10 फरवरी को बसन्त-पंचमी है, उस दिन सारे देश में व्यापक कार्यक्रम होंगे। स्थानाभाव के कारण सब प्रस्तावित समाचार छापे नहीं जा सके उसका हमें बहुत खेद है।
युग-निर्माण योजना नियमानुसार प्रत्येक महीने की 15-16 तारीख को यहाँ से निकलती है, उसके लिए यह आवश्यक है कि उनकी बाइन्डिंग, कटाई, मढ़ाई सब होकर 10 तारीख तक वह कार्यालय आ जाये पर बसंत-पंचमी के सभी समाचार इसी अंक में जाने हैं, इसलिए पत्रिका को 15 फरवरी तक रोककर रखेंगे। फरवरी अंक पाठकों तक देर से पहुँचेगा।
समाचारों के लिए ऐसा करना पड़ रहा है, इसलिए सभी कार्यकर्ता 11 फरवरी को ही समाचार प्रेषित कर दें, ताकि उनके यहाँ पहुँचने और पत्रिका छपने में और अधिक देर न हो।
-व्यवस्थापक
----***----
समाज भी एक परिवार है। वैयक्तिक परिवार छोटा और सामाजिक परिवार बड़ा है। जैसे जब किसी परिवार में कोई विवाह आदि उत्सव होता है, तब बाहर से नाते-रिश्तेदार आकर परिवार की परिधि को बढ़ा देते हैं। सारे परिवार के लोग उनको परिवार का एक विशेष अंग समझते हैं और आये हुए लोग भी परिवार को अपना ही परिवार मानते हैं। उसी प्रकार यदि जीवन के प्रत्येक क्षण को एक सुँदर अवसर समझकर मनुष्य अन्य सामाजिक सदस्यों को आया हुआ बन्धु समझे तो पूरे समाज में सहयोग और सद्भावना की स्थिति आते देर न लगे।
मनुष्य को एक सीमित और अनजान अवधि का जीवन रूपी अवसर मिला है, जिसे उसे सुँदर से सुँदर ढंग से बिताना चाहिए। इसे उलझन और अशाँति में व्यतीत करना मानवता नहीं है। हर व्यक्ति को अच्छे से अच्छा जीवन बिताने में सहायता देता हुआ स्वयं भी अच्छे ढंग से जिये, तभी मानव जीवन का उद्देश्य सफल और संसार की सृष्टि का मंतव्य पूरा होगा, अन्यथा नहीं।
-लियो टॉलस्टाय
----***----
चन्द्रचूड़ ने तीर्थयात्रा पर जाने का निश्चय किया। पीछे घर में धर्मपत्नी सौदाम, एक पुत्र, एक पुत्री और भृत्य रह रहे थे, सो चन्द्रचूड़ ने धन घर में रखना उचित न समझा। उन दिनों नगर में देवनिपुण की साधुता घर घर सराही जा रही थी, सो चन्द्रचूड़ ने अपना धन उसी को सौंप जाने का निश्चय किया।
तीर्थयात्रा पर चलने से पूर्व चन्द्रचूड़ ने देवनिपुण के पास आकर वह पोटली दी और लौटने तक उसे अपने पास सुरक्षित रखने की याचना की। चन्द्रचूड़! देवनिपुण ने कहा- ‘तुम धर्म कार्य सम्पन्न करने जा रहे हो, इसलिए तुम्हारी सहायता करना मेरा धर्म है, अन्यथा पराया धन अपने पास रखना बड़ा ही अहितकर होता है। चाहे वह ऋण के रूप में हो या सुरक्षा के लिए।’
चन्द्रचूड़ हर्षित हो यात्रा पर निकल गया। देवनिपुण ने मुद्राओं की थैली एक टूटे बक्से में डाल दी और अपने काम में लग गया।
बहुत दिन बीते चन्द्रचूड़ यात्रा समाप्त कर घर लौटे। सबकी कुशल-मंगल देखने के बाद उसे अपने धन का ध्यान आया। सो वह अपने सब काम छोड़कर सर्वप्रथम देवनिपुण के घर की ओर चल पड़ा।
देवनिपुण दरवाजे पर बैठे थे। जैसे जाते समय प्रसन्न चित्त छोड़ गया था, चन्द्रचूड़ को आज भी देवनिपुण में वैसी ही प्रसन्नता दिखाई दी। उसे एक बार तो ऐसा लगा जैसे तीर्थ बाहर नहीं मनुष्य के शरीर में ही भरे पड़े हैं। आत्म-सन्तोष, संयम, दया, करुणा यह तीर्थ ही तो है, जो इनके दर्शन स्पर्श का लाभ पा गया वह सचमुच ही जीवित ही मुक्ति पा गया।
कुशल-क्षेम हुई, फिर चन्द्रचूड़ ने अपना धन माँगा। उसी टूटी संदूक में पड़ी हैं तुम्हारी मुद्रायें, भाई चन्द्रचूड़ मैंने तो उन्हें देखा भी नहीं, जाओ और उठा ले आओ। अनासक्ति! एक बार तो चन्द्रचूड़ भारी प्रभावित हुआ। उसे लगा मनुष्य जीवन में साधुता और ईश्वर भक्ति से बढ़कर सुख नहीं, पुण्य नहीं। वह फिर सन्दूक की ओर गया पोटली उठाई, रुपये गिने। कुछ विस्मय हुआ, रुपये फिर गिने, विस्मय सही था सौ स्वर्ण मुद्राएं कम थी। लोभ-वृति और धनासक्ति में इतनी प्रबल शक्ति होती है कि वह उचित-अनुचित का विवेक भी नहीं रहने देती। मुद्रायें कम हैं तो निश्चित ही देवनिपुण ने चुराई होंगी। यह निश्चित समझकर यह देवनिपुण को बुरा-भला कहने लगा और उतनी धन-राशि लौटाने के लिए अड़ भी गया।
देवनिपुण बिना किसी क्षोभ या मनोमालिन्य के हंसे और बोले- ‘अरे भाई चन्द्रचूड़! गिनने में भूल हुई होगी। मुझे तो तुम्हारे पैसों का ध्यान भी नहीं रहा। देवनिपुण की प्रसन्नता और उसकी विषादयुक्त मुद्रा देखकर चन्द्रचूड़ की आशंका मानो और भी वेगवती हो उठी। उसने देवनिपुण को डांटा फटकारा ही नहीं कुछ साथियों को बुलाकर पीटा भी। देवनिपुण को और कोई दुख न था। था तो कुल इतना ही कि भविष्य में इससे सामाजिक जीवन में अविश्वास का भाव पनप उठेगा, अन्यथा उसे अपने कर्त्तव्य के लिए अब भी संतोष था।
अन्ततः हारकर चन्द्रचूड़ घर गया। पत्नी ने देर से आने का कारण पूछा। जब चन्द्रचूड़ ने सारी घटना सुनाई तो सौदाम के दुख का पारावार न रहा। उसने पति के पैर पकड़कर क्षमा माँगते हुए कहा-‘आपने देवनिपुण को अकारण दण्ड दिया। आवश्यक समझकर उतनी मुद्रायें तो मैंने ही निकाल ली थीं।’
चन्द्रचूड़ पश्चाताप से भर गया। उल्टे पाँव देवनिपुण के पास लौटा तो देखा कि वह तब भी गीत गा रहे थे और प्रसन्न चित्त थे। उसने देवनिपुण से अपनी भूल की क्षमा माँगी पर देवनिपुण के मुख पर तब भी किसी प्रकार की विजय या अभिमान का भाव नहीं आया। चन्द्रचूड़ ने अनुभव किया, जो सुख और दुख, यश और अपयश सबमें एक समान रहते हैं वस्तुतः वही सन्त हैं, साधु हैं।
----***----
जीवन की सूक्ष्मतम सत्ता बड़ी विलक्षण और रहस्यपूर्ण है, अब तक ऐसी सूक्ष्म जीवन की इकाई का पता नहीं लगाया जा सका, जो अंतिम (एब्सोल्यूट) और शाश्वत हो। किन्तु उसका पता लगाते-लगाते वैज्ञानिकों ने जिन सूक्ष्मताओं का पता लगा लिया है, वह भी कम आश्चर्यजनक नहीं हैं।
वैज्ञानिक विषाणु को निर्जीव कण मानते हैं, इसकी सक्रियता तो तभी देखने में आती है, जब वह किसी प्राणी के शरीर में कोशिका के संपर्क में आता है। जड़ हो अथवा चेतन यह वैज्ञानिक जानें पर इतना निश्चित है कि प्रकृति या परमेश्वर को समझने के लिए बाह्य उपकरण काम नहीं दे सकते। उनकी स्पष्ट और सही जानकारी तभी संभव है, जब हम उन्हें अपनी मानसिक चेतना-ज्ञान या अनुभूति की अत्यन्त सूक्ष्म इकाई में तोलें। अभी तो वैज्ञानिकों को सूक्ष्मदर्शी यन्त्रों की सहायता मिल रही है पर संभव है आगे चलकर उन्हें भी ध्यान प्रणाली अपनानी पड़े। प्रकृति के सूक्ष्मतम सत्यों का पता वस्तुतः चेतना की सूक्ष्म अवस्था तक पहुँचकर ही चल सकता है।
जीवन की सूक्ष्मतम इकाई को अभी जीवाणु कहते हैं। जीवाणु इतने छोटे होते हैं कि एक इंच की लाइन में उन्हें क्रमवार बैठाया जाये तो उनकी संख्या कोई 30000 बड़े आराम से बैठ जायेगी बाल की चौड़ाई में ‘काकस’ नाम के जीवाणु 75 की संख्या में मजे से बैठ सकते हैं, इतनी सूक्ष्म अवस्था में जीवन का होना भारतीय तत्व-दर्शन के- ‘अणोरणीयान् महतो महीयानात्मा’ यह आत्म अणु से भी छोटी और विराट से भी विराट है, सिद्धाँत की ही पुष्टि करता है। आत्मा का अर्थ यहाँ भी जीव-चेतना के उस स्वरूप से है, जो अगणित (नानमैथेमेटिकल) सिद्धाँतों पर खाता-पिता, पहनता, उठता-चलता, बातें करता, बोलता, हंसता, चिल्लाता, प्रेम-करुणा, दया आदि की अभिव्यक्ति करता पाया जाता है। शरीर से चाहे वह मनुष्य हो या पशु-पक्षी। जिसमें जीव-चेतना के लक्षण हैं, सब आत्मा हैं। विचित्र रूपों में होते हुए भी विश्वात्मा एक ही है, यह अनुभूति हम चेतना की अत्यन्त सूक्ष्म अवस्था तक पहुँचकर ही कर सकते हैं।
जीवात्मा के स्वरूप का प्रतिपादन करते हुए न्याय दर्शन में लिखा है।
इच्छाद्वेष प्रयत्न सुख दुख ज्ञानान्यामात्मनो लिगाँनि।
-न्याय दर्शन 1/1/8
अर्थात् जिसमें भी इच्छा, द्वेष, सुख-दुख, ज्ञान और प्रयत्न आदि गुण हैं, वह सब जीवात्मा हैं।
जीवात्मा अपने ज्ञान और प्रयत्न के द्वारा कर्म करता है और यह कर्म ही उसे विभिन्न योनियों में भ्रमण कराते हैं। जब तक वह अपने शुद्ध तेजस् स्वरूप को जान नहीं लेता और उसी में लय नहीं हो जाता, तब वह जीव भाव में बना सांसारिक दुख-सुख भोगता रहता है, किन्तु जब वह ईश्वर उपासना, चैतन्य के विकास की साधना, ध्यान, जप, स्वाध्याय, मनन, चिन्तन आदि के द्वारा मस्तिष्क में यह संकल्प सुदृढ़ कर लेता है कि साँसारिक आवश्यकतायें यथा इन्द्रियसुख, पद-यश, वित्त, पुत्र यह सब चेतना के ऊपर चढ़ी झिल्ली की खुजलाहट, क्रियाशीलता अथवा माँग उसकी निज की नहीं, तब उसका दृष्टिकोण ही बदल जाता है। आसक्ति नष्ट होकर वह शुद्ध चैतन्य की प्राप्ति का प्रयत्न करने लगता है। तब वह बार-बार अनेक तरह के शरीर धारण करने की चिंता से भी मुक्त हो जाता है।
यह बात जीवाणु के परिचय से बिल्कुल स्पष्ट हो जाती है। जीवाणु सबसे छोटे जीवों को कहते हैं, उनकी शारीरिक बनावट मनुष्य से बिल्कुल भिन्न होती है। एक नाभिक और उसके किनारे-किनारे प्रोटीन झिल्ली। प्रत्येक किस्म के जीवाणु की प्रोटीन झिल्ली में अपनी तरह के तत्व होते हैं, वह जीवाणु की प्रकृति और उसके स्वभाव पर निर्भर है। अर्थात् आत्मा के अच्छे बुरे गुण ही सब जगह साथ रहते हैं।
जीवाणु कितना खाते हैं, उसका कोई अनुमान भी नहीं कर सकता। पेटू और आलसी आदमी जिस प्रकार केवल खाने और बच्चे पैदा करने में निपुण होते हैं, ज्ञान, विद्या, विवेक, सफलता और नई-नई तरह की शोध करने की योग्यतायें उनमें विकसित नहीं हो पातीं, उसी तरह जीवाणु भी केवल खाते-पीते और बच्चे पैदा करते रहते हैं। जीवाणु एक घंटे में अपने भार से दो गुना अधिक खा डालता है। जब तक भोजन मिलता रहता है, वह खाता ही रहता है। गंधक, लोहा, अंडे, खून, सड़े-गले, पत्ते, लकड़ी और मरे हुए जानवर ही इनका आहार है, इस दृष्टि से जीवाणु बहुत कुछ मनुष्य का हित भी करते रहते हैं, जीवाणु न होते तो पृथ्वी पर गंदगी इतनी अधिक बढ़ जाती कि मनुष्य का जीवित रहना कठिन हो जाता।
कुछ जहरीले जीवाणु कार्बन मोनो ऑक्साइड पर जीवित रहते हैं। यह एक जहरीली गैस है और मनुष्य के लिए अहितकर है। भगवान शिव की तरह विष से मानव जाति की सुरक्षा का एक महान परोपकारी कार्य जीवाणु सम्पन्न करता है, जबकि मनुष्य अधिकाँश अपने ही निकृष्ट स्वार्थ-भोग में लगा रहता है।
पाश्चात्य वैज्ञानिक मनुष्य को अमीबा और बंदरों का क्रमिक विकास मानते हैं। उनसे जब अमैथुनी सृष्टि की बात कही जाती है, तब वे भारतीय तत्व-दर्शन पर आक्षेप करते हैं आश्चर्य है कि सृष्टि प्रक्रिया जीवाणुओं पर अमैथुनी होती है, इससे भी वे चेतना के सूक्ष्म दर्शन की अनुकृति नहीं कर पाते। जीवाणुओं की सन्तानोत्पत्ति जितनी विलक्षण है, उतनी ही आत्मा के शुद्ध चैतन्य स्वरूप का प्रतिपादन करने वाली भी। खमीर पैदा करने वाला एक जीवाणु ले लें, आप देखेंगे कि नर और मादा दोनों का काम यह एक ही जीवाणु कर देता है और सिद्ध करता है कि आत्मा न तो पुरुष है, न स्त्री वह तो शुद्ध चेतना मात्र है, स्त्री के शरीर में आ जाने से स्त्री भाव पुरुष के शरीर में आ जाने पर पुरुष हो जाता है। यही चेतना भैंस के शरीर में भैंस, हाथी के शरीर में हाथी बन जाती है। शरीरों में अंतर है पर तत्वतः आत्मा एक ही प्रकार की चेतना है।
एक जीवाणु बढ़कर जब पूर्ण हो जाता है, तब उसी में से कोंपल फूटती है। नाभिक थोड़ी देर में बंट जाता है और एक नये जीवाणु का रूप लेता है। जन्म से थोड़ी देर बार ही वह भी जन्म दर बढ़ाना प्रारंभ कर देता है। इस प्रकार पिता और पुत्र दोनों बच्चे पैदा करते चले जाते हैं, 1 से 2, 2 से 4, 4 से 8 ओर 8 से 16 इस क्रम में बढ़ते हुए एक सप्ताह में खमीर का जीवाणु 168 पीढ़ी तैयार कर लेता है, उनमें से लाखों जीवाणु तो एक घंटे में ही पैदा हुए होते हैं। वह भी बच्चे पैदा करने लगते हैं, जबकि उनका बूढ़ा पितामह भी उन मूर्खों की तरह बच्चा पैदा करने में लगा होता है, जिन्हें यह पता नहीं होता कि बच्चे पैदा करना ही काफी नहीं, उनकी शिक्षा-दीक्षा, स्वास्थ्य आजीविका आदि का प्रबंध न हुआ तो बढ़ी हुई जनसंख्या संकट ही उत्पन्न कर सकती है। जीवाणुओं का अस्तित्व और उनका बेतहाशा प्रजनन भी मनुष्य जाति के लिए खतरनाक ही होता है।
मनुष्य तो भी समझदार है, क्योंकि वह औसतन 25 वर्ष में नई पीढ़ी को जन्म देता है, यह बात दूसरी है कि आजकल दूषित और गरिष्ठ आहार तथा कामुकता के कारण नवयुवक छोटी आयु में ही बच्चे पैदा करने लगते हैं और इस तरह जनसंख्या की वृद्धि के साथ अपना और परिवार का स्वास्थ्य भी चौपट करते हैं, अन्यथा 25 वर्ष की आयु स्वाभाविक है। उसमें जनसंख्या और अन्य समस्याओं का संतुलन बना रहता है। यदि मनुष्य इतना विवेक नहीं रख सकता तो वह भी उन जीवाणुओं की ही तरह समझा जायेगा जो केवल 15 मिनट बाद एक नया बच्चा पैदा कर देते हैं।
अनुमान नहीं कर सकते हैं कि यह तो एक जीवाणु की एक दिन की पैदाइश है, यदि मनुष्य भी ऐसे ही जनसंख्या बढ़ाने की भूल करे तो पृथ्वी पर आहार, निवास और कृषि उत्पादन आदि की कैसी बुरी स्थिति हो। सौभाग्य है कि जीवाणु बहुत छोटे हैं, इसलिए उनके सर्वत्र भरे होने से भी हमारे सब काम चलते रहते हैं। पर यह निताँत संभव है कि हमारी प्रत्येक साँस के साथ लाखों जीवाणु भीतर शरीर में आते-जाते रहते हैं। प्रकृति की इस विलक्षणता से मनुष्य की रक्षा भगवान ही करता है। अन्यथा यदि विषैले जीवाणुओं को संख्या बढ़ जाती तो पृथ्वी पर रहने वाले सभी मनुष्यों को उसी तरह नजरबंद रहना पड़ता, जिस तरह चन्द्रमा से कोई विषाणु न आ जाये, इस भय से चन्द्र-यात्री नील आर्मस्ट्रांग, एडविन एल्ड्रिन और कोलिन्स को चन्द्रमा से उतरते ही नजर बंद करके तब तक रखा गया, जब तक उन्हें अनेक प्रकार के रसायनों से धोकर बिल्कुल शुद्ध और साफ न कर लिया गया।
मनुष्य का यह सोचना व्यर्थ है कि अनेक प्रकार के देश और वर्णों में पाये जाने का सौभाग्य वचन उसे ही मिला है, यह तो सब प्रकृति और परमेश्वर का खेल है, जो जीवन की सूक्ष्म इकाई जीवाणुओं में भी है। इनकी लाखों किस्में हैं और हजारों तरह के आकार। आड़े-टेढ़े, कुबड़े, षट्कोण, लम्बवत् विलक्षण शिवजी की बारात। कोई फैले रहते हैं, कोई गुच्छों में समुदाय बनाकर, कोई विष पैदा करते हैं, कोई मनुष्य जाति के हित के काम भी। ‘काकस’, डिप्थीरिया, स्फरोचेट्स नामक जीवाणु जहाँ उपदंश, फफोले, मवाद पैदाकर देते हैं, वहाँ वे जीवाणु भी हैं जो दूध को दही में बदलकर और भी सुपाच्य और स्वास्थ्यवर्धक बना देते हैं।
जो अच्छे प्रकार के जीवाणु होते हैं, उन्हें काम में लाया जाता है, अच्छे मनुष्यों की तरह सम्मान दिया जाता है, जबकि बुरे ओर विषैले जीवाणुओं को मारने के लिए संसार भर में इतनी दवायें बनी हैं, जितने खराब मनुष्यों के लिए दण्ड विधान। कहीं अपराधियों को जेल दी जाती है, कहीं काला पानी, कहीं उनका खाना बंद कर दिया जाता है, कहीं सामाजिक संपर्क। उसी तरह औषधियों के द्वारा खराब जीवाणुओं को भी नष्ट करके मारा जाता है। दण्ड का यह विधान कठोरतापूर्वक न चले तो उससे मानव-जाति का अस्तित्व ही संकट में पड़ जाये, इसीलिए सत्पुरुष के लिए दया और करुणा जितनी आवश्यक है। बुरे व्यक्ति को दण्ड भी उतना ही आवश्यक है।
हमारे आस-पास के संपूर्ण प्राकृतिक जीवन में यह क्रियायें चलती रहती हैं पर हम जान नहीं पाते। मनुष्य की भौतिक आँखें बहुत छोटी हैं, इसलिए यह दृश्य केवल ज्ञान से ही देख या अनुभव कर सकते हैं पर यह एक सत्य भी है कि इन अनुभूतियों को योग और साधनाओं द्वारा स्पष्ट बनाया जाता है। मनुष्य अपने को शरीर मानने की भूल को छोड़ता हुआ चला जाये और शुद्ध आत्म-चेतना की अनुभूति तक पहुँच जाये तो वह चींटी ही नहीं, जीवाणु की उस सूक्ष्म सत्ता तक भी पहुँचकर सब कुछ यन्त्रवत देख सकता है, जिसका व्यास 1/30000 इंच तक होता है। वैज्ञानिक यन्त्र इस बात के प्रमाण हैं कि आत्म-चेतना के लिए असंभव कुछ है नहीं।
जीवाणु आत्मा के अनेक रहस्यों की सत्यता का प्रतिपादन करते हैं। गीता में भगवान कृष्ण ने कहा है-
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः। न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः॥
-2/23
हे अर्जुन यह आत्मा बड़ी विलक्षण है, न तो इसे शस्त्र छेद सकते हैं और न ही अग्नि इसे जला सकती है, जल गीला नहीं कर सकता और न ही हवा उसे सुखा सकती है।
चेतना और प्रकृति के द्वैत सम्बन्ध और आत्मा के स्वरूप को जीवाणु के अस्तित्व और अध्ययन द्वारा बहुत स्पष्ट अर्थों में समझा जा सकता है, साथ ही मानवीय व्यवहार का बहुत सा मार्ग-दर्शन भी उससे प्राप्त किया जा सकता है।
जीवाणु के यह गुण, यह सूक्ष्मता इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि आत्म-चेतना प्रकृति के जड़ परमाणुओं से भिन्न अत्यन्त सूक्ष्म, अमर और सर्वशक्तिमान सत्ता है, उसे अत्यंत सूक्ष्मता की अनुभूति द्वारा ही जाना और पहचाना जा सकता है।
=कोटेशन======================================================
किसी ने कहा- ‘मनुष्य बड़ा, बहुत ही बड़ा हो सकता था लेकिन उसके दोष ही उसे देवत्व तक पहुँचने से लाचार कर देते हैं। सहज, प्रकृति सिद्ध अहं पर विजय प्राप्त कर सकना, सत्पुरुषार्थ के एक कण से भी संभव है। किंतु, पराक्रम और वैभव को उद्घाटित करने के बदले, लोग निन्दा और ईर्ष्या की कोठरी में छिद्रान्वेषण और दर्शन के सहारे अनायास जा पहुँचते हैं। और तब परिणाम होता है कि हम अपना सब कुछ गंवा बैठते हैं।’
‘दूसरे के दोषों में जिसका दर्शन हमें होता है, वह दूसरे का न होकर हमारे मन का गरल ही तो है, जिसे हम दूसरों पर सर्वथा लादने के असफल प्रयत्न में, मुक्तिकामी की भाँति अपने को निष्कलंक प्रमाणित करने का प्रयत्न करते हैं।’
श्रोता का चेहरा प्रफुल्लित हो उठा-कमलदल की तरह।
==========================================================
----***----
विचार न करने भर की भूल है अन्यथा मनुष्य और छोटे-छोटे एक कोषीय जीव अमीबा या हाइड्रा में कोई अंतर नहीं। प्रकाश रूप आत्मा की लघुतम सत्ता में भी विराट् विश्व संव्याप्त है।
स्त्री के प्रजनन क्षेत्र में भी विशेष प्रकार के जननेन्द्रिय कोष (ओवम) पाये जाते हैं। प्रत्येक पन्द्रहवें दिन दायें या बायें और स्त्री के काम-अवयव (सेक्स-आर्गन) जिसे ‘ओवरी’ कहते हैं, में एक जननेन्द्रिय कोष प्रकट होता है। वहाँ से निकलकर ‘फिभ्रिएटेड एण्ड’ जो एक पंजे की शक्ल का अवयव होता है, उसमें चला जाता है यहाँ से चलकर वह गर्भाशय की भीतरी दीवाल से चिपक जात है, जब तक कामेच्छा नहीं होती, मासिक धर्म के साथ ओवम-कोष खुलकर बाहर निकल जाता है, किन्तु यदि काम की इच्छा हो और स्त्री को पुरुष का संयोग मिले तो यह संभव है कि पुरुष का एक वीर्य-कोष (स्पर्म) गर्भाशय में जाकर ओवम से मिल जाये। ओवम और स्पर्म का मिलना ही गर्भाधान कहलाता है।
पुरुष शरीर का वीर्य-कोष (स्पर्म) मछली के बच्चे जैसी आकृति का होता है किन्तु उसे नंगी आँखों से नहीं देखा जा सकता। परमाणु का सैद्धान्तिक व्यास 0.00000001 मिलीमीटर होता है, जबकि उसके नाभिक का व्यास 0.00000000001 मिलीमीटर होता है। इनका ही अध्ययन करने के लिए शक्तिशाली सूक्ष्मदर्शी यंत्रों (माइक्रोस्कोप) की आवश्यकता होती है तो इनसे भी लघुतम आकार के मानव प्रजनन कोषों को तो बिना न्यूक्लियर माइक्रोस्कोप के देख पाना भी संभव नहीं। लघुतम होकर भी वीर्य-कोष का सुनिश्चित आकार होता है। सबसे ऊपर त्रिपार्श्व, फिर एक अण्डाकार पिण्ड और उसमें भी पूँछ। यह है, मनुष्य शरीर का आधार। कितना लघुतम रूप पर कितनी शक्तिशाली सत्ता। एक मुर्दा परमाणु में 27 लाख किलो कैलोरी ऊर्जा हो सकती है, तब इस जीवन परमाणु की शक्ति का तो कहना ही क्या। यदि मनुष्य इस लघुता का चिन्तन कर सका होता तो यह शक्ति को एक अत्यन्त शुद्ध और विशाल अवस्था में होता। अज्ञानता का दम्भ और अहंकार तो स्वयं उसी के लिए कष्टदायक सिद्ध होता है। अहंकार के वशवर्ती मनुष्य अपने घर, पास-पड़ोस वालों से भी मैत्री बनाये रख पाता। यदि वह अपनी इस सूक्ष्मता का चिन्तन कर सका होता, तब उसे सृष्टि के छोटे से छोटे जीव और जर्रे-जर्रे में अपनी ही प्रतिच्छाया दिखाई देती, तब न किसी के साथ द्वेष होता न दुर्भाव। शक्ति, क्रियाशीलता, संतोष और आनन्द की विभूतियों से आच्छादित हो गया होता।
‘अमीबा’ के अध्ययन से यह निश्चित हो गया है कि जीवन की प्रणाली नाभिक में ही है और वह शक्ति रूप में है, उसका कोई आकार नहीं है। एक अमीबा का नाभिक है, उसका कोई आकार नहीं है। एक अमीबा का नाभिक साइटोप्लाज्म (नाभिक के अतिरिक्त कोष में जल वायु, गैस खनिज आदि जो भी कुछ होता है, वह सब साइटोप्लाज्मा कहलाता है) का कुछ अंश लेकर दो अमीबाओं में बदल जाता है, दोनों की आकृति स्वभाव भिन्न-भिन्न हो जाते हैं, लगता है वे दोनों अलग-अलग विचार प्रणाली के रूप में जन्में हों। एक ही विचार प्रणाली या केन्द्रीभूत सत्ता का अनेक रूपों में विभक्त होना ऐसा ही है। वस्तुतः चेतना सारे विश्व में एक ही है। उस विश्व-व्यापी चेतना को जब हम एक महत् इकाई के रूप में देखते हैं तो वही सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापी, सर्वान्तर्यामी ईश्वर के रूप में दिखाई देने लगता है। सविता के रूप में वही आत्मा मनुष्य और कीड़े-मकोड़ों के जीवन में वही जीव कहलाता है। तीनों अवस्थायें विराट से सूक्ष्म और सूक्ष्म से विराट। इसी विद्या का अवगाहन कर हम भारतीय भी योगी, दृष्टा, ऋषि और महर्षि हो गये थे। ज्ञान के पुँज थे, शक्ति के पुँज थे हम, और उसका एकमात्र आधार यह तत्व-दर्शन ही था जिसने हमें असीम से असीम बना दिया था।
जिस प्रकार एक अमीबा उपरोक्त विधि द्वारा अनेक अमीबाओं में बदल सकता है, उसी प्रकार स्त्री के गर्भाशय में पहुँचा हुआ, आत्म-चेतना कण या वीर्य-कोष अपना विस्तार प्रारंभ करता है। एक वीर्य कोष टूटकर दो हो जाते हैं। इस क्रिया में कोष की अन्तःप्रेरणा काम करती है। फिर दो कोष विभक्त होकर चार बन जाते हैं। चार-आठ, आठ-सोलह, सोलह-बत्तीस। इस क्रम में यह कोष ही बढ़ते और पकते रहते हैं। प्रारंभ में इनकी स्थिति शहतूत के फल की सी होती है। फिर एक प्लेट और प्लेट से ट्यूब की शक्ल बनती है, यह ट्यूब आकृति ही तीन स्थानों से मुड़कर मस्तिष्क के तीन भाग (1) अग्रभाग (2) मध्य मस्तिष्क (3) पिछला मस्तिष्क बन जाते हैं।
कोषों का बनना अभी भी जारी रहता है, मुख्य कोष माँ के शरीर से पोषण लेकर प्रत्येक कोष के लिये शारीरिक प्रकृति (साइटोप्लाज्मा) भाग जुटाता रहता है, जब अनेक कोष एकत्र होते हो जाते हैं तो फिर सुषुम्ना शीर्षक (स्पाइनल कार्ड) बनना प्रारंभ होता है और इस तरह नीचे का शरीर बनता हुआ चला जाता है। यह कोष प्रत्येक स्थान की परिस्थितियों के अनुरूप अपने आप मुड़ते, सीधे होते, कड़े और कोमल होते चले जाते हैं और इस प्रकार नौ महीने की अवधि में एक विकसित बच्चा बन जाता है।
आठ, दस पौण्ड वजन का बालक सौ पौण्ड के मनुष्य में बदल जाता है। कुछ ईश्वर की लीला ऐसी ही विचित्र है अन्यथा जो चेतनता इस मनुष्य शरीर में है, वही उस एक मूल कोष में थी और वह अपने आप में एक पूर्ण संसार था। मनुष्याकृति में एक विस्तृत और वैज्ञानिक क्षमताओं में परिपूर्ण शरीर देने का उद्देश्य तो यही था कि मनुष्य स्थूल और सूक्ष्म-ज्ञान और अज्ञान, यथार्थ और अयथार्थ के लक्ष्य को अच्छी तरह समझेगा, किन्तु दुर्भाग्य मनुष्य का कि वह शरीर के साथ अपनी आत्मिक चेतना को भी सूक्ष्म बनाता चला जाता है। इस तरह उसकी शक्तियाँ भी अपवित्रता के अंधकार में छुपती चली जाती हैं और जीवन मुक्ति, शाश्वत लक्ष्य प्राप्ति जैसे लक्ष्य से वह वंचित होता हुआ चला जाता है।
आत्मा की सूक्ष्मता अनन्त है, उसी तरह उसकी शक्तियाँ भी अनन्त हैं पर उसे यों ही यंत्रों से नहीं पाया जा सकता। आत्मा ज्ञान है, आत्मा विचार से और अनुभव से ही पाया जा सकता है। योगी लोग ध्यान और नाटक के द्वारा विभिन्न प्रकार के प्राणायाम, आसन और हठधर्मी साधनाओं द्वारा उसका साक्षात्कार करते हैं तो ज्ञानी जन उसे तत्व रूप में चिंतन करके प्राप्त करते हैं, दोनों ही अवस्थाओं में उसकी सूक्ष्मता तक पहुँचना अनिवार्य है। शास्त्रकार ने श्वेताश्वेतरोपनिषद् में बताया है-
अँगुष्ठमात्रो रवितुल्य रुपः संकल्प अहंकार समन्वितो यः। बुद्धेर्गुणेनात्म गुणेन चैव अराग्रमात्रो ह्यपरोऽपि दृष्टाः॥
बालाग्रशत भागस्य शतधा कल्पितस्य च। भागो जीवः स विज्ञेयः स चानन्त्याय कल्पते। नैव स्त्री न पुमानेष न चैवायं नपुंसकः। यद् यच्छरीरमादत्ते तेन तेन स युज्यते॥
-5/8/10
अर्थात्- जो अंगुष्ठ मात्र संकल्प, विकल्प युक्त तथा बुद्धि के गुण में अपने श्रेष्ठ कर्मों के गुण से सुई के अग्रभाग जैसे आकार वाला हो गया है। ऐसी सूर्य के समान तेजस्वी आत्मा भी ज्ञानियों ने देखी है। बाल के अग्रभाग के सौवें भाग के भी सौवें भाग जितने छोटे अस्तित्व वाला भाग ही प्राणी का स्वरूप जानना चाहिए। वह सूक्ष्मातिसूक्ष्म गुण वाली आत्मा ही असीम गुणों वाली हो जाती है।
चेतना मनुष्य के शरीर के रूप में विकसित होकर परमाणु से भी बड़ी दिखाई देने लगी, यह उसका महत्तम रूप है और परमात्मा ने यह किसी विशेष हेतु से किया है। हम सब आनन्द की खोज में हैं, उस आनन्द की परिभाषा कर पाना दूसरे जीवों के लिए कठिन है, क्योंकि उनमें बुद्धि विवेक की ऐसी क्षमता नहीं, जैसी मनुष्य में, मनुष्य चाहे तो इस शरीर की विज्ञानमय शक्तियों का प्रयोग करके अपने महत्तम रूप और सौभाग्य को विश्वात्मा, विराट शरीर में विकसित कर सकता है। यही स्थिति जिनमें मनुष्य को न तो कोई अभाव हो, न अज्ञान, अशक्ति हो, न अक्षमता सबसे अधिक आनन्द उल्लास और सामर्थ्य से परिपूर्ण हो सकती है।
अक्टूबर 68 के अंक में एक लेख छपा था कि वैज्ञानिकों ने जब सूक्ष्मदर्शी की सहायता से कोष को देखा तो उनकी आंखें फटी की फटी रह गईं, उन्होंने देखा उसमें असंख्य नदियाँ, हिमालय के समान पर्वत सूर्य जैसी चमक वाले नक्षत्र और अपार सावन-सम्पत्तियों के भाण्डागार। यदि कोई ऐसी मशीन हो जिसे शरीर के किसी उपयुक्त केन्द्र-स्थान में लगाकर संपूर्ण 56 अरब कोशिकाओं को देखा जाना संभव हो तो उस विराट को देखकर खड़ा भी रह सकेगा या नहीं, कहा नहीं जा सकता। उसमें करोड़ों सूर्य, अरबों नक्षत्र, लाखों पर्वत, करोड़ों नदियाँ और न जाने क्या-क्या होगा। भगवान कृष्ण ने योग-शक्ति से अर्जुन को इसी विराट के दर्शन कराये थे और वह काँप गया था। भयभीत होकर उसे आंखें ही मूँदनी पड़ी थीं।
इस शक्ति, इस अहंकार, इस विराट को विकसित करने का श्रेय हम भारतीयों को है। हमने ध्यान प्रणाली और योगाभ्यास द्वारा विचार, चिन्तन और संकल्प प्रणाली को जीत लिया है। चेतना की पीठ पर खड़े होकर जब हमने अपने शरीर के भीतर देखा तो यही विराट जगत अपने में दिखाई दे गया। इस निखिल ब्रह्मांड में बिखरे पड़े हैं ‘प्राण मेरे’ का गीत फूट पड़ा था। इस विराट की अनुभूति कर सकना मनुष्य के लिए संभव हो तो वह इसी शरीर से आत्म-कल्याण की भूमिका सम्पादित कर सकता है। दूसरे शरीरों में तो उसे कर्मफल भोगने पड़ते हैं और यदि वह मनुष्य शरीर की उपयोगिता नहीं अनुभव करता, अमानवीय कृत्य करता है तो उन्हें भोगता भी रहता है।
एक बार कुछ विरोधी महात्मा ईसा को असमंजस में डालकर नीचा दिखाने के इरादे से एक ऐसी स्त्री को पकड़कर उनके पास ले आये जिस पर व्यभिचार का दोष लगाया था। यहूदियों के शास्त्रानुसार दुराचारिणी स्त्री को सार्वजनिक रूप से पत्थर मार-मारकर मार डाला जाता था।
विरोधी सोचते थे कि यदि ईसा अपने दया-करुणा, क्षमा के सिद्धाँत के अनुसार यदि स्त्री को छोड़ देने के लिए कहेंगे तो उन पर शास्त्राज्ञा के उल्लंघन का दोष लगायेंगे और यदि वे इस दोष से बचने के लिए उसे मारने का समर्थन करेंगे तो उनकी दया आदि ढोंग करने वाला धूर्त प्रसिद्ध करेंगे।
उन्होंने आकर ईसा से पूछा-आप इस व्याभिचारिणी के विषय में क्या व्यवस्था देते हैं। ईसा एक क्षण चुप रहकर बोले-व्यवस्था क्या देना? इसे तो पत्थर मारे ही जाने चाहिएं, किन्तु शर्त यह है कि पहला पत्थर वही मारे जो स्वयं निष्पाप हो। क्योंकि पापी को निष्पाप ही दण्ड दे सकता है।
विरोधियों के होश उड़ गये और वे हाथों के पत्थर फेंककर खिसक गये। ईसा ने स्त्री के बन्धन खोलकर कहा—जा बेटी! अब कभी गलत काम न करना।
‘शीघ्र मृत्यु से बचना है तो मानसिक व्यायाम कभी भूलकर भी बंद न करें। मानसिक व्यायाम अर्थात् स्वाध्याय। स्वाध्याय का अर्थ कुछ भी पढ़ना नहीं। जो विषय आप नहीं जानते उसका अध्ययन कीजिए। किसी ऐसे विषय का अध्ययन कीजिए, जिससे आपको अपनी खोपड़ी खुजानी पड़े।
यह शब्द अमेरिका के 67 वर्षीय डॉ. क्वाट्रज के है। डॉ. क्वाट्रज का कहना है कि मनुष्य की मृत्यु वृद्धावस्था के कारण नहीं होती। मानसिक संस्थान की क्रियाशीलता के रुकने के कारण होती है। जो लोग निरंतर क्रियाशील रहते हैं, उनकी आयु लंबी होती है। यही नहीं वे अपने शारीरिक विकारों को भी दाब बैठते हैं, उन पर शारीरिक त्रुटियों का भी दुष्प्रभाव परिलक्षित नहीं होने पाता।
डॉ. श्वार्टज के मत के अनुसार अपने देश के ऋषियों, महर्षियों के जीवन का अध्ययन करें तो विश्वास हो जाएगा कि उनके दीर्घायुष्य का कारण उनकी मनोचैतन्यता ही थी। शारीरिक श्रम के साथ में मानसिक दृढ़ता और विचारशीलता के कारण वे सैंकड़ों वर्षों की आयु हंसते हुए जीते थे।
अपने कथन की पुष्टि में डॉ. श्वार्टज ने एक 84 वर्षीय अमेरिकन व्यापारी को प्रस्तुत किया। इस व्यापारी में अपने व्यापार के लिए नई-नई बातें खोजने की क्षमता है। वह अपने मस्तिष्क को सदैव कुरेदता और विचारता रहता है, जब कभी विचार ढीले पड़ जाते हैं, तब वह पढ़कर फिर सोचने के लिए नये विचार पैदा कर लेता है, विचारों की शाखाएं-प्रशाखायें फूटती रहें, इसके लिए उसके जीवन में कर्म का समन्वय है। अर्थात् वह जितना सोचता-विचारता है उतना ही क्रियाशील भी है।
व्यापारी से पूछा गया-आपको कोई शारीरिक शिकायत तो नहीं है? इस पर उसने हंसकर उत्तर दिया-“शिकायत होती तो डॉक्टर को न दिखाते। आप देख लें, आप तो डॉक्टर हैं कोई शिकायत होगी तो आपकी पकड़ से बाहर थोड़े ही जा सकेगी।”
डॉक्टरों ने परीक्षा की। डॉक्टर आश्चर्यचकित थे कि संसार भर की तमाम बीमारियाँ उसके शरीर में भरी पड़ी हैं, लेकिन उसके काम की तल्लीनता और विचारों की सजगता के कारण शरीर का विष जलता रहता है और बीमारियाँ होते हुए भी उसे चारपाई पकड़ने की आवश्यकता नहीं पड़ती। बीमारियों की ओर तो उनका कभी ध्यान भी नहीं गया। वह अपनी आयु के किसी भी व्यक्ति से ज्यादा काम करते हैं, व्यावसायिक कार्यों से संबंधित अध्ययन के बाद भी ग्रह-नक्षत्रों की खोज, जीवात्मा परमात्मा संबंधी जानकारियाँ, प्रकृति और मनुष्यगत आश्चर्यों, चमत्कारों को पढ़ने के लिए वे कुछ न कुछ समय प्रतिदिन निकालते हैं। इन जिज्ञासाओं के कारण न तो उनका मस्तिष्क ठप्प पड़ता है न क्रिया-कलाप।
