आप तो सदैव एक ही स्वर में गाती हैं

“आप तो सदैव एक ही स्वर में गाती हैं”-कौए ने कोयल से उलाहना देते हुए कहा-कभी-कभी दूसरे राग भी बदल कर सुनाया करें।

कोयल हँसी और बोली-जानते नहीं लोगों को परिवर्तनशील होना चाहिये। काकभुशुंडिजी रूढ़ियों और अन्ध परम्पराओं का बदल जाना तो समझ में आता है पर जीवन के यथार्थ सिद्धान्त बदलने की बात तो आपके मुँह से ही सुनी है।


नाव न खेई जाय बिना मल्लाह के

एक था यात्री, दूर देश की यात्रा पर निकला था वह। अभी एक योजन ही चला था कि एक नदी आ गई, किनारे पर नाव लगी थी। उसने कहा- यह नदी मेरा क्या करेगी? पाल उसने बाँधा नहीं, डाँड उसने खोले नहीं, जाने कैसी जल्दी थी। मल्लाह को उसने पुकारा नहीं। बादल गरज रहे थे। लहरें तूफान उठा रही थीं। फिर भी वह माना नहीं, नाव को लंगर से खोल दिया और आप भी उसमें सवार हो गया।

किनारा जैसे तैसे निकल गया पर नाव मझधार में आई वैसे ही भँवरों और उत्ताल-तरंगों ने आ घेरा। नाव एक बार ऊपर तक उछली और दूसरे ही क्षण यात्री को समेटे जल में समा गई।

एक दूसरा यात्री आया। किनारे लगी नाव टूटी-फूटी थी, डाँड कमजोर थे, पाल फटा हुआ था, तो भी उसने युक्ति से काम लिया। नाविक को बुलाया और कहा-मुझे उस पार तक पहुँचा दो। नाविक यात्री को लेकर चल पड़ा। लहरों ने संघर्ष किया, तूफान टकराये, हवा ने पूरी ताकत लगाकर नाव को भटकाने का पूरा प्रयत्न किया पर नाविक उन सब कठिनाइयों से परिचित था, एक-एक को सम्भालता हुआ यात्री को सकुशल दूसरे पार तक ले आया।

मनुष्य जीवन भी एक यात्रा है, जिसमें पग-पग पर कठिनाइयों के महासागर पार करने पड़ते हैं, जो नाव छोड़ने से पूर्व भगवान् को अपना नाविक नियुक्त कर लेते हैं, भगवान् उनकी यात्रा को सरल बना देते हैं, क्योंकि जीवन पथ की सभी कठिनाइयों के वही ज्ञाता और वही मनुष्य के सच्चे सहचर हैं। अपने अहंकार और अज्ञान में डूबे मनुष्यों की स्थिति तो उस पहले यात्री जैसी है जो नाव चलाना न जानने पर भी उसे तूफानों में छोड़ देता है और बीच में ही नष्ट हो जाता है।

- नानक


इस अस्थिर संसार में सुख ढूँढ़े दुःख होय।

कल तक जिस पिंगला के यौवन और सौंदर्य की चर्चा घर-घर हुआ करती, धनाढ्य युवक उसकी कृपा की एक किरण पर लाख-लाख स्वर्ण मुद्रायें न्यौछावर कर दिया करते थे, आज उस नगर वधू के भव्य-भवन में एक भी तो अतिथि नहीं आया।

रात का प्रथम प्रहर बीत गया। अब सड़कों पर कहीं-कहीं ही कोई दृष्टिगोचर होता था। सारा नगर निद्रा देवी की गोद में जा चुका था, पर पिंगला की आँखें पथरा गई थीं, नींद भी उसे त्याग कर चली गई लगती थी।

एक क्षीण सी आशा लिये वह पुनः दुआरी पर आकर खड़ी हो गई। राज-पथ पर उसने दूर तक दृष्टि दौड़ाई। कुछ लोग उधर ही चले आ रहे थे। कोई सम्पन्न व्यक्ति लगते थे। निराशा आशा में बदलने लगी। निश्चय ही लोग मेरे पास आ रहे हैं। रंग-मंच सजेगा, पाँव थिरकेंगे और उसके बाद धन, विलासिता के सब सुख एक-एक कर शृंखलाबद्ध एक क्षण में पिंगला की आँखों के आगे नाच गये। कल्पना का सुख भी क्या अजीब है, मनुष्य को कहाँ-कहाँ की सैर करा लाता है। पिंगला की देह में हलकी सी सिहरन उठी, पर जैसे ही दूसरी दृष्टि पुनः राजपथ की ओर घूमी कि अब तक की आशा फिर निराशा में बदल गई, वह जो उधर आ रहे थे, जिन्हें पिंगला अपना अतिथि समझ रही थी वह किसी गली की ओर मुड़ चुके थे, अब उधर से कुछ कुत्तों के भौंकने की आवाज ही आ रही थी, मानो वे धिक्कार रहे हों पिंगला की आसक्ति को, पर उसे इस “दर्शन” से क्या सम्बन्ध। वह तो अब भी किसी प्रेमी की प्रतीक्षा में काष्ठवत् खड़ी क्षणिक सुख की कल्पना में डूबी हुई थी।

दासी शाँता पास आई और बोली-”मालकिन! बुरा न मानें तो एक बात कहूँ।” कह शान्ता कुछ तू ही कह-उदास शब्दों में आज्ञा तो दे दी, पर उसकी दृष्टि अब भी राजपथ पर ही अटकी हुई थी।

फिर वह चौंकी, बोली-यह क्या शान्ता तू तो कुछ कह रही थी, अब यह दर्पण क्यों दिखा रही है।”

“मुझे जो कुछ कहना है वह इस दर्पण में लिखा है, देवी! किंचित् उसमें अपनी मुखाकृति डालकर तो देखें” शान्ता ने बहुत कोमल शब्द कहे और वहाँ से चुपचाप पीछे हट गई।

पिंगला ने दर्पण में देखा-आज न तो वह रूप था, न सौंदर्य, यौवन था न आकर्षण जो कभी युवा प्रेमियों को गली-गली से खींच लाता था, उसे पहली बार लगा कि जैसे वह शरीर, यह सौंदर्य और तरुणाई सब चार दिन के नाशवान् मेहमान हैं, उसी प्रकार संसार के सुख-भोग, वासनाओं का आनन्द भी कितने दिन भोगा जा सकता है। आज पहली बार उसे सुख और संसार से विरक्ति हुई। उसके हृदय में पहली बार आत्मग्लानि उठी और मन पश्चाताप से भर गया। जिस जीवन को मुक्ति जैसे महान् लक्ष्य में नियोजित किया जा सकता था, उसे थोड़े से सुख के लिये खोखला कर देने की बात वह जितनी ही सोचती उतना ही हृदय दुःख से भर जाता।

एक दृष्टि फिर उठी। उसने देखा भिक्षुओं की टोली आ रही है। महापुरुष बुद्ध उसके आगे हैं, शिष्यगण “बुद्धं शरणं गच्छामि” “धर्म शरणं गच्छामि” कहते हुये आ रहे हैं। पिंगला का गुबार आँखों से बह निकला। यही तो वह सत्य है, जिसे मनुष्य जान नहीं पाया। “धर्मं शरणं गच्छामि” का मंत्रोच्चारण करती हुई वह नीचे उतरी और तथागत के चरणों पर लेट गई उसके मुँह से इतना ही निकला प्रभु! नारकीय जीवन की इन यन्त्रणाओं से उबारो और प्रकाश दो। अब मैं भूलकर भी उस सुख की कल्पना न करूं जिसमें सुख के नाम पर दुःख ही दुःख भरा है।


तुलसी प्रेम पयोधि की ताते माप न जोख

मन्दिर पहाड़ की चोटी पर था। फिर भी दर्शनार्थी ऊपर जा रहे थे। “दर्शन करना अवश्य है” इसलिये लोग बराबर चढ़ाई चढ़ते जा रहे थे। एक महात्मा जी भी थे, वह भी भगवान की मूर्ति के दर्शनों के लिये ऊँची-नीची घाटी चढ़ते जा रहे थे, पर थकावट के कारण उनका बुरा हाल था, इतनी चढ़ाई कैसे पार होगी यह वे समझ नहीं पा रहे थे। बार-बार थक कर बैठे जाते थे। भगवान के मिलन में आनन्द है तो उसकी साधना में आनन्द क्यों नहीं उनके मन में एक तर्क उठा-एक तर्क ने उनका मन ढीला कर दिया।

पीछे मुड़कर देखा तो एक आठ-नौ वर्षीय बालिका भी पहाड़ की चढ़ाई चढ़ रही थी। उसकी पीठ पर दो वर्ष का एक बालक था, तो भी उसके मुख-मण्डल पर थकावट का कोई भी चिन्ह नहीं था। हँस-मुख बालिका कभी बच्चे को थपथपाती, चूमती चाटती और कभी नाराज सी होकर उससे बातचीत करती। बच्चा उसे शिकायत वाली मुद्रा में देखता तो बालिका कहती- “बुद्ध”, और हँसती हुई फिर दुगुने उत्साह से चढ़ाई चढ़ने लगती।

मन तो विचारों का भण्डागार है, अभी थोड़ी देर पहले तर्क उठा था अब वह कौतूहल में बदल गया। मेरे पास कोई बोझ नहीं, शरीर भी पुष्ट है फिर भी थकावट और इस नन्हीं सी बालिका की पीठ पर सवारी है, तो भी उसके मुख पर थकावट का कोई चिन्ह नहीं। उन्होंने पूछा-बालिके! तुम इतना बोझ लिये चल रही हो, थकावट नहीं लगी क्या?

बोझ नहीं है बाबा! लड़की ने महात्मा को चिढ़ाने वाली बात बनाकर कहा-यह मेरा भाई है देखते नहीं, इसके साथ अठखेली करने में कितना आनन्द आता है-यह कहकर बालिका ने शिशु के कोमल कपोल चूमे और एक नव-स्फूर्ति अनुभव करती हुई फिर चढ़ाई चढ़ने लगी।

महात्माजी ने अनुभव किया यदि भगवान को प्राप्त करने की साधना कठोर और कष्टपूर्ण लगती है तो यह दोष भगवान का नहीं, अपनी जीवन नीति का है। वस्तुतः लौकिक हो तो क्या यदि प्रेम निश्छल वासना रहित और पवित्र बना रहता है तो कठिन कर्त्तव्य और कठिनाइयों से भरे जीवन में भी मस्ती का आनन्द लिया जा सकता है। यही नहीं व्यक्तित्व के निर्माण और पूर्णता का लाभ भी इसी तरह हँसते थिरकते प्राप्त किया जा सकता है। अपने जीवन में इस सत्य की गहन अनुभूति के बाद तभी तो प्रसिद्ध वैज्ञानिक जूलियन हक्सले ने लिखा है- “व्यक्तित्व के पूर्ण विकास के लिये सौंदर्य पर प्रेम, सुन्दर व आश्चर्यजनक वस्तुओं के प्रति प्रेम भी आवश्यक है क्योंकि उससे भावी जीवन में आगे बढ़ने की भावना जागृत होती है।”

भारतीय संस्कृति में मोह और आसक्ति, वासना और फलाशा की निन्दा की गई है, पर ऐसा कहीं नहीं बताया गया कि मनुष्य लौकिक कर्त्तव्यों का परित्याग करें। ईश्वर दर्शन, आत्म-साक्षात्कार, स्वर्ग और सद्गति, पुण्य और परमार्थ मानव-जीवन के अन्तिम लक्ष्य हैं, अपूर्णता से पूर्णता की ओर तो उसे बढ़ना ही चाहिये। उसे लौकिक हितों से बढ़कर माना जाये तो भी कोई बुरा नहीं पर यह मानकर कि साँसारिक जीवन में कठिनाइयाँ ही कठिनाइयाँ, अवरोध ही अवरोध भार ही भार है, उसे छोड़ना या उसे झींकते हुये जीना भी बुरा है, बुराई ही नहीं एक पाप और अज्ञान भी है क्योंकि ऐसा करके वह अपने रचयिता को “अमंगल” होने का प्रमाण प्रस्तुत करता है। संसार में भी पाप विकार और ध्वंसात्मक वृत्तियाँ पनपीं वह हँसी “नासमझ” का परिणाम है, जो वहाँ से प्रारम्भ होती हैं, जहाँ से मनुष्य “प्रेम” से पदच्युत होता है। प्रेम एक शक्ति है जो उच्च आकाँक्षाओं की पूर्ति करता है और यदि उसे कुपित न होने देकर, जीवन में विचारों और भावनाओं के समावेश द्वारा उसे पवित्र बनाये रखा जा सके तो पता चले कि प्रेम सृष्टि का सबसे अनोखा निर्माण है। मनुष्य तुच्छ से तुच्छ वस्तुओं तक में अपना सच्चा प्रेम आरोपित करके सुख और सद्गति प्राप्त कर सकता है।

लौकिक सुख का सच्चा आधार प्रेम है। नम्रता के साथ गर्व, धैर्य के साथ शान्ति, स्वार्थ के साथ आत्म-त्याग और हिंसा की भावनाओं को भी कोमलता में बदल देने की शक्ति प्रेम में है। यह इन्द्रिय वासनाओं को प्रसन्नता एवं पूर्ण जीवन में बदल सकता है, किन्तु आवश्यक है कि प्रेमी का सर्वोच्च लक्ष्य प्रेममय होना ही रहे।

प्रेमास्पद के प्राणों में अपने प्राण, अपनी इच्छा और आकाँक्षायें घुलाकर व्यक्ति उस “अहंता” से बाहर निकल आता है तो पाप और पतन की ओर प्रेरित कर ऐसे दिव्य मनुष्य को नष्ट करता रहता है। प्रेमी कभी यह नहीं चाहता मुझे कुछ मिले वरन् वह यह चाहता है कि अपने प्रेमी के प्रति अपनी निष्ठा कैसे प्रतिपादित हो इसलिये वह अपनी बातें भूलकर केवल प्रेमी की इच्छाओं में मिलकर रहता है, जब हम अपने आपको दूसरों के अधिकार में डाल देंगे तो पाप और वासना जैसी स्थिति आवेगी ही क्यों और तब मनुष्य अपने जीवन-लक्ष्य से पतित ही क्यों होगा? सच्चा प्रेम तो प्रेमी की उपेक्षा से भी रीझता है। प्रेम की तो व्याकुलता भी मानव अन्तःकरण को निर्मल शान्ति प्रदान करती है।

मन जो इधर-उधर के विषयों और तुच्छ कामनाओं में भटकता है, प्रेम उसके लिये बाँध देने को रस्सी की तरह है। प्रेम की सुधा पिये हुये मन कभी भटक नहीं सकता, वह तो अपना सब कुछ त्याग करने को तैयार रहता है। जो समर्पित कर सकता है, पाने का सच्चा सुख तो उसे ही मिलता है। प्रेमी को भोग तो क्या स्वर्ग भी आसक्त नहीं कर सकते और परमात्मा को पाने के लिये भी तो यह सन्तुलन आवश्यक है। प्रेम साधना द्वारा मनुष्य लौकिक जीवन का पूर्ण रसास्वादन करता हुआ पारमार्थिक लक्ष्य पूर्ण करता है। इसलिये प्रेम से बड़ी मनुष्य-जीवन में और कोई उपलब्धि नहीं।

उपल वरषि गरजत तरजि डारत कुलिस कठोर।

चितव कि चातक मेघ तजि कबहुँ दूसरी ओर॥

पवि पाहन दामिनि गरज झरि झकोर खरिखीझि।

रोष न प्रीतम दोष रखि तुलसी रागहिं रीझि॥

चढ़त न चातक चित कबहुँ प्रिय पयोद के दोष।

“तुलसी” प्रेम पयोधि की ताते माप न जोख॥

स्वाति नक्षत्र के बादल चातक के मुख पर क्या चुपचाप जल बरसा जाते हैं? नहीं, वे गरज कर कठोर ध्वनि करते और डराते हैं। पत्थर ही नहीं कई बार तो रोष में भरकर बिजली भी गिराता है, वर्षा और आँधी के थपेड़े क्या कम कष्ट देते हैं किन्तु चातक के मन में अपने प्रियतम के प्रति क्या कभी नाराजी आती है? तुलसी दास ने बताया कि यह प्रेम की ही महिमा है कि चालक पयोद के इन दोषों में भी उसके गुण ही देखता है।

अमंगल सी दिखने वाली भगवान की सृष्टि में कठिनाइयों के झंझावात कम हैं, न अभाव और कष्ट-पीड़ायें, एक-एक पग भार है और लक्ष्य प्राप्ति का बाधक है, पर यह केवल उनके लिये है जिन्होंने प्रेम तत्व को जाना नहीं। प्रेम तो समुद्र की तरह अगाध है, उसमें जितने गहरे पैठा जाये उतने ही बहुमूल्य उपहार मिलते और मानव-जीवन को धन्य बनाते चले जाते हैं।


सबसे प्रेम करना सीखो

एक बार एक स्त्री सन्तान न होने से खिन्न होकर संत चिदम्बर दीक्षित के पास गई। सन्त ने उसे दो मुट्ठी भुने चने दिये, और कहा, बैठ जा, जब बुलाऊँ, तब आना।’ वह स्त्री बैठकर चने खाने लगी। उसी समय खेलते-खेलते पाँच-सात बच्चे आये, कुछ उसके मुख की ओर देख रहे थे, कुछ ने हाथ पसारा, उसने किसी को एक दाना भी नहीं दिया। सन्त ने उसे पास बुलाकर कहा-माँ! जब मुफ्त के चनों में से भी चार दाने तुम किसी को न दे सकीं, तब भगवान् हाड़-माँस के बच्चे तुम्हें कैसे देंगे? जाओ सबसे प्रेम करना सीखो, भगवान् प्रेम से ही प्रसन्न होते, और प्रेमी को ही सब कुछ देते हैं।


“बड़े भाग्य मानुष तन पावा”

मनुष्य शरीर में अन्य जीवों के शरीरों की अपेक्षा असंख्य विशेषतायें ऐसी भरी पड़ी हैं, जो यह सोचने को विवश करती हैं कि भगवान ने मनुष्य को किसी विशेष उद्देश्य से ही बनाया है।

पानी में पाये जाने वाला एक कोशीय जीव अमीबा आकृति में जितना छोटा होता है, शारीरिक रचना में उतना ही सरल। सूक्ष्मदर्शी यन्त्र में देखने में वह “संशय” के स में लगे बिन्दु (0) जितना लगता है, मनुष्य के शरीर की तरह न तो उसके हाथ-पाँव होते हैं न फेफड़े, आँतें, आमाशय, मुँह, दाँत, नाक, आँखें आदि। एक तो उसका नाभिक (न्यूक्लियस) शेष साइटोप्लाज्म (जीव द्रव्य अर्थात् वह प्राकृतिक तत्व जिनसे जीवित शरीर बनते हैं) दोनों को मिलाकर वही प्रोटोप्लाज्मा कहलाता है। चलना हो तो उसी में दो चिमटी निकाल कर चल लेगा, दो चिमटी बनाकर खोलेगा, प्रोटोप्लाज्मा आगे बढ़ाकर ही वह चल लेता है। यह तो मनुष्य शरीर ही है जिसे भगवान ने इतना सुन्दर, सर्वांगपूर्ण और ऐसा बनाया है कि उससे संसार का कोई भी प्रयोजन पूरा किया जा सके। हमें संसार के अन्य जीवों से अपनी तुलना करनी चाहिये और यह विचार करना चाहिये इतनी परिपूर्ण देन क्या अन्य जीवों की तरह ही व्यर्थ इन्द्रिय भोगों में गुजार देने के लिये है या उसका कोई और भी बड़ा उपयोग हो सकता है?

प्राणियों की दुनिया में जीव-जन्तुओं की कोई कमी नहीं है। गणना की जाये तो 84 लाख से एक भी कम न निकले। एक से एक विचित्र आकृति, एक से एक विचित्र प्रकृति। समुद्र में एक ऑक्टोपस जीव पाया जाता है, आकार में बहुत छोटा पर आठ भुजायें। कभी-कभी अँगड़ाई लेता है तो इतना बढ़ जाता है कि एक सिरे से दूसरे सिरे तक 20 फुट लम्बा हो जाता है। न्यूयार्क के “म्यूजियम आफ नेचुरल हिस्ट्री” में “मोआ” नामक एक पक्षी के अस्थि-अवशेष (फासिल्स) सुरक्षित हैं अनुमान है कि यह 700 वर्ष पूर्व कभी न्यूजीलैंड में पाया जाता था। इसकी टाँगे 6 फुट लम्बी और लगभग इतनी ही लम्बी गर्दन। दो सिरों वाली 12 फुट की लकड़ी जैसा यह पक्षी भी प्राणि-जगत का आश्चर्य रहा होगा कभी।

“डायाट्राइमा” भी इसी तरह एक न उड़ने वाला पक्षी था उसकी आकृति देखते ही हँसी आ जाती है। अफ्रीकन राइनो के थुथनों के ऊपर सींग और पीछे दो कान-चार स्तंभों वाला सिर भी कुछ कम विचित्र नहीं। अरंग उटान, गिब्बन और चिम्पैंजी-बन्दर, डकविल, डिप्लोडोकस (इस 6 करोड़ वर्ष पूर्व भयंकर छिपकली के नाम से जाने वाले जीव की लम्बाई आज तक पाये जाने वाले जीवों में सबसे अधिक लगभग 21 मीटर होती थी) और दरियाई घोड़े जैसे विलक्षण जीव, घोंघे, मछलियाँ, मेंढक, आदि के शरीर देखकर पता चलता है कि प्रकृति कितनी चतुर- कितनी विदूषक और कैसी कलाकार है, वह तो कुछ न गढ़ दे सो थोड़ा।

एक बड़े दृष्टिकोण से सोचें तो पता चलेगा कि सृष्टि के अन्य मानवेत्तर जीवों को प्रकृति ने विलक्षण अवश्य बनाया है पर उनको इतना अशक्त-इतना कमजोर बनाया है कि वे अपनी रक्षा एक सीमा तक कर सकने में समर्थ होते हैं। किसी तरह बेचारे अपनी तुच्छ सी इच्छायें पूर्ण करने के चक्कर में पड़े भारतीय तत्व दर्शन की यह मान्यता प्रमाणित करते रहते हैं।

अनारतं प्रतिदिशं देशे देशे जले स्थले।

जायन्ते वा म्रियन्ते वा बुद्बुदा इव वारिणि॥  -योगवशिष्ट 4।43।4

अर्थात् जैसे जल के ऊपर बुलबुले उठा करते हैं और नष्ट होते रहते हैं। वैसे ही प्रत्येक देश और काल में अनन्त जीव उत्पन्न और विलीन होते रहते हैं।

इन शारीरिक बन्धनों का कारण- “स्व वासना दशा वेशादाशाविवशता गताः” (योगवशिष्ठ 4।43।3)- अर्थात् अपनी वासनाओं के द्वारा प्राप्त दशा के वशीभूत होने के कारण जीव तरह-तरह के शरीर ग्रहण करता रहता है। वैसे यह जीव शरीर नहीं प्रकाश रूप है। उसे “अणुतेजः कणोस्मीति स्वयं चेतति चित्तया” अर्थात् वह जीव अत्यन्त सूक्ष्म-प्रकाश-अणु के रूप में स्वयं ही चेतन शील है। चित्त आदि समस्त चेष्टायें उसी में सन्निहित हैं। इन शब्दों में जीव चेतना द्वारा अपने मन इच्छा और वासनाओं के आधार पर तरह-तरह के शरीरों में प्रकट होने की अभूतपूर्व खोज प्रस्तुत कर दी है पर यह सब बातें वह जीव-जन्तु नहीं समझ सकते थे क्योंकि न तो उनकी बौद्धिक क्षमतायें प्रखर होती हैं और न उनके पास ऐसी साधन सुविधायें ही होती है, जैसी कि मनुष्य के पास। इसलिये आत्म-विज्ञान जैसा कोई भी ज्ञान उनके लिये निरर्थक है। यह तो मनुष्य को समझना चाहिये कि जो कार्य संसार की कोई भी मशीन कर सकती है उससे भी आश्चर्यजनक काम कर दिखाने की क्षमता वाले मनुष्य शरीर का उपयोग भी क्या इन्द्रिय सुखों तक ही सीमित रहना चाहिये।

जब सब जीव इस तरह आसक्ति में पड़े आत्म तत्व को भूल गये तब परमात्मा ने मनुष्य शरीर को बनाया और उसमें “जीवात्मा” प्रतिष्ठित कर सृष्टि का सबसे अधिक गौरवशील प्राणी होने का सौभाग्य सौंप दिया। वायु पुराण में लिखा है-

पुरुषादिष्ठितत्वाच्घ अव्यक्तानुग्रहेण च।

महदादयो विषेषान्ता अण्डमुत्पादयन्तिवै॥

अर्थात्-ईश्वर की इच्छा और अव्यक्त प्रकृति की कृपा से ही अण्ड की उत्पत्ति हुई है। रामायण में मनुष्य शरीर को सुर-दुर्लभ उपलब्धि बताते हुए उसे जीवात्मा सबसे बड़ा सौभाग्य कहा है-

बड़े भागय मानुष तन पावा, सुरदुर्लभ सद्ग्रन्थनि गावा।

जड़ चेतनहिंग्रन्थि पड़ गई, यद्यपि मृषा छूटत कठिनाई॥

यह शरीर जड़ चेतन का संयोग है, दोनों अलग-अलग हैं पर गाँठ पड़ जाने से एक हो गये हैं उस गाँठ को खोलकर चिर मुक्त होना ही जीवात्मा का उद्देश्य है शरीर तो एक यन्त्र है उसमें प्रविष्ट आत्म चेतना ही मननीय और प्राप्त करने योग्य है, उसे जानने के लिये इतनी क्षमताओं से विभूषित शरीर परमात्मा ने दिया है। पर मनुष्य वास्तविकता को समझने की चेष्टा न करते हुये मानवेत्तर जीव-जन्तुओं की सी तुच्छ भोग वृत्तियों में पड़ा रहता है।

कल्पना करें और वैज्ञानिक दृष्टि से आँखें उघाड़कर देखें तो पता चलेगा कि मनुष्य शरीर के निर्माण में प्रकृति ने जो बुद्धि कौशल खर्च किया तथा परिश्रम जुटाया वह अन्य किसी भी शरीर के लिये नहीं किया। मनुष्य शरीर सृष्टि का सबसे विलक्षण उपादान है। ऐसा आश्चर्य और कोई दूसरा नहीं है। यह एक अभेद्य दुर्ग है, जिसमें रह रहे जीवात्मा को अन्य जीवों की तरह संसार की किसी भी परिस्थिति या संकट से भयभीत होने का कोई कारण नहीं। जबकि अन्य जीव अपनी इन्द्रियों की तृप्ति और अपने शरीर की दुश्मनों से रक्षा इन दो कारणों को लेकर ही जीते रहते हैं, मनुष्य के लिये यह दोनों बातें बिलकुल गौण हैं वह अपने बुद्धि कौशल से धर्म, कला, संस्कृति का निर्माण करता है और इनके सहारे अपनी आत्मा को ऊपर उठाते हुये स्वर्ग और मुक्ति जैसे दिव्य लाभ प्राप्त करता है।

आत्म-दर्शन और ईश्वर-साक्षात्कार जैसी विभूतियाँ प्राप्त करने की समस्त सुविधायें मनुष्य शरीर को ही प्राप्त हैं। यह सर्व क्षमता सम्पन्न जीवात्मा का अभेद्य दुर्ग यन्त्र और वाहन है, जिसका उपयोग करके मनुष्य सारे संसार में विचरण कर सकता है।

आज के वैज्ञानिक भी इस बात को मानते हैं कि जो विशेषतायें और सामर्थ्य प्रकृति ने मनुष्य को प्रदान की है वह सृष्टि के किसी भी प्राणि-शरीर को उपलब्ध नहीं। गर्भोपनिषद् के अनुसार शरीर की 180 सन्धियाँ,। 107 मर्मस्थान, 109 स्नायु, 700 शिरायें, और 500 मज्जायें, 360 हड्डियाँ, 4 1।2 करोड़ रोम, हृदय के 8 और जिव्हा के 12 पल, 1 प्रस्थ पित्त, 1 कफ आढ़क, 1 शुक्र कुड़व भेद, 2 प्रस्थ और आहार ग्रहण करने व मल-मूत्र निष्कासन के जो अच्छे से अच्छे यन्त्र इस शरीर में लगे हैं वह प्रकृति द्वारा निर्मित किसी भी शरीर में नहीं हैं।

जीव गर्भ में आता है प्रकृति तभी से उसकी सेवा सुरक्षा, प्यार-दुलार एक जीवित माता की तरह प्रारम्भ कर देती है। जीव उस समय तैत्तिरीय संहिता के अनुसार-

हिरण्यवर्णाः शुचयः पावका यासु जातः

कश्यपो यास्विन्द्रः॥

अग्निं या गर्भ दधिरे विश्वरुपा ता न आपः

शंस्योना भवन्तु॥                    -   5 । 6 । 1

सोने की तरह शुचि और पावक आपः अर्थात् अग्नि के विद्युत रूप में था। उसमें प्रकाश, जल और आकाश तत्व भी थे। अतएव उसकी सर्दी-गर्मी से रक्षा की नितान्त आवश्यकता थी। ऐसा न होता तो शीत या ग्रीष्म के कारण जल तत्व जम जाता या वाष्प हो जाता और भ्रूण प्रारम्भ में ही नष्ट हो जाता उस समय माँ के गर्भ जैसा रक्षा कवच और किसी प्राणी को नहीं मिलता। जिसमें मौसम से तो सुरक्षा होती ही है, शरीर के विकास के लिये माँ के शरीर से ही हर आवश्यक तत्व पहुँचने लगते हैं। कई बार जो तत्व जीव शरीर के लिये आवश्यक होते हैं वह माँ के शरीर में कम होते हैं। उस समय प्रकृति अपने आप माँ में उस तरह के पदार्थ खाने की रुचि उत्पन्न करती है। गर्भावस्था में दाँतों का दुखना, हड्डियों और कमर में दर्द शरीर में कैल्शियम, लोहा आदि की कमी के सूचक होते हैं। यह तत्व औषधि के रूप में तुरन्त माँ को दिये जाते हैं और इस तरह गर्भावस्था में पड़े जीव की सारी आवश्यकतायें पूर्ण हो जाती हैं।

बच्चे का गर्भ से बाहर आना और सैकड़ों-करोड़ों दुश्मनों का तैयार मिलना एक साथ होता है। हवा, पानी, मिट्टी में न दिखाई देने वाले करोड़ों जीवाणु, (बैक्टीरिया), विषाणु (वायरस), मच्छर, मक्खी सब उस पर आक्रमण को तैयार मिलते हैं। सबसे बड़ी कठिनाई पल-पल बदलते मौसम की होती है पर धन्य री प्रकृति मनुष्य शरीर के प्रति उसके प्यार और सजगता को शब्दों में नहीं सराहा जा सकता। बाल्यावस्था में वह शरीर का तापमान सदैव 37 डिग्री से. स्थिर रखती है। कहते हैं बच्चों को जाड़ा नहीं लगता, दरअसल यह सच है और प्रकृति की सबसे बड़ी कृपा कि बाहर का कितना ही मौसम बदले बच्चा जब तक स्वयं संवेदनशील नहीं हो जाता ऋतु-परिवर्तन का उस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।

आँख में छोटी सी किरकिरी गई और आँसू निकले। आँसू निकलना दुःख का कारण माना जाता है पर सच यह है कि आँसू के रूप में निकला हुआ द्रव कीटाणुनाशक औषधि होता है। वैज्ञानिकों ने आँसुओं का रासायनिक विश्लेषण करके पाया कि उसमें “लीसोजीम” नामक एक तत्व होता है, जो इतना प्रबल कीटाणु नाशक होता है कि उसकी एक बूँद दो लीटर पानी में डाल दी जाये तो पानी के सख्त से सख्त बैक्टीरिया भी मर जायेंगे। इसके अतिरिक्त “लाइसिंस” “ल्यूकिंस” प्लाकिंस नामक तत्व भी कीटाणु नाशक होते हैं, जो थूक और शरीर के अन्य सरल पदार्थों में भी पाये जाते हैं। प्रसिद्ध रसायन शास्त्री श्री रुथ और एडवर्ड ब्रेचर ने जाँच करके लिखा है कि पेचिश का जीवाणु (बैक्टीरिया) काँच के स्लाइड पर 6-6 घण्टे तक जीवित बना रहता है। पर यदि उसे हथेली पर रखें तो वह त्वचा के रासायनिक पदार्थों के कारण 20 मिनट से अधिक समय तक जीवित न रह पायेगा।

कफ होते ही खाँसी, नाक में कोई चीज फँसते ही छींक, नींद, आते ही जम्हाई, हवा और बाहरी आकाश को छानते रहने की प्रतिक्षण आँख मिचकने की क्रिया मनुष्य शरीर की विलक्षण विशेषतायें हैं। कोई कीटाणु नाक में घुसा कि बालों ने रोका, उनसे नहीं रुका तो चिपचिपे पदार्थ में पहुँचते ही छींक आई, नाक निकली और कीटाणु बाहर। दुश्मन सख्त हुआ माना नहीं, गले में चला गया तो खाँसी, पेट में पहुँच गया तो पाचक रस सुरक्षा का काम करने लगेंगे और उसे मार भगायेंगे। कहीं शत्रु फेफड़े में पहुँच गया तो श्लेष्मा उन्हें तुरन्त बाहर फेंकेगी।

शरीर में अमीबा की तरह का “लियोसोसाइटिस” जीवाणु होता है। वह शरीर की सुरक्षा का सबसे वफादार सिपाही माना जाता है। इसमें सभी शत्रु जीवाणु को खा जाने की क्षमता होती है, शरीर के किसी भी हिस्से में कोई विषाक्त जीवाणु पहुँच जायें यह “लियोसोसाइटिस” हजारों लाखों की संख्या में पहुँच कर उन्हें मार भगाते हैं।

कई बार ऐसा होता है कि शत्रु जीवाणु शक्तिशाली होता है, वह कर-छल-बल से ‘लियोसोसाइटिस’ को भी अपने पक्ष में कर लेता है। प्रकृति ने ऐसे देशद्रोहियों से निबटने के लिये मनुष्य शरीर में “मैक्रोफेजेस” नामक कुछ सुरक्षित सैनिक (रिजर्व फोर्स) रखे हैं। ऐसे समय यह वफादार सैनिक आगे बढ़ते और शत्रु तथा देशद्रोहियों दोनों का सफाया कर देते हैं। ऐसी जरूरतों के लिये अलग साधन, पृथक संचार व्यवस्थायें भी प्रकृति ने शरीर में तैयार की हैं, उन्हें “लिगफैटिक सिस्टम” के नाम से जाना जाता है।

कई बार शरीर में चोट लग जाती है, शरीर में सूजन हो आती है। सूजन देखते ही घबराहट होती है, पर घबराने की आवश्यकता नहीं, सूजन इस बात का संकेत है कि रक्त के प्लाज्मा में स्थित रक्षक द्रव “फिब्रिनोजिन” आ पहुँचा है और उसने चोट लगे स्थान के शत्रु जीवाणुओं को आगे बढ़ने से रोकने के लिये रक्त का धक्का बनाकर उन्हें उतने ही स्थान में घेर दिया है। यदि प्रकृति ने यह व्यवस्था न की होती तो वह जीवाणु हर 20 मिनट बाद दूनी संख्या में बढ़ते और शरीर को नष्ट कर डालते। धन्यवाद प्रकृति को, पिता परमेश्वर को जिसने जीवात्मा को एक ऐसे दुर्ग में रखा जहाँ का हर सैनिक उसकी रक्षा और विकास के लिये सोते, जागते हर घड़ी जागरुक रहता है। दुःखद बात तो यह होती है कि इतना होने पर भी शरीर का स्वामी अपने प्रति अन्यमनस्क ही रहता है, उसे अपने स्वरूप अपने कल्याण की कभी याद ही नहीं आती जो उसके जीवन का प्रमुख ध्येय है।

ऋषियों ने कहा है- यस्य प्रयाणमन्वन्य इद्ययुर्देवो देवस्य महिमान मोजसा। यः पार्थिवानि विममे स एतशो रजा, सिदेवः सविता महित्वना॥

-यजुर्वेद 11।6

सविता रूप आत्मा को प्रकट कर परमात्मा ने उसके विकास और आत्म-कल्याण के लिये शरीर और इन्द्रियाँ दीं और कहा-वत्स! तुम्हें मनुष्य का शरीर देने के बाद और कुछ देने को शेष नहीं रहा, तुम इस साधन का सदुपयोग कर आत्म-कल्याण को प्राप्त होंगे।

कहते हैं डॉ. खुराना ने “जीन” का संश्लेषण कर लिया है, पर सच बात यह है कि उन्होंने जिस “जीन” का संश्लेषण किया है, वह एक “यीस्ट” (एक अमीबा जैसा ही क्षुद्र जीव) का जीन है जिसमें कुल 77 न्यूक्लिओ-टाइड्स होती हैं, (जीन में ही जीवन के रासायनिक गुण सूत्र) होते हैं। जबकि मनुष्य शरीर जिन “जीन्स” से बना है, उनके न्यूकिलओटाइड्स की संख्या कई लाख होती है। ऐसी सर्वप्रभुता सम्पन्न मशीन मनुष्य को परमात्मा ही दे सकता है। जो इस तथ्य को अन्तःकरण की सम्पूर्ण गहराई से हृदयंगम कर लेता है, उसके लिये यह शरीर इन्द्र की अमरावती के समान है, पर जो इन्द्रियों के सुख और भौतिक कल्पनाओं में ही फँसे पड़े रहते हैं, उनके लिये यह शरीर अमीबा, ऑक्टोपस, डाइट्राइमा और सृष्टि के अन्य क्षुद्र जीवों के शरीरों की तरह ही है जिससे कुछ दिन तो लौकिक सुख लूटे जा सकते हैं, पर उनसे जीवात्मा का कुछ हित सम्भव नहीं।


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मनुष्य ईश्वर का प्रतिबिम्ब है, इसका मतलब है कि उसे ईश्वरीय उपेक्षाओं की पूर्ति के लिये बनाया गया है।

-डिजरायली


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जो मन की शक्ति के बादशाह होते हैं, उनके चरणों पर संसार नतमस्तक होता है।

-स्वामी रामतीर्थ


इतना ही ध्यान आत्मा का रखा गया होता

महाभारत युद्ध समाप्त हो चुका था, नरमुण्डों के ढेर पड़े थे। उन्हें खाने के लिये सैकड़ों कुत्ते, सियार और भेड़िये लपके चले आ रहे थे। महर्षि उत्तंक अपने शिष्यों के साथ उधर से निकले तो यह दृश्य देखकर उन्हें हँसी आ गई।

शिष्यों ने पूछा- भगवन् इस दुःखद प्रसंग पर आपको हँसी क्यों आई, उत्तर देते हुए उत्तंक ने कहा-बच्चों! जिन शरीर के लिये यह युद्ध लड़ा गया उनकी यह दशा है कि सियार नोंच रहे हैं। यदि इतना ही ध्यान आत्मा का रखा गया होता तो यह वीभत्स परिस्थिति क्यों आती।


काल की इकाई से महाकाल तक

समय एक साक्षेप वस्तु है, उसका अस्तित्व संसार में निरन्तर हो रही घटनाओं से है। एक लाख वर्ष बीत गये यह कहना गलत है, क्योंकि समय कुछ है ही नहीं। यह कहना चाहिये इतनी घटनायें घट चुकीं। संसार के अणु-अणु में एक गति एक परिवर्तन है उसे कैसे जाना और अनुभव किया जाये? यह एक प्रश्न है और उसका उत्तर यह है कि समय को भी लघुत्तम टुकड़े में काटा जाये आदि। यदि हम समय की सूक्ष्मतम इकाई में स्थिर हो जायें तो विराट की गति को समझ सकते हैं, इस लेख में यही समझाने का प्रयास किया जा रहा है।

