सत्य के लिए सर्वस्व त्याग

यदि मेरी मित्रतायें मेरा साथ नहीं देतीं तो न दें। प्रेम मुझे छोड़ देता है तो छोड़ दे। मेरा तो एक ही आग्रह है कि मैं उस सत्य के प्रति सच्ची रह सकूँ, जिसकी सेवा और परिपालन के लिये, मैंने अपनी इच्छाओं का, वैभव विलास से परिपूर्ण पाश्चात्य जीव−पद्धति तक का बहिष्कार कर दिया है। जब तक मेरे शरीर में रक्त की अन्तिम बूँद और अन्तिम श्वास विद्यमान है, मैं एकमेव सत्य की प्राप्ति के हित तिल−तिल जलती रहूँगी। सत्य ही तो मनुष्य जीवन का सार है।

यदि वह सत्य मुझ से रेगिस्तान में चलने को कहेगा तो मैं उसके पीछे−पीछे जाऊँगी, मुझे उसे प्राप्त करने के लिये पर्वतों पर चढ़ना पड़ा, समुद्र की थाह लेनी पड़ी तो भी मैं पीछे नहीं हटूँगी। उसने माँग की मैं प्रेम से वंचित हो जाऊँ तो मुझे वह भी स्वीकार होगा पर सत्य का आश्रय मैं छोड़ नहीं सकती। मैं तो सत्य से चिपकी रहूँगी, भले ही मुझे यह दिखाई दे कि मुझे अपना कहने वाला भी कोई नहीं रहा। मेरी हार्दिक कामना है कि जब मैं मरूँ और मेरी समाधि बनाई जाये तो उस पर लिखा जाये—“उसने सब कुछ छोड़कर भी सत्य के पीछे चलने का प्रयत्न किया।”

—एनी बेसेंट

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संस्कृति के लिए त्याग

राजसूय—यज्ञ के समापन पर एक वृहत सांस्कृतिक समारोह मनाया गया। महाराज तुर्वस् के आग्रह पर इस आयोजन में महर्षि जैमिनि भी सम्मिलित हुए थे।

ऋषि के स्वागत में राजकुमारी अर्णिका ने नृत्य प्रस्तुत किया। संगीताचार्य बोहित ने साज दिया था। राजकुमारी ने देवपूजन की अद्भुत नृत्य−नाटिकायें, इस समारोह में प्रस्तुत कीं। दर्शक समाज को आत्म−विभोर कर दिया था उन्होंने।

जब उनके नृत्य−रास में सारा दर्शक समाज आत्मविस्मृत हो रहा था, त्रिकालज्ञ जैमिनि की आँखों से अविरल अश्रुधारा प्रवाहित हो रही थी। अर्णिका ने देखा महर्षि रुदन कर रहे हैं—“मैंने ऐसा तो कोई दृश्य प्रस्तुत नहीं किया, जो उत्तेजक या अश्लील हो फिर महर्षि दुःखी क्यों हो गये।” यह सोचते ही गति मध्य में ही भंग हो गई। पाँव रुक गये, हाथ नीचे, साज बन्द हो गया। सभा में इस अप्रत्याशित घटना के लिये सन्नाटा छा गया।

महाराज तुर्वस् की दृष्टि महर्षि के गीले मुख−मण्डल पर पड़ी। किसी अनहोनी के भय से उन्होंने समारोह तत्काल विसर्जित कर दिया। उत्सव−भवन में राजकुमारी अर्णिका, आचार्य बोहित महाराज तुर्वस् और स्वयं जैमिनि के अतिरिक्त कोई शेष न रहा। सब लोग अपने−अपने निवास स्थानों को चले गये।

जैमिनि ने पूछा—“तुर्वस् यों ही समापन होने से पूर्व सभा क्यों विसर्जित कर दी गई? कोई बात हो गई, अर्णिका को कुछ हो गया क्या?”

नहीं देव! ऐसा कुछ नहीं, हम तो कारण आपसे ही जानना चाहते हैं। अर्णिका ने कोई भूल की, लगता है, जिससे आपको कष्ट हुआ। गुरुदेव! यह आपकी ही बालिका है, रंगमंच पर आने का इसका प्रथम अवसर था। कोई भूल हुई हो तो क्षमा करें देव!

महर्षि को वस्तुस्थिति का अब पता चला। रुके हुये अश्रु बिन्दु उत्तरीय वस्त्र से पोंछते हुये उन्होंने कहा—“नहीं—तुर्वस्! ऐसी कोई बात नहीं, अर्णिका तो संगीत की साक्षात् देवी है, मेरी आँखों के आँसू तो विवशता के आँसू थे। मुझे वह भविष्य दिखाई दे रहा है, जब आर्यवर्त का संगीत−शास्त्र विदेशी आक्रमणकारियों के प्रभाव से अश्लील हो उठेगा। जो विद्या आज भारतीय जीवन में सरसता और संस्कार जागृत कर रही है, वही एक दिन कामुकता और अश्लीलता भड़काने का माध्यम बनेगी, बस यही एक दुःख है, जो हृदय को छलनी किये दे रहा है।” इतना कहते−कहते महर्षि की आँखें पुनः भर आईं।

गुरुदेव! अर्णिका ने आगे बढ़कर कहा—“कोई उपाय जिससे हम अपनी संगीत संस्कृति को दूषित होने से बचा सकें—हो तो स्पष्ट आदेश दें भगवन्! अपने धर्म, अपनी संस्कृति के लिए हम सर्वस्व न्यौछावर करने के लिये तैयार हैं।”

महर्षि जैमिनि ने अर्णिका की पीठ पर स्नेह का हाथ फेरते हुये कहा—“अर्णिके! तुमसे यही आशा थी मुझे। एक उपाय है, यदि तुम आजीवन अविवाहित रहकर संगीत कला का जन−सामान्य में प्रसार कर सको तो उस समय भी राष्ट्र के किसी भी कोने में वह सुरक्षित रह सकती है। जड़ बनी रहेगी तो उसे हरे−भरे वृक्ष के रूप में कभी भी पुष्पित और पल्लवित कर लिया जा सकेगा।”

अर्णिका तथा आचार्य बोहित उस दिन से संगीत−कला का प्रसार करने लगे। मृत्युपर्यन्त अविवाहित रहकर उन्होंने इस कला को घर−घर पहुँचाया पर आज जिनके पास साधन हैं, वह भी कामुक संगीत के विकास में लगे हैं, देश में महर्षि जैमिनी की आशंका ही सत्य सिद्ध हो रही है।

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गति का दर्शन और परमगति

हम जब यह कहते हैं कि यह कमरा जिसमें हम रह रहे हैं—‘स्थिर है’ तो उसे झूठा कहने का किसी को भी अधिकार नहीं है। प्रकृति भी हमें ऐसा सोचने से विवश नहीं करती। किन्तु ऐसा हम तभी तक कह सकते हैं, जब तक कि हम इस कमरे से या यह कमरा जिस वस्तु पर (पृथ्वी पर) आधारित है, से संबंध बनाये हुए है। यदि हमें आकाश में सूर्य−चन्द्रमा, तारे नहीं दिखाई देते, केवल आकाश ही आकाश दिखाई देता तो हमें अपने कमरे के स्थिर होने में कतई सन्देह नहीं होता।

जब हम सूर्य−चन्द्रमा अथवा अन्य नक्षत्रों को घूमते हुए देखते हैं, तब हमें अपनी भूल का पता चलता है। हम सम और पदार्थ की सापेक्षता से बँधे हुये हैं, इसलिये जितने समय पृथ्वी में हैं, उतने समय में हम सोच भी नहीं सकते कि पृथ्वी चल रही है, लेकिन जब नक्षत्रों की विस्तृत खोज हुई तो पता चला कि हमारा ऐसा सोचना कि पृथ्वी या कमरा स्थिर है, भ्रम था, लगता था। सच बात यह है कि यह कमरा भी बराबर चल रहा है। उतने ही वेग से जितने वेग से पृथ्वी चल रही है।

मान लें पृथ्वी की गति 1000 मील प्रति सेकिंड है, तब इस कमरे में जो ईथर भरा हुआ है, वह भी 1000 मील प्रति सेकिंड की गति से चल रहा होगा। प्रकृति के सभी कार्य जो इस कमरे में हो रहे हैं, वह सब 1000 मील प्रति सेकिंड की गति से चल रहे हैं, इसलिये हमें चलने की स्थिति का पता नहीं चलता। पर वहीं पर हवा की गति इससे अधिक होती है, इसलिये उसकी गति का हम सीधे अनुमान कर सकते हैं, यदि संसार में गति के नियमों में सापेक्षता न होती तो हमें यह पता भी नहीं चलता कि हम स्थिर हैं या चल रहे हैं।

पृथ्वी सूर्य के आस−पास 18 मील प्रति सेकिंड की तीव्र गति से घूमती है, जबकि घड़ी की सुई एक सेकिंड में बहुत छोटा भाग (बन ग्रेजुएशन) घूमती है, हम इसी से अनुमान कर सकते हैं कि पृथ्वी कितनी तेज चल रही हो पर क्या हम उसे महसूस करते हैं? नहीं—यही हमारा भ्रम है कि हम जो कुछ भी देखते हैं, वह सब सापेक्ष (रिलेटिव) है और हम सत्य को नहीं जानते।

हम समय और पदार्थ से बँधे हैं, इसलिये पुनर्जन्म की स्थिति को नहीं समझ पाते। पूर्वजन्म में जब हम बैल या हिरन थे, तब हम भिन्न प्रकार के समय और पदार्थों से बँधे थे, इसलिये हमें पूर्ण समय और ब्रह्मांड की स्थिति का ज्ञान नहीं हो पाया था, वैसे ही गति के नियम के अनुसार अब मनुष्य शरीर में आ जाने पर फिर समय और ब्रह्मांड की सापेक्षता से बँध गये हैं, इसलिये पहले जन्म के संबंध में कुछ भी ध्यान नहीं रहा। यदि हम समय, स्थान या ब्रह्मांड के साथ अपनी गति के नियम की सापेक्षता को समझते और परम−गति (एब्सोल्यूट मोशन) की अवस्था को जानने का प्रयत्न करते तो संसार की यथार्थता, परलोक, पुनर्जन्म, इच्छाओं, कर्मफल, आत्मा, परमात्मा, स्वर्ग और मुक्ति की यथार्थता को भी समझना हमारे लिये सम्भव हो जाता।

गति या वेग के सभी माप (मेजरमेन्ट्स) किसी न किसी से संबंधित हैं। अतः सब प्रकार की गति से दृष्टा सापेक्ष है। उदाहरण के लिये एक रेलगाड़ी 60 मील प्रति घण्टा की रफ्तार से जा रही है, उसी ट्रेन का टिकट कलेक्टर 5 मील प्रति घंटा की गति से इंजन की ओर बढ़ रहा है, इस अवस्था में सड़क पर खड़े दृष्टा को ऐसा लगेगा कि टिकट कलेक्टर 65 मील प्रति घण्टा की रफ्तार से चल रहा है। दो गाड़ियाँ 40-40 मील प्रति घंटा की रफ्तार से एक ही दिशा में चल रही हैं, तब एक गाड़ी के यात्री देखेंगे कि दूसरी गाड़ी खड़ी है, दूसरी गाड़ी वाले यात्री पहली गाड़ी को खड़ी अनुभव करेंगे। किन्तु यदि दोनों गाड़ियाँ इसी रफ्तार से विपरीत दिशाओं में चल रही होतीं तो दोनों गाड़ियों के यात्री एक दूसरे को 80 मील प्रति घटा की रफ्तार से चलते हुए अनुभव करते।

इस तरह सापेक्षता के सिद्धांत का पहला नियम यह है कि साधारण परमगति (एब्सोल्यूट ट्रान्सलेटरी वेलासिटी) जो कि स्थान को किसी भी परिस्थिति में किसी भी तरीके से होती उसका माप कभी प्राप्त नहीं किया जा सकता। दूसरी बात यह है कि मुक्त आकाश (फ्री स्पेस) में प्रकाश का वेग किसी भी दर्शक को एक−सा प्रतीत होता है। हम चल रहे हों तो भी प्रकाश की गति में कोई सापेक्षता दृष्टिगोचर नहीं होती। अर्थात् जिस गति से प्रकाश हमारी आँखों की पुतली रेटिना’ से टकराता है, उसी गति से हमारी आँखों से झरने वाला प्रकाश भी साधन (मीडियम) की ओर चलता है तभी हम प्रकाश की गति को देख नहीं पाते। अर्थात् हममें और प्रकाश की सघनता में कोई अन्तर नहीं है। हम स्वयं आत्मा या ईश्वरीय प्रकाश हैं, उसका सबसे बड़ा प्रमाण यही है कि हम गति की सापेक्षता से उठकर परम गति (एब्सोल्यूट मोशन) की अवस्था में पहुँच सकते हैं, जो कि हमारे मस्तिष्क में उसी प्रकार है, जिस प्रकार समय और पदार्थ भी हमारे मस्तिष्क की ही संरचनायें हैं। मस्तिष्क बंध जाता है तो हमें एक सेकिंड का भी पता नहीं चलता, और एक विस्तृत कहानी का साराँश भी तीन घंटे में समाप्त हो जाता है।

सिनेमा बनाने वाली मशीन एक सेकिंड में 100 से भी अधिक फोटो लेने की क्षमता रखती है एक आदमी एक सेकिंड में चलते हुई, जितनी आकृतियाँ और मुद्रायें बदलता है, उन सब को वह मशीन 100 बार अपने भीतर भर लेती है, दुबारा जब उसे पर्दे पर दिखाया जाता है तो उसी गति को इस अंश तक धीमा कर दिया जाता है कि वही फोटो चलती−फिरती दिखाई देने लगती है। यदि बीच में फिल्म कभी कट जाती है और मशीन चलते−चलते रुक जाती है। तो जो जैसा फोटो सामने होता है, वैसा ही बना रह जाता है और वास्तविकता की पोल खुल जाती है कि दरअसल यह तो फोटो और प्रकाश के चलने का खेल मात्र था, कहानी में असलियत है न पर्दे पर कोई नायक−नायिका। हमारे जीवन को भी उसी प्रकार गति के नियम और उसकी सापेक्षता से बाँध दिया जाता है, इसलिये हम चलते−फिरते, खाते−पीते रहते हुये भी अपनी यथार्थ स्थिति को समझ नहीं पाते।

रंग वस्तु का भाग नहीं है। वह सफेद किरणों के विभाजन का परिणाम है। जितने भी रंगीन फूल हैं, वे रात में कभी नहीं खिलते। राज में केवल सफेद फूल ही खिल सकते हैं। अर्थात् प्रकाश से संपूर्ण जगत् व्याप्त है। पर रंगीन फूल दिन में ही खिलता है, वह इसलिये सूर्य का प्रकाश जब पौधों पर पड़ता है और फोटोन्स (प्रकाश का सबसे छोटा परमाणु जिसके टुकड़े नहीं हो सकते) में टूटकर उस आकृति में बदल जाता है, जिस आकृति का फूल दिखाई देता है।

फूल का रात में कोई रंग नहीं होता, सारी प्रकृति भी भूरी या काली लगती है। कारण प्रकाश का न होना ही है। उसी प्रकार संसार का प्रकृट और विराट् रूप वास्तव में कुछ भी नहीं है, वह सब ईश्वरी सत्ता का खेल मात्र है पर्दे के पीछे वही गति के नियमों से आबद्ध काम किया करता है। स्वयं गति में न होने के कारण ही वह सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान है।

प्रकृति में जो भी रंग−बिरंगापन है, वह सब सूर्य के प्रकाश की गति (मोशन) का परिणाम है, यदि सूर्य नहीं होता तो यह प्रकृति न होती। इस भीतर ही भीतर की हलचल को हम देख नहीं पाते, इसलिये परमगति (एब्सोल्यूट मोशन) का पता लगाने में असमर्थ होते हैं और तब तक हम साँसारिक भ्रमों में उसी प्रकार पड़े रहते हैं, जिस प्रकार रात में स्वप्न देखने पर सब कुछ सच−सच सा लगता है। मस्तिष्क की अवस्था बदलते ही वह झूठ हो जाता है। यह सत्य हो जाता है। मस्तिष्क की अवस्था बदलने पर ही अब जो दिखाई दे रहा है, वह भी गलत हो जाता है और हमारी इच्छायें जिस ढाँचे में ढली हुई होती हैं, हम उन योनि वाले संसार में चल जाते है, तब हमें वही सत्य लगता है। बाकी सब असत्य। इस भ्रम को मस्तिष्क की सीमा में बने रहकर ही समझ सकते हैं, जब तक गति की सापेक्षता से बँधे रहें, तब तक न तो यह भ्रम समझ में आयेगा और न हम अपने दृष्टिकोण और व्यवहार में परिवर्तन के लिये तैयार होंगे। उसमें अपना भले ही कितना ही अहित क्यों न होता हो। मनीषी और अध्यात्म तत्त्ववेत्ता चिन्तन पर इसीलिये जोर देते हैं कि हम अधिक से अधिक मस्तिष्क में रहें, ताकि यथार्थ हमारी समझ में उतरता रहे।

जिस प्रकार रंग प्रकाशीय प्रदर्शन (इन्टरफ्रिटेक्शन) मात्र था। उसी प्रकार हमारा शरीर भी जीवाणुओं (सेल्स) की गति (मोशन) के परिणामस्वरूप ही अदलता−बदलता दिखाई देता है। इसके भीतर भी सूर्य के प्रकाश की भाँति एक चेतना गतिशील है और वह भी निरंतर विकीर्ण होती रहती है। मनुष्य की मृत्यु एक दिन में नहीं होती या यों कहें कि शरीरान्त एक दिन का परिणाम नहीं होता, वह प्रक्रिया तो जन्म लेते ही प्रारम्भ हो जाती है। हम आहार लेते हैं, साँस लेते हैं, पानी पीते हैं, उसके द्वारा प्राण तत्त्व भीतर भरते जाते हैं, यह प्राण विचारों के रूप में सदैव निकलता रहता है। आहार के साथ शरीर में पहुँचने वाला पदार्थ भी मैल, पसीना, थूक, पेशाब, बदबू के रूप में निकलता रहता है। जब तक निकालने की क्रिया मन्द और ग्रहण की क्रिया में तीव्रता रहती है, हमारा शरीर बढ़ता है पर यह परिस्थिति बदलते ही शरीर बूढ़ा होने लगता है, जिस दिन प्राण का आखिरी कण तक निकल जाता है, उसी दिन यह शरीर निश्चेतन हो जाता है।

शरीर में इतनी गति होती रहती है पर जीवाणुओं को उसका पता नहीं चल पाता उसका कारण गति की सापेक्षता ही है। हम शरीर से बँधे रहते हैं, शरीर को ही सब कुछ माने होते हैं, उसे दृष्टा की भाँति अलग करके नहीं देखते, इसलिये परिस्थिति की गम्भीरता समझ में नहीं आती, यदि इन्द्रियों की लिप्सा, शरीर को ही अपना स्वत्व मानने की भूल को त्यागकर केवल मस्तिष्क में ही देखें तो शरीर के एक−एक अणु में गति (मोशन) होती दिखाई देगी।

संपूर्ण भ्रम का कारण यह है कि हम जहाँ भी हैं समय और स्थान की भाँति गति के नियमों से भी सापेक्ष (रिलेटिव) हो गये हैं। यदि इस बंधन को तोड़कर स्वतंत्र ध्यान और चिन्तन को बढ़ा पायें तो देखें कि सूर्य−चन्द्रमा, बुध−बृहस्पति और सारा ब्रह्मांड ही हलचल में है। हलचल गति या वेग की उन्मुक्त अवस्था जिसे हम मस्तिष्क में एक क्षण रुककर अनुभव करते हैं, सदैव−सदैव के लिये प्राप्त कर लें तो परमगति को प्राप्त करना भी हमारे लिये सम्भव हो सकता है। वही मुक्ति, मोक्ष या परम−पद है और मुक्ति किसी स्थान विशेष में नहीं है।


गृहस्थ का सन्देह

एक दिन एक गृहस्थ ने महात्मा रामानुज से प्रश्न किया कि “महात्मन्! क्या ऐसा कोई मार्ग नहीं है कि यह संसार भी न छोड़ना पड़े और स्वर्ग भी पा लूँ।”

रामानुज हँसे और बोले—“हाँ, है ऐसा मार्ग। तुम जो कुछ कमाओ ईमानदारी से कमाओ। और जो कुछ व्यय करो—सदा दूसरों की भलाई के लिये करो।”

गृहस्थ को सन्देह हुआ उसने पूछा—“मगर ऐसे कठिन मार्ग पर कौन चल सकता है?” रामानुज ने दृढ़ विश्वास के साथ कहा—“जो नारकीय यातनाओं से बचना चाहता होगा और जिसे ईश्वरीय प्राप्ति की सच्ची लगन होगी।”

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विज्ञान द्वारा प्रमाणित अन्तर्चेतना को भूला न जाय।

योग वशिष्ठ में बताया है—

परमाणु निमेषाणां लक्षाँशकलनास्वपि। जगत्कल्प सहस्राणि सत्यानीव विभान्त्यलम्॥ तेष्वप्यन्तस्तथैवान्तः परमाणु कणं प्रति। भ्रान्तिरेव मनन्ताहो इयमित्यवभासते॥

—योग वशिष्ठ 3। 62। 102,

अणावणावसंख्यानि तेन संति जगन्ति रवे। तेषान्तान्व्यहारौ घान्संख्यातुं क इव क्षमः॥

—योग वशिष्ठ 6। 2।176। 6

हे राम! प्रत्येक परमाणु के एक क्षुद्र टुकड़े के भी छोटे टुकड़े—लाखवें भाग के भीतर सहस्रों विश्व स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। उन परमाणुओं में से प्रत्येक के भीतर भी वैसा ही दृश्य जगत् विद्यमान है। यह आश्चर्य और अनहोनी जैसी लगती है पर यह सत्य है राम! आकाश के अणु−अणु में सुव्यवस्थित संसार समासीन है, उनके समाचार कौन जानता है?

ज्ञान, शक्ति, प्रकाश रूप यह चेतना ही ब्रह्म है, उसे जानना ही मनुष्य जीवन का उद्देश्य बताया है, शास्त्रकार ने। किन्तु हमारे सामने पदार्थ का एक विराट् संसार दृष्टिगोचर हो रहा है, हम उसमें भूल जाते हैं और विज्ञान को, वैज्ञानिक मान्यताओं को सत्य मानकर अन्तर्चेतना की उपेक्षा करने लगे हैं।

विज्ञान शास्त्रकार की उपरोक्त धारणा को स्थिर करता है, उसे सत्य सिद्ध करता है। सूक्ष्मदर्शी निरीक्षण (माइक्रोस्कोपिक इन्स्पेक्शन) से ज्ञात हुआ है कि मनुष्य का शरीर भी छोटे−छोटे अदृश्य परमाणुओं से हुआ है, उन्हें कोश (सेल) कहते हैं। कोशाओं की रचना प्याज के छिलकों की तरह (फैब्रिक फार्क्ड सेल्स टिसू) एक विशेष प्रकार को होती है, प्याज के छिलके की एक कोशिका अपनी पूरी प्याज की गाँठ की तरह ही परत के भीतर परत वाली होती है। इस तरह सूक्ष्म से सूक्ष्म वस्तु के भीतर भी एक नियोजित चेतना काम कर रही है।

पेड़−पौधों की पत्तियाँ भी साँस लेती हैं। साँस लेने की क्रिया वह पत्तियाँ आगे निकले हुये नुकीले भाग से करती हैं। सबसे आगे का नुकीला कोश बहुत ही छोटा होगा, वह आकाश से वायु खींच−खींचकर पहुँचाता रहता है, वायु में अकेली हवा नहीं होती, उसमें प्रकाश के कण (इसका विवरण फोटो संस्थेसिस के लेख में करेंगे) भी होते हैं, इसी वायु और प्रकाश कणों से वृक्ष−वनस्पतियों के भीतर ठीक वैसी ही चेतनता काम करती रहती है, जिस तरह मनुष्य शरीर में श्वास−प्रश्वास क्रिया से ही सारे क्रिया कलाप चलते रहते हैं।

छोटे से छोटे कोश में वायु, जल, प्रकाश, खनिज, लवण, धातुयें आदि विभिन्न वस्तुयें जिस−जिस मात्रा और अनुपात में होती हैं, उसी अनुपात में उनका स्वरूप बनता बिगड़ता रहता है और इस तरह प्रकृति में एक सुव्यवस्थित हलचल दिखाई देती रहती है। अणुओं के भीतर की यह हलचल विराट्, ब्रह्मांड में हो रही हलचलों की प्रतिच्छाया होती है। कुछ ऐसे तारों का पता लगाया गया है, जो कालान्तर में अपनी चमक बदलते रहते हैं, पृथ्वी में होने वाले ऋतु परिवर्तन को तो हम स्पष्ट देखते और अनुभव करते हैं।

कुछ विशेष प्रकार के नक्षत्रों के अध्ययन से पता चला है कि आगे उनकी गतिविधियाँ क्या होंगी, यह निश्चित रूप से जाना जा सकता है। आकाश में कुछ ऐसे भी तारे हैं, जिनको हम देख नहीं सकते। पर वे ध्वनि कम्पनों से अनुभव में आते हैं। वैज्ञानिकों ने इन तारों की खोज इसी आधार पर की है, जब कोई वस्तु हवा में तीव्रता से कम्पन करती है, तब उससे दबाव तरंगें भी तीव्रता से उत्पन्न होती हैं। जब यह तरंगें कान से कुछ निश्चित परिस्थितियों में टकराती हैं, तभी उनसे ध्वनि का अनुभव होता है। और इसी तरह अनेक अदृश्य तारों के अस्तित्व का पता लगाया गया है।

विज्ञान के अनुसार यह ध्वनि, यह परिवर्तनशीलता और यह विराट दृश्य परमाणु में विद्यमान हैं, तब फिर हम उस परमाणु की मूल सत्ता को ही क्यों न जानें ताकि उसे जानकर विश्व−ब्रह्मांड को जान लें। योगाभ्यास हमें उसी सूक्ष्म−दर्शन की प्राप्ति कराता है। इस विद्या के द्वारा मनुष्य परमाणविक चेतना में विश्वम्भर शक्ति और उसके विराट् स्वरूप के दर्शन कराता है।

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इस संसार में सब कुछ चेतना ही है।

“न जड़ं क्वचित् सर्वं चिन्मात्र मेव हि”

अर्थात्—“संसार में जड़ कुछ है ही नहीं सब कुछ चेतना मात्र है।” शास्त्रकार की यह बात सामान्य मनुष्य की समझ में नहीं आई। योग की सिद्धावस्था तक पहुँचे हुये, महर्षि रामकृष्ण जब भावावेश में आते थे, वह दक्षिणेश्वर की काली की मूर्ति से माँ-माँ कहते हुये लिपट जाते थे। मूढ़ और जड़ बुद्धि लोगों के लिये यह भावाभिव्यक्ति शाँतिपूर्ण लगी होगी, उन्हें अपनी बुद्धिशीलता का गर्व हुआ होगा, उमड़ती हुई भावनाओं में उसे कुछ भी दिखाई नहीं दिया होगा पर आज का वैज्ञानिक कहता है, सचमुच संसार में जड़ता कुछ नहीं है। चेतना ही चेतना, भाव ही भाव है सब कुछ।

स्थूल आँखों से देखने में यह बात आधी सच लगती है। सूर्य, चन्द्रमा, तारे, रेल, मोटर, बसें और चलने-फिरने वाले पक्षी जीव-जन्तुओं में तो कुछ चेतनता, कुछ हलचल दिखाई भी देती है पर पृथ्वी, मकान, वृक्ष, लोटा-थाली बर्तन, पुस्तकें, पौधे, यह तो सब स्थिर लगते हैं। यह भी चंचल और गतिशील रहे होते तो हम रात मकान नं. 313 कलेक्टरगंज में सोते और प्रातःकाल जब जागकर उठते तो अपने आपको मकान नं. 312 की बगल में नहीं, 1685 मुहल्ला रामदास मंडी में पाते।

इससे शास्त्रकार की बात असत्य नहीं हो गई? हमारी समझ मात्र का अंतर है, अन्यथा वस्तुतः संसार में जड़ता कुछ है ही नहीं, जड़ता हमारी मानसिक स्थिति के कारण है, जितनी स्थूल बुद्धि होगी, उतनी ही स्थूलता सृष्टि में दिखाई देगी। यदि हम भावनाओं की गहराई से संसार को देखने और परखने लगें तो अपने दिखाई देने वाले शरीर, मकान, शहर, खेत, पेड़−पौधे तक अपने साथ रहने के लिये तैयार नहीं सब चेतन, गतिशील अपने−अपने उद्देश्य की पूर्ति में संलग्न दिखाई देने लगें। सृष्टि का प्रत्येक परमाणु चंचल है। अपना लक्ष्य प्राप्त करने के लिये सब अशाँत हैं, न जाने क्यों यह मूढ़ता तो मनुष्य के पल्ले आ पड़ी कि वह समय और पदार्थों की स्थूलता के आगे की बात सोच ही नहीं पाता। अपने आपको वस्तुओं से आसक्त, बाँधे हुये, माया−मोह के चक्कर में पड़ा हुआ, कामनाओं और वासनाओं में घिरा हुआ, कष्टपूर्ण जीवन जीता रहता है।

एक वैज्ञानिक ने एक लोहे की एक शलाका ली, उसका एक शिरा आग में लगाया, दूसरा हाथ में पकड़े रहा थोड़ी ही देर में दूसरा सिरा भी गर्म हो गया। शलाका हाथ से फेंक देनी पड़ी। पूछा गया शलाका क्यों फेंक दी? गर्म हो गई इसलिये, उन्होंने बताया, कैसे गर्म हो गई? अगला प्रश्न पूछा—जिज्ञासु ने तो वैज्ञानिक ने बताया कि अग्नि चेतन है, उसके कण जब लोहे की शलाका के स्थूल लौह परमाणुओं से टकराये तो उन परमाणुओं में विद्यमान चेतनता (लोहे के परमाणु में भी इलेक्ट्रान्स चक्कर काटते रहते हैं) ने अपना नियमित मार्ग बदल दिया। इलेक्ट्रान जो अब तक परमाणु की सीमा में बंधे थे, आग की गर्मी लगते ही ऐसे भागे जैसे ज्ञान के उदय होने पर राग−द्वेष और वासनायें भाग खड़ी होती हैं। अग्नि की ताप सारे परमाणुओं में यह हलचल उत्पन्न करती चली गई और दूसरा सिरा भी गर्म हो गया। वैसे बाहर से देखने में शलाका में अब भी कोई अंतर नहीं आया था। चेतना शक्ति है, जब तक वह रहती है, मनुष्य या कोई भी वस्तु स्निग्ध प्राणवान गर्म और प्रकाशवान दीखती है पर जड़ता के आते ही यह गुण समाप्त हो जाते हैं, इसलिये निश्चयपूर्वक भावनाशील व्यक्ति को अधिक शक्तिशाली कहा जा सकता है।

चेतना के सूक्ष्मतम स्वरूप का चिन्तन न करने के कारण ही हमारी बुद्धि जड़तावादी हो गई है। पृथ्वी हमें इसीलिये जड़ दिखाई देती है, क्योंकि हमने अपनी भावनात्मक चेतना के द्वारा उसे देखने का प्रयत्न नहीं किया। अब आप यह मानिये कि आप एक छोटे बच्चे हैं। आपके एक हाथ में एक हथौड़ा है, दूसरे में पृथ्वी छोटे से मिट्टी के गेंद के समान। हथौड़े से पृथ्वी को पीस डालिये। देखिए पहाड़ नदियाँ, समुद्र, वृक्ष−वनस्पतियाँ सब रेत हो गये। इस रेत के किसी टुकड़े को एक छोटी−सी चीमटी से पकड़ कर प्रकाशीय सूक्ष्मदर्शी (माइक्रोस्कोप) से देखिये शायद कुछ साफ न दिखाई दे तो न्यूक्लियर माइक्रोस्कोप से देखिये परमाणु के भी टुकड़े न्यूट्रॉन, प्रोट्रॉन, इलेक्ट्रान, पाजिट्रान, क्रोमोसोम, जीन्स, आदि का अध्ययन इसी सूक्ष्मदर्शी से किया जाता है। आप देखेंगे उस टुकड़े में जो पृथ्वी का सबसे लघुतम टुकड़ा होगा, कैसी हलचल मची हुई है। आप उस छोटाई का अनुमान नहीं कर सकते हों तो एक सेन्टीमीटर में उन परमाणुओं को बिछाकर देख लें, इतनी सी जगह में एक करोड़ परमाणु आराम से बैठे मिलेंगे। इतना छोटा कि जिसकी कल्पना भी न की जा सके।

अब इसका नाभिक (न्यूक्लियस) देखते हैं तो लगता है, यह तो और भी छोटा है। एक सेन्टीमीटर स्थान में 100000000000 (एक नील) नाभिक मजे में समा सकते हैं। इस छोटी से छोटी स्थिति में भी कितनी हलचल है, यदि आप उसे देख पायें तो आप भी यही कहें—

आकाशो भूजलं वायुरग्निर्ब्रह्मा हरिः शिवः। यत्किंचिधन्नं किंचिच्च सर्वं चिन्मात्र मेवहि॥

—तेजबिन्दुपनिषद 1।28,

आकाश, पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, ब्रह्मा, विष्णु, महेश जो कुछ है और नहीं है, वह सब चैतन्य ही है। “न जड़ं क्वचित्” जड़ तो कुछ है ही नहीं।

अनुभव में न आने वाली यह चेतना जितनी सूक्ष्म है, उतनी ही विराट भी। पानी का एक परमाणु एक सेकिंड में 30 खरब टक्करें लेता है, उसकी एक परिक्रमा की दूरी इंच के दस करोड़वें भाग जितनी होती है पर इतनी सशक्त कि यदि उसे छेड़ दिया जाये तो इसी परमाणु की चेतना संपूर्ण पृथ्वी को जलाकर खाक कर सकती है। बमों की रचना में इसी शक्ति वाले भाग को छेड़ा जाता है। उसके वीभत्स परिणाम लोग नागासाकी के विध्वंस के रूप में देख चुके। मनुष्य की भावनात्मक चेतना में उससे भी कई गुनी प्रचण्ड और चमत्कारिक शक्ति होती है, जो कभी−कभी ही प्रभाव में आती है।

कोल्हापुर में एक परमहंस सन्त हो गये हैं। वे जब भावनाओं के आवेश में आते थे तो कोई कुछ भी देता जाता था, वह खाते चले जाते थे। एक बार कुछ बुरे व्यक्तियों को शरारत सूझी—उन्होंने दो भरी बोतलें शराब की दे दीं, परमहंस उन्हें पी तो गये पर संभवतः उस प्रभाव से उनकी व्याकुलता बढ़ी होगी और उसकी प्रतिक्रिया यह हुई कि उन दुष्ट लोगों को तत्काल कुष्ठ हो गया।

सामान्य अवस्था में यह शक्ति प्रसुप्त अवस्था में होती है, इसलिये वह समझ में नहीं आती या उसका प्रभाव दिखाई नहीं देता, किन्तु यदि साधना तपश्चर्या द्वारा अपने ही भीतर की भावनात्मक चेतना को जागृत कर लिया जाये तो मनुष्य सूर्य चेतना की तरह सर्वसमर्थ और शक्तिशाली हो सकता है। सामान्य और सुषुप्त अवस्था की चेतना शक्ति सूर्य की चेतना के समान ही दृष्टिगोचर नहीं होती पर वह शक्ति है असंदिग्ध।

अणुओं की चाल अनियमित होती है, इसलिये त्रिज्या को पार करके सूर्य के सतह तक पहुँचने में ही उसे कई वर्ष लग जाते हैं। सूर्य ताप के धन और ऋण अणु जब टकराते हैं तब उनमें केवल एक सेन्टीमीटर की ही उछाल होती है, इसलिये वे अणु कितनी ही तेजी से उछलें सतह तक पहुँचने में उसे काफी समय लग जाता है, इस बीच वह कोई प्रकार की किरणों में बँटकर चारों ओर प्रकीर्ण हो जाता है, इस तरह ताप शक्ति की थोड़ी−सी ही मात्रा व प्रकाश पृथ्वी तक आ पाती है और उतने से ही पृथ्वी की गतिविधियाँ चलती रहती हैं। शक्ति वाला अंश धीरे−धीरे प्रवाहित होता रहता है।

यह चेतना शक्ति ही समुद्र, वायु, वृक्ष−वनस्पतियों और मनुष्यों तक में काम करती रहती है। दरअसल पृथ्वी में दिखाई देने वाली हलचल बिलकुल स्तब्ध रही होती, यदि यह चेतना उतरकर न आई होती यह चेतना ही अनन्त स्वरूपों में विभक्त होकर विलक्षण सृष्टि उत्पन्न कर रही है। वही सब सिमट कर अलग हो जाती है तो मनुष्य का शरीर खाक होकर नष्ट हो जाता है।

हम जो भी बोलते−सुनते, खाते−पीते, भाव, अहंकार, आकांक्षायें, इच्छायें रखते हैं, वह सब चेतना के गुण हैं, शरीर नष्ट हो जाने पर भी चेतना में इनकी वासनायें और संस्कार बने रहते हैं, इसीलिये शास्त्रकार ने बार−बार आत्म−चेतना को जानने और उसे शुद्ध करने के लिये सावधान किया है। चेतना कभी मरती नहीं, रूपान्तर भर होता है, इसलिये भावनात्मक चेतना में ढँके लोगों की अमरता का अविश्वास करने का कोई कारण नहीं रह जाता।


वाणी की शक्ति

गुरुकुल के विद्यार्थियों में इस बात पर बहस छिड़ गई कि संसार में सबसे शक्तिशाली वस्तु क्या है? कोई कुछ कहता, कोई कुछ! जब पारस्परिक वाद−विवाद का कोई निर्णय न निकला तो फिर सभी विद्यार्थी गुरु जी के पास पहुँचे।

गुरु जी ने शिष्य की बात सुनकर कहा—“तुम सबकी बुद्धि खराब हो गई है।” और शाँत हो गये। शिष्य गुरुदेव की इस छोटी बात को भी सहन न कर पाये और थोड़ी ही देर में उनके चेहरे तमतमा गये। अपने लाल−लाल नेत्रों से गुरु जी को घूरने लगे।

थोड़ी देर बाद गुरु जी शिष्यों से बोले—“तुम सब पर आश्रम को गर्व है, तुम लोग अपना एक भी क्षण व्यर्थ नहीं खोते, अवकाश में समय में भी ज्ञान की चर्चा करते हो।” अब तो शिष्यों के मन में स्वाभिमान जागृत हुआ और उनके चेहरे खिल उठे।

गुरु जी ने कहा—“मेरे प्यारे शिष्यों! इस संसार में वाणी से बढ़कर कोई शक्तिशाली वस्तु नहीं है। वाणी से मित्र को शत्रु तथा शत्रु को मित्र बनाया जा सकता है। ऐसी शक्तिशाली वस्तु का उपयोग प्रत्येक व्यक्ति को सोच−समझकर करना चाहिये। वाणी का माधुर्य लोगों को अपनी ओर आकर्षित कर लेता है। और न बनने वाला कार्य भी बन जाता है।”

शिष्यगण सन्तुष्ट होकर लौट गये और उस दिन से मीठा बोलने का अभ्यास दृढ़तापूर्वक करने लगे।

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आत्म−शक्ति का कुछ ठिकाना नहीं?