डॉ. फ्रेडरिक श्वार्टज अमेरिकन मेडिकल एसोसिएशन के अध्यक्ष हैं। जीवन के सबसे बड़े आश्चर्य मृत्यु की खोज में उनकी गहन अभिरुचि है। उसे रोक सकना तो भौतिक दृष्टि से शायद ही कभी संभव हो पर यदि पौराणिक आख्यान सत्य हैं, जैसा कि अब प्रमाणित भी हो रहा है, तो आयु को हजार वर्ष तक खींच ले जाने की सम्भावनायें अगली शताब्दियों में ही सत्य सिद्ध हो सकती हैं।
उसके लिए डॉ. श्वार्टज ने जो फार्मूला बताया है, वह ऊपर दे दिया गया है। आश्चर्य की खोज के प्रति हमारी जिज्ञासायें जितनी तीव्र होंगी और शारीरिक दृष्टि से जब तक क्रियाशील बने रहेंगे, मृत्यु तब तक दूर ही रहेगी, भले ही शरीर के कई कल-पुर्जे काम करना भी बंद कर दें।
----***----
विज्ञान की अधिकाँश उपलब्धियाँ जड़ प्रकृति के क्षेत्र में हैं। पृथ्वी में पाये जाने वाले सभी कार्बनिक (आर्गेनिक) और अकार्बनिक (इन आर्गेनिक) धातुओं, खनिजों, गैसों और इन सबके द्वारा बनने वाले यंत्रों, प्रकाश, विद्युत, ताप, चुँबक आदि से संबंधित अनेक महत्वपूर्ण जानकारियाँ विज्ञान देता है, उसमें कामवासना की तरह का क्षणिक आकर्षण भी है, क्योंकि हम उससे कुछ शक्ति सुविधा पाते और प्रसन्नता अनुभव करते हैं किन्तु जब हम जीव विज्ञान की ओर चलते हैं तो पता चलता है कि यह जानकारियाँ नितान्त एकाँगी और भ्रमपूर्ण हैं। वह जीव चेतना के मूल उद्देश्य के बारे में कुछ नहीं बता पातीं।
उदाहरण के लिए जीवाणु (लिविंग आर्गनिज्म) को विज्ञान पूर्ण मानता है, चेतना सूक्ष्म कण में भी विद्यमान है, यह एक महत्वपूर्ण जानकारी हुई, किन्तु विज्ञान उसे शाश्वत नहीं मानता। जीवाणु के प्राकृतिक अंश के बारे में जीव विज्ञान (बायोलॉजी) की जानकारियाँ बहुत कुछ सत्य और उपयोगी होती हैं, किन्तु जब यह पूछा जाता है कि इसमें रह रही चेतना का मूलभूत स्वरूप क्या है? तो विज्ञान चुप हो जाता है, जबकि उसके अस्तित्व और मूल महत्व का वह स्वीकार भी करता है। जीव-विज्ञान अधिक से अधिक यह कल्पना कर सका है कि चेतना प्राकृतिक पदार्थों की रासायनिक चेतना मात्र है। प्रो. व्हाइट हेड स्वयं एक महान वैज्ञानिक थे, उन्होंने विज्ञान के इस तर्क का खंडन करते हुए पूछा - ‘एक अमीबा (प्रकृति का सबसे छोटा जीव) जिसमें साइटोप्लाज्मा ही उसका शरीर और एक नाभिक (न्यूक्लियस) ही उसकी चेतना होती है, क्योंकि ऐसा होता है कि नाभिक के निकल जाते ही शेष भाग मृत हो जाता है, जबकि नाभिक पुनः एक स्वतंत्र अमीबा का रूप ले लेता है। इससे मालूम पड़ता है कि चेतना प्राकृतिक संरचना से स्वतंत्र है, वह स्वयं प्रकृति को उत्पन्न करने की सामर्थ्य रखता है। विज्ञान इस संबंध में पूर्णतया डाँवा-डोल है।
यदि चेतना का स्वरूप रासायनिक होता तो प्रयोगशालाओं में अनेक प्रयोग करके कई तरह की रासायनिक शक्तियाँ पैदा करते हैं पर उनमें उपयोगितावाद (सरवावल ऑफ फिटेस्ट) देखने में नहीं आता। उपयोगितावाद के अनुसार बड़ी रासायनिक शक्ति को चाहिए था कि वह छोटी रासायनिक शक्ति को दबोचती पर वैसा आज तक कहीं नहीं हुआ, रासायनिक शक्तियाँ और मूल चेतन सत्ता में कोई सामंजस्य नहीं है।
विज्ञान की सीमितता (लिमिटेशन आफ साइंस) नामक पुस्तक के लेखक डॉ. जे डब्ल्यू. एन. सुलीबाग ने एक स्थान पर लिखा है-मानव-जीवन की उत्पत्ति के बारे में प्रचलित डार्विन का विकासवाद (इस मत के अनुसार मनुष्य अमीबा, अमीबा से दूसरे सर्पणशील जीवों से विकसित होता हुआ बंदर बना, बंदर से मनुष्य बन गया) और रैन्डम के सिद्धाँत (इस मत के अनुसार मनुष्य उसी प्रकार परिपूर्ण जन्मा, जिस प्रकार अन्य जीव) में से कौन सत्य है, कौन असत्य है। इस संबंध में विज्ञान कुछ भी स्पष्ट कर सकने में असमर्थ है। यहाँ बड़े से बड़े वैज्ञानिक को भी भ्रम हो जाता है कि वस्तुतः कोई ऐसी महान सत्ता संसार में काम कर रही हो सकती है, जिसकी इच्छा से बलवान और कोई शक्ति संसार में न हो।
यदि हम जानवरों के अंगों की कार्यप्रणाली का ही भौतिक और रासायनिक अध्ययन करें, तब भी निष्कर्ष वहीं के वहीं रह जाते हैं। शरीर में इच्छाओं का रासायनिक क्रम विज्ञान बता सकता है, किन्तु विज्ञान यह नहीं बता पाता कि इच्छायें क्यों उत्पन्न होती हैं। पशु भी अपनी इच्छायें रोक नहीं पाते। मार खाते हैं तो भी खेतों में चोरी से घुसकर फसल खाने की अपनी इच्छा को रोक सकना उनके लिए भी असंभव ही होता है। रासायनिक परिवर्तनों के कारण इच्छाओं के स्वरूप-परिवर्तन के बारे में विज्ञान बता सकता है पर परिवर्तनों के उद्देश्य के बारे में वह कुछ भी व्यक्त करने में असमर्थ ही रहा है।
भौतिक विज्ञान (फिजिक्स) और मनोविज्ञान (साइकोलॉजी) दोनों में पृथ्वी और आकाश का अंतर है। मनोविज्ञान के विश्लेषण से मिला व्यवहारवाद और भौतिक विज्ञान से मिले यन्त्रों की कार्यप्रणाली में बड़ा फर्क है, भौतिक विज्ञान की धारणायें स्पष्ट होती हैं, हमें पता रहता है कि अमुक यन्त्र काम न करेगा तो मशीन बंद हो जायेगी मशीन में फिर वह शक्ति नहीं होगी कि वह अपनी इच्छा से थोड़ी देर आराम करने के बाद फिर चलने लगे। जीवन के बारे में वह धारणायें बहुत अस्पष्ट होती हैं, हम अपने ही संबंध में नहीं कह सकते कि आधे घंटे पीछे हमारी मनःस्थिति क्या होगी, हम कहाँ और क्या होंगे। विज्ञान द्वारा मानवीय व्यवहार को स्पष्ट किया जाना बिल्कुल असंभव है। इसलिए यह मानना स्वाभाविक है कि आत्म-चेतना विज्ञान की सीमा से पृथक वस्तु है।
डॉक्टर भी एक वैज्ञानिक ही है उसे शरीर रचना और उसके रासायनिक परिवर्तनों की जानकारी होती है, इसलिए उसे पूरी बीमारी का पता बिना रोगी से पूछे लगा लेना चाहिए था। उसे यह भी बता देना चाहिए था कि शरीर के अमुक भाग में इस तरह की पीड़ा होती है पर वह ऐसा करने में असमर्थ होता है। वहम (मीनिया) और बिना किसी भौतिक संपर्क के किरकिराना या सिहरन (एलर्जी) का आभास क्यों होता है। डॉक्टर इसका पता लगाने में असमर्थ है।
भूगर्भ विद्या (जियोलॉजी) वृक्ष-वनस्पति विज्ञान (प्लैन्टोलॉजी) और जीव-विज्ञान (बायोलॉजी) के अध्ययन से पता चलता है कि जीवित वस्तुओं का क्रमिक विकास हुआ है। रसायन-शास्त्र (केमिस्ट्री) बताती है कि जितने भी अब तक खोजे गये 108 तत्व हैं, वह भी क्रमिक नंबर (पीरियाडिक टेबल) में है, इलेक्ट्रानों की संख्या बढ़ते-बढ़ते एक से दो हो जाती है तो दूसरा तत्व बन जाता है, तीन हो जाती है तो तीसरा और चार हो जाने पर चौथा। शेष सभी पदार्थ इनके सम्मिश्रण से बनते हैं, सृष्टि में जो कुछ भी जड़ प्रकृति है, मूलतः 108 तत्वों (अब तक की जानकारी के अनुसार) से बनी है। यह 108 तत्व किसी एक ही तत्व का विकास या अपदस्थ क्रम हैं, मूल कोई एक ही सत्ता या प्राण है, जिससे सारा संसार प्रकट होकर आ रहा है। वह सब क्या है, विज्ञान यह समझाने में असमर्थ है।
ऊँची स्थिति से नीची स्थिति में पहुँचने का यह क्रमिक विकास हजारों-लाखों वर्षों की प्रक्रिया का परिणाम है। अभी आगे यह क्रम कब तक चलेगा हमें नहीं मालूम पर पदार्थों में क्रियाशीलता क्यों है, यह भी वैज्ञानिक नहीं बता पाते किन्तु इन स्पष्टीकरणों से यह पता अवश्य चलता है कि समय, पदार्थ, चेतनता और सृष्टि के आविर्भाव का कारण (टाइम, स्पेस, मोशन एंड काजेशन) यह सब किसी एक परम बिन्दु (एब्सोल्यूट प्वाइंट) से चले हैं। विज्ञान से पूछा जाता है कि वह परमसत्ता, बिन्दु समय, तत्व क्या है, जिससे सृष्टि का आविर्भाव, घटनाक्रम, गति स्पन्दन चल रहा है तो वह भी नहीं बता पाता। इससे सिद्ध हो जाता है कि विज्ञान मानव-जीवन के सर्वांगपूर्ण पहलू का अध्ययन और विश्लेषण कर नहीं सकता।
मनुष्य के मर जाने का चिन्ह भी विज्ञान नहीं समझा सका। कभी वह हृदय की धड़कन (पल्पिटेशन) रुक जाने को मृत्यु कहता है, कभी श्वास क्रिया रुक जाने को, कभी वह मस्तिष्क की मृत्यु से जीवन की मृत्यु घोषित करता है पर अन्तिम रूप से मृत्यु और जीवन के अंतर को विज्ञान समझा नहीं सका।
अब हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि विज्ञान के द्वारा निर्जीव पदार्थों की बहुत सी जानकारियाँ देने के बाद भी अनेक जानकारियों का पता लगाना शेष रह जाता है। सापेक्षवाद के सिद्धाँत (थ्योरी आफ रिलेटिविटी) और क्वांटम सिद्धाँत की बहुत-सी बातें लोगों को समझ में इसलिए नहीं आतीं, क्योंकि उनका संबंध आत्म-चेतनता से है। धर्म और अध्यात्म से है, जो विज्ञान से परे की सत्ता है, इसलिए यदि धर्म को विज्ञान का विकल्प कहा जाये अथवा यह माना जाये कि जहाँ विज्ञान रुक जाता है, वहाँ से आगे का लक्ष्य ‘धर्म’ पूरा कर सकता है तो किसी प्रकार की अतिशयोक्ति नहीं मानना चाहिए।
प्रयोग और अध्ययन के प्रारंभिक दिनों में गैलीलियो का कहना था कि दिखाई देने वाले प्राकृतिक परिणामों (नेचुरल फेनामेना) को गणितीय सिद्धान्तों से (मैथेमेटिकली) जाना जा सकता है। प्रकृति के बारे में यह कहना बिलकुल ठीक है। एक वर्ष बाद ठीक आज के दिन सूर्य किस राशि पर होगा, गुणा भाग के द्वारा इसे माना जा सकता है। चन्द्र, बुध, शुक्र, बृहस्पति हर्शल सेंटर्न प्लूटो उस दिन कहाँ किस दिशा में होंगे, यह रेखागणित से हल किया जा सकता है, किन्तु कुछ दिन बाद जब कैपलर ने कहा कि वस्तुओं में अगणितीय गुण भी विद्यमान हैं, उदाहरण के लिए इलेक्ट्रान का पतन होने पर पदार्थ का पतन हो जाता है। इलेक्ट्रान अपनी कक्षा में घूमते हुए आगे वाली या पीछे वाली कक्षा में टूट गिरेगा, इस संबंध में कोई गणितीय नियम काम नहीं करता। मानव व्यवहार भी किसी गणितीय नियम पर आधारित नहीं है।
कुछ दिन बाद गैलीलियो ने भी स्वीकार किया कि अगणितीय गुण अन्तर्वर्ती (सब्जेक्टिव) होते हैं, उनका हमारे ज्ञान (सेन्ऐशन) के अतिरिक्त कहीं भी अस्तित्व नहीं है। मस्तिष्क न हो, ज्ञान न हो तो ब्रह्मांड का कोई आकार प्रकार होगा, न भार समझ में आयेगा, रंग, ध्वनि, गंध, स्थान और समय भी हमारे लिए कुछ भी न रह जायेगा, क्योंकि यह सारी बातें मस्तिष्क की उपज हैं, मस्तिष्क न हो तो इन विविधताओं का कोई रूप ही न हो।
मस्तिष्क ही चेतना है, चेतना का इतिहास और उसका भविष्य ही धर्म है, इसलिए जब तक चेतना का अस्तित्व है, तब तक धर्म की अनिवार्यता भी बनी रहेगी। गैलीलियो ने इन अगणितीय नियमों के आधार पर ही यह माना था कि संसार में व्यवस्था और गणित है, वह किसी महाशक्ति के हाथों का विधान है, उसे समझ पाना मनुष्य के लिए तब तक कठिन है, जब तक वह धर्म और दर्शन (रिलीजन एण्ड फिलॉसफी ) को अपने जीवन में स्थान नहीं देता।
न्यूटन का यह मत था कि विज्ञान वास्तविकता का आँशिक ज्ञान देता है, पूर्णता का विकल्प तो धर्म ही है। एडिंगटन और प्रसिद्ध वैज्ञानिक जेम्स जीन्स भी एक ही निष्कर्ष पर पहुंचे कि ब्रह्मांड का अन्तिम स्वभाव (अल्टीमेट नेचर) गणितीय नहीं, मानसिक (मेन्टल) है, अर्थात् मस्तिष्क की तरह की किसी सूक्ष्म चेतना में ही यह संसार चल रहा है, यदि मानसिक स्थिति का ज्ञान प्राप्त कर हम कुछ सत्य बात जानने की इच्छा करें तो हमें धर्म को मानने के अतिरिक्त और कोई दूसरा उपाय नहीं रह जाता।
हम यह मानने के लिए विवश हैं कि आधुनिक विज्ञान की महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ हमारे जीवन के आधारभूत तथ्यों की जानकारी देने में असमर्थ रही हैं, जब तक हम उसे आध्यात्मिक धरातल पर परिणत नहीं करते, तब तक इन जिज्ञासाओं का शाँत होना संभव नहीं, उससे तो और मानसिक अशाँति ही बढ़ेगी। मानवीय सुख-शाँति, सुव्यवस्था और इस शरीर में आने के लक्ष्य की पूर्ति धर्म से हो सकती है। धर्म को इसलिए मनुष्य जीवन से पृथक नहीं किया जा सकता।
जार्ज बर्नार्ड शा ब्रिटेन के प्रसिद्ध साहित्यकार ही नहीं, माने हुए शाकाहारी भी थे। एक बार उन्हें एक भोज में सम्मिलित होने का निमंत्रण मिला। उस भोज में शाकाहारियों के खाने के लिए कोई चीज नहीं थी। एक सलाद ही ऐसा था, जिसे खाया जा सकता था।
भोज शुरू हुआ। सब लोग भोजन करने लगे। शा बेचारे पहले तो चुप बैठे रहे। फिर सलाद ही खाने लगे। यह देखकर उनके पास बैठे हुए एक सज्जन बोले-मिस्टर शा! इतनी स्वादिष्ट चीजों के होते हुए भी आप यह क्या खा रहे हैं?
इस पर शा ने बड़ी सादगी से उत्तर दिया- ‘मेरा पेट कब्रिस्तान नहीं है, महोदय! इसमें केवल साग-सब्जियों के लिए जगह है, मुर्दों के लिए नहीं।’
आचार्य काम्भोज की सुपुत्री निश्चला प्रतिदिन इसी मार्ग से भगवती सरस्वती के दर्शनार्थ विभास-बन जाया करती थी। आर्य पुत्री ने व्याकरणाचार्य की शिक्षा प्राप्त की थी। नृत्य और संगीत में उन्होंने विशारद भी किया था। किन्तु इन सबसे बढ़कर वर्णनीय था, उनका शौर्य और साहस। कोई भी कुटिल व्यक्ति उनकी ओर ताक नहीं सकता था। उच्च शिक्षा के कारण जहाँ उनमें गंभीरता आ गई थी, साहस भी कम नहीं था उनमें। उन्होंने आर्यकुल में जन्म लेने का सौभाग्य सार्थक किया था।
आज जब ये देवी के दर्शन कर लौट रही थीं, सामने से आते हुए राजकुमार भूरिश्रवा की दृष्टि उन पर अटक गई। सौन्दर्य ईश्वर की शक्ति है पर जब उसे वासना की सामग्री समझ लिया जाता है तो उसी शक्ति की गरिमा नष्ट हो जाती है। परमात्मा के इस महत्तम स्वरूप की रक्षा के लिए, इसी कारण उन दिनों चरित्र को प्रधानता दी गई थी।
भूरिश्रवा का काम लोलुप दृष्टि डालना था कि निश्चला सिंहनी की भाँति गरज उठीं। दुष्ट, आर्यकुल में स्त्रियों को माता, भगिनी व पुत्री की दृष्टि से देखते हैं, तुझे मालूम नहीं, जिन जातियों में वासना जीवन का सुख और इष्ट मान लिया जाता है, उनकी सामर्थ्य नष्ट हो जाती है। तेरी इस धृष्टता का समाचार महाराज सिन्धुराज तक पहुँचेगा, तब पता चलेगा कि किसी कन्या को छेड़ने का क्या दण्ड हो सकता है।
किन्तु भद्रे! आपने यह कैसे सोच लिया कि मैं एक सामान्य नागरिक हूँ। आपको ज्ञात नहीं-मुझे राजकुमार भूरिश्रवा कहते हैं। सिन्धुराज मेरे पिता हैं, उन्हें मैं अपने लिए त्रासदायक क्यों समझूँ? आपके रूप-सौन्दर्य पर आसक्त हूँ। किन्तु व्यभिचार को मैं भी नीच और घृणित कृत्य मानता हूँ। दूसरे की कन्याओं पर कुदृष्टि डालने वाला मेरी दृष्टि में भी अपराधी है। मैंने तो आप पर इस उद्देश्य से दृष्टि डाली है कि आप जैसी विदुषी बाला को हम अपनी साम्राज्ञी बना सकते तो हम राज्य को यशस्वी राजकुमार प्रदान करने का श्रेय प्राप्त करते। भद्रे! आप असहमत न होंगी, जो युवक युवती समान, शारीरिक, मानसिक, आत्मिक, नैतिक योग्यता के आधार पर दाम्पत्य-वरण करते हैं, वे ही योग्य सन्तानों को जन्म दे सकते हैं।
निश्चला-विचारशील निश्चला को भूरिश्रवा की बातें बहुत तथ्यपूर्ण जान पड़ीं। उन्होंने एक क्षण विचार किया और फिर हंसकर बोली- ‘आपका कथन सत्य है महोदय! किन्तु हमारी योग्यतायें समान भी तो नहीं। आचार्य काम्भोज की पुत्री-मुझ निश्चला के पास न धन है, न द्रव्य और आप हैं प्रजा द्वारा अर्जित अपार सम्पत्ति के स्वामी। मेरे पिता परिश्रम की कमाई पर विश्वास करते हैं। मैंने आज तक सदैव ही ईमानदारी से उपार्जित धान्य ग्रहण किया है, तभी अपने मनोबल उद्दात्त रख सके हैं। आप हमारे साथ परिश्रम का जीवन जी सकें, ऐसा आपके लिये कहाँ संभव है?
भूरिश्रवा निश्चला के कथन से बड़े प्रभावित हुए। उन्होंने कहा-देवी। आपकी बात शिरोधार्य करता हूँ। राजकुमार भूरिश्रवा श्रम को ही प्रतिष्ठा देगा। अपनी आजीविका मैं आप उपार्जित करूंगा। जब तक अपनी यह परीक्षा उत्तीर्ण न कर लूँ, तब तक आपको प्रतीक्षा करनी पड़ेगी।
राजकुमार भूरिश्रवा उस दिन से कृषक भूरिश्रवा का सा जीवन जीने लगे, एक वर्ष तक बड़े परिश्रम का अभ्यास करने के बाद राजकुमार ने गृहस्थ का अधिकार प्राप्त किया। निश्चला ने तब भूरिश्रवा का पाणिग्रहण किया और सम्राट होकर भी अन्न केवल अपने परिश्रम से उपार्जित ग्रहण किया।
----***----
2 पेज मिस हैं टाइटल सहित
प्राचीनकाल में भारत अपनी उन्नति के चरम शिखर पर विराजमान था। यह ऋषि-मुनियों का देश जगतगुरु कहा जाता था। किसी देश का वास्तविक गौरव उसकी भूमि, वनस्पति, प्राकृतिक वैभव अथवा जलवायु के आधार पर निश्चित नहीं होता है। वह होता है, वहाँ के जनगण के विकास उसके आचार-विचार और आचरण के आधार पर। प्राचीनकाल में इस देश के निवासी आध्यात्मिक जीवन पद्धति अपनाकर नर-रत्नों, महापुरुषों, पराक्रमियों, सदबुद्धियों के रूप में सुखी, सम्पन्न और दीर्घ-जीवन का गौरव पाते थे। गरीब से लेकर अमीर तक और श्रमिक से लेकर शासक वर्ग तक ऐसा कदाचित ही कोई व्यक्ति होता था, जो जीवन में अध्यात्मवाद का समावेश करके न चलता हो। इसी आध्यात्मिक जीवन पद्धति के कारण ही यहाँ के लोग बड़े ही आदर्श और उच्च भावी होते थे। और अपने साथ-साथ अपने देश को भी गौरवान्वित करते थे।
अध्यात्म मानव-जीवन की सफलता का बहुत बड़ा आधार है। जीवन में अध्यात्म का समावेश किये बिना कोई मनुष्य सच्ची सफलता का अधिकारी नहीं बन सकता। लौकिक अथवा भौतिक विभूतियों की उपलब्धि ही जीवन की सफलता नहीं है। मानव-जीवन की वास्तविक सफलता है अखण्ड एवं अक्षुण्ण आँतरिक सुख-शाँति एवं संतोष की उपलब्धि। अंतर की यह माँगलिक स्थिति आत्मिक स्वास्थ्य पर निर्भर है। आत्मिक स्वास्थ्य के बिना बाह्य जीवन निःशक्त असफल एवं संतापयुक्त ही रहता है, फिर चाहे उसमें भौतिक विभूतियाँ और लौकिक सम्पदायें कितनी ही प्रचुर मात्रा में क्यों न उपलब्ध हों।
भारत के समाज हितैषी ऋषि मुनि मनुष्य की वास्तविक सफलता और उसके लिए अध्यात्मवाद की आवश्यकता में अच्छी तरह अवगत थे। वे अवश्य ही चाहते थे कि यदि जन-साधारण अध्यात्म के अलौकिक स्तर पर भले ही न पहुँचे तथापि वे अपने जीवन में इतना अध्यात्म तो अवश्य ही ग्रहण करें, जिससे वे अपने सामान्य जीवन में पूरी तरह से सुखी, सन्तुष्ट और शाँत रह सकें। इसी मन्तव्य के अन्तर्गत उन्होंने अपने जनगण के लिए सामान्य साधना, स्वाध्याय और प्रातः तथा सायंकालीन संध्या-वंदन का नियम अनिवार्य बना दिया था। जो लोग प्रमादवश इस अनिवार्य नियम का पालन नहीं करते थे, उन्हें या तो समाज-बाहर माना जाता था अथवा पतित तथा पापी।
भारतीय समाज आज जिस हीनावस्था में दिखलाई दे रहा है, उसका कारण यही है कि उसने अपने जीवन से आध्यात्मिक आदर्शों का एक प्रकार से बहिष्कार कर दिया है। कोरे भौतिक-आदर्श को अपनाकर चलने से जीवन के हर क्षेत्र में उसकी गतिविधि दूषित हो गई है। उसका चरित्र और आचरण निम्नकोटि का हो गया है। इस आदर्शहीन जीवन का जो परिणाम होना चाहिए, वह रोग-दोष, शोक-सन्ताप के रूप में सबके सामने है। साधन सामग्री और अवकाश व अवसर होने पर भी कहीं भी किसी ओर सुख-शाँति के दर्शन नहीं हो रहे हैं। दुर्भाग्य से आज देश में उल्टी विचार-धारा चल पड़ी है।
पहले जो लोग अध्यात्मवाद का आश्रय लेकर चलते थे, वे ही सभ्य, शिष्ट और सुसंस्कृत माने जाते थे। किन्तु आज सभ्यता का तमगा उन लोगों के पास माना जाता है, जो अध्यात्म के प्रति उपेक्षा और तिरस्कार का भाव रखते हैं। जो लोग अध्यात्म की, लोक-परलोक की, धर्म-कर्म की बात करते हैं, उसे मूर्ख, प्रतिगामी और पिछड़ा हुआ समझा जाता है। आध्यात्मिक विचारधारा के लोगों का उपहास किया जाता है। जिस समाज की विचारधारा इस प्रकार प्रतिकूलतापूर्ण हो गई हो, उसके सुख-सौभाग्य अस्त हो ही जाना चाहिए।
अध्यात्मवाद की उपेक्षा का जहाँ मुख्य कारण यह है कि लोग अज्ञानवश भौतिकवाद के वशीभूत हो गए हैं। उन्हें विषय-वासना और भोग, एषणाओं ने बुरी तरह जकड़ लिया है। एक कारण यह भी स्वीकार करना पड़ेगा कि आज अध्यात्मवाद का सच्चा स्वरूप लोगों के सामने नहीं है। यदि अपनी यह प्राचीनकाल वाली उपयोगिता अध्यात्मवाद आज भी उपस्थित कर सकें, अपना वास्तविक स्वस्थ और सच्चा महत्व प्रकट कर सकें तो निश्चय ही उसके प्रति समाज की सारी उपेक्षा और तिरस्कार भाव तिरोहित होते देर न लगे। किन्तु अप्रकटन की स्थिति से किसी सत्य सिद्ध विज्ञान का न तो महत्व ही घट जाता है और न उसकी उपयोगिता ही नष्ट हो जाती हैं। अध्यात्म एक सत्य सिद्ध विज्ञान है। उसका महत्व सदा बना रहा है और सदा बना रहेगा। यह मध्यकालीन अंधकार शीघ्र ही दूर होगा और अध्यात्मवाद मानव-जीवन में अपना समुचित स्थान पाकर समाज का शोक-सन्ताप हरेगा कोई भी अध्यात्मवादी व्यक्ति इस विश्वास से विचलित नहीं हो सकता।
भारतीय अध्यात्मवाद कितना शक्तिशाली विज्ञान है- यदि इसका प्रमाण पाना है तो भारतीय ऋषियों, तपस्वियों और साधकों का जीवन और उनकी घटनाओं को देखना होगा। भारतीय ऋषि-मुनि यदा-कदा आवश्यकता पड़ने पर ऐसे-ऐसे विलक्षण और आश्चर्यजनक कार्य कर दिखाते थे, जिन्हें चमत्कार कहा जा सकता है। उनके आशीर्वाद से दूसरों का भला और शाप से अहित होने के असंख्यों उदाहरण पुराणों और इतिहासों में भरे पड़े हैं। महात्माओं की आध्यात्मिक शक्ति से भयभीत रहकर बड़े-बड़े बलधारी राजा-महाराजा उनकी प्रसन्नता के लिए विविध उपचार करते रहते थे।
आज भी समाज जिन महात्माओं तथा साधकों की पूजा-प्रतिष्ठा करता है, उसका कारण भी उनका आध्यात्मिक तेज ही है। वैसे सामान्यतः पूजा-प्रतिष्ठा का हेतु धन-वैभव और शक्तिसत्ता आदि का तो उनके पास लेश मात्र भी नहीं होता।
योग शास्त्रों में जिन सिद्धियों और विभूतियों का वर्णन किया गया है, वे वस्तुतः आध्यात्मिक साधना की ही उपलब्धियाँ हैं। योग शास्त्र के अध्येता भली प्रकार जानते हैं कि उक्त शास्त्र की दक्षिण-मार्गी और वाम-मार्गी जिन अलौकिक विभूतियों और सिद्धियों का विस्तार से वर्णन किया गया है, उसके विधि-विधाता के अन्तर्गत अध्यात्म साधना का सार ही सन्निहित है। अध्यात्म साधना में जो व्यक्ति जितनी सीमा तक अग्रसर हो जाता है, वह उस सीमा तक चमत्कारी व्यक्ति बन जाता है। वे ऐसी समर्थ सूक्ष्म-शक्तियों का उपार्जन कर लेते हैं, जिनके द्वारा अभाग्य ग्रस्त लोगों का भी कल्याण सम्पादन किया जा सकता है। अध्यात्म की शक्तियाँ अपार एवं अपरिमेय हैं। इस शक्ति के आधार पर संसार के ऐसे कार्य भी सरलतापूर्वक किए जा सकते हैं, जिन्हें संसार असंभव कह सकता है। अध्यात्म एक सर्वांगीण संपूर्ण विज्ञान है। जिसकी आराधना से साधारण मनुष्य एक चमत्कारी दिव्य पुरुष बन सकता है। अपने इस महान विज्ञान की उपेक्षा करने से ही आज का भारतीय समाज इस अधोगति को प्राप्त हुआ है।
निश्चय ही अध्यात्म की चमत्कारी स्थिति तक सबको पहुँचने की आवश्यकता नहीं है। तथापि इतनी आवश्यकता तो सबके लिए ही है कि वह इसकी साधना से अपने जीवन में सुख-शाँति का समावेश कर सके। ऋषि-मुनियों की अखण्ड आत्म-साधना की हिसु करना उचित नहीं। क्योंकि वह सर्वसाधारण के वश की बात नहीं होती और जो लोग लोभ, स्पर्धा अथवा अहंकार के वशीभूत होकर अपने सामान्य जीवन की साधना से हटकर असाधारण साधना में चले जाते हैं, वे न तो इधर के रहते हैं और न उधर के। यद्यपि अध्यात्म की असाधारण साधना किसी के लिए वर्जित नहीं है तथा यह तब तक उचित नहीं, जब तक मनुष्य उस साधना के योग्य मानसिक स्तर में न पहुँच जाए। ऋषि-मुनियों की तरह चमत्कारी सिद्धियाँ प्राप्त कर लेने के लोभ से जो लोग हठपूर्वक साँसारिक कर्तव्य त्याग कर योग साधनाओं में लग जाते हैं, वे भूल करते हैं और उस ओर का कोई विशेष लाभ तो नहीं ही उठा पाते, इस ओर वे संसार से भी वंचित हो जाते हैं।
ऋषित्व की प्राप्ति किसी एक जन्म की साधना का फल नहीं होता। वह तो जन्म जन्मान्तरों की निर्बाध साधना का ही संचित सत्फल होता है। साधना की सिद्धि साहसिक घटना नहीं है। यह तो जन्म-जन्म की साधन परम्परा का एक सुनिश्चित परिणाम ही होता है। कोई साधक अपने पूर्वजन्मों की परंपरा में अपने आवश्यक कर्त्तव्यों के साथ थोड़ी-थोड़ी अध्यात्म साधना भी करता चलता है। धीरे-धीरे उनका विकास होता और संस्कार संचय होते जाते हैं। कालान्तर में जब संस्कारों की निधि संचय हो जाती है, तब किसी एक जन्म में सारी संचित साधना सिद्धि के रूप में परिपक्व हो जाती है और यह व्यक्ति चमत्कारी शक्तियों का विधान बन जाता है। सामान्य स्थिति से चमत्कारी स्थिति पर पहुँचने की यही सुन्दर, सरल और असंदिग्ध निधि है। साहसिक साधना से किसी लाभ के होने की आशा संदिग्ध ही रहती है।
सामान्य व्यक्तियों के लिए यही उचित है कि जीवन में चमत्कारी सिद्धि के लोभ से विमुख होकर अध्यात्मवाद के उस व्यावहारिक आदर्श को अपनाया जाए जिससे जीवन में शोक-संताप की मात्रा कम हो और सुख शाँति की वृद्धि होती चले। लौकिक जीवन में जितने भी सुख-साधन और प्रसन्नतादायक अवसर हैं, उनका मूल अध्यात्म ही है। जब मनुष्य जीवन में आध्यात्मिक विचार-धारा का समावेश कर लेता है तो उसका अंतर तथा बाह्य सर्वथा निर्दोष तथा उदार हो जाता है। वह सबके साथ आत्मीयता तथा आत्म-भाव अनुभव करने लगता है। किसी को प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष किसी भी प्रकार से कष्ट दे सकना उसके वश की बात नहीं होती। परोपकार, पुण्य तथा परमार्थ में उसका विश्वास अटल तथा अडिग हो जाता है। ऐसे विचार तथा व्यवहार वाले व्यक्ति के लिए चारों और अनुकूलता ही अनुकूलता उत्पन्न हो जाती है। यह अखण्ड नियम है कि जो व्यक्ति संसार में सबके लिए अनुकूल होगा उसके लिए सारा संसार भी अनुकूल ही रहेगा। अनुकूलता को सुख-शाँति तथा कल्याण की जननी माना गया है। जिसने अपनी आध्यात्मिक विचार-धारा से स्त्री, पुत्रों, परिवार, परिजनों, मित्रों, सुहृदयों, सम्बन्धियों और सम्पर्कों को अनुकूल बना लिया, उसने मानो इस भूमि पर ही अपने लिए स्वर्ग की भूमिका तैयार कर ली।
लौकिक जीवन में आरोग्य, सम्पत्ति, धन और स्नेह सौजन्य-इन तीन विभूतियों को सुख-शाँति का आधार माना गया है। जिनको इन तीन विभूतियों की प्राप्ति हो जाती है। वह निश्चित रूप से अपने को सुखी और संतुष्ट अनुभव करता है। यह तीनों विभूतियाँ अध्यात्म की साधारण सी सिद्धियाँ हैं। कोई भी अध्यात्मवादी इन्हें बड़ी सरलता से अनायास ही प्राप्त कर सकता है। अध्यात्मवाद के सत्परिणाम चिर-प्रसिद्ध हैं उसके आधार पर लौकिक तथा पारलौकिक, भौतिक एवं आत्मिक दोनों प्रकार की सुख-शाँति प्राप्त होती है।
आध्यात्मिक विचार-धारा और तदनुरूप आचरण करने वाले को शाँति, संतोष, हर्ष-उल्लास, निर्भयता और प्रसन्नता की स्थिति प्राप्त होना अनिवार्य है। यद्यपि यह स्थिति आत्म-भूत भी होती है तथापि आध्यात्मिक चरित्र वाला व्यक्ति भौतिक साधनों से भी वंचित नहीं रहता। अब किसी सत्पुरुष को उपरोक्त स्थिति प्राप्त ही होनी है तो उसके साथ उसके स्थूल साधनों का जुड़ा रहना भी उसी प्रकार अनिवार्य है, जिस प्रकार आकार के साथ उसका प्रकार जुड़ा रहता है। इस प्रकार अध्यात्मवादी अंतर और बाह्य दोनों ओर से सुखी और सम्पन्न बना रहता है।
अपनी और अपने समाज की वर्तमान अधोदशा का सुधार करने के लिए हम सबको पूर्वजों से निर्देशित आत्मा के महाविज्ञान अध्यात्मवाद को अपने व्यावहारिक जीवन में सिद्ध करते चलना चाहिए। इससे भौतिक उन्नति के साथ-साथ आत्मिक उन्नति भी होती चलेगी। और एक दिन हम सब अपने परम-कल्याण की प्राप्ति कर लेंगे।
=कोटेशन======================================================
लोग कहते हैं कि महाराज! मेरा मन चला गया। किसने देखा कि वह चला गया। किसने देखा, वह तुमने देखा। देखकर कहते हो या बिना देखे। फिर कहते हो मन स्थिर नहीं, हमारा मन शाँत नहीं है। फिर बताओ मन कहाँ गया। ऐसी कोई जगह है जहाँ मन चला गया हो। मन के चले जाने के देखने वाले तुम हो, कार्य में कर्म में तुम हो, सबमें तुम हो, इसलिए तुम्हारा नाम भगवान। जो सबका मैं मैं न हो तो नाश हो जाय।
==========================================================
----***----
अध्ययन के लिए जितनी भी एन्जिलर पकड़ी गई, नर उनमें से एक भी न निकला। जिस तरह भारतीयों में धर्म और भावनाशीलता का अधिकाँश भाग स्त्रियों में ही दिखाई देता है, एन्जिलर में नर एक भी न मिलना वैसे ही कौतूहल-वर्द्धक था।
एक दिन एक मछली विशेषज्ञ ने निश्चय किया कि इस मछली के अंग-प्रत्यंगों की जानकारी प्राप्त करनी चाहिए। मानवीय बुद्धि में एक बड़ा दोष है कि वह स्थूल और दिखाई पड़ने वाली वस्तुओं के बारे में ही अधिकाँश सोचता और उन्हें प्राप्त करने का प्रयत्न करता है, जबकि आकाश में ईश्वर के समान विश्व में अनेक अदृश्य सूक्ष्म तत्व भरे पड़े हैं, जिनकी जानकारी मिल जाये तो आज का व्यक्ति भी ऋषियों-महर्षियों जैसी समर्थता का स्वामी बन जाये। हमारी अंतरंग में ही ऐसी शक्तियों के भाण्डागार छिपे पड़े हैं पर हम शरीर को अनेक वैज्ञानिकों की तरह ऊपर-ऊपर देखकर, पढ़कर थोड़ी-सी जानकारी प्राप्त कर छोड़ देते हैं।
विशेष और महत्वपूर्ण जानकारी तब मिली जब इन विशेषज्ञ महोदय ने देखा एन्जिलर मादा के सिर के ऊपर सीधी आँख पर एक बहुत ही छोटा-सा मछली जैसा जीव चिपका हुआ है। इस जीव का अध्ययन करने से पता चला यही वह सज्जन हैं, जिनकी वैज्ञानिकों को तलाश थी। नर एन्जिलर, यही था, बेचारी मादा के सिर पर चिपका उसी के रक्त को चूसने वाला। पति या शैतान से भी बढ़कर।
मादा का आकार 40 इंच, भगवान ने अच्छा किया कि पतिदेव को कुल चार ही इंच का बनाकर यह दिखाया कि नारी को मात्र प्रजनन और शोषण की सामग्री बनाने वालों का बौना होना ही ठीक है। मनुष्य के इतिहास में भी यही पाया जाता है। संसार के जो भी देश आज प्रगति के शिखर पर पहुँचे हैं, उन सबमें नारी के उत्थान के लिए बड़े कदम उठाये गये हैं। हम भारतवासी हैं, जिन्होंने नारी को दासी, पर्दे में रहने वाली, शिक्षा-शून्य बनाया, उसका रमणी के रूप में उपभोग किया। तभी तो प्रगति में एन्जिलर नर की तरह बौने रह गये।
हम में यह दोष कहाँ से आया इसका उत्तर भी एन्जिलर मछली के अध्ययन करने वाले वैज्ञानिकों ने दिया। उन्होंने नर के स्वभाव का अध्ययन करके बताया कि उसकी यह शोषण प्रियता उसकी आलसी और वासनापूर्ण प्रकृति के कारण है। जीवन में मधुरता के लिए कोई स्थान न होने के कारण वह अपनी ही पत्नी का खून पिया करता है।
देखने में एन्जिलर नर पापी और अपराधी कहा जा सकता है पर जिन लोगों ने नारी का मूल्यांकन दहेज से किया, पर्दे और अशिक्षा से किया, उन्हें क्या माना और क्या कहा जाय इसका निर्णय तो हमें अपने भीतर मुख डालकर करना पड़ेगा?
