प्रेम की साध, ज्ञान की खोज और विश्व-मानव की पीड़ा के प्रति असह्य करुणा-यह तीन आवेग मेरे जीवन का संचालन करते रहे हैं।
एक विराट् अन्तरिक्ष मेरे सामने खड़ा है, मेरा मत क्षुद्र कंकड़ के समान था, उस छोटे-से कंकड़ को बार-बार ज्ञान के इस अथाह सागर में तैराकर मैंने उसका रहस्य ढूंढ़ा, तारे क्यों चमकते हैं-इसे जानने के लिये मैंने विज्ञान के पन्ने पलटे। और मनुष्य के हृदय में क्या है, इसके लिए शास्त्र देखे। मेरी जिज्ञासायें कभी शाँत नहीं हुईं, क्योंकि मैं यह जानने के लिए सदैव प्रयत्नशील रहा हूँ कि संसार का अन्तिम सत्य क्या है?
उतनी ही लगन से मैंने प्रेम को ढूंढ़ा है। प्रेम मानव-अन्तःकरण को प्रकाश देने वाली ऐसे अमृत सत्ता है, जिसकी चाह कीट-पतंगों तक को है, उनमें जीवन के एकाकीपन से उत्पन्न ऊब और थकावट को मिटाने की शक्ति देखकर ही प्रेम के लिए अपना सारा जीवन समर्पित कर दिया। प्रेम की परम उपलब्धि को ही मैंने स्वर्ग माना है और इसलिये स्वर्ग को किसी लोक में न ढूंढ़कर प्राणिमात्र के प्रति निश्छल प्रेम में ढूँढ़ा।
यह दोनों भाव मुझे बार-बार ऊपर उठा ले जाने का प्रयत्न करते रहे, पर मैंने देखा-संसार बहुत दुःखी है, लोग अज्ञान में भटक रहे हैं कष्ट भोग रहे हैं। यह देखकर मेरे हृदय में बार-बार करुणा उमड़ी और मैंने स्वर्गीय सुखों का परित्याग कर पृथ्वी पर रहना और यहाँ के कष्ट-पीड़ितों की सेवा करना ही अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया।
मेरे जीवन की इति-वृत्ति इतनी ही है और चाहता हूँ कि जब भी नया जीवन मिले, इसी त्रिधारा में मेरा जीवन प्रवाहित बना रहे।
-वट्रेन्ड रसेल
पृथ्वी जलाती थी पाँव और शीश झुलसा रहा था सूरज, न पेट भर अन्न और न रात काटने के लिये बिछावन। झरना मिला, उसी का जल पी लिया और कहीं से कन्द-मूल, फल-फूल मिल गये उसी से अपनी क्षुधा शान्त कर ली। एक गोल पत्थर पर सिर टिकाकर किसी चट्टान में सो लिये, तो दोपहर किसी वृक्ष की छाँव में बिता ली। ऐसे करते-करते सात दिन बीत गये। स्नातक धन्वन्तरि गुरुकुल की सीमा छोड़कर हिमालय की मध्यवर्ती उपत्यिकाओं तक जा पहुँचे किन्तु कोई भी ऐसी जड़ी-बूटी न मिली जो अपनी पीठ पर हुए व्रण का उपयुक्त औषधि हो सकती।
धन्वन्तरि का शरीर थककर आधा हो गया था। पर वाह री लगन! धन्य रे ऐसे तप-कि एक ऐसी बूटी की खोज, जो किसी भी फोड़े से पीड़ित का अचूक उपचार सिद्ध हो सके, धन्वन्तरि को उसके पीछे ही लगाये रखा।
धन्वन्तरि भिषगाचार्य के अन्तिम वर्ष में शोध कर रहे थे औषधि शास्त्र का उन्होंने ऐसा अध्ययन किया था कि स्वयं उपकुलपति भी कई बार उनसे आवश्यक जानकारियाँ उपलब्ध किया करते थे। आयुर्वेद का ऐसा गहन अध्ययन इतिहास में शायद ही कोई और कर सका हो। एक-एक ऋचा पर उन्होंने कितना-कितना परिश्रम किया, यह तो वह स्वयं ही जानते थे, पर आयुर्वेद का निधान धन्वन्तरि आज कई दिन से भ्रमण कर रहा है- एक-एक जड़ी, एक-एक बूटी का प्रयोग कर डाला है उन्होंने, पर एक भी तो पत्ती ऐसी नहीं निकली जो उनके पीठ पर हो गये फोड़े के घाव को ठीक कर देती।
रात-दिन की निरन्तर खोज के उपरान्त भी सफलता हाथ न लगने पर निराशा स्वाभाविक थी। युद्ध में पराजित सैनिक की भाँति हारे-थके धन्वन्तरि पुनः गुरुकुल की ओर लौट पड़े। वहाँ तक पहुँचते-पहुँचते भी हजारों बूटियों का प्रयोग करके देख लिया। किन्तु अन्त असफलता ही असफलता। धन्वन्तरि को न कोई बूटी मिली और न पीठ का फोड़ा अच्छा हुआ। धन्वन्तरि की मुखाकृति देखकर वीभत्सता को भी करुणा आ जाती, पर उनकी खोज की जिज्ञासा शाँत न हुई।
सूखे मुख, रूखे-मुरझाये बाल-शिष्य की ऐसी खिन्न मुद्रा देखते ही गुरु की आंखें छलक उठीं। उन्होंने स्पष्ट ताड़ लिया कि धन्वन्तरि को कोई उपयुक्त औषधि मिल नहीं पायी।
“तात! बड़ा कष्ट पाया तुमने” कहते हुए आचार्य प्रवर ने बड़ी करुणा, बड़े स्नेह से धन्वन्तरि के उत्तरीय वस्त्र को हटाकर देखा-घाव घटा नहीं था, कुछ बढ़ ही गया था। उत्तरीय वस्त्र को वैसे ही छोड़कर आचार्य श्रेष्ठ ने कहा- “वत्स! आओ मेरे साथ आओ। तुम्हारा उपचार तो यहीं मेरे पास है” यह कहकर वे आश्रम में दक्षिण दिशा की ओर चल पड़े। धन्वन्तरि उनका अनुगमन कर पीछे-पीछे चल पड़े।
थोड़ी ही दूर पर एक बूटी खड़ी थी। गुरु ने उसे तोड़ा, एक पत्थर पर रखकर पीसा और रखकर कहा- “वत्स चलो, अब तुम्हारा घाव दो दिन में अच्छा हो जायेगा।”
निराश और दुःखी धन्वन्तरि ने निःश्वास छोड़ते हुए कहा- “गुरुदेव! बूटी विद्यालय के इतने समीप ही थी तो मुझे व्यर्थ ही पन्द्रह मील तक क्यों दौड़ाया? इतना कष्ट देकर आपने क्या पा लिया?”
मौन! ऋषि ने अत्यन्त सकरुण नेत्रों से धन्वन्तरि की ओर देखा भर बस, कहा कुछ नहीं। वह तो उनकी आत्मा थी, जिसने आप ही उत्तर दे दिया-
“धन्वन्तरि! इतनी कठिन साधना नहीं करता तो यह जो हजारों औषधियों का ज्ञान प्राप्त हुआ, वह कहाँ से प्राप्त हो जाता?”
आज भी जिसने एक बड़े काठ को काटकर छेद डाला था, वह भ्रमर सायंकाल एक कमल के फूल पर जा बैठा। कमल के सौंदर्य और सुवास में भ्रमर का मन कुछ ऐसा विभोर हुआ कि रात हो गई, फूल की बिखरी हुई पंखुड़ियों सिमट कर कली के आकार में आ गईं। भौंरा भीतर ही बन्द होकर रह गया।
रात भर प्रतीक्षा की, भ्रमर चाहता तो उस कली को कई ओर से छेद कर रात भर में कई बार बाहर आता और फिर अन्दर चला जाता। पर वह तो स्वयं भी कली की ही एक पंखुड़ी हो गया, रहा हो। प्रातःकाल सूर्य की किरणें उस पुष्प पर पड़ीं, पंखुड़ियाँ फिर खिंची और वह भौंरा वैसे ही रस-मग्न अवस्था में बाहर निकल आया।
यह देखकर सन्त ज्ञानेश्वर ने अपने शिष्यों से कहा-देखा तुमने प्रेम का यह स्वरूप समझने ही योग्य है।
भक्ति कोई नया गुण नहीं, वह प्रेम का ही एक स्वरूप है। जब हम परमात्मा से प्रेम करने लगते हैं, तो द्रवीभूत अन्तःकरण सर्वत्र व्याप्त ईश्वरीय सत्ता में सविकल्प तदाकार रूप धारण कर लेता है, इसी को भक्ति कहते हैं। भगवान् निर्विकल्प और प्रेमी सविकल्प दोनों एक हो जाते हैं, तो द्वैत भाव ही अद्वैत हो जाता है। इसी बात को शास्त्रकार ने यों कहा है-
“द्रवी भाव पूर्विका मनसो भगवदेकात्म रूपा सविकल्प वृत्तिर्भक्तिरिति।”
वस्तुतः मनुष्य के अन्तःकरण में प्रेम जब तक स्फुरित न न हो तब तक वह स्थूल पिंड मात्र है। जल को लहरें लेने देने के लिये वायु के झोंके आवश्यक हैं, हिलोरें जरूरी हैं। उसी प्रकार जड़ शरीर में भरी चेतना में भाव-तरंगें तब तक नहीं फूटतीं जब तक आत्म-चेतना में प्रेम की स्फुरणा न हो। यह प्रेम जहाँ भी स्थिर हो जाता है। वहीं का आकार, गुण, स्वभाव और सत्तात्मक रूप ग्रहण कर लेता है, इसलिए प्रेम एक ऐसी सत्ता है, जो मानवीय जड़ता को देवत्व में बदल देती है।
गीता में भगवान् कृष्ण ने इसी तथ्य की ओर भी अग्रिम सीमा व्यक्त करते हुए लिखा है-
मायि निर्बद्ध हृदयाः साधवः साधवः समदर्शिनः।
वशे कुर्वन्ति माँ भक्त्या सत्स्त्रयः सत्पतिं यथा॥
“हे अर्जुन! जिस प्रकार साध्वी स्त्री अपने प्रेम से पति को वश में कर लेती है, उसी प्रकार मेरे परायण हुए मेरे भक्त मुझे वशीभूत कर लेते हैं और मुझे उनकी इच्छानुसार चलना पड़ता है।”
भक्ति प्रेम के विकास की चरम अवस्था है, जिससे अन्तः करण में मैं-मेरे का भाव भी समाप्त हो जाता है और रहता वह भी नहीं जिसका ध्यान किया जा रहा था। न वह रहता है न यह, दोनों एक हो जाते हैं और भक्त मानवीय स्वरूप में ही ईश्वरीय स्वरूप की उपलब्धि कर लेते हैं।
भक्ति निःसन्देह ईश्वरीय प्रेम की प्रगाढ़ अवस्था है, पर अनेक लोग ईश्वर-भक्ति से इसीलिए कतराते हुए पाये जाते हैं कि उनका कुछ ऐसा विश्वास होता है कि ईश्वर-भक्त को संसार, बन्धु-बान्धव, स्वजन-परिजन, माया-ममता सब छोड़ देने पड़ते हैं- पर ऐसी धारणा मिथ्या भ्रम है। जो परमेश्वर स्वयं अपने भक्त के प्रेम में ऐसा आसक्त हो सकता है कि उसका निजी अस्तित्व ही प्रकट न रह जाता हो, वह भगवान् साँसारिक कर्त्तव्यों के प्रति अवहेलना करने की इच्छा क्यों करेगा?
ऐसी आशंका किसी ने सन्त तुलसीदास के समक्ष भी की थी, तब उन्होंने कहा था-
प्रीति राम सो नीति पथ चलिय राग रिस जीति।
तुलसी सन्तन के मर्त इहै भगत की रीति॥
भक्ति की रीति यह है कि वह भगवान् को प्रेम करे और राग अर्थात् आसक्ति रिस अर्थात् द्वेष को जीतकर नीति-परायण बना रहे।
इस नीति को व्यावहारिक जीवन में धारण करने वाले व्यक्ति की दृष्टि में, संसार में सौंदर्य के अतिरिक्त और कुछ हो ही नहीं सकता। प्रेम के साथ वासना का संयोग अर्थात् यदि हम अपने प्रेमास्पद से कुछ चाहते हैं, विनिमय का भाव रखते हैं, तो वही आसक्ति है और इसी प्रकार यदि किसी से द्वेष रखते हैं तो सौंदर्य-दृष्टि का अन्त होता है। इसीलिए भक्ति यदि नीति-पथ पर आरुढ़ रहती अर्थात् हम सृष्टि के कण-कण को ‘सीया राम मय’ जानकर निष्काम व्यवहार करते रहें, तो ऐसे भगवद्भक्त के लिये यह दृश्य संसार ही अलौकिक आनन्द का धाम बन जाता है।
भगवान के प्रति इस प्रकार का पवित्र प्रेम जिसके भी अन्तःकरण में जागृत होगा, उसके लिये इस संसार में दुःखद कुछ रहेगा ही नहीं, दुःख का कारण तो हमारी अनीति और दोष-दृष्टि है। हम क्यों मानें कि कोई बुरा कर रहा है, पर यदि वह बुरा कर रहा है, तो भक्त को अपनी बुरी भावनाएं भी तो मारनी और उनकी उपेक्षा करनी पड़ती है। उसी प्रकार संसार की अभद्रता को मारता और उसकी अपेक्षा करता हुआ भी भक्त दोष- रहित बना रहता है।
वह सर्वत्र उल्लास ढूंढ़ता और वही पाता है। उसे नदियों का प्रवाह, समुद्र के ज्वार-भाटे, पुष्पों के सौंदर्य, नक्षत्रों का प्रकाश, चिड़ियों की चहक, फूलों की महक और सम्पूर्ण जीवों की चेतना में आनन्द के ही दर्शन होने लगते हैं। यह वृत्ति रोगात्मक होते हुए भी साँसारिक मायामोह से वियुक्त और भगवद् भावना में तल्लीन होती है।
गीताकार ने इसी तथ्य का उल्लेख करते हुए लिखा है-
सर्व भूतस्थतात्मानं सर्वभूतानिवात्मनि।
इक्षते योग युक्तामा सर्वत्र सम दर्शनः॥
इस प्रकार मेरे में युक्त हुआ मेरा भक्त, सृष्टि के सम्पूर्ण प्राणियों में मुझे ही देखता है और सबसे प्रेम की इस अवस्था को समाधि-सुख की तरह अनुभव करता है।
इन पंक्तियों में यह स्पष्ट है कि भगवान् और सृष्टि दो रूप नहीं है। संसार परमात्मा का ही तो विराट् रूप है। जब हम परमात्मा की भक्ति करते हैं तो वह भावना सृष्टि के प्रत्येक प्राणी को भी बाँधती है। इस तरह भक्ति तो मानवीय कर्त्तव्यों से बाँधने का सर्व सुदृढ़ आधार है। यदि व्यक्ति उस रूप में नहीं ढल पाता तो उसका सीधा-सीधा अर्थ यह है कि उसने किसी स्वरूप, मूर्ति, नाम या स्थूल की पूजा की, भगवान् से प्रेम नहीं किया। भक्ति तो भावनाओं का वह विस्तार है, जिससे पेड़ पौधे और पत्थर तक अछूते नहीं रह सकते। वह भला सगे सम्बन्धी, स्वजातियों के प्रति विलगता का भाव क्यों आने देगा, जो उसे भक्ति से रोका जाये।
भक्ति आत्मा के विकास की सम्पूर्ण साधनाओं का प्राण है, पर उसके तत्वज्ञान को कोई प्रेमी अन्तःकरण ही समझ सकता है। जो प्रेम तत्व को समझता है, वही सच्चा भक्त है, वही सच्चा ईश्वर-परायण है। यह तथ्य समझने ही योग्य है।
आचार्य हरिद्रुमत यज्ञ संचालन के लिये गाँधार जा रहे थे। मार्ग में एक ऐसा गाँव मिला, जहाँ के बारे में यह प्रचलित था कि उस गाँव का एक व्यक्ति भी नास्तिक नहीं है।
किन्तु यह क्या, जिस समय वे एक गली से गुजर रहे थे, एक गृहस्थ अपने बच्चे को बुरी तरह ताड़ना दे रहा था। गृहस्थ उस समय गुस्से से लाल हो रहा था।
हरिद्रुम के पूछने पर उसने बताया-महाराज! नाराज न होऊँ तो क्या करूं सारे गाँव में यही ऐसा है जो नास्तिक है, उससे मुझे अपयश मिलता है। आप ही बताइये क्या किया जाये?
“आप इस बालक के साथ और अपेक्षाकृत घनिष्ठ प्रेम कीजिये हरिद्रुमत ने उत्तर दिया और आगे बढ़ गया। पिता और परिवार ने बच्चे को प्रेम दिया-प्रगाढ़ प्रेम-उसी का परिणाम था कि यही बालक आगे चलकर महान् धार्मिक सन्त उद्दालक के नाम से विश्व-विख्यात हुआ।
पेंगल तब महर्षि नहीं बने थे। उसके लिये आत्म-सिद्धि आवश्यक थी। पर पेंगल साधना करते-करते पदार्थों की विविधता में ही उलझ कर रह गये। पशु-पक्षी, वन्य जन्तु, मछलियाँ, साँप, कीड़े-मकोड़ों में शरीरों और प्रवृत्तियों की भिन्नता होने पर भी शुद्ध अहंकार और चेतनता की एकता तो समझ में आ गई पर विस्तृत पहाड़, टीले, जंगल, नदी, नाले, समुद्र, सूर्य, चन्द्रमा, तारे, प्रकाश, आकाश और पृथ्वी पर पाये जाने वाले विविध खनिज, धातुएं, गैसें, ठोस आदि क्या हैं, क्यों हैं और उनमें यह विविधता कहाँ से आई है-यह उनकी समझ में नहीं आया। इससे उनकी आत्म-दर्शन की आकाँक्षा और बेचैन हो उठी।
वे याज्ञवलक्य के पास गये और उनकी बारह वर्ष तक सेवा-सुश्रूषा कर पदार्थ-विद्या का ज्ञान प्राप्त किया। इस अध्ययन से पेंगल का मस्तिष्क साफ हो गया कि जड़ पदार्थ भी एक ही मूल सत्ता के अंश हैं। सब कुछ एक ही तत्व से उपजा है। ‘एकोऽहं बहुस्यामः’,’एक नूर से सब जग उपजिआ’ वाली बात उन्हें पदार्थ के विषय में भी अक्षरशः सत्य प्रतीत हुई। पैंगलोपनिषद् में इस कैवल्य का उपदेश मुनि याज्ञवलक्य ने इस प्रकार दिया है-
“सदेव सोग्रयेदमग्र आसीत्। तन्नित्यमुक्तमविक्रियं सत्य ज्ञानन्द परिपूर्ण सनातनमेकमेवातीयं ब्रह्म॥ तस्मिन् मरुशुक्तिमस्थाणुस्फाटिकादी जल रौप्य पुरुष रेखा ऽऽदिज्ञल्लोहित शुक्ल कृष्णा गुणमयी गुण साम्या निर्वाच्या मूलप्रकृतिरासीत्। तत्प्रतिबिम्बितं यत्तत् साक्षि चैतन्यमासीत्॥”
-पैंगलोपनिषद्
हे पेंगल! पहले केवल एक ही तत्व था। वह नित्य मुक्त, अविकारी, ज्ञानरूप चैतन्य और आनन्द से परिपूर्ण था, वही ब्रह्म है। उससे लाल, श्वेत, कृष्ण वर्ण की तीन प्रकाश किरणों या गुण वाली प्रकृति उत्पन्न हुई। यह ऐसा था जैसे सीपी में मोती स्थाणु में पुरुष और मणि में रेखायें होती हैं। तीन गुणों से बना हुआ क्षी भी चैतन्य हुआ। वह मूल प्रकृति फिर विकारयुक्त हुई तब वह सत्व गुण वाली आवरण शक्ति हुई, जिसे अव्यक्त कहते हैं। उसी में समस्त विश्व लपेटे हुए वस्त्र के समान रहता है। ईश्वर में अधिष्ठित आवरण शक्ति से रजोगुणमयी विक्षेप शक्ति होती है, जिसे महत् कहते हैं। उसका जो प्रतिबिम्ब पड़ता है वह चैतन्य हिरण्य गर्भ कहा जाता है। वह महत्तत्व वाला कुछ स्पष्ट और कुछ अस्पष्ट आकार का होता है।
इसी उपनिषद् से आगे क्रमशः इसे विक्षेप से आत्मा, आत्मा से आकाश, आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल, जल से पृथ्वी आदि उत्पन्न हुए बताये हैं। वस्तुतः यह परतें एक ही तत्व की क्रमशः स्थूल अवस्थायें हैं, जो स्थूल होता गया वह अधिकाधिक दृश्य, स्पृश्य होता गया। ऊपरी कक्षा अर्थात् ईश्वर की ओर वही तत्व अधिक चेतन और निर्विकार-निराकार होता गया। वायु की लहरों के समान विभिन्न तत्व प्रतिभासित होते हुए भी संसार के सब तत्व एक ही मूल तत्व से आविर्भूत हुए हैं। उसे महाशक्ति कहा जाये, आत्मा या परमात्मा-सब एक ही सत्ता के अनेक नाम हैं।
विज्ञान की आधुनिक जानकारियाँ भी उपरोक्त तथ्य का ही प्रतिपादन करती हैं। जड़ पदार्थ चाहे वह लोहा हो या सोना, ताँबा हो या पारद-(1) गैस, (2) द्रव, ठोस, इन तीनों अवस्थाओं में पाये जाने वाले जो भी तत्व हैं, उनमें क्रमबद्ध एकता है। अब तक 108 तत्वों का पता लगाया गया है। यह सभी तत्व ‘पीरियाडिक टेबल’ में सजाकर रखे गये तो पता चला कि सभी तत्वों में केवल प्रोट्रॉन। यह धन विद्युत आवेश कण हैं जो नाभिक या न्यूक्लियस में पाया जाता है) और इलेक्ट्रान (यह परमाणु का ऋण विद्युत आवेश कण होता है) की संख्या का अन्तर मात्र है। जिस वस्तु में इलेक्ट्रान या प्रोट्रॉन (परमाणु में जितनी संख्या प्रोट्रॉन की होती है, उतनी ही इलेक्ट्रान की भी होती है) की मात्रा कम होती है, वह उतना ही हल्का और सूक्ष्म होता है। जिसमें संख्या बढ़ती गई, वह उतना ही ठोस, स्थूल, दृश्य और स्पृश्य होता गया।
हाइड्रोजन सबसे हल्की गैस है। उसमें इलेक्ट्रान या प्रोट्रॉन की संख्या 1 होती है। हीलियम में 2, लीथियम में 3, बैरीलियम में 4, बोरान 5, कार्बन 6, नाइट्रोजन 7, ऑक्सीजन 8, फलोरीन 9, नियान 10, सोडियम 11, मैग्नीशियम 12, एल्युमीनियम 13, सिलिकन 14, फास्फोरस 15, सल्फर 16, क्लोरीन 17, आर्गन 18, पोटैशियम 19, कैल्शियम 20, स्कैण्डियम 21 आदि।
इसी क्रम से पारे में 80 इलेक्ट्रॉन और प्रोट्रॉन तथा सोने में 76 इलेक्ट्रान पाये जाते हैं। आर्टिफीशियल ट्राँसम्यूटेशन (एक प्रयोग है जिसमें किरणों द्वारा न्यूक्लियस पर प्रहार करके इलेक्ट्रान को बदला जाता है) द्वारा पारे के नाभिक पर बमबाड़ किया गया तो वैज्ञानिकों ने पाया कि एक इलेक्ट्रान कम हो जाने से जब 79 ही इलेक्ट्रान्स बचे तो वही पारे का शुद्ध परमाणु, सोने के शुद्ध परमाणु में बदल गया। प्रकृति का यह प्रयोग बताता है कि यदि मनुष्य अपने भीतर बढ़े हुए दुर्गुणों की मात्रा कम कर सके तो वह अधिकतम शुद्ध और मूल्यवान् अवस्था को पहुँच सकता है।
सोना और पारा ज्यादा अपेक्षित घनत्व (रिलेटिव डेन्सिटी) वाले पदार्थ हैं, इसलिये इनके प्रयोगों में कमजोर और भौतिकवादी व्यक्तियों की तरह अस्थायित्व देखने में आया। जड़ अपना स्वभाव जल्दी नहीं बदलता। किन्तु जो अधिक सूक्ष्म होते हैं, वह यदि कोई अच्छी बात देख लेते हैं तो अपने आपको उसके अनुरूप जल्दी ही ढालकर अपनी उपयोगिता, स्थायित्व और मूल्य बढ़ा लेते हैं। कम आपेक्षित घनत्व वाले पदार्थों में यह परिवर्तन तीव्र और स्थायी होता है। उदाहरण के लिये लीथियम परमाणु जिसमें इलेक्ट्रान की संख्या तीन होती है, प्रोटान्स का बम्बार्ड द्वारा हीलियम परमाणु में बदल देता है।
अब यदि ऊपर दी हुई सारिणी को उल्टा चलें और स्कैण्डियम से बदलना प्रारम्भ करें तो क्रमशः कैल्शियम, पोटेशियम, आर्गन इत्यादि में बदलते हुए हाइड्रोजन तक बना सकते हैं। यद्यपि यह एक बहुत ही कठिन और खर्चीला प्रयोग है, पर यह निर्विवाद सत्य है कि यदि प्रयोग किये जायें तो लोहे को भी हाइड्रोजन में बदला जा सकता है।
हाइड्रोजन सूर्य की सबसे समीपवर्ती गैस है, यही गैस सूर्य में जलती है। फिर यदि हमारे शास्त्रों और योग ग्रन्थों में सूर्य को ही सम्पूर्ण प्रकृति का आत्मा, अधिष्ठाता माना माना गया है, तो उसमें अतिशयोक्ति क्या है? यह अधिक संवेदनशील, त्रिगुणात्मक शक्ति वाला, सृष्टि के कण-कण में अच्छादित तत्व है। किसी दिन नाभिकीय विद्या यह बतायेगी कि सूर्य ही क्रमशः स्थूल होता हुआ प्रकृति में ढला है, यही वह चेतना है जो हमारे मनोमय जगत का भी नियन्त्रण करती है। इस विद्या को जान लेने पर गायत्री-उपासना के आधार और सावित्री महाविद्या की उपलब्धियों में लोग विलक्षण सत्यतायें पायेंगे। सूर्य हमारी आत्मा है, जैसा कि पैंगलोपनिषद् में कहा है-हमारे ज्ञान में, अनुभूति आ जाये तो हमारे लिये शरीरों को बदल डालने वाले अनेक सत्यों को वैज्ञानिक ढंग से प्रमाणित कर सकना सम्भव हो जायेगा।
आत्मा इन तत्वों की श्रेणी का सबसे सूक्ष्म तत्व है। महर्षि कणाद ने उसे पदार्थ माना है। वह 108 तत्वों के इस क्रम में मूल होने के कारण ही है। आत्म शक्ति और पदार्थ दोनों ही है-जिस दिन हम इस बात को जान लेंगे, उन दिन पदार्थ और परमात्मा पर मानसिक रूप से नियन्त्रण करना भी निःसन्देह सम्भव हो जायेगा। अभी यह विद्या हम भारतीयों के पास है, पीछे उसका लाभ सारे संसार को प्राप्त होगा।
क्षुद्रतम में भी विराट् के सन्देश छुपे हैं। जो उन्हें उघाड़ना जानता है वह ज्ञान को उपलब्ध करता है। जीवन में सजग होकर चलने से प्रत्येक अनुभव प्रज्ञा बन जाता है और जो मूर्छित बने रहते हैं, वे द्वार आये आलोक को भी वापिस लौटा देते हैं।
-अज्ञात
एक रहस्यमय शक्ति है, जो स्थूल नेत्रों से अदृश्य और अनिवर्चनीय है, तथापि वह संसार के कण-कण में विद्यमान है। वह इन्द्रियातीत सत्ता दिखाई तो नहीं देती, पर उसे भावनाओं के द्वारा अनुभव जरूर किया जा सकता है। आत्म-निरोध और संकल्प-शक्ति के द्वारा उसे प्राप्त भी किया जा सकता है।
एक सर्वव्यापी, सर्वान्तर्यामी सत्ता की स्वीकारोक्ति आज विज्ञान ने न की होती तो सम्भवतः हिन्दू धर्म का यह विश्वास ही लड़खड़ा गया होता। हम दीपक जला कर रखते हैं, तो कमरे का प्रत्येक कण चमक उठता है। दीपक का प्रकाश अपने आप में एक विचारशील परमाणु होता है, तथापि उसमें जीवन की स्वायत्तता नहीं कही जा सकती, पर अब यह तेजी से अनुभव किया जा रहा है कि चेतना अपने प्रकाशमय आकार में ही सर्वत्र विद्यमान है। वही एक मूल स्त्रोत से प्रवाहित होता हुआ सृष्टि के कण-कण में झिलमिल-झिलमिल कर रहा है।
सूर्य हमारी पृथ्वी से दस करोड़ तीस लाख मील दूर है। वहाँ से प्रकाश चलकर पृथ्वी पर आठ मिनट में आता है। सूर्य चमकने से पहले और चमकने तक इस आठ मिनट के अन्तर को हम एक नई चेतना, गर्मी और प्रकाश के रूप में देखते हैं। सूर्य न होता, तो न तो वृक्ष और वनस्पति होती, न बादल बनते न वर्षा होती। अन्न के अभाव में प्राणधारियों का रहना असम्भव हो जाता, इसलिये सूर्य को एक मूल चेतना के अस्तित्व के रूप में स्वीकार करना ही पड़ता है।
शतपथ ब्राह्मण 7।1।1।37 में पृथ्वी का-”परिमंडल उवा अयं (पृथ्वी) लोक” अर्थात् यह पृथ्वी परिमंडल है, ऐसा कहा है। परिमंडल का अर्थ गोलाकार भी होता है और चारों और से घिरा हुआ भी होता है। पृथ्वी आकाश में तैर रही है। अपने इस रूप में वह एक इकाई है और जीवन की अनेक विभक्तियों से मुक्त हुई-सी प्रतीत होती है। यदि इस विराट् दृष्टि से देखें तब पता चलता है कि पृथ्वी में जीवन का सम्पूर्ण आधार सूर्य है। यदि यह सूर्य थोड़ा-सा भी आगे-पीछे हो जाये तो पृथ्वी न जान कहाँ चली जाये। सूर्य में इतनी अधिक शक्ति है कि यदि उस पर पचास फीट मोटी बर्फ की तह चिपका दी जाये, तो वह उसे पिघला कर खोला देने में एक सेकेण्ड से अधिक समय नहीं लेगा, जबकि इतने के लिये उसे कुल 212 डिग्री सेन्टीग्रेड ताप से काम लेना पड़ेगा। सूर्य की कुछ ही किरणें दोनों ध्रुवों को पिघला कर समुद्र बना सकती हैं, जबकि उसकी मूल शक्ति 360000 डिग्री से भी अधिक है। शक्ति का यह भण्डार उन्होंने छिपा कर रखा है। यदि सब कुछ प्राकृतिक नियमानुसार रहा होता तो कभी भी अग्निदाह या जल-प्रलय की स्थिति आ सकती थी, पर ऐसा नहीं होता। अखिल आकाश में तैरते हुए भी हम एक क्रम व्यवस्था अनुभव करते हैं यह सब अनायास ही नहीं, विधिपूर्वक और विचारपूर्वक है, इसलिये यह कहने में संकोच नहीं होना चाहिए कि पृथ्वी के सभी क्रिया-व्यापार किसी एक प्रतिनिधि चेतना द्वारा संचलित किये जा रहे हैं।
हम साँस लेते हैं, उस एक साँस में ही 3 करोड़ अरब से भी अधिक अणु हम अपने भीतर कर लेते हैं। इनमें से प्रत्येक अणु सैकड़ों मील प्रति घण्टे की गति से चलता है। प्रत्येक अणु में भीतर विद्युत शक्ति भरी है कि उससे सैंकड़ों हार्स पावर की मशीनें चलाई जा सकती हैं। अब यदि हम यह कहें कि हमारे भीतर जो चेतना का प्रवाह उमड़ रहा है, वह इतना अधिक शक्तिशाली है कि यदि उसे नियन्त्रित करके किसी पृथ्वी जैसे ब्रह्मांड को पल भी में ही जलाकर खाक किया जा सकता है, तो उसे अतिशयोक्ति नहीं माना जाना चाहिए। यह कण ही चेतना को शक्ति प्रदान करते हैं। प्रत्येक चेतन अणु की यह सामर्थ्य यह बताती है कि जहाँ से वह कण निःसृत हो रहे हैं, वह तत्व सर्वव्यापी ही नहीं, सर्वशक्तिमान भी अवश्य होना चाहिए।
सूर्य भी किसी निहारिका (नोबुला) से प्रकाश ले रहा है। अर्थात् वह विश्व-व्यापी चेतना का एक प्रतिनिधि मात्र है। उसकी शक्ति कहीं और से आ रही है। यह शक्ति-कण ही विद्युत धारायें तेज और वात बनाते हैं। उन्हीं के माध्यम से हम रेडियो ध्वनियों, चित्र और मौसम सम्बन्धी पूर्व जानकारियाँ अर्जित करते हैं अर्थात् इन कणों में शब्द, आकार, ऊर्जा, स्वामित्व की शक्तियाँ भरी पड़ी हैं। व्यष्टि रूप से हर कण में यदि कोई ऐसी विलक्षण शक्तियाँ हैं, तो उनकी केन्द्रीभूत सत्ता में वह सब कुछ अवश्य होना चाहिए, यह दर्शन ही परमात्मा पर विश्वास का एक ठोस आधार है।
इस विश्वास के आधार पर ही जब हम उस परम सत्ता से भावनात्मक सम्बन्ध जोड़ते हैं, तो मिलने वाले फलितार्थ उस विश्वास की पुष्टि कर देते हैं। भक्त प्रहलाद का अग्नि से जीवित बचकर निकल आना, मीरा का विष पीकर भी जीवित बने रहना, रैदास का कठौती से कड़ा निकाल देना-यह ऐसे उदाहरण हैं जो हमारे विश्वास की पुष्टि करते हैं। पर यदि इन्हें पुरानी घटनायें कहा जाये तो आज भी सैकड़ों उदाहरण ऐसे दिये जा सकते हैं, जब लोगों के ऐसे विश्वास प्रतिफलित होते देखे गये हैं।
यास्मीन नेशनल पार्क में फारेस्ट रेन्जर के पद पर काम करने वाले स्टार जेंकिस नामक एक कर्मचारी को 1956 में एक ऐसे स्थान का पता लगाने को भेजा गया, जहाँ बिजली गिरी थी। उस स्थान का पता लगाने के लिये श्री जेंकिस अपने घोड़े पर चढ़कर चले। यह स्थान दस हजार फुट की ऊँचाई पर कहीं था। बीहड़ वनस्थली, ऊँचे-नीचे पहाड़, कटाव, नदियाँ, नाले उतने कष्टदायक नहीं थे, जितनी कि वर्षा, हिमपात और क्षण-क्षण पर गिरने वाली बिजली।
इस सर्वेक्षण के दौरान स्टार जेंकिस को मारने वाली विपत्तियों का सामना करना पड़ा। एक बार तो उसके पास कुल 100 गज की दूरी पर ही बिजली गिरी। घोड़ा बिदक गया। सामने नदी थी। बीहड़ सुनसान में जेंकिस बुरी तरह भटक गया। मृत्यु बिल्कुल समीप थी।
तब उसने सम्पूर्ण एकाग्रता से उस परम सत्ता का ध्यान किया। श्री जेंकिस ने अपनी अनुभूति ‘प्रार्थना फल गई’ शीर्षक में बड़े मार्मिक शब्दों में व्यक्त करते हुए लिखा है कि मुझे एकाएक धैर्य आया, आधी रोटी खाकर दो कप पानी पिया। मृत्यु की विभीषिका के मध्य एक प्रकाशीय घेरे में अपने आपको पूर्ण सुरक्षित अनुभव कर रहा था। मालूम नहीं किस कोने से, पर मेरे भीतर अपने आप ही एक ज्ञान उदय हो गया कि मुझे इस दिशा में जाना चाहिए। उधर नदी बढ़ी हुई थी तो भी घोड़े ने उसे कैसे पार कर लिया। उस स्थान तक कैसे पहुँच गया, जहाँ बिजली गिरी थी-उसका स्मरण करता हूँ तो उस परम सत्ता की दया के प्रति अनुगृहीत हो उठता हूँ। उस दिन परमात्मा ने राह न दिखाई होती, तो मैं कहीं-का-कहीं भटक कर मृत्यु के मुख में चला गया होता।
‘नवनीत’ के ही एक अज्ञात अंक में फोटो सहित कु0 मन्जू का संस्मरण भी ऐसा ही है जो यह बताता है कि कोई एक मानसिक चेतना हर घर, गली और कण-कण में विद्यमान है, जो हमें अदृश्य सहायतायें देता रहता है।
“मुरादाबाद में भूकम्प आया था। दिन के लगभग पौने ग्यारह बजे भूकम्प आया। हम अपने भाई के साथ दुमंजिले की छत पर खड़े थे। कमरे की चार दीवारों में से पिछवाड़े की दीवाल गिरी। हम दोनों भागे, छत तब तक सकुशल रही, जब तक हम जीने में नहीं पहुँच गये। पैर जीने पर और छत जमीन पर। हम बाल-बाल बचे। पर जीना किसके सहारे टिकता, उसे तो तुरन्त गिर जाना चाहिए था। पर जब तक हम दोनों भाई-बहिन आखिरी सीढ़ी नहीं उतर गये, जीना लटका रहा और उससे पार होते ही वह भी धराशायी हो गया। मेरे पीछे-पीछे आई मृत्यु पीछे-की-पीछे रह गई। यह उस ईश्वर की कृपा का ही फल था।”
ऐसी अदृश्य सहायतायें सदैव क्यों नहीं मिलतीं? परमात्मा की कर्म-व्यवस्था का आधार क्या हैं? यह देर में समझ में आने वाली बात है, पर हिन्दू-दर्शन के प्रथम अध्याय में ईश्वर के अस्तित्व और उसके सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान होने में कोई सन्देह नहीं है। यहीं से हिन्दू-धर्म का विश्व कल्याणकारी अमृत-रचना फूटता है और एक दिव्य विज्ञान के रूप में सारे संसार को आत्मोत्कर्ष का प्रकाश देता हुआ आगे बढ़ता है। हम ईश्वर को सर्वत्र व्याप्त होता हुआ देखें और उसे ही प्राप्त करने का प्रयत्न करें-इस मूल सिद्धान्त को स्वीकार कर लें, तो हमारा मृत्योन्मुखी जीवन भी अमृत कणों से आविर्भूत हो सकता है।
कः काल- कानि मित्राणि को देशः कौ व्ययागमौ।
कंश्चाह का च में शक्तिरात चिन्त्य मुहुर्महः॥
समय क्या है, कौन मित्र हैं, आमदनी और खर्चा क्या है, मैं स्वयं क्या हूँ और मुझमें कितनी शक्ति है- ये छः बातें मनुष्य को बार-बार बराबर सोचते रहना चाहिए।
सत्य के लिए क्रूरता का सामना-
बगदाद के सन्त हंबल बन्दी बने, खलीफा के न्यायालय में खड़े थे। उनका मन बार-बार शासन की क्रूरता के प्रति सोच रहा था। वह बड़े असमंजस में थे, तभी द्वार पर पहरा देने वाले सिपाही ने आकर उनके कान में कहा-’हजरत! आज सच्ची वीरता दिखाने का दिन है और आप असमंजस में पड़े हुए हैं। मुझे आश्चर्य है कि आप पर कुरान का अपमान करने का आरोप लगाया गया है, जबकि आपने सारा जीवन कुरान की शिक्षाओं पर चलने में लगा दिया है! ऐसे महापुरुष की तो पूजा होनी चाहिए थी, जबकि उसके विपरीत कैदी बनाकर उपस्थित किया गया है। एक बार मैंने चोरी की, तो खलीफा ने एक हजार कोड़े की सजा सुनाई थी। सचमुच मैं चोर था, मुझे अपना अपराध स्वीकार कर लेना चाहिये था, पर मैं अपनी जिद पर डटा रहा और हजार कोड़ों की मार सह कर भी उस चोरी का रहस्य न खुलने दिया। आखिरकार मुझे छोड़ दिया गया। जब मैं झूठ के लिये अपने कलेजे को इतना मजबूत कर सकता था, तो फिर आप सत्य बात के लिये इतने भयभीत क्यों होते हैं?’
