर्थिक सहायता इस प्रयोजन के लिए दे सकते हैं।

बड़े गायत्री यज्ञों की बचत निश्चित रूप से इसी कार्य के लिए भेजी जानी चाहिए। कई शाखायें यज्ञ-बचत का पैसा अपने धर्मशाला, मन्दिर आदि स्थानीय कार्यों के लिए रोक लेती हैं। उन्हें अपनी स्थानीय शोभा की संकीर्णता से ऊँचा उठकर यह देखना चाहिए कि पहले जड़ को पानी दिया जाना चाहिये, पत्ते पीछे भी सींचे जा सकते हैं। जड़ सूख रही हो, प्यासी हो तब अपने पत्ते पल्लव मात्र की बात सोचना कहाँ तक उचित है, इसे कोई भी विवेकशील सोच सकता है। जहाँ पिछले यज्ञों की बचत जमा है, उनको विशेष ध्यान देना चाहिए और वह पैसा गायत्री तपोभूमि भेज देना चाहिए। अगले एक वर्ष में तो बिलकुल यही किया जाय, स्थानीय निर्माण की बात सोचना अगले वर्षों के लिये स्थगित कर दिया जाये। शाखाएं यह उदारता बरतें तभी अपना मिशन विश्व-व्यापी बन सकेगा और उसकी जड़ें मजबूत होंगी।

(9) इस वर्ष प्रभावशील सदस्यगण टोलियाँ बना कर अपने क्षेत्र के विचारशील लोगों से संपर्क बनाने के लिए निकलने की योजना बनायें और पहले अपनी दोनों पत्रिकाएं उन्हें नमूने के लिए दिखायें-पढ़ायें। पीछे उनकी उपयोगिता समझाकर ग्राहक बनने के लिए जोर दें। यह प्रयत्न हर जगह किए जाने लगें तो अपने मिशन को व्यापक बनाने वाली प्रधान शक्ति - पत्रिकाओं का सेवा क्षेत्र अनेक गुना हो सकता है और युग-निर्माण का प्रकाश अब की अपेक्षा बहुत व्यापक बन सकता है। यह कार्य देखने में नगण्य-सा है पर इसकी उपयोगिता और प्रतिक्रिया इतनी बड़ी है कि देखते-देखते मिशन की गति-विधियाँ अनेक गुनी हो सकती हैं और असंख्य नये व्यक्ति प्रभावित हो सकते हैं। इसलिए इस दिशा में सर्वत्र तत्परता बरती जाय और हर सदस्य सदा इसके लिए प्रयत्नशील रहे। इस वर्ष यह प्रयोजन पूरी शक्ति के साथ पूरा किया जाय।

(10) पू. आचार्य जी के संपर्क में आकर हर व्यक्ति ने कुछ न कुछ आध्यात्मिक भौतिक लाभ प्राप्त किये हैं पारस को छूने वाले लोहे का काया-कल्प होने की तरह उनके संपर्क का प्रतिफल हर किसी को मिला है। किसी को दोष-दुर्गुणों से मुक्ति मिली है। किसी ने उत्कृष्टता की दिशा में ऐसी प्रगति की है, जिसे जीवन का कायाकल्प ही कहना चाहिए। आर्थिक तंगी से निवृत्ति, कठिन रोगों से छुटकारा, विद्या-बुद्धि में आश्चर्यजनक प्रगति, अवरुद्ध प्रगति पथ का खुलना, विपत्तियों से छुटकारा आक्रमणों और आघातों से बचाव, भयंकर दुर्घटना एवं प्राण संकट में भी बच जाना, सन्तान-हीनों को संतान प्राप्ति आदि लाभ अगणित लोगों को उन्होंने दिए हैं। पर साथ ही उन सबसे चर्चा करने का निर्देश भी कर दिया था, क्योंकि उन्हें अपनी प्रशंसा सुनना और इस प्रकार की चर्चा फैलाने देना अभीष्ट न था। वे लोगों के सामने धर्म प्रचारक और समाज सुधारक के रूप में ही रहना चाहते थे, इसलिए इस चर्चा को फैलाने न देने और उस पर प्रतिरोध लगाना उचित हो सकता था। पर अब वे हम लोगों के बीच से जा रहे हैं। इसलिये स्वभावतः वे प्रतिबन्ध भी समाप्त हो जाते हैं। सर्व साधारण को यह विदित होना लाभदायक ही है कि सच्ची आध्यात्मिकता और तपश्चर्या का मार्ग अपना कर, गायत्री उपासना का अवलम्बन लेकर कोई कितना समर्थ बन सकता है। इस चर्चा से लोगों का आकर्षण और झुकाव आध्यात्मिकता की दिशा में होगा। अतएव आचार्य जी के न रहने पर उनकी पीठ पीछे प्रतिबन्ध को समाप्त हुआ ही समझा जायेगा।