=कोटेशन======================
गुलाब! मधुमक्खी बोली- “तुम जानते हो कि एक-एक करके तुम्हारे सब पुष्प तोड़ लिये जाते हैं, फिर भी तुम पुष्प उत्पन्न करना बंद क्यों नहीं करते?” गुलाब ने हंसकर कहा- “देवी! मनुष्य क्या करता है, यह देखकर संसार को सुँदर बनाने के कर्त्तव्य से मैं क्यों गिरूं?”
===========================
----***----
नगर-वधू आम्रपाली अब वैशाली ही नहीं सुदूर राज्यों के लिए भी आकर्षण बन चुकी थी। उसके रूप रस, सौन्दर्य, स्वर और कला की ख्याति कलिंग, कौशल, पंचनद और मगध तक फैल चुकी थी। अनेक राजकुमार अपना सर्वस्व देकर भी आम्रपाली को पाने के लिए बेचैन थे। वैशाली विलासियों से पट रही थी। पड़ोसी देशों की राज-मुद्रायें वैशाली भागी चली आ रही थीं। मगध के धनिक नरेश बिम्बिसार स्वयं भी आम्रपाली के सौंदर्य की गाथायें सुन-सुनकर अपनी सुध-बुध खो बैठा था।
मगध के प्रमुख नागरिकों को इस बात की चिन्ता हुई। प्रबुद्ध और साधन सम्पन्न व्यक्तियों की पतनोन्मुख स्थिति के फलस्वरूप मगध का व्यापार भ्रष्ट हो चला था मुद्रायें वैशाली खिंची चली जा रही थीं, जो मगध के निर्धन हो जाने और व्यापार गिर जाने का स्पष्ट खतरा प्रकट हो चुका था।
जब बड़े लोग आत्म-नियंत्रण खो देते हैं, तब उसका प्रायश्चित छोटों को करना पड़ता है। निदान सारी स्थिति पर विचार-विमर्श के लिए प्रमुख नागरिकों की बैठक बुलाई गई। यह निश्चय करना था कि इस असंतुलन को कैसे ठीक किया जाये। बहुत देर विचार करने के बाद वृद्धजनों ने निश्चय किया, आम्रपाली के टक्कर की ही कोई अन्य नगर-वधू मगध में ही पोषित की जाये। धनिक वर्ग उस समय विलासिता में ऐसा आकण्ठ डूबा हुआ था कि वह किसी के समझाने से मार्ग पर आने के लिए तैयार न था, इसलिए इस उपाय के अतिरिक्त और कोई उपाय सूझा नहीं।
शालवती उन दिनों यौवन के द्वार पर थी। उसके लावण्य की हल्की चर्चायें तभी से चल पड़ी थीं। उसके पास केवल साधनों का अभाव था, उसे नगर-परिषद ने पूरा कर दिया और इस तरह पड़ौसी होते-होते शालवती नगर-वधू के पद पर प्रतिष्ठित कर दी गई।
चरित्र निष्ठा जीवित न रही तो राज्य की दुर्दशा हो जाएगी, इस पर किसी ने ध्यान न दिया। शालवती के नगर वधू घोषित होते ही विलासियों की बाढ़ आ गई। वैशाली की ओर खिंची जा रही मुद्रा का निर्यात तो रुक गया, किन्तु मगध ईर्ष्या, द्वेष, प्रतिद्वन्द्विता और बीमारियों का घर बन गया। कामुक व्यक्ति शालवती पर उस तरह मंडराने लगे, जैसे भौंरे कलियों पर। देखते-देखते उसकी ख्याति सारे मगध में वर्षा के बादलों की तरह सर्वत्र छा गई।
अभी कुछ दिन ही बीते थे कि शालवती गर्भवती हो गई। वह इस अप्रत्याशित घटना के लिए तैयार नहीं थी पर ईश्वरीय विधान को रोक सकने की सामर्थ्य उस बेचारी में थी ही कहाँ? कहीं ऐसा न हो कि पुनः मगध-वासियों में आम्रपाली के प्रति आकर्षण बढ़ जाये, वह बहुत दिनों तक इसी चिंता में डूबी रही।
आखिर उसने कुछ दिन के लिए बीमारी का बहाना बनाकर एकान्त ले लिया। नव महीने बीते, शालवती ने सुँदर पुत्र को जन्म दिया पर हाय री लिप्सा-लिप्सा जो न चाहे सो पाप कराये। शालवती ने नवजात शिशु को एक वस्त्र में लपेटकर दासों के हाथों जंगल भिजवा दिया। किसी को कानों-कान खबर न हुई। सब कुछ यथावत चलने लगा। वही मूल्य, गीत और काम-क्रीड़ा। हजारों नर-पशु अपने शील, स्वास्थ्य, सौन्दर्य की वासना के अग्निकुण्ड में आहुति देने लगे।
राजकुमार अभय उस दिन मृगया से लौट रहे थे। मार्ग में उन्होंने बच्चे को पड़ा हुआ देखा तो उनकी करुणा उमड़ पड़ी। समाज के उन कुमार्गगामी पुरुषों के प्रति उनकी घृणा उमड़ उठी, जिन्हें अपने क्षणिक सुख के आगे सामाजिक मर्यादाओं का भी ध्यान नहीं रहता। जो भी हो उन्होंने निश्चय किया कि वे ऐसी दुष्प्रवृत्तियों के विरुद्ध संघर्ष करेंगे। अपने इस निर्णय के साथ ही उन्होंने उस बालक को उठा लिया और उसे घर ले आये। उन्होंने बच्चे का नाम ‘जीवक’ रखा, उसकी शिक्षा-दीक्षा का भार स्वयं उठाया, साथ ही अविवाहित रहकर समाज की इन दूषित परम्पराओं के विरुद्ध धार्मिक विद्रोह की प्रतिज्ञा की।
जीवक बड़ा हुआ। एक दिन उसने राजकुमार अभय से पूछ ही लिया- ‘मेरे माता-पिता कौन हैं।’ अभय ने वह सारी घटना कह सुनाई जिस तरह जीवक जंगल में पड़ा मिला था। अपने को मातृ, पितृ-हीन अनुभव कर जीवक को गहरी वेदना हुई। उसने अभिभावक अभय से कहा- महापुरुष! आपने मेरी रक्षा न की होती तो अच्छा था। आत्म-हीनता का भार लेकर बोलिये मैं कहाँ जाऊं?
राजकुमार को एक बार यह सोचकर बड़ा दुख हुआ कि समाज में ऐसे कितने बच्चे होंगे, जो बड़ों की भूल और असावधानी के कारण आत्म-हीनता के भार से दब रहे होंगे। पर केवल दुख करने से तो काम नहीं चल सकता था। उन्होंने धैर्य दिलाते हुए कहा-वत्स! दुख करने की अपेक्षा अच्छा हो, हम दोनों मिलकर प्रायश्चित करें। तुम्हारे लिये प्रायश्चित यह है कि तुम तक्षशिला जाओ और वहाँ विद्याध्ययन कर अपने में वह पात्रता उत्पन्न करो, जिससे पद-दलित समाज को कुछ प्रकाश दे सको और मैं आज से मगध के नैतिक उत्थान के लिए अपने आपको समर्पित करता हूँ।
जीवक ने यह मात मान ली और विद्याध्ययन के लिए तक्षशिला के लिए चल दिया। प्रवेश के नियमानुसार जीवक अब प्रधान आचार्य के सम्मुख आया तो उन्होंने प्रश्न किया - वत्स! तुम्हारा नाम, पिता का नाम, कुल और गोत्र क्या है। जीवक कुछ बोल नहीं सके। आँख डबडबा आईं। भरे हुए गले से उन्होंने कहा-आचार्य प्रवर! मुझे मगध के राजकुमार अभय ने पाला है, मैं उन्हें जंगल में कहीं, पड़ा हुआ मिला था, मुझे स्वयं भी पता नहीं है कि कौन मेरा पिता है और कौन माता।
बालक की इस निष्कपटता और सत्यनिष्ठा से आचार्य बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने कहा-तात्! जो अपने मन में बुरी से बुरी बातें भी नहीं छिपाते, वह एक दिन महान बनते हैं। तुम विद्या के सच्चे अधिकारी हो। आज से तुम विश्वविद्यालय में मन लगाकर पढ़ो। तुम्हें प्रवेश की अनुमति दी जाती है।
जीवक ने परिश्रम से अध्ययन प्रारंभ किया। एक तथ्य सदैव उसकी आँखों के सामने घूमता था, मुझे संसार को प्रकाश देना है, इसलिए वह अपना मन केवल अपनी योग्यता बढ़ाने में केन्द्रित किये रहा और एक दिन आयुर्वेद का प्रकाँड पंडित बनकर तैयार हो गया।
जीवक ने आयुर्वेदाचार्य की उपाधि ले ली। कल उन्हें मगध के लिए प्रस्थान करना था। गुरु के स्नेह और अपने जीवन की निराशाओं ने आज उन्हें बहुत दुखी बना रखा था। रात को देर तक नींद नहीं आ पाई। तभी प्रधानाचार्य उनके कोष्ठ में प्रविष्ट हुए। उन्होंने पूछा-‘वत्स! तुम्हारी आंखें लाल और मुखाकृति उदास क्यों है। जीवक ने उपेक्षित हंसी के साथ कहा-देव! आप जानते हैं, मेरा कोई कुल और गोत्र नहीं। मैं जहाँ भी जाऊंगा, लोग मुझ पर उंगलियाँ उठायेंगे। क्या आप इतना प्रायश्चित मुझे यहीं न करने देंगे कि मैं आपकी सेवा में ही बना रहूँ।
आचार्य गंभीर थे। बोले-वत्स! तुम्हारी योग्यता प्रतिभा और ज्ञान ही तुम्हारा कुल और गोत्र है, तुम जहाँ भी जाओगे, वहीं तुम्हें सम्मान मिलेगा। प्रायश्चित ही करना है तो इससे अच्छा प्रायश्चित क्या होगा कि तुम दुर्भाग्य-ग्रसित प्राणियों की सेवा में अपने आपको समर्पित कर दो।
जीवक ने गुरुदेव के चरणों की धूलि मस्तक पर लगाई और उस ओर चल पड़े, जहाँ हजारों-लाखों दुर्गुणों और दुष्प्रवृत्तियों से ग्रस्त लोग उनकी राह देख रहे थे। जीवक ने आचार्य जीवक बनकर मगध में प्रवेश किया और उपलब्ध ज्ञान के द्वारा हजारों पथ-भ्रष्ट लोगों का भला कर यश और गौरव प्राप्त किया।
=कोटेशन======================
पाप में पड़ने वाला मनुष्य होता है, जो पाप पर पश्चाताप करता है, वह साधु है, जो पाप पर अभिमान करता है, वह शैतान है।
-फुलर
==========================
----***----
यों संसार में जीवों की संख्या 84 लाख है परमात्मा के दिये गये अनुदानों का अधिकाँश भाग मनुष्य के हिस्से में आया। गाय, बैल, भैंस, हिरन, भालू, शेर-चीते, गधे, घोड़े, बकरियाँ, बंदर, खरगोश, तीतर, शुतुरमुर्ग, गौरैया, गुबरैला, चींटी, मक्खी-मच्छर इन सब की एक-एक प्रति इकट्ठी करें और देखें कि उनके हिस्से में रहने के लिए, सोने, पहनने, खाने, उठने-बैठने, लिखने-पढ़ने, परिवार बनाने की सुविधाएं कितनी उपलब्ध हैं तो पता चलेगा कि एक मनुष्य को प्राप्त सुविधाओं से भी उनकी सुविधायें कम बैठेंगी। ज्यादा क्रियाशील और सृष्टि के उपयोगी प्राणियों या तत्वों को भगवान ने ज्यादा सुविधाएं दीं, वह अकारण नहीं सोद्देश्य है। यह क्षमतायें और सम्पत्तियाँ इस विश्वास के साथ दी जाती हैं कि मनुष्य उनका उपयोग, अपने साथ-साथ समाज, राष्ट्र और विश्व के प्राणिमात्र के कल्याण के लिये करेगा। यदि मनुष्य इन ईश्वरीय अनुदानों का उपयोग अकेला अपने ही स्वार्थ और इन्द्रिय लिप्सा में करता है तो उसे ईश्वर का अयोग्य उत्तराधिकारी मनुष्येत्तर प्राणियों से भी गया बीता कहा जायेगा।
सभी प्राकृतिक तत्व इस ईश्वरीय नियम का पालन करते हैं तो मनुष्य को भी क्यों न करना चाहिए? नाइट्रोजन गैस प्रकृति का एक ऐसा तत्व है, जो मनुष्य को एक महत्वपूर्ण पाठ पढ़ाता है। उससे मनुष्य को यह शिक्षा मिलती है कि बड़ी शक्तियों को सदैव क्रियाशील रहकर संसार की भलाई में जुटे रहना चाहिए। उसे संसार में स्वयं भी आसक्त नहीं हो जाना चाहिए।
नाइट्रोजन और ऑक्सीजन को वर्षाकाल में विद्युत अलग करती है। बादल आये, हवा चली, उनमें रगड़ से विद्युत चमकी और उसने उत्प्रेरक का काम किया। जिस प्रकार परमात्मा की इच्छा से यह पंचतत्व वाला भौतिक शरीर अस्तित्व में आ जाता है और फिर अपने विकास के प्रयत्नों में जुट जाता है, उसी प्रकार बिजली चमकने से ऑक्सीजन और नाइट्रोजन दोनों में प्रतिक्रिया होती है और नाइट्रोजन पंच ओषित (नाइट्रोजन पेन्टा ऑक्साइड) बन जाता है। और इस प्रकार नाइट्रोजन अपनी जीवन यात्रा के लिए सुचारु रूप से निकल पड़ता है।
मनुष्य की उत्पत्ति भी इसी प्रकार ईश्वरीय इच्छा या संयोग है। हमें मालूम नहीं कि नाइट्रोजन में क्या किसी प्रकार का जीवन है? पर मनुष्य के संबंध में ऐसा कोई धोखा नहीं। उसे जो शक्तियाँ, सुविधाएं और सामर्थ्य उपलब्ध हैं, उन्हें देखकर यह सहज ही में विश्वास हो जाता है कि उसका जन्म किसी विशेष उद्देश्य के लिए हुआ है पर न तो संरक्षण पीढ़ी ही उसके इस लक्ष्य पर ध्यान देती है और न स्वयं मनुष्य ही यह सोचता है कि हम संसार में क्यों आये, यहाँ आकर क्या करें कि मनुष्य जीवन में आना सार्थक हो।
बिना कोई लक्ष्य बनाये मनुष्य अंतरिक्ष कीट की तरह इधर-उधर भटकता, आप भी मरता और दूसरों के लिए भी संकट उत्पन्न करता है। योजना-बद्ध जीवन जीने वाले मनुष्य यदि अपना आध्यात्मिक लक्ष्य न भी पूरा कर सकें तो भी वह बिना औरों को हानि पहुँचाये अपनी उन्नति करते रहते हैं, अपनी उन्नति का लाभ वह कई समान विचार-धारा वाले मित्रों को भी देते रहते हैं।
पंच ओषित नाइट्रोजन (नाइट्रोजन पेन्टा ऑक्साइड) जल में मिलकर शोरे का तेजाब (नाइट्रिक एसिड) बन जाता है। जिन्हें संसार की कुछ सेवा करनी होती है, वह परिस्थितियों से डरते या संघर्ष में शक्ति नहीं गंवाते वरन् जो भी उन्हें मिलता उसी से मिलकर उसकी कोई न कोई अच्छाई ग्रहण कर अपनी शक्ति बढ़ाते और अपना उद्देश्य पूरा करते रहते हैं। गुणी मनुष्य को पाने की सभी की इच्छा की तरह इस शोरे के तेजाब (नाइट्रिक एसिड) को पृथ्वी सोख लेती है। पृथ्वी कोई एक वस्तु, पदार्थ या धातु नहीं भी तो अनेक खनिज लवण और धातुओं का सम्मिश्रण है।
शोरे का तेजाब पृथ्वी में पाये जाने वाले लवण से प्रतिक्रिया करता, उससे नाइट्रेट लवण बन जाता है। नाइट्रोजन का इतना सब परिश्रम पृथ्वी की सतह तक पहुँचने के लिए होता है। महापुरुष संसार का उपकार करने के लिए छोटे से छोटे व्यक्ति का भी विश्वास प्राप्त करते हैं और तब उनके अंतःकरण में प्रविष्ट होकर अपनी विशेषताओं के बीज प्रकट कर उसके विकास में सहायक होते हैं, यह अनुभूति नाइट्रोजन की इस अवस्था से सहज ही में मिलती है।
पौधों की जड़ें इस समय पास होती हैं, वह नाइट्रोजन लवण से नाइट्रोजन उसी तरह खींच लेती हैं, जिस प्रकार किसी महापुरुष के संपर्क में आने से चतुर लोग उनके स्वभाव की बारीकियों को पढ़कर अपने जीवन में धारण कर लेते और अपनी योग्यता, महत्ता एवं उपयोगिता बढ़ा लेते हैं। जड़ें नाइट्रेट लवण से खींचे हुए नाइट्रोजन का लाभ अपनी मोटाई बढ़ाने में नहीं करती वरन् सन्त-पुरुष जिस तरह अपनी धन, सम्पत्ति, तप और योग्यता का लाभ सारे शरीर को देते रहते हैं, उसी प्रकार जड़ें नाइट्रोजन को सारे वृक्ष-तने, डालों, पत्तियों और फल-फूलों में पहुँचाती रहती हैं।
मनुष्य मर जाते हैं पर उनके कारण शरीर कभी नष्ट नहीं होते, सच पूछा जाय तो महापुरुषों के शरीर हाड़-माँस के नहीं गुणों के बने होते हैं और जन्म-जन्मान्तरों तक बरतते रहते हैं। नाइट्रोजन जिसे पत्तियों, फल-फूलों टहनियों ने सोख लिया था। उनके सूख जाने पर भी विद्यमान रहता है। पत्ते आदि सूख कर पृथ्वी में गिर जाते हैं या हरे होने पर जानवरों द्वारा चर लिये जाते हैं। दूसरी अवस्था में वह शरीर के उपयुक्त न होने पर मल-मूत्र के द्वारा अमोनिया के रूप में बाहर निकल आता है। मृत्यु हो जाने पर भी यह जानवरों के शरीर से बाहर आ जाता है, पहली अवस्था में भी वह पृथ्वी में आ जाता है और इधर-उधर बिखर जाता है।
कुसमय में लोग कई बार ऐसे हताश हो जाते हैं कि अपने हाथ-पाँव भी हिलाना बंद कर देते और विनाश को निमंत्रण दे लेते हैं पर नाइट्रोजन ऐसी अवस्था में भी धैर्य नहीं खोता। बाहर से जान पड़ता है कि पत्ते सूख गये और नाइट्रोजन समाप्त हो गया, लेकिन ऐसा नहीं होता, वह इस विषम स्थिति में अपने सहारे की खोज करते रहते हैं। जिन खोजा तिन पाइयाँ वाली कहावत चरितार्थ होती है, वर्षा का पानी गिरा और नाइट्रोसीफाइंग बैक्टीरिया नामक जीवाणु ने पत्तों को सड़ाकर नाइट्रोजन को अमोनियम नाइट्रेट या नाइट्रेट लवणों में बदल दिया। उपकारी मनुष्य को एक-एक अनेक सहयोगियों की तरह एक दूसरा बैक्टीरिया जिसे डिनाइट्रेफाइड कहते हैं, से भेंट होती है और वह अमोनिया नाइट्रेट या नाइट्रेट लवणों को नाइट्रोजन में बदल देता है और इस तरह वह नाइट्रोजन पुनः वातावरण में विलीन हो जाता है।
नाइट्रोजन मरुत देव की त्रिगुणात्मक शक्ति का एक अंश है। हमारे वेदों और उपनिषदों में मरुत देवता के गुणों की प्रशंसा की गई है, उसका कारण यही है कि उनकी यह शक्ति ही पृथ्वी पर वृक्ष और वनस्पति को जीवन देती रहती है। काल-चक्र रुक सकता है पर वह शक्ति अपने नियम व्रत का उल्लंघन यों नहीं करती कि उससे सारे प्राणी जगत को पोषण और शक्ति मिलती है।
ब्रह्मांड की एक विलक्षण शक्ति के रूप में नाइट्रोजन का अवतरण और एक जीवन व्रत बनाकर प्राणि मात्र के कल्याण के लिए आवागमन के चक्र में पड़े रहने से मनुष्य को बड़ी प्रेरणायें मिलती हैं। हम भी किसी अज्ञात शक्ति की इच्छा और अंश से जीवन धारण कर रहे हैं पर हम न तो मनुष्य शरीर में आने के उद्देश्य को पहचानते हैं, न उसे पूरा करते हैं, होना यह चाहिए था, साँसारिक प्रपंच से उतना फंसते हैं, जितना आत्म-विश्वास के लिए आवश्यक होता है। सेवा औरों का उत्थान और आत्म-प्रगति के लिए सहयोगी तत्वों का अर्जन नाइट्रोजन की तरह मनुष्य को भी इन तीनों में समरूप बने रहकर अपना लक्ष्य पूरा करना चाहिए पर ऐसा होता कहाँ है, हम तो अपने ही स्वार्थों की इन्द्रिय सुखों की अधोगामी मृग मरीचिका में भटकते रहते हैं।
सद्गुणों का विकास करने वाले व्यक्ति को दैवी प्रतिभायें साथ देती हैं, वह मनुष्य से क्रमशः देवत्व और ईश्वरत्व को श्रेणी में बदलता चला जाता है, यही आत्म-कल्याण, मोक्ष, परमपद, स्वर्ग-मुक्ति या ब्रह्म-निर्वाण की स्थिति है। जिसमें एक ही अणु-आत्मा की शक्ति करोड़ों गुना परिवर्द्धित हो जाती है।
दुर्गुणों में ग्रस्त आत्मायें पशु-शरीरों में गये उस नाइट्रोजन की तरह हैं, जो अमोनिया आदि के रूप में पृथ्वी पर गिरती, पृथ्वी द्वारा सोख ली जातीं और फिर उन्हीं वृक्ष-वनस्पतियों की योनियों में भ्रमण करती रहती हैं। नाइट्रोजन-चक्र में तो यह संभावना बहुत थोड़ी होती है पर बुद्धिमान होते हुए भी मनुष्य इतना मूर्ख और अज्ञानग्रस्त है कि वह अनेक बार फिर उन्हीं द्वेष दुर्गुणों में आकर्षित होता रहता, पाक पंक में फँसता और निकृष्ट योनियों का जीवन जीता रहता है।
हम ऊर्ध्वगामी प्रवृत्तियों द्वारा आत्मा का विकास कर अजय आनन्द और पूर्णता प्राप्त करें अथवा बार-बार कष्टदायक योनियों में मारे-मारे फिरें, यह अपने वश की बात है, उसके लिए न तो बाह्य परिस्थितियाँ दोषी हैं, न परमात्मा। मनुष्य अपना अधःपतन आप करता है। और अपने उद्धार का उत्तरदायी भी वह स्वयं ही है।
एक बार एक वृद्ध ने, कोठी से निकलते हुए किसी भद्र-पुरुष से पूछा- “क्या आप मुझे इस कोठी के स्वामी से मिला देंगे।”
क्या काम है उनसे, मुझसे कहिए? भद्र-पुरुष ने कहा।
मेरी बेटी का विवाह है। तीन सौ रुपए चाहिए, हुजूर! यदि रुपये मिल गये तो मैं अपनी बेटी का विवाह कर सकूँगा। गरीब वृद्ध ने कहा।
आओ मेरे साथ। और भद्र पुरुष उतरे और सामने खड़ी बिल्डिंग में प्रवेश कर गये। जाते-जाते वह वृद्ध को भी पास के एक बरामदे में बैठने को कह गये।
थोड़ी ही देर बाद एक चपरासी बरामदे में आया और वृद्ध को पाँच सौ रुपए संभलवाते हुए बोला- ‘भाई’! यह पाँच सौ रुपए हैं। तीन सौ में अपनी बेटी का विवाह करना और बाकी दो सौ से विवाह के बाद कोई ऐसा धंधा कर लेना, जिससे आगे की आजीविका चलती रहे।’
वृद्ध ने रुपए तो ले लिये, किन्तु बोला-भाई! मैं उस कोठी के स्वामी से तो मिला ही नहीं।’
अभी-अभी जिनके साथ कार में बैठकर आप इस दफ्तर में आये हैं, वे ही हैं उस कोठी के स्वामी बाबू चितरंजनदास! चपरासी ने कहा।
मित्रो! समय पर सहायता करने वाले, स्थिति को समझकर सहायता देने में पीछे नहीं रहते। और न किसी अहसान की वाँछना करते हैं।
अमेरिका, इंग्लैण्ड, कनाडा आदि देशों में विज्ञान लोगों के रोंये-रोंये में बस गया है। हमारी गतिविधियाँ उनके अन्धानुकरण की हैं। हम चाहते हैं कि भारतवर्ष भी पाश्चात्य देशों का अनुकरण करे और यंत्रीकरण को बढ़ावा दे ताकि देश में खुशहाली बढ़े। पर ऐसा सोचते समय हम वहाँ के जीवन में यंत्रीकरण के फलितार्थ की बात भूल जाते हैं। यदि उसे भी समानांतर वर्णन कर दिया जाता तो हम अनुभव करते हैं कि हमारे लिए यंत्रीकरण उतने उपयोगी नहीं हैं, जितना आज-कल महत्व दिया जा रहा है।
प्रोफेसर हार्वर्ड डिंगले जो लंदन विश्व विद्यालय के एक प्रख्यात खगोल पिण्डों के भौतिकीय एवं रासायनिक विज्ञान के ज्ञाता (एस्ट्रोफिजिस्ट) तथा दर्शन-शास्त्र एवं विज्ञान के इतिहास के भी ज्ञाता थे-उनका कथन है कि जब हम उस विज्ञान की प्रकृति के बारे में विचारते हैं, जो आज-कल प्रचलित है एवं जिसका उपयोग आज-कल हो रहा है, हम ऐसी परिस्थितियाँ पाएंगे, जिनसे भगवान के दूत भी रोने लगें। यह ऐसा युग नहीं है कि आँख मीच कर विज्ञान की शक्ति को महत्व दिया जाय। विज्ञान की सत्यता का ही ध्यान दिया जाय और आध्यात्मिक सत्यों को पूर्ण रूपेण भुला दिया जाय तो उसके वही परिणाम हो सकते हैं जो आज अमेरिका इंग्लैंड में दिखाई दे रहे हैं। जो सुखद नहीं है।
अमेरिका का आकाश कभी अवकाश नहीं पाता। वहाँ हर क्षण कम से कम एक हजार जहाज आकाश में केवल पहरेदारी के लिए गड़गड़ाते घूमा करते हैं। पहरेदारी की चिन्ता भयग्रस्तों को होती है। अमेरिका जैसा भयभीत कोई दूसरा देश नहीं, यह विज्ञान की देन है।
हवाई जहाजों के अतिरिक्त वहाँ हजारों कारखाने, मोटरें, मशीनें चौबीस घण्टे चलते रहते हैं, उससे वातावरण में गन्दी गैसें छाई रहती हैं, शोर इतना होता है कि एक शहर में जितना शोर होता है, यदि उसे विद्युत शक्ति से बदल दिया जाय तो सारे शहर के उपभोग की आवश्यकता को पूरा करके भी बहुत-सी विद्युत शेष बच जायेगी।
गंदी गैसों के कारण वहाँ नई-नई तरह की बीमारियां फैलती जा रही हैं, कुछ बीमारियाँ ऐसी हैं, जो केवल अमेरिका में ही पाई जाती हैं, उनके उपचार के लिए उसे निरन्तर नई-नई औषधियों की खोज में लगे रहना पड़ता है। तीन चौथाई विज्ञान वहाँ एक चौथाई विज्ञान के दुष्परिणामों की रोकथाम भर के लिए है। होता उल्टा है, विज्ञान जितना बढ़ता है, वहाँ की समस्यायें उतनी ही जटिल होती जा रही हैं। वहाँ के मूर्धन्य मनीषी आइन्स्टीन तक को इसीलिए कहना पड़ा था- विज्ञान की प्रगति के साथ धर्म की प्रगति न हुई तो संसार अपनी इस भूल के भयंकर दुष्परिणाम आप ही भुगतेगा।
चौबीस घंटे शोर के कारण वहाँ 70 प्रतिशत लोगों के मस्तिष्क खराब हैं। आत्म-हत्यायें और हत्यायें सबसे अधिक अमेरिका में होती हैं, 70 प्रतिशत अमेरिकन नींद की गोलियाँ लेकर सोते हैं, अन्यथा उनके मस्तिष्क इतने अशाँत हैं कि उन्हें स्वाभाविक नींद लेना भी कठिन हो जाता है। दाम्पत्य जीवन जितना अमेरिका और इंग्लैण्ड में क्लेशपूर्ण है, उतना संसार के किसी भी भाग में नहीं। अमेरिका में एक कहावत प्रचलित है, रात को विवाह प्रातः संबंध-विच्छेद इंग्लैंड में कोई स्त्री “मैं तुम्हें तलाक देती हूँ।” तीन बार कह दे तो उन्हें कानूनन तलाक की अनुमति मिल जाती है। यह घटनायें बताती हैं कि विज्ञान और यन्त्रीकरण की प्रगति वाले इन देशों का आन्तरिक जीवन कितना खोखला कष्टपूर्ण और विभ्रान्त है।
आकाश तत्व का मानव जीवन पर प्रभाव और उसकी शुद्धि जैसे महत्वपूर्ण भारतीय धर्म विज्ञान को भुला दिया गया अपनी साँस्कृतिक सिद्धियों को ठुकराकर विज्ञान और यंत्रीकरण के मामले में पाश्चात्यों का अंधानुकरण किया गया तो कालान्तर में भारतवर्ष भी ऐसा ही दूसरा अमेरिका बन सकता है।
----***----
इंग्लैंड के प्रधान-मंत्रियों में सबसे प्रसिद्ध प्रधानमंत्री श्री लिस्टर ग्लैडस्टन हुये हैं। उन्होंने इंग्लैंड और यूरोप में बढ़ रही मद्यपान की दुष्प्रवृत्ति का गहराई तक अध्ययन किया। जो निष्कर्ष उन्होंने निकाले उनसे वह स्वयं भी चौंके बिना नहीं रह सके। अपने एक भाषण में उन्होंने कहा- “हम जब मनुष्य जाति पर आई विपत्तियों का ध्यान करते हैं तो पता चलता है कि तीन बड़े से बड़े ऐतिहासिक युद्ध, महामारी और अकाल ने भी मनुष्य को शायद उत्पीड़ित नहीं किया जितना शराब ने।
इन आँकड़ों से यह सहज ही पता लगाया जा सकता है कि शराब मनुष्य के लिए पेय पदार्थ नहीं है। शराब जिन वस्तुओं से बनाई जाती है, वह अपने स्वाभाविक रूप में सभी खाद्य हैं, किन्तु यदि उन्हें सड़ाकर किसी को खाने को दिया जाए तो वह मनुष्य, खाना तो दूर उन्हें सूँघेगा भी नहीं, किन्तु कितना बड़ा दुर्भाग्य है मनुष्य जाति का, कि वह सी सड़े हुये पदार्थ के आसव—शराब को शौकिया पीना अपने स्वास्थ्य और जीवन को कष्ट करता रहता है।
डॉक्टरों की रिपोर्ट के अनुसार शराब पीने वालों में से 27.1 प्रतिशत मस्तिष्क रोग से 26.99 प्रतिशत फेफड़े के रोग से, 23.30 प्रतिशत अपच रोग से मर जाते हैं, जीवित भी रहते हैं, वह अर्द्ध-मृत अवस्था में। भारत वर्ष के पागलखानों के सर्वेक्षण से पता चलता है कि पागलों की संख्या का 60 प्रतिशत भाग वह है, जिसने शराब पी-पीकर अपना मस्तिष्क विकृत कर लिया है। दुर्भाग्य है हमारे देश का कि आज वह पश्चिम की बुरी आदत को तेजी से अपनाता और बुराइयों की जड़ सींचता चला जाता है, जबकि इन बुराइयों से अवगत होने के बाद करोड़ों अंग्रेज शराब छोड़कर शुद्ध शाकाहारी जीवन की ओर आकर्षित हो रहे हैं।
शराब एक ऐसा तरल (लिक्विड) है, जिनमें शरीर के लिए आवश्यक प्रोटीन आदि कोई भी तत्व नहीं होता। यकृत उसे पचा नहीं सकता, इसलिए उसे सीधे हृदय में पहुँचा देता है। हृदय में वह खून के साथ मिलकर मस्तिष्क की ओर चल पड़ता है। मस्तिष्क को उसके प्रवाह की सूचना तो मिल जाती है पर वह उसे रोकने में असमर्थ होता है, क्योंकि शराब के प्रभाव को रोकने वाला कोई अवरोधक उसके पास नहीं होता, फलतः वह शराब के दुष्प्रभाव में आ जाता है। उसके ज्ञान एवं तर्क तंतुओं की क्षमता नष्ट हो जाती है। वाणी, हाथ-पैर की क्रिया दृष्टि आदि सभी इन्द्रियाँ अनियन्त्रित हो जाती हैं। मनुष्य को भगवान ने बुद्धि, विवेक तर्क और ज्ञान की यह शक्तियाँ किसी महत्वपूर्ण उपयोग के लिये दी होती हैं पर जब वही मनुष्य के कल्याण के विपरीत काम करने लगती हैं तो मनुष्य की मूर्खता स्पष्ट हो जाती है। मस्तिष्क ईश्वरीय चेतना का युक्त रूप और बड़ा संवेदनशील होता है। उसकी यह दुर्दशा कितनी लज्जाजनक है, इसे प्रत्येक विचारशील व्यक्ति को सोचना तथा समझना चाहिए।
मानवीय प्रकृति और भगवान् का दिया हुआ शरीर आत्म-चेतना की शक्ति सुख सुविधायें बढ़ाने के लिए होते हैं पर ऐसी अवस्था में सारी व्यवस्था को शरीर की अधिकतम सफाई में लगा देना पड़ता है। गंदगी इतनी बढ़ जाये कि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य सबको भंगी का काम करना पड़ जाये तो समाज की दूसरी व्यवस्थायें जैसे ज्ञान और सद्बुद्धि, शक्ति और सुरक्षा उत्पादन और समृद्धि की आवश्यकतायें कैसे पूरी की जा सकती हैं? स्पष्टतया ऐसे समाज को अकाल और महामारी का मुख देखना पड़ जाता है। हमारे शरीर की भी ठीक वैसी ही दशा है, यदि तमाम आन्तरिक अवयव (इन्टरनल आर्गन्स) शरीर को साफ करने में ही लगे रहें तो शरीर को रोग से बचाना, उसे बलवान और बुद्धिमान बनाना कहाँ संभव होगा? निश्चित ही वह दुर्दशा का शिकार हो जायेगा, आज पाश्चात्य देशों में यही तो सब कुछ हो रहा है।
प्रकृति ने नाड़ी संस्थान द्वारा यह व्यवस्था तो की है कि कुछ दण्ड देकर शरीर की गंदगी और विष को बाहर निकाला जाता रहे पर यह अस्वाभाविक दबाव की स्थिति में नहीं हो सकता। शराब गुर्दों में पहुँचा दी जाती है। गुर्दों के बीस लाख कोष (सेल्स) इस शराब के विष को किसी तरह छान तो डालते हैं पर उसकी प्रतिक्रिया में स्वयं संरक्षण नहीं कर सकते और वे धीरे-धीरे अस्वस्थ होने लगते हैं। यह विष गुर्दों की कोशिकाओं (कैपलरीज) को खरोंचता रहता है, जिससे उनमें खुरदरापन आ जाता है। इस खरोंचे हुए भाग में कैल्शियम जमने लगता है और रक्त प्रवाह में बाधा पहुँचाने लगती है, इससे गुर्दे में दर्द भी बढ़ता है और यहाँ की कोशिकायें मोटी भी हो जाती हैं।
इन दो बीमारियों के लिए स्थिर निवास स्थान बना कर ही शराब शरीर से बाहर निकलती है। हाई-ब्लड प्रेशर भी इसी कारण बढ़ता है। गुर्दे में इस कार्यवाही के कारण जननेन्द्रिय (जैनिटल आर्गेनिज्म) में उत्तेजना (इरीटेशन) बढ़ती है। आज पाश्चात्य देशों में कामवासना एक स्वतंत्र समस्या बन खड़ी हुई है, देखना पड़ेगा क्या उसे मद्यपान की दुष्प्रवृत्ति को रोके बिना हल किया जा सकता है?
