राजकुमारी सुकन्या को अपनी भूल का पता तब चला जब महर्षि च्यवन की आँख फूट गई। राजकुमारी ने अनजान में ही यह अपराध हो गया था, पर अपराध तो अपराध ही था। पिता ने बहुत समझाया कि ऐसे वृद्ध और अन्धे व्यक्ति से विवाह कर तू अपना जीवन क्यों बरबाद कर रही है। पर सुकन्या ने कहा-महाराज। जिस दिन अपनी विशिष्टता के दाब में समाज के शीर्षस्थ लोग दण्ड से बचने का प्रयत्न करने लगेंगे, उस दिन यह धरती नरक बन जायेगी। हमारा सम्बन्ध राज घराने से है तो क्या हुआ, न्याय ईश्वर की साक्षी में होता है, इसलिये उसमें न कोई छोटा है न कोई बड़ा।
सुकन्या ने दण्ड मानकर विवाह किया था, पीछे वह बन्धन कर्तव्य में परिवर्तित हो गया। उन्होंने अश्विनीकुमारों की मदद ली और न केवल अपने पति के जराजीर्ण शरीर को स्वस्थ एवं बलिष्ठ बना लिया वरन् च्यवन को वह विद्या भी सिखाई, जिससे वृद्ध शरीरों को फिर से नया किया जा सके।
हमारे पौराणिक ग्रन्थों में जहाँ दस-दस हजार वर्षों की अवस्थाओं के वर्णन आते हैं। वहाँ ऐसे दृष्टान्तों की भी कमी नहीं, जबकि कई लोगों ने अपनी वृद्धावस्था को कई बार युवावस्था में बदला। ययाति ने भी च्यवन की ही भाँति अपने शरीर को बदला था। यह विद्या हमारे औषधि ग्रन्थों और आयुर्वेद में है। महामना मदनमोहन मानवीय ने भी कुछ दिन कायाकल्प का अभ्यास किया था। कई कठिनाइयों से वह प्रयोग अधूरा ही रहा, पर उन्होंने अभ्यास के दिनों में अपने शरीर में कई असाधारण परिवर्तन अनुभव किये थे।
वैसे ऐसे पौराणिक आख्यानों को पहले भी बोगस किया जा रहा है। यह पंक्तियाँ पढ़ने तक हमारे पाठक भी अविश्वस्त हो चुके होंगे और यह सोच रहे होंगे कि ऐसा भी कहीं सम्भव है कि कोई वृद्ध अपना शरीर बदल कर युवक हो सकता है? यदि आप विश्वास न करें, न सही पर वैज्ञानिक यह मानने लगे हैं। वैज्ञानिकों का कथन है कि मनुष्य का शरीर जिन छोटे-छोटे परमाणुओं-कोशिकाओं (सेल्स) से बना है, वह टूटती रहती हैं और नये स्थान कोशों का निर्माण करती रहती हैं। जैसे सर्प की त्वचा के कोश कुछ दिन में अलग होकर झिल्ली (केंचुल) के रूप में अलग हो जाते हैं, मनुष्य की त्वचा के कोश भी 5 दिन में नये बदल जाते हैं। 80 दिन में सारे शरीर की प्रोटीन बिलकुल नई हो जाती है, पुरानी का पता नहीं चलता कि सड़-गलकर कहाँ चली गई।
डॉ. केनिथ रोसले ने अनेक सूक्ष्म प्रयोगों के बाद बताया कि मनुष्य के कोशों (सेल्स) को नितान्त स्वस्थ रखना सम्भव हो, उनमें किसी प्रकार की गड़बड़ी न आये तो गुर्दे 200 वर्ष, हृदय 300 वर्ष तक जीवित रखे जा सकते हैं। इसके बाद उन्हें बदला भी जा सकता है। हृदय प्रतिरोपण के कई प्रयोग तो बहुत ही अधिक सफल हुए हैं। इसके अतिरिक्त चमड़ी, फेफड़े और हड्डियों को तो क्रमशः 1000, 1500 और 4000 वर्षों तक भी जीवित रखा जा सकता है। इन्हें भी बदलने में वैज्ञानिकों को सफलता मिल गई है और यदि कोशों के सम्बन्ध में आगे और भी जानकारियाँ ऐसे ही मिलती गई तो वह दिन दूर नहीं जब वृद्ध च्यवन को युवक च्यवन में बदलने का रहस्य हाथ में आ जायेगा।
मुख्य कठिनाई ‘नाड़ी-कोशिकाओं’ की है। और सब कोश तो बदलते हैं पर वह कोश जो नाड़ियाँ बनाते हैं, अब तक कभी न बदलते हैं न पुराने से नये होते हैं। यह कोश बड़े विचित्र होते हैं, इनकी लम्बाई 3 फीट तक होती है, मुँह मोटा और पूँछ साँप की तरह क्रमशः पतली होती चली जाती है।
इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना, बज्रा, चित्रणी, ब्रह्मनाड़ी, अलम्बुसा, कुहू, गान्धारी जैसी सूक्ष्म नाड़ियों के साथ उपनिषद् व योग ग्रन्थों में 72 हजार नाड़ियों का विवरण मिलता है। आज का उपलब्ध शरीर रचना विज्ञान (एनाटॉमी) योगशालाओं में वर्णित रचनाओं से इतना मिलता-जुलता है कि ऋषियों की आधुनिकतम जानकारियों के लिये दाँतों तले उँगली दबानी पड़ जाती है। यह जानकारियाँ इस बात की प्रमाण हैं कि पुराणों में प्रतिपादित यह विषय और दृष्टान्त केवल मनोरंजन के लिये नहीं लिखे गये, वरन् वैसा निश्चित रूप से था भी। प्राणायाम और एक ही प्रकार के भोजन के दीर्घकालीन अभ्यास (कल्प) चिकित्सा से शरीरस्थ कोशों को आमूलचूल शुद्ध करने का लाभ तो अभी भी हमारे यहाँ हजारों लोग लेते रहते हैं। यदि अध्यात्म के इस शरीर-रचना विज्ञान से विज्ञान की उपलब्धियाँ से खाँचा बैठाया जा सके, तो इस दिशा में तेजी से प्रगति की जा सकती है।
शरीर के कोशों के पुराने से नये बनने और प्रत्येक कोश की अलग-अलग जीवन-अवधि की जाँच का श्रेय स्व. डॉ. एलेक्सिस कैरल को है। आपने रॉकफेलर इन्स्टीट्यूट में इस पर अनेक प्रयोग किये और सन् 1912 में उक्त निष्कर्षों का विवरण देते हुए बताया कि रोग परमात्मा की दी हुई वस्तु नहीं है। यह तो शारीरिक तत्वों की अस्त-व्यस्तता का परिणाम है। अभक्ष्य पदार्थों के भक्षण, धूम्रपान, सुरापान आदि के द्वारा, अधिक भोजन, जल कम पीना, बासी और गरिष्ठ भोजन लेने से ही इस तरह की गड़बड़ होती और रोग के कीटाणुओं को प्रवेश मिलता है।
न्यूयार्क यूनीवर्सिटी के डॉ. मिलन कोपेक सूक्ष्मदर्शियों की मदद से यह जानने के प्रयत्न में हैं कि कोश की मूलभूत रचना के तत्वों और क्रम का पता लगाया जाये। जिस दिन वह पता चल गया तो कोशों का शुद्धीकरण और रोगों से बचना तथा कोषों का आमूल-चूल परिवर्तन कर दीर्घायुष्य प्राप्त करना बहुत आसान हो जायेगा। अल्ट्रावायलेट किरणों आदि के प्रयोग के शिकागो विश्वविद्यालय के डॉ. रेमण्ड जर्किल तथा डॉ. राबर्ट उरेज ने उस सिद्धान्त की भी पुष्टि कर दी है कि प्रकाश-शक्तियों के अवतरण द्वारा भी शरीर को नितान्त शुद्ध और रोगमुक्त बनाया जा सकता है।
भारतीय योग शास्त्रों में शरीरस्थ नाड़ियों में सूक्ष्म प्राण-विद्युत या प्रकाश अणुओं की उपस्थिति के उल्लेख मिलते हैं। साधना-उपनिषदों में इन प्रकाश के नियन्त्रण और लाभ लेने की उन योग-साधनाओं का भी वर्णन है जिनसे इन प्रकाश-अणुओं द्वारा स्थूल अणुओं को न केवल जराजीर्ण होने से रोका जा सके वरन् उनको आमूल-चूल परिवर्तित भी किया जा सके।
योग साधनाओं के द्वारा शारीरिक लाभ तो अभी भी सैकड़ों लोग ले रहे हैं पर इस दिशा में प्रगति और अगली शोधें चलती रहें तो विज्ञान एक दिन वृद्ध शरीर को पुनः छोटे से बच्चे के शरीर में बदलने की सम्भावना को सत्य कर दिखा सकता है पर इसके लिये भारतीय योग साधना विज्ञान का आश्रय और सहयोग लेना नितान्त आवश्यक होगा।
किधर भी दृष्टि डालें, उधर ही चैतन्यता दिखाई देगी; यहाँ तक कि विराट अन्तरिक्ष के परमाणु भी चुप नहीं हैं। सूर्य, चन्द्रमा और नक्षत्र भी अपने भीतर जो कुछ है, उसे विकीर्ण करते रहते हैं और बाहर से कुछ धारण करते हुये अपनी शक्ति बढ़ाते रहते हैं। बढ़ने और बट जाने की इस अन्तर्चेतना का आधार ढूँढ़ना ही ईश्वर को प्राप्त करने का विज्ञान है।
इस जगत में परमात्मा के अद्भुत कर्म-स्थान में हो रहे हैं। उनको देखकर ईश्वर के सामर्थ्य की कल्पना करनी चाहिये। वह ईश्वर जीवात्मा का सच्चा मित्र होने से ही जीवात्मा के हित के लिये सब कार्य इस जगत में कर रहा है। यही उसकी अपार दया है। इस दया के प्रति कृतज्ञ होना और उसका कीर्तन करना ही उसकी भक्ति है।
ज्ञानी लोग उसके इस उपकार का स्मरण करते हुये उसका ध्यान करते हैं; इससे उन्हें परमात्मा का साक्षात्कार ऐसे होता है, जैसे साधारण लोगों को सूर्य दिखाई देता है। विचार की दृष्टि से जो लोग इस जगत को देखते हैं, उनको परमात्मा का साक्षात्कार सर्वत्र होता है।
वे जागृत आत्माएँ जो आलस्य नहीं करतीं और सदा पुरुषार्थ में तत्पर रहती हैं, वे ही भक्ति, ज्ञान और विज्ञान की इस साधनारूपी त्रिवेणी में स्नान करती हुई सिद्धि प्राप्त करती हैं।
ऋग्वेद 1/22
"और दूसरा वह वृक्ष है महात्मन्! देखिये न। आस-पास की सारी भूमि पर उसने अधिकार कर लिया है, छोटे-छोटे पौधों को पनपने नहीं दिया इसने। दूसरे के अधिकार को भी अपना हित मानकर शोषण कर लिया और आज सभी वृक्षों से विशाल दिखाई देने लगा, पर आप हैं कि नैतिकता की प्रशंसा के पुल बाँधे जा रहे हैं। महाराज! संसार में शोषक, शक्तिशाली और हिंसक पनपते हैं। नीति और ईमानदारी को पकड़े रहने वाले बेचारे दूसरे वृक्षों को देखो, कितने कोमल और कमजोर दिखाई देते हैं। उगते, फलते, फूलते तो ये भी हैं,पर इनकी करोड़ों की शान और इस मदमस्ती में झूमते एक विशाल वृक्ष की शान– क्या तुलना हो सकती है ?"
साधु मुस्कराये और बोले– "वत्स! कुछ प्रश्न ऐसे होते हैं, जिनके उत्तर तत्काल नहीं दिये जाते। प्रतीक्षा करो और प्रतिफल देखो। शीघ्र ही समझ में आ जायेगा कि नीति, नीति ही है और अनीति, अनीति ही है। अनीति का अन्त सदैव दुःखद ही होता है।"
ग्रीष्म के अन्तिम दिन, वर्षा के पूर्वारम्भ के दिन बड़े बवण्डरी और तूफानी होते हैं। ऐसे ही किसी एक दिन भयंकर तूफान आया। छोटे-छोटे कोमल पौधे झुक-झुक गये, पृथ्वी माता की गोद में लोट-लोट गये। तूफान उन्हें पार करके निकल गया, तो जैसे पहले खड़े थे, वैसे ही फिर खड़े होकर अपनी विकासयात्रा में जुट गये।
किन्तु उस महावृक्ष के अभिमान और अहंकार का अब तक भी कोई ठिकाना नहीं था। उसी अकड़ में खड़ा रहा। तूफान अपनी सारी शक्ति समेटकर उस पर टूट पड़ा और लंका में जो स्थिति रावण के दस शीश और बीस भुजाओं की हुई थी, वही स्थिति उस भीमकाय वृक्ष की कर डाली। दनुजाकार डालें, तने सब क्षत-विक्षत लोटने लगे, जड़ें भी संभाल न पाईं। पेड़ पल भर में ढेर हो गया।
प्रातःकाल जो भी ग्रामीण उधर से निकलता, हाहाकारी वृक्ष की यह विनाशलीला देखकर उधर ही खिंचा चला आता। देखते-देखते ग्रामवासियों की भीड़ एकत्रित हो गई। इतना बड़ा पेड़ ढहकर भूमि पर बिखरा पड़ा है और छोटे-छोटे पौधे आनन्द की हिलोरें ले रहे हैं। यह देखकर सभी को आश्चर्य हो रहा था, तभी साधु भी उधर आ पहुँचे।
वृक्ष की ओर देखकर हँसे और बोले– "यही है उस दिन के प्रश्न का उत्तर। अनीति और अधर्म से प्रारम्भ में लोग तेजी से बढ़ते हैं, पर अन्त उनका ऐसा ही अनिष्टकारी होता है, जैसे इस वृक्ष का।"
"एक ही रात में इतने ढेर सारे रुपयों की थैली! अरे! यह तो बता।" माँ ने कड़ककर बेटे से पूछा– "यह धन तू कहाँ से लाया ?"
"सेंध काटकर! माँ ! तू ही तो कहती थी कि मनुष्य को सदैव परिश्रम की कमाई खानी चाहिए। माँ ! महाजन की सेंध काटने में मुझे कितना परिश्रम करना पड़ा, तू इस बात को समझ भी नहीं सकती।"
चपत लगाते हुए माँ ने कहा– "मूर्ख ! मैंने इतना ही नहीं कहा था कि मनुष्य को परिश्रम का खाना चाहिए, वरन् यह भी कहा था कि वह ईमानदारी से कमाया हुआ भी हो। उठा यह धन, जिसका है, उसे लौटाकर आ और अपने गाढ़े पसीने की कमाई का भरोसा कर।"
माता की इस शिक्षा को शिरोधार्य करने वाला चोर युवक अन्ततः महासन्त श्रमणक के नाम से विख्यात हुआ।
गंगा का जल शुभ्र, धवल और यमुना का नील वर्ण दोनों जल किसी रजत पात्र में लाकर अलग-अलग रखे जायें, तो भेद किया जा सकता है। श्याम वर्ण जल यमुना का, श्वेत जल गंगा का; किन्तु जब गंगा और यमुना दोनों मिलकर एक हो जाती हैं, तो आगे की पहिचान करना कठिन हो जाता है कि गंगा का जल है या यमुना का। प्रेम की परिणति भी ऐसी ही है कि उसमें दो तत्त्वों का तदाकार इस स्थिति तक हो जाता है कि एक सामान्य रस-धारा के अतिरिक्त दोनों में द्वैत का कहीं कोई भाव ही नहीं रहता। यह नहीं पहचाना जा सकता कि इसमें प्रधान इच्छा किसकी है।
दूध और पानी के समान दो प्रेमियों के हृदय से अलग-अलग प्रस्फुटित दो धाराओं का संगम हो जाता है, तो दोनों में कोई अन्तर नहीं किया जा सकता। स्त्री-पुरुष, भाई-भाई, मित्र-मित्र, पिता-पुत्र आदि लौकिक सम्बन्धों में भी प्रेम का प्रवाह ऐसा ही है। जब सर्वथा दो भिन्न धाराओं का एकाकार होता है, तो यद्यपि दूसरों की दृष्टि में जोड़े में कितने ही दोष-दुर्गुण होते हैं; तो भी उनमें से परस्पर वह दोष तिरोहित हो जाते हैं और केवल गुणों की ही सत्ता शेष रह जाती है। पानी अपनी लघुता को दूध में घुलाकर स्वयं भी दूध हो जाता है। इसलिये सांसारिक सम्बन्धों की मधुरता के लिये भी प्रेम से बढ़कर कोई अन्य उपादान नहीं।
प्रेम अन्तःकरण की एक ऐसी उपज है, जो शुष्क से शुष्क, कठोर-से-कठोर और कितने ही दिशाभ्रांत जीवन को सरस, सरल और प्रकाशवान बना देती है। प्रेम से मधुर संसार में और कुछ नहीं। जब ऐसे दो प्राणी मिलते हैं, तो आनन्द की त्रिवेणी प्रवाहित होने लगती है; किन्तु वियोग से क्या वह आकर्षण समाप्त हो जाता है। चुम्बक के दोनों ध्रुव दो विपरीत दिशाओं में अनन्तकाल से जुड़े हैं, पर उन दोनों का एक ही प्रयत्न है। पुनः मिलन का प्रयत्न अनादिकाल से दोनों ध्रुवों की धारायें एक-दूसरे को आकर्षित करने में लगी हैं। जीवन की प्रत्येक सूक्ष्म सत्तायें अलग-अलग होकर भी अपने प्रेमी के प्रति अद्यतन समर्पित होकर इस सिद्धान्त की पुष्टि करती हैं कि विरह में भी प्रेम निखरता है, कम नहीं होता।
अविश्वास को विश्वास में, निन्दा को प्रशंसा, तर्क-वितर्क को निष्ठा और औद्धत्य को सेवा में बदल देने की शक्ति केवल प्रेम में ही है। प्रेमी कभी आलस्य में घिरा बैठा रहे, ऐसा हो ही नहीं सकता। अपने प्रेमास्पद की कितनी इच्छाएँ उसे पूरी करनी होती है? इच्छाएँ कहीं चुपचाप बैठे पूरी होती हैं? नहीं– तो फिर दोनों ही सक्रिय होते हैं– कुछ न कुछ जुटाते हैं और एक दूसरे को देते हैं। परस्पर आदान-प्रदान की यह धारा ही तो समस्त चेतना का आधार है। जिस दिन वह न रहेगी, उस दिन संसार का विराम एक शून्य के अतिरिक्त कुछ भी तो नहीं होगा। प्रेम ही सृष्टि में प्राण और जीवन का आविर्भाव करता है।
कमजोर हो कोई, और उसे अपनी दीनता धोनी हो, तो वह सच्चे हृदय से प्रेम करके परीक्षा कर ले कि उसके हृदय में साहस और हिम्मत का कितना आधार छिपा पड़ा है। जो कठिन परिस्थितियों में धैर्य नहीं रख सकते, वह सच्चे प्रेमी बनकर जीवन में स्थिरता, दृढ़ता और गम्भीरता ले आते हैं, प्रेमी ही संसार का सबसे अधिक कष्टसहिष्णु हो सकता है। वह जानता है कि प्रेमी के लिये अपने प्राणों का भी कोई मूल्य नहीं, ऐसा व्यक्ति ही सच्चा साहसी, धीर, कर्मनिष्ठ और सम्पत्ति वाला हो सकता है। इसीलिये प्रेम को पारस और कल्पवृक्ष कहा है।
प्रेम जीवन की इन संघर्षपूर्ण परिस्थितियों में भी शुष्कता उत्पन्न नहीं करता, यह संघर्ष करते हुए भी वह रसपान करता है– जहाँ भी, जैसी भी स्थिति में रहता है, स्वर्ग अनुभव करता है। ऐसा केवल जीवित वस्तुओं के प्रति प्रेम से होता हो, सो भी नहीं। किसी भी निर्जीव सत्ता के और आदर्श के प्रति प्रेम में भी वही रस, वही स्वर्गीय अनुभूति और आनन्द की हिलोरें लहर मारती हैं।
सरदार भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरु ने किसी व्यक्ति से प्रेम नहीं किया था, उनका प्रेम अपने देश, अपनी संस्कृति और अपने आदर्श से था। 24 मार्च 1931 को उनको फाँसी होनी थी। किन्तु उन्हीं दिनों महात्मा गाँधी और वायसराय लार्ड इरविन के मध्य वार्ता होने को थी, उसमें उनकी फाँसी की बहाली के लिये भी जोर डाला जा रहा था। कुछ ब्रिटिश अधिकारियों ने द्वेषवश 24 मार्च के बजाय 23 को ही फाँसी दिला दी। उस समय का दृश्य स्मरण करें, तो पता चले कि आदर्शों के प्रति प्रेम की चसक भी राई-रत्ती भर भी कम नहीं होती।
उस दिन एकाएक समय से पहले ही इन कैदियों को कोठरियों में बन्द कर दिया गया। लाहौर सेन्ट्रल जेल के दरोगा श्री शेख मुहम्मद अकबर के आँसुओं ने इन्हें सूचना दे दी थी कि फाँसी आज ही होगी। तीनों कैदी पास-पास की कोठरियों में थे, एक की आवाज दूसरे तक पहुँच सकती थी। राजगुरु ने भगतसिंह को पुकारकर कहा–"मुबारक हो ! आज ही विदा होंगे।" इस पर भगतसिंह बोले– "प्यारे मित्र ! सुना है आज मकतल में हमारा इम्तहान होगा।" ‘इन शब्दों में जो मस्ती थी, वह जेल के अधिकारियों को भी रुला देती थी और उनमें देश प्रेम पैदा कर देती थी। उस दिन इन्होंने रसगुल्ले मँगाकर खाये। जेलर यह भी चाहता था कि उन्हें कोई भी बाहर निकाल ले जाये, वह किसी प्रकार संघर्ष न करता। इन तीनों वीरों को उसकी सूचना भी दे दी गई, पर उन्होंने बाहर निकलने से इनकार कर दिया। उनने माँग की तो कुल इतनी कि जब फाँसी लगने का समय हो, तो उससे 10 मिनट पूर्व बता दिया जाय कि वे अपनी भारतमाता की जय बोल सकें। तीनों ही देशप्रेम के दीवाने ऐसी ही मस्ती भरी आवाज में जय-जयकार करते हुए फाँसी के तख्ते पर झूल गये।
प्रेम, वाणी और हृदय को पवित्र करने वाली सर्वव्यापी सत्ता है। उसमें सच्चाई होती है, आदर्श होते हैं, आग्रह होता है, आकर्षण होता है और होती है हृदय की विशालता, जो न केवल अपने प्रेमी के लिये श्रद्धा-विनत करती है, वरन् सम्पूर्ण चेतना में ही उसे दिव्य रस की अनुभूति कराने लगती है। उसे सब कुछ ‘सीय राम मय’ दिखाई देने लगता है। भावनाओं की तन्मयता, जो हृदय को धोकर साफ कर दे, वही तो प्रेम है। ऐसे प्रेम के साधक के लिये न जप आवश्यक है, न तप। व्रत, नियम तो उसके लिये हैं, जिसके हृदय में राग-द्वेष विद्यमान हों। प्रेम, जीवन की सम्पूर्ण कलुषताओं को धो देता है, दुर्वासनाओं पर नियन्त्रण करके चित्त को निर्मल बना देता है। इसलिये प्रेम सर्वोत्तम योग है, वह साधारण मनुष्य को भी महान बना देता है।
जहाँ प्रेम की चर्चा हो, पर यह गुण न हो, वहाँ प्रेम नहीं वासना, योग नहीं भ्रम समझना चाहिए। ऐसे प्रेम के भुलावे में न आयें, जो प्रेम अपने अन्तःकरण के दोष−दुर्गुणों को उसी प्रकार गुणों में बदल दे, जिस प्रकार गंगा के जल में विलीन हुआ यमुना जल; वही प्रेम सच्चा, सार्थक और अभ्यास के योग्य है। ऐसा प्रेम अमृत है। उसे पीकर मनुष्य अमर हो जाता है।
आगे बढ़ते हुए राहगीर ने मील के पत्थर की ओर देखा और बोला– "उँह! तुम भी कोई आदमी हो, जहाँ गड़ गये वहाँ से हिलने का नाम भी नहीं लेते। देखो, मेरी ओर देखो सारे संसार का भ्रमण करता हुआ आनन्द कर रहा हूँ।"
पत्थर ने धीमी आवाज से कहा– "बन्धु ! मुझे देखकर लोग दूरी का अनुमान कर सन्तोष पाते हैं। इस सेवा का सन्तोष क्या कम सुखद है- जो मैं भी निरुद्देश्य इधर-उधर भटकता फिरूं?"
ब्रह्माण्ड का विस्तार इंच, फुट, गज और मीलों में नापा नहीं जा सकता। उसे केवल समय माप सकता है; क्योंकि वह जब एक मूल बिन्दु से विकसित होना प्रारम्भ हुआ था तब से आज तक बढ़ता ही जा रहा है।
प्रकाश एक सेकेण्ड में 186000 मील चलता है। एक वर्ष में वह 186000 X 60 X 60 X 24 X 365 1/4 मील - 5869713600000 मील चलता है। इतनी दूरी को 1 प्रकाश वर्ष कहते हैं। वैदिक सम्पत्ति के विद्वान् लेखक पं. रघुनन्दन शास्त्री ने पृथ्वी पर मनुष्य की उत्पत्ति का समय परार्द्ध और मन्वन्तरों के हिसाब से 1972940000 वर्ष निकाला है; जबकि पृथ्वी को इससे अधिक ही होना चाहिए। इस हिसाब से अकेले इतने ही समय में ब्रह्माण्ड का विस्तार– 5869713600000 X 1972940000 मील होना चाहिए; पर पृथ्वी तो सौरमंडल का एक अति छोटा-सा ग्रह है; इससे पहले और बाद का विस्तार तो इससे भी अरबों गुना अधिक है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यह ब्रह्माण्ड 50 करोड़ प्रकाश वर्ष के घेरे में है। 10 करोड़ तो नीहारिकाएँ मात्र हैं, जो अनेक सौरमंडलों को जन्म दे चुकीं, दे रही हैं।
पीले रंग का हमारा सूर्य एक प्रकाशोत्पादक आकाशीय पिण्ड– ‘तारा’ माना गया है। इसके मुख्य 9 ग्रह, लगभग 1000 अवान्तर ग्रह, अनेक पुच्छल तारे एवं उल्का समूह हैं। इन सबके द्वारा सूर्य के चारों ओर घेरा गया आकाश सब मिलाकर सौरमंडल कहलाता है। भारतीय मत के अनुसार जहाँ तक सूर्य की किरणें गमन कर सकती हैं, वह सब सौरमंडल का विस्तार है। इस विस्तार का अनुमान करना ही कठिन है; जबकि सौरमंडल सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में ऐसा है जैसे 10 करोड़ मन गेहूँ के ढेर में पड़ा हुआ गेहूँ का एक छोटा दाना। एटलस में सारी पृथ्वी का नक्शा निकालकर अपने गाँव के अपने घर की जगह ढूंढ़ें, तो उसकी माप ही नहीं निकाली जा सकेगी। ऐसी ही नगण्य स्थिति सौरमंडल की इस विराट् ब्रह्माण्ड में है। यहाँ इस सूर्य जैसे करोड़ों सूर्य अरबों चन्द्रमा दिन-रात प्रकाश करते रहते हैं।
किन्तु हमारी दृष्टि में यह विस्तार ही अलौकिक है। सौरमंडल के विस्तार का छोटा-सा अनुमान नवग्रहों के विस्तार से लगाया जा सकता है। 3000 मील व्यास व लाल बुध (मरकरी) सूर्य से 3 करोड़ 60 लाख मील दूर है। यह 88 दिन में सूर्य की परिक्रमा कर लेता है। 7800 मील व्यास का शुक्र (वीनस) सूर्य से 67000000 मील दूर है, 224 1/2 दिन में सूर्य की परिक्रमा करता है। इसके बाद कहीं 7920 मील व्यास की हमारी पृथ्वी है, जो सूर्य से 93000000 मील दूर और 365 1/4 दिन में सूर्य की परिक्रमा लगाती है।
सूर्य का घेरा डालने वाला अगला ग्रहमंडल मार्स है, इसका व्यास तो पृथ्वी से छोटा कुल 4200 मील है, पर यह सूर्य से 141000000 मील दूर और 387 दिन में सूर्य की परिक्रमा पूरी करता है। बृहस्पति (जूपिटर) का व्यास महाभयंकर 87000 मील, सूर्य से 483000000 मील दूर, 12 वर्ष में सूर्य की परिक्रमा करता है। 74000 मील व्यास वाला शनि, सूर्य से 886000000 मील दूर है और 29 1/2 वर्ष में सूर्य की परिक्रमा लगाता है। वारुणी (यूरेनस) 31000 मील तथा वरुण (नेपच्यून) 33000 मील व्यास वाले सूर्य से क्रमशः 180 करोड़ और 280 करोड़ मील दूर, पृथ्वी की 84 वर्ष और 164 1/2 वर्ष में परिक्रमा लगाते हैं। सबसे दूरी का ग्रह यम (प्लूटो) सूर्य से 360 करोड़ मील दूर है। 3000 मील व्यास वाले इस बुध के समान छोटे से ग्रह को सूर्य की परिक्रमा करने में 248 वर्ष लग जाते हैं। बेचारा यम जब तक एक चक्कर पूरा करके फिर उसी स्थान पर पहुँचता होगा, तब तक पृथ्वी में कम से कम 3 पीढ़ियाँ जन्म लेकर मर चुकी होती हैं। वे अनुमान भी नहीं लगा पाते होंगे कि क्या यही वह पृथ्वी है, जिसे पहले चक्कर में कुछ और ही ढंग और तौर-तरीकों से देखे गए थे।
यह 9 तो प्रमुख ग्रह हैं। उन्हीं का विस्तार इतना विशाल है। अभी तो 500 करोड़ और भी तारे, धूमकेतु और क्षुद्र ग्रह हैं, जिनके व्यास 10 मील से लेकर कई-कई हजार मील के हैं। सारा सौरमंडल महादानव की तरह है; यदि कहा जाये तो वह हजार भुजाओं वाले सहस्रबाहु अनेक मुँह वाले दशानन और अपने पेट में सारी सृष्टि भर लेने वाले लम्बोदर की तरह विकराल है और मनुष्य उस तुलना में रेत के एक कण, सुई के अग्रभाग से भी हजारवें अंश छोटा। जैसे मनुष्य जब चलता है तो चींटी, मच्छरों को नगण्य, पाप-पुण्य से परे मानकर मारता– कुचलता निकल जाता है, उसे कभी ध्यान नहीं आता कि इतने भी छोटे कोई जीव हैं, उसी प्रकार सौरमंडल की यह अदृश्य शक्तियाँ हमें कुचलती और क्षुद्र दृष्टि से देखती निकल जाती होंगी, तो हम उनका क्या बिगाड़ सकते हैं। लगी तो रहती है आये दिन शनि की दशा, दीन मनुष्य उससे भी तो छुटकारा नहीं ले पाता।
चन्द्रमा सबसे पास का उपग्रह है। वहाँ लोग थोड़े समय में हो आये। अभी तो बुध है, वहाँ मनुष्य जाये, तो 210 दिन तब लगें, जब वह इतनी ही तीव्र गति से उड़ान करे, जैसे चन्द्रयात्रा के लिये। शुक्र में पहुँचने में 292, मंगल में 598, बृहस्पति में 2724, शनि में 4416 यूरेनस, नेपच्यून तथा यम तक पहुँचने में क्रमशः 32 वर्ष, 61 वर्ष और 92 वर्ष चाहिये; जबकि मनुष्य की अधिकतम आयु ही 100 वर्ष है अर्थात् कोई यहाँ से बाल्यावस्था में चले और यम का चक्कर लगाकर आये तो वह बीच में ही मर जायेगा।
इतनी दूर की यात्राओं के लिये यात्री को और अधिक सामान न हो, तो भी ऑक्सीजन, पानी, आर्गनिक पदार्थ, क्षार आदि तो चाहिए ही। यह सामान भी एक बड़ा बोझ होगा। बुध के लिये 0.615 टन, शुक्र के लिये 0.921 टन, मंगल के लिये 1.824 टन, बृहस्पति के लिए 5.981, शनि के लिए 12.939 टन चाहिए। यदि इतना वजन (1 टन = 27 मन के लगभग) खाद्यान्न ही हो जाये, तो अन्तरिक्ष यानों की भीमकायिकता का तो अनुमान लगाना ही कठिन हो जायेगा। चन्द्रमा जाने वाले अन्तरिक्ष यान में 5600000 पुर्जे लगे थे; यदि उसमें लगे 99.9 प्रतिशत काम करें, शेष .1 प्रतिशत = 5600 पुर्जे ही खराब हो जायें, तो मनुष्य बीच में ही लटका रह जाये?
यह यात्रायें तभी सम्भव हो सकती हैं, जब मनुष्य को कुछ दिन मारकर जीवित रखा जा सके। वैज्ञानिक उसकी शोध में पूरी तरह जुट गया है। हर नई उपलब्धि इस तरह नये प्रश्न और नई समस्या को जन्म देती हुई चली जा रही है। महत्वाकांक्षाएँ हनुमान के शरीर की तरह बढ़ीं, तो प्रश्न और समस्याओं ने सुरसा का रूप धारण कर लिया। आज का विज्ञान मनुष्य को ऐसी ही समस्याओं में ग्रस्त करता हुआ चला जा रहा है।
वैज्ञानिकों ने ऐसे प्रयोग किये हैं, जिनसे मनुष्य को अस्थायी मृत्यु प्रदान करके उन्हें पुनर्जीवित करना सम्भव हो गया है; पर समस्या केवल आयु सम्बन्धी ही तो नहीं है, अन्तरिक्ष की विलक्षण शक्तियों से भी तो भय कम नहीं है; न जाने कितने सूक्ष्म-शक्ति-प्रवाह आकाश में भरे पड़े हैं। वे मानव-नियन्त्रित अन्तरिक्ष यानों को एक सेकेण्ड में कहीं का कहीं पहुँचा सकते हैं। अमेरिका को इन शक्ति प्रवाहों का पता भी है।
इन सीमित भौतिक शक्ति, परिस्थिति और अपनी लघुतम क्षमता लेकर मनुष्य अपने सौरमंडल के विस्तार को ही नाप सकने में समर्थ नहीं, तो फिर विराट ब्रह्माण्ड को जान लेना उसके लिए कहाँ सम्भव है?
