जिसे जीना आता है, वह सच्चा कलाकार है।

मानव-जीवन एक अमूल्य निधि है। यह बड़े सौभाग्य का सुअवसर है कि हम सृष्टि के किसी भी प्राणी को न मिल सकने योग्य सुअवसर को प्राप्त करें और मानव प्राणी कहलायें।

यह अनुपम अवसर कुत्साओं की कीचड़ और कुण्ठाओं के दलदल में पड़े रहकर नारकीय यातनायें सहते हुए मौत के दिन पूरे कर लेने के लिये नहीं है। वरन् इसलिये है कि हम परमेश्वर की इस पुष्प प्रतिकृति दुनिया के सौंदर्य का रसास्वादन करते हुए अपने को धन्य बनावें और इस तरह जियें, जिसमें पुष्प जैसे मृदुलता, चन्दन जैसी सुगन्ध और दीपक जैसी रोशनी भरी पड़ी हो।

जीवन जीना एक कला है। जिसे ठीक तरह जीना आ गया वह इस धरती का सम्मानित कलाकार है। उपलब्ध साधना-सामग्री का उत्कृष्ट उपयोग करके दिखा सकना-यही तो कौशल कसौटी है। अधिक साधना के अभाव और प्रस्तुत अवरोधी की चर्चा में जो प्रस्तुत उपलब्धियों की महत्ता कम करना चाहता है और यह कहता है कि यदि अमुक साधन मिल सके होते, तो अमुक कर्तृत्व प्रस्तुत करता-उसे आत्म-वञ्चना में निरत ही कहना चाहिए। जीवन-कला से अवगत कलाकार अपने स्वल्प साधनों से ही महान् अभिव्यंजना प्रस्तुत करते रहे हैं। जिसे जीना आ गया उसे सब कुछ आ गया और वह सच्चा शिल्पी है- यह मानना चाहिए।

-अरस्तू


विश्व-मैत्री

“हाँ-हाँ अम्बे! वनराज (शेर) को मैंने स्वयं चन्द्रारिका उपत्यिका की ओर जाते देखा। राजमाता (शेरनी) उनके साथ ही थीं। लगता है उनके नवाप्रसूत शावकों पर किसी रिच्छ ने आक्रमण कर दिया है। मचान बनाते समय मैंने उनका करुण क्रन्दन सुना है। जननी! तू इधर आ, देख यह मेरे परिधान यहाँ रखे हैं। मेरा धनुष और तूणीर मुझे देना- देखूँ तो मेरे मित्रों को कष्ट देने का साहस किसने किया है?” इतना कहते-कहते बालक ने स्वयं उठकर धनुष की प्रत्यञ्चा चढ़ाई और निविड़ वनस्थली में एक ओर विलीन हो गया।

शकुन्तला के लिये यह कोई नई बात नहीं थी। उसे कोई भय या आशंका भी नहीं थी। महाराज दुष्यन्त से परित्यक्त होने के बाद पितामह कण्व ने बहुतेरा प्रयत्न किया कि शकुन्तला आश्रम में रहे, पर शकुन्तला ने अस्वीकार कर दिया था। उन्हें मालूम था कि समाज में परित्यक्त की स्थिति क्या होती है। अपनी ही बात होती तो वह सहन भी कर लेती, उदर में पल रही आत्मा को आत्म-हीनता की परिस्थितियों में डालना आर्य ललनाओं ने कभी भी स्वीकार नहीं किया, शकुन्तला ही अपवाद क्यों बनती। वह जंगल में चली आई। अपना आश्रम अपने हाथों बनाया। भगवती गायत्री की उपासना की थी उन्होंने। इसीलिये प्राणवान् पुत्र ने उनकी कोख से जन्म लिया था।

भरत 11 वर्ष के सुकुमार बालक थे। जब वह 5 वर्ष के थे, शकुन्तला ने उनका उपवीत संस्कार अपने हाथों एकाकी आश्रम में भगवान् यज्ञ की साक्षी में सम्पन्न कराया था। मन्त्र-दीक्षा उन्होंने ही दी थी और उस दिन से भरत उनका पुत्र ही नहीं, शिष्य भी हो गया था। पुत्रों के साथ माताओं की जो ममता होती है, शकुन्तला ने उसे शिष्य के प्रति कठोरता में परिणत कर दिया था। ममता तो अन्तःकरण में प्रकाश भरती थी, पर उनका पुत्र-नहीं उनका शिष्य कहीं निम्न कोटि का नागरिक बनकर न रह जाये इसलिये जितनी कठोरता कर सकती थीं, की थीं। 5 वर्ष से ही उन्होंने गायत्री के महापुरश्चरण प्रारम्भ किये थे। यज्ञ के लिये समिधायें लाने से लेकर हविष्यान्न तैयार करने तक का सारा श्रम भरत को स्वयं करना पड़ता था। माँ उसे पढ़ाती भी थी-उसकी तैयारी और पहले दिये हुए पाठ को कण्ठस्थ करने का काम भी उसे साथ-साथ पूरा करना पड़ता था। इतनी कठोर साधना में ढालने का एकमात्र उद्देश्य यही था भरत साहसी बने, भरत प्राणवान्, प्रज्ञावान् और यशस्वी बने। सो वह सब राजसूय लक्षण उसमें अभी से परिलक्षित होने लगे थे।

दो दिन पूर्व ही उसने व्याघ्र के एक बालक को पकड़कर पटका था, तब शकुन्तला ने उसे न्याय-दर्शन पढ़ाया था-तात! तुम राजपुत्र हो। तुम्हें मनुष्य ही नहीं, पशु-पक्षियों के साथ भी न्याय करना चाहिए। उनकी प्रकृति जो भी हो, पर तुम्हें अकारण दण्ड देने का क्या अधिकार? मेरी तरह इस व्याघ्र शिशु की माता जब उसे पीड़ित अवस्था में देखेगी, तब उसके अवसाद का अभिशाप क्या तुझे पीड़ित नहीं करेगा? खबरदार, फिर कभी भी प्राणी को पीड़ा मत पहुँचाना। तुम्हें प्राणिमात्र के प्रति रक्षा, क्षमा और न्याय की भावना रखनी चाहिए।

आज माँ की उस शिक्षा की कसौटी थी। इसलिये शकुन्तला उसे रोक भी नहीं सकती थी। बालक भरत उधर ही बढ़ते गये, अब भी जिधर से सिंह-शावकों का करुण क्रन्दन बहता आ रहा था। सघन लताओं और वृक्षों को चीरते हुए राजकुमार भरत वहाँ जा पहुँचे, जहाँ से आवाज आ रही थी। सचमुच 5 भालुओं ने दो नन्हें सिंह-शावकों को घेर रखा था। शेर के आने से पहले ही वे उन्हें झपटकर खा जाना चाहते थे। प्रतिरोध की तो उन्होंने कल्पना भी नहीं की थी। उनमें से एक भालू झपटा और जैसे ही उसने तलवार की धार के समान तीक्ष्ण पञ्जों से बच्चों पर प्रहार करना चाहा कि गिद्ध-पंखों से पुच्छावेष्ठित तीर सनसनाता हुआ आया और पास ही पड़े शिलाखण्ड को तोड़ता हुआ गहराई तक भीतर प्रविष्ट हो गया।

भालू चौंक पड़े। पत्थर को फोड़कर तीर का उसमें प्रवेश कर जाना उनके लिये भारी आश्चर्य था। वे आक्रमण करना भूल गये। सब पीछे मुड़ गये। अब भरत कुमार को दस और चार चौदह आंखें निहार रही थीं। 10 क्रूर दृष्टि से और 4 करुणा और दया की दृष्टि से।

शिकार के समय वन्य जीव-जन्तुओं का रक्त वैसे ही गर्म हो उठता है, फिर प्रतिरोध से तो उनके क्रोध की सीमा ही टूट जाती है। विलम्ब किये बिना पाँचों भालू भरत पर टूट पड़े। आह्लाद चित्त भरत एकबार मुस्कराये, माँ की बात यादकर- ‘वत्स! दण्ड तो अपराधी को ही दिया जा सकता है। अपराधी को दण्ड न देना तो पाप भी है, पर अकारण किसी को नहीं सताना चाहिए।’

भरत ने पूर्व ही चेतावनी दी थी, पर भालुओं पर उसका कुछ प्रभाव न पड़ा तो अब दण्ड देना ही उचित था। तड़ित गति से भरत का हाथ खंग पर गया और उसने एक ही प्रहार में दो भालुओं के शीश धड़ से उड़ा दिये। शेष तीन में उसे वीर बालक का सामना करने की हिम्मत न रही। वे अपना-सा मुँह लेकर जंगल में एक ओर भाग गये।

दोनों सिंह-शावकों ने आगे बढ़कर महाराज कुमार का विनीत स्वागत किया। वह उनके चरणों पर लोट गये। भरत ने दोनों बच्चों को दोनों हाथों से उठाकर छाती से लगा लिया और कहा- ‘बच्चों चलो, आज तुम्हें अपनी माँ- अपने गुरु के दर्शन करायें।’ यह कह जैसे ही वह पीछे मुड़े, उन्होंने देखा-पीछे सिंह-सिंहनी दोनों ही कृतज्ञ मुद्रा में खड़े तीनों बालकों की क्रीड़ा ध्यान से देख रहे हैं। देखने से पता चलता था कि वे काफी समय पूर्व ही आ गये थे। उन्होंने भरत को अपने बालकों की रक्षा करते देखा था। उनकी आँखें अपनी कृतज्ञता व्यक्त करने के लिये झर-झर कर रही थीं। उन्होंने कोई विरोध नहीं किया। अपने दोनों छोनों को वनराज ने भरतकुमार के साथ सुखपूर्वक खेलने जाने दिया।

माँ ने अपने पुत्र के साहस और कर्त्तव्य-निष्ठा के लिये भगवान् को धन्यवाद दिया और भरत ने अपनी माँ को, जिनकी कृपा से आज उसे खेलने के लिए दो मित्र मिल गये थे।


समर्थ गुरु की सहनशीलता

समर्थ गुरु की सहनशीलता-

समर्थ गुरु रामदास को सुविधापूर्वक जितनी भिक्षा मिल जाती, उतने में ही काम चला लेते थे। एक दिन प्रातःकाल उन्होंने भिक्षा के लिये एक घर का द्वार खटखटाया तो उन्होंने देखा कि गृहस्वामिनी किसी कारणवश आग-बबूला हो रही हैं और अनाप-शनाप बक रही हैं। उस समय वह अपना चौका पोत रही थी। उसने समर्थ गुरु की आवाज सुनी, तो उसे और गुस्सा आ गया कि सुबह-सुबह कौन भिखारी आ गया। वह उठी, दरवाजा खोला और चौका लगाने का वह पोतना उनके मुँह पर दे मारा।

समर्थ गुरु तनिक भी रुष्ट न हुए। उन्होंने उस चौका लगाने वाले गन्दे कपड़े को अपने कमण्डल में रख लिया और नदी पर स्नान के लिये चले गये, वहाँ उन्होंने उस कपड़े को खूब धोया। अब वह साफ दिखाई देने लगा था। धूप में सुखा लिया, फिर स्नान करके अपनी कुटिया पर लौट आये।

शाम को भगवान की आरती के लिये उसी पोतने की बत्तियाँ बनाई। आरती करते समय भगवान से प्रार्थना की कि जिस प्रकार यह बत्ती प्रकाश दे रही है, उसी प्रकार उस महिला का हृदय भी प्रकाशवान हो।


प्रेम-प्रतिरोपण से पत्थर भी परमात्मा

प्रकृति में सर्वत्र एक आकर्षण का नियम (ला आफ ग्रेविटेशन) काम करता है। नियम यह है कि दो वस्तुओं की दूरी जितनी अधिक है, आकर्षण उतना ही कम होगा। यह दूरी जितनी कम होती चली जाती है, उतना ही आकर्षण बढ़ता चला जाता है।

मनुष्यों-मनुष्यों के बीच भी प्रकृति का यही नियम काम करता हम स्पष्ट देख सकते हैं। पड़ोसी के दुःख के साथी हम होते अवश्य हैं, समय आने पर उसकी सेवा और सहायता भी करते हैं, पर मूल में एक स्वार्थ भरा रहता है कि इसके साथ ऐसा इसलिए कर रहे हैं कि कहीं हमें भी बदले का सहयोग मिलेगा। विनियम वाले इस व्यवहार में आकर्षण और प्रेम होता तो है पर अत्यल्प, न के बराबर।

अपने चाचा, मामा, भाई के प्रति कर्त्तव्य-पालन में अपेक्षाकृत अधिक प्रेम और आकर्षण अनुभव करते हैं, किन्तु जो प्रेम अपने पुत्र या पुत्री के लिये हो सकता है, वह इनमें से किसी के साथ नहीं था। इस प्रेम की घनिष्ठता का कारण था दूरी का अभाव। हमारी इस मान्यता और सत्यता में कोई अन्तर नहीं था कि यह पुत्र तो मेरा प्राण है, मेरे शरीर से निकली हुई सत्ता है। इसके लिये जब आवश्यकता पड़ती है तो हम प्रकृति के नियमों का भी उल्लंघन कर डालते हैं। साधारणतया दिन भर की थकावट के बाद रात में नींद आये बिना रहती नहीं, किन्तु बच्चा बीमार हो, अस्पताल में हो तो एक-दो रात तो क्या कई-कई रात जाग सकते हैं। ऐसा किसी दूसरे के साथ करने में कष्टप्रद लगता है, पर प्रेम में वही दुःख सुख की तरह अनुभव होने लगता है।

इस तरह का सभी प्रेम ‘तस्वैवाहं’-मैं उसी का हूँ- की सीमा के अन्दर आता है। उसमें प्रेम का, आकर्षण का भाव तो है, पर वह पर्दे में है। उसमें अपनापन, अपना स्वार्थ जुड़ा हुआ प्रतीत होता है।

दूसरी प्रकार का प्रेम ‘तवैवाहं’-मैं तेरा ही हूँ-परमात्मा की अमुख उपस्थिति का बोध कराता है। हम अनुभव करते हैं कि हम अपने आपमें अपूर्ण हैं। इस अपूर्णता को जब तक भरा नहीं जाता, तब तक सन्तोष नहीं होता, शान्ति नहीं मिलती, प्रसन्नता नहीं होती। संसार में मनुष्य स्वार्थ ही स्वार्थ चाहकर भी जिन्दा नहीं रह सकता। उसे अपने स्वार्थ को जब कहीं प्रतिरोपित होने का अवसर मिलता है, तभी उसे कुछ सन्तोष होता है- ऐसा प्रेम अपनी पत्नी के प्रति हो सकता है। पत्नी से हमारा कोई रुधिरगत सम्बन्ध नहीं होता। एक व्यक्ति पूर्व से चलकर आता है, दूसरा पश्चिम से आकर मिलता है, दोनों एक दूसरे को जानते भी बहुत कम हैं किन्तु समर्पण के भाव ने साँसारिक दूरी को इतना कम कर दिया है कि जोड़े में से एक दूसरे को देखे बिना रह ही नहीं सकता। मिलन के प्रारम्भिक दिनों में एक की-दो-एक दिन की-बिछुड़न भी दूसरे के लिये कई वर्षों के समान असह्य हो जाती है। समर्पण प्रेम की इस भावना में शक्ति-सुख का स्थान अधिक तो है पर उसमें भी परमात्मा सम्मुख ही था, अपने भीतर मिल नहीं सका। ऐसा कोई नियम नहीं था कि चाहते हुए भी स्त्री-पुरुष दोनों एकाकार हो जाते- दो न रहकर एक ही शरीर में समा जाते। काम-वासना उसी की भटक है, जिसमें मनुष्य पाता तो कुछ है नहीं, अपना आकर्षण और कम कर लेता है।

प्रेम के विकास की तब एक तीसरी और अन्तिम भूमिका जो पत्थर को भी भगवान् बना देती है वह है ‘त्वमेवाहं- मैं तो तू ही हूँ।’

मैं और मेरे के घेरे में संसार में स्थूलता का एक परदा जो चढ़ा हुआ है, उसी के कारण चेतना के स्वतन्त्र अस्तित्व का आभास नहीं हो पा रहा था। “राम” में भी वही प्रवृत्तियाँ, वही आकाँक्षायें, वही चेतना भरी पड़ी है, जो “श्याम” में हैं। नैसर्गिक विकास की क्रिया दोनों में एक-सी ही है, पर राम को अपने काम से अवकाश नहीं, इसलिये उसे श्याम में कोई रुचि नहीं है। किन्तु जब वह श्याम को थोड़ा सन्देह मिटाकर देखता है, तो पाता है कि अरे! इसमें तो सब कुछ वही, वैसा ही है, जैसा मुझमें है।

राम और श्याम तो दूर के रहे, चेतना तो सृष्टि के कण-कण में समाविष्ट है। तीनों अवस्थाओं में हमारा प्रेम इस चेतना से ही रहा है। चेतना के प्रति-दान से ही हमें सुख मिलता रहा है। शारीरिक सुख का विनिमय तो क्षणिकमात्र और अज्ञानता के कारण होता है। वस्तुतः भूख और प्यास तो चेतना की थी, जिसे अपनी अपूर्णता सहन नहीं हो रही थी।

तब फिर उस चेतना की पूर्णता कहाँ हो? साकार में या निराकार में? यह प्रश्न सनातन काल से चलता और उलझता रहा है। मनीषियों, आचार्य और तत्वदर्शियों ने समझाया भी कि साकार और निराकार में कोई अन्तर नहीं है सृष्टि में जो कुछ भी दिखाई देता है, उस सबमें परमेश्वर ही भरा पड़ा है। तू तो अपना स्वार्थ, अपनी खुदी अपना पर्दा हटाकर देख तुझे सबमें भगवान ही दिखाई देगा। अपनी भावनाओं में जो सबके प्रति ‘तू’-ही-‘तू’ के प्रति प्रेम समर्पित कर देता है, उसे तो पत्थर में भी परमात्मा के दर्शन होने लगते हैं।

प्रेम जो लौकिक अर्थों में था, उसमें भी भावनाओं के समर्पण के अतिरिक्त कुछ भी तो नहीं था। भावनायें नहीं रह जाती तो अपनी स्त्री, पुत्री और भाई-बहनों के लिए भी तो कोई प्रेम नहीं रह जाता। पञ्च भौतिक पदार्थों के प्रति प्रेम भावनाओं का प्रतिरोपण मात्र है। भावनायें आवेश हैं, विद्युतीय चुम्बक हैं। उन्हें तो जहाँ भी प्रति-रोपित कर दिया जाता है, वहीं प्रेम का सुख मिलने लगता है।

पत्थर भी तो पञ्च भौतिक पदार्थ ही है। आने वाली ध्वनि को प्रतिध्वनित करने का, रगड़कर अग्नि पैदा करने का, उनके सूक्ष्म कणों में जल और आकाश का अंश होने का प्रमाण तो आज वैज्ञानिक भी दे रहे हैं। कोई भी जड़-से-जड़ वस्तु में भी चेतना का नियम सर्वत्र भावनाओं की उपस्थिति का प्रमाण ही तो है। तब फिर क्या पत्थर की मूर्ति हमें बदले में कुछ नहीं दे सकती। यदि हमारे अन्तः करण का प्रेम अपने स्वार्थ की सीमा को तोड़कर प्रत्येक वस्तु में ‘तू’-ही-‘तू’ के दर्शन करने लगे तो इन पत्थर की गढ़ी हुई मूर्तियों में ही भगवान् के दर्शन किये जा सकते हैं।

यह भगवान् कोई अशक्त और अभावग्रस्त भगवान् नहीं होगा-वरन् मीरा के गिरधर गोपाल की तरह समुद्र में से डूबने से बचाने वाला, विष का प्याला आप अपने कंठ में धारण कर लेने वाला, पायलों के साथ अपनी पायलों की संगति मिलाने वाला हो सकता है। प्रहलाद के नृसिंह की तरह वह आधा शरीर मनुष्य और आधा पशु का धारण कर रक्षा के लिये उपस्थिति हो सकता है। कविवर तुलसी-दास ने उन भावनाओं की शक्ति को निःसीम बताते हुए लिखा है-

ईश्वर की भक्ति प्रेमपूर्ण भावनाओं का पारमार्थिक विकास मात्र है। उसे हम सृष्टि में फैली विराट् चेतना के प्रति जागृत कर लें तो हम पत्थर के भगवान् से भी सब कुछ प्राप्त कर सकते हैं, जो कोई भी देहधारी भगवान् से भी सब कुछ प्राप्त कर सकते हैं, जो कोई भी देहधारी भगवान् प्रकट होकर या निराकार ईश्वर भक्ति से द्रवित होकर दे सकता है।


बिन्दु में सिन्धु समाया

कलकत्ते में एक ऐसा वट-वृक्ष (फाइकस बेंगालेन्सिज) पाया जाता है, जिसकी ऊपरी छतरी का व्यास 2000 गज से भी अधिक है। बरगद की डालियों से भी जड़ें (बरोहे) निकल-निकल कर पृथ्वी में धँस जाती हैं और ऊपरी फैलाव को साधे रहते हैं। इस वट-वृक्ष में भी हजारों जड़ें निकल कर जमीन में धँस गई हैं, उससे वृक्ष की सुरक्षा, शक्ति और शोभा और भी अधिक बढ़ गई है। हजारों व्यक्ति, हजारों पक्षी उसकी छाया में आश्रय और आजीविका प्राप्त करते रहते हैं। वृक्ष का इतना भारी घेरा एक प्रकार का आश्चर्य ही है।

उससे भी बढ़कर आश्चर्य यह है कि इतना विशाल वट-वृक्ष जिस बीज से उगा है, उसका व्यास एक सेन्टीमीटर से अधिक न रहा होगा। वनस्पति विज्ञान (बाँटनी) के जानने वालों को पता होगा कि वृक्ष का सम्पूर्ण विकास जिस धरातल पर होता है, उसे बीज कहते हैं। बीज में ही वह सारी सम्भावनायें छिपी पड़ी रहती हैं, जो आगे चलकर एक दीर्घाकार वृक्ष के रूप में दिखाई देने लगती हैं। बीज की बाह्य त्वचा (इपिडर्मिस) के भीतर अनेक परतें होती हैं, उन्हें वल्कुट (कार्टेम्स) पतली भित्तियों वाले कोषों (पैरेन्शाइटमस सेल्स) से बने होते हैं। बीज को आड़ा काटा जाय तो वह कोष गोल दिखाई देते हैं। वल्कुट की अन्तिम परत को अन्तस् त्वचा (इन्डोरमिस) कहते हैं। इसके कोष (सेल्स) आयताकार (रेक्टैन्गुलर) होते हैं। उनकी आड़ी दीवारों पर एक विशेष प्रकार की मोटाई (थिकिन्ग्स) होती हैं। पतले भित्तियों वाले कोषों की एक परत अन्तस् त्वचा (इन्डोरमिस) के भीतर स्थित होती है, इसे परिरम्भ (पेरीसाइकिल) कहते हैं। जड़ की शाखायें इसी भाग से निकलती हैं। यहीं से कुछ कोष निकल कर बढ़ने के लिये स्थान बना लेते हैं और कार्टेक्स को काटते हुए जड़ों के रूप में फूट पड़ते हैं।

जिस क्रिया में संवहन ऊतक (कैरीइंग टिसूज) का काम जाइलभ और फ्लोएम नाम के तत्व करते हैं। ये दोनों बीज के मज्जा (पिथ) को घेरे रहते हैं। यह मज्जा (पिथ) की प्रेरणा ही ऊपर तने और नीचे जड़ के रूप में फूटती है। जड़ के इस क्रियाशील भाग को सूक्ष्मदर्शी से देखें तो बिना बढ़े हुए वृक्ष का आकार-प्रकार दिखाई दे जाता है। एक विलक्षण संसार उसमें दिखाई दे जाता है। यह आश्चर्य ही है कि मज्जा (पिथ) का सर्वेक्षण करके यह बताया जा सकता है कि क्षेत्र की जड़े इतनी होंगी, इतनी मोटाई लेकर इस गहराई में अमुक-अमुक दिशा को बढ़ेंगी। इसी प्रकार तना कितना मोटा, कितनी शाखों वाला किधर को मुड़ा डालियों और कितने पत्तों वाला होगा। इस सबका पूर्णाभास इस हिस्से के सूक्ष्म दर्शन द्वारा किया जा सकता है। प्रश्न उन पर्तों और कोषों का नहीं, जो विकास की चेष्टायें करती हैं। सूझने वाली बात वह अन्तर्चेतना है, जो आत्म-प्रेरणा से विकसित होती और अपने आपको बढ़ा कर एक भरे पूरे वृक्ष के रूप में परिणत कर देती है। एक पूरे वृक्ष का नक्शा एक बीज में भरा है, यह पढ़कर लोग आश्चर्य ही करेंगे।

इतना विशाल वट वृक्ष जिस बीज से अंकुरित, पुष्पित, पल्लवित और बड़ा हुआ वह आधे सेन्टीमीटर व्यास से भी छोटा घटक रहा होगा। उस बीज की चेतना ने जब विस्तार करना प्रारम्भ किया तो तना, तने से डालें, डालों से पत्ते, फल, फूल, जड़ें आदि बढ़ते चले गये।

मनुष्य-शरीर की प्रवृत्ति और विकास-प्रक्रिया भी ठीक ऐसी ही है। वीर्य के एक छोटे-से-छोटे कोष (स्पर्म) को स्त्री के प्रजनन कोष ने धारण किया था। पीछे यही कोष जिसमें मनुष्य स्त्री या पुरुष के शरीर की सारी सम्भावनायें-आकृति-प्रकृति, रंग-रूप, ऊँचाई, नाक-नक्शा आदि सब कुछ विद्यमान था- उसने जब बढ़ना प्रारम्भ किया तो वह अन्तरिक्ष की अनन्त शक्तियों को खींच-खींचकर शरीर रूप में विकसित होता चला गया। एक सेन्टीमीटर स्थान में कई अरब कोष आ सकते थे, जो उसी सूक्ष्मतम कोष से 5 फुट 6 इंच का मोटा शरीर दिखाई देने लगता है।

गर्भ के भीतर रहने तक तो यह लघुता याद रहती है किन्तु बाहर की हवा लगते ही जीवन का मूलभूत आधार भूल जाता है और मनुष्य अपने आपको स्थूल पदार्थों का पिण्ड मात्र मानकर मनुष्य जीवन जैसी बहुमूल्य ईश्वरीय विरासत को गवाँ बैठता है। हम यदि छोटे-छोटे अणु में भी जीवन की अनुभूति कर सके होते, तो जन-चेतना के प्रति हमारा दृष्टिकोण आज की अपेक्षा कुछ भिन्न ही होता। भारतीय आचार्यों ने इस गहराई को अनुभव किया था, इसलिये उनका अधिकाँश समय, ध्यान, धारणा, जप, तप, प्राणायाम, प्रत्याहार आदि साधनाओं में लगा था। उन्होंने प्रकाश के एक परमाणु में अपनी चेतना स्थिर कर संसार के रहस्यों को उसी तरह करतल गत किया था, जिस प्रकार मज्जा (पित्त) में ध्यान जमाने से वृक्ष की भूत-भविष्य की कल्पनायें साकार हो उठती हैं।

शरीर जिन कोषों से बनता है, उसमें चेतन परमाणु ही नहीं होते, वरन् दृश्य-जगत् में दिखाई देने वाली प्रकृति का भी उसमें विकास होता है। इससे मनुष्य-शरीर की क्षमता और मूल्य और भी बढ़ गया है। द्रव, गैस और ठोस-जल, ऑक्सीजन, नाइट्रोजन, कार्बन, सिल्वर, सोना, लोहा, फास्फोरस आदि-जो कुछ भी पृथ्वी में है और जो कुछ पृथ्वी में नहीं है। अन्य ग्रह नक्षत्रों में है, वह सब भी-स्थूल और सूक्ष्म रूप से शरीर में हैं। जिस तरह वृक्ष में कहीं तने, कहीं पत्ते, कहीं फल एक व्यापक विस्तार था, शरीर के विभिन्न क्षेत्रों में उसी प्रकार विभिन्न लोक और लोकों की शक्तियाँ विद्यमान देखकर ही शास्त्रकार ने कहा था- “यत्ब्रह्माँडे तत्पिंडे” ब्रह्माँड की सम्पूर्ण शक्तियाँ मनुष्य शरीर में विद्यमान हैं। सूर्य, चन्द्रमा, बुध, बृहस्पति, उत्तरायण, दक्षिणायन मार्ग, पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश, वायु, विद्युत, चुम्बकत्व, गुरुत्वाकर्षण यह सब शरीर में है। यजुर्वेद का कथन है-

शीर्ष्णो द्यौः समावर्ततः, यस्य वातः प्राणाप्राणौ, नाभ्याऽसीदन्तरिक्षं दिशः श्रोत्रं पद्भयाँ भूमिः॥

अर्थात् द्यौ सिर, वायु ही प्राण, अन्तरिक्ष नाभि, दिशा कान और भूमि पैर हैं- इस तरह यह विराट् जगत् मेरे भीतर समाया हुआ है।

ईसाई धर्म की पुस्तक बाइबल की व्याख्या करते हुए पैरासेल्सस लिखते हैं कि- “मनुष्य-शरीर को इच्छाओं का सजा हुआ वाद्ययन्त्र कहना चाहिए, जिसमें कि आत्मा की झंकार सबसे मधुर सुनाई देती है। इच्छायें आकाश में स्थित नक्षत्रों (देव-शक्तियों) में बीज-कोष ही हैं। यह बीज शरीर के कुछ महत्वपूर्ण स्थानों में रहते हैं। उनकी आणविक संरचना और उन नक्षत्रों की आणविक संरचना में विलक्षण साम्य होता है।”

पैरासेल्सस आगे लिखते हैं- “शरीर की रचना (नक्षत्र गति) के संरक्षण और निर्देश में होती है। उत्पत्ति के तीसरे दिन चन्द्रमा से बुद्धि और तुला ने व्यक्तित्व को प्रभावित किया। शरीर में तन्मात्रायें दूसरे दिन ही आ गई थीं, जिनकी उत्पत्ति सूर्य-शक्ति से हुई। हृदय पर लियो (चन्द्रमा) का अधिकार होता है और वह आत्मिक शान्ति और सौम्यता प्रदान करता है। शरीर के दूसरे सूक्ष्म अंगों को सेजीटेरियस, इगो प्रभावित करते हैं।” मनुष्य-शरीर में विद्यमान यही चेतना-कोष ही जीवन की गतिविधियों का निर्माण करते हैं। इस तरह बाइबिल और बाइबिल के पण्डित भी इस तथ्य से परिचित थे कि शरीर का स्थूल भाग जहाँ पार्थिव अणुओं से बना है वहाँ उसकी चेतना का विस्तृत ढाँचा ब्रह्माँड की शक्तियों और नक्षत्रों से बना है, उसका स्वरूप चाहे कितना ही सूक्ष्म क्यों न हो।

योग ग्रन्थों में वर्णित चमत्कार शरीर की इन सूक्ष्म और अलौकिक शक्तियों का विकास मात्र है। सब कुछ हमारे शरीर में है, यदि हम उसे खोजने का प्रयत्न करें तो बाह्य सम्पदायें न होने पर भी अतुल शक्तियों के स्वामी बन सकते हैं। बहुमुखी शक्तियों के स्रोत हमारे भीतर भरे पड़े हैं, उनका विकास जीवन की अनेक धाराओं में कलकत्ते के वट-वृक्ष की भाँति किया जा सकता है, उससे अपना ही नहीं, हजारों औरों को भी आश्रय, संरक्षण और जीवन प्रदान किया जा सकता है।


मनुष्य-अनन्त शक्तियों का भाण्डागार

श्री रामकृष्ण परमहंस दक्षिणेश्वर में थे। एक दिन अनेक भक्तों के बीच उनका प्रवचन चल रहा था। तभी एक व्यक्ति उनके दर्शनों के लिये आया। रामकृष्ण परमहंस उसे ऐसे डाँटने लगे जैसे उसे वर्षों से जानते हों। कहने लगे- “तू अपनी धर्मपत्नी को पीटकर आया है। जा पहले अपनी साध्वी पत्नी से क्षमा माँग, फिर यहाँ सत्संग में आना।”

उस व्यक्ति ने अपनी भूल स्वीकार की और क्षमा माँगने लौट गया। उपस्थित लोग आश्चर्यचकित रह गये कि रामकृष्ण परमहंस ने बिना पूछे यह कैसे जान लिया कि उस व्यक्ति ने अपनी स्त्री को पीटा। वे अपना आश्चर्य रोक न सके, तब परमहंस ने बताया-मन की सामर्थ्य बहुत अधिक है। वह सेकिण्ड के भी हजारवें हिस्से में कहीं भी जाकर सब कुछ गुप्त रूप से देख-सुन आता है, यदि हम उसे अपने वश में किये हों।

गुरु गोरखनाथ से एक कापालिक बहुत चिढ़ा हुआ था। एक दिन आमना-सामना हो गया। कापालिक के हाथ के कुल्हाड़ी थी, उसे ही लेकर वह तेजी से गोरखनाथ को मारने दौड़ा। पर अभी कुल दस कदम ही चला था कि वह जैसे-का-तैसा खड़ा रह गया। कुल्हाड़ी वाला हाथ ऊपर और दूसरा पेट में लगाकर हाय-हाय चिल्लाने लगा। वह इस स्थिति में भी नहीं था कि इधर-उधर हिल-डुल भी सके।

शिष्यों ने गोरखनाथ से पूछा-महाराज, यह कैसे हो गया तो उन्होंने बताया-निग्रहीत मन बैताल की तरह शक्तिशाली और आज्ञाकारी होता है। यह तो क्या, ऐसे सैकड़ों कापालिकों को मारण क्रिया के द्वारा एक क्षण में मार गिराया जा सकता है।

ब्रह्मचारी व्यास देव ने आत्म-विज्ञान पुस्तक की भूमिका में बताया है कि उन्हें इस विज्ञान का लाभ कैसे हुआ। उस प्रस्तावना में उन्हें एक घटना दी है, जो मन की ऐसी ही शक्ति का परिचय देती है। वह लिखते हैं- “मैं उन साधु के पास गया। मुझे क्षुधा सता रही थी। मैंने कहा-भगवन्, कुछ खाने को हो तो दो, भूख के कारण व्याकुलता बढ़ रही है। साधु ने पूछा- क्या खायेगा? आज तू जो भी, जहाँ की भी वस्तु चाहेगा हम तुझे खिलायेंगे। मुझे उस समय देहली की चाँदनी चौक की जलेबियों की याद आ गई। मैंने वही इच्छा प्रकट कर दी। साधु गुफा के अन्दर गये और एक बर्तन में कुछ ढककर ले आये। मैंने देखा- बिलकुल गर्म जलेबियाँ, स्वाद और बनावट बिलकुल वैसी ही जैसी देहली में कभी खाई थीं। गुफा में जाकर देखा, वहाँ तो एक फूटा बर्तन तक न था। मैंने पूछा- भगवन्! यह जलेबियाँ यहाँ कैसे आई? तो उन्होंने हँसकर कहा- योगाभ्यास से वश में किये हुए मन में वह शक्ति आ जाती है कि आकाश में भरी हुई शक्ति का उपयोग एक क्षण में कर ले और भारी-से-भारी पदार्थ का उलट-फेर कर दे।”