जेनेवा यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर डॉ. एल. रेविलियोड और डॉ. पालबिनेट ने डाक्टरी अनुसंधान के आधार पर बताया कि शराब पीने वालों का पेट भीतर ही भीतर सिकुड़कर ऐसे हो जाता है, जैसे उसमें चर्बी बढ़ जाती है, जिससे पेट में कोई न कोई शिकायत बनी रहती है, शराब यकृत (लिवर) के कोषों (सेल्स) को नष्टकर डालती है, जिससे शराबियों को और उनकी संतानों को लिवर की बीमारी प्रायः हो जाती है। क्षय की यह मात्रा हर बार शराब पीने से बढ़ती ही जाती है।
शराब के स्थान पर यदि जल की पर्याप्त मात्रा लेते रहें तो उसमें स्वास्थ्य और सौंदर्य की वृद्धि होती है, शक्ति का भी विकास होता है। यदि हम बराबर पानी पीते रहें अर्थात् प्यास न लगे, तब भी थोड़ा-थोड़ा पानी पीने का अभ्यास रखें तो अपने आपको आजीवन नीरोग रख सकते हैं। डाक्टरों के अनुसार पानी पीते रहने से 24 घंटे में हृदय की धड़कन 100000 बार होती है, यदि कोई एक औंस शराब पी ले तो यह धड़कन 1043000 होने को बाध्य होगी। 2 औंस में 8600 धड़कनें बढ़ती हैं, यदि और मात्रा बढ़ाकर तीन औंस कर दी जाए तो कुल धड़कनों की संख्या 112900 हो जायेगी और इससे हृदय की कार्य क्षमता पर असाधारण दबाव पड़ेगा। किसी से भी आवश्यकता से अधिक काम लेने का अर्थ होता है, उसे मारना। शराब पी-पी कर हम अपने आपको मारते रहते हैं।
बराबर शराब पीते रहने से शरीर के कोमल तन्तु जो जल, भोजन एवं रसों को पचाकर रक्त बनाते और सारे शरीर को शक्ति देते रहते हैं, मुरझाने लगते हैं थोड़े दिन में यह अपना काम बंद कर देते हैं, कई तन्तु तो मर ही जाते हैं, रक्त बनना बंद हो जाने से शरीर में पीलापन आने लगता है। शराब का प्रभाव प्रजनन कोषों पर पड़ता है, जिनसे जन्मजात बीमार बच्चे पैदा होते हैं, उनके पेट और मूड़ बड़े होते हैं, जबकि पसलियाँ, हाथ-पाँव और गर्दन की हड्डियाँ बहुत कमजोर और सूखी होती हैं, उनमें से कई को निमोनिया, श्वास, तपेदिक सूजन आदि की बीमारियाँ भी होती हैं, इस तरह अपनी बुराई अपनी सन्तान को दुख देती है, आने वाली पीढ़ियों को कमजोर और बीमार बनाने का पाप भी उसे उसी प्रकार लगता है, जिस तरह वह अपने शरीर को रुग्ण बनाने का दोषी होता है।
डॉ. फोरबेस बिन्सली ने अनेक शराबियों के जीवन का अध्ययन करके बताया- ‘शराब से कामोत्तेजना बढ़ती जाती है, इससे स्त्री-पुरुष के बीच काम-वासना संबंधी पाप की संभावना बहुत तीव्र हो उठती है।’
सन् 1808 में अमेरिका में इस दुष्प्रवृत्ति के कारण इतनी समस्यायें उठ खड़ी हुईं कि वहाँ की लोकसेवी समस्याओं को इस ओर व्यापक रूप से ध्यान देना पड़ा। चर्चों और धार्मिक प्रतिष्ठानों के माध्यम से वहाँ ‘कम पियो’ आँदोलन चलाया गया। उसके लिए 1851 में ‘इन्डिपेंडेंट आर्डर आफ गुड टैम्पलर्स न्यूयार्क’ में एक संस्था खोली गई, उसकी शाखायें देखते-देखते आस्ट्रेलिया, इंग्लैंड, कनाडा, स्केंडीनेवियन उत्तरी और दक्षिणी अमेरिका एवं भारतवर्ष में खुलीं और उन्होंने कम आय के लोगों और मजदूरों को तरह-तरह से इस बात के लिए राजी किया कि वे अपने और परिवार, समाज एवं राष्ट्र के हित में शराब या तो बिलकुल न पिया करें अथवा कम पिया करें।
दूसरे देशों में इस दिशा में व्यापक प्रयत्न चल रहे हैं। वहाँ का प्रबुद्ध और विवेकशील वर्ग इस बात के लिए प्रयत्नशील है कि शराब का पान जितना कम किया जा सके, उतना ही अच्छा है। किन्तु भारतवर्ष जैसे शुद्ध शाकाहारी देश में यह प्रवृत्ति बढ़ती ही जा रही है। यहाँ के लोक-सेवी सज्जनों को इसके लिए व्यापक आँदोलन चलाना चाहिए था पर राज्य सरकारों की छूट के कारण उनमें शिथिलता ही रही और इस तरह यहाँ यह बुराई बढ़ती ही गई। यदि भारतवर्ष का यह हाल हो सकता है तो दूसरे देशों का तो कहना ही क्या, इसलिए यदि हम संपूर्ण विश्व को महामारी और महायुद्ध जैसे पातक से बचाना चाहते हैं तो मानव स्वभाव के इस दूषित अंग को उखाड़ने का पुरजोर प्रयत्न करना ही होगा।
=कोटेशन======================================================
और आनन्द तो सर्वत्र है। आनन्द धरती के हरित दूर्वादुकूल में है, आकाश की अक्षोभ्य नीलिमा में है, वसंत की अविचारी उर्वरता में है, आभा विहीन शिशिर की कठोर व्रतचर्या में है, काया के पंजर में प्राण-संचार करने वाले जीवन्त माँस-मज्जा में है, उदात्त और उच्छृत मानव-शरीर के अनिंद्य संतुलन में है।
आनन्द जीने में है, अपनी समस्त शक्तियों का उपयोग करने में है, ज्ञान के उपार्जन में है, बुराई से लड़ने में है, और ऐसी उपलब्धियों के लिए प्राणोत्सर्ग करने में है, जिनका उपयोग हम करने वाले नहीं हैं।
वह देह और आत्मा की भाँति है। आनन्द अद्वैत की-विश्व के साथ आत्मा के, और परम प्रेमी के साथ विश्वात्मा के अद्वैत की-सत्यता की अनुभूति है।
—रवीन्द्रनाथ ठाकुर
==========================================================
----***----
मैस्मरेजम के आविष्कर्ता डॉ. मैस्मर ने लिखा है- ‘मन को यदि संसार के पदार्थों और तुच्छ इन्द्रिय भागों में उठाकर ऊर्ध्वगामी बनाया जा सके तो वह ऐसी विलक्षण शक्ति और सामर्थ्यों से परिपूर्ण हो सकता है, जो साधारण लोगों के लिए चमत्कार सी जान पड़े। मन आकाश (स्पैश) में भ्रमण कर सकता है और उन घटनाओं को ग्रहण करने में समर्थ हो सकता है, जिन्हें हमारी ज्ञानेन्द्रियाँ ग्रहण न कर सकें और हमारा तर्क जिन्हें व्यक्त करने में असमर्थ हो।’
अमेरिका के प्रसिद्ध विद्वान डॉ. जे. बी. राइन ने भी उक्त तथ्य की बाद में विस्तृत खोज की और पाया कि विचार, चिंतन और किसी भी अभ्यास द्वारा यदि मन की विचारणाओं के सामान्य धरातल से ऊपर उठाकर आकाश में घुमाया जा सके तो वह भूत और भविष्य की अनेक घटनाओं को बेतार के तार के संदेश की तरह प्राप्त कर सकता है। न्यू फ्रंटियर्स आफ माइंड’ नामक पुस्तक में उन्होंने ऐसी अनेक घटनाओं का विवरण भी दिया है, जो उक्त कथन की सत्यता प्रतिपादित करती हैं।
‘अनुभव से अभ्यास तक’ (फ्राम एक्पीरियेन्स टु एक्सपेरीमेन्ट्स) नाम प्रथम अध्याय में पश्चिमी राज्य के एक बैंकर का महत्वपूर्ण प्रसंग उन्होंने इस प्रकार दिया है-
बैंकर एक अध्ययनशील धार्मिक मनोवृत्ति का व्यक्ति था। ईश्वर चिन्तन के लिए वह प्रतिदिन कुछ समय निकालता। एक दिन शाम आठ बजे उसे एकाएक ऐसा लगा कि ‘विला कैथर्स’ की पुस्तक ‘डेथ कम्स फॉर दि आर्कविशप’ पुस्तक पढ़नी चाहिए। इसके प्रसंग पाठक की अन्तर्वेदना का स्पर्श करते हैं। यह उपन्यास बैंकर पहले भी पढ़ चुका था। फिर अकारण वही पुस्तक दुबारा पढ़ने का मन क्यों हुआ-यह उसकी समझ में नहीं आया। तो भी उसने पुस्तक निकाली और उसे पढ़ने में तल्लीन हो गया।
आर्क विशप की मृत्यु का विवरण इस उपन्यास में बहुत ही कारुणिक है। उसे पढ़ते-पढ़ते बैंकर का हृदय आर्द्र होता गया। आँखों से आँसू झरने लगे। संवेदना के एकाकार में भगवान जाने क्या विज्ञान है, मनुष्य दूसरे के दुख को अपना दुख जैसा समझने लगता है। आत्म-चेतना के विकास की भारतीय आध्यात्मिक और योग प्रणाली लगता है, उसी का विकसित रूप है, जब व्यक्ति, व्यक्ति न रहकर अपने को समष्टिगत अनुभव करने लगता है।
बैंकर जी भर के रो लिया, तब जी हलका हुआ। तभी एकाएक उसे ध्यान आया, एक बार जब उसकी माँ की मृत्यु हुई थी, तब यह उपन्यास पढ़ा था और इसी प्रकार रोया था, कहीं ऐसा तो नहीं यह अकारण वेदना पिता की मृत्यु का संदेश या अनुभूति हो। आशंका विश्वास में बदलती गई। रात भर वह इसी चिंता में डूबा रहा।
प्रातः बोर्ड आफ डाइरेक्टर्स की मीटिंग थी। बैंकर ने उस मीटिंग को अपना शाम का अनुभव सुनाया। डाइरेक्टरों ने सत्य जानने की जिज्ञासा से वहीं पत्र लिखाया। उसका उत्तर चौथे, पाँचवे दिन आया तो सभी आश्चर्यचकित थे कि ठीक उसी दिन उसी समय सवा आठ बजे सचमुच उसके पिता की मृत्यु हो गई थी।
हमारे यहाँ जप और उर्ध्वगामी चिन्तन का उद्देश्य वैज्ञानिक मन को विकसित करना ही रहा है। उसके द्वारा अनेक अज्ञात बातें साधक को सिनेमा के पर्दे की भाँति मालूम हो जाती हैं। पर उस विज्ञान को आज लोग भूलते जा रहे हैं। जब से हमारे भीतर भरा आकाश तत्व शुद्ध होता है और ऐसी अनेक अनुभूतियों का द्वार खुलता है, जिसका संकेत डॉ. मैस्मर ने किया और इस घटना द्वारा पुष्टि डॉ. राइन ने की।
----***----
विचारों के आधार पर ही कोई व्यक्ति प्रामाणिक नहीं माना जा सकता। संसार के अधिकांश लोग, यदि उनसे बात की जाए तो बड़े अच्छे विचारों वाले ही मिलेंगे। जहां तक विचार प्रकट करने का प्रश्न है, कदाचित ही कोई ऐसा व्यक्ति मिले जो कलुषित विचारों का प्रकाशन करे। नहीं तो सभी लोग विचारों से बड़े भद्र और आदर्शवादी ही जान पड़ेंगे। यदि किसी पेशेवर चोर से भी बात करिए तो वह विचारों में ईमानदारी की प्रशंसा करेगा। बधिक से, जोकि नित्य ही अनेक जानवरों की हत्या करता है, पूछिए तो वह भी अपने विचार अहिंसा और दया के पक्ष में ही प्रकट करेगा। किन्तु वैचारिक अस्तेयता अथवा अहिंसा के आधार पर न तो चोर ईमानदार माना जा सकता है और न बधिक दयालु। किसी व्यक्ति की प्रमाणिकता का मान दण्ड उसके विचार मात्र को नहीं बनाया जा सकता।
ऐसे साधु-सन्तों, महात्माओं की कमी नहीं है, जो लोगों को परमार्थ और शरीर संयम कर उपदेश देते नहीं चलते, किन्तु अपने आचरण में ठीक उसके विपरीत कार्य करते हैं। अपने को धर्मात्मा कहने वाले और धर्म के महत्व का बखान करते रहने वाले ऐसे लोगों की कमी नहीं है, जो व्यक्तिगत जीवन में पूरी तरह अधार्मिक बने रहते हैं। सत्य की महिमा बखानने वाले आए दिन झूठी गवाही देते हैं। ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु” का जप करने वाले दूसरों से घृणा और उनको कष्ट देने में जरा भी संकोच नहीं करते।
साहस, धैर्य, वीरता और शौर्य को पुरुष की शोभा मानने वाले कायरता और क्लीवता का ऐसा प्रमाण देते हैं कि देखने-सुनने वालों तक को शर्म आने लगती है। यह सब उदाहरण और अनुभव स्पष्ट बतलाते हैं कि केवल विचार जानकर ही किसी व्यक्ति को प्रामाणिक अथवा महान नहीं माना जा सकता।
‘पर उपदेश कुशल बहुतेरे’ - यह कथन केवल सूक्ति मात्र नहीं है। इसमें एक महान सत्य और वास्तविकता छिपी हुई है। दूसरों को महानता और सदाचार का उपदेश देना, बड़ी-बड़ी बातें बनाना एक बात है और उसके अनुसार आचरण करना दूसरी बात। भगवा वस्त्र धारण किए न जाने कितने साधू-संत जहाँ-तहाँ लोगों को धर्म का उपदेश देते घूमते हैं। बहुत स्थानों पर तो उनका आदर-सम्मान तक होता है। उनके वेश और बातों के प्रभाव में आकर लोग उन्हें श्रेष्ठ पुरुष मान बैठते हैं। किन्तु भेद खुलने पर उनमें से बहुत से चोर, बदमाश, ठग, धूर्त, अपराधी, हत्यारे, भागे हुए कैदी तक निकलते हैं। किसी के विचार मात्र सुनकर उसको श्रेष्ठ अथवा प्रामाणिक व्यक्ति मान लेना बुद्धिमानी नहीं है।
जो लोग ऐसा सस्ता विश्वास रखते हैं, वे प्रायः अपने विश्वास का मूल्य चुकाकर पछताया करते हैं। व्यक्ति की प्रामाणिकता तभी स्वीकार की जा सकती है, जब उसके विचारों और आचरण में एकरूपता हो। अर्थात् जो व्यक्ति जिस प्रकार के विचार प्रकट करता है, उसी प्रकार के आचरण और चरित्र का भी प्रमाण देता है, वही विश्वस्त, श्रेष्ठ और प्रामाणिक व्यक्ति माना जा सकता है।
विचारों को कार्यों का प्रेरक कहा जाता है। किन्तु सभी विचार कार्यों के प्रेरक नहीं होते। कार्यों के प्रेरक केवल वही विचार होते हैं, जो आस्था अथवा निष्ठा के रूप में परिपक्व हो जाते हैं। अस्थिर विचारों का विचारों के रूप में कोई महत्व नहीं। बहुत से लोग जीवन भर विचार तो एक प्रकार के रखते हैं, लेकिन कार्य दूसरे प्रकार के करते रहते हैं। अपरिपक्व विचार तो मस्तिष्क की साधारण प्रक्रिया मात्र ही होते हैं। जिन विचारों में दृढ़ता नहीं होती, वे जरा-सा दबाव पड़ने पर ही बदल जाते हैं। विचार व्यसनी ऐसे बहुत से पाये जाते हैं, जो आए दिन अपने पिछले विचार को नए विचार से बदलते हैं। बहुत से लोग तो एक विचार का विरोधी विचार तक ग्रहण कर लेते हैं।
पूँजीवाद के अपरिपक्व विचार रखने वाले साम्यवाद के जोरदार तर्क सुनकर साम्यवादी विचार-धारा ग्रहण कर लेते हैं। फिर कुछ ही दिन बाद पूँजीवाद के पक्ष में उससे भी जोरदार समर्थन सुनकर पुनः पूँजीवादी विचारधारा अपना लेते हैं। अपेक्षाकृत अधिक विद्वान आए दिन लोगों की विचार-धारा बदलते रहते हैं। दलों और संस्थाओं के वक्ता लोग तो आमतौर से लोगों पर अपने-अपने विचार स्थापित करते ही रहते हैं। बहुत बार तो परस्पर विरोधी विचार-धारा के लोगों के बीच रहने वाले ऐसे लोगों को, जिनके विचार निष्ठापूर्ण नहीं होते, नित्य प्रति अपने विचार बदलने पर विवश होना पड़ता है। उनके अपने विचारों में न तो कोई बल होता है, न स्थायित्व अथवा परिपक्वता। निदान किसी की भी विचार-धारा से प्रभावित होकर अपने विचार बदलते रहते हैं। ऐसे ढुलमुल विचार वाले लोग विचारक अथवा विचारशील न होकर विचार व्यसनी ही होते हैं। विचार व्यसनियों के विचार उनके किसी काम नहीं आते। आए दिन विचार बदलते रहने वाले लोग विचारों के नाम पर सदा कोरे बने रहते हैं।
बहुत से लोग अपने को आस्तिक कहते या मानते हैं। ईश्वर पर विश्वास भी रखते हैं। सब कुछ ईश्वर की इच्छा से ही होता है-ऐसा विचार भी रखते हैं। किन्तु जब कभी आपत्ति या कष्ट आ पड़ता है तो तुरंत समाज को, भाग्य को अथवा किन्हीं दूसरे लोगों को दोष देने लगते हैं। जरा-सी देर में उनकी वह आस्तिक विचार-धारा उखड़ जाती है। कभी ईश्वर पर भरोसा करना, कभी प्रारब्ध को मानने लगना आदि विचार परिवर्तन विचार शून्यता को ही प्रकट करते हैं।
बहुत से लोग पूजा-पाठ में बड़ा विश्वास करते हैं। उससे मन भाए फलों की आशा भी करते हैं। किन्तु जब बहुत समय तक पूजा-पाठ करते रहने पर भी उनकी मनोकामना पूरी नहीं होती तो तुरंत ही उस विचार से हटकर विपरीत विचार पर आ जाते हैं। ऐसे लोगों को कदापि आस्तिक विचार-धारा वाला नहीं कहा जा सकता।
विचार वास्तव में वही सच्चा विचार है, जो किसी भी परिस्थिति में सुरक्षित बना रहे। लोभ, लालच, आकर्षण-विकर्षण, भय, दबाव अथवा किसी विवशता से न बदले। ऐसे ही दृढ़ विचार वालों की विचार धारा ही विश्वस्त होती है और ऐसे अटल विचारवान लोग ही विचारों के आधार पर संसार में कुछ उल्लेखनीय कार्य कर सकते हैं। यों तो विचारों के हवाई किले बनाने वाले लोगों की कमी नहीं है। नित्य ही न जाने कितने लोग योजनायें बनाते हैं। बड़ी-बड़ी बातें सोचते हैं, कल्पना की लंबी-चौड़ी उड़ाने भरते रहते हैं। किन्तु जब उनको यथार्थ की कठिन भूमि पर उतार दिया जाता है तो पता चलता है कि उनके विचार कितने पोले और मिथ्या हैं।
बड़ी-बड़ी बातें सोचना, लंबी-चौड़ी योजना बनाना और बात है और उनको कार्य रूप में परिणत करना दूसरी बात। अपरिपक्व तथा मिथ्या विचार क्रिया को प्रेरित नहीं कर सकते। विचार वही शक्तिशाली और सार्थक होते हैं, जो निष्ठा के रूप में पक चुके होते हैं। बहुत बार लोग अपने ही विचारों से स्वयं धोखा खा जाते हैं। कल्पना अथवा कामना की तीव्रता होने से वे अपने विचारों को बड़ा तेजस्वी और सार्थक समझ लेते हैं। इस वंचना के कारण उन्हें अपने विचारों से बड़ा लगाव हो जाता है और उसी में बहते रहने से उन्हें बड़ा आनन्द आता है। इस प्रकार के विचार व्यसनी लोग आए दिन ऊँचे-ऊँचे विचार करते और योजनाएं बनाते रहते हैं। किन्तु उन्हें मूर्तिमान करने का कोई प्रयास नहीं करते। इस प्रकार विचार व्यसनी अपनी निर्बलता के कारण सारी शक्ति और सारा समय निरर्थक कल्पनाओं और जल्पनाओं में खो देते हैं। न स्वयं अपने किसी काम आते हैं और न किसी दूसरे के।
निश्चय ही जीवन विकास में विचारों का बहुत महत्व है। विचार मनुष्य की एक बड़ी शक्ति मानी गई है, यह गलत नहीं है। किन्तु इस कोटि में मिथ्या और वंचक विचार नहीं आते। विचारों का लाभ वही व्यक्ति उठा पाते हैं, जिनके विचार, विश्वास, आस्था, निष्ठा आदि से होते हुए श्रद्धा तक जा पहुँचते हैं। विचार जब श्रद्धा के रूप में परिपक्व हो जाता है, तभी वह अटल और शक्तिशाली बनता है। ऐसा दृढ़ विचार किसी भी भय, परिस्थिति, आकर्षण अथवा प्रभाव से नहीं बदलता। मनुष्य का अपरिवर्तनशील विचार ही उसकी शक्ति बनता और क्रिया को प्रेरणा देता है। जिसका विचार सुदृढ़, विश्वास अडिग, निश्चय परिपक्व और सिद्धाँत अटूट होता है, वह देर-सबेर समाज में अपना एक नियत स्थान बना ही लेता है।
जिनके विचारों में उच्चतम, दृढ़ता और सक्रियता होती है, वे संसार में निश्चय ही ऐसे कार्य कर दिखाते हैं, जिनके उपलक्ष में समाज उन्हें महापुरुषों के रूप में याद करता है। अन्य विशेषताओं के साथ महापुरुषों की सबसे बड़ी विशेषता यह होती है कि वे अपने विचारों के प्रति अखण्ड निष्ठावान होते हैं। एक बार वे जिन विचारों को स्थिर कर लेते हैं, उन पर आजीवन डटे रहते हैं। कोई भी कष्ट, कोई भी आपत्ति, कोई भी प्रलोभन अथवा कोई भी परिस्थिति उनके विचारों को डावाँडोल नहीं कर पाती। उनके विचार उनके जीवन के साथ ओत-प्रोत होकर एक रस हो जाते हैं।
निश्चित एवं दृढ़ विचारों में सक्रियता आ जाना स्वाभाविक होता है। अपने विचारों के अनुसार कार्य करना महापुरुषों का एक और गुण होता है। वे कोरे विचार व्यसनी नहीं होते। वे एक बार जिस विचार का निश्चय कर लेते हैं, उसे तुरन्त क्रियात्मक रूप दे दिया करते हैं। विचारों को मूर्तिमान करने में उन्हें जो भी श्रम, शक्ति, समय अथवा मूल्य देना होता है, वे प्रसन्नता से देते हैं। विचारों को प्रवृत्त करने में यदि एक बार उनके प्राणों पर भी बन आती है तो भी वे उससे पीछे नहीं हटते। उनकी निष्ठा, उनका विश्वास और उनकी दृढ़ता उन्हें हर बलिदान दे सकने की शक्ति प्रदान करती रहती है।
यह अपने विचारों के प्रति विश्वास, निष्ठा और श्रद्धा का ही चमत्कार था जो राणाप्रताप वन-वन घूमे और घास की रोटियाँ खा सके। ईसा क्रूस और मंसूर सूली पर चढ़ सके। सुकरात, मीरा और दयानन्द को विषपान करने की शक्ति उनकी विचार निष्ठा ने ही दी थी। यह अपने विचारों के प्रति आस्था का ही बल था जिसके आधार पर हकीकतराय अपना सिर कटा सके और गुरु गोविंदसिंह के दो नौनिहाल दीवार में हंसते-हंसते समाधि ले सके। विचारों की अमोघता मनुष्य को तन, मन, वचन और कर्म से अमोघ बना देती है।
निश्चय ही विचार मनुष्य की बहुत बड़ी शक्ति है। किन्तु यह शक्ति सार्थक तभी होती है, जब विचारों में दृढ़ता उच्चता और आस्था हो। जो विचार एक बार निश्चित कर लिया जाए, वह जीवन का एक अभिन्न अंग बना लिया जाए। बहुत से ढुलमुल विचारों की अपेक्षा एक दृढ़ और निश्चित विचार बहुत महत्वपूर्ण है। यदि हम विचार शक्ति का लाभ उठाना चाहते हैं तो हमें बेकार के बहुत से विचार त्याग कर किसी एक उद्देश्यपूर्ण विचार को निश्चित करना होगा। और फिर उस विनिश्चित विचार को मूर्तिमान करने के लिए तन, मन, धन सब लगा देना होगा। विचारों के लिए इतना त्याग तभी संभव है, जब विचारों के प्रति आस्था तथा निष्ठा हो। निष्ठाहीन विचार मस्तिष्क के विकार के सिवाय कुछ नहीं होते। हमें चाहिए कि विचारों का व्यसन त्याग कर किसी एक महान विचार को ग्रहण कर लें और फिर उसी की पूर्ति में अपना सारा जीवन लगा दें। ऐसा करने से निश्चय ही हम ऐसे काम कर दिखायेंगे जो आपके तथा समाज के लिए हितकर होंगे।
एक बार एक पुण्यात्मा गृहस्थ के घर एक अतिथि आये। उसके शरीर पर सारे कपड़े काले थे। गृहस्थ ने तनिक खिन्नता से कहा- “तुमने काले कपड़े क्यों पहन रखे हैं?” “मेरे क्रोधादि मित्रों की मृत्यु हो गई है। उन्हीं के शोक में ये काले वस्त्र धारण कर लिये हैं।” अतिथि ने उत्तर दिया।
गृहस्थ ने उक्त अथिति को घर से बाहर निकाल देने का आदेश दिया। नौकर ने तत्काल आज्ञा पालन की। थोड़ी देर बाद उन्होंने अतिथि को वापिस बुलाया और पास आते ही फिर निकाल देने की आज्ञा दी। इस प्रकार यह क्रम सात बार चलता रहा। किन्तु अतिथि तनिक भी खिन्न न हुये। अन्त में गृहस्थ ने अतिथि का सम्मान किया और अनुभव किया कि ये सच्चे इन्द्रियजित हैं।
-
वैटसिन नकल करने की कला (दि आट्र आफ वैटसिन एडाप्शन) जीव विज्ञान का एक बहुचर्चित सिद्धाँत है, जिसका अर्थ होता है, सामाजिक बुराइयों से आत्म-रक्षा के लिए अपने आपको बदलना। बुराइयाँ कमजोर मन वालों पर आक्रमण करती हैं, हमें अभ्यास से अपने मन को ऐसा बनाना चाहिए, जिसमें कोई भी अप्रिय परिस्थिति टकराकर ऐसे लौट जाए जैसे पहाड़ की खाड़ी से समुद्री लहरें।
जर्मन वैज्ञानिक श्री मुलर ने बहुत दिन तक अध्ययन करने के बाद बताया कि वंश परम्परा से कुछ तितलियाँ भिन्न जाति की होती हैं, किन्तु वे अपना रंग-रूप और आकार इस तरह बनाती हैं, जैसे वह तितलियाँ जो स्वाद में कटु होती हैं और दुश्मन जिन्हें खाना तो दूर पास तक नहीं आते। इस तरह वे कमजोर होने पर भी अपना बचाव कर लेती हैं। हमारे जीवन में कैसा ही उतार क्यों न हो, इतिहास से हम उन पुरुषों के जीवनवृत्त ढूंढ़ सकते हैं, जिन्होंने हमारी जैसी परिस्थितियों में ही अपने आपको बदलकर सफलता के द्वार खोज निकाले हों। उनका अनुकरण और अनुशीलन करें तो गई-गुजरी स्थिति में भी हम अपने स्वत्व की रक्षा और विकास कर सकते हैं, जो वर्तमान परिस्थिति में हमारे लिये कभी भी संभव न होता।
ऐसी ही कला ‘मुलैरियन’ नकल करने की कला (दि आट्र आफ मुलेरियन एडाप्शन) कहते हैं, इसमें समान प्रकृति के लोगों के साथ मिलकर ऐसा संगठन बनाया जाता है, जिससे दुश्मन अपने आप ही पीछा करना छोड़ दे। धर्मशास्त्र में उसे तितीक्षा की संज्ञा दी जाती है। स्वामी विवेकानंद जिन दिनों योगाभ्यास कर रहे थे उनके मन में कई प्रकार की वासनायें भी भड़कती रहती थीं। कई बार यह गंदे विचार इतने तीव्र हो उठते थे कि उनको हटाना कठिन हो जाता था। विवेकानन्द हैरान थे, क्या करें-तभी उन्हें एक विचित्र दृश्य दिखाई दिया। उन्होंने देखा एक ऐसा कीड़ा है, जो चींटियों को बार-बार पकड़कर ऐसे खा जाता है, जैसे वासनायें सद्गुणों को खा जाती हैं। दुश्मन से बचने के लिए इन चींटियों ने एक तरकीब निकाली। पास ही कुछ ऐसी मकड़ियाँ रहती थीं, जिनका आकार और रंग−रूप इन चींटियों की तरह का था। चींटियों ने उनसे मेल-मिलाप कर लिया और उनके साथ ही रहने लगीं। चींटियों और मकड़ियों के पास-पास आ जाने से उनकी संख्या भी अधिक हो गई।
लोभी व्यक्ति को जिस प्रकार हित-अनहित का अच्छे बुरे का विवेक नहीं रहता, उसी प्रकार उस कीड़े ने भी चींटियों की बढ़ोत्तरी देखी तो उसकी प्रसन्नता का पारावार न रहा। उसने घात लगाई ओर टप से चींटों के धोखे में एक मकड़ी को पकड़ लिया। उस मकड़ी का स्वाद इतना जहरीला था कि कीड़े को मूर्छा आ गई। होश आने पर वह इतना डर गया कि फिर उसने दुबारा चींटियों को छेड़ने का साहस नहीं किया। अच्छे की संगत और संगठन में रहने का तब से इन चींटियों ने स्वभाव बना लिया।