पर मनुष्य कोई अकारण वस्तु भी नहीं है। भगवान ने यह शरीर एक ऐसी मशीन बनाई है कि इसमें वह सारे साधन, पदार्थ और शक्तियाँ भरी पड़ी हैं, जिससे ब्रह्माण्ड के विस्तार को यहीं बैठे-बैठे मजे में नापा जा सकता है। सृष्टि में जो कुछ है, यहीं बैठे-बैठे देखा, सुना और प्राप्त किया जा सकता है; पर उसके लिये उसे अपना दृष्टिकोण बदलना होगा। लघुतम बनना पड़ेगा। अपने भीतर खोज करनी पड़ेगी और उन सूक्ष्म शक्तियों का जागरण करना पड़ेगा, जो विराट की सम्भावनाओं को हमें घर बैठे ही उपलब्ध करा सकती हैं।
ब्रह्माण्ड की रचना और विकास सम्बन्धी डॉ0 हापल की खोजों का आज सारे संसार में तहलका मचा हुआ है, किन्तु हापल ही नहीं दूसरे वैज्ञानिकों का भी मत है कि संसार केवल भौतिक पदार्थों या प्रकृति की ही रचना है। उसके मूल में कोई ऐसी चेतन या विचारशील सत्ता नहीं है, जिसे हम ईश्वर, जीव या आत्मा कहें।
भारतीय तत्त्वदर्शन में इन शब्दों को वैज्ञानिक भी बनाकर रखा गया है, इसलिये चेतना की कल्पना असंदिग्ध नहीं है। कठोपनिषद् में पदार्थ से भी सूक्ष्म सत्ता का ज्ञान कराते हुए उपनिषद्कार लिखता है-
इन्द्रियेभ्यः परा ह्यर्था अर्थेभ्यश्च परं मनः।
मनसस्तु परा बुद्धिर्बुद्धेरात्मा महान परः॥
महतः परमव्यक्तमव्यक्तात् पुरुषः परः।
पुरुंपात् न परं किंचित् सा काष्ठा सा परागतिः॥
– 1।3।10, 11
अर्थात् इन्द्रियों से सूक्ष्म उनके विषय और इन्द्रियों– के अर्थ से भी मन सूक्ष्म है। मन से बुद्धि और बुद्धि से भी आत्मा सूक्ष्म है, अव्यक्त-अचिन्त्य-आत्मा से भी परे अर्थात् सूक्ष्म पुरुष है, पुरुष से परे कुछ भी नहीं है। वही अन्तिम स्थान और परे से भी परे की गति है।
पैगिरहस्य ब्राह्मण में, शंकर ब्रह्मसूत्र, मानव धर्मशास्त्र तथा गीता में उसे अज और क्षेत्रज्ञ दो नामों से पुकारा गया है। वास्तव में ईश्वर की व्याख्या के लिये यही दो शब्द सर्वाधिक वैज्ञानिक हैं। प्रकृति का कार्य है– ब्रह्माण्ड की रचना, यदि आत्मचेतना को प्रकृति का ही गुण मान लिया जाये, तो फिर वैज्ञानिक प्रत्येक तारा में जीवन क्यों नहीं मानते? फिर तो किसी भी रूप में प्रत्येक पिंड में जीवन होना चाहिए, पर ऐसा अभी वैज्ञानिक उपकरणों के ज्ञान में नहीं आया है। यद्यपि वह प्रकृति के कण-कण में समाविष्ट है पर वह दृश्य नहीं, क्षेत्रज्ञ है अर्थात् प्रत्येक क्षेत्र को अच्छी प्रकार जानने वाला है। “आनन्दीवातं स्वधया तदेकम्” (ऋग्वेद 10।129।2)- वह बिना प्राणवायु के जीवित, प्रकृति से संयुक्त किन्तु अद्वितीय है।
उपनिषद्कारों की यह मान्यतायें कपोल-कल्पित कर दी गई होतीं, वेद के ज्ञान को सचमुच ठुकरा दिया गया होता यदि विज्ञान उस सूक्ष्मता के अध्ययन की ओर अग्रसर नहीं होता।
संसार के सभी पदार्थ मूलभूत दो प्रकार के कणों से बने हैं– 1. नाभिक कण (न्यूक्लियस)– इसमें अब तक जो जानकारियाँ मिली हैं, वह प्रथम कण प्रोट्रॉन है, जिसमें धन विद्युत आवेश होता है और दूसरा कण न्यूट्रॉन, है जिसमें कोई चार्ज नहीं होता। इससे अधिक नाभिक की कोई जानकारी नहीं थी। यह उल्लेखनीय है कि प्रयोग के समय गणितीय- निष्कर्ष- सत्य निकलते हुए भी यह केवल परिकल्पनायें हैं, इन्हें आज तक किसी ने देखा नहीं। दूसरे नम्बर के कणों को इलेक्ट्रान कहते है, जो ऋण विद्युत के कण होते है और नाभिक के किनारे-किनारे चक्कर लगाते हैं।
सन् 1930 के एक दिन, एक फ्रेंच वैज्ञानिक डॉ. पाल एन्द्रियेन मारिस डीराक के मस्तिष्क में एक विचार आया कि क्या ऐसा भी हो सकता है कि नाभिक (न्यूक्लियस) में पाये जाने वाले धनावेश द्रव्य के साथ ही ऋणावेश द्रव्य भी हो और इलेक्ट्रान के साथ कोई ऐसा भी इलेक्ट्रान हो, जो ऋण विद्युत आवेश न होकर धनावेश हो।
वास्तव में यह कल्पना नितान्त गप्प लगती थी, इसीलिये इस वैज्ञानिक ने अपना विचार किसी पर प्रकट नहीं किया; फिर भी उसके मस्तिष्क में वह काल्पनिक ध्वनि उतनी चुप न रह सकी। वह निरन्तर विचार करता रहा, तो एक दिन वही कल्पना सत्य सिद्ध हो गई और 1933 में ही एक नया कण ‘पॉजीट्रान’ सामने आ गया, जो था तो इलेक्ट्रान, पर उसमें ऋण विद्युत आवेश न होकर धन विद्युत आवेश था। इसी पर मारिस डीराक को ‘नोबुल पुरस्कार’ भी मिला।
उसके बाद भी खोजें चलती रहीं। 1955 में ओवेन चैम्बरलेन तथा एमोलियो जे. सेग्रे ने ‘प्रतिप्रोट्रॉन है तो प्रोट्रॉन ही पर उसका उल्टा अर्थात् ऋणावेश कण है। इस खोज के साथ ही प्रकृति के साथ एक नये तत्त्व की खोज का क्रम चलता है, उसे प्रतिपदार्थ या एण्टीइलेमेन्ट कहते हैं। यह प्रतिपदार्थ कोई स्थूल द्रव्य न होकर वास्तव में वैसा दर्शन या अनुभूति मात्र है, जिसमें समय, गति और पदार्थ समासीन दिखाई देता है। वास्तव में यदि इस नये निष्कर्ष को क्षेत्रज्ञ के साथ तुलना करें, तो स्पष्ट हो जाता है कि ऐसी निराकार सत्ता की स्थिति अकाट्य है, जो स्वयं पदार्थ में होकर भी पदार्थ से परे– अद्वितीय है। इसे जीव, आत्मा, विचार, ज्ञान, अनुभूति, मन, बुद्धि इस तरह की कोई संज्ञा कह सकते हैं।
इससे भी महत् कल्पना तो प्रतिब्रह्माण्ड की है। अब वैज्ञानिक यह विश्वास करने लगे हैं कि ब्रह्माण्ड के निर्माण में, जिससे हम परिचित हैं, केवल वही द्रव्य या पदार्थ काम नहीं कर रहा; वरन् एक उसी के गुणों वाला, किन्तु उससे ठीक विपरीत एक और भी तत्त्व होना चाहिए। उसका नामकरण अभी से कर दिया गया है, पर उसकी जानकारी और खोज अभी तक अधूरी है। इसका मूल कारण परमाणुओं में प्रतिपरमाणु की उपस्थिति है। ऋण और धन आवेश पास-पास आते ही एकदूसरे को रद्द कर देते हैं। उसी प्रकार यह दोनों प्रकार के तत्त्व होकर भी एकदूसरे से विपरीत पड़ने के कारण परस्पर इस प्रकार आलिंगनबद्ध हो जाते हैं कि उन्हें अलग करना कठिन हो जाता है।
तुलसीदास ने भी यही लिखा है –
गिरा अरथ जल-बीचि सम, कहियत भिन्न न भिन्न।
बन्दौं सीताराम पद, जिनहिं परम प्रिय खिन्न॥
जो केवल दुःखियों के दुःख दूर करने में निरन्तर रत हैं, उन प्रकृति और परमेश्वर को एकदूसरे से अलग नहीं किया जा सकता। वे वाणी में, भाव और जल में तरंग की भाँति इस तरह गुथे हैं, कि अलग-अलग कदापि नहीं किया जा सकता।
जो वस्तु है, पर दिखाई नहीं देती, उसके अस्तित्व को कैसे स्वीकार किया जाये, किस प्रकार उसे देखा और उसकी अनुभूति की जाये– यह एक जटिल समस्या है। भारतीय तत्त्वदर्शन के आधार पर ऐसी योग-पद्धतियाँ विकसित की गई हैं, जिनके अभ्यास से इन सूक्ष्म तत्त्वों की अनुभूति की जा सकती है। यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि आदि साधन ऐसे ही हैं, जिनसे आत्मचेतना के विभिन्न स्तरों का क्रमिक विकास होता है और उनसे अन्न या पदार्थों की क्रमशः सूक्ष्म होती अवस्था– रस, रक्त, मास, अस्थि, वीर्य, मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार आदि का तात्त्विक ज्ञान होता चला जाता है; पर यह ऐसी कष्टसाध्य, समयसाध्य तथा श्रद्धा और विश्वासभूत प्रक्रियाएं हैं, जिन पर आज का बुद्धिमान या पढ़ा-लिखा व्यक्ति सहज आस्था प्रकट नहीं कर सकता। तर्क की कसौटी पर यह मान्यतायें सही नहीं उतरतीं। आज की प्रत्येक बात विज्ञान के तरीके से स्वीकार की जाती है। यद्यपि उपरोक्त तरीके आत्मविकास के वैज्ञानिक प्रयोग ही हैं, पर उनका वैज्ञानिक विश्लेषण न हो पाने से ही तथाकथित तार्किक व्यक्ति सन्तुष्ट नहीं हो पाते; उन्हें ईश्वरीय उपस्थिति और आत्मकल्याण के सूत्र वैज्ञानिक ढंग से ही समझाये जा सकते हैं। अब विज्ञान इस स्थिति में आ भी गया है, जब भारतीय तत्त्व दर्शन को हल्का बनाकर उन्हें भी इन सत्यों से परिचित कराया जा सके।
न्यूटन बगीचे में बैठा था। ऊपर पेड़ से एक सेब गिरा, तो न्यूटन चकित हो गया। सामान्य व्यक्ति के लिये इसमें क्या आश्चर्य हो सकता था, पर न्यूटन के मस्तिष्क में उसी बात ने एक भिन्न दिशा पकड़ी। उसने सोचा– वह सेब नीचे ही क्यों आया, आकाश में क्यों नहीं चला गया? इस तर्क ने गुरुत्वाकर्षण सिद्धांत को जन्म दिया, जो आज तक विज्ञान-जगत का एक विशिष्ट सिद्धांत माना जाता रहा है।
अब उसे सार्वभौमिक नियम बनाने में कठिनाई हो रही है। फ्रांस के वैज्ञानिक पॉल काउडर्क ने अपनी पुस्तक 'ब्रह्माण्ड विस्तार', पेज 196 (एक्शपैंशन आफ दि यूनिवर्स) में लिखा है कि तारामंडल गैलेक्सीज का दूरगमन न्यूटन के सिद्धांत को तोड़ता है। गुरुत्वाकर्षण के अनुसार तो पदार्थ को सीमित होना चाहिए, वह फैलता क्यों है? आइंस्टीन का भी मत है कि न्यूटन का गुरुत्वाकर्षण कोई शक्ति नहीं, वरन् पार्थिव आकर्षण मात्र है’। वस्तुतः न्यूटन को जो श्रेय मिला, वह तो हमारे भीष्म पितामह को मिलना चाहिए, जो आइन्स्टीन से कहीं अधिक समीप है। भूत पदार्थों के गुणों का वर्णन करते हुए उन्होंने युधिष्ठिर से कहा-
भूमैः स्थैर्यं गुरुत्वं च काठिन्यं प्रसवात्मता।
गन्धो भारश्व शक्तिश्च सघातः स्थापना धृतिः॥
– महाभारत शा. प. 261
हे युधिष्ठिर। स्थिरता, गुरुत्वाकर्षण, कठोरता, उत्पादकता, गन्ध, भार, शक्ति, संधान, स्थापना आदि भूमि के गुण हैं।
यह गुण भूमि में ही नहीं, संसार के सभी पदार्थों में है कि वे अपनी तरह के पदार्थों को आकर्षित और प्रभावित करते हैं, भले ही वह दूरी कितनी ही क्यों न हो। इसका सबसे अच्छा विश्लेषण कई हजार वर्ष पूर्व महामुनि पतंजलि ने ‘सादृश्य और आंतर्य’ सिद्धांत से कर दिया था। गुरुत्वाकर्षण सादृश्य का ही उपखंड है। समान गुणों वाली वस्तुएँ परस्पर आकर्षित होती हैं। उससे आंतर्य पैदा होता है अर्थात् एक स्थान की वस्तुएँ दूसरे स्थानों की ओर गमन करती रहती हैं। इसी से सृष्टि-विकास की प्रक्रिया निरन्तर चल रही है-
‘अचेतनेष्वपि, तद् यथा-लोष्ठ क्षिप्तो बाहुवेगं गत्वा नैव निर्यग गच्छति नोर्ध्वमारोहति पृथिवीविकारः पृथिवीमेव गच्छति-आन्तर्यत: तथा या एता आन्तरिक्ष्यः सूक्ष्मा आपस्तासाँ विकारो धूमः। स आकाश देशे निवाते नैव तिर्यग् गच्छति नावागवरोहति। अब्विकारो ऽप एवं गच्छति आर्न्तयतः। तथा ज्योतिषो विकारो अर्चिराकाश देशो निवाते सुप्रज्वलितो नैव तिर्यग् गच्छति, नावागवरोहति। ज्योतिषो विकारो ज्योतिरेव गच्छति आर्न्तयतः। - 1।1।50
‘चेतन-अचेतन सबमें आंतर्य सिद्धान्त काम करता है। मिट्टी का ढेला आकाश में जितनी बाजुओं की ताकत से फेंका जाता है, वह उतना ऊपर चला जाता है, फिर न तो ऊपर जाता है न ही तिरछा जाता है, वह तो पृथ्वी का विकार होने के कारण पृथ्वी में ही आ गिरता है। इसी का नाम आंतर्य है। इसी प्रकार अन्तरिक्ष में सूक्ष्म आपः (हाइड्रोजन) की तरह का सूक्ष्म जलतत्व ही उसका विकार धूम है। यदि पृथ्वी में धूम होता है, तो वह पृथ्वी में क्यों नहीं आता? वह आकाश में जहाँ हवा का प्रभाव नहीं, वहाँ चला जाता है– न तिरछे जाता है, न नीचे आता है। इसी प्रकार ज्योति का विकार “अर्चि” है। वह भी न नीचे आता है, न तिरछा जाता है। फिर वह कहाँ जाता है? ज्योति का विकार ज्योति को ही जाता है।’
इस आंतर्य के सिद्धान्त से शरीर के स्थूल और सूक्ष्म सभी तत्त्वों का विश्लेषण कर सकते हैं। इनमें सभी स्थूल, द्रव्य आदि अपने-अपने क्षेत्र को चले जाते हैं, पर प्रत्येक क्षेत्र का अनुभव कराने वाला अर्चि कहाँ जाता है? उसे भी आंतर्य के सिद्धांत से कहीं जाना चाहिए। उसका भी कोई ब्रह्माण्ड और ठिकाना होना चाहिए, जहाँ वह ठहर सके। जब इस प्रकार का ध्यान किया जाता है, तब एक ऐसी उपस्थिति का बोध होता है, जो समय, ब्रह्माण्ड और गति से भी परे होता है। वह कारण-चेतना ही ब्रह्म है। योग का उद्देश्य शरीरस्थ क्षेत्रज्ञ को उस कारण-सत्ता में मिला देने का है। आंतर्य सिद्धान्त ध्यान की इसी स्थिति को सिद्ध करता है। इसीलिये उसे प्रतिगुरुत्वाकर्षण कहा जा सकता है अर्थात् मन को अन्य सभी विकारों का परित्यागकर केवल चेतना को चेतना से ही, प्रकाश को प्रकाश से ही मिलाने का अभ्यास करना चाहिए। इसी से पदार्थ से परे, राग-द्वेष आदि पार्थिव विकारों से परे, उस शुद्ध-बुद्ध-निरंजन आत्मा और परमात्मा की अनुभूति की जा सकती है।
जब तक तुम स्वयं अपने अज्ञान को दूर करने के लिये कटिबद्ध नहीं होते, तब तक कोई तुम्हारा उद्धार नहीं कर सकता।
– स्वामी रामतीर्थ
आनन्द की उत्पत्ति प्रियता से ही होती है। यह सारा संसार पंचतत्वों से बना है। पंचतत्वों की स्थिति जड़ है। जड़ता में न तो सुन्दरता होती है, न आकर्षण और न आनन्द। इस प्रकार यह सारा संसार एक प्रकार से असुन्दर एवं अनाकर्षक ही है। तब भी लोगों का मन संसार में लगता है। उसमें आनन्द और सुख की प्राप्ति होती है।
यह बात सही है कि संसार में लोगों का मन लगता है, आनन्द आता है; किन्तु यह बात भी गलत नहीं है कि सन्त को न तो संसार की सब चीजें अच्छी लगती हैं, और न सब बातों में आनन्द ही आता है। किसी को आनन्द केवल उसी विषय अथवा वस्तु में प्राप्त होता है, जो उसे प्रिय होती है। उदाहरण के लिए, परस्पर विरोधी वस्तुएँ होने पर भी किसी को दूध पसन्द आता है, उसे सेवन करने में आनन्द मिलता है, और किसी को शराब पीने में। यदि उनमें से किसी एक ही वस्तु में आनन्द होता, तो वही एक चीज सबको प्रिय एवं पसन्द होती; लेकिन ऐसा नहीं होता। वास्तविक बात यह है कि जिस मनुष्य की, जिस वस्तु में प्रियता संलग्न होती है, वही चीज उसे पसन्द आती है, और उसी में आनन्द प्राप्त होता है। इस सारे विवेचन का अन्तिम निष्कर्ष यही निकलता है कि आनन्द और आकर्षण वस्तु अथवा विषय में नहीं बल्कि मनुष्य की प्रियता में होता है।
प्रियता की उत्पत्ति आत्मीयता से होती है। जमीन, जायदाद, घर, मकान, पशु-पक्षी, जो भी जब तक अपने रहते हैं, उनके प्रतिआत्म भाव बना रहता है, बड़े प्रिय लगते हैं। उनकी सुरक्षा, सुन्दरता और पालन-पोषण में बड़ी रुचि रहती है। उनको जरा सी क्षति होते ही हृदय पर चोट लगती है। उन्हें देख-देखकर बड़ा आनन्द मिलता है। किन्तु जब किन्हीं कारणों से वे अपनी वस्तुयें पराई हो जाती हैं, तो आत्मीयता का भाव समाप्त हो जाने से, उनके प्रति किसी प्रकार का आकर्षण नहीं रह जाता। उन वस्तुओं के प्रति प्रियता का भाव नहीं रहता और तब उनके टूट-फूट, मर-मिट जाने पर भी अपने को कोई कष्ट नहीं होता। यदि आनन्द और प्रियता उन वस्तुओं में रही होती, तो अवश्य ही अपनी न रहने पर भी उनके प्रति वही प्रियता और आकर्षण बना रहता। आनन्द की उत्पत्ति प्रियता से ही होती है और प्रियता की उत्पत्ति आत्मभाव से।
आत्मीयता में प्रियता की उपलब्धि इसलिए होती है कि आत्मा अपने को बहुत प्यार करता है। जिस वस्तु अथवा विषय में वह अपनी छाया की झलक पाता है, वही उसे प्रिय लगने लगती है। अन्य बच्चों की अपेक्षा मनुष्य को अपने बच्चे अधिक प्यारे लगते हैं; दूसरे के बच्चे चाहे जितने सुन्दर और सुशील क्यों न हों, तब भी वे उतने प्रिय नहीं लगते, जितने कि अपने बच्चे। इसका कारण यही होता है कि अपने बच्चे अपनी आत्मा के अंश होते हैं। वे आत्मा का ही एक प्रतिबिंब होते हैं। चूँकि आत्मा अपने को प्यार करता है, इसलिए अपने अंश रूप बच्चों को भी प्यार करता है। परमात्मा की तरह निराकार होने पर भी आत्मा बड़ा सुन्दर और आनन्दमय है और उसी की तरह वह अपने स्वरूप को भली-भाँति जानता है। वह अपनी सुन्दरता, गुण और विशेषताओं से अच्छी तरह परिचित होता है। इसलिए उसका अपने को प्यार करना स्वाभाविक ही है। इसमें किसी प्रकार की असंगति नहीं है। एक सामान्य मनुष्य, जो सुन्दर होता है, गुणी और विशेषतापूर्ण होता है, जब वह भी अपने को प्यार करता है, तब आत्मा तो अलौकिक सुन्दरता और गुणों का निधान होता है; फिर भला वह अपने को प्यार क्यों न करेगा। यही वह नैसर्गिक कारण है कि जहाँ-जहाँ जिस वस्तु में आत्मा को अपना आभास मिलता है, वहाँ-वहाँ वह उस वस्तु को प्यार करने लगता है और उसी में रसानुभूति और आनन्द पाने लगता है।
सौंदर्य और आनन्द आत्मा का सहज धर्म है। जहाँ-जहाँ तक आत्मा का विस्तार होता जाएगा वहाँ-वहाँ तक सौंदर्य और आनन्द का विस्तार होता जाएगा। यों तो संसार में न तो आनन्द है और न सुन्दरता; लेकिन आत्मा की उपस्थिति से वह सुन्दर भी भासता है और आनन्दपूर्ण भी लगता है। यदि हम सांसारिक जीवन में वास्तविक रूप से आकर्षण और आनन्द चाहते हैं और इच्छा रखते हैं कि इसके दुःख-क्लेश और शोक-संताप न व्यापें, सब ओर और सब काल सुख और उल्लास की ही प्राप्ति होती रहे, तो हमें अपनी आत्मा का विस्तार करना होगा। इस दुःखपूर्ण संसार में भी अखण्ड और अनिवर्चनीय आनन्द की सम्भावना है और उसको प्राप्त किया जा सकता है। इसका प्रमाण हमारे ऋषि-मुनियों का जीवन रहा है। उन्होंने इस तथ्य को समझा कि इस नीरस और नश्वर संसार में जो भी सुख, जो भी आनन्द और जो भी रस है, वह सब आत्मा की उपस्थिति से है। इसलिए उन्होंने आनन्द की खोज विषय अथवा वस्तु में न करके, आत्मा में करने की बुद्धिमानी की। उन्होंने अपनी इस बुद्धिमत्ता के बल पर आनन्द के आदि स्रोत आत्मा को प्राप्त किया और अपने जीवन में अक्षय और अनन्त आनन्द की स्थापना कर ली। महान ऋषि-मुनियों का आनन्द किसी वस्तु अथवा विषय पर निर्भर नहीं था। वे स्वतः आत्मा से आनन्दित रहते थे। विषयवस्तु के सम्बन्ध में वे इतने निरपेक्ष रहते थे कि सामान्य जीवनयापन के साधन भी उनके पास अपर्याप्त मात्रा में ही रहते थे। तब भी वे पूर्ण सन्तुष्ट, पूर्ण शान्त और पूर्ण सुखी रहते थे। आनन्द का उद्गम और स्रोत आत्मा ही है। उसी की उपस्थिति से इस संसार में सुख की प्रतीति होती है। सच्चा आनन्द आत्मा को ही प्राप्त करने पर मिल सकता है। दूसरे उपाय से नहीं।
आत्मा के विस्तार का महत्त्व अकथनीय है। उसकी सफलताएँ अनन्त हैं ; इसीलिए विवेकवान व्यक्ति भौतिकता के हाथ न बिककर आध्यात्मिक जीवन को महत्व देते थे। वे बड़े से बड़ा कष्ट सहकर और त्याग करके भी आत्मिक विस्तार के प्रयत्न में संलग्न रहते थे। यह सोचना कि आध्यात्मिक जीवन को प्रमुखता देने पर व्यवहार-जगत की उपेक्षा हो जाएगी, गलत है। भारतीय आर्य पुरुष अज्ञानी नहीं थे। वे व्यवहार-जगत का महत्त्व समझते थे और बड़े कुशल व्यवहारवादी थे। अन्तर केवल इतना था कि भौतिकवादी दृष्टिकोण रखने वालों का व्यवहार स्वार्थ पर ही निर्भर रहता था और उनके व्यवहार का आधार हर प्रकार से परमार्थ रहता था। अपने व्यवहार-जगत की क्रियाओं को स्वार्थ से हटाकर परमार्थ पर निर्भर कर देने से रंच मात्र भी हित की हानि नहीं होती है; बल्कि जहाँ स्वार्थ पर आधारित हितों के नष्ट हो जाने का भय रहता है, वहाँ परमार्थ पर निर्भर हित सदैव सब प्रकार से सुरक्षित रहता है। परमार्थपूर्ण व्यवहारिक नीति का ग्रहण, सब प्रकार से पवित्र और कल्याणकारी होता है। उससे लोक और परलोक दोनों की सफलता निश्चित होती है।
मनुष्य जब तक स्वार्थ के संकीर्ण दायरे में बन्दी रहता है तब तक ही दुःख पाता है। संकीर्णता का परिणाम दुःख ही है; किन्तु जब संकीर्णता से निकलकर विशालता में प्रवेश करता है, तो आनन्द की अनुभूति अनायास ही उसके पास आ जाती है। जब तक मनुष्य स्वार्थ के वशीभूत होकर ‘यह मेरा है, इतना मेरा,’ की संकीर्ण भावना से अभिभूत है, उसकी उपलब्धियाँ उसकी भावना के अनुसार सीमित तथा संकीर्ण बनी रहेंगी। किन्तु जब वह संकीर्णता के दायरे से निकलकर यह सोचने लगता है कि यह सारा संसार हमारा है, इसकी हर वस्तु मेरी अपनी है, संसार के सारे प्राणी परम पिता परमात्मा के नाते मेरे भाई बन्धु हैं; मेरे आत्मीय जन हैं; तो सम्पूर्ण संसार पर, उसकी सम्पूर्ण वसुधा के साथ, अपना अधिकार अनुभव होने लगता है और वह अपने इस आत्मभाव से ही तृप्त तथा सन्तुष्ट हो जाता है। उसकी ऐषणाऍ , तृष्णाऍ, लिप्साऍ एक साथ नष्ट हो जाती हैं, जिसका फल उसे अखंड एवं अनिवर्चनीय आत्मसुख के रूप में ही मिलता है। आत्मविस्तार के अनुपात से मनुष्य संकीर्णता के बन्धन से मुक्त होकर व्यापकता की ओर बढ़ता और तदनुसार ही आनन्द तथा तृप्ति पाता चला जाता है।
आत्मीयता के अभाव में आनन्द की उपलब्धि नहीं हो सकती। फिर उसके लिए चाहे वस्तुओं के विधान संचयकर लिए जाऐ या विषयों में आजीवन आकंठ निमग्न रहा जाए! इस कुरूप तथा क्लेशपूर्ण संसार में सुख अथवा सुन्दरता कहाँ? यदि सच्चे सौंदर्य और वास्तविक आनन्द की अनुभूति करनी है, तो आत्मा की दिशा में अभियान करना होगा। आत्मा को प्रबुद्ध कर, उसको सब ओर, सबके साथ सम्बद्ध करना होगा। अपनी आत्मा का ही सौंदर्य और उसी की रसानुभूति बाह्य संसार में प्रतिभासित होकर संसार को सौंदर्य तथा आनन्दपूर्ण बनाती है। यह जड़ संसार न तो अपने में सुन्दर है और न आनन्दपूर्ण। प्रियतम-आत्मा का आनन्द छलक-छलककर जब संसार के पदार्थों पर प्रत्यक्ष होता है, तभी वे अपने को प्रिय तथा आनन्ददायक अनुभव होती हैं। संसार का कोई भी पदार्थ– कोई भी व्यक्ति क्यों न हो, उसका प्रिय-अप्रिय लगना उसकी विशेषता पर निर्भर नहीं है; वह अपनी उस निःस्वार्थ आत्मीयता पर निर्भर है, जो उसके साथ सम्बन्धित होती है। इस आध्यात्मिक क्रम को सदा याद रखना चाहिए कि आनन्द की उत्पत्ति प्रियता से और प्रियता की उत्पत्ति आत्मीयता से होती है।
यदि सच्चे सुख और वास्तविक आनन्द की आकांक्षा है, तो सांसारिक वस्तुओं अथवा विषयों की नहीं, आत्मा की शरण में जाना होगा। उसी की आराधना एवं उपासना से आनन्द की यह आकांक्षापूर्ण होगी। बाहर संसार में कुछ भी नहीं है। जो भी सुख, आनन्द और रूप स्वरूप है, वह सब अपने अन्दर और अपनी आत्मा में ही है। बाह्य संसार में जो भी रसानुभूति होती है, वह सब अपने अन्तर की ही छाया मात्र होती है। जिसका आत्मा जितना-जितना स्पष्ट और व्यापक होता जाता है, उसकी छाया भी उतनी ही गहरी और स्थायी होती जाती है। आभास के अनुपात से ही बाहर संसार के पदार्थों में भी उसी अनुपात से सुख-सौंदर्य की अनुभूति होती जाती है।
बाह्य वस्तुओं तथा विषयों से आत्मा को सुखी करने का प्रयास गलत है। सही प्रयास यह है कि आत्मा द्वारा, उसके विकास और आभास द्वारा बाह्य संसार की विषय वस्तुओं को सुख एवं सौंदर्य के योग्य बनाना चाहिए। जो कुछ है अपने अन्दर ही है। इसलिए अपने अन्दर अपनी आत्मा को ही खोजना, समझना, पाना और बनाना चाहिए। आत्मा के जागरण, विकास तथा विस्तार के उपलक्ष में ही यह कुरूप तथा क्लेशपूर्ण संसार आनन्ददायक तथा आकर्षक बन सकता है। शाश्वत सुख और अक्षय आनन्द पाने का एक ही उपाय है, वह है– आत्मीयता का भाव बढ़ाना। आनन्द की उत्पत्ति प्रियता से और प्रियता की उत्पत्ति आत्मीयता से होती है। जिस दिन मनुष्य का आत्मविस्तार संसार के अणु-अणु से आत्मीयता का सम्बन्ध बना लेगा, उस दिन उसके लिए यह सारा संसार आनन्द और सौंदर्य का विधान बन जाएगा और उसके लिए उसी प्रकार इस अनुभूति की कमी न रहेगी, जैसे हमारे ऋषि-मुनियों के लिए नहीं रहती थी।
ममत्तं छिन्दये ताये महाना गोव्व कंचुयं।
– उत्तराध्ययन 19।87
आत्मसाधक ममत्व के बन्धन को उसी प्रकार उतार फेंके, जैसे सर्प शरीर पर आई केंचुली उतार फेंकता है।
एक चींटी कहीं से गुड़ का ढेला पा गई। उसे उसने कोठरी में बन्द कर लिया। प्रतिदिन चुपचाप थोड़ा सा गुड़ खा लेती, दुर्ग में और भी जो कर्मचारी थे, उनमें से एक को भी रत्तीभर टुकड़ा न देती।
रानी चींटी को एक दिन पता चल गया। उसने सब चींटियों को आदेश दिया। वे घुस पड़ीं और उस चींटी का सारा गुड़ छीनकर न केवल खा गईं, वरन् उसे चोरी के अपराध में बाहर निकाल दिया। चींटी अपनी स्वार्थपरता पर दुःख करती, जिन्दगी भर वैसे ही अकेले मारी-मारी फिरी, जैसे स्वार्थी मनुष्य जीवन भर अकेलेपन का कष्ट झेलता है। उसका कोई हमदर्द नहीं होता।
कई दिन से लोग पीछे पड़े थे– “तुम हिमालय (भारतवर्ष) जाकर योगविद्या सीखकर आये हो, तो कोई चमत्कार भी तो दिखाओ। कैसे पता चले कि भारतीय योग में भी कुछ शक्ति है और तुमने उस शक्ति का कुछ भाग पा लिया है?” ऐसे प्रश्न बराबर पूछे जा रहे थे।
बात दक्षिण अफ्रीका के न्यूकैसिल शहर की है। एक साधारण सी दुकान में काम करने वाले युवक पीटरवान डेनबर्ग ने किसी से सुन लिया था कि भारतवर्ष योगियों का देश है, वहाँ आसन, प्राणायाम, ध्यान, धारणा आदि के ऐसे योगाभ्यास सिखाये जाते हैं, जिनसे मनुष्य अतिमानवीय एवं अपरोक्ष शक्ति और अनुभूतियाँ भी प्राप्त कर सकता है। सामान्य लोग कोई कौतूहलपूर्ण बात सुनते हैं, तो थोड़ा मनोरंजन-सा उन्हें होता है और बात आई-गई हो जाती है; पर पीटरवान डेनबर्ग ने सोचा– यदि सचमुच ऐसा कुछ है, तो उसे जानना और सीखना चाहिए; कथन की सत्यता को परखा ही जाना चाहिए।
वह तिब्बत होता हुआ हिमालय पहुँचा। हिमालय धरती का स्वर्ग पवित्रता की विरासत ही योग विद्या और ज्ञान की खान आज भी है। “जिन खोजा तिन पाइयाँ” कहावत के अनुसार पीटरवान को किसी योगी के दर्शन हुए। उन्हीं से वह योगविद्या सीखकर गये थे। यह जानकर तो उसका भारतवर्ष के प्रति प्रेम और आदरभाव और भी उमड़ पड़ा। उसे दुःख इतना ही है कि भारतीयों में स्वयं ही अपने धर्म और योगविद्या के प्रति श्रद्धा नहीं रही है।
योगविद्या सीखकर वह अपनी जन्मभूमि लौट पड़ा। यहाँ आकर उसने लोगों को भारतीय तत्त्व दर्शन से परिचित कराना प्रारम्भ किया। वह यह भी बताया था कि वह योगविद्या स्वयं भी सीखकर आया है। तभी लोग उसके पीछे पड़ गये थे और कोई चमत्कार दिखाने का आग्रह कर रहे थे।
पीटरवान ने बहुतेरा समझाया कि योग का उद्देश्य आत्मकल्याण है। अपनी लघुतम चेतना का विस्तार करके विश्व सम्पदा का स्वामी बनना और भावनात्मक आनन्द लूटना है। चमत्कार से किसी का कुछ भला नहीं होता; पर लोग तो लोग ही ठहरे; उनकी जिद कम न हुई।
28 जुलाई 69 का दिन– उसने चमत्कार दिखाना स्वीकार कर लिया। हम भारतीय अपने तत्त्व दर्शन, धर्म व संस्कृति की महत्ता को पहचानते भी हैं, पर उसके प्रति अपनी न तो निष्ठा व्यक्त कर पाते हैं, न स्वाभिमान; पर डेनबर्ग देर तक यह उपेक्षा सहन नहीं कर सके। उन्होंने कहा– मैं ईसा की तरह सलीब पर चढूँगा और यह दिखाऊँगा कि ईसा का क्रूस पर चढ़ना मनगढ़न्त बात नहीं है और न ही मनगढ़न्त है भारतीय योगविद्या। दोनों वैज्ञानिक उपलब्धियों की तरह सुनिश्चित तथ्य हैं।
उस दिन की तैयारी की गई। लाउडस्पीकर बजने लगा। कस्बे के बाहर एक खेत में जहाँ यह प्रदर्शन होने वाला था, हजारों की संख्या में लोग एकत्रित हो गये। मजबूत सलीब मंगाया गया। पत्थर के कोयलों में आग लगा दी गई। जब कोयले दहकने लगे, तो उन्हें जमीन पर बिखेर दिया गया। डेनबर्ग ने दोनों हाथ जोड़कर दर्शकों को अभिवादन कर कहा– मैं कोई ईश्वर नहीं, ईश्वर का दूत भी नहीं। मैं तो एक साधारण मनुष्य हूँ और लोगों को यह बताना चाहता हूँ कि मनुष्य सब कुछ भौतिक ही नहीं है, वह अधिकांश आध्यात्मिक शक्तियों से ओतप्रोत प्राणी हैं। उसकी आध्यात्मिकता, भौतिकता की अपेक्षा कहीं अधिक समर्थ है– यही प्रदर्शन करने के लिये आज मैं यहाँ उपस्थित हुआ हूँ।
इसके बाद वह दहकते अंगारों पर चल पड़ा। बड़ी देर तक उसने दहकते अंगारों पर आराम से चहलकदमी की। पाँवों में न तो कोई जलन न कोई पीड़ा। लोगों के आग्रह पर जब वे बाहर निकलकर आये, तो उनके पैरों में एक भी छाला नहीं था। लोगों ने फूल−मालाओं से उन्हें लाद दिया। उन्होंने कहा कि यह मेरा सम्मान नहीं, सम्मान तो उस विद्या और गुरु का है, जिसके अभ्यास और मार्गदर्शन से मैंने उस सत्ता की अनुभूति की। उन्होंने भावविभोर होकर कहा– "भारतवर्ष में सचमुच मनुष्य को भगवान बना देने की विद्या है, पर अभी तो भारतीय ही अपना दर्शन आप भूल बैठे हैं। हाँ, अब कोई आत्मा वहाँ आ गई है और वह आध्यात्मिकता का प्रकाश फैला रही है। जल्दी ही सारा विश्व भारतवर्ष के चरणों में प्रणिपात करेगा।"
इस बीच 6 फीट लम्बा सलीब (दो लकड़ियाँ बाँधकर बनाया गया वैसा क्रूस, जिस तरह के क्रूस पर ईसा को सूली दी गई थी) आ गया। डेनबर्ग प्रसन्नतापूर्वक उस पर लेट गये। लोगों के दिल धड़कने लगे, पर योगी शांत और संयत। उनके हाथ-पैरों में इस्पात की 6-6 इंच लम्बी कीलें ठोंक दी गईं। एक कील बायें पैर की जंघा पर भी ठोंक दी गई और सलीब को उठाकर खड़ा कर दिया गया। डेनबर्ग ने संस्कृत का एक श्लोक पढ़ा और कहा कि मैं बहुत प्रसन्न हूँ, मुझे पीड़ा या मृत्यु का कोई भय तक नहीं है।
आधा घण्टे बाद उन्हें सलीब से उतारा गया। उनकी आँखें छलक आईं। उन्होंने कहा– मनुष्य आत्मशक्तियों का विकास करके कितना शक्तिशाली और आनन्दपूरित हो सकता है, पर कैसा अज्ञान है कि लोग मनुष्य शरीर जैसा अलभ्य और बहुमूल्य ईश्वरीय अनुदान प्राप्त करके भी दीन-दुःखी व दरिद्रता की स्थिति में पड़े हुए हैं।
डेनबर्ग के शरीर में रक्त के एक-दो छींटों के अतिरिक्त कहीं कोई घाव भी नहीं था। मरहम-पट्टी की भी आवश्यकता नहीं थी। लोग वहाँ से बड़ा आश्चर्य, कौतूहल और जिज्ञासाएँ लेकर लौटे। यह समाचार संसार भर के समस्त दैनिकपत्रों में छपा, तो अविश्वासियों को भी यह विश्वास करने के लिये बाध्य होना पड़ा कि योग निरर्थक कल्पना नहीं, उसका आधार एक ऐसे विलक्षण विज्ञान पर आधारित है, जिसकी जानकारी अभी सर्वसाधारण को नहीं हो पाई।
मरुतदेव क्रुद्ध होकर बोले– "ओस कणों ! तुम्हें हमारा प्रतिरोध करते भय नहीं लगा? नष्ट करके रख देंगे तुम्हें, नहीं तो रास्ता छोड़कर अलग हो जाओ।"
ओसकण हाथ जोड़कर बोले– "महापुरुष ! जब तक आप हैं, तब तक हम नष्ट कैसे हो सकते हैं? हमारा तो जन्म ही आपसे हुआ है। इतना कहने पर भी मरुत का क्रोध न गया।"
बात कुछ भी नहीं थी, अहंकार मात्र था, सो ऐसे शान्त कहाँ होता। मरुतदेव चले, वेग से आक्रमण किया। ओसकण झरकर भूमि में जा गिरे, पर वायुदेव की अन्तःशीलता को छूकर दूर्वा दलों में अन्य ओसकण झलकने लगे। वायु ने पीछे मुड़कर देखा, तो उसे अपनी पराजय पर बड़ी लज्जा आई। उमड़-घुमड़कर सब तरफ से प्रयत्न किया उसने, पर ओसकण कम न हुए।
आकाश ने यह देखकर कहा– "व्यर्थ क्यों खीझते हो, पवमान ! बलिदान की शक्ति ही कुछ ऐसी है, कि एक नष्ट होता है, तो पीछे एक हजार तैयार हो जाते हैं। ऐसा न होता तो संसार में नेकी, धर्म और भलाई जिन्दा कैसे रह पाते?"
