देश, वेश और कर्मकाण्ड से ही नहीं धर्म की पहचान गुणों से होती है। महासागर के समान विशाल, स्पष्ट और गंभीर जीवन प्रणाली को धर्म कहते हैं।
समुद्र क्रमशः नीचा और गहरा होता गया है, धार्मिक क्रमशः विनयशील और आप्त-सत्यता की गहराई में उतरता चला जाता है। समुद्र का स्वभाव है स्थिरता और अपनी मर्यादा में बने रहना, धर्म भी मनुष्य को स्थिर और मानवीय मर्यादाओं का निष्ठापूर्वक परिपालन सिखाता है।
समुद्र में मृतक शरीर नहीं रहने पाता, उसी तरह जीवन के सत्य के प्रति जिनकी आस्था नहीं रही जो जड़ हो गये हैं, धर्म उनको अपने में नहीं मिलाता पर अनेक नदी-नद समुद्र में आकर गिरते हैं, उसने किसी को मना नहीं किया। धर्म भी वर्ण-भेद, जाति-भेद और देश-काल का भेद किये बिना प्रत्येक आत्म-परायण को अपना लेता है। समुद्र अपना रस नहीं बदलता उसी प्रकार धर्म भी अपने सिद्धान्तों पर दृढ़तापूर्वक आरुढ़ रहने की शिक्षा देता है। समुद्र में अनेक तरह के रत्न, मूँगे, मोती भरे पड़े हैं तो सेवार, खर, पतवार भी। उसी प्रकार धर्म गुणों का आगार होकर भी जो तुच्छ और अवरोधक हैं, उन्हें भी प्यार करता है।
महासमुद्र को देखकर जो अपने जीवन को वैसा ही विस्तृत और महान् बनाये वही सच्चा धर्मनिष्ठ है।
—महात्मा गौतम बुद्ध, (मिलिन्द प्रश्नबोधिनी)
----***----
कथा-
प्रसेनजित की पुत्री राजकुमारी विपुला राजोद्यान भ्रमण के लिये निकली थी। कौसुम्भ (केसरिया) परिधान के साथ हिरण्यमय चोली पहने राजकुमारी का सौंदर्य कुमुदिनी को भी हतप्रभ कर रहा था। मस्तक पर ओपश, कानों में कर्ण शोभन उन्नत वक्षस्थल पर पड़ी मणियों की माला और ग्रीवा पर जड़ित सुवर्ण निष्क सब मिलकर उनकी रूप-राशि में शतगुणित सौन्दर्य कार्य की वृद्धि कर रहे थे। राजकुमारी की सुन्दरता की चर्चा उन दिनों सारे संसार में थी। प्रत्येक युवक का हृदय उन्हें प्राप्त करने को बेचैन था।
प्रातःकाल की पीयूष वेला, भगवान् भुवन भास्कर प्राची में अपना रथ तेजी से दौड़ाते आ रहे थे। इधर आयुष्मान् नागसमाल जो आप राजोद्यान में ही ठहरे हुये थे, भगवती सरस्वती की वन्दना में निमग्न थे। वीणा की झंकार से राजोद्यान का पत्ता-पत्ता भाव-विभोर हो रहा था। फूलों को देखकर ऐसा लगता था कि ये भैरवी राग सुनने के लिये ही ध्यान-मग्न हो गये हों।
केहरिनाद सुनकर मंत्र-मुग्ध मृग जिस प्रकार मरण-विस्मरण कर बहेलिये के पास जा पहुँचते हैं, सप्त स्वरों में अवगुण्ठित विपुला भी मदमस्त गजराज की भाँति उधर ही चलती चली गई, जहाँ नागसमाल वीणा पर भाव-विभोर भैरवी का अलाप कर रहे थे।
विपुला स्फटिक शिला पर बैठकर उन अमृतमय स्वर लहरियों का पान करते-करते भाव-विमुग्ध हो उठी। प्राण विद्युत में चपलता आ गई, पाँव मचलने लगे, वीणा की झंकार के साथ पायलों का मधुर स्वर एकाकार होकर उद्यान के पक्षियों तक को मंत्र मुग्ध करने लगा।
न रुकती थी वीणा संगीत धारा प्रवाहित करने वाली नागसमाल की उँगलियाँ और न थमना चाहते थे राजकुमारी के थिरकते पाँव। सूर्यदेव एक बाँस ऊपर चढ़ आये। महाराज प्रसेनजित स्वयं भी महारानी मल्लिका के साथ वहाँ आ उपस्थित हुये। महापंडित नागसमाल जो अब तक भगवती भक्ति की गोद में सच्चिदानन्द की रसानुभूति में डूबे थे, महाराज को सामने देखते ही रुक गये। वीणा की तान टूटते ही पाँव की थिरकन भी उजड़ गई। भाव-विभोर विपुला ने आगे बढ़कर वक्षस्थल पर पड़ी माला उतारी और चीवर-धारी संन्यासी के गले में डाल दी।
स्थित प्रज्ञ की भाँति संन्यासी ने माला उतार फेंकी और प्रसेनजित की ओर देखते हुये कहा- “आर्य प्रवर कुशल मंगल तो हैं न?” सब कुशल है ब्राह्मण श्रेष्ठ। किन्तु आपने राजकुमारी द्वारा पहनाई गई माला क्यों उतार दी। आप जानते हैं कि भारतीय कुमारियाँ जिसे माला पहना देती हैं, वही उनका पति हो जाता है। फिर वे किसी और का वरण नहीं करतीं। आप यह भी अच्छी तरह जानते हैं। इसलिये अब तो आपको मेरी रूपवती कन्या के साथ विवाह करना ही पड़ेगा।
नागसमाल ने हँसकर कहा- “ महाराज संन्यासी और लोक-सेवक के लिये प्रजा ही पत्नी और प्रजा ही पति है। मैंने संसार की भलाई के लिये यह वेष धारण किया है, आप चाहते हैं, क्या मैं, उससे पथ-भ्रष्ट हो जाऊं।”
“सोच लो संन्यासी!”- महाराज के स्वर में कुछ तीखापन भी था और याचना का भाव भी- हम आपको आधा राज्य भी देंगे। राजकुमारी के भरण पोषण की कोई चिन्ता नहीं करनी पड़ेगी।
सौन्दर्य प्रलोभन और भय कुछ भी संन्यासी को विचलित नहीं कर सकते राजन्! यह कहकर नागसमाल ने वीणा उठाई और जिस मृगों के बीच से सिंह निकलता है, उसी तरह धीरे-धीरे कदम बढ़ाते हुये राजोद्यान से बाहर निकल गये।
----***----
5 वर्ष पूर्व की बात है शिकागो अमेरिका के हिप्नोटिस्ट डॉ. स्टैनली मिशल ने दावा किया कि टेड सेरियस नाम का उनकी पहचान का एक ऐसा व्यक्ति है, जो बिना बिम्ब के भी केवल मानसिक कल्पना द्वारा संसार के किसी भी दूरवर्ती स्थान का चित्र कैमरे में उतार सकता है। यह आवश्यक नहीं था कि यह चित्र वर्तमान समय के ही हों, वह भूतकाल के भी, जबकि कैमरा का आविष्कार भी नहीं हुआ था, चित्र खींच देने की क्षमता रखता है। उदाहरण के लिये वह चाहे तो सिकन्दर के युद्ध, ईसा-मसीह के क्रूस के समय वहाँ कौन-कौन उपस्थित थे, मिस्र के पिरामिड बनाते समय मजदूर कैसे काम करते थे, वह सब दृश्य, वह कैमरे में उतार कर दिखा सकता है।
इस तरह का समाचार सुनकर अमेरिका की विश्व विख्यात पत्रिका ‘लाइफ’ के सम्पादक पाल बेल्च और उनके साथियों को बड़ी उत्सुकता हुई। उन्होंने ‘लाइफ’ कार्यालय का ही कैमरा लिया। रोल भी अपने हाथ से भरी और डॉ. मिशल के दफ्तर में जा पहुँचे।
टेड सेरियस एक कुर्सी पर बैठ गया। फिर उस कैमरे को गोद में लेकर इस तरह फिट किया कि उसका चेहरा लेंस के सामने आ गया। अब वह भूतकाल की कोई घटना याद करता सा जान पड़ा। मस्तिष्क में ध्यानावस्थित-सा होकर उसने कैमरे का बटन दबाया। पहले दो-तीन चित्र तो अस्पष्ट से उतरे पर एक चित्र जो बिलकुल स्पष्ट उतरा, वह यूनान की किसी अति प्राचीन मूर्ति का चित्र था। हजारों मील दूर, बिना चले, वह भी अतिभूत की वस्तु का फोटो निकाल देना सचमुच एक बड़ा आश्चर्य था। उसे पढ़कर सहसा भारतीय तत्व-दर्शन की वह बात याद हो आती है, जिसमें आत्मा की व्याख्या करते हुये कहा गया है-
अपाणि पादो जवनो ग्रहीता पश्यत्यचक्षुः स श्रणोत्यकर्णः स वेत्ति वेद्यं न च तस्यास्ति वेत्ता तमाहुरग्प्रं पुरुषं महान्तम्॥
—श्वेताश्वेतरोपनिषद् 31।96,
अर्थात्- वह आत्मा बिना हाथ-पाँवों का होते हुये भी सबका ग्रहण करने वाला, सर्वत्र गमनशील, बिना आँखों, वह सब कुछ देखता कानों के बिना सब कुछ सुनता और सब ज्ञातव्य विषयों का ज्ञाता है पर उसका ज्ञाता कोई नहीं। ज्ञानी जन उसे आदि और महान् बतलाते हैं।
भारतीय दर्शन आदि काल से उसे ही जानने और प्राप्त करने की प्रेरणा देते रहे हैं, योगीजन विभिन्न कष्ट साध्य साधनाओं द्वारा इस अद्भुत शक्ति को ही प्राप्त करने में लगे रहे हैं तभी उस महान् शक्ति की प्राप्ति और उद्घाटन सम्भव हुआ। “या निशा सर्वभूतायाँ तस्यामि जागर्तिसंयमी” योगी की व्याख्या एक ही वाक्य में कर दी गई, उसका अर्थ ही होता है जब सबके लिये अन्धकार होता है, तब भी योगी और आत्म-संयमी के लिये सर्वत्र प्रकाश ही रहता है। इस तरह का विलक्षण ज्ञान तो आत्मा की सिद्धि-सामर्थ्यों के एक कण के समान है।
अभी तक भारतीय दर्शन की इन मान्यताओं को कपोल-कल्पित और भावावेश माना जाता था पर अब जब विज्ञान ने स्वयं उन्हीं तथ्यों को प्रमाणित करना प्रारम्भ कर दिया तो हठात् पाश्चात्य सभ्यता से प्रभावित लोगों का ध्यान भी उधर जाने लगा और लोग अनुभव करने लगे कि वस्तुतः शरीर में कोई अति शक्तिशाली सत्ता का निवास है। वह विलक्षण शक्तियों से भरपूर है। उसे चलने के लिये पाँव देखने को आँखें आवश्यक नहीं, बिन कानों के वह हजारों मील दूर की भी सुन सकता है और अब जो है तथा जो नहीं रहा, वह उसका भी ज्ञाता है।
यदि कोई ऐसी वस्तु है तो उसका भी एक निर्धारित विज्ञान होना चाहिये, जिससे उसे प्राप्त किया जाय? यह प्रश्न हर व्यक्ति के मन में उठना स्वाभाविक है। ऐसा ही प्रश्न शास्त्रकारों के समक्ष उपस्थित हुआ था। तब उन्होंने देखना प्रारम्भ किया, ऐसी कौन-सी इन्द्रिय और शक्ति है, जो स्थूल रूप से भी उसे अतीन्द्रिय सत्ता का बोध, ज्ञान और दर्शन करा सकती है। आँखें उसे देख नहीं सकतीं, कान उसे सुन नहीं सकते, नाक उसे सूँघ नहीं सकती तो फिर उसकी अनुभूति कैसे हो? यह विकट प्रश्न, तत्व-दर्शियों के सामने भी आया था।
योगी वशिष्ठ का ध्यान उधर गया और उन्होंने बताया, “हाँ मन एक ऐसी शक्ति है, जो जड़ और चेतन दोनों ही है, वह आत्मा के इन सब रहस्यों के द्वार खोल सकता है। मन एक ऐसी इन्द्रिय है, जिससे आत्मा के इन सभी गुणों का परिचय प्राप्त किया जा सकता है।
चिन्निःस्पन्दो हि मलिनःकलंक विकलान्तरम्। मन इत्युच्यते राम न जड़ं न च चिन्मयम्॥
-3।96।41,
चितो यच्चेत्यकलनं तन्मनस्त्वमुदाहृतम्। चिद्भागोऽन्नाजडो भागो जाड्यमत्र हि चेत्यता॥
-3।91।37
नाहं वेदावभासात्मा कुर्वाणोऽस्मीति निश्चयः। तस्मादेकान्तकलनस्तद्रू पं मनसो विदुः।
-3।96।4
मनो हि भावनामात्रं भावना स्पन्द धर्मिणी। क्रिया तद्भावितारुपं फल सर्वोऽनुधावति।।
-3।96।1
नहि दृश्यादृते किचिंन्मनसो रुपमस्तिहि॥
-3।4।48
हे राम! आत्मा का यह मलीन और पदार्थों को भोगेच्छा के कारण च्युत हुआ स्पन्दन, जो मन कहलाता है न तो पूर्णतया जड़ है और न ही पूर्ण चेतन। आत्मा की प्राप्ति के लिये वैराग्य और कल्पना आदि भाव जब उठते हैं तो वही आत्म-भाव से चेतन और विषयों, जड़ पदार्थों की आसक्ति के समय वही जड़ हैं। जब वह अपने स्वयं प्रकाशमय आत्म-स्वरूप को भूल कर यह मानने लगता है कि ‘यह सब मैं कर रहा हूं’ और उसका एक ही विषय में ध्यान रहता है, तब वह उसी के ज्ञान में पड़ा मन कहलाता है। मन भावना मात्र है, स्पन्दन उसका गुण है। वह कुछ न कुछ करने की इच्छा करता है। किसी न किसी फल के रूप में परिणत होने के लिये रहता है, अर्थात् पदार्थ की रचना वही करता है। दृश्य के अतिरिक्त मन का कोई स्वरूप है ही नहीं।
यही मन जब शुद्ध शाँत व निर्विकार भाव में परिणत हो जाता है तो आत्मा के दर्शन होने लगते हैं पर शास्त्रकार ने ऊपर की पंक्तियों में यह भी बताया है कि प्रकाश कण के रूप में वह उसी प्रकार स्पन्दन वाला, गतिशील है, जिस तरह जल वाला काला कीड़ा अपने पीछे जल में धारा बनाता हुआ बहता है। यह मन भी उसी प्रकार संसार के किसी भी भाग में जाकर उसे देखने, ज्ञान प्राप्त करने और यहाँ तक उसे उठा लाने में भी समर्थ है। योगियों ने ऐसा तब जाना जब ध्यान धारणा प्रत्याहार, प्राणायाम आदि साधनाओं का अभ्यास करते हुए उन्होंने मन को भ्रूमध्य में वशवर्ती बना लिया था।
प्रकाश के इस खेल का विज्ञान सम्मत एक प्रमाण तो ऊपर दिया गया है। उसमें यह भी बताया गया है कि टेड सेरियस अपन इस प्रयोग में सदैव सफल नहीं रहता और उसका कारण यही है कि उसका मन उतना सधा हुआ नहीं है।
चूँकि श्री मिशल महोदय सम्मोहन विद्या (हिप्नोटिज्म) के ज्ञाता थे, इसलिये श्री पाल बेल्च को आशंका हुई कि सम्भव है उनके सम्मोहित करने के फलस्वरूप यह फोटो आई हो, इसलिये उन्होंने दुबारा फिर अकेले टेड सेरियस को ‘लाईफ’ पत्रिका के कार्यालय में बुलाया। कैमरा लाइफ की फिल्म भी ‘लाईफ’ कार्यालय द्वारा भरी गई। पाल बेल्च ने कहा इस बार वह किसी 17 मंजिल की इमारत का ऐसा चित्र चाहते हैं, जिसकी खिड़कियाँ स्पष्ट दिखाई देती हों। सेरियस फिर पहले की तरह बैठा। वैसा ही चित्र मानसिक कल्पना द्वारा उसने कैमरे में उतार दिया किस शहर की यह इमारत हो सकती है, इसका तो कुछ पता नहीं चल सका पर वह चित्र ‘लाईफ’ पत्रिका में छपा था। लोगों को टेड सेरियस की इस विलक्षण क्षमता पर बड़ा आश्चर्य हुआ। टेड का यह भी कहना है कि आज तो लोग मुझे केवल कौतूहल से देखते हैं, पर मैं शीघ्र ही प्रमाणित कर दूँगा कि शरीर में एक प्रकाश पूर्ण सामर्थ्य है और वह एक स्थान पर बैठे हुये संसार भर को देख सकती है। टेड ने प्रथम विश्वयुद्ध और अमेरिका स्वतंत्रता संग्राम के सिपाहियों के ऐसे चित्र भी उतारें हैं, जो तत्कालीन परिस्थितियों के हूबहू चित्रण हैं और इस बात के प्रमाण भी। किसी एक बिन्दु पर हम भूत और भविष्य एक ही दृश्य में देख सकते हैं।
दरअसल समय कोई वस्तु नहीं वह तो ब्रह्मांड अथवा आत्मा का विस्तार मात्र है, यदि हम उस मूल-प्रकाश-बिन्दु को प्राप्त कर लेते हैं तो हम त्रिकालदर्शी, सर्वव्यापी सब कुछ बन सकते हैं। चलते फिरते अनुभव करने के लिये आँख, कान, नाक और इन्द्रियाँ आवश्यक नहीं, आत्मा का प्रकाश रूप अपने आप ही इन क्षमताओं से भरपूर है।
अभी तक माना जाता था कि कोई वस्तु देखनी हो तो प्रकाश और आंखें दो ही वस्तुयें आवश्यक हैं। प्रकाश जब आँखों की रेटिना से टकराता है तो आंखों का तंत्रिका तन्त्र एक विशेष प्रकार की रासायनिक क्रिया करके सारी सूचनायें मस्तिष्क को देता है। मन एक तीसरी वस्तु है, जो प्रकाश और आँखों के क्रिया-कलाप को अनुभव करता और नई तरह की योजनायें, आदेश, अनुभूतियाँ तैयार करके शरीर के दूसरे अवयवों में विभक्त करता है। अर्थात् मानसिक चेतना न हो तो प्रकाश और आँखों के होते हुये भी देखना सम्भव नहीं।
मन प्रकाश ही नहीं, एक प्रकार की विद्युत तरंग जैसा है, इसलिये यदि वह वस्तुओं को दृश्य बनाने में सीधे सक्षम हो तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिये। ऐसे भी अनेक उदाहरण दिखाई देते हैं, जब प्रकाश को ‘रेटिना’ (पुतली का केन्द्र-बिन्दु) द्वारा विद्युत आवेग में बदलने की आवश्यकता नहीं पड़ती और कुछ लोग केवल त्वचा, गाल अथवा शरीर के और किसी भाग से ही देख लेते हैं।
‘इजवेस्तिया’ (रूस में छपने वाला समाचार-पत्र) में प्रकाशित एक समाचार के अनुसार निझनी तागिल (रूस) की रोजा नामक युवती पंक्तियों पर उंगली चलाकर मामूली प्रेस में छपी पुस्तकें पढ़ लेती है। कई समाचार-पत्रों ने उसके प्रमाण सहित फोटो भी छापे हैं। आश्चर्य तो यह है कि पुस्तकों में बने हुये किसी भी फोटो को उँगलियां रख कर ही वह बता देती है कि यह फोटो महात्मा गाँधी की है अथवा इब्राहिम लिंकन की है। यदि वह जानती नहीं होती तो आकृति का वर्णन कर देती है, इनके इतनी बड़ी मूंछें हैं, ऐसे कान और अमुक पोशाक पहने हुये फोटो उतारी गई।
वैज्ञानिक हैरान थे, आखिर यह है क्या? उन्होंने ध्यान दौड़ाया तो एक बात सूझ पड़ी। साँप के शरीर में ‘इन्फ्रारेड हीट डिटेक्टर’ की तरह का एक अति संवेदनशील अंग होता है। यह एक प्रकार का ताप सूचक यन्त्र है, जिससे ताप की किरणें बाहर आती हैं और पास आ रही वस्तु से टकराकर वापिस लौटती हैं। साँप चुपचाप पड़ा होता है और अपने इस अवयव से यह जान लेता है कि किस दिशा में कहाँ पर शिकार है, बस उधर ही झपटकर उसे पकड़ लेता है।
इसी तरह के तन्तुओं से कबूतर और चिड़ियों के मस्तिष्क भी सजे होते हैं, जिससे वे हजारों मील की यात्रा का ज्ञान रिकार्ड करके रखते हैं। दस वर्ष बाद भी उनकी सहायता से वे अपने मूल-निवास को लौट सकते हैं। मेढक की आँख और मस्तिष्क के बीच में इस तरह के ज्ञान-तन्तु होते हैं, उन्हीं से वह अपने दुश्मनों की आक्रमण करने की इच्छा तक को पहचान लेता है (यह मनुष्य के आज्ञा-चक्र भूमध्य में भी एक ऐसी ही संवेदनशील शक्ति के होने का सबसे बड़ा प्रमाण है) और आक्रमण होने से पहले ही बच निकलता है।
इन जानकारियों के आधार पर वैज्ञानिकों ने रौजा की भी जाँच की। उन्होंने प्रकाश में से ‘इन्फ्रारेड किरणें’ निकाला हुआ प्रकाश और उसके साथ अक्षर एक कागज पर डाले तब भी रौजा ने उन्हें पढ़ दिया। बेशक वह इस स्थिति में आकृतियां नहीं पहचान पाई पर वैज्ञानिकों को यह मालूम पड़ गया कि आंखें ही नहीं, शरीर के अन्य अंगों में भी दृष्टि-तत्व हो सकते हैं। रौजा के हाथों में प्रति एक मिलीमीटर ऐसे दस तत्व पाये भी गये। वैज्ञानिकों ने बताया-यह असामान्य स्थिति है, हम कह नहीं सकते कि क्या शरीर में ऐसे तत्व और भी कहीं हैं या विकसित किये जा सकते हैं। हम इस बात को जानने की शोध अवश्य करेंगे कि प्रकाश को ग्रहण करने वाले तत्व उँगलियों में कैसे आ गये। यदि इस बात को ढूंढ़ निकाला गया तो ध्यान के रूप में प्रकाश कणों को आकर्षित करने और शरीर में अतीन्द्रिय ज्ञान (एक्स्ट्रा आर्डिनरी सेन्स परऐप्शन) की क्षमता उत्पन्न करने की भारतीय योग-प्रणाली पूर्ण विज्ञान सम्मत हो जायेगी।
“ब्रिटिश जनरल आफ मेडिकल हिप्नोटिज्म” ने एक ऐसा ही समाचार छापकर बताया है कि बैंकाक में तो एक संस्था ही काम करती है जो अंधों को गालों से देखने का प्रशिक्षण देती है। उसके संचालकों का दावा है, मनुष्य के गाल शरीर भर के समस्त अंगों की अपेक्षा अति संवेदनशील हैं और उनमें सूक्ष्म आध्यात्मिक शक्तियों का प्रचुर प्रवाह विद्यमान् रहता है। चुम्बन का महत्व और निर्देश इसीलिये है कि इस संवेदनशील अंग का उपयोग केवल उचित प्रयोजन के लिये और व्यक्ति की सूक्ष्म क्षमताओं का सदुपयोग करने के लिये ही किया जा सके।
यह उदाहरण यह बताते हैं कि संसार में कोई ऐसा महत्तत्व है। जिसकी सीमित मात्रा विकसित करके भी विलक्षण शक्तियों का जागरण किया जा सकता है। यह तो वैज्ञानिक भी मानते हैं कि प्राणी के अन्दर तन्तुओं का ऐसा जाल फैला है कि कैसी भी नई समस्या आये, उसका भी निराकरण प्रस्तुत कर देने की उनमें क्षमता है। उन क्षमताओं को विकसित करने की विद्या हम भारतीयों ने ‘योग विज्ञान’ के नाम से प्राप्त की है, उसका उपयोग और अभ्यास हममें से कोई भी व्यक्ति करके इस तरह की अतींद्रिय क्षमतायें अपने आप में भी उत्पन्न होकर एक स्थान के दृश्य और चित्र लाखों-करोड़ों मील दूर कैसे पहुँच जाते हैं। हम उसे कैसे ग्रहण कर लेते हैं, इसका वर्णन अगले अंक में करेंगे।
बसरा का व्यापारी रेगिस्तान में भटक गया। कई दिनों तक मरुस्थल में मारा-मारा फिरा। भूख के मारे उसका बुरा हाल हो गया।
भगवान् ने पुकार सुन ली लगता था। उस दिन शाम होते-होते नखलिस्तान दिखाई दे गया। व्यापारी वहाँ पहुँचा तो प्रसन्नता से बाँछे खिल गई। वहाँ एक पोटली पड़ी थी। व्यापारी ने उसे लिया। सोचा इतने सारे चनों से तो दो दिन का काम चलेगा।
किन्तु अगले क्षण कितनी निराशा के थे जब उसने पोटली खोली। उसमें चने नहीं मोती बंधे पड़े थे। जीवन के आखिरी क्षण व्यापारी जान पाया कि धन जीवन की मूल आवश्यकता नहीं, वह तो कंकड़-पत्थर है, यदि उसका कुछ सदुपयोग न हो
बच्चा प्रश्न करता है- “माँ! भगवान राम या कृष्ण के मुख-मण्डल पर गोलाकार प्रकाश की आभा क्यों दिखाई जाती है? प्रकाश तो दीपक से ही निकलता है, सूर्य अथवा चन्द्रमा से भी निकलता है, फिर मनुष्य के मुख मण्डल से दर्शाया जाने वाला प्रकाश क्या है”? माँ जानती नहीं, कोई निश्चित उत्तर नहीं दे पाती और इस तरह महापुरुषों के मुखमण्डल पर दिखने वाले तेजोवलय का रहस्य- रहस्य ही बना रह जाता है।
महापुरुषों के मुख मण्डल पर ही नहीं, इस तरह का प्रकाश प्रत्येक मनुष्य के शरीर से प्रतिक्षण स्फुरित होता रहता है। परमाणु विज्ञान जानने वाले लोगों को पता होगा कि प्राकृतिक पदार्थ अत्यन्त सूक्ष्म परमाणुओं से बने हैं। पदार्थ के परमाणु के मूल में जब हम प्रवेश करते हैं तो पता चलता है कि वहाँ भी सूर्य की सी चमक वाला एक सितारा विद्यमान है, उसे नाभिक, केन्द्रक या नाभि-केन्द्र (न्यूक्लियस) कहा जाता है। अणु आवेश की दृष्टि से पूर्ण उदासीन होता है अर्थात् न तो उसमें धन आवेश होता है, न ऋण आवेश। किन्तु केन्द्रक स्थित प्रोटान, अर्थात् धन आवेश अणुओं और केन्द्रक के आस-पास चक्कर काटने वाले इलेक्ट्रानों अर्थात् ऋण आवेश अणुओं का सन्तुलन रखने में उसका हाथ होता है। यदि परमाणु के भीतर का यह सन्तुलन बिगड़ जाता है तो उसका विस्फोट हो जाता है, उसमें कितनी जबर्दस्त शक्ति होती है, हिरोशिमा प्रकरण से यह बात सारा संसार भलीभाँति जान गया है।
इसी बात को जब हम प्राण-धारी के ऊपर लागू करते हैं तो पता चलता है कि उसमें कोई एक अति विचारशील सत्ता काम कर रही है। यदि उसके अच्छे या बुरे दोनों भावों को निकाल दें तो मनुष्य एक प्रकार का मननशील पदार्थ ही है। महापुरुषों के मुख-मण्डल पर दिखाई देने वाला यह तेजोवलय उस विचार-सत्ता की तीव्र इच्छा-शक्ति, विचार-शक्ति या दिव्य संकल्प-शक्ति का ही प्रतीक है। उसे ही इच्छा शरीर कह सकते हैं, क्योंकि यह प्रकाश-अणु केवल मुख-मण्डल से ही प्रस्फुटित नहीं होते वरन् सम्पूर्ण शरीर से प्रस्फुटित होते रहते हैं। अमेरिका की सुप्रसिद्ध अध्यात्म साधिका श्रीमति डॉ. जे. सी. ट्रस्ट ने इस प्रकार स्फुरित होने वाले प्रकाश अणुओं को मानव-अणु नाम दिया है।
इन अणुओं की शक्ति का पता लगाना हो तो हमें भगवान राम, कृष्ण, गौतम बुद्ध, शंकराचार्य, ईसा आदि महापुरुषों का जीवन चरित्र अध्ययन करना होगा। इन मानव अणुओं में परमाणु विस्फोटक से भी अधिक करोड़ों व्यक्तियों को बदल डालने वाली सामर्थ्य होती है।
उस समय तक वैज्ञानिक 95 भौतिक तत्वों की ही खोज कर सके थे, मानव के शरीर के इन सूक्ष्म प्रकाश अणुओं के बारे में उनमें से किसी ने भी नहीं सोचा था, इसलिये इस तथ्य का बड़ा उपहास किया गया, किन्तु बाद में संसार के सभी वैज्ञानिकों ने माना कि मनुष्य के शरीर में सचमुच ऐसे प्रकाश-अणु विद्यमान हैं, जो विद्युत चुम्बकीय रसायन-पदार्थ निकालते रहते हैं। उसी से केवल उनकी उपस्थिति का निश्चय होता है।
सूक्ष्मदर्शी भारतीय तत्व-दर्शियों ने यह बात डॉ. जे.सी. ट्रस्ट से भी हजारों वर्ष पहले मालूम कर ली थी। 84 लाख जीवों का अस्तित्व 84 लाख प्रकार के मानव-अणुओं की ही खोज है। यह बात डॉ. जे. सी. ट्रस्ट ने भी अपनी पुस्तक ‘अणु और आत्मा’ (एटम एण्ड सोल) में स्वीकार की है कि मानव-अणुओं की प्रकाश-वाष्प न केवल मनुष्यों में वरन् अन्य जीव-धारियों, वृक्ष-वनस्पति, औषधि आदि में भी होती है। यह प्रकाश अणु ही जीवधारी के यथार्थ शरीरों का निर्माण करते हैं खनिज पदार्थों से बना मनुष्य या जीवों का शरीर तो अभी तक स्थिर रहता है, जब तक यह प्रकाश-अणु शरीर में रहते हैं। इन प्रकाश अणुओं के हटते ही स्थूल शरीर बेकार हो जाता है, फिर उसे जलाते या गाड़ते ही बनाता है। खुला छोड़ देने पर तो उसकी सडाँद से उसके पास एक क्षण भी ठहरना कठिन हो जाता है।
स्वभाव, संस्कार, इच्छायें, क्रिया-शक्ति यह सब इन प्रकाश अणुओं का ही खेल है। हम सब जानते हैं कि प्रकाश का एक अणु (फोटान) भी कई रंगों के अणुओं से मिलकर बना होता है। मनुष्य शरीर की प्रकाश आभा भी कई रंगों से बनी होती है। डॉ. जे. सी. ट्रस्ट ने अनेक रोगियों, अपराधियों तथा सामान्य व श्रेष्ठ व्यक्तियों का सूक्ष्म निरीक्षण करके बताया है कि जो मनुष्य जितना श्रेष्ठ और अच्छे गुणों वाला होता है, उसके मानव-अणु दिव्य तेज और आभा वाले होते हैं, जबकि अपराधी और रोगी व्यक्तियों के प्रकाश अणु क्षीण और अंधकारपूर्ण होते हैं। उन्होंने बहुत से मनुष्यों के शरीरों के काले धब्बों को अपनी दिव्य दृष्टि से देखकर उनके रोगी या अपराधी होने की बात को बताकर लोगों को स्वीकार करा दिया था कि सचमुच रोग और अपराधी मनोवृत्तियाँ काले रंग के अणुओं की उपस्थिति का प्रतिफल होते हैं, मनुष्य अपने स्वभाव में चाहते हुये भी तब तक परिवर्तन नहीं कर सकता, जब तक यह दूषित प्रकाश-अणु अपने अन्दर विद्यमान् बने रहते हैं।
यही नहीं जन्म-जन्मान्तरों तक खराब प्रकाश अणुओं की यह उपस्थिति मनुष्य से बलात् दुष्कर्म कराती रहती है, इस तरह मनुष्य पतन के गड्ढे में बार-बार गिरता और अपनी आत्मा को दुःखी बनाता रहता है। जब तक यह अणु नहीं बदलते या निष्क्रिय होते तब तक मनुष्य किसी भी परिस्थिति में अपनी दशा नहीं सुधार पाता।
यह तो है कि अपने प्रकाश अणुओं में यदि तीव्रता है तो उसमें दूसरों का आकस्मिक सहायता दी जा सकती है। रोग दूर किये जा सकते हैं। खराब विचार वालों को कुछ देर के लिये अच्छे सन्त स्वभाव में बदला जा सकता है। महर्षि नारद के सम्पर्क में आते ही डाकू बाल्मीकि के प्रकाश अणुओं में तीव्र झटका लगा और वह अपने आपको परिवर्तित कर डालने को विवश हुआ। भगवान् बुद्ध के इन प्रकाश अणुओं से निकलने वाली विद्युत विस्तार सीमा में आते ही डाकू अंगुलिमाल की विचार धारायें पलट गई थीं। ऋषियों के आश्रमों में गाय और शेर एक घाट पानी पी आते थे, वह इन प्रकाश अणुओं की ही तीव्रता के कारण होता था। उस वातावरण से निकलते ही व्यक्तिगत प्रकाश अणु फिर बलवान् हो उठने से लोग पुनः दुष्कर्म करने लगते हैं इसलिये किसी को आत्म-शक्ति या अपना प्राण देने की अपेक्षा भारतीय आचार्यों ने एक पद्धति का प्रसार किया था, जिसमें इन प्रकाश-अणुओं का विकास कोई भी व्यक्ति इच्छानुसार कर सकता था। देव उपासना उसी का नाम है।
उपासना एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है, जिसमें हम अपने भीतर के काले, मटमैले और पापाचरण को प्रोत्साहन देने वाले प्रकाश-अणुओं को दिव्य तेजस्वी, सदाचरण और शाँति एवं प्रसन्नता की वृद्धि करने वाले मानव अणुओं में परिवर्तित करते हैं। विकास की इस प्रक्रिया में किसी नैसर्गिक तत्त्व, पिण्ड या ग्रह-नक्षत्र की साझेदारी होती है। उदाहरण के लिये जब हम गायत्री की उपासना करते हैं तो हमारे भीतर के दूषित प्रकाश अणुओं को हटाने और उनके स्थान पर दिव्य प्रकाश अणु भर देने का माध्यम “गायत्री का देवता सविता” अर्थात् सूर्य होता है।
वर्ण रचना और प्रकाश की दृष्टि से यह मानव-अणु भिन्न-भिन्न स्वभाव के होते हैं। मनुष्य का जो कुछ भी स्वभाव आज दिखाई देता है, वह इन्हीं अणुओं की उपस्थिति के कारण होता है, यदि इस विज्ञान को समझा जा सके तो न केवल अपना जीवन शुद्ध, सात्विक, सफल, रोग-मुक्त बनाया जा सकता है, वरन् औरों को भी प्रभावित और इन लाभों से लाभान्वित किया जा सकता है। परलोक और सद्गति के आधार भी यह प्रकाश-अणु या मानव अणु ही हैं।
महान् शक्तियों यथा राम, कृष्ण,बुद्ध, ईसा, मोहम्मद, गुरु नानक आदि के मुख-मण्डल पर प्रदर्शित प्रकाश-वलय इस बात के प्रतीक हैं कि उन्होंने अपने आपके उन सभी अन्य प्रकार के अणुओं को निकाल या नष्ट कर दिया है, जो अज्ञान और पाप मूलक हो सकते हैं। उनमें दिव्य प्रकाश की उपस्थिति उनकी सर्वशक्ति सत्ता, सबके मन में प्रविष्ट होकर अंतरंग की जान लेने की क्षमता, किसी भी रोगी को अच्छा और आचरणहीन व्यक्ति को दंड देने की शक्ति का आधान उनमें हो चुका होता है। यह कोई अवैज्ञानिक तथ्य नहीं वरन् प्रकाश-अणुओं के विकास की प्रक्रिया मात्र है और उस अभ्यास को करके कोई भी व्यक्ति इन सत्यों की अनुभूति अपने वर्तमान जीवन में ही कर सकता है। क्योंकि प्रकाश ही एक ऐसी सत्ता है, जो न केवल देखती, सुनती वरन् विचार और प्रज्ञाएं एकत्रित करता है। मस्तिष्क के वह सभी केन्द्र जिनमें देखने, सुनने, सूँघने आदि की क्रियायें सम्पन्न होती हैं। प्रकाश परमाणुओं से ही बने होते हैं, इसलिये मानना पड़ता है कि प्रकाश के कुछ कण ऐसे हो सकते हैं, जो अन्तरंग अनुभूति की क्षमता से भी सम्पन्न हों। अनेक प्रकार के अनजाने ज्योति स्रोतों (क्वासार) आदि की खोज ने भी यह सिद्ध कर दिया है कि प्रकाश के भिन्न और क्रमशः अधिक दिव्य केन्द्र ब्रह्मांड में विद्यमान हैं।
आत्मा या चेतना शक्ति जिन अणुओं से अपने को अभिव्यक्त करती है, वह यह प्रकाश अणु ही हैं, जबकि आत्मा स्वयं उनसे भिन्न है। प्रकाश-अणुओं को प्राण, विधायन शक्ति, अग्नि, तेजस कहना चाहिये, वह जितने शुद्ध दिव्य और तेजस्वी होंगे व्यक्ति उतना ही महान् तेजस्वी, यशस्वी, वीर, साहसी और कलाकार होगा। महापुरुषों के तेजोवलय उसी बात के प्रतीक हैं, जबकि निकृष्ट कोटि के व्यक्तियों में यह अणु अत्यन्त शिथिल, मन्द और काले होते हैं। हमें चाहिये कि हम इन दूषित प्रकाश-अणुओं को दिव्य अणुओं में बदलें और अपने को भी महापुरुषों की श्रेणी में ले जाने का यत्न करें।
(क्रमशः)
बारह वर्ष तक तप करने के उपरान्त साधक घर लौटा तो जिज्ञासुओं की भीड़ एकत्रित हो गई। सभी जानना चाहते थे कि इतने दिन में उन्हें क्या-क्या सिद्धि मिली।
‘सिद्धि!’ साधक ने कहा- “अभी दिखाता हूँ।” यह कहकर उसने जल लेकर मन्त्र पढ़ा और एक हाथी के ऊपर छिड़क दिया। बात की बात में हाथी की मृत्यु हो गई।
साधे ने दुबारा जल लिया और फिर मंत्र पढ़कर मृत हाथी के शरीर में जल छिड़क दिया। अभिमंत्रित जल के छींटे पड़ते ही हाथी पुनः जी उठा। यह देखते ही लोगों ने करतल ध्वनि की और साधक की खूब जय-जयकार हुई।
साधक का पिता भी वहीं उपस्थित था, उसने कहा-वत्स! अच्छा अब यह तो बताओ इस सिद्धि से तुम्हें क्या मिला?