इस दृश्य ने स्वामी विवेकानन्द को इक नई सूझ प्रदान की। उन्होंने निश्चय कर लिया कि यदि अब दुबारा कभी मन ने दुर्भावनायें उठाईं तो उसे भी ऐसा ही कड़ुवा स्वाद चखायेंगे। दैववश उसी दिन जब वे भोजन बना रहे थे एक लड़की उनके पास आ गई। उसे देखते ही उनका मन चंचल हो उठा। स्वामी जी तो पहले से ही घात में थे। उठे और जलते तवे पर बैठ गए। सारा चूतड़ जल गया। लड़की चीख मारकर भाग गई। विवेकानन्द एक महीने अस्पताल में तो पड़े रहे पर फिर दुबारा उनके मन में कभी कोई पाप भावना नहीं आई।
डोनाउस क्राइसीपस नामक तितली, ततैये और टिड्डे आदि अपने दुश्मनों से बचने के लिए बहुत चमकीले भड़कीले, लाल, काले, पीले, रंग बदलने सुगंध छोड़कर अपने आपके क्रोधी और जहरीला दिखाने की क्रिया करते हैं। दुश्मन डर कर भाग जाता है। इसी प्रकार मन में उठने वाली बुराइयों को उनके अप्रिय परिणाम दिखाकर डराया और धमकाया जा सकता है। उदाहरण के लिए पढ़ने में मन न लगे तो फेल हो जाने की निराशा का चित्रण, काम न करने पर भूख-प्यास और कपड़े-लत्ते की तंगी का चित्रण, काम-वासना भड़के तो रोग बुढ़ापा और दुर्बलता का चित्रण करके उन्हें हटा देना चाहिए।
हेनरी फोर्ड ने इसी सिद्धाँत के रचनात्मक अभ्यास से औद्योगिक सफलता अर्जित की थी। उन्होंने अपने एक संस्मरण में लिखा है- ‘व्यापार के प्रारम्भिक दिनों में मुझे बड़ा आलस्य और अनुत्साह रहता, उस समय मैं अच्छे सम्पन्न भविष्य की कल्पना करता। मेरे बंगले होंगे, कार होगी, दास-दासियाँ होंगे, सुख के सब साधन होंगे तो कितना अच्छा होगा। इन कल्पनाओं से आलस्य का अंत हो जाता और मैं फिर दुगुने उत्साह से काम करने लगता। इसी तरह बढ़ते-बढ़ते मैं वर्तमान स्थिति तक पहुँचा।
जीव-जन्तु अपने बचाव के लिए इस सिद्धाँत का बहुत उपयोग करते हैं, उदाहरण के लिए कटलमछली या सीपिया शरीर की एक थैली में स्याही जैसा एक तरल पदार्थ भरकर रखते हैं। अपने इस संचित संस्कार के कारण वे निर्भय विचरण करते रहते हैं, यदि उन्हें सामने से कोई दुश्मन आता दिखाई दिया तो उस थैली का रंगीन तरल पदार्थ काफी दूर तक उड़ेल कर पानी को रंगीन करके आप उसी में छिपकर बैठ जायेंगे। शत्रु शिकार को देख नहीं पायेगा या एक और खड़ा ताकता रहेगा, मछली अपनी मस्ती से दूसरी ओर से निकल जायेगी। जिन लोगों में ऐसे रचनात्मक स्वभाव होते हैं, वे ही संसार में उच्च सफलताएं प्राप्त करते हैं, जो निराशावादी हर परिस्थिति के फंदे में फंस जाने वाले होते हैं, उन्हें तो छोटे-छोटे आघात ही मारकर नष्ट कर देते हैं।
कछुआ, सीप, घोंघा, मगर आदि अपनी त्वचा के ऊपर सुरक्षात्मक आवरण रखते हैं और जी चाहे जहाँ विचरण करते हैं, उनका बड़े से बड़ा शत्रु भी कुछ नहीं बिगाड़ सकता। संसार में माना विषम परिस्थितियों के अम्बार लगे हैं पर मनस्वी व्यक्तियों के लिए जैसे परिस्थितियाँ होती ही नहीं, वे मन को इतना मजबूत बना लेते हैं कि चाहे लाभ हो या हानि, सुख हो या दुख, यश मिले या अपयश वे अपने आदर्श-सिद्धाँतों से उन सबको दबाकर मस्ती और निश्चिंतता का जीवन जीते हैं। ऐसे जीवन क्रम की गीता में बड़ी प्रशंसा की गई है। कर्मयोगी के लिए साँसारिक गतिविधियों से बचाव के लिए ऐसा ही सुरक्षात्मक आवरण रखना नितान्त आवश्यक होता है।
संसार ऐसा विलक्षण है कि यहाँ बहुत शक्तिशाली और रूप-गुणशील भी कई बार बुराइयों की, आक्रमण की लपेट में आ जाते हैं इसीलिए कहते हैं, न्याय और आत्मा की आवाज के लिए सबको समान रूप से प्रयत्नशील रहना चाहिए, चाहे वह छोटा हो या बड़ा। दोनों समाज में रहते हैं, दोनों को ही सामाजिक उत्तरदायित्वों का पालन अनिवार्यतः करना चाहिए।
शेर जंगल का राजा होता है, बड़ा शक्तिशाली और एकान्तवासी। तो भी कुछ मक्खियाँ और कीड़े उसे ऐसे काटते हैं कि कई बार उसकी जान के ग्राहक ही बन जाते हैं। उत्तरी अमेरिका में एक खूबसूरत रंगीन-पक्षी ‘स्कनस’ पाया जाता है और सूक्ष्मदर्शी चमगादड़ भी अपने दुश्मनों से बच नहीं पाते। वह अपनी आत्म-रक्षा के लिए अपने शरीर से एक विशेष प्रकार की दुर्गन्ध निकालकर दुश्मन को भगाते हैं तात्पर्य यह है कि हमें संघर्ष के क्षणों में उन परिस्थितियों के लिए तैयार रहना चाहिए जो हमारी आदत के अनुकूल नहीं हों। इसके लिए ‘पारक्यूपाइन’ की तरह पहले से ही तैयार रहना चाहिए। इस जन्तु के शरीर पर छोटे-छोटे काँटे होते हैं। स्याही के शरीर पर भी काँटे होते हैं, साधारणतया वे उसके काम नहीं आते। क्रोध और नाराजी भी मनुष्य के लिए हितकारक नहीं पर जिस तरह आत्म-रक्षा के लिए यह जीव अपने काँटों को तरेर कर उन्हें डराकर भगा देते हैं, उसी तरह मनुष्य को परिस्थितियों में क्रोध और नाराजी भी व्यक्त करना ही चाहिए। उस समय यही हमारे धर्म हो जाते हैं। राष्ट्र रक्षा, सामाजिक जीवन में व्याप्त बुरे तत्वों चाहे वह चोर-डकैत हों अथवा दहेज, रिश्वत लेने वाले क्रोध ओर नाराजी के काँटे तरेरने ही चाहिएं, यदि प्रजा अपना यह अस्त्र नहीं संभालती तो अवाँछनीय तत्व बढ़ते हैं और समाज पर छाकर सर्वत्र त्रास देते हैं।
एटम बम विनाशकारी है, अन्य शस्त्रास्त्र लगता है, मानवता के हित में नहीं हैं पर सशस्त्र दुश्मन से बचाव की आवश्यकता आ पड़े तो प्रकृति यह बताती है कि आत्मरक्षा के लिए वैज्ञानिक अस्त्रों का भी प्रयोग करना धर्म है। टारपीडो ओर नारसीन नामक मछलियों में शरीर से विद्युत उत्पन्न करने की क्षमता होती है। साधारणतया वह ऐसा करती नहीं पर यदि कोई दुश्मन पीछा करे तो वे विद्युत करेंट उत्पन्न कर उन्हें मार भगाती हैं। मनुष्य इन सभी गुणों का विचित्र सम्मिश्रण है, प्रकृति अपने नन्हें जीवों के द्वारा उसे यह प्रेरणा देती है कि परिस्थिति के अनुसार मनुष्य को अपनी प्रत्येक क्षमता का प्रयोग कर मानवता की रक्षा के लिए प्रयत्नशील रहना चाहिए।
अमेरिका में ‘हागनोज्ड’ नामक एक सर्प पाया जाता है, वर्जीनिया में ‘अपोसम’ नामक कंगारू पाया जाता है, दोनों में परले सिरे की चतुराई होती है, यह जब अपने शिकारी को देखते हैं तो ऐसे निश्चेष्ट हो जाते हैं, मानो मर गये हों। शिकारी इन्हें मृत समझकर मुड़ता है तो यह पीछे से आक्रमण कर देते हैं। कई बार हमारे सामने भी ऐसी परिस्थितियाँ आती हैं, जब कोई क्षमता काम नहीं देती, उस समय ‘देखि दिनन को फेर रहिमन चुप ह्वै बैठिये’ वाली कहावत के अनुसार चुप पड़ जाये पर जैसे ही परिस्थिति अनुकूल आये फिर क्रियाशील हो जाये। आत्म-रक्षा, आत्म-विकास और सामाजिक संघर्ष हमारे जीवन की मूलभूत आवश्यकतायें हैं, उसके लिए भिन्न-भिन्न परिस्थितियों में भिन्न-भिन्न स्वरूप बनाकर नाटककारिता का परिचय और अभिनय का आनन्द लेते हुए जीना चाहिए। ऐसा रंग-बिरंगा जीवन ही सफल और सार्थक होता है।
स्वायत्ता इन सब गुणों से ऊपर है। संसार में सामर्थ्यवान् लोग जीते हैं। ‘वीरभोग्या वसुन्धरा’ का उद्देश्य सबसे पहले हम भारतीयों ने दिया था, उसका आधार हमारी समर्थता थी। सामर्थ्यवान मनुष्य ही अपने आपको अपनी बुराइयों व शत्रुओं को भी जीत सकते हैं। शेर, चीता, हाथी, मगर, सूअर यह जंगल के बलवान जीव जंगल में सर्वत्र स्वच्छन्द विचरण करते हैं, उन्हें केवल मनुष्य का ही भय रहता है और किसी का नहीं, क्योंकि उन्हें अपनी सामर्थ्य पर भरोसा होता है, यह अपनी शक्ति से आत्म रक्षा ही नहीं, आक्रमण भी कर सकते हैं, इसी प्रकार मनुष्य को भी शक्तिशाली होना चाहिए। पाप और दुष्कर्म से बचे रहने के लिए हम भगवान से तो डरें पर अच्छे उद्देश्य, आदर्श और पार्थिव सुखोपभोग के लिए वर्तमान परिस्थितियों में हमें अपनी आन्तरिक सामर्थ्य को इतना स्वायत्त बनाना चाहिए कि आवश्यकता पड़े तो विरोधियों को बलपूर्वक भी मारा और भगाया जा सके। जनसंख्या बढ़ाने से नहीं, आन्तरिक सामर्थ्य बढ़ाने से ही हम बदली हुई परिस्थितियों में अपने आपको स्थिर और सम्मानित रख सकते हैं, दुर्बलों के लिए तो संसार में पग-पग पर कठिनाइयों के अतिरिक्त कुछ नहीं है।
संसार परिवर्तनशील है। पल-पल पर परिस्थितियाँ बदलती रहती हैं, उनसे हम प्रभावित भी होते रहते हैं, इसलिए प्रकृति ने हमें वह सारी क्षमताएं दी हैं, जिनका सम्यक् उपयोग करके हम सुरक्षित, सफल और समर्थ व्यक्ति और जाति बन सकते हैं। प्रकृति के असंख्य छोटे-छोटे जीव हमें इसी बात की प्रेरणा देते हैं।
काँचनी नरेश की राजकुमारी प्रेत बाधा से पीड़ित हुई। भूत सामान्य नहीं, ब्रह्म राक्षस था। तब श्री रामानुजाचार्य बुलाये गये। उन्होंने वहाँ जाकर पूछा- “आपको यह योनि क्यों कर मिली।” रोकर ब्रह्मराक्षस बोला- “मैं विद्वान था, किन्तु मैंने अपनी विद्या छिपा रखी। किसी को भी मैंने विद्या दान नहीं किया, इससे ब्रह्म-राक्षस हुआ। आप समर्थ हैं, मुझे इस प्रेतत्व से मुक्ति दिलाइये।” श्री रामानुज ने राजकुमारी के मस्तक पर हाथ रखकर जैसे ही भगवान का स्मरण किया, वैसे ही ब्रह्मराक्षस ने उसे छोड़ दिया, क्योंकि वह स्वयं प्रेतयोनि से मुक्त हो गया। उस दिन से श्री रामानुज ने प्रतिज्ञा कि वह भी स्वाध्याय का लाभ अपने समाज को भी देते रहेंगे।
साइक्लोपटेरस नाम की मछली एक बार में 8000 से लेकर 1360000 तक अंडे देती है। मनुष्यों की तरह उसकी भी यह मूढ़ मान्यता है कि बच्चे सौभाग्य का प्रतीक होते हैं। अपनी इस मूर्खता के कारण ही उसका जीवन सदैव संकट में बीतता है।
मादा अपने पति की कामुक वृत्ति का लाभ लेती है। अण्डे दिये और पति को सौंपे। आप तो घूमने-फिरने निकल गई और पति महोदय पर उस तरह बोझ आ पड़ा, जैसे अन्धाधुन्ध बच्चे करने वाले पुरुषों पर उनके भरण-पोषण, आजीविका, वस्त्र, शिक्षा आदि का दबाव पड़ता है। न तो लड़कों को पौष्टिक आहार मिल पाता है, न विकास की समुचित परिस्थितियाँ। उसका परिवार छाती का पीपल बना उसे ही त्रास देता रहता है।
नर इस बड़े ढेर को कभी सिर, कभी पूँछ से हिलाता रहता है। फिर भी कई बार उन्हें पर्याप्त शुद्ध जल नहीं मिल पाता, आवश्यक ऑक्सीजन नहीं मिल पाती। सैकड़ों अण्डे इसी में मर जाते हैं। जो बच जाते हैं वे भी अधिकाँश कमजोर और बीमार ही बने रहते हैं।
शक्तिशाली निर्बलों को खा जाते हैं, किसी को इसका उदाहरण देखना हो तो बहुसंख्यक संतानों वाली इस मछली को देख लें। छोटी-छोटी मछलियाँ भी इसे चारों तरफ से सताती रहती हैं। कौवे तथा बगुले आदि पक्षी तो इसके लिए यमराज हैं। वे चोंच मार-मारकर नर को अधमरा कर देते हैं और अच्चे-बच्चे खा पीकर बराबर कर देते हैं।
फिर भी शायद प्रकृति ने उसे इसलिए पैदा किया है कि मानो वह मनुष्य के लिए उदाहरण छोड़ना चाहती हो-देख लो संतान की संख्या बढ़ाने, अपनी समर्थता का बिलकुल ध्यान न देने का यही परिणाम होता है।
इतना होने पर भी न नर जानता है, न मादा। हर तीसरे महीने फिर वही, उतने ही अण्डों की फौज तैयार कर देते हैं। नर अपनी कामुकता का शिकार होता है। मादा तो फिर घूमने निकल जाती है और नर महोदय को फिर वही संकट और संकट वाला जीवन। सबसे अधिक बच्चे पैदा करने वाला, जीवन भर भय-ग्रस्त कमजोर और आपत्तियों में डूबा हुआ। उसे न कभी समुद्र में सैर का आनन्द मिल पाता है, न तरह-तरह की वस्तुयें खाने-पीने का। थोड़े ही दिन में परलोक की तैयारी करने लगता है।
कार्डफिश भी ऐसी ही मछली है, एक बार में 6000000 अण्डे देने वाली। इस मछली का ही तेल है जो औषधियों के काम में लिया जाता है। कमजोर होने के कारण अपनी सुरक्षा भी नहीं कर पाती। सारे समुद्र में कुल पाँच होतीं पर स्वस्थ और समर्थ होतीं तो क्योंकर यह दवा होती।
तरबोट मछली 9000000 अण्डे देती हैं। बच्चे भोजन के टुकड़ों पर ऐसे लड़ते हैं, जैसे माँस के एक टुकड़े के लिए कई चीलें। यादवों की तरह का मुशल पर्व मनता है, सारे बच्चे लड़-झगड़कर मर जाते हैं। यही दशा कमजोर नस्ल वाली लिंग मछली की होती है, यह एक बार में 28000000 अंडे देती है।
परिवार नियोजन की चर्चा होती है, तब अनेक भावुक हिन्दू यह आक्षेप लगाते हैं कि सरकार पक्षपात करती है मुसलमानों पर वह संतान सीमा बंध का दबाव नहीं डालती। ऐसे लोगों को अनुभव करना चाहिए कि संसार में संख्या नहीं, समर्थता जीतती है। एक भेड़िया सैकड़ों बकरियों को मार डालता है। कहते हैं कि सिंह के सारे जीवन में दो ही बच्चे होते हैं पर उनकी शक्ति और सामर्थ्य के सामने जंगल के हाथी, गैंडे जैसे भीमकाय जीव भी पानी भरते हैं। भले ही पक्षपात हो पर हमें मुसलमानों की संतान सीमा का भय नहीं करना चाहिए। थोड़ी संतान हो पर स्वस्थ और समर्थ हो तो हम विश्व-विजयी बन सकते हैं। पर सत्तर करोड़ चीनी बनने से तो हम अपने आप में ही संकट खड़ा कर लेंगे।
संख्या ही बलवान होती तो आइस्टर सीप संसार में सबसे शक्तिशाली होती। एक जोड़ा आइस्टर एक वर्ष में 66000000000000000000000000000000000 अंडे देता है। इनका ढेर बनाया जाये तो यह पृथ्वी के आकार से आठ गुना बड़ा हो पर यह स्थिति आने ही नहीं पाती। समुद्र के छोटे जीव भी इनकी असमर्थता का लाभ उठाते हैं, थोड़े ही दिन में वे इन्हें खा-पीकर बराबर कर देते हैं।
यदि इन समुद्री जीवों में हम शिक्षा ले पाये तो फिर संख्या का लोभ न कर अपनी जाति की समर्थता विकसित करने का प्रयत्न करें, उसी से हम संसार में विजयी हो सकते हैं। संसार में सिंह के सदृश सिरमौर हो सकते हैं।
----***----
मगध नरेश महापद्मनन्द पर चन्द्रगुप्त ने कई बार आक्रमण किये पर उसे एक बार भी सफलता हाथ न लगी। जिस प्रकार एक महीने में ही करोड़पति एक वर्ष में ही बड़े से बड़ा पद और कुछ ही दिनों में बीमारी से मुक्ति के उतावलेपन में कई बार लोग ऐसे ऊट-पटाँग काम कर बैठते हैं कि उनके हाथ की सम्पत्ति, आजीविका योग्य नौकरी और रहा-सहा स्वास्थ्य भी चौपट हो जाता है। उसी प्रकार मगध को जीतने के उतावलेपन में चन्द्रगुप्त अपनी सेना से भी हाथ धो बैठा। एक बार उसे जंगलों की खाक छाननी पड़ी।
दिन ढला। अंधकार घिरने लगा। मगध के गुप्तचरों की आँख बचाता हुआ चन्द्रगुप्त एक बुढ़िया के द्वार पर उपस्थित हुआ। रात भर की शरण माँगकर वह उसी झोंपड़ी में विश्राम करने लगा।
द्वार आये अतिथि का सत्कार अपना धर्म मानकर वृद्धा ने खिचड़ी पकाई। थाल परोसकर उसने चन्द्रगुप्त को लगाया और खिचड़ी उसके आगे बढ़ाकर कहा- ले बेटा! पहले भोजन कर ले फिर विश्राम करना।’
मातृवत् स्नेह पाकर चन्द्रगुप्त की आँखें भर आईं। भूखा वह था ही उसने बीच थाली से हाथ से बड़ा कौर भरा। खिचड़ी बहुत गर्म थी, सो हाथ जलने लगा। हाथ को जलन से बचाने के लिए खिचड़ी मुँह में भर ली यह भी न सोचा कि मुख भी तो हाथ की तरह संवेदनशील है, वह भी जल गया, खिचड़ी पूरी थूकनी पड़ी। वृद्ध यह देखकर बोली- ‘बेटा’ लगता है कि तुझ पर चन्द्रगुप्त की छाया पड़ गई है, अन्यथा इस तरह की गलती न करता।’
चंद्रगुप्त आश्चर्यचकित हो गया। ‘आखिर ऐसी कौन सी भूल हुई चन्द्रगुप्त से’ उसने वृद्धा से प्रश्न किया। ‘उतावलापन’। वृद्धा ने उत्तर देते हुए आगे कहा- ‘संसार में प्रत्येक सफलता समय और एक निश्चित विधान के बाद पनपती है। एकाएक किसी को सफलता मिल गई हो, ऐसा अपवाद भी मिलेगा।’ जो शाश्वत नियम है, वह यह है कि मनुष्य छोटे-छोटे कदम बढ़ाकर पहले छोटी सफलताओं पर नियंत्रण करता है फिर उससे बड़ी सफलताओं के लिए भी साहस मिल जाता है।
जिस तरह तुझसे यह तो नहीं बन पड़ा कि पहले किनारे-किनारे की ठण्डी खिचड़ी खाना प्रारंभ करता, तब तक बीच का ढेर ठण्डा हो जाता और उसे भी खाना सुगम हो जाता, उसी प्रकार चन्द्रगुप्त ने यह तो नहीं किया पहले छोटी-छोटी जागीरों को जीतता, फिर अपनी शक्ति बढ़ाकर मगध पर आक्रमण करके उसे भी जीत लेता। उसने पहले ही मगध जीतने की सोची फलस्वरूप सेना भी हाथ से जाती रही और मगध भी हाथ न आया।
समझ गया माँ-चन्द्रगुप्त ने किनारे की खिचड़ी का कौर मुख में रखते हुए कहा-जो लोग छोटे-छोटे अभ्यास से आगे बढ़ते हैं, वही जीवन में सफलतायें प्राप्त करते हैं, उतावली में आकर लंबी छलाँग लगाने वाले सचमुच मेरी ही तरह जीवन संग्राम में असफल और पराजित होते हैं।
चन्द्रगुप्त ने फिर सेना एकत्रित की। इस बार उसने छोटी-छोटी रियासतों पर आक्रमण कर महापद्मनन्द के मुकाबले की शक्ति खड़ी कर ली और तब उसने मगध पर आक्रमण कर दिया और महापद्मनन्द को परास्त कर स्वयं वहाँ का शासक बन बैठा।
मनुष्य जीवन में जो लोग छोटे प्रयत्नों से प्रारंभ कर अपनी योग्यताएं बढ़ाते हुए आगे बढ़ते हैं, वह एक दिन चन्द्रगुप्त की तरह सिपाही से सम्राट बन जाते हैं, उतावलेपन और तुरंत लाभ पाने की आशा-दुराशा मात्र है, उससे हाथ भी जलता है और मुख भी।
----***----
चट्टान के भीतरी भाग में कोमलता भरी हुई पर ऊपर सुदृढ़ता क्यों? यह एक आश्चर्यजनक तथ्य है। भीतर के सब जीव श्रम विभाजित कर अपना-अपना काम करते रहते हैं। कोई खाद्यान्न जुटाता है तो कोई बच्चे सेता है। बाहरी रक्षा पंक्ति के एन्थोजोआ कैल्शियम कार्बोनेट का बहुत भारी आवरण अपने ऊपर चढ़ा लेते हैं, इस तरह वे एक चट्टान की आकृति में मजबूत दुर्ग के समान सुरक्षित बने रहते हैं, यदि उन्होंने परस्पर मिलने की सुदृढ़ता न दिखाई होती आपस में बिखरे और विशृंखलित बने रहते तो आज उनकी वंशावली या तो होती ही नहीं, होती भी तो बहुत सम्भव है, पूर्व भारतीयों के समान पराधीन या विश्व में अल्पसंख्यक रह गये होते।
आवश्यकतानुसार यह विभिन्न आकृतियां बनाते रहते हैं, कभी पंखे जैसे होकर ‘सीफैन’ कहलाते हैं तो कभी प्राचीनकाल के मोरपंख की लेखनी जैसे जिन्हें ‘सीपेन’ कहते हैं। इसी जाति का ‘एटाल’ नामक जीव बैलों व घोड़ों के खुरों में जड़े जाने वाले नाल जैसा होता है, जिसकी दोनों भुजाओं के बीच की दूरी 50 मील तक हो सकती है। विभिन्न आकृतियों में संगठन का स्वरूप यह इंगित करता है कि हम ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य आदि कैसे ही स्वरूप में रहें, शासन और सामाजिक व्यवस्थाओं के स्वरूप भले ही बनते-बिगड़ते रहें पर धर्म व संस्कृति की दृष्टि से अपनी एकता कभी भंग न करें, तभी हम संसार की भयंकरताओं से, द्वन्द्वों और आक्रमणों से टक्कर ले सकते हैं।
काम वितरण करके भी एक जाति एक परिवार की तरह रह सकती है। संसार के अनेक जीवों में यह सिद्धाँत पाया जाता है, जिसका नाम ‘पोली मार्फिजम’ है। एक ही जीव कई प्रकार का आकार बनाकर रहते हैं पर उनका मुख्य उद्देश्य अपने समाज व समुदाय की सुरक्षा व विकास करना ही होता है।
सीलेन ट्रेटा समुदाय के ‘साइफोनोफोरा’ वर्ग में पाये जाने वाले फाइसेलिया, बेलेला, पोरपिटा, टेन्टिला कैलिकोफोरा आदि जीव श्रम का वर्गीकरण करके जीते हैं पर पारस्परिक एकता व मैत्री भी इतनी घनिष्ठ होती है कि कोई भी बाहरी जीव उंगली नहीं उठा सकता। किसी समय भारतीय समाज में भी यही व्यवस्था भी। सारी हिन्दू-जाति एक पिता की संतान की तरह रहती थी। सुविधा की दृष्टि से कोई ब्राह्मण का समाज को संस्कारवान बनाने का कार्य करता था, कोई देश की सुरक्षा का क्षत्रिय कर्म। कुछ भरण-पोषण का उत्तरदायित्व संभालते थे, कुछ सेवा, सुश्रूषा के स्थूल कार्य। काम बंटे थे, एकता नहीं। जब तक वह व्यवस्था रही भारत विश्व में अपराजेय रहा पर जब संगठन टूटा तो अपने घर में मुसलमान, अंग्रेज, पुर्तगाली आदि कितनी ही जातियाँ घुस बैठीं और हम पर शासन करने लगीं।
फाइसेलिया जीव पुर्तगाल के खिलाड़ी की हैट (पुर्तगीज मैन आफ वार) की तरह आकृति बनाकर अपनी जाति के सब अंडे बच्चों को समेट कर सुरक्षित कर लेता है। इनमें जो उदर-पोषण के लिए समुद्र से आहार लेते रहते हैं, उन्हें ‘गैग्ट्रोजूइड’ कहते हैं। अन्य कुछ सुरक्षा का कार्य करते हैं। अकेले तो यह कीड़े को भी नहीं मार सकते पर संगठित होने के कारण वे बड़ी-बड़ी मछलियों को उसी प्रकार मार भगाते हैं, जैसे संगठित भारतीय कभी आक्रमणकारी अफगानों, चीनियों को मार भगाते थे। ‘गोनो जूइड’ नामक इन्हीं जीवों की एक श्रेणी प्रजनन का काम करती है, शेष सब संयमित जीवन यापन करते हैं उनका एक ही काम रहता है, अपने समाज की सेवा और सुरक्षा। हमारी आन्तरिक व्यवस्था भी ऐसी ही थी। जब तक संयमी व सेवाशील समाज सुधारकों की कमी न रही, देश विश्व का सिरमौर रहा पर अब जब सारे लोग पेट और प्रजनन की निकृष्ट प्रक्रियाओं में ग्रस्त हो गये, हमारी सारी विशेषताएं ही नष्ट हो गईं। धर्म, संस्कृति और तत्वदर्शन अभी वैसा ही सामर्थ्यवान है पर अपनी जातीय एकता से विमुख होने के कारण हम उस समर्थता को धारण करने में भी समर्थ नहीं रहे।
संगठित जातियाँ संख्या में थोड़ी ही हों तो भी वे सारे संसार में अंग्रेजों की तरह छा सकती हैं। मुसलमान भारत वर्ष में कुल सात सौ आये थे और आज भारतीय प्रदेश में ही दस करोड़ मुसलमान हैं। एक पाकिस्तान बन गया सो अलग यह सब संगठन की महिमा है। मनुष्य क्या जीवों में भी उसके बड़े अनूठे उदाहरण हैं। ‘बाल बाक्स’ नामक प्रोटोजोआ (जिन जीवों के शरीर एक ही कोष के होते हैं, उन्हें प्रोटोजोआ कहते हैं) जीव भी है और कुछ वैज्ञानिक उसे वनस्पति भी मानते हैं, इसको भोजन प्रकाश-संश्लेषण (फोटो संथेसिस) द्वारा प्राप्त होता है, यह हमेशा एक कालोनी में संगठन बद्ध रहता है। इनकी कालोनी गोल गेंद के आकार की होती है। परस्पर मिले-जुले न रहें तो एक जीव तैर भी नहीं सकता पर वे जब परस्पर मिल कर गेंद की आकृति बना लेते हैं तो कहीं भी समुद्र भर में घूमते रह सकते हैं। सुरक्षा, आजीविका और प्रजनन के सब कार्य इनमें भी वितरित होते हैं।
शीत ऋतु में तापक्रम गिर जाने के कारण मक्खियाँ जीवित नहीं रह पातीं। कमजोर वाली मक्खियाँ अकेली अकेली रहती हैं और भारतीयों की तरह नष्ट होती रहती हैं लगता है हमारी समझ से उनकी समझ अच्छी है कि वे अपनी भूख शीघ्र ही अनुभव कर लेती हैं। जाति, उपजाति, प्रजाति के भेद-भाव भूलकर वे लाखों की संख्या में संगठित होकर एक पत्ते की सी आकृति बना लेती हैं। अब वे एक जाति एक वंश, एक कुनबे की तरह रहती, खाती पीती, उठती बैठती, दिखाई देने लगती हैं, इससे वे प्रकृति के आघात हंसते-खेलते सहन कर लेती हैं। सटे रहने के कारण हवा उसी प्रकार प्रवेश नहीं कर पाती जिस प्रकार संगठित जातियों में भेदिये, जासूस और तोड़ फोड़ की कार्यवाही करने वाले कुछ नहीं बिगाड़ पाते। इस प्रकार वे ठण्ड से अपने शरीरों की रक्षा कर लेती हैं।
संगठन और जातीय एकता, शक्ति और सुरक्षा के आधार हैं। कोई भी देश और जाति तब तक विकसित नहीं हो सकती, जब तक उनका यह प्राथमिक आधार ही सुदृढ़ न हो।
----***----
(गताँक से आगे)
साधु चले गए तब मेजर कुछ आश्वस्त हुए। हेकड़ी अभी भी गई नहीं थी। नौकर को डाँटते हुए बोले ‘मूर्ख तूने मेरी आज्ञा का पालन क्यों नहीं किया।’ नौकर पहले तो बंदरों की तरह खों-खों करने लगा फिर धीरे-धीरे वह मनुष्यों की सी भाषा में बोल पाया - ‘कैसी आज्ञा साहब! आपने मुझसे कुछ कहा था क्या?’