मरुत ने हार मान ली और तब से ओसकणों को नीचा दिखाना उसने बन्द कर दिया।
33 देवताओं और पंचतत्त्वों में वायु की बड़ी प्रतिष्ठा की गई है। प्राणवायु, मरुद्गण, पवमान, सोम के रूप में जिस जीवन-तत्त्व की प्रार्थना वेद-उपनिषदों में की गई है, वह हवा के ही विभिन्न रूप हैं। 49 गैसें, 49 मरुद्गण ही हैं, जो भिन्न-भिन्न स्थानों पर भिन्न-भिन्न प्रकृति के पदार्थों से संयुक्त होकर विविधतापूर्ण संसार बनाते हैं। यदि मरुद्गण न होते, तो अनेक तत्त्वों का सामंजस्य न हो पाता और पृथ्वी पर तब जीवन का आविर्भाव, पोषण और रक्षण भी नहीं हो सकता था।
वायु को यदि गैसों का ही पुँजीभूत स्वरूप कहें, तो भी वह स्थूल पदार्थ (धातुएँ, खनिज, लवण) और सूक्ष्म शक्तियों (विद्युत, ताप और प्रकाशकणों) का ही मिश्रित रूप होना चाहिए। इस रूप में भी उनसे संसार की जितनी सेवा हो रही है, उसे आज वैज्ञानिक भी मानने लगे हैं जबकि उनकी जानकारियाँ सीमित प्रयोगों पर ही आधारित हैं।
जिस प्रकार आजकल मौसम-विशेषज्ञ गुब्बारे और सर्वे-प्रक्षेपण-यन्त्र छोड़कर वायुमण्डल और मौसम का अध्ययन करते हैं उसी प्रकार महर्षि स्यूमर रश्मि भार्गव ने बहुत काल तक मरुतः देवता का अध्ययन किया। उस अध्ययन से उन्होंने जो सूक्ष्म जानकारियाँ उपलब्ध कीं, उनका वर्णन उन्होंने ऋग्वेद म. 10 म. 6 के 77-78 सूक्तों में किया है। लिखा है-
अभ्रपुषो न वाचा प्रुषा वसु-
हविष्मन्तो न यज्ञा विजानुवः।
स्तुतियों द्वारा प्रसन्न हुए मरुद्गण मेघ से जल-बिन्दु रूप वैभव की वृष्टि करते हैं। वही हवि सम्पन्न यज्ञ के समान विश्व के रचयिता हैं-
प्रये दिवः पृथिव्या न बर्हणात्मना रिरिच्रे अभ्रान्न सूर्या।
पाजवस्वन्तो न वीराः पनस्यवो- रिशादसो मर्या भद्यवः अभिधवः॥
युष्माकं बुध्ने अपां न यामनि विथुर्यति न महीश्रथर्यति।
विश्वप्सुर्यज्ञो अर्वागयं सु वः प्रयस्वन्तो न सन्नाच आगत॥
-ऋग्वेद 10।6।77-3, 4
अर्थात्- पृथ्वी और स्वर्ग में यह मरुद्गण स्वयं प्रवृद्ध हुए हैं, सूर्य के मेघ से बाहर निकलने के समान ही मरुद्गण प्रकट हुए हैं। यह वीर पुरुषों के समान प्रशंसा की कामना करते हैं, शत्रुओं का संहार करने वाले मनुष्यों के समान तेजस्वी हैं। हे मरुद्गण ! जब तुम पृथ्वी पर वृष्टि करते हो, तब पृथ्वी न तो व्याकुल होती है और, न बलहीन होती है।
विलक्षण-सी लगने वाली इन ऋषाओं को जब विज्ञान की कसौटी पर कसते हैं, तो पता चलता है कि वायु के सम्बन्ध में ऋषियों की जानकारी कितनी आधुनिक थी। अपने दृष्टिकोण को थोड़ा व्यापक बनायें, तो पता चलेगा कि हमारे आस-पास जो हवा पूर्व से पश्चिम, पश्चिम से पूर्व, उत्तर से दक्षिण, दक्षिण से उत्तर भागती दिखाई देती है– वह केवल भ्रम है। हम रेलगाड़ी पर बैठे होते हैं, तो लगता है कि गाड़ी स्थिर है और रेलवे-लाइन के किनारे खड़े हुए पेड़ पौधे और जमीन चल रही है। उसी प्रकार हवा की कोई दिशा नहीं है, वह तो एक गोलाकार लिफाफा या समुद्र जैसा है, जिसने पृथ्वी के चारों ओर घेरा डाल रखा है।
उसकी उत्पत्ति के सूक्ष्म रहस्यों की खोज विज्ञान अभी तक नहीं कर सका। विज्ञान की आधुनिक जानकारी पृथ्वी से 120 मील ऊँचाई तक की है। इससे ऊपर के क्षेत्र को यद्यपि ‘एक्सोस्फियर’ नाम दे दिया गया है, पर वैज्ञानिक उसके बारे में इतना ही जानते हैं कि वहाँ उसके अणु-परमाणुओं की संख्या बहुत ही कम है। यह क्षेत्र बाद में अनन्त आकाश तक चला जाता है। यहाँ वायु के स्वयं प्रवृद्ध होने की बात यों सत्य होती है कि आकाश में स्थित अनेक प्रकार के ऊर्जा-कण यहाँ एकत्रित होते हैं। ज्ञात नहीं, उनकी किस क्रिया से वायु का प्राकट्य होता है। पर हमारी मान्यता को समर्थन अवश्य मिल जाता है कि आकाश से ही वायु की उत्पत्ति है। यह आकाश कोई स्वतन्त्र वस्तु नहीं, केवल मात्र आकाशीय पिंडों का सूक्ष्म विकिरण मात्र है।
इस 120 मील से नीचे 60 मील तक- 60 मील की पट्टी मनुष्य जीवन की सुरक्षा का सबसे बड़ा कवच और रहस्य है। इसे वैज्ञानिक भाषा में ‘आइनोस्फियर’ कहते हैं। ‘आइन’ कहते हैं विद्युतीकणों को और ‘आइनोस्फियर’ को विद्युतीकरण कहते हैं। यह पट्टी मनुष्यजीवन की सुरक्षा पट्टी है। यदि यह न होती, तो आकाश से होने वाली तत्त्व-वर्षा, विकिरण और उल्कापात का प्रभाव सीधे पृथ्वी पर पड़ता और उस मार को झेलना किसी भी प्राणी के लिये सम्भव न होता।
यह वह क्षेत्र है, जहाँ रासायनिक प्रक्रियाएं बड़ी तेजी से चलती रहती हैं, तो ऑक्सीजन और नाइट्रोजन गैस के परमाणु तेजी से नाचने लगते हैं। इस उछल-कूद में वे एक-दूसरे से टकराते हैं और इसी कारण उनमें विद्युतआवेश आ जाता है। इसे एक प्रकार से सीधे वायु और प्राणशक्ति का सांघातिक सम्मिश्रण कहना चाहिए। वायु यहाँ से प्राणवायु में परिवर्तित होकर एक ओर मनुष्य की सुरक्षा करती है और दूसरी ओर प्राणियों के विकास की संभावनाएँ पैदा करती हैं। इसी बात को महर्षि स्यूमरश्मि भार्गव ने यों कहा है-
प्रयद्वहध्व मरुतः पराक्राद्यूयं महः संवरणस्य व स्वः।
विदानासो वसवो राध्यस्याराच्चिद् द्वेषः सनुतर्यु योत॥
-10।6।79-6
हे मरुद्गण! बहुत दूर से तुम अभीष्ट धन लाते हो। द्वेष करने वाले शत्रुओं को दूर भगाते हुए तुम उनके सब धनों को प्राप्त कर लेते हो।
यह विद्युत या प्राणशक्ति ही प्रकीर्ण होकर सारे संसार के प्राणियों के भीतर प्राणवायु रूप से गमन करती है। इसकी तेजस्विता भी असंदिग्ध है। वायुमण्डल में यह क्रिया सम्पन्न होने के कारण ही संचार-व्यवस्था का इतना आधुनिक रूप सामने आया। आज रेडियो में हम अमेरिका और इंग्लैंड के प्रसारण सुन लेते हैं, वह इस वायु पट्टी (आइनोस्फियर) के फलस्वरूप ही है। रेडियो स्टेशनों से होने वाले प्रसारण यहीं आकर टकराते हैं और फिर सारी पृथ्वी में फैल जाते हैं। तब मरुद्गणों को प्राप्त कर लेने से भारतीय ऋषि बिना किसी यन्त्र के संसार के किसी भी कोने में होने वाली हलचल को इसी कारण देख-सुन सकते थे। आज की अपेक्षा उन्हें मौसम का ज्ञान बहुत पहले हो जाता था, क्योंकि यह सब मानसिक प्रक्रिया से सम्पन्न होता था।
जल देवता का वर्णन करते हुए हमने एक स्थान पर लिखा था कि उनमें सचेतन क्रियाशीलता होने का प्रमाण यह है कि जल प्रकृति के परिवर्तनों के साथ स्थूल के परिवर्तन के लिये उतने बाध्य नहीं, जितने दूसरे स्थूल पदार्थ।
इस रहस्य को समझना हो, तो हमें आइनोस्फियर की नीचे वाली वायु-पट्टी का अध्ययन करना होगा। इसका प्रारम्भ ओजोन गैस से होता है, इस पट्टी में आइनोस्फियर की विद्युत और अल्ट्रा-वायलेट-किरणों के प्रभाव के कारण तापशक्ति इतनी बढ़ जाती है कि यदि वह पृथ्वी तक सीधी चली आने दी जाती, तो सारी पृथ्वी आग के एक गोले के रूप में धधक रही होती। जिस प्रकार बिल्ली और बन्दर चलते हुए, ऊपर-नीचे चढ़ते-उतरते अपने बच्चों को पेट से लगाये रहते हैं। हृदय से लगे रहने से बच्चे की सुरक्षा ही नहीं होती, वरन् माता का स्नेह का आदान-प्रदान भी होता है। हमारे यहाँ मित्रों से हृदय-से-हृदय मिलाकर मिलने की परम्परा है। उसमें इस तरह के स्नेह के आदान-प्रदान का सिद्धान्त ही काम करता है। ठीक ऐसे ही इस स्थान पर वायुदेव का उदार हृदय मनुष्य के लिये काम करता है। वह यहाँ ऐसी प्रक्रिया उत्पन्न करते हैं, जिससे मनुष्य की रक्षा होती है और पोषण के तत्त्व भी वायु में घुलकर हम तक पहुँचते हैं।
शून्य डिग्री से 170 डिग्री फारेनहाइट की इस गर्मी को यह पट्टी सोख लेते हैं और अधिक से अधिक 37 डिग्री फारेनहाइट गर्मी ही नीचे आने देती है। यह वह स्थान होता है, जब वायु देवता सबसे तीव्र गति से प्रकम्पित करते हैं। इसी मण्डल के 78 सूक्त के 1, 2 और 3 मन्त्रों में इस रहस्य का बड़ा सूक्ष्म विवेचन हुआ है। यहाँ वायु का वेग 200 मील प्रति घण्टा तक रहता है। वैज्ञानिकों को यह भी आश्चर्य है कि जहाँ 50 मील नीचे के क्षेत्र में वायु पूर्व से पश्चिम की ओर चलती है, वहाँ इससे ऊपर के इस क्षेत्र में वह उलटा अर्थात् पश्चिम से पूर्व की ओर चलती है और इसका कोई रहस्य ज्ञात नहीं कि ऐसा क्यों होता है? यह क्षेत्र 12 मील से 21 मील की ऊँचाई का माना गया है और उसे ‘स्ट्रेटोस्फियर’ नाम दिया गया है। यहाँ मरुत देव को वस्तुतः मनुष्य जाति की सेवा के लिये प्राकृतिक नियमों का उल्लंघन और तप करना पड़ता है; इसलिये उनकी महानता की जितनी स्तुति की जाय, कम मानी जानी चाहिए।
देबोर्त नामक फ़्रांसीसी वैज्ञानिक ने मौसम सम्बन्धी अध्ययन के समय वायु के अनेक विलक्षण गुणों का पता लगाया। उन्होंने देखा कि 8 मील की ऊँचाई के क्षेत्र में वायुमण्डल में कभी मौसम सम्बन्धी स्थिरता नहीं रहती; इसलिये इस क्षेत्र का नाम ट्रापोस्फीयर रखा गया है। यहाँ से ताप और शीत के घटने-बढ़ने के परिणाम स्वरूप मौसम का आविर्भाव होता है, जिससे हम लोग प्रभावित होते रहते हैं।
सबसे मुख्य शोध भारतीय योग की वह क्रिया है, जिसके द्वारा वायु में पाई जाने वाली उन समस्त अदृश्य शक्तियों का हमें लाभ मिलता है, उसे प्राणायाम कहते हैं। प्राणायाम से शरीर के दूषित मलों का शोधन होकर चित्तवृत्तियों का विकास होता है जिससे हमें मौसम का पूर्वाभास, शरीर में तेज की वृद्धि, प्राणविद्युत की प्राप्ति, दूसरों के मन की बातें जानना, अपने साथ होने वाली घटनाओं का पूर्वाभास आदि चमत्कार प्राप्त होते हैं। प्राणायाम से भीतर भरी हुई हवा, शरीर में आकाश तत्त्व को शुद्ध करती है। उसी से सूक्ष्म ग्रहणशीलता बढ़ती है और एक समय वह आ सकता है, जब हम बिना किसी यन्त्र के पृथ्वी के किसी भी भाग में होने वाली हलचल को समीप हो रही घटना की भाँति देख-सुन सकते हैं। यह सब वायु द्वारा प्राणशक्ति के संवर्द्धन और शारीरिक यन्त्रों के शुद्धीकरण का परिणाम होता है। उसके लिये भारतीय योगियों ने अनेक तरह की प्राणायाम-विधियाँ ढूँढ निकाली हैं। उसका अपना एक स्वतन्त्र इतिहास ही बन गया है। यह विद्या प्राणविद्या के नाम से विख्यात है। भारतवर्ष के अतिरिक्त तिब्बत और जापान के लोग भी इसे जानते और लाभ उठाते हैं।
वायु हमारे प्राण को धारणकर हम तक पहुँचाने वाला तत्त्व है– देव है। हम उन्हें यज्ञों व आहुतियों के द्वारा शुद्ध और परिपुष्ट रखा करते थे, साथ ही प्राणायाम के अभ्यास से स्वास्थ्य ही नहीं, अनेक सूक्ष्म चमत्कार– मेधा और ऋतंभरा, प्रज्ञा आदि प्राप्त किया करते थे। जब से हम यह बातें भूल गए, हमारी उन्नति के द्वार बंद हो गए। हमें मरुत देवता की कृपा प्राप्त करने के लिए यज्ञों का प्रसार, प्राणायाम की शोध और उसका अभ्यास तो करना होगा ही; धुम्रपान, यंत्रीकरण आदि को भी रोकना होगा, जिससे मरुत देवता की कृपा का अधिक से अधिक लाभ ले सकें।
"उदास क्यों हो बहन?" –अकेली बैठी मधुमक्खी को देखकर चींटी ने पूछा। इस पर मधुमक्खी बोली– "क्या बताऊँ बहन ! कितने परिश्रम से मधु एकत्रित किया था, यह अभागा मनुष्य आया और उसे थोड़ी देर में तोड़ ले गया।
अनाज का कण आगे धकेलती हुई चींटी बोली– "बहन ! अब चिन्ता करने से क्या लाभ? अब तक तो तुम बहुत-सा मधु पुनः एकत्र कर लेती।"
एकान्त से अच्छा साथी मुझे और कोई नहीं मिला।
– थोरो
मध्य एशिया में पाई जाने वाली मादा 'क्वेल' चिड़िया अपने बच्चों को बड़ा अनुशासित रखती है। जब तक वे बड़े नहीं हो जाते, इकट्ठे मिलकर चलते, उठते-बैठते और खाते-पीते हैं। फिर भी कई बार शिकारी पक्षी आक्रमण कर देते हैं, उनसे जान बचाना मुश्किल पड़ता है।
क्वेल तब बड़ी बुद्धिमत्ता से काम लेती है। उसने जैसे ही देखा कि कोई शिकारी पक्षी झपटा, वह उसी दिशा में आगे बढ़कर जायेगी और उस शिकारी पक्षी के सामने उड़कर ऐसे गिर पड़ेगी, मानो अब उसमें उड़ने की सामर्थ्य नहीं रही।
शिकारी पक्षी इतनी आसानी का शिकार पाकर व्यर्थ परिश्रम करने का इरादा छोड़ देता है और जहाँ क्वेल पड़ी होती है, उधर चल पड़ता है। इस बीच बच्चों को सुविधाजनक स्थान में छुप जाने का अवसर मिल जाता है।
शिकारी अपने आहार के लिये आश्वस्त होता है, इसलिये उसे तो कोई सावधानी रहती नहीं, पर क्वेल चोरी आँख से चुपचाप शिकारी का वहाँ पहुँचना देखती रहती है। जैसे ही वह वहाँ पहुँचा कि वह अपने पंख तेज़ी से फडफडा कर उड़ भागती है। पंख फड़काने से शिकारी घबड़ा उठता है और दुबारा जब तक वह संभलता है, क्वेल तीर की तरह छूटकर न जाने कहाँ की कहाँ जा पहुँचती है। शिकारी मूर्ख को निराशा ही हाथ लगती है। द्विविधा में न तो माया ही मिल पाती है और न ही राम। अपना-सा मुँह लेकर उदास भाग जाता है।
क्वेल अपने बच्चों के पास लौट आती है। पर क्वेल जानती है कि कदाचित बच्चों के जीवनकाल में ऐसी कोई स्थिति न आने पाये, वे अप्रशिक्षित रह जायें और फिर कभी उनके बच्चों पर आक्रमण हो, तो वे अपने बच्चों की सुरक्षा कैसे करें, इसके लिये क्वेल को वैसे ही परिश्रम करना पड़ता है, जैसे पहलवान बाहरी दंगलों में जाकर कुश्ती-प्रदर्शन करने से पूर्व गाँव के अखाड़ों में खूब अभ्यास करते हैं। सेना में भी ऐसा ही होता है। दो बटालियनें या और बहुत-सी फौज मिलकर अभ्यास करती हैं। दो दलों में विभक्त होकर वे इस तरह से अभ्यास करती हैं, मानों दो दुश्मन फौजें लड़ रही हों। इस प्रकार के अभ्यास में केवल गोलियाँ नहीं चलतीं, और सब वैसा ही होता है, जैसे युद्ध में। दोनों दलों के नाम अलग-अलग रखे जाते हैं, सीमायें बंटती हैं, घेरेबन्दी होती है, संचार-वाहन, गिरफ्तारियाँ, सामग्री-वितरण, भेदियों से पूछताछ आदि के सब ड्रामे बिलकुल असली युद्ध की तरह होते हैं। इससे सैनिकों को असली युद्ध की झाँकी मिल जाती है और वे जब कभी युद्ध होता है, बिना किसी घबराहट के सब काम कर लेते हैं।
क्वेल नर और मादा भी इस तरह का अभ्यास करके अपने बच्चों को दिखाते हैं, जिससे वे सब बातें समझ जाते हैं और यदि उनके सामने कभी वैसी परिस्थिति आती है, तो वे उसे हँसी-खुशी से पार कर लेते हैं।
हम चाहते है कि हमारे बच्चे भी आगे चलकर अच्छा और अनुशासित जीवन जियें, तो उसके लिये केवल आकाँक्षा करने से काम न चलेगा। उन्हें क्वेल पक्षी की तरह उस जीवन का प्रारम्भ में उँगली पकड़कर अभ्यास करना ही पड़ेगा। जिन बच्चों को प्रारम्भ में नीति, धर्म, सदाचार, स्वच्छता, सफाई, अनुशासन आदि का अभ्यास करा दिया जाता है। क्वेल के बच्चों की तरह ही वे आगे चलकर सफल नागरिक बन पाते हैं।
हम चाहते है कि हमारे बच्चे भी आगे चलकर अच्छा और अनुशासित जीवन जियें, तो उसके लिये केवल आकांशा करने से काम न चलेगा। उन्हें क्वेल पक्षी की तरह उस जीवन का प्रारम्भ में उँगली पकड़कर अभ्यास कराना ही पड़ेगा। जिन बच्चों को प्रारम्भ में नीति, धर्म, सदाचार, स्वच्छता, सफाई, अनुशासन आदि का अभ्यास करा दिया जाता है। क्वेल के बच्चों की तरह ही वे आगे चलकर सफल नागरिक बन पाते हैं।
सद्वाक्य
कभी न कभी माता का सदाचार और पिता का पाप बच्चे पर अवश्य आता है ।
– डिकोस
==================================
पश्चिम में यह धारणा जन-जन में व्याप्त हो गई है कि हम जितनी अधिक उन्नति कर सकते हैं, करें। अपने पराक्रम और पौरुष को व्यक्त होने का अवसर मिले, यह कोई बुरी बात नहीं। मनुष्य स्वभाव से ही क्रियाशील है, निष्क्रिय और आलस्य में पड़े रहकर वह जिन्दा तक नहीं रह सकता। शरीर को विश्राम की सीमा से अधिक विश्राम मिले, तो हम देखते है कि वह नई स्फूर्ति अर्जित करने की अपेक्षा शक्ति खोने लगता है। गति ही जीवन है और निष्क्रियता ही मृत्यु है, इसलिये हमें अपने जीवन को अमर रखने के लिये निरन्तर उद्योगशील तो रहना ही चाहिए।
इच्छाएँ अपने आप में बुरी नहीं, उनका असीम होना बुरा है। इच्छा और प्रगति की दिशा पर नियन्त्रण भी रखना आवश्यक है, अन्यथा पौरुष वीभत्स हो सकता है। पाश्चात्य देशों में यही हुआ, वहाँ भौतिकता बढ़ी और बढ़ती ही गई। उसी अनुपात से आदमी की लालसाएँ इतनी बढ़ीं कि वास्तविक मानवीय समस्याओं पर विचार के लिये कोई समय ही नहीं रहा। मनुष्य की दशा उस बालक-की-सी हो गई है, जो सर्कस देखकर खाना, पीना और घर लौटना भी भूल जाता है। विज्ञान की अद्भुत प्रगति को देखकर मनुष्य कुछ इस तरह खो गया है कि उसकी यथार्थता फीकी पड़ गई है।
यदि हमारी प्रगति में धर्म का स्पर्श बना रहता, तो हम उसी तरह भटकते नहीं, जैसे कोई अच्छे लड़के सर्कस देखते हैं, तब भी अपने माता-पिता की उँगली पकड़े रहते हैं। जीवन-रक्षा के लिये वह बालक अपने माता-पिता के संरक्षण को प्रमुख मानते हैं, सर्कस को गौण। यद्यपि कुछ देर को वह सर्कस में इतना निमग्न हो जाता है कि उसे अपने पिता की उँगली का भी ध्यान नहीं रहता। लेकिन सच पूछा जाये, तो वह इस तल्लीनता के बाद भी इस बात में आश्वस्त रहता है कि पिता की उँगली मेरे हाथ में है, पिता की गोद मेरा आश्रय ही है। इसमें वह सुरक्षित भी रहता है और सर्कस का आनन्द भी उसे मिल जाता है। भौतिक प्रगति बुरी नहीं, किन्तु उसका उपयोग धर्म की आधारशिलायें नष्ट करने में न हो, जैसा कि पश्चिम में हुआ। विज्ञान का उपयोग धर्म को मजबूत बनाने में हुआ होता, तो मनुष्य अपने आप को ज्यादा सुरक्षित और निर्भय अनुभव करता।
धर्म गुणों के विकास द्वारा आत्मा या परमात्मा को प्राप्त करने का विज्ञान है और उससे हम सब तरफ से जुड़े हुए हैं। गुणों की आवश्यकता तो हमें पल-पल पर, पग-पग पर होती है। कई बार तो ओछे और अपराधी व्यक्ति गुणों का नाटक करके भी लोगों से अपना स्वार्थ सिद्ध कर लेते हैं। सिनेमा हम केवल इसलिये पसन्द करते हैं कि उसमें प्रेम, प्यार, साहस, सद्भावनाओं के दृश्यों को रंग देकर उभारा जाता है। यह गुण हमारी आत्मिक आवश्यकतायें हैं, इसलिये सिनेमा बार-बार देखने जाते हैं; जबकि यह अच्छी तरह जानते हैं कि परदे के पीछे काम करने वाले कलाकारों का आचरण शुद्ध नहीं। वे केवल पैसे के लिये यह सब कुछ करते हैं।
कुछ दिन पूर्व कानपुर में एक भिखारी एक अपंग लड़के से भीख मंगवाता पकड़ा गया। भिखारी को पता था कि अपाहिज को देखकर लोगों को दया आ जाती है, इसलिये उसने बच्चे को जबरन अपाहिज करके उससे भीख माँगने का काम लिया। इसी अपराध में वह पकड़ा भी गया, पर तब तक तो वह दया के प्रदर्शन का बहुत सा लाभ ले चुका था। इससे स्पष्ट है कि गुण या धर्म जीवन की नैतिक आवश्यकता है। उसके विपरीत हम जो कुछ भी करते है, अनैतिक ही कहा जायेगा। पाश्चात्य देशों में बुद्धि का विकास हुआ, गुणों का नहीं। इसीलिये आज वहाँ भयंकर अशांति है।
मानव को मानवीय गुणों से सम्पन्न करने के लिये भी कोई आधार होना आवश्यक है। हमारी आदर्श विचारणाएँ और नैतिक परम्पराएँ भी निराधार नहीं टिक सकतीं। सुख और भौतिक प्रगति की अधिकतम मात्रा स्वल्प से स्वल्प समय में कोई अर्जित करना चाहे, तो सिवाय इसके कि वह आदर्श विचार और नैतिकता का अतिक्रमण करे और दूसरा उपाय भी क्या हो सकता है। ईमानदारी से मनुष्य गुजारे योग्य कमा सकता है, धन की तृष्णा तो उसे मिलावट, कम तोल और अधिक दाम लेने की ही प्रेरणा दे सकती है, देती है।
आदर्श और नैतिक जीवन का आधार है– आध्यात्म। जब तक हम अपने जीवन के गहरे तत्त्व दर्शन में प्रवेश नहीं करते, तब तक जीवन के यथार्थ उद्देश्य सामने नहीं आते और इसीलिये हमारी नैतिक आस्थायें कमजोर पड़ जाती है। यदि केवल भौतिक प्रगति को ही महत्त्व न दिया होता और तत्त्व दर्शन के लिये भी मनुष्य अपने साधन और अवकाश निकालता रहा होता, तो आज की अशान्ति का प्रादुर्भाव भी न हुआ होता।
जब हम प्राचीन महापुरुषों के जीवनवृत्त पढ़ते हैं, तो यह देखते हैं कि उन्हें उनके साधना-गुरुओं द्वारा सताया ही गया है। आरुणि ब्रह्मविद्या सीखने धौम्यपाद के आश्रम में गये थे, तब उन्हें गाय रखने का कष्टकर कार्य दिया गया। दिलीप राजा थे, चाहते तो वह महर्षि वशिष्ठ की गाय चराने के लिये कई भृत्य रख सकते थे, पर वह समझते थे कि आत्मिक आवश्यकताएँ अपना सबसे बड़ा स्वार्थ हैं और उसकी पूर्ति सांसारिक ढर्रे से उल्टा चलकर ही हो सकती है; इसीलिये उन्होंने पद-प्रतिष्ठा का मोह छोड़कर महारानी सुलक्षणा के साथ वशिष्ठ की गाय चराना स्वीकार किया। इससे उन्हें जीवन के वह आध्यात्मिक और भावनात्मक सूत्र पकड़ में आएँ जो मनुष्य को जन्म-जन्मान्तरों से बाँधे हुए हैं। दिलीप को अपनी इस तपश्चर्या से असन्तोष नहीं हुआ। इससे प्रकट होता है कि आत्मिक आवश्यकताओं की पूर्ति कष्टकर परिस्थितियों में हो, तो भी वह बुरी नहीं।
धर्म या आध्यात्म कोई बाहर से थोपी गई वस्तु नहीं है। यह तो मनुष्य जीवन की आन्तरिक प्रक्रिया है। किसी परम सत्ता की इच्छा से यह संसार बना है। उसमें कोई शाश्वत सिद्धान्त गणितीय आधार (मैथेमेटिकल वे) में काम करता है, उसे जानने से ही हम यथार्थ स्थिति की अनुभूति कर सकते हैं। ब्रह्माण्ड में मनुष्य की स्थिति का अध्ययन करना ही पड़ेगा। उसके लिये जैविक विकास (बायोलॉजिकल प्रोग्रेस) के आधार को ढूँढना ही पड़ेगा, तभी तो हम तर्कशील दर्शन (लॉजीकल फिलॉसफी) को जन्म दे सकते हैं और उसके आधार पर अपने जीवन की उड़ान को नियन्त्रित कर सकते हैं।
(1) संसार का एक प्रबन्धकर्ता परमात्मा है। (2) आत्मा, ईश्वर का अंश और अविनाशी तत्त्व है। (3) अच्छे-बुरे कर्मों के आधार पर मरणोत्तर जीवन निश्चित होता है। (4) सुख-दुःख का आधार भाग्य नहीं कर्म है। (5) प्राणिमात्र एक ही परमात्मा की समान प्रिय सन्तान है और हमें इसी आधार पर ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का जीवन जीना चाहिए।– यह परिकल्पना (हाइपोथेसिस) स्वयं सिद्ध प्रमाणों पर आधारित हैं। वैज्ञानिक आधार पर भी ये उपयोगी है। सामाजिक शान्ति और व्यवस्था के लिये इस विश्वास से बढ़कर और कोई सुदृढ़ आधार नहीं। इनसे अनेकों क्लिष्ट समस्याओं के हल और गुणों के विकास में बड़ा योगदान मिलता है।
यह विश्वास वस्तुतः वैज्ञानिक सत्य है, पर हमारे मस्तिष्क की और भावनाओं की चौड़ाई आकाश की तरह विराट नहीं होती। इसी से पदार्थ की बात समझ में नहीं आती, पर यह रेखागणित (ज्योमेट्री) की तरह स्वयंसिद्ध प्रमाण है। बिन्दु की परिभाषा के अनुसार कोई बिन्दु है ही नहीं, पर विश्वास के आधार पर कितनी गणितीय समस्यायें हल कर लेते हैं और सचमुच ही बिन्दु के लिये कोई न कोई स्थान निकल आता है। जब सारा संसार योजनाबद्ध तरीके से गणित के सिद्धान्तों पर काम कर रहा है तो निश्चय ही एक अतिमस्तिष्क (सुपर मेन्टल पावर) प्रकृति पर नियन्त्रण किये होना ही चाहिए। जीवन के बिना सृष्टि का अस्तित्व ही सम्भव नहीं है, तो उसकी एक केन्द्रीय-सत्ता, जहाँ से वह प्रादुर्भूत होता है, होना ही चाहिए। बिना कारण के कोई क्रिया नहीं होती। बिना आधार जीवन नहीं हो सकता।
आत्मा और ईश्वर के तत्त्व दर्शन के अतिरिक्त धर्म के और कोई भी सिद्धान्त विवादास्पद नहीं है। इसलिये उनके आधार पर भी विश्व शांति का उद्देश्य तो हल किया ही जा सकता है। उसके लिये व्यक्ति का परमार्थवादी होना आवश्यक है।
आध्यात्मिक प्रयत्न स्वतंत्र रूप से हमारे अपने कर्म पर निर्भर हैं। यदि हमारा चरित्र, मनोबल और आत्मभाव अत्यन्त शुद्ध और सुदृढ़ हो जाता है, तो यही उपलब्धि हमें ऊँचे उठा देती है। यदि आदर्श और नैतिकता को हम अपने आप में विकसित कर सकें, अपने अन्तःकरण को पवित्र बना सकें, तो धर्मतत्व और उसके सभी दार्शनिक आधार स्वयं सिद्ध प्रमाणों की तरह अपने ही भीतर मिल सकते हैं।
प्रारम्भ में, सम्भव है, गुणों का अभ्यास करते समय हम अपने आपको कुछ पीछे पायें और लोगों की तुलना में भौतिक दृष्टि से कुछ घाटा अनुभव करें; किन्तु यदि सर्वोच्च सत्य के प्रति हमारी निष्ठा और समाज के लिये श्रद्धा कमजोर न पड़े, तो यही घाटा एक दिन सौ गुने लाभ में परिणत होता देखा जा सकता है। राम, कृष्ण, गौतम, गांधी, सुकरात, अरस्तु, टॉलस्टाय, महावीर, रामकृष्ण, परमहंस, रमण, दयानन्द, स्वामी विवेकानन्द, रामतीर्थ, प्रभृति-सन्त-महात्माओं के जीवनवृत्त इस बात के प्रत्यक्ष उदाहरण है। भौतिक दृष्टि से उनके पास कुछ था नहीं, पर उनकी बड़ी से बड़ी आवश्यकतायें समाज ने पूरी कीं। उन्होंने जितना त्याग किया, समाज ने उनसे भी बढ़कर प्यार उन पर उड़ेल दिया।
फ्रांस के प्रसिद्ध नोबुल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिक डॉ. रिकाम्प्टे ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘मनुष्य का लक्ष्य’ (ह्यूमन डेस्टिनी) में लिखा है-”आध्यात्मिकता सदैव लोक-समूह में ही सफल रही है। यह मूर्खों द्वारा नहीं, और न ही व्यक्तिगत एकाकी में फलती है। आध्यात्मिकता के विकास के लिये, जो आधार बने हैं, वह यह हैं कि व्यक्ति को भौतिकता, नैतिकता और भावुकता की परीक्षा देने के लिये सदैव तैयार रहना चाहिए। आराम, ऐश्वर्य एवं विलास के जीवन में आध्यात्मिकता का विकास नहीं हो सकता। भावनाओं पर कठोर नियन्त्रण और कठिनाइयों से लड़कर ही अध्यात्मवादी बना जा सकता है।
विद्या रुपं धनं शौर्यं कुलनत्वमरोगता।
राज्यं स्वर्गश्व मोक्षश्व सर्वं धर्म्मादवाप्यते॥
विद्या, रूप, धन, शूरता, कुलीनता, आरोग्यता राज्य और स्वर्ग तथा मोक्ष ये सभी धर्म से ही प्राप्त होते हैं। धर्म पालन करने वाले में ही ये गुण होते हैं।
भगवान् बुद्ध अनाथ पिण्डक के जैतवन में ग्रामवासियों को उपदेश कर रहे थे। शिष्य, अनाथ पिण्डक भी समीप ही बैठा, धर्म चर्चा का लाभ ले रहा था।
तभी सामने से महाकाश्यप मौद्गल्यायन, सारिपुत्र, चुन्द और देवदत्त आदि आते हुए दिखाई दिये। उन्हें देखते ही बुद्ध ने कहा-वत्स! उठो, यह ब्राह्मण मण्डली आ रही है, उसके लिये योग्य आसन का प्रबन्ध करो।
अनाथ पिण्डक ने आयुष्मानों की ओर दृष्टि दौड़ाई, फिर साश्चर्य कहा- भगवन्! आप सम्भवतः इन्हें जानते नहीं। ब्राह्मण तो इनमें कोई एक ही है, शेष कोई क्षत्रिय, कोई वैश्य और कोई अस्पृश्य भी हैं।
गौतम बुद्ध अनाथ पिण्डक के वचन सुनकर हँसे और बोले– "तात ! जाति, जन्म से नहीं, गुण, कर्म और स्वभाव से पहचानी जाती है। श्रेष्ठ, रागरहित, धर्मपरायण, संयमी और सेवाभावी होने के कारण ही इन्हें मैंने ब्राह्मण कहा है। ऐसे पुरुष को तू निश्चय ही ब्राह्मण मान जन्म से तो सभी जीव शूद्र होते हैं।"
धर्म और दर्शन, साहित्य एवं संस्कृति का पतन देख नागेश भट्ट का स्वाभिमानी मन विचलित हो उठा। उन्होंने प्रतिज्ञा की कि जब तक आर्ष-साहित्य का अवांछनीय भाग सुधार नहीं डालेंगे, जब तक शुद्ध और सच्चे दर्शन का निर्माण नहीं कर लेंगे, तब तक और कोई काम करेंगे ही नहीं, चाहे मुझे भूखों ही क्यों न मरना पड़े।
शाम तक जो कुछ मिल जाता, खाकर वे दिन भर आर्ष ग्रन्थों की खोज, पठन-पाठन, मनन-चिन्तन और लेखन-संकलन में ही लगे रहते। अपनी संस्कृति को जीवित करने की उनकी अदम्य भावना ने स्वास्थ्य का भी ध्यान नहीं देने दिया। आयु जैसे-जैसे ढलती गई, वैसे-वैसे उनका शरीर ही निर्बल नहीं होता गया, वरन् पीठ में कूबड़ भी निकल आया।
लोग हँसते और कहते– "यह देखो भगवान का काम, कहते हैं– जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा स्वयं करता है। अब भगवान को क्या हो गया, जो अपने इस प्रेमी की भी रक्षा नहीं कर पाये?" कहने वाले तो नागेश के सामने भी न जाने क्या-क्या बक जाते, पर उस निस्पृह सेवक का मन जैसे कमल का पत्र बन गया था, कोई कुछ कहता, वह उसी तरह ढुलक जाता, जैसे पुरइन के पत्ते पर से पानी। जिस दीवार के सहारे बैठते थे, जब वह चुभने और कूबड़ को कष्ट देने लगी, तो नागेश भट्ट ने उस दीवार को कटवाकर छेद करा लिया। छेद इतना बड़ा था कि जब वे दीवार के सहारे बैठ जाते तो कूबड़ उसी में समा जाता और उन्हें किसी प्रकार का कष्ट न होता।