एक बार स्वामी विवेकानन्द हैदराबाद गये। उन्हें किसी ने एक ब्राह्मण ताँत्रिक के बारे में बताया कि वह किसी भी समय कोई भी वस्तु कितनी ही मात्रा में चमत्कारिक ढंग से प्रस्तुत कर सकता है। ताँत्रिक का कथन है कि मन में ऐसी शक्ति है कि वह संसार के किसी भी भाग के किसी भी पदार्थ को क्षण भर में आकर्षित करके वहाँ उपस्थित कर सकती है।

स्वामी विवेकानन्द ने इस प्रसंग का विवरण देते हुए लिखा है- कि मैं स्वयं उस ब्राह्मण से मिलने गया। ब्राह्मण का लड़का बीमार था। जब मैंने उसे यह प्रयोग दिखाने को कहा तो उसने कहा-पहले आप मेरे पुत्र के सिर पर हाथ रखें, जिससे उसका बुखार उतर जाये तो मैं भी आपको यह चमत्कार दिखा सकता हूँ। उसे किसी ने बताया था कि महापुरुष हाथ रखकर ही किसी भी बीमार को अच्छा कर सकते हैं। इसलिये उसने मुझसे ऐसा आग्रह किया। मैंने उसकी शर्त मान ली।

इसके बाद वह एक कम्बल ओढ़कर बैठ गया। हमने उसका कम्बल अच्छी तरह देखा। उसमें कुछ भी नहीं था। इसके बाद जो भी सेवा, फल माँगा, उसने भीतर से निकालकर दे दिये। ऐसी-ऐसी वस्तुयें माँगी, जो उस प्राँत में होती भी नहीं, वह भी, इतनी मात्रा में कि हममें से कई के पेट भर गये, उसने निकालकर दिये। वह वस्तुयें खाने में वैसी ही स्वादिष्ट भी थीं। एक बार हमारे आग्रह पर उसने गुलाब के ताजे फूल, जिन पर ओस की बूँदें पड़ी हुई थीं, इतनी मात्रा में कम्बल से निकाल दीं जितनी कम्बल में बँध भी नहीं सकती थीं। हम सब यह देखकर आश्चर्यचकित रह गये।

यह घटनायें बताती हैं कि मनुष्य का सम्बन्ध शरीर की किसी अज्ञात सत्ता से है अवश्य, जो क्षणभर में ही करोड़ों मील दूर की बात जान भी सकती है और कोई वस्तुयें उन सुदूर स्थानों से ला भी सकती है। अणिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकम्प, ईशत्व, वशित्व आदि सिद्धियाँ कपोल-कल्पित नहीं- वह आधारपूर्ण हैं और विज्ञान भी अब इन सम्भावनाओं को स्वीकार करने लगा है।

अभी कुछ दिन पूर्व अपोलो 11 के अन्तरिक्ष यात्री आर्मस्ट्राँग और एडविन ऑल्ड्रिन चन्द्रमा-तल पर उतरे थे। वहाँ उन्होंने अनेक यन्त्रों के साथ ‘लेजर’ नामक एक यन्त्र भी स्थापित किया था। पाठक बहुत कम जानते होंगे कि यह ‘लेजर’ यन्त्र ही है जो भारतीय योग शास्त्रों में वर्णित सिद्धियों की सम्भावना को सत्य प्रमाणित करने लगा है। इस यन्त्र का जिस दिन पूर्ण ज्ञान हो जायेगा, उस दिन ऊपर दी हुई घटनाओं की तरह वैज्ञानिक भी कहीं भी बैठे-बैठे खेल की तरह चाहे किसी के मन की बात जान लेंगे। एक क्षण में चन्द्रमा, मंगल, शुक्र, शनि, यूरेनस, नेपच्यून आदि किसी भी ग्रह की बात जान लिया करेंगे। यही नहीं, भारी-से-भारी बोझ की वस्तुएँ कहीं-से-कहीं पहुँचा दी जाया करेंगी और लोगों को उनका पता भी न चला करेगा। ‘लेजर’ इस युग का जीता-जागता तिलस्म ही है।

चन्द्रमा पर यह इसलिये लगाया गया हैं कि वहाँ होने वाली किसी भी हलचल को सेकेण्डों में धरती तक पहुँचा देता है। यहाँ के वैज्ञानिक क्षणभर में मालूम कर लेते हैं कि चन्द्रमा में क्या हो रहा है? सन् 1962 में आविष्कृत इस यन्त्र का पहला प्रयोग 9 मई को रात को 8 बजकर 55 सेकेण्ड पर लेंकिसग्टन (बोस्टन के पास) में किया गया। अनेक वैज्ञानिक और सम्भ्राँत व्यक्ति वहाँ एकत्रित थे। जैसे ही प्रो.लुई स्मलिन ने बटन दबाया कि बहुत बारीक, धागे के आकार में प्रकाश का रश्मि-समूह (बीम ऑफ रेज) निकली और आकाश को चीरती हुई कुल 13 सेकेण्ड में चन्द्रमा पर जा पहुँची। अल्बा टेनियस ज्वालामुखी के पास उसने 2 मील का प्रकाश-बिम्ब बना दिया। फिर थोड़ी ही देर में वहाँ से टकराकर वह पुनः वेधशाला में लौट आया।

यह यन्त्र चन्द्रमा में लग जाने से चन्द्रमा और सुदूर ग्रहों की हरकतों की शोध करना ऐसे सम्भव हो गया है जैसे हम मकान की किसी ऊँची छत पर बैठकर पास-पड़ौस के लोगों की सब गतिविधियाँ देख लेने की स्थिति में आ जाते हैं। इस यन्त्र की शक्ति इतनी भयंकर है कि कठोर-से-कठोर हीरे पर यदि इसकी एक हलकी-सी ही किरण फेंक दी जाये तो वह 1।200000000 सेकेण्ड में ही उसे छेदकर रख देगी। इन दिनों अमेरिका में इस पर 2000 वैज्ञानिक शोध कर रहे हैं। लगभग 400 प्रयोगशालाओं में ‘लेजर’ के विभिन्न उपयोग कर प्रयोग चल रहे हैं। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि इस यन्त्र का विकास करके संसार के किसी भी भाग में बैठे सैनिकों को, उनके हवाई अड्डों और साज-सामान को पल भर में ही नष्ट-भ्रष्ट कर डालना सम्भव हो जायेगा। अनुमान है कि अमेरिका ने ऐसी एक ‘लेजर बन्दूक’ बना भी ली है, जिसमें गोली की कोई आवश्यकता नहीं होती, नियन्त्रित लेजर किरणें ही यह काम कर देती हैं।

इस शक्ति के उपयोग ध्वंसात्मक ही नहीं हैं, वरन् उसका पूर्ण विकास हो जाने पर उससे अनेक प्रकार के मानवोपयोगी और जीवन में काम आने वाले अद्भुत कार्य भी सम्पन्न किये जा सकेंगे। इस यन्त्र की मदद से विश्व के किसी भी भाग में बैठे किसी भी व्यक्ति से वैसी ही बातचीत करनी सम्भव हो जायेगी जैसे कोई योगी किसी दूरस्थ व्यक्ति को अपने संकल्प-बल से ही कोई सन्देश पहुँचा देता है। जगद्गुरु शंकराचार्य ने अपनी माँ को वचन दिया था कि जब वह मरणासन्न होंगी, अन्तिम दर्शनों के लिये हम अवश्य आयेंगे। मृत्यु के समय उनकी माँ ने उन्हें स्मरण किया। तब जगद्गुरु उत्तर-भारत की यात्रा पर थे, उस समय ऐसे कोई यन्त्र टेलीफोन आदि नहीं थे फिर भी वह उस परावाणी को पकड़ने में सफल हो गये थे और घर जाकर माँ से मिले व माँ का अन्तिम दाह-संस्कार भी अपने हाथों से किया था।

टेलीविजन का स्थान कुछ दिनों में ‘लेजर’ ले सकता है, तब कोई भी व्यक्ति संजय की तरह चलता-फिरता कहीं के भी दृश्य देख सकेगा और यह सिद्ध हो जायेगा कि योगियों की तीसरे नेत्र की कल्पना गलत नहीं है। भूमध्य में अवस्थित-आण चक्र उसी का दूसरा रूप है, जिसके द्वारा मन संसार में कहीं भी हो रहे युद्ध भी देख व नृत्य, गीत और सार्वजनिक आयोजन का बिना टिकट आनन्द भी ले सकता है।

‘लेजर’ का सिद्धान्त ‘मन के द्वारा चमत्कार’ के सिद्धाँत का समानान्तर ही है। ‘लेजर’ अंगरेजी के ‘लाइट एंप्लिफिकेशन बाई स्टिम्युलेटेड एमिशन आफ रेडिएशन’ से निकाला गया संक्षिप्त नाम है। उसका अर्थ होता है- ‘विश्वव्यापी विकिरण शक्ति को उत्तेजित करके एक बिन्दु से प्रकाश के रूप में ढाल देना’ अर्थात् आकाश में फैले हुए प्राकृतिक परमाणुओं की शक्ति सामान्यतः इधर-उधर अस्त-व्यस्त और बिखरी हुई होती है। उसे रेडप्लेटिनम धातु की छड़, होलियम या क्रिप्टान गैसों के माध्यम से प्रवाहित होने को विवश कर दिया जाता है, जिससे अनन्त आकाश में भरी परमाणु शक्ति काम करने लगती है। जो लोग परमाणु की इस शक्ति से परिचित हैं वे अनुमान कर सकते हैं कि इन लाखों परमाणुओं का उपयोग करने वाले यन्त्र की क्षमता कितनी अधिक भयंकर और वीभत्स होगी। अमेरिकी वैज्ञानिक और वायुसेना के प्रधान जनरल श्री कर्टिस ई.लीमे ने ठीक ही कहा है कि ‘लेजर’ किसी भी महाद्वीप के प्रक्षेपणास्त्रों को भी क्षणभर में नष्ट-भ्रष्ट करके रख डालने की सामर्थ्य रखता है। फिलाडेल्फिया के फ्रैकफोर्ड शस्त्र निर्माण फैक्ट्री में बने रहे यन्त्र इस बात के प्रमाण हैं। अनुमान है कि इन यन्त्रों का निशाना कभी चूकेगा नहीं और एक सेकेण्ड में 186000 मील तक के व्यक्ति को भी धराशायी कर देगा।

लेजर यन्त्र की कल्पना सर्वप्रथम 1951 में डॉ. चार्ल्स टाउन्स ने की थी। उन्होंने सोचा आकाश में कितनी गैसें भरी पड़ी हैं, वे इधर-उधर चक्कर काटती रहती हैं। इन व्यूहाणुओं को यदि किसी यन्त्र द्वारा ऊर्जा में बदला जा सके तो उस शक्ति का पारावार न रहे। इसी कल्पना ने ‘लेजर’ यन्त्र को जन्म दिया।

मन भी हीलियम या क्रिप्टान गैस जैसी ही सूक्ष्म शक्ति या क्रिस्टल है। भारतीय तत्व दर्शन के अनुसार अन्न की सूक्ष्मातिसूक्ष्म अवस्था ही मन है। अन्न से शरीर में रस बनता है फिर क्रमशः रक्त, माँस, मज्जा, मेदा, अस्थि और वीर्य बनते हैं। यही वीर्य बाद में अन्तःकरण चतुष्टय-मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार में बदलता है। तात्पर्य यह कि मन भी एक प्रकार का सूक्ष्म पदार्थ ही है। प्रकाश संश्लेषण (फोटो सिंथेसिस) के लेख में पाठकों ने पढ़ा होगा कि वृक्षों के विकास में 95 प्रतिशत भाग सूर्य किरणों का है जो फल या अन्न में भी सोख (आब्जर्व) जाता है। शरीर एक ऐसा यन्त्र है जो इन प्रकाश कणों को फिर एक स्थान पर ला देता है, उसे ही मन कहते हैं। इस तरह मन प्रकाश या सूर्य की तरह एक शक्ति और पदार्थ ही है।

जर्मन विद्वान् हेकल की पुस्तक विश्व की समस्या (दि राइडिल आफ यूनीवर्स) के उत्तर में डॉ.लाज ने लिखा है कि- ‘हेकल भी यह मानते हैं कि प्रकृति (मैटर) और शक्ति (फोर्स) का अभाव नहीं हो सकता। वे किसी-न-किसी रूप में बने रहते हैं। इसे उन्होंने ‘विश्वव्यापक नियम’ (यूनिवर्सल ला) या ‘सृष्टि का मौलिक नियम’ (फंडामेंटल कॉस्मिक ला) कहा है। इसी प्रकार प्राण (लाइफ) मन (माइंड और अहंकार (कान्शसनेस) भी अलग-अलग पदार्थ हैं। विज्ञान ने अभी तक इन्हें शक्ति नहीं माना है पर मेरा सिद्धान्त है कि प्राण आकाश में रहता है और मन उसका उच्चतर विकास है, ये सब आकाश में स्थित हैं और पदार्थ की शक्ति का नियन्त्रण कर सकते हैं।

यह बात यद्यपि बहुत सूक्ष्म विचार की है तथापि इस बात से सन्देहरहित है कि इनका प्रयोग किसी भी शक्ति की तरह हो सकता है। भारतीय योगी इस बात के प्रमाण हैं। एक दिन आयेगा जब लोग अनुभव करेंगे कि वस्तुतः मन की सामर्थ्य लेजर की सामर्थ्य से अधिक है। उसके विकास से अनेक चमत्कार जैसे लाभ प्राप्त किये जा सकते हैं और दूसरों को भी लाभान्वित किया जा सकता है।


जीवनोद्देश्य से विमुख न हूजिए।

इस अनादि और अनन्त काल के शाश्वत प्रवाह में न जाने वह कौन-सा अभागा क्षण मनुष्य को छूकर निकल गया, जब मनुष्य ने भोग-भावना की उपासना को अपना जीवन-लक्ष्य निर्धारित कर लिया।

मनुष्य का जीवन-लक्ष्य भोग-वीथियों में भटकते रहना हो सकता है-किसी प्रकार भी तो यह विश्वास नहीं किया जा सकता है। यदि ऐसा रहा होता तो मनुष्य का निर्माण भी उसी प्रकार का हुआ होता जिस प्रकार अन्य पशुओं का। न उसमें बुद्धि होती न विवेक और न आध्यात्मिक चेतना का विकास। संसार का यह सर्वगुण-सम्पन्न प्राणी मनुष्य भी यदि अन्य जीव-जन्तुओं की भाँति ही भोजन, वास, निद्रा और मैथुन में रत रहकर ही सारा जीवन बिताता और मरकर चला जाता तो फिर उसमें और उनमें अन्तर ही क्या रह जाता है?

प्राणियों के बीच एक दूसरे से उनकी विशेषताओं की भिन्नताओं के पीछे निश्चित ही कुछ अर्थ और कुछ उद्देश्य निहित रहता है। परमात्मा की यह विशाल, व्यापक, नियमित तथा व्यवस्थित सृष्टि, किसी बाजीगर का निरुद्देश्य तमाशा भर नहीं है और न यह बालू खेलते हुए अबोध बच्चों की क्रीड़ा है कि वे मिट्टी से विविध प्रकार के आहार-प्रकार बनाते और यों ही कुतूहलवश बिगाड़ते रहते हैं। गाय-बैलों के सिर-सींग, शेर के पञ्जे, हाथी की सूँड, वराह के वीर और पक्षियों के डैने होना अपने पीछे एक सार्थक मन्तव्य रखते हैं। यह यों ही निरर्थक की उपज एवं विभिन्नता नहीं हैं। यह बात दूसरी है कि हमारी मोटी बुद्धि इसके सूक्ष्म उद्देश्य को पूरी तरह समझ सकने में कृतार्थ न हो सके।

व्यवस्थित रूप से सोचने की क्षमता, परिष्कृत वाणी बोलने और समझा ने का गुण, सामाजिकता, पारस्परिकता, सहयोग, सौंदर्य, सहानुभूति, चिकित्सा, वाहन, मनोरञ्जन, न्याय, गृह, वस्त्र एवं आजीविका की सुविधा आदि की जो विशेषतायें मनुष्य को मिलीं और अन्य जीव-जन्तुओं को नहीं मिलीं-परमात्मा के इस अनुग्रहाधिक्य का यह अर्थ तो कदापि नहीं हो सकता कि मनुष्य अपना जीवन इन विशेषताओं एवं सुविधाओं, इन पुरस्कारों एवं उपहारों को यों ही मिट्टी में मिलाकर अन्य पशुओं की तरह ही अपना जीवन बिताये और मर जाये। अवश्य ही मनुष्यों का जीवन उद्देश्य अन्य जीव-जन्तुओं से भिन्न होना निर्धारित है।

मनुष्य जीवन-पद्धति की यह भिन्नता एक सोद्देश्य जिन्दगी, एक ऊँची और परिष्कृत जिन्दगी के सिवाय और कुछ नहीं हो सकती। मानव-जीवन की परिस्थितियों को देखते हुए यह मानना पड़ेगा कि वह शरीर की संकीर्ण परिधि से बाहर निकलकर व्यापक विभु की ओर बढ़े, नीचे स्तर से उठकर ऊपर अनन्त की ओर अभियान करे। यदि वह सर्वगुण-सम्पन्न इस मनुष्य जीवन जैसे अलभ्य अवसर को पाकर भी अपनी आत्मा को संकीर्णता के कलुष से मुक्त करने का प्रयत्न न करें तो यही मानना पड़ेगा कि हमने इस पावन प्रसाद का न तो समुचित मूल्याँकन ही किया और न परमात्मा की कृपा का समादर। इस मनुष्य शरीर को पशुओं जैसा यापन कर उसी श्रेणी का सिद्ध करने का अनुचित अपराध किया। आत्म-कल्याण, आत्म-मुक्ति एवं आत्म-विस्तार की साधना से विरत रहकर न केवल यही एक अलभ्य अवसर खो दिया वरन् आगे कि लिए भी अपनी पात्रता असिद्ध कर दी और पुनः लाखों करोड़ों वर्षों के लिये चौरासी लाख योनियों के कारावास की भूमिका तैयार कर ली।

शारीरिक वासनाओं की सँकरी तथा असाध्य वीथियों से निकलकर यदि कुछ देर के लिये भी मन को मुक्त कर संसार के विस्तार तथा व्यापकता पर दृष्टिपात किया जाय तो कोई कारण नहीं कि यह अनादि से लेकर अनन्त तक फैला हुआ नीलाकाश, इसमें अवस्थित असंख्यों प्रकाशमान ग्रह, नक्षत्र, चाँद एवं सूरज अपनी दिव्यता से हमारे उन्नत एवं व्यापक अभिमान में सहायक न हों। कोई कारण नहीं कि इनका दर्शन, इनका विचार कुछ देर के लिये भी हमारे हृदय में व्यापकता की अनुभूति उद्बुद्ध न करें और हम इनके बीच अपने अन्दर इन्हीं जैसी महानता तथा व्यापकता का अनुभव न करने लगें। किन्तु कहाँ? हम तो भोगों के रोगों से ग्रस्त, अपने चारों ओर वासनाओं तथा एषणाओं की कारा निर्मित किये अपने को काल-कोठरी का बन्दी बनाए पड़े हैं। हमें अवकाश ही कब मिलता है कि हम संकीर्णताओं से निकलकर इस अपार्थिव वैभव, इस व्यापक विभूति से तादात्म्य का प्रयास करें। ईर्ष्या, द्वेष, काम, क्रोध और मोह आदि आत्म-विरोधियों का संग कर हम निविड़ अन्धकार में भटक कर अपने इस महान् उद्देश्य की ओर से उदासीन होकर मनुष्य से पशु बने पड़े हैं और एक क्षण को भी यह सोचना नहीं चाहते कि अवसर निकला जा रहा है और हम अन्त में पश्चाताप की अग्नि में जलने के लिये चूके जा रहे हैं।

नित्यप्रति सूर्योदय के समय से एक नया दिन आरम्भ होता है और सूर्य अस्त होने के तक समाप्त हो जाता है। इस प्रकार नित्य ही आयु से एक मूल्यवान दिन कम हो जाता है। हम कभी नहीं सोचते कि हमने जिस दिन इस धरती पर जन्म लिया, उसी दिन से जीवन का ह्रास आरम्भ हो गया है। बड़ी तेजी से क्षण अनुक्षण, श्वाँस एवं प्रश्वास के साथ अन्त की ओर बढ़ते जा रहे हैं। उस अन्त की ओर जिसकी स्थिति अथवा अवस्था का कोई आभास हमारे पास नहीं हैं। किसी बड़े उद्देश्य के लिए मिला हुआ यह छोटा-सा अवसर, यह गिना-चुना समय यों ही व्यर्थ में नष्ट हुआ जा रहा है और हम उसके लिये कुछ भी तो नहीं कर रहे हैं।

हम नित्य ही जन्म, मृत्यु, जरता, क्षरता, रोग-शोक, आपत्ति, विनाश, काल अकाल एवं अकाल मृत्यु के विचार प्रेरक तथा जगा देने वाले दृश्य देखते-सुनते ही रहते हैं, किन्तु हमारे कान पर जूँ तक नहीं रेंगती है। विषय-वासनाओं, कामनाओं-एषणाओं, भोग तथा लोलुपता ने हमें इस सीमा तक मोहग्रस्त बना दिया है कि हम विचार, विवेक और बुद्धि के रूप में अन्धे हो गये हैं। साँसारिकता के प्रमाद में इस सीमा तक विस्मृत हो गये हैं, डूब गये हैं कि एकाध घड़ी एकाँत में बैठकर विचार सकें कि हमको यह विचित्रतापूर्ण मानव शरीर क्यों मिला? इसका उद्देश्य क्या है? हम कौन हैं? कहाँ से आये और कहाँ जा रहे हैं? हमें क्या करना चाहिए और हम क्या कर रहे हैं? इस प्रकार की कल्याणकारी भावना, जिज्ञासा अथवा उत्सुकता की चेतना से हम सर्वथा अपरिचित ही हो गये हैं।

एक तिनके की तरह हम चेतनाहीन होकर समय के प्रवाह, प्राकृतिक प्रवृत्तियों के वेग में, संसार की अबूझ परम्परा-जन्म लेना, जीना और मर जाना-के साथ बहे चले जा रहे हैं। इन्द्रिय-भोग, पदार्थ-पूजा, अधिकार, पुत्र-कलत्र, धन-धाम आदि अनित्य एवं परतन्त्रतामूलक वस्तुओं को लक्ष्य बनाकर दिन-रात इन्हीं में मरते-खपते चले जा रहे हैं। जब अन्त काल आता, चेतना जागती और बुद्धि प्रश्न करती है तब हम अपनी भूल समझते और छटपटा उठते हैं। किन्तु तब तक जीवन की हाट उठने लगती है और हम उस सबको ज्यों-का-त्यों यथास्थान छोड़कर खाली हाथ मलते हुए किसी अनजान दिशा की ओर चल देते हैं। वह कुछ भी न तो हमारे साथ जाता है और न काम ही आता है, जिसका हमने सुर-दुर्लभ मानव जीवन को नष्ट करके बड़े उत्साह से संचय किया था। विशाल वैभव, अपार धन-धान्य, पुत्र-कलत्रादिक सञ्चय तथा संसार की सारी परिस्थितियाँ हमारे सामने बनी रहती हैं। जिनको हम अपना कहते और जिनके लिए प्राण देते रहते हैं, कोई भी काम नहीं आते, हम अपनी मोहमयी भूल के पश्चाताप में जलते हुए परवशता के परों से बँधे उड़ ही जाते हैं। उस समय की वह व्याकुलता, वह व्यग्रता और वह शोक-सन्ताप या तो वह ही समझ सकता है जो भुक्तभोगी रहा है अथवा वह समझेगा जो आज उसी भूल का प्रतिपादन करता हुआ सोचने-समझने की आवश्यकता नहीं समझता।

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परं पौरुषमाश्रित्य दतैर्दन्तान्विचूर्णयन्।

शुभेनाशुभमुद्युक्तं प्राक्तनं पौरुषं जयेत्॥

मनुष्य को चाहिए कि पूर्वजन्म के अशुभ पौरुष (कुसंस्कारों) के फलोन्मुख होने पर, दाँतों से दाँतों को पीसते हुए, परम पुरुषार्थ का आश्रय लेकर शुभ कर्मों द्वारा उसको जीत ले।

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जीवन के प्रति विश्वास एवं आस्था रखना अच्छी बात है। तथापि जिन्दगी कितनी ही लम्बी और विश्वासपूर्ण क्यों न हो, जीवन-लक्ष्य की महानता को देखने और संसार की नश्वरता को समझते वह सदैव छोटी तथा अविश्वस्त ही है। इसका एक-एक क्षण मूल्यवान है। हर बीते हुए क्षण की क्षतिपूर्ति नहीं की जा सकती, किसी आते हुए क्षण को व्यर्थ नहीं किया जा सकता। लक्ष्य की दिशा में ही उपयुक्त किया हुआ क्षण हमारा सार्थक तथा सहयोगी हो सकता है अन्यथा जीवन के पचास-सौ साल क्या हजार और लाख वर्ष भी निरर्थक एवं निरुपयोगी ही सिद्ध होते हैं।

अज्ञान के कारण मनुष्य भौतिक उपलब्धियों को ही उन्नति एवं सफलता का प्रतीक मान लेता है। किन्तु मनुष्य शरीर, बल, बुद्धि, धन, वैभव, विभूति, यश, ऐश्वर्य अथवा पद-प्रतिष्ठा के क्षेत्र में क्यों न हिमालय की तरह ऊँचा और सागर की तरह गहरा हो जाये, किन्तु जब तक उसमें आत्म-सम्पदा का अभाव है, आध्यात्मिक चेतना की आवश्यकता है, तब तक वह निर्धन तथा निम्नकोटि का ही माना जायेगा। आत्मोन्नति एवं आध्यात्मिक उपलब्धि ही वह वास्तविक उन्नति एवं विकास है जिसे प्राप्त कर यह मानव जीवन धन्य तथा सार्थक होता है। भौतिक विभूतियों की चमक मरुस्थल की उस मृग-मरीचिका से अधिक कुछ भी तो नहीं है, आकर्षक तो बहुत होती है किन्तु न तो आत्मा की प्यास बुझा सकती है और न हृदय को सन्तोष दे सकती है।

यह बात सोचना या समझना भूल होगी कि मानव-जीवन में भौतिक पदार्थों का कोई मूल्य या महत्व नहीं है। इनका अपना भी एक मूल्य एवं महत्व है। मनुष्य का शरीर पार्थिव है, उसे चलाने तथा बनाये रखने के लिये भौतिक पदार्थों की नितान्त आवश्यकता है। भोजन, वस्त्र तथा निवास आदि आवश्यकताओं की आपूर्ति में जीवन चलना ही कठिन हो जायेगा। किन्तु इनका महत्व केवल इस सीमा तक ही है कि ये मानव-जीवन के उद्देश्य की पूरक मात्र ही बनी रहें, स्वतः लक्ष्य न बन जायें। शरीर-रक्षा आज जीवन की असुविधाएं दूर करने भर को इनके उपार्जन एवं प्राप्ति में आवश्यक समय तथा श्रम देने के उपरान्त जो शक्तियाँ और जो अवसर शेष बचे उसे परम लक्ष्य की ओर जाने में ही लगाना बुद्धिमानी है। भौतिकता के हाथ अपना समग्र जीवन बेच देने का अर्थ यही होगा कि हम अपने उद्देश्य की दिशा से भटककर गलत रास्ते पर चल निकले हैं। जो साधन था वह हमारा साध्य बन गया है। ऐसी दशा में यथाशीघ्र अपना सुधार कर लेना ही कल्याणकारी माना जायेगा।

जिस प्रकार कोई चित्रकार अपनी रचना के चरमोत्कर्ष लक्ष्य तक तब ही पहुँच पाता है, जब वह अपने अभिलेखन में कला एवं सौंदर्य का समुचित समन्वय कर लेता है। कला-विहीन सुन्दर रचना अथवा कलापूर्ण असुन्दर रचना, दोनों अपने में अपूर्ण एवं अवाँछनीय होने से कलाकार को अपने चरमोत्कर्ष के लक्ष्य तक नहीं पहुँचा पातीं। उसी प्रकार भौतिकता एवं आध्यात्मिकता का समुचित समन्वय ही मनुष्य को उसके आत्मोत्कर्ष के लक्ष्य तक ले जा सकता है। यदि कोई भौतिक आवश्यकताओं की सर्वथा उपेक्षा कर आध्यात्मिक चिन्तन अथवा साधना में लगे रहे तो आवश्यकताओं की पीड़ा से उसका चित्त अस्थिर रहेगा और शरीर जवाब देगा जिसका फल अनानुभूति के सिवाय और कुछ भी नहीं हो सकता। इस प्रकार की आध्यात्मिक साधना उसके लिये मृत्यु की तरह कष्टदायक बन जायेगी। इसी प्रकार यदि आध्यात्मिक साधना से विरत होकर केवल भौतिक भोगों की ही उपासना की जाती रहे तो भी मानवीय लक्ष्य दूर से दूरतर होता चला जायेगा। दोनों का समुचित समन्वय ही उद्देश्य-पूर्ति का कारण बन सकता है, जिसका अनुपात कम-से-कम पच्चीस और पचहत्तर का ही होना चाहिए। इससे कम अनुपात में लक्ष्य-प्राप्ति के लिए अनेक जन्म-जन्मान्तरों तक प्रयत्न एवं प्रतीक्षा करनी होगी।

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बाहर नहीं, भीतर देखते हैं।

तारापीठ (बंगाल) में द्वारका नदी के सुरम्य तट पर भगवती तारादेवी का मन्दिर है। उस दिन उसका मेला या कोई विशेष पूजन-पर्व था। पास के ही गाँव का जमींदार भी तारादेवी के दर्शनों के लिये आया। दर्शन करने से पूर्व, उसने सोचा-स्नान करके यहीं पूजा-पाठ भी समाप्त कर लिया जाय, सो उसने द्वारका के तट पर ही अपना सामान रख दिया।

वस्त्र उतार कर जमींदार ने स्नान किया। अनन्तर आसन बिछाकर पूर्वाभिमुख पूजा-पाठ के लिये बैठकर ध्यान करने लगे। एक सन्त भी स्नान के लिये उसी समय वहाँ आये। उन्हें बड़ी प्रसन्नता थी कि भारतीय जीवन में अभी आस्तिकता का अभाव नहीं हैं। तभी तो लोग न जाने कहाँ-कहाँ से देव-दर्शन और तीर्थ-यात्राओं के लिये आते-जाते रहते हैं। इस आस्तिकता का ही असर है कि भारतीय जीवन में अभी भी शान्ति, सन्तोष और पवित्रता की पर्याप्त मात्रा बची हुई है, जबकि शेष विश्व इससे सर्वथा विपरीत है। भले ही वे कितने ही सुखी और समृद्ध क्यों न हों।

यह महात्मा बंगाल के असाधारण ताँत्रिक वामक्षेप थे। उधर वे स्नान कर रहे थे, इधर जमींदार भगवान् के ध्यान में निमग्न। जो सन्त अभी थोड़ी देर पहले इतनी प्रसन्नता अनुभव कर रहे थे, सुन्दर विचारों में डूबे हुए थे, न जाने क्या कौतुक सूझा कि एकाएक जमींदार पर पानी के छींटे मारने लगे। जमींदार ने आँखें खोलीं-आँखों में गुस्सा भरा स्पष्ट दिखाई दिया। सन्त वामक्षेप शरीर रगड़ने लगे, ठीक बालकों जैसी मुद्रा-मानों उन्होंने जल के छींटे मारे ही न हों और उन्हें पता तक न हो कि अभी कुछ हुआ भी है।

जमींदार ने दुबारा आँखें मूँद लीं और फिर ध्यान में मग्न दिखाई दिये। उधर उन्होंने आँख मींची, इधर वामक्षेप फिर जल उलीचने लगे और जमींदार के दुबारा आँख खोल देने के बाद भी जल उलीचते ही गये जैसे उनके मन में भय नाम की कोई वस्तु ही न हो।

जमींदार गरजे- ओरे! साधु, अन्धा हो गया है। दिखाई नहीं देता, मेरे ऊपर पानी उलीच रहा है? मेरा ध्यान टूट गया, साधु होकर भी उपासना में विघ्न डालते तुझे लाज नहीं आती?

वामक्षेप को हँसी आ गई। बोले- उपासना को कलंकित न करो महाराज। भगवान् का ध्यान कर रहे हो या ‘मूर एण्ड कम्पनी’ कलकत्ता की दुकान से चमड़े के जूते खरीद रहे हो?

जमींदार का उबलता हुआ क्रोध जहाँ-का-तहाँ ऐसे बैठ गया जैसे उफनते दूध में जल के छींटे मारने से उफान रुक जाता है। उनके आश्चर्य का ठिकाना न था। यह उठे और साधु के चरण पकड़कर बोले- ‘महाराज! सचमुच मैं ध्यान में यही सोच रहा था। मूर एण्ड कम्पनी से जूते पहनने हैं, वही सोच रहा था, कौन-सा जूता ठीक रहेगा। मुझे आश्चर्य है आपने मेरे मन की बात कैसे जान ली?