कहते हैं 50 खरब से 80 खरब वर्ष के लगभग पहले ब्रह्माण्ड में एकाएक विस्फोट हुआ और उस विस्फोट केन्द्र बिन्दु से असंख्य “मन्दाकिनियाँ” प्रकाश लेकर चल पड़ीं। ब्रह्माण्ड में फैला हुआ जीवन और प्रकाश उसी स्रोत से बहता आ रहा है। कहते हैं 10 खरब साल पहले हमारा सौर मण्डल और वह जिस आकाश गंगा से बना है उसके 30 अरब तारागणों में से कोई भी अस्तित्व में नहीं आया था। पृथ्वी पर मनुष्य का आविर्भाव 1 अरब 97 करोड़ 29 लाख 40 हजार 70 वर्ष पहले हुआ था। समय की सारी सीमायें अनुमान मात्र हैं और उनका अनुमान घटनाओं से लगाया जाता है। घटनायें न होतीं तो हमें पता न चलता कि संसार में समय नाम की कोई वस्तु नहीं। समय साक्षेप वस्तु है, उसके गर्भ में मात्र घटनाओं का तारतम्बार लगा हुआ है जो सत्य है वह समय की सीमा से परे है और जो अब भी सृष्टि के कण-कण में गतिशील हो रहा है।

उस सत्ता को पीछे लौटकर नहीं पाया जा सकता, क्योंकि आज तक जो भी घटनायें ब्रह्माण्ड में घटीं हम उनका इतिहास नहीं जान सकते, वह तो वेद के शब्दों में नेति, नेति (इनफिनिट, इनफिनिट) है, फिर यदि उस सत्ता की अनुभूति करनी हो उसे ढूँढ़ना हो तो कैसे ढूंढ़ा जाये? यह प्रश्न अनादि काल से चला आ रहा है। दुनिया का हर विचारशील व्यक्ति चाहे वह साहित्यिक हो या कलाकार दार्शनिक हो या वैज्ञानिक सभी इस प्रयत्न में हैं कि उस आदि सत्ता को ढूँढ़ा जाये जो महाकाल से भी परे है। भारतीय मनीषिओं ने कहा, उसकी अनुभूति पदार्थ और समय से परे उठकर ही हो सकती है। इसका व्यावहारिक हल ध्यान के रूप में निकाला। ध्यान द्वारा मन को स्थिर करना पदार्थ और समय से ऊपर उठना ही है। ध्यान की प्रगाढ़ अवस्था यद्यपि अति सूक्ष्म स्थिति है पर वस्तुओं का विश्लेषण और सत्य की जानकारी का वही एक मार्ग है।

सन् 1944 में अमेरिका के वैज्ञानिक प्रो. इसाडोर. आई. रैवी ने एक अनुसन्धान के आधार पर बताया कि संसार का प्रत्येक अणु बड़ी तेजी से कम्पनशील है। उन्होंने बताया कि सीसियम के अणु एक सेकेण्ड में 9 अरब 19 करोड़ 26 लाख 31 हजार 7 सौ 70 बार कंपन करते हैं। अणुओं के इस कम्पन की बहुत सूक्ष्म समय में इतनी अधिक तेज कम्पनशीलता इस बात का प्रमाण थी कि ब्रह्माण्ड विस्फोट के समय की सारी दशायें और तत्व पदार्थों के सूक्ष्मतम परमाणुओं में निश्चित रूप से सन्निहित होने चाहिये। पर कठिनाई यह थी कि समय को छोटे से छोटा कैसे किया जाये। सृष्टि के कण-कण में व्याप्त गतिशीलता को उतना ही सूक्ष्म स्तर पर मापा जा सकता है, जितना सूक्ष्म समय की माप हो, पर वैज्ञानिक समय को अब तक शून्य (जीरो) बिन्दु पर न ला सके। हाँ यह अवश्य हुआ कि समय को छोटे से छोटा करने का प्रयत्न किया गया। अनुमान है कि समय को बिलकुल शून्य अवस्था पर जिस दिन माप लिया जायेगा उन दिन सृष्टि का हर सत्य प्रकाशित हो जायेगा। भारतीय ऋषियों ने जो ज्ञान तत्व को, ध्यान को, समय से ऊपर उठकर विश्व-चेतना के दर्शन का विधान बताया उसकी सत्यता के प्रमाण यहीं आकर मिलते हैं।

आज जो भूकम्प आता है वह वस्तुतः आज की ही किसी दुर्घटना का परिणाम नहीं होता वरन् वह जहाँ से भूकम्प फूटता है वहाँ के अणुओं की दीर्घकालीन हलचल का परिणाम होता है। हजारों वर्षों से सूर्य उस स्थान पर प्रकाश कण उड़ेलता रहा होगा उन प्रकाश कणों की ऊर्जा किन्हीं तेल या तत्व के अणुओं को उत्तेजित करती रही होंगी। उससे इलेक्ट्रानिक न्यूट्रॉन कण या ऐसे ही किन्हीं चार्ज-कणों वाली शक्ति या गैस बनती और एकत्रित करती रही होगी। उसकी इतनी मात्रा एकत्रित हो गई होगी कि उसके दबाव को पृथ्वी और दूसरे तत्व सम्भाल सकने में असमर्थ हो गये होंगे इसलिये वह विस्फोट हुआ और दिखाई दिया।

प्रकृति के कण-कण में ऐसी हलचल चल रही है, पर हम समय के स्थूल भाग से बंधे होने के कारण उन सूक्ष्म परिवर्तनों को समझ सकने की स्थिति में होते नहीं। इसीलिये उन मोटी घटनाओं के होने तक अपने आपको बचाव करने की स्थिति भी बना नहीं पाते और जैसे भी कुछ अच्छे-बुरे परिवर्तन प्रकृति करती रहती है उन्हीं से प्रभावित होते रहते हैं, देखने में लगता है मनुष्य बड़ा बेबस प्राणी है, वह काल के थपेड़े खाने के लिये ही बना है, पर यह सचमुच उसे प्रदत्त शक्तियों के साथ लाँछन हैं। मनुष्य के भीतर वह तत्व बहुत खूबसूरती से विकसित किये गये हैं जिनको यदि जान और समझ लिया जाये तो मनुष्य प्रकृति के सूक्ष्म अन्तराल में होने वाले परिवर्तनों का न केवल ज्ञाता वरन् साझीदार तक होकर प्रकृति में अद्भुत हलचल उत्पन्न कर सकता है।

महर्षि पातंजलि ने योग दर्शन में लिखा है-

“क्षण तत्क्रमयोः मंयमाद दिवकजंज्ञानम्।”

-पातञ्जलि योग दर्शन 3। 52

अर्थात्- “समय के छोटे से छोटे टुकड़े में ध्यान जमाने से विवेक जन्य ज्ञान मिलता है और संसार की यथार्थ स्थिति का पता चलता है।”

जैन आगमों में भी बताया है कि संसार की वस्तुस्थिति समय के परमाणु में स्थित होने पर ही पहचानी जा सकती है।

चउव्विहे परमाणु पण्णते तजंहा, द्रव्य परमाणु खेत्त परमाणु, काल परमाणु-भाव परमाणु।

-भगवती शतक सूत्र 20।5।12

अर्थात् परमाणु में द्रव्य, क्षेत्र और भाव ही नहीं होता काल या समय की इकाई भी सन्निहित होती है, उस इकाई का बोध होने पर ही संसार का यथार्थ ज्ञान होता है।

आगे इसी बात को यों स्पष्ट किया है-

कारण मेव तदन्त्यं जूक्ष्मो नित्यश्च भवति परमाणु।

एक रस गन्ध वर्णो द्विर्स्पशः कार्य लिंगश्च॥

-भगवती शतक 18 उ. 2

अर्थात् पदार्थ के निर्माण का अन्तिम कारण परमाणु है, वह सूक्ष्मतम है भूत में या वर्तमान में है और भविष्य में भी रहेगा। उसमें एक रस, एक ग्रन्थ 1 वर्ण 2 स्पर्श तथा कायलिंग यानी आँखों से दिखाई न देकर केवल समय की सूक्ष्मतम अवस्था में ध्यान जमाने वाले ज्ञानी ही उसे समझ सकते हैं।

अभी तक विज्ञान ध्यानावस्थित होकर अन्तःकरण के सूक्ष्म विकास और विश्व को यथार्थ आध्यात्मिक स्थिति का विश्लेषण तो नहीं कर सका पर जैसे-जैसे समय की इकाई छोटी होती जा रही है विज्ञान भारतीय योगियों के से चमत्कार हासिल करता चला जा रहा है, अभी तक प्रयुक्त समय की सबसे छोटी इकाई सेकेण्ड थी। सेकेंड का अर्थ दिन का 1/86400 वाँ हिस्सा। पर यह माप सही है इसमें वैज्ञानिकों को सन्देह है। दिन-रात की माप सूर्योदय और सूर्यास्त से लेते हैं, पर पृथ्वी की गति अनियमित होने के कारण हर 100 वर्ष पीछे सेकेण्ड में 1/1000 वें हिस्से के बराबर अन्तर आ जाता है। युगों की गणना में यह अन्तर बहुत भारी पड़ेगा और उससे घटनाओं का कभी भी सच-सच नहीं जाना जा सकेगा क्योंकि परमाणुओं का कम्पन तो इतना सूक्ष्म है कि वह एक सेकेण्ड में अरबों बार काँप जाता है। तब से एक सेकेण्ड को हजारवें भाग “मिली सेकेंड” दस लाख वें भाग “माइक्रो सेकेंड” में बाँटा। उससे भी काम चलता न दीखा तो एक सेकेण्ड को एक अरब हिस्सों में बाँटकर नानो सेकेण्ड की कल्पना की गई। “नानो सेकेण्ड” का अर्थ यह हुआ कि यदि हम एक “नानो सेकेण्ड” में एक कदम चल सकें तो पृथ्वी की भूमध्य रेखा क्षेत्र में एक सेकेण्ड में 10 बार परिक्रमा कर सकते हैं अर्थात् सारी पृथ्वी में कहाँ क्या हो रहा है, उन सब बातों को एक सेकेण्ड में दस बार स्पष्ट आँखों से देख सकते हैं यह एक सिद्धान्त है जो केवल ज्ञान से ही सम्भव है।

स्थूल दृष्टि से भी समय की पकड़ हमें उन्हीं आश्चर्यों की ओर ले जा रही है। अब प्रकाश को भी परमाणुओं में विभक्त किया जा रहा है। प्रकाश-अणुओं को “फोटोन्स” कहते हैं” और अनुमान है कि वे सेकेण्ड के एक लाखवें हिस्से के भी करोड़वें अंश में सीमित है। इसी बात को यदि यह कहें कि ध्यान की प्रगाढ़ अवस्था प्रकाश की ही अनुभूति है और संसार केवल प्रकाश की लहरों का खेल है तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिये। समय की इस सूक्ष्मतम अवधि को “पिको सेकेंड” कहा जाता है। “नीयोडाइमियम गलास लेसर” के भीतर प्रकाश कणों के प्रवेश से इन छोटे टुकड़ों को प्राप्त किया जाता है और उनका उपयोग यहाँ तक हो सकता है कि एक सेकेंड में ही फुलस्केप के फुलस्केप समाचार हजारों मील दूर सेकेंडों में पहुँचाये जा सकते हैं। एक मिनट के अन्दर ही इस विधि से पेरिस के किसी मरीज की हृदय गति का रेखाचित्र खींचकर वाशिंगटन पहुँचाया जा सकता है और उसका इतने ही समय में इलाज समाप्त करके उसे अच्छा कर घर भी भेज दिया जा सकता है। लेसर किरणों के प्रयोग से संसार-पद्धति में कौतूहलवर्धक परिवर्तन होने की सम्भावना है। यहाँ तक हो सकता है कि लोगों के पास कुछ ऐसे यन्त्र हो जायें जो आकार में 1/10 इञ्च से भी छोटे हों पर उतने में ही वे 1.5 करोड़ सूचनायें एकत्र कर रखें और जब चाहें तब बात की बात में किसी को भी पहुँचा दें। यह सब ध्यान से प्राप्त होने वाली सिद्धियों की ही पुष्टि करते हैं।

अमेरिका की “वेस्टर्न इलेक्ट्रानिक कम्पनी” एक ऐसा यन्त्र तैयार कर रही है, जो केवल “बिन्दु के ही आकार के हों और सुई के छेद में ही जिन्हें आसानी से फिट किया जा सकता है। एक ऐसे धातु रहित तत्व नं. 14 के बने सिलिकन डाइड्स का उत्पादन किया जा रहा है, जो आधे “नानो सेकेंड” में ही विद्युत यन्त्र चालू कर सकेंगे अर्थात् जितनी देर में अब विद्युत चालू की जाती है, उतनी देर में तो 1 वर्ष में पूरे होने वाले कामों को हल किया जा सकता है। लोगों की बौद्धिक क्षमतायें बदली जा सकती हैं, शरीर बदले जा सकते हैं, आँख मारते ही रोग अच्छे किये जा सकते हैं। वह सब आश्चर्य दिखाये जा सकते हैं, जिनकी आशा केवल एक भारतीय योगी या सिद्ध महात्मा से ही की जा सकती है।

विज्ञान की यह उपलब्धियाँ अभी तक माध्यम रहित नहीं है तथापि उनसे यह निश्चित हो चुका अवश्य है कि समय के छोटे से छोटे अंश में महाकाल घुसा बैठा है। भारतीय योगियों ने समय से परे की अवस्था तक पहुँच कर ही सत्ताईस चतुर्युगियों के 116640000 वर्ष, सतयुग के 1728000 वर्ष, त्रेता के 296000 वर्ष, द्वापर के 864000 वर्ष और कलयुग के 5030 वर्षों का इतिहास जानकर एक-एक मन्वन्तर के घटनाचक्रों का इतिहास लिख दिया था, जो आज भी ठीक-ठीक उतरते चले जा रहे हैं। लोगों के आचार-विचार, खान-पान, रहन-सहन, राजनीति से लेकर सामाजिक परिस्थितियों तक के सारे भविष्य फल करोड़ों वर्ष पूर्व लिख दिये गये थे, जो आज ऐसे सच दिखाई दे रहे हैं, मानों उन लोगों ने यह सब अपनी आँखों से देखा हो।

सारा संसार महाकाल के गर्भ में चल रही घटनाओं का नाटक मात्र है, हम जब तक घटनाओं से प्रभावित होते है, तब तक समय से परे की उस चिन्मय अवस्था को समझ नहीं पाते, इसीलिये संसार का यथार्थ भी हमारे सामने प्रकट नहीं हो पाता। यदि ध्यान द्वारा समय की स्थिति से ऊपर उठने का प्रयास करें तो विश्वव्यापी ज्ञान चेतना में घुल-मिलकर हर समय के छोटे से छोटे अंश से लेकर महाकाल तक की घटनाओं के ऐसे ही ज्ञाता हो सकते हैं, जैसे कभी हमारे पुरखे हुआ करते थे।

इन सबसे बड़ा लाभ उस अवस्था में आत्म-निर्माण या ब्रह्म प्राप्ति का होगा जिसे जाने बिना जीव अपने साँसारिक बन्धनों से मुक्त नहीं हो पाता।


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सोने का एक कण जितना मूल्यवान होता है, समय का एक क्षण उससे सौगुना इसलिये एक-एक क्षण का उपयोग ही बुद्धिमानी है।

-मैसन


गुरु दक्षिणा जो चुकाई न जा सकी।

“मान लो, तुममें योग-साधनाओं के लिये अभीष्ट मनोबल हो भी, तुम तन्त्र की कठिनाइयों को झेल लो और अनेक सिद्धियों के स्वामी बन जाओ तो भी उसमें तुम्हारा कोई हित नहीं है। आत्म-कल्याण का प्रयोजन तो किसी और ही तरह से पूरा होता है, उसके लिये व्यक्ति को अपने अन्तःकरण को शुद्ध बनाना पड़ता है। सद्गुण और सन्मार्गगामी साधनायें करनी पड़ती हैं, तुम्हारे लिये भी वही उचित है।” महर्षि वर्ष ने नवागत शिष्य व्याडि और इन्द्रदत्त को बहुतेरा समझाया पर वे तन्त्र और पदार्थ विद्या सीखने का ही हठ करते रहे। महर्षि ने सोचा यह विद्या लुप्त न हो, लोग आध्यात्मिक शक्तियों को भौतिक शक्ति से बढ़कर स्वीकार करते रहें और आवश्यक हो तो विश्व-कल्याण में तन्त्र का उपयोग भी होता रहे, इस दृष्टि से उन्होंने शिष्यों की बात मान ली। उन्हें अनेक ऐसे आसन, प्राणायाम, हठ-योग की क्रियायें आदि बताईं जिससे उनमें सैकड़ों सिद्धियों का प्रादुर्भाव होता चला गया। परकाया प्रवेश से लेकर सूक्ष्म लोकों में अभिगमन तक, दूरदर्शन, श्रवण से लेकर औरों के मन की बता जान लेने तक की सारी विद्यायें उन्होंने दोनों शिष्यों को सिखाकर उनको निष्णात योगी बना दिया।

साधनायें समाप्त कर घर चलने का समय हुआ तो व्याडि बोला-गुरुदेव! कहिये आपको गुरुदक्षिणा क्या दें? इन्द्रदत्त ने भी वही, आग्रह किया तो वर्ष बोले-तात! भौतिक सम्पत्तियाँ क्षण भंगुर सुख देती हैं, हमें वह चाहिये नहीं, कोई भी अध्यात्मवादी जो चाहता है, मेरी भी वही इच्छा है कि तुम यहाँ से जाओ, धर्म और ज्ञान का प्रकाश फैलाओ ताकि अपने देश जाति और संस्कृति के जीवन में उच्च आदर्शों, उद्दात्त भावनाओं, सुख और समृद्धि की कमी न रहे और हमें कुछ नहीं चाहिये।

शिष्य सन्तुष्ट न हुये उन्हें अपनी उपलब्धि का अहंकार नचा रहा था-वे दोनों हठ करते रहे कोई भौतिक वस्तु माँगने की। न मानने पर महर्षि ने कहा-दे सकते हैं तो एक हजार स्वर्ण मुद्रायें लाकर दे दें, ताकि टूटे आश्रम के जीर्णोद्धार का प्रबन्ध किया जा सके। यह बात शिष्यों ने स्वीकार कर ली। होना यह चाहिये था कि दोनों परिश्रम करते, उद्योग करते और मेहनत से गुरुदक्षिणा चुकाते पर अहंकार तो अहंकार ही है। निश्चय यह हुआ कि तन्त्र विद्या का प्रयोग कर गुरुदक्षिणा अविलम्ब चुका दी जाये। संयोग से जिस दिन उनकी यह मन्त्रणा चल रही थी, मगध के सम्राट नन्द की मृत्यु हो गई। दोनों शिष्य ने वररुचि को अपना मित्र बनाया और तय किया कि इंद्रदत्त नन्द के शरीर में परकाया प्रवेश करें, उसके शव की रक्षा व्याडि करे और इंद्रदत्त की आत्मा नन्द के शरीर में पहुँच जाये, तब वररुचि जाकर उनसे स्वर्ण मुद्रायें माँग लायें जिससे गुरुदक्षिणा भी चुका दी जाये और अपने लिये भी धन प्राप्त किया जा सके।

सारी व्यवस्था जुटायें ली गई। इन्द्रदत्त ने अपने शरीर से प्राण-निकाल कर नन्द के शरीर में प्रवेश कर लिया। मृत नन्द जी उठे तो सारे मगध के लोग आश्चर्य चकित रह गये। इस रहस्य को और कोई तो नहीं जान पाया पर स्वभाव में भिन्नता के कारण नन्द का मन्त्री शकटारि सारी स्थिति समझ गया। उसने तत्काल पता लगाकर इन्द्रदत्त के शव का तो दाह करा दिया और व्याडि को बन्दी बनाकर कारागृह में डाल दिया। कोई उपाय न देखकर नन्द के शरीर में व्याप्त इन्द्रदत्त उसी शरीर में रह गये और भोग-वासनाओं में डूब गये। इधर चन्द्रगुप्त के हाथों वह मारा गया और व्याडि कारागृह की यातनाओं से। जो योग-विद्या आत्म-कल्याण के उद्देश्य से सिखाई गई थी, अहंकार के कारण वह अपने साधकों को ही ले डूबी। गुरुदक्षिणा तो दूर रही वर्ष ने यह समाचार सुना तो उन्होंने इतना ही कहा-अपात्र को विद्या देने का यही फल होता है-आगे उन्होंने योग-विद्या हर किसी को न सिखाकर आत्म-कल्याण की दक्षिणमार्गी साधनायें ही सिखाईं।


मनुष्य की विलक्षण दिव्य शक्तियाँ

“सहदेव के जन्म के समय मेरे एक मित्र, जिन्होंने ज्योतिष का बहुत अध्ययन किया था, मेरे पास ही थे। उन्होंने भैया (जिस परिवार को यहाँ उद्धृत किया जा रहा है, उनके घर छोटे बच्चों को भैया के ही सम्बोधन से पुकारा जाता है) की जन्म तिथि के आधार पर बताया कि आपके घर कोई देवात्मा आई है। इसे तो किसी बड़े सम्पन्न घर में जन्म लेना चाहिये था, पता नहीं वह कैसे आपके घर आ गया। फिर कुछ रुककर उन्होंने कहा-जून सन् 1955 की किसी तारीख को आपका बच्चा रहेगा? यदि कुछ उपाय कर लोगे तो यह बचा भी रह सकता है, बचा रहा तो आपके जीवन में तीव्र परिवर्तन आयेगा। सुख-सम्पत्ति का घाटा नहीं रहेगा।”

“बातचीत के दौरान उन्होंने, बताया कि ज्योतिष शास्त्र के अब ज्ञाता रहे नहीं, अब तो जहाँ-तहाँ उसका झूठा व्यवसाय चल रहा है, पर यदि सचमुच भविष्य विद्या की साधना करें तो न केवल बालक के पूर्व जन्मों का इतिहास जाना जा सकता है, वरन् भविष्य के एक-एक दिन का इतिहास भी सिनेमा के पर्दे की तरह देखा जा सकता है। उन्होंने नकली प्रचलिन फलित ज्योतिष का बहुत खण्डन किया था।”

“मेरे पूछने पर उन्होंने बताया पूर्व जन्मों में जो ईश्वर उपासक और देव वृत्ति की आत्मायें हैं, वे यदि किसी प्रकार परमात्मा को नहीं पा पातीं तो उनका दूसरा जन्म भी, कुल, यश, साधन सम्पन्न परिवारों में जन्म होता है। यदि वे किसी साधारण परिवार में ही जन्म ले लें तो “तिमि सुख सम्पत्ति बिनहिं बुलायें। धर्मशील पहं जाहिं सुहाये॥” के अनुसार साधन सम्पत्तियाँ उसके पास अपने आप दौड़ी चली आती हैं इसी आधार पर हमने कहा है कि यदि बच्चा 6 वर्ष की आयु के बाद जीवित रहा तो आपके घर किसी बात की कमी न रहेगी।”

उस समय की यह बात आई गई हो गई। ज्योतिष पर पढ़े-लिखे लोगों का जैसा आम अविश्वास है, वैसे ही हमने भी उन बातों पर विशेष ध्यान नहीं दिया।

उपरोक्त घटना पाण्डुचेरी के अरविन्द आश्रम की वर्तमान संचालिका श्री यज्ञ शिखा माँ (श्री माँ) को लिखे गये एक पत्र के आधार पर लिखी जा रही है। यह पत्र मध्य प्रदेश के महान राजनैतिक क्रान्तिकारी काशीराम का है, जो उनके एक मित्र द्वारा श्रीमाँ को भेजा गया था। श्री काशीराम जी अमर शहीद भगत सिंह, चन्द्रशेखर आजाद आदि के साथियों में हैं, कानपुर सूटिंग केस में उन्हें सात वर्ष की जेल हुई थी। गाड़ोदिया बैंक के डकैती केस में वे चन्द्रशेखर आजाद के साथ रहे थे।

इस पत्र में अपने प्रिय पुत्र के निधन का सकरुण चित्रण करते हुये काशीराम ने आत्मा सम्बन्धी भारतीय दर्शन को गम्भीर आस्था के साथ स्वीकार किया है और लिखा है कि हम साँसारिक व्यापारों में इतने पदार्थवादी हो गये हैं कि आत्मा की आवाज को भी नहीं पहचान सकते। आत्मा हर क्षण हमें अपने सन्देश और प्रेरणायें देकर हमारा मार्गदर्शन करना चाहती है, पर साँसारिक आसक्तियों में फँसे हम साधारण मनुष्य उसकी उपेक्षा ही करते रहते हैं और मनुष्य शरीर जैसे अलभ्य अवसर को यों ही गँवाते रहते हैं।”

“आगे की घटना फिर प्रारम्भ होती है- सहदेव बच्चा था, पर उसने जीवन में एक बार भी असत्य नहीं बोला। उसने कभी पैसे भर की किसी और की वस्तु नहीं उठायी। उसके मुँह से निकली हुई कोई भी बात असत्य नहीं होती थी। एक बार काशीराम के एक पड़ोसी का मुकदमा चल रहा था। जिस दिन उन्हें फैसला सुनाया जाना था, सवेरे-सवेरे वे घर आये और पूछा “भैया! बताओ मैं मुकदमा जीत जाऊँगा या नहीं।” भैया ने कहा- “तुम मुकदमा हार जाओगे और तुम्हें तीन साल की सजा होगी।” उन सज्जन ने इस मुकदमे में बड़ी लम्बी रिश्वतें दी थीं और उन्हें छूट जाने का पक्का आश्वासन मिला था। इसीलिये वे हँसे और बड़े विश्वास के साथ बोले-सहदेव! तेरी बात झूठ निकलेगी किन्तु सायंकाल उनके घर से खबर लाई कि सहदेव की बात सच निकली। उस व्यक्ति को सचमुच तीन वर्ष की सजा सुना दी गई थी। सहदेव ने कहा-देख लिया न। मैं कभी झूठ नहीं बोलता, फिर मेरी बात असत्य कैसे हो जाती? बच्चे ने अनेक बार ऐसी भविष्यवाणियाँ की और वह सब सच निकलीं। घर मुहल्ले के लोग समझ नहीं पाते-कि जब बड़े-बड़े शिक्षित और बुद्धिमान लोग साधारण बातों का भविष्य नहीं जान पाते तब यह बच्चा असाधारण भविष्य ज्ञान कहाँ से पा गया। ऐसी जिज्ञासायें हम सबके सामने आती हैं, किन्तु हम कहाँ सोच पाते हैं कि आत्मानुवर्ती होना सबसे बड़ा ज्ञान और योग्यता है, जो आत्मा के जितना समीप है वह उतना ही स्पष्ट भूत और भविष्य दृष्टा होता है।

जून की 20 तारीख और सन् 1955 काशीराम जी किसी काम से घर के बाहर जाने लगे। बच्चे ने जिद की-पिताजी मुझे भी साथ ले चलिये। श्री काशीराम जी ने उसे समझा दिया और वहाँ से चले गये। पीछे एक दो बार बच्चे ने उन्हें याद किया तो उसकी माँ ने यों ही हँसी-हँसी में कह दिया-तेरे पापाजी अब घर नहीं आयेंगे तू उन्हें बहुत तंग करता रहता है सो वे घर छोड़कर चले गये हैं।” बात हँसी में कही गई थी, पर लड़का इस बात को लेकर दिनभर उदास बना रहा।

शाम को श्री काशीराम जी के घर पहुँचते ही सहदेव उनसे लिपट कर रोया-पिताजी! आप मुझसे तंग रहते हो। तो अब तुम घर छोड़कर न जाना मैं स्वयं ही चला जाऊँगा।” बच्चे के यह शब्द कहते ही न जाने क्यों श्री काशीराम जी को ज्योतिषी की बात याद आ गई। बच्चे के कथन में कोई एक सत्य झाँकता हुआ सा उन्हें प्रतीत हुआ। उन्हें जब पता लगा तो अपनी धर्मपत्नी को वैसा कह देने के लिये डाँटा भी पर सहदेव का मनोमालिन्य दूर न हुआ। वह शाम तक फिर काशीराम जी से एक शब्द भी नहीं बोला। उनके पास ही सोता था, सो सोया तो उन्हीं के साथ ही, पर उनसे कुछ हटकर निःशब्द बिना कुछ बोले, बातचीत किये, जबकि इससे पूर्व वह घण्टों अपने पिता से तरह-तरह की मीठी-मीठी बातें किया करता था।

बच्चे कितने संवेदनशील होते हैं, पर हम उनकी भावनाओं का आदर कहाँ करते हैं। माता-पिताओं की उपेक्षा उन्हें गलत रास्तों में भटका देती है। उन्हें गुनहगार ठहराया जाता है, पर सारी भूल अभिभावकों की होती है, जो उन्हें स्नेह और मनोवैज्ञानिक ढंग से सिखाना, समझाना भी नहीं जानते।

रात बारह बजे बच्चे की नींद टूटी। उसने कई बार श्री काशीराम जी को पिताजी, पिताजी! कहकर पुकारा-उस दिन दुर्भाग्य से पति-पत्नी दोनों ने भंग पी ली थी। देर तक नींद न टूटी एक पड़ोसी ने आकर जगाया-बच्चा कब से चिल्ला रहा है और आप ऐसे धुत्त सो रहे हैं। उस दिन श्री काशीराम जी ने पहली बार अनुभव किया-नशा-मनुष्य जीवन का कितना बड़ा पाप है।

बच्चे ने बिना किसी प्रकार की शिकायत किये कहा- “पापाजी- मेरी गरदन दुःख रही है” यह कहकर उसने काशीराम जी का हाथ पकड़ कर अपने दाहिनी गरदन पर रख कर वह स्थान बताया। श्री काशीराम चौंक पड़े-बच्चे का सारा शरीर गर्म तवे की भाँति जल रहा था। उन्होंने घबड़ा कर पत्नी को जगाया। दोनों उतर कर नीचे आये। पत्नी बच्चे को लेकर सो गई काशीराम जी अलग जा सोये। नशे का अभिशाप-दोनों में से किसी को भी यह ध्यान नहीं रहा कि बच्चे को बुखार है उसे डॉक्टर को दिखाना चाहिये, औषधि दिलानी चाहिये।

प्रातःकाल सहदेव की स्थिति बहुत बिगड़ी हुई मिली तब श्री काशीराम जी डॉक्टर के लिये दौड़े। समय निकल जाता है, तब सिवाय हड़बड़ी के और क्या हो सकता है। डॉक्टर आया उसने देखकर बताया कि स्थिति ठीक नहीं है, उसे अस्पताल ले जाना चाहिये।

नानी-नाना बुला लिये गये। बच्चा दिनभर तीव्र ज्वर में अचेत नानी की गोद में पड़ा रहा। काशीराम जी डॉक्टर के पास गये। डॉक्टर “अभी-अभी” कहकर अपने मरीजों में व्यस्त था, उसे पता था, काशीराम जी की स्थिति तंगी की है, वहाँ से दवाओं के पैसे मिलना कठिन है, इसलिये उसने शाम के सात बजा दिये और चला नहीं।

काशीराम जी डॉक्टर के पास खड़े थे, तो उन्हें ऐसा लगा जैसे सहदेव कह रहा हो- “पिताजी अब तो लौट आओ अब मैं हमेशा के लिये जा रहा हूँ” आत्मा की आवाज, पर कितनी स्पष्ट और शक्तिशाली। श्री काशीराम जी ने कहा- “डॉक्टर साहब! धन्यवाद! अब आपको कष्ट करने की आवश्यकता नहीं रही। सहदेव रहा नहीं।” यह कहकर वे घर की तरफ भागे और तब पीछे-पीछे डॉक्टर साहब भी अपनी कार लेकर दौड़े पर प्राण किस की प्रतीक्षा करते हैं? बच्चे का शरीर ठण्डा पड़ चुका था, ओठ सुख गये थे। डॉक्टर ने जल्दी-जल्दी देखा और कह दिया- “बच्चे की मृत्यु हो गई है।” किसे दोष दिया जाये ऐसे तो हजारों बच्चे रोज मरते रहते हैं डॉक्टर लौटा और अपने काम में लग गया।

जल्दी नाना जी को भी थी। जीवन और मृत्यु के क्षणों में भी मनुष्य उन काल की विलक्षण घटनाओं के बारे में एक क्षण भी विचार नहीं करता- सम्भव है ऐसे प्रसंग देखकर ही धर्मराज युधिष्ठिर ने यक्ष के “संसार में सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है?” प्रश्न का उत्तर देते हुए कहा था-

अहन्यहन्य भूतानि गच्छन्ति यम मन्दिरम्।

शेषाः स्थिरत्वभिच्छन्ति किंआश्चार्य मतः परम्॥

अर्थात् एक-एक करके सारा संसार मृत्यु के मुख में समाता चला जा रहा है, पर पीछे रह जाने वालों की गतिविधियाँ ऐसी रहती हैं मानो उन्हें मृत्यु तक जाना ही नहीं-हे यक्ष! इससे बढ़कर संसार में और कोई दूसरा आश्चर्य नहीं हो सकता।

व्यवस्थापक नाना जी ही थे। बच्चे को ले जाकर जल्दी-जल्दी गड्ढा खोदकर दफना दिया गया। श्री काशीराम जी उसका अच्छी तरह मुँह भी नहीं देख पाये।

मित्र, परिचित और सम्बन्धी आते और श्री काशीराम जी को सान्त्वना दिलाते रहे। वह दिन ऐसे ही बीता। सन्ध्या आई और चली गई। बत्तियाँ बल गई। बच्चे की माँ की स्थिति अब भी बड़ी गम्भीर थी। पर काशीराम जी के दुःख का पारावार ही न था। स्वतन्त्रता आन्दोलन का क्रान्तिकारी जो कभी गोली और बन्दूक दागने और डकैती डालने जैसे कामों में भी नहीं घबराता था, पुत्र की ममता के आगे उसकी सारी दृढ़ता ढेर हो गई।

रात कोई आठ बजे होंगे। काशीराम जी चारपाई पर लेटे थे। बिजली का खम्भा सामने ही था बल्ब जल गया था। उससे सड़क के उन हिस्से में खूब प्रकाश फैल रहा था। तत्ववस्य (हिप्नोटाइज्ड) मस्तिष्क की भाँति काशीराम जी को एकाएक ऐसा लगा जैसे सहदेव की छाया बल्ब के नीचे प्रकाश में खड़ी है। आकृति थोड़ा आगे बढ़ी और बोली- “पिताजी! आपने मुझे जीवित गाढ़ दिया। जल्दी करो मुझे निकाल लो। मुझे बड़ा कष्ट हो रहा है।” रुक-रुक कर बच्चे ने तीन बार यही शब्द कहे। बच्चे की आकृति सामने आते ही पिता का हृदय छलक पड़ा। वे चिल्लाये- भैया! मेरे भैया! और उनके इतना कहने पर ही उनकी धर्म पत्नी का ध्यान उनकी ओर गया। उन्होंने बताया अभी भैया आया था और कह रहा था, मुझे जीवित गाड़ दिया गया है। मुझे फावड़ा तो लाओ, मैं अभी जाकर सहदेव को खोद लाता हूँ।

धर्मपत्नी ने कहा-तुम्हें यों ही वहम हो गया है, जब बच्चा बीमार था, तब दवा कराते नहीं बना अब जब उसकी लाश गाड़ दी गई तो उसे उखाड़ने से क्या लाभ? श्री काँशीराम ढीले पड़ गये और फिर इन्हीं शोकपूर्ण विचारों में डूब गये।

हलकी सी नींद लगी और भैया की आवाज फिर सुनाई दी- “पिताजी-मुझे जीवित गाड़ दिया गया है, मुझे निकाल लो पिताजी, मेरा दम घुट रहा है।” काशीराम जी की नींद फिर टूट गई। फिर सोये तो फिर वही आवाज। रात भर बच्चे की आत्मा पिता के आस-पास घूमती, जगाती और सन्देश देती रही, पर कुछ धर्मपत्नी के शब्द, कुछ अपना भी अविश्वास बेचारे लेटे के लेटे ही रहे। पर प्रातःकाल 4 बजे जब बच्चे को मरे 24 घण्टे हो रहे थे, फिर जोर से बच्चे की वही आवाज सुनाई दी-पिताजी मुझे जीवित गाड़ दिया गया है, मुझे जल्दी निकाल लो।”

श्री काशीराम जी की नींद टूट गई। वहाँ भागे। पागल की तरह बच्चे की कब्र के पास पहुँच गये। एक क्षीण सी आवाज आई- “पिताजी! बहुत देर करदी। मैं मर रहा हूँ, अब आने का क्या लाभ?” काशीराम जी पागल हो उठे। हाथ में कोई वस्तु नहीं किससे खोदते। फिर घर को भागे। फावड़ा लेकर फिर उसी स्थान की ओर दौड़े, जहाँ बच्चा गड़ा था। अब तक घर के सब लोग भी जग चुके थे। सबने यही कहा कि काशीराम जी बच्चे की ममता में पागल हो गये हैं, यह किसी ने नहीं समझा कि आत्मा की भी कोई आवाज होती है, इसका भी कहीं कोई अस्तित्व होता है?

काशीराम जी ने कब्र खोदकर बच्चे को निकाला तो आश्चर्यचकित रह गये। बच्चे की देह बिलकुल गर्म थी, लाश में किसी प्रकार की खराबी नहीं थी। साँस चलने का तो कोई लक्षण नहीं दिखाई दे रहा था, पर कनपटी की नसें अब भी फड़क रही थी और उससे यह स्पष्ट होता था कि बच्चा थोड़ी देर पहले पूर्णतया जीवित था। अभी भी उसके शरीर में जीवन शेष है। अब तक घर के बहुत से लोग और दूसरे लोग भी जमा होने लगे थे। बहुत लोगों ने उसके फोटो लिये। कई लोग कई तरह की चर्चा कर रहे थे, पर यह किसी से न बना कि कोई किसी डॉक्टर को लाता।

बच्चे का शरीर उसकी नानी को देकर काशीराम जी कई डाक्टरों के पास गये पर जिसने भी यह चर्चा सुनी उसी ने काशीराम जी को पागल कह कर टाल दिया। इसी बीच कोई एक तान्त्रिक भी दौड़ा-दौड़ा वहाँ आया और बच्चे को देखकर चिल्लाया- तुम लोगों ने बच्चे को जीवित मार डाला- उसका इलाज भी नहीं करते बना। उसके इतना कहते-कहते एक बार बच्चे ने खून की उल्टी की और फिर सदा के लिये इस संसार से विदा हो गया। मिट्टी जहाँ से आई थी उसी में मिल गई।”

यह पत्र श्री माँ ने बहुत ध्यान से पढ़ा और फिर काशीराम जी के मित्र को, उन्होंने उन तक यह पत्र पहुँचाया था-लिखा-ओह! उसने आत्मा की आवाज को नहीं पहचाना (पिटी, ही डिड नाट लिसन टु विद इंट्यूशन)। एक काशीराम क्या, हम सब भी तो पागलों की सी जिन्दगी जीते हैं। बाहरी भौतिक संसार के सुख के लिये न जाने क्या-क्या करते हैं, पर आत्मा तो उपेक्षित पड़ी है। हमें उसकी आवाज सुनने का अवकाश ही कहाँ?