विचार यह है कि एक विशाल ग्रन्थ आचार्य जी के व्यक्तित्व की महानता के संस्मरणों का तथा उनके संपर्क में आने से प्राप्त होने वाले लाभ विवरणों का प्रकाशित किया जायेगा, पत्रिकाओं के विशेषाँक के रूप में भी प्रकाशित हो सकता है। अस्तु ऐसे भी लोगों से जिनने गुरुदेव के संपर्क में आकर भौतिक या आध्यात्मिक कुछ लाभ पाया हो, कुछ प्रकाश प्राप्त किया हो, या अपने में परिवर्तन उत्कर्ष अनुभव किया हो, उसका सारा विवरण विस्तारपूर्वक लिख भेजें। संपर्क से पूर्व की कठिनाई तथा बाद की प्रगति सुविधा दोनों ही पक्ष लिखे जाने से बात पूरी होती है। ऐसे विवरण अपने तथा उन सब लोगों से जिनके पास यह अनुरोध नहीं पहुँच सका है, एकत्रित करके शीघ्र ही भिजवाने चाहियें। अपने क्षेत्र के अनुभवों को इकट्ठा करने का काम उत्साही लोग आसानी से कर सकते हैं ऐसे अनुभव प्रेषकों के आधे शरीर वाले फोटो को भी भेजना चाहिये। जिससे विवरण सचित्र छपवाया जा सके।

इस ग्रन्थ की तैयारी एवं छपाई शीघ्र ही आरम्भ होने वाली है। एक वर्ष के भीतर इस बहुत बड़े काम को पूरा किया जाना है, इसलिये ऐसे अनुभव जितनी शीघ्र भेजे जा सकें, उतना ही अच्छा है। देर से आने वाले अनुभवों को सम्मिलित करने में कठिनाई पड़ेगी।

पीछे जिन दस कार्यक्रमों की चर्चा की गई है, उन्हें कार्यान्वित करने में शीघ्र ही हमें अपनी सारी शक्ति लगा देनी चाहिये। यह सन्देश अपने तक ही सीमित नहीं रहना चाहिये वरन् अपने संपर्क के सभी स्वजनों को इकट्ठा करके अथवा उनके पास घर-घर जाकर इसे पहुँचाना चाहिये। हममें से प्रत्येक भावनाशील और सजग सक्रिय व्यक्ति का कर्त्तव्य है कि अपने क्षेत्र में इस योजना की चर्चा जितनी शीघ्र जितनी तरफ पहुँचा-फैला सकते हों, उसमें तनिक भी कमी न रखें।

हमें विश्वास है कि प्रत्येक भावनाशील व्यक्ति- इस योजना को प्रसारित एवं कार्यान्वित करने के लिये अपनी स्थिति के अनुसार इस फिर कभी न आने वाले अवसर पर- अधिक से अधिक तत्परता एवं सक्रियता बरतने में कुछ उठा न रखेगा।


धन की सार्थकता

शीमक कठिन शीत ज्वर से पीड़ित है उनके पुत्र पात्रों ने उपचार की अच्छी व्यवस्था की है तो भी वे औषधि नाम मात्र को ही ले रही है। उनका कथन है कि औषधि का काम विष के प्रभाव को रोकना भर है, रोग को नष्ट करना नहीं, वह काम तो प्रकृति स्वयं ही करती है। तब हम उसमें हस्तक्षेप क्यों करें! पर उनके इस कथन का भी वही अर्थ लगाया गया जो अब तक लगाया जा रहा था। अर्थात् शीमक बड़ा कृपण है। घर में अथाह धनराशि होते हुये भी वह न तो अच्छा खा सकता है, न पहन सकता है, बाल-बच्चों को देना तो दूर, अब जब उसका अपना ही जीवन संकट में पड़ गया तब भी पैसे का इतना मोह-छिः शीमक की कृपणता- कलंक नहीं तो और क्या है।

बहुत बार तो शीमक को कई ऐसे व्यक्ति भी मिले थे जो उसे मुख पर ही कह गये थे-”शीमक इतनी कृपणता तो न किया करो, कभी कुछ दान, कभी कुछ पुण्य, तीर्थ यात्रा, ब्राह्मण भोज, नगर भोज कुछ तो ऐसा कर डालो, जिससे यह धन ठिकाने लग जाये! मर गये तब वह धन किसी और के हाथ लग गया तो तुम्हारी इस कमाई का क्या लाभ।”

शीमक हंस पड़ते और अच्छा! अच्छा!! कहकर उस प्रसंग को टाल देते। ऐसे अवसर आते तो दूर दृष्टि डालते हुये शीमक की मुख मुद्रा देखने से प्रतीत होता था मानो वे सुन्दर भविष्य में कुछ खोजना चाहते हैं, वे क्या चाहते हैं, यह आज तक उसके पुत्र परिजन भी नहीं समझ सके थे।