इस तरह निर्धनता और अभाव के मध्य नागेश भट्ट की साधना निरन्तर चलती रही। स्वार्थी तत्त्वों द्वारा मिलाऐ मिथ्या विचारों, श्लोकों को अपने साहित्य में से वे ऐसे निकाल-निकालकर फेंकते गये, जैसे किसान खेत के झाड़-झंखाड़ को। नागेश भट्ट प्रकाण्ड पण्डित गिने जाने लगे। उनकी योग्यता के आगे कोई भी प्रतिक्रियावादी व्यक्ति टिक नहीं पाता था।
महाराज पेशवा बाजीराव ने यह सब सुना, तो स्तब्ध रह गये। सचमुच ऐसा भी पण्डित और लगनशील तपस्वी अब भी इस देश में हो सकता है, इस पर उन्हें सहसा विश्वास नहीं हुआ। उन्होंने ऐसे महान साधक और संस्कृतिनिष्ठ देवपुरुष के दर्शन और सहायता करने का निश्चय किया।
पेशवा बाजीराव महाराष्ट्र से चलकर स्वयं ही वाराणसी पहुँचे। वस्तुतः जैसा सुना था, वैसा ही पाया। नागेश भट्ट का शरीर काल का कौर बन चला था, पर वह थे कि अब भी पुस्तकों का ढेर जमा किए अपनी साधना में जुटे पड़े थे, जैसे शेष संसार उनके लिये किसी श्मशान की तरह हो, जहाँ न तो कुछ दर्शनीय होता है, न ग्रहणीय। संसार में कोई भौतिक सुख भी होता है, यह उन्होंने जाना ही नहीं।
पेशवा ने उन्हें देखा, तो उनकी आँखें डबडबा आईं। अपने दुर्भाग्य पर उन्हें बड़ा पश्चाताप हुआ। ऐसे महापुरुष को तो बहुत पहले सहयोग दिया जाना चाहिए था। सम्भवतः तब वे अब की अपेक्षा सैकड़ों गुना अधिक काम कर सके होते।
बाजीराव ने आगे बढ़कर उन्हें प्रणाम किया और बड़े आदर के साथ कहा– "आचार्य प्रवर ! आज्ञा दें मैं आपकी कुछ सहायता कर सकूँ, तो यह मेरा बड़ा सौभाग्य होगा।"
ध्यान भंग हुआ, तो नागेश ने सिर ऊपर उठाकर महाराज की ओर देखा और उन्हें बड़े आदर के साथ पास में बैठाते हुए कहा– "हाँ महाराज! आत्मा के अस्तित्व को प्रमाणित करने के लिये एक सूत्र कठिनाई से हाथ लगा है, पर उसकी व्याख्या नहीं हो पा रही। आप उसमें मेरी सहायता कर दें, तो आपकी बड़ी कृपा होगी।"
आर्थिक सहायता देने के लिये आये महाराज पेशवा यह सुनकर स्तब्धित हो बोले– "आपकी साधना अद्वितीय है, उसकी सफलता कोई रोक नहीं सकता।"
1943 में जन्में स्विट्जरलैंड के वैज्ञानिक थियोफ्राट्स पैरासेल्मस एक दिन एक प्रयोग कर रहे थे। उन्होंने तेजाब में धातु का एक टुकड़ा डाला, तो एक गैस उठी। इस गैस की यह विशेषता थी कि आग के संपर्क में आते ही फफक कर जल उठती थी। पैरासेल्मस आध्यात्मिक व्यक्ति थे, वे पदार्थ की खोज में किसी प्राणवान सत्ता की खोज करना चाहते थे। इस प्रयोग का यद्यपि वे कोई अर्थ नहीं निकाल सके, उस गैस का नामकरण भी वे नहीं कर पाये, पर बाद में कैवंडिश ने उसे ‘सुलगने वाली हवा’ तथा फ्रांस के प्रसिद्ध-रसायन-विज्ञानी आनत्वान लैवेजियर ने उसका नाम जलोत्पादक (हाइड्रोजन) रख कर लोगों को बताया कि यह संसार की सबसे हल्की गैस है। इस प्रयोग के कारण पैरासेल्मस को ही रसायनशास्त्र का जन्मदाता मानते हैं। उधर इस तत्त्व के सम्मुख आते ही आध्यात्मवादी ईश्वरीय मान्यता को एक नई राह मिली।
ईश्वर के लिये वेद कहता है–
विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतोमुखो विश्वतोबाहुरुत विश्वतस्यात्। सं बाहुभ्यां धमति संपतत्रैर्द्यावा भूमि जनयन् देव एकः।
– ऋग्वेद 10।81।3
वह एक ही अपनी आँख से सर्वत्र देखता है, वही सुनता, उसी के पाप-पुण्य रूप बाहु, सर्वत्र काम करते और जीवों को चेतना देते हैं। वह दिव्य गुणों वाला परमेश्वर ही पृथ्वी और द्यौलोक को उत्पन्न करता है।
एक वाक्य में परिभाषा करनी हो तो– "ईश्वर एक ऐसी आदिसत्ता है, जिसका कभी अन्त नहीं होता, वह एक ऐसा सर्वव्यापी तत्त्व है, जहाँ संसार की सभी प्रतिकूल परिस्थितियाँ एकाकार होती हैं।” अर्थात् वह गर्म और सर्द, मधुर और कड़वे, पाप और पुण्य, प्रकाश और अन्धकार, कोप और करुणा, आदि परस्पर विपरीत शक्तियों का सम्मिलन केन्द्र है। इड़ा और पिंगला नाड़ियों के योग से जिस प्रकार सुषुम्ना का आविर्भाव होता है, ‘पॉजिटिव चार्ज’ (धन धारा) और निगेटिव चार्ज (ऋण-धारा) के सम्मिलन हैं। जिस तरह विद्युत नाम की शक्ति का प्रादुर्भाव होता है, उसी प्रकार परमात्मा एक ऐसा तत्त्व है, जहाँ संसार की प्रत्येक विपरीत परिस्थितियाँ आकर मिल जाती हैं।
उपरोक्त परिभाषाओं के आधार पर जब हाइड्रोजन का अध्ययन करते हैं, तो एक विलक्षण साम्य दिखाई देता है। हाइड्रोजन सृष्टि का आदितत्व है, लेकिन अपनी सरल रचना के कारण वह कहीं भी अपने स्वतन्त्र अस्तित्व में उपलब्ध नहीं। इसमें गर्म और शीत दो धाराओं का विलक्षण संयोग भी है। हाइड्रोजन के एक अणु में केवल दो ही परमाणु होते हैं। उसके नाभिक के किनारे एक ही इलेक्ट्रान चक्कर काटता है, उसमें प्रोटान भी एक ही होता है। इस सरल रचना के कारण वह ऑक्सीजन, नाइट्रोजन, मिट्टी, घी, तेल, वृक्ष, वनस्पति, जिस किसी के संपर्क में आता है, उसी से मिलकर अपने अस्तित्व को वैसे खो-सा देता है, जैसे कोई लोकसेवक अथवा महान आत्माऐ संसार की सेवा में अपने आप को इस तरह घुला देती हैं कि उनकी अपनी निजी इच्छाओं, स्वार्थों और महत्वकांक्षाओं का कोई अस्तित्व ही नहीं रह जाता।
हाइड्रोजन सर्वव्यापी तत्त्व है। पृथ्वी के कण-कण में तो वह विद्यमान है, ही मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, यूरेनस, नेपच्यून और गैलेक्सी का कोई भी ऐसा तारा नहीं है, जिसमें न्यूनाधिक मात्रा में हाइड्रोजन उपलब्ध न हो। ताप का स्वभाव स्फुरण का होता है; अर्थात् आग के संपर्क में आने वाला कोई भी तत्त्व तेजी से फैलता है, इसलिये यह तो है कि जो ग्रह-नक्षत्र अधिक गर्म हैं, उनका हाइड्रोजन स्फुरति होकर आकाश में फैल जाता है; जबकि कम गुरुत्वाकर्षण और कम ताप वाले लोकों में वह बहुत-से अपने स्वतन्त्र अस्तित्व में भी बना रहता है। सूर्य में भी हाइड्रोजन ही जलता है और हीलियम के रूप में सारे संसार को प्रकाश देता है।
ईश्वर जड़ भी है, चेतन भी। हाइड्रोजन जड़ वस्तुओं में भी पाया जाता है, और मनुष्य जैसे प्राणधारियों के शरीर में भी। हमारे शरीर का वजन यदि सौ पौण्ड हो, तो इसका अर्थ यह हुआ कि हमारे शरीर में 60 पौण्ड पानी होगा। पानी कोई स्वतन्त्र तत्त्व नहीं-- 2 भाग हाइड्रोजन और 1 भाग ऑक्सीजन का संमिश्रण ही पानी है। तब यदि 60 पौण्ड शरीर में पानी है, तो इसका यह अर्थ हुआ कि 100 पौण्ड वाले शरीर में 40 पौण्ड हाइड्रोजन अनिवार्य रूप से पाया जायेगा। यह स्थिति सृष्टि के प्रत्येक प्राणी के लिये है। हाइड्रोजन इस तरह एक सर्वव्यापी तत्त्व है।
एक व्यक्ति एक ही स्थान पर हिंसक भी हो और अहिंसक भी; यह कुछ अटपटा-सा लगता है; पर ईश्वर और हाइड्रोजन दोनों में ही बात स्पष्ट प्रकट है। किसी भी तत्त्व से अतीत होने पर यह सम्भव है; उदाहरण के लिये किसी व्यक्ति को दो ऐसे व्यक्तियों के पालन-पोषण का भार सौंपा जाये, जिनमें एक अच्छा और एक बुरा हो, तो सन्तुलन बनाये रखने के लिए और न्याय-व्यवस्था स्थिर रखने के लिये उसे आवश्यक होगा कि वह नेक पुत्र को प्रशंसा, प्यार और प्रोत्साहन दे तथा बुरे व्यक्ति को दण्ड, प्रताड़ना और धिक्कार भी दे। भगवान इसी नियम से सभी के कर्मों का लेखा-जोखा रखते और तदनुसार फल देते हैं। हाइड्रोजन में भी दोनों प्रकार के तत्त्वों से मेल-जोल की पद्धति ऐसी ही है।
उसे लेकर जलाया जाय, तो आग के हलके सामीप्य से भी वह धधककर जल उठेगा। संसार की कोई भी वस्तु जलती है, तो राख बनती है, पर यह रही न विचित्र बात कि हाइड्रोजन जलता है, तो पानी बनता है। ईश्वरीय न्याय में कठोरता या हिंसा तो है, पर वह है उद्देश्यपूर्ण ही। सृष्टि को खराब होने से बचाने के लिये उन्हें हिंसा का भी आश्रय लेना पड़ता है; पर अन्ततः वे जल की तरह शीतल हैं। अब यह प्रत्येक मनुष्य की अपनी इच्छा है कि वह शीतलता प्राप्त करे या बुरे कर्म करे और ईश्वरीय कोप का भोजन बने। हाइड्रोजन में आग भी है, पानी भी; दया भी है, निर्दयता भी; पर यह सब लोक-नियन्त्रण के लिये है। यदि उन्होंने एक ही पक्ष पकड़ा होता, तो संसार तो होता, पर उसमें कोई हलचल नहीं होती।
ऐसा कहा भी जाता है कि जल केवल पृथ्वी पर है; इसलिये प्राणधारी केवल पृथ्वी पर ही हैं; किन्तु हाइड्रोजन का प्रत्येक तत्त्व के साथ संयुक्त होकर सृष्टि की रचना में भाग लेना यह बताता है कि यदि वह पृथ्वी में दृश्य रूप से ठोस रूप से सृष्टि करता है, तो लोकोत्तर प्राणियों के शरीर स्थूल न होकर तरल और गैसीय स्थिति में भी हो सकते हैं। हाइड्रोजन में यह गुण है कि वह गैस होते हुए भी तरल और ठोस दोनों ही स्थितियों में प्राप्त किया जा सकता है।
इन गुणों के साथ हाइड्रोजन की ईश्वर के इन गुणों से तुलना करें, तो हमें यही मानना पड़ेगा कि हाइड्रोजन नहीं, तो ऐसा कोई तत्त्व ही होगा, जो सम्पूर्ण सृष्टि में अच्छादित होकर निर्माण और नाश की प्रक्रिया को सम्पन्न कर रहा होगा। यह गुण अथर्व वेद 2।2।2 में इस प्रकार वर्णित है-
दिविस्पृष्टौ यजतः सूर्यत्वगवयाता हरसो दैव्यस्य।
मृडाद गन्धर्वो भुवनस्य यस्पतिरेक एव नमस्यः सुशोवाः ॥
अर्थात् सूर्य और अग्न्यादि देवताओं को अपने अन्दर धारण किये, तुम्हीं सब का पालन करते हो और सबको सुख देते हो।
हाइड्रोजन सचमुच ऐसा ही तत्त्व है, जो जल बनाकर जीवन की रक्षा भी करता है, पर उसके प्रत्येक परमाणु में सूर्य जैसी ज्वलनशील अग्नेय शक्ति का आधार भी है। हाइड्रोजन बम में इसी शक्ति का विस्फोट किया जाता है, तो वह शक्ति लाखों व्यक्तियों को भून डालने में समर्थ होती है। लोकों की बुरे तत्त्वों से सुरक्षा के लिये इस तरह की प्रचण्ड शक्ति नियामक सत्ता के हाथों होनी आवश्यक थी, वह हाइड्रोजन तत्त्व में भी सुरक्षित है।
यह समानतायें सम्भव हैं कि किसी दिन एक ऐसे तत्त्व को भी सामने ला दे, जो हाइड्रोजन से बढ़कर भी समर्थ और ईश्वरीय क्षमताओं की तरह हो। यदि ईश्वर व्यक्ति या शरीर न होकर सचमुच कोई सर्वव्यापी तत्त्व है, तो इस कथन को कोई भी अप्रासंगिक न कहेगा।
मैरीटेरियन सागर में गर्मी के प्रारम्भिक दिनों में मछलियों की बहुतायत देखने को मिलती है। मैकरल, पिलचर्ड और हैरिंग नाम की रंग-बिरंगी मछलियाँ इधर से उधर खेलती, कूदती, उछलती, फुदकती हुई बहुत अच्छी लगती हैं। इन्हें देखकर ऐसा लगता है, क्रीड़ा और मनोरंजनपूर्ण जीवन ही यथार्थ है। पैसा और प्रजनन की चिन्ता में पड़े घिसी-पिटी जिन्दगी जीना कोई बुद्धिमत्ता नहीं।
कुछ ही सप्ताह बाद वहाँ जायें तो फिर एक भी मछली दिखाई न देगी। चहल-पहल वाला वह क्षेत्र बिलकुल सूना-वीराना दिखाई देने लगता है। प्रलय के बाद पृथ्वी की-सी नीरवता और निर्जनता का साम्राज्य देखकर लगता है− जीवन पृथ्वी में बँधा हुआ नहीं, वह परमात्मा की एक कलात्मक सत्ता है, जो इन मछलियों की तरह आनन्द के लिये कभी पृथ्वी में आ जाती है, तो कभी अन्य लोकों में। उसे सांसारिक बन्धनों से बाँधना बेवकूफी है। मुक्ति के इच्छुक जीवन को तो प्रवासी होना चाहिए। आज यहाँ, कल वहाँ− उसके लिये तो सारा संसार ही अपना घर है।
स्काम्बर नाम की मछलियों का जीवन बनजारे की तरह होता है। शीत ऋतु में स्काम्बर उत्तरी समुद्र में बड़ी संख्या में देखने को मिलती हैं। ग्रीष्म ऋतु आई और जैसे ही किनारों का पानी गर्म होना प्रारम्भ हुआ, वे बड़े-बड़े समुदाय बनाकर उत्तरी अटलांटिक महासागर के दोनों तटों पर पहुँच जाती हैं। जीवशास्त्रियों का मत है कि मछलियाँ खाने और प्रजनन के लिये प्रवास (माइग्रेशन) करती हैं, पर स्काम्बर उन भारतीयों की तरह है, जो आत्मकल्याण के लिये ही अन्तःवास करते हैं। ब्रह्मचर्य और गृहस्थ दो आश्रम सामुदायिक संगठन में एक स्थान पर रहकर बिताने के बाद, वे सांसारिक प्रलोभनों को ठुकराकर विराट सीमा के सौंदर्य का रसपान करने निकल पड़ते हैं और वानप्रस्थ व संन्यासी जीवन जंगलों, पहाड़ों और सुदूर देशों में भ्रमण करते हुए व्यतीत करते हैं। एक स्थान पर रहकर सांसारिक गन्दगी बढ़ाने का पाप हम भारतीयों ने स्काम्बर के समान ही कभी नहीं बढ़ने दिया। इस तरह हम एक स्थान पर रहते हुए भी सारे संसार के बने रहे।
स्काम्बर भी ऐसा ही करती है। तरीके में थोड़ी ही भिन्नता है। मई, जून में वे उत्तरी समुद्र में ही अण्डे-बच्चे देती हैं और फिर वहाँ से अकेले नहीं, अपने सम्पूर्ण समुदाय को लेकर वहाँ से निकल पड़ती हैं। “अकेले नहीं, हम सब” का सिद्धान्त देखकर लगता है, ये मछलियाँ श्रेष्ठता में मनुष्य से आगे निकल गईं।
एक बार गुरु नानकदेव एक ऐसे गाँव में पहुँचे, जहाँ के लोग बड़े उद्दण्ड और गँवार थे। उन्होंने नानक की आवभगत अच्छी तरह नहीं की, फिर भी जब वे चलने लगे, तो ग्रामवासियों को आशीर्वाद दिया- "तुम लोग इसी तरह आबाद रहो।" नानक अगले दिन अगले गाँव में रुके। वहाँ के लोग बड़े नेक, शांतिप्रिय, अहिंसावादी और मिलनसार थे। उन्होंने नानक का यथेष्ट आदर-सत्कार किया। नानक विदा होने लगे, तो वे लोग उन्हें कुछ दूर पहुँचाने भी गये। प्रणामकर जब ग्रामवासी लौटने लगे, तो नानक ने आशीर्वाद दिया "तुम लोग उजड़ जाओ, तुम लोग उजड़ जाओ।"
नानक के एक शिष्य को यह बात नहीं भायी, उसने कहा− "महात्मन् ! बुरे लोगों को अच्छा आशीर्वाद और अच्छे लोगों को बुरी-बात, कुछ समझ में नहीं आई।" नानक हँसे और बोले− "बात यह है कि बुरे लोग संसार में फैलें, तो उससे बुराई उसी तरह फैलती है, जैसे अँग्रेजों की अँग्रेजियत सारी दुनिया में फैल गई, पर यदि अच्छे लोग एक ही स्थान पर जमे बैठे रहें− लोकसेवा के उद्देश्य से वे घर न छोड़ें, तो संसार में भलाई के विस्तार का अवसर ही कहाँ आयेगा?"
शिष्य की समझ में सारी बात स्पष्ट हो गई, पर हम अभी तक यह बात नहीं समझ पाये। आजीविका और अपने बच्चों के विकास की दृष्टि से भी हमें संसार में फैलना पड़े, तो एन्ग्रालिश मछली की तरह फैलना चाहिए। विश्व की विशदता का और अपने आप को अच्छी तरह अध्ययन करने का अवसर तो तभी मिलता है, जब हम औरों के पास जाकर अपनी तुलना करें। हिन्दू, मुसलमान आदि जातियाँ कोई ईश्वरीय विधान नहीं। जाति एक सापेक्ष वस्तु है, उसकी अच्छाई-बुराई का आधार गुणों की श्रेष्ठता ही हो सकती है, वंश नहीं। यह पता हमें और सारे संसार को तभी चल सकता है, जब हमारे संपर्क का दायरा विस्तीर्ण हो।
एन्ग्रालिश मछली बसन्त ऋतु में अपनी ही चैनल में पाई जाती है, किन्तु अण्डे देने के लिये वह ‘ज्वाइडर जा’ के बाहरी हिस्से में पहुँच जाती है। सारडिना मछली जुलाई से दिसम्बर तक कार्नवेल में रहती है, पर जाड़ा प्रारम्भ होते ही वह गरम स्थानों की ओर चल देती है। सामों मछली समुद्र में पाई जाती है, पर उसे गंगा और यमुना नदी के जल से अपार प्रेम है। अपने इस अपार प्रेम को प्रदर्शित करने और अच्छे वातावरण में अपने बच्चो के पालन-पोषण के लिये वह हजारों मील की यात्रा करके गंगा, यमुना पहुँचती है। अण्डे-बच्चे सेने के बाद भोजन के लिये वह फिर अपने मूल निवास को लौट आती है। इस स्वभाव के कारण ही सामों दीर्घजीवी और बड़ी और चतुर मछली होती है। हमारी तरह उनके बच्चे भी सामाजिक संकीर्णता में पले होते, तो इस अतिरिक्त विकास का अवसर उन्हें कहाँ मिल पाता।
हमारी कमजोरी यह है कि विपरीत परिस्थितियों और संघर्षों से टकराना हमें अच्छा नहीं लगता। शांतिपूर्ण दिखाई देने वाली यह स्थिति वस्तुतः एक भ्रम है और हमारे विकास का मुख्य अवरोध भी। यों तो संसार की अधिकांश सभी जातियों की मछलियाँ उल्टी दिशा में चलती हैं, पर योरोप में पाई जाने वाली एन्ग्युला बहाव की उल्टी दिशा में चलकर लम्बी यात्रा करने वाली उल्लेखनीय मछली है। ज्ञान और सत्य की शोध में हिमालय की चोटियों तक पहुँचने वाले भारतीय योगियों के समान यह एन्ग्युला मछली अटलांटिक महासागर पार करके गहरे पानी की खोज में बरमूडा के दक्षिण में जा पहुँचती है। बरमूडा अमेरिका के उत्तरी कैरोलाइना राज्य से 600 मील पूर्व में स्थित 350 छोटे-छोटे द्वीपों का एक समूह है।
वहाँ अण्डे-बच्चे देकर यह अपने घर लौट आती है। उनके प्रवासी बच्चों में अपने माता, पिता, पूर्वजों और संस्कृति के प्रति इतनी प्रगाढ़ निष्ठा होती है कि ढाई-तीन साल के होते ही वे वहाँ से चल पड़ते हैं और 5-6 महीने की यात्रा करते हुए अपने जाति भाइयों से जा मिलते हैं; और इस तरह बहुत दूर-दूर होकर भी उनका अपनी जाति से सांस्कृतिक सम्बन्ध उसी प्रकार बना रहता है, जिस तरह सैकड़ों मॉरीशस, ट्रिनिडाड, केन्या, यूगाण्डा, मलेशिया, थाई, इण्डोनेशिया, नेपाल, डर्वन, सुवाफिजी, लंका, बर्मा, इंग्लैण्ड और अमेरिका में रहने वाले भारतीय आज भी अपने धर्म और अपनी संस्कृति की आदि भूमि भारत वर्ष से सम्बन्ध बनाये हुए हैं।
समुद्र में जोर का तूफान आया, नाव डगमगाने लगी। पाल को मजबूती से बाँधने के लिये मल्लाह का लड़का ऊपर चढ़ गया। पाल बाँधकर नीचे उतरने के लिये जैसे ही पैर बढ़ाया कि उसके मुँह से चीख निकल पड़ी। नीचे गरजते, उफनते समुद्र को देखो, तो मुँह से आवाज न निकली और नीचे उतरने की भी हिम्मत न पड़ी।
मल्लाह ने चिल्लाकर कहा− “ऊपर आसमान की ओर देख और नीचे उतर आ।” बालक ने वैसा ही किया, वह नीचे उतर आया। अनुभवी मल्लाह ने समझाते हुए कहा− "जो डरता है, वही मरता है। संकट के समय तो धैर्य से ही काम चलता है।”
शिकागो के जोहान्स और टेड सीरियस– कोई भारतीय योगी नहीं है। ध्यान विज्ञान पर उनका कोई अध्ययन, कोई शोध भी नहीं है; किन्तु कितना आश्चर्य है कि टेड सीरियस अपने सामने कैमरा रखते हैं, मन में किसी वस्तु का सम्पूर्ण एकाग्रता से ध्यान करते हैं और जोहान्स ने कैमरे का शटर दबाया कि लेन्स के सामने टेड के बैठे होने पर भी चित्र टेड का न आकर उसकी मानसिक कल्पना का आ जाता है। उदाहरण के लिये टेड यदि किसी घोड़े का ध्यान कर रहा होगा, तो कैमरे में फोटो घोड़े का ही होगा; जबकि ताल (लेन्स) के सामने बैठा होगा टेड सीरियस।
इसे न तो हिप्नोटिज्म कहा जा सकता है, न ट्रिक। यह भारतीय दर्शन और उपासना पद्धति में प्रयुक्त एक गम्भीरतम ध्यान विज्ञान है, जिसके आधार पर कभी भारतीय न केवल दूरदर्शन, दूरश्रवण, दूसरों के मन की बात जान लेना, ईशत्व, वशित्व आदि सिद्धियाँ प्राप्त किया करते थे, बल्कि अपनी लघुतम चेतना को सृष्टि की किसी भी प्रचण्ड प्रक्रिया के साथ संयोग करके कुछ भी विलक्षण परिणाम उपस्थित कर सकने में समर्थ होते थे। विराट ईश्वरीय चेतना में घुलाकर अपने को मोक्ष, परमानन्द और भगवान बना देने का महानतम लाभ भी इस विज्ञान द्वारा ही प्राप्त किया करते थे।
भारतीय ध्यानपद्धति के प्रति जो उपेक्षा आज शिक्षित भारतीयों में देखने को आती है, वैसी ही उपेक्षा प्रारम्भ में इस टेड सीरियस के साथ भी की गई। उसे भ्रामक और हिप्नोटिज्म करने वाला कहा जाता रहा, पर जब सन् 1963 में टेड सीरियस ने अनेक वैज्ञानिकों, फोटोग्राफरों, बुद्धिजीवियों तथा ‘इलिनाइस सोसायटी फॉर साइकिक रिसर्च’ (यह संस्थान अमेरिका में मनोविज्ञान तथा अतिमानवीय चेतना सम्बन्धी शोध कार्य करती है) की उपाध्यक्ष श्रीमती पालिन ओहलर की उपस्थिति में कई प्रतिबन्धों, फिल्मों पर नियन्त्रण दूसरे-दूसरे के कैमरों के प्रयोग द्वारा भी टेड सीरियस तथा जोहान्स ने कल्पना के चित्र उतारकर दे दिये तब एक साथ सारे योरोप में तहलका मच गया और वैज्ञानिकों को आश्चर्य हुआ कि दूरवर्ती वस्तुओं के फोटो लेना केवल माइक्रोफिल्म द्वारा ही सम्भव है; और वह भी तब जबकि उस तरह का दृश्य किसी निश्चित फ्रीक्वेन्सी पर निश्चित माइक्रो-ट्रांसमीटर द्वारा शक्तिशाली विद्युत-तरंगों द्वारा प्रेक्षित किया गया हो। बिना किसी यन्त्र और माइक्रो-तरंगों (शब्द की तरह आकार को भी शक्ति तरंगों में बदलकर एक स्थान से दूसरे स्थान पर भेजते हैं, टेलीविजन उन्हें ही पकड़ते हैं, इन्हें माइक्रो-तरंगें कहते हैं) के केवल मस्तिष्क द्वारा किसी भी स्थान का कैमरे में चित्र उतार देना एक बड़ा भारी आश्चर्य था, जिसने सारे दर्शकों को कौतूहल में डाल दिया, उसका कोई सिद्धान्त वे लोग निश्चित नहीं कर पाये।
1962 में ही टेड सीरियस को भारतवर्ष का नक्शा देखने को मिला था। नक्शे से भौगोलिक सीमाओं का अनुमान किया जा सकता है। किस स्थान पर क्या हो रहा है, कैसे लोग रहते हैं, कौन सी इमारत खड़ी है, कितने वृक्ष, बगीचे, तालाब आदि हैं− इन सबकी कोई स्पष्ट जानकारी नहीं हो सकती। उस समय अन्य देशों के समान टेड सीरियस से भारत के भी कुछ प्रसिद्ध स्थानों के कल्पना-चित्र उतारने को कहा गया। टेड सीरियस ने फतेहपुर सीकरी की मस्जिद के मुख्य द्वार और दिल्ली के लाल किले के दीवाने आम के दो चित्र खींचे। बाद में अध्ययन करके यह पाया गया कि वे कल्पना-चित्र फतेहपुर सीकरी की मस्जिद के मुख्य द्वार और लाल किले के दीवाने आम की बिलकुल हमशक्ल थे। नवम्बर 1968 की मासिक “कादम्बिनी” में टेड सीरियस के उन चित्रों का सही चित्रों से तुलनात्मक सामुख्य कराया गया है। उसे देखकर कोई भी आश्चर्य किये बिना न रहेगा कि अमेरिका में बैठे किसी व्यक्ति ने हिन्दुस्तान के ऐसे स्थान के हू-ब-हू फोटो कैसे खींच दिए, जबकि इस तरह के किन्हीं स्थानों का उसे कोई पूर्वपरिचय भी नहीं था।
योग तत्त्ववेत्ता भारतीयों की दृष्टि में यह कोई बड़ा चमत्कार नहीं। ध्यान के परिपाक की प्रारंभिक अवस्था मात्र है। महर्षि पातंजलि कृत योगदर्शन में लिखा है-
“तम प्रत्ययैकतानता ध्यानम्”
– पाद 3। सूत्र 2
अर्थात् जिस प्रकार कोई नदी जब समुद्र में मिलती है, तो कुछ दूर उसका प्रवाह अलग-सा प्रतीत होता है, किन्तु थोड़ी ही देर में नदी का अस्तित्व समुद्र में इस तरह विलीन हो जाता है कि उसके स्वतन्त्र अस्तित्व का कुछ भान ही नहीं होता। उसी प्रकार जब कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति, वस्तु या देश का ध्यान करता है, तो ध्येय के अवलम्ब के ज्ञान में ध्यान करले वाले के चित्त का लय हो जाता है; अर्थात् दोनों की अनुभूतियाँ एक हो जाती हैं।
ऐसी स्थिति में प्रथक होते हुए भी एकत्व का ज्ञान ही उन सब सिद्धियों का कारण है, जो ध्यानयोग से प्राप्त होती हैं। एक की मानसिक चेतना प्रवाहित होकर दूसरे का मानसिक चेतना में विलय कर देने का नाम ध्यान है, और सिद्धियाँ उसकी अनेक विधायें हैं। यह विलय की पद्धति, जितनी अधिक एकाग्र होगी, तन्मयता जितनी बढ़ेगी, सादृश्यता का ज्ञान उतना ही स्पष्ट होता चला जायेगा।
ध्यान दो वस्तुओं की एकता का प्रतीक है। इस स्थिति में कोई भी बुद्धिवादी व्यक्ति प्रश्न कर सकता है कि मेल सदैव एक-सी वस्तुओं में ही हो सकता है- जल का जल से मेल हो सकता है, जल और दूध एक रूप नहीं हो सकते। ऑक्सीजन गैस ऑक्सीजन गैस से मिला देने पर ही ऑक्सीजन बना रह सकती है। कार्बन से संयोग हो जायेगा तो अविलम्ब एक नये तत्व की रचना हो जायेगी। फिर न ऑक्सीजन रहेगी न कार्बन, वरन् कार्बन डाई-ऑक्साइड की रचना हो जायेगी।
भारतीय योगी इस बात को अच्छी तरह जानते थे। भगवान राम को महर्षि वशिष्ठ सावित्री का ध्यान सिखा रहे थे, तब यह प्रश्न उन्होंने भी वशिष्ठ से किया था-
न सम्भवति सम्बन्धो विषमाणां निरन्तरः।
न परस्पर सम्बन्धाद्विनानुभवनं मिथिः॥
– योग वशिष्ठ 3।121।37
अर्थात् असमान वस्तुओं में कभी सम्बन्ध नहीं हो सकता, इसी प्रकार जब तक उस वस्तु का ज्ञान नहीं होता, तब तक उस वस्तु से सम्बन्ध नहीं हो सकता?
इस पर वस्तुस्थिति का निराकरण करते हुए महर्षि वशिष्ठ ने जो कुछ कहा, वह आज के विज्ञान के विद्यार्थी की जानकारी से शत-प्रतिशत मेल खा जाता है, उन्होंने कहा− राम यह ठीक है कि-
‘सज्जातीयः सज्जातीये नैकतामनुगच्छति’
अर्थात् सजातीय पदार्थ ही एकता को प्राप्त हो सकते हैं। किन्तु राम−
यदा चिन्मात्रमेवेयं दृष्टिदर्शन दृश्यदृक्।
तदानुभवनं तत्र सर्वस्य फलितं स्थितम्॥
− योग वशिष्ठ 6।2।38।8
सर्व जगद्गते दृश्यं बोधमात्र मिदं ततम्।
स्पन्द मात्रं यथा वायुर्जलमात्रं यथार्णव॥
− योग वशिष्ठ 6।2।25।17
अर्थात्− दृष्टा को वस्तुएँ इसलिये दिखाई देती हैं कि दृष्टा, दर्शन और दृष्टि सभी चेतन हैं। विश्व के सभी पदार्थों में यह चेतना ही बोध वा अनुभव रूप में विद्यमान है। बोध ही सब ओर फैला हुआ है जैसे कि हवा के झोंके भी हवा और समुद्र जल भी जल है, उसी तरह सृष्टि के कण-कण में चेतना ही खेल रही है।
सीसं जहा सरीरस्स जहा मूलं दुमस्स य।
सव्वस्स साहुधम्मस्स तहा झाणं विधीयते।
-इसिभासियाइं 22।13
आत्मशोध का साधना में ध्यान का ऐसा ही प्रमुख स्थान है जैसे शरीर में मस्तिष्क तथा वृक्ष में उसकी जड़ का।
इसलिये आत्म-चेतना का किसी भी दृश्य पदार्थ से जोड़कर एकाकार हो जाना और उस वस्तु की प्रकृति की जानकारी प्राप्त कर लेना कोई दुःसाध्य प्रक्रिया नहीं है।
देखने से तो हमारा शरीर भी जड़ प्रतिभासित होता है। किन्तु उपरोक्त सिद्धान्त के अनुसार शरीर की जड़ता में भी चेतना व्याप्त है और वही मानसिक चेष्टाओं के अनुभव एवं बोध के रूप में अभिव्यक्त होती है। यदि 1838 व 39 में जर्मनी के प्रसिद्ध वनस्पति शास्त्री एम.जे. श्लाइडेन और प्राणिविद् थियोडोरश्वान कोशिका सिद्धान्त के निरूपण द्वारा इस बात को सिद्ध नहीं कर देते तो भारतीय तत्व दर्शन सचमुच उपेक्षित ही पड़ा रहा होता। शरीर देखने में जड़ लगता है। वह जिन कोशिकाओं (सेल्स) से बना है, वे हैं भी रासायनिक प्रणाली ही के। किन्तु उनके भीतर की रासायनिक हलचल समाप्त हो जाती है तो वे मर जाती हैं अर्थात् रासायनिक स्वरूप होने पर भी चेतना प्रणाली एक भिन्न सत्ता है और वह भिन्न सत्ता, वह प्रणाली, सृष्टि के प्रत्येक कण में विद्यमान है। ध्यान के द्वारा उस सूक्ष्म चेतना के साथ ही सम्बन्ध जोड़कर तादात्म्य का लाभ लेते हैं।
कौन-सा ध्यान अच्छा है, कौन अनुपयोगी और हानिकारक है, यह प्रत्येक वस्तु की प्रकृति पर निर्भर है और अन्यत्र विचार की वस्तु भी। किन्तु ध्यान विज्ञान का एक गूढ़तम सिद्धान्त है जिसके द्वारा न केवल चेतन और कोमल वस्तुओं का वरन् कठोर-से कठोर वस्तुओं का भी भेदन करके वहाँ की स्थिति का पता लगाया जा सकता है। कई भारतीय योगियों द्वारा पृथ्वी के अन्दर जन-स्रोतों का पता देने के वर्णन अखण्ड-ज्योति में छप चुके हैं। गड़ा धन, भूतों से सम्बन्ध स्थापित करना देव-शक्तियों से तादात्म्य स्थापित कर दिव्य एवं चमत्कारिक शक्तियों का अर्जन सब ध्यान की परिपक्वता के ही परिणाम है। टेड सीरियस ने भी गुप्त खजानों की खोज के लिये यह अभ्यास प्रारम्भ किया था। यह एक अलग बात रही कि सम्यक् मार्ग-दर्शक प्राप्त न होने के कारण उसकी यह विलक्षण प्रतिभा भी कोई उपयोगी लाभ नहीं दे सकी, जबकि भारतीय तत्ववेत्ता ध्यान-सिद्धि के द्वारा अपना, हजारों औरों का भी भला करते हुए मोक्ष और परमानन्द के अधिकारी होते हैं।
सुजाता ने खीर दी, वृद्ध ने उसे ग्रहण कर परम सन्तोष का अनुभव किया। उस दिन उनकी जो समाधि लगी तो फिर सातवें दिन जाकर टूटी। जब वे उठे, उन्हें आत्म-साक्षात्कार हो चुका था।
निरञ्जरा नदी के तट पर प्रसन्न मुख आसीन भगवान् बुद्ध को देखने गई सुजाता बड़ी विस्मित हो रही थी कि यह सात दिन तक एक ही आसन पर कैसे बैठे रहे? तभी सामने से एक शव लिये जाते हुए कुछ व्यक्ति दिखाई दिये। उस शव को देखते ही भगवान् बुद्ध हँसने लगे।
सुजाता ने प्रश्न किया- योगिराज! कल तक तो आप शव देखकर दुःखी हो जाते थे, आज वह दुःख कहाँ चला गया?
भगवान बुद्ध ने कहा- बालके! सुख-दुःख मनुष्य की कल्पना मात्र है। कल तक जड़ वस्तुओं में आसक्ति होने के कारण यह भय था कि कहीं यह न छूट जाय, वह न बिछुड़ जाये। यह भय ही दुःख का कारण था, आज मैंने जान लिया कि जो जड़ है, उसका तो गुण ही परिवर्तन है, पर जिसके लिये दुःख करते हैं, वह तो न परिवर्तनशील है न नाशवान्। अब तू ही बता जो सनातन वस्तु पा ले, उसे नाशवान् वस्तुओं का क्या दुःख?