यह घटना प्रसिद्ध साहित्यकार श्री बनारसीदास जी चतुर्वेदी के आग्रह पर स्वयं काशीराम जी ने लिखकर ‘नई दुनिया’ को भेजी थी। यह दैनिक पत्र इन्दौर से निकलता है। 3 नवम्बर 1968 के अंक में यह हृदयस्पर्शी संस्मरण छपा भी था।


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आत्म ज्ञान पर ज्ञानम् (वेद व्यास)

आत्म-ज्ञान ही समस्त ज्ञान का मूल है।


सन्त बोनीफेस

सन्त बोनीफेस ने आजीवन औरों की सेवा की, पर कभी किसी से कुछ माँगा नहीं, भले ही उन्हें दिन का उपवास ही क्यों न करना पड़ा हो।

एक बार उन्हें कई दिन तक कुछ खाने को न मिला। एक स्त्री दूध निकाल रही थी। उन्हें ऐसा लगा कि अपने भीतर न माँगने का व्यवहार उठ रहा है, सो उन्होंने तुरन्त ही उस स्त्री से थोड़ा दूध माँगा। उसके पति ने बीच में ही रोककर दूध देने से इनकार कर दिया। सन्त बिना किसी दुर्भाव से आगे बढ़े, पर भूख सहन न करने के कारण जमीन पर गिर पड़े। वहीं एक निर्झर फूट पड़ा। जो आज भी बोनीफेस निर्झर के नाम से विख्यात है।


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तमेव विद्वान न विभाय मृत्योः

-ऋग्वेद

आत्मा को जान लिया जिसने, मृत्यु का उसे क्या भय?


परमार्थ की उपेक्षा न करें।

जिस प्रकार प्रकाश के अभाव को अन्धकार स्थानापन्न करता है, दया भाव का अभाव क्रूरता से स्थानापन्न होता है, उसी प्रकार पुण्य-परमार्थ के अभाव को पाप प्रवृत्तियाँ स्थानापन्न करती है।

जो मनुष्य पुण्य प्रवृत्तियों में निरत नहीं होता उससे पाप कर्मों की सम्भावना बनी रह सकती है। मनुष्य इन दो स्थितियों में से एक को ही प्राप्त कर सकता है। मध्य स्थिति या तो बड़ों के लिये सम्भव है अथवा जीवन मुक्त योगी के लिये। सामान्य मनुष्य न जड़ होता है और न जीवन मुक्त योगी। अस्तु आवश्यक है कि पाप से बचे रहने के लिये वह किसी न किसी परमार्थ कार्य में लगा रहे।

जो सत्पुरुष अपने अन्तःकरण में परमार्थ बुद्धि का विकास कर लेते हैं, जो परिष्कृत और उदार दृष्टिकोण से जीवन की सार्थकता पर विचार करते हैं, और जो अपनी आत्मा में आध्यात्मिक स्फूर्ति की स्थापना कर लेते हैं, उन्हें अपनी प्रवृत्तियों से भय नहीं रहता कि वे उसे पाप मार्ग पर ढकेल सकती है। मानव की सहज प्रवृत्तियाँ परमार्थ बुद्धि की अनुगामिनी बन जाती हैं।

शारीरिक स्वास्थ्य और आरोग्य के लिये जिस प्रकार खाना-पीना, सोना-जागना, हँसना, खेलना और व्यायाम करना आवश्यक है, उसी प्रकार आत्मिक मंगल के लिये, आध्यात्मिक स्वास्थ्य के लिये परमार्थ कार्य करते रहना बहुत जरूरी है। दिनचर्या में परमार्थ को स्थान दिये बिना आत्मा का निर्मल और निष्कलंक रहना सम्भव नहीं। यदि आत्मा कलुषित एवं कलंकित है, तो शरीर कितना ही स्वस्थ, सुन्दर और शक्ति सम्पन्न क्यों न हो, मनुष्य अपूर्णता के दोष से बचा नहीं रह सकता। मनुष्य का स्वरूप पूर्ण तभी होता है जब शरीर के साथ आत्मा और बाह्य के साथ अन्तर भी स्वस्थ तथा सुन्दर हो। यह वाँछित स्थिति तभी सम्भव है, जब मनुष्य नित्यकर्मों की भाँति परमार्थ को भी जीवन क्रम का एक अभिन्न अंग बनाए।

पुण्य परमार्थ की इस आवश्यकता को प्रायः सज्जन व्यक्ति अनुभव करते हैं। किन्तु उसको कार्यान्वित करने में प्रमाद बरतते हैं। इस प्रमाद का व्यवहार वे अधिकतर दो प्रकार से करते हैं। या तो वे अवसर और परिस्थिति न होने का बहाना करते हैं अथवा परमार्थ प्रवृत्ति को आगे के लिये टालते रहते हैं। बहुत से लोग यह सोचते और कहते रहते हैं कि क्या करें, हमारे पास धन ही नहीं है। हम पुण्य परमार्थ कर भी कैसे सकते हैं? उसके लिये तो धन की आवश्यकता होती है। जो थोड़ी बहुत आय है उसमें परिवार का ही खर्च पूरा नहीं होता। अपने भविष्य के लिये ही जब कुछ नहीं बच पाता तो परोपकार अथवा पुण्य परमार्थ में कहाँ से बचाया और लगाया जा सकता है।

बहुतों के पास जब धन का बहाना नहीं होता तो समय के अभाव का बहाना ले बैठते हैं। सफाई देते हुए कहा करते हैं- कुछ सत्कर्म और परमार्थ करने की इच्छा तो होती है। उसके लिये, भगवान ने कुछ खर्च कर सकने की समता भी दी है। लेकिन क्या बतायें समय का बड़ा अभाव रहता है। घर-बार, कारोबार और जीवन के अन्य कामों की इतनी बहुतायत है कि एक मिनट का भी समय नहीं मिलता। किस समय तो परोपकार किया जाये और किस समय परमार्थ।

किन्तु सच्ची बात यह है कि इस प्रकार की मजबूरी बहाने के सिवाय और कुछ नहीं है। धन का बहाना लेने वालों को सोचना चाहिए कि जब दुनिया की सारी जरूरतों के लिए पैसे का प्रबन्ध हो जाता है तो क्या पुण्य परमार्थ के लिये इतना बड़ा अकाल पड़ जाता है कि कोई छोटा-मोटा सत्कर्म भी नहीं कर सकते। सीमित आय में भी जब दुनियादारी का कोई आकस्मिक व्यय आ पड़ता है तो उन्हीं सीमित साधनों में से उसका भी प्रबन्ध हो जाता है। तब क्या कारण है कि पुण्य परमार्थ के लिये थोड़ा सा भी पैसा खर्च नहीं किया जा सकता। यदि मन में सच्ची भावना हो और परमार्थ को अनिवार्य कार्यों की तरह अपरिहार्य समझा जाये तो उसके लिए भी सौ रास्ते निकल सकते हैं। कमी पैसे की नहीं कमी वास्तव में सच्ची भावना की होती है।

पुण्य परमार्थ पैसे के आधार पर ही होता हो, पैसे के बिना हो ही न सकता हो, ऐसी भी कोई बात-नहीं है। पुण्य परमार्थ के ऐसे हजारों काम हैं जो पैसे के बिना भी हो सकते हैं। परमार्थ तो तन-मन-धन तीनों प्रकार से हो सकता है। परमार्थ का आशय-दान देना, सदावर्त खोलना, गोशाला, धर्मशाला, कुँआ अथवा मंदिर बनवाना ही तो नहीं है। दीन दुखियों के प्रति दया, करुणा और सहानुभूति की भावना रखना। रोगियों, अपाहिजों और आपत्तिग्रस्तों की सेवा करना, अन्धों को राह दिखलाना और खोये हुए को घर पहुँचा देना भी तो पुण्य परमार्थ के ही अंतर्गत आता है। इसके लिए न धन की आवश्यकता है और सम्पत्ति की। यह सत्कर्म बिना धन के थोड़े शारीरिक श्रम द्वारा भी किए जा सकते हैं। धन का बहाना-बहाना मात्र ही है। इसके पीछे न तो कोई तथ्य है और न सत्य!

समयाभाव का बहाना भी इसी तरह का थोथा बहाना मात्र है और कुछ नहीं। एक दिन के चौबीस घंटों और गुजर गये जीवन की लम्बी अवधि में ऐसी कौन सी व्यस्तता रही हो सकती है जिसके कारण थोड़ा सा पुण्य परमार्थ, कोई छोटा सा सत्कर्म करने का भी समय न मिल सका। खाने, पीने, सोने, जागने, मनोरंजन करने और व्यापार व्यवसाय के बीच से क्या थोड़ा सा भी समय नहीं निकाला जा सकता जो कि किसी सत्कर्म में लगाया जा सके।

माना, व्यापार व्यवसाय के व्यस्त समय में कटौती नहीं कि जा सकती। ऐसा करने से सम्भव है कि किसी हानि का सामना करना पड़ जाये। तथापि विश्राम एवं मनोरंजन के समय में से तो कुछ समय ऐसा निकाला जा सकता है तो पुण्य परमार्थ के कर्म में लगाया जा सके! गद्दी पर बैठे बैठे दान किया जा सकता है। रास्ता चलते-चलते किसी की सहायता की जा सकती है। किसी समय थोड़ा सा समय देकर कुछ ऐसे विद्यार्थियों की परीक्षा ली जा सकती है जो सहायता के पात्र हों और उसी समय से उनको छात्रवृत्ति देकर एक साल तक परोपकार के उस कार्य को चलाया जा सकता है।

इसके अतिरिक्त मनोरंजन के उपायों में परमार्थ परक गतिविधियाँ और कार्यक्रम शामिल किए जा सकते हैं। बहुत बार जहाँ सैर सपाटे के लिए यात्राओं पर जाया जा सकता है, वन-विहार और जल विहार के लिये प्रस्थान किया जा सकता है तो एक बार किसी दीन-हीन और पिछड़ी बस्ती की और भी जाया जा सकता है। उनकी आवश्यकताएँ और दुःख दर्द का पता लगाया और सहायता की जा सकती है। जहाँ सौ बार संगीत सुना जा सकता है वहाँ एक बार दुखियों की पुकार भी सुनी जा सकती है। जिस प्रकार उस पर खर्च किया जा सकता है, उसी प्रकार उन गरीबों पर भी किया जा सकता है, कहने का तात्पर्य यह है कि यदि परोपकार की भावना सच्ची हो और कुछ करने का उत्साह हो तो समय का प्रभाव आड़े नहीं आ सकता! हजारों ऐसे परोपकार के कार्य हो सकते हैं जो घूमते-चलते और बैठते-उठते किए जा सकते हैं।

अवसर न मिलने की बात भी व्यर्थ है। इसमें भी कोई तथ्य नहीं है। कोई आवश्यक नहीं कि परोपकार के लिए कोई बड़ी योजना बनाई जाये और खास तौर से उसका प्रबंध किया जाये। परमार्थ कोई बड़ा यत्न करने अथवा विश्वविद्यालय खड़ा करने में ही नहीं है और न गरीबों की बस्ती का पुनः-निर्माण करने मात्र में ही है। कहीं भी चल रहे इन आयोजनों में योगदान करने से भी परमार्थ का प्रयोजन पूरा हो जाता है। किसी के आयोजित यज्ञ में कुछ दे देने और किसी संस्था के निर्माण में सहयोग करने में भी उतना ही बड़ा पुण्य है जितना कि स्वयं उसका आयोजन करना! जिस प्रकार खड़े-खड़े व्यावसायिक सौदे कर लिए जाते हैं बैठे-बैठे, बड़े-बड़े कारोबार चला लिए जाते हैं, वैसे ही चलते-चलते किसी जन-निर्माण में चुपके से अपना अंश-दान भी लिखाया जा सकता है। बिना कहे साधन सामग्री भी भेजी जा सकती है। ऐसे कार्यों के लिए किसी अवसर की तलाश करना, किसी तीर्थ यात्रा की प्रतीक्षा करते रहना एक बहाने के सिवाय और कुछ नहीं है। श्रद्धापूर्वक अच्छे और निष्काम मन से किया हुआ एक छोटा सहयोग भी परमार्थ के बड़े आयोजन की तरह ही पुण्य प्रतापी होता है।

पुण्य परमार्थ के अवसर अथवा भावना को टालने वाले जीवन में भारी भूल करते हैं। परमार्थ अथवा परोपकार की भावना अथवा अवसर का उदय होना किन्हीं पूर्व पुण्यों का उदय ही समझना चाहिए। अन्यथा इस प्रपंच एवं प्रवंचनापूर्ण संसार में, इसके दूषित वातावरण में ऐसे अवसर और ऐसी कल्याणकारी भावनाएं सुलभ ही कहाँ होती हैं। यदि आये हुए उत्साह को कार्यान्वित न करके आगे के लिये टाल दिया गया तो कोई ठीक नहीं कि वह भावना फिर उठे या न उठे, वह अवसर फिर आये न आये। इस नश्वर संसार में जीवन का भी कोई ठिकाना नहीं। आज है कल नहीं भी रह सकता। तब तो पुण्य परमार्थ का एक अवसर भाग्यवश आया था उसके भी लाभ से वंचित रहना पड़ेगा! परमार्थ अथवा पुण्य-कार्य में तत्परता करने का महत्व समझने के लिए महाभारत का यह उपाख्यान बड़ा उपयोगी तथा शिक्षाप्रद है।

एक बार एक भिक्षुक ने महाराज युधिष्ठिर के सम्मुख उपस्थित होकर कुछ याचना की। महाराज युधिष्ठिर उस समय किसी अन्य कार्य में व्यस्त थे। निदान उन्होंने उससे दूसरे दिन आने को कह दिया। भिक्षुक चला गया!

उस अवसर पर भीम वहीं उपस्थित थे! भिखारी के चले जाने पर वे उठे और हर्ष सूचक दुन्दुभी बजाने लगे उसका संकेत स्वर सुनकर नगर में खुशी के बाजे बजने लगे। युधिष्ठिर ने सुना और भीम से पूछा। भीम यह हर्ष सूचक वाद्य सहसा क्यों बज उठे। भीम ने उत्तर दिया-वह इसलिए कि हमारे महाराज युधिष्ठिर ने काल को जीत लिया है!

भीम की बात सुनकर महाराज युधिष्ठिर बड़े चकित हुए। बोले- “भीम यह तुम क्या कह रहे हो-मैंने काल को जीत लिया है। क्या कोई मनुष्य काल पर भी अधिकार कर सकता है।” भीम ने कहा क्यों नहीं महाराज-यदि आपने काल को न जीत लिया होता तो क्या उस भिक्षुक को कल के लिये कह कर वापस कर देते। ज्यादा तो नहीं कल के लिए तो आपने काल को अपने वश में कर ही लिया है।” महाराज युधिष्ठिर भीम का आशय समझ गये। उन्होंने अपनी भूल पर लज्जित होते हुए तुरन्त ही भिखारी को बुलाया और दान देकर कहा-भीम तुम ठीक कहते हो। पुण्य परमार्थ का कोई अवसर टालना नहीं चाहिए। क्योंकि अगले क्षण यह रहे न रहे! क्या ठिकाना।

अस्तु, पुण्य परमार्थ के बिना मनुष्य का कल्याण नहीं और जब तक उसे जीवन का अनिवार्य अंग नहीं बना लिया जावेगा उसका बन पड़ना सम्भव नहीं होगा! साथ ही उसके करने में न तो विलम्ब करना चाहिए और न प्रमाद! मानव जीवन की सार्थकता और आत्मा का कल्याण इसी में है।


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जीवितं सफलं तस्य यः परार्थोद्यतःसदा

-ब्रह्मपुराण

जो परमार्थ रत हैं जीवन तो उन्हीं का धन्य है।


गुरु नानक देव जी का सौदा

“माँ, मैं सौदा करके आ गया।”

“कौन सा सौदा इतनी जल्दी कर आये बेटा? सामान तो तुम्हारे पास कुछ दिखाई नहीं देता।”

“सामान वाला सौदा इस संसार के लोग करते हैं। उस संसार के सौदे के लिये सामान की आवश्यकता नहीं पड़ती और वही सौदा मैं करके आया हूँ।”

“कैसे?”

सारे रुपयों का अनाज गरीबों को बाट आया। माँ, वे बहुत भूखे थे। उनकी भूख मुझसे देखी नहीं गई।”

“खैर, अब कैसे भी अपने घर का काम चल ही जायगा। इतनी चिन्ता करने की क्या आवश्यकता है।”

माँ बेटे के सौदे पर गदगद हो गई। दूसरे के दुःखों को अपना मानने वाला वह बालक- नानक था। आगे चलकर वही गुरु नानक सिख धर्म के प्रवर्तक बने।


मंत्र परम लघु जासुवश विधि हरि हर सुर सर्व

मंत्र, योग साधना का एक ऐसा शब्द और विज्ञान है कि उसका उच्चारण करते ही किसी चमत्कारिक शक्ति का बोध होता है। ऐसी धारणा है कि प्राचीन काल के योगी, ऋषि और तत्वदर्शी महापुरुषों ने मंत्रबल से पृथ्वी, देव-लोक और ब्रह्माण्ड की अनन्त शक्तियों पर विजय पाई थी। मंत्र शक्ति के प्रभाव से वे इतने समर्थ बन गये थे कि इच्छानुसार किसी भी पदार्थ का हस्तान्तरण, शक्ति को पदार्थ और पदार्थ को शक्ति में बदल देते थे। शाप और वरदान मंत्र का ही प्रभाव माना जाता है। एक क्षण में किसी का रोग अच्छा कर देना, एक पल में करोड़ों मील दूर की बात जान लेना एक नक्षत्र से दूसरे नक्षत्र की जानकारी और शरीर की 72 हजार नाड़ियों के एक-एक जोड़ की जानकारी तक मंत्र की ही अलौकिक शक्ति थी। इसलिये भारतीय तत्वदर्शन में मंत्र शक्ति पर जितनी शोधें हुई हैं, उतनी और किसी पर भी नहीं हुई। मंत्रों के आविष्कारक होने के कारण ही ऋषि मंत्र दृष्टा कहलाते थे। वेद और कुछ नहीं एक प्रकार के मंत्र विज्ञान हैं जिनमें विराट् ब्रह्माण्ड की उन अलौकिक सूक्ष्म और चेतन सत्ताओं और शक्तियों तक से सम्बन्ध स्थापित करने के गूढ़ रहस्य दिये हुए हैं, जिनके सम्बन्ध में विज्ञान अभी “क ख ग“ भी नहीं जानता।

मंत्र का सीधा सम्बन्ध उच्चारण या ध्वनि से है। इसलिये इसे “ध्वनि विज्ञान” भी कह सकते हैं। अब तक इस दिशा में जो वैज्ञानिक अनुसंधान हुए और निष्कर्ष निकले हैं वह यह बताते हैं कि सामान्य भारतीय मंत्र शक्ति पर भले ही विश्वास न करें पर वैज्ञानिक अब उसी दिशा में अग्रसर हो रहें है। वह समय समीप ही है जब ध्वनि विज्ञान की उन्नति ऋषियों जैसे ही कौतूहलवर्द्धक कार्य करने लगेगी। उदाहरण के लिये “ट्रान्स्डूयसर” यंत्र से सूक्ष्म से सूक्ष्म आपरेशन किया जा सकता है। वह शब्द को कर्णातीत शक्ति का ही फल है। प्रसिद्ध भौतिक शास्त्री डॉ. फ्रिस्टलाव ने “अल्ट्रासोनोरेटर” नामक एक ऐसा मंत्र तैयार किया है जो दो रासायनिक द्रव्यों को थोड़ी ही देर में मिला सकता है। इस पद्धति में एक ‘खे’ का उपयोग किया जाता है। कर्णातीत ध्वनि खे को प्रभावित करती है खे इतनी तीव्रता से कम्पन करता है कि भारी मात्रा में भरा हुआ जल कड़ाही में खौलते पानी की तरह मंथन करने लगता है। वैज्ञानिक इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि एक दिन वह आयेगा जब कर्णातीत ध्वनि से सृष्टि के किसी भी अदृश्य भाग के प्राकृतिक परमाणु में तीव्र हल-चल उत्पन्न कर किसी भी क्षेत्र को मथ डालना या उसमें परिवर्तन उत्पन्न कर देना सम्भव हो जायेगा। कई कीटाणु ऐसे होते हैं जो किन्हीं रसायनों में इस कदर घुल मिल जाते हैं कि उन्हें किसी बाह्य उपचार द्वारा नष्ट करना संभव नहीं होता, कर्णातीत या सूक्ष्म ध्वनि कम्पन उन्हें भी नष्ट कर देते हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि यदि भारतीय तत्वदर्शी मंत्र शक्ति से किसी के रोग अच्छा कर देने, विष उतार देने, लोगों के रोग और उन्माद नष्ट कर देने के प्रयोग सफलतापूर्वक करते रहे हैं तो यह कोई आश्चर्य न होकर वैज्ञानिक प्रक्रिया ही है और धीरे-धीरे प्रकाश में आ रही है।

आज मंत्र विज्ञान के नाम पर भारी अन्धविश्वास फैला हुआ है और सीधे-सीधे भारतीयों का मंत्रों पर अनादि विश्वास झूठे दृष्टाओं ओझाओं की सहायता करता है। ये ओझा और तथाकथित मंत्रविद जानते कुछ नहीं, लोगों की श्रद्धा का दोहन करते रहते हैं पर सचमुच ही यदि मंत्र शक्ति के विज्ञान को समझकर उसे प्रयोग करने की विधि जान ली जाये तो जो शक्ति आज लोगों को बरगलाने में प्रयुक्त हो रही है, वह लोक-मंगल के काम आ सकती है आज यह बात विज्ञान भी मानता है।

कैलीफोर्निया अमेरिका में हुए एक प्रयोग में एक वैज्ञानिक ने एक सैकिण्ड में पाँच करोड़ से अधिक कम्पन वाली ध्वनि पैदा कर दी उस क्षेत्र में रुई का टुकड़ा पड़ा था वह अकस्मात जल उठा वैज्ञानिकों के कपड़े इतने गर्म हो उठे कि यदि वे कुछ देर के लिये उस क्षेत्र से अलग नहीं हो जाते और ध्वनि का कम्पन थोड़ा और तीव्र हो जाता तो उनके शरीर के कपड़े भी जलने लगते।

प्रयोग का विश्लेषण करते हुए वैज्ञानिकों ने बताया है कि मनुष्य कम से कम 20 और अधिक से अधिक 20000 कम्पन वाली ध्वनि सुन सकता है। कुछ व्यक्ति खास कर वृद्ध लोग इसके अपवाद हो सकते हैं अन्यथा इस सीमा से बाहर वाले कंपनों की ध्वनि कानों से सुनी नहीं जा सकती पर उसका अस्तित्व इतना शक्तिशाली होता है कि बादलों के गर्जन से जिस प्रकार सारे प्राकृतिक परमाणु काँप जाते हैं उसी प्रकार यह ध्वनि कम्पन जहाँ से भी गुजरते हैं तीव्र हलचल उत्पन्न कर देते हैं। जीवों को नष्ट कर देना परमाणुओं को उछाल कर उड़ा ले जाना, उन्हें शक्ति में बदल देना, यह सब कर्णातीत ध्वनि की तीव्रता पर निर्भर करता है। योग पद्धति में मंत्र के उच्चारण से उत्पन्न ध्वनि को शब्द-शक्ति ही विद्युत प्रदान करती है जबकि मानवीय इच्छा-शक्ति उस पर नियंत्रण करके कोई भी कार्य कर सकने में समर्थ होती है। जप और ध्यान, नाद (शब्द या ध्वनि कम्पन) और बिन्दु साधना का सम्मिलित रूप है उससे सृष्टि के विराट से विराट और अणु से अणु कण का भेदन भी संभव हो जाता है। इसलिये मंत्र की शक्ति को अकूत माना जाता है और अनुमान किया जाता है कि इस शक्ति की उल्लंघन विधि (ब्रह्मा) विष्णु महेश तथा कोई अन्य देवता भी नहीं कर सकता।

इंग्लैंड की बी. एफ. गुडरिच कंपनी के रिसर्च डाइरेक्टर डॉ. एल सेमान, इस बात के परीक्षण कर रहे हैं कि सूक्ष्म ध्वनि तरंगें प्राकृतिक व कृत्रिम परमाणु की संरचना पर किस प्रकार प्रभाव डालती हैं और इनका उपयोग पृथ्वी के अंतराल ग्रह नक्षत्रों के अन्तराल का पता लगाने में किस प्रकार उपयोग किया जा सकता है। गायत्री उपासना द्वारा सूर्य के अंतराल का वेधन करके वहाँ के परमाणुओं में हलचल उत्पन्न होना इसी सिद्धान्त के अंतर्गत है जैसा कि चमगादड़ के उदाहरणों से स्पष्ट है। एक बार इटली के जीव विशेषज्ञ स्पालानजानी ने चमगादड़ को अन्धा करके उड़ाया। चमगादड़ में एक अलौकिक क्षमता यह होती है कि कितने ही तीव्र अन्धकार में बारीक से बारीक धागों की सैकड़ों बाधाओं को पार करता हुआ बराबर एक ही गति से उड़ता रहता है। किसी भी डोरे से टकराता नहीं। स्पालानजानी ने चमगादड़ के मुँह, तथा नाक बन्द करके परीक्षण किये तो एक बात स्पष्ट हो गई कि चमगादड़ बाधाओं को पार करने में कर्णातीत ध्वनि का उपयोग करता है पीछे इस बारे में नये तथ्य प्रकाश में आये और पता चला कि चमगादड़ भागते समय हलकी चीख निकालता है वह वस्तु से प्रतिध्वनित होकर लौटती है और चमगादड़ के “रेटीक्युलर फार्मेशन” (मस्तिष्क का वह भाग जहाँ हिन्दू चोटी रखते हैं) की संवेदनशील नाड़ियों द्वारा उसको यह सूचना दे देते हैं कि वस्तु कैसी है। किस दिशा में है आदि। मंत्रधारण में कर्णातीत ध्वनि निकलती है। उसे भावनाओं की विद्युत शक्ति जितनी अधिक मात्रा में मिलती है उतनी ही तीव्रता से यह आकाश के परमाणुओं को कँपाती हुई ध्यान वाले स्थान तक दौड़ी चली जाती है। यह जानने वाली-बात है कि आकाश भी शून्य नहीं है। उसमें करोड़ों सूक्ष्म परमाणु बाल्टी में पानी की भाँति भरे और गतिशील हैं। साधारणतया ध्वनि चारों दिशाओं में फैलती है पर मंत्रों में शब्द इस प्रकार गुंफित होते हैं कि उसकी ध्वनि तरंगें विशेष प्रकार की हो जाती हैं। गायत्री मंत्र की ध्वनि तरंगें तार के छल्ले जैसी ऊपर उठती हैं और यह सूक्ष्म अन्तराल के परमाणुओं के माध्यम से सूर्य तक पहुँचती हैं और जब यही ध्वनि सूर्य के अन्तराल से प्रतिध्वनित होकर लौटती है तो अपने साथ प्रकाश अणुओं की (गर्मी, प्रकाश व विद्युत सहित) फीज जप करने वाले के शरीर में उतारती चली जाती है। साधक उन अणुओं से शरीर ही नहीं मन और आत्मा की शक्तियों का विकास करता चला जाता है। और कई बार वह लाभ प्राप्त करता है जो साँसारिक प्रयत्नों द्वारा कभी भी संभव न होते।

साधक के अन्तःकरण में इन्द्रियातीत दृश्यों की अनुभूति, भविष्य की सूचना वाले स्वप्न भी यंत्र जप के परिणाम होते हैं यही स्थिति एक दिन नाद की उच्चतम अवस्था “ऊँ” कार की स्थिति तक पहुँचा देती है। प्रमाण स्वरूप पिट्सबर्ग (अमरीका) की वेस्टिंग हाउस कि सर्च लैबोरेटरी के इंजीनियरों सर्व श्री डब्लू-एच पाकला, जे-एच-थामसन और आर-ए-लेस्टर द्वारा बनाये उस उपकरण को प्रस्तुत किया जा सकता है जो इन दिनों बिजली के लीकेज का पता लगाने में प्रयुक्त होता है। विद्युत जहाँ से लीक होती है वहाँ हलका लीलम प्रकाश भी पैदा करती है और चटखने की आवाज भी। गति कोई भी हो उसमें स्पन्द के और प्रत्येक स्पन्दन (वाइब्रेशन) की एक सूक्ष्म ध्वनि होती है। पर इसे हमारे कान नहीं सुन सकते। इस यंत्र में दो 20 के लगभग ट्रान्स डयूगर और टेलिस्कोप लगाये जाते हैं जो उस स्थान पर जहाँ से बिजली लीक होने से कर्णातीत कम्पन पैदा हो रहे थे, इसी और स्थिति का ज्ञान करा देते हैं। अर्थात् उस स्थान से शब्दों का आया हुआ कम्पन उस स्थान की स्थिति के दृश्य और शब्दों तक का ज्ञान करा देता है। यही मंत्र-जप के साधकों के साथ भी होता है। आवश्यकता केवल भावनाओं की तीव्रता भर की होती है।

सूक्ष्म ध्वनि शक्ति से इन दिनों चिकित्सा और औद्योगिक क्षेत्रों में क्रान्तिकारी परिवर्तन हो रहें हैं। चिमनी से निकले धूएं को 95 प्रतिशत में बदल देने, रोग ठीक करने, इस्पात की चदरों की कटाई, लाण्ड्री, सिंचाई के साधनों में इस शक्ति का उपयोग बिजली की तरह होने लगा है। इससे कोहरा दूर करके यह सिद्ध कर दिया गया है कि शब्द प्रकृति को भी जीत सकता है। इस दिशा में इंग्लैंड और अमेरिका में तत्परतापूर्वक खोजें हो रही हैं और आशा की जाती है कि कर्णातीत ध्वनि से एक दिन खगोल विज्ञान में आश्चर्यजनक प्रगति होगी। इन प्रगतियों ने एक बार फिर से हमें उस स्थान पर लाकर खड़ा कर दिया है जहाँ से आवाज आती है-क्यों न हम अपने मंत्र विज्ञान को फिर से जागृत कर उसकी महान शक्ति से लाभान्वित हों। इस शक्ति से भौतिक और आध्यात्मिक सभी तरह के लाभ प्राप्त किये गये हैं किये जा सकते हैं।


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मंत्र तोप के गोले से भी बलवान होता है। क्योंकि यदि हम उसकी विचारणा को भी आत्म सात कर लें।


भिखारी बालक मिल गया

एक बार विद्यासागर को रास्ते में एक भिखारी बालक मिल गया। वह उनके सामने हाथ फैलाकर एक पैसा माँगने लगा। विद्या सागर ने पूछा “यदि मैं तुम्हें एक पैसे के स्थान पर एक रुपया दे दूँ तो तुम उस का क्या करोगे।” वह बालक रुपये की बात सुनकर बहुत प्रसन्न हुआ उसने कहा ‘बाबूजी! मैं भीख माँगना ही छोड़ दूँगा।

विद्यासागर उसके हाथ पर एक रुपया रखकर आगे बढ़ गये। कुछ वर्षों बाद विद्यासागर फिर उसी बाजार से जा रहे थे। सामने से एक युवक धोती कुर्ता पहने आया और झुककर उन्हें प्रणाम किया। विद्यासागर भी रुक गये तो उसने निवेदन किया ‘बाबूजी! कृपया मेरी दुकान पर चलकर उसे पवित्र कीजिये।’

विद्यासागर उस युवक की बात न टाल सके। थोड़ी ही देर में फल की बड़ी दुकान के सामने उन्होंने अपने को खड़ा पाया। युवक ने कहा ‘यह दुकान आपकी ही है। शायद आपको याद होगा कि एक बार भिखारी को एक पैसे के बदले में आपने एक रुपया दिया था और यह मंत्र सिखाया था कि मनुष्य को अपनी आजीविका आप कमानी चाहिये उसी रुपये से मैंने फलों का व्यवसाय शुरू कर दिया और आज इतनी बड़ी दुकान है।’

विद्यासागर बहुत प्रसन्न हुये। और अधिक उन्नति करने का आशीर्वाद देते हुए उन्होंने कहा-बेटा जो लोग तुम्हारी तरह शिक्षा ग्रहण करते हैं उनके लिये यह सफलता कोई आश्चर्यजनक बात नहीं है।


प्रकृति जब महाकाली बन गई।

मार्च का महीना प्रारम्भ हुआ ही था कि एकाएक मौसम में विलक्षण परिवर्तन दिखाई देने लगे। आमतौर पर यह महीना शीत के उतार का होता है किन्तु एकाएक शीत बढ़ी, आँधियाँ चलने लगीं, बर्फीले तूफानों की गरज से अमरीका के न्यूयार्क व दक्षिणी ओटेरियों के क्षेत्रों में प्रलय की सी स्थिति उत्पन्न हो चली। बात सन् 1848 की है आज से कोई 112 वर्ष पूर्व की। लोगों के दिल किसी अज्ञात अनिष्ट की कल्पना से काँप उठे।

मनुष्य बड़ा शक्तिशाली है पर मनुष्य बड़ा निर्बल और कमजोर भी है क्योंकि वह ज्ञान-विज्ञान का इतना क्षेत्र विकसित कर लेने पर भी प्रकृति को जीत नहीं सका प्रकृति का संदेश मनुष्य को व्यवस्थित और अनुशासित जीवन जीते हुए आत्म-कल्याण करने का है, वह प्राणि-मात्र को पुत्र की भाँति पालती है। अपनी छाती पर हल चलाना, अन्न देने की, खाद और पानी के बदले मधुर फल देने की, जलती जगती को अरबों नदियाँ सरोवर और समुद्र भर देने की ममता उसी ने दिखलाई। प्रकृति की गोद में ही मनुष्य सुखी-जीवन यापन करता है इस दृष्टि से वह पूज्य और संरक्षणीय है पर आज के मनुष्य ने प्रकृति की इस देवोपम महत्ता को ठुकरा दिया, उल्टा उसे जीतने का समर रच डाला तो प्रकृति को भी अपनी सामर्थ्य और सर्व शक्ति सत्ता का परिचय देना ही पड़ा। शीत लहर, भीषण गर्मी अति जल वृष्टि सूखा जैसे प्रकोप मानवीय दुष विवादों के ही परिणाम होते हैं। पर इस काँड ने तो सचमुच खंड प्रलय जैसा ही दृश्य उपस्थित कर दिया। नियाग्रा जैसा जल प्रपात जो 181 1। 2 फीट ऊँचा और 3630 फीट चौड़ा है और संसार के सात आश्चर्यों में गिना जाता है जो मनुष्य की अद्वितीय सामर्थ्य का परिचायक माना जाता है, उसके प्रवाह को भी रोककर प्रकृति ने मनुष्य को एक सबक दिया है कि हे! मनुष्य तू सृष्टि का नियामक नहीं तुझसे अनन्त गुनी शक्ति वाली सत्ताएं इस सृष्टि में विद्यमान हैं। वही संसार का नियमन करती हैं उनकी इच्छा से ही तू आगे बढ़ सकता है। देवशक्तियों का तिरस्कार करके तो तेरे सुविधाजनक जीवन की भी कल्पना नहीं हो सकती है।

प्रकृति इस तरह के पाठ न पढ़ाती तो मनुष्य उद्दंड हो गया होता उसने ईश्वरीय अस्तित्व को बिल्कुल ही ठुकरा दिया होता इसीलिये जब-जब मनुष्य दुर्बुद्धि ग्रस्त होता है। प्रकृति मनुष्य को ऐसे दंड निश्चित रूप से देती है। उन दिनों अमरीका का यह भाग पाप और दुर्गुणों का जमघट बन गया था। अभी मौसम का प्रकोप प्रारम्भ ही हुआ था कि वहाँ के धर्माचार्यों और भविष्य वक्ताओं ने घोषणा कर दी कि प्रलय आने वाली है, लोगों के पाप बहुत बढ़ गये हैं इसलिये भगवान पुरानी सृष्टि नष्ट करके नई सृष्टि उत्पन्न करेंगे। नये मनुष्य भले ही न गढ़े हों पर इस प्रकोप ने सचमुच ही सैकड़ों हजारों लोगों को नष्ट कर दिया, जो कभी मंदिरों में नहीं गये थे, जिन्होंने फिल्मी गीत गाये थे पर भक्तिगान जिनके ओठों को छू नहीं गया था। उन्हें भी मंदिरों में जाते और भगवान् की प्रार्थना करते देखा गया। पहली बार परस्पर सेवा, प्रेम भावना और मनुष्य का मनुष्य के प्रति इस तरह आदर करते देखकर वहाँ का हर विचारशील व्यक्ति यही कहता था कि मनुष्य सदा ही इस तरह प्रेम भाव और भाई चारे का जीवन जिए तो क्यों प्रकृति को दंड देने की स्थिति में आना पड़े। अब यह घटना समाप्त हो जाने के भी बहुत समय बाद तक लोग पाप करने की हिम्मत नहीं करते थे। सचमुच कुछ समय के लिये उस क्षेत्र में स्वर्गीय स्थिति का आभास होने लगा था।

मार्च का पूरा महीना इसी तरह अंधड़ और बर्फीली तूफानी वर्षा शीत शहर के साथ बीता। 30 मार्च को तो यह झंझावात अपनी पराकाष्ठा पर थे। चारों और त्राहि-त्राहि मच गई पहाड़ियों पर पहाड़ियां बर्फ से ढक गईं। मकानों पर बर्फ की चादरें बिछ गईं। यही अनुमान हो रहा था कि यदि यह स्थिति एक दो दिन और रही तो सारे अमरीका और कनाडा का अन्त ही हो जायेगा। लोग घरों में व्यक्तिगत व सामूहिक रूप से गिरजा घरों में पूजायें किये जा रहे थे। धर्माचार्यों का धर्म शिक्षण तेज हो गया। कथा कीर्तनों का दौर दिन भर चलता रहा।

उस रात एकाएक मौसम बदल गया। हवा शान्त हो गई, बादल बिलकुल साफ हो गये, बर्फीला तूफान रुक गया शीत में कमी आ गई। इस आकस्मिक परिवर्तन ने लोगों को और भी विस्मित कर दिया। सभी यह कहने लगे कि यह प्रलय की पूर्वावस्था है जिस प्रकार बुझने से पूर्व दीपक एक बार तेज लौ करता है उसी प्रकार उसे लोगों ने प्रलय की पूर्णावस्था ही माना है।

तभी लोगों को कोई कमी सी महसूस हुई- सवेरा होता आ रहा है किन्तु कल-कल हर-हर वाली नियाग्रा जल प्रपात की ध्वनि सुनाई नहीं दे रही है। पहले वह लोगों को थपकी देकर सुलाने का काम करती थी पर आज जब सब लोग जाग रहे हैं तो उसका जलरव सुनाई नहीं पड़ रहा। अभी वर्षा हो चुकी है उसे तो और भी भीषण हाहाकार करते रहना चाहिए था यह क्या कि नीरव निस्तब्धता छा गई है। लोग प्रपात की ओर दौड़े। जाकर देखा कि सवा सौ फुट गहराई वाले प्रपात में पत्थर ही पत्थर बिछे हैं। जल का एक कण भी वहाँ नहीं। उंगली जिसके मुँह में थी मुँह में रह गई जिसके सिर में थी बाल खुजलाती रह गई लोगों में सोचने की शक्ति थी वह नष्ट सी हो गई। अवाक् एक दूसरे का मुँह ताकते नियाग्रा के किनारे करोड़ों लोगों की भीड़ खड़ी थी तो भी इतनी नीरवता छाई थी कि पत्थर में एक सुई गिर जाती उसका भी स्वर सुनाई दे जाता है। नियाग्रा जिसमें एक सेकेंड में 1000 टन जल बहता है। उसका एकाएक रुक जाना ऐतिहासिक घटना थी लोग विस्मित थे कि ऊपर की साँस न तो नीचे आ रही थी न नीचे की साँस ऊपर, लगता था, आसमान से कोई तारा टूटकर भूमण्डल पर गिरने और उसे नष्ट-भ्रष्ट करने वाला हो।