सन्त के मन पर छाया भय का भूत जाने कहाँ चला गया। उन्हें अन्धकार में प्रकाश की एक किरण दिखाई देने लगी। वे बोले-’सचमुच तुम ठीक ही कहते हो। तुमने समय पर मुझे जगा दिया, इसके लिये सदैव तुम्हारा आभारी रहूँगा।’ और दूसरे ही क्षण सन्त ने खलीफा के न्यायालय में धर्मांधों के रोष का बहादुरी के साथ सामना करने के लिये करने अपने को समर्थ पाया।
दूसरे दिन खलीफा द्वारा पूछे गये सारे प्रश्नों का सन्त ने सही-सही उत्तर दे दिया। वह पहले ही सोच चुके थे कि अधिक-से-अधिक मृत्यु-दण्ड ही तो दिया जा सकता है। खलीफा ने हजार बेंत लगाने का आदेश सुना दिया। उनका शाँत चेहरा जैसा था, वैसा ही बना रहा। न्यायालय के बाहर खड़े सैंकड़ों व्यक्ति तरह-तरह की बातें कर रहे थे। नौकरों द्वारा कोड़े बरसाये जाने लगे। सन्त का शरीर चोट खाकर बेहोश हो गया। वह सत्य के लिये मरते दम तक शासन की क्रूरता को सहन करते रहे, पर उस चोर सिपाही के वचन को न भूले।
जिन दिनों भगवान बुद्ध श्रावस्ती के जैतवन में विचरण कर रहे थे, उन्हीं दिनों सुप्पारक तीर्थ में साधु बाहिय दारुचीरिय पर लोगों की श्रद्धा और सम्मान के सुमन चढ़ रहे थे। दारुचीरिय वासना पर विजय पा चुके थे। धन से कोई मोह नहीं रहा था, पर सम्मान को पचा सकना उन्हें भी कठिन हो गया। लोकेषणा को प्रबलतम ऐषणा मानना वस्तुतः शास्त्रकारों की सूक्ष्म-दृष्टि का ही परिचायक है। मान और अपमान में समान भाव रख पाना सचमुच बहुत दुष्कर है, उस कोई विरला योगी ही सिद्ध कर सकता है।
दारुचीरिय जहाँ भी जाते, लोग उनके चरणों पर धन, सम्पत्ति, वस्त्र उपादानों के ढेर लगा देते। यह देख कर उनके मन में वितर्क उठा-अब मेरा योग सिद्ध हो गया और मैं स्वयं एवं मुक्ति का अधिकारी हो गया।
इस प्रकार का अहंकार लिये जब वह आश्रम लौटे वृद्ध गुरु के तीक्ष्ण वीक्षण से उनका यह अहंभाव छिपा नहीं रह सका। दारुचीरिय को पास बुलाकर उन्होंने कहा-वत्स! जाओ, समिधा ले आओ। प्रातःकाल के यज्ञ की तैयारी कर दें।
दारुचीरिय ने उपेक्षा की और कहा-भगवन्, अब मुझे कर्म करने की आवश्यकता नहीं रही। मैं अर्हत् मार्ग पर आरुढ़ हो चुका हूँ।
यह तो बड़ी प्रसन्नता की बात है-गुरु ने स्नेहमीलित स्वर में कहा और पूछा-तात! आप गौतम बुद्ध को तो जानते हैं?
हाँ-हाँ महात्मन्! मैं उन्हें अच्छी तरह जानता हूँ। वे इन दिनों जैतवन में परिव्राजक हैं। उन्होंने भी अर्हत मार्ग सिद्ध कर लिया है। मुझे इस बात का पता है।
“तब तो आप एक बार उनके दर्शन अवश्य कर आएं” तपस्वी ने धीरे से कहा-सम्भव है उनके सामीप्य से आपके ज्ञान-चक्षु कोई नवीन प्रकाश प्राप्त कर लें।
दारुचीरिय सुप्पारक से चल पड़े और थोड़े ही समय में श्रावस्ती जा पहुँचे। अनाथपिण्डक के जैतवन में पहुँचने पर बुद्ध तो नहीं मिले, पर वहाँ उनके अनेक शिष्य भिक्षुगण विचरण कर रहे थे। दारुचीरिय ने पूछा-आप लोग बता सकते हैं कि भगवान् बुद्ध कहाँ है? इस पर एक भिक्षु ने बताया-महानुभाव! वे भिक्षाटन के लिये श्रावस्ती गये हुए हैं। तृतीय पहर तक लौटेंगे। आप यहीं विश्राम करें।
दारुचीरिय आश्चर्यचकित रह गए। इतने भिक्षुओं के होते हुए भी भगवान् बुद्ध को भिक्षाटन की क्या आवश्यकता पड़ी। अभी चलकर देखता हूँ, बात क्या है? यह सोचकर वे श्रावस्ती की ओर चल पड़े। एक सद्गृहस्थ के घर भीख माँगते हुए उनकी भेंट भगवान् बुद्ध से हो गई। दारुचीरिय ने देखा-उनके मन में न किसी प्रकार का हर्ष है, न शोक। विशुद्ध शाँत मन से बैठे भगवान् बुद्ध को उन्होंने प्रणाम किया और कहा-भगवन् मुझे बन्धन-मुक्ति का उपदेश करें।
बुद्ध बोले-अवुस! यह उचित समय नहीं है। तुम जैतवन चलो, वहीं आकर बातचीत करेंगे।
किन्तु दारुचीरिय ने वही बात फिर दुहराई-भगवन्, मुझे अनासक्ति का तत्वज्ञान समझायें, जब तक आप ऐसा नहीं करेंगे, मैं यहाँ से नहीं जाऊँगा।
तब भगवान् बुद्ध बोले-तात्! जो एक बार में केवल एक ही कर्म में इतना तल्लीन हो जाता है कि उसकी दूसरी इन्द्रियों का भाव ही शेष नहीं रह जाता, ऐसा कर्मयोगी ही सच्चा अनासक्त और अर्हत्-आरुढ़ है। जिसकी चित्तवृत्तियाँ एक ही समय में चारों ओर दौड़ती हैं, वही आसक्ति है एवं वही संसार के दुःखों में भ्रमण करता है। दारुचीरिय को तब अपनी भूल का पता चल गया। वे वहाँ से लौट पड़े। उनकी यह भ्राँति जाती रही और कर्म को पूर्ण तन्मयता तथा आत्म-साधना मानकर करने की शिक्षा लेकर लौटे। यही तो बन्धन-मुक्ति का राज-मार्ग था, सो उन्हें बुद्ध के क्रिया-योग का दर्शन कर स्वयमेव मिल गया।
विज्ञान का मत है कि पदार्थ और उसके रासायनिक संवेग ही सत्य हैं। पदार्थ से परे भी कोई आत्मा या परमात्मा नाम की कोई सूक्ष्म सत्ता काम कर रही है-विज्ञान की इस सम्बन्ध में कोई श्रद्धा नहीं। विज्ञान की यह मान्यता मेंढक-विश्वास के समान है।
एक कुँए में एक मेंढक रहता था। एक हँस मान-सरोवर से उड़ता हुआ उधर आ पहुँचा। उसने कुएँ में देखकर कहा-ओ कूप-मण्डूक! इस संकीर्ण क्षेत्र में पड़े रहने में क्या आनन्द? आओ, देखो तो संसार कितना विराट् है। यहाँ कैसी-कैसी वैभव-विभूतियाँ फैली हुई हैं।
मेंढक ने कुएँ का का एक चक्कर लगाया और हंस से पूछा-”तुम्हारी दुनिया इतनी बड़ी है?” हंस मुस्कराया और कहने लगा-इससे भी बड़ी है। मण्डूक ने अब कुँए के दस-बीच चक्कर काटे और फिर पूछा-तो फिर तुम्हारी दुनिया इतनी बड़ी होगी? हंस को हँसी आ गई। उसने कहा-बन्धु! यह तो उस विशालता की तुलना में हाथी के आगे चींटी के सिर से भी छोटा हैं। मेंढक इस बार देर तक 100-200 चक्कर मारता रहा, फिर रुककर बोला-तो भाई हंस! तुम्हारा संसार इतना बड़ा होना चाहिए।
हंस गम्भीर होकर बोला-बन्धु! तुम जिस स्थिति में पड़े हो, विश्व की विशालता का दिग्दर्शन करना उससे सम्भव नहीं। यह कहकर हंस वहाँ से उड़कर चल आया।
आज के तथाकथित पदार्थवादी या बुद्धिवादी लोगों की आध्यात्म और धर्म के सम्बन्ध की मान्यतायें भी कूप-मण्डूक की तरह हैं। तो भी संसार आज जिस विश्वास पर और प्रत्यक्षवादी दर्शन पर चल रहा है, उसे देखते हुए हमें विरोध नहीं व्यक्त करना चाहिए कि सचमुच विज्ञान का धर्म के सम्मुख कोई अस्तित्व नहीं।
चींटी एक बार में अधिक-से-अधिक एक वर्ग इंच दूरी की वस्तुएं देख सकती है। इसका यह अर्थ नहीं कि उसकी दुनिया को कुल एक योजन की अधिकतम सीमा में ही मान लिया जाय। विज्ञान पढ़ने और सुनने वालों की आंखें यदि केवल थोड़े-से वैज्ञानिक निष्कर्षों तक ही बुद्धि दौड़ाकर कोई निष्कर्ष निकाल रही हों तो, न तो उनकी बात को सत्य ही माना जा सकता है और न ही उन्हें झूठा सिद्ध किया जा सकता है। किसी अन्तिम निर्णय पर पहुँचने के लिये हमें वैज्ञानिकों का मत भी जानना अनिवार्य है, क्योंकि उनके मस्तिष्क की दौड़ सामान्य पाठक से भिन्न होती है।
इंग्लैण्ड के प्रसिद्ध वैज्ञानिक श्री जे0 आर्थर हिल ने ‘आत्म-विज्ञान और धार्मिक विश्वास’ (साइकिकल साइन्स एण्ड रिलीजियस विलीफ) नामक पुस्तक में विज्ञान की अपूर्णता और धर्म की आवश्यकता पर प्रकाश डालते हुए लिखा है-
“जब भी हमारे सामने धर्म शब्द आता है हमें एक आध्यात्मिक संसार की कल्पना करनी पड़ती है। आध्यात्मिक संसार का अर्थ है कि हमें यह विश्वास करना चाहिए कि यह भौतिक विश्व ही सब कुछ नहीं है। व्यक्तिगत अस्तित्व (इन्डिविजुअल एक्जिस्टैन्स) हमारे शारीरिक अन्त तक ही सीमित नहीं है। हमें इस भौतिक विश्व में ही यह बोध होता है कि कुछ ऐसी भी घटनायें (फेनामेना) इस संसार में घटती रहती हैं, जो हमें भौतिक सिद्धान्तों से आगे ले जाती हैं। यह प्रतिक्रियायें ही हमें भौतिकतावादी आस्था से धार्मिक विश्वास में अस्तित्व का भान कराने का कारण बनती हैं।”
एक बच्चा जन्म से ऐसी प्रतिभायें लेकर आता है, जो उसके माता-पिता ही नहीं, परिवार के किसी भी सदस्य में नहीं होतीं। माता-पिता बड़े साहसी और धार्मिक निष्ठाओं वाले होते हैं, पर उनके बच्चे प्रारम्भ से ही भयभीत और बुरे स्वभाव वाले। जो बच्चा सारी बातें अपने माता-पिता से अनुकरण कर सीखता है, उसके लिये भय एक पूर्व संस्कार ही हो सकता है और वह किन्हीं-न-किन्हीं घटनाओं और परिस्थितियों के कारण होता है। ये घटनायें और परिस्थितियाँ जब इस जन्म की नहीं हुईं, तो उससे निश्चित होता है कि इस नये जन्म से पूर्व वह एक व्यवस्थित जीवनयापन कर चुका है।
11 नवम्बर 1969 के ‘वीर अर्जुन’ में बम्बई का एक समाचार इस प्रकार छपा है-”बम्बई 10 नवम्बर। हीरालाल कर्णावत नामक एक अद्भुत स्मरण- शक्ति सम्पन्न 6 वर्षीय बालक उज्जैन से यहाँ आया है। संस्कृत साहित्य का पर्याप्त ज्ञान तो इसे प्रभु-प्रदत्त वरदान ही प्रतीत होता है।”
“इस बालक के पिता श्री रामचन्द्र कर्णावत ने डिप्टी कलेक्टरी के पद का परित्याग कर शिक्षण कार्य अपनाया था। उनका कथन है कि पाँच वर्ष की आयु में ही हीरालाल संस्कृत ग्रन्थों का अध्ययन करने की हठ करने लगा था। तब से अब तक वह विभिन्न धार्मिक विषयों के सौ से भी अधिक संस्कृत ग्रन्थों का अध्ययन कर चुका है। वह गीता के किसी भी श्लोक को उद्धृत कर उसकी व्याख्या कर सकने में समर्थ है। उसने विगत 15 मास से तो जैन धर्म और संस्कृत ग्रन्थों पर विशाल जन समुदाय के समक्ष अनेक भाषण भी किये हैं। वह 15 मिनट से लेकर 1 घन्टे तक बोलने की क्षमता रखता है।”
ऐसे ही पूर्वाभास, स्वप्नों में घटित होने वाले सत्य, भविष्यवाणी का सत्य होना और अन्तरिक्ष की असीमता का जितना अधिक चिन्तन करते हैं, धार्मिक विश्वास उतने ही परिपुष्ट होते चले जाते हैं। हमें विश्वास करना पड़ता है कि दृश्य संसार में कुछ अदृश्य सत्य भी हैं जो दिखाई तो नहीं देते, पर मनुष्य उन संवेगों से भी चिरकाल से जुड़ा हुआ है। जब तक वे सुखी नहीं होते, मनुष्य पूर्णतः सुखी नहीं हो पाता।
श्री आर्थर हिल स्वीकार करते हैं-”विज्ञान और धर्म विरोधी नहीं ही हैं। हमारी धार्मिक चेतनायें और आध्यात्मिक ज्ञान सत्य को पाने का एक यथार्थ या उचित मार्ग हैं, क्योंकि उससे हमें अपने भीतर उठने वाली जिज्ञासाओं का समाधान मिलता है। मान लिया कि हम पदार्थों के बारे में बहुत-सी जानकारी प्राप्त कर लेते हैं, पर उससे जीवन का उद्देश्य तो सिद्ध नहीं हो जाता। यदि पदार्थों का सुख ही वास्तविक सुख है, तो हमें मृत्यु से पूर्व किसी ऐसे स्थान को प्राप्त कर लेना चाहिए था, जहाँ हमारी सभी सुख की इच्छायें सन्तुष्ट हो जातीं। पर ऐसा स्थान कहाँ हैं? हम अमरता की इच्छा क्यों करते है? क्यों सुख को चिरस्थायित्व देने का प्रयत्न करते हैं? इससे हमें लगता है कि अन्तर्ज्ञान और अनुभूतियाँ (इंट्यूशन एण्ड इन्स्पायरेशन्स) वास्तविक हैं, पदार्थ-ज्ञान का महत्व केवल शरीर धारण किये रहने तक है, इसीलिये वह कम उपयोगी है। धर्म स्थाई जीवन का उद्देश्य और व्यवहार बताता है, इसलिये उसका मूल्य और महत्व होना चाहिए।”
विज्ञान उन पदार्थों के समान है, जो हमारे खेलने में, प्रसन्नता बढ़ाने में मदद करते हैं। पर वृद्धा माँ जानती है कि यह सारी सामग्री खेलने और बच्चे के समुचित विकास भर के लिये आवश्यक है। इसीलिये जैसे ही बच्चा बड़ा हुआ।
धर्म सीधी लकीर नहीं, बल्कि विशाल वृक्ष है। उसके करोड़ों पत्ते हैं, जिनमें दो पत्ते भी एक-से नहीं हैं।
-महात्मा गाँधी
वह छोटी साइकिल, छोटी गेंद, लकड़ी की घोड़ा-गाड़ी आदि सब छीन लेती है और बड़ी वस्तुएँ देती है, जिससे वह गृहस्थ-पालन व समाज-सेवा की जिम्मेदारी पूरी करता है। कोई बड़ा होकर भी यदि वही खेल-खिलौने माँगे, तो उस पर हंसा ही जा सकता हैं। वृद्धा इस बात को जानकर ही छोटी वस्तुएँ छीन लेती है।
आज विज्ञान की उपलब्धियाँ सामान्य स्तर की नहीं रहीं। वह अनुभव कर रहा है कि कोई पदार्थ से भी बड़ी सत्ता संसार में है। यदि ऐसी सम्भावना है, तो उसे प्रत्यक्ष वादी मान्यताओं तक ही सीमित न रहकर धर्म और अध्यात्म के सूक्ष्म जगत् में प्रवेश की प्रेरणा भी मनुष्य को देनी चाहिए। धर्म की आँख विज्ञान से बड़ी और यथार्थ है। जब तक हम वह दूसरी आँख भी नहीं खोलते, तब तक अपने और संसार के वास्तविक स्वरूप को उसी प्रकार समझ न सकेंगे, जिस प्रकार पानी में पड़े मेंढक ने केवल कुएँ को ही संसार समझा और उसी में चहकता-फुदकता रहा
प्रकाश एक सेकेण्ड में 186000 मील चलता है। एक दिन में 186000 60 60 24 और 1 वर्ष में 186000 60 60 24 365 5602196000000 मील चलता है। लम्बी दूरियाँ जो मील, गज, फीट, इंचों में नहीं नापी जा सकतीं, उन्हें नापने के लिये वैज्ञानिकों ने प्रकाश वर्ष की कल्पना की। एक प्रकाश वर्ष का अर्थ हुआ 590219600000 मील दूरी।
ऐसे 50 करोड़ प्रकाश वर्षों जितना विराट् इस ब्रह्माँड को वैज्ञानिकों ने माना है। 10 करोड़ नीहारिकायें (नेबुला) प्रकाश धारायें लेकर चलती है और वह अनेकों सूर्यों को जन्म देती है। हमारे लिये प्रत्यक्षतः सूर्य ही उस ब्रह्माँड का जनक, प्राण-प्रतिष्ठता है, जिसमें हम रहते हैं। ऐसे-ऐसे अरबों और सौर-मण्डल विराट् आकाश में भरे पड़े हैं। उस विशालता का अनुमान छोटा-सा मनुष्य स्थूल आँखों से कर भी कैसे सकता है। हम तो गगन-मण्डल के अधिक-से-अधिक 6 हजार तारे ही एक स्थान पर खड़े होकर देख सकते हैं।
सौर-मण्डल के स्वामी सूर्य अरबों छोटे-बड़े गृह-नक्षत्रों को अपनी शक्ति से चलाते हैं। नवग्रह तो उनके सबसे समीपवर्ती कार्यकर्त्ता और सहयोगी हैं। वस्तुतः उनका परिवार कितना विशाल है, उसमें कितने सदस्य हैं, उसकी सही-सही कल्पना नहीं की जा सकती। चींटी के लिये हिमालय पर्वत की माप जितनी कठिन हो सकती है, हमारे लिये उतनी ही दुःसाध्य है सौर मण्डल की इस लम्बाई-चौड़ाई की कल्पना।
लेकिन यह सब अव्यवस्थित नहीं है। सब कुछ मस्तिष्कीय है। गणितीय नियमों पर आधारित है। सूर्य की प्रथम कक्षा में बुद्ध, द्वितीय में शुक्र, तृतीय में पृथ्वी, चतुर्थ में मंगल, पंचम में वृहस्पति छठवें में शनि, सातवें में यूरेनस, आठवें में नेपच्यून और नवें में प्लूटो-इन नवग्रहों की स्थिति, कक्षा का अध्ययन और उनके ज्योतिर्विज्ञान द्वारा एक समय भारतीय प्रकृति की सूक्ष्म हलचलों को भी जान लिया करते थे। आज भी वैज्ञानिक मौसम सम्बन्धी अनेक पूर्व जानकारी प्राप्त करते रहते हैं। यूगोस्लाविया आदि में तो इनका मानवीय आचार-संहिता से भी सम्बन्ध जोड़ा जाने लगा है-यह सब बताता है कि सौरमण्डल के नियम विधान किसी विश्वव्यापी विधान की व्याख्या और अंग मात्र हैं। ऐसा नहीं कि जो कुछ हो रहा कि वह निरर्थक, बिना किसी की प्रेरणा या किसी सत्ता के नियन्त्रण के बिना हो रहा है, चाहे उस शक्ति को शक्ति भर कहें, देवता या भगवान्। कल्पना में वह वस्तु एक ही हो सकती है-सूर्य की तरह सर्वव्यापी और सर्व समर्थ शक्ति।
सूर्य के मध्य भाग में 50000000 डिग्री गर्मी भरी पड़ी है। इस महाशक्ति का 20000 वाँ हिस्सा ही वह प्रकृति के विकास, विनाश और सन्तुलन में काम लेता है। शेष भाण्डागार शायद इसलिये सुरक्षित हैं कि कोई उपयुक्त पात्र आये और किसी ईश्वरीय प्रयोजन की पूर्ति के लिये शक्ति की आवश्यकता अनुभव करे, तो उसे इतनी शक्ति दी जा सके, जिससे वह कैसे भी ध्वंस या निर्माणकारी कार्यक्रम सुभीते से चला सकें। एक समय हम भारतीय इस अक्षय शक्ति का स्वामित्व और भागीदारी प्राप्त किया करने थे और ऐसे-ऐसे अतीन्द्रिय चमत्कार दिखाया करते थे, जो आज अमेरिका और रूस के वैज्ञानिक भी दिखा नहीं पाये।
वृक्ष, वनस्पति पैदा करना सूर्य का काम है। वायु का चलाना सूर्य का काम। ऋतु-परिवर्तन, प्रकाश, ताप और विद्युत शक्ति बाँटना सूर्य का काम। गुरुत्वाकर्षण द्वारा सम्पूर्ण ग्रहों को स्थिर रखना भी उसी की सामर्थ्य में है। कॉस्मिक किरणों (अल्फा किरण, बीटा किरण और गामा किरण) के द्वारा सम्पूर्ण सौरमण्डल में त्रिगुणात्मक चेतना फैलाने का काम सूर्य भगवान ही करते हैं। इसे उपनिषदों में सावित्री विद्या कहा है। यह गायत्री की ही स्थूल चेतना का ज्ञान है। आज अयन मण्डल (आइनोस्फियर) के नाम से इस सम्बन्ध की बहुत-सी बातें वैज्ञानिक भी जानने लगे हैं।
यह जानकारियाँ इतनी अधूरी हैं कि उतने मात्र में हमारी जिज्ञासा का समाधान नहीं हुआ। एक बार ऐसी ही उलझन एक ऋषि के समक्ष आई थी। उन्होंने आकाश की ओर आँखें फाड़कर देखा, तो स्तब्ध रह गए थे। उन्होंने समझ लिया था कि विराट् ब्रह्माण्ड के दर्शन स्थूल आँखों से नहीं किये जा सकते। यन्त्र भी कुछ ठोस सहायता देने वाले नहीं। विराट् दर्शन की जिज्ञासा भी इतनी प्रखर हो उठी थी कि ऋषि के लिये चुपचाप बैठना कठिन हो गया था।
तब उन्होंने आत्म-चेतना पर नियन्त्रण करने का अभ्यास प्रारम्भ किया। ध्यान द्वारा चित्तवृत्तियाँ एकाग्र कर उन्होंने मनो-जगत में प्रवेश किया तो पाया कि जो कुछ भी इस विराट् विश्व में है सौरमण्डल उसका एक नमूना है, उदाहरण है और जो कुछ सौरमण्डल में वह सब अण्ड (परमाणु) में है अर्थात् परमाणु में ही विराट् विश्व समाया हुआ है, इसीलिये हमें बड़े-से-बड़े बनने और अन्तरिक्ष बेधकर सुदूर नक्षत्रों में दौड़ने का कष्ट व समयसाध्य अभ्यास की आवश्यकता नहीं, वह सब हम छोटे-से-छोटे होकर जहाँ हैं, वहीं थोड़े समय में प्राप्त कर सकते हैं।
ब्रह्माँड की प्रतिकृति परमाणु पदार्थ का वह छोटे-से-छोटा टुकड़ा है, कण है जिसके और टुकड़े नहीं हो सकते। जो स्वतन्त्र अवस्था में उसी प्रकार नहीं रह सकता, जिस प्रकार सामाजिक आश्रय का पूर्ण परित्याग करके कोई जीवित नहीं रह सकता। किन्तु यही छोटे-से-छोटा अविभाज्य कण अपने भीतर पूरा सौर जगत् छिपाये है। योग-वसिष्ठ में कहा है-
परमाणौ परमाणौ सर्गवर्गा निरर्गलम्।
महाचितैः स्फुरन्त्यर्कसचीव त्रसरेणवः॥
-योग वसिष्ठ 32/7/29
अर्थात् सृष्टि के परमाणु-परमाणु के भीतर अनन्त सृष्टियाँ हैं। यह ऐसा ही है जैसे सूर्य की किरणों में अनेक त्रसरेणु दिखाई देते हैं।
आज का विज्ञान इस बात की अक्षरशः पुष्टि करता है। भौतिक विज्ञान के अनुसार पदार्थ का छोटे-से-छोटा टुकड़ा एक वैसा ही ब्रह्माण्ड है, जैसा सौर-मण्डल। जहाँ से उसकी स्थूलता समाप्त होकर सूक्ष्मता प्रारम्भ होती है, वहाँ आकाशीय पिण्डों की विलक्षण गतिविधियाँ देखने को मिलती हैं। सूर्य की तरह सबका स्वामी नाभिक (न्यूक्लियस) होता है। शक्ति और सामर्थ्य में भी वह सूर्य की तरह ही प्रखर और प्रचण्ड होता है।
नाभिक के आस-पास किसी तत्व में 1 कि.मी. में 7, 10, 15, 18, 22 आदि इलेक्ट्रॉन उसी तरह चक्कर लगाते रहते हैं, जिस तरह सूर्य के आस-पास ग्रह-उपग्रह चक्कर काटते हैं। क्लाड-सिद्धान्त (क्लाड थ्योरी) के अनुसार परमाणु में सौरमण्डल की तरह ही आकाश, ग्रह-नक्षत्र, उनका परिभ्रमण, उल्कापात आदि सब कुछ किसी क्रम-व्यवस्था में होता रहता है। जिस प्रकार परमाणु को एक केन्द्रीय सत्ता बाँधे है और सौरमण्डल को सूर्य उसी प्रकार समूचे ब्रह्माण्ड को भी एक आदि-शक्ति द्वारा बँधा होना चाहिये। ईश्वर के अस्तित्व का वह सबसे बड़ा प्रमाण है, जो विश्वास के बाद कसौटी पर खरा उतरता है। यह शक्ति ही संसार में व्यवस्था स्थापित करती है।
न्यूक्लियस में धन आवेश वाले कण (पार्टिकल्स) पाये जाते हैं, उन्हें ही प्रोटान्स कहते हैं। नाभिक में ही दूसरे प्रकार के कण होते हैं, जिसका भार हाइड्रोजन के परमाणु के बराबर होता है, किन्तु विद्युत् आवेश नहीं होता, उन्हें न्यूट्रॉन कहते हैं। परमाणु का भार प्रोटान और न्यूट्रॉन का सम्मिलित भार ही होता है। इसका व्यास 0000.000000001 मिलीमीटर अर्थात् प्रायः कुछ भी नहीं होता। वह कुछ भी नहीं है और उसी पर सारे परमाणु की सत्ता आश्रित है यह परस्पर विरोधी बाते हैं, पर यह है सत्य। तात्पर्य यह है कि नाभिक (न्यूक्लियस) का शक्ति भाग सूर्य हैं। उसकी समस्त क्रियायें सूर्य की तरह ही होती हैं।
परमाणु में रेडियो सक्रियता (रेडियो एक्टिविटी) नाभिक का ही गुण है। इसमें सूर्य की तरह तीन किरणें निकलती रहती हैं-1. अल्फा किरण, 2. बीटा किरणें, 3. गामा किरणें। अल्फा किरणें धन आवेशयुक्त (पॉजिटिव चार्ज) होती हैं, परन्तु गैसों को आयनीकृत (आयोनाइज) करने की क्षमता होती है। यह सादृश्य सूर्य से ज्यों-का-त्यों है। सूर्य भी अल्फा रेंज के माध्यम से हीलियम गैस ही निकालता (एमिट) है। यह छोड़ी हुई गैस या अल्फा किरणें ही आइनोस्फियर का निर्माण करती हैं, इसीलिये न्यूक्लियस को ही परमाणु का सूर्य या विश्वव्यापी चेतन सत्ता कहना चाहिये।
परमाणु का यह त्रसरेणु भी प्रकाश की गति के अनुसार ही चलता है। ग्रहों की तरह इलेक्ट्रॉन के कक्षा-पथ और उनके चलने, टूटने, एक कक्षा में कूदने की गतिविधियाँ भी परमाणु में अहर्निश चलती रहती हैं। गुरुत्वाकर्षण की भाँति एक शक्ति, जिसे केंद्र की ओर खींचे रहने वाली (सेण्ट्रीफयूगल फोर्स) कहते हैं, भी काम करते रहती है। नाभिक (न्यूक्लियस) की शक्ति का विस्तृत परिचय नाभिक विद्या (न्यूक्लियर साइन्स) संबंधी किसी लेख में अलग देंगे, तब उसकी क्षमता का पता चलेगा। संक्षेप में एक परमाणु की सारी शक्ति का विस्फोट कर उसे नियन्त्रण में ले लिया जाये, तो उससे इतनी गर्मी पैदा होगी, जिससे 27000 क्विन्टल जल क्षण भर में उबालकर उड़ाया जा सके।
ब्रह्माँड की दूरी का अनुमान नहीं किया जा सकता। पर परमाणु के नाभिक के अन्दर के प्रोटानों की दूरी तो कुल 1/2000000000000 इंच होती है। यदि यह दूरी आधा इंच होती, तो उन दोनों के बीच की दूरी 1/4 इंच होने पर शक्ति सोलह गुनी होती। 1/2 इंच होने पर 64 गुनी-तात्पर्य यह कि ब्रह्माँड की जो शक्ति विस्तार में हैं, परमाणु में वही शक्ति प्रोटानों की समीपता में है। पति-पत्नी जितने प्रेम और आत्मीयता से रहते हैं, उनकी शक्ति उतनी ही अधिक होती है। इसका अनुमान इस व्याख्या से चलता है अर्थात् दो प्रोटानों के बीच में 1/2000000000000 इंच की दूरी के बीच इतनी शक्ति होगी, जो इस्पात की 10 इंच मोटी चादर को भी काटकर रख देगी।
विराट् ब्रह्माँड की शक्तियों का कोई पारावार नहीं, पर अण्ड की शक्तियाँ उससे भी अधिक चमत्कारिक हैं। बड़े घेरे में हजार व्यक्तियों को बैठाया जा सकता हैं, पर यदि छोटे-से बिन्दु में सिन्धु भरा हो, तो उसे चमत्कार ही कहा जायेगा। यह चमत्कार सृष्टि के प्रत्येक परमाणु में भरा है, उस ध्यान-प्रणाली और योग-विद्या को जान लें, तो सूर्य की तरह हवा, पानी, आकाश, ग्रह, नक्षत्रों, पृथ्वी, पौधों, ऋतु, वनस्पतियों तक भी इच्छित परिवर्तन कर सकते हैं। भारतीय योगी इसी शक्ति के द्वारा विश्व-विजयी होते रहे हैं।
जिसका देह और मन शुद्ध न हो उसका मन्दिर में जाकर भगवान की पूजा करना व्यर्थ है। जिनके देह और मन दोनों पवित्र हैं, भगवान् उन्हीं की प्रार्थना सुनते हैं।
वन में खड़े एक पौधे के साथ लिपटी हुई एक लता भी धीरे-धीरे बढ़ कर पौधे के बराबर हो गई। पौधे का आश्रय लेकर उसने फलना-फूलना आरम्भ कर दिया।
बेल को फलते-फूलते देखकर वृक्ष को अहंकार हो गया कि मैं न होता, तो लता कब की नष्ट हो गई होती। उसने धमकाते हुए कहा-”ओ री बेल! मैं जो कुछ कहूँ, तू उसका पालन किया कर, नहीं तो तुझे मारकर भगा दूँगा।”
अभी वह लता को डाँट ही रहा था कि दो पथिक उधर से निकले। एक बोला-बन्धु! देखिये, यह वृक्ष कैसा शीतल और सुन्दर है। इस पर कैसी अच्छी लता पुष्पित हो रही है-आओ, यहाँ कुछ देर बैठकर विश्राम करें।
अपना सारा महत्व लता के साथ है, यह सुनकर वृक्ष का सारा अभिमान नष्ट हो गया। उस दिन से उसने लता को धमकाना बन्द कर दिया।
करुणा की ओर संकेत करते हुए 5 वर्ष की लड़की शुक्ला ने कहा-यह हमारे ‘तूमी’ हैं। खेतू नामक करुणा के बड़े भाई को उसने मीनू के चाचा और श्री हरिधन चक्रवर्ती की ओर संकेत से ही उसने कहा-यह मीनू के पिता हैं। और ‘मीनू’ को तो देखते ही उसकी वर्षों की करुणा और ममता फूट पड़ी थी। वह पाँच वर्ष की ही बालिका, पर एक प्रौढ़ माता की तरह उसकी आँखों से आँसू भरने लगे।
‘तूमी’ बंगाल में छोटे देवर को कहते हैं। करुणा को उसकी बड़ी भाभी ही तूमी कहती थी और सब कुटी कहा करते थे। इससे घटनास्थल पर उपस्थित सभी व्यक्ति आश्चर्यचकित हुए बिना नहीं रह सके। पच्चीस-तीस व्यक्तियों के बीच अपने पूर्वजन्म के पति, देवर, श्वसुर और पुत्री को पहचान लेना जितना कौतूहल वर्द्धक था, उतना ही इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण भी कि पुनर्जन्म भारतीय तत्वदर्शन की मात्र कोरी कल्पना नहीं वरन् प्रमाणभूत वैज्ञानिक सत्य है और उसी सत्य को आधार मानकर ही भारतीय आचार संहिता में कर्मफल को इतना अधिक महत्व दिया गया कि एक छोटे-से-छोटे जीव को भी मारना या कष्ट देना पाप समझा गया। कर्म-अकर्म के पग-पग पर इतने अधिक प्रतिबन्ध और किसी भी देश, धर्म या संस्कृति में नहीं, जितने भारतीय समाज में। अब नहीं तो एक दिन यह प्रमाण और विज्ञान की उपलब्धियाँ लोगों को बतायेंगी कि मानवीय चेतना कर्म-फल से कितनी दृढ़ता के साथ बंधी हुई हैं। अभी तो यही विश्वास कर लिया कि मृत्यु के बाद भी मनुष्य जीवित रहता है, तो यही काफी है। यह घटना उसकी पुष्टि का एक प्रबल प्रमाण ही है।