यह तो साधुओं की अकारण बाढ़ ने योग की प्रतिष्ठा घटाई है, अन्यथा योग विशुद्ध विज्ञान है। भौतिक विज्ञान में जो महत्ता ताप, विद्युत, प्रकाश शब्द, चुम्बक आदि शक्तियों की है, आत्म−शक्ति का स्वरूप और महत्ता उससे हजारों गुना अधिक है। योगी शक्ति का पुञ्ज होते हैं, तब जबकि उन्होंने वस्तुतः योग आष्टाँग नियमों —(1) यम, (2) नियम, (3) आसन (4) प्राणायाम (5) प्रत्याहार (6) ध्यान (7) धारणा और (8) समाधि का अभ्यास किया हो। जिस प्रकार जनरेटर से विद्युत उत्पन्न करते हैं उसी प्रकार शरीर रूपी मशीन में उक्त साधनों का अभ्यास करने से आत्मा की शक्ति के अनन्त स्रोत जाग पड़ते हैं। यह शक्ति जिस किसी योगी के पास होगी, वह निर्भय होगा, निष्काम होगा, मुक्त होगा संसार के किसी भी व्यक्ति का उस पर प्रभाव न होगा वरन् वह सब का स्वामी, देवतुल्य होगा।

शरीर तो सबके एक से ही होते हैं, इसलिये योगी की पहचान शरीर से नहीं की जा सकती। आत्म−शक्ति का परिचय ही उसकी असली पहचान है। साधु अपमानपूर्वक निकाल दिये गये। यद्यपि वे स्वयं रेल से उतरने को तैयार थे पर टिकट कलेक्टर ने कुछ ऐसी अपमानजनक भारतीय साधु और योग−विद्या पर आक्षेप करने वाली बातें कह दीं कि साधु का स्वाभिमान जाग गया। क्रुद्ध नहीं हुये थे। क्रोध आता तो वे टिकट कलेक्टर को पहले नष्ट करते पर उन्होंने ऐसा न कर भारतीय योग−विद्या का गौरव प्रदर्शित करके ही उसके दम्भ को चकनाचूर करने का निश्चय किया।

संत रेलगाड़ी से उतर कर एक खम्भे के सहारे बैठ गये। किसी से कुछ बोले नहीं। निश्चल निस्तब्ध मुद्रा में बैठे साधु की दृष्टि एकटक इञ्जन के पहियों में लगी हुई थी।

गार्ड ने हरी झण्डी दिलाई, सीटी बजाई, ड्राइवर ने एक्सीलरेटर दाबा पर गाड़ी स्टार्ट न हुई। सोचा ब्रेक न जाम हो गये हों, उन्हें देखा—खुले पड़े थे। इञ्जिन के एक−एक पुर्जे की जाँच कर ली गई, कहीं कोई खराबी नहीं। गार्ड हरी झण्डी दिखाता रहा, गाड़ी लाल झण्डी। वह टस से मस न हुई ड्राइवर सारी शक्ति लगाकर हार गया।

दो घन्टे तक यही स्थिति रही। स्टेशन पर तहलका मच गया, हेडक्वार्टर को फोन किया गया, फिटरों ने लाइन की जाँच कर ली, कहीं रत्ती भर त्रुटि न निकली। इसी बीच किसी व्यक्ति की दृष्टि उन महात्मा पर पड़ी। उनकी आँखों से तीव्र ज्योति इञ्जन पर पड़ रही थी। लोगों को अब कारण समझते देर न लगी। अधिकारीगण उन सज्जन को आगे लेकर साधु के पास आये उन्हें प्रणाम कर क्षमा याचना की, उठाया और आदरपूर्वक गाड़ी में बैठाया और तब गाड़ी ऐसे स्टार्ट हो गई, जैसे वह इसी की प्रतीक्षा में थी।

जड़ प्रकृति को नियन्त्रण में रखने और उस पर स्वामित्व स्थापित करने की जो सामर्थ्य भौतिक शक्तियों में नहीं, यह आत्मा के अन्तराल में भरी पड़ी है, हम भी चाहें तो योग के आष्टाँग नियमों का अभ्यास कर उस शक्ति की न्यूनाधिक मात्रा की अनुभूति और उपलब्धि कर सकते हैं।

=कोटेशन======================

धर्म आत्मा का विज्ञान है। आत्मिक शक्ति सब शक्तियों से बढ़कर है। इसीलिये धर्म ही सच्चा विज्ञान है।

—महात्मा गाँधी

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लड़ रहा हो जब स्वयं विज्ञान से विज्ञान

सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक जे. वी. एस. हाल्डेने से एक बार एक अन्य वैज्ञानिक ने प्रश्न किया—“आप विज्ञान और धर्म में क्या संबंध मानते हैं, क्या विज्ञान के साथ धर्म का भी मानव−जीवन में महत्त्व है?”

जे. बी. एस. हाल्डेने ने हँसते हुये उत्तर दिया—“विज्ञान की शिक्षा और धर्म की शिक्षा दोनों एक दूसरे से विपरीत हैं। धर्म विज्ञान के आगे उस भिखारी की तरह है, जो अपने जीवन की रक्षा के लिये विज्ञान से ज्ञान के टुकड़े माँगा करता है, उससे वह अपना पेट पाल सकता है। उद्यम नहीं कर सकता, वह एक परोपजीवी के रूप में स्थित है, जिस प्रकार फर्नीचर (कुर्सी−मेज आदि) चारपाई और दीवार की दरारों में खटमल प्रवेश कर जाते हैं, उसी प्रकार विज्ञान की दरारों में धर्म जीवित है।”

जे. बी. एस. हाल्डेने की बुद्धिशीलता से कोई इनकार नहीं करेगा, क्योंकि आखिर उसने अनेक वैज्ञानिक विभागों का अध्ययन किया था। उसके मस्तिष्क की पहुँच का प्रमाण यही था कि उसने कई अनुसंधान भी किये थे, इसलिये विज्ञान के प्रति उसकी आस्था स्वाभाविक थी। किसी इञ्जीनियर से राजयक्ष्मा की दवा पूछी जाये तो वह बेचारा क्या बतायेगा। जीवन भर पंसारी की दुकान करने वाले रामदास पंसारी के लिये यह कहाँ सम्भव हो सकता है कि वह रखे हुये जवाहरातों में से हीरा, नीलम, पन्ना, पुखराज, मोती, मूँगे, गोमेद, बदूर्य आदि अलग−अलग निकाल कर रख सके। पारखी के लिये विषय का पारंगत भी होना चाहिये। धर्म−तत्त्व का अध्ययन किये बिना उसे परोपजीवी का स्वरूप देना ऐसा ही था, जैसे गवर्नर का लड़का गवर्नर से कहे—“इस कुर्सी पर तुम्हारा नहीं पापा! मेरा अधिकार है।”

डॉ. डेस्काटेंस और प्रसिद्ध वैज्ञानिक हेरबर्ट बटरफील्ड ने जे. बी. एस. हाल्डेने की बात ध्यान से सुनी और फिर उसका प्रतिवाद करते हुये, उन्होंने पूछा—“क्या कोई वैज्ञानिक आज तक फूलों का सा सौन्दर्य बना सका है, क्या वृक्षों की हरियाली और मनुष्य−शरीर जैसे कोई सर्वसमर्थ मशीन बना सका है, यदि नहीं तो इन्हें किसने बनाया? संसार में जब तक सौन्दर्य है, व्यवस्था है, तब तक हम ईश्वर के अस्तित्व को अस्वीकार नहीं करेंगे, जब तक ईश्वर है, धर्म उसके सर्वसमर्थ पुत्र की भाँति विश्व के राज्यासन पर उसका साम्राज्य बना रहेगा। धर्म नहीं परोपजीवी विज्ञान है। क्योंकि वह आज तक अपनी प्रयोगशाला (लैबोरेटरी) में भावनायें नहीं बना सका।

बहुत से वैज्ञानिक मनुष्य के विचारों और कार्यों पर विज्ञान और धर्म के अन्तरंग प्रभाव के अध्ययन के लिये समय नहीं निकाल सकते, इसलिये ही विज्ञान और धर्म दो भिन्न अनुभवों के रूप में दिखाई देते हैं। एक वैज्ञानिक जितना समय विज्ञान के अध्ययन के लिये देता है, उतना ही समय यदि वह धर्म के अध्ययन के लिए दे सका होता तो वस्तुतः वह अपने ही द्वंद्व−युद्ध से बच गये और उन्होंने संसार को भी उससे बचा लिया होता। विज्ञान कितनी ही हठधर्मी करे पर वह धर्म के अस्तित्व से इन्कार नहीं कर सकता, क्योंकि उसे यह तो पता है ही कि विज्ञान के फर्नीचर में भरे जाने के लिये अनेक दराजें हैं और उन्हें विज्ञान भर पाने में असमर्थ है केवल धर्म ही उस अभाव की पूर्ति कर सकता है।

एडिंगटन का कहना था, 17 वीं शताब्दी से ही बढ़ रहे विज्ञान ने, धार्मिक अंध−विश्वासों और प्राचीन रूढ़ियों का विनाश तेजी से किया है। अंध−विश्वासों की संख्या इतनी तीव्र हो गई थी कि विज्ञान को उस पर शुभ−चिन्तक की तरह नहीं शत्रु की तरह आक्रमण करना पड़ा। उसका फल यह हुआ कि ईश्वर, आत्मा कर्मफल जैसी आवश्यक मान्यताओं का भी उनके साथ ही सफाया हो गया। उन्होंने लिखा है—एक वैज्ञानिक के रूप में मैं भी सर्वप्रथम नास्तिक हूँ, किन्तु जे. बी. एस. हाल्डेने के साथ सहमत होने के लिये मैं बाध्य नहीं हूँ। हम मानते हैं कि धर्म और ईश्वर को हम एक वैज्ञानिक विचार−धारा अथवा अनुसंधान के रूप में नहीं ला सकते तो भी कई ऐसे अनुभव हैं, जो वैज्ञानिक ढंग से भी स्पष्ट नहीं किये जा सकते। हम नहीं जानते कि इन अनुभवों को किस ढंग से स्पष्ट किया जा सकता है। किन्तु यदि कोई उपाय हो सकता है तो उसे धर्म कहने में मुझे कोई संकोच नहीं हो सकता।

डॉ. बरनल भी वैज्ञानिकों की नास्तिकतावादी पंक्ति के सदस्य थे। वह कहा करते थे—“अब विज्ञान का विकास इतना अधिक हो चुका है कि इस वस्तुवादी संसार में धर्म और ईश्वर की आवश्यकतायें रद्दी एवं क्षीण हो चुकी हैं। हम ईश्वर और धर्म के बिना भी बहुत अच्छे रह सकते हैं।

इसका उत्तर भी एक प्रसिद्ध जीव−शास्त्री वैज्ञानिक डॉ. कोलिन्स ने दिया उन्होंने कहा—“यदि वैज्ञानिक अपने उपयोगितावाद सिद्धान्त को सुधार कर प्राणिमात्र के प्रति भाई−चारे का विश्वास बना लें तो भी उसे अपने मूल प्रयोजन और विश्व की उत्पत्ति जानने के लिये धर्म और ईश्वर का आश्रित होना ही पड़ेगा। जीव विज्ञान परमात्मा का स्मरण किये बिना नहीं रह सकता। जीव की उत्पत्ति और विकास के उद्देश्य का मूल्यांकन करने के लिये धर्म और ईश्वर की आवश्यकता सदैव ही बनी रहेगी।”

मध्य युग के अनेक विज्ञान−वेत्ताओं ने धर्म की आलोचना की और उसे मानवीय प्रगति का अवरोध तक ठहराया। उनका कहना था—“जब तक ईश्वर और आत्म−चेतना का विज्ञान इतना विकसित नहीं हो जाता कि उसे स्थूल पदार्थों की तरह ही पढ़ाया और प्रमाणित किया जा सके, तब तक इन मान्यताओं को शिरोधार्य नहीं किया जा सकता।”

धर्म जीवन की आन्तरिक और भावनात्मक प्रक्रिया है, उसके निश्चित परिणाम, विचारों की एकाग्रता और आत्मचिन्तन से ही प्रतीत होते हैं। इसलिये उसे एक स्वतंत्र रूप में अध्ययन का विषय बनाया जाना चाहिये था, जैसा कि भारतवर्ष में किया गया। यहाँ पदार्थ के गुणों के रूप में भी भौतिक विज्ञान का पर्याप्त विकास किया गया और चेतना के अस्तित्व की जानकारी के लिये भी योग विज्ञान का प्रादुर्भाव किया गया, जिससे स्थूल रूप से धर्म और ईश्वरीय सत्ता की अनुभूति की जा सके। आर. ए. मिलिकान ने पता लगाकर बताया कि इलेक्ट्रान में भी चार्ज होता है, इसी से सिद्ध हो जाता है कि सम्पूर्ण प्रकृति में एक मस्तिष्क (इन्टेलीजेन्स) काम करता है और वही आत्मा और भगवान का स्वरूप हो सकता है। यह एक प्रकार से आत्मा या परमात्मा की स्थूल व्याख्या ही है। भौतिकीय विवेचन की दृष्टि से ही महर्षि कणाद ने आत्मा को पदार्थ कहा था। वैशेषिक दर्शन के इस मत की भारतीय आचार्य भी आलोचना करते हैं पर दरअसल ऐसी कोई बात है नहीं। एक बिन्दु निश्चित रूप से ऐसा है, जहाँ प्रकृति और आत्म-चेतना एकाकार होते हैं, यदि इस बात को पदार्थ विज्ञान द्वारा समझ लिया जाये तो धर्म की भावनात्मक प्रक्रिया को आसानी से समझा जा सकता है। आर. ए. मिलिकान के उक्त कथन से इसलिये इनकार नहीं किया जा सकता।

नास्तिकवादी धर्म और ईश्वरीय आस्थाओं को नहीं मानते हैं, किन्तु अलबर्ट आइन्स्टीन जैसे महान् वैज्ञानिक को भी यह मानना पड़ा कि वैज्ञानिक अनुसन्धान मनुष्य की आध्यात्मिक भावनाओं पर निर्भर करते हैं। इनका सम्बन्ध भी भावनाओं की गहराई एवं आन्तरिक अनुभूतियों से ही है। एक वैज्ञानिक प्रयोगशाला में अपने चिन्तन में इतना डूब जाता है कि उसे अपने शरीर की आवश्यकताओं का भी ध्यान नहीं रहता। वह यह देखकर ही कहते थे कि कुछ अनुभव है, उनसे यह व्यक्त होता है कि मेरा ईश्वर यहाँ विद्यमान है। वह शक्ति जो ऐसी अनुभूतियाँ कराती है। चिन्तन में बाँध लेती है, वही आत्मा है, ईश्वर है, उसी को धार्मिक चिन्तन द्वारा प्रगाढ़ बनाते हैं।

गिलवर्ट मुरे ने आइन्स्टीन के अनुभूतिवाद को और स्पष्ट करते हुए कहा था—बाज तेजी से उड़ता हुआ अपने शिकार की ऐसी ताक करता है कि वह उसके चंगुल से बच नहीं पाता, कुत्ता सुगन्ध लेता हुआ, उन्हीं गलियों से चलता हुआ चोर का पता लगा लाता है, जहाँ हम कई बार चलते हुए भी कुछ समझ नहीं पाते, हिरन इतनी तेजी से भागता है कि और कोई हो तो पीछे की आवाज सुन भी न सके, किन्तु वह सब कुछ सुनता भी जाता है। हम सामान्य जीवन के अनेक कार्य करते हैं पर ऐसी विलक्षणतायें प्रतीत नहीं होतीं तो भी उन विलक्षणताओं से इनकार नहीं कर सकते। वह बहुत मूल्यवान होती हैं और आध्यात्मिक होती हैं, इसलिए धर्म को मानव−जीवन से हम कभी अलग कर भी नहीं सकते हैं।

जेनी मार्गन नामक एक लड़की का उदाहरण इस मन्तव्य की पुष्टि करेगा। मिसौरी के सिडैलिया के निकट रहने वाली एक डरपोक लड़की जेनी मार्गन जब 14 वर्ष की हुई, तब अचानक उसके शरीर में अज्ञात विद्युत शक्ति आ गई। जो कोई भी उसे स्पर्श करता ठीक बिजली की तरह का उसे तेज करेंट लगता। वह कभी कोई लोहे की सलाख पकड़ती तो उससे विद्युत स्फुल्लिंग निकलने लगतीं। चिनगारियाँ इतनी तीव्र होतीं कि स्वयं लड़की उससे घबरा जाती।

इस विलक्षण घटना की सूचना डॉ. ऐशक्राफ्ट को दी गई। वे वैज्ञानिक थे किसी की बात पर सहज विश्वास करना उनके लिये आवश्यक न था, उन्हें इस बात पर कतई विश्वास न हुआ। इसका पता लगाने के लिये उन्होंने स्वयं लड़की का स्पर्श किया। और जब आधे घण्टे बाद उनकी बेहोशी दूर हुई तो उन्हें पता चला कि उनकी हालत सुधारने के लिये डाक्टरों को कितने प्रयत्न करने पड़े। इस पर भी उन्हें विश्वास न हुआ तो उन्होंने दुबारा पुनः लड़की का स्पर्श किया। इस बार उनकी जो हालत हुई कि दुबारा वे उसे स्पर्श तो क्या वहाँ बैठ सकने का भी साहस नहीं रख सके। उन्हें कहना ही पड़ा—“कोई विलक्षण शक्ति मनुष्य शरीर में है, जिसे हम वैज्ञानिक नहीं जानते।”

पीटरवान ने भारतीय योग पद्धति से यह शक्तियाँ विकसित कीं और यह दिखाया कि आध्यात्मिक शक्तियाँ भौतिक विज्ञान की शक्तियों से बढ़कर हैं, उनसे इनकार करने का तो कोई कारण ही नहीं है। वैज्ञानिक इनके शरीर की जाँच करके आश्चर्यचकित हैं वे इस पर कुछ भी अन्तिम निर्णय दे सकने में असमर्थता अनुभव कर रहे हैं जबकि उसके कुल एक सप्ताह पूर्व ही चन्द्र धरातल का वैज्ञानिक उपकरणों द्वारा स्पर्श तक किया जा चुका है।

वैज्ञानिकों की मान्यताओं का वैज्ञानिकों द्वारा ही खण्डन होता चला जा रहा है, तब प्रबुद्ध व्यक्तियों के सामने यह प्रश्न उपस्थित होता है कि किसे स्वीकार करें। अन्तिम निर्णय उन्हें स्वयं लेना चाहिये पर यदि यह कहा जाये कि मनुष्य जीवन में धर्म और अध्यात्म की महत्ता भौतिक विज्ञान के मूल्य और महत्त्व से बढ़कर है तो उसमें किसी को आश्चर्य या नाराजी नहीं प्रकट करनी चाहिये।


लुहार का घमण्ड

प्राचीन चीन देश की बात है। एक लुहार भाले और ढालें बनाया करता था। बड़ी मजबूत ढालें वह बनाता था। वह कहता था—“संसार का कोई भी भाला मेरी ढालों को नहीं छेद सकता।” भाले भी वह ऐसे ही मजबूत बनाता था। बड़ा गर्व था उसे अपने तेज भालों पर कहता था—“ऐसी कोई भी ढाल नहीं, जिसे मेरे भाले नहीं छेद सकते हों।” एक दिन एक आदमी आया और उस लुहार से पूछने लगा—“आखिर तुम्हारे ही भालों से कोई तुम्हारी ढालों को छेदना चाहे तो क्या होगा?” लुहार का सारा घमण्ड चूर−चूर हो गया। उससे कोई उत्तर देते न बना।


वासना स्वभाव नहीं विकार मात्र

राजकुमार युयुत्स सहित राजदरबार के अनेक श्री सामन्तों ने भी श्रावणी पर्व में भाग लिया। महर्षि आँगिरस उस दिन प्रजा से हेमाद्रि संकल्प कराया करते थे। पिछले वर्ष भर किसी ने पाप और बुराइयाँ की होतीं, जब तक उसका प्रायश्चित नहीं करा लेते थे, वे नया यज्ञोपवीत किसी को भी नहीं प्रदान करते थे।

आज अनहोनी हो गई। एक वर्ष तक लगातार उच्चस्तरीय साधना और तपश्चर्या करने के कारण निषाद कुल में जन्मे बटुक काँदीवर को उन्होंने क्षत्रियत्व प्रदान कर राज्य की सेना में प्रवेश का अधिकार दे दिया, जबकि राजकुमार युयुत्स को उन्होंने असंयमी ठहराकर एक वर्ष के लिये क्षत्रियत्व का अधिकार छीन लिया। उन्होंने बताया—“राजकुमार ने अनेक महिलाओं का शील भंग कर उन्हें व्यभिचारिणी बनाया है, उन्हें 1 वर्ष तक नंगे पाँव, उघारे बदन राज्य की गौयें चरानी चाहियें और दुग्ध कल्प करके शरीर शुद्ध करना चाहिये। जब तक वे वह प्रायश्चित नहीं कर लेते, उन्हें राजकुमार के सम्मानित संबोधन से भी वंचित रखा जायेगा। उन्हें केवल युयुत्स कहकर पुकारा जायेगा।

काँदीवर को क्षत्रियत्व और अपने आपको पदच्युत होते देखकर युयुत्स का दम्भ उग्र हो उठा। उसने याचना की गुरुवर! वासना मनुष्य का स्वभाव है। स्वाभाविक बातें अपराध नहीं गिनी जानी चाहियें। इस पर मनुष्य का अपना वश नहीं, इसलिए वासना व्यक्ति के लिये क्षम्य है।

आंगिरस तत्त्वदर्शी थे और दूरदर्शी भी। उन्होंने कहा—“युयुत्स! समाज और जातिगत स्वाभिमान से गिराने वाला कोई भी कर्म पाप ही गिना जाता है, फिर चाहे वह किसी की सहमति से ही क्यों न हो। जिन कुमारियों को तुमने भ्रष्ट किया है, वे एक दिन सुहागिनें बनेंगी। क्या उनके पतियों के साथ यह अपराध न होगा? तुम्हारी यह स्वाभाविकता क्या समाज के असंयम और पथ भ्रष्टता का कारण नहीं बनी?”

महर्षि आंगिरस अंत तक दृढ़ रहे। युयुत्स पराजित होकर लौटे। उनके कंधे पर पड़ा यज्ञोपवीत व्यभिचार के अपराध में छीन लिया गया।

चोट खाया सर्प जिस तरह फुँकार मारकर आक्रमण करता है, युयुत्स का हृदय भी ऐसे ही प्रतिशोध से जलने लगा। वह महर्षि को नीचा दिखाने के उपक्रम खोजने लगा।

राजधानी में संस्कृति समारोह आयोजित किया गया। उसका संचालन किसकी इच्छा से हो रहा है, यह किसी ने नहीं जाना। अच्छे−अच्छे संभ्रांत व्यक्ति आमन्त्रित किये गये। महर्षि आंगिरस प्रधान अतिथि के रूप में आमन्त्रित किये गये थे।

मरकत−मणियों से जगमगाते राजमहल की आभा उस समय और भी द्विगुणित हो गई, जब श्रीसामन्तों के मध्य प्रवेश किया नृत्याँगना काँचीबाला ने। झीने रेशमी वस्त्रों पर षोडश शृंगार देखते ही बनता था। काम−रूप थी काँचीबाला उसे देखते ही राजाओं के मन स्खलित हो−हो जाते थे।

नृत्य प्रारम्भ हुआ, पाँव थिरकने लगे, साज गति देने लगा। ताल के साथ नृत्य करती काँचीबाला ने अपनी चूनर उतार फेंकी। दर्शकों की साँसें गर्म हुईं पर फिर नृत्य में अटक गईं। अन्ततः उसने अपने संपूर्ण वस्त्राभूषण उतार फेंके। साज बन्द हो गया, दर्शक न जाने कहाँ चले गये। अकेले, आंगिरस और काँचीबाला। एक कामुक दृष्टि डाली नृत्याँगना ने महर्षि पर और प्रश्न किया—“नारी अभिसार क्यों करती है ऋषिवर!?” महर्षि बोले—“पुरुष की आत्म−दर्शन की जिज्ञासा को उद्दीप्त करने के लिये भद्रे! आज तुम्हारे सौन्दर्य में सचमुच अलौकिक बाल रूप है।” काँचीवाला आई थी, भ्रष्ट करने, पर आप गलकर पानी हो गई। यह सब युयुत्स का प्रबंध था। पर उससे महर्षि का क्या बिगड़ता। युयुत्स को अन्ततः तप और प्रायश्चित के लिये जाना ही पड़ा।

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मनुष्य शरीर जैसी मशीन नहीं

एलिवेटर या लिफ्ट एक ऐसी मशीन बनाई गई है, जिस पर बैठकर कई मंजिल की ऊँची इमारतों में क्षण भर में चढ़ा जा सकता है और सीढ़ियाँ चढ़ने की थकान से बचा जा सकता है। तार से सन्देश भेजने और उन्हें लिखित रूप में प्राप्त करने के लिये ‘टेलीप्रिन्टर’ मशीनें बनाई गई हैं। फैक सिमली नामक मशीनों पर आज-कल तार से चित्र भेजना भी सम्भव हो गया है। अमेरिका में हो रहे अधिवेशन के चित्र दूसरे ही दिन भारतीय समाचार पत्रों में छप जाते हैं, यह सब इसी मशीन की कृपा का फल है।

इसी प्रकार कैमरे, घड़ी, प्रेस, जाइरोस्कोप, जनरेटर कन्सर्टिला बेसिमर कन्वर्टर, विलियर्ड, टैंक आदि सैकड़ों मशीनें और आयुध मनुष्य की बुद्धिमत्ता की दाद देते हैं। ‘टेलस्टार’ नामक राकेट को तो संसार का महानतम आश्चर्य कहना चाहिए। भारी पृथ्वी को एक संचार सूत्र में बाँधने वाले 170 पौण्ड भार और कुल 34 इंच व्यास के इस यन्त्र में 3600 सौर बैटरियाँ लगी हैं, इसी की सहायता से हम संसार के किसी भी कोने में बैठे हुए व्यक्ति से ऐसे बातचीत कर सकते हैं, मानो वह अपने सामने या बगल में बैठा हुआ हो। इन सबके बनाने में मनुष्य की विलक्षण बौद्धिक क्षमता चमत्कार रूप में प्रकट हुई है, उस पर हम चाहें तो गर्व भी कर सकते हैं।

किन्तु मनुष्य शरीर जैसी मशीन बनाना मनुष्य के लिये भी सम्भव नहीं हुआ। ऐसी परिपूर्ण मशीन जो शरीर के रूप में परमात्मा ने बनाकर आत्मा को विश्व-विहार के लिए दी है, आज तक कोई भी वैज्ञानिक नहीं बना सका। भविष्य में बना सकने की भी कोई आशा मनुष्य से नहीं है। यह परमात्मा ही है, जो अपनी इच्छा से ऐसी प्राणयुक्त मशीन का निर्माण कर सका। संसार की विलक्षण से विलक्षण मशीन भी उसकी तुलना नहीं कर सकती।

भारतवर्ष में रक्त का ताप 100 डिग्री फारेनहाइट माना जाता है। त्वचा का ताप 98 डिग्री फारेनहाइट। मौसम का तापमान इससे घटता-बढ़ता रहता है। गर्मी के दिनों में तापमान इतना बढ़ जाता है कि बाहर धूप में नंगे बदन निकलना कठिन हो जाता है। उसी प्रकार सर्दी के दिनों में कहीं-कहीं तापमान शून्य से भी नीचे चला जाता है और तब बड़ी-बड़ी मशीनें भी ठप्प पड़ जाती हैं। उनका पेट्रोल, डीजल भी जम जाता है। यह तो मनुष्य शरीर ही है कि वह कठिन गर्मी और शीत को भी बर्दाश्त कर लेता है। त्वचा एक ऐसा ताप-रेगुलेटर है, जो गर्मी में शरीर को ठण्डा और ठण्डक में उसे गर्म बनाये रखता है। इतना अच्छा ताप-रेगुलेटर वैज्ञानिक भी नहीं बना पाये।

थोड़ा-सा गढ्ढा पड़ जाये तो साइकिल में ऐसा धक्का लगता है कि सवार एक तरफ जा गिरता है और साइकिल एक तरफ। कई बार मोटरें, हवाई जहाज, गाड़ियाँ ऊँची-नीची जमीन में उड़ते हुये किसी वस्तु से टकरा जाते हैं और टूट-फूटकर नष्ट हो जाते हैं, किन्तु त्वचा और रीढ़ की हड्डियाँ ऐसे ढंग से भगवान् ने शरीर में बनाये हैं कि वह मनुष्य को हर घड़ी चोट लगने की टूट-फूट से बचाते रहते हैं, रीढ़ की हड्डी में इंटर बर्टेबल डिस्क लगी होती है, जो हर दो रीढ़ की हड्डियों के बीच में ऐसी फिट रहती है कि मनुष्य कैसी भी छलाँग लगाये, उछले-कूदे पर चोट लगने का कोई भय नहीं रहता। यह सबसे अच्छे चोट-बचावक (शाक-आब्जर्बर) का काम करती है। शाक-आब्जर्बर वस्तुतः रीढ़ की हड्डी की ही नकल है। मनुष्य तो दरअसल अपनी सूझ-समझ से थोड़ी वस्तुएं ही बना सका अधिकांश शरीर की नकल या उन सीखी हुई बातों का विकास (मॉडिफिकेशन) मात्र होता है। मनुष्य, मशीनें बनाने में इतनी बुद्धिमत्ता समय और सूझ-बूझ का उपयोग करता है, तब क्या अपने शरीर जैसी कोई मशीन बनी होगी, तब बिना किसी ज्ञान या सूझ-समझ के बन गई होगी।

हम इस पर थोड़ा-सा भी विचार करें तो यह मानना पड़ेगा कि संसार में कोई ऐसी नियामक सत्ता है अवश्य जो बुद्धिशील मनुष्य से भी अधिक दूरदर्शी और सूक्ष्म ग्रहणशीलता से सम्पन्न एवं सर्वसमर्थ है। वह ऐसे उपकरण बना सकती है, जो मनुष्य करोड़ों वर्ष का समय लगाकर भी नहीं बना सकता।

कैमरे एक से एक अच्छे बने हैं। सूर्य के प्रकाश से लेकर विद्युत प्रकाश के माध्यम से भी फोटो खींच सकते हैं पर ऐसा कोई कैमरा अभी तक नहीं बना, जिससे लेन्स (कैमरे का सामने वाला शीशा) के नाभ्यान्तर (फोक लेन्थ) को बदला जा सकता हो। फोटो लेने के लिये अच्छे कैमरों के लेन्स भी पहले एक निश्चित नाभ्याँतर (नाभ्याँतर उस दूरी को कहते हैं, जो लेन्स से प्रारम्भ होती है और जहाँ, जिस वस्तु की फोटो ले रहे हैं, प्रतिबिम्ब पड़ता है में जाकर समाप्त होती है) पर फिट कर लेते हैं, तभी सही फोटो ले सकते हैं। फिल्मों तक में मशीनें पहले फिट करनी पड़ती हैं, किन्तु आँख के रूप में भगवान ने हमें ऐसा कैमरा दिया है, जिससे पास से पास और दूर से दूर वस्तु को भी हम आँखों को आगे-पीछे किये बिना मजे में देख सकते हैं।

प्रिज़्म या त्रिविमीय (थ्री डाईमेंशनल) कैमरे बड़े अच्छे माने जाते हैं पर आँख उससे भी अच्छी—किसी भी रंग को ज्यों के त्यों अन्तर से दिखा देने वाली होती है। इसकी सुरक्षा, सफाई का स्वयं प्रबन्ध (ऑटोमेटिक सेफ एण्ड क्लीनिक) रहता है। कैमरे के द्वारा ली गई फोटो पहले उल्टी (निगेटिव) आती है, फिर उसे दोबारा प्रिन्ट किया जाता है, जबकि आँख एक ही बार में दोनों आवश्यकतायें पूरी कर देता है।

कान से अच्छा ध्वनि साफ करने वाला (साउण्ड फिल्टर) यन्त्र नहीं। रेडियो, बेतार का तार (वायरलैस) की आवाजें एक निश्चित ऊँचाई (फ्रीक्वेंसी) पर ही सुन सकते हैं, किन्तु कानों से किसी भी तरफ की कोई भी ऊँची हलकी आवाज सुन सकते हैं। कई आवाजें एक साथ सुनने या कोलाहल के बीच अपने ही व्यक्ति की बात सुन लेने की क्षमता कान में ही है।

ध्वनि साफ करने के लिये ‘रेक्टीफायर’ यन्त्र का प्रयोग किया जाता है। कुछ यन्त्रों में बैकुअम सिस्टम काम करता हैं और अच्छे यन्त्रों में ‘गस सिस्टम’ से ध्वनि साफ करते है। उसमें धन प्लेट (एनोड) और ऋण प्लेट (कैथोड) के साथ ग्रिड को भी जोड़ना पड़ता है, तब ध्वनि साफ होती है। यह सिद्धान्त बाहरी कान (एक्सटरनल इयर) मध्य कान (मिडिल इयर) और अन्तश्रवण (इन्टरनल इयर) की नकल मात्रा है। कान की तीन हड्डियाँ — (1) स्टेपिस (2) मेलियम और (3) अकेस इन्हीं की आकृति से ध्वनि सम्बन्धी यन्त्रों का विकास हुआ है। आवाज सुनने के लिए हमें सीधे कष्ट नहीं उठाना पड़ता वरन् एक प्रणाली (आडिटरी सेन्टर आफ दि ब्रेन) काम करती है, वह आवश्यकतानुसार आवाज के शीघ्र या धीमे प्रभाव में भी हमें अवगत कराती रहती है और हम उसके फलितार्थ से तुरन्त परिचित हो जाते हैं। साँप फुसकारता है तो यह प्रणाली केवल उस फुंसकार का बोध ही नहीं कराती वरन् खतरे से सावधान करने के लिए शरीर के सारे रोंगटे खड़े कर देती है। ऐसी बढ़िया व्यवस्था संसार की किसी भी मशीन में नहीं हो पाई।

श्वास-प्रश्वास तथा सूँघने की तो कोई मशीनें बन भी नहीं पाई। मस्तिष्क जैसी विचार क्षमता तो कम्प्यूटर में भी नहीं। यह सारी बातें ही वैज्ञानिक के महत्त्व को घटाती और बताती हैं कि संसार में कोई अदृश्य किन्तु बुद्धिसम्पन्न शक्ति है अवश्य उसकी कलाकारी की बराबरी मनुष्य नहीं कर सकता। यह तुलनायें तो बाहरी और स्थूल हैं। यदि मनुष्य अपनी चेतना को जान पाये जैसा कि योगविज्ञान बताता है तो मनुष्य अपनी त्वचा के छिद्रों से सारे विश्व को, आँखों से दूर से दूर की वस्तु को, कानों से विश्वव्यापी हलचल को देख-सुन और समझ सकता है। चमत्कार जैसी दीखने वाली यह बातें योगियों के लिए ऐसे ही होती हैं, जैसी कि वैज्ञानिकों के लिए एलेवेटर, टेलेप्रिन्टर टेलस्टार और टेलीविजन।

=कोटेशन======================================================

प्रसन्नता बाह्य पदार्थों में नहीं, यह तो हृदय के अन्दर की वस्तु है। जो बाहरी आडम्बरों से प्रभावित नहीं होता, वह सदैव प्रसन्न रहता है

—शेख सादी

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शरीर का ही नहीं−आत्मा का भी ध्यान रखें।

इस बात से जरा भी इनकार नहीं किया जा सकता कि मानव जीवन में शरीर का महत्त्व कम नहीं है। शरीर की सहायता से ही संसार यात्रा सम्भव होती है। शरीर द्वारा ही हम उपार्जन करते हैं और उसी के द्वारा सारी क्रियायें संपन्न करते हैं। यदि मनुष्य को शरीर प्राप्त न हो तो वह तत्त्व रूप से कुछ भी करने में समर्थ न हो।

यदि एक बार मानव−शरीर के इस महत्त्व को गौण भी मान लिया जाये, तब भी शरीर का यह महत्त्व तो प्रमुख है ही कि आत्मा का निवास उसी में होता है। उसे पाने के लिए किए जाने वाले सब प्रयत्न उसी के द्वारा सम्पादित होते हैं। सारे आध्यात्मिक कर्म जो आत्मा को पाने, उसे विकसित करने और बंधन से मुक्त करने के लिए अपेक्षित होते हैं, शरीर की सहायता से ही संपन्न होते हैं। इस रूप में तो निश्चित रूप से शरीर का अपरिहार्य महत्व है। इससे इनकार नहीं किया जा सकता।

शरीर का महत्त्व बहुत है। तथापि, जब इसको आवश्यकता से अधिक महत्त्व दे दिया जाता है, तब यही शरीर जो संसार के बंधन से मुक्त होने में हमारी एक मित्र की तरह सहायता करता है, हमारा शत्रु बन जाता है। अधिकार से अधिक शरीर की परवाह करने और उसकी इन्द्रियों की सेवा करते रहने से, शरीर और उसके विषयों के सिवाय और कुछ भी याद न रखने से वह हमें हर ओर से विभोर बनाकर अपना दास बना लेता है और दिन−रात अपनी ही सेवा में तत्पर रखने के लिए दबाव डाला करता है। शरीर के दबाव में आ जाने वाला व्यक्ति कमाने−खाने और विषयों को भोगने के सिवाय, इससे आगे की कोई बात सोच ही नहीं पाता। उसका सारा ध्यान शरीर और उसकी आवश्यकताओं तक ही केन्द्रित हो जाता है। वह शरीर और इन्द्रियों की दासता में बँधकर अपनी सारी शक्ति, जिसका उपयोग महत्तर कार्यों में किया जा सकता है, शरीर की सेवा में समाप्त कर देता है। इस प्रकार उसका जीवन व्यर्थ चला जाता है और उस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए उसके हृदय में एक पश्चाताप रह जाता है, जिसके लिए यह बहुमूल्य मानव−जीवन प्राप्त हुआ है। इसलिए मनुष्य को इस विषय में पूरी तरह से सावधान रहने की आवश्यकता है कि शरीर का कितना महत्त्व है और अपनी सेवा पाने का उसे कितना अधिकार है?