मेजर समझ गये। क्या साधु सचमुच इतना समर्थ था कि वह मनुष्य के मन, प्राण और चेतना पर पूरा अधिकार कर सकता था। जो कुत्ते अभी तक बुत बने खड़े थे, साधु के वहाँ से हटते ही चल-फिर सकने की स्थिति में आ सके। मेजर ने अपनी मेम साहब को सारी घटना सुनाई। वे बेचारी कोमल हृदय थीं, इसलिए एकदम भयभीत होकर बोलीं- ‘आपको इतना क्रोध नहीं करना था, मुझे बुला लिया होता, मैं ही साधु को कुछ खाने के लिए दे देती या फिर कुछ पैसे ही दे देती।’
जैसे-तैसे एक महीना बीता। मेजर डिक साहब उस दिन प्रातःकाल समय पर ही उठे पर वह हैरान थे कि आज न तो कोई नौकर ‘बेड-टी’ (सबेरे की चाय) ही लाया और न स्नान के लिए पानी ही, श्रीमती डिक ने बहुतेरी आवाज लगाई पर वहाँ कोई सुनने वाला हो तब तो। मेजर उठे नौकरों के कमरों में जाकर देखा तो सब खाली पड़े थे। एक ही नौकर बचा था, सो उसने भीतर से ही चिल्लाकर कहा- ‘साहब’! इधर मत आना, इस मुहल्ले में प्लेग फैल चुकी है। इन कमरों में भी चूहे मरे हैं, इसीलिए नौकर घर छोड़कर भाग गये। मुझे तो प्लेग हो गया है, इसलिए मैं तो भाग कर जा भी नहीं सका।’
मेजर ने पुलिस और स्वास्थ्य विभाग से सेवायें माँगी। नौकर को दवा का प्रबंध कराया और स्वयं सारा सामान बाँधकर बंगला छोड़ देने की तैयारी करने लगे।
सायंकाल होने से पहले ही वे डाक-बंगले पहुँच गये। इस आपा धापी में प्रातःकाल से चाय भी नहीं मिली थी। डाक-बंगले के नौकर को आदेश दिया - ‘तीन कप चाय लाना।’ चाय आई, मेजर साहब, उनकी धर्मपत्नी और पुत्री तीनों ने एक बार ही मुख लगाया और तीनों ने एक साथ अपने-अपने चाय के प्याले एक ओर सरका दिये। बात यह थी कि उनमें बुरी तरह मिट्टी के तेल की दुर्गंध आ रही थी।
अभी वे कुछ कहें इसी बीच सबका ध्यान कैप्टन स्मिथ नामक एक और अंग्रेज अफसर ने आकर बंटा दिया। पत्र निकालकर मेजर डिक को देते हुए स्मिथ ने बताया ‘छावनी के मेडिकल ऑफिसर ने कहा है कि चूँकि आप लोगों के बंगले में प्लेग फैल गई है, इसलिए आप सबको दूसरे एरिया से बाहर जाना पड़ेगा। मेजर स्मिथ का माथा ठनका। उन्हें एक माह पूर्व हुई दुर्घटना याद आ गई। साधु का श्राप क्या वस्तुतः सत्य होने जा रहा है, यह सोचते ही उनकी देह में पसीना फूट पड़ा।
अब जिस कोठी में उन्हें जाना था, उसका पता स्मिथ ने हाथ में थमा दिया। मेजर डिक बोले- ‘स्मिथ। मैं वहाँ अभी चला जाता हूँ, किन्तु हममें से किसी ने भी दिन भर हो गया, खाना नहीं खाया। पहले हमें खाना खा लेने दें।’
नौकरी तो नौकरी ठहरी। कोई उद्यम कर रहा होता तो भला अपने साथी को एक असहाय व्यक्ति को दो टूक उत्तर देने की नौबत क्यों आती। स्मिथ को नौकरी चले जाने का भय था सो उसने कहा- “मेजर साहब! आप उस बंगले पर अभी चले जायें, आपके लिए भोजन का प्रबंध हम पीछे से करके ला रहे हैं।”
----***----
::::::::::::::::::::::दो पेज मिस हैं पेज न. 42, 43:::::::::::::::::::::::::::::::::::::::
लोकापवाद के भय से असत्य का आश्रय लेना एक ऐसा दोष है, जो मनुष्य को नैतिक पतन की ओर ले जाता है। मनुष्य से भूल हो जाना कोई अपराध बन पड़ना आश्चर्यजनक नहीं है। अज्ञान अथवा असावधानी के कारण ऐसा हो जाता है। अपराध निश्चय ही अपराध है। उसको मान्यता नहीं दी जा सकती। तथापि क्वचित् प्रायश्चित से उसका परिमार्जन हो सकता है। पर जब मनुष्य अपने उस अपराध को छिपाने के लिए असत्य का आश्रय लेता है, तब वह अपराध और भी जघन्य हो जाता है। साधारण दोष भी पाप में बदल जाता है।
जान-अनजान में कोई अपराध अथवा पाप बन पड़े तो उसे झूठ बोलकर अथवा मिथ्या व्यवहार कर छिपाने की भूल नहीं करनी चाहिए। यदि उसे जन-साधारण पर न भी प्रकट किया जाए तब भी अपने हितैषी गुरुजनों पर उसे प्रकट ही कर देना चाहिए। इससे कई बड़े-बड़े लाभ होते हैं। एक तो यह कि प्रकट हो जाने से पाप की पीड़ा कम हो जाती है। छिपाने के लिए असत्य अथवा छल का आश्रय नहीं लेना पड़ता। सबसे बड़ी बात यह है कि गुरुजन उसका प्रायश्चित तो बतलाते ही हैं, साथ ही अपनी शिक्षा, उपदेश, निर्देश अथवा परामर्श द्वारा पाप प्रवृत्ति के दमन की प्रेरणा देते हैं, जिससे कि आगे का जीवन अधिकाधिक निष्कलुष हो जाता है। गुरुजनों पर पाप प्रकट करने से अपवाद, उपहास अथवा जग हंसाई का भय नहीं रहता। वे तो जन-मानस के उत्तरदायी वैद्य होते हैं। उनका काम, पीड़ित का उपचार करना होता है, उपहास करना नहीं।
आधार कोई भी हो और कोई भी कारण क्यों न हो, असत्य का आश्रय लेना ठीक नहीं। असत्य स्वयं में ही एक बहुत बड़ा पाप है। मानव-जीवन की आधार-शिला सत्य पर ही अवस्थित है। असत्य तो उसका विरोधी भाव है। मानव-जीवन जहाँ स्वयं भी एक सत्य है, वहाँ उसका लक्ष्य भी सत्य ही है। इसलिए अधिकाधिक सत्य को आश्रय करके ही जीवन की व्यवहार विधि निर्धारित करनी चाहिए।
असत्य को अपनाना नास्तिकता को प्रश्रय देना है। ईश्वर का विरोध करना है। ‘सत्यंह्येव ब्रह्म’। सत्य ही ब्रह्म है। इस दशा में जो सत्य के विपरीत जाता है, वह परमात्मा से विमुख होता है। मानव-जीवन का यथार्थ लक्ष्य परमात्मा को जानना और पाना है। उसके उपायों में सत्य को सबसे बड़ा उपाय बतलाया गया है। धर्माचरण से ही ईश्वर की प्राप्ति संभव है और उस धर्म का सार सत्य में निहित है-महाभारत के शाँति पर्व में एक स्थान पर कहा गया है-
नास्ति सत्यात्परो धर्मो, नानृतात्पातकं परम। श्रुतिर्हिं सत्यं धर्मस्य तस्मात्सत्यं न लोपयेत्॥
सत्य से बढ़कर कोई धर्म नहीं। असत्य से बढ़कर कोई पातक नहीं। सत्य ही धर्म का आधार है। अतएव सत्य का परित्याग कभी भी नहीं करना चाहिए।
सत्य का परित्याग कर देने वाले जीवन जगत् के मूल तथ्य से ही परे चले जाते हैं। वे असत्य के भ्रम के और अज्ञान के गहरे अंधकार में भटकते हुए अपने बहुमूल्य जीवन को नष्ट करते रहते हैं। असत्य दोष से दूषित धर्माचरण भी कोई फल नहीं लाता। मिथ्या साधक जीवन भर साधना, जप, अनुष्ठान आदि में लगे रहते हैं। पर उनके हाथ कुछ भी नहीं आता। उनकी सारी साधना, सारी तपस्या और सारा धर्माचरण यहाँ तक कि सारा जीवन ही व्यर्थ चला जाता है। बाद में वे सोचते और पछताते हैं कि ऐसी क्या कमी रह गई कि साधना का कोई लाभ नहीं हुआ। इस निराशा में वास्तविकता यह होती है कि वे इस आप्त वचन को नहीं जानते-
सत्यं ब्रह्म तपः सत्यं, सत्यं विसृजते प्रजाः। सत्येन धार्यते लोकः स्वर्गं सत्येन गच्छति॥
सत्य ही ब्रह्म है, सत्य ही तप, सत्य से ही सृष्टि उत्पन्न होती है। सत्य ही इस पृथ्वी को धारण किए हुए है। सत्य से ही स्वर्ग प्राप्त होता है।
इतने महनीय महत्व का तत्व-सत्य छोड़कर जो साधना की जाएगी, उसका निष्फल हो जाना स्वाभाविक ही है। सारे श्रेयों का मूल सत्य ही है। जब उसका परित्याग कर साधना में निरत हुआ जाएगा तो वह एक विडम्बना के सिवाय और क्या सिद्ध हो सकती है। सामान्य जीवन में ही नहीं, सत्य का महत्व तो आध्यात्मिक जीवन में और भी अधिक है। जो आध्यात्मिक जीवन में उतरता है, वह मानों एक प्रकार से सत्याचरण करने की प्रतिज्ञा करता है। अध्यात्मवाद और सत्य समानार्थी शब्द हैं। अध्यात्मवादी बनकर भी जो असत्य को अपनाता है। वह एक सामान्य व्यक्ति से बढ़कर पाप करता है। सत्य या तप करने से अच्छा है कि किसी तप में न होकर सत्य को ही अपना लिया जाए। सत्य स्वयं में ही बहुत बड़ा तप है। उसका महत्व बतलाते हुए कहा गया है-
अश्वमेध सहस्रं च सत्यं तुलया धृतम्। अश्वमेध सहत्राद्धि सत्यमेव विशिष्यते॥
सहस्र अश्वमेध के पुण्य को एक ओर और सत्य को एक ओर तुला पर रखा जाए तो सहस्र अश्वमेध की अपेक्षा सत्य विशिष्ट बैठेगा।
अध्यात्म की सिद्धि- परमात्मा की प्राप्ति जीवन में सत्य को आश्रय दिए बिना नहीं हो सकती। हम सत्य बोलें, सत्य के अनुसार ही विचार करें, सत्य से प्रकाशित कर्म करें और सदा-सर्वदा सत्य-परायण होकर व्यवहार करें तो निश्चय ही एक इस ही जन्म में परमात्मा की प्राप्ति कर सकते हैं। एक सत्य का ही आश्रय ले लेने पर फिर किसी और तप आदि की आवश्यकता नहीं रहती। महापुरुषों ने अपने जीवन के जिन अनुभवों को संसार को दिया है, उनमें सत्य को ही प्रथम स्थान-प्रदान किया है।
मन-वचन और कर्म से सत्य का आचरण करने वाला निश्चय ही एक महान् तपस्वी होता है। सच्चा तप क्या है? किसी सत्-व्रत का निरन्तर निर्वाह। सत्-व्रतों की गणना में सत्य सर्वश्रेष्ठ व्रत है। इस व्रत का समुचित निर्वाह करने वाला सहज ही भवसागर में पार हो जाता है। उसके द्वारा पालित सत्य स्वयं ही नौका रूप बनकर उसका संतरण कर देता है। सत्य की साधना से आत्मा में आप्त तेज का विकास होता है। साधक का व्यक्तित्व सुखद और प्रभावशाली बनता है। संसार में जितने भी आत्मज्ञानी और तत्वदर्शी हुए हैं, उन सबने अपने अनुभवों और साँसारिक निष्कर्षों के आधार पर एक स्वर में सत्य की महत्ता घोषित की है। और अभिवचनों, धर्म-ग्रन्थों, शास्त्रों तथा आत ग्रन्थों द्वारा मानव-समाज को सत्य को धारण और उसी का आचरण करने का निर्देश किया है। जो धर्म जन महापुरुष के इन वचनों का आदर करते हुए सत्य पथ का आलम्बन करते हैं, वे क्या भौतिक और क्या आध्यात्मिक किसी भी जीवन क्षेत्र में सफल नहीं होते। हर दिशा और हर चरण पर उनकी विजय ही होती चलती है।
सत्य की इतनी महत्ता, प्रेरणा और आदेश न होने पर भी लोग असत्य का आश्रय क्यों लेते हैं? यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है। इसका उत्तर यह कहकर दिया जा सकता है-नशे का व्यसन बुरी बात है। उससे शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक, आत्मिक, आर्थिक तथा सामाजिक सब प्रकार की हानियाँ होती हैं, तब भी लोग क्यों नशा खाते-पीते हैं। इसीलिए कि उनका वह दुर्व्यसन वैसा करने के लिए बलात् प्रेरित करता है। बात दरअसल यह नहीं होती कि मद्यप मद्य त्याग का लाभ नहीं जानता अथवा वह उसको बुरा नहीं मानता-बात दरअसल यह होती है कि अभ्यासवश उनका स्वभाव खराब हो जाता है। व्यसन की बुराई उन्हें इस प्रकार शिकंजे में जकड़कर निर्बल कर देती है कि उनमें उससे बचने का उत्साह नहीं रहता। वे उससे आसक्त होकर उसे छोड़ने का प्रयत्न नहीं करते अन्यथा ऐसी बात नहीं कि वे उससे मुक्त नहीं हो सकते।
यही तथ्य सत्य और असत्य के विषय में भी घटित होता है। लोग सत्य की विशेषता जानते हैं और उसकी उपयोगिता भी। लेकिन असावधान रहकर वे असत्य का अभ्यास कर लेते हैं। उनका स्वभाव इस अभ्यास के यहाँ तक अधीन हो जाता है कि वे लोग अनावश्यक और अकारण ही झूठ का व्यवहार करने लगते हैं। इस दोष के कारण उन्हें बहुत बार हानि भी उठानी पड़ती है, तब भी वे उस विषय में विवश ही रहते हैं। असत्य अभ्यासी जहाँ भी बैठता है, योंही अकारण झूठी बातें करने लगता है, जो भी व्यवहार करता है, उसमें असत्य का समावेश कर लेता है। सीधा, सरल और सत्य बोलना व्यवहार कर सकना, उसके वश में ही नहीं रहता। उसका सारा जीवन वाचालता, प्रलापता और अपवादिता से दूषित हो जाता है।
मनुष्य का यह स्वभाव अच्छा नहीं। इससे बड़ी गहरी और दूरगामिनी हानियाँ होती हैं। सबसे स्थूल और प्रत्यक्ष हानि तो यही होती है कि लोग उसे झूठा और मिथ्यावादी समझकर उसका विश्वास करना छोड़ देते हैं। उसके प्रति अविश्वास की स्थिति इस सीमा तक पहुँच जाती है कि एक बार यदि वह सच्ची बात भी कहता और सच्चा व्यवहार भी करता है तो भी उसे झूठा मानकर उस पर विश्वास नहीं किया जाता।
दूसरे प्रकार की हानियाँ जो इससे भी अधिक भयंकर होती हैं। वाणी को ईश्वर का स्वरूप माना गया है- ‘शब्दों से ब्रह्म’-इस ईश्वर रूप वाणी को असत्य से कलुषित करना ईश्वर का स्पष्ट अपमान करना है। ईश्वर की अवहेलना, उसका तिरस्कार अथवा अपमान करने वाले के लोक-परलोक नष्ट हो जाते हैं। वह अनेक जन्मों तक सद्गति प्राप्त नहीं कर सकता। वाणी और व्यवहार में असत्य को आश्रय देने वाले व्यक्ति का आत्मिक तेज नष्ट हो जाता है। वह व्यक्तित्वहीन होकर दीन-हीन और मलीन बन जाता है। सत्य को बुद्धि का नेत्र माना गया है। जो व्यक्ति असत्य का आधार लेता है, वह बुद्धि के इस नेत्र को स्वयं फोड़ लेता है। एक तो अंधा और फिर बुद्धि का अंधा। व्यक्ति पतन और पाप के किन भयंकर नरकों में गिर सकता है, इसका अनुमान नहीं किया जा सकता।
लोक, परलोक, मन, बुद्धि और आत्मा के कल्याण के लिए मनुष्य को असत्य का त्याग कर सत्य को ग्रहण करना चाहिए। असत्य बोलने का अभ्यास छोड़कर सत्य बोलने का साहस और अभ्यास करना चाहिए। जो कुछ बोलें, जो कुछ करें और जो कुछ सोचें उसे सत्य के प्रकाश में ही बोलें, करें और सोचें। सत्य को ही प्रश्रय दें, उसी को ग्रहण करें और उसी का पक्ष लें। असत्य को प्रश्रय देने अथवा असत्य का पक्ष लेने से मनुष्य का पतन हो जाता है। उसकी साख गिर जाती है और सामाजिक सम्मान नष्ट हो जाता है।
असत्य से बचने और सत्य का अभ्यास करने का सबसे सरल और सफल उपाय यही है कि जो कुछ बोला जाय खूब-सोच समझकर नाप-तोल कर बोला जाए। भाषण में कम से कम शब्दों का प्रयोग भी असत्य से बचने का एक अच्छा उपाय है। जो वाचाल वाणी को बे-लगाम छोड़कर उसे मनमाने ढंग से चलने देते हैं, वे असत्य के दोष में अनायास ही फंस जाते हैं। सत्य बहुत नहीं थोड़ा ही होता है। उसे व्यक्त करने के लिए बहुत बड़े वाग्जाल की आवश्यकता नहीं होती। संक्षिप्त और सधे हुए शब्दों में उसे आसानी से प्रकट किया जा सकता है।
वाणी को देवता माना गया है। उसका उपयोग उस देवता की पूजा ही है। सत्य के स्थान पर असत्य का प्रयोग करने से वाग्देवता रुष्ट हो जाते हैं, जिससे मनुष्य की वाणी उसके कथन का प्रभाव नष्ट हो जाता है। अनावश्यक रूप से बकवास करते रहने से लाभ तो कुछ होता नहीं, उलटे वाचालता का दोष लगता है। इसीलिए कम से कम भाषण करने को मनुष्य को एक गुण और वाणी का तप बतलाया गया है। कम भाषण का अभ्यास करने के लिए मौन व्रत का अवलम्ब लेना बड़ा हितकर हो सकता है। आवश्यकता भर बोलिये। बाकी सारे समय मौन रहिए। वाणी में संक्षेप आते ही सत्य का समावेश होने लगेगा। इस प्रकार कुछ दिन साधन करते रहने पर असत्य का स्वभाव छूटने और सत्य का स्वभाव बनने लगेगा। यदि सहसा सत्य-निष्ठा ग्रहण करने में कठिनाई हो तो उसको धीरे-धीरे तो ग्रहण किया ही जा सकता है। इसके लिए कहा भी गया है-
अनुगन्तुं सतां वर्त्म कृत्स्नं यदि न शक्यते। स्वल्प मप्यनुगन्तण्यं मार्गस्थो नावसीदति॥
-यदि सत-पथ पर सहसा चल सकना शक्ति के बाहर हो तो थोड़ा-थोड़ा चलते रहना चाहिए। क्योंकि मार्ग पर आगे बढ़ते रहने वाला कभी न कभी गन्तव्य स्थान पर पहुँच ही जाता है।
----***----
विकासवाद के सिद्धाँत के समर्थकों में प्रसिद्ध वैज्ञानिक हीकल्स भी आते हैं। वे भी यह मानते हैं कि मनुष्य शरीर का विकास एक कोषीय जीव (प्रोटोजोन्स) से हुआ। पहले अमीबा, अमीबा से स्पंज, स्पंज से हाइड्रस फिर जेलीफिश मछली, मेंढक, साँप, छिपकली, चिड़िया, घोड़े आदि से विकसित होता हुआ आदमी बना। इसके लिए (1) जीवों के मिले अवशेषों (2) विभिन्न प्राणियों की शारीरिक बनावट के तुलनात्मक अध्ययन, (3) थ्योरी आफ यूज एण्ड डिसयूज (अर्थात् जिस अंग का प्रयोग न किया जाए, वह घिसता और नष्ट होता चला जाता है, उदाहरण के लिए पहले मनुष्य पेड़ों पर रहता था। उछल कर चढ़ने के लिए पूँछ आवश्यक होती है तब मनुष्य को पूँछ थी यह इसका निशान ‘टेल वरटिब्रो’ के रूप में अभी भी शरीर में है। पर जब मनुष्य पृथ्वी पर रहने लगा, पेड़ों पर चढ़ने की आवश्यकता न पड़ी तो पूँछ का प्रयोग भी बंद होता गया और वह अपने आप घिस गई) इन तीन उदाहरणों से यह सिद्ध किया जाता है कि मनुष्य शरीर विकसित हुआ है।
किन्तु एक शरीर से दूसरे शरीर के विकास का समय इतना लंबा है कि उन परिवर्तनों को सही मान लेना बुद्धि संगत नहीं जान पड़ता। प्रकृति के परमाणुओं में भी ऐसी व्यवस्था नहीं है कि एक बीज से दूसरे बीज वाला पदार्थ पैदा किया जा सके, भले ही उसके लिए भिन्न प्रकार की जलवायु प्रदान की जाये। जलवायु के अंतर से फल के रंग आकार में तो अंतर आ सकता है पर बीज के गुणों का सर्वथा अभाव नहीं हो सकता।
‘सेल फिजियोलॉजी ग्रोथ एण्ड डेवलपमेन्ट्स’ विभाग कार्नेल यूनिवर्सिटी के डाइरेक्टर डॉ. एफ सी स्टीवर्ड ने एक प्रयोग किया। उन्होंने एक गाजर काटी। उसका विश्लेषण करके पाया कि वह असंख्य कोशिकाओं (सेल्स) का बना हुआ है। इन सभी कोशिकाओं के गुण समान थे। कुछ कोशिकायें निकालकर काँच की नलियों में रखीं। खाद्य के रूप में नारियल का पानी दिया। कोशिका जो संसार में जीवन की सबसे छोटी इकाई होती है, जिसके और टुकड़े नहीं किये जा सकते। वह इस खाद्य के संसर्ग में आते ही 1 से 2, 2 से 4, 4 से 8 अनुपात में बढ़ने लगीं और प्रत्येक कोष ने एक स्वतंत्र गाजर के वृक्ष का आकार ले लिया।
इस प्रयोग से दो बातें सामने आती हैं- (1) कोष अपने भीतर की शक्ति बढ़ाकर अपनी तरह के कोष बना सकते हैं (2) किन्तु नई जाति का कोष बना लेना किसी अन्य कोष के लिए संभव नहीं, यदि ऐसा होता तो नारियल के पानी के आहार के साथ गाजर का कोष किसी अन्य प्रकार के वृक्ष और फल में बदल गया होता। प्रकृति की यह विशेषता विकासवाद के साथ स्पष्ट असहमति है। एक कोषीय जीव (प्रोटोजोआ) से मनुष्य का विकास तथ्य नहीं रखता। जोड़ गाँठ करके बनाया गया तिल का ताड़ मात्र है।
‘थ्योरी आफ यूज एण्ड डिस्यूज’ की बात में तो भी कुछ दम है, उससे इच्छा शक्ति की सामर्थ्य का पता चलता है। यदि हमारे मस्तिष्क में किसी जबर्दस्त परिवर्तन की आकाँक्षा हो तो निश्चय ही वह कोषों के संस्कार सूत्रों (जीन्स कोष में बटी हुई रस्सी की तरह का अति सूक्ष्म अवयव जिस पर कोष के विकास की सारी संभावनायें और भूत का सारा इतिहास संस्कार रूप में अंकित रहता है, को बदल सकता है। यदि संस्कार सूत्र (जीन्स) बदल जायें तो नये बीजों में परिवर्तन आ सकता है पर यह सब चेतन इच्छा शक्ति के द्वारा ही संभव है, किसी वैज्ञानिक प्रयोग से नहीं।
इस बात से जहाँ विकासवाद के सिद्धाँत का खंडन होता है, वहाँ 84 लाख योनियों में भ्रमण और कर्मफल की बात भी सत्य जान पड़ती है। हम देखते हैं कि मनुष्य की इच्छा शक्ति का कभी अंत नहीं होता। मृत्यु के समय एक या अनेक इच्छायें बलवान हो उठती हैं, उसके अनुरूप ही संस्कार सूत्र (जीन्स) में परिवर्तन आ जाता है। जीन्स कभी नष्ट नहीं होते, यदि किसी तरह उनमें चेतना का अंश सिद्ध किया जा सके तो यह निश्चयपूर्वक कहा जा सकता है कि अपनी इच्छाओं के वश में बंधा हुआ होने के कारण ही मनुष्य दूसरी-दूसरी योनियों में भटकता रहता है।
अंतिम इच्छाओं के अनुसार परिवर्तित जीन्स जिस जीव के जीन्स से मिल जाते हैं, उसी ओर ये आकर्षित होकर वही योनि धारण कर लेते हैं। 84 लाख योनियों में भटकने के बाद वह फिर मनुष्य शरीर में आता है। गर्भोपनिषद् में इस बात की पुष्टि हुई है।
पूर्व योनि तहस्त्राणि दृष्ट्वा चैव ततो मया। आहारा विविधा मुक्ताः पीता नानाविधाः। स्तनाः………………………...। स्मरति जन्म मरणानि न च कर्म शुभाशुभं विन्दति॥”
अर्थात्- उस समय गर्भस्थ प्राणी सोचता है कि अपने हजारों पहले जन्मों को देखा और उनमें विभिन्न प्रकार के भोजन किये, विभिन्न योनियों के स्तन पान किये। अब जब गर्भ से बाहर निकलूँगा, तब ईश्वर का आश्रय लूँगा। इस प्रकार विचार करता हुआ प्राणी बड़े कष्ट से जन्म लेता है पर माया का स्पर्श होते ही गर्भ ज्ञान भूल जाता है। शुभ अशुभ कर्म लोप हो जाते हैं। मनुष्य फिर मनमानी करने लगता है और इस सुरदुर्लभ शरीर के सौभाग्य को गंवा देता है।
सौभाग्य से हीकल्स की अपनी व्याख्या से ही इस बात का समर्थन हो जाता है। उन्होंने भ्रूण-विज्ञान में एक प्रसिद्ध सिद्धाँत दिया—“आन्टोजेनी रिपीट्स फायलोजेनी” अर्थात् चेतना गर्भ में एक बीज कोष में आने से लेकर पूरा बालक बनने तक, सृष्टि में या विकासवाद के अन्तर्गत जितनी योनियाँ आती हैं, उन सब की पुनरावृत्ति होती है। प्रति तीन सेकिंड से कुछ कम के बाद भ्रूण की आकृति बदल जाती है। स्त्री के प्रजनन कोष में प्रविष्ट होने के बाद पुरुष का बीज कोष 1 से 2, 2 से 4, 4 से 8, 8 से 16, 16 से 32, 32 से 34 कोषों में विभाजित होकर शरीर बनता है।
इन भावनात्मक परिस्थितियों को हम समझते कहाँ हैं? बौद्धिक दृष्टि से परावलम्बी हम भारतीयों को तो अब पाश्चात्य विद्वानों ओर वैज्ञानिकों की बातें अधिक प्रामाणिक लगती हैं। भले ही उनके विचार-चिन्तन की दिशा एकाँगी हो। वही तथ्य जब हमारे सिद्धान्त पुष्ट करते हों, तब भी हम अपने दर्शन अपनी धार्मिक मान्यताओं से बिलकुल आँखें मूँदे रहें, इससे बढ़कर दुर्भाग्य हमारे लिये और क्या हो सकता है।
नारदजी ने खिन्न होकर प्रजापति ब्रह्मा से कहा- ‘भगवन्। मनुष्य ही यथेष्ट था आपने यह संसार भर के जीव-जन्तु बनाकर उन्हें व्यर्थ कष्ट क्यों दिया?’
भावनाओं की गहराई में डूबते हुए ब्रह्माजी ने कहा- “जीव अधःपतन को रोकने के लिए कोई और उपाय भी तो नहीं था नारद।”
28 अगस्त 1883 की बात है। बोस्टन से छपने वाले दैनिक समाचार पत्र ‘बेस्टनाग्लोब’ के संवाददाता श्री एड सैमसन ने उस दिन काफी देर तक काम किया था। उसे कई दिन की थकावट थी सो रात पूरी तरह विश्राम करना चाहता था। प्रेस के चपरासी को उसने हिदायत दी- मुझे 3 बजे से पहले न जगाया जाये और यह कहकर वह अपने बिस्तर पर लेट सो गया।
उस रात उसने एक स्वप्न देखा - ‘महाभयंकर हृदय को कंपा देने वाली मानवीय इतिहास की एक जबर्दस्त दुर्घटना जिसने लोगों को यह सोचने के लिए विवश किया कि संसार में स्थूल हलचलें ही सब कुछ नहीं जो दिखाई नहीं देता, उस सूक्ष्म आकाश में भी ऐसी अनेक सूक्ष्म शक्तियाँ क्रियाशील हैं, जो मनुष्य की अपेक्षा अधिक संवेदनशील, शक्ति और सामर्थ्य से परिपूर्ण हैं। इस घटना ने ही एक छोटे से संवाददाता की प्रतिष्ठा सारे विश्व में फैला दी।
एड सैमसन ने देखा-एक भयंकर पहाड़-उससे लाल रंग का लावा फूट पड़ा, जिससे उस द्वीप में महाभयंकर विनाशलीला प्रारंभ हो गई। टापू अग्नि ज्वालाओं में बदल गया है। पृथ्वी काँप रही है और सब कुछ जलता हुआ स्वाहा होता जा रहा है। स्वप्नावस्था में ही उसने किसी से पूछा- ‘इस द्वीप का क्या नाम है’- ‘प्रालेप’ किसी ने स्वप्न में ही संदेश दिया और सैमसन की नींद टूट गई।
स्वप्न इतना वीभत्स था कि वह दृश्य सैमसन के मस्तिष्क में ज्यों के त्यों उभरे तब तक आँदोलन मचाते रहे, जब तक उसने पूरे स्वप्न को एक लेख के रूप में तैयार नहीं कर लिया। उसने सोचा यह था कि यह लेख किसी दिन समाचार में छापेंगे-इसलिए उस पर इम्पोर्टेन्ट (महत्वपूर्ण) की चिट लगाई और घर चला गया।
प्रातःकाल संपादक आया, उसने महत्वपूर्ण की चिट लगे इस समाचार को पढ़ा, उसे लगा, यह किसी संवाददाता का समाचार है सो ‘बोस्टेन-ग्लोब’ में मुख पृष्ठ पर प्रमुख समाचार के रूप में दोहरा शीर्षक देकर छाप दिया। 29 अगस्त को समाचार सारे संसार में फैल गया। जबकि संसार के और किसी भी अखबार में ऐसा कोई समाचार नहीं छपा था। दिन भर ‘बोस्टन ग्लोब’ कार्यालय से पूछताछ चलती रही। सम्पादक अपनी भूल के लिए स्वयं भी हैरान था।
मैक्सिको, आस्ट्रेलिया, अमेरिका से आकाश में गड़गड़ाहट, समुद्री तूफान, भू-कम्पनों के संक्षिप्त समाचार तो मिले पर उतने से सम्पादक और पाठकों में से किसी की जिज्ञासाओं का समाधान न हुआ। आखिर सम्पादक को सारी घटना का भूल सुधार छापना पड़ा।
सचमुच जिस समय युवक संवाददाता एड सैमसन यह स्वप्न देख रहा था, पृथ्वी के दूसरे छोर पर ‘क्राकातोआ’ द्वीप पर भयंकर भूकंप और तूफान आया था। इस भयंकर ज्वालामुखी के कारण संपूर्ण द्वीप समुद्र के गर्त में ऐसे समा गया था, जैसे विशाल घड़ियाल की दाढ़ में मानव अस्थि पिंजर, घटना की पुष्टि कई दिन बाद उधर से लौटने वाले जहाजों ने की। तब फिर ‘भूल सुधार का भूल सुधार’ छापा गया। सैमसन के बड़े-बड़े फोटो समाचार पत्रों में छपे।
इस स्वप्न की गहरी छान-बीन की गई तो कई ऐसे सूक्ष्म रहस्यों का पता चला जो मनुष्य के लिए अकारण कभी संभव ही नहीं हो सकते थे। लोगों ने अनुभव किया वस्तुतः कोई शाश्वत और साक्षी सत्ता है, जिससे संबंध जोड़ने या अनायास जुड़ जाने से ऐसी विलक्षण अनुभूतियाँ हो सकती हैं। पहले लोगों को इस द्वीप के प्रालेप नाम पर टिप्पणी करने का अवसर मिला अवश्य पर पीछे कई दस्तावेजों से यह रहस्य प्रकट हुआ कि डेढ़ सौ वर्ष पूर्व ‘क्राकातोआ’ का नाम ‘प्राले’ ही था।
मानवीय इतिहास में संकलित किये जायें तो इस तरह के पूर्वाभास वाले स्वप्नों के समाचारों से एक दो नहीं हजारों लाखों पुस्तकें लिखी जा सकती हैं, जिनसे यह पता चल सकता है कि स्वप्न वस्तुतः एक विलक्षण विज्ञान और किसी महान आत्मिक सत्य के प्रमाण हैं। पर आज तक यह गुत्थी कोई भी वैज्ञानिक या मनोवैज्ञानिक सुलझा नहीं सका कि आखिर स्वप्नों के सत्य होने का रहस्य क्या है।
भारतीय तत्व-दर्शन में इस संबंध में गूढ़ व्याख्यायें हैं, उनसे नई शोध और उपलब्धियों के भाग भी निकलते हैं। इसकी प्रमाणिकता को कसौटी पर कस कर देखा भी जा सकता है।
भारतीय योगी और तत्वदर्शी आचार्यों के मतानुसार आत्मा और सूर्य में सादृश्यता है। अर्थात् हमारी आत्मा या सूर्य दोनों एक ही हैं। मन शरीर का प्रतिनिधि और आत्मा का अध्ययन करने वाला, जब निद्रावस्था में सुषुम्ना प्रवाह (इसे जीवन रेखा भी कहते हैं) में घूमता है, तब उसका संबंध शरीर की समस्त नस, नाड़ियों, 33 अस्थि खण्डों से जुड़ जाता है। योग द्वारा देखा गया है कि मेरुदण्ड के पोले भाग में सुषुम्ना के भीतर अनेक परतों में छिपे हुए अनेक सूक्ष्म जगत हैं, जिनका संबंध आकाश की दिव्य शक्तियों से है।
सामान्य अवस्था में दूषित आहार-विहार के कारण मन भी दूषित होता है, इसलिए निद्रावस्था में मन जीवन देखा पर भ्रमण करते हुए भी सूक्ष्म लोकों में अंधकार ही देखता है। पर जिनके मन शुद्ध होते अर्थात् उनमें काम, क्रोध, मोह, क्षोभ, प्रतिशोध आदि विकार नहीं होते, उन्हें जीवन रेखा पर चलते हुए अनेक दृश्य ऐसे दिखाई देते हैं, जिनका संबंध हमारे निजी जीवन या पृथ्वी के किसी भी भाग से संबंधित हो सकता है। कई बार प्रकाश चंद्रमा या सूर्य के बिम्ब की अनुभूति होती है, यह आत्मा के साथ आँशिक साक्षात्कार होता है। इस स्थिति के स्वप्न प्रायः बहुत ही स्पष्ट और सत्य होते हैं।
बाइबिल के पंडित पैरासेल्सस ने भी ऐसी ही व्याख्या की है। उन्होंने लिखा है-सूर्य भूमध्य रेखा को पार करता है, 21 मार्च एवं 21 सितंबर को वह एक्वेरियस में गिरता है। यहाँ से चन्द्रमा (लियो) का क्षेत्र प्रारंभ होता है। चन्द्रमा की सूक्ष्म शक्तियों का संबंध हृदय से है। यदि मनुष्य का मन शुद्ध है, अन्तर्मुखी है तो स्वप्नावस्था में मनुष्य को इसी गति का बोध होता है। अर्थात् मनुष्य की निद्रावस्था सूर्य की दूसरी कक्षा में परिचालन में जो कि अधिक विराट अंतरिक्ष को प्रभावित करती है, अपनी अनुभूति होती है। वह मन द्वारा चन्द्रमा के प्रकाश या तत्व के कारण होती है।
उस अवस्था में सूर्य का सूक्ष्म प्रकाश अपनी पृथ्वी के अयन-मंडल (आयनोस्फियर) को भी प्रभावित करता रहता है, इसलिए हमारे बहुतायत स्वप्न पृथ्वी की परिधि के भी होते हैं, किन्तु उस समय चेतना अपने शाश्वत स्वरूप में होती है, इसलिए वह अनुभूतियाँ जागृत अनुभवों से भिन्न प्रकृति की होती हैं। जब हमारी आत्मा इतनी पवित्र होती है कि उसमें सूर्य के प्रकाश जैसी पवित्रता आ जाती है तो हमारे स्वप्न बहुत स्पष्ट, ऊर्ध्वमुखी, आशयपूर्ण और सुखदायक होते हैं, गायत्री उपासकों के स्वप्न इसीलिए बहुत सार्थक, स्पष्ट और भविष्य का ज्ञान कराने वाले होते हैं, क्योंकि वे सूर्य की अदृश्य शक्ति-धाराओं से प्रभावित होते हैं, गायत्री उपासक ही नहीं, जिनकी आत्माएं गुण, कर्म, स्वभाव से जितनी अधिक पवित्र होंगी, उन्हें उतनी ही स्पष्ट अनुभूतियाँ होंगी, वे भले ही किसी देश, प्राँत या काल के निवासी हों।
जैसा कि ऊपर बताया जा चुका है, स्वप्नावस्था सूर्य की विपरीत स्थिति में अनुगमन का ही परिणाम होती है, इसलिए सूर्य चेतना की तरह ही स्वप्न चेतना स्पष्ट और प्रकाशपूर्ण होती है। अर्थात् उस समय हम सूर्य-शक्ति के आँशिक साक्षात्कार में डूबे हुए होते हैं, कई बार स्वप्न में सूर्य या चन्द्रमा के बिम्ब स्पष्ट प्रकट होते हैं, वह क्षणिक आत्म बोध की अनुभूतियाँ होती हैं, सिद्धि का स्वरूप उसी का अपरिवर्तित रूप कहा जा सकता है और इसीलिए कहा जाता है कि योगी कभी सोता नहीं- या निशा सर्वभूतानां तस्यामि जागर्तिसंयमी।’ योग सिद्ध पुरुष स्वप्न अवस्था में भी पृथ्वी के उस भाग में जहाँ सूर्य रहता है, अपने सूक्ष्म शरीर में रहता है और सूर्य प्रकृति के साथ उसका तादात्म्य होता है, सूर्य की चेतना सर्वदा एक-सी रहती है, इसलिए उस योगी की चेतना भी काम करती रहती है। अर्थात् वह उस अवस्था में किसी को स्थूल संदेश प्राण या प्रकाश दे सकता है। दो पवित्र आत्माओं की भेंट से दूर-दर्शन, दूर-श्रवण भी इसी सिद्धाँत का फलित है।
यह पूछा जा सकता है कि जीव चेतना की आत्मचेतना में परिणित किस प्रकार होती है। यह जानने के लिए हमें सुषुम्ना शीर्षक के अंदर होने वाले प्राण प्रवाह और उसके सात केन्द्रों का अध्ययन करना पड़ेगा। इसी सूक्ष्म संस्थान में ब्रह्मांड को बीज रूप में उतारा गया है और वह अदृश्य केन्द्र बनाए गये हैं, जो सूर्य, चन्द्रमा, पृथ्वी आदि लोगों से संबंध रखते हैं। स्वप्नावस्था में वैज्ञानिक भाषा से, अवचेतन मन सुषुम्ना शीर्षक में प्रवेश करता है। जिसे एक्वेरियन कहते हैं और जिस पर सूर्य शक्ति का परिभ्रमण होता है, वह इसी सुषुम्ना की ही सूक्ष्म-शक्ति धारा है। सिम्पेथेटिक मस्तिष्क प्रणाली की नसें भी-ग्रन्थियों की दो जंजीरों की तरह रीढ़ की हड्डी के दोनों तरफ होती हैं और उसमें से नसों के रेशे दिल, पेट, आँतों एवं अन्य मुख्य अंगों तक जाते हैं। मस्तिष्क कोष से संबंधित रिफलेक्स आर्क जो नस रेशों से संबंधित रहता है, बिना मस्तिष्क को समाचार पहुँचाये ही सुषुम्ना द्वारा माँसपेशियों के वातावरण के अनुकूल हरकत कराता रहता है, इसलिए मूल चेतना से संबंध विच्छेद हो जाने पर भी मनुष्य शरीर जीवित बना रहता है और उतने समय में वह चेतना सुषुम्ना के भीतर पोले भाग में परिभ्रमण करती हुई उन शक्ति-केन्द्रों के अनुभव और तन्मात्रायें ग्रहण करती रहती है।
विज्ञान ने अब तक रीढ़ से लेकर दुम तक ऐसी 49 ग्रन्थियों की जानकारी प्राप्त की है और यह स्वीकार किया है कि उनमें से 7 का विशेष महत्व है और उनसे दिव्य गंधों, दिव्य शब्दों एवं दिव्य प्रकाशों, जैसे सूक्ष्म तत्वों की अनुभूतियाँ मनुष्य को हो सकती हैं इतना मानकर भी वैज्ञानिक यह नहीं जान पाये हैं कि यह शक्ति-केन्द्र क्या वस्तुतः तात्विक रूप से किन्हीं आकाशीय नक्षत्रों से संबंध रखते हैं, इसे योगियों ने ध्यान नेत्रों से देखा और पहचाना कि यह शक्ति धारायें अस्थि खण्डों के तैंतीस सूत्रों में और शरीर की 72 हजार नाड़ियों में किस प्रकार प्रवाहित होकर चेतना को मूल ब्रह्मांड से जोड़ती हैं। इस समय मस्तिष्क की तिल्ली से अदृश्य नक्षत्रों की शक्तियाँ शरीर में खिंची चली आतीं और गुलाब के फूल की सुगन्ध की तरह शरीर में फैलती रहती हैं, इस अवस्था में अपने भीतर से भी संदेश प्रकाश और भावनाएं औरों को प्रेषित की जा सकती हैं पर यह सब मानसिक शक्तियों के नियंत्रण और आत्मिक शुद्धता पर निर्भर है।
स्वप्न इन्द्रियातीत अनुभूतियाँ होती हैं, यह अनुभूतियाँ उतनी ही सत्य और स्पष्ट हो सकती हैं, जितना शुद्ध और अन्तर्मुखी हमारा अन्तःकरण हो। एलियस होवे जिस दिन अपनी असफलता पर दुखी हुआ था, उसे स्वप्न में सिलाई की मशीन का ज्ञान मिला था। सर ई.ए. वालिस बज प्राचीनतम प्राच्य भाषाओं के विद्वान हो गये हैं, उनका हृदय बड़ा शुद्ध था। उन्हें एसीरियन और एक्वेडियन भाषाओं के कठिन प्रश्न-पत्र स्वप्न में ही सूझ गए थे। कई बार दुष्ट और दुराचारी लोगों को भयंकर स्वप्न दिखाई दिये हैं पर वह उन्हें आत्म-शक्ति के द्वारा चेतावनी जैसे रहे हैं, जिनसे अनेक लोगों को अपनी जीवन दिशाएं बदलते देखा गया है। अपनी वृत्तियों को शुद्ध बनाकर प्रकाशमय बनाकर सरल और संवेदनशील बनाकर हम भी इस ईश्वरीय शक्ति का अपने जीवन में महत्वपूर्ण उपभोग कर सकते हैं।
भिखारी दिन भर भीख माँगता-माँगता शाम को एक सराय में पहुँचा और भीतर की कोठरी में भीख की झोली रखकर सो गया।
थोड़ी देर पीछे एक किसान आया उसके पास रुपयों की एक थैली थी। बैल लेने आया था। रात में वह भी उसी सराय में रुका, जहाँ भिखारी था और वह पोटली सिराहने रखकर सो गया।
भीख की झोली रुपयों की थैली से बोली ‘बहन! हम तुम एक बिरादरी हैं, इतनी दूर क्यों हैं, आओ हम तुम एक हो जायें?’