शुक्ला का जन्म सन् 1954 में पश्चिमी बंगाल के कम्पा नामक गाँव में श्री के0 एन॰ सेन गुप्ता के यहाँ हुआ। अभी वह कोई दो वर्ष की ही हुई थी और बोलने का हल्का सा ही अभ्यास हुआ था, तभी वह कोई गुड़िया, लकड़ी या जो कुछ भी खेलने को पाती, उसे ही ‘मीनू-मीनू’ कहकर अपने हृदय से लगा लेती। किशोर बालिका में मातृत्व के यह प्रौढ़ संस्कार घर वालों को आकृष्ट अवश्य करते, पर किसी ने उस पर उसी तरह गंभीरता से ध्यान नहीं दिया। जिस प्रकार हम आत्मा, परमात्मा, मृत्यु आदि अविच्छिन्न रूप से जुड़े होने पर भी न तो उनकी ओर कभी ध्यान देते हैं और न प्राप्ति के प्रयत्न ही करते हैं।
शुक्ला जैसे-जैसे बड़ी होने लगी, उसके मस्तिष्क में पूर्व जन्म की स्मृतियाँ और भी तीव्रता से उभरने लगीं। वह अपनी माँ से, पिता से और सब घर वालों से कहती-मेरी ससुराल भारपाडा के रथलता स्थान में है। मेरे पति मुझे एक ही बार सिनेमा दिखाने ले गये थे। उस पर सास बड़ी नाराज हुई थी। मेरी लड़की का नाम मीनू है। आप लोग मुझे रथलता ले चलिये, मुझे अपनी मीनू की बहुत याद आती है। मरने से लेकर मुझे अब तक भी उसकी याद नहीं भूलती।
शुक्ला अभी पाँच वर्ष की ही थी, पर इतनी बातें बताती थी कि घर वाले हैरान रह जाते। पता लगने पर मालूम हुआ कि सचमुच वहाँ से कोई 15 मील दूरी पर रथलता स्थान है। वे लोग एक दिन शुक्ला को लेकर वहाँ पहुँचे और गाँव के किनारे ही ले जाकर छोड़ दिया। इसके बाद शुक्ला गलियों-गलियों होती हुई अपने ससुराल के घर जा पहुँची।
इसके बाद उसने अपने पूर्व के सभी संबंधियों को न केवल पहचान लिया वरन् प्रत्येक के साथ उसने भारतीय नारी के आदर्शानुरूप लज्जा व संकोच का प्रदर्शन भी किया। उसने बताया कि मेरा पहले का नाम ‘मना’ था। डॉ0 पाल आदि परामनोविज्ञान के शोधकर्ताओं को कई ऐसी बातें भी बताईं, जो उसके पति के अतिरिक्त और कोई नहीं जानता था और वे सच भी निकलीं। इस पर सभी को यह विश्वास हो गया कि पुनर्जन्म का सिद्धाँत वस्तुतः कोई गंभीर विषय है, उसकी उपेक्षा नहीं की जानी चाहिये।
विकासवाद के समर्थक प्रो0 सोलस, शिम्पर, हैकैल कीथ और डॉक्टर चर्च आदि ने इस सिद्धान्त के आधार पर पृथ्वी पर प्राणियों का जीवनकाल कुल 820000 वर्ष स्थिर किया है इसमें जीवों के क्रमिक विकास में ही अधिकाँश समय लग जाता है और मनुष्य की उत्पत्ति का समय कुछ हजार वर्ष ही रह जाता है। ईसाई मत में आदम से नोआ की 11 पीड़ियों का कुल समय 2262 वर्ष और नोआ के शेग से इब्राहीम तक 1310 वर्ष कुल 3572 वर्ष मनुष्य की उत्पत्ति के होते हैं। स्पीगल की मान्यता में थोड़ा अन्तर है उन्होंने यह अवधि 6993 वर्ष की मानी हैं कुछ और संशोधन वादियों ने यह समय 7200 वर्ष भी माना है। अधिक से अधिक इतने समय से ही मनुष्य का आविर्भाव अन्य धर्मावलम्बियों के विश्वास में आता है। इतने दिन के इतिहास को ही विभिन्न कालों में बाँट कर धर्म, सभ्यता और दर्शन के विभिन्न स्वरूप इन लोगों ने निकाले हैं।
यों संसार के सभी विद्वानों ने भारतीय ग्रन्थ ऋग्वेद को सबसे प्राचीन ग्रन्थ माना है किन्तु वे उसकी अधिकतम आयु भी सात हजार वर्ष से अधिक नहीं मानते। जबकि हम भारतीय धर्म को सनातन और शाश्वत धर्म मानते हैं हमारा विश्वास है कि पृथ्वी बनने के साथ ही ईश्वरीय इच्छा से परिपूर्ण मनुष्य का आकस्मिक अभ्युदय हुआ। वेद अर्थात् ज्ञान पूर्व पुरुषों-ऋषियों-प्रजापति ब्रह्मा नारायण, अदिति आदि को ईश्वरीय प्रेरणा से मिला। वेदों को अपौरुषेय मानते हैं और यह विश्वास है कि उनमें प्रतिपादित विषय ईश्वरीय इच्छा से और संसार के सम्पूर्ण प्राणियों के हित के लिये हैं। सनातन धर्म का आविर्भाव वेद से ही होता है इसीलिये उसे सनातन धर्म भी कहते हैं। यह ईश्वर, प्रकृति, आत्मा और पदार्थ का वैज्ञानिक अध्ययन है जिसकी सबसे अच्छी जानकारी आदि महापुरुषों को दिव्य ज्ञान के रूप में हुई।
संसार के इतिहास और संवत्सरों की गणना पर दृष्टि डालें तो भी पाश्चात्य मान्यताओं का खण्डन तो तुरन्त हो जाता है। ईसाई संवत् महापुरुष ईसा के जन्म से मानते हैं वह सबसे छोटा अर्थात् 1969 वर्षों का है। इससे अधिक दिन मूसा द्वारा प्रसारित मूसाई संवत् 3536 वर्ष का है। इससे भी प्राचीन संवत् युधिष्ठिर के प्रथम राज्यारोहण से प्रारम्भ हुआ था उसे 4125 वर्ष हो गये, कलियुगी संवत् को 5070 वर्ष, इबरानियन संवत् के अनुसार 5982 वर्ष, इजिप्शियन संवत् 28622 वर्ष, फिनीशियन संवत् 30040 वर्ष। ईरान में शासन पद्धति प्रारम्भ हुई थी नव से ईरानियन संवत् चला और उसे अब तक 189948 वर्ष हो गये। ज्योतिष के आधार पर चल रहे चाल्डियन संवत् को 21500040 वर्ष हो गये। खताई धर्म वालों का भी हमारे भारतीयों की तरह ही विश्वास है कि उनका आविर्भाव आदि पुरुष खता से हुआ। उनका वर्तमान संवत् 88840341 वर्ष का है। चीन का संवत् जो उनके प्रथम राजा से प्रारम्भ होता है वह और भी प्राचीन 96002469 वर्ष का है। अब हम अपने वैवस्तु मनु का संवत् लेते हैं जो चौदह मन्वन्तरों में से एक है उससे अब तक का मनुष्योत्पत्ति काल 120533070 वर्ष का हो जाता है। जबकि हमारे आदि ऋषियों ने किसी भी धर्मानुष्ठान और माँगलिक कर्मकाण्ड के अवसर पर जो संकल्प पाठ का नियम निर्धारित किया था और जो आज तक ज्यों का त्यों चला आता है उसके अनुसार मनुष्य के आविर्भाव का समय 19729400 वर्ष होता है।
भूगर्भ शास्त्री पृथ्वी की आयु चार प्रकार से निकालते हैं पहली गणना परतदार चट्टानों के निर्माण की गति से करते हैं। इस अनुमान का आधार यह है कि जब से महाद्वीप और महासागरों की रचना हुई, वर्षा तभी से प्रारम्भ हो गई होगी। सूर्य के ताप के कारण समुद्र से वाष्प बनना और वृष्टि होना तभी से प्रारम्भ हो गया होगा। वर्षा के साथ ही नदियाँ भी अस्तित्व में आ गई होंगी और समुद्र के साथ उनका लेने और देने का सिद्धान्त भी तभी से चल पड़ा होगा।
विचार और शोध से मनुष्य न जाने कैसी-कैसी आश्चर्यजनक खोजें कर लेता है। मनुष्य के इस छोटे से चिन्तन ने एक बड़े कार्यक्रम को जन्म दिया। सोचा गया कि पृथ्वी में पाई जाने वाली परतदार चट्टानें नदियों द्वारा पृथ्वी के बहाव के कारण हैं नदियाँ बहती हैं तो अपने साथ मिट्टी भी छीलती जाती है यह मिट्टी किसी एक स्थान पर जमा होती गई और उस पर अनेक पर्तें चढ़ती गईं। बहुत अध्ययन के बाद पता चला कि 1 फुट मोटी परत 880 वर्ष में तैयार होती है जबकि अब तक अधिकतम मोटाई वाली चट्टान 5 लाख 14 हजार फुट की मिली है। इस सिद्धान्त के अनुसार पृथ्वी की आयु 514000 * 880 =542320000 वर्ष होती है। इनमें कल्पनाओं का अंश अधिक होने से यह हल भूगर्भ शास्त्रियों ने बाद में स्वयं ही अमान्य कर दिया।
समुद्र के खारेपन से पृथ्वी की आयु निकालने का दूसरा सिद्धान्त भी ऐसा ही है। नदियाँ अपने साथ स्थान-स्थान का खनिज लवण देकर समुद्र में गिरती हैं इससे स्वाध्याय-शील के ज्ञान अनुभवों की तरह समुद्र का खारापन प्रतिवर्ष कुछ न कुछ अधिक हो जाता है। सूर्य की किरणें समुद्र में बड़वाग्नि पैदा करती है और उसका जल सदैव भाप बनकर उड़ता रहता है। इस विराट् हलचल में भी समुद्री नमक वाष्पीकृत नहीं हो पाता इस तरह खारेपन को कोई नुकसान नहीं पहुँचता। अब एक गैलन जल में नमक का औसत और कुल समुद्र में जल का औसत लेकर कुल नमक का परिमाण निकाला गया। अब प्रतिवर्ष नदियाँ समुद्र को कितना नमक देती हैं यह हिसाब लगाकर उसका कुल प्राप्त नमक की राशि में भाग दिया गया उससे पृथ्वी की आयु 12 करोड़ वर्ष निकली जो पहले नियम से भी कम थी इसीलिये वह भी अमान्य हो गया।
लार्ड कैल्विन को एक और तुक सूझी। उन्होंने अनुमान किया कि पृथ्वी जब अस्तित्व में आई तब उसका तापमान 3900 डिग्री सेन्टीग्रेड रहा होगा। अब का भू-ताप निकाल कर उन्होंने अब तक कम हो गये ताप को निकाला और फिर उसमें प्रति वर्ष कम हो जाने वाले ताप से भाग देकर भी 10 करोड़ वर्षों की ही पृथ्वी की आयु प्राप्त की।
अन्तिम रेडियो सक्रिय तत्वों के विघटन का सिद्धान्त सर्वाधिक प्रामाणिक है। हम भारतीयों का मत है कि आदिकाल के पूर्ण शुद्ध चेतन और आनन्दस्वरूप एक परमात्मा की ही सत्ता थी बाद में इच्छा-शक्ति उत्पन्न होने से वह स्थूल और स्थूल होती गई। यूरेनियम, थोरियम, रेडियम आदि अनेक तत्व भी ऐसे ही होते हैं जो अपनी सूक्ष्म अवस्था से स्थूलता में विघटित होते रहते हैं। इन्हें रेडियो धर्मी तत्व कहा जाता है। इनके परमाणुओं से अल्फा, बीटा, गामा किरणें अपने आप विच्छिन्न (डिसइन्टी ग्रेट होती रहती हैं। कालान्तर में यह तत्व ही सीस धातु (लेड) में बदल जाते हैं।
यह परिवर्तन बहुत धीरे-धीरे होता है और बहुत अनियमित होता है इसलिये उसका निश्चित अनुमान करना तो संभव नहीं होता पर इन तत्वों की अर्द्ध जीवन अवधि निकाल ली जाती है। अर्द्ध जीवन अवधि का अर्थ यह होता है कि कितने वर्षों में वह पदार्थ आधा रह जायेगा।
एक प्राचीन चट्टान में यूरेनियम की 119 ग्राम मात्रा पाई जाती है। उसी के पास एक चट्टान में सीसा भी मिलता है जो यूरेनियम से विच्छिन्न होकर बना था उसे तौलने पर भार 309 ग्राम निकला। प्रयोग से देखा गया कि 206 ग्राम सीसा 238 ग्राम यूरेनियम के विच्छिन्न होने से बनता है इसलिये 309 ग्राम का सीसा 238*309 बटे 206=357 ग्राम यूरेनियम से बना होगा। अब यह जो 119 ग्राम यूरेनियम बच रहा है यह प्रारम्भ में 357+119=476 ग्राम रहा होगा।
यूरेनियम की अर्द्धजीवन अवधि 456 करोड़ वर्ष की है। 456 ग्राम यूरेनियम आधा-आधा बनने (238 ग्राम) होने में 456 करोड़ वर्ष लगे फिर 119 ग्राम बच रहने में भी 456 करोड़ वर्ष लगे अर्थात् अब तक उस चट्टान को बने 456+456=912 करोड़ वर्ष हो गये हैं। उल्लेखनीय है कि रेडियो धर्मी तत्व अस्तित्व में आते ही विच्छिन्न होना प्रारम्भ कर देते हैं और उन पर वायुदाब, ताप और रासायनिक क्रियाओं का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। इससे यह बात भी पुष्ट होती है कि यदि शरीर भी प्रकाश और प्राकृतिक तत्वों का सम्मिश्रण है तो आज की अपेक्षा पूर्व पुरुषों की बौद्धिक, मानसिक, शारीरिक और आत्मिक क्षमतायें वस्तुतः बहुत अधिक प्रखर और स्पष्ट रही होंगी। हमारे शरीर का सूक्ष्म तत्व भी तो विच्छिन्न होता रहा है। और इसी कारण हम आज अधिक स्थूल हैं। सम्भवतः इस जानकारी के आधार पर ही गुरुवार युगों की कल्पना ऋषियों ने की होगी।
रेडियो सक्रिय तत्वों की खोज का यह उदाहरण मात्र था। अब तक ऐसी सबसे प्राचीन चट्टान कनाडा में पाई गई है और उपरोक्त गणना की तरह उसकी आयु 198 करोड़ वर्ष निकाली गई है। अगली पंक्तियों में भारतीय ज्योतिर्विज्ञान के आधार पर जब पृथ्वी की उत्पत्ति का समय निकालेंगे तो पाठक देखेंगे कि भारतीय सिद्धान्त जो परम्परागत रूप में चले आते रहे हैं कितने प्रामाणिक हैं।
“ऊँ तत्सदध ब्रह्माणो द्वितीय परार्धे श्री श्वेत वाराह कल्पे जम्बूद्वीपे भारत खण्डे आर्यावर्तेक देशार्न्तगत कुमारिका नाम क्षेत्रं वैवस्वत मन्वन्तरे अष्टाविंशति तमे कलियुगे कलि प्रथम चरणे...........।”
यह वह संकल्प है जिसका पाठ प्रत्येक धार्मिक और माँगलिक अनुष्ठान के प्रारम्भ में किया जाता है।
परार्ध की व्याख्या करते हुये श्रीमद्भागवत पुराण में लिखा है-
एवं विद्येरहौरात्रैः काल गत्योप लक्षितैः।
अपक्षितामि वास्यापि (ब्रह्माणः) परमापुर्वयः शतम्॥
यदर्धमायुषस्तस्य परार्धमभिधीयते।
पूर्वः परार्धोउपक्रान्तो हृपरोऽद्य प्रवर्तते॥
3/11-32-33
अर्थात् ब्रह्माजी की आयु 100 वर्ष की है उसमें पूर्व परार्ध (50 वर्ष) बीत चुका द्वितीय परार्ध प्रारम्भ हो चुका। त्रैलोक्य की सृष्टि ब्रह्माजी के दिन प्रारम्भ होने से होती है और दिन समाप्त होने पर उतनी ही लंबी रात्रि होती है। एक दिन एक कल्प कहलाता है।
मनुस्मृति में कल्प की लंबाई के लिये लिखा है-
देविकाना युगाना तु सहस्त्रं परिसंख्यया।
ब्राह्ममेकमहज्ञेयं तावतीं रात्रिमेव च॥ 1/72
अर्थात् ब्रह्माजी का एक दिन (कल्प) देवताओं के 1000 युगों (चतुर्युगों) के बराबर होता है उतनी ही लंबी रात्रि होती है।
यह एक दिन 1-स्वायम्भुव 2-स्वारोचिष 3-उत्तम 4-तामस 5-रैवत 6-चाक्षुष 7-वैवस्वत 8-सावर्णिक 9-दक्ष सावर्णिक 10-ब्रह्म सावर्णिक 11-धर्म सावर्णिक 12-रुद्र सावर्णिक 13-देव सावर्णिक और 14-इन्द्र सावर्णिक। इन 14 मन्वन्तरों में विभाजित किया गया है इनमें से सातवाँ वैवस्वत मन्वन्तर चल रहा है। एक मन्वन्तर 1000/14 चतुर्युगों के बराबर अर्थात् 71/3/8 चतुर्युगों के बराबर होता है। भिन्न संख्या पृथ्वी के 27/1/4 प्रतिशत झुके होने और 365/1/4 दिन में पृथ्वी की परिक्रमा करने के कारण होती है। इस भिन्न को जैसा कि सूर्य सिद्धान्त 1/19 के अनुसार दो मन्वन्तरों के बीच का सन्धिकाल मान लिया गया है जिसका परिमाण 4800 दिव्य वर्ष (सतयुग काल) माना गया है अतः अब मन्वन्तरों का काल=14*71=994 चतुर्युग
15 सन्धियों का समय = 8400*15=72000=6 चतुर्युग कुल 994+6=1000 चतुर्युगों में मन्वन्तर बंटे हैं। और एक चतुर्युग 1200 दिव्य वर्षों का हुआ। यहाँ प्रत्येक मन्वन्तर के बीच 4800 वर्ष का सतयुग होना बताया गया है। उससे यह बात पुष्ट हो जाती है कि कलयुग का द्वितीय चरण प्रारम्भ होने से पूर्व 4800 वर्षों तक धर्म की चरम उन्नति होगी और सत्युग जैसा सुख लोगों को मिलेगा। एक युग में अनेक युग बर्तने के सिद्धान्त के आधार पर ऐसा प्रत्येक मन्वन्तर में होता रहेगा।
महाभारत वन पर्व 188/22-26 में चतुर्युगों का परिमाण अलग-अलग बताते हुये लिखा है-”4000 दिव्य वर्षों (अर्थात् 4-4 सौ वर्ष) उसके सन्ध्या व सन्ध्याँश होते हैं अर्थात् कुल 8400 वर्ष का सतयुग, 3000 वर्षों का त्रेतायुग उसकी संध्या व संध्याँश के 3-3 सौ वर्ष कुल 3600 वर्ष, 2000 दिव्य वर्ष और 2-2 सौ सन्ध्या व सन्ध्याँश =2400 वर्ष का द्वापर और 1000 वर्ष व 1-1 सौ वर्ष का कुल 1200 वर्ष का कलियुग। इस हिसाब से एक चतुर्युग 4800+3600+2400+1200 वर्ष =1200 दिव्य वर्ष हुये।
अब दिव्य वर्ष का मनुष्य वर्ष से हिसाब लगाये तो मनुस्मृति के अनुसार-
दवे रात्रहनी वर्ष प्रविभागस्तयोःपुन।
अहस्तत्रोद गयनं रात्रिः स्याद् दक्षिणायनम्॥
अर्थात् एक दिव्य रात-दिन मनुष्य के 1 वर्ष के बराबर होती है उत्तरायण सूर्य देवताओं का दिन और दक्षिणायन रात्रि होती है देववर्ष और दिनों के वर्णन के आधार पर कभी भारतीय ज्योतिर्गणित का विवरण और उसके साथ सामयिक परिवर्तनों की चर्चा करेंगे तो पाठक यह देखकर आश्चर्य करेंगे कि प्राचीन गणितज्ञ किस प्रकार आज के एक-एक दिन के इतिहास से परिचित रहे होंगे।
इन गणनाओं से निम्न बातें हो गईं। 1-ब्रह्माजी (पृथ्वी की उत्पत्ति काल) 15वें वर्ष के प्रथम दिन के 6 मन्वन्तर और 7 सन्धियाँ बिता चुके॥ 2-7 वें वैवस्वत मन्वन्तर के 27 चतुर्युग अपनी सन्धियों के साथ बीत चुके 3-प्रचलित 28वें चतुर्युग में भी प्रथम तीनों (सतयुग, द्वापर, त्रेता) युग बीत चुके 4-अब कलियुग के विक्रम संवत् 2023 तक 5069 वर्ष बीत चुके।
इस हिसाब से 6 मन्वन्तर =671 चतुर्युग=6*71*12000 दिव्य वर्ष=5112000 दिव्य वर्ष। इनकी 7 सन्धियों का समय 33600 दिव्य वर्ष, 7वें वैवस्वत मन्वन्तर के 12000*27=324000 दिव्य वर्ष, 3 युग इस वैवस्वत के बीत चुके उनका योग 4800+360+2400 दिव्य वर्ष=10800 कुल, 5112000+33600+324000+10800=5480-400 दिव्य वर्ष। दिव्य वर्ष में 360 का गुणा करने से मनुष्य वर्ष आ जाते हैं। (भारतीय मतानुसार वर्ष 360 दिन का ही होता है। प्रक्षेप सन्धियों के रूप में जुड़ गया)। वह 5480400*360=1972944000 मनुष्य वर्ष होते हैं। इसमें कलियुग के 5069 वर्ष जोड़ने से 1972944000+5069=197249069 वर्ष अक्षरों में एक अरब सत्तानवे करोड़ उन्तीस लाख उनचास हजार उनहत्तर वर्ष पृथ्वी की आयु हुई। भूगर्भ शास्त्री यह आयु एक अरब अट्ठानबे करोड़ वर्ष निकालते हैं जब कि उनकी गणना पदार्थों के गुण से संयुक्त है और भारतीय आँकड़े शुद्ध गणित। दोनों में इतने हद तक साम्य भारतीय दर्शन की सत्यता और प्रामाणिकता ही सिद्ध करता है।
यह दोनों तरह के तुलनात्मक अध्ययन यह बताते हैं कि पृथ्वी के आविर्भाव काल से ही शुद्ध ज्ञान (वेदों) के रूप में भारतीय धर्म और संस्कृति का अपौरुषेय विस्तार हुआ। हम अल्पबुद्धि लोग उस ज्ञान का अवगाहन न कर पायें तो उसमें संस्कृति का क्या दोष, ज्ञान का क्या दोष? दोष तो अपना ही है जो उस ज्ञान को पकड़ने और अपना मनुष्य जीवन धन्य बनाने की अपेक्षा हम भौतिक जीवन, जगत और पदार्थों में उलझे पड़े अपनी मानवीय क्षमताओं को व्यर्थ गंवा रहे हैं।
वर्षा ऋतु के आगमन से पूर्व महर्षि कणाद ने यह उचित समझा कि आश्रम में यज्ञ तथा नित्य के भोजन हेतु समिधा तथा सूखी लकड़ी एकत्रित कर लेनी चाहिए। बरसात के दिनों में न तो आश्रमवासी ही जंगल का चक्कर लगा सकेंगे और न सूखी लकड़ी ही मिलेगी। अतः अपने शिष्यों को साथ लेकर एक दिन सुबह ही सुबह वह चल पड़े। किसी हाथ में लकड़ी काटने की कुल्हाड़ी थी तो कोई रस्सी लिये जा रहा था।
जंगल में पहुँचकर सबके सामूहिक प्रयत्नों से लकड़ियों का ढेर लग गया। सब रस्सी में बाँध-बाँध कर गट्ठे आश्रम को ले आये। अगले दिन नित्य की भाँति प्रातः ही सब शिष्य स्नान के लिये नदी की ओर चल पड़े। राह में वही जंगल पड़ता था, जिसमें से एक दिन पूर्व उन्होंने परिश्रमपूर्वक लकड़ियाँ एकत्रित की थीं। सभी को ऐसा अनुभव होने लगा कि जंगल कल तक बिल्कुल सूखा दिखाई दे रहा था वह आज हरा-भरा है पर आश्चर्य तो यह कि रात्रि को पानी भी नहीं बरसा था। महर्षि को भी आश्चर्य हुआ वह भी शिष्यों से पूछ बैठे ‘सूखे जंगल में यह मधुर गंध कैसी?’ शिष्यों ने आस-पास जाकर देखा तो उन्हें पता चला कि लकड़ी काटते समय तथा गट्ठा उठाकर चलते समय जहाँ-जहाँ पसीने की बूँदें गिर गई थीं वहाँ मधुर सौरभ बिखेरने वाले पुष्प खिल उठे हैं।
शतपथ ब्राह्मण तथा सूर्य सिद्धान्त आदि ज्योतिष ग्रन्थों में प्रलय की गणनायें दी गईं हैं। काल और समय के बारे में निश्चित अनुमान करना तो कठिन है किन्तु यह निश्चित है कि पृथ्वी में कभी-कभी अग्नि, हिम या जल प्रलय जैसे तीव्र विघटन होते अवश्य हैं। ऐसे कई संघात पहले हो चुके हैं इस बात को भूगर्भ वेत्ता और इतिहासज्ञ भी मानते हैं।
अटलांटिक महासागर पर हुई खोजों के समय गोताखोरों ने समुद्री सतह पर कुछ ऐसे खण्डहर और वस्तुयें प्राप्त कीं जिनसे सिद्ध होता है पहले वहाँ कोई द्वीप था जो जल प्रलय के समय में ही समुद्र के गर्भ में समा गया। रूस और चीन के बीच गोवी रेगिस्तान के बारे में अनुमान है वहाँ पहले समुद्र था। कभी जल-प्रलय हुई जिसमें वहाँ का जल सिमट कर एक ओर चला गया और पृथ्वी निकल आई जो कालान्तर में रेगिस्तान में बदल गई। इस तथ्य को वहाँ उपलब्ध समुद्री जानवरों के अस्थिपंजरावशेषों से प्रमाणित किया जाता है।
प्रलय प्रकृति का एक समर्थ शस्त्र है जिसके द्वारा वह परिवर्तन लाया करती है ऐसा उसे मनुष्य को यह सिखाने और समझाने के लिये भी करना पड़ता है कि यदि वह अपने आपको सृष्टि का सर्व-समर्थ प्राणी समझता है तो यह उसकी भारी भूल है। उसे अनुभव करना चाहिये कि इस विशाल ब्रह्माण्ड में केवल देव-शक्तियों का आधिपत्य है। यह देव-शक्तियाँ ही सृष्टि का संचालन करती हैं। मनुष्य उस परिवर्तन को किसी भी वैज्ञानिक यन्त्र से रोक नहीं सकता। हाँ वह अपने आपको इन परिवर्तनों के अनुकूल ढाल कर आत्म-कल्याण का लाभ अवश्य ले सकता है।
भागवत में ऐसी ही एक जल प्रलय का विवरण देते हुये बताया है कि तब एक मात्र मार्कण्डेय मुनि बचे थे। उन्होंने जब प्रकृति की भीषणतम विनाश लीला देखी तो आँखें ही मूँदते बने। उन्हें तब बालक स्वरूप धारण करना पड़ा अर्थात् ज्ञान और बुद्धि वर्चस्व के सारे अहंकार को भुलाकर अपने आपको ईश्वरीय शक्तियों को ही समर्पण करना पड़ा था।
प्रसिद्ध अंग्रेज ज्योतिषाचार्य कीरो ने भी जल प्रलय के भारतीय सिद्धान्तों को सत्य माना है। मेष से लेकर वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुम्भ और मीन तक यह बारह राशियाँ हैं जिन पर सूर्य चलता रहता है। एक राशि से दूसरी राशि 30 अंशों में विभक्त है। एक अंश पार करने में उसे 70 वर्ष 9 मास लगते हैं। पूरी राशि पार करने में उसे 70 वर्ष 9 माह 30=लगभग 2122 वर्ष 6 मास लगते हैं। बारह राशियाँ पार करने में 25467 (एक डिग्री पार करने में 70 वर्ष 9 मास के अतिरिक्त कुछ दिन भी लगते हैं इसलिये कीरो ने यह समय 25850 वर्ष निकाला हैं) वर्ष लगते हैं। अर्थात् लगभग 25467 वर्षों में एक बार ऐसा समय आता है जब प्रकृति में असाधारण रूप से हलचल उत्पन्न होती है और पृथ्वी में जल-प्रलय जैसा संकट उठ खड़ा होता है।
प्रलय की बात अब वैज्ञानिक भी स्वीकार करते हैं। उन्होंने देखा कि समुद्र में निरन्तर ज्वार-भाटे आने के कारण पृथ्वी की गति धीमी पड़ती जा रही है। पृथ्वी की गति में अन्तर पड़ने का अर्थ यह होगा कि चन्द्रमा पृथ्वी कीं और समीप आता चला जायेगा। जितना अधिक चन्द्रमा से हलचल उत्पन्न होती है और पृथ्वी में जल-प्रलय जैसा संकट उठ खड़ा होता है।
प्रलय की बात अब वैज्ञानिक भी स्वीकार करते हैं। उन्होंने देखा कि समुद्र में निरन्तर ज्वार-भाटे आने के कारण पृथ्वी की गति धीमी पड़ती जा रही है। पृथ्वी की गति में अन्तर पड़ने का अर्थ यह होगा कि चन्द्रमा पृथ्वी के और समीप आता चला जायेगा। जितना अधिक चन्द्रमा पृथ्वी के पास आयेगा ज्वार-भाटों में भी आ सकता है जब चन्द्रमा और पृथ्वी इतने पास-पास आ जायें कि ज्वार-भाटों का वेग संभलना कठिन हो जाये। इसी दिन को हम जल-प्रलय की संज्ञा दें तो कोई अत्योक्ति नहीं होगी। उस स्थिति के बाद पृथ्वी में जीवन के अस्तित्व को सम्हालना ईश्वरीय शक्तियों पर ही अवलंबित होगा। मनुष्य को तो तब अपने जीवन की रक्षा करना ही कठिन हो जायेगा। इस महाप्रलय से बचाव के लिये वैज्ञानिकों के पास भी कोई शक्ति नहीं होगी।
पृथ्वी की गति में अन्तर बहुत धीमे हो रहा है इसलिये बहुत जल्दी तो किसी विस्फोट की संभावना नहीं है पर यह सोचने समझने की आवश्यकता अवश्य है कि क्या धरती के सामूहिक जीवन क्रम का ग्रह-नक्षत्रों की गतिविधियों से कुछ संबंध हो सकता है? यदि हाँ-जैसा कि वैज्ञानिक मान रहे हैं, तो हम अपने कर्म-कलाप में परिवर्तन लाकर निश्चित ही उस दुष्प्रभाव को करोड़ों वर्षों के लिये और टाल सकते हैं।
पृथ्वी के आयन मण्डल (आइनोस्फियर) को शुद्ध रखकर हम अन्य ग्रहों के पृथ्वी में पड़ने वाले प्रभाव को बदल सकते हैं। आकाश में जहाँ से हवा और गैसों का दबाव प्रारम्भ होता है तथा आकाशीय पिण्डों से आने वाले ऊर्जा कण अपनी प्रतिक्रिया प्रारम्भ करते हैं उसे अयन मण्डल करते हैं। अयन मण्डल एक प्रकार से हवा और गैसों का वह गुब्बारा है जिस पर पृथ्वी का पिण्ड समाया हुआ है। अयन मण्डल को स्वाभाविक रूप में रहने दिया जाय उसमें अप्राकृतिक परिवर्तन न लाये जाएं तो ग्रहों के प्रकोप से बचाया जा सकता है। उसके लिये यह आवश्यक होगा कि धूम्रपान से लेकर उन सब मशीनों और एटमबमों तक के प्रयोग का निषेध हो जो वातावरण को दूषित करते हैं मनुष्य जाति को यह सावधानी व्यक्तिगत और सामूहिक तौर-तरीकों से भी बरतनी होगी।
यदि ऐसा न हुआ तो ग्रहों के संघात भी हो सकते हैं। वैज्ञानिक कारण तो नहीं बताते पर उनका विश्वास है कि एक दिन चन्द्रमा का स्वयं ही विस्फोट हो सकता है। एक बार इस तरह का विस्फोट शनि में हुआ था। यदि ऐसा हुआ तो पृथ्वी में असंख्य अग्नि ज्वालायें फूट पड़ेंगी और जल-प्रलय के स्थान पर अग्नि प्रलय के दृश्य उपस्थित हो जायेंगे।
सूर्य के पास अनन्त शक्ति है पर वह उसके 20 हजारवें हिस्से से ही काम लेता है और अपने सम्पूर्ण सौर-परिवार का भरण पोषण करता है। अनुमान है कि शक्ति के इस स्वल्प क्षय से भी सूर्य धीरे-धीरे ठण्डा पड़ रहा है। यदि सूर्य ठण्डा हुआ तो पृथ्वी में बर्फ की मात्रा बढ़ जायेगी और हिम प्रलय जैसी स्थिति भी आ सकती है। दूसरी ओर वैज्ञानिक यह मानने के लिये तैयार नहीं कि सूर्य ठंडा होगा यदि हुआ भी तो यह स्थिति ढाई करोड़ वर्ष बाद ही आयेगी, हिम प्रलय वैसे और अन्य कारणों से हो सकती है।
“अपनी पुस्तक आर्कटिक होम इन द वेदाज” में लोकमान्य तिलक ने भी पेज न॰ 32 में इस प्रकार का वर्णन देते हुये लिखा है कि दोनों गोलार्द्धों में हिमान्तर 10500 वर्षों के बाद होता रहता है। प्रसिद्ध भूगर्भ शास्त्री डाक्राल ने गणितीय आधार पर बताया है कि पिछले लाख वर्षों में पृथ्वी अपनी कक्षा में 3 बार डगमगाई है और तीनों बार भयंकर हिमपात के दृश्य उपस्थित हुये हैं। प्रथम बार 1 लाख सत्तर हजार वर्ष में दूसरी बार दो लाख साठ हजार वर्ष में और तीसरी बार एक लाख साठ हजार वर्ष में अन्तिम बार पृथ्वी की धुरी डगमगाए हुये लगभग 80 हजार वर्ष बीत चुके अर्थात् अगले दिनों में कभी भी हिम प्रलय की स्थिति उत्पन्न हो सकती है
ज्योतिष और ग्रह-विज्ञान बड़ा ही जटिल है। इसलिये समय की बात निश्चित नहीं कही जा सकती पर आगे कभी जल, अग्नि या हिम प्रलय जैसी कोई स्थिति उपस्थित हो सकती है इसमें राई रत्ती सन्देह नहीं। ज्योतिषी, भूगर्भ वेत्ता एस्ट्रालाजिस्ट और वैज्ञानिक सभी इस बात को मानते हैं।
मिट्टी का एक कण, पानी की एक बूँद हवा की एक लहर, अग्नि की एक चिंगारी और आकाश के एक स्फुल्लिंग-पाँचों पहाड़ों की चोटी पर खड़े होकर भगवान् सूर्य से प्रार्थना करने लगे-हे सविता देव्! हमें भी अपने समान प्रकाशमान् और ऐश्वर्यशाली बनाओ?