पादरी ने कहा लोगों! प्रार्थना करो अब हम सब की रक्षा भगवान ही कर सकते हैं। जो जहाँ था वहीं बैठकर प्रार्थना करने लगा। अभूतपूर्व दृश्य था वह भी- जिसने एक बार सारे अमरीका और कनाडा को आभानुभूति और ईश्वर के अस्तित्व द्वार पर लाकर खड़ा कर दिया।

प्रार्थना दोपहर तक चलती रही। आखिर भगवान ने उन सब की सुनी। सूर्य जितना ऊपर चढ़ आया धीरे-धीरे वैसे ही जलरव धीमें-धीमें सुनाई देना प्रारम्भ हुआ। जलधारा भयंकर अवस्था में करुणा का दृश्य उपस्थित करती चली आ रही थी। लोगों के उस दृश्य का, उस जल राशि का स्वागत किया। काँपते अन्तःकरणों में फिर से नई आशा का संचार हुआ।

कुछ लोग कहते हैं कि पहाड़ पर तापमान बिलकुल गिर जाने से सारा जल बर्फ हो गया होगा इसलिए नियाग्रा का बहना बन्द हो गया होगा जहाँ तक बर्फ जमी होगी वहाँ के आगे का पानी बहकर निकल गया होगा इसलिये बीच का स्थान सूना पड़ गया होगा। पर दूसरे विशेषज्ञ कहते हैं। पहाड़ में अभ्रक और सल्फर आदि की ऐसी खाने हैं जिसकी उपस्थित में जल कभी जम ही नहीं सकता। चाहे कितनी शीत हो प्रपात को बहते ही रहना चाहिये था। यदि मैदानी भाग में पानी जम जाता तो आस-पास के क्षेत्र में बाढ़ आ जानी चाहिये थी पर ऐसा भी नहीं हुआ। सचमुच वह कौन सी शक्ति थी जिसने नियाग्रा जैसे जल प्रपात को रोक दिया यह अभी तक रहस्य ही बना हुआ है। यदि यह सब प्रकृति का ही खेल था तो भी यह तो मानना ही पड़ेगा कि यह उसका महा रौद्र रूप था। मनुष्य को सीधी राह लाने के लिये कभी-कभी उसे यह वीभत्स रूप भी धारण करना पड़ता है। प्रलय उसी का नाम है। वह आगे भी हो सकती है। हमारी बुद्धिमत्ता तो इसमें है कि हम प्रकृति माता को नष्ट न करें वरन् उनको प्रतिष्ठा दें ताकि उनकी कृपा और प्यार भरा आशीर्वाद हम पर हमेशा बरसता रहे।


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प्रकृति परमात्मा की इच्छा-शक्ति का अभिव्यक्ति रूप है।

मनुष्य के तमाम पाप और उसकी तमाम भूलों का सुधार प्रकृति एक माता की तरह रमण करती है इसलिये वह उपाय है उपभोग नहीं।


हिमालय में अमर आत्माओं का रहस्य

पश्चिमी कमान के सैनिक कमाण्डेन्ट श्री एल. पी. फैरेल एक बार कुमायुँ नरेश के साथ हिमालय की यात्रा पर गये। बात लगभग 1940 की है तब यहाँ अँग्रेजों का शासन था। एक उच्च पदाधिकारी होते हुए भी उनकी धर्म में बड़ी आस्था थी, उन्होंने गहन आध्यात्मिक तथ्यों का पता लगाया जिनका उल्लेख उन्होंने अपने जीवन परिचय में किया है।

एक दिन उनकी भेंट एक महात्मा से हुई। महात्मा ने पराशक्ति द्वारा प्रेरणा देकर भारत के मैदानी भाग से एक युवक को बुलाया था। उन्होंने उस युवक से कहा-वत्स! मैं तुम्हारा एक जन्म का नहीं कई जन्मों का मार्गदर्शक हूँ। तुम्हें इसलिये बुलाया है कि तुम भी अन्य व्यक्तियों की तरह ही आत्मिक शक्ति साँसारिक सुखोपभोग और तुच्छ इन्द्रिय वासनाओं में खर्च मत कर देना। भारतवर्ष की आध्यात्मिक जागृति के लिये मैं तुम्हें सदैव से ही तपाता चला आ रहा हूँ। अब भारत में स्वर्ण-युग आने वाला है उसके लिये लोगों को आध्यात्मिक धार्मिक एवं नैतिक शिक्षण का काम तुम्हें करना है। इसके लिये तुम्हारे अन्दर जो शक्ति जागृत होगी उसके लिये पहले साधना करनी पड़ेगी। तुम्हें उन साधनाओं की जानकारी के लिये ही यहाँ बुलाया है।

इस घटना का उल्लेख करते हुए श्री फैरले लिखते है कि-युवक ने प्रश्न किया-भगवन् मेरी बुद्धि पर अज्ञान का पर्दा चढ़ा है मैं कैसे जानूँ कि आप मेरे बहुत समय से मार्गदर्शक रहे हैं? इस पर महात्मा ने एक प्रयोग दिखाया ठीक चल-चित्र की भाँति। वह चित्र मैंने स्वयं देखा। महात्मा ने किसी अज्ञात शक्ति से ऐसा किया। वह चित्र देख कर मुझे ऐसा लगा कि इन महात्मा की आयु 1000 वर्ष भी हो सकती है बल्कि इससे भी अधिक हो सकती है।

उनकी शारीरिक बनावट में क्रमशः अन्तर होता गया था जिससे पता चलता था कि इन्होंने कई बार स्थूल शरीर का कायाकल्प किया है। यह सब मैं उनकी कृपा से ही जान पाया उसके बाद न तो मैं दुबारा उन सन्त के दर्शन कर सका और न ही उस युवक के बारे में ही कुछ जान सका जिससे उन महात्मा ने कहा था-आने वाले युग में लोगों की जीवन पद्धति क्या हों, जिसमें धर्म अध्यात्म, भारतीय संस्कृति का भी समावेश रहे, इसका तुम्हें मार्गदर्शन करना है।

“योगी की आत्म-कथा” के परिच्छेद 34 में सुप्रसिद्ध भारतीय योगी श्री श्यामाचरण लाहिड़ी के जीवन की घटना का भी एक ऐसा ही उल्लेख है जिससे पता चलता है कि उन्हें भी किसी हिमालयवासी महात्मा ने आत्म-प्रेरणा से बुलाकर योग-विद्या सिखाई जिससे योग को नष्ट होने से बचाया जा सके। कुछ दिन पूर्व कल्याण में एक साधु की हिमालय के दुर्लभ प्रान्तों की यात्रा का वर्णन छपा था। वर्णन अतिरंजित जैसा था उसमें यह बताया गया था कि उसने हिमालय में महाभारत काल के मनीषियों को समाधिस्थ देखा है। वहाँ अग्नि-धूनियाँ जल रही हैं बरगद के वृक्ष खड़े हैं वहाँ का दृश्य बिलकुल ऋषि आश्रमों जैसा आज भी है।

यह श्रद्धा पोषित घटनायें कही जा सकती हैं। पर पिछले दिनों एवरेस्ट पर चढ़ने के जितने भी अभियान हुये हैं उन सब में एक प्रश्न चिन्ह हिम-मानव का उभरा है। ऊँचे चढ़ने वाले पर्वतारोहियों में से प्रायः सभी ने या तो हिम-मानव की आकृति अथवा पैरों के निशान देखे जाने का जिक्र किया है। किन्तु इस हिम-मानव के सम्बन्ध में अब तक कोई सुनिश्चित जानकारी नहीं दे सका। प्रश्न अब भी रहस्यमय बना हुआ है।

शिव, भैरव, हनुमान, अश्वत्थामा आदि प्राचीन देवी-देवताओं और सिद्ध महापुरुषों के अमर होने का उल्लेख भारतीय धर्म ग्रन्थों में बहुतायत से मिलता है। कल्कि पुराण में एक आख्यायिका आती है-जब कल्कि भगवान् ने देखा कि सारा संसार काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर आदि विकारों में आकंठ डूबा पड़ा है आत्माओं का प्रकाश नष्ट हो चुका है तो उन्होंने अज्ञानान्धकार में भटकते लोगों के उद्बोधन और उन्हें स्वर्ग और बन्धन मुक्ति का मार्ग दिखाने का निश्चय किया। अन्धकार बड़ा गहरा था। लौकिकता भौतिकता और इन्द्रिय वासनाओं से सारा संसार बुरी तरह जकड़ा हुआ था कल्कि भगवान ने मोहान्धकार में डूबे विश्व को जगाने के लिये जो शक्ति चाहिए उसमें कमी अनुभव की, तब उन्हें उनके गुरु परशुराम ने हिमालय बुलाया और जहाँ स्वयं उन्होंने तप किया था वहाँ तप कराकर उनमें उस प्रचंड शक्ति का जागरण कराया जो युग-परिवर्तन के लिये अनिष्ट थी।

भगवान परशुराम का जन्म कई सतयुगों से पूर्व वैदिक-युग का है कलियुग में भी उनकी उपस्थिति उनकी अमरता का द्योतक है और इस बात का घोषणा पत्र भी कि उन जैसी अमर आत्मायें अभी भी हिमालय में हैं। डॉ. हरिदत्त भट्ट शैलेश ने धर्मयुग के 23 अगस्त 1964 के अंक में अपने “जाँवली (गढ़वाल) पहाड़ी जो 22000 फुट ऊँची है, के पर्वतारोहण का रोचक वर्णन देते हुए स्वीकार किया है कि वहाँ पर हिमस्खलन की एक भयंकर दुर्घटना से किसी शक्ति ने ही-बलात् बचाया अन्यथा हम सब के सब वहीं दब कर मर गये होते। यह सब घटनायें इस तथ्य की ही पुष्टि करती हैं कि हिमालय में प्रचंड अतीन्द्रिय क्षमताओं वाली अमर आत्मायें अभी भी हैं और अनन्त काल तक रहेंगी।

अमरता भारतीय योग की ही उत्कण्ठा नहीं है आज के वैज्ञानिक भी अमरता की शोध बड़ी तत्परता से कर रहे हैं। रूस, फ्रान्स, ब्रिटेन, जर्मनी सभी देशों के जीव-वैज्ञानिक वृद्धावस्था और मृत्यु के कारणों की खोज लम्बे अर्से से करते आ रहे हैं। अकेले अमरीका में एक हजार से अधिक दल इस दिशा में सक्रिय हैं और उन्होंने अपनी अब तक की उपलब्धियों के आधार पर भी यही निष्कर्ष निकाले हैं कि मृत्यु कोई आवश्यक घटना नहीं, वृद्धावस्था एक प्रकार का रोग है। यदि उसका उचित उपचार मिल जाये तो मनुष्य हजारों वर्ष तक जी सकता है। आयुर्वेद में कायाकल्प के जो विधान दिये हैं वह भी इसी सिद्धान्त की पुष्टि करते हैं। अब तो विज्ञान स्पष्ट रूप से उन बातों को स्वीकार करने लगा है।

मृत्यु वस्तुतः काल की सीमा नहीं वरन् शरीर की व्यवस्था में व्यतिक्रम का परिघटित रूप मात्र है। युवावस्था में जिस शरीर की माँसपेशियों का भार 100 पौण्ड होता है वृद्धावस्था में कुल 70 पौण्ड रह जाता है। उसी के अनुरूप शारीरिक शक्ति भी कम हो जाती है। युवा शक्ति का हृदय 6 लीटर रक्त पंप करता है। वृद्ध का 3 ही लीटर फेफड़े अपनी आधी क्षमता खो देते हैं। मस्तिष्क से शरीर और शरीर से मस्तिष्क को समाचार लाने ले जाने वाले तंत्रिका तंतुओं की शक्ति में 15 प्रतिशत का ह्रास हो जाता है। मस्तिष्कीय द्रव्य का भी भार 3.03 पौण्ड से घटकर 2.27 पौण्ड रह जाता है। शारीरिक क्षमताओं में धीरे-धीरे ह्रास ही वृद्धावस्था का कारण और जीवन गति का रुक जाना ही मृत्यु है। यदि जीवन की गति को प्रखर रखा जा सके और शरीर को बनाने वाले कोशों के नवीनीकरण की क्रिया में अंतर न आने दिया जाये तो मनुष्य को चिरकाल तक जीवित रखा जा सकता है, जीवन तत्व (जीन्स) अमर पदार्थ है यदि वह नष्ट नहीं होता तो शरीर के नष्ट होने का कोई कारण नहीं होना चाहिये यह तो हमारी जीवन पद्धति का दोष है कि हम अपने जीवन प्रवाह को कमजोर बनाकर शरीर को भी कमजोर बना डालते हैं।

आयुर्वेद पर दृष्टिपात करने से पता चलता है कि प्राचीन काल के ऋषि मनीषियों ने उन पौधों, जड़ी-बूटियों, फलों और रसायनों का पता लगा लिया था जो शरीर के स्थूल कोशों को निरन्तर बदलते रहने में सहायक होते हैं। यह बात अब विज्ञान भी मानता है और विज्ञान जगत का यह एक बहुचर्चित मुहावरा बन गया है कि- “मनुष्य आहार नहीं खाता, आहार स्वयं मनुष्य को खाता है”। हमारा स्थूल शरीर रक्त से पोषण पाता है। रक्त नाड़ियों के रूप में सारे शरीर को ऑक्सीजन देता है। ऑक्सीजन और दूसरे “नर्क्स फलूड” ही शरीर में चेतना का संचार करते हैं। यह सब भावनाओं द्वारा होता है। विचार और भावनायें ही शरीर में हारमोन्स का स्राव करती हैं। यह हारमोन्स ही शरीर की सारी गतिविधि (मेटाबॉलिज्म) का नियंत्रण करती हैं। इससे प्रकट होता है कि अन्तिम रूप से शरीर के पोषण और उसे स्वस्थ रखने का सर्वाधिक उत्तरदायित्व भावनाओं और विचारों या वास्तविक जीवन तत्व को ही है। साल्योन नामक पक्षी को देखा गया है कि वह अंडा देने के बाद ही रोग का शिकार हो जाती है। खोज करने से पता चला है कि अंडा देने के बाद उसकी पिचुट्री ग्रन्थि (यही विचार या भाव संस्थान है।) उत्तेजित हो उठती है और उससे ए.सी.टी.एच. हारमोन्स भारी मात्रा में स्रावित होने लगता है जिससे वह बीमार पड़ जाती है। ऐसा कई जीव जन्तुओं के बारे में होता है। इससे यह प्रतिपादित होता है कि यदि मनुष्य अपनी विचार-प्रणाली को सशक्त बनाकर काम ले और अपना आहार सूक्ष्म रखे तो वह इच्छानुसार आयु बनाये रखने में समर्थ हो सकता है।

विचार नियंत्रण प्रणाली का अभी तक पाश्चात्य वैज्ञानिक ज्ञान नहीं कर सके। अपनी भावनाओं में क्या ऐसी भी शक्ति है कि वे आकाश में तैरते हुए जीवन प्रवाह (जीन्स) को बिलकुल शुद्ध रूप में ग्रहण कर सकें यह विद्या अभी केवल भारतीय योगी जानते हैं पर अब वैज्ञानिक भी उसकी पुष्टि करने लगे हैं उदाहरण के लिये सन् 1929 में स्ट्रासबर्ग के कुछ जीव वैज्ञानिकों ने बत्तखों पर “जीन्स” बदलने का प्रयोग किया। कैम्पबेल और पेकिस जाति की दो बत्तखें चुनी गईं। एक के डी.एन.ए. (कोश का पैड़ी नुमा वह सूक्ष्म भाग जिसमें जीवन रहता है) दूसरे के दूसरे के पहले में प्रवेश कराये। इससे दोनों के रंग में परिवर्तन दिखाई देने लगा। कुछ ही दिन में कैम्पबेल का खाकी रंग पेकिस में उभरने लगा और कैम्पबेल की गर्दन श्वेत पड़ने लगी।

विज्ञान ऐसे थोड़े प्रयोग कर सकता है। एक दो गुण-सूत्र बदल लेना सफलता की प्रारम्भिक सीढ़ी है। 10 अरब मनुष्य के प्रजनन कोशों में “न्यक्लिऔआइड़ों” के लगभग दस अरब जोड़े होते हैं। प्रत्येक जोड़े में 46 गुण सूत्र। अभी इन में परिवर्तन करके मनुष्य के स्वभाव में ही परिवर्तन करना कठिन हो रहा है। अभी तो शरीर में कुछ ऐसे कोश हैं जो एक बार बनने के बाद कभी भी बदलते नहीं उन्हें स्वस्थ रखे जाने का प्रश्न तो और भी टेढ़ा है विज्ञान को वहाँ तक पहुँचने में लम्बा समय लग सकता है पर योग विज्ञान और भारतीय रसायन पद्धति में वह ज्ञान पहले से ही विद्यमान है यदि उसे खोजा जा सके तो मनुष्य को इच्छानुसार जीवित रख सकना कोई कठिन बात नहीं जैसा कि हिमालय के उपरोक्त उदाहरणों से स्पष्ट है।

यह सब कठिन साधनाओं के अतिरिक्त उपयुक्त वातावरण पर भी निर्भर है। अनेक वैज्ञानिकों ने उसके लिये ऐसे तापमान की आवश्यकता बताई है जो शून्य से भी कम हो। ‘स्पेश ओडिसी’ में श्री क्लार्क ने भी लिखा है कि 200-200, 400-400 वर्षों में पूरी होने वाली अन्तरिक्ष यात्राओं में मनुष्य को सुषुप्त रखकर उन्हें लम्बी आयु प्रदान करने में शून्य तापमान से कम तापमान आवश्यक होगा। इन सब उदाहरणों से स्पष्ट है कि यदि हिमालय में ऐसी कोई अमर आत्मायें हों तो उसे आश्चर्य न मानकर सत्य माना जाये यदि यह आत्मायें इस देश को जागृत करने और अध्यात्म ज्ञान की एक नई दिशा देने का प्रयत्न कर रही हों तो इसे भी आश्चर्य न मानकर तथ्य और सत्य ही माना जाना चाहिये।


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जीवात्मा अमर है नष्ट होने वाला तो शरीर है इसलिये अमरत्व पाना है तो शरीर नहीं आत्मा की उपासना करो।

-रामकृष्ण परमहंस


आत्मा के कल्याण की साधना

गौतमी नामक स्त्री का इकलौता पुत्र मर गया। वह शोक-संतप्त भगवान बुद्ध के पास आई और उसे जिन्दा करने को कहने लगी। भगवान बुद्ध ने उससे परसों के कुछ दाने, उस घर से लाने को कहा जहाँ कोई भी न मरा हो वह गाँव में गई परन्तु ऐसा घर कोई न मिला।

उस दिन से गौतमी ने मृत्यु के दुःख का परित्याग कर दिया और अमर आत्मा के कल्याण की साधना में जुट गई।


स्वर्ग प्रवेश की योग्यता

स्वर्ग के द्वार पर आज, सोमवती अमावस्या पर गंगाजी के किनारे होने वाली भीड़ की तरह, प्रवेशार्थियों का ताँता लगा हुआ था। यम समझ नहीं पा रहे थे यह भीड़ कहाँ से उमड़ पड़ी? और यदि इन सबको स्वर्ग-प्रवेश की आज्ञा दे दी गई तो इतने लोगों को स्वर्ग में स्थान कहाँ मिलेगा? उन्होंने द्वारपाल को आज्ञा भेजकर स्वर्ग के द्वार बन्द करा दिये और घोषणा करा दी कि जब तक सम्यक् परीक्षा न ले ली जायेगी तब तक चाहे जिसको स्वर्ग में प्रवेश करने नहीं दिया जायेगा।

निषेधाज्ञा सुनते ही आगन्तुकों में खलबली मच गई। धैर्य छूट गया। धक्का-मुक्की करते हुए सब आगे बढ़ने का प्रयत्न करने लगे। द्वारपाल बेचारा दुविधा में डूब गया किस-किस की सुने, यहाँ तो सभी अपनी-अपनी प्रशंसा करते हुए स्वर्ग प्रवेश का अधिकार जता रहे थे। यम ने खिड़की से झाँककर देखा तो यह दृश्य देखकर उनके मुँह से यही निकला जो मनुष्यता का पहला पाठ-”अनुशासन और व्यवस्था” नहीं सीख सके वे भी यदि स्वर्ग के अधिकारी हो गये तब तो स्वर्ग और नरक में अन्तर ही क्या रह जायेगा।

उन्हें एक उपाय सूझा-चित्रगुप्त को आज्ञा देकर अविलम्ब एक विवरण पत्रक छपाया और उसे सभी प्रवेशार्थियों में बाँट दिया और घोषणा करा दी कि इस परीक्षा पत्रक में अपने जीवन के अच्छे बुरे कार्यों को अंकित करने के लिये रिक्त स्थान है। पहले सब लोग उन्हें भरकर दें, उसी के आधार पर स्वर्ग के योग्य व्यक्तियों का चुनाव किया जायेगा।

परीक्षा-पत्र बात की बात में बँट गये। उन्हें भरते भी देर न लगी। “क्या आपके जीवन में कोई बुराई रही है? क्या आपने कोई खराब काम किया है? यह प्रश्न भी लगभग सभी पर्चों में कोरा ही था। कहाँ लोगों ने जीवन में किये गये अच्छे कार्यों के विवरण से परचे का पेट, पीठ सब रंगकर रख दिया था।

पर्चे लेकर उनकी जाँच के लिये यम एक स्थान पर बैठ गये। चित्रगुप्त उनकी बगल में बैठे ताकि पर्चों में लिखे विवरण की सत्यता प्रमाणित की जा सके। यह एक साधु का पर्चा था’- लिखा था- “मैंने जीवन भर तप किया है तप के अतिरिक्त कुछ नहीं किया इसलिये मुझे स्वर्ग का पहला अधिकार है”? यम ने चित्रगुप्त की ओर देखा-चित्रगुप्त आशय समझ गये बोले-महाराज! साधु ने तप तो किया है पर वे इतने अहंकारी रहे हैं कि भूलकर भी यह नहीं देखा कि समाज में कोई दीन-दुःखी भी है। किसी को मेरी सेवाओं का भी अधिकार है यह बात उनके मन में भूलकर भी नहीं आई।

‘हुँ’ कहकर यम-ने अगले पत्र-उठाये-यह सब उन लोगों के पत्र थे जिन्होंने लिखा था हमने आजीवन ज्ञान की साधना की वेद उपनिषद् से लेकर ब्राह्मण आरण्यक तक एक भी ग्रन्थ नहीं छोड़ा। हम ज्ञानी हैं, ब्राह्मण हैं अतएव स्वर्ग के अधिकार से हमें वंचित नहीं किया जा सकता।

यम ने फिर चित्रगुप्त की ओर देखा, वे बोले-महाराज यह कथन हैं तो सत्य पर इनके ज्ञान में व्यावहारिकता कभी नहीं आई। इनमें से एक ने भी अपने माता, पिता, पत्नी, पुत्र के साथ मीठा व्यवहार नहीं किया। पड़ोसी को कभी प्यार की दृष्टि से नहीं देखा? यह सब तो ईर्ष्या द्वेष की आग में झुलसते लोग हैं।

यम ने वह पर्चे भी एक तरफ रख दिये। अन्त में एक पर्चा एक वृद्ध का आया-लिखा था मुझे भूल से स्वर्ग ले आया गया, मुझे तो नरक जाने की इच्छा है ताकि वहाँ दीन-दुःखी लोगों की सेवा कर सकूँ, अज्ञान में डूबे लोगों को प्रकाश दे सकूँ।

यम ने चित्रगुप्त की ओर देखा भी नहीं उनसे कुछ पूछा भी नहीं-उसमें कुछ लिखा और वहाँ से उठकर चल दिये पीछे द्वारपाल ने परीक्षाफल की घोषणा की तो पता चला यम ने अकेले उस वृद्ध को ही स्वर्ग प्रवेश का अधिकारी घोषित किया है।


दिव्य शक्ति, संवेदना और तेज की संग्राहक-शिखा

हिन्दू के जीवन में आस्तिकता को जितना महत्व मिला है शिखा प्रत्येक हिन्दू के लिये एक अत्यन्त पवित्र और अनिवार्य प्रतीक होता था। प्राण दिये जा सकते थे शिखा नहीं। गुरु गोविन्द सिंह के पुत्रों ने जीवित बलि दे दी पर चोटी न कटाई। इतिहास इस बात का साक्षी है। प्राण जैसी महत्वपूर्ण वस्तु हँसते-हँसते दे देना पर हिंदुत्व के प्रतीक शिखा को न कटवाना यह संकेत करता है कि चोटी रखने का कोई बड़ा भारी रहस्य हिन्दू-तत्वदर्शन में है। अन्यथा उस पर मनीषियों ने इतना जोर नहीं दिया होता।

आर्ष ग्रन्थों में लिखा है।

चिन्द्रूपिणि महामाये दिव्यतेज समन्विते।

तिष्ठ देवि शिखा मध्ये तेजो वृद्धिं कुरुष्वमे॥

चेतना स्वरूप, महान महिमा वाली तथा दिव्य तेज प्रदान करने वाली, हे शक्ति! तुम हमारी शिखा में आओ बैठो और हमारे अन्दर तेजस्विता की वृद्धि करो।

दीर्घापुष्प वाय बलाय वर्च से।

शक्तये शिखाये वषट् ॥

तुम दीर्घ जीवन, बल, ब्रह्मवर्चस्व और शक्ति का संवर्धन करने वाली हो।

इन मंत्रों में शिखा के सूक्ष्म रहस्यों और उसके महान महत्व का प्रतिपादन किया गया है। सर्वप्रथम यह मानवीय चेतना का सम्बन्ध सृष्टि की अनादि चेतन शक्तियों से जोड़ती है। किसी रेडियो स्टेशन से संदेश प्रसारित करने हों तो उसे विद्युत तरंगों द्वारा किसी शक्ति-शाली ट्रान्समीटर द्वारा निक्षेपित करना पड़ता है। अन्तःकरण की भाव तरंगें किन्हीं देवशक्तियों तक पहुँचाने का वैसा ही कार्य शिखा करती है। बाहरी सन्देश और रेडियो तरंगों को ग्रहण कर आवाज में बदलने के लिये प्रारम्भिक आवश्यकता “एरियल” की होती है। मनुष्य शरीर जैसे दिव्य रेडियो और टेलीविजन सेट में वह कार्य शिखा से ही सम्पन्न होता है। इस तरह बाह्य और आन्तरिक शक्तियों का मूल बिन्दु शिखा को ही मानना चाहिए।

बरगद की जटायें और पेड़ों की पत्तियां अपने सूक्ष्म छिद्रों से हवा और प्रकाश के कण खींचती हैं। जिससे उनमें “प्रकाश संश्लेषण” की क्रिया होती है। और वे अपना विकास करते रहते हैं। मनुष्य के बाल भी देखने में अत्यन्त बारीक दिखाई देते हैं पर वे भी छिद्र युक्त होते हैं। इस दृष्टि से तो शरीर के सभी बालों का महत्व है, पुराने जमाने में पंच केश रखने की प्रथा भी थी सिर, मूँछ, दाढ़ी, बगल और शरीर के गुप्त अंगों के बाल न कटवाने से इन सूक्ष्म संस्थानों की विद्युत शक्ति उत्तेजित और अस्त−व्यस्त नहीं होने दी जाती थी जिससे वह शक्ति स्वास्थ्य रक्षा, आत्म बल आदि के विकास में काम आती थी आज भी सिख लोग पंचकेश रखते हैं तो उनकी शक्ति तेजस्विता और नेतृत्व वाले गुण भी इस देश के अन्य प्रान्तों के निवासियों से पृथक स्पष्ट देखे जा सकते हैं। दूसरी ओर जिन जातियों और लोगों में हमेशा दाढ़ी मूँछ कटाते रहने और बारबार बाल बनाने की अधिकता है वे प्रायः कामुक और निम्न प्रवृत्तियों वाले देखे जाते हैं। पाश्चात्य देशों के लोगों ने गरिष्ठ भोजन पद्धति के अनुसार अपने शरीर में चर्बी और फैट्स चाहे कितने बढ़ा लिये हों उनमें शील, सज्जनता और मानवीय सद्गुणों की मात्रा अत्यल्प ही मिलेगी। यौन उच्छृंखलताएं और उसके दुष्परिणाम पश्चिम के लिये अपनी भुखमरी की तरह संकट बने हुए हैं उसमें बालों को महत्व न देने का भी हाथ है।

शरीर के अन्य भागों के बाल जहाँ शरीर के विभिन्न अंगों को पोषण और प्रकृति के परिवर्तन से होने वाले तापमान की घट-बढ़ से सुरक्षा रखते हैं वहाँ सिर के बाल मस्तिष्क की शक्तियों को प्रबुद्ध और प्रखर बनाते हैं स्त्रियाँ लम्बे बाल इसीलिये रखती हैं क्योंकि उससे उनके मुखमंडल को तेजस्व की प्राप्ति होती रहती है और वे देखने में सुन्दर आकर्षक लगती हैं। अनिष्टकारी प्रभावों से रक्षा, अवसाद से रक्षा ‘मनोबल की वृद्धि’ वासना की कमी तथा मानसिक शक्तियों के पोषण में यों सिर के सभी बालों का महत्व है पर शिखा-स्थान का महत्व इन सबसे अधिक है। जिस तरह शरीर के प्रत्येक अंग के विकास में शक्ति खर्च होना आवश्यक है उसी प्रकार बालों को बार-बार काटने से शारीरिक शक्तियों को बालों के “टिशूज” (कोश जाल या ऊतक) भी बनाने पड़ते हैं, जिस तरह शरीर के प्रत्येक अंग की एक सीमा होती है उसी प्रकार बालों की लम्बाई की भी एक सीमा होती है। उससे आगे उनका बढ़ना बन्द हो जाता है। शिखा चूँकि शक्तियों को खींचने और प्रेषण करने का सबसे संवेदनशील स्थान है इसलिये यहाँ से स्वभावतः अधिक ही शक्ति खर्च होती है। बार-बार बाल कटवाने से उनके बढ़ने के लिये बार-बार शक्ति खर्च होती है पर यदि शिखा रखाकर उस शक्ति का अपव्यय रोक देते हैं तो उसी से मानसिक शक्तियों का पोषण होने लगता है। वही शक्ति मनुष्य की (1) विवेक शक्ति (2) दूरदर्शिता (3) दृढ़ता (4) संयम ओर प्रेम शक्ति के रूप में विकसित होकर मनुष्य जीवन में शक्ति और सफलता सुख और शान्ति के द्वार खोलने में मदद करती है।

शिखा रखना अब-तक श्रद्धा और विश्वास का विषय था। हम हिन्दू लोग हमेशा से उसी आधार पर चोटी रखते आये और उसके दिव्य लाभों से लाभान्वित होते रहे हैं। धर्म-ध्वजा की तरह उसकी रक्षा को जातीय गौरव और प्रतिष्ठा का चिन्ह मानते रहे हैं पर आज, जब कि लोगों में सूक्ष्म बौद्धिक क्षमता का अभाव हो चला है, लोगों की कल्पना और विचार शक्ति स्थूल जानकारियों तक ही सीमित हो गई है, यह प्रश्न उठाया जाने लगा है कि आखिर शिखा रखने का वैज्ञानिक अर्थ क्या है? श्रद्धा-पोषित सीधे-सादे पुरोहित उसका भला क्या उत्तर दें? लेकिन सच यह है कि आज विज्ञान भी मानने लगा है कि शिखा-स्थान का मानव जीवन से महत्वपूर्ण सम्बन्ध है। एक समय था जब हमारे बच्चे प्राण दे सकते थे पर चोटी नहीं, एक दिन आज है जब कि हमारे ही बच्चे स्वेच्छा से चोटियाँ कटवाते चले जा रहे हैं। चोटी उनके लिये उपहास की वस्तु है। कोई पढ़ा-लिखा चोटी रखता है तो उसे अपने मित्रों द्वारा उपहास का भय और लाज लगती है। एक दिन वह आने वाला है जबकि भारत वर्ष से चोटी बिलकुल ही उठ सकती है पर एक वैज्ञानिक सत्य है कि जिस तरह धीरे-धीरे हमारे बच्चे चोटी कटाते चले जायेंगे दूसरे देशों के लोग उसके वैज्ञानिक महत्व को समझते चले जायेंगे। कल के विदेशी चोटी रखने वाले हों तो इस भविष्यवाणी को अत्युक्ति न समझा जाये।

मस्तिष्क पर हुई वैज्ञानिक शोधों ने शिखा-स्थान की वही महत्ता प्रतिपादित की है जो हम हिन्दुओं ने उसे श्रद्धा वश प्रदान की थी। सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक नेल्सन ने अपनी विश्व ख्याति की पुस्तक “ह्यूमन मशीन” में तंत्रिका जाल (रेटीक्युलर फार्मेशन) पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए बताया है कि शरीर में सतर्कता के सारे कार्य-क्रमों का नियमन उसी स्थान से होता है। अपने आस-पास के वातावरण जल-वायु आदि में तनिक भी परिवर्तन आता है तो उसे समझता, ग्रहण करता और परिवर्तन के अनुसार शरीर में समायोजित (एडजस्ट) करता है। उदाहरण के लिये गर्मी या सर्दी का बढ़ना, हवा में पानी की मात्रा बढ़ाना आदि। फिजियोलॉजिस्ट (शरीर-रचना विज्ञान-वेत्ता) ने पता लगाया है कि इस क्रिया का सम्बन्ध तंतु जाल से है। हमारे मस्तिष्क के पार्श्वभाग में तृतीय शून्य स्थान (थर्ड वेन्ट्रिकल) की सतह मेडुला आब्लाँगेटा (सुषुम्ना शीर्ष) से लेकर हाइपोथैलेमस (थर्ड वेष्ट्रिकल की सतह से नीचे वाले भाग) तक एक रचना पाई जाती है। जिसका नाम “रेटीक्युलर फार्मेशन है” रेटीक्युलर का अर्थ है जाल। यह जाल सारे रीढ़ धारी जानवरों में पाया जाता है।

इस जाल का निर्माण बहुत से नाड़ी तन्तुओं के समानान्तर रूप से एक ही केन्द्र की ओर जाने से होता है यह रचना दो भागों में बँटी है (1) जब सभी नाड़ी तन्तु अलग-अलग इन्द्रियों जैसे आँख, कान, नाक, स्पर्शेन्द्रियों, संकुचन और प्रसरण वाली माँस-पेशियों से निकाल कर ऊपर बढ़ते हैं तो वे सब मध्य मस्तिष्क में नाड़ी गुच्छक की तरह एक स्थान पर मिल जाते हैं। इसे ‘सेन्ट्रीफ्युगल’ फार्मेशन कहते हैं (2) पुनः उसी भाग से नाड़ी जाल ऊपर की ओर सेन्ट्रीपीटल रूप (फार्म) में ऊपर की ओर “सेरेव्रल कारटेम्स” जो शरीर की सम्पूर्ण संवेदनाओं को ग्रहण नियमन और नियंत्रण करने वाला आश्चर्यजनक मस्तिष्क का भाग है उधर की ओर चलता है और उसमें सर्वत्र फैल जाता है। दोनों नाड़ी जाल सिर बिन्दु तक पहुँचते हैं उससे 90 डिग्री का कोण बनाते हुए एक रेखा ऊपर को खींची जाये तो यही भाग चोटी का होगा। इससे यह स्पष्ट प्रकट है कि वाह्य परिवर्तनों का संग्राहक और व्यवस्थापक ही नहीं अनेक विलक्षण अनुभूतियों का मार्ग भी यह चोटी वाला स्थान है इसे ही सूक्ष्म रेडियो तरंगें प्रभावित करती हैं इसलिये यदि यह कहा जाये कि समाधि अवस्था के, अतीन्द्रिय ज्ञान, ध्यान द्वारा आकाश स्थित सूक्ष्म शक्तियों का आकर्षण का मूल बिन्दु यही है तो उससे किसी को आश्चर्य न होना चाहिए।

दीमक दिन भर काम करती रहती है और पानी बरसने को हुआ कि वह एक घंटे पहले ही जान जाती है और अपना कारोबार समेट कर बिल में घुस जाती है यह जानकारी उन्हें तन्त्रिका जाल (रेटीक्युलर फार्मेशन) से ही मिलती है। चींटी और मकड़ी भी इसी तरह मौसम के प्रत्येक परिवर्तन को अनुभव करती हैं यदि इस क्षेत्र की संवेदनशीलता को बढ़ा दिया जाये तो और भी सूक्ष्म अनुभूतियाँ होते पाया गया है। इंग्लैंड में छपने वाली साइंस पत्रिका “नेचर” के पिछले एक अंक में दो अमेरिका वैज्ञानिकों का एक लेख छपा है जिसमें एक प्रयोग का हवाला देकर यह सिद्ध किया गया है कि यदि मस्तिष्क के उस केन्द्र को अत्यधिक संवेदनशील बना लिया जाये जो सभी ज्ञानेन्द्रियों की संवेदनाओं को ग्रहण करता और उनके अनुरूप अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करता है तो जो कार्य आंखें, नाक, कान, त्वचा आदि करती हैं वह अपने आप (अतीन्द्रिय) रूप में किया जा सकता है। अर्थात् तब देखने के लिये आँखें आवश्यक न रह, सुनने के लिये कानों की जरूरत न रह जाये आदि। समाधि अवस्था का यथार्थ ज्ञान और स्वप्नों की सत्य अनुभूतियाँ इसी संवेदन शीलता का परिणाम होती हैं। राजा रणजीत सिंह और जनरल बेन्टुरा की उपस्थिति में संत हरदास ने एक माह की समाधि लगाई थी जब वे बाहर निकले थे तब डाक्टरों ने उनकी जाँच करते समय पाया था कि उनकी चोटी वाले स्थान का तापमान इतना अधिक था कि उसे छुआ भी नहीं जा सकता था इससे उन्होंने अनुमान लगाया था कि समाधि की स्थिति में श्वांस लेने और शरीर के कोषों की उत्सर्जन क्रिया (शरीर के हर सेल बदलते रहते हैं उसे उत्सर्जन क्रिया कहते हैं।) रोक कर उन्हें यथावत स्थिति में रखने का काम तक इस संस्थान द्वारा किया जा सकता है इस अवस्था में शरीर का सारा पोषण सूक्ष्म आकाश से होता है साथ ही आत्म-चेतना का बाह्य जगत से मुक्त सम्बन्ध तक जुड़ जाता है। यह इस बात के प्रमाण हैं कि अनन्त की अनन्त शक्तियों से संपर्क और दूरानुभूतियों का केन्द्र भी शिखा-स्थान ही है। इस स्थान को भारतीय उपासना पद्धति में बहुत अधिक संवेदनशील बनाने का इसीलिये अनिवार्य विधान रखा गया है।