स्वामी रामदास कथामृत से उद्भूत यह घटना बताती है कि योगाभ्यासी साधु हो या कोई और वह अपनी अन्तरंग को पहचानने वाली क्षमताओं को जागृत कर सकता है। चमत्कार भले ही न दिखा सके, पर उससे आत्मकल्याण का मार्ग तो प्रशस्त किया ही जा सकता है।


असुरता के संहार में प्रवृत्त-हमारी अन्तःचेतना

कैंसर क्रॉनिक स्टिमुलश से बढ़ता है, जिसका अधिकाँश कारण धूम्रपान (स्मोकिंग) है। क्रॉनिक सविसाइटिस (स्त्री-रोग), पेट का फोड़ा (पेप्टिक अल्सर) आदि से भी 5 प्रतिशत कैंसर हो सकता है। पर डाक्टरों की राय में इन सबका कारण अपनी ही चिन्तायें, उतावलापन और मिर्च-मसालों वाला गरिष्ठ आहार होता है। एक बार क्रॉनिक स्टिमुलश पैदा हो जाने के बाद वह कोष (सेल्स) को विकृत करना प्रारम्भ करता है। 1 से 2, 2 से 4 इस क्षिप्र गति से बढ़ता हुआ यह रोग सारे शरीर पर उसी तरह छा जाता है जिस तरह दहेज, रिश्वत, मिलावट, अन्धविश्वास, अशिक्षा और बाल-विवाह आदि कुरीतियाँ भारतीय जीवन को आच्छादित किये हैं। यदि प्रारम्भ में ही इसे नष्ट न किया गया तो कैंसर का ठीक होना कठिन हो जाता है। हमारी सामाजिक बुराइयों और आँतरिक दुर्वासनायें भी ऐसी ही बुरी होती हैं जो यदि जड़ पकड़ गई तो मरणोपरान्त ही पिंड छोड़ती हैं। भारतवर्ष की इन बुराइयों को नष्ट करने का यही समय है। यदि इन्हें अभी नष्ट नहीं किया गया तो शारीरिक स्वास्थ्य की तरह या तो धर्म नष्ट हो जायेगा या फिर पराधीनता की तरह समाज का ही पतन हो जायेगा।

भारतवर्ष के पराधीन होने का भी यही कारण था कि हमारी आँतरिक बुराइयों ने हमारी समर्थता की जड़ें काटीं और हम विदेशियों का सामना करने में असमर्थ हो गये। एक ऐसा समय आया जब भूल अनुभव की गई। संघर्ष हुआ और इस तरह अँधेरे इतिहास का अन्त हुआ। हमारा देश पुनः स्वाधीन हो गया।

हम विदेशी सत्ता से स्वाधीन हो गये किन्तु वह स्वाधीनता अक्षुण्ण रहेगी? इस बात की निश्चित गारन्टी तब तक नहीं दी जा सकती जब तक भारतीय समाज कुरीतियों, अन्धविश्वास, अनैतिकता, बेईमानी, छल, कपट, भ्रष्टाचार, अनय, अत्याचार, तृष्णाओं, वासनाओं और दुष्प्रवृत्तियों से ग्रसित बना रहेगा। बुराइयाँ मनुष्य को रोग के कीटाणुओं की तरह खा जाती हैं, इसलिये बुद्धिमान लोग समय रहते उनसे बचने का प्रयत्न करते हैं। यह एक दुःसाध्य कार्य है इसलिये इस कार्य को बहुत सावधानी, सजगता और योजनाबद्ध तरीके से पूरा करना पड़ता है।

मनुष्य जीवन की एक विस्तृत प्रक्रिया का नाम समाज है। हम जिस गाँव में, मुहल्ले या नगर में रहते हैं- समाज वहीं तक सीमित नहीं। हमारा प्रान्त, हमारा देश, पड़ौसी देश और सारा विश्व एक समाज है। समाज की सीमायें विशाल हैं। अपने आप तक सीमित सुधार की प्रक्रियायें सरल हो सकती हैं किन्तु हम इस व्यापक समाज से इतने प्रभावित और बँधे हुए हैं कि उसकी हर छोटी-बड़ी बुराई से हमारा टकराव हर घड़ी होता रहता है। हमारी सज्जनता, हमारी शुद्धता, हमारा सौष्ठव तभी स्थिर रह सकता है जब सारा विश्व-समाज ही शुद्ध, सज्जन और सौम्य हो। इस जटिल समस्या को हल करना तभी सम्भव है जब विश्व संस्कृति की सभी भलाई वाली शक्तियाँ निरन्तर क्रियाशील रहें और बुराइयों पर उसी प्रकार दबाव डालती रहें, जिस तरह शरीर में उत्पन्न होने वाले रोग, शोक और बीमारियों का संहार औषधियों से करते रहते हैं।

हम शरीर को एक समाज मानते हैं और उसकी गतिविधियों के द्वारा बाह्याभ्यन्तर असुरता से टक्कर लेने के निष्कर्ष निकालते हैं। जब शरीर में बाहरी कीटाणुओं से या भीतरी किसी कारण से कोई रोग हो जाता है तो ऐन्टी बायोटिक्स दवाइयों द्वारा उस पर सीधा घातक प्रभाव डाला जाता है। यह औषधियाँ शरीर के सारे रक्त का दौरा करती हैं और जहाँ कहीं भी रोग-कीटाणुओं को छिपा हुआ पाती हैं, मार गिराती हैं। सामाजिक बुराइयाँ, चाहे वह बाहर से थोपी गई हों या आँतरिक हों, इसी तरह नष्ट की जा सकती हैं। उनकी विरोधी शक्ति तैयार की जानी चाहिए, जिससे उन्हें मारकर भगाया जा सके। उदाहरण के लिये माँसाहार ऐसी दुष्प्रवृत्ति है जो भारतीयों पर विदेशियों ने थोपी, पर दहेज, पर्दा प्रथा, अन्धविश्वास हमारी आँतरिक बुराइयाँ हैं और उनसे छुटकारे का एक ही मार्ग है कि अच्छे लोग माँसाहार के विरुद्ध शाकाहार और जीव-दया की भावना को उभारें और दहेज, अन्धविश्वास आदि के स्थान पर बिना दहेज विवाह, शुद्ध आस्तिकता आदि का व्यापक प्रसार करें, स्वयं इन आदर्शों का पालन करें व साथी, सहयोगी, सम्बन्धी सबको उसके लिये प्रोत्साहित करें।

कई बार इस संघर्ष में अपनी भी हानि होती है। औषधि शास्त्र कहता है- यदि 100 शत्रु नष्ट करने में एक अपना भी मारा जाये तो कुछ कर्ज नहीं, पर सीधे मुकाबले का रास्ता छोड़ना नहीं चाहिए। पेट में कई बार राउन्ड वार्म्स पैदा हो जाते हैं। यह परजीवी (पैरासाइट) कीड़े (बैक्टीरिया) आँतों को उस तरह खाने लगते हैं जैसे फैशनपरस्ती, नशेबाजी, वासनायें स्वास्थ्य को खाने लगती हैं। इस स्थिति में डॉक्टर कोई दस्तावर औषधि देते हैं और रक्त में होने वाले विषैले प्रभाव से शरीर को बचाते हैं। इन औषधियों में तीव्रता होती है, वह पेट की सारी गन्दगी झाड़ फेंकती हैं। यह क्रिया कुछ तीव्र होती है, इससे पाचन वाले अम्ल (एसिड्स) भी पटक जाते हैं पर उनका चला जाना भी रोग से आक्रमण से हो जाने वाली हानि की तुलना में कहीं अधिक उपयोगी है। इसलिये सीधे संघर्ष में कुछ लोगों को शारीरिक या मानसिक कष्ट भी हो, तो भी प्रसन्नता अनुभव करनी चाहिए।

कई बार डॉक्टर उचित इलाज का पता नहीं लगा पाते, तब वे प्रभावित अंग से रोग के कीटाणु निकालकर उन्हें कल्चर प्लेट पर रखते हैं और उन पर कई एण्टी बायोटिक्स औषधियों की एक-एक बूँद रखते जाते हैं। जो औषधि अधिक कीटाणुनाशक हुई, बाद में उसी का प्रयोग किया जाता है। समाज में जब इस तरह ला-इलाज बुराइयाँ उठे तब विचारशील लोगों को कई प्रयोग करने चाहिए जो स्थिति के अनुरूप, जो भी उचित हो, उस उपाय को कारगर ढंग से अपनाना चाहिए।

बुराइयों से सतर्कता तो प्रत्येक स्थिति में रखनी ही चाहिए अन्यथा पता न चलेगा और वह भीतर-ही-भीतर हमें नष्ट कर दे सकती है। शराब पीने वालों में चर्बी की एक सतह जिगर के कोषों के ऊपर जम जाती है। उससे जिगर के कोषों को खाद्य (ऑक्सीजन) मिलना बन्द हो जाता है। शराब पीने वाले को पता नहीं चलता और भीतर-ही-भीतर सिरोसिस आफ लीवर बीमारी हो जाती है। इसलिए मनुष्य को अपने स्वभाव, समाज की प्रत्येक गतिविधि पर सतर्क दृष्टि रखनी चाहिए। यदि ऐसा न हुआ और बीमारी पककर फूटी तो उसका सँभालना कठिन हो जाता है।

जहाँ भी ऐसा वातावरण उठ रहा हो, बुद्धिशीलता की माँग है- उसे नष्ट किया जाये। यह कार्य प्रतिलोम वातावरण अर्थात् अच्छाइयों की मात्रा बढ़ाकर पूरा किया जाता है। डॉक्टर और स्वास्थ्य-विशेषज्ञ जानते हैं कि जीवाणु दो प्रकार के होते हैं- [1.] एयरोबिक अर्थात् जिन्हें जिन्दा रहने के लिये ऑक्सीजन आवश्यक है। [2.] एन एयरोबिक अर्थात् जिन्हें आवश्यक नहीं। कोई अंग सड़ जावें (ग्रैगीन) क्लास्टेडियम बेसलाई, क्लास्टेडियम एडेमेन्टीस एवं क्लास्टेडिक सेप्टिकी जो एक एयरोबिक हैं उनको मारने के लिये एयरोबिक वातावरण पैदा करना आवश्यक है। अर्थात् यदि समाज में अच्छाइयों की प्रचुरता को व्यापक बना दिया जाये तो अनेक बुराइयाँ वातावरण न मिलने के कारण ही नष्ट हो जायेंगी।

उदाहरण के लिये असंयम आलस्य को परिश्रम और उद्योग द्वारा, वासना और असंयम को व्यायामशालाओं और बौद्धिक शक्तियों के ऊर्ध्वीकरण, स्वाध्याय, ज्ञानार्जन, आदि के द्वारा नष्ट किया जा सकता है। सादगी का वातावरण पैदा किया जाये तो उससे फैशन के नाम पर होने वाला अपव्यय भी रुके और बालकों की उच्छृंखलता तथा गुण्डागर्दी भी रुक सके। सदाचार, साहस और ईमानदारी को सम्मानित नहीं किया जाये तो दुराचार, संकीर्णता और बेईमानी बढ़ती है। सज्जन व्यक्तियों का सम्मान बढ़ाकर ऐसी बुराइयों को सहज ही दूर किया जा सकता है।

बुराई न बढ़े, उसके लिये यह भी आवश्यक है कि उन्हें पोषण न मिले। गुण्डा तत्वों से डरकर लोग न चाहते हुए भी उन्हीं का समर्थन और हाँ में हाँ मिलाने लगते हैं। इससे उनका कुनबा और भी फलने-फूलने लगता है। यदि लोग उनका समर्थन और पोषण बन्द कर दें तो वह अपने आप मरकर नष्ट हो जायें।

टी.बी. के कीटाणु इसी सिद्धाँत पर मारे जाते हैं। यह एसिड फास्ट बेसिलाई [जो एसिड से भी नहीं मरते] हैं। जब इस तरह के कीटाणु शरीर में प्रविष्ट हो जाते हैं, तब डॉक्टर स्ट्रैप्टोमाइसीन देते हैं। यह टी.बी. के कीटाणु की ऊपरी झिल्ली [लायपाइड कवरिंग] पर चारों ओर से घेरा डाल लेता है। इससे उस कीटाणु की मुसीबत आ जाती है। दुष्ट अपना खाद्य भी नहीं ले सकता और भीतर घुटकर मर जाता है। जो बुराइयाँ सीधी टक्कर से नहीं जीती जा सकतीं, उनको पोषण न मिले तो वे टी.बी. के कीटाणु की तरह आप नष्ट हो जाती हैं।

जहाँ इस स्थिति में भी काम न बने वहाँ भलाई की शक्ति का उद्बोधन करना और उसे मुकाबले के लिये ललकारना आवश्यक हो जाता है। नान स्पेस्फिक थैरेपी के अंतर्गत कई बीमारियाँ ऐसी होती हैं जो लगातार औषधि-सेवन से भी अच्छी नहीं होती। उदाहरण के लिये चमड़ी की बीमारी-एक्जिमा। उस स्थिति में डॉक्टर मुकाबले की शक्ति तैयार करते हैं। रोगी के शरीर का 5 सी.सी.शुद्ध रक्त लेकर रोगी के शरीर में प्रवेश [इन्जेक्ट] कर दिया जाता है। यह प्रोटोन होता है और भीतर शरीर में पहले से ही प्रोटोन होता है। जब तक अच्छाई बुराई में भेद न किया गया था, बुराई भी दहेज, पर्दा-प्रथा, नशा आदि की तरह साथ-साथ पल रही थी। पर जब कुछ यज्ञ, हवन, जप, तप, बिना दहेज विवाह, नशा-उन्मूलन आदि की स्थिति बनी तो दूसरे लोगों ने भी अनुभव किया कि बुराई वह है जो अपनी या समाज के किसी भी वर्ग का अहित करती है, भले ही वह कोई परम्परा बन गई हो। जब इस तरह का विवेक जाग पड़ता है तो अपनी बुराइयों का उन्मूलन ठीक ऐसे ही सरल हो जाता है, जैसे एक्जिमा में रोगी का ही रक्त इन्जेक्शन कर देना। भीतर वाले प्रोटोन उन्हें बाहरी समझ कर हमले के लिए तैयार होते हैं पर जब वे अनुभव करते हैं कि अरे! यह तो अपने ही बन्धु और हितैषी हैं तब उनसे मिल जाते हैं और एक नई शक्ति अनुभव करते हैं। अब सब मिलकर एक्जिमा के विरोध में लड़ पड़ते हैं और उस न मिटती जान पड़ने वाली बीमारी को भी नष्ट करने का प्रयोग बहुत ही उपयोगी और सफल सिद्ध होता रहा है।

यह वैज्ञानिक प्रयोग हैं जिनसे शरीर के समान ही अपने को शुद्ध, पवित्र और दिव्य बनाया जा सकता है। उसी के आधार पर सुख, समृद्धि और विश्वशान्ति का वातावरण पैदा किया जा सकता है।


गुरु-भक्ति

गुरु-भक्ति-

स्वामी दयानन्द ने अपने गुरु विरजानन्दजी की कुटिया में प्रतिदिन की भाँति झाड़ू लगाई और कूड़ा दरवाजे के निकट लगाकर किसी दूसरे काम में लग गये।

गुरु विरजानन्द प्रज्ञाचक्षु थे। उनके पाँव कूड़े से लगे। बस, वे उबल पड़े और दयानन्द को दो-चार थप्पड़ मार दिये। जब गुरु का क्रोध शान्त हुआ, तो दयानन्द गुरु के पाँव पकड़ कर बोले- “गुरुदेव आप बहुत कमजोर हैं। मुझे आप डण्डे से पीटिये, क्योंकि मैं तो मोटा-ताजा हूँ। आपके हाथों को कष्ट होता रहा होगा।”

अपने दोष स्वीकारने और उनका प्रायश्चित्त करने की दयानन्द की इस निश्छलता पर गुरु विरजानन्द की आँखों में आँसू आ गये।


सौ प्यारे को सौ दुःख

भगवान् बुद्ध ने आमन्त्रण स्वीकार कर लिया था। श्रावस्ती की विशाखा मृगार माता के लिये यह बड़े हर्ष की बात थी। उसके पास धन-संपत्ति, वैभव, विलास का कोई अभाव था नहीं। पुत्र-पौत्र भी खूब फल-फूल रहे थे। तथागत के स्वागत के लिये उसने अपने पूर्वाराम प्रासाद को खूब अच्छी तरह सजाया और भगवान् को उसी में विश्राम दिया।

परमात्मा की रचना बड़ी विलक्षण है। वह कब क्या कर दे-कुछ ठिकाना नहीं। भगवान् बुद्ध जिस दिन श्रावस्ती पधारे उसी रात विशाखा के पौत्र धीरज का देहाँत हो गया। पौत्र के निधन से विशाखा इस तरह व्याकुल होकर रुदन करने लगी जैसे मरुस्थल में डाल दी गई मत्स्य।

प्रातःकाल हुआ। शिशु का शवदाह कर दिया गया। अब तक बह रहा आवेग शोक-निर्झर अब पर्वतीय अंचल से उतरकर मैदान में बहने वाली नदी की तरह धीर, शाँत और गम्भीर हो चला था। विशाखा उस समय भी अस्त-व्यस्त शरीर, वस्त्र और बाल भिगोये उस सभा-भवन में जा बैठी जहाँ भगवान् बौद्ध दर्शनार्थियों को आत्म-कल्याण का उपदेश कर रहे थे।

इस मुद्रा और वेश-भूषा में देखकर भगवान् बुद्ध ने पूछा- “विशाखे! मध्याह्न हो चुका, अब तक तूने वस्त्र और बाल भी नहीं सुखाये।”

आहत स्वर में विशाखा ने उत्तर दिया- “हाँ भगवन्! मेरे पौत्र का निधन हो गया है। वह वेदना मेरे हृदय का उच्छेदन कर रही है।” कहकर वह फिर सुबक-सुबक कर रुदन करने लगी।

भगवान् बुद्ध ने बहुत धीरज दिया, फिर भी वह चुप न हुई। तब उन्होंने कहा- “अच्छा विशाखा! बोल यदि तेरा नाती तुझे मिल जाये तो तू खुश हो जायेगी।”

“हाँ! हाँ!! भगवान् तब तो मेरी प्रसन्नता का पारावार ही नहीं रहेगा।” विशाखा ने विस्मय के साथ उत्तर दिया।

“अच्छा तो मुझे कितने पौत्र चाहिए? एक, दो, दस, सौ या जितनी श्रावस्ती की जनसंख्या है।” भगवान् बुद्ध ने किञ्चित् विनोदपूर्वक प्रश्न किया।

उसका उत्तर देते हुए मृगार माता ने कहा- “भगवन्! जितने अधिक दे सकते हों दें, मेरी प्रसन्नता उतनी ही बढ़ेगी।”

तब फिर बुद्ध भगवान् ने प्रश्न किया- “अच्छा, यह मान लें कि इस नगर के सभी लोग तेरे ही पुत्र-पौत्र हैं। अब यह बता यहाँ प्रतिदिन कितने लोग मरते होंगे?”

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शाँति और संतृप्ति चाहते हो? तो साँसारिक कामनायें कम कर अपने संकल्प को कहने दो- परमात्मा के अतिरिक्त मुझे कुछ नहीं चाहिए।

-स्वामी रामतीर्थ

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“निश्चित तो नहीं, पर कभी दस भी मरते हैं कभी चार-छः, तीन और दो भी। कोई महामारी आ जाती है तो सौ-दो सौ भी मर जाते हैं- यह मृगार माता का उत्तर था।

अब तू ही बता विशाखा! भगवान् बुद्ध ने हँसते हुए पूछा- “एक पौत्र के निधन से तो तू इतनी दुःखी है, यदि तेरे हजार पौत्र हो जाएं तो प्रतिदिन कितने मरेंगे और तब तू कितनी दुखी होगी। यह तो उनकी मृत्यु का ही दुःख होगा। उनके पालन-पोषण, शिक्षा-दीक्षा में कितना कष्ट उठाना पड़ेगा। सेवा का ही सुख चाहिए तो सारा संसार पड़ा है सबकी सेवा कर, आसक्ति से तो दुःख ही बढ़ेगा?”

मृगार माता की समझ में बात आ गई। उसने अपना दुःख भुला दिया और संसार की सेवा में जुट गई।


उपकारिणी धरती माता

वेदों और उपनिषदों में भगवती पृथ्वी को माता कहा है। पृथ्वी ही समस्त प्राणियों का जीवन-विकास और रक्षा करती है। पञ्च तत्वों में पृथ्वी की प्रतिष्ठा सर्व-प्रथम की गई है। प्राणियों के अत्यधिक समीप होने के कारण हम पृथ्वी की गतिविधियों से जितना अधिक प्रभावित होते हैं, उतना और किसी देव और तत्व से नहीं। स्थूल होकर भी सम्पूर्ण सूक्ष्मतायें और शक्तियाँ पृथ्वी में विद्यमान हैं, इसलिये वेदों ने पग-पग पर उनकी उपासना और ऋचा गान किया है।

हम कई स्थानों पर कह चुके हैं कि भारतीय तत्वदर्शन में प्रत्येक वस्तु को चेतन रूप में देखने की प्रथा रही है। इसलिये स्थूल दिखाई देने वाले पदार्थों-पत्थरों को भी मानवीय चेतना के रूप में पूजा गया। कुछ दिन तक यह विषय लोगों के लिये उपहास का विषय रहे पर अब विज्ञान भी बताता है कि संसार में पदार्थ कुछ है ही नहीं, जो कुछ भी दृश्य-अदृश्य है सब परमाणुओं की अवस्थायें हैं। जहाँ परमाणु विरल हैं वहाँ आकाश, जहाँ सघन हैं वहीं पदार्थ दृष्टिगोचर होने लगता है। पर पदार्थ कोई वस्तु नहीं, वहाँ भी एक निरन्तर की क्रियाशीलता काम करती रहती है। आत्म-चेतना को पदार्थ चेतना के साथ मिलाकर ऋचाओं द्वारा-शब्द शक्ति के द्वारा उन शक्तियों से लाभान्वित होने का विज्ञान ही मन्त्र-विद्या है। उसे हम एक प्रार्थनामय रूप में भी देखते हैं। अन्तर्विज्ञान सबमें एक ही है। उसकी आधुनिकतम जानकारी ऋषियों-महर्षियों को हो रही है। इसका प्रमाण इन पंक्तियों में आगे मिलेगा।

इन दिनों “आयनिक थैरेपी” अपन-चिकित्सा की तेजी से शोध हो रही है और उससे चिकित्सा जगत् में क्राँतिकारी परिवर्तन होने की आशा है। यह पद्धति धूलि-कणों में व्याप्त विद्युत शक्ति के द्वारा सम्पन्न होती है। इसलिए यह बात बिना किसी संकोच के कही जा सकती है कि पृथ्वी न होती तो न केवल हम शरीर धारण किये रहने से असमर्थ होते वरन् यह कि पृथ्वी ही हमें रोगों से बचाती है। पृथ्वी के कण अज्ञात रूप से हमारे शरीर की सैकड़ों बीमारियों को मारते रहते हैं। यह विषय मिट्टी द्वारा प्राकृतिक चिकित्सा से भिन्न है।

अभी तक लोग इतना ही जानते थे कि स्वस्थ रहने के लिये स्वच्छ वायु आवश्यक है, पर अब यह कहा जाता है कि स्वस्थ रहने के लिये वायु में धूलि कणों की उपस्थिति अनिवार्य है। यह धूलिकण प्राकृतिक रूप से वायु में फैले रहते हैं। इन्हें कोई अलग करना चाहे तो भी अलग नहीं किया जा सकता। इन कणों में कई कण विद्युत-आवेश युक्त होते हैं। कुछ कण धन-आवेश [पॉजिटिव चार्ज] और कुछ कण ऋण आवेश [निगेटिव चार्ज] होते हैं। धन आवेश वाले कण यद्यपि मनुष्य के लिये उपयोगी नहीं होते पर वे वायुमण्डल में छाई हुई दुर्गन्ध और बुरे तत्वों को निष्क्रिय बनाते रहते हैं जबकि ऋण आवेश वाले कण हमें रक्तचाप और गले की बीमारियों से बचाते रहते हैं। श्वास नली के रोमों द्वारा यही आवेश शरीर में नाड़ी की गति, ताप, कार्यक्षमता को स्थिर रखता है। पशुओं में यही दूध देने की क्षमता बढ़ाते हैं। पौधों के 25 से 73 प्रतिशत विकास में यह आवेशित धूलिकण ही मददगार होते हैं।

इन आवेशित कणों को ही अपन कहते हैं। यद्यपि इनकी संख्या 10 खरब (1012) कणों में एक या दो भर होती है तथापि इनके बहुमूल्य प्रभाव को आँकना सम्भव नहीं। इन्हीं स्वल्प कणों की मदद से ‘आपनिक थैरेपी’ का जन्म हुआ।

पृथ्वी की मिट्टी में यह गुण बहुतायत से पाये जाते हैं। प्रातःकाल ओस गिरी शुद्ध भूमि में नंगे पाँव टहलने से एक विद्युत् शक्ति का शरीर में सञ्चार होता है जिससे सारा शरीर दिन भर तरोताजा रहता है। पहलवान लोग मिट्टी में लोटते हैं, उससे शारीरिक विष का शोषण हो जाता है। कई रोगों में, पेट की, सिर की पीड़ा में मिट्टी थोपने से बड़ा आराम मिलता है। यह सब मिट्टी के कणों में व्याप्त विद्युत् शक्ति का ही प्रभाव है और यह सूक्ष्म जानकारी आर्ष-ग्रन्थकारों को आधुनिक भूगर्भ वेत्ताओं से कहीं अधिक स्पष्ट रही है।

पृथ्वी की उत्पत्ति के बारे में गैस्मो आदि पश्चिमी विद्वानों और भारतीय मान्यताओं में काफी कुछ अन्तर है। हम उस विवाद में पड़ना नहीं चाहते, हम तो यह देखते हैं कि उसके बाद की जानकारियाँ बहुत अधिक मिलती-जुलती हैं तब जबकि भारतीय शोधें बिना आधुनिक यन्त्रों की मदद के हुई, यदि अब की शोधों से बहुत बढ़िया जानकारी दे सकती हैं तो हमारी जानकारियों को ज्येष्ठ और प्रामाणिक मानने में कोई आपत्ति न होनी चाहिए।

काठक संहिता में पृथ्वी को जल प्रधान बताते हुए लिखा है-

आपो वा इदमासन् सलिलमेव। स प्रजापतिः पुष्करः वर्णो वातो भूतोऽलेलीयत। स प्रतिष्ठा नाविदन्त। स एतमपाँ कुलायमपश्यत्। स एतं प्रजापतिरयाँ मध्येऽग्निमचिनुत। सेयमभवत्। ततः प्रत्यतिष्ठत इयं वाव अग्निः।

-काठक सं. 22। 9

आप सलिल रूप थीं। वह प्रजापति कमल पत्र में बात की तरह लहलहाता था, उसे ठहरने का स्थान न मिला। उसने इन आपों के कुलायभ (जाल) को देखा। तब प्रजापति ने आपों के मध्य में अग्नि चिना तब पृथ्वी बनी और ठहर गई यह पृथ्वी ही अग्नि है।

और अब जब धरती के कणों का आणविक विश्लेषण किया गया तो पता चलता है कि वस्तुतः प्रत्येक तत्व में ऊपरी अणु अग्नि के रूप में और नीचे जल के रूप में है। वायु उनके मध्य में अवस्थित है। मृत्तिका कणों की यह आणविक संरचना भारतीय मत के अनुसार ही है जबकि पूर्व पुरुषों के पास माइक्रोस्कोप जैसा कोई यन्त्र पढ़ने के लिये नहीं था।

शतपथ ब्राह्मण में पृथ्वी को-

पृथ्वी वै सर्वेषाँ देवानाम् आयतनम्।

सूर्या वै सर्वेषाँ देवानाम् आत्मा॥

-24। 3। 2। 4 और 8

अर्थात् पृथ्वी भी अन्य देवों की तरह आयतन वाली है सूर्य उसकी आत्मा है।

“अयस्मयी पृथ्वी”- यह पृथ्वी लौह आदि धातुओं से परिपूर्ण। ऋग्वेद में पृथ्वी को आपसी [लोहयुक्ता] कहा है। लौह तत्वों की अधिकता के कारण आकाशगत मरुतों की विद्युत् शक्ति से संयोग से चुम्बकत्व धारण करती है। ऐसा लिंकन बार्नेट ने भी माना है। विष्णु पुराण में सूर्य के परिक्रमा पथ को भूरेखा के नाम से पुकारा है-

तदा चलति भूरेखा साद्रि द्वीपाब्धिकानना।

अर्थात् वह पर्वत द्वीपों, समुद्रों और वनों के साथ चल पड़ती है।

इयं [पृथिवी] वै सर्पराज्ञी अर्थात् वह सर्पणशील [रेंगने वाली] है जैसे साँप आदि रेंगते हैं, पृथ्वी अन्तरिक्ष में रेंगती है। यह बात- जेमिनीय ब्राह्मण के इस मन्त्र से और भी स्पष्ट हो जाती है-

स एष प्रजापतिः अग्निष्टोमः परिमण्डलो भूत्वा अनन्तो भूत्वा शये। तदनुकृतीदम् अपि अन्या देवताः परिमण्डलाः॥ परिमण्डल आदित्य परिमण्डला इयं पृथिवी।

-1। 257

अर्थात् वह प्रजापति अग्निष्टोम परिमंडल [अग्नि-गोले के समान] रूप होकर अनन्त [गोल] होकर ठहरा। देवता भी उसी प्रकार परिमंडल है। आदित्य, द्यौ, अन्तरिक्ष और पृथ्वी सभी परिमंडल हैं। [परिमंडल का अर्थ यह है कि यह आकाश में स्थित है।]

इसके बाद सूर्य आदि लोकों से विकीर्ण होने वाले परमाणु आकाश में आइनोस्फियर की परतें किस प्रकार कितने बनाते हैं- उसका भी उल्लेख ब्रह्माँड पुराण में मिलता है-

अर्थात् पृथिवी मंडल के चारों ओर घन तोय [जलवाष्प] उससे ऊपर की पर्त घन तेज, उसके ऊपर तिर्यक और ऊर्ध्व घनवात [क्षीण ऑक्सीजन वाले पवन] उससे ऊपर आकाश और अन्तरिक्ष है। इस तथ्य को हम आयनोस्फियर लेख में, अखंड-ज्योति में पहले प्रकाशित कर चुके हैं।

शतपथ ब्राह्मण में पृथिवी ‘अग्निगर्भा पृथिवी’ (14। 9। 4। 21) अर्थात् पृथ्वी के गर्भ में अग्नि दाह है। ‘माता पुत्रं यथोपस्थे साग्निं बिभर्तु गर्भ आ’ (यजुर्वेद 11। 57) अर्थात् जिस प्रकार माता अपने गर्भ में पुत्र को धारण करती है, पृथ्वी ने अग्नि को धारण किया है। यह तथ्य कितने सत्य हैं इसका प्रमाण प्रसिद्ध भूगर्भशास्त्री श्री गैस्मो ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘पृथ्वी की आत्मकथा’ (बायोग्राफी आफ दी अर्थ) के पेज न. 27-28 में इस तरह किया है-

“पृथिवी कभी पिघली चट्टानों का गोला थी। पृथिवी के अन्दर के अध्ययन से पता चलता है कि भीतर का अधिकाँश भाग अभी भी पिघली दशा में है। ऊपर की ठोस भूमि पतली चादर की तरह है। यह चादर एक प्रकार से पिघले तरल पदार्थ पर तैर रही है। जितना पृथिवी के भीतर धंसते जायें तो प्रति 1000 फुट नीचे का ताप 16 डिग्री फारेनहाइट ताप बढ़ जाता है। दक्षिण अफ्रीका की रोबिन्सन खान अब तक सबसे अधिक गर्म पाई गई है। उसकी दीवारों की गर्मी मनुष्य को भाड़ में चने की तरह भून सकती है। पृथिवी का 97 प्रतिशत भाग पिघली दशा में है।’

यह अग्नि ही कभी-कभी ज्वालामुखी के रूप में फूट पड़ती है तो विनाश के दृश्य भी दिखाई देने लगते हैं अन्यथा यह अधिकाँश प्राणियों की जीवन रक्षा में ही प्रयुक्त होती है। समुद्र से बनाकर वर्षा कराना तथा वनस्पतियों को जन्म देना इसी भूमिगत ऊष्मा का ही काम है।

कपिष्ठल 41। 7 में-

तस्मादग्निर्मध्यत औषधीः प्रविष्टः।

इस अग्नि से ही औषधियाँ उपजती हैं। शतपथ ब्राह्मण 2। 2। 4। 5 में भी बताया गया है कि पृथ्वी के आग्नेय परमाणुओं को ग्रहण करके ही वृक्ष और वनस्पतियाँ उगते और बड़े होते हैं। सभी वृक्षों में आग्नेय परमाणु और जल परमाणु पाये जाते हैं। जल परमाणु हवा में विस्तृत हो जाते हैं तब काठ अधिक ज्वलनशील और अग्निकणों की उपस्थिति के कारण ही हो जाता है।

यह व्याख्यायें यह बताती हैं कि पृथ्वी को देवता और पंचतत्व के रूप में पूजा-प्रतिष्ठा देने में भारतीयों ने केवल श्रद्धा ही नहीं, विज्ञान का भी पूर्ण सहारा लिया है। पर प्रत्येक वस्तु की चेतना के लाभ को सर्वोपरि महत्व देने के कारण इन स्थूल विवेचनाओं की ओर उतना ध्यान नहीं दिया गया जितना भावात्मक प्रसंगों की ओर। शक्ति के उपादानों की ओर बढ़ता हुआ आज का विज्ञान हमारी इस धारण का समर्थन ही करता है क्योंकि उसके पीछे हमारी दृष्टि स्थूल नहीं, विराट् रही है और विज्ञान भी अब विराट् की ओर ही बढ़ रहा है।

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चिड़ियों की तरह हवा में उड़ना और मछलियों की तरह पानी में तैरना सीखने के बाद अब हमें इन्सानों की तरह पृथ्वी पर चलना सीखना है।

-राधाकृष्णन

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दान और परोपकार की महत्ता

“कर्ण तुम्हें अच्छी तरह समझ लेना चाहिये कि मैं जो कवच और कुण्डल तुमसे दान ले रहा हूँ उसे दे देने के बाद काल तुम पर कभी भी आक्रमण कर सकता है?” ब्राह्मण वेशधारी इन्द्र ने सावधान किया।

किन्तु कर्ण ने उत्तर दिया- “विप्रवर! वसुषेण इस बात को अच्छी तरह जानता है पर जो दान और परोपकार की महत्ता को पहचानता है, उसके लिये प्राणों का मोह कोई बाधा नहीं।”

यह कहकर कर्ण ने कुण्डल और कवच उतारे और इन्द्र को सौंप दिये।


समय और चेतना से उठकर आम-चेतना के दर्शन

धर्म-अधर्म, आस्तिकता-नास्तिकता, आध्यात्म और अनात्म का द्वन्द्व बहुत दिनों से चल रहा हैं। धर्म की आवश्यकता और ईश्वर के अस्तित्व के लिये लोगों की मान्यतायें ऐसी जटिल हो गई हैं कि उनकी अनुभूति करना कराना वस्तुतः एक बड़ी समस्या हो गई है। मनुष्य अपने पूर्वाग्रह अर्थात् वह जिस स्थिति में है उसे छोड़ने के लिये तैयार नहीं और ईश्वरीय नियम भी अपने आप में इतने अटल और अविचल हैं कि वह भी अपने स्थान से एक इंच हटने को तैयार नहीं। पूर्वाग्रह या मनुष्य द्वारा अपने स्थूल रूप को सब कुछ मान लेने की धारणा और ईश्वरीय नियमों की अटलता के बीच ऐसी रस्साकशी उठ खड़ी हुई है कि मनुष्य यह भी सही-सही नहीं जान पा रहा है कि उसका और संसार का वास्तविक स्वरूप क्या है?