सूर्य से एक किरण चमकी और बोली-भाइयो! भास्कर के समान तेजस्वी बनना है तो उठो किसी से कुछ माँगो मत, अपना जो कुछ है वह प्राणी मात्र की सेवा में उत्सर्ग करना प्रारम्भ करना।
प्राणि जगत में मनुष्य सर्वश्रेष्ठ प्राणी माना गया है। संसार के अन्य सारे पशुओं पर उसने सदा से शासन किया है। उन्हें अपने अधीन बनाया, प्रशिक्षण किया और उपयोगी बनाया है। यों तो प्राणिशास्त्र के अनुसार मनुष्य व पशु में कोई विशेष अन्तर नहीं है। मनुष्य भी एक पशु ही है। प्राणिजगत में सर्वोपरिता का गौरव पाने और अन्य पशुओं पर शासन कर उनको उपयोगी बना सकने का जो श्रेय मनुष्य को मिला है, उसका मूल कारण उसकी विकसित बुद्धि एवं विवेक ही है! पशुओं एवं मनुष्यों के बीच यही तो एक अन्तर है। मनुष्य में यही एक ऐसी विशेषता है जिसके कारण वह अन्य प्राणि जगत का स्वामी तथा गुरु बना हुआ है। यद्यपि शारीरिक रूप से अन्य असंख्यों पशु ऐसे हैं जिनकी तुलना में मनुष्य बहुत ही निर्बल तथा अपूर्ण है। किन्तु परमात्मा के विशेष वरदान के रूप में मिली बुद्धि ने उसे सर्वश्रेष्ठता एवं ज्येष्ठता प्रदान करा दी है।
पशुओं में मनुष्यों की तरह आगे की बात सोच सकने, वर्तमान को समझ सकने और परिस्थितियों पर विजय प्राप्त कर सकने की क्षमता नहीं होती! वे तो सामने की, सो भी खाने-पीने तथा प्रजनन संबंधी बातें अपनी नैसर्गिक प्रवृत्ति पर ही जान पाते हैं। जबकि मनुष्य दिन, मास, वर्षों तथा युगों की बात आज ही सोच सकता है।
मनुष्य के बौद्धिक विकास के प्रमाण रूप में हम आज के उन्नत-ज्ञान, आश्चर्यजनक वैज्ञानिक प्रयोग, विशाल उद्योग, यातायात तथा न्याय, चिकित्सा आदि की ओर विस्मय तथा संतोष के साथ देखते और मनुष्य होने पर गर्व करते हैं। यह सब कुछ मनुष्य की विकसित बुद्धि के ही चमत्कार हैं। बुद्धि के विकास से मनुष्य का जीवन धन्य हो जाता है, उसका मनुष्य होना सार्थक और संसार सुन्दर से सुन्दरतर हो जाता है। बुद्धि विकास के अभाव में मनुष्य अन्य पशुओं की भाँति ही सींग पूँछ से रहित पशु ही रहता है। मनुष्यता का लक्षण बुद्धि एवं विवेक का विकास ही है। पूर्ण मनुष्य बनने और सर्वोपरिता का श्रेय पाने के लिये हर संभव उपाय से मनुष्य को अपने बुद्धि विकास में लगा ही रहना चाहिये।
ईश्वर की ओर से लगभग समान बुद्धि तत्व का हर मनुष्य को अनुग्रह मिलता है। कोई जन्म-जात मेधावी विद्वान अथवा विवेकी कदाचित ही होता है जन्म लेने और चेतना अनुभव करने के बाद मनुष्य उसको अपने अध्यवसाय के बल पर ही विकसित करता तथा बढ़ाता है। जो जन्म-जात मेधावी माने जा सकते हैं, वे भी अपने पूर्व जन्म के अध्यवसाय के फल रूप वह विशेषता लेकर वर्तमान जीवन में जाग्रत होते हैं। आशय यह कि मनुष्य के लिये विवेक एवं बुद्धि का विकास उसके अध्यवसाय के आधार एवं अनुपात पर ही होता है।
मनुष्य के बुद्धि विकास के अध्यवसायों में विद्याध्ययन का स्थान प्रमुख तथा व्यापक है। विद्या की आवश्यकता न केवल बुद्धि विकास के ही लिये है, प्रत्युत यह लोक से लेकर परलोक तक की सभी सफलताओं का आधार है। जीवन को सफल, उच्च तथा परिपक्व बनाने के लिये युगों से संचित मानवीय ज्ञान की नितान्त आवश्यकता है। उन सारे महान व्यक्तियों ने, जिन्होंने उन्नति के चरम शिखरों को छूने का प्रयास किया है, अपने जीवन में अध्ययन संबंधी अध्यवसाय को प्रधानता दी है। उन्होंने लाख संकट उठाये, हजार अभावों में रहे, कितनी ही व्यग्रता एवं व्यथा की परिस्थितियां क्यों न आई हों अपने अध्ययन एवं ज्ञान संबंधी अभ्यास में व्यवधान न आने दिया। वे पुराने ज्ञान से जीवन का अनुभव और तात्कालिक विषयों का अधिकाधिक अध्ययन कर आधुनिक ज्ञान का लाभ उठाते ही गये।
यदि उन्हें ज्ञान की इतनी उत्कृष्ट अभिलाषा न होती या उसके महत्व को कम आँक कर यों ही मनोरंजन के रूप में कुछ पढ़ कर काम चलाने की सोची होती तो निश्चय ही वे उन्नति के उन सोपानों पर भी चरण न रख सकते जिसके अधिकारी बन कर आज विद्या, बुद्धि, ज्ञान, विवेक तथा आध्यात्मिक क्षेत्रों के उदाहरण बन चुके हैं। नित्य नियम से उत्तमोत्तम ग्रन्थों तथा विषयों का अध्ययन करते रहने से मनुष्य की बुद्धि में उस प्रखरता का सचमुच विकास होता रहता है जिसके आधार पर अच्छाई, बुराई, पाप-पुण्य का ठीक-ठीक निर्णय किया जा सकता हैं अपनी पाशविक प्रवृत्तियों पर विजय पाई जा सकती है और प्रगति की ओर विश्वस्त तथा निर्भय पग बढ़ाया जा सकता है।
विद्या के अभाव में उन्नति असंभव है। यही वह पूँजी है जो सच्चे अर्थों में मनुष्य का उत्थान कराती और यश व गौरव का अधिकारी बनाती है। ऐसा एक भी उदाहरण इस संसार में नहीं पाया जा सकता जिसके आधार पर यह कहने का साहस किया जा सके कि बिना ज्ञान एवं विद्या के भी उन्नति एवं प्रगति संभव मानी जा सकती है। उत्कर्ष का उपाय ज्ञान ही है। ज्ञान-तप को पूरा किये बिना न तो कोई उस उत्कर्ष का अधिकारी बना है और न बन सकता है। मनुष्यता का गौरव, आदमी की विशेषता और सागर का सारा वैभव विद्या-विभूति के ही अधीन माना गया है। ज्ञान रूपी तप किसी भी काल एवं अवस्था में क्यों न किया जाये कभी निष्फल नहीं जाता-कहा भी गया है-
गतेपि वयसि ग्राह्या विद्या सर्वात्मना बुधैः।
यद्यपि स्यान्न फलदा, सुलभा सान्यजन्मनि॥
आयु के निकल जाने पर भी विद्या प्राप्ति के लिये प्रयत्नशील रहना बुद्धिमानी है। यदि वह किसी कारण से इस जन्म में फलवती न हुई तो आगामी जन्मों में सुलभ होगी।
निःसन्देह विद्या ऐसी ही अक्षय संपदा है जिसका तीनों लोक तीनों कालों में नाश नहीं होता। वह जन्म-जन्मान्तरों में मित्र की तरह मनुष्य के साथ बनी रहती है। प्रथम तो विद्या का फल आर्थिक सफलता के रूप में देखना ही नहीं चाहिये। फिर भी यदि वह अर्थकारी न भी हो पाती है तथापि उनके ज्ञान का जो एक अनिर्वचनीय एवं अहेतुक सन्तोष, शान्ति अथवा आनन्द है उसका तो कोई परिस्थिति नहीं छीन सकती।
विद्या के सर्वथा अभाव में सम्पन्नता भी नहीं और यदि वह उत्तराधिकार, संयोग अथवा किन्हीं उचित अनुचित उपायों से सुलभ भी हो गई तब भी उसका कोई मूल्य महत्व मनुष्यता के रूप में नहीं माना जा सकता। सच्चा मनुष्य वही है जिसके पास ज्ञान की विशेषता है, विद्या सभी धन है। विद्या की कृपा से मनुष्य का जीवन सार्थक बनता है। विद्या के कारण ही मनुष्य सभ्य समाज में आदर का अधिकारी बनता है। धन के आधार पर विद्या रहित व्यक्ति का आदर आडम्बर तथा प्रदर्शन मात्र होता है। उसमें कोई सत्यता अथवा हार्दिकता नहीं होती है। वह लोग उसे ठगने अपना उल्लू सीधा करने के लिये ही ऊपरी मन से आदर दिया करते हैं। सफलता, समाज, परिवार, आनन्द, उल्लास, आदर, सम्मान आदि के जो भी भौतिक सुख हैं विद्यावान व्यक्ति उन्हें यथार्थ रूप में भोगता ही है, साथ ही वह उसी आधार पर आगे बढ़ता हुआ आत्म-प्रकाश अथवा मोक्ष पद तक पा लेता है। विद्या ही सारे सुखों की जड़ और अविद्या ही सारे दुखों का हेतु माना गया है।
धन, वैभव, जमीन-जायदाद, शक्ति सुन्दरता आदि के आधार पर किसी की उन्नति, विकास अथवा व्यक्तित्व को परखने की कसौटी मूर्ख जनों की होती है। सज्जन एवं सत्पुरुष की कसौटी तो विद्या, बुद्धि, सद्ज्ञान, सदाचार, योग्यता एवं प्रतिभा ही रहा करती है। जिनने विद्वानों तथा बुद्धिमानों से सम्मान पाया, श्रेष्ठता तथा सफलता का प्रमाण पत्र प्राप्त किया है, वही वास्तव में सफल एवं श्रेष्ठ हैं अन्यथा व्यक्ति तो सफलता एवं श्रेष्ठता का झूठा सन्तोष कर आत्मप्रवंचना किया करते हैं।
अध्येयता अपनी आत्मा का सफल चिकित्सक माना गया है। अध्ययन द्वारा उपार्जित ज्ञान से वह शीघ्र ही अपनी आत्मा की व्याधियों को पहचान लेता है और उसी आधार पर उसका उपचार भी करता है। अविद्या से ग्रस्त मनुष्य की आत्मा प्रकाश से वंचित रह जाती है। आत्मिक प्रगति के अभाव में मनुष्य भी अन्य जीव-जन्तुओं की तरह ही हीन अवस्था में पड़ा रहता है और उन्हीं की तरह प्राकृतिक प्रेरणा से अपना जीवन यापन किया करता है। मनुष्य का वास्तविक लक्ष्य, अधोगामी परिस्थितियों से उठ कर ऊर्ध्व दिशा की ओर अभियान करना है। धर्म का सच्चा रूप पहचान कर उन पारमार्थिक कर्तव्यों को पूरा करना है, जिससे उसकी आत्मा दिनों-दिन मुक्ति की ओर ही अग्रसर होती रहे। नर तन पाकर भी जो मुक्ति की ओर अग्रसर होने से रह गया, वह मानों सब कुछ होते हुए असफल एवं अभाग्यवान ही है। यह आत्मिक प्रगति विद्या के अभाव में कदापि संभव नहीं हो सकती। उन्नति एवं अवनति के कर्मों का निर्णय विवेक के आधार पर किया जा सकता है, उसका विकास विद्या के बिना हो ही नहीं सकता।
न केवल आध्यात्मिक प्रगति ही वरन् भौतिक प्रगति भी विद्या के बिना नहीं हो सकती। मानसिक, सामाजिक, आर्थिक तथा वैयक्तिक हर प्रकार की उन्नति का मूल विद्या ही है। विद्या से मनुष्य का मानसिक संस्थान सन्तुलित एवं सुव्यवस्थित हो जाता है, जिससे वह अच्छाई-बुराई, हानि-लाभ, उत्थान-पतन आदि की परिस्थिति पर ठीक-ठाक विचार कर सकता है और उनको समुचित दिशा प्रदान कर सकता है।
समाज में जिधर देखिये, विद्यावान् को ही हाथों-हाथ लिया जाता है। अशिक्षित तथा अज्ञानी की कहीं पूछ नहीं होती। लोग उसका मन-ही-मन तिरस्कार किया करते हैं और संपर्क में आने पर मूर्ख, गंवार अथवा अज्ञानी समझ कर टालने-हटाने का उपक्रम किया करते हैं। परिवारों में भी प्रायः उन्हीं सदस्यों का प्रभाव रहता है और उन्हीं की बात ज्यादा मानी जाती हैं, जो शिक्षित तथा विद्यावान् होते हैं। अशिक्षित तथा अज्ञानी सदस्यों के प्रति बहुधा उपेक्षा का ही दृष्टिकोण रहा करता है। बच्चों में भी स्नेह तथा प्यार का अनुपात उसी मात्रा में रहा करता है, जिस मात्रा में वे शिक्षा की ओर अधिकाधिक अग्रसर रहा करते हैं। शिक्षित सन्तान पिता के गौरव तथा संतोष का कारण बनती है।
जिस प्रकार नेत्रहीन के लिये सारा संसार अन्धकारपूर्ण रहता है, सुन्दर दृश्यों तथा रंगों के आनन्द से वह वंचित रह जाता है। उसी प्रकार ज्ञानान्ध के लिये भी संसार का मधुर रहस्य, ज्ञान-विज्ञान के चमत्कार, साहित्य तथा कलाओं का आनन्द युग-युग संग्रहीत ज्ञान का रसास्वादन आदि सारे सुख निरर्थक ही रहते हैं। वह इन स्वर्गीय संपदाओं के बीच भी एक पशु की तरह ही केवल उदरपोषण की क्रिया में ही बहुमूल्य मानव-जीवन को नष्ट कर देता है। संसार से लेकर आत्मा तक के जितने सुख माने गये हैं, विद्या के अभाव में, अज्ञानी पुरुष उन सबसे सर्वथा वंचित ही रह जाता है।
यदि आपको जीवन में सुख-सम्मान पाना है, अपनी आत्मा को उन्नत बनाकर परमात्मा तक पहुँचने की जिज्ञासा है, तो आज से ही विद्या रूपी धन-संचय करने में लग जाइये। यदि आपकी साँसारिक व्यस्तता आपके लिये अधिक समय नहीं छोड़ती, तो भी थोड़ा-थोड़ा ज्ञान-संचय ही करते जाइये। बूँद-बूँद करके घट भर जाता है। जीवन के जिस क्षेत्र में आपको उन्नति करने की अभिलाषा है, आप जिस प्रकार की सफलता प्राप्त करना चाहते हैं। उसी विषय एवं क्षेत्र के अध्ययन में निरत हो जाइये। यदि आपका लक्ष्य सत्यम्, शिवम्, सुन्दरम् है तो आप उसी से उन्नति करते हुए अन्ततः अपने परम लक्ष्य आत्म साक्षात्कार तक पहुँच ही जायेंगे। मनुष्य ज्यों-ज्यों उसकी ज्ञान-पिपासा बढ़ती जाती है और वह अध्ययनशील बनता जाता है। संसार का कोई भी विषय पृथक नहीं है। वे सब ही ज्ञान सागर की बूंदें हैं जो अन्ततः एक ही चिरशाँति के लक्ष्य पर पहुँचा देती हैं।
विद्या से मेरा अभिप्राय यह है कि मनुष्य के शरीर, बुद्धि और आत्मा के सभी गुणों को प्रगट किया जाय। पढ़ना-लिखना विद्या का अन्त तो है ही नहीं, वह आदि भी नहीं है।
-महात्मा गाँधी
एक साथ कई पतिंग आगे बढ़कर दीपक का आलिंगन करते और जलकर वहीं भस्म हो जाते। एक झींगुर यह दृश्य देख रहा था। उसने पतिंगों से पूछा-क्यों भाई! तुम लोग आखिर अपनी जिन्दगी यों ही व्यर्थ क्यों नष्ट कर रहे हो?
पतंगे हंसे और एक स्वर में बोले-बन्धु! बलिदान की यह प्रक्रिया बन्द कर देते, तो फिर संसार में प्रकाश की प्रतिष्ठा कौन करता?
बात उन दिनों की है जब ट्रावनकोर में स्वातितिरुनालु राजा राज्य करते थे। उनके दरबार में वडिवेलु नाम के एक प्रसिद्ध संगीतज्ञ रहते थे। संगीत के क्षेत्र में उनका यश सारे देश में फैला हुआ था।
रस ही तो है, एक दिन वडिवेलु अपनी संगीत-साधना में इतने तन्मय हो गये कि उन्हें राज-दरबार में उपस्थित होने की भी सुधि न रही। इस पर स्वातितिरुनालु बहुत क्रुद्ध हुए और उन्होंने वडिवेलु को राज्याश्रय से बाहर निकाल दिया। मन्त्रियों तथा सभासदों ने कहा-महाराज! संगीत तो भगवान् का स्वरूप है। यदि कोई संगीत-आराधना में इतना निमग्न हो गया कि उसे राज दरबार में आने का ध्यान न रहा, तो उसे ईश्वर-भक्ति मानकर क्षमा ही नहीं करना चाहिये, वरन् श्रद्धा व्यक्त करनी चाहिये। यदि संगीत न रहेगा महाराज, तो जीवन नीरस हो जायेगा। फिर कौन आत्मा इस धरती पर आना चाहेगी? प्रेम, सौंदर्य और संगीत यही तो आत्मा के आकर्षण हैं, इन्हीं पर तो संसार टिका हुआ है।
अहंकार प्रबल हो तो मनुष्य न्याय की बात सोच भी कैसे सकता है। स्वातितिरुनालु ने एक न सुनी। उन्होंने वडिवेलु को राज्य-आश्रय से निकाल ही दिया। अपना थोड़ा -सा सामान बाँधकर वीतराग संगीतज्ञ वहाँ से निकल पड़ा। साथ में बेला की पेटी भी थी। जब वह हार-थक जाते, तो बेला बजाते और अपनी सारी थकावट को दूर कर लेते। सचमुच संगीत मनुष्य को ताजगी और नया जीवन देता है। हम पाश्चात्य संगीत की कामुक धार में बहे न होते और अपने संगीत के भाव-पक्ष को जीवित रख सके होते, तो आज जैसी नीरसता के शिकार न हुए होते।
वडिवेलु एक जंग पार कर रहे थे, तभी कुछ डाकुओं ने उन्हें आ घेरा। उनका सारा सामान छीन लिया और साथ में बेला-वादन पेटी भी। वडिवेलु ने प्रार्थना की ‘भाइयों! तुम सब कुछ ले जाओ पर मुझे मेरी बेला दे दो। तुम नहीं जानते, संगीत मेरा प्राण है। मेरा ही क्यों, यह तो मानव-मात्र की आत्मा है। देखा नहीं-गाँवों के कृपण-मजदूर दिन भर के थके माँदे आते हैं, शाम को एक स्थान पर बैठकर संगीत के साथ लोक-धुनों में मस्त हो जाते हैं, उनकी पीड़ायें हर लेता है संगीत। कृपा करो, मेरी बेला मुझे दे दो ताकि कभी कुछ न हो, तो अपनी आत्मा की प्यास और थकावट तो दूर कर लिया करूंगा।’
डाकुओं को दया आ गई। उन्होंने वेला वडिवेलु को लौटा दी। जैसे छोटा बच्चा अपनी माँ को पाकर गदगद हो जाता है और उसके स्तनों से चिपक जाता है, वैसे ही वेला मिलते ही वडिवेलु की आँतरिक भावनायें प्रवाहित हो उठीं। वहीं बैठ गये। ढीले तार कसे और वेला का मधुर राग हवा में गुँजाने लगे।
डाकुओं को वह स्वर-लहरियाँ बहुत मीठी लगीं। परिस्थितिवश कोई कितना ही बुरा क्यों न हो जाये, उसकी करुणा थोड़े ही मर जाती है। वेला की स्वर-झंकृति ने उन डाकुओं के हृदयों को छुआ और उनसे कोमलता फूट पड़ी। डाकू श्रोता बनकर बैठ गये। वडिवेलु पूरी तन्मयता से वेला के तारों को गति देने लगा। डाकुओं का चित्त संगीत की रस धारा में ऐसा बह गया कि उन्हें अपने आप का भी ध्यान न रहा। इसका पता तो उन्हें तब लगा जब वाद्य बन्द हुआ। सबकी आँखों में प्रेम और पश्चाताप के आँसू। पश्चाताप अपने दुष्कर्म पर और प्रेम संगीत से, मानव की आत्मा से, जो अब तक उनसे छिपी थी और संगीत-स्वरों ने जिसे फूँककर जगा दिया था।
डाकुओं ने वडिवेलु का सारा समान लौटा दिया। उन्हें जंगल से बाहर तक छोड़ भी आये। उनके पैर छुए और प्रतिज्ञा की कि अब वे कभी भी किसी को न लूटा करेंगे। यह बात स्वातितिरुनालु ने सुनी तो उनका भी अहंकार दूर हो गया। उन्होंने वडिवेलु को सादर वापिस बुलाया और टावनकोर में फिर से संगीत की रसधारा लोक-जीवन को अनुप्राणित करने लगी।
‘श्रीमान जी! मुझे अपने गुरुदेव के दर्शन करने वाराणसी जाना है। मुझे तीन दिन का अवकाश चाहिये और आज थोड़ा जल्दी अवकाश चाहिए, ताकि रात की गाड़ी पकड़ने के लिये तैयारी कर सकूँ। गोरखपुर के एक रेलवे दफ्तर में यह शब्द एक छोटे-से कर्मचारी अविनाश बाबू ने आफिस इंचार्ज श्री बाबू भगवती चरण घोष (कलकत्ता निवासी) से कहते हुए छुट्टी का प्रार्थना-पत्र प्रस्तुत किया।
श्री भगवती चरण बाबू रुष्ट हो उठे-छुट्टी! छुट्टी!! छुट्टी!!! तुम्हारे गुरुदेव हुए या आफत हो गए। जब देखो, उनके ही दर्शनों को जाते रहते हो। कल जाना है, तो चले जाना। अभी जाकर काम करो।
अविनाश बाबू चुपचाप अपनी कुर्सी के पास आ गये, पर उनका मन काम करने में न लगा। जैसे-जैसे आफिस के घण्टे पूरे किये, इसी बीच कुछ नरम-से हुए भगवतीचरण जी आये और बोले-चलो मेरी कार पर, मैं तुम्हें घर छोड़ दूँगा, तो बनारस जाने की तैयारी कर लेना।
अविनाश और भगवतीचरण दोनों कार से चल पड़े। अविनाश का मकान सड़क के कुछ दूर मोड़ पर पड़ता था, मोड़ तक कार चली गई। इधर अविनाश बाबू भारी हृदय से उतर रहे थे, उधर दूसरी खिड़की के पास कोई व्यक्ति आया और भगवतीचरण से बोला-”भगवती बाबू, आप अपने मातहतों के प्रति बहुत निर्दय हैं। आपका यह स्वभाव अच्छा नहीं।” बस, इतने ही शब्द, इतनी ही देर की पहचान। आकृति तो पूरी-की-पूरी भगवतीचरण के मन में बैठ गई, पर वह आश्चर्यचकित रह गये कि यह एक सेकेण्ड में उस सुनसान में कौन व्यक्ति था, जो एकाएक प्रकट हुआ और इस तरह आदेश देकर अन्तर्धान हो गया मानो उसकी मुझसे वर्षों से पहचान रही हो। उनका शरीर भय से काँप रहा था। यह शब्द अविनाश ने भी सुने थे, पर उन्होंने किसी को ही देखा नहीं। इस एक छोटी-सी घटना ने भगवती चरण के जीवन में क्राँतिकारी परिवर्तन कर दिया। वे जीवन भर के लिये आध्यात्मिक जिज्ञासु और श्रद्धालु बन गये। उन्होंने उसी समय अविनाश से कहा-तुम तैयारी करो, कल हम भी तुम्हारे साथ अपनी कार में बनारस तुम्हारे गुरुदेव के दर्शन करने चलेंगे।
दूसरे दिन दोनों ही व्यक्ति बनारस महान् योगी श्री श्यामचरण लाहिड़ी के पास गये। भगवती बाबू उन्हें देखते ही आनन्द-आश्चर्य में डूब गये। ठीक यही आकृति थी, जो कल उन्हें आदेश देने गई थी। यही नहीं, उनका आश्चर्य तब सीमा पार कर गया, जब श्री लाहिड़ी जी ने उनके वहाँ पहुँचते ही पूछा-आप तो भगवतीचरण हैं न? आपका अपने मातहतों के प्रति बहुत निर्दय स्वभाव है, यह अच्छा नहीं। ठीक कल वाले शब्द उसी आवाज में दोहराये गये। एक व्यक्ति एक ही समय में दो स्थानों पर उपस्थित रहे, यह एक महान् आश्चर्य था। पर योगी के लिये यह सब व्यक्ति के सूक्ष्म शरीर का खेल है। वे इसे आश्चर्य नहीं मानते वरन् योग की अणिमा, गरिमा, लघिमा,महिमा प्राप्त, प्राकम्प, ईशत्व, वशित्व जैसी सिद्धियों-सामर्थ्यों का एक नगण्य अंश मानते हैं।
बातचीत के समय श्री लाहिड़ी ने योग और तत्व-दर्शन ने अनेक गूढ़ दृष्टाँत बताये। उन्होंने एक अति आश्चर्यपूर्ण रहस्य बताया कि हिमालय में एक ऐसे साधु हैं। जिनकी आयु का कोई भी अनुमान नहीं। कई युगों से भारतवर्ष में प्रकट होने वाली सद्गुरु आत्माओं को आत्म-बोध, ज्ञान और प्रकाश वही देते आ रहे हैं। भारतवर्ष में जितने भी सिद्ध महापुरुष हुए हैं, उनकी दीक्षा इन साधु ने ही की है। वे दिगम्बर बर्फ की चट्टानों या कहीं ऐसे स्थान में रहते हैं, जहाँ केवल सूर्य झाँक सकता है, पृथ्वी का तो वही प्राणी वहाँ पहुँच सकता है, जिसे वह आप ही बुलाना चाहें।
वाराणसी में श्री अविनाश और भगवतीचरण द्वारा परमयोगी श्री लाहिड़ी की भेंट के दो और भी महत्वपूर्ण प्रसंग हैं-एक तो यह कि श्री भगवतीचरण को कोई संतान नहीं थी। उन्होंने आशीर्वाद दिया कि आपको सन्तान तो होगी, पर आध्यात्मिक प्रताप से उत्पन्न होने के कारण अंतर्दर्शी होगी। उसे धर्म और समाज की सेवा और आत्मोत्थान की उच्चस्तरीय साधना के लिये आपको छोड़ना पड़ेगा। भगवतीचरण ने यह शर्त स्वीकार करली।
दूसरा प्रसंग श्री अविनाश का है। उन्होंने निवेदन किया-गुरुदेव! अब तो साँसारिकता से जी भर गया। नौकरी-चाकरी करते भजन-पूजन हो नहीं पाता। इसलिये अब तो आज्ञा दें तो सर्विस छोड़ दूँ और अपना मन योगाभ्यास में लगाऊँ।
श्री लाहिड़ी जी ने कहा ‘-बेटा! साधन और अभ्यास के लिये गृहस्थ और सामाजिक जीवन का परित्याग आवश्यक नहीं। अपनी समर्थता बढ़ाकर सामाजिक उद्देश्य भी पूरे किये जा सकते हैं और आध्यात्मिक अनुभूतियाँ भी पर यदि तुम्हें कुछ दबाव अनुभव होता है, तो पेंशन के लिये प्रार्थना पत्र भेज दो! पेंशन मिलने लगेगी, तो गुजारे की दिक्कत नहीं होगी।
लेकिन गुरुदेव!- श्री अविनाश ने चिन्तित स्वर में पूछा-अभी तो मेरी सर्विस अधिक-से-अधिक चार वर्ष की ही होगी। मुझे पेंशन कौन दे देगा? इस पर श्री लाहिड़ी जी बोले-! योगी और ईश्वर-निष्ठ व्यक्ति यद्यपि ऐसा कभी-कभार किसी उद्देश्य के लिये ही करते हैं तथापि वे कहीं भी, कानून का उल्लंघन करके भी, किसी भी बड़े पदाधिकारी तक को गलत बात सही मनवा सकते हैं। तुम उसकी चिन्ता न करो। अपना प्रार्थना-पत्र भर दो, लिखना कि रीढ़ की हड्डी में दर्द है। आगे हम सब ठीक कर लेंगे।
इसके बाद भगवतीचरण ने वहाँ दीक्षा भी ली और दोनों शिष्य गोरखपुर लौट आये। यह एक विलक्षण सत्य है कि श्री अविनाश ने प्रार्थना-पत्र दिया, उनकी डाक्टरी जाँच हुई और पता नहीं क्यों और कैसे उन्हें थोड़ी ही सर्विस के बाद पेंशन बाँध दी गई। अविनाश गृहस्थ से बदलकर स्वामी प्रणवानन्द बन गये। अनेक सिद्धियाँ और सामर्थ्यों को अर्जित करते हुए वे योग की परिपक्व अवस्था तक पहुँच गये, तब तक भी उन्हें पेंशन मिलती रही।
समय पाकर श्री भगवतीचरण के एक पुत्र हुआ। यही पुत्र बाद में श्री लाहिड़ी जी के सामर्थ्यवान शिष्य श्री मुक्तेश्वर का शिष्य बना और बाद में योगानन्द के नाम से न केवल भारतवर्ष वरन् अमेरिका और योरोप में विख्यात हुए। यह घटनायें, जो यहाँ प्रस्तुत की जा रही हैं, वह उन्हीं की आत्म-कथा ‘एक योगी की आत्म-कथा’ (आटो बाईग्राफी आफ ए योगी) का अंश हैं।
श्री योगानन्द तब लड़के थे और कलकत्ता में रहते थे। श्री प्रणवानन्द तब बनारस आ चुके थे। एक बार श्री भगवती बाबू को श्री केदारनाथ नामक बनारस के एक व्यक्ति से कुछ काम पड़ा। परिस्थितिवश वे उसका पता नहीं जानते थे। इसलिये उन्होंने अपने पुत्र श्री स्वामी प्रणावानन्द (यही पहले भगवती के आश्रित कर्मचारी अविनाश थे) के नाम था, दूसरे में कोई पता न था। केवल-केदारनाथ के लिये लिखा था। लड़के को बताया गया था कि स्वामीजी केदारनाथ को जानते हैं, वह यह पत्र उन तक पहुँचाने में मदद करेंगे।
योगानन्द के जीवन में आध्यात्मिक तत्वों के प्रति घोर आकर्षण और तीव्र जिज्ञासा पैदा करने वाली यह प्रथम और अन्तिम घटना थी, जिसने उनके जीवन की दिशा को एकदम आध्यात्म की ओर मोड़ दिया।
जैसे ही प्रणवानन्द के पास पहुँचे, उन्होंने कहा-आओ छोटे महाशय! (बंगाल में छोटे बच्चों को ऐसे ही सम्बोधित करते हैं) क्या तुम भगवतीचरण के पुत्र हो?
हाँ-बच्चे ने आश्चर्यचकित हो उत्तर दिया-मैं श्री भगवतीचरण का ही पुत्र हूँ। क्या आप स्वामी प्रणावानन्द हैं? स्वामीजी ने मुस्करा कर कहा हाँ। मानो उनकी पैनी दृष्टि बच्चे में छिपे आध्यात्मिक संस्कारों को पहले ही ताड़ गई थी, तभी जान-बूझकर ऐसे रहस्यमय दृश्य और वातावरण उपस्थित कर रहे थे अन्यथा योगी जब चाहे, जिनके सम्मुख प्रदर्शन करते नहीं। वे अपनी यौगिक शक्तियों का प्रदर्शन अधिकारी पात्रों के सामने ही करते हैं।
बच्चे ने केदारनाथ का पत्र देते हुए कहा यह पत्र श्री केदारनाथ जी को देने के लिये पिताजी ने दिया है, आप उनका पता बता दें या उन्हें यही बुलवा दें।
स्वामीजी का संक्षिप्त उत्तर था। अभी प्रबन्ध किये देता हूँ। यह कहकर उन्होंने आँखें सिकोड़ीं। ऐसा लगा जैसे ध्यानस्थ हो रहे हों। थोड़ी ही देर में वे पूर्ण समाधि की सी स्थिति में चले गये। बच्चे ने समझा, स्वामीजी पूजा या ध्यान कर रहे होंगे, वह कमरे में रखी खड़ाऊँ पूजन-सामग्री और दूसरी वस्तुओं की ओर देखने लगा। कोई 10 मिनट यह सन्नाटा रहा होगा, एकाएक स्वामी जी बोले अभी आधे घन्टे में केदार बाबू यहीं आ रहे हैं।
आधे घन्टे पीछे उन्होंने कहा देखो, नीचे कौन आ गया। लड़का तुरन्त सीढ़ियाँ उतर कर नीचे गया, उसका वर्णन करते हुए स्वामी योगानन्द ने स्वयं ही अपनी आत्मकथा में लिखा है।
मैंने नीचे जाकर पूछा क्या आप ही केदारनाथ हैं? वे बोले हाँ, अभी आधा घन्टे पहले स्वामी जी मुझे बुलाने गये थे। उस समय मैं गंगा स्नान करने गया था। मुझे पता नहीं स्वामी जी को कैसे पता चल गया कि मैं वहाँ हूँ, जबकि मेरी उनसे 10-15 वर्षों से भेंट नहीं हुई।
मैं चौंका कि स्वामी जी तो मेरे सामने बैठे रहे, फिर वे वहाँ कैसे पहुँच गये? मैंने पूछा वे क्या पहने थे? इस पर केदारनाथ ने बताया लँगोटी और खड़ाऊँ। गंगाजी से कुछ दूर तक वे मेरे साथ आये, फिर पूछा तुम कितनी देर में पहुँच रहे हो? वहाँ तुम्हारी एक लड़का प्रतीक्षा कर रहा है। मैंने कहा आधे घन्टे में। इसके बाद घर गया और सीधा यहाँ चला आया।
मैं चकित था कि स्वामी जी लँगोटी तो पहने थे, पर खड़ाऊँ भी उनकी बगल में रखी हैं, उन्होंने बड़े विश्वासपूर्वक कहा भी कि केदारनाथ आधे घन्टे के बाद आ रहे हैं।
यह सब क्या है? स्वामीजी एक ही समय में दो स्थानों में कैसे?
दोनों व्यक्ति ऊपर आ गये। आवश्यक बातें हुईं। इसके बाद लड़के ने अपनी जिज्ञासा और आश्चर्य स्वामीजी को प्रकट किया। श्री प्रणवानन्द हँसे और बोले बेटा! योगी के लिये यह सब खेल है। यहाँ मेरा स्थूल शरीर था, वहाँ सूक्ष्म शरीर। दोनों एक जैसे हैं, पर सामर्थ्यों में अलग-अलग। यह जब तुम कभी योगाभ्यास करोगे, तो
अपने आप जान लोगे कि यह सूक्ष्म शरीर ही है, जिस पर स्थूल शरीर का जीवन आधारित है, वही सूक्ष्म शरीर स्वप्न, सुषुप्ति और मृत्यु के बाद भी क्रियाशील रहता है। इस रहस्य को तुम भली-भाँति योगी बनकर ही समझ सकोगे।
योगानन्द ने वहीं निश्चय किया कि आगे से वे अपना जीवन आध्यात्मिक साधनाओं में लगाकर अतींद्रिय शक्तियों का विकास और परमानन्द की प्राप्ति करेगा।
मनः प्रभादार्द्बधन्ते
दुःखानि गिरि कुटवत्।
तद्वशा देव नश्यन्ति
सूर्यस्याग्रे हिमं यथा॥
अपने मन के प्रमाद से ही संसार में समस्त दुःख पर्वत की चोटी के समान बढ़ जाया करते हैं। अपने मन की विवेकशीलता होने पर वे सारे दुःख शीघ्र ही ऐसे नष्ट हो जाया करते हैं।
घोर अँधेरी रात, जब हाथ को हाथ नहीं सूझता था। झरना अपने अविरल प्रवाह से कल-कल करता हुआ एकाँत निर्जन विजन में बहता चला जा रहा था।
एक पहाड़ी उपत्यिका ने पूछा निर्झर! तुम्हें थकावट नहीं आती क्या? तनिक रुको, कुछ विश्राम भी तो कर लिया करो।
एक स्नेहपूर्ण दृष्टि डालते हुए झरने ने उपत्यिका को उत्तर दिया बहन! मुझे जिस महासागर से मिलना है, उसकी दूरी अनन्त है। रुकूँगा तो इधर-उधर भटकूँगा। चलते रहने से तो वह दूरी कुछ कम ही होगी। यह कहकर झरना आगे बढ़ चला।
वेल्स के प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक हर्बट्र क्रेशर ने अपने दो बच्चों को अलग-अलग रखकर दो प्रकार के प्रयोग किये। एक के पास जाते समय वे अपना स्वभाव मसखरा रखते। अपनी धर्मपत्नी से उसके सामने ही मजाक और अश्लील बातें करते, फूहड़ हाव-भाव प्रदर्शित करते। फलस्वरूप वह बच्चा प्रारम्भ से ही दुश्चरित्र हो गया और उच्च शिक्षा दिलाने के बाद भी वह अच्छा नहीं बन सका। दूसरे बच्चे के पास जाते समय क्रेशर सदैव विज्ञान की, वैज्ञानिक खोजों की बात करते। वहाँ उनका व्यक्तित्व एक गम्भीर चिन्तक की तरह रहता। फल यह हुआ कि ठीक यही प्रवृत्तियाँ बच्चे में विकसित हुईं और उसने विज्ञान के क्षेत्र में बड़ा नाम कमाया।
डॉ0 क्रेशर लिखते हैं- बच्चे को खराब से खराब घर में जन्म मिला हो, यदि उसे अच्छा वातावरण मिले तो वह बहुत अच्छा बन सकता है, जबकि बुरे वातावरण में पड़कर अच्छे घरों के लड़के भी खराब हो जाते हैं। अच्छे और बुरे विचार अच्छे या दूषित वातावरण की ही उपज होते हैं, विचार कहीं अन्यत्र से नहीं आते।
बच्चा स्वयं भी एक मस्तिष्क या विचारशील प्राणी होता है। उसके अपने संस्कार भी होते हैं। आत्म प्रदर्शन (सेल्फ एजर्शन) का भाव तो प्रत्येक बच्चे में अपना ही होता है। हमें यह देखना चाहिए कि उसकी यह भावना अच्छे अर्थ में है या खराब अर्थ में। यदि अच्छी और रचनात्मक दिशा में भावनायें और विचार शक्ति काम कर रही हो, तो उसे रोकना नहीं चाहिए वरन् अपनी ओर से सहयोग भी देना चाहिए। उदाहरण कई बच्चे छोटी अवस्था से ही अध्यापक बनना खेलते हैं वे अपने पिता का चश्मा उठाकर पहन लेते हैं और झूठ मूठ की हाजिरी भरने और बच्चों को डाँटने-डपटने का अभिनय करते हैं। यह आत्म प्रदर्शन इस बात का प्रतीक है कि बच्चे को अध्यापक बनना पसंद है। भविष्य में भले ही उसकी मान्यता बदले, पर अभी तो उसे इस प्रदर्शन के फलस्वरूप कई अच्छी बातें सिखाई जा सकती हैं। उदाहरणार्थ अनुशासनपूर्वक एक पंक्ति में बैठना, पढ़ाई का सब सामान क्रम में सजाकर रखना, गन्दगी से बचना आदि।
सर जगदीश चन्द्र बोस बाल्यावस्था में पौधों से बहुत प्रेम करते थे। छोटे-छोटे पौधे लाना, उनको लगाना, सींचना, उन्हें जानवरों से बचाना और फल-फूलों की रक्षा करने में उन्हें बहुत आनन्द आता था। उनकी इस भावना को यदि रोका गया होता, तो वह प्रसिद्ध वनस्पति शास्त्री नहीं बन सके होते। बच्चा प्रारम्भ से अपने पूर्वजन्मों के प्रबल संस्कार ही प्रदर्शित करता है और यदि वह अच्छे अर्थ में- ईश उपासना, नेतृत्व विज्ञान, सुधारक किसी भी दिशा में हो- यदि उसमें उसका और समाज का हित होता है तो उस भाव को पनपने में पूरा-पूरा सहयोग देना चाहिए उसके इस विकास में सहयोग देने के लिए उसकी पूरी बातें सुनना चाहिए, डाँटना या झिड़कना नहीं चाहिए। उसी की आयु का बनकर, उस जैसी ही टूटी-फूटी भाषा में बात करनी चाहिए ताकि वह निःसंकोच अपने को प्रकट कर सके। जो बच्चे प्रारम्भ में दब्बू हो जाते हैं, वे बाद में बुराइयों की ओर अधिक आकर्षित होते हैं।
‘चोर और कोतवाल’ का खेल प्रायः सभी बच्चों खेलते हैं। देखने में आया है कि दरोगा या कोतवाल वही बच्चा बनता है, जो अपेक्षाकृत अधिक चतुर हृष्ट-पुष्ट और स्वाभिमानी माता-पिता के घर जन्मा होता है। चोर को पकड़ने उसकी ढूंढ़ खोज करने और दण्ड देने की अधिकाँश क्रियाएं ऐसी होती हैं, जो उसने पुलिस वालों की देखी या सुनी होती हैं। न्याय के क्षेत्र में बालक कठोरता बरतता दिखाई देता है और उसमें वह अपनी कई बातें भी जोड़ता है। जो उसने देखी या सुनी भी नहीं होती। यह बातें बताती हैं कि बच्चे की भावनाओं में विकास की अच्छी संभावनाएं होती हैं। यदि उनको सही दिशाएं दे दी जाएं, तो बच्चों में योग्य नागरिक के गुणों का क्रमिक विकास सरलतापूर्वक किया जा सकता है। जिन बच्चों को इस तरह का सहयोग नहीं मिलता, वे बच्चे ही बुरे स्वभाव और आचरण करने लगते हैं।
भावनाओं के साथ बच्चों की इच्छाएं भी होती हैं। इच्छाओं को जीवन शक्ति (लाइफ फोर्स) कहते हैं। इच्छाओं को लोग शरीर से बढ़कर प्रेम करते हैं ‘विल्स डामिनेट बॉडी’ - यह मनोविज्ञान का बहुचर्चित सिद्धान्त है और उसका निराकरण यह देता है कि उन्हें दबाना नहीं चाहिए। फ्रायड का कथन है कि दबाई गई इच्छाएं भी वैज्ञानिक नियम का पालन करती हैं अर्थात् जितनी शक्ति से उन्हें दबाया जायेगा, वह उतनी ही नई शक्ति से फिर फूटेंगी और विद्रोह पैदा करेंगी। इस तर्क को मानवजीवन के हित में अचिन्त्य नहीं कहा जा सकता।
यदि इच्छाएं ऐसी हैं, जिनमें बच्चों का अहित हो सकता है, तो उनको दूसरी समानान्तर अच्छी इच्छा के लिए मोड़ना (रिडारेक्ट) चाहिए। बच्चे को मालूम नहीं है कि चाय पीना स्वास्थ्य के लिए अहितकर है, उसने अपने मित्र पिता या किसी पड़ोसी को चाय पीते देखा है, उसकी भी इच्छा है कि चाय पी जाय, उसे दबाना चाहेंगे, तो सम्भव है वह बाजार में जाकर चाय पिए और उसके लिए घर में पैसों की चोरी करे। बेहतर है कि उसे एक कप चाय दे दी जाये, फिर उसको चाय की बुराई से परिचित कराकर प्रतिदिन मीठा दूध या कोई अन्य पौष्टिक पेय लेने को प्रेरित किया जाये। बच्चा यह बात मान लेगा और फिर दुबारा चाय के लिए हठ नहीं करेगा।
सुरुचि का विकास बालक को साहसी और स्वाभिमानी बनाने का महत्वपूर्ण साधन है। हमारी भूल यह है कि हम बच्चों को किसी भी काम के अयोग्य समझ लेते हैं यदि उसमें थोड़ी-सी बुराइयाँ भी हों, तो भी उसे बिल्कुल अयोग्य न समझकर यह मानना चाहिए कि उन्हें गलत दिशा दी गई अथवा उसके पूर्वजन्म के संस्कार अच्छे नहीं रहे।
आगे के बच्चों में यह दोष न हों, इसके लिए उन्हें सुरुचि वाला बनना चाहिए पाश्चात्य देशों में प्रत्येक व्यक्ति की अपनी एक विशेष पसन्द (हॉबी) होती है- किसी की खेलने की, किसी की बागवानी की, किसी की घुड़सवारी करने की, किसी की बढ़ईगीरी और किसी की अपनी प्राइवेट प्रयोगशाला में बैठकर नये-नये प्रयोगों द्वारा छोटी-छोटी सुविधा बढ़ाने वाली नई वस्तुओं के अनुसन्धान की। ऐसी रुचियाँ यदि हम अपने बालकों में पैदा कर सकें तो उन्हें अनेक बुराइयों से सहज ही बचा सकते हैं।
क्रियाशीलता आत्म-चेतना का गुण है। बच्चा चुप रह ही नहीं सकता, यदि उसे कोई निश्चित दिशा न दी जाये, तो यह आवश्यक है कि वह तोड़-फोड़, मार-धाड़ छीना झपटी करे। यही आदतें धीरे-धीरे बुरे स्वभाव में बदल जाती हैं। यदि प्रारम्भ से ही बच्चे में कोई रचनात्मक रुचि पैदा कर दें, तो बच्चा एक नया आत्म विश्वास लेकर आगे बढ़ सकता है।
डॉ0 फ्रायड उदात्तीकरण (सव्लीमेशन) के पक्ष में थे। यह सिद्धाँत भी वस्तुतः काम का है। कोई लड़का मान लीजिए, क्रोधी स्वभाव का है, बहुत बढ़-बढ़कर बातें करता है, अहंकारी है, जहाँ जाता है वहीं झगड़ा कर देता है। उसे यदि कोई अच्छी पुस्तक देकर या खेलने कूदने की प्रेरणा देकर उस आदत को मोड़ना चाहें, तो सम्भव है कि वह किताब को भी फेंक दे और खेलने कूदने वाले साथियों को भी मार पीट बैठे। ऐसे बच्चों को उदात्तीकरण द्वारा उपयोगी बनाया जा सकता है। उदाहरण के लिए उसे ग्रुपिंग करना सिखाया जाये और उसे कोई स्काउटिंग एन0सी0सी0 आदि किसी ग्रुप का नेता बनाकर उसे एक अच्छे सैन्य अधिकारी का उत्तरदायित्व निबाहने की प्रेरणा ही जाये। इसमें उसके खराब गुणों का उसी प्रकार उपयोग हो सकता है जैसे गन्दी खाद का उपज बढ़ाने में।
इस तरह बच्चों को जब भी कुछ समझाया सिखाया या अप्रत्यक्ष रूप से प्रेरित किया जा रहा हो, तो यह ध्यान हो रहा है कि उसे पूर्ण स्नेह और सहानुभूति पाने का विश्वास हो रहा है। बीच-बीच में उसकी जिज्ञासाओं को भी जगाया जाता रहे। घटनाओं, प्रसंगों या कथाओं के माध्यम से उसकी पुष्टि भी की जाती रहे। उसे दूसरों के आगे परिचित (इन्ट्रोड्यूस) भी कराया जाता रहे। बच्चे की गलत प्रशंसा भूलकर भी न की जाये, पर उसकी छोटी सी विशेषता को भी बड़ा माना जाये, तो निश्चय ही एक दिन वह उस छोटी सी अच्छाई को ही बहुत अधिक विकसित कर लेता है।
प्रत्येक स्थिति में बच्चे को व्यस्त रखना आवश्यक है भले ही उसके काम का कोई उपयोग न होता हो। व्यस्त रहकर सामाजिक जीवन को स्वस्थ और समस्याहीन शाँतिमय बनाया जा सकता है। पन्तनगर (नैनीताल) में परीक्षा प्रति सप्ताह या प्रति पखवारे होती है। वार्षिक परीक्षा वहाँ नहीं होती। इन्हीं छोटी परीक्षाओं (टेस्ट्स) के नम्बर जोड़कर विद्यार्थियों को उत्तीर्ण या अनुत्तीर्ण किया जाता है। इस व्यवस्था का मूल उद्देश्य बच्चों को पढ़ाई में सदैव व्यस्त रखना होता है और सचमुच उसका बच्चों पर बड़ा अच्छा असर होता है। शिक्षा के स्तर की दृष्टि से यहाँ के बच्चे दूसरे स्कूलों के बच्चों से योग्य होते हैं।
जीवन के किसी भी क्षेत्र में व्यस्तता बढ़ाकर आज की और भावी पीढ़ी की योग्यताओं का विकास जिस समाज में रहा होगा, वहाँ के लोगों में बुराइयाँ कम होंगी। आत्महीनता भी वहाँ कम होगी, क्योंकि वह तो बुराइयों का ही आत्मा पर पड़ा हुआ व्यापक प्रभाव है। बुराइयों को मिटाकर ही हम अपने देश में आत्म विश्वासी और प्रतिभा सम्पन्न नागरिक को जन्म दे सकते हैं।
एकेनापि सुवृक्षेण पुष्पितेन सुगन्धिना।
वासितं स्याद्वन्नं सर्वं सुपुत्रेण कुलं यथा॥
जैसे एक ही वृक्ष विकसित होकर अपनी सुगन्ध से समस्त वन को सुवासित कर देता है, वैसे ही एक ही सद्गुण सम्पन्न सुपुत्र समस्त कुल को यश का भागी एवं विख्यात कर दिया करता है।
गुरु-कर्त्तव्य पितृ-हृदय से भी आवश्यक-
मिथिला के पंडित गंगाधर शास्त्री, जिस विद्यालय में पढ़ाते थे, उनका पुत्र गोविन्द भी उसी विद्यालय में पढ़ता था। गोविन्द के सौजन्य, अनुशासन और मंत्री भाव के कारण छात्र जितनी अधिक श्रद्धा शास्त्री जी के प्रति रखते थे, उससे अधिक प्रेम गोविन्द के प्रति। गोविन्द की सहृदयता की उन सब पर अमिट छाप थी।
कभी अनुपस्थित न रहने वाला छात्र गोविन्द उस दिन विद्यालय नहीं पहुँचा, तो विद्यार्थियों को स्वभावतः कुछ बेचैनी अनुभव हुई। सायंकाल तक कक्षाएं नियमित रूप से चलती रहीं। शास्त्री जी जैसे पहले पढ़ाया करते थे उसी तन्मयता, एकाग्रता और माधुर्य के साथ पढ़ाते रहे- जबकि सभी छात्रों के मन में रह रहकर गोविन्द के न आने का प्रश्न उठ-उठ पड़ता था, जैसे श्री शास्त्री जी मानो गोविन्द से पूर्ण अपरिचित रहे हों। उनकी मुद्रा में कोई भी ऐसा भाव दिखाई न दिया, जिससे पता चलता कि उन्हें गोविन्द की एक बार भी याद आई हो।
विद्यालय समाप्त हुआ, तो एक छात्र ने पूछ ही लिया- ‘गुरुजी’ आज गोविन्द पढ़ने नहीं आया, कहीं गये हैं क्या?