साधक चुप था। उससे कोई उत्तर देते न बन पड़ रहा था। पिता ने कहा- बेटा! जितने दिन चमत्कार के चक्कर में रहे, अगर अपने परिवार और संसार की सेवा करते तो उससे अपना भी भला होता और संसार का भी।
अनेक बार समझदार लोग भी यह कहते सुने जाते हैं कि, यह जानते हुए भी कि संसार में लिप्त रहने से कष्ट-क्लेश ही मिलते हैं। भगवान की ओर से विमुखता सी बनी रहती है और सारा जीवन जाल-जंजालों में फँसा हुआ नष्ट हो जाता है, तथापि मन उसी की ओर, संसार के जाल-जंजालों की ओर ही दौड़ता रहता है। भगवान् की माया ही कुछ ऐसी प्रबल है कि न चाहते हुये भी उसके वशीभूत हुए, संसार में ही मरते खपते रहते हैं।
लोगों की यह बात सुनकर ऐसा लगता है कि यह लोग माया को भगवान् की कोई ऐसी शक्ति मानते हैं, जो मनुष्यों को संसार के जाल-जंजालों में फँसाये रखने के लिये नियुक्त की गई है और वह भगवान् की आज्ञा पालन का अपना कर्त्तव्य बड़ी तत्परता से करती रहती है। भला भगवान् की इस आज्ञाकारिणी शक्ति माया के सम्मुख मनुष्य की बिसात हो क्या? माया एक यन्त्र की तरह उसे खींचकर जाल-जंजाल में डाल देती है और मनुष्य न चाहते हुए भी उसमें फंस जाता है।
किन्तु विचार करने की बात है कि क्या करुणा-सिन्धु दीन-बन्धु भगवान् मनुष्य के साथ ऐसा छल कर सकता है? क्या अपने अंश, अपने पुत्रों, मनुष्यों को जिनको कि उसने उत्पन्न किया है, किसी ऐसी शक्ति का बन्दी बना सकता है, जो उन्हें कष्ट-क्लेशों, शोक-सन्तापों अथवा अशाँति -असन्तोष के कंटकाकीर्ण मार्गों पर खींचती रहे। क्या उसको अपनी सन्तानों का दुःख, देखकर सुख मिल सकता? भगवान् ऐसा क्रूर हो यह सम्भव नहीं।
वास्तविकता यह है कि परमात्मा ने जीवों और मुख्यतः मनुष्यों को संसार में इस उद्देश्य से उत्पन्न किया है कि वह वहाँ आनन्दपूर्वक रहें और अन्त में अपनी बुद्धिमत्ता तथा प्रयत्नों के बल पर उसकी परमानन्दमयी गोद में आ जाएं- उसका स्वरूप बन जाएं। इस सदाशय की पूर्ति के लिए उसने मनुष्यों को हर प्रकार की शक्ति तथा साधन भी दिये हैं। भगवान् अपनी माया शक्ति द्वारा मनुष्यों को भुलाता, भटकाता है, ऐसा कहना उस परमपिता की न्यायशीलता, कारुण्य तथा कृपालुता पर लाँछन लगाना है, जो किसी प्रकार उचित नहीं।
तथापि अनुभव बतलाता है कि कोई ऐसी बात है अवश्य कि मनुष्य, जिसके कारण इच्छा न रहते हुये भी, परिणाम जानते हुए भी और मन में सोच-संकोच व लज्जा रहते हुए भी उन मार्गों पर चला जाता है, जहाँ दुःख, कष्ट-क्लेश आदि के दारुण आघातों को सहना पड़ता है। इसी को अधिकाँश लोग अज्ञान-वश भगवान् की माया बतलाया करते हैं। किन्तु वास्तविकता यह है कि मनुष्य के भटकाव सम्बन्धी रहस्य से भगवान् का कोई सम्बन्ध नहीं इसके लिये उसे दोष लगाना या अपने कष्ट-क्लेशों के कारण का दायित्व उसके कन्धों पर डालना सर्वथा अनुचित एवं अशोभनीय है।
धर्म-ग्रन्थों में जिसको माया कहकर पुकारा गया है और जिसकी भूरि-भूरि भर्त्सना की गई है और मनुष्यों को उससे बचे रहने के लिये पग-पग पर चेतावनी तथा उपदेश दिया गया है, वह और कुछ नहीं, मनुष्य की अपनी त्रुटि, दुर्बलता, अविद्या, मूर्खता अथवा अदूरदर्शिता ही है। किन्तु खेद है कि मनुष्य अपनी कमी का दायित्व भगवान पर डालता रहता है। अपना दोष दूसरों पर थोपने का स्वभाव स्वयं एक विडम्बना है, जिससे सत्य-असत्य, वास्तविकता-अवास्तविकता का बोध नहीं हो पाता। मनुष्य अपने को निर्दोष कल्पना किये रहता है, जिसके फलस्वरूप अपने सुधार से विरत रहकर दंड भोगा करता है।
संसार में मनुष्य जीवन की दो ही गतियाँ मानी गई हैं। एक उत्थान, दूसरी पतन। मनुष्य इनमें से कोई भी एक उत्थान अथवा पतन की गति अपने लिये निर्धारित कर सकता है। वह चाहे तो मानवता का पूर्ण विकास कर उसकी आदर्श महानताओं को अपनाकर देवत्व तक उठ जाए और स्वर्गीय सुख की परिस्थितियों का आनन्द प्राप्त करे अथवा उसके विपरीत मनुष्यता का त्याग कर पशुत्व को अपनाने और असुरता की स्थिति में गिरकर अशाँति, असन्तोष अथवा शोक-सन्तापों की नारकीय परिस्थिति में विविध यातनायें भोगे। ऐसा करने के लिये कोई भी एक स्थिति चुनने के लिये, वह पूर्ण स्वतन्त्र है। यह सर्वथा उसके विवेक विचार पर निर्भर है कि वह अपने लिये स्वर्ग का निर्माण करता है अथवा नर्क भोगने की योजना कार्यान्वित करता है।
संसार में कदाचित ही कोई ऐसा हतबुद्धि मनुष्य मिले जो जानबूझ कर नरक भागने की इच्छा करता हो, अन्यथा आबाल, वृद्ध, स्त्री-पुरुष अपने लिये स्वर्गीय सुख की कामना करते हैं। किन्तु यह देखकर कम आश्चर्य नहीं होता कि अधिकाँश लोग नर्क की ओर ही बढ़ते और पढ़ते दिखाई देते हैं।
इन दोनों विपरीत अवस्थाओं के दो मार्ग परस्पर विपरीत दिशाओं में ही जाते हैं, जिन पर चलकर मनुष्य स्वर्गीय अथवा नारकीय परिस्थितियों अथवा उत्थान-पतन की अवस्था में पहुँचता है। उन दोनों में से एक स्वार्थ का और दूसरा परमार्थ का मार्ग है। इन्हीं को शास्त्रीय भाषा में ‘प्रेय’ अथवा ‘श्रेय’ पथ भी कहा गया है। इनमें से स्वार्थ अथवा प्रेय मार्ग मनुष्य को पतन की ओर और परमार्थ अथवा श्रेय मार्ग उत्थान की ओर ले जाता है।
प्रेय पथ के पथिक की दृष्टि बड़ी ही संकुचित और विचार बहुत ही संकीर्ण होते हैं। उसकी दृष्टि सदैव तात्कालिक लाभ की ओर ही लगी रहती है। फिर वह लाभ कितना ही छोटा, ओछा और भविष्य के लिये कितना ही भयप्रद क्यों न हो, उसके संकीर्ण विचार उसे त्याग कर भविष्य के बड़े और ऊंचे लाभ के लिये प्रतीक्षा करने में विश्वास नहीं रखते। संसार के छोटे-छोटे प्रलोभनों पर वह पग-पग पर फिसलता रहता है। उसमें उस किसान जैसा धैर्य नहीं होता है। जो प्राप्त थोड़े से बीजों को तत्काल खा-पीकर बराबर न करके उन्हें खेतों में बोता है और एक लम्बे समय तक खून-पसीना एक करके उनका पोषण करता है- भविष्य में समय आने पर उनका सैकड़ों गुना लाभ उठाकर एक बड़ी फसल काटता है- इस प्रकार एक स्थायी लाभ की व्यवस्था कर लेता है। उसमें उस माली जैसी बुद्धिमता नहीं होती, जो अपने पौधों की एक लम्बे समय तक सेवा करता रहता है और जिसके फलस्वरूप फल-फूलों का प्रचुर लाभ उठाया करता है। उसमें उस विद्यार्थी जैसी कष्ट सहिष्णुता एवं दूरदर्शिता नहीं होती, जो दसवीं कक्षा के बाद ही मिलती है, छोटी सी- नौकरी के प्रलोभन में न आकर एम. ए. तक शिक्षा प्राप्त करता है और आगे चलकर किसी उच्च एवं संतोषप्रद पद का अधिकारी बन जाता है। तात्कालिक लाभ के लोलुप और दूर के उन्नत एवं उज्ज्वल भविष्य की ओर न देखने वाले प्रेय-पथ के ही पथिक हुआ करते हैं, जो पग-पग पर फिसलते गिरते हुये जीवन समाप्त कर देते हैं और किसी प्रकार की उन्नति के अधिकारी नहीं बन पाते।
श्रेय पथ के पथिक दूर दृष्टि से काम लेते हैं, वे वर्तमान में वही करते और वही अपनाते हैं, जो उनके भविष्य को अधिकाधिक उन्नत एवं उज्ज्वल बनाने में उपयोगी होता है। वर्तमान के तात्कालिक लाभ का लोभ उन्हें विचलित नहीं कर पाता। वे अच्छी तरह जानते हैं कि वर्तमान का अपना कोई अस्तित्व नहीं है, वह तो केवल भविष्य की भूमिका उसकी आधार शिला मात्र है। वर्तमान में जो कुछ किया जाता है। उसका परिणाम भविष्य में ही प्राप्त होता है।
वर्तमान का परिश्रम तत्काल कोई लाभ नहीं देता। उसका लाभ भविष्य में ही प्राप्त होता है। वर्तमान का भोग, तत्काल किसी प्रकार की हानि प्रदर्शित नहीं करता। उसकी सारी हानियाँ भविष्य में ही सामने आती हैं। जवानी का संयम तथा संचय किया हुआ स्वास्थ्य भविष्य का संबल बनता है। श्रेयकामी व्यक्ति आरम्भ में तप, त्याग, परिश्रम, पुरुषार्थ का कष्ट उठाते हैं, वे इनका विनिमय छोटे-छोटे लाभों से नहीं करते चलते, वे छोटे-छोटे लाभों को त्याग कर भविष्य का कोई बड़ा लाभ, कोई उच्च श्रेय प्राप्त करने के लिये पर्याप्त धैर्य तथा सहिष्णुता रखते हैं। उन्हें सुख भोगने सुख पाने और लाभ उठाने की कोई शीघ्रता नहीं होती है।
प्रेम प्रधान पुरुष शरीर तथा पदार्थों को उपभोग की वस्तु समझता है और लगे हाथ उन्हें भोगता हुआ क्षीण करता चलता है और अन्त में जाकर खाली हाथ हो जाता है, बिना कुछ किये और लिये काल-कवल बनकर संसार से चला जाता है। जहाँ प्रेयवादी शरीर और विषयों के संयोग से क्षणिक सुखों की आराधना करते हैं, वहाँ श्रेय का श्रद्धालु उनके संयोग से योग की साधना में तत्पर रहता है वह शरीर तथा वस्तुओं के संपर्क से तपपूर्ण कर्मों की योजना करता है और उनके फल को अक्षय परिपाक के लिये बिना भोगे, छोड़ता चलता है। वह संसार के विषय से लेकर उपासना तक के सारे कर्तव्य अभोगी वृति से करता हुआ भविष्य के स्वर्ग का निर्माण करता चलता है। वह न तो इतना लोलुप होता है ओर न अधैर्यवान् कि तुरन्त के छोटे-छोटे लाभों तथा सुखों का भोग लिये बिना चैन से न रह सके।
श्रेय साधक बड़ा ही सूक्ष्म, दूर, स्पष्ट तथा यथार्थवादी होता है। वह संसार की जादू नगरी में चारों और फैले प्रलोभनों, छलनाओं तथा मरीचिकाओं से सदा सजग तथा सावधान रहता है। वह अपनी वृत्तियों को विवेक बल से पूरी तरह वश में रखता है। उन्हें इतनी छूट ही नहीं देता कि वे अबोध मृग की भाँति मरीचिका में अथवा लुब्ध मछली की भाँति चारा देखकर मछुये के काँटे में कण्ठ फंसाकर मृत्यु का मेहमान बन जायें। वह अच्छी तरह जानता है कि संसार में यह जो मनमोहन रूप, शृंगार और सौन्दर्य दिखलाई देता है वह सब धोखा है। इसके पीछे यथार्थ का कोई तत्व नहीं है। इन पर मूढ़ पतंगे की भाँति प्राण निछावर कर देना, आत्म प्रवंचना के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। यह हाड़-माँस गन्दगी गलीज के पंजर पर चमक-दार पत्री भर चढ़ी हुई है। जो कुछ ही समय में उतर जायेगी और फिर उसकी उपासना में त्यागे अपने सारे श्रेयों के लिये पश्चाताप के अतिरिक्त कुछ भी प्राप्त न होगा।
वह सोने चाँदी और धन-दौलत की असलियत से अच्छी तरह परिचित होता है। इसलिये इनका चमत्कार भी उसे भूला-भटका नहीं पाता। उसे पता रहता है कि धन का आवश्यकतानुसार उपार्जन और उसका सीमान्त सदुपयोग ही इसका उचित मूल्य एवं महत्व है। इसके अतिरिक्त इसका संचय अथवा अपव्यय दोनों ही व्यर्थ विडम्बनाएं हैं जिसमें फंसकर मनुष्य-मनुष्य न रहकर न जाने क्या बन जाता है। इसके अपव्ययी, अपकारी, व्यसनी, व्यभिचारी, अत्याचारी आदि कुछ भी बन सकता है। इसका संचयी शोषक, क्रूर, धूर्त, अन्यायी भ्रष्टाचारी आदि किसी भी कुरूप को धारण कर सकता है इसके अपव्ययी जहाँ आगे चलकर अभाव अथवा अकाल की मौत मरते हैं। पाई-पाई के लिये हाथ फैलाते और रिरियाते हैं ,वहाँ संचयी जाते समय हसरत भरी निगाह से इसे टुकर-टुकर देखा करते हैं और जमा की हुई उनकी दौलत अपनी प्रभा में मुस्काती हुई कहा करती है- तुम्हारे जैसे न जाने कितने मूर्ख यों ही मुझे हसरत भरी निगाह से टुकुर-टुकुर देखते हुये, इस संसार से कूच कर गये और मैं इसी संसार में इसी जादुई नगरी में एक के बाद एक उत्तराधिकारियों के हाथों में खेलती और उनकी प्रेम व पूजा की अधिकारिणी बनती रही और आगे भी बनती रहूँगी। मेरा जादू सच्चा जादू है। मैंने तुम्हारे जैसे न जाने कितने अदूरदर्शी पथिकों को श्रेय पथ से विचलित कर पतन के मार्ग पर डाल दिया है और जो भी असावधान होकर चलेगा उसे डालती ही रहूँगी।
श्रेयवादी इतना दृढ़, धीर, वीर और साहसी होता है कि संसार का कोई जादू उस पर कारगर नहीं होता। उसका सम्बन्ध स्वार्थ से नहीं, परमार्थ से होता है। भोग से नहीं, योग से रहता है। वह शरीर को भोग की वस्तु नहीं पर सेवा का साधन समझता है। सम्पत्ति का उसकी दृष्टि में इतना ही महत्व होता है कि उससे अपनी सामान्य आवश्यकतायें पूरी कर ली जायें और शेष को परोपकार, दान-पुण्य और लोक-रंजन में लगा दिया जाये। वह लोक नहीं परलोक संग्रह में विश्वास करता है। जिसके फलस्वरूप वह लोक में यश और परलोक में सद्गति का अधिकारी होता है। उसकी आत्मा दिन-दिन उन्नत होकर देवत्व की सीमा में पहुँच जाती है और वह युग-युग तक लोक में सुख संतोष का, स्वर्ग का आनन्दपद भोगता है। जबकि प्रेय पथ का अबोध पथिक छोटे-छोटे भोगों, नगण्य सुखों और तुच्छ स्वार्थों की शंख-सीपियाँ संचय करता हुआ, इसी भवसागर में घड़ियाली तथा मगरमच्छ जैसे भयानक प्रलोभनों के बीच मर-खपता और डूबता उतरता रहा करता है।
----***----
कथा-
“प्रजा महर्षि यज्ञदीति को सर्वाधिक सम्मान देती है, यहाँ तक ठीक है महाराज! शिक्षक ही समाज का निर्माण करता है, इसलिये वह वस्तुतः सबसे अधिक आदर देने योग्य है, किन्तु आचार्यगण राजकीय व्यवस्था की आलोचना करें, यह सही नहीं। महाराज! शिक्षा राजनीति का आश्रित अंग है, राजनीति शिक्षा की आश्रित नहीं। शिक्षकों को राजतन्त्र की आलोचना करने या मार्ग-दर्शन करने का कोई अधिकार नहीं।” महामन्त्री आँत्रेष्टक आवेश में बोले चले जा रहे थे।
महाराज पिष्टिपाद ने रोकर पूछा- “तुम्हारा आशय क्या है, महामन्त्री, वह कहो- क्या तुम यह चाहते हो कि आचार्य यज्ञदीति के गुरुकुल में अध्यापन करने वाले आचार्यगणों को दण्डित किया जाये?”
नहीं महाराज! आँत्रेष्टक ने छलबाज जुआरी का सा विश्वस्त दाँव फेंकते हुये कहा- “मेरी ऐसी कुछ इच्छा नहीं पर यदि प्रजा ने राज्य के प्रति विद्रोह कर दिया तो? कैसे भी हो आचार्यों को राजनीति का आश्रित होना ही चाहिये। मेरा तो यह सुझाव भर है कि समस्त गुरुकुलों को दी जाने वाली राजकीय सहायता समाप्त कर दी जाये। जब भूख सतायेगी तो यह आचार्य अपने आप सीधे हो जायेंगे।
महाराज पिष्टिपाद कुछ चिन्तित स्वर में बोले- “यह न भूलो महामन्त्री तुम्हारी योग्यता भी इन गुरुकुलों की ही देन है। यदि उनके साधन समाप्त कर दिये गये तो आज देश में जो प्रतिभायें हैं, प्रज्ञाएं, तेजस्विता है, ज्ञान और विज्ञान है, वह नष्ट हो जायेगा।
राज्य को अराजकता से बचाने और आपके सम्मान को सुरक्षित रखने के लिये यदि प्रतिभाओं के स्त्रोत बन्द करने पड़े तो बुरा क्या है महाराज!” महामन्त्री की यह तुष्टिकरण नीति आखिर काम कर गई। दाँव ठिकाने पर लगा। पिष्टिपाद ने घोषणा करा दी - अब आगे किसी भी गुरुकुल को राजकीय सहायता नहीं मिलेगी। अब तक दी गई सारी गायें, अन्न और वस्त्र छीन, अविलम्ब लौटा दिए जाएं।
देखते ही देखते आश्रमों के सारे साधन छिन गये। स्थिति गम्भीर हो चली। विद्यार्थियों का भरण-पोषण तो भिक्षाटन से किया जा सकता था पर आचार्य क्या करते?
महर्षि यज्ञदीति की अध्यक्षता में आचार्यों का सम्मेलन बुलाया गया। सर्वसम्मति से यह निश्चित किया गया कि महर्षि स्वयं ही महाराज के पास जायें और उन्हें वस्तुस्थिति से अवगत कराकर राजकीय-वृत्ति पुनः प्रारम्भ करायें।
महर्षि यज्ञदीति गये भी किन्तु महामन्त्री आँत्रेष्टक की धूर्तता के आगे उनकी एक न चली। यज्ञदीति राजधानी से खाली हाथ लौटे। पर मार्ग में उन्होंने निश्चय कर लिया- “शिक्षा प्रजा की अपनी आवश्यकता है, राजतन्त्र के दबाव में उसे नष्ट नहीं किया जा सकता। प्रजा उस आवश्यकता को अनुभव करेगी तो स्वयं ही आगे बढ़कर सहायता करेगी। गुरुकुल बन्द कदापि नहीं होंगे। देश को निरक्षरता के कलंक में धकेला नहीं जायेगा।
यज्ञदीति यही सोचते हुये जैसे ही अपने पर्णकुटीर में पहुँचे देखा कि उनका नन्हा-सा बालक पृथ्वी पर लोट रहा है। क्षुधार्त बालक माँ के समझाने से भी नहीं मान रहा। मानता कैसे आज कई दिनों से पर्याप्त भोजन न मिलने के कारण उनके स्तनों में भी तो दूध नहीं आ रहा था।
यज्ञदीति की आंखें भर आईं- “जो सारे समाज का हित-चिन्तन करते हैं, समाज क्या उन्हें इसी स्थिति में रखेगा।” पर वे मनस्वी महात्मा थे। परिस्थितियों से विचलित होना यज्ञदीति के स्वभाव में नहीं था। उन्होंने धर्मपत्नी के कान में कुछ कहा- “पत्नी भीतर गई और एक कटोरे में कुछ ले आई, बच्चे ने प्रसन्नतापूर्वक दूध पी लिया और खेलने गया। उस बेचारे को क्या पता था कि श्वेत रंग दिया हुआ तरल पदार्थ दूध नहीं चावल के आटे का घोल है।
आचार्य गण पिष्टिपाद के निर्णय से बड़े निराश हुये पर गुरुकुल बन्द न किये जायें, इस बात पर सब एकमत थे। प्रातःकाल सभी विद्यार्थियों को भिक्षाटन के लिये भेजा गया। किन्तु प्रजा ने कहा- “जो शिक्षा बालकों को भिखारी बनाती है, उस शिक्षा से अच्छा है, बच्चे अनपढ़ घरों में रहकर परिश्रम से उपार्जित अन्न ग्रहण करें। भीख माँगना मानवीय शक्ति और परमात्मा का अपमान करना है। अध्यात्म, धर्म, शिक्षा और संस्कृति के नाम पर उस अनात्म कृत्य का पोषण नहीं किया जा सकता।
ब्रह्मचारी खाली हाथ गये थे और लौटे तब भी हाथ खाली ही निकले। एक बार तो ऐसा लगा कि अब विद्यालय बन्द हो जायेंगे। किन्तु आचार्य अभी भी साहस हारने को तैयार न थे। राज्य की शिक्षा और संस्कार परम्परा को बनाये रखने के लिये वे प्रत्येक तितिक्षा पर कसे जाने के लिये तैयार थे।
विद्यार्थियों के लिये यह नियम बनाया गया कि अपनी व्यवस्था के लिये वे अपने अभिभावकों का आश्रय लें। इधर आचार्यों ने अपने लिये आश्रम में ही फल-फूल, शाक और अन्न उगाकर पेट पालन करना प्रारम्भ कर दिया। मुसीबतें आईं पर विद्यालय एक दिन के लिये भी बन्द न हुये। आचार्य कौपीन पहन कर रहने लगे पर अध्यापन एक दिन भी बन्द न किया। आचार्य पत्नियों के पास जो मंगल-सूत्र थे, विक्रय कर आश्रम के लिये गायें मंगा ली गईं, उनके दाने-चारे का प्रबन्ध भी वे स्वतः करने लगीं पर उन्होंने आचार्यों के अध्ययन व अध्यापन में थोड़ी भी रुकावट न आने दी।
अभाव तो आखिर अभाव ही थे। आश्रमों के पास इतनी भूमि भी तो नहीं थी कि उससे आचार्यों और उनके आश्रित स्त्री-बच्चों को पेट भर अन्न मिलता रहता। महर्षि यज्ञदीति समय निकालकर स्वयं भी जंगल जाया करते और बन पड़ता उतनी सूखी लकड़ियां काटकर लाया करते। यह कार्य वे दूसरों की आँख बचाकर करते, जिससे विद्यार्थियों के अध्ययन में अवरोध न आने पाये।
शरीर कृश पहले ही था, भूख ने रही सही शक्ति भी तोड़ दी। यज्ञदीति ने लकड़ी का बोझ उठा तो लिया, किन्तु दो पग भी आगे नहीं बढ़ सके। आँखों के आगे अंधेरा छा गया, पैर लड़खड़ा गये और वे वहीं सिर के बल गिर पड़े।
देखते-देखते ग्रामवासियों की भीड़ एकत्रित हो गई। जल के छींटे लगाये गये। महर्षि की चेतना लौटी पर थी वह शून्य में ही। वे बुदबुदाये- “हे प्रभु! जब तक शिक्षा और संस्कृति के आधार यह गुरुकुल स्वावलम्बी और साधन सम्पन्न नहीं हो जाते, तब तक मैं बार-बार जन्म लेता रहूँ। बार-बार गुरुकुलों की सेवा करता रहूँ।” इन शब्दों के साथ ही महर्षि यज्ञदीति ने अपना यह नश्वर शरीर छोड़ दिया।
ग्राम वासियों और नगर-निवासियों में यह समाचार वर्षाकालीन मेघों के समान सर्वत्र, पल भर में फैल गया। एक ओर चिता प्रज्ज्वलित हो रही थी, उस पर महर्षि का पार्थिव शरीर फूँका जा रहा था, दूसरी ओर प्रजा साधनों से आश्रमों के आँगन पाट रही थी। लोगों ने संकल्प कर लिया था- शिक्षा और संस्कृति हमारी अपनी आवश्यकता है, राजतन्त्र उसे सहायता नहीं देता तो न दे पर हम नागरिक उन्हें साधन-हीन नहीं रहने देंगे।
प्रतिशोध ने डाँटते हुये धैर्य से कहा- “बन्धु! आप जैसे कायर के साथ रहने में मेरी शान घटती है, आप मेरे साथ न रहें तो ही अच्छा।”
धैर्य ने साथ छोड़ दिया, तभी से एकाकी प्रतिशोध भयंकर काण्ड करता हुआ संसार में विचरण कर रहा है।
दक्षिणी अटलाँटिक महासागर के कुछ नाविक अपनी नौकायें जलतरण कराने वाले थे, तभी उन्होंने देखा एक मादा कछुआ, जिसकी लम्बाई लगभग पाँच फुट और वजन कोई 900 पौण्ड था, एसंशन द्वीप की ओर जा रही है। ‘एसंशन’ कुल पाँच मील क्षेत्रफल का छोटा-सा द्वीप है। नाविक कछुये के पीछे चलते चले गये। मादा टापू पर पहुँची। एक छोटा-सा गड्ढा खोदा उसमें 100 अण्डे दिए और उन्हें रेत से ढ़क दिया। अण्डों को सुरक्षित जान कर वह वहाँ से फिर लौट पड़ी। अब वह हजार मील की यात्रा कर ब्राजीलियन समुद्र तट पर पहुँच गई। इधर अंडे अपने आप पकते रहे।
ढाई, तीन वर्ष बाद वही मादा फिर गर्भवती हुई और फिर उसी ‘एसंशन’ द्वीप की ओर चल पड़ी। ठीक उसी दिशा में चलती हुई वह मादा कछुआ उसी गड्ढे के पास पहुँची और फिर वहीं अंडे दिए। बिना किसी यन्त्र के इतनी दूर के स्थान तक पहुँचना आश्चर्य का विषय था। जब वैज्ञानिकों ने उसकी खोज की तो उन्होंने और भी आश्चर्यजनक रहस्यों का पता लगाया।
उन्होंने देखा कि कछुआ अंडे रखने के इस स्थान को एक विशेष प्रकार की गंध और विद्युत चुम्बकीय तरंगों से पहचानती है, यह तरंगें उसके मस्तिष्क से निकलती थीं और उसे न केवल उस स्थान तक पहुँचा देती थीं वरन् उसकी विद्युत चुम्बकीय शक्ति के द्वारा वह अपने इन अंडों का हजार मील की दूरी होने पर भी पकाती रहती थी। यदि यह मादा मर जाय तो फिर उसका दिया हुआ एक भी अंडा न पकेगा। मानसिक शक्ति का यह चमत्कार पहली बार वैज्ञानिक की समझ में आया।
शरीर में स्थित आत्मा के व्यवहार के लिए यद्यपि पाँच कर्मेन्द्रियाँ और पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं पर वह स्थूल होने से केवल भौतिक प्रयोजन ही पूरा करती हैं इनकी क्षमता सीमित है। ग्यारहवीं इन्द्रिय या शक्ति मन है, जिसके द्वारा आत्मा अपनी इच्छायें और संकल्प व्यक्त करती है। यह मन इतनी जबर्दस्त शक्ति है कि आत्मा को भी इच्छाओं के जाल में बाँधकर लोक-लोकान्तरों में बाँधे फिरती है। मन की इस चंचलता को वश में करना संकल्प के ही बूते की बात है। संकल्प आत्मा की जय-शक्ति है। आत्मज्ञ पुरुष इसीलिये संकल्पवान भी होते हैं या यों कहें कि संकल्पशील अर्थात् प्रत्येक सत्य का निष्ठापूर्वक पालन करने वाले ही आत्मा को जानते हैं, ‘संशयात्मा विनश्यति’ अर्थात् जिनके संकल्प डाँवाडोल होते हैं, वे तो अपना ही विनाश करते हैं।
भारतवर्ष में ऐसी अनेक कथायें प्रचलित हैं, जिनमें किन्हीं महापुरुषों द्वारा वर्षा रोक देना, बहते हुए जल-प्रवाह को खण्डित कर देना, पत्थर खण्ड को उठा देना आदि का व्याख्यान होता है। सर आडियार ने एक दक्षिणी साधु गोविन्द स्वामी का वर्णन करते हुए लिखा है कि - जल से भरे हुए घड़े को जब स्वामी जी आदेश देते तो वह पृथ्वी से डेढ़ फुट तक ऊँचा उठ जाता था। महर्षि गालब ने प्यासे आश्रम-वासियों को मरते देखा तो पर्वत को फाड़कर जल देने का आदेश दिया। कहते हैं उन्होंने जैसे ही अपना संकल्प व्यक्त किया पहाड़ के भीतर से जल धारा फूट निकली।
यह स्थान जयपुर में आज भी ‘गलता जी’ के नाम से बना हुआ है। पहाड़ की अदृश्य खोहों से वर्ष भर जल निःसृत होता रहता है। पहाड़ के ऊपरी सिरे से कहाँ से जल निकलता है, यह बड़े आश्चर्य की बात है पर यह है सत्य कि वहाँ वर्ष भर पानी निकलता रहता है। हजारों भक्त दर्शनार्थी प्रति दिन वहाँ जाते और स्नान करते हैं।
इन गाथाओं को जब तक भारतीय योगियों तक ही सीमित माना गया, तब तक वैज्ञानिक और दूसरे पढ़े-लिखे तर्कशील लोग उसे कपोल कल्पना कहते रहे पर पिछले दिनों जब रूस की एक महिला ने भी अपनी इच्छा-शक्ति का प्रदर्शन किया और केवल दृढ़ इच्छा से घड़ी की सुइयों को आगे-पीछे कर दिया, तब वैज्ञानिकों का ध्यान तेजी से आकृष्ट हुआ और उन्होंने खोज करके यह पाया कि जिस समय एकाग्र भाव से किसी क्रिया का चिन्तन किया जाता है तो मन से विद्युत चुम्बकीय तरंगें फूट पड़ती हैं। ठीक विद्युत धारा के समान इसमें भी धन और ऋण (पॉजिटिव एण्ड निगेटिव) अयन होते हैं। इन तरंगों में इच्छा शक्ति के अनुरूप लम्बाई कुछ फीट से हजारों मील दूरी तक की हो सकती है, जितनी तीव्र इच्छा-शक्ति होगी, वह उतनी ही दूरवर्ती पदार्थ को भी प्रभावित कर रही होगी। इन प्रारम्भिक जानकारियों को लेकर आज पश्चिमी देशों में व्यापक खोज प्रारम्भ कर दी गई है, जब हमारे देशवासी ध्यान की एकाग्रता जैसी महत्वपूर्ण योग प्रणाली को भूलते जा रहे हैं।
संकल्प आत्मा की शक्ति है, जिसका व्यवहार मन द्वारा स्फुट कार्यों में होता रहता है और उसके लाभ भी वैसे ही फुटकर मिलकर रह जाते हैं। साधारण लोगों को किसी भी उद्यम-उद्योग में इसीलिये कोई उल्लेखनीय सफलता नहीं मिल पाती, क्योंकि उनका ध्यान विशृंखलित और अधूरा होता है वह वही काम जब दत्तचित्त पूरे मन से किया जाता है तो मानसिक विद्युत तेजी से प्रकीर्ण होने लगती है और उस कार्य से सम्बन्धित अनेकों ऐसी सूक्ष्म बातें सूझने लगती हैं, जिनसे सफलता की संभावना भी बहुत अधिक बढ़ जाती है।
आत्मा यदि यह गुण छोड़ दे तो शरीर जीवित न रहे इसलिए विचार प्रणाली अत्यावश्यक है। मस्तिष्क सम्बन्धी आपरेशनों की सबसे बड़ी बाधा यही है कि उससे लगातार उत्पन्न होने वाली विद्युत तरंगें रुक जाती हैं। इन तरंगों को रुकना नहीं चाहिये और न ही उसमें गड़बड़ी आनी चाहिये। आशंकित मस्तिष्क में विद्युत प्रक्रिया अस्त-व्यस्त हो जाती है अर्थात् सोचने, समझने की शक्ति का ह्रास हो जाता है पर यदि मन को इतना वशवर्ती बना लिया गया हो कि यह विद्युत धारा अपनी ही दिशा में बहती रहे चोट या घाव की ओर वह न मुड़े तो उसे कष्ट और पीड़ा का भान ही न हो। न्यूकैसिल के योगी ने कुछ दिन पूर्व सलीब पर जीवित चढ़कर यह दिखा दिया कि कष्ट विचार प्रणाली की अस्त-व्यस्तता मात्र है, यदि अपना संकल्प दृढ़ हो तो उसे किसी भी प्रिय वस्तु पर आरोपित करके अप्रिय कल्पना को ही ठुकराया जा सकता है।
लोकमान्य तिलक के अंगूठे का आपरेशन होना था। डॉक्टर क्लोरोफार्म लेकर पहुँचे। “इसे सुँघाकर बेहोश करेंगे, ताकि आपरेशन में आपको कष्ट न हो।” डाक्टरों के यह कहने पर तिलक हंसे और बोले- “उसकी आवश्यकता नहीं, तुम मुझे गीता की एक प्रति ला दो।” डाक्टरों ने उन्हें गीता दे दी। कुछ ही क्षणों में गीता पढ़ने में वे इस तरह तल्लीन हो गये कि उन्हें कब आपरेशन हो गया इसका पता ही न चला।
अपना संकल्प इतना दृढ़ हो कि हम कोई और वस्तु सोचें ही नहीं तो अनेक निराधार भय और कल्पनाओं को दूर किया जा सकता है, एक ही दिशा का सूक्ष्म से सूक्ष्म ज्ञान भी प्राप्त किया जा सकता है।
अब इस बात को डॉ. और वैज्ञानिक भी जानने लगे हैं। उनकी जानकारी तो यहाँ तक पहुँच चुकी हैं कि यदि किसी व्यक्ति का अपना मनोबल काम ने दे तो उसे कछुए की तरह का कोई अधिक संकल्पशील व्यक्ति सम्मोहित (हिप्नोटिज्म) करके भी काम निकाल सकता है। इन्डियानापोलिस (अमेरिका) के एक अस्पताल में एक ऐसा व्यक्ति आया जिसके सर में गोली लगी थी। व्यक्ति बहुत घबराया हुआ था, इसलिये सीधे मस्तिष्क का आपरेशन नहीं हो सकता था। फलस्वरूप उस व्यक्ति को सम्मोहित करके गहरी निद्रा में लाया गया। निद्रा की अवस्था में ज्ञान-शून्य विचार शृंखला चलती रहती है, इसलिये मृत्यु का भय नहीं रहता। आपरेशन अच्छी तरह सम्पन्न हुआ। अन्त में डाक्टरों ने लिखा कि ऐसी सुविधा उन्हें और किसी भी आपरेशन में नहीं हुई।
यह संकल्पशक्ति अत्यन्त स्थूल लाभ है। ध्यान और जप के माध्यम से प्राणायाम और प्रत्याहार आदि योग साधनाओं के माध्यम से सिद्ध होने वाला संकल्प तो इतना सूक्ष्म और शक्तिशाली है कि आत्मा उससे अपनी घोर से घोर शत्रुओं से रक्षा, प्रहार, दूर-दर्शन, दूर श्रवण आदि अलौकिक प्रयोजन सम्पन्न कर सकती है। यह आत्मा अपना वैभव संकल्प शक्ति द्वारा ही प्रकट करता है। इस अनुभव के आधार पर ही वेद में कहा गया है-
यो वः शुष्मो हृदयेष्वन्तराकूतिर्या वो मनसि प्रविष्टा। तान्सीवयामि हविषा घृतेन मयिसजाता रमतिर्वो अस्तु॥
-अथर्व वेद 6।73।2,
अर्थात्- हृदय का बल और मन का संकल्प एक कार्य में लगते हैं तो प्रत्येक कार्य उत्तम रीति से पूर्ण हो सकता है। हृदय और मन का एक भाव होकर सबके मन में स्नेहपूर्ण भाव जगने लगें तो लोगों में जो जातीयता होती है, वह विलक्षण संघ बल उत्पन्न करती है। अर्थात् संकल्प शक्ति से ही राष्ट्र, जाति और संस्कृति अजेय बनते हैं।
भिशक अनंगपाल के लिये यह कोई नई बात नहीं थी। वे जिस जल से स्नान करते थे, उसमें तो प्रत्येक ही दिन कोई न कोई इत्र, चन्दन, अगरु, केवड़ा या गुलाब की सुवास मिलाई जाती थी पर जो मादकता और मधुरता आज के जल में थी, वह कभी भी नहीं मिली थी।
विस्मित महाराज भिशक अनंगपाल ने परिचालिका को बुलाया और पूछा- आज जल-कलश में कौन सी सुवास मिलाई गई है। परिचालिका किसी अज्ञात भय से स्तब्ध हो गई। उसने कहा- क्षमा करें, महाराज! आज एक नई परिचारिका, जो कल ही नियुक्त की गई है, ने स्नान का प्रबन्ध किया था, आज्ञा हो तो सेवा में उसे ही उपस्थित करूं।
महाराज भिशक अनंगपाल ने उस दूसरी परिचारिका को बुलाकर पूछा तो वह सहास बोली- महाराज! उस जल में तो कुछ भी नहीं मिलाया गया। हाँ वह जल मैं स्वयं ही अपने साथ अपने मायके से लाई थी।
मायके से। महाराज की उत्सुकता और भी बढ़ी, उन्होंने पूछा- बताओ परिचारिके तुम्हारा पितृगृह कहाँ है, क्या यह जल किसी कुएं का है या पद्म-पुष्पित किसी सरोवर का?