आज जितने चिन्तित शीमक बैठे थे, उससे अधिक विकल आचार्य महीधर दिखाई दे रहे थे। उन्होंने बड़े परिश्रम के साथ वेदों का भाष्य किया था। भाष्य भी ऐसा जो भी विद्वान उसे पढ़ता धन्य हो जाता। किन्तु धन के अभाव के कारण आज स्वयं महीधर इतने निराश हो गये थे कि उन्हें अपना सारा तप ही निरर्थक लगने लगा था। वे चाहते थे कि वेदों का यह भाष्य घर-घर पहुँचे ताकि बौद्धों के प्रभाव को रोका जा सके। उनकी आकांशा, आकांशा ही रही। कोई उपाय बन नहीं सका।

शीमक ने समाचार सुना तो चुपचाप घर से निकल पड़ा। कहा गया शीमक की कई दिन तक खोज की गयी। पर कुछ भी पता न चला! बहुत दिन बाद जब महीधर के वेदभाष्य घर-घर पहुँचने लगे तब लोगों ने इतना भर सुना कि कोई एक देव पुरुष उनके पास आया था और उसने अपनी सारी सम्पत्ति उन्हें देकर कहा था-आचार्य प्रवर! सद्इच्छाएं धन के अभाव में रुकती नहीं। यह मेरे जीवन भर की कमाई इसे काम में लेकर मेरा जीवन धन्य करें।

उसके बाद फिर उस महापुरुष के कभी दर्शन नहीं हुए। कहते हैं, वह वानप्रस्थ ग्रहण कर अंतिम साधना के लिये अन्तेवासी हो गया था।


युग-निर्माण अभियान का महान् सत्साहित्य

विचार क्रान्ति के अत्यन्त सस्ते 200 ट्रैक्ट

जन-जागृति, विचार-क्राँति एवं नव-निर्माण के लिए जनमानस में प्रेरणा, स्फूर्ति, उत्साह एवं साहस भर देने वाले यह ट्रैक्ट अपने भीतर बाहरी शक्ति छिपाये बैठे हैं। लागत से भी कम मूल्य में अत्यन्त सस्ते, सुन्दर, आकर्षक और प्रेरणाप्रद ट्रैक्ट छापे गये हैं, जिन्हें स्वयं पढ़ना और दूसरों को पढ़ाना या सुनाना जनमानस को सुसंस्कृत एवं परिष्कृत बनाने के लिए आवश्यक है। अब तक 200 ट्रैक्ट छप चुके हैं। प्रत्येक का मूल्य 25-25 पैसा है।