‘हाँ!’ बड़े करुण और शान्त स्वर में शास्त्री जी ने कहा-’गोविन्द वहाँ चला गया, जहाँ से कोई लौटकर नहीं आता।
गुरुभाई के आकस्मिक निधन का समाचार सुनकर विद्यार्थी अवाक् रह गये। एक छात्र ने पूछ ही लिया-’गुरुजी! सारा दिन बीत गया, आपने पहले क्यों नहीं बताया?’
‘पिता के हृदय से गुरु का कर्तव्य बड़ा होता है’ - दस शब्दों का इतना सा संक्षिप्त उत्तर देकर शास्त्री जी घर की ओर चल पड़े।
6 सितम्बर 1968 को दिल्ली से छपने वाले अखबार “वीर अर्जुन” में एक 6 वर्षीय बालिका के यौन परिवर्तन का समाचार छपा है। कैलाशनगर (अगरतल्ला) निवासी एक क्लर्क की 6 वर्षीया पुत्री सुमित्रा के शरीर में काफी दिन से ही विलक्षण शारीरिक परिवर्तन के चिन्ह प्रकट हो रहे थे। पिता ने अस्पताल में परीक्षण कराया। डाक्टरों ने बताया कि बालिका का यौन परिवर्तन हो रहा है। बाद में लड़की पूर्ण लड़का बन गई। ड्रेसडन के शल्य चिकित्सक डॉ0 बार्ने क्रुत्प ने जिस ईनर बेलरन नामक डेनिश चित्रकार को पुरुष से स्त्री बना दिया उसका वृत्तान्त भी कम मनोरंजक नहीं। ईनर वेलनर जब बीस वर्ष का था तभी उसने अपने साथ पढ़ने वाली एक लड़की से गंधर्व विवाह कर लिया। चित्रकार के हाव-भाव बहुत कुछ स्त्रियों जैसे थे यह देखकर उसकी पत्नी प्रायः मुस्कराया करती पर तब तक उनके दाम्पत्य जीवन के सुख में किसी प्रकार का अन्तर नहीं आया।
एक दिन ईनर को उसकी स्त्री ने हँसी-हँसी में अपने कपड़े पहना दिये। इन कपड़ों में ईनर बिलकुल लड़कियों जैसा लगा। पीछे उसे स्त्रियों के वेष में देखकर उसके मित्रों ने उसका नाम भी स्त्रियों का रख दिया। अब वह “लिली” नाम से पुकारा जाने लगा। यह नाम मानो उसके लिये ही चुना गया था। अन्त तक वह स्थायी रह भी गया क्योंकि उसके भीतर सचमुच एक नारी का व्यक्तित्व छिपा था। समय बीतने के साथ-साथ वह लक्षण और स्पष्ट होते गये। उसकी मानसिक प्रक्रियायें तो तेजी से नारी के स्वभाव में बदलती गई। उसे अपने ही यौन-अंगों के प्रति विलक्षण आकर्षण होता। इसे कुछ लोग उसकी मूर्खता और वहम बताते। कई शल्य-चिकित्सकों ने तो उसे मूर्ख कहकर अपने यहाँ से भगा भी दिया।
वर्तमान विज्ञान-वेत्ताओं का ध्यान प्रकृति की इस विलक्षणता की ओर गया होता कि उसके प्रत्येक कण में पुरुष और नारी भाव छिपा पड़ा है तो वे विकासवाद को यों ही गले का हार न बनाते। वे यह भी सोचते कि जिस प्रकृति में ऐसे विलक्षण सत्यों के लिये स्थान है वह स्वतन्त्र पुरुष या स्त्री का अमैथुनी निर्माण भी कर सकती है।
फरवरी 1930 में ईनर की अवस्था बहुत गम्भीर हो गई। उसने आत्म-हत्या करने तक का निश्चय किया। सौभाग्य से इन्हीं दिनों ड्रेसडेन डॉक्टर वार्नेक्रुत्स पेरिस आये हुये थे। सो ईनर के कई मित्रों ने उनसे परीक्षण कराने की सलाह दी। ईनर ने ऐसा ही किया। वार्नेक्रुत्स ने उसके शरीर की परीक्षा करके बताया कि उसके शरीर के भीतर स्त्री और पुरुष दोनों के ही लक्षण हैं पर दोनों में से पूर्ण विकास के लिये किसी को भी अवसर नहीं मिल रहा इसलिये यह कष्टपूर्ण स्थिति है। स्त्री होने की सम्भावनायें अधिक थीं वार्नेक्रुत्स ने उसे बर्लिन जाकर प्रोफेसर गेबहार्ड के पास शल्य चिकित्सा की सलाह दी।
ईनर बर्लिन चला गया। वहाँ उसका कठिन आपरेशन किया गया। आपरेशन के कुछ ही समय बाद उसकी आवाज विलक्षण ढंग से बदलने लगी। अब उसकी आवाज कोमल और सुरीली हो रही थी। आपरेशन से उसकी पुरुष योनि स्त्री योनि में बदल ही चुकी थी। कुछ ही महीनों में उसके स्तन भी उभर आये और इस तरह एक अच्छा हृष्ट-पुष्ट युवक कोमल भोली-भाली स्त्री में बदल गया। प्रकृति की इस विलक्षणता पर वैज्ञानिक कुछ भी प्रकाश डालने में असमर्थ हैं पर अब वे यह स्वीकार करते हैं कि प्रकृति में कोई विलक्षण मानसिक चेतना काम कर रही है और वह अपने आप ही ऐसे विलक्षण जीव और शरीर उत्पन्न करती रहती है। सम्भव है आरम्भ में मनुष्य का आविर्भाव भी ऐसी ही अमैथुनी स्थिति में हुआ हो। इसी प्रसंग में “अर्द्धनारीश्वर” के रहस्यों पर अगले अंकों में प्रकाश डाला जायेगा जिसमें प्रकृति की सर्वशक्तिमत्ता का और भी विलक्षण प्रतिपादन होगा। अगले अंकों में ऐसे पुरुषों के उदाहरण भी पढ़ने को मिलेंगे जिन्हें स्त्रियों के समान ही मासिक धर्म भी होता था और जो दूध भी दे सकने की स्थिति में थे। यह घटनायें इसलिये दी गई हैं कि उनसे स्त्री और पुरुष के प्रजनन कोषों में परस्पर एक दूसरे के गुणों का विद्यमान होना निश्चित समझा जाये। पर इससे सम्भावना मात्र सिद्ध होती है ऐसा नहीं जान पड़ता कि प्रकृति ने अपने आप कहीं से ईंट-पत्थर जोड़कर पुरुष या स्त्री का शरीर गढ़ दिया हो। पौराणिक कथानकों पर यदि विश्वास करें तो उनके ऐसे सैकड़ों उदाहरण हैं जिनसे स्वतन्त्र सन्तान उत्पन्न करने के अनेक वैज्ञानिक प्रयागों का विवरण मिलता है।
मार्कण्डेय पुराण में अनुसुइया के तीन पुत्र चन्द्रमा, दत्तात्रेय और महर्षि दुर्वासा के जन्म का विवरण आता है। यह तीनों ही देव शक्तियों के अंशावतार थे उनकी चेतना का सम्बन्ध ब्रह्माण्ड की अदृश्य शक्तियों के साथ था जबकि शरीरों का निर्माण रासायनिक ढंग से हुआ था।
कथा इस प्रकार है। एक बार सती अनुसुइया ने ऋतु स्नान किया। प्राकृतिक जीवन में रहने के कारण उनका सौंदर्य वैसे ही अपरिमित था स्नान के बाद तो जैसे स्वयं कामदेव ही उनके शरीर में उतर आये। रजोदर्शन के उपरान्त शृंगार किये हुए अनुसूइया को देखकर एकाएक महर्षि अत्रि का मन कामोद्वेग से विचलित हो उठा। उन्होंने मन ही मन अनुसूइया के साथ सम्भोग का वैसे ही चिन्तन किया जैसे कोई स्वप्न में किसी रमणी के साथ समागम का दृश्य देखता है। इससे उत्पन्न हुए विकार को व्यर्थ न जाने देने के लिए उन्होंने तीन प्रकार के रसायन (1) सतोगुणी जिसे विष्णु का अंश कहते हैं (2) रजोगुणी- ब्रह्मा का अंश और (3) तमोगुणी - शिव का अंश तैयार किये। यह तीनों एक प्रकार से अण्ड थे जिनमें उन्होंने अपने वीर्य कोष स्थापित किये। भ्रूण के विकास के लिए उचित परिस्थितियाँ आवश्यक होती हैं। इसलिए इन तीनों को बाद में उन्होंने अनुसूइया के गर्भ में उसी प्रकार बिना सम्भोग के प्रतिष्ठित किया जिस प्रकार ब्रिटेन में प्रयोग करके श्रीमती एमीनेरी जोन्स के गर्भ में कृत्रिम गर्भाधान कराकर मोनिका नामक लड़की को जन्म दिया (इस आशय का विस्तृत समाचार लन्दन से छपने वाले मासिक पत्र के 15 जुलाई 1967 के ‘टिट्विट्स’ पत्रिका में छपा है। यह लेख श्री जिराल्ड मैकनाइट द्वारा प्रस्तुत किया गया है)। यही गर्भ अन्त में क्रमशः चन्द्रमा दत्तात्रेय और दुर्वासा के रूप में जन्मे। इन तीनों सन्तानों में अपने-अपने रसायनों के प्रकृति गुणों के साथ दैवी गुणों की बहुतायत थी।
तामस मनु की उत्पत्ति भी इसी प्रकार स्वराष्ट्र नामक राजा के प्रभाव से एक हरिणी के गर्भ से हुई थी। इनमें शारीरिक दृष्टि से पशुओं के लक्षण होते हुए भी मानसिक दृष्टि से प्रकाँड पाँडित्य था। नृपति स्वराष्ट्र ने यह विद्या बहुत तप करके पाई थी। उन्होंने पंचाग्नि विद्या का गहन अध्ययन, अन्वेषण और प्रयोग किया था।
रावण स्वयं बड़ा वैज्ञानिक था। उसने भी अपनी मन्दोदरी के उदर से एक ऐसे ही भ्रूण को जन्म दिलाया था पर पीछे उसने उसे असफल मानकर समुद्र में फिंकवा दिया। इस भ्रूण की विलक्षणता यह थी कि उसमें लाखों वीर्य कोष एक साथ विकसित हो गये थे। गर्भ में यह संभव न था कि वे सब बच्चों हो जाते। दबे रहने के कारण अविकसित रह गये इसीलिए यह प्रयोग असफल हो गया था। यही भ्रूण बहते-बहते एक पीपल की जड़ों में अटक गया।
जो साधक सत्य की आज्ञा में उपस्थित रहता है वह मार अर्थात् मृत्यु के प्रवाह को भी तैर जाता है।
-आचाराँग 1।3। 3।
वीर्य कोषों में जीवन तो था ही। सम्मिलित भ्रूण छितर गया और वे सब पीपल का दूध चूस-चूस कर उसी तरह बढ़ने लगे जैसे कोई एक कोषीय जन्तु (प्रोटोजोन) विकसित होता है। आखिर समुद्री आहार ले लेकर यह सब 1 लाख पुत्रों में परिणत हो गये। उनमें सबसे प्रथम बालक “नारान्तक” नाम से प्रख्यात हुआ शेष सब भाइयों को लेकर उसने “बिहवावल” राजधानी बनाकर स्वतन्त्र राज्य स्थापित किया। यह सभी 1 लाख भाई जुड़वाँ भाइयों के समान इतने मिलते जुलते थे कि बाहर का कोई भी व्यक्ति उनमें से किसी की भी पहचान नहीं कर सकता था।
अरब में पाये जाने वाले फायनिक्स पक्षी (यह पक्षी वहाँ रेगिस्तान में 6 वीं शताब्दी तक पाए जाते रहे) के सम्बन्ध में भी एक ऐसा ही पौराणिक आख्यान आता है। जिसमें यह बताया गया है कि रेगिस्तान में एक जगह राख पड़ी हुई थी। एक सन्त ने उसमें से ही युवा फ्रायनिक्स को बनाया। ऐसा लगता है कि इस राख में प्रजनन वाले कोई अंश रहे होंगे और सन्त उनका जीवन विज्ञान से सम्बन्ध जानते रहे होंगे तभी उनके लिए यह सम्भव हुआ होगा।
रघुवंश में “युवनाश्व” नामक राजा का वर्णन आता है। वह एक बार जंगल में भटक कर एक ऋषियों के आश्रम में पहुँच गये। उन दिनों इस आश्रम में इस तरह का एक प्रयोग चल रहा था। विविध रसायनों से भरा एक घड़ा यज्ञ वेदी पर रखा गया था। यज्ञ के माध्यम से ऋषिगण उसमें उतारने का प्रयत्न का रहे थे। घड़े का अधिकाँश भाग जल था। (स्मरण रहे प्रोटोप्लाज्मा जिससे जीवित शरीरों का निर्माण होता है उसमें अधिकाँश भाग जल का ही होता है) रात में सब लोग सो गये। युवनाश्व भी यज्ञ मंडप के समीप ही सोये थे। रात में उन्हें प्यास लगी। वहाँ कहीं पानी नहीं दिखाई दिया। प्यास रोक सकने की स्थिति में भी वे नहीं थे निदान उस घड़े से ही लेकर जल उन्होंने पी लिया। अभिमंत्रित जल उनके उदर में गर्भ के रूप में बढ़ने गला। ऋषियों के लिए यह और भी कौतूहल की बात हो गई थी इसलिए वे बराबर युवनाश्व की देखभाल करते रहे। अन्त में पूर्ण विकास होने पर युवनाश्व की दाहिनी कोख की शल्य क्रिया करके बच्चे को जीवित निकाला गया। यह बालक ही मान्धाता नाम से विश्व विख्यात हुआ।
सुद्युम्न की कथा अग्नि पुराण में आती है वह पुरुष से स्त्री बन गया था। तब उसका नाम “इला” हो गया। इला एक दिन राजकुमारी के वेष में वन-बिहार के लिए निकली। सोम के पुत्र “बुध’ ने उसे देखा तो वे कामासक्त हो उठे। उन्होंने “इला” को वहीं स्वीकार कर लिया “बुध” उसी प्रकार की नक्षत्रीय शक्ति है जिस प्रकार सूर्य और चन्द्रमा। वह कोई पुरुष नहीं था। बुध की चेतना शक्ति ने ही इला के गर्भ के प्रवेश किया था। इसी अमैथुनी सहवास से पुरुरवा नामक प्रतापी राजा का जन्म हुआ। भारतीयों में गोत्रों के नाम सूर्यवंशी, चन्द्रवंशी आदि नाम से चलते हैं यह इन्हीं आख्यानों से प्रारम्भ हुए हैं अर्थात् यहाँ अमैथुनी सन्तानों का प्रचलन किन्हीं दिनों में सामान्य बात थी। यहाँ का वैदिक युग और पुराण काल दोनों ही विज्ञान की चरम प्रगति के काल थे। उन दिनों देव-शक्तियों के आवाहन और धारण द्वारा अमैथुनी सन्तानें उत्पन्न करने के सैंकड़ों सफल प्रयोग हुए। यदि भारतीय अपने आपको यों प्रत्यक्ष देव वंश का मानें तो इसमें आश्चर्य जैसी कोई बात नहीं होनी चाहिए। प्रारम्भ के “स्वायंभु’ पुरुष की उत्पत्ति भी तो ईश्वरीय ही है। उस पद्धति के बीच में भी कभी भी पुनः नया रूप देना सम्भव हो पाये तो उसमें किसी को आश्चर्य नहीं करना चाहिए।
आज विज्ञान इस दिशा में तेजी से प्रयोग कर रहा है और एक दिन आने वाला है जब प्रयोगशालाओं में बच्चे पैदा होंगे और उपरोक्त पौराणिक गाथाओं की पुष्टि करेंगे। आज जो लोग वेद पुराणों को कल्पना की उड़ान कहते हैं। वही उन्हें सत्य सिद्ध होते अपनी आँखों से देखेंगे।
वैज्ञानिकों ने जीवित शरीर की इकाई प्रोटोप्लाज्मा का विश्लेषण कर लिया इसमें हाइड्रोजन, नाइट्रोजन, ऑक्सीजन, सिलिकन, कार्बन सोडियम, कैल्शियम, क्लोरीन, गंधक फास्फोरस, मैग्नीशियम और आयोडीन तत्व पाये जाते हैं उन सबको प्रकृति प्राप्त किया जाना सम्भव हो गया है अब उसमें चेतना डालना भर शेष रह गया है जिस दिन यह भी हो जायेगा उस दिन अमैथुनी सन्तानों का निर्माण भी होने लगेगा। तब सन्तान के लिए न स्त्री की आवश्यकता होगी न पुरुष की, किन्हीं प्रकाश किरणों से कृत्रिम -सन्तानें उस प्रकार तैयार कर ली जाय करेंगी जैसे घड़े से कुम्भज ऋषि को पैदा कर लिया गया था। पैतृक गुणों की दृष्टि से यह सन्तानें देव शक्तियों का ही प्रतिनिधित्व करेंगी।
कोश (सेल) जीवित पदार्थों द्वारा बनाये जाते हैं। पहले भोजन का प्रोटीन बनता है फिर प्रोटीन से “सेल”। भोजन को निर्जीवन कहें और कोश (सेल को जीवित तो प्रोटीन को उनके बीच की इकाई कहेंगे। प्रोटीन ही सजीव “सेल्स” का निर्माण करते हैं। इसके बिना हाथ पाँव, पेट, मुँह, दाँत, आदि कुछ नहीं बन सकते। मुर्गी के अण्डों में प्रोटीन आश्चर्यजनक रूप से बढ़ाता पाया गया है इससे यह आशा हो गई है कि जिस प्रकार अन्न से अमीनो एसिड और अमीनो एसिड 24 तत्वों में बदलता हुआ जीवित कोश बन जाता है उसी प्रकार प्रोटीन सीधे भी रासायनिक क्रियाओं से तैयार किया जा सकता है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि वंश परम्परा और विकास के लिए यह प्रोटीन की बनावट और विशेषता ही सहायक है। कोर्नल विश्व विद्यालय और फेलर इन्स्टीट्यूट न्यूयार्क आदि में यह पता लगाया गया है कि न्यूक्लिक तेजाब (जो लक्षण बीज (जीन्स) के मूल होते हैं) और अमीनो एसिड्स दोनों के अणु मिल कर ही शरीर का भवन और चेतना तैयार करते हैं। जीवित सेल में प्रोटीन के उत्पादन का पता लगते ही अमैथुनी सृष्टि का निर्माण प्रारम्भ हो जायेगा।
मियामी (फ्लोरिडा) विश्व विद्यालय के आणविक विकास संस्थान के डॉ0 सिडनी फाक्स और उनके सहयोगियों का ध्यान उस ओर गया है जब पृथ्वी में पहली बार जीवन का आविर्भाव हुआ होगा। उस समय तो यहाँ गैस, ताप और पानी ही रहा होगा। इसलिए एक ऐसा थियेटर तैयार करके डॉ0 फाक्स परीक्षण कर रहे हैं जिससे वैसा ही वातावरण रहे जैसे जीवन के प्रादुर्भाव काल में रहा होगा। उन्होंने देखा गैसों को गरम करने से अमीनो अम्ल बनते हैं। इस अम्ल को गर्म करने से वह प्रोटोनायड का रूप ले लेता है। यदि उसमें पानी मिला दें तो एक ऐसा जटिल तत्व बन जाता है जो हमारे कोषाणुओं से बहुत कुछ मिलता जुलता है। यदि जीवित सेल की इस तरह रचना सम्भव हो गई तो केवल उस ढाँचे का निर्माण ही शेष रह जायेगा जिसमें भर कर मनुष्य,पशु-पक्षी, कुत्ते, बिल्ली कोई भी आकृतियाँ बना लेना सम्भव हो जायेगा।
प्रकृति के यह विलक्षण रहस्य जब तक अप्रकट हैं तक तक हम स्थूलताओं से घिरे हैं यह रहस्य पूर्णतया प्रकट होंगे तो चेतन शक्तियों की महत्ता का पता चलेगा। हम यह मानने को विवश होंगे कि चेतन शक्तियों ने जब धरती में मनुष्य का आविर्भाव किया होगा तब प्राकृतिक परिस्थितियाँ ही उनके लिए पर्याप्त रही होंगी। विकासवाद की जटिलता से गुजर कर विकसित प्राणी तैयार करना उसके लिए आवश्यक न रहा होगा।
प्रकृति भी ईश्वर के समान ही समर्थ है अपनी उन्नति और विकास में वह रुकना नहीं जानती हाँ जो स्वयं रुक रहा हो उसके लिए वह अभिशाप अवश्य बन जाती है।
-गेटे
बूँदें जो बन गई मोती-
समुद्र खौलाया जाने लगा तो डरी सहमी जल की बूँदें विधाता के पास जाकर कहने लगीं पितामह! हमें कष्ट क्यों देते हो हमने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है। विधाता ने बहुतेरा समझाया- बूँदों तुम आकाश में उड़ोगी जहाँ बरसोगी वहीं हरियाली फूटेगी और संसार को प्रसन्नता मिलेगी पर यह उपदेश बूँदों को अच्छा न लगा। वे लौटीं तो, पर विधाता को गालियाँ दी देती रहीं।
समुद्र ने जल की बूँदों को आकाश में फेंक दिया, फिर वे धरती पर गिरीं और बहते-बहते समुद्र में फिर जा पहुँचीं तब उन्हें पता चला कि अरे हम तो व्यर्थ ही डरते रहे हमारा तो कुछ भी नहीं बिगड़ा। इतने सुन्दर दृश्य देखने और विश्व भ्रमण का सौभाग्य मिला सो अलग।
उधर स्वाति नक्षत्र आ गया तो बूंदें एक बार फिर उमड़ीं इस बार उनमें न भय था न उद्वेग। हँसती खिलखिलाती बूँदें आकाश से झरने लगीं कोई बाँस में गिरी तो वंशलोचन वन गई, कोई कदली में गिरी तो कपूर और सीपी के मुख में गिरी तो मोती बन गई।
बूँदें अपने इस सौभाग्य पर प्रसन्न हो रही थीं तब विधाता विचार कर रहे थे कि मनुष्य भी संकट और साधनाओं से विचलित न होता तो आज वह बूँदों के समान, वंशलोचन कपूर और मोती बन गया होता।
नदी जब समुद्र में मिलने की प्रबल आकाँक्षा से अभियान करती है तो उसकी गति रोकने वाले अवरोधों को परास्त ही होना पड़ता है। समुद्र से मिलने की प्रबल आकाँक्षा, आवश्यकतानुसार उसे विरोधी चट्टानों को कभी काटने पर विवश करती है तो कभी इधर -उधर घूमकर रास्ता निकाल लेने की प्रेरणा देती है। उसकी प्रबल इच्छा उसे अपनी लक्ष्य सिद्धि के लिए कभी टक्कर लेने, कभी निम्न होने, कभी रास्ता बदलने और कभी मन्द मंथर हो जाने का ज्ञान देती है। उसका वाँछित लक्ष्य सागर से मिलन होता है और वह उसे किसी न किसी प्रकार संघर्ष अथवा सामंजस्य पूर्ण नीति से प्राप्त कर ही लेती है। वह किन्हीं कारणों से हार कर निराश अथवा निरुत्साह होकर गतिहीन नहीं होती। इसलिए कि उसकी इच्छा शक्ति में सच्चाई और प्रबलता होती है।
नदी की तरह ही वह मनुष्य भी अपनी सफलता के लिए मार्ग निकाल ही लेता है जिसकी इच्छा दृढ़ और बलवती होती है। उसकी इच्छा स्वयं ही उसका मार्ग प्रदर्शन करती चलती है। सफलता का मूल मनुष्य की इच्छा शक्ति में सन्निहित रहता है। मानवीय शक्तियों में उसकी इच्छा शक्ति सबसे प्रबल और प्रमुख होती है। जिन मनुष्यों की इच्छा शक्ति निर्बल होती है, वे साधन सम्पन्न होने पर भी कोई उल्लेखनीय सफलता नहीं पा पाते। निर्बल इच्छा शक्ति वाले मार्ग में आई एक साधारण सी कठिनाई अथवा सामान्य विरोध को देखकर हिम्मत खो बैठते हैं।
मनुष्य की शारीरिक शक्ति का अपना महत्व है। लेकिन उसकी संचालिका शक्ति इच्छा शक्ति ही होती है। यदि इच्छा शक्ति का अभाव हो जाय तो मनुष्य की शारीरिक शक्ति भी कुण्ठित हो जाएगी। शरीर पर इच्छा शक्ति का ही शासन होता है। शरीर क्या है? इन्द्रियों का संगठित समूह। इन्द्रियों का कार्य ही शरीर का कार्य होता है। इन्द्रियाँ इच्छा शक्ति से ही कार्य की प्रेरणा पाती हैं। कोई कितना ही आवश्यक काम क्यों न हो, इन्द्रियाँ सक्षम और प्रस्तुत क्यों न हों, किन्तु जब तक इच्छा शक्ति की प्रेरणा न होगी वे बँधी बैठी रहेंगी, किसी काम में हाथ न लगायेंगी। जब इच्छा का स्फुरण होगा, उसकी प्रेरणा होगी तभी इन्द्रियाँ कार्यरत हो जायेंगी। शरीर इन्द्रियों के और इन्द्रियाँ इच्छा शक्ति के अधीन होती हैं। इच्छा शक्ति की जागरुकता के बिना मनुष्य कोई भी कार्य करने में सक्षम नहीं हो सकता।
संसार के छोटे बड़े सभी कार्य शक्ति द्वारा ही पूरे होते है। शक्ति के बिना मनुष्य एक पग भी आगे नहीं बढ़ सकता। श्वास लेने की सामान्य प्रक्रिया से लेकर पहाड़ काटने तक के कठिन काम शक्ति द्वारा ही सम्पादित किये जाते हैं। जब तक शक्ति है, तब तक कर्म है जब तक कर्म है तब तक जीवन है। शक्ति के समाप्त होते ही क्रिया स्थगित हो जाती है और क्रिया के स्थगित होते ही जीवन समाप्त हो जाता है। अपाहिज, असाध्य, अकर्मण्य आदि सब, जिनकी क्रियाएं स्थगित हो गई होती हैं, जो किसी मतलब और मसरफ के नहीं रहते वे एक बार प्राण भले ढो रहे हों, पर होते मृतक समान ही हैं।
किन्तु मनुष्य की वह वास्तविक शक्ति है क्या? वह वास्तविक शक्ति मनुष्य की इच्छा शक्ति ही है। क्योंकि यही जीवन के चिन्ह-कर्म की विधायिका तथा प्रेरिका होती है। जहाँ इच्छा नहीं वहाँ कर्म नहीं- और जहाँ इच्छा है वहाँ कर्मों का होना अनिवार्य है। इच्छा की ही प्रेरणा से ही मनुष्य कर्मों में प्रवृत्त होता है। यदि उसमें इच्छा की स्फुरणा नहीं उसकी प्रेरणा न हो तो मनुष्य भी जड़ बन कर पड़ा रहे। आदिकाल से मनुष्य अब तक जो विकास और उन्नति करता आया है वह सब इच्छाशक्ति का ही चमत्कार है। मनुष्य में यदि इच्छा शक्ति की विशेषता न होती तो वह अब तक भी दो हाथ-पैरों वाला वनमानुष बना अन्य पशुओं की तरह ही जीवन बिताता, गुफा- कन्दराओं में पड़ा होता। इस प्रकार आश्चर्यजनक साधनों के साथ शान से देवताओं से एक पद पूर्व न रहा रहा होता। तथापि जिनमें इच्छा शक्ति का प्राबल्य होता है वे अब भी अपनी साधना और तपश्चर्या के बल पर देवताओं के समकक्ष होना तो क्या परमात्मा के समकक्ष हो जाते हैं। जीवन की समग्र उन्नतियाँ और सारी सफलतायें इच्छा शक्ति के ही अधीन होती हैं।
नव सृजन, नव चेतना, नव निर्माण की जो भी क्रांतियां संसार में हुई हैं अथवा होती हैं उनका आधार मनुष्य की प्रबल इच्छा शक्ति ही होती है। संसार में अब तक जो भी महान और उल्लेखनीय काम हुए हैं उनको उन्हीं महामानवों ने सम्पादित किया है, जिनकी इच्छा शक्ति प्रबल और प्रखर रही है। निर्बल इच्छा शक्ति वाले लोग संसार में अब तक न कोई उल्लेखनीय कार्य कर सके हैं और न आगे ही कर सकेंगे। निर्बल इच्छा शक्ति वाले व्यक्तियों के मन में, महानता, सफलता और उन्नति के विरोधी भाव, जैसे सन्देह, आशंका, भय और अविश्वास आदि भरे रहते हैं। उसे अपने कुविचारों, कुकल्पनाओं और कुप्रवृत्तियों के जाल से निकलने का अवकाश ही नहीं मिलता जिससे वह श्रेय-पथ पर अग्रसर हो सकें। वह स्वभावतः अस्थिर विचार, अस्थिर उद्देश्य और अस्थिर निश्चय वाला होता है। एक काम को तब तक करते रहने का धैर्य उसमें नहीं होता जब तक कि उसका अन्तिम निष्कर्ष न निकल आये। वह जल्दी ही एक काम को छोड़कर दूसरा और दूसरे को छोड़कर तीसरा पकड़ता रहता है। अपनी इच्छा शक्ति की अदृढ़ता के कारण वे एक छोटी सी कठिनाई से ही भयभीत तथा उद्विग्न हो जाता है और जल्दी ही कर्त्तव्य से हट जाता है। इच्छा शक्ति की निर्बलता मनुष्य के समग्र जीवन की निर्बलता है।
सबल इच्छा शक्ति जहाँ एक प्रकार की अमोघ औषधि है वहाँ निर्बल इच्छा शक्ति विविध प्रकार के रोगों की जननी होती है। जिसकी इच्छा शक्ति निर्बल होती है वह एक छोटे से रोग में ही अपनी मृत्यु ही कल्पना करने लगता है। उसके विचार प्रतिगामी होते हैं। वह रोगों का उपचार भी करता है तो भी सोचता रहता है कि औषधि उसे लाभ नहीं कर रही है। बहुत बार तो वह काल्पनिक रोगों के भय से ही ग्रस्त बना रहता है और देर सवेर उस प्रकार का रोग उत्पन्न ही कर लेता है। मानस चिकित्सा शास्त्रियों ने अपने अनुभव के आधार पर बतलाया है कि वास्तविक रोगियों की अपेक्षा ऐसे रोगियों की संख्या अधिक होती है जो अपनी प्रतिगामी कल्पना के कारण अपने को रुग्ण तथा अस्वस्थ समझते रहते हैं। यह अनेक प्रयोगों के आधार पर सिद्ध किया जा चुका है कि यदि मनुष्य की इच्छा शक्ति प्रबल हो तो वह बिना किसी उपचार के रोगों पर विजय प्राप्त कर सकता है।
निर्बल इच्छा शक्ति की हानियाँ केवल व्यक्ति तक ही सीमित नहीं रहतीं। वे समाज पर भी अपना प्रभाव डालती हैं। मनुष्य की इच्छा शक्ति में एक प्रकार की अदृश्य तरंगें होती हैं जो मानसिक गतिविधियों से निकल कर वातावरण में फैल जाती हैं और दूसरों को प्रभावित करती हैं। उनके मानसिक भावों को अपने प्रकार का बनाने का प्रयत्न करती हैं। यही तो कारण है कि जिस स्थान पर कमजोर और कायर मन वाले लोग रहते हैं वहाँ प्रायः भय और आशंका का वातावरण बना रहता है। किसी संगठन में दुर्बल इच्छा शक्ति वाले अपनी गतिविधियों से औरों को भी निर्बल और हतोत्साह बना देते हैं। युद्ध में एक कायर सैनिक भागकर और भी अनेक सैनिकों को भागने की प्रेरणा देता है। जिस देश, समाज अथवा राष्ट्र के नेता निर्बल इच्छा शक्ति वाले होते हैं वह देश, समाज अथवा राष्ट्र बहुधा अवनति और पराभव के ही अधिकारी बनते हैं। नेता का प्रभाव विस्तृत होता है, उसमें जनगण का विश्वास होता है। इसी कारण, नेता यदि निर्बल इच्छा शक्ति वाला होता है तो उसकी संक्रामकता निर्बलता जनता का भी हृदय दुर्बल बना देती है। सारे राष्ट्र में भय आशंका और कायरता का वातावरण उत्पन्न हो जाता है। जहाँ इस तरह के पाप अभिशाप जनगण को दबाये होते हैं वहाँ उन्नति, प्रगति अथवा विजयश्री का पदार्पण नहीं होता।
इसके विपरीत जिस समाज अथवा राष्ट्र के नेता प्रबल इच्छा शक्ति वाले होते हैं, वह समाज और राष्ट्र भी प्रबल तथा शक्तिशाली बना रहता है, फिर चाहे वह विस्तार और जनसंख्या की दृष्टि से छोटा ही क्यों न हो। जापान, इंग्लैण्ड और जर्मनी आदि देश इस बात के ज्वलंत प्रमाण हैं। भारत में भी राणा प्रताप, शिवाजी, गुरुगोविन्द सिंह, हम्मीर देव आदि के ऐसे अनेक उदाहरण मौजूद हैं जो साधन और सैन्य शक्ति की दृष्टि से नगण्य होने पर भी सर्वसम्पन्न मुगल बादशाहों के अत्याचारों से टक्कर लेते रहे। महात्मा गाँधी तो प्रबल इच्छा शक्ति के एक जीते-जागते आदर्श थे। उनके पास एक प्रबल, दृढ़ तथा प्रखर इच्छा शक्ति को छोड़कर और क्या साधन थे? न सेना न शस्त्र और न साम्राज्य। तथापि उन्होंने अपनी एक उस अमोघ इच्छा शक्ति के आधार पर उदयास्त पर्यन्त फैले अंग्रेजी साम्राज्य से जम कर टक्कर ली और अपनी शान्ति अहिंसा की नीति से ही उनकी तोपों, बन्दूकों, गनमशीनों और सेनाओं की शक्ति को पराभूत कर दिया। महात्मा गाँधी की प्रबल इच्छा शक्ति का ही तो यह चमत्कार था कि उनके नेतृत्व का भारत आबाल वृद्ध स्त्री-पुरुषों के साथ साधनहीन होने पर भी अजेय बन गया था। इच्छा शक्ति की महिमा अपार और अपूर्व है।
यदि हमें अपने जीवन को उन्नति और प्रगति के द्वारा सार्थक बनाना है तो अपनी इच्छा शक्ति को बढ़ाना और प्रबल बनाना होगा। तभी हममें दृढ़ता, साहस और कार्य क्षमता का विकास होगा। हम उत्साही वीर और संकल्पवान बनेंगे। हममें वह कर्मठता आएगी जो जीवन पथ की बाधाओं तथा विपत्तियों से भी कुण्ठित न हो सकेगी। सफलता का पथ निश्चय ही बड़ा कठिन और दुर्गम होता है। उसको सरल और प्रशस्त बनाने में मनुष्य की इच्छा शक्ति का बड़ा उपयोग है। इच्छा शक्ति की दृढ़ता और प्रबलता मनुष्य को पराक्रमी, पुरुषार्थी और धीर-गम्भीर बना देती है। प्रबल इच्छा शक्ति वाला जिस काम में हाथ डालता है, उसे तब तक नहीं छोड़ता जब तक पूरा नहीं कर लेता। वह बाधाओं विरोधों से साहसपूर्वक लड़ता हुआ बढ़ता रहता है। उन्नति और सफलता का इसके सिवाय और कोई उपाय नहीं है।