शरीर की सेवा तक सीमित हो जाने की भूल मनुष्य से प्रायः तब होती है, जब वह शरीर को ही सब कुछ समझ लेता है। सत्य बात यह है कि मनुष्य शरीर नहीं आत्मा है। शरीर तो साधन मात्र है, साध्य केवल आत्मा ही है। इसलिए प्रधान महत्त्व शरीर को नहीं आत्मा को ही देना चाहिए। आत्मा स्वामी है और शरीर सेवक। इसलिए शरीर को ही आत्मा की सेवा में नियोजित करना चाहिए न कि आत्मा को शरीर के अधीन कर देना चाहिए। जो इस नियम एवं अनुशासन का उल्लंघन करते हैं, वे आत्मा की हित हानि करने की भयानक भूल करते हैं, जो निश्चित रूप से शोक, खेद और पश्चाताप का विषय है।

शारीरिक स्वार्थ का महत्व है, लेकिन एक सीमा तक। उसी सीमा तक जहाँ तक वह स्वस्थ, सशक्त और सक्षम बना रहे। वह अशक्यता तथा अल्पायु से बचा रहे। इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए उपार्जन भी करना है और सुख−सुविधा, मनोरंजन आदि की व्यवस्था भी। किन्तु सच्चा स्वार्थ आत्मा का ही है। उसी की पूर्ति और उसी का हित−साधन करने को प्रधानता दी जानी चाहिए। क्योंकि मानव−जीवन का उद्देश्य यही है और इसी के लिए यह अनुग्रह भी किया गया है।

आवश्यकता से अधिक शरीर की सेवा में लगा रहने से शरीर पुष्ट हो जाता है। उसकी जड़ता प्रबल हो जाती है। आवश्यकतायें वितृष्णा के स्तर पर पहुँच जाती हैं और तब मनुष्य मोह−लोभ−मद−मत्सर आदि ऐसे विकारों से ग्रसित हो जाता है, जो स्पष्टतः आत्मा के शत्रु माने गए हैं। यह विकार अपना अस्तित्व पाकर मानव−जीवन को पतन की ओर ही प्रेरित करते हैं। उनका ऐसा करना स्वाभाविक ही है। मनुष्य को पतन की ओर ले जाना विकारों का सहज धर्म है। इसके लिए उन्हें दोष नहीं दिया जा सकता। दोषी तो वास्तव में वह मनुष्य है, जो इनसे अपनी रक्षा का प्रबंध नहीं करता। बिच्छू का धर्म है डंक मारना। यदि वह किसी के डंक मारता है तो इसके लिए बिच्छू को दोष नहीं दिया जा सकता। दोष तो उस व्यक्ति को ही आएगा, जिसने उस कुटिल कीट को कष्ट पहुँचाने का अवसर अपने प्रमाद के कारण दिया। एक मात्र शरीर की सेवा में निरत रहने से उक्त विकार जन्मेंगे, पनपेंगे और अपना अस्तित्व पाकर मनुष्य को धर्मतः पतन की ओर खींचेंगे। अस्तु, अपनी रक्षा के लिए मनुष्य को चाहिए कि वह प्रधानता शरीर को नहीं आत्मा को दे और उसी के हित साधन में निरत हो उसी का कल्याण करे।

शरीर को अपेक्षित अधिकार देकर जो बुद्धिमान व्यक्ति शेष समय तथा रुचियाँ आत्मा के स्वार्थ में, उसकी सेवा करने में लगाते हैं, वे लोक में सुख और परलोक में श्रेय के अधिकारी बनते हैं। शरीर की सेवा जहाँ मनुष्य को पतन के गर्त में गिराकर रोग−शोक, संताप, पश्चाताप, आदि की यातना दिलाकर भव−पाशों में लपेटती जाती है, वहाँ आत्मा की सेवा में मनुष्य अलौकिक सुख, हर्ष−उल्लास, आनन्द आदि के साथ मोक्ष एवं मुक्ति का पुरस्कार पाता है अवश्य ही शरीर की उपेक्षा मत कीजिए। कमाइये, खाइये, गृहस्थी बसाइए, सुख और संपत्ति के अधिकारी बनिए। लेकिन उसमें इस सीमा तक न डूब जाइए कि इसके सिवाय और कुछ सूझ ही न पड़े। शरीर और संसार में उतना ही समय, श्रम और मनोयोग लगाना चाहिए, जितना आवश्यक है और जिससे जीवन की गाड़ी सुविधापूर्वक चलती रहे। शेष का सारा समय, श्रम तथा मनोयोग आत्मा का हितसाधन करने में लगाना चाहिए, जिससे स्वार्थ के साथ परमार्थ और लोक के साथ परलोक भी बनता चले।

आत्मिक कल्याण आवश्यक होने के साथ−साथ थोड़ा कठिन भी है। कठिन इसलिए कि मनुष्य प्रायः जन्म−जन्म के संस्कार अपने साथ लाता है। वे संस्कार प्रायः भौतिक अथवा शारीरिक ही होते हैं। इसका प्रमाण यह है कि जब मनुष्य का देहाभिमान नष्ट हो जाता है तो वह मुक्त हो जाता है। उसे शरीर धारण करने की लाचारी नहीं रहती। चूँकि सभी मनुष्यों की अभिव्यक्ति शरीर में हुई, इसलिए यह सिद्ध है कि उसमें अभी शारीरिक संस्कार बने हुए हैं। पूर्व संस्कारों पर विजय पाकर इन्हें आधुनिक रूप में मोड़ लेना—या यों कह लिया जाए कि शारीरिक संस्कारों का आत्मिक संस्कारों से स्थानापन्न कर लेना सहज नहीं होता। संस्कार बड़े प्रबल व शक्तिशाली होते हैं। इन दैहिक संस्कारों को बदलने का सरल सा उपाय यह है कि जिस प्रकार साँसारिक कार्यों और शारीरिक आवश्यकताओं की चिन्ता की जाती है, उसी प्रकार आत्म−कल्याण की चिन्ता की जाए। जिस प्रकार साँसारिक सफलताओं के लिए निर्धारित एवं सुनियोजित कार्यक्रम बनाकर प्रयत्न तथा पुरुषार्थ किया जाता है, उसी प्रकार मनोयोगपूर्वक आध्यात्मिक कार्यक्रम बनाए और प्रयत्नपूर्वक पूरे किए जाते रहें। इस प्रकार यदि मनुष्य अपने विचार−कोण के साथ−साथ पुरुषार्थ की धारा बदल डाले तो निश्चय ही उसके संस्कार परिवर्तित हो जायेंगे और वह शरीर की ओर से मुड़कर आत्मा की ओर चल पड़ेगा।

संस्कार बदलने का प्रयत्न करने के साथ−साथ यह भी देखते चलना आवश्यक है कि संस्कारों में अपेक्षित परिवर्तन घटित हो भी रहा है या नहीं। इसकी पहचान यह है कि जब आप देखें कि आत्म−कल्याण के कार्यक्रमों की सफलता के लिए वैसी ही चिन्ता रहती है, जैसी कि घर−गृहस्थी के कामों और आर्थिक योजनाओं को सफल बनाने की तब समझ लें कि संस्कारों में परिवर्तन प्रारम्भ हो गया है। यदि भौतिक सफलता की चिन्ता की तरह आध्यात्मिक सफलता की चिन्ता नहीं होती तो समझ लेना चाहिए कि उस दिशा में उचित प्रगति नहीं हो रही है। आप जो कुछ भी आध्यात्मिक प्रयत्न कर रहे हैं, वह सब योंही एक बेगार अथवा मनोरंजन के लिए कर रहे हैं। उनमें आपका पूरा−पूरा मानसिक योग नहीं है और आपने उत्तरदायित्व के रूप में उक्त प्रयत्न का मूल्याँकन नहीं किया है।

संस्कारों में परिवर्तन लाने के लिए इस प्रकार के हल्के−फुलके दिखाऊ प्रयत्न करने से काम न चलेगा, इस कर्तव्य को जीवन लक्ष्य के उत्तरदायित्व की भावना से ही करना होगा। बहुत से लोग आवेश में आकर जोश−खरोश के साथ संस्कार बदल डालने में सहसा जुट पड़ते हैं। इस प्रकार का असात्विक प्रयत्न भी वाँछित सफलता सम्पादित करने में कृतकृत्य न होगा। ज्वार की तरह उठा हुआ कोई भी जोश कुछ ही दिनों में ठण्डा पड़ जाता है। संस्कारों में वाँछित परिवर्तन लाने के लिए सात्विक निष्ठा के साथ आध्यात्मिक कार्यक्रम अपनाकर और उत्तरदायित्व के साथ उन्हें पूरा करना होगा। प्रगति यदि कम भी है, लेकिन गति में एक दृढ़ता है तो चिन्ता की बात नहीं है। कभी न कभी वह काम पूरा हो जायगा। किन्तु यदि प्रगति के चरण तो लंबे−चौड़े दीखते हैं, और गति में दृढ़ता नहीं है तो निश्चय ही शीघ्र ही थकान घेर लेगी और उदासीनता गतिहीन हो जाने के कारण विवश कर देगी। संस्कारों में परिवर्तन लाने की योजना तभी सफल होगी, जब स्थिति के अनुसार व्यावहारिक कार्यक्रम बनाया जाए और दृढ़तापूर्वक एक−एक कदम बढ़ाया जाए। ऐसा करने से ही संस्कारों में परिवर्तन संभव है अन्यथा नहीं। जिस दिन अध्यात्म विषयक कार्यक्रमों में भौतिक कार्यक्रमों की अपेक्षा अधिक आनन्द और उत्साह अनुभव होने लगे और शरीर की अपेक्षा आत्मा की चिन्ता अधिक रहने लगे समझना चाहिए कि संस्कार बदल गए हैं और अब शीघ्र ही हमारा जीवन−यान भवसागर के उस तट की ओर चल पड़ा है, जिस पर कल्याण−कुसुमों से सुशोभित वनस्पति लहलहा रही है।

मनुष्य शरीर नहीं आत्मा है। उसे चाहिए कि वह शरीर की अपेक्षा आत्मा को अधिक महत्त्व दे। आत्मा का स्वार्थ ही सच्चा स्वार्थ है, जिसे परमार्थ के नाम से भी पुकारा जाता है। परमार्थ पथ पर अग्रसर होने के लिए आवश्यक है कि दैहिक संस्कारों के स्थान पर आत्मिक संस्कारों की स्थापना की जाए। इसके लिए आध्यात्मिक कार्यक्रमों को निर्धारित कर उनकी सफलता के लिए चिन्तापूर्वक उसी प्रकार प्रयत्न करना होगा, जिस प्रकार भोजन वस्त्र और घर−गृहस्थी की चिन्ता की जाती है।

मानव−जीवन का लक्ष्य आत्म−कल्याण है। इस लक्ष्य को पाने के लिए आवश्यक है कि आत्मा को शरीर के ऊपर प्रधानता दी जाए। यह क्रिया, विचार−कोण बदल देने से सहज में पूरी हो सकती है। हम मनुष्य हैं, शरीर ही सब कुछ है। इसकी सेवा करना हमारा कर्त्तव्य है, इस प्रकार के दैहिक विचारों के स्थान पर इन विचारों को स्थापित करना होगा—हम आत्मा हैं। शरीर तो साधन मात्र है। आत्मा का कल्याण करना ही हमारा परम धर्म है, जिसका निर्वाह हर मूल्य पर करना ही है। इस प्रकार मनुष्य शारीरिक दासता से बचकर आत्मा की सेवा में समर्पित हो जाएगा। जिससे उसे यह पश्चाताप करने का अवसर नहीं रहेगा कि—“हाय मैंने अज्ञान के वशीभूत होकर अमर आत्मा की उपेक्षा कर दी और अपना सारा जीवन उस शरीर की सेवा में लगा दिया, जो नश्वर है और जिसको दासता पतनकारी विकार देने के सिवाय और कुछ नहीं दे पाती।


चार मित्र

एक बार चार मित्र यात्रा पर निकले। उसमें तीन ‘बुद्धिहीन वैज्ञानिक’ थे और एक ‘बुद्धिमान अवैज्ञानिक’। मार्ग में उन्हें एक मरे हुए शेर का अस्थि पंजर मिला। बुद्धिहीन वैज्ञानिकों ने सोचा कि क्यों नहीं हम उस पर अपनी विद्या की परीक्षा कर लें। तुरन्त एक ने उसका अस्थि संचय किया, दूसरे ने उसमें चर्म माँस और रुधिर संचारित किया और तीसरा उसमें प्राण डालने ही वाला था कि चौथे बुद्धिमान अवैज्ञानिक ने कहा—“अरे−अरे, यह आप क्या कर रहे हैं? आप सिंह को जीवित करने जा रहे हो। वह जीवित होते ही हमें खा जायेगा। पहले अपनी रक्षा का उपाय तो कर लो।” लेकिन उसकी बात किसी ने नहीं मानी।

लाचार, वह अकेला वृक्ष पर चढ़ गया। उधर तीसरे ने जैसे ही उसमें प्राण डाले शेर जीवित होकर उन तीनों को खा गया।

प्रत्यक्ष को देखने वाला आज का संसार भी इन बुद्धिहीन वैज्ञानिकों की तरह है। जो शरीर के लिये तो साधन बढ़ाते चले जा रहे हैं पर आत्मा का तनिक भी ध्यान नहीं देते।


मुशल पर्व आस्ट्रेलियाई खरगोशों का

खरगोश आस्ट्रेलिया में बहुतायत से पाया जाता है। खरगोश शीघ्र−प्रजनन प्राणी है, उसे कुछ ही समय में सारे आस्ट्रेलिया द्वीप में अधिकार जमा लेना चाहिये था। पर ऐसा न होना यह बताता है कि प्रकृति में एक ऐसी व्यवस्था भी है, जो जनसंख्या वृद्धि को बलपूर्वक रोकती रहती है, यदि वह ऐसा न करे तो पृथ्वी में किसी प्रकार का अस्तित्व ही सम्भव न रहे।

यह व्यवस्था है विस्फोट की। जनसंख्या अनियन्त्रित होती है तो एक ही जाति के प्राणी लड़−भिड़कर स्वयं ही नष्ट हो जाते हैं। आस्ट्रेलिया के खरगोश इस बात के स्पष्ट प्रमाण हैं।

एक जोड़ी खरगोश से एक बार में कम से कम 6 बच्चे पैदा होते हैं। खरगोश जब 6 माह का होता है, तभी उसमें प्रजनन शक्ति आ जाती है। एक बार बच्चा देना आरम्भ करने के बाद वह हर तीसरे माह 6 बच्चे देता चला जाता है। इस तरह वर्ष में एक जोड़े से 24 बच्चे पैदा हो जाते हैं। इन चौबीस में से बारह बच्चे ऐसे होते हैं, जो 6 माह बाद स्वयं भी बच्चे पैदा करने लगते हैं। 9 वें महीने में बारहवें महीने 72 और कुल मिलाकर एक जोड़े से एक वर्ष में 24+36+72=132 खरगोश पैदा हो जाते हैं। चक्रवृद्धि ब्याज की दर से यह संख्या बढ़ती रहती है। यदि एक खरगोश 5 वर्ष जीवित रहे तो इस अवधि में उसके परिवार की संख्या 132+144+288+576+1152+2304+4608+9216+18432+36864+73728+147556+295112=590112 हो जायेगी। यह एक जोड़े की पैदाइश होगी। बाबाजी कुल 5 वर्ष के ही होंगे यदि ऐसे बाबाजी की संख्या कुल बीस ही हो जाये तो वहाँ खरगोशों की संख्या इस अवधि में 11802240 (एक करोड़ 18 लाख दो हजार दो सौ चालीस हो जाये)।

आस्ट्रेलिया का कुल क्षेत्र फल 30 लाख वर्ग मील है और वहाँ की जनसंख्या कुल 90 लाख है। यदि प्रकृति ने इन्हें अपने ही अनुपात से बढ़ने दिया होता तो आज आस्ट्रेलिया में एक भी तो आदमी न होता। हरियाली का एक भी तिनका न होता। दैवयोग से आस्ट्रेलिया में माँसभक्षी जीव भी नहीं पाये जाते, इसलिये इनके अस्तित्व को वहाँ कोई खतरा भी नहीं है। खरगोश का वहाँ एकछत्र साम्राज्य होता।

तो भी वहाँ खरगोश कम क्यों हैं, यह जानने की उत्कंठा वैज्ञानिकों में पैदा हुई जनसंख्या का अध्ययन किया। उन्होंने टेलेफोटोलेन्स (ऐसे कैमरे जो किसी स्थान पर लगा दिये जाते हैं, फोटो खींचने वाला पीछे चला आता है और दूर से ही फोटो लेता रहता है।) लगाकर बड़े−बड़े समूहों के चित्र लिये। सभी चित्र बड़े मजेदार थे। और यह दिखा रहे थे कि उनमें जल और अन्न के सीमित कोटे को प्राप्त करने के लिये कितनी मार−पीट होती है। आपस में ही उनके लड़−झगड़कर नष्ट होते दिखाई देने वाले यह चित्र आज भी ‘आस्ट्रेलियन न्यूज एण्ड इन्फॉर्मेशन ब्यूरो’ के पास सुरक्षित हैं। एक चित्र जो ‘किनशिप आफ ऐनीमल एण्ड मैन’ पुस्तक, जिसके लेखक मार्गन हैं, में पेज नम्बर 92 में छपा है। बड़ा ही कौतूहलवर्धक है वह। एक छोटे से गड्ढे में पानी पीने के लिये खरगोश का समूह उमड़ पड़ा है। वे एक दूसरे के ऊपर चढ़कर सबसे पहले आगे पहुँचकर पानी प्राप्त करने की आपा−धापी में हैं। गड्ढा छोटा है पानी बहुत कम। सब आपस में झगड़ते हैं कितने ही युद्ध में मर जाते हैं, कितने ही प्यास और भूख से तड़पकर दम तोड़ देते हैं।

खरगोश ठहरा विवेकहीन प्राणी पर आज का मनुष्य तो उससे भी गया−गुजरा लगता है, जो देखता और समझता है कि पृथ्वी में आजीविका के साधन सीमित हैं तो भी वह जनसंख्या बढ़ाता ही चला जाता है। आगे संयम न बरता गया तो आस्ट्रेलियाई खरगोशों का सा मुशल पर्व मनुष्यों में चल पड़े इसका कुछ ठिकाना नहीं?

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जल (वरुण देवता) की अनुपम अद्भुत और अन्यतम सत्ता

महर्षि मेधातिथि और काण्व ने जल की प्रशस्ति में लिखा है—

—ऋग्वेद 1। 5। 23

यज्ञ की इच्छा करने वाले के लिए जल एक ही माँ से पैदा हुए बन्धु के समान है, वह दूध को पुष्ट करता हुआ, यज्ञ मार्ग से चलता है, जो जल सूर्य के पास स्थित है अथवा सूर्य जिनके साथ हैं, वे हमारे यज्ञ को सींचें हम जलों को चाहते हैं, क्योंकि उन्हें गाये पीती हैं। बहते हुये जल को हवि देंगे। जलों में अमृत है, जलों में औषध है, जलों की प्रशंसा से उत्साह प्राप्त करो।

उपरोक्त वैदिक कथन में जहाँ जल के भौतिक लाभों का वर्णन किया है, वहाँ उसकी अत्यंत सूक्ष्म चेतन क्रिया शीलता पर भी प्रभाव डाला है, अब विज्ञान उसकी पुष्टि भी करता है। जल का बन्धु होना कुछ अटपटा सा लगता है पर आज के वैज्ञानिक को वही बात सच मालूम पड़ गई। उन्होंने देखा कि जल में जड़ के ही गुण विद्यमान् नहीं वरन् वह विश्व चेतना का एक अत्यन्त आवश्यक चेतन अंश है उसके बिना जीव जीवन धारण किये रहने में समर्थ नहीं। जीवों की कोशिका जैसे अत्यंत सूक्ष्म एवं कोमल भाग में जल की मात्रा ही सर्वाधिक है, कोश (सेल) शरीर का यह सबसे छोटे से छोटा परमाणु है, जिनसे सारे शरीर का निर्माण होता है। वह एक प्रकार के प्रोटोप्लाज्मा नामक तत्त्व से बना है। भीतर नाभिक (न्यूक्लियस) और उसको घेरने वाले भाग को साइटोप्लाज्मा कहते हैं। साइटोप्लाज्मा का अधिकाँश भाग जल है। भाई उसे कहते हैं, जो अपनी ही माँ के पेट में जन्मा हो और दुःख, कष्ट, असुरक्षा की स्थिति में काम आता हो। जो हमें मैत्री−प्रेम, दया का पाठ पढ़ाता है और आत्मकल्याण के लिये उत्पन्न संकटों से बचाता है। जल भी आत्म−चेतना का वैसा ही भाई है। कोश के नाभिक (न्यूक्लियस) को जिस प्रोटीन झिल्ली ने सुरक्षित किया है, उसमें जितने भी खनिज होते हैं, उन्हें जल ही पचाकर शक्ति देता है स्वयं दबकर नाभिक की सुरक्षा करता है। आश्चर्यजनक बात है कि जल लोहे, सोने जैसी कठोर धातुओं को भी जला डालता है। जीव कोशिका में वह सृष्टि के आदि आविर्भाव से ही विद्यमान होने और शरीर में सूर्य (अग्नि) की सहायता से प्राण संचार करने की क्रिया संपन्न करने के कारण वह सहोदर भाई ही तो हुआ। शरीर में तेजस्विता का आधार जल तत्व ही है। इसलिये हम जन्म लेने से लेकर मृत्यु होने तक और उसके पश्चात् पारलौकिक गति में भी जल−तत्व से विलग होकर नहीं रह सकते।

स्थूल पदार्थों में सामान्य नियम यह होता है कि वे अपने गुणों के अनुसार ही आचरण करते हैं। मनुष्य उसका अपवाद है, वह प्रत्येक स्थिति के अनुरूप अपने आप को ढालने की क्षमता से परिपूर्ण है, ऐसा इसलिये होता है कि उसमें स्थूल अवयवों की अपेक्षा चेतन अंश अधिक सक्रिय और समर्थ होता है। अन्तरिक्ष यान एक होता है पर उसमें लगी हुई बैटरियाँ सूर्य से विद्युत शक्ति खींचती रहती हैं, कैमरे फोटो लेते रहते हैं, एक्सीलेटर गति पर नियन्त्रण रखते हैं।

धातुओं के विशेष सम्मिश्रण से बनी चादरें कालिक किरणों से यान के भीतरी भाग की रक्षा करती हैं। देखने में एक यान सक्रिय रहता है, किन्तु उसका सम्पूर्ण व्यक्तित्व इन छोटी−छोटी सक्रिय इकाइयों से बना है। वह न हो तो यान का अस्तित्व ही कुछ न रह जाये। इसी प्रकार मनुष्य की अन्तर्चेतना स्वतन्त्र अस्तित्व होकर भी चेतना की इकाइयों से विनिर्मित है। जल भी उनमें से एक है और वह चेतना के किसी भी स्वरूप की तरह समग्र व्यक्तित्व है, अर्थात् वह पदार्थों की तरह केवल जड़ गुणों वाला ही नहीं। मानवीय चेतना की तरह वह अपने आप को किसी भी परिस्थिति में ढालने की क्षमता से परिपूर्ण है इसीलिये वरुण (जल) देवता है और उसके साथ आत्मसंबंध के द्वारा वह लाभ मिलने भी सम्भव हैं, जिनका वर्णन वेदों में किया गया है।

ऐसा करने की आवश्यकता तब न होती, यदि जल एक जड़ तत्त्व होता तो उसे अधिक गर्म अवस्था से ठण्डी अवस्था में लाते समय तो उसका घनत्व अवश्य बढ़ता, किन्तु ठण्डी अवस्था से 4 डिग्री सेन्टीग्रेड की अधिक गर्म अवस्था में लाते समय उसका घनत्व घटना चाहिये। अपने इस मनोनीत गुण के द्वारा वरुण देव सम्पूर्ण जलचरों और मनुष्यों की जीवन रक्षा करते हैं। हिमाच्छादित प्रदेशों के जब झोलों तथा सागरों के जल के ऊपरी भाग हिम में बदल जाते हैं, तब भी उसके नीचे 4 डिग्री सेन्टीग्रेड तापमान वाला तरल जल विद्यमान् रहता है तथा जल के ऊपरी धरातल से समस्त जलचर हटकर नीचे आकर अपनी प्राण रक्षा कर लेते हैं। इस अवस्था में भी वे अपने साथ पर्याप्त ओषजन (ऑक्सीजन) घोलकर रखते हैं, जो जलचरों को हिमाच्छादित अवधि तक पर्याप्त होती है। सूखे में रहने वाले लोग भी बर्फ भी ऊपरी सतह तोड़कर जल लेते और जीवन की रक्षा करते रहते हैं।

जल देवता ने अपने इस गुण का परित्याग कर दिया होता तो समुद्र में वाष्प बनने से लेकर ध्रुव प्रदेशों तक की स्थिति कुछ ऐसी हो गई होती कि प्राणियों का जीवित रहना असम्भव हो गया होता। इन नियमों के परिपालन में न्यूनाधिक कमी भी संकटकारक हो सकती थी पर उन्होंने प्राणियों के हित में अपने नियमों का उल्लंघन कभी नहीं किया। यह तो मनुष्य ही है, जिसे भगवान् ने अपनी सभी शक्तियाँ दीं, अपने जैसा सामर्थ्यवान् बनाया पर वही मनुष्य संसार के तो क्या अपने भी काम नहीं आया। संसार का ऐसा कोई भी जीव नहीं है, जो किसी भी स्थिति में मनुष्य के समान इच्छित परिवर्तन कर सकता है। जाड़े गर्मी बरसात के अनुरूप वस्त्र बदल लेने की क्षमता उसे दी गई।

किसी भी देश, प्रान्त और भाषा वाले क्षेत्र में आकर वह कुछ ही समय में वहाँ के कायदे−कानून में ढल जाता है। अद्भुत कार्य न सही पर मानव−मात्र के कल्याण के लिये वह किसी भी समय में अपनी स्थिति में परिवर्तन ला सकता है। मनुष्य ने भी जल देवता की तरह सेवा और सदाशयता का मार्ग अपनाया होता तो संसार में आज जो कोलाहल और कलह मची हुई है, वह तब शाँति और मैत्री में परिणत हो गई होती। जल देवता हमें मानवता की सेवा में निरन्तर रत रहने की, अपने आपको दबाकर कष्ट सहकर भी दूसरों के हित में काम आने की प्रेरणा देते रहते हैं।

उपरोक्त ऋचाओं में कहा गया है। जल सूर्य के पास स्थित है, स्थूल दृष्टि से यह अनहोनी बात है। सूर्य के पास कोई गैसें ही रह सकती हैं। उसका तापमान इतना अधिक है कि वहाँ स्थूलता ठहर ही नहीं सकती। लोहा, सोना, चाँदी, अभ्रक आदि सभी धातुयें वहाँ गैस स्थिति में ही रह सकती हैं, जल चूँकि तरल है या ठोस, इसलिये वह सूर्य के पास ठहर ही नहीं सकता पर वैज्ञानिकों ने इस आश्चर्य को भी पढ़ा। उन्होंने देखा कि जल 2 भाग, हाइड्रोजन और 1 भाग ऑक्सीजन के (टू वाल्यूम्स आफ हाइड्रोजन वन वाल्यूम ऑक्सीजन टू वाल्यूम्स आफ वाटर) सम्मिश्रण से बना है। यह दोनों ही गैसें हैं, विज्ञान के विद्यार्थी यह भी जानते हैं कि परमाणुओं के पीरियाडिक अन्तर के कारण एक ही तत्त्व अनेक तत्त्वों में प्रतिभासित होता है। पीरियाडिक तालिका में ऑक्सीजन से पहले वाला तत्त्व नाइट्रोजन और आगे वाला फ्लोरीन कहलाता है। इन दोनों के मिलने से तो हाइड्रोजन बना, जोकि सबसे हलका तत्त्व है और सूर्य के आस−पास वही छाया हुआ है। जब ऑक्सीजन इस हाइड्रोजन के साथ संयोग करता है तो जल दिखाई देने लगता है, यदि वह इस अवस्था में न आता तो सम्भवतः लोग उसके अस्तित्व को न मानते पर अब यह जानना सम्भव हो गया कि यह तत्त्व सूर्य की ही देन है, इसलिये जल सूर्य (चेतना) की ही एक शक्ति है, उसे होना चाहिये गैस किन्तु प्राणि मात्र या सृष्टि के संचालन के लिये उसने स्वेच्छा से दृश्य तरल होना स्वीकार किया।

हम राजा हैं या सचिव, श्रमिक हैं या उद्योगपति, अध्यापक हैं या विद्यार्थी सन्त हैं अथवा साधक सब एक ही परमात्मा के पुत्र भाई−भाई की तरह हैं। विचित्र श्रेणियों में प्रतिभासित होकर भी हम एक मूल सत्ता से जुड़े हुये उसी के अंश हैं। यह भाव तभी सार्थक हो सकता है, जब हम किसी भी स्थिति में अपने से कम योग्यता वाले, कम साधनों और पीड़ित दलित स्थिति में पड़े लोगों की सेवा, सहायता में संलग्न रहते हैं। समाज के किसी भी वर्ग का दीन और दलित होना, सबके लिये अपमान और पाप है, इसलिये हमें जल के समान ही भाई−चारे का व्यवहार कर संसार की भलाई में जुटे रहना चाहिये।

तरल होते हुये भी उसमें स्थूलता कुछ भी नहीं है, स्थूलता पृथ्वी का अंश है और जहाँ पृथ्वी (मिट्टी) का अंश होगा, वहाँ रंग, गंध और स्वाद भी होगा पर जल में न तो गंध है, न स्वाद और न रंग इसलिये वह विशुद्ध चेतनता है, यदि यह माना जाये तो उसमें किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिये।

दृश्य में स्थूलता और अदृश्य में चेतनता ही मनुष्य की विलक्षणता है। सच कहें तो धन और आत्मा के सभी भाव चेतनता के ही विशेषण हैं वही जीवन और विश्व को प्रभावित करते हैं, इसलिये भावनाओं का महत्त्व सर्वाधिक है। मनुष्य की भूल कि वह स्थूल द्रव्यों को तो महत्व देता है, किन्तु उस शाश्वत चेतना के विकास में किंचित भी ध्यान नहीं देता, जिससे उसका मूलभूत अस्तित्व बँधा हुआ है।

भारतीय आचार्यों ने मानवीय गुणों को सर्वाधिक महत्त्व दिया, क्योंकि वह जानते थे, चेतनता ही प्रधान है। वह प्रेम के लिये दया स्नेह, आत्मीयता मानवता की रक्षा के लिये अपनी सुख−सम्पत्ति तक को न्यौछावर कर देते थे। गुणों की इस प्रतिष्ठा का कारण उनकी आत्मानुभूति ही थी, जल का यह गुण बताता है कि मनुष्य भी दृश्य बना रहे पर वह अपने चेतनात्मक गुणों का अभाव न होने दे। आत्म शक्तियों को वह निरन्तर लोक−कल्याण के लिये जागरुक रखे ताकि चेतना जड़ता में न भटकने पाये।

यही नहीं जल सूर्यदेव की शक्ति के द्वारा अपना मंथन करके वाष्प पैदा करते हैं और फिर वर्षा के द्वारा सारी पृथ्वी को तृप्त करते हैं। पानी की विशिष्ट ऊष्मा संसार के सब पदार्थों से विलक्षण होती है। अपनी इस विलक्षणता के कारण ही वह शेष वातावरण में ताप का नियन्त्रण करते हैं। जल के द्वारा ही जीव एवं वनस्पतियाँ गर्मी एवं सर्दी के अन्तर को, उतार−चढ़ाव को झेलते रहते हैं। जन्म से ही नहीं तमाम जीवन भर मनुष्य वरुण देव की कृपा पर ही आश्रित रहता है। ऐसे उपकारी देवता को स्थूल और सूक्ष्म दृष्टि से आत्मसात करने वाला मनुष्य कभी अस्वस्थ, अप्रसन्न एवं असंतुष्ट क्यों रहेगा।

वरुण देवता की चेतना से सूक्ष्म संबंध स्थापित करने के ऋषियों के विज्ञान में कितनी सत्यता है, उसका रहस्य अब लोगों की समझ में आया है, जब जल के अणुओं की संरचना का अध्ययन किया गया। शुतः शेप आजीगर्ति ने उसकी कृपा से ही ईश्वरत्व का बोध किया था। ऋग्वेद अ. 1, अ. 2 व 14 म. 1, अ. 6 के 24 वें सूक्त में उन्होंने वरुण विद्या का उद्घाटन करते हुये बताया—

नहिते क्षत्रं न सहो न मन्युं वयश्चनामी पतयन्त आयुः। ने मां आयो अनिमिषं चरन्तीनं ये वातस्य प्रमिनन्त्यभ्वम् ॥6॥

अम्बुध राजा वरुणो वनस्योध्वं स्तूपं ददते पूतदक्षः नीचीनाः स्थुरूपरि बध्न एषामस्मे अन्तर्निहिताः केतवः स्युः॥ 7॥

अदब्धानि वरुणस्य व्रतानि विचाक— शच्चन्द्रमा नक्तमेति ॥ 10।14॥

इन मन्त्रों के अधिष्ठाता शुतः शेप आजीगर्तिः कृत्रिमो वैश्वामित्रो देवरातः ने कहा—“तुम्हारे अखण्ड राज्य बल और क्रोध को यह उड़ते हुए पक्षी नहीं पहुँच सकते। निरन्तर चलते हुये वायु का प्रबल वेग भी तुम्हारी गति रोकने में समर्थ नहीं। पवित्र पराक्रमयुक्त वरुण आकाश के ऊपर की ओर तेज समूह को स्थापित करते हैं, इस तेज समूह का मुख नीचे और जड़ ऊपर है। यह हमारे भीतर स्थित होकर बुद्धि रूप से वास करते हैं, वरुण ने सूर्य गमन के लिये विस्तृत मार्ग बनाया है तथा निराश्रय आकाश में सूर्य के पाँव रखने की व्यवस्था की है। वे धृत नियम वरुण प्रजाओं के उपयोगी बारह महीनों को तथा तेरहवें अधिक मास को भी जानते हैं। सोने के कवच में उन्होंने अपना मर्म भाग ढँक लिया है। उनके चारों और समाचार वाहक उपस्थित हैं। (इसी मंडल में 25 वें सूक्त के मन्त्र)।

इन मंत्रों में शक्ति का विलक्षण विज्ञान भरा पड़ा है। उसका जो अंश वैज्ञानिक जान पाये हैं, वह इससे बिलकुल मिलता−जुलता है, जबकि वे अभी अरबवें हिस्से का शताँश ही जान सके हैं। पानी के विलक्षण गुण कर्म और स्वभाव का अध्ययन करते समय वैज्ञानिकों ने आश्चर्यपूर्वक देखा कि उसका अणु दो छोटी−छोटी भुजाओं वाला है, वह एक गुच्छे सा लगता है और दोनों भुजायें बाहर की ओर निकली हुई हैं, इन भुजाओं के मध्य में सिर की तरह ऑक्सीजन का एक परमाणु है, जिसमें दो इकाई, धन विद्युत आवेश है तथा हाइड्रोजन परमाणुओं में 2-2 इकाई ऋण विद्युत आवेश रहता है। ध्रुव विद्युतीय होने के कारण विपरीत दिशाओं वाली इन भुजाओं में प्रबल आकर्षण शक्ति है, उस आकर्षण शक्ति के मध्य में ही उसका नाभिक सुरक्षित है, यह सूर्य का अंश है। अर्थात् उसके नाभिक में सूर्य के जैसी प्रचण्ड क्षमता विद्यमान् है, जिसे वैज्ञानिक अभी जान नहीं पाये। यह वह सर्वान्तर्व्यापी शक्ति है, जिसे जानकर विश्व के किसी भी भाग में हो रही हलचल का पता लगाया जा सकता है, यही नहीं उस शक्ति का नियन्त्रण करना मनुष्य सीख जाये तो वस्तुतः वह करोड़ों मील दूर के आँधी−तूफान को भी घर में बैठा उसी तरह रोक सकता है, जैसे कोई किवाड़ अपनी इच्छा से खोल−बन्द कर सकते हैं, मस्तिष्क में भी जो शून्य स्थान (वेस्ट्रिकिल्स) है, उनमें अधिकाँश जल ही भरा है।

वरुण ईश्वर की विगुणात्मक शक्ति का पुञ्ज है, इसे वैज्ञानिकों ने देख तो लिया है पर अभी उनकी जानकारी प्रारंभिक है। पानी के अणु ध्रुव−विद्युतीय आकर्षण के कारण कई अणु गुच्छकों के सिरे एक स्थान पर चिपक जाते हैं, इससे त्रिविमीय (थ्री डाईमेंशनल) समुदाय का निर्माण होता है, इसे हाइड्रोजन बौडिंग कहते हैं, यह ‘बौडिंग’ ही जल के अनेक ज्ञात−अज्ञात असाधारण गुणों का आधार है। तरल स्थिति में आना ही इस हाइड्रोजन बौन्डिग का फल है। अन्यथा जल तो सूक्ष्म गैसीय स्थिति का तत्त्व है, इसी कारण से सभी हाइड्रोजन वाले पदार्थों की अपेक्षा वह 100 डिग्री सेन्टीग्रेड के सर्वाधिक तापक्रम पर उबलता और शून्य डिग्री में जम जाता है। इस तापक्रम के बीच का कोई भी पदार्थ तरल अवस्था में नहीं रह सकता पर प्रोटोप्लाज्म के अन्दर भी इसी गुण के कारण तरल स्थिति में विद्यमान है। ऐसा न होता तो आज जो सृष्टि दिखाई देती है, वह अस्तित्व में न आती।

यूनिवर्सिटी कालेज लन्दन के डॉ. ह्वाइट ने पानी में पोलीइथेलीन ऑक्साइड नामक पदार्थ घोलकर दिखाया कि वह एक सर्वशक्तिमान तत्व है। ऐसा करने पर उसने गुरुत्वाकर्षण के नियम का भी पालन नहीं किया, बिना किसी यन्त्र के वह ऊपर की ओर चढ़ने लगा, जब लोगों ने पूछा कि इसका कारण क्या है। तो डॉ. ह्वाइट को चुप्पी ही साधते बना, क्योंकि स्वयं उन्हें भी उसकी जानकारी नहीं थी। समग्र व्यक्तित्व सम्पन्न जल की इन विशिष्टताओं की जानकारी भारतीय अध्यात्म के तरीके पर शोध करके ही सम्भव है।

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माँसाहार का पाप पूर्व को भी पश्चिम न बना दे।

डॉ. बारमस रक्तचाप (ब्लडप्रेशर) की बीमारी पर एक शोध−कार्य चला रहे थे। अनेक रोगियों का अध्ययन करते समय उन्होंने जो एक सामान्य बात पाई वह यह थी कि रक्तचाप (ब्लडप्रेशर) के अधिकाँश बीमार लोग माँसाहारी थे। उनके मस्तिष्क में एक विचार उठा कि कहीं माँसाहार ही तो रक्तचाप का कारण नहीं है, यदि है तो किन परिस्थितियों में? इस प्रश्न के समाधान के लिये उन्होंने प्रयोग की दिशायें ही बदल दीं। अब वे माँसाहार से होने वाले शरीर पर प्रभाव का अध्ययन करने लगे। उनके प्रयोग और निष्कर्ष बहुत महत्वपूर्ण सिद्ध हुये दूसरे वैज्ञानिकों ने भी माना कि माँसाहार केवल शरीर ही नहीं, मानसिक स्थिति को भी प्रभावित करता है। दोनों पर उसकी प्रतिक्रिया दूषित और अस्वाभाविक होती है।

कई माँसाहारी जीवों को कुछ दिन के लिये माँस देना बिलकुल बन्द कर दिया गया। इस अवधि में निर्वाह के लिये उन्हें घास, सब्जी और फल खाने को दिये गये। देखा गया कि ऐसा करने से कुछ दिन में ही इन जानवरों का उतावलापन मन्द पड़ गया, वे काफी शान्त रहने लगे, कम हिंसक हो चले।

एक दूसरे कमरे में कुछ शाकाहारी जीवों को रखकर उन्हें माँसाहार के लिये विवश किया गया। उनमें से कुछ ऐसे थे, जिन्होंने तो आमरण अनशन ही कर दिया, उन्होंने माँस को सूँघा तक नहीं। अन्त में परीक्षण के लिये उन्हें अम्लीय (एसिडिक) आहार दिया गया। इससे उन पर बड़े दूषित प्रभाव दिखाई दिये, उनकी पाचन क्रिया अवरुद्ध हो गई और कई तरह के रोगों ने घेर लिया। उनमें अधिक स्वार्थपरता आ गई, उनका सौम्य स्वभाव नष्ट हो गया, वे गुर्राने और काटने तक लगे। पहले उनके पास जाने में उन्हें कोई भय नहीं लगता था। वे सकरुण आँखों से देखते रहते थे। पर इस तरह के प्रयोग के बाद उनमें संशयशीलता की मात्रा एकाएक बहुत अधिक हो गई।

माँस मनुष्य का स्वाभाविक आहार नहीं हो सकता। हम इस संसार में सुख−शाँति और निर्द्वंद्वता का जीवन जीने के लिये आये हैं। आहार हमारे जीवन धारण की सामर्थ्य को बढ़ाता है, इसलिये पोषण और शक्ति प्रदान करने वाला आहार तो चुना जा सकता है, किन्तु जो आहार हमारी मानसिक, बौद्धिक एवं आत्मिक शक्तियों को नष्ट करता हो, वह पौष्टिक होकर भी स्वाभाविक नहीं हो सकता। हमारे जीवन की सुख−शाँति शरीर पर उतनी अवलम्बित नहीं, जितना इनका संबंध मन, बुद्धि और आत्मा की शुद्धता से है। इसलिये जो आहार इन तीनों को शुद्ध नहीं रख सकता, वह हमारा स्वाभाविक आहार कभी भी नहीं हो सकता।

बहुत स्पष्ट बात है। जंगल के शेर, चीते, भेड़िये भालू, लकड़बग्घे माँसाहार करते हैं, इन्हें देखकर लोग कहते हैं कि शक्तिशाली होने के लिये माँसाहार आवश्यक है। उनकी एक दलील यह भी होती है कि माँस खाने की प्रेरणा स्वयं प्रकृति ने दी है, समुद्र की बड़ी मछलियाँ छोटी मछलियों को जंगल के बड़े जन्तु छोटे जीवों को मारकर खाते रहते हैं? प्रकृति ने मानवेत्तर प्राणियों की संख्या न बढ़ने देने के लिये ऐसी व्यवस्था की है पर मनुष्य उन परिस्थितियों से सर्वथा भिन्न है, जिनमें अन्य जीव−जन्तु जन्म लेते, बढ़ते और विकसित होते हैं। शेर, चीते माँसाहारी होने के कारण बलवान् होते हैं पर उनमें इस कारण दुष्टता और अशाँति से जो संशयशीलता उत्पन्न होती है, वह उन्हें भयग्रस्त और कायर बना देती है। शेर दिन भर भय ग्रस्त रहता है। चीते और भेड़िये खूँखार होने के अतिरिक्त समय केवल इसी प्रयत्न में रहते हैं कि कहाँ छिपे रहें, जिससे कोई उन्हें देख न ले या मार न डाले। साँप चलते हुए इतना भय ग्रस्त होता है कि सामान्य सी खुटक से भी वह बुरी तरह घबड़ा जाता है। मनुष्य भी यदि माँसाहार करता है तो उसमें भी स्वभावतः ऐसी संशयशीलता, अविश्वास और भय की भावना होनी चाहिये। यह बुराइयाँ मनुष्य को सदैव ही अधःपतित करती रही हैं।