(1) विवाह के आदर्श और सिद्धान्त। (2) तीन दिन का सत्यानाशी विवाहोन्माद। (3) विवाह-शादियों के लिये बुद्धि क्यों बेच दी जाय? (4) विवाह- शादियों का असह्य अपव्यय। (5) इस हृदयद्रावक द्रादक स्थिति को कब तक सहा जायेगा? (6) यह कुरीतियाँ मिट रही हैं और मिटेंगी। (7) विवाहों का वातावरण धर्मानुष्ठान जैसा रहे। (8) आदर्श विवाहों की रूप रेखा। (9) आदर्श- विवाहों का प्रचलन कैसे हो? (10) प्रगतिशील जातीय संगठनों की आवश्यकता। (11) हम भाग्यवादी नहीं कर्मवादी बनें। (12) अन्ध विश्वासी नहीं विवेकशील बनिये। (12) अन्धविश्वास से लाभ कुछ नहीं, हानि अपार है। (14) भिक्षा व्यवसाय देश और समाज का कलंक। (15) मन्दिर जन जागरण केन्द्र बनें। (16) उनसे जो पचास के हो चले। (17) साधु की महान् परम्परा और जिम्मेदारी। (18) ब्राह्मण अपना उत्तरदायित्व संभालें। (19) स्वच्छता मनुष्यता का प्रथम गुरु मंत्र। (20) दर्शन तो करें-पर इस तरह। (21) आलस्य छोड़िए, परिश्रमी बनिये। (22) पक्षपात त्यागें औचित्य अपनावें (23) माँसाहार मानवता के विरुद्ध है। (24) तम्बाकू एक भयानक दुर्व्यसन। (25) प्राणियों के प्रति निर्दयता न करें! (26) अपव्यय का ओछापन (27) मृतक-भोज की क्या आवश्यकता? (28) नारी को तिरस्कृत न किया जाय। (29) अशिष्टता न कीजिये! (30) ईमानदारी का परित्याग न करें। (31)खाद्य समस्या और उसका हल। (32) आहार में असंयम न बरतें। (33) सन्तान की संख्या न बढ़ाइये। (34) गन्दगी की घृणित असभ्यता। (35) शाकाहारी व्यंजन। (36) व्यायाम हमारी एक अनिवार्य आवश्यकता। (37) वृक्षारोपण- एक परम पुनीत पुण्य। (38) शाक उगायें, अन्न बचायें। (39) पुस्तकालय-सच्चे देवालय। (40) निरक्षरता का कलंक धो लिया जाय। (41) परिवार को, सुसंस्कृत कैसे बनायें? (42) हम सच्चे अर्थों में आस्तिक बनें। (43) संस्कारों की पुण्य परम्परा। (44) पर्व और त्योहारों से प्रेरणा ग्रहण करें। (45) लोक निर्माण के लिए जन गायन। (46) विवाह-दिवसोत्सव कैसे मनायें (47) जन्म-दिवसोत्सव इस तरह मनायें। (48) गायत्री यज्ञों की विधि व्यवस्था। (49) गायत्री यज्ञों की विधि- व्याख्या। (50) प्रबुद्ध व्यक्ति धर्मतन्त्र संभालें। (51) सत्कार्यों का अभिनन्दन किया जाय। (52) पुँसवन संस्कार विवेचन। (53) नामकरण संस्कार विवेचन। (54) अन्नप्राशन संस्कार विवेचन। (55) चूड़ाकर्म संस्कार विवेचन। (56) विद्यारम्भ संस्कार विवेचन। (57) यज्ञोपवीत संस्कार विवेचन। (58) विवाह संस्कार विवेचन। (59) वानप्रस्थ संस्कार विवेचन। (60) अंत्येष्टि संस्कार विवेचन। (61) मरणोत्तर संस्कार विवेचन। (62) बाल विवाह की भयंकरता से समाज को बचाया जाय। (63) बच्चों को सद्गुणी कैसे बनायें? (64) छात्रों का निर्माण अध्यापक करें। (65) हरिजन उत्कर्ष के लिए बड़े कदम उठें। (66) नारी उत्थान के लिए महिलायें आगे आवें। (67) पशुबलि हिन्दू धर्म का कलंक। (68) नवनिर्माण के लिए जन-सम्मेलन। (69) विधवा विवाह शास्त्र विरुद्ध नहीं। (70) क्या मनुष्य पशु-पक्षियों से भी गिरा रहेगा। (71) खाया कैसे जाय? (72) शरीर को स्वस्थ रखिये। (73) आरोग्य का आधार शारीरिक श्रम। (74) कपड़ों से जकड़े न रहिये। (75) ब्रह्मचर्य जीवन की अनिवार्य आवश्यकता। (76) सर्वोपयोगी सरल व्यायाम। (77) स्वस्थ रहना है तो यह खाइये। (78) कब्ज से कैसे बचें और छूटें? (79) श्वास सही तरीके से लीजिये। (80) दूध पियें तो इस तरह। (81) उत्कृष्ट और परिष्कृत जीवन। (82) मन की तुष्टि आत्मा की दुर्गति। (83) मन के हारे हार है,मन के जीते जीत। (84) अपने दोषों को ढूंढ़ें और निकालें। (85) मरने से डरना क्या? (86) कलात्मक जीवन जियें। (87) जिन्दगी हंसते-खेलते जियें। (88) सुखी इस तरह रहा जा सकता है। (89) जीवन श्रेष्ठ व सार्थक बने। (90) जीवन का लक्ष्य भुला न दिया जाय। (91) सन्तोषी सर्वदा सुखी। (92) मत असन्तुष्ट रहिये, मत खिन्न हूजिये। (93) कामना और वासना की मर्यादा। (94) अपना दृष्टिकोण बदलें। (95) असन्तोष की आग में यों न जलें। (96) घन्योगृहस्थाश्रमः। (97) परिवार को सुसंस्कृत बनायें। (98) परिवार का पालन ही नहीं निर्माण भी। (99) सुखी और सफल दाम्पत्य जीवन। (100) दाम्पत्य जीवन में स्वर्ग का अवतरण। (101) क्या