संसार की सारी सफलताओं का मूल मन्त्र है प्रबल इच्छा शक्ति - इसी के बल पर विद्या, सम्पत्ति और साधनों का उपार्जन होता हैं। यही वह आधार है जिस पर आध्यात्मिक तपस्याएं और साधनाएं निर्भर रहती हैं। यही वह दिव्य सम्बल है जिसे पाकर संसार में खाली हाथ आया मनुष्य वैभव और ऐश्वर्यवान बनकर संसार को चकित कर देता है। यही वह मोहन ओर वशीकरण मन्त्र है जिसके बल पर एक अकेला पुरुष कोटि-कोटि जन-गण को अपना अनुयायी बना लेता है। जीवन में उन्नति और सफलता की आकाँक्षा करने से पहले अपनी इच्छा शक्ति को प्रबल तथा प्रखर बना लेने वालों को न कभी असफल होना पड़ता है और न निराश। वे अपनी मनोवाँछित विजयमाल पहन कर ही मानते हैं।
दृढ़ निश्चय और आत्म-विश्वास में वह शक्ति है जो असम्भव को सम्भव बना देती है।
-मदनमोहन मालवीय
‘नन्ही सी चिनगारी, तुम भला मेरा क्या बिगाड़ सकती हो, देखती नहीं मेरा आकार ही तुमसे हजार गुना बड़ा है अभी तुम्हारे ऊपर केवल गिर पड़ूं तो तुम्हारे अस्तित्व का पता भी न लगे। तिनकों का ढेर अहंकार पूर्वक बोला।
चिनगारी बोली कुछ नहीं, चुपचाप ढेर के समीप जा पहुँची। तिनके उसकी आँच में भस्मसात होने लगे। अग्नि की शक्ति ज्यों ज्यों बढ़ी तिनके त्यों-त्यों जलकर नष्ट होते गये, देखते-देखते भीषण रूप से आग लग गई और सारा ढेर राख में परिवर्तित हो गया।
यह दृश्य देख रहे आचार्य ने अपने शिष्यों को बताया- बालकों जैसे आग की एक चिनगारी ने अपनी प्रखर शक्ति से तिनकों का ढेर खाक कर दिया तेजस्वी और क्रियाशील एक व्यक्ति ही सैंकड़ों बुरे लोगों से संघर्ष में विजयी हो जाता है।
24 वर्ष पूर्व 16 जुलाई को मैक्सिको (अमेरिका) के रेगिस्तान में परीक्षण के लिए बम विस्फोट किया गया। विस्फोट करने से पूर्व कई महीने तो उसकी तैयारी में लगे थे। इस्पात का एक बहुत बड़ा खम्भा बनाया गया था उसके ऊपर बम रखा गया। बिजली के तार के द्वारा उसका सम्बन्ध जिस स्विच से किया गया था वह उस स्थान से 7 मील की दूरी पर था वैज्ञानिकों को पता था कि उसका विस्फोट इतना तीव्र होगा कि पास खड़े देखने वाले लोगों की आँखें यदि नंगी हुईं तो वह बाहर निकल आयेंगी या इस तरह चौंधिया जायेंगी कि फिर अच्छे से अच्छे आपरेशन और औषधि से भी अच्छी न होंगी। उनकी देखने की क्षमता नष्ट हो जायेगी शरीर यदि नंगा रहता तो वह इस तरह जल उठता जैसे शरीर में तेजाब लगा हो और उसे आग ने पकड़ लिया हो।
मनुष्य ने अपनी यह बुद्धि कुशलता इस महाध्वंस के निर्माण में न लगाकर किसी रचनात्मक कार्य में लगायी होती तो संसार का कितना कल्याण होता पर आज मनुष्य जिस अहंकार में डूबा है उसमें ऐसे वीभत्स काँड ही सम्भव हैं करुणा और दया के, सृजन और सहानुभूति के कार्यों की उससे आशा की भी तो नहीं जा सकती।
शरीर में विकिरण प्रभाव से मुक्त वस्त्र धारण कर आँखों में गाढ़े रंग के चश्मे लगा कर विस्फोट किया गया। दुर्भाग्य से उस क्षेत्र में 2 व्यक्ति नंगे बदन रह गये थे वृक्षों और अन्य वनचर जीवों के साथ वे भी जलकर ठूँठ मात्र रह गये थे। यदि भीतर जली हुई हड्डियाँ न दिखाई देतीं तो पता भी न चलता कि वे मनुष्य जले हैं अथवा कोई हरा वृक्ष जल कर ठूँठ रह गया है।
विस्फोट से धुएं और प्रकाश का जो गुम्बज उठा वह 8 मील ऊँचा या पर्वताकार था। विस्फोट से इतनी ताप पैदा हुई थी कि पक्के इस्पात का बना वह खम्भा पहले पिघल गया और उसके कुछ ही सेकेण्ड बाद पिघली हुई धातु भाप बन कर उड़ गई। जिस स्थान पर विस्फोट के पूर्व खम्भा था विस्फोट के बाद वह एक ऐसा गड्ढा बन गया था मानों उस स्थान से कभी ज्वालामुखी फूटा हो।
विस्फोट क्षेत्र का रेत पिघल कर पानी हो गया था विस्फोट शान्त हुआ तब वह काँच की चादर की तरह बिछा हुआ मिला था। उस क्षेत्र में जीवन के नाम पर एक कीड़ा भी नहीं बचा था। पृथ्वी काँप गई थी, तब जब कि वह बहुत ही हलके स्तर का विस्फोट था।
अब तो उससे भी कई गुना अधिक क्षमता वाले परमाणु बमों का विकास हो चुका है। मानवीय स्वभाव की दुर्भावनाएं यदि न रुकीं तो कौन जाने ऐसी प्रतिक्रिया हो कि इन बमों का ही प्रयोग लोग कर बैठें। उस समय जो विनाश लीला पृथ्वी पर होगी उसका थोड़ा सा ही अनुमान पाठक इन पंक्तियों में कर पायेंगे। उस वीभत्स परिस्थिति की तो सही-सही कल्पना कर सकना भी कठिन है।
क्यों माँ! बबूल का पौधा लगा देने के बाद ज्यादा देख-रेख नहीं करनी पड़ती वह अपने आप ही इतना बड़ा हो जाता है- बच्चे के इस प्रश्न का माँ ने-”हाँ बेटा” कह कर संक्षिप्त उत्तर दे दिया।
और क्यों माँ- गुलाब छोटे-छोटे होते हैं, एक वर्ष में ही तैयार हो जाते हैं, तो भी उनके लिए पिता जी को दिन-रात परिश्रम करना पड़ता है। वह क्यों? बच्चे ने फिर प्रश्न किया।
इस बार माँ ने बच्चे की जिज्ञासा का भरपूर समाधान करते हुए कहा-बेटे! श्रेष्ठ वस्तुएं सदैव परिश्रम से मिला करती हैं ऐसा न होता तो अच्छे व बुरे में अन्तर ही क्या रह जाता।
योग मानवीय अन्तर्चेतना के विकास और अनुभूति का वैज्ञानिक तरीका है। स्थूल विवरण दें, तो कह सकते हैं कि जिस आत्म-चेतना का स्वरूप साधारण रूप से बातचीत में या विचार करने से भी समझ में नहीं आता, योग के द्वारा उसी आत्म-चेतना को प्रकाश के रूप में या शक्ति के रूप में हम ऐसे देख और अनुभव कर सकते हैं जैसे अब शरीर को कर रहे हैं।
ध्यान, धारणा, जप, प्राणायाम, यम, नियम, प्रत्याहार आदि योग के आठ अंग बताये गये हैं। यह आठ प्रकार के वैज्ञानिक प्रयोग हैं, जिनके अभ्यास से आत्मा का स्वरूप स्पष्ट प्रकट होने लगता है। शेष सात को तो अभी विज्ञान की कसौटी पर नहीं कसा जा सका, पर प्रत्याहार के सम्बन्ध में वैज्ञानिकों की राय भारतीय आचार्यों के सिद्धाँत का समर्थन करती है। इससे भी भारतीय योग और तत्वदर्शन की प्रामाणिकता सिद्ध होती है।
प्रत्याहार में जहाँ आहार की शुद्धता, संस्कार और मिताहार आदि बातें आती हैं, वहाँ सर्वाधिक जोर इस बात पर दिया जाता है कि आहार में नमक का प्रयोग कतई बन्द कर देना चाहिए। अस्वाद को भारतीय पाक-ग्रन्थों में एक व्रत कहकर उसकी बड़ी महत्ता प्रतिपादित की है। आज का विज्ञान इस मान्यता का पूरी तरह से समर्थन करता है।
जो विज्ञान नहीं जानते, उन्हें भी समझ लेना चाहिए कि नमक का क्षार तत्व सोडियम और क्लोरीन गैस से मिलकर बनता है। विज्ञान की भाषा में नमक को सोडियम क्लोराइड कहते हैं। क्लोरीन एक विषैली गैस है, जो शरीर के लिये अनावश्यक ही नहीं, हानिकारक भी है। हमारे शरीर के कोषाणु (सेल) उसे पचा नहीं सकते। इसलिये उससे आमाशय यन्त्र की श्लेष्मिक झिल्ली (एक प्रकार की दीवार, जिसमें लगे हुए शक्ति चूसने वाले रेशे अन्न से शक्ति ग्रहण करते हैं) को हानि पहुँचती है। शरीर का कैल्शियम घटता है और स्नायविक प्रणाली उत्तेजित होती है, जिससे शरीर में पक्षाघात और मिरगी जैसे रोगों की सम्भावना की वृद्धि होती है।
सुप्रसिद्ध अमरीकी आहार विशेषज्ञ डॉ0 रेमाँड बर्नार्ड ने नमक को विष बताते हुए लिखा है कि एक बार कुछ पक्षियों और सुअर को उनकी आदत के प्रतिकूल नमक अधिक मात्रा में खाने को विवश किया गया। स्मरण रहे संसार का के कोई भी जीव-जन्तु प्राकृतिक लवण के अतिरिक्त ऊपर से नमक नहीं खाते। फल यह हुआ कि उनमें से अधिकाँश पक्षी 2-3 दिन में ही बीमार पड़ गये, उनमें से कुछ की मृत्यु होने लगी। सुअर की भी मृत्यु हो गई, तब यह प्रयोग रोका गया। नवम्बर 1962 के ‘हिन्दी डाइजेस्ट’ (नवनीत) में डॉ0 रेमाँड बर्नार्ड का इस आशय का लेख छपा भी है।
प्रश्न किया जा सकता है कि यदि नमक शरीर के लिये आवश्यक नहीं, तो लोगों ने खाना क्यों प्रारम्भ किया और सामान्य जीवन में उसकी हानियाँ क्यों नहीं दिखाई देतीं?
इसका उत्तर बहुत आसान है। शरीर के लिए जितना नमक आवश्यक है, वह प्राकृतिक रूप में अन्न और सब्जियों के साथ अपने आप मिल जाता है। रही बात उसकी हानियाँ स्पष्ट प्रकट न होने की, तो उसके बारे में यही कहा जा सकता है कि अभ्यास में आ जाने के कारण उसकी अस्वाभाविकता समझ में नहीं आती। प्राचीनकाल में कुछ राजाओं के यहाँ विष कन्यायें हुआ करती थीं। इनका उपयोग दुश्मन राजाओं को गुप्त रूप से मारने में किया जाता था। यह स्त्रियाँ बाहर से देखने में स्वस्थ, सुन्दर और कलाकार भी हुआ करती थीं। किन्तु इन्हें विष थोड़ा-थोड़ा करके खाने का अभ्यास कराया जाता था। धीरे-धीरे उसकी मात्रा बढ़ायी जाती थी। कुछ दिन में उनके शरीर में विष की मात्रा इतनी अधिक बढ़ जाती थी जो व्यक्ति कि उनके संसर्ग में आता था, उनसे शरीर सम्बन्ध स्थापित करता था उसकी मृत्यु हो जाती थी, जबकि उनको स्वयं कुछ न होता था। नमक अभ्यास के कारण हमारा स्वाभाविक आहार-सा बन गया है अन्यथा उसका प्रभाव शरीर में विष की तरह ही होता है।
अफीम, शखिंया जैसा कोई भी विष खाने से मुँह सूखता है और प्यास लगती है। स्वभाव से अधिक कभी नमक खा लें, तो तुरन्त और थोड़ी-थोड़ी देर बाद तेज प्यास लगती है। हमारा आमाशय, जहाँ भोजन पचने की क्रिया होती है, जानता है कि नमक विजातीय पदार्थ है। वह शरीर में पच नहीं सकता, इसलिये उसे अपना काम छोड़कर सबसे पहले उस गन्दगी को धोने की आवश्यकता पड़ती है, इसी कारण तुरन्त प्यास लगती है। इस अतिरिक्त जल से आमाशय नमक को घोलकर गुदा के मार्ग से बाहर निकालता है। उसमें उनकी बहुत-सी शक्ति तो बेकार जाती ही है, साथ ही गुरदे की कोमल नलियों में उसका जो भार पड़ता है, उससे उनमें खराबी आती रहती है। कुछ दिन नमक न खाकर देखें, तो पता चलेगा कि तब पेशाब हलका और जलनरहित होता है, फिर एकाएक किसी दिन अधिक नमक खा लेने के बाद पेशाब करने से उसका भारीपन और जलन एक साथ अनुभव की जा सकती है। गुर्दे की सूजन, पैरों की बीमारियाँ और रक्त विकार यह सब शरीर में नमक की वृद्धि के कारण ही होते हैं। इन रोगों पर वैद्य-हकीम दवा देने से पहले बिना नमक का खाना लेने का परहेज बताते हैं। कुष्ठ की बीमारी भी दरअसल नमक की मात्रा असाधारण रूप से बढ़ जाने के कारण उत्पन्न हुआ रक्त-विकार ही है। इस अवस्था में शरीर के कोष उस विजातीय द्रव्य को धारण किये रहने में समर्थ नहीं होते, इसीलिये कुष्ठ के बीमार को लम्बी अवधि तक बिना नमक का आहार लेना पड़ता है।
अक्टूबर 1969 के नवनीत में प्रसिद्ध समाज-सुधारक श्री रविशंकर महाराज का एक संस्मरण छपा है। उनके किसी वैद्य मित्र को एक गाँव जाना हुआ। वहाँ कोई कुष्ठ के रोगी थे, उन्होंने वैद्यजी से कुष्ठ रोग की दवा पूछी। वैद्य जी ने उन्हें बताया कि उन्हें गुरच और एरण्डी का तेल दवा के रूप में लेना चाहिये और बिना नमक की साबुत मूँग का ही सेवन करना चाहिए।
यह परहेज केवल इसलिये था कि शरीर के कोषाणुओं (सेल्स) में जो विजातीय द्रव्य भर गया है, दवा उसे निकालती रहे और ऊपर से विजातीय तत्व (नमक) का पहुँचना बन्द रहे। यदि नमक भी जारी रहता, तो औषधि का कोई प्रभाव न पड़ता। यह दवा बता कर वैद्यजी घर चले गये।
5-6 वर्ष पीछे वैद्यजी को पुनः उसी गाँव जाना पड़ा। उस व्यक्ति ने वैद्यजी का आना सुना, तो उनके पास गया और उन्हें प्रणाम करके बताया कि अब मैं आपकी दवा के प्रभाव से अच्छा हो गया हूँ साथ ही यह भी पूछा कि अब भी मुझे वैसा ही आहार लेना चाहिये या नहीं?
जो वस्तुएँ सरलता से मिल जाती हैं, वे महान् नहीं होतीं। महान् वस्तुओं के लिये दुर्गम मार्ग पर चलना होता है।
-लोकमान्य तिलक
वैद्य जी को इस बात की प्रसन्नता हुई कि उनको यह अनुकूल प्रयोग मिल गया। इसलिये उन्होंने उल्टा रोगी को ही अपनी ओर से इनाम दिया। यह घटना यह बताती है हम अपने आहार में सम्पूर्ण नहीं, तो कुछ ही दिन नमक को छोड़ दें, तो अधिकाँश बीमारियाँ बिना औषधि के ही ठीक कर सकते हैं। क्योंकि प्रकृति ने शरीर में स्वच्छता और सफाई की व्यवस्था अपने आप कर दी है। यदि कुछ दिन नमक न लें, तो भीतर भरी हुई गन्दगियाँ अपने आप घुलकर साफ हो सकती हैं और रक्त-कण फिर से सशक्त एवं नीरोग हो सकते हैं।
नमक हृदय को भी बहुत हानि पहुँचाता है। जब तक सोडियम और कैल्शियम स्वाभाविक रूप से आता रहता है, हृदय की पेशियाँ सहज ढंग से काम करती रहती हैं। पर जैसे ही इस सन्तुलन में गड़बड़ी आई कि हृदय की माँस पेशियों में दबाव बढ़ा। फल यह होता है कि हृदय की गति बढ़ती है और रक्तचाप भी। इसी कारण स्नायु संस्थान पर जोर पड़ता है और वह खराब होता है। बायोकेमिस्ट श्री बंगे का कथन है कि हजारों वर्ष पूर्व पृथ्वी में सोडियम और पोटेशियम उपयुक्त मात्रा में था, तब खाद्यान्न के साथ सोडियम की मात्रा पर्याप्त रूप से मिल जाती थी, पर वर्षा के कारण कुछ दिन बाद सोडियम तत्व पानी में घुलकर बह गया। इसलिए नमक खाने की आवश्यकता पड़ीं। पर सोचने वाली बात है कि सोडियम के साथ क्लोरीन की क्या आवश्यकता? यदि सोडियम आवश्यक ही था, तो उसे प्राकृतिक रूप में ले सकते थे। नमक के रूप में तो वह हृदय की पेशियों में भार ही लाता है।
इस अस्वाभाविक आहार को भारतीय आचार्यों ने और भी गहराई से समझा था, तभी वह शारीरिक शुद्धता के लिये उसके न्यूनतम प्रयोग पर जोर देते रहे हैं। नमक मुँह से लेकर आमाशय तक विरेचन का कार्य करता है। उससे अनेक उपयोगी तत्वों का व्यर्थ क्षरण हो जाता है और शरीर में गड़बड़ी फैलती है। यदि नमक न लें, तो हमारे शरीर के कोषों में इतनी शुद्धता आ सकती है कि किसी भी भारी-से-भारी विष के प्रभाव को निरस्त किया जा सके। कुछ दिन पूर्व अखबारों में ऋषिकेश के एक साधु की घटना छपी थी कि एक सर्प ने एक साधु को काट लिया। साधु को तो कुछ नहीं हुआ, पर साँप की मृत्यु हो गई। पीछे रुड़की के डाक्टरों ने साँप की जाँच की, तो पता चला कि महात्मा के शरीर में कोई ऐसा तत्व था, जो सर्प के विष से उल्टा और तीव्र प्रतिक्रिया वाला था। उसी से सर्प की मृत्यु हो गई।
योगाभ्यास में प्रत्याहार का महत्व वैज्ञानिक है। उससे शरीर में ही इन साधु जैसी किसी अत्यन्त शक्तिशाली सत्ता के विकास को तो वैज्ञानिक ढंग से प्रतिपादित करना यहाँ सम्भव नहीं, पर आहार में नमक न लेने के महत्व को तो वैज्ञानिक और डॉक्टर भी स्वीकार करते हैं। यह लाभ सामान्य जीवन में भी योगाभ्यास की तरह ही लिये जा सकते हैं। हम कुछ दिन नमक न खाने का अभ्यास करें तो इन परिवर्तनों को स्पष्ट अनुभव कर सकते हैं।
एक बार भगवान बुद्ध से उनके प्रिय शिष्य ने पूछा-’प्रभो! क्या संसार में ऐसी भी कोई वस्तु है, जो चट्टानों से भी अधिक कठोर हो?’ बुद्ध ने कहा ‘हाँ, लोहा है जो चट्टानों से भी कठोर है।’ शिष्य ने फिर पूछा- क्या ऐसी भी कोई वस्तु है, जो लोहे से भी कठोर और मजबूत हो?’ बुद्ध ने कहा ‘हाँ, अग्नि है। यह लोहे को भी पिघला देती है।’ शिष्य ने फिर पूछा-’अग्नि से भी बढ़कर कौन-सी वस्तु है?’ बुद्ध ने उत्तर दिया-’पानी, जो अग्नि को भी बुझाने की सामर्थ्य रखता है।’ शिष्य की जिज्ञासा अब भी शान्त नहीं हुई। उसने पुनः प्रश्न किया-’पानी से भी श्रेष्ठ कोई वस्तु हो सकती है?’
बुद्ध ने कहा-’हाँ, वायु। वह जल के प्रवाह को बदल देती है। पानी बरसाने वाले मेघों को भी तितर-बितर कर देती है।’
शिष्य ने अन्त में पूछा-’प्रभो! क्या विश्व में ऐसी भी वस्तु है, जो वायु से भी बलवान् है, श्रेष्ठ है?’
बुद्ध ने उत्तर दिया-’हाँ, वह है मनुष्य की संकल्प-शक्ति। संकल्प-शक्ति के द्वारा मनुष्य वायु को भी अपने वश में कर सकता है। संकल्प-शक्ति के बल पर मनुष्य अनेक ऐसे महान कार्यों को सम्पन्न कर लेता है, जो सामान्य लोगों के लिये आजीवन असम्भव जान पड़ते हैं।’
गणितीय भाषा में योग का अर्थ ‘जोड़ना या मिलाना’ होता है। एक और एक बराबर दो, यह योग हुआ। किन्तु मनुष्य जीवन के दार्शनिक पक्ष में योग का अर्थ घुलाना होता है। यह भी मिलने के सदृश ही है, पर यहाँ एक और एक मिलकर दो नहीं, एक ही बनता है। अपूर्ण एक परिपूर्ण इकाई में परिवर्तित होता है।
जीवात्मा पानी की एक बूँद की तरह आविर्भूत हुई। वह अपूर्ण है। शक्ति, ज्ञान और समृद्धि की दृष्टि से निताँत अपूर्ण और अभावग्रस्त आत्मा की सम्पूर्ण अशान्ति का अर्थ यह अभाव या अपूर्णतायें ही है। उन्हें दूर करने के लिये मनुष्य आदिकाल से प्रयत्न करता रहा है। उसे एक ऐसे अगाध सिन्धु की आवश्यकता हुई, जिसमें घुलकर वह अपनी लघुता को मिटा डालती किन्तु भौतिक अर्थों में बड़े-बड़े चक्रवर्ती सम्राट् भी पूर्ण न हो सके। दिग्विजयी सिकन्दर ने तमाम दुनिया से सम्पत्ति एकत्रित की, किन्तु जब उसका मृत्यु-क्षण समीप आया और जब उसे पता चला कि उसका जोड़ा हुआ यह धन साथ नहीं जा सकता, तो उसने अपने मन्त्रियों से कहा कि मेरी अर्थों निकाली जाय, तब मेरे दोनों हाथ बाहर निकाल दिये जायें ताकि संसार समझे कि जीवन भर धन-सम्पत्ति और लोकाचार में पूर्णता की प्राप्ति में लगा रहने वाला सिकन्दर अन्ततः खाली हाथ ही मर गया।
मनुष्य का पार्थिव जीवन ही सब कुछ नहीं, उसकी नैसर्गिक जीवन प्रणाली भी है और जब तक वह शाँत और सन्तुष्ट नहीं होती, उसकी तमाम चेष्टायें निरर्थक ही रहती हैं।
जीवन का विस्तृत अध्ययन करने के उपरान्त ऋषियों ने जिस तत्व दर्शन की खोज की, वह यह है कि मनुष्य जब तक अपनी वैयक्तिक चेतना (व्यष्टि) को विराट विश्व में एकरस फैली हुई चेतना (समष्टि या परमात्मा) में नहीं मिला देता, तब तक उसकी अशाँति दूर हो भी नहीं सकती। इसी के साथ-साथ जो मार्ग, जो पद्धति, जो साधनायें उन्होंने आत्मा के विकास के लिए निकालीं, वह सब योग कहलाईं, योग का अर्थ है, अपने आपको परमात्मा में घुलाना, लघु से विभु, अणु से महत् और जीव से परम ऐश्वर्यशाली परमात्मा बनना।
किन्तु इन पंक्तियों का लिखना या उपदेश करना जितना सरल है, योग उतना ही कठिन भी है। वाजिश्रवा के पुत्र नचिकेता ने यमाचार्य से भगवान् को जानने की इच्छा प्रकट की, तब यमाचार्य ने यही कहा था-
देवैरमापि विचिकित्सितं पुरा,
न हि सुविज्ञेय मणुरेष धर्मः।
अन्यं वरं नचिकेतो वृणीश्व,
मा मोपरोत्सीरति मा सृजैनम्॥
-कठोपनिषद् 1। 21
नचिकेता! इस सम्बन्ध में तो देवता भी सन्देहग्रस्त हैं, योग विज्ञान अत्यन्त सूक्ष्म होने से शीघ्र समझ में नहीं आता। इस कठिनाई में न पड़कर तुम अन्य कोई वरदान माँग लो, मुझे दबाओ मत।
किन्तु जब नचिकेता ने भोग और साँसारिक सुखों को भी तृणवत् तुच्छ और क्षण भंगुर मानने का साहस अभिव्यक्त किया, तो यमाचार्य सन्तुष्ट हुए, उन्होंने कहा- दृढ़ निश्चय और कठिनाइयों से लड़ सकने का जिसमें साहस है, वही योगी हो सकता है।
यह कठिनाइयाँ इसलिए और भयंकर हैं, क्योंकि भगवान को प्राप्त करने में जो समर करना पड़ता है, वह अपने आपसे ही करना पड़ता है, अपनी इच्छाओं को ही मारना पड़ता है। इसलिए उसमें प्रवेश से पूर्व ही उसका तत्वज्ञान समझना आवश्यक है। समझ -बूझ के साथ उठाया कदम लाभदायक होता है। औंधे सीधे चल पड़ने और थोड़ी ही दूर चलकर वह मार्ग छोड़ देने से तो योग विद्या का उपहास ही होता है। इसलिए अस्थिर व बालक बुद्धि लोगों को नहीं, निष्ठावान साधकों को ही योग मार्ग पर आरुढ़ होने की आज्ञा दी जाती है।
पातंजलि योग-दर्शन का कथन है-
योगरचित्तवृति निरोधः।
-योग दर्शन पापद 1। सूत्र 2
अर्थात्- ‘चितवृत्तियों को रोकना ही योग है।” यदि मनुष्य अपने मन में उठने वाली अनेक प्रकार की कामनाओं और वासनाओं को रोक लेता है और उनका प्रयोग इन्द्रियों की इच्छा से नहीं, अपनी इच्छा से उस तरह कर सकता है, जिस प्रकार सारथी रथ में जुते हुए घोड़ों को, तो वह निश्चय ही अपनी शक्तियों का ऊर्ध्वगामी विकास करके परमात्मा की उपलब्धि कर सकता है।
साधारणतया चितवृत्तियों का समझ पाना भी सरल कार्य नहीं है। कौन-सी कामना, कौन सी इच्छा उचित है, कौन-सी अनुचित- इसका निर्णय कर सकना अजानकार के लिए उतना ही कठिन है, जितना मोटर न चलाना जानने वाले के लिए मोटर चलाना। आत्मिक आवश्यकताओं और इन्द्रियजन्य वासनाओं में घोर विरोध है। आत्मा शरीर से स्थूल पदार्थों में इस तरह घुला हुआ है कि उन दोनों को अलग-अलग करना बहुत कठिन हो जाता है। इसलिए योग दर्शनकार अपने आप ही प्रश्न करता है कि वह चित्तवृत्तियाँ कौन सी हैं, जिनका विरोध किया जाये। योग दर्शन के पाद 1 सूत्र 6 में उसी का उत्तर देते हुए लिखा है-
प्रमाण विपर्यय विकल्प निद्रा स्मृतयः॥
अर्थात्- प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा और स्मृति यह पाँच चित्तवृत्तियाँ हैं, जिनको वशवर्ती करना योगी के लिए परमावश्यक है।
प्रमाणवृत्तियाँ वह कहलाती हैं, जो किन्हीं इन्द्रियों से सम्बन्ध रखने वाली विषय वस्तुओं को देखकर जागृत होती हैं। इनके सूक्ष्म भेदोपभेदों की क्लिष्टता में जाकर विभ्रमित होने की अपेक्षा यह जान लें, तो पर्याप्त है कि श्रोत अर्थात् कान मधुर ध्वनि सुनने को इच्छुक रहते हैं। जहाँ कही भी प्रचुर शब्द सुनाई देते है, संगीत या सुन्दर वाद्य हो रहा होता है, उधर ही चल पड़ने को मन करता है। त्वचा में स्पर्श से सुख अनुभव करने का गुण होता है, आँखें रूप पसन्द करती हैं और वहीं रमे रहना चाहती हैं, जहाँ सौंदर्य दिखाई देता है। चाहे वह वस्तुओं का सौंदर्य हो, स्थान अथवा स्त्री पुरुषों के शरीर का। जिह्वा रस की प्यासी रहती है- सदैव अच्छा-अच्छा खाने की ही उसकी तलाश रहती है और उसी तरह घ्राण या नासिका का गन्ध से सम्बन्ध है। उसका प्रिय विषय सुगन्ध है, चाहे वह फूलों में मिले अथवा इत्र-गुलाब में। यह इन्द्रियाँ अपने-अपने सुख आवरण रहित प्राप्त करना चाहती हैं, जितना इन सुखों में व्यक्ति रमण करता है, उतना ही शरीर दुर्बल और निस्तेज होता है। शरीर के साथ ही मन और आत्मा भी दुर्बल होता जाता है इसलिए यह प्रत्यक्ष सुख की सी अनुभूति कराने वाली चित्तवृत्तियाँ सबसे प्रमुख हैं, उनको नियन्त्रण में रखना चाहिए।
इन आकर्षणों को छोड़ने और मन को उनसे विमुख करने का अर्थ यह नहीं है कि इससे इन्द्रियाँ सन्तुष्ट हो जायेंगी। हम फ्रायड के इस सिद्धाँत को मानते हैं कि दमित वासनाएं और भी वेग से उठती हैं, किन्तु एडलर और जंगु के स्थानापत्ति (सब्लीमेशन) सिद्धाँत के अनुसार इन कामनाओं को हम अंतर्वर्ती बना लें, तो जो सुख प्रत्यक्ष पदार्थों में दिखाई देते हैं, वही क्रमशः कल्पना मन और आत्मा में उतरता चला जा सकता है अर्थात् आज का दिखाई देने वाला घाटा इस अर्थ में एक पूर्णता की ही तैयारी है। अभी हम थोड़े-से रूप, रस, गन्ध, स्पर्श और श्रोम में अपनी शक्ति गंवाकर बेचैन हो सकते हैं, पर अपना अंतर्वर्ती जगत इतना परिपूर्ण है कि उसमें किसी भी इन्द्रिय की वासना को पूर्ण करने की उतनी सामग्री अपने ही आप में इतनी मात्रा में उपलब्ध है, जो करोड़ों वर्षों तक उपभोग करने से भी चुक नहीं सकती। इस पूर्णता के प्राप्त करने के लिए प्रारम्भ की इन सम्पूर्ण और क्षणिक वासनाओं को, जो प्रत्यक्ष सुख प्रतीत होती हैं, आवश्यक हो जाता है।
दूसरी वृत्ति है अज्ञानता या विपर्यय। मरुभूमि में दूर से चमकते सिकताकण देखकर जिस प्रकार जल होने का मिथ्या-बोध होता है, उसी प्रकार पदार्थों के प्रति हमारा अज्ञान ही विपर्यय है। रुपये-पैसे, सोने-चाँदी, स्त्री पुत्रों के प्रति हमारे अन्दर कोई तात्विक व्याख्या न होकर आसक्ति मात्र होती है जो वस्तु बहुत प्रिय लगती है, भले ही उसका आत्म-हित से कोई सम्बन्ध न हो, उसी के पीछे लगे रहते हैं। विपर्यय वृत्ति को रोकना भी योगी के लिए आवश्यक है। उसे संसार के प्रत्येक पदार्थ के वैज्ञानिक स्वरूप को समझना चाहिए ताकि उसमें से कितना और क्या ग्रहणीय है, इस पर स्थिर चित्त से विचार किया जा सके। केवल अपनी मनो-मान्यता के आधार पर ही किसी वस्तु को अपने लिए उपयोगी मानने की वित्तेषणा को छोड़कर ही व्यक्ति योगी बन सकता है।
विकल्प वृत्ति का सीधा सम्बन्ध भय से है, जैसे बड़े दाँतों और मुँह से आग उगलते हुए भूत का चिन्तन, सींगों वाले आदमी आधा आदमी आधा भैंसा इस तरह की भ्राँत कल्पनाएं जिनका अर्थ तो कुछ भी नहीं होता, पर अपनी मानसिक दुर्बलता के कारण वैसे विचार मस्तिष्क में आते और डराते रहते हैं। साधना काल में यह स्थिति बड़ी ही कष्टदायक प्रतीत होती है। इसलिए दुर्बल मनोभूमि के व्यक्तियों को योग की दीक्षा नहीं दी जाती। यदि मस्तिष्क की इन विकल्पनाओं पर विजय न प्राप्त की जा सके, तो उच्च भूमिका में पहुँचे हुए साधक भी स्त्री और बालकों के समान भयग्रस्त होकर साधनाएं छोड़ सकते हैं।
चौथी निद्रावृत्ति का सीधा सम्बन्ध तामसिक आहार-बिहार से ही मनुष्य का शरीर शुद्ध नहीं रहता। आहार घृणित, बासा, बुसा होता है, तब वह बहुत सोता है या जागते हुए भी उसे आलस्य घेरे रहता है। योगाभ्यासी के लिए अपनी तामसिक वृत्तियों का नियन्त्रण कर निद्रा में कमी करनी चाहिए, अपने आलस्य को दूर करना चाहिए।
पांचवीं वृत्ति स्मृति कहलाती है। ऊपर कहे हुए सभी सुखों को बार -बार याद करना भी सुखों की ओर आकर्षित करना है। यह मानसिक चिन्तन भी कम शक्ति क्षय नहीं करता। फ्रायड का कथन है कि मनुष्य जो इच्छाएं प्रत्यक्ष संसार में पूर्ण नहीं कर पाता, अवचेतन मन उसकी सृष्टि स्वप्नावस्था में करता है। साधक को कुछ ही दिन के अभ्यास से रात में मधुर-मधुर स्वप्न दिखाई देने लगते हैं। जागने पर उनका बार-बार स्मरण होता है और मन अपने आपको उसी तरह का सुख प्राप्त करने की चेष्टा कराता है। साधक स्वयं वैसा नहीं चाहता, पर वह स्मृति उसे बार-बार उस सुख की याद दिलाती है। कई सुख और भोग, जो पिछले जन्मों में भोगे गये हैं और अब जिनके केवल मात्र संस्कार अवचेतन मस्तिष्क में पड़े हैं, वह भी स्वप्न में विलक्षण स्मृतियों के रूप में प्रकट होते हैं।
यह सब मिलकर आत्मा को परमात्मा में मिलने से रोकते हैं और बार-बार पार्थिव सुखों की प्रेरणा देते हैं। इसलिए इन्हें बार-बार रोकने और अपने लक्ष्य में आरुढ़ रहने को कहा जाता है। जो इन चित्तवृत्तियों के चंगुल में नहीं आता, वही योगी अन्त में अपने उद्देश्य में सफल होता है।
यमश्च नियमश्चैव तृतीयमासनं मतम्।
प्राणायामस्तथागार्गी प्रत्याहारश्च
धारणा।
ध्यानं समाधिरेतानि गाडाँनि
निबोध मे॥
हे गार्गी! तू यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारण, ध्यान, समाधि- इन अंगों को ही योग के आठ अंग जान।
वास्तविक आयु
सन्त वायजीद से किसी ने पूछा -’आपकी आयु क्या है?’
उन्होंने उत्तर दिया- “चार वर्ष”
‘कैसे?’