रुपयों की थैली ने हंसकर कहा- “बहन क्षमा करो, यदि मैं तुमसे मिल गई तो संसार में परिश्रम और पुरुषार्थ का मूल्य ही क्या रह जायेगा।”
----***----
संसार में जो कुछ श्रेष्ठ और उत्तम है, उसका सीधा संबंध परमात्म-तत्व से है। निकृष्टता और निम्नता से उस सच्चिदानन्द परमात्मा का कोई संबंध नहीं। उत्तमता से प्रेम करना, उत्तमता को ग्रहण करना और अपने समग्र जीवन में उत्तमता एवं श्रेष्ठता को समाविष्ट करना ईश्वर की सर्वोत्तम उपासना और शक्ति है।
उत्तमता की उपलब्धि ईश्वरीय उपलब्धि के समान है। सुख, संतोष, शाँति, सरलता, प्रेम और करुणा आदि की प्राप्ति ईश्वर-प्राप्ति के लक्षण हैं। उत्तम वस्तुएं, उत्तम विचार और उत्तम गुण पा जाने पर मनुष्य में भक्त लक्षण स्वयमेव उद्भूत हो उठते हैं। उत्तमता प्राप्त व्यक्ति अपने में एक त्रयकालिक पूर्णता का अनुभव करता है। पूर्णता का अनुभव ब्रह्मानन्द का प्रदाता होता है। इस प्रकार सारी पूर्णताओं, आनन्दों और संतोषों का आधार उत्तमता को ही मानना चाहिए।
मनुष्य संसार का सर्वोत्तम प्राणी है इसलिए कि उसका सर्वोत्तम तत्व परमात्मा से निकटतम संपर्क है। उसने परमात्मा को खोजा, पाया और उससे संपर्क स्थापित किया। बदले में परमात्मा ने उस पर अपना ज्ञान, अपनी शक्ति, अपनी गरिमा और अपना धर्म अवतरित किया, उसकी आत्मा में बोध रूप से स्वयं भी अवतरित हुआ। यही तो वह विशेषता है, जिसके आधार पर मनुष्य विद्वान के रूप में ज्ञान का, वैज्ञानिक के रूप में रहस्यों का और शूरवीरों के रूप में अमरता का सम्पादन कर सका है और कर रहा है। ऐसे सर्वोत्तम प्राणी मनुष्य का जन्मसिद्ध अधिकार और कर्त्तव्य दोनों ही उत्तमता और श्रेष्ठता ही है। अपने इस दैवी अधिकार और कर्त्तव्य से च्युत होना उसके लिए अशोभनीय है, अयोग्य है।
मनुष्य संसार की प्रत्येक उत्तम वस्तु का अधिकारी है। इसलिए कि वह संसार में सर्वोत्तम जो है। ऐसा भी नहीं कि कोई उत्तम वस्तु उसके लिए दुर्लभ हो। हर उत्तम वस्तु उसके लिए सहज सुलभ है। इस सुलभता का कारण यह नहीं है कि वे सब वस्तुएं उत्तराधिकार में उसके नाम लिख दी गई हों। इस सुलभता का कारण यह है कि मनुष्य में सर्वशक्तिमान का अंश विद्यमान है। जिसके अनुग्रह से वह स्वयं भी सर्वशक्तिमान है। जो शक्तिमान, गुणवान और क्षमतावान है, उसके लिए ऐसी कौन-सी सम्पदा हो सकती है, जो सुलभ न हो। वह तो उनका नैसर्गिक अधिकारी होता है।
किन्तु इसके साथ यह न भूल जाना चाहिए कि अधिकार कर्त्तव्य का अनुगामी होता है। बिना कर्त्तव्य के अधिकार के नाम पर शून्य ही रहता है और कर्त्तव्य अधिकार से हीन हो ही नहीं सकता। यदि कोई मनुष्य उत्तम सम्पदाओं के अधिकार के लिए हाथ तो बढ़ाता है, लेकिन उसके लिए वाँछित कर्त्तव्यों के नाम पर पैर पीछे हटाता है तो वह अपने मनोरथ में सफल नहीं हो सकता। उत्तम सम्पदाओं को पाने के लिए उत्तम कर्त्तव्यों का पालन भी करना होगा।
जो सर्वशक्तिमान है, सर्वसामर्थ्यवान है, उसके लिए संसार का ऐसा कौन-सा कर्त्तव्य हो सकता है, जो दुष्कर हो। जिस प्रकार उसके अधिकारों में उसकी शक्तिमत्ता सहायक है, उसी प्रकार उसके कर्त्तव्यों में भी सहायिका ही होगी। अस्तु, उस सर्वशक्तिमान का सर्वोत्तम अंश मनुष्य सब कुछ कर सकने और सब कुछ पा सकने में समर्थ है। उसे अपनी इस विशालता का अनुभव और उनका उपयोग करना ही चाहिए। क्योंकि ईश्वर की ओर से उसका अनुदान व्यर्थता के लिए नहीं सार्थकता के लिए ही किया गया है।
किन्तु खेद है कि मनुष्य न तो सामान्यतः अपनी इस विशालता का अनुभव कर पाता है और न उसका उपयोग इसका कारण है। वह यह कि अज्ञान के कारण मनुष्य आत्म-विस्मरण की गहरी नींद में सोया हुआ, जीवन पथ पर चला जा रहा है। वह अपने को हाड़-माँस का एक चेतन पिण्ड समझे हुए है। उसे पता ही नहीं कि उसका वास्तविक स्वरूप क्या है? अपने को शरीर मात्र समझने पर उनकी नश्वरता में विश्वास रखने के कारण निर्बल, भीरु लोलुप बना हुआ है। यही सोचता और मानता रहता है कि जैसा जो कुछ जीवन है, वह सलामती से पूरा हो। बस यही बहुत है। अपनी इस भीरुता के कारण उसकी सारी शक्तियाँ और सारी श्रेष्ठतायें कुण्ठित बनी रहती हैं और वह आत्म-स्वरूप जानने के साहसिक कार्य में प्रवृत्त नहीं हो पाता।
यदि एक बार वह मोह निद्रा से जागकर यह सोचता कि - ‘मैं सर्वशक्ति सम्पन्न एक अक्षय ज्योति-पिण्ड हूँ’। मेरा सत्यस्वरूप यह नश्वर शरीर नहीं अक्षय आत्मा है। मैं सम्राटों का उत्तराधिकारी पुत्र हूँ। संसार का हर उत्तम पद और हर उत्तम सम्पदा मेरी है, मैं उसका अधिकारी हूँ। मुझमें उसे पाने की परिपूर्ण पात्रता विद्यमान है।’ तो निश्चय ही उसकी शक्तियाँ प्रबुद्ध ही नहीं परिलक्षित भी हो उठें।
अवश्य ही उन आदमियों पर अभाग्य की छाया मानी जाएगी, जो अपने को अकारण ही तुच्छ, नगण्य, निर्बल और हेय समझा करते हैं। यह आत्म-अवमानना नहीं। ऐसी भावनाओं से सृजनात्मक शक्तियों का विनाश होता है। अपना निरादर करने वाला व्यक्ति एक प्रकार से ईश्वर का निरादर ही करता है। मनुष्य संसार में ईश्वर की प्रतिमूर्ति है, उसका प्रतिनिधि है। ऐसे उन्नत पद पर होकर मनुष्य को कदापि अधिकार नहीं कि वह आत्म-तिरस्कार का पाप करे। उसके भीतर ईश्वर की सारी सम्पदायें और शक्तियाँ सुरक्षित हैं। वह अपने को संकीर्णता, हेयता और हीनता के हाथों रहन कर देने का कोई अधिकारी नहीं है। उसे वही करना और सोचना होगा, जो ईश्वर को वाँछित है और उससे निर्देशित है। ईश्वर का स्पष्ट आदेश है कि ‘पूर्ण बनो जैसा कि मैं हूँ।’ ‘महान बनो जैसा कि मैं हूँ।’ और ‘ विशाल बनो जैसा कि मैं हूँ।’ संकीर्णता, हीनता अथवा भीरुता को आश्रय देना मेरा विरोध करना है, जिसे मैं किसी पण पर भी स्वीकार नहीं कर सकता।
मानव-जीवन का ध्येय है-उत्तमोत्तम बनकर, उत्तम कर्तव्यों पर सर्वोत्तम अर्थात् परम पद पाना। जो इस सर्वश्रेष्ठ श्रेय के लिए प्रयत्न नहीं करता, उसके लिए पुरुषार्थ में प्रवृत्त नहीं होता, वह इस बहुमूल्य जीवन को व्यर्थ में नष्ट कर रहा है, इसमें संशय नहीं। उत्तमता ईश्वरीय तत्व है। अस्तु उसको प्राप्त करने की आकाँक्षा करनी ही चाहिए। जो जितना उत्तमता के समीप पहुँचता जाएगा, वह उतना ही ईश्वर के सन्निकट होता जाएगा, जो उत्तमता से विमुख होकर जीवन को एक भार, एक बेगार समझकर उसे घसीट-घसीटकर निम्नताओं की ओर लिए जाते हैं, वे ईश्वरता का अपमान करते हैं। ऐसे पातकी व्यक्ति यहाँ-वहाँ कहीं भी क्षमा नहीं किए जाते।
अज्ञान के अंधकार से निकलकर मोह निद्रा का त्याग करिए और देखिए कि आप संसार में श्रेष्ठ कार्य करने के लिए सर्वश्रेष्ठ प्राणी के रूप में अवतरित किए गए हैं। जिन ब्राह्मीय शक्तियों से आपको सम्पन्न किया गया है, उन्हें पहचानिए और काम में लाइए। उत्तमता आपका जन्मसिद्ध अधिकार है, उसे पाइए और अपने से की गई ईश्वरीय अपेक्षा को चरितार्थ कर दिखाइए। अपने को हाड़-माँस का शरीर मानकर हीनता के अभिशाप से छूटिए और स्वीकार कीजिए कि आप ईश्वर के पुत्र हैं। उस ज्योति पुँज की एक प्रकाशित उल्का हैं, जो संसार में प्रकाश प्रदान करने के लिए प्रेषित की गई है।
आपका कर्त्तव्य विषय वासनाओं के नरक की सेवा करना नहीं है और न ईर्ष्या-द्वेष, काम-क्रोध आदि के हाथों दंडित होना आपका अधिकार है। आपका कर्त्तव्य है, विषयों-विकारों और विकृतियों को विजय करना। और शुद्ध-बुद्ध तेज-पुँज परमात्मा में स्थित होना आपका अधिकार है। आप अपने उत्तम कर्तव्यों और अधिकारों को पहचानिए और उनमें प्रवृत्त होइए। यह विचार पास भी मत आने दीजिए कि आपमें इस उन्नत कर्तव्य और महान अधिकार के योग्य शक्ति, सामर्थ्य नहीं है। यद्यपि है, तथापि यदि किसी कारण से आप अपनी उस महत् शक्ति को इस समय अनुभव नहीं कर पा रहे हैं। तब भी कोई चिन्ता नहीं। आप अपने लिए उत्तमता से विभूषित छोटे-छोटे कर्त्तव्य चुनिए और अपनी ज्ञात एवं सकल हस्तगत शक्ति के साथ लग जाइए। धीरे-धीरे आपकी सारी गुप्त शक्तियाँ उद्बुद्ध हो उठेंगी और तब आप पुरुषार्थ के विशाल पंखों पर परमपद की ओर उठते चले जायेंगे।
अपनी इस प्रेरणा के लिए पवन-गामी गरुड़ की ओर नहीं मंथरगामी चींटी की ओर देखिए। चींटी कदाचित कर्तव्यनिष्ठ जीवों में सबसे छोटी होती है। किन्तु वह भी अपनी दृढ़ संकल्प शक्ति और छोटे-छोटे पैरों की सीमित शक्ति का अविराम उपयोग कर एक दिन मूल से पर्वत शिखर पर चढ़ जाती है, एक देश से दूसरे देश और धरातल की सातवीं तह तक पार कर जाती है। अपनी सीमित शक्ति में असीम की भावना लाइए और अपने कर्त्तव्य पथ पर गतिमान हो जाइए। परमपिता परमात्मा का वरद्हस्त आपके पीछे रहेगा। वह दयालु देव गुप्त रूप से अपनी शक्ति शनैः - शनैः आपके पास भेजता जाएगा। इस प्रकार अनु-अनु के अनुसार सशक्त, समर्थ और शूरवीर बनते जायेंगे। ऐसी सुरक्षा और सहायता के साथ चलते रहने पर क्या कारण हो सकता है कि आप अपने लक्ष्य पर न पहुँच जाए।
संसार में कदाचित ही ऐसा कोई चेतन व्यक्ति हो, जिसके हृदय में महत्वाकाँक्षा, उच्च कल्पनायें और उत्तम कामनाएं जन्म न लेती हों। अन्यथा सर्वोत्तम का अंश होने के कारण से ऐसा होना स्वाभाविक है। आपके हृदय में भी महत्वाकाँक्षायें और उत्तम कामनायें जन्मती होंगी। किन्तु आप उनमें से पूरा एक को भी नहीं कर पाए। यदि ऐसा कर पाए होते तो निश्चय ही अपने परमार्थ लक्ष्य के बहुत समीप पहुँच गए होते। इस असफलता का कारण यही है कि आपने अपने अंदर जन्मी हर उच्च आकाँक्षा को इसलिए मार डाला है कि आपने अपने को उसकी अपेक्षा हीन और तुच्छ समझा है। बस आपकी इसी भूख ने आपको तुच्छ बनाकर छोड़ दिया।
संजीवनी विद्या का मुख्य मंत्र यही है कि अपनी सद्कामनाओं, ऊँची और उत्तम आकाँक्षाओं का पालन करिए, उन्हें जीवन-गति की प्रेरणा बनाइए और विश्वास रखिए कि आप उनको चरितार्थ करने के सर्वथा योग्य हैं। अपनी उत्तम आकाँक्षाओं के प्रति निषेध भाव लेकर चलने वाले उत्तम पद के अधिकारी नहीं बन पाते कभी मत सोचिए कि आपमें उत्तम कार्यों के योग्य शक्ति नहीं है। परिस्थितियाँ आपके अनुकूल नहीं है। प्रतिक्षण परमात्मा में विश्वास रखिए और अपनी सीमित शक्ति के साथ अभिमान का संकल्प गतिशील बनाइए। आप विजयी होंगे, उत्तमता पायेंगे और निश्चय ही उत्तम-पद पर प्रतिष्ठित होकर कृतकृत्य हो जायेंगे।
एक गुरु के दो शिष्य थे। दोनों किसान थे। भगवान का भजन, पूजन भी दोनों करते थे। स्वच्छता और सफाई पर भी दोनों की आस्था थी, किन्तु एक बड़ा सुखी था, दूसरा बड़ा दुखी।
गुरु की मृत्यु पहले हुई पीछे दोनों शिष्यों की भी। देवयोग से स्वर्ग-लोक में भी तीनों एक ही स्थान पर जा मिले, पर स्थिति यहाँ भी पहले जैसी ही थी। जो पृथ्वी में सुखी था, यहाँ भी प्रसन्नता अनुभव कर रहा था और जो आये दिन क्लेश-कलह के कारण पृथ्वी में अशाँत रहता था, यहाँ भी अशाँत दिखाई दिया।
दुखी शिष्य ने गुरुदेव के समीप जाकर कहा- “भगवन्! लोग कहते हैं, ईश्वर भक्ति से स्वर्ग में सुख मिलता है पर हम तो यहाँ भी दुखी के दुखी रहे।”
गुरु ने गंभीर होकर उत्तर दिया- ‘वत्स! ईश्वर भक्ति से स्वर्ग तो मिल सकता है पर सुख और दुख मन की देन है। मन शुद्ध हो तो नर्क में भी सुख ही है और मन शुद्ध नहीं तो स्वर्ग में भी कोई सुख नहीं है।
----***----
आत्मा में सन्निहित ब्रह्मवर्चस का जागरण करने के लिए गायत्री उपासना आवश्यक है। यों सभी के भीतर सत तत्व बीज रूप में विद्यमान है पर उसका जागरण जिन तपश्चर्याओं द्वारा संभव होता है, उनमें गायत्री उपासना ही प्रधान है। हर आस्तिक को अपने में ब्रह्म तेज उत्पन्न करना चाहिए। जिसमें जितना ब्रह्म-तत्व अवतरित होगा, वह उतने ही अंशों में ब्राह्मणत्व का अधिकारी होता जाएगा। जिसने आदर्शमय जीवन का व्रत लिया है, व्रतबंध, यज्ञोपवीत धारण किया है, वे सभी व्रतधारी ब्राह्मण क्षत्रिय, वैश्य अपनी आत्मा में प्रकाश उत्पन्न करने के लिए गायत्री उपासना निरन्तर करते रहें, यही उचित है। जो इस कर्त्तव्य से च्युत होकर इधर-उधर भटकते हैं। जड़ को सींचना छोड़कर पत्ते धोते फिरते हैं, उन्हें अभीष्ट लक्ष्य प्राप्त करने में विलंब ही नहीं, असफलता का भी सामना करना पड़ता है।
साधना शास्त्रों में निष्ठावान भारतीय धर्मानुयायियों को- द्विजों को- एकमात्र गायत्री उपासना का ही निर्देश किया गया है। उसमें वे अपना ब्रह्मवर्चस आशाजनक मात्रा में बढ़ा सकते हैं और उस आधार पर विपन्नता एवं आपत्तियों से बचते हुए, सुख-शाँति के मार्ग पर सुनिश्चित गति से बढ़ते रह सकते हैं। द्विजत्व का व्रत-बंध स्वीकार करते समय हर व्यक्ति को गायत्री मंत्र की दीक्षा लेनी पड़ती है, इसलिए उसे ही गुरुमंत्र कहा जाता रहा है। पीछे से अंधकार युग में चले सम्प्रदायवाद ने अनेक देवी-देवता, मन्त्र और उनके उपासना विधान गढ़ डाले और लोगों को निर्दिष्ट मार्ग से भटकाकर भ्रम-जंजालों में उलझा दिया। फलतः अनादि काल से प्रत्येक भारतीय धर्मानुयायी की निर्दिष्ट उपासना पद्धति हाथ से छूट गई और आधार रहित पतंग की तरह हम इधर-उधर टकराते हुए अधःपतित स्थिति में जा पहुँचे।
उस तथ्य को दूरदर्शी शास्त्रकारों ने समझा है और सचेत किया है कि वे निरर्थक भटकाने वाले भ्रम-जंजाल को समझें और भ्रान्तियों से निकलकर यदि उपासना करनी है तो समर्थ एवं सनातन उपासना पद्धति-गायत्री-मंत्र का आश्रय लें। सही मार्ग पर चलने से ही सही परिणाम निकल सकते हैं। अन्यान्य देवताओं का आराधन कुछ क्षणिक प्रयोजन भले ही सिद्ध करे जीवन लक्ष्य को प्राप्त करा सकने में समर्थ नहीं हो सकता। देवी भागवत में इस तथ्य पर यों प्रकाश डाला गया है-
एषा निष्टा दुर्लभा मर्त्यबुद्धौ तस्माल्लोके वाः शाम्वैष्णश्च भिन्नं भिन्नं मार्गमास्थाय वेदं क्षामं कुर्वन्त्या स्तिक छद्मने मे ॥17॥
पक्षि द्वन्द्वं विद्यते स्वस्य देहो भोक्तारं सा ध्यान माचष्ट एतत्। यावत् क्षीणा भोक्तता स्यात्ततस्तु ज्ञात्वा व्रूयाह ब्रह्मतां स्वस्य विद्वान ॥18॥
भस्मान्तं चेद्विश्व मेतत् समस्तं भस्मोद्भतं भस्म संभासते च। तस्माद ब्रह्म प्राहुराद्यै र्वचोभिर्वेदा स्तस्माद्भस्म लिंग द्विजानाम्। इति शंकरा चार्य्याभिप्रायः कृष्ण भिक्षुणा। वर्णितस्ते न गायत्री विभूत्या सहनन्दतु॥21॥
अर्थ-मानवों की बुद्धि में इस प्रकार की निष्ठा अत्यन्त दुर्लभ होती है। इसी कारण से लोक में शैव और वैष्णव आदि विभिन्न मतानुयायी लोग हो गये हैं। इस प्रकार से भिन्न-भिन्न सम्प्रदायों के मार्ग में समास्थित होकर आस्तिक बनने के छद्म से मेरे वेद-मार्ग को दुर्बल करते हैं। ॥17॥
किसी भी मत एवं सम्प्रदाय का पक्ष जब ग्रहण कर लिया जाता है तो अन्य लोगों के साथ एक प्रकार का द्वन्द्व छिड़ जाता है। अपने देह में वह वेद जननी भोक्ता के ध्यान को आकर्षित करती है कि जिस समय यह भोक्तता क्षीण हो जाती है, तभी फिर ज्ञान प्राप्त करके विद्वान पुरुष अपनी ब्रह्मता को कहे। गायत्री के अर्थ को सामान्यतया कोई भी नहीं जानता है, इसी कारण से द्विज भी जिसने गायत्री की दीक्षा से ही द्विजत्व का लाभ प्राप्त किया है, अन्य देव को कहा करते हैं। अर्थात् गायत्री को परमाराध्य सर्वोपरि विराजमान न मानकर अन्य देवों की उपासना किया करते हैं। यदि गायत्री के अर्थ का ज्ञान हो जाए तो फिर सब तरह के विवादों की शाँति हो जाया करती है। गायत्री मन्त्र का जो गायन करता है, उसका मोक्ष प्राप्त कर लेना तो फिर उसी के हाथ में रहा करता है।
यदि भस्मान्त हो तो वह समस्त विश्व ही भस्म से उद्भव प्राप्त करने वाला है और इसमें भस्म ही संभासित होती है। इसी से वेदों ने प्राथमिक वचनों से ब्रह्म को बतलाया है। इसीलिये द्विजों का चिन्ह ही भस्म होता है। स्वामिपाद भगवान श्री शंकराचार्य जी का अभिप्राय है, जिसको कृष्ण भिक्षु ने वर्णन किया है। इससे गायत्री की विभूति के साथ यह अभिवर्णित होंगे।
मन्त्रैः किं तैर्य प्रतीक्ष्येत देवी गायत्र्यम्बा सम्प्रवेष्टुं द्विजेषु। देवैः कि तैरग्निना पुष्टिमद्भि स्तस्मा द्भस्मोद्भषितैः सा निषेव्या। ॥8॥
दत्तं भस्म श्री त्रिपादावयैतंत्र्यंगेरग्नेः शेष रुपं स्वरूपम्। तस्माद्भस्म प्रौच्यते भासच्च भूतिर्गायत्र्यंवयेक्या त्रिपुण्ड्रम् ॥9॥
शैवोऽन्यो वा यां बिना किं द्विजः स्याच्छैवोऽन्यो वा दीक्षया वेदमातुः तस्माच्छैवो वैष्णवोऽन्येषु गण्यो गायत्र्याप्ता ब्रह्मता वेदमान्या ॥10॥
भेदापोहव्यावृति सा विभर्तिं ध्यानैर्भिन्नै र्ध्यान निष्ठैक वेद्याम्। तस्मान्मामान्यत्र संयान्ति सर्वाण्यस्या निष्ठा शाम्भवी वैष्णवी चा ॥11॥
अर्थ- उन मंत्रों से क्या लाभ है जिनके द्वारा द्विज गणों में माता गायत्री का सम्प्रवेश करने के लिए प्रतीक्षा की जावे। उन देवों के सेवन से भी क्या प्रयोजन सिद्ध हो सकता है, जो अग्नि के द्वारा पुष्टि वाले हों और उसी से भस्म के द्वारा विभूषित होकर उस गायत्री देवी का निवेषण किया जावे। ॥8॥
श्री त्रिपादाम्बा के द्वारा ही दी हुई भस्म है, जो तीन चरणों वाली अग्नि का शेष स्वरूप है। माता गायत्री के ऐक्य से ही उस आसमान से वह भस्म त्रिपुण्ड की विभूति कही जाती है। ॥9॥
चाहे कोई अन्य शैव हो किन्तु वह उस वेद माता के बिना क्या कभी द्विजत्व का लाभ कर सकता है अर्थात् शिव की उपासना से भी गायत्री के बिना द्विजत्व नहीं मिल सकता। चाहे कोई शैव हो या वैष्णव हो, दोनों देवों में से किसी भी एक की उपासना करने वाला क्यों न हो उसकी वेदमाता की दीक्षा से ही गणना की योग्यता होती है। वेदमान्य ब्रह्मता तो माता गायत्री के द्वारा ही प्राप्त होती है। ।।10।।
वही वेद जननी गायत्री भेदापोह को धारण किया करती है अर्थात् भेद को दूर करने वाली है। जो ध्यान निष्ठा की एक वेदी में भिन्न ध्यानों के द्वारा किया करती है। इसी से यहाँ पर समस्त नाम इसकी शाम्भवी अथवा वैष्णवी निष्ठा को प्राप्त किया करते हैं।
लोकस्थास्ते विष्णु रुद्रादि देवाः कैश्चित्कार्मः कैश्चिदेवाधिकारैः। गायत्र्यास्ता मूर्त्तयः सेवनीया गायत्र्यां ते सेविताः सम्भ्रमेण।
अर्थ- विष्णु और रुद्र आदि समस्त देवगण लोकों में रहने वाले हैं। उनमें कुछ कामनाओं की पूर्ति करने की शक्ति तथा कतिपय कुछ अधिकार रहते हैं। वे सभी गायत्री की ही मूर्तियाँ हैं, जो सेवन के योग्य हैं। गायत्री में वे सम्भ्रम से ही सोवित होती हैं।
ब्रह्मत्वं चेदाप्तुकामोऽस्युयास्व गायत्रीं चेल्लोक कामेऽन्यदेवम् कामो ज्ञातः क्वीय पाद प्रवृत्या वादः को वा तृप्ति हीने प्रवृत्तिः। बुद्धेः साक्षी बुद्धिगम्यो जयादौ गायत्र्यर्थः सोऽनघो वेद साः तद ब्रह्मैव ब्रह्मतोपासकस्याप्येवं मंत्रः कोऽस्ति तत्रे पुराणै। ॥13॥
जान्यश्वः किं जातिमाप्तुं सकामो गत्यभ्यासात्स्यष्टता मेति जातिः। ब्रह्मत्वाप्तौ कः प्रयासो द्विजा नां यद गायत्र्या व्यज्यते चाष्टमेऽब्दे। ॥14॥
ब्रह्मत्वस्य स्यापनार्थं प्रविष्टा गायत्रीयं तावतास्य द्विजत्वम्। कर्ण द्वारा ब्रह्म जन्म प्रदानायुक्तो वेदे ब्राह्मणो ब्रह्मनिष्ठः। ॥16॥
अर्थ-यदि किसी को ब्रह्मत्व की प्राप्ति करने की इच्छा है तो उसको वेदमाता गायत्री की ही उपासना करनी चाहिए। यदि किसी लोक विशेष के प्राप्त करने की इच्छ हो तो अन्य देवी की उपासना करो। अपने चरणों में प्रवृत्ति करने से ही हार्दिक कामना का ज्ञान हो जाता है। जो तृप्तिहीन होता है, उसी को प्रवृत्ति होती है। इसमें कोई भी वाद नहीं है।
यह बुद्धि की साक्षी है। गायत्री का अर्थ है, वह अघ रहित, अर्थ पूर्ण पवित्र और वेदों का साररूप है, इसके जप आदि के करने में ही यह बुद्धि में गम्यमान होता है। ब्रह्मत्व प्राप्ति की जो उपासना करने वाला है, उसके लिए यह साक्षात ब्रह्म ही है। गायत्री के समान तन्त्र और पुराण में अन्य कोई भी मंत्र नहीं है। गायत्री मंत्र ही सर्व शिरोमणि मन्त्र है। ॥13॥
जाति से जो अश्व है वह क्या कभी अपनी जाति की प्राप्ति करने की इच्छा वाला होता है? उसकी जाति की स्पष्टता तो उसकी गति के अभ्यास से ही तुरंत हो जाया करती है। इसी तरह ब्रह्मत्व की प्राप्ति के लिए द्विजों का क्या प्रयास होता है, अर्थात् कुछ भी नहीं क्योंकि वह तो आठवें वर्ष में उपनयन संस्कार होने पर गायत्री माता के द्वारा स्वयं ही व्यज्यमान हो जाया करता है। ॥14॥
ब्रह्मत्व के स्थापन करने के लिए ही यह गायत्री प्रविष्ट होती है और तभी से द्विजत्व की इसके द्वारा प्राप्ति हुआ करती है। कानों के छिद्रों के द्वारा ब्रह्म जन्म का ज्ञान प्रदान किया जाता है अर्थात् गायत्री का उपदेश कानों में ही किया जाया करता है। जब दीक्षा-सम्पन्न होता है, तभी वह ब्रह्मनिष्ठ ब्राह्मण होता है-ऐसा ही वेदों में कहा गया है। ॥16॥
तात्पर्य यह है कि जन्मजात ब्राह्मण कोई भी नहीं हो सकता है। यह तो मिथ्याभिमान ही होता है, क्योंकि ब्राह्मण का भले ही कोई पुत्र हो किन्तु वह ब्राह्मण एवं द्विज तब तक नहीं हो सकता है, जब तक उसे आठवें वर्ष में उपनयन संस्कार होने पर गायत्री की दीक्षा नहीं होती है। गायत्री मंत्र ही ब्रह्मत्व प्रदान करने वाला होता है।
ब्रह्मवर्चस गायत्री उपासना से ही उपलब्ध होता है। इस उपासना से देव-तत्वों की मानव शरीर में निरंतर वृद्धि होती है और शक्तिशाली व्यक्ति देवत्व की अहिंसा, महत्ताओं को उसी जीवन में उपलब्ध कर लेता है। ‘कर्म देवी विशेषताएँ’ प्रत्यक्ष परिलक्षित होने लगती हैं।
सर्व देवमयो विप्रो ब्रह्म-विष्णु शिवात्मकः ब्रह्म तेजः समुद्भूतः सदा प्राकृतिको द्विजः। ब्राह्मणै र्भुज्यते यत्र-तत्र भुङंक्ते हरि, स्वयम। तत्र ब्रह्मा च रुद्राश्च खेचरा ऋषयो मुनिः। पितरो देवताः सर्वे भुज्जन्ते नात्र संशयः। सर्व देव मयो विप्रस्तस्मात्तं नाव मानय॥
ब्राह्मणं च जननीं वेद स्याग्निं श्रुतिं च गाम्। नित्य मिच्छन्ति ते देवा यजितुं कर्म भूमिषु॥
अर्थ- ब्राह्मण सर्व देवमय और ब्रह्मा-विष्णु एवं शिव स्वरूप है। द्विजगण यद्यपि प्राकृतिक अर्थात् पंचभूतमय ही होते हैं तो भी गायत्री के ब्रह्म तेज से उनकी उन्नति होती है। जिस स्थान पर गायत्री के उपासक ब्राह्मण भोजन किया करते हैं, वहाँ साक्षात स्वयं श्रीहरि ही भोजन किया करते हैं और वहाँ पर ब्रह्म-विष्णु-रुद्र-शेखर-ऋषि-मुनि पितर और देवता सभी भोजन करके संतृप्त होते हैं। इसमें संदेह नहीं है, ब्राह्मण जो सावित्री के परमोपासक हैं, ये सर्वदेवमय होते हैं, इसलिए उनका कभी भी अपमान नहीं करना चाहिए। देवगण सदा वही कामना किया करते हैं कि इस कर्मभूमि में ब्राह्मण वेदमाता गायत्री अग्नि-श्रुति और गौ-इन सबकी नित्य पूजा होती रहनी चाहिए।
प्राचीनकाल में सभी प्रमुख देवता तथा ऋषि गायत्री उपासना के आधार पर अपनी शक्ति, सामर्थ्य प्राप्त करने बढ़ाने तथा अक्षुण्य रखने में समर्थ हुए हैं-
मनुश्चन्द्रः कुबरेश्च लोपामुद्रा च मन्मथः। अगस्तिरग्निः सूर्यश्च इन्द्रः स्कन्दः शिवस्तथा। क्रोध भट्टारको देव्या द्वादशामी उपासकाः॥
“(1) मनु (2) चन्द्र (3) कुबेर, (4) लोपामुद्रा, (5) मन्मथ (6) अगस्ति (7) अग्नि (8) सूर्य (9) इन्द्र (10) स्कन्द (11) शिव (12) क्रोध भट्टारक (दुर्वासा) - ये बारह भगवती के उपासक हैं।”
ऐसा ब्रह्म तेज सम्पन्न व्यक्ति शाप, वरदान देने की स्थिति में भी होता है। राजा परीक्षित को तक्षक द्वारा काटे जाने का मृत्यु-शाप बालक शृंगी ऋषि ने दिया था। यह ब्रह्म बल का ही चमत्कार था। शाप की तरह वरदान भी ऐसा ब्रह्मवादी ही दे सकता है और अपने ब्रह्मवर्चस में अगणित मनुष्यों का असीम हित साधन कर सकता है।
तक्षकेणापि दंष्टस्य प्रतीकारो हि तत्क्षणात्। ब्रह्मशाप प्रसक्तस्य कलपान्ते स्यात्प्रतिक्रिया॥ नरकान्निष्कृति र्नास्ति तस्याभावान्न संशयः॥ एवं तद्वंशजाः सर्वे पीडयनतेऽहर्निशं प्रिये॥ नानाविध महोत्पातैयवस्यानसप्त पौरुषम्। तस्मान् ब्राह्मणं देवि, नविमन्येत कदिंचित्॥
अर्थ-तक्षक के काटने पर भी तत्काल उसका प्रतीकार हो सकता है, किन्तु गायत्री-उपासक ब्राह्मण के शाप से ग्रसित का कल्पान्त में भी कोई प्रतीकार नहीं है। प्रलय के क्रिया नरक से छुटकारा नहीं है। ब्रह्म-शाप ग्रसित के सात पुरुषों तक अनेक उत्पातों से पीड़ित रहते हैं। अतएव कभी भी गायत्री-उपासक ब्राह्मण का अपमान न करना चाहिए।
अन्यान्य देवताओं की उपासना को साधना शास्त्र में निरर्थक ही नहीं, हानिकारक भी बताया गया है। और कहा गया है कि सनातन उपासना गायत्री ही है। जब देवता उसी की उपासना करके शक्ति प्राप्त करते हैं तो मूल का तिरस्कार कर पत्तों पर भटकने की भूल क्यों की जाय? ऐसी भूल करने वालों की भर्त्सना भी की गई है।
न विष्णुपासना नित्य वेदोक्ता कुत्रचित्। न विष्णुदीक्षा नित्यास्ति शिवस्यापि तथैव च॥
गायत्र्युपासना नित्या सर्ववेदैः समीरिता। यथा बिना त्वधःपातो ब्राह्मणस्यास्ति सर्वथा। तावता कृतकृत्यव्यं नान्यापेक्षा द्विजस्य हि। गायत्रीमात्रनिष्णातो द्विजो मोक्षमवाप्नुयात्॥
कुर्य्यादन्यन्न वा कुर्यांदिति प्राह मनुः स्वयम्। विहाय तां तु गायत्री-विष्णु पास्तिपरायणः॥ शिवोपास्तिपरो विप्रो नरकं याति सर्वथा॥
-देवी भागवत, द्वादश स्कन्ध, अध्याय 8
अर्थात्- वेद में कहीं भी विष्णु-उपासना का नियमित रूप से विधान नहीं किया है, न विष्णु-दीक्षा ही नियमित है, वैसे ही शिव की भी। गायत्री उपासना तो सब वेदों ने नियमित रूप से प्रतिपादित की है। जिसके बिना ब्राह्मण का भी सर्वथा अधःपतन हो जाता है। उतने से (गायत्री-उपासना मात्र) से ही कृतकृत्यता हो जाती है, क्योंकि द्विज को और किसी की अपेक्षा नहीं रहती। गायत्री-उपासना मात्र से निष्णात द्विज सचमुच मोक्ष प्राप्त कर सकता है, चाहे वह और कुछ करे या न करे ऐसा स्वयं मनु जी ने कहा है। उस गायत्री को छोड़कर विष्णु-उपासना में तत्पर अथवा शिवोपासक ब्राह्मण सर्वथा नरक को प्राप्त करता है।
उचित यही है कि प्रत्येक भारतीय अध्यात्म पर आस्था रखने वाला अनादि उपासना केन्द्र-बिन्दु गायत्री महामंत्र पर ही अपना ध्यान केन्द्रित करे और उसी से लौकिक एवं पारलौकिक सुख-शाँति का पथ प्रशस्त करे।
भूखे-प्यासे साधु के मन ने कहा - ‘काया को कष्ट क्यों देते हो, किसी के घर से भीख माँग लो।’ साधु अभी एक ओर मुड़ने ही वाले थे कि आत्मा बोली- ‘जिससे माँगोगे वह भी तो तुम्हारे जैसा ही होगा। तुम स्वयं क्यों नहीं कमा लेते।’