नारी इसी दुर्दशा में पड़ी रहेगी? (102) सुयोग्य नारी सुखी गृहस्थ। (103) पुत्र की कामना से उद्विग्न क्यों? (104) धन का उपार्जन और उपयोग। (105) मित्रता क्यों कैसे और किससे? (106) स्वाध्याय में प्रमाद न करें। (107) बोलिए तो पर इस तरह। (108) बच्चों को बिगड़ने न दें। (109) बच्चों का भावनात्मक विकास। (110) बच्चों का प्रशिक्षण घर की पाठशाला में। (111) चरित्र का निर्माण सबसे बड़ा निर्माण (112) सद्गुण बढ़ाएं सुसंस्कृत बनें। (113) व्यक्तिवाद नहीं-समूहवाद। (114) परोपकारी और सेवा भावी बनिये। (115) स्वार्थ और परमार्थ का समन्वय। (116) अपना सुधार संसार की सबसे बड़ी सेवा। (117) पहले अपने को सुधारें। (118) उद्धरेदात्मनात्मानम्। (119) संयम हमारी एक महत्वपूर्ण आवश्यकता। (120) मनोबल की चमत्कारी शक्ति (121) अनर्थकारी गलतफहमियों से बचे रहें। (122) धैर्य सब सफलताओं का मूल है। (123) ज्ञान-योग की साधना। (124)कर्मयोग की नीति-रीति।(125) भक्ति-योग का वास्तविक रूप। (126) प्रेम ही परमेश्वर है। (127) उपासना जीवन की अनिवार्य आवश्यकता। (128) हम ईश्वर से विमुख न हों। (129) गृहस्थ एक योग साधना।(130) आत्मा की पुकार अनसुनी न करें। (131) हम सशक्त और साहसी बनें। (132) सफलता आत्मविश्वासी को मिलती है। (133) जो करें मन लगाकर करें।(134) आराम नहीं, काम कीजिये। (135) विनोद और उल्लास की प्रवृत्तियाँ। (136) मित्रता करें पर समझ-बूझकर। (137) बचत ही आपकी असली आय है। (138) उतावली न करें-उद्विग्न न हों। (139) दूसरों के दोष-दुर्गुण ही न देखा करें। (140) प्रतिकूल परिस्थितियों में भी उद्विग्न न हों। (141) कठिनाइयों से डरिये नहीं-लड़िये। (142) निराशा को पास न फटकने दें। (143) आवेश-गृहस्थ होने की अपार हानि। (144) विचारों की उत्कृष्टता प्रगति का मूल मंत्र। (145) मानसिक स्थिति का स्वास्थ्य पर प्रभाव। (146) न डरिये न अशान्त हूजिये। (147) अहंकार में डूब मत जाइये। (148) सज्जनता की राह। (149) हम दुर्बल नहीं शक्तिशाली बनें। (150) धर्मरक्षा से आत्मरक्षा होगी। (151) मर्यादाओं का उल्लंघन न करें। (152) समय का सदुपयोग करें। (153) हम सुख शाँति से वंचित क्यों हैं? (154) सशक्त दीर्घ जीवन का राजमार्ग। (155) अपूर्णता से पूर्णता की ओर। (156) काम आएंगे अपने ही हाथ। (157) विद्या की संपत्ति निरन्तर बढ़ाती चलें। (158) अपना उत्साह शिथिल न होने दें। (159)टोना-टोटका, जंतर मंतर। (160) जीतता है सत्य ही, असत्य नहीं। (161) बच्चों का निर्माण घर की पाठशाला में। (162) उत्तम साहित्य से संपर्क स्थापित कीजिये। (163) भावुकता से सावधान। (164) उच्च शिक्षित कन्या की विवाह समस्या। (165) झूठी आलोचनाओं से परेशान न रहिये। (166) वे गरीब बच्चे महान कैसे बने? (167) अपनी आर्थिक स्थिति डगमगाइए मत। (168) प्रशंसा की सृजन शक्ति से आश्चर्यजनक सुधार। (169) झोला पुस्तकालय-अमृत कलश। (170) ज्ञान-यज्ञ का उद्देश्य और स्वरूप। (171) गो-रस बेचन हरि मिलन-एक पंथ दो काज। (172) मनुष्य में देवत्व। (173) खर्च करना भी सीखिये। (174) कर्ज से पीछा कब छूटे? (175) गृहस्थाश्रम-एक कर्त्तव्य कर्म। (176) छोटी उम्र में बड़े काम। (177) जीतेंगे हिम्मत वाले। (178) खाते समय इन बातों का ध्यान रखिये। (189) बुराइयों के अन्धकार में प्रकाश की किरण। (180) धरती पर स्वर्ग। (181) दुर्दैव को चुनौती। (182) हमारा स्वास्थ्य संकट और उसका समाधान। (183) तेजस्वी और मनस्वी संतति। (184) पतिव्रत की महिमा पत्नी व्रत की गरिमा। (185) समस्यायें अनेक हल एक। (186) गुण निर्माण का आधार व्यक्ति निर्माण- (187) सौभाग्य का द्वार- सम्मिलित परिवार। (188) यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते...............। (189) आन्तरिक सुख ही वास्तविक सुख। (190) बुढ़ापे से टक्कर लीजिये। (191) हमारी शत-सूत्री युग-निर्माण योजना। (192) हमारा युग निर्माण सत्संकल्प। (193) संगठित परिवार-स्वरूप एवं आदर्श। (194) गृहस्थ ही नहीं सद्गृहस्थ बनें। (195) अमृत और पारस। (196) शतायु जीवन का राजमार्ग। (197) आदर्श परिवार की मर्यादायें। (198) प्रतिष्ठा यों प्राप्त करें। (199) जीवन लक्ष्य और उसकी प्राप्ति।