हाथी माँस नहीं खाता, बैल और भैंसे माँस नहीं खाते, साँभर नील गाय शाकाहारी जीव हैं, यह शक्ति में किसी से कम नहीं होते। भारतवर्ष संसार के देशों में एक ऐसा देश है जिसमें अधिकाँश लोग अभी भी शाकाहार करते हैं यह प्रत्यक्ष उदाहरण है कि भारतीयों जैसा शौर्य संसार की किसी भी जाति में नहीं है। यदि किसी में है भी तो वह चील−झपट्टे जैसा है। आकस्मिक प्रहार तो एक बच्चे का भी प्राण घातक हो सकता है, उसे शौर्य कभी नहीं कहा जा सकता। वीरता आत्मा की पवित्रता का गुण है और वह माँसाहार से कदापि विकसित नहीं हो सकता।

किन्हीं अंशों में ऐसा न भी हो तो भी मनुष्य का पाचन संस्थान माँसाहारी प्राणियों के पाचन संस्थान की तरह कठोर और बलवान् नहीं होता। वह कम अम्लीय प्रकृति (एसिडिक नेचर) का ही आहार पचा सकता है। माँस में क्लिष्ट प्रोटीनों (काम्प्लेक्स प्रोटीन्स) की मात्रा अधिक होती है, अधिक प्रोटीन युक्त भोजन वैसे ही रक्त को अधिक अम्लीय बना देते हैं। माँसाहारी जन्तुओं का पाचन संस्थान काफी शक्तिशाली होता है। इनका माँस पचता है, तब काफी मात्रा में एमीनो एसिड बन जाता है, उसी एमीनो एसिड को यकृत (लिवर) प्रोटीन्स में बदल देते हैं। इसीलिये लगता है माँसाहार में शक्ति अधिक है।

किन्तु एमीनो एसिड में यूरिया (मूत्र) की मात्रा भी कम नहीं होती। सार्कोलैक्टिक एसिड भी माँसाहार से बनता है। यह दोनों पदार्थ रक्त में उसी मात्रा में शोषित (आब्जर्व) हो जाते हैं। ऐसा दूषित रक्त जब मस्तिष्क में परिभ्रमण करते हुये पहुँचता है, तब अधिक अम्लीय होने के कारण नाड़ी संस्थान (नर्वस सिस्टम) के नियंत्रक मस्तिष्क (पिट्युटरी ग्लैंड) में थकावट (फटीग) और अशुद्धता उत्पन्न करता है। इस थकावट और अशुद्धता को दूर करने के लिये अधिक रक्त की आवश्यकता आ पड़ती है, फलस्वरूप हृदय की धड़कन गति बढ़ जाती है और मस्तिष्क को ज्यादा खून पहुँचने लगता है। इसी कारण रक्त चाप (ब्लड प्रेशर) की बीमारी उठ खड़ी होती है।

गाँवों में रहने वाले लोगों को प्रायः लकड़बग्घे, बाघ या भेड़ियों का सामना करना पड़ जाता है। शहरी लोग चिड़िया−घरों में इन जन्तुओं को देखते हैं, जो इनके समीप से गुजरे होंगे उन्हें मालूम होगा कि उनके पास पहुँचने के काफी दूर से कितनी भयंकर दुर्गन्ध आने लगती है, उनके पास तो अधिक देर खड़ा भी नहीं हुआ जाता। यह दुर्गन्ध दरअसल और कुछ नहीं माँसाहार से रक्त में बढ़े मूत्र (यूरिआ) और सार्कोलैक्टिक एसिड के कारण होती है। यह तत्त्व मनुष्य के रक्त में मिलकर मस्तिष्क में दुर्गन्ध भर देते हैं, उससे कई बार लोग अच्छी स्थिति में अशाँति, असन्तोष, उद्विग्नता और मानसिक कष्ट अनुभव करते हैं, यह तो स्थूल बुराइयाँ हैं, आत्मा पर पड़ने वाली मलिनता तो इससे अतिरिक्त और अधिक निम्नगामी स्थिति में पटकने वाली होती है।

माँस के प्रोटीन उपापचय (मेटाबॉलिज्म) पर बुरा प्रभाव डालते हैं। शरीर में आहार पहुँचने से लेकर उसके द्वारा शक्ति बनने तक की क्रिया को उपापचय (मेटाबॉलिज्म) कहते हैं, यह कार्य निःस्रोत ग्रन्थियां (डक्टलेस ग्लैंड्स) पूरा करती हैं। इन ग्रन्थियों द्वारा ही मनुष्य की मनःस्थिति एवं संपर्क में आने वाले लोगों के साथ व्यवहार (रिएक्शन या विक्टैवियर) निर्धारित होता है। प्रोटीन्स की यह जटिलता (काम्प्लेक्सिटी) इन ग्रन्थियों को उत्तेजित करती रहती है, इसलिये ऐसा व्यक्ति किसी भी व्यक्ति के साथ कभी भी कुछ भी बुरा कार्य चोरी, छल, अपमान, लूटपाट, उच्छृंखलता और बलात्कार कर सकता है। पाश्चात्य देशों में यह बुराइयां इतनी सामान्य (कॉमन) हो गई हैं कि लोगों का इस ओर ध्यान ही नहीं रहा कि क्या यह आहार की गड़बड़ी का परिणाम तो नहीं। जिस दिन वहाँ के लोग यह अनुभव कर लेंगे कि मन, आहार की ही एक सूक्ष्म शक्ति है और उनकी मानसिक अशाँति का कारण मानसिक विकृति है, उस दिन सारे पाश्चात्य देश तेजी से इस दुष्प्रवृत्ति हो छोड़ेंगे।

इतिहास प्रसिद्ध घटना है कि जार्ज बर्नार्ड शा को जब माँसाहार की अनैतिकता मालूम पड़ गई थी, उसी दिन से उन्होंने माँसाहार बन्द कर दिया था। जहाँ इस तरह के पाश्चात्य विचारक माँसाहार से घृणा कर रहे हैं, दुर्भाग्य ही है कि यहाँ हमारे देश के शाकाहारी लोग भी भ्रम में पड़कर माँसाहार को बढ़ावा देते चले जा रहे हैं। उसी का परिणाम है कि पूर्व भी धीरे-धीरे पश्चिम बनता जा रहा है। अपने देश को इससे बचाने के लिये एक व्यापक विचार क्राँति लानी पड़ेगी। माँसाहार करने वालों को इन बुराइयों से अवगत और सचेत किए बिना हमारी आने वाली पीढ़ियों की सुख-शाँति एवं व्यवस्था सुरक्षित न रह पायेगी।

ऊपर बता आये हैं कि माँस में कुछ अत्यन्त क्लिष्ट (कांप्लेक्स) प्रोटीन होते हैं, प्रारम्भ में जब कोई नया-नया माँस खाना प्रारम्भ करता है, तब उसके पाचन संस्थान की पूर्व संचित शक्ति काम देती रहती है पर वह शीघ्र ही समाप्त हो जाती है, तब क्लिष्ट प्रोटीन (काम्प्लेक्स प्रोटीन) को सरल प्रोटीन (नार्मल प्रोटीन्स) बनाने के लिये किन्हीं विशेष द्रवों के लेने की आवश्यकता पड़ने लगती है, जो यह कार्य कर सकें। यह द्रव अल्कोहल या शराब होते हैं। शराब क्लिष्ट प्रोटीनों को रासायनिक क्रिया के द्वारा (बाई केमिकल रिएक्शन) प्रोटीन अम्ल रस में बदल देता है, इस प्रकार एक बुराई से दूसरी बुराई, दूसरी से तीसरी बुराई का जन्म होता चला जाता है।

इंग्लैंड और अमेरिका आदि प्रधान आमिषाहारी देशों में प्रायः 7 वर्ष की आयु से ही बच्चों को इसी कारण शराब देनी प्रारम्भ कर दी जाती है। अन्य माँसाहारी जातियों में भी शराब इसीलिये बहुतायत से पी जाती है। पाश्चात्य देशों में शराब (बीयर) जल की तरह एक आवश्यक पेय हो गया है। आहार की यह दोहरी दूषित प्रक्रिया वहाँ के जीवन को और भी दुःखद बनाती चली जा रही है।

माँसाहार से स्वास्थ्य की विकृति उतनी कष्टदायक नहीं है, जितना उसके द्वारा भावनाओं का अधःपतन और उसके फलस्वरूप उत्पन्न हुये दुष्परिणाम। मनुष्य परस्पर दया, करुणा और उदारता के सहारे जीवित और व्यवस्थित है। इन्हीं गुणों पर हमारी व्यक्तिगत पारिवारिक, सामाजिक और सम्पूर्ण विश्व की सुख-शाँति एवं सुरक्षा बनी हुई है। भले ही जानवरों पर सही जब मनुष्य माँसाहार के लिये वध और उत्पीड़न की नृशंसता बरतेगा तो उसकी भावनाओं में कठोरता, अनुदारता और नृशंसता के बीज पड़ेंगे और फलेंगे-फूलेंगे ही। कठोरता फिर पशु-पक्षियों तक थोड़े ही सीमित रहेगी, मनुष्य-मनुष्य के बीच भी उसका आदान-प्रदान होगा।

मानवीय भावना का यह अन्त ही आज पश्चिम को दुःख−ग्रस्त, पीड़ा और अशाँति−ग्रस्त कर रहा है, यही लहर पूर्व में भी दौड़ी चली आ रही है। वहाँ की तरह यहाँ भी हत्या, लूटमार, बेईमानी, छल−कपट, दुराव, दुष्टता, व्यभिचार आदि बढ़ रहे हैं और परिस्थितियाँ दोषी होंगी, यह हमें नहीं मालूम पर माँसाहार का पाप तो स्पष्ट है, जो हमारी कोमल भावनाओं को नष्ट करता और हमारे जीवन को दुःखान्त बनाता चला जा रहा है। समय रहते यदि हम सावधान हो जाते हैं तो धन्यवाद अपने आपको, अन्यथा सर्वनाश की विभीषिका के लिये हम सबको तैयार रहना चाहिये। माँस के लिये जीवात्माओं के वध का अपराध मनुष्य जाति को दण्ड दिये बिना छोड़ दे, ऐसा संभव नहीं, कदापि सम्भव नहीं।


पुरुषार्थ

वृक्ष ने पथिक से कहा—“तुम जितनी बार पत्थर मारोगे, उतनी ही बार उपहार में मैं फल दूँगा। यह तो मेरा व्रत है। पत्थर का उत्तर पत्थर से देना मुझे नहीं आता, भले ही मुझे क्षत−विक्षत होना पड़े।” पथिक ने कुढ़कर कहा—“तुम यों फूलो−फलो और मैं भूखा फिरूं, क्या यह तुम्हारा और तुम्हारे भगवान् का अन्याय नहीं।”

वृक्ष ने हँसकर कहा—“ईर्ष्या क्यों करते हो पथिक! मेरे पतझड़ के कष्टों को देखते तो पता चलता कि यह फल मैंने कितनी तपश्चर्या से प्राप्त किये हैं। तुम भी वैसा पुरुषार्थ कर देखो।”

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अपनी कमाई—सदा काम आई

सम्राट जनमेजय प्रति माह कुछ समय राज्य में यह देखने के लिये भ्रमण किया करते थे कि उनकी प्रजा को किसी प्रकार का कष्ट तो नहीं। विकास की जो योजनायें क्रियान्वित की जाती हैं, उनका परिपालन होता है या नहीं? उनका लाभ नागरिकों को मिलता है या नहीं?

वे एक गाँव से गुजर रहे थे। छिपे वेश में थे, इसलिये कोई पहचान नहीं सका। एक जगह लड़के खेल, खेल रहे थे। एक लड़का उनमें शासक बनकर बैठा था। सभासद बने लड़के सामने बैठे थे। शासक का अभिनय करने वाला लड़का जिसका नाम कुलेश था, खड़ा सभासदों को व्याख्यान दे रहा था—“सभासदों! जिस राज्य के कर्मचारीगण वैभव विलास में डूबे रहते हैं, उनका राजा कितना ही नेक और प्रजावत्सल क्यों न हो, उस राज्य की प्रजा सुखी नहीं रहती। मैं चाहता हूँ जो भूल जनमेजय के राज्याधिकारी कर रहे हैं, वह आप लोग न करें, ताकि मेरी प्रजा असन्तुष्ट न हो। तुम सबको वैभव−विलास का जीवन छोड़कर जीना चाहिये। जो ऐसा नहीं कर सकता वह अभी शासन सेवा से अलग हो जाये।”

सभासद तो अलग न हुये पर बालक की यह प्रतिभा उसे ही वहाँ से अवश्य खींच ले गई। जनमेजय उससे बहुत प्रभावित हुये और उसे ले जाकर महामन्त्री बना दिया। कुलेश युवक था तो भी वह बड़ी सूक्ष्म दृष्टि से राज्य−कार्यों में सहयोग देने लगा। सामान्य प्रजा से उठकर अब वह महामंत्री बनने चला था, तब उसके पास एक कुदाली, लाठी और एक उत्तरीय वस्त्र (अंगोछा) के अतिरिक्त कुछ नहीं था, वह इन्हें अपने साथ ही लेता गया था।

उसके प्रधान मन्त्रित्व काल में अन्य मन्त्रियों, सामन्तों एवं राज्य कर्मचारियों के लिये एक आचार−संहिता बनाई गई, जिसके अनुसार प्रत्येक पदाधिकारी को दस घण्टे अनिवार्य रूप से कार्य करना पड़ता था। अतिरिक्त आय के स्रोत बन्द कर दिये गये। इससे बचा बहुत सा धन प्रजा की भलाई में लगने लगा। सारी प्रजा में खुशहाली छा गई। जनमेजय कुलेश के आदर्श व प्रबंध से बड़े प्रसन्न हुये।

पर शेष सभासद जिनकी आय व विलासितापूर्ण जीवन को बट्टा लगा था, महामंत्री कुलेश से जल उठे और उसे अपदस्थ करने का षड़यन्त्र रचने लगे।

उन्हें किसी तरह पता चल गया कि महामंत्री के निवास स्थान में एक कक्ष ऐसा भी है, जहाँ वह किसी भी व्यक्ति को जाने नहीं देता। जब वह दिन भर के काम से लौटता है, तब स्वयं ही कुछ देर उसमें एकान्तवास करता है।

सभासदों ने इस रहस्य को लेकर ही जनमेजय के कान भर दिये कि कुलेश ने बहुत सी सम्पत्ति अवैध एकत्रित कर ली है। महाराज उनके कहने में आ गये। अतएव जाँच का निश्चय कर एक दिन वे स्वयं सैनिकों सहित कुलेश के निवास पर जा पहुँचे। सब ओर घूमकर देखा पर महाराज को सम्पत्ति के नाम पर वहाँ कुछ भी तो नहीं दीखा। तभी उनकी दृष्टि उस कमरे में गई। वे समझे कुलेश निश्चय ही अपनी कमाई इसमें रखता है।

महाराज ने पूछा—“कुलेश! तुम इस कक्ष में एकान्त में क्या किया करते थे?” “इनकी पूजा महाराज!” उसने उत्तर दिया। कुदाली मुझे सदैव परिश्रम की प्रेरणा देती थी और लाठी स्वजनों की सुरक्षा की। उत्तरीय वस्त्र की पूजा मैं इसलिये करता हूँ कि घर हो या बाहर यही बिछौना मेरे लिये पर्याप्त है।” यह कहकर कुलेश ने तीनों वस्तुयें उठा लीं और वहाँ से फिर उसी ग्रामीण जीवन में चला आया।

महाराज! जनमेजय सभासदों के षड़यन्त्र से दुःखी होकर हाथ मलते रह गये। यही दुःख अब भी बना हुआ है। वह तब दूर हो जब कुलेश जैसे राज्य कर्मचारी देश में उत्पन्न हों।

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हमारा दृष्टिकोण अध्यात्मवादी बने

यं लब्ध्वा च परमं लाभं मन्यते नाधिकं ततः। यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते॥

योगी परमेश्वर की प्राप्ति रूप लाभ से अधिक लाभ कुछ नहीं मानता। आत्मा को प्राप्त कर लेने से दुःख चलायमान नहीं करते।

कितना ही धन कमा लिया जाये, कितनी ही विद्या प्राप्त कर ली जाय, कितनी ही शक्ति संचय कर ली जाय—तब भी संसार के दुःखों से सर्वथा मुक्ति नहीं पाई जा सकती। धन अभावों एवं आवश्यकताओं को पूरा कर सकता है। विद्या, बौद्धिक विकास कर सकता है और शक्ति से किन्हीं दूसरों को वश में किया जा सकता है। किन्तु इस प्रकार की कोई सफलता दुःखों से मुक्ति नहीं दिला सकती। धनवानों को दुःख होता है, विद्वान् शोक मनाते देखे जाते हैं और शक्तिमानों को पराजित होते देखा गया है।

धन हो और विद्या न हो तो जड़ता से मिलकर धन विनाश का हेतु बन जाता है। विद्या हो पर स्वास्थ्य न हो तो विद्या का कोई समुचित उपयोग सम्भव नहीं। दिन−रात स्वास्थ्य की चिन्ता लगी रहेगी। थोड़ा काम किया नहीं कि कभी सिर दर्द है तो कभी अजीर्ण हो गया। कभी सरदी है तो कभी ज्वर घेर रहा है। इस प्रकार न जाने कितनी बाधायें और व्यथायें लगी रहती हैं। केवल विद्या के बल पर उनसे छुटकारा नहीं मिल पाता। इस प्रकार शक्ति तो हो पर धन और विद्या न हो तब भी पद−पद पर संकट खड़े रहते हैं। धन के अभाव में शक्ति निष्क्रिय रह जाती है और यदि उसके बल पर धन संचय भी कर लिया जाये तो विद्या के अभाव में उसका कोई समुचित उपयोग नहीं किया जा सकता विद्या रहित शक्ति भयानक होती है। मनुष्य को आततायी, अन्यायी और अत्याचारी बना देती है। ऐसी अवस्था में संकटों का पारावार नहीं रहता। धन, विद्या और शक्ति तीनों वस्तुयें संसार में किसी को कदाचित ही मिलती हैं।

यदि एक बार यह तीनों वस्तुयें किसी को मिल भी जाएं तो हानि−लाभ, वियोग−विछोह, ईर्ष्या−द्वेष आदि के न जाने कितने कारण मनुष्य को दुःखी और उद्विग्न करते रहते हैं। ऐसा नहीं हो पाता कि धन, विद्या और शक्ति को पाकर भी मनुष्य सदा सुखी, सन्तुष्ट एवं शाँत बना रहे। संसार की कोई भी ऐसी उपलब्धि नहीं, जिसके मिल जाने से मनुष्य दुःख क्लेशों की ओर से सर्वथा निश्चिंत हो जाये।

मनुष्य जीवन का लक्ष्य आनन्द की प्राप्ति ही है। उसी को पाने के लिये सारे प्रयत्न किये जाते हैं। भौतिक विभूतियों की सहायता से वह मिल नहीं पाता। मनुष्य दुःखी तथा उद्विग्न बना रहता है। तब ऐसा कौन−सा उपाय हो सकता है, जिसके आधार पर इस असफलता को सफलता में बदला जा सके? उसका एक मात्र उपाय यदि कोई है तो वह है ‘अध्यात्म’। अध्यात्म की महिमा अपार है। उसके द्वारा प्राप्त होने वाले अहेतुकी सुख की तुलना संसार की किसी भी विभूति से मिलने वाले क्षणिक सुख से नहीं की जा सकती। मानव−जीवन की सर्वोत्कृष्ट विभूति वही है। उसकी सहायता से मनुष्य देवताओं की भाँति सदा आनन्द से रह सकता है− देवत्व प्राप्त हो जाने पर दुःख की सम्भावना ही समाप्त हो जाती है।

अध्यात्म भव रोगों की अमोध औषधि मानी गई है। दुःखों के निवारण के लिए भौतिक प्रयत्नों के साथ−साथ यदि अध्यात्म की भी साधना की जाती रहे तो निश्चित ही भव रोगों से सहज ही छुटकारा पाया जा सकता है। आध्यात्मिक औषधि का महत्व जानने वाले प्राचीन ऋषि मुनियों ने भौतिक विभूतियों को त्याग कर भी सुखी और उपयोगी जीवन−यापन कर इसकी अमोघता को सिद्ध कर दिखलाया है। आज भी इसमें वही विशेषता मौजूद है, पर खेद है आज हमारे प्रमाद, भ्रम, अज्ञान, आलस्य एवं अनास्था आदि दोषों ने हमारी दृष्टि और अध्यात्म के महत्त्व के बीच परदा डाल दिया है। हम अध्यात्म के सारे महत्त्व को भूले चले जा रहे हैं। भौतिक उपलब्धियों में संलग्न रहने और अध्यात्म साधना की सर्वथा उपेक्षा करने से ही आज मनुष्य जाति इतनी उन्नति और प्रगति के बाद भी दुःखी और दीन बनी हुई है।

ब्रह्म ज्ञान, भौतिक विभूतियाँ और जड़ विज्ञान, उनका कितना ही विकास क्यों न हो जाये मनुष्य के जीवन लक्ष्य आनन्द को प्राप्त नहीं करा सकतीं। उसके लिए तो अध्यात्म तत्त्व को ही धारण करना होगा। बाह्य विकास और भौतिक उन्नति मनुष्य को कुछ सामयिक सुविधा का सुख भले ही प्रदान कर सके पर इससे श्रेयपूर्ण स्थायी सुख की उपलब्धि सम्भव नहीं। वह तो अध्यात्म से ही मिल सकता है। भौतिक विभूतियाँ मात्र इन्द्रिय सुख की सम्भावना उपस्थिति कर सकती हैं। इसके द्वारा वह अखंड आनन्द सम्भव नहीं, जो अध्यात्म के आधार पर इन्द्रिय निग्रह द्वारा प्राप्त होता है। संसार में चारों और जो दुःखों का जाल फैला हुआ है, उससे तभी मुक्ति मिल सकती है, जब सर्वथा साँसारिक लिप्साओं को कम कर अध्यात्म के श्रेय−पथ का प्रतिपादन किया जाय। साँसारिक कर्त्तव्यों के साथ−साथ आत्म−साधना में भी लगा जाय।

आज मनुष्य जाति जीवन का जितना समय भौतिक प्रगति में लगा रही है, यदि उसका एक अंश भी आत्म−क्षेत्र को उन्नत एवं उर्वर बनाने में लगा सके तो कोई कारण नहीं कि वह अपने जीवन लक्ष्य आनंद को न पा पाये। इसी एक मात्र भौतिक दृष्टिकोण के कारण ही तो वह अध्यात्म के शुभ परिणामों से वंचित बनी हुई है। आत्मा−परमात्मा के ज्ञान से रहित जड़−ज्ञान न उत्पन्न होने वाले दुःखदायी परिणामों को भोग रही है। मनुष्य ने जितनी प्रगति भौतिक क्षेत्र में की है, उससे कहीं अधिक सम्भावना आध्यात्मिक क्षेत्र में भरी पड़ी है। किन्तु उनको पाने के लिये भी अपनी चेतना और शक्ति को उसी प्रकार आत्म−विकास में लगाना होगा, जिस प्रकार भौतिक प्रगति में लगाई जा रही है। एक बार आत्मिक आनन्द को पा लेने पर संसार के सारे वैभव और भोग−विलास तुच्छ लगने लगेंगे।

मनुष्य का जीवन लक्ष्य नश्वर भोगों को प्राप्त करना नहीं है। वह तो संसार में अमृतत्व प्राप्त करने के लिये अवतरित हुआ है। संसार में यदि कुछ अमृत है, अविनाशी और अक्षर है तो वह आत्मा ही है। मनुष्य जन्म का उद्देश्य ही अध्यात्म मार्ग द्वारा आत्मा और आत्मा द्वारा परमात्मा को प्राप्त करना है। इस श्रेय को विस्मृत कर जो व्यक्ति केवल साँसारिक भोगों द्वारा शरीर की ही उपासना में लगे रहते हैं, वे अपनी बड़ी भारी हानि करते हैं। ऐसे अबोध लोगों को ही शास्त्रों में अज्ञानी एवं प्रमादी कहा गया है।

हमारी दुखपूर्ण परिस्थितियों का उत्तरदायित्व हमारे एक मात्र भौतिकवादी दृष्टिकोण पर है। यदि हम अपने दृष्टिकोण में परिवर्तन कर उसे थोड़ा भी आध्यात्मिक बना सकें तो बहुत अंशों तक हमारी ये दुःखद स्थिति बदल सकती है। आत्मा की उपेक्षा करते रहने पर भौतिक सम्पदायें कभी भी हमारी समस्याओं का समाधान नहीं कर सकतीं। शाश्वत सुख की प्राप्ति अथवा जीवन लक्ष्य की सिद्धि एक ही मार्ग से सम्भव है। और वह मार्ग है आध्यात्मिक जीवन पद्धति। इस पुण्य पथ का अवलम्ब लिए बिना निस्तार होना कठिन है।

अध्यात्मिक मानव−जीवन का बहुत बड़ा आधार है, उसकी महानतम सम्पदा है। मनुष्य के भौतिक एवं आत्मिक चिर उत्कर्ष के लिए इसका ग्रहण नितान्त आवश्यक है। मनुष्य जीवन की अगणित समस्याओं को हल करने और सुख−शाँतिपूर्वक जीने के लिए इससे बढ़कर अन्य कोई उपाय नहीं है। इसकी उपेक्षा करने के कारण ही मनुष्य जाति सब कुछ पाकर भी दीन−हीन बनी आत्मिक दरिद्रता का जीवन−यापन कर रही है। इस भयानक पतन का एक ही कारण है और वह है आत्मा की उपेक्षा करना अनाध्यात्मिक जीवन बिताना।

शरीर को भोग का साधन मानना एक अकल्याणकारी दृष्टिकोण है, अनाध्यात्मिक भाव है। इसी के कारण ही तो आज हम सब पतन के गर्त में गिरे हुए शोक−संताप और दुःख−क्लेशों में फंसे हुए हैं। शरीर आध्यात्मिक साधना का एक महान् माध्यम है। इसी की सहायता से आत्मा का ज्ञान और परमात्मा का साक्षात्कार होता है। इसे संसार के अपवित्र भोगों में लिप्त कर डालना अकल्याणकारी प्रमाद है, जिसे कभी भी न करना चाहिये। शरीर को भगवान का मन्दिर समझ कर आत्म−संयम तथा अध्यात्म साधना द्वारा श्रेय−पथ पर बढ़ना चाहिये। अनात्म भाव के कारण ही शरीर, शरीर बना हुआ है। अन्यथा यह एक चमत्कारी साधन है, जिसका सदुपयोग करके इसी जीवन में आत्मा को पाया और परमात्मा का साक्षात्कार किया जा सकता है। शरीर को अपनी सम्पत्ति मानकर भोग−विलासों में लगाये रहना अहंकार है। वस्तुतः शरीर आत्मा की संपत्ति है, उसका ही उपादान है, अस्तु इसे ऐसे साधनों में ही लगाया जाना चाहिए, जिससे भवबन्धन में आबद्ध आत्मा मुक्त हो और जीव को शाश्वत सुख का लाभ प्राप्त हो।

भव सागर में फँसे मनुष्यों की इस पतितावस्था से उद्धार का एक ही मार्ग है और वह है अध्यात्मवाद, भौतिकवाद के उन्माद ने आज मानव−जाति को उन्नत बना रखा है। वह कल्याण, अकल्याण के ज्ञान से सर्वथा रिक्त होती जा रही है। आज लोगों की मनोभूमियाँ इस सीमा तक दूषित हो गई हैं कि अमंगल में ही मंगल दीखने लगा है। मानसिक विकारों, आवेगों, प्रलोभनों और पापों पर नियन्त्रण कर सकना उनके लिए कठिन हो गया है। तनिक−सा प्रलोभन सामने आते ही पाप करने को उद्यत हो जाना, जरा−सा भय उपस्थित होते ही कर्त्तव्य−पथ का त्याग कर देना साधारण बात बन गई है।

चित्त की अस्थिरता और जीवन की निरुद्देश्यता ने लोगों को विक्षिप्त बना रखा है। लोग न करने योग्य व्यवहार करते और उसके परिणामस्वरूप शोक−संतापों में गिरते चले जा रहे हैं। उपेक्षणीय प्रतिकूलतायें, कठिनाइयाँ असफलतायें भी उनको तुरन्त क्षोभ, क्रोध, आशंका, निराशा और निरुत्साह के वशीभूत बना देती हैं। स्वार्थ, ईर्ष्या, कामुकता, निष्ठुरता, असहिष्णुता, विषय और वासनाओं ने लोगों का मनुष्य जीवन निकृष्ट और गर्हित बना रखा है। ऐसी भयानक मनोभूमि और ऐसे पापपूर्ण व्यवहार के रहते हुए कैसे आशा की जा सकती है कि मनुष्य अपने जीवन लक्ष्य परमानन्द को प्राप्त कर सकता है।

इन सब विकारों और विपरीतताओं का एकमात्र कारण है अध्यात्मवाद की उपेक्षा। यदि संसार के साथ आत्मा का भी ध्यान रखा जाये, उसके विकास और मुक्ति का प्रयत्न करते रहा जाये तो शीघ्र ही इन सारे भव रोगों से मुक्त होकर मनुष्य आनन्द की ओर अग्रसर हो चले। आत्म−लाभ ही सर्वश्रेष्ठ लाभ माना गया है, उसी को प्राप्त करना श्रेय है। और उसी को पाने के लिए प्रयत्न भी किया जाना चाहिये।


श्रम का पुरस्कार

बहरूपियों ने राजा के दरबार में पाँच रुपये का प्रश्न किया, तो राजा ने कहा कि —“वह कलाकार को पुरस्कार तो दे सकते हैं, दान कदापि नहीं।” बहरूपिये ने स्वाँग प्रदर्शन के लिए तीन दिन का समय माँगा।

अगले दिन राजधानी के बाहर टीले पर एक जटाधारी तपस्वी समाधि मुद्रा में शाँत बैठा दिखाई दिया। उत्सुकतावश चरवाहे वहाँ जुट गये। और पूछने लगे—“महात्मन्! आप कहाँ से पधारे हैं? बाबा, कुछ भिक्षा ग्रहण करेंगे !”

पर उत्तर में दिव्य मौन। नगर लौटे चरवाहों से उस महान् तपस्वी का वर्णन सुनकर सभी नागरिकों, सेठों ओर दरबारियों की सवारियाँ नगर के बाहर की ओर महात्मा के दर्शनार्थ दौड़ पड़ीं। फल-फूल, मेवा-मिठाई के अम्बार लग गये, किन्तु साधु ने आंखें न खोलीं। तीसरे दिन महाराज का आगमन हुआ। लाख अशर्फियाँ चरणों पर रख वह साधु से आशीर्वाद की प्रार्थना करते रहे, किन्तु तपस्वी अचल रहा। चौथे दिन बहरूपिये ने दरबार में उपस्थित होकर अपने सफल स्वाँग के लिए पाँच रुपये के पुरस्कार की माँग की।

“छिः छिः मूर्ख ! सारे राज्य का वैभव तेरे चरणों में उमड़ पड़ा। पर तब तूने आँख खोलकर देखा भी नहीं। अब केवल पाँच रुपये के लिये...।”

“उस समय सारे वैभव तुच्छ थे राजन् !” बहरूपिये ने राजा की बात काटते हुए उत्तर दिया—“तब मुझे वेश की लाज रखनी थी, पर अब पेट की आग अपने श्रम का पुरस्कार चाहती है।”

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बदलती परिस्थितियों में स्वयं भी बदलें

परिस्थितियों के मनुष्य जीवन पर पड़ने वाले जबर्दस्त प्रभाव से इनकार नहीं कर सकते पर वहाँ परमात्मा ने मनुष्य को ऐसी योग्यतायें भी दी हैं, जिनसे वह अपने आपको परिस्थितियों के अनुरूप ढाल सके। यदि मनुष्य ऐसा नहीं कर सकता तो दण्ड भुगतने और असफल पड़े रहने का दोष उसी का है।

वस्तुतः परिस्थितियाँ संसार में कुछ हैं भी नहीं। अपने आपको परिवर्तनों के अनुसार बदलते न रहने की प्रतिक्रिया का नाम ही परिस्थितियाँ है। संसार में जितने भी प्राणी हैं, वह प्राकृतिक परिवर्तनों के साथ अपने आपको बदलते रहते हैं, यही कारण है कि वे बिना किन्हीं साधनों के भी मुक्ति, आनन्द, स्वास्थ्य और नीरोगता का जीवन जीते रहते हैं। एक दूसरे को खा जाने की प्रवृत्ति पशुओं और जंगली जन्तुओं की कही जाती है, तथापि आज मनुष्य जितना अशाँत और द्वन्द्वों में फंसा हुआ है, उतने तो वन्यपशु भी नहीं है, इसका एकमात्र कारण परिस्थितियों के अनुरूप अपने आपको न बदलने का दोष है।

वातावरण परिवर्तनशील है। वस्तुयें बदलती रहती हैं, किसी भी स्थान के अनुकूल बने रहने का तात्पर्य यह है कि परिस्थितियाँ चाहे जिस दिशा में मुड़ें हमें उन बदलती हुई परिस्थितियों के साथ बदलने की अथवा परिस्थितियों के अनुसार अपनी शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक प्रणाली को ढालने की क्षमता होनी चाहिये। काम तभी चलेगा, जब हम इतने प्राकृतिक हों कि हमारी प्रत्येक गतिविधि प्राकृतिक परिवर्तनों के साथ बहती चली जाए, यदि हम उसका उल्लंघन करेंगे तो निश्चय ही रोग, शोक, हारी−बीमारी का कष्ट उठायेंगे।

ध्रुवीय प्रदेशों में कुछ जन्तु जैसे लोमड़ी, रीछ और गिलहरियाँ अपने आपको वहाँ की परिस्थितियों के समरूप रखती हैं, वहाँ वर्ष भर बर्फ जमी रहती है। बर्फ श्वेत होती है, यह जीव भी अपने बालों को श्वेत रखते हैं, इससे यदि कोई बाहरी व्यक्ति इनको ढूंढ़ना चाहे तो ढूँढ़ नहीं सकता। रंग की समरूपता के कारण यह अपने आपको बर्फ की चट्टानों के साथ इस तरह समायोजित कर लेते हैं कि शिकारी इनके पास घूमते रहते हैं तो भी पहचान नहीं पाते। मनुष्यों को भी ऐसे ही समाज परिवर्तन की आवश्यकता पड़ती है, अन्य स्थानों पर पहुँचकर वह अपने आपको एकाकी अनुभव करके दुःखी अनुभव करता है पर यदि उसने अन्य प्राणियों से अनुकूलन की विद्या सीखी होती अर्थात् उस वातावरण के अनुरूप अपने आपको ढाल लेने की योग्यता का उपयोग करता तो वह जहाँ भी जाता, वहीं परस्पर प्रेम, विश्वास, एकता और आत्मीयता स्थापित करके प्रसन्नता अनुभव करता।

मरुस्थल में पाई जाने वाली बकरियाँ, हिरण और ऊँट आदि वहाँ की प्रकृति को अक्षरशः ग्रहण कर लेते हैं। जिससे उनके शरीर भी पूरे और लहरियोंदार हो जाते हैं। कोई दूर से यह नहीं जान सकता कि वहाँ कोई खड़ा है, क्या और इस प्रकार वे अपने जीवन को सुरक्षित किये रहते हैं। कई सर्प जिस मिट्टी में रहते हैं, उसी रंग के हो जाते हैं, तितली पौधों−पौधों में जाकर उनके सौरभ और सौन्दर्य का आनन्द लेती है, इसके लिये वह किसी फूल से बंधती नहीं वरन् अपने आपको सभी फूलों के समान रंग−बिरंगा बना लेती है। टिड्डी जैसे कई कीड़े जो हरी−पत्तियाँ ही खाते हैं, अपने आपको हरा रखते हैं, वह हरे वृक्षों में बैठे रहते हैं पर बाहर का कोई व्यक्ति उनका पता नहीं लगा सकता।

समुद्री चिड़ियाएं जैसे फ्लावर्स भारद्वाज (हार्क) टिटहरी आदि खुले स्थानों पर अण्डे देते हैं। टिटहरी, सारस आदि पक्षी पानी के बीच खुले भाग में अण्डे देते हैं। यदि वे अण्डों का रंग अपनी मन−मर्जी से कुछ भी रखते तो कभी भी कोई हमलावर जानवर आते और उन्हें उसी तरह मार कर खा जाते, जिसे सामाजिक जीवन में संग्रह−वृत्ति वाले धनी लोगों को, जो दूसरे पीड़ित प्रजा वर्ग की सुविधाओं का भी ध्यान नहीं देते, चोर और डकैत लूट ले जाते हैं। सामाजिक जीवन से अपना ताल−मेल न रखकर अपनी खिचड़ी अलग पकाने वाले लोग अपने आप कितना ही अहंकार प्रदर्शित करें पर भीतर ही भीतर अपनी सुरक्षा के लिये सबसे अधिक डरने वाले दुःखी लोग वे ही होते हैं, जो समाज की परिस्थितियों में बने रहते हैं, वह इन पक्षों की तरह हैं, जो चौड़े में अण्डे देते हैं पर उनका रंग इस तरह का रखते हैं कि जमीं के रंग में और उनके रंग में कोई अन्तर दिखाई न दे। चील और बाज की आँखें बड़ी तेज होती हैं, वे ऊपर मँडराते रहते हैं पर उन्हें इन अण्डों का पता भी नहीं चल पाता। समुद्र में एक चपटी मछली (फ्लैटफिश) पाई जाती है, इसी कोटि का सर्वत्र पाया जाने वाला जन्तु गिरगिट है, यह जहाँ भी रहते हैं, अनुकूलन के द्वारा अपनी सुरक्षा बनाये रखते हैं। गिरगिट अपनी ओर किसी दुश्मन को आते देखता है तो वह जिस स्थान पर होता है उस स्थान का रंग निकालकर उसी में छुप जाता है। दुश्मन समझ नहीं पाता और इधर से उधर निकल जाता है, कई बार वे कई तीव्र रंग निकालकर दीवाल खड़ी कर देते हैं और आप स्वयं अपने आपको बचा कर निकाल ले जाते हैं। प्रकृति के यह उदाहरण बताते हैं कि संसार में अस्तित्व उन्हीं का सुरक्षित है, जो स्थिति के अनुसार अपने आपको बदल सकते हों।

यह रंग बदलने की कला मनुष्य जीवन में बड़े काम आती है, यदि हम अपने वातावरण का चारों ओर चौकसी से निरीक्षण करते रहें। उदाहरण के लिये आज लोगों में खाँसी, खसरा, कैंसर, तपेदिक आदि रोग बढ़ रहे हैं, हमें देखना चाहिये कौन−सी बुराइयाँ हैं, जो इन्हें जन्म देती हैं। अप्राकृतिक रहन−सहन, आहार−विहार, धूम्रपान, आलस्य, असंयम आदि के कारण ही यह बुराइयाँ बढ़ती हैं, यदि हमारी भी परिस्थितियाँ ऐसी ही हैं तो उनसे सुरक्षा का उपाय यही है कि हम अपना रंग बदल डालें अर्थात् उन बुराइयों के आवरण को ही उतार फैंकें।

अनुकूलन की इस योग्यता का यह अर्थ नहीं कि यदि हम किसी बुरे समाज में जाते हैं तो वहाँ की बुराइयों को आत्मसात करना प्रारम्भ कर दें। ऐसी परिस्थितियों से बचाव की प्रेरणा कालिमा नामक तितली से ले सकते हैं। इसके पंखों का ऊपरी रंग चमकदार होता है, परन्तु सतह का रंग सूखी पत्ती की तरह का होता है। जब कभी वह किसी पौधे पर पंख सिकोड़कर बैठती है तो ऐसा प्रतीत होता है, जैसे यह कोई सूखी पत्ती हो। मनुष्य अपने मूल व्यक्तित्व को इस तरह आकस्मिक काल में छिपाकर अपनी सुरक्षा बनाये रख सकता है पर जो अपने व्यक्तित्व को बढ़ा−चढ़ा कर दिखाते हैं, शेखी−खोरी करते हैं, वे राह चलते चाहे, जिन मामूली व्यक्तियों के द्वारा ठग लिये जाते हैं।

दंडकीट (हाइड इन्सेन्ट) नामक कीड़ा सूखी टहनी की तरह का होता है, रंग भी उसी तरह का कुछ भूरा−काला सा होता है, मोटाई भी पतली टहनी के समान ही होती है। इसके पंख ही बड़े होते हैं पर अपनी इस विशेषता को वह बड़ी चतुराई से छिपाता है, जब किसी टहनी पर बैठता है तो पंखों को शरीर से इस तरह चिपका लेता है कि दूर से देखने पर ऐसा लगता है, जैसे यह पत्तीदार कोई टहनी ही हो और इस तरह वह अपने आपको दुश्मन से बचा लेता है, यह उदाहरण बताते हैं कि वातावरण समकूलता से व्यक्ति अपनी आत्म−रक्षा कर सकता है। इसमें उसे कुछ भी हानि नहीं होती।