इन दोनों अमेरिकी वैज्ञानिकों ने एक बिल्ली के इसी तन्त्रिका जाल वाले बिन्दु पर स्टेनलैस स्टील के महीन तार जोड़ दिये और उसकी छाती पर गीगर काउंटर (यह एक यंत्र है जिससे रेडियो विकरण की माप की जाती है) बाँध दिया। इसके बाद कमरे के एक कोने में एक छोटा सा विकिरण स्रोत लगा दिया जब तक बिल्ली उस विकिरण यंत्र से दूर रही तब तक उसकी स्थिति सामान्य रही पर जैसे ही वह इस स्रोत से पाँच फुट की दूरी पर आई कि उसे एकाएक झटका लगा और वह पीछे डरकर हट गई। इस प्रयोग से इन वैज्ञानिकों ने भी यही निष्कर्ष निकाला कि मस्तिष्क की आँख सूक्ष्म विकिरण तक देख सकने में समर्थ है। हमारे यहाँ उसे ही सहस्रार कमल में बैठे हुए भगवान् या शिखा-शक्ति (आत्मा) कहा है वही देखता सुनता चलता-फिरता और समस्त कार्यों का कर्माध्यक्ष है इसलिये इस केन्द्र को जितना अधिक संवेदनशील बना सकते हैं संसार के रहस्यों, आत्मा के रहस्यों भूत और भविष्य में घटित होने वाली घटनाओं की सत्य जानकारियों को उतना ही अधिक स्पष्ट और सच-सच देख सुन एवं अनुभव कर सकते हैं। शुद्ध हुए इस संस्थान की सहायता से ही योगी एक-एक दिन की भविष्यवाणी कर सकने में समर्थ होते हैं। चूँकि यह कार्य शिखा के बालों के माध्यम से ही होता है। ब्रह्माण्ड के लिये एरियल और ट्रान्समीटर वही है इसलिये इसे आध्यात्मिकता का मूल बिन्दु मानकर इतना महत्व दिया गया। आज चूँकि लोग इसके महत्व को भूल गये हैं इसीलिये हमारी बौद्धिक क्षमतायें कुँठित पड़ी हैं। हमारी दूरदर्शिता हमें छोड़कर न जाने कहाँ भाग गई। लोग मानवेत्तर जीवों की भाँति ही स्थूल इन्द्रियों के चक्कर में पड़े रहते हैं।

प्रसिद्ध जीव शास्त्री जेम्स ओल्डस के शिष्य डॉ. डब्लू. जी. पेनफील्ड ने एक बार एक चूहे के मस्तिष्क के इसी भाग में इलेक्ट्रोड से हलकी विद्युत प्रवाहित कर एक नाड़ी को छुपाया तो चूहे में प्रसन्नता के लक्षणों का विकास हुआ वह एक यंत्र का पैंडल चलाने में मस्त हो गया सामने रखा जाना उसने छुआ भी नहीं, एक इसकी नस में विद्युत प्रवाहित करके सामने बिल्ली आने दी तो भी चूहा डरा नहीं, एक अन्य केन्द्र पर विद्युत प्रवाहित करते ही चूहा एक चींटी को देखकर ही डर गया। ऐसे अनेक परीक्षण फ्रान्सीसी वैज्ञानिक प्रो. डेल्गाडो ने भी करके यह सिद्ध करके दिखा दिया कि समस्त सुख दुःखों का केन्द्र मस्तिष्क के इसी भाग से सम्बन्ध रखता है। जिसे हम शिखा-स्थान कहते हैं और वैज्ञानिक रेटीक्युलर फार्मेशन।

“हारमोन विज्ञान” ने यह सिद्ध कर दिया है कि मनुष्य की प्रसन्नता ही नहीं शारीरिक स्वास्थ्य तक भावनाओं और विचारों के अच्छे-बुरे होने पर निर्भर है। नीच विचार कुत्सित भावनाओं से शरीर में दूषित रसायनों का स्राव होता है जबकि पवित्र और अच्छी भावनाओं से अच्छे हारमोन जो कि शरीर को स्वस्थ और संतुलित रखते एवं जीवन को सुखी बनाते हैं इन सब का केन्द्र भी तंत्रिका जाल ही है। इसकी विशेषता यह है कि हम लगातार एक ही विषय के सैकड़ों तरह के विचार एकत्रित कर सकते हैं। प्रयोग से देखा गया है कि यदि रक्त में कार्बनडाइऑक्साइड या एड्रिनलीन की मात्रा बढ़ा दी जाये तो इस जाल की क्रियाओं पर असर पड़ता है उससे इसकी गति तीव्र हो उठती है, जिससे चित्त की चंचलता और अस्थिरता बढ़ जाती है तथा समाचार जल्दी-जल्दी आने-जाने लगते हैं। नेलसन ने इस जाल की गतिविधियों को उत्तेजना की गति का समानुपाती माना है अर्थात् यह भाग जितना अधिक सूक्ष्म-संवेदन शील होगा बाह्य जगत की सूक्ष्म संवेदनाओं से भी हम उतने ही अधिक प्रभावित होंगे। यह प्रभाव केवल मस्तिष्क पर ही नहीं पड़ता जैसा कि ऊपर बता चुके हैं कि इस केन्द्र से मस्तिष्क और शरीर की सभी ज्ञानेन्द्रियों एवं माँसपेशियों से सीधा सम्बन्ध है अतएव यह केन्द्र सारे शरीर को प्रभावित कर सकने और इन्द्रियों व शरीर की सामर्थ्य बढ़ाने में समर्थ है।

शिखा व्यक्ति को ब्रह्म से, व्यष्टि से, समष्टि और अपनी सूक्ष्म क्षमताओं को अनन्त क्षमताओं से जोड़कर लाभान्वित होने का माध्यम है उसकी जितनी महिमा गाई जाये कम है और आज जो लोग इस महत्व को भूलते जा रहे हैं शिखायें कटाकर अहिन्दू होते जा रहे हैं इसके लिए जितना दुःख किया जाये वह उतना ही कम है।


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मैं हिन्दू हूँ इसलिये चोटी रखना चाहिए मैं ऐसा नहीं सोचता वरन् चोटी मेरे हिन्दूपन की रक्षा करती है इसलिये चोटी रखना मैं परम धर्म मानता हूँ।

-महात्मा गान्धी


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शिखा जातीयता का प्राण है, हम उसका परित्याग नहीं कर सकते।

-महामना मालवीय


धर्म प्रथाओं में नहीं, सदाचरण में है।

धर्म के विषय में दुनिया में जितना मतभेद देखने में आता है, उतना और किसी विषय में शायद ही मिल सके। यह भेद अज्ञानियों में ही नहीं समझदार और उन्नतिशील लोगों में भी देखने में आता है। हिन्दू गौ का एक रोम भूल से भी दूध के साथ पेट में चले जाने पर घोर पाप समझते हैं, मुसलमान उसी गाय को खुदा के नाम पर काट कर खा जाने में बड़ा पुण्य बतलाते हैं, ईसाई बिना पाप-पुण्य के झगड़े में पड़े नित्य ही उसके माँस को एक साधारण आहार की तरह ग्रहण करते हैं। यहूदी भगवान की उपासना करते समय मुँह के बल लेट जाते हैं, कैथोलिक ईसाई घुटनों के बल झुकते हैं, प्रोटेस्टेंट ईसाई कुर्सी पर बैठ कर प्रार्थना करते हैं, मुसलमानों की नमाज में कई बार उठना-बैठना पड़ता है और हिन्दुओं की सर्वोच्च प्रार्थना वह है जिसमें साधक, ध्यान मगन होकर अचल हो जाय। यदि यह कहा जाय कि इन सब में एक ही उपासना-विधि ठीक है, दूसरी सब निकम्मी हैं, तो भी काम नहीं बनता। अन्य में भी अनेक व्यक्ति बड़े सन्त, त्यागी महात्मा हो गये हैं। धार्मिक-क्षेत्र के इसी घोर वैषम्य को देखकर ‘ओरिजन एण्ड डेवलपमेंट आफ रिलीजस विलीफ’ (धार्मिक विश्वास की उत्पत्ति और विकास) नामक ग्रन्थ के लेखक एस. बैरिंग-गाल्ड ने लिखा है-

“संसार में समस्त प्राचीन युगों से अनगिनत ऐसे धार्मिक विश्वास पाये गये हैं जो एक दूसरे से सर्वथा विपरीत हैं और जिनकी रस्मों तथा सिद्धान्तों में जमीन-आसमान का अन्तर है। एक प्रदेश में मन्दिर का पुजारी देव मूर्ति को मानव रक्त से लिप्त करता है और दूसरे ही दिन अन्य धर्म का अनुयायी वहाँ आकर उसे तोड़कर गन्दगी में फेंक देता है जिनको एक धर्म वाले भगवान मानते हैं, उन्हीं को दूसरे धर्मानुयायी शैतान कहते हैं। एक धर्म में धर्म याजक भगवान की पूजा के उद्देश्य से बच्चों को अग्नि में डाल देता है, और दूसरे धर्म वाला अनाथालय स्थापित करके उनकी रक्षा करता है और इसी को ईश्वर-पूजा समझता है। एक धर्म वालों की देव मूर्ति सौंदर्य का आदर्श होती है और दूसरे की घोर वीभत्स और कुरूप। इंग्लैण्ड में प्रसव के समय माता को एकान्त स्थान में रहना पड़ता है, पर अफ्रीका की ‘बास्क’ जाति में सन्तान होने पर पिता को कम्बलों से ढककर अलग रखा जाता है और ‘लपसी’ खिलाई जाती है। अधिकाँश देशों में माता-पिता की सेवा सुश्रूषा करके उनके प्रति श्रद्धा-भक्ति प्रकट की जाती है, पर कहीं पर श्रद्धा की भावना से ही उनको कुल्हाड़ी से काट दिया जाता है। अपनी माता के प्रति श्रद्धा प्रकट करने के उद्देश्य से फिजी का एक मूल निवासी उसके माँस को खा लेता है जबकि एक योरोपियन इसी उद्देश्य से उसकी एक सुन्दर समाधि बनवाता है।”

विभिन्न धर्मों और मतों के धार्मिक विश्वासों में अत्यधिक अन्तर होने का यह बहुत ही अल्प विवरण है। फ्रेजर नामक विद्वान ने इस विषय पर “गोल्डिन वो” नाम की प्रसिद्ध पुस्तक सोलह बड़े-बड़े खण्डों में लिखी है, पर उसमें भी पृथ्वी तल पर बसने वाले अनगिनत फिर्को जाति में सम्प्रदायों में पाये जाने वाली असंख्यों धार्मिक प्रथाओं और रस्मों का पूरा वर्णन नहीं किया जा सका है। ये सिद्धान्त, विश्वास और रस्में हर तरह के हैं। इनमें निरर्थक, उपहासास्पद, भयंकर, कठोर, अश्लील प्रथाएं भी हैं और श्रेष्ठ, भक्तिपूर्ण, मानवतायुक्त, विवेकयुक्त और दार्शनिकता के अनुकूल विधान भी पाये जाते हैं।

इन धार्मिक प्रथाओं ने धीरे-धीरे कैसे हानिकारक और निकम्मे अन्धविश्वासों का रूप धारण कर लिया है, इस पर विचार करने से चकित हो जाना पड़ता है। डॉ. लैंग ने आस्ट्रेलिया के एक मूल निवासी से उसके किसी मृत सम्बन्धी का नाम पूछा। उसने मृतक के बाप का नाम, भाई का नाम, उसकी शक्ल-सूरत, चाल-डाल, उसके साथियों के नाम आदि सब कुछ बता दिया पर मृतक का नाम किसी प्रकार उसकी जबान से नहीं निकल सका। इस सम्बन्ध में अन्य लोगों से पूछने पर पता लगा कि ये लोग मृतक का नाम इसलिये नहीं लेते कि ऐसा करने से उसका भूत इनके पास चला आवेगा! भारत के गाँवों में जब कोई उल्लू बोल रहा हो तो उसके सामने किसी का नाम नहीं लिया जाता, क्योंकि लोगों को भय होता है कि उस नाम को सुनकर उल्लू उसका उच्चारण करने लगेगा और इससे वह व्यक्ति बहुत शीघ्र मर जायगा!

हमारे देश में अनेक लोग अब भी स्त्रियों के पर्दा त्याग करने के बहुत विरुद्ध हैं और जो लड़की विवाह शादी के मामले में अपनी सम्मति प्रकट करती है या अपनी इच्छानुसार विवाह के लिये जोर देती है तो उसे निर्लज्ज कुलंकिणी आदि कहकर पुकारा जाता है। पर उत्तरी अफ्रीका के “टौर्गस” प्रदेश में पुरुष बुर्का डाल-कर रहते हैं और स्त्रियाँ खुले मुँह फिरती है। वहाँ पर स्त्रियाँ ही विवाह के लिये पुरुष ढूंढ़ती हैं, प्रेम प्रदर्शित करती हैं और उसे विवाह करके लाती हैं। ‘बिली’ नाम की जाति में कुमारी कन्याओं को मन्दिर के पुजारियों को दान कर दिया जाता है, जिनका वे उपभोग करते हैं। हमारे यहाँ दक्षिण भारत के मन्दिरों में ‘देव दासी’ की प्रथा का भी लगभग ऐसा ही रूप है, काँगो में कुमारी कन्याओं का मनुष्याकार देव-मूर्ति के साथ संपर्क कराया जाता है। ‘बुदा’ नामक जाति के समस्त फिर्के वाले गाँव की चौपाल में इकट्ठे होते हैं और उनका धर्म गुरु वहाँ चारों हाथ-पैर से चलता हुआ स्यार की बोली बोलता है और अन्य सब लोग उसकी नकल करते हैं। मलाया में जिस लड़की को कोई प्यार करता है वह उसके पदचिह्न के स्थान की धूल को उठा लाता है और उसे आग पर गर्म करता है। उसका विश्वास होता है कि ऐसा करने से उसकी प्रेमिका का हृदय पिघलेगा और वह उसकी पत्नी बनने को राजी हो जायगी। संसार के कुछ भागों में ऐसी भी प्रथायें हैं जिनमें फिर्के के ‘भगवान’ का ही बलिदान कर दिया जाता है। कुछ फिर्के वाले, यदि उनकी फसल नष्ट हो जाती है तो अपने राजा तथा पुरोहित को ही मार देते हैं। इस प्रकार संसार भर में धर्म के नाम पर अनगिनत अन्ध-विश्वास, हानिकारक और घृणित प्रथायें प्रचलित हैं और मानवता के उद्धार के लिये उनका मिटाया जाना आवश्यक है।

किसी मजहब या सम्प्रदाय में तो भगवान के पुत्र, पौत्र, पत्नी आदि की कल्पना को भी सत्य माना जाता है और दूसरी जाति (रूस, चीन आदि) में ईश्वर की गणना केवल एक ‘विश्व-नियम’ से रूप में की जाती है। एक धर्म वाला संगीत और वाद्य को ईश-प्रार्थना का आवश्यक अंग मानता है और दूसरा धर्म इसे महापाप बतलाता है। बिहार के सखो-सम्प्रदाय के अनुयायी ईश्वर-भक्ति के लिये स्त्री की तरह रहना, यहाँ तक कि मासिक-धर्म की भी नकल करना बहुत बड़ी साधना समझते हैं। इसका उद्देश्य यह होता है कि जिस प्रकार स्त्री अपने पति से प्रेम करके उसमें तन्मय जो जाती है उसी प्रकार ईश्वर में भी तन्मयता प्राप्त कर ली जाय।

इसी प्रकार देश में ऐसे ताँत्रिक सम्प्रदाय भी पाये जाते हैं, जिनमें मद्यपान, माँस भक्षण, पशु वध और मैथुन भी ‘धर्म’ का एक अंग माना जाता है। दूसरी ओर जैन-धर्म जैसे मत हैं जिनमें ब्रह्मचर्य-पालन के लिये अठारह हजार प्रकार की अश्लीलता से बचने का उपदेश दिया गया है। अगर एक सम्प्रदाय किसी मानव शरीरधारी को ‘भगवान’ मानता है (जैसे बल्लभ सम्प्रदाय में) तो दूसरा सम्प्रदाय (जैसे वेदान्ती) ईश्वर के अस्तित्व से ही इनकार करता है।

सभी मजहबों या धर्मों के भीतर इतने सम्प्रदाय या फिर्के पाये जाते हैं कि उनको गिनना भी कठिन है। लोगों को प्रायः रहस्यवाद में बड़ा आकर्षण जान पड़ता है। इसलिये सदा नये-नये गुरु उत्पन्न होते रहते हैं, जो साधना या उपासना की एक भिन्न विधि निकालकर एक पृथक सम्प्रदाय स्थापित कर देते हैं, उनका एक नवीन मन्दिर बन जाता है। इस प्रकार के हजारों नये-नये मत और धार्मिक फिर्के जंगली कहे जाने वाले प्रदेशों में ही नहीं वरन् योरोप, अमरीका, एशिया के साक और सुसंस्कृत देशों में भी पाये जाते हैं। ऐसी कोई पूजा-पद्धति नहीं है जिसका आविष्कार और प्रचलन संसार में कहीं न कहीं न हो चुका हो। आप कैसी भी विचित्र अथवा असंगत उपासना पद्धति की कल्पना क्यों न करें, वह इस विस्तृत पृथ्वी पर किसी जगह अवश्य ही क्रिया रूप में होती मिल जायगी।

हमारा आशय यह नहीं है कि संसार में विभिन्न धर्मों का होना कोई अस्वाभाविक बात है या मनुष्य की गलती है। जिस प्रकार जलवायु और देश भेद से मनुष्यों की भाषा और आकृति में अन्तर पड़ जाता है, उसी प्रकार परिस्थितियों की भिन्नता के कारण विभिन्न जातियों की संस्कृति में भी अन्तर हो सकता है। पर ऐसी बातें जो प्रत्यक्ष में हानिकारक, क्रूरतापूर्ण और अशिष्टता सूचक हैं, किसी धर्म के नाम पर माननीय नहीं हो सकती। उदाहरण के लिये अपने यहाँ प्रचलित कितने ही देवी देवताओं के मंदिरों में होने वाले पशु-बलिदान का उल्लेख कर सकते हैं। धर्म के नाम पर बकरी, मुर्गों, भैंसों आदि का काटना किसी दृष्टि से उचित नहीं ठहराया जा सकता। यही बात अनेक धर्मों में प्रचलित अश्लीलता और नशे की प्रथाओं के लिये कही जा सकती है।

जैसा भारत के मूर्धन्य विद्वान श्रीराधा कृष्णनन् ने कहा है किसी भी धर्म और सभ्यता की श्रेष्ठता के लिये उसमें सच्चाई, आत्मीयता और उदारता के गुणों का होना आवश्यक है। अब पुरोहितों द्वारा स्वार्थ-साधन के लिये केवल बाहरी पूजा-पाठ के दिन समाप्त हो गये। अब लोग धर्म में वास्तविकता के दर्शन करना चाहते हैं। वे जीवन को गहराई में उतरना चाहते हैं, उस पर्दे को हटा देना चाहते हैं जिसने “आदि-सत्य को छिपा रखा है और उसे जानना चाहते हैं जो जीवन के लिये, सत्य के लिये और न्याय के लिये आवश्यक है।”


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सदाचार की सुगन्ध चन्दन, तगर, कमल और जुही से भी बढ़कर होती है।

-धम्मपद


सच्चे संतों की खोज

महाराज बिन्दुजात ने निश्चय किया राज्य में निराश्रय साधु हैं उन्हें राज्य वृत्ति प्रदान की जाये। एक “कोष” नियुक्त किया गया जिसमें प्रतिदिन एक लाख स्वर्ण मुद्रायें राज्य के साधु-संतों को भोजन निर्वाह आदि के लिये बाँटने की व्यवस्था रखी गई।

यह कार्य नीतिः निपुण मंत्री आचार्य गुत्समद को सौंपा गया। गुत्समद कई दिन तब धन की थैली लेकर घूमे किन्तु एक भी स्वर्ण मुद्रा का वितरण न हो सका। हारकर उन्होंने अब तक सारा “कोष” सम्राट बिन्दुजात को लौटा दिया।

महाराज ने पूछा- महामन्त्री उस दिन धन राशि का वितरण नहीं हो पाया क्या? क्या इतने बड़े राज्य में एक भी साधु संत ऐसा नहीं जिसे हमारी सहायता की आवश्यकता हो?

इस पर एक दीर्घ निश्वास छोड़ते हुए गुत्समद ने उत्तर दिया-नहीं हो पाया आर्य! कठिनाई यह है कि कोष उन साधु-सन्तों के लिये नियुक्त है जो लोक-मंगल का कार्य करते हों ऐसे संत राज्य में कम नहीं पर वे धन स्वीकार नहीं करते? उनकी सामान्य सी आवश्यकतायें हैं उसके लिये वे किसी के ऋणी नहीं होना चाहते और जो धन लेना चाहते हैं वे भिखारी हैं, उनकी लोक-मंगल में कोई अभिरुचि नहीं ऐसे व्यक्तियों को धन देने से क्या लाभ?

बिन्दुजात मंत्री की नीति निपुणता पर बड़े प्रसन्न हुए उन्होंने यह धन-राशि प्रजा की भलाई में खर्च करना प्रारम्भ कर दिया।

जो केवल भिक्षावृत्ति करने वाले थे लोक मंगल में उतनी रुचि नहीं थी उनके रोजगार में यही धन काम में आया।


स्वप्नों में छिपी जीवन की गहराइयाँ

प्रातःकाल उठकर राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने प्रातः क्रियायें सम्पन्न कीं, नाश्ता किया और उसके बाद ही अपने राजोद्यान में भ्रमण पर जाने की अपेक्षा अपने जीवनी लेखक वार्ड लेमन को फोन करके तुरन्त व्हाइट हाउस (अमरीका का राष्ट्रपति भवन) पहुँचने का आग्रह किया। उनकी गंभीरता यह बता रही थी कि आज कुछ विशेष बात हुई है पर क्या? यह अभी तक भी अज्ञात था।

वार्ड लेमन के आते ही राष्ट्रपति लिंकन ने पूछा- “क्या आपको स्वप्नों की सच्चाई पर विश्वास है, यदि नहीं तो आइये और सुनिये मैंने आज एक विचित्र स्वप्न देखा है। और मुझे न मालूम क्यों यह विश्वास सा हो गया है कि यह स्वप्न न होकर किसी देव-शक्ति का दिया हुआ सत्य-संदेश है” इसके बाद राष्ट्रपति उस रात को देखा वह ऐतिहासिक स्वप्न सुनाने लगे जो आज तक भी उनके जीवन-प्रसंग में जुड़ा हुआ हर पाठक से प्रश्न किया करता है- स्वप्नों में सचाई का रहस्य क्या है- स्वप्नों के माध्यम से भविष्य में घटित होने वाली सत्य-घटनाओं की सूचना कौन देता है?

राष्ट्रपति कहने लगे-मैं व्हाइट हाउस के प्रत्येक कक्ष में घूमा पर मुझे सब कमरे खाली और सूनेपन से घिरे दिखाई दिये, तभी पूर्वी भाग से कुछ लोगों के रोने की ध्वनि सुनाई दी मैं उधर पहुँचा तो देखा कि बहुत से लोग एक शव को घेरे खड़े रो रहे हैं इनमें मेरे परिवार के सभी लोग, मित्र स्वजन सम्बन्धी भी हैं और दूसरे राजनयिक भी। कौतूहलवश मैंने पूछा क्या बात है? यह शव किसका है?- एक आकृति ने मेरी और देखकर कहा-राष्ट्रपति की हत्या कर दी गई है यह शव उन्हीं का है-यह आखिरी दृश्य था नींद टूट गई पर मुझे लगता है इस स्वप्न का मेरे जीवन से कोई घनिष्ठ सम्बन्ध है।

वार्ड लेमन ने घटना “शॉर्टहैंड” में नोट तो कर ली पर राष्ट्रपति के इस अन्ध-विश्वास जैसे प्रसंग पर वे हँसे बिना न रह सके। राष्ट्रपति लिंकन का ध्यान बँटाने के लिये वे इधर-उधर की बातें करते रहे पर लिंकन का मन उस दिन किन्हीं और बातों में लगा ही नहीं। इतिहास प्रसिद्ध घटना है कि इस स्वप्न के 3-4 दिन पश्चात् ही लिंकन की ठीक इन्हीं परिस्थितियों में हत्या कर दी गई जैसी की उनने स्वप्न में देखी थी। तब से आज तक यह प्रसंग राष्ट्रपति की जीवनी के साथ जुड़ा हुआ है पर आज तक भी उसकी कोई वैज्ञानिक व्याख्या नहीं हो सकी।

स्वप्नों में इन्द्रियातीत अनुभूति और भविष्य में घटित होने वाली घटनाओं के पूर्वाभास के लिये अमरीका के एक कर्नल की धर्मपत्नी श्रीमती नाडियन डोरिस बहुत प्रसिद्ध हुई हैं। इंग्लैण्ड के अनेक मनोविज्ञान शास्त्री और वैज्ञानिकों के सम्मिलित सहयोग से बनी “सोसाइटी फॉर साइकिकल रिसर्च” लंदन को दिये गये अपने एक बयान, जो “आई हैव नो च्वाइस” शीर्षक से छपा, में श्रीमती डोरिस ने एक भविष्य सूचक स्वप्न का विवरण देते हुए लिखा है-

उन दिनों मैं बहुत परेशान रहा करती थी और चाहती थी कि मुझे कोई ऐसा जीवन-साथी मिल जाये जिसके साथ मैं सुखद दाम्पत्य जीवन बिता सकूँ। रात सोई तो मुझे स्वप्न में दिखाई दिया कि मेरे आस-पास बहुत से लोग खड़े हैं तभी फोन की घंटी बजी, फोन पर किसी ने बताया कि मैं अमुक व्यक्ति हूँ और आपसे शादी का प्रस्ताव कर रहा हूँ मैंने प्रस्ताव स्वीकार कर लिया और वहाँ उपस्थित सब लोगों को निमंत्रण भी दे दिया। इस तरह स्वप्न का पटाक्षेप हो गया।”

जागने पर मुझे बहुत हँसी आई और सोचने लगी कि फ्रायड का यह कथन- “स्वप्न अचेतन इच्छा तुष्टि है, मन दिन भर इच्छायें करता है पर साँसारिक परिस्थितियाँ ऐसी होती हैं कि हर इच्छा की पूर्ति नहीं होती। यह दमित इच्छायें ही स्वप्न में अपनी काल्पनिक रचना द्वारा तुष्टि प्राप्त करना चाहती हैं”। कोई असत्य नहीं है पर उस दिन शेष जो घटनायें घटीं उन्होंने मुझे तुरन्त अपने विचार बदलने को विवश कर दिया और अब मैं यह मानती हूँ कि स्वप्न केवल दमित वासनाओं का काल्पनिक चित्रण मात्र नहीं वरन् उनमें जीवन की गहराइयाँ भी छिपी हुई हैं और यदि उन गुत्थियों का रहस्य ढूंढ़ा जा सके तो मनुष्य जीवन से सम्बन्धित अनेक दुरूह प्रश्नों का भी समाधान निकाला जा सकता है।

हुआ यह कि उस दिन मेरे कई परिचित मित्र और सहेलियाँ घर मिलने आये अभी हम उनसे बातचीत कर ही रहे थे कि किसी ने फोन पर बुलाया। इसके बाद जो-जो घटित हुआ वह जब रात को देखे स्वप्न का अक्षरशः सत्य स्वरूप था। मुझे सब कुछ स्वप्न में कैसे मालूम हो गया था मैं इसे आज तक नहीं जान पाई। जब भी विवाह की वर्षगाँठ आती है यह स्वप्न मुझे मनुष्य जीवन के सत्यों की शोध को प्रेरित करता है पर मैं अपने को उसके लिये विवश ही पाती हूँ।

ऐसे स्वप्न जिन्होंने अपनी सत्यता के ऐतिहासिक पृष्ठ खोले हैं एक सुविस्तृत शृंखला है। शेक्सपियर ने जूलियस सीजर नाटक में सम्राट सीजर के स्वप्न को यथावत चित्रित किया है। सीजर की पत्नी कार्नीलिया को अपने पति की हत्या का पूर्वाभास स्वप्न में हो गया था, इसलिये उस दिन उसने पूरा जोर लगाकर सीजर को राज-दरबार जाने से रोका था पर सीजर को स्वप्नों पर विश्वास नहीं था इसलिये उसने बात नहीं मानी थी और उसी का परिणाम था कि वह दरबार गया और उसी दिन उसकी हत्या करा दी गई। सम्राट क्रीसस ने अपने पुत्र एथिस की हत्या का दृश्य स्वप्न में ही देख लिया था। एलियस होवे को सिलाई की मशीन बनाने का पूर्वाभास स्वप्न में ही हुआ था। कहते हैं कि गान्धी जी को अपनी मृत्यु की बात स्वप्न में ही कई दिन पूर्व ही मालूम हो गई थी। ऐतिहासिक महापुरुषों के जीवन के इन प्रसंगों को देखकर ही “विजडम आफ ओवर सेल्फ” पुस्तक में “पाल ब्रन्टन” ने लिखा है-विज्ञान ओर बुद्धिवादी लोग भले ही इसे रूढ़िवाद या केवल मानसिक कल्पना कहें- पर स्वप्न जीवन के कोई गम्भीर अध्याय हैं उनके विश्लेषण द्वारा आत्मा के गहन रहस्यों तक पहुँचने में बड़ी मदद मिल सकती है।

कोई मनुष्य निरन्तर जागृत नहीं रह सकता। यदि किसी को सोने न दिया जाये तो वह मर जायेगा। मनुष्य जीवन का एक तिहाई भाग निद्रा में व्यतीत करता है। निद्रा का अधिकाँश भाग स्वप्नों से घिरा होता है। इससे पता चलता है कि अचेतन अवस्था जीवनी शक्ति का स्रोत है, पर उस समय भी चेतना का अस्तित्व बना रहता है। अर्थात् वह पदार्थ नहीं हो जाती। यही वह प्रकाश था जिसने भारतीय तत्वदर्शियों को पुनर्जन्म और लोकोत्तर जीवन के बीच के रहस्यों को जानने का द्वार खोला।

स्वप्न की स्थिति में मनुष्य के शरीर में अनेक परिवर्तन होते हैं। नाड़ी की गति मध्यम हो जाती है रक्त परिभ्रमण धीमा पड़ जाता है। सम्पूर्ण इन्द्रियाँ धीमी पड़ जाती हैं। हृदय की धड़कन और फेफड़ों द्वारा रक्त शुद्धि का कार्य भी जारी रहता है पर विचार शिथिल हो जाते हैं। देखने, सुनने, सूँघने, स्पर्श करने, चखने आदि की शक्ति नहीं रह जाती पर स्वप्न अवस्था में यह सारी क्रियायें इन्द्रियातीत अवस्था में अनुभव होती रहती हैं। मनुष्य सामान्य निद्रावस्था में भी जबकि उसके शरीर पर कोई बाहरी दबाव नहीं पड़ रहा होता तब भी उसे जीवित शरीर के से दृश्यों का अनुभव होता है उससे यह प्रमाणित होता है कि शास्त्रकारों के यह कथन ही प्रमाणित होते हैं-

जाग्रत्स्वप्न दशाभेदों न स्थिरास्थिरते बिना।

समः सदैव सर्वत्र समस्तोष्नुभवोऽनयोः॥

-योगवशिष्ठ 4।19।11

अर्थात्- जागृत और स्वप्न में कोई अन्तर नहीं है जागृत के अनुभव स्थिर और स्वप्न के अस्थिर प्रतीत होते हैं पर-

“यथोदित तथा तत्र तद् दृश्यं खात्मकंस्यितम्”

-योगवशिष्ठ 6।2।62।27

अर्थात्- यह सब चिद्काश अर्थात् मूल चेतना का ही विकास है।

स्वप्न यों अस्थिर दिखता है पर जीवन भी अस्थिर ही तो है। स्वप्न में जैसे थोड़ी देर के लिए हम सूक्ष्म और विराट अदृश्य और भविष्य के दृश्य सत्य-सत्य देख लेते हैं पर जागृत में वह कभी सत्य कभी असत्य प्रतीत होते हैं उसी प्रकार यह संसार है हम जब तक बाह्य व्यवहार से बंधे हैं; तब तक सब कुछ असत्य होकर भी सत्य दीखता है पर वस्तु स्थिति का पता तो तभी चलता है जब चेतना स्वप्न जैसी मूल स्थिति में आती है इसलिये स्वप्नों का मनुष्य जीवन में बड़ा भारी महत्व है। स्वप्न में जिस प्रकार मनुष्य को चेष्टायें काम करती रहती हैं उसी प्रकार लोकोत्तर जीवन में अर्थात् आत्मा अमर है। यदि हम उसे जीवित अवस्था में ही जान लें तो विराट् चेतना की सर्वदर्शी, सर्वव्यापकता, सर्व ज्ञाता के वह सभी गुण अपने अन्दर विकसित कर सकते हैं जो स्वप्नों में थोड़े समय के लिये और बहुत अस्पष्ट छाया-चित्र से दिखाई देते हैं।

भविष्य सूचक स्वप्नों का विश्लेषण करते समय देखा गया है कि मनुष्य शारीरिक दबाव, रोग, अपवित्रता की स्थिति में भयानक और दुखाँत स्वप्न देखता है पर वह जितना अधिक शुद्ध और पवित्र होता है उसके स्वप्न उतने ही स्पष्ट, सुखद और भविष्य के गूढ रहस्यों को भी स्पष्ट ध्वनि देने वाले होते हैं इससे यह भी प्रमाणित होता है कि चिदाकाश अर्थात् आत्मा या मूल चेतना नितान्त शुद्ध और पवित्र है। उस अवस्था की एक क्षणिक झलक से यदि जीवन के किसी महत्वपूर्ण भाग का दृश्य दिख सकता है तो अपना जीवन नितान्त शुद्ध और भौतिक कामनाओं से हटाकर ही सारे जीवन के दृश्यों का पूर्वाभास पाया जा सकता है। यही नहीं प्रगाढ़ निद्रा में भी मनुष्य जागृत अवस्था से भी अधिक बढ़कर दूसरे लोगों को सन्देश और प्रेरणायें देने के पारमार्थिक कार्य कर सकता है। जिस दिन वीर शिवाजी सायस्ता खाँ से अस्त्र रहित भेंट करने वाले थे उस दिन रात में समर्थ गुरु रामदास ने स्वप्न में ही उन्हें बता दिया था कि सायस्ता खाँ छल करेगा। तभी शिवाजी वधनख लेकर गये थे और सायस्ता खाँ जैसे अपने से अधिक शक्तिशाली व्यक्ति को ढेर कर दिया था। इसी तरह की अतीन्द्रिय प्रेरणा द्वारा महर्षि अरविंद ने फ्रान्स से श्रीयज्ञ-शिखा माँ और विवेकानन्द ने आयरलैण्ड से नोकुल मार्गरेट को प्रेरणा देकर बुलाया था।

स्वप्न जीवन की गहराइयों के मापक और उत्प्रेरक सत्य हो सकते हैं यदि हम उन्हें गम्भीर दृष्टि से देखें और उनकी स्पष्टता के लिये अपना जीवन शुद्ध बनायें।


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बाह्य जगत में ढूंढ़ो मत आनन्द का स्रोत तो अपने भीतर दिया है।

-महर्षि रमण


वही जो शेख चिल्लियों के बच्चों का होता है

वर्षा समीप है अब छत पर मिट्टी डाल लेनी चाहिए पत्नी ने पति को सुझाव दिया। पति थे दीर्घ सूत्री-बोले ऐसी क्या जल्दी है, डाल लेंगे। मिट्टी डालने में कितना समय लगता है। पत्नी बेचारी चुप हो गई!

फिर आकाश में कुछ-कुछ बादल घिर आये, पत्नी बोली-देखिये, बरसात सिर पर आ गई अब मिट्टी डाल ही लेनी चाहिए। पति महोदय-ऊँघते हुए बोले अजी! कोई रात में ही बादल नहीं बरस पड़ेंगे, बादल तो रोज ही आते हैं।

वह दिन भी निकल गया और मिट्टी छत पर पड़ी ही नहीं ।

एक दिन एकाएक आँधी आई और अपने साथ बादलों के झुण्ड बहा लाई, देखते ही देखते आकाश काला पड़ गया, बिजली कड़की और तेज वृष्टि प्रारम्भ हो गई। कई दिन तक घनघोर वर्षा हुई परिणाम यह हुआ कि पूरा मकान धराशायी हो गया।

पति महोदय रोने लगे-अब इन बच्चों का क्या होगा? इस पर पत्नी ने संक्षिप्त उत्तर दिया- वही जो शेख चिल्लियों के बच्चों का होता आया है।


मनुष्य और कीट-पतंगों में कितना अन्तर?