नहीं, नहीं महाराज! ऐसे किसी स्थान का जल नहीं था वह। मेरा घर गन्धमादन पर्वत की तलहटी पर है और यह जल जो मैं अपने साथ लाई।
वह तुम्हारे पिता का तैयार किया हुआ है भद्रे! अच्छा यह तो बताओ, तुम्हारे पिता गन्धी तो नहीं हैं, महाराज ने बीच में ही बात काटते हुये पूछा। परिचारिका बोली- महाराज यह जल मेरे पिता का तैयार किया हुआ नहीं है। मेरे ग्राम के समीप एक आश्रम है। वहाँ एक योगी रहते हैं। आश्रम के समीप ही एक कुण्ड है, जो वर्ष भर जल से भरा रहता है, यह जल उसी कुण्ड का है। मैं उसे विशेष रूप से आपके लिये ही लाई थी।
भिशक अनंगपाल की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। नव-परिचारिका को पर्याप्त पारितोषिक दे वे उस आश्रम की ओर चल पड़े। दो दिन की अनवरत यात्रा के बाद सब लोग उस आश्रम जा पहुँचे। महाराज ने वहाँ पहुँचते ही अनुभव किया कि यहाँ की तो प्रत्येक वस्तु उसी सुगन्ध से परिपूर्ण दिखाई देती है। महाराज बड़े आश्चर्यचकित हुये। सत्वर ही योगी को प्रणाम कर उन्होंने पूछा- महात्मन्! आपके आश्रम में यह भीनी-भीनी सुगन्ध कहाँ से आ रही है।
योगी ने हंसकर कहा- महाराज! एक वृक्ष यहाँ से सौ योजन दूरी पर इसी पर्वत पर है, मैं सदैव उसका ध्यान करता रहता हूँ, आश्रम उसी की सुगन्ध से अहिर्निश गूँजा करता है।
“केवल स्मरण मात्र से ऐसा होना बड़ी कठिन बात है महात्मन्!” आप समझ भी नहीं सकते, यह सब संकल्प चमत्कार है। संकल्प-बल से व्यक्ति अपने जीवन को ही नहीं, प्रत्युत्तर अपने वातावरण को भी जैसा चाहे, वैसा ही बना सकते हैं, महाराज!” महाराज को वह पुष्प तो नहीं मिल सका पर जो तत्व-ज्ञान लेकर लौटे वह उससे भी महत्वपूर्ण था।
‘स्टार्ट’- एस, टी, ए, आर, टी कुल पाँच अक्षरों का उच्चारण करना भर था कि पाँच-सात मन भार की कार धड़-धड़-धड़-धड़ करने लगी। ‘गो’ अगला शब्द एक व्यक्ति के मुख से निकला और जी तथा ओ इन दो शब्दों ने न जाने क्या चमत्कार दिखाया कि स्वामिभक्त सेवक की भाँति कार सड़क पर चल पड़ी। देखते ही देखते कार पूरी स्पीड में थी। बिना किसी ड्राइवर के कार यों खुली सड़क पर जा रही थी, तभी सामने से कोई वाहन आता दिखाई दिया और तभी एकान्त में बैठे उन्हीं सज्जन ने आदेश दिया ‘हाल्ट’- एच,ए,एल,टी, कुल चार अक्षरों से एक कोई जादू निकला और कार जहाँ थी, वहीं जाम होकर खड़ी की खड़ी रह गई।
यह पंक्तियाँ पढ़ने तक किसी भी पाठक को भ्रम हो सकता है कि कहीं किसी जादू या हाथ की सफाई का खेल दिखाया जा रहा होगा, यह वर्णन उसी समय का होगा पर वस्तुस्थिति यह नहीं। यह एक विधिवत् सम्पन्न कार्यक्रम था, जिसे ग्राहम और नील नामक दो आविष्कारकों ने प्रस्तुत किया था। प्रदर्शन आस्ट्रेलिया के मेलबोर्न नगर की एक भारी भीड़ वाली सड़क पर हुआ था। शब्द में कितनी सामर्थ्य है, यह देखने के लिये लाखों की भीड़ एकत्रित थी।
एक व्यक्ति के शब्दों और संकेतों पर निर्जीव कार काम कर रही थी, उसके पीछे विज्ञान का एक सिद्धान्त काम कर रहा था। शब्द की सामर्थ्य काम कर रही थी। प्रदर्शनकारी के हाथ में एक माचिस की तरह की डिब्बी जैसी ट्राँजिस्टर था। इस ट्राँजिस्टर का काम इतना था कि वह कार स्वामी की आवाज को एक निश्चित फ्रीक्वेन्सी पर विद्युत शक्ति के माध्यम से कार में ‘डैशबोर्ड’ के नीचे लगे नियन्त्रण-कक्ष (कन्ट्रोल यूनिट) तक पहुँचा देता था। उसी के आगे ‘कार-रेडियो’ नामक एक दूसरा यन्त्र लगा था, जब शब्द की विद्युत चुम्बकीय तरंगें उसमें टकरातीं तो कार के सब कल-पुर्जे अपने आप काम करने लगते। इंजन की नहीं, हॉर्न, बत्तियाँ, वाइपर आदि यन्त्र भी इशारे पर काम करते। लोगों ने देखा और आश्चर्य भी व्यक्त किया पर जो जानते थे, उन्होंने इस वाक् शक्ति के अकूत भण्डार का स्फुल्लिंग मात्र माना।
शब्द की सामर्थ्य सभी भौतिक शक्तियों से बढ़कर सूक्ष्म और विभेदन क्षमता वाली है, इस बात की निश्चित जानकारी होने के बाद ही मन्त्र-विद्या का विकास भारतीय तत्त्व-दर्शियों ने किया। यों हम जो कुछ भी बोलते हैं, उसका प्रभाव व्यक्तिगत और समष्टिगत रूप से सारे ब्रह्मांड पर पड़ता है तालाब के जल में फेंके गये एक छोटे से कंपन की लहरें भी दूर तक जाती हैं, उसी प्रकार हमारे मुख से निकला हुआ, प्रत्येक शब्द आकाश के सूक्ष्म परमाणुओं में कम्पन उत्पन्न करता है, उस कम्पन से लोगों में अदृश्य प्रेरणायें जागृत होती हैं, हमारे मस्तिष्क में विचार न जाने कहाँ से आते हैं, हम समझ नहीं पाते पर मंत्र-विद जानते हैं कि मस्तिष्क में विचारों की उपज कोई आकस्मिक घटना नहीं वरन् शक्ति की पर्तों में आदिकाल से एकत्रित सूक्ष्म कम्पन हैं, जो मस्तिष्क के ज्ञान-कोषों में टकरा कर विचार के रूप में प्रकट हो उठते हैं, तथापि अपने मस्तिष्क में एक तरह के विचारों की लगातार धारा को पकड़ने या प्रवाहित करने की क्षमता है। एक ही धारा में मनोगति के द्वारा एक सी विचार-धारा निरन्तर प्रवाहित करके सारे ब्रह्मांड के विचार जगत् में क्राँति उत्पन्न की जा सकती है, उसके लिये यह आवश्यक नहीं कि उन विचारों को वाणी या सम्भाषण के द्वारा व्यक्त ही किया जाये।
एक दिन महर्षि रमण के आश्रम में बहुत से सम्भ्रान्त लोग एकत्रित थे। अरुणाचलम् का वह स्थान जहाँ महर्षि का आश्रम था, पर्वतीय भाग से जुड़ा हुआ था। वहाँ अनेक तरह के जीव-जन्तु रहा करते थे। एक बन्दरिया वहाँ आकर खों-खों करने लगी। बड़ी देर तक वह ऐसे ही करती रही, किसी के मना करने और भागने पर भी वह भागी नहीं, तब महर्षि रमण ने हँसकर बताया- “इसका पति दल का राजा है, बन्दरों के मुखिया को यह अधिकार होता है कि वह एक से अधिक रानियाँ भी रखे। उसने किसी और बन्दरिया को भी रानी चुन लिया है, यह बात इस पहली रानी को पसन्द नहीं। बन्दरिया वही शिकायत करने आई है।” इसके बाद महर्षि थोड़ा ध्यानावस्थित हुये फिर थोड़ी देर में राजा-बन्दर वहाँ आया और ऐसा लगा मानो किसी ने उसे जबर्दस्ती समझा दिया हो, वह अपनी पहली रूठी हुई रानी को वहाँ से मना ले गया।
मूक सत्संग और प्रेरणाओं की ऐसी अनेक घटनायें वहाँ आये दिन घटती रहती थीं। उसका लाभ बिना वाणी सैकड़ों लोगों ने प्राप्त किया। ऐसे सूक्ष्म प्रेरणा प्रवाहों का लाभ केवल अति-साँसारिक व्यक्ति ही नहीं ले पाते अन्यथा अपने मस्तिष्क को थोड़ा भी विचार-शून्य करके ध्यानावस्थित हुआ जाये तो अभी भी पूर्व पुरुषों के अदृश्य और अपने काम के विचार आकर्षित किये जा सकते हैं।
यों कहने को स्वतन्त्रता संग्राम में विजय का श्रेय कुछ थोड़े से काँग्रेसी नेताओं को है पर एक समय वह आयेगा, जब विज्ञान बताएगा कि उन नेताओं में से एक भी ऐसा नहीं था, जो महर्षि अरविन्द जैसी महान् आत्माओं द्वारा सूक्ष्म रूप से प्रेरित और अनुप्राणित न किया गया हो।
विचारों की सूक्ष्म सामर्थ्य से मनोमय जगत् में क्रांतिकारी परिवर्तन किये जा सकते हैं तो शब्द की सामर्थ्य से स्थूल जगत् में ,पदार्थ और आकाश स्थित पिण्डों में जबर्दस्त विस्फोट किया जा सकता है। यही नहीं ग्रह नक्षत्रों में पाई जाने वाली सूक्ष्म-प्राण, विद्युत-प्रकाश, गर्मी आदि को आकर्षित किया जा सकता है पर उसके लिये इस कार में लगे नियन्त्रण कक्ष और ट्राँजिस्टर की तरह शब्दों का चयन एवं उनका नियंत्रित प्रयोग आवश्यक है, इस बात की गहनतम जानकारी के आधार पर ही मन्त्र और वैदिक ऋचाओं का निर्माण हुआ है। देखने में शब्द और प्रार्थनायें लगने वाले मन्त्र और ऋचायें एक प्रकार के यंत्र हैं, जिन का विधिवत् प्रयोग यदि कोई कर सके तो वह सारे संसार का स्वामित्व प्राप्त कर सकता है। आज इस बात को भौतिक विज्ञान अच्छी तरह जानता चला जा रहा है।
पचास वर्ष पूर्व तक रेडियो, टेलीफोन, जैसे यंत्रों को ही शब्द शक्ति के चमत्कार रूप में माना जाता था पर जब कैलीफोर्निया विश्व-विद्यालय के प्रसिद्ध भूगर्भ शास्त्री डॉ. हर्बर्ट हूबर ने शब्द के सूक्ष्म कम्पनों द्वारा एक ऐसी बारीक और नाजुक हड्डी पर लगे मैल और मिट्टी को साफ करके दिखा दिया, जिस पर कैसा भी हल्का ब्लेड चलाया जाता तो हड्डी टूटे बिना न रहती। पीछे तो शब्द शक्ति का ऐसा विकास हुआ कि औद्योगिक जगत में एक नई क्राँति मच गई। इन दिनों बड़ी-बड़ी मोटी इस्पात की चादरों को काटने, कपड़ों की धुलाई करने, शहर की आवाज से शहर के लिये विद्युत शक्ति तैयार कर लेने जैसे भारी कामों में भी शब्द शक्ति का उपयोग होने लगा है। अभी तक एक्स-रे को ही ऐसा सूक्ष्म यन्त्र समझा जाता था, जो शरीर के भीतरी हिस्सों की स्थिति का भी पता दे देता है पर उसके द्वारा खींचे गये फोटोग्राफ इतने स्पष्ट नहीं आते कि स्थिति का पूर्णतया सही अनुमान लगाया जा सके, शब्द की सामर्थ्य ने अब इस कार्य को भी अति आसान बना दिया है। यह कार्य अब ‘अल्ट्रा साउण्ड’ द्वारा सम्पन्न होने लगा है।
‘अल्ट्रासाउण्ड’ उस ध्वनि को कहते हैं, जो मनुष्य के कान से किसी भी स्थिति में न सुनी जा सके। अति सूक्ष्म कम्पनों को जब विद्युत-आवेश प्रदान किया जाता है तो उनकी भेदन क्षमता इतनी बढ़ जाती है कि सघन से सघन वस्तु के परमाणुओं का भी भेदन करके उसकी आन्तरिक रचना का स्पष्ट फोटोग्राफ प्रस्तुत कर देती है।
उदाहरण के लिए शिकागो की एक महिला की डाक्टरी परीक्षा की गई पर डॉक्टर यह नहीं निश्चय कर पाये कि इसके पेट में ट्यूमर की गाँठ है अथवा गर्भ। एक्सरे पर एक्सरे खींचे गये पर स्थिति का सही पता नहीं चल सका। तब अल्ट्रा साउण्ड का प्रयोग किया गया और यह साफ प्रकट हो गया कि महिला के पेट में गर्भ विकसित हो रहा है। यूटा (अमेरिका) में एक व्यक्ति से धोखे में गोली चल गई। छर्रा एक छोटे बच्चे की आँख में धंस गया। डाक्टरों ने पचासों प्रयत्न किये पर यह पता नहीं चल पाया कि कारतूस का टुकड़ा किस स्थान पर डट गया है।
आखिरकार बच्चे को वाशिंगटन के सरकारी अस्पताल में भेजा गया। वहाँ ‘अल्ट्रासाउण्ड’ का प्रयोग किया गया तो पीतल के टुकड़े का साफ चित्र आ गया और बात की बात में डाक्टरों ने उसे निकालकर बाहर कर दिया।
अभी तक किसी ऐसी विधि का आविष्कार नहीं हो पाया था, जो शरीर के अति कोमल ‘ऊतकों’ की जाँच कर सके। शरीर छोटे-छोटे कोश (सेल्स) से बना है। बहुत से कोश मिलकर ऊतक बनते हैं, जिनसे शरीर के विभिन्न अंगों का निर्माण होता है पर अमेरिका के कोलोरेडो विश्व-विद्यालय के चिकित्सा शास्त्री डॉ. जोऐफ होम्स ने अल्ट्रासाउण्ड के प्रयोग द्वारा ऊतकों के साफ अध्ययन की सफलता भी प्राप्त कर ली। यह कार्य जिस यन्त्र से सम्पन्न होते हैं, उसे ‘ट्राँस्डूसर’ कहते हैं, इस यन्त्र में विद्युत-ऊर्जा को ध्वनि-ऊर्जा में बदला जाता है। एक सेकिंड में बीस हजार से भी अधिक की गति से ध्वनि-तरंगें प्रसारित करता है, यह तरंगें आगे जाकर जिस माध्यम से टकराती हैं उस वस्तु का परावर्तित कम्पनों से चित्र तैयार कर देती हैं। कम्पन की गतियों के नियन्त्रण और विस्तार की प्रणाली हर कार्य में अलग होती है। पर अन्ततः सिद्धान्त एक ध्वनि-तरंगों के अति सूक्ष्म प्रसारण का है।
विज्ञान की उपलब्धियाँ यह बताती हैं, क्रमबद्ध ध्वनि-कम्पनों में जबर्दस्त सामर्थ्य है, यन्त्रों में इन्हीं सिद्धान्तों का समावेश है। मनोगति के सम्मिश्रण के द्वारा यह शक्ति और भी बढ़ जाती है और जब मनुष्य उस पर पूरा-पूरा नियन्त्रण-मन्त्र सिद्धि प्राप्त कर लेता है तो वह ऐसे ही आश्चर्यजनक प्रयोग कर सकता है, जैसे इस लेख में ऊपर बताये गये हैं।
कौत्स उन दिनों महर्षि कण्व के आश्रम में तप कर रहे थे। एक दिन गुरु और शिष्य दोनों जंगल में देर तक काम करते रहे। सायंकाल महर्षि ने कौत्स को थोड़ा पहले आश्रम भेज दिया आप कुछ पीछे चले।
कौत्स आश्रम आ रहे थे, तब उन्होंने मार्ग में पड़ी एक सुन्दर स्त्री देखी। स्त्री को चोट लगी थी, वह पीड़ा से कराह रही थी। कौत्स एक क्षण रुके और फिर अपनी राह चलते बने।
पीछे महर्षि कण्व भी उधर से आये और युवती को यों पड़ी कराहते देखा तो अपने शिष्य पर उन्हें बड़ा क्षोभ हुआ। युवती को उठाकर वे आश्रम लाये और उसकी चिकित्सा की व्यवस्था कर दी।
कौत्स को बुलाकर उन्होंने पूछा-जब यह स्त्री मार्ग में तुम्हें कष्ट-पीड़ित अवस्था में मिली तब तुमने उसे उठाया क्यों नहीं, उसे आश्रम लाकर सेवा का उचित क्यों नहीं किया।
कौत्स ने सिर झुका कर कहा- भगवन्! मुझे सन्देह था कि मैं उस स्त्री के सौन्दर्य से कहीं विचलित न हो जाऊँ, इसलिये चुपचाप चला आया।
महर्षि ने गम्भीर स्वर में कहा-वत्स! इससे क्या सौन्दर्य से विरक्ति हो जायेगी। छिपा हुआ भाव तो कभी भी प्रकट हो सकता है, इसलिये वासनाओं के आकर्षण से बचने के लिये तो यह आवश्यक है कि वैसे वातावरण में रहकर ही आत्म-नियन्त्रण का अभ्यास किया जाये। तैरना सूखे में नहीं सीखा जा सकता, उसी प्रकार आत्म-नियन्त्रण भी एकान्त में नहीं हो सकता।
मध्य यूरोप की नदियों में एक ‘रोडियश’ नामक मछली पाई जाती है। हिन्दुओं में हरिजनों के बच्चों को जिस तरह कभी शिक्षित और साधन सम्पन्न नहीं होने दिया जाता था। इस गरीब मछली के लिये भी खुले स्थान पर अंडे देना एक प्रकार की आफत है। जो भी जीव उधर गुजरता है वही उन्हें साफ कर जाता है।
कुछ ऐसे वृक्ष होते हैं, वो अपनी सीमा में छोटे-छोटे पौधों को पनपने नहीं देते हैं। सारे जंगल में दो-चार ऐसे हिंसक जन्तु भी होते हैं, जो छोटे-छोटे जीव-जन्तुओं को खा डालते हैं, अफ्रीका के कुछ पौधे ऐसे धोखेबाज होते हैं कि उनमें कोई चिड़िया आश्रय के लिये आई और उन्होंने अपने नुकीले पत्तों से उसे जकड़कर खून पी लिया। समुद्र में एक-दो मछलियाँ, एक-दो जन्तु जैसे मगर और घड़ियाल ऐसे भी होते हैं, जो किसी का पनपना देख नहीं सकते, अपने से कम शक्ति का जो भी दाँव में आ गया, उसी को चट कर लिया।
विविधा-विपुला प्रकृति में ऐसे दृष्ट प्रकृति के जीव-जन्तु हैं तो पर उनकी संख्या, उनका औसत थोड़ा है पर मनुष्य जाति के दृष्टि-दोष को क्या कहा जाये, जो इन दो चार उदाहरणों को लेकर ‘ उपयोगितावाद’ जैसा मूर्खतापूर्ण सिद्धान्त ही तैयार कर दिया। ढूंढ़ें तो अधिकाँश संसार ‘ आओ हम सब मिलकर जियें’ के सिद्धान्त पर फल-फूल रहा है। यदि छोटों को मारकर खा जाने वाली बात ही सत्य रही होती तो कुछ ही शताब्दियों में विश्व की आबादी दो गुनी से भी अधिक न हो गई होती।
प्रस्तुत प्रसंग यह बताता है कि संसार के अबुद्धिमान जीव-जन्तु भी परस्पर मिलकर रहना कल्याणकारक मानते हैं। जहाँ रोडियश मछली पाई जाती है, वहीं एक ‘सीप’ नामक जीव भी पाया जाता है। सीप के शरीर को कछुये की सी तरह का एक मोटा और कड़ा आवरण घेरकर रखता है, जिससे वह अपने अण्डों की सेवा नहीं कर सकता। ऐसी स्थिति में रोडियश मछली और सीप दोनों मिलते हैं और ‘आओ हम आप दोनों मिलकर जिएं’ के अनुसार समझौता कर लेते हैं।
रोडियश अपने अण्डे सीप के खोल में प्रविष्ट कर देती है, इसी समय सीप अण्डे देती है, वह रोडियश अपने शरीर से चिपका लेती है। रोडियश घूम-घूमकर अपने लिये भोजन इकट्ठा करती है, उसी के दाने-चारे पर सीप के बच्चे पल जाते हैं, जबकि उसके अपने बच्चों को सीप पाल देती है। विभिन्न जातियों में सहयोग और संगठन की आचार संहिता लगता है, भारतीय समाज शास्त्रियों ने प्रकृति की इस मूक भाषा को पढ़कर ही तैयार की थी। आज भी उसका मूल्य और महत्त्व सामाजिक जीवन में उतना ही है। इस सिद्धान्त के आधार पर ही संसार सुखी रह सकता है। शोषण, छल, कपट, बेईमानी, अनीति और मिलावट पर नहीं। वह यदि दूसरे के साथ यह दुष्टता करेगा तो शेष वातावरण उसके लिए भी वैसा ही तैयार मिलेगा।
यह उदाहरण कोई अपवाद नहीं। अखण्ड-ज्योति के पिछले अंकों में ऐसे सैंकड़ों उदाहरण देते चले आ रहे हैं। ‘एलगी’ जाति के ‘प्रोटोकोकश’ पौधे और फंगस जाति के ‘एस्कोमाइसिटीज’ पौधे भी आपस में मिलकर एक दूसरे को बहुत सुन्दर ढँग से पोषण की वस्तुएँ प्रदान करते हैं। हमें शिक्षक ज्ञान देता है, शिक्षा देता है पर हम अपनी अनपढ़ धर्मपत्नी या अशिक्षित पड़ौसी के लिये एक घण्टा भी नहीं निकाल सकते, हमारे माता-पिता हम जब बच्चे थे, तब आधे पेट गीले वस्त्रों में सोकर हमारी परवरिश करते थे पर आज जब वे वृद्ध हो गये, तब हम उनकी कितनी अवहेलना करते हैं। नाई, धोबी, तेली, कुम्हार, दुकानदार, रेलवाला, बसवाला, सारा संसार यों कहिये अपनी सेवाएँ हमें देने को तत्पर है, तब यदि हम दूसरों को धोखा देने की बात सोचें कृतघ्नता दिखायें तो ऐसे व्यक्ति से नीच और घृणित कौन होगा?
पौधों का क्या अस्तित्व पर वे मनुष्य जाति से अच्छे हैं। ऊपर के दोनों पौधे मिलकर एक चपटे आकार का ढाँचा बना लेते हैं, उसे ‘जूलाजी’ में ‘लाइकन’ कहते हैं। इसमें से होकर एलगी की जड़ें फंगस के पास पहुँचती हैं और फंगस की एलगी के पास। एलगी के पास जिस तत्त्व कि कमी होती है, उसे फंगस पूरा कर देता है और फंगस की कमी को एलगी-दोनों के आदान प्रदान में यह थैला भी विकसित होता रहता है। औरों के कल्याण में अपना कल्याण, सबकी भलाई में अपनी भलाई अनुभव करने वाले समाज इसी तरह विकास और वृद्धि करते हैं और अपने साथ उन छोटे-छोटे दीन-हीन व्यक्तियों को भी पार कर ले जाते हैं, जो सहयोग के अभाव में दबे पड़े पिसते रहते हैं।
‘स्कारपियन’ मछली अपने शरीर के ऊपर छोटे-छोटे हाइड्रा जाति के जीवों को फलने-फूलने देती है, वे छोटे-छोटे जन्तु हजारों की संख्या में एक सिरे से दूसरे सिरे तक पूरी सतह में फैले रहते हैं। देखने में यह हरे रंग के होते हैं। मछली के शरीर के ऊपर इनका पूरी तरह पोषण होता रहता है।
जब एक अविकसित मछली दूसरे दीन-दुर्बलों की सहायता में इतना योगदान दे सकती है तो हम समाज के दलित वर्ग हरिजनों, आदिवासियों, दहेज के अभाव में पीड़ित बहनों, दवा के अभाव में पिसते रोगियों को जो अपने ही समाज के अंग हैं, कल्याण की योजनायें क्यों नहीं बना सकते। जीव-जीव, पेड़-पौधों तक में जब एक दूसरे के प्रति सेवा और सहयोग का भाव पनप रहा हो, तब मनुष्य जाति उससे पीछे हटे, यह उसका दुर्भाग्य ही कहना चाहिये।
परोपकारिता घाटे का सौदा नहीं, व्यक्ति का महान् स्वार्थ है। जब हम दूसरे की सेवा करते हैं, तब सही मानों में अपनी ही सेवा करते हैं। मछली इन हरे जीवों को पालते समय कोई मूल्य नहीं माँगती। वह पूर्ण निष्काम होती है पर उसे क्या पता कि यह कीड़े अस्वादिष्ट होते हैं और अपने शरीर से एक ऐसी दुर्गन्ध निकालते हैं, जिनके कारण हिंसक मछलियाँ और जन्तु उनसे दूर ही भागते हैं, इसे वह मछली जो इन्हें पालती है, स्वयं भी शिकार होने से बच जाती है।
हमारा मनुष्य भी निष्काम सेवा और परस्पर मिल-जुलकर रहने के इस तत्त्व-ज्ञान को समझ जाता तो वह इसी पृथ्वी पर स्वर्गीय सुखों की अनुभूति कर रहा होता, इसमें राई-रत्ती सन्देह नहीं है।
मृत्यु के उपरान्त एक साधु तथा एक डाकू साथ-साथ यमराज की सभा में पहुँचे। यमराज ने उनके बही-खातों की जाँच-पड़ताल करके उनसे कहा- यदि तुम दोनों को अपने लिये कुछ कहना हो तो कह सकते हो।
डाकू विनम्र स्वर में बोला- “महाराज! मैंने जीवन में बहुत पाप किये हैं। जो भी दण्ड विधान आपके यहाँ मेरे लिये हो- वह करें- मैं प्रस्तुत हूँ।”
फिर साधु बोले- “आप तो जानते ही हैं, मैंने जीवन भर भक्ति की है। कृपया मेरे सुख साधनों का प्रबन्ध शीघ्र करवायें।”
यमराज ने दोनों की इच्छा सुनकर डाकू से कहा - “तुम्हें यह दण्ड दिया जाता है कि तुम आज से इस साधु की सेवा किया करो।” डाकू ने सिर झुकाकर आज्ञा शिरोधार्य की, परन्तु साधु ने आपत्ति की -महाराज! इस दुष्ट के स्पर्श से मैं भ्रष्ट हो जाऊंगा। मेरी भक्ति तथा तपस्या खण्डित हो जायेगी।
अब यमराज आदेश के स्वर में सक्रोश बोले- “निरपराध भोले व्यक्तियों का वध करने वाला तो इतना विनम्र हो गया कि तुम्हारी सेवा करने को तत्पर है। और एक तुम हो कि वर्षों की तपस्या के पश्चात भी यह न जान सके कि सबमें एक ही आत्म-तत्व समाया हुआ है, जाओ- तुम्हारी भक्ति अधूरी है, अतः आज से तुम इसकी सेवा किया करो।”
अब वे तृतीय वय में प्रवेश पा चुके थे। एक दिन उनकी धर्म परायणा पत्नी प्रभावती ने कहा - स्वामी! धार्मिक मर्यादा के अनुसार अब हमें राज्य-शासन राजकुमार अभीचि को सौंप देना चाहिये और अपने को परमार्थ एवं परलोक की तैयारी के लिए मुक्त कर लेना चाहिए। उद्रायण राजमाता की यह सम्मति पाकर अतीव प्रसन्न हुए। राजकुमार अभीचि के राज्याभिषेक की तैयारी होने लगी।
महाराज उद्रायण की एक बहन भी थी। उसका एक पुत्र केशीकुमार इन दिनों सिन्धु-सौवीर के संरक्षण में ही पल रहा था। केशीकुमार के पिता किसी अन्य राज्य के शासक थे पर एक युद्ध में वह मारे गये थे। तब सम्राट् उद्रायण की बहन सिन्धु-सौवीर ही चली आई थी। एक दिन पति वियोग में जब वह परलोक प्रयाण करने लगी थी। तब उसने ही केशीकुमार को सौंपा था। महाराज ने वचन दिया था कि उसे अपने पुत्र राजकुमार अभीचि से अधिक ध्यान देकर रखेंगे। अपने कर्त्तव्य का उन्होंने अब तक अक्षरशः पालन किया था। शिक्षा-दीक्षा तथा आमोद-प्रमोद के जो साधन अभीचि को उपलब्ध होते थे, वह केशीकुमार के पास पहले पहुँचा दिए जाते थे, तब भी केशीकुमार के मन में फणिधर के विष की तरह अभीचि के प्रति अज्ञात दुर्भाव पनपता रहा। हर शंकालु व्यक्ति की तरह उसे अभीचि से सदैव भय बना रहता था।
राज्याभिषेक की तैयारियाँ अभी प्रारम्भ भी नहीं हुईं कि केशीकुमार महाराज के पास जा पहुँचा। धूर्तों को सजगता ही तो होती है कि उन्हें कभी-कभी अनायास सफलता भी हाथ लग जाती है। उसने सम्राट् को उनके दिये वचन की याद दिलाई और कहा- अब तक प्राप्त प्राथमिक सुविधाओं के समान क्या सिन्धु-सौवीर के राज्य-सिंहासन पर मेरा प्रथम अधिकार नहीं?
प्रश्न बड़ा टेढ़ा आ पड़ा। मंत्रीगण, सचिव और सेनापति सब इस पक्ष में थे कि राजकुमार अभीचि ही राज्य के उत्तराधिकारी और योग्य प्रशासक हैं, किन्तु महाराज उद्रायण ने जब अपनी स्थिति देखी तो पाया कि वे वचनबद्ध हैं। यों वह केशीकुमार के दुष्ट स्वभाव को जानते थे। दुष्ट को दबाना पाप नहीं होता पर अपयश का भय धर्म के नाम पर एक प्रकार की हीनता ही कही जायेगी, जीवन भर एक क्षत्र, क्षात्र धर्म का पालन करने वाले सम्राट् उद्रायण से उतना भी साहस करते न बना। राज्याभिषेक उन्होंने केशीकुमार का ही कर दिया।
बन्दर के हाथ तलवार वाली कहावत हो गई। दुष्ट स्वभाव के मनुष्य को शक्ति और साधन देना तो दुष्टता का अभिसिंचन और परिपोषण करना ही होता है। राज्य पाकर केशीकुमार का जीवन और उद्दण्ड हो गया। प्रजा के हित की चिन्ता न रही। मार्ग की एक मात्र बाधा अभीचि को भी उसने राज्य से निष्कासित कर मुट्ठी भर समर्थकों के साथ भोग-विलास का जीवन जीने लगा। अभीचि अपने मौसेरे भाई चंपापति के राजकुमार कुणिक के पास चला गया।
उद्रायण ने महाश्रमण महावीर से धर्म-दीक्षा ग्रहण की और आत्म-कल्याण की साधना में रत हो गये। साधना और लोक-सेवा में तत्पर श्रमण उद्रायण बहुत समय तक देश का भ्रमण और तीर्थाटन कर अपनी आत्मिक क्षमतायें बढ़ाने में लगे रहे। धर्म साधना के क्षेत्र में भी उनका यश पहले की ही भाँति सारे संसार में फैल गया।
कुठीचक के रूप में रह रही प्रभावती का देहावसान हो गया तब श्रमण उद्रायण अकेले ही लोकहित में परिव्रज्या करने लगे। बहुत दिनों के बाद उनके मन में अपनी राजधानी सिन्धु-सौवीर की स्मृति ताजा हो उठी। वे वीतभय की ओर प्रस्थान कर गये और कुछ ही दिन में सिन्धु-सौवीर जा पहुँचे। अपने भूतपूर्व धर्मप्रिय शासक को पाकर प्रजा ने अपना सारा प्यार उन पर उड़ेल दिया। यह अंतर्स्नेह ही तो व्यक्ति को धर्म और सदाचरण की प्रेरणा देता है, अन्यथा आज संसार में दुष्ट, दुराचारियों का ही प्रभुत्व रहा होता।
सब अच्छे ही नहीं होते, इस संसार में बुरे भी कम नहीं एक ओर जहाँ प्रजा अपने भूतपूर्व शासक के स्वागत में तल्लीन थी, वहाँ दूसरी ओर निहित स्वार्थ के चापलूस पदाधिकारी केशीकुमार को भड़का रहे थे कि महाराज प्रजा का समर्थन लेकर आपको राज्यच्युत करने वाले हैं और राजकुमार अभीचि को पुनः राज्य-सिंहासन दिलाने वाले हैं।
कृतघ्नता नीचता की पहली और अन्तिम कसौटी है। किसी के किये हुये उपकार के प्रति श्रद्धा नहीं रखता, उससे बढ़कर दूसरा कोई पापी नहीं हो सकता। केशीकुमार ने दस व्यक्तियों के प्रभाव में आकर घोषणा कर दी कि सिन्धु-सौवीर का जो भी नागरिक श्रमण उद्रायण को आश्रय प्रदान करेगा, उसकी सम्पूर्ण संपत्ति छीन ली जायेगी और उसे मृत्यु-दंड भी दिया जायेगा।
ज्येष्ठ की चिलचिलाती धूप में श्रमण उद्रायण भिक्षाटन के लिये निकले पर भिक्षा देना तो दूर जिसने भी उन्हें देखा द्वार बन्द कर दिए, मुख छुपाकर लोग घरों में घुस जाते। इसी से तो भय को भी पाप कहा गया है। भयभीत व्यक्ति अन्याय का प्रतिकार भी नहीं कर सकता है। जो प्रजा कल तक उद्रायण के लिये अपना सर्वस्व तक न्यौछावर करने को तैयार रहती थी, आज वही लोग भयवश अपने कर्त्तव्य पालन से भी विमुख हो रहे थे।
ऐसे समय एक कुम्भकार ने आगे बढ़कर उद्रायण का स्वागत किया और यह दिखा दिया कि साहसी व्यक्ति सत्य के समर्थन में किसी भी भय से विचलित नहीं होते, चाहे मृत्यु-दंड की ही आशंका क्यों न हो। उसने उद्रायण की समुचित सेवा की और विश्राम दिया। उसके इस साहस ने श्रीमन्तों के सिर लज्जा से झुका दिए। अब तो और लोग भी उनके स्वागत को उद्यत हो गये।
केशीकुमार तक यह समाचार पहुँचा पापी में साहस कितना। वह कुम्भकार के साहस का भी सामना नहीं कर सका। उसने छलपूर्वक उद्रायण को मरवा देने का निश्चय किया कुम्भकार के समीपवर्ती एक ग्वाले के हाथ विष भरा दुग्ध भिजवा कर उसने उन्हें मार डालने की योजना निश्चित कर दी।
सायंकाल का समय था। उद्रायण ने दुग्धपान कर लिया। विष का प्रभाव शरीर में फैलने लगा। उद्रायण भयंकर पीड़ा से कराह उठे। सारे नगर में यह समाचार बिच्छू के विष की तरह फैल गया। नगरवासी विद्रोह कर उठे। महाराज उद्रायण की आज्ञा लेने और केशीकुमार की सत्ता उखाड़ फेंकने के लिए मतवाली भीड़ कुम्भकार के द्वार पर जा पहुँची।
उद्रायण ने एक बार सिर ऊपर उठाया और धीमे बहुत धीमे स्वर में कहा -आप लोग केशीकुमार का प्रतिकार न करना। वह क्षमा के पात्र हैं, शरीर तो आज नहीं कल नष्ट होना ही था।
उद्रायण के प्राण-पखेरू उड़ गये पर उनके अन्तिम शब्द केशीकुमार के कानों में जा पड़े। उसका हृदय पश्चाताप से जल उठा। आज वह अपनी ही दृष्टि में गिर चुका था। इस भयंकर आत्म-दाह में ही उसने अपने प्राण त्यागे।
=कहानी=============================
भगवान् बुद्ध श्रावस्ती में जैतवन की ओर जा रहे थे। मार्ग में कुछ लोग एक पशु को बाँधकर बलि दे रहे थे। उन्हें देखकर बुद्ध भगवान् ने ऐसा करने से रोका, तब एक ग्रामीण ने कहा-महाराज बलि से देवता प्रसन्न होते हैं और वरदान देते हैं।
बुद्ध ने कहा-अपने सुख के लिये जो दूसरे को मारता है, वह दूसरे जन्म में घोर कष्ट पाता है। उसी दिन से ग्राम-वासियों ने जीव हिंसा छोड़ दी।
==================================
----***----
वासना का ग्रहण ने लगे तो जीवन को सम्पूर्ण असफलताओं और निराशाओं को प्रेम के पुण्य प्रकाश में ऐसे ही नष्ट किया जा सकता है, जैसे महावट की वर्षा के तुषार के अन्न-नाशी पात को। प्रेम से बढ़कर अन्य कोई प्रतिष्ठा इस संसार में नहीं है। इसीलिये मनुष्य प्रेम के लिए जीता रहता है।
कीट्स अँग्रेजी का महान् कवि थोड़ा सा जीवन जिया, अभाव और कष्टों में जिया। कहते हैं कीट्स कई-कई दिन की सूखी रोटियाँ रख लिया करता था, वही जीवन-निर्वाह की साधन होती थीं, ऐसी परिस्थितियों में कोई व्यक्ति यदि जी सकता है तो उसे किसी का परम-प्रेमास्पद ही होना चाहिए। कीट्स के सम्बन्ध में ऐसा ही था। एक सम्पन्न परिवार की नवयुवती ने उसे प्रेम दिया था। वासना-रहित उस प्रेम ने ही कीट्स के सम्बन्ध में ऐसा ही था। एक सम्पन्न परिवार की नवयुवती ने उसे प्रेम दिया था। वासना-रहित उस प्रेम ने ही कीट्स की भावनाओं को इतना कोमल और संवेदनशील बनाया था। 21 वर्ष की स्वल्पायु में लिखी उसकी रचनायें प्रौढ़ कवियों को भी मात करती चली जाती हैं और जब यही प्रेम उससे छिना, कीट्स की प्रेमिका का विवाह किसी धन सम्पन्न परिवार में कर दिया गया तो उसका यही प्रेम परमात्मा के पैरों में समर्पित हो गया। ‘दि लैमेन्ट’ नामक गीत में उसकी यह सम्पूर्ण भाव-विभोरता छलक उठी है और उसने ‘कीट्स’ को अमर बना दिया है।
महाकवि कालिदास जब तक एक भावना-विहीन व्यक्ति थे, तब तक उन्हें यह भी सुधि न थी कि वे जिस डाल पर बैठे हैं, उसी को काट रहे हैं, किन्तु जब विद्योत्तमा के पावन प्रेम ने उसे झकझोरा तो कालिदास का सम्पूर्ण अन्तःकरण अँगड़ाई लेकर जाग उठा। महाकवि के गीतों में भगवती सरस्वती को उतरना पड़ा।
कहते हैं एक बार विवाद उठ खड़ा हुआ कि कवि दंडी श्रेष्ठ हैं अथवा कालिदास। जब इसका निर्णय माननीय पंचायत न कर सकी, तब दोनों सरस्वती के पास गये और पूछने लगे- “अम्बे! अब तुम्हीं निर्णय कर दो न हम दोनों में श्रेष्ठ कौन, बड़ा कौन है? “ भगवती ने मुस्कराते हुए कहा-”कविर्दडी! कविर्दडी!! कवि तो दंडी ही है।”
महाकवि कालिदास ने भगवती के चरणों में अपना सर्वस्व समर्पण किया हुआ था। उन्हें यह निर्णय पक्षपात पूर्ण लगा। पूछ बैठे- “अम्बे! यदि दंडी ही कवि हैं तो फिर मैं क्या हुआ?”