कविता और कहानियाँ

इन पुस्तिकाओं के पृष्ठ ट्रैक्टों की अपेक्षा अधिक हैं। उसी अनुपात से इनका मूल्य भी अधिक रखा गया है। इन पुस्तिकाओं का मूल्य 40-40 पैसा है।

12 कहानी

1. समाधि दीप। 2. ज्योति बुझती नहीं। 3. प्रकाश की ओर। 4. भगवान् के दरबार में। 5. एक थे राजा। 6. प्रेरणाप्रद कथा गाथायें। 7. सौम्य संवाद। 8. अविस्मरणीय संस्मरण, भाग-1। 9. अविस्मरणीय संस्मरण, भाग-2। 10. अविस्मरणीय संस्करण भाग-3। 11. सन्त समागम। 12. प्रेरक प्रसंग।

12 कविता

1. ज्योति किरण। 2. नव युग का नया निर्माण। 3. अपना दीप जलाओ। 4. अभिवन्दना। 5. अभिव्यंजना। 6. युग-नियन्त्रण। 7. मंगल किरण। 8. अवतार कथा। 9. नव-प्रभात। 10. प्रभात किरण। 11. मणियुक्ता। 12. अर्जना गीत।

62 जीवन-चरित्र -कुल मूल्य 24) 28

युग निर्माण योजना का उद्देश्य राष्ट्र की भावी पीढ़ी को सशक्त, समर्थ और विचारवान बनाना है। यह तेजस्विता महापुरुषों की जीवन शैलियों के अनुसरण से सम्भव होती है। अब तक इस सीरीज में 62 ट्रैक्ट छप चुके हैं, इन पुस्तिकाओं का मूल्य 40-40 पैसे रखा गया है।

1. जगद्गुरु शंकराचार्य। 2. स्वामी विवेकानन्द। 3. महावीर स्वामी। 4. ईश्वरचन्द्र विद्यासागर। 5. महर्षि कर्वे। 6. ठक्कर बापा। 7. महापुरुष लेनिन। 8. महर्षि कार्लमार्क्स। 9. पवित्रात्मा ब्रह्मा।10. ठाकुर दयानन्द। 11. महाप्रभु चैतन्य। 12. स्वामी केशवानन्द। 13. प्रभु जगद्बन्धु। 14. महात्मा एण्ड्रूज। 15. अब्राहम लिंकन। 16. केशव चन्द्र सेन। 17. राजाराम मोहनराय। 18. गोपाल कृष्ण गोखले। 19. श्रीमती एनी बेसेन्ट। 20. रामकृष्ण परमहंस। 21. महायोगी अरविन्द। 22. दादाभाई नौरोजी। 23. सन्त कबीर। 24. महारानी अहिल्याबाई। 25. गुरु गोविन्द सिंह। 26. टोयोहिको कागावा। 27. वीर शिवाजी। 28. दुर्गादास। 29. महात्मा फ्राँसिस। 30. स्वामी सहजानन्द। 31. वीर सावरकर। 32. सिस्टर निवेदिता। 33. मास्टर प्रभुदयाल। 34. समर्थगुरु रामदास। 35. सन्त तुकाराम। 36. कमाल पाशा। 37. महापुरुष जैमिनी। 38. लाला लाजपत राय। 39. गैरीवाल्डी। 40. मदनमोहन मालवीय। 41. महात्मा गौतम बुद्ध। 42. विनोबा भावे। 43. लोकमान्य तिलक। 44. सुभाषचन्द्र बोस। 45. रवीन्द्र नाथ टैगोर। 46. जमना लाल बजाज। 47. महादेव गोविन्द रानाडे। 48. जुगल किशोर बिरला। 49. मार्टिन लूथर। 50. मार्टिन लूथर किंग। 51.फ्लोरेन्स नाइटिंगेल। 52. गणेश शंकर विद्यार्थी। 53. पुरुषोत्तम दास टण्डन। 54. महापुरुष ईसा। 55. बंकिमचन्द्र। 56. महारानी लक्ष्मीबाई। 57. सन्त सुकरात। 58. श्रीमती सरोजनी नायडू। 59. गंगाराम। 60. स्वामी श्रद्धानन्द। 61. कर्मवीर कोलम्बस। 62. विश्वेश्वरैया।