सुजाता यह उत्तर सुन कर प्रसन्न हुई और स्वयं भी आत्म-चिन्तन में लग गई।
मनुष्य जीवन के लिये शिक्षा का बहुत महत्व है। इस महत्व को थोड़ा या बहुत, लोग स्वीकार करते हैं। कदाचित् ही कोई ऐसा जड़ व्यक्ति हो, जो विद्या के महत्व से इनकार करता हो। अन्यथा अधिकाँश व्यक्ति इस सत्य को एक स्वर से स्वीकार करते हैं कि विद्या से विहीन मनुष्य एक प्रकार से पशु तुल्य ही होता है।
तथापि शिक्षा का इतना महत्व मानते हुए भी अपने देश में अभी अधिकाँश संख्या ऐसे लोगों की ही पाई जाती है जो कोई न कोई बहाना लेकर शिक्षा के श्रम से मुँह मोड़े रहते हैं। उनके बहानों में कुछ प्रमुख बहाने इस प्रकार रहते हैं- “शिक्षा है तो अच्छी चीज लेकिन इससे कोई लाभ नहीं होता। पढ़ने की आयु निकल गई है। घर-गृहस्थी तथा कारोबार की इतनी व्यस्तता रहती है कि समय ही नहीं मिलता बच्चे पढ़ें-सीखें अब अपना पढ़ना क्या? विद्या प्राप्त हो सकती नहीं और लोग उल्टा उपहास करेंगे।” ऐसे बहाना आज लोगों के लिये कोई तर्क-वितर्क देने के स्थान पर कुछ ऐसे विद्या प्रिय लोगों के उदाहरण अधिक शिक्षा एवं प्रेरणाप्रद होंगे जिन्होंने आयु एवं समय का बन्धन न मानकर शिक्षा प्राप्त की और विद्वान् बने हैं।
जर्मन के डॉ. सुज की आयु इस समय लगभग सत्तर बहत्तर वर्ष की होगी। यह वह आयु है जिसमें पहुँचकर अधिकतर लोग अपने को बेकार तथा बेमतलब का समझने लगते हैं। वे हर समय मृत्यु का दुःस्वप्न देखने के सिवाय और कुछ नहीं करते। दिन-रात चल-चलाव के विषय से अब-तब करते रहते हैं। बात-बात में कब्र में पैर लटकाये होने की घोषणा करते हुये निराशा एवं निरुत्साह की ही अभिव्यक्ति किया करते हैं। आशय यह कि उन्हें मृत्यु की प्रतीक्षा करने के सिवाय जीवन के सम्बन्ध में कोई रुचि अथवा उत्साह नहीं रह जाता।
इसके विपरीत एक डॉक्टर सुज है जो अब तक अपने को संसार की तीन सौ विभिन्न भाषाओं का विद्वान् बना चुके हैं, और अभी उनका अध्ययन यथावत् पूर्ववत् ही जारी है। आपका निश्चय है कि इन तीन सौ भाषाओं के अतिरिक्त अभी वे दो सौ विभिन्न भाषाओं का ज्ञान और प्राप्त करेंगे। यह केवल उनका उत्साह अथवा आशा ही नहीं बल्कि दृढ़ विश्वास है कि वे अपने जीवन में ही अपना यह विद्या विषयक विचार पूरा कर लेंगे उनका यह उत्साह विश्वास, संकल्प तथा प्रयत्न उनकी भावना के अनुसार सफल भी हो रहा है।
अभ्यास, लगन, अध्यवसाय तथा जीवन के प्रति इन अडिग आस्था के फलस्वरूप वे इस, लगभग पौन सौ साल की आयु में भी तरुणों की तरह ताजे और युवकों की तरह स्फूर्तिवान हैं। जहाँ इस आयु में लोगों के बाल सन की तरह सफेद होकर निष्क्राँत हो जाते हैं, कमर कमान की तरह झुक जाती है। हाथ पैरों में कंपन होने लगता है, आँख, कान आदि इन्द्रियाँ निस्तेज हो जाती हैं, गरदन डुग-डुग करने लगती है और शेष जीवन को भार की तरह ढोते नजर आते हैं, वहाँ जर्मन के आस्थावान डॉ. सुज में जरठता के ऐसे कोई लक्षण दृष्टिगोचर नहीं होते। वे सर्वथा प्रफुल्ल एवं चैतन्य बने रहते हैं।
यदि विद्या प्राप्ति में आयु अथवा उपयोगिता का विचार ही प्रमुख होता तो डॉ. सुज को बहुत पहले अधिक से अधिक तीस साल के बाद अपना अध्ययन बन्द कर देना चाहिये था, और जीवन यापन के लिये एक दो भाषायें ही पर्याप्त होतीं। पांच सौ भाषाओं की योजना का व्रत न लेना चाहिये था।
किन्तु डॉ. सुज जीवन और उसके लिये विद्या तथा ज्ञान के महत्व को पूरी तरह जानते हैं। उन्होंने यथार्थ रूप में उसके प्रकाश को देखा और आनन्द को अनुभव किया है। ज्ञान का आनन्द तो इस सागर में उतरने और उस प्रकाश में पदार्पण करने पर ही जाना समझा जा सकता है, उससे दूर रह कर नहीं।
डॉ. सुज संसार के एक चमत्कारी व्यक्ति माने जाते हैं। किन्तु उसका चमत्कारी होना केवल इस मान में हैं कि उन्होंने अपने अध्यवसाय के आधार पर इस सत्य को प्रत्यक्ष कर दिया है कि मनुष्य के भीतर अद्भुत शक्तियों के भण्डार भरे पड़े हैं, जो भी इनको काम में लाना चाहता है या लाता है वह संसार का, कोई भी ऐसा काम नहीं है, जो न कर सके। स्वयं भी डॉ. सुज ने एक साक्षात्कार के समय इस आस्था को इस प्रकार प्रकट किया है-इतनी बड़ी संख्या में भाषाओं का ज्ञान प्राप्त कर सकने का रहस्य बतलाते हुये उन्होंने कहा- “मैंने जिन्दगी के विषय में चेतना पाते ही यह जान लिया था कि मनुष्य में विभिन्न प्रकार की शक्तियों का अद्भुत एवं अक्षय भण्डार भरा पड़ा है। साथ ही मैं मनुष्य के दृढ़ संकल्प को सफलता की आधारशिला मानता हूँ, और परमात्मा की दी हुई अद्भुत शक्तियों के सदुपयोग में विश्वास रखता हूँ। मुझे इसमें किसी प्रकार का संदेह नहीं कि यदि मनुष्य अदम्य उत्साह, सच्ची लगन, दृढ़ संकल्प और अनवरत श्रम से किसी काम में लगा रहे तो वह मनोवाँछित सफलता का अधिकारी बन सकता है। मेरी सफलता यदि कुछ है तो, उसका मात्र इतना ही रहस्य है कि मैं जीवन में प्रारम्भ से ही- गम्भीर तथा मनोयोग पूर्वक अध्ययन, ज्ञान प्राप्ति की नित्य नई जिज्ञासा, और अनवरत श्रम तथा लगन इन तीन सिद्धान्तों का उपासक रहा हूँ।”
डॉ. सुज का उदाहरण देख-सुनकर भी अब यदि कोई व्यक्ति समय, आयु एवं उपयोग के अभाव का बहाना लेकर विद्याध्ययन से दूर रहता है तो उसका यही अर्थ लगाया जा सकता है कि अमुक व्यक्ति जीवन में ज्ञान प्राप्त करने का जिज्ञासु नहीं है। यों ही बहाने बनाकर अपनी दुर्बलता एवं अकर्मण्यता को छिपाने का प्रयत्न कर रहा है।
अभी हाल ही का तो समाचार है कि पैरिस की एक अस्सी वर्षीय वृद्धा ने सरबोन विश्वविद्यालय में पुनः प्रवेश लिया है और एक सुशील छात्रा के रूप में अध्ययन शुरू कर दिया है। इस समय उनके तीन प्रौढ़ पुत्र, सात युवा पुत्रियाँ और अनेक किशोर प्रपौत्रियाँ हैं जो सबकी सब पढ़ रही हैं। उनके पुत्रों एवं प्रपौत्रियों में से अनेक उनसे ऊँची कक्षा में अध्ययन कर रही हैं।
यह वृद्ध महिला 1905 तक तो पहले भी इसी विद्यालय में विज्ञान का अध्ययन करती रही थी, पर बाद में विवाह के पश्चात् घर-गृहस्थी तथा बच्चों के पालन-पोषण के कारण उनका अध्ययन रुक गया। किन्तु अब ज्यों ही वे बच्चों के पालन-पोषण तथा घर गृहस्थी के दायित्व से मुक्त हुई कि विधिवत् अपना अध्ययन प्रारम्भ कर दिया। इस समय वे विश्व-विद्यालय की कुशाग्र बुद्धि छात्राओं में मानी जाती हैं।
इस महिला का यह प्रयास सिद्ध करता है कि विद्याध्ययन के लिए समय एवं आयु का कोई प्रतिबन्ध नहीं है, उसके लिये केवल उत्कृष्ट इच्छा तथा लगनशीलता की ही आवश्यकता होती है। यदि वृद्धावस्था एवं घर-गृहस्थी विद्या प्राप्ति में बाधक होती तो यह भाग्यवान महिला अब पुनः छात्रा न बन पाती। मनुष्य की प्रारम्भिक आयु तो विद्याध्ययन के लिये उपयुक्त है ही साथ ही अग्रस्थ आयु भी उसके लिये बहुत उपयोगी है। इस निवृत्त आयु का उपयोग विद्याध्ययन के लिये पूर्वकालीन आयु से भी अधिक उपयुक्त मानना चाहिए क्योंकि इस आयु में निश्चिन्तता तथा समय की कमी नहीं रहती। मनुष्य आगामी तथा वर्तमान साँसारिक चिन्ताओं से बहुत कुछ मुक्त हुआ रहता है। इस विषय में हतोत्साह एवं निराश तो वे ही लोग हो सकते हैं जो आवश्यकता न होने पर भी घर-बार की लिप्साओं में यों ही अभ्यासवश लगे रहते हैं। यदि वृद्धावस्था में विद्याध्ययन उपहासास्पद होता और विद्या प्राप्ति की आशा न होती तो यह वृद्ध महिला ऐसा कदापि न करतीं और आज समाज में प्रशंसनीय न होकर उपहास की पात्र बनी होती। अन्तिम अवस्था ही तो वह वास्तविक अवस्था है जिसमें अध्ययन के लिये निश्चित अवकाश की कमी तो नहीं ही रहती है साथ ही ज्ञान की आवश्यकता भी बहुत होती है क्योंकि उसके बाद तो पटाक्षेप होना होता है और उस अज्ञान यात्रा पर जाना होता है जिसका सबसे उज्ज्वल प्रकाशवान और उपयोगी पाथेय ज्ञान ही माना गया है।
अनेक लोग साधनहीनता का बहाना ले दौड़ते हैं। इस बहाने से अपनी अविधावृत्ति को बल देने से पहले इस लोगों को ईश्वरचन्द्र विद्यासागर तथा रामतीर्थ जैसे प्रकाण्ड विद्वानों की ओर दृष्टि डाल लेनी चाहिए। पंडित ईश्वरचन्द्र विद्यासागर इतने गरीब थे कि घर में प्रकाश का अभाव होने से वे रात-रात भर सड़क पर लगी लालटेनों के नीचे बैठकर पढ़ा करते थे, पिता की इतनी आय न थी कि दो कक्षा तक भी पढ़ा सकते। वे ईश्वरचन्द्र से मजदूरी कराने की सोच रहे थे कि बालक ने अपनी मील के पत्थरों पर खुदी संख्याओं द्वारा गिनती सीख कर अपनी विद्या प्राप्ति की उत्कट इच्छा प्रकट कर पिता को विवश कर दिया कि वे उसे पढ़ने का अवसर दें। थोड़ा-सा अवसर पाते ही ईश्वरचन्द्र न केवल विद्वान ही बने बल्कि विद्यासागर की सम्मानित उपाधि पाकर प्रसन्न हो गये।
स्वामी रामतीर्थ दो पैसे में गुजर कर विद्या विभूति का उपार्जन करते रहे, रोटी के दो पैसे बचाकर रात को दीपक के लिये तेल खरीदते थे। नंगे पैर कॉलेज आते-जाते थे और भूखे रहकर अध्ययन किया करते थे। उनकी यह पराकाष्ठा तक की गरीबी तथा साधनहीनता उनको अपने अध्ययन से न रोक सकी और वे संसार के विख्यात विद्वानों में मिल गये।
इतना ही क्यों 1911 में काशी के सरकारी संस्कृत कॉलेज से जिन ढाई सौ स्नातकों ने उपाधियाँ प्राप्त कीं उनमें से एक श्री महेशचन्द्र शर्मा भी थे जो जन्माँध थे और जिन्होंने संस्कृत में व्याकरण आचार्य की उपाधि प्राप्त की थी। किसी के सामने जन्माँध होने वैसी मजबूरी से बढ़कर कौन सी विवशता हो सकती है। किन्तु श्री महेशचन्द्र ने अपनी सफलता से सिद्ध कर दिया कि संसार की कोई भी साधन हीनता अथवा विवशता किसी को भी विद्या प्राप्त करने से नहीं रोक सकती, बशर्ते कि उसमें लगन तथा इच्छा का अभाव न हो।
संसार में ऐसे महापुरुषों तथा ज्ञान-पिपासुओं की कभी-कमी नहीं रही और न आज ही है जो जीवनभर विद्यार्थी बने रहने में ही अपना सौभाग्य मानते हैं। वाराणसी के डॉ. रामकुमार चौबे की आयु सत्तर से ऊपर होगी। इस समय तक वे सत्तरह विषयों में एम.ए. की परीक्षा पास कर चुके हैं किन्तु अपना अध्ययन समाप्त नहीं किया है। उनका संकल्प है कि वे जीवन भर विद्यार्थी बने रहेंगे और संसार का अधिक से अधिक ज्ञान प्राप्त करेंगे। उनका निश्चय है कि वे लगभग सभी विषयों में एम.ए. की परीक्षा पास करेंगे। इसी क्रम में उन्होंने अभी हाल ही में तीन विषयों में आचार्य की उपाधियाँ प्राप्त कर एल.एल.बी. की परीक्षा पास की है और बनारस विश्वविद्यालय से ही कला तथा स्थापत्य कला की एम.ए. परीक्षा में प्रविष्ट हुये हैं। वे लगभग 45 वर्षों से विविध विषयों में अध्ययन भी करते रहे और हालैण्ड विश्वविद्यालय से डॉक्टर आफ लाज की सम्मानित उपाधि लेकर इस समय काशी विद्यापीठ में अवैतनिक प्राध्यापक के रूप में जनसेवा का पुण्य लाभ कर रहे हैं।
ऐसे अध्यवसायी एवं विद्याप्रेमियों के उदाहरण देख सुनकर भी जो शिक्षा के सम्बन्ध में समय एवं उपयोगिता की मीनमेख निकाल कर उससे विरत रहते हैं तो यह उनका दुर्भाग्य ही कहा जायेगा।
धन की तराजू पर विद्या का उपयोग जाँचना अवाँछनीय वाणिज्य है। विद्या स्वयं एक धन है। ऐसा धन जिसे न चोर चुरा सकता है, न दावेदार बाँट सकता है, जो आपत्ति तथा प्रवास में सच्चे बन्धु की तरह सहायक होता है और दान करने से अधिकाधिक बढ़ता है। इस धन के लिए न राजा का भय होता है और न नश्वरता। इसलिए किसी भी अवस्था में एवं परिस्थिति में क्यों न हो विद्या प्राप्त करने से विरत नहीं ही होना चाहिए और मनीषियों द्वारा प्रतिपादित इस नीति वचन में विश्वास करना चाहिए-
पाठतो नास्ति मूर्खत्वं जपतो नास्ति पातकम्।
जाग्रतस्तु भयं नास्ति कुलो नास्ति मोनिनः॥
अर्थात्- जो निरन्तर प्रयत्नशील रहता है उसमें मूर्खता नहीं आती जो जप-तप करता रहता है उससे कोई पाप नहीं होता। जो जागरुक रहता है उसे भय नहीं होता और जो मौन धारण करता है वह कलह विग्रह से बचा रहता है।
सर्वद्रव्येषु विद्यैव द्रव्यमाहुरनुत्तमम्।
अहार्यत्वादनर्घत्वादक्षयत्वाच्च सर्वदा॥
विद्या से श्रेष्ठ कोई धन नहीं क्योंकि न तो यह चोरों द्वारा चुराया जा सकता है और न ही कभी इसका क्षय होता है।
ज्ञान, समझ के साथ बुद्धिमत्ता, विधि के साथ शक्ति, उदारता के साथ परोपकार तथा धर्म के साथ सद्गुण और शान्ति पैदा करता है।
-हीनफर
बकरा दौड़ता हुआ आया और आढ़त की दुकान में घुस कर भीतर लगी अन्न की ढेरी चबाने लगा। आढ़त का मालिक एक स्वस्थ नवयुवक, जो अभी पानी पीने कुएं पर चला गया था दौड़ा-दौड़ा आया बकरे की पीठ पर डंडे का ऐसा भयंकर प्रहार किया कि बकरा औंधे मुंह जमीन पर गिर पड़ा। दम निकलते-निकलते बची। मिमियाता हुआ वहाँ से बाहर भाग गया।
आद्य शंकराचार्य एक स्थान पर बैठे यह दृश्य देख रहे थे। उन्हें ऐसा देखकर हँसी आ गई फिर वे एकाएक गम्भीर हो गये। शिष्य श्रेष्ठि पुत्र ने प्रश्न किया-भगवान। बकरे पर प्रहार होते देख कर आपको एकाएक हँसी कैसे आ गई और अब आप इतने गम्भीर क्यों हो गये।
दिव्य दृष्टा आद्य शंकराचार्य ने बतलाया- वत्स। यह बकरा जो आज डण्डे की चोट खा रहा है कभी उसी आढ़त का स्वामी था। यह नवयुवक कभी इसका पुत्र था, इस बेचारे ने अपने पुत्र की सुख-सुविधाओं के लिये झूठ बोला, मिलावट की, शोषण किया वही पुत्र आज उसे मार रहा है जीव की इस अज्ञानता पर हँसी आ गई पर सोचता हूँ कि मनुष्य मोह-माया के बन्धनों में किस प्रकार जकड़ गया है कि कर्मफल भोगते हुए भी कुछ समझ नहीं पाता दुकान में बार-बार घुसने की तरह नश्वरता पर, क्षणिक सुख भोगों पर विश्वास करता है और इस तरह दैहिक, दैविक एवं भौतिक कष्टों में पड़ा-दुःख भुगतता रहता है।
अज-रहस्य की यह कथा अब पुरानी पड़ गई। किन्तु क्या वस्तुस्थिति भी पुरानी पड़ गई? आद्य शंकराचार्य ने श्रेष्ठि पुत्र को जो ज्ञान दिया था, पुनर्जन्म, कर्मफल आसक्ति माया और साँसारिक कष्ट भुगतने के वह सिद्धान्त क्या पुराने पड़ गये? क्या अब वैसी घटनायें नहीं घटती? सब कुछ होता है केवल समझ और शैली भर बदली है। अन्यथा आज भी ऐसी सैकड़ों मार्मिक घटनायें घटती रहती हैं। हम उनका अर्थ जान पायें तो देखें कि वस्तुतः माया-मोह के बन्धनों में पड़ा जीव कितनी निकृष्ट योनियों में पड़ता और कष्ट भुगतना है।
फ्रेडरिक डब्ल्यू. श्लूटर. नामक एक जर्मनी अमेरिका आकर बस गया। उसकी एक दादी थी। जिसका नाम था कैथेरिना सोफिया विट वह फ्रेडरिक से पूर्व ही 1871 में ही अमरीका आकर बस गई थी। यहीं इंडियाना राज्य के बुडबर्न नामक ग्राम में उन्होंने एक कृषक के साथ दुबारा विवाह कर लिया था। सोफिया विट के पति का एक बंगला यहाँ से चार-पाँच मील दूर खेतों में भी बना हुआ था। उसके पति प्रायः वहीं रहते थे। फ्रेडरिक किसी दूसरे शहर में नौकरी करता था किंतु वह मन बहलाने के लिये कभी-कभी अपनी दादी के पास आ जाया करता था। वह अपना अधिकाँश समय इस बंगले पर ही बिताया करता था।
जून सन् 1925 की बात है जबकि फ्रेडरिक यहाँ छुट्टियाँ बिताने आया हुआ था एक दिन उसे शिकार करने की सूझी। बंदूक लेकर बाहर निकला और कोई पक्षी या जीव-जन्तु तो उसे नहीं दीखा हाँ सामने ही एक चीड़ का वृक्ष था उसकी चोटी पर बने एक कोटर में एक वृद्ध कौआ बैठा हुआ था। फ्रेडरिक ने कौवे पर ही निशाना साध लिया पर अभी गोली छूटने ही वाली थी कि कौवे की दृष्टि उस पर पड़ गई सो वह बुरी तरह काँव-काँव करने और पंख फड़फड़ाने लगा।
उसकी यह आवाज सुनते ही फ्रेडरिक का चाचा (सोफिया का पति) दौड़ता हुआ आया और फ्रेडरिक की बन्दूक नीचे करते हुए बोला-यह क्या करते हो भाई- यह तुम्हारी दादी का पालतू कौआ है। इसे फिर कभी मत मारना।
कौवे की मैत्री एक विलक्षण बात है पर यह एक अद्भुत सत्य कथा है। कौवा यद्यपि अधिकाँश समय इस वृक्ष पर ही बिताता था पर कोई नहीं जानता रहस्य क्या था कि वह जब तक दिन में चार-छह बार सोफिया से नहीं मिल लेता था तब तक उसे चैन ही नहीं पड़ता था। कौवे में इतना विश्वास शायद ही कही देखा गया हो, शायद ही किसी और से कौवे की इतनी गहरी दोस्ती जुड़ी हो।
सोफिया की आयु इस समय कोई 85 वर्ष की थी। फ्रेडरिक खेतों से लौटकर घर आया और अपनी दादी के पास बैठकर बातें करने लगा। तभी उसने खिड़की की तरफ फड़फड़ की आवाज सुनी उसने सिर पीछे घुमाया वही कौवा था जिसे उसने अभी थोड़ी ही देर पहले मारते छोड़ा था। कौवा एक बार तो चौंका पर जैसे ही सोफिया ने उसे पुचकारा कि दरवाजे से होकर कौवा भीतर आ गया और सोफिया की गोद में अनजान-अबोध बालक की भाँति लौटने लगा। कौवा निपट वृद्ध हो गया था उसकी एक टाँग टूट गई थी। एक आँख भी जाती रही थी पंख कुछ थे कुछ झड़ गये थे। सोफिया ने कहा- फ्रेडरिक नहीं जानती क्या जन्म का आकर्षण है जो कौवा को मेरे पास आये बिना न इसे चैन और न मुझे।
इस घटना के कोई 2 वर्ष पीछे की बात है। फ्रेडरिक तब मिलिटरी में भरती हो गया था और अब वेस्ट पाइन्ट की इंजीनियर्स बैरक में रह रहा था। यह स्थान ब्रुडवमैन जहाँ उसकी दादी रहती थीं-से कोई 500 मील दूर था। एक रात जब फ्रेडरिक सो रहा था तब खिड़की पर कुछ फड़फड़ाने की आवाज सुनाई दी-होगा कुछ ऐसी उपेक्षा करके वह फिर सो गया, उसे क्या पता था कि जीवन के अनेक क्षण मनुष्य को बार-बार किसी गूढ़तम जीवन रहस्य की प्रेरणा देते रहते हैं पर हमारी उदासीनता ही होती है जो आये हुये वह क्षण भी निरर्थक चले जाते हैं। और हम जीवन की सूक्ष्म विधाओं से अपरिचित के अपरिचित ही बने रह जाते हैं।
फ्रेडरिक जब सवेरे उठा तब उसने देखा एक कौवा भीतर घुस आया है। और मरा पड़ा है उसने पास जाकर देखा तो आश्चर्यचकित रह गया क्योंकि यह कौवा वही था जिसे उसने 2 वर्ष पूर्व मारते-मारते छोड़ा था।
उसने कौवे की मृत्यु की सूचना पत्र लिखकर दादी के पास भेजी पर उधर से उत्तर आया चाचा का। जिसमें लिखा था कि- दादी का निधन हो गया है जिस दिन से वे मरीं वह कौआ दिखाई नहीं दिया।
कौवे की सोफिया से मैत्री, उसके निधन पर उसका फ्रेडरिक के पास जाना और मृत्यु की सूचना देना गहन रहस्य है जिन पर मानवीय बुद्धि से कुछ सोचा नहीं जा सकता। सम्भवतः कोई और आद्य शंकराचार्य वहाँ उपस्थित होते तो कहते इस कौवे का सोफिया से पूर्व जन्म का कुछ सम्बन्ध रहा होगा सम्भव है वह उसका पति रहा हो। उसकी मृत्यु पर भी मोह-ममता कम न हुई हो जिसे पूरी करने के लिये वह अपने नाती फ्रेडरिक के पास पहुँचा होगा और वहाँ शीत सहन न करने के कारण मर गया होगा। यही सब संसार की माया मोह है जो जीव को विभिन्न योनियों में भ्रमण कराता रहता है। भौतिकता सहन करते हुये भी मनुष्य इस तरह के आध्यात्मिक सत्यों की बात क्षण भर को सोचता नहीं जबकि कुछ न कुछ रहस्य इन कथानकों में रहता अवश्य है।
समुद्र से जल भरकर वापस लौट रहे मरुत देवों को विंध्याचल शिखर ने बीच में ही रोक दिया। मरुत विंध्याचल के इस कृत्य पर बड़े कुपित हुये और युद्ध ठानने को तैयार हो गये।
विंध्याचल ने बड़े सौम्य भाव से कहा-महाभाग। हम आपसे युद्ध करना नहीं चाहते, हमारी तो एक ही अभिलाषा है कि आप यह जो जल लिये जा रहे हैं वह आपको जिस उदारता के साथ दिया गया है उसी उदारता के साथ आप भी इसे प्यासी धरती को पिलाते चलें तो कितना अच्छा हो।
मरुतों ने अपने अपमान की पड़ी थी सो वे शिखर से भिड़ ही तो गये पर जितना युद्ध किया उन्होंने उतना ही उनका बल क्षीण होता गया और धरती का जल धरती को अपने आप मिल गया मनुष्य न चाहे तो भी ईश्वर अपना काम करा ही लेता है पर श्रद्धापूर्वक करने का तो आनन्द ही कुछ और है।
लम्बाई अब की अपेक्षा कुछ अधिक 7 फुट तक, छाती कुल 12 इंच, सारस जैसी सीर्कियाँ टाँगे, मुँह में दाँत नहीं, पाँव में कुल चार अँगुलियाँ आँख कबूतर जैसी नाक, गीध की सी चोंच, सर पूरे फुटबाल जितना पर उनमें एक भी बाल नहीं, स्त्रियों को भी जूड़ा बाँधने से मुक्ति- यह होगी अब से कुछ शताब्दियों बाद मनुष्य की रेखागणित। अभी तक जो मनुष्य देवाकृति जैसा स्वरूप और सुन्दर दिखाई दिया करता था अब उसी में वह परिवर्तन उभर रहे हैं जो मनुष्य को 1 लाख वर्ष बाद बिलकुल कार्टून की सी स्थिति में बदल देंगे। इसके लिए दोषी परिस्थितियाँ न होंगी वरन् परिस्थितियों को विद्रूप करने वाला आज का मनुष्य ही होगा जो आज अपनी विद्या और बुद्धि के अभिमान में फूला नहीं समा रहा।
मनुष्य का दोष इसलिए होगा कि परमात्मा के दिए हुए सर्वांग सुन्दर वाहन शरीर को जिस उद्देश्य की पूर्ति के लिए जैसा उचित प्रयोग करना चाहिए था नहीं कर रहा। एक पहिये से खींचने पर गाड़ी की जो दुर्दशा हो सकती है मनुष्य शरीर के एकाँगी भौतिक उपयोग के कारण भी वही दुर्दशा हो सकती है।
प्रसिद्ध जीव-शास्त्री लेमार्क, जिसका पूरा नाम बेप्टाइज लेमार्क था ने विकासवाद सिद्धान्त के अंतर्गत एक सिद्धान्त प्रतिपादित किया जिसका नाम है- “लेमार्क थ्योरी आफ यूज एण्ड डिस्यूज।” लेमार्क ने अनुभव किया कि नये जीवों का वातावरण बदलने का कारण होता है। वातावरण बदलने से आवश्यकताएं बदलती हैं और आवश्यकताओं के अनुसार आकृति में भी परिवर्तन होता है वे जीव इन परिवर्तनों को आगे आने वाली पीढ़ी को उत्तराधिकार में दे देते हैं इसमें अन्तर पड़ता चला जाता है आज वह जीव जिस आकृति में होता है उसकी कई पीढ़ियों के बाद का बच्चा आकृति में उससे बिलकुल भिन्न होता है।
उदाहरण के तौर पर लेमार्क ने बताया कि पहले जो बन्दर थे वे पेड़ों पर रहते थे सुरक्षा के लिए उनकी आँख हड्डी की परिधि के भीतर रहती थी। पेट की बनावट सीधी थी। कन्धे की हड्डी स्पष्ट थीं। हाथ की दोनों हड्डियों रेडियस और “अलना” कभी एक में जुड़ी रहती थी। हाथ और पैर में पाँच-पांच उँगलियाँ रहती थीं इनमें पूँछ भी होती थी क्योंकि पेड़ों पर चढ़ने के लिए इन्हें उछाल लेनी पड़ती थी। बन्दर, लंगूर, भील वानर तब इसी श्रेणी में आते थे। यही जब ‘अलक’ श्रेणी में आये अर्थात् जब इन्होंने धीरे-धीरे पेड़ों की अपेक्षा पृथ्वी पर भी रहना प्रारम्भ कर दिया तो इनकी आकृति में अन्तर आ गया। उछलने की आवश्यकता न रहने से पूँछ घिस गई। विकासवाद के समर्थक कहते हैं मनुष्य की रीढ़ की हड्डी जहाँ समाप्त होती है उसके पास आज भी ‘टेल बरटिग्री’ पाई जाती है यह वही स्थान है जहाँ पहले पूँछ रहती थी किन्तु उसका उपयोग न होने के कारण यह होते-होते “अलक” में बिलकुल ही समाप्त हो गई।
लेमार्क सिद्धान्त के दूसरे मत के अनुसार जीवन काल में अंगों के उपयोग और अनुपयोग का शरीर पर बहुत प्रभाव पड़ता है। जो अंग बराबर काम में प्रयुक्त होते रहते हैं उनमें स्थिरता बनी रहती है उस अंग के परमाणु क्रियाशील रहते हैं इसलिए वह स्थान बलवान और स्थानाविक बना रहता है। यह अंग बढ़ता और अधिक शक्तिशाली होता रहता है। किन्तु जो अंग प्रयोग में नहीं आते थे धीरे-धीरे दुर्बल होते हुए क्षीण एवं अनुपयोगी हो जाते हैं। हम इस सिद्धान्त को मानते हैं हमारा विश्वास भी ऐसा ही है। पर उसके योनियों के अपने अंशानुक्रम प्रभावित होते हैं ऐसा नहीं होता कि एक जीव ही दूसरे जीव में बदल जाता है। ये परिवर्तन जो व्यक्ति के जीवन काल में प्रयोग और अप्रयोग (यूज एण्ड डिसयूज) के कारण होते हैं उन्हें अपने में जोड़ लेने या बढ़ा लेने को “एम्बायर्ड करेक्टर” कहते हैं। नेमार्क के मतानुसार यह गुण आगे आने वाली पीढ़ियों में लक्षण सूत्रों (जीन्स) के रूप में “पास” हो जाते हैं इसलिए कई पीढ़ियों बाद मानवाकृति में पूर्णकृति से भिन्नता आ जाती है।
इस सिद्धान्त का मनुष्य के भविष्य से गहरा सम्बन्ध है इसलिये इसका प्रतिपादन आवश्यक है हम देखते हैं कि आज हमारी परिस्थितियाँ हमारे रहन-सहन का ढाँचा ऐसा हो गया जिसमें कुछ आवश्यकताओं की ओर मनुष्य बिलकुल ध्यान नहीं देता, कुछ बातों में यह आवश्यकता से अधिक महत्व देता है महत्व पाने वाले अंग तेजी से विकसित होंगे किन्तु जिनकी उपेक्षा की जा रही है वह नष्ट होंगे या ऐसे क्षीण होंगे कि आने वाली पीढ़ियों में इतना अन्तर आ जायेगा कि वह अब की मनुष्याकृति न रहकर ‘कार्टून’ सा बन जायेगा।
हमारे पूर्वजों का रहन-सहन इस तरह का था कि वे अधिक से अधिक प्रकृति के संपर्क में रहते थे। फलों के लिये वे वृक्षों पर चढ़ा करते थे। पहाड़ों की सैर करते थे खेती करते थे। भरपूर परिश्रम करने से उनकी श्वास-प्रश्वास क्रिया गहरी बनी रहती थी। फेफड़े इतने फूलते थे कि छाती में पर्याप्त हवा भरी रहती थी उससे सीने चौड़े और सारा शरीर सुडौल बना रहता था किन्तु जीवन में अब कृत्रिमता आ जाने से शरीर का पर्याप्त श्रम करना रुक गया इसलिए अब के युवकों की छातियाँ अपने पिता, बाबाओं की छाती की तुलना में छोटी पड़ गई। परिश्रम और पूरी साँस न लेने का ही परिणाम होगा कि आने वाली पीढ़ियाँ 12 इंच से अधिक चौड़े सीने वाली नहीं होंगी। पेट भी इनका सिकुड़ता चला जायेगा।
आवश्यकता इस बात की थी कि हम अपने पूर्वजों से कुछ ग्रहण करते पर हुआ यह कि अपनी बुद्धिमत्ता सिद्ध करने के लिए आज के मनुष्य ने अधिक से अधिक कामोपभोग करने में अपनी क्षमतायें लगाई फलस्वरूप उसके शरीर में उतार होता चला जा रहा है। योरोप और अमरीका में इस सम्बन्ध में गहन सर्वेक्षण हुआ है पिछले 50 वर्षों के जो निष्कर्ष सामने आये हैं वह बताते हैं कि आज का मनुष्य 1.37 इंच अधिक लम्बा हो गया है। वह इस दिशा में निरन्तर प्रगति कर रहा है। आणविक विकरण के प्रभाव और शुद्ध ऑक्सीजन शरीर को न मिलने के कारण लक्षण सूत्र (जीन्स) विकृत हो रहे हैं। जिससे मनुष्य की आकृति शिवजी के बरातियों की सी हो सकती हैं इन परिवर्तनों को अधिकतर वही रोक पायेंगे जो कृत्रिमता को दूर रखकर, संयम पूर्वक आहार-विहार में शुद्धता रखकर अपने शरीर और बीजकोषों को शुद्ध और बलवान बनाये रखेंगे।
लोहार के हाथ (मसल्स) बहुत मजबूत होते हैं किन्तु शहरी बाबुओं के हाथ परिश्रम न करने के कारण कमजोर और पतले होते हैं। गाँव के चरवाहे और किसानों को औसत 10 मील प्रति दिन चलना पड़ता है किन्तु नौकरी पेशे वालों को 1 मील जाकर घूमने और शुद्ध हवा लेना भी मुश्किल लगता है इससे उनकी जंघा और टाँगें पतली होती चली जा रही हैं। सरीसृप श्रेणी के सभी जीवों के पैर होते हैं- मगर, घड़ियाल, कछुये, छिपकली, कोतरी, बम्हनी, गोह इन सब के पैर होते हैं क्योंकि इनमें से जल में रहने वाले जीव भी बराबर जल से बाहर आकर अपने पैरों का उपयोग करते रहते हैं। इनके पैरों में कोई अन्तर नहीं आया पर साँप ने रेंगकर चलने के कारण अपने पैरों का उपयोग नहीं किया इसलिए उसके पेट में हाथ और पाँव के छोटे-छोटे दाने (इम्प्रेशन) मात्र रह गये। प्रारम्भ में साँप इतना बड़ा न होता था। रेंगकर चलने में उसे शरीर को खींचना पड़ता है जिससे वह बड़ा भी होता गया। अपने शरीर का विधिवत उपयोग न करने के कारण मनुष्य की भी यही स्थिति होगी।
धरती के भीतर रहने वाले जीव जैसे मेंढक, केंचुए, गुबरैले और दूसरे कीड़ों की आंखें बिलकुल कमजोर होती हैं क्योंकि उन्हें आँखों का काम नहीं लेना पड़ता, जबकि खुली हवा में आकाश में उड़कर केवल अपने शिकार की ही ढूंढ़ में रहने वालों की आंखें बहुत तेज होती हैं। परिश्रम और भरपूर प्रयोग से अंगों में दबाव पड़ने की अपेक्षा शक्ति आती है यह बात भूलने के कारण ही हम अपने शरीरों को कुछ का कुछ बनाते चले जा रहे हैं।
जीव वैज्ञानिकों का मत है कि अब से कई शताब्दियों पूर्व जब वन अधिक थे जंगलों में दूसरे जीवों का बाहुल्य था तब मनुष्यों की चिन्ताएँ कम थीं, कम से कम आवश्यकताओं में वह अधिक से अधिक मस्ती का जीवन-यापन करता था, तब उसका सिर 814 घन सेन्टीमीटर था अब मस्तिष्क के घनत्व का औसत 1350 घन सेन्टीमीटर था अब यन्त्र विज्ञान इतना बढ़ गया है कि आने वाली पीढ़ियाँ को कम से कम एक पुस्तक नाम तो, उन पुर्जों के याद रखने पड़ेंगे जो उनके सामान्य जीवन के उपयोग के होंगे। शरीर को काम करना पड़ेगा नहीं, इसलिये वे तो कमजोर हो जायेंगे पर सिर अनुमान है 1725 घन सेन्टीमीटर अर्थात् वनमानुष युग से दोगुना बड़ा होगा। पाँच लाख वर्ष बाद सिर फुटबाल की तरह और शरीर उन पुतलों जैसा हो जायेगा जो गाँवों की स्त्रियाँ व्यास पूजा पर दीवारों पर काढ़ा करती हैं।
जीव वैज्ञानिकों के अनुसार पहले लोग कच्चा खाने और तरकारियाँ खाने, मेवे चबाने में दाँतों को पर्याप्त व्यायाम देते रहते थे, इसलिये तब दाँत बहुत मजबूत थे। किन्तु अब पेयों का बहुत प्रचलन हो गया है, कामुकता के कारण लोगों के पेट की माँस पेशियाँ दुर्बल पड़ जायेंगी, जिससे वह कच्ची वस्तुएँ पका ही नहीं सकेगा। तब पेयों की मात्रा और अधिक बढ़ेगी, इससे लोगों के दाँत समाप्त हो जायेंगे। कुछ लोगों के दाँत होने पर बहुत दुर्बल, अधिकाँश पोपले हुआ करेंगे। भाँहों की हड्डी भी, अनुमान है बिलकुल फुटबाल या धोख जैसा लगेगा। यह सब इसलिए होगा कि हम अपनी परिस्थितियाँ, अपना वातावरण ऐसा बनाते चले जा रहे हैं कि सारे शरीर का उपयोग ही नहीं होता। जिन अंगों का उपयोग बढ़ा रहे हैं वह तो बड़े और भोंड़े हो सकते हैं जबकि प्रयोग में न आने वाले अंग या तो समाप्त ही हो सकते हैं या फिर ऐसे होंगे जिन्हें देखते ही ऐसे हँसी आ जाये जैसे कार्टून को देखकर हँसी आ जाती है।
इन परिस्थितियों में क्या हम सोचेंगे कि हमारे जीवन में पनप रही कृत्रिमता, परिश्रम का अभाव और यन्त्रीकरण का प्रेम हमें कहाँ से कहाँ और क्या से क्या बना सकता है।
(क्रमशः)
वाणी का वेग, मन का वेग, क्रोध का वेग, तृष्णा का वेग, उदर का वेग, उपस्थ का वेग इन प्रचण्ड वेगों को जो सह सकता है उसका भविष्य सब प्रकार उज्ज्वल है।
‘द’ का रहस्य-
एक बार सुर, असुर और मनुष्य तीनों मिलकर ब्रह्मा के पास उपदेश सुनने के लिये गये और यह निवेदन किया कि वे जीवनोपयोगी ऐसी बातें बतायें, जिससे जीवन सफल हो जाये।
ब्रह्मा जी ने उपदेश दिया ‘द’।
तीनों सन्तुष्ट होकर लौट आये। देवताओं ने सोचा- हमारे स्वर्गलोक में भोगों की कोई कमी नहीं है। सारी सुख-सुविधायें उपलब्ध हैं। सभी इतने लिप्त रहते हैं और एक दिन अपने लक्ष्य से ही भटक जाते हैं। अतः ब्रह्माजी ने ‘द’ से दमन अर्थात् इन्द्रिय संयम का उपदेश दिया है।
असुर सोचने लगे- हम लोगों का स्वभाव ही हिंसक है। बनी बनाई व्यवस्था बिगाड़ते रहते हैं। क्रोध में उचित-अनुचित का विचार तक नहीं कर पाते और अन्त में अपनी ही हानि कर लेते हैं। अतः ‘दया’ ही ऐसा राजमार्ग है जिसके द्वारा हमारे दुष्कर्म छूट सकते हैं। और पारस्परिक मेल-जोल से रहकर दूसरों के प्रति प्रेम तथा सहानुभूति की भावना रख सकते हैं।
मनुष्यों ने ब्रह्माजी के उपदेश को तुरन्त ही ताड़ लिया। वे समझ गये कि हम अपने बाल-बच्चों के पीछे जीवन भर हाय-हाय करते रहते हैं और झूठ, बेईमानी, मक्कारी तथा भ्रष्ट तरीकों से धन एकत्रित करके रखते हैं। इसलिए ‘दान’ करते रहने का उपदेश उन्होंने हमें दिया है। हम अपनी सुविधानुसार ज्ञान, विद्या या धन का दान देकर अभावग्रस्त लोगों को आगे बढ़ा सकते हैं।
महाराज प्रद्युम्न का रोग बढ़ता ही गया। कोई भी औषधि लाभदायक न हुई। वैद्य निराश हो-होकर अपने घर लौट गये। सारे राज-प्रासाद में उदासी छा गई।
अब क्या हो? मंत्रिपरिषद् की बैठक में विचार-विमर्श किया गया। प्रधान सचिव ने महारानी को सुझाव देते हुए बताया-आचार्य पुरन्ध्र वेद वेदान्त के ही पंडित नहीं है, आयुर्वेद का भी उन्हें ज्ञान है, क्यों न उन्हें ही बुलाकर महाराज को दिखाया जाय?