भगवती ने उसी स्नेह से कहा-”तात्! त्वं साक्षात् सरस्वती। तुम तो साक्षात् सरस्वती ही हो। हम और तुम दोनों अभिन्न हैं।” इस आख्यान से महाकवि का मन पश्चात्ताप से भर गया, उन्होंने तब जाना निःस्वार्थ प्रेम की गौरव-गरिमा कितनी महान् है।
महाकवि तुलसी के अन्तःकरण को प्रेम ने ही जागृत कर ईश्वर परायण बनाया था। सूरदास तब विल्वमंगल कहे जाते थे, चिन्तामणि वेश्या के प्रति निश्छल प्रेम ने ही उनकी आत्मा को झंकृत किया था। प्रेम आध्यात्म की पहली और आखिरी सीढ़ी है। उस पर चढ़कर ही व्यक्ति निराकार सत्ता में विश्वास और चिर-सुख की अनुभूति करता है। उसी में मिलकर ही वह अमरत्व का आनन्द लूटता है। प्रेम का अभ्यास जीवन में न किया हो, ऐसा एक भी अध्यात्मवादी व्यक्ति नहीं मिलेगा, क्योंकि प्रेम नहीं होगा तो वह कैसे मानेगा कि संसार का अन्तिम सत्य पदार्थों में शरीर और संपत्ति में नहीं, भावनाओं में है, उसकी ही प्यास मनुष्य को चारों और दौड़ाती है।
यही प्रेम का भाव जब विस्तृत होने लगता है तो व्यक्तित्त्व भी उसी क्रम से परिष्कृत होने लगता है। इसके अनेक रूप समाज के साथ हमारे सम्बन्धों को प्रगाढ़ और मधुर बनाते हैं। छोटों से प्रेम स्नेह, समवयस्कों से मैत्री और भ्रातृत्व, पत्नी का प्रेम, राग और बड़ों से प्रेम श्रद्धा कहलाता है। यह सब प्रेम रूपी वृक्ष के शाखा, पत्ते और फूल की तरह हैं। ईश्वर के प्रति भक्ति कहलाता है, यह निष्काम और विश्वास की शक्ति से सम्पन्न होने के कारण महान् हो जाता है और जिस अन्तःकरण में प्रस्फुटित होता है, उसे भी मजनू कीट्स, कालिदास, सूर और तुलसी की तरह क्षुद्र से महान् बना देता है।
अपने पति प्रेम-स्वार्थ से विश्व-प्रेम-परमार्थ की ओर प्रगति करता हुआ, प्रेमी-साधक ही विराट् जगत् में फैली आत्मा की एकता को हृदयंगम कर सकता है, उसी की ओर संकेत करते हुए गीताकार ने लिखा है-
आत्मानाँ सर्वभूतेषु सर्वभूतानि चात्मनिः।
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शिनः॥
अर्थात्- वह योगी सभी भूत-प्राणियों में अपनी ही आत्मा समाई हुई देखता है, इसीलिये सभी को समभाव से देखता हुआ, वह सभी के साथ प्रेम करता है।
जीवन की सर्वोच्च प्रेरणा प्रेम ही आत्मा का प्रकाश है। प्रेम की प्रेरणा से काम करना ही ईश्वर की इच्छा का पालन करना है। उसने प्रेम से ही संसार की रचना की है। एक-एक को वह प्रेम से ही जोड़कर रखता है और अन्त में स्वयं भी उसी से जुड़ गया है। अन्य सब साधनायें जो ईश्वर को प्राप्त करा सकती हैं, देश, काल, स्व-स्थिति के अनुसार अदल-बदल सकती हैं, लाभदायक भी हो सकती हैं। और हानिकारक भी, किन्तु शुद्ध प्रेम की साधना में कहीं भी, किसी भी समय कोई भी परिवर्तन की आवश्यकता नहीं।
प्रेम आत्मा को झकझोर कर जगा देता है और व्यक्ति को परमार्थवादी बनने को विवश कर देता है। प्रेम का शुद्ध अर्थ है विश्वास। जो निराकार सत्ता में विश्वास करना सीख गया, ईश्वर उससे दूर नहीं रह सकता। आत्मा को झकझोर कर परमात्मा से मिला देने वाली इसीलिये सबसे सरल, सरस, अमर साधना प्रेम ही है। आध्यात्मवादी प्रेमी हुए बिना ईश्वर की ओर गमन नहीं कर सकता।
यहूदी अनपढ़ था, और ग्रामीण भी। किसी ने उसे बता दिया कि जिस दिन प्रायश्चित पर्व हो उस दिन खूब अच्छा-अच्छा खाना चाहिये और मिले तो शराब भी पीना चाहिये। सो जब अगला- ‘प्रायश्चित पर्व’ आया तो एक दिन पूर्व ही उसने खूब डटकर खाया, शराब पी और नशे में धुत्त हो गया।
प्रातःकाल नींद टूटी तो भोले-भोले ग्रामीण यहूदी ने देखा उसका साथी तो प्रायश्चित पर्व की लगभग आधी प्रार्थना पूरी कर चुका है। उसे तो एक भी मन्त्र याद न था, सो उसे अपने आप पर भारी ग्लानि हुई। कल शराब न पीकर मन्त्र याद कर लेता तो कितना अच्छा होता, यह सोचकर वह बड़ा दुःखी हुआ।
सबको प्रार्थना करते देखकर वह वहीं बैठ गया और वर्णमाला के अक्षरों का ही पाठ करता हुआ भावना करने लगा- “हे प्रभु! मुझे तो कोई मन्त्र याद नहीं, इन अक्षरों को जोड़ कर तुम्हीं मन्त्र बना लेना। मैं तो तुम्हारा दास हूँ पूजा के लिये नये भाव कहाँ से लाऊँ?” जब तक दूसरे लोग प्रार्थना करते रहे वह ऐसे ही भगवान् का ध्यान करता रहा।
सायंकाल जब वे दोनों सामूहिक प्रार्थना में सम्मिलित हुये तो धर्मगुरु रबी ने उस ग्रामीण को भक्तों की अग्र-पंक्ति में रखा। यह देखकर उसके साथी ने आपत्ति की “श्रीमान् जी! इसे तो मन्त्र भी अच्छी तरह याद नहीं।”
“तो क्या हुआ”- रबी ने आर्द्र कण्ठ से कहा- इनके पास शब्द नहीं, भाव तो हैं। भगवान् तो भाव का ही भूखा है, मन्त्र तो हमारे-तुम्हारे लिये हैं।
श्रीमती जे0सी0 ट्रस्ट ने एक ऐसे व्यक्ति को चुना जो छोटी-छोटी बातों में उत्तेजित हो जाता था। वह दिन में कई-कई बार क्रुद्ध हो जाने के कारण बहुत दुर्बल पड़ चुका था, सर्दी-गर्मी के हलके परिवर्तन भी उसको कष्टदायक प्रतीत होते, उसे कोई न कोई बीमारी प्रायः बनी रहती थी।
एक बार जब वह भरे गुस्से में था, तब श्रीमती ट्रस्ट ने उसे लिटा दिया और उसके नँगे शरीर पर बालू की हलकी परत बिछा दी उनके शिष्य, अनुयायी और कई वैज्ञानिक भी उपस्थित थे। उन सबने बड़े कौतूहल के साथ देखा कि जिस प्रकार पानी से भरी काँसे की थाली को बजाने से पानी की थरथरी काँसे के अणुओं में उत्तेजन और स्पन्दन का अभ्यास कराती है, उसी प्रकार मनुष्य के शरीर से भी प्रकाश-अणु निरन्तर निःसृत होते और थरथरी पैदा करते रहते हैं।
क्रोध जैसे उत्तेजनशील आवेश के समय यह प्रकाश-अणु बड़ी तेजी से थरथराते हुए निकलते हैं, इसलिए उस समय तो स्पष्ट आभास हो जाता है पर सामान्य स्थिति में प्रकाश कणों की थरथराहट धीमी होती है। जो व्यक्ति जितना अधिक शान्त, कोमल-चित्त, मधुर स्वभाव, मितभाषी, स्थिर बुद्धि होता है, उसके सूक्ष्म शरीर के प्रकाश-अणु बहुत धीर-धीरे निकलते हैं और बहुत समय तक शरीर में शक्ति, उष्णता और सहनशीलता बनाये रखते हैं। ऋतुओं के आकस्मिक परिवर्तन भी शरीर पर दबाव नहीं डाल पाते।
रासायनिज्ञ रोमेल ने भी इस तथ्य को एक प्रयोग द्वारा सिद्ध करके दिखा दिया की शरीर में निरन्तर विद्युत चुम्बकीय उर्मियाँ (कम्पन) निकलते और मानव अणुओं को बाहर निकालते रहते हैं। उन्होंने रेडियो-फास्फोरस, रेडियो आयोडीन आदि रेडियो-धर्मी औषधियाँ खाईं तो चमक के साथ प्रकाश किरणें सी शरीर से स्पष्ट लपकती जान पड़ीं। दरअसल अणुओं की इस आभा का छिटकना जीवन के लिये बड़ा महत्त्वपूर्ण है, यदि यह क्रिया शरीर में न चल रही होती तो न तो शरीर की गन्दगी बाहर निकलती और न ही पुराने कोश (सेल्स) नये कोशों में बदलकर शरीर को स्वस्थ रखते। देखने में आया है कि इन अणुओं के निकलते ही शरीर के कोश बदलने की अपेक्षा सड़ने लगते हैं और कुछ ही देर में शरीर में बदबू आने लगती है।
शरीर से जीवन अणुओं का निकलना एक वैज्ञानिक सिद्धाँत है, उसकी अपेक्षा महत्त्वपूर्ण जानकारी है, शरीर में पहले से व्याप्त इन प्रकाश-अणुओं में से धूमिल, मटमैले, गन्दे संस्कारों वाले प्रकाश अणुओं के स्थान पर दिव्य अणुओं का विकास। यदि इस विकास के विज्ञान को कोई जान ले तो उसके लिये सृष्टि की नैसर्गिक शक्तियों के दिव्य प्रकाश कणों को आकर्षित करना ही सुगम न हो जाये वरन् वह व्यक्ति बड़ी आसानी से किसी के द्वारा प्रेक्षित सन्देश और शक्ति-संचार को भी बड़ी तेजी से अपने अन्दर भरता हुआ, उसी प्रकार उन शक्तियों से ओत-प्रोत हो सकता है, जिस प्रकार बड़े तालाब से नाली निकालकर किसी भी छोटे गड्ढे को अपनी पात्रता भर लेते हैं। किसी के कष्ट निवारण छाया शरीर का नियन्त्रण, परकाया प्रवेश और समाधि-अवस्था में सुदूर प्रान्तरों एवं ग्रह-नक्षत्रों में विचरण सब इसी विद्या की शाखायें हैं।
प्रकाश अणुओं के आकर्षण की एक क्रिया तो अपने आप शरीर के द्वारा चलती रहती है, यों हमारा सीधा संपर्क सूर्य की गर्मी या प्रकाश-अणुओं से है, तथापि हम जहाँ भी हैं, वहाँ इस ब्रह्माँड के लाखों-करोड़ों ग्रह-नक्षत्रों के प्रकाश-कण विद्यमान् होकर एक विलक्षण शक्ति के रूप में वायु में घुले हमारी साँस और त्वचा के द्वारा भीतर जाते हैं। वैज्ञानिक इस ही ‘वाइटल फोर्स’ और भारतीय तत्त्व-वेत्ता उसे ही प्राण कहते हैं।
पराकासनी (इन्फ्रारेड) विकिरण तो शरीर में पर्याप्त भीतर तक घुस जाता है और उसके अणु या ऊष्मा भीतर ही भीतर बिखर जाती है। मनुष्य की त्वचा एक मिलीमीटर गहराई तक इन किरणों को संप्रेषित करती रहती है। काली चमड़ी वालों में यह प्रकाश-कण सोखने (टु आब्जार्व) की क्रिया धीमी होती है फिर यही विद्युत-चुम्बकीय तरंगें स्नायु सूत्रों तथा विद्युत चालकों प्रोटानों के माध्यम से शरीर के सभी कोनों में फैल जाती हैं।
शरीर के दूसरे अवयव जैसे कोशिकाओं, रक्त, माँस, मज्जा, कार्टेक्स (मस्तिष्क के आन्तरिक भाग को कार्टेक्स कहते हैं) तथा स्नायु सूत्रों में भी प्रकृति की अन्य वस्तुओं की भाँति ही कई प्रकार के विकिरणों (प्रकाश के छिटके हुये अणु प्रवाह) को ग्रहण करने, परिवर्तन, शोषण, सम्प्रेषण तथा पुनः विकिरण करने की भी क्षमता होती है। इस क्रिया पर ही स्वस्थ,दुर्बल, युवा अथवा वृद्ध होना निर्भर है। प्राणायाम द्वारा प्राणों का नियन्त्रण और योगाभ्यास द्वारा उन शरीर-संस्थानों को जागृत कर जो प्राण-शक्ति को आकाश में से बहुतायत से खींच सकते हैं, वृद्ध होने पर भी अपने शरीर को बलवान् और तेजस्वी बनाये रखते हैं।
मस्तिष्क द्वारा भी किन्हीं अनजाने प्रकाश-स्रोतों के प्रकाश-कण आकर्षित कर प्रकाश शरीर वाले सूक्ष्म शरीर को विकसित किया जा सकता है, यह थोड़ी कठिन उपपत्ति (सोलूशन) है तथापि विज्ञान अब उसे भी प्रमाणित करने लगा है। इस प्रमाण के लिये बेचारे रूसी खगोल-शास्त्री श्री चिजोव्स्की को भारी तप करना पड़ा।
पहले तो वह घण्टों कभी सूर्य की तेज धूप में तो कभी चन्द्रमा के शीतल प्रकाश में बैठे रहते और होने वाले अपने मानसिक परिवर्तनों को लिखते रहते । फिर उन्होंने पिछले 400 वर्षों के इतिहास में मानवीय स्वभाव के उतार-चढ़ाव तथा अनेक प्रकार की बीमारियों के वार्षिक आँकड़े एकत्रित कर देखा कि सूर्य आदि की चमक ओर उसके 11 वर्षीय कलंकों (सन-स्पाट्स) से मनुष्य की मनोदशा से गहरा सम्बन्ध है। इस सम्बन्ध में विस्तृत चर्चा तो कभी बाद में करेंगे पर यहाँ यह समझ लेना नितान्त आवश्यक है कि विचार प्रणाली का सम्बन्ध मस्तिष्क की जिन थॉयराइड, एड्रीनल और पिट्युटरी आदि ग्रन्थियों से है, वे सब नलिका विहीन (डक्टलेस) होती हैं, अर्थात् उनमें किसी प्रकार का रासायनिक प्रवाह न होना, प्रकाश या प्राण के सूक्ष्म कण ही उसी तरह प्रवाहित होते हैं, जिस प्रकार तार में विद्युत-कण। जैसे-जैसे यह प्रकाश-कण होते हैं, वैसे-वैसे भाव उठते हैं। सूर्य की तेज धूप में क्लान्ति, क्रोध, वीरता जैसे भाव आते हैं तो चन्द्रमा के प्रकाश में आह्लाद और कामुकता के। अब यदि कोई व्यक्ति अपना ध्यान किसी प्रकाश-स्रोत पर लगाता है तो इसका अर्थ यह हुआ कि हमारी नलिका विहीन ग्रन्थियाँ उस स्रोत विशेष से विद्युत चुम्बकीय सम्बन्ध स्थापित कर लेती हैं और वह कण तेजी से हमारे अन्दर भरने लगते हैं। ध्यान जितना एकाग्र और गहन होता है, इस आकर्षण की और सूक्ष्म शरीर के विकास की गति को हम उतना ही स्पष्ट अनुभव करते-करते एक दिन उस स्रोत से तादात्म्य कर सिद्धि प्राप्त कर लेते हैं।
उदाहरण के लिये गायत्री उपासना के साथ सूर्य का ध्यान भी करना पड़ता है। ध्यान की अवस्था में सूर्य के विद्युत-चुम्बकीय प्रवाह से अपने मस्तिष्क की चोटी वाले स्थान से नलिका विहीन ग्रन्थियों का सम्बन्ध जुड़ जाता है और सूर्य तेज के कण हमारे शरीर में प्रवेश करते हुये चले जाते हैं, इस तरह अपना प्राण शरीर विकसित होता हुआ सूर्य प्रकाश के समान हलका दिव्य तेजस्वी होता चला जाता है। जिस दिन शरीर के सभी प्रकाश अणु बदल जाते हैं, उसी दिन साधक गायत्री सिद्ध या सूर्य की सी गति वाला हो जाता है। जब तक शरीर में एक भी विजातीय अणु रहेगा, तब तक साधक के चित्त में कोई न कोई अस्थिरता बनी रहेगी पर सिद्धि के बाद सभी आशंकायें और अस्थिरतायें मिट जाती हैं।
इस तरह सुन्दर, शुद्ध स्थान में रहकर, महापुरुषों व देवस्थानों के संपर्क में आकर, प्राणायाम, प्रत्याहार आदि के द्वारा तथा जप और ध्यान के माध्यम से साधक प्रकाश-अणुओं या प्राण शरीर पर नियन्त्रण करना व विकास करना ही सीखता है। दूसरे के देखने में वह सब कौतूहल या खिलवाड़ सा लगता है पर साधक जानता है कि वह इस तरह कितना शक्तिशाली बनता व महान् जीवनोद्देश्य पूरा करता है।
----***----
कौशल नरेश राज्य के समस्त पाँच सौ कर्मचारियों की पत्नियों के लिये पाँच सौ वस्त्र दान किया करते थे। यह नियम उन्होंने राजमाता की आज्ञानुसार बनाया था।
एक बार शीत ऋतु का आगमन होने को था। कौशल नरेश वस्त्र बाँट चुके थे, तभी बौद्ध भिक्षु आनन्द ने कौशल में प्रवेश किया। उस दिन राजधानी में ही उनका प्रवचन रखा गया। दान के महत्व पर बोलते हुए भिक्षु ने कहा- “ अपनी आवश्यकता से अधिक द्रव्य या वस्तुयें लोकहित में दान करते रहना चाहिये, इससे समाज में विषमता पैदा नहीं होती।”
राज कर्मचारियों को लगा जैसे राज्य से प्राप्त होने वाले वस्त्र में उनका लोभ और अपरिश्रम भी जुड़ा हुआ है, वे सब धर्मनिष्ठ, देश-भक्त और सामाजिक मर्यादाओं का पालन करने वाले थे, सो सबने अपने-अपने वस्त्र लाकर आनन्द को दान कर दिये।
अगले दिन यह चर्चा महाराज के कानों पर पड़ी। भगवान् बुद्ध के उपदेशों का उन्होंने अच्छी तरह स्वाध्याय किया था। भिक्षुओं के लिये निर्धारित आचार संहिता- शास्ता के भी वे अच्छे ज्ञाता थे। उन्हें मालूम था कि भिक्षु को अपने पास तीन चीवर से अधिक रखने का अधिकार नहीं है। उन्हें ऐसा लगा कि अपरिग्रह का उपदेश करने वाले आनन्द ने स्वयं ही शास्ता-मर्यादा तोड़ दी है, सो उनकी नाराजी और भी बढ़ गई। अगले दिन वे स्वयं ही बौद्ध स्थविर आ उपस्थित हुए।
आनन्द अभी संध्योपासना से निवृत्त होकर बैठे ही थे कि उन्हें महाराज के आगमन की सूचना दी गई। आनन्द द्वार तक स्वयं आये और महाराज को सादर परामर्श कक्ष तक ले आये। महाराज उद्विग्न थे, सो जाते ही पूछ लिया- भंते! आप भिक्षु हैं शास्ता के अनुसार आप अधिक से अधिक तीन चीवर ही ग्रहण करने के अधिकारी हैं, पर आपने पाँच सौ वस्त्र कैसे ग्रहण कर लिये?
आनन्द उठे ओर संघ विश्रामागार की ओर प्रस्थान करते हुये बोले-महाराज! आपका कथन सत्य है। वह समस्त चीवर यहाँ के अन्य भिक्षुओं को बाँट दिये गये हैं? अपने लिये तो एक ही चीवर- पर्याप्त था सो लिया भी एक ही है। भिक्षुओं के चीवर फट चुके थे, सो उनके लिये ही यह वस्त्र स्वीकार करने पड़े। अनावश्यक कुछ नहीं लिया।
महाराज ने पूछा- पर इस तरह इन भिक्षुओं के पास अब तक जो चीवर थे, क्या उनका अपव्यय नहीं हुआ, क्या आपके पूर्ण उपयोग की बात यहाँ असत्य न हो गई? आनन्द ने कहा- नहीं महाराज! हम शास्ता की मर्यादा का कभी भी उल्लंघन नहीं करेंगे। भिक्षुओं के पुराने चीवर उत्तरीय वस्त्र, उत्तरीय वस्त्र अन्तर-वासक और अन्तर-वासक बिछौने के काम में उपयोग कर लिये गये हैं, महाराज इन सबके बिछावन फट चुके थे।
महाराज को अपने अविश्वास पर बड़ी आत्म-ग्लानि हुई। क्षमा माँगते हुए उन्होंने कहा- “भंते! अपनी भूल के लिए हार्दिक पश्चाताप है।” इस पर आनन्द ने कहा- नहीं महाराज! ऐसा न कहें। दान पाने वाले को ही नहीं, देने वाले को भी सन्तुष्ट होना चाहिये कि उसका सही उपयोग हो रहा है, इसके लिये यदि दान दाता निरीक्षण करना चाहता है तो वह भी पुण्य ही है।
महाराज सन्तुष्ट होकर लौट आये।
=कहानी=============================
दो शिष्य आपसे में लड़ रहे थे, एक कहता था सच्चा योगी मैं हूँ मैंने काम पर विजय पा ली है, दूसरा कहता था, मैंने पद्मासन सिद्ध कर लिया है, मैं तुमसे भी बड़ा हूँ।
आचार्य ने दोनों की सुनकर कहा- ‘सच्चा योगी तो मृगाल है, जो अपने लिये कभी कुछ कहता ही नहीं, सदैव संसार के कल्याण की बात सोचता रहता है।
==================================
----***----
डॉ0 हेनकेन आगरा में गवर्नमेंट साइन्स डिपार्टमेन्ट में एक बड़े अफसर थे। प्रयोग के लिये उन्होंने जो जल लिया वह स्नान घाट वाराणसी के उस स्थान का था, जहाँ बनारस की गन्दगी गंगाजी में गिरती है। परीक्षण से पता चला कि उस जल में हैजा के लाखों कीटाणु भरे पड़े हैं। 6 घन्टे तक जल रखा रहा, उसके बाद दुबारा जाँच की गई तो पाया कि उसमें एक भी कीड़ा नहीं है, जल पूर्ण शुद्ध है, हैजे के कीटाणु अपने आप मर चुके हैं। उसी समय जब इस जल का प्रयोग किया जा रहा था, एक शव उधर से बहता हुआ आ रहा था। वह शव भी बाहर निकाल लिया गया, जाँचने पर पता चला कि उसके बगल के जल में भी हजारों हैजे के कीटाणु हैं, 6 घन्टे तक रखा रहने के बाद वे कीटाणु भी मृत पाये, यही कीटाणु निकाल कर एक दूसरे कुएं के जल में दूसरे बर्तन में डालकर रखे गये तो उसमें हैजे के कीटाणु अबाध गति से बढ़ते रहे।
यह घटना अमेरिका के प्रसिद्ध साहित्यकार मार्कट्वेन को आगरा प्रवास के समय ब्योरेवार बताई गई, जिसका उन्होंने भारत यात्रा वृत्तान्त’ में जिक्र किया है। इस प्रयोग का वर्णन प्रयाग विश्व-विद्यालय में अर्थशास्त्र के अध्यापक पण्डित दयाशंकर दुबे एम॰ ए॰ एल॰ एल॰ बी0 ने भी अपनी सुप्रसिद्ध ‘श्री गंगा रहस्य’ में किया है। धर्म ग्रन्थावली दारागंज प्रयाग से 1952 में प्रकाशित 300 से अधिक इस पुस्तक में गंगाजी के आर्थिक, औद्योगिक, सामाजिक, वैज्ञानिक, धार्मिक एवं साँस्कृतिक आदि अनेक लाभ और प्रयोगों की विस्तृत जानकारी दी गई है। विद्वान् लेखक ने गंगाजी के प्रति जो प्रबुद्ध श्रद्धा अभिव्यक्त की है, उसे पढ़कर भगवती गंगा की उपयोगिता का सहज ही पता चल जाता है।
बर्लिन के सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक डॉ0 जे0 ओलिवर ने तो भारत की यमुना, नर्मदा, रावी, ब्रह्मपुत्र आदि अनेक नदियों की अलग-अलग जाँच करके उनकी तुलना गंगा-जल से की और बताया कि गंगा का जल न केवल इन नदियों की तुलना में श्रेष्ठ है वरन् संसार की किसी भी नदी में इतना शुद्ध कीटाणु नाशक और स्वास्थ्यकर जल नहीं होता। उनके परीक्षणों का विस्तृत हवाला 4 नवम्बर 1933 के दैनिक पत्र ‘कर्मवीर’ में डॉ0 रविप्रताप सिंह श्रीनेत द्वारा दिया गया है। डॉ0 ओलिवर का इस सम्बन्ध में एक लेख न्यूयार्क से छपने वाले ‘ इन्टरनेशनल मेडिकल जर्नल’ में भी छपा था।
गंगा जल से मिलने वाले व्यक्तिगत लाभों की चर्चा की जाये तो उसका एक स्वतन्त्र गंगा-पुराण ही बन सकता है। विश्रामधाम कार्यालय बम्बई के श्री एन॰ आर॰ निगुडकर एक बार हिमालय यात्रा पर गये। एक दिन वे चलते समय फिसलकर गिर पड़े। सिर में गहरी चोट आई, घाव हो गया। उन्होंने लिखा है कि मैं प्रतिदिन गंगा-जल से घाव धो लिया करता था, उतने से ही वह गहरा घाव अच्छा हो गया।
‘गंगा स्नान महिमा’ के लेखक श्री ललनप्रसाद पाँडेय ने गंगा-जल की औषधोपम उपयोगिता का वर्णन करते हुये 19 वें पृष्ठ पर लिखा है कि मैं स्वयं पेट का रोगी था, गंगा-जल के नियमित सेवन से मेरे पेट की कमजोरी जाती रही।
गंगा-रहस्य के लेखक ने अपने आरोग्य-लाभ के लिये भी गंगा-जल के प्रति भूरि-भूरि श्रद्धा व्यक्त की है। गंगा के इन महत्त्वों को सम्भवतः श्री पं0 जगन्नाथ जी भी जानते थे, तभी तो उन्होंने गंगाजी की गोद में जीवित समाधि ले ली थी। पं0 जगन्नाथ जी की श्रद्धा का वर्णन बड़ा हृदय स्पर्शी है। वे कवि थे, प्रेमवश उन्होंने एक मुसलमान कन्या से विवाह कर लिया था। विवाह उन्होंने विशुद्ध प्रेम-भावना से किया था पर बनारस के रूढ़िवादी ब्राह्मणों ने उसका घोर विरोध किया। बेचारे पंडित जी को उन्होंने कभी चैन से नहीं बैठने दिया। तब वे गंगा जी के किनारे पहुँचे और भगवती को माँ सम्बोधित कर गीत रचने लगे। एक सीढ़ी पर बैठकर एक शिखरणी छन्द बनाने के बाद वे दूसरी पर पहुँचते और दूसरा छन्द बनाते। इस तरह 52 सीढ़ियों पर उतर कर 52 छन्द रचकर वे घाट पर रख गये और भावावेश में आकर उन्होंने भगवती की गोद में समाधि ले ली। पीछे गंगा लहरी के नाम से उनके यह छन्द प्रकाशित हुये।
गंगा-जल के पाचक, कीटाणु नाशक प्राण और शक्ति-वर्द्धक गुणों की प्रशंसा सुनते-सुनते बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के रसायन-शास्त्र के प्रवक्ता डॉ0 एन॰ एन॰ गोडबोले ने निश्चय किया कि -क्यों न गंगा-जल की रासायनिक परीक्षा करके देख ली जाय? उनके विश्लेषण का निष्कर्ष 18 जून 1967 के साप्ताहिक ‘धर्मयुग’ पृष्ठ 39 पर इस प्रकार दिया है- “मुझे फिनाइल यौगिकों की जीवाणु निरोधता के परीक्षण का काम दिया गया था, तभी मुझे गंगा-जल पर कुछ ‘चिकित्सा सम्बन्धी शोध-पत्र’ पढ़ने को मिले जिनमें यह बताया गया था कि ऋषिकेश से लिये गये, गंगा-जल में कुछ ‘प्रोटेक्टिव कालौइड’ होते हैं वही उसकी पवित्रता को हद दर्जे तक बढ़ाते हैं। कालौइड एक ऐसा तत्व है, जो पूरी तरह घुलता भी नहीं और ठोस भी नहीं रहता। शरीर में लार, रक्त आदि देहगत कालौइड हैं, ऐसे ही कालौइड गंगाजी के जल में भी पाये जाते हैं, जब उनकी शक्ति का ‘रिडैल-वाकर’ नामक यन्त्र से पता लगाया तो हम इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि गंगा-जल जीवाणु की वृद्धि को रोकता ही नहीं, उन्हें मारता भी है। रिडैल और वाकर नामक दो वैज्ञानिकों ने मिलकर बनाया था इसमें जिस तरह परमाणुओं के भार को हाइड्रोजन के परमाणु से सापेक्षित (रिलेटिव) मान निकालते हैं, उसी तरह फीनोल से सापेक्षित (रिलेटिव) जीवाणु निरोधता (कीटाणु नष्ट करने की शक्ति ) निकालते हैं।
गंगा जी के महत्त्व के प्रतिपादन को बहुत लम्बा किया जा सकता है पर उसके विस्तार में जाने की अपेक्षा उसके इतिहास में जाने से अनेक वह तथ्य जानकारी में आ सकते हैं, जिनकी अभी तक वैज्ञानिक ढँग से भी खोज नहीं हो पाई पर उनका महत्त्व साधारण और भारतीय प्रजा के लिये बहुत लाभदायक हो सकता है।
पौराणिक कथानक के अनुसार सगर के साठ हजार पुत्र जब श्राप वश मृत हो गये तो सगर को उनके उद्धार की चिन्ता हुईं उन्होंने असमंजस के पौत्र भागीरथ को उसके लिये तप करने और गंगा जी को लाने को भेजा। भागीरथ ने हिमालय में जाकर घोर तप किया। उसके फलस्वरूप गंगा का प्राकट्य हुआ।
प्रत्येक घटना को कलात्मक रीति से वर्णन करने की हमारे यहाँ पद्धति रही है। ऐसी प्रतीत होता है कि उन दिनों अकाल जैसी स्थिति आई होगी। तब प्रजा को पुत्र के समान मानते थे। सगर के 60 हजार नागरिक पीड़ित हुये हों और तब उन्हें एक नहर की आवश्यकता हुई हो। पौराणिक कथन है कि गंगा जी के लिये सगर की तीन पीढ़ियों ने तप किया था। तप का अर्थ हमारे यहाँ आग में तपना नहीं वरन् असम्भावित परिस्थितियों में भी संघर्ष का नाम तप रहा है। हिमालय की चट्टानों को काटकर गंगा जी को लाना एक कठिन कार्य था, उसके लिये सचमुच बड़े परिश्रम की आवश्यकता थी। पाश्चात्य विशेषज्ञों की भी ऐसी धारणा है कि गंगा नदी नहीं, नहर है और उसे कुछ विशेष स्थानों से जानबूझ कर लाया गया है।
हिमालय बहुमूल्य रसायनों और खनिजों का रहस्यमय स्रोत है। सर्पगन्धा चन्द्रवटी ऐसी जड़ी-बूटियाँ जो संसार में और कहीं नहीं पाई जातीं, हिमालय में आज भी मिलती हैं। जो फल संसार में दूसरे स्थानों में भी उगाने से नहीं उगते उनकी वहाँ मीलों लम्बी घाटियाँ हैं, पृथ्वी पर यदि कहीं कोई स्वर्ग है तो वह हिमालय ही है।
भगीरथ की प्रजा अकाल-ग्रस्त ही न थी, अभिशाप-ग्रस्त भी न थी, अर्थात् वे लोग अनेक रोगों से पीड़ित रहे होंगे, इसलिये गंगा के जल को उन-उन स्थानों से लाने के लिये एक विशेष शोध कार्य सगर की तीन पीढ़ियों को करना पड़ा था, जिनमें स्वास्थ्यवर्धक, कीटाणु नाशक, शक्ति और तेज वर्धक तत्त्वों का बाहुल्य था। गंगा जी का भूगोल इस तथ्य का शतशः प्रतिपादन करता है।
फार्म- 4
प्रकाशन का स्थान- मथुरा
प्रकाशन का अवधि क्रम- मासिक
मुद्रक का नाम-श्रीराम शर्मा आचार्य
राष्ट्रीयता- भारतीय
पता- जनजागरण प्रेस, मथुरा
प्रकाशक का नाम- श्रीराम शर्मा आचार्य
राष्ट्रीयता- भारतीय
पता- अखण्ड-ज्योति संस्थान, मथुरा
सम्पादक का नाम- श्रीराम शर्मा आचार्य
राष्ट्रीयता- भारतीय
पता- अखण्ड-ज्योति संस्थान, मथुरा
स्वत्वाधिकारी- श्रीराम शर्मा आचार्य
पता- अखण्ड-ज्योति संस्थान, मथुरा
मैं श्रीराम शर्मा आचार्य यह घोषित करता हूँ कि ऊपर दिये गये सब विवरण मेरी अधिकतम जानकारी और विश्वास के अनुसार सत्य हैं।
-हस्ताक्षर, श्रीराम शर्मा आचार्य
दोनों सत्यनिष्ठ, दोनों श्रद्धालु, दोनों ही अपनी प्रजा को पुत्र की दृष्टि से देखते थे, दोनों ही भगवती सरस्वती के उपासक थे। इन सब समानताओं के साथ-साथ दोनों पड़ौसी भी थे, उनका नाम था, महाराज विदूरथ और सम्राट् सिन्धुराज।
समय की गति और राजनीति का परिवर्तन कब हो जाये जाना नहीं जा सकता। एक दिन सम्राट् सिन्धुराज ने विदूरथ पर आक्रमण कर दिया। विदूरथ का पराक्रम सिन्धुराज से कम नहीं था। वह भी अपनी सेनायें लेकर संग्राम में आ जुटे। कई दिन तक भयंकर युद्ध हुआ पर विजय सिन्धुराज की ही हुई। विदूरथ खेत रहे। सिन्धुराज ने अपने हाथों से ही उनका वध कर डाला।
सन्ध्या समय जब महाराज सिन्धुराज की सेनायें विजयोन्मत्त उल्लास के साथ अपनी राजधानी लौट रही थीं, तब स्वर्गीय महाराज विदूरथ की धर्मपत्नी ने युद्ध क्षेत्र में प्रवेश किया। युद्ध क्षेत्र कहाँ? अब तो वहाँ श्मशान दिखाई दे रहा था।
मृतक पति का शीश अपनी बाँई जानु पर रखकर महारानी लीला ने भगवती सरस्वती का आवाहन किया। भक्त का करुण स्वर सुनकर वीणापाणि प्रकट हुईं और बोलीं- “भद्रे! तुम्हारा दुःख देखकर मेरा हृदय करुणा से भर गया है, बोला तुम क्या चाहती हो?”