मनुष्य जीवन की सर्वांगपूर्णता में कोई सन्देह नहीं हैं, पर यदि वह अपनी क्षमताओं और बुद्धि कौशल का उपयोग भौतिक और लौकिक सुखों के सम्पादन में ही करता है, इन्हीं के चक्कर में पड़ा रहता है, तो यही कहा जायेगा कि मनुष्य और अन्य छोटे-छोटे जीवों में कोई अन्तर नहीं। जीव शास्त्र के पन्ने पलटते चलिये, मनुष्य की बौद्धिक क्षमता को लजाने वाले एक से एक अनोखे उदाहरण मिलते चलेंगे पर उन सबमें एक भी तो ऐसा नहीं होता जो पार्थिव देह में प्रविष्ट आत्मा के रहस्यों को जान पाता और अपना जीवन धन्य कर सका होता। यह क्षमता केवल मनुष्य में ही है कि वह आत्मा के रहस्यों को उघाड़कर जीव मात्र के कल्याण का पथ प्रशस्त करे, पर दुःख है कि वह अपनी इन विभूतियों को भी मानवेत्तर जीवों की भाँति ही खर्च करता रहता है।

सृष्टि के अन्य जीवों में मनुष्य की सैकड़ों विशेषतायें हैं। वह सफाई पसन्द करता है, करना भी चाहिये क्योंकि जो साफ-सुथरा रहता है, गन्दगी से बचता है, वही केवल स्वस्थ व नीरोग रह सकता है। स्वास्थ्य विज्ञान की लम्बी जानकारियों के आधार पर यह नियम बनाया गया है, पर मधुमक्खी के पास इस तरह का ज्ञान देने वाला कोई विद्यालय नहीं, स्वास्थ्य के नियमों का उसे पता नहीं, रोग कौन-कौन से होते हैं इसका उसे कोई ज्ञान नहीं; फिर मधुमक्खी के उपनिवेश में सफाई का उतना ही ध्यान रखा जाता है, जितना रानी की सुरक्षा का। कोई मधुमक्खी मर जाये तो उसके सड़ने-गलने और बदबू फैलाने से पूर्व ही मधुमक्खियाँ उसके शव को छत्ते से 15-20 गज की दूरी पर बाहर फेंक आती हैं। उनमें एक क्रम रहता है, प्रतिदिन नियत समय पर मक्खियाँ उड़ान करती हैं और छत्ते से बाहर टट्टी कर आती हैं। इसका अर्थ है कि यदि मकान की सफाई न रखी गई, उनमें गन्दगी फैलने दी गई तो उससे सारी कालोनी में महामारी फैल सकती है। यह ज्ञान शरीर का नहीं, उस आत्मा का है, जो मनुष्य और मधुमक्खी दोनों में एक समान है।

श्री रक्षपाल लिखित पुस्तक “कीटों में सामाजिक जीवन” नामक पुस्तक में बताया गया है कि यदि कोई चूहा किसी दीमक के किले में घुस जाता है, तो रक्षक दीमक उस पर अपने डंकों का प्रहार करके उसे मार डालते हैं। संगठित आक्रमण और प्रकृति प्रदत्त साधनों के उपयोग से वे शत्रु पर विजय पा जाते हैं, पर बेचारे कण-कण के कीट उतने वजन के चूहे के शव को बाहर किस तरह करें। जब तक वह सड़-गल कर समाप्त हो तब तक तो उनके कमरे में इतनी बदबू फैल सकती है, जो उन सबका ही नाश कर दे, इसलिये वे दूसरी युक्ति से काम लेते और मनुष्य से अधिक चतुरता का परिचय देते हैं। लोग तो जंगल- टट्टी जाते हैं और टट्टी खुली छोड़ आते हैं, जिससे वातावरण दूषित होता है, उसे गड्ढा खोद कर टट्टी करने और उसमें मिट्टी पटक देना भी लज्जास्पद लगता है, इस दृष्टि से अधिक बुद्धिमान दीमक हैं, क्योंकि वे तुरन्त एक प्रकार का द्रव प्रोपासिल बनाते हैं और उसकी मोटी परत वाली वार्निश उसके शरीर में कर देते हैं, इससे उसकी गन्दगी का एक झोंका भी बाहर नहीं आ पाता। एक बार कपूर की डली इनके महल में फेंककर देखा गया। जितनी देर में कपूर की गन्ध उपनिवेश में फैले दीमकों ने उसे इस द्रव से कीलित कर दिया।

मनुष्य बड़ा भारी इंजीनियर है, भाखड़ा से लेकर चन्द्र राकेट तक की डिजाइनिंग में उसने जो बुद्धि खर्च की है, उसे देखकर लगता है, यह दूसरा परमात्मा है, पर यदि यही योग्यता किसी तुच्छ प्राणी में हो तो उसे भी परमात्मा का अंश न कहा जायेगा। जीव-वैज्ञानिक डॉ. वेल्ट ने हिमालय की 4000 फुट ऊँची एक चोटी पर चढ़कर एक ऐसे चींटी परिवार का अध्ययन किया जो गृह-निर्माण कर रहा था। बिल से निकाली हुई मिट्टी नीचे गिर जाती थी और इस कारण मकान सहन उम्दा नहीं बन पा रहा था। अन्त में इस स्थिति से निपटने का काम कुछ विशेषज्ञ चींटियों की टीम को सौंपा गया। उन्होंने उस स्थान का विधिवत् निरीक्षण कर एक योजना बनाई। उस योजना के अनुसार मजदूर चींटियों को भीतर के काम से हटाकर पहले छोटी-छोटी कंकड़ियाँ बीनकर लाने का आदेश दिया गया। वह सब कंकड़ बीनकर लाईं और इस तरह पहले एक मजबूत मंच बना दिया गया तब आगे का काम प्रारम्भ हुआ। अब मिट्टी को लुढ़कने की कोई गुञ्जाइश नहीं रही।

मनुष्य की सर्वोत्तम उपलब्धि है- प्रेम, प्रेम जैसे देव गुण के कारण ही वह धरती को स्वर्ग बनाता और स्वर्ग मुक्ति की परवाह न करके बार-बार पृथ्वी पर लौट-लौटकर जन्म लेता है। पर यह दिव्य गुण भी केवल मनुष्य की ही विशेषता हो, ऐसा नहीं कहा जा सकता, अन्य जीव भी प्रेम करते हैं, प्रेम ही नहीं, शुद्ध और नितान्त पवित्र प्रेम। उदाहरण के लिये कुछ गर्म देशों के समुद्र में मछली की सी आकृति का एक जीव पाया जाता है, उसे मनाती कहते हैं। उसे अपने बच्चे से इतना प्यार होता है कि कैसी भी परिस्थिति में वह उसे अपने से अलग नहीं करती, उसके शरीर में दो झिल्लियाँ होती हैं, जो हाथों का काम देती हैं, इनसे ही वह अपने बच्चे को छाती से चिपकाये रहती है और उसे हमेशा दूध पिलाती रहती है। कभी-कभी इसका बच्चा छूट जाता है तो वह ऐसे रँभाती है जैसे लवाई (हाल की ब्याई) गाय अपने बच्चे के लिये रँभाती है। सम्भवतः इसी गुण के कारण उसे समुद्री गाय (सी काऊ) भी कहते हैं। 1 टन वजन से भी भारी मनाती संसार के दुर्लभ जीवों में से है, इसीलिये उसकी रक्षा के लिये कड़े नियम बनाये गये हैं, अन्तर्राष्ट्रीय कानून के अंतर्गत इसे अवध्य कर दिया गया है।

मनुष्य अपने आपको सामाजिक प्राणी कहला सकता है तो छोटे-छोटे जीव कम सामाजिक नहीं। यह केवल प्राकृतिक प्रेरणा से ही नहीं, उनकी बुद्धिमत्ता से भी होता है। मनुष्य तो अपनी बुद्धि का उपयोग अपने निजी स्वार्थ में ही अधिक करता है। पर जीव इतने अज्ञानी नहीं होते, वे जानते हैं कि शान्ति और सुविधा का जीवन जातीय एकता, समानता, सहयोग और सामाजिकता के आधार पर ही जिया जा सकता है, इसलिये वे परस्पर मिल-जुलकर ही जीने में प्रसन्न होते हैं।

उत्तरी योरोप का बीवर जन्तु इसका बहुत अच्छा उदाहरण है। यह बड़ा बुद्धिमान जीव है, पानी में बाँध बनाकर रहता है। बाँध बाँधने में तो इंजीनियर भी चकराते हैं, फिर उन्हें भी परेशान होना चाहिये पर नहीं। कई बीवर मिलकर योजना बनाते हैं, एक लबड़ी इकट्ठा करता है तो दूसरे छोटी-छोटी डालियाँ, कुछ मिट्टी ढोते हैं, कुछ खोदते हैं। पत्थरों के भार से ये लट्ठों को पानी में डुबा देते हैं और फिर उन पर मिट्टी थोप कर अपने लिये कमरे बना लेते हैं। एक दूसरे से मिलते-जुलते रहने के लिये यह कमरों में दरवाजे भी रखते है। एक इंजीनियर जैसी व्यवस्था यह सब मिलकर कर लेते हैं। चींटी, मधुमक्खी, दीमक, मनाती, बीवर आदि के शरीर में अवतरण, निश्चित रूप से अज्ञान, अन्धकार और अचेतनता में जन्म लेना है, पर यह एक विलक्षण सत्य है कि इस नन्हें से शरीर में रहने वाली नन्हीं सी चेतना में भी वह सारी क्षमतायें भरी पड़ी हैं, जो किसी भी योग्य मनुष्य में सम्भव है। शरीर जीवन साधनों के यन्त्र हैं और प्रत्येक जीव को उसकी प्रकृति और स्वभाव के अनुरूप मिले होते हैं, यह मनुष्य शरीर की ही विशेषता है कि उसमें प्रकृति के परम्परागत विषयों को भी विजय करने की क्षमता है, यदि वह ऐसा न करके अन्य जीवों का साही निम्नगामी जीवन जीता है और अपने स्वभाव को ऊर्ध्वमुखी नहीं बनाता तो निश्चित रूप से उसे भी अज्ञान, अन्धकार और अचेतना में भटकता हुआ एक सामान्य गुण मात्र समझना चाहिये, जबकि वह एक शाश्वत सर्वव्यापी और सनातन पराशक्ति है, यदि वह अपने इस रूप को समझ ले तो भगवान् हो जाये पर यदि वह महत्वाकाँक्षाओं में ही भटकता है, तब तो उसे भी कीट-पतंगे की श्रेणी का ही एक जीव कहना चाहिये।


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मनुष्य महान है, यदि वह पशु को भी मनुष्य बनाये, पर यदि वह स्वयं पशुवत् आचरण करे तो वह अन्य पशुओं से भी तुच्छ है।

-जयशंकर प्रसाद


आध्यात्मिक काम विज्ञान- एक महान तथ्य-1

सृष्टि का संचरण किस क्रिया से होता है, इस सम्बन्ध में पदार्थ विज्ञान अणु को प्रथम इकाई मानता है। उनका कहना है कि अणु के अंतर्गत नाभिक तथा दूसरे उपअणु अपनी क्रिया-कलाप जिस निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार संचरित करते हैं, उसी में विविध हलचलें उत्पन्न होती हैं और वस्तुओं के उद्भव से लेकर शक्ति उप शक्तियों की विद्या विभिन्न क्रम-विक्रमों के आधार पर चल पड़ती है। यह तीस वर्ष पुरानी मान्यता है। अब विज्ञान की आधुनिकतम शोधों ने बताया है कि अणु आरम्भ नहीं परिणति है। सृष्टि का मूल एक चेतना है, जिसे पदार्थ और विचार की द्विधा से सुसम्पन्न कहा जा सकता है। इस चेतना को वे प्रकृति कहते हैं। प्रकृति के स्फुल्लिंग ही परमाणु माने जाते हैं और कहा जाता है कि उन्हीं की गतिविधियों पर सृष्टि का उद्भव, विकास और विनाश अवलम्बित है।

अध्यात्म विज्ञान इसकी बहुत अधिक गहराई तक जाता है और वह सृष्टि का आरम्भ प्रकृति और पुरुष के सम्मिश्रण से मानता है। वैज्ञानिक शब्दों में प्रकृति को रयि और पुरुष को प्राण भी कहा जाता है। इसी को शक्ति और शिव कहते हैं। वेदों में इसे सोम और अग्नि कहा गया है। और भी अधिक स्पष्ट समझना हो तो ऋण (निगेटिव) और धन (पॉजिटिव) विद्युत धारायें कह सकते हैं। विद्युत विज्ञान के ज्ञाता जानते हैं कि प्रवाह (करेंट) के अन्तराल में उपरोक्त दोनों धाराओं का मिलन-बिछुड़न होता रहता है। यह मिलन-बिछुड़न की क्रिया न हो तो बिजली का उद्भव ही सम्भव न हो सकेगा।

प्रकृति और पुरुष के बारे में साँख्यकार की उक्ति है कि वह निरंतर मिलन-बिछुड़न के संघर्ष अपवय की प्रक्रिया संचरित करते हैं। फलस्वरूप परा और अपरा प्रकृति के नाम से पुकारा जाने वाला वह सृष्टि वैभव आरम्भ हो जाता है, जिसका प्रथम परिचय हम अणु प्रक्रिया द्वारा प्राप्त करते हैं। क्लॉक घड़ियों में पेण्डुलम लगा रहता है और गतिचक्र के नियमानुसार एक बार हिला देने पर वह स्वयमेव हिलते रहने की क्रिया करने लगता है और घड़ी की मशीन चलने लगती है। प्रकृति और पुरुष निरन्तर उसी प्रकार का मिलन बिछुड़न क्रम संचरित करते हैं और सृष्टि का क्रिया-कलाप दीवार घड़ी की पेण्डुलम प्रक्रिया की तरह चल पड़ता है।

इस सूक्ष्म तत्व ज्ञान का एक अन्तर विज्ञान को और भी अधिक स्पष्ट समझना हो तो उसे नर-नारी का रूपक दिया जा सकता है। ब्रह्म को नर और प्रकृति को नारी का प्रतीक प्रतिनिधि माना जा सकता है। सृष्टि का उद्भव विकास और विगठन करने वाली शक्ति त्रिवेणी को ब्रह्मा, विष्णु, महेश के नाम से पुकारते हैं। यों तत्व एक ही है, पर उसके क्रिया-कलाप की भिन्नता को अधिक स्पष्टता के साथ समझने-समझाने के लिए तीन देवताओं का नाम दिया गया है। वे तीनों ही सपत्नीक हैं। ब्रह्मा की पत्नी का नाम सावित्री, विष्णु की लक्ष्मी और शिव की उमा प्रख्यात हैं। इस अलंकार के पीछे इसी तथ्य का प्रतिपादन है कि सृष्टि का उद्भव अकेले ब्रह्म से नहीं वरन् प्रकृति के संयोग से होता है। नर और नारी दोनों मिलकर ही एक व्यवस्थित शक्ति का रूप धारण करते हैं, जब तक यह मिलन न हो गति एवं चेतना उत्पन्न ही न होगी और सब कुछ शून्य निष्प्राण की तरह पड़ा रहेगा। नृतत्व विज्ञान की दृष्टि से पति-पत्नी का मिलना सृष्टि का स्थूल कारण है। संयोग या संभोग से ऊर्जा उत्पन्न होती है। प्रजनन प्रक्रिया में मिलन-बिछुड़न क्रम की एक रगड़ संघर्ष जैसी हलचल चलती है। इससे सृष्टि के अति सूक्ष्म क्रिया-कलाप का अनुमान लगाया जा सकता है। शरीर का जीवन इसी क्रिया-कलाप पर जीवित है। माँस-पेशियाँ सिकुड़ती-फैलती हैं। और जीवन शुरू हो जाता है। साँस का संचरण, दिल की धड़कन, नाड़ियों का रक्त संचार, कोशिकाओं का क्रिया-कलाप इस मिलन-बिछुड़न की- आकुँचन प्रकुँचन की क्रिया पर ही निर्भर है। जिस क्षण यह क्रम टूटा उसी क्षण मृत्यु की विभीषिका सामने आ खड़ी होती है। यह तथ्य मात्र देह के जीवन का नहीं- सम्पूर्ण सृष्टि का है। समुद्र में उठने वाले ज्वार-भाटे की तरह यहाँ सब कुछ उस संयोग-वियोग पर हो रहा है, जिसे अध्यात्म की भाषा में प्रकृति और पुरुष अथवा रयि और प्राण कहते हैं।

मानव जीवन इसी सर्वव्यापी क्रिया-कलाप पर निर्भर है। नर और नारी मिलकर स्थूल जीवन को पुरुष और प्रकृति के संयोग से चलने वाले सूक्ष्म जीवन क्रम की तरह विनिर्मित करते हैं। इसलिये सामाजिक जीवन में नर और नारी का मिलन एक अनिवार्य आवश्यकता बन गया है। अपवाद की बात अलग है। विवशता और अति उच्चस्तरीय आदर्शवादिता नर-नारी के मिलन को वर्जित भी रख सकती है, पर वह मात्र अपवाद है। उनमें स्वाभाविक नहीं और न सरल विकास क्रम की क्रम-व्यवस्था का ही समावेश है। स्वाभाविक जीवन नर-नारी के सुयोग संयोग से विकसित होता है, इस तथ्य को स्वीकार करने में किसी को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए।

यह संयोग मात्र प्रजनन के लिए नहीं है और न इन्द्रिय तृप्ति के लिये। वंश वृद्धि और आह्लाद की आवश्यकता इन क्रियाओं को अपनाने के लिए भी प्रेरणा कर सकती है, पर नर-नारी के मिलन के आधार पर बनने वाला संयोग मूलतः दोनों की प्रसुप्त चेतनाओं को जगाने के लिए, जन्म से लेकर मरण पर्यन्त यह आवश्यकता समान रूप से बनी रहती है। बचपन में माता का स्तन पीना, गोदी में खेलना लाड़-दुलार एक आवश्यकता है। मातृ विहीन लड़के और पितृ विहीन लड़कियाँ मनोवैज्ञानिक दृष्टि से बहुत हद तक अविकसित रह जाते हैं। बहिन-भाइयों का साथ खेलना परिवार की शोभा है। जिन घरों में केवल लड़के ही लड़के हैं या लड़कियों ही लड़कियाँ हैं, उनमें सर्वतोमुखी प्रतिभा का विकास बहुत कुछ रुका रहता है और मानसिक अपूर्णता को वहाँ सहज ही देखा जा सकता है। यौवन के आँगन से प्रवेश करते ही दाम्पत्य-जीवन की व्यवस्था जुटानी पड़ती है। ढलती आयु में यह जरूरत पुत्र और पुत्रियों को गोदी में खिलाते हुए पूरी होती है। इस प्रकार प्रकारान्तर में नर-नारी आपस में प्रायः गुथे ही रहते हैं और अपनी-अपनी विशेषताओं के कारण एक दूसरे की प्रतिभा की-प्रसुप्त शक्तियों को जगाने की महत्वपूर्ण भूमिका स्थापित करते रहते हैं।

मनोविज्ञान शास्त्री डॉ. फ्राइड ने मानव जीवन के विकास की सबसे महती आवश्यकता “काम” मानी है। जिसे वह नर और नारी के मिलन से विकसित होने वाली मानता है। चूँकि अपने देश में ‘काम’ शब्द प्रजनन क्रिया एवं संयोग के अर्थ में प्रयुक्त होने लगा है, इसलिये वह अश्लील जैसा बन गया है और उसे हेय दृष्टि से देखा जाता है। इसलिये फ्रायड को उपरोक्त मान्यता अपने गले नहीं उतरती और न रचती है। पर यदि उसे वैज्ञानिक परिभाषा के आधार पर सोचें और शब्दों के प्रचलित अर्थों को कुछ समय के लिये उठाकर एक ओर रख दें तो इस निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ेगा कि सृष्टि के मूल कारण प्रकृति पुरुष के मिलन से लेकर दाम्पत्य जीवन बसाने तक चली आ रही काम प्रक्रिया विश्व की एक ऐसी आवश्यकता है जिसे अस्वीकार करने में केवल आत्म-वंचना ही हो सकती है।

दुरुपयोग हर वस्तु का निषेध है। अति को सर्वत्र वर्जित किया गया है। अविवेकी मनुष्य ने हर इन्द्रिय को दुरुपयोग करने में कोई कसर नहीं रखी है। जिव्हा को ही लें तो कटु और असत्य भाषण से लेकर अभक्ष भोजन तक की दुष्प्रवृत्ति अपनाकर अपना शारीरिक, मानसिक, नैतिक आर्थिक सब प्रकार अहित ही किया गया है। यह दोष जिव्हा की स्वाद एवं संभाषण क्षमता का नहीं। इनका सदुपयोग किया जाय तो जिव्हा हमारे जीवन में विकास क्रम की महती भूमिका सम्पादित कर सकती है। इसी प्रकार जननेन्द्रिय को सीमित और सोद्देश्य प्रयोग के लिए प्रतिबन्धित कर दिया जाय। संयम और ब्रह्मचर्य के महत्व को समझते हुए मर्यादाओं के अंतर्गत रहते हुए तत्सम्बन्धित कामोल्लास का लाभ किया जाय तो उससे हानि नहीं, लाभ ही होगा। हानि तो दुरुपयोग से है। सो दुरुपयोग अमृत का करके भी हानि उठाई जा सकती है और सदुपयोग विष का भी किया जाय तो उससे भी आश्चर्यजनक लाभ उठाया जा सकता है। हेय काम प्रकृति नहीं- भर्त्सना उसके दुरुपयोग की की जानी चाहिए।

नर-नारी का मिलना जितना ही प्रतिबन्धित किया जायगा उतनी ही विकृतियाँ उत्पन्न होंगी। सच तो यह है कि अनावश्यक प्रतिबन्धों ने ही हेय काम प्रवृत्ति को भड़काया है। बच्चा माँ का दूध पीता है, उसे स्तन स्पर्श से कुछ भी अश्लीलता प्रतीत नहीं होती है और न लज्जा जैसी कोई बुराई दीखती है। आदिवासी क्षेत्रों में, पिछड़े, कबीलों में, स्त्रियाँ प्रायः छाती नहीं ढकती। वहाँ किसी को इसमें अश्लीलता और काम विकार भड़काने वाली कोई बात ही प्रतीत नहीं होती। यह मानसिक कुत्सायें और मूढ़ मान्यतायें ही हैं, जिन्होंने नारी के स्तन जैसे परम पवित्र और अभिवन्दनीय अंग को विकारों का प्रतीक बनाकर रख दिया। यह विचार विकृति का दोष ही है कि अति स्वाभाविक और अति सामान्य नारी के- एक कुत्सा गढ़कर खड़ी कर दी है। काम का विकृत स्वरूप जिसने मनुष्य की एक प्रकृति प्रदत्त दिव्य सामर्थ्य को कुत्सित बनाकर रख दिया वस्तुतः हमारी बौद्धिक भ्रष्टता ही है। पशु-पक्षी नग्न रहते हैं। उनकी जननेन्द्रिय बिना ढकी रहती है। सभी साथ-साथ खाते, सोते हैं, पर बिना अवसर की माँग हुये दोनों पक्षियों में से कोई किसी की ओर ध्यान तक नहीं देता, आकर्षित होना तो दूर। मनुष्यकृत गर्हित कामशास्त्र को यदि जला दिया जाय और प्रकृति की स्वाभाविक प्रेरणा और जीवन विकास के पुण्य प्रयोजन के लिए उस संजीवनी शक्ति का सदुपयोग किया जाय तो काम-क्रीड़ा गर्हित न रहकर जीवनोत्कर्ष की एक महती आवश्यकता पूर्ण कर सकने में समर्थ बनाई जा सकती है।

बेटी, भगिनी और माता का पिता, भाई और पुत्र के साथ विनोद और उल्लास भरा संपर्क अहितकर नहीं, हित कारक ही हो सकता है, उसी प्रकार नर-नारी के बीच खड़ी करदी गई एक अवाँछनीय विभीषिका यदि गिरा दी जाय तो इससे अहित क्यों होगा? दाम्पत्य-जीवन की बात ही लें, उसमें से कुत्सायें हटा दी जायें और परस्पर सहयोग एवं उल्लास अभिवर्धन वाले अंश को प्रखर बना दिया जाये तो विवाह उभय पक्ष की अपूर्णता दूर करके एक अभिनव पूर्णता का ही सृजन करेगा। इस दिशा में भगवान कृष्ण ने एक क्रान्तिकारी शुभारम्भ किया था। उन दिनों अबोध बालकों और बालिकाओं का सहचरत्व भी प्रतिबन्धित था। लोगों ने एक काल्पनिक विभीषिका गढ़कर खड़ी कर ली थी कि नर-नारी चाहे वे किसी भी आयु के, किसी भी मनःस्थिति के क्यों न हों, मिलेंगे तो केवल अनर्थ ही होगा। इस मान्यता ने जन साधारण की मनोभूमि तमणाछिन्न कर रखी थी और छोटे बच्चे भी परस्पर इसलिए हँस-बोल नहीं सकते थे, खेल-कूद नहीं सकते थे क्योंकि वे लड़के और लड़की के भेद से प्रतिबन्धित थे। कृष्ण भगवान ने इस कुण्ठा को अवाँछनीय बताया और उन्होंने लड़के-लड़कियों को साथ हँसने, खेलने के लिए आमन्त्रित करते हुए रासलीला जैसे विनोद आयोजन खड़े कर दिये। उन्हें अवाँछनीय लगा कि मनुष्य-मनुष्य के बीच इसलिए दीवार खड़ी कर दी जाये कि एक वर्ग को नारी कहा जाता है और उसके मूँछें नहीं आतीं। दूसरे वर्ग को इसलिए अस्पर्श्य घोषित किया जाय कि वह पुण्य है और उसकी मूंछें आती हैं। प्रजनन अवयवों की बनावट में प्रकृति प्रदत्त अन्तर सृष्टि की शोभा विशेषता है। इतने नन्हें से कारण को लेकर मनुष्य जाति के दो परस्पर पूरक पक्षों को यह मानकर अलग कर दिया जाय कि वे जब मिलेंगे तब केवल अनर्थ ही सोचेंगे, अनर्थ ही करेंगे। यह मनुष्य ही मनुष्य के प्रति अविश्वसनीयता की अति है। प्रतिबन्धित करके किसी को भी सदाचरण के लिए विवश नहीं किया जा सकता। जेल में कैदी हथकड़ी, बेड़ी पहने हुए भी बड़े-बड़े अनर्थ करते हैं। घूंघट और पर्दे के कठोर प्रतिबन्ध रहते हुए भी दुनिया में न जाने क्या-क्या हो रहा है, सगे भाई-बहिन, पिता, पुत्र जैसे बाह्याचार के भीतर ही भीतर न जाने क्या-क्या बनता बिगड़ता है, उन कुत्सित कथा-गाथाओं को कहने-सुनने में कुछ लाभ नहीं। बात सोचने की यह है कि यदि मनुष्य की सज्जनता-ईमानदारी और प्रामाणिकता को विकसित न किया गया हो तो कड़े से कड़े प्रतिबन्ध आदमी की बुद्धि चातुरी को चुनौती नहीं दे सकते। वह हर कानून और हर प्रतिबन्ध के रहते हुए भी चाहे जो कर गुजर सकता है। मानवीय चरित्र निष्ठा को उनकी श्रद्धा, विवेकशीलता और दूरदर्शिता तथा आदर्शवादिता को विकसित करके ही परिपक्व करनी होगी। अन्यथा प्रतिबन्ध कड़े करते जाने में परस्पर सहयोग से उपलब्ध हो सकने वाले अगणित भौतिक लाभों और असीम आत्मिक उत्कर्षों से वंचित रहकर अपार हानि का ही सामना करना पड़ेगा और हम निरन्तर पिछड़ते ही चले जायेंगे। भगवान कृष्ण की रास परिहास आन्दोलन के पीछे यही क्रान्तिकारी भावना काम कर रही थी।

आध्यात्मिक काम शास्त्र की जानकारी हमें सर्व-साधारण तक पहुँचानी ही चाहिए। भले ही उस प्रशिक्षण को अवाँछनीय या अश्लील कहा जाय। सृष्टि के इतने महत्वपूर्ण विषय को जिसकी जानकारी प्रकृति जीव-जन्तुओं तक को करा देती है उसे गोपनीय नहीं रखा जाना चाहिए। खास तौर से तब जबकि इस महत्वपूर्ण विज्ञान का स्वरूप लगभग पूरी तरह से विकृत और उलटा हो गया हो। जो मान्यतायें चल रही हैं, वे चलती ही जायें। सुलझे हुए समाधान और सुरुचिपूर्ण प्रावधान यदि प्रस्तुत न किये गये तो विकृतियों ही बढ़ती, पनपती चली जायेंगी और उससे मानव जाति एक महती शक्ति का दुरुपयोग करने अपना सर्वनाश ही करती रहेगी।

आध्यात्मिक काम विज्ञान नर-नारी के निर्मल सामीप्य का समर्थन करता है। दाम्पत्य जीवन में उसे इन्द्रिय तृप्ति और काम-क्रीडा द्वारा उत्पन्न होने वाले हर्षोल्लास की परिधि तक बढ़ाया जा सकता है। इसके अतिरिक्त वह सौम्य सामीप्य अप्रतिबन्धित रहना चाहिए। जिस प्रकार दो नर या दो नारी चाहे वे किसी वय के हों निर्बाध रूप से हँस-बोल सकते हैं और स्नेह सामीप्य बढ़ा सकते हैं और उससे कुछ भी अनुचित आशंका नहीं की जाती, इस प्रकार नर-नारी का परस्पर व्यवहार भी निर्मल और निष्कलंक रखा जा सकना अति सरल है। इस सौम्य सरलता को प्रतिबन्धित नहीं किया जाना चाहिए। प्रतिबन्ध परक प्रयोग पिछले बहुत दिनों से चले आ रहे हैं और उनके निष्कर्षों ने उस मान्यता की निरर्थकता ही सिद्ध की है। पर्दे की प्रथा चलाकर हमने क्या पाया? केवल इतना भर हुआ कि नवागन्तुक वधुयें अपनी ससुराल का जो अविच्छिन्न स्नेह पा सकती थी, अनुभवी गुरुजनों का परामर्श प्राप्त कर सकती थी, अपनी कठिनाइयों की चर्चा करके समाधान पा सकती थीं, उससे वंचित रह गईं। उन्हें ससुराल का वातावरण पितृ गृह से उतना भिन्न और विपरीत लगा जितना स्वच्छन्द विचरण करने वाले पक्षी को आँखें बन्द करके, चारों ओर से पर्दा लगाकर रखे गये पिंजड़े में बन्द किये जाने की स्थिति में हो सकता है। कई भावुक लड़कियाँ तो इस जमीन-आसमान जैसे परिवर्तन से बुरी तरह घबरा जाती है और उन्हें हिस्टीरिया सरीखे-भय, भूत-प्रेत, घबराहट जैसी अनेकों मानसिक बीमारियाँ उठ खड़ी होती हैं। ऐसी स्थिति में हीनता की भावना बढ़ना नितान्त स्वाभाविक है। सब लोग हँसी-खुशी से घर-बाहर घूमें और हँसें-बोलें पर उस वयस्क नारी की, जिसकी भावुकता नये वातावरण में बहुत ही उभरती है और नई परिस्थितियों में ढलने, बदलने के लिए उस परिवार के भारी मानसिक सहयोग की आवश्यकता पड़ती है-यदि मुँह ढककर एक कोने में बैठे हुए प्रतिबन्धित कैदी की स्थिति में पटक दिया जाये तो निस्सन्देह उसका मानसिक प्रभाव घुटन, कुण्ठा, अरुचि, विवशता, ज्यादती के रूप में ही होगा। या तो विद्रोह भड़केगा या अन्तःकरण अपना अहं खोकर सर्वथा दीन-हीन, पराधीन हो जायेगा। दोनों ही मनः स्थितियाँ अवाँछनीय है। इससे नारी की भाव सम्पदाओं का-सृजनात्मक विभूतियों का नाश हो सकता है। हुआ भी है। पर्दा प्रथा ने नव वधुओं के साथ सचमुच बहुत अनीति बरती और ज्यादती की है और उसका परिणाम समस्त समाज को भोगना पड़ा है।

यह अस्वाभाविक प्रक्रिया एक कदम भी जीवित न रह सकी। पर्दा का उद्देश्य रत्तीभर भी सफल न हुआ। उसका उद्देश्य नर और नारी के बीच पारस्परिक आकर्षण को रोकना था। वह कहाँ पूरा हुआ। नव वधू केवल ससुराल में सास-ससुर, जेठ आदि गुरुजनों से पर्दा करती है। जो वस्तुतः उसे बेटी जैसी ही समझ सकते हैं। जिनसे खतरा है, उनके तई तो पर्दा फिर भी खुला रह सकता है। यदि व्यभिचार की रोक-थाम की समस्या है तो उसकी सबसे अधिक गुंजाइश पितृगृह के स्वच्छन्द वातावरण में रहती है। ससुराल में भी बाहर के लोगों से हाट बाजार में-मेले-ठेले में किसी से भी मुँह खोलकर बातें की जा सकती हैं। ससुराल में भी यदि उस आकर्षण की गुंजाइश है तो देवर से है, जो पति की अपेक्षा अधिक मृदुल लग सकता है। उससे पर्दा नहीं, बुजुर्गों से पर्दा-इस मूर्खता को किसी भी तथ्य के आधार पर समर्थित नहीं किया जा सकता, जो आज-कल चल रही है।

पर्दे की प्रथा उन विदेशी शासकों की देन है जो दूसरों की बहिन-बेटियों को केवल पाप अनाचार की दृष्टि से ही देखते और उनका अपहरण करने में नहीं चूकते थे। उन दिनों पर्दे का कुछ सामयिक उपयोग हो भी सकता था। अरब के रेगिस्तानों में जहाँ रेतीली आँधियाँ चलती रहती थीं। आँख, नाक, कान, मुँह आदि को कूड़े-कचरे से बचाने के लिए पर्दे का प्रचलन कुछ समझ में भी आता है। पर भारत की वर्तमान परिस्थिति में कहीं घूँघट, पर्दे की गुंजाइश है, इसका कोई कारण समझ में नहीं आता। यौवन कोई अभिशाप नहीं- नारी का शरीर मिलना कोई पाप नहीं है। इस ईश्वरीय अनुदान को निष्ठुरतापूर्वक प्रतिबन्धित किया जायगा तो उसकी प्रतिक्रिया अवाँछनीय और अनुपयुक्त ही होगी। पर्दे ने नारी का मनोबल गिराया और उसकी अगणित क्षमताओं को कुचलकर फेंक दिया। उससे इसकी उपयोगिता में कमी आई और स्थिति यहाँ तक जा पहुँची कि लड़कियों का विवाह करना हो तो लड़के वाले रिश्वत के रूप में दहेज, नकदी, जेवर और गुलामी जैसी दीनता माँगते हैं। यह स्थिति तभी बनी जब नारी का मूल्य बे हिसाब गिर गया। यदि उसका उचित मूल्य स्थिर रखा गया होता तो बिना कीमत अपना शरीर मन और सहयोग देने के लिये महान आत्मिक अनुदान देने वाली वधू के ससुराल वाले चरण धो-धोकर पीते। पशु भी कीमत देकर खरीदा जाता है। अनेक गुणों से विभूषित वधू घर में आवे तो उसे लेने के लिये उपेक्षा दिखाई जाय और रिश्वत माँगी जाय इस दयनीय स्थिति के पीछे नारी का वह अवमूल्यन झाँक रहा है, जो पर्दे जैसे प्रतिबन्धनों ने अवाँछनीय और अनुचित रूप से प्रस्तुत कर दिया।

अध्यात्म तत्व ज्ञान की मान्यतायें नर-नारी के बीच की उन अवाँछनीय दीवारों को तोड़ना चाहती हैं जो मनुष्य को मनुष्य से पृथक करती हैं और एक दूसरे का सहयोग करने में अस्वाभाविक, अप्राकृतिक प्रतिबन्ध उत्पन्न करती हैं। यौन विकृतियों और व्यभिचार के खतरों को रोकने के दूसरे तरीके हैं। एक दूसरे से सर्वथा पृथक रखने वाली प्रक्रिया इस प्रयोजन को पूरा नहीं करती। आधी जनसंख्या को इन प्रतिबन्धों के नाम पर अपंग बनाकर हम अपने ही पैरों में कुल्हाड़ी मार रहे हैं। सारी समस्या का एकमात्र कारण वह बौद्धिक भ्रष्टाचार है, जिसने नारी को कामिनी और रमणी का अतिरंजित चित्रण करके उसे एक भयावह चुड़ैल के रूप में प्रस्तुत कर दिया। तथाकथित कलाकारों-चित्रकारों, मूर्तिकारों, कवियों, गायकों, साहित्यकारों, अभिनेताओं ने नारी का कुत्सित अंश ही उभारा-उसे यौन आकर्षण का प्रतीक मात्र बनाया और उस भ्रान्ति को अधिकाधिक सघन करने में अपनी सारी कलाकारिता का अन्त कर दिया।

नर और नारी के बीच पाये जाने वाले प्राण और रयि-अग्नि और सोम स्वाहा और स्वधा तत्वों का महत्व सामान्य नहीं असामान्य है। सृजन और उद्भव की-उत्कर्ष और आह्लाद की असीम सम्भावनायें उसमें भरी पड़ी हैं, प्रजा उत्पादन तो उस मिलन का बहुत ही सूक्ष्म या स्थूल और अति तुच्छ परिणाम है। इस सृष्टि के मूल कारण और चेतना के आदि स्रोत इन द्विधा संस्करण और संचरण का ठीक तरह मूल्याँकन किया जाना चाहिए और इस तथ्य पर ध्यान दिया जाना चाहिए कि इनका सदुपयोग किस प्रकार विश्व कल्याण की सर्वतोमुखी प्रगति में सहायक हो सकता है और उनका दुरुपयोग मानव जाति के शारीरिक, मानसिक स्वास्थ्य को किस प्रकार क्षीण विकृत करके विनाश के गर्त में धकेलने के लिए दुर्दान्त दैत्य की तरह सर्वग्राही संकट उत्पन्न कर सकता है।

अश्लील अवाँछनीय और गोपनीय संयोग कर्म ही हो सकता है। विकारोत्तेजक शैली में उसका वर्णन अहितकर हो सकता है। पर सृष्टि संस्करण के आदि, उद्गम प्रकृति पुरुष के संयोग से किस प्रकार यह विश्व वसुधा गतिशील हो रही है। नर-नारी के बीच वह शिव शक्ति की द्विधा किस प्रकार काम कर रही है यह जानना न तो अनुचित है और न अनावश्यक। सच तो यह है कि इस पंचाग्नि विधा की अवहेलना अवमानना से हमने अपना ही अहित किया है। नर-नारी के बीच प्रकृति प्रदत्त विद्युतधारा से किस सीमा तक, किस दिशा में कितनी और कैसे श्रेयस्कर प्रतिक्रिया उत्पन्न करती है और उनकी विकृति विनाश का निमित्त कैसे बनती है। इस जानकारी को आध्यात्मिक काम विज्ञान कह सकते हैं। इसकी चर्चा क्रमशः अगले अंकों में पाठक पढ़ते रह सकेंगे।


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अपनी अन्ध परम्परायें बदल दें तो हमारी शक्ति और सामर्थ्य का ठिकाना न रहे।

-विवेकानन्द

काम एक शक्ति है, तुम चाहो तो उसे ऊर्ध्वगामी बनाकर जीवन को उल्लास से भर लो।

-महर्षि दयानन्द

काम एक शक्तिशाली आवेग है, जिसे खुला छोड़ देने पर मनुष्य अपने जीवन उद्देश्य से गिर जाता है।

-एमर्सन


गुणों की ही पूजा

भादो की तीज। घर में सभी स्त्रियों की चहल-पहल, कोई पार्वती की स्तुति कर रही थी तो दूसरी महिला आरती कर रही थी। देखा-देखी छोटी-छोटी कन्यायें भी उस पूजा में सम्मिलित थीं। पर छोटे बच्चों को घर से बाहर निकाल दिया गया था।

छोटे बच्चों में श्री लोकमान्य तिलक का पोता भी था, वह पूजा में सम्मिलित होने के लिये बराबर हठ करता रहा, इस पर महिलाओं ने उसे डाँटकर भगा दिया। पोते को यह बात अच्छी न लगी। वह सीधे श्री तिलक के पास जाकर शिकायत करने लगा-बाबा! मुझे माँ जी शिवजी की पूजा में सम्मिलित नहीं होने दे रहीं।

श्री तिलक “केशरी” अखबार के सम्पादन के सम्बन्ध में कुछ चर्चा कर रहे थे। बातचीत बीच में ही रोककर-पोते को समझाते हुये बोले-बेटा! तुम्हें पूजा करने की आवश्यकता नहीं है। तुम्हें प्रसाद चाहिये वह मिल जायेगा।

इस पर बच्चे ने कहा-मुझे पूजा की आवश्यकता नहीं है तो फिर-काकी, बुआ, दीदी सबकी सबको पूजा करने की क्या आवश्यकता है।

श्री तिलक ने बच्चे की पीठ थपथपाते हुये कहा-बेटा, आज की ‘पूजा तो बालिकायें करती हैं, तभी तो तुम्हारी बहनें पूजा कर रही है। जानते नहीं शंकर को पाने के लिये पार्वती ने पूजा की थी। उसी प्रकार योग्य पति प्राप्ति की लालसा से यह बालिकायें भी पूजा कर रही है।’ तुम्हें पति थोड़ा ही चाहिये?