बर्फीले क्षेत्रों में पाये जाने वाले रीछों के पास कोई वस्त्र नहीं होते, वे वहाँ के वातावरण को ही अपने में आत्मसात करके सुरक्षित रहते हैं। जिन दिनों बर्फ और कड़ाके की सर्दी पड़ती है, बेचारा स्वयं भी जकड़कर बर्फ में दब जाता है। छः महीने तक भालू उसी में कुछ खाये−पिये बिना ही पड़ा रहता है, यदि आदमी की तरह उसने भी कृत्रिम जीवन बनाया होता, अधिक कपड़े पहनने और तंग मकानों में रहकर अपने आपको ज्यादा शानदार दिखाने की भूल उसने की होती, असंयमित जीवन बिताया होता, एक ही कड़ाके में ढेर हो गया होता पर प्रकृति माता की गोद में पड़े रहने के कारण उसमें इतनी क्षमता आ जाती है कि वह छः महीने दबा रहकर भी मरता नहीं वरन् यह समय उसकी आयु−वृद्धि के काम आता है। छः महीने बाद जब धूप निकलती है, ऊपर की बर्फ पिघलकर बह जाती है, शरीर के रक्त में थोड़ी गर्मी आती है तो रीछ ऐसे ही अँगड़ाई लेकर उठ खड़ा होता है, जैसे रात को नींद लेकर सबेरे वह नई ताजगी प्राप्त कर रहा हो। प्रकृति का घनिष्ठ सान्निध्य हमें भौतिक परिस्थितियों से सदैव ही सुरक्षा प्रदान करता है।

सरलता और सीधापन प्रकृति का स्वभाव है, हम जब अपनी मान−मर्यादा, पद−प्रतिष्ठा, धन पुत्रों के बनावटी आवरण उतार देते हैं तो ऐसे ही सीधे स्वाभाविक सरल और सौम्य प्रतीत होते हैं, जैसे प्रकृति के दूसरे भोले−भाले प्राणी। कोई कहेगा, ऐसी स्थिति में तो जो आवेगा, हमें वह नष्ट कर डालेगा, बात ऐसी नहीं। प्रकृति हमें परिस्थितियों के अनुरूप संघर्ष के लिए भी उत्साहित करती है। हम उसके लिये तैयार न हों, तब तो एक दिन का जीवित रहना भी कठिन हो जाये। बुराइयों और दुष्प्रवृत्तियों का सामना करने के लिये भयानक आकार (टेरीफाइंग अपियरेन्स) भी रखना आवश्यक है। हरे टिड्डे (ग्रास−होपर्स) दुश्मन को देखते ही अपने पंख फैलाकर भयानक आकृति बना लेते हैं। दुश्मन अचम्भे में पड़ जाता है और उसे चुपचाप लौटना ही पड़ता है जब तक बन पड़ता है बिल्ली आत्म रक्षा के लिये भागती है पर जब वह यह समझती है कि कुत्तों से बचकर भाग निकलना सम्भव नहीं, तब वह अपने दाँत, मूँछें और आँखों को ऐसे तरेर कर खड़ी हो जाती है कि कुत्तों की सिट्टी गुम हो जाती है और वे आक्रमण करना भूल जाते हैं। प्रकृति का यह गुण हमें बताता है कि यदि साहस और हिम्मत हो तो मनुष्य अपने से कई गुना बलवान् और भयानक व्यक्तियों से भी मोर्चा लेकर उन्हें परास्त कर सकता है पर साहस बाहर की देन नहीं, मनुष्य को उसे परिस्थिति के अनुरूप अपने ही भीतर से जागृत करना पड़ता है। यदि परिस्थिति आने पर वह संघर्ष के लिये तैयार नहीं होता तो कोई भी बुरा व्यक्ति या पशु उसे आसानी से मार सकता है।

शत्रु के विरोधी पक्ष में आ जाने के कारण भी हम अपनी सुरक्षा ही नहीं अनुभव करते वरन् संसार की बुराइयों के विरुद्ध अपना साहस प्रदर्शित करने का यश भी प्राप्त करते हैं। प्रकृति का यह पक्ष हमें यह बताता है कि विरोधी शक्ति यदि न्यायोचित है तो कम शक्तिशाली होने पर उसके साथ रहने से बुरे तत्त्वों से रक्षा हो जाती है। हमारे जीवन में सैंकड़ों बुराइयाँ होती हैं। हम समझ नहीं पाते, उन्हें कैसे दूर करें पर जब ‘अणुव्रत’ सिद्धान्त के आधार पर कोई एक छोटी−सी अच्छाई का भी व्रत लेकर उसका निष्ठापूर्वक पालन करने लगते हैं तो हमारी बुरी आदतों, बुरे तत्त्वों से रक्षा हो जाती है। इंग्लैंड के प्रसिद्ध वैज्ञानिक श्री बेट्स ने दक्षिण अमेरिका में जीव−जंतुओं की बहुत दिन खोज की थी, उन्होंने पीयरिड नामक तितली का वर्णन करते हुए लिखा है—“कुछ पक्षी हेलीकोनिड तितली का शिकार नहीं करते। पर उन्हें पीयरिड का शिकार करना अच्छा लगता है। पीयरिड उनसे अपनी रक्षा करने के लिये विरोधी पक्ष के साथ हो जाती है। यद्यपि हेलीकोनिड में उसकी रक्षा करने की शक्ति नहीं होती किन्तु विरोध के फलस्वरूप ही वह आक्रमणकारी पक्षियों की दुष्टता को निरस्त कर देती है।”

अपने आपको परिस्थिति के अनुकूल ढालने की यह सूझ मनुष्य ने भी विकसित की होती तो वह आज परिस्थितियों का दास न होकर मनचाही परिस्थितियां उत्पन्न करने में समर्थ रहा होता। यदि हम अपने दृष्टिकोण में अब भी यह परिवर्तन कर लें, तो भविष्य में अपने जीवन को उन्नत सफल और सुरक्षित बनाये रख सकते हैं। प्रकृति का यह सिद्धान्त सदैव समरस और अकाट्य है। (क्रमशः)


संसार का अधिकार

राथचाइल्ड के पास एक दिन उनके एक कम्युनिस्ट मित्र पहुँचकर बोले—“मिस्टर राथचाइल्ड आपने इतना धन एकत्रित कर लिया है यह अन्याय है, इस पर आपका ही नहीं संसार का अधिकार है।”

राथचाइल्ड ने कहा—“सो तो है” और फिर एक पर्चे में कुछ गुणा भाग करने लगे। फिर जेब से दो सिक्के निकालकर मित्र महोदय को देते हुये बोले—“लीजिये और जो कोई आता जायेगा, उसे दो−दो पैसे देता जाऊँगा। मेरी कमाई इतनी ही है कि सारे मनुष्यों को दो−दो पैसे बाँट सकूँ।”

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महानता का जनक शुद्ध अहंभाव

महत्त्वाकाँक्षायें जीवन का नैसर्गिक स्वभाव होती हैं। महान् बनने की इच्छा हर किसी को होती है, होना भी चाहिये क्योंकि उससे आत्म−तत्त्व की महत्ता अभिव्यक्त होती है। पर कुसंस्कारों और आत्म−हीनताओं के बोझ से दबा हुआ मनुष्य उसी प्रकार आगे नहीं बढ़ पाता, जिस प्रकार टेपवर्म वाला जानवर, टेपवर्म एक प्रकार का परजीवी कीड़ा होता है, वह जिस जानवर के शरीर में जन्म लेता है उसी में सारे जीवन भर बना रहकर उसी के रक्त−माँस पर पलता रहता है।

कुत्ते के शरीर पर लगी किलनी कुत्ते के खून पर पलती है। इस किलनी पर भी कुछ ऐसे जीवन होते हैं, जो एक कोष (सेल) के ही होते हैं और किलनी का खून पीते रहते हैं। कुसंस्कार और दुष्कर्म भी इसी तरह हमारे जीवन में जो थोड़े से गुण होते हैं, उन्हें खाकर बुराइयों पर बुराइयाँ बढ़ाते रहते हैं।

मनोविज्ञान के महापण्डित मैगडूगल ने लिखा है—मनुष्य आत्म-विकास (मास्टर सेन्टीमेन्ट्स) या अच्छे अर्थ (सेन्स) में अहंभाव रखकर अपने व्यक्तित्व को महान बना सकता है। आत्म-विश्वास घमण्ड की श्रेणी में नहीं आता यह आत्म-सम्मान या स्वाभिमान की रक्षा का भाव है, उससे मनुष्य के गुणों और कार्य क्षमताओं का विकास होता है। इन्हीं के आधार पर महत्त्वाकाँक्षी की सफलता के लिये द्वार भी खुलते रहते हैं।

इंग्लैंड का राजा मरा तब उत्तराधिकार की समस्या सामने आई। योग्य व्यक्ति का चुनाव कठिन बात थी। यों हर कोई राजा बनने का इच्छुक था, राजपुरोहित मेर्लीन को पता था कि जिस व्यक्ति में आत्म-विश्वास की भावना न होगी, वह एकाएक अर्जित सफलता को लाटरी में प्राप्त धन की तरह गँवायेगा ही नहीं, जीवन में अनेक अप्रत्याशित बुराइयाँ और लाद लेगा। इसलिये उसने उत्तराधिकारी के चुनाव का एक अनोखा ही उपाय निकाला।

लोहे की एक निहाई में उसने एक तलवार घुसेड़ दी और उसे एक सभा में मैदान में रखकर कहा—“यह तलवार जादू के द्वारा इस लोहे में गाड़ी गई है, जो उसे अपनी शक्ति से निकाल देगा, वही राजा बनेगा। सारे दरबार में सन्नाटा छा गया। एक से एक बढ़ कर बलिष्ठ और पहलवान लोग बैठे थे पर सब डर गये। आत्म-विश्वास के अभाव में कोई भी व्यक्ति इस परिस्थिति का लाभ न ले सका।

दरबार में आर्थर नामक एक सैनिक भी बैठा था। उसने सोचा—यह सबसे अच्छा अवसर है, जब अपनी महत्त्वाकाँक्षाओं को सफल किया जा सकता है। यदि सचमुच कुछ जादू हुआ भी तो संसार को यह पता चलेगा कि मनुष्य की शक्ति जादू की शक्ति से कमजोर है अन्यथा तलवार को तो उखाड़कर रख ही दूँगा।

आर्थर उठा और एक झटके में उसने तलवार निकाल दी। इस तरह वह इंग्लैण्ड का राजा बना। इंग्लैण्ड के इतिहास में वह न्याय, बुद्धिमानी और गुणों के प्रति आदर के लिये—विक्रमादित्य के समान विख्यात हुआ। आत्म-विश्वास हो तो मनुष्य क्या नहीं कर सकता। पर हमें उसे पढ़ना और समझना भी चाहिये। शुद्ध अहंभाव, आत्मशक्ति पर विश्वास करना, जिस व्यक्ति को आ गया, उसकी सफलता को कभी कोई रोक नहीं सकता।

अपने पास जो शक्तियाँ हैं, उन पर विश्वास करना और उन्हें अच्छे काम में प्रयुक्त होने का अवसर देना ही आत्म-विश्वास है। उसे इस घटना से अच्छी तरह समझा जा सकता है।

डेनमार्क का राजा कैन्यूट 1018 में गद्दी पर बैठा। इस गद्दी पर कोई भी राजा बहुत दिन तक नहीं टिकता था। कैन्यूट ने देखा कि उसका कारण चापलूस दरबारी हैं, जो राजाओं की झूठ-मूठ प्रशंसा बहुत बढ़ा-चढ़ाकर किया करते हैं।

कैन्यूट के साथ भी यही हुआ। कुछ दरबारी तो उसे सर्वशक्तिमान् ईश्वर का अवतार तक कहने लगे। इस पर कैन्यूट को शंका हुई। वह उन दरबारियों को लेकर सागर तट पर आया और समुद्र की ओर देखकर बोला—“ओ इधर आने वाली लहर रुक और पीछे लौट जा।” लेकिन लहर न रुकी, न लौटी, यह जब तक किनारा नहीं मिल गया, तब तक आगे ही बढ़ती रही।

कैन्यूट ने दरबारियों को डाँटकर कहा—“तुम लोग आगे इस तरह बेवकूफ बनाने का प्रयत्न मत करना। मनुष्य किसी के कहने से सर्वशक्तिमान् नहीं हो जाता, उसे स्वाभाविक प्रवाह की तरह आगे बढ़ना और अपनी शक्तियों को खुले तौर पर किनारे तक पहुँचने का अवसर देना चाहिये।” यही आत्म-विश्वास की सबसे अच्छी परिभाषा है।

और राजा कैन्यूट पहला व्यक्ति था, जिसने न केवल डेनमार्क वरन् नार्वे और इंग्लैण्ड तीनों पर एक साथ सफलतापूर्वक शासन किया।

आत्म-विश्वास कोई परजीवी कीड़ा नहीं वरन् वह अपनी ही शक्तियों को बढ़ाने और उनसे काम निकालने की शक्ति का नाम है। जो इस सिद्धान्त का प्रयोग करते हैं, जीवन में सफलतायें उन्हीं के हाथ लगती हैं।


श्रमशील इंका जाति

जहाँ अब पेरु, चिली और बोलिविया देश बसे हैं, वहाँ से दक्षिण अमेरिका तथा इक्वेडोर तक किसी समय एक आदिम सी जाति इंका निवास करती थी। इंका आत्म-विश्वासी जीवन के लिये संसार में प्रसिद्ध है, आज भी इतिहास में उनकी तुलना समर्थ जातियों में की जाती है।

एक बार उनके राज्य में तेज तूफान आया। इंका लोग घास-फूस और लकड़ी के मकानों में रहते थे। तूफान का वेग पूरे दिन और रात तक बना रहा, जिससे उनके सब मकान और सामान न जाने कहाँ उड़ गये। जानवर यहाँ से वहाँ हो गये और सैकड़ों लोगों का पता न चला वे कहाँ चले गये।

होना यह चाहिये था कि अगले दिन से मकानों की टूट-फूट संभालते, सामान ढूंढ़ते और जो कुछ हुआ था उस पर बैठकर शोक करते पर इंका के सरदार ने कहा—“अब जो हुआ उसके लिये शोक करना व्यर्थ है। भाइयो ! अब ऐसा कुछ करना चाहिये, जिससे तूफान हमारा फिर कभी कुछ बिगाड़ न सके।

फिर वे पत्थरों के औजारों से ही जुट पड़े और पत्थरों की शिलायें काट-काटकर भवन निर्माण करने लगे। घोड़े, बल और गाड़ियाँ कुछ भी तो नहीं थीं, पीठ से ढो-ढोकर ऐसी इमारतें गढ़ी इंकाओं ने, जिनकी मजबूती देखते ही बनती। नगर के नगर तैयार कर दिये उन्होंने, उनके कला-कौशल को आज भी संसार का आठवाँ आश्चर्य माना जाता है।

फिर एक बार अकाल पड़ा। खेत खड़े सूख गये, पानी के स्त्रोत तो कहीं न कहीं से बने रहे पर भुखमरी की स्थिति ऐसी थी कि पेड़ों की पत्तियाँ भी नहीं बचीं। दूसरी बैठक हुई कुछ श्रद्धालु इंकाओं ने कहा—“सूर्यदेव की बिनती करनी चाहिए, ताकि पानी बरसे और अकाल दूर हो (इंकाओ में सूर्य उपासना प्रचलित थी) पर इस बार भी अन्तिम निर्णय वही लिया गया, जो एक समर्थ जाति को लेना चाहिये था।

इंकाओं ने पहाड़ काट-काटकर सीढ़ियाँ बनाईं और उनमें फल लगाये। पहाड़ों के चश्मों में पानी मिल जाता था, उससे सिंचाई कर-करके उन्होंने संसार के अद्वितीय बाग तैयार कर दिये। उससे उन्हें इतने फल मिलने लगे कि अन्न के बिना वे वर्षों काम चला सकते थे।

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हृदय−परिवर्तन

शालिवाहन मृगया के लिये निकलते तो वनचरों में प्रलय मच जाती। लाशों के ढेर बिछ जाते उस दिन। शेर चीते जैसे हिंसक जंतु ही नहीं, हिरन, साँभर, नीलगाय जैसे कोमल प्रकृति के जीव−जंतु भी शालिवाहन की कोप−दृष्टि से न बचते। शालिवाहन की पशु निर्दयता दूर−दूर तक विख्यात हो गई।

महारानी वसुप्रिया! मृगया से क्लान्त महाराज शालिवाहन की सेवा तो करतीं पर उस दिन वह जीव दया पर उपदेश देना भी न भूलतीं। वे कहतीं—“जीव−जंतु विराट्−विश्वात्मा के ही परिजन हैं। किसी को मारने, जीवन देने का अधिकार परमात्मा को है। हम मनुष्यों पर उनके उपकार पहले ही कम नहीं है, अपनी क्षणिक तृष्णा और दम्भ के लिये उन बेचारों का वध क्यों करें? महाराज जिस तरह हम मनुष्य दूसरों के द्वारा सताया जाना बुरा मानते हैं, उसी तरह जीवों का जी दुःखाना भी पाप है। आप आत्मा के कोप भोजन न बनें। जीवों को न सताया करें, उससे दुर्गति होती है।

शालिवाहन हँसते क्या—विद्रूप अट्टहास करते और कहते—“बावरी! हर शक्तिशाली अशक्त को मारकर खा जाता है, यह तो प्रकृति का नियम है, इसमें पाप क्या हो गया?” महारानी उत्तर देतीं—“नहीं महाराज! हर महान् व्यक्ति, महान् आत्मा छोटों को प्रश्रय देती, सहयोग और सहानुभूति देती है। जब समुद्र, वारिद बनकर बरसता है, तब तो नदी−नद भरे रहते हैं, सूर्य तपता है, तभी तो सृष्टि चक्र चलता है। संसार दया और दान पर टिका है। हम यदि वह न कर सकें तो कम से कम अपने से गये−गुजरों को सतायें भी नहीं।”

शालिवाहन उपदेश सुनने के आदी नहीं थे। वह उन अहंकारी व्यक्तियों में से थे, जो स्वयं को भगवान् मानने जैसा दम्भ दिखाते रहते हैं पर इस संसार में अहंकार टिका किसका? कौन व्यक्ति क्रूरता करके महान् बन सका?

शालिवाहन दूसरे दिन ही मृगया के लिये निकल पड़े। असंख्य पशु−पक्षियों का वध किया उनने। जीवों के विलाप के कारण वन−शोकसागर में बदल गया। किसी पशु का वंशनाश ही हो गया तो किसी मृगी के छौने मारे गये। प्रलयकाल जैसा जीव संहार कर रहे शालिवाहन ने एक हिरणी के देखते−देखते उसके दो सुकुमार बच्चों का वध कर दिया। हिरणी भी वहाँ से हटी नहीं, उसकी आँखें कह रही थीं—निर्दयी और एक तीर निकाल और बेध मेरा वक्षस्थल तुझे यह तो पता चले कि जीवों के भी ममता होती है, उन्हें भी अपने बच्चे तुम मनुष्यों के समान ही प्यारे लगते हैं।

हाथ तूणीर पर गया तो वह बिलकुल रिक्त हो चुका था। एक भी तीर न बचा था तरकस में। शंख ध्वनि की गई और महाराज शालिवाहन विजयी की भाँति दल−बल के साथ राजवानी की ओर लौट पड़े।

उस दिन से नवरात्र प्रारम्भ होते थे। महारानी वसुप्रिया! भगवती दुर्गा के अभिषेक के लिये, राजमहल से निकलकर पर्वतीय उपत्यिका पर बने मन्दिर में जाया करती थीं। उस दिन उनके साथ राजकुमारी उत्पल भी थी। उत्पल की आयु तब कुल पाँच वर्ष की ही थी।

अभी वे पर्वत के समीप पहुँच ही पाई थीं कि झाड़ियों के एक ओर से नर−भक्षी बाघ झपटा और राजकुमारी को झपटकर उठा ले गया। अंगरक्षक सैनिक देखते ही रहे, बाघ क्षण भर में ही घने जंगल में धँस गया। शालिवाहन के भय से भयभीत सैनिक बाघ का पीछा करते ही गये। बाघ सैनिकों की आँख बचाकर एक झाड़ी में छुपना चाहता था पर उसका वहाँ रुकना भारी पड़ गया। शाम हो चली थी। हिरणी जिसके दो बच्चे आज ही महाराज शालिवाहन द्वारा मृत्यु के घाट उतार दिये गये थे, ने राजकुमारी उत्पल की ओर कातर दृष्टि से देखा। एक बार अपने बच्चों की ममता फिर उमड़ पड़ी हिरणी के हृदय में। वह बाघ पर टूट पड़ी। थका हुआ बाघ उसका सामना न कर सका। सैनिकों का भय भी था उसे। उत्पल को वहीं छोड़कर वह भाग निकला। हिरणी ने उत्पल को झाड़ी के अन्दर सुरक्षित स्थान पर पहुँचाया। रात हो गई, सैनिक भी निराश होकर घर लौट गये।

बाघ के पंजों के घाव जहाँ−जहाँ लगे थे, हिरणी उन−उन स्थानों को रात भर चाटती रही। बार−बार उसके हृदय में अपने बच्चों की ममता और करुणा उमड़ती, वह उतनी ही ममता से उत्पल को चाटती रही मानो उसे अब उत्पल में ही अपने बच्चों की आत्मा झाँकती दिखाई दे रही थी।

रात भर की सुश्रूषा से उत्पल चंगी हो गई। प्रहर रात रह गई थी, तब उत्पल की अचेतावस्था वापिस लौटी। हिरणी के ममत्व में वह राज−परिवार का स्नेह और ममत्व भूल गई। सूर्योदय तक वह हिरणों से ऐसी हिल−मिल गई जैसे वह उसके ही परिवार की एक सदस्या हो।

प्रातःकाल शालिवाहन स्वयं राजकुमारी की खोज में निकल पड़े। खोजते−खोजते वह उसी स्थान पर पहुँचे जहाँ उत्पल हिरणी से खेल रही थी। चुपचाप बैठी हिरणी को कुछ ध्यान ही नहीं था, कौन आया, कौन गया। क्रोधावेश में आकर शालिवाहन ने तीर निकालकर प्रत्यंचा चढ़ाई। उसे कान तक खींचकर बाण को छोड़ना ही चाहते थे कि उत्पल ने देख लिया। वह हिरणी की ओट करके दोनों हाथ फैलाकर तीर अपनी छाती में चुभा लेने के लिये खड़ी हो गई। महाराज ने डाँटा—हट जा उत्पल एक ही तीर में दुष्ट हिरणी का वध कर देता हूँ।

उत्पल तब मूर्तिवत् खड़ी थी। बोली तो नहीं पर उसकी आंखें कह रही थीं—निर्दयी ! चला तीर। तुझे पता तो चले, किसी जीव के प्राण लेने का फल क्या होता है। तू ही पिता नहीं, इन जीवों के भी माता पिता हैं। इन्हें भी मालूम होने दे कि जो मनुष्य आज निर्दयतापूर्वक पशुओं को मार सकता है, वह कल मनुष्य को भी मार सकता है।

चढ़ी हुई प्रत्यंचा ढीली पड़ गई। धनुष हाथ से छुट गया। शालिवाहन की आँखों से आँसू झरने लगे। वह खाली हाथ हिरणी के पास तक चले गये। हिरणी की आंखें झर-झर झर रही थीं। शालिवाहन ने निर्झर से जल लिया और प्रतिज्ञा की अब वे कभी किसी पशु-पक्षी का वध नहीं करेंगे।

उसी दिन से सारे राज्य में घोषणा कर दी गई, कोई भी किसी जीव को कष्ट नहीं देगा। यह विजय महारानी वसुप्रिया की विजय थी। उस दिन उन्होंने सारे नगर की गायों को भोजन भी कराया।

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चिन्ताओं और कठिनाईयों पर विजय पाने वाला ही उन्नति के मार्ग पर आगे बढ़ सकता है। जीवन बहुत सुन्दर है, बहुत शानदार है। लेकिन वह इससे भी सुन्दर और शानदार बन सकता है। जो लोग इस समय सबसे अधिक सुखी हैं, हमारा उद्देश्य उनसे अधिक सुखी बनना है। हम दासता और भय को दूर कर दें, तो सुख, समृद्धि और सफलता हमारे पाँव चूमेगी।

कोई बड़ा संकट चाहे कितना ही शीघ्र आने वाला हो, परवाह मत करो, उस समय तक यथासम्भव प्रसन्न रहो, जीवन का यह नियम बना लो तो जब तक सचमुच पुल पार न करना पड़े, यह मत सोचो कि वह कैसे पार होगा। जो आदमी कल से डरता है, वह जीवन से डरता है और बुज़दिल है। उसे भगवान में और अपने में विश्वास नहीं, वह कभी कोई महत्त्व प्राप्त नहीं करेगा।

शेक्सपियर ने लिखा है—“हमारे सन्देह गद्दार हैं। हम जो सफलता प्राप्त कर सकते हैं, वह नहीं कर पाते, क्योंकि संशय में पड़कर प्रयत्न ही नहीं करते।

—श्री प्रताप कोठारी

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मेजर कार्लडिक को एक साधु का श्राप

सूर्य भगवान की किरणें नई-नई फूटी थीं। मेजर कार्लडिक अपने नित्य के नियम के अनुसार बरामदे में कुर्सी पर बैठे हलकी धूप में शरीर सेंक रहे थे। नौकर चाय बनाकर लाया। चाय पी और विचारों की मस्ती में खो गये।

घटना प्रारम्भ होने से पूर्व यह बता देना आवश्यक है कि यह जो कुछ लिखा जा रहा है, वह न तो कोई गल्प कथा है, न कहानी वरन् सियालकोट छावनी के इतिहास का एक सच्चा प्रसंग है। बात उन दिनों की है, जब पाकिस्तान नहीं बना था। रायल आर्मी मेडिकल कोर उन दिनों सियालकोट में थी। तब अंग्रेज अफसरों के लिये भारतीय अफसरों व जवानों को सबसे अलग निवास के लिये बँगले दिये जाते थे। मेजर कार्ल डिक इसी कोर से सम्बन्धित थे पर अब वे रिटायर्ड हो चुके थे। उनके निवास का प्रबन्ध अब तक भी स्थायी अफसरों की लाइन में ही था।

अभी वे चाय पीकर चुके ही थे कि गेरुए वस्त्र में एक साधु कहीं से आ पहुँचे। साधु की मुख मुद्रा देखने से ही लगता था या तो इन्होंने आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन किया है या फिर योग की उच्च-स्तरीय भूमिकाएं पार कर सिद्धावस्था प्राप्त है उन्हें। मस्तक पर अपूर्व तेज। भिखारियों की तरह विद्रूप मलिनता और आत्म-हीनता का भाव नहीं वरन् हाव-भाव, चाल-ढाल सबसे विलक्षण स्वाभिमान और राम बादशाह की सी मस्ती। कमण्डल के अतिरिक्त और कोई वस्तु साथ में नहीं, मुख चिर-प्रसन्नता से उद्दोत न कोई दीनता का भाव, न थकावट और परेशानी का।

“कई दिन की भूख और प्यास तंग कर रही है, साहब!” साधु ने विनम्र शब्दों में पूछा—“यदि एक- दो रोटी, टोस्ट, चाय या थोड़े से पैसे मिल जाते तो आपकी बड़ी कृपा होती?”

मेजर डिक ने चिलचिलाती गर्मियों में जैसी धूप होती है, आँखों से ऐसी ही ताप बिखेरते हुये, साधु की ओर देखा और उपेक्षा से बोले—“जाओ-जाओ और किसी घर में माँग लो, मेरे पास खिलाने का ठेका नहीं।”

भारतीय तब परतन्त्र थे, इसलिये अंग्रेज वैसे ही—भारतीयों को बहुत रौब-दाब दिखाया करते थे, साधुओं के बारे में तो उनकी मान्यतायें और भी खराब थीं। इसका कुछ कारण तो साधु आप भी हैं। संन्यास के मर्म को समझे बिना साधना की कठिनाइयों को झेल सकने की क्षमता न होने पर भी वैराग्य का ढोंग करने वाले पलायनवादी श्रेणी के लोगों ने घुसकर साधुओं की संख्या न बढ़ाई होती, भीख माँगना, नशेबाजी करना आलस्य और प्रमोद में पड़े रहने जैसी अनेक तरह की धूर्ततायें ने की होतीं तो यों उपेक्षा और अपमान के दिन देखने को न मिलते। इस तरह तो उन्होंने अपनी कम, अपने धर्म और संस्कृति की मिट्टी कहीं अधिक कुटाई।

साधु ने इस उपेक्षा का बुरा नहीं माना। योगी का लक्षण ही है कि वह सुख-दुख, मान-अपमान में सदैव एक समान रहता है। उन्होंने हंसकर कहा—“साहब ! नाराज न हों, क्या हिन्दू,क्या ईसाई, सृष्टि तो सभी एक परमात्मा की ही बनाई है। आप भेद क्यों करते हैं, आपसे थोड़े से भोजन की याचना की है। सम्भव हो तो पूरा कर दें। कटु शब्द तो अपने बच्चों में भी नहीं कहना चाहिये।

साहब की सहनशीलता कागज की नाव पानी में डालते ही गल गई। बड़े क्रोध से बोले—जाता है यहाँ से या अभी नौकर को बुलाकर धक्के मारकर बाहर निकलवा दूँ।

साधु की मुख-मुद्रा में अभी भी न तो किसी प्रकार का क्रोध का भाव था, न प्रतिशोध का। लोग समझें न समझें पर इतनी गम्भीरता, पत्थर की तरह दृढ़ता और किसी भी कठिन से कठिन परिस्थिति में इतना धैर्य धारण की क्षमता किसी भारतीय में ही रही है। संसार की किसी भी संस्कृति ने ऐसी सहिष्णुता का पाठ अपने अनुयाइयों को नहीं पढ़ाया होगा। हमारी यह उपलब्धि भी किसी चमत्कार से कम नहीं। हलके व्यक्ति उसे धारण करने में न कभी सफल हुये, न कभी होंगे। साधु ने धीमे से मुस्कराते हुये कहा—महाशय! जहाँ तक मेरे शरीर को अपमानित करने का प्रश्न है, वह कोई महत्त्व नहीं रखता पर चूँकि आपका सीधा कटाक्ष यह है कि भारतीय योग, तत्त्व-दर्शन और हम साधुओं का कोई आदर्श अथवा सिद्धान्त नहीं, हमारे धर्म में कोई प्राण नहीं—यह असह्य है, इसलिये अब आप अपने नौकर को बुलाइये, आप देखेंगे कि वह मेरे पास आते आते पत्थर की तरह अचल हो जायेगा।

मेजर डिक का क्रोध, सीमा पार कर गया। चिल्लाकर नौकर को बुलाया और कहा—“इस मूरख को धक्के मार कर निकाल दो।” नौकर भागा-भागा आया और मेजर की आज्ञा पालन करने के लिये जैसे ही आगे बढ़ा कि उसके पाँव काठ की तरह निश्चेष्ट पड़ गये। आंखें निकल आईं, एकटक भयभीत-सा देख रहा था, पर वह एक इंच भी आगे नहीं बढ़ रहा था। साहब ने बहुतेरा डाँटा पर नौकर ऐसी अनसुनी कर गया जैसे हम किसी पत्थर के आगे कुछ बकते रहते हैं और उस पर रत्ती भर प्रभाव नहीं पड़ता।

साधु ने हँसकर कहा—“साहब ! नौकर पर नाराज क्यों होते हो, वह तो अब मेरी इच्छाओं का वशवर्ती है, कहें तो आपको बाहर निकलवा दें। आप समझते हैं, हमारी योग-साधनायें और तपश्चर्यायें मूर्खता हैं, आज आप अनुभव करें कि योग में साधारण मनुष्यों को ही नहीं, पर्वत और नदियों को भी इच्छानुवर्ती बना लेने की शक्ति है हमारा अहंकार न बढ़े इसलिये सामान्य मनुष्य की तरह हम भीख माँग कर खाना खाते और जीते हैं पर आप न भूलें योग की शक्ति वह सब कर सकती है, जो आपकी मशीनें, आपका विज्ञान भी नहीं कर सकता?”

मेजर साहब पर तो भौतिकता का भूत सवार था, अंग्रेजियत की शान चढ़ी हुई थी। एक हिन्दू साधु से एकाएक कैसे हार मान लेते। उन्होंने अपने पालतू कुत्तों को आवाज देकर पुकारा और साधु की ओर संकेत करके उन्हें बढ़ावा दिया कि वे साधु पर झपट पड़ें और उसे काट खायें पर जैसे उन्हें लकवा मार गया हो, दोनों खूँखार कुत्तों ने एक बार मेजर की ओर देखा दूसरी बार साधु की ओर और सिर झुकाकर ऐसे खड़े हो गये, जैसे कोई द्वारपाल किसी सम्राट के अभिवादन के लिये खड़े हों। पदार्थ की शक्ति पर चेतना की बड़ी भारी विजय थी। कुत्तों के शरीर तो क्या चेतना तक जवाब दे गई। काटना तो दूर वे भौंक तक नहीं सके।

मेजर के सारे शरीर से पसीना छूट गया। बुद्धि फेल गई। साधु ने कमण्डल से थोड़ा जल लिया और कहा—“साहब! मुझे आपसे कोई द्वेष नहीं पर अब चूँकि यह हमारे धर्म को अपमानित करने की बात थी, इसलिये यदि आपको कुछ दण्ड दिया जाये तो यह कोई दोष न होगा। मैं तुम्हें श्राप देता हूँ, आज से ठीक एक महीने पीछे तुम मेरी तरह भूख से तड़पोगे, इस सारे शहर में माँगने पर भी तुम्हें रोटी न मिलेगी। तुम इस शहर में रह भी नहीं सकोगे।” यह कर उसने जल एक ओर छिड़क दिया। और वहाँ से चुपचाप चल दिया। मेजर साहब का अभिमान अभी भी दूर नहीं हुआ था तो भी उनके मुख पर भय के भाव निश्चित रूप से दिखाई दे रहे थे।

साधु वहाँ से चलकर लगभग एक फर्लांग दूर उसी लाइन के एक अन्य बँगले में प्रविष्ट हुये। यह बँगला कर्नल जार्ज का था। उनकी पुत्री इला बरामदे में बैठी अंग्रेजी का समाचार−पत्र पढ़ रही थी। साधु उधर ही मुड़ गये।

बेटो! मुझे भूख लग रही है, कुछ खाने को मिलेगा क्या? साधु ने उसी विनयपूर्ण भाव और भाषा में पूछा, जिनका प्रयोग उन्होंने मेजर डिक के साथ किया था। इला को उन पर दया आ गई। भले ही उसने यह न समझा हो कि यह साधु कोई सिद्ध महापुरुष हैं पर उसे मानवता की सिद्धि का मूल्याँकन करना आता था। उसने सोचा यह किसी न किसी तरह धर्म और आस्तिकता का भाव तो जागृत करते ही हैं। समाज को इस तरह प्रकाश देने वाले को यदि थोड़ा भी दान दे दिया जाये तो बुरा क्या। केवल मात्र भिक्षा ही जिनका व्यवसाय है, भावना और फटकारना तो उन्हें चाहिये।

इला ने कहा—बाबा जी! बैठिये अभी आती हूँ। यह कहकर वह अन्दर गई। थोड़ा दूध, टोस्ट और कुछ फल लाकर साधु को दिये। साधु ने उन्हें खाया और पानी पिया। भूख शाँत हुई।

कृतज्ञता संसार का सबसे पहला पुण्य है। कोई हमारे साथ उपकार करे, हम उसका मूल्य न चुकाएं तो यह सबसे बड़ा पाप ही होगा। लड़की की यह दया यों एक कर्त्तव्य मात्र थी तो भी साधु और महान् व्यक्ति किसी का ऋण अपने ऊपर नहीं रखते। यदि वे कुछ भौतिक वस्तु नहीं भी दे सकते तो भी अपनी आत्म−शक्ति से औरों का भला करने से वे चुकते नहीं।

उन्होंने अपनी पोटली से एक फल निकाला। फिर कर्नल जार्ज की पुत्री की ओर देखकर कहा—“बेटी! तू नहीं जानती हम योगी यह बात आगे से आगे देख और जान लेते हैं, जो किन्हीं व्यक्तियों के साथ बाद में घटित होने को होती है। तुम्हारे घर में ठीक तीन सप्ताह बाद कोई बीमार पड़ेगा। डॉक्टर और हकीम भी उसका इलाज नहीं कर सकेंगे। हमारे आयुर्वेद पर आपको विश्वास तो न होगा पर मैं तुम्हें एक दुर्लभ औषधि देता हूँ, यह फल हिमालय में मिलता है। जब सारा उत्तराखण्ड बर्फ से ढँक जाता है, तब यह बड़ी कठिनाई से मिलता है। यह फल ही तुम्हें चमत्कार दिखायेगा।

जब तुम्हारे घर में कोई बीमार हो, डॉक्टर हार जायें तब तुम एक अंगीठी के कोयले फूँकना जब कोयले दहकने लगें, तब उसमें यह फल रख देना। थोड़ा धुआँ छूटेगा और पटाखे की आवाज की तरह वह फूट जायेगा। उसके तुरन्त बाद तुम देखोगी कि बीमार की हालत में आश्चर्यजनक सुधार होगा और वह थोड़ी देर में ही अच्छा हो जायेगा।

लड़की को थोड़ा विस्मय हुआ, थोड़ा कौतुहल। फल उसने यों ले लिया कि उसने कई भारतीय सहेलियों से सुना था—भारतीय योगी−साधु सचमुच चमत्कारी होते हैं। वैसे उसका इस पर कोई विश्वास न था। फल लेकर उसने अपनी पुस्तकों के बीच कहीं छुपाकर रख दिया।

तीन सप्ताह बीते कोई अनहोनी बात नहीं हुई। पर उसके अगले ही दिन कर्नल जार्ज आफिस में काम करते हुए एकाएक गम्भीर रूप से बीमार हो गये। काम छोड़कर उन्हें बीच में ही कार से घर पहुँचाया गया। इला बहुत हैरान थी, कुछ अपने पिता की बीमारी पर कुछ उस साधु की बात का स्मरण करके।

कई सुयोग्य मिलिटरी डाक्टरों ने उपचार किया पर कोई लाभ न हुआ। बंबई से भी एक डॉक्टर बुलाये गये वह भी बीमारी ठीक न कर सके। कर्नल जार्ज की स्थिति मरणासन्न हो चली।

उसी दिन अपराह्न वह साधु एकाएक फिर कर्नल साहब के बँगले पर दिखाई दिये। उस समय इला अपनी सहेली मेजर डिक की पुत्री के साथ अपनी रसोई में थी। साधु को देखते ही इला बाहर आ गई। साधु ने कहा—“बेटी! मुझे पता था तुम मुझ पर विश्वास नहीं करोगी तो भी तुम्हारे किये हुये उपहार का फल चुकाना मेरा कर्त्तव्य था, इसलिये दुबारा फिर आना पड़ा।”

आगे की बात प्रारम्भ रखते हुये उन्होंने कहा—“तुम्हारे पिताजी अस्वस्थ हैं, अब अन्तिम समय है, तुम उस फल का प्रयोग करो तभी कर्नल साहब अच्छे हो सकेंगे।

इला अपने पढ़ाई के कमरे में गई। वह फल निकाला अँगीठी जलाई। जब कोयला अंगार हो गये तो वह फल उस पर रख दिया। थोड़ा धुआं छूटा और फिर पटाखे की आवाज हुई। डॉक्टर ने आगे बढ़ना चाहा पर देखा सब कुछ ठीक है, इसलिये वहाँ से वापिस लौट पड़ा।

इधर बंबई से आये हुए डॉक्टर कर्नल साहब की नब्ज़ टटोल रहे थे। जो शरीर कुछ क्षण पहले शव हुआ चाहता था, एकाएक उसमें गर्मी और स्फूर्ति दिखाई दी। डाक्टरों ने निश्चय किया, यह मृत्यु के पूर्व की अन्तिम और तीव्र ज्योति है पर वे यह देखकर हैरान रह गये कि कर्नल साहब ने धीरे−धीरे आँखें खोल दीं। हलके−हलके मुस्कराने लगे। थोड़ी ही देर में स्थिति सामान्य हो चली। भयंकर स्थिति से देखते−देखते सामान्य स्वस्थ मनुष्य की सी स्थिति में आ जाना सचमुच बड़े आश्चर्य की बात थी। डॉक्टर हक्के−बक्के रह गये पर उस स्थिति का विश्लेषण कर सकना उनके लिये सम्भव कहाँ था। तो भी उन्होंने स्वीकार किया सचमुच अध्यात्म में कोई शक्ति है अवश्य जो पदार्थ की और भौतिक विज्ञान के नियमों का भी उल्लंघन कर सकती है। उन्होंने भारतीयों के योग की महत्ता भी समझी कि व्यक्ति ही अपनी आत्मा का उपकार कर सकता है और स्वीकार की—तब, जब इला ने और उसकी सहेली ने सारी घटना आद्योपान्त विस्तार से डाक्टरों को बताई।