भारतीय धर्म और आध्यात्म में मनुष्य को जीवन सम्बन्धी यथार्थ की अनुभूति कराने की सामर्थ्य है किन्तु विभिन्न मत-मतान्तरों, विज्ञान में विश्वास और व्यक्ति की आसक्ति प्रवृत्ति के कारण धर्म एक ऐसी विवादास्पद धारणा बन गई है जिस पर विश्वास करने से पूर्व ही प्रबुद्ध वर्ग कतरा जाते हैं। उन्हें सापेक्षवाद (थ्योरी आफ रिलेटिविटी) के आधार पर यथार्थ की अनुभूति कराया जाना सम्भव है।

हम विश्व के यथार्थ को क्यों नहीं समझ पाते? महा अणु विज्ञानी आइन्स्टीन अपने सापेक्षवाद सिद्धाँत (थ्योरी आफ रिलेटिविटी) के द्वारा उत्तर देते हैं- “हमारे साधारण विचार, समय और पदार्थमय हो गये हैं [वी आर बाउण्ड टु टाइम एण्ड स्पेस]। हम इनसे मुक्त नहीं हो पा रहे। किन्तु हमारा समय और स्थान या पदार्थ से बँध जाना समस्त प्रकृति या विराट् जगत् का दर्शन कराने में असमर्थ है। हम प्रकृति की वास्तविकता को तभी पहचान सकते हैं जब समय और स्थान [टाइम एण्ड स्पेस] से हम ऊपर उठ जायें।”

समय और स्थान क्या है? यह वास्तव में कुछ भी नहीं हैं, हमारे मस्तिष्क की कल्पना या रचना मात्र हैं। लोग कहा करते हैं कि- मैं आठ बजकर आठ मिनट पर घर से निकला, मेरी सगाई 2 जुलाई को सायं सात बजे हुई, राम और श्याम में परसों दोपहर 12 बजे लड़ाई हो गई, किशोर ने मई सन् 1955 में हाई स्कूल में परीक्षा दी आदि आदि। इन वाक्यों को ध्यान से कई बार पढ़ें तो हमें मालूम होगा कि प्रत्येक समय किसी-न-किसी घटना से जुड़ा हुआ है। समय दरअसल कोई वस्तु ही नहीं है। यदि कोई घटना या क्रिया न हुई होती तो हमारे लिये समय का कोई अस्तित्व ही नहीं होता। आठ बजकर आठ मिनट, सात बजे, मई सन् 1857, परसों-यह सब घटनाओं की सापेक्षता (रिलेटिविटी) मात्र है। जिसे हम 1957 कहते हैं उसे हम सम्वत् 2015 भी कह सकते हैं। शक सम्वत् के हिसाब से वह कोई और ही तिथि होगी, आर्य सम्वत् प्रणाली के अनुसार वह और ही कुछ होगा क्योंकि वे लोग समय की माप उस अवस्था से करते हैं जब से यह पृथ्वी या पृथ्वी में जीवन अस्तित्व में आया। कल्पना करें कि पृथ्वी का अस्तित्व ही न होता तब हमारे लिये समय क्या रह जाता-कुछ भी तो नहीं। यदि हम घटनाओं से परे हो जायें तो समय नाम की कोई वस्तु संसार में है नहीं। ऐसी कल्पना तभी हो सकती है जब हम सारा चिन्तन, क्रिया-कलाप छोड़कर मस्तिष्क बन जायें या मस्तिष्क में केन्द्रीभूत हो जायें अर्थात् समय मस्तिष्क की रचना के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। जब हम अपने आपको समय के ऊपर उठकर देखते हैं तो हमें अपनी मस्तिष्कीय चेतना के अतिरिक्त कुछ भी दिखाई नहीं देता, तब हमारा सही रूप से एक भिन्न व्यक्तित्व होता है। तब हम लगातार विचार, ज्ञान, अनुभूति या प्रकाश की किरण के समान हो जाते हैं और स्थूल शरीर के प्रति अपना मोह-भाव समाप्त हो जाता है। माँडूक्य कारिका [2। 14] में इसी बात को शास्त्रकार ने यह शब्द दिये हैं-

चित्तकाला हि येऽन्तस्तु द्वय कालाश्च ये बहिः।

कल्पिता एव ते सर्वे विशेषो नान्यहेतुकः॥

“हे शिष्य! यह संसार वास्तव में चित्त की अनुभूति और घटनाओं की सापेक्षता मात्र है, सब कुछ कल्पित है। दृश्य संसार में विशेषता कुछ भी नहीं है।”

महर्षि पातञ्जलि ने यही तथ्य इस तरह प्रतिपादित किया है-

-पातञ्जलि योग दर्शन 3। 52

जब हम अपना ध्यान समय के अत्यन्त छोटे टुकड़े क्षण में जमाते हैं तभी संसार की सही स्थिति का निरीक्षण कर सकते हैं।

समय की भाँति ही मनुष्य के सामने आने वाली सभी वस्तुयें भी सापेक्ष हैं। भौतिक पदार्थ साधारणतया कोई अपरिवर्तनीय [एब्सोल्यूट] मूल्य नहीं रखते वरन् चुने गये प्रसंग के अनुसार मूल्य रखते हैं। उदाहरण के अनुसार आप जिसे मिट्टी कहते हैं, यदि उसे आप किसी रसायनज्ञ के पास ले जायें तो वह उस ढेले का रासायनिक विश्लेषण [केमिकल एनालिसिस] करेगा और बतायेगा इसमें इतना भार इस धातु के कण, इतना नमक है, इतना पानी और अमुक-अमुक गैसों के समूल कण। इस तरह हमें दिखाई देने वाले सभी भौतिक पदार्थ वैज्ञानिकों की दृष्टि में कार्बनिक [आर्गेनिक] या अकार्बनिक [इनार्गेनिक] कण मात्र होते हैं। उन्हीं से यह सारा संसार बना है।

संसार परमाणुमय है। परमाणुओं के मिलने से पदार्थ बनते हैं और पदार्थों से मिलकर स्थान, देश और ब्रह्माँड बने। इस ब्रह्माँड को ही हम पदार्थों के रूप में खाते हैं, पहनते हैं, उसी में रहते हैं। हमारा शरीर भी तो पदार्थ या परमाणुओं से बना हुआ है। यह भी एक प्रकार का ब्रह्माँड ही है। आइन्स्टीन ने सम्भवतः शरीर रूपी पदार्थ जगत् [स्पेस] में एक मस्तिष्कीय सतर्कता होने के विश्वास स्वरूप अपना यह मत व्यक्त किया था कि प्रत्येक ब्रह्माँड को एक सतर्कता [सेन्टीमेन्ट] नियन्त्रण करती है अर्थात् पृथ्वी की या प्रत्येक ग्रह-नक्षत्र की अपनी एक स्वतन्त्र चेतना या अहंभाव है और वह मनुष्य के समान ही गणितीय आधार पर [इन दि मैथेमेटिक वे] काम करती रहती है अर्थात् संसार मस्तिष्क द्वारा पदार्थों की रचना के अतिरिक्त कुछ है ही नहीं।

हम जब तक अपने स्थूल रूप से देखते हैं तब तक संसार की स्थूलता दृष्टिगोचर होती है लेकिन यहाँ भी किसी प्रकार की सत्यता नहीं है। प्रत्येक परमाणु संसारमय है अर्थात् हर परमाणु की रचना एक भरे-पूरे संसार जैसी है उसमें पूरे के पूरे संसार के दर्शन कर सकते हैं और उस पर भी मस्तिष्क [सतर्कता] बैठा हुआ होता है। वैज्ञानिक पद्धति से विश्लेषण करने से पता चलता है कि परमाणु भी अन्तिम सत्य नहीं है वह और भी सूक्ष्म आवेशों-इलेक्ट्रान, प्रोट्रॉन, पाजिट्रान और न्यूट्रॉन से बना होता है। जो समझाने के लिये उन्हें बिन्दु के रूप में दिखाया जाता है किन्तु इलेक्ट्रान पदार्थ नहीं, तरंग रूप [वेविकल शेष] में हैं। अर्थात् हम जिन पदार्थों को देख रहे हैं, यदि अपने देखने की स्थूलता हटा दें और केवल मस्तिष्क से हटा दें तो वह एक तरंग के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है अर्थात् हम जिस संसार को स्थूल रूप में देख रहे हैं वह तो हमारा दृष्टिदोष है। क्वांटम सिद्धाँत [थ्योरी आफ लाइट क्वांटम] के अनुसार जो वस्तु कण के रूप में है वह उसी प्रकार से तरंग के रूप में है। साधारण अवस्था में हम उसे ठीक तरंग रूप में नहीं देख पाते। उसका और कोई कारण नहीं वरन् हमारे मस्तिष्क का पदार्थ से बँधे रहना मात्र होता है।

इस सब जानकारी का उद्देश्य मनुष्य को विभ्रमित या आश्चर्यचकित करने का नहीं है वरन् उसके दृष्टिकोण को चौड़ा करना है, जिससे वह अपने शाश्वत स्वरूप को समझाने की चेष्टा कर सकता है। हम अपने आपको कितना ही धोखा दें, कितना ही शरीर, समय और स्थान में बँधे हुए देखे पर हमारा विशुद्ध ‘अहंभाव’ [शाश्वत स्वरूप] तो अपने नियमों से विचलित होने वाला हैं नहीं। तब फिर हमारे लिये अपने आपको पदार्थों की सीमा में बाँधना कहाँ तक उचित होगा? कहाँ तक हम अपने मनुष्य-जीवन में आने के लक्ष्य को न पहचानने की भूल करते रहेंगे?

पदार्थ या स्थान और समय में कोई सत्यता नहीं है। कोई भी निश्चित एक ब्रह्माँड नहीं है, जिसमें कि संसार समा सके। अनेक ब्रह्माँड है और वह सब मस्तिष्क में समाये हुए हैं। एक कण प्रकृति का एक अहंभाव, चेतनता या परमेश्वर का दो ही अनादि तत्त्व हैं। उनका विस्तृत ज्ञान जब तक नहीं जिसमें मनुष्य इसे साँसारिक भूल-भुलैया में ही गोते लगाता रहेगा। क्योंकि हम जिस सुख-शाँति, सन्तोष और आनन्द की खोज में है वह पदार्थ में मस्तिष्क की अपनी अनुभूति है इसलिए यथार्थ आनन्द की प्राप्ति भी स्थान और समय से ऊपर उठकर ही प्राप्त नहीं की जा सकती है।

कोई मूलभूत समय भी नहीं है जिसमें कोई घटना घटित हुई है। निरीक्षण के अनुभव ही समय की रचना करते हैं और इसी समय से हम ब्रह्माँड को, स्थान को, अपने जीवन को नापते हैं। यदि हम अपने मस्तिष्क को समय से ऊपर उठा दें तो अपने अमरत्व की अनुभूति ही नहीं पदार्थ और ब्रह्माँडों के स्वामी बनते चले जा सकते हैं। हमारा मस्तिष्क अर्थात् हम स्वयं ही सदैव ही जागरुक रहते हैं। परिवर्तनीय तो यह जड़ या प्रकृति परमाणु ही हैं और जब तक हम अपने आप में समाहित नहीं होते, प्रकृति पर न तो नियन्त्रण कर सकते हैं और न ही उसका उपयोग।

उपर्युक्त सम्पूर्ण विवेचन अल्बर्ट आइन्स्टीन के सापेक्षवाद [थ्योरी आफ रिलेटिविटी] की व्याख्या मात्र हैं। इसे उन्होंने गणित के द्वारा सिद्ध किया है। उन्होंने यह सिद्ध कर दिखाया कि एक सरल रेखा का सरल या सीधा होना आवश्यक नहीं। संसार अण्डाकार है। ब्रह्माँड सीमारहित है किन्तु अनन्त नहीं, और भी ब्रह्माँड हैं जिनका ज्ञान पाना मानवीय बुद्धि के लिये सम्भव नहीं है। प्रकाश-कणों में भार होता है, जबकि भार पदार्थ में ही सम्भव है शक्ति में नहीं (स्मरण रहे-प्रकाश पदार्थ नहीं, शक्ति माना गया है) मस्तिष्क प्रकाश से बना है। इस तरह यह साबित होता है कि इस संसार में प्रकृति और परमात्मा, प्रकाश और पदार्थ, मस्तिष्क और चेतना दोनों अभिन्न हैं। मनुष्य-शरीर एक छोटा ब्रह्माँड और अपना मस्तिष्क छोटा परमात्मा-हमारी अपने ज्ञान और स्थूलता के आधार पर होती है जो समय, स्थान की सीमा में बँधी होती है। यदि हम समय और पदार्थ या स्थान के बन्धनों को तोड़कर देखें तो हम अपने को शाश्वत, चिरंतन, चिन्मय, विराट् और परमात्मा के रूप में देख सकते हैं। इसी बात को महर्षि रमण इन शब्दों में कहते हैं-

भाति दिक्काल कथा विनाऽस्मान्।

दिक्काल लीलेहि वपुर्वयं चेत्॥

न क्वापि भामौ न कदापि भामौ।

वयं तु सर्वत्र सदा च भामा॥

“ऐसा कौन-सा स्थान है, ऐसा कौन-सा समय है जहाँ पर मैं मौजूद नहीं। शरीर, समय और स्थान में रहता है लेकिन मैं किसी स्थान या समय में नहीं हूँ। प्रत्येक स्थान में, प्रत्येक समय में मैं हूँ।”

इसी बात को माँडूक्य कारिका 2।24 में- “काल इदि काल विदो दिश इति च तहिदः”- मैं समय हूँ और हर क्षण को जानता हूँ, मैं सर्वत्र हूँ और सर्वज्ञ भी- ऐसा कहा है। गीता 11।30 में “कालोऽस्मि”- मैं ही काल हूँ- काल है।

हम क्या हैं? कितने विस्तृत और शक्तिमान् हैं हमारे ज्ञान की सीमायें कितनी विराट् हैं? इसे हम समय और स्थान की सीमा से ऊपर उठकर ही जान सकते हैं। यही मनुष्य जीवन का लक्ष्य है। जो इसे नहीं जानता वही तुच्छ है, आसक्ति और दुःखों में अपने आपको जकड़ रहा है। जो इस स्थूल दृष्टि-दोष से छूटा वह संसार का यथार्थ ज्ञान पा गया, बन्धन-मुक्त हो गया, परमैश्वर्य को प्राप्त कर लिया।


संख्या नहीं; समर्थता जिन्दा रहेगी।

सारे विश्व में सबसे अधिक उत्पादन यदि किसी वस्तु का बढ़ रहा है तो वह है मनुष्य का उत्पादन। घड़ी में लगी सेकेण्ड की सुई इधर टिक करती है उधर संसार में कहीं-न-कहीं तीन बच्चे जन्म ले लेते हैं। एक सप्ताह गुजरता है तब जनसंख्या के पुराने आँकड़ों में 20 लाख शिशुओं की वृद्धि हो जाती है। इसलिए कोई भी जनसंख्या-विशेषज्ञ पृथ्वी की जनसंख्या की शत-प्रतिशत जानकारी कभी दे ही नहीं सकता। जितनी देर में वह एक वाक्य बोलेगा उतनी देर से ही एक सो बच्चों की संख्या और बढ़ जायेगी।

सृष्टि के आदि काल से लेकर सन् 1830 तक सारी धरती की जनसंख्या कुल एक अरब हुई, पर इसके बाद से विज्ञान की प्रगति से होड़ लेती हुई जनसंख्या भी इतनी तेजी से बढ़ी कि अगली एक शताब्दी में ही वह दुगुनी अर्थात् 2 अरब हो गई। इसके बाद तो वृद्धि और भी तीव्र हुई- 1830 के बाद कुल 30 वर्ष में ही आबादी 3 अरब हो गई। यदि इस क्रम को रोका न गया तो इस शताब्दी के अन्त तक अर्थात् सन् 2000 तक विश्व की जनसंख्या 6 अरब 20 करोड़ होगी और तब सारा संसार एक बार विस्फोट के लिये तैयार होगा। महाप्रलय अगले 30 वर्षों में कब हो जाये, कुछ कहा नहीं जा सकता।

इस बेतहाशा वृद्धि का देखकर ही माल्थस को चिन्ता हुई थी और उन्होंने जनसंख्या पर एक सुविख्यात शोधकार्य किया जो आज सारे विश्व में ‘माल्थस का जनसंख्या सिद्धाँत’ (माल्थस थ्योरी) के नाम से प्रसिद्ध है। माल्थस ने जनसंख्या वृद्धि की गम्भीरता का दिग्दर्शन कराते हुए लिखा है- “जनसंख्या गुणोत्तर क्रम (ज्योमेट्रिकल प्रोग्रेशन) की दर से अर्थात् 1 से 2। 2 से 4। 4 से 8। 8 से 16। 16 से 32। 32 से 64। 64 से 128 के हिसाब से बढ़ती है, जबकि उत्पादन समान्तर क्रम (अरिथमेटिकल प्रोग्रेशन) अर्थात् 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7 के हिसाब से बढ़ता है। इस हिसाब से पहले वर्ष 1 व्यक्ति था तब उसके लिये 1 यूनिट अन्न की आवश्यकता थी जो उसके उदर-पोषण के लिये पर्याप्त था। तीसरे वर्ष व्यक्ति हो गये 8 पर अन्न उत्पादन की यूनिट 3 ही रही। पाँच व्यक्तियों के लिये अन्न का जो दबाव पड़ेगा, उसके लिये शिक्षा, स्वास्थ्य, वस्त्र, मकान और मनोरञ्जन आदि के साधनों में कटौती करके भरण-पोषण की समस्या पूरी करनी पड़ेगी। प्रत्येक अगले वर्ष यह जटिलता बढ़ती ही जायेगी। 7 वर्ष बाद जहाँ खाने के लिये जनसंख्या 128 होगी वहाँ उत्पादन कुल 7 ही यूनिट होगा। तात्पर्य यह कि 121 व्यक्ति बेरोजगारी, भुखमरी, बीमारी और निरक्षरता की समस्या से जन्मजात पीड़ित होंगी और वह सब मिलकर उनको असुरक्षा की समस्या से पीड़ित कर रहे होंगे। उत्पादन का यह अनुपात अन्न के क्षेत्र में ही नहीं, वस्त्र आदि आत्म-सुरक्षा और आत्म-विकास के क्षेत्र में भी होगा। इस तरह संकट प्रत्येक क्षेत्र में बढ़ेंगे। बेरोजगारी, भुखमरी, अशिक्षा और अनुशासनहीनता का वह स्वरूप आज स्पष्ट देखा जा सकता है।

सम्भवतः इन आँकड़ों के आधार पर ही डॉ. वी.आर.सेन (जो पहले भारत के खाद्य मन्त्रालय के सचिव थे, सन् 1966 में जो संयुक्त राष्ट्रीय खाद्य एवं कृषि संगठन के महानिर्देशक नियुक्त हुए थे) ने कहा था- ‘यह माना गया है कि संसार में तब तक स्थायी शान्ति और सुरक्षा कायम नहीं हो सकती जब तक भुखमरी और अभाव को खत्म न कर दिया जाये। वस्तुतः व्यक्तियों का स्वास्थ्य और सुख ही नहीं, वरन् एवं लोकतन्त्री समाज का अस्तित्व भी खतरे में हैं। अगले 14 वर्ष मानवीय इतिहास में अत्यधिक नाजुक होंगे। या तो हम उत्पादकता बढ़ाने और जनसंख्या न बढ़ने देने के लिये सब सम्भव प्रयत्न कर लें अन्यथा हमें अभूतपूर्व रूप से विशाल विपत्ति का सामना करना होगा।’

यह कथन शेख चिल्ली के विवाह की कल्पना नहीं वरन् एक सत्य है जो हमें आगामी दिनों किसी भयंकर विस्फोट के लिए तैयार रहने को सावधान करता है। प्रकृति के कोष में सीमित सामग्री है, वह असीमित लोगों के पेट नहीं भर सकती। इसलिए उसने एक सिद्धाँत बना लिया है कि जो भी जातियाँ दीवाली में आतिशबाजी के साँप की तरह बढ़ती हैं उनको नष्ट किया जाता रहे। मक्खी और मछलियाँ संसार में सबसे अधिक बच्चे पैदा करती हैं। यदि प्रकृति भी उनका संहार तेजी से न करती तो आज इन मक्खियों और मछलियों के रहने के लिये 10 करोड़ ऐसी ही धरतियों की आवश्यकता पड़ती जैसी अपनी पृथ्वी है।

एक हाथी मरने से पूर्व केवल 6 हाथी पैदा कर जाता है। यदि प्रकृति उन पर नियन्त्रण न करती तो संसार में हाथी ही हाथी होते। आस्ट्रेलिया में खरगोश बहुतायत से पाये जाते हैं। वहाँ छोटे-छोटे गड्ढों में पानी के लिये ही उनमें भयंकर युद्ध होता है और यादवों की सेना की तरह आपसी रक्तपात में ही उनका विनाश होता रहता है।

मनुष्य भी ऐसे ही विनाश के कगार पर आ पहुँचा है। संसार में जो भी जातियाँ अधिक प्रजनन वाली थीं वह अविकसित और पददलित ही नहीं हुई, नेस्तनाबूद भी हो गई। योरोप में पाई जाने वाले ‘डायनोसरस’ और ‘ब्रान्टोसरान’ जातियाँ जिनके पहले राज्यों-के-राज्य बसे थे, अब उनका एक भी आदमी संसार में देखने को भी नहीं मिलता। उनकी स्त्रियों को दूसरी समर्थ जातियों ने हड़प लिया और वे आपस में ही खाने-पहनने के नाम पर लड़-झगड़ कर नष्ट हो गई। जबकि थोड़े-से संयमी इजरायल और कजाख संख्या में थोड़े होने पर भी संसार में गौरवपूर्ण स्थान बनाये हैं। ‘जनसंख्या नहीं-समर्थता जिन्दा रहती हैं’ के सिद्धाँत को इन उदाहरणों द्वारा अनुभव किया जा सकता है। अभी युद्ध हुआ और इजराइल जिनकी संख्या कुछ लाख ही है, ने कई करोड़ अरबों को 7 दिन में परास्त करके रख दिया।

सूअर सबसे अधिक बच्चे देने वाला जानवर है। उसे अपना उदर-पोषण घृणित साधनों से ही करना पड़ता है। स्वयं भी बहुत कमजोर होता है दूसरी ओर ‘शेर’ बहुत ही कम बच्चे देता है, उसकी शारीरिक क्षमता इतनी प्रचण्ड होती है कि जब दहाड़ता है। किंवदन्ती है कि उसे आशंका रहती है कि मेरी दहाड़ से कहीं पृथ्वी न फट जाये। इस विशेष दहाड़ को ‘नाकी’ कहते हैं- जब वह दहाड़ भरता है तो उस क्षेत्र के सारे पेड़-पौधे और पृथ्वी तक काँप जाती है। भारतीयों की संख्या तब थोड़ी ही थी पर हमने संयमित और ब्रह्मचर्यपूर्ण जीवन के कारण वह शक्ति पाई थी जब हिमालय पर खड़े होकर दहाड़ते थे तो सारा एशिया काँप जाता था। हमारी वाहिनियाँ अमेरिका तक चली जाती थी और उन्हें जीतकर लौटती थी। अधिक सन्तान वाली जातियाँ होती हैं वे तो 1. जल्दी ही समाप्त हो जाती हैं। 2. कमजोर होती हैं। 3. अव्यवस्थित होती हैं इसलिये ये संघर्ष और प्रतिस्पर्धा में सबसे पिछड़ी रहती हैं।

माल्थस ने जनसंख्या रोकने के दो उपाय बताये हैं- 1.पॉजिटिव चेक 2. प्रिवेन्टिव चेक। पहले का आशय उपर्युक्त कथन से ही है। माल्थस कहते हैं- जनसंख्या बढ़ती है तो लोग पत्ते खाने को तरसते हैं। फिर प्रकृति अकाल, महामारी, भुखमरी आदि से उनका स्वयं संहार कर देती है।

प्रिवेन्टिव चेक का तात्पर्य यह है कि मनुष्य स्वयं निरोध कर ले। उससे वह सुरक्षित रह सकता है। इसमें प्रतिबन्धात्मक निरोध, जिसमें परिवार नियोजन के सारे साधन आते हैं। पहला उपाय है। दूसरा और सबसे अच्छा उपाय यह है कि मनुष्य संयमित जीवन बिताये पर इसके लिये उसे रचनात्मक दिशा की आवश्यकता होगी अर्थात् उसे मनोरञ्जन के ऐसे साधन देने होंगे जो काम-सुख की तुलना में कहीं अधिक आकर्षक हों।

प्रतिबन्धात्मक रोक-थाम को माल्थस ने भी बुरा माना है और बताया है कि कृत्रिम साधनों से परिवार-नियोजन करने वाली जातियाँ मनोवैज्ञानिक दृष्टि से कमजोर होती हैं। लूप, निरोध, नसबन्दी आदि की चर्चा करने से आत्म-हीनता के भाव आते हैं जबकि सरकारी मशीनरी के हाथ में यह साधन हों तब उसके दुरुपयोग की और भी आशंका रहती है, जैसा कि इन दिनों हो रहा है। आज का परिवार नियोजन कार्यक्रम चारित्रिक अवस्थाओं को सबसे अधिक चरमरा देने वाला आयोजन है। बिनोवा जी ने तो उसे ‘मातृत्व की विडंबना’ कहकर पुकारा है। यदि इन कृत्रिम साधनों की चर्चा बन्द न हुई तो हम अपना सम्पूर्ण आध्यात्मिक, धार्मिक एवं साँस्कृतिक गौरव तक खो सकते हैं।

इन साधनों से स्वास्थ्य बिगड़ता है। कृत्रिम साधन नये-नये रोगों को जन्म देते हैं। अनेक महिलायें रक्तस्राव से पीड़ित हुई, अनेकों को दूसरी बीमारियाँ।

कृत्रिम साधन कामुकता और अनैतिक आचरण को प्रोत्साहन देते हैं। यौन-समस्या शारीरिक कम मानसिक अधिक है। कृत्रिम साधन लोगों को मानसिक दृष्टि से विभ्राँत और विक्षिप्त बनाते हैं। सामान्य चर्चा से काम-स्वेच्छावाद भड़कता है। सामाजिक मर्यादायें टूटती हैं। साँस्कृतिक मूल्य बदल जाते हैं।

माल्थस के इस कथन की सत्यता को आज हम प्रत्यक्ष देख रहे हैं। सिनेमा के भद्दे अभिनय, गन्दे गीत और अश्लील दृश्य यह बताते हैं कि आज समाज की मनोवृत्ति ऐसी ही है। अधिकाँश जनता यही देखना चाहती है। इसमें फिल्म-निर्माताओं का उतना दोष नहीं है- उनकी आदर्शवादी फिल्में लोग देखना पसन्द ही नहीं करते जबकि सस्ते ड्रामे रिपीट-रिपीट कर देखने में लोगों को प्रसन्नता होती है। यह साँस्कृतिक मूल्य, सामाजिक मनोवृत्ति के कारण ही बदले हैं।

माल्थस ने सबसे अच्छा उपाय समाज और भावी पीढ़ी को रचनात्मक दिशायें देने को माना है। परिवार नियोजन कार्यक्रमों को हटाकर यह शक्ति समाज-कल्याण को दे देनी चाहिए और उनका कार्यक्षेत्र गाँव-गाँव 1. खेलकूद और व्यायामशालायें 2. पाठशालायें 3. लघु कुटीर उद्योग 4. साँस्कृतिक आयोजन आदि तक बढ़ा देना चाहिए। मालवीय जी के मन में यह योजना थी- वे गाँव-गाँव में पाठशालायें, व्यायामशालायें और साँस्कृतिक आयोजनों के मण्डल और पीठ स्थापित करने का एक विधिवत् आन्दोलन चलाना चाहते थे। उससे लोगों को स्वस्थ मनोरञ्जन मिलता और वर्तमान काम-प्रवृत्ति से लोगों का ध्यान टूटता।

महामना मालवीयजी की इस आकाँक्षा को अब पूरा किया जाय तो हम जनसंख्या रोकने में सात्विक ढंग की सफलता प्राप्त कर सकते हैं, और तो न रोकने का परिणाम वही होगा जो इस लेख की प्रारम्भिक पंक्तियों में दर्शाया गया है।


पार्थिव सुखोपभोग

यूनाइटेड स्टेट्स से अर्जेन्टाइना तक चूहे की आकृति का एक ओपोसम जन्तु पाया जाता है। उसकी पूँछ बहुत लम्बी होती है। अपनी पूँछ को लपेट कर यह घन्टों डालों में लटका झूलता रहता है।

मादा ओपोसम को प्रकृति ने 13-13 स्तन दिये हैं। किन्तु उसकी प्रजनन क्रिया इससे भी बढ़कर है। ओपोसम एक बार में 18-18, 20-20 तक बच्चे देती है। इतने अधिक स्तन होने पर सब बच्चों को दूध पीने के लिये एक-एक भी स्तन नहीं मिलता, फलस्वरूप भाइयों में आपस में ही युद्ध होता है। इस संघर्ष में प्रति प्रसव 14-15 बच्चे मर जाते हैं जो प्रारम्भ से ही कुछ शक्तिशाली होते है वही 4-5 जीवित रह पाते हैं।

इसी प्रकार आज जनसंख्या कितनी ही बढ़े पर अन्ततः पार्थिव सुखोपभोग समर्थ ही प्राप्त करेंगे।


प्रयोग कितने उत्पीड़क

जीवित खरगोश को मारकर उसकी आँत निकाल लेते हैं और उस पर नव निर्मित दवाइयों का प्रभाव देखते हैं। चिकित्सा-अनुसन्धान के क्षेत्र में ऐसी हिंसा तो सामान्य बात है। कुत्ते के दिल, मेंढक के दिल, कबूतर के दिल और गिनीपिग के गर्भाशय (यूट्रस) में भी दवाओं के प्रभाव देखे जाते हैं। उन परीक्षणों के समय इन जीवों को जो मर्मान्तक पीड़ा होती है उसका वर्णन नहीं हो सकता।

अमेरिका की एक प्रयोगशाला में खरगोश का कान काटकर कोशिकाओं (कैपिलरी) पर दवा का प्रभाव देखा जा रहा है। दवा इतनी तीक्ष्ण थी कि प्रत्येक बार के प्रयोग से खरगोश टट्टी-पेशाब कर देता, उसकी चीख सुनकर बाहरी लोगों के रोंये खड़े हो जाते पर उन्हें तब भी कुछ दया न थी जो उन पर दवाओं के नाम पर यह क्रूर अत्याचार कर रहे थे।

आँख की औषधियों की जाँच के लिये खरगोश की आँखों की पुतलियों पर दवायें छोड़ी जाती हैं। कई बार तो उनकी जिन्दा आँखें बाहर निकल आती हैं। बेचारे जीव की जान जाती है और उसकी पुतली के घटने-बढ़ने से वैज्ञानिक अपना अनुमान लगाते हैं। इतना ही नहीं, खरगोश और गिनीपिग के शरीर छील दिये जाते हैं। छीलना बालों का नहीं खाल का होता है। खून चहचहा आता है तब उस पर दवायें लगाकर उनका हिप्नोटिक रिएक्शन देखा जाता है। फिर उस कटे हुए स्थान पर सुइयाँ चुभोकर देखते हैं कि चिल्लाता है या नहीं। हमारे एक काँटा लग जाता है तो आंखें छलछला आती हैं और सृष्टि के इन निरीह जीवों को औषधि के नाम पर इस तरह क्रूर अत्याचार किया जाता है, इस पर किसी की दृष्टि नहीं दौड़ती। आज का मनुष्य इतना अशाँत आत्मा को तड़पाने के कारण ही है। वह दिन-प्रतिदिन निर्दयी बनता जा रहा है। मनुष्य-मनुष्य में ही प्रेम-भाव नहीं है। उसे यदि इन जीवों का शाप न भी कहा जाये तो इतना तो निश्चित ही है कि इन प्रयोगों से आज का मनुष्य इतना तक निष्ठुर हो सकता है कि वह कल मनुष्यों के भी गले घोटने लगे। ऐसा होने भी लगा है, इसका हृदयस्पर्शी वर्णन अखण्ड-ज्योति के अगले पृष्ठों में करेंगे जबकि डाक्टरों ने माताओं के गर्भ से जीवित भ्रूण धोखा देकर निकाला और प्रयोग के बाद उसे एक तरफ फेंक दिया।

डिजी टेलिस औषधियों जो हृदय-रोगों के लिये बनाई जाती हैं, उनका प्रभाव कबूतरों पर देखा जाता है। दर्जनों कबूतरों पर एक साथ यह औषधि इन्जेक्शन कर दी जाती है। इन्जेक्शन देने के बाद यदि आधे से अधिक कबूतर मर जाते हैं तो यह माना जाता है कि दवा अच्छी बन गई अन्यथा उसे फिर से बनाते हैं। रोग प्रकृति की नहीं, मानव स्वभाव की विकृति है। अपने बुरे आचरण का दण्ड मनुष्य को भोगना ही चाहिए, चाहे वह शूल के रूप में हो या बीमारी के रूप में। उसे अपने खातिर जीव-हत्या करने का अधिकार नहीं है। यदि वह बलात् ऐसा करता है तो आज तो उसका दण्ड कम ही है, अगले दिनों मनुष्य जाति अपने ही उद्धत स्वभाव के दुष्परिणाम अब की अपेक्षा सौ गुने अधिक भोगेगी।

शारीरिक प्रतिक्रिया की जाँच के लिये चूहे, खरगोश, मेंढक, बन्दर आदि के सिर, हाथ, पाँव में डण्डे मारते हैं और फिर देखते हैं-उन पर क्या प्रभाव पड़ा? मेढ़क को तो गेंद की तरह उछालकर पटका भी जाता है। दाबा जाता है और इतना दाबा जाता है कि नीबू के रस की तरह रक्त छलछला आता है। इन सब प्रयोगों के बाद बुद्धिमान् और वैज्ञानिक कहाने की अपेक्षा मनुष्य अनपढ़, मजदूर और किसान बने रहते तो अच्छा था। हिंसा मनुष्य जाति पर कलंक है जो उसे नारकीय परिस्थितियों में ढकेलती ले जा रही है।


पतिव्रत ही नहीं- पत्निव्रत भी

मादा ने अण्डे दिये और फिर बच्चे सेने और बड़े होने तक उनकी सुरक्षा का उत्तरदायित्त्व नर महोदय पर आ पड़ा। मनुष्य ही संसार में ऐसा प्राणी है, जो बच्चे पैदा करने के बाद उनकी परवरिश का सारा भार स्त्री पर छोड़ देता है, जबकि संसार के अधिकाँशतः सभी जीव केवल मात्र वासना के लिये सहचर नहीं बनते वरन् गृहस्थ का निर्वाह भी वे पूर्ण निष्ठा के साथ करते हैं।

ऊपर जिस जीव की कथा प्रारम्भ की गई है वह ‘बेट्टा’ नामक मछली की कहानी है और गृहस्थ में पुरुष के कर्त्तव्यों का बोध कराती है। उधर मादा गर्भवती हुई कि नर का काम प्रारम्भ हुआ। वह अपने मुँह से हवा के बुलबुले छोड़ता घूमता है। इन बुलबुलों को यह इकट्ठा करके अपने शरीर से एक विशेष प्रकार का लसलसा पदार्थ निकालकर अपनी पीठ में चिपका लेता है। विदिशा के पास बौद्धों का एक तीर्थ है- साँची। एक छोटी-सी पहाड़ी पर अर्द्ध चन्द्राकार अनेक स्तूप खड़े हैं। अधिक ऊँचाई से देखने पर स्तूप एक बस्ती से लगते हैं। इसी प्रकार की, स्तूपों वाली बस्ती-सी नर बेट्टा की पीठ पर तैयार हो जाती है। सूखने पर यह कुछ कड़ी हो जाती है और उसमें परिवर्तन का प्रभाव प्रवेश नहीं कर पाता।