माँ! लीला ने अश्रुशीत नेत्रों से दो बूँद अश्रु भूमि पर टपकाते हुये कहा-”सिन्धुराज ने अन्यायपूर्वक आक्रमण किया, तुमने यह जानते हुए भी मेरे पति की रक्षा नहीं की, जबकि मेरे पतिदेव भी तुम्हारे अनन्य उपासक थे।”
इसमें मेरा क्या दोष पुत्री! यह सब भावनाओं का खेल है। जो जिस कामना से मेरी उपासना करता है, मैं वैसा ही फल देती हूँ- सिन्धुराज की इच्छा चक्रवर्ती बनने की थी सो वह आज चक्रवर्ती है और तुम्हारे पति की इच्छा थी, आत्मोद्धार सो उनका उद्धार हो गया, यह तुम देख ही रही हो?
“अणु-अस्त्रों की भयंकरता की ओर अभी किसी का ध्यान नहीं है पर अगले तीन वर्षों के भीतर ही चीन या रूस का कोई आणविक परीक्षण साइबेरिया में होगा। इस परीक्षण से वहाँ की पृथ्वी फट जायेगी (स्मरण रहे साइबेरिया संसार का सबसे अधिक रेडियो विकिरण वाला क्षेत्र है) जो पृथ्वी अभी गोलाकार है, उसके फट जाने से अन्तरिक्ष परिभ्रमण-पथ पर उसकी स्थिति फटे हुए रबड़ के गेंद की तरह होगी। समुद्र उफन उठेगा, भीषण ताप से संसार में त्राहि-त्राहि मच जायेगी, पृथ्वी कई टुकड़ों में बिखरते-बिखरते बचेगी पर तीव्र-भूकम्प, तूफान, अतिवृष्टि और महामारियों की विभीषिका फैल जाने से लाखों लोग नष्ट हो जायेंगे॥”
अमेरिका की स्थिति बड़ी भयानक होगा। सन् 1980 तक चीन उसके किन्हीं दो सबसे बड़े शहरों पर अणु-बम गिरायेगा। उससे अमेरिका का क्रोध एकदम भड़क उठेगा। अमेरिका और रूस दोनों एक हो जायेंगे और दोनों मिलकर चीन पर आक्रमण करके उसे पूरी तरह नष्ट-भ्रष्ट कर देंगे। चीन में बहुत थोड़े लोग रह जायेंगे, फिर उनकी रक्षा भारतवर्ष करेगा। यह युद्ध तीसरे महायुद्ध के नाम से पुकारा जायेगा और पृथ्वी का अन्तिम युद्ध होगा। इस युद्ध में आतंकवादी देश, व्यक्ति और शक्तियाँ बिलकुल नष्ट हो जायेंगी और तब संसार में संयुक्त राष्ट्र संघ की तरह का एक अन्तर्विश्व स्थापित होगा।”
यह भविष्य वाणी अमेरिका के ऐसे भविष्य वक्ता की है, जिसकी भविष्य वाणियाँ आज तक अधिक से अधिक तीन प्रतिशत ही असत्य रहीं, उसकी शेष 97 प्रतिशत भविष्यवाणियाँ कभी असत्य नहीं निकलीं। अमेरिका और यूरोपीय देशों में भविष्य सम्बन्धी अद्भुत अतीन्द्रिय ज्ञान के लिये सर्वाधिक विख्यात नाम श्रीमती जीन डीक्सन और प्रोफेसर कीरो के हैं। विक्टोरिया युग का कवि टेनीसन भी दिव्य दृष्टि रखता था। उस युग में जब लोगों ने विमान, चन्द्र यात्रा और अणु-अस्त्रों की कल्पना भी नहीं की थी, टेनीसन ने अपनी एक कविता में लिखा था- “ यह संसार इतना विस्तृत है कि उसे समय ही माप सकता है, समय की उस विराट् सीमा को पार कर मेरी आंखें सुदूर भविष्य को देख रही हैं। मुझे दिखाई दे रहा है, संसार का व्यापार क्षेत्र बढ़ गया और आकाश के मार्ग से सामान की आवाजाही प्रारम्भ हो गई है। मनुष्य पृथ्वी के परे अवान्तर ग्रहों में आ-जा रहा है। यह विमान अपने साथ कोई बड़ा गोल आग्नेयास्त्र लिये दौड़ रहे हैं। यह अस्त्र पृथ्वी पर छोड़े गये हैं, उनका नीला धुँआ आकाश में छा गया है दक्षिण से एक तीव्र ताप उमड़कर सारे विश्व में फैल रहा है, जिसकी ज्वाला में संसार भर के झण्डे जलकर खाक हो गये हैं। युद्ध-बन्दी की घोषणायें कर दी गईं और पृथ्वी के सब लोग परस्पर मिल-जुलकर प्रेमपूर्वक रहने लगे।”
आज यह भविष्य वाणियाँ बिलकुल सच दिखाई दे रही हैं। विमान हम सब देख रहे हैं। दो-दो मानव-युक्त चन्द्रयात्रायें हो चुकी, मनुष्य तो सौर-मंडल के दूर की खोज के भी उपक्रम कर रहा है। अणुबम एक तो गिराया भी जा चुका, उसका धुआँ भी नीला ही होता है। पर इन सब सत्यों के बावजूद भी जब टेनीसन ने यह भविष्य वाणियाँ की थी कोई ऐसा ठोस प्रमाण नहीं था, जिससे उसके भविष्य दर्शन पर तत्काल विश्वास कर लिया जाता और उसके आधार पर पृथ्वी में रहने वाले लोग कोई परिवर्तित जीवन नीति अपनाने की प्रेरणा ग्रहण करते।
ऊपर के दो पैराग्राफों में दिये गये भविष्य-सम्भाषण एक ऐसे सूक्ष्म-दर्शी व्यक्ति के हैं, जिसकी भविष्य वाणियाँ जोन डिक्सन, कीरो और टेनीसन से भी अधिक सत्य पाई गई हैं। एक-एक, दो-दो वर्ष आगे की, की हुई उसकी भविष्य वाणियों को लोगों ने सैकड़ों बार सत्य होते देखा है। इस ज्योतिषी का जन्म सन् 1910 में अयोवा (अमेरिका) में हुआ था, उसे लोग ‘एण्डरसन’ के नाम से जानते हैं। एण्डरसन को यद्यपि मुख्य ख्याति उसके अतुलित शारीरिक पराक्रम और व्यायाम सम्बन्धी अद्भुत प्रदर्शनों के कारण मिली है तथापि वह शरीर की अपेक्षा प्रज्ञा-चक्षु अधिक है, उसकी शायद ही कोई भविष्य वाणी असत्य निकली हो, यही कारण है कि न केवल अमेरिका वरन् दूसरे देशों के व्यापारी, उद्योगपति, फिल्म-कलाकार, नेता आदि भी उससे भविष्य सम्बन्धी प्रश्न पूछ कर काम करते हैं।
एण्डरसन आठ वर्ष का हो गया, तब एक दिन वह अपने घर की बैठक में खेल रहा था। उन दिनों पहला विश्व-युद्ध प्रारम्भ हो चुका था। एण्डरसन का भाई नेल्सन कनाडा की सेना में कप्तान हो गया था। उसकी फोटो बैठक में लगी हुई थी। एण्डरसन अपनी माँ को पकड़कर कमरे में ले गया और बोला- “माँ देख भैया के चेहरे पर बन्दूक की गोली लग गई है और वह पृथ्वी पर गिरकर मर चुके हैं।”
माँ ने डाँटा- “चल मूर्ख! फिर कभी ऐसी बुरी बात मुख से मत निकालना।” पर एण्डरसन फिर भी वही बात कहता रहा। इस घटना के दो-तीन दिन बाद ही कनाडा से तार आया कि नेल्सन की 1 नवम्बर 1918 को गोली लगने से मृत्यु हो गई है। यह समाचार सुनते ही परिवार शोक-सागर में डूब गया और आश्चर्य में भी कि एण्डरसन को यह पूर्वाभास किस तरह हो गया था।
इसके बाद उसने कई ऐसी घटनायें अपने मुहल्ले, पास-पड़ौस वालों से सम्बन्धित बताईं और वे सब अक्षरशः सत्य निकलीं, तभी से लोग एण्डरसन को ‘सिद्ध भविष्य-वक्ता’ मानने लगे पर घर वालों ने ध्यान बटाने के लिये उसे शीघ्र ही एक खान में नौकरी से लगा दिया। यह नौकरी अधिक दिन नहीं चली। उसने यह कहकर- मैं उन्मुक्त आत्मा हूँ, मुझमें योग के संस्कार हैं, वह मुझे निरन्तर आत्म-विकास की प्रेरणा देते रहते हैं, मैं भौतिक परिस्थितियों का धन, रुपये, पैसे के लालच से बँधा नहीं रह सकता। उसने नौकरी छोड़ दी। और व्यापारी जहाजों के द्वारा संसार भ्रमण के लिये निकल पड़ा।
इस बीच उसने अपने शरीर का जिस तरह विकास किया उसे देखकर तो अनेक लोग यहाँ तक कहने लगे थे कि यह पूर्व जन्म का कोई योगी है, पिछले जन्म में किये योगाभ्यास का प्रभाव और प्रकाश उसमें अब भी विद्यमान् है। वह स्वयं इस पर कुछ भी टीका-टिप्पणी नहीं करते पर यह अवश्य स्वीकार करते हैं कि मनुष्य की सामर्थ्य नापी नहीं जा सकती। यदि वह संयम और परिश्रम का, व्यायाम और योगाभ्यास का प्रयोग करे तो अपने शरीर में अद्भुत सामर्थ्य उत्पन्न कर सकता है, साथ ही अपनी अतीन्द्रिय चेतना की शोध करने से चमत्कार लगने वाली बातों को नित्य-जीवन की भाँति सामान्य रूप से विकसित कर सकता है।
एण्डरसन शारीरिक सामर्थ्य का युवावस्था में सफल प्रदर्शन कर चुके हैं। वह अपने कन्धे पर लोहे की छड़ रख कर उसमें 15-20 व्यक्तियों तक को लटकाकर चल फिर लेते, कार उठा लेते और शक्तिशाली मोटर को भी हाथ से रोक देते तो मोटर एक इंच आगे न बढ़ती। जापानी व्यायाम-जूड़ो के वह सफल प्रदर्शनकारी माने जाते थे। एक बार उन्होंने अपने फार्म में बहुत से साँड पाले। एक दिन उन्होंने सार्वजनिक घोषणा करा दी कि वे साँड़ों से कुश्ती लड़ेंगे। समाचार बड़ा दिलचस्प था। हजारों की संख्या में दर्शक एकत्रित हो गये। कई लोग तो यहाँ तक कहते सुने गये कि एण्डरसन शीघ्र ही मरेगा पर जब उसने उन सबके सामने बड़े-बड़े उन्मत्त और क्रुद्ध सांड़ों को पछाड़ना प्रारम्भ कर दिया, तब लोगों को उसकी वास्तविक शारीरिक सामर्थ्य का पता चला।
एण्डरसन अब साठ वर्ष से अधिक आयु के हैं तो भी लोह की नाल दोनों हाथों से पकड़कर सीधा कर देते हैं। लोगों को आश्चर्य है कि हनुमान ने पहाड़ किस तरह उठाया होगा पर एण्डरसन ने सिद्ध कर दिखाया है कि संयम, शुद्ध, खान-पान, ब्रह्मचर्य और योगाभ्यास से ऐसी किसी भी सामर्थ्य का विकास असम्भव नहीं। वे स्वयं भारत आकर योग और ज्योतिष सम्बन्धी विस्तृत ज्ञान प्राप्त करना चाहते थे पर परिस्थितियाँ अनुकूल न होने से वे कभी अपनी यह इच्छा पूर्ण न कर सके। तो भी भारतीय धर्म और दर्शन के प्रति उनकी रुचि नहीं गई, जिसे वे और तरह से पूरी करते हैं।
द्वितीय विश्व-युद्ध के सम्बन्ध में उन्होंने घोषणा की- “इस युद्ध में रूस और अमेरिका एक साथ मिलकर लड़ेंगे पर आगे दोनों में शत्रुता हो जायेगी।” उन दिनों जर्मनी और रूस अभिन्न मित्र थे। और मित्र राष्ट्र दोनों के संयुक्त शत्रु। इसलिए तब किसी ने भी इस बात पर विश्वास नहीं किया। पर यह इतिहास प्रसिद्ध तथ्य है कि मित्र राष्ट्रों की सेनाओं में रूस और अमेरिका दोनों साथ-साथ मिलकर लड़े। “राष्ट्रपति रुजवेल्ट अधिक दिन तक राष्ट्रपति न रहकर मई 1945 तक दिवंगत हो जायेंगे” रुजवेल्ट सचमुच बीमार पड़े और साधारण-सी बीमारी के झटके से ही चल बसे। इस युद्ध का एक अमेरिकी सेनापति बाद में अमेरिका का राष्ट्रपति बनेगा।” सचमुच जनरल आइजन हीवर जो मित्र देशों की सेना में अमेरिका के सेनापति थे, बाद में राष्ट्रपति बने। “1947 में एशिया का एक महत्वपूर्ण देश अँग्रेजों के राज्य से निकल जायेगा।” भारत वर्ष को लोग भूले न होंगे, 1947 में ही स्वतन्त्र हुआ था।
युवा-अवस्था बीतने के साथ उनकी ख्याति निरन्तर एक भविष्य वक्ता के रूप में बढ़ती गई। मई सन् 1945 में एक दिन वे अपने आप अमेरिकी समाचार पत्र ‘वाकर काउन्टी मैसेन्जर’ के सम्पादक के पास जाकर बोले- ‘8 अगस्त को एक ऐसी भयंकर घटना होगी, जिससे जापान के साथ चल रहे युद्ध की स्थिति बिलकुल बदल जायेगी।” सम्पादक ने वह घटना नोट तो कर ली पर तब तक उन्हें कोई विश्वास न हुआ।
8 अगस्त ही वह क्रूर दिन था, जब हिरोशिमा पर बम गिराया गया, फलस्वरूप एक लाख से भी अधिक व्यक्ति मर गये या अपंग हो गये, यह बातें बाद में तुरन्त सत्य हो गईं। इस वज्रपात से जापान बुरी तरह लड़खड़ा गया। उसने आत्म-समर्पण कर दिया और उसी के साथ 18 अगस्त को युद्ध-विराम की घोषणा कर दी गई।
इसके बाद उन्होंने नीग्रो नेता मार्टिन लूथर किंग, राबर्ट कैनेडी की हत्या की भविष्य वाणियाँ कीं जो शत प्रतिशत समय और घटनाओं के साथ सत्य निकलीं। मार्टिन लूथर किंग की हत्या के लिये जो उन्होंने बारेन स्मिथ नामक एक प्रेस रिपोर्टर को 2 अप्रैल को ही लिख कर तक दे दिया था। उस पत्र में यद्यपि उसने नाम नहीं लिखा पर नीग्रो-नेता का स्पष्ट अर्थ ही मार्टिन लूथर किंग से था। इसी प्रकार उन्होंने जब दुबारा फिर कहा कि एक और नीग्रो नेता की हत्या होगी, तब तो लोगों ने उसे बिलकुल निराधार कह दिया था, किन्तु 22 जुलाई 1969 को जब स्व0 मार्टिन लूथर किंग के भाई रेवरेंड विलियम्स किंग का शव एक तालाब में तैरता पाया गया, तब लोगों को सच्चाई का पता चला।
अमेरिका को चीनी नागरिकों से सतर्क करने का श्रेय तो पूरी तरह एण्डरसन को ही दिया जाता है। उसने कहा था कि- “चीनी सारे संसार में अपना कूटजाल फैलायेंगे। अमेरिका में भीतर ही भीतर उनके षड़यन्त्र चलेंगे और जब केन्द्रीय विभाग उसकी जाँच करेगा, तब यही निष्कर्ष निकलेगा कि अमेरिका में चीनियों का अस्तित्व खतरे से खाली नहीं।”
इसके कुछ ही दिन बाद देश के भीतरी दंगों से पीड़ित अमेरिका सरकार ने एक जाँच कमेटी बैठाई। इस के महा निर्देशक श्री हूवर नियुक्त हुए उन्होंने 1969 को अपनी जाँच रिपोर्ट प्रस्तुत की, उसमें वही बातें पाई गईं, जो एण्डरसन ने पहले ही बता दी थीं।
कोई साँसारिक भय ज्ञानी पुरुष के मन को नहीं दहला सकता, चाहे वे उसके कितने ही निकट आ जाए। जैसे कोई तीर पत्थर की विशाल ठोस शिला को नहीं बेध सकता।
-योगवशिष्ठ
इन घटनाओं का सम्बन्ध जो बीत गया उस समय से है, इसलिये अब इनका कोई महत्व नहीं रहा। पठनीय और विचारणीय तो वह अंश है, जिसमें आगामी दशक और सत्र 2000 तक की परिस्थितियों पर प्रकाश डाला गया है।
अपनी एक महत्वपूर्ण भविष्य वाणी में श्री एण्डरसन ने बताया कि आगामी 3 वर्ष (सन् 1970, 71 और 72) संसार के लिये महाविनाशक होंगे। एशिया का सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश (चीन) उत्पात शुरू करेगा और उसका सामना करने के लिए अमेरिका व रूस को एक होना पड़ेगा। अरब राष्ट्रों सहित मुसलिम बहुल राज्यों में आपसी क्रान्तियाँ और भीषण रक्तपात होंगे। युद्धों की यह शृंखला 1980 तक चली जायेगी। इस बीच सभी देशों के राजनैतिक प्रधानों का अस्तित्व खतरे में रहेगा और उनका प्रभुत्व घटता हुआ चला जायेगा। लोग छोटे से छोटे तबके के सच्चे ईमानदार और धार्मिक व्यक्ति को महत्व देने लगेंगे। कई देशों में बुरे लोगों को विधिवत् नष्ट करने के लिये कई तरह की चमत्कारी शक्तियाँ तक उदय हो सकती हैं।
इस बीच भारतवर्ष में एक छोटे देहात में जन्मे व्यक्ति का धार्मिक प्रभाव न केवल भारतवर्ष वरन् दूसरे देशों में भी बढ़ने लगेगा। यह व्यक्ति इतिहास का सर्वश्रेष्ठ मसीहा बनेगा, उसके पास अकेले उत्पादित इतनी संगठन शक्ति होगी, जितनी विश्व के किसी भी राष्ट्र की सरकार के पास भी नहीं होगी। यह संसार के तमाम संविधान के समानान्तर एक मानवीय संविधान का निर्माण करेगा, जिसमें सारे संसार की एक भाषा, एक संघीय राज्य, एक सर्वोच्च न्याय-पालिका, एक झंडा की रूपरेखा होगी। इस प्रयत्न के प्रभाव से मनुष्य में संयम, सदाचार, न्याय, नीति, त्याग और उदारता की होड़ लगेगी। समाचार-पत्रों के मुख-पृष्ठों पर ऐसे समाचार छपा करेंगे, जो मानवीय सेवा , त्याग साहस और उदारता के अद्वितीय उदाहरण होंगे। जिन्हें पढ़कर लोगों की भावनायें बरबस उमड़ने लगा करेंगी। हत्या लूट-पाट, राहजनी, चोरी, छल आदि अपराधों का अस्तित्व सदैव के लिये मिट जायेगा। सन् 1999 तक इस सारे ही संसार का स्वरूप बदल जायेगा और फिर हजारों वर्षों तक लोग सुख-शाँति का जीवन व्यतीत करेंगे।
उनका यह भी कहना है कि- “आज संसार धर्म और संस्कृति के जिस स्वरूप की कल्पना भी नहीं करता, उस धर्म का तेजी से विस्तार होगा और वह सारे संसार पर छा जायेगा। यह धर्म और संस्कृति भारतवर्ष की होगी और यह मसीहा भी भारतवर्ष का ही है, जो इन दिनों आने वाली क्राँति की नींव सुदृढ़ बनाने में जुटा हुआ है।
लगभग ऐसी ही भविष्य वाणी जीन डिक्सन ने भी की है। वह पहले छप चुकी है, इस तरह संसार के तीनों महान् भविष्यवक्ताओं का एक ही तरह का भविष्य-दर्शन यह विश्वास दिलाता है कि युग-परिवर्तन परमात्मा की निजी इच्छा है और वह रुकेगा नहीं। यह युग बदल कर ही रहेगा, इसमें सन्देह नहीं है।
एक दिन भिक्षु संगाम जी ने भगवान् बुद्ध से पूछा- भगवन्! संसार के प्रमाद में पड़े हुये की क्या पहचान है? भगवान् बुद्ध ने तत्काल कोई उत्तर न दिया। और और बातें करते रहे।
एक दिन कुण्डिया नगर की कोलिय पुत्री सुप्पवासा के यहाँ उनका भोज था। सुप्पवासा सात वर्ष तक गर्भ धारण करने का कष्ट भोग चुकी थी। भगवान् बुद्ध की कृपा से ही उसे इस कष्ट से छुटकारा मिला था, इसी प्रसन्नता में वह भिक्षु संघ को भोज दे रही थी।
जब सुप्पवासा तथागत को भोजन करा रही थी, उसका पति नवजात शिशु को लिये पास ही खड़ा था। सात वर्ष तक गर्भ में रहने के कारण बालक जन्म से ही विकसित था। देखने में अति सुन्दर। उसके हँसने और क्रीड़ा करने की गतिविधियाँ बड़ी मनमोहक थीं। बार-बार माँ की गोद में जाने के लिये मचल रहा था।
भगवान् बुद्ध ने मुस्कराते हुये पूछा-बेटी सुप्पवासा! तुझे ऐसे-ऐसे पुत्र मिलें तो कितने और पुत्रों की कामना तू कर सकती है।
सुप्पवासा ने कहा- “भगवन्! ऐसे सात पुत्र हों तो अच्छा है।”
संगाम जी बगल में ही बैठे थे। कल तक जो प्रसव पीड़ा से बुरी तरह व्याकुल थी, आज फिर पुत्रों की कामना कर रही है, यह देखकर संगाम जी बड़े आश्चर्यचकित हुये।
बुद्ध ने हँसकर कहा- संगाम जी चौंकिये मत, तुम्हारे कल के प्रश्न का उत्तर यही तो है।
संसार की हर वस्तु के दो उपयोग माने गये हैं। एक सदुपयोग दूसरा दुरुपयोग। मानव-जीवन के भी यही दो उपयोग होते हैं।
किसी वस्तु का सदुपयोग तब ही हुआ माना जायेगा, जब उसके यापन से अधिक अच्छी स्थिति, अधिक शाँति और अधिक सुख-संतोष प्राप्त हो। इसके विपरीत यदि उसके यापन से कोई लाभ न हो, उल्टे दुःख-तकलीफों, अशाँति एवं असंतोष में वृद्धि हो तो समझ लेना चाहिये, उसका दुरुपयोग ही हुआ।
जीवन का एक भी क्षण बचाकर नहीं रखा जा सकता। उसका प्रत्येक क्षण यापन होता रहता है। कोई काम किया जाय या केवल पड़े, बैठे रहा जाये जीवन बीतता ही चला जायगा। समापन की ओर बहता हुआ उसका अविराम प्रवाह एक क्षण को भी स्थगित नहीं किया जा सकता। कुछ आवश्यकताओं की प्रेरणा, कुछ सुख की लिप्सा का दबाव और कुछ उसकी निरन्तर गति का खेद मनुष्यों को कुछ करते रहने अथवा कर डालने के लिये विवश कर देता है। यदि जीवन का यापन हो जाना अटल सत्य न हो तो बहुत से आलसी तो ऐसे भी मिलेंगे, जो आवश्यकताओं की आपूर्ति की पीड़ा सहकर भी निष्क्रिय एवं निश्चेष्ट पड़े रहें।
जब हर प्रकार से जीवन का यापन होना ही है तो बुद्धिमानी इसी में है कि इसका अधिक से अधिक सदुपयोग करके कुछ ऐसा लाभ उठा लिया जाये, जो श्रेयस्कर भी हो और स्थायी भी। समझने के लिये तो हर आदमी यही समझता है कि वह दिन-रात दौड़-धूप कर अधिक सुख तथा अधिक शाँति पाने के लिए जीवन का सदुपयोग कर रहा है। किन्तु, सत्य यह है कि ऐसे बिरले ही बुद्धिमान मिलेंगे, जो यह समझते हों कि जीवन को किस प्रकार और किस दिशा में यापन करने से उसका सदुपयोग होगा और किस प्रकार तथा किस दिशा में यापन करने से दुरुपयोग। बाकी लोग तो अन्धाधुन्ध “जिधर सींग समाये” धंसते चले जाने में में ही उसका उपयोग सदुपयोग समझते हैं।
अधिकाँश लोग धन बटोरने में ही जीवन का सदुपयोग मानते हैं। उनका कुछ ऐसा विचार रहता है कि यदि ढेर सा धन मिल जाये जो वे उसके बल पर सारे सुख, सारे सन्तोष और सारे श्रेय खरीद सकते हैं। उनके सुख एवं श्रेय की परिभाषा, ऊँचे-ऊँचे मकान, लम्बे-चौड़े व्यापार, भारी भरकम तिजोरी और दान-दक्षिणा के आधार पर सामाजिक मान-सम्मान तक ही सीमित होती है। सुख आराम के अधिक से अधिक और आधुनिकतम साधन जुटा लेने को ही प्रायः वे सुख संचय कर लेना समझते रहते हैं। इसके आगे बढ़े तो भोग-विलास, इन्द्रिय तृप्ति, फैशन प्रदर्शन और अधिकाधिक व्यय करने तक पहुँच जाते हैं। बस इसके आगे न तो उनका कोई सुख होता है और न श्रेय।
किन्तु उनके इस सत्य की असत्यता समझने के लिये उनके जीवन पर दृष्टिपात करना होगा। अधिक धन उनका ध्येय होता है। किन्तु हिस्से से अधिक धन की प्राप्ति सच्चाई से परिश्रम करने और ईमानदारी से व्यापार करने से नहीं मिल सकता। उसके लिये अन्य लोगों का शोषण करना होगा। रोजगार में लम्बे-लम्बे मुनाफों की जुगाड़ करनी होगी। सरकारी टैक्स की चोरी तथा समाज के भाग से मुख मोड़ना होगा। मुनाफा-खोरी, भ्रष्टाचार, कालाबाज़ारी तथा अभाव, अकाल का अनुचित लाभ उठाना, कुछ ऐसे मार्ग हैं, जिनके द्वारा ही अधिकाधिक धन प्राप्त हो सकता है। अथवा इससे भी दुष्ट एक मार्ग और है-वह है किसी का माल मार लेना, किसी को ठग कर धोखा देख सब कुछ छीन लेना, चोरी, मक्कारी, लूट-खसोट, सट्टा, जुआ आदि।
विचारणीय बात है कि क्या इन मार्गों से आया हुआ धन जीवन में एक क्षण भी सुख-शाँति को ठहरने दे सकता है। यदि उससे जुटाये गये उपकरण कुछ आराम देते हैं तो उससे हजारों गुना यह चिन्तायें प्राण खाये रहती हैं कि कहीं चोरी न खुल जाये, यह रेत की भींति पर खड़ा आर्थिक महल गिर न जाये, कहीं ऐसा न हो कि काठ की यह आज चढ़ी हाँडी कल काम न दे सके। चालाकी तथा चार-सौ-बीस पर चल रहा यह धन्धा कहीं चौपट न हो जाये। ऐसा न हो कि लोग हमें बेईमान, मक्कार तथा मिथ्याचारी न समझ लें, जिससे सारी प्रतिष्ठा धूल में मिल जाये। कहीं गुप्त धन का पता सरकार को न लग जाये। कहीं चोर, डाकू हमारे धन को लक्ष्य न बना लें आदि।
यह सब चिन्ताएँ इतनी भयानक तथा स्थायी होती हैं कि धन की तृष्णा रखने वाले के लिये व्यंजन को विष और सुख-सेज को कंटकाकीर्ण बना देती हैं। इस बाहर से दिखलाई देने वाली तड़क-भड़क तथा बड़प्पन एवं धनाढ्यता के पीछे चिन्ताओं का कितना धुआँ, शंकाओं, के कितने विषधर भरे रहते हैं, यह तो वही लोग बतला सकते हैं, दुर्भाग्य से अधिकाधिक धन जिनका ध्येय बन गया है और उसकी प्राप्ति के मार्ग अनुचित हैं।
इस प्रकार सुख-संतोष के लिए धन कमाने में जीवन का सदुपयोग बतलाने वाले लोगों की बात कहाँ सच्ची हुई। इतनी चिन्ताएं, इतनी जलन और इतनी कुण्ठाएँ स्पष्ट सिद्ध करती हैं कि वह लोग जीवन का सदुपयोग नहीं दुरुपयोग कर रहे हैं।
धन लिप्सालुओं की छोड़िये, उन जनसाधारण को ले लीजिए, जिनका ध्येय अधिकाधिक धन तो नहीं, किन्तु सुख-संतोष का साधन इन्द्रियों की वासना तृप्ति मानते हैं। वे अधिक से अधिक और अच्छे से अच्छा भोजन पाने और वस्त्र पहनने तथा इन्द्रियों की तृप्ति की जुगाड़ में ही सारा जीवन लगाते रहते हैं। जो कुछ मिल गया, उसी दिन चाट-पोंछ कर साफ कर दिया, दूसरे दिन जो कुछ छीने-झपटे, मिला ले आये और चाट पोंछ की समाप्त कर दिया। जो कुछ कमा पाओ, कमाओ और खा-पीकर बराबर कर देना ही उनके जीवन का लक्ष्य होता है। माना कि अर्थ तृषा से उत्पन्न समस्याओं जैसी समस्याएँ ऐसे लोगों की नहीं होती, तब भी यह लोग कष्टों, क्लेशों तथा कुण्ठाओं से मुक्त नहीं रहते। इसकी समस्यायें तथा चिन्तायें इनके अनुरूप होती हैं।
आज का आज ही खा-पीकर बराबर कर दिया और जब कल हारी-बीमारी की कोई आवश्यकता सामने आ जाती है, तब दूसरों के सामने हाथ फैलाते और दाँत दिखलाते फिरते हैं। कर्ज लाते और ब्याज भरते-भरते मर जाते हैं। बच्चों की फीस समय पर जमा नहीं होती उनकी शिक्षा बन्द हो जाती है। बेटी जवान हो जाती है किन्तु पास में कानी कौड़ी नहीं होती। बुढ़ापा दौड़ता हुआ चला आता है, किन्तु उसका कोई प्रबन्ध नहीं। क्या यह विषमताएँ ऐसी नहीं हैं, जो किसी भी व्यक्ति का जीवन गीली लकड़ी की तरह सुलगा-सुलगा कर जलाया करें।
इसके अतिरिक्त, जो व्यक्ति इन्द्रिय लोलुप होते हैं, स्वाभाविक है कि असंयमी भी होते हैं। असंयम तथा स्वास्थ्य में घना विरोध है और उसकी, रोगों के साथ घनी मित्रता होती है। महीने का असंयम तथा इन्द्रिय तृप्ति वर्ष दो वर्ष के लिये स्वास्थ्य की छुट्टी कर देती है, तब जिनके जीवन का ध्येय ही मौज मारना होता है, उनके जीवन की क्या दशा होती है, इसे तो किसी भी असंयमी को देखकर जाना जा सकता है। कुछ ही समय में शरीर खोखला हो गया होता है, मंदाग्नि अथवा अरुचि के रोग लग गये होते हैं, चेहरे सूखकर असुन्दर हो गये होते हैं, स्वभाव क्रोधी, चिढ़-चिढ़ा तथा झक्की बन गया होता है, पत्नी, परिवार तथा बच्चों से लड़ाई ठनी रहती है। ऐसी दशा को देखकर यह कैसे माना जा सकता है कि उन लोगों ने जीवन का सदुपयोग किया अथवा कर रहे हैं।
वास्तविक बात तो यह है कि इस प्रकार का कोई भी जीवन यापन उसका सदुपयोग नहीं है। जीवन के उतने अंश को ही सदुपयुक्त कहा जायेगा, जो भौतिक तृष्णाओं तथा इन्द्रिय तृप्ति के प्रयत्नों से बचाकर परमार्थ तथा अध्यात्म की दिशा में लगाया जायेगा। इस इन्द्रजाल जैसी भूल भुलैया से भरे संसार में एकमात्र आध्यात्मिक दिशा ही वही दिशा है, जिसमें सच्चे तथा स्थायी सुख-संतोष के कोष बिखरे मिलते हैं। जितना भी समय इस ओर लगाया जाता है, उतने का तो सदुपयोग हो जाता है बाकी तो संसार के जाल-जंजाल में उलझकर यों ही नष्ट ही नहीं हो जाता वरन् न जाने कितना शोक-सन्ताप तथा पश्चाताप दे जाता है। जीव के जड़-जंजालों में पड़े हुए भी जो लोग कुछ समय इस ओर भी दे देते हैं, वे अन्य लोगों की तुलना में अधिक सुखी, संतुष्ट और शाँतिपूर्ण दिखाई देते हैं। अध्यात्मवाद ही तो वह शीतल छाया है, जो संसार चक्र से थके-माँदे मनुष्य को सच्ची विश्राँति दे पाती है। बाकी सारे सुखों, सारे उपकरणों की छलना सिवाय शोक-संतापों के और कुछ भी नहीं देती।
साधन सम्पन्न व्यक्तियों से भी पूछा जा सकता है कि आपने जो यह योजनों लम्बा कारबार फैला रखा है, इसकी क्या आवश्यकता थी। उतना कारोबार काफी था, जिससे सुविधापूर्वक जीवन यापन किया जा सकता है। धन की सामाजिक प्रतिष्ठा का मानदण्ड मानकर आपने स्वयं ही तो यह जाल अपने चारों ओर फैलाया है। यदि आपने संयम, संतोष और सादगी को जीवन की शोभा माना होता तो न जाने कितना समय आध्यात्मिक प्रगति के लिये मिल जाता।
दरअसल बात यह है कि अधिकाँश लोग इन्द्रिय लोलुपता तथा वितृष्णा अथवा लोकेषणा को जीवन का लक्ष्य बनाकर अपना घात आप किया करते हैं। जबकि न तो यह कोई नैसर्गिक उत्तरदायित्व है और न सामाजिक बन्धन! और फिर सारी व्यस्तताओं के होते हुए भी जब आकस्मिकताओं, घटनाओं तथा आपत्तियों से निपटने के लिये अवकाश की कमी नहीं रहती, तब आध्यात्मिक प्रगति के लिये समयाभाव की शिकायत किस प्रकार उपयुक्त मानी जा सकती है। लोग सबसे उपयोगी आनन्ददायक अध्यात्मवाद को उतना आवश्यक नहीं समझते जितना कि इन्द्रिय लोलुपता तथा विविध एषणाओं को। यदि वे अध्यात्मवाद को उपयोगी आवश्यक तथा हितकारी समझकर प्राथमिकता देने लगें तो न तो अवकाश की शिकायत रहे और जनजीवन में दुख-दर्द की बहुतायत। जो व्यक्ति इसकी महत्ता तथा सदुपयोगिता का ठीक-ठीक अर्थ समझते हैं, वे आनन्द करते हैं।
भिखारी ने हाथ आगे बढ़ाया पर जेब में कुछ न निकला। अश्वपति कुछ दुखी से होकर घर गये और एक बर्तन उठाकर ले आये और भिखारी को दे दिया।
थोड़ी देर में अश्वपति की पत्नी आई और वह बर्तन न पाकर चिल्लाई अरे चाँदी का बर्तन भिखारी को दे दिया। दौड़ो-दौड़ो उसे वापिस लेकर आओ।
अश्वपति ने आगे बढ़कर भिखारी को रोककर कहा-भाई! मेरी पत्नी ने बताया है कि यह गिलास चाँदी का है, उसे सस्ता मत बेच देना।
एक पड़ौसी ने पूछा-अश्वपति! जब तुम्हें पता हो गया था कि गिलास चाँदी का है तो भी उसे गिलास क्यों ले जाने दिया।
अश्वपति ने हँसकर कहा-मन को इस बात का अभ्यास बनाने के लिये कि वह बड़ी वे बड़ी हानि से भी दुखी और निराश न हो।
1947 की बात है, लिम्बर्ग में वान टासिंग नामक एक युवक की हत्या कर दी गई। हत्यारे ऐसा कोई चिन्ह नहीं छोड़ गये थे, जिससे उनका रत्ती भर सुराग मिलता। पुलिस ने कोई भी प्रयत्न छोड़ा नहीं, किन्तु उसे किसी तरह की सफलता हाथ न लगी।
अन्त में एक ऐसे व्यक्ति की सहायता ली गई, जिसके बारे में उन दिनों न केवल हालैण्ड वरन् सारे विश्व में यह कहा जाता था कि उसे किसी की वस्तु या शरीर का कोई अंग स्पर्श करते ही उसके सम्बन्ध में अनेक रहस्यों का पता फिल्म में दिखाये गये दृश्यों की भाँति चल जाता है। उसे विलक्षण सिद्धि प्राप्त थी। उसे लोग सर्वदर्शी मानते थे।
उस व्यक्ति ने पुलिस कार्यालय में आते ही बताया कि इससे पूर्व कि मैं आप लोगों की कुछ सहायता करूं, मुझे टासिंग के शरीर से लगी किसी वस्तु या वस्त्र की आवश्यकता पड़ेगी। आप उसका प्रबन्ध करा दें, उस वस्तु की गन्ध के आधार पर ही यह बताया जाना संभव होगा कि उसकी किसने हत्या की है? वस्त्र धुला न हो यह भी आवश्यक है।
टासिंग का कोट उपलब्ध था, वह उसे दिया गया। उसे हाथ में लेते ही एक विचित्र प्रकार की स्थिति उसने अनुभव की। अनेक दृश्य अपने आप मस्तिष्क में उतरने लगे। उसने कहा- “टासिंग की हत्या जिस व्यक्ति ने की है, वह अधेड़ आयु का है, उसकी बड़ी-बड़ी मूँछें हैं और मैं स्पष्ट देख रहा हूँ कि उस व्यक्ति का एक पाँव लकड़ी का है। वह चश्मा भी लगाता है।
इतना बताने तक पुलिस अधिकारियों ने न कोई उत्सुकता दिखाई, न रुचि क्योंकि इस हुलिए का व्यक्ति जो जेल में पहले ही बन्द था। यह मृतक का पिता ही था पर अब उसने दूसरा विवाह कर लिया था। पुलिस को भी उस पर सन्देह था पर जब तक कोई प्रमाण न मिले मुकदमा कैसे चलाया जा सकता था।
उस सर्वदर्शी व्यक्ति ने आगे कहना प्रारम्भ किया- “व्यक्ति का स्वार्थ जब इतना प्रबल हो जाता है कि उसका नियन्त्रण नहीं हो पाता तो मनुष्य कोई भी पाप कर सकता है, उस व्यक्ति की कुदृष्टि एक दिन टासिंग की पत्नी पर ही चली गई। कुछ दिन तक तो वह इस बात को टालता रहा पर जब वासना अनियन्त्रित हो उठी तो उसने टासिंग की हत्या कर दी।” इतना बताने पर भी पुलिस इंस्पेक्टर को कोई विशेष दिलचस्पी न जगी। उसने कहा- “आपने जो कुछ बताया वह तो सारा लिम्बर्ग शहर जानता है। इसमें नया क्या है।
तब वह व्यक्ति कुछ रुका और इंस्पेक्टर की ओर देखता हुआ बोला- “अच्छा तो जो बात आप नहीं जानते वह बताते हैं। उस व्यक्ति ने जिस हथियार से हत्या की है, वह एक बन्दूक है और उसी मकान की छत पर है। उसमें उस व्यक्ति की उँगलियों के निशान भी हैं।” इतनी जानकारी वरदान सिद्ध हुई। इंस्पेक्टर ने तलाशी ली और वह बन्दूक ठीक वहीं मिली। अभियुक्त को उसी के आधार पर दंडित किया जा सका।
कोई वस्तु देखकर उस व्यक्ति से सम्बन्धित अदृश्य बातें और मनोभाव तक बता देने की यह क्षमता जिस व्यक्ति में थी, उसे पीटर हरकौस के नाम से आज सारा संसार जानता है। उसका वास्तविक नाम पीटर वान डेर हर्क था। 21 मई 1911 को उसका जन्म हालैंड में हुआ। यह नाम तो उसने जर्मनी आक्रमणकारियों से रक्षा के लिये बदल लिया था।
हमारे देश में ऐसे सिद्ध-महात्माओं का आज भी अभाव नहीं है, जो योग साधनाओं द्वारा अपने शरीर के मर्मों में सुरक्षित सूक्ष्म यन्त्र, चक्र, उपत्यिकाओं, नाड़ी-गुच्छकों और कुण्डलिनी शक्ति को जागृत कर लेते हैं, और उनसे ऐसी सामर्थ्य प्राप्त कर लेते हैं, जो साधारण व्यक्तियों के लिये चमत्कार जैसी लगती हैं। यह साधनायें कुछ कष्ट साध्य, समय साध्य और जीवन-प्रवाह से विपरीत दिशाओं पर चलकर साहसपूर्वक सिद्ध होती हैं, कुछ उनका सम्बन्ध आध्यात्मिक श्रद्धा और विश्वास से भी होता है, इसलिये बहुत कम लोग उन पर विश्वास कर पाते हैं, जो विश्वास कर भी लेते हैं, वे इतनी मूल्यवान् वस्तु के लिये उतना ही परिश्रम और परित्याग नहीं करना चाहते, इसीलिये भारतीय तत्व दर्शन का यह एक अत्यन्त महत्वपूर्ण अध्याय उपेक्षित ही होता चला जा रहा है। पर इस एक आकस्मिक घटना ने एक बार फिर से सारे भारतवर्ष वरन् समूचे विश्व को यह सोचने के लिये विवश किया कि शरीर में कोई एक अतीन्द्रिय सत्ता अवश्य है, जो सर्वदर्शन, दूरदर्शन, दूरानुभूति आदि सूक्ष्म गुणों से सम्पन्न है। यह शक्ति सूक्ष्म होकर भी वैज्ञानिक है और उसे विभिन्न योगिक क्रियाओं के द्वारा जागृत भी किया जा सकता है। इस शक्ति का एक साधारण यन्त्र दोनों भौंहों के बीच जहाँ देखने वाली नाड़ियाँ (आप्टिक नर्ब्स) आप्टिक कैजमा बनाती हैं, वहाँ है और उसका नाम ‘आज्ञा चक्र’ रखा गया है। साधारण मनुष्यों में कभी गर्म नाड़ी (इड़ा), कभी ठंडी नाड़ी (पिंगला) चलती रहती है, इसीलिये उस सूक्ष्म संस्थान का बोध नहीं होता पर कुछ प्राणायाम और योग क्रियाओं से दोनों नाड़ियों को ‘समवात’ कर लिया जाता है तो एक तीसरी विद्युत-चुम्बकीय शक्ति ‘भ्रूमध्य में दिव्य प्रकाश के रूप में चमक उठती है, यह चैतन्य विद्युत ही उन तमाम जानकारियों का आधार है, जो दूसरों के लिये रहस्य जैसी होती है पर उस योगी के लिये वह नितान्त साधारण बात होती है। ‘योग चूडामण्युपनिषत्’ तथा दूसरे योग उपनिषदों शिव संहिता, घेरण्ड संहिता आदि आर्ष-ग्रन्थों में उसका विस्तार से वर्णन मिलता है।
पीटर हरकौस के साथ तो जो कुछ हुआ, वह सब अकल्पित और अनायास ही हो गया। उसने इसके लिये किसी प्रकार अभ्यास नहीं किया था। एक दिन की बात है-पीटर हरकौस अपने पिता के साथ हालैंड की सेनाओं की बैरिकों की पुताई कर रहा था, यह उसका पैतृक धन्धा था। पीटर की बहुत इच्छा थी कि वह पढ़-लिखकर कोई बड़ा कार्य करे पर परिवार के उत्तरदायित्वों से विवश पीटर को पढ़ाई छोड़कर नौकरी करनी पड़ी। कुछ दिन वह चीन में नाविक बनकर भी रहा पर वहाँ से छुट्टी मिली जो उसने फिर अपना सारा ध्यान इस एक ही कला में लगाया। दीवार की पुताई करते समय एकाएक उस दिन उसका हाथ छूट गया और वह 30 फुट नीचे एसफाल्ट की सड़क पर जा गिरा। उसे सख्त चोटें आईं कपाल फट गया, अस्पताल पहुँचाया गया, वहाँ किसी प्रकार जीवन रक्षा हुई।
पाड़ से गिरने की घटना सन् 1943 में घटी। अस्पताल में जब उसे होश आया तो उसने अपने में विलक्षण क्षमता अनुभव की। उसे ऐसा लगा कि कपाल के उस भाग में जहाँ चोट आई है, एक विशेष प्रकार की विद्युत तरंग-उभर उठी है, जब कोई अन्य वस्तु संपर्क में आती है तो उसके प्रभाव से उस व्यक्ति की अज्ञात बातों का भी उसके मन में अनायास प्राकट्य होने लगता है। हरकौस के बगल में ही एक दूसरा रोगी पड़ा था। उसे देखते ही हरकौस ने कहा- “तुम बड़े बुरे व्यक्ति हो।” वह व्यक्ति इस अयाचित प्रसंग के लिये बिलकुल तैयार न था पर जब छेड़खानी हो ही गई तो उसने भी आखिर पूछ लिया- “मैं क्यों खराब हूँ?”