मेजर डिक को दिया हुआ श्राप किस तरह फलित हुआ यह अगले अंक में दिया जा रहा है।

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आत्मिक प्रगति के लिए−उत्कृष्ट शिक्षा की आवश्यकता

हमारे जीवन−यापन की क्रियाओं में पाप का पुट प्रवेश न करने पावे—इस सावधानी के लिये ज्ञान की अनिवार्य आवश्यकता है। ज्ञान से दृष्टिकोण परिमार्जित होता है, विचार−शक्ति बढ़ती है और युक्तायुक्त निर्णय की क्षमता प्राप्त होती है। क्या पाप है, क्या पाप नहीं है, इसका ज्ञान जीवन एवं कर्म−दर्शन संबंधी पुस्तकों से ही प्राप्त हो सकता है—और वे सद्ग्रन्थ हैं, वेद−शास्त्र, गीता, उपनिषद्, रामायण आदि आध्यात्मिक एवं धार्मिक पुस्तकें। इन आदर्श ग्रन्थों के अतिरिक्त लौकिक विद्वानों द्वारा लिखा हुआ, एक से एक बढ़कर नैतिक साहित्य भरा पड़ा है—योग्यता तथा युग के अनुसार उसका लाभ भी उठाया जा सकता है।

ज्ञान−गुण प्राप्त करने के लिये जिस वस्तु की प्रथम एवं प्रमुख आवश्यकता है, वह है—शिक्षा। शिक्षा ज्ञान की आधार भूमि है। जो अशिक्षित है, पढ़ा−लिखा नहीं है, वह किसी भी जीवन अथवा कर्म−दर्शन संबंधी पुस्तक का अध्ययन किस प्रकार कर सकता है, किस प्रकार उनकी शिक्षाओं को समझ सकता है और किस प्रकार हृदयंगम कर सकता है? उसके लिये तो ज्ञान से भरी पुस्तकें भी रद्दी कागज से अधिक कोई मूल्य न रखेंगी।

अनेक लोग कबीर, दादू, नानक, तुकाराम, रायदास, नरसी यहाँ तक कि सुकरात, मुहम्मद और ईसा जैसे महात्माओं एवं महापुरुषों का उदाहरण देकर कह सकते हैं कि यह लोग शिक्षित न होने पर भी पूर्ण ज्ञानवान् तथा आध्यात्मिक सत्पुरुष थे। इनका सम्पूर्ण जीवन आजीवन निष्पाप रहा और निश्चय ही इन्होंने आत्मा को बन्धन मुक्त कर मोक्ष पद पाया है। इससे सिद्ध होता है कि निष्पाप जीवन की सिद्धि के लिये शिक्षा अनिवार्य नहीं है। ऐसा कहने वाले यह भूल जाते हैं कि अनायास ज्ञान प्राप्त कर लेने वाले महापुरुष अपने पूर्वजन्म के संस्कार साथ लेकर आते हैं।

एक ही शरीर में जीवन की इतिश्री नहीं हो जाती। इसका क्रम जन्म−जन्मान्तरों तक चला करता है और तब तक चलता रहता है, जब तक जीवात्मा पूर्ण निष्पाप होकर मुक्त नहीं हो जाती। अनायास ज्ञानज्ञों का उदाहरण देने वालों को विश्वास रखना चाहिये कि उक्त महात्माओं ने अपने पूर्वजन्मों में ज्ञान पाने के लिये अनथक पुरुषार्थ किया होता है। उसके इतने अनुपम एवं उर्वर बीज बोये होते हैं। अपने मन, मस्तिष्क एवं आत्मा को इतना उज्ज्वल बनाया होता है कि किसी समय भी पुनर्जीवन में आँख खोलते ही उनका संस्कार रूप में साथ आया हुआ ज्ञान खुल, खिलकर उनके आदर्श−व्यक्तित्व में प्रतिबिम्बित एवं मुखरित हो उठता है। ज्ञान प्राप्ति का प्रारम्भिक चरण शिक्षा ही है। शिक्षा के अभाव में कोई भी व्यक्ति ज्ञानवान् नहीं बन सकता।

जीवन पद्धति को आध्यात्मिक मोड़ दिये बिना आत्मा के विकास की सम्भावनायें उज्ज्वल नहीं हो सकतीं। जीवन में आध्यात्मिक गुणों को —उदारता, त्याग, सदिच्छा, सहानुभूति, न्यायपरता, दयाशीलता आदि को जागृत करने का काम शिक्षा द्वारा ही पूरा किया जा सकता है। शिक्षा मनुष्य को ज्ञानवान् ही नहीं, शीलवान् बनाकर निरामय मानवता के अलंकरणों द्वारा उसके चरित्र का शृंगार कर देती है। शिक्षा संपन्न व्यक्ति ही वह विवेक शिल्प सिद्ध कर सकता है, जिसके द्वारा गुण, कर्म, एवं स्वभाव को वाँछित रूप में गढ़ सकना सम्भव हो सकता है। अशिक्षित व्यक्ति का संपूर्ण जीवन, क्या बाह्य और क्या आन्तरिक, विकारों एवं विकृतियों से भरा हुआ ऊबड़−खाबड़ बना रहता है। अशिक्षित व्यक्ति न तो जीवन की साज संभाल कर सकता है और न उसका उद्देश्य ही समझ सकता है।

अशिक्षित व्यक्ति जब सामान्य जीवन की साधारण परिस्थितियों तक का निर्वाह सफलता एवं कुशलतापूर्वक नहीं कर सकता तब वह आत्मोद्धार के प्रवीणतापूर्ण प्रयत्नों को किस प्रकार कार्यान्वित कर सकता है। कर्म कुशल वह आध्यात्मिक कर्म−कुशलता केवल शिखा के बल पर ही खोजी, पाई और प्रयोग की जा सकती है। जो अशिक्षित व्यक्ति एक पत्र पढ़वाने के लिये दूसरों पर निर्भर रहता है। जो यह नहीं समझ पाता कि जिस कागज पर उसने अँगूठा छापा है, उसमें क्या लिखा है, जिस मनीआर्डर को वह प्राप्त कर रहा है, उसमें कितने रुपये लिखे हैं, वह भला आत्मिक विकास के सूक्ष्म उपायों को क्या जान सकता है? उसके लिये आत्मा, परमात्मा, प्रकृति, पुरुष, मोक्ष, मुक्ति, कर्म, अकर्म, पाप पुण्य आदि की परिभाषायें ऐसी अनबूझ हो रहती हैं, जैसे किसी बालक के लिये पक्षियों का कलरव। वह केवल इतना ही अनुभव कर सकता है, यदि कर सके— यह कुछ है तो अच्छा किन्तु यह नहीं समझ सकता कि इन सबका अर्थ और उद्देश्य क्या है, और क्या है उसके जीवन से संबंध।

पशु क्या है? एक प्राणी। और मनुष्य—वह भी एक प्राणी है। एक चतुष्पद और दूसरा द्विपद। दोनों खाते खेलते और एक से अनेकता सम्पादित करते हैं। दोनों भूख प्यास अनुभव करते हैं और दोनों नींद से निमीलित होते हैं। दोनों स्वार्थ के लिये लड़ते−झगड़ते और दोनों ही समान रूप से अपने सामान्य हित−अनहित को जानते हैं। जैसे अन्य पशु−पक्षियों को दुःख सुख की अनुभूति होती है, उसी प्रकार मनुष्य को भी। जीवों के असंख्यों आकार प्रकारों में से एक मनुष्याकार भी है। हाथ−पैर, नाक−कान, पेट−पीठ संबंधी कायिक कौतुहल पशु और मनुष्य प्राणी के बीच किसी मूल एवं महत्वपूर्ण भेद की प्रवक्ता नहीं है।

संसार के अन्य प्राणियों से भिन्न मानव प्राणी− मनुष्य की यथार्थक संज्ञा का अधिकारी तब ही बनता है, जब वह प्रकृत प्रेरणाओं एवं प्रवृत्तियों का परिष्कार कर, आध्यात्मिक आलोक में उनका प्रयोग कर सकने की योग्यता विकसित कर लेता है। अन्यथा, अन्य प्राणियों और मानव प्राणी में कोई अन्तर नहीं है। जिस प्रकार जीव−जगत् में किसी को गाय, बैल, घोड़ा, गधा, हाथी, हिरन आदि अभिधानों से संबोधित किया जाता है, उसी प्रकार इस द्विपदगामी मनुष्य को भी नर−पशु नाम से पुकारा जाता है।

अन्य जीव−जन्तुओं तथा मनुष्य के बीच जो मूल एवं महत्वपूर्ण अन्तर है, वह यह कि मनुष्य ‘आत्म−जीवी’ है, जबकि अन्य जीव ‘शरीर जीवी’ होते हैं। उनकी सारी इच्छायें, अभिलाषायें एवं आवश्यकतायें केवल शरीर तक ही सीमित रहती हैं, जबकि मनुष्य की अभिलाषाएं आध्यात्मिक और आवश्यकतायें आत्मिक स्तर तक जा पहुँची हैं। वह विवेक−बुद्धि अन्य प्राणियों में नहीं होती, जिसके प्रसाद से मनुष्य ने आत्मा को जाना−पहचाना और उसके उद्धार के लिये प्रयत्न पथ का प्रस्तुतन किया।

आत्मा की परिचायक इस विवेक, बुद्धि का विकास जड़तापूर्ण स्थिति में नहीं हो सकता। इसके लिये मनुष्य को साक्षर ही नहीं, शिक्षित होना होगा। अशिक्षा का अभिशाप पाप की प्रेरणा, देकर मनुष्य जीवन का उद्देश्य ही नष्ट कर देता है। कर्माकर्म का युक्त ज्ञान न होने से अशिक्षित व्यक्ति की अधिकाँश क्रियायें अंधकार की ओर ही ले जाने वाली सिद्ध होती हैं। जड़ता जन्य प्रेरणाओं में काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार के विकार तथा ईर्ष्याद्वेष, स्वार्थ, अदया एवं अनाधिकारिता का विष व्याप्त रहता है। जिससे मनुष्य की आत्मा प्रबुद्ध होने के स्थान पर अधिकाधिक निश्चेष्ट होती जाती है। अन्धकार में चलने वाला व्यक्ति जिस प्रकार कदम−कदम पर ठोकर खाता चलता है, उसी प्रकार अन्तर में अज्ञान का अंधकार लेकर चलने वाला अशिक्षित व्यक्ति संसार पथ पर अविस्खलित गति से नहीं चल सकता। प्रतिपद्, पतन का भय उसे कभी भी आत्मोद्धार की दिशा में बढ़ने देगा, ऐसी आशा कर सकना सम्भव नहीं।

जो अशिक्षित है, अज्ञानी है और इस अभिशाप को मिटा डालने में रुचि नहीं रखता उसे उस आत्मा का अमित्र ही कहा जायेगा, जो परमात्मा का पावन अंश है और शरीर साधन को सक्रिय रखने के लिये चेतना रूप से मनुष्य में इस उद्देश्य से स्थापित की गई है कि वह उसे जाने और उसके माध्यम से विश्व−ब्रह्मांड के कारण भूत परमात्मा को पहचान कर मुक्ति पद का अधिकारी बने।

जो आत्मा की जिज्ञासा नहीं करता और उसे मुक्त करने के प्रयत्नों की ओर से विमुख है, वह जन्म−जन्मान्तरों तक इस प्रकार ही दुःख भोगता रहेगा, जिस प्रकार वर्तमान में भोग रहा है। ज्ञान के अतिरिक्त इस भ्रामक भव रोग की अन्य कोई औषधि नहीं, जिसकी प्राप्ति विद्या बल पर ही की जा सकती है।

लोक की सफलता और परलोक की संराधना के लिये शिक्षितों को ज्ञान और अशिक्षितों को शिक्षा की ओर अग्रसर होना ही चाहिये। परिस्थितिवश जिन्हें शिक्षा के अवसर नहीं हो, वे जिस प्रकार भी हो सके साक्षरता के अक्षत तो डाल ही लें। इससे उनके सूक्ष्म अन्तःकरण में विद्या के बीच पड़ जायेंगे, जोकि संस्कार रूप में उनके साथ जाकर पुनः अथवा पुनरपि जन्म में पुष्पित एवं पल्लवित होकर ही रहेंगे।


खून बहाना पसन्द नहीं

सिकन्दर जिस देश पर आक्रमण करने की तैयारी में था, उसी देश का राजा जब अपने सामने उपस्थित देखा तो उसकी प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। उसने सोचा कि यह हमारे सैन्यबल से भयभीत हो आत्म−समर्पण हेतु आया है। अतः वह गर्व से फूल उठा। पर बातों ही बातों में उसने सिकन्दर से कहा—“कृपया यह तो बताइये कि हमने आपका कोई अपकार तो किया नहीं, फिर हमारे राज्य पर आक्रमण की तैयारी कैसे कर दी?”

अभिमान के नशे में चूर सिकन्दर बोला—“तुम तो कायरों की तरह बातें करते हो, जाओ अब तुम्हारे राज्य पर आक्रमण नहीं करेंगे पर कम से कम सात वर्ष तक तुम्हें कर देना होगा।”

“आप जैसे ऐश्वर्यशाली राजा के लिए थोड़े से कर की शर्त शोभा नहीं देती। फिर इतनी कम धनराशि से आपका क्या बनता बिगड़ता है? क्या ही अच्छा हो कि हम दोनों मित्रता कर लें और अपनी प्रजा को सुख−शाँतिमय जीवन व्यतीत करने दें।” राजा ने सिकन्दर को समझाते हुए कहा।

सिकन्दर, राजा की बात मान गया। अन्त में राजा ने सिकन्दर को अपनी संपूर्ण सेना सहित राज्य में प्रीति−भोज हेतु आमन्त्रित किया। निश्चित समय सिकन्दर सारी सेना सहित पहुँच गया। स्वागत के लिए वहाँ राजा, मन्त्रीगण और समस्त सशस्त्र सैनिक उपस्थित थे। सिकन्दर अपनी सेना को चारों ओर से घिरा देख काँप उठा। उसे मित्रता के बीच विश्वासघात की गंध आने लगी।

राजा ने बड़े प्रेम से अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा—“सिकन्दर! मैं सेना की छोटी−सी टुकड़ी को लेकर आप सबका स्वागत करने आया था। वैभवशाली सम्राट का स्वागत भी तो उसी स्तर का होना चाहिए था। शायद आपको यह शंका है कि मैंने सैन्य दुर्बलता के कारण आपसे मैत्री की, पर इस विचार को आप भूल जाइये। मुझे व्यर्थ में ही लोगों का खून बहाना पसन्द नहीं है और न अब ही मैं युद्ध की इच्छा से यहाँ उपस्थित हुआ हूँ। हम सब आपकी अगवानी करने आये हैं। हमारा विश्वास शाँति और प्रेम में है, घृणा और युद्ध में नहीं।” इतना सुनकर सिकन्दर का सिर लज्जा से झुक गया।

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दांपत्य जीवन की तैयारी और पत्नी−व्रत

‘स्टिकल−बैक’ नामक की एक मछली होती है, जो समुद्र में ही पाई जाती है। डॉ. लार्ड ने इस मछली की विभिन्न आदतों और क्रियाओं का बहुत सूक्ष्मता से अध्ययन किया। बैकोवर आइलैण्ड में महीनों रह−रहकर आपने इस मछली की जीवन पद्धति का अध्ययन किया और बताया कि मनुष्य चाहे तो इससे अपने पारिवारिक जीवन को सुखी और सुदृढ़ बनाने की महत्वपूर्ण शिक्षायें ले सकता है।

नर स्टिकल बैक अपना घर बसाने के लिये बहुत पहले से तैयारी प्रारम्भ कर देता है। सबसे पहले सारे समुद्र में घूम−घूमकर वह कोई ऐसा स्थान ढूँढ़ निकालता है, जहाँ पर पानी न बहुत तेजी से बह रहा हो न बहुत धीरे। जगह शाँत एकान्त हो और वहाँ हर किसी का पहुँचना भी सम्भव न हो।

प्राचीन काल की जीवन−प्रणाली और शिक्षा पद्धति पर दृष्टि दौड़ाकर देखते हैं तो पता चलता है कि तत्कालीन ऋषियों−मुनियों एवं सामाजिक मार्गदर्शक आचार्यों ने भी यह भलीभाँति अनुभव किया था कि दाम्पत्य और गृहस्थ जीवन एक महत्वपूर्ण योग साधना है, उसके लिये आवश्यक तैयारियाँ न की जायें तो लोगों के वैयक्तिक जीवन ही नहीं पारिवारिक और सामाजिक व्यवस्थायें भी लड़खड़ा सकती हैं। जीवन के प्रथम 25 वर्ष ब्रह्मचर्यपूर्वक रहकर विद्याध्ययन करने और पाठ्य−क्रम में धार्मिक, आध्यात्मिक नैतिक, साँस्कृतिक विषयों के समावेश के पीछे एक मात्र उद्देश्य और रहस्य यही था कि आने वाले जीवन और जिम्मेदारियों को वहन करने के लिये शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक, चारित्रिक त्रुटि न रह जाये। पूर्ण तैयारी कर लेने के फलस्वरूप ही उन दिनों के दाम्पत्य जीवन, पारिवारिक और सामाजिक संगठन, प्रेम−मैत्री, करुणा, दया, क्षमा, उदारता आदि सुख−संतोष और स्वर्गीय परिस्थितियों से भरे−पूरे रहते थे। आनंद छलकता था उन दिनों, पर आज जबकि शिक्षा के ढंग−ढाँचे में, हमारी रीति−नीति और जीवन पद्धति में उस तैयारी के लिये कोई स्थान नहीं रहा, तब हमारे पारिवारिक जीवन में कोई उल्लास नहीं रह गया। दाम्पत्य जीवन असन्तोष और अस्तव्यस्तता के पर्याय बन गये हैं।

मनुष्य भूल कर सकता है पर सृष्टि के सैंकड़ों जीव−जन्तुओं की तरह स्टिकल बैक मछली यह भूल कभी नहीं करती। जैसे उसे प्रकृति से यह प्रेरणा मिली हो कि वह अपनी जीवन पद्धति द्वारा मनुष्य को सिखाये और समझाये कि जो आनन्द पहले से तैयारी किये हुये दाम्पत्य जीवन में है, वह चाहे जैसे गृहस्थी बसा लेने में नहीं है। यह सारा उत्तरदायित्व पति का है कि वह समुचित व्यवस्थायें स्वयं जुटाये। अपनी तैयारी में कोई त्रुटि न हो तो पत्नियों की और से पूर्ण सहयोग और समर्थन न मिले ऐसा कभी हो ही नहीं सकता। इस मछली की तरह तैयारी किये हुये नर दाम्पत्य जीवन का ऐसा आनन्द पाते हैं कि उन्हें न तो स्वर्ग की कल्पना होती है और न मुक्ति की ही। वे इसी जीवन में स्वर्ग−भोग का सौभाग्य प्राप्त करते हैं।

तत्परतापूर्वक ढूँढ़−खोज के बाद जब उपयुक्त स्थान मिल जाता है, तब स्टिकल बैक पत्नी के लिये सुन्दर घर बनाने की तैयारी करता है। इसके लिये उस बेचारे को कितना परिश्रम करना पड़ता है, यह बात अपने माता−पिता की पीठ पर चढ़े, विवाह की कामना करने वाले युवक भला क्या समझेंगे? स्टिकल बैक पानी में तैरती हुई छोटे−छोटे पौधों की नरम−नरम लकड़ियाँ, तैरते हुये पौधों की जड़ें इकट्ठी करता है और उन्हें चुने हुये स्थान पर ले जाता है। विवाह के शौकीन स्टिकल को पहले खूब परिश्रम और मजदूरी करनी पड़ती है। अपने शरीर से वह एक प्रकार का लसलसा पदार्थ निकालता है और एकत्रित सारी वस्तुओं को उसी में चिपका लेता है ताकि उसका इतना परिश्रम व्यर्थ न चला जाये। उसने जो लकड़ियाँ एकत्रित की हैं, वह अपने स्थान तक पहुँच जायें।

स्टिकल बैक पूरे आत्म−विश्वास के साथ काम करता है। सारा एकत्रित सामान मजबूती से चिपक गया है, इसका विश्वास करने के लिये वह अपने शरीर को फड़फड़ाता हुआ नाचता है, जैसे उसे परिश्रम में आनन्द लेने की आदत हो। जब एक बार विश्वास हो गया कि सामान गिरेगा नहीं, तब आगे बढ़ता है और पूर्व निर्धारित स्थान पर इस सामान से मकान बनाता है। शरीर का लसलसा पदार्थ यहाँ सीमेंट का काम करता है और लाई हुई लकड़ियाँ ईंट−पत्थरों का। आगन्तुक वधू के लिये महल बना कर एक बार वह उसे घूम−घूमकर देखता है। लगता है अभी वैभव में कुछ कमी रह गई। फिर वह रेत के बारीक टुकड़े मुख में भर कर लाता है और मकान के फर्श पर बिछाता है। कोठरी में कहीं टूट−फूट की गुँजाइश हो तो उसे ठीक करता है। सारा मकान वार्निस किया हुआ सा हो जाने के बाद ही उसे संतोष होता है। जब यह तैयारियाँ पूर्ण हुईं तब वह स्वयं मादा की खोज में निकलता है। उसे दहेज और लेन−देन की आवश्यकता नहीं, क्योंकि वह जानता है, नारी—नर की अपनी आवश्यकता भी है, इसलिये प्रिय वस्तु को भरपूर स्वागत और सम्मान अपनी ओर से ही क्यों न दिया जाये। वह मनुष्यों की तरह का दम्भ और पाखण्ड प्रदर्शित नहीं करता।

उपयुक्त पत्नी मिल जाने पर वह उसे घर लाता है। पत्नी कुछ दिन में गर्भावस्था में आती है, तब यह उसे घूमने को भेजता रहता है, घर और अंडों की देख−भाल तब वह स्वयं ही करता है। यह उनके भोजन आदि का ही प्रबंध नहीं करता सुरक्षा के लिये दरवाजे पर कड़ा पहरा भी रखता। मि. फ्रैक बकलैण्ड ने इसकी कर्मठता का वर्णन करते हुये लिखा है कि मकान में थोड़ी−सी भी गड़बड़ी हो तो यह उसे तुरन्त ठीक करता है।

स्टिकल बैक अपने बच्चों और पत्नी के पालन का उत्तरदायित्व पूरी सूझ समझ के साथ निबाहता है। वह उन्हें पर्दे में नहीं रखता। पर्याप्त ऑक्सीजन मिलती रहे, इसके लिये वह अपने मकान में दो दरवाजे रखता है। इससे वहाँ के पानी में बहाव बना रहता है और ताजी ऑक्सीजन मिलती रहती है, यदि बहाव रुक जाये तो वह तुरन्त शरीर फड़फड़ाकर बहाव पैदा कर देता है, जिससे रुके हुये पानी की गन्दगी प्रभावित न कर पाये।

स्टिकल बैक का जीवन कितना कलात्मक और सुरुचिपूर्ण है। इधर बच्चे निकलने लगे, उधर उसने मकान के ऊपरी भाग छत को अलग करके एक बढ़िया झूला तैयार किया। मनुष्यों की तरह गुम−सुम का जीवन उसे पसन्द नहीं। झूला बनाकर उसमें बच्चों को भी झुलाता है और पत्नी को भी। स्वयं उस क्षेत्र में परेड करता रहता है, जिससे उसके आनन्द और खुशहाली की अभिव्यक्ति होती है पर दूसरे दुश्मन और बुरे तत्त्व डरकर भाग जाते हैं, जैसे कला प्रिय और सुरुचिपूर्ण सद्गृहस्थ से अवगुण दूर रहने से अशाँति पास नहीं आती। बच्चे झूला छोड़कर इधर−उधर भागते हैं तो यह उन्हें बार−बार झूले में डाल देता है, जब तक बच्चे स्वयं समर्थ न हो जायें, यह उन्हें आवारागर्दी और कुसंगति में नहीं बैठने देता। अपनी रक्षा करने में जब वे समर्थ हो जाते हैं, तभी उन्हें जाने और नया संसार बनाने की अनुमति देता है।

स्टिकल बैक की तरह मनुष्य का पारिवारिक जीवन भी तैयारी, उद्देश्य और सुरुचिपूर्ण होता, पतिव्रत ही नहीं पत्नीव्रत का भी ध्यान रखा गया होता तो सामाजिक जीवन हँसता खिलखिलाता हुआ होता।


लोकमान्य तिलक

लोकमान्य तिलक के नाम से कौन परिचित न होगा। यह उनकी अनुपम लगन ही थी, जो उनका नाम इतिहास में अमर कर गई। वे केसरी का अग्रलेख लिख रहे थे। तभी समाचार आया कि पत्नी की हालत चिन्ताजनक है। सिर उठाकर सहज भाव से सुन लिया और पुनः अपने कार्य में रत हो संसार छोड़ दिया। बाद में इस बात के लिये लोगों ने तिलक को बहुत बुरा−भला कहा। पर सारी बातों का उन्होंने एक ही उत्तर दिया—“मनुष्य से बड़ा भगवान् है। पत्रकार जन−जन के हृदय में व्याप्त भगवान् का पुजारी होता है। ऐसे भगवान की पूजा छोड़कर जाना मेरे लिए सम्भव न था।” धन्य थे वे और उनकी कर्त्तव्य के प्रति अडिग, अटूट निष्ठा।

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मानव मस्तिष्क की वैभव विभूतियाँ

प्रसिद्ध अमेरिकी डॉ. बिल्डर पेनफील्ड ने मस्तिष्क की वात नाड़ियों का अध्ययन करते समय कई कौतुहल देखे। एक दिन उन्होंने एक 8 वर्षीय बालिका के मस्तिष्क के एक भाग में विद्युत−आवेश प्रवाहित किया। ऐसा करते ही लड़की ग्रामोफोन के रेकार्ड की तरह एक घटना सुनाने लगी—“मैं अपने भाइयों के साथ खेत में घूम रही थी। मेरे भाई मुझे चिढ़ाने के लिये खेत में छुप गये। मैं उनसे भटक गई एक आदमी दिखाई दिया। उसके वस्त्र बड़े भद्दे थे। उसने अपने थैले से एक साँप निकालकर दिखाया। मैं डर कर भागी और हाँफते हुये घर पहुँची।”

डॉ. पेनफील्ड पहले ही आश्चर्यचकित थे कि 8 वर्षीया बालिका का यह विचार प्रवाह असामान्य है। छोटे बच्चे इतनी खूबसूरती से घटनाओं का विवरण नहीं कर सकते। बाद में उस लड़की की माता से पूछने पर उसने बताया—“सचमुच जब वह ढाई वर्ष की बच्ची थी, तब उसके साथ यह घटना सचमुच घटित हुई। पेनफील्ड को विश्वास था इतनी छोटी आयु का कोई भी बच्चा अतीत की स्मृतियाँ बनाये रखने में समर्थ नहीं हो सकता। इसलिये निःसन्देह खोपड़ी के अन्दर पूर्ण प्रतिभा प्रौढ़ और विचार संपन्न शक्ति होनी चाहिये। उस शक्ति का स्वरूप, आकृति और महत्तम क्षमतायें क्या और कितनी हो सकती हैं, इसका उत्तर वे तुरन्त तो नहीं दे सके पर तबसे वे निरन्तर मस्तिष्क के आश्चर्यजनक तथ्यों की खोज में लगे हैं, उनकी उपलब्धियां भारतीय तत्व-दर्शन की सहस्रार कमल वाली उपलब्धियों को ही प्रमाणित करती है। एक दिन लोग यह सच मानेंगे कि खोपड़ी के भीतर सहस्रार कमल जैसा कोई सूक्ष्म शक्ति प्रवाह है अवश्य, जो मानवीय चेतना को ब्रह्मांड की विराट् शक्तियों से तादात्म्य कराता है। जिसमें सर्वव्यापकता, सर्वशक्तिमत्ता, भूत−भविष्य और वर्तमान सबकी सर्वज्ञता शक्ति विद्यमान है।

भारतीय योगियों ने ब्रह्मरन्ध्र स्थित जिन षटचक्रों की खोज की उनमें, सहस्रार कमल उनसे बिलकुल अलग और सर्वप्रभुता संपन्न है। यह स्थान कनपटियों से दो−दो इंच अन्दर भृकुटि से लगभग ढाई या तीन इंच अन्दर छोटे से पोले में प्रकाश पुञ्ज के रूप में है। तत्त्व−दर्शियों के अनुसार यह स्थान उलटे छाते या कटोरे के समान 17 प्रधान प्रकाश तत्वों से बना होता है, देखने में मर्करी लाइट के समान दिखाई देता है। छान्दोग्य उपनिषद् में सहस्रार दर्शन की सिद्धि पाँच अक्षरों में इस तरह प्रतिपादित की—‘तस्य सर्वेषु लोकेषु कामचारो भवति’ अर्थात् सहस्रार प्राप्त कर लेने वाला योगी संपूर्ण भौतिक विज्ञान प्राप्त करने में समर्थ हो जाता है। यही वह शक्ति केन्द्र है जहाँ से मस्तिष्क शरीर का नियन्त्रण करता है और विश्व में जो कुछ भी मानवकृत विलक्षण विज्ञान दिखाई देता है, उनका संपादन करता है।

यदि हम अपने मस्तिष्क के ज्ञान भाग को प्रखर रख पायें तो पिछले जीवन में कभी भी कुछ देखा-सुना, सोचा, अनुभव किया वही नहीं वरन् दूसरों के द्वारा पढ़ा, सोचा, देखा-सुना और अनुभव किया हुआ भी उसी तरह पकड़ सकते हैं, जिस प्रकार परदे पर दिखाई देने वाली सिनेमा की रीलें। प्रति सेकिंड एक चित्र की दर से अतीत में जो कुछ भी देखा है या भविष्य में देखने वाले हैं, वह सब मस्तिष्क में चमत्कार की तरह विद्यमान है। उसे कभी भी ढूंढ़ा और उसका लाभ उठाया जा सकता है।

योग तत्त्व की इस बात को अनेक वैज्ञानिक प्रयोगों द्वारा भी सिद्ध किया जा चुका है। उपरोक्त घटना के बारे में यह संदेह हो सकता है कि बालिका के साथ यह घटना इतनी तीव्रता से घटी होगी कि छोटी अवस्था में भी अमिट छाप छोड़ गई होगी पर कुछ ऐसे विलक्षण मामले सामने आये हैं, जो यह बताते हैं कि इसी जन्म की नहीं मस्तिष्क में ऐसे संस्कार कोष विद्यमान हैं, जिनसे पूर्वजन्मों की घटनाओं और अनुभवों को याद किया जा सकता है। उनसे पुनर्जन्म लोकोत्तर जीवन और जीवन की अमरता को प्रतिपादित किया जा सकता है।

उपरोक्त प्रकार का एक प्रयोग एक लड़के पर भी किया गया। जैसे ही मस्तिष्क की एक वातनाड़ी पर विद्युत धारा प्रवाहित की गई, लड़का एक गीत गुनगुनाने लगा। लड़का विचित्र भाषा में गा रहा था। छन्द-बद्ध गुनगुनाने, लय और संगति मिलने के कारण लोगों को आश्चर्य हुआ। गीत टेप कर लिया गया। बाद में भाषा विशेषज्ञों और अनुवाँशिकी विशेषज्ञों से जाँच कराई गई तो पता चला कि लड़के ने पश्चिम जर्मनी में बोली जाने वाली एक ऐसी भाषा का गीत गया था, जो बहुत समय पहले बोली जाती थी। लड़के का वहाँ के लोगों से किसी प्रकार का पैतृक या मातृक सम्बन्ध भी नहीं था। इससे एक ही बात साबित होती है कि लड़का किसी जन्म में उस प्रदेश का कोई मनुष्य था, उस जीवन के संस्कार उसमें विद्यमान थे, विद्युत आवेश द्वारा उन्हें केवल जागृत कर लिया गया।

डॉ. पेनफील्ड के पास ऐसा रोगी आया जिसे मिर्गी आती थी। उसका आपरेशन करके उन्होंने देखा कि जब मिर्गी आती है तो एक विशेष नस ही उत्तेजित होती है, उसे काटकर अलग कर दिया तो वह रोगी सदा के लिये अच्छा हो गया। बाद में पेनफील्ड ने बताया कि मस्तिष्क में कई अरब प्रोटीन−अणु पाये जाते हैं, इस प्रोटीन अणुओं में औसत आयु 70 वर्ष के लगभग सवा दो अरब सेकिंड होते हैं, इन क्षणों में जागृत स्वप्न में वह जो कुछ देखता सुनता और अनुभव करता है, यह सब मस्तिष्क के कार्यालय में जमा रहता है और उसमें से किसी भी अंश को विज्ञान की सहायता से पढ़ा जाना सम्भव है। मस्तिष्क के 10 अरब स्नायु कोषों में अगणित आश्चर्य संग्रहीत हैं, उन सबकी विधिवत जानकारी रिकार्ड करने वाला कोई यन्त्र बना सका तो जीव किन−किन योनियों में कहाँ−कहाँ जन्म लेकर आया है और उसने कब क्या पाप, क्या पुण्य किया है, उस सबकी जानकारी प्राप्त करना सम्भव हो जायेगा। उन सब की याददाश्त दिलाने वाला सहस्रार में बैठा हुआ वह ‘क्रिस्टल’ मात्र है, जिसे हमारे धर्म ग्रन्थों में सूत्रात्मा कहते हैं।

असाधारण ज्ञान, असाधारण कार्य प्रणाली और मस्तिष्क की विलक्षण रचना से जहाँ जीवात्मा के अनेक रहस्यों का ज्ञान होता है, वहाँ उसकी दूर−दर्शन और इन्द्रियातीत ज्ञान के भी अनेक प्रमाण पाश्चात्य देशों में संकलित व संग्रहीत किये गये हैं। “दि न्यू फ्रान्टियर्स आफ माइंड” के लेखक श्री जे. वी. राइन ने दूर−दर्शन के तथ्यों का वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक दोनों तरह से अध्ययन किया और यह पाया कि कुछ मामलों में अभ्यास के द्वारा ऐसे प्रयोग 50 प्रतिशत से अधिक सत्य पाये गये, जबकि स्वप्नों एवं मनोवेगों द्वारा भविष्य दर्शन की अनेक घटनाओं को शत प्रतिशत सत्य पाया।

एक घटना का उल्लेख इस प्रकार है। मेरे पड़ोस में एक सज्जन रहते थे। एक रात उनकी धर्म−पत्नी ने स्वप्न देखा कि उसका भाई जो वहाँ से काफी दूर एक गाँव में रहता था, अपने खलिहान जाता है। खलिहान पहुँचकर उसने घोड़ा गाड़ी खोल दी। फिर न जाने क्या सोचकर भूसे के ऊपर बने मचान पर चढ़ गया और वहीं खड़े होकर उसने पिस्तौल चलाकर आत्म−हत्या कर ली। गोली लगते ही भाई भूसे पर लुढ़क पड़ा। इस स्वप्न से वह स्त्री इतनी घबड़ा गई कि उसने अपने पति से तुरन्त गाँव चलने को कहा। वे सज्जन मेरे घर आये और मेरे पिता जी से घोड़ा गाड़ी देने को कहा। पिता जी ने गाड़ी दे दी। वह स्त्री अपने पति को लेकर गाँव गई और लोगों के आश्चर्य का ठिकाना न रहा, जब उन्होंने खलिहान में जाकर पाया कि उसके भाई की मृत्यु ठीक वैसे ही स्थान और परिस्थितियों में हुई पड़ी थी।

स्वप्नावस्था में हमारे शरीर के सारे क्रिया−कलाप अन्तर्मुखी हो जाते हैं। उस समय भी मस्तिष्क जागृत अवस्था के समान ही क्रियाशील रहता है, यदि उस स्थिति में देखे हुए दृश्य सत्य हो सकते हैं तो यह मानना ही पड़ेगा कि आत्म−चेतना का कभी अन्त नहीं होता, वह एक सर्वव्यापी और अतीन्द्रिय तत्त्व है पर सम्पूर्ण तन्मात्राओं की अनुभूति उसे होती है।

उक्त घटना श्री राइन महोदय के एक प्रोफेसर द्वारा बताई गई, जब वे स्नातक थे। बाद में वह लिखते हैं कि मैं जब पेन्सिलवेनिया के पहाड़ों पर रहता था तो मुझे भी अनेक निर्देश और सन्देश इसी प्रकार अदृश्य शक्तियों द्वारा भेजे हुये मिलते थे।

एक अन्य प्रोफेसर की धर्म−पत्नी का भी इसी पुस्तक में उल्लेख है और यह बताया है कि वह जब अपनी एक सहेली के घर ब्रज खेल रही थीं तो उन्हें एकाएक ऐसा लगा जैसे उनकी बालिका किसी गहरे संकट में हो। उन्होंने बीच में ही उठकर टेलीफोन से घर से पूछना चाहा पर सहेली के आग्रह पर वे थोड़ी देर खेलती रहीं। इस बीच उनकी मानसिक परेशानी काफी बढ़ जाने से वह खेल बीच में ही छोड़कर टेलीफोन पर गईं और अपनी नौकरानी से पूछा लड़की ठीक है, उसने थोड़ा रुककर कहा—हाँ ठीक है। इसके बाद वे फिर खेल खेलने लगीं, खेल समाप्त कर जब वे घर लौटीं तो पता चला कि एक बड़ी दुर्घटना हो गई थी। उनकी लड़की पिता के साथ कार में आ रही थी, वह खेलते−खेलते शीशे के बाहर लटक गई और काफी सफर उसने उसी भयानक स्थिति में पार किया। जब एक पुलिस वाले ने गाड़ी रुकवाई, तब पता चला कि लड़की मजबूती से कार की दीवार पकड़े न रहती तो किसी भी स्थान पर वह कार से कुचलकर मर गई होती। नौकरानी ने कहा चूँकि बच्ची सकुशल थी, इसलिये आपको परेशानी से बचाने के लिये झूठ बोलना पड़ा।

यह घटनायें, यह विशेषण हमें मानव मस्तिष्क की उसी अमर सत्ता की ओर ले जाते हैं, जिधर ले जाने का प्रयास वैज्ञानिक आइन्स्टीन ने अपने सापेक्षवाद सिद्धान्त (थ्योरी आफ रिलेटिविटी) के द्वारा पहुँचाने का प्रयत्न किया। दोनों का उद्देश्य जीवन की अमरता और ज्ञान रूप में मनुष्य के मस्तिष्क में विद्यमान सहस्रार का ही परिचय कराना है, भले ही उतनी सूक्ष्म जानकारी अभी वैज्ञानिकों को नहीं मिल पाई हो।

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‘प्रेम का यह नियम सत्य के नियम के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। सत्य के बिना प्रेम नहीं होता, सत्य के बिना प्रेम ढोंग है, जैसे कि दूसरों को कष्ट पहुँचाकर समझना कि हम देश प्रेम कर रहे हैं, या यह मोह, जैसे एक तरुण का किसी लड़की के प्रति होता है, यह हमारा यह प्रेम अयुक्तियुक्त एवं अंधा है, जैसे कि अज्ञानी माँ−बाप का अपने बच्चों के प्रति होता है। प्रेम सब पाशविकता से ऊपर होता है, और उसमें पक्षपात का नाम नहीं होता। इसलिए सत्याग्रह को एक ऐसे सिक्के के रूप में वर्णित किया गया है, जिसके एक तरफ प्रेम है, दूसरी तरफ सत्य। यह सिक्का हर जगह चलता है और इसकी कीमत नहीं आँकी जा सकती।”

—महात्मा गाँधी

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स्वप्नों की सत्यता का रहस्य क्या है?