मादा पानी की सतह पर अण्डे देना प्रारम्भ करती है तो नर महाशय उस स्थान पर गहरे पानी में चले जाते हैं और वहीं से अण्डों की प्रतीक्षा करने लगते हैं। पति पत्नी के सहयोग का यहाँ अद्वितीय उदाहरण देखने को मिलता है।

अण्डे पानी से अधिक भार के होने के कारण डूब जाते हैं और सतह की ओर भागे चले जाते हैं। वहाँ नर बेट्टा पहले से ही प्रतीक्षा में खड़ा मिलता है। वह अण्डों का स्वागत करता है और उन्हें अपनी पीठ वाली कालोनी में मुँह से पकड़-पकड़ कर डाल देता है। अण्डे उन बुलबुलों की कोठरी में विकसित होने लगते हैं।

इस अतिरिक्त उत्तरदायित्व को सँभालना- मादा जानती है, एक कठिन कार्य है इसलिये वह पति की कृतज्ञता को भूलती नहीं। इधर-उधर घूमकर उसे कुछ खाने को मिलता है, वह लेकर पहुँचती है और नर को खिलाती है। हमेशा ध्यान रखती है कि पति किसी प्रकार भूखा न रहे, उसे ताजा भोजन मिलता रहे।

बच्चे निकल आते हैं। छोटे-छोटे बच्चों में क्रियाशीलता होती ही अधिक है। यह बच्चे फिर चुप कहाँ बैठें? बार-बार कोठरियों से निकल-निकल कर भागते हैं तब नर सावधानी से उन्हें बार-बार भीतर कर लेता है और इस तरह जब तक बच्चे बड़े नहीं हो जाते नर उस भार को अपनी पीठ में बाँधे रहता है।

उत्तरी और दक्षिणी अमेरिका की नदियों में कुछ मछलियों को अंडे देकर सुरक्षा के लिये उन्हें अपने मुँह में रखना पड़ता है। ऐसा न करें तो उन्हें दूसरे जीव-जन्तु मारकर खा जाते हैं। मुँह में रखकर बच्चों को पालना ऐसा ही कठिन कार्य है जैसे कठिनाइयों से भरा मनुष्य का जीवन। पेट भरने से लेकर पैसा कमाने, घर बसाने, बच्चों की परवरिश, उनकी ब्याह-शादियाँ, शिक्षा-दीक्षा सचमुच सारा जीवन कर्त्तव्यों का पुलिन्दा है- उन झंझटों को पार करना कठिन हो जाता, यदि पुरुष को नारी का सहयोग न मिलता। पति-पत्नी परस्पर प्रेम और सहयोग से इस रूखे संसार में भी सरसता और आनन्द पैदा कर लेते हैं।

मादा उन अण्डों को अकेले दिन भर मुँह में रखती तो भूखों-प्यासों मर जाती। अकेला नर भी यह काम कर नहीं सकता था। औरों की जिम्मेदारी पर छोड़ने का अर्थ होता अपने कर्त्तव्य से विमुख होना और अपनी सन्तति को संकट में डाल देना। इस महापाप से बचने के लिये नर और मादा जिस सहयोग-भावना का परिचय देते हैं वह मनुष्य के लिये सीखने का एक बहुत ही भला उदाहरण है।

मादा जब थकने लगती है, नर उसके मुँह से अपना मुँह जोड़ देता है और वह अण्डे अपने मुँह में ले लेता है। अब मादा इधर-उधर टहलती और भोजन ग्रहण करती तथा विश्राम लेती है। इससे उसके शरीर में फिर ताजगी आ जाती है। तब तक पति महोदय थक गये होते हैं तो वह अण्डों को फिर अपने मुँह में ले लेती हैं। इस तरह दोनों हँसते-खेलते अपना जीवन पार कर लेते हैं।

मछलियों का जीवन दाम्पत्य-प्रेम, सहयोग और कर्त्तव्य-भावना का आदर्श उदाहरण है। ‘बटरफिश’ नामक एक मछली जिसकी लम्बाई कुल 10 इंच ही होती है, अण्डे देती है और उन्हें एक गेंद के आकार में इकट्ठा कर लेती है। इनकी सुरक्षा के लिये नर और मादा दोनों ओर से गेंद के किनारे घेरा डाल देते हैं। जहाँ जाते हैं दोनों साथ-साथ ऐसे ही अण्डों को सुरक्षा में लिये हुए जाते और भोजन प्राप्त करते हैं। पति अपने सहयोग से एक क्षण को भी पत्नी को वञ्चित नहीं करता।

भारतीय प्रशान्त महासागर में ‘करटस’ नाम की एक मछली पाई जाती है, जिसमें नर को अपने कर्त्तव्य-पालन की कठोर परीक्षा देनी पड़ती है और नर उस कर्त्तव्य को परिश्रम और भावना के साथ पूरा भी करता है।

मादा अण्डे देकर उन्हें दो बराबर-बराबर हिस्सों में बाँटकर दो गोल गेंदों की आकृति में कर देती है। दोनों गोलों का एक दूसरे से सम्बन्ध बनाये रखने के लिये वह एक डोरा (चैन) बाँध देती है। इरादा यह होता है कि वह उस डोरे को पकड़कर खींचती हुई अण्डों को इधर-से-उधर टहलाया करेगी- पर नारी जाति प्रकृति से ही कोमल और कमजोर होती है। उसके शरीर में भारी भरकम और अधिक परिश्रम वाले काम करने की क्षमता नहीं होती, इसलिये मनुष्यों की आचार संहिता तैयार करने वाले मनीषियों ने पुरुष को श्रम वाले कठोर काम दिये और नारी को घर के हलके-फुलके काम। दोनों का सामञ्जस्य कर देने से गृहस्थ आनन्द पूर्वक चलता रहता है।

लगता है यह प्रेरणा हमें प्रकृति के इन नाबूझ जीवों से ही मिली है। पुरुष ने जैसे ही देखा कि मादा ‘करटस’ उस भार को ढोने में समर्थ नहीं तो वह आगे बढ़कर आता है और अपने सिर पर लगे हुए हूक के आकार की एक खूँटी से उस डोरे को बाँध लेता है और फिर उन्हें यहाँ से वहाँ घुमाता रहता है। इस स्थिति में मादा करटस अपने पति के भोजन का भी प्रबन्ध करते देखी गई है।

मछलियों में कुछ जातियाँ तो ऐसी भी होती हैं जिनके नरों को प्रकृति जन्म से ही एक थैली (ब्रूड पाउच) प्रदान करती है। इन जातियों में नर को अनिवार्यतः अण्डों को इन थैलियों में रखकर पालना पड़ता है। लगता है जो मनुष्य इस जीवन में गृहस्थ के प्रति अपने उत्तरदायित्वों का समुचित पालन नहीं करते, नारी पर ही बोझ डालते रहते हैं पर स्वयं आलस्य और प्रमाद का जीवन जीते हैं, प्रकृति इन नरों की श्रेणी में जन्म लेने का दण्ड देती है ताकि वे यह सीखें कि गृहस्थ स्वार्थ की दृष्टि से नहीं, कठोर लोग इस पृथ्वी पर दाम्पत्य जीवन का आनन्द भी पाते हैं जो पति-पत्नी, पत्नि एक दूसरे के प्रति अपने कर्त्तव्यों का उदारता पूर्वक परिपालन करते हैं।


प्रकृति

अमरीका का रेगिस्तान- जहाँ की गर्मी कोई भी वनस्पति सहन नहीं कर सकती- वहाँ भी अति सुरम्य पुष्प उगाकर प्रकृति ने अपनी सर्व सामर्थ्य तथा कलाप्रियता का परिचय दिया है।

कैक्टस नाम के इन पीले, नारंगी, गुलाबी, सिंदूरी, श्वेत तथा बैंगनी रंग के फूलों की लगभग 1000 जातियाँ पाई जाती हैं। इसका पौधा उँगली के पोर जितना छोटा और दुमंजिली इमारत जितना बड़ा भी हो सकता है। पर उसके बीज इतने छोटे होते हैं कि उन्हें नंगी आँखों से देखा भी नहीं जा सकता। इन पौधों में एक गाँठ होती है, वही पानी की टंकी का काम करती है और उससे यह सिद्ध होता है कि प्रकृति का हर कार्य बड़ी सूक्ष्म योग्यता के साथ सम्पन्न होता है।


सजीव स्वर्ग- हिमालय की पुष्प घाटी

कामना तो आखिर कामना ही है। अर्जुन ने हठ किया तो द्रौपदी ने कह दिया-आप ला सकते हैं तो मेरे लिये नन्दन वन के वह पारिजात ला दें जो जल में नहीं, पत्थरों में पैदा होते हैं, जिनकी सुगन्ध कस्तूरी-मृग से भी मादक होती है, जिनका सौंदर्य दिव्य सौंदर्य की अनुभूति करा देता है।

अर्जुन चले और नन्दन वन पहुँचे। वहाँ के रक्षक से उन्हें युद्ध करना पड़ा, तब कहीं एक फूल द्रौपदी के लिये ला सके।

महाभारत की इस कथा में सम्भवतः कल्पना अधिक, तथ्य कम जान पड़ता हो। किन्तु यह कल्पना नहीं आश्चर्यजनक रहस्य ही है कि ऐसा नन्दन वन आज भी इसी भारत-भूमि में वैसे ही विद्यमान है जैसी महाभारत में कथा आती है। समुद्र-तल से 13200 फीट ऊँचा यह हिमालय की गोदी में स्थित स्थान आज भी ‘फूल घाटी’ के नाम से विख्यात है। प्रतिवर्ष हजारों विदेशी पर्यटक यहाँ पहुँचते और जहाँ, वहाँ की मादक छटा को देखकर मुग्ध होते हैं, वहीं यह आश्चर्य भी है कि 10-15 मील क्षेत्र में प्राकृतिक तौर पर उगते आ रहे इन हजारों प्रकार के चित्र-विचित्र पुष्पों को किसने रोपा? सारे संसार में ऐसा कोई भी स्थान नहीं जहाँ प्राकृतिक तौर पर इतने अधिक, इतने सुन्दर, इतने वर्णों के पुष्प और कहीं खिलते हों।

विशेषज्ञों का अनुमान है कि यह फल प्रकृति की उतनी अधिक देन नहीं है जितनी इस बात की सम्भावना कि यह पौधे अतीत काल में सुनियोजित ढंग से विकसित किये गये हों। सम्भव है यह कोई राजोद्यान रहा हो, यह भी सम्भव है कि यहाँ कभी किसी महर्षि का तपोवन आश्रय रहा हो। जो भी हो- महाभारत काल के बाद तो यह स्थान उन सैंकड़ों रहस्यों की तरह छुपा ही रहा जिनके लिये प्रतिवर्ष देश-विदेश के सैकड़ों पर्वतारोही भारत आते और हिमालय के आश्चर्य खोजने के प्रयत्न करते हैं।

जहाँ अनेक धार्मिक व्यक्तियों का यह विश्वास है कि हिमालय में राजाओं द्वारा छिपाये हुए खजाने हैं, यज्ञों के बहुमूल्य पात्र, आभूषण और अस्त्र हैं, वहाँ पर्वतारोहियों का यह कथन है कि हिमालय की प्रत्येक वनस्पति औषधि है। जहाँ धार्मिक लोग विश्वास करते हैं कि वहाँ अभी भी अखण्ड अग्नियाँ स्थापित हैं, ऐसे-ऐसे गुप्त आश्रम हैं जहाँ अर्द्ध-सहस्र आयु के भी सन्त-महात्मा समाधिस्थ हैं, वहाँ पर्वतारोहियों ने हिम-मानव ही कल्पना ही हिमालय में नहीं की, उनके पद-चिह्न भी देखे हैं। आदि साधना-भूमि होने के कारण हमारा भी विश्वास है कि हिमालय में अध्यात्म-विज्ञान की वह अदृश्य तरंगें, वह ज्ञान अब भी विद्यमान है जिसे प्राप्त कर इस भौतिक युग की सम्पूर्ण जड़वादी मान्यताओं, परम्पराओं, सिद्धाँतों को बालू की दीवार की तरह बदला जा सकता है। ‘पुष्प घाटी’ ऐसे-ऐसे रहस्यों की ही पुष्टि का एक प्रमाण है।

इस स्थान की सबसे पहली खोज ब्रिटिशकालीन भारतीय सेना के एक कप्तान ने की थी। उसने यहाँ के सैकड़ों प्रकार के फूलों के बीज एकत्रित कर इंग्लैंड भेजे। एक पुस्तक भी लन्दन में छापी गई, जिसमें इस फूल घाटी को प्रकृति का ‘अद्भुत चमत्कार’ कहकर पुकारा गया। तब से अनेक विदेशी खोजी आते रहे और भटक-भटक कर लौटते रहे। पर इंग्लैंड की श्रीमती जान लेग को दुबारा यह स्थान फिर मिल गया। उन्होंने यहाँ से लगभग 500 फूलों के बीज इकट्ठे कर लन्दन भेजे। अब तो वहाँ तक पहुँचने की तमाम सुविधायें हो गई हैं इसलिये कोई भी वहाँ जा सकता है, पर अभी हमारे हिमालय में ऐसा बहुत कुछ है जहाँ तक हम नहीं जा सकते। वहाँ जा सके होते और उसके अनन्त रहस्यों में से कुछ का भी पता लगा सके होते तो देखते कि हम जिन वस्तुओं के लिये विदेशों के आश्रित हैं दूसरों का मुँह ताकते हैं वह और उनसे श्रेष्ठ वस्तुएँ हम अपने ही भीतर से निकाल सकते हैं।

तीर्थ-यात्रा और आत्म-कल्याण के लिये साधनाओं की दृष्टि से अब हिमालय ही एक पुण्य स्थान बचा है। वहाँ चित्ताकर्षक शाँति हैं, अतुलित प्राण और सौंदर्य भरा है। उसमें जो एक बार इस पुष्प घाटी को ही देख आता है, उसे हिमालय का सौंदर्य भूलता नहीं। वह वहाँ बार-बार जाता है। पुष्प घाटी तक पहुँचने के लिये जोशी मठ पहुँचना पड़ता है। वहाँ से बद्रीनाथ को जाने वाली सड़क पर मध्य में गोविन्द घाट स्थान पर उतरना पड़ता है। यहाँ से पैदल चढ़ाई है और आगे घाघरिया तक की 7 मील की दूरी को पार करने के लिये पूरा एक दिन लग जाता है।

घाघरिया से कुल एक घण्टे में मुख्य घाटी पहुँच जाते हैं। उसकी दाहिनी ओर ‘कुबेर भण्डार’ पर्वत और आगे ‘कामेट चोटी’ है। बांई ओर सप्राष्टंग पर्वतों की चोटियाँ हैं। कामेट झरना सामने ही बहता हुआ आ रहा है। म्यून्डर ग्राम पर पहुँचते ही यह पुष्प घाटी मिल जाती है और अनेक प्रकार के गुलाब, कुमुदिनी, गुलदाऊदी, सिलपाड़ा, जंगली गुलाब, चम्पा, बेला, जुही और कुछ फूल तो ऐसे हैं जिनके नाम वैदिक साहित्य में हैं पर अब उनकी सही जानकारी करना कठिन है। अँग्रेजों ने इनके नाम ‘बड आफ पमडाइज, ग्लाडेओली, हिमालयन, आरकिड हिबिस्टकम’ आदि रख लिये हैं। कथींड के सफेद व बैंगनी फूलों के गुच्छे बड़े मोहक लगते हैं। बुराँस फूल तो गुलाब के सौंदर्य को भी मात देता है। जब यह बुराँस पूरी तरह अपनी ऋतु में फूलता है तो यह वन नन्दन वन या स्वर्ग से भी सुहावना प्रतीत होता है। कितना ही देखो-न तो आँखें थकती हैं और न वहाँ से हटने का ही जी करता है। वर्ष भर उसी तरह किसी-न-किसी फूल की शोभा बनी रहती है। 3000 से अधिक विभिन्न फूल विभिन्न समय में फूलते रहते हैं।

ब्रह्म-कमल यहीं पाया जाता है। कमल जल में ही हो सकता है पर प्रकृति के संसार में क्या बन्धन? उसने यहाँ पत्थरों में कमल उगाकर यह दिखा दिया कि उसकी सत्ता सर्व शक्तिमान है। यह कमल श्वेत रंग का होता है, इसकी सुगन्ध ऐसी जादू भरी होती है कि हलकी-सी महक से ही अनन्त सुख और शाँति का आभास होता है इसलिए इसका नाम ब्रह्म-कमल पड़ा है। इसे पाकर ही द्रौपदी की इच्छा पूर्ण हुई थी।

फल कहीं भी हो, वह तो प्रकृति का उन्मुक्त सौंदर्य है। जो लोग अपने घरों के आस-पास थोड़े-से भी फूलों के पौधे लगा देते हैं तो वह स्थान इतना इच्छा और आकर्षक लगने लगता है कि बार-बार वहाँ जाने का मन करता हैं, फिर एक ऐसे प्रदेश में पहुँचकर जहाँ 10 इंच से लेकर 28 इंच ऊँचाई के पौधे केवल फूलों से ही आच्छादित हों, उस स्थान के सौंदर्य तो ईश्वर या उस दिव्य आत्मा के समान है, जिससे इस सौंदर्य और आनन्द की अनुभूति ही हो सकती है, अभिव्यक्ति नहीं।


तत्वशोध की साधना अधूरी न रहने पाये

इन्द्र जैसे महाबली देवता के लिये भी, जब तक महर्षि दधीचि की धर्मपत्नी भगवती वेदवती उपस्थित थीं, आश्रम में प्रवेश करना कठिन था। इन्द्र सबसे छुप सकते थे पर सती के अपूर्व तेज के समक्ष छद्मवेश छिपा सकना उनके लिये भी सम्भव न हुआ।

वेदवती जल भरने के लिये बाहर निकलीं, तब इन्द्र ने आश्रम में प्रवेश किया और महर्षि दधीचि से अस्थिदान ले लिया। वेदवती लौटी तब दान दिया जा चुका था। महर्षि अपने प्राण निकाल चुके थे।

वेदवती ने एक क्षण में ही सारी स्थिति का अनुमान कर लिया। अभी वे इन्द्र को शाप देने ही जा रही थीं कि दिव्य देहधारी महर्षि ने उन्हें परावाणी में समझाया-भद्रे! देवत्व की रक्षा के लिये यह दान मैंने स्वेच्छा से दिया है। अब आपके लिये भी यह उचित है कि शाप न देकर गर्भ में पलने वाली आत्मा का ऐसा निर्माण करो कि ‘तत्वशोध’ की हमारी साधना अधूरी न रहने पाये।

“आज्ञा शिरोधार्य है देव।” यह कहकर वेदवती तपश्चर्या में संलग्न हो गई। इतिहास साक्षी है कि इवपक गर्भ से महर्षि पिप्पलाद जैसा महान् ऋषि उत्पन्न कर उन्होंने पति की अन्तिम आकाँक्षा भी पूरी कर दी।


एक भाषा- संस्कृत भाषा

अशिक्षित भारतीय “लार्ड” उच्चारण नहीं कर सकते थे इसलिये इंग्लैंड से आने वाले लार्ड्स को वे लोग “लाट कहने लगे। कैप्टन को कप्तान, सिगनल को सिंगल, डेवलपमेंट को डबलामिन्ट आदि अपभ्रंश नामों से पुकारने की यही परम्परा अब इन अभारतीय शब्दों को भारतीय भाषा बना चुकी। किन्तु कभी शब्दों का इतिहास खोजा जायेगा तो यह शब्द स्पष्ट बतायेंगे कि भारतीय भाषा में कभी अँग्रेजी का सम्मिश्रण हुआ था।

इस सिद्धांत को उलटकर हम जब संसार भर की भाषाओं का अध्ययन करते हैं और उनके प्राचीन इतिहास एवं शब्दावली पर दृष्टि दौड़ाते हैं तो यह स्पष्ट हो जाता है कि वे सब हमारी मूल भाषा संस्कृत से ही निकली हुई भाषायें हैं। आज जो विश्व की सम्पन्न भाषायें मानी जाती हैं उनका भी उद्गम संस्कृत ही है। संस्कृत कभी विश्व-भाषा थी, निम्नाँकित अध्ययन से, कोई भी इस तथ्य से इनकार नहीं करेगा।

अँग्रेजी, फ्रेंच, जर्मनी आदि भाषायें लैटिन से निकली हुई मानी जाती हैं किन्तु यह लैटिन मूल रूप से संस्कृत की ही निर्वासित पुत्री की तरह है। शब्दों का तुलनात्मक अध्ययन करके देखें पता चलेगा आज नव-व्यवहृत अंग्रेजी को छोड़ दे तो अधिकाँश प्राचीन शब्द संस्कृत से प्रभावित मिलेंगे-संस्कृत में पृथ्वी को “ईरा” कहते हैं “ग्रीक” भाषा में ‘ई’ के स्थान पर उच्चारण का सामान्य अन्तर “ए” हो गया और उन्होंने “एरा” कहना प्रारम्भ कर दिया। लैटिन में उसे “तेरा” जर्मनी में “एर्दा” -प्राकृत इंग्लिश में “इटार्थ” और प्रचलित अँगरेजी में उसी का अपभ्रंश रूप “अर्थ” कहा जाता है। संस्कृत का “द्यौः” ही अँगरेजी का “डे”। “पद” को लेकर ही अंगरेजी के पंडल, पडेस्टेरियन, पेडेस्ट्रल, “इन्त” को लेकर “डेन्ट” “डेन्टल” और “डेन्टिस्ट” शब्द बने हैं। “मार्टल” और “इम्मार्टल” शब्द “मृत्यु” और “अमर” शब्दों के ही उच्चारण क्रम में बिगड़े हुये रूप हैं। संस्कृत में “प्र” “प्रि” और “प्रो” उपसर्ग लगाकर शब्द-विन्यास को अँगरेजी में ज्यों का त्यों ग्रहण कर लिया गया है। प्रो-नाउन, प्रि-मेडिकल प्र-एशिया [प्रशिया] आदि यह उपसर्ग लगाने से ही बने हैं। संस्कृत का “अन्” उपसर्ग भी ज्यों का त्यों ही ग्रहण किया गया है। जैसे हिन्दी में न बनने को ‘अनबन’ न देखी हुई वस्तु को ‘अनदेखी’ आदि ‘अन’ लगाकर उल्टा अर्थ बोध का उपयोग होता है अँगरेजी में भी उसी प्रकार ‘अन-सीन’, ‘अन-परटर्ब्ड’ ‘अन-नोन’ आदि शब्द एक ही उपसर्ग से बने हैं।

भाषाओं के बारे में कहावत है- “कोस-कोस में पानी बदले, चार कोस में बानी” अर्थात्-दूरी के कारण भाषाओं के उच्चारण में अन्तर आ जाता है और यह अन्तर कुछ दिनों में इतना घुल-मिल जाता है कि प्रचलित मूल भाषा का एक ही अंग बन जाता है। दुनिया की जितनी भी भाषायें हैं यद्यपि वे आज अलग-अलग दिखाई देती हैं, किन्तु वे अपने प्रारम्भ में संस्कृत से ही पैदा हुई हैं।

मनुष्य को संस्कृत में ‘मनु’ कहते हैं, अँगरेजी में उसी का बिगड़ा हुआ रूप ‘मैन’ बना है, “मि”-थी, ‘षट्’-सिक्स, ‘अष्ट’-एट, सूनू (पुत्र) ही सन, ‘पितर’ फादर, भ्रातर-व्रादर, सन्त-सेन्ट, ‘सर्प’, ‘सर्पेन्ट’ अन्तर-अण्डर, ‘नास्ति’ [नहीं]- ‘नोट’ ‘न’- ‘नो’, मृद् [कीचड़] ‘मड’, ‘पथ’-’पाथ’ ‘नाम’-’नेम’ ‘क्रूर’-’क्रूयल’ ‘पशुचर’-पास्चर ‘स्वेद’ [पसीना] ‘स्वेट’, ‘ग्रन्थि’-ग्लैंड आदि एक ही समान के शब्द यह बताते हैं कि अँगरेजी कोई स्वतन्त्र अस्तित्व में विकसित हुई भाषा है यह गलत है। यह दूसरी बात है कि संसार की सभी भाषाओं ने कालान्तर में अपने व्याकरण, वाक्य रचना और नये-नये पारिभाषिक शब्द गढ़े और अपने को समृद्ध बना लिया किन्तु यह भी निश्चित है कि ‘संस्कृत’ भाषा कभी अति समृद्ध भाषा थी और आज भी वह विश्व की किसी भी भाषा की तुलना में आ सकती है।

ऊपर दिये हुये उदाहरण बहुत थोड़े-से हैं वस्तुतः अँगरेजी के अतिरिक्त दूसरी भाषायें भी संस्कृत से ही निकली हुई हैं। एशिया की भाषाओं में सर्वाधिक प्रभावशील और प्रचलित फारसी भाषा का मूल भी संस्कृत है। शरीर को संस्कृत में ‘तनु’ कहते हैं, फारसी में तन कहते हैं। घुटने को संस्कृत में ‘जानु’ कहा जाता है फारसी में भी ‘जानु’ ही कहते हैं। ‘नव’ संस्कृत का शब्द है फारसी में उसे ‘नौ’ कहते हैं। आगे के जोड़ों में पहला अक्षर संस्कृत का है और साथ वाला फारसी का- पाठक मिलाकर देखें तो पता चलेगा कि वह अक्षर संस्कृत शब्दों के कितने पास हैं। उदाहरणार्थ-दन्त-दन्दाँ [दाँत], ग्रीवा-गरेबा [गर्दन] भ्रू-अब्रू [भौंह] पञ्च-पंज [पाँच] शत-सद [सौ] विधवा-बेवा, बात-बाद [हवा] आप-आब [पानी] शृंगाल-शगाल [सियार] अँगुष्ठ-अँनुश्त [अँगूठा] आदि।

हेमेटिक भाषाओं में मिश्र की भाषा को सबसे प्राचीन मानते हैं और जहाँ दूसरी भाषायें लुप्त प्रायः हो गई वहाँ मिश्र की भाषा का अब भी अस्तित्व बना हुआ है। पर उपरोक्त प्रकार से तुलनात्मक अध्ययन करके देखते हैं तो पता चलता है कि मिश्र की भाषा भी संस्कृत से ही निर्गत हुई है। उदाहरण के लिये आरम्भ को संस्कृत में ‘आदि’ कहते हैं तो मिश्र की भाषा में ‘आत’। रोटी को संस्कृत में अपूप और मिश्री में ‘पूपू’, आप शब्द दोनों भाषाओं में पानी के लिये उभयनिष्ठ प्रयोग हुआ है। देखना-’अक्ष’ मिश्री में ‘अरब’ कहा जाता है। ‘सेवा’ को ‘सेव’ ‘रसना’ [जीभ] को ‘रस’ कहते हैं। ‘अषा’ औरक [आत्मा] भी दोनों भाषाओं में ज्यों के त्यों उभयनिष्ठ हैं।

एशियाई देशों में रूस की ‘कला’ और ‘भाषा’ के महत्व को भुलाया नहीं जा सकता। इन दिनों जब कि रूस राजनीति के क्षेत्र में आज विश्व की अद्वितीय शक्ति गिना जाता है उसे छोड़ना उचित न होगा। रूसी भाषा के अध्ययन से पता चलता है कि उसके अधिकाँश शब्द संस्कृत से निकले हुये हैं। आगे जो युग्म दिये जा रहे हैं उनमें पहला अक्षर संस्कृत का है उसके साथ वाला ‘रसियन’ का जिनका आवश्यक है कोष्ठक में अर्थ भी दिया गया है- उदाहरणार्थ- सूतुः-सिन [पुत्र] नख-नोकत्य [नाखून] वात-वेतेर [हवा] उषर-अत्र [ऊषा] द्विशत-द्वेस्ति [दो सौ], दस-देस्यत विधवा-वदवा। ‘द्वा’ और ‘मि’ ‘स्वर्ग’ ‘चष’ शब्द दोनों भाषाओं में समानार्थी हैं। द्वार-द्वेर, कदा-कग्दा [कब], शृंगाल शकाल [सियार], पथ-पुत् [रास्ता] आदि ऐसे बहुत से शब्द हैं जिनके संस्कृत व रूसी उच्चारण में बहुत ही नगण्य अन्तर है। संसार की अनेक भाषाओं के साथ यह समानता संस्कृत में ही है इसलिये यह निश्चय पूर्वक कहा जा सकता है कि सारे संसार में कभी प्रचलित मूल भाषा के रूप में संस्कृत ही थी।

अरबी, जन्द, चीनी, जापानी और अफ्रीका तक की स्वाहिनी भाषा भी संस्कृत के ही ‘तत्सम’ शब्दों से बनी हुई भाषायें हैं उनका वर्तमान रूप उन शब्दों के अपभ्रंश उच्चारण के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। संस्कृत के अजहाक को अरबी में इजहार, लोहित को लहू, सुर को हूर, हर्म्य को हरम [रनिवास] शरद को शिरत, ‘धनी’ को ‘गनी’ ‘अर्व’ को ‘अर्वन’ याम को योम [क्षण] आदि उच्चारण यह बताते हैं कि आज की अरबी कल की संस्कृत का ही बिगड़ा रूप है।

अरबी, जन्द, चीनी, जापानी और अफ्रीका तक की स्वाहिनी भाषा भी संस्कृत के ही ‘तत्सम’ शब्दों से बनी हुई भाषायें हैं उनका वर्तमान रूप उन शब्दों के अपभ्रंश उच्चारण के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। संस्कृत के अजहाक को अरबी में इजहार, लोहित को लहू, सुर को हूर, हर्म्य को हरम [रनिवास] शरद को शिरत, ‘धनी’ को ‘गनी’ ‘अर्व’ को ‘अर्वन’ याम को योम [क्षण] आदि उच्चारण यह बताते हैं कि आज की अरबी कल की संस्कृत का ही बिगड़ा रूप है।

अरबी, जन्द, चीनी, जापानी और अफ्रीका तक की स्वाहिनी भाषा भी संस्कृत के ही ‘तत्सम’ शब्दों से बनी हुई भाषायें हैं उनका वर्तमान रूप उन शब्दों के अपभ्रंश उच्चारण के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। संस्कृत के अजहाक को अरबी में इजहार, लोहित को लहू, सुर को हूर, हर्म्य को हरम [रनिवास] शरद को शिरत, ‘धनी’ को ‘गनी’ ‘अर्व’ को ‘अर्वन’ याम को योम [क्षण] आदि उच्चारण यह बताते हैं कि आज की अरबी कल की संस्कृत का ही बिगड़ा रूप है।

इसी प्रकार जापानी में संस्कृत के बहुत्व को भोत्तो, यम को इम्मा, द्यौः को ‘दे’, ध्यान को गेन आदि कहते हैं। अक्षरों की दृष्टि से चीनी भाषा में संसार की सब भाषाओं से अधिक 204 अक्षर पाये जाते हैं। तथापि उसके शब्द भी संस्कृत भाषा के ही अपभ्रंश-विकास है अभी भी सैकड़ों शब्द संस्कृत के बिलकुल समीपवर्ती दिखाई देते हैं उदाहरण के लिये जन स्थान पृथिवी को चीनी में जिनतान, द्यौः को तौ, होम को घोम, लिंग ज्योति अम्बा, स्थान आदि के लिये प्रयुक्त चीनी शब्दों में उच्चारण भर का अन्तर हैं। ऐसा नियम है कि एक शब्द को दूसरी भौगोलिक स्थिति में रह रहा व्यक्ति ज्यों का त्यों उच्चारण नहीं कर सकता। उच्चारण का यह अन्तर ही अनेक भाषायें बनाता गया वस्तुतः शब्द और विश्व-भाषाओं के इतिहास से पता चलता है कि जिस तरह आज अँगरेजी अन्तर्राष्ट्रीय भाषा बन चुकी है उसी प्रकार पहले संस्कृत थी, यह केवल इसीलिये नहीं था कि आदि मानव का जन्म भारतवर्ष में हुआ और यही से सभ्यता का विकास हुआ वरन् भारतीयों ने अपने सन्देश दूर-दूर तक पहुँचाकर लोगों को सभ्य बनाया था।

अफ्रीका की स्वाहिली भाषा के शब्दों में संस्कृत का केन्द्रक होना यह बताता है कि भारतीय अपनी सभ्यता का सन्देश उस प्रकृति के भयंकरतम खण्ड में भी पहुँचाने में सफल हुये थे। स्वाहिनी में ध्यान को धानी, गो को गोम्बे, मृत्यु को माती, सप्त को सबा आदि उच्चारण, करते हैं। पारसियों का प्राचीन साहित्य जो ‘जन्दावस्ता’ के नाम से पुकारा जाता है उसमें जाननु [घुटना], वज्र, अजा, पशु, वैद्य, यव, वायु, इषु आदि संस्कृत के शब्द ज्यों के त्यों अर्थ और उच्चारण में प्रयुक्त हुये हैं। कुछ अक्षरों में तो नाम मात्र का ही अन्तर है उदाहरणार्थ-विश्व का विस्प, छन्द का जन्द, वाहु का बाजु, श्वसुर का कुसुर आदि।

यह उदाहरण और तुलनात्मक अध्ययन जहाँ संस्कृत की प्राचीनता का बोध कराते हैं वहाँ यह भी विश्वास दिलाते हैं कि सारे संसार की एक भाषा हो सकती है और यदि ऐसा हो सकता है तो अपने आप में एक विज्ञान और विश्व-संस्कृति होने के कारण यह स्थान भारतीय सभ्यता, संस्कृति और भाषा को ही मिल सकता हैं। आज हमें विज्ञान के लिये नये शब्द बनाने में दिक्कत का प्रश्न खड़ा किया जाता है पर वस्तुतः यह अपनी भाषा के प्रति हीनता का भाव है संस्कृत एक समर्थ भाषा है उसके व्याकरण से कैसे भी पारिभाषिक शब्द गढ़े जा सकते हैं पर यदि अपने यहाँ विज्ञान की खोज को नया और आध्यात्मिक स्वरूप दिया जा सके तो करोड़ों शब्द पहले से ही ऐसे विद्यमान हैं जिनका अध्ययन दूसरे देशवासियों को उसी तरह करना पड़े जिस तरह आज हमें अँगरेजी भाषा में नये-नये शब्द सीखने के लिये करना पड़ता है।


ध्येय सबका एक ही है

एक विद्यालय के तीन छात्रों को सदाचरण और उत्कृष्ट चरित्र के लिये पुरस्कृत किया गया। तीनों को मिलाकर एक ही सिक्का दे दिया गया कि वे जाकर आपस में उसे बाँट लें।