15 गायत्री ट्रैक्ट

गायत्री महामन्त्र के विज्ञान और विधान से परिचित कराने वाले सर्वांग सुन्दर प्रचार ट्रैक्ट। मूल्य प्रत्येक का 40-40 पैसा।

1. गायत्री का स्वरूप व रहस्य। 2. गायत्री की गुण शक्ति। 3. सर्व सुलभ साधना। 4. गायत्री शक्ति का स्रोत सविता देवता। 5. गायत्री और उसका प्राण-प्रक्रिया। 6. गायत्री पंचमुखी और एक मुखी। 7. गायत्री की पंचविधि दैनिक साधना। 8. गायत्री की साधनायें। 9. गायत्री मन्त्र की विलक्षण शक्ति। 10. गायत्री की असंख्य शक्तियाँ। 11. गायत्री की सिद्धियाँ। 12. गायत्री शक्ति का नारी स्वरूप। 13. स्त्रियों का गायत्री अधिकार। 14. गायत्री और यज्ञोपवीत। 15. गायत्री और यज्ञ का सम्बन्ध।

एक-एक रुपया मूल्य की अनुपम पुस्तकें

विचार क्रान्ति, नव-निर्माण, जन जागृति एवं आत्मोत्कर्ष की अति प्रेरणाप्रद पुस्तकें। अति सुन्दर, सस्ती कार्ड के रंगीन कवरों वाली यह पुस्तकें हर शिक्षित व्यक्ति के पास रहने योग्य। मूल्य प्रत्येक का एक-एक रुपया।

1. पन्थ अनेक लक्ष्य एक। 2. आत्म कल्याण का राजमार्ग। 3. सद्गुणों की सच्ची संपत्ति। 4. आशा की जीवन ज्योति। 5. प्रगति के पथ पर। 6. मनुष्य का मूल्याँकन। 7. मानसिक कमजोरियों से बचें। 8. समाज की अभिनव रचना। 9. समस्त समस्याओं का एक ही हल। 10. नये युग की नई प्रेरणा। 11. विष से अमृत की ओर। 12. मनुष्य में ईश्वर की झाँकी। 13. नये युग का सूत्रपात। 14. जीवन संग्राम में कैसे जीतें? 15. राष्ट्र की निर्मात्री नारी। 16. प्रभावशाली वक्ता बनने की कला। 17. आप लेखक कैसे बनें?18. आरोग्य रक्षा रहस्य। 19. तम्बाकू घातक विष है। 20. कल्प चिकित्सा। 21. शिशु जन्म से पूर्व। 22. शिशु और अभिभावक। 23. हमारे महान उत्तराधिकारी। 24. बच्चे और उनका मनोविज्ञान। 25. बालकों का नव निर्माण। 26. बाल विकास की समस्याएं। 27. बच्चों को कैसे सुधारा जाये। 28. बच्चों की शिक्षा-दीक्षा। 29. बालकों को इन दुर्गुणों से बचाइये। 32. बच्चे सद्गुणी कैसे बनें। 33. सुख-शाँतिमय गृहस्थ। 34. सुसन्तुलित परिवार। 35. मितव्ययी बनिये-सुखी रहिये। 36. भारत की महान विभूतियाँ। 37. बड़ों की बड़ी बातें। 38. युग सन्देश। 39. युग वीणा। 40. उद्बोधन। 41. दोहा अंताक्षरी।

धर्म कथा एवं प्रवचनों का साहित्य

गीता, रामायण एवं सत्यनारायण कथा का ऐसे सुन्दर ढंग से संकलन किया गया है कि जनता को इन प्रवचनों द्वारा मन्त्रमुग्ध किया जा सकता है। और जन जागृति के आन्दोलन के लिये यह पुस्तकें अति उपयोगी हैं।

1.गीता कथा 6)

2.गीता पद्यानुवाद 3)

3.रामायण कथा 6)

4.संक्षिप्त रामायण 1)

5.सत्य नारायण कथा-75

6.सत्यनारायण कथा पद्यानुवाद-40

पर्व और संस्कारों का प्रशिक्षण

नैतिक, साँस्कृतिक एवं आध्यात्मिक भावनाओं का जीवन का अभिनव जागरण करने के लिये पर्वों एवं संस्कारों की महान परम्परा जागृत करने एवं इस माध्यम से लोक शिक्षण की आवश्यकता पूरी करना आज की स्थिति में अति आवश्यक है। प्रस्तुत पुस्तकें उसी आवश्यकता की पूर्ति के लिये हैं।

1. अभिनव संस्कार पद्धति 2) 50

2. पर्वों की प्रेरणा और पद्धति 2)