“गुड नाइट सर !”—मित्र ने अमेरिका के प्रेसीडेन्ट अब्राहम लिंकन को भोज से विदाई देते हुए अभिवादन किया। उसके उत्तर में प्रेसीडेन्ट ने कहा—“गुड बाई डियर क्रुक (प्रिय क्रुक अन्तिम नमस्ते)।” यह शब्द तमाम मित्रों को चौंकाने वाला था। अँग्रेजी शिष्टाचार के नाते आमतौर पर ‘गुड बाई किसी लंबी विदा के समय किया जाता है पर लिंकन के लिये तो ऐसी कोई बात भी नहीं थी। ह्वाइट हाउस ने कोई ऐसी सूचना भी नहीं दी थी, जिसमें यह बताया गया हो कि श्री लिंकन कहीं जाने वाले हों।

एक दिन पूर्व ही लिंकन ने स्वप्न देखा था। उन्हें किसी ने गोली मारी है और उनका मृतक शव पृथ्वी पर पड़ा है। स्वप्न उन्होंने अपने जीवन में सैकड़ों देखे होंगे पर इस स्वप्न का उनके अन्तःकरण पर गहरा प्रभाव था। स्वप्न का विस्तृत विवरण देते समय उन्होंने अपने मित्र मि. क्रुक को बताया कि उन्हें जिस समय से स्वप्न में गोली लगने का दृश्य दीखा है, न जाने क्यों उसकी सत्यता पर विश्वास हो गया है। मि. क्रुक ने तब तो उस बात को हँसी में टाला पर जब एक भोज से प्रेसीडेन्ट ने ह्वाइट हाउस के लिये चलते समय बड़ी गम्भीर मुद्रा में ‘गुड बाई’ कहा तो एकाएक सभी के चेहरे गम्भीर हो गये। 14 अप्रैल 1865 ही वह दूसरा दिन था, जिस दिन श्रीयुत लिंकन को गोली मार कर उनकी हत्या कर दी गई।

वैज्ञानिकों से एक प्रश्न है कि यदि मनुष्य भी सचमुच वृक्ष−वनस्पति की तरह केवल रासायनिक अस्तित्व या जड़ मात्र है तो जो बातें बड़ी−बड़ी मशीनें नहीं बता सकतीं, वह स्वप्नावस्था में कैसे मालूम हो गया। स्वप्नों के यह पूर्वाभास हमें यह सोचने के लिये विवश करते हैं कि आत्मा कोई चेतन तत्त्व है और वह अमरत्व, सर्वव्यापकता, सर्व अन्तर्यामिता आदि गुणों से परिपूर्ण है अन्यथा निद्रावस्था में हम उन सत्य बातों का आभास कैसे पा लेते, जिन्हें पदार्थ के किसी कण या मशीन द्वारा जाना पाना सम्भव नहीं है।

मनुष्य जितनी अधिक प्रगाढ़ निद्रा में होता है, पदार्थ विज्ञान के अनुसार उसे साँसारिक बातों का उतना ही विस्मरण होना चाहिये, किन्तु इलेक्ट्रो इनकेफैली ग्राम (एक प्रकार का यन्त्र जो मस्तिष्क में पैदा होने वाली विद्युत तरंगों की गणना करता है) के द्वारा प्रसिद्ध वैज्ञानिक डॉ. क्लीटमत ने यह सिद्ध किया कि निद्रावस्था जितनी ही गहरी होती है, उतने ही स्वप्न अधिक स्पष्ट और सार्थक होते हैं। उन्होंने यह दावा किया है कि स्वप्न देखना भी साँस लेने की तरह जीव की एक स्वाभाविक क्रिया है। स्वाभाविक क्रियायें यदि सत्य बातों का ज्ञान करा सकती हैं तो उनकी अनुभूति करने वाले तत्त्व को जड़ नहीं कहा जा सकता है। उनका यह भी कहना है कि निद्रा की गहराई रात में एक या दो घण्टे के लिये ही आती है। इसीलिये तमाम रात सार्थक स्वप्न न देखकर वह अनुभूतियाँ बहुत थोड़े समय के लिये होती हैं। प्रातः काल जब बाह्य प्रकृति भी स्वच्छ हो जाती है और थोड़े समय के लिये मनुष्य भी गहरी निद्रा में उतरता है तो उसे ऐसे स्वप्न दिखाई देते हैं, जिनमें किन्हीं सत्य घटनाओं का पूर्वाभास मिलता है।

इसलिये कोई यदि यह तर्क दे कि यदि स्वप्न आत्मचेतना के प्रमाण हैं तो सबको ऐसे स्वप्न क्यों नहीं दिखाई देते तो उसका खण्डन इस उपरोक्त कथन से हो जायेगा। डॉ. क्वीटमन ने भी लिखा है कि अस्त−व्यस्त स्वप्न प्रायः भोजन में गड़बड़ी के कारण होते हैं। तीखे और उत्तेजक पदार्थों के सेवन से शरीर की स्थूल प्रकृति उत्तेजित बनी रहती है, इसलिये स्वप्न साफ नहीं दीखते पर चेतना जैसे ही गहराई में उतर जाती है, सार्थक स्वप्नों का क्रम चल पड़ता है।

इस तरह के स्वप्न के लिये एक बार पोलैण्ड में व्यापक हलचल उठ खड़ी हुई थी और तबसे वहाँ के सैंकड़ों लोग इस जिज्ञासा में हैं कि वह कौन−सा तत्त्व है, जो मनुष्य को गहन एकाकीपन में भी समीपता का दिग्दर्शन कराता है। कौन−सी चेतना है जो निद्रा में भी सच्ची घटनाओं का आभास कराती है।

जिस घटना ने इस जिज्ञासा को जन्म दिया वह अपने आप में बड़ी रोचक है। मेरना नामक एक पोलिश युवती का एक युवक के साथ विवाह संबंध निश्चित किया गया युवक सेना का सिपाही था। विवाह होने से कुछ दिन पूर्व ही जब वह छुट्टी पर घर आया हुआ था, एकाएक युद्ध छिड़ गया और उसे जेरनैक नगर छोड़कर अपनी बटालियन के लिये प्रस्थान कर जाना पड़ा, मेरना ने अश्रुपूरित हृदय से विदाई तो दी पर उसके हृदय में युवक के प्रति प्रेम की घनिष्ठता छा गई थी। उसने सच्चे हृदय से आत्म−समर्पण किया था, इसलिये उसे हर क्षण अपने भावी पति की याद आती रहती।

युवक स्टैनिस्लास आमेंस्की लौट तो आया पर प्रेम की पीड़ा उसे भी बार−बार मेरना तक खींच ले जाती, वह भी सदैव मेरना की याद किया करता। एक दिन वह शत्रु सेना में बुरी तरह घिर गया और सैंकड़ों अन्य सिपाहियों के साथ युद्ध की विभीषिका में न जाने कहाँ खो गया। काफी दिनों तक उसके बारे में कुछ भी पता न चला।

डॉ. क्लीटमन के सहायक यूगेन एसेरिन्सकी ने स्वप्नों पर अपना विश्लेषण प्रस्तुत करते समय एक स्थान पर लिखा है कि मनुष्य निद्रावस्था में स्वप्न देखता है तो स्वप्न की तीव्रता के अनुपात में उसकी पुतलियाँ भी घूमती हैं, एक रात में पाँच−2 बार यह पुतलियाँ घूमती हुई पाई गई हैं, और घंटों तक यह क्रिया होती रहती है, साथ ही स्वप्न के दृश्यों में उठने वाले संवेग हृदय आदि मर्मस्थलों को भी प्रभावित करते हैं, उससे भी स्पष्ट है कि स्वप्न का मनुष्य से घनिष्ठ संबंध बना रहता है। आत्मा शरीर में भी होती है और वह किसी विलक्षण गति या स्वरूप में उस दृश्य वाले स्थान में भी होती है। मेरेना जब भी यह स्वप्न देखती शारीरिक संवेग इसी तरह की अवस्था में होते। आश्चर्य कि प्रतिदिन उसे रात्रि के अन्तिम प्रहर यही स्वप्न दिखाई देता।

मेरेना ने दूसरे दिन भी वही स्वप्न देखा। तीसरे दिन भी और लगातार वही स्वप्न। उसकी आँखों में दिन रात वही किला और स्टेनिस्लास का निराश दृश्य घूमता, वह जिससे भी मिलती एक ही चर्चा करती। इस घटना का वर्णन प्रकाश में लाने वाले डॉ. फ्रैक एडवर्ड्स ने लिखा है, अन्त में इस युवती को पागल की संज्ञा दे दी गई। कुछ लोगों को उससे सहानुभूति भी हुई पर पोलैंड शाही किलों का सुप्रसिद्ध देश है। किस किले में खोज की जाती। सहानुभूति के अतिरिक्त और कोई सहयोग भी क्या करता।

एक दिन मेरना घर से निकल पड़ी। उसने निश्चय किया कि वह अपने स्वप्न को सच्चा साबित करेगी और अपने भावी पति का ढूँढ़ निकालेगी। कई महीने पैदल यात्रा करती हुई मेरना ने अनेक किलों के दर्शन कर लिये पर स्वप्न के किले से संगति खाने वाला किला अभी दूर था। मार्ग में उसे लोग गरीबनी समझकर जो कुछ खाने को दे देते वह खा लेती। भगवान् के भरोसे मेरना इसी तरह चलती रही।

पर मेरना पर उसका कुछ प्रभाव नहीं पड़ा। वह उठ खड़ी हुई और किले की ओर दौड़ी। लोग उसके पीछे हो लिये। मेरना किले के उस भाग में जा पहुँची, जहाँ सचमुच ईंटों का मलबा भरा पड़ा था, वह तेजी से उसके पत्थर हटाने लगी। उन लोगों में कुछ समझदार भी थे, उन्होंने मेरना का साथ दिया। आधे से ज्यादा पत्थर निकल गये तो सचमुच भीतर जाने का एक दरवाजा निकल आया और अब तक भीतर किसी आदमी की आवाज स्पष्ट सुनाई देने लगी। एक आदमी को निकलने योग्य दरवाजा खुल गया, लोगों ने आश्चर्यचकित होकर देखा कि उसमें दबा हुआ व्यक्ति बाहर निकल आया, वह स्टेनिस्लास ही था। इतने दिन तक अंधकार में दबे रहने के कारण वह प्रकाश में चौंधिया रहा था। कपड़े फट गये थे। शरीर क्षीण हो गया था।

उसने बताया कि जिस समय वह स्टोर की रक्षा कर रहा था, शत्रु सेना के एक गोले से यह स्थान धराशायी हो गया था, वह इतने दिन मोमबत्तियाँ जलाकर रहा। खाने के लिये सूखे बिस्कुट और पीने के लिये शराब थी, उसी के सहारे वह किसी तरह जिन्दा बना रहा। इस घटना का सैनिक अधिकारियों पर बड़ा प्रभाव पड़ा और उन्होंने स्टेनिस्लास को ससम्मान सेना से निवृत्त कर दिया और मेरना के साथ उसका विवाह भी करा दिया गया। इस घटना ने सारे पोलैण्ड को यह सोचने के लिये विवश किया कि जीवन में कुछ गहराई और तथ्य भी हैं, स्वप्न उसका दिग्दर्शन कराते रहते हैं, इन तथ्यों की किसी भी स्थिति में उपेक्षा नहीं की जा सकती।

इदं जाग्रदयं स्वप्न इतिनास्येव भिन्नता। सत्ये वस्तुनि निःशेष समयोर्यानिभूतितः॥

—6।2।161।24,

आदिरुर्गेहि चित्स्यप्नो जाग्रदित्यभिशब्धते। अद्यः रात्रौ चितेः स्वप्नः स्वप्न इत्यभिधीयते॥

—6।2।55।9

स्वप्न और जागृत अवस्था में कोई भेद नहीं है। दोनों का अनुभव सर्वथा समान है। सर्ग के आदि में आत्मा का स्वप्न जागृत कहलाता है और सर्ग में रहते हुये स्वप्न कहलाता है। दोनों स्थितियों में आत्मा की स्थिति और अस्तित्व समान है।

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गुरु−भक्ति की परीक्षा

गृहस्थाश्रम का अन्त निकट आ चला किन्तु महाराज दिलीप को कोई सन्तान नहीं हुई। वानप्रस्थ ग्रहण करने से पूर्व राज्य के लिये योग्य उत्तराधिकारी की उन्हें चिन्ता थी और सुलक्षणा को निःसन्तान होने का दुःख। अन्ततः दोनों ने मन्त्रणा की और समुचित समाधान के लिये गुरु वशिष्ठ की शरण जाने का निश्चय कर लिया।

दिलीप और सुलक्षणा समित्पाणि महर्षि वशिष्ठ के आश्रम में पहुँचे और गुरु को प्रणिपात कर अपना दुःख निवेदन किया। एक क्षण मौन रहकर त्रिकालज्ञ महर्षि ने देखा पूर्वजन्म में दिलीप ने एक गाय के बच्चे की बहुत कष्ट दिया था। गाय बहुत दुःखी हुई थी। आत्मा अबूझ रहे तो भी उसकी सर्वशक्तिमत्ता नष्ट तो नहीं होती। भरे हृदय से उसने श्राप दिया था और उसी कारण महाराज दिलीप को इस जन्म में सन्तान सुख से वंचित होना पड़ा था।

अपनी महत्ता छिपाये रखने का ऋषियों में स्वभाव होता है, इसलिये उन्होंने पूर्वजन्म का तो कोई उल्लेख नहीं किया पर उन्होंने कहा—“दिलीप! यदि तुम तप करने के लिए तैयार हो तो ही सन्तान का सौभाग्य मिल सकता है, तुम्हें ज्ञात हो परमात्मा भी निरन्तर तप करता है, तभी वह संसार का स्वामी बन सका।

महर्षि का सीधा उद्देश्य दिलीप से पूर्व−कृत−पापों का प्रायश्चित कराना था। तत्त्वदर्शी आचार्य आश्रमों में आये आगन्तुकों की इच्छायें उनके मनोरथ सब कुछ जानते हैं, उन्हें पूरी करने की सामर्थ्य भी उनमें होती है पर ईश्वरीय नियमों की अवहेलना वे भी नहीं कर सकते। देते हैं वे भी पर तब जब प्रायश्चित द्वारा उनकी मलिनताओं और कुसंस्कारों को दूर कर लेते हैं। दुष्ट−दुराचारी पाप और वासनाओं में डूबे हुए को कोई वरदान देकर उस अलौकिक आत्म−शक्ति के दुरुपयोग का अपराध वे कभी नहीं करते, भले ही सारा संसार एक ओर हो जाये और अपने सिद्धान्तों पर उन्हें अकेले ही तटस्थ होकर खड़ा रहना पड़े।

दिलीप! और सुलक्षणा ! तुम दोनों ही मुझे मेरे प्राणों से भी अधिक प्यारे हो। राज वंश की रक्षा हमारा धर्म भी है—वशिष्ठ बोले—किन्तु ईश्वरीय न्याय के सिद्धान्त प्राणिमात्र के लिए एक से हैं, जिस तरह तुम अपनी प्रजा का न्याय करते समय छोटे−बड़े, अपने−पराये का भेद नहीं करते, क्या उसी प्रकार ईश्वर की सत्ता पर यह विश्वास न करोगे कि वह प्राणिमात्र के प्रति समान न्याय भाव रखता है।

यह तो हमारा धर्म है गुरुदेव! दिलीप ने दोनों हाथ जोड़कर कहा—“आप जो कुछ कहेंगे उसमें हमारा हित ही होगा।” इससे आगे की बात सुलक्षणा ने पूरी की—“देव! आपकी कोई भी आज्ञा हमें शिरोधार्य है, हम तप करने के लिए राजी हैं।”

वशिष्ठ ने राज दम्पत्ति को आशीर्वाद दिया। आश्रम के प्रबंधकों ने उनके निवास का प्रबंध किया। जिस तरह आश्रम में विद्याध्ययन और साधनायें करने वाले स्नातक और वानप्रस्थ वर्ण−कुटीरों में रहते थे, उन्हें भी एक पर्ण कुटीर रहने के लिये दे दिया गया। बिलकुल सामान्य, राज−वंश की शान के अनुकूल विशेषता का एक भी अंश उसमें नहीं था।

एक दिन सायंकाल उनके द्वार आये दो बटुकों—उनके साथ महर्षि की ‘नन्दिनी’ गाय थी—ने उन्हें बताया—कल से आपको इस गाय को चराने जाना होगा। इस गाय की संपूर्ण व्यवस्था का उत्तरदायित्व आगे आप लोगों पर ही होगा, ऐसा महर्षि का आदेश है।

सुलक्षणा ओर दिलीप दोनों ने नन्दिनी के चरण स्पर्श किये और उसे पर्ण कुटीर के सम्मुख एक अन्य पर्ण−कुटीर में रख दिया।

प्रातःकाल नन्दिनी वन के लिए चली। कटि में परिकर और पीठ पर तूणीर, जिन में बाण भरे हुए थे, धारण कर दिलीप गाय के पीछे चले। दक्षिण स्कन्ध पर प्रत्यंचा चढ़ा हुआ धनुष—दिलीप का वीर देश देखते ही बनता था। उनके पीछे पदत्राण रहित सुलक्षणा। जिसने कभी एक योजन भी पैदल न चला था, जिसकी देह पर वर्षों से सूर्य का भरपूर प्रकाश भी न पड़ा था, वही सुकुमारी सुलक्षणा कंटकाकीर्ण वन में पति दिलीप के साथ नन्दिनी चराने जाने लगी।

नन्दिनी जब चरती उसकी सुरक्षा के लिये धनुर्धारी दिलीप सन्नद्ध खड़े रहते। नन्दिनी जब चलती दिलीप उसके पीछे-पीछे चलते नन्दिनी बैठ जाती, तभी उन्हें बैठने को मिलता। नन्दिनी कभी अस्वस्थ दीखती तो दिलीप और सुलक्षणा रात-रात जागकर उसका उपचार करते। जप, तप, हवन, ब्रह्म-भोज सब कुछ उनके लिये नन्दिनी की सेवा ही थी। गुरुदेव की गाय को वे अपने प्राणों से भी अधिक बचाकर रखते थे। गुरु वशिष्ठ का इसमें कोई स्वार्थ नहीं था। महाराज दिलीप से सेवा लेकर किसी बड़प्पन की भी उन्हें आकाँक्षा नहीं थी। इस बहाने वे दिलीप के पापों का प्रच्छालन करना चाहते थे। वही सब हो रहा था।

शीत, बरसात, ग्रीष्म—ऋतुएं बदलती गईं पर दिलीप की साधना में कोई अन्तर नहीं पड़ा। एक शरद गई दूसरी ने प्रवेश किया। कार्तिक के सुहावने दिन प्रकृति की हरीतिमा और नव्य-कुसुमों की शोभा वन-श्री को नई आभा प्रदान कर रही थी। नन्दिनी चरते-चरते कैलाश शिखर तक जा पहुँची। दिलीप प्रकृति के अजस्र सौन्दर्य का पान करते उसके पीछे-पीछे चलते चले गये।

सन्ध्या हो चली पर नन्दिनी ने पीछे मुड़ने का नाम भी न लिया। भगवान सूर्यदेव थककर अस्त होने चल पड़े। ज्योति-पूर-विधु आकाश में हलकी आभा से उदय हो चला। विलक्षण शाँति थी उस समय। सघन क्षेत्रों का कोलाहल भी मिट चुका था, आर्यावर्त भगवती सन्ध्या की वन्दना में लीन हो रहा था। महाराज दिलीप का ध्यान इस शाँतिपूर्ण वेला में एकाग्र हो गया। प्रकृति के सौंदर्य में वे एक क्षण के लिये खो गये। नन्दिनी थोड़ा आगे निकल गई।

तभी एक सिंह की गरज ने उनका ध्यान भंग किया। वह अभी नन्दिनी पर टूट पड़ने वाला था कि दिलीप का धनुष गति कर उठा। तीखा बाण तूणीर से काढ़कर उन्होंने प्रत्यंचा चढ़ाई। श्रवण तक खींचकर अभी वे बाण को छोड़ना ही चाहते थे कि हाथ धनुष से चिपक गये और वे अपने को सर्वथा असह्य, असमर्थ अनुभव करने लगे। सिंह हँस पड़ा और बोला—“दिलीप तुम जिसे सिंह समझते हो, वह नहीं हूँ—मैं भगवान आशुतोष का गण हूँ मुझे नन्दिनी को भक्षण करने के लिये भेजा गया है। तुम उसे बचा नहीं सकते।

दिलीप आर्तनाद कर दौड़े और नन्दिनी को अपने पीछे कर बोले—“जब तक मेरा शरीर है—वनराज! तब तक तुम नन्दिनी पर प्रहार नहीं कर सकते।” अब तक सुलक्षणा भी आगे पहुँच चुकी थी, उसने हाथ जोड़कर याचना की—“मृगेन्द्र आप पहले मुझे भक्षण करें, तब मेरे पतिदेव पर हाथ उठाएं।”

एक निमिष में सब कुछ हो गया। सिंह वहाँ था कहाँ? महर्षि वशिष्ठ शिला पर खड़े मुस्करा रहे थे। उन्होंने आशीर्वाद दिया—“अब तुम आश्रम लौट आओ दिलीप! तुम्हारी तपश्चर्या पूरी हो गई।”

इसी साधना के प्रताप से दिलीप और सुलक्षणा ने रघु को जन्म दिया। जिनके नाम पर दिलीप के वंश का नाम ‘रघुवंश’ पड़ा।


आप मेरे गुरु हैं

प्रयाग में द्विवेदी मेले की चहल-पहल थी। वहाँ सर गंगानाथ झा की, अध्यक्षता में एक सभा का आयोजन किया गया। जैसे ही द्विवेदी मंच पर आये कि सर गंगानाथ उनके चरण स्पर्श करने के लिए झुके। उसी क्षण द्विवेदी जी ने भी सर गंगानाथ के चरण छूने का प्रयास किया। द्विवेदी जी बोल—“आप मेरे गुरु हैं आपने मुझे संस्कृत लिखना सिखाया है, अतः मुझे चरण स्पर्श का अवसर दीजिए।” सर गंगानाथ बोले—“नहीं, आप मेरे गुरु हैं, क्योंकि मुझे हिन्दी लिखना तो आपने ही सिखाया था।”

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जीवन के उतार-चढावों पर उद्विग्न न हों।

यों तो जरा−जरा सी बात पर दुःखी होना बहुत से लोगों का स्वभाव होता है। यह स्वभाव किसी प्रकार भी वाँछनीय नहीं माना जा सकता। मनुष्य आनन्दस्वरूप है, उसका दुःखी होना क्या? उसे तो हर समय प्रसन्न, आनन्दित तथा उत्साहित ही रहना चाहिए। यही उसके लिए वाँछनीय है और यही जीवन की विशेषता। इस स्वभाव के अतिरिक्त लोग तब तो अवश्य ही दुःखी रहने लगते हैं, जब वे किसी उच्च स्थिति से नीचे उतर जाते हैं। इस दशा में वे अपने दुःखावेग पर नियन्त्रण नहीं कर पाते और फूल जैसे जीवन में ज्वाला का समावेश कर लेते हैं। जब कि उस उतार की स्थिति में भी दुःख−शोक की उपासना करना अनुचित है।

उतार की स्थिति में दुःखी होना तभी ठीक है। जब वह उतार पतन के रूप में घटित हुआ हो। और यदि उसका घटना नियति में नियम ‘परिवर्तन’, ईश्वर की इच्छा, प्रारब्ध अथवा दुष्टों की दुरभिसंधियों के कारण हुआ हो तो कदापि दुःखी न होना चाहिए। तब तो दुःख के स्थान पर सावधानी को ही आश्रित करना चाहिए। पतन के रूप में उतार का घटित होना अवश्य खेद और दुःख की बात है। उदाहरण के लिए किसी परीक्षा को ले लीजिए, यदि परीक्षार्थी ने अपने अध्ययन, अध्यवसाय और परिश्रम में कोताही रखी है। समय पर नहीं जागा, आवश्यक पाठ आत्मसात नहीं किये, गुरुओं के निर्देश और परामर्शों पर ध्यान नहीं दिया। अपना उत्तरदायित्व अनुभव नहीं किया और असावधानी तथा लापरवाही बरती है तो उसका फेल हो जाना खेद, दुःख व आत्महीनता का विषय है। उसे अपने इस किए का दुःख रूपी दण्ड मिलना ही चाहिए। वह इसी योग्य था। उसके साथ न किसी को सहानुभूति होनी चाहिए और न उसे सान्त्वना और आश्वासन का सहयोग ही मिलना चाहिए।

किन्तु उस पुरुषार्थी विद्यार्थी को दुःख से अभिभूत होना उचित नहीं, जिसने पूरी मेहनत की है और पास होने की सारी शर्तों का निर्वाह किया है। बात अवश्य कुछ उल्टी लगती है कि जिसने परिश्रम नहीं किया, वह तो अनुत्तीर्ण होने पर दुःखी हो और जिसने खून−पसीना एक करके तैयारी की वह असफल हो जाने पर दुःखी न हो। किन्तु हितकर नीति यही है कि योग्य विद्यार्थी को असफलता पर दुःखी नहीं होना चाहिए। इसलिए कि उसके सामने उसका उज्ज्वल भविष्य होता है। दुःख और शोक से अभिभूत हो जाने पर वह निराशा के परदे में छिप सकता है।

अयोग्य विद्यार्थी का न तो कोई वर्तमान होता है और न भविष्य। वह निकम्मा, चाहे दुःख हो, चाहे प्रसन्न कोई अन्तर नहीं पड़ता। इस प्रकार पतन द्वारा पाई असफलता तो दुःख का हेतु है, किन्तु पुरुषार्थ से अलंकृत प्रयत्न की असफलता दुःख खेद का नहीं, चिन्तन−मनन और अनुभव का विषय है। आशा, उत्साह, साहस और धैर्य की परीक्षा का प्रसंग है। प्रयत्न की असफलता स्वयं एक परीक्षा है। मनुष्य को उसे स्वीकार करना और उत्तीर्ण करना ही चाहिए।

प्रायः आर्थिक उतार लोगों को बहुत दुःखी बना देता है। जिसका लंबा−चौड़ा व्यापार चलता हो। लाखों रुपये वर्ष की आमदनी होती हो, सहसा उसका रोजगार ठप हो जाए, कोई लंबा घाटा पड़ जाए, हैसियत, बिगड़ जाए और वह असाधारण से साधारण स्थिति में आ गिरे तो वह अवश्य ही दुःखी और शोक−ग्रस्त रहने लगेगा। फिर भी इस आर्थिक उतार का शोक करना उचित नहीं। क्योंकि शोक करने से स्थिति में सुधार नहीं हो सकता। यदि शोक करने और दुःखी रहने से स्थिति में सुधार की आशा हो तो एक बार शोक करना और दुःखी रहना उस स्थिति में किसी हद तक उचित कहा जा सकता है। किन्तु यह सभी अच्छी तरह से जानते हैं कि विपन्नता का उपचार दुःखी रहना नहीं, बल्कि उत्साहपूर्वक पुरुषार्थ करना ही है। तथापि लोग उल्टा आचरण करते हैं। यह कम खेद की बात नहीं है।

सम्पन्नता से विपन्नता में आ जाने पर लोग क्यों दुःखी रहते हैं? इसके अनेक कारण होते हैं। इसका एक कारण तो है अपनी वर्तमान स्थिति से विगत स्थिति की तुलना करना। दूसरा कारण है दूसरों की संपन्न स्थिति को सामने रखकर अपनी स्थिति देखना। तीसरा कारण है, सामाजिक अप्रतिष्ठा की आशंका करना चौथा कारण है लज्जा और आत्म−हीनता का भाव रखना। और पाँचवाँ कारण है, विगत वैभव का व्यामोह। यह और इसी प्रकार के अन्य कारणोंवश लोग अपने आर्थिक उतार पर दुःखी और शोकग्रस्त रहा करते हैं। किन्तु यदि इन कारणों पर गहराई से विचार किया जाए तो पता चलेगा कि इन कारणों को सामने रखकर अपनी विपन्नता पर शोक करना बड़ी हल्की और निरर्थक बात है। इनमें से कोई कारण तो ऐसा नहीं, जिसे शोक का उचित सम्पादक माना जा सके।

अपनी वर्तमान स्थिति से विगत स्थिति की तुलना करने से क्या लाभ। अतीत काल की वह स्थिति जो वैभवपूर्ण थी, आज लौट कर नहीं आ सकती। हाँ उसकी तरह की स्थिति वर्तमान में बनाई अवश्य जा सकती है। किन्तु यह सम्भव तभी होगा, जब अतीत का रोना छोड़कर वर्तमान के अनुरूप साधनों का सहारा लेकर परिश्रम और पुरुषार्थ किया जाये। केवल अतीत को याद कर−करके दुःखी होने से कोई काम न बनेगा। जब मनुष्य अपने वैभवपूर्ण अतीत का चिन्तन करके इस प्रकार सोचता रहता है तो उसके हृदय में एक हूक उठती रहती है—एक समय ऐसा था कि हमारा कारोबार जोरों से चलता था। लाखों रुपयों की आय थी। हजारों आदमी अधीनता में काम करते थे। बड़ी−सी कोठी और कई हवेलियाँ थीं। मोटर कार पर चलते थे। मन−माने ढँग से रहते और व्यय करते थे। लेकिन आज यह हाल है कि कारोबार बन्द हो गया है। आय का मार्ग नहीं रह गया। दूसरों की मातहती की नौबत आ गई है। कोठियाँ और हवेलियाँ बिक गईं। मोटर कार चली गई। हम एक गरीब आदमी बन गए। अब तो यह जीवन ही बेकार है। इस प्रकार का चिन्तन करना अपने जीवन में निराशा और दुःख को पाल लेना है।

यदि अतीत का चिन्तन ही करना है तो इस प्रकार करना चाहिए। हमने इस−इस प्रकार से अमुक−अमुक काम किए थे। जिससे इस−इस तरह की उन्नति हुई थी। उन्नति के इस मार्ग में इस−इस तरह के विघ्न आए थे। जिनको हमने इस नीति द्वारा दूर किया था। इस प्रकार का चिन्तन करने से मनुष्य का सफल स्वरूप ही सामने आता है और वह आगे उन्नति करने के लिए प्रेरणा पाता है। विचारों का प्रभाव मनुष्य के जीवन पर बड़ा गहरा पड़ता है। जो व्यक्ति अपनी अवनति और अनिश्चित भविष्य के विषय में ही सोचता रहता है, उसका जीवन चक्र प्रायः उसी प्रकार से घूमने लगता है। इसके विपरीत जो अपनी उन्नति और विकास का चिन्तन किया करता है, उसका भविष्य उज्ज्वल और भाग्य अनुकूलतापूर्वक निर्मित होता है।

मनुष्य की चिन्तन क्रिया बड़ी महत्वपूर्ण होती है। चिन्तन को यदि उपासना की संज्ञा दे दी जाए, तब भी अनुचित न होगा। जो लोग उपासना करते हैं, उन्हें अनुभव होगा कि जब वे अपना ध्यान परमात्मा में लगाते हैं तो अपने अन्दर एक विशेष प्रकार का प्रकाश और पुलक पाते हैं। उन्हें ऐसा लगता है, मानो परमात्मा की करुणा उनकी ओर आकर्षित हो रही है। यह कल्याणकारी अनुभव उस उपासना, उस चिन्तन अथवा उन विचारों का ही फल होता है, जिनके अन्तर्गत कल्याण का विश्वास प्रवाहित होता रहता है।

इस प्रकार जिस प्रकार का विश्वास और जिस प्रकार के विचार लेकर मनुष्य अपने भविष्य के प्रति उपासना करता है, उसी प्रकार के तत्त्व उसकी जीवन परिधि में सजग और सक्रिय हो उठते हैं। अतएव मनुष्य को सदैव ही कल्याणकारी चिन्तन ही करना चाहिए। निराशापूर्ण चिन्तन जीवन के उत्थान और विश्वास के लिए अच्छा नहीं होता।

दुःख मनाने से दुःख के कारणों का निवारण नहीं हो सकता। दुःख के कारण उद्विग्न और मलीन रहने के कारण मन की शक्तियाँ नष्ट होती हैं। अधोगत व्यक्ति के भौतिक साधन प्रायः नगण्य हो जाते हैं। उस स्थिति में उसके पास मनोबल के सिवाय अन्य कोई साधन नहीं रह जाता। मनोबल का साधन कुछ कम बड़ा साधन नहीं होता। मनोबल के बने रहने पर मनुष्य में प्रसन्नता, विश्वास और उत्साह बना रहता है। इन गुणों को साथ लेकर जब किसी स्थान पर व्यवहार किया जाता है तो दूसरों पर उसके धैर्य सहिष्णुता और साहस का प्रभाव पड़ता है। लोग उसे एक असामान्य व्यक्ति मानने लगते हैं। उन्हें विश्वास रहता है कि इसको दिया हुआ सहयोग सार्थक होगा। यह परिस्थितियों से हार न मानने वाला दृढ़ पुरुष है। इस प्रतिक्रिया से लोग उस व्यक्ति की ओर स्वतः आकर्षित हो उठते हैं—ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार उपासक की ओर परमात्मा की करुणा आकर्षित हो उठती है।

विगत वैभव का सोच करना किसी प्रकार भी उचित नहीं। क्योंकि अतीत का चिन्तन न तो वर्तमान में कोई सहायता करता है और न भविष्य का निर्माण। बल्कि वह उस व्यामोह को और भी सघन तथा दृढ़ बना देता है, जिसके अधीन मनुष्य विगत वैभव का सोच किया करते हैं। उत्थान अथवा अवनति के माया जाल से बचने के लिए आवश्यक है कि उनके प्रति व्यामोह के अंधकार से बचे रहा जाय। इस सत्य में तर्क की जरा भी गुँजाइश नहीं है कि संसार परिवर्तन के चक्र से बँधा हुआ घूम रहा है। यहाँ पर कोई भी सदैव एक जैसी स्थिति के प्रति आश्वस्त रहने का अधिकार नहीं रखता। उसे परिवर्तन का अटूट नियम सहन ही करना पड़ेगा। यह सोचकर इस सत्य को स्वीकार करना ही होगा कि पहले गरीब थे, फिर अमीरी आई और अब उसी चक्र के अनुसार पुनः गरीबी आ गई है। पुनरपि यह निश्चित है कि यदि पूर्ववत पुरुषार्थ का प्रमाण दिया जाए तो संपन्नता निश्चित है। इस सहज संयोग में रहते हुए सम्पन्नता, विपन्नता से विचलित होना किसी प्रकार भी बुद्धिसंगत नहीं है।

किन्हीं विगतमान चीजों के प्रति दुःख होने का कारण यह है कि व्यामोह के वशीभूत मनुष्य उससे अपना आत्मभाव स्थापित कर लेता है। सोचने की बात है कि जब यह संसार ही हमारा नहीं है, यह शरीर तक हमारा नहीं है तो यहाँ की किसी चीज के साथ आत्मभाव स्थापित कर लेने में क्या बुद्धिमत्ता है। एक दिन जब मनुष्य खुद ही सब को छोड़कर चला जाता है तो यदि कोई चीज उसे छोड़कर चली जाती है तो इसमें दुःख की क्या बात है? यह संसार और उसकी दृश्यमान अथवा अदृश्यमान सारी चीजें एकमात्र परमानन्द की हैं। उसके सिवाय किसी भी व्यक्ति का यहाँ की किसी चीज पर अधिकार नहीं है। जिसे जो कुछ मिलता है, वह सब परमात्मा का दिया होता है।

मनुष्य की बुद्धिमानी इसी में है कि वह इस सत्य को स्वीकार करे और इस बात के लिये सदैव तैयार रहना चाहिये कि परिवर्तन के नियम के अन्तर्गत उससे कोई भी चीज किसी भी समय ली जा सकती है। इस सत्य में विश्वास रखने वाले को व्यामोह का कोई दोष नहीं लगने पाता और वह सम्पत्ति तथा विपत्ति में सदा समभाव रहता है।

इसी व्यामोह के जाल से बचने के लिए ही गीता में भगवान् ने अनासक्तिपूर्वक जीवन−चक्र चलाने का निर्देश किया है। उत्साहपूर्वक अपना कर्तव्य करते हुए इस बात के लिए सदा तैयार रहना चाहिये कि इस परिवर्तनशील जगत् में कुछ भी अपना नहीं है। सम्पन्नता अथवा विपन्नता जो भी प्राप्त हो रही है, किसी समय भी बदल सकती है। यह अनासक्त भाव मानव−जीवन में सुख−शाँति का बड़ा महत्वपूर्ण विधायक है। मानव−जीवन आनन्द रूप है। दुःखों सन्तापों तथा आवेगों से इसे अशान्त करना अन्याय है। ऊर्ध्व स्थिति से अधोस्थिति में आकर अथवा विपन्नता से सम्पन्नता में पहुँचकर किन्हीं अतिरिक्त अथवा अन्यथा भाव से आन्दोलित नहीं होना चाहिये। सम्पन्नता की स्थिति में अभिभूत रहना और विपन्नता में दुखी होना, दोनों भाव ही जीवन में अशाँति का कारण हैं।

विगत वैभव के प्रति व्यामोह के कारण वर्तमान जीवन तो अशान्त रहता है, साथ ही मलीन चिन्तन के कारण भविष्य भी प्रभावित होता है। अनासक्त भाव से, परिवर्तन में विश्वास रखते हुए उत्साहपूर्वक अपना कर्तव्य करते हुए जो स्थिति प्राप्त हो, उसे मित्र की भाँति स्वीकार करने से जीवन में अशाँति और असुख की सम्भावना नहीं रहती।

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अपनों से अपनी बात-


मानवता का प्राण −अध्यात्म नष्ट न होने पाये।

भारतीय इतिहास का उज्ज्वल अतीत इस कारण शानदार रहा कि तब आदर्शवादिता को विचारणा एवं क्रिया में महत्त्वपूर्ण स्थान मिलता था। सोचने का स्तर उदारता एवं विवेकशीलता से और क्रिया का स्तर लोकमंगल एवं आदर्शों की रक्षा से अनुप्राणित रहता था। जहाँ उस रीति-नीति को प्रश्रय मिलेगा, वहाँ सुख और शाँति का, प्रगति और समृद्धि का बाहुल्य रहना स्वाभाविक है। इस आधार को जब कभी भुलाया जायगा—उपेक्षित किया जायेगा एवं ओछापन अपनाया जायगा, तभी पतन एवं संकट की विपन्नतायें इकट्ठी होती चली जाएंगी। साधनों की दृष्टि से हम अपने पूर्वजों से बहुत आगे हैं—अस्तु हमें उनकी अपेक्षा अधिक समर्थ, सशक्त, सम्पन्न एवं सफल होना चाहिए था। किन्तु हो ठीक उल्टा रहा है। इसका कारण हमारी विचारणा में घटियापन आ जाने से क्रियाओं का अवाँछनीय हो जाना ही है। उस स्थिति को जब तक न बदला जायगा तब तक अन्य छुट-पुट प्रयत्न मन बहलाव के बाल-विनोद मात्र सिद्ध होते रहेंगे।

अध्यात्मवाद का समस्त कलेवर इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए विनिर्मित हुआ है कि व्यक्ति आन्तरिक दृष्टि से—भावनात्मक स्तर पर अपनी उत्कृष्टता सुरक्षित रखने एवं बढ़ा सकने में समर्थ बना रहे। और बाह्य दृष्टि से—क्रिया स्तर पर आदर्शवादिता भरे संयमित, मर्यादित एवं लोकमंगल के लिए गतिविधियाँ अपनाये रहने की तत्परता बरते। पूजा, उपासना, कथा, वार्ता, तीर्थ, मंदिर, व्रत, अनुष्ठान, जप-तप तथा नियम-संयम, स्नान-ध्यान, दान-पुण्य आदि की अध्यात्मिक प्रक्रियाओं के आधार पर यदि बारीकी से दृष्टिपात किया जाय तो एक ही निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ेगा कि इन मनोवैज्ञानिक क्रिया-कलापों का प्रयोजन व्यक्ति की अन्तरंग उत्कृष्टता का अभिवर्धन करना है। आस्तिकता का अर्थ है, ईश्वर विश्वास। ईश्वर विश्वास का अर्थ है—एक ऐसी न्यायकारी सत्ता के अस्तित्व को स्वीकार करना, जो सर्व-व्यापी है और कर्मफल के अनुरूप हमें गिरने एवं उठने का अवसर प्रस्तुत करती है। यदि यह विश्वास कोई सच्चे मन से कर ले तो उसकी विवेक-बुद्धि कुकर्म करने की दिशा में एक कदम भी न बढ़ने देगी। हम आग नहीं छूते, जहर नहीं खाते तो कोई कारण नहीं कि सर्व-व्यापी कर्मफल के अनुरूप सुख-दुख देने वाली ईश्वरीय सत्ता विधि-व्यवस्था तोड़ने और अनाचार अपनाने का दुस्साहस करें। आस्तिकता हमें उसी निष्कर्ष पर पहुँचाती है। वह हमें विवश करती है कि यदि सुख-शाँति के लिए आकर्षण है तो सत्प्रवृत्तियों और सद्भावनाओं का ही अवलम्बन ग्रहण करना चाहिए। संक्षिप्त में आस्तिकता का तत्त्व हमारे अन्तरंग में उत्कृष्टता एवं बहिरंग में आदर्शवादिता की अधिकाधिक मात्रा का समावेश करने वाला अन्तःविश्वास ही कहा जा सकता है।