यह सम्मति सबने पसन्द की। आचार्य पुरन्ध्र आये और उन्होंने रोगग्रस्त प्रद्युम्न का पूर्ण परीक्षण भी किया, पर उनके शरीर में जीवन के कोई लक्षण शेष रहे नहीं थे सो उन्होंने भी वही बात कही जो शेष वैद्यों ने कही थी। लेकिन राज-परिवार हठ करने लगा- भगवन्! आप तो सिद्ध महापुरुष हैं, आप सब कुछ कर सकते हैं। कैसे भी महाराज को बचाइये।
पुरन्ध्र ने किंचित हँसकर कहा- सिद्धि का लौकिक लाभ से कोई सम्बन्ध नहीं है यदि हो भी तो उससे आत्म कल्याण में बाधा ही पड़ती है। आप सब यह मोह छोड़िये, महाराज आज बच गये तो इनका जरा जर्जर शरीर कितने दिन चलेगा? मृत्यु भी तो परमात्मा का उपचार ही है। इधर यह सड़ा-गला शरीर छूटा, उधर बढ़िया नया शरीर तैयार- ऐसी मृत्यु पर प्रसन्न होना चाहिए या दुःखी? आचार्य ने सब तरह समझाया पर आसक्ति भी क्या बला है कि उस समय व्यक्ति तात्कालिक लाभ के लोभ में सनातन स्वार्थ को भी कुचलने को तैयार हो जाता है अन्यथा विद्यान यही है कि कर्मानुसार जैसा कुछ फल मिलता है-वह यदि दुःख है, रोग है, जरा और मृत्यु है तो उसे भी सुख की ही भाँति सहन किया जाय।
जब लोग न माने तो उन्होंने कहा- “हाँ, एक उपाय अभी है। प्रधानमन्त्री। आप प्रयत्न करें तो महाराज के प्राण अभी भी बच सकते हैं।”
“आज्ञा दें महात्मन्। हम महाराज के लिये प्रत्येक सेवा के लिये तैयार हैं”-सचिव ने उत्सुकतापूर्वक निवेदन किया।
महर्षि पुरन्ध्र ने सधे और सीमित शब्दों में कहा-महाराज को अभी मर जाने दो। थोड़ी दूरी पर ही राजोद्यान में आम का एक वृक्ष है। ये उसमें काष्ठ-कीट के रूप में जन्म ले लेंगे। आप उसे जाकर पकड़ लाना। उसको मार देने से महाराज फिर से जीवित हो उठेंगे।
सब लोग बहुत प्रसन्न हुए और आचार्य पुरन्ध्र की सिद्धि के गुण गाने लगे। इसी बीच सम्राट का प्राणान्त हो गया।
शव को ढककर महामन्त्री राजोद्यान पहुँचे। थोड़ी ही देर में आचार्य ने जैसा बताया था जैसा ही एक काष्ठ-कीड़ा मिल गया। उसे पकड़ने के लिये मन्त्री वृक्ष पर चढ़े, पर वह जिस डाल में था उस तक पहुँचते-पहुँचते वह दूसरी डाल में पहुँच गया।
शव को ढककर महामन्त्री राजोद्यान पहुँचे। थोड़ी ही देर में आचार्य ने जैसा बताया था जैसा ही एक काष्ठ-कीड़ा मिल गया। उसे पकड़ने के लिये मन्त्री वृक्ष पर चढ़े, पर वह जिस डाल में था उस तक पहुँचते-पहुँचते वह दूसरी डाल में पहुँच गया।
जिसका चित्त निर्मल है, वही मोक्ष पाता है।
-दशाश्रुत स्कन्ध 5/1
महामंत्री उस पर भी चढ़े पर वह कीड़ा अस्थिर ही नहीं, चालाक भी था। अपने प्राण बचाने के लिये वह दूसरे वृक्ष पर छलाँग लगा गया। महामन्त्री ने बहुतेरा पीछा किया पर शाम तक भी वह हाथ नहीं आया। महामन्त्री निराश और खाली हाथ लौट आये।
आचार्य हँसे और बोले- जाओ, अब इनका अन्तिम संस्कार करो- यह मोह ही तो नाशवान है। कीड़े को अपने शरीर से इतना मोह है कि वह राजा बनना पसन्द नहीं करता। वैसे ही हम सब भी एक अच्छे और नये जीवन के लिये भी डरते रहते हैं, यह मोह नहीं तो क्या है?
आचार्य के यह वचन सुनकर सबका मोह टूटा और सब लोग दाह-संस्कार के प्रबन्ध में जुट गये।
हिमालय में कुछ पक्षी ऐसे पाये जाते हैं जो वर्ष भर केवल देशाटन करते रहते हैं। भारतवर्ष ही नहीं, पड़ौसी देशों में भी वे जाते रहते हैं। यह उनकी आहार आदि की सुविधा पर निर्भर है कि वे किधर जायें, किधर न जायें पर जब अण्डे देने का अवसर आता है तब वे अपने मूल निवास स्थान हिमालय को ही लौट आते हैं। ऐसा ही इतिहास अटलांटिक सागर में पाई जाने वाली ‘ईल’ मछली का भी है। वह मीठे पानी के लिये हजारों मील समुद्र पार कर गंगा यमुना तक पहुँचती है पर उसे अण्डे देने होंगे तो अपने अटलांटिक सागर में ही जाकर देगी।
संसार में फैली हुई सैकड़ों जातियाँ और विभिन्न देशों के निवासी आकृति, रंग, रूप, खानपान और भौगोलिक परिस्थितियों के कारण वेष व बनावट में कितने ही बदलाव क्यों न आ गये हों, वे सब एक ही मूल पुरुष से जन्में, एक ही स्थान से विकसित हुए हैं। एक घर में जब चार लड़के हो जाते हैं, तब चार घरों की आवश्यकता पड़ती है। बड़ा वहीं रह जाता है, शेष तीन नया घर बना लेते हैं। ऐसा करते-करते ही इस पृथ्वी पर इतने देश, इतनी जातियाँ बन गई और वे ऐसी अलग-अलग हो गई कि अब उनको एक ही पिता की सन्तान कहना भी कठिन हो गया है।
किन्तु धार्मिक भूगोल और मनुष्य जाति के पुरातत्व इतिहास की खोज एक बार हमें फिर उसी ओर ले जाती है। उपलब्धियाँ और निष्कर्ष यह बताते हैं कि भारत कभी सारे संसार का राष्ट्र संघ था और यहाँ की संस्कृति विश्व संस्कृति। अनेक देशों में रहने वाले लोग भाषा की दृष्टि से एक थे- उसकी भाषा संस्कृत थी। आचार की दृष्टि से एक थे- सभी ईश्वर उपासक और संगठन बनाकर जीवों को पालकर रहने वाले होते थे। सच्चाई, ईमानदारी आदि के पालन पर विशेष ध्यान दिया जाता। राजाओं को अनेक अधिकार और सुविधाएँ इसीलिए दी जाती थीं कि वे खण्ड-खण्ड में बसे देशवासियों का निरीक्षण करते रहें और कभी कहीं उद्दण्डता न पनपने दें। यह सब राजे-महाराजे और शासन-तन्त्र भारतवर्ष से जुड़े रहते थे। उन्हें दिशा-निर्देश यहीं से होता था। वेदान्त संस्कृति की आदि भूमि होने के कारण चक्रवर्ती साम्राज्य यहीं से चलते थे। यह धर्म का एक आवश्यक अंग था और उसके लिये लोगों को ज्ञान-धारायें ही प्रवाहित नहीं की जाती थीं, शक्ति और शस्त्र का प्रयोग भी किया जाता था। यह उत्तराधिकार हिन्दुओं ने एक समर्थ संगठित जाति होने के कारण ही अपने कन्धों पर लिया था और उसका धर्म-पूर्वक पालन भी करते थे। आज भी यदि हम समर्थ हों और शस्त्र नहीं शक्ति के द्वारा विश्व संघ की रचना एक महान आदर्श विश्व शाँति के लिये कर सकें तो यह एक बड़ी बात होगी। यदि अपनी आँतरिक बुराइयों को दूर कर हम अपने को ज्ञान-विज्ञान, धर्म-संस्कृति, आचार-विचार, रहन-सहन आदि की दृष्टि से सर्व समर्थ सिद्ध कर सकें तो शौर्य और साहस आज भी हमारा वही है। संसार में फैले अपने छोटे भाइयों को एक बार फिर से मानवता के रास्ते पर ज्ञान और शक्ति दोनों तरह से लाया जा सकता है।
इतिहास इस बात का साक्षी है कि पहले ऐसा ही था। भारतीय संस्कृति मनु को आदि पुरुष मानती है। संपादक प्रायः सभी देश और धर्म भी मनु को ही अपना पितामह मानते हैं। हमारे धर्मग्रन्थ बताते हैं-
मनुना च प्रजाः सर्वाः सदेवासुर मानुषाः।
सृष्टव्याः सर्वलोकाश्च यत्रेगति पच्चेगति॥
-महाभारत वनपर्व
अर्थात्- सम्पूर्ण पृथ्वी पर अपनी-अपनी स्थिति के अनुसार जाकर बसे देवता, मनुष्य और राक्षस (यह मनुष्यों के क्रमशः गुण-विभाग हैं) सब मनु की ही प्रजा है।
अमरेन्द्रमया बुद्धया प्रजाः सृष्टास्तथा प्रभौ।
एक वर्णाः समाभाषा एक रुपाश्च सर्वशः॥
-बाल्मीक रामायण
अर्थात्-हे प्रभो। संसार भर में बसे सभी लोग एक ही जाति, एक ही भाषा और सब प्रकार एक ही आचार-विचार वाले मनु के पुत्र हैं।
‘एन्सियन्ट एण्ड मीडिवियल इण्डिया’ के प्रथम खण्ड 118 पेज में प्रसिद्ध इतिहासकार मैनिंग ने उपरोक्त तथ्य की जो तुलनात्मक व्याख्या की है वह बड़ी महत्वपूर्ण है। श्री मैनिंग लिखते हैं कि मानव-जाति के आदि जनक, जिन्हें भारतीय ‘मनु’ कहते हैं, उन्हीं से संसार की सभी जातियाँ बनीं, यह निर्विवाद सत्य है। भारतीय मनु या मानस की तरह जर्मन भी आदि पुरुष को “मनस” कहते हैं, यही ‘ट्यूटनों’ के मूल पुरुष समझे जाते हैं। जर्मनी का “मन्न” और अँग्रेजी का मैन उच्चारण में थोड़ा अन्तर रखता है पर वह “मनु” ही है। जर्मनी के “मनेस” और संस्कृत के “मनुष्य” में कोई अन्तर नहीं है।
बाहर गई हुई जातियाँ कालान्तर में अपने आहार-विहार और रहन-सहन बदलती अवश्य गई पर वे लम्बे अर्से तक साधना, उपासना, व्यवहार-व्यापार, धर्म और दर्शन, भाषा और शासन व्यवस्था आदि की दृष्टि से भारतीय संविधान से जुड़ी रहीं। ईसा से 1500 वर्ष पूर्व मध्य एशिया में “मिटानी” और “हिटाइट” नामक दो पड़ौसी राज्य थे। मिटानी का शासक “मलिउजाजा” था और हिटाइट में “शिविलुलिउमा” राज्य करता था। प्राचीन काल में जब दो राजाओं के मध्य सन्धि या किसी प्रस्ताव पर बातचीत होती थी तो अदालतों में जिस प्रकार भगवान की शपथ ली जाती है, उसी प्रकार देवताओं को साक्षी बनाया जाता था। इन दो राजाओं के मध्य हुई सन्धि का एक शिलालेख मिला है। उसमें जिन देवताओं को साक्षी दी गई है, उनके नाम इन्द्र, मित्र, वरुण और नासत्य (अश्विनीकुमार) हैं। यह देवता केवल ऋग्वेद में ही प्रयुक्त हुए हैं और संसार के किसी भी धर्म में नहीं। इससे स्पष्ट पता चलता है कि यह दोनों ही संभाग वेदान्त सभ्यता से प्रभावित थे।
मिश्र के एक “एल अमारा” में एक बेबीलोनिया का शिलालेख है। उसमें प्रयुक्त हुए नाम आर्तमन्य, यशदत्त सुवर्ण, आर्जवीय आदि संस्कृतनिष्ठ शब्द भी वेदों के ही हैं। कश्मीर में मिले “दबिस्तान” नामक शिलालेख में बैक्ट्रिया के राजाओं की नामावली दी है, वह हिन्दुओं के नामों की तरह ही है। ‘हिस्ट्री आफ इण्डिया’ के लेखक डॉ.मिल ने भी स्वीकार किया है। बैक्ट्रिया में मिले पुरातत्व अवशेष यह बताते हैं कि वहाँ की सभ्यता भारतीय रही है। ‘हिस्टोरीकल हिस्ट्री आफ दी वर्ल्ड’ प्रथम खण्ड के पेज 89 में इजिप्ट निवासी पणिकों की शाखा है। ये लोग पान्त देश से आये। यह पान्त पहले पाण्डय् देश था और उनके पणि ही पणिक हैं। उन्होंने ही फिनीशिया बसाया। उपरोक्त के पेज 77 में स्वयं लेखक ने भी स्वीकार किया है कि इजिप्ट भारतीयों का ही प्रवासी देश रहा है। भले ही कालान्तर में उसने अपनी अलग संस्कृति बना ली हो।
पुराणों में वर्णित आन्ध्रालय ही आस्ट्रेलिया है। इसका प्रमाण है ‘अक्षय तूण अस्त्र’। एकलव्य ने इसी अस्त्र का प्रयोग एक बार किया था। इसकी विशेषता यह होती है कि यह दुश्मन को मारकर वापस आ जाता है। यह यन्त्र ‘बूमराँग‘ नाम से अभी भी आस्ट्रेलिया में पाया जाता है।
जानते और समझते हुए भी अन्याय का विरोध करने की शक्ति जिसमें नष्ट हो गई वह जाति अधिक दिनों तक जीवित नहीं रह सकती।
-शरतचन्द्र
अमेरिका के पुरातत्व संग्रहों में हाथी के चित्र पाये जाते हैं जबकि वहाँ हाथी मिलते ही नहीं। गणेश की मूर्तियाँ हैं, जबकि वहाँ गणेश को आज लोग जानते तक नहीं, इसके विपरीत महाभारत युद्ध और रामायण काल में अहिरावण, अलम्बुस आदि राजाओं का वर्णन मिलता है, जो पाताल वासी बताये गये हैं। यह अमेरिका ही था जो भारतवर्ष से ठीक नीचे की ओर ‘ग्लोब’ में है। कोलम्बस के पहुँचने से पहले पेरु और मैक्सिको में स्वस्तिक का चिन्ह प्रत्येक मंगल पर्व पर काढ़ा जाता था, जो बिलकुल भारतीयों की अनुकृति है। बलि पाताल का राजा था। दक्षिण अमेरिका में उसके नाम का स्मरण कराने वाला नगर बलिविया आज भी है, यह किसी समय राजधानी थी। अंग देश से पहुँचे हुए लोगों ने ही अमेरिका में ‘इंक’ जाति बनाई। दोनों के पुरातत्व संग्रह एक ही प्रकार के मिलते-जुलते पाये गये हैं।
इन्डोनेशिया के द्वीप जावा, सुमात्रा, लम्बोक, बालि आदि के नाम तो ज्यों के त्यों महाभारत में आये हैं। वहाँ के लोगों के नाम अभी भी सुकर्णों, भीमी, अर्जुनों आदि होते हैं, जो स्पष्ट यह बताते हैं कि उनके नामों की शैली भारतीय थी अर्थात् वे संस्कारों की दृष्टि से भारतीय संस्कृति के अंग ही थे। वहाँ के लोक-जीवन, साहित्य और छाया नाटकों में पुराण काल की संस्कृति के दर्शन आज भी किये जा सकते हैं। कम्बोडिया, थाईलैण्ड और रूस के अधिकाँश राज्यों के नाम और वहाँ की संस्कृति में अभी भी भारतीय संस्कृति से बहुत अधिक साम्य पाया जाता है। यह उदाहरण इस बात के प्रमाण हैं कि सृष्टि में मानव का आदि पदार्पण भारतवर्ष में हुआ। उन्होंने ‘वेद’ रचकर वेदान्त सभ्यता या भारतीय संस्कृति का निरूपण किया। यही जाति इस संस्कृति को लिये हुए सारे विश्व में फैलती चली गई। पहले तो राष्ट्रसंघ स्थापित था इसलिये सभी लोगों को भारतीय संस्कृति के अनुरूप जीवन पद्धति, नीति, धर्म, दर्शन आदि को अपनाना ही पड़ता था। ये लोग अपना पितामह देश भारत को मानते थे। इसलिए इसे विदेश मानने का कोई कारण ही नहीं था। भारतीय संस्कृति को विश्व-संस्कृति मानकर ही वे लोग अपने जीवन में स्थान देते रहे।
धीरे-धीरे यहाँ के लोगों में भेदभाव, स्वार्थ-परायणता और ऊँच-नीच का भाव आता गया। उससे अथवा किन्हीं भौगोलिक व ऐतिहासिक कारणों से परिवर्तन होते गए और विश्व अनेक देश, अनेक संस्कृतियों के रूप में दिखाई देने लगा। विश्व की अशान्ति का आज का कारण भी यही है कि जाति, गुण, कर्म, स्वभाव, धर्म, दर्शन की एकता को भूलकर आज सारा संसार वर्ण भेद जाति और धर्म-भेद के मैदान में कूद आया है। उसी से परस्पर संघर्ष होता है। उस संघर्ष से तभी बचा जा सकता है, जब पुनः लोगों को पता चले कि हमारा मूल उद्गम भारतीय संस्कृति है। सारे संसार को एक सूत्र में बाँधने और सबका हित साधन की क्षमता भारतीय संस्कृति में है। वहीं अपने दूर-दूर तक जाकर बसे लोगों को मातृत्व और स्नेह देकर संसार को पुनः एक राष्ट्रसंघ, एक भाषा, एक ही मानव जाति के मनका में पिरो सकती है। यही सब कुछ आगे करना और होना है।
गरीबों का हमदर्द-
“माँ देखना, मैं कितनी अच्छी चीज लाया हूँ।”
“अरे यह क्या ले आया। यह तो किसी चिड़िया के अंडे हैं। मुझे ऐसा लगता है कि तू चिड़िया के तीनों अंडे उठा लाया है। जब वह अपने घर लौटेगी तो बहुत रोयेगी बेटा।”
“अच्छा माँ। यह चिड़िया के अंडे हैं। मुझे क्या मालूम था?” वह बालक लंगड़ाते-लंगड़ाते उस पेड़ तक गया क्योंकि चोट के कारण उसके पैर में दर्द हो रहा था। वह पेड़ पर चढ़ा और उसने सब अंडे उसी घोंसले में रख दिये। और पेड़ के नीचे बैठा तब तक रोता रहा जब तक कि वह चिड़िया पेड़ पर न आ गई। चिड़िया को देखकर उसका सारा दर्द जाने कहाँ चला गया और हँसता-कूदता अपनी माँ के पास लौट आया। यह बालक कोई और नहीं वरन् दीनबन्धु एन्ड्रूज थे, जो जीवन भर दीनों को अपना भाई समझ कर प्यार करते रहे।
रक्त में पाये जाने वाले लाल कणों को, जिनकी सघनता से ही रक्त का रंग लाल होता है, निकाल डालें तो जो शेष बचेगा वह पानी होगा। चरक संहिता के अनुसार रक्त में 8 अंजलि और मस्तिष्क में आधा अंजलि केवल जल ही होता है। शरीर के भार का 70 प्रतिशत भाग केवल जल ही होता है। यदि आप 100 पौंड वजन के हैं तो आप में 70 पौंड पानी है। रक्त में तो यह प्रतिशत 92 का होता है अर्थात् शरीर में यदि 6 लीटर रक्त है तो उसमें रक्तकणों की मात्रा कुल 0.48 लीटर ही होगी शेष 5.52 लीटर मात्रा केवल जल की होगी।
प्रकृति ने मनुष्य को खनिज धातु, लवण और गैसों के एक विशेष सम्मिश्रण से बनाया है। शरीर में किस वस्तु का कितना प्रतिशत रहना चाहिए, उसे प्रकृति ने शरीर बनाते समय पहले ही निश्चित कर दिया है। जब तक यह अनुपात स्थिर रहेगा तब तक शरीर स्वस्थ और मन प्रसन्न रहेगा। यदि उसमें व्यतिक्रम हुआ, गलत खाने से वह अनुपात बिगड़ा तो फिर मनुष्य का स्वस्थ रहना सम्भव नहीं, कोई न कोई बीमारी उसे अवश्य धर पकड़ेगी। यह एक वैज्ञानिक सिद्धान्त हुआ।
आजकल लोगों का विश्वास है कि अधिक से अधिक चर्बी वाले पदार्थ भी, तेल, माँस और आटा, दाल खाने से ज्यादा शक्ति मिलती है, वह मात्र भ्रम है। चर्बी वाले पदार्थों का सेवन ही दीर्घ जीवन के प्रतिफल है। इसमें पाया जाने वाला ‘कोलेस्ट्रॉल’ तत्व धमनियों में रुकावट पैदा करता है इसी के कारण ही नाड़ियों में रक्तस्राव व ‘एथेरीसक्लेरोसिस’ नामक रोग पैदा होता है।
अन्न न मिले तो मनुष्य 60 दिन तक जीवित बना रह सकता है, पर पानी के बिना तो वह अधिक से अधिक सात ही दिन जी सकता है। पानी के बिना एक दिन बिताना भी सबसे बड़ी तितिक्षा मानी गई है- वह पानी के महत्व को ही प्रतिपादित करता है। प्रोटीन, चर्बी और ग्लाइकोजन सब मिलाकर शरीर में 40 प्रतिशत होते हैं। यह सबके सब समाप्त हो जायें तो भी मनुष्य जीवित रह सकता है, पर पानी की मात्रा में 20 प्रतिशत भी कमी हो जाये तो शरीर का जीवित रहना सम्भव नहीं। शरीर में पाचन क्रिया से लेकर रक्त परिभ्रमण तक के लिये जल शरीर की प्राथमिक आवश्यकता है।
इस दृष्टि से जहाँ दिन में बार-बार पानी पीने की आवश्यकता है वहाँ यह भी आवश्यक है कि हम जो आहार ग्रहण करें उसमें भी पानी की मात्रा कम न हो। पीली सब्जी और दाल बनाकर खाने का केवल भारतवर्ष में ही रिवाज है। यह पद्धति जल की आवश्यकता देखकर ही चलाई गई थी। अब जो वैज्ञानिक आँकड़े सामने आ रहे हैं, उनसे पता चलता है कि आहार में शाकों की बहुलता निर्धारित करने के पीछे भारतीय आचार्यों ने कितनी बुद्धिमत्ता और वैज्ञानिकता से काम लिया है।
मोटे रूप से हम जो अन्न लेते हैं उसमें जल की अधिकतम 60 प्रतिशत ही मात्रा होती है, पर फल और सब्जियों में जल की मात्रा 95 प्रतिशत तक होती है इसी से सुपाच्य भी होते है और आरोग्यवर्धक भी। सेब में 84 प्रतिशत जल होता है और केला व अंगूर में क्रमशः 75.3 प्रतिशत वह 77.3 प्रतिशत। आड़ू में 89.4 प्रतिशत तो गोभी तथा गाजर में 91.5 प्रतिशत व 88.2 प्रतिशत। पालक जैसी पत्तेदार हरी सब्जियों और टमाटर में तो 92.3 तथा 94.3 प्रतिशत जल होता है। यह जल उस खनिज जल के समान होता है जो पहाड़ी नदियों से पर्वतों के अनेक सल्फर तत्व लेकर बनता है। इसलिये स्वास्थ्य के लिये जितने उपयोगी शाक है उतना और कोई पदार्थ हो ही नहीं सकता।
माँस और भारी अन्न से कोई शरीर की स्थूलता भले ही बढ़ा ले पर जिन्हें स्वस्थ, रोगमुक्त और तेजस्वी जीवन बिताना है उन्हें जल की पर्याप्त मात्रा ग्रहण करनी ही होगी- वह केवल शाकाहार से ही मिल सकती है।
जम्बूदीप का नृत्य संगीत विश्वविद्यालय और आचार्य कुमारदेव को उन दिनों आर्यावर्त ही क्यों, सारा विश्व जानता था। वे संगीत-सिद्ध थे। संगीत की ऐसी कोई विद्या न शेष थी, जिसका मर्म कुमारदेव न जानते हों।
मगध, कौशल, कौशाम्बी, सिन्धु, पाँचाल, उरु, कुरु, मिश्र, ईरान आदि अनेक राज्यों की राजकुमारियाँ और श्रीसामंतों की पुत्रियाँ उनके गुरुकुल में नृत्य-संगीत सीखती थीं पर आचार्य देव को आज तक कोई ऐसा योग्य शिष्य नहीं मिल सका था, जिससे वह आशा करने कि वह नादयोग संगीत की परम्परा को उन्हीं के समान जीवित रख सकेगा।
उस दिन पहली बार आशा की पहली किरण आचार्य देव के हृदय में उतरी जिस दिन मगध की राजनर्तकी सुनन्दा की ज्येष्ठा कन्या कोसा ने आश्रम में प्रवेश लिया। आचार्य देव जानते थे- संगीत और नृत्य कलायें योग साधनायें हैं। उन्हें वही प्राप्त कर सकता है, जिसमें असीम श्रद्धा, निष्ठा और चारित्रिक पवित्रता भी हो। यह संस्कार आत्मा से सम्बन्ध रखते हैं-समृद्धि सवर्णना और कुल श्रेष्ठता से नहीं। जब उनने कोसा को उस रूप में पाया तो उनकी वर्षों की निराशा दूर हो गई। कोसा को पाकर उनका आचार्यत्व और वात्सल्य दोनों एक साथ उमड़ पड़े। उन्होंने जितने परिश्रम से कोसा को आरती, अमिसारिका, परकीय, प्रमोद, मधुमिलन, संगोपन, सूचिका, ताँडव आदि गूढ़ और सूक्ष्म भावनाओं से ओत-प्रोत नृत्य सिखाये। कोसा ने उन्हें सीखा, कला पारंगत हुई और एक दिन मगध की राजनर्तकी का यश-शील पद भी प्राप्त कर लिया।
योग साधनायें कठिन बताई जाती हैं पर सिद्धि का संरक्षण उससे भी कठिन बात है। कोसा जिस दिन मगध राजनर्तकी घोषित हुई, उस दिन उसे प्राप्त करने के लिये श्रीसामन्तों, राजकुमारों तक में होड़ लग गई। स्वयं मगध नरेश की दृष्टि भी निष्कलुष न रह सकी, पर कोसा के मस्तिष्क में आचार्य देव के वह शब्द अभी भी सुप्त नहीं पड़े थे- भद्र! राजनर्तकी का गौरव प्राप्त हुआ तो तुम भारतीय नारी हो, भारतीय नारी सदैव एक पुरुष का वरण करती है और उसके आदर्शों के लिये अपने को न्यौछावर करती रही है, उस परम्परा को भूलना मत।”
दीपक की लौ में जल जाने वाले पतंगों की तरह अनेकों कामुक व्यक्तियों की लालसायें बढ़ीं और कोसा की दृढ़ता की अग्नि में भस्मसात होती गई। कोसा महामन्त्री शकटार के पुत्र स्थूलिभद्र को प्रेम करती थी। उनके अतिरिक्त उसने स्वप्न में भी किसी पुरुष का स्मरण नहीं किया।
कोसा जितनी पवित्रता से स्थूलिभद्र के प्रति प्रेम रखती थी, उतना ही रथाध्यक्ष राजकुमार सुकेतु उस पर आसक्त था। जिस दिन उसे पता चला कि कोसा स्थूलिभद्र को वरण कर चुकी है, उसका प्रतिशोध उमड़ उठा, उसने शकटार की हत्या करा दी ताकि स्थूलिभद्र का कोई प्रभाव शेष न रहे। इस घटना से स्थूलिभद्र इतना दुःखी हुए कि उन्होंने वैराग्य धारण कर लिया और वन में जाकर तप करने लगे। यह कोसा के जीवन में वज्राघात की तरह था, किन्तु उसकी चारित्रिक दृढ़ता में रत्ती भर भी प्रभाव नहीं पड़ा।
तपस्वी स्थूलिभद्र चतुर्मास के लिये मगध आने वाले हैं, यही नहीं वे कोसा के ही अतिथि होंगे। एक क्षीण आशा अब भी बनी हुई थी, पर जब वह आये और चतुर्मास साधना पास रहकर कर चुके किन्तु उनके मन में एक क्षण के लिये भी काम-विकार और साँसारिक आकर्षण जागृत न हुआ तो कोसा की रही-सही आशायें भी टूट गई।
स्थूलिभद्र चतुर्मास समाप्त कर निर्विकार लौट गये। वह रात कोसा के जीवन की सबसे निराश और भयंकर रात थी। आशा जीवन को बाँध रखने वाली एक प्रबल आकर्षण शक्ति है, वह टूट जाये और फिर जीवन में प्रसन्नता दिखाई न दे तो विरक्ति स्वाभाविक ही है। रात का एक-एक पल कोसा के लिये भारी पड़ रहा था, एक परमात्मा के अतिरिक्त दूसरा कोई आश्रय समझ में नहीं आ रहा था, पर उस दिव्य सत्ता को समझ पाना एकाएक सबके बस की बात नहीं? वह तो योगियों को ही कठोर तप करने से मिलता है।
रात्रि का समय, कोसा उठी और द्वार से बाहर की ओर चल पड़ी। यह घर से एक ही क्षण में निकलकर कहीं प्राणान्त कर लेना चाहती थी पर वह जैसे ही द्वार पर आई, सम्मुख खड़े आचार्य कुमारदेव को देखते ही अवाक् रह गई। आगे बढ़कर उसने सजल नेत्र गुरु को प्रणिपात किया- “यह जीवन बड़ा कठिन है गुरुदेव।” बस वह इतना ही कह सकी। आँखों से आँसुओं की अविरल धारा फूट पड़ी।
आचार्य देव ने उसे उठाकर हृदय से लगाते हुए कहा, ‘पुत्री। उठो तुम्हारा चरित्र स्थूलिभद्र की साधना से भी अधिक पवित्र है। अब तुम आश्रम में रहकर शिक्षण कार्य करो, तुम्हारी गाथा चिरकाल तक भारतीय नारी को चरित्र का उपदेश करती रहेगी।
भगवान के प्रसन्न होने का रहस्य-
दक्षिण कर्नाटक के बेलगाँव जिले की एक महिला सन्तान न होने के कारण बहुत दुःखी थी। भजन, पूजन व्रत, उपवास- जिसने जो बताया, उसने बड़ी श्रद्धा से पूर्ण किये। फिर भी उसकी गोद सूनी-की-सूनी ही रही। अन्त में उदास मन लेकर सन्तान पाने की लालसा से वह चिदम्बर दीक्षित के पास पहुँची। दीक्षित जी उद्भट विद्वान्, समाजसेवी और लोकोपकारी व्यक्ति थे। वह दूसरों के दुःख दर्दों को अपना दुःख-दर्द समझकर दूर करने का भरसक प्रयत्न करते।
दीक्षित जी के पास बर्तन में कुछ भुने हुए चने रखे थे। उन्होंने उस महिला को अपने पास बुलाकर दो मुट्ठी चने दे दिये और कहा- उस आसन पर बैठकर चबा लो। उस ओर कई बच्चे खेल रहे थे। छोटे-छोटे बच्चे, उन्हें अपने पराये का ज्ञान कहाँ होता है। वे भी खेल बन्द करके उस महिला के पास आकर इस आशा में खड़े हो गये कि यह महिला शायद हमें भी खाने को देगी। पर वह तो मुँह फेर अकेली ही चने खाती रही और बच्चे लालच की दृष्टि से टुकुर-टुकुर खड़े देखते रहे।
चने खत्म हो गये तो वह दीक्षित जी के पास पहुँची और बोली- ‘अब आप हमारे दुःख दूर करने के लिये भी कुछ उपाय बताइये।’
‘देखो देवी। फोकट में मिले चनों में से तुम उन बच्चों को चार दाने भी नहीं दे सकीं, जबकि एक बच्चा तो तुम्हारी ओर हाथ तक पसार रहा था। फिर भगवान तुम्हें हाड़-माँस का बच्चा क्यों देने लगेंगे।’
उदार भगवान से और भी अधिक उदारता पाने की आशा करने वालों को अपना स्वभाव और चरित्र अधिक उदार बनाने का प्रयत्न करना चाहिए।
ऐसी असाध्य रोग से ग्रसित महिला को संगीत के द्वारा स्वस्थ होते देखा तो राल्फ लारेन्स हाय का मन संगीत के प्रति श्रद्धा से भर गया। यही नहीं अपनी पत्नी श्रीमती ग्रेश्चैन के साथ विचार-विमर्श करके उन्होंने यह भी निश्चित किया कि भगवान की दी हुई इस बहुमूल्य निधि का मानवीय सेवा के रूप में सदुपयोग क्यों न किया जाय? शब्द शक्ति के वैज्ञानिक पहलू पर ध्यान देते तो इस योजना के लिए उन्हें और भी विकलता होती। अन्ततः उन्होंने इस परियोजना को मूर्त रूप दे ही दिया। पहली बार “आर फोर आर” रिफ्लेक्शन (रिकार्डिंग फॉर रिलैक्सेशन, रिफ्लेक्शन, रेस्पाँस एण्ड रिकवरी) नाम से एक संस्था ने संगीत आन्दोलन के लिए हिम्मत की ओर थोड़े ही समय में वह सफलता के जिस चरम बिन्दु तक पहुँची उससे भी संगीत की महाशक्ति और उसके प्राण वर्द्धक स्वरूप का परिचय मिलता है।
प्रारम्भ में उन्होंने कुछ शास्त्रीय धुनें तैयार कीं और उन्हें पिट्सवर्ग के अस्पतालों में, जहाँ वृद्ध लोग रहते थे वहाँ तथा घायल सैनिकों के अस्पतालों में जाकर सुनाना प्रारम्भ किया। उससे रोगियों को जो शारीरिक तथा मानसिक लाभ हुआ उससे उनका उत्साह और भी बढ़ गया। इस दृष्टि से देखें तो विदेशी हम भारतीयों से हजार गुना अच्छे। जो वस्तु उन्हें उपयोगी और मानवीय हित में दिखाई दी उसके प्रति निष्ठा और कार्यान्वयन का साहस हमें विदेशियों से ही सीखना होगा। उस तरह की हिम्मत हममें भी आ गई होती तो न केवल दहेज, जाति भेद, ऊँच-नीच, छुआछूत, अन्ध-विश्वास, पलायनवाद, जैसी सामाजिक बुराइयों को पूरी तरह समाज से उखाड़ चुके होते वरन् ज्ञान विज्ञान, भाषा, भेष, साहित्य और संस्कृति के पुनर्निर्माण में भी बहुत आगे बढ़ चुके होते।
सेवा-भाव और परिश्रम के साथ संगीत सत्ता के समन्वय ने एक ऐसा प्रभाव उत्पन्न किया कि कुछ ही समय में न केवल पिट्सवर्ग वरन् अमरीका के दूसरे शहरों में भी इस संस्था की चर्चा होने लगी। एक लड़का जिसके हाथ पाँव लकवे से मारे गये थे। स्वस्थ होने की कोई आशा नहीं थी किन्तु उसे लारेन्स हाय का शास्त्रीय संगीत सुनने का सौभाग्य मिला। उसके फलस्वरूप उसका रोग अच्छा हो गया अब यह युवक कम्पनी में टाइपिस्ट का काम करता है।
अस्पताल में एक ऐसी वृद्ध महिला प्रविष्ट की गई जिसका मस्तिष्क लगभग शून्य हो गया था। वह न तो बोल सकती थी और न ही चल फिर सकती थी। भीतर का कष्ट आँसुओं से ही दिखाई देता था। डॉक्टर अनुभव करते थे कि रोगों की प्रक्रिया शारीरिक ही नहीं मानसिक भी है, मानसिक ही नहीं वह आत्मिक भी है क्योंकि बाह्य परिस्थितियाँ ही नहीं अपने स्वभाव और संस्कार भी कई बार ऐसे कर्म करने को विवश कर देते हैं जो हमारे शरीर को रोगान्मुखी कर देते हैं। इतना सोचने पर भी चिकित्सा का कोई विकल्प उनसे पास नहीं था।
डॉ. हाय ने कहा- तब जबकि मनुष्य का रोग का और सामान्य असाध्य हो गया हो उसकी चेतना के अन्तिम स्रोत तक को संगीत की अदृश्य स्वर लहरियों से प्रभावित और ठीक किया जा सकता है। फलस्वरूप यह मामला भी उन्हें सौंपा गया। श्री हाय ने कुछ पुराने लोकप्रिय गीतों के टेप उस महिला को सुनाये। थोड़े ही समय में वह स्त्री न केवल गुनगुनाने और बोलने लगी वरन् जब भी ‘टेप’ बजाये जाते उसके पाँव भी नाचने की मुद्रा में गति देने लगते।
एक और रोगी जो उठकर चल भी नहीं सकता था जिसका सदैव आत्म-हत्या करने का प्रयत्न रहता था वह श्री हाय के संगीत से अच्छा हो गया। नार्वे का एक मरीज भी ऐसी ही निराशाजनक स्थिति में हाय के पास आया। दिक्कत यह थी कि डॉ. हाय के पास नार्वे संगीत के रिकार्ड नहीं थे फलस्वरूप उन्होंने वहाँ के शासनाध्यक्ष को पत्र लिखा। उस पत्र में उन्होंने संगीत की शोध सम्बन्धी उपलब्धियों का भी वर्णन किया उससे नार्वे का राजा बड़ा प्रभावित हुआ उसने अच्छे रिकार्ड हाय को भिजवा दिये। हाय के प्रयोग से यह रोगी भी अच्छा हो गया।
अब हाय के समक्ष एक दूसरा ही जीवन था-संगीत विद्या का प्रसार। हम में से सैकड़ों ऐसे हैं जो अपनी अमूल्य संगीत निधि के लिए बहुत कुछ कर सकते हैं। हम स्वार्थ, संकीर्णता और हिम्मत के अभाव में चाहते हुए भी कुछ कर नहीं पाते, लेकिन डॉ. हाय ने जैसे ही यह निश्चित समझ लिया कि संगीत मनुष्य के लिए एक ईश्वरीय वरदान के समान है उन्होंने ‘अल्कोआ’ कम्पनी के सम्मानास्पद पद से त्याग पत्र दे दिया। इन दिनों वे न्यूयार्क राज्य के एक गाँव ब्रेनार्ड्स विल में रहते हैं। यह स्थान शेटूगे लेक (झील) के पास है। यहाँ उनका सब प्रकार के आधुनिक साधनों से सज्जित आर्केस्ट्रा तथा साउण्ड रिकार्डिंग थियेटर है। एक छोटा सा आश्रम जैसा है वहीं से सब कार्यक्रमों का संचालन, पत्र व्यवहार तथा शोध कार्य सम्पन्न होता है। श्री हाय का विश्वास है कि एक दिन वह भी आयेगा जब मानवीय आदर्शों का नियमन सचमुच संगीत द्वारा होने लगेगा क्योंकि उसमें आश्चर्यजनक आकर्षण और मधुरता है।
इस कार्य में अकेले श्री हाय संलग्न हो सो बात नहीं वहाँ के अधिकाँश लोग शास्त्रीय संगीत की महत्ता अनुभव करने लगे हैं यही कारण है कि सार्वजनिक संस्था के रूप में इस संस्थान को साधनों का कभी अभाव नहीं अखरा। न्यूयार्क फिलहार्मोनिक आर्केस्ट्रा प्रसिद्ध अभिनेता डैनी तथा मार्मन टैबनेंक क्वार, जो कि अमरीका की एक अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त धार्मिक भजनों को गाने और प्रसार करने वाली मंडली है, ने अपने सामान और कार्यक्रमों के टेप हाय को दिये हैं। स्व. राष्ट्रपति कैनेडी ने व्हाइट हाउस में जो भी संगीत कार्यक्रमों के टेप थे उन सबकी नकल कराके डॉ. हाय को भेंट कर दी। प्रसिद्ध संगीतकार जेनिस हरसॉटी ने अपना स्वर बिना मूल्य हाय को मानवीय सेवाओं के लिए दिया। नार्वे के अतिरिक्त लिसबन (पुर्तगाल) के केलूस्ट गुल्बेकियन फाउंडेशन में भी बहुत से पुर्तगाली रिकार्ड दिये हैं। अब तक इस संस्था के पास 700 से भी अधिक टेप तथा 2000 से अधिक ऐसी संस्थाएँ हैं जो इस कार्य में नियमित सहयोग देती हैं। जन सहयोग इससे भिन्न है हम भी चाहें तो अपने देश के प्रभावशाली व्यक्तियों से अथवा जन-सहयोग से कोई इस तरह का आन्दोलन खड़ा करके लोक जीवन को सरस और प्राणवान बना सकते हैं।
डॉ. हाय को तो शोध कार्य भी करना पड़ता है। हमारे शास्त्रीय संगीत में तो सबकुछ पहले से ही उपलब्ध है। टोड़ी, दीपक, मेघ, मल्हार, पचड़ा आदि रोग, भेरी, शंख, वंशी, मृदंग, पटह, कलह, पणाद, कोण, वीणा, सितार, किलकिला, क्रकच स्वेड आदि वाद्ययन्त्र उसके प्रमाण हैं। इनके प्रसार भर की आवश्यकता है यदि कुछ लोग शास्त्रीय संगीत की प्रतिष्ठा के लिए डॉ. हाय की तरह ही सेवा व्रत लेकर जुट जायें तो अपनी महानतम लोक-कला को फिर से नया जीवन दिया जा सकता है। व्यक्तिगत रूप से तो संगीत जैसी ललित कला के प्रति अभिरुचि सभी को रखनी चाहिये।
स्वर-ब्रह्म की उपासना-
देव-दनुजों में भयंकर युद्ध हुआ। इस बार देवताओं की शक्ति क्षीण हो गई थी इसलिये उन्हें असुरों के द्वारा पराजित होना पड़ा। आत्म-रक्षा के लिए देवताओं ने पृथ्वी, समुद्र, आकाश जहाँ भी छिपने का प्रयत्न किया असुरों ने उन्हें ढूंढ़ निकाला। पीड़ित देवगण ब्रह्माजी के पास गये और बोले-भगवान आप ही हमारी सुरक्षा के लिए कुछ उपाय बतायें?