‘तो क्या अच्छी पत्नी मुझे नहीं चाहिये।’

तिलक ने अपने पोते के सिर पर हाथ फिराते हुये बड़ी शान्ति से कहा ‘तुम बहुत चतुर हो बेटा! अपने देश में श्रेष्ठ पति प्राप्त करने के लिये पार्वती के समान कठोर तप करना पड़ता है, पर स्त्रियाँ तो सभी साध्वी होती हैं, अतः अच्छी पत्नी पाने के लिये पूजा-पाठ नहीं करना पड़ता।’ हाँ यदि पत्नी के प्रति सच्चा प्रेम प्रदर्शित करना हो तो बच्चों को गुणी और चरित्रवान् बनना चाहिये। तुम चाहो तो गुणों की पूजा कर सकते हो।

बच्चा बहुत खुश हुआ और बोला, अच्छा तो दादाजी-हम अब गुणों की ही पूजा करेंगे।


युग परिवर्तन अत्यन्त सन्निकट

अखण्ड-ज्योति सन् 1942 का जनवरी अंक “सतयुग अंक” था उसमें संसार के मूर्धन्य ग्रह-गणितज्ञों संतों और भविष्यवक्ताओं की भविष्यवाणियाँ छपी थीं जिनमें यह बताया गया था कि संसार में तीव्र उलट-फेर होने वाला है। सारी पृथ्वी में व्यापक हलचल होगी भयंकर युद्ध और रक्तपात होंगे और उस अशान्ति की, संकटपूर्ण परिस्थिति के भीतर से ही एक स्वर्णिम लालिमा का उदय होगा जो एक नये युग के सूर्य के रूप में छा जायेगी और संसार में आज जो भीषण परिस्थितियाँ दिखाई दे रही हैं उनका अन्त हो जायेगा उनके स्थान पर मानवीय सुख-शान्ति, सद्भाव, परस्पर प्रेम, दया, समता आदि सद्गुणों का विकास होगा। यही सतयुग या स्वर्गीय जीवन की रूपरेखा होगी।

इसी अंक में छपी हुई महर्षि अरविन्द की भविष्यवाणी का एक अंश- “भारतवर्ष शीघ्र स्वतंत्र हो जायेगा काँग्रेस सत्तारूढ़ हो जायेगी पर वह अपने संचालक महात्मा गान्धी के आध्यात्मिक आदर्शों को भूल जायेगी। अभी जो नेता त्यागी और कष्ट सहिष्णु दिखाई देते हैं वे तब धन ऐश्वर्य और सत्ता के लालच में निकृष्ट व्यक्तियों जैसे कर्म करने लगेंगे। तब भारतीय प्रजा अपने अन्दर से ही किसी सच्चे गान्धीवादी लोक नेता के नेतृत्व में एक नई विचार क्रान्ति को जन्म देगी तब एक नये युग का आरम्भ होगा जो भारतीय प्रतिष्ठा को सारे विश्व में चमकाने वाला होगा।”

इसी अंक के पृष्ठ 28 में महर्षि अरविन्द द्वारा 1918 में ही की गई भविष्यवाणी का एक अंश इस प्रकार छपा था- भारत में भारत को विपुल तथा विराट कार्य का भार अपने ऊपर लेकर खड़ा होना पड़ेगा, आगामी 40 वर्ष के भीतर संसार में विचित्र प्रकार का परिवर्तन होगा। सारी बातों में उलट-पुलट हो जायेगी। उसके बाद जो नया जगत तैयार होगा उसमें भारत की सभ्यता ही सभ्यता होगी।”

इन बातों पर उस समय कितने ही तो हमारे पाठकों को ही विश्वास नहीं हुआ था। आशंका भरे पत्र आते थे पर जब 1947 में भारतवर्ष स्वतंत्र हो गया और काँग्रेस सत्तारूढ़ हो गई तो वही लोग आश्चर्य चकित रह गये। इधर 30 वर्षों में जो परिवर्तन हुए हैं उनसे भारतवर्ष का नक्शा ही बदल गया है पर वास्तविक स्थिति जो भारतीय संस्कृति को विश्व संस्कृति के रूप में प्रतिष्ठित दिखायेगी अभी नहीं बन सकी है। उसके लिये अभी तक एक और बड़ी विचार क्रान्ति का सृजन हो रहा है उसके फलितार्थ भारत की राजनैतिक स्वाधीनता से कहीं अधिक आश्चर्यजनक होंगे।

नया युग तेजी से दौड़ा आ रहा है सारे विश्व के अध्यात्म वेत्ता इस सम्बन्ध में पूर्णतया एकमत हैं। इंग्लैण्ड के प्रकाण्ड ज्योतिष शास्त्री प्रो. शेरो को कौन नहीं जानता उन्होंने महारानी विक्टोरिया की मृत्यु, जर्मनी से मित्र राष्ट्रों का युद्ध और हिटलर के पतन आदि की भविष्यवाणियाँ की थीं, तब की थी, जब वैसी कोई संभावना नहीं थी, पर वे पूर्ण सत्य निकली थीं। लार्ड किचनर के सम्बन्ध में सन् 1887 में ही उन्होंने लिखा था-वे सन् 1914 में किसी महायुद्ध का उत्तरदायित्व अपने कन्धों पर उठायेंगे। इसी युद्ध में 66 वर्ष की आयु में उनकी मृत्यु हो जायेगी पर मृत्यु मैदान में न होकर समुद्र में डूबने से होगी अन्ततः यह भविष्यवाणी भी अक्षरशः सत्य हुई-

1925 में श्री शेरो ने एक पुस्तक लिखी-”वर्ल्ड प्रोडक्शन” इसमें की गई उनकी अधिकाँश भविष्यवाणियाँ सच हुईं अब जो आगे होने को है वे इस प्रकार हैं-

“सूर्य अपने स्थान से हट रहा प्रतीत होता है। उसका कारण पृथ्वी का अपनी धुरी से हटना है। पृथ्वी के अपने स्थान से हटने के कारण ध्रुवों की स्थिति में अन्तर पड़ेगा फलस्वरूप पृथ्वी की जलवायु में तीव्र परिवर्तन होंगे, शीत लहरों और बर्फीले तूफानों के साथ कहीं तो अति वृष्टि होगी कहीं सूखा पड़ेगा। समुद्र में कितने ही भाग डूब जायेंगे (धनुष्कोटि की तरह) कितने नये द्वीप निकल आयेंगे। तीव्र भूकम्प के कारण तुर्कों को भीषण धन-जन हानि का सामना करना पड़ेगा। वह किसी दिन भूकम्प के कारण पूरी तरह नष्ट हो सकता है। ईरान और लेबनान में भारी संकट होंगे। मिस्र और जोर्डन चैन से नहीं रह सकेंगे इनकी भूमि का बहुत सा हिस्सा निकल जायेगा। आयरलैण्ड, इंग्लैण्ड, स्वीडन, नार्वे, डेन्मार्क, रूस, जर्मनी और फ्राँस के उत्तरी भाग भीषण रूप से ठंडे हो जायेंगे वहाँ लोगों का रहना कठिन होगा। इन परिवर्तनों से पूर्व एक बड़ा भयंकर युद्ध होगा इस युद्ध में संसार का बड़ा संहार होगा। सीमित जनसंख्या रह जायेगी। युद्ध और राजनैतिक कूटनीति से अलग रहकर ज्ञान-विज्ञान की उन्नति में ही अपने को तटस्थ रखने वाले लोग ही बचेंगे। इस संहार के कारण रहे बचे लोगों की विचारधारा पलट जायेगी और सत्य, प्रेम, न्याय के सिद्धान्तों का प्रचार होने लगेगा। राजनैतिक छल-प्रपंच समाप्त हो जायेंगे, विश्वव्यापी संघ की स्थापना होगी। परस्पर प्रेम भाव की वृद्धि होगी, सुख-शान्ति सुरक्षित रहेगी और सारे संसार में एक ही धर्म-मानव धर्म के रूप में विराजमान होगा।”

चूँकि अपने मिशन का सीधा सम्बन्ध नये युग का ढाँचा तैयार करने और विश्व में मंगल प्रभात लाने वाली शक्ति से है, इसलिये अपनी निजी विचारधारा कभी नहीं दी तो भी उन भविष्य कथनों को हम बहुत लम्बे समय से छापते आ रहे हैं। जो लगभग हमारे विश्वास के ही समान होते हैं। उनकी विश्वस्तता का प्रमाण यही है कि भारत की स्वाधीनता के पूर्व से ही किया जा रहे अध्यात्म तत्व वेत्ताओं के अधिकाँश भविष्य कथन सत्य होते जा रहे हैं। प्रो. कीरो की ऊपर की भविष्यवाणी कितनी सच हो रही है, यह हम सब देख रहे हैं।

सन् 1942 के इसी भविष्यवाणी अंक में श्री परमहंस राजनारायण जी षट शास्त्री ने मथुरा की कुण्डली बनाकर “मथुरा का भविष्य” नामक लेख भेजा था। लेख में श्री शास्त्री जी ने लिखा था- “यमुना नदी की आयु सं. 1992 से आगे 4538 वर्ष की है। उन्हें एक बार भगवान् कृष्ण के समय गंगा जी की तरह महत्व मिला था, पीछे लोग यमुना नदी, जो गंगाजी की सगी बहन के समान ही है, के महत्व को भूल गये पर अब शीघ्र ही फिर से हरिद्वार के स्थान पर ब्रजधाम सतयुग के तीर्थ बनेंगे। सारे भारतवर्ष का ध्यान इस पुण्य भूमि की ओर आकर्षित होगा, उसका कारण वहाँ किसी महान शक्ति का अभ्युदय होगा। पहले तो दिल्ली की खूब उन्नति होगी, पर उसके बाद मथुरा एक बार फिर से सारे राष्ट्र की विचारणा का केन्द्र बिन्दु बनेगा, मथुरा एक बार फिर से उन्नति के शिखर तक पहुँचेगी।”

इस लेख का बहुत सा अंश ऐसा था जिसकी स्पष्ट यह ध्वनि हमसे और इस मिशन से सम्बन्ध व्यक्त करती थी, अतएव उस अंश को छापा नहीं गया था। थोड़ा ही अंश दिया गया था। इस अवधि में इस पुण्य भूमि में एक बार फिर से सहस्र कुण्डी यज्ञ सम्पन्न हुआ, वेद, उपनिषद्, दर्शन आदि आर्षग्रन्थों का प्रकाशन और प्रसार हुआ, यह सब बातें उपरोक्त भविष्य कथन की सत्यता सिद्ध करती हैं। जनलेखा विभाग की रिपोर्ट है कि पिछले दस वर्षों में मथुरा आने वाले तीर्थ यात्रियों की संख्या निरन्तर बढ़ी है। जबकि आम लोगों की धारणा यह है कि लोग धर्म और आध्यात्मिकता को भूल रहे हैं, लोगों का आध्यात्मिकता के प्रति आग्रह बढ़ना इस बात का प्रमाण है कि हमारे देश के आध्यात्मिक संस्कारों का तेजी से जागरण हो रहा है। श्री षट् शास्त्री जी की मथुरा सम्बन्धी कई भविष्यवाणी जो अभी तक प्रकाश में नहीं हैं, आगे प्रकट हों तो कोई आश्चर्य नहीं।

जार्ज बाबेरी जो मिस्र की गुप्त विद्याओं के प्रकाण्ड पण्डित और तान्त्रिक थे। उन्होंने भविष्यवाणी की थी-कि संसार को सतयुग का प्रकाश देने वाली आत्मा भारतवर्ष में जन्म ले चुकी है, पर उसका कार्य 1930 के आस-पास स्वतन्त्र रूप से विकसित होगा। 14 सितम्बर 1936 नये युग का प्रथम दिन होगा। उस दिन यह आत्मा अपने मनुष्य-भाव से निकल कर सत्ता भाव (अवतार रूप) में आ जायेगी और फिर हजारों अज्ञानग्रस्त मूढ़ लोगों के विरोध के बावजूद वह अपने प्रखर और प्रचंड रूप से प्रभाव में आयेगी और संसार को झकझोरती चली जायेगी। 1965 के बाद उसके स्वरूप की लोगों को स्पष्ट कल्पना होने लगेगी और सन् 1970 के बाद अधिकाँश भारत में अवतार अपने प्रकट रूप में आ जायेगा। इस बीच चौथे विश्व युद्ध की काट-छाँट चलती रहेगी। एक भयंकर ज्वाला के साथ यह महाविनाशकारी युद्ध होगा जिसमें आज के संसार की बड़ी-बड़ी सभ्यतायें इस तरह नष्ट हो जायेंगी, मानों वह कभी अस्तित्व में ही नहीं थीं। फिर भारतवर्ष अपनी तरह से संसार को व्यवस्था सम्भालेगा और संसार की सुख-शाँति की राह दिखायेगा।”

पटना की “खुदाबख्श ऑरिएंटल लाइब्रेरी” में फारसी कसीदा (कविता) की पुस्तक है, जो बुखारा के सुप्रसिद्ध सन्त शाह नियामत उल्लाबल्ली साहब की लिखी हुई है। श्री बल्ली साहब की ख्याति जितनी एक सन्त के ईश्वर उपासक के रूप में है उससे अधिक एक भविष्यवक्ता के रूप में। शुद्ध चित्त में भावी जगत के चित्र फिल्म के पर्दे पर दिखाये जा रहे चल-चित्र कि तरह स्पष्ट और साफ उतरते चले आते हैं, यह बात श्री बल्ली साहब के जीवन से चरितार्थ हो जाती है। उन्होंने कभी क्रोध नहीं किया था, किसी जीव को सताया नहीं था, शराब और माँस वे किसी दिन आँख से देख लेते थे तो उस सम्पूर्ण दिन उपवास रखते थे और भगवान से प्रार्थना करते थे- हे प्रभु! ऐसी वस्तुयें संसार में न रहें ताकि लोग मार्ग से भ्रष्ट न हों? उनका सारा जीवन सच्चाई और नेक नीयती की प्रतिमूर्ति ही कहना चाहिये। इसीलिये उन्हें संसार का भविष्य अपने अन्तःकरण में इतना स्पष्ट उतरता दीख जाता था।

इस पुस्तक में उन्होंने लिखा है- “जापान और रूस में युद्ध होगा” (1904 में रूस और जापान में युद्ध हुआ भी) जापान में भयंकर भूकम्प आयेगा (1923 में भूकम्प आया)। प्रथम विश्वयुद्ध में अलफ (अँग्रेज) जीम (जर्मनी) लड़ेंगे, उसमें अँगरेज जीतेंगे पर युद्ध में एक करोड़ इकत्तीस लाख व्यक्ति मारे जायेंगे (ब्रिटिश कमीशन की रिपोर्ट के अनुसार सचमुच इस युद्ध में एक करोड़ तीस लाख लोगों की मृत्यु का विवरण दिया गया है) “दो जीम” (जर्मनी दो भागों में बँट गया) आपस में तनावपूर्ण स्थित में आ जायेंगे।” द्वितीय विश्वयुद्ध में बम विस्फोट की बात भी सच निकली और इस तरह उनकी एक भी भविष्यवाणी गलत नहीं हुई।

भारत के प्रसंग में वही बल्ली साहब लिखते हैं- “मुसलमानों के हाथ से यह मुल्क विदेशियों के हाथ चला जायेगा। फिर हिन्दू-मुसलमान मिलकर उनके खिलाफ लड़ाई लड़ेंगे और विदेशी यहाँ से चले तो जायेंगे, पर हिन्दुस्तान को दो टुकड़ों में बाँट जायेंगे। दोनों दो देश बन जायेंगे और परस्पर शत्रुता इतनी बढ़ जायेगी कि दोनों में युद्ध का तनाव तब तक बना रहेगा जब तक मुसलमानी भूभाग पूरी तरह पराजित होकर फिर से भारत में नहीं मिल जायेगा। मुसलमानी भाग (पाकिस्तान) को जीतने वाला भारतीय सेनापति कोई मुसलमान ही होगा इसके बाद दोनों जातियाँ एक जाति की तरह घुल-मिल जायेंगी।”

“तृतीय विश्व युद्ध बड़ा भयंकर होगा। अमेरिका इसका प्रमुख दल होगा। चीन दूसरा घटक। इस युद्ध के बाद अँगरेज पूरी तरह समाप्त हो जायेंगे और ‘भारत का अभ्युदय एक सर्वोच्च शक्ति के रूप में हो जायेगा। पर उसके लिये उसे बहुत कठोर संघर्ष करने पड़ेंगे। देखने में यह स्थिति कष्टकारक होगी, पर इस देश में एक फरिश्ता आयेगा जो हजारों छोटे-छोटे लोगों को इकट्ठा करके उनमें इतनी हिम्मत पैदा कर देगा कि वही नन्हें-नन्हें लोग तथाकथित भौतिकवादी लोगों से भिड़ जायेंगे और उनकी मान्यताओं को मिथ्या सिद्ध करके दिखा देंगे। इसके बाद संसार में सीधे-सच्चे लोगों की प्रतिष्ठा बढ़ेगी और अमन-चैन फैलती चली जायेगी।”

चन्द्रमा पर मनुष्य की उड़ान और विषय से पूर्व ही जिन श्रीमती जीन डिक्सन ने भविष्यवाणी कर दी थी, उनकी इन भविष्यवाणियों को भी लोग सत्य होते देख चुके हैं-

गाँधी जी और राष्ट्रपति कैनेडी की हत्या कर दी जायेगी। इनके हत्यारे भी जिन्दा न रहेंगे।

भारत का बँटवारा हो जायेगा।

रूस और चीन में जंग छिड़ जायेगी।

मिस्र और इजराइल में युद्ध होगा, हार अरबों की होगी।

जहाँ यह भविष्य कथन सत्य हुये, वहाँ आगे इनके सत्य होने की प्रतीक्षा है-

एक छोटी डेढ़ फुट मिसाइल का विकास होगा, जो छोटा शस्त्र होते हुये भी संसार के सबसे भयंकर आयुध वाली मारक क्षमता का होगा।

रूस और चीन का युद्ध होगा उसमें अमरीका और रूस मित्र राष्ट्रों की तरह साथ-साथ लड़ेंगे।

1980 में विश्व युद्ध, रूस और चीन के युद्ध के फलस्वरूप ही भड़केगा जो जब तक हुये सभी युद्धों से विकराल होगा।

जीन डिक्सन की इन भविष्यवाणियों से अधिक महत्वपूर्ण भविष्यवाणी- “एक ऐसी आत्मा का जन्म हो चुका है, जो संसार का कायाकल्प करेगी सम्प्रदायों की संकीर्णता मिटाकर एक ऐसे सार्वभौम विश्व-धर्म की स्थापना करेगी जो विश्व के हर नागरिक को मान्य होगा। 1980 के आस-पास होने वाले महा विनाशकारी युद्ध के समय भी इस मसीहा का कार्य धर्म स्थापना के रूप में चलता रहेगा और युद्ध के पश्चात् वह संसार का सर्व-समर्थ व्यक्ति बन जायेगा। आज तक समूचे विश्व को प्रभावित करने वाला इतिहास का कोई भी ऐसा व्यक्ति न हुआ होगा।”

जीन डिक्सन का स्पष्ट संकेत यह भी था कि ऐसा महापुरुष भारतवर्ष के किसी साधारण परिवार में जन्मा है और वह अपनी गतिविधियाँ तेजी से चला रहा है। प्रसिद्ध भविष्यवक्ता एण्डरसन का भी यही मत है, अन्तर सिर्फ इतना है कि श्रीमती जीन डिक्सन ने इस महापुरुष का जन्म 1965 में माना है, जबकि एण्डरसन का कथन है कि 1965 तक तो महान विभूति अपनी आधी के लगभग मंजिल पूरी कर चुकी होगी।

कल्कि पुराण और महाभारत आदि में निष्कलंक या कल्कि अवतार का जो समय दिया है, वह भी अभी पड़ता है। इन दोनों सम्भावनाओं को एक ही स्थान पर पाकर अमेरिकी अध्यात्मवादियों की इस संदर्भ में रुचि बढ़ी, फलस्वरूप वहाँ “कल्कि” अवतार की खोज के लिये एक समिति भी बनाई गई। एक अमरीकी छात्रा ने उसे अपना शोध विषय चुना है। इंग्लैण्ड आदि में जो प्रामाणिक प्रतिलिपियाँ हिन्दू ग्रन्थों की मिली हैं, उनके अनुसार इस समिति का भी विश्वास है कि कल्कि जन्म ले चुका है। 8 अक्टूबर के “अमेरिकन रिपोर्टर” के अनुसार यह समिति भारतवर्ष में रहकर कल्कि अवतार की विस्तृत खोज और जानकारी उपलब्ध करने में जुट गई है।

“इस युग के मसीहा और निष्कलंक” अवतार पर दक्षिण के प्रसिद्ध सन्त और भविष्यवक्ता रामन स्वामी अइय्यर के कथन अभी तक हुये भविष्य कथनों में से सबसे अधिक स्पष्ट हैं, श्री अइय्यर लिखते हैं- कल्कि न तो घोड़े पर चढ़ा हुआ आयेगा न तलवार लेकर, तो भी वह दोनों प्रतीक ही उनकी पहचान के माध्यम होंगे। घोड़ा शक्ति का प्रतीक है, उस पर कल्कि के आसीन होने का अर्थ है, कि वह इतना समर्थ व्यक्ति होगा कि “शक्ति” उसकी इच्छानुसार कार्य करेगी। राम ने अपनी शक्ति को हठात् रावण जैसे तान्त्रिक पर भी थोप दिया था कृष्ण अवतार थे क्योंकि उनकी शक्ति के आगे कौरव-पाण्डव तक थर्राते थे। अपने शुद्ध अहंकार तब अवतार का ही काम है और उनकी यही पहचान होती है कि संसार के शेष सभी बुद्धिमान से बुद्धिमान और बलवान् लोग भी उसकी शक्ति से नीचे पड़ जाते हैं। घोड़े का यही अर्थ है कि वह इतिहास का प्रबलतम शक्तिशाली व्यक्ति होगा।

तलवार का अर्थ काटना है। शत्रु के सिर तो नहीं काटे जाते विचार भी काटे जाते हैं, कल्कि पुराण से भी प्रकट है कि कल्कि बौद्धों अर्थात् उन लोगों के बुद्धिवाद से युद्ध करेगा जो आज के युग में देखने में बहुत शिक्षित लगते हैं पर वे पदार्थ से परे कुछ सोच ही नहीं पाते। नास्तिकतावादी, भोगवादी, संचय और उपयोगितावादी व्यक्तियों की ऐसी मान्यताओं को जो विस्मार करेगा वही कल्कि होगा।

श्री अइय्यर ने बताया है कि- ‘कल्कि का जन्म मथुरा के पास ही होगा।’ शम्भल का अर्थ चम्बल नदी के किसी तटवर्ती ग्राम से है। कार्य क्षेत्र उसका मथुरा होगा। उसके सहायक सभी प्रान्तों से आयेंगे। वह महान गायत्री उपासक और सावित्री तत्व ज्ञाता होगा। विचारों को विचारों से काटने की कला में वह अत्यधिक प्रवीण होगा। अब तक समाज में मान्यताएँ फैली हैं उनकी प्रतिस्थापनाएं दे सकने में केवल मात्र वही समर्थ होगा। दूसरे कई लोग अपने आपको अवतार कहेंगे वे थोड़े बहुत चमत्कार भी दिखायेंगे पर किसी प्रकार की रचना उनके वश की बात न होगी- इसलिये वे बरसाती कीड़ों की तरह निकलते और अपने आप नष्ट होते जायेंगे। जबकि कल्कि नामी महापुरुष सम्पूर्ण आर्ष ग्रन्थों के उद्धार से लेकर सामान्य जीवन तक की सारी रीति-नीति सम्बन्धी नये विचारों का सृजन करेगा पीछे इन्हीं विचारों का लोग अनुसरण करेंगे। वह गृहस्थ होगा। अतुल सम्पत्ति वाला होकर भी उसका रहन-सहन साधारण गृहस्थ जैसा होगा उसकी सम्पत्ति लोक-मंगल के लिये होगी। उसके इस आदर्श को उनके देशव्यापी अनुयायी भी अपनाकर एक ऐसा समर्थ संगठन तैयार करेंगे जो उसके दिये हुए विचारों को सारे विश्व में फैला देंगे। महिलायें उसकी विशेष सहायिकायें होंगी। वह अद्भुत स्वभाव वाला चमत्कारी व्यक्ति अपने जीवन के उत्तर काल में स्थान परिवर्तन करेगा। तब उसका रौद्र रूप प्रकट होगा। जब उसके भयंकर विचारों से लोग काँपने लगेंगे तब उसकी साध्वी पत्नी शासन-सूत्र सँभालेंगी फिर वह अपने अतुलित प्यार और स्नेह शक्ति से भूले भटकों को रास्ता दिखायेगी। भारतवर्ष विपुल उन्नति करेगा और उसका प्रभाव अमरीका और रूस पर भी छा जावेगा। यह दोनों देश भी उसके वैभव के आगे नगण्य जैसे होंगे।

कल्कि होने का श्रेय जिसे मिलेगा यह परिस्थितियों और समय के लिये छोड़ दिया जाये। अवतारों को लोग उनके जीवन काल में ही पहचानते आये हैं सो उनकी पहचान न हो ऐसा सम्भव नहीं। वे भले ही कितना ही छुपकर रहें उजागर होंगे ही। पर इतना निश्चित है कि युग को पलट डालने वाली सत्ता का अवतरण हो चुका है वह अपने “यदा यदाहि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत, अभ्युत्थानं धर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्” संकल्प को पूरा करने न आती ऐसा कहाँ संभव है? यह अलग बात है कि कौन लोग उसका प्यार पाते हैं, कौन उसकी दाढ़ के नीचे पिसते हैं चलना सबको ही लोक-मंगल के पथ पर पड़ेगा। चाहे कोई इच्छा से चले या मजबूर करके चलाया जाये।

युग परिवर्तन सृष्टि का अवश्यंभावी क्रम है और परिवर्तन का क्रम प्रारम्भ हो गया है यह दोनों ही बाते अकाट्य हैं। प्रोफेसर हरार के अनुसार “1965 से 1971 तक का समय युग परिवर्तन का प्रारम्भ काल होगा।”

श्रीमती जीन डिक्सन का विश्वास है “सन् 1999 तक तृतीय विश्व युद्ध और सभी भयंकर घटनायें हो लेंगी और नये युग का पूर्ण विकास भी हो जावेगा।” कीरो के अनुसार-

This Sign of Zodiac more immediately influenced as it is by the Planets Uranus and Saturn has in minds of ancient students of Occultism from true immemorial been associated with the idea of "New Age' and the complete change in the laws controlling Civilization. It was believed and understood that the Peculiar Vibrations caused by action of the sun retrograding through this Part of Zodiac would, so effect the minds of humanity that most astounding changes upheavals and revolution would follow in its train,The Aquarian or " New Age" has also been set down as the period when woman in the Order of upheaval revolution and change would appear on the worlds stage in completely new role.

सूर्य कुम्भ राशि पर प्रवेश कर गया है एक राशि को पारकर सूर्य अन्य राशि पर पदार्पण करता है तब युग बदलते हैं। इस संदर्भ में लिखे उपरोक्त कथन का हिन्दी रूपांतर- “सूर्य कुम्भ पर प्रवेश करता है तब बहुत तीव्र प्रभाव दिखाई देते हैं क्योंकि उसके ग्रह यूरेनस और शनि हैं। गूढ़ विद्याओं के प्राचीन ज्ञाता इनका सम्बन्ध “नये युग का शुभारम्भ” से मानते रहे हैं। शनि एक ओर तोड़-फोड़ विध्वंस करता है यूरेनस के प्रभाव से पुराने नियम कानून आमूल-चल बदल जाते हैं। सूर्य कुम्भ पर आता है तब बड़े आश्चर्यजनक परिवर्तन हलचल और क्रान्तियाँ उत्पन्न होती हैं इसलिये उसे नये युग का निर्माता ग्रह कहा जाता है इसके प्रभाव से स्त्रियाँ संसार में नये ही रूप में आती हैं।”

सूर्य-मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, मीन, कुम्भ इन बारह राशियों में भ्रमण करता है तब प्रत्येक राशि का स्वामी अपना प्रभाव व्यक्त करता है। सूर्य एक राशि पार कर पूरी तरह दूसरी राशि में प्रवेश कर जाता है इस अवधि में 2150 वर्ष बीत जाते हैं इस प्रकार हर 2150 वर्ष बाद परिवर्तन होते हैं। ज्योतिष गणना के अनुसार 1762 में सूर्य मीन राशि से हटकर कुम्भ राशि की ओर चल पड़ा था तभी से संसार की स्थिति में व्यापक हलचलें युद्ध परिवर्तन होते आ रहे हैं। “युग-क्षय” के अनुसार कलियुग से सतयुग के बीच 200 वर्षों की “सन्ध्या” होती है तदनुसार 1762+200=सन- 1962 (लगभग यही समय युग परिवर्तन की हलचल के लिए सभी भविष्यवक्ताओं ने दिया है। इसी अवधि में निर्माणकारी शक्तियों को तीव्र होना चाहिए) सो नये युग का सृजन प्रारम्भ हो जाता है। इस बीच चीन, जापान, तुर्की, मिश्र जैसे रूढ़िवादी देशों में भी स्त्रियों के तीव्र आन्दोलन और उनका पुरुषों के समानान्तर होने का संघर्ष कीरो की भविष्यवाणी को सत्य सिद्ध करता है और यह निर्विवाद निष्कर्ष निकलता है कि नये युग का प्रारम्भ हो चुका है और अब उसका प्रसार होना शेष है।

प्रसिद्ध भविष्यवक्ता पैरा सेल्सस, डेनियल, नास्टरडम, वेजीलेटिन तथा पादरी वेल्टर बेन सबका निश्चित मत है कि युग परिवर्तन इस शताब्दी की अन्तिम और सबसे जबर्दस्त घटना होगी। उसे रोकना किसी के लिए भी सम्भव न होगा। इन तत्वदर्शियों की कुछ भविष्यवाणियाँ बड़ी महत्वपूर्ण हैं।

1- 1999 में पूर्व के किसी देश से एक जबर्दस्त सेनापति आकाश मार्ग से योरोप की धरती पर उतरेगा उस समय युद्ध चल रहा होगा पर उसका यान किसी अज्ञात शक्ति से ढका हुआ (कवरिंग) होगा अतएव कोई भी मिसाइल उसे नष्ट नहीं कर सकेगी। पेरिस का पतन तभी होगा तथा दूसरे प्रबल पश्चिमी राष्ट्र जो अभी तक भी अपनी भौतिकवादी चाल पर चल रहे होंगे वह भी उस शक्ति से पराजित हो जावेंगे।

-नास्टरडम

2- सारे संसार का शासन सूत्र एक स्थान से चलेगा, “एक भाषा होगी-एक संस्कृति” शहरों की संख्या बहुत थोड़ी रह जावेगी। संचार के साधनों का यहाँ तक विकास हो जावेगा कि लोग अपने मन की बात दूसरे लोगों तक बेतार के तार की तरह पहुँचा दिया करेंगे।

-डेनियल

3- सतयुग का प्रारम्भ 25 वर्ष से कम आयु के बालकों से प्रारम्भ होगा। वृद्ध लोग रूढ़िवादी मान्यताएं छोड़ने को तैयार नहीं होंगे तब भारतवर्ष में एक ऐसे संत का जन्म होगा जो सारी दुनिया में विचारक्रान्ति खड़ी कर देगा। उसके प्रभाव में सैकड़ों लोग आ जावेंगे पर उनमें से मूढ़ मान्यताओं वाले लोग अपने को बदलने में लज्जा अनुभव करेंगे तब नयी पीढ़ी उसके विचारों को आत्म-सात करेगी और नया युग का शुभारम्भ करेगी। लोग आशावादी होंगे। छल, कपट, हत्या, लूटपाट का स्थान प्रेम, दया, त्याग, ईमानदारी, परोपकार और भाईचारे की भावनायें ग्रहण कर लेंगी। धर्म की स्थापना होगी और अधर्म का अन्त हो जावेगा। यह सब सन् 2000 तक स्पष्ट दिखाई देने लगेगा।

-हंगरी की महिला ज्योतिषी बोरिस्का सलविगर

इस तरह संसार के सभी भविष्य वक्ता युग परिवर्तन के लिए आश्वस्त है। भारतीय आर्ष ग्रन्थों में तो पग-पग पर यह सूचनायें भरी पड़ी हैं।

ततस्तुमुल संघाते वर्तमाने युगक्षये।

द्विजाति पूर्वको लोकः क्रमेण प्रभविष्यति॥

दैवः कालान्तरेऽन्यास्मिन्युनर्लोकं विवृद्धये।

भविष्यति पुनर्देवमनुकूलं यदृच्छया॥

यदाचन्द्रश्च सूर्यश्च तथा तिज्य बृहस्पति।

एक राशौ समेष्यन्ति प्रपत्स्यति तदा कृतम्॥

काल वर्षी च पर्जन्यो नक्षत्राणि सुभानिच।

क्षेम सुभिक्षमारोग्यं भविष्यति निरामयम्॥

-महाभारत वन पर्व 190।88, 89, 90, 91

वर्तमान युग के समाप्त होने के समय कठोर घटनायें घटेंगी। उत्तम वर्ण वाले लोगों की धीरे-धीरे उन्नति होने लगेगी। कुछ समय पश्चात् दैव की इच्छा से लोगों को सुखी और समुन्नत बनाने वाला समय फिर आ जायेगा। यह सतयुग तब प्रारम्भ होगा जब तिष्य में सूर्य, चन्द्र और बृहस्पति तीनों एक राशि पर आ जाते हैं (यह स्थिति भी 1962 में बन चुकी है) उस समय वर्षा और प्रकृति अनुकूल हो जायेंगी, लोग स्वस्थ और प्रसन्न मन वाले हो जायेंगे।

महात्मा सूरदास के शब्दों में-

एक सहस्र नौ सौ के ऊपर ऐसा योग परे।

सहस्र वर्ष लौं सतयुग बीते धर्म की बेल बढ़े॥

सन् 1900 के बाद फिर से सतयुग आ रहा है, उसमें सर्वत्र धर्म का प्रसार होगा।

यदा देवर्षयः सप्त मघासु विचरन्तिहि।

तदा प्रवृत्तस्नु कलिद्वदिशाब्द शतात्मकः॥

यदा मघाभ्यो यास्यन्ति पूर्वाषाढ़ा महर्षयः।

तदा नन्दात् प्रभृत्येष कलिवृद्धिंगमिष्यति॥

यस्मिन कृष्णो दिवं यातस्तास्मिन्नेव तदाहनि।

प्रतिपन्नं कलियुग भिति प्राहु पुराविदः॥

-भागवत् 2।31-32-33

भगवान् कृष्ण अपने धाम को पधारे, तब जबकि सप्त ऋषि पूर्वाषाढ़ नक्षत्र में आ चुकेंगे तो 12 सौ वर्षों में कलियुग राजा नन्द के समय में समाप्त हो जायेगा। यह समय भी अभी होकर समाप्त हो रहा है। इस प्रकार कलियुग का अन्त होकर नये युग का आना शास्त्रीय दृष्टि से भी आवश्यक है, जो लोग यह मानते हैं कि कलियुग 432000 वर्षों का होता है और यह उसका प्रथम चरण है, उन्हें मनुस्मृति के प्रथम अध्याय में 67 से 70 तक के श्लोक देखने चाहिये जिनमें कलियुग से लेकर सतयुग तक की 4800, 3600, 2400 और 1200 वर्ष आयु लिखी है।

“माला बुद कब्लुत कमायत” नामक अरबी पुस्तक और मक्के के हमीदिया पुस्तकालय में रखी, “अल्कश्फ बल्कत्मफी मार्फत” पुस्तक के अनुसार भी अब 14वीं कमायत की सदी प्रारम्भ हो रही है। उनमें दिये सभी लक्षण प्रकट हो चुके हैं, उनके विश्वास के अनुसार अब तक ऐसी प्रलय होगी जिसमें मुसलिम सभ्यता का अन्त हो जायेगा।

“इमामे आखिकज्जम्मा” के अनुसार उसके बाद एक फरिश्ता आयेगा वह फिर से बचे हुये लोगों को सत्य, धर्म और न्याय का मार्ग दिखाकर संसार को अच्छा बनायेगा।

संसार के सभी भविष्यवक्ता सन्त-मनीषी और आर्ष ग्रन्थ स्पष्ट युग परिवर्तन की सूचना दे रहे हैं। राजनीति वेत्ता भी संसार की वर्तमान परिस्थितियों को देखकर कहते हैं कि प्रलय जैसी स्थिति समीप ही है यदि तृतीय विश्व युद्ध हुआ तो संसार फिर से पत्थर युग में आ जायेगा अर्थात् सभ्यता का सृजन फिर से नये आदर्शों के अनुरूप होगा। अब तक की जड़ता नष्ट-भ्रष्ट हो जायेगी और सर्वत्र स्वर्गीय परिस्थितियों का सूरज जगमगाने लगेगा।

युग परिवर्तन निकट है, इसमें सन्देह नहीं। इस संक्रान्ति काल में हमारे भी कुछ कर्त्तव्य है। महाकाल अपनी इच्छा को मूर्त रूप देने के लिये प्रकट हो रहे हैं तो हमारा भी कर्त्तव्य है कि हम उनकी आकाँक्षा समझें और उनके उद्देश्य की पूर्ति में सहायक बनें। अवतार का उद्देश्य सदैव सत्प्रवृत्तियों का विकास होता है। अवतार समझ में न आये तो न सही पर उनकी प्रक्रियायें तो समझी ही जा सकती हैं, यदि वह समझ में आ जायें तो धर्म अध्यात्म और सत्प्रवृत्तियों के विकास के लिये त्याग, श्रम, सहयोग देकर अवतार का प्यार और आशीर्वाद पाया जाये, यदि नहीं और सन्मार्ग अच्छा न लगे तो अपने आपको महाकाल की दाढ़ में पिसने को भी मजबूत रखा जाये।


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अपने हाथों बनाये ऐश्वर्य को दूसरे लोग भाग्य कहते हैं।

-डिजरायली


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जो अपने को जानता है, वह अपने भविष्य को भी जानता है।

-कन्फ्युशिमसा


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अवतार आता है, पर प्रेरणाओं के रूप में, कुछ करने का श्रेय तो वह अपने भक्तों को ही देता है।

-स्वामी विवेकानन्द


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मानवीय शक्ति का दूसरा नाम ही भविष्य है, इसलिये भविष्य निर्माण के लिये मानवीय शक्ति का निर्माण आवश्यक है।

-रूसो


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तुम कुछ न करो सब कुछ हो जावेगा यह ऐसा ही है जैसे कोई कहे दवा देख लो अच्छे हो जाओगे।

-अलेक्जेण्डर


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भाग्य साहसी मनुष्य की सहायता करता है, कायर की नहीं।

-वर्जिल


प्रकृति की अपनी दण्ड व्यवस्था

राजकुमार स्थावर-सर्ग की दिनों दिन बढ़ रही उच्छृंखल वृत्ति से जितना पीड़ित थी, प्रजा उससे अधिक परेशान थी महाराज द्रुमिल की चिंता को एक से एक विद्वान् बुलाये गये, अच्छे से अच्छे नैतिक उपदेशों की व्यवस्था की गई किन्तु जिस तरह पुरइन के पत्तों और चिकने घड़े पर पानी का प्रभाव नहीं पड़ता उसी प्रकार राजकुमार स्थावर-सर्ग पर कोई प्रभाव न पड़ा।

अन्त में महाराज द्रुमिल ने पूज्यपाद अश्वत्थ की शरण ली। प्रजा के हित की दृष्टि से महर्षि अश्वत्थ ने राजकुमार को ठीक करने का आश्वासन तो दे दिया, पर उन्होंने महाराज से स्पष्ट कह दिया कि उनकी किसी भी योजना में बाधा उत्पन्न नहीं की जायेगी। महाराज द्रुमिल ने उस शर्त को सहर्ष स्वीकार कर लिया।

महर्षि अश्वत्थ की आज्ञा से सर्वप्रथम स्थावर-सर्ग की राज्य वृत्ति रोक दी। उनके पास की सारी सम्पत्ति छीन ली और सम्राट की ओर से उन्हें बन्दी बनाकर अप-द्वीप निष्कासित कर दिया गया। यह वह स्थान था, जहाँ न तो पर्याप्त भोजन ही उपलब्ध था और न ही जल, अतिवृष्टि के कारण रात में सो सकना कठिन था, वहाँ दिन में हिंसक जन्तुओं का भय। कुछ ही दिन में स्थावर-सर्ग सूखकर काँटा हो गये अब तक उनके मन में जो अहंकार और दर्प था, प्रकृति की कठोर यातनाओं के आघात से टूटकर चकनाचूर हो गया। महाराज को इस बीच कई बार पुत्र के मोह ने सताया भी पर वे अश्वत्थ को वचन दे चुके थे, अतएव कुछ बोल भी नहीं सकते थे।

अश्वत्थ ने कहा-महाराज जिस तरह आपके मन में मोह है, प्रकृति भी अपने पुत्र से प्यार करती है, पर अपने पुत्रों की बुराइयों को दण्ड देकर सुधार भी वही सकती है, अब आप स्थावर-सर्ग को बुलाकर देखें तो सही, उनकी स्थिति क्या है।