मन ने कहा - ‘तुम तो तपस्वी हो, अपरिग्रही हो, तुम्हें कमाना नहीं चाहिए।’
आत्मा ने तत्काल उत्तर दिया - ‘जो अपरिग्रह हो, परिग्रह का दास हो उससे अच्छा तो परिग्रह ही है, जो कम से कम हाथ तो नहीं फैलाता।’
साधु ने आत्मा की बात सुनी और उस दिन से साधना, उपासना के साथ स्वावलम्बी जीवन का अभ्यास भी प्रारंभ कर दिया।
----***----
अपनों से अपनी बात—
अध्यात्म की तुलना अमृत, पारस और कल्प-वृक्ष से की गई है। इस महान तत्व-ज्ञान के संपर्क में आकर मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप को- बल और महत्व को- पक्ष और प्रयोजन को ठीक तरह समझ लेता है। इस आस्था के आधार पर विनिर्मित कार्य पद्धति को दृढ़तापूर्वक अपनाये रहने पर वह मानव बन जाता है, भले ही सामान्य परिस्थितियों का जीवन जीना पड़े। अध्यात्मवादी की आस्थायें और विचारणायें इतने ऊँचे स्तर की होती हैं कि उनके निवास स्थान अन्तःकरण में अमृत का निर्झर झरने जैसा आनन्द और उल्लास हर घड़ी उपलब्ध होता रहता है।
अध्यात्म निस्संदेह पारसमणि है। जिसने उसे छुआ वह लोहे से सोना हो गया। गुण, कर्म और स्वभाव में महत्तम उत्कृष्टता उत्पन्न करना अध्यात्म का प्रधान प्रतिफल है। जिसकी आन्तरिक महानता विकसित होगी, उसकी बाह्य प्रतिभा जहाँ कहीं भी होगी, वहाँ सफलतायें और समृद्धियाँ हाथ बाँधे सामने खड़ी दिखाई देंगी। लघु को महान बनाने की सामर्थ्य और किसी में नहीं, केवल अन्तरंग की महत्ता, गुण-कर्म, स्वभाव की उत्कृष्टता में है। इसी को अध्यात्म उगाता बढ़ाता और संभालता है, फल स्वरूप उसे पारस कहने में किसी को कोई आपत्ति नहीं, अध्यात्म अमृत ही नहीं, पारस भी है। उसे पाकर अन्तरंग ही हर्षोल्लास में विमग्न नहीं रहता। बहिरंग जीवन भी स्वर्ग जैसी आभा से कीर्तिमान होता है। इतिहास का पन्ना-पन्ना इस प्रतिपादन से भरा पड़ा है कि इस तत्व-ज्ञान को अपनाकर कितने कलुषित और कुरूप लौह-खण्ड स्वर्ण जैसे बहुमूल्य, अग्रिणी एवं प्रकाशवान बनने में सफल हुए है।
कल्पना की ललक और लचक ही मानव-जीवन का सबसे बड़ा आकर्षण है। कल्पना लोक में उड़ने और उड़ाने वाले ही कलाकार कहलाते हैं। सरसता नाम की जो अनुभूतियाँ हमें तरंगित, आकर्षित एवं उल्लसित करती हैं उसका निवास कल्पना क्षेत्र में ही है। भावनाओं में ही आनन्द का उद्गम है। आहार, निद्रा से लेकर इन्द्रिय तृप्ति तक की सामान्य शारीरिक क्रियायें भी मनोरम तब लगती हैं जब उनके साथ सुव्यवस्थित भाव कल्पना का तारतम्य जुड़ा हो, अन्यथा वे नीरस एवं भार रूप क्रिया-कलाप मात्र बनकर रह जाती हैं। उच्च कल्पनायें अभाव-ग्रस्त, असमर्थ जीवन में भी आशायें और उमंगे संचारित करती रहती हैं। संसार में जितना शरीर सम्पर्क से उत्पन्न सुख है, उससे लाख-करोड़ गुना कल्पना, विचारणा एवं भावना पर अवलंबित है। उस दिव्य संस्थान को सुव्यवस्थित करने और परिस्थितियों के साथ ठीक तरह ताल-मेल मिला लेने की पद्धति का नाम अध्यात्म है। इसलिए उसे कल्प-वृक्ष भी कहते हैं।
कल्पनाओं को क्रमबद्ध रूप से उठाना और परिष्कृत दिशा में गतिशील रखना मात्र अध्यात्म तत्व-ज्ञान का काम है। अन्यथा वे अस्त-व्यस्त दिशाओं में बिखर कर जी का जंजाल बनती हैं और अकारण शोक-संताप का कारण बनती हैं। वासना और तृष्णा की आग में सारा संसार जल रहा है, असंतोष और उद्वेग ने मनःक्षेत्र में श्मशान जैसी वीभत्स परिस्थिति उत्पन्न कर रखी है-संसार अभावों से इतना दुखी नहीं, जितना उद्वेगों से। इसका वास्तविक कारण कुछ भी नहीं-कल्पना तत्व की विकृत अवस्था ही हमें नरक की आग में निरंतर जलाती-झुलसाती चली जाती है। इस स्थिति को बदल कर परिष्कृत कल्पनाओं के मंगल-लोक में पहुँचाने की क्षमता अध्यात्म में ही सन्निहित है इसलिए उसे कल्प-वृक्ष कहा जाता है।
1 पेज मिस है ::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::
अध्यात्म ही जीवन लक्ष्य की पूर्ति का एकमात्र आधार है, जिसने इसे प्राप्त कर लिया वही बाह्य और अंतरंग जीवन में सुख-शाँति से ओत-प्रोत होने का सौभाग्य प्राप्त कर सकने में सफल हो सका है।
भारत की एकमात्र विशालता एवं सम्पदा उसकी अध्यात्मवादी आस्था ही रही है। इसी से उसे ‘पृथ्वी का स्वर्ग’ और देवताओं का निवास-स्थल कहलाने का सौभाग्य प्रदान किया और समस्त संसार के सामने हर क्षेत्र में हर दृष्टि से सम्मानित अग्रिणी बना रहा। जहाँ आन्तरिक उत्कृष्टता होगी, वहाँ बाह्य सामर्थ्य एवं समृद्धि की कमी रह ही नहीं सकती। यही विशेषताएँ हमें समस्त विश्व का मार्गदर्शन करने एवं विविध अनुदान दे सकने योग्य बनाये रह सकीं। अपनी इस विशेषता को खोया तो मणिहीन सर्प की तरह खोखले हो गए।
संसार वालों ने अध्यात्म का प्रथम पाठ पढ़ा है और वे साँसारिक उन्नति की दिशा में बहुत आगे बढ़ गये। साहस, पुरुषार्थ, श्रम, तन्मयता, मधुरता, व्यस्तता, स्वावलम्बन, नियमितता, व्यवस्था, स्वच्छता, सहयोग जैसे गुण अध्यात्म के प्रथम चरण में आते हैं। इन्हें यम नियम की परिभाषा में अथवा धर्म के दस लक्षणों में गिना जा सकता है। पाश्चात्य देशों ने उतना भर सीखा है। इन्हीं गुणों से उन्हें शारीरिक, बौद्धिक, आर्थिक, संगठनात्मक एवं वैज्ञानिक उपलब्धियों से भरपूर कर दिया। जो देश कुछ समय पहले तक गई-गुजरी स्थिति में पड़े थे, उन्होंने अध्यात्म का प्रथम चरण सद्गुणों के रूप में अपनाया और आश्चर्यजनक भौतिक उन्नति कर सकने में सफल हो गए। यदि वे दूसरे चरण उत्कृष्टता एवं आदर्शवादिता की भूमिका में प्रवेश कर सके होते, आस्तिकता एवं आत्मवादी तत्व-ज्ञान को भी अपना सके होते, अध्यात्मवाद का अगला चरण भी बढ़ा सके होते तो उनकी भी वही महानता विकसित हुई होती, जो कभी इस भारत भूमि के निवासी महामानवों में निरन्तर प्रस्फुटित होती थी।
हम हर दृष्टि से पिछड़ गये। क्यों न हम अध्यात्म के पथ पर एक चरण भी आगे न बढ़ा सके। यों इस देश में धर्म और अध्यात्म का आडम्बर आकाश को छूने जैसा बढ़ता चला जाता है पर यह रामलीला में खड़े किये जाने वाले विशालकाय कागज और बांस की खपच्चियों से बनाये गये रावण की तरह है। जो देखने भर के लिए बड़ा है, भीतर उसके खोखलापन ही खोखलापन भरा हुआ है।
प्राचीनकाल में थोड़े से ऋषि थे, उनके प्रभाव से सारा देश ही नहीं, सारा विश्व प्रभावित हुआ था। सभी लोग अपने बच्चों का शिक्षण और विकास उन्हीं की छाया में करते थे, ताकि वे प्रखर व्यक्तित्व से सुसंपन्न बन सकें। उनका परामर्श और निर्देश राजा-प्रजा सभी को मान्य होता था। उनका पुरुषार्थ और कर्तृत्व समाज के हर वर्ग और हर पहलू को प्रभावित करता था। आशा भी यही की जा सकती है। जब आरोग्यवान्, विद्वान और धनवान लोग असंख्यों को प्रभावित करते हैं तो कोई कारण नहीं इन सब सम्पन्नताओं में लाखों-करोड़ों गुनी शक्तिशाली क्षमता को पाकर स्वयं प्रकाशवान न हों और असंख्यों को प्रकाशित न करें? प्राचीनकाल के गृहस्थ और विरक्त अध्यात्मवादियों के ऊँचे स्तर इस वास्तविकता के प्रमाण भी हैं।
आज की स्थिति सर्वत्र विचित्र है, धर्म का कलेवर ओढ़े 56 लाख सन्त-महात्मा इस देश में मौजूद हैं। पंडित पुरोहितों, धर्मोपदेशकों, कथा-वाचकों, कीर्तनकारों की संख्या भी लगभग इतनी है। इस प्रकार 50 करोड़ की जनसंख्या वाले इस देश में हर पचास व्यक्ति के पीछे एक व्यक्ति धर्म और अध्यात्म के नाम पर अपना समय पूर्ण करता और निर्वाह चलाता है। यह विशाल जनसमूह यदि वस्तुतः अध्यात्म के तत्व-ज्ञान से परिचित रहा होता तो आज अपना देश न जाने कहाँ की अपेक्षा कहाँ पहुँचा होता। भारत में 7 लाख गाँव हैं। 56 लाख संत। हर गाँव के पीछे 8 संत हैं और इतने पण्डे-पुरोहित। अर्थात् हर गाँव पीछे 16 व्यक्ति पलते हैं। यदि इन विशाल धर्मध्वजी जनसमूह ने रचनात्मक कार्यक्रम अपनाकर लोक-मंगल के लिए काम किया होता तो देश की सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, शारीरिक, आत्मिक, पारिवारिक, नैतिक स्थिति न जाने कितनी समुन्नत हुई होती और न जाने उसका समस्त संसार पर कितना आशाजनक प्रभाव पड़ा होता।
धर्म स्थलों, धर्म संस्थाओं एवं धार्मिक कर्मकाँडों में भारत की गरीब जनता प्रायः 300 अरब रुपया हर वर्ष व्यय करती है। इतने धन से संसार की 3 अरब जनता सद्ज्ञान देने और सद्प्रवृत्तियाँ उभारने के लिए हर व्यक्ति के पीछे 100 रु. व्यय किया जा सकता था, हमारे देश के धर्मध्वजी एक करोड़ लोग 300 व्यक्तियों को प्रकाश देने में अपना समय लगा रहे होते तो संसार के हर व्यक्ति को अपने महान तत्व-ज्ञान से परिचित और प्रभावित करने में सफल हो गये होते और तब संसार की स्थिति आज की अपेक्षा सर्वथा भिन्न ही हुई होती। पर हो सब कुछ प्रतिकूल रहा है। धर्मध्वजी लोग दूसरों को प्रकाश देने की अपेक्षा स्वयं ही दयनीय स्थिति में पड़े हैं और परावलम्बी दीन−हीन जीवन जी रहे हैं। स्थिति को बारीकी से देखने वाला यही सोचता है कि प्रस्तुत अध्यात्मवाद निरुपयोगी एवं निरर्थक है।
नई पीढ़ी में आस्तिकता एवं धार्मिकता के प्रति कोई आकर्षण नहीं रह गया है, इस स्थिति का उत्तरदायित्व इन महान आस्थाओं के उस विकृत स्वरूप का है, जिसने परीक्षा की कसौटी पर अपनी निरर्थकता सिद्ध कर दी है। अब प्रगतिशीलता का अर्थ धर्म और अध्यात्म के प्रति अनास्थावान होना भी बनता चला जाता है।
अध्यात्म का तत्व-ज्ञान मनुष्य को आदर्शवादिता एवं उत्कृष्टता की विचारणा से ओत-प्रोत भावनाओं से विभोर एवं प्रक्रिया से तत्पर बनाये रखने वाला दार्शनिक अवलम्बन है। हम ईश्वर के सत्चित् आनन्द स्वरूप अविनाशी अंग हैं, अस्तु अपनी महानता को अक्षुण्य बनाये रखें। मानवजीवन महान प्रयोजन के लिए चिरकाल उपरान्त मिला है, उसका उपयोग उच्च प्रयोजनों के लिये करें। ईश्वर सर्वव्यापी, निष्पक्ष एवं न्यायकारी है, उसके दण्ड एवं कोष से बचने के लिए दुर्भावनाएँ एवं दुष्प्रवृत्तियाँ त्यागें। समस्त प्राणी ईश्वर के पुत्र और अपने भाई हैं, इसलिए उनके साथ सद्व्यवहार करें। अपने पाशविक कुसंस्कारों को हटाने के लिये संघर्ष साधना, तितीक्षा, संयम एवं तपश्चर्या का अभ्यास करें। फैली हुई दुष्प्रवृत्तियों को हटाने का पुरुषार्थ कर अपने आत्म बल को विकसित करें। आदर्श जीवन जीकर दूसरों के लिए प्रकाश प्रदान करने वाले उज्ज्वल नक्षत्र सिद्ध हों। उन विचारों से ओत-प्रोत रहें, जिनसे शाँति मिले। उन कार्यों को अपनायें जिनसे यशस्वी जीवन जीने का अवसर मिले और परलोक में सद्गति को प्राप्त हों। ईश्वर की सृष्टि को सुन्दर, सुगन्धित एवं सुसज्जित बनाने की सेवा साधना में संलग्न रहकर प्रभु का अनुग्रह प्राप्त करें। हृदय कमल पर भाव भगवान की उच्च-स्तरीय स्थापना करें। अपनी मनोभूमि ऐसी बनायें जिससे सद्भावना सम्पन्न सद्भक्त कहला सकें। अपने को शरीर नहीं आत्मा समझें और शरीरगत वासना-तृष्णा से ऊँचे उठकर आत्म-कल्याण की गतिविधियाँ अपनायें। काम-क्रोध, मोह-मद मत्सर रूपी षटरिपुओं से सावधान रहें। भीतर और बाहर स्वर्गीय वातावरण का सृजन करने के लिए सद्भावनाओं की रीति-नीति अपनायें। तृष्णा और वासना के बंधनों से युक्त होकर संकीर्णता से मुक्ति पायें। आदि आस्थाएँ आध्यात्मिकता की पृष्ठ-भूमि हैं। इन्हीं को हृदयंगम कराने के लिए सारा धर्म कलेवर खड़ा किया है। समस्त कर्मकाँडों के पीछे इन्हीं आस्थाओं को हृदयंगम कराने का मनोवैज्ञानिक उद्देश्य छिपा पड़ा है।
पर आज के प्रचलित तथाकथित अध्यात्म की दिशा बिल्कुल उलटी है। वह व्यक्ति को भावनात्मक उत्कर्ष की ओर उठाने की अपेक्षा पतनोन्मुख बनाने में सहायक हो रहा है। भगवान की कृपा प्राप्त करने के लिए तीर्थ स्नान, देव-दर्शन, भजन-कीर्तन आदि के कर्मकाँड ही, पर्याप्त मान लिये गये हैं, लोगों ने यह सोचना छोड़ दिया है कि इन कर्मकाँडों का उद्देश्य भगवान की न्यायकारी सर्वव्यापक सत्ता का हर घड़ी स्मरण दिलाते रहना मात्र है। इस स्मरण का प्रयोजन यह है कि व्यक्ति सबमें ईश्वर की झाँकी करके हर किसी से सद्व्यवहार में निरत रहे। न्यायकारी के न्याय से डरें और कुछ का कुछ करके फलभोग से बच जाने की बात न सोचें। यदि देव-दर्शन, भजन-कीर्तन आदि के द्वारा उपरोक्त सदाचरण एवं परमार्थ की भावना उदय हो तो हो इन कर्मकाँडों का महत्व है। अन्यथा प्रशंसा करके या प्रसाद खिलाकर परमेश्वर के वरदान, आशीर्वाद पाने की ललक एक भ्रम भरी विडम्बना ही कही जाएगी।
भाग्यवाद एवं ईश्वर की इच्छा से सब कुछ होता है जैसी मान्यताएँ विपत्ति में असंतुलित न होने एवं सम्पत्ति में अहंकारी न होने के लिए एक मानसिक उपचार मात्र है। हर समय इन मान्यताओं का उपयोग अध्यात्म की आड़ में करने से तो व्यक्ति कायर अकर्मण्य और निरुत्साही हो जाता है। सोचता है, अपने करने से क्या होगा, जो भाग्य में होगा, ईश्वर की इच्छा होगी वही होगा। पुरुषार्थ की दौड़-धूप करने से क्या लाभ? इस प्रकार की मान्यता वाले की प्रगति का क्रम समाप्त हो गया ही समझना चाहिए। आक्रमणकारियों, शोषकों और अत्याचारियों में उपरोक्त मान्यता अपने समय के भ्रष्ट धर्मध्वजियों द्वारा रिश्वतें देकर इसलिए चलाई कि शोषित वर्ग उनके अन्याय से लड़ने खड़ा न हो जाय और उन अन्यायों को ईश्वर की इच्छा तथा भाग्य का खेल मानकर चुप बैठा रहे।
संसार को स्वप्न, माया, बंधन, भवसागर कहकर पारिवारिक तथा सामाजिक कर्त्तव्यों की उपेक्षा करने एवं भिक्षाजीवी निरर्थक जीवन बिताने की पलायनवादी मान्यता अध्यात्म के साथ जब से जुड़ी तब से साधु-ब्राह्मणों और वानप्रस्थों का अति महत्वपूर्ण लोक-सेवी वर्ग मिथ्या आडम्बरों में फंसकर तरह-तरह की भ्राँतियाँ फैलाने वाला समाज के लिए भारभूत बन गया। उपरोक्त मान्यताएँ केवल वासना और तृष्णा की निरर्थकता बताने के लिए थीं पर उनकी व्याख्या उलटी की गई और व्यक्ति समाज से विमुख होकर संकीर्ण स्वार्थपरता के दायरे में-स्वर्ग मुक्ति और सिद्धियाँ प्राप्त करने की बात सोचने लगा फलतः, अध्यात्मवाद की उपयोगिता अनुपयोगिता में बदल गई।
देव शक्तियों से लोग अपने में देवत्व के अवतरण की माँग करते, उनकी विशेषताओं, प्रेरणाओं एवं महानताओं को अपने में जागृत करने की आशा रखते तो देव-पूजन का प्रयोजन सिद्ध होता। पर अब तो लोग देव-पूजन इस शर्त पर करते हैं कि हमारी अमुक मनोकामना बिना पुरुषार्थ किये अथवा योग्यता उत्पन्न किये ही देव कृपा से अनायास ही पूरी हो जाय। आमतौर से लोग धन, स्वास्थ्य, विवाह, पुत्र, परीक्षा में उत्तीर्ण, नौकरी, शत्रु नाश, विपत्ति निवारण जैसी मनौतियाँ देवता से माँगते हैं और इसके लिए रिश्वत के रूप में कुछ पूजा-पत्री अर्पित करते हैं। इस विकृति का परिणाम यह हुआ कि लोग अपनी योग्यता बढ़ाने एवं पुरुषार्थ करने में जो प्रयत्न करते उन्हें छोड़कर परावलम्बी होते चले गये और उन्हें दीन-दरिद्र रहना पड़ा। विकृत मान्यताएं किसी को कुछ लाभ नहीं दे सकतीं केवल दुर्बलता और हानि ही प्रस्तुत कर सकती हैं।
अध्यात्म का तात्पर्य है आत्मा की परिधि का विस्तार। अपने अहम् को स्वार्थपरता को संकीर्ण परिधि को विश्व-मानव के लिए परमात्मा के लिए उत्सर्ग कर देना यही आत्मिक प्रगति का एकमात्र चिन्ह है। अनादिकाल से यही परम्परा चली आ रही है कि जो अपने व्यक्तिगत लोभ-मोह, यश एवं सुख को जिस हद तक विश्व-मंगल के कृत्य में परित्याग करता है, वह उसी सीमा तक परमात्मा के सान्निध्य में पहुँचा माना जाता है। यह मान्यता हर अध्यात्मवादी को समाज के लिए अधिक उपयोगी एवं उपकारी बनाकर सर्वजनीन सुख-शाँति का अभिवर्द्धन करती थी, पर अब तो ठीक उलटा है। जो जितना स्वार्थी, संकीर्ण, अनुत्तरदायी अकर्मण्य है, वह उतना ही त्यागी-तपस्वी है। सबके सुख-दुख को अपना सुख-दुख समझकर-आत्म-सुख को लोक-मंगल में घुला देने की प्रवृत्ति अब अध्यात्मवादियों में दिखाई नहीं पड़ती वरन् लोग अपनी भौतिक सुख-सुविधाओं की अभिवृद्धि के लिए ईश्वरीय सहायता की याचना-कामना किया करते हैं और उसी तराजू पर दैवी कृपा या अकृपा का - अपनी पूजा-पत्री की सफलता, असफलतावाद का—मूल्यांकन करते हैं। फलस्वरूप अब अध्यात्म व्यक्तिवाद को पोषक बनता जाता है और ऋषि-सिद्धियों से लेकर स्वर्गमुक्ति तक विभिन्न स्तर के स्वार्थों की पूर्ति के लिए लिप्साएँ उत्पन्न करता है। यह स्तर बदला न गया तो तत्व-ज्ञान का महान् दर्शन मानव-जाति के लिए और अधिक विपत्ति उत्पन्न करने वाला बनता चला जाएगा।
पाप से बचने और डरने का शिक्षण देना अध्यात्म का प्रयोजन है। पर जब से यह मान्यता चली है कि अमुक नदी-सरोवर में स्नान करने, अमुक तीर्थ की यात्रा या अमुक पुस्तक का पाठ करने से पाप फल भोगने से छुटकारा मिल जाता है, तब से लोग पाप से डरने की आवश्यकता अनुभव नहीं करते। सोचते हैं अब थोड़ा-सा व्यय करके पाप फल से बचा देने वाले कर्मकाँड करके दुष्कर्मों के दंड से छुटकारा प्राप्त किया जा सकता है तो फिर कुकर्मों का आकर्षण और लाभ, लोभ क्यों छोड़ा जाय? पाप के दंड से बचने की मान्यता केवल अनैतिकता का ही अभिवर्धन करेगी और उससे अनाचार एवं विग्रह, विक्षोभ ही बढ़ेगा।
किसी वर्ग विशेष को दान-दक्षिणा देने और उसी को ईश्वर का प्रतिनिधि मानकर यह सोचना कि उन्हें जो दिया जाएगा, वही कहलायेगा, एवं अविवेकपूर्ण भ्राँति है। ईश्वर के सभी पुत्र समान हैं, वह अधिक प्यार केवल अधिक संयमी और अधिक सेवी-भावी को कर सकता है। वंश के आधार पर कोई उसका प्रतिनिधि नहीं हो सकता। ब्राह्मण को ही दान देने की मान्यता ने समाज के उपयोगी कार्य में प्रयुक्त होने वाली उदारता को रोककर निहित स्वार्थों को मुफ्तखोर बनने और गुलछर्रे उड़ाने का द्वार खोल दिया। इससे समाज की उपयोगी प्रवृत्तियों को पोषण न मिलने पर सूख जाना पड़ा और निठल्ले लोग मसखरी करके उस उदारता एवं दान प्रवृत्ति को निरस्त करते चले गये। और उसका दुष्परिणाम सारे समाज को भोगना पड़ा।
अध्यात्म दर्शन में उत्पन्न हुई विकृतियों ने हमारा मानसिक और सामाजिक ढाँचा चरमरा कर रख दिया है। विद्या, सदाचार, लोक-सेवा और उदात्त मनोभूमि के कारण पूजे-जाने वाले साधु-ब्राह्मण जब वंश और वेष के आधार पर प्राण-प्रतिष्ठा प्राप्त करने लगे तो उन महान गुणों की ओर ध्यान देना ही बंद हो गया। ओछे लोग जहाँ भी पूजे जायेंगे, वहाँ विकृतियाँ ही बढ़ेंगी, कर्म के आधार पर आरंभ हुआ वर्णाश्रम धर्म जब वंश पर अवलम्बित हो गया और उसमें नीच-ऊँच का भेदभाव घुस गया तो ब्राह्मण दुर्गुणी होने पर भी पूजा जाने लगा और शूद्र सद्गुणी होने पर भी दुत्कारा जाने लगा। जहाँ गुणों का वर्चस्व समाप्त हो जाय और अकारण ही लोगों को मान या अपमान मिलने लगे तो वह समाज अपनों की और दूसरों की दृष्टि में अधःपतित होगा ही। झूठ मान्यताओं ने एक ओर तथाकथित उच्च वर्ग को अनावश्यक सम्पत्ति देकर उन्हें दान-दक्षिणा की मुफ्तखोरी का चस्का लगाया, दूसरी ओर तथाकथित नीच वर्ग को मानवता के न्यायोचित अधिकारों से भी वंचित करके अछूत बना दिया। इसी तिरस्कृत वर्ग का एक बड़ा भाग विधर्मी होता चला गया और हिन्दू समाज से प्रतिशोध लेने के लिए पिल पड़ा। अपनी सामाजिक दुर्बलता का यह एक बहुत बड़ा कारण है।
नारी जाति को अविश्वस्त प्रतिबन्धित, बन्दिनी और रमणी की दुर्दशा में धकेल देने वाली संकीर्ण विचार-धारा हमारे धर्म की आड़ में न जाने कहाँ से वह कंटीली झाड़ियों की तरह उठ आई और आधे समाज को लकवा के रोगों की तरह अपंग करके रख दिया। विवाह-शादियों में धर्म के नाम पर इतना अपव्यय करने को मजबूर होना पड़ा कि व्यक्ति को बेईमान और दरिद्र बनने के अतिरिक्त और कोई चारा न रह गया। मरने के बाद उसके कुटुम्बी लम्बी-चौड़ी दावत देकर मृतक-भोज करें, यह कैसी घृणित और दयनीय प्रथा है। भूत-पलीत, कुटुम्ब-कुटुम्ब और गाँव-गाँव के अगणित देवता, लोगों का मनोबल दुर्बल करने, आतंक उत्पन्न करने और अपव्यय कराने के लिए धर्म की आड़ में ही उगे हैं। अपनी कुरीतियों का अंत नहीं। और यह एक तथ्य है कि कुरीतियों का अंत नहीं। और यह एक तथ्य है कि कुरीतियों के साथ अनैतिकता का अविच्छिन्न संबंध है। आज के विकृत धर्म ने हमें अन्ध-विश्वासी ही नहीं अनैतिक एवं दीन, दरिद्र भी बना दिया।
इस दयनीय दुर्दशा से अब निकलना ही होगा और दार्शनिक विकृतियों से पिण्ड छुड़ाने के लिए आगे बढ़ना ही होगा। अन्यथा हमारी दुर्दशा ग्रस्त मनोदशा व्यक्ति एवं समाज का स्तर दिन-दिन गिराती और बिगाड़ती ही चलेगी और इस पतनोन्मुख पथ पर चलते हुए अन्ततः हम कहीं के भी न रहेंगे। भूतकाल में हम 30 करोड़ व्यक्ति इसी दार्शनिक भ्रष्टता के शिकार होकर 15 हजार विदेशी आक्रमणकारियों द्वारा पद-दलित होकर एक हजार वर्ष तक गुलामी के बंधनों में बंधे रहे हैं। अब भी यदि इन्हीं विकृतियों को छाती से चिपकाये बैठे रहे तो अगले दिनों हमारे दुर्भाग्य का ठिकाना न रहेगा।
ओछा तत्व-दर्शन अपनाए रहने वाला व्यक्ति और समाज कभी भी ऊँचा नहीं उठ सकता। दर्शन ही प्रेरणाओं का आधार है। उसी के अनुरूप विचारणायें, आकांक्षायें और क्रियायें उत्पन्न होती हैं। दर्शन ही व्यक्ति को ढालता और उसी ढाँचे में समाज का कलेवर खड़ा होता है। हम अपने समाज और संसार को समर्थ समृद्ध और सुविकसित बनाना चाहते हों तो उसका सर्वप्रमुख उपाय यही है कि वर्तमान दार्शनिक विकृतियों का परिशोधन किया जाए।
यदि इस स्थिति को सुधारा, संभाला और बदला न गया तो भावी परिस्थितियाँ दिन-दिन अधिक भयावह होती चली जाएंगी। वैयक्तिक जीवन में आदर्शवादिता और उत्कृष्टता उत्पन्न वाला जब प्रकाश ही बुझ जाएगा तो अन्धकार में भटकने वाला दुर्दशाग्रस्त ही होगा। लोग बुराई की ओर बढ़ते और बुरी परिस्थितियाँ पैदा करेंगे। इससे सर्वत्र दुर्गन्ध और दुर्गति ही दृष्टिगोचर होगी। और हम सब पारस्परिक विद्वेष, असहयोग एवं छल−छद्म की आग में जलकर सामूहिक आत्म-हत्या कर लेंगे।
आज की महत्तम आवश्यकता यह है कि हमारा तत्वज्ञान और दर्शन अपने सौम्य पथ से भ्रष्ट होकर जिस अवाँछनीय दिशा में चल पड़ा है, उसे रोका और टोका जाय। दिग्भ्राँत जन-मानस को वस्तुस्थिति से परिचित कराया जाय और अध्यात्म के महान स्वरूप, उपयोग एवं प्रतिफल से भलीभाँति परिचित कराया जाय। आत्मा की आकाँक्षा पूर्णता के लक्ष्य पर बढ़ने के लिए स्वभावतः उल्लसित होती रहती है, यदि उसे सही मार्ग मिले तो निस्सन्देह उससे व्यक्ति को आत्म-शाँति और समाज को समर्थता एवं सम्पन्नता का लाभ मिल सकता है। पर जब उसे बहका-भटका दिया जाय तो फिर विपथगामिनी धारा विग्रह एवं अवाँछनीय परिस्थितियाँ ही उत्पन्न करेगी। अस्तु हम अपना सारा प्रयत्न इस तथ्य पर केन्द्रित करें कि जनमानस की आस्थाओं, मान्यताओं, दिशाओं एवं गतिविधियों को प्रभावित करने वाली अध्यात्म पथ भ्रष्टता से विरत होकर उस दिशा में चलें, जिस पर लाखों करोड़ों वर्षों तक हमारे महान पूर्वज चलते और गौरवान्वित होते आये हैं।
चिन्तन की दिशा बदलना ही युग परिवर्तन है। परिवर्तन का केन्द्र-बिन्दु चिन्तन ही है। चिन्तन की बदली हुई दिशायें ही व्यक्ति को विविध विधि भली-बुरी गतिविधियाँ अपनाने के लिए प्रेरित एवं प्रस्तुत करती हैं। निकृष्ट चिन्तन व्यक्ति को दुष्ट, दुराचारी, पतित, पिशाच, उच्छृंखल एवं अवाँछनीय स्तर का बना सकता है और यदि चिन्तन की धारा उत्कृष्टता की ओर मुड़ जाय तो वही व्यक्ति सन्त, सज्जन, महान, विचारवान, विद्वान एवं परमार्थ परायण बनकर देवत्व की भूमि का सम्पादन कर सकता है।
अशुद्ध चिन्तन मनुष्य को लोभी, स्वार्थी, कृपण, शोषक तथा संग्रही बनाता है, यदि वह अशुद्ध, शुद्ध हो जाय तो वही व्यक्ति अपनी संपदा एवं विभूति को लोक-मंगल के लिये उत्सर्ग करके अपना जीवन धन्य बनाने तथा दूसरों को आदर्शवादी प्रेरणायें देने में समर्थ हो सकता है। व्यक्ति तथा समाज का हित अनहित वर्तमान और भविष्य उनकी आस्थाओं तथा चिन्तन की धाराओं पर निर्भर है। हमें इसी मर्म स्थल का स्पर्श करना चाहिए और उन उपायों को खोज निकालना चाहिए कि समग्र चिन्तन की—अध्यात्म की धारा सत्पथ गामिनी बनकर विश्व-मंगल की संभावनाएँ मूर्तिमान कर सके।
विवेकवान दूरदर्शी और प्रबुद्ध वर्ग के समस्त प्रयास उसी दिशा में केन्द्रीभूत होने चाहिएं कि जनमानस का प्रवाहित होने वाला समग्र चिन्तन अध्यात्म वर्तमान निकृष्ट स्तर से ऊँचे उठे तथा उत्कृष्टता की आस्थाओं से अनुप्रमाणित रह सके। इसी एक प्रक्रिया पर मानव-जाति का भविष्य निर्भर है। सुख-सुविधाएँ बढ़ाने के लिए बहुत कुछ किया जाता रहा है, किन्तु चिन्तन न बदला तो विज्ञान तथा धन द्वारा उपलब्ध हो सकने वाली विपुल सुविधाएं भी हमें सुख-शाँति से वंचित ही करती रहेंगी। अंतरंग में जलने वाली दुर्बुद्धि की आग शाँति और सुव्यवस्था को भस्म करके ही छोड़ेगी।
हमारा ज्ञान-यज्ञ इसी महान प्रयोजन की पूर्ति के लिए है। इसकी सफलता, असफलता पर भावी शाँति अथवा विपत्ति की सम्भावनाएँ जुड़ी हुई हैं। प्रबुद्ध परिजनों का कर्त्तव्य है कि वे इस महान अभियान को सर्वांगीण सफलता की ओर अग्रसर करने में अपना योगदान देने में कुछ उठा न रखें।
----***----
=कविता======================================================
जलाकर स्वयं को, उजाला जुटाना, मिटाना कठिन कालिमाएं धरा की।
प्रदीपो! जगत् सीखना चाहता है। लिये पंचभूतों की काया निराली,
नयी चेतना मर गिरी गर्द छाई। अहंकार की तामसी वृत्तियों को,
नहीं स्वार्थ के ओर देता दिखाई॥ लगाना लगन, स्नेह सबको लुटाना,
जलाना दुखद वेदनायें जरा की। प्रदीपो! जगत सीखना चाहता है।
तिरोहित मनुजता, विवश भावनायें, दुरुपयोग मति का, प्रगति की कहानी।
अधःपात के आवरण से झलकती, सुखद सत्य की आह! धूमिल निशानी॥
निभाना सरल प्रीति, पहरा दिलाना, भुलाना विषमता विषम अन्तरा की।
प्रदीपो! जगत् सीखना चाहता है। विहँसना, लिये मौत का द्रुत निमंत्रण
कनक-वीणा पर भैरवी गुनगुनाना। बहिर्व्योम-अन्तर्मनःस्थित विरसता
सभी को विमल ज्योति से जगमगाना॥ सुलाना, बिलखती हुई बाल, उन्मद,
बिकल चेतना आज विश्वम्भरा की। प्रदीपो! जगत् सीखना चाहता है।
जलाकर स्वयं को, उजाला जुटाना, मिटाना कठिन कालिमाएं धरा की। प्रदीपो! जगत् सीखना चाहता है॥
-श्री डॉ. रामस्वरूप त्रिवेदी,
==========================================================
*समाप्त*