छात्रों में एक भारतीय था, दूसरा पारसी, तीसरा था अंगरेज। एक दूसरे की भाषा वे नहीं समझते थे इसलिये सिक्के का बँटवारा एक समस्या हो गई। अंगरेज लड़के ने अपनी भाषा में कहा- मुझे अपने हिस्से का “वाटर मेलन” चाहिये। पारसी ने अपनी भाषा में कहा-मुझे ‘हन्दुवाना’ होना और भारतीय लड़के की माँग थी कि मुझे ‘तरबूज मिलना चाहिये। बात काफी बढ़ गई पर झंझट तय न हुआ।

अन्त में तीनों एक ऐसे आदमी के पास गये जो तीनों भाषायें अच्छी तरह समझता था। तीनों ने उससे अपनी-अपनी बात कहीं। उस व्यक्ति ने वह सिक्का अपने हाथ में ले लिया और बाजार से एक बड़ा सा तरबूज खरीद कर लाया। उसकी तीन बराबर फाँके करके उसने सर्वप्रथम अंगरेज बालक को बुलाया और एक फाँक देते हुये कहा यह रहा तुम्हारा-वाटर मेलन [तरबूज]। इसी प्रकार शेष दोनों को बुलाकर उनकी भाषा में समझाकर पारसी को हिन्दुवाना और हिन्दू को तरबूज की एक-एक फाँक दे दी। तीनों जब कमरे के बाहर आकर मिले तो पाया कि उन तीनों की इच्छा एक ही थी एक ही वस्तु के लिये वे देर से लड़ रहे थे।

संसार की स्थिति भी ऐसी ही है, ध्येय सबका एक ही है पर भाषा, जाति, देश के भेद-भाव के कारण परस्पर टकरा रहे हैं।


मोह-माया में भ्रमित अग-जग

मथुरा से थोड़ी दूर पर छाता कस्बा है। 1850 में वहाँ के निवासी श्री बृजलाज वार्ष्णेय के घर एक बच्चे ने जन्म लिया। उसका नाम प्रकाश रखा गया। अभी यह बालक चार ही वर्ष का हुआ था कि वह एक दिन रात को सोते-सोते उठा, घर से निकल कर बाहर आ गया और सड़क की ओर चल पड़ा। यह तो अच्छा हुआ कि घर वालों को पता चल गया, वे पीछे-पीछे भागे और बच्चे को थोड़ी ही दूर से पकड़ लाये।

किन्तु हैरानी उस समय और बढ़ गई जब प्रकाश का स्वभाव सा हो गया कि वह रात के अँधेरे में ही अकेला जाग पड़ता और चुपचाप घर से निकलकर सड़क की ओर भागने लगता। घर वाले पकड़ते और पूछते तो वह कहता-मुझे कोसी कलाँ ले चलो मेरा घर कोसी में है वहाँ मेरे माता-पिता, भाई और बहन हैं, मैं उनसे मिलूँगा।

वार्ष्णेय परिवार लगातार की इस परेशानी से चिन्तित तो था ही अब उनकी जिज्ञासायें और तर्क-वितर्क भी प्रबल हो उठे। एक दिन वे बच्चे को कोसी लेकर आये भी पर दैवयोग से उस दिन वह दुकान बन्द थी जिसे वह अपने पूर्व जन्म की दुकान कहता था इसलिये वह और कुछ पहचान न पाया और इस तरह जैसे गया था वैसे ही वापस ले आया गया।

अगले दिन उस दुकान के मालिक श्री भोलानाथ जैन को पता चला कि कोई लड़का छाता से यहाँ आया था और यह कहता था कि यह उनके पूर्व जन्म के पिता की दुकान है तो एकाएक उन्हें 5 वर्ष पूर्व हुई अपने दस वर्षीय पुत्र निर्मल की मृत्यु की घटना याद हो आई। निर्मल बीमार पड़ा था। लगातार कोशिशों के बाद उसका बुखार टूटा नहीं। एकाएक ऐसा जान पड़ा कि बुखार बिल्कुल उतर गया है वह स्वस्थ चित्त होकर बातें करने लगा। मृत्यु के पूर्व प्रायः सदैव ही ऐसा होता है, बुझने से पूर्व एक बार तीव्र लौ प्रकट करने के समान आत्मा एक शरीर त्यागने को होती है तो कुछ क्षणों के लिये वह अपने दिव्य स्वरूप का अनुभव करती है और तब अतीत और भविष्य की अगणित बातें अनायास मस्तिष्क पर उभरती हैं। भारतीय दर्शन की इस मान्यता की पुष्टि उस समय देखने को मिली जब निर्मल ने कहा- “मैं छाता अपनी माँ के पास जा रहा हूँ” और इसके बाद ही उसका निधन हो गया था।

उस घटना की याद आते ही श्री भोलानाथ जैन ने छाता जाने का निश्चय किया। साथ अपनी पुत्री को लेकर जब वे छाता पहुँचे और पता लगाते हुए श्री बृजलाल वार्ष्णेय के यहाँ पहुँचे तो बालक प्रकाश उन्हें देखते ही खुशी से नाच उठा और श्री भोलानाथ की पुत्री को अपनी बहिन तारा कहकर उसके साथ घुल-मिल कर ऐसी बातें करने लगा जैसी उसके साथ वर्षों की पहचान हो।

इस घटना के बाद प्रकाश की सोई स्मृतियाँ एक बार पुनः तीव्र हो उठीं। अब यह पुनः कोसी कलाँ जाने के लिये हठ करने लगा। श्री भोलानाथ के आग्रह पर वार्ष्णेय परिवार उसे कोसीकलाँ लाने के लिये राजी हो गया पर वे लोग भीतर ही भीतर कुछ डर से रहे थे कि कहीं ऐसा न हो कि लड़का वहाँ से न आने का ही हठ करने लगे और वह अपने हाथ से भी चला जाये।

कोसीकलाँ लाये जाने पर उसने अपने पूर्व जन्म की माँ और अपने भाई जगदीश को पहचान लिया और अपने भाई देवेन्द्र को तो उसने देखते ही “देवेन्द्र” कहकर पुकारा भी। उससे लोगों के आश्चर्य का ठिकाना न रहा कि क्या पूर्व जन्मों की स्मृतियाँ इतनी भी स्पष्ट हो जाती हैं। दोनों परिवारों की बात-चीत से पता चला कि पूर्व जन्म के निर्मल और अब के प्रकाश की रुचि, आदतें, व्यवहार बहुत अंशों में एक ही समान हैं। निर्मल ने ही प्रकाश के रूप में जन्म लिया है, इस सम्बन्ध में कोई सन्देह शेष नहीं रहता। पहले जन्म में उसने छाता जाने का मोह प्रदर्शित किया इस जन्म में उसकी कोसी के प्रति ममता है-कुछ ऐसी माया का फेर है कि मनुष्य बार-बार जन्म लेता और मरता है पर अपने शाश्वत स्वरूप को पहचानने और पाने का प्रयत्न नहीं करता।


मकड़ी भी भगवान दत्तात्रेय की गुरु

भगवान् दत्तात्रेय ने साधक जीवन में प्रवेश किया तब की बात है। अनेक विद्वानों, योगियों का आश्रय लेने पर भी आत्म-साक्षात्कार और जगत सम्बन्धी उनकी जिज्ञासाओं का समाधान नहीं हो पाया। उनकी अशान्ति दिनों दिन बढ़ती ही जा रही थी। तब वे प्रजापति ब्रह्माजी के पास गये और आत्म-कल्याण के लिये योग्य मार्ग-दर्शक का नाम पूछा।

प्रजापति ने उनकी सारी बात ध्यान से सुनी और बोले-तात! इस तरह तो तुम सारे संसार के पास भी जाकर कुछ न सीख सकोगे। मौखिक शिक्षण तो हर कोई कर सकता है पर अपने लिये व्यावहारिक जीवन नीति अपनाने के लिये यह आवश्यक है कि गुरु के आचरण का भी अध्ययन किया जाय और उसे अपने जीवन में धारण किया जाये। यदि तुम किसी मनुष्य से कुछ नहीं सीख सकते तो अब प्रकृति की शरण में जाओ। वहाँ तुम्हें प्रत्येक अणु-प्रत्येक कण और तुच्छ दिखाई देने वाले जीव-जंतुओं में भी ऐसी अगणित प्रेरणायें और व्यावहारिक शिक्षण प्राप्त करने का अवसर मिलेगा जिससे अपनी जीवन-नीति और संसार की वास्तविकता का ज्ञान प्राप्त करना सुगम हो जायेगा।

पितामह ब्रह्माजी की बात सुनकर दत्तात्रेय वहाँ से चल पड़े। उन्होंने पाया कि वस्तुतः प्रकृति के असंख्य जीवों में असंख्य प्रेरणायें, ज्ञान और शिक्षण भरा पड़ा है। चील को देखकर उन्हें अपने लक्ष्य के प्रति तन्मयता और लम्बी साधना, धैर्य और सक्रियता की प्रेरणा मिली तो एक गुरु चील को बना लिया। समुद्र को देखकर उन्होंने जाना कि संसार की विभिन्न परिस्थितियों, घात-प्रतिघातों को भी जो अपने में अविचल भाव से भरता चला जाता है वह समुद्र के समान अक्षय, विशाल, धीर और गम्भीर बन जाता है। इसी तरह कुमार सर्प, स्त्री, बैल आदि विभिन्न जीव-जन्तुओं को अपना गुरु वरण करते हुये भगवान् दत्तात्रेय ने ज्ञान, कर्मकुशलता, गुण और भावनाओं का दीर्घ-प्रकाश अपने में धारण कर लिया। उनके इस महान् अर्जन-तप की सर्वत्र चर्चा होने लगी।

तब एक दिन वह पुनः एक और गुरु की खोज में निकले। चलते-चलते उन्हें एक झाड़ी दिखाई दी। उस झाड़ी में बने एक बहुत कलात्मक मकड़ी के जाले को देखकर वहीं रुक गये। सृष्टि का एक अत्यन्त तुच्छ जीव बुद्धिमान यान्त्रिकों की सी कारीगरी जानता है, वह यह सब कैसे करता है, उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ। दत्तात्रेय वहीं चुपचाप बैठ गये और नन्हीं सी मकड़ी का वह व्यापार तन्मयतापूर्वक देखने लगे।

साधन-विहीन मकड़ी उसके पास कुछ भी तो नहीं था। झाड़ी की शाखा में चुपचाप बैठी थी। सम्भवतः उसे अकेलापन अच्छा नहीं लग रहा था। अकेला मनुष्य तो भावाभिव्यक्ति भी नहीं कर सकता, प्रेम, सेवा, सहानुभूति का तो आनंद ही कहाँ मिलता? मकड़ी ने तब अपने शरीर की पीछे की थैली से एक प्रकार का लसलसा द्रव निकालना प्रारम्भ किया। पीछे की इस थैली का सम्बन्ध मस्तिष्क से होता है, इसलिये जब भी वह इच्छा करती है यह द्रव निकालने लगती है। थैली में चलनी की तरह के छेद होते हैं जिन्हें रोम छिद्र कहते हैं। यह द्रव उन्हीं से निकलता और हवा के संपर्क में आते ही सूख कर कड़ा हो जाता है। मकड़ी को पीछे का यह हिस्सा दिखाई नहीं देता तथापि वह अपनी इच्छा-शक्ति से जब भी जितना, जहाँ आवश्यक हुआ यह जाला निकालती है और अपना काम चलाती रहती है। यह कार्य वह मस्तिष्क की नाड़ियों में जोर डालकर करती है। उसकी सम्वेदनशीलता इतनी सूक्ष्म होती है कि कहाँ कितना मोटा कहाँ कितना पतला सूत चाहिये यह वह अपने मन से ही समझकर सूत को उतना ही मोटा पतला निकालती रहती है।

इस जाले से वह एक ही प्रकार का मकान नहीं बनाती। बच्चों के रहने के लिये वह एक विशेष प्रकार का बिल दार मकान बनाती है इससे लगा सूत इतना सघन होता है कि उसमें से होकर हलकी बौछारें और शीत आदि मौसम के प्रभाव भी अन्दर नहीं जा सकते। अपने लिये एक हवादार महल तैयार करती है। उसमें कई भाग होते हैं एक तो उसका निजी कक्ष, एक शिकार पकड़ने का जाला। अपने निजी निवास से वह एक डोरा सारे मकान में इस तरह जोड़कर रखती है कि वह अपने निजी-कक्ष में बैठी हुई ही सारे किले की जानकारी लेती रहती है।

मकड़ी के कान नहीं होते। वह सुन नहीं सकती पर अपनी अतीन्द्रिय क्षमता सूक्ष्म-स्पन्दनों से सब कुछ समझ लेने की सामर्थ्य का उपयोग करके वह यह देखती रहती है कि किले में कहाँ कौन आया। खबर लगते ही वह अपने बच्चों के दुश्मनों से लड़ती है, उन्हें मार भगाती है। शिकार फस गया हो तो उसे पकड़कर खा जाती है। कई बार शिकार बड़ा और ताकतवर होता है तब वह पहले अपने इसी सूत से उसे चारों तरफ से लपेट कर बन्दी बनाती है और तब उससे निपटती है।

मकड़ी अपनी स्पर्शेन्द्रिय और घ्राणेन्द्रिय से अपने जाले ही नहीं, जाले के आस-पास और यहाँ तक कि मौसम की बारीकियों तक का भी पता लेती है। मनुष्य जैसा बुद्धिमान प्राणी भी यन्त्रों की ही मदद से जान सकता है कि वर्षा या मौसम के सम्भावित परिवर्तन का स्वरूप और समय क्या होगा, पर मकड़ी को किसी बाहरी यन्त्र की आवश्यकता नहीं पड़ती वह अपनी शारीरिक चेतना के उपयोग से ही यह जान लेती है कि इतनी देर बाद वर्षा होगी, बादल आयेंगे धूप निकलेगी आदि-आदि।

दत्तात्रेय यह सब देखते जा रहे थे और प्रकृति के इस अनोखे व्यापार पर विह्वल भी। सृष्टि के आविर्भाव का एक महान् रहस्य उनकी आत्मा में प्रकट और स्पष्ट होता जा रहा था। वे ध्यानमग्न मकड़ी के इस कूट-जाल का निरीक्षण करने में लगे थे, दिन बीतता जा रहा है इसका उन्हें कुछ भी भान न था।

अभी तक अकेले थी वह मादा मकड़ी। कुछ विश्राम के लिये रुकी तभी एक नया दृश्य सम्मुख उपस्थित हुआ। एक नर मकड़ी जो मादा से आकृति में छोटा होता है उस जाल के पास आता है और सन्देश-सूत्र के सहारे कोई सन्देश प्रसारित करता है। यह उसका प्रणय-निवेदन था। नर मकड़ी निर्बल और भावुक होती है, विवाह की इच्छा उसे स्वयं प्रकट करनी पड़ती है। मादा इस प्रणय-याचना को एकाएक स्वीकार नहीं कर लेती। मनुष्य दाम्पत्य जैसे पवित्र आध्यात्मिक सम्बन्ध पर विचार करे या न करे उसे लौकिक दृष्टि से ही देखे अथवा पारमार्थिक समायोजन भी रखे यह उसकी अपनी बात है पर मकड़ी इस सम्बन्ध में स्पष्ट है। वह अपने पति का चुनाव देर तक संपर्क रखने के बाद जब यह जान लेती है कि भावी-पति में पतित्व के सब गुण हैं तभी सम्बन्ध स्वीकृति प्रदान करती है। इस संपर्क व्यवस्था में उस एक ही सूत से काम चलता रहता है। उसी से वह मकड़े की मानसिक स्थिति, स्वास्थ्य, गुणों आदि का पता लगाती रहती है, योग्य होने पर ही वह विवाह रचाती है।

इसके बाद मादा प्रजनन करती है। बच्चों का पालन-पोषण और उनकी सुरक्षा दोनों मिलकर करते हैं।

दत्तात्रेय यह सब कुछ तन्मयतापूर्वक देख रहे थे और मकड़ी को जैसे इस बात का पता ही न हो वह एकान्त भाव से अपने जीवन-लक्ष्य की ओर बढ़ रही थी।

पिछली थैली से सूत निकाला और नाला पार करने के लिये वह आकाश में तैरी किन्तु हवा की दिशा विपरीत थी वह आगे नहीं बढ़ सकी। फिर जहाँ की तहाँ आ लटकी। किन्तु इससे वह निराश न हुई। पुनः उड़ी फिर वापस आई। बीसियों प्रयत्न बेकार हुये अन्ततः एक बार हवा को अनुकूल होना ही पड़ा। हवा अनुकूल हुई और मकड़ी पीछे से जाला निकालती उस पार जा पहुँची। वहाँ उसने एक ताना एक झाड़ी की शाखा से जोड़ दिया। फिर दूसरा ताना निकालती पहली तरफ आई। कई बार इधर से उधर आ-जाकर उसने जाले को मजबूत कर दिया फिर एक बार उस पर लटककर परीक्षा की कि पुल टूटेगा तो नहीं। जब उसकी दृढ़ता पर विश्वास हो गया तो उसे अपने बच्चों की सेवा में भी समर्पित कर दिया।

एक मकड़ी इधर से चली। उधर की झाड़ी से नीचे उतर गई। सम्भवतः उसे धरती पर रहने की अपेक्षा पानी में रहना पसन्द था। उसने पानी में एक स्थान की खोज की। एक माँसाहारी पौधा उसे दिखाई दिया। कुछ सोचकर उसने वहीं पर अपना किला तैयार कर लिया।

वह जब चाहती अपना सारा जाला स्वयं खाकर फिर अपने मूल निवास को लौटने के लिये तैयार हो जाती। यह सारे दृश्य देखते-देखते प्रातः से शाम हो चली। दत्तात्रेय के हृदय में सृष्टि-संचालन प्रक्रिया का एक गूढ़ रहस्य स्पष्ट हो गया। उन्होंने अनुभव किया आत्मा एक सूक्ष्म चेतन सत्ता है। मकड़ी के समान वह अपनी इच्छा से अपने ही अन्दर से पंच-तत्वों की रचना करती है। जाले से जिस प्रकार मकड़ी अनेक तरह के मकान बनाती है वह भी इन पंचतत्वों से विराट् संसार का निर्माण करती है। इन पंच-तत्वों के प्रपंच में फँसने की अपेक्षा आत्मा को जानने वाला व्यक्ति ही परा-शक्तियाँ, महासमर्थ और अतीन्द्रिय क्षमतायें एकत्रित करता है।

यह संसार चेतना का ही खेल है। यहाँ मकड़ी के समान क्रियाशील, साहसी, कठिनाइयों से भी हिम्मत न हारने वाले पर देर तक विचार-विमर्श करके जीवन की आवश्यक नीतियाँ निर्धारित करने वाले व्यक्ति ही सफल होते हैं। कुछ लोग जो विषयासक्ति में पड़े रहते हैं, वह उन कीड़ों की तरह होते हैं जिनको पौधे भी खा जाते हैं इसलिये विषयासक्ति ही संसार में दुःख है। मनुष्य को चाहिये कि वह संसार में जितनी चाहे सफलता प्राप्त करे पर सब कुछ निष्काम भाव से करता हुआ अन्त में अपनी सम्पूर्ण चेष्टाओं, इच्छाओं को कूटकर अपने में ही समेट कर आत्म-चेतना में लीन हो जाये।

एक बड़े रहस्य से पर्दा उठ गया। दत्तात्रेय ने प्रजापति को एक महत्वपूर्ण दिशा निर्देश के लिये धन्यवाद दिया और मकड़ी को प्रणाम कर कहा-आप मेरी अन्तिम गुरु हैं। अब मुझे और कुछ जानना शेष नहीं रहा। दत्तात्रेय आत्म-कल्याण की साधना के लिये वहाँ से चल पड़े। उधर भगवान् सूर्य पश्चिम क्षितिज पर ढलते जा रहे थे। इधर दत्तात्रेय अपने पाँव बढ़ाते हुये आगे बढ़ रहे थे, मानों उनके और भगवान सूर्य के लक्ष्य में कोई अन्तर न हो।


परिश्रमशील मैक्सीकॉज कबीला

मैक्सिको नगर जहाँ विश्व के ओलम्पिक खेले जाते हैं, वहाँ कभी सुनसान और पत्थरों के अतिरिक्त कुछ न था। यहाँ मैक्सीकॉज नामक कबीला परिवार रहता था, उसे एक अन्य कबीलों के दल ने अपना गुलाम बना रखा था। मैक्सीकॉज बड़े कष्ट झेल रहे थे। ऐसी ही अवस्था में एक दिन उनका सरदार मर गया। मरते समय उसने कहा- परिश्रम करना, परिश्रम से ही कष्ट दूर होंगे।

बहुत दिन बाद एक दिन भूखा-प्यासा कबीला परिवार शोक सागर में डूबा बैठा था तभी उन्होंने देखा कि पत्थरों के बीच एक नागफनी उग आई है। पत्थरों के बीच नागफनी, कठिनाई में विकास- फिर थोड़ी ही देर में एक बाज उड़ता हुआ आया और उसके ऊपर बैठ गया वह बड़ी देर तक बैठा ही रहा। कबीले की एक समझदार स्त्री ने कहा- बाज का सन्देश मेरे पास आ रहा है कि तुम परिश्रम करके यहाँ एक नगर बसाओ तुम्हारे कष्ट दूर होंगे।

कहते हैं उसी दिन मैक्सीकॉज की नींव पड़ी। मैक्सिको ने अथक परिश्रम करके यह नगर बसाया और अन्य कबीलों को जीत कर स्वस्थ राज्य की परम्परा डाली। इस घटना की याद में आज भी मैक्सिकन झंडे में नागफनी पर बैठे बाज का चित्र प्रयुक्त होता है।


अज्ञ रहना अन्धकार में भटकना है।

ज्ञान स्वयं एक अनिवर्चनीय आनन्द है। ज्ञानोद्भूत आनन्द की तुलना आत्मानन्द के सिवाय और किसी से नहीं की जा सकती। भौतिक उपभोगों के सुखों और ज्ञान-जन्य आनन्द के बीच दरिद्री तथा श्रीपति जैसा अन्तर हैं। जिसने एक बार ज्ञान के पवित्र आनन्द का आस्वादन कर लिया, उसके लिये इन्द्रियजन्य आनन्द सदा सर्वदा के लिये हेय तथा अग्राह्य हो जाता है। जब तक मनुष्य आनन्द के लिये ज्ञानार्जन का मार्ग छोड़कर विषयों तथा इन्द्रियों के संयोग में सुख खोजता रहता है तब तक वह मरुमरीचिका में प्यास बुझाने का प्रयत्न जैसी ही मूढ़ता करता रहता है। एक बार ज्ञान का रसास्वादन करने पर वह उसी प्रकार परितृप्त हो जाता है, जिस प्रकार कोई प्यासा सुन्दर, स्वच्छ एवं प्रसन्न जलाशय को पाकर हो जाता है। आत्मा की प्यास ज्ञान रूपी अमृत से ही परितृप्त होती है। सारे काम करते रहकर अथवा काम छोड़कर भी, जैसी भी परिस्थिति हो मनुष्य को ज्ञान-लाभ करने का प्रयत्न अवश्य करते रहना चाहिये। मनुष्य का जीवन पाकर जिसने ज्ञान की कतिपय बूँदें भी इकट्ठी न कीं उसने मानो इस रत्न को मिट्टी मोल खो दिया।

सारे सद्विषयों की परिलीनता एक ही आत्म-ज्ञान के महासागर में पूर्ण होती है। अस्तु यह आवश्यक नहीं कि मनुष्य प्रारम्भ से ही सारे विषयों को छोड़कर एकमात्र आध्यात्मिक ज्ञान में ही तल्लीन हो जाये। जिनको इस प्रकार की सुविधा प्राप्त हो उन्हें तो एक क्षण नष्ट किये बिना ही आध्यात्म-ज्ञान की प्राप्ति में लग जाना चाहिए। किन्तु जिनको इस प्रकार की सुविधा प्राप्त न हो उन्हें अपने आवश्यक विषयों के अध्ययन में लगना ही चाहिए। भौतिक विषयों का अनुसरण भी यदि यह विश्वास एवं दृष्टिकोण रखकर पवित्रता एवं निस्पृहता के साथ किया जाये कि इन सारे विषयों का सम्मिलीकरण एक, अनन्त अगाध एवं परिव्याप्त विषय आत्म-ज्ञान में ही होता है, तो भावना के अनुसार साँसारिक विषयों का भी वही फल बताया गया है जो आध्यात्मिक प्रयासों का।

ज्ञान क्या है? किसी विषय की पूर्ण एवं व्यवस्थित जानकारी को ज्ञान कहा जाता है। यह जानकारी पूर्ण रूप से प्राप्त होने पर, फिर उसका विषय कोई भी क्यों न हो, एक आत्म-सन्तोष एक आत्मभूत आनन्द ही देती है। उदाहरण के लिये राजनीति का ही विषय ले लीजिए। यों तो यह विषय बड़ी ही व्यस्तता, व्यग्रता एवं अशाँति का कारण बतलाया गया है, और इसमें उलझे हुए अधिकाँश लोग अशान्त तथा व्यस्त ही दीखते हैं तथापि जब इसका ज्ञान पूर्णता को पहुँच जाता है तब वह आनन्द का हेतु बन जाता है। राजनीति के धुरन्धर दिन और रात में से अपना कोई भी क्षण बेकार नहीं खोते। वे परिश्रम एवं स्वाध्याय द्वारा अपने राजनैतिक ज्ञान को अनुदैनिक बनाये रहते हैं। सम्पूर्ण संसार की राजनीतिक गति-विधियों तथा उसके अनुबन्धित विषयों का आधुनिकतम ज्ञान उपलब्ध किये रहते हैं। इससे उनको एक प्रकार से सारा संसार ‘करतलगत आमलक समान’- हो जाता है। वे अपने कक्ष में बैठे हुये संसार की सारी गतिविधियाँ, अपने ज्ञान बल पर चलचित्र की भाँति देखा करते हैं। ज्ञान द्वारा प्राप्त यह दिव्य दृष्टि एवं यह आश्चर्यजनक उपलब्धि कितना आनन्द दे सकती है इसका अनुमान नहीं लगाया जा सकता। इस आनन्द की प्रेरणा आत्म-ज्ञान की ओर अग्रसर न करेगी तो क्या इन्द्रिय जन्य भोग सुख की ओर करेगी? इसी प्रकार संसार का कोई भी विषय क्यों न हो उसका सम्पूर्ण ज्ञान समग्र जानकारी आत्मानन्द का ही हेतु बनती है।

जहाँ ज्ञान आनन्द का कारण है वहाँ अज्ञान घोर अशान्ति का हेतु माना गया है। अज्ञान अथवा अविद्या एक तो यों ही अन्धकार माना गया है, और अन्धकार में ग्रस्त मनुष्य का अशान्त रहना स्वाभाविक ही होता है। फिर जीवन में अजानकारी का दोष कितना अशान्त एवं व्यग्र बना देता है इसको समझने के लिये यह साधारण सा उदाहरण ही पर्याप्त है।

जीवन की सबसे आवश्यक, अनिवार्य तथा सामान्य क्रिया ‘ठाठ-बाट’ मानी गई है। क्रय-विक्रय का समुचित ज्ञान न रखने वाला व्यक्ति बाजारों में अधिकतर ठगा ही जाता है। भावों का पता न रहना, वस्तुओं के गुण-दोषों को न जानना, उनकी उपयोगिता-अनुपयोगिता के सम्बन्ध में अज्ञानता मानो एक ऐसा अपराध है, समाज में जिसे क्षमा नहीं किया जा सकता। दुकानदार उसकी इस त्रुटि का पूरा-पूरा लाभ उठाता है। ऊँचे दामों पर घटिया चीजें भेड़ता है। अपने वाक्जाल में घेरकर अनावश्यक एवं अनुपयोगी चीजें माथे मढ़ देता है। इस प्रकार जब वह गाँठ के खरे दाम खोकर घटिया एवं अनुपयोगी चीजें लेकर आता है, तब उसको बेवकूफ बनना पड़ता है। जानकार लोगों के उपहास का विषय बनता है। इस प्रकार अपने अज्ञान का ज्ञान होने पर उन्हें कितना असन्तोष तथा अशान्ति होती होगी, इसे तो उस स्थिति का व्यक्ति ही जान सकता है।

अज्ञान के कारण मनुष्य में आत्म-विश्वास की कमी रहती है। इसलिये या तो वह आवश्यक होने पर भी बहुत से कामों को करने का साहस नहीं करता और यदि डरता-डरता करता भी है तो बहुधा उसमें असफल ही रहा करता है। अज्ञानजन्य असफलता कितने बड़े सन्ताप का कारण होती है- इसे तो वही प्रकट कर सकता है जिसे उन परिस्थितियों का अनुभव होता है।

अज्ञानी व्यक्ति के लिये यात्रा तो एक भयंकर काम है। मार्ग न जानना, भाड़े का ज्ञान न होना, गाड़ियों का समय एवं स्वयं स्थान की अजानकारी वे कमियाँ हैं, जिनके कारण बहुत बार तो लोग जेब के पैसे और पास का माल-असवाब खोकर खाली हाथ घर वापिस आते रहते हैं। इस प्रकार के अशिक्षित तथा अजानकार बहुत-से व्यक्ति आये दिन स्टेशनों पर इधर-से-उधर जिस-तिस से गाड़ी तथा भाड़ा को पूछते-भागते देखे जा सकते हैं। अज्ञानी व्यक्ति को संसार में सभी ज्ञानवान् दिखाई देते हैं। उसकी पूछताछ का जो व्यक्ति भी जो उत्तर दे देता है, उसी पर विश्वास कर लेता है और इस प्रकार बहुत बार लोगों के विवाद का कारण बन जाता है, अथवा न जाने कहाँ का कहाँ पहुँच जाता है। इस दुनिया में सबसे अधिक कष्ट तथा व्यग्रता अज्ञानी व्यक्ति को ही होती है। उसे कदम-कदम पर ऐसे अवसर आते रहते हैं, जो उसको शाँत अथवा सन्तुलित नहीं रहने देते हैं। अज्ञान का एक बड़ा दण्ड पर-निर्भरता भी है। अशिक्षित अथवा अज्ञानी व्यक्ति को एक पत्र लिखाने-पढ़ाने अथवा संसार का कोई समाचार जानने के लिये दूसरे पर ही निर्भर रहना पड़ता है। वह न तो स्वयं पढ़ सकता है और न ठीक से कोई बात समझ सकता है। कदम-कदम की असफलता एवं पर-निर्भरता में कितना सन्ताप, अशान्ति एवं असन्तोष रहता है इसका वर्णन उसके लिये भी सम्भव नहीं जो उसकी आग में जला करता है। अज्ञान का दोष दुर्भाग्य का बहुत प्रबल प्रतिनिधि है। इसे तो हर सम्भव उपाय से मार ही भगाना चाहिए।

जब संसार की साधारण बातों में अज्ञान-अशाँति का इतना बड़ा कारण हो सकता है, तब जीवन आत्मा के और परमात्मा के विषय में उसका अन्धकार कितना भयंकर हो सकता है-इसका अनुमान लगा सकना कठिन है। आत्मा होकर भी अपने को शरीर मानना एक ऐसा अन्य अज्ञान है जो मनुष्य को न केवल लोक अपितु परलोक तक भ्रष्ट कर देता है। अपने को देह मानकर चलते रहने वाले अज्ञानी व्यक्ति ही तो अपनी इन्द्रियों को विषयों द्वारा तृप्त करने में लगा रहकर अपनी आत्मा का नाश किया करते हैं। भोग-विलास की तृष्णा उन्हें मनुष्य से पशु बनाकर रख दिया करती है। वित्तेषणा तथा लोकेषणा की पिशाची उनको कर्म-अकर्म और धर्म-अधर्म की विवेकबुद्धि से वञ्चित रखकर अवसाद की तरंगों पर उठाती-पटकती रहती हैं। दिन-रात शरीर-सेवा में लगे वे इतने मूढ़ हो जाते हैं कि इसके आगे भी एक आत्मा एवं परमात्मा का वह विषय पड़ा हुआ है, जिसका अन्वेषण ही मानव-जीवन का प्रमुख ध्येय है। ऐसे व्यक्ति जल्दी ही देर तक सीमित रहकर आत्मा के साथ-साथ शरीर का भी सर्वनाश कर लेते हैं। अनेक तरह के दैहिक तथा मानसिक रोगों के शिकार बनकर अपने जीवन का एक-एक क्षण अशाँति एवं असन्तोष से भर लिया करते हैं।

जीवन में अशाँति एवं असन्तोष से दूर रहने और एक स्थायी सुख-शाँति प्राप्त करने के लिये मनुष्य को अज्ञान के अन्धकार से निकल कर ज्ञान के प्रकाश में आना ही चाहिए। अशाँत एवं असन्तुष्ट जीवन असफल तथा पापपूर्ण जीवन माना गया है। ज्ञान का प्रकाश पाते ही मनुष्य की आत्मा चमत्कृत हो उठती है। उसके आगे आशा, विश्वास, उन्नति एवं सफलता के हजारों फूल खिलकर अपनी मोहक मुस्कान से उसे आकर्षित करने और बुलाने लगते हैं, मनुष्य-जीवन पाकर जिसने ज्ञान प्राप्त करने के लिये अपने को प्रयत्न एवं पुरुषार्थ से विरत रखा, उसने मानों जीवन में कुछ किया ही नहीं। अनन्त धनराशि, विपुल वैभव, अपरिमित उन्नतियाँ-यदि इनका उद्देश्य आत्मानन्द की ओर प्रेरित करना नहीं है तो तृष्णा आत्मानन्द की तरह निरर्थक एवं निःसार ही मानी जायेगी। ज्ञान के आलोकाभाव में यह सारी उपलब्धियाँ मनुष्य को गलत रास्ते पर ही डालने में सहायक होती हैं। यह कारण अज्ञान ही तो ही कि जीवन की सारी सुख-सुविधायें एकत्र होने पर भी अधिकाँश धनी लोग अधिकाधिक व्यग्र एवं अशाँत रहा करते हैं। ज्ञान का सच्चा रसास्वादन करने वाले विद्वान अथवा महात्मा धन-सम्पत्ति कुछ भी न होने पर भी कितने सुखी, सन्तुष्ट तथा शाँत चित्त देखे जाते हैं। ज्ञान का आलोक प्रकार उन्हें किसी वस्तु की अपेक्षा नहीं रहती। वे सागर की तरह अपनी गम्भीरता में निमग्न आत्म-तुष्ट रहा करते हैं।

ज्ञान द्वारा मनुष्य में जिस दिव्य तेजस्विता का समावेश होता है उसकी तुलना में श्रीमन्तों तथा शासकों का तेज भी नगण्य ही माना जाता है। किसी विद्वान् महात्मा अथवा ज्ञान-गरिमा से अभिभूत व्यक्ति को देखकर सबका मस्तक अनायास ही श्रद्धा से झुक जाया करता है। विद्वान् का आदर-स्वागत बड़े-बड़े श्रीमन्त भी उठकर और आगे बढ़कर किया करते हैं। ज्ञान के धनी विद्वान् का सब कालों तथा सब देशों में सदैव ही सच्चा एवं समुचित आदर होता है। उसके वचन आर्ष-वाक्यों की तरह ही माननीय एवं विश्वस्त माने जाते हैं। संसार का सुधार तथा उसको नई दिशा देना विद्वानों का ही अधिकार है। इस तेजस्विता से किसी मौलिक आनन्द की उपलब्धि होती होगी-यह तो ज्ञानवान् बनकर ही जाना जा सकता है। संसार का सारा सार एवं सुख एक इस ‘ज्ञान’ शब्द में सन्निहित हुआ रहता है। इसकी इतनी महत्ता होते हुए भी जो व्यक्ति अज्ञान के अन्धकार से निकलकर ज्ञानलोक में आने का प्रयास नहीं करते उन्हें मूढ़, दुर्भाग्यवान् अथवा पाप-ग्रस्त प्राणी के अतिरिक्त और क्या कहा जा सकता है? वास्तव में वह मनुष्य सर्वश्रेष्ठ तथा सौभाग्यवान् ही है जो दिनों-दिन ज्ञान की सम्पत्ति संचय करने में लगकर अपने लोक एवं परलोक दोनों को बनाने की बुद्धिमानी कर रहा है।


साँसारिकता और वास्तविकता

साँसारिकता और वास्तविकता-

नट खेल दिखाकर लौटा तो पीछे-पीछे एक साधु भी अपने शिष्य के साथ चल पड़े। मार्ग में नदी पड़ी। नट किनारे बैठकर नाव वाले को पुकारने लगा। सन्त ने पूछा- “क्यों भाई! तुम तो ऐसे-ऐसे करतब दिखा रहे थे- यह छोटी सी नदी भी पार नहीं कर सकते?”