सैनिक गण अप-द्वीप भेजे गये। राजकुमार स्थावर-सर्ग की जोरदार अगवानी की गई, पर आज उनके मुख मंडल पर दर्प और उच्छृंखलता नहीं, करुणा और सौम्यता टपक रही थी। जो काम मनुष्य नहीं कर सके थे, वह भगवती प्रकृति ने अपनी दण्ड व्यवस्था द्वारा पूरा कर दिया।


अपनो से अपनी बात

अपने मिशन का सबसे बड़ा पर्व वसन्त पंचमी है। अगले वर्ष यह पर्व दि. 31 जनवरी 71 रविवार को पड़ रहा है, परिजन इसका महत्व समझते न हों, इसकी उपलब्धियाँ जानते न हों तो उसे जान लेना चाहिए। यों यह पर्व भगवती सरस्वती का जन्मदिन है। ज्ञान की गंगा इसी दिन धरती पर अवतरित हुई थी और मानव इसे पाकर धन्य हो गया था। तुच्छ से पशु प्राणी को सृष्टि का मुकुटमणि बना देने का श्रेय विद्या, बुद्धि एवं विचारणा को है। यदि उससे वंचित रहा होता तो मनुष्य अन्य जीवधारियों से आगे नहीं अपनी शारीरिक अयोग्यताओं के कारण पीछे रहा होता। पर सौभाग्य का ईश्वरीय उपहार उस पर बरसा और उस अमृत को पीकर वह देवता हो गया। इस अमृत वर्षा के साथ लेकर जो ज्ञान गंगा धरती पर उतरी उसे सरस्वती के नाम से पुकारते हैं। वह दिन अभिवन्द्य वीणापाणि का जन्मदिन है जिसे विद्या प्रेमियों द्वारा हर वर्ष उत्साह के साथ मनाया जाता है। वसन्त पंचमी वही पुण्य पर्व है।

ऋतुराज वसंत का शुभारम्भ वसंत पंचमी से होता है, ऋतुओं का अपना-अपना महत्व है। लता गुल्मों से लेकर वृक्ष वनस्पतियों तक में नव-चेतना, हरिलिमा के साथ नूतन पल्लव, अभिनव पुष्प उमँगते और महकते देखे जा सकते हैं। प्रकृति की शोभा देखते ही बनती है। हरी साड़ी पहने, पीत पुष्पों का शृंगार किये प्रकृति वघूटी खेत-खेत पर जिस उल्लास के साथ थिरकती दीखती है उसे अवलोकन कर बुझे हुए मन भी उल्लास भरी आशा किरणों के साथ चमकने लगते हैं। आशा, उत्साह, उल्लास और उमंग का स्रोत न जाने प्रकृति के किस अंचल से फूट पड़ता है। उसका रसास्वादन कर कोकिल, मयूर-भ्रमर और पतंग अपने नृत्य गान का संगीत अभिनय का-आनन्द दिशाओं में बखेरते देखे जाते हैं। न जाने कहाँ से मनों में आशा और उमंगों की लहरें-लहलहाने के लिये उमंगती चली जाती हैं। जन-जीवन में अनायास की उल्लास भर देने वाला वसन्त पर्व अन्धकार भरे जीवनों में भी विद्युत जैसी किरणें चमका जाता है। इस नव चेतना के उत्सव को मानव जाति न जाने कितने प्राचीन काल से हर्षोल्लास भरी अभिव्यक्तियों के साथ मनाती चली आ रही है। इसे मनाने के लिए किये जाने वाले आयोजन लोगों को निराशा से आशा की ओर अन्धकार से प्रकाश की ओर-मृत्यु से अमृत की ओर अग्रसर करते हैं। भगवती वीणापाणि की, मधुमयी झंकार न जाने कितने अन्तःकरणों में झंकृत होती है और न जाने क्या-क्या देती बताती चली जाती है।

वसन्त पंचमी का सरस्वती साधकों की भाव दृष्टि से बड़ा मूल्य है। सो जगह-जगह इसे अपने-अपने ढंग से मनाया जाता है। अपनी संस्था के लिए वह एक के बाद एक जुड़ी हुई कड़ियों की मंगलमय शृंखला है। उसके साथ एक भाव भरा इतिहास जुड़ा हुआ है। आज से 45 वर्ष पूर्व हमें एक दिव्य प्रकाश का दर्शन हुआ, आत्मबोध इसी दिन मिला, जीवन को दिशा उन्हीं क्षणों में बदली, देवत्व की शरण में उसी दिन समर्पण किया और मानव पुत्र न रहकर शक्ति पुत्र के रूप में अपना काया-कल्प होते पाया। वस्तुतः वही हमारा जन्मदिन है। ईश्वर की वाणी उसी दिन सुनी और 24 महापुरश्चरणों की तपश्चर्या का शुभारम्भ उसी दिन किया। इस प्रकार हमारा वास्तविक जन्मदिन वही है।

जो शरीर आश्विन सदी 13 को जन्मा था। पर उस हाड़ माँस के थैले को पाकर कौन सौभाग्यशाली हुआ है। दूसरी भोग योनियों में तो केवल भुगतना भर पड़ता है जिससे प्रारब्ध का बोझ हलका होता है। मनुष्य बनकर जो जन्म से लेकर मरने तक जिन मनुष्यता को कलंकित करने वाली दुष्प्रवृत्तियों को अपनाये रहते हैं इससे पापों का बोझ बढ़ता ही है। स्वयं दुःख पाते हैं और दूसरों को दुःख देते हैं, ऐसे नर पशु की जिन्दगी कोई जी ले तो उससे किसी का क्या बना-सच तो यह है कि अगले अनेक जन्मों के लिए पाप के दुःखदायी और अधिक लाडले- ऐसे जन्म दिन को मानना न मानना क्या महत्व रखता है। औरों की तरह हमारा शरीर जन्म भी कीट पतंगों की कोटि-कोटि नित्य होने वाली जन्म-मृत्यु में एक संख्या की बढ़ोतरी भर गिना जा सकता था। पर सौभाग्य न जाने कहाँ से आ गया जिसने मनुष्य शरीर से मनुष्य चेतना का प्रकाश भी कर दिया। यह सौभाग्य हमें बसन्त पंचमी के दिन मिला। इसलिये वही हमारा वास्तविक जन्मदिन है। पूछने वालों को बताते भी नहीं है। यों शरीर 60 वर्ष का हो गया पर असल में हम अभी केवल 45 वर्ष के हैं। 15 वर्ष तो ऐसे ही हँसते खेलते न जाने कहाँ से कहाँ किस बहाव में बहते-चले गये। उनकी अब हमें ठीक से याद भी नहीं आती। हम कभी जन्मदिन मनाने की बात सोचते हैं या दूसरे लोग वैसा कुछ करते हैं तो वह व्यवस्था वसन्त पंचमी से ही जुड़ती है।

केवल हमारा आत्मिक जन्म तो वसन्त पंचमी को नहीं हुआ वरन् हर महत्वपूर्ण कार्य हमने इसी दिन से शुरू किये हैं। अखण्ड-ज्योति पत्रिका का आरम्भ वसन्त पंचमी से। युग-निर्माण पत्रिका जन्मी वसन्त पंचमी को। गायत्री तपोभूमि का निर्माण कार्य आरम्भ किया वसन्त पंचमी से। गत् 5000 वर्षों में अनुपम कहे जाने वाले सहस्र कुण्डी गायत्री महायज्ञ का संकल्प लिया वसन्त पंचमी को और उसी दिन एक वर्ष बाद उसका अग्नि समापन हुआ। आर्ष ग्रन्थों का हर अनुवाद हमने वसन्त पंचमी से आरम्भ किया। वेदों से लेकर उपनिषदों, दर्शन, स्मृतियों, पुराणों, गीताओं तन्त्र तथा योग विशिष्ट जैसे अब तक के प्रकाशित हमारे सभी ग्रन्थ वसन्त पंचमी के दिन से आरम्भ होते रहे हैं। ट्रैक्ट माला के अंतर्गत जिन सैकड़ों जीवन निर्माण पुस्तिकाओं का सृजन पिछले वर्षों में सम्भव हो सका उनका प्रथम श्रीगणेश उसी दिन किया गया था। गायत्री महाविज्ञान का आरम्भ भी इसी शुभ पर्व में किया था हमारी साहित्यिक कृतियों का जन्मदिन किसी को तलाश करना या मनाना हो तो उसे उन सारी प्रवृत्तियों की गंगोत्री वसन्त पंचमी ही मिलेगी।

युग-निर्माण आन्दोलन और उसके पीछे शक्ति का अजस्र स्रोत ज्ञान-यज्ञ जो आज प्रकाश छूने का दुस्साहस कर रहा है वसन्त पंचमी के दिन से ही आरम्भ हुआ था। एक वर्ष के अज्ञातवास में जब हम सन् 60 में हिमालय थे तब हमारे गुरुदेव का सर्वोपरि अनुदान हमें उसी दिन मिला था। परोक्ष दर्शन तो 45 वर्ष पूर्व कर चुके थे पर प्रत्यक्ष और समीपस्थ दर्शन देने के लिए-अपनी बहुमूल्य संपदाएं सौंपने के लिये वही दिन निर्धारित किया था सो अपने जीवन के सर्वोत्तम सौभाग्य दिनों में से वह भी एक दिन हमें जन्म-जन्मान्तरों तक स्मरण रहेगा।

इन दिनों हमारी जो छोटी-बड़ी प्रवृत्तियाँ चलती हैं उनका शुभारम्भ हम सदा वसन्त पंचमी से करते रहे हैं। युग-निर्माण विद्यालय, युग-निर्माण प्रेस, गुजराती अनुवाद, अंग्रेजी अनुवाद, उड़िया अनुवाद, मराठी अनुवाद आदि अन्य भाषाओं से अपना प्रचार क्षेत्र बढ़ाने के लिए जो कदम पिछले दिनों बढ़ाये गये हैं उन समस्त निर्माणों में वसन्त पंचमी हमें बहुत सुहाई। इसलिये मुहूर्त का जब भी प्रश्न आया हमने इसी पर्व को महत्व दिया। अब कला भारती का आरम्भ जनवरी से होने जा रहा है उसका विधिवत उद्घाटन समारोह वसन्त पंचमी को ही करेंगे।

माता भगवती देवी के भावी निवास और तप साधना के लिये हरिद्वार और ऋषिकेश के बीच सप्तधारा गंगा संगम पर-सप्त ऋषि आश्रम के समीप जो उपवन आश्रम बनाया गया है उसका आरम्भ भी वसन्त पंचमी के दिन कराया गया है। यों हम जून में हिमालय चले जायेंगे फिर भी तपश्चर्या का आरम्भ वसन्त पंचमी से ही करेंगे। कौन जानता है हमारे जीवन का अन्त कब हो-पर यदि वसन्त पञ्चमी को हो तो किसी को आश्चर्य नहीं करना चाहिए क्योंकि वह हमें स्वभावतः बहुत प्रिय जन्म है। न जाने किस-किस जन्म में हम उस दिन क्या-क्या करते रहे हैं। और न जाने उनमें से किस-किस संस्कार का हमारे ऊपर क्या प्रभाव है जिससे हमें वसन्त पञ्चमी बहुत प्रिय लगती है और वह जब आती है तो न जाने किस-किस लोक से क्या-क्या लेकर आती है और उस दिन न जाने कितना क्या दे जाती है जो साल भर तक चुकाये नहीं चुकता। खरचते नहीं खरचा जाता।

कई व्यक्ति तो हमारे अधिक निकट संपर्क में आये हैं वे भी प्रायः इसी ढाँचे में ढले हैं और हमारी ही तरह उनने भी अपना जन्मदिन वसन्त पञ्चमी घोषित कर दिया है। यह व्यक्तिगत बात हुई। मिशन का जन्म तो निश्चित रूप से वही है। यदि गायत्री परिवार-युग-निर्माण आन्दोलन का जन्मदिन मनाना अभीष्ट हो तो उसके लिए वसन्त पञ्चमी ही एकमात्र पर्व रहेगा। इस प्रकार अब यह शुभ दिन भगवती सरस्वती का- वसन्त उल्लास का जन्मदिन न रहकर धरती पर स्वर्ग के अवतरण और मनुष्य में देवत्व के उदय का संकल्प लेकर अवतरित हुए ज्ञान-यज्ञ एवं युग-निर्माण आन्दोलन का भी जन्म दिन रहेगा। और स्वभावतः इस मिशन से किसी प्रकार का सम्बन्ध रखने वाले हर व्यक्ति के मन में उसे मनाने की उत्कण्ठा उत्पन्न होगी। ऐसा होना भी चाहिए उसमें औचित्य भी है, तथ्य भी और भविष्य के लिए आशा भरा प्रकाश भी। जिन्हें हमसे कुछ व्यक्तिगत लगाव हो उनके लिए भी अपनी ममता और सद्भावना व्यक्त करने का इससे अच्छा दिन और कोई हो नहीं सकता।

पिछले दिनों वसन्त पंचमी पर्व हम लोग किसी न किसी रूप में मनाते रहे हैं। गायत्री तपोभूमि में कुछ न कुछ रूप उसका सदा ही बनता रहा है। जिन्हें कुछ विशेष लगाव या परिचय था वे उसे अपने-अपने यहाँ अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग रीति से व्यक्तिगत या सामूहिक रूप से मनाते भी रहे हैं। पर अब इस पर्व को मिशन के साथ जोड़कर उसे विशेष उत्साह के साथ हर शाखा संगठन में सामूहिक रूप से-जहाँ संगठन नहीं है वहाँ व्यक्तिगत रूप से मनाने की परम्परा आरम्भ करने की बात परिजनों में सोची जा रही है, इसमें हमें कुछ भी अनुचित दिखाई नहीं पड़ता।

इस प्रकार का उत्सव आयोजन तभी सार्थक होगा जब उसके पीछे मिशन और उनके आदर्शों एवं कार्यक्रमों को आगे बढ़ाने की प्रेरणा जुड़ी हुई हों। अन्यथा सैकड़ों त्यौहारों में एक और त्यौहार का स्वरूप बढ़ा देने से कुछ विशेष प्रयोजन सफल न हो सकेगा। सामान्यतया उत्सव आयोजनों में जुलूस, प्रभात फेरी, अभिनय, हवन, प्रवचन, प्रसाद, दीपदान, ध्वजा-पताका, श्रद्धांजलि आदि की व्यवस्थाएँ बना ली जाती हैं। लोग इकट्ठे होते हैं और एक आनन्द, उत्साह का वातावरण बनाकर अपने घरों को वापिस चले जाते हैं। इतनी भर लकीर हम लोग भी पीटने लगें तो बड़ी बात न होगी।

इस वर्ष हमारे सामने मनाई जाने वाली यह अन्तिम वसन्त पञ्चमी है। इसलिए गायत्री तपोभूमि के कार्यकर्त्ता भी उसे अधिक समारोह पूर्वक मनाने की तैयारी कर रहे हैं और शाखाओं से जो समाचार आ रहे हैं एवं व्यक्तिगत पत्रों में भी जो सूचनाएं मिल रही हैं उनसे यही जानकारी प्राप्त हो रही है कि इस वर्ष हर जगह सामूहिक और व्यक्तिगत रूप से वसन्तोत्सव मनाये जाएंगे और उन आयोजनों को मिशन के प्रति अधिक आस्था व्यक्त करने के कार्यक्रमों से जोड़कर रखा जायगा।

जन उत्साह को रोका भी क्यों जाय? फिर जब उसके साथ परम्परागत भावनात्मक और सृजनात्मक अभिव्यक्तियाँ जुड़ी हुई हों तब तो उन्हें निरुत्साहित करने की कोई बात भी नहीं है। उसे प्रोत्साहन और समर्थन ही मिलना चाहिए हमें तो इतना भर कहना है कि यदि उसे मनाना ही हो तो ऐसे मनाना चाहिए जिससे आन्दोलन को विस्तृत और मजबूत बनाने में अधिक सहायता मिल सके।

इस प्रकार के कार्यों में अखण्ड-ज्योति और युग-निर्माण पत्रिकाओं के नये ग्राहक बढ़ाने पुराने ग्राहकों से चन्दे एकत्रित करने के कार्य को सर्वोपरि प्राथमिकता मिलनी चाहिए। दिसम्बर के अंक के साथ प्रायः सभी का चन्दा समाप्त हो जाता है। जिनका वर्ष बीच में समाप्त होता है उन नये ग्राहकों से भी आग्रह किया जाता है कि शेष महीने के पैसे चुकाकर जनवरी से दिसम्बर तक का हिसाब सीधा कर लें। इसी में कार्यालय को तथा पाठकों को उभय पक्षीय सुविधा रहती है। वैसे भी 80 प्रतिशत का चन्दा दिसम्बर में ही समाप्त होता है। यह समय पुराने ग्राहकों से चन्दा वसूल करने के लिए उपयुक्त है और यही नये सदस्य बढ़ाने के लिए। टोलियाँ बनाकर इन दिनों यही जनसंपर्क कार्य हाथ में लिया जाय। जो लोग पत्रिकाओं से परिचित और प्रभावित हैं उन्हें अपने तक ही सीमित न रहकर-इस प्रकाश को आगे बढ़ाने में सहयोग देने के लिए आग्रह करना चाहिए, टोली में उन्हें भी साथ ले लिया जाय तो उनके परिचय क्षेत्र में नये सदस्य बढ़ने की सम्भावना बढ़ सकती है। इस प्रकार यदि थोड़े उत्साह से काम लिया जाय और वसन्त पञ्चमी को बढ़-चढ़कर नये सदस्य बढ़ाने की श्रद्धाँजलि का लक्ष रखा जाय तो निश्चय ही बहुत बड़ा काम हो सकता है और उसके दूरगामी परिणाम प्रस्तुत हो सकते हैं।

मिशन का परिचय क्षेत्र और प्रभावशाली क्षेत्र जितना बढ़ेगा उतनी ही आन्दोलन की सम्भावना सुदृढ़ होती जायेगी। यह कार्य पत्रिकाएं ही कर सकती हैं। अब तक मिशन को जितना विस्तार मिला है उसका अधिकाँश श्रेय पत्रिकाओं को ही है। हर महीने सुई चुभोने की-हवा भरने की प्रक्रिया इन्हीं के माध्यम से सम्पन्न होती है और पुराने कार्यकर्त्ताओं में दृढ़ता तथा नये लोगों में उत्साह का सञ्चार उन्हीं के द्वारा होता है। हमें आन्दोलन का क्षेत्र बढ़ाना हो तो पत्रिकाओं के विस्तार पर अधिकाधिक ध्यान केन्द्रित करना चाहिए। वसन्त पंचमी पर्व के साथ यदि सदस्य संख्या बढ़ाने की प्रतिज्ञा और प्रक्रिया को जोड़ लिया जाय तो इससे बढ़कर भाव भरी श्रद्धाँजलि प्रस्तुत करने का और कोई तरीका नहीं हो सकता। इस प्रयोजन के लिए रसीद बहियाँ छपा ली गई है जिन्हें आवश्यकता हो मँगा लें। चन्दा भेजने के लिए बैंक ड्राफ्ट भेजने का तरीका सस्ता और जल्दी का है। मनीआर्डर तो कई बार पहुँचने में महीनों लगा देते हैं।

ज्ञान घटों की स्थापना, शाखाओं की व्यवस्था, कार्यवाहकों की नियुक्ति के माध्यमों से संगठन की सुदृढ़ता का कार्य जहाँ अभी न हो सका हो वहाँ पूरा कर लिया जाय जहाँ हो चुका है वहाँ उसकी और अधिक अभिवृद्धि हो जाय। दस पैसे जमा करने वाले ज्ञान घट अब सदस्यता की अनिवार्य शर्त बना दिये गये हैं सो अब पाठकों को कर्मठ सदस्य के रूप में अपने को परिणत करना चाहिए। जो सदस्य बन चुके हैं उन्हें दूसरों को बनाना चाहिए। ज्ञान घटों की संख्या वृद्धि को भी वसन्त पञ्चमी पर्व के श्रद्धाँजलि अभियान में सम्मिलित रखा जाय तो इससे संगठन की नींव मजबूत होने में भारी सहायता मिलेगी।

पाठशालाओं की स्थापना आदि कितने ही अन्य कार्यक्रम हैं जिनका शुभारम्भ इसी अवसर पर किया जा सकता है रचनात्मक और संघर्षात्मक कार्यक्रमों की शत-सूत्री योजना को कार्यान्वित करने का विशाल क्षेत्र पड़ा हुआ है। अक्टूबर, नवम्बर, दिसम्बर के युग-निर्माण योजना अंक अपनी योजना के वर्तमान तथा भावी कार्यक्रम पर गहराई से प्रकाश डालने और भावी रूपरेखा के साथ प्रस्तुत किये गये हैं। इन तीनों अंकों का सेट पढ़ने, मँगाने या भेंट करने के लिए कुछ न कुछ प्रयत्न हर जगह किये जायं तो उससे एक नया प्रकाश प्रस्फुटित होगा।

इस वर्ष की-ता. 31 जनवरी 71 को मनाई जाने वाली वसन्त पंचमी हमारे प्रत्यक्ष जीवन में मनाया जाना वाला अन्तिम पर्व है। इन हमारे प्राणप्रिय ज्ञान-यज्ञ आन्दोलन को-युग-निर्माण अभियान को-प्रखर बनाने की तैयारी के साथ मनाया जा सके तो हमें भी सन्तोष भरी प्रसन्नता का आनन्द मिलेगा।


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जीर्ण शीर्ण मान्यताओं में परिवर्तन और नये आदर्शों की स्थापना के लिए जिनमें साहस नहीं होता वह जातियाँ कभी समर्थ नहीं बन पातीं। प्रगति के लिए परंपराएं नहीं परिवर्तन की जिन्दादिली चाहिए।

-विवेकानन्द


दस आवश्यक सूचनायें- जो नोट कर ली जायें।

अखण्ड-ज्योति हमारे उद्गारों, अनुभवों, निष्कर्षों, अनुरोधों एवं निर्देशों को परिजनों तक पहुँचाने का प्रधान माध्यम है। हमें सुनने, समझने में जिन्हें दिलचस्पी है उन्हें अखण्ड-ज्योति को स्वयं पढ़ने तक ही सीमित न रह जाना चाहिए वरन् उसका कार्यक्षेत्र आगे बढ़ाने के लिए भी प्रयत्नशील होना चाहिए। अगले वर्ष पत्रिका के सदस्य अधिक बढ़ सकें इसके लिए हम में से प्रत्येक को विशेष रूप से उत्साह एवं पुरुषार्थ करना चाहिए।

उत्साही परिजन अपने यहाँ के पुराने सदस्यों से चन्दा वसूल करें तथा टोली बनाकर नये सदस्य बनाने निकलें। सबका पैसा इकट्ठा करके-ग्राहकों के पूरे पते वाली लिस्ट के साथ इसी मास मथुरा भेज देनी चाहिए, ताकि सदस्य संख्या के अनुरूप ही पत्रिका छपना सम्भव हो सके। मनीआर्डर अक्सर बहुत देर से पहुँचते हैं इसलिए बैंक ड्राफ्ट से भेजना सस्ता भी पड़ता है और अच्छा भी रहता है। इससे अनावश्यक विलम्ब नहीं होता। ग्राहक बनाने के लिए रसीद बहियाँ छपाई गई हैं। प्रत्येक में 10-10 पन्ने हैं। जितनी रसीद बहियाँ आवश्यक हों मँगा लेनी चाहिए।

पत्रिका का स्तर जब से ऊँचा हुआ है तब से अंकों के बीच में ही गुम होने की शिकायतें बढ़ गई है। वो पत्र आते ही दुबारा भेजते रहते हैं पर अच्छा उपाय यह है कि जहाँ 10 से अधिक पत्रिकाएं जाती हों वहाँ इकट्ठी ही डाक पार्सल से मँगाई जायं। इसमें मँगाने वाले को घर-घर पहुँचाने का झंझट तो उठाना पड़ेगा और हमें भी हर पार्सल पर 1) अतिरिक्त रजिस्ट्री खर्च देना पड़ेगा, इतना होते हुए भी खोने की शिकायत दूर हो जायगी। जहाँ 10 से अधिक सदस्य हों ऐसी ही व्यवस्था बनाई जाय। 50 से अधिक सदस्य हों तो रेलवे पार्सल मँगाना ठीक रहता है। ऐसी दशा में अपने पास के रेलवे स्टेशन तथा रेलवे लाइन का उल्लेख भी करना चाहिए।

जिनके चन्दे के बीच के किसी महीने में समाप्त होते है उन्हें अगले वर्ष के शेष महीने के पैसे भी भेजकर जनवरी से दिसम्बर का हिसाब पूरा कर लेना चाहिए इसी से हिसाब-किताब में तथा अंक समान संख्या में छापने की सुविधा रहती है।

1 जनवरी 71 से अखण्ड-ज्योति और युग-निर्माण पत्रिकाओं की पाठ्य सामग्री की सम्मिलित पत्रिका अन्य भाषाओं में भी प्रकाशित होने जा रही है। (1) गुजराती युग-निर्माण योजना, (2) मराठी युग-निर्माण योजना, (3) उड़िया युग-निर्माण योजना छपना शुरू हो गई है। अँग्रेजी पत्रिका की तैयारी चल रही है। पृष्ठ संख्या अखण्ड-ज्योति के बराबर रहेगी। कागज सफेद ग्लेज बढ़िया लगेगा। कम संख्या में छपने तथा कागज बढ़िया लगाने से इसका मूल्य 1) बढ़ाना पड़ा है। 7) वार्षिक चन्दा इनमें से प्रत्येक पत्रिका का रहेगा। इन भाषाओं से सम्बन्धित प्रेमी पाठकों को अपनी भाषाओं की पत्रिकाओं के ग्राहक बढ़ाने का इस वर्ष भरपूर प्रयत्न करना चाहिए ताकि कम ग्राहक रह जाने के कारण संस्था को घाटा न देना पड़े।

युग-निर्माण योजना की पूरी रूपरेखा तथा रीति-नीति और भावी कार्य पद्धति ‘युग-निर्माण पत्रिका’ के अक्टूबर, नवम्बर, दिसम्बर अंकों में है। इन तीनों अंकों को अखण्ड-ज्योति के प्रत्येक पाठक पाठक अवश्य पढ़ लें। स्वयं न मंगाने हों तो मंगाने वालों से माँगकर पढ़ लें ये अंक समाप्त हो गये है- अतः इन्हें अपने में ही मिलकर पढ़ावें।

युग-निर्माण विद्यालय का कला विभाग 1 जनवरी से आरम्भ होने जा रहा है। उसमें इस वर्ष केवल 20 छात्र लिये जा सकेंगे। पाठ्यक्रम 6 महीने का है। संगीत, वाद्य, गायन अभिनय, नृत्य, प्रकाश चित्र, प्रवचन एवं लोक-निर्माण की सर्वतोमुखी गतिविधियों का प्रशिक्षण इसमें रहेगा। जिन्हें इसी सम्बन्ध से अभिरुचि हो वे नियमावली तथा आवेदन पत्र मँगा लें। चूँकि प्रशिक्षण 1 जनवरी से आरम्भ हो जायगा। सीटें कम हैं। इसलिये जिन्हें इस प्रथम सत्र में सम्मिलित होना हो उन्हें जल्दी ही प्रवेश प्राप्त कर लेने की चेष्टा करनी चाहिए।

अब युग-निर्माण योजना और अखण्ड-ज्योति दोनों पत्रिकाओं का अलग-अलग सीमा विभाजन कर दिया गया है। युग-निर्माण योजना गायत्री तपोभूमि से प्रकाशित होगी और उसमें मिशन की परम्परा, रीति-नीति तथा गतिविधियाँ घटनाएं तथा दिशाएं रहा करेंगी। सम्पादन अभी तो हम करते हैं पीछे उसे तपोभूमि के कार्यकर्त्ता सँभालेंगे। अखंड-ज्योति आध्यात्मिक पत्रिका रहेगी। वैज्ञानिक अध्यात्मवाद, तत्व-दर्शन, आत्म-निर्माण, संजीवनी विद्या, प्रसुप्त शक्तियों का जागरण जैसे विषय उसमें रहेंगे। इसका प्रकाशन पूर्ववत् अखण्ड-ज्योति संस्थान, घीयामंडी मथुरा से होता रहेगा। सम्पादन माता भगवती देवी करेंगी। दोनों की अर्थ व्यवस्था तथा प्रकाशन प्रक्रिया भी अलग-अलग रहेगी। अस्तु संस्था सम्बन्धी पत्र व्यवहार, युग-निर्माण योजना का चन्दा तथा दान-अनुदान गायत्री तपोभूमि मथुरा के पते पर भेजने चाहिए। तथा अखण्ड-ज्योति का चन्दा एवं तत्सम्बन्धी पत्र व्यवहार घीयामंडी के पते पर करना चाहिये। दोनों पत्रिकाओं की ग्राहक लिस्ट तथा ड्राफ्ट आदि एक लिफाफे में बन्द तो किये जा सकते हैं पर होने अलग-अलग चाहिएं ताकि भिन्न स्थानों पर चल रही दो भिन्न व्यवस्थाओं में गड़बड़ी न पड़े।

हम अब लगातार 6 महीने बाहर रहेंगे। 2 नवम्बर से 2 मई तक प्रायः बाहर ही रहना होगा। प्रायः 50 विशाल कार्यक्रमों में लगभग 1 करोड़ जनता को अपना सन्देश इसी छमाही में पहुँचावेंगे। बीच-बीच में एक-एक, दो-दो दिन को ही मथुरा आना होगा। इसलिये हमारे निमित्त किया जाने वाला सारा आध्यात्मिक तथा वैयक्तिक परामर्श पत्र व्यवहार माता भगवती देवी से ही घीयामंडी के पते पर ही करना चाहिए। वे परिजनों के व्यक्तिगत उत्कर्ष में वैसी ही सहायता देती रहेंगी, जैसी कि अब तक हम देते रहे हैं। वस्तु स्थिति यह है कि अब हमारा प्रत्यक्ष सम्बन्ध परिवार से टूटा ही समझना चाहिये। 2 मई तक हम बाहर रहेंगे शेष मई में संस्था के अनेक उत्तरदायित्वों से मुक्त होंगे तथा भावी कार्य-पद्धति का स्पष्ट निर्धारण करेंगे। 3 जून को हमारी लड़की का विवाह है। 20 जून को हम सदा के लिए अपनी प्रचण्ड तपश्चर्या के लिए चले जायेंगे।

हमारा कार्यकाल अभी से समाप्त हुआ समझा जा सकता है। पर इतने बड़े परिवार को आध्यात्मिक सहयोग से वंचित नहीं किया जा सकता। हम जिस तप साधना के बल पर अब तक परिजनों को कठिनाइयों से बचाने और उत्कर्ष में सहयोग देने में समर्थ रहे हैं वह उत्तरदायित्व माताजी उठावेंगी। वे हरिद्वार, ऋषिकेश के बीच सप्त सरोवर के निकट “शान्तिकुँज” नामक साधना कक्ष में हमारी ही तरह अखण्ड दीपक पर 24 लक्ष गायत्री महापुरश्चरणों का क्रम चलावेंगी और उसी उपलब्धि के आधार पर परिवार की सेवा सहायता करने का क्रम पूर्ववत् जारी रखेंगी। बाप मर जाता है तो बच्चों को माता किसी प्रकार पाल लेती है। माँ मर जाय तो बाप के लिए छोटे बच्चे पालना कठिन पड़ता है। हम जा रहे हैं पर सारे परिवार की आत्मिक जिम्मेदारी माताजी के कन्धों पर छोड़े जा रहे हैं। हमें पूरा और पक्का विश्वास है कि वे हमसे कम नहीं कुछ अधिक ही प्रिय परिजनों को अपनी सन्तान से अधिक दुलार करने और भरपूर सहायता देने में समर्थ रहेंगी। उनकी इस सामर्थ्य को हम घटने न देंगे। कहीं भी रहकर उसे पूरा करते रहेंगे। अस्तु, परिजन अपने को निराश्रित न समझें। अपनी आवश्यकताओं के लिए अपना संपर्क उनसे अभी मथुरा बनाये रहें पीछे 20 जून के बाद ‘शान्तिकुंज’ सप्त सरोवर हरिद्वार के पते पर उनसे संपर्क रखा जा सकता है। यह हमारे संपर्क की आवश्यकता में रत्ती भी कमी अनुभव न होने देगा।

गायत्री तपोभूमि-युग-निर्माण योजना की व्यवस्था पं. लीलापत शर्मा सँभालते रहेंगे। संस्था के अनेक उत्तरदायित्व-पूर्ण विभागों का कार्य अन्यान्य बहुत ही सेवाभावी कार्यकर्त्ताओं को सौंप दिया है, यह टोली हमारे संस्था सम्बन्धी उत्तराधिकारों को ठीक तरह निबाहती रहेगी और संगठन तथा संस्था का काम ठीक तरह चलता रहेगा। चूँकि इस मिशन के पीछे भगवान की प्रत्यक्ष प्रेरणा काम करती है। परमेश्वर स्वरूप हमारे गुरुदेव उसके पीछे हैं और हम भी जहाँ भी रहेंगे वहीं से अपनी पैनी आँखें इस मानव जाति के भाग्य निर्णायक मिशन पर जमाये रहेंगे। इसलिये किसी को भी यह आशंका नहीं करनी चाहिए कि हमारे चले जाने के बाद मिशन लड़खड़ा जायगा सच तो यह है कि जिन सुयोग्य हाथों में यह मशाल सौंप रहे हैं वे कभी भी उसे बुझने न देंगे और अपने प्राण देकर भी उसे ज्वलन्त रखेंगे।


शरीर नहीं आदर्श की रक्षा आवश्यक

अग्नि बोले-महाराज! महाराज शिवि का धर्म और उनकी जीव दया उशीनर देश में ही नहीं सारे विश्व में विख्यात है। सभी जानते हैं कि राजसत्ता का स्वामी होकर भी शिवि ने न तो किसी के साथ अनीति बरती न छल किया इसलिये उनकी परीक्षा लेने की बात व्यर्थ ही है। इसमें कोई सन्देह नहीं वे प्राणिमात्र को आत्मा की दृष्टि से ही प्यार करते हैं।

देवराज इन्द्र ने उत्तर दिया-साधन सम्पन्न व्यक्ति का कोई ठिकाना नहीं जातवेद। क्या पता शिवि जो कुछ कर रहे हैं वह एकमात्र दिखावा हो वे इस तरह सब का ध्यान अपने विलासी जीवन की ओर से बँटाये रखना चाहते हों। निष्ठा की परीक्षा लिये बिना किसी की शुद्धता का क्या प्रमाण। फिर यदि वे सचमुच अपने अन्तःकरण से पूर्ण निश्छल हैं और परीक्षा में उत्तीर्ण हो जाते हैं तो उससे उनकी कीर्ति ही बढ़ेगी।

भगवान इन्द्र के तर्कों के आगे अग्नि देव की एक न चली। तब उन्होंने भी शिवि की परीक्षा लेने की बात स्वीकार कर ही ली।

एक निमेष के अन्तर से दृश्य पलट गया। महाराज शिवि सभासदों सहित राज दरबार में बैठे किसी महत्वपूर्ण विषय पर चर्चा कर रहे थे तभी एक श्वेत कपोत उड़ता हुआ आया और उनकी जंघा पर आ बैठा। पक्षी घबराया हुआ था लगता था वह किसी संकट से ग्रस्त है। महाराज शिवि अभी अच्छी तरह सोच भी नहीं सके थे कि कबूतर का पीछा करता हुआ एक बाज भी वहाँ आ पहुँचा। एक बार उसने ललचाई दृष्टि से कपोत की ओर देखा फिर सिंहासन के दक्षिण पार्श्व में बैठता हुआ बोला-महाराज! कबूतर मेरा आखेट है आप उसे मुझे सौंप दीजिये।

शिवि बोले- तात! मेरे राज्य में कहीं भी जीव-हिंसा नहीं होती फिर वह कबूतर तो मेरी शरण में आ गया उसे तुम्हें सौंप कर हम जीव हिंसा का पाप अपने सिर पर नहीं ले सकते। कबूतर के बदले तुम और जो कुछ भी चाहो ले सकते हो।

एक का अधिकार छीन कर दूसरे की रक्षा करना कहाँ का धर्म है-महाराज! बाज ने तर्क किया-प्रकृति ने मुझे माँस भोजी बनाया है इसलिये मुझे तो माँस ही चाहिये। जब भी माँस देने की बात आयेगी आपको जीव हिंसा करना ही पड़ेगी इसलिए अच्छा तो यही है कि आप इस कबूतर को ही लौटा दें।

महाराज शिवि! एक क्षण के लिए विचार मग्न से प्रतीत हुये-बाज का कथन गलत नहीं है धर्म की रक्षार्थ बाज को माँस दिया जाये तो वह किसी जीव को मार कर ही दिया जा सकता है। एक की रक्षार्थ दूसरे को मारना पाप ही तो है फिर-तब ऐसा करो बाज, महाराज बोले-तुम्हें इस कबूतर के बराबर तोल कर यदि अपने शरीर से माँस दे दूँ तो- “मुझे कोई इन्कार नहीं” बाज ने सहमति प्रकट कर दी।

क्षण-क्षण चढ़ते-उतरते दृश्यों में ठहराव आ गया। सारी सभा इस आलौकिक न्याय को निस्तब्ध होकर देख रही थी। तराजू मँगाया गया। एक पलड़े में कबूतर के रूप में अग्नि देव को बैठाया गया दूसरी ओर शिवि अपने शरीर का माँस काट कर चढ़ाने लगे। बाँया हाथ, बाँया पाँव, दाँया पाँव तीनों चढ़ गये फिर भी माँस कबूतर के बराबर न हुआ। महामंत्री ने टोका महाराज? कुछ छल हो रहा है तो उन्होंने कहा-धर्म की राह पर चलने वाले वीर, छल-कपट की बात नहीं सोचते महामंत्री उठो और मुझे उठा कर पलड़े पर रख दो यदि कबूतर की रक्षार्थ मेरे प्राण चले जाते हैं तो भी कुछ हर्ज नहीं।

महाराज को पलड़े पर रख दिया गया, दोनों पलड़े बराबर हो गये पर अब भगवान् इन्द्र को और देर तक छद्म वेष में रहना कठिन हो गया शिवि की निष्ठा ने उन्हें पराभूत कर दिया। वे अपने देव रूप में प्रकट हुये और शिवि के धर्मपालन की प्रशंसा करने लगे। उनकी कृपा से शिवि के कटे अंग भी जुड़ गये और जुड़ गया इतिहास में जीव दया और कर्त्तव्य पालन का एक ऐसा पृष्ठ जो युग-युगों तक मनुष्य को कर्त्तव्य पालन की प्रेरणा देता रहेगा।


चमके भाल तुम्हारा


जिसने मन को जीत लिया (कविता) - विद्यावती मिश्र

जिसने मन को जीत लिया है,

उससे है सारा जग हारा  !

उसका क्रोध शान्ति का स्वामी ,

उसका बल जन-हित अनुगामी,

उसका हास सर्व मंगल है,

उसकी गति है जय-पथ गामी ,

उसे ना बंदी कर सकती है,

स्वार्थ, अहम्, वैभव की कारा !

उसके हित कुछ नहीं पराया,

उसने सबको ही अपनाया ,

उस पर वरद हस्त रखती है,

कल्पवृक्ष की मोहक छाया,

उसमें अपना  प्रेम विश्व के,

कण-कण जन- जन में विस्तारा !

गीता उसके सुयश सुनती,

रामायण उस पर मुसकाती,

कर देती आलोक विश्व में,

है उसके प्राणों की बाटी,

ऐसा नर मेरी मञ्जिल है,,

मेरा पथ मेरा ध्रुव तारा !

- विद्यावती मिश्र

*समाप्त*