इसी केन्द्र-बिन्दु पर आस्तिकता का समस्त दार्शनिक एवं प्रयोगात्मक आधार खड़ा किया गया है। समस्त धर्म-ग्रन्थों में विविध विधि कथा, उपाख्यानों द्वारा इसी तथ्य का प्रतिपादन है। धार्मिक कर्मकाण्डों के द्वारा इसी आस्था को हृदयंगम कराने को मनोवैज्ञानिक उपचार कहा जा सकता है। योग शास्त्र का प्रयोजन कुसंस्कारों एवं लिप्साओं को संघर्ष करके ऊर्ध्वगामी मनस्विता को प्रखर बनाना है व्यक्ति ईश्वर का पुत्र है, उसमें अपने पिता की समस्त विभूतियाँ एवं महत्ताएं बीज रूप में विद्यमान हैं, साधना का प्रयोजन अन्तःकरण पर चढ़े हुए उन मल आवरण विक्षेपों को हटाना है, जो हमें देवत्व से वंचित कर नर-पशु की स्थिति में डाले हुए हैं। तपश्चर्या इसी मलीनता को स्वच्छ करती और प्रस्तुत ऋद्धि-सिद्धियों का जागृत करके दैवी वरदान की तरह लघु को महान् बना देती है।

आस्तिकता और उपासना का सारा आधार यही है। धार्मिकता का कलेवर कितना ही बड़ा क्यों न हो उसकी शाखायें कितनी ही क्यों न हों, बीज मूल की तरह तथ्य इतना ही है कि व्यक्ति अपनी महान महत्ता को समझे, उसी के अनुरूप सोचे और गतिविधियाँ अपनाये। व्यक्ति और समाज की प्रगति एवं सुख-शाँति का आधार इतना ही है। उत्थान और पतन का सौभाग्य, दुर्भाग्य इन्हीं तथ्यों पर पूर्णतया निर्भर है। सद्गुणी, सदाचारी, उदार और जन-कल्याण की भावनाओं से ओत-प्रोत मनुष्य ही सच्चा मनुष्य है, देवता उसी को कहते हैं और वह जहाँ भी रहता है, वहाँ स्वर अनायास ही अवतरित होकर रहता है। परिस्थितिवश कुछ कष्टकर परिस्थितियाँ भी सामने आ जाएं तो भी उच्च दृष्टिकोण रखने वाले उनका कोई बहुत बुरा प्रभाव उत्पन्न नहीं होने देते वरन् अपनी सत्प्रवृत्तियों को और भी अधिक उत्तमता से प्रस्तुत करने का एक ईश्वरीय परीक्षा का सौभाग्य सुअवसर मानते हैं और अपनी महानता को और भी अधिक प्रखरता के साथ प्रस्तुत करते हैं। इस प्रकार सामान्य लोगों के लिए जो घटनायें विपत्ति जैसी लगती हैं, वे ही अध्यात्मवादी के लिए अधिक प्रखर एवं यशस्वी होने की ईश्वरीय अनुकम्पा सिद्ध होती है। इस तथ्य में दो मत नहीं हो सकते कि उत्कृष्ट और आदर्शवादी व्यक्ति ही अपने और समस्त विधि के लिए एक वरदान बन कर जीते हैं। उन्हीं से संसार में सुख-शाँति, सुव्यवस्था, प्रगति और समृद्धि की सम्भावनाएँ साकार होती हैं। मनुष्य जाति का सारा सौभाग्य अध्यात्म के सूर्य से प्रभावित होता है। इसकी विमुखता घोर अन्धकार और आपत्ति भरी अस्त-व्यस्तता ही उत्पन्न करती है। आज की विपन्न परिस्थितियों का तात्विक कारण हमारी अनास्था ही है। उच्च आदर्शों से विमुख होकर संकीर्ण स्वार्थता अपनाने वालों की सदा ही दुर्गति होती रही है। प्रकृति के इस अटल नियम को कोई चुनौती नहीं दे सकता। निकृष्ट स्तर के व्यक्ति कभी शाँति से न रह सकेंगे और उनके बाहुल्य वाला समाज कभी भी समुन्नत न बन सकेगा।

यदि हम व्यक्ति और समाज के उत्कर्ष की बात सोचते हों तो हमें उसके मूल आधार ‘अध्यात्म’ की ओर ध्यान देना होगा और उसको स्वस्थ स्थिति में लाकर जन-मानस में गहराई तक प्रतिष्ठापित करने के लिए घोर प्रयत्न करना होगा। यदि इस ओर ध्यान न दिया गया तो राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक, बौद्धिक, वैज्ञानिक क्षेत्रों में कितने ही—कुछ भी प्रयत्न किये जाते रहें, उनका तनिक भी संतोषजनक परिणाम उत्पन्न न होगा। कोई योजना कितनी ही उत्तम क्यों न हो, उसे चलाने वाले, कार्यान्वित करने वाले, उत्कृष्ट व्यक्तित्व और आदर्शवादी गतिविधियाँ अपनाने वाले न हों। ओछे और कमीने लोग जो भी कार्य हाथ में लेंगे उसे अपने दुर्गुणों के कारण कलुषित कर देंगे। और वही लाभदायक की जगह हानिकारक बन जायगा। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण हम हर क्षेत्र में देखते हैं। उच्च आदर्शों के लिए बनी हुई, संस्थाएं आज पद लिप्सा और धन-लोभ के कारण संघर्ष का अखाड़ा बनी हुई हैं।

मानव-जीवन का प्रत्येक क्षेत्र आज कंटकाकीर्ण और असुविधाओं से भरा हुआ है। जो आधार हमें प्रगति और प्रसन्नता में सहायक सिद्ध होने चाहिए थे, वे ही हमें शोक-संताप देकर दुःखों में वृद्धि कर रहे हैं। शरीर रुग्ण, मन अशांत, परिवार उद्विग्न, समाज विक्षुब्ध, धन जंजाल, शिक्षा अनुपयुक्त किसी भी दिशा में दृष्टिपात करें, सर्वत्र उलझनें और विभीषिकायें ही दीखती हैं। लगता है सुख शाँति के सारे आधार उलटकर दुःख दैन्य के कारण बन गये हैं। इस विडम्बना का एकमात्र कारण अध्यात्म की उपेक्षा है। अध्यात्म मानव जीवन का प्राण है, उसे जिस क्षेत्र से भी तिरस्कृत, बहिष्कृत किया जायगा उसी में विपन्नता उत्पन्न हो जायगी। जल के बिना मछली नहीं जी सकती, मानवीय शाँति भी अध्यात्म की उपेक्षा करके जीवित नहीं रह सकती। आज की श्मशान जैसी सर्वव्यापी जलन का एकमात्र कारण यही है।

आर्थिक क्षेत्र में उपार्जन उत्पादन काफी बढ़ा है। पैसा पहले की अपेक्षा कम नहीं अधिक है। पर इतने पर भी हम आर्थिक तंगी और भी चौगुनी, सौगुनी अनुभव कर रहे है। कारण यह है कि व्यक्तिगत जीवन में हम अधिक अपव्ययी और विलासी बनते चले जा रहे हैं और व्यापारिक क्षेत्र में जमाखोरी, मुनाफाखोरी, तस्करी, मिलावट, धोखाधड़ी पनप रही है। उत्पादन बढ़ता है पर महंगाई नहीं घटती। कमाई बढ़ती है पर तंगी दूर नहीं होती, इस गोरख धन्धे के पीछे उत्पादक, उपभोक्ता और व्यापारी, वितरकों को ओछी दृष्टि ही झाँकती है। लोग उचित आवश्यकता पूर्ण करने भर के लिए उचित श्रम और संग्रह करने का आदर्श अपना लें तो जितनी कुछ अर्थ व्यवस्था आज उपलब्ध है, उसी में बड़े संतोष, आनन्द और हर्षोल्लास के साथ सारे समाज का काम चल सकता है और वास्तविक प्रगति के सभी अवरुद्ध मार्ग सहज ही खुल सकते हैं।

बढ़ते हुए अपराधों की संख्या आर्थिक नहीं अध्यात्म के अभाव में बढ़ रही है। नीति, धर्म और सदाचार का बाँध टूट जाय, व्यक्ति, ईश्वर, परलोक और कर्मफल की सुनिश्चिता पर विश्वास न करे तो फिर अनीति अपनाकर तत्काल लाभ प्राप्त करने के प्रलोभन से फिर उसे कोई नहीं बचा सकता। फिर वह राज-दंड और समाज-दंड से बचने की हजारों तरकीबें ढूंढ़ निकालेगा और गुप्त या प्रकट रूप से परिस्थिति के अनुसार अपनी योजनानुसार दुष्कर्म करता रहेगा। किसी भी धूर्त और सूझ-बूझ वाले व्यक्ति के लिए प्रलोभन अथवा आतंक की स्थिति उत्पन्न कर शासन अथवा समाज में दंड से बहुत ही सरलतापूर्वक बचते हुए अपराध पूर्ण दुष्कर्म करता रह सकता है। हम देखते हैं कि दुष्ट, दुराचारियों की संख्या दिन-दूनी राज चौगुनी बढ़ रही है।

गिरते हुए स्वास्थ्य का एक मात्र कारण असंयम है। जब तक विलासिता और वासना के प्रति वर्तमान आकर्षण बना रहेगा, जब तक आहार-विहार की मर्यादाओं को तोड़कर अप्राकृतिक रीति-रिवाज को अपनाये रहा जायगा, सर्वजनीन स्वास्थ्य की स्थिति निरन्तर गिरती ही चली जाएगी। औषधि उपचार से स्वास्थ्य के संरक्षण एवं संवर्धन हो सकने की भ्रान्त धारणा मृग-तृष्णा की तरह है। उससे मन बहलाव तो हो सकता है पर प्रयोजन की पूर्ति सम्भव नहीं। अस्वस्थता-जन्य कष्ट बढ़ते ही जायेंगे, बीमारियों का प्रकोप और प्रवाह दिन-दिन प्रबल ही होता चला जाएगा।

व्यक्ति जब कभी सच्चे मन से स्वास्थ्य की आकाँक्षा करेगा और सशक्त शरीर का महत्व समझेगा, तब उसे अध्यात्म की ही शरण में आना पड़ेगा और संयम, नियमितता और प्रकृति के अनुसरण का अवलम्बन लेना पड़ेगा। वर्तमान अस्त-व्यस्त और अप्राकृतिक रहन-सहन अपनाये रहा गया तो जन स्वास्थ्य में निरन्तर गिरावट आती चली जाएगी और अन्ततः जीवित रहना एक भार मात्र बन जाएगा। इस दुष्परिणाम से उबारने का उपाय चिकित्सा विज्ञान की प्रगति नहीं, संयम शिक्षा ही सिद्ध होगा। अध्यात्म की शरण में आये बिना हम निरन्तर अधिकाधिक वंचित होते चले जायेंगे।

परिवार एक छोटा समाज है, जिसमें व्यक्ति को उसी तरह जुड़ा रहना पड़ता है जैसा कि शरीर के साथ उसके हाथ-पाँव आदि अवयव जुड़े रहते हैं। परिवार का सहयोग सौहार्द, सद्भाव और संतुलन स्वर्गीय आनन्द का सृजन करता है। संसार के समस्त सुखों की तुलना में पारिवारिक सौहार्द का महत्व भारी बैठता है। माता-पिता का वात्सल्य पत्नी का प्रेम, भाई-बहिनों का सहयोग, बच्चों की श्रद्धा और अन्य कुटुम्बियों का सद्भाव जिसे उपलब्ध है, उसे भाग्यवान ही कहना चाहिये। मानव-जीवन की यह एक बहुत बड़ी उपलब्धि है। पर यह जिस मूल्य पर खरीदी जा सकती है, वह हमारी आध्यात्मिक आस्था ही है। हम स्वयं अपने भीतर उदारता, सद्भावना, ममता, सेवा, करुणा कृतज्ञता और सौहार्द की भावनाओं से ओत-प्रोत रखकर परिवार के हर सदस्य के साथ भाव भरी ममता रखें सज्जनतापूर्ण व्यवहार करें और उनकी त्रुटियों को उदारतापूर्वक सहते-निवाहते और क्रमशः सुधारते चले जायें तो अपनी यह शालीनता कटु कर्कश स्वभाव के परिजनों को भी अपने ढाँचे में ढाल लेगी और बरबस उनका सद्भाव और सहयोग खिंचता चला आयेगा। लाँछना, तिरस्कार, दबाव, उपेक्षा, घृणा और ताड़ना का आतंक भले ही किसी को कुछ समय के लिये चुप करा दे या कुछ करा ले पर उससे आन्तरिक दुर्भावों की और भी अधिक वृद्धि होती है। शरीर से कोई अनुकूल बन भी जाये, किन्तु भीतर से प्रतिकूल बना रहे तो इस विडंबना भरी स्थिति में कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं हो सकता।

पारिवारिक आनन्द के लिए गहन अन्तस्तल से निकलने वाले सद्भाव की आवश्यकता है और हमें केवल वे ही उपलब्ध करा सकते हैं, जो स्वयं उदार सहृदय और सेवा भावनाओं से परिपूर्ण हैं। परिवार में स्वर्गीय वातावरण का सृजन केवल आध्यात्मिकता के आदर्श ही कर सकते हैं। जब यह तथ्य लोगों के अन्तःकरणों में प्रतिष्ठित हो जायगा तो तभी यह आशा की जा सकेगी कि गरीब रहते हुए भी छोटे घर घरौंदों में रहकर व्यक्ति आनन्द और उल्लास भरे दिन बिता सके।

मानसिक शाँति और संतुलन का आधार यों लोगों की समझ में धन की बहुलता और परिस्थितियों की अनुकूलता ही माना जाता है पर वास्तविकता यह है नहीं। यदि ऐसा होता तो धनी−मानी लोगों की आन्तरिक स्थिति संतोष एवं शाँति से भरी−पूरी पाई जाती। किन्तु देखा इससे प्रतिकूल जाता है। सम्पन्न लोग बाहर वालों को ही सुखी दीखते हैं। कोई भीतर से उन्हें देख सके तो पता चलेगा कि वैभव का सदुपयोग कर सकने की बुद्धि न होने के कारण वह सम्पदा उनके लिये अनेक उलझनें, चिन्तायें, कुत्सायें, कुण्ठायें, आशंकायें और विभीषिकायें उत्पन्न करने वाली बनी हुई है। बाहर से मित्र दीखने वाले ही भीतर से उनके शत्रु बने हुए हैं। घात− प्रतिघात ने उनकी मनः−स्थिति को विक्षुब्ध किया हुआ है और अति अशाँति भरा जीवन वे जी रहे हैं। मानसिक शाँति, वैभव पर आधारित नहीं है। वह तो सोचने की सही दिशा पर अवलम्बित है। जिसे विचारों को क्रम से सजाना, संभालना, मोड़ना, बदलना एवं सुधारना आता है, केवल वही सुखी, संतुष्ट और हर्षोल्लास भरा जीवन जी सकता है। यह स्थिति आध्यात्मिक आस्थाएं अपनाने से ही उपलब्ध हो सकती है। विचार करने की कला—अध्यात्म तत्त्व−ज्ञान का प्रधान अंग है। जिसने इसे सीख लिया उसकी शिक्षा पूर्ण हुई, समझी जानी चाहिये। जिसे यह सीख नहीं मिली, उसकी सारी पढ़ाई मानसिक शाँति की दृष्टि से निरर्थक है, भले ही उसे बाजार से बेचकर कुछ पैसे कमाये जाते रहें। अस्तु विचारों का ही परिणाम चिन्ता, निराशा, द्वेष, असन्तोष, घृणा, क्रोध, उद्वेग और विक्षोभ के रूप में देखा जाता है।

जिसकी विचार पद्धति व्यवस्थित है, उसे हर परिस्थिति में आशा, उत्साह, सन्तोष, संतुलन आनन्द, उल्लास और उज्ज्वल भविष्य का प्रकाश परिलक्षित होता रहेगा। गरीबी में भी अमीरों का आनन्द विचारशील लोग उठाते हैं और अविवेकी लोग अमीरी में भी अभाव और उद्वेग की आग में जलते हैं। दृष्टिकोण की परिष्कृति विवेकशीलता और दूरदर्शिता यदि अपने में हो तो व्यक्ति अपने को हर स्थिति में समर्थ, संतुष्ट और सुसम्पन्न अनुभव करता रह सकता है। यह मनःस्थिति आध्यात्मिक आस्थाओं पर ही अवलंबित है, ऐसे आस्थावान देवोपम हर्षोल्लास भरा जीवन जीते हैं। और जहाँ भी रहते हैं, सुख−शाँति के स्वर्गीय वातावरण का सृजन करते हैं।

समाज में व्यापक रूप से फैली हुई कुरीतियों और अनैतिकताओं ने उसे जर्जर, विसंगठित और दीन−दुर्बल बनाकर रख दिया है। ऐसे समाज का हर सदस्य अपने आपको अशाँत एवं असुरक्षित ही अनुभव करेगा, उसे अपने चारों ओर घिरा वातावरण आक्रमणकारी, आशंका भरा और अविश्वस्त ही अनुभव होता रहेगा। समाज में अवाँछनीय परम्परायें चल पड़ें तो उसके सदस्यों का स्तर हर दृष्टि से दयनीय बना रहेगा। अपने समाज में नारी जाति के प्रति, अछूतों के प्रति जो ओछी मान्यता प्रचलित है, उसने आधी जनसंख्या को अविकसित, असमर्थ और असन्तुष्ट बनाकर रख दिया है। आधे शरीर को लकवा मार जाने की तरह नारी तथा अछूतों के प्रति अवाँछनीय दृष्टिकोण रखने के कारण हिन्दू−जाति अपंग और असहाय बनकर रह गई है।

जाति−पाँति और ऊँच−नीच की मान्यताओं ने एक ही जाति को हजारों टुकड़ों में खंड−खंड करके इतना दुर्बल बना दिया है कि विदेशी शक्तियाँ उतनी आसानी से इतनी बड़ी जाति को लंबे समय तक पद दलित बनाये रह सकीं, जैसा कि भेड़ों के झुँड पर ग्वाले के लिए भी सम्भव नहीं होता। विवाह−शादियों के समय होने वाले अपव्यय, मालमाल और धूम−धड़क्के की परम्पराओं ने जन−समाज को दरिद्र और अनैतिक बनाकर रख दिया है। एक दूसरे को ठगने और अनुचित लाभ उठाने की अनैतिक प्रवृत्ति ने सारे समाज का ढाँचा ही लड़खड़ा दिया है। इन दिनों अपनी छाया पर भी विश्वास करना कठिन हो रहा है। ऐसे समाज के सदस्य अपने को असुरक्षित ही अनुभव करेंगे और एक दूसरे से अधिक पतित बनने की प्रेरणा ही ग्रहण करेंगे।

समाज सुधार के लिए यों कतिपय प्रकार के प्रयत्न तथा आन्दोलन चलते रहते हैं और उनकी असफलता और निरर्थकता भी सामने आती रहती है। समाज का बिगाड़ अविवेक और अनौचित्य को अस्वीकार करने के साहस की कमी से उत्पन्न हुआ है। सुधार उस दिन से आरम्भ होगा जिस दिन लोग अनीति और अनौचित्य का प्रतिरोध करने के लिए खड़े हो जायेंगे और यह न देखेंगे कि वह अवांछनीयता कितने दिनों से प्रचलित, किसके द्वारा प्रतिपादित तथा कितनों द्वारा व्यवहृत है। अनौचित्य के विरुद्ध एकाकी लड़के का शौर्य आध्यात्मिक तत्त्व−ज्ञान अपनाने से ही सम्भव है। यह उपलब्धि जिस दिन अपने लोगों में जड़ जमाने लगे, समझना चाहिये कि समाज सुधार का शुभारंभ हो गया।

कहना न होगा कि सामाजिक वातावरण का उसके सदस्यों पर असाधारण प्रभाव पड़ता है। उत्कृष्ट परिस्थितियों में ही उत्कृष्ट व्यक्तियों का निर्माण होता है। और फिर ये उत्कृष्ट व्यक्तित्व ही समर्थ समाज की रचना करते हैं। यदि हमें अपना समाज सुविकसित, सभ्य और समर्थ बनाना हो तो उसकी मान्यताओं और गतिविधियों में आध्यात्मिकता का समुचित समावेश करना होगा। यह समावेश ही हमें अपने अतीत की गौरवपूर्ण स्थिति तक पुनः पहुँचा सकने में समर्थ होगा।

राजनीति में आज की गन्दगी हर किसी को निराश कर देती है। लगता है स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए अतीत में जो महान् बलिदान हुए थे, वे व्यर्थ चले गये। नित नई योजनायें बनती हैं और जनता पर कर और ऋण का भार बढ़ता चला जाता है, जिन लाभों के उसे सब्जबाग दिखाये जाते हैं, वे अन्त तक आकाश कुसुम ही बने रहते हैं। न देश में प्रगति, न विदेश में प्रतिष्ठा। डींगें हाँकने से काम क्या बनना है, खोखलापन कहाँ तक छिपाया जा सकता है। बीस वर्ष से अधिक समय हमें स्वराज्य प्राप्त हुए हो गया। इतने समय में युद्ध जर्जरित जापान, इटली, जर्मनी, ब्रिटेन, फ्राँस, पोलैण्ड, चैकोस्लेविया आदि पुनः पहले जैसी वरन् उससे भी अच्छी स्थिति में पहुँच गये। अफीमची चीन ने अपना काया−कल्प कर लिया। रूस और अमेरिका कहाँ से कहाँ जा पहुँचे। इस प्रगति के युग में बीस वर्ष बहुत होते हैं। सुव्यवस्थित आधार पर बढ़ने वाले कितनी तेजी से बढ़ रहे हैं, यह देखकर जहां हर्ष और आश्चर्य होता है, वहाँ अपनी ओर देखकर दुःख भी होता है कि हमारा नेतृत्व अपने संकीर्ण स्वार्थों में किस बुरी तरह उलझा हुआ है। भाषा, प्रान्त, सम्प्रदाय, आदि के संकीर्ण स्वार्थों को प्रमुखता देने की होड़ लगी हुई। आत्म−दाह, अनशन, राष्ट्रीय सम्पत्ति जलाना, तोड़−फोड़, षडयंत्र गुंडागर्दी, आपा−धापी जैसी निकृष्टतायें ही मानो अपनी चरम सीमा की ओर बढ़ रही हों।

इन परिस्थितियों में राष्ट्र के उज्ज्वल भविष्य का चित्र दिन−दिन धुँधला ही होता जाता है। राजनैतिक दलों में जिस तरह की अनुशासनहीनता और आपा−धापी फैली हुई है, उनसे समूची राजनीति के प्रति ही अनास्था और निराशा उत्पन्न होती है।

तथ्य यह है कि राजनीति को कूटनीति मात्र बना दिया गया है, उसके साथ जिन आदर्शों का समावेश होना चाहिये, कहने−सुनने भर के लिए रह गये हैं। नेता लोग जोड़−तोड़ मिलाकर उल्लू सीधा करने की नीति पर विश्वास करते हैं, आदर्शों के लिए मर मिटने की लगन यदि उनमें रही होती तो आज गाँधी, तिलक, सुभाष, मालवीय जैसे नेताओं का अभाव अनुभव न होता। उत्कृष्ट व्यक्तियों का राज नेतृत्व जन−साधारण में कितना उत्साह उत्पन्न करता है, इसके उदाहरणों से इतिहास का पन्ना−पन्ना भरा पड़ा है। देश की उत्साहजनक राजनैतिक स्थिति के लिए, तब तक हमें प्रतीक्षा ही करनी पड़ेगी, जब तक कि हर राजनेता के व्यक्तित्व को आदर्शवादिता और उत्कृष्टता की कसौटी पर कसे जाने और खरे उतरने के लिए विवश नहीं कर दिया जाता।

आज की राजनैतिक विभिन्नता का यही एक मात्र हल है। घोषणा−पत्रों में भरी हुई डींगों का जंजाल कुछ प्रयोजन सिद्ध न कर सकेगा, काम विशाल दृष्टिकोण वाले ऊँचे व्यक्तियों से चलेगा और यह उत्पादन केवल आध्यात्मिकता के क्षेत्र में ही सम्भव है। यदि हमारी राजनीति धर्म और अध्यात्म के आदर्शों से जुड़ जाय तो धर्मराज्य, रामराज्य, स्वराज्य और सतयुग के दृश्य उत्पन्न होने में देर न लगे।

धर्म तन्त्र का अपना महत्व और स्थान है। उसकी शक्ति राजतन्त्र से कम नहीं वरन् अधिक है। 56 लाख व्यक्ति सरकारी कर्मचारी नहीं हैं पर साधुओं की संख्या 56 लाख से अधिक है। सरकारी कर्मचारियों को बीबी बच्चों की तथा आजीविका की भी चिन्ता रहती है। साधुओं को इन दोनों चिन्ताओं से भी मुक्ति मिली हुई है। यदि वे अपना कर्तव्य निर्वाह और जन−मानस में उत्कृष्टता उत्पन्न करने वाले रचनात्मक कार्यों में जुट पड़े तो देखते−देखते देश का सर्वतोमुखी काया−कल्प हो सकता है। सात लाख गाँवों में यदि रचनात्मक कार्य करने के लिये 56 लाख साधु जुट जायें तो वे हर गाँव के हिस्से में आठ आते हैं। आठ व्यक्तियों की शक्ति बहुत होती है। वे गाँव में व्यायाम, स्वच्छता, शिक्षा, उद्योग, कुरीति उन्मूलन, नीति सदाचार आदि आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये बहुत कुछ कर सकते हैं।

उनके व्यक्तित्व यदि आदर्शवादिता से संपन्न हों तो सारे जन−समाज पर उनका प्रभाव पड़े बिना नहीं रहेगा और यह देश सच्चे अर्थों में धर्मनिष्ठ बनकर अपनी सर्वतोमुखी समर्थता का अनुपम उदाहरण समस्त विश्व के सामने उपस्थित कर सकता है। धर्म के नाम पर प्रचलित मूढ़ता, अन्ध−विश्वास, परावलंबन और संकीर्णता को हटाकर महान् धार्मिक आदर्शों की आस्था यदि जन−मानस में उत्पन्न की जा सके तो घर−घर में प्राचीनकाल की तरह महापुरुष और नर−रत्न उत्पन्न होने लगें। तब धर्म किसी वर्ग विशेष का व्यवसाय न रहकर जन−साधारण का स्तर उठा सकने में समर्थ हो और संसार में धर्म और धार्मिकता की उपयोगिता समझी जाने लगे।

अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में वर्ग और क्षेत्र विशेष के संकीर्ण स्वार्थों के लिए जो संघर्ष, शोषण, घृणा, आरोप, आक्रमण, विद्वेष और अनाचार उत्पन्न किये जाते रहते हैं, उनकी कोई भी चिनगारी कभी भी विश्व−युद्ध की आग लगा सकती है। और चिर−संचित मानव संस्कृति का अन्त हो सकता है। बढ़ते हुए अणु अस्त्रों की विभीषिका किसी दिन मानव जाति की सामूहिक आत्म−हत्या करके अपने अस्तित्व को गँवा बैठने के लिए विवश कर सकती है। अन्तर्राष्ट्रीय शतरंज का खेल इन दिनों जिस स्तर पर खेला जा रहा है, उसका परिणाम मानव−जाति को कभी न उबरने वाले संकट में धकेल देना ही हो सकता है। छुट−पुट उपायों से काम न चलेगा। आयोग और कमीशनों की रिपोर्टें समस्याओं का हल न ढूंढ़ सकेंगी। विश्व−शाँति का आधार आध्यात्मिकता के आदर्श ही हो सकते हैं।

विश्व−बन्धुत्व और विश्व−परिवार के आदर्श को अपनाकर यदि परस्पर सहयोग, सद्भाव और संरक्षण की नीति अपनाई जाय तो सारा नक्शा ही बदल जाय। तब विवादों का हल पंचायत किया करें। विश्व−शासन का संचालन एक ही नीति पर हो और संसार के समस्त राष्ट्र—विश्व−राष्ट्र के जिले, प्रान्त मात्र रहकर काम करें। युद्ध को अनैतिक घोषित कर दिया जाय और अस्त्र−शस्त्र केवल स्थानीय उपद्रवों की शाँति के लिए प्रयुक्त किये जाने के अतिरिक्त किसी देश का, किसी के विरुद्ध प्रयोग हो सके। सम्पदाओं तथा सुविधाओं के अनुरूप कार्य करने तथा आवश्यकतानुसार पाने की व्यवस्था में बंधे रहना पड़े। न कोई शोषण कर सके, न शोषित रह सके। सबको समान अवसर मिले और सबको नीति−नियम में बंधे रहने के लिए बाध्य होना पड़े।

अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में आध्यात्मिकता का समावेश ही विश्व−बन्धुत्व और विश्व परिवार की परिस्थितियाँ उत्पन्न करेगा। तब सेना पर होने वाला व्यय शिक्षा पर किया जायेगा। युद्ध की तैयारियों में लगने वाली धन,जन एवं बुद्धि की शक्ति बेकारों, बीमारों, गरीबी एवं अनीति के निवारण में लगेगी। संसार में इतनी संपदा मौजूद है कि प्रत्येक व्यक्ति को जीवन−यापन कर सकने तथा आनन्द उल्लास के साधन प्राप्त कर सकने की सुविधा मिल सके। गरीबी और अमीरी को सबमें बाँट दिया जाय तो हर एक के हिस्से में पर्याप्त आ जायगा। और उससे संसार का प्रत्येक व्यक्ति सुखी रह सकेगा। जब अनैतिकता एवं असामाजिकता के कारणों का उन्मूलन हो जायगा तो फिर व्यक्ति को अवाँछनीय करने और अनुपयुक्त सोचने का कोई आधार ही शेष न रह जायगा। धन की अनावश्यक मात्रा जब संचय करने का अवसर ही न मिले तो कोई क्यों चोरी, बेईमानी करेगा, ईर्ष्या करने और ललचाकर अमीरी भोगने का जब अवसर ही नहीं है तो वे दुष्प्रवृत्तियाँ जियेंगी कैसे? जब आतंक और अनाचार की हर दिशा से भर्त्सना एवं ताड़ना की प्रतिक्रिया उत्पन्न दीखेगी तो गुण्डागर्दी बढ़ने की कोई गुंजाइश न रहेगी। प्रेम, संयम, सहयोग, समन्वय, सहिष्णुता और समझौता ही जब मानवीय आचार में सर्वत्र घुले दीखेंगे तो वे प्रवृत्तियां जन्म−जात संस्कारों के रूप में हर व्यक्ति को मिलेंगी और विघटनात्मक दिशा में व्यय होने वाली शक्तियाँ रचनात्मक प्रयोजनों में संलग्न होकर इस पृथ्वी पर स्वर्ग का अवतरण करेंगी।

विज्ञान का नियन्त्रण जब विवेक करेगा तो वह बेकारी, गरीबी, आलस्य, विलासिता एवं आतंक उत्पन्न करने वाला न रहेगा। थोड़े से व्यक्तियों को असीम सुविधायें होने का कारण न बनेगा वरन् केवल उपयोगी आविष्कारों तक सीमित रहकर मानवीय प्रगति में सहायक सिद्ध होगा। आज की तरह उसका आतंकवादी एवं विलासी उपयोग जब निषिद्ध घोषित कर दिया जायगा, तब विज्ञान से किसी को विरोध न रहेगा वरन् उसे सुख−शाँति एवं सुविधाओं में सहायता करने वाला उपयोगी अनुचर अनुभव किया जाने लगेगा।

मनुष्य और इतर प्राणियों के साथ आज जो संबंध शोषक, शोषित के बने हुए हैं, उनका कोई कारण न रह जायेगा। माँस की दृष्टि से पशु−पक्षियों का उत्पादन न किया जाय तो उन्हें काटने−मारने की आवश्यकता न रहेगी। शाकाहारी पदार्थ माँसाहार से अधिक पौष्टिक हैं एवं हो सकते हैं। इतर प्राणियों के प्रजनन को सीमित सुविधाओं में रखा जाय तो वे अपने क्षेत्र में अपना अस्तित्व मनुष्य को बिना कुछ हानि पहुँचाये बनाये रह सकेंगे। पशु−पक्षियों जलचरों तथा अन्य जीवों को माँस के लिए चमड़े के लिए तथा श्रम के लिए सताने की आवश्यकता न पड़ेगी। विज्ञान इन आवश्यकताओं को दूसरी तरह और भी अधिक सफलतापूर्वक संपन्न कर देगा। तब मनुष्य जाति तक ही नहीं समस्त प्राणियों तक विस्तृत एक अति विशाल विश्व संस्कृति का निर्माण होगा और अपने गौरवशाली अतीत की तरह हम प्राणि परिवार के साथ अतीव सहयोग, शाँति और आनन्द उल्लासपूर्वक रह सकेंगे। विश्व−शाँति का स्थिर स्वरूप यही हो सकता है।

अध्यात्म एक ऐसा तथ्य है, जिसके ऊपर मानव कल्याण की आधार शिला रखी हुई है। उसे जिस सीमा तक उपेक्षित एवं तिरस्कृत किया जायगा, उतना ही दुःख दारिद्रय बढ़ता जायगा। हमारी संपन्नता, समृद्धि, शाँति, समर्थता और प्रगति का एकमात्र अवलंबन अध्यात्मिक ही है। यदि हमें सुखी और प्रगतिशील होकर जीना है तो स्मरण रखा जाना चाहिए कि दृष्टिकोण में उत्कृष्टता और आदर्शवादिता का समुचित समन्वय नितान्त अनिवार्य है। इसकी विमुखता सर्वनाश को सीधा निमन्त्रण देने के बराबर है।

हम मानवीय आदर्शों को जीवित रखना चाहते हैं, इसलिए इसके प्राण—अध्यात्म को असुर प्रवृत्तियों के आक्रमण से बचाये रखना चाहते हैं। पर देखते हैं कि असुरता ने पूरी शक्ति से मानवीय आदर्शों को समाप्त करने के लिए चढ़ाई की है। आत्म−रक्षा के इस धर्म−युद्ध में लड़ने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं। असुरता के सन्मुख—हथियार डालकर आत्म−समर्पण करने का तात्पर्य आत्म−हत्या के लिए प्रस्तुत होना ही माना जायगा। आदर्श−विहीन मनुष्य तो पशु और पिशाच ही बन सकता है, देवत्व की प्रतीक मनुष्यता की ऐसी दुर्गति होते देखना इन आँखों के रहते सम्भव न हो सकेगा, अस्तु अध्यात्म की जीवन रक्षा के लिए धर्म−युद्ध लड़ना ही स्वीकार करना पड़ा है, सो हम उसे रक्त की अंतिम बूँद और श्वाँस का अंतिम प्रवाह वेग रहने तक लड़ेंगे।

धर्म और अध्यात्म के संरक्षण की जिम्मेदारी ब्राह्मणों की है। इस आड़े वक्त में संस्कृति ने ब्राह्मणत्व को पुकारा है, यदि वह कहीं जीवित हो तो आगे आये। जाति और देश में हम वर्ण का संबंध नहीं जोड़ते। ब्राह्मण हम उन्हें कहते हैं, जिनके मन में आदर्शवादिता के लिए इतना दर्द मौजूद हो कि वह अपनी वासना और तृष्णा से बचा कर शक्तियों का एक अंश अध्यात्म की प्राण रक्षा के लिए लगा सकें। किसी भी अंश में पैदा क्यों न हुआ हो पर जिसमें मानवीय आदर्शों की रक्षा में कुछ त्याग और बलिदान करने का शौर्य एवं साहस उठता है वस्तुतः वही ब्राह्मण कहा जाने का अधिकारी है। उसी वर्ग ने समय समय पर ईश्वरीय प्रयोजन की पूर्ति में महत्वपूर्ण भूमिकायें प्रस्तुत की हैं।

आज फिर वही परीक्षा की घड़ी आ गई, जब अध्यात्म को जीवन रक्षा करने के लिए बड़े से बड़ा त्याग करने की हिम्मत दिखाई जाय और संस्कृति को इस कलंक से बचाया जाय कि उसका संरक्षक ब्राह्मणत्व मर गया था, इसलिए उसकी जीवन−रक्षा न हो सकी।

अखण्ड−ज्योति परिवार के उन परिजनों को जिनमें ब्राह्मणत्व का शौर्य, साहस विद्यमान हो—समाज की पुकार पूरी करने के लिए आमन्त्रित किया जा रहा है। क्या करने से मानवीय सुख−शाँति को स्थिर रख सकने वाला अध्यात्मिक जीवित रखा जा सकता है, इसकी चर्चा क्रमशः अगले अंकों में करेंगे।

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पूज्य आचार्य जी के आगामी कार्यक्रम

माह फरवरी 70 तक के कार्यक्रम पहले अंकों में छापे जा चुके हैं। मार्च 70 से आगे के कार्यक्रम निम्नानुसार है।

श्री अखण्ड−ज्योति गायत्री परिवार शाखा मार्फत, श्री लाभशंकर के. दबे युग−निर्माण सन्देश कार्यालय,

अंजार (कच्छ)

जिला मन्दसौर,

श्री मानसिंह टाक, विजय चौक, किसान बोर्डिंग हाउस के पास जोधपुर (राज.)

श्री गणेशदत्त शर्मा क्वा. न. 15, केबुल ओल्ड टाउन सी. टाइप पी. गोलमुरी, जमशेदपुर—3 जिला सिंहभूमि (बिहार)

श्री सत्यानारायण तिवारी, सहायक अध्यापक मा. वि. धेगाँव, जिला खरगोन (म. प्र.)

1. श्री अखण्ड−ज्योति गायत्री परि. शाखा भक्तिनगर, स्टेशन प्लाट—12 अ. राजकोट—2 (गुजरात)

2. श्री अखण्ड−ज्योति गायत्री परि. शाखा मार्फत श्री प्रभाशंकर आर. जोशी, देवकुँबरबा, मिडिल स्कूल स्ट्रीट, राजकोट−1

श्री अखण्ड−ज्योति गायत्री परिवार शाखा, मार्फत श्री शाँतिलाल अं. दवे, मु. पो. ऊड़, बाया सिरोही (राज.)

जिला मन्दसौर,

श्री झंबर प्लास्टिक इन्डस्ट्रीज, भीलवाड़ा (राज.)

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=कविता======================================================


मन की प्यास


मन की प्यास (Kavita)

प्यास मन पनघट ढूंढ़ रही अन्यत्र कहाँ। तेरे प्रानों का पनघट तेरे आस−पास ॥

तेरी रग−रग में लहराता है वह सागर। बुझ सकती जिससे भव भर की उद्दाम प्यास॥

तन तेरा केवल रक्त चर्म का पिण्ड नहीं। इसमें गुम्फित हैं कोटि कोटि रवि शशि तारे॥

है अनल, अवनि अप्य, अनिल व्योम द्युति, दिग्मंडल। मधु मास अनगिनत छुपे अमित प्यारे-प्यारे।।

ले नव प्रभात की नवल किरण। चलती तेरी हर साँस−साँस। प्यासे मन पनघट ढूंढ़ रहा अन्यत्र कहां। तेरे प्रानों का पनघट तेरे आस पास॥

मत देख चर्म दृग से जग को आकुल-व्याकुल जीवन रथ को। पग−पग पर तेरे लगी पनघटों की कतार॥

मत दृग विस्फारित कर दर्शन कर, संसृति का, सम्प्रति का। अपनी जीवन गतिका, कर छिन्न−छिन्न संकीर्ण साध बनकर उदार।।

क्यों व्यथा युक्त हो भटक रहा खोया-खोया। तेरे हाथों में भाग्य तेरा कर रहा वास॥ प्यासे मन पनघट ढूंढ़ रहा अन्यत्र कहाँ। तेरे प्रानों का पनघट तेरे आस पास॥

हो सजग श्रवन कर आगन्तुक की पद्ध्वनि को।

जाने वाले को रोक रहा क्यों जाने—दे।।

रोने वाले को रोक निडर बाधक बनकर—।

गाने वाले को मुक्त कण्ठ से गाने दे।।

छाने वाला यदि बादल है तो छाने दो।

हर बादल में तु, तुझ में बादल का निवास।।

प्यासे मन पनघट ढूंढ़ रहा अन्यत्र कहाँ।

तेरे प्रानों का पनघट तेरे आस पास।।

-दिवाकर

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*समाप्त*