नट ने कहा- “भगवन्! नट-कला और बात है, नदी पार करना और। इन दोनों में कोई संगति नहीं।”

साधु ने अपने शिष्य की ओर संकेत करके कहा- ‘तात! ऐसे ही आध्यात्मिक उन्नति के लिये साँसारिक दृष्टि से चतुर होना ही पर्याप्त नहीं, उसके लिये तो साधन ही काम आते हैं।”


बिना कुछ खाये जिन्दगी बीत गई।

जैसे-जैसे गिरिबाला की आयु बढ़ती गई, उसकी भोजन पचाने की क्षमता भी असाधारण एवं आश्चर्यजनक ढंग से बढ़ती गई। यों वह और भी काम करती थी, पर मुख्य रूप से उसका ध्यान खाने में ही लगा रहता। वह दिन भर खाती रहती। औसतन पाँच-छः व्यक्तियों का भोजन वह अकेली ही खा जाती? अपनी बच्ची थी, इसलिये उसे भूखों मारना तो कठिन था पर माँ भी नहीं चूकती थी- “गिरिबाला! तू ससुराल जायेगी तो तेरी सास तेरी अच्छी मरम्मत करेगी। इतना खायेगी तो भला किस घर में निर्वाह होगा?”

इन पंक्तियों में प्रस्तुत घटना कोई काल्पनिक कथा नहीं, वरन् एक सत्य इतिहास है। गिरिबाला नाम की यह कन्या बंगाल के बाकुड़ा जिले में ब्यूर नामक एक छोटे-से गाँव के सम्पन्न बंगाली परिवार में जन्मी। माता-पिता यद्यपि जमींदार थे पर भाई लम्बोदर बाबू ख्यातिप्राप्त वकील थे। गिरिबाला की इस अस्वाभाविक खाने की आदत से सभी लोग चिन्तित थे और सोचते थे कि यह ससुराल जायेगी तो क्या होगा? पर होनी तो आखिर होनी ठहरी। 12 वर्ष की अल्पायु में ही गिरिबाला का सम्बन्ध कलकत्ता जिले में नवाबगंज के एक सम्पन्न परिवार में कर दिया गया। गिरिबाला ससुराल आई तो पहली ही उसकी इस राक्षसी भक्षण-प्रवृत्ति ने सबको चौंका दिया।

कुछ दिन यों ही बीते। पर आखिर यह पीहर तो था नहीं, अपरिचितों ने अपरिचितों जैसा ही व्यवहार किया। एक दिन सास ने आखिर व्यंग्य-बाण छोड़ ही दिया- बहू, भला तू अपने पिता के घर भी कुछ छोड़कर आई है? तू तो इतना खाती है कि लगता है- घर का एक साल का अन्न एक महीने में ही चुका देगी?

गिरिबाला स्वयं नहीं जानती थी कि यह किस जन्म के संस्कार हैं। पर वह अपने आपको असहाय अनुभव करती, बिना खाये उससे रहा ही नहीं जाता था। पर उस दिन का अपमान कुछ ऐसा था जिसने उसके सम्पूर्ण स्वाभिमान को चरमरा दिया। गिरिबाला ने बड़े आत्म-विश्वास से कहा- “अच्छा, अब आज से बिलकुल एक दाना भी न खाऊँगी।”

सास हंसी और बोली- “बिना खाये एक दिन तो रहा नहीं जाता, उपवास की कहती तो सम्भवतः मान भी लेती। जीवन भर कुछ न खाने का संकल्प और वह भी तू करे- यह नितान्त असम्भव है। कोई योगी होता तो कुछ विश्वास भी कर सकते थे।”

परमहंस योगानन्द ने अपनी पुस्तक- एक योगी की आत्मकथा (ऑटो बाईग्राफी आफ योगी) नामक अपनी जीवनी में इस घटना का कौतूहलपूर्ण विवरण देते हुए लिखा है- मनुष्य को कई जन्मों के संस्कार विलक्षण ढंग से प्रभावित करते हैं, पर सामान्य मनुष्य उन्हें पहचान नहीं पाते, जबकि असामान्य व्यक्ति अपनी बौद्धिक सूक्ष्मता के कारण अपने जीवन की राहें असामान्य बना लेते हैं। गिरिबाला भी ऐसी ही कन्या थी, जो पूर्व जन्म में कोई महान् तपस्विनी, योग-साधिका अथवा कुटीचक संन्यासिनी रही होगी। किसी साधना में विघ्न के कारण सम्भवतः ऐसी स्थिति और यह संस्कार बन गये होंगे। पर साधना और कठिन तपश्चर्या के संस्कार तथापि आत्म-निष्ठा के संस्कार उसमें अब भी अत्यधिक प्रबल थे। उन संस्कारों का ही प्रभाव इस आत्म-विश्वास पूर्ण संकल्प में उभरा था।

गिरिबाला घर से निकली और सीधे गंगा-तट की ओर चल पड़ी। घाट टूटी-फूटी, सीढ़ियों का था, गंगाजी के किनारे देवी का मन्दिर था। पुजारी बाहर ही बैठा था। गिरिबाला ने उसे प्रणाम कर पूछा- “आप कोई ऐसी औषधि, रसायन, प्राणायाम या यौगिक क्रिया बता सकते हैं, जिससे खाने की आवश्यकता न रहे?”

पुजारी ने छूटते ही कहा- “हाँ-हाँ, है क्यों नहीं। पर तुम शाम को आना, तब एक वैदिक क्रिया बतलायेंगे।

गिरिबाला ने पुजारी की मुद्रा में स्पष्ट फूहड़पन देखा। उसे अन्तःकरण में इस वृत्ति पर बड़ा दुःख हुआ कि यह साधु-पुजारी कदाचित् अपना समय नष्ट करने और दूसरों को छलने की अपेक्षा आत्म-निर्माण की आवश्यकता पर कुछ भी जोर दे सके होते तो अपनी यह अवनति क्यों होती, भारतीय दर्शन यों अस्त-व्यस्त क्यों होता? पर 12 वर्ष कुछ महीनों की यह कन्या भला उसे क्या समझाती। वहाँ से चुपचाप चली आई।

गंगाजी में स्नान करते समय गिरिबाला को बड़ी पुलक थी। उसे बार-बार रोमाँच हो जाता था। रह-रह कर उसके अन्तःकरण में एक आवाज उठती थी कि आज उसे कोई महापुरुष मिलेगा अवश्य। जैसे ही वह स्नान कर बाहर खड़ी हुई कि उसने अपने समक्ष एक ज्योति-वृत्त और उसमें खड़े एक छायापुरुष को देखा। और कोई होता तो भय से चक्कर खाकर वहीं ढेर हो जाता। सम्भवतः इसीलिये शक्तिशाली योग-आत्मायें संसार में विचरण तो करती हैं पर किसी को स्थूल रूप से प्रकट होकर कोई सन्देश नहीं दे पातीं। मुसीबत यह है कि सूक्ष्म सन्देश और परा-वाणी को ग्रहण करना सबके वश में नहीं होता।

इसलिये पूर्वजन्मों के परिचितों के साथ ही समर्थ योगी इस तरह प्रकट होते हैं। छाया-पुरुष को देखते ही गिरिबाला की पूर्वजन्मों की स्मृतियाँ साकार हो उठीं। उसके मुँह से अनायास निकल पड़ा-बाबा! आप आ गये।- यह कहकर उसने दण्डवत् की और कहा- भगवन्! दिन भर भोजन करते रहने की पशु-प्रवृत्ति पीछा नहीं छोड़ती। आप मुझे वह योगिक क्रिया बतायें जिससे मुझे फिर कभी खाने की आवश्यकता न पड़े।

छायाकृति योगी ने पातञ्जलि योग-सूत्र के तीसरे अध्याय के 31वें सूत्र का स्मरण कराते हुए कहा-

-बालिके पूर्वजन्म में सिखाया हुआ यह पाठ- ‘कण्ठ कूप से संयम करने से भूख-प्यास की निवृत्ति हो जाती है, भूल गई क्या?

गिरिबाला ने अपनी उँगलियों से सिर खुजलाया मानो उसे पूर्वजन्म की कोई साधना याद आ रही हो। तत्पश्चात् प्रकाश-पुरुष ने प्रकाश-घेरे को बढ़ाया और गिरिबाला को उसी घेरे में ले लिया।

यह सम्पूर्ण घटना श्री स्वामी योगानन्द को बताते हुए गिरिबाला ने आगे कहा- “इसके बाद बाबा ने मुझे प्रकाश के घेरे में दीक्षा दी और वह योगिक क्रिया बताई जिसके द्वारा मैं आकाश से ही भोजन ग्रहण कर लेती हूँ। प्रकाश का वह घेरा लक्ष्मण-रेखा के समान था, उसे कोई नहीं और लाँघ सकता था- हम बाहर के सभी दृश्य देख सकते थे किन्तु हमें कोई भी नहीं देख सकता था। इस तरह मेरे जीवन का एक अध्याय समाप्त हुआ और दूसरे अध्याय का श्रीगणेश, जो 56 वर्ष बीत जाने पर भी लोगों के लिये विस्मय का विषय बना हुआ है।”

गिरिबाला दीक्षित होकर लौटी। शाम तक कुछ भी नहीं खाया। पर घर वालों ने समझा यों ही रूठ गई है, इसीलिये न खा रही होगी। किन्तु दूसरा दिन बीता, तीसरा दिन आया और चला गया। सप्ताह बीते, पखवारे आये और चले गये। कितनी ही पूर्णमासियाँ गुजर गई, वर्ष के वर्ष समाप्त होते गये। अन्न तो दूर गिरिबाला ने कभी एक गिलास पानी भी नहीं पिया। लोग ताक-ताक कर रह गये पर कहीं से कभी भी किसी ने यह नहीं पाया कि गिरिबाला के मुँह में भूल से भी अन्न का एक दाना चला गया हो, जबकि शारीरिक विकास और स्वास्थ्य में राई-रत्ती भर भी अन्तर नहीं था।

समय बीतने के साथ यह खबर भी सारे बंगाल, भारतवर्ष और विदेशों तक में फैलने लगी। बर्दवान के तत्कालीन राजा ने गिरिबाला को राज-दरबार में उपस्थित कराया और परीक्षण के तौर पर तीन महीने तक एक कोठरी में बन्द कर दिया और बाहर से सशस्त्र पहरा लगा दिया। तीन महीने बाद जब उसे निकाला गया और डाक्टरों से जाँच कराई गई तो डाक्टरों ने बताया कि स्वास्थ्य, हृदय और नाड़ियों की गति, रक्त-दबाव आदि सब कुछ वैसा ही है जैसे 3 महीने पूर्व था। स्वास्थ्य में कोई गड़बड़ी या निर्बलता नहीं है। सारे उपस्थित लोग चकित थे कि यह सब क्या है?

सन् 1933 में मेमफिश में चिकित्सकों की एक बड़ी सभा हुई। उसमें क्लेवलैंड के वैज्ञानिक डॉ. जार्ज डब्ल्यू. क्रायल ने अपना शोध निबन्ध प्रस्तुत किया, जो इस विषय में था। डॉ. क्रायल ने बताया कि हम जो कुछ खाते हैं वह मात्र प्रकाश-तरंगों का स्थूल रूप है। हमारा भोजन एक प्रकाश का शक्ति-पुञ्ज है। यदि हम उसे सीधे ग्रहण करने की कोई पद्धति जान सकें तो पेड़-पौधों की तरह हम भी आकाश से सीधे पोषण तत्व प्राप्त कर सकते हैं, अन्न लेना कोई आवश्यक नहीं है।

अपने कथन का वैज्ञानिक विश्लेषण प्रस्तुत करते हुए उन्होंने बताया- “आकाश में प्रकाश विकिरण होता है। उससे शरीर में स्थित विद्युत् तरंगों के लिये विद्युत् प्राप्त होती है। नाडी संस्थान (नर्वस सिस्टम) को सूर्य की किरणों से भोजन मिलता है। अणु सौरमण्डल ही है। ये अणु सूर्य-आभा (सोलर रेडियेन्स) से पूर्ण रहते हैं। इनके अन्दर शक्ति वर्तुलाकार (लाइक क्वाइल्ड स्प्रिंग) रूप में स्थित रहती है। यही अगणित अणु हमारे भोजन के रूप में शरीर में प्रवेश करते हैं और प्रोटोप्लाज्म (वह तत्व जिससे शरीर का निर्माण होता हैं) में परिवर्तित हो जाते हैं। इससे शरीर में स्थित विद्युत् तरंगों को रासायनिक ढंग से शक्ति प्राप्त होती है। शरीर ऐसे ही अणुओं से बना है, यही अणु माँस-पेशियों, मस्तिष्क, ज्ञानेन्द्रियों आदि सभी के ऊतक (टिसूज-कई कोष मिलकर शरीर का अंग बनाते हैं, उन्हें टिसूज कहते हैं) बनाते हैं और इस तरह सम्पूर्ण शरीर शक्ति तरंगों का खेल है। हम चाहे तो आवश्यक शक्ति सीधे आकाश से खींच सकते हैं पर अभी तक उस विधि की खोज नहीं कर सकें।”

जब डॉ. क्रायल का यह बयान योरोप में प्रसारित हुआ, उस समय परमहंस योगानन्द अमरीका में थे। उन्होंने गिरिबाला के सम्बन्ध में कभी सुना था कि वह कभी भोजन नहीं करती। उसका पता और फोटो भी उनके पास था। उनकी जिज्ञासा इस तथ्य को जानने के लिए तीव्र हो उठी। अतएव वे अपने अमेरिका सेक्रेटरी मिस्टर राइट के साथ भारत आये और गिरिबाला के गाँव तक पहुँचे। उन्होंने गिरिबाला से प्रश्न किया- माँ! आप अपने मुँह से बताइये, क्या आप भोजन नहीं करतीं?

गिरिबाला ने उत्तर दिया- “यह बिलकुल सत्य है।”

“क्या आपको भोजन की इच्छा होती है?” योगानन्द ने दूसरा प्रश्न किया।

“नहीं” गिरिबाला ने उत्तर दिया- “इच्छा होती तो खाना पड़ता।”

“तब फिर आप अपने शरीर और स्वास्थ्य के लिये पोषक तत्व कहाँ से पाती हैं?” उन्होंने अगला प्रश्न किया।

“आकाश और सूर्य से जिस प्रकार पेड़-पौधे आवश्यक पोषण प्राप्त करते हैं, उसी प्रकार मेरे गुरु ने मुझे प्राणायाम की एक ऐसी विधि बताई है, जिससे हम आकाश से सीधे तत्व प्राप्त कर लेते हैं।”- गिरिबाला ने विस्तार से बताया।

स्वामीजी ने पूछा- “आप यह विधि हमें और दूसरों को क्यों नहीं बताती, आप अकेले ही ऐसा क्यों करती हैं?”

गिरिबाला ने उत्तर दिया- “मनुष्य कैसा ही समर्थ हो, वह ईश्वर की इच्छा के बाहर नहीं जा सकता। ईश्वर इच्छा-शक्ति की रक्षा करता है, इसलिए ऐसी क्रियायें गुप्त रखनी पड़ती हैं। हमें तो यह प्रदर्शन इसलिये करना पड़ रहा है, ताकि लोग अनुभव करें कि मनुष्य शरीर नहीं आत्मा है।” इस तरह की अनेक वैज्ञानिक प्रणालियाँ हमारे शास्त्रों में हैं, जिन्हें आज के बड़े-बड़े वैज्ञानिक भी नहीं जानते, पर अपना वह तत्व-दर्शन आज अपनों से ही उपेक्षित है- यह सोचते हुए योगानन्द वहाँ से वापिस लौट आये। गिरिबाला 70 वर्ष तक बिना कुछ खाये जीती रहीं, उनका निधन सन् 1962 में हुआ। इसी तरह की कुछ न खाने वाली एक अँगरेज महिला ‘थेरसे न्यूमैन’ भी हुई हैं। उनका वर्णन फिर कभी देंगे।


अपनी संस्कृति तो प्रवासी पक्षी भी नहीं भूलते

कार्तिक लगा और भरतपुर की झीलें तरह-तरह के रंगीन चहल-पहल करने वाले प्रवासी पक्षियों से भरनी प्रारम्भ हुई। कहते हैं भरतपुर आने वाले अधिकाँश पक्षी रूस के साइबेरिया प्रान्त से आये हुए होते हैं। पक्षियों का यों विश्व के भिन्न-भिन्न स्थानों से यह प्रेम विलक्षण है, कौतूहल वर्द्धक भी। उससे जीव मात्र की एकता और सम्पूर्ण पृथ्वी के एक परिवार, एक इकाई होने का जो प्रमाण मिलता है, वह भी कम कौतूहल वर्द्धक नहीं।

बड़ौदा के आस-पास तथा कच्छ के नल सरोवर में भी शेष भारत और विश्व के अनेक भागों से आये हुए पक्षी जाड़े के दिन किस हँसी-खुशी से काटते हैं, उसे देखकर लगता है संसार के लोग भी ऐसे ही परस्पर मिल-जुलकर रहने का अभ्यास कर सके होते तो विश्व कितना खुशहाल दिखाई देता।

पक्षियों के प्रवासी जीवन (माइग्रेशन) का अपना एक विचित्र ही इतिहास है। जहाँ मनुष्यों में थोड़ी-थोड़ी जमीन भाषावार प्राँत, देश-देशान्तरों के मध्य सीमा-विवाद उग्र रूप धारण करते हैं और रक्तपात की परिस्थितियाँ उत्पन्न करते हैं, वहाँ पक्षी हैं- मनुष्य से बहुत नेक, जिन्हें न तो भाषा का भेदभाव करना आता है, न प्रान्त और देश का थोड़े दिन का आयुष्य, बड़ी हँसी-खुशी के साथ बिता लेते हैं।

पक्षी-विशेषज्ञों का मत है कि वे यह सब अन्तःप्रेरणा से करते हैं। इस प्रेरणा का उद्देश्य मौसम की अनुकूलता प्राप्त करना, भोजन और आजीविका की खोज, बच्चे पैदा करने के लिये उपयुक्त वातावरण प्राप्त करना होता है। कई पक्षी प्रकाश की कमी अनुभव करने पर उसी प्रकार एक स्थान छोड़कर दूसरे स्थानों में चले जाते हैं जिस प्रकार कुछ देशों में राजनैतिक या शासन-यन्त्र की भयंकरता के कारण बहुत से लोगों को निर्वासित होना पड़ता है।

किन्तु चिड़ियों के प्रवास की दिशा का अध्ययन यह बताता है कि ऐसा करते समय पक्षी अपना सूक्ष्म बुद्धि, विवेक एवं सूक्ष्म-बूझ का भी प्रयोग करते हैं। वे जब अक्षाँशीय (लाँगीट्यूडनल) पथ पर एक ध्रुव से दूसरे ध्रुव की ओर यात्रा करते हैं, तब ऐसे स्थानों से होकर चलते हैं, जहाँ उन्हें भोजन-घोंसले आदि की सुविधा रहे। लौटते समय भी वे उसका ध्यान रखते हैं। यह केवल अन्तः प्रेरणा से ही नहीं हो सकता। इसमें उनकी समझ ही प्रधान होती है। मनुष्य भी इसी प्रकार प्रवाह से पूर्व समझ से काम ले यह आवश्यक है।

पक्षी जब उत्तरी गोलार्द्ध से दक्षिणी गोलार्द्ध को चलते हैं, तो यह सीधा (देशान्तरीय) प्रवास (वर्टीकल माइग्रेशन) कहलाता है। इसमें भी वही सूझबूझ रहती है। कुछ पक्षी जो एक स्थान पर स्थायी रूप से रहते हैं, पर कुछ ही समय के लिये बाहर जाते हैं, उदाहरण के लिये कौवे, खञ्जन, पिपलीज, मछली राजा (किंगफिशर) आदि को खाना नहीं मिलता, बर्फ जम जाती है तब कुछ ही दिन बाहर रहना पड़ता है, फिर वे वापिस आ जाते हैं। कुछ चिड़ियाएं होती ही खानाबदोश (बर्ड आफ पैसेज) हैं। वे घूमते-फिरते हुए सृष्टि के विभिन्न दृश्यों का आनन्द लेती हुई जीवन यापन करती हैं। इसकी मनुष्य से तुलना करने पर लगता है एक ही गाँव, प्राँत और देश को घर बना लेना मनुष्य जाति की कितनी संकीर्णता है, यदि हम सारे संसार को ही एक परिवार, एक देश मान सके होते तो धरती स्वर्ग बन गई होती।

डॉ. एलचित ने बहुत दिन तक चिड़ियों के प्रवासी जीवन का अध्ययन करके लिखा है-यह पक्षी समय के अनुसार अधिक-से-अधिक अपने रहन-सहन, वेश-भूषा में परिवर्तन भी कर लेते हैं। पर अपनी सभ्यता, संस्कृति और आदर्शों को वे उन स्थानों में भी नहीं भूलते जहाँ उन्हें प्रवासी जीवन बिताना पड़ता है। हम भारतीय हैं जिन्होंने कभी ‘कृण्वन्तोविश्वमार्यम्’, ‘हम सारे विश्व को आर्य (सु-संस्कृत) बनायेंगे’ का नारा दिया था, संसार भर में फैल गये थे, लोगों को धार्मिक, साँस्कृतिक उपदेश व शिक्षण देकर उन्हें सभ्य व सुसंस्कृत बनाया था। उनकी साँस्कृतिक निष्ठा रत्ती भर भी न डिगी थी, तभी सारे विश्व को प्रभावित करना सम्भव हुआ था। आज तो स्थिति बिलकुल ही उलट गई। लाखों-करोड़ों भारतीय जावा, सुमात्रा, मौरिशस, केन्या, यूगाँडा, ट्रिनीडाड, फिलीपिन्स, नैटाल, डर्बन, मलाया, सिंगापुर आदि में बसे हैं,पर उनकी अपनी न शिक्षा रही न संस्कृति। वेश-भूषा, रहन-सहन, आहार-विहार तक बदल गये। नाम अभी भी भारतीय है, पर काम और आचार-विचार तो पाश्चात्यों से भी गये गुजरे हो गये। अपनी संस्कृति के प्रति निष्ठा न होना सत्य सनातन धर्म के लिये भारी आघात हुआ। हम अपनी ही निष्ठा से टूट गये तो संसार पथभ्रष्ट क्यों न होता?

चिड़ियाँ चलने के लिये तैयारी करती है तब अपने पुराने पंख गिराकर नये पंख धारण कर यात्रा का स्वागत करती हैं। पहले वे एक बार परीक्षण उड़ान कर लेती हैं। अकेले नहीं, अनेक चिड़ियाँ एक दिन एक स्थान में नियत समय पर एकत्रित होकर उड़तीं और संगठन व एकता की महत्ता प्रतिपादित करती हैं। वे दिन में भी चलती हैं और सुरक्षा की दृष्टि से रात में भी। पर यात्रा के दिनों में उनकी सभ्यता और शिष्टाचार देखते ही बनता है।

सबसे आगे कबीले की- झुण्ड की वृद्ध चिड़ियाएं चलतीं हैं और मनुष्य जाति को संकेत से समझाती हैं कि वृद्ध शरीर से कितने ही अशक्त क्यों न हो जायें वे कभी अनुपयोगी नहीं होते। उनके पास जीवन भर का ज्ञान और अनुभव संग्रहीत रहता है। चिड़ियाँ उनसे महत्वपूर्ण लाभ ले सकती हैं, तो मनुष्य जैसा समझदार प्राणी वैसा क्यों नहीं कर सकता ? भारतीय संस्कृति में वृद्धों को, माता-पिता को इतना सम्मान दिया गया है, तभी हम संसार में अपना गौरव स्थापित कर सके हैं और आज जबकि पाश्चात्यों के अन्धानुकरण व अपनी ही दुर्बलताओं के शिकार हमने उन्हें आदर देने में कमी कर दी तब हम दिग्भ्रान्त पथिक के समान इधर-उधर भटकते भी दिखाई दे रहे हैं।

चिड़ियों की समझ इस दृष्टि से मनुष्य की समझ से श्रेष्ठ है । वे जब अपने देश से जाती हैं, तब वृद्धों को आगे रखती हैं। उनके पीछे अर्थात् मध्य में छोटे बच्चे होते हैं- सुरक्षा की कितनी सावधानी- सबसे पीछे युवा पक्षी। पर लौटते समय यह स्थिति बिलकुल बदल जाती है। वृद्धों के आदेश पर अब प्रौढ़ पक्षी सबसे आगे चलते हैं, ताकि वे अगली यात्राओं के लिये अनुभव प्राप्त करें, दक्ष हो जायें बीच में वही छोटे बच्चे और सबसे पीछे मार्ग-दर्शन करती हुई वृद्ध चिड़ियाएं। वे रहती भर हैं पीछे, पर रास्ता चलने में थोड़ी-सी भी भूल हो तो वे उसे सुधार देती हैं। घनी अंधेरी रातों में भी वृद्ध पक्षी तारागणों की मदद से उन्हें चलना सिखाते हैं। पक्षी अपने बुजुर्गों के सम्मान का पूरा लाभ लेते हैं जबकि हम मनुष्यों ने बुजुर्गों का सत्कार न कर अपना भारी अहित किया।

हजारों मील की दूरी तक चले जाते हैं यह पक्षी, पर जब वापिस लौटते हैं तो अपनी संस्कृति, बोली, भाषा में किञ्चित मात्र परिवर्तन परिलक्षित नहीं होता। आर्कटिक टर्न 11000 मील की यात्रा करती है तो गोल्डेन पावर 7000 मील का प्रवास। वुडकाक, सारस और राबिन पक्षी क्रमशः 2500, 2000, 1000 मील तक चले जाते हैं। छोटी-छोटी गौरैया और चहचहाने वाली चिड़ियां भी 500 व 300 मील तक चली जाती हैं और विश्व भ्रमण का आनन्द व ज्ञान-लाभ प्राप्त करती हैं।

समुद्र के तट, पर्वत, वादी, घाटियों और नदियों का भ्रमण करते पक्षी होते हैं छोटे, पर अपना दृष्टिकोण विशाल बना लेते हैं। पक्षी-विशेषज्ञों का विश्वास है कि इन्हें पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र, उसके घूमने से उत्पन्न मैकेनिकल फोर्स आदि का भी पता होता है। मनुष्य ही है कि अपने सीमित ज्ञान का दम्भ दिखाता है। यह पक्षी जो ज्योतिर्विज्ञान तक से परिचित होते हैं, अँधेरी रातों में तारों की मदद से आगे बढ़ते चले जाते हैं, पर उन्हें अपनी श्रेष्ठता का कुछ भी अभिमान नहीं होता। एक छोटे-से प्राणी की चहकती-पदकती जिन्दगी जी लेते हैं साथ ही तरह-तरह के ज्ञान और अनुभव भी अर्जित करते रहते हैं। लेकिन ऐसा कभी न हुआ कि उन्होंने अपनी जाति, अपनी संस्कृति, अपनी विशेषताओं का परित्याग किया हो। हम भी अपनी संस्कृति के प्रति वैसी ही निष्ठा व्यक्त कर सके होते, तो स्वयं भी धन्य हो गये होते, धर्म और संस्कृति को भी गौरव प्रदान कर गये होते।

=कोटेशन============================

देश, काल और कठिन परिस्थितियों में भी जो धर्म का त्याग करता, उसे इन्द्र भी पराजित नहीं कर सकते।

-जगद्गुरु शंकराचार्य

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बीमारियों का वास

बीमारियों का वास-

तब बीमारियाँ एक पहाड़ पर रहा करती थीं। पर्वत उन्हें अपनी पुत्री की तरह पालता-पोसता। बीमारियाँ उसका अनुग्रह मानती और कोई भी उपकार करने की इच्छुक बनी रहतीं, पर पहाड़ को उनकी सेवाओं की आवश्यकता भी तो नहीं थी।

कुछ दिन बीते। एक किसान को कृषि-योग्य भूमि की कुछ कमी पड़ी। और कहीं जमीन थी नहीं, अलबता वह पहाड़ ही बहुत सारी जमीन दबाये खड़ा था। यह देखकर परिश्रमी किसान पहाड़ काटने और उसे चौरस बनाने में जुट गया।

किसान ने बहुत-सी भूमि कृषि-योग्य कर ली। यह देखकर दूसरे किसान भी जुट पड़े। किसानों की संख्या देखते-देखते सैकड़ों तक जा पहुँची। इस तरह निरन्तर काया काटते देखकर पहाड़ घबराया और अपने बचाव के उपाय खोजने लगा।

और कुछ तो समझ में नहीं आया- हाँ, उसे अपने कोटर में पल रही बीमारियों की याद अवश्य आ गई। सो उसने सब बीमारियों को इकट्ठा किया और पूछा- क्या आप लोग हमारे उपकार चुकायेंगी? बीमारियाँ तो पहले ही कह चुकी थीं। उन्होंने कहा- आप सहर्ष आदेश दें, हम आपकी क्या सेवा कर सकती हैं?

पहाड़ ने फावड़े और कुदाल चलाते हुए किसानों की ओर संकेत किया और कहा- पुत्रियों। देखो यह रहे मेरे शत्रु मुझे काटकर जर्जर किये दे रहे हैं। तुम सब-की-सब इन पर झपट पड़ो और मेरा नाश करने वालों का सत्यानाश कर डालो।

अपने-अपने आयुध लेकर बीमारियाँ आगे बढ़ीं और किसानों के शरीर से लिपट गई पर किसान तो अपनी धुन में लगे थे। फावड़े जितना तेजी से चलाते, पसीना उतना ही अधिक निकलता और सारी बीमारियाँ घुलकर नीचे गिर जातीं। बहुत उपक्रम किया, पर बीमारियों की एक न चली। एक अच्छा स्थान छोड़कर उन्हें गन्द-वासिनी बनना पड़ा सो अलग।

पहाड़ ने जब देखा कि बीमारियाँ उसकी रक्षा नहीं कर सकीं तो वह बड़ा कुपित हुआ और शाप दिया- मैंने तुम्हें पुत्रियों की तरह पाला फिर भी तुम मेरा थोड़ा-सा काम भी न कर सकीं। अब तुम जहाँ हो वहीं पड़ी रहो।

तब से बीमारियाँ हमेशा गन्दगी में प्रश्रय पाती हैं और मेहनत-कस अनपढ़ हों तो भी स्वस्थ जीवन जीते हैं- यही नियम अब तक चला आ रहा है।


हम सुधरें तो बच्चे सुधरें- वैज्ञानिक दृष्टि

‘बच्चा उतना प्राचीन होता है जितना उसके पूर्वज’ (दि चाइल्ड कैन बी ऐज ओल्ड ऐज हिज एन्सेस्टर्स) वैज्ञानिकों के इस सिद्धाँत का सीधा अर्थ यह है कि बच्चों में दिखाई देने वाली आज की विकृतियों में अधिकाँश उनके माता-पिता और पितामहों का हाथ है। इस सिद्धाँत के अनुसार बच्चे जैसे हैं उसका सीधा सम्बन्ध जातीय गुण (रेशनल हैबिट्स) से है। इसलिये उनमें ठोस सुधार भी हम अपने सुधार और परिवर्तन से ही ला सकते हैं।

जीव-विज्ञान (बायोलॉजी) के अनुसार मनुष्य शरीर का निर्माण जिन छोटे-छोटे परमाणुओं से हुआ है उन्हें कोश सेल कहते हैं। पर यह कोश भी अन्तिम सूक्ष्मकण होते हैं जिन्हें गुण सूत्र (क्रोमोसोम) कहते हैं, यह गुण सूत्र ही बच्चे की प्रारम्भिक विचार प्रणाली और संस्कार के रूप में दिखाई देते हैं। बच्चे की मानसिक रचना जिन 48 गुण सूत्रों से होती है, उनमें एक कोश अर्थात् 24 गुण सूत्र (क्रोमोसोम) पिता प्रदत्त और 24 गुण सूत्र माता के रज से आये हुये होते हैं। इन्हीं से बाद में बच्चा अपनी मानसिक स्थिति स्वतन्त्र ढंग से विकसित करता है। इसलिये यह विश्वासपूर्वक कहा जा सकता है कि बच्चे में आज का संस्कार जो भी है, वह उसके माता-पिता, बाबा-नाना, परबाबा और नाना के पिता आदि से ही कहीं न कहीं से आये हैं। अच्छे हैं या बुरे उनका बच्चे से इतना ही सम्बन्ध है कि वह यदि चाहें तो अपने आप में आकस्मिक परिवर्तन करके अपना जीवन एक नई दिशा की ओर मोड़ दें अन्यथा उनकी आज की स्थिति के लिये पूर्णतया पूर्वज ही उत्तरदायी हैं।

मनोवैज्ञानिक भी इस तथ्य का मानसिक प्रतिपादन बड़े अच्छे ढंग से उदाहरण देकर करते हैं। कुछ बच्चे ऐसे होते हैं, जिन्हें आवश्यकता नहीं होती तो भी कोई वस्तु पेन्सिल आदि चुरा लेते हैं। मनोवैज्ञानिक इसे ‘क्लैक्टो-मीनिया’ कहते हैं। मनोवैज्ञानिक के अनुसार यह ‘क्लैक्टो-मीनिया’ किसी न किसी पूर्वज का ही गुण होता है, जो बच्चे में अकारण ही पनप उठता है और उसे बाग में उगे झाड़-झंखाड़ की तरह उखाड़कर फेंका न जाये तो वह खतरनाक रूप से बढ़ता ही रहता है।

जेरार्ड के एक 9 वर्षीय बच्चे को रॉयल कॉलेज में भरती किया गया। यहाँ प्रायः सभी उच्च परिवारों के होते हैं। इस बच्चे का सम्बन्ध भी एक बहुत सम्पन्न परिवार से था, पर वह प्रतिदिन किसी न किसी लड़के के कमरे में घुसकर गुड़ चुरा कर खा लिया करता। उसके लिये यद्यपि गुड़ का प्रबन्ध था तो भी उसकी यह आदत नहीं छूटती थी। मनोवैज्ञानिकों ने बाद में काफी खोज की तब पता चला कि उसकी माता के पिता (बच्चे का नाना) को घर में गुड़ चुराकर खाने की आदत थी उसका यह संस्कार ही लड़के की माँ के द्वारा बच्चे में विकसित हुआ। चोरी, दंगा-फसाद, चिड़चिड़ापन, भय क्रोध ऐसी सभी बुराइयाँ आज के बंदों की अपनी ही नहीं होतीं उनका सम्बन्ध हमसे अर्थात् पहले की पीढ़ियों से ही होता है।

आज के खराब विचार कल के बच्चे में बुरे संस्कारों के रूप में आ सकते हैं, तो अच्छे विचार और आचरण आने वाली सन्तानों को अच्छे संस्कार भी दे सकते हैं। पैसाडोना जेल में एक विचित्र घटना देखने में आई। एक ही परिवार की तीन पीढ़ी के लोगों में लगातार अपराधी मनोवृत्ति पाई गई। उस परिवार में जन्म लेने वाले प्रायः सभी को किसी न किसी अपराध में जेल जाना पड़ा, किन्तु तीसरी पीढ़ी का एक लड़का बड़ा संयमी और गोल्फ का खिलाड़ी निकला। मनोवैज्ञानिकों ने जाँच करके बताया कि उस लड़के के बाबा की बड़ी इच्छा रहती थी कि वह गोल्फ खिलाड़ी बनें। जहाँ कहीं भी गोल्फ होता वह देखने अवश्य जाता। घोड़ा न होने से वह खेल तो नहीं पाया पर आजीवन उसी के स्वप्न देखता रहा। वैज्ञानिकों की राय में वही संस्कार इस बच्चे में दिखाई दिये।

संस्कारों की शक्ति इतनी बलवान होती है कि वह आने वाली पीढ़ी के मन ही नहीं शरीरों को भी प्रभावित कर सकती है। फरवरी, 1962 के मासिक कादम्बिनी अंक में- ‘मत्स्य कन्यायें’ शीर्षक से डॉ. विश्वनाथ राय ने अपनी एक निजी घटना का विवरण देते हुये बताया है कि- ‘1955 में मैंने एक रोगिणी का प्रसव कराया। प्रसव में मैंने देखा, कि पैर के बदले एक पुच्छाकार माँस पिण्ड बाहर आया और फिर देह सिर अन्त में फूल (प्लेसेंटा) प्रसव हुआ बालक के नाभि के ऊपर का अंश तो मनुष्याकृति से मेल खाते थे नीचे के नहीं। प्रसव के बाद ही बालक मर गया। विकलाँग शिशु का एक्सरे करके मैंने देखा कि उसके ऊपरी भाग की सभी हड्डियाँ सही गठित हुई हैं परन्तु कटि प्रदेश में कोई हड्डियाँ न थीं। अस्थि-चिन्ह मात्र प्रकट होकर रह गये थे।’

लेखक ने विचित्र प्रसव के लिये गर्भिणी की मानसिक स्थिति को दोषी बताया है। इसके लिये आपने डॉ. कुलिगा की खोजों का हवाला देते हुए बताया है कि जच्चा की मानसिक उत्तेजनाओं के कारण ऐसी विकृतियाँ उत्पन्न होती हैं।

यह घटनायें और वैज्ञानिक शोधें दोनों इस बात में एक मत हैं कि आज के बच्चे कल के पूर्वजों की ही मानसिक स्थिति और आचरण के अनुरूप हैं। हमारे सोचने करने की प्रणाली भली हो, उद्दात्त हो तो आने वाली सन्तान भी महान हो सकती है। लूले-लँगड़े विचार भद्दे-भोंडे आचरण से तो वैसी ही अस्त-व्यस्त सन्तानें हो सकती हैं, जैसी आज दिखाई दे रही हैं।


योग्यता की परख

योग्यता की परख-

युवक अंकमाल भगवान बुद्ध के सामने उपस्थित हुआ और बोला- भगवन्। मेरी इच्छा है कि मैं संसार की कुछ सेवा करूं, आप मुझे जहाँ भी भेजना चाहें भेज दें ताकि मैं लोगों को धर्म का रास्ता दिखाऊँ?