पीटर हरकौस ऐसे बोले जैसे कोई चित्र वह स्पष्ट रूप से देख रहे हों-उन्होंने कहा- “तुम्हारे पिता ने कितने आदर और भावना के साथ तुम्हें सोने की घड़ी दी थी पर तुम ऐसे उड़ाऊ प्रकृति के व्यक्ति हो कि उसे बेच डाला और वह धन किसी सत्कार्य में लगाने की अपेक्षा यों ही आवारागर्दी में उड़ा दिया।”
यह सबसे प्रारम्भिक घटना थी, जिसने किसी दूसरे आदमी को प्रकट होने दिया कि पीटर हरकौस विलक्षण शक्ति का स्वामी बन चुका है। वह रोगी आश्चर्यचकित था कि जो बात मेरे अतिरिक्त दूसरा कोई व्यक्ति नहीं जानता वह इसने कैसे जान ली। उसने पूछा- “आपने यह कैसे जान लिया?” पर इसका कोई निश्चित उत्तर देने की क्षमता पीटर हरकौस में नहीं थी। जैसे कोई व्यक्ति उत्तराधिकार में पाये बहुत से धन को पाकर प्रसन्न तो होता है पर वह यह नहीं समझ पाता, इसका उपयोग कैसे करें? अपना पसीना न लगा होने से उसे उस धन के प्रति दर्द भी नहीं होता, इसलिये वह उसका अपव्यय ही करता है, उसी प्रकार हरकौस यह नहीं समझ पा रहा था कि वह क्या शक्ति है और उसका उपयोग किस प्रकार किया जाना चाहिये।
अनुभव के अभाव में दुरुपयोग की आशंका से ही भारतीय योगी अपने किसी भी शिष्य को चाहे जब अपनी शक्ति नहीं दे देते। रामकृष्ण परमहंस ने जिस तरह स्वामी विवेकानन्द को अच्छी तरह तौल लिया था कि वह इस शक्ति का उपयोग केवल लोक-कल्याण में करेंगे, तब शक्ति-दान दिया था, उसी प्रकार अन्य योगी भी शिष्य के पात्रत्व की परख करके ही उसे अपनी इन अलौकिक क्षमताओं का अनुदान देते हैं। पुरुषार्थ वाला रास्ता वे हर किसी के लिए खुला रखते हैं, कोई भी साहसी, शूरवीर साधक उसे अपने पुरुषार्थ और तप से प्राप्त कर सकता है। अपने पराक्रम से अर्जित शक्ति के प्रति दर्द भी होता है। अनायास उपलब्ध शक्ति का अपव्यय पीटर हरकौस की तरह ही निरर्थक होता है। जिस शक्ति से लोक-जीवन की दूषित दिशायें मोड़ी जा सकती थीं, वह कुछ लोगों को कौतुक और चमत्कार दिखाने में ही बीतीं।
थोड़ी देर हुई थी कि एक नर्स मरीजों का चार्ट देखती हुई पीटर हरकौस के पास पहुँची। उसे देखते ही उन्मादी की तरह पीटर बड़बड़ाया- “मैं देख रहा हूँ तुम रेलगाड़ी में यात्रा कर रही हो, इस यात्रा में तुम्हारी सहेली का सन्दूक खोने वाला है।”
नर्स अवाक् रह गई। वह स्टेशन से सीधे हास्पिटल पहुँची थी। इस बात का किसी और को पता भी नहीं था। सूटकेस सचमुच रेल में ही छूट गया था, वह स्टेशन को भागी। लौटकर उसने डाक्टरों को बताया कि पीटर हरकौस नामक रोगी के पास विलक्षण इन्द्रियातीत शक्ति है, वह किसी भी व्यक्ति के भूत और भविष्य को पढ़ने की अभूतपूर्व क्षमता से ओत-प्रोत है। डाक्टरों ने यह खबर मानस रोग विशेषज्ञ डॉ0 पीटर्स को भेजी। डॉ0 पीटर्स ने हरकौस की अनेक प्रकार से जाँच की। इस सूक्ष्म शक्ति का निश्चित विवेचन तो वे नहीं कर सके पर उन्होंने स्वीकार किया कि मस्तिष्क में कोई अति सूक्ष्म विद्युत-चुम्बकीय चेतना होनी चाहिये, जिसके परमाणुओं में अतिवाहिकता का यह गुण हो सकता है। पर प्रत्येक व्यक्ति के परमाणु किस प्रकार अलग-अलग होते हैं और यह मानस शक्ति उन्हें छाँटकर किन्हीं घटनाओं का दूर और पूर्वाभास कैसे पा लेती है, इस बात का कोई निश्चित पता वे नहीं लगा सके।
इसी शोध परीक्षण में तीन-चार दिन और बीते। एक दिन एक पुराना रोगी अस्पताल से छूटा। चलते समय वह रोगियों से हाथ मिलाने गया। पीटर के हाथ में उसका हाथ गया ही था कि वही अतीन्द्रिय बोध पुनः कौंचा। इधर वह अस्पताल से बाहर निकला उधर हरकौस चिल्लाये- “इसे रोको-यह तो अँग्रेजों का गुप्तचर है। जर्मन सी0 आई॰ डी0 इसके पीछे लगे हैं उन्हें इसकी असलियत मालूम पड़ गई है, ऐसा लगता है कि ‘कलचर स्ट्रीट’ में उसकी हत्या कर दी जायेगी।”
पीटर हरकौस और भी कुछ चिल्लाए इससे पहले ही डॉक्टर और नर्सों ने उसे आ सम्हाला। उन्होंने आते ही उसे चुप किया। उनका अनुमान था, वह विक्षिप्त अवस्था में प्रलाप कर रहा है, किन्तु दो दिन पीछे सचमुच ‘कलचर स्ट्रीट में उसकी हत्या हो गई, तब लोगों को पता चला कि पीटर हरकौस ने जो कुछ कहा था, वह प्रलाप न होकर एक ऐसी सच्चाई थी, जो उसके अन्तःकरण से निकली थी। वह शक्ति क्या थी, क्यों थी-अब भी यह कोई नहीं समझ पा रहा था।
विमुक्ति सुख का अनुभव करते हुये भगवान बुद्ध एक सप्ताह तक समाधि में बने रहे। मेघ घिरे थे, ठण्डी हवा चल रही थी, बड़ा दुर्दिन हो गया था। यह देखकर सर्पराज मुचलिन्द ने बुद्ध के शरीर को सात बार लपेटा लगाकर फन निकालकर खड़ा हो गया। सात दिन तक उनके शरीर की रक्षा मुचलिन्द ने ही की।
एक ग्रामीण जो यह देखकर भाग गया था, जब भगवान बुद्ध समाधि से उठे जो आकर पूछा-महाराज सर्प ने आपका अहित नहीं किया। इस पर बुद्ध बोले-तात्! जो संसार के सभी प्राणियों को संयम और मित्र-भाव से देखता है, उसके लिये कोई बुरा नहीं।
सन्तान प्राप्ति की चिर आकाँक्षा पूर्ण हुई तो अत्रि की प्रसन्नता का पारावार न रहा। महर्षि पुत्र और पुत्री में कोई भेद नहीं करते थे, दोनों में वे एक ही आत्मा के दर्शन करते थे। इसलिये पुत्री होने पर भी उन्हें उतनी ही प्रसन्नता थी, जितनी किसी को पुत्र पाकर होती है। नामकरण संस्कार से लेकर विद्यारम्भ तक सारे संस्कार विधिवत अपने हाथ सम्पन्न कराये उन्होंने उसका नाम रखा-अपाला।
किन्तु अपाला ज्यों-ज्यों बढ़ती गई, महर्षि की प्रसन्नता त्यों-त्यों घटती गई। अपाला की त्वचा में पहली बार श्वेत कुष्ठ देखकर वे चौंके भर थे। विश्वास यह था कि औषधोपचार से वह ठीक हो जायेगा पर आयुर्वेद के पन्ने पलट-पलट कर महर्षि थक गये, जो सम्भव प्रयोग थे, उन्होंने एक-एक सब कर डाले, किन्तु त्वचा दोष दूर न हुआ।
समाज की कैसी विडम्बना है कि पुरुष के अनेक दोष क्षमा हो जाते हैं पर कन्या का रूप−रंग साधारण होना भी अस्वीकार्य होता है। फिर अपाला तो एक ऐसे रोग को शरीर में पाल रही थी, जिसे अपने समाज में न केवल रोग वरन् पाप भी माना जाता है। परिस्थितियों से निराश महर्षि अत्रि ने अब अपना सारा ध्यान अपाला को ज्ञानवान् बनाने में केन्द्रित कर दिया। वेद, उपनिषद्, ब्रह्माण, आरण्यक आदि सम्पूर्ण आर्य ग्रन्थों के अध्यापन के साथ महर्षि अत्रि ने अपाला को व्याकरण, मीमाँसा और दर्शन ग्रन्थों का भी अनुशीलन कराया। अपाला ने संगीत विद्या भी सीखी और इस तरह वह अपने अपूर्व तेज और यश के साथ तत्कालीन शीर्षस्थ विद्वानों की श्रेणी में जा पहुँची।
अपाला अब यौवन के द्वार पर खड़ी थी। स्वाभाविक था कि महर्षि उसके हाथ पीले करने की बात सोचते पर ऐसा आदर्शनिष्ठ युवक उन्हें मिलता कहाँ, जो जीवन के भौतिक और लौकिक आकर्षणों से ऊपर उठकर विवाह को दो आत्माओं का पुनीत सम्बन्ध मानकर अपाला को स्वीकार करता। धर्म और आत्म-तत्व की बातें करना सरल है पर अनेक कठिनाइयों एवं संघर्षों में असली हानि सहकर भी उसे व्यवहार में लाने वाले तो कोई बिरले ही साहसी सपूत होते हैं।
महर्षि ने दृष्टि दौड़ाई तो उन्हें ऐसा लगा कि पृथ्वी अभी वीर-विहीन नहीं हुई। कृशाश्व जो अभी उनके स्नातक रह चुके थे, उन्होंने अपाला को सहर्ष स्वीकार कर लिया। वैदिक रीति से कृशाश्व और अपाला एक दाम्पत्य सूत्र में आबद्ध हो गये।
दाम्पत्य सम्बन्ध का प्रारम्भिक आकर्षण कुछ कम हुआ तो कृशाश्व के मन में भी अपाला के प्रति विरक्ति आने लगी। वासना का जाल ऐसा भयंकर है कि वह जहाँ भी उद्दीप्त होता है, प्रेम की पावनता को उपेक्षा और तिरस्कार में परिवर्तित कर देता है। जो कृशाश्व अब तक प्रेम के कारण त्वचा दोष वाली अपाला में गुण ही गुण देखते थे, अब उन्हें अपाला जैसी विदुषी नारी भी माँस-पिण्ड मात्र लग रही थी, उनकी अन्यमनस्कता विचारशील अपाला से छिपी न रह सकी। अपाला इस अपमान से छटपटा उठी और अन्ततः एक दिन पूछ ही बैठी- “आर्य श्रेष्ठ! अपाला इन दिनों आपके स्नेहपूर्ण सम्बोधन और सम्मान से भी वंचित हो रही है, कोई अपराध तो नहीं हो गया?”
कृशाश्व क्या उत्तर देते? उन्होंने स्वीकार किया कि वह मन की वासना के आगे पराभूत हैं, प्रेम के स्थान पर सौंदर्य की अभिलाषा ने उनके आदर्श को तोड़ डाला है।
जो निराशा एक दिन शरीर से श्वित्र-डडडडडड के छींटे देखकर हुई थी, उससे अधिक पीड़ा हुई पति की उपेक्षा से। आज प्रथम बार अपाला के मन में स्वाभिमान जागृत हुआ और उन्हें इस बात का दोष हुआ कि संसार में पराश्रय सदैव दुःख देता है। आत्म-स्थिति, अपनी शक्ति, अपने पैरों पर खड़े होने का भरोसा ही सच्ची शक्ति है, उसी से मनुष्य साँसारिक अपमान से अपनी सुरक्षा कर सकता है।
अपाला ने पतिगृह का परित्याग कर दिया। रही वह अपने पिता महर्षि अत्रि के आश्रम में ही, किन्तु उन्होंने दीनता वहाँ भी किसी से प्रकट नहीं की। अपाला ने गम्भीरता धारण की वह स्थैर्य ही धीरे-धीरे तपश्चर्या में बदल गया। अपाला ने देखा किसी भी वस्तु का सच्चा पता उसके मूल से ही लगाया जा सकता है। आत्मा ही वह केन्द्र-बिन्दु है, जिस पर एकाग्र होने से अपनी परिस्थितियों का सम्यक् ज्ञान प्राप्त हो सकता है। यह विचार आते ही अपाला आत्म-शोध की साधना में तल्लीन हो गई।
मनुष्य के मन में बड़ी शक्ति है, जिधर लगा दे, उधर से ही अज्ञातभूत के समान ज्ञान के कोष के कोष एकत्रित कर देता है, आत्मा की शोध करते हुए अपाला ने अनुभव किया, मनुष्य जीवन के विकार, कष्ट और यन्त्रणायें ईश्वर प्रदत्त नहीं उसकी निजी भूलें और पाप होते हैं। परमात्मा तो उनके प्रक्षालन में सहायता करता है, आत्मा को शुद्ध और सुघड़ बचाने की शक्ति प्रदान करता है।
अपाला ने इन्द्र की उपासना इसी रूप में की। जप, तप, हवन, व्रत, उपवास आदि तप और तितीक्षाओं के द्वारा उन्होंने अपना अन्तःकरण नितान्त शुद्ध कर लिया। शास्त्र अनुशीलन और वेदों की शोध में अपने जीवन का एक-एक क्षण घुला दिया। शेष संसार से सम्बन्ध टूट गया। अपाला ने आत्म-साक्षात्कार की साधना में दिन-रात एक कर दिये। भगवान् को और क्या चाहिये, उन्हें तो निष्ठा भर की परख होती है, अन्यथा अपने भक्त की सहायता के लिये तो वे अहर्निशि तत्पर रहते हैं।
कार्तिक की शरदपूर्णिमा का दिन। जब सारा संसार निद्रा की गोद में पड़ा आनन्द ले रहा था, अपाला आश्रम के एक नीरव नीड़ में बैठी प्रज्ञा-चक्षुओं से विश्व के अनन्त विस्तार को हृदयंगम कर रही थी। रजनीकान्त अपनी सम्पूर्ण उज्ज्वलता पृथ्वी पर बिखेर कर आत्म-सुख अनुभव कर रहे थे, वैसे ही अपाला अपनी आत्म-चेतना को भगवान् इन्द्र के प्राण-शरीर में हवन करती जा रही थी। देखते देखते लघुता महानता में, अणु विभु में एकाकार हो चले। आत्मा ने अपने को परमात्मा के साथ एकाकार कर लिया।
मैं हूँ तुम्हारा प्रिय उपास्य, देवराज इन्द्र ने स्नेह और वरदान का हाथ ऊपर उठाते हुए कहा।
“देवेश!” भावावेश में अपाला इतना ही कह सकी। पुत्री अपने पिता को पाकर जिस तरह विह्वल हो उठती है, वैसे ही विह्वल अपाला की आँखों से झर-झर आँसू झरने लगे। भाव नेत्र निर्निमेष अपने साध्य को देख रहे थे। चिर-प्यास, तृप्ति का आनन्द ले रही थी।
मैं तुम्हारा ‘त्वग्दोष’ दूर करता हूँ भद्रे! भगवान इन्द्र ने वात्सल्य भरे हृदय से कहा पर उनकी वाणी सुनने को ध्यान डिगाना भी अपाला के लिये कष्टकारक था।
उन्होंने विनम्र निवेदन किया- “देव! यह शरीर जो आज नहीं कल छूटने ही वाला है, वह रुग्ण रहे या रोग मुक्त उससे क्या बनता-बिगड़ता है, आप तो मुझे वह शक्ति दें, वह सामर्थ्य दें, विद्या और प्रकाश दें, जिससे मैं इस प्रसुप्त, भौतिक आकर्षणों में भ्रमित संसार को कुछ ज्ञानदान दे सकूँ। संसार का कुछ कल्याण कर सकूँ।
एवमस्तु! कहकर महावान् अदृश्य हो गये पर वे अपनी सम्पूर्ण कान्ति, शक्ति और प्रज्ञा अपाला पर छोड़ गये। अपाला ऋषि हो गई, यह संवाद क्षण भर में सारे आश्रम और राष्ट्र में गूँज गया।
कृशाश्व ने सब कुछ सुना तो दूसरे दिन ही अपाला को लेने महर्षि अत्रि के आश्रम में पहुँचे। बड़ी अनुनय विनय की उन्होंने पर अपाला ने साथ जाने से इनकार कर दिया शेष जीवन पिता के पास रहकर उन्होंने धर्म और समाज सेवा में ही बिताया। कृशाश्व ने स्वयं भी अपाला से वेदाँग का अध्ययन किया।
सोपानभूतं स्वर्गस्य मानुष्यं प्राण्य दुर्लभम्।
तथात्मानं समाधत्स्व भ्रश्यसे न पुनर्यथा॥
अपूर्व पुण्यों से प्राप्त सुरदुर्लभ मानव शरीर स्वर्ग प्राप्ति का सोपान होता है। अतः इसे पाकर सदा शुभ कर्मों में ही लगाना चाहिये, ताकि मनुष्य पुनः इस शरीर से पतन, अवनति और भ्रष्टता की ओर उन्मुख न हो।
अमेरिका की अणु-अनुसन्धान संस्था के समीप ही एक फार्म में बहुत-सी भेड़ें पाली गई थीं। आये दिन के प्रयोगों से उत्पन्न रेडियो-धूलि के फलस्वरूप उनमें से 6000 भेड़ें मर गईं। जब उसकी जाँच की गई तो पता चला यह सब रेडियो धर्मी कणों के विषैले प्रभाव के कारण था। उत्तरी व दक्षिणी ध्रुवों में पाये जाने वाले पेन्गुइन पक्षियों पर भी यह कण पाये गये, तभी से वहाँ के वैज्ञानिकों की अणु-धूलि के बारे में चिन्ता बढ़ी।
अणु-बम विस्फोट किए जाते हैं, तब उसमें से बम में प्रयुक्त विभिन्न विषैले तत्वों के धुयें का बादल छा जाता है, यह धुआँ कुछ देर में वायु-मण्डल में घुल-मिल जाता है, पीछे धुएं के विषैले परमाणु जमीन, वृक्ष-वनस्पति और विभिन्न जीव-जन्तुओं के शरीरों में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों तरह से पहुँच जाते हैं, इन्हीं विषैले परमाणुओं को अणु-धूलि कहते हैं और आज सारा संसार इस अणु-धूलि के दुष्प्रभाव से इतना अधिक चिन्तित है, जितना मशीनों के धुएं, बढ़ती हुई जनसंख्या आदि के कारण भी नहीं।
1963-64 में चीन ने परमाणु बम का विस्फोट किया, तब जापान आदि पड़ौसी देश बुरी तरह चिन्तित हो गये थे। भारत के अणु शक्ति विभाग ने उक्त विस्फोट के नियन्त्रण और परिणाम जानने के लिये, अपने नौ हजार से अधिक प्रशिक्षित कर्मचारी लगाये थे। 730 विभिन्न स्थानों पर विकिरण और रेडियो सक्रियता की जाँच की गई, सभी तरह के खाद्य-पदार्थों का निरीक्षण भी किया गया और उसके बाद यह सूचना प्रसारित की गई थी कि देश में खाद्य-पदार्थों में रेडियो सक्रियता की मात्रा काफी कम हो गई है, इसलिये उससे स्वास्थ्य को इतना खतरा नहीं है।
सूचना में प्रसारित उपरोक्त सन्देश की शब्दावली यह बताती है कि इस सम्बन्ध में वैज्ञानिक या तो राजनैतिक दबाववश अथवा प्रजा को भय से बचाने के लिये मूल तथ्यों को ज्यों का त्यों नहीं प्रकाशित करना चाहते पर वे इस बात से इनकार भी नहीं कर सकता है यह अणु-धूलि मानव-जाति के लिए एक गम्भीर समस्या है।
इसके बाद चीन ने तीसरे परमाणु बम का विस्फोट किया, उधर निशस्त्रीकरण की दिशा में कोई प्रगति नहीं हुई, तब संसार के सभी विचारशील लोगों और वैज्ञानिकों में भी मानव-जाति के कल्याण की करुणा जागृत हुई और निश्चित रूप से उन्होंने बताना प्रारम्भ किया कि अणु-बमों के प्रयोग ही घातक नहीं वरन् उनके परीक्षण भी कम विनाशक नहीं। यदि मानव-जाति के अस्तित्व को बनाये रखना है तो न केवल संसार में विज्ञान की विघातक प्रगति को रोका जाये वरन् मानवता का पोषण करने वाले भावों, संस्थाओं और आयोजनों का तीव्रगति से प्रसार भी किया जाये। हमें इतने भर से ही सन्तुष्ट नहीं हो जाना चाहिये, अब तक जो विस्फोट हो चुके हैं, उनके दुष्प्रभाव से बचने का ऐतिहात भी बरतना आवश्यक है। सावधानी न रखी गई जो उसका कुफल मानव-जाति पर व्यापक महामारियों के प्रकोप, राजरोग जैसे तपेदिक, कैंसर, यकृत के रोग और स्नायविक दुर्बलता के कारण कानी-कुबड़ी, बौनी और मानसिक दृष्टि से पूरी नहीं तो अर्द्ध-विक्षिप्त अवश्य होगी।
बम विस्फोट के कारण जो विषैले तत्वों का धुआँ उठता है, उसमें स्ट्रेशियम-90 वृक्ष-वनस्पतियों पर सबसे अधिक असर डालता है। एक बार के विस्फोट के बाद यह 27 वर्ष तक वायु-मंडल में बना रहता है, जबकि आयोडीन 131 एक सप्ताह और दूसरे तत्व भी इससे कुछ ही दिन बाद धुल जाते हैं पर यह मात्रा रहती पृथ्वी में ही है, इसमें सन्देह नहीं। यह विषैला तत्व शाक-फल, अन्न, दूध आदि के द्वारा सीधे और पशुओं के शरीर से होकर भी हमारे अन्दर पहुँच रहा है। छोटे बच्चों के पोषण के लिये आवश्यक तत्वों में कैल्शियम सबसे पहला है, यह कैल्शियम भी अधिकाँश दूध और फलों से ही मिलता है। यों दूध शक्ति-वर्द्धक खाद्य है पर उसमें पहले भी स्ट्रेशियम पाया जाता है। वृक्ष-वनस्पति के माध्यम से पशुओं के दूध में और उस दूध के पीने से बच्चों के शरीर में स्ट्रेशियम की मात्रा बढ़ेगी तो भावी पीढ़ी का क्या बनेगा? इस चिन्ता से भारत के अणु शक्ति विभाग ने वह जानकारियाँ दीं, जिनका व्यवहार अणु सक्रियता के प्रभाव से अधिक से अधिक बचाने में सहायक हो।
यह प्रभाव दूध में ही नहीं है, प्रत्येक खाद्य में है। इसलिये वैज्ञानिकों के अनुसार प्रत्येक फल और साग को अच्छी तरह धोकर और उनका छिलका उतारकर ही खाना चाहिये। आलू में यह प्रभाव अधिकाँश छिलके पर रहता है, इसलिये सब्जियों में आलू की मात्रा बढ़ाकर ली जाये पर उसे अच्छी तरह धो लेना तथा छिलका उतार कर ग्रहण करना आवश्यक है। यदि यह स्ट्रेशियम शरीर में चला जाता है तो कैंसर जैसे भयंकर रोग हो जाने का खतरा बना रहेगा।
दूध का स्ट्रेशियम के प्रभाव से बचाने के लिये वैज्ञानिक एक यन्त्र भी बना रहे हैं पर फिलहाल के लिये उनकी यह चेतावनी नोट करने की है कि यदि बच्चों को अणु सक्रियता के दोष से बचाना है तो मातायें उन्हें ऊपरी दूध पिलाने की अपेक्षा अपने स्तनों का ही दूध पिलाना प्रारम्भ कर दें। खुरदरे छिलके वाले फल जैसे अनानास, अमरूद, अंजीर पर यह धूलि अधिक जमा होती है, चिकने फलों पर कम इसलिए खुरदरे फल कम मात्रा में लिये जायें, लेना ही हो तो छिलका अवश्य उतारा जाय।
संयुक्त राष्ट्र संघ की संरक्षकता में चाय पर जब इस रेडियो सक्रियता का अध्ययन किया गया तो पता चला कि यह सबसे अधिक शीघ्र प्रभावित होने वाली पत्ती है। चाय स्ट्रेशियम के प्रभाव को शीघ्र ग्रहण कर लेती है। दुर्भाग्य से चाय भारत में सबसे अधिक उत्पन्न होती है और उसका प्रयोग भी दिन प्रति दिन बढ़ रहा है। चाय के प्रयोग को जितना बन पड़े कम किया ही जाना चाहिये।
इन सब आहार सम्बन्धी सावधानियों, संयम और भरपूर परिश्रम के द्वारा शरीर की जीवन-शक्ति को स्थिर और शुद्ध बनाये रखा जा सकता है और रखना पड़ेगा पर वातावरण के प्रभाव को किस तरह रोकना सम्भव होगा, यह प्रश्न थोड़ा जटिल और अधिक गम्भीर है।
‘आकाश बदल रहा है’ शीर्षक से अक्टूबर 68 की ‘प्लनट्रथु’ पत्रिका ने वैज्ञानिकों की चेतावनी इस तरह छापी है- “अणु सक्रियता बढ़ जाने से सन् 2000 तक सारे संसार का तापमान 2 डिग्री सेन्टीग्रेड बढ़ जायेगा, उससे आज के बर्फ से जमे ध्रुव प्रदेश पिघल पड़ेंगे। समुद्र ऊँचा हो जायेगा। बन्दरगाह डूब जायेंगे।”
ताप और वायु दाब को नियन्त्रित रखने के साथ आकाश को दूषित तत्वों से बचाने की हमारी चिन्ता स्वाभाविक है पर उसके लिये कोई औषधि कोई दवादारु काम न करेगी। इन गम्भीर परिस्थितियों में हमें एक बार पुनः ऋषियों की इस मंत्रणा की ओर लौटना पड़ेगा-
मुँचामि त्वा हविषा जीवनाय कमज्ञातयक्ष्मादुत राजयक्ष्मात। ग्राहिर्जग्राह यद्येतदेनं तम्या इंद्राग्नी प्र मुमुक्त मेनम्॥
-अथर्व वेद 3 11
अर्थात् -मेरी संतानों! तुझे अज्ञात और क्षय रोगों से मुक्ति दिलाने के लिये इन्द्राग्नी, विद्युत, अग्नि, वायु सूर्य ही समर्थ हैं (अर्थात् शुद्ध वायु-मंडल में ही तू स्वस्थ रह सकता है) इसलिये तू हवन कर इन शक्तियों को जागृत कर और नीरोग बन।
रेडियो धूलि की मारक शक्ति बड़ी गम्भीर है, उसे यज्ञ जैसे महान् अनुष्ठान से ही सुधारा जा सकता है, इसलिये अगले दिनों न केवल आहार-विहार का संयम और नियंत्रण आवश्यक होगा वरन् यज्ञीय प्रक्रिया का भी तेजी से विस्तार करना पड़ेगा।
यदि परमेश्वर की इच्छा होती तो उसने कुछ लोगों को हाथ ही हाथ दिये ओर कुछ लोगों के सिर ही सिर होते। कुछ राहू और कुछ केतू निर्माण होते। किन्तु भगवान् ने प्रत्येक मनुष्य को सिर और हाथ दोनों दिए हैं। इसका अर्थ है कि अग्नि में जो कर्म की आहुतियाँ देता चलता है, वही सच्चा यजमान है, उसी के जीवन में यज्ञ जैसी तेज स्थित होती है।
-स्वामी विवेकानन्द
अथर्व वेद में कहा गया है- “त्वं नो मेधे प्रथमा”- “सद्विचार ही संसार में सर्वश्रेष्ठ वस्तु है।”
विचारों की उत्पत्ति मस्तिष्क से होती है। जो स्तर मनुष्य के मस्तिष्क का होता है, उसी स्तर के विचार उत्पन्न होते हैं। मस्तिष्क यदि स्वस्थ तथा संतुलित है तो विचार भी सुन्दर और सृजनात्मक ही उत्पन्न होंगे और यदि मस्तिष्क अस्वस्थ अथवा असंतुलित है तो उसी के अनुसार विचारों का सृजन भी अस्वस्थ तथा असंतुलित ही होगा।
अस्वस्थ तथा असंतुलित विचार पागलपन का लक्षण है। साधन और साध्य, उचित और अनुचित, पाप और पुण्य, अच्छे और बुरे के बीच जो सही निर्णय न कर सके। जो कर्त्तव्य को छोड़कर असत्य का आश्रय ले वह मनुष्य किसी पागल से कम नहीं माना जा सकता। भले ही वह पागलखाने में बन्द उन लोगों की तरह न हो जो नंग-धड़ंग रोते-चिल्लाते और मार-पीट करते हैं। भय, क्रोध, लोभ, अहंकार आदि की अधिकता भी मनुष्य के पागलपन की निशानी है। जिस प्रकार पागल कहे जाने वाले लोग समाज अथवा अपने लिए हानिकारक होते हैं, वैसे ही इन मनोविकारों से ग्रस्त लोग भी अपने अथवा अपने समाज के लिए भयानक होते हैं।
भय-ग्रस्त व्यक्ति यदि शीघ्र किसी को हानि नहीं पहुँचाते तो अपना सर्वनाश कर लेते हैं। भीत-वृत्ति वाला व्यक्ति न तो समाज में बढ़कर कोई साहस दिखला सकता है और न किसी उन्नति की ओर बढ़ सकता है। वह अपनी इस दुर्बलता से त्रस्त होकर छिपता-लुकता रहता है और इस प्रकार अपनी उस आत्मा का हनन करता है, जो मानव-जीवन का सबसे महत्वपूर्ण तत्व है। क्रोधी व्यक्ति जब अपने इस विकार के चंगुल में फँस जाता है, तब मनुष्य से न जाने क्या बन जाता है। क्रोध के आवेग से उसकी मुद्रायें, भंगिमाएं, यहाँ तक कि उसकी मुखाकृति भी बुरी तरह विकृत हो जाती है क्रोधी व्यक्ति के हृदय में विकार की भयानक आग जलती रहती है, जिससे उन्मत्त होकर वह बड़े भयंकर अपराध तक कर डालता है। क्रोध में किसी को मार डालना, अपने को जला डालना, समाज को हानि पहुँचाना, अपनी शाँति भंग कर लेना अथवा भयानक होकर व्यवहार करना पागलपन के सिवाय और क्या कहा जा सकता है।
लोभ-ग्रस्त मनुष्य तो पिशाच के समान हो जाता है अपनी लोभ-वृत्ति की तुष्टि के लिए वह बुद्धि और विवेक से अंधा हो जाता है। असत्य, बेईमानी, छल-कपट, विश्वासघात आदि की सारी रीतियाँ, एक लोभी व्यक्ति के लिए सहज बातें होती हैं।
अहंकार एक ऐसी वृत्ति है, जिससे काम-क्रोध, लोभ-मोह आदि सारे विकार उत्पन्न होते हैं। अहंकार का दोष ही मनुष्य को मनुष्य का शत्रु बना देता है। अनुशासनहीनता, धृष्टता और अविनय का व्यवहार करने में अहंकारी को गौरव अनुभव होता है। सम्माननीय को आदर न देना, पूजनीय की पूजा न करना और गुरुता का महत्व स्वीकार न करना अहंकारी व्यक्ति के स्वभाव का एक प्रधान अंश होता है।
अनियन्त्रित रीति से उठने वाले मनुष्य के सारे मनोविकार एक प्रकार के मानस रोग ही होते हैं। जिनकी उत्पत्ति का केन्द्र मनुष्य का मस्तिष्क ही होता है। यदि मनुष्य का मस्तिष्क सही दिशा में काम कर रहा हो तो अच्छे और स्वस्थ विचार ही उत्पन्न होंगे। गलत दिशा में सक्रिय मस्तिष्क से यह आशा नहीं की जा सकती कि वह सुन्दर स्वस्थ और उत्पादक विचारों को जन्म देगा।
परमात्मा की ओर से मनुष्य को जो सम्पदायें मिली हैं, उनमें मस्तिष्क सबसे अधिक मूल्यवान् तथा महत्वपूर्ण सम्पदा है। उचित रूप से प्रयोग किए जाने पर यह बड़ी महान् सृजनात्मक शक्ति के रूप में सिद्ध होता है। अन्तर्द्वन्द्वों, दुविधाओं, सन्देहों, भयों तथा कुभावनाओं के प्रभाव से इसकी रक्षा की जानी चाहिए। शरीर, शक्ति और साधन की सुविधा होते हुए भी, यदि मनुष्य का मस्तिष्क विकृत हो जाए तो वह संसार का कोई काम करने योग्य नहीं रह जाता। मनुष्य की वास्तविक शक्ति उसका शरीर नहीं, मस्तिष्क ही होता है। किन्हीं कारणों से पागल हो जाने वाले लोगों को उनके अवयव और उनकी शक्ति में कोई कमी नहीं आती तब भी वे किसी काम के योग्य नहीं रहते। इसका एक ही कारण है। मस्तिष्क का विकृत हो जाना। एक मात्र मस्तिष्क के विकृत हो जाने से उनका स्वस्थ तथा सबल शरीर और उसकी शक्ति किसी काम की नहीं रहती।
मनुष्य के लिए शारीरिक स्वास्थ्य का कम महत्त्व नहीं है। किन्तु शारीरिक स्वास्थ्य से कहीं अधिक महत्त्व है, बौद्धिक स्वास्थ्य का। एक बार शरीर यदि रोगी, अस्वस्थ अथवा अशक्त हो जाए तो भी बुद्धि बल पर अपना काम किसी न किसी प्रकार चलाया जा सकता है। किन्तु यदि मस्तिष्क में विकार उत्पन्न हो जाए तो स्वस्थ और सबल शरीर भी बेकार हो जाता है। शरीर का उपयोग मस्तिष्क द्वारा ही होता है। एक अकेला मनुष्य मस्तिष्क के आधार पर बड़े-बड़े उद्योगों, नेतृत्वों तथा व्यवस्थाओं को एक स्थान पर बैठा-बैठा चलाता रहता है। जबकि शरीर के आधार पर वह एक छोटा-मोटा काम भी नहीं कर सकता।