पर्व मनाने का विधान

1.श्रावणी पर्व विधान 50 पैसे।

2.पितृ अवस्था पर्व विधान 40 पैसे।

3.विजयादशमी और दीपावली पर्व विधान 50 पैसे।

4.गीता जयन्ती और बसन्त-पंचमी विधान 43 पैसे।

5.शिवरात्रि और होलिका पर्व विधान 50 पैसे।

6.गायत्री जयन्ती और गुरु पूर्णिमा 40 पैसे।

संस्कार बनाने के विधान

1.पुँसवन और नामकरण संस्कार 40 पैसे।

2.अन्नप्राशन, चूड़ाकर्म और विद्यारम्भ संस्कार 40 पैसे।

3.यज्ञोपवीत और वानप्रस्थ संस्कार 40 पैसे।

4.विवाह संस्कार 50 पैसे।

5.मरणोत्तर और अन्त्येष्टि संस्कार 50 पैसे।

6.जन्म दिवसोत्सव और विवाह-दिवसोत्सव संस्कार 40 पैसे।

गायत्री विद्या के अमूल्य ग्रन्थ रत्न

वेदमाता गायत्री महाशक्ति के अति महत्वपूर्ण रहस्यों एवं अनुभूत विधानों का वर्णन इन पुस्तकों में विस्तारपूर्वक सरल भाषा में किया गया है, इन अनुपम पुस्तकों को पढ़ आशाजनक लाभ उठाया जा सकता है।

1.गायत्री महाविज्ञान प्रथम भाग 3.50

2.गायत्री महाविज्ञान द्वितीय भाग 3.50

3.गायत्री महाविज्ञान तृतीय भाग 3.50

4.गायत्री यज्ञ-विधान भाग-12.00

5.सामूहिक गायत्री हवन (यज्ञ-विधान भाग-2) 2.00

6.गायत्री चित्रावली 1.50

7.गायत्री मन्त्रार्थ 1.50

8.संक्षिप्त गायत्री हवन 20

पुस्तक मंगाते समय इन नियमों को ध्यान में रखें।

1. 6 रु. से कम की पार्सल नहीं भेजी जाती।

2. डाक खर्च या रेलवे खर्च हर हालत में मंगाने वाले के जिम्मे होगा।

3. 10 रु. से कम पर कोई कमीशन नहीं। 10 रु. से 99 रु. तक 15 प्रतिशत और 100 रु. से ऊपर का माल मंगाने पर 25 प्रतिशत कमीशन दिया जाता है।

4. छोटे पार्सल डाक से और बड़े पार्सल रेल से मंगाने से लाभ रहता है। रेल से मंगाना हो तो अपने रेलवे स्टेशन का नाम भी लिखिये। अपना पता हिन्दी या अंग्रेजी में स्पष्ट अक्षरों में लिखना चाहिये।

‘अखण्ड-ज्योति’ संस्थान, मथुरा


पूजा का मर्म


पूजा का मर्म (kavita)

जिस घर में अंधियार घिरा हो, उसमें दीप जला कर,

किरण पुँज बिखरा देना ही तो सच्ची पूजा है।

ममता, स्नेह, सरसता, समता चली गयी जीवन से।

सारे सद्गुण सुमन भर चुके हैं जीवन कानन में।

तड़प रहे हों प्राण किसी व्याकुल के आकुल तृषा से,

उसको नीर पिला देना ही तो सच्ची पूजा है।

दौड़ रहा दिशि हीन मनुज है, पग-पग ठोकर खाता।

चरण तोड़ बैठे हैं अपना, लक्ष्य-बिन्दु से नाता॥

भटक रहा हो कोई अपनी मंजिल ही दिशि खोकर,

उसे राह दिखला देना ही तो सच्ची पूजा है।

उलझन, कटुता, व्यंग-विवशता, जीवन की परिभाषा।

गहन तिमिर से आच्छादित है प्राण दायिनी आशा॥

कोई डूब रहा हो मन के भंवरों बीच अकेला,

उसे किनारे पर ले आना ही सच्ची पूजा है॥

मुरझाता हो कोई अंकुर-सूखे कोई पाती।

कड़ी धूप में झुलस रही हो, जहाँ धरणि की छाती॥

सूख रहा हो कोई उपवन बिन शीतल पानी के,

उसमें फूल खिला देना ही तो सच्ची पूजा।

भौतिकता को सदा संजोया उसके पीछे दौड़े।

एक क्षणिक सुख की खातिर, सौ स्वर्ग सभी ने छोड़े॥

कोई जग के आकर्षण में उलझ गया हो उसको,

नश्वरता का बोध कराना ही सच्ची पूजा है।

गंवा दिया विश्वास, धैर्य, साहस मानव ने पशु बन।

भूल गया-क्यों मिला हमें मानव का यह सुन्दर तन॥

शाश्वत सत्य दिखाकर, उसके प्रति विश्वास जगाना।

नर को नारायण कर देना ही सच्ची पूजा है॥

-माया वर्मा,

*समाप्त*