प्रजापति ने कहा- देवगणों। विशाल ब्रह्माण्ड में फैला स्वर चेतना में लीन हो जाओ तभी मुक्ति मिलेगी। देवताओं ने परस्पर विचार किया और भगवती सरस्वती के पास जाकर शरण देने की प्रार्थना की। देवी ने देवताओं को अपनी संगीत चेतना में छिपा लिया। उस दिन से संगीत रूप में देवताओं की उपासना होने लगी। जो लोग श्रद्धापूर्वक संगीत में लीन हो जाते हैं उनकी देवता रक्षा करते हैं।
अमरीका के कैलीफोर्निया राज्य में एक ऐसा भी स्थान है जो एक ओर तो अत्यन्त गर्म और बालू से भरा है दूसरी ओर समुद्र तल से इतना नीचा होने के कारण इस क्षेत्र का सारा धुआँ यहाँ वर्ष भर छाया रहता है।
धुयें में कार्बन डाइऑक्साइड जैसी गैसें होती हैं। हाइड्रोजन सबसे हलकी गैस है इसलिये वह वायुमण्डल के सबसे ऊपरी सतह पर अच्छादित रहती है उसी प्रकार कार्बन डाइऑक्साइड भारी होने के कारण सबसे निचला स्थान ढूंढ़ती है यह स्थान संसार भर में सबसे नीचा होने के कारण यहाँ से कार्बन डाई ऑक्साइड कभी कम नहीं होता। शीत ऋतु जैसा कोहरा वर्ष भर भरा रहता है। कोई भी पक्षी, कोई भी मनुष्य वाहन या जीव-जन्तु वहाँ जाकर आज तक वापस नहीं लौटा। उसकी विषैली धुन्ध से लोग घुट-घुट कर तड़प-तड़प कर मर जाते हैं। यह घाटी करोड़ों मन हड्डियों और नर-कंकालों से पटी हुई है इसीलिये उसे “मृत्यु घाटी” कहते हैं। यहाँ जानकर आज तक कोई सही सलामत नहीं लौटा।
समुद्र तल से इतना निचला होने के कारण यहाँ कार्बन डाइऑक्साइड जमा है उसका अर्थ यह नहीं कि यह विषैली गैस केवल वहीं है। आज कल धरती में धुआँ इतना अधिक बढ़ रहा है कि उसके विषैली प्रभाव से हिमालय जैसे कुछ ही ऊँचे स्थान बच रहे होंगे शेष संसार में तो यह धुआँ मौत-घाटी की तरह ही बढ़ता जा रहा है। उसके कारण हजारों तरह की बीमारियाँ मानसिक रोग और मृत्यु दर बढ़ती जा रही है। विश्व की आबादी 6 अरब हो जाने की तो चिन्ता हुई। उसके लिये तो दुनिया भर के देश अपने यहाँ पृथक परिवार-नियोजन मन्त्रालय खोलकर इस समस्या के समाधान में रत हैं जबकि उससे भी भयंकर है धुयें की यह समस्या उस पर आज तक किसी का भी ध्यान नहीं जा रहा।
जेट विमानों से जो धुआँ निकलता है उसमें ईंधन (फ्यूल) के रूप में पेट्रोल जलता है और कार्बन मोनो ऑक्साइड तथा कार्बन डाइऑक्साइड बनाता है। इसमें कार्बन मोनो ऑक्साइड तो एक प्रकार का विष ही है जबकि कार्बन डाइऑक्साइड भी तो कम विषैली नहीं होती। यह जेट तो धुआँ छोड़ने वाले यन्त्रों का एक छोटा घटक मात्र है। अपने आप चलने वाले ऑटोमोबाइल, मोटरें, कारें, साइकिलें, डीजल इंजन, पम्प, रेलवे इंजन, फैक्ट्रियों के कम्बस्तन इंजन, फैक्ट्रियों की चिमनियाँ सब की सब कार्बन डाइऑक्साइड निकालती हैं। कार्बन डाइऑक्साइड भारी गैस है, हाइड्रोजन का परमाणु-भार एक है। तो उसका 44, उसे पौधे ही पचा सकते हैं, मनुष्य तो उससे मरता ही है सो अब जो स्थिति उत्पन्न हो रही है उससे सब ओर आज नहीं तो कल वही मृत्यु-घाटी के लक्षण उत्पन्न होने वाले हैं।
“ड्राइव मैगज़ीन” के फरवरी 67 के अंक में दिये आँकड़ों के अनुसार एक कार सात साल में इतना धुआँ उगल डालती है कि उसके कार्बन डाइऑक्साइड में ईसाइयों का प्रसिद्ध गिरजाघर सेंटपॉल का गुम्बद दो बार, मोनो ऑक्साइड से तीन कमरों वाले बँगले को नौ बार, नाइट्रोजन से एक डबल टैंकर बस दो बार भरी जा सकती है। इस गैस को छानकर यदि उसका सीसा (लेड) काडा (एक्स्ट्रेक्ट) कर लिया जाये तो वह एक गोताखोर के सीने को ढंकने के लिये पर्याप्त होगा।
यह नाप-तौल तो एक कार से उत्पन्न विषय वर्द्धक धुयें की है जबकि अकेले इंग्लैंड में डेढ़ करोड़ मोटर गाड़ियाँ हैं। 1980 तक इनकी संख्या साढ़े चार करोड़ तक हो जाने का अनुमान है। अमरीका के पास कारों की संख्या इंग्लैंड से बहुत अधिक है कहते हैं 12 सेकेण्ड में अमरीका में एक 1 बच्चा पैदा हो जाता है जबकि यहाँ कारों का उत्पादन इतना अधिक है कि एक कार इस पाँच सेकेंड बाद तैयार हो जाती है। अपने संगठन परिवार के एक सदस्य श्री आनन्द प्रकाश इन दिनों अमरीका के टैक्सास राज्य में ह्यस्टन नगर (यहीं नासा स्पेस रिसर्च सेन्टर है जहाँ से अन्तरिक्ष के लिये केप कैनेडी से अंतरिक्ष यान उड़ते हैं) के एक मस्तिष्क एवं तन्तु ज्ञान प्रयोगशाला में शोध-कार्य कर रहे हैं अमेरिका सम्बन्धी तथ्यों की उनसे सदैव जानकारी मिलती रहती है। 26/12/69 के पत्र में उन्होंने लिखा है यहाँ कारों की संख्या बहुत अधिक है और उनकी संख्या इस गति से बढ़ रही है कि प्रत्येक 20 कारों में एक नई कार अवश्य होगी। यातायात की इस वृद्धि पर चिन्ता करते हुए 26 जनवरी 69 के “संडे स्टैंडर्ड ने लिखा है कि पिछले वर्ष केवल अमरीका के न्यूयार्क शहर में गैर जहाजों के धुयें में 36000000 टन की वृद्धि हुई है।
27 जुलाई 1967 के एक प्रसारण बी.बी.सी. लन्दन में बताया कि लन्दन में यातायात की वृद्धि यहाँ तक हो गई है कि कई बार ट्रैफिक रुक जाने से 17-17 मील की सड़कें जाम हो जाती हैं। यहाँ के सिपाहियों को जो ट्रैफिक पर नियन्त्रण करते हैं अन्य वस्त्रों के साथ मुँह पर एक विशेष प्रकार का नकाब (मास्क) भी पहनना पड़ता है यदि वे ऐसा न करें तो उन सड़कों पर उड़ रहे मोटरों के धुयें 5 घण्टे खड़ा रहना कठिन हो जाये। इन क्षेत्रों में स्थायी निवास करने वालों के स्वास्थ्य, मनोदशा और स्नायविक दुर्बलता के बारे में तो कहा ही क्या जा सकता है? आज सारे इंग्लैण्ड में इतना अधिक धुआँ छा गया है कि वहाँ की प्रतिवर्ग भूमि पर प्रति वर्ष एक किलोग्राम राख जमा हो जाती है।
परीक्षणों से पता चला है कि मोटरों के धुयें का प्रभाव शराब से भी अधिक घातक होता है। इस दुष्प्रभाव को इंग्लैंड के स्वास्थ्य सम्बन्धी आँकड़े देखकर सहज ही समझा जा सकता है। 24 नवम्बर सन् 67 को लन्दन से प्रसारित मानसिक स्वास्थ्य अनुसन्धान निधि की वार्षिक रिपोर्ट में बताया गया है कि इंग्लैंड में मानसिक रोग से पीड़ित व्यक्तियों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। इस समय “मति विभ्रम” नामक मानसिक रोग से पीड़ित व्यक्तियों की संख्या 60 हजार के लगभग है। इनमें से अधिकाँश ड्राइवर और घने धुयें वाले क्षेत्र के ही लोग हैं।
इसी प्रकार 1906 में धुयें से फेफड़े के कैंसर के कुल 100 रोगी लन्दन में थे इसके 60 वर्ष बाद 1966 में उस अनुपात से 12000 हजार ही संख्या होनी चाहिये थी जबकि पाई गई 27 हजार। अब यह वृद्धि और भी अधिक है।
मोटरें, इंजिन मिल और फैक्ट्रियाँ अकेले इंग्लैण्ड और अमरीका में ही नहीं सारी दुनिया में है और बढ़ रही हैं। सन् 1900 की जाँच के अनुसार सारे संसार में पहले ही 260000000000 टन कार्बन गैस छा गई थी अब उसकी मात्रा बीस गुने से भी अधिक है। रेडियो विकिरण का दुष्प्रभाव उससे अतिरिक्त है। धुयें का यह उमड़ता हुआ बादल एक दिन ऐसा भी आ सकता है जब सारी पृथ्वी को ही मृत्यु-घाटी की तरह गर्म और ऐसा बना दे कि यहाँ किसी के भी रहने योग्य वातावरण न रह जाये। बहुत होगा तो पेड़-पौधे खड़े उस धुयें को पी रहे होंगे मनुष्य तो लुप्त जीवों की श्रेणी में पहुँच चुका होगा।
4 दिसम्बर 1952 का वह काला दिन जबकि लन्दन में दक्षिणी हवा बह निकली शीत और आर्द्रता बढ़ने के साथ ही सारे शहर की भट्टियाँ कल-कारखानों गैस चूल्हों का धुआँ वातावरण में घुटन पैदा करने लगा। धुआँ सघन होता गया और 6 दिसम्बर को उसका घनापन इतना बढ़ गया कि लोगों की आँखों से अपने आप आँसू निकलने लगे, दिखाई देना बन्द हो गया। हवाई जहाज और यातायात ठप्प पड़ गये। तापमान पानी के जमाव बिन्दु से नीचे उतर गया। पुलिस वालों को गैस मास्क लगाने पड़े। सूर्य धुँधली लालटेन सा दिखाई देने लगा। अस्पताल भरने लगे और साँस लेना इस तरह कठिन हो गया कि 10 दिसम्बर तक 4 हजार आदमी घुट-घुट कर मर गये। अन्य 8 हजार व्यक्ति भी दो महीनों के भीतर रोगग्रस्त होकर इस धुयें वाली सभ्यता को गाली देते हुये मौत के घाट उतर गये फिर भी जो बच गए उन्होंने इस यान्त्रिक सभ्यता को रोकने की हिम्मत नहीं की।
भगवान ने मनुष्य को अगणित शक्तियों का भण्डागार बनाकर इस धरती पर इसलिए भेजा है कि वह उन क्षमताओं का उपयोग करके अपने लिए सुख-शान्ति, समृद्धि और प्रगति के साधन उपलब्ध करे और दूसरों के लिए मार्गदर्शन एवं सहयोग के सरंजाम जुटाये। मानव जीवन की सफलता इन शक्तियों को पहचानने उन्हें विकसित एवं उपयुक्त दिशा में प्रयोग कर सकने पर निर्भर है।
जो अपनी इन शक्तियों को जानते नहीं और अभिवर्धन एवं प्रयोग की व्यवस्था नहीं बनाते थे इस संसार में दीन दुःखी, दरिद्र, असहाय और उपेक्षित बने हुए अभाव एवं तिरस्कार का दण्ड पाते रहते हैं इस आत्म विस्मृति की दुःखदायी प्रतिक्रिया का नाम नरक है। अपने आपे को भूल कर-अपनी क्षमताओं की उपेक्षा कर -अपने साहस को त्यागकर हम स्वयं अपने लिए नरक का सृजन करते हैं। मनुष्य अभावग्रस्त और दीन दुःखी जीवन यापन करने के लिए पैदा नहीं किया गया। अभाव और क्लेश अपने आपे को ठीक तरह समझने और उसका समुचित प्रयोग न कर सकने का परिणाम मात्र है। अपनी उपेक्षा करना एक बहुत भारी अपराध है। नियति इसे सहन नहीं कर सकती, इस प्रकार के अपराधी दुर्भाग्य के कुचक्र में पिसते हुए निरन्तर काँपते देखे जाते हैं।
आध्यात्म की प्रथम शिक्षा- अपनी महत्ता को समझना अपनी शक्तियों को ढूंढ़ निकालना और उनके सदुपयोग में जुट जाना है। इस साधना में प्रवृत्त व्यक्तियों के ऊपर ऋद्धि-सिद्धि छाया किये खड़ी रहती और उस पर चंवर डुलाती देखी गई है।
उच्च स्तर के लोग अपनी क्षमताओं को समझते और विकसित तो करते ही हैं साथ ही इतना साहस और करते हैं कि अपनी विभूतियों के उपयोग का क्षेत्र लोभ-मोह एवं वासना तृष्णा तक सीमित न रख कर उसका प्रयोग क्षेत्र उत्कृष्टता एवं आदर्शवादिता के लिए व्यापक बना देते हैं। ऐसे ही व्यक्ति आत्म-कल्याण का शाश्वत शान्ति का और जीवन-लक्ष्य की पूर्ति का प्रयोजन पूरा करते हैं। इन्हें इतिहास महामानव के रूप में स्मरण रखता है।
सामान्य सफलता से भी यह मूल्य कीमती है कि उनके लिये प्रबल पुरुषार्थ किया जाय। कृषि, व्यवसाय, शिल्प अध्ययन, नौकरी, कला, कौशल कोई भी दिशा क्यों न हो प्रगति के लिए कठोर श्रम एवं तन्मयतापूर्ण अध्यवसाय हर हालत में चाहिए। कोई विद्वान्, कलाकार, धनी, नेता एवं शीर्षस्थ व्यक्ति ऐसा न मिलेगा जिसे पुरुषार्थ की कसौटी पर कसकर खरा सिद्ध न होना पड़ा हो।
साहस के देवता की प्रथम साधना शारीरिक श्रम से प्रसन्नता अनुभव करने के साथ आरंभ करनी होती है। आलस्य हमारा सबसे बड़ा शत्रु है। दरिद्रता और अस्वस्थता उसी के अभिशाप हैं। शरीर को आराम तलब बना लेना, बैठे ठाले रहने में सन्तोष करना, मेहनत से जी चुराना, समय रहने के लिए मटरगश्ती करना, तथाकथित यार-दोस्तों में गप-शप लड़ाते रहना, ऐसे दुर्गुण हैं जो जहाँ भी रहेंगे वहाँ दरिद्रता आकर रहेगी। पूर्व उपार्जित पूँजी धीरे-धीरे समाप्त हो जायगी। ठोकर पाकर साथी और कर्मचारी अनुचित लाभ उठाने को उत्सुक होंगे और जो मुट्ठी में हैं उसको सुरक्षित रख सकना भी सम्भव न रहेगा। यह विचार सही नहीं है जो अमीर होते हैं वे मौज करते हैं जो गरीब हैं उन्हीं को श्रम करना पड़ता है।’ सचाई यह है कि जो श्रमशील हैं वे ही अमीर बनते हैं और जो आरामतलबी के शिकार हैं वे क्रमशः गरीबी के गत में चले जाते हैं।
प्रगति किसी भी दिशा में करनी हो, सफलता किसी भी क्षेत्र में पानी हो उसके लिए कठोर श्रम से ही काम चलेगा। चालाकी और बेईमानी के सहारे कई व्यक्ति बिना श्रम के भी सफलतायें पाते देखे जाते हैं पर यह पूरी तरह ध्यान रखना चाहिए कि उन उपलब्धियों की जड़ें खोखली होती हैं। उनके विदा होते इतनी भी देर नहीं लगती जितनी बादल की छाँह को। टिकाऊपन केवल परिश्रम के उपार्जन में है। धन ही नहीं स्वास्थ्य भी श्रम पर ही टिका हुआ है। यह गाँठ बाँध रखनी चाहिए कि निरोग एवं परिपुष्ट वे रहेंगे जिनका शरीर कठोर श्रम में निरत रहेगा, जिन्होंने हाथ पैर चलाने में आना-कानी कि उन्हें अस्वस्थता की विविध विधि पीड़ायें सहने के लिए विवश होना पड़ेगा। शरीर और धन उनका पुष्ट रहेगा जो समय को श्रमशीलता के साथ जोड़े रहेंगे। गहरी नींद और कड़ी भूख का आनन्द उन्हें मिलेगा जो मेहनत मशक्कत से अपने आपको थकाकर दूर करने में उत्साह एवं आनन्द अनुभव करते होंगे। हमारा साहसिक प्रथम चरण यही हो सकता है कि आलस्य को मार भगायें। एक क्षण भी बेकार बर्बाद न करें और निरन्तर क्रमबद्ध कार्य में व्यस्त रहने की आदत डालें।
साहस के देवता की साधना का दूसरा चरण मन की अस्त-व्यस्तता दूर करना है। देखा गया है कि कितने लोगों का मन बड़ा चंचल रहता है। अनर्गल और अनावश्यक विचार मस्तिष्क में घुमड़ते रहते हैं। जिन बातों का अपने से सीधा सम्बन्ध नहीं उन निरर्थक और अनर्गल बातों को सोचते रहते हैं और चिन्तन की एक बहुत बड़ी शक्ति का महत्वपूर्ण अंश यों ही निरर्थक खर्च हो जाता है। अपने स्वभाव में जिन अनावश्यक आदतों की घुसपैठ है उन्हें हटाने के लिए क्या किया जाए? जो सद्गुण एवं सत्प्रवृत्तियाँ अपने में नहीं हैं उनका अभ्यास अभिवर्धन कैसे किया जाय? इन प्रश्नों पर कभी सोचने का प्रयत्न नहीं किया जाता। अपना व्यक्तिगत जीवन क्रम कितना अस्त-व्यस्त है और पारिवारिक ढाँचे को सुधारने बदलने के लिए क्या किया जाना चाहिए? जिन कारणों ने अपने प्रगति पथ को अवरुद्ध कर रखा है उन्हें कैसे व्यवस्थित किया जाय? यदि इन प्रश्नों पर हम अपनी विचारशक्ति को लगायें। जीवन जीने की कला, समस्याओं के समाधान तथा उत्कर्ष की दिशा में होने वाले प्रयोगों एवं अनुभवों को पढ़ें, सुनें, समझें उन पर चिन्तन-मनन करें तो हमारा मस्तिष्क हमारे लिए कल्प वृक्ष का काम कर सकता है। पर उसका अधिकाँश भाग तो अनर्गल चिन्तन में ही नष्ट हो जाता है। तृष्णा, वासना, लोभ-मोह, शौक-मौज, द्वेष-दुर्गुणों के द्वारा उत्पन्न की हुई इतनी ज्यादा शक्तियाँ सामने होती हैं कि उनका हल ढूंढ़ना ही मस्तिष्क के विचार के लिए कठिन पड़ता है। ऐसी दशा में बौद्धिक चेतना की ज्ञानवृद्धि एवं सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्द्धन में कैसे लगाया जाय? इसी कुचक्र में पड़े हुए हम अपनी मानसिक क्षमताओं को नष्ट-भ्रष्ट करते रहते हैं और खाली हाथ इस संसार से उठ जाते हैं। यदि इस कुचक्र को तोड़ने की मनस्विता का परिचय दिया जा सके तो समझना चाहिए कि हमने साहस के देवता की पूजा का दूसरा चरण पूरा कर लिया शरीर और मन को व्यवस्थित और सत्प्रवृत्तियों का अनुगामी बनाने के लिये जो अपने आप में संघर्ष करना पड़ता है वही गीता में वर्णित महाभारत है। इसमें विजय प्राप्त कर लेना एक ऐसा पुरुषार्थ है जिसके फलस्वरूप व्यक्ति की महत्ता और उपयोगिता में आशाजनक अभिवृद्धि होती है और वह साधारण परिस्थितियों में रहते हुए भी अपने आपको बहुत समुन्नत एवं सन्तुष्ट अनुभव करने लगता है।
यस्मिन् जीवति जीवन्ति बहवः सतु जीवति।
ककोऽपि किन्न कुरुते चंच्वास्व दरपूरणम्॥
जिसके जीने के कारण अन्य बहुत से प्राणी जीवन पाते हैं वही मनुष्य जीवित माना जाता है। अन्यथा कौवा भी अपनी चोंच से ही अपना पेट भर लेता है। जो अपने लिये जीता है वह तो निष्फल ही है।
साहस के देवता की पूजा का अन्तिम एवं उत्कृष्ट चरण है अपने संकीर्ण स्वार्थों की परिधि से बाहर निकलकर परमार्थ के पुण्य प्रयोजनों में अपनी विचारणा एवं उपलब्धियों को नियोजित कर सकना, अपनी तुच्छता एवं संकीर्णता को रौंदता हुआ विश्व मानव की सेवा साधना की ओर जो जितने कदम बढ़ा सका, समझना चाहिए कि उसने उतने ही बड़े शौर्य का परिचय दे दिया। शारीरिक और मानसिक वीरतायें कई लोग बड़ी आसानी से दिखा सकते हैं पर आध्यात्मिक वीरता जिसका अर्थ है- स्वार्थपरता की संकीर्ण परिधि से बाहर निकल कर परमार्थ के लिए, लोक मंगल के लिए आवश्यक त्याग बलिदान का परिचय देना- निस्सन्देह बहुत ही कठिन है। उसे केवल उदात्त और वसुदेव कुटुम्बकम् की प्रवृत्ति वाले लोग ही कार्यान्वित कर सकते हैं। आदर्शवाद की लम्बी चौड़ी बातें बखानना किसी के लिए भी सरल है पर जो उसे अपने जीवन क्रम में उतार सके सच्चाई और हिम्मत का धनी उसी को कहा जायगा। ऐसे व्यक्ति कम ही होते हैं। पर जो होते हैं वे अपने समय की प्रकाशवान विभूति माने जाते हैं।
व्यक्ति वस्तुतः तुच्छ एवं महान है उसकी परीक्षा एक ही कसौटी पर होती है कि उसने अपनी प्रतिभा का लाभ अपने या अपने स्त्री बच्चों के लिए सुरक्षित रखा अथवा ईश्वर प्रदत्त इन विभूतियों को ईश्वरीय प्रयोजन के लिए लोक मंगल के लिए-लगाने का दुस्साहस कर डाला। दुस्साहस शब्द का प्रयोग इसलिए किया जा रहा है कि इन दिनों लोगों की मनोदृष्टि बेतरह स्वार्थपरता में जकड़ी हुई है। हर कोई केवल अपनी संकीर्ण स्वार्थपरता की पूर्ति में ही संलग्न है। धन, रूप, यश, भोग और पद से अधिक और किसी को कुछ नहीं चाहिए। पूजा पाठ की आड़ में भी इन भौतिक प्रयोजनों की पूर्ति ही छिपी रहती है। राम, रहीम का पल्ला भी इसीलिये पकड़ा जाता है कि साँसारिक सुख साधनों का वह लाभ मिल जाय जो अपने पुरुषार्थ से प्राप्त नहीं किया जा सका। ऐसे जमाने में जिसमें तृष्णा और वासना की पूर्ति से आगे की बात किसी को सुहाती ही नहीं इस प्रकार का साहस दिखा सकना जिसमें अपने लिए असुविधा और दूसरों के लिए सुविधा उत्पन्न होती हो निस्संदेह बहुत बड़ी हिम्मत का काम है। ऐसे साहस का उच्चारण नहीं प्रयोग जो कर सके उन्हें धारा का प्रवाह चीरते हुए उल्टी दिशा को चल सकने वाले राजा की तरह ही प्रबल पुरुषार्थी माना जायगा। प्राचीन काल में ऐसे नर-रत्न घर घर में पाये जाते थे जो तुच्छ स्वार्थों को कुचलकर आदर्शवादिता के लिए अपना जीवनक्रम सजायें। पर आज तो वह इतिहास पुराणों की चर्चा रह गई है। एक दूसरे को बहकाने के लिए इस तरह की लम्बी-चौड़ी कथा चर्चा परस्पर करते तो देखे-सुने जाते हैं पर जो व्यवहार में भी उन सिद्धान्तों को ला सके दीख नहीं पड़ते। स्वार्थपरता और संकीर्णता की कीचड़ में जहाँ कीड़े ही कीड़े कुलबुला रहे हैं वहाँ कमल पुष्पों का खिलना एक अचरज ही कहा जावेगा। ऐसा अचरज केवल साहसी और दुस्साहसी ही प्रस्तुत कर सकते हैं।
आज ऐसे ही शूरवीरों की जरूरत है जो पीड़ित मानवता का परित्राण करने के लिए अपनी सुख-सुविधाओं का उत्सर्ग कर सकें। पेट भरने के लिए रोटी और तन ढकने के लिए कपड़ा पाकर जो सन्तुष्ट हो सकें और जिन्हें संचय संग्रह की बड़प्पन और अमीरी की लालसा न हो। जो शरीर को नहीं आत्मा को अपना स्वरूप माने और आत्मा की शान्ति के लिए विश्व मानव की सेवा साधना में अपने को समर्पित कर दें। उन्हें सच्चे अर्थों में सन्त तपस्वी और साहसी कहा जायगा।
===========================================================================
हृदय परिवर्तन इस तरह-
गाँधी जी का सत्याग्रह आन्दोलन चल रहा था। ब्रिटिश सरकार भी गाँधी जी के नये-नये आन्दोलनों से तंग आ गई थी। एक अंग्रेज अधिकारी ने तो क्रोध में यहाँ तक कह दिया ‘यदि मुझे गाँधी अभी कहीं मिल जाय तो मैं उसे गोली से उड़ा दूँ।’
बात छिपने वाली न थी, गाँधी जी को भी सुनने को मिल गई। वह दूसरे दिन सुबह ही उस अंग्रेज के बँगले पर अकेले ही पहुँच गये। उस समय वह अँग्रेज सो रहा था, जगने पर गाँधीजी की भेंट हुई उन्होंने कहा- ‘मैं गाँधी हूँ। आपने मुझे मारने की प्रतिज्ञा की है। आपकी प्रतिज्ञा आसानी से पूर्ण हो सके अतः मैं यहाँ तक अकेला ही चला आया हूँ अब आपको अपना काम करने में सुविधा होगी।’ इतना सुनकर अँग्रेज पानी-पानी हो गया। मारने की कौन कहे उसके मुख से कोई अपशब्द तक न निकला। उसका हृदय उसी समय बदल गया था और बाद को तो वह गाँधी जी का परम भक्त बन गया।
===========================================================================
“कुबेर हो या रंक जब तक परिश्रम के कमाये हुये धन का एक अंश लोकहित में समर्पित नहीं करता तब तक यह अधर्म का खाता है।”
इतने से अक्षर महर्षि अनमीषि के लिये शास्त्र हो गये। उन्होंने अपनी धर्मपत्नी सहित प्रतिज्ञा की जब तक वे किसी अपने से भी दीन-दुखी को भोजन नहीं करा दिया करेंगे तब तक स्वयं भी ग्रहण नहीं किया करेंगे भले ही उन्हें वह दिन निराहार ही क्यों न बिताना पड़े।
उन दिनों आज की तरह की स्थिति नहीं थी। तब प्रायः हर व्यक्ति धार्मिक उदार वृत्ति का हुआ करता था, अधिकाँश लोग आत्म-कल्याण और लोक-सेवा की साधनाओं में लगे रहते थे इसलिए उन्हें उदर पोषण के लिए थोड़े धान्य की ही समस्या रहती थी इसीलिए अन्नदान और किसी को भोजन करा देना उन दिनों सबसे बड़ा पुण्य माना जाता था। आज की स्थिति उल्टी है इसलिए परम्परा को भी उलट देना चाहिये। अब अधिकाँशतः सारे संसार की चिन्ता कैसे भी कमाई की है। आत्म-कल्याण या लोक सेवा की बात तो कभी किसी के मस्तिष्क में ही नहीं आती इसलिये पुरुषार्थी का कर्तव्य है कि वह किसी को अन्न या खाना न खिलावें पर सद्प्रवृत्ति का कहीं अंकुर उगता दिखाई दे तो अपने साधनों का अंजलि जल डालकर उसके पनपने में सहायक अवश्य हो।
महर्षि, अनमीषि, को यह संकल्प निबाहते हुये वर्षों बीत गये कभी ऐसा न हुआ जब साधना में अवरोध आया हो। किन्तु आज कोई भी तप परीक्षा के बिना जरा सिद्ध हो गया हो ऐसा कभी हुआ नहीं। एक दिन अनमीषि के जीवन में भी ऐसा आया कि उस दिन कोई भी सेवा का अधिकारी द्वार तक आना तो क्या किसी की छाया भी नहीं झाँकी।
अनमीषि और उनकी धर्मशील धर्मपत्नी दोनों बड़े दुःखी हुये। प्रश्न एक दिन भूखे रहने का नहीं था व्रत के अंकित हो जाने की कल्पना से ही वे अत्यन्त दुःखी हो रहे थे।
तभी उन्होंने देखा वृक्ष के नीचे एक कुष्ठ रोग से पीड़ित वृद्ध खड़ा काँप रहा है। शरीर में घाव हो जाने के कारण वह कराह रहा था वृद्ध कोई अन्त्यज दिखाई देना था।
अनमीषि आगे बढ़कर वहाँ पहुँचे और बोले-अतिथि देव। बड़ी कृपा हुई आपकी चलिये हमारी कुटी को पवित्र कीजिये। भोजन तैयार है आप भोजन ग्रहण कर कृतार्थ करें।
वृद्ध ने कराहते हुए कहा- आर्य श्रेष्ठ! भगवान आपका मंगल करें। किन्तु मैं आपकी इस महान उदारता का अधिकारी नहीं हूँ मैं तो जाति का चाण्डाल हूँ। सम्भव हो तो घर में कुछ रोटियाँ बची हों तो यहाँ फेंक जायें उन्हें उठाकर अपना पेट भर लूँगा।
अपनी आत्मा की महत्ता से बड़ी कोई महत्ता नहीं है। अपनी आत्मा के भीतर जो सार्वलौकिकता है उससे परे कोई सार्वलौकिकता नहीं है।
-इनैस्टहाकिंग
वृद्ध की यह दशा देखकर अनमीषि की करुणा उमड़ उठी आँखों से अश्रु धारा प्रवाहित करते हुये अनमीषि बोले ऐसा न कहे तात। हम जाति के पुजारी नहीं जीवमात्र में व्याप्त आत्मा के उपासक हैं। आप जो भी हों हमारे लिये तो वंदनीय आत्मा हैं आप में यह जो कुछ चेतन है वही तो परमात्मा है उसे छोड़कर हम अन्न ग्रहण करने का पाप कैसे कर सकते हैं।
यह कहकर उन्होंने उस श्वपच के हाथ पकड़े। उसे सादर कुटी में लाये और स्नान कराकर नूतन वस्त्र पहनायें, अतिथि को भोजन कराने के बाद ही उन्होंने अन्न ग्रहण किया।
उस रात जब अनमीषि सोये तो भगवान अग्निदेव प्रकट हुये और बोले-दान रुचि। तू ही ईश्वर का भक्त है जो ब्राह्मण और चाण्डाल, हाथी और कुत्ते में कोई भेद नहीं करता वहीं सच्चा ईश्वर भक्त है।
प्रातः काल होने को था। भगवान सूर्य सात अश्वों के रथ पर बैठ कर प्राची की ओर से बढ़ते आ रहे थे। तभी एक क्षुद्र जुगनू सामने आया और मूँछों पर ताव देता हुआ बोला- “ऐ सूरज! वहीं रुक जा, नहीं तो तुझे नष्ट करके रख दूँगा।”
सूर्य भगवान को पहले तो हँसी आ गई, फिर वे धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगे। सूर्य की तेजस्विता देखी तो जुगनू को उल्टे पाँव भागते ही बना।
आकाश खिलखिला कर हँस पड़ा। बोला- “सच है, प्रलाप करना मूर्खों का ही काम है, तेजस्वी व्यक्ति तो निर्भय आगे बढ़ा करते हैं।”
अपनों से अपनी बात-
व्यक्ति और समाज का भावनात्मक कायाकल्प करने के लिए हमें रचनात्मक और संघर्षात्मक मोर्चे खोलने पड़ेंगे। रचनात्मक कार्यों में शिक्षा और कला दो क्षेत्र ऐसे हैं जिन्हें विनाश की दिशा में मोड़कर विकास के लिए प्रयुक्त किया जाता है। हमें एक समान शिक्षा संगठन खड़ा करना है। जिसमें नौकरी दिलाने वाले प्रमाण पत्र ही न मिल सकेंगे पर इतनी प्रतिभा जरूर उत्पन्न कर दी जायगी जो दूसरे अनेकों को नौकर रख सकें। जीवन जीने की कला और समाज के समग्र पुनरुत्थान की प्रक्रिया इस प्रशिक्षण की आधारशिला होगी। बिना आवश्यक भार ढोने हर शिक्षार्थी अपने काम आने वाली भौतिक जानकारियाँ प्राप्त कर ले और कृषि, पशु-पालन, शिल्प आदि के माध्यम से अपनी आजीविका स्वयं कमा ले इतना शिक्षण अनिवार्य रूप से दिया जायगा। साथ ही यह भी ध्यान रखा जायेगा कि समय उतना ही लिया जाय जितना नितान्त आवश्यक है। व्यर्थ के बड़े-बड़े पौधे काटकर विभाग की उपयोगी शक्ति को नष्ट होने से बचाया जाय और न्यूनतम समय से अधिक से अधिक सिखा देने का प्रयत्न किया जायगा। आरम्भिक बाल कक्षाओं से लेकर-वयोवृद्धों तक के-श्रमिक मजूरों से लेकर वयस्क महिलाओं तक के लिए उनकी सुविधा के समय रात्रि पाठशालायें, प्रौढ़ पाठशालायें, बाल मन्दिर, स्वाध्याय मंडल, क्लब आदि के गठन की एक सुव्यवस्थित योजना हमारे दिमाग में है। इन दिनों उसकी झाँकी भर करा रहे हैं, समाज भर बता रहे हैं। क्योंकि इस विदाई वर्ष और कुछ करने के लिये नहीं कहेंगे अन्यथा लोगों का ध्यान बटेगा और संगठन की जड़ मजबूत बनाने की बात से उचटकर ‘जड़ सींचना भूले और पत्ते सींचे’ वाली कहावत चरितार्थ करने लगेंगे।
अगले वर्ष एक ऐसे विश्व विद्यालय की स्थापना करेंगे जो गैर सरकारी-जन स्तर का होते हुए भी उस अभाव की पूर्ति करेगा जो सरकार नहीं कर सके। सरकारी शिक्षा पद्धति बदली जाय यह गाते फिरने का अरण्य रोदन निरर्थक है। वे अपना काम-अपनी अक्ल से अपने ढंग से करेंगे। हम जन स्तर पर एक विशाल शिक्षा योजना खड़ी करेंगे और जन-सहयोग के आधार पर उसे इतनी ऊँची उठा देंगे कि सत्ता को उसका अनुकरण करना उचित एवं आवश्यक अनुभव होने लगे। यह शिक्षा नया व्यक्ति, नया समाज, नया युग विनिर्मित करने में अति महत्वपूर्ण भूमिका का सम्पादन करेगी।
भौतिक मन पर सबसे अधिक प्रभाव इन दो आधारों से ही पड़ता है। शिक्षा का क्षेत्र केवल लेखन, वाचन, हिसाब, ज्यामिति, भूगोल, इतिहास आदि सामान्य जानकारियों तक ही सीमित नहीं है वरन् मानवीय कर्तव्यों के प्रति निष्ठा एवं सामाजिक उत्तरदायित्वों को वहन करने की जिम्मेदारी भी उसी के साथ संलग्न विद्या भी जुड़ी हुई है। शिक्षा और विद्या मिलकर ही बौद्धिक समर्थता प्रदान करने का माध्यम बनती हैं। अकेली शिक्षा एक कला-कौशल मात्र है। प्रशिक्षण का कम ठीक हो तो 10 वर्ष में बड़ा राष्ट्र बनकर खड़ा हो जाता है। आज जो बच्चे दस पन्द्रह वर्ष के हैं उन्हें ठीक तरह प्रशिक्षण मिल सके तो अगले दस वर्ष में जब वे 25-25 वर्ष की आयु के होंगे। समर्थ बनकर हर क्षेत्र को प्रभावित करेंगे और उनके स्तर का राष्ट्र बनकर खड़ा हो जायगा, सभी जानते हैं कि पिछले दिनों जर्मनी, चीन, रूस आदि ने अपने देश को अभीष्ट स्तर का बनाने के लिए सबसे पहले शिक्षा पद्धति को हाथ में लिया था और विद्यालयों की टकसाल में बहुत सिक्के ढलते चले गये थे। प्राचीन भारत की महानता और गौरव गरिमा के उद्गम अपने गुरुकुल ही थे। आगे कभी किसी राष्ट्र को किसी विशेष दिशा में ढालना हो तो उसे अपनी शिक्षा पद्धति का निर्माण एक दूरगामी एवं व्यवस्थित दृष्टिकोण लेकर ही करना होगा।