बुद्ध हँसे और बोले- तात। संसार को कुछ देने के पहले अपने पास कुछ होना आवश्यक है, जाओ पहले अपनी योग्यता बढ़ाओ फिर संसार की भी सेवा करना।

अंकमाल वहाँ से चल पड़ा और कलाओं के अभ्यास में जुट गया। बाण बनाने से लेकर चित्रकला तक मल्लविद्या से लेकर मल्लाहकारी तक उसने जितनी भी कलायें हो सकती हैं उन सबका उसने 10 वर्ष तक कठोर अभ्यास किया। अंकमाल की कला-विशारद के रूप में सारे देश में ख्याति फैल गई।

अपनी प्रशंसा से आप प्रसन्न होकर अंकमाल अभिमान पूर्वक लौटा और तथागत की सेवा में जा उपस्थित हुआ। अपनी योग्यता का बखान करते हुये उसने कहा- भगवन्। अब मैं संसार के प्रत्येक व्यक्ति को कुछ न कुछ सिखा सकता हूँ। अब मैं 24 कलाओं का पंडित हूँ। भगवान बुद्ध मुस्कराये और बोले अभी तो तुम कलायें सीख कर आये हो परीक्षा दे लो तब उन पर अभिमान करना।

अगले दिन भगवान बुद्ध एक साधारण नागरिक का वेश बदलकर अंकमाल के पास गये और उसे अकारण खरी-खोटी सुनाने लगे। अंकमाल क्रुद्ध होकर मारने दौड़ा तो बुद्ध वहाँ से मुस्कराते हुये वापस लौट पड़े।

उसी दिन मध्याह्न दो बौद्ध श्रमण वेश बदलकर अंकमाल के समीप जाकर बोले-आचार्य आपको सम्राट हर्ष ने मन्त्रिपद देने की इच्छा की है क्या आप उसे स्वीकार करेंगे। अंकमाल को लोभ आ गया उसने कहा- हाँ-हाँ अभी चलो। दोनों श्रमण भी मुस्करा दिये और चुपचाप लौट आये। अंकमाल हैरान था- बात क्या है?

थोड़ी देर पीछे भगवान बुद्ध पुनः उपस्थित हुये। उनके साथ आम्रपाली थीं। अंकमाल जितनी देर तथागत वहाँ रहे आम्रपाली की ही ओर बार-बार देखता रहा। बात समाप्त कर तथागत आश्रम लौटे।

सायंकाल अंकमाल को बुद्ध देव ने पुनः बुलाया और पूछा-वत्स। क्या तुमने क्रोध, काम और लोभ पर विजय की विद्या भी सीखी है। अंकमाल को दिनभर की सब घटनायें याद हो आई। उसने लज्जा से अपना सिर झुका लिया और उस दिन से आत्म-विजय की साधना में संलग्न हो गया।


विज्ञान और धर्म में पारस्परिक सम्बन्ध

प्रकृति और परमेश्वर की तरह विज्ञान और धर्म दो महाशक्तियाँ हैं। एक पुरुष दूसरी नारी-की तरह दो विपरीत वस्तुयें लगती हैं, पर यदि वे दोनों एक दूसरे को काटने लग जायें तो गृह कलह की तरह संसार में सर्वत्र अशान्ति ही अशान्ति फैल सकती है। इस युग में यह बात स्पष्ट दिखाई देने लगी है। इसलिये आज यह तय कर लेना आवश्यक है कि वे दोनों पूरक बनकर रहें अथवा परस्पर विरोध करते रहें।

भावी पीढ़ी को मानसिक दिग्भ्रान्ति से बचाने के लिये यह प्रश्न सुलझाना आवश्यक है। धर्म के गिरते हुए मूल्य को देखकर ऐसा लगता है कि कहीं आने वाली पीढ़ियाँ पूर्णतया पदार्थवादी होकर अपनी आध्यात्मिक शक्तियाँ नष्ट न कर डालें।

हमारी तरह से ऐसे विचार दुनिया के अनेक मनीषियों के मस्तिष्क में आये और उन्होंने अपनी-अपनी तरह के विचार भी दिये। किसी भी ठोस निर्णय के लिये उन के विचारों का बड़ा भारी महत्व हो सकता है। एक अमरीकी स्नातक श्री हरोल्ड केशेलिंग के मस्तिष्क में भी यह प्रश्न उठा था। उन्होंने ‘विज्ञान और धर्म में क्या सम्बन्ध है? इस सम्बन्ध में विस्तृत अध्ययन किया और अपने निर्णयों को एक ‘थीसिस’ के रूप में ‘साइन्स’ एण्ड रिलीजन (विज्ञान और धर्म) के नाम से पेन्सिलवेनिया यूनीवर्सिटी को प्रस्तुत (संमिट) किया। थीसिस के मध्य-पृष्ठों में श्री केशेलिंग ने भी चेतावनी देते हुए लिखा है कि- हमें व्यक्तिगत और सामूहिक रूप से इस परिस्थिति की ओर सच्चे रूप में ध्यान देना होगा हमेशा के लिये यह तय करना होगा कि वास्तव में धर्म और विज्ञान में कोई समझौता हो सकता है या नहीं।’

इसी संदर्भ में अपने विचार व्यक्त करते हुये उन्होंने आगे लिखा- ‘कई धार्मिक संस्थाओं ने यह पहचान लिया है कि धर्म और विज्ञान की सम्मिलित प्रगति से मनुष्य जाति की यथार्थ प्रगति हो सकती है। इस ओर उन्होंने काम भी प्रारम्भ किया है। इससे अनेक मानवीय समस्याओं के सही हल सामने आये हैं। विज्ञान की महत्वपूर्ण बातों में कई बातें ऐसी हैं जो धार्मिक संस्थाओं के लिये उचित है तथा उनकी स्वयं की जानकारी का स्पष्टीकरण करती हैं। पिछले दिनों धर्म विज्ञान का संघर्ष मुख्य बातों में असहयोग के कारण होता था जो अब समाप्त होता जा रहा है। पहले जो बातें विरोधी लगती थीं, अब पूर्ण रूप से एक रूप और अनुरूप प्रतीत होती हैं।’

यह विचार वस्तुतः मार्गदर्शक है। आइन्स्टीन, न्यूटन, गैलीलियो जैसे महान वैज्ञानिकों को अन्ततः यह स्वीकार करना पड़ा कि सब कुछ पदार्थ ही नहीं है कुछ मानसिक और भावनात्मक सत्य भी संसार में है। विज्ञान का दृष्टिकोण उनका स्पष्टीकरण करना है। इस तरह के व्यक्तियों के बाद ही रूढ़िवादी वैज्ञानिक और धार्मिक व्यक्तियों- दोनों को अपना हठ समझौते के लिये बदलना पड़ा। आज पाश्चात्य देशों में इसीलिये लोग विज्ञान की बातों की संगतियाँ आध्यात्मिक सत्यों से जोड़ने लगे। उसे उनकी समझदारी कहना चाहिये। विज्ञान कितना ही आगे बढ़ जाये हम मनुष्य-जीवन के मूलभूत सत्यों यथा जन्म-मरण, परलोक, पुनर्जन्म, कर्मफल, परमात्मा आदि के अस्तित्व और मानव-मानव के बीच के सम्बन्धों को ठुकरा नहीं सकते। उनको सुलझाने के लिये हमें भावनात्मक आधार बनाना ही पड़ेगा और तब-तब धर्म की उपस्थिति अनिवार्य होगी ही।

धर्म और विज्ञान में सम्बन्ध स्थापित करने में प्रमुख कठिनाई इनकी वास्तविक प्रकृति के बारे में प्रचलित मिथ्या-बोध (मिस अण्डरस्टैंडिंग) है। धर्म को अध्यात्मवादियों ने इस ढंग से प्रस्तुत किया है कि विज्ञान उस बात को कभी नहीं मान सकता जैसे कोई भगवान का नाम नहीं लेगा तो नरक को चला जायेगा? वैज्ञानिक कहता है यह भी कोई बात हुई जो कुछ संसार में है ही नहीं उसका नाम कैसे लें, यदि है भी तो क्या वह इतना स्वार्थी है कि केवल अपना नाम न लेने पर कठोरतम दण्ड दे सकता है ‘ऐसा व्यक्ति भगवान हो भी सकता है?’ इसी बात को यदि यों कहा जाता कि ‘मनुष्य जब तक संसार की नियामक सत्ता (क्रियेटिव सावरेन) से संपर्क नहीं बनाता उसके विचार स्वार्थवादी, भोगवादी होते जाते हैं, उससे आत्म-शक्तियों का हनन होता है और जब शक्तियाँ नहीं रहतीं तभी मनुष्य दुःखी रहता है। अशक्त मनःस्थिति में छाई हुई वासनायें ही नरक की तरह हैं’ तो सम्भवतः विज्ञान का समर्थन करने वाले लोगों की समझ में भी बात आती और वे एक विशाल दृष्टिकोण से चिन्तन करने की आवश्यकता अनुभव करते। झगड़ा इसलिये पैदा हुआ कि धर्म विज्ञान के तर्क (लॉजिक) को सन्तुष्ट नहीं कर सका।

इसी तरह वेदान्त के वैशेषिक विज्ञान ने पदार्थ, समय, ब्रह्माण्ड, गति और इन समस्त परिस्थितियों का कारण और उद्देश्य क्या है इस बात का कोई संतोषजनक उत्तर देने से पहले ही कह दिया कि संसार में ऐसी कोई चेतन सत्ता नहीं है जिसे आत्मा या परमात्मा कहें। उसने ऐसा कहते समय मनोविज्ञान के सिद्धाँतों को ठुकरा दिया इसलिये धर्म बिगड़ खड़ा हुआ। यह नासमझी ही दोनों में झगड़े का कारण बनी अन्यथा अन्तर्ज्ञान दोनों ही दिशाओं में एक रूप, एक निश्चित और यथार्थ उद्देश्य की ओर बढ़ रहा है।

प्रोफेसर हरवर्ड डिंगले जो लन्दन विश्व-विद्यालय के सुप्रतिष्ठित खगोल पिण्डों के भौतिकीय एवं रासायनिक विज्ञान के ज्ञाता (एस्ट्रोफिजिस्ट) थे उन्हें जब इससे सन्तोष नहीं हुआ तो उन्होंने मनुष्य जीवन का लक्ष्य निर्धारित करने के लिये विज्ञान का इतिहास (हिस्ट्री आफ साइन्स) और दर्शन शास्त्र (फिलॉसफी) भी पढ़ी। दोनों प्रकार का ज्ञान प्राप्त करने के बाद उन्होंने जो निष्कर्ष दिये वह काफी महत्वपूर्ण एवं विचारणीय हैं। वे लिखते हैं- ‘जब हम उस विज्ञान की प्रकृति (नेचर आफ साइन्स) के बारे में विचार करते हैं जो आजकल प्रचलित है एवं जिसका आजकल उपयोग हो रहा है तो हम ऐसी दुःखद परिस्थितियाँ पाते हैं जिन्हें देखकर भगवान के दूत भी रो पड़ें। यह ऐसा युग नहीं है जिसमें हम विज्ञान की शक्ति को महत्व दें, विज्ञान की सत्यता पर ही ध्यान दें और आध्यात्म के सत्यों को पूर्ण रूपेण भुला दें, क्योंकि उसके दुःखद परिणाम भी हमारे सामने प्रस्तुत हैं।’

इंग्लैंड, अमेरिका, फ्राँस आदि संसार के वह देश हैं जहाँ लोग विज्ञान में जन्म लेते हैं, विज्ञान में पलते हैं, विज्ञान में ही खाते-पीते , चलते हैं। किन्तु इन देशों में 70 प्रतिशत लोगों की मानसिक स्थिति उद्विग्नता से भरी है, दुनिया में सबसे ज्यादा हत्यायें और आत्म-हत्यायें अमेरिका में होती हैं। 70 प्रतिशत लोग नींद की दवाइयाँ लेकर नींद बुलाते हैं। रात में विवाह, सवेरे तलाक (नाइट मैरिजजे मारनिंग डाइवर्स) वहाँ का प्रसिद्ध मुहावरा बन गया है। वहाँ प्रतिक्षण आकाश में हवाई जहाजों की गूँज छाई रहती है, शहरों में शोर-शराबा इतना बढ़ गया है कि जिसे कोई शारीरिक कष्ट नहीं वह भी कुछ विलक्षण सी ताँत्रिक परेशानी अनुभव करता है। कुछ बीमारियाँ केवल इन्हीं देशों में होती हैं, दूसरे देशों के डॉक्टर उनका नाम तक नहीं जानते। यह क्या है-धर्म विहीन, आस्था विहीन भौतिकतावाद का विषदंश। खाते-पीत लोग भी वहाँ शान्ति अनुभव नहीं करते। माता-पिता और बच्चों में भावनात्मक सम्बन्ध बहुत सीमित हो गये हैं। वहाँ लोग धर्म की आवश्यकता तीव्रता से अनुभव कर रहे हैं।

विज्ञान एवं भौतिकतावाद को हम पूर्णतया छोड़ नहीं सकते पर उसी प्रकार धर्म के बिना भी हमारी शान्ति स्थिर नहीं रह सकती इसलिये इन दिनों में समन्वय की जीवन पद्धति अपनानी ही पड़ेगी तभी हम सुखी और शाँतिपूर्ण जीवन यापन कर सकते हैं।


शरीर के हरिजन फेफड़े

शुद्ध प्राणवायु के बिना शरीर का अधिक दिन तक टिके रहना सम्भव नहीं, पर यदि शरीर में शुद्ध हवा ही पहुँचती रहे, रक्त आदि में उत्पन्न गन्दगी दूर न हो तो उस नई शक्ति का पाना भी निरर्थक होता है। अशुद्धि का निवारण न हो तो मनुष्य एक दिन भी स्वस्थ जीवन नहीं जी सकता।

शरीर की गन्दगी के अतिरिक्त हम जो साँस लेते हैं, उसमें भी गन्दगी रहती है। श्वाँस के साथ ली गई वायु में 79 प्रतिशत तो नाइट्रोजन ही होता है, जिसका शरीर में कोई उपयोग नहीं। ऊतकों (टिसूज) के लिये जितना नाइट्रोजन चाहिये वह अलग से मिलता रहता है। ऑक्सीजन मुख्य तत्व है, प्राण है, जिसकी सर्वाधिक आवश्यकता होती है। यह श्वाँस में 20.96 प्रतिशत होता है। इसके अतिरिक्त कार्बनडाई ऑक्साइड नामक विषैली गैस भी .4 प्रतिशत श्वाँस के साथ शरीर में प्रवेश करती है। अब यदि इस प्रविष्ट वायु का प्रत्येक अंश शरीर में चुस जाता तो जितनी गन्दगी भीतर भरी थी, उतनी ही और इकट्ठी हो जाती और प्राणी का जीवित रहना कठिन हो जाता।

हम जहाँ रहते हैं, वहाँ की प्रकृति का ही स्वभाव है कि वह कुछ न कुछ गन्दगी फैलाती रहती है। किसी स्थान की सफाई न हो तो मकड़ी जाला लगा लेगी, कीड़े-मकोड़े पक्षी घर और घोंसले बना लेंगे, मिट्टी, कूड़ा जमा हो जायेगा। यह गन्दगी ही कम हानिकारक नहीं फिर मनुष्य की पैदा की हुई गन्दगी तो और भी घातक होती है। बेचारे हरिजन उस मल-मूत्र की सफाई न करें जो मनुष्य और जानवर फैलाते रहते हैं तो मनुष्य समाज का स्वस्थ रहना कठिन हो जाय। शरीर और मनुष्य समाज दोनों इस दृष्टि से एक समान हैं।

शरीर में सफाई के लिये फेफड़े उत्तरदायी हैं। यह फेफड़े उस स्थान पर हैं, जहाँ श्वाँस नली जाकर बहुत छोटी-छोटी नलियों में बँट जाती है। यह इतनी छोटी होती हैं कि कोरी आँख से भी दिखाई नहीं देती। 40 सूक्ष्म नलिकायें मिलती हैं, तब कहीं एक इंच का एक वायु कोष्ठ (एअरसैक) बनता है। यही वायु कोष्ठ (एअर सैक) सघन होकर फेफड़े का रूप लेते हैं इनकी संख्या 1700 के लगभग होती है। यह सूक्ष्म कोष्ठ चुपचाप हरिजनों के समान सेवा करते रहते हैं, हम उन्हें भले ही छोटा कहें पर उनके कार्य की जितनी सराहना की जा सकती हो कम है। वायु कोष्ठों के समान बेचारे हरिजन कितने नम्र और अपने को छोटा मानने वाले होते हैं, खेद है कि तब भी हम उन्हें अछूत मानते हैं।

श्वाँस लेने के साथ यह वायु कोष्ठ फूलते हैं, छोटे दिखाई देने वाले इन कोष्ठों की महिमा बड़ी विशाल है। यदि उन्हें पूरी तरह फूलने का अवसर दिया जाये तो इनकी दूरी शरीर के बाहरी सतह से 55 गुनी अधिक हो सकती है। हम उसके इसलिये उपयोग नहीं कर पाते क्योंकि हम उसकी सूक्ष्म महत्ता को समझते कहाँ हैं। शरीर में यह फुफ्फुसों का प्राणायाम आदि से पूरा उपयोग लिया जाता तो मनुष्य का शरीर तेज से जगमगाता होता, समाज में यदि हरिजनों को पर्याप्त आदर दिया गया होता तो हमें गन्दगी के दर्शन भी न होते। स्वर्ग से साफ-सुथरे वातावरण का आनन्द ले रहे होते। पर्याप्त आदर न देने का परिणाम दिल्ली के हरिजनों की सी हड़ताल होती है,चार दिन की हड़ताल से शहर में इतनी गन्दगी फैल गई थी कि सड़कों पर निकलना मुश्किल हो गया था। नेताओं ने सड़कों पर झाडू तो लगाई पर अन्ततः उनकी माँगें पूरी करने को विवश ही होना पड़ा।

सफाई जीवन की बड़ी भारी आवश्यकता है कोई यह कोई फेफड़े के काम से सीखे। श्वाँस में आया 79 प्रतिशत नाइट्रोजन तुरन्त वापस। साधारण स्थिति में ऑक्सीजन का कुल 4.5 प्रतिशत ही शरीर ले पाता है यदि श्वास लम्बी और गहरी ली जाये तो 13.5 प्रतिशत तक तिगुनी ऑक्सीजन ग्रहण की जा सकती है। सामान्य अवस्था में जितनी ऑक्सीजन (4.5) प्रतिशत ग्रहण की जाती है उतनी ही अर्थात् 4.5 प्रतिशत कार्बनडाई ऑक्साइड शरीर से बाहर निकल जाती है। फुफ्फुसों की कार्यक्षमता बढ़ाकर इस तरह न केवल अधिक शक्ति ही मिलती है, वरन् दूषित तत्वों की अधिक मात्रा भी शरीर से निकल जाती है और इस तरह शरीर की असाधारण सफाई हो जाती है।

बदायूँ के एक स्कूल के चपरासी को एक बार चोरों ने घेर लिया। चपरासी ने स्कूल की साइकिल देने से इनकार कर दिया। चपरासी को घायल करके ही चोर साइकिल ले जा सके। इस कर्तव्यनिष्ठ चपरासी को हर किसी ने सराहा वैसे ही सराहनीय हैं- शरीर के हरिजन फेफड़े। इन तत्वों के अतिरिक्त जल वाष्प या और कोई गन्दगी शरीर में पहुँचती है, तो वे उसे अपनी क्षति करके ही शरीर के किसी ऊतक तक जाने देते हैं। उनकी शक्ति रहते कोई विजातीय गैस शरीर में नहीं जा सकती।

हृदय के समान ही फेफड़े आजीवन कभी विश्राम नहीं करते। 20 से 30 घन इंच हवा को वे बार-बार भरते और शरीर को ताजगी प्रदान करते रहते हैं, प्रति मिनट 17 बार के हिसाब से यह आजीवन धोंकते रहते हैं, बच्चों की श्वास गति 40 से 25 तक होती है क्योंकि यह उनका विकास काल होता है। इस अवस्था में शरीर का हर कार्य तेजी से होता है। कभी-कभी सामान्य स्थिति में काम अधिक करना पड़ता है तो शरीर के ऊतक (टिसूज) धुलकर कार्बन डाई ऑक्साइड अधिक बनाने लगते हैं। (ऊतक शरीर की असंख्य कोशिकाओं से बनी एक प्रकार की ईंटें हैं जिनमें कार्बन, नाइट्रोजन, हाइड्रोजन और ऑक्सीजन होता है और शरीर के विभिन्न अंग बनते हैं।) इस बढ़े हुए कार्बन डाई ऑक्साइड की सफाई के लिये फेफड़ों को और भी तेजी से काम करना पड़ता है, पर वे कभी उदास नहीं होते। कर्म ही जीवन है के सिद्धाँत का फेफड़े आजीवन अक्षरशः पालन करते हैं और जब कभी कोई ऐसी विकृति उत्पन्न हो जाती है कि फेफड़ों द्वारा शरीर के ऊतकों को ऑक्सीजन मिलना बन्द हो जाता है, उसी दिन मनुष्य की मृत्यु हो जाती है। इससे प्रतीत होता है कि सफाई और स्वच्छता जीवन के अनिवार्य तत्व हैं शुद्धता को उसी से स्थान मिलता है।


भगवान सबको देखता है

भगवान सबको देखता है-

एक बार एक भला आदमी बेकारी से दुःखी था। उसकी यह दशा देखकर एक चोर को सहानुभूति उपजी। उसने कहा- ‘मेरे साथ चला करो, चोरी में बहुत धन मिला करेगा।’ वह बेकार आदमी तैयार हो गया। पर उसे चोरी आती न थी। उसने साथी से कहा मुझे चोरी आती तो है नहीं, करूंगा कैसे? चोर ने कहा इसकी चिन्ता न करो मैं सब सिखा लूँगा। दोनों एक किसान का पका हुआ खेत काटने गये। वह खेत गाँव से कुछ दूर जंगल में था। वैसे तो रात में उधर कोई रखवाली नहीं थी। तो भी चोर ने उस नये साथी को खेत की मेंड़ पर खड़ा कर दिया कि वह निगरानी करता रहे कि कहीं कोई देखता तो नहीं है। वह खुद खेत काटने लग गया।

नये चोर ने थोड़ी ही देर में आवाज लगाई कि- ‘भाई जल्दी उठो, यहाँ से भाग चलो,खेत का मालिक पास ही खड़ा देख रहा है, मैं तो भागता हूँ।’ चोर काटना छोड़कर उठ खड़ा हुआ और वह भी भागने लगा। कुछ दूर जाकर दोनों खड़े हुये तो चोर ने साथी से पूछा-मालिक कहाँ था? कैसे देख रहा था? उसने कहा-ईश्वर सबका मालिक है। इस संसार में जो कुछ है, उसी का है। वह हर जगह मौजूद है और सब कुछ देखता है। मेरी आत्मा ने कहा-ईश्वर यहाँ भी मौजूद है और हमारी चोरी को देख रहा है। ऐसी दशा में हमारा भागना ही उचित था।

पहले चोर पर इसका कुछ ऐसा प्रभाव पड़ा कि उसने हमेशा के लिये चोरी छोड़ दी।


कला की शक्ति लोक मंगल में लग जाय


धर्मात्मा गिद्धराज जटायु

जटायु अपने जीवन-कर्तव्य से निवृत्त होकर आयु का अन्तिम चरण शाँतिपूर्वक भगवत्-भजन में बिताता हुआ मोक्ष का प्रयत्न कर रहा था। वह गिद्ध की योनि में सत्कर्मों द्वारा यह सिद्ध कर रहा था कि मोक्ष का प्रयत्न अधम योनि में भी निषिद्ध नहीं है। यदि कोई सच्चे मन से निम्न योनि में भी धर्म-कर्तव्यों का पालन करता है तो वह उस योनि को भी धन्य बनाकर स्वयं भी धन्य बन जाता है और यदि मनुष्य जैसी श्रेष्ठ योनि पाकर भी अधम कार्य करता है तो न केवल उस योनि को ही कलंकित करता है अपितु स्वयं भी अधम बन जाता है। अधमोन्नत योनि जीव के कर्मानुसार ही मानी जानी चाहिए, जन्म के अनुसार नहीं। सत्कर्मों के कारण ही गीध होते हुए भी जटायु ने देव-पद पाया।

रावण की अनीति सीमा पार की गई थी। यहाँ तक कि वह पिता का वचन पालन करने के लिये वन में आकर रहने वाले राम की पतिव्रता भार्या- सीता का भी छलपूर्वक हरण कर लाया। वह आकाश-मार्ग से अपने वायु-गामी विमान में देवी सीता को बलात् लिये जा रहा था। सीता कातर कुररी की तरह विलाप कर रही थी। वे सहायता के लिये अरण्यवासियों को पुकार रही थीं और बार-बार राम और लक्ष्मण का नाम लेकर रक्षा के लिये रो रही थीं।

राम और लक्ष्मण मारीच के भुलावे में आकर जंगल में बहुत दूर निकल गये थे। सीता की कातर पुकार की सीमा से बहुत दूर। अरण्य निर्जन था। वहाँ के अधिकाँश वासी रावण के अत्याचार और आतंक से त्रस्त होकर अन्यत्र चले गये थे। एक जटायु ही वहाँ किसी स्थान पर अपनी अभीष्ट तपश्चर्या में निमग्न हुए रहते थे। वे इस समय लोक से निवृत्त होकर परलोक अर्जन में लगे हुए थे। उनका शारीरिक पौरुष इस समय विश्राम ले रहा था।

ध्यानावस्थित जटायु के कानों में सीता का क्रन्दन पड़ा और शान्त अन्तस् में पहुँचकर ध्वनित हो उठा। उन्हें ऐसा लगा जैसे किसी गतानुगत जीवन की कोई घटनापूर्ण ध्वनि वर्तमान विकास में घिरकर ध्वनित हो उठी है। वे अपनी समाधि-साधना की अपेक्षा से निरपेक्ष ही रहे। किन्तु ध्वनि स्पष्टतर होती हुई तल्लीनता को अनस्थिर बना रही थी। आखिर जागकर ऊपर आना ही पड़ा। पहचानते देर न लगी कि यह क्रन्दन किसी अत्याचार त्रस्त अबला का है, जो सहायता के लिये आह्वान कर रहा है। परोपकारी जटायु ने हस्तगत होता हुआ मोक्ष का छोर छोड़ दिया और उठ पड़े।

परोपकार की भावना ने उनके शिथिल पंखों में नवजीवन का सञ्चार कर दिया और उन्होंने ध्वनि को लक्ष्य करके वेगपूर्ण उड़ान भरी। अच्छा! तो यह लंका का राजा-रावण है और राम की भार्या को बलात् हरण किए लिये जा रहा है। जटायु ने दूर से ही देखकर पहचान लिया और कहा- ठहर, अत्याचारी ठहर। अनीति का जन्मजात शत्रु- जटायु आ गया । साथ ही वातार्णव में डैनों के डाँड इस वेग से मारे कि मुहूर्त मात्र में पुष्पक विमान के आगे आकर प्रतिरोध में टक्कर मारी। रावण के साथ ही पुष्पक भी काँपकर गतिभंग हो गया। रावण ने चौंककर देखा- क्या यान किसी पर्वत-शिखर से टकरा गया? और खंग खींचता हुआ बोला- अच्छा, जटायु तू है। एक ओर धर्मधारी जटायु और दूसरी ओर खंगधारी रावण। निःशस्त्र जटायु ने रावण के छक्के छुड़ा दिये- कई बार परास्त कर दिया। किन्तु निर्लज्ज पापी जूझता ही रहा और अनीतिपूर्ण घात-प्रतिघात करता रहा। पंख कट जाने से जटायु पृथ्वी पर आ गये। रावण ने अट्टहास किया और कहा- क्षुद्र पक्षी, पा गया न अपने दुःसाहस का दण्ड। जटायु ने उत्तर दिया- पापी! परोपकार में प्राण देकर मुझे तो सद्गति मिलेगी ही, पर तेरा सर्वनाश अब निकट ही है जिसको पाकर तू कल्पों तक नरक भोगेगा। जटायु राम द्वारा संस्कार पाकर सद्गति का अधिकारी हुआ और रावण का चिन्ह तक मिट गया।


अब बलिदानों की बात करो।


अब बलिदानों की बात करो (kavita)

जाने वाले से माँग चुके अनुदान बहुत।

अब तुम भी तो प्रतिदानों की कुछ बात करो॥

तुम दुःखी हुए- दृग-नीर बहाया है उसने,

भीषण संकट से सदा बचाया है उसने,

जब-जब उदभ्रान्त हुए- समझाया है उसने,

उत्कृष्ट प्रगति का मार्ग बताया है उसने।

पर आज कह रहा है वह ‘मेरे साथ चलो’।

तो, मोह त्याग- बलिदानों की कुछ बात करो॥

द्रव्यार्जन किया बहुत- खुद से छल किया करे,

तृष्णा से क्षुधा मिटाई- दृग-जल पिया करे,

चाँदी के तारों से आत्मा को सिया करे,

जैसे पशु जीते हैं- तुम भी तो जिया करे।

वह सिखा रहा तुमको- ‘मानव बनकर जी लो’।

तो तुम भी नव सोपानों की कुछ बात करो॥

तुम अन्धकार में थे- वह ज्योति जला लाया,

देवत्व सिखाया- मार्ग मुक्ति का बतलाया,

हर दुखती रग को बड़े प्यार से सहलाया,

अपना अमूल्य तप भी तुम पर है बरसाया।

मैं कहती हूँ- ‘इतने कृतघ्न मत बनो सखे!’

उसके अमूल्य अहसानों की कुछ बात करो॥

यह विश्व आज दिग्भ्रान्त हुआ है दिशा भूल,

जन-जन के उर में चुभा हुआ अज्ञान शूल,

जीवन कानन रस-हीन हुआ- उड़ रही धूल,

वह कहता तुमसे ‘सखे! खिलादो वहाँ फूल’।

जिस स्वर को सुनकर रोता हृदय विहँस जाये।

बस, ऐसे ही रस-मय गानों की बात करो॥

तुमने सीखा है केवल लेना-ही-लेना,

मैं कहती हूँ- ‘बेहद सन्तोषजनक- ‘देना’,

मन की संतृप्ति मिटाते दो मीठे बयना,

उल्लासपूर्ण- भंवरों में नैया को खेना।

जिनकी न पूर्ण हो सकी साधना-उनके हित।

अपने सञ्चित वरदानों की कुछ बात करो॥

-माया वर्मा

-माया वर्मा

*समाप्त*