वायजीद ने कहा- ‘जीवन में 70 वर्ष तो नाना प्रकार के संसारी प्रवचनों में व्यतीत हो गये। केवल चार वर्ष से अध्यात्म के मार्ग पर चलने का प्रयत्न किया है। अतः मेरी वास्तविक आयु चार वर्ष ही तो मानी जायेगी।’
महात्मा ‘निष्कम्प’ नगर के बाहर एक उपवन में रुके हैं- यह समाचार पाकर जिज्ञासु साधक उनके ज्ञान का लाभ लेने पहुँचे। विद्रूप ने भी सुना। वे परमार्थ तथा आत्म-कल्याण की साधना में रत थे। अपनी साधना में गतिरोध सा उन्हें अनुभव होता था। अवसर का लाभ उठाने वह भी पहुँचे।
सहज शिष्टाचार के बाद अवसर देख विद्रूप ने पूछा- ‘महात्मन्! साधना में भौतिक वैभव बाधक बनता है। किन्तु उनको छोड़ा भी नहीं जा सकता और बिना छोड़े गति भी नहीं। कृपया कोई मार्ग बतलावें।’
महात्मा हँसे, बोले- ‘वत्स! तुम्हारी समझ को अपच हो गया है- हलका आहार दो।’
विद्रूप न समझ सकने के कारण अवाक् खड़े रह गये। महात्मा ने उनकी स्थिति समझ ली तथा पुनः बोले- ‘मस्तिष्क पर अधिक तनाव मत दो। अपने खेल में तल्लीन बच्चों की गतिविधि में रस लिया करो, वहीं तुम्हारे प्रश्न का व्यवहारिक उत्तर प्राप्त हो जायेगा।’
‘बच्चों के खेल में इस गम्भीर प्रश्न का उत्तर?’ विद्रूप मन ही मन संकल्प करने लगे- क्या कहें, कैसे पूछें? बोले- ‘भगवन्! स्वयं अपने श्रीमुख से शंका निवारण कर दें, तो अति कृपा होगी।’
महात्मा मुस्करा उठे। प्रेम से विद्रूप की पीठ पर हाथ फेरते हुए कहने लगे-’वत्स! शब्द से क्रिया का शिक्षण अधिक उपयोगी होता है। तुम्हें सम्भवतः यह शंका हो रही है कि बच्चों के खेल में क्या सीख मिलेगी? किन्तु ध्यान रखो, यह संसार उस प्रभु का क्रीडाँगन ही है। इसके महत्वपूर्ण पक्ष क्रीडा सिद्धान्तों से समझे जा सकते हैं। फिर भगवान दत्तात्रेय को प्रकृति व जीव जन्तु शिक्षा दे सकते हैं, तो क्या तुम्हें बच्चे भी न दे सकेंगे? जाओ, प्रयास मनोयोग से करना।’
विद्रूप प्रणाम करके लौट आये। आदेशानुसार उन्होंने क्रीडारत बालक बालिकाओं को देखना प्रारम्भ किया। प्रारम्भ में ही उन्हें अन्तःकरण में हलकापन अनुभव हुआ। उन्होंने पाया कि बच्चे खेल के समय कितने तन्मय हो जाते हैं। उनकी तन्मयता के साथ विद्रूप भी तन्मय होने लगे। प्रश्न का उत्तर न मिला, तो भी सहज शाँति मिलने लगी। और एक दिन अचानक उनके गम्भीर प्रश्न का क्रियात्मक उत्तर भी मिल गया।
तीन बच्चे खेल रहे थे। दो बालक एक बालिका। घुड़सवारी के खेल का प्रस्ताव हुआ। घोड़े खोजे गये। दो लाठियाँ मिलीं। उन्हें राँगों के बीच दबाकर बच्चे घुड़सवार बन गये। चाबुक के स्थान पर ज्वार के डण्ठल ले लिए गये। किन्तु घोड़े दो ही थे तथा सवार तीन। निर्णय हुआ कि बारी-बारी से सवारी की जाये। दोनों बच्चे घोड़ों पर सवार होकर चल पड़े चाबुक घुमाते! बच्ची एक क्षण खड़ी देखती रही, फिर अचानक झपटकर उसने दो डण्ठल उठाये। एक को राँगों के बीच दबाकर घोड़ों बनाया तथा दूसरे से फटाफट चाबुक जमाना प्रारम्भ किया। विद्रूप बालिका के भोलेपन पर हँसे-’बेचारी को ठीक घोड़ा भी न मिल सका।’
किन्तु उनकी हँसी रुक गई। उन्होंने देखा- बालिका का दुर्बल घोड़ा उसे सबसे आगे पहुँचा चुका था। दोनों बालकों के बढ़िया (भारी) घोड़े उनके पैरों की गति में बाधक बने थे और बालिका का मरियल (हल्का) घोड़ा उसके लिए वरदान सिद्ध हो रहा था घोड़ा किसका अच्छा कहा जाये, लड़कों का या उस बेचारी बच्ची का?
मस्तिष्क ने करवट ली। रसानुभूति के साथ विवेक कार्य करने लगा। दृश्य स्थूल से सूक्ष्म दृष्टि का विषय बन गया। विद्रूप को जैसे दिव्य दृष्टि मिल गयी थी। वे देख रहे थे विश्व क्रीड़ा को। अपने आपको बुद्धिमान ज्ञानी कहने वाले प्रौढ़ बच्चे जीवन का खेल खेल रहे हैं। नाम, यश, वैभव, कीर्ति आदि के सुगढ़ सुन्दर लकड़ी के घोड़े उन्हें आवश्यक लगते हैं। प्रगति पथ पर बढ़ना, दौड़ना तो अपने पैरों की शक्ति से ही पड़ता है। प्रतिभा, चरित्र, साहस, धैर्य, सौजन्य, उदारता आदि गुणों की शक्ति ही गतिशीलता लाती है, किन्तु ‘घुड़सवार’ विकास के साधक कहलाने के लिए स्थूल प्रतीक भी उन्हें आवश्यक लगते हैं।
विद्रूप को ध्यान आया महात्मा का वचन - ‘वत्स! तुम्हें बुद्धि का अपच हो गया है।’ वास्तव में वह जो विचार सोच समझ रहे थे, उन्हें आत्म सात कहाँ कर पा रहे थे। चित्त में हलकापन आते ही- बच्चों के खेल से ही तत्व की बात मिल गई। जीवन साधना में लौकिक दृष्टि से आवश्यक समझे जाने वाले वैभव आदि को भारी क्यों बनने दिया जाये। जब हर हालत में दौड़ना अपने ही पैरों से है, तो क्यों न बालिका जैसा हलकापन स्वीकार कर लिया जाए?
विद्रूप पुनः महात्मा निष्कम्प के पास पहुँचे। अपना अनुभव सुनाया। सुनकर महात्मा ने साधुवाद दिया- ‘वत्स! सही दृष्टिकोण अपनाया तुमने। क्या अब भी अपनी साधना के लिए भौतिक वैभव आवश्यक लगता है?’ विद्रूप ने स्वीकार की अपनी भूल। महात्मा ने आशीर्वाद दिया-’तुम्हारी साधना आगे बढ़ेगी। उसके लिए भौतिक वैभव का अभाव नहीं। उसका भार ही गतिरोध उत्पन्न करता है। लोक मर्यादा के लिए भी आवश्यक पड़े, तो तुम उसका प्रत्यक्ष समाधान देख ही चुके हो।’
विद्रूप ने अपने को धन्य माना तथा महात्मा के निर्देशानुसार साधना में श्रेष्ठ गति प्राप्त की।
पहली परख-श्रद्धा और विनम्रता
परिचय-पत्र लेकर शिष्य धर्मगुरु केइचु मेइजी के पास गया और बिना कुछ कहे उनके हाथ में वह परिचय-पत्र थमा दिया। लिखा था- राज्यपाल किटागाकी- क्योटो राज्य।
संत मेइजी ने कार्ड एक ओर रख दिया और बोले - मुझे इन महाशय से कोई काम नहीं है? न ही उनसे मिलने की आवश्यकता है। जाओ, और उनसे कह दो कि आप यहाँ से जा सकते हैं।
शिष्य ने वापस आकर सन्त के शब्द ज्यों के त्यों कह दिये। राज्यपाल किटागाकी एक बार तो अहंकारवश कुद्ध हो गये। पर पीछे उन्होंने विचार किया- महापुरुषों के पास श्रद्धा और विनीत भाव से जाना चाहिए। सन्त के न मिलने का कहीं यही कारण तो नहीं? अतएव उन्होंने दूसरा परिचय पत्र निकाला और उसके ‘राज्यपाल क्योटो राज्य’ शब्द पेन्सिल से काट दिये और केवल अपना नाम मात्र ही रहने दिया। कार्ड दुबारा शिष्य को देकर राज्यपाल ने कहा, एक बार और कष्ट कीजिए।
शिष्य दुबारा परिचय पत्र लेकर पहुँचा और आचार्य प्रवर को दे दिया। कार्ड पर दृष्टि डालते ही सन्त मेइजी बोले- अच्छा, तो किटागाकी आया है, अरे, उससे मिलने की कब से इच्छा थी। जाओ, जल्दी बुला लाओ।
राज्यपाल किटागाकी भीतर पहुँच कर, देर तक मन्त्रणा कर जब चलने लगे, तो उनके हृदय में असीम प्रसन्नता थी। धर्म का प्रथम पाठ श्रद्धा और विनम्रता का अभ्यास उनके जीवन का संचालक अंग बन गया और उसने उनकी प्रतिष्ठा इतनी बढ़ा दी, जितनी की किसी सम्राट की।
सैना जाति की एक छोटी सी चिड़िया जिसका नाम था सैडल बैक किसी समय न्यूजीलैण्ड में ऐसे चहचहाती घूमती फिरती थी जैसे अपने आँगन में घुटनों रेंगते हुये फूल से कोमल बच्चे। बच्चों के लिये हम क्या नहीं करते? उनसे हमारे प्रेम और सौंदर्य की, वात्सल्य और चापल्य की आकाँक्षायें तृप्त होती हैं इसलिये जिस घर में बच्चे न हों श्मशान सा लगता है।
किन्तु अपने घरों में सौंदर्य के लिये तड़पने वाले मनुष्यों ने सृष्टि के सौंदर्य को जो उजाड़ने का षड़यन्त्र रचा है क्या उसकी भर्त्सना न की जाये? एक दिन था जब न्यूजीलैण्ड के पेड़-पौधे, खेत बाग और वन चितले शरीर, कत्थई रंग की इस चिड़िया की चहक से खुशनुमा दिखाई दिया करते थे वनों-उद्यानों में उसकी पूँछ के भी दर्शन नहीं होते। यह चिड़िया अब लुप्त जन्तुओं के रजिस्टर में दर्ज करा दी गई हैं। मनुष्यों ने अपने स्वाद के लिये इन सारी चिड़ियों को उदरस्थ कर डाला। अब न्यूजीलैण्ड से इनका वंश समाप्त ही हो गया है।
चिड़ियों का फुदकना, चहकना उनके रंग-बिरंगे रूप प्रकृति का सौंदर्य होते हैं। पर्वत, नदियाँ, घाटी और वादियाँ ऊँचे, लंबे फल-फूल और झब्बेदार पेड़-पौधे देखकर आत्मा को शान्ति मिलती हैं। उसी प्रकार रंग-बिरंगी चिड़ियों को देखकर भी बड़ी प्रफुल्लता और स्फूर्ति मिलती है पर मनुष्य की शैतानियत को क्या कहा जाये जो इन भोले-भाले पक्षियों का वह सफाया करती जा रही है।
मॉरीशस द्वीप में पाया जाने वाला डोडो पक्षी भी इसी प्रकार माँसाहारी विदेशियों द्वारा चट कर लिया गया। आकृति भले ही भद्दी रही हो इस पक्षी की पर अपने सीधेपन के लिये यह मनुष्यों का मन सदैव आकृष्ट करता रहा। कबूतर की तरह का हंस से थोड़ा बड़ा यह पक्षी लोगों को दया की प्रेरणा दिया करता था। पर आप ही दुर्बुद्धि मनुष्यों की हिंसा का शिकार हो गया। तीन सौ वर्षों से अधिक हो गये इस पक्षी का अब कहीं नाम-निशान भी नहीं मिलता।
भारतीय मैना अपनी बौद्धिक कुशलता के लिये संसार में प्रसिद्ध है। उसने मनुष्य जाति का कितना उपकार किया है उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। मनुष्य किसी छोटे से चोर से डर सकता है पर मैना ने भयंकर डाकुओं से भी मुकाबला किया है। कई बार उसने अपने मालिकों की करोड़ों की सम्पत्ति बचाई है। ऐसी कहानी घर-घर सुनने को मिलेगी पर अब यही मैना धीरे-धीरे नष्ट होती जा रही है। कुछ तो जंगल नष्ट होने के कारण कुछ मनुष्य की माँसाहारी दुष्प्रवृत्ति के कारण। मैना अब 5 प्रतिशत से अधिक शेष नहीं रही। प्रकृति के इस सौंदर्य और इस प्रेरणा को तभी बचाया जा सकता है जब लोगों की माँसाहारी प्रवृत्ति रुके और उनमें जीवों के प्रति प्रेम और दया का भाव भी पनपे।
हमारे राष्ट्रीय पक्षी मोर की भी यही दशा हुई। कंजड़ कवाली, नट-कंजरों ने इसे मार-मार कर समाप्त सा कर दिया है। पहले मोर बादलों की गरज से गरज मिलाया करते थे। उनकी कूक इतनी प्यारी लगती थी कि वर्षा का सौंदर्य द्विगुणित हो उठता था पर मोर भी धीरे-धीरे नष्ट होता जा रहा है। यदि उसे सुरक्षा प्रदान न की गई तो पक्षी-शास्त्रियों का अनुमान है कि अगले कुछ ही वर्षों में मोर पक्षी भी लुप्त जन्तुओं की श्रेणी में आ जायेगा।
अधिकाँश सभी पक्षी प्राकृतिक चारे पर निर्भर करते हैं। मनुष्य का वे अहित नहीं करते वरन् कीड़े-मकोड़ों से गन्दे और बदबू फैलाने वाले माँस से मनुष्य जाति की सेवा और रक्षा करते हैं पर हमारी ओर से उन्हें मिलती है बंदूक की गोलियाँ। शिकार का ऐसा शौक चर्राया है मनुष्य को कि वह बेचारे सीधे-सादे पक्षियों को ही नष्ट किये दे रहा है। कुछ लोग दयालुता के नाम पर ही उनको कष्ट देते हैं। पिंजड़े में बन्द करना या मारकर नष्ट करना दोनों पाप एक ही तरह के हैं। पक्षी प्रकृति में उन्मुक्त-सौंदर्य है उन्हें उन्मुक्त ही रहने देना चाहिये।
कैलीफोर्निया में पाया जाने वाला गिद्ध जिसे वहाँ काण्डर कहा जाता था, मरे हुये पशुओं का माँस खाकर प्रकृति को शुद्ध रखता था पर शिकारी लोगों ने उस बेचारे का वंश ही नष्ट कर दिया। सन् 1950 के लगभग एक पहाड़ी पर उनका एक झुण्ड दिखाई दिया था इसके बाद बहुत खोज की गई पर अब तो उसकी छाया के भी दर्शन नहीं होते।
मनुष्य को देखते ही झुरमुट में छिप जाने वाले, अपनी मादा के सामने भी लाज मारने वाले पक्षी नोटोरनिस को भी नहीं छोड़ा, मानवीय दुष्प्रवृत्ति ने। जल में रहने वाला यह पक्षी भी मूल रूप से न्यूजीलैण्ड में ही पाया जाता था पर आज 20 वर्ष से अधिक हो गये वहाँ भी एक भी नोटोरनिस देखने को नहीं मिलता।
आइसलैण्ड तथा न्यूफाउन्डलैण्ड में पाया जाने वाला ग्रेट आक पक्षी अपने परों के सौंदर्य के लिये कभी संसार में प्रसिद्ध था। बना रहता तो प्राकृतिक सौंदर्य भी नष्ट न होता और लोगों को घर या बाल सजाने के लिये उसके पर भी मिलते रहते। पर मनुष्य की मूर्खता ने यहाँ एक और ‘सोने वाली मुर्गी’ की कथा रच डाली। लोगों ने सोचा पता नहीं मारकर कितने पर मिल जायेंगे। एक-एक करके मारते गये और अब कोई 90 वर्ष से ऊपर हुये यह पक्षी भी सदैव के लिये इस संसार से उठ गया।
कौन जाने, मनुष्य की यह दुष्प्रवृत्तियां न बदलीं तो एक दिन सृष्टि का सारा ही प्राकृतिक सौंदर्य नष्ट न हो जाये। कहते हैं मनुष्य बुद्धिशील, दयावान् प्राणी है वह तरह-तरह की वस्तुयें गढ़ सकता है। पर सही यह है कि उसने अधिकाँश फूहड़पन गढ़ा। सौंदर्य जो परमात्मा ने बनाया था उसे तो नष्ट करने का पाप ही कर सका है वह। लगता है यह दानवी प्रवृत्ति न रुकी तो संसार का यह जीव-सौंदर्य एक दिन सबका सब ही नष्ट हो जायेगा।
महात्मा जी तीर्थ यात्रा को निकले तो उनकी भेंट एक धनी व्यक्ति से हुई। उसे अपने धन पर बड़ा गर्व था। महात्मा को आर्थिक सहायता देना तो दूर रहा वरन् एक शीशा देकर कहा ‘आप पूरे देश का भ्रमण करेंगे, यदि आपको सबसे बड़ा मूर्ख कोई मिल जाये तो यह शीशा उसी को दे दें।
सन्त स्वभाव, शीशा लेकर झोली में डाल लिया महात्मा ने। वह शीशा भी बड़ा विचित्र था, उसमें एक व्यक्ति की अनेक प्रतिमायें दिखाई देती थीं। महात्मा पर्यटन से लौट कर आये तो उस धनी को मृत्युशय्या पर पड़ा पाया। उन्होंने पूछा ‘साहूकार! क्या तुम्हें किसी ऐसी विद्या का ज्ञान है जो मृत्यु से बचा सके।’
‘नहीं!’
‘क्या तुम्हारे धन में इतनी शक्ति है जो तुम्हारे काल को परास्त कर सके,’
फिर वही छोटा सा उत्तर उस धनी ने दिया, ‘नहीं’।
‘तो तुमसे बड़ा मूर्ख तो इस संसार में मुझे कोई दिखाई नहीं देता। यह लो अपना शीशा। आश्चर्य इस बात का है कि तुम सभी वस्तुओं की निस्सारता को जानते हुये भी अपने जीवन को इसी में खपाते रहे फिर तुमसे बड़ा मूर्ख और कौन होगा।’
शिक्षित दिखाई देने वाले आज के लोग भी उस साहूकार की तरह हैं जो प्रमादवश दूसरों को तो मूर्ख समझते हैं पर स्वयं कहाँ जा रहे हैं इसका पता उन्हें भी नहीं है।
जीवात्मा क्या है? कहाँ से आया है? विश्व में वह किस स्थिति में है और कहाँ पहुँच कर वह पूर्णता प्राप्त करता है? इस संबंध में पूर्व और पाश्चात्य, ज्ञान और विज्ञान जगत् दोनों ही आदि काल से खोज करते रहे हैं। किन्तु अति सूक्ष्म विज्ञान होने के कारण उसे अच्छी तरह समझा नहीं जा सका। इस संदर्भ में उपलब्ध दर्शनों में वेद और उपनिषद् संबंधी मीमाँसा को सर्व शुद्ध और प्रामाणिक माना गया है।
1.भूः 2. भुव 3. स्वः 4. महः 5. जनः 6. तपः और 7. सत्यम्-यह सात लोक, 1.बीज जागृत 2. जागृत 3. महा जागृत 4. जागृत स्वप्न 5. स्वप्न 6. स्वप्न जागृत और 7. सुषुप्ति-यह जीव की सात अवस्थायें, 1. रस 2. रक्त 3. माँस 4. मज्जा 5. मेद 6. अस्थि और 7. वीर्य-यह सप्त धातुयें, तथा 1. स्वप्न जागर 2. संकल्प जागर 3. केवल जागर 4. चिर जागर 5. धन जागर 6. जागृत स्वप्न और 7. क्षीण जागर-यह जीवों के सात प्रकार। इन सबकी विधिवत् जानकारी दिलाना भारतीय तत्व-दर्शन का उद्देश्य रहा है। यह सप्तक केले के पत्तों के अनुसार जीव-चेतना के विकास की सात अवस्थाओं का विज्ञान है। इसे समझ लेने पर परमात्मा की स्थिति से लेकर संसार के विस्तार, जीवात्मा के विज्ञान से लेकर पुनः मुक्त अवस्था प्राप्त होने तक का शुद्ध ज्ञान प्राप्त करना सुगम हो जाता है। इन अवस्थाओं को ‘एस्ट्रल’ शरीर के नाम से थियोसोफिस्ट और पाश्चात्य वैज्ञानिक भी जानने लगे हैं, तथापि उनकी सबसे अच्छी व्याख्या योग-ग्रन्थों और उपनिषदों में ही प्राप्त है।
सर्वप्रथम सृष्टि विस्तार की प्रक्रिया को लेते हैं। भारतीय दर्शन की मान्यता यह है कि प्रारम्भ में एक ही ‘महातत्व’ या परमात्मा था, उसकी इच्छा हुई-’एकोऽहं बहुस्याम्’ मैं एक हूँ, अनन्त हो जाऊं। उसकी इस इच्छा से ही पंच-तत्वों की रचना हुई और क्रमशः अनेक लोक-लोकान्तरों और जीवधारियों की रचना होती चली गई। यों ब्रह्माण्डों की संख्या अनन्त है-बहवो ह वा......आदित्यात् पराच्चो लोकाः (जैमिनी ब्रह्माण 1/11) अर्थात् आदित्य से परे लोक है तथापि पंच तत्वों की न्यूनाधिक मात्रा के अनुपात से लोकों की संख्या सात ही मानी गई, 5 लोक पाँच तत्वों की मिश्रित बहुलता वाले अर्थात् किसी में आकाश तत्व अधिक है, शेष 4 कम मात्रा में। किसी में अग्नि तत्व अधिक है, शेष 4 कम ऐसे। एक इन समस्त तत्वों से परे महत्तत्व और अन्तिम तमिस्र लोक अर्थात् जिसमें स्थूलता-ही-स्थूलता, अन्धकार-ही-अन्धकार है।
इन लोकों की स्थिति पृथक-पृथक न होकर अंतर्वर्ती है अर्थात् एक लोक में ही शेष 6 भी हैं। एक ही स्थान पर सातों लोक विद्यमान हैं। जीव-चेतना अपने तत्वों की जिस बहुलता में होती है, वह उसी प्रकार के लोक का अनुभव करती है। पृथ्वी पर रहते हुए भी हम सूर्यलोक, आदित्य या स्वर्गलोक में स्थित हो सकते हैं, यदि हमारी चेतना अग्नि, सोम और महत्त्व में परिणित हो चुकी हो। जैमिनी ब्रात्म में इसी बात को-’अनन्तर्हितान् एश्वेत् उध्वनि लोकान् जयति’ कहा है, जिसका अर्थ होता है-ईश्वर को प्रयत्नपूर्वक धारण करने वाला व्यक्ति न पृथक् हुए ही ऊर्ध्व लोकों को जीतता है।
लोक हमारे भीतर है, हम जिस लोक के तत्व का विकास कर लेते हैं। स्थूल रूप से शरीर में होने पर भी अपने भीतर उसी लोक में अनुभव करते हैं, वैसी ही सूक्ष्म दृष्टि और शक्ति के स्वामी भी हम होते हैं। भूलोक स्थूल धातुओं और खनिजों का लोक है। इस लोक में रहने वाले व्यक्ति में इच्छाएं और वासनाएँ बनी रहती हैं। इस तत्व से प्रभावित व्यक्ति में नेतृत्व, सर्व विद्या विनोदी, रोगमुक्त, काव्य और लेखन की सामर्थ्य आदि विकसित होते हैं।
भुवः लोक जल तत्व प्रधान सिन्दूर वर्ण का है। इस लोक में निवास करने वाले व्यक्तियों का अहंकार, मोह, ममत्व नष्ट हो जाता है। ईश्वरीय मनन में प्रसन्नता अनुभव होने लगती है। रचना-शक्ति का विकास होने लगता है, सामान्य व्यक्ति की अपेक्षा वह अधिक उन्नतिशील होता है स्वःलोक अग्नि तत्व की प्रधानता की अवस्था है। सूर्य में अग्नि तत्वों वाले जीव ही रह सकते हैं या यों कहना चाहिये कि सूर्य का ध्यान करते रहने से अग्नि अर्थात् उष्णता, विद्युत् और प्रकाश के परमाणुओं का शरीर में विकास होता है। ऐसे शरीर वाले व्यक्ति में संहार और पालन की शक्ति, वचन-सिद्धि आदि गुण होते हैं। उस शक्ति को दुर्गुणों से घृणा होने लगती है तथा परमार्थ व सेवा में आनन्द मिलने लगता है।
महः लोक वायु तत्व की प्रधानता का प्रतीक है। इसके ध्यान और प्राप्ति से इन्द्रिय संयम, ज्ञान-प्राप्ति की उत्कण्ठा और परकाया प्रदेश आदि सिद्धियों का स्वामित्व मिलता है। इसी स्थिति में परिणित हो जाने पर आत्म-चेतना इन शक्तियों सामर्थ्यों का अधिकार सामान्य रूप में प्राप्त कर लेती हैं। जनः लोक, जिसके परमाणु धूम्र वर्ण के, आकाश तत्व की प्रधानता वाले होते हैं। इस स्थिति में जीवात्मा दीर्घ जीवन, तेजस्विता, सर्व हित परायणता और भूत-भविष्य को देखने का अधिकार प्राप्त करती है। इस स्थिति पर पहुँच गई आत्मायें कठिन परिस्थिति में भी अतीव शान्ति अनुभव करती हैं। उनके मस्तिष्क में से सदैव सुखद विचार उठते रहते हैं।
तप लोक शुभ्र वर्ण के शुद्ध ज्योतिर्मय परमाणुओं से बना होता है। इसे ही महत्तत्व कहते हैं, उसके ध्यान करने से ॐ कार का सुखद नाद सुनाई देता है और तीनों लोकों में जो कुछ है वह स्थूल नेत्रों की तरह आत्मा में प्रतिभासित होने लगता है। इस अवस्था में पहुँचे हुए साधक के सभी दोष नष्ट हो जाते हैं। अन्तिम सत्यलोक, जहाँ से परमात्मा का संकल्प स्फुरित होता है, जो निराकार और सभी तत्वों से अतीत है। यहाँ पहुँची हुई आत्मायें जन्म-मृत्यु के बंधनों से छूटकर सहस्रदल कमल की तरह आकार वाले दिव्यलोक का स्वामित्व प्राप्त करती हैं। इन सातों लोकों की क्रमशः सूक्ष्म, सूक्ष्मतर, सूक्ष्मतम अवस्थायें हैं। इनमें आत्म-चेतना की क्रमशः परिणिति को ही जीव की सात अवस्थायें कहा गया है।
यों ब्रह्माँड के विस्तार के संबंध में पाश्चात्य विद्वानों के अनेक मत हैं, पर उनमें से जिन जिन सिद्धान्तों को पाश्चात्य देशों में प्रमाणिक माना गया हैं, उनका सार इन तथ्यों का प्रतिपादन ही करता है।
पहला ब्रिटिश खगोलशास्त्री फ्रायड हायल का ‘अपरिवर्ती’ सिद्धाँत है। इसके अनुसार ब्रह्माँड का अस्तित्व हमेशा रहा है। हम भी मानते हैं कि परमात्मा अनादि तत्व है, वह कालातीत है अर्थात् ऐसा कोई भी समय नहीं, जब वह न रहा हो। इस तत्व को हाइड्रोजन कहते हैं। इसी से अनेक आकाश गंगायें बनीं और क्रमशः घनत्व वाले ब्रह्माँडों का विस्तार होता चला गया है।
दूसरा सिद्धाँत कैम्ब्रिज विश्व-विद्यालय के रेडियो खगोल शास्त्री डॉ0 मार्टिन रैले का ‘बृहत् विस्फोट’ का सिद्धान्त कहलाता है। उसके अनुसार 10 अरब वर्ष पूर्व एक अत्यन्त सघन परमाणुओं वाला तत्व था, उसमें एका-एक जोर का विस्फोट हुआ। उस विस्फोट से बिखरे पदार्थ-खण्ड ही आकाश गंगायें बनीं और उनसे सूर्य, सूर्य से पृथ्वी आदि ग्रह-नक्षत्र बने। गुब्बारा फूलने की तरह यह ब्रह्माँड विकसित होता जा रहा है और वह अनन्त विस्तार में समाता चला जायेगा। इस मत के मानने वाले ब्रह्माँड की समाप्ति कर नहीं, विस्तार पर ही विश्वास करते हैं।
तीसरा सिद्धान्त पुनरावृत्ति का या दोलायमान स्थिति का सिद्धाँत कहलाता है और जो ऐलेन सैण्डेज तथा पालोमर वेधशाला के वैज्ञानिकों की देन है-ये और सब बातें वृहत् विस्फोट के सिद्धान्त की ही हैं, पर इनके अनुसार 80 अरब वर्ष पीछे ब्रह्माँड के विस्तार की अन्तिम स्थिति होगी अर्थात् उस समय प्रलय जैसी स्थिति उत्पन्न होने से सारे पंचभूत नष्ट होकर पुनः एक ही तत्व में चले जायेंगे। इसके बाद सृष्टि-निर्माण की प्रक्रिया पुनः प्रारम्भ होगी।
यह सिद्धान्त प्रकारान्तर से भारतीय सिद्धान्तों की ही पुष्टि करते हैं। एक ही तत्व के विकास और काल-विभाजन की हमारे यहाँ गणनायें तक हुई हैं और उन्हें देव-युगों से लेकर पृथ्वी के युगों तक बाँटकर एक-एक युग में तत्वों की कमी या आधिक्य के साथ यह तक बता दिया है कि अमुक युग में ऐसी मनःस्थिति, अमुक युग में अमुक मन-स्थिति के लोग होंगे। ब्रह्माँड के विकास के साथ चेतना के विकास का जितना अच्छा समन्वय और सामंजस्य भारतीय तत्व-दर्शन ने प्रस्तुत किया है, उतना संसार के अन्य किसी भी विद्वान ने नहीं किया। वे अभी तक स्थूल विवेचन तक ही सीमित है, इसलिये आगे जीव की जिन सात अवस्थाओं का विवेचन करेंगे, उनका वैज्ञानिक दृष्टि से कोई प्रमाण नहीं मिलेगा। उनको प्रमाणित करने वाले तत्व केवल मनोवैज्ञानिक और घटनापरक तथ्य ही होंगे, जिनका विवरण अखण्ड-ज्योति के पृष्ठों में लगातार दिया जा रहा हैं।
अब तक सप्त लोकों की स्थिति का अध्ययन और पुष्टि वैज्ञानिक नहीं कर सके तथापि ब्रह्माँड में कुछ धुँधली रहस्यमयी वस्तुयें दिखाई दी हैं, जिन्हें आकाश की जबर्दस्त शक्ति-स्त्रोत के रूप में देखा जा रहा है। इन वस्तुओं का नाम ‘क्वासार’ रखा गया है। उनका अध्ययन तो ज्योतिर्विज्ञान के अध्याय में अन्यत्र करेंगे, पर यहाँ यह उल्लेखनीय है कि इन शक्ति-स्रोतों के वर्णक्रम (स्पेक्ट्रम) सात रंग के पाये जाते हैं 1. बैंगनी 2. नीला 3. आसमानी 4. हरा 5. पीला 6. नारंगी 7. लाल। इनमें से कुछ वर्ण भेद समीपवर्ती रंगों के सम्मिश्रण हो सकते हैं। यदि ऐसा हो, तो उनकी पूर्ति अत्यन्त दिव्य और अत्यन्त अन्धकारपूर्ण वे दो रंग हो सकते हैं, जिन्हें अपने वर्णक्रम (स्पेक्ट्रम) में पालोमर वेधशाला के वैज्ञानिक डॉ0 एलन सैडेज और जीस ग्रीनस्टेन ने प्राप्त किया। बड़े परिश्रम से जब उन्होंने अत्यन्त सूक्ष्म वर्ण क्रम प्राप्त किया, तो उसमें यह दो ही रंग उपलब्ध हुए।
इन अवस्थाओं और शक्ति स्रोतों को इकट्ठा चित्रित करना कठिन है, पर यह निश्चित है कि यह अनजाने शक्ति-स्त्रोत सात लोकों के सात तत्व केन्द्र ही हैं। उन पर और विस्तृत खोजें हुईं, तो लोग देखेंगे कि भारतीय तत्व-दर्शन कितना अत्याधुनिक और प्रमाणिक रहा है। ...
(क्रमशः)
जलान्तश्चन्द्रपलं जीवितं खलु देहिनाम्।
तथाविधिमिति ज्ञात्वा शाश्वात्कल्याण-माचरेत्॥
देहधारियों का जीवन निश्चय करके पानी के भीतर चन्द्रमा के बिंब के समान चंचल है, ऐसा इसे जानकर सर्वदा कल्याण करना चाहिये।
आत्म-विस्तार-
अग्नि, मरुत, वरुण देवता सब खड़े अनुनय-विनय करते रहे-हे बीज! मुझे धारण करो, हम तुम्हारी क्षमताओं का अनन्त गुना विस्तार कर देंगे। पर बीज इस डर से कि मेरी ऐसी सुन्दर देह सड़-गल कर नष्ट हो जायेगी, जहाँ था, वहीं पड़ा पड़ा सूख गया बीज, मौत तो अन्ततः उसे आनी ही थी।
पास ही एक और बीज पड़ा था, उसे देवों की बात में कुछ सार जान पड़ा-सो वह पृथ्वी की गोद में पड़ा सबको गले लगाने लगा। अग्नि, मरुत, वरुण सबको धारण करने से उसमें अंकुर फूट पड़ा और विकसित होते-होते एक दिन विशाल वृक्ष के रूप में लहलहाने लगा। एक दिन वह वृक्ष फूलों से लदा हंस रहा था, तो मृत्युन्मुख बीज ने सिर ऊपर उठाकर देखा और पश्चाताप के आँसू बहाता हुआ बोला-वृक्ष! तुम्हारा साहस धन्य है। मेरी तरह से तुम भी मोह में पड़ गये होते तो आज यह जो सैकड़ों-सैकड़ों बीजों में परिवर्तित होने का जो सौभाग्य तुम्हें मिल रहा है, वह कहाँ मिलता?
चन्द्रमा अब हमारे लिये पड़ौसी राज्यों की तरह हो गया है। कई चन्द्र-परिक्रमायें पूरी हुईं, पर उनकी कीमत कम ही लोग जानते होंगे। 10 जुलाई को प्रसारित अन्तरिक्ष केन्द्र ह्यूस्टन (टेक्सास) की एक विज्ञप्ति में बताया गया है कि अपोलो-11 के यात्री नील आर्मस्ट्राँग की चन्द्रमा पर दो घण्टे 40 मिनट की चहलकदमी के लिये 180 अरब रुपये खर्च किये हैं। दस साल पूर्व स्थापित अन्तरिक्ष प्रशासन को अब तक 180 अरब रुपयों की धनराशि मिल चुकी है। यह धनराशि यदि पिछड़े लोगों की भलाई में प्रयुक्त होती, तो सैकड़ों 12 आना प्रतिदिन पाने वाले लोगों को दोनों वक्त भरपेट भोजन देने के काम आती।
अन्तरिक्ष यात्री नील आर्मस्ट्राँग को 20500 रुपया प्रतिवर्ष वेतन मिलता है। चन्द्रमा पर उतरने के लिये उसे जो पोशाक पहनाई गई, उसकी कीमत उसके 12 वर्ष के वेतन के बराबर मूल्य अर्थात्-246600 (चौबीस लाख 66 हजार रुपये) की थी। अपोलो-11 के निर्माण पर ही 2 अरब 62॥ करोड़ रुपया खर्च करना पड़ा। इतने रुपयों में भारतवर्ष के एक वित्तीय वर्ष का बजट बनता। यह संपत्ति एक बार के प्रयोग के बाद लगभग पूरी नष्ट हो जाती है। 4 करोड़ 10 लाख डालर के मूल्य पर बना चन्द्र-मोड्यूल ‘ईगल’ तो चन्द्रमा में ही गिर कर नष्ट हो गया। सैटन-5 जो यान को प्रक्षेपित करता है, 18 करोड़ 50 लाख डालर में बना है। यह अपव्यय अभी तो प्रत्येक बार की यात्रा में होता रहेगा।
इन आँकड़ों को देखकर ही भारतीय वैज्ञानिक डॉ0 आत्माराम की आत्मा रो पड़ी थी। उन्होंने चन्द्रमा पर मनुष्य के चरण का समाचार सुनकर अपनी भावाभिव्यक्ति करते हुए कहा था-”अन्तरिक्ष की खोज में लग रही यह विशाल धनराशि यदि अशिक्षितों को शिक्षित बनाने, बेरोजगारों को रोजगार देने, बीमारों को औषधि, भूखों को भोजन देने के काम आ सकी होती, तो आज संसार के किसी भी देश का कोई भी व्यक्ति भूखा-नंगा नहीं रहा होता।”
दुनिया के दो-तिहाई लोग अभावग्रस्त जीवन जीते हैं। अमेरिका जैसे देश में भी निर्धन लोगों की कमी नहीं। रूस दूसरों से अन्न मोल लेकर अपने नागरिकों के पेट भरता है। यदि अन्तरिक्ष यात्राओं और वैज्ञानिक अनुसन्धान में खर्च होने वाली अथाह धनराशि मानवता के कल्याण की दिशा में प्रयुक्त हुई होती, तो संसार में एक भी व्यक्ति भूखा न रहता। 30 नवम्बर 1969 के ‘धर्मयुग’ पृष्ठ 43 पर एक बड़ा मार्मिक समाचार छपा है। प्रारम्भिक पंक्तियाँ यह हैं-बम्बई जैसे महानगरों में जहाँ गन्दी बस्तियों और फुटपाथों पर रहने वाले अपंग और भिखारी जूठे पत्ते चाट कर अपना पेट भरते हैं। बम्बई के श्री एच॰ सी0 मेहता और उनकी धर्मपत्नी ने कदम उठाया है-इन भूखे गरीब अनाथों की मदद के लिये वे कमर कसकर निकल पड़े हैं। ये लोग कई पार्टियों और दावतों में निमन्त्रण पाकर वहाँ बचा-खुचा भोजन इकट्ठा करने जाते हैं, (उनमें शरीक होने नहीं), उस भोजन को कार में, रखकर गन्दी बस्तियों में जाकर भूखों में बाँट आते हैं।
ऐसी स्थिति भारतवर्ष ही नहीं, सारी दुनिया में है। कदाचित् विज्ञान के नाम पर खर्च होने वाली यह धनराशि इन निर्धनों के पेट भर सकती, तो संसार में कितनी शाँति होती?