शिक्षा को यहाँ दो भागों में बाँट सकते हैं। एक धर्मतत्व प्रधान, दूसरी साक्षरता प्रधान। धर्मतत्व प्रधान में उन प्रवचन सम्मेलन, कथा, गोष्ठी आदि की गणना होगी जो किसी धार्मिक आयोजन के साथ जुड़े तो हों पर मूल प्रयोजन जन-मानस की विकृतियाँ का निराकरण और विवेकी दृष्टिकोण का सम्वर्धन हो। साक्षरता प्रधान में उन स्कूल, कालेज, रात्रि पाठशाला, प्रौढ़ पाठशाला, शिल्प, कृषि उद्योग आदि की गणना होगी। जिसमें व्यक्ति निर्माण की तथा स्वस्थ समाज की संगठना कर सकने वाले तत्व पर्याप्त मात्रा में घुले हों आज धार्मिक कथा प्रवचन तो होते हैं पर उनका निष्कर्ष निकलने पर निरर्थकता, अलंकारिता, प्रतिगामिता, अवाँछनीयता एवं भ्रान्ति उत्पन्न करने वाले प्रशिक्षण की ही भरमार दीखती है। विवेकशीलता और उपयोगिता रहित धर्म शिक्षण शक्ति का अपव्यय ही नहीं हानिकारक भी है। स्कूली शिक्षा में गणित, भूगोल, ज्यामिति जैसी सामान्य जानकारियाँ भर हों तो उसे भी अपूर्ण ही कहा जायगा व्यक्ति के कर्तव्य और स्वस्थ समाज के आधार गले उतरने वाले तत्व जिस शिक्षा में मिले न हों उसे पेट पालने में काम आने वाला एक उद्योग भर कहा जा सकता है।
प्रतिगामिता को गाली देने अवाँछनीयता को कोसने से अमीर लोगों का क्षणिक आवेश भर शान्त हो सकता है पर उनसे कुछ प्रयोजन सिद्ध नहीं होता आवश्यकता इस बात की है कि बुरी वस्तु की तुलना में दूसरी अच्छी चीज सामने रखी जाय ताकि सार्वजनिक विवेक एक को छोड़ने तथा दूसरी को ग्रहण करने का निर्माण कर सके। यदि सामने एक ही वस्तु होगी तो जैसी भी कुछ है उसी से काम चलाया जाता रहेगा। धर्म मंच का प्रगतिशील स्वरूप यदि जन साधारण के सामने प्रस्तुत किया जा सके तो निस्संदेह उसे सराहा और स्वीकारा जायगा। अपव्यय का सदुपयोग की दिशा में मोड़ने के लिए प्रगतिशील कार्यक्रम के साथ प्रतिभाशाली और उत्कृष्टता सम्पन्न व्यक्तित्वों को आगे आकर कमान संभालनी चाहिये। पिछले बीस वर्ष से हम यही प्रयत्न कर रहे हैं रामायण, गीता, भगवत् आदि की कक्षाओं के सहारे प्रगतिशील प्रशिक्षण की भी काफी गुंजाइश है। धर्म सम्मेलनों द्वारा लोक रुचि को परिष्कृत करने की पूरी सम्भावना है। पर्व त्यौहार यदि सामूहिक रूप से मनाये जाने लगें और उनके पीछे दिये हुए रहस्यों को समझाया जा सके तो समाज निर्माण की चेतना उछल भी सकती है। संस्कारों के कर्मकाण्डी व्यक्ति और परिवार की अभिनव रचना का पूरा प्रशिक्षण हो सकता है। जन्म दिन मनाने की परम्परा में आम चिन्तन, आत्म सुधार, आत्म-निर्माण और आत्म-विकास की महती सम्भावना विद्यमान है। विवाह दिन मनाने की परिष्कृत प्रथा चल पड़े तो हमारा दाम्पत्य जीवन व परिवार नई हरियाली से सुशोभित हो सकता है गायत्री महामन्त्र के तत्वज्ञान को समझाकर विवेकशीलता की समस्त धाराएँ प्रवाहित की जा सकती हैं भावनात्मक नव-निर्माण का जैसा सुन्दर तत्वज्ञान इन चौबीस अक्षरों में भरा पड़ा है वैसा अन्यत्र कही नहीं मिलेगा। इन महामन्त्र को उपासना का माध्यम बनाकर विशृंखलित समाज का केन्द्रीयकरण किया जा सकता है आत्म-दल बढ़ाने की दिशा मिल सकती है और विचार क्रान्ति की महान आधुनिक आवश्यकता को प्राचीनतम आधार के सहारे भली-भाँति पूरा किया जा सकता है इसी प्रकार यज्ञीय कर्मकाण्ड से चिर-परिचित, चिर अभ्यस्त भारतीय जनता यज्ञीय जीवन, यज्ञीय परम्पराओं का प्रकाश ग्रहण कर सकती है और व्यक्ति वाद को समूहवाद में- स्वार्थ को परमार्थ में बदलने की व्यापक भूमिका बन सकती है।
धर्म तन्त्र के माध्यम से नव-निर्माण की सम्भावनाओं को साकार करने की सुव्यवस्थित और साँगोपाँग योजना हम बहुत पहले प्रस्तुत कर चुके हैं आवश्यकता उसे क्रियान्वित कर सकने वाले समर्थ व्यक्तित्वों की है। यदि राजनीति जैसी दिलचस्पी प्रबुद्ध वर्ग इस दिशा में लेने लगे तो जो कार्य राजतन्त्र के द्वारा सौ वर्ष में नहीं हो सकता वह पाँच वर्ष में सम्भव हो जायगा। भारत जैसे 80 प्रतिशत अशिक्षित और गहन देहात में फैले हुए देश के लिए जन-जागरण का आधार ‘धर्म तन्त्र’ के अतिरिक्त दूसरा हो ही नहीं सकता। गाँधी जी इस मर्म को समझते थे और उन्होंने स्वतन्त्रता आन्दोलन में इस तत्व का समावेश भी किया और आशाजनक सफलता भी पाई। आज भी ऐसे दूरदर्शी लोगों की जरूरत है जो गाँधी जी की तरह इस देश की वस्तु स्थिति समझने का प्रयत्न करें और नव-निर्माण के लिये धर्म तन्त्र की विपुल क्षमता को प्रयुक्त करने के लिए योगदान दे सकें।
धर्म तन्त्र के माध्यम से अपने हिन्दू समाज में उत्कृष्टता आदर्शवादिता एवं प्रगतिशीलता उत्पन्न करने के लिए एक सर्वांग, सुन्दर योजना हम बहुत दिनों से चला रहे हैं। आवश्यकता इस बात की है कि ऐसी ही योजनायें अन्य देशों के लिए अन्य भाषा-भाषियों के लिए अन्य धर्म सम्प्रदायों के लिए भी बनाई जाय। आधार, उद्देश्य, प्रवाह तो सबका एक हो पर क्षेत्रीय एवं परम्परात्मक स्थिति को ध्यान में रखकर बाह्य कलेवर अलग-अलग ढंग से बना दिये जायँ। अपनी योजना हिन्दू समाज की परम्पराओं के आधार पर चल रही है। अब समय आ गया कि इसे बहुमुखी बनाया जाय। अपने देश में भी अभी जैन, बौद्ध, सिक्ख, द्रविण तथा प्रान्त एवं सम्प्रदायों के हिसाब से बहुत भिन्नता है। इन भिन्नताओं को ध्यान में रखते हुए स्थानीय भाषाओं तथा परम्पराओं का सम्मिश्रण करते हुए अलग-अलग क्रिया-प्रक्रिया बन सकती है और बननी चाहिए। हिन्दू धर्म के बाहर का क्षेत्र भी अछूता नहीं छोड़ा जा सकता। मुसलमान, ईसाई, यहूदी, पारसी, बौद्ध आदि अनेक धर्म एवं संस्कृतियों का संसार में विस्तार है। उनके लिए भी उन्हीं वर्गों के लोग उनकी रुचि एवं परम्परा मिश्रित योजनायें लेकर अग्रसर हो सकते हैं और अपने क्षेत्र तथा वर्ग को प्रभावित कर सकते हैं। अभी वह समय नहीं आया कि एक ही रीति-नीति को सब पर थोपा जा सके। यह प्रयत्न इतिहास में अनेक बार हो चुके हैं और हर बार असफल हुए हैं। एक धर्म या संस्कृति के नीचे सारे विश्व को लाने के लिए एक सर्व-सम्मत धर्म तन्त्र की रचना करनी होगी। वर्तमान तन्त्रों में ऐसे कोई एक अपना प्रभुत्व सार्वभौम बढ़ाना चाहे तो यह सम्भव न होगा। आग्रह दुराग्रह वर्तमान मान्यताओं के साथ इतने जुड़ गये हैं कि कोई किसी की प्रभुता स्वीकार करने को तैयार नहीं। योरोप में ईसाई धर्म हिन्दुस्तान में इस्लाम धर्म फैलाने के लिए प्रचार से लेकर प्रलोभन और आवक तक के तरीके काम में लाये जा चुके हैं। पर वे सदा असफल ही सिद्ध हुए हैं। एक सार्वभौम धर्म की- सार्वभौम संस्कृति की निस्सन्देह अति आवश्यकता है पर उसके लिए आग्रहवाद भूमिका को नरम करने के उपरान्त एक सर्वसम्मत आधार को गढ़ देने का धैर्य रखना होगा। सम्भव है ऐसे तत्व भारतीय धर्म और संस्कृति में ही छिप जायें जो उपरोक्त प्रयोजन की अधिकाँश आवश्यकता पूरी कर दें। पर अभी तो इतना कदम उठाना ही सामयिक होगा कि अपने धर्म और संस्कृतियों के दायरों में उसी वर्ग के लोगों द्वारा उसी परिधि एवं परम्परा को आगे रखकर युग-निर्माण के मूल तत्व ज्ञान को सर्वत्र हृदयंगम कराया जाय। इन दिनों धर्म-तन्त्र के प्रति जो उदासीनता एवं उपेक्षा दिखाई पड़ रही है यदि वह दूर हो सके तो यह अति सरल है कि एक दिशा देने वाली विभिन्न परम्परायुक्त योजनायें बनकर तैयार हो जायें और धर्म तन्त्र का महान प्रयोजन विपन्न वर्ग और क्षेत्रों में समान गति से क्रियान्वित हो सके।
इस सार्वभौम सर्व-सम्प्रदाय सम्मत धर्म मंच के लिए कितनी बड़ी योजना बनानी पड़ेगी, कितनी तैयारी करनी पड़ेगी और उसे कार्यान्वित करने के लिए कितनी-कितनी विशाल सीमा निर्धारित करनी तथा कितने साधन जुटाने पड़ेंगे यह सब असम्भव और आश्चर्यजनक लगता है। किन्तु यह ध्यान रखा जाय जो कुछ अब तक किया जा चुका है और जो आगे किया जाने वाला है वह निस्सन्देह आश्चर्य ही है। अगले दिनों अपना कोई कदम चमत्कार से कम गिना जाने वाला नहीं है। विश्व मानव की उत्कृष्टता की एक मैन धुरी पर केन्द्रित करने के प्रयास और प्रयत्नों को अद्भुत अनुपम एवं चमत्कार से कम कहा नहीं जा सकता।
साक्षरता प्रधान शिक्षा को सुविस्तृत बनाने के लिए एक सुव्यवस्थित योजना हमारे सामने होनी चाहिए। लोगों को कहा जाना चाहिए कि नौकरी के लोभ में नहीं, वरन् व्यक्तित्वों के विकास के लिए शिक्षा प्राप्त की जानी चाहिए। कोई जमाना था जब स्कूल-कालेज की पढ़ाई के बाद आसानी से नौकरी मिल जाती थी। अब शिक्षा का व्यापक प्रसार हो जाने से यह सर्वथा असम्भव हो गया। धीरे-धीरे सभी पढ़ जायेंगे। सभी नौकरी करें तो उन्हें रखेगा कौन? अभी भी शिक्षितों की बेकारी समाज में विद्रोह उत्पन्न कर रही है। आगे तो वह एक संकट ही खड़ा कर देगी। इसीलिए “नौकरी के लिये पढ़ाई” वाली दृष्टि तुरन्त बढ़ती जानी चाहिए और घर-घर जाकर अभिभावक-अभिभावक से, बच्चे-बच्चे से, यह कहना चाहिए कि पढ़ाते या पढ़ते समय यह भली-भाँति समझा दिया जाय कि नौकरी के लिये नहीं, योग्यता के लिये-आवश्यकता के लिये ही शिक्षा प्राप्त की जानी चाहिए। वर्तमान पीढ़ी का यह वहम जितनी जल्दी निकाला जा सके, निकालने का प्रयत्न करना चाहिए कि पढ़ने के बाद नौकरी करेंगे। यह भ्रम निकल जाय तो व्यक्तियों को विकसित कर सकने वाली शिक्षा पद्धति को जड़ जमाने का अवसर मिल सकता है और वह बिना सरकारी सहयोग के भी अपने पाँवों पर आप खड़ी होकर व्यक्तित्वों के निर्माण का महान उद्देश्य आसानी से पूरा कर सकती है।
सरकारी वर्तमान शिक्षा पद्धति बहुत ही उलझी हुई है। उसमें निरर्थक पाठ्यक्रम की भरमार है। औसत व्यक्ति के लिये जितनी जानकारी चाहिए, अनावश्यक अंश बहुत ज्यादा है। फिर वार्षिक परीक्षा लेने का क्रम ऐसा है जिसे जुआ खेलने की बाजी ही कहा जा सकता है। शिक्षार्थी का बहुमूल्य, समय, श्रम और धन इस ऊबड़-खाबड़ जंगल में भटकते ही नष्ट होता रहता है। यदि जीवन में काम आने जितनी बातें ही सीखनी हों तो वर्तमान पाठ्यक्रमों में से तीन चौथाई अंश हटा देना पड़ेगा और नया जो अति आवश्यक है, उतना ही-लगभग तीन चौथाई ही-और जोड़ना पड़ेगा। तभी एक स्वर्ग सुन्दर पाठ्यक्रम की रचना हो सकेगी। जिन्हें किसी विशेष क्षेत्र में प्रवेश करना हो, उनके लिये विशेष शिक्षा की व्यवस्था रहे पर सर्वसाधारण को-जिसे सर्वसाधारण ही रहना है- उसे वह शिक्षा मिलनी चाहिए जो उसके भावी जीवन में बहुत करके काम आती रहे।
इस शिक्षण से व्यक्तिगत जीवन को विकसित एवं परिपुष्ट बनाने वाली, शारीरिक, मानसिक, आर्थिक, पारिवारिक, सामाजिक सभी स्तर समुचित रूप से समाविष्ट रहेंगे। समाज के सामने प्रस्तुत समस्याओं के कारण और निवारण भी समझाए जाने चाहिए और यह बताया जाना चाहिए कि समाजों के उत्थान-पतन किन आधारों पर निर्भर रहते हैं। भूगोल, इतिहास, गणित आदि उतने ही पढ़ाने चाहिए जिनसे काम चलाऊ ज्ञान हो जाय और सामान्य जानकारियों का मोटा सिलसिला दिमाग में ढला रहे। ऐसी शिक्षा ही सर्वांगपूर्ण शिक्षा कही जा सकती है।
आज की स्थिति में उपरोक्त शिक्षा-पद्धति को सरकारी पाठ्यक्रमों के साथ नहीं जोड़ा जा सकता। स्कूली कोर्स और परीक्षा के ढंग ऐसे हैं कि शिक्षार्थी का पूरा दिमाग उसी में उलझ कर रह जाता है। अध्यापक अपनी कार गुजारी रिजल्ट अच्छा रखने में केन्द्रित रखते हैं। इसलिये वे बच्चों को कोर्स से बाहर की चीजें न पढ़ने को दबाते हैं। बच्चों के कमजोर मस्तिष्क और बढ़े-चढ़े पाठ्यक्रमों का वह बोझ ऐसा है जिसका ताल-मेल बिठाने में ‘ट्यूशन’ पढ़ना अनिवार्य हो गया है। स्कूल में और घर पर वही तोता रटन्त करनी पड़ती है, तब कहीं पास होने की नाव किनारे लगती है। यदि साल में अन्य पाठ्यक्रम भी जोड़कर रखे जायें तो पार पड़ने वाली नहीं है।
यह प्रयोग सर्वथा असफल हो चुका है कि सरकारी पाठ्यक्रमों के साथ जीवन-निर्माण की शिक्षा भी जोड़कर चलाई जा सकती है। इस आशा में कितने ही शिक्षण-संस्थान कितनी बड़ी-बड़ी आशायें लेकर चलाये गये। पर वे आदर्शवादी ख्वाब धूलि में मिल गये और ऊँचे आदर्शों के लिये स्थापित विद्यालय मात्र अन्य स्कूलों की लकीर की फकीर पीटने वाले, उसी ढाँचे में ढले हुए- उसी ढर्रे पर चलने वाले बन गये। गुरुकुलों के पाठ्यक्रम जब तक अपने थे, तब तक उनमें जान रही। अब जब सरकारी पाठ्यक्रम सरकारी मदद लेकर, सरकारी नौकरी ढालने के लिए राज्याश्रय स्वीकार कर लिया गया तो उनमें और दूसरे मामूली स्कूलों में कोई अन्तर नहीं रह गया।
हमें यह स्पष्ट मस्तिष्क लेकर चलना चाहिए कि परखे हुए अध्यापकों द्वारा व्यक्ति और समाज का सर्वांगपूर्ण विकास प्रस्तुत कर सकने में समर्थ शिक्षा-व्यवस्था होनी चाहिए और उसे प्राप्त करने वाले के मस्तिष्क में यह तथ्य स्पष्ट रहना चाहिए कि नौकरी के लिये नहीं वरन् प्रतिभा के लिये पढ़ा जा रहा है। स्पष्ट मनः स्थिति में ही 1-समान पाठ्यक्रम का निर्माण 2-परीक्षा विधान 3-अध्यापकों का चयन सम्भव है। हमारी दृष्टि में अनुभवी, चरित्रवान और वयोवृद्ध शिक्षक होना चाहिए। सरकारी दृष्टि में 25 वर्ष से कम उम्र का अनुभवहीन और गधा पच्चीसी की उम्र का उच्छृंखल लड़का ही गुरु पद स्वीकार करने का अधिकारी है। शिक्षक की योग्यता प्रमाणपत्रों के आधार पर सरकार आँकती है पर अपनी कसौटी इसमें सर्वथा भिन्न है। दो विपरीत भिन्नताओं के आपस के जोड़ने से आधा तीतर आधा बटेर बनेगा। इसलिए अच्छा यह है कि जो कुछ बनना हो स्पष्ट दृष्टिकोण से बने। जो नौकरी के लिए पढ़ना चाहें वे सरकारी पढ़ें। जिन्हें जीवन निर्माण की शिक्षा लेनी है वे नौकरी के लिए आवश्यक समझे जाने वाले प्रमाणपत्रों का लोभ छोड़ दें। अपने देश में आज की स्थिति में यह विलगाव और स्पष्टीकरण है। किसी समय काशी विद्या पीठ, गुजरात विद्यापीठ, नेशनल कॉलेज, गुरुकुल काँगड़ी, प्रेम महाविद्यालय की स्थापना भी इसी आधार पर हुई थी। अब भी यदि वे ही परिस्थितियाँ बनी हुई हैं, तो वह विलगाव भी आवश्यक है।
इस आधार पर विनिर्मित एक शिक्षा पद्धति का छोटा-सा नमूना गायत्री तपोभूमि में ‘युग-निर्माण विद्यालय’ के नाम से खड़ा किया गया है। यह अति आरम्भिक और साधन-रहित छोटा-सा प्रयोग है, इसलिए उसका पाठ्यक्रम भी एक वर्ष का ही रखा गया है। फिर भी उसके पीछे एक स्पष्ट दिशा विद्यमान है। इस विद्यालय में जापान के ढंग की बिजली से चलने वाली छोटी-छोटी मशीनों द्वारा संचालित दस्तकारियाँ सिखाई जाती हैं। प्लास्टिक के खिलौने, फाउन्टेन पेन, डाट पेन्सिलें, मोजे, बनियान बुनना, त्वरित कपड़े धोने की मशीनें, चश्मों के लेंस, साबुन बनाना, कितने ही प्रकार के केमिकल, रेडियो-ट्राँजिस्टर बनाना तथा साधारण बिजली की फिटिंग तथा विद्युत यन्त्रों की मरम्मत, प्रेस उद्योग की शिक्षा, रबड़ की मुहरें, तरह-तरह के खिलौने, फोटोग्राफी आदि ऐसे उद्योग सिखाये जाते हैं, उसमें विद्युत शक्ति और कला-कौशल के आधार पर अच्छी जीविका कमाई जा सके। जापान जैसे छोटे देश ने इतनी आर्थिक सम्पन्नता इस विद्युत संचालित कुटीर उद्योग से विकसित की है। यह अपने देश में भी शिक्षितों की बेकारी दूर करने का महत्वपूर्ण माध्यम हो सकता है।
इस औद्योगिक शिक्षण के साथ-साथ व्यक्ति एवं समाज से सम्बन्ध प्रायः सभी समस्याओं के कारण और निवारण का हल बताया जाता है। आज ऐसी ही शिक्षा की आवश्यकता है। साधन-सम्पन्न संस्थायें इस प्रयोग को बड़े पैमाने पर कर सकती हैं। अनुभवी रिटायर्ड वयोवृद्ध वानप्रस्थ लेकर अवैतनिक या निर्वाह मात्र लेकर अपनी बहुमूल्य सेवायें ऐसी संस्थाओं को दे सकते हैं। इस प्रकार इन संस्थाओं का खर्च बहुत थोड़ा रह जायगा, जिसे छात्रों की फीस, उत्पादन अथवा दान आदि में आसानी से चलाया जा सकता है। देश भर में ऐसी शिक्षण संस्थाओं का जाल फैल सकता है और उनके माध्यम से व्यक्ति एवं समाज का नव-निर्माण कर सकने की प्रवृत्ति व्यापक रूप से फैल सकती है।
अपने देश में अधिकाँश व्यक्ति दिन भर आजीविका के लिये कठोर श्रम करते हैं। छोटे बच्चों तक को बाप का हाथ बटाना पड़ता है। ऐसी दशा में देश के 20 प्रतिशत अशिक्षितों को शिक्षित बनाने की शिक्षा प्रौढ़ पाठशालाओं एवं रात्रि पाठशालाओं द्वारा ही हल हो सकती है। भारतीय नारी में असुरक्षा की भावना होती है, उन्हें पढ़ने के लिए प्रोत्साहन भी नहीं मिलता, दिन भर वे काम में भी लगी रहती हैं। ऐसी दशा में उनको फुरसत वाला तीसरा पहर वाला समय ही उपयुक्त रह सकता है। निरक्षरों को साक्षर बनाने और साक्षरों को आगे की योग्यता बढ़ाने के लिए ऐसे शिक्षण प्रयासों की भारी आवश्यकता है। स्वतन्त्र पाठ्यक्रम बन जाने- आवश्यकतानुसार परीक्षा व्यवस्था रहने, शिक्षार्थियों के उपयुक्त समय निर्धारित रहने, सेवानिवृत्त वानप्रस्थों द्वारा सस्ती शिक्षा मिलने के आधार पर एक देशव्यापी ऐसी शिक्षा-व्यवस्था बन सकती है जो न केवल निरक्षरता का उन्मूलन करे वरन् व्यक्तिगत जीवन के आदर्श एवं सामाजिक परम्पराओं को सुव्यवस्थित चलाने की आवश्यकता पूरी करे।
नव-निर्माण के लिए ऐसा प्रशिक्षण सुसंगठित एवं व्यापक बनाया जा सकता है। यह देखने भर में ही कठिन है, वस्तुतः इसका व्यवहार अति सरल है। इस प्रक्रिया के अंतर्गत छोटे बालकों के शिशु-मन्दिरों से लेकर वयोवृद्धों के स्वाध्याय मण्डलों तक- युवकों की व्यायामशालाओं से लेकर महिलाओं के ग्रह-उद्योगों शिक्षण तक- अनेक धाराओं में यह प्रक्रिया बन सकती है और उसका संचालन, कार्यकर्त्ताओं का प्रशिक्षण एक केन्द्रीय सूत्र के अंतर्गत हो सकता है। धर्मतन्त्र के माध्यम से जन-जागृति पैदा करने वाले कार्यकर्त्ताओं का भी प्रशिक्षण केन्द्र बन सकता है। ऐसी रचना निस्सन्देह जन-जीवन का कायाकल्प प्रस्तुत कर सकती है।
इस प्रयोजन को पूर्ण करने वाली एक शिक्षा प्रक्रिया तो इन दिनों भी चल रही है। विज्ञप्तियों की संख्या पिछले दिनों 50 तक छपी है। सन् 70 में शेष 50 और लिखकर उन्हें पूरी 100 कर देंगे। एक विज्ञप्ति रोज पढ़ाने या सुनाने का क्रम चलाकर- 5 छुट्टी काटकर 25 दिन के महीने में- 25 हर महीने पढ़ाई जा सकती हैं और यह कोर्स 4 महीने में पूरा हो सकता है। नव-निर्माण की दिशा देने की दृष्टि से एक सामान्य परिचय की तरह यह पाठ्यक्रम भी अतिमहत्वपूर्ण सिद्ध होगा। अपनी विज्ञप्तियाँ अन्य भाषाओं में भी छपनी आरम्भ हो गई हैं। उनके माध्यम से 14 भाषा-भाषी भारत के कोने-कोने में तथा विश्व में यह विचारधारा पढ़ाई-सुनाई एवं परिचित कराई जा सकेगी।
दूसरा प्रयत्न इन दिनों 25 पैसे वाले निबन्ध-ट्रैक्टों का है। अभी ये 200 हैं। कुछ दिनों में इनकी संख्या 300 हो जायेगी। छुट्टी काटकर 25 दिन का महीना मानें तो 12 महीने में हर रोज एक ट्रैक्ट पढ़ने के हिसाब से यह भी एक सर्वांगपूर्ण प्रशिक्षण सिद्ध होगा।
विज्ञप्तियों का कोर्स दस मिनट प्रतिदिन पढ़ने या सुनने वाले 4 महीने में पूरा कर सकेंगे। इस दूसरे कुछ ऊँचे ट्रैक्टों को पढ़ाने वाले ऊँचे कोर्स के लिए प्रतिदिन एक घंटा समय पढ़ाने या सुनाने के लिए और एक वर्ष का समय इस अवधि के पूरा करने के लिए चाहिए।
इन दोनों कोर्सों की एक परीक्षा विधि भी है। जो उन्हें पूरा कर ले उनके ज्ञान को जाँचने की लिखित परीक्षायें हुआ करें। छोटे विज्ञप्तियों वाले कोर्स की हर चार महीने बाद वर्ष में तीन बार। बड़े कोर्स की वर्ष में एक बार। प्रश्न-पत्र मथुरा से जाया करें और उत्तीर्ण लोगों को अति सुन्दर एवं आकर्षक प्रशंसा-पत्र, प्रमाण-पत्र दिये जाया करें।
इसके अतिरिक्त तीसरा पाठ्यक्रम इन सबमें ऊँचा और विशाल है। बाल कक्षा एवं पहले दर्ज से लेकर दसवें दर्जे तक का एक सा समान पाठ्यक्रम बनाया जायगा जिससे जीवन में काम आने वाली भाषा, गणित, भूगोल, इतिहास, शरीर शास्त्र, चिकित्सा, दीवानी फौजदारी कानून, सेल टैक्स, इनकम टैक्स, यात्रा, रेलवे, बैंक आदि के नियम विश्व की राजनैतिक एवं सामाजिक स्थिति आदि सामान्य जानकारियाँ तो दी ही जायें साथ ही व्यक्तित्व का विकास परिवार की सुव्यवस्था एवं समाज के समग्र विकास के आधार एवं प्रयोग समझाने वाली सामग्री प्रस्तुत की जाय। गृह शिल्प एवं कुटीर-उद्योग का भी इसमें सम्मिश्रण हो। पानी के हैंडपंप, फ्लेश के पखाने, निर्धूम और स्वल्प ईंधन से जलने वाले चूल्हें, गोबर गैस, चीनी मिट्टी के बर्तन, बिस्कुट, डबल रोटी, फलों के रस सुरक्षित रखना, साबुन, घरेलू शाक वाटिका, खिलौना उद्योग जैसे नये शिल्पों का तेजी से विकास होने वाला है। घर की पुताई, किवाड़ों तथा फर्नीचरों को वार्निश, टूटे बर्तनों की मरम्मत तथा सिलाई, रंगाई, चारपाई बुनना आदि दर्जनों गृहशिल्प ऐसे हैं जिनकी घर में आय दिन जरूरत पड़ती रहती है। इसी शिक्षण से सम्बन्धित रहेंगे और यदि सम्भव हुआ तो बिजली से चलने वाले ऐसे दर्जनों स्वल्प लागत के उद्योग सम्मिलित किये जायेंगे जो हर शिक्षित व्यक्ति को सम्मानपूर्ण अच्छी जीविका देकर उसकी बेरोजगारी की समस्या हल कर सकें। जापान जैसे छोटे देश ने अपनी आश्चर्यजनक आर्थिक प्रगति इसी आधार पर की है। हमें भी भारत जैसे निर्धन, अशिक्षित और देहातों में फैले हुए देश की आर्थिक समस्या सुलझाने के लिए कुटीर उद्योगों को ही प्रोत्साहन देना होगा। अपनी शिक्षा-प्रक्रिया में उपरोक्त सभी तत्वों का सम्मिश्रण होगा।
गायत्री तपोभूमि में आगे से जो एक वर्ष का पाठ्यक्रम चला करेगा उसमें छात्रों को उपरोक्त प्रथम कक्षा से दसवें कक्षा तक चलने वाली शिक्षा को उसी अवधि में पूरा करा दिया जायगा और उन्हें इस योग्य बना दिया जायगा कि वे अपने निज के जीवन को तो उस प्रशिक्षण के आधार पर सुविकसित एवं समुन्नत बनाए ही, साथ ही उपरोक्त शिक्षा प्रणाली के लिए सुयोग्य अध्यापक भी सिद्ध हो सकें। ऐसे विद्यालय सर्वत्र चलने चाहिए। चलाये जायेंगे। एक वर्ष तक मथुरा में शिक्षित हुए छात्र चाहें तो स्वयं अपना विद्यालय चला सकते हैं अथवा किन्हीं दूसरों द्वारा चलाये हुए विद्यालय में अध्यापक बन सकते हैं। इस प्रकार वे अपने जीवन का सदुपयोग करते हुए राष्ट्र की महती सेवा भी कर सकेंगे।
उपरोक्त प्रशिक्षण का सर्वांगपूर्ण पाठ्यक्रम इस वर्ष बनाया जा रहा है। अगले वर्ष जुलाई 71 से यह प्रशिक्षण मथुरा में आरम्भ किया जा सकेगा। तब तक उसकी पाठ्यक्रम पुस्तकें छापने, उपयुक्त साधन तथा स्थान आदि की व्यवस्था बनाने की दौड़-धूप भी की जाती रहेगी।
इस समय शिक्षा को एक विश्वविद्यालय के स्तर पर अगले वर्ष से अग्रसर किया जायगा। इसके लिये कितने विशाल साधनों की जरूरत पड़ेगी इसकी कल्पना करने भर से सिर चकराता है। अपने आज के संकल्प साधनों को आजकल के महान प्रयोजनों की तुलना करते हैं तो रंक को राजा बनने जैसा स्वप्न दीखने लगता है। पर हमें मनुष्य के भीतर बैठे भगवान की उदारता पर विश्वास है जो ऐसे महान प्रयोजनों को पूरा करने के लिए भामाशाह जैसे उदार सहयोग को समय-समय पर व्यवस्थित बनाता रहा है। अपनी साधन रहित परिस्थिति को- इस विशाल प्रशिक्षण को समर्थ में बदलने के लिए सम्भवतः वह बूँद-बूँद सहयोग दे सकने की अपने निर्धन परिवार से प्रेरणा उत्पन्न करेगा। इनमें से कोई बड़े कदम उठाने वाले भी निकल सकते हैं जो हमारी चिन्ता और आवश्यकता को सरल बनाने में अपनी गाढ़े पसीने की कमाई तथा श्रम सहयोग प्रस्तुत करने के लिए कुछ साहसपूर्ण कदम उठायें।
इस समय शिक्षा को एक विश्वविद्यालय के स्तर पर अगले वर्ष से अग्रसर किया जायगा। इसके लिये कितने विशाल साधनों की जरूरत पड़ेगी इसकी कल्पना करने भर से सिर चकराता है। अपने आज के संकल्प साधनों को आजकल के महान प्रयोजनों की तुलना करते हैं तो रंक को राजा बनने जैसा स्वप्न दीखने लगता है। पर हमें मनुष्य के भीतर बैठे भगवान की उदारता पर विश्वास है जो ऐसे महान प्रयोजनों को पूरा करने के लिए भामाशाह जैसे उदार सहयोग को समय-समय पर व्यवस्थित बनाता रहा है। अपनी साधन रहित परिस्थिति को- इस विशाल प्रशिक्षण को समर्थ में बदलने के लिए सम्भवतः वह बूँद-बूँद सहयोग दे सकने की अपने निर्धन परिवार से प्रेरणा उत्पन्न करेगा। इनमें से कोई बड़े कदम उठाने वाले भी निकल सकते हैं जो हमारी चिन्ता और आवश्यकता को सरल बनाने में अपनी गाढ़े पसीने की कमाई तथा श्रम सहयोग प्रस्तुत करने के लिए कुछ साहसपूर्ण कदम उठायें।
आपके सम्मुख 5 महत्त्वपूर्ण कार्य
(1) इन दिनों चल रहे 4-4 दिन के परामर्श शिविरों की उपयोगिता अनुपम है। इनमें हर अखण्ड-ज्योति पाठक को सम्मिलित होने का लाभ लेना ही चाहिए। इतना महत्त्वपूर्ण शिक्षण शायद ही फिर कभी किसी को मिल सके। इनमें सम्मिलित होने की तैयारी अभी से करनी चाहिए और मार्च में छपी अखण्ड-ज्योति में छपे शिविर क्रम में अपने लिये जो उपयोगी पड़ता हो उसमें आने की स्वीकृति प्राप्त कर लेनी चाहिये।
(2) अखण्ड-ज्योति और युग-निर्माण योजना के अंक कम से कम अपने दस मित्रों को पढ़ाते रहने का क्रम बनाइये और प्रयत्न कीजिए कि कुछ नये सदस्य बन सकें।
(3) प्रतिदिन दस नया पैसा और एक घण्टा समय निकालने और उसे ‘ज्ञान यज्ञ’ योजना के अंतर्गत अपने समीपवर्ती लोगों में विचार क्रान्ति उत्पन्न करने के लिए नियमित रूप से लगाया कीजिए।
(4) अपने क्षेत्र में युग-निर्माण विचार धारा को व्यापक बनाने के लिए ‘चल पुस्तकालय’ ढकेल गाड़ी का प्रबन्ध कीजिए। और ज्ञान मन्दिर की कितनी अद्भुत प्रतिक्रिया होती है, यह प्रत्यक्ष देखिये।
(5) आपके क्षेत्र में जन-जागृति का प्रयोजन पूरा करने के लिए एक युग-निर्माण सम्मेलन- जिसमें गायत्री यज्ञ भी जुड़ा हो- की सम्भावना पर विचार कीजिए और यदि सम्भव हो तो उसके लिए उत्साहपूर्वक प्रयत्न कीजिए।
(5) आपके क्षेत्र में जन-जागृति का प्रयोजन पूरा करने के लिए एक युग-निर्माण सम्मेलन- जिसमें गायत्री यज्ञ भी जुड़ा हो- की सम्भावना पर विचार कीजिए और यदि सम्भव हो तो उसके लिए उत्साहपूर्वक प्रयत्न कीजिए।
मेघनाथ आकर पहले ही जब टकराया,
जाना रीछ-वानरों ने, जो ज्ञान नहीं था।
सेना में भरती हो जाना काम सरल था,
पर रावण से भिड़ना कुछ आसान नहीं था॥
महाबली थे असुर, छनी थे, मायावी थे,
उस पर भी संगठित शक्ति के आराधक थे।
यम, कुबेर, दिकपाल जहाँ थे भरते पानी,
कुम्भकर्ण, अहिरावण-में जिनमें साधक थे॥
उसकी प्रबल चोट वानरों ने जब खाई,
त्राहि-त्राहि मच गई, मोह उन सबमें छाया।
कोई करता याद देश की, मातु-पिता की,
कितनों में ही प्रेम भार्या का जग आया॥
अंगद को चिन्ता हो आई राज्य भोग की,
जामवंत भयभीत पड़े थे मरण-भाव से।
नील और नल जिनने था समुद्र को बाँधा,
उसका भी मन भरमाया था चाम-भाव से॥
हनुमान, सुग्रीव सहित सब मोह रहे थे,
देख लक्ष्मण का विजयी मानस चकराया।
और राम के दुःख का पारावार नहीं था,
उनके कमल-लोचनों में था जल भर आया॥
रीछ और वानर को जो अब तक यह कहते थे-
राम! तुम्हारे लिये जिन्दगी हम सब हारे।
देख युद्ध की घड़ी असुरता में सब-के-सब,
मोह रहे थे प्रबल ऐषणाओं से सारे॥
रामचन्द्र ने तब प्रकाश है आत्म-ज्ञान का,
“जीव अमर है” की उन सबमें ज्योति जगाई।
और लक्ष्मण न तब शक्ति चला हाथों से,
असुरों की माया को काटा भीति भगाई॥
धर्म-मंच ने आज युद्ध नूतन ठाना है,
उसका रीछ-वानरों जैसा ही बाना है।
है कौतुक की बात आज भी ठीक उसी विधि
चढ़ा हुआ वह मोह सभी में मनमाना है॥
नहीं रही है जान असुरता से लड़ जायें,
राम दे रहे ज्ञान पिलाते लक्ष्मण बूटी।
उस दिन तो था भंग हो गया मोह सभी का
किन्तु आज की यह समाधि है अभी न टूटी॥
-बलराम सिंह परिहार
*समाप्त*