निश्चय ही मस्तिष्क मनुष्य की महान शक्ति है। इसके आधार पर वह जो भी उन्नति करना चाहे कर सकता है। किन्तु सम्भव यह तभी होता है, जब मनुष्य का मस्तिष्क उच्च और सृजनात्मक विचारों का उत्पादन करे। कलुषित कुटिल और ध्वंसक विचारों की उत्पत्ति भी मस्तिष्क से ही होती है। चिन्ता, उद्वेग, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या-द्वेष आदि विकारों से युक्त विचार मनुष्य कल्याण सम्पादन नहीं कर सकते। यह वे ध्वंसात्मक विचार हैं, जिनसे मनुष्य का चरित्र गिर जाता है और वह ऐसे-ऐसे अकरणीय कार्य करने लगता है, जो उसके सर्वनाश के कारण बन जाते हैं। मनुष्य का वह मस्तिष्क ही सृजनात्मक शक्ति के रूप में सिद्ध होता है, जो आशा, उत्साह, पौरुष, धैर्य, त्याग, प्रेम, आनन्द आदि के कल्याणकारी विचार उत्पन्न करता है। इस प्रकार के उत्पादक विचार ही मनुष्य को नई प्रेरणा देकर नित्य नई दिशा, नए कर्तव्य और नूतन योजनाओं में संलग्न करते हैं।
ईश्वर की देन होने पर मस्तिष्क स्वयं सिद्ध विचार यन्त्र नहीं है। इसको कल्याणकारी विचार उत्पन्न करने योग्य बनाने के लिए प्रयत्न की आवश्यकता पड़ती है। विश्वासों, मान्यताओं, कामनाओं तथा संगति आदि का मानव मस्तिष्क पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है। जिसके विचार ऊँचे, मान्यतायें वास्तविक, कामनायें माँगलिक और संगति साधुता पूर्ण होगी, उसका मस्तिष्क सदा स्वस्थ तथा सुफलदायक होगा। जिसके विश्वास संदिग्ध, मान्यतायें मूढ़, कामनायें कुत्सित और संगति निकृष्ट कोटि की होगी, उसका मस्तिष्क शंकाओं, सन्देहों, निराशाओं, कुकल्पनाओं और कुत्साओं से भरा रहेगा।
हम मनुष्य हैं-मनुष्य बनें और फिर उसके बाद देवत्व की ओर अग्रसर हों। इसके लिए हमारा प्रधान कर्तव्य यह है कि हम अपने विचार यन्त्र का निर्माण इस प्रकार से करें कि वह सदा-सर्वदा कल्याणकारी दिशा में ही सक्रिय रहे। कल्याण निवास परमार्थ के सिवाय और किसी में नहीं है। हम अपना निरीक्षण करें, अपने अन्दर झाँकें और खोज करें कि कहीं ऐसी प्रवृत्तियाँ तो हमारे भीतर नहीं छिपी पड़ी हैं, जो हमारे आचार-विचारों को दूसरों को दुख देने, सताने और शोषण करने के लिए प्रेरित करती हों।
हो सकता है कि अपरिष्कार के कारण हमारे भीतर इस प्रकार की प्रवृत्तियाँ हों। यदि हैं तो हमें सत्संग, अध्ययन और चिन्तन के द्वारा उन्हें निकाल बाहर करना चाहिए। असद्प्रवृत्तियों के मिल जाने पर हमारा मस्तिष्क साफ-सुथरा होकर सद्विचारों का सृजन करने लगेगा। सद्विचार ही हमारी बहुमूल्य शक्ति है। इसी के आधार पर हम बनते और बिगड़ते हैं।
परिचारक ने जाकर सन्देश दिया- “महात्मन्! महाराज त्रैवृष्ण स्वयं पधारे हैं, आपसे अभी भेंट करने की इच्छा प्रकट की है उन्होंने।
महर्षि जन के पुत्र महर्षि वृश जान सायंकालीन संध्या से अभी उठे ही थे। परिचारक ने जैसे ही सन्देश दिया- वह स्वयं उठकर द्वार तक आये और सम्राट त्रैवृष्ण का स्वागत कर अपने परामर्श कक्ष की ओर चल पड़े। मार्ग में ही पूछा- “महाराज! दिग्विजय के लिये प्रस्थान की सारी तैयारी सम्पन्न हो चुकी होगी। विजय-दशमी की प्रातः-कालीन अग्निहोत्र के बाद ही प्रस्थान कर देना होगा।”
ऐसा ही होगा भगवन्! हम आपकी आज्ञाओं का अक्षरशः पालन करा रहे हैं। सेवा में तो हम एक अन्य अकिंचन आकाँक्षा लेकर उपस्थित हुये हैं। देवर्षि! आपके प्रताप से इक्ष्वाकु-वंश की विजय पताका दिक्मंडल में फहरा रही है। प्रजा को कोई कष्ट नहीं, कहीं अपराध नहीं, अराजकता नहीं, सब आपका ही आशीर्वाद है। हमारी इच्छा है भगवन् कि इस युद्ध में मेरे रथ की रास आप ही सँभालें आपने पुरोहित का गुरुतर भार सँभालकर अपनी शास्त्रज्ञता सिद्ध कर दी है, जब तक आप जैसे समर्थ पुरोहित इस देश में जन्म लेते रहेंगे, प्रजा के हित की तब तक चिन्ता नहीं की जा सकती पर हम यह भी देखना चाहते हैं, शास्त्रज्ञ पुरोहित शास्त्रज्ञता का निर्वाह कैसे करते हैं। आज तक आपके ब्राह्मणत्व को जानते आये हैं, अब आपमें समाहित क्षात्रत्व को देखने की अभिलाषा भी तीव्र हो उठी है, आशा है निवेदन ठुकरायेंगे नहीं।
वृश हँसे और बोले ऐसा ही होगा महाराज! जाओ युद्ध की अवशेष तैयारियाँ भी पूरी करो। इस युद्ध में आपके रथ का संचालन हम स्वयं करेंगे।
और सचमुच सारी प्रजा ने देखा कल तक जो गैरिक वस्त्र धारण किए सारी प्रजा को ज्ञान का उपदेश दिया करते थे, आज वह वीर-केसरिया-वेश से सज्जित इक्ष्वाकु श्रेष्ठ त्रैवृष्ण के रथ की बागडोर अपने हाथ में लिये चल रहे हैं। वय का पूर्वार्द्ध समाप्त कर वे उत्तरार्द्ध में चल रहे थे, बाल पकने लगे थे तो भी जटा-जूट सँवार कर जब उन्होंने एक योद्धा का रूप लिया, शिरस्त्राण, कवच और तूणीर धारण किया तो वह वीर वेश भी देखते ही बनता था। जन्मजात योद्धा सरीखे दीख पड़ रहे थे वृश। सैंकड़ों कलाकारों ने प्रस्थान की उस पुण्य वेला में राजधानी पहुँच कर महर्षि का वह वीर-वेश तूलिकाँकित किया।
दिग्विजय की युद्ध शृंखला प्रारम्भ हुई। महर्षि वृश जान ने रथ का संचालन बड़ी कुशलता से किया। वे स्वयं सिद्ध योद्धा थे। युद्ध पर युद्ध जीतते गये और एक बार फिर इक्ष्वाकु-वंश का ऐश्वर्य सारे विश्व में छा गया।
विजय-वाहिनियाँ राजधानी लौट रही थीं। स्वागत के लिये प्रजा उमड़ पड़ी। दोनों ओर पंक्तिबद्ध खड़े नागरिकों का अभिनन्दन करता हुआ, राज-स्यन्दन आगे बढ़ रहा था, तभी एक ब्राह्मण बालक रथ के पहिये के नीचे आकर कुचल गया। कुछ ही क्षणों में उसकी मृत्यु भी हो गई। सर्वत्र हाहाकार मच गया। ब्राह्मण बालक की मृत्यु न केवल, अशोभनीय थी वरन् दंडनीय भी। अभी तक जिन महाराज और महर्षि की जय-जयकार हो रही थी, अगले ही क्षण वे न्यायालय में ले जाये गये।
नागरिक परिषद के प्रमुख न्यायाधीश ने महर्षि से कहा- “आप रथ का संचालन कर रहे थे, उसे सम्भालना आपका कर्त्तव्य था। बच्चे की मृत्यु का दोष आप पर है, क्यों न उसके लिये आपको दंडित किया जाये।”
महर्षि वृश जान ने नागरिक परिषद से प्रश्न किया-इस रथ का संचालन तो युद्ध में भी मैंने ही किया था, फिर विजय-श्री महाराज के नाम के साथ क्यों जोड़ी गई? मैं तो निमित्त मात्र हूँ, मुझे कर्म-फल से कोई लगाव नहीं, बालक की मृत्यु का दोष महाराज को है, मुझे नहीं।
महर्षि अपना दोष स्वीकार नहीं करते थे, महाराज त्रैवृष्ण अपने को निर्दोष कहते थे। विलक्षण द्वन्द्व था। कई दिनों तक यह स्थिति रही। सर्वोच्च न्याय पालिका में इक्ष्वाकु वंशजों का ही आधिपत्य था, सो अन्तिम निश्चय महाराज के पक्ष में हो गया। इस तिरस्कार से दुःखी होकर वृश जान ने राज्य का परित्याग कर दिया।
महर्षि वृश ही धर्म तंत्र शीतल पड़ गया। राज घराने में होने वाला अग्निहोत्र समाप्त हो गया तो सामान्य प्रजा भी धर्म कृत्यों को छोड़ बैठी। देखते ही देखते राज्य की सम्पूर्ण तेजस्विता नष्ट भ्रष्ट हो गई। लोग आलसी, कामुक एवं उच्छृंखल हो गये। व्यापार ठप्प पड़ गया, कृषि टूट चली, देश की दुर्गति हो चली। तब लोगों को महापुरोहित वृश का अभाव खटका।
एक दिन एक सामान्य नागरिक की पत्नी ने अपने पति की अपेक्षा कर दी उसके भूखे और थके होने पर भी उसके लिए भोजन नहीं बनाया। पति पत्नी के मध्य प्रेम और आत्म भाव न रहे तो उस युग को दुःख और दैन्य की चरम अवस्था कहना चाहिए। उपेक्षा राजवंश में भी न चल पड़े, इसकी चिन्ता हो चली। हुआ भी ऐसा ही। एक दिन महाराज त्रैवृष्ण की एक महारानी ने ही महाराज के प्रति कर्तव्य का प्रमाद किया, तब उन्हें धर्म मंत्र के जागरण की आवश्यकता प्रतीत हुई।
दुःखी नरेश स्वयं वृश को लेने गये। वृश को अपनी प्रजा के समाचार सुनकर बड़ा दुःख हुआ। यद्यपि उन्हें तिरस्कृत किया गया था तो भी लोक हित के लिए अपने अपमान का ध्यान न दिया और पुनः राजधानी लौट आये। उनके आते ही लोक मर्यादायें पुनः प्रदीप्त हो उठीं।
महाराज ने धर्म मंच के स्वरूप को पहचाना और तब से अनन्तकाल तक के लिए पुरोहित का पद शासनाध्यक्ष से भी उच्च घोषित कर दिया।
नव दीक्षित शिष्य ने कहा- गुरुदेव! उपासना में मन नहीं लगता। भगवान की ओर चित्त दृढ़ नहीं होता।
गुरु ने गम्भीर दृष्टि डालकर शिष्य को देखा और जैसे कोई बात समझ में आ गई तो बोले- सच ही कहते हो वत्स! यहाँ ध्यान लगेगा भी नहीं। अन्यत्र चलकर साधना करेंगे, वहाँ ध्यान लगेगा। आज सायंकाल ही यहाँ से प्रस्थान करेंगे।
“सायंकाल! शिष्य कुछ चिन्तित स्वर में प्रश्न कर बैठा, जिसका गुरु ने कोई उत्तर न दिया। सूर्यास्त के साथ ही वे दोनों एक ओर चल पड़े। गुरु के हाथ में मात्र एक कमण्डल था, शिष्य के हाथ में थी एक झोली जिसे वह बहुत यत्नपूर्वक सम्भाले हुए चल रहा था।
मार्ग में एक कुआँ आया। शिष्य ने शौच की आशंका व्यक्त की। दोनों रुक गये। बहुत सावधानी से उसने झोला गुरु के पास रखा और शौच के लिए चल दिया। जाते जाते उसने कई बार झोले की ओर दृष्टि डाली।
‘गड़ाम!’ एक तीव्र प्रतिध्वनि भर सुनाई दी और झोले में पड़ी कोई वस्तु कुएं में जा समाई। शिष्य दौड़ा हुआ आया और चिन्तित स्वर में बोला- भगवन्! झोले में सोने की ईंट थी सो क्या हुई।
कुएं में चली गई, अब कहें तो आगे चलें, कहें तो फिर वहीं लौट चलें जहाँ से आये हैं, अब ध्यान न लगने की चिन्ता कहीं न रहेगी।
एक दीर्घ श्वास छोड़ते हुए शिष्य ने कहा- सच ही गुरुदेव! आसक्ति का मन से परित्याग किये बिना कोई भी ईश्वर में मन नहीं लगा सकता।
‘बर्र’ यों एक छोटा सा जीव लगता है, बड़ी सारंग मधुमक्खी (डारसेटा) का भी शरीर पौन इंच से बड़ा नहीं होता पर कभी छोड़ दिया जाये तो इनकी भयंकरता देखते ही बनती है, इसी प्रकार मनुष्य की चित्त वृत्तियां जिनका सामान्य अवस्था में न तो कोई स्वत्व दिखाई देता है, मूल्य न महत्व पर जब इन्हीं को कुचला और नियंत्रण में रखने का अभ्यास किया जाता है, तब इनकी भयंकरता देखते ही बनती है। राक्षसी सुरक्षा की तरह अनेक रूप बनाने में पटु यह चित्त वृत्तियां मनुष्य को लुभाती ही नहीं, डराती और धमकाती भी हैं, निर्बल मन और अस्थिर बुद्धि व्यक्ति उनकी एक ही झपाक में ठण्डे होकर योगाभ्यास छोड़ बैठते हैं और इस तरह स्वात्मानुभूति की इच्छा मन की मन में ही रह जाती है।
अर्जुन जैसे महारथी को भी यही कहना पड़ा था-
चंचलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढ़म।
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्॥
-गीता 6।34
हे भगवन्! यह मन बड़ा चंचल है। मस्तिष्क को मथ डालता है यह बहुत दृढ़ शक्तिशाली है इसीलिए इसका वश में करना बहुत कठिन है।
किन्तु योगाचार्यों का मत है कि कठिनाइयाँ कुछ ही दिन की होती हैं यदि अभ्यास बंद न किया जाय तो यही मन एक दिन सर्वोत्तम समीपस्थ मित्र की भाँति अनुकूल आचरण करने वाला हो जाता है। भगवान कृष्ण ने अर्जुन की बात स्वीकार करते हुए कहा था-निःसंदेह अर्जुन! मन बड़ा चंचल है पर निरन्तर अभ्यास से वह भी वश में आ जाता है। योग एक लम्बी अवधि का अभ्यास है जो देर तक उसमें स्थिर रह सकता है वही अन्तिम सिद्धि तक पहुँच सकता है, यह पहले ही मन में बिठा लेने की बात है।
चित्त वृत्तियों के निरोध के दो उपाय हैं (1) मनोवैज्ञानिक (2) वैज्ञानिक। प्रथम प्रकार के सभी उपाय मानसिक हैं उनमें अपने मन को ही इस बात के लिए राजी किया जाता है कि वह अपने आप संसार की क्षण भंगुरता अनुभव करे और इस बात की जिज्ञासा जागृत करे कि हम वस्तुतः हैं क्या, मनुष्य शरीर में हम किस तरह फंसे पड़े हैं, किस तरह उससे मुक्ति और पूर्ण आनन्द, जिसके लिए हमारी चाह अनवरत है, किस तरह प्राप्ति हो सकती है।
योग दर्शन पाद 1 सूत्र 12 में बताया है “अभ्यास वैराग्यभ्यान्तन्निरोधः” अर्थात् निरन्तर वैराग्य का अभ्यास करने से मन की पार्थिव वृत्ति बदल जाती है इसी बात को भगवान कृष्ण ने अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते।” निरन्तर वैराग्य का अभ्यास करने से मन की वृत्तियाँ धीरे-धीरे वश में आने लगती हैं।
दूसरा उपाय है “ईश्वर प्रणि धानाद्वा-” (योग 1।23) अर्थात् अपने आपको परमात्मा में मिलाने का अभ्यास करने से मद की प्रवृत्तियाँ ऊर्ध्वगामी होने लगती हैं।
नीचे दी गई साधना विधि का प्रतिदिन थोड़ी देर तक अभ्यास करने से अपना वैराग्य और ईश्वर प्राप्ति का भाव दृढ़ होता है,यह अभ्यास कोई भी अपनी सुविधानुसार कर सकता है जानकारी के लिए दो अभ्यास नीचे दे रहे हैं।
(1) किसी समतल और एकान्त स्थान में कोई वस्त्र बिछाकर सीधे चित्त लेट जाइये, दोनों पाँव सीधे और मिला कर रखना चाहिए। दोनों हाथ छाती के ऊपर रखिये, अब शरीर को पूर्ण निश्चेष्ट करके बिलकुल शिथिल छोड़ दीजिए। ऐसा जान पड़े जैसे प्राण शरीर से निकलकर प्रकाश के एक गोले की तरह हवा में स्थिर हो गया है और शरीर मृत अवस्था में बेकार पड़ा है, अब एक-एक अंग की ओर ध्यान दीजिए-कल तक यही आँखें अच्छी-अच्छी वस्तुयें देखने का हठ करती थीं, अब आज क्यों नहीं देखतीं और यह मुख जो बढ़िया-बढ़िया खाने को माँगता था कैसा बेकार पड़ा है।
नाक आँख, मुख, कण्ठ, हाथ-पैर उन सब घृणित अंगों को बार-बार देखिए जिनमें कफ, थूक, मल मूत्र के अतिरिक्त कुछ नहीं रह गया है। यथार्थ वस्तु जो कि आत्म चेतना थी वह तो अभी भी मेरे ही साथ है, क्या मैंने इस शरीर के लिए ही अपने इस प्रकाश शरीर को, आत्मा को भुला दिया था? क्या अब तक इसी शरीर के लिए जो पाप कर रहा था, वह उचित था? आदि ऐसे-ऐसे प्रश्न उठाना चाहिए, जिससे साँसारिक भाव नष्ट हों और मन यह मानने को विवश हो कि हम अब तक भूल में थे- “मनुष्य का यथार्थ जीवन शरीर नहीं आत्मा है”
दूसरा अभ्यास-किसी शान्त, एकान्त स्थान में कुश आदि कोई पवित्र स्थान आसन बिछाकर बैठिये। आसन समतल स्थान पर होना चाहिए। ऊंचा-नीचा होने पर शरीर को कष्ट होगा और ध्यान नहीं जमेगा, शरीर, सिर एवं ग्रीवा को सीधा रखकर अध-खुले नेत्रों से नासिका के अगले भाग को देखें। दृष्टि और मन को दूसरी ओर नहीं जाने देना चाहिए। यदि जाता है तो उसे बार-बार अपने मूल अभ्यास की याद दिलाकर एकाग्र करना चाहिए।
जब मन शान्त हो तब ऐसा ध्यान करें कि मैं प्रकाश के एक कण तारा या जुगनूँ की तरह हूँ और नीले आकाश में घूम रहा हूँ। सूर्य की तरह का उससे भी हजारों गुना बड़ा और तेज चमक वाला एक प्रकाश पिण्ड आकाश में दिखाई दे रहा है, उसी की किरणें फूटकर निखिल ब्रह्माँड में व्याप्त हो रही है। हजारों सूर्य उसके पास-आस चक्कर काट रहे हैं। मैं जो अभी तक एक लघु प्रकाश कण के रूप में अशक्त अज्ञान-ग्रस्त और सीमा बद्ध पड़ा था, अब धीरे-धीरे उस परम प्रकाश पुँज में हवन हो रहा हूँ, अब मैं रह ही नहीं गया या तो करोड़ों कोस के विस्तार वाला गहरा नीला आकाश है या फिर वही दिव्य प्रकाश जिसमें घुलकर मैं अपने आपको सर्वव्यापी, सर्वदर्शी, सर्वज्ञ और सर्वसमर्थ अनुभव कर रहा हूँ।
यह दो अभ्यास वैराग्य और ईश्वर प्राप्ति की कामना को बढ़ाने में बहुत सहायक हो सकते हैं अपनी सुविधानुसार कोई भी स्त्री-पुरुष इन साधनाओं का अभ्यास कर सकता है।
उपरोक्त दो अभ्यास महत्वपूर्ण हैं, उनसे मनोनिग्रह में सहायता मिल सकती है पर मन उतने से ही वश में आ जाय यह कोई आवश्यक नहीं। हम आज जिस स्थिति में हैं, वह कई जन्मों का विकसित रूप है, मनुष्य के पूर्वजन्मों के पाप और वासनाओं के संस्कार जो मन में कई पर्तों में जमे होते हैं वह बार-बार उन्हीं वासनाओं की ओर घसीटते हैं इसलिए साधक की वृत्तियां कभी भी उद्दीप्त हो उठती हैं। उसके लिए वैज्ञानिक विधियाँ काम में लाई जाती हैं। शरीर और मन की अंतरंग सफाई यौगिक क्रियाओं से की जाती है तब निर्मलता आती है, इसलिए आत्म साक्षात्कार की इच्छा रखने वाले किसी भी साधक के लिए यह आवश्यक हो जाता है कि वह अष्टाँग योग का अभ्यास करता हुआ, आत्मा का विकास परमात्मा की ओर करे। यह आठ अंग-
यम नियमासन प्राणायाम प्रत्याहार-
धारणा ध्यान समाधयोष्टावंगानि।
-योग 2।26
अर्थात् (1) यम (2) नियम (3) आसन (4) प्राणायाम (5) प्रत्याहार (6) धारणा (7) ध्यान और (8) समाधि। इनका अभ्यास करने से कठिन मलिनतायें भी नष्ट हो जाती हैं और निर्मल ज्ञान प्रकाश एवं विवेक बुद्धि की वृद्धि होती है योगियों के पास दिखाई देने वाली कई सिद्धियाँ और चमत्कार जैसी दीखने वाली अनुभूतियाँ भी इन्हीं आठ अंगों में उत्तरोत्तर अभ्यास और विकास द्वारा उपलब्ध होती हैं पर इनका कुल लाभ आत्मा या ईश्वर की प्राप्ति ही है, इसलिये किसी को भी चमत्कार और सिद्धियों की ओर मन न लगाकर केवल आत्म कल्याण का ही विचार करना चाहिए।
इन आठ अंगों की संक्षिप्त जानकारी योग साधक के लिए आवश्यक है। (1) यम कहते हैं असत्य को मारना। हमारे जीवन में झूठ फरेब अन्याय आदि का समावेश सत्य के प्रति अनास्था का फल है। असत्यशील व्यक्ति ही परमार्थ से गिरते हैं इसलिए ऐसे क्षणों में अपने आपको दबाकर बचाकर रखना यम कहलाता है। उसके लिए प्रारम्भिक अभ्यास किसी एक व्रत से करना चाहिए, उदाहरण के लिए अधिक न बोलना, झूठ न बोलना, किये हुए उपकार को न भूलना, किसी से ईर्ष्या न करना आदि ऐसा कोई एक संकल्प लें, जब उसका अच्छी प्रकार अभ्यास हो जाय, तब दूसरा इस तरह किये हुए सभी असत्य आचरण छोड़ने से यम सिद्धि होती है। नियम उसका पूरक अंग है अर्थात् बुराई के परित्याग के साथ अच्छाई या किसी सत्य का अनुशीलन नियम कहलाता है। उससे बुरे संस्कारों के स्थान पर श्रेष्ठ सद्गुणों की प्रतिष्ठा होती है।
(3) आसन- देर तक निश्चल होकर बैठने को आसन कहते हैं पर ऐसा तभी हो सकता है जब शरीर का प्रत्येक अंग स्वस्थ हो। स्वास्थ्य के लिए जितने भी उपाय डाक्टरों, वैद्यों और वैज्ञानिकों ने खोजे हैं, वह सब बाह्य हैं और अपूर्ण जानकारी वाले हैं। योगाचार्यों ने देखा कि शरीर में ही भगवान ने वह सब शक्तियाँ और सामग्रियाँ पहले से ही रखी हैं, जिनका यथोचित उपयोग करके कोई भी व्यक्ति पूर्णतया स्वस्थ व नीरोग रह सकता है। आसन उन उन स्थानों को जो शरीर के मर्म और विशेष महत्व के हैं, खोलने और लाभ लेने की वैज्ञानिक विद्या है। 84 प्रकार के आसन शरीर को सुगठित और शक्तिशाली ही नहीं शुद्ध और रोग मुक्त भी करते हैं। अगले अंकों में एक-एक आसनों को वर्णन देते रहेंगे, जिनके अभ्यास से रोगी व्यक्ति भी औषधोपचार की भाँति स्वास्थ्य लाभ कर सकते हैं।
(4) प्राणायाम का सम्बन्ध केवल श्वास खींचने रोकने और श्वास छोड़ने भर से नहीं है वरन् शरीर की सम्पूर्ण चेष्टाओं का नियन्त्रण भी प्राणायाम से ही होता है, छींक, जम्हाई, अंगड़ाई, आँखों का मिचकना, थूक का बार-बार निगलना, लघुशंका ऐसी क्रियायें शरीर में स्वतः उत्पन्न होती हैं यह न तो मनुष्य की इच्छा से ही होती हैं और ना ही सामान्य मनुष्य इन पर नियंत्रण रख सकता है। यह शरीर के विभिन्न प्राण अपान, समान, उदान व्यान स्थान आदि वायुओं के गुण धर्म हैं उनकी जानकारी होने और नियंत्रण करने का सारा विज्ञान प्राणायाम कहलाता है। जीवित अवस्था में ही सूक्ष्म शरीर से बाहर निकल आना दूर गमन, दूरानुभूति, परकाया प्रवेश आदि सब प्राणायाम के ही चमत्कार हैं पर यह सब पीछे की बातें हैं प्रारम्भ में इसका उपयोग मनोनिग्रह के लिए है, उससे मन की निर्मलता बढ़ती है, जिससे मन अपने आप शाँत और प्रफुल्ल बनने लगता है।
वनेअपि दोषाः प्रभवन्ति रागिणी गृहेऽपि पंचेन्द्रिय निग्रहस्तपः। अकृत्सिते कर्मणि यः प्रवर्तते निवृत्त रागस्य गृहं तपोवनम्॥
-पद्य पु0 सुष्टि सं0 19।295
रोगी पुरुषों को (जिनके हृदय में काम क्रोधादि हैं) वन में चले जाने पर भी दोष लगे रहते हैं घर में रहता हुआ, इन्द्रियों को बुरे विषयों से रोके हुए है तो वह मानो तप कर रहा है। खोटे कर्म (हिंसा, चोरी आदि) में प्रवृत्ति नहीं राग द्वेष से रहित है ऐसे पुरुष का घर ही तपोवन है।
(5) मन को बाह्य शक्तियों से रोकने के लिए प्रत्याहार करना पड़ता है मन वस्तुतः और कुछ नहीं अन्न का ही सूक्ष्म संस्कार है। अन्न ही रस, रक्त, माँस मज्जा अस्थि वीर्य आदि बनता हुआ मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार आदि सूक्ष्म शक्तियों अन्तःकरण चतुष्प्रय के रूप में परिलक्षित होता है। यदि हम अपना आहार शुद्ध कर लें तो यह स्वाभाविक है कि अपना अन्तःकरण चतुष्टय भी शुद्ध हो जाये। खारी गन्ने का गुड़ खारी बनता है। उसी प्रकार दूषित अन्न का मन भी दूषित ही होगा। मन को शुद्ध और पवित्र रखने के लिए शुद्ध आहार आवश्यक है, यह सारी जानकारी प्रत्याहार के अंतर्गत आती है।
(6) धारणा कहते हैं मन को किसी एक स्थान या देश में स्थिर करने को। प्रकाश के बारे में कहा जाता है कि उनका एक कण एक सेकिंड में 186000 मील चलता है किन्तु मन की गति के बारे में वैज्ञानिक आज तक हजार कोशिशों के बावजूद नहीं जान पाये। मन के चलने की कक्षा का भी पता नहीं चल पाया पर वह एक अति समर्थ शक्ति है। यह सभी जान गये हैं। उससे कोई लाभ इसीलिये नहीं ले पाते क्योंकि वह बहुत अधिक चंचल है, स्थिर रहना उसका स्वभाव नहीं धारणा शक्ति के द्वारा मन को किसी स्थान पर रोककर विश्लेषण कराना उसी तरह सिखाते हैं जैसे मदारी बंदर को, सरकस वाला शेर का। धारणा से मन को एक स्थान पर रोकने का अभ्यास करते हैं।
(7) ध्यान भी धारणा की ही स्थिति है पर उसमें इन्द्रियों की चेष्टायें चाहे वह सूक्ष्म ही क्यों न हों समाप्त हो जाती हैं, इसलिए मन औरों के मन की पदार्थों की दूसरे किसी की भी हो रही बात-चीत आदि की जानकारी हजारों मील दूर बैठा होने पर भी ले लेने में समर्थ होने लगता है। दूर श्रवण,दूर दर्शन भविष्य ज्ञान आदि ध्यान की ही सिद्धियाँ हैं।
(8) और इस तरह जब ध्यान पूर्णतया निःचेष्ट होकर केवल मात्र अतीन्द्रिय सुख में ही स्थिर हो जाय वह अवस्था समाधि कहलाती है इसके लिए कोई अभ्यास नहीं करना पड़ता उपरोक्त सातों अवस्थाओं से पकी हुई स्थिति ही समाधि है उस अवस्था में पहुँचा हुआ योगी अपने शरीर में ही विराट ब्रह्म के दर्शन करता है। ‘सदाचार स्रोत्र’ में जगद्गुरु शंकराचार्य ने उसी का वर्णन करते हुए लिखा है-
देहो देवालयो प्रोक्तो देवो निरंजन।
अर्चितं सर्वभावेन स्वानुभूत्या विराजते।
अर्थात्- उचित प्रकार से योगाभ्यास और परमार्थ करने से इसी शरीर में ही निरंजन परमात्मा के दर्शन होते हैं।
यह योग संसार में हर किसी के लिए सुलभ है ऊंच नीच स्त्री पुरुष जाति पाँति का कोई भेद नहीं-
ब्राह्मण क्षत्रिय विशाँ शूद्राणाँ च पावनम् शाँतये कर्मणामन्य द्योगान्नास्ति विभुक्तये युवा वृद्धोअतिवृद्धो वा व्याधिष्टो दुर्बलाअपिवा अभ्यासात्सिद्धि माप्नोति सर्वं योगेष्वतंद्रितः।
-हठयोग प्रदीपिका 1-2
अर्थात्- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र व स्त्री योग का अधिकार सब को है। युवक को या वृद्ध और जिनका शरीर बहुत ही जीर्ण हो गया हो जो बीमार, रोगी तथा इन्द्रियों की दुर्बलता से ग्रस्त हैं वे भी योग का अभ्यास कर सकते हैं। यह सभी को सिद्धि शाँति और मुक्ति देने वाला मार्ग है। इससे बड़ा अन्य कोई साधन आत्मिक प्रसन्नता की प्राप्ति के लिए संसार में है नहीं।
इन पंक्तियों में योग सम्बन्धी भ्रान्त धारणाओं के निवारण के साथ दो मानसिक और आठ प्रकार के उन साधनाओं की व्याख्या कर दी गई है, जिनके अभ्यास से जीवात्मा अपनी क्षमताओं का विकास करते हुए परमात्मा को प्राप्त कर सकती है। यही योग का उद्देश्य है।
सर्वेषामुत्तामस्थानाँ सर्वासाँ चिर सम्यदाम्।
स्वमनो नियहोभूमिर्भूमिः सस्य श्रियामिव॥
समस्त उत्तम परिस्थितियाँ और सम्पूर्ण श्रेय चिरस्थायिनी सम्पदायें केवल अपने मन के निग्रह से उसी प्रकार प्राप्त होती हैं जैसे अच्छी भूमि से सब उत्तम अन्न प्राप्त होते हैं।
कौवे ने हंस से कहा- “मित्र! कुछ भी हो तुम मुझे भी साथ ले चलो, मैं भी मान सरोवर के दर्शन करूंगा” हंस ने बताया-दूरी लम्बी है तुम उतनी दूर उड़ नहीं सकोगे? पर कौवे ने एक न मानी वह बराबर चलने की जिद करता रहा।
आखिर कौवे को लेकर हंस उड़ा पर थोड़ी ही दूर में कौवे के पंख ढीले पड़ गये। थके कौवे ने कहा- मित्र! तुम तो मुझे वहीं पहुँचा दो जहाँ से लाये थे। हंस ने बहुतेरा कहा कि हम तुम्हें अपने पंखों से ले चलेंगे पर कौवा भ्रमित था, शायद इतनी दूर पर मुझे अपनी जीवन यापन की वस्तुयें मिलें भी या नहीं, सो वह आगे बढ़ने को राजी नहीं ही हुआ।
हंस उसे लेकर फिर वहीं लौटा- “अपात्र को ज्ञान देने से तो ज्ञान का ही अपमान है यह कहकर वह फिर वहाँ से उड़ गया। कौवा तो जहाँ था वहीं पड़ा रहा।”
इस ‘अपनों से अपनी बात’ स्तम्भ के अंतर्गत अपने अंतरण में घुमड़ती हुई हर बात- हर विचारणा परिजनों के सम्मुख व्यक्त करते चले आ रहे हैं। ताकि हमारे जी की कोई बात दबी छिपी न रह जाय। अखण्ड ज्योति परिवार के प्रवृद्ध परिजनों को हम अपने विराट शरीर के कल पुर्जे-अंग प्रत्यंग ही मानते हैं। सो उन तक अपनी हर छोटी बड़ी- हर बुरी भली बात पहुँचाना आवश्यक समझते हैं। इससे हमारा चित्त हलका होता है और परिजनों को हमारा अंतःकरण पढ़ने समझने में सुविधा होती है चलते वक्त इतना तो हमें करना ही चाहिए था। अब हमें अपने आपसे कोई शिकायत नहीं रहेगी कि जी में बहुत कुछ था पर स्वजनों से कह न सके। उसी प्रकार परिजनों को भी यह न अखरेगा कि आचार्य जी के मन में न जाने क्या था और वे न जाने क्या सोचते हुए चले गये। हम अपने परिवार के साथ घुले हुए हैं। इसलिए अपनी हर विचारणा को भी उनके सम्मुख पूरी स्पष्टता के साथ प्रस्तुत करते चले जा रहे हैं। यह क्रम अगले 16 महीने और भी चलता रहेगा। जो कुछ और कहना बाकी है, इसी स्तम्भ के अंतर्गत अपनों से अपनी बात कहते हुए अपना चित्त पूर्णतया हलका कर लेंगे।