हमें आकाश में पक्षियों की तरह उड़ना और पानी में मछलियों की तरह तैरना सीखने के पश्चात् पृथ्वी पर मनुष्यों की तरह रहना सीखना है।
-डॉ. राधाकृष्णन
अपनों से अपनी बात-
समुद्र मन्थन की तरह जीवन की लंबी अवधि में हम लोक मानस में उत्कृष्टता और आदर्शवादिता के लिये आस्था और हिम्मत उत्पन्न करने का प्रयास करते रहे हैं। संपर्क में जो भी आया-जिस प्रयोजन से भी आया-उसे यही प्रकाश और प्रेरणा देते रहे हैं कि विचारणा और कार्य पद्धति केवल पेट और प्रजनन के लिये ही सीमित न रहने दी जाय। मनुष्य का कलेवर मिला है तो मनुष्यता के उत्तरदायित्व भी वहन किये जायें। चरित्रवान् बनकर ऐसा जीवन जिया जाय जिससे दूसरों को प्रकाश मिले और अनुकरण के लिये प्रस्तुत हो सकने वाले व्यक्ति महामानवों की रीति-नीति अपना सकें।
हमने अपने साथ किसी भी कारण संबंध बनाने वाले हर किसी को यही कहा है कि प्रगति की दौड़ में समाज बहुत पिछड़ गया। यदि पिछड़ापन दूर न किया गया तो इस घुड़ दौड़ के युग में हम इतने पीछे रह जायेंगे कि फिर सभ्य और सम्पन्न देशों की पंक्ति में खड़े हो सकना संभव ही न रहेगा। आज की आवश्यकता यह है कि हममें से प्रत्येक भारतीय कम से कम कुछ दशाब्दियों के लिये व्यक्तिगत तृष्णा वासना को एक ओर रख कर हर क्षेत्र में संव्याप्त पिछड़ेपन और अविवेक को दूर करने के लिये आपत्ति धर्म की तरह सर्वतोभावेन जुट जाये। समय की यही माँग है, कर्तव्य की यही पुकार है। सो इस दिशा में कदम बढ़ाने के लिये कोई जीवित और जागृत अन्तरात्मा वाला व्यक्ति कंजूसी न दिखाये।
धर्म प्रचार कहिए-अध्यात्म साधना कहिए-विवेकशीलों का संगठन कहिए-जन जागृति का बीजारोपण अपना कहिए-नव निर्माण की पृष्ठभूमि कहिए-नाम जो कुछ भी दिया जाय हम जीवन भर एक ही काम करते रहे हैं कि नरपशु जैसा संकीर्ण और स्वार्थी जीवन जीने से आदमी लजाये और कुछ ऐसा करने की उमंग उत्पन्न कर-अनुदान देने की बात सोचे जिससे अपने समाज का पिछड़ापन दूर होने में मदद मिले। आज का सबसे बड़ा धर्म पुण्य यही है कि एक हजार वर्ष की गुलामी ने जिन संकीर्णताओं, स्वार्थपरताओं, क्षुद्रताओं मूढ़ताओं, कुत्साओं और कुण्ठाओं ने आज का भारतीय जीवन तमसाच्छन्न कर दिया है उसे उन्हें उखाड़ने के लिए कुछ शौर्य साहस प्रदर्शित करे और पिछड़ेपन को प्रगतिशीलता में बदलने के लिये यथा संभव त्याग और बलिदान की’ सहयोग पुरुषार्थ की बात सोचे। कह नहीं सकते कि हमारे इस प्रयत्न का कितना परिणाम निकला। कितनों ने उसे हृदयंगम किया और कितनों ने इस कान सुनकर उस कान निकाल दिया। इसका लेखा-जोखा समय लेगा। सफलता-असफलता का मूल्याँकन इतिहासकार करेंगे पर इतना निश्चित है कि हमारी उपासना साधना, तपश्चर्या से लेकर-साहित्य सृजन और प्रचार संगठन से लेकर विविधविध रचनात्मक कार्यों तक इसी प्रयोजन के लिये होते चले आये हैं कि मनुष्य में मनुष्यता की और समाज में देवत्व की मात्रा जो अति न्यून मात्रा में शेष रह गई है उसका अधिकाधिक संवर्धन कर सकने के लिए हर संभव पुरुषार्थ किया जाय।
साठ वर्ष के इस जीवन काल में 45 वर्ष एक निष्ठ भाव से इसी प्रयोजन के लिये लग गये। आरम्भ के 15 वर्ष बालकपन के थे सो खेल-कूद और पढ़ने-लिखने की बाल-क्रीड़ाओं में लग गये। जब से होश संभाला, तब से सावधानी बरती कि समय का एक भी क्षण और शक्ति का एक भी कण किसी अन्य प्रयोजन के लिये खर्च न हो जाये। न दूसरी बात सोची, न दूसरी क्रिया की। काम करने और सोचने के ढंग में परिस्थिति के अनुसार हेर-फेर भले ही होता रहा है, प्रयोजन और लक्ष्य में रत्ती भर भी व्यतिरेक नहीं हुआ। इस प्रकार एक लंबी मंजिल का महत्वपूर्ण भाग पूरा कर लिया और ईश्वर के सामने उपस्थित होने पर उसके अनुदान मनुष्य-जीवन को निरर्थक गंवा देने की लज्जा से बचे रहने की स्थिति बन गईं। सन्तोष इतना भर है कि ब्राह्मण आत्मा की जो चेष्टा और दिशा होनी चाहिये, उसी पर कदम बढ़े। प्रगति चाहे मन्द रही हो, पर व्यतिरेक नहीं हुआ।
अब जबकि हमारे स्थूल जन-संपर्क वाले जीवन का अन्त अति निकट आ गया-कुछ महीने भर ही शेष रह गये तो एक बात अनायास ही मन में उठती रहती है कि जिस प्रयत्नशीलता का क्रम एक लंबे अर्से से चला आ रहा था और जिसके परिणाम देखकर सर्वत्र बड़ी-बड़ी आशायें बाँधी जाने लगी थीं, उनका क्या होगा? बहुत पहले हम सोचते थे कि हमारे बहुत-से साथी, अनुयायी, स्वजन और शिष्य हैं। वे अपना सहज कर्तव्य समझेंगे और उस पुण्य परम्परा को उदार श्रद्धा के साथ सहज ही अग्रसर करते रहेंगे।
पर आशंका या कुकामना ही समझिये अथवा वस्तुस्थिति कहिये-अब ऐसा लगने लगा है कि जो विशाल भीड़ हमें चारों ओर से घेरे रही है, घेरे रहती है उसके कम ही लोग उस स्तर के हैं, जिन्हें हमारे प्रयासों के प्रति सच्ची सहानुभूति हो। अधिकाँश लोग निहित स्वार्थ वाले हैं, जो अपने किसी प्रयोजन विशेष में सहायता प्राप्त करने के लिये हमारा उपयोग भर करना चाहते हैं। उनकी मनोभूमि उस स्तर तक विकसित नहीं हो सकी है कि वे हमारे जीवनोद्देश्य और क्रिया-कलापों के पीछे काम कराके दूरगामी प्रयोजन की उपयोगिता समझें और उसके लिये कुछ सहयोग-अनुदान देने की हिम्मत करें। मनुष्य, मनुष्य से सहायता प्राप्त करे-यह उचित है, पर केवल उतने तक ही सीमित बनकर रह जाये, यह बुरा है। बारीकी से अपने वर्तमान साथियों पर निगाह डालते हैं, तो खोखलापन बहुत नजर आता है। लगता है-ढोल के इर्द-गिर्द ही थोड़ी सी लकड़ी और चमड़ी लगी है, भीतर तो पोल ही पोल है। भीड़ में क्या बनता है। सोमवती अमावस्या को गंगा-तट पर स्नान करने वाले और रामलीला में रावण वध के उत्सव में उपस्थित रहने वाले तथाकथित धार्मिक लोगों की भारी भीड़ जमा होती है, पर उस जनसमूह के पीछे कोई लक्ष्य नहीं होता। अतएव उस एकत्रीकरण का न व्यक्ति को लाभ मिलता है और न समाज को। वह जमघट विडम्बना मात्र बनकर रह जाते हैं। सोचते हैं अपने साथ जुड़ा हुआ लाखों मनुष्यों का जन-समूह कहीं ऐसा ही खोखला न हो जो हमारे पीठ फेरते ही मुँह फेर ले और जिस प्रयोजन को हम विश्वव्यापी बनाने के लिये अपने को तिल-तिल गलाते रहे हैं वे उसकी ओर मुड़कर भी न देखें। यदि ऐसा हुआ तो उन रंगीन सपनों का क्या होगा, जो हमने बड़ी साध के साथ जीवन भर सजाये और संजोये हैं?
विदाई की घड़ियां जैसे-जैसे निकट आती जाती हैं, वैसे-वैसे संबंधी स्वजनों के प्रति हमारी दबी हुई ममता सहसा उभरती चली आ रही है और मोहग्रस्त अज्ञानियों की तरह यह लालसा उठती है कि अपने हर आत्मीय से एक बार तो जी भर कर मिल लें, प्यार कर लें और अपने मन की कह लें, उनकी सुन लें। सो, उस प्रयोजन के लिये इन दिनों 4-4 दिन के शिविर चला रहे हैं। इससे हमारा जी हल्का हुआ है। प्रायः सभी विशिष्ट आत्मीय जन 15 अक्टूबर तक चलने वाली इस शिविर-शृंखला में मथुरा आकर मिल जायेंगे। इससे अपने को बहुत संतोष मिलता है। हो सकता है कि आगंतुकों का भी जी भरता हो। अब अन्तिम विदाई के समय मिलने आने वालों की आवश्यकता नहीं रही और यह शिविर-शृंखला उपर्युक्त ही रही। जो अभी नहीं आये हैं, उन्हें प्रेरणा कर रहे हैं कि वे अपना काम हर्ज करके भी हमसे मिल जाएं अन्यथा वे इस महत्वपूर्ण अवसर से वंचित रह जाने पर जीवन भर पछताते रहेंगे और हमें भी दुख ही रहेगा।
एक ओर यह चल रहा है, दूसरी ओर यह आशंका खाये जाती है कि यह तथाकथित हमारा परिवार यदि व्यक्तिगत संपर्क की परिधि तक ही सीमित रहा और हमारे मिशन के प्रति उसमें आवश्यक निष्ठा उत्पन्न न हुई, तो एक प्रकार से हमारे प्रयोजनों का मटियामेट हो जायेगा। भीड़ बढ़ा लेना और जन-संपर्क फैला लेना, मिलनसारी या प्रतिभा का चमत्कार हो सकता है, पर उस समूह में कोई जीवट न रही, तो बालू की दीवार की तरह उस भीड़ को बिखरने में भी देर न लगेगी, और यदि कहीं ऐसा हो गया, तो हमारी जीवन-साधना की सार्थकता क्या रह जायेगी।
दिन जैसे-जैसे बीतते जाते हैं, वैसे-वैसे हमारे मन की आशंका और उद्विग्नता बढ़ती जाती है। अपने पीछे कर्मठ और आस्थावान् आदर्शवादी नर-रत्नों की एक शृंखला छोड़ जाने की साध हमारे मन में रही है, यदि वह अधूरी रह गई, तो हिमालय में तप करने या परलोक में रहते हुये भी हमें चैन न मिलेगा। सो इस संदर्भ में इन दिनों कुछ ऐसा कर जाने को जी हुआ है, जिससे मन उलझन में पड़ा न रह जाये। स्थिति भली-बुरी जैसी भी हो, हमारे सामने साफ हो जाये-जिससे हम अपने गुरुदेव के सामने-ईश्वर के सामने अपने क्रिया-कलापों और भावी सम्भावनाओं का वास्तविक रूप प्रस्तुत कर सकने का साहस कर सकें। पीछे कुड़कुड़ाते रहने की अपेक्षा अभी से वस्तुस्थिति समझ ली जाये, तो उसके आधार पर कुछ भावी रूपरेखा कल्पना बन सकती है और उसे अग्रगामी बनाने के लिये चले जाने के बाद भी कुछ प्रयत्न किये जा सकते हैं और अनुदान दिये जा सकते हैं।
निश्चय किया गया है कि अपने घनिष्ठ परिवार में मात्र उन लोगों को रखा जाये, जो हमारे प्रति व्यक्तिगत मोह रखने से आगे एक कदम बढ़कर हमारे मिशन का भी कुछ महत्व समझने लगे हों और उसके लिये कुछ सहयोग करने की आवश्यकता अनुभव करने लगे हों। इस कसौटी पर जितने लोग खरे उतरेंगे, उन पर अपनी आशायें केन्द्रित करेंगे और शेष लोगों का हमारे ऊपर जो व्यक्तिगत अनुग्रह रहा है, उसके लिये आभार व्यक्त करके या उनके ऋण चुकाने के लिये यथासंभव प्रयत्न करके अपने कर्तव्य की इति-श्री कर लेंगे। हम स्वयं दृश्य दीखते भर हैं, वस्तुतः एक विचार, मिशन अथवा प्रकाश हैं, जिसे एक विशेष प्रयोजन के लिये परमेश्वर ने ऐसा कुछ करने के लिये जुटा दिया है, जो उसकी इच्छा अथवा योजना है। सो हमें ध्यान तो अपने उस बाजीगर के निर्देशों की ओर ही रखना है, जिसकी उंगलियों में कठपुतली की तरह हमने अपने समस्त सूत्र घनिष्ठतापूर्वक बाँध दिये हैं और उन्हीं इशारों पर सब कुछ करते रहे हैं और आगे भी करेंगे। उसकी इच्छा भारत का पिछड़ापन दूर करके उसमें प्रगतिशीलता का संवर्धन करना है, ताकि अगले दिनों वह विश्व-शाँति’-नव निर्माण धरती पर स्वर्ग का अवतरण और मनुष्यों में देवत्व के उदय का महान् प्रयोजन पूरा कर सकें और दुनिया को-मनुष्य जाति को सर्वांग सुन्दर बनाने की भूमिका का संपादन कर सकें। इसी प्रयोजन के लिये सजीव और सद्भाव संपन्न स्वजनों का एक संभावित परिवार भी छोड़कर जाना है, जिसकी मनःस्थिति को देखकर उससे कुछ कार्य बन पड़ने की आशा रखी जा सके।
अगले दिनों हमें नव-निर्माण के लिये बड़े कदम उठाने और अभियान को अति व्यापक क्षेत्र में विस्तृत करना है। उसमें कन्धा लगा सकने वाले सहयोगियों की संख्या तथा उत्कृष्टता ही उस प्रयोजन की पूर्ति का आधार बनेगी। सो, जाने से पहले एक सक्रिय, कर्मठ एवं सजीव कार्यकर्ताओं का संघ खड़ा कर देना चाहते हैं, जिस पर भविष्य की आशाओं को केन्द्रित रखा जा सके। इस सजीवता को परखने के लिये भी हम बहुत दिनों से एक घण्टा समय और दस पैसा रोज देने की अपील करते रहे हैं। ढीले-पोले ढंग से उस अपील पर कुछ एक ने ध्यान भी दिया था। पर यह सब कुछ अनियन्त्रित और अस्त-व्यस्त ढंग से चल रहा था। अब उसे नियन्त्रित और व्यवस्थित बनाया जा रहा है तथा कर्मठ परिवार के लिये उसे एक अनिवार्य शर्त के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। जो एक घण्टा समय के हिसाब से महीने में कम-से-कम 30 घण्टा नव-निर्माण के लिये दे सकते होंगे एवं दस पैसे के हिसाब से अनुदान निकाल सकते होंगे, उन्हें कर्मठ कार्यकर्ताओं की श्रेणी में रखा जायेगा और उन्हीं के संगठन को युग-निर्माण परिवार के रूप में गठित कर दिया जायेगा। जो इन दोनों में से एक भी शर्त पूरी न करेंगे, केवल मिशन से सहानुभूति भर रखेंगे और यदा-कदा यथा संभव सहयोग करते रहेंगे, वे सहायक माने जायेंगे। सदस्य वे ही रह जायेंगे, जिन्हें एक घण्टा समय और दस पैसा देने की शर्त मंजूर हो और स्वीकार कर लेने के बाद उसे निष्ठापूर्वक निबाहते रहने का संकल्प कर लिया हो।
कहना न होगा कि नव-निर्माण का प्रथम चरण ‘ज्ञानयज्ञ’ है। व्यक्ति और समाज की असंख्य समस्याओं और दिशाओं पर आवश्यक और अति महत्वपूर्ण सुलझा हुआ प्रकाश डालने वाला साहित्य युग-निर्माण योजना के अंतर्गत तेजी से प्रस्तुत किया जा रहा है। अपने देश को एक ही कमी, एक ही आवश्यकता है कि विवेक और औचित्य के आधार पर सोचना और तदनुरूप गतिविधियाँ अपनाने का साहस पुनर्जीवित किया जाय। इस प्रयोजन के लिये अपना ‘ज्ञानयज्ञ’ अभियान अति उत्साहपूर्वक चल रहा है। यह समय और पैसा विशुद्ध रूप में उसी के लिये निर्धारित और निश्चित है। इस अनुदान का एक-एक कण विचार-क्राँति के लिये ही खर्च किया जाना है। धूपबत्ती, प्रसाद, जप, चिड़ियों को दाना आदि किसी धार्मिक या सामाजिक काम में यह समय या पैसा खर्च नहीं किया जा सकता। अन्य उपयोगी कार्य के लिये प्रयत्न करना चाहिये। अपने सारे आँदोलन की नींव इस बात पर रखी गई है कि नव-निर्माण की प्रखर विचारधारा से अपने सदस्य स्वयं भली-भाँति परिचित अवगत रहने के लिये नियमित रूप से अपने साहित्य का स्वाध्याय करें और अपने घर-परिवार के हर सदस्य को उसे पढ़ाने-सुनाने के लिये आधे घण्टे का नियमित क्रम बनायें। इसके अतिरिक्त संपर्क क्षेत्र में भी, जिनमें कुछ विचारकर्ता दिखें, उन्हें यह सब साहित्य पढ़ाता-सुनाता रहे। हर सदस्य का संपर्क क्षेत्र न्यूनतम दस व्यक्तियों का होना चाहिये और प्रेरणा देने के लिये ही यह एक घण्टे का समय लगाया जाना चाहिये। रोज एक घण्टा निकालना हो सप्ताह में सात दिन या जैसे भी क्रम बनें, बनाया जा सकता है।
दस पैसा इसके लिये निर्धारित है कि मथुरा से निकलने वाली अखण्ड-ज्योति और युग-निर्माण पत्रिकायें तथा ट्रैक्ट-साहित्य, जो अब तक छप चुका है या तेजी के साथ छपने वाला है, उसे माँगते रहा जाये। इसी पैसे से विज्ञप्तियों के वितरण की भी प्रक्रिया चलती रह सकती है। यों इस पैसे का सारा साहित्य सदस्य के घर में ही पहुँचेगा और वह कभी भी बेचना चाहे, तो आसानी से बिक भी सकता है। इस दृष्टि से वह उसकी घरेलू पूँजी ही बनी रहेगी। बाहर के किसी व्यक्ति को उसमें से देना कुछ नहीं है, युग-निर्माण संस्था को भी नहीं। क्योंकि उसका प्रकाशन कागज-छपाई के लागत मूल्य पर ही बिकता है। इस साहित्य का पूरा लाभ स्वयं को, अपने परिवार को तथा मित्र संबंधियों को ही मिलने वाला है। इसलिये उसे बचत या सदुपयोग भी कहना चाहिये। फिर भी हम सम्मान बढ़ाने के लिये उसे दान अनुदान ही मान लेते हैं। क्योंकि जिस उच्च विचारणा का महत्व सारा देश पूरी तरह भूल गया है और जिसकी ओर से पूर्ण उपेक्षा धारण कर आँखें बंद कर ली गई हैं, ऐसे उपेक्षित तथ्य को अपनाने का जिसने साहस किया, उसे दानी से भी कुछ अधिक कहा जाना चाहिये और इस अनुपम साहस की प्रशंसा ही की जानी चाहिये।
अभी भी कुछ साहित्य जीवन-निर्माण की कुछ दिशाओं पर प्रकाश डालने वाला छपा है। आगे बहुत अधिक उपयोगी सामग्री प्रस्तुत करने का क्रम जारी रहेगा। हर सभ्य और विचारवान परिवार में एक ऐसा घरेलू पुस्तकालय रहना ही चाहिये। जो घर के हर सदस्य का सुख-शाँति भरा भविष्य बना सकने योग्य समर्थ मार्ग-दर्शन कर सके। हममें से प्रत्येक को अभी अपनी बौद्धिक भूख बुझाने के लिये जो उपलब्ध है, उससे बहुत अधिक, अनेक गुना उपलब्ध करने से ही काम चलेगा। हजार वर्ष की गुलामी ने हर दिशा में अपनी विचारणा को विकृत किया है। एक तरह से मस्तिष्क का ‘ओवर होलिंग’ ही करना पड़ेगा और गतिविधियों में क्राँतिकारी परिवर्तन लाना होगा। इसलिये उस विचारधारा की नितान्त आवश्यकता है, जो उपरोक्त प्रयोजन पूरा कर सके। इस प्रकार का सृजन युग-निर्माण योजना के अंतर्गत बहुत ही सावधानी के साथ किया जा रहा है। इसका लाभ उठाने के लिये यह दस पैसे ही माध्यम हो सकते हैं, जिनके लिये हर सदस्य को बहुत जोर देकर कहा, समझाया और दबाया जा रहा है।
नियमितता लाने के लिये सरकारी अल्प बचत योजना जैसे टीन के बहुत सुन्दर डिब्बे (गुल्लक) बना दिये गये हैं, जिन पर माता का, दूसरे चित्र एवं निर्देश बहुत ही सुन्दर ढंग से छपे हैं। ताला-चाबी सभी हैं। इसका मूल्य 2) है। कर्मठ कार्यकर्ताओं को इन्हें अपने यहाँ जल्दी-से-जल्दी स्थापित करके अपनी सदस्यता की शर्त पूरी कर लेनी चाहिये।
इन ज्ञानयज्ञ के धर्मघटों (गुल्लकों) के मंगाने में डाक-खर्च बहुत लगता है। इसलिये अच्छा तो यह है कि शिविरों में मथुरा आते-जाते लोगों के हाथों यह मंगा लें अथवा उस क्षेत्र के लोगों के लिये इकट्ठे रेल पार्सल से मंगा लें। डाक से ही मंगाने हों, तो कम-से-कम दो मंगाने चाहिएं। दो पर भी लगभग 2 डाकखर्च लगेगा, पर सुविधा की दृष्टि से 1 ही लिया जायेगा। बाकी खर्च संस्था उठा लेगी। इस प्रकार दो गुल्लकों पर भी 4+1=5 रुपया तो बैठ ही जायेगा और संस्था को भी 1 वहन करना पड़ेगा। इसलिये विवशता में ही डाक से मंगाये। हर हालत में इनकी स्थापना आगामी नवरात्रि से पूर्व हो जानी चाहिये ताकि संगठन का रूप 15 अक्टूबर तक प्रस्तुत किया जा सके।
संगठन का नया स्वरूप इस आधार पर बनाया गया है कि जिनमें अपने मिशन के प्रति इतनी निष्ठा उत्पन्न हो गई है कि उसके लिये कुछ सक्रिय सहयोग कर सकें, उन्हें ही संघबद्ध किया जाये और नव-निर्माण के भावी कार्यक्रमों में कुछ कर सकने की उन्हीं से आशा की जाये। समझने और सहानुभूति रखने वाले भी संपर्क में बने रहें और उनसे भी यह आशा रखी जाये कि वे कभी-न-कभी सक्रिय हो उठेंगे। पर जब तक वैसी स्थिति नहीं आती, तब तक इस वर्ग के लोगों को पकने देने के लिये प्रतीक्षा ही की जा सकती है। संगठन तो उन्हीं का होना चाहिये, जो थोड़ा-बहुत वजन उठा सकें और सहयोग का यत्किंचित् तो परिचय दे सकें। इसलिये न्यूनतम कार्यक्रम यही रखा है कि युग निर्माण आन्दोलन के आधार स्तम्भ बनने के लिये सदस्यता की शर्त एक घण्टा और दस पैसा कर दी है। व्यवस्था और नियमितता का नियन्त्रण ज्ञान-यज्ञ के धर्मघट करेंगे, जिनमें दस पैसा नित्य डालने पड़ेंगे और जिनकी चर्चा ऊपर की जा चुकी है।
जीवन के अन्तिम अध्याय में कर्मठ कार्यकर्ताओं का एक सजीव संगठन छोड़कर हम जाना चाहते हैं। इसलिए परिवार के प्रत्येक सदस्य को यह कह दिया है कि वे अपनी स्थिति स्पष्ट कर दें। उनको सहानुभूति मात्र हो, तो भी हम आभारी और प्रसन्न हैं, पर यदि वे अधिक घनिष्ठता और समीपता की स्थिति में आ पहुँचे हैं, तो उन्हें प्रारंभिक शर्त को बिना किसी ननुनच के तुरन्त पूरा करने लग जाना चाहिये। 15 अक्टूबर तक शिविर भी समाप्त हो जायेंगे, उनमें जो लोग नहीं आ पा रहे हैं, उन्हें भी अपनी स्थिति के स्पष्टीकरण का अवसर मिल जायेगा। जिन्हें सदस्यता-सक्रियता स्वीकार हो, तो सूचना दे दें। इन सब लोगों की सूचियाँ 31 अक्टूबर तक बना देने का विचार है। सक्रिय सदस्यों में से एक को कार्य वाहक नियुक्त कर देंगे। चुनाव का झंझट खड़ा करना और पदलिप्सा के नाम पर सिर-फुटौल का तमाशा खड़ा करना हमें अभीष्ट नहीं। इस संगठन में भले ही कम व्यक्ति हों पर उनकी सजीवता के आधार पर यह आशा की जा सकेगी कि यह लोग अगले दिनों कुछ कह सकने योग्य कर्तृत्व प्रस्तुत कर सकेंगे।
संगठन को सजीव, सक्रिय और अग्रगामी बनाये रहने और शाखाओं की गतिविधियों की विस्तृत चर्चा करने के लिये ‘युग-निर्माण आन्दोलन’ नामक बड़े साइज का मासिक समाचार पत्र इसी वर्ष प्रारम्भ हो जायेगा। वर्तमान ‘युग-निर्माण योजना’ में समाचार छप नहीं पाते। सारे समाचार छपे, तो उसका साहित्यिक एवं वैचारिक स्वरूप नष्ट होता है। लोग उसे अब बहुत पसन्द करते हैं और सर्वत्र उसका स्वागत किया जा रहा है। समाचार भर देने से उसका यह स्तर न रह सकेगा। इसलिये दोनों पत्रिकाओं को अपना-अपना काम करने दिया जायेगा और समाचारों का प्रसारण करने के लिये उपरोक्त समाचार पत्र आरम्भ किया जायेगा। अगले दिनों अपनी हलचलें इतनी तीव्र हो सकती हैं कि अभी मासिक रूप में आरंभ किया जाने वाला उपरोक्त समाचार पत्र साप्ताहिक या दैनिक करना पड़े। अभी तो उसे संगठित शाखाओं में ही एक-एक प्रति भेजने जितनी ही छापेंगे और ऐसा प्रबन्ध करेंगे कि सभी सदस्य उसी एक प्रति को मिल-जुलकर पढ़ लिया करें। आगे आवश्यकतानुसार उसकी संख्या बढ़ाने की बात सोची जाती रहेगी। समाचारों का सचित्र और विस्तृत विवरण छपते रहने से अपने आन्दोलन की आशाजनक प्रगति होगी, ऐसा सोचा गया है। सब शाखायें एक दूसरे की गतिविधियों का परिचय भी इसी माध्यम से प्राप्त करती रहेंगी और एक दूसरे से संबंध बढ़ाकर प्रेरणा भी अधिक प्राप्त करती रह सकेंगी। सन् 70 में ही अपने वर्तमान परिवार में से सक्रिय-निष्क्रिय की छाँट हो जाने और सजीवों का संगठन बन जाने पर वस्तुस्थिति स्पष्ट हो जायेगी और भावी कार्यक्रमों के लिये एक सुव्यवस्थित आधार खड़ा हो जायेगा, इस दृष्टि से इस कदम को अति महत्वपूर्ण और अति आवश्यक ही माना गया है। इसके अतिरिक्त अगले दिनों संगठन को पाँच बड़े काम करने हैं-
(1) ज्ञान-यज्ञ के महान् प्रयोजन को अति व्यापक बनाने का क्रम बराबर जारी रहेगा। सक्रिय सदस्य दस पैसे रोज बचाकर जो घरेलू पुस्तकालय स्थापित करेंगे, उनका प्रकाश वे दस व्यक्तियों तक पहुँचाने का भी प्रयत्न करेंगे। अपने घर-परिवार से आरम्भ कर मित्र, पड़ौसी और परिचितों पर नजर डाली जाये, तो दस की ऐसी संख्या हर जगह मिल सकती है, जिसको पुस्तकालय में लगातार आते रहने वाले साहित्य को पढ़ाया-सुनाया जा सके। इस प्रकार लाखों की संख्या में लोगों को निरन्तर विचार-क्राँति के प्रकाश से प्रभावित किया जा सकेगा। यह क्रम निरन्तर बढ़ेगा और करोड़ों व्यक्तियों को इस स्तर का बनाया जा सकेगा कि उपलब्ध प्रेरणाओं के आधार पर अपना व्यक्तिगत जीवन, परिवार का स्वरूप एवं समाज का निर्माण आदर्शवादिता के आधार पर विनिर्मित करने में साहसिक कदम उठा सके। भावी परिवर्तन इसी पृष्ठभूमि पर अवलंबित हैं, इसलिये ज्ञान-यज्ञ का वर्तमान क्रम आगे और भी अधिक उत्साह एवं साहसपूर्वक जारी रखा जायेगा।
(2) इसके अतिरिक्त चार चरण और हैं, जो स्थानीय परिस्थिति तथा संगठन की शक्ति के अनुरूप निरन्तर उठाये जाते रहेंगे। जून की अखण्ड ज्योति में विचार-क्राँति के लिये खड़ी की जाने वाली शिक्षा-योजना की चर्चा कर चुके हैं। इसके लिये रात्रि पाठशालायें हर जगह चलाई जानी हैं और प्रस्तुत पाठ्यक्रम की वर्ष में दो बार परीक्षायें लेकर, उत्तीर्ण छात्रों को सुन्दर प्रमाण-पत्र देकर एक देशव्यापी व्यवस्थित प्रशिक्षणक्रम चलाया जाना है। जहाँ पूरे समय के विद्यालय संभव होंगे, वहाँ गृह-उद्योगों सहित उनका स्वरूप मथुरा के युग-निर्माण विद्यालय जैसा बनाया जायेगा, नहीं तो रात्रि पाठशालाएं तो हर जगह चलेंगी ही। विषय ऐसे अनुपम और आवश्यक होंगे कि जिनसे अशिक्षित, अल्पशिक्षित और उच्च शिक्षित सभी समान रूप से लाभान्वित हो सकें। शाखायें अगले दिनों ऐसी प्रशिक्षण व्यवस्था अपने यहाँ बनायेंगी।
(3) जुलाई के अंक में कला के माध्यम से जन-जागृति पर चर्चा की गई है। साहित्य, चित्र, संगीत, अभिनय आदि सभी माध्यमों से जन-जागृति का प्रयोजन पूरा करने के लिये एक युग-भारती कला मंच खड़ा किया जा रहा है। उसका उपयोग शाखायें करेंगी। नैतिक, बौद्धिक और सामाजिक क्राँति के लिये चित्रावलियाँ प्रकाशित की जा रही हैं और बहुत बड़े साइज के चित्र बनवा कर उनके द्वारा जगह-जगह चित्र प्रदर्शनियों का क्रम चलाया जायेगा। मैजिक लालटेन, सेमिटेस्कोप, सिनेमा जैसे प्रकाश-चित्रों से भी यही क्रम चलाया जायेगा। साहित्य-प्रकाशन में और तेजी लाई जायेगी। कथा-साहित्य की तैयारी की जा रही है, जो हल्के मनोरंजन के साथ-साथ जन-जागृति का प्रयोजन पूरा करे। हिन्दी के अतिरिक्त अन्य भाषाओं में नव-निर्माण की विचारणा को प्रकाशित करने की व्यापक तैयारी कर ली गई है। इसके अतिरिक्त अति सुरुचिपूर्ण और कलात्मक ऐसी नाटक मण्डलियाँ बनाई जा रही हैं, जो अपनी विशेषताओं के कारण लोकप्रिय ही न बनें, स्वस्थ मनोरंजन का प्रयोजन ही पूरा न करें वरन् लोक-मानस को उलट देने के क्राँतिकारी प्रयोजन को भी बड़ी खूबी के साथ पूरा कर सकें। मथुरा केन्द्र द्वारा प्रस्तुत किये जाने वाले उपरोक्त कला माध्यमों को स्थानीय जनता के लाभ दिलाने की योजनायें शाखायें बनाएंगी। ऐसे ग्रामोफोन रिकार्ड बनाये जाने हैं, जिन्हें लाउडस्पीकरों के माध्यम से बजाकर सुनने वालों में एक नई लहर पैदा की जा सके। शाखायें इनका उपयोग भी किया करेंगी।
(4) शत सूत्री रचनात्मक कार्यक्रमों पर बहुत दिनों से जोर दिया जाता रहा है। व्यायामशालायें, प्रौढ़ पाठशालायें, पुस्तकालय, हरी क्राँति अभियान, स्वच्छता एवं सुरक्षा दल प्रतियोगितायें, गृह उद्योग, सत्कर्मों के अभिनन्दन, पर्व-त्यौहारों के प्रेरणाप्रद आयोजन, श्रमदान द्वारा सामूहिक निर्माण, प्राकृतिक चिकित्सा, सहकारी व्यापारी एवं उत्पादन, गौ-संवर्धन आदि रचनात्मक कार्यों के द्वारा नव-निर्माण के लिये प्रोत्साहन एवं प्रशिक्षण दिये जाने से जनसाधारण में नव-निर्माण के लिये आवश्यक रुचि उत्पन्न होगी और सेवाभावियों को सुसंबद्ध होने का अवसर मिलेगा।
(5) संघर्षात्मक कार्यों में वैयक्तिक दोष-दुर्गुणों का त्याग, परिवारों की न्यायसंगत विधि-व्यवस्था, सामाजिक कुरीतियों का उन्मूलन, विवाह-शादियों में अपव्यय का विरोध, अपराधों का नियन्त्रण, राजसत्ता में घुसे अनाचार का प्रतिरोध, जन-जीवन में संव्याप्त भ्रष्टाचार को उखाड़ना, नर-नारी और मनुष्य-मनुष्य के बीच ऊँच-नीच का निवारण, निहित स्वार्थों का भण्डाफोड़, अर्थ वैषम्य की खाई पाटना, मूढ़ता और रूढ़िवादिता से विग्रह जैसे असंख्य संघर्षात्मक मोर्चे अगले दिनों खड़े किये जाने हैं क्योंकि अनीति द्वारा अनुचित लाभ लेते रहने का चस्का जिनकी दाढ़ में लग गया है, वे मात्र अनुरोध से मानने वाले नहीं हैं। उन्हें प्रचण्ड प्रतिरोध के द्वारा विवश ही किया जायेगा कि दुष्टता से बाज आयें। सैनिकों द्वारा सीमा-संघर्ष के लिये लड़े जाने वाले युद्धों में नहीं, व्यापक अविवेक और अनीति के विरुद्ध खड़े किये गये इंच-इंच भूमि पर लड़े जाने वाले संघर्ष से ही सदा के लिये असुरता का अन्त होगा और मनुष्य में देवत्व एवं धरती पर स्वर्ग के अवतरण का लक्ष्य पूरा होगा।
युग-निर्माण योजना के भावी पाँच चरणों की संक्षिप्त चर्चा की गई है। इन्हें कार्यान्वित करना एक व्यक्ति का काम नहीं, उसे तो समर्थ संगठन ही पूरा कर सकता है। इसलिये हम अपने परिवार को सक्रिय संगठन के अंतर्गत आबद्ध करके और उसे एक सजीव संगठन के रूप में छोड़ कर जाना चाहते हैं ताकि हमारे चले जाने पर भी वह मशाल बुझने न पाये, जो मानव-जाति का भविष्य उज्ज्वल करने और विश्व में स्नेह-सहयोग का वातावरण उत्पन्न करने के लिये अति भावनापूर्वक जलाई गई हैं। हम अपने हर प्रियजन को इस सक्रिय संगठन में सम्मिलित होकर अपनी सद्भावना का प्रमाण, परिचय देने के लिये सादर आमन्त्रित करते हैं।
गायत्री तपोभूमि में पोस्ट आफिस खुला
प्रसन्नता की बात है कि ‘गायत्री तपोभूमि’ में पोस्ट आफिस खुल गया है। इससे नव-निर्माण आन्दोलन की डाक-व्यवस्था में बहुत सुविधा होगी।
अब युग-निर्माण आन्दोलन, युग-निर्माण, विद्यालय, शिविर, विज्ञप्ति, साहित्य एवं संस्था से संबंधित सारा पत्र-व्यवहार तथा धन-निर्यात आदि ‘गायत्री तपोभूमि मथुरा’ के पते पर ही करना चाहिये। वहाँ इस प्रकार की डाक संभालने के लिये सुयोग्य कार्यकर्ता नियत कर दिये गये हैं।
साधना तथा व्यक्तिगत परामर्श संबंधी डाक ‘अखण्ड-ज्योति संस्थान’ के पते पर ही भेजनी चाहिये, क्योंकि इन दिनों इस प्रकार की डाक माताजी ही खोलती हैं। जब हम रहते हैं, तो हम स्वयं उत्तर लिखते या लिखाते हैं-हमारे न रहने पर माताजी उत्तर देती हैं। चूँकि माता जी अखण्ड-ज्योति संस्थान में ही रहती हैं और वहीं की व्यवस्था संभालती हैं, इसलिये व्यक्तिगत पत्र वहीं भेजे जाने उचित हैं।
दोनों पत्रिकायें इस वर्ष घीयामण्डी से ही निकलेंगी। जनवरी से ‘युग-निर्माण योजना’ का प्रकाशन गायत्री तपोभूमि से होगा और ‘अखण्ड-ज्योति’ घीयामण्डी से निकलेगी। पर अभी इस वर्ष दोनों पत्रिकाओं का दफ्तर घीयामण्डी ही है, सो चन्दा शिकायतें आदि इसी पते पर भेजने चाहिएं। पाठक इस डाक-विभाजन को ध्यानपूर्वक समझ लें और नोट कर लें।
मानव-मानव ममतामय हो, जग जन-जन से नेह निबाहें,
जिससे जग-जीवन सार्थक हो, हिलमिल अपनाये शुभ राहें।
साथ-साथ सब चल न सको यदि, अलग-अलग सद्पथ अपनाओ,
पथ पर पुष्प बिछा न सको यदि, उस पर नहीं बबूल बिछाओ।
(2)
भौतिक-सुख परित्याग श्रेष्ठजन, आध्यात्मिक साधन के द्वारा,
अपनी-अपनी आत्म-शक्ति से, करते हैं प्रकाश-विस्तारा।
भव्य-भावना भर न सको यदि, नहीं कुतर्कों में भरमाओ,
पथ पर पुष्प बिछा न सको यदि, उस पर नहीं बबूल बिछाओ।
(3)
नर-तन रत्न न फिर-फिर संभव, इसकी परम प्रभा प्रकटाओ,
योनि-योनि के संस्रति-क्रम का, अंत करो, शुभ सद्गति पाओ।
उपकारों को कर न सको यदि, जग से कर अपकार न जाओ,
पथ पर पुष्प बिछा न सको यदि, उस पर नहीं बबूल बिछाओ।
(4)
जग में जितना, जो कुछ करना, उसका अपना नियम बनालो,
मन में मित्र-भावनायें भर, परहित-सेवा को अपना लो।
दलित-दीन-दुःख हर न सको यदि, विपदाएँ उन पर मत ढाओ,
पथ पर पुष्प बिछा न सको यदि, उस पर नहीं बबूल बिछाओ।
(5)
जग से जितना लो उतना ही, उसको दे देना समुचित है,
है सिद्धाँत यही युग-युग का, ऋण का रखना नहीं उचित है।
समय, शक्ति, सहयोग न दो यदि, जन-जन को मत दुःखी बनाओ,
पथ पर पुष्प बिछा न सको यदि, उस पर नहीं बबूल बिछाओ।
(6)
वित्त-विशेष और बल, वैभव, अन्त समय में साथ न जाते,
दया, दान दोनों लोकों में, नर-जीवन को सफल बनाते।
सुखद शाँत, सन्तोष न दो यदि, असन्तोष में मत भटकाओ,
पथ पर पुष्प बिछा न सको यदि, उस पर नहीं बबूल बिछाओ।
(7)
उठो, चलो, गिर-गिरकर संभलो, बढ़ो, विवेकी बनो, बनाओ,
भरसक भक्ति-भावना भर-भर, प्रमुदित प्रभुवर के गुण गाओ।
यदि परहित कुछ कर न सको जग, मग में मत रोड़े अटकाओ,
पथ पर पुष्प बिछा न सको यदि, उस पर नहीं बबूल बिछाओ।
(8)
तर्क उठाकर विविधवाद के, चंचलता मन में मत लाओ,
भारतीय दर्शन का उत्तम, आत्मवाद निज लक्ष्य बनाओ।
बुद्धिवाद से पा न सको यदि, शाँति, सत्य-दर्शन में पाओ,
पथ पर पुष्प बिछा न सको यदि, उस पर नहीं बबूल बिछाओ।
-गौरीशंकर द्विवेदी ‘शंकर’
*समाप्त*