जो बातें सार्वजनिक रूप से सबके सामने कही जाने योग्य थीं- सब पर लागू होती थीं, उन्हें ही इस स्तम्भ के अंतर्गत लिखा, छापा जा सकना सम्भव हो सका है। इसके अतिरिक्त व्यक्तिगत पक्ष ऐसा रह गया है जो अलग व्यक्तियों से अलग-अलग ही कहा सुना जा सकता है। अपना परिवार बहुत बड़ा है, उसमें अनेक स्तर के व्यक्ति हैं, उनकी स्थिति अलग-अलग है। हमारे सम्बन्धों में भी उतार-चढ़ाव है कोई अत्यधिक घनिष्ठ है किन्हीं के साथ वह घनिष्ठता सामान्य स्तर की है। विचार करने का क्षेत्र एवं आकाँक्षायें और दिशायें भी लोगों की अलग-अलग हैं। लक्ष्य एक होते हुए भी थोड़े-थोड़े अंतर से स्थिति में बहुत अंतर पड़ जाता है। इसी से व्यक्ति परामर्श की आवश्यकता बनी ही रहती है। भाषणों और लेखों की एक सीमा है, उनमें वही व्यक्त किया जा सकेगा जो एक सामान्य स्तर वालों के लिए समान स्तर का प्रकाश देता है। पर हर व्यक्ति का स्तर भिन्न है उसे परामर्श और मार्गदर्शन अलग ढंग का अपेक्षित होता है। सो यह आवश्यकता व्यक्तिगत परामर्श से ही पूरी हो सकती है।
सोचा यह गया है कि परिजनों से व्यक्तिगत विचार विनिमय का अन्तिम दौर चलने से पहले समाप्त कर लें। चलते वक्त भीड़ लगाने का हमारा मन नहीं है। हमारी भावुकता भी इन दिनों कुछ तीव्र हो गई है। बुझने के समय दीप की लौ जिस तरह तेज हो उठती है- शायद वही बात हो या जो भी हो यह एक तथ्य है कि इन दिनों अपने प्रिय परिजनों के प्रति ऐसी भावुकता की लहर उमड़ती है जिसे विदाई का- वियोग का- मोह का- अथवा जिस प्रकार का भी नाम दिया जा सके उभार बहुत आता है। स्वजनों को बार-बार देखने और मिलने की इच्छा होती है। मिल लेने पर भी तृप्ति नहीं होती। परिजनों के साथ चिर अतीत से चले आ रहे मधुर सम्बन्धों की स्मृतियाँ और भविष्य में उनके उस मृदुल शृंखला के टूट जाने का ताल-मेल विवश हमारे लिए बहुत भारी पड़ता है। स्वजनों को आग्रहपूर्वक बुलाते हैं, आते हैं तो प्रसन्नता होती है पर जब वे विदा होते हैं तो जी टूटने लगता है और मुख फेर कर आँसू पोंछने पड़ते हैं। मरते समय अज्ञानियों को मोह ग्रस्त होकर रोते-बिलखते हमने देखा है और उनकी इस दुर्बलता का जीवन भर उपहास उड़ाया है। पर अब तो हम स्वयं ही उपहासास्पद बनते चले जा रहे हैं। प्रियजनों के साथ लम्बे समय से चली आ रही मृदुल अनुभूतियाँ अब प्रत्यक्ष न रहकर परोक्ष पात्र रह जाएंगी, यह कल्पना जी को बहुत भारी कर देती है और अक्सर रुला देती है। साठ वर्ष के लम्बे जीवन में जितने आँसू सब मिलाकर निकले होंगे, अब विदाई की वेदना प्रायः हर दिन उतना पानी आँखों से टपका देने को विवश करती रहती है। भगवान जाने यह प्रेम है या मोह भावना है या आसक्ति सहृदयता है या दुर्बलता जो भी हो- वस्तुस्थिति यही है। सो हम अपनी दुर्बलता भी छिपाकर नहीं रखेंगे। छिपाने लायक हमारे पास कभी कुछ नहीं रहा तो फिर अपनों से अपनी दुर्बलता भी क्यों छिपायें। कोई हंसी करेगा ज्ञानी को अज्ञानी कह कर उपहास करेगा इतने भर संकोच से वस्तुस्थिति को छिपाकर रखें यह उचित नहीं लगता।
विदाई के दिन निकट आ रहे हैं। पहले विचार था कि चलते समय एक बार एक दिन एक दृष्टि से सब को देख लेंगे और शाँति तथा संतोष के साथ विदाई देते लेते चले जायेंगे जाते समय एक छोटा समारोह सम्मेलन जैसा बुला लेंगे और अपनी कहते हुए और दूसरों की सुनते हुए अपने पथ पर पाँव बढ़ाते हुए अदृश्य के अंचल में विलीन हो जायेंगे। पर अब जबकि दूसरे ढंग से सोचते हैं तो वह बात पार पड़ती दीखती नहीं कारण कई हैं एक तो हमारी मनोदशा में गड़बड़ी उत्पन्न होती है, एक-दो व्यक्तियों को जब अन्तिम विदाई का अभिवन्दन करते हैं तो देर तक हमारे सीने में दर्द होता है। अभी तो यह आशा भी है कि दुबारा मिलना हो सकता है। तब भी जी बहुत भारी हो जाता है। फिर जब इतने स्वजनों की सचमुच अन्तिम बाद विदा करने की बात होती तो हमारी मनोदशा संतुलित रहना कठिन हो जायगा। अभी तो एक दो व्यक्ति आते जाते हैं और वे किसी खास भावुकता के मूड में नहीं होते तब हमें उनकी विदाई बहुत भारी पड़ती है और सम्भवतः बहुत लोग हमारी ही तरह द्रवित हो उठे और वह हमारे लिए असह्य हो जाय। उस स्थिति का गहरा असर हम पर पड़ सकता है और यदि वह स्थिति देर तक बनी रही तो हमारी भावी साधना क्रम में अव्यवस्था उत्पन्न हो सकती है।
दूसरा कारण यह भी है कि उस समय व्यक्तिगत विचार विनियम सम्भव न होगा। बहुत अधिक व्यक्तियों में भावावेश की स्थिति में गम्भीर विचार विनिमय सो भी सबसे उनकी स्थिति के अनुरूप अधिक मनोयोग के साथ तो सम्भव हो ही नहीं सकता। अभी अपने विशेष परिजनों से व्यक्तिगत रूप से बहुत कुछ कहना और सुनना बाकी है। उतना बड़ा काम उस दो-चार दिन के विदाई समारोह वाले दिनों में कैसे सम्भव होगा। यदि वह बात न बनी तो एक बहुत बड़ी आवश्यकता अधूरी ही पड़ी रह जायगी। और वह आयोजन लोकाचार मात्र रह जायगा। उपयोगिता उसकी नहीं के बराबर ही रहेगी।
सहस्र कुण्डी गायत्री महायज्ञ के समय यह सब हम देख चुके हैं। 4 लाख व्यक्ति इस समारोह में कितना व्यय करके और कितना कष्ट सह कर आये थे पर हम आगन्तुकों से कुशल समाचार तक न पूछ सके। इतने विशाल जन समुदाय से एक व्यक्ति उतना संपर्क बना भी नहीं सकता था। अब फिर वैसी स्थिति ही आ जाएगी। विदाई के समय सहस्र कुण्डी गायत्री यज्ञ जितने वरन् जिससे भी अधिक व्यक्ति आ सकते हैं क्योंकि तब की अपेक्षा अब अपना परिवार कम से कम दस गुना और बढ़ गया है। ऐसी दशा में इस समय भी वैसी ही स्थिति बन जायगी और हमें पहले जैसे ही विशाल आयोजन का सरंजाम अभी से खड़ा करना होगा। अब उतना बड़ा झंझट सिर पर लेने का मन नहीं है।
इन दो कारणों से विदाई समारोह तो न होना ही अच्छा है। पर यह उचित नहीं कि परिजनों से अन्तिम परामर्श का अवसर भी न मिले। व्यक्तिगत स्वभाव, व्यक्तिगत रुचि, व्यक्तिगत समस्यायें एवं व्यक्तिगत संभावनाओं के सम्बंध में उचित मार्गदर्शन एवं विचार विनिमय व्यक्तिगत परामर्श से ही सम्भव है। सो इसकी गुंजाइश निकालनी ही चाहिए। अभी व्यक्तिगत रूप से बहुत सुनना और कहना बाकी है उसकी पूर्ति इस थोड़े समय में ही पूरी कर लेने की बात सोची गई है।
अभी 15 मई, 70 तक हमारे कार्यक्रम देश व्यापी युग निर्माण सम्मेलनों तथा गायत्री यज्ञों में जाने के बन चुके हैं। उस समय तक बाहर रहना पड़ेगा। इसके बाद ठीक एक वर्ष रहा जायगा इस अवधि का अधिकाँश भाग प्रिय परिजनों के साथ विदाई मिलन कहिये अथवा व्यक्तिगत परामर्श कहिये- उसी में लगाने की बात सोची गई है।
योजना यह है कि 4-4 दिन के शिविर 15 मई से 15 अक्टूबर तक 5 महीने लगातार लगाये जाते रहें और उनमें थोड़े-थोड़े परिजनों को बुलाकर विदाई मिलन और अन्तिम परामर्श का प्रयोजन पूरा करते चला जाय। गायत्री तत्व ज्ञान,दर्शन, नीति, सदाचार जीवन जीने की कला, व्यावहारिक अध्यात्मवाद, नव निर्माण आदि विषयों का प्रशिक्षण करने के लिए हमारे भाषण होते थे और हर आगंतुक को एक लघु अनुष्ठान गायत्री तपोभूमि के सिद्ध पीठ में करने के लिए कहा जाता था। तीर्थयात्रा का कार्यक्रम भी रहता था। अब की बार ऐसा कुछ न होगा। यह शिविर शृंखला व्यक्तिगत बातें पूछने व्यक्तिगत अभिव्यंजनायें व्यक्त करने तथा व्यक्तिगत रीति-नीति निर्धारित करने का विचार विमर्श करने के लिए ही होंगे। भाषण तो प्रातः काल एक ही हुआ करेगा। बाकी तो सारे दिन चर्चा और परामर्श का ही क्रम चलता रहेगा।
हमारे पास अभी भी बहुत कुछ देने को है, व्याकुलता रहती है कि उसे किसे दिया जाय, क्या कोई उसे लेने के अधिकारी मिल सकते हैं। बहुमूल्य वस्तुयें केवल माँगने या चाहने मात्र से नहीं दी या ली जातीं, उनके लिए पात्रत्व की अनिवार्य आवश्यकता पड़ती है। इन शिविरों में पात्रत्व ढूंढ़ते रहेंगे और जो संग्रहित है उसे देने का प्रयत्न करेंगे। इसी प्रकार अलग-अलग स्तर और स्थिति के लोगों को उनकी परिस्थितियों के अनुरूप अधिक तेजी से आगे बढ़ सकने का परामर्श देंगे। अगले दिनों हमारा शरीर ही अदृश्य होने वाला है जीना तो अभी हमें बहुत दिन है। उस अवधि में संग्रहीत तप बल का प्रधान उपयोग तो जनमानस में प्रकाश उत्पन्न करना और प्रवृद्ध आत्माओं को लक्ष्य की दिशा में गतिशील करना तथा अध्यात्म विज्ञान के लुप्त रहस्यों को खोजकर मानव समाज की प्रगति के लिए उन्हें पुनः उपलब्ध करना है पर उस तप साधना का एक अंश अपने प्रिय परिजनों की व्यक्तिगत सहायता के लिए भी सुरक्षित रखा है।
अभावों, कुण्ठाओं, उलझनों, विपन्नताओं और विकृतियों के ऐसे जंजाल जो प्रगति का पथ अवरुद्ध किये पड़े हैं, मार्ग से हटाये ही जाने चाहिएं। अन्यथा आगे बढ़ सकने की आशा पूर्ण न हो सकेगी। परामर्श मात्र देकर हम अपने कर्तव्य से छुट्टी नहीं पा सकते। वरन् परिजनों का पथ प्रशस्त करने के लिए आवश्यक अनुदान एवं सहयोग भी देते रहेंगे। हमारी तपश्चर्या का एक अंश उसके लिए निर्धारित है। श्रद्धा, आत्मीयता, एवं स्नेह सद्भावों की बहुमूल्य अमृत वर्षा जिन्होंने हमारे ऊपर की है। उनके प्रति हमारे मन में असीम कृतज्ञता उमड़ती रहती है समय आ गया कि उस कृतज्ञता का ऋण चुकायें। यों अब तक भी कितनों की कुछ कुछ सेवा सहायता करके अपना ऋण भार हलका करते रहेंगे पर पूँजी कम और उपभोक्ता अधिक होने से हिस्से में थोड़ा-थोड़ा ही आता रहा है। अब उपभोक्ता कम रह जायेंगे और उपार्जन अधिक होगा तो स्वभावतः अनुदान भी अधिक मात्रा में लिया और दिया जा सकेगा। जिसके लिए हमें अगले दिनों क्या करना है - इसका भी एक बार पर्यवेक्षण फिर से हो जायगा और इस अन्तिम मिलन की स्मृति में यह तथ्य नोट करके रख सकना सम्भव होगा कि आगे हमें किसका कितना ऋण किस प्रकार किस अनुदान के रूप में चुकाना है।
उपरोक्त कारणों को ध्यान में रखते हुए यही निष्कर्ष निकाला गया है कि 15 मई से 15 अक्टूबर तक 5 महीने तक चार-चार दिन के शिविरों की शृंखला आरम्भ कर दी जाय और उनमें लगभग सभी विशिष्ट परिजनों से परामर्श और विदाई का प्रयोजन पूरा कर लिया जाए इसके बाद के शेष छः महीने हमें दूसरे आवश्यक कार्यों में व्यय करने हैं। हरिद्वार और ऋषिकेश के बीच जंगल में हिमालय की गोद और गंगातट पर माता भगवती देवी की भावी साधना के लिए एक उद्यान बनाया है। उसमें हर ऋतु में फलने वाले वृक्ष तथा दूसरे कन्द-मूल, शाक आदि लगाये गये हैं। माता जी यहीं रहकर अपनी भावी साधना करेंगी।
सात ऋषियों की तप साधना वाला यह प्रदेश जहाँ गंगा सात धारायें बनाकर बही हैं, उपासना की दृष्टि से अतीव उपयुक्त स्थान है। यहाँ कुछ समय के लिए यदाकदा हम भी आते रहेंगे और जो प्रकाश संग्रह करेंगे उसको जनसाधारण में फैलाने के उपयुक्त जितना अंश होगा माता जी के पास छोड़ जाया करेंगे। वे इस प्रकाश को जनसाधारण तक बखेरती रहेंगी। इस उद्यान का नाम शाँति कुण्ड रखा है। इसे वेदमाता गायत्री ट्रस्ट के अंतर्गत देवोत्तर सम्पत्ति बना दिया गया है।
सप्त सरोवर के समीप यह बड़ा ही मनोरम और शाँतिदायक स्थल होगा। इसमें कुछ निर्माण कार्य होना बाकी है, ताकि वहाँ हम लोग निवास कर सकें और कोई अतिथि वहाँ जा पहुँचे तो उसके ठहरने का भी प्रबन्ध हो सके। चूँकि इस आश्रम का स्वामित्व गायत्री माता का है इसलिए उनका एक छोटा मन्दिर भी बनाना है जिसकी सेवा पूजा हम लोग स्वयं ही किया करेंगे। यह कार्य हमें उन नवम्बर 70 से मई 70 तक 6 महीनों में ही पूरा कराना है।
जिस प्रकार हमें अपना विशाल परिवार छोड़ना कठिन पड़ रहा है। माता जी का भी अपना एक परिवार है, जो अखण्ड ज्योति कार्यालय के कार्यकर्ताओं से लेकर गायत्री तपोभूमि के आश्रम वासियों और छात्रों तक फैला है। इसमें देश व्यापी परिवार के सहस्रों परिजन भी बंध गये हैं। माता जी भी हमारी ही तरह भावुक हैं और उन्हें इस प्रकार के एकाकी जीवन का यह पहला ही अनुभव होगा। उन्हें इससे अभ्यस्त कराना होगा, सो उन शेष छः महीनों में वे भी उस उद्यान में आती जाती रहेंगी। ताकि उन्हें यकायक का परिवर्तन अधिक कष्टकर प्रतीत न हो।
हम लोग गुरुदेव के हाथों में धागे की तरह बँधी कठपुतली मात्र हैं। वे जो निर्देश करें वही करना, यही हमारे लम्बे जीवन की एकमात्र रीति नीति है। कभी दूसरी बात सोची ही नहीं उनकी इच्छा पूर्ति के अतिरिक्त और कुछ चाहा ही नहीं। अब जबकि शरीर में जीर्णता आ गई है और सुख सुविधायें भोगने की इच्छाओं वाला समय भी चला गया तो गुरुदेव के निर्देश के अतिरिक्त और दूसरी बात सोचेंगे भी क्यों? करेंगे तो वही जो कराया जा रहा है। पर उस खाँचे में फिट होने की अड़चन तो हम लोगों को स्वयं ही हल करनी है। वे अन्तिम छः महीने इसी प्रयोजन के लिए लगाने का विचार है। माता जी वातावरण में परिवर्तन का अभ्यास करने और हम निर्माण कार्य कराने के लिए यहाँ रहेंगे और वह व्यवस्थायें जुटायेंगे, जिससे उसे जंजाल में निर्वाह सम्बन्धी आवश्यकतायें सरलतापूर्वक पूरी होती रह सकें।
विदाई का समय गायत्री जयन्ती है ज्येष्ठ सुदी 10 सम्वत् 28 तदनुसार 3 जून 71 को गायत्री जयन्ती है। गायत्री को प्रणाम करेंगे और उसी रात को चुपचाप निर्धारित दिशा में चल पड़ेंगे। उस समय कोई उत्सव, आयोजन करना निरर्थक है। भावनाएं उमड़ती हैं और वे बहुत दर्द पैदा करती हैं चुपचाप चल पड़ने से अपने मन की ही आग रहेगी, दूसरे लोग उसमें आहुतियाँ न देंगे तो वह दर्द सहा और सीमित ही बना रहेगा और उस जलन पर अपेक्षाकृत कुछ शीघ्र ही काबू पाया जा सकेगा। विदाई समारोह से उत्पन्न कष्ट से एक सीमा तक उसी प्रकार बचा जा सकेगा।
इन सब तथ्यों को ध्यान में रखते हुए 5 महीने वाली चार-चार दिन की योजना प्रस्तुत की गई है। हर महीने 6 शिविर 24 दिन के रखे हैं और अंतिम सप्ताह दोनों पत्रिकाओं की तैयारी तथा दूसरे आवश्यक कार्यों के लिए खाली रखा है। हर महीने 6 शिविर होते रहेंगे। अर्थात् कुल मिलाकर 5 महीने में 30 शिविर होंगे। परामर्श थोड़े ही व्यक्तियों में ठीक तरह हो सकता है। यह संख्या अधिक से अधिक 100 हो सकती है। 30 शिविरों में 3000 व्यक्तियों तक ही परामर्श सम्भव है यों अपना परिवार बहुत बड़ा है, उसमें इतनी छोटी संख्या नगण्य है। पर किया क्या जाय थोड़ी बहुत गुंजाइश रही तो 6 महीने जो माता जी उद्यान निर्माण के लिए रखे हैं उसमें से काट छाँटकर दो पाँच शिविरों के भी बढ़ाने की बात सोचेंगे पर अभी तो इतना ही विचार है।
इन पंक्तियों द्वारा हम अपने प्रवृद्ध परिजनों को अभी से आमन्त्रित करते हैं कि जिन्हें कुछ कहना सुनना हो वे 30 शिविरों में से किसी में आने की तैयारी अभी से करें। आवश्यक नहीं कि उनने जो तारीख भेजी है वह स्वीकृत ही हो जाय। यदि वह पहले से ही भर गई तो उन्हें आगे के किसी शिविर के लिए कहा जा सकेगा। इसलिए अपनी सुविधा की पसन्दगी के रूप में क्रमशः तीन के लिए सूचना भेजनी चाहिए। ताकि यदि पहले में सम्भव न हो तो दूसरे में और दूसरे में भी सम्भव न हो तो तीसरे में स्थान रखा जा सके। आवेदन पत्र पर यहाँ यह देखा जायगा कि किस शिविर में स्थान खाली है। उसी के अनुसार स्वीकृति दी जा सकेगी। अस्तु उचित यही है कि शीघ्र ही अपने लिए स्थान सुरक्षित करा लिया जाय। यह कार्य 15 मार्च से आरम्भ होकर 15 अप्रैल तक समाप्त कर देने का विचार है। आशा है कि इस एक महीने में ही 3000 परिजनों के आवेदन आने और उन्हें स्वीकृति प्रदान करने का कार्य समाप्त कर लिया जायगा।
इन शिविरों में छोटे बच्चे महिलायें तीर्थ यात्री दर्शनार्थी तथा इधर-उधर के काम लेकर एक तीर में कई शिकार करने वाले लोग न आयें। जिनका हमारे मिशन से पूर्व परिचय या सम्बन्ध नहीं है वे भी दर्शन मात्र के लिए आकर भीड़ न बढ़ाएं और दूसरे आवश्यकता वाले लोगों का स्थान घेर कर उन्हें लाभ से वंचित न करें। रोगियों अथवा अन्य दीन दुःखियों को लाने की भी आवश्यकता नहीं है। उनकी बात बता देने पर भी हम उनकी सेवा सहायता जो कर सकते होंगे कर देंगे। इन शिविरों में केवल उन्हीं को आना चाहिए जो अपने को हमारे साथ देर से जुड़ा हुआ समझते हैं और आगे भी उस सम्बन्ध को बनाये रहने की आवश्यकता उपयोगिता समझते हैं। आशीर्वाद तो पत्र द्वारा भी प्राप्त किया जा सकता है। किराया भाड़ा तथा समय उन्हें ही व्यय करना चाहिए जो हमारे प्रकाश और मार्ग दर्शन का मूल्य समझते हैं और उनकी उपयोगिता समझते हैं।
जहाँ वाँछनीय भीड़ को इन शिविरों में आने की निरुत्साहित किया जा रहा है वहाँ हर प्रवृद्ध परिजन को आग्रह तथा अनुरोधपूर्वक यह कहा भी जा रहा है कि अंतिम बार हमसे मिल लेने और जी भर कर अपनी अन्तःभावनाओं को व्यक्त करने का यह अवसर किसी भी मूल्य पर चूके नहीं। समय तो बीमार पड़ जाने पर ढेरों बच जाता है और जरूरी व्यय आ पड़ने पर पैसे की भी किसी प्रकार व्यवस्था हो जाती है, किराये-भाड़े के पैसे तथा चार दिन का समय निकाल सकना उनके लिए कुछ अधिक कठिन न रहेगा, जिनकी इच्छा गहरी है और जो इस मिलन एवं परामर्श की उपयोगिता अनुभव करते हैं। विश्वास है कि अंतिम मिलन के यह चार दिन आगन्तुकों के जीवन में अविस्मरणीय बनकर रहेंगे और सम्भव है इन्हीं दिनों वे ऐसा प्रकाश प्राप्त कर लें जो उनके शेष जीवन को आनन्द और उल्लास से भरे महामानव जैसी स्थिति में परिवर्तित कर दे।
अपने अंतरंग परिजनों से एक बार अंतिम बार जी भर कर मिल लेने की हमारी प्रबल इच्छा है हमारी ही जैसी भावना जिनके मन में उमड़े उन सब को हम अनुरोधपूर्वक आग्रह करते हैं कि वे प्रत्येक अड़चन की उपेक्षा करके चार दिन के भीतर हमसे मिल जाने वाली बात को सर्वोपरि महत्व दें।
चार-चार दिन के तीस शिविरों की पाँच मास तक चलने वाली शृंखला इस प्रकार है :-
(1) 16, 17,18, 19 मई सन् 1970।
(2) 20, 21, 22, 23 मई।
(3) 24, 25, 26, 27 मई।
28 से 31 मई तक अवकाश।
(4) 1, 2, 3, 4 जून
(5) 5, 6, 79, 8 जून
(6) 9, 10, 11 ,12 जून
(7) 13, 14, 15, 16 जून
(14 जून गायत्री जयन्ती)
(8) 17, 18, 19, 20 जून।
(9) 21, 22, 23, 24 जून।
25 से 30 जून तक अवकाश
(10) 1, 2, 3, 4 जुलाई
(11) 5, 6, 7, 8 जुलाई
(12) 9, 10, 11, 12 जुलाई
(13) 13, 14, 15, 16 जुलाई
(14) 17, 18, 19, 20 जुलाई
(17 जुलाई गुरुपूर्णिमा)
(15) 21, 22, 23, 24 जुलाई।
25 से 31 जुलाई तक अवकाश
(16) 1, 2, 3, 4 अगस्त।
(17) 5, 6, 7, 8 अगस्त।
(18) 9, 10, 11, 12 अगस्त।
(19) 13, 14, 15, 16 अगस्त।
(20) 17, 18 ,19, 20 अगस्त।
(17 अगस्त श्रावणी, रक्षा बंधन)
(21) 21, 22, 23, 24 अगस्त।
(24 अगस्त कृष्ण जन्माष्टमी)
25 से 31 अगस्त तक अवकाश
(22) 1, 2, 3, 4 सितम्बर
(23) 5, 6, 7, 8 सितम्बर
(24) 9, 10, 11, 12 सितम्बर
(25) 13, 14, 15, 16 सितम्बर
(26) 17, 18, 19, 20 सितम्बर
(27) 21, 22, 23, 24 सितम्बर
25 से 30 सितम्बर तक अवकाश
(28) 1, 2, 3, 4 अक्टूबर।
(1 अक्टूबर से नवरात्रि आरम्भ)
(29) 5, 6, 7, 8 अक्टूबर
(30) 9, 10, 11, 12 अक्टूबर।
(10 अक्टूबर विजय दशमी)
स्मरण रहे तीन पसन्दगी के लिए तीन शिविरों के नाम क्रमशः लिखने चाहिएं। ताकि यदि पहले शिविर भर चुके हो तो आगे वालों की स्वीकृति दी जा सके। स्थान केवल तीन हजार के लिए है, परिवार बहुत बड़ा है। यों अपने लिए स्थान सुरक्षित करने में विलम्ब नहीं करना चाहिए।
फसल काटकर खलिहानों में भर दी गई थी। चमकते दानों के रूप में किसान का श्रम सार्थक हो उठा था। तभी बैलगाड़ियाँ आईं और गेहूँ से भर दी गईं। खलिहान में शेष रह गई केवल जौ तथा चने की ढेरियाँ।
आँखों में आँसू भरे गेहूँ की ढेरी किसान से बोली- “मुझे बेचकर अपने से दूर करके, जौ तथा चनों को अपने पास रखकर उन्हें महत्ता प्रदान की? मुझसे इतनी घृणा क्यों?”
किसान बोला- “तुम्हारी महत्ता से भला कौन इनकार कर सकता है? तुम सचमुच सर्वश्रेष्ठ हो। भला में तुमसे कैसे घृणा कर सकता हूँ?” गेहूँ की ढेरी सिसकर बोली फिर मुझे घर के लिए क्यों नहीं रखा?
अब किसान के नेत्र भी नम हो आये। भारी स्वर में उसने कहा पगली कहीं की भला ऐसी बात भी कहीं सोचते हैं। तुम मेरी पुत्री के समान हो। मेरी शक्ति तथा श्रम की प्रतिष्ठा। भला आज तक बेटी भी किसी के घर रही है? वह तो सदा दूसरों के घर की शोभा तथा अपने पितृ कुल की सम्मान वर्धिका होती है। और ये जौ तथा चने? ये मेरे पुत्र हैं। मेरे जीवन की भूख के सहारे। मार्ग के शक्ति दण्ड। चल उठ पगली निसर्ग की इस देहरी को पारकर और संसार में मेरी महत्ता तथा प्रतिष्ठा के लिए जिनकी समाज में अधिक उपयोगिता है उनको पोषण देने के लिए प्रमाण कर।
किसान के शील तथा सौजन्य ने गेहूँ की ढेरी का हृदय छू लिया। और वह आश्वस्त होकर संतोष के साथ उधर चल पड़ी जिधर अधिक उपयोगी व्यक्तित्व उसकी प्रतीक्षा कर रहे थे।
गायत्री तपोभूमि में अवस्थित युग निर्माण विद्यालय ने पिछले तीन वर्षों में जो असाधारण प्रगति की है तथा अपने प्रयोजन में सफलता पाई है उसकी चर्चा दूर-दूर तक है एक वर्ष का पाठ्यक्रम इतने अधिक विषयों को इतनी सफलतापूर्वक सिखा सकता है। यह एक अपने ढंग का अनोखा प्रयोग है।
(1) बिजली सम्बन्धी फिटिंग और मरम्मत के अनेक काम (2) रेडियो ट्राँजिस्टर नये बनाना और पुरानों की मरम्मत करना (3) आँख के चश्मों के लेंस हर नम्बर के बनाना (4) मोजे बनियानें बनाना (5) प्लास्टिक के बटन खिलौने और फाउन्टेन पेन डाट पेन्सिलें बनाना (6) तरह-तरह के खिलौने बनाना (7) अनेक किस्म के सस्ते महंगे घटिया बढ़िया साबुन, मोमबत्तियां। स्याहियाँ पेन्ट वार्निस तेल पेन्ट शरबत फिनायल आदि कैमिकल (8) ड्राइक्लीनिंग रेशमी, ऊनी सूती कपड़े मशीनों द्वारा तुरन्त धोना (9) प्रेस का छपाई कम्पोज रबड़ की मोहरें, बाइंडिंग प्रबन्ध आदि का समग्र शिक्षण (10) घरेलू काम के छोटे बड़े बर्तन मकान फर्नीचर एवं अन्य उपकरणों की मरम्मत, सफाई और साज संभाल की अनेक दस्तकारियां। इन दस शिल्पों में सभी ऐसे हैं जिनके आधार पर प्रशिक्षित व्यक्ति इतनी आजीविका बड़ी आसानी से कमा सकता है। जितनी एम॰ ए॰ पास लोगों को बड़ी कठिनता से मिलती है।
लगभग यह सभी शिक्षण एक वर्ष में पूरा हो जाता है। शिक्षा की कोई फीस नहीं ,निवास के लिए छात्रावास का सुप्रबन्ध, व्यायाम तथा बंदूक तलवार लाठी भाला छुरी आदि अस्त्र शस्त्र चलाने की शिक्षा नित्य खेद कूद ड्रिल और मनोरंजन के साँस्कृतिक कार्यक्रम छात्रों को आकर्षक अनुभव होते हैं और उनका ऐसा मन लग जाता है कि आरम्भ में घर की बहुत याद करने वाले भी कुछ दिन बाद वहाँ से जाने का नाम तक नहीं लेते।
विद्यालय का मुख्य शिक्षण है- ‘जीवन जीने की कला’ शारीरिक, मानसिक, पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक एवं आध्यात्मिक प्रगति के लिए उत्कृष्ट विचारणा और कार्य पद्धति को अपनाने की आवश्यकता है उसके बौद्धिक तथा व्यावहारिक रूप में उसे प्रतिदिन सिखाया जाता है। यह शिक्षा पद्धति इतनी अनुभूत और सारगर्भित है कि शिक्षार्थी का जीवन क्रम ही बदल जाता है। गुण कर्म स्वभाव को सुधारने संभालने और सुव्यवस्थित बनाने का विद्यालय द्वारा जो प्रयत्न होता है उसका लाभ देखकर आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है। अभिभावकों को यह कहते सुना गया है कि यदि कोई भी शिल्प न सीखा जाता तो भी स्वभाव सुधार की शिक्षा इतनी महत्वपूर्ण है कि हम अपने बच्चे का एक वर्ष उतने मात्र से भी सार्थक और सफल मान सकते थे।
इस वर्ष छात्रों की संख्या पिछले वर्षों से कम रखनी है। क्योंकि छात्रावास का एक भाग 5 महीने तक चलने वाले शिविरों के लिए लेना पड़ रहा है यों सदा ही आवेदन पत्रों में से लगभग आधे स्थान की कमी से अस्वीकृत करने पड़ते हैं। इस वर्ष तो और भी अधिक कटौती होगी। गत वर्ष से भी कम छात्र इस वर्ष लिये जायेंगे। इसलिए जिन्हें अपने बच्चे इस प्रशिक्षण के लिए भेजने हों उन्हें अभी से विद्यालय की नियमावली माँगकर आवेदन पत्र भेज देने चाहिए यों शिक्षा पहली जुलाई से आरम्भ होती है पर स्वीकृति अभी से ली जा सकती है।
शिक्षार्थी की आयु कम से कम 14 वर्ष और शिक्षा कक्षा 8 तक होनी आवश्यक है। उसे शारीरिक, मानसिक दृष्टि से निरोग होना चाहिए और अनुशासन में रहने को तैयार रहना चाहिए। भोजन व्यय छात्रों को ही करना पड़ता है जो लगभग 30 रु. मासिक आता है। विशेष जानकारी के लिये युग निर्माण विद्यालय गायत्री तपोभूमि मथुरा के पते पर भेजकर नियमावली एवं आवेदन पत्र मंगा लें।
(1)
जन्म जीवन की प्रथम झाँकी मनोहर,
मानता मानव उसे ही परम सुखकर।
मृत्यु, अन्तिम लक्ष्य जो जग-जन्म का है,
मूढ़ मन कहता है अरे! वह है भयंकर
(2)
प्राण-हंस सदैव उड़ जाता अकेला,
छोड़कर घर द्वार सब जग का झमेला।
नित्य आवागमन है इतना यहाँ पर,
रात दिन रहता भरा यह विश्व मेला॥
(3)
पुष्प कंटक पादपों के पुत्र प्रिय दो,
साथ बढ़ते प्राप्त करके एक रस को।
पुष्प ममता दृष्टि-जग की नित्य पाता,
नेह भर किसने निहारा कण्टकों को?
(4)
ग्रीष्म की तीखी किरण से धरा जलती,
वही पावस प्राप्त कर, फल-फूल फलती।
शिशिर शरद, बसंत कितने यहाँ आते,
किन्तु कब प्रतिकूल किसकी चाल चलती!
(5)
कर्म बंधन में बंधा जग जीव आता,
कार्य करके लोक से परलोक जाता।
देह नश्वर, आत्मा नित अमर ही है,
त्याग जन जाता यहाँ का यहीं नाता॥
(6)
युग-युगों से क्रम यही चलता निरन्तर,
प्रकृति-पथ में कुछ न पड़ता कभी अंतर।
जन्म पर, नक्षत्र, नभ हँसते कभी क्या,
और रोई है धरा कब मृत्यु-दुख पर॥
(7)
पुष्य कलियों ने अधिक सौरभ बखेरा,
मत्त-मधुपों ने तभी घेरा घनेरा।
धूल में जब फूल मिलता एक दिन वह,
समझ पड़ता है नियति का नित्य फेरा॥
(8)
लोक-सेवा साधना रत जो मनस्वी,
कर्म करता सतत जग में जो तपस्वी।
अमर पद शंकर उसे मिलता यहाँ पर,
सफल जग जीवन बनाता वह यशस्वी॥
-श्री गौरीशंकर द्विवेदी ‘शंकर’
*समाप्त*